Books / Siddhanta Lesa Sangraha of Appayya Dikshit Chandi Prasada Shukla Krishna Pantha Hindi 1996

1. Siddhanta Lesa Sangraha of Appayya Dikshit Chandi Prasada Shukla Krishna Pantha Hindi 1996

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सिद्धान्तलेशसंग्रह: [भापानुवादसहिता ]

प्रकाशनस्थानम्- अच्युतग्रन्थमाला-कार्यालयः, काशी।

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च्युतग्रन्थमालाया: (खत्र) विभाग पछ्ठ प्रसूनम्

सिद्धान्तलेशंसंग्रह

[ भाषानुवादसहित ]

प्रकाशनंस्थानं-

अच्युतग्रन्थमाला-कार्यालय,

काशी। विद्या-मन्दिर, सगासूला, अयश

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अचयुतग्रन्थमालाया: (स्त्र) विभागे पछ्टं प्रसूनम्

श्रीमदप्पय्यदीक्षितविरचितः

..~-

वेदान्ताचार्यपं • श्रीमूलशकरव्यासविरचितेन सटिप्पण भापानुवादेन

समलकृतः

सम्पादित: ।

पकाशनस्थानम्- अन्युतग्रन्थमाला-कार्यालय:, कागी।

संवत्

प्रथमात्ृि: ] १९९३ [ मूल्यम् ३)

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प्रकाशंक- श्रेष्विप्रवर श्रीगौरीशङ्कर गोयनका अच्युतग्रन्थमाला-कारयोलय, काक्षी।

मुद्रक ना० रा० सोमण श्रीलक्ष्मीनारायण ग्रेस, बनारस।

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'भूमिका'

कुछ लिखनेके पहले उन श्रद्धेय महानुभावोंको में कदापि नहीं भूल सकता हैं, निन्होंने इस ग्रन्थके अनुवादकी आशातीत सफलताके लिए अनेक कष्टोंको सहकर परिश्रम किया है और उपयोगी सलाह देते रहें हैं। यदि उनकी सलाह न दोती तो ऐसे लिए अ्न्थका अनुवाद होना प्रायः असम्भव् ही था; वे महानुभाव हें-प्रद्वेय वयोवृद्ध पू० पं० चण्डिप्रसाद शुऊजी और मांन्यवर श्रद्धय पं० श्रीकृप्ण पन्तजी। सिद्धान्तलेशसंग्रह्के प्रणेता पण्डित अप्पय्यदीक्षित उन महान् पण्डितोंमें थे, जिनका नाम आज तक विद्वत्समुदायमें बड़े गौरव और श्रद्धासे लिया जाता है, इन्होंने अपनी लेखनीसे ऐसे-ऐसे अनेक ग्रन्थ लिख डाले हैं, जिन्हें देखकर सरस विद्वानोंका मस्तक अपने-आप उनके चरणोंमें झुक जाता है। इतिहासज्ोंने ई० १५२० से १५९३ तक इनका जीवनकाल निश्चित किया है। पं० अप्पय्यदीक्षितका जन्म काख्चीके आस-पास 'भडपप्पल' गावमें हुआ था, अमी तक उनके कुछ वंशज उस प्रान्तमें विद्यमान हैं। अप्पय्य- दीक्षिनक पितामदका नाम आचार्यदीक्षित था, क्योंकि उन्दोंने न्यायरक्षामणि अन्थमं+ पितामद्का न कनामग्रहण करके नमस्कार किया है। इनका

वद्यपि इसर निषयमे कुछ मतभेद है अर्थात् कुछ लोग १५५०-१६२२ तक इनकी स्थितिका काल मानते हैं, सथापि तत्तम्बन्धी विचार पुरुपार्थचतुष्टयान्यतमोत्पादक न द्ोनेंक कारण प्रकसमें अनावश्यक सा है। और ऐतिदासिक लोग अन्य प्रन्थोंसे भी दमफा अर्भारण कर सफते हैं। इखलिए में इसपर अधिक लिसना पसन्द नहीं करता। +आमेतुषन्भतटमा न तुपारशेलादानार्यदीक्षित इति प्रथिताभिधानम्।

एय प्रकारका ग्लोक न्यायरक्षामणिमं उपलब्ध होता है।

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[ R ] वक्ष:स्थलाचार्य भी दूसरा * नाम था। ये अपने समयके प्रौढ़ विद्वान् और दानी थे। उन्होंने बड़े-बड़े अनेक यज्ञ किये थे। अप्यय्यदीक्षितके पिताका नाम 'रङ्राजाध्वरी' था। ये मी अनेक शास्त्रोंमें अप्रतिम पण्डित थे। अप्पय्यदीक्षितने इन्हींसे सव शास्त्र पढ़े थे, इस विपयका स्वयं दीक्षितजीने ही अनेक स्थानोंमें स्पष्टीकरण किया है+। अनेक प्रमाणोंसे दीक्षितजीका नाम 'अप्प' दीक्षित ही मालम होता है, परन्तु आन्ध्र, कर्णाटक आदि देशोंकी भापासरणिसे इनके 'अप्पय या अप्पय्य' ऐसे भिन्न नाम भी व्यवहारमें प्रचलित हैं। ये विजयनगरके अधीश्वर चिन्न बोम्म, नरसिहदेव और चेंकटपतिरावके समकालिक थे, इसमें अनेक प्रमाण मिलते हैं। सिद्धान्तकौमुदीके विख्यात रचयिता भट्टोजीदीक्षितने भी सिद्धान्त- कौमुदीकी रचनाके बाद दक्षिणमें जाकर अप्पय दीक्षितजीसे पढ़ा था, उसके बाद उन्होंने तत्त्वकौस्तुभनामका ग्रन्थ लिखा था, जिसमें अपने गुरु अप्पयदीक्षितको ही प्रणाम किया है। अप्पयदीक्षितने अपने जीवनकालमें सौसे अधिक अन्थ लिखे थे, ऐसा प्रमाण मिलता है, X क्योंकि उनके नामके आगे 'चतुरधिकशतप्रत्रन्घनिर्वाहका- यहाँपर चित्रमीमांसाका कुछ अंश प्रमाणरूपसे उद्धृत करते हैं-यथास्मतकुलकूटस्थ- वक्षस्थलाचार्यविरचितवरदराजवसन्तोत्सवे- 'काश्वित् काशनगौराङ्ीं वीक्ष्य स्ाक्षादिव श्रियम्। वरदः संशयापजो वक्षःस्थलमवेक्षते ।।' इसी अ्रन्थके 'तातचरणव्याख्यावचःख्यापितान्' 'विद्वद्गुरोर्विदितविश्वजिद्घ्वरस्य' इत्यादि पद्य इसमें प्रमाण हैं। * इस विषयमें ये प्रमाण मिलते हैं- हेमाभिषेकसमये परितो निषण्णसौवर्णसह तिमिपाच्िनवोम्मभूपः। अप्पय्यदीक्षितमणेरनवद्यविद्याकल्पद्रुमस्य कुरुते कनकालवालम्।१॥ द्विर्भाव: पुष्पकेतोविर्वुध विटपिना पौनरत्तयं विकल्पश्िन्तारत्नस्य चीप्सा तपनतनुभवो वासवस्य द्विरुक्तिः । द्वैतं देवस्य दैत्याधिपमथनकलाकेलि- कारस्य कुर्वजानन्दं कोविदानां जगति विजयते श्रीनसिंह: क्षितीन्द्रः ॥२॥

नियोगाद् व्यङ्षटपतेर्निरुगधिकृपानिधेः ॥३। ये तीनों पद्य क्रमशः समरपुङ्वदीक्षितके यात्राप्रवन्धमें, अप्ययदीक्षितविरचित चित्र- मीमांसामें और कुंवलयानन्दमें मिलते हैं। X यद्यपि अप्पय्यदीक्षितके सभी प्रन्थोंके नाम ज्ञात नहीं हो सके हैं। गुरुपरम्परा एवं अन्यान्य ग्रन्थोंसे जितने नाम हमें उपलब्ध हो सके हैं, उनका निम्न प्रकारसे उल्लेख किया है-

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[ ३ j चार्य' अर्थात् एक सौ चार ग्रन्थोंके निर्माण करनेवाले आचार्य, यह उपाधि लगी हुई कहीं-कहींपर मिलती है। अस्तु जो कुछ हो, परन्तु इतना तो निर्विवाद सिद्ध होता है कि दीक्षित- जीका सब शास्त्रों में अप्रतिहत पाण्डित्य और उनकी प्रतिपादनशैली विलक्षण ही थी। ये परम आस्तिक थे। इनका गोत्र भारद्वाज था। ये ७२ वर्षकी दीर्घ आयु तक जीवित रहे। शायद इतनी बड़ी आयुवाले पण्डित संसारमं अल्प ही हुए हैं। इतिहासप्रेमियोंके लिए इतनी ही सामग्री छोड़कर अव अन्य प्रकृतो- पयोगी विचार करते हैं- सिद्धान्तलेशसंप्रह वेदान्तदर्शनका एक बड़ा उपयोगी अ्रन्थ है, क्योंकि इसके यधावत् अध्ययन करनेपर अद्वैतवेदान्तशास्त्रका ऐसा कोई भी मत अज्ञात नहीं रह जाता है, जो इसमें न आया हो। इस ग्रन्थमें अ्रन्थकारने जिन-जिन मतोंका सङ्गह किया है, उनका आगे जाकर दिग्दर्शन करायेंगे। इसके पहले यह चतलानेकी चेष्टा करते हैं कि दर्शनशव्दका क्या अर्थ है, वे कितने हैं, और उनकी क्या आवश्यकता है। यद्पि दर्शनशव्दके प्रकरणानुसार अनेक अर्थ होते हैं, और उनका कोपोंमें निरूपण भी मिलता है , तथापि जहां शास्त्रशव्दके साथ दर्शनशब्द आता

कपलयानन्द, चिय्मीनांखा, पृत्तियार्तिक, नाममंभदमाला, और इसकी व्यास्या, नक्षत्रवादावली, प्राकत्त चन्द्रि्ा, नित्पुट, विधिरयायन, मुखोपयोजनी, उपक्मपराक्रम, परिमल, न्यायरक्षामणि, सिद्धान्तलशयंमह, मतसारार्थर्सप्रद्व, नयमघरी, न्यायमुकावली, नयमयूखमालिका, शिवा- थेमणिदीपिका, मणिमालिका, रुवनयपरीक्षा, शिसरिणीमाला, शिवतर्तत्वविचेक, मह्मातर्कस्तव, शिवकर्णानतृन, रामायणतात्वर्यसंभद, भारततात्पर्थमंगद, शिवाद्वितनिर्णय, शिवार्चनचन्द्रिका, बालगन्द्रिका, शिवध्यानपद्धति, आदित्यस्तवरत्न, मध्तन्त्रमुसमर्दन और मध्मतवि्ध्वसन आदि। *दस विपयमे दीक्षितजके भ्राताके पुत्र नीलकण्ठ द्वारा विरचित शिवलीलाणर्वेके प्रथम सुर्गमें एक न्ोक प्रमाणरूपसे मिलता दे- फालेन शुम्भु: फिल तावताऽपि कलाय्षतुप्पप्टिमिता: प्रणिन्ये। हाग्रपति प्राप्थ समाः प्रयन्धाष्छतं व्यघादप्पयदीक्षितेन्दुः ।। और इसी प्रमाणमे दीक्षितजने यौ प्रन्थ बनाये है, यह भी सावित होता है। जैसे नेत्र, स्वम्र, सुद्धि, धर्म, दर्पण आदि। * शाजशन्दफा लक्षण यी मिलता है-प्रमृतिन निषृत्तिय नितेन फृतकेन वा। पुर्सा

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है, वहाँ पर उसका अर्थ होता है-दश्यते-यथार्थरूपतया जायते अलौकि- कार्थो येन, इस व्युत्पत्तिसे ठीक-ठीकरूपसे अलौकिक अर्थका (लौकिकचक्षु आदि प्रमाणोंसे ज्ञात नहीं होनेवाले अर्थका) परिज्ञान जिससे होता हो- ऐसा शास्त्र। द्शनशास्त्रोंके सामान्यरूपसे पहले दो -विभाग किये जा सकते हैं-आस्तिकदर्शन और नास्तिकदर्शन। आस्तिकदर्शन उन्हें कहते हैं, जिनमें वेदोंके प्रामाण्यका अङ्गीकार करके पारलौकिक अर्थका निरूपण किया गया हो। और नास्तिकदर्शन उन्हें कहते हैं-जिनमें वेदोंके प्रामाण्यका अङ्गीकार न करके केवल युक्तिसे अर्थका प्रतिपादन किया गया हो। इस प्रकारसे सामान्यतः द्विघा विभक्त दर्शनशास्त्रोंका पुनः इस प्रकार अवान्तर विभाग किया गया है-आस्तिकदर्शन-शास्त्रोंके फिर तीन विभाग हैं-न्याय, सांख्य और मीमांसा। न्यायशब्दसे गौतम और कणाद महर्षि द्वारा प्रणीत न्याय और वैशेपिक, ये दो शास्त्र विवक्षित हैं। साङ्ख्यशव्दसे कपिल और पतञ्जलि द्वारा लोकमें आविर्भृत सांख्य और योग शास्त्र विवक्षित हैं। मीमांसाशव्दसे जैमिनि और भगवान् वेदव्यास द्वारा प्रणीत पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा विवक्षित हैं। इसीलिए व्यवहार होता है कि आस्तिकदर्शन छः प्रकारके हैं। इसी रीतिसे नास्तिकदर्शनोंके भी पहले पहले चार्वाक, वौद्ध और जैन इस प्रकार तीन विभाग करनेके वाद विनेयोंकी (शिष्योंकी) वुद्धिके अनुसार विभक्त माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभापिकके भेदसे बौद्धदर्शनके चतुर्विध होनेसे वे मीछः प्रकारके हैं। यद्यपि दर्शनशास्त्रके अन्य भी अवान्तर भेद हैं, तथापि मुख्यरूपसे उनकी गणना न होनेके कारण व्यावहारिक प्रसिद्धि नहीं है। वेदप्रामाण्यवादी समुदायकी दृष्टिसे नास्तिकदर्शनोंमें परमपुरुषार्थ- प्रयोजकता विवादास्पद है, क्योंकि किसी खास प्रमाणविशेषका अनङ्गीकार. येनोपदिश्येत शास्त्रं शास्त्रविदो विदुः ॥ अर्थात् हितसाधनोंमें प्रृंत्ति और हितसाधनोंस निवृत्ति जिससे बोघित होती हो, उसे शास्त्र कहा जाता है। *अर्थात् सर्वप्रमाणधिराज अपौरुपेय वेदवाक्योंके आधारके विना ही केवल यौकिक धलंके आधरपर नास्तिकमतावलम्धियोंका विचार प्रस्तुत हुआ है, अतः युक्ति अप्रतिष्ठित

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[4 j करके केवल यौंक्तिकबादका ही उनमें असीकार किया गया है। वेदविरुद्ध युक्तिके अप्रतिष्ठित होनेके कारण यथार्थरूपसे तत्व्विनिश्चय उनसे नहीं हो सकता। यद्यपि इस विषयमं सत्मतिपक्ष हो सकता है कि आस्तिकदर्शनशास्त्रोंमें मोक्षोप- युक्तमार्गमदर्शकत्व नहीं हे और नास्तिकदर्शनोंमें है। तथापि उभयदर्शनज्ञ प्रेक्षावान पुरुषकी विचार-कसौटिमें कसे जानेके बाद नास्तिकदर्शन ही उक्तार्थमें पूतिकप्माण्डीकृत प्रतीत होते हैं, अतः उक्त सत्पतिपक्ष प्रेक्षावत्पुरुपश्रद्धेय नहीं हो सकता है। आस्तिक और नास्तिक दर्शनोंका परस्पर भेद जिस-जिस अंशमें है, उसे संक्षेपसे बतलाना प्रकृतमें अनुपयुक्त नहीं होगा, अतः उसको दिखाते हैं- न्यायशाल न्यायशासके मूल रचयिता महर्षि गौतम हैं। उन्होंने सोलह पदार्थ माने हैं-प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, द्ष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निणेय, बाद, जल्म, वितण्डा, ऐेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान * । इनके गतमें चार प्रमाण हैं-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शव्द। इन सालह पदारथेंकि तत्वज्ञानसे अनात्मभूत देह आदिमें आत्माकी जो मिथ्याज्ञान- रूप आन्ति है, उसकी निषृष्ि होती है और उससे राग + आदि दोपोंकी निशृचि होती है। दोपोंकी निवृत्तिसे शुभाशुभकर्मकी निवृत्ति, इससे निमित्तके अभापसे नमित्तिक अनेक योनियोंगें जन्मकी नियृति, और इससे गर्भावाससे लेकर मरण तकके सम्पूर्ण दुःनोंकी नितृचिरूप मुक्ति होती है। वैशेपिकशासत्र पैद़ोपिक दर्शनके रयिता कणाद मुनि हैं। इनके मतमें छः पदार्थ हैं-

होनिके सपकितनिवार निव्निरतिदयमुनपयप्रद्सक नहीं दो सेकती हैं। और पुरुपवुद्धिके मरविमन्रमादियोपरिवायाकान्त दोनेके कारण भी उनका तरवप्रतिपादन अवश्य भ्रान्त हो पकता है। अगोरदेय पेदयापयोंके निरस्तमहापम्ल होमेके कारण उनमें ऐसी सम्भावना नहीं दो मछती हे, ऐमा आशपिरकोका सात्पर्य दे। बएम पदार्थाका प्रतिपादम करमेवाला गौतमका यह प्रथम सूझ है-प्रमाणप्रमेय-

स्वसनापिधेगयधिगम: [गो० सूध्र १प्र० आ० १ सू० १]।

इसमें प्रमाण है।

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17 द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण हैं। उक्त छः प्रकारके पदार्थोंके ईश्वरानुग्रहवश यथार्थज्ञानसे आत्यन्तिक। दुःखकी निवृत्तिरूप मोक्षकी उत्पत्ति होती है। यद्यपि उक्त प्रकारसे न्याय और वैशेषिकका परस्पर भेद है, तथापि प्रतिज्ञादिन्यायप्रयुक्त विचारकी प्रवृत्ति होनेसे दोनों शास्त्रोंमें न्यायशास्तरत्वका व्यवहार होता है।

इस शास्त्रके प्रधान आाचार्य कपिल मुनि हैं-इनके मतमें संक्षेपसे पहले चार प्रकारके पदार्थोंका विभाग किया गया है-प्रकृति, विकृति, प्रकृतिविकृति और प्रकृतिविकृतिसे रहित । इन सामान्यरूपसे परिगणित पदार्थोंके विशेष- रूपसे पच्चीस विभाग हैं-प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, अहक्कार, मन, श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, भ्राण, वाकू, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, आकाश, वायु, अशनि, जल और पृथ्वी X। और इसमें प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द, ये तीन प्रमाण हैं। परम पुरुष जगत्के प्रति कारण नहीं है, किन्तु प्रकृति ही कारण है। सत्व, रज, और तम इन तीन गुणोंकी साम्यावस्थाको प्रकृति कहते हैं। किसी एक गुणके उद्रेक होनेपर वह प्रकृति कार्यकारणरूपमें परिणत होती

यद्यपि अभावको लेकर सात पदार्थ काणाद मतमें यत्र तन्न उपवर्णित हैं, तथापि अभावपदार्थके तुच्छ होनेसे वैशेषिक सूत्रमें उसकी गणना नहीं की गई है। धर्मविशेष प्रसूतात् द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवायानां पदार्थानां स्राधर्म्य-वैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानाप्निः श्रेयसम्। * अथवा न्यायशन्दका अर्थ परार्थानुमान होता है, और परार्थानुमान सम्पूर्ण ज्ञानोंका अनुग्राहक है और सव कर्मोंके अनुष्ठानमें परम्परया प्रयोजक भी है, अतः 'प्राधान्येन व्यपदेशा: भवन्ति' इस न्यायसे इन शात्त्रोंमें न्यायशब्दका व्यवहार होता है। इम् विपयमें अभियुक्तोंने कहा है कि 'सोयं परमो न्यायो विप्रतिपन्नपुरुषप्रतिपादकत्वात्' इत्यादि। मूलप्रकृतिरविक्कृतिर्महदाय्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त। षोडशकस्तुविकारो न प्रकृति र्नाऽपि विक्ृतिः पुरुषः । यह शलोक इस पदार्थविभागमे प्रमाण है। X इन पदार्थोंकी उत्पत्ति इस प्रकार चतलाई गई है- प्रकृतेमहान् ततोऽदद्ारस्तस्माद्रणश्च पोडशकः। तस्मादपि च षोडशकात् पश्वभ्यः पञ्च भूतानि॥ अर्थात् प्रकृतिसे महत्तत्व, (बुद्धितत्व) महत्तत्वसे अहङ्गार, अह्ङ्कारसे एकादश इन्द्रिय और पश्चतन्मान्रा, और इन सोलहमें स्थित पव्वतन्मात्रासे आकाशादि पज्ञभूत पदार्थे उत्पन्न होते हैं।

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[ ] है, क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थोंमें सत्वादि गुणन्रयकी अवस्थिति है, अतः उनका कारण गुणत्रयवरती प्रकृति ही हो सकती है, यह उनका सिद्धान्त है। इसमें ईश्वरका प्रतिपादन नहीं है, अतः यह निरीश्षरसाङ्रूय कहलाता है। इस मतमें प्रकृति और पुरुपके विवेक-प्रत्ययसे मुक्ति होती है। इसका अन्य अवान्तर भेद साङ्ख्यकारिका आदि अन्थोंसे जानना चाहिए। सेश्वरसाड्ख्यशास्त्र सेशवरसाड्स्यशास्त्रको योगशास्त्र कहते हैं। इसके मूभून प्रणेता आचार्य पतज्ञलि मुनि हैं। इन्दोंने सम्पूर्ण योगशाम्त्रके त्त्त्वोंका चारपादोंमें समा- वेश किया है, इसीको योगसून्र कहते हैं। पदार्थविवेकमं पूर्वोक्त साङ्ख्यशास्त्रकी अपेक्षा एक अधिक परमेशर पदार्थ माना गया है, अतः इनके मतमं छव्तीस पदार्थ हैं। प्रकृतिम अधिष्ठित परमात्माके महत्तत्व, काल और पुरुप-कार्योपाधि जीव-इस प्रकार तीन पदार्थ मी ये लोग मानते हैं। जब परमात्माकी असीम कृपासे अष्टाक्षयोग द्वारा जीवका अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब अपनेको बुद्धि आदि पदार्थोसे भिन्न समझता हुआ वह कैवल्यरूप अमृतसागरमें अवगाहन कर समस्त दुःसोंसे विमुक्त हो जाता है, इस प्रकार उनके मतका संक्षेप है। पूर्वमीमांसाशास्त्र पूर्वगीमांसाशास्रकी सूत्रों द्वारा सबसे पहले आचार्य जैमिनिने संसारमें प्रसिद्धि की। इन्होंने 'अथातो धर्मजिज्ञासा' आदि सूत्रोंसे बारह अध्यायोंमें केवल धर्माधर्मका ही विचार किया है। पूर्वमीमांसाको छोड़कर दर्शन शास्त्रोंमें से किसी भी शास्त्रमें इतने सूत्र नहीं हैं। इस शास्त्रमें दो मत प्रचलित हैं-कुमारिलभट्टका मत और प्रभाकरका मत। इन मतोंको भाटटमत और गुरुमत भी कहते हैं। इनमें भाट्टानुसारी छः प्रमाणोंसे वस्तुकी सिद्धि करते हैं। वे छः प्रमाण-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापति और अनुपलन्धि हैं। और प्रमाकरके मतमें अनुपलन्धिप्रमाणके न होनेसे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द और अर्थापत्ति पांच ही प्रमाण हैं, क्योंकि वे अभावको पदार्थ नहीं मानते हैं, प्रत्युत उसे अधिकरणस्वरूप मानते हैं, अतः अभावके प्रत्यक्षके लिए अनुपलव्धिप्रमाणकी इनके मतमें आवश्यकता

*फशकर्मविपाकाशयेरपरामृष्टः पुरुपविशेप ईवरः अर्थात झेश आदिसे रहित पुरुष- विदोष ईखर है, यह सूत पतपलिके मतमें ईधरकी स्वीकृतिका प्रमाणरूप है।

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[ < ] नहीं है। प्रमेयविभागके अवसरमें प्रभाकरानुयायी-द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, समवाय, शक्ति, सङ्ख्या और सादृश्य इस प्रकारसे आठ पदार्थ मानते हैं। मीमांसक ईश्वरको नहीं मानते। कुछ साम्प्रदायिक कहते हैं कि मीमांसक ईश्वर नहीं मानते, ऐसी वात नहीं है, किन्तु ईश्वरके होते हुए भी वह स्वतन्त्र नहीं है अर्थात् तद्-तत् कर्मोंके अनुसार तत्-तत् प्राणियोंको शुभाशुभ फल देनेके कारण वह ईश्वर परंतन्त्र है, अतएव उसका अस्तित्व अकिश्चित्कर होनेसे नहींके वरावर ही है। मनुष्य धर्माधर्मका ठीक-ठीक परिज्ञान करके उनके अनुष्ान द्वारा स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। यही मोक्ष है, क्योंकि स्वर्गकी प्ाप्तिसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता, वह सुखस्वरूप है। ज्ञानकाण्डको ये लोग स्वार्थमें प्रमाण नहीं मानते हैं। अन्य अघिक विस्तार मीमांसाग्रन्थोंसे जानना चाहिए।

उत्तरमीमांसाशास्त्र उत्तरमीमांसा शास्त्रका सूत्रों द्वारा भगवान् वेदव्यासने ग्रथन किया है। इसका सम्पूर्ण विचार चार अध्यायोंमें है, जिनका क्रमशः समन्वयाध्याय, अविरोधाध्याय, साधनाध्याय और फलाध्यायसे भी व्यवहार होता है। उत्तरमीमांसामें वेदके ज्ञानकाण्डका विचार है। प्रकृतमें मीमांसाशव्द्रका अर्थ पूजित विचार होता है। उसी विचारको पूजित विचार कहते हैं-जो कि मनुप्योंको निरतिशयनित्यसुखकी साधनताका यथार्थ परिज्ञान करानेमे समर्थ हो। और पूर्वमीमांसामें आये हुए मीमांसाशव्दका अर्थ-धर्माघर्मविपयक विचार-करना चाहिए। इस प्रकारके भिन्नार्थकत्वमें केवल पूर्वोत्तरशब्द ही प्रमाणरूपसे वस हैं। इसी उत्तरमीमांसाके लिए वेदान्तशब्दका व्यवहार होता है। यद्यपि वेदान्तशब्दका मुख्य अर्थ वेदका उपनिषद्धाग * है, तथापि परम्परया उपनिषद्भागके अर्थनिर्वचनमें उपकारक शारीरकमीमांसा + आदि भी वेदान्तशब्दका अर्थ होता है।

  • वेदका सामान्यतः तीन काण्डोंमें विभाग किया गया है-कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड, इनमें ज्ञानकाण्डको अर्थात् आत्मतत्त्वप्रतिपादक वेदविभागको उपनिषत् कहते हैं। शारीरक-जीवात्मा-तवंपद्वाच्य पदार्थ, उसका तत्पदवाच्य परमात्माके साथ अभेद प्रतिपादनके लिए जो मीमांसा है, उसको शारीरकमीमांसा कहते हैं, अर्थात् न्रह्मसूत्रभाष्य आदि।

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[ ९ ] भगवान् शकराचार्यके सिवावमसूत्रके ऊपर अन्य मी कई-एक आचायोंने अपने-अपने अभिमत साम्प्रदायिक अर्थके प्रतिपादनके लिए मिन्न-मिन्न गाप्य बनाए हैं, उनमेंसे रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य, और निम्बार्काचार्य प्रसिद्ध है। रामानुजाचार्यका मत श्रीरामानुजाचार्य द्वारा प्रचारित सिद्धान्तफो चिशिष्टाद्वैतसिद्धान्त कहते हैं। विशिष्टाद्वैतसिद्धान्तशव्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है-द्वयोर्भावः- हिता, दविता एव-द्वंतम्-न द्वैतम् अद्वतम्-अमेदः, विशिष्टस्य-स्वव्यति- रिकतसमस्तचेतनाचेतन विशिषटस्य न्रक्मण: अद्वैतम्-विशिष्टाद्वैतम्, तदेव सिद्धान्त :- विशिष्टाद्वितसिद्धान्तः अर्थात् न्रवा अदैत है, किन्तु स्वभिन्न चेतन और अचेतन पदार्थोसे विशिष्ट है। इनके मतमें चित, अचित और ईधरके मेदसे अर्थात् मोक्ता, भोग्य और नियासकके मेदसे तीन पदार्थ हैं। जसे कि उन्होंने ही अपने ग्रन्थमें कहा है- ईचरश्विदचिच्ति पदार्थत्रितयं हरिः। ईश्वरश्चित दृत्युक्तो जीवो ृश्यमचित् पुनः ।।' नित्शव्दसे कहलानेवाला जीवात्मा परमात्मासे भिन्न अणु तथा अवि- नाशी हे अचित्-शब्दयाच्य पदार्थ भोग्य, भोगोपकरण और भोगायतनके भेदसे त्रिविध हैं। इस त्रिविध जगत्का कर्ता वासुदेवपदवाच्य परमात्मा है। इसीकी उपासनासे* जीवकी मुक्ति होती है, इत्यादि। मध्वाचार्यका मत गध्वाचार्य हेतवादी हैं। इन्होंने नमासूत्रके ऊपर भाव्य बनाकर द्वैतवाद सिद्धू करनेकी चेषा की है। स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र ये दो इनके मतमं तत्व हैं। सम्पूर्ण शुभगुणसम्पन्न विष्णु स्वतन्त्र तत्त्व है, और इतर सब अस्वतन्त्र हैं। स्वतन्त्र ईशर और जीवका परस्पर मेद ज्ञात हो जानेपर मुमुक्षु सांसारिक कएसे मुक्त हो जाता है, और दुःखरहित आनन्दका उपभोग करता हुआ वह

  • ईसरफी पांच प्रकारसे उपासना गानी गई है-अभिगमन, उपादान, इज्या, स्वाध्याय, और गोग। देवताफें रथान और मार्ग आदिको साफ-सुगरा करना अभिगमन, गन्ध, पुप्प आदि देवताओंकी यामभीका सम्पादन उपादान, दवतापूजन हज्या, अर्थानुसन्धानपूर्वक स्वोपादिका पाठ रवाध्याय और देवानुगन्धान योग कहालाता दै। २

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[ १. ] ईश्वरके पास प्रमोद प्राप्त करता है। रामानुजोंके समान ये भी जीवाणुवादी ही हैं। इनके मतको पूर्णपज्ञदर्शन * भी कहते हैं। वल्लमाचार्यका मत वल्लभाचार्यका जो ब्रह्मसूत्रके ऊपर भाष्य है, उसको अणुभाष्य भी कहते हैं। ये भी जीवाणुवादी ही हैं, परन्तु पूर्वोक्त मतोंसे इनके मतम यह विशेष है कि गोलोकाधीश्वर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही उपास्य है, अन्य नहीं। किश्, यह मानते हैं कि यद्यपि वस्तुतः द्वैत है, तथापि शुद्धाद्वैत ही वेदान्तप्रतिपाद्य है, अर्थात् शुद्ध जीव और परमात्माका अद्वैत है, क्योंकि जीव और ईश्वरकी अविद्या और मायारूप उपाधि वे नहीं मानते हैं, इसलिए असि और विस्फुलिङ्गके समान शुद्ध जीव और परमात्माका ऐक्य हो सकता है और अविकृतपरिणामवाद भी इन्होंने माना है। निम्बार्काचार्यका मत ब्रह्मसूत्रके ऊपर निम्बाकोचार्यकी सौरभ नामकी अति संक्षिप्त व्याख्या है, इसीको भाष्य भी कहते हैं। इनका मत मेदाभेदवाद कहलाता है। इनके मतमें चित्, अचित् और ब्रह्म ये तीन पदार्थ मूलरूपसे माने गये हैं। चित्शब्दसे जीव लिया गया है, जो कि अणु, ज्ञानरूप और ज्ञातृत्व आदि धर्मवाला एवं अहंपदवाच्य है। अचित्पदार्थ प्राकृत, अप्राकृत और कालके भेदसे तीन प्रकारका है। सत्त्व आदि तीन गुणोंका आश्रयीभूत द्रव्य प्राकृत पदार्थ है और विष्णुपद, परमपद आदिसे कहलानेवाला अप्राकृत है। इन दोनोंसे भिन्न अचेतन द्रव्यका नाम काल है। जगत्कर्तृत्व आदि गुणोंसे युक्त नारायण, वासुदेवपदवाच्य श्रीकृष्ण ही ब्रह्मशब्दका अर्थ है। ये चित्, अचित् और ब्रह्म पदार्थ अनेक वाक्योंसे + परस्पर मिन्न और

  • प्रथमस्तु हनूमान् स्यात् द्वितीयो भीम एव च। पूर्णप्रज्ञस्तृतीयः स्यात भगवत्कार्यसाधकः ॥ इस श्लोकसे मध्वमतप्रवतकपरम्पराके ऊपर कुछ आभास पड़ता है-अर्थात् वायुके अवतारभूत-इनूमान् आदि द्वारा यह मत प्रस्तुत हुआ है। + अर्थात् 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि वाक्योंसे पदार्थोंकी भिन्नता भासती है और 'सदेव सोम्ये- दमग्र आसीत्' 'सर्व खल इदं ब्रह्म' इत्यादि श्रतियोंसे उक्त पदार्थोंकी परस्पर अभिन्नता भासती है, अतः इन वाक्योंके आधारपर चिदचिद्भिन्नाभिन ब्रह्म जिज्ञास्य है, यह इन लोंगोंका कथन है।

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[ ११ ] अभिन्न भी मालम पड़ते हैं, इसलिए भिन्नार्थप्रतिपादक और अभिन्नार्थप्रतिपादक वाक्योंका स्वार्थमें प्रामाण्य होनेके कारण ब्रह्माधीनस्थितिप्रवृत्तिमत्त्वरूपसे और प्रत्येकवृत्ति असाधारणधर्मसे चिदचिद्धिनाभिन्न व्रम्म ही सुमुक्षु द्वारा जिज्ञासितव्य है। उक्त प्रकारके ब्रह्मज्ञानसे भगवद्धावापत्तिरूप मोक्षकी प्राप्ति होती है, यह निम्बार्कका संक्षिप्तसे मत है। उक्त प्रकारसे आस्तिकदर्शनोंका साधारणरूपसे दिगूदर्शन कराया गया है। इनका अधिक विस्तार तो उनके अ्न्थोंसे जानना चाहिए। अब नास्तिक दर्शनोंका कुछ विवेचन करते हैं- चावाकमत चार्वाकशव्दका अर्थ है-आपाततः रमणीय वाणीको कहनेवाला मत- विशेषम्वर्तक आचार्य। चार्वाकमतके आलोचनसे रागतः मवृत्तिशील पुरुषोंको उनका मन्तवय अच्छा ही लगता है। इनके मतमें चार तत्व हैं-पृथ्वी, जल, तेज और वायु। ये ही चार तत्त्त्र देहाकारमें परिणत होकर मदशक्तिसे युक्त मद्यके समान। चैतन्ययुक्त हो जाते हैं और चैतन्ययुक्त देहेन्द्रियादि ही इनके मतमं आत्मा है। इनसे अतिरिक्त 'आत्मा' कोई पदार्थ नहीं है। और इस मतमं केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, अनुमानादि नहीं। इस मतके मूल प्रवर्तक आचार्य वृहस्पति हैं। ये लोग अतीन्द्रिय पदार्थ मानते ही नहीं ।

चक्षु आदि इन्द्रियाँ यद्यपि परस्पर स्वकीय असाधारणधर्मसे भिन्न है, तथापि प्राणाधीनस्थितिकत्वरूपमे अभिन्न है। वैसे ही चित्, अचित् और ब्रह्मके विपयमें भी उक्त दृटान्त घट सकता है, यह इनका मनोगत भाव है। + जैसे मुरा जिम्व पदार्थसे वनती है, उस पदार्थमें मादकता पहलेसे नहीं रहती है, किन्तु उसकी विशेषक्रिया द्वारा उसमें अकस्मात् मादकता आ जाती है, वैसे ही पृथ्व्यादि पदार्थोंमें प्रत्येकरुूपसे चैतन्यशचिके न होनेपर भी उनके परस्पर विलक्षण आकृतिमें परिणत हो जानेके बाद चेतन्यशकि भा जाती है, यह चार्वाकोंका तात्पर्य है। जैसे कि इन्हीं लोगोंकी उक्ति है- अत्र चत्वारि भूतानि भूमिचार्य्र्यनलानिलाः । चतुर्भ्यः खदु भृतभ्यश्वैतन्यमुपजायते॥१॥ िण्वादिम्यः समेतेभ्यो द्रव्येभ्यो मदशक्तिघत्। अहं स्थूल: कृशोऽस्मीति सामानाधिकरण्यतः ।।२।। अर्थात् अतीन्द्रिय पदार्थोंकी सिद्धि अनुमानसे की जा सकती है और अनुमान तो इनके मतमें प्रमाण नहीं है, अतः इनके मतमें अतीन्द्रिय पदार्थ नहीं है, यह तात्पर्य है।

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[ १२ ] वौद्धमत वौद्धमत चार प्रकारसे विभक् है-माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिक। चार्वाकमतसे इनके मतमें अनेक विलक्षणताएँ हैं। ये लोग अनुमानको भी प्रमाण मानते हैं। इन चारोंके मतमें 'सर्व क्षणिक क्षणिकम्, सर्व दुःखं दुःखम्, सर्वं स्वलक्षणं स्व्रलक्षणम् और सर्व शून्यं शून्यम्, इस प्रकारकी चतुर्विध भावनासे * परम पुरुषार्थ होता है, ऐसा माना गया है। इनका मत है कि शिष्योंको गुरुके पास जाकर योग और आचार दो क्रियाएँ करनी चाहिएँ। + योग-अप्राप्त वस्तुकी यथार्थरूपसे प्राप्तिके लिए शक्का। आचार-गुरुने जो उत्तररूपसे कहा हो, उसका अङ्गीकार। गुरुजीने जो उपदेश दिया हो उसका अङ्गीकार कर पर्यनुयोग (शक्का) नहीं करनेपर माध्यमिकसंज्ञा होती है। ये माध्यमिक सर्वशून्य- वादी हैं और अनुमान प्रमाण मानते हैं। योगाचारमत माध्यमिक बौद्ध सर्वशन्यवादी हैं। और ये योगाचार वाह्यार्थशून्यवादी हैं अर्थात् आन्तरज्ञानरूप अर्थकी क्षणिकरूपसे स्थिति मानते हैं। इसमें युक्ि है कि यदि ज्ञानरूप अर्थ न माना जाय, तो जगदान्ध्यप्रसक्ति होगी, इसलिए वुद्धितत्त्व्र माननेकी आवश्यकता है। इनकी 'योगाचार' संज्ञा इसलिए हुई कि गुरु द्वारा कहे गए भावनाचतुष्टय और वाह्यार्थशून्यत्वका अक्कीकार करनेके अनन्तर आन्तरज्ञानरूप अर्थकी शुन्यता कैसे हो सकती है? इस प्रकार पर्यनुयोग किया है। ये लोग क्षणिकत्वरूपसे बुद्धितत्त्व्रका अङ्गीकार करके वाह्यार्थवादका खण्डन करते हैं अर्थात् वाहय पदार्थ ज्ञानरूप ही है, उसकी ज्ञानसे अतिरिक्त सचा नहीं मानते हैं। केवल वासनाविशेषसे ज्ञानमें अनेक आकार भासते हैं। पूर्वोक्त भावनाचतुष्टयसे सम्पूर्ण वासनाओंका उच्छेद हो जानेसे केवल विशुद्ध विज्ञानका उदय होना ही इनके मतमें मोक्षपदार्थ है। सौत्रान्तिक मत सौत्रान्तिकमतमें ज्ञानके सिवा वाह्यार्थ वस्तुकी सत्ता अनुमानसे मानी गई • अर्थात् सब क्षणिक है, दुःखात्मक है, स्वलक्षण है और शून्य है, इस प्रकारकी, . भावनासे ही मोक्ष हो सकता है, यह वौद्धोंका कथन है। +. अप्राप्तार्थस्य प्राप्तये पर्य्यनुयोगो योगः। गुरुक्तस्यार्थस्याङ्गीकरणमाचारः, इस प्रकार योग और आचारका लक्षण मिलता है।

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[ १३ ] है। उनका कहना है-यदि बाह्यार्थका सर्वथा अभाव माना जाय, तो 'चाहरके समान आन्तर वस्तुका अवभास होता है, यह योगाचारका कथन ही नहीं वन सकेगा, क्योंकि वाह पदार्थके सर्वथा अभावमें तन्निरूपित द्ष्टान्तका न होना निश्चित ही है। इन्होंने रूपस्कन्ध, विज्ञानस्कन्ध, वेदनास्कन्ध, संज्ञास्कन्ध और संस्कारस्कन्ध, इस मेदसे पाँच स्कन्ध माने हैं। शव्दादि विपय और इन्द्रियाँ रुपस्कन्ध हैं, आलयविज्ञान और प्रवृत्तिविज्ञानका प्रवाह विज्ञानस्कन्ध है, सुखदुःखादिप्रत्ययका प्रवाह वेदनास्कन्ध है और संस्कारस्कन्घशव्दसे धर्मा- धर्मादि कहे जाते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् दुःखरूप और दुःखसाधन है, इस प्रकारकी भावना करके उसके निरोधके लिए तत्त्वज्ञानका सम्पादन करना चाहिए और वह तभी हो सकता है जब दुःख, आयतन, समुदय और मार्ग रूप चार तत्त्वोंका ठीक-ठीक परिज्ञान हो। एवञ्च इसीके परिज्ञानसे मोक्ष होता है। इन लोगोंकी सौत्रान्तिक इसलिए संज्ञा हुई कि इन्होंने सूत्रके परम रहस्यको पूछा है। वैभापिकमत वैभापिक लोग वास अर्थको प्रत्यक्षसे ही सिद्ध करते हैं, अनुमानसे नहीं; क्योंकि व्याप्तिज्ञानके बिना अनुमान हो ही नहीं सकता। अनुमानमें प्रत्यक्षात्मक ही व्याप्तिग्रह अपेक्षित होता है, यह सर्वानुभवसिद्ध है। इसलिए ग्रा्य और अध्ववसेय मेदसे दो प्रकारका अर्थ वैभाषिक लोगोंने माना है। पूर्वमतमें वाह अर्थकी सत्ता अनुमानसे ही मानी गई है और इस मतमें प्रत्यक्षसे मानी गई है, यह विशेष है। प्रत्यक्षपरमाणसे गम्य अर्थ ग्राह है और अनुमानसे गम्य अर्थ अध्यवसेयरूप है, यह समझना चाहिए। यद्यपि आदि बुद्ध एक ही हैं, तथापि उन्होंने वास और आन्तर पदार्थोंमें सर्वथा अनास्था रखनेवाले शिष्योंके प्रति उपदेशके लिए पहले शुन्यवादका उपदेश दिया, विज्ञानमात्रमें आस्था रखनेवालोंके प्रति केवल विज्ञान ही सत है, ऐसा उपदेश दिया और विज्ञान एवं वाह्य पदाथोंमें श्रद्धा रखनेवालोंके प्रति दोनों सत्य हैं, ऐसा उपदेश दिया है, इसलिए विनेयमेदसे बुद्धकी भाषा भिन्न-भिन्न है-इस बातको यह चतुर्थ बुद्ध कहता है, अतः इसकी ैभापिकसंज्ञा हुई। रपादि पत्तस्कं्ध दुःस है। पाँच शानेन्द्रिय, पाँच विषय, मन और वुद्धि दुःखका आयतनं है। मनुष्योंके हृदयमें जो राग, द्वेपका उदय होता है, वही समुदयपदार्थ है और सब पदार्थ क्षणिक है, इस प्रकारकी स्थिर वासना-मार्गपदार्थ है, इन चार पदार्थोंके जञानसे मोक्ष होता है।

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१४ ] L यही कारण है कि उक्त चार प्रकारके वौद्धोंको उपदेश देनेवाले मूलभूत वुद्धके एक हेोनेपर भी तत्-तत् स्वोपदेष्टव्य शिष्योंकी मतिके वैचित्यसे चार प्रकारकें वौद्ध कहलाते हैं। जैनमत इस मतको आहत मत भी कहते हैं, क्योंकि इसके प्रवर्तक 'अर्हत्' नामके आदि पुरुष थे। ये आत्माको स्थायी मानते हैं। इस मतमं पहले जीव और अजीव भेदसे दो तत्व माने गये हैं। फिर इसीका विस्तार जीव, आकाश, धर्म, अधर्म और पुद्धलास्तिकायसे भी किया गया है। अस्तिकायशब्द पदार्थवाची है। ये संसारी और मुक्तमेदसे दो प्रकारके जीव मानते हैं। अजीव पदार्थका ही आकाश, धर्म, अधर्म और पुदल विस्तार है। और जैनोंने प्रकारान्तरसे जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जर, बन्ध और मोक्ष, इस प्रकार सात पदार्थ माने हैं। परोक्ष और अपरोक्ष दो प्रकारके इनके मतमें प्रमाण हैं। इनके मतमें श्वेताम्वर और दिगम्बर आदि अनेक अवान्तर भेढ़ हैं। स्याद्वाद सभी जैनोंको सम्मत होनेपर भी क्रियांशमें इन मतोंकी भिन्नता है। सम्पूर्ण कर्मवन्धनोंसे छुट जानेके वाद असङ्गरूपसे जीवकी अवस्थिति ही इनका मोक्षपदार्थ है। सम्यक्दर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यक्चरित्र मोक्षपाप्तिके मार्ग माने गये हैं। पूर्वोक्त प्रकारसे आस्तिक और नास्तिक दर्शनोंका अत्यन्त सूक्ष्म रीतिसे विभाग किया गया है। परन्तु उनका अधिक विस्तार तत्-तत् ग्रन्थोंमें अधिक विस्तृतरूपसे मिलता है। प्रकृतमें सूक्ष्मरीत्या इसलिए चतलाए गये हैं कि उनके अभिमत पदार्थोंका आकलन सूत्ररूपसे तत् तत् दर्शनशास्त्रोदित पदार्थजिज्ञा- सुओंको हो सके।

दर्शनशास्त्रोंकी रचनामें आचार्योकी प्रवृत्तिका कारण प्रत्येक दर्शनकारोंकी दर्शनरचनामें प्रवृत्ति इसलिए हुई कि अनेक प्रकारके दुःखोंसे परिपीडित सांसारिक जीवोंकी दुःखोंसे मुक्ति हो और उन्हें० सुख प्राप्त हो। तव तक मनुष्योंको चिरस्थायिनी शान्ति प्राप्त नहीं होती है, जब तक कि उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं होता। यद्यपि व्यावहारिक साधन-

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[ १५ ] विशेषोंकी सम्पत्ति कुछ व्याहारिक अड़चनोंको हटा सकती है, तथापि उससे पारमार्थिक चिरस्थायिनी शान्ति नहीं मिलती है, अतः जगत्के साधारण जनोंके उपकारको मनगें रखकर तत्-तत दर्शनकारोंने सूत्ररूपसे अधिकारि- विशेषोंके लिए तत्ं-तत् प्रकारोंका अनेक युक्ति-प्रयुक्तियोंसे दिग्दर्शन इसलिए कराया है कि उतने दरजेके अधिकारी पुरुषोंको कुछ-न-कुछ शान्ति अवश्य मिल जाय, और उन्हींके मूलभूत सिद्धान्त या सूत्रोंके आधारपर आगेके व्यास्यानकारोने भी विशद व्याख्या की है। अब इस विपयमं समझनेकी आवश्यकता है कि किसी खास वस्तुको प्राप्त करनेके लिए उसके भिन्न-भिन्न मार्ग हो सकते हैं, परन्तु उस वस्तुके स्वरूपम सदान्तिक मेद नहीं हो सकता। जैसे कि कोई लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिए अनेक गार्गोका अनुसरण कर सकता है, परन्तु उससे प्राप्तव्य लक्ष्मीरूप अर्थके स्वरूपमें भिन्नता नहीं हो सकती है। वैसे ही तृप्त्यर्थ भोजनके मार्ग भले ही अनेक प्रकारके हों, परन्तु उससे साध्य तृप्तिके स्वरूपमें भेढ नहीं हो सकता। बस, इसी टष्टान्तको लेकर ठीक-ठीक यदि विचार किया जाय, तो भले ही मान- सिक निश्वधिक शान्ति या मोक्षके लिए अनेक मार्ग मिल जायँ, परन्तु लक्ष्यके रवरूपमें उनका मेद नहीं हो सकता। यदि उसीके स्वरूपमें भेद हो गया, तो उसे मोक्ष या मानसिक शान्ति कैसे कह सकते हैं ? पूर्वोद्धृत दर्शनोंके विपयमं यही गड़बड़ी भरी पाई जाती है, अर्थात् उनमेंसे किसीने मोक्षका एक-सा रूप नहीं बतलाया है, प्रत्युत अपने-अपने वैयक्तिक भावसे म्रेरित होकर मोक्षके भिन्न-भिन्न स्वरूप निर्धारण किये हैं। जो आस्तिक- दर्शनविभागमें मत उपन्यस्त किये गये हैं, उनमें श्रुतिवाक्योंकी खींचातानी ही की गई है। और नास्तिक-द्शनोंका तो कोई मूलभूत आधार ही नहीं है, अतः उनमें तो दर्नत्व भी सन्दिग्ध है। यद्यपि कुछ महापुरुष उक्त सभी दर्शनोंका एक-सा समन्वय करनेके लिए भी प्रवृत होते हैं, परन्तु उनका वह समन्वय केवल उसी प्रकारका होता है- जैसा कि कोई घट और पटको द्रव्यत्वरूपसे एक स्वरूप बना कर जलाहरणक्रिया पटसे करनेकी ईच्छा करता हो। और उस प्रकारका समन्वय दर्शनकारोंने अपनी किसी भी पंकिमें नहीं वतलाया है। और दूसरी बात यह भी है कि वेदान्तदर्शनको छोड़कर न्याय आदि

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[ १६ ] आस्तिक-दर्शनशास्त्र आत्मतत्त्वविज्ञानाख्य मोक्षके प्रतिपादनके लिए मुख्यरूपसे प्रवृत्त नहीं हुए हैं, परन्तु अन्यान्य द्रव्यादि पदार्थोंका निरूपण करनेके लिए प्रवृत्त हुए हैं। जैसे न्यायमें द्रव्यादि पदार्थोंका निरूपण, सांख्यमें प्रकृति, पुरुष और योगका निरूपण, पूर्वमीमांसामें धर्माधर्मका निरूपण किया गया है। उनमें आत्माका निरूपण खासरूपसे नहीं किया गया है, अतः उनसे साक्षात् आध्यात्मिक उन्नतिकी मनुष्यको आशा नहीं करनी चाहिए। हां, इतना अवश्य हो सकता है कि उनके अध्ययनसे व्युत्पत्ति हो जानेके कारण वुद्धिदोपकी निवृत्ति होनेसे वेदान्तके अध्ययनमें सरलता होती है। इसीलिए उनमें परम्परया-मोक्ष- शास्त्रयुत्पादन द्वारा-मोक्षोपयुक्तज्ञानसाधनता आ सकती है, अतः हम उनके ऋणी हो सकते हैं। आचार्यपाद श्रीशक्करक्ता श्रुतिसम्मत अद्वैततत्त्व अब आइए वेदान्तदर्शनमं, वेदान्तमें भी आत्मस्वरूपके प्रतिपादनावसरमें श्रीशङ्कराचार्यके सिवा अन्यान्य आचार्योंने श्ुतिके वास्तविक तात्पर्यको विरुद्धरूपसे ही बतलाया है, अतः उनके व्याख्यानसे आत्मतत्त्व्रप्रतिपत्तिकी आशा व्यर्थ है। जव हम भगवान् आचार्यपाद श्रीशङ्करके विस्तृत भाप्योंको देखते हैं, तभी हमें एक आशाका स्थान और सन्तोष प्राप्त होता है। यह सर्वसाधारणको विदित है कि जो कोई पुरुप कपट आदि दोषोंसे रहित होता है, उसके कहे हुए वाक्यमें भी एकार्थता ही रदती है, भिन्नार्थता नहीं। यदि उस वाक्यको, जो उस निर्दुष्ट पुरुपने जिस अर्थके परिज्ञानके लिए प्रयुक्त किया है, बुद्धिकौशल्यसे अन्यार्थपरक मान लें, तो उस वक्ताके साथ अन्याय अवश्य होगा। इसी प्रकार वेदवाक्योंका, जो कि अपौरुपेय होनेके कारण सर्वथा दोषरहित हैं, मूल तात्पर्य छोड़ कर यदि अन्य स्वाभिमत ही अर्थ करें, तो अवश्य हम दोपी ठहरेंगे। भगवान् शक्कराचार्यने उन श्रुतियोंका ऐसा ही व्याख्यान किया है, जो उनका वस्तुतः प्रतिपाद था। शङ्कराचार्य साक्षात् भगवान् ही थे, जिनमें छद्म या व्यर्थाभिमानका लेश भी नहीं था, अतः निर्दुष्ट अपौरुषेय वाक्योंका भगवान् ही ठीक-ठीक व्याख्यान कर सकते हैं। अपि च, श्रुतिके प्रत्येक वाक्योंके तात्पर्यका निर्णय करनेके लिए उपक्रमोप- संहार आदि छः प्रमाणोंकी अपेक्षा अवश्य होती है। उपक्रमोपसंहारादिपड्विध श्रुतितात्पर्यनिश्चायक प्रमाणोंकी उपेक्षा करके केवल यदि मनगढ़न्त अर्थ किया

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जाय, तो उन वाक्योंका वास्तविक अर्थ हाथमें नहीं आ सकता है। अतः इन प्रमाणोंके आधारपर ही श्रुतियोंका अर्थ निश्चय करना चाहिए। किसी प्रकार भी श्रुतिवाक्यार्थनिर्णयावसरम इन प्रमाणोंकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि श्रुतिवाक्योंका यह स्वभाव है कि उनके स्वार्थनिर्णयमें उपक्रमोपसंहारादिकी अपेक्षा हेती है। अतः श्रुत्यर्थनिर्णायकत्वरूपसे स्वभावतः प्राप्त उन प्रमाणोंकी यदि कोई उपेक्षा करे, तो इससे यही कहा जा सकता है कि वह वहिके उप्णत्वस्वभावका भी अपलाप करता है। जब इस स्वभावस्थितिका अवलम्बन करके श्रुतियोंके अर्थका निर्णय किया जाता है, तब श्रुतियों द्वारा भगवान् शज्राचार्यपादने जिस निर्गुण सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वैत अर्थका प्रतिपादन किया है, वही अद्वैत अर्थ श्रुतिवाक्योंसे अपने-आप प्राप्त हे। जाता है, इतर नहीं, क्योंकि श्रुतिने वार-वार उक्त अद्वैतवस्तुका ही प्रतिपादन किया है, कारण कि निम्नलिसित- द्वितीयाद्व भयं भवति। इदं सर्व यदयमात्मा। एकमेवाह्वितीयं न्रक्ष । एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं नेह नानास्ति किश्चन । भवति। मृत्यो: स मृत्युमामनोति य इह नानेव सलिल एको द्रष्टाद्वैतः । पठयति । अथात आदेशो नेति नेति। पेततादात्म्यमिदं सर्वम्। एकधा बहुधा चैव दश्यते जलचन्द्रवत्। सरव खलु इदं न्म। नान्योडतोडस्ति द्रष्टा। आत्मा वा इदमेक पवाय आसीत। यत्र द्वैतमिव भवति तदितर इतरं योडन्यां देवतामुपास्ते न स चेद। पश्यति, यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् अहं त्रमास्मि। तत् केन कं पश्येत्। तथ्वमसि । इत्यादि अनेक श्रुतियाँ अद्वैत-समस्त द्वैतप्रपश्वसे शून्य-स्वतःप्रकाश आनन्दस्वरूप नसाका ही प्रतिपादन करती हैं और अ्रंमसे प्रतीयमान द्वैत- चस्तुका निषेध करती हैं। इसी श्रुतिसम्मस्त अद्वैततत्त्व्रका भगवान् बादरायणने अपने न्रषासूत्रोंसे भी प्रतिपादन किया है। और उसीको भगवत्पाद शक्कराचार्यने लोक- कल्याणार्थ विशद किया है। अन्य मतावलम्धियोंने जो खींचा-तानी की है, उसका तो उक्त श्रुतियोंसे ही निराकरण हो जाता है, अतः उनके विपयमें

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अधिक कुछ लिखनेकी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है'। यही अद्वैतन्रद्म माया- शवलित होकर समस्त प्रपञ्चके प्रति अभिन्न निमित्ोपादान होता है। श्रुतिसम्मत मायाका स्वरूप कुछ लोग मायावादका, जिसका कि आचार्यपादने वर्णन किया है, खण्डन करनेके लिए प्रस्तुत होते हैं। परन्तु उनका वह कथन केवल अज्ञान- मूलक ही है। पहले जिस मायावादका वे खण्डन करनेके लिए प्रस्तुत होते हैं, उनको यदि धर्मिकुक्षिप्रविष्ट मायाका परिज्ञान है, तो वे किसका खण्डन करेंगे। यदि नहीं है, तो खण्डनमें खण्डनीय वस्तुके परिज्ञानकी, जो कि सर्वतन्त्र- सिद्धान्तसम्मत है, आवश्यकता होनेके कारण उसके अस्तित्वाभावमें उनका खण्डन केवल उपहासास्पद ही होगा। अपि च भगवान् आचार्यपादने किस रूपमें मायाका अङ्गीकार किया है, उसे भी पहले समझना चाहिए, और उसे टटोलना चाहिए कि वह वेदसम्मत है? या नहीं। अनन्तर उसकी परीक्षा की जाय तो परीक्षा ठीक होती है, परन्तु ऐसा नहीं किया जाता। ऋग्वेदादिमें मायाशव्दका आचार्यसम्मत अर्थमें प्रचुररूपसे प्रयोग किया गया है। जैसे कि - मायाविन वृत्रमस्फुरन्निः भायिनो दानवस्य माया अपादयत् [ म० २ सू० ११ म० १-१०] श्रुतस्य महीं मायाम् कवितमस्य मायाम् [म० ५ सू० ९६५-६] निर्माया उत्ये असुरा अभूवन् त्वञ्च मा वरण कामयासे। . ऋतेन राजन्ननृत विविंचन्मम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि [म० १० सू० १२४ मन्त्र ५] मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं श्रुष्णमवातिर: [ म० १ सू० १२] माथिनाममिनाः प्रोत माया: [म० १ सू० ३२ ] इस प्रकारके मायाशब्दघटित अनेक वाक्य ऋग्वेदादिमें उपलब्ध होते हैं। उनका उपक्रमोपसंहार आदिके आधारपर निर्णय करनेसे वही मायाशव्दार्थ लव्घ होता है जो कि पूज्यपाद श्रीशक्कराचार्यजीने माना है। आचार्यपादने वार-चार कहा है कि सत्यस्वरूप तत्त्वज्ञानसे असत्यस्वरूप मायाकी निवृत्ति होती है-यही वात ऋग्वेदके 'ऋतेन राजन्' (सत्यसे अनृतकी अर्थात् मायाकी निवृत्ति होती है) इत्यादि मन्त्रसे स्पष्ट भासती है; एवं-

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इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते। मायान्तु प्रकृति विद्यात् मायिनन्तु महेश्वरम् । मायामेतां तरन्ति। अनृतेन ही प्रत्यूढाः । इत्यादि अन्याऽन्य श्रुतिवाक्य भी उक्तार्थमं ही प्रमाण हैं। और मांयाको अनिर्वचनीय मानना भी श्रुतिने ही बतलाया है-'न सत् तन्नासदुच्यते' अर्थात् गाया सत्त्व और असत्त्वसे रहित है-अनिर्वचनीय है। पूर्वापरभावका विचार न करके जो लोग अपनी निरालग्व बुद्धिके आधारपर विचार करते हैं, उनसे वेदके यथार्थ अर्थकी आशा नहीं करनी चाहिए, च्योंकि ऐसे पुरुपोंसे दमेशा श्रुति डरा करती है, इस अर्थका पोपक- 'विभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति। इतिहास-पुराणाभ्यां वेनं समुपबृंहयेत् ।।' इस प्रकार प्रसिद्ध वचन भी मिलता है। और मायाशव्दका लोकपरसिद्ध अर्थ किया जाय, तो भी वही अर्थ होता है, जो कि आचार्यचरणने माना है, क्योंकि कोपकारोंने मायाशब्दके छद्म, कापटय, इन्द्रजाल और मिथ्यावुद्धिहेतु अज्ञान अर्थ माने हैं। यदि माया- शब्द उक्त अर्थवाला नहीं होता, तो इस अनादिपवाहकी गति कैसे होती? और सूत्रकार बादरायणको भी यही बात सम्मत है, क्योंकि यह बात वेदान्तजगतूमे प्रसिद्ध है कि एकके विज्ञानसे सभी वस्तुका विज्ञान हो जाता है। इसी विचारको लेकर सूत्रकारने 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टानतानुपरोधात्' 'तदनन्य- त्वमारम्भणयव्द्रादिभ्यः प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छव्देभ्यः' इत्यादि सूत्रोंसे प्रतिज्ञा और दष्टान्तके अनुसार त्रदाको जगत्की प्रकृति माना है और कार्यकी न्रमसचासे पृथक् सत्ताका खण्डन किया है। एवमेव आकाशादिकी ब्रह्ममें अध्यस्तता गानी है। इसीसे यह परिम्फुट है कि प्रतिज्ञावाक्य औरोंसे प्रधान है, उस प्रतिज्ञावाक्यकी तभी उपपतति हो सफती है जब कि विवर्तवादका आश्रयण किया जाय, अन्यथा नहीं हो सकती, कारण कि एकके विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा करके दष्टान्त दिया गया है कि 'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्टेन सर्व मृण्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव

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[ R० ] संत्यम्' इस श्रुतिकी आचार्यपादकी प्रणालीके सिवा अन्य प्रणालीसे उपपत्ति नहीं हो सकती है। इस श्रुतिमें एकविज्ञानसे सर्वविज्ञान जो प्रतिज्ञात है, वह तत्-तत् व्यक्तित्वरूपसे विवक्षित नहीं है, किन्तु मुमुक्षुके लिए जो अभीष्ट ज्ञान है, उसका प्रतिपादन करती है। वह है-मोक्षसाधनीभूत अद्वितीय ब्रह्मज्ञान । श्रुति जिसका प्रतिपादन करना चाहती है, उसमें शिष्यको शङ्का हो कि द्वैत प्रपश्च तो विद्यमान है, फिर कैसे अद्वितीयत्वका ज्ञान हो सकता है? तो इस शङ्काका परिहार करनेके लिए 'यथा सोम्यैकेन' इत्यादि श्रुतिकी प्रवृत्ति हुई है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे शुक्तिमें आरोपित रजतादिका और रज्जुमें आरोपित सर्पादिका स्वरूप शुक्ति आदि ही हैं, क्योंकि आरोपितकी अधिष्ठानसे अतिरिक्त सचा नहीं हो सकती। अतः शुक्ति आदिके तत्व्र- ज्ञानसे उनमें आरोपित सकल पदर्थोंका सत्त्व विदित हो जाता है, आरोपित रजतादिका तत्त्व शुक्ति आदि है और यथार्थ ज्ञान भी वही हो सकता है, जो तत्त्वावगाही हो। जो तत्त्वावगाही ज्ञान नहीं होता, वह मिथ्याज्ञान है। अतः शुक्तिमें रजतका ज्ञान मिथ्याज्ञान है, इसलिए उक्त श्रुतिमें एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानका जो कथन है, वह भी अधिष्ठानभूत सत्य वस्तुके विज्ञानसे आरोपित पदार्थोंका स्वरूपविज्ञान विवक्षित है याने न्रह्मभूत अघिष्ान- की सचासे पृथक द्वैतपदार्थोंकी वास्तविक सत्ता नहीं है, अतः वे मिथ्याभूत ही हैं। इस प्रकारका ज्ञान विवक्षित है,। 'सदेव सोम्येदम्र आसीत्' इत्यादि छान्दोग्योपनिषद्का उपक्रम भी उक्त ज्ञानकी सम्पत्तिके लिए ही है, यह समझना चाहिए। विस्तारभयसे प्रकृतमें विचार नहीं करते। यदि इतरमतोंका अवलम्वन किया जाय, तो श्रुतिका प्रतिज्ञा-दष्टान्तवाक्य कभी नहीं युक्तियुक्त होगा। इसलिए जिनकी आशक्का है कि निर्विशेष अद्वैतवाद सूत्रकारको सम्मत नहीं है, उसका 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा' इत्यादि सून्रोंसे स्पष्ट खण्डन हो जाता है, अतः उनका कथन आ्रान्त है। यदि विवर्तवाद न मान कर परिणामवाद माना, जाय, तो यह प्रश्न भी उपस्थित हो सकता है-ब्रह्म एक देशसे परिणत होता है, या सर्वात्मना परिणत होता है ? यदि प्रथम पक्ष माना जायगा, तो सावयवत्वकी प्रसक्ति होगी और निरवयवप्रतिपादक श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। यदि द्वितीयपक्ष माना जायगा, तो ब्रह्मसे अतिरिक्त विकारकी अनवस्थिति और ब्रह्मका अभाव प्रसक्त होगा।

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अतः इसी पूर्वपक्षकी 'कृतस्नप्रसक्तिनिरवयत्वशब्दकोपो वा' इस सूत्रसे उत्थान करके 'श्रुतेस्तु शब्द्मूलत्वात्' इससे आपाततः समाधान करके 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' इस सूत्रसे सूत्रकारने विवर्तवाद के आश्रयणसे ही समाधान किया है कि जैसे स्वप्नद्रष्टा जीवका उसके स्वरूपके अनुपमर्दसे परिणाम न होनेपर भी अनेक प्रकारकी रथादि सृष्टिका प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही ब्रह्ममं भी स्वरूपके अनुपमर्दसे अनेकाकार सृष्टिका भास होता है। वाचस्पत्तिमिश्रने भी कहा है कि 'अनेन 'फुटितो मायावादः' अर्थात् इससे मायावादका स्पष्टीकरण हो ही जाता है। यद्यपि सूत्रकारका अभिमत मायावाद (विवर्तवाद) अत्यन्त स्पष्ट है, तथापि प्राक्तन कर्मविशेषोंके प्रभावसे और सम्प्रदायशुद्ध शास्त्रीय परिज्ञान न होनेके कारण मनुप्यस्वभावोचित भमका होना स्वाभाविक है; फिर भी उपक्रम आदि तात्पर्यनिश्चायक प्रमाणके अनुसार विज्ञ जनोंसे साम्प्रदायिक अध्ययन करनेपर उक्त भ्रम अपने-आप मिट जाता है। कुछ लोगोंकी इस विषय में भी विप्रतिपत्ति है कि ब्रह्मसूत्रोंमें ब्रम्मज्ञानसे मोक्षरूप फल नहीं वतलाया गया है, अतः तरदाजिज्ञासा क्यों करनी चाहिए? परन्तु यह भी असअत है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहारके सूत्रोंको देखनेसे यह शक्का विलीन हो जाती है। जैसे-पहले उपक्रमका सूत है-'अथातो न्रदा जिज्ञासा'। साधन चतुष्टय सम्पन्न पुरुषोंको त्रपाजिज्ञासा क्यों करनी चाहिए? इस प्रकारकी शक्काका समाधान उपसहारके 'अनावृत्तिः शव्दात् अनावृत्तिः शव्दात्' इस सूत्रसे स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि व्रपाजिज्ञासा करनेसे उस पुरुपकी संसारमं आवृत्ति नहीं होती है, ऐसा 'न स पुनरावर्तते' इस श्रुतिसे ज्ञात होता है। सूक्ष्म विचारसे इन सब पूर्वपक्षोंका समाधन हो सकता है, अतः मायावाद श्रुति-स्मृति-सूत्र-सग्गत है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिए, और उसीका आचार्य गौडपाद और आचार्य शक्राचार्यजी द्वारा विस्तार किया गया है, जिससे कि साधारण मनुष्योंका उपकार हो। भगवदवतार श्रीआचार्यपादके मुखागबुजसे निकले हुए वचनोंके अनुसार अद्वैततत्त्वके प्रतिपादनके लिए मिन्न-मिन्न झैलियोंसे जिन आचार्योंने सिद्धान्त- मेद वतलाये हैं, उनका तत्-तत् अन्थोंसे शब्दसंक्षेप द्वारा सङ्गह करके श्रीअप्पय्यदीक्षितने इस अन्थमें संद्ह किया है। इस ग्रन्थकी उपयोगिता,

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मौलिकता आदिके विषयमें यही प्रमाण सर्वोच हो सकता है कि इसके प्रणेता अप्पय्य दीक्षित हैं। इस ग्रन्थमें अप्पय्यदीक्षितजीने निम्नलिखित मतोंका सङ्गह किया है-

(१) प्रकटार्थकारका मत (२१) भारतीतीर्थका मत (२) विवरणकारका मत (२२) तत्त्वशुद्धिकारका मत (३ ) विवरणके एकदेशियोंका मत (२३) न्यायचन्द्रिका कारका मत (४) संक्षेपशारीरककारका मत (२४) पञ्चदशीकारका मत (५) वार्तिककारका मत (२५) तत्त्वप्रदीपिकाकारका मत (६) आचार्य वाचस्पतिमिश्रका मत (२६) तत्त्वशुद्धिकारका मत (७) कौमुदीकारका मत (२७) कवितार्किकका मत (८) माया और अविद्याके मेदवादियों- (२८) पञ्चपादिकाकारका मत का मत (२९) न्यायसुधाकारका मत (९) उक्त भेदवादियोंके एकदेशी- (३०) विवरणवार्तिककारका मत का मत (३१) शास्त्रदीपिकाकारका मत (१०) माया और अविद्याके अभेद (३२) न्यायरत्मालाकारका मत वादियोंका मत (३३) अद्वैतविद्याचार्यका मत (११) पदार्थतत्त्वनिर्णयकारका मत (३४) विवरणोपन्यासकारका मत (१२) विवर्तवादियोंका मत (३५) न्यायनिर्णयकारका मत (१३) परिणामवादियोंका मत (३६) वेदान्तकौमुदीकारका मत (१४) सिद्धान्तमुक्तावलीकारका मत (३७) शास्त्रदर्पणकारका मत (१५) प्रकटार्थविवरणकारका मत (१८) चित्सुखाचार्यका मत (१६) सत्त्व-विवेककारका मत (१७) नैष्कर्म्यसिद्धिकारका मत (३९) रामाद्वयाचार्यका मत (४०) आनन्दवोघाचार्यका मत (१८) ब्रह्मानन्दका मत (१९) हग्दृश्यविवेककारका मत (४१) अद्वैतदीपिकाकारका मत (४२) दृष्टिसृष्टिवादियोंका मत (२०) कल्पतरुकारका मत (४३) सृष्टिदृष्टिवादियोंका मत इनसे अन्य भी कई मतोंका उपन्यास किया है। भगवान् शङ्कराचार्यजी द्वारा प्रतिपादित अद्वैत सिद्धान्तोंका कितने गौरव और श्रद्धाके साथ अनेक आचार्योंने स्वीकार किया है, यह इसी ग्रन्थके

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अध्ययनसे ज्ञात हो सकता है। आचार्यपादके सिवा अन्य कोई सिद्धांन्त नहीं है, जिसका कि इतने आदरसे अनेक प्रगल्भ पण्डितों द्वारा आदर किया गया हो। ऐसे विशिष्ट ग्रन्थकी हिन्दी भाषा हो जानेसे उन लोगोंको अवश्य आनन्द मिलेगा जो लोग अनुदित हिन्दी भापाके समझनेमें अच्छी व्युत्पत्ति रखते हैं। हिन्दी भापाके सारल्यम अत्यन्त ध्यान रखा गया है, और जहाँ मूलमें काठिन्य मालूम हुआ है, वहाँ टिप्पणी द्वारा उस अंशको ठीक-ठीक साफ करनेकी न्ेष्टा की है। विशेषतः टिप्पणीमें यह भी बतलानेका अधिक यतन किया गया है कि जिन ग्रन्थोंसे मूलकारने मत लिया है, उन अ्न्थोंकी अक्षरशः पड्क्तियाँ रखकर उनके पृष्ठाव्व भी दिये हैं और उनका भाव भी लिखा है। दूसरी बात इस ग्रन्थमें माये हुए मतोंका संक्षेपसे आकलन हो, इसलिए साथ-साथ वेदान्तसूक्तिमज्जरीका भी अनुवादके साथ समावेश किया गया है। इसके रचयिता श्रीपरमहंसपरिवाजकाचार्य गन्ाघरसरस्वतीथे। ये अच्छे शास्त्रवेग होंगे, ऐसा उनकी सूक्तिमख्जरीकी रचनासे ज्ञात होता है, इससे अधिक उनके विपयमें जाननेकी सामग्री नहीं मिल सकी है। जिस आनन्दकन्द परमेश्वरकी असीम कृपासे इस सिद्धान्तलेशका अनुवाद- प्रकाशन कार्य निर्चिन समाप्त हुआ है, उसको सहस्रशः प्रणाम करते हुए विश्रान्ति लेते हैं।

काश़ी। वसन्तपश्तमी १९९३ मूलशङ्कर व्यास

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I श्रीः ।।

सिद्धान्तलेश-सङ्ग्रहकी विषय-सूची

प्रथम परिच्छेद [पृ० १-२६२ ]

विषय पृष्ठ-पंक्ति

अपूर्वनिधि, नियमविभि और परिसत्षयाचिधिका निरूपण ... ४ - १

स्रवणविधिमें अपूर्वनिधित्वका निरूपण ... १० -५

व्रहाये लक्षणका विचार ५३ - ५ ... ... मरदामे कारणत्वका विचार ५७- १० ...

मायारक कारणत्वका विवार ७४ - ६ ... जीय और इसरके स्वरूपका विचार ८१- ९ ...

जीवके धकत्व और अनेकत्व का विचार १२१ - १

मसमे कनृत्वका प्रतिपादन १२२- १२ .. .. . ...

मलके सर्वमत्पका समर्थन १३७-८ ... ... गृसिकी उपयोगिताका विचार ... १४३- २

मृसिका निषय्क साथ सम्बन्ध-विचार १४६- ८ .. अमेदकी अिव्यक्तिक स्वरूपका निरूषण १५२ - ६

आवर्णाभिभवर्क स्वमूपका निरूपण १५७ - ६ + :.

मासकि स्वरू्पका निरूपण १८० - १ . . . ...

अज्ानसे साक्ीके अनावृतत्वका निरूपण १९३ -१ ..

माक्षीरूप आनन्द्म अनाववत्वका निरुपण १९५ - ३

अरक्वार आदिके अनुसन्धानफा निरुमण ... २०६ - १ ...

ग्रकारण अध्यासका निरूपण ... २१४ - १

वृचिके निर्गमनकी आवध्यकताका निरूपण २४७ - ५ ...

द्वितीय परिच्छेद [पृ०२६३-४१४]

प्रत्यक्षसे अद्वैतथुतिके अवाधित्वका निरूपण २६३-८ ... प्रत्यक्षसे आगमके मावव्यका विचार २७९ - ५ ... उपजीव्यत्वरूपसे भी प्रत्यक्षसे श्ुतिके अवाधित्वका विचार ३०८ - ५ ...

प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण ... ३१६ - १ ...

स्वाम पदार्थोंके अधिष्ानका निरूयण ३४० -८ ...

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( १ )

स्वाम पदार्थोंके अनुभवनप्रकारका निरूपण ... ... ६४१ - १

सृष्टिके कल्पकका निरूपण १५६ - १

मिथ्या अर्थकी अर्थ-क्रियाकारिताका निरूपण ३६६ -५ ... मिथ्याके मिध्या होनेपर भी ग्रपश्तके मिथ्यात्वका उपपत्ति १७४- ६ ...

जीवोपाधिके भेदका विचार ... ... उपाधिके मेदसे भी 'मैं सुखी है' इत्यादि अनुसन्धानका विचार जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ११८ - ५

तृतीय परिच्छेद [पृ० ४१५-५१०]

ज्ञानकी उत्पचतिमें करमोंकी उपयोगिताका विचार ... ४१५ -१

श्रुति द्वारा विनियुक्त कर्मविदेपोंका प्रतिपादन .. ...

विद्यार्थकमोंमें नवर्णिकोंके अधिकारका निरूपण .. ..:

विद्यार्थकमोंमें शूद्रके अनधिकारका कथन ...

संन्यासकी विद्योपयोगिताका निरूपण .. ... अ्रवण आदिमें क्षत्रिय और वद्योंके अधिकारका कथन ..* :< -4 अमुख्य अधिकारी द्वारा किये गये कर्मोंकी जन्मान्नरीय विवयासे उपयोगिता ... ... .. विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण ... ... ब्रह्मसाक्षात्कारमे करण-विचार .. ... ४६-4

ब्रह्मसाक्षात्कार में शाव्दापरोनत्वका विचार ४७ - १ अज्ञानके निवरतकका निरूपण ... ... ४८Y-८

ब्रहाज्ञानके विनाशकका विचार ... ... .. 4 ५०३ -४

चतुर्थ परिच्छेद [ पृ० ५११-५५६]

अविद्यालेशका निरूपण ... अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार मोक्षके स्वतःपुरुषार्थत्वका विचार ..

... ... मोक्षके प्राप्यत्व और अप्राप्यत्व का विचार ... ४२१-१ मुक्तके त्वरूपका विचार .. ... ...

इति।

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श्रीगणेशाय नमः । सिद्धान्तलेशसड्ग्रह [भापानुवादसहित ]

प्रथम परिच्छेद अधिगतभिदा पूर्वाचार्यानुपेत्य सहस्रधा सरिदिव महीभेदान् सम्प्राप्य शौरिपदोद्गता।

जननहरणी सृक्तिर्व्रह्माद्वयैकपरायणा ॥१॥

जैसे भगवान् श्रीहरिके चरण-कमलसे निकली हुई गङ्गाजीनें अनेक प्रदेशोंको प्राप्त होकर हजारों मेद धारण किये, वैसे ही व्याख्यान करनेवाले , अनेक पूर्वाचार्योंको व्याख्येयरूपसे प्राप्त होकर हजारों मेदोंको प्राप्त हुई, शुद्ध अद्वितीय न्रद्मका प्रतिपादन करनेवाली अत एव जन्मका नाश करनेवाली मगवान् शक्कराचार्यके सुन्दर मुख-कमलसे निकली हुई (भाष्यरूपा) सुललित वाणी सर्वोत्कृष्ट है अर्थात् में उसे प्रणाम करता हूँ # ॥ १ ॥

• ग्रन्थाध्ययनमें मनुद्योंकी प्रवृत्ति होनेके लिए ग्रन्थके आरम्भमें विषय, प्रयोजन, अधिकारी और सम्पन्य ये चार अनुबन्ध बतलाये जाते हैं। प्रकृत श्लोकमें 'ब्रहमााद्वयैक- परायणा' विशेषणसे प्रपशशन्य सचिदानन्द व्रक्ष सृक्तिपदसे सूचित भाव्यका विषय तथा 'जननहरणी' पदसे मुकिरुप प्रयोजन बतलाया गया है। मुफिको चाहनेवाला इसका अधिकारी है और सुकि प्राम्य और अधिकारी प्राप्त करने वाला है इस प्रकार प्राप्यप्रापकभाव सम्बन्ध है, यद अर्थतः सूचित होता है। अतः निरवधिक सुख चाहनेवालेको इस ग्रन्थके अध्ययनमें अवश्य प्रशृत दोना चाहिए, क्योंकि 'यह मेरा इट साधन है' ऐसा ज्ञान प्रवर्तक होता है। निरधिक सुससे बढ़कर अन्य कोई दुष नहीं हो सकता। इस प्रकार भाष्यरूप शास्त्रके विषय, प्रयोजन आदि अनुबन्धोंका प्रतिपादन करते हुए अ्रन्थकारने भाष्यके ग्रकरण-एक- देशरूप होनेरे अपने ग्रन्थके भी वे ही विषय, प्रयोजन आदि हैं, यह सूचित किया है।

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सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद २

प्राचीनैर्व्यवहारसिद्ध विषयेष्वात्मैक्यसिद्धौ परं सन्नह्यद्द्रनादरात् सरणयो नानाविधा दर्शिताः । तन्मूलानिह सड्ग्रहेण कतिचित् सिद्धान्तभेदान् धिय- ऋशुद्ध्थे सङ्कलयामि तातचरणव्याख्यावचःख्यापितान् ॥२॥ तेषूपपादनापेक्षान् पक्षान् प्रायो यथामति। युक्त्योपपादयन्नेव लिखाम्यनतिविस्तरम् ॥ ३॥

आत्माके ऐक्यकी अर्थात अद्वितीय आत्मतत्त्वकी सिद्धिमें परम तात्पर्य (अत्यन्त आदर) रखनेवाले प्राचीन आचार्योंने केवल अ्रमसे प्रतीत होनेवाले जीव, ईश्वर और जगतरूप पदार्थोंमें आदर न होनेसे परस्पर विरुद्ध अनेक प्रकार-मार्ग दिखलाये हैं। इस ग्रन्थमें, प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रदर्शित उन्हीं अनेक मार्गोंके आधारपर पूज्य पिताजीके व्याख्यारूप वचनोंसे वोधित कुछ सिद्धान्तोंका, अपनी बुद्धिकी विशदताके लिए, मैं संकलन करता हूँ॥२॥* प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रदर्शित उन विविध सिद्धान्तोंमेंसे उपपत्तिकी अपेक्षा रखनेवाले सिद्धान्तोंका अपनी बुद्धिके अनुसार युक्तिसे उपपादन करता हुआ मैं संक्षेपसे चित्रण करता हूँ॥। ३॥

यहाँपर शङ्का होती है कि जसे भिन्न-भिन्न वस्तुओंमें अभिनिवेश होनेसे भेदवादियों के वचनोंमें प्रामाण्य नहीं है, चैसे ही अद्वैतियोंमें कोई आचार्य एक जीव मानते हैं, तो कोई अनेक जीव मानते हैं, कोई जीवको, प्रतिविम्ब मानते हैं, तो किसीके मतमें प्रतिविम्व ही ईश्वर है और किसीके सतमें विम्ब ईश्वर है इत्यादि विरुद्ध पक्षोंमें अभि- निवेश रखनेवाले प्राचीन आचार्योंके मतमें भो आस्था कैसे हो सकती है। परन्तु इस शब्ाका परिहार श्रोकमें कहे हुए 'अनादरात्' शब्दसे हो जाता है। उन उपर्युक्त पक्षोंमें आचार्योंका आदर-तात्पर्य नहीं है, किन्तु विवक्षित जो जीव और ब्रह्मका अभेद है, उसके यथार्थ ज्ञानके लिए उपायरूपसे वे वतलाये गये हैं। अतः वे अनेक मार्ग दोषावह नहीं हैं, प्रत्युत अलद्ठारके लिए ही हैं, क्योंकि मनुष्योंकी बुद्धि भिन्न-भिन्न है। अत एव किसी एकको किसी एक प्रकारसे और अन्यको अन्य प्रकारसे ब्रह्मात्मत्वका ज्ञान होगा। अतः उक्त शङ्गाका अवसर नहीं है। 'यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि। सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वी सा चानवस्थिता।' यह सुरेश्वराचार्यका वाक्य भी इसी अर्थका समर्थक है, इसका भाव यही है कि जिस जिस प्रक्रियासे पुरुषोंको आत्म-सम्बन्धी ज्ञान हो, वही प्रक्रिया उनके लिए निर्दुष्ट है। और वह प्रक्रिया अनेक प्रकारकी हो सकती है। [ क्योंकि संसारमें मनुष्योंकी बुद्धि एक प्रकारकी नहीं है]। इस श्लोकसे ग्रन्थकारने अपने चिकीर्षितका-अभीष

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विधिविचार ] भापानुवादसहित

[वेदान्तसूक्तिमञ्जरी ] तरणिशतसवर्ण कर्णघूर्णद्द्विरेफा- वलिवलितकपोलोद्दामदानाभिरामम् ।। गिरिशगिरिसुताभ्यां लालितं नित्यमढ्े स्वजनमरणशीलं शीलये विघ्नराजम् ॥ १ ॥

सिद्धान्तलेशसिद्धान्तान् कारिकाभिनिदर्शये ॥ २॥ अपूवी नियमोऽन्यस्य परिसङ्खयेति च क्रमात्॥। न्रयो हि विधयस्तेपु श्रोतव्य इति को विधिः ॥ ३॥ मैकड़ॉ सू्योंके समान तेजस्वी, कानोंके आघातसे इधर उधर उड़ते हुए भँवरोंसे आच्छादित गण्डस्थलोये अमतिदत गतिये बहते हुए मदजलसे सुशोभित, अपने भक्तोंका भरण-भोषण करनेवाले, श्रीमदददेवजी तथा पार्वतीजी दोनों अपनी गोदमें बैठाकर जिनफा नित्य लालन-पालन करते हैं ऐसे श्रीगणेशजी का मैं ध्यान करता हूँ ॥ १॥ मैं भगुयजीके सुन्दर चरणकगलोंगें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके सिद्धान्तलेशर्मे संगदीत विदान्तोंको फारिका ओसे दर्शाता हूँ ॥ २ ॥ अगूर्यनिधि, नियमविधि और परियमयाविधि इस प्रकार कमसे तीन विधियाँ कही गए है, उनमेसे 'ोतव्ः' (बरहासक्षारकारके लिए श्रवण करना चाहिए) · यह कौन गिषि है।। ३ ।। (१) तत्र तावत् 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः' इति अधीवसाअस्वाध्यायस्य वेदान्तैरापातप्रतिपञ्े व्रम्मात्मनि समुदितजिज्ञा सस्य तज्ज़ानाय वेदान्तथवणे विधिः प्रतीयमान: किंविध इति चिन्त्यते- सवे प्रथम यहांपर यह विचार किया जाता है कि जिसको अझोंके साथ समग्र वेदका अध्ययन करनेसे वेदान्तवाक्यों द्वारा साधारणरूपसे व्रप्ारूप आत्मा ज्ञात है और विशेपरूपसे वमको जाननेकी मबल इच्छा हुई है, उस पुरुपके विशेषरूपसे ऋज्ञानके लिए 'आत्मा वा अरे०' (हे मैत्रेथि ! आत्माका अपरोक्ष-साक्षात्कार करना चाहिए, श्रवण करना चाहिए और मनन करना चाहिए) इत्यादि श्रुतिसे वेदान्तोंके श्रवणमें विधिकी प्रतीति होती है, वह विधि किस प्रकारकी है? काव्यका-नदयेन भी किया है। 'तातचरण' इत्यादिवाययसे प्रन्थकारका वेदान्त- ज्ञान जानार्थपरम्पराप्रात द, यद भी सूचित होता है।

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सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

तिस्ः खलु विधेर्विधा :- अपूर्वविधि:, नियमविधिः, परिसङ्गया- विधिश्चेति। तत्न कालत्रयेऽपि कथमप्यप्रास्तस्य प्राप्तिफलको विधिराद्यः, यथा 'ब्ीहीन् प्रोक्षति' इति। नाऽन्र व्रीहीणां प्रोक्षणस्य संस्कारकर्मणो विना नियोगं मानान्तरेण कथमपि प्राप्तिरस्ति। पक्षप्रासतस्याऽप्राप्तांशपरिपूरणफलको विधिर्द्वितीयः। यथा 'ब्रीहीन-

विधिके तीन भेद होते हैं-अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसंख्याविधि । इन तीनोंमें से-[ दृष्ट या अदृष्ट अर्थके लिए] तीनों कालोंमें किसी भी प्रमाणसे जो प्राप्त नहीं है, उसकी प्राप्ति करानेवाली विधि अपूर्वचिधि है। जसे 'ब्रीहीन् प्रोक्षति' (ब्रीहियोंका-धानोंका प्रोक्षण करे) यहाँ ब्रीहियोंका प्रोक्षणरूप संस्कार-कर्म विधायक श्रुतिके बिना अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त नहीं है। [तात्प्य यह है कि दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें पुरोडाशके लिए ब्रीहियोंकी-धानोंकी अपेक्षा होती है। पुरोडाशके लिए अपेक्षित धानोंका जलसे प्रोक्षण करना पड़ता है। दृष्ट या अदष्ट किसी भी प्रयोजनके लिए अन्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे न्रीहि- प्रोक्षणकी प्राप्ति नहीं है, केवल 'ब्रीहीन् प्रोक्षति' इस विधायक वाक्यसे ही उसकी प्राप्ति है, इसलिए वह विधायक शब्द अपूर्वविधि है]। पक्षमें जो प्राप्त है उसके अप्राप्त अंशकी परिपूर्ति करनेवाली विधि नियम- विधि कहलाती है। [अपूर्वविधिसे नियमविधिमें यह विशेषता है कि नियमविधिमें श्रुतिके बिना भी अन्य प्रमाणसे एक पक्षमें क्रिया प्राप्त होती है। जत एक वस्तुमें एक क्रिया की जायगी, तब उस कालमें उसमें अन्य क्रिया नहीं की जा सकती, क्योंकि एक कालमें एक वस्तुमें दो क्रियाएँ नहीं हो सकतीं हैं, इसलिए पक्षान्तरमें ही भिन्न-मिन्न क्रियाएँ होंगी, जैसे चावल निकालनेके लिए जिस क्षणमें धान मूसलसे कूटे जाते हैं, उस क्षणमें नखोंसे उनका विदारण नहीं कर सकते और जिस क्षणमें नखोंसे विदारण किया जाय, उस क्षणमें कूटना नहीं वन सकता। इसलिए अन्य-अन्य पक्षमें ही उन क्रियाओंकी प्रसक्ति है। दर्श- पूर्णमासमें आये हुए पुरोडाशके लिए धानोंका छिलका अवश्य निकालना पड़ेगा, अन्यथा पुरोडाश ही नहीं वन सकेगा। अतः अर्थापत्तिरूप प्रमाणसे अवघात आदिकी विधायक श्रुतिके बिना भी प्राप्ति है। अपूर्वविधिमें ऐसा नहीं है।

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विधिविचार ] भांपानुंवादसहित ५

चहन्ति' इति। अत्र विध्यभावेऽपि पुरोडाशप्रकृतिद्रव्याणां व्रीहीणां

विधि:, किन्त्वाक्षेपादवहननप्रास्तौ तद्वदेव लोकावगतकारणत्वाविशेपात् नखविदलनादिरपि पक्षे प्राप्तुयादिति अवहननाप्रापांशस्य सम्भवात् तदंशपरिपूरणफलकः ।

इसी भावको 'यथा' इत्यादिसे अ्रन्थकार कहते हैं] जैसे 'न्रीहीनवहन्ति' (त्रीहियों- का अवघात करे अर्थात् चावल निकालनेके लिए मूसलसे धानोंको कूटे) ऐसा विधिवाक्य है। 'प्रकृतम अवधातका विधान न भी किया जाय, तो भी ब्रीहियोंका, जो पुरोडाशके प्रकृतिद्रव्य हैं, अवहनन तण्डुलनिष्पचिसे आक्षेप द्वारा ही प्राप्त हो जायगा, इसलिए अवघातकी अपूर्व प्राप्ति करानेके लिए यह विधि नहीं है। [ स्पष्टार्थ यह है कि दर्श और पूर्णमास यागमें आग्नेय आदि यागोंके उत्पत्तिवाकयमें (आग्नेयोऽष्टाकपालो भवति) पुरोडाशद्रव्यका विधान किया गया है और उस स्थलमं यागका अनुवाद कर ब्रीहियोंका भी विधान है। यद्यपि न्ीहि यागके साक्षात् साधन नहीं हैं, तो भी पुरोडाशके प्रकृतिद्रव्य होनेसे न्रीहियोंमें परग्परासे यागसाधनत्व है, क्योंकि व्रीहिसे उत्पादित चावलोंका वना हुआ पुरोडाश़ ही यागका साक्षात् कारण है। इसी प्रकार चावलकी उत्पत्ति अवघातके बिना नहीं हो सकती है, इसलिए वह तण्डुलो- त्पचति भी अवश्य अपने अवघातरूप कारणका आक्षेप करेगी, क्योंकि अन्वय और व्यतिरेकसे चावलके उत्पादनमें अवघात कारणरूपसे निश्चित है, अतः 'ब्रीहीनवहन्ति' विधिके बिना भी पूर्वोक्त प्रणालीसे व्रीहिका अवघात प्राप्त है, अतः उक्त वाक्य अपूर्व अर्थका प्रतिपादक नहीं हो सकता। यदि अवहनन लोकसे प्राप्त हे, तो उसीसे नित्य प्राप्त हो? इसपर 'किन्तु' इत्यादि- से कहते हैं] परन्तु जैसे तण्ड्ररुनिष्पतिसे आक्षेप द्वारा अवहननकी प्राप्ति होगी, वैसे ही लोकमं [ चावल बनानेमं ] ज्ञात जो कारण हैं, उनके सामान्य होनेसे पक्षमें नखविदलन [नखांसे छिलना ] आदि भी प्राप्त होंगे, इससे अवहननके अप्राप्तांशका सम्भव होनेसे अप्राप्तांशकी परिपूर्तिके लिए यह 'बीहीनवद्दन्ति' नियमविधि है। [अर्थात् पुरोडाशके लिए तण्डुलकी उत्पत्ति अवघातसे ही करनी चाहिए न कि नखविदलनसे। इस नियमविघिसे

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सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथमपरिच्छेद

द्वयोः शेपिणोरेकस्य शेषस्य वा एकस्मिञ्छेपिणि द्वयोः शेपयोर्वा नित्यप्रास्तौ शेष्यन्तरस्य शेपान्तरस्य वा निवृत्तिफलको विधिस्तृतीयः ।

यथा वा चातुर्मास्यान्तर्गतेष्टिविशेपे गृहमेधीये 'आज्यभागी यजति' इति। अभिचयने अश्वरशनाग्रहणम्, गर्दभरशनाग्रहणं चेति द्वयमनुष्टेयम्।

अप्राप्तांशकी परिपूर्ति होती है-सर्वदा अवघात ही प्राप्त होता है और दूसरे नखविदलन आदिकी अर्थात् निवृत्ति होती है।] दो शेषियोंमें-अङ्वियोंमें एक शेपकी-अङ्गकी नित्य प्राप्ति होनेपर एक शेषीकी निवृत्ति करनेवाली विधि परिसंख्याविधि है तथा एक शेपीमें दो शेषोंकी नित्य प्राप्ति होनेपर अन्य शेषकी निवृत्ति करनेवाली विधि भी परिसंख्याविधि है। जैसे अभिचयनमें 'इमामगृभ्णन्नशनामृतस्येत्यश्वाभिधानी- मादते ('इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रसे अश्वकी रशनाका-रस्सीका ग्रहण करे) अथवा चातुर्मास्ययागके अन्तर्गत गृहमेधीय इष्टिमं 'आज्यभागी यनति' (आज्यभाग याग करे) यह विधि है। अभिचयनमं दोनोंका-अश्वरशनाग्रहण

  • अम्निचयन नामका एक स्थण्डिल होता है। यह सोमयागका अम् है। चयन- ईंटोंसे बनाया हुआ स्थलविशेष। सोमयागकी उत्तर वेदीको चढ़ाकर वहाँ ईटोंसे चयनका निर्माण कर उसके ऊपर आवहनीय अनिको रखकर उसमें होम किया जाता है। यह स्थण्डिल अमिका आधार है, इसलिए उसका नाम भी अग्निचयन हुआ और उस स्थण्डिलपर किया जानेवाला यागविशेप भी अग्निचयन है, जिसका वर्णन (का० श्री०सू० १६।१ आदिमें) विस्तारसे है। अग्निक पांच भेद हैं-आवहनीय, आवसथ्य, स्य, गारहपत्य और दक्षिणाग्नि, इनका अग्निद्ोत्र आदिमें उपयोग होता है। * चातुर्मास्य नामके याग है, ये याग चार मासोमें अनुष्ठित होते हैं, अतः 'चातुर्मास्य' शब्दसे इनका व्यवहार किया जाता है। इनमें चार पर्व होते हैं-वैश्वदेव, वरुणप्रघास; साकमेघाः और शुनासीरीय। पहला पर्व फाल्गुनकी पूर्णिमामें, दूसरा चार मास वीतनके चाद आपाढ़की पूर्णिमामे, तीसरा कार्तिककी पूर्णिमामें और चौथा फाल्गुनकी शुक्क प्रतिपदामें पड़ता है, इस प्रकार वारंवार अनुष्ठानका आवर्तन होता है। गृहमेधीय नामकी इष्टि होती है। यह चातुमास्यान्तर्गत साकमेधार्यपर्वके, जो दो दिनमें निष्पन्न होता है, अनुष्ठानके पहले दिन सायंकालमें 'मरुद्भ्यो गृहमेधिभ्यः सर्वासां दुग्धे सायमोदनम्' इस वाक्यसे विहित है, इसमें ग्रहमेधी मरुत् देवता है, दूधमें पकाया हुआ चरु द्रव्य है और ऋषभ दक्षिणा है।

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विधिविचार] भापानुवादसहित ७

तत्राऽश्वरशनाग्रहणे 'इमामगृम्णन्' इति मन्त्रो लिङ्गादेव रशषनाग्रहण- प्रकाशनसामर्थ्यरूपान्नित्यं प्रामोतीति न तत्प्राप्त्यर्थः, तदप्राप्तांशपरि- पूरणार्थो वा विधिः, किन्तु लिङ्गाविश्येपात् गर्दभरशनाग्रहणेऽपि मन्त्रः प्राप्नुयादिति तन्निवृत्यर्थः । तथा गृहमेधीयस्य दर्शपूर्णमासप्रकृतिकत्वा- दतिदेशादेवाऽडज्यभागौ नित्यं प्राप्नुत इति न तत्र विधि: तत्प्राप्त्यर्थः, और गर्दभरशनाग्रइणका अनुषान होता है। ऐसी परिस्थितिमें रशनाके ग्रहणरूप अर्थके प्रकाशनसामर्थर्यरूप लिनप्रमाणसे ही 'इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रकी अश्वरशनाग्रहणमं नित्य म्राप्ति है। इससे 'अश्वाभिधानीमादत्ते' यह विधि अश्वरशनाग्रहणमें उक्त मन्त्रकी अपूर्वप्राप्ति करानेके लिए अपूर्वविधि नहीं है। अथवा उसके अपापतांशके परिपूरणरूप प्रयोजनके लिए नियमविधि भी नहीं है, किन्तु अर्थप्रकाशनरूप लिम्रके सामान्य होनेसे गर्दभकी रशना (रस्सी) के अहणमं भी 'इमाम०' इत्यादि मन्त्र प्राप्त होगा, इसलिए रासभकी रशनाके ग्रहणमें उस मन्त्रकी प्राप्तिकी निवृत्ति करनेके लिए 'अशवाभिघानी०' इत्यादि परिसंख्याविधि है। [परिसंख्याविधिके प्रथम लक्षणका समन्वय इस प्रकार करना चाहिए-दो शेपी हैं-अश्वरशनात्रहण और रासभरशनाग्रहण, उन दोनों शेपियोंमें लिम्प्रमाणसे 'इमामगृभ्णन्' इत्यादि शेपरूप मन्त्र नित्य "प्राप्त है और शोपीकी-गर्दभरशनाके ग्रहणकी निवृत्ति भी होती है-'इमाम- गृम्णन्' इत्यादि मन्त्रसे अश्वरशनाग्रहण ही करना चाहिए, गर्दभरशनाका ग्रहण नहीं करना चाहिए] उसी प्रकार दर्श और पूर्णमास गृहमेधीय इष्टिकी प्रकृति हैं, इसलिए प्रकृतिवत् विकृतिः कर्तव्या (प्रकृति यागमें जो उपयुक्त है, वही विकृति यागमें भी लेना चाहिए) इस प्रकारके अतिदेश वाक्यसे प्रकृति यागमें प्राप्त आज्यभाग गृहमेधीय विकृति यागमें प्राप्त होंगे ही, इसलिए

" दर्श-पूर्णमास शब्दरो छः याग लिए जाते हैं-आग्नेय याग, उपांध्ञु याग, अग्नीषोमीय याग, आग्नेग याग और दो साजाय्य याग। प्रथम तीन याग पूर्णिमाके दिन होते हैं और अन्तिम तीन याग अमावास्याके दिन होते हैं। आग्नेय याग पूर्णिमा और अमावास्या दोनों दिन होता है, इसलिए 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इत्यादिमें दर्शपूर्णमासशब्दसे उक्त छः यागोंका ग्रहण है। द्विपननकी उपपति दो त्रिकमें रहनेवाले तित्व-त्रित्वरूप दो धर्मोंके अभिप्रायसे विवक्षित है। दर्श और पूर्णमास सभी दृष्टियोंकी प्रकृति हैं, क्योंकि 'दर्शपूर्णमासाविष्टीना प्रकृति:' [आप० श्री० २४।३।३२] इत्यादि सूत्र इस अर्थमें प्रमाणभूत है।

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८ सिद्धान्त लेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

तन्नियमार्थो वा, किन्त्वतिदेशात् प्रयाजादिकमपि प्राप्तुयादिति तन्नि- वृत्यर्थः । गृहमेधीयाधिकरण-(१०-७-९)-पूर्वपक्षरीत्येदमुदाहरणं यत्र

न च नियसविधावपि पक्षप्राप्तावहननस्याऽप्राप्तांशपरिपूरणे कृते तद्वरुद्धत्वात् पाक्षिकसाधनान्तरस्य नखविदलनादेनिवृत्तिरपि लभ्यते इतीतरनिवृत्तिफलकत्वाविशेपान्नियमपरिसङ्खययोः फलतो विवेको न युक्त

'आज्यभागौ यजति' यह विधि अपूर्व आज्यभागकी प्राप्ति करानेके लिए नहीं है, अथवा अप्राप्त अंशके पूरणरूप नियमके लिए भी नहीं है, किन्तु अतिदेशवाक्यके साधारण होनेसे आज्यभागके समान प्रयाज आदिकी भी प्राप्ति होगी, इसलिए प्रयाज आदिकी निवृत्ति 'आज्यभागौ' इत्यादि विधिका प्रयोजन है। [यहांपर परिसंख्याविधिके द्वितीय लक्षणकी सक्कति इस प्रकार है-एक शेपी है-गृहमेघीय इष्टि, उसमें आज्यभाग और प्रयाज आदिरूप दो शेषोंकी अति- देशवाक्यसे प्राप्ति होनेपर उनमेंसे एक प्रयाज आदिरूप शेपकी निवृत्ति होती है, अतः द्वितीय लक्षण घट गया। यदपि अन्यतरत्वरूपसे परिसंख्याका एक ही लक्षण है, तो भी सुगमतासे लक्षणसमन्वय वतलानेके लिए विभाग करके दो लक्षण कहे गये हैं, यह जानना चाहिए। परन्तु पूर्वमीमांसामें सिद्धान्तरूपसे 'आज्यभागौ यजति' यह परिसंख्याविधि नहीं मानी गई है, अतः यहां इसका उदाहरण देना उचित नहीं है ? यदि इस प्रकारकी शङ्का किसीको हो, तो उसका निराकरण करनेके लिए 'गृहमेधीयाधिकरण' इत्यादिसे कहते हैं] यद्यपि गृहमेघीयाघिकरणमें यह पूर्वपक्षरूपसे उदाहरण है, तथापि [ परिसंख्याविधिके स्वरूपके प्रदर्शनमं ] कहीं भी उदाहरण दे सकते हैं, इसलिए यहां इसका उदाहरणरूपसे कथन किया गया है। यदि कोई शङ्का करे कि नियमविधिमें भी एक पक्षमें प्राप्त जो अवघात है, उसके अप्राप्तांशकी परिपूर्ति करनेपर तदवरुद्ध होनेसे- अवघातसे ही तण्डलकी उत्पत्तिसे होनेवाले आक्षेपकी शान्ति होनेसे- पाक्षिक नखविदलन आदि अन्य (ब्रीहिके छिलके दूर करके अन्य) साधनोंकी निवृत्ति भी होती है, इससे-नियमविधिमें इतरकी निवृत्तिरूप

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विधिविचार ] भापानुवादसहित ९

इति शङ्गयम्, वरिधितोऽ्वहनननियमं बिना आक्षेपलभ्यस्य नखविदल- नादेनिवर्तयितुमशक्यतया अप्रासांशपरिपूरणरूपस्य नियमस्य ग्राथम्यात् विधेयाचहननगतत्वेन प्रत्यासन्नत्वाच्च तस्यैव नियमविधिफलत्वोपगमाद्। तदनुनिप्पादिन्या अविधेयगतत्वेन विप्रकृष्टाया इतरनिवृत्ते: सन्निक्रष्टफल- सम्भवे फलत्वानचित्याद्। एवं विविक्तामु तिसृपु विधेविधासु किंविध: श्रवणविघिराश्रीयते।

प्रयोजनका भी लाभ होनेसे फलतः नियमविधि और परिसंख्याविधिम कोई मेद नहीं है?[ फलतः कहनेसे नियम और परिसंरूयामे स्वरूपतः भेद है, यह मादम होता है, क्योंकि नियमविधि पक्षमें प्राप्त अवघातक्रियाका विधान करती है और परिसंग्याविधि नित्य प्राप्त क्रियाका विधान करती है, इसलिए स्वरूपतः भेद होनेपर भी फलतः मेद नहीं है, यह शक्का हो सकती है] परन्तु ऐसी शक्ा करना युक्त नहीं है, क्योंकि विधिसे जब तक अवघातका नियम न किया जाय, तब तक तण्डलनिप्पतिसे होनेवाले आक्षेपसे प्राप्त नखविदलन आदिकी निवृत्ति नहीं की जा सकती, इससे अप्राप्तांसका परिपूरणरूप नियम ही प्रथम उपस्थित है, और साक्षात् विधिसे लभ्य अवघातमं ही (अप्राप्तांशकी पूर्ति होनेसे) अप्रापांशपरिपूरणरूप नियम ही विधिके प्रति प्रत्यासन्न-निकटवर्ती है, इसलिए अप्रासांझपरिपूरणरूप नियमको ही नियमविधिका फल मानना चाहिए, इतरनिवृत्ति नियमविधिका फल नहीं है, क्योंकि इतरनिवृत्ति अग्ाप्तांश- परिपूरणकी उपस्थितिके अनन्तर उपस्थित होती है और अविधेय जो नखविदलन है, उसमें रहनेके कारण निकटवर्ती नहीं है, इसलिए सन्निकृष्ट चस्तुम जब तक फलत्वका सम्भव हो, तव तक असन्निकृष्टमें (नखविदलन ादिकी निवृत्तिम) फलत्वकी कल्पना करना उचित नहीं है? पूर्वोक्त तीन प्रकारकी विधियोंमें से श्रवणविधि कौन विधि है? [ग्रन्थके इतने अंशसे अपूर्व, नियम और परिसंख्या चिधिका निरूपण किया गया, परन्तु 'श्रोतव्यः' यह श्रवणविधि अपूर्वविधि है या नियमविधि है अथवा परिसंख्या विधि है, इसका विचार नहीं हुआ, इसलिए पूर्वपक्षी पूछता है कि 'श्रोतव्यः' यह श्रवणविधि किस विधिके अन्तर्गत है अर्थात् उसको अपूर्वविधि मानना चाहिए या नियमचिधि मानना चाहिए अथवा परिसंख्याविधि मानना चाहिए?] २

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[प्रथम परिच्छेद १० सिद्धान्तलेश संग्रह

तन्नोपायापरिज्ञानादलौकिकसमीक्षणे।। प्रकटार्थकृतः प्राहुरपूर्व श्रवणे विधिम् ॥। ४ ॥ प्रकटार्थकार कहते हैं कि ब्रह्मसाक्षात्कारमें अवणरूप उपायका किसी प्रमाणसे परिज्ञान न होनेके कारण उक्त तीन विधियोंमें से श्रवणमें अपूर्वविधि है॥। ४॥ अत्र प्रकटार्थकारादय: केचिदाहु :- अपूर्चचिधिरयम्, अप्राप्तत्वात्। नहि 'वेदान्तश्रवण ब्रह्मसाक्षात्कारहेतुः' इत्यत्र अन्वयव्यतिरेकप्रमाण- इसपर प्रकटार्थकार आदि कहते हैं-'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि है, क्योंकि वेदान्तश्रवण अप्राप्त है, अर्थात् वेदान्तश्रवण ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, यह 'श्रोतव्यः' इस विधिको छोड़कर अन्य किसी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणसे नहीं जाना जाता। [परन्तु वेदान्तश्रवणमें न्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता अन्य प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, यह कहना युक्त नहीं है, क्योंकि वक्ष्यमाण अन्वय और व्यतिरेकरूप प्रमाणसे वेदान्तश्रवणमें न्रक्षसाक्षात्कारकी हेतुता प्राप्त है इसपर 'नहि' इत्यादिसे कहते हैं] चेदान्तका श्रव्रण ब्रह्मसाक्षात्कारका कारण है, इस कार्यकारणभावमें अन्वय या व्यतिरेक- * कार्य और कारणके अवधारणमें अर्थात् यह इसका कारण है और यह इसका कार्य है, इस प्रकारके कार्यकारणभावका निश्चय करनेमें अन्वय और व्यकतिरेककी आवश्यकता होती है। अन्वयके लिए बहुत जगहोंमें अन्वयसहचार और अन्वयव्याप्तिका भी प्रयोग देखा जाता है, इसी तरह व्यतिरेकके लिए व्पतिरेकव्याप्ति और व्यतिरेकसहचारका प्रयोग भी देख पढ़ता है। इसलिए कहींपर ऐसे शब्द आवें, तो घवराना नहीं चाहिए। कारणके रहनेपर कार्यका अवश्य रहना अन्वय है, जैसे-दण्डके रहनेपर घटका रहना। कारणके अभावमें कार्यका अभाव होना व्यतिरेक है; जैसे-दण्डरूप कारणके अभावमें घटरूप कार्यका अभाव होना अर्थात् दण्डके चिना घट कदापि उत्पन्न नहीं हो सकता। अतः इस प्रकारके अन्वय और व्यतिरेकके होनेसे दण्डमें घटकारणत्वका निश्चय होता है। यदि अन्वय और व्यतिरेक न हों, तो किसी भी वस्तुमें कारणत्वका निश्वय नहीं होगा। अन्वय और व्यतिरेकका अभाव होनेपर यदि वस्तुमें कारणत्व माना जाय, तो अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेक- व्यभिचार दोष प्राप्त होते हैं। अन्वयव्यभिचारका अर्थ है-अन्वय न होना अर्थात् कारणके रहनेपर भो कार्योत्पत्ति न होना और व्यतिरेकव्यभिचार-व्यतिरेकव्याप्तिका न रहना अर्थाव कारणके अभावमें भी कार्यकी उत्पत्ति होना। वे दोनों-अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेक- व्यभिचार दोष क्रमशः अन्यथासिद्धत्वज्ञानद्वारा और साक्षात् प्रतियोगित्वज्ञानद्वारा कारणत्व-ज्ञानमें प्रतिबन्धक होते हैं। भाव यह हैं कि पहला अन्वयव्यभिचार परम्परासे कारणत्वका चिरोधी है और दूसरा व्यतिरेकव्यभिचार साक्षात् कारणत्वका विरोधी है, क्योंकि कारण उसे कहते हैं जो अनन्यथासिद्ध होकर पूर्वक्षणमें कार्यके अधिकरणमें रहे, इसलिए

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विधिविचार 1 भांपांनुवादसहित ११

मस्ति। लोके कृतश्रवणस्याऽपि बहुशस्तदनुत्पत्तेः, अकृतश्रवणस्याऽपि गर्भगतस्य वामदेवस्य तदुत्पत्तेरुभयतो व्यभिचारात्। न वा 'श्रवणमात्रं

रूप कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि लोकमें प्रायः देखा जाता है कि वेदान्तथवण करनेपर भी आत्मसाक्षात्कार नहीं होता। और वेदान्तश्रवण न करनेपर भी गर्भाशयमॅ ही वामदेव मुनिको आत्माका साक्षात्कार हुआ था। इसलिए दोनों अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेकव्यभिचार हैं। [वामदेवके विषयमें श्रुति है कि 'गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच' (गर्भमें ही सोते हुए वामदेवने आत्म- ज्ञानके वलसे अपनी शक्तिका परिचय दिया-मैं मनु हुआ इत्यादि) इससे यह बात स्पष्ट होती है कि श्रवण न होनेपर भी वामदेवको आत्मज्ञान हुआ। यह कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि गर्भमें उसने श्रवण किया होगा, अत एव उसको आत्मज्ञान हुआ, क्योंकि गर्भमें श्रावयिताके अभावसे यह सब होना असम्भव है। परन्तु यहाँपर यह शक्का होती है कि गान्धर्वशास्त्रके (गानशास्त्रके) श्रवणसे पड्ज आदि स्वरोंका साक्षात्कार होता है, और गान्धर्वशास्त्रका श्रवण न होनेपर उन स्वरोंका साक्षात्कार नहीं होता, यह बात निर्विवाद है, इस परिस्थितिमें श्रोतव्य अर्थविशेपके-स्वरोंके साक्षात्कारके प्रति गान्धर्वशास्त्रविचाररूप श्रवणको कारण माननेकी अपेक्षा लाघवप्रमाणसे श्रोतव्य जितने अर्थ हैं उन सभीके साक्षात्कारके प्रति श्रवणमात्र कारण है, ऐसे कार्यकारणभावका ग्रहण करना उचित है, अतः ब्रह्मसाक्षात्कार और वेदान्त- वाक्यश्रवणका विशेपरूपसे कार्यकारणभाव न होनेपर भी सामान्यरूपसे आत्म- साक्षात्कार और वेदान्तश्रवणका परस्पर कार्यकारणभाव है, क्योंकि आत्म- साक्षात्कार श्रोतव्य अर्थका साक्षात्कार है और वेदान्तका विचार श्रवण है, इसलिए श्रोतव्य (विचारने योग्य) आत्मरूप अर्थके साक्षात्कारके प्रति वेदान्त-

यदि अन्वयव्यभिचार होगा, तो अनन्यथासिद्व नहीं होगा, और व्यतिरकव्यमिचार होगा तो कार्यके अधिकरणमें नहीं रहेगा। प्रकृतमें वेदान्तभ्रवणके रहते भी अनेक मनुष्योंको आत्माका साक्षात्कार नहीं होता और वेदान्तश्रवणके अभावमें भी वामदेव ऋषिको आत्माका साक्षात्कार हुआ था, अतः वेदान्तश्रवणमें अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेक- व्यभिचार दोप होनेसे लोकतः वह आत्म-साक्षात्कारके प्रति कारण नहीं है, यह भाव है। इसलिए श्रवणविधिको अपूर्वविधि मानना चाहिए यह प्रकटार्थकार आदिका अभिप्राय है।

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सिद्धान्तलेश संग्रंहं [प्रथम परिच्छेदं

श्रोतव्यार्थसाक्षात्कारहेतुः' इति शास्त्रान्तरश्रवणे गृहीतः सामान्यनियमो- डस्ति। येनाऽन्र विशिष्य हेतुत्वग्राहकाभावेऽपि सामान्यमुखेनैव हेतुत्वं प्राप्यत इत्याशङ्कयेत। गान्धर्वादिशास्त्रश्रवणस्य पड्जादिसाक्षात्कारहेतुत्वा- भ्युपगमेऽपि कर्मकाण्डादिश्रवणात् तदर्थधर्मादिसाक्षात्कारादर्शनेन व्यभि- चारात्। तस्मादपूर्वविधिरेवाडयम्।

विचारमें हेतुता प्राप्त ही है, तो 'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि नहीं हो सकती है, इस शह्काका 'न वा' इत्यादिसे परिहार करते हैं] और श्रोतव्यरूप अर्थके साक्षात्कारके प्रति श्रवणमात्र कारण है, इस प्रकारका सामान्य नियम भी गान्धर्व आदि अन्य शास्त्रके श्रवणमें गृहीत नहीं है, जिससे कि इस स्थलमें विशेषरूपसे हेतुताका ग्रहण करानेवाले प्रमाणके न रहनेपर भी सामान्य रूपसे [ वेदान्तश्रवणमें आत्मसाक्षात्कारकी ] हेतुता प्राप्त होगी, इस प्रकारकी आशक्का की जाय, क्योंकि षड्ज आदि साक्षात्कारके प्रति गान्धर्व आदि शास्त्रके श्रवणको हेतुरूपसे स्वीकार करनेपर भी कर्मकाण्ड आदि शास्त्रके श्रवणसे उसके धर्म आदि अदृष्ट अर्थका साक्षात्कार नहीं देखा जाता, इसलिए पूर्व- कथित सामान्य नियममें व्यभिचार है। इससे 'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि ही है। [ यद्यपि पूर्वमें सामान्य नियमके विषयमें लाघव वतलाया गया है तो भी धर्मके श्रवणस्थलमें अद्दष्ट रूपधर्म अथवा अलौकिक स्वर्गके साधनत्वसे विशिष्ट याग आदि धर्मका, प्रत्यक्षके अयोग्य होनेसे, साक्षात्कार नहीं देखा जाता] इससे पूर्वोक्त *षड्जादि सात प्रकारके स्व्रोंका संगीतशास्त्रमे वर्णन मिलता है-पड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पश्चम, घैवत और निषाद। इनकी उत्पत्ति श्रुतियोंसे मानी गई है। इस विषयमें संगीतरत्नाकरमें यों कहा गया है- श्षुतिभ्यः स्युः स्वराः षड्जर्षभगान्धारमध्यमाः । पञ्चमो धैवतख्वाथ निषाद इति सप् ते।। षड्जशब्दका लक्षण भी सज्वीतरत्नाकरके टीकाकारने बतलाया है- षण्णां स्वराणां जनकः षड्भिर्वा जन्यते स्वरैः। षड्म्यो वा जायतेऽङ्रेम्यः षड्ज इत्यभिधीयते॥ इसका अर्थ-इतर छः स्व्रोंका कारण, छः स्वरोंसे प्रकाशित होनेवाला भथवा कण्ठ आदि छः स्थानोंसे उत्पन्न होनेवाला स्वर पड्ज कहलाता है। इसी प्रकांर ऋुषभ आदिके भी लक्षण सङ्वीतरत्नाकरमें [ पृ० ३९ आनन्दाश्रम पूना, संस्करण ] वतलाये गये हैं।

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विधिविचार ] भापानुवादसहित १३

भाव्येऽपि 'सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत्' (३-४-४७) इत्यघिकरणे 'विद्यासहकारिणो मौनस्य वाल्यपाण्डित्य- वद्विधिरेवाऽडश्रयितव्यः, अपूर्वत्वाद्' इति-पाण्डित्यशब्दशव्दिते श्रवणे अपूर्वविधिरेवाडङ्गीकृत इति ।

सामान्य कार्यकारणभावमें व्यभिचार दोप है, अतः लाघव अप्रयोजक है अर्थात् लाघवके रहनेपर भी व्यभिचारके भयसे सामान्य नियम नहीं मान सकते। प्रत्युत गान्धर्वश्यासत्श्रवणका और पड्ज आदि साक्षात्कारका परस्पर कार्यकारणभाव है, क्योंकि उन्हींका अन्वय और व्यतिरेक देखनेमें आता है, यह भाव है, और इस विपयमें भाप्यकारकी सम्मति भी देते हैं-'भाप्येडपि' इत्यादिसे ]। भाष्यमें भी 'सहकार्यन्तरविधिः'* इस अधिकरणमें 'विद्याके सहकारी कारण निदिध्यासनकी भी वाल्य और पाडित्यके समान विधि ही माननी चाहिए, क्योंकि वाल्य और पाडित्यके समान निदिध्यासन भी अपूर्व है अर्थात् विद्याके साधनरूपसे अन्य ग्रमाणसे प्राप्त नहीं है' इस प्रकार पाण्डित्य कहलाने- वाले श्रवणमें अपूर्वविधिका ही अङ्गीकार किया गया है।

  • इस अधिकरणमें माध्यका अभिप्राय यह है-वृहदारण्यक उपनिपत्में इस प्रकारकी क्रुति है कि 'तस्मात् माद्माण: पाण्डित्यं निविध वाल्येन तिष्ठासेत् वाल्यक्व पाण्डित्यं च निर्विद् थ मुनिः'- चूंकि भूतकालीन व्राह्मणोंने श्रव्ण आदि साधनोंसे आत्माका साक्षात्कार करके सम्पूर्ण विक्षेपोंसे रहित जीवन्मुकिका व्यजक परमहंसाश्रम प्राप्त किया था, इससे ब्रह्मसाक्षास्कारके अभिलाषी आधुनिक त्राह्मण भी पाण्डित्य प्राप्त करके वालभावसे रहनेकी इच्छा करें और वाल्य और पाण्टित्यका सम्पादन करके मुनि-ध्यानशील हों। पण्डाशब्दका अर्थ है-विचार करनेके लिए उपयुक साधारण युद्धि, वह जिस पुरुपको प्राप्त है, वह पण्डितशब्दसे कहा जाता है। उस पण्टितका कार्य पाण्टित्य कहा जाता है। और छोटे वच्चेका जो कृत्य-दम्भ आदिका अभाव है, वह वाल्य कहलाता है, यद्यपि यथेष चेष्ा करना भी वालभाव है, तथापि विद्यामें उपयुक्त न होनेसे उसका यहाँ ग्रहण नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार मुनिशध्दका अर्थ-ध्यान है, क्योंकि व्यारा प्रमृति ध्याननिष्टोंमें ही मुनिशब्दका प्रयोग देखा जाता है। और ध्यानके चिना विचार मात्रसे शान्ति रखनेवाले पुरुषमं मुनिशब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता। इस परिस्थितिमें जैसे अपूर्व होनेसे श्रवण बिधि माना जाता है, वैसे ही विद्याकी उत्पत्तिमें सहकारी कारण मौनकी भी विधि माननी चाहिए, यह भाव है। सूत्रका अर्थ है-तहूतः-ध्रवण और मननके प्रभावसे जिसको तत्त्वनिर्णयरूप विद्या प्राप्त हुई है, ऐसे तत्त्वसाक्षात्कारकी अभिलापा करनेवाले संन्यासीके लिए पाण्टित्य और वाल्यकी अपेक्षासे तीसरे मौनका-ध्यानका भी विधान किया जाता है। यहाँ-

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१४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

विचारस्य विचार्यार्थनिर्णयं प्रति हेतुता।। अपरोक्षप्रमाणस्य तत्साक्षात्कारहेतुता ॥ ५ ॥ प्रासैव, किन्त्वियता भ्रान्तिः प्राप्ताऽन्यसाधनैः ॥ ततो नियम इत्याहु: सर्वे विवरणानुगाः ॥६॥ विचार विचारणीय अर्थके निश्चयके प्रति हेतु है, इस प्रकार अपरोक्षार्थविपयक प्रमाण अपरोक्षार्थसाक्षात्कारके प्रति हेतु है, यह प्राप्त ही है, किन्तु अनियत प्राप्ति है, अतः अन्य साधनोंके साथ श्रवणकी प्राप्ति होनेसे सन्देह होगा कि यह साधन है अथवा यह ? अतएव विवरणानुयायी सब आचार्य श्रवणको नियमविधि कहते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥ अन्ये तु-वेदान्तश्रवणस्य नित्यापरोक्षव्रह्मसाक्षात्कारहेतुत्वं न अप्रा-

कुछ लोगोंका मत है कि वेदान्तके श्रवणमें नित्य अपरोक्ष अर्थात् सदा प्रत्यक्षरूपसे भासमान आत्माके साक्षात्कारकी कारणता प्राप्त नहीं है, ऐसा नहीं है, अर्थात् विचारसे युक्त वेदान्तरूप श्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी कारणता

पर यह शङ्का होती है कि ध्यानकी विधि माननेकी कोई भावश्यकता नहीं है, क्योंकि जैसे रत्नके यथार्थ स्वरूपकी जिज्ञासा करनेवाला पुरुष स्वयं ही रत्नतत्त्वके ज्ञानके प्रवाहमें अर्थात रत्नकी ठीक पहचान करनेके लिए वार वार उसके परिदर्शनमें तत्पर होता है, वैसे ही आत्मतत्वसाक्षात्कारका अभिलाषी भी स्वयं ही ध्यानमें प्रवृत होगा, अतः मौनविधि व्यर्थ है ? इसपर कहते हैं- 'पक्षेण' अर्था सूत्रकार कहते हैं कि विद्यामें सहकारिभूत मानकी-निदिध्यासनकी विधिका भी स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि पक्षमें उसकी अप्राप्ति है। यद्यपि साक्षात्कारके लिए मनुष्य स्व्रतः ध्यानमें प्रवृत होता है, तो भी विषयदर्शनके प्रभावसे कदाचित् ध्यानकी अप्राप्तिका भी सम्भव है, अतः मौनविधि अपूर्वविधि नहीं है; परन्तु नियमविधि है, यह सिद्ध होता है। जब नियम- विधि सिद्ध हुई, तो उसके अतिक्रमण करनेपर नियमादृष्टका लाभ नहीं होगा और उसके अलाभसे साक्षात्कारका भी उद्य नहीं होगा, इसलिए स्व्रभावसे प्राप्त विपयदर्शनका प्रयत्नसे निवारण करके ध्यानमें ही प्रवृत्त होता है, यह 'पक्षेण' इसका भाव है। परन्तु ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें ध्यानविधि कैसे होगी? यदि मानोग, तो वाक्यभेद होगा, इसपर कहते है-विध्यादिवत्- अङ्गविधिके समान-जैसे प्रधानविधिके प्रकरणमें अवान्तरवाक्यभेदसे प्रयाजादि अग्ञकी विधि है, वैसे ही ब्रह्मविद्याके अङ्गभूत ध्यान आदिकी भी विधि है, यह भाव है। इस रीतिसे मौन विधिके नियमत्वकी सिद्धि होनेपर भाष्यमें जो 'अपूर्वत्व' शब्दका कथन है, वह पाक्षिक अप्राप्तिके सद्भावमें है। सूत्रके अनुसार 'पक्षमें प्राप्ति नहीं होनेसे' इस प्रकार न कहकर भाष्यमें 'अपूर्वत्वात्' (अपूर्व होनेसे) यह जो कहा है वह श्रवणको अपूर्वविधि वतलानेके लिए कहा गया है, और दृष्टान्त-दार्ध्टान्तिकका सद्भाव केवल अप्राप्तिमात्रमें ही विवक्षित है।

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विधिविचार ] भापानुवादस हित १५

सम् ; अपरोक्षवस्तुविपयकप्रमाणत्वावच्छेदेन साक्षात्कारहेतुत्वस्य प्राप्तेः शाव्दापरोक्षवादे व्यवस्थापनात्। तदर्थमेव हि तत्प्रस्तावः । न च तावता

न्यर्थमिष्यमाणसत्तानिश्वयरूपतत्साक्षात्कारहेतुत्वं श्रवणस्य न प्राप्तमिति

विधिके बिना भी प्राप्त है, क्योंकि अपरोक्ष वस्तुओंको विषय करनेवाले सभी प्रमाण साक्षात्कारके हेतु हैं, इसका शव्दापरोक्षवादमें (जिसमें शब्दसे भी अपरोक्ष ज्ञान होता है ऐसा प्रतिपादन किया गया है, उस प्रकरणमें) प्रतिपादन किया गया है। वेदन्तवाक्य व्रह्मके अपरोक्ष साक्षात्कारके जनक हैं, इस प्रकारकी वेदान्तोंमें अपरोक्षसाक्षात्कारकी कारणतासिद्धिके लिए ही शाव्दापरोक्षवादका उपक्म है। [ परन्तु इसपर यह शक्का होती है कि शाव्दरापरोक्षवादमें इसीकी सिद्धि की गई है कि अपरोक्ष वस्तुको विपय करनेवाला प्रमाण अपने विषयकी अपरोक्षप्रमा उत्पन्न करता है, इसलिए वेदान्तवाक्योंमें भी नित्य अपरोक्ष व्रद्ारूप अपने विषयके सामान्य अपरोक्ष ज्ञानकी कारणता प्राप्त होगी, किन्तु व्रद्मसचाका निश्चयात्मक जो साक्षात्कार है, उसकी कारणता वेदान्तोंमें प्राप्त नहीं होगी, और यह साक्षात्कार अर्थात् ब्रह्मसत्ताका निश्चया- त्मक साक्षात्कार विचारविशिष्ट वेदान्तरूप श्रवणसे ही हो सकता है, अन्यथा- यदि ऐसा स्वीकार न किया जाय, तो विचारके विना भी ब्रह्मसत्ताका निश्चया- त्मक साक्षात्कार उत्पन्न होगा। परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता। जिसको अविद्याकी निवृत्ति करनी है, उसे तो न्रम्म-सत्ताका निश्चयात्मक ज्ञान ही अपे- क्षित है, क्योंकि साधारण ज्ञानसे अविद्याकी निवृत्ति नहीं हो सकती। इसीसे श्रुतियोंमें वार बार प्रश् और प्रतिवचनोंसे सत्ता-निश्चयरूप ब्रह्मसाक्षात्कार ही अविद्याका निवर्तक कहा गया है। अतः सचानिश्चयरूप ब्रह्मसाक्षात्कारके हेतु रूपसे वेदान्तश्रवण प्राप्त नहीं है, उसीका विधान करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि है, इस प्रकार 'न च' इत्यादिसे शक्का करते हैं] यद्यपि वेदान्त- वाक्य व्रह्मज्ञानके साधन हैं, इससे वेदान्तोंमें संशयात्मक और निश्चयात्मक न्रम्मज्ञानसामान्यके प्रति हेतुता प्राप्त है, तथापि अविद्याकी निवृत्ति करनेमें समर्थ अभिलपित जो ब्रह्मसत्तानिश्रयात्मक साक्षात्कार है, उसके प्रति वेदान्तश्रवण कारण हैं, ऐसा प्राप्त नहीं है, इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि

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१६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

वाच्यम् : विचारमात्रस्य विचार्यनिर्णयहेतुत्वस्य ब्रह्मप्रमाणस्य तत्सा- क्षात्कारहेतुत्वस्य च प्रप्तौ विचारितवेदान्तशब्दज्ञानरूपस्य श्रवणस्य तद्वेतुत्वप्राप्तेः । न चोक्त उभयतो व्यभिचारः, सहकारिवैकल्येनाऽन्वयव्य-

विचारमात्रमें विचारविषयके निर्णयात्मक ज्ञानके प्रति हेतुता प्राप्त है, और ब्रह्मप्रमाण वेदान्तमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता प्राप्त है, इससे विचारित वेदान्ता- त्मक शब्दोंसे होनेवाले ज्ञानरूप श्रवणमें भी सत्ता-निश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षांत्कारकी कारणता प्राप्त ही है। [भाव यह है कि अन्वय और व्यतिरेकसे दो कार्यकारण- भाव प्राप्त हैं-एक तो जिसके विषयमें विचार होता है, वह विचार उस विषयके निर्णयात्मक ज्ञानके प्रति कारण है और दूसरा अपरोक्ष वस्तुके विषयमं प्रवृत्त प्रमाण अपरोक्षसाक्षातकारके प्रति कारण है, इन दो कार्यकारणभावोंके मिला देनेसे इस स्थलमें विचारित वेदान्तका ज्ञानरूप जो श्रवण है, वह सचा- निश्चयरूप ब्रह्मसाक्षातकारके प्रति कारण है, यह कार्यकारणभाव सिद्ध होता है, इसलिए सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कार विचारे हुए वेदान्तोंके श्रवणसे प्राप्त ही है और उससे अविद्याकी निवृत्ति भी हो सकती है, तो 'श्रोतव्यः' यह विधायकशब्द अपूर्व अर्थका विधान नहीं करता, अतः अपूर्वविधि नहीं है] परन्तु यहाँपर शङ्का होती है कि पहले अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचार कहा गया है, अर्थात् आत्मसाक्षात्कारके प्रति वेदान्तश्रवण कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वेदान्तश्रवण करनेपर भी अनेक मनुष्योंको आत्मज्ञान नहीं होता और वामदेवको वेदान्तश्रवण न करनेपर भी आत्मज्ञान हुआ था, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचारके होनेसे विचारित वेदान्तश्रवण भी आत्मसत्ताके निश्चयात्मक ज्ञानके प्रति कारण नहीं हो सकता है। यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अन्य सहकारी कारणके न रहनेसे अन्वय व्यभि- चार दोष नहीं है। [भाव यह है कि आत्मसाक्षात्कारके प्रति केवल वेदान्त- श्रवण ही कारण नहीं है किन्तु चित्तकी एकाग्रता आदि भी कारण हैं। इससे वेदान्तश्रवण करनेपर यदि ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं हुआ, तो कल्पना करनी चाहिए कि चितकी एकाग्रता आदि जो सहकारी कारण हैं, वे वहाँ नहीं रहे होंगे, इसलिए आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ, अतः अन्वयव्यभिचार नहीं है। इसीसे दण्ड आदि सहकारी कारणके न रहते मिटटीसे घटके उत्पन्न

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विधिविचार] भापानुवादसहित १७

भिचारस्यादोपत्वात्। जातिस्मरस्य जन्मान्तरश्रवणात् फलसम्भवेन व्यतिरेकव्यभिचाराभावात्। अन्यथा व्यभिचारेणेव हेतुत्ववाधे शुत्याऽ- पि तत्साधनताज्ञानासम्भवात्। घटसाक्षात्कारे चक्षुरतिरेकेण त्वगिन्द्रिय- मिव न्रह्मसाक्षात्कारे श्रव्णातिरेकेण उपायान्तरमस्तीति शङ्कायां व्यति-

न होनेपर भी मिट्टीमें अन्वयव्यभिचार नहीं है। ] पूर्वजन्मके वेदान्तश्रवणसे आत्मसाक्षात्काररूप फलका संभव होनेसे पूर्व जन्मका स्मरण करनेवाले वामदेवमें व्यतिरेकव्यभिचार नहीं है। यदि इस रीतिसे अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचारका परिहार न माना जाय, तो इन दो व्यभिचारोंसे ही वेदान्तश्वणमें आत्मसाक्षात्कारकी साधनताका बाध होनेसे श्रुतिसे भी वेदान्त- श्रवणमें साक्षात्कारकी साधनताका ज्ञान नहीं हो सकेगा । [्रह्मके साक्षा- त्कारमें जैसे श्रवण कारण है, वैसे ही तपश्चर्या या उत्तमजन्मप्राप्ति आदि अन्य कारण भी हैं। ऐसी परिस्थितिमें 'वामदेवको उत्तमजन्मप्राप्ति आदि अन्य कारणोंसे ज्ञान उत्पन्न हुआ होगा' इस प्रकारकी शक्का होनेसे वाम देवमें श्रवणका व्यतिरेकव्यभिचारज्ञान श्रवणकी साक्षात्कारसाधनताका प्रतिवन्धक नहीं हो सकता। एक पदार्थके ज्ञानमें परस्पर निरपेक्ष दो कारणोंके न होनेसे न्रप्मसाक्षात्कारम कारणान्तर नहीं है, यह बात नहीं है; क्योंकि लोकमें एक पदार्थके परिज्ञानमं परस्पर निरपेक्ष दो कारण भी देखे जाते हैं, इस भावको 'घटसाक्षात्कारे' इत्यादिसे बतलाते हैं-] जसे घटके प्रत्यक्षमें चक्षुसे अन्य त्वगिन्द्रिय भी कारण है, वैसे ही ब्रक्मके साक्षात्कारमं श्रवणसे अतिरिक्त अन्य कारण है, इस प्रकारकी शक्का होनेपर व्यतिरेकव्यभिचार भी दोपावह नहीं है। इससे-विधिके बिना भी श्रवणमें ब्रद्मासाक्षात्कारसाधनताके प्राप्त होनेसे श्रवणविधि अपूर्वविधि नहीं है अर्थात् नियमविधि है।

• यह निश्चित है कि अन्वयव्यगिचार या व्यतिरेकव्यभिचारके निश्चयसे हेतुत्वका बाध होता है, अतः यदि प्रदर्शित रीतिसे अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेकव्यभिचारका परिहार न किया जाय, तो श्रवणविधिस भी श्रवणमें तत्त्वज्ञानकी साधनता प्राप्त न होगी, अतः श्रवणफी अपूर्वविधि अप्रमाण होगी, यद भाव है।

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१८ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

अत एव 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्' (४।१।१) इत्यधिकरणभाण्ये 'दर्शनपर्यवसानानि हि अ्रवणादीन्यावर्त्यमानानि दृष्टार्थानि भवन्ति, यथाऽवघातादीनि तण्डलनिष्पत्तिपर्यवसानानि' इति श्रवणस्य ब्रह्मदर्श- नार्थस्य दष्टार्थतया दार्शपूर्णमासिकावघातन्यायप्राप्तावावृत्युपदेशः। अपूर्व- विधित्वे तु स न सङ्गच्छते, सर्वोषधावघातवत्। अग्निचयने-'सर्वोषधस्य पूरयित्वाSवहन्ति अथैतदुपदधाति' इत्युपधेयोलूखलसंस्कारार्थत्वेन विहित- स्याऽवघातस्य दृष्टार्थत्वाभावात् नाऽडवृत्तिरिति हि तन्त्रलक्षणे (११।१।६) स्थितम् : अतो नियमविधिरेवाऽयम्। तदभावे हि यथा वस्तु किश्चिचक्षुपा वीक्षमाणस्तत्र स्वागृहीते सूक्ष्मे विशेपान्तरे केनचित् कथिते तदवगमाय तस्यैव चक्षुषः पुनरपि सप्रणिधानं व्यापारे प्रवर्तते, एवं मनसा 'अहम्' इति गृह्यमाणे जीवे वेदान्तैरध्ययनगृहीतैरुपदिष्टं निर्विशेपत्रह्मचैतन्यरूपत्व-

इसीसे जैसे तण्डुलकी उत्पत्ति ही जिनका प्रयोजन है, ऐसे अवधात आदि दष्टार्थक होनेसे जव तक चावल न निकलें तब तक पुनः पुनः किये जाते हैं, वैसे ही साक्षात्कार जिनका प्रयोजन है, ऐसे दष्टार्थक श्रवण आदिकी ब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्त आवृत्ति होती है, इस प्रकार 'आवृत्तिरसकृदुपदेशाद्' इस आवृत्त्यधिकरणके भाष्यमें ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए किये गये श्रवणके दृष्टार्थक होनेसे दर्शपूर्णमाससम्बन्धी अवघातन्यायके आधारपर श्रवणादिकी आवृत्तिका उपदेश किया गया है। श्रवणमें यदि अपूर्वविधि मानी जाय, तो सव ओषधियों- के अवघातके समान आवृत्तिका उपदेश सङ्गत न होगा, क्योंकि अग्निचयनमें 'सर्वोषधस्य०' (ऊखलमें सब ओषधियोंको भरकर कूटे अनन्तर उस ऊखलंका स्थापन करे) इस प्रकार उपधेय ऊखलके संस्कारके लिए विहित अवघात, दृष्टार्थक न होनेसे, पुनः पुनः नहीं किया जाता, इस प्रकार पूर्वमीमांसाके ग्यारहवें अध्यायमें विचार किया गया है। इससे श्रवणके प्राप्त होनेसे यह नियमविधि ही है। यदि नियमविधि न मानें, तो जैसे किसी रत्न आदि वस्तुका निरीक्षण करनेवाला पुरुष, किसी दूसरेके कहनेपर अपनेसे अदृष्ट उसकी अन्य सूक्ष्म विशेषताका परिज्ञान करनेके लिए, फिर भी उसी चक्षुके सप्रणिधान व्यापारमें प्रवृत्त होता है, वैसे अन्तःकरण द्वारा अहरूपसे गृहीत जीवमें 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस अध्ययनविधिसे प्राप्त वेदान्तोंसे उपदिष्ट निर्विशेषन्रह्मचैतन्यस्वरूपताका

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विधिविचारं ] भापानुवादसहित १९

माकर्ण्य तदवगमाय तत्र सावधानं मनस एव प्रणिधाने कदाचित् पुरुपः प्रवर्तेतेति वेदान्तश्रवणे प्रवृत्तिः पाक्षिकी स्यात्। 'अग्राप्य मनसा सह' इति श्रुतिः 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' 'दृश्यते त्वग्रयया वुद्धूया' इत्यपि श्रवणेनानवहितमनोविपयेति शङ्कासम्भवात्। अथवा 'जुएं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः'

परोक्षज्ञान करनेके अन्तर उसी निविशेपस्वरूपके अपरोक्ष परिज्ञानके लिए अवधान पूर्वक मनके प्रणिधानमं ही कदाचित् पुरुप प्रवृत्त होगा, इससे श्रवणमें पाक्षिक प्रवृत्ति होगी। वेदान्तश्रव्णके समान मनके व्यापारमें पुरुषकी प्रवृत्ति न होगी, क्योंकि 'अप्राप्य मनसा सह' (सत्य, ज्ञान आदि शव्ड शक्तिवृत्तिसे ब्रह्मका प्रतिपादन न करके मनके साथ ही निवृत्त होते हैं-लक्षणावृत्तिका आश्रयण करते हैं) यह ्रति न्रह्मकी मनोविपयताका निपेध करती है अर्थात् ब्रह्मका ग्रहण मनसे नहीं हो सकता, यह स्पष्टरूपसे कहती है, अतः मनके व्यापारमें पुरुषकी प्रवृत्ति केसे होगी? ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही न्रप् जानना चाहिए) 'दृश्यते०' (सावधान मनसे आत्मा देखा जाता है) इत्यादि श्रुतियोंके सद्भावसे 'मनसा सह' इत्यादि श्रुति अनवहित मनका अवलम्बन करती है, इस प्रकार कल्पना हो सकती है।। अथवा 'सुषं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य०' (बड़े बड़े ऋपियों द्वारा सेवित * अनवहदित-एकाप्रतासे रहित। + 'निश्षयसम्भवात्' के स्थानमें 'शकासम्भवात्' इस कथनका भाव यह है कि निर्गुण असके साक्षारकारमें मन करण नहीं है, क्योंकि निर्गुण ब्रम्म औपनिपद-उपनिपत् प्रमाणमात्रसे वेद कहा गया है। सोपाधिक आत्माके साक्षातकारमें भी मन कारण नहीं है, क्योंकि सोपाधिक आत्मसाक्षार्कार नित्यसाक्षिरूप है। इसलिए 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इसमें 'मनसा' यह जो साधन तृतीया है, वह वाक्यजन्यपृत्तिसाक्षात्कारके प्रति साधनताके अभिप्रायसे है, यह धाब्दापरोक्षवादमे कहा जायगा। इससे-आत्मसाक्षात्कारके प्रति. मनके करण न होनेसे 'मनके ही व्यापारमें कदाचित् पुरुपकी प्रवृत्ति होगी' इससे कहा गया नियमविधिका व्यावत्य अयुकत है। * इसका तात्पर्य यह है कि व्याकरण आदि छः अमवोंके साथ वेदाध्ययन करनेके बाद 'तरति शोकमात्मवित्' (आत्माको जाननेवाला दुःखरो मुकत हो जाता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे 'आत्माका यथार्थ ज्ञान मुकिका साधन है'यह ज्ञात होता है, परन्तु लोकमें प्रायः देखा जाता है कि सामवेदका अध्ययन करनेपर भी विचारंके बिना आत्मतत्वज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि अनेक अभिग्रायोंसे आत्मरूप अर्थका प्रतिपादनं करनेवाले वेदान्तोंमें तात्पर्यकी

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२० सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परच्छेदं

इत्यादिश्रवणात् भिन्नात्मज्ञानात् मुक्तिरिति भ्रमसम्भवेन मुक्तिसाधनज्ञानाय भिन्नात्मविचाररुपे शास्त्रान्तरश्रवणेऽपि पक्षे परवृत्तिस्स्यादित्यद्वैतात्मपर- वेदान्तश्रवणनियमविधिरयमस्तु। इहाऽडत्मशव्दस्य 'इदं सर्वें यदय- ईश्वरके स्वरूपको जव देखता है, तब ईश्वरकी महचाको प्राप्त करता है और शोक-दुःखसे निर्मुक्त हो जाता है) इत्यादि श्रुतियोंके श्रवणसे जीवसे भिन्न- आत्माके ज्ञानसे मुक्ति होती है, इस प्रकारका अ्रमात्मक ज्ञान हो सकता है। जिनमें परमात्मा जीवसे पृथक है, ऐसा विचार किया गया है, ऐसे अन्य शास्त्रों- न्याय, सांख्य आदिमें उक्त अ्रमसे ही मुक्तिके साधनीभृत ज्ञानके लिए प्रवृत्ति होगी, इससे अद्वैत आत्मतत्व्रका चोध करानेवाले वेदान्तके श्रवणमें मनुष्यकी प्रवृत्ति पक्षमें होगी, अतः उसकी व्यावृत्ति करनेके लिए यह श्रवणविधि नियमविधि है। प्रकृतमें 'आत्मा वा अरे' इत्यादि श्रुतिमें आत्मशब्द अद्वितीय आत्मपरक है, क्योंकि 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (जो सब यह चारों तरफ देखा जाता हे, वह आत्मा भ्रान्ति हो सकती है अर्थात् विचारके विना वेदान्तोंका ठीक तात्मर्य किसमें है, यह निर्णय नहीं हो सकता। इसलिए मुकतिके साधनकी अन्वेषणा करनेवाला तथा तत्त्वज्ञानके प्रतिचन्धक तात्पर्यभ्रम और संशय आदिकी निवृत्ति करनेके लिए वेदान्तके विचारमें प्रवृत हुआ पुरुप जैसे उत्तरमीमांसाशास्त्रमें प्रवृत्त होता है, वैसे ही न्याय, सांख्य आदि शास्त्रोंमें भी प्रवृत्त होगा; क्योंकि उनमें भी उनके अभिप्रायानुकूल वेदान्तका विचार है। यद्यपि सांस्य आादि शास्त्रोंमें अद्वितीय आत्मतर्त्रका प्रतिपादन नहीं है, तो भी 'जीवभिनन आत्माका ज्ान नुकिका साधन है' इस प्रकार भ्रमात्मक ज्ञानसे उन शास्त्रोंमें प्रवृत्ति हो सकती है। और 'भिन्नात्मज्ञान मुक्तिका साधन है' ऐसा अ्रमात्मक ज्ञान साअवेदाध्यायीको नहीं होता है, यह भी इम नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'जुटं यदा' इत्यादि श्रुतिमें अन्य शब्द पढ़ा गया है, इससे उसको त्रम हो सकता है। वस्तुतः इस श्रुतिका अर्थ-समीपमान्नमे सुद्धि आदिका प्रवर्तेक बुद्धि आदिसे वस्तुतः भिन्न [जीव भिन्न नहीं है, क्योंकि जीव और म्रहाका भेद प्रत्यक्ष सिद्ध होनेसे उपदेश व्यर्थ होगा] और ऋषियोंसे सेवित ईश्वरका आत्मरूपसे जय ज्ञान करता है, तव ईश्वरके वास्तविकरूपकी प्राप्ति करता है और शोकरहित हो जाता है। अतः त्रमसे शास्त्रान्तरके विचारमें प्रसक परवृत्तिका निराकरण करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि है। परन्तु 'श्रोतव्यः' इस श्रुतिसे केवल आत्मविचार ही प्राप्त होता है, अद्वैत आत्मविचार प्राप्त नहीं होता, अतः इस क्षतिसे भिन्नात्मविचारकी व्यावृत्ति कैसे होगी, इस शक्काको दूर करनेके लिए 'इह' इत्यादि ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। इसमें आदिशब्दसे 'आत्मनि ज्ञाते सर्व विदितं भवति' (अत्माके ज्ञात होनेपर सच विदित होता है) इत्यादि प्रतिज्ञावाक्य लिया जाता है। इससे यह जाना जाता है कि 'आत्मा वा अरे' इत्यादिमें 'आत्मा' से भद्वितीय आत्माका ही प्रहण है, यह भाव है।

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विधिविचार ] भापानुंादसहित २१

मात्मा' इत्यादिप्नकरणपर्यालोचनया अद्वितीयात्मपरत्वात्। वस्तुसत्साधनान्तरप्राप्तावेव नियमविधिरिति कुलधर्मः; येन वेदान्तश्रवण- नहि

नियमार्थवच्याय नियमादृष्टजन्यस्वप्रतिवन्धककल्मपनिवृत्तिद्वारा सत्तानिश्चय- रूपन्रहासाक्षात्कारस्य वेदान्तश्रवणेकसाध्यत्वस्याऽम्युपगन्तव्यत्वेन तत्र वस्तुतः साधनान्तराभावान्न नियमविधिर्युज्यत इति आशङ्गयेत; किन्तु यत्र साधनान्तरतया सम्भाव्यमानस्य पक्षे प्राप्त्या विधित्सितसाघनस्य पाक्षिक्य प्रासिनिवारयितुं न शक्यते, तत्र नियमविधिः। तावतैचाऽप्राप्तांश- परिपूरणस्य तत्फलस्य सिद्धेः । है) इस श्रुतिके प्रकरणके पर्य्यालोचनसे ऐसा ज्ञात होता है। [यहाँपर शक्रा होती हे कि तण्डुलकी उत्पत्तिमं अवघातके समान नम्वचिदलनकी वरतुतः साधनरूपसे प्राप्ति है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए वहाँ नियमविधि मानना उचित हे, परन्तु प्रकृतस्थलमं अद्वितीय आत्माके साक्षात्कारम भिन्नात्म-विचार वास्तविक साधन नहीं है, अतः प्रकृतमं नियमविधि उसकी व्यावृत्तिके लिए नहीं हो सकती *। इसका उत्तर 'नहि' इस प्रन्थसे देते हैं] 'वस्तुसत् अन्य साधनकी प्राप्ति रहते ही नियमविधि होती है' यह कोई कुलधर्म नहीं है अर्थात् जैसे कुलक्रमसे प्राप्त धर्मकी आवश्यकता है, वैसे वस्तुसत् अन्य साधनकी प्राप्तिकी आवश्यकता नहीं है, जिससे कि वेदान्त- श्रवणके नियमकी सार्थकताके लिए यह स्वीकार किया जाय कि नियमापूर्वसे उत्पन्न जो न्साक्षातकारके प्रतिबन्धकीभूत पापोंका निरसन, उसके द्वारा सतानिध्रयात्मक नसाका अपरोक्षसाक्षात्कार वेदान्तके श्रवणमात्रसे साध्य है, ऐसा मानकर न्मसाक्षात्कारमें वस्तुतः अन्य साधनका अभाव होनेसे प्रकृतमें नियम- विधि युक्त नहीं है, ऐसी आशका की जाय। किन्तु जहाँपर सम्भावित अन्य- साधनकी पक्षमें प्राप्ति होनेसे विधानके लिए अभीष्ट साधनकी पाक्षिक अपरापिका निवारण नही कर सकते हैं, वहींपर नियमविधि होती है। इंसीसे अप्राप्तां- शपरिपूरणरूप नियगविधिके फलकी सिद्धि हो जाती है। • मशानिधात्मक मवनसाक्षासकारके प्रति विभित्सित गुरुके अधीन वेदान्तश्रवणके रामान गुन्ये निरपेक्ष पेदान्तथवण भी कारण है, इसलिए गुरुके अधीन वेदान्तश्रवणका नियम माना जायगा, परन्तु उमका कोई प्रत्यक्ष फल तो है नहीं। अतः नियमापूर्व मानना होगा। और उससे पापोको निमृत्ि रोगी और उसके द्वारा नियमाहट मदासाक्षाटकारमें साधन होगा, इस प्रकार नियमविधिमें कल्पना करनी होगी।

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२२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

अथवा गुरुमुखाशीनाध्ययनादिव निपुणस्य स्वप्रयत्नमात्रसाध्यादृपि वेदान्तविचारात् सम्भवति सत्तानिश्चयरूपं त्रह्मापरोक्षज्ञानम्, किन्तु गुरुमुखाधीनवेदान्तवाक्यश्रवणनियमादष्टमविद्यानिवृत्ति प्रति कल्मपनिरा- सेनोपयुज्यत इति तदभावेन प्रतिवद्धमविद्यामनिवर्तयत् परोक्षज्ञानकल्पमव- तिष्ठते। न च ज्ञानोदये अज्ञानानिवृत्त्यनुपपत्तिः, ग्रतिबन्धकाभावस्य सवँत्राऽपेक्षितत्वेन सत्यपि प्रत्यक्षविशेपदर्शने उपाधिना ग्रतिबन्धात् ग्रति- अथवा गुरुमुखसे किये गये वेदान्तविचारके समान व्युत्पन्न पुरुपको केवल अपने प्रयत्नसे किये गये वेदान्तविचारसे भी सचानिश्चयरूप न्झ्मके अप- रोक्ष-साक्षात्कारका सम्भव है, परन्तु गुरुमुखसे किये गये वेदान्तवाक्योंके श्रवणसे उत्पन्न हुआ नियमापूर्व कल्मपनिवृत्तिपूर्वक अविद्याकी निवृत्तिके प्रति उपयोगी है, इससे यदि गुरु द्वारा वेदान्तश्रवण न किया जाय-अपने प्रयत्नसे ही किया जाय, तो वेदान्तश्रवणसे कल्मपोंकी निवृत्ति नहीं होगी, अतः कल्मपों- से प्रतिवद्ध होनेसे अपने प्रयत्नसे किया हुआ निपुणपुरुषका सतानिश्रात्मक अपरोक्ष-साक्षात्कार अविद्याकी निवृत्ति न करता हुआ परोक्षज्ञानके सदय ही स्थित रहेगा। परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि अज्ञानके उत्पन्न होनेपर अविद्या निवृत्त न हो, यह अनुपपन्न है अर्थात् ज्ञानसे अवश्य ज्ञानकी निवृत्ति होती है, [कारण कि जो प्रमा होती है वह अपने अज्ञाननिवृत्तिरूपकार्यको उत्पन्न करती ही है, जैसे छुक्तिप्रमासे उसका अज्ञान नष्ट होता है।] नहीं, यह नियम नहीं है कि ज्ञान होनेपर अज्ञान निवृत्त होता है, क्योंकि प्रति- बन्धकके अभावकी + सर्वत्र अपेक्षा होनेसे प्रत्यक्षसे विशेषदर्शनके रहते भी *यहाँपर मतभेदसे व्यवस्था करनी चाहिए, किसी आचार्यके मतमें नियमादट कल्मप- निवृत्ति द्वारा ज्ञानोत्पत्तिमें कारण है और किसी आचार्य्यके मतमें नियमादष्ट कल्नपनिवृत्ति द्वारा अविद्यानिवृत्तिमें कारण है-अन्यथा पूर्व अन्थमें 'नियमार्थवर्वाय' इत्यादिसे कल्मपनिवृत्ति द्वारा ज्ञानकी उत्पत्तिमें नियमादष्टको कारण वतलाया है और यहाँपर नियमा- दृष्टको प्रतिवन्धरूप कल्मपकी निवृत्ति द्वारा उत्पन्न ज्ञानसे जननीय अविद्याकी निवृत्तिमें कारण वतलाया है, इससे विरोधका प्रसद्ग अवश्य आ सकता है। यदयपि वेदान्तसिद्धान्तमें प्रतिवन्धकाभाव कारण नहीं माना गया, तथापि 'अप्रतिवद्ध सामग्री कार्यकी हेतु है' इसका स्वीकार होनेसे विशेषणरूपसे प्रतिबन्धका- भावकी अपेक्षा है, क्योंकि सामग्रीमें अप्रतिवद्ध यह विशेषण है, और इसका अर्थ है-प्रतिवन्धकाभावसहकृत सामग्री, इसलिए विशेषगविधया उसकी अपेक्षा है, यह भाव है-

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विधिविचार ] भापानुवादसहित २३

विम्नभ्रमानिवृत्तितत् तदनिवृत्युपपत्तेः। एवं च लिखितपाठादिनाऽपि स्व्राध्यायग्रहणप्रसक्ती गुरुमुखाधीनाध्ययननियमविधिवत् स्वप्रयत्नमात्र- पूर्वकम्याऽपि वेदान्तविचारस्य सत्तानिश्चयरूपत्रह्मसाक्षात्कारार्थत्वेन पक्षे प्राप्ती गुरुमुखाधीनश्रवणनियमविधिरयमस्तु। न च 'तदविज्ञानार्थ स गुरुमेवाभिगच्छेत्' इति गुरूपसदनविधिनैव उसकी उपाधिसे प्रतिबद्ध होनेके कारण जसे प्रतिबिम्बके विभ्रमकी निवृत्ति नहीं होती, वैंसे ही कल्मपोंसे प्रतिबद्ध सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार भी अविद्याकी निवृत्ति नहीं कर सकता। ऐसा होनेपर अर्थात् गुरुनिरपेक्ष ेदान्तविचाररूप व्यावत्यका लाभ होनेपर जसे लिखित* पाठ आदिसे स्वाध्याय-वेदराशिके ग्रहणकी प्राप्ति होनेपर गुरुमुखाधीन अध्ययनकी नियमविधिसे उसकी-लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति होती है, वैसे ही सत्तानिश्- यात्मक न्र्साक्षात्कारके लिए अपने प्रयत्नमात्रसे किये गये वेदान्तविचारकी पक्षमं प्राप्ति होनेपर गुरुमुखाधीन श्रवणकी यह नियमविधि है। [ परन्तु स्वन्नयत्नसाध्य वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि है, यह कथन असद्रत हे, क्योंकि बदाज्ञानके लिए गुरुके पास जानेका श्षतिमें वर्णन है। और गुरूपगमन न्रह्मसाक्षातकारका साक्षात् साधन नहीं है, किन्तु परम्परासे साधन है। इसलिए वह ज्ञानके उत्पादनमें किसी द्वारकी अपेक्षा करेगा और वह द्वार योग्यतासे गुरुके अधीन विचार * यहां माराश यद हकि चादे अभ्युदयका अभिलापी पुरुष हो चाहे निश्रयसका अभिलापी हो दोनोंको नेदार्थका अनुष्टान करना चाहिए, क्योंकि वेदार्थके अनुष्ठानके विना अन्युक्य या निधेगसफी सिद्धि नहीं दो सकती है। और अनुष्ठान तब तक नहीं हो गफता, जय तफ कि नेदफे अर्थका ठोफ ठीक परिज्ञान न हो। वेदके अर्थका परिज्ञान वेदके महणके बिना नहीं हो गकता। और बेदका ग्रदण दो रीतिस हो सकता है, एक तो गुरु द्वारा और दूगरा निमित पाठसे, कारण कि से दोनों प्रकार लोकमें देसे जाते हैं। इस परिस्थितिमें अध्ययनविधियाक्य यह काम करता है कि अध्ययनसे दी वेदाक्षर ग्रहण करे। इससे लिखित पाठ आदकी व्यापृति होती है। इसी तरह प्रकृत स्थलमें भी आत्मसाक्षात्कारके प्रति गुरु द्वारा सम्पादित वदान्तविनार कारण ह और निपुण पुरुषोसे अपने प्रयत्न द्वारा किया गया वेदान्तविचार भी कारण है। इस अवस्थामें 'श्रोतव्यः' यद नियमविधि स्वप्रयत्न- प्राप्त वेदान्तीयचारकी व्यावृत्ति करंगी, अर्थात् इससे यह सिद्ध होगा कि अपने प्रयत्नसे किया गया पदान्तविचार आत्मसाक्षातकारमें समर्थ नहीं है, किन्तु गुरुमुख द्वारा सम्पादित येदान्तभ्रवण दी साक्षात्कारमें समर्थ है।

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२४ सिद्धान्तलेश संग्रह प्रथम परिच्छेद

गुरुरहितविचारव्यावृत्तिसिद्धेर्विफलो नियमविधिरिति शङ्कचम् ; गुरूप- सदनस्य श्रवणाङ्गतया श्रवणविध्यभावे तद्विधिरेव नास्तीति तेन तस्य चैफल्याप्रसक्तेः। अन्यथा अध्ययनाङ्गभूतोपगमनविधिनैव लिखितपाठा- दिव्यावृत्तिरित्यध्ययननियमोऽपि विफल: स्याद्। ही होगा। अदष्टको द्वार नहीं मान सकते, क्योंकि दृष्ट द्वारका सम्भव होने- पर अदष्टकी कल्पना करना ठीक नहीं है। इससे यह निर्विघाद सिद्ध हो गया कि गुरुसे प्राप्त वेदान्तविचार द्वारा अभिगमनविघिसे ही गुरूपगमन आत्म- साक्षात्कारके प्रति कारण है और इसीसे गुरुरहित वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति होगी, तो श्रवणकी नियमविधि निरर्थक है। इस प्रकारका मनमें तात्पर्य रखते हुए शङ्का करते हैं 'न च' इत्यादिसे ] यदि कोई शङ्का करे कि *'तद्विज्ञानार्थम्०' (आत्मतत्त्वके परिज्ञानके लिए उसको गुरुके पास जाना चाहिए) इस प्रकारकी गुरूपसदनविघिसे ही गुरुसे रहित-गुरुके बिना अपने आप किये गये विचारका निरास हो सकता है, तो यह नियम- विधि निरर्थक है? नहीं, इस प्रकारकी आशक्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि गुरू- पसदनके श्रवणाङ्क होनेसे श्रवणविधिके अभावमें गुरूपसदनविधि ही नहीं हो सकती है, इसलिए गुरूपसदनविघिसे श्रवणविधिकी विफलता नहीं प्रसक्त होती। यदि इसे स्वीकार न करें, तो अध्ययनके अङ्गभूत उपगमनके विधानसे ही लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति होनेसे अध्ययनकी नियमविधि भी चिफल हो जायगी। * 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' इस श्रुतिके पहले श्रति है-'ब्राह्मणो नि्वेदमायान्ना- स्त्यकृतः कृतेन' इसका अर्थ है कि ब्राह्मणको वैराग्य करना चाहिए, क्योंकि अकृत-निल्य- स्वरूप जो मोक्ष है, वह कृतेन-अनित्यकर्मसे प्राप्त नहीं हो सकता। अतः मोक्षको ब्रह्म- ज्ञानसाध्य जनकर वैराग्य सम्पन्न व्राह्मण श्रोत्रिय व्रह्मनिष्ठ गुरुके पास ब्रहमज्ञानके लिए जाय, यह 'तद्विज्ञानार्थम्' इत्यादि श्रुतिका अर्थ हुआ। इसमें 'तत' शच्दसे पहलेकी श्चतिमें उक्त व्राह्मणका ही परिग्रह है। यहाँ तात्पर्य यह है-'श्रोतव्यः' यह प्रधान नियमविधि है और इससे गुरुके अधीन विचारका नियमन होता है, इससे विचारके नियमित होनेपर उक प्रधानविधिके अज्गरूपसे गुरूपसदनका विधान होता है, अतः उपगमनविधि अङ्गविधि हुई। एवन्च यदि प्रधान श्रवणविधि न मानी जाय, तो अप्रधानविधिका स्वरूप ही नहीं वन सकेगा इसलिए उपगमनचिधिसे श्रवणविधिकी निरर्थकता सिद्ध नहीं हो सकती है, इस अभि- प्रायसे परिहार किया गया है। यहाँ 'अन्यथा' शच्दका अर्थ है-अङ्गविधिसे प्रधानविधिकी विफलता मानी जाय, तो।

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विधिविचार] भापानुवादसहित २५

अथवा अद्वैतात्मपरभापाप्रवन्धथ्रवणस्य पक्षे प्राप्त्या वेदान्तश्रवणे नियमविधिरस्तु। न च 'न म्लेच्छितवै' इत्यादिनिपेधादेव तदग्रापति:

भापाप्रचन्धेना्द्वेतं जिज्ञासमानस्य तत्र प्रवृत्तिसम्भवेन नियमविधेरर्थवच्चोप-

अथवा अद्वैत आत्मतत्त्ववोधक भापा-अ्रन्थोंके श्रवणकी पक्षमं प्रापि होनेसे उसकी निवृत्तिके लिए वेदान्तथ्रवणमें यह नियमविधि है अर्थात् अद्वैत आत्माकी जिज्ञासा करनेवाला वेदान्तका ही श्रवण-विचार करे, भापा- अन्थोंका विचार न करे। यदि कोई कहे कि 'न ग्लेच्छितवै' (भाषा- प्रबन्धरूप अध्यक्त शब्दोंका उच्चारण नहीं करना चाहिए) इत्यादि निषेधशास्त्र- से ही अद्वैतपरक भापाप्रबन्धोंकी व्यावृत्ति हो जायगी, फिर भाषाप्रवन्धके श्रवणकी व्यावृत्तिके* लिए नियमविधि क्यों मानी जाय? नहीं, ऐसी शक्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शास्त्रीय व्युत्पत्तिकी न्यूनतासे वेदान्तके श्रवणका संभव न होनेसे पुरुपार्थनिषेधका उल्लद्दन करके भी भाषाग्रन्थोंसे अद्वैत न्वकी जिज्ञासा करनेवालेकी भापाप्रबन्धके श्रवणमें प्रवृत्ति हो सकती है, उसकी व्यावृत्तिके लिए नियमविधि सार्थक है। [भाव यह है कि 'न ग्लेच्छितने' इत्यादि जो भाषाप्रबन्धका निपेध है वह ज्ञानका अङ्ग नहीं है, पुरुषार्थ है। यदि ज्ञानाम होता, तो ज्ञानकी अनुत्पत्तिके भयसे उसमें पुरुष प्रवृत्त न होता, परन्तु पुरुपार्थ होनेसे उसका उल्लद्दन करके महाफल- मोक्षके लिए भाषाप्रबन्धके श्रवणमें प्रवृत्त हो सकता है। भापाप्रबन्धके अ्रवणमें मनुष्यके प्रवृत्त होनेपर पक्षमें वेदान्तश्रवणकी अप्राप्ति होगी, अतः उसके अप्राप्तांकी परिपृर्तिके लिए श्रवणविधिको नियमविधि मानना चाहिए। पुरुषार्थनिषेधका उल्छन करके महाफलकी अभिलापासे निषिद्धमें प्रवृत्ति होती है, इसलिए उसकी निवृत्तिके लिए नियमविधिकी अर्थवत्ता भीमांसकोंने मानी

यथप नियमविधिका फल अग्नाप्तांश परिपूरण दी है इतरव्याृत्ति नहीं है, कर्योंकि यह तो परिवरयाविधिका फल है, तथपि नियमविधिका फल आयोग- व्यापृति मीमासर्कोने माना है और अन्ययोगव्यापृत्ति परिसंखयाका फल माना है। अतः नियमविधिके फलमें व्यायृत्तियब्दका प्रयोग कदाचित् आवे, तो अयोगव्यावृत्ति समझना चादिए।

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२६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

पत्तेः। अभ्युपगम्यते हि क्त्रधिकरणे व्युत्पादितम्-पुरुषार्थ अनृतवद- ननिषेधे सत्यपि दर्शपूर्णमासमध्ये कुतश्रिद्वेतोरङ्गीकृतनिपेधोल्लड्घनस्याS- विकलां क्रतुसिद्धिं कामयमानस्याऽनृतवदने प्रवृत्तिस्स्यादिति पुनः क्रत्वर्थतया दर्शपूर्णमासप्रकरणे 'नानृतं वदेत्' इति निषेध इति क्रत्वर्थतया निपेध- स्यारऽर्थवच्वम्।

है,] क्योंकि दर्शपूर्णमासमें पुरुषार्थरूप असत्यभापणनिपेधके रहनेपर भी किसी कारणवश निषेधके उल्लद्दनका अङ्गीकार करके अविकल क्रतुसिद्धिकी अभिलाषा करनेवाला पुरुष अनृतवदनमें (असत्य भापणमें) प्रवृत्त हो सकता है, इसलिए दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें क्रतुके अङ्गरूपसे 'नानृतं वदेत्' (असत्य भाषण न करे) ऐसा निषेध किया गया है, इस प्रकार क्त्रधिकरणमें क्रत्वर्थ- रूपसे व्युत्पादित निषेधकी अर्थवत्ताका (प्रकृतमें भी) अङ्गीकार किया है।

  • इसका जिस अधिकरणमें विचार किया गया है, उसका नाम है-अनृतवदननिपेधस्य ऋतुधमत्वा धिकरण-असत्यभाषणके निषधमें कतुधर्मताका प्रतिपादन करनेवाला अधिकरण; [अधिकरण उसे कहते है, जिसमें संशय, विपय, पूर्वपक्ष, और सफ्तिका प्रदर्शन करके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया हो ] इसका विचार 'अकर्म कतुसंयुकं संयोगात् नित्यानुवाद: स्यात्' इस सुत्रमें है। भावार्थ यह है कि दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें 'नानृतं वदेत्' (असत्य भाषण न करें) यह वाक्य सुना जाता है। यहांपर-'यह उपनयनमें नित्य जो अनृतवदन निषेध है, उसका अनुवाद है अथवा अपूर्वविधि है? इस प्रकारका संशय होनेपर पूर्वपक्षी-कहता है कि कतुसंयुक्त-क्रतुप्रकरणमें पठित अकर्म-'नानृतं वदेत्' यह असत्यभाषणनिषेधवाक्य नित्यानुवाद :- नित्यानुवादरूप है। किससे? इससे कि 'संयोगात्' अर्थात् उपनयनकालमें ही 'सत्यं वद' 'धर्म चर', इस प्रकारके उपदेशसे अनृतवदनका निषेध नित्य ही पराप्त है, इस प्रकार पूर्वपक्षकी प्राप्ति होनेपर- सिद्धान्ती-'विधिर्वा संयोगान्तरात्' यह सूत्र कहते हैं, अर्थात् कतुप्रकरणमें पठित अनृत- वदननिषेध विधि ही है, क्योंकि यह संयोगान्तर-अन्य संयोग है-उद्देश्यका भेद है। तात्पर्य यह है कि उपनयन कालमें जो विधि है, वह पुरुषको उद्देश्य करके प्रवृत्त हुई है और कतुप्रकरणमें जो अनृतवदननिषेधविधि है वह कतुको उद्देश्य करके प्रवृत्त है, अतः उद्देश्यका भेद होनेसे उत्त निषेधको कतुप्रकरणमें विधि हो मानना चाहिए-इस प्रकार सुवोधिनी वृत्तिमें [पू० मी० सू १२-१३ अ० ३ पा० ४ पृ० १२४ काशीमुद्धित ] विचार किया गया है।

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विधिविचार ] भापांनुवादसहित २७

यद्वा, यथा 'मन्त्रैरेव मन्त्रार्थस्मृतिः साध्या' (पूर्वमी० अ० १ पा० २ अ० ४) इति नियमः, तन्मूलकल्पसूतात्मीयग्रहणकवाक्यादीनामपि पक्षे प्राप्तेः: तथा ेदान्तमूलेति हासपुराणपौरुपेयप्रब्नन्धानामपि पक्षे आ्रप्तिसम्भ- वान्नियमोऽयमस्तु । सर्वथा नियमविधिरेवायम्। 'सहकार्यन्तरविधि:' (अ० ३ पा० ४ अधि० १४ सू० ४७) इत्य- धिकरणभाप्ये अपूर्वविधित्वोक्तिस्तु नियमविधित्वेऽपि पाक्षिकाप्रासिसद्द्ावाद् तदभिप्रायेति तत्रैव 'पक्षेण' इति पाक्षिकाप्ाप्तिकथनपरसूत्रपदयोजनेन स्पष्टीकृतमिति विघरणानुसारिणः ।

अथवा ज 'मन्त्रैरेव' (मन्त्रोंसे ही मन्त्रार्थका स्मरण करे) यह नियम माना गया है, क्योंकि यदि यह नियम न माना जाय, तो मन्न्नमूलक कल्पसूत्र, आत्मीयग्रहणक वाक्य आदिकी भी पक्षमं प्राप्ति होगी, वैसे ही प्रकृतमें भी चेदान्तमूलक इतिहास, पुराण और पुरुपनिर्मित ग्रन्थोंके श्रवणमें भी पक्षमें प्राप्ति हो सकती है (उसकी निवृत्तिके लिए श्रोतव्यः) यह नियमविधि है। इससे सर्वथा यह नियमविधि ही है। और 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यादि अधिकरणके भाष्यमं अपूर्वविधिका जो कथन है, वह नियमविधिके रहते भी पाक्षिक अप्रापिके सद्भावके अभि- परायसे हे, यह प्रकार पूर्वोक्त अधिकरणके भाष्यमें ही 'पक्षेण' इस शब्दसे पाक्षिक अप्राप्तिके कथनपरक सूत्रके पदके योजनसे स्पष्ट किया गया है, यह विवरणानुमारी लोगोंका मत है।

• 'मन्नैरेय मन्त्रार्थस्मृतिः साध्या' इसका निर्णय पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष द्वारा निम्न रीतिसे किया गया है-पहले पूर्यपक्ष होता है कि 'उर प्रथस्व' (हे पुरोठाश तुम प्रचुर परिमाणमें चढ़ो) दत्यादि जितने गन्न्न प्रयोगोंमें उपयुक है वे सबके सब केवल अदृट ही उत्पन्न करते हैं-अर्थप्रफाशनके लिए उनका उध्चारण नहीं होता, क्योंकि उरु प्रथनरूप अर्थ माहाणवाययये भी प्रतीत होता है-उरु प्रथस्वेति पुरोटाशं प्रथयति' इससे मन्त्रोंका केवल अदष्ट ही प्रयोजन है, इस प्रकार पूर्वपक्षके प्राप्त होनेपर- सिदान्ती कहत है कि यद तुमारा पूर्वपक्ष एक दम निरर्थक है, क्योंकि यदि र2 प्रयोजन मिलता दो, तो अदृष् प्रयोजन की कल्पना करना घृष्टता है, अतः यागोंमें प्रयुक मन्त्रोंका दट-अर्थोका अनुस्मरण ही प्रयोजन है, यदि ब्राह्मण वाक्यसे भी मन्नार्थस्मरण होता है, यह कहो, तो 'मन्त्रसे ही मन्घार्थका स्मरण करना चादिए' इगर प्रकारफा जो नियम वनेगा, उसका अदृष्ट प्रयोजन होगा, अतः यह सिद्ध हुआ

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सिद्धान्तलैशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

तथा तदीया: शब्दस्तु परोक्षज्ञानकृत् पुरा।। मननादियुतोऽध्यक्षं कुर्याद्विधुरचित्तवत् ॥७॥ विवरणानुयायियोंमें से कुछ लोग कहते हैं कि शब्द पहले परोक्ष ज्ञान उत्पन्न करता है तदनन्तर वही शब्द मनन, निदिध्यासनसे युक्त होकर विधुरके चित्तके समान (अर्थात् जैसे विधुरका चित्त कामिनीपरिभावित होकर कामिनीका अपरोक्ष साक्षात्कार करता है, वैसे ही) अपरोक्ष साक्षात्कार उत्पन्न करता है।। ७॥। कृतश्रवणस्य प्रथमं शव्दान्निर्विचिकित्सं परोक्षज्ञानमेवोत्पद्यते, शब्दस्य परोक्षज्ञानजननस्वाभाव्येन क्लपसामर्थ्यानतिलङघनाद्। पश्चात्तु कृतमनननिदिध्यासनस्य सहकारिविशेपसम्पन्ाठ तत एवाऽपरोक्षज्ञानं ['श्रोतव्यः' इस वाक्यसे श्रवणका जो विधान किया जाता है, वह निश्चयात्मक शव्दजन्य परोक्षज्ञानके उद्देश्यसे ही किया जाता है, शव्दजन्य अप- रौक्षज्ञानके लिये नहीं किया जाता, क्योंकि शब्द स्वभावसे ही परोक्षज्ञानका जनक होता है और जैसे संस्कारसे सहकृत चक्षु 'स एवायं देवदत्तः' इस प्रत्यमिज्ञाका जनक होता है अथवा भावनाधिक्यसे युक्त वियोगी पुरुपका मन कामिनीके साक्षात्कारका जनक होता है, वैसे ही मनन और निदिध्यासनसे युक्त शब्द अपरोक्षज्ञान जनक भी हो सकता है। इससे यह विधि परोक्षज्ञान अथवा अपरोक्षज्ञानके लिए अपूर्वविधि नहीं है किन्तु नियमविधि है, क्योंकि विधिके बिना भी पूर्वोक्त दो कार्यकारणभाचोंके प्रभावसे विचारविशिष्ट वेदान्तात्मकश्रवण प्राप्त है, इसलिए पूर्वोक्त भाषाप्रबन्ध आदिकी व्यावृत्ति करनेके लिए यह नियमविधि ही है इस प्रकार विवरणानुसारियोंके एकदेशियोंके मतका प्रति- पादन करते हैं-'कृतश्रवणस्य' इत्यादि ग्रन्थसे ] वेदान्तश्रवणकर्ता पुरुपको प्रथम शब्दसे निश्चयात्मक परोक्ष ज्ञान ही उत्पन्न होता है, क्योंकि परोक्ष ज्ञानके उत्पादनमें ही शब्दकी सामर्थ्य है, इससे अपने निश्चित स्वभावका शब्द उलङ्गन नहीं कर सकता। तदनन्तर अर्थात् शब्दसे निश्चयात्मक परोक्ष ज्ञान होनेपर मनन और निदिध्यासन करनेवाले पुरुपको मनन आदि सहकारी कारणोंसे युक्त शब्दसे ही अपरोक्ष ज्ञान होता है। क्योंकि सहकारी कारणकी विचित्रतासे कार्यमें विचित्रता देखी जाती है, इसीसे जैसे 'सोऽयं कि मन्त्रोंसे ही मन्त्रार्थका अनुस्मरण करना चाहिए। [दष्टव्य-अधिकरण न्या० पृ० २४ आनन्दाश्रम सु०]।

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विधिविचार] भापानुवादसहित २९

जायते। तत्तांशगोचरज्ञानजननासमर्थस्याऽपीन्द्रियस्थ तत्समर्थसंस्कारसाहि- त्यात् प्रत्यभिज्ञानजनकत्ववत् स्वतोऽपरोक्षज्ञानजननासमर्थस्याऽपि शब्दस्य विधुरपरिभावितकामिनीसाक्षात्कारस्थले तत्समर्थत्वेन वलप्भावनाप्रचय- साहित्यादपरोक्षज्ञानजनकत्वं युक्तम्। ततश् शव्दस्य स्वतः स्व्रविपये परोक्षज्ञानजनकत्वस्य भावनाप्रचयसहकृतज्ञानकरणत्वावच्छेदेन विधुरान्तः- करणवद्परोक्षज्ञानजनकत्वस्य च प्राप्तत्वात् पूर्ववननियमविधिरिति तदे- कदेशिनः ।

देवदत:' (वही यह देवदच है) इत्यादि प्रत्यभिज्ञानात्मकज्ञानके 'तद्' अंशका अ्हण करनेमें इन्द्रियके समर्थ न होनेपर भी तत्ांशके ज्ञानमें समर्थ संस्कारके सान्निध्यसे-सहभावसे इन्द्रिय-चक्षु-प्रत्यभिज्ञानात्मक- ज्ञानकी कारण होती है, वैसे हीं इस स्थलमे यद्यपि शब्द स्वयं अपरोक्षज्ञान- के उत्पादनमें असमर्थ है, तथापि विधुरपुरुष * द्वारा परिभावित कामिनीके साक्षात्कारके समान निश्चित भावनाप्रचयके सहभावसे शब्दमें अपरोक्ष ज्ञानकी जनकता युक्त है। ऐसा सिद्ध होनेपर जनकता स्वरूपतः शब्दमें स्वविषय-वाच्यके परोक्षज्ञानकी जनकता और भावनाविक्यके सहभावसे ज्ञानकरणमात्रमे विधुरके अन्तःकरणके समान अपरोक्षज्ञानकी जनकता प्राप्त है, अतः पूर्वोक्त विवरणमतके समान यह नियम- विघि हे-अपूर्वविधि नहीं है। इस प्रकार विचरणके एकदेशियोंका मत है।

*यह आशय है कि कामिनीकी भावनासे युक विधुर पुरुपका अन्तःकरण कामिनीके अपरोक्ष माक्षात्कारमें हेतु रूपसे देखा जाता है, इस स्थलमें चाहरके पदार्थके प्रहणमें यथपि अन्तःकरण स्वतन्त्र नहीं है अर्थात् चछ आदि वाह इन्द्रियोंकी अपेक्षा करता है, तो भी घाहय वस्तुकी भावनासे युकत छोकर बास वस्तुके साक्षात्कारमें हेत्ु होता है, इस प्रकार विशेष कार्य-कारणभावके ग्रहण करनेकी अपेक्षा लाघवंसे और वाघफके न होनेसे भावनासदकृत यावत जानके करण अपरोक्ष शानके साधन है, इस प्रकार सामान्य कार्य-कारण- भाव मानना उचित है। अतः शब्दके ज्ञान-करण दोनेसे भावनाविशिष्ट शब्द भी अपरोक्ष ज्ञानका जनक दो सकता है, इसलिए स्वभावतः शब्द परोक्षज्ञानका कारण है, तो भी भावनासे युक्त दोकर वही शब्द अपने विपयका अपरोक्ष साक्षारकार करेगा, और भावनाविशिष्ट शब्दमें अपरोक्ष साक्षार्कारकी जनकता अप्राप्त नहीं है, परन्तु ऊपरके कार्य-करणभावके वलसे प्राप्त ही है, अतः 'श्रोतव्यः' यह नियमषिधि ही है। + यह एकदेशीका मत युक नदीं हे, क्योंकि परोक्षशान उत्पन्न करना ही शब्दका

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३० सिद्धान्तलैश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

अन्ये परोक्ष एवात्मज्ञाने नियममास्थिताः। मनसैवेदमाप व्यमित्यादिश्रुविदर्शनात्॥८॥ कुछ लोग परोक्ष ज्ञानके उत्पादनमें शब्दकी सामर्थ्य होनेसे 'श्रोतव्यः' को परोक्ष आत्मज्ञानमें ही नियमविधि मानते हैं, क्योंकि 'मनसैवेदमासव्यम्' (यद आत्मतर्व मनसे ही प्राप्त करने योग्य है) इत्यादि श्रुति देखी जाती है॥ ८ ॥ वेदान्तश्रवणेन न ब्रह्मसाक्षात्कार, किन्तु मनसैव, 'मनसैवानु- द्रष्टव्यम्' इति अ्ुतेः। 'शास्त्राचार्योपदेशशमदमादिसंस्कृतं मन आत्म- दर्शने करणम्' इति गीताभाष्यवचनाच। श्रवणं तु निर्विचिकित्सपरोक्ष- ज्ञानार्थमिति तादर्थ्येंनैव नियमविधिरिति केचिद्।

वेदान्तके श्रवणसे ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं होता, किन्तु अन्तःकरणसे ही होता है, क्योंकि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही साक्षात्कार करना चाहिए) इस प्रकारकी श्रुति है, और 'शास्त्रा चार्योंपदेशशमदमादिसंस्कृतं०' ('तत्त्वमसि' आदि शास्त्र, आचार्यका उपदेश, शम, दम, तितिक्षा आदिसे शुद्ध हुआ मन ही आत्माके अपरोक्षानुभवमें करण है) ऐसा श्रीमद्भगवद्गीताके भाष्यमें वचन भी है। श्रवणका फल तो निश्चयात्मक परोक्षज्ञान ही है, इस- लिए निश्चयात्मक शब्दजन्य परोक्षज्ञानरूप प्रयोजनके लिए श्रवणकी नियम- विधि है, इस प्रकार कोई लोग कहते हैं ।।

स्वभाव है, यह बात नहीं है। इसीलिए ज्ञानमें रहनेवाला परोक्षत्वधर्म किसी कारणविशेषसे प्राप्त होता है, इसका खण्डन किया जायगा, अतः शब्दजन्य अपरोक्षज्ञानके प्रति मनन आदिके समान श्रवणकी विधि भी अयुक्त नहीं है, इसलिए एकदेशी, ऐसा कहा गया है। *आचार्यका उपदेश-आचार्य द्वारा किया गया वाक्याथोंका विवरण अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि अद्वैतपरक वाक्योंके अर्थोका स्पष्ट रीतिसे प्रतिपादन। *इस मतमें पूर्व मतसे इतना विशेष है कि यहाँ ब्रह्मपाक्षात्कार मानस-मनसे होनेवाला कहा गया है, अतः मनकी सहकारितारूपसे मनन और निदिध्यासनमें विधि है और पूर्व मतमें ब्रह्मसाक्षात्कार शान्द-शन्दसे होनेवाला कहा गया है, इसलिए शाब्दज्ञानके कारण शब्दकी सहकारितारूपसे मनन और निदिध्यासनमें विधि है।

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विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३१

गान्धर्वशास्त्रवत् चित्तसहकारितयेष्यते॥ आत्माऽपरोक्षे श्रवणं, तत्रैव नियमम्परे ॥ ९ ॥ जैसे पड्ज आदिका अपरोक्षज्ञान अन्तःकरणकी सहकारिता द्वारा गान्धर्वशास्त्रसे उत्पन्न होता है, वैसे ही अन्तःकरणकी सहकारितासे श्रवण आत्माका अपरोक्षज्ञान उत्पन्न कर सकता है, अतः अपरोक्षज्ञानके लिए ही श्रवणको नियमविधि मानते हैं, इस प्रकार भी कुछ लोगोंका मत है।। ९ ॥। अपरोक्षज्ञानार्थत्वेनैव श्रवणे नियमविधि: 'द्रष्टव्यः' इति फल- कीर्तनात्। तादर्थ्य च तस्य करणभूतमनःसहकारितयैव, न साक्षात्। शब्दादपरोक्षज्ञानानङ्गीकरणात्। न च तस्य तेन रूपेण तादर््य न प्राप्तमित्यपूर्वविधित्वप्रसङ्ग: । श्रावणेपु पड्जादिपु समारोपितपरस्पराविवेकनिवृत्त्यर्थ गान्धर्वशास्त्रश्रवण- अपरोक्ष ्रह्मसाक्षात्कारके लिए ही अ्रवणमें नियमविधि है, क्योंकि 'द्रष्टव्यः' इस प्रकार श्रवणके फलका कथन है[ भाव यह है 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि वाक्यसे विहित श्रवण आदिका 'द्रष्टव्य' शब्दसे दर्शन ही फल कहा गया है और दर्शनशब्दका प्रयोग साक्षात्कार ज्ञानमें ही होता है।] और श्रवणमें अप- रोक्षज्ञानार्थता करणभूत मनकी सहकारितासे ही हो सकती है साक्षात् नहीं हो सकती, क्योंकि शब्दसे अपरोक्ष-साक्षात्कार नहीं होता और उसका अङ्गीकार भी नहीं किया गया है। परन्तु यह तुम्हारा कथन तभी युक्त हो सकता है, जब वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कारके करणभूत मनकी सहकारिता रूपसे अपरोक्षानुभवार्थता कहीं प्राप्त देखी गई हो, परन्तु वह किसी प्रमाणसे प्राप्त ही नहीं है, इसलिए यह नियमविधि नहीं है, प्रत्युत अपूर्वविधि ही है, यदि इस प्रकार क़ोई शङ्का करे तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रोत्रेन्द्रियजन्य प्रत्यक्षके विपयीभूत अर्थात् कानसे प्रत्यक्ष किये जानेवाले पड्ज आदि ध्वनिविशेषोंमें

  • पड्ज आदि स्वरोंका पूर्वमें निरूपण किया जा चुका है, जिसने सभीतशास्त्रका अभ्यास न किया हो, ऐसे पुरुपको स्वरोंका विशदरूपसे भान नहीं होता, परन्तु सभी स्वर एकसे प्रतीत होते हैं-उन स्वरोंका परस्पर भेद प्रतीत नहीं होता है और गन्धर्व- शास्त्रका अभ्यास करनेपर उन स्वरोंका ठीक ठीक भेद प्रतीत होता है, इसी प्रकार मनसे, जो भीतर की इन्द्रिय है, अनुभव किय जानेवाले शरीर, प्राण और चिदात्मा आदिमें परस्पर

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३२ सिद्धान्तलेश संग्रह प्रथम परिच्छेद

सहकृतश्रोत्रेण परस्परासङ्कीर्णतद्याथार्थ्यापरोक्ष्यदर्शनेन प्रकाशमाने वस्तुन्या- रोपिताविवेकनिवृत्त्यर्थशास्त्रसन्भ्ावे तच्छुवणं तत्साक्षात्कारजनकेन्द्रियसह- कारिभावेनोपयुज्यते इत्यस्य क्लसत्वादित्यपरे। ऊहापोहात्मिका चित्त्रियैव श्रवणं विधेः। अपरोक्षं परोक्षं वा नाऽमानस्यास्य तत्फलम् ॥ १० ॥ तस्मात् पुन्दोषतात्पर्य भ्रान्तिसंस्कारशान्तये। नियमोऽस्येति सङ्क्षेपशारीरककृतो विदुः ॥ ११ ॥ ऊहापोहात्मक मानसिक किया ही श्रवण है, अतः अप्रमाणरूप इस श्रवणकी विधिसे आत्माका अपरोक्ष या परोक्षज्ञानलक्षण फल नहीं हो सकता है, इससे पुरुषगत तात्पर्यभ्रम या उसके संस्कार आदि दोषोंकी शान्तिके लिए यह श्रवण नियम विधि है, ऐसा संक्षेपशारीरककार-सर्वज्ञात्ममुनि मानते है॥ १० ॥ ११ ॥ वेदान्तवाक्यानामद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यनिर्णयानुकूलन्यायविचारा-

अज्ञानसे-गन्धर्वशास्त्रके अनभ्यासप्रयुक्त अज्ञानसे आरोपित जो परस्पर एकरूपता है, उसकी निवृत्तिके लिए गान्धर्वशास्त्रीय विचारसहकृत श्रोत्रसे उन षड्जादि स्वरोंकी परस्पर असंकीर्णता और यथार्थ अपरोक्षताका दर्शन होनेसे प्रकाशमान वस्तुमें आरोपित अविवेकनिवृत्तिरूप प्रयोजनवाले शास्त्रके सद्भावमें उस शास्त्रका श्रवण प्रकाशमान वस्तु साक्षात्कारकी कारण इन्द्रियके सहभावसे साक्षात्कारका हेतु हो सकता है, इस प्रकार वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कार करणभूत इन्द्रियकी सहकारिता निश्चित है, अतः विधिके बिना भी प्राप्त होनेसे यह अपूर्वविधि नहीं है, प्रत्युत नियमविधि है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं। वेदान्तवाक्योंका अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य * निश्चय करानेवाला न्याय- विचारात्मक जो अन्तःकरणका परिणामरूप श्रवण है, उसका ब्रह्में परोक्ष

भेद प्रतीत नहीं होता-एकरूपता प्रतीत होती है, यह सभीके अनुभवसिद्ध है, इसलिए यहाँ भी विचारवान् पुरुष षड्जादि स्वरोंके साक्षात्कारके दष्टान्तसे कल्पना करता है कि यदि आरोपनिवर्तक शास्त्र है, तो उस आरोपनिवर्तक शास्त्रके सहकारसे आन्तर इन्द्रिय ही वुद्धि आदिसे विविक्त आत्माका, जो ब्रह्मरूपसे वेदान्तोंसे प्रतीत होता है, साक्षात्कार करावगा । इसी भावको 'प्रकाशमान' इत्यादिसे व्यक्त करते हैं। प्रमेयकी असम्भावनाका निवर्तक जो मनन है उसमें अतिव्याप्ति वारण करनेके लिए

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विधिविचार] भापानुवादसहित ३३

त्मकचेतोवृत्तिविशेपरूपस्य श्रवणस्य न त्रह्मणि परोक्षमपरोक्षं वा ज्ञानं फलम्, तस्य शब्दादिग्रमाणफलत्वात्। न चोक्तरूपविचारावधारिततात्पर्य- विशिष्टशाव्दज्ञानमेव श्रवणमस्तु तस्य ब्रह्मज्ञानं फलं युज्यत इति वाच्यम्, ज्ञाने विध्यनुपपत्तेः । श्रवणविधेविचारकर्तव्यताविधायकजिज्ञासासूत्रमूलत्वो या अपरोक्ष फल नहीं है, क्योंकि परोक्ष या अपरोक्ष ज्ञानरूप फल शब्द आदि प्रमाणोंसे ही उत्पन्न होता है। परन्तु यहाँ यह'श्रवणशब्दका अर्थ नहीं है, प्रत्युत अद्वैत ब्रह्ममें वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य करानेवाले न्याय- विचारोंसे निश्चित तात्पर्यसे युक्त जो शाव्दज्ञान-शव्द्रजनित ज्ञान-है, वही प्रकृतमें श्रवण पदार्थ है, और उससे ब्रह्मज्ञानरूप फल हो सकता है, इस प्रकारकी शक्का नहीं करनी चाहिए। क्योंकि ज्ञानमें विधिकी उपपत्ति नहीं हो सकती अर्थात् श्र्णके ज्ञानरूप होनेसे ज्ञानात्मक श्रवणकी विधि नहीं होगी-ज्ञान विषयतन्त्र है विघेय नहीं है। और श्रव्रणविधि विचार- कर्तव्यताके + विधायक जिन्ञासासूत्रकी मूल है, ऐसा स्वीकार भी किया

तात्पर्यनिर्णयानुकल कहा। तात्पर्यका निश्चय करनेमें उपकरम और उपसंहारका ऐक्य, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति इन छःकी आवश्यकता होती है, इसी अर्थमें प्रामाणभूत एक श्लोक भी है- उपकमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम्। अर्थवादोपपती च लिस तात्पर्यनिर्णये। छान्दोग्यके पष अध्यायमं 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इस प्रकार अद्वितीय व्रह्मका उपक्रम करके 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' इस प्रकार उपसंहार किया गया है, इसलिए वहाँके सम्पूर्ण सन्दर्भका तात्पर्य उपकरम और उपसंदारके ऐक्यसे अद्वितीय ब्रह्ममें ही है। 'तत्त्वमसि' इस वाक्यका नौ बार पाठ है, इसलिए अभ्यासरूप तात्पर्यलिस्से इसका अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य माना गया है। 'यं वै सोम्य' दलयादिसे अन्य प्रमाणोंके अयोग्यत्वकथनसे अपूर्वरूप लिग्वसे अद्वितीय व्रह्मका निश्य होता है। 'तस्य तावदेव' इत्यादिका तात्पर्य भी अद्वितीय ब्रह्ममें है, क्योंकि विदेहकेवल्य- रूप फलका कथन है। 'अनेन जीवेन' इसका अर्थवादरूप प्रमाणसे अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य निश्ित होता है, 'एकेन मृत्पिण्टेन' इत्यादिका उपपत्तिसे अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य निर्णात होता है। अन्तःकरणके वृत्तिविशेपके कथनसे यत्रवाध्य क्रियावृत्तिकी विवक्षा है। तदसाध्य ज्ञानरूप धृत्तिकी विवक्षा नहीं है, क्योंकि ज्ञान विधिके अयोग्य है। मूलमें 'ब्रह्मणि' यह सप्तमी विपयार्थक है, इसलिये व्रद्मविपयक परोक्ष या अपरोक्ष फल श्रवणका नहीं हो सकता, यह पूर्वपक्षका भाव है। + मक्जिशञासासूत्र है-'अथातो ब्रम्मजिज्ञासा'। इसका अर्थ है कि वैराग्य आदि साधन-

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३४ सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम परिच्छदं.

पगमाच्च। ऊहापोहात्मकमानसक्रियारूपविचारस्यैव श्रवणत्वौचित्यात्।. न च विचारस्यैव तात्पर्यनिर्णयद्वारा, तञ्जन्यतात्पर्यभ्रमादिपुरुषापराध- रूपप्रतिबन्धकविगमद्वारा वा ब्रह्मज्ञानं फलमस्त्विति वाच्यम्, तात्पर्यज्ञानस्य

गया है। इसलिए ऊहापोहात्मक मानसिक क्रियारूप विचारको ही श्रंत्रण मानना उचित है। अब यह शङ्का होती है कि परम्परया-तात्पर्यके निश्चय द्वारा अथवा विचारजन्य तात्पर्यभ्रम आदि पुरुषके दोषोंके निरसन द्वारा विचारका भी ब्रह्मज्ञान फल हो सकता है, फिर श्रवणसे न्रह्मविषयक परोक्ष ज्ञान या अपरोक्ष ज्ञान नहीं हो सकता यह कहना असङ्गत है [शङ्काका भावार्थ यह है कि 'सदेव सोग्य' 'तत् सत्यम् स आत्मा' (हे सोम्य ! पहले यह सद्रूप था, वह सत्यस्वरूप है वह आत्मा है) इस प्रकार 'सदेव' से लेकर 'स आत्मा ततत्त्व्रमसि' तक वाक्यसमूह अद्वैत आत्मपरक है, अद्वैतप्रतिपादक उपक्रम और उपसंहारका ऐक्य होनेसे, इस रीतिके विचारका अनुमितिरूप अद्वैत तात्पर्यका निश्चय साक्षात्-अव्यवहित फलहै- इसके द्वारा और जो प्रतिबन्धक दोष हैं, उनका निवर्तन भी विचारका फल है।- इनके द्वारा विचार भी ब्रह्मज्ञानका हेतु बन सकता है, इसलिए जैसे ज्ञान शब्द आदि प्रमाणोंका फल है, वैसे ही विचारका भी तात्पर्यनिर्णय द्वारा अथवा तज्जन्य प्रतिबन्धकोंके निरास द्वारा फल हैं इससे 'श्रवणस्य न. ब्रह्मणि परोक्षमपरोक्षं वा ज्ञानं फलम्' इत्यादि उक्ति असङ्गत है, इसपर उत्तर देते हैं-उक्त शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ] तात्पर्यज्ञान शाब्दबोधमें कारण है, इस प्रकारके कार्यकारण- भावका स्वीकार नहीं किया गया है और प्रतिबन्धकके भभावका कहींपर भी

सम्पत्तिके अनन्तर मनुष्यको ब्रह्मके अपरोक्ष ज्ञानके लिए वेदान्तविचार करना चाहिए, क्योंकि सूत्रमें कहे गये जिज्ञासाश्दकी विचारमें लक्षणा है और इस जिज्ञासासूत्रका मूल है 'श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्य। इससे श्रवणका अर्थ यदि ज्ञान मान लिया जाय, तो 'श्रोतव्यः' इसका 'श्रवणरूप ज्ञान करना चाहिए'-यह अर्थ होगा। इस परिस्थितिमें जिज्ञासासूत्र और श्रोतव्यवाक्यका परस्पर मूलमूलिभाव अर्थात् प्रयोज्यप्रयोजकभाव नहीं होगा, क्योंकि दोनोंकी एकार्थता नहीं है, इसलिए यदि 'श्रोतव्यः' यह श्रति जिज्ञासासूत्रका मूल है, तो श्रवणका अर्थ हम ज्ञान नहीं कर सकते, यह भाव है। ऊह-न्यायाभासोंको-दुष्ट न्यायोंको-हटाकर निर्डुष्ट न्यायोंका प्रदर्शन। अपोह-न्यायाभासका निराकरण ।

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विधिविचार ] भांपानुवादसहित ३५

शाब्दज्ञाने कारणत्वानुपगमात्, कार्ये क्वचिदृपि प्रतिबन्धकाभावस्य कारण-

कारणरूपसे स्वीकार नहीं किया गया, अतः तात्पर्यज्ञानमें और विचारसे होनेवाले प्रतिबन्धकाभावमें द्वारत्वकी उपपत्ति ही नहीं हो सकती है-भाव यह है कि वेदान्तसिद्धान्तमें शाव्दवोघके प्रति तात्पर्यज्ञान और प्रतिब्न्धकका (प्रतिबन्धक उसे कहते हैं जो कार्यकी उत्पत्ति न होने दे) अभाव कार्यमात्रके प्रति कारण नहीं माने गये हैं, इसलिए उनके द्वारा विचार व्रदज्ञानका, जो शव्द प्रमाणका फल है, कारण नहीं हो सकता, क्योंकि द्वार शब्दका अर्थ है-'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वम्' अर्थात् जो स्वयं कारणसे उत्पन्न होकर कारणसे उत्पन्न होनेवाले कार्यके प्रति कारण हो, जसे घटके प्रति दण्ड कारण होता है, इसमें द्वार है-श्रमि, भ्रमि दण्डसे उत्पन्न होती है और दण्डसे उत्पन्न होनेवाले घटके प्रति कारण है, इसलिए भ्रमिमें द्वारता है। प्रकृतमें जब शव्दवोधके प्रति तात्पर्यज्ञान * और कार्यके प्रति प्रतिवन्धकाभाव + कारण ही नहीं हैं, तब

*शब्दयोधके प्रति यदि तात्पर्यज्ञान कारण माना जाय, तो शुक (सुग्गा ) से कहे गये शब्दये शब्दवोध न दोगा, क्योंकि वदाँ वकताके तात्पर्यका अभाव है और लोकमें व्यवहार भी होता है-'शुरु आदिके शब्दसे अर्थका बोध होता है, लेकिन वहां तातपर्य नहीं है' इससे शान्द्योधके प्रति तात्पर्यज्ञान हेतु नहीं है, यह स्पतः ज्ात होता है। 'वहां भी ईखरका तात्र्य ह' इर पकारकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि ईखवरके तात्पर्यकी शन्द्योभरूप फलके बाद कल्पना लोगी, पदले तो ईश्वरतात्पमर्य दुर्बोध ही है, शब्दके साननिध्यसे भी तात्पर्गका निर्णय नहीं कर सकते, क्योंकि 'अदो । विमल जलं नया: कच्छे महिपाश्ररन्ति' इत्यादिमें 'नयाः' का सनिधान जल और वच्छके खाथ एकसा है और 'पय लाओ' ऐसा कहनेपर 'जल' या 'दूध' दूध प्रकार प्रश्न दोनसे यह वल्पना अवश्य होती है-चकताके तात्पर्यका परिज्ञान न रहनेपर भी शान्दवोध दोता है, इसलिए शाब्दजानमें तात्पर्यशान कारण नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है। प्रतिबन्धकाभाव कार्यमें कारण नहीं है, इसमें युक्ति यह है कि प्रतिधन्धकाभावकी फार्यकी सामपीमें अन्तर्माच नहीं कर राकते, क्योंकि 'सामप्रीके रहनेपर भी प्रतिवन्धकके रद्दनेसे कार्य उत्यन नहीं हुआ' इस प्रकार व्यवदार देखा जाता है, यदि सामन्ीके अन्दर प्रतिबन्धका- मावका समायेश रोता, तो प्रतियन्धकसे कार्यकी उत्पत्ति नहीं हुई, इस प्रकार न बोलते। इससे यह ज्ञात दोता है कि अप्रतियदध सामप्री कार्यके प्रति कारण है। इस अवस्थामें अप्रतिवद्ध-प्रतिबन्धका- आाययुक्, यद सरामभीका विशेषण हुआ अर्थात रामग्रीकी कारणताका अवच्छेदक-विशेषण हुआ। जो फारणताका अवच्छेदक होता है, वह कार्यका कारण नहीं दोता, क्योंकि वद्द अन्यथासिद्ध होता है। इसीलिए घट के प्रति दण्डल कारण नहीं है, परन्तु दण्ड कारण है, प्रकृतमें भी प्रतिन्वकाभावके

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३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

त्वानुपगमाच्च तयोर्द्वारित्वानुपपत्तेः। ब्रह्मज्ञानस्य विचाररूपातिरिक्तकारण- जन्यत्वे तत्प्रामाण्यस्य परतस्त्वापत्तेश्र। तस्मात्तात्पर्यनिर्णयद्वारा पुरुपा- पराधनिरासार्थत्वेनैव विचाररूपे श्रवणे नियमविधिः। 'द्रष्टव्यः' इति तु दर्शनार्हत्वेन स्तुतिमात्रम्, न श्रवणफलसङ्कीतेनमिति सङ्केपशारीरका- नुसारिण: ।। कारणघटित द्वारत्वकी उपपत्ति ही उनमें नहीं हो सकती है। और यदि यह मानें कि ब्रह्मज्ञान शब्दप्रमाणसे अतिरिकत विचाररूप कारणसे उत्पन्न होता है, तो ब्रह्मज्ञानके प्रामाण्यको परतस्त्व प्राप्त होगा। परन्तु इसे स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि वेदान्तसिद्धान्तमें ज्ञान स्वतः प्रमाण माना गया है अर्थात् ज्ञानमें रहनेवाला प्रामाण्य ज्ञान-आ्राहक सामग्रीसे ही ग्राह्य होता है, इतरसे नहीं, यही प्रामाण्यका स्वतस्त्व है। और यदि ज्ञानग्राहक शब्द आदि सामग्रीसे अन्य विचारको ज्ञानके प्रति कारण मानें, तो ज्ञानके प्रामाण्यमें परतस्त्वकी आपत्ति स्पष्टरूपसे प्राप्त होगी और सिद्धान्तकी हानि होगी, इसलिए ब्रह्म- ज्ञानके प्रति विचारको परम्परया या साक्षात कारण नहीं मान सकते। इससे-ब्रह्मज्ञानके विचारफल न होनेसे-तात्पर्यके निर्णय द्वारा (वेदान्तों- का अद्वितीय ब्रह्मके प्रतिपादनमें तात्पर्य है, अन्यत्र नहीं है इस प्रकारके निश्चय द्वारा) पुरुषके तात्पर्यश्रम आदि अपराघोंके निरास द्वारा ही विचार- रूप श्रवणमें नियमविधि है, अर्थात् तात्पर्यनिर्णय द्वारा पुरुषोंके दोषोंका निरास ही विचारका फल है, और श्रवणसे ही इस फलका सम्पादन करना चाहिए, अन्य साधनोंसे नहीं, यह भाव है। परन्तु 'द्रष्ट्यः' (अपरोक्ष साक्षात्कार करना चाहिए) इस प्रकार श्रवणके फलका कथन है, इसलिए श्रवणसे-विचारसे अपरोक्ष साक्षात्कार हो सकता है? यदि इस प्रकार कोई शङ्का करे तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मा द्रष्टव्य है-दर्शनके योग्य है, इस प्रकार यह दर्शन केवल स्तुतिमात्र है, वस्तुतः श्रवणसे अपरोक्ष ज्ञान होता है, इस प्रकार श्रवणके फलका कथन नहीं है, यह संक्षेपशारीरकानुयायियोंका मत है * । अवच्छेदक होनेसे अन्यथासिद्धिशन्यत्वके न रहनसे प्रतिबन्धकाभाव कारण नहीं हो सकता है, इसलिए प्रतिबन्धकाभावमें भी द्वारता नहीं है, अतः तद्द्वारा विचार ब्रह्मज्ञानका कारण नहीं हो सकता है, यह भाव है। * इस अभिप्रायके सूचक संक्षेपशारीरकके निम्नलिखित झलोक हैं-

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विधिविचार ] भांपानुवादसहित ३७

चिकित्साशास्त्रवत् प्राप्तव्यापारान्तरवारिणी। श्रवणे परिसङ्ख-्येयमिति वार्तिकवेदिनः ॥१२ ॥ जैसे ओपधियोंके ज्ञानके लिए आयुर्वेदके अध्ययनमें प्रवृत्त पुरुपको मध्यमें अन्य व्यापार परास होता ऐै, चैसे ही महाशानार्थ प्रवृत पुरुषको मध्यमे अन्य व्यापार प्रास्त दो सकता है, अतः प्रातत अन्य-्व्यापारका निवारण करनेवाली परिसंख्या- विधि ही सवणमे ह, ऐसा वार्तिकके अभिशोंका मत है ॥ १२ ॥ पुस्यापराममलिना घिपणा निश्वयचशुरदयापि यथा। न फलाय भामुविपया गर्वतत क्षुतिसम्मवापि तु तथात्मनि घीः ॥१४॥ पुरपापराधयिगमे तु पुनः प्रतियन्धवध्युदसनात् सफला। गणिमन्त्रयोस्पगग तु यथा सति पावकाद् भवति भूमलता ।१५॥ पुस्यापराधविनिगृतिफल: मलो विनार इति वेदविदः। अनंपक्षतामनुषयध्य गिरः फलवद् भवेत् प्रयरणं तदतः ॥१६॥ पुस्यापराधशतबद् कुलता विनियतते प्ररुरणेन गिर:। स्वयमेय वेदशिरंगो चननादू अथ युद्धिष्द्मवति मुक्तिफला॥९७॥ इत्यादि (सं. शा० पृ०२३ पुना सुद्दित)। पदले शलोकया भाव हे- मतर्युनामक कोई रामाका प्रीतिपात्र सेवक था। उससे द्वेष करनेवाले राजाके अन्य नौकर छलसे उसे अन्मत कहीं ले गये, और उस स्थलपर उस्को छोनकर राजाके पास आकर घोले कि सापका बद नोकर मर गया है। इसके अनन्तर कभी उम राजाने उस अपने उपवनमें देसा। राजा उस्रे देखकर पिशानकी भ्रान्तिये डर गया और भाग गया। इस अवस्यामें निर्वोष चक्षत होनेवाला सेवक-विपयक राजाका ज्ञान-'यह मेरा नौकर ही है पिधान नहीं है' इम्र प्रकार निकयात्मक ज्ञान-उत्पन्न नहीं कर सका, क्योंकि 'मर गया' इस विपरीत संसकारये उसका प्रतिबन्ध दो गया था। इसी प्रकार निर्दोष श्रुतिसे उत्पन्न 'मैं यदा है' इस तरदफा ज्ान भी प्रमाताकें पूर्यकालीन विपरीत भावनासे प्रतिबद्ध दोनेके कारण म्रदाविपयक निमयात्मक जानको उत्पनन नहीं कर सकता, इसलिए पह्दले प्रतिबन्धकका निरास करना अस्यन्त अपेक्षित है। अगन्भापना और विपरीतभावना आदि पुरुषके दोपोंका निराकरण दोनेपर असम्मायना आदि प्रतिपन्धर्कों के विनासये उच ज्ञान सफल है, जैसे-मणि और मन्त्नोंके अपगमसे पहिये भूमलता उत्पन्न होती दै॥१५॥ ललूकि सम्पूर्ण धर्म और महाविचार पुरुपके अपराधकी निमृत्तिके लिए हैं, ऐसा वेदविद् कहते है, इसीलिए 'अथे ऽनुपलन्धे तत्प्रमाणं वादरायणस्यानपेक्षत्वात्' (जै० १1१।५) इस सूमें पेदवापयफी निर्भात अनपेक्षताका चाध न करके शासत्र और प्रकरण सफल होते है, ऐसा कह़ा गया है॥ १६॥ प्रकरण या शालसे पुरुषके दोपोक विनाश छोनेपर मुकिरूप फलका उत्पादन करनेवाली 'तश्यमधि' आदि महावाक्योंये स्वयं दी बुद्धि उत्पन्न होती है।१७॥ इख प्रकार ऊपरके सभी रोफोंका भाव है, इनके देखनेसे यद स्पष्ट ज्ञात होता है कि विचारफा फट-प्रतिबन्धकका विनाश दी संक्षेपशारीरककार मानते हैं।

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३८ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेदे

ब्रह्मज्ञानार्थ वेदान्तश्रवणे अवृत्तस्य चिकित्साज्ञानार्थं चरकसुश्रुतादि- श्रवणे प्रवृत्तस्येव मध्ये व्यापारान्तरेऽपि प्रवृत्ति: प्रसज्यत इतिः तननिवृत्ति- फलकः 'श्रोतव्यः' इति परिसङ्ल्याविधिः। 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' (छा० २ । २३ । १ ) इति छान्दोग्ये अनन्यव्यापारत्वस्य मुक्त्युपायत्वावधारणात् सम्पूर्वस्य तिष्ठतेः समाप्तिया- चितया ब्रह्मसंस्थाशब्दशव्दिताया व्रह्मणि समाप्तेरनन्यव्यापाररूपत्वाद्। 'तमेवैकं जानथ अन्या वाचो विमुश्चथ' इत्याथर्वणे कण्ठत एव व्यापारा-

औषधोंके परिज्ञानके लिए चरक, सुश्रुत आदि आयुर्वेदके ग्रन्थोंके विचार- में प्रवृत्त हुए पुरुषके समान ब्रह्मज्ञानके लिए वेदान्तविचारमें प्रवृत्त हुए पुरुषकी वीच-बीचमें विचारके उपराम कालमें अन्य व्यापारोंमें भी प्रवृत्ति हो सकती है, अतः उनकी निवृत्तिके लिए 'श्रोतव्यः' यह परिसंख्याविधि है। भाव यह है कि औषधोंके परिज्ञानके लिए वैद्यकके ग्न्थोंके श्रवणमें पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, क्योंकि औषधका ज्ञान केवल वैद्यकग्रन्थोंसे ही होता है, अन्य अन्थोंसे नहीं होता। इस परिस्थितिमें यद्यपि दवाके ज्ञानके लिए वैद्यकग्रन्थोंके श्रवणके विना अन्य व्यापारकी प्रसक्ति नहीं है, तो भी विषयवासनाओंके वलसे मध्यमें इंतर व्यांपारोंमें पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, इसी प्रकार ब्रह्मतत्त्वके यथार्थज्ञानके लिए वेदान्तश्रवणमें प्रवृत्त पुरुष जन्म-जन्मान्तरकी भेदवासनाओंसे आकृष्ट होकर कदाचित् मध्य-मध्यमें अन्य लौकिक और वैदिक व्यापारोंमें भी प्रवृत्तः हो सकता है, अतः मध्यमें प्राप्त अन्य व्यापारोंकी निवृत्ति करनेके लिए श्रोतव्यः यह परिसंख्याविधि है। [ परन्तु जैसे सुश्रुंत, चरक आदिके श्रवणमें प्रवृत्त पुरुषको अन्य व्यापार- अन्य- शास्त्र श्रवण आदि करनेपरभी चिकित्साका ज्ञान होता है, वैसे ही वेदान्तके श्रवणमें प्रवृत्त पुरुषको बीच-वीचमें अन्य व्यापार करनेपर भी ब्रह्मज्ञान हो सकंता है, इसलिए परिसंख्याविधिका स्वीकार निष्फल है? नहीं, निष्फल नहीं है ] क्योंकि 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' (ब्रह्मनिष्ठ पुरुष अमृतत्व प्राप्त करता है). इस श्रुतिसे छान्दोग्यमें अनन्यत्यापारत्वका ही मुक्तिके प्रति उपायरूपसे अवधारण किया- गयां है, कारण कि सम्पूर्वक 'स्था' धातुके समाप्तिवाची होनेसे ब्रह्मसंस्थाशव्द्से बोधित-ब्रह्ममें समाप्ति अनन्यव्यापाररूपहै। और 'तमेवैंक जानथ अन्या

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विधिविचार ] भापानुवादसहित ३९

न्तरप्रतिपेधाच्च । 'आसुपेरामृतेः कालं नयेद्वेदान्तचिन्तया' इत्यादि- स्मृतेश्व। न चं त्रह्मज्ञानानुपयोगिनो व्यापारान्तरस्य एकस्मिन् साध्ये श्रव्णेन सह समुन्तित्य प्राप्त्यभावान्न तन्निवृत्त्यर्थ: परिसङ्गचाविधिर्युज्यते इति वाच्यम्, 'सहकार्यन्तरविधिः' (उ० मी० अ० ३ पा० ४ अधि० १४ सृ० ४७) इत्यादिसूत्रे 'यस्मात् पक्षे भेददर्शनप्रावल्यान्न ग्रामोति, तस्मान्नियमविधि:' इति तन्द्ाप्ये च कृतश्रवणस्य शाव्दज्ञानमात्रात्

चाचो विमुश्चथ' (हे मुमुक्षु लोगो! जिस आधारमं आकाश आदि समस्त जगत् अध्यस्त है, उसी आधारभूत एकरूप आत्माको जानो और अनात्मप्रति- पादक शब्दोंका त्याग करो) इस श्रतिसे आथर्वणमें कण्ठसे ही अर्थात् अभिघावृत्तिसे ही शास्त्रान्तरश्रवणका प्रतिषेध किया है, और 'आसुप्तेरामृतेः कालम्०' (सुप्ति और मृति पर्यन्त कालको वेदान्तके चिन्तनसे वितांवे) इस प्रकारकी स्मृति मी है अर्थात् यह स्मृति भी अन्य व्यापारका प्रतिपेध करती है। परन्तु न्ह्मज्ञानरूप एक साध्यमें श्रवणके साथ साथ अनुपयुक्त अन्य व्यापारकी पाप्ति नहीं होनेसे उसकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि युक्त नहीं है? नहीं, ऐसी शब्ा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'सहकार्यन्तर- विधिः इत्यादि सूत्रमें और 'यस्मात् पक्षे मेददर्शनपावल्यात् न प्रामोति, तस्मान्नियमविधिः' इस प्रकारके उस सूत्रके भाव्यमं-जिसने श्रवण किया

• दादा और उत्तर करनेवालोंका अभिप्राय यह है कि परिसंरुयाविधि वहीं होती है, जहाँ एक वस्तुके उत्पदनमें एक साथ दो साधनोंकी प्राप्ति दो। परन्तु प्रकृतमें ऐसी वात नहीं है, क्योंकि यहाँ नपजानका उत्पादन करना है, इसके उत्पादनमें श्रवण कारण है, न कि अन्य व्यावदारिक व्यापार, इसलिए एक साथ दो साधनोंकी प्राप्ति न होनेसे अन्य व्यापारकी नियृसिके लिए परिसंकयाविधि कैसे होगी? इसका उत्तर प्रतिबन्दी है अर्थात् भाष्यकारने निदिध्यासनमें नियमविधि मानी है, इसमें कारण केवल यही बतलाया है-श्रवणके बाद वब्दजानये अपनेको धन्य समसनेवाला निदिध्यासनमें, जो साक्षात्कारका उपयोगी है, फदाचित् प्रशृत न दोकर अन्य अनुपयुचा लौकिक व्यापारमें प्रवृत हो जाय, इसलिए निदिध्यासन में नियमविधिका अगञीकार है। उत्तरवादीका भाव यह है-साक्षारकारके जननमें पक्षमें असाधनकी प्रासतिकी संभावनामान्नये निदिध्यासनके अग्नाप्ताशकी परिपूर्तिसे जैसे नियमविधि मानी गई है, वैरे दो प्रकृतमें धवणके साथ समुचयसे सम्भावनामान्नसे असाधन की प्राप्ति है, हससे उसकी नियृततिके लिए अपश्य श्रवणको परिसंख्याविधि मानना चाहिए।

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४० सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

कृतकृत्यतां मन्वानस्याऽविद्यानिवर्तकसाक्षात्कारोपयोगिनि निदिध्यासने प्रवृत्तिर्न स्यादिति अतत्साधनपक्षप्राप्तिमात्रेण निदिध्यासने नियमविधेर- भ्युपगततया तन्न्यायेनाऽसाधनस्य समुच्चित्य प्राप्तावपि तन्निवृत्तिफलकस्य परिसङ्ख्याविधेः सम्भवादिति। नियम: परिसङ्या वा विध्यर्थोऽत्र भवेद्यतः ॥ अनात्मादर्शनेनैव परात्मानमुपास्महे॥ १ ॥ इति वार्तिक- वचनानुसारिण: केचिदाहुः॥

श्रवणं ह्यागमाचार्यवाक्यजं ज्ञानमिष्यते। अयोग्येडत्र विधिनेति वाचस्पतिमतानुगाः ॥१३॥

शात्त्र और आचार्यके वचनोंसे उत्पन्न होनेवाला आत्मज्ञान ही श्रवण है, अतःउक्त तीनों विधियोंके अविषय श्रवणमें (कोई भी) विधि नहीं है, यह वाचस्पतिके अनुयायियोंका मत है ।। १३ ॥

'आत्मा श्रोतव्यः' इति मननादिवत् आत्मविषयकत्वेन निवध्य-

है और जो शब्दके श्रत्रणसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानमात्रसे अपनेको कृतकृत्य मानता है तथा अन्य व्यांपारोंमें भी जिसकी प्रवृत्ति है, ऐसे पुरुपकी अविद्याकी निवृत्ति करनेवाले साक्षात्कारके उपयोगी निदिध्यासनमें कदाचित् प्रवृत्ति न हो, इसलिए पक्षमें ज्ञानके असाधनकी प्राप्तिमात्रसे निदिध्यासनकी-नियमविधि मानी गई है, इसी न्यायसे समुच्चयसे असाधनकी प्राप्ति होनेपर उसकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि हो सकती है, इस प्रकार 'नियम: परिसंख्या वा०' (इस 'आत्मा- वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्यमें नियम विधिप्रत्ययका अर्थ होगा। अथवा श्रवणके नित्य प्राप्त होनेसे नियम यदि विधिका अर्थ न हो सके, तो परिसंख्या ही विधिप्रत्ययका अर्थ हो, क्योंकि हम उपासक लोग अनात्मा- दर्शनसे ही-अनन्यव्यापारसे ही परमात्माकी उपासनामें प्रवृत्त हैं) इस वार्तिकवचनका अनुसरण करनेवाले कुछ लोग कहते हैं। मनन आदिके समान 'आत्मा श्रोतव्यः' (आत्माका श्रवण करना चाहिए) इस प्रकार आत्मविषयकत्वरूपसे कहा गया श्रवण भी आगम-शास्त्र और

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विधिविचार ] भापानुवादसहित ४१

मानं श्रवणमागमाचार्योपदेशजन्यमात्मज्ञानमेव, न तु तात्पर्यविचाररूप- मिति न तत्र कोऽपि विधि:।

आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न होनेवाला आत्मज्ञान ही है, तात्पर्यविचाररूप नहीं है, अतः श्रवणमें कोई विधि नहीं है। भाव यह है कि जसे मनन और निदिध्यासन, जो आत्माको विषय करते हैं, ज्ञानरूप हैं, वैसे ही श्रवण भी, जो आत्माको विषय करता है, ज्ञानरूप ही है, क्योंकि 'आत्मा श्रोतव्यः' इस श्रुतिमें आत्मा और श्रवणका परस्पर विषय-विषयिभाव सम्बन्ध प्रतीत होता है, अतः श्रवण आत्मविषयक है। यदि श्रवण विचाररूप माना जाय, तो वह आत्मविपयक न होगा और श्रवणक्रियाका कर्म आत्मा न होगा, किन्तु वेदान्तवाक्य होंगे। इससे मनन आदिमें क्लप् आत्मरूप कर्मका परित्याग होनेसे प्रकमका भङ्र होगा। [परन्तु मनन आदिका जो दष्टान्त दिया गया है, उसपर कुछ आलोचना करनी चाहिए, क्योंकि आपाततः मननशब्दका अर्थ-ज्ञान नहीं होता है। मननका अर्थ है-युक्तियोंसे किसी वस्तुकी आलोचना करना अर्थात् एक वस्तुको युक्ति-प्रयुक्तियोंसे टटोलना, इससे हम मननको ज्ञानरूप नहीं मान सकते, व्यापारात्मक ही मान सकते हैं। इसी प्रकार निदिध्यासन भी ज्ञानरूप नहीं हो सकता, क्योंकि निदिध्यासन शब्दकी निष्पत्ति चिन्तार्थक 'ध्यै' धातुसे हुई है, इसलिए 'मनन आदिके समान' यह दष्टान्त युक्त नहीं है। इसपर यह कहा जाता है कि मनन व्यापाररूप नहीं है, किन्तु अनुमितिज्ञानरूप है। और वह अनुमिति- आत्मा ब्रह्मस्वभाव है, चिद्रूप होनेसे, क्के समान । वुद्धि आदि कल्पित हैं, दृश्य होनेसे, शुक्तिरजतके समान-इस प्रकार है। इसमें मैत्रेयीब्राह्मणका वार्तिक प्रमाण है- आगमार्थविनिश्चित्यै मन्तव्य इति भण्यते। 1 वेदशव्दानुरोध्यत्र तर्कोऽपि विनियुज्यते।। पदार्थविपयस्तर्कः तथैवाऽनुमितिर्भैवेत्। श्रुतिके अर्थको दढ करनेके लिए तर्करूप मननका विधान किया जाता है, वह तर्क वेदाविरोधी होता है तथा तत्त्वंपदार्थविषयक और अनुमित्यात्मक होता है, यह इसका भाव है। जव अनुमितिरूप मनन है, तो उसे ज्ञानरूप मानने-

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४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

अत एव समन्वयसूत्रे (उ० मी० अ० १ पा० १ सू० ४) आत्म- ज्ञानविधिनिराकरणानन्तरं भाष्यम्-'किमर्थानि तहिं 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः इत्यादीनि वचनानि विधिच्छायानि १ स्वाभाविक पवृत्तिविषयविमुखीकरणार्थानीति ब्रूमः' इत्यादि। में क्या हानि है ? इसी प्रकार निदिध्यासन भी ज्ञानरूप है, क्योंकि बृहदारण्यके ४र्थ और ६ष अध्यायगत मैत्रेयीब्राह्मणमें भगवती श्रुति कहती है-'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः'। अनन्तर छठे अध्यायमें 'मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दष्टे श्रुते मते विज्ञाते' और चौथे अध्यायमें 'मैन्नेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेन' इस प्रकार निदिध्यासनके अनुवादके लिए विज्ञानशव्दका प्रयोग किया गया है, इससे वार्तिककार ज्ञानरूपसे निदिध्यासनका भी अङ्कीकार करते हैं, अतः 'अपरायत्तबोधोऽ्र निदिध्यासनमुच्यते' इस प्रकार वार्तिककारकी उक्ति भी उपलब्ध होती है। इसलिए मनन आदिका ज्ञानरूपसे अङ्गीकार होनेसे दष्टान्तासिद्धि नहीं है-अब प्रसङ्गसे यहाँ एक शक्का यह भी होती है- निदिध्यासन और दर्शनके अर्थात् 'निदिध्यासितव्यः' और 'द्रष्टव्यः' इनं दो पदोंके एकार्थक होनेसे पुनरुक्ति होगी? नहीं, यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'दृष्टव्यः' इस शब्दसे विचारप्रयोजक-विचारमें प्रवृत्तिके उपयुक्त आपाततः दर्शनका अनुवाद है और 'निदिध्यासितव्यः' इस शब्दसे विचारका फलभूत जो साक्षात्कार है, उसका अनुवाद है, अतः पुनरुक्ति नहीं है ]। [ श्रवणमें विधि नहीं है, इसमें भाष्यकी सम्मति भी है ] इसीसे श्रवण और मनन आदिके ज्ञानरूप होनेके कारण विधिके अयोग्य होनेसे- 'तत्तु समन्वयात्' इस समन्वयसूत्रमें आत्मज्ञानकी विधिके निराकरणके पश्चात् भाष्य है-'किमर्थानि तर्हि 'आत्मावा अरे .... ब्रूमः' इत्यादि। (यंदि आत्म- ज्ञानकी विधि नहीं है, तो 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादि 'अध्येतव्यः' इत्यादि विधिके समान वचन किसलिए हैं? स्वाभाविक प्रवृत्तिके विषयसे विमुख करनेके लिए ऐसे वचन हैं, ऐसा हम कहते हैं) * स्त्रभावसे-अविद्यासे होनेवाली प्रवृत्तिका नाम स्वाभाविक प्रवृत्ति है। + इसमें आदिशब्दसे 'यो हि वहिर्मुखः पुरुषः प्रवतते' 'इषश मे भूयादनिष्टथ्च मा भूत्' इत्यादि भाष्यका संग्रह करना चाहिए, इस भाष्यका अभिप्राय है कि जो पुरुष वहिमुख है, वह मुझे इष्ट वस्तु प्राप्त हो और अनिष्ट प्राप्त न हो, इस बुद्धिसे वाहरके विषयोंमें ही प्रृत होता

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विधिविचार ] भापानुवांदसहित ४३

यदि च वेदान्ततापर्त्यविचाररूपं श्रवणम्, तदा तस्य तात्पर्यनिर्णयद्वारा वेदान्ततात्पर्यभ्रमसंशयरूपप्रतिवन्धकनिरास एव फलम् ; न प्रतिबन्ध- कान्तरनिरासो ब्रह्मागमो वा। तत्फलकत्वं च तस्य लोकत एव प्राप्तम्। साधनान्तरं च किश्चिद्विकल्प्य समुच्चित्य वा न प्राप्तमिति न तत्र विधि- त्रयस्याऽप्यवकाशः ।

इत्यादि। [तात्पर्य यह है यदि 'श्रोतव्यः' इत्यादि वेदानतवाक्य विधायक नहीं हैं, तो 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि विधायक-वाक्योंमें तव्यप्रत्यय निरर्थक होंगे? इस प्रश्नपर भगवान् भाष्यकारका कहना है कि निरर्थक नहीं हैं, क्योंकि उन तव्य आदि प्रत्ययोंसे श्रवण आदिकी स्तुति होती है। जो मुमुक्षु श्रवण आदिमें मोक्षकी साधनताका अनुभव करके भी संन्यास, न्रदाचर्य आदिके अनुष्ठानके क्ेशोंसे उनमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्त नहीं होता और साधारणतया प्राप्त वर्णाश्रमके अनुकूल कर्म और उपासनाओंका अनुष्ठान करता हुआ भी उनसे निवृत्ति नहीं पाता है, उन वर्णाश्रम कर्मोंमें आत्यन्तिक मोक्ष- साघनताके अभावका अनुसन्धान कराते हुए ये 'तव्य' आदि प्रत्यय उसके प्रति श्रव्रण आदिकी प्रशंसा करते हैं अर्थात् 'मुमुक्षु पुरुष सम्पूर्ण उत्साहसे श्रवण आदिमें ही प्रवृत्त हो, क्योंकि वे ही मुक्तिके साधन हैं' इस प्रकार प्रशंसा द्वारा 'तव्य' आदि प्रत्यय पुरुपके प्रवर्तक हैं, अतः विधायक न होनेपर भी 'तव्य' आदि प्रत्यय निरसर्थक नहीं हैं ]। यदि श्रवणको ज्ञानरूप न मानकर वेदान्ततात्पर्यविचाररूप ही मानें, तो भी तात्पर्यनिश्चय द्वारा वेदान्तोंके तात्पर्यभ्रम या तात्पर्यसंशयरूप प्रतिबन्धकका निराकरण ही श्रवणका फल है; अन्य प्रतिबन्धकका- पापका निरास या ब्रझज्ञान उसका फल नहीं है। अ्रमादिरूप जो प्रतिबन्धक है, उसका निराकरणरूप श्रवणका फल तो लोकसे ही प्राप्त है और अन्य साधन-अर्थात् व्रम्मज्ञानमें श्रवण आदिसे अन्य कोई कारण चिकल्पसे या समुचयसे म्राप्त भी नहीं है, इसलिए तीन विधियोंमें से किसी भी विधिका अव- काश नहीं है।

है, 'आत्मा या अरे' इत्यादि श्रुतिस्थ तव्य प्रत्यय उस पुरुपकी स्वाभाविक वाए प्रृत्तिको हटाकर प्रशंखा द्वारा आभ्यन्तर प्रवृत्ति कराते हैं।

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सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

विचारविध्यभावेऽपि विज्ञानार्थतया विधीयमानं गुरूपसदनं दृष्टद्वार- सम्भवे अदृष्टकल्पनायोगात् गुरुमुखाधीनवेदान्तविचारद्वारव विज्ञानार्थ पर्यवस्यतीति। अत एव स्व्रप्रयत्नसाध्यविचारव्यावृचिः। अध्ययनवि- ध्यभावे तूपगमनं विधीयमानमक्षरावाप्त्यर्थत्वेनाऽविधीयमानत्वान्न तदर्थं गुरुमुखोच्चारणानूच्चारणमध्ययनं द्वारीकरोतीति लिखितपाठादिव्यावृत्य- सिद्धे: सफलोऽध्ययननियमविधिः।

वेदान्तविचारकी विधि न होनेपर भी गुरूपसदनका-गुरुके पास विज्ञानार्थ गमनका, जिसका कि विज्ञानरूप प्रयोजनके लिए विधान है, गुरुमुखके अधीन वेदान्तविचारके द्वारा ही विज्ञानमें पर्यवसान होता है अर्थात् 'गुरु- मेवोपगच्छेत्' इत्यादिसे गुरुके समीपमें विहित जो गमन है, वह गुरुमुखसे सम्पादित वेदान्तविचाररूप दृष्ट द्वारा विज्ञानकी-आत्मज्ञानकी उत्पत्ति करेगा अदष्ट द्वारा नहीं। क्योंकि जब तक दष्ट द्वारकी सम्भावना हो, तब तक अटृष्ट द्वारका अङ्गीकार करना उचित नहीं है। इसीसे-'तद्विज्ञानार्थ स गुरु- मैवाभिगच्छेत्' (उसके ज्ञानके लिए गुरुके पास ही जावे) इस उपगमनविधिसे ही अपने आप-गुरुके बिना स्वतः प्रयत्नसे किये गये वेदान्तविचारकी 6यावृत्ति हो सकती है, तो पुनः 'श्रोतव्यः' को स्वप्रयत्नसाध्य विचारके मिरासके लिए विधि माननेकी आवश्यकता नहीं है। [ परन्तु पहले कहा जा चुका है कि उपगमनविधि विचारविधिकी अङ्ग है, अतः विचारविधि यदि न मानी जाय तो उपगमनविधिका स्वरूप ही न बनेगा, इसलिए विचारविधिका स्वीकार अवश्य करना चाहिए? नहीं-इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके प्रति गुरूपसदन जब द्वारकी (मध्यवर्ती व्यापारकी) अपेक्षा करेगा, तब लोकसिद्ध गुरुके अधीन विचार ही द्वाररूपसे प्राप्त हो सकता है, अतः श्रोतव्यविधिकी अपेक्षा ही नहीं है, तो उपगमनविधि विचारविधिकी अङ्ग नहीं है और विचारके समान उपगमन भी विद्याका अङ्क हो सकता है, इससे पूर्वोक्त शङ्काका अवसर नहीं है। ] यदि अध्ययनविधि न मानी जाय, तो, विधीयमान जो उपगमन है, वह अक्षरग्रहणके लिए नहीं है, इससे वह अक्षर- अहणके लिए गुरुमुख-उच्चारणके अनन्तर उच्चारणकी अर्थात् अध्ययनकी (वेदा- ध्ययनमें पहले वेदमन्त्रको गुरु कहते हैं अनन्तर शिष्य उसीका उच्चारण

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विधिविचार] भापानुवादसहित ४५

न च तात्पर्यादिभ्रमनिरासाय वेदान्तविचारार्थिनः कदाचित् द्वैत- शास्त्रऽपि प्रवृत्तिः स्यात्। तत्नाऽपि तदभिमतयोजनया वेदान्तविचार- सच्ात् इत्यद्वैतात्मपर वेदान्तविचारनियमविधिरर्थवानिति वाच्यम्, स्वय- मेव तात्पर्यभ्रमहेतोस्तस्य तन्निरासकत्वाभावेन साधनान्तरप्राप्यभावात्।

करता है) द्वाररूपसे अपेक्षा नहीं करेगा, अतः लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति- रूप फलकी असिद्धि होनेसे अध्ययनविधि सार्थक है। [तात्पर्य यह है कि पहले अतिप्रसक दिया है-'श्वणविघिको, जो गुरूपसदनके प्रति प्रधानविधि है, न मानकर अन्रभूत उपगमनविधि मानी जाय, तो अध्ययनाऊ उपगमन- विघिसे ही लिखिन पाठकी व्यावृत्ति हो जायगी, अतः अध्ययनकी नियमविधि व्यर्थ होगी', इस अतिप्रसनका परिहार करनेके लिए उपर्युक्त ग्रन्थ है अर्थात् अध्ययनविधिका अज्ञीकार न किया जायगा, तो उपगमनविधिसे लिखित- पाठकी व्यावृत्ति नहीं होगी, क्योंकि 'गुरुमुखसे अक्षरोंका अहण करना इस अर्थका विधायक न उपगमनविधिवाक्य है और न इंतरविधिवाक्य है, इसलिए अध्ययनविधि उक्त व्यावृत्तिके लिए अपेक्षित है, अतः श्रव्रणविधिके न माननेपर भी कोई अतिप्रसद् नहीं है ]। [अन श्रव्णको विधि माननेवाले यह शक्ा करते हैं कि यद्यपि तुम्हारे कथनके अनुसार शवणविधिका स्वप्रयलसाध्य विचार व्यावर्त्य नही है, तथापि अन्य व्यावर्त्य है, क्योंकि] वेदान्तके विचारको चाहनेवाले पुरुपकी तात्पर्य आदिके अ्रमके निराकरण करनेके लिए कदाचित् द्वेतशास्त्रमें (उस शान्त्रमें, जिसमें ईश्वर और जीवका मेदप्रतिपादन किया गया है) प्रवृत्ति हो सकती है, कारण कि द्वैतप्रतिपादक शास्त्रमें भी अपने मतके अनुकूल वेदान्तका चिचार किया गया है, इसलिए अद्वैत आत्मपरक वेदान्तविचार श्रवणकी नियमविधि सार्थक हे-अ्रणविधिका खण्डन करना अकाण्डताण्डव है? नहीं, यह शक्ा व्यर्थ है, क्योंकि जो स्वयं तात्पर्यभ्रमका कारण है, वह तात्पर्यग्रमका निराकरणकर्ता कैसे हो सकता है? अर्थात् नहीं हो सकता, इसलिए अन्य साधनकी प्राप्ति ही नहीं है [ भाव यह है कि जो द्वेतशास्त्र हैं, वे सबके सब तात्पर्य्रमको उत्पन्न करनेवाले हैं, हटानेवाले नहीं हैं, इससे तात्पर्यथ्रमके दूरीकरणके लिए अद्वैत-शास्त्रको छोड़कर द्वैत-

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४६ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेदे

तननिरासकत्वभ्रमेण तत्रापि कस्यचित्प्रवृत्तिः स्यादित्येतावता 'श्रोतव्यः' इति नियमविधेरभ्युपगम इत्यपि न । ईश्वरानुग्रहफलाद्वैतश्रद्धारहितस्य श्रोतव्यवाक्येऽपि पराभिमतयोजनया सद्वितीयात्मविचारविधिपरत्वभ्रम- सम्भवेन भ्रमप्रयुक्ताया अन्यत्र प्रवृत्तेर्विधिशतेनाऽप्यपरिहार्यत्वाद्।

शास्त्रकी प्राप्ति ही नहीं है, अतः द्वैत-शास्त्रीय विचारकी व्यावृत्ति करनेके लिए श्रवणकी नियमविधि मानना केवल दुराग्रह है। इस विपयमें और भी शङ्ा करते हैं कि ] यदपि द्वैत-शास्त्रीय विचार तात्पर्यभ्रमका निवर्तक नहीं है, तथापि निरासकत्वअ्रमसे-'भिन्नात्मज्ञानं मुक्तिसाधनम्' (द्वैतात्मज्ञान मुक्ति का हेतु है) इस प्रकारके अरमसे द्वैतशास्त्रमें भी किसी पुरुषकी प्रवृत्ति हो सकती है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए 'श्रोतव्यः' इस नियमविधिका अङ्गीकार है, परन्तु यह भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि अद्वैत-श्रद्धासे, जो ईश्वरकी अनुकम्पाका फल है, शून्य पुरुपकी 'श्रोतव्यः' वाक्यमें भी अन्यमतानुसारी योजनासे सद्वितीयात्मविचारविधिपरत्वका भ्रम हो सकता है इससे भ्रमप्रयुक्त द्वैतवस्तुपरक शास्त्रमें प्रवृत्तिका सैकड़ों विधियोंसे भी परिहार नहीं हो सकता। इसका विशद भाव यह है-इस बातका शास्त्रोंमें निर्विवादरूपसे प्रतिपादन किया गया है कि श्रवणविधिमें वही पुरुष अधिकारी है, जिसको जन्म-जन्मा- न्तरमें यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे बलवती ब्रह्मज्ञानकी इच्छा है और साधन- चतुष्टयसम्पत्ति भी-अर्थात् नित्य और अनित्य वस्तुका विवेचनात्मक ज्ञान, इस लोकके और परलोकके फलभोगमें वैराग्य, सुमुक्षुता, और शम- दमादि-जिसको प्राप्त है। क्योंकि यज्ञ आदिसे सम्पादित जो अदृष्ट है, वह निष्प्रपञ्च अद्वितीय ब्रह्मसाक्षात्कारमें साङ्गवेदान्तके अध्ययनसे ल्ध वेदान्तोंसे मुक्तिकी साधनताके निश्चयका सम्पादन करके अद्वितीय आत्मसाक्षात्कारमें विविदिषाकार अद्वैत ब्रह्मज्ञानकी इच्छाका उत्पादन करता है और उसके द्वारा अद्वितीय आत्मसाक्षात्कारके साधन अद्वितीयात्माके श्रव्ण आदिमें मुमुक्षु पुरुषको प्रवृत्त करता है, नकि जीवभिन्न आत्मज्ञानमें मुक्तिकी साधनताका भ्रमात्मक ज्ञान उत्पन्न कर उसके द्वारा भिन्नात्मज्ञान और इसके कारणविचार आदिमें इच्छा, प्रवृत्ति आदिका उत्पादन करता है, क्योंकि द्वैतात्मज्ञानकी इच्छामें भिन्नात्मविचार द्वारा यज्ञ आदिके फलभूत निष्प्रपञ्च ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता

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विधिविचार ] भापानुवादसहित ४७

न च व्यापारान्तरनिवृत्त्यर्था परिसङ्लचेति वाच्यम्, असंन्या- सिनो व्यापारान्तरनिवृत्तेरशक्यत्वात्। संन्यासिनस्तनिवृत्तेः ब्रह्मसंस्थया सह संन्यासविधायकेन 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इति अ्त्यन्तरेण नहीं है; ऐसी स्मृति भी है- 'ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना' यज्ञ आदिसे सम्पादित ईश्वरानुग्रहसे ही पुरुषोंको अद्वैत ब्रह्मज्ञानकी इच्छा होती है, यह भाव है। इससे जिस पुरुषको भिन्न आत्मज्ञानमें मुक्तिसाधनत्वका भ्रम है उसमें अद्वैत साक्षात्कारकी इच्छा आदिके न रहनेसे श्रवणविधिमें उसका अधिकार ही नहीं है और उसके प्रति नियमविधि सार्थक भी नहीं है, इसलिए भ्रमी पुरुषकी अन्यत्र प्रवृत्तिका किसी प्रकारसे भी निराकरण नहीं कर सकते हैं, और ईश्वरके अनुगहसे अद्वैतमें जिसकी श्रद्धा ही नहीं हुई है, ऐसे पुरुषकी पराभिमतयोजनासे-'आत्मा श्रोतव्यः' इस श्रुतिमें आत्माका अर्थ जीव है, परमात्मा नहीं, क्योंकि 'आत्मनस्तु कामाय' इत्यादि पूर्व वाक्यमें जीव ही प्रकृत है, और 'इदं सर्वं यदयमात्मा' इस प्रकारके वाक्यशेषमें परमात्माका प्रतिपादन किया गया है, इससे 'श्रोतव्यः' वाक्यमें आत्मा-परमात्मा ही है यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि वाक्यशेषमें भी परमात्माका प्रति- पादन नहीं कर सकते, कारण कि 'जो यह सब है, वह परमात्मा है' इस प्रकार प्रपञ्च और परमात्माका, जो जड़ और चेतन हैं, परस्पर तादात्म्य नहीं बन सकता। अतः उक्त श्रुति अभेदध्यानपरक है, अद्वैतपरक नहीं-इस प्रकारकी श्रवणवाक्यकी योजनासे भी द्वैतविचारमें भ्रमप्रयुक्त प्रवृत्ति हो सकती है, उसका निराकरण सैकड़ों विधियोंसे भी नहीं हो सकता।] श्रव्णमं परिसंख्याविधि माननेवाले शङ्का करते हैं कि अन्य व्यापारकी निवृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' वाक्यमें परिसंख्याविधि माननी चाहिए; परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि [श्रवणविधिसे गृहस्थ आदिके व्यापारकी निवृत्ति होती है या संन्यासीके व्यापार की निवृत्ति होती है? इन दो विकल्पोंमें पहला पक्ष युक्त नहीं है] असंन्यासीके-गृहस्थ आदिके व्यापारकी निवृत्ति नहीं कर सकते, कारण कि ऐसा करनेपर अन्य श्रुतियोंसे, जो ब्रह्मसंस्थासे अतिरिक्त व्यापारोंका गृहस्थके प्रति विधान करती हैं, विरोध होगा, [ द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि] संन्यासीके

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४८ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

सिद्धतया संन्यासविधायकश्चृत्यन्तरमपेक्ष्य श्रोतव्यवाक्वेन तस्य व्यापा- रान्तरनिवृत्युपदेशस्य व्यर्थत्वात्। न च विचारविध्यसम्भवेऽपि विचारविषयवेदान्तनियमविधि: सम्भवति, भापाप्रचन्धादिव्यावर्त्यसत्वादिति शाङ्गयम्। सन्निधानादेव वेदान्तनियमस्य लव्घत्वेन विधिचिपयत्वायोगात्, 'स्वाध्यायोऽव्येतव्यः' इत्यर्थावबोधार्थनियम विधिवलादेवाध्ययनगृहीतवेदोत्पादितं वेदार्थज्ञानं फल- पर्यवसायि, न कारणान्तरोत्पादितमित्यस्यार्थस्य लव्धत्वेन वेदार्थे त्रह्मणि

(व्यावहारिक) अन्य व्यापारकी निवृत्ति तो ब्रह्मसंस्थाके साथ संन्यास- विधायक 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' (ब्रह्मसंस्थ पुरुष अमृत पाता है) इस इतर श्रुतिसे सिद्ध ही है, इसलिए संन्यासविधायक अन्य श्रुतिकी अपेक्षा करके 'श्रोतव्यः' वाक्यसे उस अन्य व्यापारकी निवृत्तिका उपदेश करना सर्वथा व्यर्थ है। और यह भी शक्का नहीं करनी चाहिए कि विचारविधिके न रहनेपर मी विचारविषयत्वरूपसे वेदान्तमें नियमविधि हो सकती है, क्योंकि भाषा- प्रवन्ध आदि व्यावर्त्य हैं। कारण कि सन्निधिसे ही वेदान्तनियमके प्राप्त होनेसे (वेदान्त) विधिविषयके अयोग्य हैं। [शङ्काकर्ताका अभिपराय यह है कि विचार- विधिका खण्डन करनेपर भी वेदान्तनियमविधि-अर्थात् विचार करना चाहिए, तो वेदान्तोंका ही, इस प्रकारकी विधि-हो सकती है। और इससे भाषा- प्रवन्धोंकी व्यावृत्ति होगी। उत्तरदाताका यह भाव है कि-इस प्रकारका नियम श्रवणविधिसे पहले ही प्राप्त हो जाता है, क्योंकि साङ्गवेदका जिसने अध्ययन किया है और साधारणतः ज्ञात ब्रह्मकी विशेषरूपसे जिसको जिज्ञासा हुई, ऐसे पुरुषको जिज्ञासाके निवर्तकका निर्णय करनेके लिए कर्तव्यरूपसे विचारकी प्राप्ति होनेपर विचारविषयके अन्वेषण करनेमें सर्वप्रथम वेदान्त ही वुद्धिस्थ होते हैं। इससे 'वेदान्तोंका ही विचार करना चाहिए' इस प्रकार सबसे पहले बुद्धिके. उदय होनेसे वेदान्तविधिके लिए श्रवणविधिकी कोई आवश्यकता नहीं है] और 'स्वाध्यायोऽघ्येतव्यः' (स्वाध्याय-वेद पढ़ना चाहिए) इस अर्थके परिज्ञानके लिए (विद्यमान) नियमविधिके प्रभावसे यह अर्थ प्राप्त होगा कि अध्ययनसे गृहीत वेद द्वारा उत्पादित वेदके अर्थका ज्ञान ही फलका पर्यवसायी है, मोक्ष आदि फलका उत्पादक है, अन्य कारणसे उत्पादित वेदार्थज्ञान

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विधिविचार ] भापानुचादसहित ४९

मोक्षाय ज्ञातव्ये भापाप्रवन्धादीनामप्राप्तेथ। न च 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यधिकरणे वाल्यपाण्डित्यमौनशव्दितेपु श्रवणमनननिदिध्यासनेपु विधि- रभ्युपगत इति वाच्यम्, विचारे विचार्य्यतात्पर्यनिर्णयहेतुत्वस्य वस्तु- सिद्ध्यनुकलयुक्त्यनुसन्धानरूपे मनने तत्प्रत्ययाभ्यासरूपे निदिध्यासने च वस्त्ववगमवैशदहेतुत्वस्य च लोकसिद्धत्ेन ेुिध्यनपेक्षा् विधिच्छा यार्थवादस्वेव प्रशंसाद्वारा प्रवृत्त्यतिशयकरत्वमात्रेण तत्र विधिव्यवहारात्। एवं च श्रवणविध्यभावात् कर्मकाण्डविचारवत् ब्रह्मकाण्डचिचारोऽप्यव्ययन- विधिमूल इत्याचार्यवाचस्पतिपक्षानुसारिणः ॥ १॥

फलका पर्यवसायी होगा, इससे मोक्षके लिए ज्ञातव्य चेदके अर्थभूत नक्ममें भाषाग्रन्थ आदिकी व्यावृत्ति सिद्ध ही है, अतः भाषाप्रबन्धकी निवृत्तिके लिये वेदान्तनियमविधिकी कोई आवश्यकता नहीं है। परन्तु 'सह- कार्यन्तरविघिः इत्यादि अधिकरणमें श्रवण, मनन और निदिध्यासनमें, जिनका क्रमशः पाण्डित्य, बाल्य और मौनशब्दसे व्यवहार किया गया है, सूत्रकार और भाष्यकारने विधि मानी है, इसलिए श्रवण-विधि नहीं है, यह कहना असझत है, नहीं असझ्त नहीं है, क्योंकि विचारमें विचार- विषय-तात्पर्यके निश्चयात्मक ज्ञानकी हेतुता एवं वस्तुकी सिद्धिमें हेतुभूत युक्तिके ज्ञानरूप मननमें और तत्प्रत्ययाभ्यासरूप-वस्त्वाकार वृत्तिके अभ्यास- रूप-निदिध्यासनमें वस्तुके परिज्ञानकी विशदताकी-प्रतिवन्धशून्यताकी-हेतुता लौकिक प्रमाणोसे निश्चित ही है, इसलिए मनन आदिम विधिकी अपेक्षा न होनेसे विधिके तुल्य अर्थवादके समान प्रशंसाके द्वारा केवल प्रवृत्तिमें अतिशय करनेसे शव्णादिमं विधित्वका व्यवहार [सूत्र और भाष्यमें ] किया गया है। इसलिए श्रवणविधिका अभाव होनेसे कर्मकाण्डके विचारके समान ब्रद्माकाण्डका विचार भी अध्ययन विधिसे ही प्राप्त है, यह आचार्य वाचस्पतिके पक्षका अनुसरण करनेवाले वेदान्तियोंका मत है#॥ १ ॥

  • आचार्य वाचस्पति श्रवण आदिमें विधि नहीं मानते हैं। इसंका उन्होंने भामती ग्रन्थमें वड़े ऊदापोद्दसे विचार किया है। वदांका कुछ अंश नीचे उद्ृत किया जाता है-'ननु 'आत्मेत्येवोपासीत' इययादयो विधय: भ्रयन्ते। न च ग्रमततगीताः, तुल्यं हि साम्प्रदायिकत्वम, तस्माद्विधेयेनान्न 5

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५० सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

[टिप्पणी ] भवितव्यमित्यत आह-तद्विपया लिडादय इति। सत्यं श्रूयन्ते लिहदयः, न त्वमी विधिविषयाः, तद्विषयत्वेSप्रामाण्यप्रसन्ञात्। हेयोपादेयविषयो हि विधिः । स एव च हेय उपादेयो वा, यं पुरुषः कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तु शक्नोति। तत्रैव च समर्थ: कर्ताधिकृतो नियोज्यो भवति।

इति प्रयुक्ता अपि लिअदयः प्रवर्तनायामसमर्था उपल इव श्षुरतैक्ष्ण्यं कुण्ठमप्रमाणीभवन्ति इति। 'अनियोज्यविषयत्व:त्' इति। समर्थे। हि कर्ताधिकारी नियोज्यः, असामथ्ये तुन कर्तृता ततो नाधिकृतोऽतो न नियोज्य इत्यर्थः। यदि विधेरभावान्न विधिवचनानि, किमयोनि तर्हि वचनान्यतानि विधिच्छायानीति पृच्छति-'किमर्थानि' इति। न चानथकानि युकानि, स्वा- ध्यायविध्यधीनग्रहणत्वानुपपत्तेरिति भावः । उत्तरम्-स्वाभाविकेति। अन्यतः प्राप्ता एव हि श्रवणादयो विधिस्व्ररूपरवाक्यैरनूदन्ते, न चानुवादोऽप्यप्रयोजनः, प्रवृत्तिविशेषकरत्वाद। तथाहि- तत्तदिष्टानिष्टविषयेप्साजिहासापहृतहृदयतया वहिमुखो न प्रत्यगात्मनि समाघातुमहेति। आत्म- अ्रवणादिविधिसरूपैस्तु वचनैरमनसी विषयस्नोतः सिलीकृत्य प्रत्यगात्मस्रोत उद्धाद्यते इति अवृत्तिविशेषकरताऽनुवादानामस्तीति सप्रयोजनतया स्वाध्यायविध्यघीनग्रहणत्वमुपपद्यत इति। [भामती कल्पतरु पृ० १२९ पं० २२ निर्णयसा० ] इसी भामतीके नीचे कल्पतरुकारने व्याख्यारूपसे कहा है कि 'दर्शनार्थ कर्तव्यत्वेनान्वयव्यतिरेकावगतान् श्रवणादीननुवदन्ति वचांसि तद्तप्राशस्यलक्षणया तेपु रुचिसुत्पाद्यानात्मचिन्तायामरुचि कुर्व्रन्ति, प्रृत्त्यतिशायं जनयन्तीत्यर्थः । [वेदान्तकल्पतरु पृ० १३० नि० सा० पं० २८] इस प्रन्थका भाव यह है-'आत्मेत्येवोपासीत' (आत्माकी उपासना करे) इत्यादि विधि सुनी जाती है, इसलिए वेदान्तोंको विधायक मानना चाहिए। ये किसी प्रमत्त-पागल व्यक्तिसे कहे गये हैं, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि साम्प्रदायिकता तुल्य है, इसलिए विधेय हो सकते हैं, इसपर कहते, हैं- 'तद्विषया लिडादयः' । यद्यपि लिङ् आदि सुने जाते हैं, परन्तु वे विधिविषयक नहीं हैं, अन्यथा अप्रामाण्य प्रसक्त होगा। हेय और उपादेयमें विधि होती है। और वही हेय और उपादेय होता है जिसमें पुरुष उलटफेर कर सके, और उसीमें नियोज्य अधिकारी समर्थ होता है, आत्माके श्रवण, मनन और निदिध्यासन आदि वैसे नहीं हैं, अतः विधिव्यापक विषय और अनुष्ठाताका अभाव होनेसे लिङ् आदिके प्रयुक्त होनेपर भी प्रवर्तनामें असमर्थ होते हुए पत्थरके ऊपर प्रयुक्त छुरेकी धारके स्रमान कुण्ठित होकर अप्रमाण होते हैं। जो समर्थ है, वही कर्ता और अधिकारी होता है, सामर्थ्यके अभावमें न कर्तृता है और न अधिकारिता ही है, यह तात्पर्य है। यदि विधि न होनेसे ये विघिवचन नहीं हैं तो ये वचन विधिसदश क्यों हैं? ऐसा (भाष्यमें) पूछते हैं-'किमर्थानि'. इत्यादिसे। यदि अनर्थक विधिवाक्य होते, तो स्वाध्यायविधिसे ग्रहण नहीं हो सकता था, इसलिए अनर्थक नहीं हैं, यह भाव है। भाष्यकार उत्तर देते हैं-'स्वाभाविकेति' अन्यसे-लोकसे-प्राप्त होनेके कारण श्रवण आदिका विधि- सदश वाक्योंसे अनुवाद किया जाता है, और अनुवादका प्रयोजन है-प्रतृत्ति करना अर्थात् मनुष्यकी श्रवण आदिमें। भाव यह है कि लौकिक इष्ट और अनिष्ट वस्तुकी प्राप्ति और परिहारमें जिसका हृदय लगा हुआ है, ऐसा वहिसुख पुरुष प्रत्यक् आत्मामें अपने चित्तका

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विधिविचार] भापांतुवांदसहित ५१

[ टिप्पणी ] आधान नहीं कर सकता है, परन्तु आत्माके विधायकसदृश वाक्योंसे, तो मनकी विषयवृत्तिका परिदार करके प्रत्यगात्मामें मानसिक वृत्तिके प्रवाहका उद्धाटन करेगा, अतः प्रवृत्तिविशेष- कारिता अनुवादवाक्योंमें है, इसलिए उनका प्रयोजन होनेसे स्वाध्यायविधिसे ग्रहण उपपन्न हो सकता है। कल्पतरुवाक्यका अर्थ है-अपरोक्ष ज्ञानके लिए कर्तव्यरूपसे ज्ञात श्रवण आदिका अनुवाद करते हुए विधिसदृश वाक्य श्रव्रण आदिमें प्राशस्त्यका वोधन करके उनमें रुचि उत्पन्न करते हैं और अनात्मविचारमें अरुचि उत्पन्न करते हुए प्रवृत्तिके अतिशयको उत्पन्न करते है। और भी 'द्रष्टव्यः' (दर्शन करना चाहिए) इस विधिका खण्डन करते हुए वाचस्पति मिश्र कहते हैं-'अन्न चात्मदर्शंन न विधेयम्' तद्धि दृशेरुपलब्धिवचनत्वात् श्रावणं वा स्यात् प्रत्यक्षं वा। प्रत्यक्षमपि लोकिकमहंप्रत्ययो वा भावनाप्रकर्षपर्यन्तजं वा। तत्र श्रावणं न विधेयम्; स्वाध्यायविधिनैवास्य प्रापितत्वात्, कर्मश्रावणवत्। नापि लौकिकप्रत्यक्षम्, तस्य नेसर्णिकत्वात्, न चौपनिपदात्मविपयं भावनाधेयवैशयं विधेयम्, तस्योपासनाविधानादेव वाजिनवदनुनिप्पादितत्वात्। इसना कहकर आगे कहते हैं-'द्रष्टव्यः' इत्यादयस्तु विधिसरूपा न विघय इति। ('द्रष्टव्यः' इससे यहाँ वेदान्तमें आत्माके दर्शनका भी विधान नहीं है, क्योंकि दश्धातुका अर्थ ज्ञान होनेसे यह विकल्प होता है कि वह श्रावण ज्ञानका (कानसे होनेवाले ज्ञानका) विधान करता है या प्रत्यक्ष ज्ञानका विधान करता है, प्रत्यक्ष ज्ञानमें भी लौकिक अहंप्रत्ययका अथवा भावनाके प्रकर्पसे होनेवाले प्रत्यक्षका? इसमें श्रावण ज्ञानका विधान नहीं कर सकते, क्योंकि वह तो स्वाध्यायविधिसे ही प्राप्त है, और प्रत्यक्ष ज्ञानका भी विधान नहीं, कर सकते, क्योंकि लोकिक प्रत्यक्ष तो स्वभावतः होता ही है औपनिपद आत्मविषयक भावना वैशद् भी विधेय नहीं है, क्योंकि वह उपासनाके विधानसे ही वाजिनके समान पीछेसे उत्पन्न होगा (दूधको फाढनेसे जो घना भाग होता है उसे आमिक्षा-पनीर कहते हैं और जो पानी बचता है, उसे चाजिन कहते हैं, इस स्थलमें जैसे आमिक्षाके विधानसे ही वाजिन वन जाता है उसके विधानकी आवश्यकता नहीं है, वैसेही उपासनाके विधानसे भावनावैशय भी उत्पन्न होगा इसलिए उसका भी विधान करना कोई आवश्यक नहीं है, यह भाव है। इस प्रकारके विकल्पोंसे दर्शनका विधान सिद्ध नहीं कर सकते हैं, इसलिए 'दरष्टव्यः' आदि-श्रोतव्यः, मन्तव्यः और निदिध्यासितव्य :- विधिके सदश ही हैं, वस्तुतः विधि नहीं है, यह भाव है। इसमें आदि- शब्दसे आचार्य वाचस्पतिमिश्रने मनन आदिके विधित्वका खण्डन किया है, यह भली भांति अवगत होता है, इस वाचस्पतिमिश्रके मतकी परिपुष्टिके लिए भामतीव्याख्याकारने एक ोक भी लिखा है। वह यों है- "वेदान्ता यद्ुपासा विदधति, विधिसंशोधिमीमांसयैव प्राध्या तहीरितार्था इति विफलमिदं ब्रह्मजिज्ञासनं स्यात्। अप्युत्युच्चातिनीचो जनिमृतिभयभारवैधधीसाध्यमोक्ष: कर्मोत्थेः स्वर्गपश्चाद्यतिमधुरफलैः कोऽपराधः कृतो नः॥१॥ [पृ० ११३ क० नि० ]

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५२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ग्रंथम परिच्छेद

[टिप्पणी ] यदि वेदान्तवाक्य भी उपासना (आदिका) विधान करें, तो विधिके संस्कारके लिए प्रवृत्त पूर्वमीमासासे ही गतार्थे होंगे, यह ब्रह्मजिज्ञास्रा विफल हो जायगी और विधि- सांध्यमोक्ष उत्पत्तिविनाशशील एवं न्यूनाधिकभावग्रस्त हो जायगा, अतः कर्मजन्य स्वर्ग पश्वादि फलोंने, जो अत्यन्त आवश्यक हैं, क्या अपराध किया? अर्थात् कर्मोंसे होनेवाले स्वर्ग, पछु आदि फलोंसे मोक्षम कुछ विशेषता नहीं रहेगी। अतः इससे श्रव्रणादि विधि नहीं है, यह अत्यन्त स्फुट है। इसी प्रकार 'मनननिदिध्यासनयोरपि न विधिः, तयो- रन्वय व्यतिरेकसिद्ध साक्षात्कार फलयोर विधिसरूपवेचनरनुवाद त्'१५३ भाम० नि०) यह कहा गया है, इसलिए वाचस्पतिमतानुयायी श्रवण आदिको विधि नहीं मानते हैं, यह युक है। एक और स्थलमें भी श्रवण आदिके विधित्वके खण्डनमें प्रमाण मिलता है- 'ननु 'आत्मा ज्ञातव्यः' इत्येतद्विधिपरैवेदान्तैः तदेकवाक्यतयाऽववोधे' इत्यादिसे आरम्भ कर 'अयमभिसन्धि :- न तावत् ब्रह्मसाक्षात्कारे पुरुषो नियोक्तव्यः; तस्य ब्रह्मस्वाभाव्येन नित्य- त्वातू, अकार्यत्वात्, नाप्युपासनायाम्; तस्या अपि ज्ञानप्रकर्षे ह्ेतुभावस्यान्वयव्यतिरेकसिद्ध- तया प्राप्तत्वेनाSविधेयत्वात्। नापि शाब्दवोधे, तस्याप्यधीतवेदस्य पुरुपस्य विदितपदतदर्थस्य समधिगतन्यायतत्त्वस्याप्रत्यूहमुत्पत्तेः' इत्यादि। इसका भाव प्रायः पूववत् ही है।

विधिच्छायार्थवाद-विधिके सदश अर्थवाद, जैसे 'उपांशु यागमन्तरा यज्ञति' (आग्नय और अग्नीषोमीय पुरोडाशके वीचमें उपांशुयाग करे) इस प्रकार कहकर फिर कहते हैं- 'विष्णुरुपांशु यष्टव्यः, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्यः, अग्नीषोमाचुपांशु यष्टव्यौ' यहां पहले जो उपांशुयागमन्तरा' इत्यादि अन्तरा वाक्य है, वह आग्नेय और अग्नीषोमीय पुरोडाशके मध्यवर्ती कालमें उपांशुयागका विधान करता है, इसलिए 'विप्णुरुपांशु' इत्यादि तीन वाक्य मन्त्रवणोंसे प्राप्त वैकल्पिक देवताओंका अनुवाद करके 'उपांशु यागमन्तरा यजति' इस अन्तरा वाक्यसे विहित यागकी स्तुति करनेवाले अर्थवाद ही हैं, इस प्रकार पूर्वमीमासामें प्रतिपादन किया गया है (अ०२ पा० २ अधि० ४ ) वैसे ही 'आत्मा श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्य भी अर्थवाद हैं और प्रशंसार्थक हैं, ऐसा समझना चाहिए।

कोई लोग श्रवण आदिकी विधि माननेके लिए यह भी कहते हैं कि यदि श्रवण में नियम विधि न मानी जाय, तो 'तत्कारणं सांख्ययोगाभिपन्नम्' इत्यादि श्रुतिमें कहे गये योगकी व्यावृत्ति नहीं होगी, इसलिए नियम मानना चाहिए, परन्तु यह भी ठोक नहीं है, क्योंकि विधिके न माननेपर भी विचार प्राप्त ही है, कारण कि जो विचार करनेकी सामथ्य रखता है, उसे किसी कालमें अपनी या अन्यकी अनुपपत्तिसे तत्त्ववस्तुमें सन्देह हो सकता है, इससे निश्चयात्मक वेदान्तार्थके ज्ञानके लिए विधिके बिना भी योग्यतासे विचार अवश्य प्राप्त हो सकता है, अतः विधिकी आवश्यकता नहीं है। सगुण उपासनाकी व्यावृत्तिके लिए कोई नियम-विधि मांनते हैं, उनका भी पक्ष युक्तिसङ्गत नहीं है, क्योंकि जो एकदम निस्पृह है, वह ब्रह्मलोककी प्राप्तिके द्वारा मुक्तिके प्रति साधनभूत सगुणोपासनामें कैसे प्रवुत होगा अर्थात् कभी नहीं होगा, अतः सगुणोपासनाकी व्यावृत्तिके लिए भी नियमविधि नहीं मान सकते हैं।

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मसलक्षणविचार ] भापानुवादसहित ५३-

जगजन्मस्थितिलयेप्वेकेंक मसलक्षणम् प्रत्येकं पक्षलिन्नलात् इत्पाहु: कौमुदीकृतः ॥। १४ ॥ जगत्के जन्म, स्थिति और लय इनमें से प्रत्येक व्रद्माका असरधारण धर्म है, अतएव प्रत्येक बसका लक्षण सो सकता है यह कामुदीकार का मत है॥ १४ ॥ (२) विचार्यस्य च त्रम्मणः जगजन्मस्थितिलयकारणत्वं लक्षणमुक्त

  • विचार्य त्रमपका-(जिस व््का विचार प्रस्तुत हुआ हे उसका) जग-

यहो पूर्व प्रन्यसे समति दय प्रकार है-पूर्व ग्रन्थमे 'अथातो व्रह्मजिज्ञास्रा' इय प्रथम सूलका अर्थ संगृद्दीत किया गया, अक्षका विचार करना चाहिए, इससे व्रम्म- मधास्टरके लिए जिस्न मदाविनारकी प्रतिज्ञा हुई, उस विचारके विपय-मरहाका लक्षण करना अत्पन्त आवश्यक है। उसके अनन्तर विनार या विभाग आदि किया जाता है, अतः 'पूर्व प्रतिशाइथ प्रतिम्ातस्य लक्षणं सतो विभागादियम्' इय प्रकार शाखत्रीय परिपाटी है, इससे मदाफे लक्षणके लिए 'जन्मादस्य यतः' दस द्वितीय सूनके अर्थका इस अन्यसे संग्रह करते हैं। प्रगतपक्ष लहणदब्दार्थका निर्वचन करते है, लक्षणशव्दका व्यवहार लक्षण-असाधारण भ्ने और लदयम देसा जाता दे, क्योंकि 'लक्ष्यते अनेन' वा 'लक्ष्यते यत्' इति लक्षणम्, इस प्रकार करण और फर्म व्युलसिये असाधारण धर्म और लक्ष्य स्वरप चोवित होते हैं। प्रकृतमें करणन्युन्पतिके आपारपर विनार है, जो असाधारण धर्म दोता है अर्थात् जिस धर्ममें अव्याप्ति असिन्याति और अगुम्मव दोय नहीं होते है, उम्र धर्मको लक्षण कहते हैं। जो लक्ष्यके एक देशमं-अवयनमें न रहे, उस धर्मको अव्यापिदोपये युकत कहते हैं, जैसे िसीने गौका लकषन किया-जिसका कपिल रूप दो, वह गी है, परन्तु यह नहीं चन सकता, क्योंकि शेत गौमें मृ.पिन् रप नहीं है, अत: गोलक्मके एक देशमें-खेत गोमें-इस लक्षणके न रहनेसे यह नक्षण अप्यातिदोप्य आकन्त हुआ। रसी प्रकार अतिव्यापिदोप युकत उसे कहते है-जो लक्ष्य में रहकर अल:पमे भी रदे-जिसकी पूँल हो, उसे गो कहना, यह लक्षण यदि गायका किया जाय, तो नदीं बन सकना, गर्योंकि मदिपि आदिकी भी पूँछ होती है, इसी प्रकार असम्भच दोषगुण लक्षण उम् कहते हैं-जो धर्म सवंधा लक्ष्पमें न रहे, जैसे एकशफ जिस पन्ुका हो, वह गाग ऐ, परन्तु मान ऐेगरी नही है, क्योंकि गायके दो शफ-गुर होते हैं, अतः यहाँ असम्भच दोर्प ह। गोका दन तीनों दोपोि रहित 'सारनावस्व' लक्षण ऐे (सास्ना- गौके गले के नीचेका लसका हुआ भाग)। लक्षणके दो भद है- लरु्पलक्षण और तटस्थलक्षण। स्वरूपलक्षण याने परमुखा समप भी परतुफा लघण है, बक्षका स्वरूप है-सतया, ज्ञान और आनन्द, दसलिए मन्य, ज्ञान और आनन्द इसाके स्वम्पलक्षण है, यदपि पहले असाधारण धर्मे ही रक्षण कहा गया दे, तथापि सत्य आदिमें अपनी अपेकाये ही धर्म-धर्मिभावकी कल्पना करके सद्य-लक्षणमायका निर्वाद करना चादिए, अतः 'आनन्दो विपयानुभयो नित्यत्वशेति सन्ति धर्मा अप्रयष्येऽि नैतन्यात पृथगिवावभासन्ते' (आनन्द, चिपयका अनुभव और नित्यता में धर्म गद्यपि अषटधक-अभिनन ही है, तथापि चैतन्यसे भिन्न जैसे भासते हैं) इस प्रकार

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५४ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' इत्यादिश्रुत्या। जगज्न्मस्थितिलयेपु

ज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप लक्षण 'यतो वा इमानि०' (जिस व्रस्मसे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं) इत्यादि श्रुतिसे ही कहा गया है, [ फलितार्थ यह हुआ कि हम ब्रह्म उसे कहते हैं जो समस्त जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण हो, इसलिए ब्रह्ममें जो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लयकी कारणता है, वही आसाधारण धर्म होनेसे ब्रक्का लक्षण है।

वचन भी मिलता है। तटस्थ लक्षण उसे कहते हैं-लक्ष्यके यावत्कालमें न रहकर व्यावर्तक हो, जैसे कि पृथ्वीका गन्ध-तटस्थ लक्षण है, परन्तु यह सभी कालमें नहीं रहता है, क्योंकि महाप्रलयमें परमाणु और उत्पत्तिकालमें घट आदिमें नहीं रहता है, प्रकृतमें ब्रह्मका-जगत्की उत्पत्ति आदिका कारणत्व-तटस्थ लक्षण है। स्वरूप लक्षण तो ऊपर कहा गया ही समझना चाहिए। 'विचार्यस्य च' इसमें चकारका अर्थ-एव-अवधारण है और इसका आगेके 'इत्यादिश्त्या' शब्दके साथ सम्बन्ध है। भाव यह होगा कि हम जो ब्रह्मका जगज्जन्मादिकारणत्व लक्षण करते है, वह श्रति ही कहती है, हम अपनी वुद्धिसे व्याप्ति आदि लक्षणके समान उसे नहीं कहते हैं। 'इत्यादिश्षत्या' में आदि शब्दसे 'येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व, तद् ब्रह्म' यह वाक्यशेप गृहीत होता है। मूलमें स्थित 'यतो वा' श्रुतिमं 'यत्' शब्दसे ब्रह्मवल्लीमें कहे गये सत्यज्ञानानन्दानन्तात्मक ब्रह्मका परिग्रह होता है, क्योंकि प्रधानका ही सर्वनाम परामर्श करता है, यही कारण है कि 'यत्' शब्दके प्रभावसे 'यतो वा' इत्यादिसे स्वरूपलक्षणका भी लाभ होता है, पश्चमीकें प्रकृत्यर्थक अथवा सामान्यकारणत्ववाची होनेसे अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप लक्षण प्राप्त होता है। वाक्यशेषसहित 'यतो वा' इत्यादिक्षुतिका यह अर्थ होता है-'इमानि' इस इदं शब्दसे प्रत्यक्षसे उपस्थित सम्पूर्ण पदार्थोंका प्रहण होता है, यद्यपि भूतशब्द पृथ्वी आदि महाभूत और प्राणियोंमें रूढ है, तथापि प्रकृतमें रूढिका परित्याग करके 'भवन्ति इति भूतानि' (जो उत्पन्न होते हैं वे सव भूत हैं) इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे कार्यमात्रका भूतशब्दसे लाभ करना चाहिए। 'जीवन्ति' शब्दका अर्थ है-स्थितिको पाते हैं। प्रयन्त्यभि- संविशन्ति-लीन होकर जिसके साथ तादात्म्य प्राप्त करते हैं, अर्थात् दिखानवाले ये समस्त पदार्थ जिस चेतनसे उत्पन्न होनेसे जिसमें स्थित हैं और जिसमें लीन होकर जिसके साथ तादाम्य लाभ करते हैं, वह-कारण व्रह्म है और उसे विशषरूपसे-सच्चिदानन्दैकरस पूर्ण प्रत्यकरूपसे प्रत्यक्ष करनेकी इच्छा करो अर्थात् पूर्वोंक्त लक्षणके द्वारा ब्रह्मका विचाररूप। श्रुतिका एकरूपसे पाठ होनेके कारण उक्त एक ही लक्षण प्राप्त होता है, यदि 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, तद् ब्रह्म, येन जीवन्ति तद् ब्रह्म' इत्यादि भिन्न-भिन्नरूपसे पाठ होता, तो जगत्की उत्पत्तिका कारण जो है वह ब्रह्म है, स्थितिके प्रति जो कारण है, वह न्रह्म है और लयके प्रति जो कारण है वह ब्रह्म है, इस प्रकार तीन लक्षण होते, परन्तु वैसा है नहीं, अतः यह शङ्का हो ही नहीं सकती।

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महलक्षणविचार ] भापानुवादसहित ५५

एकैककारणत्वमप्यनन्यगामित्वाल्लक्षणं भवितुमर्हतीति चेत्, सत्यम्। लक्षण- [ परन्तु जसे जगजन्मस्थितिलयकारणत्वरूप एक लक्षण करते हैं, वैसे] जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीनोंमेंसे एक-एकका कारणत्व भी अनन्यगामी होनेसे ब्रह्मका लक्षण हो सकता है। [शक्काका भाव यह है कि जगत् के जन्म, स्थिति और लय इन तीनोंका जो कारण है, वह ब्रह्म है, इस प्रकार जन्म आदि तीनोंको मिलाकर एक लक्षण क्यों किया जाता है, कर्योंकि 'जगज्जन्मकारणत्व, जगतस्थितिकारणत्व और जगल्लयकारणत्व' अर्थात् जगत्की उत्पत्तिका कारण, जगत्की स्थितिका कारण और जगत्के लयका कारण, इस प्रकार तीन परस्पर निरपेक्ष त्रह्मके लक्षण हो सकते हैं और जवको छोड़कर अन्यत्र जाते भी नहीं हैं , किन्तु केवल ब्रह्ममें ही रहते हैं, अतः निदुष् भी हैं, इसलिए एक लक्षण करना अयुक्त है ] सत्य है परस्पर निरपेक्ष ये तीन ही लक्षण हैं। इसीलिए 'अत्ता चराचरग्रहणात्'

  • यद्पि जगज्न्म आदिकी कारणता मसाके समान साह्याभिमत प्रधानमें भी है, अतः उच लक्षण अनन्यगामी नहीं हुआ, क्योंकि प्रधानको सांख्यानुगामी लोग जगत्के उपादान- कपरो जगजन्मके प्रति हेतु, जगत्का आधार होनसे स्थितिका हेतु और लयका आश्रय होनेसे लयके प्रति भी हेतु मानते हैं, तथापि जगत्की उत्पत्ति आदिका कर्ता होकर उनके प्रति जो देतु दो, पद तदा है, इस प्रकार लक्षणमे कर्तृत्वका निवेश करनेसे जय प्रधानमें अतिव्याप्ति नहीं है, अतः उक शक्ा केवल धुलिप्रिक्षेप है। इसप्रर यदि शक्त की जाय कि जन्म आदिके प्रति जो कर्ता है, वही नता है, लक्षणके गर्भमें कारणका निवेश क्यों करना? तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि जीवमें अतिव्याप्त दोगी, कारण कि जीव भी अदट्टके द्वारा जगतका कर्ता होता है, लक्षणमें कारणके प्रचशसे जीवमें दोप नहीं होगा, क्योंकि स्वल्प जीव जगलूका कारण नहीं हो सकता है। (यहाँ कारणशब्द उपादानकारणपरक है, यह ख्याल रखना नादिए) इसपर यह कहा जाय कि जीवमें अतिव्याप्ति दोपके निवारण करनेके लिए साक्षात् जगत् की उत्पत्तिके प्रति कर्ता-साक्षात्जगजन्मकतृत्वरूप ब्रहाका लक्षण करते हैं, अतः पर- म्यरया जगतके कर्ता-जीवमें दोप नहीं होनेसे फारणत्वका लक्षणमें प्रवेश व्यर्थ है, तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि उपादानत्वकी-अर्थात् जगत्के प्रति उपादानत्वकी-गी.स्वतन्त्र लक्षण- रपसे विवक्षा हो सकती है, गाया नारूप उपादानमें घटक है और प्रधान आदि अग्नामाणिक हैं, अतः उनमें दोप नहीं है, यह भाव हैं। +'अत्ता चराचरप्रदणात्' इस सूत्रका निम्नलिखित अर्थ होता है-अत्ता-'यस्य ब्रद्या न क्षत्रं चोगे भवत ओदन: । गृत्युर्यस्योपरोचनं क इत्था वेद यत्र सः' (जिसके ब्रम्म-न्राह्मण और क्षत्ता-प्षत्रिय अदनीय है और मृत्यु उपरोचन (दाल आदि) है, ऐसा संहार करनेवाला

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५६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

त्रयमेवेदं परस्परनिरपेक्षम्। अत एव 'अत्ता चराचरग्रहणात्' इत्याद्यधि- करणेपु (उ० मी० अ० १ पा० २ अधि० १ सू० ९) सर्वसंहर्तत्वादिकं ब्रह्मलिङ्गतयोपन्यस्तमिति कौमुदीकारः । उपादानत्वविज्ञत्ववस्त्वन्तरनिराक्रियाः । व्युत्कमाल्व्धुमाचर्युरन्ये संवलितं त्रयम्।।१५ ।। व्युत्क्रमसे अर्थात् जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप लक्षणके घटक उलटे पदोंसे- (लयकारणत्व, स्थितिकरणत्व और उत्पत्तिकारणत्वके कथनसे) एक ही ब्रह्मरूप वस्तुमें उपादनत्व, सर्वज्ञत्व और अन्य वस्तुके निराकरणके लाभके लिए तीनोंको मिलाकर एक ही जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप लक्षण है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १५॥ अन्ये तु जन्मकारणत्वस्य स्थितिकारणत्वस्य च निमित्तकारणसाधार- ण्यात् उपादानत्वप्रत्यायनाय प्रपञ्चस्य ब्रह्मणि लयो दर्शितः । अस्तु त्रक्म

इत्यादि अधिकरणोंमें सर्वसंहृतृत्व (सबका संहारकर्ता) आदिका ब्रह्मके लिङ्ग ज्ञापकरूपसे उपन्यास किया है, इस प्रकार कौमुदीकार कहते हैं। जन्मकारणता और स्थितिकारणताके निमित्तकारणसाधारण होनेसे उपादानकारणताका सूचन करनेके लिए ब्रह्ममें प्रपश्चका विलय [ 'यतो वा' इत्यादि श्रुतिमें 'यत्पयन्त्यभिसंविशन्ति' शब्दसे ] दिखलाया गया है, [यदि उपादानत्वका सूचन प्रपश्चके विलयके प्रदर्शनके विना नहीं हो सकता है, तो केवल लयकारणत्व ही ब्रह्मका लक्षण करो, क्योंकि इसीसे ब्रह्ममें उपादान- कारणत्वका लाभ होगा, इसपर 'अस्तु' इत्यादिसे कहते हैं] न्रह्म जगत्का उपादान भले ही हो, परन्तु जैसे घटकी उत्पत्तिमें मिट्टीरूप उपादान कारणसे 'अन्य निमित्तकारण-कुलाल होता है, वैसे जगत्की उत्पत्तिमें ब्रह्मरूप उपादानसे

परमात्मा, जिस निर्विशेषमें भेदकल्पनासे है, उस निर्विशेष परमात्माको उक्तरूपसे कौन जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता) इस श्रतिमें कहा गया अशनकर्ता परमात्मा ही है, क्योंकि चर और अचरका अत्तृत्व परिगृहीत है, अतः जीव आदिका परिम्रह नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह चराचरका अत्ता नहीं हो सकता। 'इत्यायधिकरणमें' आदि शव्दसे अन्तयाम्यधिकरण [उ० मी० अ० १ पा० २ अ० ५ सू० १८ ] और जगद्वाचित्वाऽधिकरण [उ० मी० अ० १ पा० ४ अधि० ५ सू० १६] ये दो अधिकरण लिये जाते हैं। सवसंहर्तृत्वादिमें आदि शब्दसे सर्वनियन्तृत्वरूप सर्वस्थितिकर्तृत्व और सर्वजगद्गुपत्ति कर्तृत्व इन दोनोंका ग्रहण करना चाहिए।

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महलक्षणविचार ] भापानुवादसहित ५७

जगदुपादानम्, वज्जन्मनि घटजन्मनि कुलालवत, तत्स्थितौ राज्यस्थेमनि राजवच्च उपादानादन्यदेव निमित्तं भविष्यतीति शङ्काव्यवच्छेदाय तस्यैव जगजननजीवननियामकत्वमुक्तम्। तथा चकमेवेदं लक्षणम् अभिन्ननिमित्तो- पादानतयाऽद्वितीयं न्रह्मोपलक्षयतीत्याहुः ॥२॥ तन्रोपादानता विश्वविवतास्पिदता चितः। स्वाभिन्नन्यूनसत्ताडर्थी विवर्त इति कथ्यते॥। १६ ॥ लक्षणमें जो उपादानता है, वह व्रदाकी समस्त प्रपथ्वरूपसे विवर्ताभयतारूप है और विवत उसे कहते हैजो उपादानरूपसे अभिमत वस्तुसे अभिन्न होकर न्यूनसत्तायाला दो॥ १६ ॥ न्ह्मणश्च उपादानत्वम् अद्वितीयकूटस्थचैतन्यरूपस्य न परमाणू- नामिवारम्भकत्वरूपम्, न वा प्रकृतेरिव परिणामित्वरूपम्, किन्त्वविद्यया चियदादिप्रपश्चरूपेण विवर्तमानत्वलक्षणम्।

अन्य कतृरूप कोई निमित्तकारण होगा। जैसे पालनरूप राज्यकी स्थिरतामें पालनीय प्रजा आदिके उपादानसे भिन्न राजा निमित्त कारण है, वैसे ही जगत्की स्थिति और पालनमें उपादानसे अन्य नियन्तृरूपसे स्थितिहेतुभूत कोई निमित्त कारण होगा, इस प्रकारकी शक्काका निराकरण करनेके लिए उसी एक ही ब्रक्षमें श्रुति द्वारा जगजननजीवननियामकता-जगत्के जन्म और पालनके प्रति कारणता कदी गई है, अतः जगजन्मनियामकता और जगत्पालननियामकतासे जगदुपादानमें ही जगत्के जनन आदिके प्रति निमित्तकारणताके सिद्ध होनेपर यह श्रुति द्वारा कहा गया जगजनग-स्थिति-लयकारणत्वरूप एक ही लक्षण होकर अमिन्ननिगितोपादानत्वरूपसे अद्वितीय नद्मको उपलक्षित करता है-ब्रह्मसे भिन्न वस्तुके अस्तित्वकी शक्काके निराकरण द्वारा अद्वितीय त्रद्मका बोधन करता है। तीन लक्षण इस अर्थके प्रतिपादक नहीं हैं, यह भाव है ।।२॥ अद्वितीय कूटस्थ चतन्यरूप व्रम्ामें जो जगत्की उपादानकारणता है, वह परमाणुओंके समान आरम्भकत्वरूप नहीं है अथवा प्रकृतिके समान परिणागितारूप भी नहीं है, किन्तु अविदयासे आकाश आदि प्रपश्चके आकारसे विवर्तमानतारूप है।

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५८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

वस्तुनस्तत्समसचाकोऽन्यथाभावः परिणामः, तदसमसत्ताको विवर्त इति वा; कारणसलक्षणोऽन्यथाभावः परिणामः, तद्विलक्षणो विवर्त इति वा; [नैयायिकोंके मतमें द्यणुक आदि जगत्के प्रति परमाणु उपादान कारण होते हैं, परन्तु आरम्भकत्वरूपसे होते हैं तथा साङ्ख्यमतावलम्वी प्रकृतिको परिणामितारूपसे जगत्के प्रति उपादान कारण मानते हैं, इन दो मतोंके अनुसार अर्थात् आरम्भकत्व और परिणामित्व रूपसे ब्रह्मको जगत्के प्रति उपादान कारण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि जो कूटस्थ अद्वितीय चैतन्यात्मा है, वह आरम्भक नहीं हो सकता और परिणामवादमें परिणाम और परिणामीका अभेद होनेसे ब्रह्ममें भी विकारिता और जन्म आदिकी प्रसक्ति होगी, अतः उक्त दोनों पक्ष सङ्गत नहीं हैं, इसलिए अविद्या द्वारा प्रपश्चरूपसे विवर्तमानतारूप उपा- दानता ही ब्रह्ममें अमीष्ट है अर्थात् जैसे रज्जु आदिमें आरोपित सर्प आदिकी अधिष्ठानता है, वैसे ही ब्रह्ममें जगद्रूप विवर्ताधिष्ठानता है, यह भाव है। इसपर एक विचार होता है कि व्रह्म और उसके विवर्त जगत्का परस्पर अमेद सिद्धान्तमें माना जाता है, अतः आरम्भवादमें आरम्य और आरम्भकका अभेद न होनेसे उसके त्याग करनेपर भी परिणामवादमें अमेदका सम्भव होनेसे परिणाम- वाद और विवर्तवादमें कोई वैषम्य सिद्ध नहीं होता है? इसलिए विवर्त और परिणामके भिन्न स्वरूप प्रदर्शनार्थ उनके पृथक् पृथक लक्षण करते हैं-] उपादानरूपसे अभिमत वस्तुकासमान सत्तावाला अन्यथाभाव- पूर्वरूपकी अपेक्षा अन्यरूपसे अवस्थान-परिणाम है और उपादानसे विलक्षण- सत्तावाला अन्यथाभाव विव्त है। अथवा कारण-उपादानकारणका समानलक्षण-समानधर्मी अन्यथाभाव परिणाम है और उपादानसे विलक्षण- असमानधर्मी-अन्यथाभाव विवर्त है*।

  • वस्तुनस्तत्समानसत्ताकोऽन्यथाभाव :- इस लक्षणमें वस्तुशव्दसे उस वस्तुका ग्रहण है, जो उपादानत्वरूपसे अभिमत हो, पूर्वरूपकी अपेक्षा अन्यरूपसे अवस्थान-अन्यथाभाव अर्थोत् अवस्थाविशेष, यह कैसा होना चाहिए? तत्समानसत्ताक-तेन समा सत्ता यस्य-अन्यथामावस्य स तथा अर्थात उपादानभूत वस्तुकी सत्ता और उससे उत्पन्न हुए कार्यकी सत्ता समान होनी चाहिए, यह भाव है। जसे-मृत्तिकाका परिणाम है-घट, घटका उपादान कारण है-मृत्तिका और घट है मृत्तिकाका अन्यथाभाव, घटकी जो व्यावहारिक सत्ता है, वही उपादान कारण मृत्तिकाकी

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ब्रहलंक्षणविचार ] भोपानुवादसहित ५९

[टिप्पणी ] है, अतः घटरूप मृत्तिकाके अन्यथाभावमें मृत्तिकारूप उपादानकी समानसत्ता होनेसे घट मृत्तिकाका परिणाम हुआ। ब्रह्मका जगत् परिणाम नहीं हो सकता है, क्योंकि व्रह्मकी सत्ता तरिकालावाधित है अर्थात पारमार्थिक है और जगत्की सत्ता व्यावहारिक है। उपादानका अन्यथाभाव उपादानकी सततारो यदि विषमसत्तावाला हो, तो वह विवर्त होगा, जैसे-छुकतिका विवर्त है-रजत। झुकि और उसमें उत्पन्न प्रातीतिक रजतकी समान सत्ता नहीं है, क्योंकि शुक्तिकी व्यावदारिक सत्ता है और रजतकी प्रातिभासिक सत्ता है। इन लक्षणोंका परिष्कार इस प्रकार किया जाता है-उपादानव्वाभिमतयस्तुसत्तास्मानसत्ताकत्वे सति तदवस्था- विशेषरूपत्यम्-तत्परिणामत्वम्। सत्यन्त अर्थात् विशेषण दल इसलिए दिया गया है कि विवर्तमें अतिव्यांत्ति दोष न दो और विशेष्य दल इसलिए दिया गया है-घट आदिमें तन्तु आदिके परिणामत्वका निराकरण हो। इसी प्रकार विवर्तका लक्षण-'उपादानत्वाभिमत- वस्तुमत्ताधिपममत्ताकले सति तदचस्थाविशेपरूपत्वम्' है। परिणामका वारण करनेके लिए सत्यन्त विशेषण है और विशेष्यदल वम्ममें मृत्परिणामत्वकी व्यावृत्तिके लिए है। ये उपर्युक्त दो लक्षण पारमार्थिक, व्यावदवारिक और प्रातिभाषिक सत्ताओंको मानकर किये गये हैं। यदि में तीन सताऐं न मानी जायँ और घट, शुक्ति, रजत आदि सब जगह न्रहमस्वरूपसत्ता दी मान ली जाय, तो इस पक्षमें उक्त दो लक्षण परिणाम और विवर्तके नहीं होंगे, इसलिए 'कारणसरक्षणो' इत्यादिये परिणाम और विवर्तका अन्य लक्षण करते हैं। इसका अर्थ होगा 'उपा दानत्वाभिमतव स्तुलक्षण समानलक्षणरे सति तदवस्थाविश्येपत्वं तत्परिणामत्वम्' यहाँ जडत्वरूप नगये सालक्षण्य सजातीयत्य विवक्षित दे अर्थात्-उपादानत्वरूपसे गृहीत जो वस्तु है उसके जटत्वरूप धर्मसे सजातीय उपादानकी अन्य अवस्था परिणाम होगी, मृत्तिकाक परिणाम घटमें यह घटता हे-उपादानभूत वस्तु है गृतिका और उसकी अन्य अवस्था है-घट, इन उपादान और उपादेयमें जउत्वरूप धर्मके अस्तित्वसे राजातीयता है। व्रह्मके विवर्त जगत में, नेतनत्वके न दोनसे, ब्रम्मरूप-उपादानसजातीयताका अभाव है, अतः ब्रहाके विवर्त जगतमें परिणामका लक्षण नहीं गया, इसलिए अतिव्यापति दोप नहीं है। गृत्तिकामें घटके परिणामत्वका वारण करनेके अभिप्रायसे विशेष्य दलका प्रवेश है और प्रपथमें संवित्का परि- मामत्व न हो, अतः सत्यन्त विशेषण दे, यह समक्ना चादिए। विवर्तका लक्षण होगा-'उपादानत्वाभिगतवस्तुविलक्षणत्वे सति तदवस्थाविशेपत्वम्' अर्योत् उपादानत्यरसे परिगृद्दीत वस्तुसे विलक्षण दोकर उस वपादानरुप वस्तुका अवस्था विशेष विवत है, यहाँ निस्व और जउत् रूप धर्मोरो विलक्षणता विवक्षित है। शुक्ति-रजतमें, जो युत्त्यवच्छिन वैतन्यका विवर्त है, उक लक्षणका समन्वय भली भांति होता है, शुत्तय- चच्छिन चैतन्य ही अविद्याके समवधानरो रजताकारसे विचर्तभायको प्राप्त होता है, अतः चैतन्यसे रजत अवश्य विलक्षण हुआ, कर्गोंकि चैतन्यमें चित्वधर्म है और रजतमें जवत्व है, इसी प्रकार घ्रम्ष और जगत्में भी चित्त्व और जउत्वसे वैलक्षण्य होनेसे बह्मके विवर्त जगत्में भी लक्षणसमन्वय ो जायगा। चैतन्यमें जविवर्तत्वके परिद्वारके लिए विशेष्यदल है और गृत्परिणाम घट आदिमें मृद्दिवर्तेत्वके निराकरणके लिए विशेपणाश है।

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६० सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

कारणामिन्नं कार्य परिणामः, तदभेदं विनैव तन्तिरेकेण दुर्वचं कार्यं विवर्त: इति वा विवर्तपरिणामयोर्विवेकः ॥ ३ ॥

अथवा उपादान कारणसे अमिन्न कार्य परिणाम है और उपादानसे अभिन्न न होकर उपादानके विना दुर्वच-जिसका निर्वचन करना सम्भव नहीं ऐसा कार्य विवर्त हैं। इस प्रकार विवर्त और परिणामगें भेद है# ॥३॥

अन्य रीतिसे भी विवर्त और परिणामके लक्षण कहते हैं-'उपादान कारणत्वाभिमतव सतभ- भिन्नल्वे सति तत्कार्यत्वम्, परिणामत्वम्। अर्थात्, कारणरपसे मानी जानेवाली वस्तुखे अभिन्न होकर उसका जो कार्य हो, वह परिणाम। घट मृत्तिकास अभिन भी है और नृत्तिकाका कार्य भी है, अतः लक्षणसमन्वय है। और 'तदभेदं विनैव तद्व्यतिरेकेण दुर्वचं कार्य विवर्तः इस मूलसे कार्यरप विवर्तका ही लक्षण किया गया है, क्योंकि मूलकारने लक्षणमे कार्यशब्दका प्रक्षेप किया है, अथवा लक्षणमें कार्यत्वकी अविवक्षा करनी चाहिए, इससे अनादि अविदामें भी, जो नवविवर्त हे, विवतत्वका लक्षण घट जायगा और अव्यापति नहीं होगी। 'तदभेदं बिना' इसका अर्थ-वस्तुसत् अभेदके विना, अतः प्रातीतिक अभेद होनेपर भी अमदति नहीं है। इंसलिए कार्यरूप विवतके लक्षणका परिष्कार हुआ-'उपादानत्वाभिनतवस्तुनः सकाधात् वस्तुतो भेदाभेदाभ्यां दुनिरूपतवे सति कार्यत्वम्। अविद्यामें अतिव्याप्तिका वारण करनेके लिए विशेष्यदल है। आरम्भवादमें और परिणामवादमें क्रमशः अभेद और भेदसे कार्यका निरूपण अशक्य होनेसे उस स्थलमें दोषवारण करनेके लिए 'भेदाऽभेदाभ्याम्' इतना लक्षग- कुक्षिमें निविष्ट है, सिद्धान्तमें कार्य और कारणमें अभेदका उपगन होनेसे असम्भनका वारण करनेके लिए 'वस्तुतः' कहा गया है। कार्य और कारणका परस्पर भेद है या अमेद है, इसका निर्वचन नहीं कर सकते, क्योंकि उंनका यदि भेद माना जाय, तो उसपर यह शाक्ठा होती है कि 'घट ही मृत्तिका है, तन्तु ही पट हैं और सुवर्ण ही कुण्डल है, इस प्रकार सामानाधिकरण्य कैसे होगा, मेदमें सामानावि- करण्य नहीं देखा जाता। अन्यथा रासभ और उष्ट्रका भी परस्पर सामानाधिकरण्य होने लगेगा, और विशेषरुपसे समालोचना करनेपर मृत्तिकासे पृथक् घट या तन्तुओोंसे अतिरिक पट देखनेमें नहीं आता। यदि कारण और कार्य मिन्न होते तो अवश्य कार्य और कारणका पृथकूरूपसे अस्तित्व देखा जाता। दूसरी बात यह है कि कारकव्यापारके पूर्व क्षणमें भी मृत्तिकामें घटकी सत्ताका स्वीकार करना चाहिए, ऐसा न माननेपर शशशह्गके समान असत् पदार्थकी उत्पत्तिके अभावका प्रसम्न आवेगा और उत्पत्तिकालके पूर्वमें असत कार्यको माननेमें उत्पत्ति क्रियाके प्रति कर्तृत्वकी उपपत्ति नहीं होगी और शशश्द्ध आदि असत् पदार्थोंकी भी उत्पत्ति प्रसक होगी। इन युक्तियोंसे इम कार्यके अस्तित्वका स्वीकार करनेके लिए वाध्य होते हैं तो पूर्वमें कार्य और कारणके अभेदकी सिद्धि भी

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ब्रह्मकी कारणताका विचार] भापानुवादसहित ६१

अथ शुद्धमुपादानमीश्वरो जीव एव वा। शुद्धं सङ्क्षेपकमते ज्ञेयलक्षणवर्णनात् ॥ १७ ॥ अब संश्रय होता है कि शुद्ध व्रदा उपादान है या ईश्वररूप या जीवरूप ? इसमें . शुद्ध व्रहा उपादान है, ऐसा संक्षेपशारीरककारका मत है, क्योंकि श्ञेय ब्रह्मका ही लक्षण किया गया है॥ १७ ।। अथ शुद्धं त्रह्म उपादानमिष्यते, ईश्वररूपम्, जीवरूपं या। अत्र

अब नस्समें सामान्यरूपसे उपादानत्वके ज्ञात होनेके वाद जिज्ञासा होती है कि जिस नस्सको सगस्त जगत्के प्रति उपादान कारण मानते हो, क्या वह

अगत्या माननी होगी, और इसीसे उत्तर क्षणमें भी अभेदकी ही सिद्धि होगी, इस प्रकार सांख्य- मतानुगाबी कहते हैं। कार्य और कारणका भेद माननेवाले नैयायिक लोग कहते हैं कि कार्यकारणका अभेद नहीं हो सकता, क्योंकि जो एक ही वस्तु है उसमें कार्यकारणभाव किसी भी प्रमाणके वलसे सिद्ध नहीं दो सकता अर्थात् एक वस्तुमें अपना कार्यत्व और कारणत्व ये विरुद्ध धर्म कैसे रह सकेंगे और कार्य और कारणका अमेद माननेसे अर्थक्रियाके भेदका अभाव भी होगा-अन्यथा जलका आदरण वृत्तिकासे भी प्रमक दोगा, क्योंकि अभेदवादियोंके मतमें घट और मृत्तिका एक ही हैं। और मृत्तिकाके समान घटसे भी घटकी उत्पत्तिका प्रसभ आविगा। इस प्रकार भेदवादी और अभेद- यादीये दर्शित युक्ियोंसे परस्पर प्रतिक्षेप नहीं कर सकते हैं, अतः कार्यका कारणके साथ भेद है या अभर है तथा कार्यक पूर्वकालमें कार्यका सत्त्य है या असत्व है, इसका निरूपण करना असम्भव दोनेंस अर्थात् उसे अनटत दी मानना होगा। और जो कारण है, वह तो कार्यके पूर्वकाल और कार्यकालमें अनुवर्तमान है। अतः उसका कार्यसे पृथकरूपतया निरूपण कर सकते मैं, इसलिए कार्यकी अपेक्षा कारण सत्य होगा, यद्यपि मृत्तिका आदि अवान्तर कारण तत्तत् कायोकी तुलनामें सत्यसे है, परन्तु पारमार्थिक सत्यता तो उनमें नहीं ही है, क्योंकि 'पाचारम्भणं विकारी नामधेयं मृत्तिकत्येव सत्यम' (घट आदि विकारोंका केवल वाणीसे ही व्यवदार दोता है, अतः उनका नाम मात्र है, कोई अर्थ नहीं है-अर्थात् वस्तुके न रहने- पर भी 'पुरुपस्य सतन्यम्' इतयादिके समान 'पट है' इस प्रकार विकल्प मात्र होता है, तो सत्य क्या है? इसपर क्षति कहती है 'मृत्तिकेत्ये' अर्थात् कारणरूपसे प्रतीयमान मृत्तिका ही सत् चस्तु है) इस प्रकारकी श्षति प्रद्यव्यतिरिक सब प्रपच्वका असत्य और वाधित- रूपसे बोधन करती है। यह श्रुति केवल दटन्तरूपमें हे-अर्थात् जैसे घट आदि स्थूल विकारंमें अनुवर्तमान मृतिका सत्य है, चैसे ही समन्तात् दश्यमान पदार्थोंमें अनुवर्तमान 'सत्' पदार्थ ही कारणरूपसे सत्य है और दतर असत्य हैं, इस प्रकार प्रपथ, अनिर्वाच्य होनेसे, अरत है और दुर्वन है, इसलिए मूलकारने ठीक कहा है कि 'तद्व्यतिरेकेण टुर्वचम्' इत्यादि। यहाँ व्यतिरेक शब्दका अर्थ मेद है।

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सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

सङ्क्षेपशारीरकानुसारिणः केचिदाहु :- शुद्धमेवोपादानम्, जन्मादिसूत्र- तद्भाष्ययोरुपादानत्वस्य ज्ञेयव्रह्मलक्षणत्वोक्ते: । शुद्ध ब्रह्म है या ईश्वररूप ब्रह्म है अथवा जीवरूप न्रम्म है? * । इस प्रश्नके उत्तरमें संक्षेपशारीरकके मतमं श्रद्धा रखनेवाले कुछ लोग कहते है कि शुद्ध ब्रह्म + ही उपादान है, क्योंकि 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रम

  • शुद्ध व्रह्म उपादान कारण है, इस विषयमें संक्षेपशारीरकमें यों इलोक मिलता है- निमित्तं च योनिश्च यत्कारणं तत् परव्रह्म सवस्य जन्मादिभाजः । इति स्पष्टमाचष्ट एपा श्रुतिनेः कथं सिद्धवद्वक्षणं सिद्धिवाहयम् ॥ [सं०शा०भ०१ श्लो० ५५३] इस इलोकका अर्थ है-सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके प्रति उपादान और निमित्तभूत जो कारण है, वह परव्रह्म-शुद्धब्रह्म ही है, ऐसा 'यतो वा' इत्यादि ध्रुति स्पष्ट- रूपसे कहती है अर्थात् यद्यपि ऐसा कारण लोकमें प्रसिद्ध नहीं है, तथापि जगजन्म आदिके उपादानरूपसे अपूर्व ब्रह्मका श्रुतिप्रतिपादन करती है, अतः यह लक्षणस्वरूपका असाधक किसी रूपसे भी नहीं होगा। इससे यह ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरकके सिद्धान्तसे शुद्ध व्रह्म ही जगत्का उपादान माना गया है। और 'तद् त्रह्म' इसके साप्तिध्यसे 'यतो वा' इत्यादिसे जगत् के कारणत्वरूपसे प्रतिपादित व्रक्ष ही लेना चाहिए यह 'लोकप्रसिद्धार्थपदान्तराणाम्' (सं० शा० अ० १ श्ो० २९०) इत्यादि श्ोकमें विशेप स्पष्ट शब्दोंसे कहा गया है, अतः अधिक विषय वहींसे जानना चाहिए। + यहाँ आदिशब्दसे 'सोऽकामयत' (उस ब्रहमाने इच्छा की प्रजारुपमें अनेक होऊँ) 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' (जो सर्वज्ष है विशेपरूपसे ज्ञानवान् है) इत्यादि अनेक क्षतियों का उद्धरण करना चाहिए। भाव यह है कि यदि शुद्ध व्रह्म जगत्के प्रति उपादान है, तो उक वाक्य, जो ईश्वरके कारणत्वका प्रतिपादन करते हैं, अप्रामाण होंगे, क्योंकि शुद्ध न्रह्ममें इच्छा और ज्ञानक्ियाकी कर्तृता नहीं हो सकती है, इसलिए शुद्ध व्रह्म जगत्का उपादान नहीं है, यह श्रुतिसे प्रतीत होता है, परन्तु ईश्वररूप ्रह्म जगत्का कारण प्रतीत होता है, इसपर संक्षेप- शारीरककारके अनुयायी कहते हैं कि उक्त वाक्योंमें कहे गये शवलवाची आत्मशब्दकी शुद्धमें लक्षणा करते हैं, अतः उन वाक्योंसे भी शुद्ध ब्रह्म ही वोधित होता है। इस कल्पनामें केवल हेतु है-'जन्माद्यस्य यतः' यह सूत्र और इसका भाष्य। 'जन्मादस्य यतः' इस सून्नका अर्थ है-समस्त जगत्के उत्पत्ति, स्थिति और लय जिससे होते हैं, वह न्रह्म है। है, इस मतके पक्षपातियोंका कहना यह है कि 'अथातो न्रह्मजिज्ञासा' (साधनसम्पत्तियुक होनेके अनन्तर ब्रह्मसम्वन्धी विचार करना चाहिए) इस सूत्रमें ज्ञेयरूपसे उसी ब्रह्मकी प्रतिज्ञा की गई है, जो निर्गुण सच्चिदानन्दरूंप है, अतः 'जन्माद्यस्य यतः' सूत्रसे निर्गुण ज्रह्मका

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मसकी कारणताका विचार ] भांपानुवादसहित ६३

तथा च 'आत्मन आकाशः सम्भूतः" इत्यादिकारणवाक्येपु शवल- वाचिनामात्मादिशव्दानां शुद्धे लक्षणैवेति। सार्वात्म्यस्येशललिद्गत्वात् यः सर्वज्ञ इति श्रुतेः। मायोपहितमीशं तदाहुर्विवरणानुगाः ॥ १८ ॥ 'हैव घडकू तत्साम' इत्यादि भुतिसे कहा गया सर्वात्मकत्व ईश्वरमॅ लिद्ग है और 'यः सर्वज्ञः' इस प्रकार क्षुति है; अतः जगत्का उपादान मायोपाधिक चैतन्य अर्थात् ईश्वर ही है, ऐसा विवरणानुसारी कहते हैं॥। १८ ॥ विवरणानुसारिणस्तु-'यः सर्वज्ञः सर्ववित् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते' इति शुतेः सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट मायाशवलमीश्वररूपमेव ब्रह्म उपादानम्।

और उसके भाप्यम जगदुपादानत्व ज्ञांतव्य ब्रह्मका लक्षण कहा गया है। इसलिए 'आत्मन आकाश:०' (आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ) इत्यादि कारणप्रतिपादक वाक्योंमें शवलवाची-मायासे युक्त चैतन्यके वोधक-'आत्म' शव्दोंकी शुद्धमें लक्षणा ही है। 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्०' (जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है, जिसका तप ज्ञानमय-स्वरूपज्ञानका विकार है, उस सर्वज्ञ ब्रह्मसे हिरण्यगर्भ, नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं) इस अ्तिसे सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त मायासे

हो लक्षण किया जाता है, यह अवश्य स्वीकार करना होगा, अन्यथा अप्रतिज्ञातके लक्षणका प्रसश होगा, अतः सूत-भाष्यकी मर्यादाका संरक्षण करनेके लिए उन शवलवाची आत्मार्थक शब्दोंकी शुद्धमें लक्षणा करनी होगी, यह संक्षेपशारीरककारके अनुयायियोंका मत है। यद्यपि 'तद्विजिन्ञासस्व' इत्यादि वाक्यशेपसे शुद्ध ब्रह्म ही जिज्ञास्य है और उसका 'यतो वा' इत्यादि श्रुतिसे लक्षण किया गया है, अतः इस शक्काका अवसर नहीं है कि शुद्ध ब्रह्म कारण है या जीवरूप या ईश्वर, तथापि जैसे शुद्ध व्रह्म जिज्ञास्य है, वैसे ही जीव और ईश्वर, जो 'त्वम्' और 'तत्' शब्दसे वाच्य हैं, जिज्ञास्य हैं, क्योंकि वे भी शुद्ध ब्रदाके ज्ञानके प्रति हेतु हैं, अतः उनमें भी जगत्के प्रति उपादानता है, इसलिए शक्ाका होना सम्भव है, और चैतन्यके तीन भेद भी शास्त्रमें मिलते हैं- जीव ईशो विशुद्धा चित तथा जीवेशयोर्भिदा। अविद्या तितोर्योगः पडस्माकमनादयः ॥ अर्थात् जीव, ईश्वर, शुद्ध चैतन्य (ब्रह्म), जीव और ईश्वरका भेद, अविद्या और चित्का सम्बन्ध, ये छः अनादि है, इनमें चैतन्यके तीन भेद प्रतीत होते हैं, अतः प्रश्न होता है।

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६४ सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम परिच्छेद

अत एव भाष्ये 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' (उ० मी० अ० १ पा० १

शबल अर्थात् मायारूप उपाधिसे विशिष्ट * ईश्वररूप ब्रह्म ही जगत्के प्रति उपादान है, ऐसा ज्ञात होता है। इसीसे-ईश्वररूप व्रह्म ही उपादान है, ऐसा स्वीकार करनेसे।अन्त-

  • 'मायाविशिष्ट व्रह्म ही जगत्के प्रति उपादान है' यह विवरणका मत है, अतः इसकी परिपुष्टि करनेके लिए हम यहाँ विवरणकी कुछ पठकियाँ उद्धृत करते हैं- 'तस्मादनिर्वचनीयमायाविशिष्टं कारणं न्रह्मति प्राप्तम् ........... त्रैविष्यमत्र सम्भवति- रज्वा: संयुक्तसूत्रद्दयवत् मायाविशिष्टं ब्रह्म कारणमिति वा 'देवात्मशक्ति स्वगुणैनिगृढाम्' इति श्रुतेः मायाशक्तिमत्कारणमिति वा, जगदुपादानमायाश्रयतया न्रह्मकारणमिति वा। तन्न विशिष्टपक्षे तथव ब्रह्मत्वेनोपलक्षितस्य ज्ञानानन्दादिस्वरूपलक्षणेन मायानिष्कर्षाल्लक्षणद्वयेन विशुद्धव्रह्म- सिद्धिः। उत्तरपक्षयोस्तु मायाया ब्रह्मपरतन्त्रत्वात् तत्कार्यमपि ब्रह्मपरतन्त्रं भवति; यथांऽशु- तन्न्रतन्त्वारब्धोऽपि पटोऽशुतन्त्रः प्रतीयते। ततक्ष उत्पद्यमानकार्यस्य यद् आश्रयोपाधि- ज्ञानानन्दलक्षणं च तद् ब्रह्मेति शुद्धव्रह्मलाभ इति"। (टीकानवकोपेत शा० पृ० ९०७ कल० सुद्रित) अर्थात इससे अनिवर्चनीय मायासे विशिष्ट व्रह्म ही जगत्का उपादान है, यह सिद्ध हुआ, इसमें तीन प्रकार भासते हैं-जैसे रज्जुके प्रति संयुक्त दो सूत्र कारण हैं, वैसे ही मायाविशिष्ट व्रह्म कारण है-माया भी विशेषणरूपसे कारण है, अथवा 'देवात्मशकतिम्' इत्यादि श्रतिके अनुसार मायाशक्तिसे युकत व्रह्म कारण है, अथवा जगत्की उपादान मायाके आश्रय- रूपसे ब्रह्म कारण है। प्रथम पक्षमें ब्रह्मका लक्षण-जगत्कारणस्वरूप मायामें जाता है तथापि ज्ञानानन्दरूप स्वरूपलक्षणके प्रवेशसे शुद्ध ब्रह्म ही सिद्ध होगा। द्वितीयादि पक्षमें जैसे अंशुके (तन्तुके अवयवके) अधीन तन्तुसे आरब्ध पट अशुतन्त्र ही है, वैसे ही ब्रह्म- परतन्त्र मायाका कार्य भी ब्रह्मपरतन्त्र ही होगा. इसलिए उत्पय्यमान कार्यका जो आश्रयोपाधि (अज्ञान सत्ताका हेतु) ज्ञान और आनन्द लक्षण है, वह ब्रह्म है, ऐसा सिद्ध होगा। इससे यह वात मालूम होती है-विवरणकार यद्यपि औपाधिक व्रह्मको कारण मानते हैं, तथापि शुद्ध ब्रह्मकी सिद्धि तो किसी रूपसे होती ही है। + 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रके भाष्यमें विचार किया गया है कि छान्दोग्यमें 'एषोऽन्त- रादित्ये हिरण्मयः' (जो यह सूर्यके अन्दर ज्योतिःस्वरूप पुरुष है) इत्यादिका उपक्रम करके 'य एषोन्तरSक्षिणि पुरुषो दृश्यते' (जो यह चक्षुके भीतर पुरुष देखा जाता है) इत्यादि सुना - जाता है। यहांपर संशय होता है-आदित्य और आँखके अन्दर रहनेवाला कोई विशिष्ट जीव है या ईश्वर है। पूर्वपक्षीके अभिप्रायसे जीवके प्राप्त होनेपर सिद्धान्त करते हैं कि आदित्य आदिमें रहनेवाला ईश्वर ही है, क्योंकि उन श्रतियोंमें ईश्वरके धर्मोंका कथन मिलता है-सर्वात्मकत्व-सर्वतादात्म्यत्वरूप धर्म सर्वापादान होनेसे ईश्वरमें ही है, जीवमें नहीं है, कारण कि जीव अल्पज्ञ और अल्पशक्ति होनेसे जगत्के प्रति कारण नहीं है। अतः सर्वात्म- कत्व उसमें नहीं हैं, इसलिए आदित्य आदिके अन्दर रहनेवाला पुरुष जीव नहीं है। और

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ब्रह्मकी कारणताका विचार] भापानुवादसहित ६५

सृ० २०) 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' (उ० मी० अ० १ पा० २ सू० १) इत्याद्यधिकरणेपु 'सैव ऋक तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद् ब्रह्म सर्वकर्मा सर्वकाम: सर्वगन्धः सर्वरसः इत्यादिश्ुत्युक्तं सर्वोपादानत्वप्रयुक्तं सर्वात्म-

जीवेश्वरानुस्यूतचैतन्यमात्रस्य सर्वोपादानत्वे तु न तज्जीवव्यावृत्त- मीश्वरलिङ्गं स्यात्। सङक्षेपशारीरके शवलोपादानत्वनिराकरणमपि माया-

स्तद्धर्मपदेशात्' और 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' इत्यादि अधिकरणोंके भाष्यमें 'सेव ऋकू तत्साम०' (वही-चक्षुके अन्दर रहनेवाला पुरुष ऋक् है, वही साम है, वही उक्थ है, वही यजु है और वही ब्रद्म-वेद है अर्थात् ऋक् आदिसे अतिरिक्त वेद है) इत्यादि श्रुतिसे कहा गया जीवव्यावृत्त-जीवमें नहीं रहने वाला सर्वोपादानतापयुक्त जो सर्वात्मकत्व है, वह ईश्वरका लिङ्ग कहा गया है। यदि जीव और ईश्वरमें अनुगत केवल शुद्ध चैतन्य ही सबके प्रति उपादान 1 कारण माना जाय, तो वह सर्वात्मकत्व जीव-व्यावृत्त ईश्वरलिङ्ग नहीं होगा। शवलवाची चतन्यमें उपादानकारणताका निराकरण संक्षेपशारीरकमें जो किया गया है, वह भी मायाविशिष्ट चेतन उपादान कारण नहीं है, इस अभिपरायसे है अर्थात् मायाके विम्वरूप ईश्वरके विशेषण होनेसे जो उसका

भगवान् भाष्यकारने' ..... ऋुकू सामाद्यात्मकर्ता निर्धास्यति। सा च परमेश्वरस्यैवोपपययते, सर्वकारणत्वात् सर्वात्मकत्वोपपत्तेः' इस पंकिसे सर्वोपादानत्वप्रयुक्त जो सर्वात्मकत्व है, वह 'आदित्य आदिमें रहनेवाला जीव नहीं है, प्रत्युत ईश्वर है' इस प्रकार जीवव्यावृत ईश्वरके परित्रह्में लिंगरूपसे कहा गया है। 'अन्तस्तदर्मोपदेशात्' इस सूत्रका अर्थ है-अन्तः आदित्य आदिके अन्दर रहनेवाला पुरुष [ईश्वर ही है किससे? इससे कि] तद्धर्मोपदेशात् यहां ईश्वरके धर्मका उपदेश है। 1 'सर्घत्र प्रसिद्धोपदेशात्' इस सूत्रमें भी 'सर्व खल्विदं व्रह्म' (यह सब ब्रह्म है) इसका उपकम करके 'स कतुं कुर्वीत' (वह उपासना करे) इस प्रकार उपासनाका विधान किया है। अनन्तर 'मनोमयः प्राणशरीरः' (मनोमत्र-मन-प्रधान और प्राणशरीरवाला) इत्यादिसे वह उपास्य कहा गया है। इसमें मनोमय आदिसे जीवका ग्रहण होता है अथवा पर- ब्रह्मका? इस प्रकार संशय होता है, पूर्वपक्षमें जीव प्राप्त होता है, परन्तु सिद्धान्तमें ईश्वर ही मनोमय आदिसे लिया गया है, क्योंकि 'सर्व सल्चिदं व्रद्म' इत्यादिसे सर्वात्मकत्वका अभिधान है।

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सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

विशिष्टोपादानत्वनिराकरणाभिप्रायम्, न तु निष्कृष्टेश्वररूपचैतन्योपादानत्व- निराकरणपरम्। तन्नैव प्रथमाध्यायान्ते जगद्ुपादानत्वस्य तत्पदार्थवृत्ति- स्वोक्ते। एवं च ईश्वरगतमपि कारणत्वं तदनुगतमखण्डच्ैतन्यं शाखा- चन्द्रमसमिव तटस्थतयोपलक्षयितुं शक्नोतीति तस्य ज्ञेयत्रह्मलक्षणत्वोक्ति- रिति मन्यन्ते।

उपादानकुक्षिमें भी प्रवेश प्राप्त है, उसके निरासके लिए संक्षेपशारीरककारका प्रयास है, न कि विम्वविशिष्ट चैतन्यरूप ईश्वर उपादान कारण नहीं है इस अभिप्रायसे। [अतः संक्षेपशारीरककारके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है। परन्तु संक्षेपशारीरकमें 'शवल चेतन * जगत्का उपादान नहीं है' इस प्रकार साक्षात् औपाधिक चेतनमें जगत्कारणताका निषेध करके 'शुद्ध न्रद् ही जगत्का उपादान है, क्योंकि शुद्ध न्रह्म ज्ञेयरूपसे उपन्यस्त है, ऐसा कहा गया है, अतः स्वारसिक अर्थको छोड़कर संक्षेपशारीरककारका स्वकपोलकस्पित विरुद्ध अर्थ कैसे करते हो? यदि कोई इस प्रकारकी शक्का करे, तो वह युक्त नहीं है,] क्योंकि संक्षेपशारीरकमें ही प्रथम अध्यायके अन्त्में 'जगत्की उपादानता तत्पदार्थ-ईश्वरमें है' ऐसा कहा गया है। इस परिस्थितिम-'अन्तस्तद्धर्मो- पदेशात' इत्यादि अधिकरणोंके पर्यालोचनसे अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप लक्षणके बिम्बभूत ईश्वरगत होनेपर ईश्वरमें रहनेवाली भी कारणता तटस्थरूपसे शाखास्थ चन्द्रमाके समान विम्न्रूपचैतन्यानुगत अखण्डचैतन्यकी उपलक्षण हो सकती है, अतः उसका ज्ञेय ब्रह्मके लक्षणरूपसे कथन (सूत्र और भाप्यमे)

*इस अभिप्रायका सूचक संक्षेपशारीरकका श्लोक देखिए- स्वात्मानमेव जगतः प्रकुर्ति यदेकम्, सर्गे विवर्तयति तन्र निमित्तभूतम्। कमाकलय्य रमणीयक्कपूयमिथरम, पश्यन्तृणां परिवृदं तदितीर्यमाणम् ॥५५०॥ सं० शा० अ. १] जो संसारकी उत्पत्तिमें एक चेतन निमित्तभूत है, वह प्राणियोंके पुण्य, पाप और मिश्र-इन त्रिविध कर्मोंका ठीक-ठीक आलोचन करता हुआ उनका ग्रहण करके तदनुसार स्वयं ही चेतनप्रकृतिरूप होकर मायासे जगदाकारेण विवर्तमान होता है, अतः वही सर्वज्ञ सर्वेशकि- आदि स्वभाववाला न्रह्म है और 'तद् व्रह्म' आदि वावय भी इसी लक्षणको कहकर ब्रह्ममें ही समन्वित होता है।

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ब्रंह्मकी कारणताकां विचार] भापानुवादसहित ६७:

ईश्वरो वियदादौ स्यात् जीवेशौ लिङ्गतद्गते। मायाSविद्याभिदावादाः केचिदेवं प्रचक्षते ।१९।। आकाश आदि महाभूतोंकी सृष्टिमें ईश्वर उपादान है और लिङ्गशरीर, लिङ्गस्थ धर्म और सुख आदिमें जीव और ईश्वर दोनों उपादान कारण हैं, इस प्रकार माया और अविद्यामें भेद माननेवालोंमें से कुछ लोग कहते हैं ॥। १९ ॥ वियदादिप्रपश्च ईश्वराथ्रितमायापरिणाम इति तत्रेश्वर उपादानम्। अन्तःकरणादिकं तु ईश्वराश्रितमायापरिणाममहाभूतोपसृष्टजीवाविद्याकृत- भूतसूक्ष्मकार्यमिति तत्रोभयोरुपादानत्वम्। अत एव 'एवमेवास्य परि- परिद्रष्टुरिमा: पोडश कलाः पुरुपायणा: पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति' इति श्ुतौ कलाशन्दवाच्यानां आणमनःप्रभृतीनां विदुपो विदेहकैवल्यसमये विद्यानिवर्त्या विद्याकार्याशा भिमायेण विद्ययोच्छेदो दर्शितः । 'गताः कलाः पश्चद्श प्रतिष्टाः' इति श्रुत्यन्तरे तदनिवर्त्यमायाकार्य-

है, [अतः 'जन्माद्यस्य' इत्यादि सूत्र और उसके भाष्यके साथ विरोध नहीं है] ऐसा विवरणके अनुयायियोंका मत है। आकाश आदि महाभूतप्रपञ्च ईधरमें रहनेवाली मायाका परिणाम है अतः आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चका उपादान है-ईश्वर। अन्तःकरण आदि प्रपश्च तो ईश्वराश्रित मायाके परिणामभूत आकाश आदि उपष्टम्भकलक्षण महाभूतोंसे संसृष्ट जीवकी अविद्यासे उत्पन्न हुए सूक्ष्म भूतोंका कार्य है, इसलिए ईश्वर और जीव दोनों अन्तःकरण आदिके उपादान कारण हैं। इसीसे अर्थात् जीवकी अविद्यासे परिणत सूक्ष्म भूत और उसके उपष्टम्मक मायाके परिणाम महाभूत उपादानरूपसे अन्तःकरण आदिमें प्रविष्ट होनेसे 'एवमेवाऽस्य०' (जैसे गङ्गा आदि नदियां समुद्रको प्राप्त कर उसमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही सर्वत्र आत्मभावको देखनेवाले इस विद्वान् पुरुपकी ये सोलह कलाएँ, जिनका चिदात्मा-पुरुष ही अधिष्ठान है, पुरुपको प्राप्त कर उसीमें लीन हो जाती हैं) इस श्रुतिमें विद्वान्के विदेहकैवल्य- समयमें विद्यासे नष्ट होनेवाली अविद्याके कार्यांशके अभिप्रायसे कलाशब्दसे कहे जानेवाले प्राण, मन आदिका पुरुपमें विद्यासे विनाश बतलाया गया है। 'गताः कलाः पश्चदश प्रतिष्ठाः' (पन्द्रह कलाएँ प्रतिष्ठाके-पृथ्वी आदि

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६८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

महाभूतपरिणामरूपोपष्टम्भकांशाभिप्रायेण तेपां स्वस्वप्रकृतिपु लयो दर्शित इति मायाऽविद्याभेदवादिनः । लिङ्गादौ जीव एवेति केचित्तत्रैकदोशिनः । महाभूतलयोक्तिस्तु कलानामन्यदृष्टितः ॥२०॥ माया और अविद्यामें भेद माननेवालोंमें से कुछ लोग लिङ्गशरीर और अन्तःकरण आदिका उपादान जीव ही है कलाओंकी महाभूतोंमें लयोक्ति तो तत्वज्ञानाकी हष्टिसे है, ऐसा कहते हैं ॥ २० ॥ यथा वियदादिप्रपश्च ईश्वराश्रितमायापरिणाम इति तत्र ईश्वर उपा- दानम्, तथाऽन्तःकरणादि जीवाश्रिता विद्यामात्रपरिणाम इति तत्र जीव एव उपादानम्। न चान्तःकरणादौ मायाकार्यमहाभूतानामप्यननुप्रवेशे उदाहृतश्रुति-

महाभूतोंके-प्रति गईं अर्थात् उनमें लीन हुई) इस प्रकारकी अन्य ्रुतिमें जीवकी विद्यासे निवृत्त न होनेवाली मायाके कार्य महाभूतोंका परिणारूप जो उपष्टम्भक अंश है, उसके आधारपर उन पश्चदश कलाओंका अपनी-अपनी प्रकृतिमें विलय बतलाया गया है, यह उन लोगोंका मत है, जो माया और . अविद्याको भिन्न-भिन्न मानते हैं। माया और अविद्याको भिन्न माननेवालोंमें से कुछ लोगोंका मत है कि जैसे आकाश आदि महाभूत प्रपञ्च ईश्वरकी आश्रित मायाका परिणाम है, अतः आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चमें ईश्वर उपादान है, वैसे ही अन्तःकरण आदि जीवकी आश्रित केवल अविद्याके परिणाम हैं, इसलिए उनमें जीव ही उपादान है, ईश्वर उपादान नहीं है। यदि कोई कहे कि मायाके कार्य जो महाभूत हैं, उनका अन्तःकरण आदिमें अनुप्रवेश न माना जाय, तो पूर्वमें उदाहृत दो श्रुतियोंकी व्यवस्था नहीं होगी, नहीं, व्यवस्था होगी, क्योंकि 'एवमेवास्य' इत्यादि प्राण, मन आदि कलाओंका विद्यासे उच्छेदबोधन करनेवाली जो श्रुति है, वह तत्त्व्विद्द्दष्टि- विषयक है अर्थात् आत्मतत्वको जाननेवाला जो पुरुष है, उसकी जो दृष्टि-तत्त्व- साक्षात्कार तद्विषयक है-पुरुषमें कलालयश्रुति साक्षात्कारके अभिप्रायसे है,

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मह्मकी कारणताका विचार] भापानुवादसहिंत ६९

'गताः कलाः' इति श्रुतिस्तु तच्वविदि म्रियमाणे समीपवर्तिनः पुरुपाः नश्यद्घटवत्तदीयशरीरादीनामपि भूम्यादिपु लयं मन्यन्ते इति तटस्थ- पुरुपप्रतीतिविपयेति व्यवस्थाया: कलालयाधिकरणभाष्ये स्पष्टत्वात्, इति मायाऽिद्या भेदवादिप्वेकदेशिनः॥ मायाSविद्येक्यवादेऽपि जीवताद/त्म्यदर्शनात्। जीव एव हि लिग्गादेरुपादानमिर्तीतरे ॥ २१ ॥ माया और अविय्याका अभेद मानने वालोंमें भी कुछ लोग अन्तःकरण आदिकी जीवके साथ तादात्म्यप्रतीति होनेसे अन्तःकरण आदिका जीव ही उपादान है, ऐस कहते हैं॥ २१ ॥

तदभेदवादिप्वपि केचित्-यद्यपि वियदादिप्रपश्चस्य इश्वर उपादानम्, तथाऽप्यन्तःकरणादीनां जीवतादात्म्यप्रंतीतेः जीव एचोपादानम्। अत एवाऽध्यासभाप्ये अन्तःकरणादीनां जीवे एवाऽध्यासो दर्शितः ।

यह भाव है। और 'गताः कलाः०' इत्यादि श्रुति तो तत्त्वज्ञानीके मर जाने- पर समीपस्थ पुरुष जैसे चूर्णावशेष घटका विनाश भूमिमं देखते हैं, वैसे ही उसके शरीर आदिका भूमि आदिमं लय मानते हैं। इस प्रकार तटस्थपुरुप- विषयक है, ऐसी व्यवस्था कलालयाधिकरणभाप्यमं स्पष्टरूपसे की गई है। माया और अविद्याको जो अभिन्न मानते हैं, उनमसे कुछ लोग कहते हैं-यद्यपि आकाश आदि महाभूतप्रपश्चका ईश्वर ही उपादान है, तथापि अन्तःकरण आदिमें जीवके तादात्म्यकी प्रतीति होनेसे उनका-अन्तःकरण आदिका-जीव ही उपादांन है। इसीसे अध्यासगाप्यमं अन्तःकरण आदिका जीवमें ही अध्यासभ्रम बत-

• गाया दी थविदा है और वह ईशवरकी उपाधि है अर्थात् मायाशचलित चतन्य ईश्वर है और प्रतिबिम्यभृत जीयोंकी उपाधियाँ अन्तःकरण हैं, इस रीतिसे माया और अविद्याको अभिजन मानकर व्यनस्था करनेवालोंमें से भी भेदवादियोंके समान कुछ लोग अन्तःकरण आदिमें जीवको उपादान मानते हैं। 'तदगेदवादिष्वपि' इसमें 'अपि' शब्दरो पूर्व मतके साथ किसी अंशमें समानता है, यद प्रतीत होता है और उस विशेपताका 'तथापि' प्रन्थसे स्पष्टीकरण होता है अर्थात् जैसे ईशवरमें रद्दनेवाली मायाके परिणामी होनेरे महाभूर्तोंके प्रति ईश्वर उपादान है वैसे दी माया और अविद्ाके अभिन्न दोनेसे अविद्यापरिणामी अन्तःकरण आदि भी ईश्वरा-

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७० सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

विवरणे च प्रतिकर्मव्यवस्थायां न्रह्मचैतन्यस्योपादानतया घटादिसद्गित्वम्, जीव चैतन्यस्य तदसङ्गित्वेऽप्यन्तःकरणादिसङ्गित्वं च वर्णितमित्याङ्कः॥

लाया गया है। और विवरणमें भी प्रतिकर्मव्यवस्थाके प्रतिपादक + अ्रन्थमें ब्रह्मके उपादान होनेसे ब्रह्मचैतन्यका घटके साथ तादात्म्य है, और घटादिके प्रति उपादान न होनेसे जीवका घटादिके साथ तादात्म्य न रहनेपर भी अन्तःकरण आदिके साथ जीवकी सङ्गिता-तादात्म्य है' इस प्रकार वर्णन किया गया है।

श्रित मायाके ही परिणाम हैं। अतः उनके प्रति ईश्वर ही उपादान क्यों न माना जाय ? इस प्रकारकी शङ्काका परिहार 'तथापि' इत्यादिसे किया गया है-'अहं काणः' (मैं काना हूँ) 'अहं कर्ता', (मैं कर्ता हूँ) 'अहं मूकः', (मैं मूक हूँ) और 'अहं स्थूलः' (मैं स्थूल हूँ) इत्यादि रूपसे शरीरके अन्दर रहनेवाले अन्तःकरण आदिका जीवके साथ तादात्म्य प्रतीत होता है, वह तभी उपपन्न हो सकता है, जव उनका जीवमें अध्यास माना जाय, ऐसा माननेपर तद्धिष्ठानत्वरूप उपादानत्व भी जीवमें ही है। + प्रतिकर्म-व्यवस्था-जीवके प्रति विषयव्यवस्थाका दिग्दर्शन करानेवाला विवरणग्रन्थका प्रकरण। माया और अविद्याका अमेद माननेमें विवरणकारने 'अन्न केचिदाहुः-अतोऽविद्यामयं वक्तव्यं न मायामयमिति' इत्यादि ग्रन्थसे लेकर 'इति युक्तं मायामयम्' यहां तक अनेक युक्तियों और प्रमाणोंका उपन्यास किया है। (पृ० २०७ कल० मुद्रित भामत्यादिटीकानव- कोपेत शाङ्रभाष्य) जानकारीके लिए उसमें से कुछ सारांश यहांपर देते हैं-माया और अविद्याका अभेद नहीं मान सकते, क्योंकि माया अपने आश्रयको मुग्ध नहीं करती और कर्ताकी इच्छाके अनुसार अनुवर्तन करती है। अविद्या वैसी नहीं है अर्थात स्वाश्रयको मुग्ध करती हुई कर्ताकी इच्छाके विरुद्ध प्रवृत्त होती है। और लोकमें अविद्या तथा मायाका अन्योन्य भेद प्रसिद्ध है? इस प्रश्नके उत्तरमें विवरणकार कहते हैं कि इनका भेद हम लक्षणके भेदसे या व्यवहारके भदसे नहीं कर सकते हैं, क्योंकि अनिर्वचनीयतया तत्वावभासप्रतिवन्घ विपर्ययावभासरूप लक्षण माया और अविद्यामें सामान्यरूपसे रहता ही है (लक्षणार्थ यह हुआ कि अनिर्वचनीय होकर यथार्थ वस्तुके परिज्ञानमें प्रतिवन्ध करे और विपरीत वस्तुका भान करे उसे अविद्या या माया कहते हैं)। और मायाशब्दका मन्त्र या औषध आदि सत्य वस्तुमें प्रयोग होता है, यह वात नहीं है, क्योंकि मिथ्यारूपसे देखे जानेवाली वस्तुमें भी माया शब्दका प्रयोग होता है। और समीपस्थ पुरुषको मन्त्र आदिका परिज्ञान भी नहीं है, अधिक क्या कहा जाय? मन्त्र आदिमें मायाशब्दका प्रयोग भी तो लोकमें देखा नहीं जाता और 'मायां तु प्रकृतिम्' (मायाको प्रकृति जानो ) इस श्रुतिमें मायाशब्दका प्रयोग प्रकृतिमें है। अतः प्रकृतिभूत माया और अविद्याके लिए एक ही लक्षण अवगत होता है। माया अपने आश्रयमें मोह नहीं करती और अविद्या करती है, इस प्रकार जो लक्षण-भेद कहा गया है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि मायाका आश्रय द्रष्टा माना जाय, तो वह सुग्घ होता ही है और यदि

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मस्मकी कारणताका विचार ] भापानुवादसहित ७१

इष्ट ईश उपादानं सर्वास्मिन् व्यावहारिके। प्रातिभासिककायें तु जीव इत्यपरे जगुः ॥२२॥

सम्पूर्ण व्यावददारिक पदार्थोंका उपादान ईश्वर है और प्रतिभासिक पदार्थोंका उपादान जीय है, ऐसा अन्य लोग कहते हैं।। २२ ।।

"एतस्माज्जायते प्राणो मनस्सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी" ॥

इत्यादिश्रुतेः कृत्सव्यावहारिकग्रपश्चस्य ब्रह्मैव उपादानम्। जीवस्तु प्रातिभासिकस्य स्वप्नप्रपश्चस्य च। 'कृत्स्प्रसक्तिनिरवयवत्वशब्दकोपो वा'

'एतस्माजयते०' (इस प्रकृत ईश्वररूप उपादानसे प्राण, मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज और सम्पूर्ण पदार्थोकी आधारभूत पृथ्वी उत्पन्न हुई) इत्यादि श्रुतिसे सम्पूर्ण व्यावहारिक घट आदि प्रपञ्चका व्रक्म ही उपादान कारण है और प्रातीतिक रवमके प्रपश्चोंका अर्थात् स्वम्न सृप्टिमें देखे जानेवाले प्रतीतिकालावस्थायी अ्रमात्मक पदार्थोका जीव ही उपादान कारण है, क्योंकि 'कृत्म पसक्तिर्निरवयत्वशव्दकोपो वा' * इस अधिकरणमें 'जगत्का उपादान

धर्सा माना जाय, तो उसके मायाची होनेसे उसमें व्यामोदका अभाव है, यद नहीं कद सकते। और इच्छाफे अनुवार माया कर सकते हैं और अविद्या नहीं कर सकते यह युक्ति भी भदमें नहीं दे सफते, कर्योंकि मन्त् और औषध आदिमें फर्ताका स्वातन्त्रय है, मायामें नहीं है अविय्यामे भी दिचन्द्र आदि श्रम फर्ताकी इच्छाके अधोन होते हैं। और शास्त्रीयव्यवद्वारसे भी माया एवं अविषाका भेद नदीं है, कर्योंकि 'भूयधान्ते विश्वमायानिधृत्तिः' इत्यादि श्रुतिसे गधार्थ जानसे निवर्त्य अविययामें मायाशब्दका प्रयोग होता है। 'तरत्यविर्यां वितर्ता हृदि गरि्मन्निषेशिते। गोगी मायाममेयाय तस्मे विद्यात्मने नमः ॥' इस क्षुतिमें भी माया और अविय्या- का सामानाधिकरण्से (एकार्थकत्वसे) निर्दय कर तत्त्वज्ञानसे तैरना बतलाया है। इसी प्रकार भगवान सून्नकारने 'मायामात्रन्तु कारत्स्येनाभिव्यकस्वरूपत्वात्' इस सुन्नमें स्व्प्नमें भी मायाशब्दका प्रयोग किया है। भाप्यकारने भी 'अविद्यामायाSविद्यात्मिका मायाशकि:' (अविद्या-माया से मायाशकि भी अविद्यारुप है) इस वाक्यसे माया और अविद्याका अभद दशाया है अतः यह स्पष हुआ कि गाया और अविद्याका अभेद है, भेद नहीं है। * 'कृस्न प्रस्वकिरनिसवयवत्वशव्दकोपो वा' इस सुन्नका अर्थ है, यदि व्रहाका सर्व अंशसे परिणाम माना जाय, तो कृत्स्नप्रसक्ति दोगी अर्थात् जैसे दधिके आकारसे परिणत दूधकी अपने स्वरूपसे दानि होती है, पैसे ही प्रदाकी अपने रूपसे हानि होगी। और एक देशसे

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७२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

(उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ७ सू० २६) इत्यधिकरणे ब्रह्मणो जगदुपादानत्वे तस्य कात्स्न्येन जगदाकारेण परिणामे विकाराति रेकेण ब्रह्माभावो वा, एकदेशेन परिणामे निरवयवत्वश्चुतिविरोधो वा प्रसज्यते इति पूर्वपक्षे 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' (उ० मी० अ० २ पा० १ सू० २८) इति सूत्रेण विवर्तवादाभिप्रायेण स्वप्नदृशि जीवात्मनि स्वरूपानुप- मर्दनेनाऽनेकाकारस्वाप्नप्रपश्चसृष्टिवत् ब्रह्मणि वियदादिसृष्टिरुपपद्यते इति सिद्धान्तितत्वादित्यन्ये।

ब्रम्म है' इस सिद्धान्तमें शङ्का की है कि क्या ब्रह्म सर्वाशसे जगदाकारमें परिणत होता है या एकदेशसे? प्रथम पक्षमें (जैसे दविरूपमें दूधके परिणत होनेसे दूध रहता ही नहीं है, वैसे ही) ब्रह्मके सर्वांशसे जगद्रूपमें परिणत होनेपर जगव्से पृथक ब्रह्मका अस्तित्व नहीं रहेगा; यदि द्वितीय पक्ष अर्थात् एकदेशसे ब्रह्मका परिणाम माना जाय, तो ब्रह्मके निरवयवत्वका प्रतिपादन करनेवाली ('अजो नित्यः शाश्वतो' (आत्मा उत्पन्न नहीं होता है, नित्य-अवयवरहित और सनातन है) इस श्रुतिके साथ विरोध होगा। अतः दोनों मार्गोसे ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं हो सकता है, इस प्रकार पूर्वपक्षके प्राप्त होनेपर + 'आत्मनि चैवं < विचित्राश्च हि' इस सूत्रसे विवर्तवादके अभिप्रायसे 'जैसे जीवके स्वरूपके बिगड़े बिना ही स्वम् देखनेवाले जीवात्मामें अनेक आकार-प्रकारवाली स्वम्न पदार्थोंकी सृष्टि बनती है, वैसे ही ब्रह्मके स्वरूपमें कुछ भी विकृति न होकर आकाश आदि प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है' इस प्रकारका सिद्धान्त किया गया है, ऐसा भी कुछ लोगोंका मत है।

परिणाम माना जाय, तो निरवयत्वशब्दकोप होगा अर्थात् ब्रह्मकी निरवयताका प्रतिपादन करने- वाली श्रुतिके साथ विरोध होगा। + आत्मनि चवं विचित्राश्च हि। इस सूत्रमें प्रथम 'च' शब्दका अर्थ यथा (जैसे) है और द्वितीयका अर्थ तथा (वैसे ही) है और 'हि' शब्द हेतु अर्थमें है। इसलिए जैसे आत्मनि-स्वप्नद्रष्टा जीवमें विचित्र-विलक्षण रथ आदि सृष्टि प्रतीत होती है, और उसके स्वरूपका विनाश नहीं होता है, क्योंकि स्वप्नावस्थाकी निवृत्तिके वाद भी साक्षीरूपसे जीव चैतन्य पूर्ववत् ही रहता है, वैसे ही ब्रह्ममें भी स्वरूपविनाशके विना विचिन्न आकाश आदि . सृष्टि उत्पन्न होती है।

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ब्रह्मकी कारणताका विचार] भापानुवादसहित ७३

स्वात्ममोहात् समस्तस्य सेश्वरस्य प्रकल्पकः । स्वप्नवज्जीव एवैको नापरोऽस्तीति केचन ।। २३॥। केवल एक जीव ही अज्ञानसे स्वप्न पदा्थोंके समान ईश्वरसहित इस सब प्रपञ्नका कारण है, दूसरा कोई कारण नहीं है, ऐसा कुछ लोगोंका मत है॥ २३ ॥ जीव एव स्व्मद्रष्टृवत् स्वस्मित्नीश्वरत्वादिसर्वकल्पकत्वेन सर्वकारणम् इत्यपि* केचित् ॥ ४ ॥

स्वमद्रष्टाके समान अपनेमं ईश्वरत्व आदि सभी वस्तुओंकी कल्पना करनेके कारण जीव ही सबके प्रति उपादान कारण है, यह भी कुछ लोगोंका मत है। भाव यह है कि पूर्वग्रन्थम जगत्का शुद्ध त्रम्म उपादान है या ईश्वररूप ब्रह्म उपादान है या जीवरूप त्रवा उपादान इस प्रकार तीन विकल्प किये गये हैं, उनमें से तृतीय पक्षको लेकर कहते हैं-जीव ही उपादान है अर्थात् अवच्छेद या प्रतिविम्बवादकी अपेक्षा न करके परिपूर्ण चिदात्मा ही अविद्यासे जीवभावको प्राप्त होकर अपनेको समीका ईश्वर मानता हे अर्थात् 'में ही ईश्वर हूँ' इस प्रकार कल्पना करता है, अनन्तर अपनेसे गगन आदिकी उत्पचिकी कल्पना करता है और अपने आप अपनेसे ही कल्पत ईश्वरका भेद और उससे 'मैं नियम्य हूँ' इस प्रकार कल्पना करता है, इसी रीतिसे मनुप्य आदिभावकी क्रमसे कल्पना करता है। जैसे 'आकाश आदि प्रपश्व व्यवहारमें सत्य है और स्वमन्नपञ्च प्रातीतिक है' इस पक्षमें स्वनका द्रष्टा जीव ही-(स्वममें) देवादिभावसे, उसके नियन्ता परमेश्वररुपसे और उससे में भिन्न हैं-इत्यादिरूपसे अपनी कल्पना करता है, वसे ही दृष्टिसष्टिपक्षम श्रद्धा रखनेवाले कुछ महाजन अपने आपमें सब प्रपश्चकी कल्पना करनेवाला जीवस्वरूपापन्न न्रद्ा ही जगत्का उपादान है, ऐसा स्वीकार करते हैं।। ४ ॥

यहाँ इसतव्यवशेष यह है कि इस पक्षमें अर्थात् जीवभावापन वढ्मा जगत्का उपादान है, इस पक्षमें जीवसे इतर ईशवर रहेगा नहीं, इससे एक तो इश्वरके अस्तित्वका प्रतिपादन करनेवाली तथा गव जीवोंके नियन्ताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके साथ एवं इसीके समर्थक सूत्र और स्मृतियों के साथ विरोध प्रमक होगा, दूगरा बन्ध और मोक्ष-व्यवस्था भी अस्तंगत रोगी, इसलिए यह पक्ष असारत है और यह भाव 'इत्यपि' इसके अपि शब्दसे सुस्पष्ट विदित भी होता है, अतः ईश्वररूप न्रदा ही जगत्का उपादान है यही पक्ष निदष्ट है, ऐसा प्रतीत होता है।

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७४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

अहेतुत्वादमायस्य मायाशवलतेष्यते।

मायासे रहित शुद्ध ब्रह्म उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए (ब्रह्ममें) माया- शबलता मानी जाती है और वह माया भी उपादान ही है, ऐसा तत्त्वनिर्णयकारका मत है॥ २४ ॥ अथ 'मायां तु प्रकृति विद्यात्' इति श्रुतेः, मायाजाड्यस्य घटा- दिष्वनुगमाच्च माया जगदुपादानं प्रतीयते, कथं ब्रह्मोपादानम्?। अत्राऽडहुः पदार्थतत्च्वनिर्णयकारा :- ब्रह्म माया चेत्युभयमुपादानमित्यु- भयश्रुत्युपपत्तिः, सत्ताजाड्यरूपोभयधर्मानुगत्युपपत्तिश्र। तत्र ब्रह्म विवर्त- मानतयोपादानम्, अविद्या परिणममानतया। यहाँपर यह शङ्का होती है कि 'ब्रह्म जगत्का उपादान है' यह नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'मायान्तु प्रकृति'० (माया ही जगत्की प्रकृति-उपादान है, ऐसा जानो) इस प्रकारकी मायामें ही उपादानत्वकी प्रतिपादिका श्रुति है और [जैसे घट आदिमें उपादानभूत मृत्तिकाके शलक्ष्णत्व आदि धर्मोंका अनुस्यूतरूपसे भान होता है, वैसे ही ] घट आदि समस्त प्रपञ्चमें मायामें रहनेवाले जडत्व धर्मका अनुस्यूतरूपसे भान होता है, अतः माया जगत्की उपादान है, ऐसा प्रतीत होता है। [यद्यपि अनेक श्रुतियोंके आधारपर पीछे ब्रह्मकी उपादानताका दिग्दर्शन कराया गया है, तथापि निरवयव ब्रह्ममें मृत्तिका आदिके समान परिणामी उपादानता नहीं हो सकती है, यदि ब्रह्मको विवर्तोपादान कहें तो भी जसे परिणामी उपादान लोकमें देखे जाते हैं, वैसे विवर्तके अधिष्ठानमें उपादानत्वकी प्रसिद्धि लोकमें नहीं है, अतः ऐसे पदार्थोंमें उपादानत्वका स्वीकार करना केवल स्वकीय-कपोलकल्पनासे परिभाषा वांधना- मात्र है, ऐसा आक्षेपकर्ताका प्रकृतमें अभिप्राय है ]। इस परिस्थितिमें पदार्थतत्त्वनिर्णयकार उत्तर कहते हैं-ब्रह्म और माया दोनों ही जगत्के प्रति उपादान हैं; इसलिए माया और ब्र्ममें उपादानत्वकी प्रतिपादिका दोनों श्रुतियोंकी युक्तार्थता है और (घट आदिमें भासनेवाले) सत्ता और जड़ता दोनों ध्मोंके अनुगमकी भी उपपत्ति हो सकती है। इसमें विशेषता यह है कि ब्रह्म विवर्तमानरूपसे उपादान है और माया परिणाम- रूपसे उपादान है।

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मायाकी कारंणताका विचार ] भापानुवादसहित

न च विचर्ताधिष्ठाने पारिभापिकमुपादानत्वम्। स्वरात्मनि कार्यजनि- हेतुत्वस्योपादानलक्षणस्य तत्राऽप्यविशेपादिति। केचित् उक्तामेव प्रक्रियामाश्रित्य विवर्तपरिणामोपादानद्वयसाधारण- मन्यल्लक्षणमाहु :- स्वाभिन्नकार्यजनकत्वमुपादानत्वम्। अस्ति च प्रपश्चस्य

और. पूर्वमें यह जो कहा गया है कि विवर्तके अधिष्ठानमें पारिभापिक उपादानत्व है, यह भी नहीं है, क्योंकि 'स्वात्मनि कार्यजनिहेतुत्वरूप उपादानका लक्षण है, वह [मृत्तिका आदि उपादानमें जैसे रहता है, वैसे ही ] विवर्तके अघिष्ठानमें भी रहता ही है। ['स्वात्मनि' इत्यादि उपादानके लक्षणमें प्रविष्ट स्वशव्दसे उपादानरूपसे अभिमत जो वस्तु हो उसका ग्रहण करना चाहिए, अतः लक्षण-समन्वय यों करना चाहिए-स्वपदसे मृत्तिकाका ग्रहण हुआ, उसमें घटरूपकार्यकी उत्पचिकी हेतुता है, इसलिए घटकी कारण मृत्तिकामें उपादानता है। वरक्षमें भी वियदादिसृष्टिकी हेतुता होनेसे उपादानका उक्त लक्षण घट जाता है ]। कुछ लोग इसी प्रक्रियाके आधारपर विवर्त और परिणाम दोनों उपादानोंमें समानरूपसे लागू होनेवाला अन्य लक्षण कहते हैं कि स्वाभिन्नकार्यजनकत्व ही उपादानत्व * है अर्थात् उपादानसे अभिन्न जो कार्य उसकी उत्पत्तिका जो हेतु

  • इस लक्षणमें स्वशव्दसे परिणामी-उपादानत्वसे विवक्षित मृत्तिका, अज्ञान आदिका और विवर्तीपादानत्वसे विवक्षित जसका ग्रहण होता है, मृतिकारूप उपादान और घटका परस्पर अभेद है दो, क्योंकि 'घट मृतिका ही है' इस प्रकार अभेद प्रतीत होता है। परन्तु इस परिस्थितिमें एक विचार अवश्य होता है कि 'मृत्तिका घट है' या 'तन्तु पट है' इस प्रकार जैसे अभेदप्रत्यायक प्रतीति हुआ करती है, वसे 'घट ब्रह्म है' 'पट ब्रह्म है' या 'अज्ञान घट है' इस प्रकार मदा और अज्ञानका घटादिसे अभेद सिद्ध होनेके लिए लौकिक व्यवहार नहीं दोता, अतः म्रदा या अज्ञानरूप उपादानसे घटादि प्रपमका अभेद कैसे मान सकते हैं? इख राझके परिदवारमें यों कहा जाता है-यद्पि ब्रह्म और अज्ञानके साथ प्रपथ्वका अभेद ब्रह्मत्व या अज्ञानत्वरूपसे व्यवहत नहीं होता है, तो भी सत्त्व और जउत्वरूप धर्मोंसे, जो ब्रह्म और अज्ञानके धर्म है, 'सन् घटः' 'जयो घटः' इस प्रकार न्रम्म और अज्ञानका प्रपथ्वके साथ अभेद भासता है। सर्व और जदत वरदा तथा अज्ञानके धर्म हैं इसमें श्षुतिरूप प्रमाण भी है 'सदेव' (अ्रदा यत् ही है) 'तदेतजयं मोदात्मकम्' (वद्द अज्ञान जद और मोहात्मक है) इसी गूढ़ अभिप्रायका सूचन करनेके लिए मूलमें 'सदूपेण' यह बदाका विशेषण और 'जडेन' यह अज्ञान- का विशेषण दिया गया है।

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७६ सिद्धान्तलेशसंग्रंह [प्रथम परिच्छेद

सद्रूपेण ब्रह्मणा विवर्तमानेन जडेनाऽज्ञानेन परिणामिना चाडभेद 'सन् घटः, जडो घटः' इति सामानाधिकरण्यानुभवात्। न च 'तद्नन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' (उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४) इति सूत्रे 'अनन्यत्वं व्यतिरेकेणाऽभावः' 'न खल्व- नन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु १ भेदं व्यासेधामः' इति भाष्यभामतीनि- बन्धनाभ्यां प्रपश्चस्य ब्रह्माभेदनिपेधादभेदाभ्युपगमे अपसिद्धान्त इति वाच्यम्, तयोरन्रह्मरूपधर्मिसमानसत्ताकाभेदनिपेधे तात्पर्येण शुक्तिरजत- योरिव प्रातीतिका भेदाभ्युपगमेऽपि विरोधाभावादिति।

हो, वही उपादान है। सदूरूप विवर्तमान ब्रह्मके साथ तथा परिणामी जड़रूप अज्ञानके साथ प्रपञ्नका अभेद भासता है, क्योंकि 'सन् घटः' और 'जडो घंटः अर्थात् घटमें सच्ाका और जड़ताका अनुभव होता है। अब शङ्का होती है कि * 'तदनन्यत्वमारम्भणशव्दादिभ्यः' इस सूत्रमें अनन्यत्वका अर्थ है-'कारणसे पृथक कार्यका न रहना' 'अनन्यत्वशव्दका अर्थ हम अमेद नहीं करते हैं, परन्तु भेदका निषेध करते हैं' इस प्रकार भाष्य और भामती अन्थसे ब्रह्म और प्रपश्चके अभेदका निषेध किया गया है, अतः यदि प्रपञ्च और ब्रह्मका परस्पर अभेद माना जाय, तो अपसिद्धान्त होगा, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन निबन्धोंका ब्रह्मरूपधर्मीके समान- सचावाले अभेदके निषेधमें तात्पर्य है, अर्थात् पारमार्थिक अभेदके निषेधमें अभिप्राय है, अत एव जैसे शुक्ति और रजतमें प्रातीतिक अभेदके स्वीकारमें विरोध नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी प्रातीतिक अमेदके स्वीकरणमें कोई विरोध नहीं है।

*इस सूत्रका अर्थ है-तदनन्यत्वम्-तयोः-कार्यकारणयोः अनन्यत्वम्-उन कार्य और कारणका अनन्यत्व है, क्योंकि आरम्भण आदि श्रुतियाँ, इस अर्थका प्रतिपादन करती हैं। आरम्भणशब्दसे 'वाचारम्भण' श्रुति ली जाती है और आदि शब्दसे 'आत्मैवेदं सर्वम्' 'नेह नानास्ति किन्चन' इत्यादि श्रुतियोंका संग्रह करना चाहिए। भाव यह हुआ कि कार्य और कारण तत्त्वान्तर माने जायँ, तो जगत्कारण ब्रह्ममें सर्वात्मत्वकी प्रतिपादिका ्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। अतः अनन्यत्व मानना चाहिए।

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मायाकी कारणताका विचार ] भापानुवादसहित ७७

न्रह्ममान्नमुपादानं माया तु द्वारकारणम्। सृच्छृक्ष्णतावत् संक्षपशारीरककृतां नये ॥ २५॥ संक्षेपशारीरककारके मतमें केवल व्रहा जगत्के प्रति उपादान है और माया तो जैसे घट आदिके प्रति मृत्तिकाका क्रष्णत्व द्वार कारण है, वैसे ही द्वार कारण है।। २५ ॥। सङ्क्षेपशारीरककृतस्तु -- त्रह्रौवोपादानम्। कूटस्थस्य स्वतः कारण- त्वानुपपत्तः माया द्वारकारणम्। अकारणमपि द्वारं कार्येऽनुगच्छति।

न्रह्म ही जगत्का उपादान कारण है, माया उपादान कारण नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं, कृटस्थ ब्रह्ममें स्वतः कारणताकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः माया द्वार कारण है। [भाव यह है कि यदि मायाके बिना ही न्दा जगत्के प्रति उपादान कारण हो, तो माया व्यर्थ होगी और ब्रम्म स्वयं परिणामी होगा, इस परिस्थितिमं परिणामवादियोंके मतमें परिणाम और परिणामीका परस्पर वस्तुसत् अमेद होनेसे परिणामके जन्म आदि विकारोंसे जरहा भी विकृत होगा, और इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं, क्योंकि 'न जायते' (आत्मा उत्पन्न नहीं होता) इस प्रकार अनेक श्रुतियोंके साथ

#संक्षेपशारीरककार कूटस्थ ब्रह्मको जगत्के प्रति उपादान मानते हैं, इसके सविशेष दटीकरणमें उन्हींके दो श्लोक देते हैं- उपादनता चेतनस्याऽपि टष्ट यथा स्वप्रसर्गे विचिन्न प्रतीचः । यथा चोर्णनाभस्य सुन्नेपु पुंरसा यथा केशलोमादिसृष्टी च दृषा॥ [संक्षेपशा० १ अ० शो० ५४५] अज्ञानतजघटना चिदधिकियायाम द्वार परं भवति नाधिकृतत्वमस्याः । नाचेतनस्य घटतेऽधिकृति: कदाचित् कर्तृत्वशककिविरहादिति वक्ष्यते हि॥ [संक्षेपशा० १ अ०शो० ५५५] अर्थात्-जसे विचिन्न स्वप्नसष्टिमें निद्रासे तिरस्कृत-अभिभृत है करणसमुदाय जिसका ऐंसा प्रत्यगात्मा उपादान है, और जैसे ऊर्गनाभ उसके सूत्रोंके प्रति उपादान है अथवा जैसे केश, लोम आदिमें पुरुष उपादान है, वैरे ही कूटस्थ चेतन भी उपादान है। अविद्या और उसके कार्यका अध्यास वरदाकी अधिकारितामें अर्थात् जगत्के प्रति ब्रह्ामें उपादानत्वके सम्पादनमें निमित्तमान्र हे, क्योंकि अचेतनकी अध्यासगें अधिकारिता नहीं है, कारण कि उसमें कर्तृत्वशक्तिका अगाव दे, ऐसा कदेंगे। और ५५३ के 'अनधिकारिणि शुद्धचिदात्मके' इत्यादिमें भी 'माया बरहाकी अधिकारिताकी सम्पादिका है' ऐसा कहा गया है। इससे स्पष्ट रीतिसे ज्ञात होता है कि संक्षपशारीरककारने गूलोक विपयका अत्यन्त विस्तारसे अपने अ्रन्थमें विवेचन किया है।

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७६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथंम परिच्छेद

सद्रूपेण ब्रह्मणा विवर्तमानेन जडेनाऽज्ञानेन परिणामिना चाडभेद: 'सन् वटः, जडो घटः' इति सामानाधिकरण्यानुभवात्। न च 'तद्नन्यत्वमारम्भणशव्दादिभ्यः' (उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४ ) इति सूत्रे 'अनन्यत्वं व्यतिरेकेणाभावः' 'न खल्व- नन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु! भेदं व्यासेधामः' इति भाष्यभामतीनि- वन्धनाभ्यां प्रपश्चस्य व्रह्माभेदनिषेधादभेदाभ्युपगमे अपसिद्धान्त इति वाच्यम्, तयोर्न्रह्मरूपधामेसमानसत्ताकाभेदनिषेधे तात्पर्येण शुक्तिरजत- योरिव प्तीतिका भेदाभ्युपगमेऽपि विरोधाभावादिति।

हो, वही उपादान है। सदरूप विवर्तमान ब्रह्मके साथ तथा परिणामी जड़रूप अज्ञानके साथ प्रपश्चका अभेद भासता है, क्योंकि 'सन् घटः' और 'जडो घटः' अर्थात् घटमें सत्ताका और जड़ताका अनुभव होता है। अव शक्का होती है कि 'तदनन्यत्वमारम्भणशव्दादिभ्यः' इस सूत्रमं अनन्यत्वका अर्थ है-'कारणसे पृथक् कार्यका न रहना' 'अनन्यत्वशव्दका अर्थ हम अमेद नहीं करते हैं, परन्तु भेदका निषेध करते हैं' इस प्रकार भाष्य और भामती अ्न्थसे ब्रह्म और प्रपश्चके अभेदका निषेध किया गया है, अतः यदि प्रपश्च और ब्रह्मका परस्पर अमेद माना जाय, तो अपसिद्धान्त होगा, परन्तु यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन निवन्धोंका न्रह्मरूपघर्मीके समान- सत्तावाले अमेदके निषेधमें तात्पर्य है, अर्थात् पारमार्थिक अभेदके निषेघमें अभिप्राय है, अत एव जैसे शुक्ति और रजतमें प्रातीतिक अमेदके स्वीकारमें विरोध नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी प्रातीतिक अमेदके स्वीकरणमें कोई विरोध नहीं है।

*इस सूत्रका अर्थ है-तदनन्यत्वम्-तयोः-कार्यकारणयोः अनन्यत्वम्-उन कार्य और कारणका अनन्यत्व है, क्योंकि आरम्भण आदि श्रतियाँ, इस अर्थका प्रतिपादन करती हैं। आरम्भणशब्दसे 'वाचारम्भण' श्रुति ली जाती है और आदि शव्दसे 'आत्मैवेदं सर्वम्' 'नेह नानास्ति किश्वन' इत्यादि श्रुतियोंका संग्रह करना चाहिए। भाव यह हुआ कि कार्य और कारण तत्त्वान्तर माने जायँ, तो जगत्कारण व्रह्ममें सर्वात्मत्वकी प्रतिपादिका श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। अतः अनन्यत्व मानना चाहिए।

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मायाकी कारणतांका विचार ] भापानुवादसहित ७७

ब्रह्ममात्रमुपादानं माया तु द्वारकारणम्। सृच्छृक्ष्णतावत् संक्षपशारीरककृतां नये॥२५॥ संक्षेपशारीरककारके मतमें केवल व्रह्म जगत्के प्रति उपादान है और माया तो जैसे घट आदिके प्रति मृत्तिकाका श्लक्ष्णत्व द्वार कारण है, वैसे ही द्वार कारण है॥ २५ ॥ सङक्षेपशारीरककृतस्तु-त्रह्मैयोपादानम्। कूटस्थस्य स्वतः कारण- त्वानुपपत्तः माया द्वारकारणम्। अकारणमपि द्वारं कार्येऽनुगच्छति।

न्रह्म ही जगत्का उपादान कारण है, माया उपादान कारण नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं, कृटस्थ ब्रह्ममें स्वतः कारणताकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः माया द्वार कारण है। [भाव यह है कि यदि मायाके बिना ही त्रह्म जगत्के प्रति उपादान कारण हो, तो माया व्यर्थ होगी और ब्रह्म स्वयं परिणामी होगा, इस परिस्थितिमें परिणामवादियोंके मतमें परिणाम और परिणामीका परस्पर वस्तुसत् अमेद होनेसे परिणामके जन्म आदि विकारोंसे ब्रह्म भी विकृत होगा, और इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं, क्योंकि 'न जायते' (आत्मा उत्पन्न नहीं होता) इस प्रकार अनेक श्रुतियोंके साथ

*संक्षेपशारीरककार कूटस्थ ब्रह्मको जगत्के प्रति उपादान मानते हैं, इसके सविशेष दढीकरणमें उन्हींके दो ग्लोक देते हैं- उपादनता चेतनस्याऽपि दृष्टा यथा स्वप्सर्गे विचित्रे प्रतीचः । यथा चोर्णनाभस्य सून्नेपु पुंसा यथा केशलोमादिसटी च दषा॥ [संक्षेपशा० १ अ० शो० ५४५] अज्ञानतज्घटना चिद्धिक्रियायाम् द्वारं परं भवति नाधिकृतत्वमस्याः। नाचेतनस्य घटतेऽधिकृतिः कदाचित् कर्तृत्वशक्किविरहादिति वक्ष्यते हि॥ [संक्षेपशा० १ अ० श्ो. ५५५] अर्थात्-जैसे विचिन्न स्वप्नसटष्टिमें निद्रासे तिरस्कृत-अभिभूत है करणसमुदाय जिसका ऐसा प्रत्यगात्मा उपादान है, और जैसे ऊर्गनाभ उसके सून्नोंके प्रति उपादान है अथवा जैसे केश, लोम आदिमें पुरुप उपादान है, वैसे ही कूटस्थ चेतन भी उपादान है। अविद्या और उसके कार्यका अध्यास ब्रह्मकी अधिकारितामें अर्थात् जगत्के प्रति ब्रह्ममें उपादानत्वके सम्पादनमें निमित्तमात्र है, क्योंकि अचेतनकी अध्यासमें अधिकारिता नहीं है, कारण कि उसमें कर्तृत्वशक्तिका अभाव है, ऐसा कहेंगे। और ५५३ के 'अनधिकारिणि शुद्धचिदात्मके' इत्यादिमें भी 'माया ब्रह्मकी अधिकारिताकी सम्पादिका है' ऐसा कहा गया है। इससे स्पष्ट रीतिसे ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरककारने मूलोक्त विषयका अत्यन्त विस्तारसे अपने प्रन्थमें विवेचन किया है।

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७८ सिद्धान्तलेश संग्रहं [प्रथम परिच्छेदं

मृद इव तद्गतश्लक्ष्णत्वादेरपि घटे अनुगमनदर्शनादित्याङुः । न्रह्ैव जीवाश्रितयाSविद्यया विपयीकृतम्। वाचस्पतिमते हेतुर्माया तु सहकारिणी ॥२६॥

वाचस्पतिमिश्रके मतमें जीवाश्रित अविद्यासे विषयीकृत व्रद्ा ही जगत्के प्रति उपादान है और माया तो सहकारी कारण है॥ २६ ॥

विरोध होगा, कारण कि उन श्रुतियों द्वारा ब्रह्ममं नित्यत्व, अविकारित्व आदिका प्रतिपादन किया गया है। अतः मायाके द्वारा ही त्रह्म कारण है, ऐसा कहना चाहिए, अतः माया व्यर्थ भी नहीं है। जैसे घटादिके प्रति मृद् आदिके उपादान होनेपर भी मृत्तिकामें रहनेवाला ऋक्ष्णत्व आदि संस्कार द्वारकारण हैं, क्योंकि जव तर्क मृत्तिकाका संस्कार न किया जाय, तव तक मृत्तिकामें घटादिकी उपादानता नेहीं घट सकती है, वैसे ही कूटस्थ चैतन्यरूप ब्रह्ममें आरोपित माया उसमें (न्रह्ममें) जगत्पकृतित्वका सम्पादन करके सहकारिकारण बन जाती है। मायामें उपादानत्वकी प्रतिपादिका 'मायान्तु प्रकृति विद्यात्' इत्यादि श्ुतिके साथ विरोध मी नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंका तात्पर्य यह है कि माया ही न्रक्ममें प्रकृतित्वका निर्वाह करती है, अतः उसमें प्रकृतित्वका केवल उपचार है। इसीलिए मायामें शक्तित्वका व्यवहार होता है-'पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' (इस ब्रह्मकी अनेक परा शक्तियाँ हैं) और सृतिकामें रहनेवाली शक्तिमें घटादिके प्रति उपादानता लोकमें नहीं देसी जाती है। अतः माया और ब्रह्म दोनोंमें उपादानता नहीं है। इस मतमं परिणामी उपादान कोई नहीं, होगा यदि ब्रह्ममें वैसी उपादानता मानी जाय, तो सकड़ों श्रुतियोंके साथ विरोध होगा, इसलिए वाचस्पतिमतके समान चित्में अध्यस्तमाया- विषयीकृत व्रह्मका प्रपश्च विवर्त है, यही इस मतमें मानना होगा, संक्षेप- शारीरकमें कहींपर मायामें परिणामित्वका कथन किया गया है, वह अन्य मतोंके अभिप्रायसे किया गया है, यह ध्यानमें रखना चाहिए ]। अकारण भी द्वार- कार्यमें अनुस्यूत होता है। जैसे कि मृत्तिकाके समान मृत्तिकामें रहनेवाले श्ृक्ष्णत्व आदिका भी घटमें अनुगम होता है, यह देखा जाता है। अतः मायाकी जड़ताका घटादिमें भान होता है।

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मायाकी कारणताका विचार ] भापानुवादसहित ७९

वाचस्पतिमिश्रास्तु -- जीवाश्रितमायाविपयीकृतं ब्रह्म 'स्वत एव जाड्या श्रयप्रपश्चाकारेण विवर्तमानतयोपादानमिति माया सहकारिमात्रम्, न कार्यानुगतं द्वारकारणमित्याहुः।

वाचस्पतिमिश्र, कहते हैं कि जीवकी आश्रित मायासे विपयीकृत ब्रह्म ही ir स्वयं जाड्यका आश्रयीभूत अर्थात् जड़ प्रपश्चके आकारसे विवर्तमानरूपसे उपादान है, अतः माया सहकारी कारण ही है। कार्यानुगत द्वारकारण नहीं है *।

• वाचस्पतिमिथके उक्त मतमें एक विचार उपस्थित होता है कि अक्षरब्राह्मणमें आकाश- शब्दसे कहलानेवाली मायाका अक्षरशब्दये वाच्य नित्य चैतन्य रूप व्रह्म ही आश्रय माना गया है, इसलिए उसका (मायाका) जीव आश्रय है, यह कहना अत्यन्त विरुद्धसा ज्ञात होता है और 'मायिनं तु महेखरम्' (महेश्वरको मायाका आश्रय जानो) इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुतियाँ मायाके नंसाश्रितत्वमें प्रमाण हैं जीवाधितत्वमें प्रमाण नहीं, अतः उभयता यह मत असन्ञत है, दूसरी बात यद है कि जीव के मायाश्रय होनेपर जीवमें जगदुपादानत्वका प्रसभ्ग आवेगा अ्रक्षमें नहीं आवेगा। अपि च यदि माया ब्रदाकी उपाधि न हो, तो व्रह्म नियन्ता भी कैसे दोगा? इसपर वाचस्पतिमिश्रके अनुयायियोंका कहना है कि जीवाशितत्वपदसे जीवर्वविशिष्ट नतन्याधितत्व विवक्षित नहीं है, परन्तु अक्षरव्राहाणके अनुरोधसे चतन्याशितत्व ही विक्षित दे। और मायापदसे वेदनीय अविद्याकी चैतन्यधृत्तिमें जीवत्वका अवच्छेदकरूपसे भान होता है, अतः मायामें जीवाधितत्वका कथन है और 'निरवद्यं निरअनम्' इत्यादि ध्रुतिसे ब्रह्मके निर्गुणत्यका ज्ञान होनेसे उसे अविदाश्रय मानना विरुद्ध दी है 'मायिनं तु महेश्वरम्' इत्यादि शुतिका माया और न्रम्मका परस्पर विपयविपयिभावरूप सम्बन्धके बोध करनेमें तात्पर्य है। प्रपथका उपादान जीव होगा, यद आपत्ति भी वन्ध्यापुन्रके समान मिथ्या है, क्योंकि समस्त प्रपण जीयाधितमायाविपयीकृत बदाका विचर्त है, ऐसरा स्वीकार करनेसे जीवमें जगत्की उपादान- कारणताफी प्रमकि नहीं होगी। व्रदामें वस्तुतः उपाधिका सम्पर्क न होनेपर भी सर्वनियन्तृत्व आदिफी-जीनकी अविद्यासे विपयीकृत वके विवर्तरूपसे-ब्रह्मधर्मसे कल्पना की जाती है, इसलिए जीयाविद्याविपयीकृत व्रदा दी प्रपभाकारसे विवर्तमान होता है, इसमें कोई दोप नहीं है। आरम्भणाधिकरणके भाष्यमें 'मूलकारणमेव ...... नटवत्सर्वव्यवद्दारास्पदत्वं प्रतिपथ्यते' नटके दटान्तसे वाचस्पतिमिश्रफा यद मत जञात होता हे, इसीलिए कल्पतरुमें कहा गया है कि- स्वशस्या नटवद ब्रम्म कारणं शहरोऽन्रवीत्। जीवध्रान्तिनिमिंतं तद् धभापे भामतीपतिः । अज्ञातं नटयद् वदा कारणं शक्करोऽत्रवीत्। जीवाज्ञानं जगद्वीजं जगी वाचस्पतिस्तथा ॥ अर्थात् जैसे दषाओंसे अविज्ञात है रूप जिसका ऐसा नट उन-उन अभिनयोंको, जो वस्तुतः सत्य नहीं है, प्राप्त दोता है, वैसे दी जीवों द्वारा अज्ञातस्वरूप बरढ्ा द्ी अस्त्य

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८० सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम परिच्छेद

अपूर्वानपरं ब्रह्म नोपादानं जगात्स्थितेः । माया तु मुख्योपादानमिति मुक्तावलीकृतः ॥ २७ ॥ कार्य कारणसे रित ब्रद्मा जगत्के प्रति उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए माया ही सुख्य कारण है, ऐसा सिद्धान्त सुक्तावलीकार कहते हैं॥ २७ ॥ सिद्धान्तमुक्तावलीकृतस्तु -- मायाशक्तिरेवोपादानं न त्रह्म 'तदेतद्" ब्रह्मापूर्वमनपरमवाह्यम्' 'न तस्य कार्य करणं च विद्यते' इत्यादिश्रुतेः जगदुपादानमायाधिष्ठानत्वेन उपचारादुपादानम्, तादृयमेवोपादानत्वं लक्षणे विवक्षितमित्याहुः ॥५॥

मायाशक्ति ही उपादान है ब्रह्म उपादान नहीं है, क्योंकि 'तदेतत्०' (प्रकृत वुद्धि आदिका साक्षीरूप ब्रह्म कारण नहीं है, कार्य नहीं है और वाह नहीं है) 'न तस्य०' (उसका अर्थात् ब्रह्मका कोई कारण और कार्य नहीं है) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्ममें उपादानताका निषेध किया गया है। और ब्रह्ममें जो उपा- दानताका व्यवहार होता है, वह तो केवल जगत्की उपादान मायाके अधिष्ठान होनेसे औपचारिक व्यवहार होता है। इसीलिए जगदुपादानमायाघिष्ठानत्व ही उपादानत्व लक्षणमें अर्थात् व्रह्मके लक्षणमें विवक्षित है, ऐसा सिद्धान्त- मुक्तावलीकार कहते हैं *॥ ५ ॥

वियदादिकी आकारताको प्राप्त होता है और उसके द्वारा व्यवहारकी विषयताको प्राप्त होता है, इस दृष्टान्तसे भामतीकारका मत शक्कराचार्यके अनुकूल है, ऐसा प्रतीत होता है [ पृ० ४७१ कल्पतरु निर्णय• मु० ] और 'न ह्चेतनं चेतना".'से लेकर 'तस्माज्ीवाधिकरणाप्यचिद्या निमित्ततया विपयतया चेश्वरमाश्रयते इतीश्वराश्रयेत्युच्यते, न त्वाधारतया, विद्यास्वभावे ्रह्मणि तदनुपपत्तेरिति' भाव यह है कि जीवमें रहनेवाली अविद्या निमित्त और विषय रूपसे ईशवरको आधय करती है, अतः ईश्वराश्रय माया कही जाती है, वस्तुतः आधाररूपसे ईश्वराश्रय है नहीं, क्योंकि जिसका विद्यास्वभाव है, उसमें अविद्या कैसे रह सकती है [ कल्पतरुसहित भाम० पृ० ३७८ निर्णय- सागर सु०] इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि सूलोक्त वाचस्पतिमिश्रका पक्ष भामती ग्रन्थमें स्पष्ट ही है। * इसी भावको सिद्धान्तमुक्तावलीकार श्रीप्रकाशानन्दस्वामीजी निम्न लिखित पंकियोंसे प्रकट करते हैं- ब्रह्माज्ञानात् जगज्जन्म न्रष्षणोSकारणत्वतः । अधिष्ठानत्वमान्रेण कारणं ब्रह्म गीयते ।३८॥ दृशयत्वादनुमानसिद्धानिवचनीयस्य जगतः अनाद्यनिर्वचनीया अविद्यैव कारणम्, न न्रह्म, तस्य कूटस्थस्य कार्यकारणविलक्षणत्वात, 'तदेतद्' ब्रह्माापूर्वमनपरमनन्तरमवाह्यम्' 'अयमात्मा

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित ८१

क ईश्वरोऽथ को जीवः? प्रकटार्थकृतो विदु:। ईशं मायाचिदाभासं जीवमाविद्यकं च तम् ॥ २८॥ अनादिर्विश्वप्नकृतिर्माया चिन्मात्रसंश्रया। तदेकदेशोSविद्या तु विक्षेपावरणान्विता॥। २९ ॥ ईश्वर कौन है और जीव कौन है ? इस प्रकारकी विप्रतिपत्तिमे प्रकटार्थकार कहते ऐ कि मायामें चैतन्यका जो आभार है, वह ईश्वर है और अविद्यामें चैतन्यका जो आभास है, वद जीव है। अनादि विश्वकी प्रकृति और चिन्मान्नमें रहनेवाली माया है और उस मायाका आवरण-विक्षेपशक्तियुक्त एकदेश अविद्या है। २८॥ २९।। अथ क ईश्वरः को वा जीवः? अत्रोक्तं प्रकटार्थविवरणे-

[ पूर्वअ्रन्थमें जगत्के उपादान ईश्वरक्ता और 'जीवाश्रित माया' इस वाक्यमें जीवका कथन हुआ है, अतः प्रसञ्जसे या उपोद्धात सङ्गतिसे ईश्वर और जीवके स्वरूपका निर्णय करनेके लिए प्रश्न करते हैं-] ईश्वर कौन है और जीव कौन है ? अर्थात् ईश्वर और जीवका क्या लक्षण है। इस परिस्थितिमें प्रकटार्थ-

म्रदा सर्वानुभू:' इति धुतेः । कर्थं ताि प्रक्षणो जगत्कारणत्वं थ्रुती प्रसिद्धम् ? जगत्कारणाधिष्टानत्वेन कारणत्ोपचारात्। अद्वितीयत्वं तायदू महाग: सिद्धं तत्कय सम्भाव्यतामिति कार्यकारणयोः अभेदस्तावल्लोकप्रसिद्दः ... अज्ञानं कारणमिति अभिदितत्वाप। साथ ही साथ इनका सारांश भी सुन लीजिए-ब्रह्माज्ञानसे अर्थाव अश्ञानसे दी जगत्की उत्पत्ति होती है, क्योंकि व्रहा अविकारी होनेसे कारण नहीं हो सकता, यदि अपमें कारणत्वव्यवद्ार होता है, तो केवल जगत्की उपादान मायाके आश्रय दोनिसे होता है, वस्तुतः किसी प्रकारका कारणत्व उसमें है ही नहीं। इसलिए 'विमत अनिर्वचनीय है, दृश्यत्व दोनेसे, इत्यादि दशयत्वदेतुसे अनुमानसे सिद्ध अनिर्वचनीयं जगत्की अनादि अनिर्वचनीय अविधा ही कारण है, ब्राप नहीं, कर्योंकि 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वम्०' (अज्ञान आदिका विषय जगत् अदा ही है अर्थोत् जगत्का स्वरूप व्रहासे अन्य नहीं है, वह ब्रह्मा कारण और कार्य रहित है, तथा अव्यापृत्ताननुगत है.) इत्यादि श्रुतियोंसे कूटस्थ ग्रह्ममें कारणत्वका निषेध किया गया है। कदीपर श्रुतिमें वममाकी जगत्कारणता जो प्रसिद्ध है, वद जगत्कारण मायाके अधिष्टान होनेसे उपचारमान्नसे है और नममें कारणत्वप्रतिपादक श्रुतिका प्रयोजन 'ब्रह्म कारण है' इस्र अर्थका प्रतिपादन करना नदीं है, परन्तु अन्य है अर्थात् 'एकमेवादितीयम्' (एक ही अद्वितीय नद है) इत्यादि श्रुतिसे 'व्रद्ा अद्वितीय है' ऐसा सिद्ध होता है। परन्तु इसका सम्भव फैस्रे हो सकता है, इस प्रकार असम्भावनाके प्राप्त होनेपर लोकप्रसिद्ध कार्यकारणके अभेदके अनुसार उक्क असम्भावनाकी नियृत्ति करना ही कारणत्ववोधक श्रुतिका तात्पर्य है, अतः अज्ञान दी कारण है। 11

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८२ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

अनादिरनिर्वाच्या भूतप्रकृतिश्चिन्मात्रसम्बन्धिनी माया। तस्यां चित्प्रतिविम्ब ईश्वरः, तस्या एव परिच्छिन्नानन्तप्रदेशेष्वावरणविक्षेपशक्ति- मत्सु अविद्याभिधानेपु चित्प्रतिविम्बो जीव इति। विवरणमें कहा गया है-अनादि, अनिर्वचनीय, * सब भूतोंकी प्रकृति और चिन्मात्रमें रहनेवाली जो माया है, उस मायामें चैतन्यका जो प्रतिबिम्न है, वह ईश्वर है और उसी मायाके अविद्या नामक आवरण और विक्षेपशक्तिवाले जो परिच्छिन्न अनन्त प्रदेश हैं, उनमें चैतन्यका प्रतििम्ब जीव है। * यहाँ अनिर्वचनीयशब्दसे मायाकी सत्यताका निराकरण किया गया है, अन्यया जैमे सांख्य प्रकृतिको सत्य मानते हैं; वैसे ही किसरीको यह शक्का हो सकती है कि 'माया' वेदान्तमतमें भी सत्य है। माया अनिर्वचनीय है, इसमें भी युक्तियोंका अनुसन्धान करना चाहिए, माया ब्रह्मसे वस्तुतः भिन्न भी नहीं है, क्योंकि न्रद्यभिन्न सम्पूर्ण प्रपचके मिथ्या होनसे उसका भेद वास्तविक हो ही नहीं सकता। ब्रहममने माया अभिन्न भी नहीं है, क्योकि चैतन्य और जड़ एक कैसे हो सकते हैं, मिन्ना-भिन्न अर्योत् नहसे भिन्न भी है और अभिस भी है, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि परस्पर विरुद्ध भिन्नत्व और अभिन्वत्व धर्म एक मायामें कैसे रहेंगे। माया सत भी नहीं है, द्वैतापत्ति होनेसे अद्वैत श्रुतिके साथ निरोध दोगा, असत् भी वह नहीं कही जा सकती, क्योंकि जगत्की प्रकृति वह कैसे होगी, अर्थात् असत् पदार्थ किसी भी वस्तुके प्रति उपादान या निमित्त कारण नहीं हो सकता है। मायाको सदसत नहीं कह सकते, पूर्वके समान सत्त्व और असत्व, जो परस्पर तेज और अन्धकारके समान विरुद्ध हैं, एकमें कदापि नहीं रह सकते। इसी प्रकार मायाको सावयव नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा स्वीकार करनेसे मायामें सादित्का प्रसन्न होगा और सुतरां उसके प्रतिबिम्बभृत ईवरमें भी सादित्वकी प्रसक्ति होगी, और मायाके सादि माननसे उसकी कारण और माया माननी पड़ेगी, निरवयव भी नहीं मान सकते हैं, क्योंकि जो निरवयव पदार्थ है, वह भी किसी का उपादान कारण या प्रकृति नहीं हो सकता। निरवयव और सावयवरूप नहीं कह सकते, क्योंकि सावयत्व और निरवयवत्वके एक स्थलमें रदनेमें विरोध है। इससे सभी प्रकारसे मायाका निरवचन करना असम्भव होनेके कारण परिशेपात् उसे अनिर्वचनीय ही मानना चाहिए। मूलमें प्रदेशशब्दमें परिच्छिन्त्व विशेषण देनेसे उसमें प्रतिचिम्ब जीव भी परिच्छिन्न है, यह लाभ होता है। इसीलिए अनेक स्थलोंमें भाष्यमें भी जीवका परिच्छिन्नत्व कथन सक्ञत होता है-जैसे 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' इस सूत्रके भाप्यमें जीवनिरूपणमें अर्थात् सूत्रस्थ शारीरपदके निर्वचनमें 'शारीर इति शरीरे भव इत्यर्थः । ननु ईश्वरोऽपि शरीरे भवति, सत्यं शरीरे भवति, न तु शरीर एव भवति' इत्यादिसे जीवमें परिच्छिन्नत्वका व्यपदेश भली भाँति किया गया है"। यद्यपि अनादि होनेसे मायामें अनन्त प्रदेश नहीं हो सकते है, तथापि मायाके आवरणशक्कति और विक्षेपशक्तिे युक होनेसे उसके आधारपर मायाके अनेक प्रदेश बतलायेः

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जीवेश्वरस्वरूपविचारं ] भांपातुवाद सहित ८३

उक्ता तत्वविवेके तु शुद्धसत्त्वमयी स्फुटा। माया रजस्तमोध्वस्ताSविद्या, शेपं तु पूर्ववत्॥ ३० ।। तत्वधिवेकमें तो शुद्धसत्वप्रधान मूलप्रकृति माया कही गई है तथा रज और तमसे तिरस्कृत मूलप्रकृति अविद्या कही गई है, शेष पूर्वके समान है॥ ३०॥ तत्व्रविवेके तु-त्रिगुणात्मिकाया मूलप्रकृतेः 'जीवेशावाभासेन करोति माया चाडविद्या च स्वयमेव भवति' इति श्रुतिसिद्धौ द्वौ रूपभेदौ। रजस्तमोऽनभिभृतशुद्धसच्वप्रधाना माया, तदभिभूतमलिनसच्ा अविद्येति मायाऽविद्याभेदं परिकल्प्य, मायाप्रतिविम्ब ईश्वरः, अविद्याप्रतिघिम्ब्ो जीव इत्युक्तम् ।

त्रिगुणात्मिका अर्थात् सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंकी साम्यावस्था रूप मूल प्रकृतिके माया और अविद्या दो स्वरूप 'जीवेशावाभासेन करोति' (जीव और ईशको आभाससे करती है माया और अविद्ा स्वयं होती है) इत्यादि क्षुतिसे सिद्ध हैं। उनमें रज और तमसे तिरस्कृत न होकर जो मुख्य- रुपसे शुद्धसत्त्रप्रधान है वह माया है। जो रज और तमसे अभिभूत होकर गलिनसत्त्वप्रधान है, वह अविद्या है, इस प्रकार माया और अविद्याके मेदकी कल्पना करके मायामें प्रतिविम्धित चैतन्य ईश्वर और अविद्यामें प्रतिबिम्बित चैतन्य जीव है, ऐसा तत्वविवेकमें * कहा गया है।

गये हैं। आवरणशकि-व्रद्ा नतन्यको आघृत करनेवाली मायाकी शक्ति और आवरण- 'यकषा नहीं दै, वरदा प्रकाशित नहीं होता' इस प्रकारके व्यवहारकी योग्यता। विक्षपशक्ि- तराज्जीवोंमें रहनेवाले असाधारण दुःसोंके अनुकूल मायाकी शाकि। भाष्यकार अधिद्याको जीवफी उपाधि मानते है वद भी प्रदेशोंके अभिप्रायस है अर्थात् उम उन स्थलोंमें आया हुआ अविद्याशब्द प्रदेशार्थक है। * तत्वविचेय शब्दसे विद्यारण्यस्वामीकृत पमदशीका प्रथमप्रकरण ही अभिप्रेत है, क्योंकि पथ्चदशीके आरम्भमें तत्वविवेकप्रकरण है। किसी-किसीका मत है कि प्चदशीमें आये हुए सभी प्रकरणोंके फर्ता श्रीविदारण्यस्वामी नहीं हैं प्रत्युत भिन्न-भिन्न हैं, कुछ घालके चाद कर्ताओंके नामका ठीक-ठीफ स्मरण न ऐोनेफे कारण उन सूच प्रकरणोंको मिलाकर एक प्रन्थ विद्यारण्यस्वामीजीके नामसे प्रसिद्ध हुआ, इसीलिए सिद्धान्तलेशमें उन उन प्रकरणोंका पृथक् पृथकरूपसे उद्धरण किया है अन्यया 'पवाद्शीम ऐसा प्रतिपादन किया है' ऐसा ग्रन्थकार क्यों नहीं लिखते, परन्तु इस यातका विवेचन इतिदासके यथार्थवेत्ताओंके ऊपर छोडकर हम प्रकृत अर्थकी पुष्टिके

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सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

विक्षेपशक्तिमाधान्यात् मायेशोपाधिरुच्यते। अविद्याSSवरणोत्कपति् जीवस्येत्यपि कश्चन ॥ ३१ ॥ विक्षेपशक्तिकी प्रधानतासे मूलप्रकृति-मायाशबदसे कदलानेवाली ईश्वरकी उपाधि कही जाती है और आवरणशक्तिकी प्रधानतासे अविद्याशब्दसे वाच्य मृल्प्रकृति ज़ीवक्री उपाधि कही जाती है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं।। ३१ ॥। एकैव मूलम्रकृतिविक्षेपप्राधान्येन मायाशव्दितेश्वरोपाधिः, आवरण- प्राधान्येनाविद्याऽज्ञानशव्दिता जीवोपाघिः। अत एव तस्या जीवेश्वर- साधारणचिन्मान्रसम्बन्धित्वेऽपि जीवस्थेव 'अज्ञोऽस्मि' इत्यज्ञानसम्बन्धा- नुभवः, नेश्वरस्येति जीवेश्वरविभाग: क्वचिदुपपादितः । एक ही मूलप्रकृति विक्षेप अंशकी प्रवानतासे मायाशव्दसे वाच्य होकर ईश्वरकी उपाधि होती है और आवरण अंशकी प्रधानतासे अविद्या होकर अर्थात् अज्ञानसे वाच्य होकर जीवकी उपाधि होती है। इसी लिए-जीवके ही आवरणशक्तिमदुपाधिसे उक्त होनेके कारण मूल प्रकृतिका जीव और ईश्वर साधारण चिन्मात्रके साथ सम्बन्ध होनेपर भी 'अन्ञोडस्मि' (मैं अज्ञानी हूँ) इस प्रकार जीवको ही अज्ञानके संसर्गका अनुभव होता है, ईश्वरको* नहीं होता है, क्योंकि आवरणशक्ति ईश्वर भी अंशमें प्रविष्ट नहीं है। इसलिए जीव और ईश्वरकी उपाधिके एक होनेपर भी सर्वज्ञत्व और असर्वज्ञत्वधमोंसे जो उनमें वैलक्षण्य है, उसकी अनुपपत्ति नहीं है। इस प्रकार भी जीव और ईश्वरका कहींपर विभाग वतलाया गया है।

लिए उक्त प्रकरणके कुछ वचन उद्धृत करते हैं-उसमें माया और अविद्याका भेद इस तरद कहा गया है- सत्यशुद्दयचिश्रुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते। मायाविम्यो वशीकृत्य तां स्यात सर्वज्ञ ईश्वरः ॥ १६ ॥ अविद्यावशगस्त्वन्यस्तद्वचित्रयादनेकघा ॥ १७॥ सत्त्वकी शुद्धि और अगुद्धिसे प्रकृतिके माया और अविद्या दो भेद है, उम्र मायामें प्रति- फलित चिदात्मा मायाको अधीन करके सर्वज् ईश्वर होता है और अविद्यामें प्रतिविम्च- रुपसे स्थित परतन्त्र अन्य चिदात्मा जीव है, उक्त वचनोंका यह भाव है। [पत० तत्व० पृ० १२ निर्ण० मु० ]। * यहाँपर भी 'अत एव' शब्दका सम्बन्ध करना चाहिए। इसलिए आवरणशक्तिका ईश्वरकी उपाधिकुक्षिमें सम्बन्ध न होनेसे अज्ञानका सम्पर्क ईश्वरमें नहीं होगा, यह भाव है।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित ८५

कार्यापाधिर्भषज्ञीवः कारणोपाधिरीश्वरः। प्रतिविम्बोऽत्र सङ्क्षेपशारीरककृतां नये ॥ ३२ ॥ संक्षेपशारीरककारके मतमें अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्न ईश्वर है और अन्तः- करणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है॥ ३२ ॥ सदक्षेपशारीरके तु-कार्योपाधिरयं जीव: कारणोपाघिरीश्वरः। इति श्ुतिमनुसृत्याऽविद्यायां चित्म्रतिविम्ब ईश्वरः, अन्तःकरणे चित्प्र- तिविम्बो जीवः। न चाडन्तःकरणरूपेण द्रव्येण घटेनाऽडकाशस्येव चैतन्य- स्पाऽवच्छेदसम्भवात् तदवच्छिन्नमेव चैतन्यं जीवोऽस्त्विति वाच्यम्, इह संक्षेपशारीरकमें तो कहा गया है कि 'कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधि- रीशरः (कार्योपाधिक-अन्तःकरणोपाधिक जीव है और मायोपाधिक ईश्वर है) इर श्रुतिके आधारपर अविद्याम चेतन्यका प्रतिविम्ब ईश्वर है और अन्तः- करणमं चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है*। शक्का होती है कि जैसे आकाशका घटरूप दरव्यसे परिचछेद होता हे, वैसे ही अन्तःकरणरूप द्रव्यसे चैतन्यका परिच्छेद

क दग विषयमें योदा विनारणीय हे-'जीवेशावाभासेन करोति' इत्यादि क्षुतिके साथ दस मसना विरोध है, पर्योंकि इस अतिये जीवमें कारणोपाधिकता प्रतीत होती है, इसपर प.दा जाता है-'जीवेसानामासेन' इस पूर्व भागये जीव और दश्वर दोनोंका प्रतिविम्बभाव प्रसीय होता है, जदा विम्ब एक ही दोगा उस स्थलमें उपाधिके भेदके चिना वह नहीं हो गुकता है, कारण कि सूर्य आदिके प्रतियिम्बस्थलमें उपाधिकी भिन्नताके बिना भेद नहीं देखा जाता है, इसलिए उफ्क भतिसे प्रतिबिम्बरूप जीव और ईश्वरमें कमसे माया और अविद्या दन्दोंसे उपाधि समपित होती है। इस क्षतिमें मायाशब्द मायाका कार्य अन्तःकरणरूप अर्थंध बोपक दै। 'माया नाषिया व स्वयमेय भनति' इस वाक्यशोपकी उपपतति भी-माया- शब्दये कहलानेवाले अतःकरण और मूल प्रकृतिमें मुर्य अभेदके न दोनेपर भी प्रकृति पिट्विभावश्र्युक अभेदके सम्भन दोनेशे-दो सकती दै। कृसदान-िये गये यमोंफी निष्फलता, भाव यह है कि न्राह्मण आदि शरीरोंमें रहनेवाले अन्त:करणये अगककस नतन्यप्रदेश दी दस लोकके कर्मोका कर्ता है और अन्य लोकमें देग भदिगत अन्तःपरणावच्छिस पतन्य प्रदेश, जो कि किसी कर्मका कर्ता नहीं है, भोका होगा, इमलिए उनका भोग किसी पूर्योपारजित कर्मका फल नहीं दो सकता है, अतः कृतफर्मका दान सपट्ट दोगा, यदि अन्तःकरणावन्किम् नैतन्य प्रदेशको जीव माना जाय, तो अकृताभ्यागम- जिखुने कर्मे किया उग्रफो भोगप्रातति नहीं दोगी और जिसने कर्म नहीं किया उसको भोग प्राप्ति रोगी। अर्थात देवादिशरीरके अन्तःकरणसे युक चैतन्य किसी कर्मका कर्ता नहीं है तो भी फलका भोफा है और मनुष्ण आदि परीरगत अन्तःकरणसे युक तन्य कर्मका कर्ता है, तो भी फलका भोका नहीं हो राफता, ये दोनों दोप अन्तःकरणाचच्छित चतन्यके जीव माननेमें होंगे

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८६ सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम परिच्छेद

परत्र च जीवभावेनावच्छेद्यचैतन्यप्रदेशस्य भेदेन कृतहानाकृताभ्यागमप्र- सङ्गात्। प्रतिविम्वस्तूषाधेर्गतागंतयोरवच्छेद्यवन्न भिद्यते इति प्रतिविम्बपक्षे नायं दोप इत्युक्तम्। एवमुक्तेष्वेतेपु जीवेश्वरयोः प्रतिविम्वविशेपत्वपक्षेपु यत् विम्वस्थानीयं ब्रह्म तत् मुक्तप्राप्यं शुद्धचैतन्यम्।

बुद्धितद्वासनाभासौ जीवेशौ, वुद्ध्युपाधिकः ॥ ३३ ॥ कूटस्थ: शुद्धचित् ग्रह्म चित्रदीपे चतुर्विधम्। कूटस्थे कल्पितो जीवः शुद्धे न्रह्मणि चेश्वरः। अहं वहेति वाघायामक्यमित्यपि तन्मतम्॥३४ ॥ घटके जल और मेघके जलमें जैसे आकाशके प्रतिबिम्ब हैं, वैसे ही वुद्धि-अन्तःकरण और उसकी वासनाओंमें चैतन्यके आभास क्रमशः जीव और ईश है, वुद्ध्युपाधिक- स्थूल सूक्ष्म शरीरोंमें अधिष्ठानरूपसे वर्तमान कूटस्थ चैतन्य है अर्थात् कुटके अयो- घनके समान निश्चलरूपसे रहनेवाला चैतन्य है और सब उपाधियोंसे रहित शुद्ध चैतन्व ब्रह्म है, इस प्रकार चैतन्यके चार भेद चित्रदीपमें हैं। और कृटस्थमें कस्पित तीव है, शुद्धब्रह्ममें कल्पित ईश्वर है और 'अद्ं ब्रझ्मास्मि' (मैं ब्रद्म हूं) यह वाधमें सामानाधि- करण्य है, यह भी उसका मत है ।३३।।३४।।

हो सकता है, तो अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही जीव हो, अन्तःकरणमें प्रतिविग्वित चैतन्यको जीव क्यों माना जाता है? नहीं यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि इस लोकमें और परलोकमें अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशका भेद होनेसे कृतहान और अकृताभ्यागमका प्रसङ्ग आवेगा। प्रतिविम्व तो उपाधिके गमनमें या आगमनमें भी भिन्न नहीं होता है, इसलिए यह दोप प्रतिविम्ब पक्षमें नहीं है। [ जैसे चन्द्र आदि प्रतिबिम्बसे युक्त जलपात्रोंमें से एकके विनाश होनेपर उसमें वृत्तिरूपसे प्रकाशित प्रतिविम्वका विम्त्रके साथ एकीभाव देखा जाता है, अन्य प्रतिविम्वका एकीभाव नहीं देखा जाता, इसी प्रकार प्रतिविम्वरूप जीवका भी विदेहकैवल्य समयमें विम्ब्रभूत शुद्ध ब्रह्मके साथ एकीभाव होगा प्रतिविम्ब्भूत ईश्वरके साथ नहीं होगा, क्योंकि प्रत्यक्ष विरोध है, इस प्रकार आशक्का करके इस मतमें माया और अविद्या पर्याय हैं, विशुद्धसत्त्व माया है और अविशुद्धसत्त्व अविद्या है यह भेद नहीं है, इससे मायाका मायाकार्य अन्तःकरण अर्थ करनेमें और अविद्याको ईशकी उपाधि माननेमें कोई हानि नहीं है यह भाव है।

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जीवेभररवरूपविचार ] भापानुवादसहित ८७

चित्रदीपे-'जीव ईशो विशुद्धा चित्' इति त्रैविध्यप्रक्रियां विहाय यथा घटावच्छिन्नाकाशो घटाकाश, तदाश्रिते जले ग्रतिविम्वितस्साभ्रन- क्षत्रो जलाकाशः, अनवच्छिनो महाकाशः, महाकाशमध्यवर्तिनि मेघमण्डले वृष्टिलक्षणकार्यानुमेयेपु जलरूपतद्वयवेपु तुपाराकारेपु प्रतिविम्बितो मेघाकाशः' इति वस्तुत एकस्याप्याकाशस्य चातुर्विध्यम्, तथा स्थूलसूक्ष्म- देहद्वयस्याऽघिष्टानतया वर्तमानं तद्वच्छिन्नं चैतन्यं कूटवन्निर्विकारत्वेन स्थितं कृटस्थम्, तत्र कल्पितेन्तःकरणे प्रतिविम्धितं चैतन्यं संसारयोगी जीवः, अनवच्छिनं चेतन्यं ब्रह्म, तदाश्रिते मायातमसि स्थितामु सर्वप्राणिनां धीवासनासु प्रतिविम्नितं चतन्यमीश्वरः इति चतन्यस्य चातुर्विध्यं परिकल्प्य अन्तःकरणधीवासनोपरक्ताज्ानोपाधिभेदेन जीवेश्वरविभागो दर्शितः । इष्टापतिसे परिदवार करते हैं-'एवम्' इत्यादिसे ] इस प्रकारसे जीव और ईश्वरके विपयम कहे गये इन प्रतिविम्न्नविशेष पक्षोंमें जो बिम्ब्नस्थानीय शुद्ध चितन्य त्रश् है, वही मुक्तों द्वारा प्राप्तव्य है। चित्रदीपमें 'जीव ईशो विशुद्धा चित्' (जीव, ईश और शुद्ध चेतन) इस प्रकार चैतन्यके तीन भेदोंकी प्रक्रियाको छोड़कर-जैसे घटरूप उपाघिसे युक्त जाकाश-घटाकाश है, उस घटस्थ आकाशमें आश्रित जलमें प्रतिविम्बित बादल और नक्षत्रोंके सहित जो आकाश है-वह जलाकाश है, घट आदि उपाधिसे रहित आफाश-महाकाय है और महाकाशके मध्यवर्ती मेघमण्डलमे वृष्टिरूप कार्यसे अनुमित जलरूप तुपाराकार मेघमण्डलके अवयवोंमें प्रतिनिम्धित आकाश मेघाकाश है, इस प्रकार वस्तुस्थितिगें एक ही आकाशके चार मेद हैं, वैसे ही स्थूल और सूक्ष्म दो शरीरोंमें अधिष्ठानरूपसे वर्तमान दो देहोंसे अवच्छिन्न (युक्त) चैतन्य कूटके-लोहघनके-समान निर्विकाररूपसे स्थित कृटस्थ नैतन्य है, उस कृटस्थ चैतन्यमें कल्पित अन्तःकरणमें प्रतिविम्बित चैतन्य-सांसारिक जीव चैतन्य है, समस्त उपाघिसे रहित अर्थात् अनवच्छिन्न चैतन्य-वरकचैतन्य है और वपाके आश्रित मायारूप तममें विद्यमान सत्र प्राणियोंकी धीवासनाओंगें (धी उनका नाम है जो अन्तःकरण जाग्रत् और स्वम दो अवस्थाओंमें स्थूलरूपसे अनुगत हैं और उन अन्तःकरणोंकी सुपुप्तिकालीन सूक्ष्मावस्थाको वासना कहते हैं) प्रतिविम्नित चैतन्य-ईश्वर- नैतन्य है,-इस रीतिसे चैतन्यके चार विभाग करके अन्तःकरण और

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८८ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेंद

अयं चापरसतदभिहितो विशेष :- चतुर्विधेपु चैतन्येपु जीवः 'अहम्' इति प्रकाशमान: कूटस्थे अंविद्यातिरोहितासङ्गानन्दरूपविशेपांशे शुक्तो

विशेषांशरूपयो: स्वयन्त्वाहन्त्वयोः सह प्रकाशः 'स्व्रयमहं करोमि' इत्यादौ।

धीवासनोपरक्त अज्ञानरूप दो उपाधियोंके मेदसे जीव और ईश्वरका विभाग बतलाया गया है *। इस विषयमे चित्रदीपमें कहा गया यह अन्य विशेष है अर्थात् इसमें पूर्व अन्थसे चतन्यका चातुर्विध्य विशेष दिखलाया उसकी अपेक्षा अन्य प्रति- विम्ब मिथ्यात्वरूप विशेष है, यह भाव है। चार प्रकारके चतन्योंमेंसे 'अहम्' (मैं) इस प्रकारसे प्रकाशमान जो जीव है, वह अंविद्यासे आच्छादित हुए हैं असङ्ग और आनन्दरूप विशेष अंश जिसके, ऐसे कृटस्थ चतन्यमें-गुक्तिमं रजतके समान-अध्यस्त है, इसीलिए अर्थात् अहमर्थके कूटस्थम अध्यस्त

पश्चदशीके चिन्नदीपप्रकरणमें इस अभिप्रायके सूचक निम्नलिखित मोक हैं- कूटस्थो व्रह्म जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा। : घटाकाशमहाकाशी जलाकाशाभ्रखे यथा ।१८ ॥ घटावच्छिनसे नीरं यत्तत्र प्रतिविम्बितः । साम्रनक्षत्र आकाशो जलाकाश उदीर्येते ॥१९॥ महाकाशस्य मध्ये यन्मेघमण्डलमीक्ष्यते। प्रतिविम्बतया तन्न मेघाकाशो जले स्थितः ॥२०। मेघांशरूपमुदकं तुपाराकारसंस्थितम्। तन्न सप्रतिविम्बोऽयं नीरत्वादनुमीयते ॥२१॥ अधिष्ठ नतया देहद्वयावच्छिनचेतनः । कूटवन्निर्विकारेण स्थितः कृटस्थ उच्यते ॥२२ ॥ कूटस्थे कल्पिता वुद्धिस्तत्र चित्प्रतिषिम्बकः। प्राणानां धारणाजीवः संसरिण स युज्यते ॥२३॥ जलव्योम्ना घटाकाशो यथा सर्वस्तिरोहितः । तथा जीवेन कूटस्थः सोऽन्योन्याध्यास उच्यते ॥ २४॥ इन श्लोकोंका भाव मूल प्रन्थसे व्यक्तं है, केवल अन्तिम श्लोकका सार यह है कि यदि कूटस्थ चेतन है, तो उसका अनुभव क्यों नहीं होता है? इसका उत्तर है कि जैसे जलाकाशसे घटाकाश तिरोहित हो जाता है, वैसे ही जीवसे तिरोहित हो जानेके कारण कूटस्थका अनुभव नहीं होता है, और इसीको अन्योन्याध्यास कहते हैं।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित ८९

अहन्त्वं हयध्यस्तविशेपांशरूपम्, पुरुपान्तरस्य पुरुपान्तरे 'अहम्' इति व्यवहाराभावेन व्यावृत्तत्वात्। स्वयन्त्वं चाऽन्यत्वग्रतियोग्यधिष्ठानसामा- न्यांशरूपम्। 'स्वयं देवदत्तो गच्छति' इति पुरुपान्तरेऽपि व्यवहारेणाऽनु- वृत्तत्वात्, एवं परस्पराध्यासादेव कूटस्थजीवयोरविचेको लौकिकानाम्। होनेसे ही जसे 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इसमें इदन्त्व और रजतत्वका, जो क्रमशः अचिष्ठानसामान्य अंश और अध्यस्तविशेष अंश हैं, साथ-साथ प्रकाश होता है, वैसे ही स्वयन्त्व और अहन्त्वका साथ-साथ प्रकाश होता है- 'स्वयमहं करोगि' (में स्वयं करता हूँ) इत्यादिमं। *प्रकृतमं अहन्त्व अध्यस्त- विशेष अंश है, क्योंकि अन्य पुरुषका अन्य पुरुपमें 'अहम्' इस प्रकारका व्यवदार नहीं होता, इसलिए व्यावृत् है। और स्वयन्त्व तो अन्यत्वका विरोधी है और अविष्ठानसामान्य अंश है, क्योंकि 'स्वयं देवदतः गच्छति' (देवदच स्वयं जाता है) इस प्रकार अन्य पुरुपमं भी स्वयन्त्वका व्यवहार होनेसे वह अनुवृत्त हे। ऐसा होनेपर-अहमर्थ जीवके शुक्तिमं रूप्यके समान कूटस्थमें अध्यस्त होनेपर-परस्पर अभेदके अध्याससे ही कूटस्थ और जीवका लोकमें अन्योन्य अभेद भासता है।

• कूटस्थके अमद्ृत्व, आनन्दत्व और पूर्णत्व आदि विोषधर्म अविद्याके प्रभावसे प्रतीत नहीं रोते, यह वम मानते हैं, परन्तु जैसे शुफिका इदन्तव अंश प्रकाशित होता है, वैसे अधिष्ठान का गामान्ग अंद प्रकाशित नहीं होता। फित्, जैसे 'दद रजतम्' इत्यादिमें अधिष्ठानके सामान्य अंशका और आगोपित विशेष अंशका खाथ-साथ प्रकाश होता है, चैसे प्रकृतमें अदृंरूप विशेष अंश और सामान्य अंशफा प्रकाश नदीं दोता किन्तु अहमर्थ विशेषका ही प्रकाश होता है इसलिए कूटरयमें 'अदम्' का शुधिमें रप्पके समान अध्यास है, गद कहना असगत है, इसपर 'अत एव' दत्यादिये कहते है। मदपि कुडस्थका सामान्य अंश कृटस्थत्व दोना चाहिए, तथापि शास्त्रीय- प्रमाण के अनुसार 'स्वगन्त' ही उसका सामान्य अंश है, ऐसामाननेके लिए हमें वाध्य दोना पड़ता है, इलिए अहमथके-जीवके-आरोपालमें स्वयन्त्वका साथ-साथ प्रकाश होता है, किं बहुना स्पयन्सवके कृटरय चैतन्यरन होनेसे आरोप-पूर्वकालमें भी उसका भान होता है। यद्यपि स्वयन्त्व और फूटस्थ एक दी है, तथापि 'रारो: शिर:' (राहुका माथा) के समान यहाँ भेदकी कल्पना करके धर्मधर्मिनानकी उपपति करनी चाहिए। अतः स्वयन्त्वसामान्यरूपसे कूटस्थका सर्वदा प्रकाश दोनेसे अद्मर्थ (जीव) रूप चिदाभासफे अध्यासका अधिष्ठान कूटस्थ उपपन्न हुआ। पुरुपान्सरमें 'में' शब्दका व्यवदार न दोनेसे उसमें 'अदन्त्व' की व्यापृत्तिका अवगम होता है, अतः अदनत् विशेष अंदा है। स्वयम् और अन्य शब्द एकार्थक नहीं हैं, परन्तु पुरु- पान्तरमें स्वयंशब्दका व्यवदार होता है, इसलिए उस्चे सामान्यांश माननेमें कोई हरकत नहीं १२

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९० सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम, परिच्छेद

विवेकस्तु तयोवृहदारण्यके-'प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति' इति जीवाभिप्रायेणोपाधिविनाशानुविनाशग्रति- [ 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इत्यादि भ्रमस्थलमें 'यह शुक्ति है' इस प्रकारके विशेष परिज्ञानसे 'इदं रजतम्' इससे प्रतीत सामान्य और विशेष. पदार्थोंमें शुक्तित्व और रजतत्वरूप विरुद्ध धर्मोंका निश्चय होनेसे उनका भेद माना जाता है, परन्तु प्रकृतमें जीव और कूटस्थका भेढ कैसे अवगत हो सकता है: यदि भेदका परिज्ञान न हो, तो 'स्वयमहम्' ( मैं स्वयम्) इस प्रकार सामान्यविशेषभावसे प्रतीयमान जीव और कूटस्थका सत्यस्थलीय रजत और इदमर्थके समान वस्तुतः एकत्वापत्ति होनेसे अहमर्थ- जीवकी स्वयंशब्दार्थ-कूटस्थमें कल्पना नहीं हो सकती, इस प्रकारकी आशक्का करके श्रुतिसे उनका मेद दिखलाते हैं ]-वृहदारण्यकमें जीव और ईश्वरका मेदानुभव तो 'प्रज्ञानघन एवैतेम्यो भूतेभ्यः समुत्थाय०' (प्रज्ञानरूप आत्मा ही देहादिरूपसे परिणत सन्निहित उपाधिरूप भूतोंसे समुत्थानकर-उपाधिभृत बुद्धि आदिकी उत्पत्तिसे उत्पत्तियुक्त होकर-तत्त्वज्ञानसे उन उपाधियोंका विनाश होनेपर उन्हीं भृतोंमें लीन हो जाता है) इत्यादि श्रुतिसे जीवके अभिप्रायसे ही अर्थात् जीवका ही उपाधिके विनाशके अनन्तर विनाशप्रतिपादन

है-जैसे इदन्त्व शुकतिमें रहता है, वैसे ही पट आदिमें भी रहता है। इस विशेष पक्षके संग्रांहक निम्न लिखित श्लोक हैं- 'अविद्यावृतकूटस्थे देह्दद्दययुता चितिः। शुक्ता रूप्यवदध्यस्ता विक्षेपाध्यास एव हि॥३३॥ आरोपितस्य दृष्टान्ते रूप्यं नाम यथा तथा। कूटस्थाध्यस्तविक्षेपनामाहमिति निश्चयः ॥३६॥ इदमंशं स्वतः पश्यन् रूप्यमित्यभिमन्यते। तथा स्वं च स्वतः पश्यन्नहमित्यभिमन्यते ॥३७॥ इदन्त्वरूप्यत मिन्ने स्वत्वाद्दन्ते तथेष्यताम्। सामान्यं च विशेषश्च हुभयन्नापि गम्यते।३८॥ देवदत्तः स्वयं गच्छेत्त्वं वीक्षस्व स्वयं तथा। अहं स्वयं न शक्रोमीत्येवं लोके प्रयुज्यते ॥३९॥' [पश्च० चित्रदी०] इन श्लोकोंके आधारपर ही 'अयव्नापरस्तदभिहतो विशेषः .इत्यादिसे विशेष वात कही गई है, और जो मूलमें विशेष कहा है, वही इन शलोकोंका अर्थ है, अतः शोकोंका अनुवाद नहीं किया गया।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित ९१

पादनेन, 'अचिनाशी वा अरेऽयमात्मा' इति कूटस्थाभिप्रायेणाSविनाशप्रति- पादनेन च स्पष्टः । अहमर्थस्य जीवस्य विनाशित्वे कथमविनाशित्रह्माभेदः। नेदमभेदे सामानाधिकरण्यम्, किन्तु वाधायाम्। यथा 'यः स्थाणुरेप पुमान्' किया गया है, इससे और 'अविनाशी वा अरे०' (हे मैत्रेयि ! यह आत्मा अविनाशी है) इत्यादि श्रुतिसे कूटस्थ आत्माके अविनाशित्वका प्रतिपादन करनेसे स्पष्ट ही है। यहांपर शक्का होती है कि यदि श्रुतिसे वह विनाशी सिद्ध हो तो उसका-अहमर्थ जीवका-अविनाशी न्रह्मके साथ अमेद कैसे होगा? यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि अविनाशी त्रह्म और जीवका सामानाधि- करण्य अमेद अर्थमं नहीं है, परन्तु बाध अर्थमें सामानाधिकरण्य है-जैसे •भाव यद है कि यद्पि 'अयमात्मा प्रज्ञानधनः' इत्यादि भुतिसे ज्ञात होता है कि चिदेकरस आत्मा ही उपाधिके उम्मपके पात् उत्पन्न होता है और उपाधिके नाशके अनन्तर नष्ट दोता है, अतः उपाधिकी उत्पत्ति और विनाशसे पृथक् ही चिदात्माकी उत्पत्ति और विनाशका प्रतिपादन है, कयोंकि अनुशव्दका प्रयोग दे, साथापि चिदात्माकी उत्पत्ति और विनाश स्वगावसिद् ६ै, ऐवा नहीं कह सकते; क्योंकि 'अविनाशी वा अरेऽ्यमात्मा०' (है भैत्नेयि, यह आत्मा अविनाशी रै) इस युतिसे विज्ञानघन आत्माके अविनाशका प्रतिपादन है। इससिए उत्पत्ति-पिनाशयान् यैतन्य प्रतिविम्बरूप जीवके तादाम्यके आधारपर विनाश आदि वननकी उपपत्ति करनी चादिए। इससे अ्रमस्थलमें रजत और इदमर्थमें जैसे विनाशित्व और अधिनाशित्रप विरुद्ध धर्मके निथयसे भेदप्रद होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी विनाशित्व भोर अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मके निशयसे दी जीव और कूस्थके भेदका परिज्ञान होता है। ह शयका यद भाव हे 'सोडयम् नरेन्द्रः' (ह यह नरेन्द्र है) इत्यादि समाना धिकरण वाक्यका जसे अभेद अर्थ प्रतीत होता है-कलकत्तेमें जिस नरेन्द्रको देखा था वदी यह है, अतः कलफतोके नरेन्द्र और इस नरेन्द्रका भेद नहीं है किन्तु अभेद ही है, वैछे 'यः स्थाणुः ग पुरुपः' (जो स्थाणु था वद पुरुप है) इस समानाधिकरण वाक्यसे अमेद-प्रतीत नदीं होता, य्योंकि स्थाण और पुरुषका अभेद कभी नहीं घट सकता, इसलिए यहाँपर वाययार्थ है-याध, अर्थात् उक्त वाक्यसे-जिस आधारभूत पुरुपमें स्थामुत्वकी कल्पना की गई है, उसमें स्थाणुतादात्म्य नदीं है-इस प्रकार वाधरूप वांक्यार्थ देया जाता है। इसलिए 'गः स्थाणुः स पुरुपः' इस वाक्यसे 'वस्तुतः स्थाणुतादात्म्याभाव- घानयं पुदव:' (वस्तुतः पुरप स्थाणु-तादात्म्यका आधार नहीं है) यद चोध होता है। इस पोघसे पुरपमें स्थाणुरुप निषयके सरहित आरोप निषृत होता है। इसी रीतिसे 'अहं ग्रम्मास्मि' (मैं भ्रमा हूँ) अद्मर्थ (जीव) तादात्म्यसे शून्य 'मैं बह्म है' यह शान होता है और इस शानसे "मैं कर्ता ह' इत्यादि आरोप-सम्पूर्ण कर्तृत्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट जीवरूप अपने विपयोंके साथ नियृत्त होता है। आरोपित अद्मर्थकी नियृत्ति दोनेपर जो जीवका कूटस्थसत्यत्वरूप स्वरूप दे वद पूर्ण म्दारुपसे रदता है, इसलिए अत्यन्तरफे साथ विरोध नहीं है।

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९२ सिद्धान्त लेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

इति पुरुपत्ववोधेन स्थाणुत्ववुद्धि्निवर्त्यते। एवम् 'अहं त्रह्मास्मि' इति

'योडयं स्थाणुः पुमानेष पुन्धिया स्थाणुघीरित्र।

इति नैष्कर्म्यसिद्धिवचनात्। यदि च विवरणाद्युक्तरीत्या इदमभेदे सामानाधिकरण्यम्, तदा जीववाचिनोऽहंशव्दस्य लक्षणया कूटस्थपरत्तर- मस्तु। तस्याऽनध्यस्तस्य त्रह्माभेदे योग्यत्वाद्।

'ो स्थाणु है, वह पुरुष है, इस प्रकार स्थाणुमें पुरुपत्वके ई वोघनसे स्थाणु- त्वका ज्ञान निवृत्त होता हे, वैसे ही 'मैं त्रह्म हं' इस प्रकार जीवमें त्रह्मत्वरूपत्वक चोवसे अध्यस्त अहमर्थरूपताकी-जीवरूपताकी-निवृत्ति होती है। 'घोडयं स्थाणु:०' (जैसे मन्द अन्यकारमं 'जिसे स्थाणु [पुरुषाकार खड़ा हुआ सूखा वृक्ष विशेष ] समझा था यह तो पुरुष है, इस प्रकारके महाजनके वाक्यसे उत्पन्न हुई पुरुषविपयक वुद्धिसे सर्थात् 'यह पुरुष ही हे स्थाणु नहीं' इस प्रकारकी बुद्धिसे 'यह स्याणु है' इस प्रकारकी बुद्धि आरोपित स्थाणु तादात्य के साथ निवृत् होती है, वैसे ही 'मैं त्रह हूँ' इस वाक्यसे उत्पन्न बुद्धिसे- अहमर्थभूत जीनके तादात्यसे शून्य केवल त्रह्रूप ही मैं हूँ, इस प्रकारकी अहंबुदधिसे-'मैं करता हूँ' इत्यादि सम्पूर्ण बुद्धि आरोपित अहमयके साथ निवृत होती है) ऐसा नैप्कर्म्यसिद्धिका * वचन मी है। यदि विवरण आदिके कथना- नुसार 'सहं त्रझास्मि' ( मैं त्रह्म हूँ) यह सामानाविकरण्य अमेदमें माना जाय, तो जीववाचक महंशव्दका लक्षणावृत्तिसे कृटस्थ चेतन्य ही अथ मानना होगा, क्योंकि उसीकी अनध्यस्त ब्रह्मके अमेदमें योग्यता है।

पुरुषत्वपदसे कल्पितस्थाणुतादात्यामानवत्न विवक्षित है, क्योंकि वाघक ही वाक्यारय माना गया है, यह भाव है। 8 नैष्कन्यसिदिमें सुरेश्वराचार्यका यह वचन है, इसलिए वाको वाक्यार्थ नाननेनें कोई हानि नहीं है। इस शोकमें 'हि' शब्द इस अर्थका सूचन करता है-महावाक्यार्यके ठीक-ठौक परिज्ञानसे सम्पूर्ण अनर्थकी निवृत्ति होती है, यह अनुभवी पुरुपोंके अनुभवसे सिद्ध है। * समानाविकरण वाक्योंका वह स्वभाव है कि तनका सर्य सुर्यतः समेद ही होता है, और निवरण दिमें ऐमे समानाविकरण वाक्योंकी अमेदार्थकता ही मानी गई है। वाक्यवृत्तिमें भगवत्पादशङ्राचार्यजी महाराजने भी 'तादाल्यमात्रं वाक्यार्थस्तयोरेत पदार्थयोः' इस नोकसे

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित ९३

यस्तु मेघाकाशतुल्यो धीवासनाप्रतिविम्त ईश्वर उक्त:, सोऽयं 'सुपुप्स्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दशुक्' इति माण्डक्य- श्रुतिसिद्ध: सौपुप्तानन्दमयः, तत्रैव तदनन्तरम् 'एप सर्वेश्वर एप सर्वज्ञ एपोऽन्तर्याम्येप योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्' इति श्रुतेः।

*और मेघाकाशके समान धीवासनाओंमें प्रतिबिम्ब चैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, वह 'मुपुप्तस्थान एकीभूतः' (सुपुप्तस्थान-सुपुप्त है स्थान जिसका, ऐसा एकीभूत और प्रज्ञानघन-जीव ही आनन्दमय और आनन्दभोक्ता है) इस माण्टक्यश्नुतिसे सिद्ध, सुपुप्तिकालीन आनन्दमय है, च्योंकि वहींपर उसके वाद 'एप सर्वेश्वरः' (यही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और

'तत्यमसि' महावायरयमें तत् और त्वंक: तादात्म्यशब्दसे कहे जानेवाला अभेद ही घायगार्थ माना है, इसलिए वार्तिककारके वचनानुसार 'अहं त्रदास्मि' इत्यादि स्थलमें याघका वाक्यार्थकत्व केवल प्रौडियाद ही है, इसलिए 'अहं ब्रम्मास्मि' इत्यादिमें अमेदको ही यादयार्थ मानना चादिए। दख परिस्थितिमें विनाशी जीव और अविनाशी ब्रह्मका अभेद नहीं दो सकता है, इसलिए पूर्वमतमें अस्वरस है, अतः 'यदि च' शब्दसे विवरणका मत कहते हैं। * यहाँ तुशब्द अवधारणार्थक है अर्थात् पूर्वमें जो ईश्र कहा गया है, वह श्रुतिमें उफ आनन्दमय हो दे, उससे अन्य नहीं है, गह भाव है। 'सुपुप्स्थान' इत्यादि श्रुतिका सपष अर्थ यद हे-मुपुत स्थानं गस्य सः-मुपुपस्थानः अर्यात् जिसका सुपुप्ति स्थान है। जापरदयरयामें अन्तःकरणके गराथ तादात्म्यका अध्यास दोनसे विज्ञानमयत्व, मनोमयत्व और नृंत्य आदि रूप जीवके भर्म है, देहमें 'मैं स्थूल हैँ' इत्यादि अध्यासंसे स्थूलत्व, कृशत्व, मादागत आदि रूप धर्म मे, तथा चछ आदिमें 'मैं काना है' इत्यादिके अध्याससे काणत्व आदि धर्म एै, इसी प्रहार आफाश आदि चाहा पदा्थोमें अध्याससे होनेवाले श्रुतिद्वारा प्रतिपादित आकाशमगत्व आदि धर्म है और शुगुप्षिमें तो युद्धि आदिका चिलय होनेसे समस्त संसारकी ध्रान्तिका अभाव दनिसे उकक ग्रभी प्रफारके स्वरूप लीन होते हैं, अतः इसी अभिप्रायसे श्षुतिमें एकोभून कहा गया है, इसीये इख अर्थका संप्रादक ग्ठोक उपलब्ध दोता है- 'विज्ञानमयमुगर्यो रुपर्युक: पुराऽधुना। य लयनकर्ता प्राप्तो बहुतण्ड्रलपिष्टवत् ॥'[ प० व्रदानन्द श्ो० ६९ ] सुपुपिके पूर्वमें विज्ञानगय आदि स्वरूपोंसे जो युक था वद सुपुप्िमें उन रूपोंके विनाशरो अनेंक तण्टुलोंफा पिष् जैसे एकरूप दो जाता है, वैसे ही एकरूप दो गया। प्रज्ञान चैतन्य है। जागरणमें वृत्ियोंके अनेक शोनेसे जीवका चैतन्य उस समयमें शिथिल हो जाता है,

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९४ सिद्धान्त लेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपाधिकस्य तस्य सर्वेज्ञत्वस्य तत एव सर्वकर्तृत्वादेरप्युपपत्तेश्र। न चाऽस्मद्वुद्धिवासनोपहितस्य कस्यचित् सार्वज्यं नाऽनुभूयते इति वाच्यम्, वासनानां परोक्षत्वेन तदुपहितस्याऽपि परोक्षत्वादिति ।

अन्तर्यामी है और यह उत्पत्ति और विनाशका कारण है, इसलिए सम्पूर्ण जगत्का उपादान कारण है) इत्यादि श्रुति है। सम्पूर्ण वस्तुको विषय करनेवाली सब प्राणियोंकी धीवासनाओंसे + उपहित उस चैतन्यमें सर्वज्ञत्व और उसी श्रुतिसे सर्वकर्तृत्वकी उपपत्ति भी होती है। और हम लोगोंकी वुद्धिकी वासनाओंसे उपहित किसी चतन्यमें सर्वज्ञत्वका अनुभव नहीं होता, यह आपत्ति नहीं है, क्योंकि वासनाओंके परोक्ष होनेसे उपहित चैतन्य मी परोक्ष है।

और सुबुप्षिमें वृत्तियोंका लय होनेसे उसका घनीभाव रहता है, इसे प्रज्ञानधन-चैतन्यघन कहते हैं, आनन्दमय है अर्थात विम्यभूत ब्रह्मानन्दका प्रतिविम्ब होनेसे जीव आनन्दमय है। और यह आनन्दमय जीव सुषुप्तिकालमें अविद्यावृत्तिसे उपभोग करता है, इसलिए आनन्द्भुक् भी उसे कह सकते हैं। + आानन्दमय सर्वेज्ञ है इसमें युक्ति इस अ्न्थसे देते हैं-एक वुद्धि किसी एक धस्तुको विषय करती है और सव बुद्धियां मिलकर सभी वस्तुओंको विषय करती हैं। इस प्रकारसे सब बुद्धियां यदि सब वस्तुओंका अवगाहन करें, तो उन बुद्धियोंकी वासनाएँ भी सव पदार्थोंको अवश्य विषय करेंगी। इसलिए सव प्राणियोंकी वुद्धिवास्नाओंसे उपहित आनन्दमयमें भी सर्ववस्तुविषयकत्व होनेसे सर्वज्ञत्व अर्थात् सिद्ध ही है, अतः आनन्दमयको सर्वज्ञ माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। प्रकृतमें यह चिन्ता होती है कि धीवासनाओंसे उपरक्त अज्ञानसे उपहित जो ईश है, उसमें शुद्ध अज्ञान ही उपाधि है अथवा वासनासे उपरक्, या सम्पूर्ण धीवासना अथवा प्रत्येक वासना उपाधि है, यदि प्रथम पक्षका स्वीकार किया जाय, तो 'धीवासनाओंमें प्रतिविम्वित चैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, उसके साथ विरोध होगा, क्योंकि केवल अज्ञान उपाधि हो तो धीवासनाको उपाधि कहना व्यर्थ ही है। और द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि अज्ञानमें रहनेवाले सत्त्वांशकी परिणामरूप सर्वविषयक वृत्तियोंसे सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो फिर वासनोपरक्त अज्ञानको उपाधि मानना केवल मूर्खता है। तृतीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि एक कालमें सब वृत्तियाँ नहीं हो सकती है। इसलिए चौथा पक्ष ही परिशेषसे वचता है, परन्तु इसमें अनुभवविरोध है, और इसी अनुभवविरोधका 'न चा०' इत्यादि अन्थसे परिहार भी किया गया है। अर्थात वासनाओंके परोक्ष होनेसे उन वासनाओंसे उपहित आनन्दमयकी 'अहं सवजञः' इस प्रकार अपरोक्षानुभूति नहीं होती है, यह भाव है।

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जीेश्वर स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित ९५

पोढा चिदानन्दमयव्यप्टिर्जीव इतीरितम् ॥ ३५ ॥

ब्रजेशसूत्रवैराजाः पराभाससमोऽसुभृत् ॥ चित्रदीपे चित्रपटन्यायेनेत्थं निरूपिताः ॥ ३६॥ विराट्सूत्राक्षराण्यादो विभज्य ग्रणवाक्षरेंः। विलाप्य गोडपादीये तुरीयात्माऽवशेपितः ॥। ३७ ।। व्रदानन्द (प्रकरण) मैं विराट् आदि समा्टि और व्य्टिरूप उपाधिके भेदसे चैतन्यके कः भेद है व्यष्टि आनन्दमय जीव है, ऐसा कहा गया है। चित्रदोपमे-चिन्नपटके टटन्तसे अर्थात् जैसे शुद्ध, लाक्ठित, अकित और वर्णसे पूरित इस प्रकारसे वस्त्रके चार भेद होते हैं, वैसे ही वस, दश, सून और विराट् ये चैतन्यके चार भेद हैं और जीव ब्रद्दाके आभासके समान है, ऐसा निरूपण किया गया है। पहले विराट्, सूत और अक्षरका विभाग करके 'ओम्के' अ, उ और म्-इन तीन अक्षरोंके साथ उनका प्रविलापन करके तुरीय आतमाका गौटपादकी कारिकाओंके विवरणमें अवशेष बतलाया है॥३५॥३६॥३७॥ त्रह्मानन्दे तु सुपुप्तिसंयोगाद माण्टक्योक्त आनन्दमयो जीव इत्युक्तम्।

न्रमानन्दर्गे* तो माडक्यमें कहा गया आनन्दमय सुपुप्िके संयोगसे

पमदशीमें प्रसानन्दके योगानन्दप्रकरणमें इस अर्थके संग्राहक निम्न लिखित 'ोक हैं- 'म् जनन्दमयः गुभ्ती य विधानमयात्मताम्। गत्पा समं प्रयोर्ध वा प्रामोति स्थानभदेतः ॥' [पश०प्र० यो० श्ो० ९०] और पगदशीके चिश्नदीपप्रकरणमें चैतन्यके चार गेद चित्नपटके दशन्तसे चतलाये गये हैं- 'सभा चिन्नपटे दष्टमयस्थाना चतुष्टयम्। परमातानि विशेयं तथाऽवस्थाचतुष्टयम्ं॥१॥ गथा धौतो घदितय ल्छिती रशितः पटः। चिदन्तर्यामी सूग्रात्मा विराट् चाऽडामा तथेरयते ॥२॥ स्वतः शुधोऽत धोतःस्याहहितो Sनचिलेपनात्। मप्याकरेर्लाच्छित: स्यादजितो वर्णपूरणात्।३॥ स्वतशिदन्तर्गामी तु मागानी सूक्ष्मसष्टितः । सूनात्मा रथूलमृप्ठैय विराहित्युच्यते परः ॥४॥ इन सभी लोफोंफा गाव सृलमें मन्थकारने स्पटरूपसे लिसा है। इसलिए पुनरुक्ि नही करते है।

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९६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

यदा हि जाग्रदादिपु भोगप्रदस्य कर्मणः क्षये निद्रारूपेण चिलीनमन्तःकरणं पुनर्भोग प्रदकर्मवशात् प्रबोधे घनीभवति, तदा तदुपाधिको जीवः विज्ञानमय इत्युच्यते। स एव पूर्व सुपुप्तिसमये विलीनावस्थोपाधिकः सन्नानन्दमय इत्युच्यते। स एव माण्डक्ये 'सुपुप्स्थानः' इत्यादिना दर्शित इति। एवं सति तस्य सर्वेश्वरत्वादिवचनं कथं सङ्गच्छताम्! इत्थम्, सन्त्यधिदैवतमध्यात्मं च परमात्मन: सविशेपाणि त्रीणि त्रीणि रूपाणि। तत्राऽधिदैवतं त्रीणि शुद्धचैतन्यं चेति चत्वारि रूपाणि चित्रपट- दष्टान्तेन चित्रदीपे समर्थितानि। यथा स्वतश्शुभ्रः पटो धौतः, अन्नलिसो घट्टितः, मष्यादिविकारयुक्तो लाञ्छितः, वर्णपूरितो रज्ञितः, इत्यवस्थाचतु- प्यसेकस्यैव चित्रपटस्य, तथा परमात्मा मायातत्कार्योपाधिरहितः शुद्धः,

जीव ही है, ऐसा कहा गया है। और जब जाग्रत् आदि अवस्थाजोंमें भोग- प्रद कर्मका विनाश होनेपर निद्रारूपसे तिरोहित अन्तःकरण फिर भोग देनेवाले कर्मके वलसे प्रवोध अवस्थामें स्थूलरूपताको प्राप्त होता है, तब उस अन्तःकरणरूप उपाघिस युक्त जीव 'विज्ञानमय' शब्दसे कहा जाता है। यही जीव पहले निद्राके समयमें विलीनावस्थोपाधिक (जिसकी उपाधिकी अवस्था विलीन है) होता हुआ 'आनन्दमय' शब्दसे कहा जाता है। और इसीका माण्डक्य उपनिपत्में 'सुपुप्तस्थानः' इत्यादिसे परिचय कराया गया है। यदि आनन्दमय जीव ही है, तो 'एष सर्वेश्वरः' इत्यादि वाक्यशेषके साथ, जो जीवमें ईश्वरत्वका प्रतिपादन करता है, विरोध होगा अर्थात् उपक्रम- वाक्यकी उपसंहारवाक्यके साथ सङ्कति कैसे होगी? इस प्रकार उसकी सङ्गति होगी। [भाव यह है कि यद्यपि सुषुप्तिकालिक जीवरूप आनन्दमय चैतन्य ईश्वररूप नहीं है, तो भी ईश्वरके साथ अभेदकी विवक्षा करके उक्त उपकम और उपसंहारकी सङ्कति होगी इसीको दिखलाते हैं-] परमात्माके अधिदैव और अध्यात्म सविशेष तीन-तीन रूप हैं। उनमें से देवतात्मक तीन रूप और चौथा शुद्ध चैतन्य, इस प्रकार चार रूपोंका चित्रित वस्त्रके दृष्टान्तसे चित्रदीपमें समर्थन किया गया है-जैसे स्वाभाविक शुभ्र वस्त्न घौत कहलाता है, अन्न आदिसे लिप घट्टित कहा जाता है, स्याही आदिसे संयुक्त लाञ्छित कहा जाता है, वर्णोंसे रंगा हुआ रज्जित कहा जाता है, इस प्रकार

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवांदसहित ९७

मायोपहित ईश्वरः, अपश्चीकृतभूतकार्यसमष्टिसूक्ष्मशरीरोपहितो हिरण्यगर्भः, पश्चीकृतभूतकार्यसमष्टिस्थूलशरीरोपहितो विराद् पुरुप .4* चतुष्टयमेकस्यैव परमात्मनः। अस्मिंश्र चित्रपटस्थानीये परमात्मनि चित्र- इत्यवस्था-

स्थानीयः स्थावरजङ्गमात्मको निखिलः प्रपश्चः। यथा चित्रगतमनुष्याणां चित्राधारचसत्रसद्दशा वस्त्राभासा लिख्यन्ते, तथा परमात्माध्यस्तदेहिनामधि- ष्टनचैतन्यसदशाश्रिदाभासा: कल्प्यन्ते। ते च जीवनामानः संसरन्तीति। अध्यात्मं तु विश्वतैजसप्राज्ञभेदेन त्रीणि रूपाणि। तत्र सुपुप्तौ चिलीने अन्तःकरणे अज्ञानमात्रसाक्षी प्राज्ञः, योऽयमिहानन्दमय उक्तः । स्वप्ने व्यष्टि-

एक ही चित्रित पटकी चार अवस्थाएँ होती हैं, वैसे ही माया और उसके कार्यरूप उपाधिसे रहित परमात्मा शुद्ध कहा जाता है, माया उपाधिसे युक्त ईश्वर, अपश्चीकृत भूर्तोंके कार्यमूत समष्टि (समूह) सूक्ष्म शरीरसे उपहित* हिरण्यगर्भ और पश्चीकृत भूतोंके कार्यभूत समष्टि स्थूल शरीरसे उपहित विराद पुरुष कहलाता है। इस प्रकार एक ही परमात्माकी चार अवस्थाएँ हैं। इस परिस्थितिमें चित्रपटस्थानीय पर- * मात्मामें चित्रस्थानापन्न सम्पूर्ण स्थावर और जग्रम रूप प्रपश्न है। जैसे-चित्रमें चित्रित मनुप्योंके चित्रके आधारभूत वस्त्रके सदश वस्त्रोंके आभास लिखे जाते हैं, वसे ही परमात्मामें अध्यस्त स्थूल देहके अभिमानी अहक्वारोंके अधिष्ठानभूत- आधारभृत-चैतन्यसदश चिदाभासोंकी कल्पना की जाती है, और वे जीव- नामधारी छोकर संसारके भागी होते हैं। जीवात्मक चैतन्यके विश्व, तैजस और प्राज् मेदसे तीन रूप होते हैं। उनमसे सुपुप्ति अवस्थामें अन्तःकरणके तिरोहित होनेपर अज्ञानमात्रका साक्षी चैतन्य-प्राज्ञ है, जो कि प्रकृतमें + आनन्दमय- - • यह शाछा होती है कि दिरण्यगर्भ कहलानेवाला जो सूनात्मा है, उसीमें श्रुति और स्वृतियोंये जीवत्वकी प्रविद्धि दै, अतः उसे ईशवर मानना प्रमाणविरुद्ध है, परन्तु यह रादा गुक नहीं है, चर्योंकि समष्टि सूक्षम शरीरके अभिमानसे विशिष्ट सत्यलोकका स्वामी जीवरूप दिरण्यगर्भ ईशरये अन्य है, ऐसा स्वीकार किया गया है। ईशवरमें यद्यपि समष्टि सूक्ष्म 1 शरीरका अभिमान नहीं है, तो भी समटटिसूक्ष्मशरीरों का नियन्ता होनेसे समष्टि सूक्ष्म उपाधिसे उपदितत्य गुणके योगसे ईवरका दिरण्यगर्भ और सूतात्माशव्दसे व्यवहार होता ै। ईखरमें दिरण्यगर्भत्वका व्यवदार गौण है, सुख्य नहीं है। यही कारण है कि चित्रदीपमें ईश्वर और दिरण्यगभकी अपेक्षासे सत्यलोकके अधिपति अह्षका-उन उन वादियोंसे अभिमत ईवरकी गणनाके अवसरमें-पृथक उपादान किया गया है। + प्रकृतमें अर्थात माण्ृक्यश्ुतिमें। यहाँपर 'आनन्दभुक्' शब्दके अनन्तर 'चेतोमुखः 18

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९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

सूक्ष्मशरीराभिमानी तैजसः । जागरे व्यष्टिस्थूलशरीराभिमानी विश्वः। तत्र माण्डूक्यश्रुतिरहमनुभवे प्रकाशमानस्याऽडत्मनो विश्वतैजसप्राज्ञतुर्यावस्थाभेद- शब्दसे कहा गया है। स्वम्नमें परिच्छिन्न (अल्प) सूक्ष्म शरीरका अभि- मानी चैतन्य-तैजस है और जाअदवस्थामें परिच्छिन्न स्थूलशरीरका अभिमानी चैतन्य-विश्व है। इस रीतिसे पादकल्पनाके युक्त होनेपर माण्डक्य उपनिषत्की ्रुतिने 'अहम्' अनुभवमें प्रकाशित होनेवाले आत्माके *

प्राज्ञस्तृतीयः पादः ऐसा वाक्यशेष कहा गया है, अतः यह ज्ञात होता है, यह भाव है। चेतोमुखशब्दका अर्थ है-चेतांसि मुखानि यस्य सः चतोमुखः अर्थात् चित्प्रतिविम्बसे युक हैं अविद्यावृत्तिरूप सुपुप्तिकालीन आनन्दके अनुभवके साधन जिसके, ऐसा तृतीय पाद प्राज्ञ है। सुपुप्तिकालमें भी सुखका अनुभव होता है, क्योंकि उठनेके वाद 'में सुखसे सोया था' यह स्मरण होता है। यदि सुखका अनुभव न होता, तो यह स्मरण कैसे होता, कारण कि अनुभवके बिना स्मरण नहीं हो सकता, यह रहस्य है। * इस श्रुतिमें पादशब्दका अर्थ है-पद्यते-अवगम्यते ब्रह्मात्म्यैक्यम्, एभिः इति पादा: अर्थात् जिनके द्वारा ब्रह्मा और आत्माका ऐक्य जाना जाता है, वे पादशब्दसे कहे जाते हैं। इसी व्युत्पत्तिका अङ्गीकार करके श्रीतपादकल्पनाका प्रयोजन भी 'पूर्वपूर्व' इत्यादि ग्रन्थसे वतलाया गया है। अभिप्राय यह है कि 'सोयमात्मा चतुष्पात्' इस वाक्यसे जीवके चार पादोंका उपक्रम करके 'जागरितस्थानो वैश्वानरः प्रथम: पाद:' इत्यादिसे प्रथम पाद कहा गया है। यहाँपर जीवपादोंका उपक्रम होनेसे 'विश्वः प्रथमः पादः' ऐसा कहना चाहिए, परन्तु वैश्वानरशब्दके वाच्य विराट् पुरुषरूप ईश्वरमें प्रथमपादत्वका कथन विश्वमें वैश्वानरका अन्तर्भाव सूचन करता है। द्वितीयपादके वोधक वाक्यमें 'स्वप्स्थानस्तैजसो द्वितीयः पादः' ऐसा कहा गया है, यहाँ सूक्ष्म उपाधिकी समानता होनेसे हिरण्यगर्भ का तैजसमें अन्तर्भाव होता है, कारण कि 'वैश्वानरः प्रथमः पादः' ऐसा उपकम है। 'सुषुप्तस्थान एकीभूत आत्मा' यह तृतीय पादका प्रतिपादक, जो पूर्व वाक्य है, इसमें भी तृतीय पादरूपसे कहे गये प्राज्ञशन्दित आनन्दमयमें सूक्ष्मतर उपाधिकी समानतासे ईश्वरका अन्तर्भाव विवक्षित है। इसलिए 'एप- सर्वेश्वरः' इत्यादि वाक्यशेषके आनन्दमय और ईश्वरकी परस्पर अभेदविवक्षामें प्रवृत होनेसे अनुपपत्ति नहीं है। तुरीयपादका प्रतिपादक वाक्य है-'अदृश्यमव्यवहार्यमत्राह्यमलक्षण- मचिन्त्यमव्यपदेश्यमकात्मप्रत्ययसारं प्रपच्चोपशमं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते' (इन्द्रियोंका अविषय, व्यवहारका अविषय, कर्मेन्द्रियोंका अविपय, असाधारण धमासे शून्य, शुष्कतरकसे अगम्य, शब्दशकतिका अविषय, स्वगतभेदसे रहित, सब देहोंमें व्याप्त, चिद्रूप, आनन्दरूप, प्रपश्चाभावरूप, शुद्ध और अद्वैत-विश्व, तैजस, और प्राज्ञरूप तीन पादोंकी अपेक्षा-चतुर्थ- पाद है, ऐसा मानते हैं-चिन्तन करते हैं) इसमें विश्व, तैजस और प्राज्ञलक्षण पादोंमें वैश्वानर, हिरण्यगर्भ और ईदवरका जो अन्तर्भाव कहा गया है, वह-उनके परस्पर एकत्वका अनुचिन्तन करनेके लिए है। इसी प्रकार विश्व आदि पादोंका और ओंकारके अवयवभूत

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जीवेइवरंस्व रूंपंविचार ] भापानुवादसहित

रूपं पादचतुष्टयम् 'सोडयमात्मा चतुष्पात्' इत्युपक्षिप्य पूर्वपूर्वपादग्रविलापनेन

'सोडयमात्मा चतुष्पात्' (यह आत्मा चार पादवाला है) इस प्रकार विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय अवस्था विशेषरूप चार पादोंका उपक्रम करके पूर्व- पूर्व पादोंके तिरोधानसे निष्प्रपश्च ब्रह्मरूप चतुर्थपादके ज्ञानके सौळभ्यके लिए मात्राओंका एकत्व-चिन्तन यहाँ विवक्षित है। इसमें क्रुति है-पादा मात्रा मात्राश्च पादाः' (पाद मान्राएँ है और मात्राएँ पाद हैं) इसी अर्थका प्रतिपादक गौदपादका वचन भी है- 'भोक्वारं पादशो विद्यात् पादा मात्रा न संशयः ।' अर्थात् विश्व आदि पाद और मात्राओंके परस्पर एकत्वका अनुचिन्तन करना चाहिए, यह इस वचनका भाव है। मात्रा-अकार, उकार, और मकार। इसी रीतिसे विश्वादिपाद, वश्वानरादि पाद और मात्राओंका एकत्वचिन्तन उन सबका निष्प्रपव ब्रह्मरूप चतुर्थपादमें प्रचिलापनार्थ है। इसमें यह क्रम है-विश्व, वैश्वानर और अकारके एकत्वका पहले चिन्तन करनेके अनन्तर तैजस, हिरण्यगर्भ और उकारके एकत्वका अनुचिन्तन करे, उसके वाद ईश्वर, प्राज्ञ और मकारके एकत्वका अनु. चिन्तन करे। इसी चिन्ताके कमसे प्रचिलापन करे। अकार आदि त्निकका उक्कारमें, उकारादि त्रिकका मकारमें और मकार आदि त्रिकका चिन्मान्न तुरीयपादमें प्रविलापन करे। चिन्मात्रमें प्रविलापन करके वहीं चित्तको स्थिर करे। उकार आदिमें प्रविलापन करना अर्थात् अकार आदि तीन उकारसे पृथक नहीं है, इस प्रकार आहार्य निश्चय करना। इस प्रकार प्रतिदिन समाधि करनेवालको ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। और ब्रह्मसाक्षात्कारसे- म्रह्मप्राप्तिसे-कृतकृत्यता होती है। इसी भावको सुरेश्वराचार्यने वार्तिकमें इस रूपसे कहा है- 'अकारमान्रं विश्वः स्यादुकारस्तैजसः स्मृतः । प्राक्षो मकार इत्येवं परिपश्येत् कमेण तु ॥४७।। समाधिकालात प्रगेवं विचिन्त्यातिप्रयत्नतः । स्थूलसूक्ष्मक्मात् सर्व चिदात्मनि विलापयेत् ॥।४८॥ अकारं पुरुपं विश्वमुकारे प्रचिलापयेद्। उकारं तैजसं सूक्ष्मं मकारे प्रविलापयेत् ॥४९॥ मकारं कारणं प्राज्तं चिदात्मनि विलापयेत्। चिदातमाहं

जात्वा विवेचकं चित्तं तत्साक्षिणि विलापयेत्॥५१॥ चिदात्मनि विलीनं चेत्तचितं नैव चालयेत्। पूर्णाचलस मुद्रवत्।।५२। एवं समाहितो योगी श्रद्धाभक्तिसमन्वितः। जितेन्द्रियो जितक्रोधः पश्येदात्मानमद्दयम्॥५३॥

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सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद'

म्यात् विराडादीन् विश्वादिष्वन्तर्भाव्य 'जागरितस्थानो चहिःप्रज्ञः' इत्यादिना विश्वादिपादान् न्यरूपयत्। अतः प्राज्ञश्दिते आनन्दमये अव्या- कृतस्येश्वरस्याऽन्तर्भावं विवक्षित्वा तस्य सवश्वेरत्वादितद्धर्मवचनमिति। इत्थमेव भगवत्पादैगौंडपादीयविवरणे व्याख्यातम्। मायाच्छन्ने चिदाभासः कूटस्थे व्यावहारिकः ॥ तस्मिन्निद्रावृते ताहकू जीवोऽन्यः प्रातिभासिकः ३८ ॥ जीवस्त्रिधैवं हृग्दृश्यववेके प्रतिपादितः । इत्येते दर्शिताः पक्षाः प्रतिविम्वेशवादिनाम् ॥ ३९॥ अन्तःकरणावच्छिन्न कूटस्थ चैतन्य पारमार्थिक जीव है, मायावृत कूटस्थमें (मायामे कल्पित अन्तःकरणमें) जो चित्का आभास है, वह व्यावहारिक जीव है और निद्रासे आवृत व्यावहारिक जीवमें कल्पित चिदाभास प्रातिभासिक है, इस प्रकार त्रिविध जीव का हगूदृश्यविवेकमें प्रतिपादन किया गया है, इस रीतिसे ईश्वरको प्रति- बिम्बरूप माननेवालोंके पक्ष दिखलाये गये हैं॥३८॥३९॥

स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर उपाधिकी समानतासे विराड् आदिका विश्व आदिमें अन्तर्भाव करके 'जागरितस्थानो वहिःप्रज्ञः' (जागदवस्थाका अभिमानी वहिःप्ज्ञ है) इत्यादिसे विश्व आदि पादोंका निरूपण किया है। इससे प्राज्ञशव्दसे कहे जानेवाले आनन्दमयमें अव्याकृत * ईश्वरके अन्तर्भावकी विवक्षाकरके उसमें (आनन्दमयमें) सर्वेश्वरत्व आदि ईश्वरके धर्मोंका कथन है। भगवान् शक्करने गौड़पादीय-विवरणमें भी ऐसा ही व्याख्यान किया है।

  • यद्यपि अव्याकृत शब्दका अर्थ है-अनभिव्यक्त जगत्, तथापि लक्षणाधृत्तिसे भनेक स्थलोंमें वह ईश्वरार्थक भी प्रसिद्ध है, अतः यहाँ अव्याकृतशब्द ईश्वरके अर्थमें आया है। इस ग्रंन्थमें विश्व आदि पादोंका पूर्व-पूर्वमें प्रविलापन करनेसे निष्प्रपश्व ब्रह्मका ज्ञान अत्यन्त सुलभ कहा गया है। यद्यपि श्रावण आदि अन्य ब्रह्मज्ञानके साधन हैं, तो भी मन्दवुद्धिवाले संन्यासीको अथवा प्रखर-वुद्धिमान् होते हुए भी जिसको न्याय-व्युत्पादक कुशल आचार्य नहीं मिला है, ऐसे संन्यासीको साठ्ख्यमार्ग द्वारा तत्त्वप्रतिपत्ति नहीं हो सकती है, इसलिए उक्त पुरुषोंको अनायास ब्रह्मज्ञानके साधनरूपसे वुद्धिपूर्वेक प्रविलापन क्रमसे माण्डक्य आदि अन्थमें समाधिका विधान है, इसीलिए ध्यानदीपमें विद्यारण्यस्वामीजीने भी कहा है- 'अत्यन्तवुद्धिमान्याद्वा सामग्रया वाप्यसम्भवात्। यो विचार न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम्॥' ५४ ध्या० दीप ॥

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुंवादसहित

दग्दृश्यविवेके तु चित्रदीपव्युत्पादितं कूटस्थं जीवकोटावन्तर्भाव्य चित्रै विध्यप्रक्रियैवाSऽलम्वितेति विशेप:। तत्र ह्युक्तं जलाशयतरङ्गवुद्वुदन्यायेनोपर्युपरि कल्पनाद् जीव: त्रिविध := पारमार्थिक:, व्यावहारिकः, प्रतिभासिकश्चेति। तत्रा्वच्छिन्ः पारमासथिरिकी

विद्यारण्यस्वामीजीने दृम्दश्यविवेकमें तो-चित्रदीपप्रकरणमें, सयुत्पादित कूटस्थका जीवकोटिमें अन्तर्भाव करके-चैतन्यकी त्रिविधप्रक्रियाका ही मवलम्वन किया है, यह विशेष है। टगृदश्यविवेकमें जलाशयके तरक और बुद्बुदके दष्टान्तसे ऊपर रऊपर की कल्पनासे जीवके तीन ेद कहे गये हैं-पारमार्थिक, व्यावहारिके"और प्रातिभासिक। तीन जीवोंमें से अवच्छिन्न अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म दो शरीरोसै अर्वच्छिन्न कूटस्थ आत्मा-पारमार्थिक जीव है। उस अवच्छिन्न जीवमें

अर्थात् बुद्दिकी मन्दतासे अथवा सामग्रीके अभावसे जो विचार नहीं कर सकता, वह प्रतिदिन बरस्स को उपासना करे, यह भाव है। अतः मूलमें भी 'प्रतिपत्तिसौकर्य्याय' यही कहा गया है यह ध्यान रखना चाहिए। * जलाशय, तरम और वुद्बुदके दष्टान्तका साराश यह है-जैसे समुद्र आदि जलाशयमे सरभ ऊपर रहती हैं और उनके ऊपर बुद्युद रहते हैं, यह प्रसिद्ध है, इसी प्रकार कूटस्थवे ऊपर व्यायदारिक अन्तःकरणमें प्रतिविम्बरूप सम्पूर्ण व्यवहारकालमें अनुगत व्यावहारिक जीवकी कल्पना की जाती है और उसके ऊपर स्वप्कालमें वासनामय प्रातिभासिक रथ आदिके समान वासनामय अन्तःकरणमें प्रतिविम्यरूप प्रातिभासिक जीवकी कल्पना की जाती है। रस विषयमें दगटश्यविचेकके निम्न लिसित छोक है, जिनका भाव भी मूल अ्रन्थके अनुसार दी दे- 'अवच्छिमः चिदाभासस्तृतीयः स्वप्कल्पितः। विजेयस्त्िविधो जीवस्तन्रायः पारमुाथिकन॥२॥ .. अवच्छेद: कल्पितः स्यात् अवच्छेदन्त्र वास्तवम्) तस्मिन् जीवत्वमारोपात् ब्रह्मात्वन्तु स्वेभावतः ।३३॥ अवच्छिपस्य जीवस्य पूर्णेन मेदाणकताम्। तत्वमस्यादियाक्यानि जगनतरजीवयो: ॥३४॥ महाण्यवस्थिता माया विक्षेपतृति रूपिणी।, आशृत्यासण्ठतां तस्मिन् जगजीवी प्रकल्पयेत् ।।३५॥ जीवो धीस्थविविदाभासो जगत् स्यात गतभौतिकम्। अनादिकालमारभ्य मोक्षात् पूर्वमिदं ्यमूः॥३६।.

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१०२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

जीवः । तस्मिन्नवच्छेदकस्य कल्पितत्वेऽपि अवच्छेद्यस्य तस्याडकल्पितत्वेन ब्रह्मणोडभिन्नत्वात्। तमावृत्य स्थितायां मायायां कल्पितेऽन्तःकरणे चिदाभासोऽन्त:करणतादात्म्यापच्या 'अहम्' इत्यभिमन्यमानो व्या- वहारिकः, तस्य मायिकत्वेऽपि यावद्वयवहारमनुवृत्तेः । स्व्रप्ने तमप्यावृत्य स्थितया मायावस्थाभेदरूपया निद्रया कल्पिते स्वान्नदेहादावहमभिमानी प्रातिभासिकः। स्वम्नप्रपश्चेन सह तद्द्रष्टुरजीवस्यापि प्रवोधे निवृत्तेरिति। एवमेते प्रतिविम्बेश्वरवादिनां पक्षभेदा दर्शिताः । अविद्यायां चिदाभासो जीवो विम्बचिदीश्वरः। स्वातन्त्र्याद्युपपत्तेरित्या हुर्विवरणानुगा: ॥।४० ।।

विवरणके अनुसारियोंका कहना है कि अविद्यामें चैतन्य का आभास जीव है और बिम्वस्थानापन्न चैतन्य ईश्वर है, क्योंकि उसमें स्वातन्त्र्य आदिकी उपपत्ति है॥४०॥

विशेषणीभूत स्थूल और सूक्ष्म शरीरोंके कल्पित होनेपर मी विशेष्यभूत चैतन्यके स्वतः सत्य होनेसे उसका (जीवका) ब्रह्मके साथ अमेद हो सकता है। कूटस्थ आत्माको आवृत करके अविद्याके स्थित होनेपर कूटस्थ आत्मामें कल्पित अन्तःकरणमें-अन्तःकरणके तादात्म्यसे 'अहम्' (मैं) इस प्रकारका अभिमान करनेवाला-चिदाभास व्यावहारिक जीव है। यद्यपि वह मायिक है, तो भी व्यवहारपर्यन्त उसकी अनुवृत्ति होती है। [कोई लोग शङ्का करते हैं कि व्यावहारिक जीव है ही नहीं, परन्तु यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहं कर्ता भोक्ता' इत्यादि अनुभवसे वह सिद्ध है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म जीवसे अन्यत्र-अन्तःकरणमें नहीं रह सकते, क्योंकि चिदाभासशून्य अन्तः- करणमें चेतनधर्मत्वसे प्रसिद्ध कर्तृत्व आदि नहीं रह सकते। पारमार्थिक जीव भी कर्तृत्वका आश्रय नहीं है, क्योंकि वह कूटस्थ है, यह भाव है ] स्वमावस्थामें व्यावहारिक जीवका भी आवरण करके स्थित मायावस्थाविशेष निद्रासे कल्पित स्वप्नके शरीर आदिमें 'अहम्' अभिमान करनेवाला जीव प्रातिभासिक है, क्योंकि जागरणावस्थामें स्वमप्रपश्चके साथ ही साथ स्वम्- द्रष्टा जीवकी भी निवृत्ति होती है। इस प्रकार प्रतिबिम्बको ईश्वर कहनेवालोंके पक्षोंका दिग्दर्शन कराया गया है।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १०३

विधरणानुसारिणस्त्वाहु :- 'विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते। आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं क: करिष्यति।।' इति स्मृत्यैकस्थैवाऽज्ञानस्य जीवेश्वरविभागोपाधित्वप्रतिपादनात् विम्वप्रतिविम्वभावेन जीवेश्वरयोर्विभागः, नोभयोरपि प्रतिविम्बभावेन। विवरणके अनुयायी कहते हैं कि विमेदजनक अज्ञानका-जीव और ईश्वरके अवस्थानमं हेतुभृत अज्ञानका-आत्यन्तिक नाश * होनेपर जीवात्माका और परमात्माका (वरसका) असत्-अनिर्वचनीय मेद कौन करेगा अर्थात् कोई नहीं करेगा। इस प्रकारकी स्मृतिसे एक ही अज्ञान जीव और ईश्वरकी उपाधि कहा गया है, अतएव विम्ब और प्रतिविम्वरूपसे जीव और ईश्वरका विभाग है।। इन दोनोंका प्रतिविम्बरूपसे विभाग नहीं है, क्योंकि दो

क आत्यन्तिकनाश-समूल अज्ञानका विनाश। यद्यपि अज्ञानका सुपुप्ति या प्रलयमें कार्य- कारणका अभद होनेसे कार्यका नाश दोनेसे कायार्तमना अज्ञानका विनाश है, परन्तु वह आत्य- न्तिफ चिनाश नहीं है, कयोंकि स्वरूपतः उसकी स्थिति है, अन्यथा पुनरुत्यानकी अनुपपत्ति होगी। तत्वज्ञानसे दोनेवाला अज्ञाननाश स्वरूपसे ही होता है, अतः वह आत्यन्तिक विनाश है, इसी अभिप्रायसे अज्ञाननाशमें आत्यन्तिक विशेषण दिया गया है। अथवा जीवन्मुकतिम आवरण अंशञका नाश दोनेपर भी अज्ञानके विक्षेपशिक रहनेसे आत्यन्तिक नाश नहीं है, परन्तु विदेरसुकिमें दी है, इसी अभिग्रायसे आत्यन्तिक विशेषण दिया गया है, यह भी वुछ लोग कहते हैं। +यहां शक्ा होती है कि 'विभेदजनकेऽज्ञाने०' इस श्रुतिके अनुसार ईशको विम्ब और जीवको प्रतिबिम्ब माननेमें दोनोंको प्रतिबिम्ब माननेवाली 'जीवेशवाभा०' इस श्रुतिके साथ विरोध दोगा। दसपर विनरणानुयायी कहते हैं कि प्रतिविम्बत्वके समान विम्बत्वके भी कस्वित होनेये आभावशब्दसे बिम्ब और प्रतिषिम्ब दोनोंका भ्रहण दो सफता है, अतः विरोध नहीं है। यदि शक्ता की जाय कि प्रतिविम्वत्वसे नुफ युग आदिमें दी आभाय्यव्दफा व्यवदार होता है, विम्बत्वविशिष्ट सुखमें आभास- शब्दका व्यवदार नदीं होता, अतः आभारशव्दका सुख्य अर्थ चिम्त्र नहीं हो सकता, इसलिए .. आभावदब्दकी बिम्वमें लक्षणा माननी पदेगी, तो यह शक् नहीं हो सकती, क्योंकि एक बार उपरित आभायदाव्दका सुख्यपतिये प्रतिबिम्ब अर्थ और गौणीवृतिसे चिम्च अर्थ नहीं हो गखता। यदि कहिये कि अजदलक्षण मानकर आभासशब्दके दोनों अर्थ मानेंगे, सो भी युक नहीं है, यर्गोंकि जय दोनोंको अर्थात जीत और ईश्वरको प्रतिविम्ब मानकर ही विभाग हो सकता दे तथ फिर, लक्षणाके सगस्षमें पदनेकी आवश्यकता ही क्या है? इसपर विवरणानुसार उत्तर है कि श्रुतिके अनुसार भी जीन ओर ईश्वरका विभाग फेवल प्रतिबिम्बरूपसे नहीं हो सकता, सूर्यके समान

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१०४ सिद्धान्तलेश संग्रह प्रथम परिच्छेद

उपाधिद्वयमन्तरेणोभयोः प्रतिविम्धत्वायोगात्। तत्राऽपि प्रतिविम्बो जीवः। विम्वस्थानीय ईश्वरः। तथा सत्येव लौकिकविम्त्प्रतिविम्वदष्टान्तेन स्वातन्त्र्यमीश्वरस्य, तत्पारतन्त्र्यं जीवस्य च युज्यते।

पुमान् क्रीडेद्यथा त्रह्म तथा जीवस्थविक्रियाः ॥' इति कल्पतरूक्तरीत्या 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' (उ० मी० अ० २ पा० १ सू० ३३) इति सूत्रमपि सङ्गच्छते। अज्ञानप्रतिविम्न्नितस्य जीव-

उपाधियोंके विना दो प्रतििम्ब हो ही नहीं सकते। उनमें भी (विम्ब और प्रतिविम्ब दोनोंमें भी) प्रतिविम्बस्थानापन्न जीव है और विम्वस्थानीय ईश्वर है। विम्वचैतन्यके ईश्वर होनेसे ही लौकिक विम्ब और प्रतिविम्वके दृष्टान्तसे ईश्वरमें स्वातन्त्र्य और जीवमें ईश्वरका पारतन्त्र्य संगत होता है । 'प्रतिविम्बगता:०' (जैसे लोकमें कोई पुरुष दर्पणमें पड़े हुए अपने प्रति- विम्बके ऋजु और वक्र आदि भावोंको विम्वरूप अपनेसे हुए देखकर खेलता है, वैसे ही व्रह्म भी जीवस्थ प्राणियोंके कर्मानुसार स्वप्रयुक्त भावोंको देखकर खेलता है) इस प्रकार कल्पतरुमें कही गई रीतिसे 'लोकवत्तु लीला- कैवल्यम्' यह सूत्र भी सङ्कत होता है। जैसे सर्वत्र व्याप्त सूर्यके किरणोंका

विम्वभूत चैतन्यके एक होनेसे उपाधिकी भिन्नताके विना प्रतिविम्वका भेद नहीं हो सकता। माया और अविद्या दो उपाधियां हैं, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि मूलप्रकृतिके मायात्व और अविद्यात्वके लक्षणभेदसे भिन्न होनेपर भी प्रतिबिम्बद्वयसे अपेक्षित दो उपाधियों का कहींपर प्रतिपादन नहीं किया गया है और मायाका स्वरूपतः भेद भी सिद्धान्तविरुद्ध है, अतः आभासशव्द लक्षणावृत्तिसे विम्ब प्रतिविम्ब उभयपरक ही है। 4 'एष सर्वेश्वरः' इत्यादि श्रुतिसे ईश्वरमें स्वातन्त्र्य सिद्ध है और 'एप ह्पेव साधु कर्म कारयति' इत्यादि श्रुतिसे जीवमें पारतन्त्र्य सिद्ध है। 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्'-किसी प्रकारके प्रयोजनके चिना सृष्टि आदिमें प्रृत्ि रूप ईश्वरकी जो क्रिया है, वह केवल लीला ही है, जैसे लोकमें सव साधनोंसे सम्पन्न पुरुपकी कीड़ा किसी प्रयोजनविशेपके लिए नहीं होती, वैसे ही आप्काम इश्वरकी भी प्रयोजनके चिना स्वभावतः ही सृष्टिमें प्रवृत्ति उपपन्न है। लोकमें अत्यन्त सुखका उद्रेक होनेसे हँसना, गाना आदि प्रयोजनके विना ही होने लगता है और दुःखके उद्रेकसे रोना आदि स्वभावतः हुआ करता है, अतः हँसने या रोनेमें लोकमें कारण पूछा जाता है, परन्तु प्रयोजत नहीं पूछा जाता, यह 'लोकवत्त' इत्यादि सूत्रका भाव है।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १०५

स्याऽन्तःकरणरूपोऽज्ञानपरिणामभेदो विशेपाभिव्यक्तिस्थानं सर्वतः प्रसृतस्य सवितृप्रकाशस्य दर्पण इव। अतस्तस्य तदुपाधिकत्वव्यवहारोऽपि। नैता- वताडज्ञानोपाधिपरित्यागः, अन्तःकरणोपाधिपरिच्छिन्नस्यैव चैतन्यस्य जीवत्वे योगिन: कायव्यृहाधिष्ठानत्वानुपपत्तेः। न च योगप्रभावाद्योगिनोऽन्तःकरणं कायव्यूहाभिव्यक्तियोग्यं चैपुल्यं मामोतीति तद्वच्छिनस्य कायव्यूहाधिष्ठानत्वं युज्यते इति वाच्यम्, 'प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० १५) इति

अभिव्यक्तिस्थान दर्पण है, वैसे ही अज्ञानमें प्रतिविम्वित जीवका विशेष अभि- व्यक्ति-स्थान अज्ञानका परिणामरूप अन्तःकरण है। भाव यह है कि अविद्यामें प्रतिविग्वित सुपुपितसाधारण चैतन्यरूपकी म्रमातृत्व, कर्तृत्व आदि विशेषरूपसे अभिव्यक्ति-उपलन्धिका स्थान (उपाधि) अन्तःकरण है। कर्तृत्व आदि धर्मोके केवल अज्ञानके परिणाम न होनेसे उनकी उपाघिमात्रतासे जीवमं कर्तृत्व आदिका लाभ नहीं हो सकता, किन्तु कर्तृत्व आदि धर्मवाले अन्तःकरणके तादात्म्यके' अध्याससे ही जीवमें कर्तृत्व आदिका लाभ हो सकता है, अतः अन्तःकरणमें जीवकी उपाधिताका वर्णन किया गया है। अन्तःकरण विशेष उपलन्धिका स्थान है, ऐसा स्वीकार करनेसे जीवमें अन्तःकरणोपाघिकताका व्यवहार भी है, अर्थात् 'कार्योपाघिरयं जीवः' इत्यादि श्रुतिमें और भाष्यमं, यह रहस्य है। श्रुतिगं कार्योपाधिकताके विशेषणमात्रसे अज्ञानोपाधिकताके निराकरणका परित्याग नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणरूप उपाधिसे परिच्छिन्न चैतन्यको जीव माननेपर योगियोंमें एककालीन अनेक शरीरोंकी नियन्तृताकी उपपति नहीं दोगी। . योगके प्रभावसे योगीका अन्तःकरण कायव्यूद्में-देहसमूहमें-अभिव्यक्तिके योग्य व्यापकता प्राप्त करता है, अतः उस अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चिदात्मा भी कायव्यूह्का भेरक हो सकता है? ऐसी शका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'प्रदीपवदावेदस्तथा हि दर्शयति' * इस शासत्रोपान्त्याधिकरणके अर्थात् *प्रदीपनदावेशस्तथा हि दर्शयति' इस सूत्नका अर्थ इस प्रकार है-जैसे एक ही प्रदीपका अनेक वक्ियोंमें प्रषेश है, वैसे ही एक ही योगीका योगके प्रभावसे अनेक शरीरोंमें आपेश-प्रवेश होता है। गद्यपि पूर्व दीपका और वत्तियोंमें प्रविष्ट अन्य दीपोंका परस्पर 18

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१०६ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

शास्त्रोपान्त्याधिकरणभाष्यादिपु कायव्यूहे प्रतिदेहमन्तःकरणस्य चक्षुरादिवद् भिन्नस्यैव योगप्रभावात् सृष्टेरुपवर्णनात्। प्रतिविम्बे विम्बात् भेदमात्रस्याऽ- भ्यस्तत्वेन स्वरूपेण तस्य सत्यत्वान्न प्रतिविम्बरूपजीवस्य सुक्त्यन्वयासम्भव

ब्रह्ममीमांसांशास्त्रके अन्तिम अविकरणके पहले अधिकरणके भाप्य आदिमें कायव्यूहमें योगके प्रभावसे प्रत्येक शरीरमें चक्षु आदिके समान पृथक्- पृथक अन्तःकरणकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है।। प्रतिविम्बमें विम्बसे जो भेद है * वही कल्पित है, इससे स्वरूपतः उसके सत्य होनेसे

भेद है और योगीका सब देहोंमें अमेद ही है इस प्रकार द्टान्त और दार्द्ान्तमें वैषम्य है, तथापि दीपत्वजातिके अभेदका व्यक्तियोंमें आरोप करके दृष्टान्त और दार्शान्तिककी उपपत्ति करनी चाहिए। एक योगीकी अनेकताको श्रुति भी दिखलाती है-'स एकधा भवति त्रिधा भवति पख्वधा सप्तधा' (वह योगी एक प्रकारका, तीन प्रकारका, पांच प्रकारका और सात प्रकारका अर्थात् अनेक प्रकारका हो सकता है)। एक ही समयमें अनेक शरीरोंमें योगीके अवस्थानके बिना अनेकत्व उपपन्न नहीं हो सकता। * यदि एक ही अन्तःकरणकी कार्यव्यूहमें अभिव्यकिके योग्य विपुलता मान ली जाय, तो उक्त भाष्यके साथ अवश्य विरोध होगा। यद्यपि भाप्य आदिका यह तात्पर्य कहना उचित है कि योगीका पूर्वसिद्ध अन्तःकरण. ही-योगके प्रभावसे विपुलता प्राप्त कर स्वाव- च्छिन चैतन्यरूप योगीके कायव्यूहमें-भोग आदि कराता है। योगप्रभावसे अनेक अन्तः- करण उत्पन्न होते हैं, ऐसा तात्पर्य मानना ठीक नहीं है, क्योंकि अनेकविध अन्तःकरणोंक्ी सृष्टि माननेमें कल्पनागौरव और असत्कार्यवादका प्रसन्न आता है और हिरण्यगर्भ आदिका ब्रह्माण्डव्यापी जो समाष्टि अन्तःकरण है, वह भी योगप्रभावसे ही है, भाप्यमें जो अन्तः- करणकी सृष्टिका प्रतिपादन है, वह परकीय मतके अभिप्रायसे है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि 'एपैव च योगशास्त्रपु' इत्यादि भाप्यमें यह अर्थ स्पष्ट है, तथापि शास्त्रो- पान्त्याधिकरणके यथाश्षुत भाप्यके अभिप्रायसे यह दूपण दिया गया है, ऐसा समझना चाहिए। * इस प्रन्थसे-चित्रदीपमें जो प्रतिविम्ब चैतन्यरूप जीवके स्वरपतः मिथ्या होनेसे त्रिकालावाधित ब्रह्मके साथ उस जीवकी एकता नहीं हो सकती, इसलिए चैतन्यके चार भे र करके ऐक्यनिर्वाहके लिए जीव और ईश्वरसे विलक्षण कूटस्थ चैतन्य माना गया है, और दग्दश्य- विवेकमें प्रतिविम्त्रको मिथ्या मानकर युक्तिसे अन्वयके लिए जो पारमार्थिक जीवकी कल्पनाकी गई है-उसका परिहार किया जाता है। अर्धात् प्रमाणके न होनेसे प्रतिविम्ब जीवसे अतिरिक् अन्य जीव-कूटस्थ या व्यावहारिक जीवसे अन्य प्रातिभासिक जीव नहीं है, यह भाव है, कुछ लोग शङ्का करते हैं कि व्यावहारिक जीव स्वप्रकालमें आवृत रहता है, अतः स्वप्समयके व्यवहारकी अनुपपत्ति ही प्रातिभासिक जीवकी कल्पना करती है। नहीं अनुपपति

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित .१०७

इति न तदतिरेकेण सुक्त्यन्वयायाऽवच्छिनरूपजीवान्तरं वा प्रतिविम्बजीवा- तिरिक्तं जीवेश्वरचिलक्षणं कृटस्थशव्दिनं चैतन्यान्तरं वा कल्पनीयम्। 'अविनाशी वा अरेज्यमात्मा' इति श्रवणं जीवस्य तदुपाधिनिवृत्तौ

प्रतिविग्वरूप जीवका मुक्तिमें अन्वयका संभव नहीं हे यह नहीं कह सकते, इससे प्रतिविग्यरूप जीवसे पृथक मुक्तिमें सम्बन्ध होनेके लिए अवच्छितरूप अन्य जीवकी या प्रतिबिम्न जीवसे अतिरिक्त्त जीव और रश्वरसे विन्क्षण कूटस्य शब्दस कहे जानेवाले भिन्न चैतन्यकी कल्पना नहीं करनी चाहिए। + 'अधिनाशी वा अरे०' (अरे मैत्नेयि ! यह आत्मा अवि- नाथी है) इत्यादि श्रुति जीवकी उपाधिका विनाश होनेसे प्रतिविम्बभावका

नही दे, औवभैवन्स्मे आवरण नही होता दे, इसका गे ाक्षिनिरूपणमें वर्णन करेंगे, इससे रममें भी जीपरेसन्ससे सी व्यवदारकी उपपति दोगी। 'जिस मैंने सवपमे श्रीकृष्णको देसा था, महो में अगरर उस कुष्णया स्मरण करता है' दग प्रहारधे प्रतीतिसे जाम्त् और स्वमके दष्टाका समेद हो गासता है। इमीलिए प्रातिभागिष् जीपकी वलपना निर्दुट नहीं है। हअनदिपानु विनश्वत', 'अविनाक्षी का अरजयमात्मा' इत्यादि वाक्योये प्रकृत विमानपन अामे रिनाशित और अविनादित्वरूप विनुद धर्मोफा प्रतिपादन किया गया है, परन्तु इनका एहमें मनोपेग नहीं दो यपना, इसलिए विनासी प्रतिषिन्स्रसे भिन्न विनाशरदित कूटस्थ ननन्वदी विदि दोसी दे, गए जो यदा गया दै, चद भी अगमत है, क्योंकि अविदा- भमिविन्य नतन्दमप जीपमे ही प्रिविम्यत्रूप विशेषणशके नाशके अभिप्रायसे विनाशित्वका श्रविवादन दे सर नतन्वतर सिवेध्य अकषके अनिप्रगसे अविनाशित्वका प्रतिपादन है, एग म्रहाशरी न्वपराये भी विवाशित और अपिनाशित्वका व्यवदार दो सकता है ऐसी अरायामे गोरवदीपणे दूमिस पनिमेदकी रल्तना नदीं करनी चाहिए। यदापर शक्ी होथीं हे कि अवियाने प्रिविम्य नेतन्य तीत है, अवियामें विभ्वभून चैतन्य ईशर दे और विम्ब दवं अ्मिबित्यम अनुगत नेसन्म शुद नतन्य है। इस विपरणपक्षमें चैतन्के चार भेद माननेान्योंने पृदस्पशा जो सह्ोपार रिया है, उस्का किसमें अन्तर्मान दोता है? जीवमें या सुद नैनन्ये तो दमया सम्तर्मान से नदीं मकता, कर्योकि से दोनों किसीफे प्रति उपादान नहीं दे और मूटरप मो रयूड्मूक्ष्म परीरके प्रति उपादान माना गया है, अतः उनमें कृटस्यका अन्नमं.प नदीं हो गहना। इससें भी उमस अन्तर्भान नदीं सो सकता, क्योंकि कृउस्पका ददादि विवरोमें अवऱयान हे और ददरस्को ऐसी अवस्थितिमं कोई प्रमाण नहीं है। परन्तु गह गहा दुष नही दै, पर्योंकि फूटरपका जीन या शुद्ध वैतन्य्मे अन्तर्भाष न होनेपर भी हसरने शम्तगांव हो गपना दे, गर्योकि पदी दशरप पतन्य नेतनात्मक और अचेतनात्मक रमस्न प्रानरा उपाकन देऔर देदनिगारोंमें उसका अवस्थान भी है, अतः कूटस्थ चैतन्य- का ईसरये मेद मानना श्रामाषिक नहीं है।

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१०८ सिद्धान्तलेशसंग्रंह [प्रथम परिच्छेद

प्रतिबिम्बभावापगमेऽपि स्वरूपं न विनश्यतीत्येतत्परम्, न तदतिरिक्तकूट- स्थनामकचैतन्यान्तरपरम्। जीवोपाधिना अन्तःकरणादिनाज्वच्छिन्नं चैतन्यं विम्बभूत इश्वर एव। 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादिश्रुत्या ईश्वर- स्यैव जीवसन्निधानेन तदन्तर्यामिभावेन विकारान्तरावस्थानश्रवणादिति। घटसंृतमित्यादिश्रुतिस्मृति समाश्रयात्। अन्येऽन्तःकरणेनावच्छिन्नं जीवं वभापिरे॥ ४१ ॥ कुछ लोग 'घटसंवृतम्' इत्यादि श्रुति और स्मृतिके आधारपर अन्तःकरणसे अव्छिन्न चैतन्य जीव है, ऐसा कहते हैं॥।४१॥ अन्ये तु-रूपानुपहितप्रतिविम्बो न युक्त: सुतरां नीरूपे। गगन-

अपगम होनेपर भी जीवका स्वरूप नष्ट नहीं होता, यह बोध कराती है। जीवसे अतिरिक्त कूटस्थ चैतन्यका बोध नहीं कराती। जीवकी उपाधि- अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न विम्त्रभूत चैतन्य ही ईश्वर है, क्योंकि 'यो विज्ञांने तिष्ठन्' (जो विज्ञानमें रहता हुआ) इत्यादि श्रुतिसे जीवके सन्निधानसे उसके अन्तर्यामी रूपसे विकारोंके मीतर ईश्वरके ही अवस्थानका श्रवण है। कुछ लोग अवच्छिन्न पक्षको ही रुचिकर मानते हैं, क्योंकि रूपरहित पदार्थका प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता, नीरूप अन्तःकरण आदिमें चैतन्यका प्रति- बिम्ब होना सुतरां असम्भव है। [ भाव यह है कि पूर्व अ्रन्थसे मतमेदके साथ

  • इसमें आदिशब्दसे 'विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं यो विज्ञान- मन्तरो यमयति' इत्यादि वाक्यका ग्रहण है। यहांपर विज्ञानशब्दका अर्थ है-जीव अर्थात् जो जीवके अन्दर रहकर जीवका अभ्यन्तर है, जिसको जीव नहीं जानता है, जिसका जीव शरीर है और जो जीवका नियमन करता है। इससे ईश्वरमें जीव आदिकी नियन्तृता स्पष्टरूपसे भासती है, और जैसे दूरस्थ राजा प्रजाका नियन्त्रण करता है, वह वैसे नियन्त्रण नहीं करता, किन्तु जीवके सान्निध्यसे ही नियन्त्रण करता है, यह भाव है। यह अन्तर्यामिन्राह्मण स्मृतिका भी उपलक्षण है, इससे- 'ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥' [गीता १८ श्लोक ६१ ] इस स्मृतिका ग्रहण होता है-हे अर्जुन, शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ होकर प्राणियों को अपनी मायासे भ्रमण कराता हुआ सम्पूर्ण भूतोंके हृद्देशमें ईश्वर रहता है। इससे ईशवरमें मायाप्रयुक्त नियन्तृत्व है, यह ज्ञात होता है।

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भापानुवादसहित १०९

प्रतिविम्धोदाहरणमप्ययुक्तम्, गगनाभोगव्यापिनि सचितृकिरणमण्डले सलिले प्रतििम्निते गगन प्रतिविम्वत्वव्यवहारस्य भ्रममात्रमूलकत्वात्। प्रतिविग्ववादियोंके मतमें जीव और ईश्वरका विभाग दिखलाया गया है, इस अन्धसे प्रतिविम्वको न माननेवालोंके मतसे जीव और ईश्वरका विभाग दिखलाया जाता है। जो लोग चैतन्यका प्रतिविम्ब नहीं मानते हैं, उनका मत है कि लोकमें जिनके प्रतिबिम्न देखे जाते हैं वे सबके-सब रूपवान् होते हैं, जल आदिमं प्रतिविग्धित चन्द्र आदिमं रूपवताकी उपलन्धि प्रत्यक्ष ही है और जो स्वतः रूपचान् नहीं हैं, जैसे वायु आदि, उनका प्रतिबिम्न कहींपर भी नहीं दोता है। और कदाचित् अरूपचान्का गगनादिके दष्टान्तसे प्रतिविम्व मान भी लिया जाय, तो भी प्रतिविग्व जिस स्थलमें होता है उसमें रूप अवश्य ही रहना चाहिए, क्योंकि अरूपी गगनका रूपवान् जल आदिमें ही प्रतिबिम्ब है, अतः उन प्रतिविम्ववादियोंका पक्ष श्रद्धेय नहीं हो सकता है, यह रहस्य है।] पूर्व अन्थोंमें नीरूप गगनके जो प्रतिबिम्बका दष्टान्त दिया गया है, वह मी अत्यन्त युक्तिशून्य है, कारण कि गगनके महाविस्तारमें व्याप्त सूर्य- किरणमण्डलके जनमें प्रतिविग्वित होनेपर गगनके प्रतिविग्वकी प्रतीति केवल अममूनक है, अर्थात् जल आदिमें गगनका प्रतिविम्ब नहीं होता है किन्तु गगनगे व्यास सूर्यके किरणोंका ही प्रतििम्न होता है, परन्तु लोग अमसे नयवदार करते हैं कि गगनका प्रतिबिग्ध है*। • दयमे विनारकीय अंश दे कि असे बाहर 'आफाश नील है' यह व्यवदार होता है, पेथ्े ही मप, सालय इत्मादिमं मी 'तीम आफाश और विशाल गगन' ऐसा व्यवदार सभी करंत है, परन्तु दछ व्यपदारको सरग नहीं मान सकते, इसलिए कृप आदिमें दृश्यमान आरान प्रतिवित्वरत है, ऐया मानगा दोगा। इस परिस्मितिमें गगनका, जो नीरूप है, प्रतिचिम्ब नही है, ऐगा अपलाप नदीं कर सहमे। नीरूपका प्रतिबिम्य ऐोता दी नहीं, ऐसा नहीं फटना चाटिए, गमोकि सब, मंख्या और परिमाणका प्रतिथिम्य देना जाता है। यदि शक्रा सो पिनीदन इम्पपा प्ररिविम्व नहीं होता है, तो गदद भी युक नहीं दै, पर्गोंकि वेदान्त- विदनतमें दरध्य और मुगनी परिभाषा ही नदीं है, गदि कथित् मान लिया जाय कि द्रव्य, गुव आदिकी परिभाया हे, तो भी गगनका प्रतिबिम्य होता हे, इसलिए र्मोपदित म्रज्यका भां्तिबिम्य होता है, ऐये नियमफा सीधर करेंगे। उपदितल वस्तुयत् स्यगतरूपसे दोना नादिए या आरोपत रुपये दोना चादिए। अतः आरोपितरूपवाले आकाशका प्रतिबिम्ब दो बगता है, उसमे कोई पापक नहीं है। यदि शङ्ता की जाय कि जलमें आलोफके प्रतिधिम्ब- ये दी निर्वाह सो गकता है, फिर गमनके प्रतिषिम्यमें गौरव है, नहीं, क्योंकि आलोकके

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११० सिद्धान्तलेश संग्रह .[ प्रथम परिच्छेद

ध्वनौ वर्णप्रतिविम्वत्ववादोऽप्ययुक्त:, व्यञ्ञकतया सन्निधानमात्रेण ध्वनिधर्माणामुदात्तादिस्वराणां वर्णेष्वारोपोपपत्तेः ध्वनेर्वर्णप्रतिविम्बग्राहित्व- कल्पनाया निष्प्रमाणकत्वात्। अ्रतिध्वनिरपि न पूर्वेशब्दप्रतिबिम्वः, पश्चीकरणप्रक्रियया पटहपयो-

ध्वनि वणोंका प्रतिविम्ब है, यह वाद भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वनिके, जो सन्निधिमात्रसे वर्णोंका व्यञ्ञक है, धर्मभूत उदात्त आदि स्वरोंके वणोंमें आरोपमात्रसे उपपत्ति हो सकती है, तो फिर ध्वनिमॅ वर्णप्रतिविम्बकी ग्राहिता है, इस प्रकारकी कल्पना प्रमाणशून्य है। [भाव यह है कि हस्वत्व, दीर्धत्व आदि जो धर्म हैं, वे वस्तुतः ध्वनिके ही हैं, परन्तु उनका वर्णोंमें (अकार आदिमें) आरोप किया जाता है, उनका आरोप तभी हो सकता है, जब ध्वनिको वर्णोका प्रतिविम्ब माना जाय। प्रतिविम्बके स्वीकार करनेसे जैसे दर्पणमें रहनेवाला मालिन्य प्रतिबिम्ब द्वारा मुखमें आरोपित होता है, वैसे ही ध्वनिमें रहनेवाले हस्वत्व आदिका प्रतिबिम्ब द्वारा विम्बभूत वर्णोंमें आरोप होगा, इस परिस्थितिमें नीरूप ध्वनिमें नीरूप वर्णोका प्रतिविम्ब मानना ही पड़ेगा, इस प्रणालीसे नीरूप अन्तःकरणमें नीरूप आत्माका प्रतिबिम्ब क्यों न माना जाय, इसका समाधान इस रीतिसे दिया गया है कि वर्णोका प्रतिविम्ब माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु व्यञ्ञक ध्वनिके सामीप्यमात्रसे ध्वनिमें रहनेवाले हस्वत्व आदिका वर्णोंमें आरोप होता है, जसे जपाकुसुमके सामीप्यसे रक्तत्वका स्फटिकमें आरोप होता है, अतः वर्णप्रतिविम्व्नका स्वीकार न करनेसे इस दष्टानतसे अन्तःकरणमें आत्मप्रतिविम्बका अभ्युपगम नहीं हो सकता ]। * प्रतिध्वनि भी पूर्वशब्दका प्रतिविम्ब नहीं है, क्योंकि पञ्ची-

प्रतिविम्बमें गगनप्रतिविम्बत्व भ्रम माननेपर भी उस भमके विषयीभूत गगनप्रीतिचिम्बको अनिर्वेचनीय मानना होगा, अतः गौरव समान ही है और अनुभवानुसारी गौरव दोषावह -- नहीं होता, इसलिए रूपवान्का ही प्रतिविम्व होता है, इस नियममें गगनमें व्यभिचार दुर्वार है। तथापि चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं होता है, क्योंकि नीरूप अन्तःकरण प्रतिचिम्बकी उपाधि नहीं हो सकती है, यह रहस्य है। * भाव यह है कि पटह आदि वादयसे उत्पन्न शब्दस्थलमें पापाणविशेष आदिके समीप- वर्ती आकाशप्रदेशमें प्रतिध्वनि सुनी जाती है। वह पूर्व शब्दका प्रतिबिम्ध है, मुख्य ध्वनि

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुयादसहित १११

निधिप्रभृतिशव्दानां क्षितिसलिलादिशव्दत्वेन प्रतिध्वने रेवांकाशशव्दत्वेन तस्याऽन्यशच्दप्रतिबिम्वत्वायोगात्। वर्णरूपप्रतिशब्दोऽपि न पूर्ववर्णप्रति-

त्वेनोपपचेः। तस्मात् घटाकाशवदन्तःकरणाचच्छिन्नं चैतन्यं जीव:। तदन- वच्छिनम् ईश्वरः। न चैवमण्डान्तर्वर्तिनव्वैतन्यस्य तत्तदन्तःकरणोपाधिभि: सर्वात्मना जीव-

करणकी प्रक्रियासे पटह (वाद्यचिशेप), समुद्र आदिशव्द पृथ्वी और जल आदिके शब्द हैं, वैसे ही प्रतिध्वनि भी आकाशका ही शब्द है, इसलिए उसे अन्य झव्दका प्रतिविम्न मानना युक्तियुक्त नहीं है। वर्णरूपशब्द भी प्रतिध्वनिके समान पूर्व वर्णका प्रतिबिम्ब नहीं है, कर्योंकि वर्णकी अभिव्यञ्ञक ध्वनिसे उत्पन्न होने- वाली प्रतिध्वनि भी मूनध्चनिके समान वर्णकी अभित्रयज्जक है, ऐसा माननेसे ही उपपत्ति हो सकती है।। इससे-नीरूप चैतन्यके प्रतिबिम्ब न होनेसे यही स्वीकार करना चाहिए कि घटाकाशके समान अन्तःकरणवच्छिन्न चैतन्य ही जीव है और उपाधिसे अनवच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है। संसारान्तर्वरती चैतन्यका तत्तत् अन्तःकरणरूप उपाधियोंसे सर्वात्मना जीव- भावसे अवच्छेद है अर्थात् संसारान्तर्वर्ती समग्र चैतन्य अन्तःकरणरूप उपाधियोंसे

नदी है, क्योंकि समक्वा उत्तपादक कोई नहीं है, इस परिस्थितिमें जैसे नीरूप ध्वनि नीरूप आगादमे प्रतिबि्चित होती दे, पैसे दी नीहप चतन्य नीरूप अन्तःकरणमें क्यों प्रति- बिम्यित नदीं होता ? नहीं, यह टशन्त युक नहीं है अर्थात् नीरूप आकाशमें नीरूप ध्वनिका प्रतिबिन्य नहीं है, विन्तु यद सब्दान्तर दी दै और उसका उत्पादक आकाश है और निमिस कारण द- पूर्व शब्द। प्रतिध्यनिके प्रतिबिम्वरूप दोनेपर आकाशगुण वह नहीं हो सफसी, फारण कि विम्य और प्रतिषिम्बके मदपक्षमें प्रतिध्यनिरूप प्रतिबिम्बके प्रातिभासिक होनेंसे उममें ग्नापदारिकमुणलफी उपपति नदीं दो सकती है और विम्ब प्रतिबिम्धिके अभेद पक्षमें प्रतिप्युनिह्य प्रतिबिब्व के विम्यसूत पृथ्वी आदि पाब्दकी अपेक्षासी भेद न होनेके कारण उसमें साफसमुणतबकी उपपतति भी नहीं सो सफती है, यद भाव दै। * तात्पर्य यद है कि छण्ठ, तालु आदि वर्णके व्यजक नहीं है, परन्तु कण्ठ आदि के अगि- पातये उत्पमन ध्यनि ही उसकी अभिव्यजक दै, इसलिए जैसे मूलप्वनि वर्णकी व्यजर है, भैये ही प्रतिपर्णकी अभिव्यधिमें उत्पन्न प्रतिध्यनि दी वर्णकी व्यजरु है, अतः प्रतिवर्ण भी प्रतिबिम्य कप नहीं दै, दसलिए इस दमान्तसे भी चैतन्यके प्रतिविम्बका प्रतिपादन नदीं कर गफते हैं।

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११२ सिद्धान्तलेश संग्रह - [ प्रथम परिच्छेद

भावेनाऽवच्छेदात् तदवच्छेदरहित चैतन्यरूपस्येश्वरस्याडण्डात् वहिरेव सच्वं स्यादिति 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादाचन्तर्यामिभावेन विकारान्तर- वस्थानश्रवणं विरुध्येत। प्रतिविम्वपक्षे तु जलगतस्वाभाविकाकाशे सत्येव प्रतिविम्बाकाशदर्शनात् एकत्र द्विगुणीकृत्य वृत्तिरुपपद्यते इति वाच्यम्। यतः प्रतिविम्वपक्षेऽप्युपाधावनन्तर्गतस्यैव चैतन्यस्य तत्र प्रतिघिम्बो वाच्यः, न तु जलचन्द्रन्यायेन कृत्स्नप्रतिबिम्बः। तदन्तर्गतभागस्य तत्र

प्रतिविम्बवत् जलान्तर्गतस्याडपि तत्र प्रतिबिम्बो दश्यते। न वा मुखादीनां वहिःस्थितिसमये इच जलान्तर्निमञ्नेऽपि प्रतिविम्बोऽस्ति। अतो जलग्रति-

अवच्छिन्न होनेसे जीवभावापन्न ही है, अतः अन्तःकरणरूप उपाघिसे रहित ईश्वररूप चैतन्यका ब्रह्माण्डसे अन्यत्र ही अवस्थान प्राप्त होगा, इस परिस्थितिमें 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' (जो जीवमें रहता हुआ) इत्यादि श्रुतिमें अन्तर्यामिभावसे ईश्वरका विकारोंके अन्दर जो अवस्थानका श्रवण है, वह विरुद्ध होगा, इसलिए अवच्छेदवाद मानना युक्त नहीं है, प्रत्युत प्रतिबिम्त्र पक्ष ही मानना युक्त है, क्योंकि प्रतिबिम्ब पक्षमें तो जलके अन्दर वस्तुतः स्वाभाविक आकाशके रहते ही आकाशप्रतिबिम्ब देखा जाता है, इसलिए प्रकृतमें भी एक ही उपाधिमें प्रतिबिम्बभूत जीवभावसे और तत्तत् उपाधिके अन्तर्यामिभावसे वृत्ति-अवस्थिति उपपन्न हो सकती है, अतः अवच्छेदवाद अयुक्त है। इस प्रकारकी यदि कोई शङ्का करे, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिविम्ब पक्षमें भी उसी चैतन्यका उपाधिमें प्रतिबिम्ब मानना चाहिए, जिसका उपाधिमें अवस्थान नहीं है अर्थात् जो चैतन्य उपाधिके अन्तर्गत नहीं है। जलचन्द्रके दृष्टान्ससे सम्पूर्णका प्रतिबिम्ब नहीं मानना चाहिए। उपाधिके अन्तर्गत भागका उस उपाधिमें प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता है, क्योंकि मेघावच्छिन्न आकाश अथवा आलोकका जैसे जलमें प्रतिविम्ब होता है, वैसे .जलान्तर्गत आकाशका या .. आलोकका जलमें प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता है। अथवा जलसे वाहर जब सुखकी अवस्थिति रहती है, तब जैसे मुखका जलमें प्रतिबिम्ब होता है, वैसे जलके भीतर मज्जन समयमें उस जलमें सुखका प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता हैं, इससे-अर्थात् कथित दष्टान्तोंसे यह सिद्ध हुआ कि उपाधिमें अनन्तर्गत

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित ११३

विम्वं प्रति मेघाकाशादेरिवान्तःकरणाद्युपाधिप्रतिविम्वं प्रति तदनन्तर्गत- स्यैव विम्बत्वं स्यादिति विम्वभूतस्य विकारान्तरवस्थानायोगात् ईश्वरे

एतेनाऽवच्छिनस्य जीवत्वे कर्तभोक्तसमययोस्तत्र तत्ाऽन्त:करणाव- च्छेद्यचतन्यप्रदेशस्य भिन्नत्वात् कृतहानाकृताभ्यागमप्रसङ्ग इति निरस्तम्। प्रतिविम्न्नपक्षेऽपि सवानन्तर्गतस्य सवसंनिहितस्य चैतन्यप्रदेशस्याऽन्तः- करणे प्रतिविम्ब्रस्य वक्तव्यतया तत्र तत्राऽन्तःकरणगमने विम्बभेदात् तत्प्रतिविम्वस्याऽपि भेदावश्यम्भावेन दोपतौल्यात्। न च 'अन्तःकरणप्रति- विम्नो जीवः' इति पक्षे दोपतौल्येऽपि 'अविद्याप्रतिविम्बो जीचः' । तस्य च तत्र तत्र गत्वरमन्त:करणं जलाशयव्यापिनो महामेवमण्डलप्रतिविम्वस्य

का ही उस उपाधिम प्रतिविग्न होता है। इससे जलप्रतिविम्बके प्रति जैसे मेघाकाश आदिम विम्वत्व है, वैसे ही अन्तःकरण आदि उपाधियोंमें रहने- वाले प्रतिविम्त्रके प्रति अन्तःकरण आदिमें अनन्तर्भूत चैतन्यमें विम्बत्व होगा, इसलिए विन्ध्मूत चैतन्यके विकारके अन्दर अवस्थानका अयोग होनेसे प्रतिविम्नपक्षम भी 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादि अन्तर्यामिन्राह्मणकी असमञ्जसता तुल्य ही है *। इससे अवच्छिन्न चैतन्यके जीवत्वपक्षमें कर्म करने और उसके फल भोगनेके समयमें पृथ्वी और स्वर्ग आदिम अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशके भिन्न होनेपर मी कृतहान या अकृताभ्यागम रूप दोपका प्रसङ्ग-निरस्त हुआ। क्योंकि प्रतिनिम्नपक्षमें भी उपाधिमें अनन्तर्गत और उपाधिके सन्निहित चैतन्य प्रदेशका ही अन्तःकरणमें प्रतिबिम्ब होता है, ऐसा कहना होगा, इसलिए उस-उस स्थलम अन्तःकरणके गमनमें विम्नके मेदसे उसके प्रतिविम्बका भेद भी अवश्यम्भावी है, अतः पूर्वोक्त कृतहान और अकृतका अभ्यागमरूप दोष समान ही है। शब्ा होती है कि अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिविम्त् जीव है, इस पक्षमें दोपकी समानता रहनेपर भी (हम) अविद्यामें चित्के प्रतिविम्ब को जीव मानते हैं। जैसे तत्तत् जलाशयोंमें व्याप महा मेधमण्डलके प्रतिबिम्बकी * अर्थात् लोकमें गही अनुभव होता है कि उपाधिकुक्षिमें अप्रविष्टका ही प्रतिविम्ब देखा जाता है, उपाधिकुक्षिमें प्रविष्ट्का प्रतिविम्त्र नहीं देखा जाता, यह भाव है। १५

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११४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

तदुपरि विसृत्वरस्फीतालोक इच तत्र तत्र विशेपाभिव्यक्तिहेतुरिति पक्षे नाडयं दोषः। अन्तःकरणवदविद्याया गत्यभावेन प्रतिविम्वभेदानापत्तेरिति वाच्यम्, तथैवाऽवच्छेदपक्षेऽपि 'अविद्यावच्छिन्नो जीवः' इत्यभ्युपगम- सम्भवात्। तत्राऽप्येकस्य जीवस्य क्वचित् प्रदेशे कर्तृत्वं प्रदेशान्तरे भोक्तृ- अभिव्यक्तिका हेतु जलाशयके ऊपर भागमें गमनशील मेघके छिद्रोंसे निकला हुआ स्पष्ट प्रकाश विशेष है, वैसे ही इस लोक या परलोकमें गमन- शील अन्तःकरण. भी अविद्यामें प्रतिविम्बभूत जीवकी अर्थात् जीवगत कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिकी विशेष अभित्रयक्तिका हेतु है, इसलिए इस पक्षमें समानता- प्रयुक्त दोष नहीं है। कृतहानादि दोष की प्रसक्ति भी नहीं है, क्योंकि अन्तः- करणके समान अविद्याकी गति न होनेसे प्रतिविम्वका भेद हो ही नहीं सकता। परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं हैं, क्योंकि अवच्छेदपक्षमें भी उसी प्रकार अविद्यावच्छिन्न जीव है, ऐसा स्वीकार कर सकते हैं।'अविद्या-

  • भाव यह है कि व्रह्माण्डान्तर्गत चैतन्यभागके उपाधिके अन्तर्गत होनेसे उससे वाहरके चैतन्यका ही प्रतिविम्ब होगा, अतः ब्रह्माण्डसे वाहर ही विम्बभूत चैतन्यके अवस्थान- की प्रसकि होगी और अन्तर्यामी ब्राह्मणके साथ विरोध होगा। यदि प्रतिविम्बपक्षमें ईश्वरकी सर्वान्तर्यामित्वप्रतिपादक श्रुतिके अनुसार लोकानुभवका परित्याग करके सम्पूर्ण चैतन्यका प्रतिविम्व मानकर अन्तर्यामी व्राह्मणके सामज्स्यका उपपादन किया जाय, तो अनवच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसी विवक्षा होगी। अन्तःकरणके कल्पित होनेसे चैतन्यमें अन्तःकरणवच्छिन्नके रहनेपर भी वस्तुसत् अन्तःकरणाभाव है, अतः अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्यरूप ईशवरका सभी विकारोंमें अवस्थान हो सकता, इससे अन्तर्यामी ब्राह्मणकी इस पक्षमें भी अनुपपत्ति नहीं है। तृप्तिदीप- प्रकरणमें अभाव भी ईशवरकी उपाधि कहा गया है- अन्तःकरणसाहित्यराहित्याभ्यां विशिष्यते। उपाधिर्जीवभावस्य ब्रह्मतायाश्च नान्यथा॥। ८५।। यथा विधिरुपाधि: स्यात् प्रतिषेधस्तथा न किम्। सुवर्णलोहमेदेन शङ्लात्वं न भिद्यते ॥। ८६॥ अतद्यावृत्तिरूपेण साक्षाद्विधिमुखेन च। वेदान्तानां प्रवृत्ति: स्यात् द्विधेत्याचार्यभाषितम् ॥।८७॥ इन श्लोकोंका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणके साहित्य और राहित्यसे जीवभाव और ब्रह्मभावका -भेद है अर्थात् जीवत्वकी उपाधि अन्तःकरणसाहित्य है और अन्तःकरणराहित्य ब्रह्मत्वकी उपाधि है। अन्य प्रकारसे उनका भेद नहीं हो सकता। भावके समान अभावके व्यावर्तक उपाधि

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भांपानुवादसहितं ११५

त्वमित्येवं कृतहानादिदोपापनुत्तये वस्तुतो जीवैक्यस्य शरणीकरणीयत्वेन तन्न्यायादन्त:करणोपाधिपक्षेऽपि वस्तुतश्वैतन्यैक्यस्य तदवच्छेदकोपाध्यै- क्यस्य च तन्त्रत्वाभ्यृपगमेन तदोपनिराकरणसम्भवाच। न चाऽवच्छेदपक्षे 'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा वित्स्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन्। उपाधिना

प्रतितिम्बो जीवः' इस पक्षम भी ब्राह्मण आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें कर्तृत्व और देव आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें भोक्तृता है, इस प्रकार प्रदेश-मेद्र होनेपर भी कृतहान आदि दोपका निराकरण करनेके लिए अगत्या प्रतिविम्बवादियोंको एकजीववादपक्षका अङ्गीकार करना होगा, अतः इसी न्यायके आधारपर अन्तःकरणोपाघिपक्षमें भी (अन्तः- करणावच्छिन्न चैतन्य जीव है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य- प्रदेशके भिन्न होनेपर मी) वास्तवमें चतन्यकी एकता और चैतन्यकी अवच्छेदक उपाधिकी एकताको प्रयोजक माननेसे कृतहान आदि दोषोंका निरा- करण भी हो सकता है। परन्तु अवच्छेदपक्षमें-'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा०'

दोनमें कोई विशेष नहीं है। जैसे सुघर्ण और लोहके मेदसे द्लात्वमें कोई विशेपता नहीं दोतो, वैस ही भावा मावके व्यावर्तकत्वमें विशेषता नहीं है। वेदान्तोंकी अतव्ावृत्ति और विधिनुससे दिधा प्रवृति होती है, ऐसा आचार्योंका सम्मत पक्ष है। अतध्यावृत्ति-तत् शच्दसे प्रम्मका परिव्रह होता है, अतत् शब्दसे व्रद्ममिन्न अन्तःकरण आदिका, उनकी व्यावृ तिरुपसे ब्रदाका बोध होता है और बुद्धिका साक्षी, मनका साक्षी, इस प्रकार विधिमुखसे भी ब्रह्मका बोध होता दे। इस परिस्थितिमें प्रतिविम्य और अवच्छेद दोनों यादोंमें अन्तर्यामी भाहणं उपपास और अनुपपतिके समान होनेपर 'मुनरा नीरे' हत्यादिसे नीरूप अन्तःकरण आदिमें चतन्बके प्रतिथिम्ब के असंभवका प्रतिपादन होनेसे अवच्छेदपक्ष ही आदरणीय है, प्रतिचिम्यपक्ष आदरणीय नहीं है। *तातपन यह है कि वस्तुतः चैतन्य यदि एक है, तो अन्य जीव द्वारा किये गये मोंके फलका भोग अन्यको दोगा, यह आपति देना युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदवादियोंके मतमें एक अन्तःकरणसे अवच्छिन चैतन्य एक जीव है और अन्य अन्तःकरणसे अवच्छिन्न अन्य जीव ह इस प्रफारका अभ्युपगम दोनेसे अन्तःकरणोंके भिन्न-भिन्न होनेसे जीवान्तर- कृत कर्मोंका जीवान्तरीसि भोग नहीं हो सकता है, इसी रहस्यको प्रन्थकारने (तदवच्छेदको- पाधि) इव शब्दसे प्रछट किया है। इस अवच्छेदपक्षमें पूर्वकथनानुसार अन्तःकरणके अभावये युक चैतन्य-अन्त:करणाभावाचच्छिस चैतन्य-ईशवर है अथवा 'कारणोपाधिरीश्वरः' इस श्ुतिके अनुरोधसे अविद्यावच्छिन चेतन्य ईश्वर है, ऐसा समझना चाहिए।

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११६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रेथम परिच्छेद

क्रियते भेदरूपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा' 'अत एव चोपमा सूर्यका- दिवत्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १८) इति श्रुतिसूताभ्यां विरोधः। 'अम्वुवद्ग्रहणात्ु न तथात्वम्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सृ० १९) (जैसे प्रकाशस्वरूप एक सूर्य अनेक जलपात्रोंमें प्रतिविम्ित होकर अनेक- रूप होता है, वैसे ही स्वप्रकाश यह नित्य आत्मा स्वतः एक होनेपर भी उपाधियोंमें प्रतिबिग्वित होकर अनेकरूप होता है *) इत्यादि श्रुतिके साथ और 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' इस सूत्रके साथ विरोध है? नहीं, विरोध नहीं है, क्योंकि उदाहृत सूत्रके अनन्तर पठित 'अम्वुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्'

  • इत्यादिमें आदिशब्दसे 'एक एव तु भूतात्मा भृते भूते व्यवस्थितः, एकधा बहुधा चेव दश्यते जलचन्द्रवत्' 'रूप रूपं प्रतिरूपो वभूव' 'जीवेशावाभासेन करोति' इत्यादि प्रतििम्ब- बोधक श्रुतियोंका भी ग्रहण करना चाहिए। ग्रथम श्रुतिका अर्थ है-एक ही भूतात्मा जलमें प्रतिविम्बित चन्द्रके समान सभी उपाधियोंमें प्रतिचिम्बरूपसे अवस्थित होकर अनेकसा दीखता है। द्वितीय श्रुतिका अर्थ है-प्रत्येक उपाधिमें आत्माका प्रतिरूप-प्रतिविम्व है। तृतीयका अर्थ है-माया जीव और ईशको आभाससे-प्रतिविम्वसे-करती है। अनेक स्थलोंमें प्रतिरूपशब्द प्रतिविम्वरूप अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। 'पुरुपका प्रतिरूप है' अर्थात् पुरुपका प्रतिथिम्ब है। इसलिए श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे अवच्छेदवाद अयुक्त है, यह पूर्व- पक्षीका भाव है। + 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' इस सूत्रका अर्थ है-चूँकि आत्मा स्वभावतः एक अद्वितीय है, श्रुतियोंमें उसकी अनेकता औपाधिकरूपसे कही गई है। इसीलिए उसकी औपाधिक अनेकरूपतामें जल आदिमें प्रतिविम्वित सूर्य आदि दष्टन्तरूपसे क्षुतियोंमें गहीत हैं। अर्थात जैस सूर्य के एक होनेपर भी जल आदिमें उसके प्रतिविम्वित होनेसे वह अनेकविध होता है, वैसे ही चैतन्यके स्वतः एक होनेपर भी अन्तःकरण आदिमें उसका प्रतिविम्व पढनेसे वह अनेकविध होता है, यह भाव है। * तात्पर्य यह है कि श्रुतिमें स्थित प्रतिरूपशब्द प्रतिविम्ववाचक नहीं है, क्योंकि 'वायुर्य- ैको भुवनं प्रषिष्टो रूप रूपं प्रतिरूपो वभूव' इसमें पठित प्रिरूपशब्दका, प्रतििम्ब अर्थ नहीं हो, सकता। अतः सूर्य आदिके प्रतिविम्बंदष्टान्तकी स्वरसतासे ही चतन्यका प्रतिबिम्ब कहना चाहिए, परन्तु यह भी नहीं हो सकता है, कारण कि सूत्रकारने स्वयं ही 'अम्वुवदग्रहणातु न तथात्वम्' इस सूत्रसे उसका निराकरण किया है। सूत्रके दष्टान्तभागंके अर्थका ही मूलमें 'यथा' इत्यादिसे विवरण किया है, तथापि संग्रहीत अर्थ यह है-जल आदिके समान अत्यन्त स्वच्छ और रूपवान् उपाधिका ग्रहण न होनेसे सूर्य आदिके समान चैतन्यंका प्रतिविम्त नहीं हो सकता, यद्यपि अन्तःकरण उपाधि है, तथापि वह रूपवान् और आत्मासे विप्रकृष्ट नहीं है, जैसे कि सूर्यसे विप्रकृष्ट जल है। इसपर शङ्का होती है कि यदि सूर्यका दष्टान्त उक रीतिसे

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुंवादसहित ११७

इत्युदाहृतसूत्रानन्तरसूत्रेण यथा सूर्यस्य रूपवतः प्रतिविम्बोदययोग्यं ततो विप्रकृष्टदेशं रूपवज्जलं गृह्यते, नैवं सर्वगतस्याऽऽत्मनः प्रतिविम्बोदययोग्यं किश्चिदस्ति ततो विप्रकृष्टमिति प्रतिविम्बासम्भवमुक्त्वा 'वृद्धिहासभावत्व- मन्तर्भावादुभयसामज्जस्यादेवम्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सृ० २०) इति तदनन्तरसूत्रेण यथा जलग्रतिविम्वितः सूर्यो जलवृद्धौ वर्धते इच, जलहासे हसतीच, जलचलने चलतीवेति तस्याऽडध्यासिकं जलानुरोधिवृद्धि- हासादिभाक्त्वम्, तथा आत्मनोऽन्तःकरणादिनाऽवच्छेदेन उपाध्यन्त-

सूत्रसे-'जैसे रूपवान् सूर्यके प्रतिविम्ब्रके योग्य स्वच्छ और सूर्यसे दूरदेशमें रहने- वाला रूपवान् जल उपलब्ध होता है, वैसे सर्वगत आत्माके प्रतिविम्व्नके योग्य और आत्मासे दूरदेशवर्ती कोई वस्तु उपलब्ध नहीं होती' इस प्रकार प्रतिविम्नका असम्भव कहकर 'वृद्धिहासभाक्त्वम्' इत्यादि अनन्तर पठित सूत्रसे-'जैसे जलमें प्रति- चिम्बित सूर्य जलकी वृद्धि होनेपर बढ़ता-सा है, जलके कम होनेपर छोटा-सा होता है और जलके चलनेसे जलप्रतिविम्वित सूर्य मानो चलता है, इस प्रकार सूर्यमें जलके सम्वन्धसे आध्यासिक वृद्धि और ह्वास आदिकी प्रतीति होती है, वैसे ही चिदा- त्माके अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न होनेके कारण (उसके) बुद्धि आदि उपाधिमें नहीं घट सकता है, तो क्षुतिमें कहे गये 'जलचन्द्रवत्' या 'जलसूर्यवत्' इत्यादि दष्टान्तोंकी असपति होगी, नहीं, असकति नहीं होगी, कारण कि यद्यपि दष्टान्त और दाष्टान्तिकका प्रतिविम्वितत्व- रुपसे साम्य नहीं है, तथापि वृद्धि, द्रास आदिसे अन्य सादृश्य होनेसे दष्टान्तकी उपपत्ि-सप्नति हो खफती है। दसी उपपत्तिका मूलमें 'घृद्धिहास भावत्वमन्तर्भावादुभयसामशस्यम्' इस सूत्रसे उल्लेख किया गया दै। यद्यपि मूलमें दी सूतका अर्थ किया गया है, तथापि विशेपरूपसे स्फुट होनेके लिए फिर मुन लीजिये-विशाल जलसमुदायमें यदि सूर्यका प्रतििम्ब पढ़े, तो वह बहुत वढ़ा दीखता दे, सुद्पात्रस्थित जलमें प्रतिविम्यित सूर्य क्षुद्रसा भासता है, जलके हिलनेसे सूर्यका भी हिलना- चलना मालूम होता है, येसे ही आत्मा भी अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन है, अतः उसकी अन्तःकरण आदिके अभ्यन्तर सतता है, इसलिए हाथी आदि विशालकाय जीवोंके अन्तः- करण आदि उपाधियोंके विशाल दोनेसे आत्मा विशाल मालूम होता है और मच्छर आदि 1 छुद्र जीवोंके छोटे अन्तःकरणमें वह छोटा मालम होता है अर्थात् हूसित आत्मा ज्ञात होंता है। अन्तःकरण आदिके गतिमान, दोनेसे वह चलता-सा मालम होता है। वस्तुतः न तो चद बढ़ा है, न छोटा है और न चलता है। इसीलिए 'ध्यायतीव, लेलायतीच' (चुद्धिके ध्यान करनेपर आत्मा मानो ध्यान करता है, चलनेपर मानो आत्मा भी चलता है, ऐसा प्रतीत होता है) । अतः टष्टान्त और दार्शान्तिककी इसी रूपसे सजति है, इसलिए दृष्टान्त-चाक्य अनुपपण् नहीं है और उनका तात्पर्य प्रतिबिम्बवादमें नहीं है।

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११८ सिद्धान्त लेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

र्भावादाध्यासिकं तदनुरोधिवृद्धिहासादिभाक्त्वमित्येवं दृष्टान्तदार्टान्तिकयो- स्सामञ्जस्यादविरोध इति स्वयं सूत्रकृतैवाऽवच्छेदपक्षे तयोस्तात्पर्यकथनाद्। 'घटसंवृतमाकाशं नीयमाने यथा घटे। घटो नीयेत नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपमः॥' 'अंशो नानाव्यपदेशात्' (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३) इति श्रुतिसूत्राभ्यामवच्छेदपक्षस्यैव परिग्रहाच्च। तस्मात् सर्वगतस्य चैतन्य- स्याऽन्त:करणादिनाऽवच्छेदोऽवश्यम्भावीति आवश्यकत्वात् 'अवच्छिन्नो जीवः' इति पक्षं रोचयन्ते।

अन्तर्भूत होनेसे उसमें अन्तःकरणप्रयुक्त आध्यासिक वृद्धि और ह्वास आदिकी प्रतीति होती है, इस प्रकार दृंष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका सामक्जस्य होनेसे विरोध नहीं है-ऐसा स्वयं सूत्रकारने ही 'यथा ह्ययं' और 'अत एव चोपमा' इत्यादि प्रतिविम्बवोधक श्रुति और सूत्रका अवच्छेदपक्षमें तात्पर्य कहा है। अवच्छेदपक्षमें श्रुति आदिके विरोधका केवल अभाव ही नहीं है, प्रत्युत श्रुति और सूत्रका आनु- कूल्य भी है-'घटसंवृतम्०' (जैसे घटके ले जानेपर घटावच्छिन्न आकाश नहीं ले जाया जाता किन्तु केवल घट ही ले जाया जाता है, वैसे ही जीव भी आकाशके तुल्य है अर्थात् जीव भी अवच्छिन्न चैतन्यरूप है और उसकी उपाधिका ही गमन होता है) इस श्रुतिसे और * 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इस सूत्रसे भी अव- च्छेदपक्षका ही लाभ होता है। इससे अर्थात् प्रतिविम्वपक्षमें दोष होनेसे और अवच्छेदपक्षमें किसी प्रकारका दोष न होनेसे सर्वगत चतन्यका अन्तःकरण आदि उपाधियोंसे अवच्छेद अवश्य ही होगा, अतः अन्तःकरणावच्छिन्न चतन्यको जीव मानना ही अत्यन्त आवश्यक है।

  • 'अंशो नानाव्यपदेशात्'-अंश :- जीव ईश्वरका अंश है, किससे? इससे कि नानाव्यप- देशात्-'य आत्मानमन्तरो यमयति' (जो आत्माका-जीवका अभ्यन्तर नियमन करता है) इत्यादि श्रुतियोंमें नियम्यनियामकरूपसे जीव और ईश्वरका भेद कहा गया है। प्रकृतमें अंशशब्दका अर्थ अवयव या एकदेश नहीं है, परन्तु घटाकाशके समान अन्तःकरणा- वच्छिनत्वरूप है, मुख्य अंशत्व विवक्षित नहीं है, क्योंकि ब्रह्म निरवयव है, अतः उसका मुख्य अंश नहीं हो सकता। + यह उपलक्षण है, अर्थात् अविद्यावच्छिन चैतन्य ईश्वर है, ऐसा भी जानना चाहिए, क्योंकि 'कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः' ऐसी क्षति पूर्वमें कही जा चुकी है। 'जीवेशावा-

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित ११९ 5. कौन्तेय इव राधेयो जीव: स्वाविद्यया पर: । नांऽभासो नाऽप्यवच्छिन्न इत्याहुरपरे वुधा: ।४२। जैसे कौन्तेय ही राधेय है, चैसे ही परमात्मा ही अपनी अविद्यासे जीवभावापन्न होता है, न प्रतििम्ब है और न अवच्छिन है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥४२॥ अपरे तु न प्रतिविम्बः, नाऽप्यवच्छिन्नो जीवः। किन्तु कौन्तेयस्पैव राघेयत्ववद् विकतस्य ब्रह्मण एव अविद्यया जीवभावः। व्याघ- कुलसंचर्धितराजकुमारद्ष्टान्तेन 'ब्रह्मैव स्वाविद्यया संसरति, स्वविद्यया मुच्यते' इति वृहदारण्यकभाप्ये प्रतिपादनाद्। कुछ लोग कहते हैं कि प्रतिविम्ब जीव नहीं है और अवच्छिन्न भी जीव नहीं है, किन्तु जैसे कुन्तीके ही पुत्र कर्णमें राधेयत्व (दासीपुत्रत्व) का व्यवहार होता है, वैसे ही अविकृत नम्में ही अविद्यासे जीवभावका व्यवहार होता है, क्योंकि वृहदारण्यकभाष्यमें-व्याधकुलसंवर्धितराजकुमारके दष्टान्तसे 'ब्रद्म ही अपनी अविद्यासे संसारका भागी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है, ऐसा-प्रतिपादन किया गया है। और 'राजसूनो०' भामेन करोति' इत्यादि श्रतिमें आभासशब्दका अर्थ अवच्छिन है, प्रतिबिम्ब अर्थ नहीं है, यह वदा जा चुहा है। 'माया च अविद्या च स्वयमेच भवति' इसमें माया शब्दार्थ है- 'कार्योपाधिरयं जीयः' इख ध्ुतिके अनुसार अन्तःकरण। मायापदसे गृहीत अन्तःकरणमें माया- शब्दका प्रयोग एसलिए है कि वह प्रकृतिका विकार है। अनवच्छिनचैतन्य ईशवर है, ऐसा जो यहा गया दै, यद चित्रदीपके आधारपर और अन्तःकरणाभावावच्छिन्नचैतन्य ईश्वर है, वह सम्भवमाप्रसे कहा गया है, तात्पर्गसे नदीं कहा गया है, अन्यथा 'कारणोपाधिरीश्वरः' इस धुतिके साथ विरोध होगा। अनवच्छिन्नको ईदवर माननेपर किसी उपाधिके न रहनेसे ईश्वर सर्वेक्ष केसे होगा ? इस प्रश्नका उत्तर उन्दीसे पूछना चाहिए। इसीलिए वाक्यवृत्षिमें भगवान, पहराचार्यने 'मायोपाधिर्जगद्योनि: सर्वशञत्वादिलक्षणः' (माया उपाधिसे युक्त ईरवरके वर्वदत्व आदि लक्षण हैं) ऐया कहा है। * दशन्तका तालार्थ यह े-राजकुलमं उत्पनन हुआ कोई राजकुमार किसी वारणवश लोटी अयरथाये दी व्याधके कुलमें रदा और अपनेको राजकुमार नहीं समझता था किन्तु में व्यापका अर्थात एक निकृष्ट जातिका पुत्र हाँ ऐसा जानता था, इसी कारणसे कदाचित् . यद अत्यन्त शूर या विजयी दोनेपर भी लोकमें अपनी निकृष्ट जातीयताप्रयुक अपमानका अनुभव फरता रहा, इस दशामें उसके पंसका परिजान रखनेवाले किसीने उससे का कि तुम राजपुत्र हो न्याधके पुत्र नहीं दो, इसये-अपनी उत्कृष्ट जातिके स्मरणसे-हीन जातिप्रयुक्त अपमान आदिको भूनकर यह उत्तम जातिके सुसका जैसे अनुभव करने लगा, घैसे ही ग्रह्म भी अनादि अविद्या के प्रभावसे अपने स्वतः ग्रिद्द, नित्य और आनन्दरूप स्वभाषको भूलकर जीवभावको प्राप्त हुआ है। और तजन्य

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१२० सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

राजसूनोः स्मृतिप्राप्तौ व्याधभावो निवर्तते। यथैवमात्मनोऽज्ञस्य तत्वमस्यादिवाक्यतः । इति वार्तिकोक्तेश। एवं च स्वाविद्यया जीवभावमापन्नस्यैव ब्रह्मण सर्वप्रपश्चकल्प- कत्वात् ईश्वरोऽपि सह सर्वज्ञत्वादिधर्मैः खमोपलब्धदेवतावजीवकल्पित इत्याचक्षते ॥ ६ ॥ एको जीव उत्ाऽनेकस्तन्राऽनुपदवादिनः । एकं देहं च तस्यकमन्यत्स्वप्नसमं विदु: ॥४३।।

एक जीव है या अनेक जीव हैं, इस विप्रतिपत्तिमं अनुपदवादी (पूर्वाक्त आचार्योमेंसे कुछ लोग) कहते हैं कि एक ही जीव है और उसका श्गर भी एक है अन्य सब स्वप्नमें देखे जानेवाले पदार्थोंके समान प्रातिभासिकमात्र हैं॥४३॥

जैसे व्याधके कुलमें वढ़ा हुआ राजकुमार अपनी राजकुमारताकी स्मृतिसे व्याधभावसे निवृच होता है, वैसे ही अज्ञ आत्माकी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे होनेवाली स्मृतिसे अज्ञानता निवृत होती है, इस प्रकार वार्तिकका वचन भी है। बृहदारण्यकभाष्य और वार्तिकके पयर्यालोचनसे प्रतिविम्वादिभावसे रहित पूर्ण ब्रह्ममें ही जीवभावकी सिद्धि है, अतः अपनी अविद्यासे जीवभावापन्न ब्रह्म ही सभी प्रपश्चकी कल्पना करनेवाला होनेसे सर्वज्ञत्व आदि धर्मोसे युक्त ईश्वर भी-स्वप्नमें उपलब्ध देवताके समान t जीव द्वारा-कल्पित है॥६॥

अनेक कष्टोंको भोगता है। किसी समयमे गुरुद्वारा या शास्त्रमे जब उसको ज्ञान हो जाता है कि 'मैं जीव नहीं हूँ परन्तु सचिदानन्द ब्रह्म ही हूँ' तब जीवभावको भूल कर वह अपने सत्य- स्वरूपका अनुभव करता है। स्त्रप् देखनेवाला पुरुष-जीव जैसे स्वयं ही सवपमें अपनेसे भिन्न सर्वेज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त किसी देवताकी कल्पना करता है और उसकी अहर्निश पूजा करता है, और उसकी उपासनासे अभ्युदय फल प्राप्त करता है, वैसे ही जागरणमें भी इश्वर कल्पित है, यह इष्टान्तका भाव है।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १२१

अथाडयं जीत एक, उताडनेक: ? अनुपदोक्तपक्षाचलम्बिनः केचिदाह :- एको जीवः, तेन चैकमेव शरीरं सजीवम्। अन्यानि स्वमदट्टशरीरा- णीव निर्जीवानि। तदज्ञानकल्पितं सरवं जगत्, तस्य स्वमदर्शनवद्यावदविद्यं सर्वो व्यवहारः। वद्धमुक्तव्यवस्थाऽपि नास्ति, जीवस्यकत्वात्। शुक्र- मुक्त्यादिकमपि स्वामपुरुपान्तरमुक्त्यादिकमिव कल्पितम्। अत्र च सम्भा- चितसकलशङ्ापङ्प्रक्षालनं स्वमद्दष्टान्तसलिलधारयव कर्तव्यमिति।

मत सन्देह होता है कि जीव एक है या अनेक हैं? इस विपयमें अनुपदोक्त (त्रक्ष ही अपनी अविधासे संसारी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है, इस ग्रन्थसे कहे गये) पक्षका अनुसरण करनेवाले कुछ लोग कहते हैं- जीव एक ही है [त्रदा एक है और उसमें अवच्छेदवाद या प्रतिबिम्ध- वादका स्वीकार नहीं है, अतः जीवका भेद नहीं हो सकता है, यह भाव है]। इससे एक ही शरीर जीवसे युक्त है और अन्य जितने शरीर हैं; वे सबके सब स्वममें देखे जानेवाले शरीरोंके समान निर्जीव हैं। यह समस्त जगत् जीवके अज्ञानमात्रसे कलिरित है। जैसे जब तक निद्राकी निवृत्ति नहीं होती है, तभी तक स्वम देखा जाता है, वैसे ही जब तक जीवकी अविद्याका विनाश नहीं होता, तभी तक जीवके सब व्यवहार होते हैं। [ इस एक जीव- बादमें पूर्वपक्ष होता है कि यदि अज्ञानसे स्वमव्यवहारके समान यह समक्ष् जगत्का व्यवहार कल्पित है, तो जसे स्वम्नव्यवहार एकदम नष्ट हो जाता है, घैसे ही जगत्का व्यवहार एकदम नष्ट हो जाना चाहिए, फिर विद्याकी स्वीकृति व्यर्थ है, इसपर इस ग्रन्थसे यह कहा गया है कि विद्या व्यर्थ नहीं है, क्योंकि जसे कारणान्तरसे निद्रा आदिका क्षय होनेपर स्वमकी निवृत्ति होती है, बैंस ही ज्ञानसे अज्ञानान्धकारके निवृत होनेपर ही नाथ होता है, समस्त संसारका विद्याके उदयके बिना अज्ञानका नाश नहीं होता और अज्ञानके नाशके बिना इस प्रपश्चात्मक व्यवहारका लोप नहीं होता। अतः विद्या निरर्थक नहीं है] इस पक्षमें बद्ध या मुक्तकी व्यवस्था भी नहीं हैं, क्योंकि जीव एक ही है। शुक आदिकी जो मुक्ति सुनी जाती है, वह भी स्वम्रकालिक अन्य पुरुषकी मुक्ति आदिके समान कल्पित ही है। तात्पर्य यह है 15

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१२२ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

सूत्रमेकं परं जीवपदाभासान् परान् परे। कुछ लोग यह कहते हैं कि एक सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ मुख्य जीव है और अन्य सभी जीव जीवाभास हैं॥ अन्ये त्वस्मिन्नेकशरीरैकजीववादे मनःप्रत्ययमलभमानाः 'अधिक तु भेदनिर्देशात्' (उ० मी० अ० २ पा० १ सू० २२) 'लोकवत्तु लीला- कैवल्यम्' (उ० मी० अ० २ पा० १ सू० ३३) इत्यादिसूत्रैरजीवाघिक ईश्वर एव जगतः स्रप्टा, न जीवः। तस्याऽडपकामत्वेन प्रयोजनाभावेऽपि केवलं लीलयैव जगतः सृष्टिरित्यादि प्रतिपादयद्भ्विरोधं च मन्यमाना हिरण्यगर्म एको ब्रह्मप्रतिविम्धो सुख्यो जीवः। अन्ये तु तत्प्रतिविम्न-

कि जैसे स्वमसे उठा हुआ पुरुष स्वम्नभ्नमसे सिद्ध अन्य पुरुपकी मुक्तिको अन्यके प्रति कहता है, वैसे ही जीवके भ्रमात्मक ज्ञानसे सिद्ध शुक्क आदिकी मुक्ति श्रवण आदिमें पुरुषोंकी प्रवृत्तिके लिए कही गई है। इस एक जीव- बादमें सम्भावित सम्पूर्ण शद्ारूप कीचड़का प्रक्षालन स्वमदष्टान्तरूप जल- धारासे ही करना चाहिए-जसे कोई शङ्का करे कि यदि जीव एक ही है, तो विद्याके उपदेशक अन्यका अभाव होनेसे ज्ञान नहीं होगा और जीव तथा ईश्वरके विभक्त न होनेसे जीवका ईश्वरोपासना आदि व्यवहार भी नहीं होगा, ऐसी आशङ्का करके कहते हैं-'अन्र च' इत्यादिसे। जैसे स्वम्दशामें स्वम्न देखनेवाला किसीको ईश्वर और किसीको गुरु मानकर उपासना करता है और उससे विद्या प्राप्त करता है, वैसे ही प्रकृतमें भी होगा, यह भाव है। कुछ लोग एकजीववादमें सन्तुष्ट न होकर अर्थात् प्रामाण्यनिश्चय न प्राप्त कर 'अधिकं तु भेदनिर्देशात्' 'लोकवतु लीलाकैवल्यम्' इत्यादि सूत्रोंके आधारपर जीवसे अन्य ईश्वर ही जगत्का स्रष्टा है, जीव स्ष्टा नहीं है, यद्यपि ईश्वरको कोई अभिलाषा नहीं है, क्योंकि वह आप्तकाम है, इसलिए जगत्के सर्जनमें उसका कोई प्रयोजन नहीं है, तथापि 'केवल लीला से ही जगत्की सृष्टि करता है' इत्यादि प्रतिपादन करनेवालोंके साथ जीवको सृष्टिकता माननेमें विरोध मानते हुए ब्रह्मका प्रतिबिम्बभूत हिरण्यगर्भ ही एक सुख्य जीव है। हिरण्यगर्भसे अन्य इन्द्रादि तो हिरण्यगर्भके प्रतिविम्बभूत

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जीवेदवरंस्वरूपंविचार ] भापातुवादस हित १२३

भूताश्रित्रपटलिखितमनुष्यदेहार्पितपंठाभासकल्पाः जीवाभासा: संसारादि-

योगीव कायव्यूहेपु जीवोऽन्य इति चापरे ॥। ४४ ॥. जैसे शरीरोंके समूहमें एक ही योगी अपना अधिकार रखता है, वैसे ही दिरण्य- गर्भसे अन्य एक सुख्य जीव है[ और वही सब शरीरों में अधिकार रखता है] ॥४४॥ अपरे तु हिरण्यगर्भस्य प्रतिकल्पं भेदेन कस्य हिरण्यगर्भस्य मुख्यं. जीवत्वमित्यत्र नियामकं नास्तीति मन्यमाना एक एव जीवोऽविशेपेण सर्व शरीरमधितिष्ठति।

चित्रके पटमें लिखित मनुष्यके देहमें अर्पित पटाभासके समान संसार आदि भोगनेवाले जीवाभास हैं, इस प्रकार सजीव हैं अनेक शरीर जिस एक जीववादमें, ऐसे जीवैक्यवादका अङ्गीकार करते हैं। प्रत्येक कल्पमें हिरण्यगर्भका भेद होनेसे किस हिरण्यगर्भको सुख्य जीव मानना, इसमें नियामक-प्रमाण-नहीं है अर्थात् अमुक कल्पका हिरण्यगर्भ ही मुख्य जीव है, अमुक्त कल्पका नहीं, ऐसा माननेमें कोई विनिगमक (एकतर पक्षपातिनी युक्ति) नहीं है, विनिगमकके बिना यदि हिरण्यगर्भको मुख्य जीव माना जाय, तो अविशेषात् सभी कल्पके हिरण्यगर्भ मुख्य जीव होंगे। तस्मात् पूर्वोक्त पक्षसे भी एकजीववाद सिद्ध नहीं होगा, यह भाव है। इसलिए एक ही जीव मुख्य और अमुख्य विभागके बिना सब शरीरोंमें अपने भोगके लिए अधिष्ठित है, ऐसा मानते हुए अविशेपानेकशरीरैकजीववादका* ही कुछ लोग स्वीकार करते हैं। [ भाव यह है कि अविद्यामें चैतन्यप्रतिबिम्ब जीव एक है, क्योंकि अविद्या एक है, वही जीव सब शरीरोंमें स्वभोगके लिए अधिष्ठित है, अविद्यामे ब्रह्मप्रतिबिम्व हिरण्यगर्भशरीरमें अधिष्ठित है, और हिरण्यगर्भका प्रतिबिम्ब जीवाभास इतर शरीरोंमें अधिष्ठित है, यह युक्त .J नहीं है, क्योंकि इतर जीवोंके हिरण्यगर्भ-प्रतिविम्ब होनेमें कोई प्रमाण नहीं है, यही 'एक एव' इसमें उक्त एवकारका अर्थ है ]।

अविशेषण अधिष्ठितानि अनकशरीराणि यस्मिन् एकजीववादे सः अविशेषानेक- शरीरैकजीववादस्तम्, अर्थात् जीवके मुख्य और अमुख्य विभागके विना अधिष्ठित हैं अनेक शरीर जिसमें ऐसा अनेकजीववाद, यह भाव है।

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१२४ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

न चैवं शरीरावयवभेद इव शरीरभेदेऽपि परस्परमुखाद्यनुसन्धान प्रसङ्ग:। जन्मान्तरीयसुखाद्यनुसन्धा ना दर्श्न न र भे दस्य तदननुसन्धान- प्रयोजकत्वक्लप्तेः । योगिनस्तु कायव्यूहसुखाद्यनुसन्धानं व्यवहितार्थग्रहणवद्योगप्रभाव- निचन्धनमिति न तदुदाहरणमिति अविशेपाने कशरीरेंकजीवतादं रोचयन्ते।

यदि सब शरीरोंमें एक ही जीव है तो शरीरके अवयवभेदके समान शरीरका भेद होनेपर भी परस्परके सुखादिका अनुसन्धान होना चाहिए अथात् जैसे हाथ, पैर, मस्तक आदि अनेक अवयवोमें अधिकार रखनेवाले एक ही देवदत्तमें यह अनुभव देखा जाता है कि 'मेरे मस्तकम वेदना है और पैरोंमें सुख है, वैसे ही यदि एक जीव सभी शरीरोंमें अधिष्ठित है, तो उसे यह अनुभव होना चाहिए कि देवदत्तके शरीरमं मुझे सुख है और यज्ञदत्तके,शरीरम दुःख है, परन्तु यह अनुभव नहीं होता, इसलिए एकजीववाद असम्रत है। इस प्रकार यदि शङ्का हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि [यद्यपि पूर्व- जन्मके शरीरमें अधिकार रखनेवाला जीव और इस जन्मके शरीरमें अधिकार रखनेवाला जीव एक ही है, तो भी जन्मान्तरीय सुख आदिका अनुसन्धान इस शरीरमें नहीं देखा जाता, इससे सुख आदिके अनुसन्धानके अभावम शरीर- भेदको हेतु मानना चाहिए, अतः उक्त दोप नहीं है। अनेक शरीरोंमें योगीको जो सुख आदिका अनुसन्धान होता है, वह तो व्यवहित अर्थके ज्ञानके समान योगप्रभावसे होता है, अतः उसे उदाहरण- रूपसे नहीं दे सकते हैं; [ तात्पर्य यह है कि योगी अपने विलक्षण प्रभावसे अनेक शरीरोंको धारण करता है और उन सब शरीरोंमें से किसीमें सुख और किसीमें दुःखका अनुभव करता है, शरीर-भेदको यदि अननुभवके प्रति हेतु माना जायगा, तो उसे भिन्न-भिन्न शरीरमं सुख दुःखका अनुभव नहीं होना चाहिए, अतः उक्त नियममें (सुखादिके अननुसन्धानमें शरीरभेद कारण है, इसमें) व्यभिचार होगा, नहीं व्यभिचार नहीं होगा, क्योंकि योगी जैसे मुदूर भूत- कालीन पदार्थका और सुदूर भविष्यत्कालीन अर्थका, (जिन्हें हम अपने चर्मचक्षुओंसे सर्वथा नहीं देख सकते हैं) योगपभावसे ज्ञान कर लेते हैं, वैसे ही -योगप्रभावसे अनेक शरीरोंमें सुख और दुःखका अनुभव कर लेते हैं, अतः

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुंवादसहित १२५

जीवभेदं परे ग्राहु:, व्यवस्था चाडत कीदशी।।.४५।। बद्ध और सुक्त की व्यवस्थाके लिए अन्तःकरणके भेदसे जीवोंका भेद है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं। इस अनेकजीववादमें बद्ध और सुक्तकी व्यवस्था कैसी है॥४५॥ इतरे त्वत्रापि बद्धमुक्तव्यवस्थाऽभावस्य तुल्यत्वेन 'तद्यो यो देवानां प्रत्यवुध्यत स एव तदभवत्' इत्यादिश्रुतेः 'प्रतिपेधादिति चेन्न

योगीके दृष्टान्तसे कथित नियममें व्यमिचार नहीं है अर्थात् सुख आदिके अननुसन्धानमें योगप्रभावसे असहकृत शरीरभेदको प्रयोजक मानेंगे, योगीका शरीरमेद है, परन्तु वे योगप्रभावसे असहकृत नहीं हैं किन्तु सहकृत हैं अतः व्यभिचार नहीं है ]। कुछ लोग इस मतसे सन्तुष्ट न हो अन्तःकरण आदिको जीवकी उपाधि मानकर, अनेकजीववादका आश्रय करके बद्ध और मुक्तकी व्यवस्था करते हैं, क्योंकि पूर्वके समान इस मतमें भी बद्ध और मुक्तकी व्यवस्थाका अभाव समान होनेसे 'तद्यो यो देवानां०' (देवोंमें से जिस देवने आत्माका साक्षात्कार किया, वही ब्रह्मरूप हो गया इत्यादि विद्वान्में मुक्तत्व और. अवि- द्वान्में बद्धत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति और 'प्रतिपेधादिति चेन्न शारीरात्'*

• 'प्रतिपधादिति चेन्न शारीरात्' इस सूत्नका यह अर्थ है-'न तस्य प्राणा उत्कामन्ति' (उस · न्रह्मवेत्ताके प्राणोंका उत्कमण नहीं होता) इस काण्वशाखाकी श्रुतिसे न्रह्मतत्ववेत्ताके प्राणोंका उत्क्रमण निषिद्ध होनेसे उसकी गति और उत्कान्ति नहीं होती है, यह नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वृहदारण्यकमें 'न तस्मात् प्राणा उत्कामन्ति' (उससे प्राणोंका उत्क्मण नहीं होता है) यह क्षति ब्रह्मवेत्ताके शारीरका-जीवका-उपक्रम करके सुनी जाती है। इससे जीवसे प्राणोतक्रमणका निषेध है शरीरसे नहीं अर्थात् विद्वान्के प्राणोंका भी शरीरसे उत्क्रमण होता है, इसलिए 'न तस्य' इत्यादि काण्वके श्षुतिका भी यही अर्थ करना चाहिए कि विद्वान्के प्राण जीवसे उत्क्मण नहीं करते हैं, परन्तु उसके साथ-साथ ब्रहालोकमें जाते हैं। यह पूर्वपक्षसूत्र है। अनेकजीववादमें भी-'बरद्ा ही अपनी अविदयासे संसारी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है', ऐसा वृद्ददारण्यकभाष्यमें प्रतिपादन होनेसे विरोध समान ही है, ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि उस भाष्यका यह तात्पर्य है कि ब्रह्म ही अनेक अन्तःकरणरूपसे परिणत अपनी अविद्यासे अनेकजीवभावको प्राप्त करके संसारी होता है और अपनी विद्यासे क्रमशः मुक्त होता है। यदि कोई कहे कि क्ुति स्मृतिके ठीक-ठोक पर्यालोचनसे उनका तात्पर्य अनेकजीववादमें नहीं ज्ञात होता है, अतः अनेकजीववाद असनत है, नहीं, असजत, नहीं है, क्योंकि तुल्ययुत्तयाउन

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१२६ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रंथम परिच्छेद

ज्ञारीरात्' (उ० मी० अ० ४ पा० २ सू० १२) इत्यधिकरणे वद्धमुक्तत्व- प्रतिपादकभाष्यस्य च नाsऽञ्जस्यमित्यपरितुष्यन्तोऽन्तःकरणादीनां जीवोपा- धित्वाभ्युपगमेनाऽनेकजीववादमाश्रित्य वद्धमुक्तव्यवस्थां प्रतिपद्यन्ते। प्रतिजीवमविद्यांशा भिन्ना न्रझ्मावृतिक्षमाः । तन्नाशक्रमतो मुक्तिव्यवस्था कैश्रिदीर्यते ॥४६॥ कोई लोग कहते हैं कि प्रत्येक जीवमें अविद्याके अंश भिन्न-भिन्न हैं और वे ब्रह्मका आवरण करनेमें समर्थ हैं और उनके नाशक्रमसे मुक्तिकी व्यवस्था है॥४३॥ तेषु केचिदेवमाहु :- यद्यपि शुद्ध्रह्माश्रयविषयमेकमेवाऽज्ञानम्, तन्नाश एव च मोक्षः, तथापि जीवन्मुक्तावज्ञानलेशानुवृत्यभ्युपगमेनाऽज्ञानस्य सांशत्वात् तदेव क्वचिदुपाधौ त्रह्मावगमोत्पत्तौ अंशेन निवर्तते, उपाध्यन्तरेपु यथापूर्वमंशान्तरैरनुवर्तते इति।

इस अधिकरणमें बद्धत्व और मुक्तत्वका प्रतिपादन करनेवाले भाष्यके साथ सामञ्जस्य नहीं है अर्थात् उक्त श्रुति और भाष्यकी अनुपपत्ति है। उन अनेकजीववादियोंमें से कुछ लोग यह कहते हैं कि यद्यपि शुद्ध ब्रह्मका आश्रय और उसको विषय करनेवाला अज्ञान एक ही है, और उसके नाश होनेसे ही मोक्ष होता हैं। तथापि जीवन्मुक्तिमें अज्ञानके विक्षेपांशकी अनुवृत्तिका स्वीकार होनेसे अज्ञान सांश है, इससे जिस उपाघिमें (जीवरूप अधिकरणमें) ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति होगी, उसी स्थलमें अंशतः अज्ञानकी निवृत्ति होगी और अन्य स्थलमें पूर्ववत् अन्य अंशोंसे अज्ञानकी अनुवृत्ति होगी।

उन श्रुतियों और स्मृतियोंका एकजीववादमें भी तात्पर्य नहीं है, ऐसा कह सकते हैं। यह भी नहीं कह सकते हैं कि अविद्याके एक होनेसे तदवच्छिन जीव एक है, क्योंकि कथित श्रति और स्मृतिके आधारपर अविद्याका अनेकविधत्व भी सम्भव है और एकत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य जातिके अभिप्रायसे भी लगा सकते हैं अर्थात् अविद्यात्व जातिके एक होनेसे अविद्या एक है, ऐसा कहा गया है। कदाचित् अविद्याको एक माना जाय, तो भी 'कार्यो- पाधिरयं जीवः' इत्यादि उदाहृत पूर्वकी श्रुतिके वलसे नाना अन्तःकरण ही जीवकी उपाधियाँ हैं, ऐसा भी स्वीकार कर सकते हैं, अतः अनेकजीववादमें विरोध नहीं है, यह भाव है। + विशिष्ट जीव और ईश्वर अज्ञानके आश्रय नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे स्वयं ही अज्ञानसे कल्पित हैं, अतः शुद्ध ब्रह्म ही उसका आश्रय है, इसी प्रकार अज्ञानविषयत्व अर्थोत् अज्ञानावृतत्वरूपविषयत्व भी शुद्धमें है ईश्वरमें नहीं है, क्योंकि जैसे औपाधिक भेदसे

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १२७

आत्मन्यविद्यासंसर्गो हृदयग्रन्थिसंश्रयः । तन्देदात्तदसंसर्ग: क्रमान्मुक्तिकमः परेंः॥ ४७ ॥ आत्मामे जो अविद्याका सम्बन्ध है, वह हृदयअ्न्थिप्रयुक्त-अन्तःकरणप्रयुक्त है, अतः अन्तःकरणके विनाशसे आत्मा और अविद्याका जो कमसे असम्बन्ध है वही मुक्तिमम है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।४७।। अन्ये तु यथा न्यायेकदेशिमते भृतले घटात्यन्ताभावस्य वृत्तो घट- संयोगाभावो नियामक इति अनेकेपु प्रदेशेष तद्वत्सु संसृज्य वर्तमानो घटात्यन्ताभावः क्वचित्प्रदेशे घटसंयोगोत्पच्या तद्भावनिवृत्ती न संसृज्यते। * कुछ लोग यह कहते हैं कि जैसे मूतलमें घटात्यन्ताभावकी वृत्तिमें घटके संयोगका अभाव नियामक (प्रयोजक) है, इसलिए अनेक घटसयोगा- भाववाले प्रदेशोंमें सग्वन्ध करके स्थिंत घटका अत्यन्ताभाव-किसी प्रदेशमं घटके संयोगकी उत्पचिसे घटसंयोगाभावकी निवृत्ति होनेसे (उस

अन्य जीवरी उपलब्धि नहीं होती दै, घैसे ही ईशरकी भी अनुपलब्धि हो सकती है। अतः उम्को (ईश्वरको) आपृत मानना अनुचित हे। अम्ञान एक दी हे उसमें प्रमाण हे-अज्ञानवाचक दब्दोंका श्रुतिस्मृतियोंमें एकवचनान्त प्रयोग, जये 'अजामेकम्' 'मायान्तु प्रकृति विद्यात्' 'विभेदजन केऽज्ञाने' इत्यादिमें 'अजाम् 'मायाम्' 'प्रकृतिम्' और 'अज्ञाने' ये सच एध्वननान्त ही कदे गये है, और इसी एक अज्ञान के नाशसे मोक्ष होता दे, ऐवा क्ुति प्रतिपादन करती हे-भूयथान्ते विश्वमायानिवृत्तिः'। दख मन्मे एसके तत्वसानसे समप्र अज़ानका नाथा नहीं माना जाता है, किन्तु जिस पुरुपको तत्यज्ञान रोगा उभी पुरषका अज्ञानाद नष दोगा, इसलिए बद और मुककी अत्यन्त उचित रीतिखे व्यवस्था दो मपेगी, गद माव है। • इस गतमें इानये धज़ञानकी निमृत्ति होती दै, ऐम्रा प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंका अज्ञानके मम्बन्यकी निमृसिमे दी सात्पर्य मानना रोगा ज्ञानकी निवृत्तिमें नदीं। यदि अज्ञानके नादमें दी तात्पर्य माना जाय, तो असे तृलसमुदायके विरोधी अग्निके उदयसे समत्र तुलराशिका नाश दोता रै, बेये ही अज्ञानविरोधी जानके उदयसे समभ अर्थात् निःशेष अज्ञानके नाशका प्रसभ आधेगा। ऐसी परिस्थितिमें जीवन्मुकिशास और बदमुक्तिशासके साथ अवश्य विरोध होगा। इसमें घटात्यन्ताभावका जो टशान्त दिया गया है, उसका तात्पर्ये यह है कि 'भूतलमें घट नहीं ऐै' इस अनुमनसे विद जो अभाव है, यद नेफालिक ऐै अर्थात् अत्यन्ताभाय है, इसलिए घटके लानेपर भी 'घट नदीं है' ऐगी प्रतीति छोनी चाहिए, परन्तु दोती नदीं है, कारण कि घटाधिकरणमे घटात्यन्ताभावप्रतीतिका नियामक सम्बन्ध नहीं है, घटात्यन्ताभावकी प्रतीतिका नियामक हे-पटस्रंयोगाभाव, घटाभिकरणमें घटसंगोगाभापके न रदनेसे उक आपति नदीं है।

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१२८ सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम परिच्छेद

एवमज्ञानस्य चैतन्ये वृत्तौ मनो नियामंकमिति तदुपाधिना तत्प्रदेशेपु संसृज्य वर्तमानमज्ञानं क्वचिद् ब्रह्मदर्शनोत्पच्या 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्युक्तरीत्या मनसो निवृत्तौ न संसृज्यते। अन्यत्र यथापूर्वमवतिष्ठते। अज्ञानसंसर्गासंसर्गावेव च बन्धमोक्षावित्याहुः। जातिर्व्यक्तिमिव व्वस्तां स्वात्मज्ञं यज्हाति सा। जीवं जीवाश्रिताऽविद्या मुक्तिः सेत्यपि चाडपरेः॥४८॥ जैसे व्यक्तिमें रहनेवाला जातिरूप धर्म विनष्ट व्यक्तिका परित्याग करता है, वैसे ही जीवाश्रित अविद्या आत्मज्ञानी जीवका जो परित्याग करती है, वही मुक्ति है, यह भी किन्हीं लोगोंका मत है॥४८॥ अपरे तु नाडज्ञानं शुद्धचैतन्याश्रयम्, कि तु जीवाश्रयं न्रह्मविपयम्। स्थलमें) सम्बद्ध नहीं होता, ऐसा किसी नैयायिकका मत है, वैसे ही चैतन्यमें अज्ञानकी वृत्तिताका मन नियामक है, इसलिये मनरूप उपाघिसे युक्त प्रदेशमें सम्बन्ध करके रहा हुआ अज्ञान-किसी चैतन्यदेशमें ब्रह्मापरोक्षकी उत्पत्तिसे 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः० (अन्तःकरणरूप अ्न्थि ब्रह्मदर्शनसे निवृत होती है) इस श्रुतिके आधारपर मनकी निवृत्ति होनेसे सम्बद्ध नहीं होता है और अन्यत्र अर्थात् जिस प्रदेशमें ब्रह्मज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हुई है, उस स्थलमें यथापूर्व रहता ही है, [ क्योंकि इस मतमें ] अज्ञानका सम्बन्ध बन्ध है और अज्ञानका असम्बन्ध मोक्ष है [ पूर्व मतमें अज्ञानकी सत्ता बन्धन और उसका नाश मोक्ष है और इस मतमें अज्ञानका सम्बन्ध बन्ध और असम्बन्ध मोक्ष है यह पूर्व मत और इस मतमें भेद है ]। अज्ञान शुद्ध चैतन्यमें नहीं रहता है * किन्तु जीवमें ही रहता है और * वेदान्तशास्त्रसे प्रतिपाद्य जो शुद्ध चैतन्य है, वह अज्ञानका आश्रय नहीं है, क्योंकि 'वेदान्तवेद्यवस्तुको में नहीं जानता हूँ' इस अनुभवसे शुद्ध चैतन्यका अज्ञानविषयत्वरूपसे ही अनुभव होता है। और 'मैं परमात्माको नहीं जानता हूँ'। इस अनुभवसे अज्ञानकी जीवा- श्रयत्वरूपसे प्रतीति होती है, अतः जीव ही अज्ञानका आश्रय है। अज्ञान अपने कार्यभूत अन्तःकरणसे युक्त चैतन्यरूप जीवमें कैसे रहेगा, यह शक्का नहीं करनी चाहिए, कारण कि अन्तःकरणमें प्रतिविम्वभूत जो चैतन्य है उसीमें जीवत्वका स्वीकार होनेसे अन्तःकरणा- वच्छिन्न चैतन्यको जीव मानते ही नहीं हैं। अन्तःकरण सादि है, इसलिए उसमें प्रतिविम्बभूत चैतन्यके भी सादि होनेसे वह अनादि अविद्याका आश्रय न होगा, इस प्रकारकी यदि शङ्का हो, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणके-सुपुप्ति और जाप्रदवस्थाके अनुभवसे

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जीवेकत्वानेकत्व विचार] भापानुवादसहित १२९

अतश्राऽन्तःकरणप्रतिविम्वरूपेपु सर्वेपु जीवेपु व्यक्तिपु जातिवत् प्रत्येकपर्य- चसायितया वर्तमानमुत्पन्नविद्यं कश्चित्यजति नष्टां व्यक्तिमिव जातिः। स एव मोक्षः । अन्यं यथापूर्वमाश्रयतीति व्यवस्थेत्याङ्कः।

वह ब्रह्ाविषयक है। इससे प्रत्येकव्यक्तिको व्याप्त करके रहनेवाली जातिके समान अन्तःकरणमें प्रतिविम्वरूप सब जीवोंमें रहनेवाला अज्ञान-जैसे जातिरूप धर्म नष्ट व्यक्तिका त्याग करता है, वैसे ही जिस जीवमें विद्या उत्पन्न हुई है, उसका-त्याग करता हे और यही त्याग मोक्ष कहलाता है। अन्य पुरुपका, जिसमें विद्याका आविर्भाव नहीं हुआ है, आश्रय करता है, इस प्रकारसे भी कुछ लोग बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था करते हैं।

-लय और जन्म हैं अतः उसके सादि दोनेपर भी स्थूलके सूक्ष्मरूपसे वह अनादि है, ऐसा 'पुंसत्वादिवत्वस्य सतोऽभिव्यकियोगात्' (म्र० सू० अ० २ पा० ३ सू० ३१) इस सूत्रमें प्रतिपादन किया गया दे। इस सूत्रका यह अर्थ है-जैसे वाल्य अवस्थामें अनभिव्यकत पुंसत्व और खीत्व आदिका योवनमें प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही स्वाप आदिमें अनभिव्यक्त अन्तःकरणकी, जो कि सत् है, स्थूलावस्थारूप अभिव्यकति होती है। अनादि चैतन्यप्रति- विम्यमें अचिद्या रदती है, इसका विचार-माया और अविद्याके अभेदनिरूपणके प्रसगमें- किया गया है।

  • द्विल या बहुत्वके समान अज्ञान व्यासज्यपृत्ति (एकाधिकव्यकिमात्रवृत्ति) माना जाय, तो सभी को प्रत्येकर्पसे "मैं अक्ष हूँ' ऐसा जो प्रत्यक्ष होता है, वह नहीं होगा, पर्योंकि व्यासज्यवति धर्मके प्रत्यक्षमें यावत् आध्रयीभृत व्यक्कियोंका प्रत्यक्ष कारण होता है, अतः एक-एक जीवको सूब जीवोंका प्रत्यक्ष न होनेसे एक व्यक्तिको व्यासज्यवृत्ति अज्ञानका प्रयक्ष नहीं दोगा, इसलिए अज्ञानको गोत् आदि जातिरूप धर्मके समान प्रत्येक जीव- व्यकिमें पर्यवसायी मानना चाहिए। वस्तुतस्तु यदि अज्ञान व्यासज्यवृति माना जाय, तो भी दोप नहीं है, कारण कि अज्ञानप्रत्यक्ष नित्य और साक्षिरूप होनेसे उसके अपरोक्षावभासमें यावदाधयका प्रत्यक्ष कारण नहीं है, य्योंकि जन्य-प्रत्यक्षमें ही यावदाश्रयप्रत्यक्ष कारण होता ऐै, गद्द भाव है। . उत्पन्न विद्यारे मनकी निमृत्ति होगी और उसके निधृत होनेपर तन्निवन्धन चैतन्य- प्रतिबिम्यका निरास दोगा और दसीये तदविशिष्ट चेतन भी निमृत हो जायगा, इस कमसे मोक्ष दोगा। इसीलिए 'जदात्येनां भुकभोगामजोऽन्यः' (विद्यावान जीव जिसके विषय भुक्त हुए हैं, ऐसी अविद्याका त्याग करता है) गद भाव है।

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१३० सिद्धांन्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

अतिजीवमविद्याया भेदमाश्रित्य चेतरे। तद्विनाशक्रमान्मुक्तिव्यवस्थां संप्रचक्षते ॥४९।। कोई-कोई प्रत्येक जीवमें अविद्याका भेद मानकर उसके विनाशक्रमसे सुक्ति व्यवस्था करते हैं॥४९॥ इतरे तु प्रतिजीवमविद्याभेदमभ्युपगम्यैव तदनुवृत्तिनिवृत्तिभ्यां बद्धमुक्तव्यवस्थां समर्थयन्ते। अविशेषेण सर्वेषामविद्यातः प्रवर्तते। ग्रपञ्चोऽस्मिन्नैकतन्त्वारब्धः पक्षे पटो यथा ॥ ५०॥ जैसे अनेक तन्तुओंसे एक पट उत्पन्न होता है, वैसे ही अविशेषसे सभी जीवोंकी अविद्यासे प्रप्च उत्पन्न होता है, ऐसा अनेक जीववादियोंमें कुछ लोग कहते हैं ॥५०॥ अस्मिन् पक्षे कस्याऽविद्यया प्रपश्चः कृतोऽस्त्वति चेत्, विनिगमका- भावात् सर्वाविद्याकृतोऽनेकतन्त्वारब्घपटतुल्यः। एकस्य मुक्ती तदविद्या- नाशे एकतन्तुनाशे पटस्येव तत्साधारणप्रपश्चस्थ नाश:, तदैव विद्यमान-

कुछ लोग प्रत्येक जीवमें अज्ञानका भेद मानकर ही अज्ञानकी अनुवृत्ति और निवृत्तिसे बन्ध और मोक्षका समर्थन करते हैं x। इस अनेक-अज्ञानपक्षमें किसकी अविद्यासे प्रपश्च हुआ है? इस प्रश्नके उत्तरमें कुछ लोग कहते हैं कि जैसे अनेक तन्तुओंसे पटका आरम्भ हुआ है, वैसे ही सभी जीवोंके अज्ञानसे यह समस्त प्रपञ्च हुआ है, क्योंकि किसी एक जीवके अज्ञानसे प्रपञ्चकी उत्पत्ति माननेमें कोई बलवत्तर विनगमक (युक्तिविशेष) नहीं है। जैसे एक तन्तुका नाश होनेसे उस तन्तुकी सत्त्वदशामें जो विजातीय पट था, उसका नाश हो जाता है, वैसे ही एक जीवकी अविद्याका नाश होनेसे

X इस पक्षमें अविद्याकी अनुवृत्ति चन्ध है और अननुवृत्ति मोक्ष है। और अविद्या प्रत्येक जीवमें अलग-अलग है। एक माननेपर बन्ध और मोक्षका उपपादन नहीं हो सकेगा। यदि शङ्का की जाय कि अविद्याके अंशके आधारपर वन्ध और मोक्षकी व्यवस्था हो सकती है? नहीं, नहीं हो- सकती, क्योंकि विरोधी विद्याका उदय होनेपर उस अविद्याका किसी अंशसे भी अवस्थान नहीं हो सकता और जीवन्मुक्तिके निर्वाहके लिए अविद्याका लेश नहीं माना गया है, किन्तु अविद्याका नाश होनेपर भी प्रारब्धके अनुसार उसके संस्कार कुछ रहते हैं, इसीको अविद्याका लेश कहा गया है। वस्तुतस्तु अविद्याका लेश है ही नहीं। अतः अविद्याका प्रत्येक जीवमें भेद मानना ही उचित है।

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जीवे कत्वानेकत्वविचार ] भापानुवादसहित १३१

तन्त्वन्तरः पटान्तरस्येव इतराविद्यादिभिः सकलेतरसाधारणप्रपश्चान्तरस्यो- त्पादनमित्येके। प्रत्यविदं प्रपञ्चस्थ भेदं न्यायनये यथा। अपेक्षाबुद्धिजद्वित्वं शुक्तिरुप्यं च भिद्यते ॥ ५१ ॥ हैसे न्यायमतमें प्रत्येक पुरुपकी अपेक्षावुद्धिसे जन्य द्वित्व भिन्न-भिन्न होते हैं, और शुकिरूप्यादि प्रातिभासिक पदार्थ भी तत्-तद् अज्ञानसे भिन्न है, वैसे ही प्रत्येक अज्ञानके मेदसे प्रपजका भी भेद है, ऐस भी कोई लोग कहते हैं।५१॥ तत्तदज्ञानकतप्राति भासिकरजतवत् न्यायमते जन्यद्वित्ववच्च तत्तदविद्याकतो वियदादिप्रपश्चः प्रतिपुरुपं भिन्नः। शुक्तिरजते त्वया यद् दृष्ट रजतम्, तदेव मयाऽपीतिवदैक्यभ्रममात्रमित्यन्ये। तत्साधारण विजातीय मरपख्वका नाश होता है और जैसे उसी क्षणमें (तन्तुके नाशक्षणमें) वर्तमान अन्य तन्तुओंसे पूर्वपटसे विलक्षण पट उत्पन्न होता है, वैसे ही इतर जीवोंकी अविद्या आदिसे-मुक्त जीवसे अन्य समस्त जीवोका साधारण अन्य प्रपश्व उत्पन्न होता है। जसे उन उन पुरुषोंके अज्ञानसे प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति होती है और जैसे न्यायमतमें + उन उन पुरुषोकी अपेक्षावुद्धिसे (अनेकमें एकत्व बुद्धि-यह एक है, यह एक है, इत्यादिरूपसे ) द्वित्व आदि संख्या उत्पन्न होती है, वसे ही उन उन पुरुषोंके अन्ञानसे आकाश आदि समस्त पदार्थोंकी उत्पत्ति हुई है, अतः अज्ञानके मेदसे प्रत्येक पुरुपके प्रति प्रपश्च भिन्न-भिन्न है। शुक्तिरजतस्थलंमें जैसे एकत्वका ग्रम होता हे, जिस रजतको तुमने देखा था वही मने देखा, वसे ही जिस प्रवश्चको तुम देखते हो, उसी प्रपञ्चको "मैं देस रहा है', इस प्रकार ऐक्यका भ्रम ही है, वस्तुतः प्रपञ्च एक नहीं है, गसा भी उन्हीं लोगोंका मत है। *ै यहाँ एक शझ होती है कि जिस स्थलमें एक कालमें अनेक पुरुषोंको एक साथ ही भ्रम हुआ ऐै, उम्र स्वलमे उन सभी पुरुपोंके अश्ञान एक रजतके प्रति कारण होंगे, अतः दशन्तकी अमम्ति अवश्य दोगी, परन्तु यद युक नहीं है. फ्योंकि उक स्थलमें देवयोगसे एक पुरुपमें छुधिका ज्ञान होनसे 'नेद रजतम्' ऐसे बाधक प्रत्यक्षस सोपादान रजतका नाथ ऐोनपर भी सन्गोमें रजतका अ्रम यथापूर्व अनुवर्तमान रहता दी है। अतः रजतका मेर अवद्य गानना दोगा, इसलिए दट्ान्तकी असिदि नहीं है, यह भाव है। + "ायगते' दय कथनका आशय गह है कि वेदान्तसिद्धान्तमें-द्वित्व आदि अपेक्षा-

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१३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

प्रातिभासिकरूप्यादे: प्रकृतिरजीवसंश्रया । अविद्येशाश्रया माया विश्वस्यत्यपरे जगुः ॥ ५२॥ प्रातिभासिक रूप्य आदिकी प्रकृति (उपादान) जीववृत्ति अविद्या है और ईशमें रहनेवाली माया समस्त विश्वकी प्रकृति है, ऐसा कोई-कोई कहते हैं ॥५२॥ जीवाश्रितादविद्यानिवहाद्भिना मायव ईश्वराश्रिता प्रपश्चकारणम्। जीवानामविद्यास्तु आवरणमान्रे प्तिभासिकशुक्तिरजतादिविक्षेपेऽपि च उपयुज्यन्ते इत्यपरे ॥७ ॥ ईशस्य कर्तृता कीहक् ? तत्र केचित् प्रचक्षते। कार्यानुकूलविज्ञानचिकार्षाककृतितेति ताम् ।५३॥ ईश्वरमें कैसा कर्तृत्व है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कोई लोग कहते हैं कि कार्यानुकूल ज्ञानचिकीर्षा-कृतिमत्व ही कर्तृत्व है ।५३।। अवसितमुपादानत्वम्, तत्प्रसक्तानुप्रसक्तं च।

कुछ लोगोंका यह मत है कि जीवोंमें रहनेवाले अज्ञानके समुदायसे ईश्वरमें रहनेवाली माया पृथक् है और यही समस्त वियद् आदि संसारके प्रति उपादान है। और जीवोंकी अविद्या आवरणमात्रमें और उपादानरूपसे प्रातिभासिक शुक्ति आदि विक्षेपमें उपयुक्त होती है *।।७।। [अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप ब्रह्मलक्षणमें प्रविष्ट ] उपादनत्वका लक्षण समाप्त हुआ और उसके प्रसङ्जसे प्राप्त जीवेश्वरस्वरूपनिरूपण तथा जीवेश्वर- स्वरूपनिरूपणके अनन्तर प्राप्त जीवैकत्व, नानात्व आदिका भी निरूपण समाप्त हुआ। [ अब कर्तृत्वका निरूपण करते हैं ]-

बुद्धिज़न्य नहीं हैं, किन्तु अनेकद्रव्यजन्य ही हैं, क्योंकि अनेक द्वित्व आदिकी और उनकी उत्पत्ति आदिकी कल्पनामें गौरव है इसलिए अपेक्षाुद्धि द्वित्व आदिकी व्यज्क है, यह माना गया है। * यद्यपि जीवाश्रित अविद्या स्वाप् प्रपश्चके प्रति उपादान है, अतः इसका स्वम्नप्नपश्चमें भले ही उपयोग हो, परन्तु शुकिरजतके प्रति उसका उपयोग नहीं हो सकता, कारण कि- रजतका अधिष्ठान जो शुत्तयवच्छिन्न चैतन्य है, उसमें जीवाविद्या नहीं रहती है, तथापि अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि 'रजतादिमें' आदि पदसे स्वप्नप्नपश्व ही गृहीत है, अथवा वाचस्पतिमिश्रके समान शुकतिरजतादिको जीवाविद्याविषयीकृतशुक्तयाद्यवच्छिन्नचतन्यका ही विवर्ते मानकर जीवाविद्याओोंका प्रातिभासिक रजत आदिके प्रति उपयोग वतलाया गया है, अतः अनुपपत्ति नहीं है।

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बह्मके कतृत्वरस्वरूपका विचार ] भापानुवादसहित १३३

अथ कीदशं कर्तृत्वम्।? केचिदाहु :- 'तदैक्षत सोऽकामयत तदात्मानं स्वयमकुरुत' श्रवणान्न्यायमन इव कार्यानुकलज्ञानचिकीर्पाक्कतिमच्वरूपमिति । इति

कार्यानुकूलिज्ञानमाध्रं सा नेतरे तयोः। कार्यत्वेनानवस्थानादिति चान्ये प्रचक्षते ॥। ५४॥ कोई-फोई कहते हैं कि कार्यानुकूलशनवत् ही कर्तृत्व है, क्योंकि चिकीर्पा (करनेकी इच्छा) और कृतिके कार्य होनेसे तदनुकूल अन्य चिरकीषां और कृतिके माननेमें अनवस्था प्रसक होगी ॥५४॥ अन्ये तु चिकीर्पाकृतिकर्तृत्वनिर्वाहाय चिकीर्पाकृत्यन्तरापेक्षायामन- वस्थाप्रसङ्गात् कार्योनुकलज्ञानवच्वमेव त्रह्मण: कर्तृत्वम्। न च ज्ञानेऽप्येप

नप्षमें कर्तृत्व कैसा है? [न्रक्षमें कोई धर्म नहीं है, अतः यदि कर्तृत्व है, तो उसका स्वरूप क्या है, यह आक्षेपकर्ताका भाव है] इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे न्यायमतमें कार्या- नुकूरज्ञान चिकीर्षाकृतिमत्वरूप * कर्तृत्वका लक्षण किया है, वैसे ही प्रकृतमें फर्तृत्वका यही लक्षण है, क्योंकि 'तदैक्षत०' (उसने (बदने) देखा, उसने चाहा, और उसने स्वतः ही अपनेको जगद्रप किया) इत्यादि श्रुति है [ यद्यपि त्रदाम स्वतः कर्तृत्व नहीं है, तथापि औपाधिक कर्तृत्व है, यह भाव है]। कुछ लोग कहते हैं कि चिकीर्पाके प्रति और कृतिके प्रति कर्तृताका निर्वाह करनेके लिए यदि अन्य चिकीर्पा और अन्य कृतिका स्वीकार किया जायगा, तो अनवस्था होगी, इससे कार्यानुकृवज्ञानवत्त्व ही कतृत्वका लक्षण है।

  • मारयानुकज्ञाननिकीयोकृतिमश्यम्-वर्तृलम्। इसका विवेचन कुछ पठ्क्तियोंके अनन्तर अनुवादमें राषरूपये किया गगा है, लक्षणमें इच्छा, कृति आदिका यय्यपि समाचेश नहीं रोता, इच्छनुकल शच्छा कृतिके अनुकूल कृति ऐखा गानकर उनमें (इच्छा आदिके कर्तृत्वमें) लक्षण- - समन्नय किया जायमा, तो परिशेषसे अनवस्था दी प्रसक दोगी, तथापि इस लक्षणकर्ताओंका अभिप्राय है कि इचछा आदिय भिन्न जो कार्य है, उनके प्रति वर्तृत्वका यह लक्षण है इच्छा आदिक प्रति नहीं, इच्छा आदिके प्रति अन्यविध कर्तृत्व होगा। इससे इसमें कर्तृत्वलक्षणका अननुगम दोप होता ह, यही अस्वरस है, अतः 'कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वं कर्तृत्वम्' अर्थात् फार्यका अनुफूल ज्ञान जिग्रमें रहे, वह कर्ता है, ऐसा 'अन्ये तु' इत्यादिसे अन्य पक्ष कहा जाता है।

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१३४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

प्रसङ्ग:। तस्य ब्रह्मस्वरूपत्वेनाऽकार्यत्वात्। एवं च विवरणे जीवस्य सुखादिकर्तत्वोक्तिः, वीक्षणमात्रसाध्यत्वात् वियदादि वीक्षितम्, हिरण्य-

ज्ञानमें यह प्रसङ्ग नहीं है, क्योंकि ज्ञानके ब्रह्मत्वरूप होनेसे वह किसीका भी कार्य नहीं है। [ तात्पर्यार्थ यह है कि सच्चिदानन्द परमात्मा समस्त जगत्का कर्ता है और पूर्वमतमें कर्ता वह कहा गया है-जिसमें कार्यका ठीक-ठीक परिज्ञान, उसकी चिकीर्षा (कार्यको वनानेकी प्रवल इच्छा) और कार्य- विषयिणी (कार्यानुकूल) कृति हो। जो कर्ता होता है, उसमें कार्यविपयक ज्ञान, कार्यविषयक चिकीर्पा और तदनुकूल कृति रहती है, जैसे-घटका कर्ता है- कुम्भकार, उसमें घटका ज्ञान, घटकी चिकीर्षा और घटानुकूल कृति, ये तीनों विद्यमान हैं। तुल्य युक्तिसे ईश्वरम भी उपाधिवश कार्यानुकूल ज्ञान, चिकीर्षा और कृति माननी ही पड़ेगी, अन्यथा ईश्वरके कर्तृत्वका निर्वाह नहीं होगा। ऐसी परिस्थितिमें कर्ताके लक्षणमें प्रविष्ट जो चिकीर्षा और कृति है, उनको कार्य माना जाय या नहीं? यदि उनको कार्य न माना जाय, तो ईश्वरसे अन्य चिकीर्षा और कृतिके भी नित्य होनेसे अद्वितीयत्वश्रुतिके साथ विरोध होगा, इसलिए चिकीर्षा और कृतिको कार्य अवश्य मानना होगा, यदि वे कार्य हैं, तो चिकीर्पाके अनुकूल द्वितीय चिकीर्पा और कृतिके अनुकूल अन्य कृति माननी होगी, इस प्रकार द्वितीय चिकीर्पा और कृतिके कार्य होनेसे तदनुकूल तृतीय चिकीर्षा और कृति माननी होगी, अतः इस क्रमसे विचारधारा करनेपर अनवस्था ही होगी, ज्ञानके ब्रह्मस्वरूप होनेसे वह नित्य है, अतः तत्प्रयुक्त अनवस्था नहीं हो सकती है, इसलिए चिकीर्षा और कृतिसे रहित-'कार्यानुकूल' अर्थात् कार्यके लिए उपयुक्त जो ज्ञान तद्वान् जो हो वह कर्ता है-इस प्रकार प्रथम लक्षणमें अरुचि वतलाकर कर्ताका लक्षण कहा गया, यह भाव है]। इच्छा और कृतिका कर्ताके लक्षणमें प्रवेश नहीं है, अतः विवरणमें सुख आदिका जीव कर्ता है, ऐसा कहा गया है*। और वीक्षणमात्रसे साध्य होनेसे वियद् आदि वीक्षित कहे गये हैं, हिरण्यगर्भ द्वारा भौतिक * यह तात्पर्य है-जीवमें सुख आदिकी उत्पत्तिके अनुकूल ज्ञान है, परन्तु सुख आदिकी उत्पत्तिके अनुकूल इच्छा या कृति नहीं है, क्योंकि, ऐसा अनुभूत नहीं है, और किसी तन्त्रकारने स्वीकार भो नहीं किया है। इसीलिए कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्वरूपकर्तृत्वका अङ्गीकार करके ही विवरणकारका उक्त वचन सज्त होता है, अन्यथा सकत नहीं होगा।

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बक्षके कर्तृत्वस्वरूपका विचार] भापानुवादसहित १३५

गर्भद्वारा वीक्षणाधिकयत्नसाध्यत्वात् भौतिकं स्मितमिति कल्पतरूक्तिश सङ्गच्छत इति वदन्ति। एवं जीवोऽपि कर्ता स्याजगतः स्वन्नजस्य च। ततः सृष्ट्यनुकूलार्थाऽडलोचनेवेति चापरे॥ ५५॥ यदि कार्यानुकूल ज्ञानवत्व कर्तृत्व माना जायगा, तो जीव भी जगत् और स्वप्नका कर्ता होगा, इसलिए सृष्टिके अनुकूल आलोचनात्मक ज्ञानवत्व ही कर्तृत्व है, ऐसा कोई लोग कहते है॥५५॥ अपरे तु कार्यानुकूलस्ष्टव्यालोचनरूपज्ञानवच्वं कर्तृत्वम्, न कार्यानुक-

पदार्थ वीक्षणसे अधिक यत्नसाध्य हैं, अतः भौतिक पदार्थ स्मित हैं । इस प्रकार कल्पतरुकी उक्ति भी सम्त होती है। कुछ लोग कहते हैं कि 'मया इदं स्रष्टव्यम्' इत्याकारक कार्यानुकृल जो आलोचनात्मक ज्ञान है, वह जिसमं हो, वह कर्ता है, केवल कार्यानुकूल ज्ञानवान्

भागतीमन्थके आरम्ममें मगलाचरण है- निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पत्व भूतानि। स्गितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्ं महाप्रलयः ।। इसका यह अर्थ है-से पुरुषके निःश्वासमें कोई प्रयत्नविशेपकी आवश्यकता नहीं होती, ैने ही जिस बसाके-यें समम ज्ञानके आगार चारों चेद प्रयत्नके बिना ही-कार्य हैं, जिसफी दृष्टिमानये दी ये मदाभूत हुए हैं, जिसका हिरण्यगभके साथ चराचर विश्व एक मन्दहास्प है और महाप्रलय जिसकी मानो मुपुप्ति है, उस न्रदाका नमन करता हूँ। दग् मरोकमें मदाभृत वहायोक्षित हे और भौतिक चराचर ग्रपन्व व्रक्षस्मित हैं, ऐस कहा गया है, इसी तात्पर्यफो कहंनके लिए छल्पतरुकारने यह कहा है कि 'वीक्षणमान्नेण सृष्टत्वात् भृतानि चीक्षितम, दिरण्यगर्भद्वारा साध्य चराचरं वीक्षणाधिकप्रयत्नसाध्यस्मितसाम्यात् स्मितम्' (केवल वीक्षणसे सी भृतोंकी उत्पत्ति है, अतः भूत चीक्षित कहे गये हैं हिरण्यगर्भ द्वारा चरानरकी उत्पत्ति हुई है, अतः वीक्षणसे अधिक प्रयत्नसाध्यस्मितकी समानता होनेसे चराचर मदाका स्मित है अर्थात् लोकमें मन्दहासरूप जो स्मित है, उसमें वीक्षणसे-ज्ञानसे अधिक कुछ ओष्टसचालनके अनुकूल यत्न करना पढ़ता है, वैसे ही चराचरकी उत्पत्तिमें बदाको पीक्षणके सिया हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिरूप व्यापार करना पढ़ता है, अतः वीक्षणाधिक यत्न- की अपेक्षा दोनेसे चराचर स्मित है, यह भाव है) इस वल्पतरुव्यार्याके आधारपर कार्यानुकल ज्ञानवत्त्वरूप वर्तृत्वका दी लाभ होता है, क्योंकि 'वीक्षणमत्रिण सषत्वात्' इसमें मात्रदब्दसे स्पष्ट ही चिकीर्या और कृतिका निरास दोता है, यह भाव है।

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१३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

जीवस्य कर्तृत्वप्रसङ्गात्। न चेष्टापत्तिः, 'अथ स्थान् रथयोगान् पथः सृजते स हि कर्ता' इत्यादिश्वत्यैव जीवस्य स्व्रन्नप्रपश्चकर्तृत्वोक्तेरिति वाच्यम् । भाष्यकारैः 'लाङ्गलं गवादीनुद्वहृतीतिचत् कर्तत्वोपचारमात्रं रथादिप्रतिभाननिमित्तत्वेन' इति व्याख्यातत्वादित्याङ्कुः ॥

कर्ता नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर जीवमें भी शुक्ति-रजत और स्वम्विभ्रमके प्रति कर्तृत्वका प्रसङ्ग होगा, क्योंकि उसमें अध्यस्यमान (जिनका अध्यास होता है, ऐसे ) रजत आदिके अनुकूल जो अघिष्ठानका ज्ञान है, वह है। परन्तु यह दोष नहीं है, प्रत्युत इष्टापत्ति ही है, क्योंकि 'अथ रथान्०' (स्वम- कालमें जीव रथ, घोड़े और मार्गको उत्पन्न करता है, क्योंकि वह जीव स्वाम पदार्थके हेतुभूत कर्मका कर्ता है) इस श्रुतिसे 'जीव स्वाम् प्रपश्चका कर्ता है' ऐसा कहा गया है, नहीं इष्टापत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि भाष्यकारने व्याख्यान किया है कि जैसे 'लाङ्ल गो आदिका उद्वहन करता है' यह प्रयोग केवल औपचारिक है, वैसे ही रथ आदिके प्रतिभानके निमित्तरूपसे जीवमें कर्तृत्वका उपचारमात्र * है।

*'लाङलं गवादीनुद्दहति' (हल गाय आदि पश्चुओोंका उद्वहन करता है अर्थात् गौ आदि पश्चुओंकी जीवनस्थितिको हल करता है) इस प्रयोगमें लाङलमें गाय आदिका स्थितिकतृत्वरूप उद्धोहृत्व सुना जाता है, वह मुख्य नहीं हो सकता है, क्योंकि हलका भक्षण नहीं किया जा सकता है। पशुओंका उद्दहन करना कैसे हो सकता है, इसलिए- लाङलसे कृषि होगी, कृषिस गाय आदिकी स्थितिमें कारणभूत भूसा आदिका लाभ होगा-इस प्रकार परम्परासे औपचारिक कहा जाता है, वैसे ही स्वपर्थ आदिका जो प्रतिभान-प्रतिभास होता है उसमें कारणभूत धर्म आदिके, कर्ता होनेसे 'स हि कर्ता' इत्यादि श्रतिमें जीवोंमें स्व्रप्ररथ आदिके प्रति कर्तृता कही गई है, वस्तुतः नहीं। इस प्रकार भाष्यकारने जीवमें औपचारिक कर्तृत्व-स्वप्नर्थ आदिके प्रति कहा है, विवरणमें सुख आदिके प्रति जीवमें जो कर्तृत्वका प्रतिपादन किया गया है, वह भी इससे औपचारिक ही सावित होता है। 'मया इदं स्त्रष्टव्यम्' (मुझे यह वनाना चाहिए) इस प्रकार आत्माके आलोचनात्मक ज्ञानके न रहनेपर भी सुख आदि देखे जाते हैं, अतः मुख्य कर्तृत्वकी सम्भावना नहीं है 'वीक्षणमान्रसाध्यम्' इस प्रकार जो कल्पतरुका वचन है, इससे भी स्नष्टव्यालोचनरूप ज्ञान ही वीक्षणक्षव्दसे अभिप्रेत है, अतः उसके साथ भी कोई विरोध नहीं है, यद भाव है।

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त्रहाकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १३७

जगत्कर्तृत्वसंसिद्धं सर्वज्ञत्वं समर्थितम्। ईशस्य शास्त्रयोनित्वात्तच्च कीदृग्विधं भवेत् ॥५६ ॥। ईश्वर जगत्का कर्ता है, इससे अर्थतः और सम्पूर्ण वेदोंका कर्ता है, इससे साक्षात् ईश्वरमे सर्वंशत्व सिद्ध है, वह सर्वज्ञत्व कैसा है? ॥५६॥ अनेनैव निखिलग्रपश्चरचनाकर्तभावेनाऽर्थसिद्धं सर्वज्ञत्वं त्रह्मणः 'शास्त्र- योनित्वात्' (उ. मी. अ. १ पा. १ सू. ३) इत्यधिकरणे वेदकर्तृत्वेनाऽपि समर्थितम् ॥८।। अथ कथ त्रह्मणः सर्वज्ञत्वं सङ्गच्छते। जीववदन्तःकरणाभावेन

इसी सम्पूर्ण प्रपश्चरचनाके कर्तृत्वसे ब्रद्ममं अर्थतः सिद्ध हुए सर्वज्ञत्वका 'शास्त्नयोनित्वाद' इस अधिकरणमं वेदकर्तृत्वसे भी समर्थन किया गया है* ॥ ८ ॥ अव शक्का करते हैं कि व्रक्म सर्वज्ञ कैसे हो सकता है? क्योंकि जीवके समान न्रसमें अन्तःकरणका सम्बन्ध न होनेसे ज्ञातृत्वका ही असम्भव है।।

"'जन्मादस्य यतः' (जिस आनन्दकन्दसे समस्त प्रपश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं, वह वदा है) इख सन्नसे समस्त प्रपनका कर्ता होकर जगत्का जो उपादान दो, वह वम्त है, ऐसा लक्षण प्राप्त दोता है, परन्तु सर्वज्ञत्वके चिना सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके प्रति कतृत्व वरद्ममें नहीं हो सकता है, अतः ब्रह्मका सर्वज्ञत्व अर्थतः सिद है। और 'शासत्रयोनित्वात' (त्रम्म सर्वज्ञ है, क्योंकि ऋग्वेद-आदि साज्ष सगस्त वेदोंका कर्ता है) इस अधिकरणमें वेदकतृंतवसे भी सर्वज्ञताका साक्षात् साधन किया गया है, पूर्वके 'जन्मादस्थ यतः' इस सून्नमें अर्थतः सिद्ध है और 'शास्न्नयोनित्वात्' में साक्षात् सर्वज्ञत्वका साधन है, क्योंकि पूर्वसूत्र म्रह्का लक्षण बोधन करता है 'और शाल्त्रयोनित्वात्' सर्वक्ञत्वका साधन करता है। + यद्यपि 'यः सर्वश्ष: सर्वचित्, इत्यादि श्रुतियोंसे वरह्मके सर्वज्ञत्वका साक्षात् ही कथन है, तथापि युकियोंसे सर्वज्ञत्वका अधिक दढीकरण करनेके लिए इस सर्वज्ञत्वविचारका उपकम है। शक् करनेवालेका भाव यह है कि जीवमें जञातृत्वका व्यवहार जो होता है, वह अन्तःकरणरूप जोवकी उपाधिके आधारपर ही अवलम्बित है, ईशवरके अन्तःकरण नहीं है, अतः उसमें शातृत्वका सर्वया अभाव ही रहगा, ईश्वरकी उपाधि अन्तःकरण नहीं दो सकता, क्योंकि 'कार्योपाधिरयं जीवः' इस उदाहत श्रुतिसे अन्तःकरण जीवकी ही उपाधि कही गई है। जातृत्व धर्म सर्वज्ञत्वका व्यांपक है, अर्थात् जहाँ जहाँ सर्वज्ञत्व होगा वहाँ चहाँ जातृत्व अवश्य रहेगा, क्योंकि जातृत्वका एकदेश ही सर्वजञत्व है। इसलिए व्यापक १८

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१३८ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

साक्षित्वान्धारर्तीतीर्थमते सार्वत्यमीरित्तम् ॥५७॥ सम्पूर्णवस्तुविषयक सम्पूर्णंधीवासनाओंसे उपहित ईश्वर सम्पूर्ण विषयवासनाका साक्षी है, अतः ईश्वरमें सर्वज्ञत्व है, ऐसा भारतीतीर्थका मत कहा गया है॥५७॥ अत्र सर्ववस्तुविपयसकलप्राणिधीवासनोपरक्ताज्ञानोपाधिक ईश्वरः। अतस्तस्य सर्वविषयवासनासाक्षितया सर्वज्ञत्वमिति भारतीतीर्थादिपक्षः आ्रगेव दर्शितः ।

जैकालिकेष्वापरोक्ष्यं प्रकटार्थकृतो विदुः॥५८॥ चित्प्रतिबिम्बका ग्हण करनेवाली मायावृत्तियोंसे इश्वरम कालत्रयमें रहनेवाले प्रपञ्चका जो अपरोक्ष ज्ञान है, वह सर्वज्ञत्व है, ऐसा प्रकटार्थकार कहते हैं॥५८॥ प्रकटार्थकारास्त्वाहु :- यथा जीवस्य स्वोपाध्यन्तःकरणपरिणामाश्चैत- न्यप्रतिविम्बग्राहिण इति तद्योगात् ज्ञातृत्त्वम्, एवं न्रह्मणः स्वोपाधिमाया-

*इस आक्षेपके समाधानमें भारतीतीर्थ आदिका पक्ष पूर्वमें ही दिखलाया गया है कि सर्ववस्तुविषयकसम्पूर्ण प्राणिधीवासनाओंसे उपरक्त अज्ञानसे उपहित चैतन्य ईश्वर है, इससे अपनी उपाधिभूत वासनाओंके विषयीभूत वस्तुओंके अवभासकरूपसे ईश्वरमें सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है। प्रकटार्थकार कहते हैं कि जसे जीवके उपाधिरूप अन्तःकरणके परिणाम (वृत्तियाँ) चैतन्यके प्रतिबिम्बको ग्रहण करते हैं, इसलिए उनके योगसे जीव ज्ञाता होता है, वैसे ही ब्रह्मकी उपाधिभूत मायाके परिमाण चैतन्यके

ज्ञातृत्वकी निवृत्तिसे व्याप्य सर्वज्ञत्वका भी निरास हुआ, कारण कि व्यापकके अभावसे व्याप्यका अभाव सिद्ध होता है, यह सिद्धान्त है, अतः पूर्वपक्ष होता है कि व्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति कैसे हो सकती है।

*'सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपाधिकस्य तस्य सर्वज्ञत्वस्य तत एवोपपतेः' इस प्रन्थसे दिखलाया गया है [द्रष्टव्य-पृ० ९४ ]। + जैस प्रकटार्थकारके मतसे जीवमें ज्ञातृत्वकी प्रयोजक उपाधि अन्तःकरण है, वैसे ही ईश्वरमें ज्ञातृत्वकी प्रयोजक उपाधि माया है, इसलिए मायोपाधिक ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वका व्यापक ज्ञातृत्व नहीं है, ऐसा नहीं है, परन्तु है ही और 'मायिनन्तु महेश्वरम्' इत्यादि श्रुतिसे माथा ईश्वरकी उपाधि प्रसिद्ध है।

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प्रप्म की सर्वज्ञताका स्वरूपविचार] भापातुवादसहित १३९

परिणामाध्ित्प्रतिविम्वग्राहिणरसन्तीति तत्प्रतिविम्वितैः स्फुरणैः कालतय- वर्तिनोऽपि प्रपश्चस्याऽपरोक्षेणाऽवकलनात् सर्वज्ञत्वमिति। तत्वशुद्धिकृतो भृते स्मृति भाविनि तूहनम् ॥ बदामें [वतेमान चस्तुका अनुभव ह], भूतकालीन वस्तुका स्मरण है और भविष्वत्कालीन वस्तुका मी (मृलोक्त प्रकारस) ज्ान है, इसलिए ब्रह्या सर्वदा सर्वज् है, ऐसा तत्यपुदधिकार कहते हैं। तत्वशुद्धिकारास्तुक्तरीत्या त्रह्मणो विद्यमाननिखिलप्रपश्चसाक्षार्कार- सम्भवात् तअ्ञनितसंस्कारवत्तया च स्मरणोपपत्तेरतीतसकलवस्त्ववभास- सिद्धिः। सृष्टेः प्राक् मायायाः सरज्यमाननिखिलपदार्थस्फुरणरूपेण जीवादष्टा- नुरोधन विवर्तमानत्वात् तत्साक्षितया तदुपाधिकस्य ब्रह्मणोऽपि तत्साधक- त्वसिद्धेः अनागतवस्तुविषय विज्ञानोपपत्तिरिति सवर्ज्त्वं समर्थयन्ते। सदा सर्वस्य सत्त्वात्तु साक्षिणा कोमुदीकृतः ॥५९॥ सार्वस्ये ज्ञानरूपत्वमिषट न ज्ञानकर्तृता।

प्रतििम्वको ग्रहण करनेवाले हैं, अतः उनमें प्रतिविम्वित स्फुरण (चैतन्य) तीनों कालंगें रहनेवाले प्रपञ्चको अपरोक्षसे विषय करते हैं, अतः ब्रह्ांमें सर्वनत्व दो सकता है। तत्वशुद्धिकार कहते हैं कि पूर्वोक्त रीतिसे सम्पूर्ण वर्तमान प्रपश्चका साक्षात्कार सम्भव है और विद्यमान वस्तुविपयक साक्षात्कारसे उत्पन्न संस्कारके आश्रयरुगसे गूनकालीन सम्पूर्ण वस्तुके अवभासकी सिद्धि होती है। नृष्टिक पूर्वंकालमें जीवोंके अटष्टवशसे सृज्यगान सम्पूर्ण पदार्थोकी वृत्तिरूपसे मायाका परिणाग होता है, इससे गार्यमं प्रतिविम्न् होनेसे मायोपाधिक त्रह्ममें भी गायाकी वृत्तिके प्रति कर्तृत्वकी सिद्धि होनेस अनागतवस्तुविपयक विज्ञानकी उपपत्ति है, अतः न्रस्के सर्वनत्वकी सिद्धि है।

  • इय वत्यशुदिदारक मतमे पूर्ममतसे यद विशेष है-पूर्वमतमें ईश्वरका अतीत-अनागत- निपयफ ज्ञान अपरोक ही है और इख मत्मे जीवके समान ईश्वरका भी अतीत आदिविपयक ज्ञान परोक्ष है, पर्माकि लोक्मे वर्तमानविषयक ज्ञान दी अपरोक्ष धान कहा जाता है। अवर्तमान- वियक अपरोक ज्ञान नहीं कका जाता, अतः लरमें अनुभृत स्वभावका शास्तर भी अतिक्रमण नहीं कर सकता है।

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१४० सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

भाष्येऽस्य जीवलिङ्गत्वकीर्तनादिति ते विदुः ॥ ६० ॥ सूक्ष्मरूपसे सभी पदार्थोंके विद्यमान होनेके कारण साक्षिरूपसे ब्रह्म सब वस्तुका अवभासक है। ऐसा कौमुदीकार कहते हैं। ज्ञानरूपत्व ही सर्वज्ञत्व है, ज्ञानकर्तृत्वरूप नहीं, इसीलिए भाष्यमें ज्ञानकर्तृत्व जीवका लिङ्ग कहा गया है, ऐसा भी वे (कौमुदी-' कार) कहते हैं ॥१९॥६०।। कौमुदीकृतस्तु चदन्ति-स्वरूपज्ञानेनैव ब्रह्मणः स्वसंसृष्टसर्वावभास- कत्वात् सर्वज्ञत्वम्। अतीतानागतयोरप्यविद्यायां चित्रभित्तौ विमृष्टानु- न्मीलितचित्रवत् संस्कारात्मना सच्वेन तत्संसर्गस्याऽप्युपपत्तेः। न तु वृत्तिज्ञानैस्तस्य सर्वेज्ञत्वम्। 'तमेव भान्तमनु भाति सर्वम्' इति

कौमुदीकार कहते हैं कि स्वरूपज्ञानसे ही व्रह्म अपने साथ सम्वद्ध सब पदार्थोका अवभासक होनेसे सर्वज्ञ है। जैसे विमृष्ट होनेसे अनभिव्यक्त चित्र संस्काररूपसे चित्रभित्तिमें रहता है, वैसे ही अतीत और अनागत पदार्थ अविद्याके संस्काररूपसे रहते हैं, अतः उनके साथ ब्रह्मका सम्वन्ध है, इसलिए अतीत और अनागत विषयके साथ सम्बन्ध होनेसे तत् संसृष्ट ब्रह्म सर्वज्ञ है। वृत्तिज्ञानसे ब्रह्म सर्वज्ञ नहीं है, क्योंकि 'तमेव भान्त०' (उसके ही

  • पूर्वके दो मतोंसे वृत्तिज्ञान द्वारा ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वका निरूपण किया गया है, और इस मतसे स्वरूपज्ञानसे ब्रह्मकी सर्वज्ञताका निरूपण किया जाता है। अतीत और अनागत प्रपश्व प्रलयकालमें और सृष्टिकालमें संस्काररूपसे विद्यमान रहते हैं, इसलिए उनका ब्रह्मके साथ सम्बन्ध होता है, अतः अतीत और अनागत वस्तुओंसे सम्पृक्त ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी अनुपपत्ति नहीं हो सकती है। देवताधिकरणके भाष्यमें और आरम्भणाधिकरणके भाष्यमें अतीत और अनागत वस्तुकी प्रलय- कालमें और सृष्टिकालमें संस्कारात्मना अवस्थिति रहती है, इसका निरूपण किया गया है। इसमें एक वातकी न्यूनता रहती है, उसे जानना चाहिए-जव स्थूल प्रपथ्चका अवस्थान है तव सूक्ष्म प्रपथ्च नहीं है और प्रलयकालमें सूक्ष्म प्रपश्न है, तो उस कालमें स्थूल प्रप्च नहीं है, अतः सब कालमें सब प्रपश्चके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध न होनेसे ब्रह्ममें असंकुचित सर्वज्ञत्व सिद्ध नहीं होगा। 'तमेव भान्तम्' इसमें 'एव के अवधारणार्थक होनेसे यह अर्थ स्पष्ट भासता है कि व्रह्म- चिषयके प्रकाशनमें अन्य किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं करता है, अतः ब्रह्मकी सर्वज्ञतामें वृत्तिकी अपेक्षा नहीं है, परन्तु स्वरूपज्ञानसे ही ब्रह्म स्वसम्बद्ध सकल पदार्थोका अवभास करता है। इस विषयमें भी कुछ विचारणीय अंश है, जैसे न्रह्मचतन्य जगत्के अवभासनके लिए मायावृत्तिकी अपेक्षा करे तो 'तमेव' इस श्रौत अवधारणके साथ विरोध होता है, वैसे ही घट आदिके अवभासनमें जीव अन्तःकरण वृत्तिकी अपेक्षा करता है, तो श्रौत अवधारणके

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मलकी सवज्ञताका स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १४१

सावधारणश्रुति विरोधात् सृष्टेः आगेकमेवाउद्वितीयमित्यवधारणानुरोधेन महा- भृतानामित वृत्तिज्ञानानामपि प्रलयस्य वक्तव्यतया न्रह्मणस्तदा सर्वज्ञत्वा- भावापत्या प्राथमिकमायाविवर्तरूपे ईक्षणे तत्पूर्वके महाभूतादौ च सष्टृत्वाभावप्रसङ्गाच। एवं सति त्रह्मणस्सर्वविपयज्ञानात्मकत्वमेव स्याद, न तु सर्वज्ञातृत्वरूपं सर्वव्त्वमिति चेत्, सत्यम्। सर्वविपयज्ञानात्मकमेव न्म, न तु सर्वज्ञानकर्तत्वरूपं ज्ञातृत्वमस्ति। अत एव 'वाक्यान्वयात्' प्फाशित होनेपर सब वस्तुओंका प्रकाश होता है) इस अवधारण (एव) के सदित श्यमाण श्रुतिके साथ विरोध होगा और 'एकमेवाद्वितीयम्' (एक ही अद्वितीय) इस अवधारण अ्ुतिके आधारपर सृष्टिके पूर्वकालमं महाभूतोंके समान वरिन्ानोंका मरलय है, यह कहना होगा, इसलिए उस कालमं वृत्तिका अभाव होनेसे नमगं सर्वजत्वाभावकी प्रसक्ति होगी और प्राथमिक (आद) मायाके प्रथम परिणाम ईक्षणमें और उस ईक्षणपूर्वक महाभूत आदिकी सृष्टिमें त्रक्मकी लष्टता भी नहीं रहेगी। इस परिस्थितमं त्रद्ाकी सर्ववस्तुविषयज्ञानात्मकता ही सर्वज्ञता होगी, सर्वज्ञानकर्तृतारूप नहीं होगी, ठीक है, सर्वविपयकज्ञानात्मकत्व ही सर्वज्ञत्वर है, क्योंकि सर्वविषयकज्ञानस्वरूप वरा है, सर्वज्ञानकर्तृत्वरूप ज्ञातृत्व

साप विरोष होगा ही, गदि दम अनुपपशिक परिशरके लिए सम्पूर्ण जढ़ वस्तुएँ पृत्तिसाक्षिप मतन्दमे सी प्रसाशित दोती है, यह अवधारणभुतिका अर्थ माना जाय, तो ब्रहाचैतन्य भी मायाकृकी अपेशा करके नद वस्तुको प्रकाशित कर सफता है, इसमें आपतति नहीं है। इग गसमें वर्गनपेक्ष मल्त स्कू शाने दी सर्वागभासक दोकर सर्वश है, यह कद्दा जाता है, क्योकि 'एस्मवाहितीयं पम्' इत्यादि क्षतिके आगारपर प्रलयकालमें सत्र वृत्तियोंका विनाश प्रतीन होता दे। इसलिए र द्वारा, बहटि पूर्वकलमें पसिक अभाव होनेरे, 'तदेक्षत' (उसने ईरण किया) इम प्रकार दकण नहीं को सफता है। बहापर भी विचार करने लायक एक भात से-रटिके सूरकारसमें माया आदिकी सताका अवस्य अह्ीकार करना होगा, क्योंकि वदान्तविदान्तमें अविया यदि कः पदार्थ अनादि नाने गये है। 'एकमेवाद्ितीयम्' इत्यादि शदनीगतके सनभारणफो मुख्य नदीं मान सहते है, परन्तु मागा आदिके अनादित्वकी प्रति- पादक श्रतिके वापारपर व्याकुत-फार्यरप द्वितीयसे रदित ना था, गदद 'अद्वितीगम्' का अर्थ करना होगा। दस्ी न्यायक अनुसार सर्वनिषयकज्ानकर्तृत्वप्रतिपादक ध्रुतिके वलसे आयापृत्तिये व्यतिरिक कोई दिलीग वस्तु दे दी नदी, ऐसा अर्थ अदवितीय श्ुतिका ययों न किया जाय। और ईशत्यधिकरणमें भाष्यकारन भी मायाकृतिसे ही सर्वसत्वका समर्थन किया है।

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१४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

(उ. मी. अ. १ पा. ४ सू, १९) इत्यधिकरणे विज्ञातृत्वं जीवलिङ्ग- मित्युक्तं भाष्यकारैः। 'यः सर्वज्ञः' इत्यादिश्रुतिरपि तस्य ज्ञानरूपत्वा- भिप्रायेणैव योजनीयेति। हृद्यावच्छिन्नरूपेण चितः कार्यत्वसम्भवात्। सार्वज्यं ज्ञानकर्तृत्वं वाचस्पतिमते स्थितम् ॥६१॥ दश्यावच्छिन्नरूपेण चैतन्य कार्यरूप हैं, अतः ज्ञानकर्तृत्व ही सर्वज्ञत्व है, ऐसा वाचस्पतिमिश्रका मत है ॥६१ ॥ यद्यपि ब्रह्म स्वरूपचैतन्येनैव स्वसंसृष्टसर्वावभासकम्, तथाऽपि तस्य स्वरूपेणाऽकार्यत्वेऽपि दृश्यावच्छिन्नरूपेण तु ब्रह्मकार्यत्वात्। 'यः सर्वज्ञः'

(सर्वज्ञत्व) व्रह्ममें नहीं हैं अर्थात् ब्रह्म ज्ञाता नहीं है। इसीलिए 'वाक्यान्वयात् * इस अधिकरणमें भाष्यकारने विज्ञातृत्वका जीवके लिङ्गरूपसे कथन किया है। 'यः सर्वज्ञः' (जो सर्वज्ञ) इस श्रुतिकी भी ज्ञानरूपताके अभिप्रायसे ही योजना करनी चाहिए। + आचार्य वाचस्पतिमिश्र कहते हैं कि यद्यपि ब्रह्म अपनेसे सम्बद्ध सव वस्तुओंका अवभासक स्वरूपचैतन्यसे ही है, तथापि स्वरूपतः चैतन्यके उसके कार्य न होनेपर भी दश्यावच्छिन्नरूपसे वह कार्य ही है, इससे 'यः सर्वज्ञः'

  • 'वाक्यान्वयात्', 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि श्रुतिमं द्रष्टव्यरूपसे कहा गया आत्मा' जीव नहीं है, किससे? इससे कि 'इदं सर्चमात्म।' (यह सव आत्मरूप है) इत्यादि श्रुति- वाक्य तात्पर्यवृत्तिसे सर्वात्मक ब्रह्ममें ही अन्वित हैं। 'विज्ञातारम्' इत्यादि वाक्यके आधारपर पूर्वोक्त श्रुतिस्थ आत्मासे जीवात्माका ग्रहण नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उस वाक्यसे मुक्त पुरुपका ही वोधन होता है, अतः भूतपूर्वविज्ञातृत्व धर्मका, जो जीवमें ही था, अनुवादमात्र है, अतः द्रष्टव्य परमात्मा ही है, जीव नहीं। इसमें विज्ञातृत्व धर्म जीवलिक्वतया ही उपन्यस्त है, व्रह्मसाधारणविज्ञातृत्वका कथन नहीं है, अतः ब्रह्म स्वरूपतः सव वस्तुका प्रकाशक है, यह भाव है। सब वेदान्तोंका लक्ष्य नित्य निर्विशेष चैतन्य ही है, अतः 'सर्वज्ञः' इसमें जो ज्ञाधातु - है, उसका वाच्य यह नहीं हो सकता है, इसलिए उसका अर्थ विशिष्ट चेतन ही होगा, विशिष्ट चेतनके कार्य होनेसे 'सर्वन्ञः' में प्रत्ययार्थ जो कर्तृत्व है, उसकी उपपत्ति हो सकती है। ब्रह्ममें सर्वज्ञानकर्तृत्वप्रतिपादक श्रति है, उसकी उपपत्ति होनेके लिए ज्ञातृत्व ईश्वरमें मानना होगा। जीवके लिद्गरूपसे भाष्यकारने जो विज्ञातृत्वका कथन किया है, वह तो केवल वाक्या- न्वयाधिकरणकी सिद्धानतकोटिमें स्वीकृत निर्विशेष ब्रह्मसे व्यावृत्ति करनेके उद्देशसे है,

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वृत्तिके उपयोगका विचार] भापानुवादसहित १४३

इति ज्ञानजननकर्तृत्वश्ुतेरपि न कश्षिद्विरोध इति आचार्यवाच- स्पतिमिश्राः ॥ ९॥ नन्वीश्रवज्जीवोऽपि वृत्तिमनपेक्ष्य स्वरूपचैतन्वेनैव किमिति विपयानाऽवभासयति ?- सुद्धो संसृज्यते जीवः सर्वगो व्यक्तिजातित्। अन्येस्तद्वृत्युपारूडो ज्ञाता विवरणे स्थितः॥ ६२॥ जैसे गोल आदि जातिके व्यापक होनेपर भी उसका गोव्यक्तिमें ही सम्बन्ध होता है, पेगे ही जीबके व्यापक होनेपर भी उसका अन्तःकरणमं ही सग्बन्ध होता है, और अन्त :- करणकी ृत्तिके ऊपर आरूग सोयर अन्य विपयोंके साथ उसका सम्बन्ध होता है, असषः नद (जीव) नाता होता है, ऐस विवरणमें कहा गया है।।६२।। अत्रोक्तं विवरणे-व्रह्मचैतन्यं सर्वोपादानतया सर्वतादात्म्यापन्नं सत् स्वसंसृष्टं सर्वमव्रभामयति, न जीवचैतन्यम्। तस्याऽविद्योपाधिकतया

इत्यादि ज्ञानजननकर्तृत्वकी (ज्ञानोत्पत्तिके प्रति कर्तृत्वकी) प्रतिपादक श्रुतिके साथ कोई भी विरोध नहीं है॥। ९ ॥ शद्का होती है कि ईसवरकी नाईं जीव भी वृत्तिकी अपेक्षा न करके स्वरूपचेतन्यसे विषयोंका परिज्ञान (पकाश) क्यों नहीं करता है *? इसके ऊपर विवरणकारने यह समाधान किया है-ब्रह्मचैतन्य सभीका उपादान है, इसलिए समीके साथ तादात्म्यरूप होकर स्वसम्बद्ध सब पदार्थोंका प्रकाश करता है, न कि जीवचैतन्य; कारण कि यद्यपि वह अविद्योपाधिक होनेसे

यर्योंकि आाप्पकारने की ईसत्यधिकरणमें सर्वविषयकज्ञानकर्तृत्य कहा है, इसलिए पूर्वपक्षमें योई जीय नहीं है, दमी असारसस धीनाचरपतिमिधरके पक्षका उपकम है। माया यद्यपि अनादि है, सथापि तत्तन कार्योंके साथ मायाका तादत्म्य दोनेसे गायावच्छिन चैतन्य कार्य दो सकता है, दमलिए 'दशयावन्किअरुपेण तु मदाकार्यत्यात्' इस ब्रन्थकी अनुपपत्ति नहीं है। यदि गृत्तिकी अपेक्षा न करके जीव भी साव वस्तुओंका अवभासक हो, तो आपत्ति यध दोगो कि अविदाश्तिविम्वनतन्मरप जीवके व्यापक होनेसे अपनेसे सम्बद् यावत् मस्तुका प्रफाशक हनिये जोव भी सर्वश प्रयक रोगा, अतः जीवको स्वरूपज्ञानये अवभावक नहीं मानना चाहिए। और स्वर्पनैतन्यको किवी करणकी अपेक्षा न धोनेसे वक्षु आदि व्यर्थ भी प्रमक होंगे।

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१४४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

सर्वगतत्वेऽप्यनुपादानत्वेनाऽसद्गित्वात्। यथा सर्वगतं गोत्वसामान्यं स्वभा- वादश्वादिव्यक्तिसद्गित्वाभावेऽपि सास्नावव्यक्ता संसृज्यते, एवं विपया- सङ्ग्यपि जीव: स्वभावादन्तःकरणे संसृज्यते। तथा च यदाऽन्तःकरणस्य परिणामो वृत्तिरूपो नयनादिद्वारेण निर्गत्य विपयपर्यन्तं चक्षूरश्मिवत् झटिति दीर्घप्रभाकारेण परिणम्य विपयं व्यानोति, तदा तमुपारुह्य तं विषयं गोचरयति। केवलाग्न्यदाह्यस्याऽपि तृणादेरयःपिण्डसमारूढाग्निदाह्य- त्ववत् केवलजीवचैतन्याप्रकाश्यस्याऽपि घटादेरन्तःकरणवृत्तयुपारूढस्य तत्- प्रकाश्यत्वं युक्तम् । यद्वाऽन्तःकरणोपाधिर्जीवो वृत्या वहिर्गतः ।

अथवा अन्तःकरणोपाधिक जीव वृत्तिद्वारा वाहर निकलकर विपयचैतन्य और ब्रह्मचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्तिसे अर्थका अवभासक होता है॥६३।। यद्वाऽन्तःकरणोपाधिकत्वेन जीवः परिच्छिन्नः। अतः संसर्गाभावान्न

सर्वगत है, तो भी विषयोंके प्रति अनुपादान होनेसे घट आदिके साथ उसका सम्वन्ध नहीं है। जैसे गोत्व जाति व्यापक है, तथापि उसका स्वभावसे अश्व आदि व्यक्तिके साथ सम्बन्ध नहीं है, परन्तु सास्ावाली गो व्यक्तिमें ही उसका सम्बन्ध है, वैसे ही जीवके विषयासङ्गी होनेपर भी वह स्वभावतः अन्तःकरण- के साथ संसृष्ट होता है। इस रीतिसे जीवका स्वभावतः विषयके साथ सम्बन्ध न होनेपर जब नेत्र आदि द्वारसे अन्तःकरणका वृत्तिरूप परि- णाम विषयदेश तक निकलकर चक्षुकी रश्मिके समान सहसा बड़ी प्रभाके आकारसे परिणत होकर विषयको व्याप्त करता है, तव जीवचैतन्य उस परिणामके ऊपर चढ़कर उस विषयको प्रकाशित करता है। जैसे तृण आदिका केवल शुद्ध अझनिसे दाह नहीं होता है, परन्तु अयोगोलक आदिके ऊपर आरूढ़ होकर तृण आदिको अभनि दग्ध करती है, वैसे ही केवल जीव -- चैतन्यसे विषयका प्रकाश न होनेपर भी वृत्तिके ऊपर आरुढ़ होकर जीवचैतन्य विषयका प्रकाश करता है, यह मानना युक्त है। अथवा जीव अन्तःकरणोपाधिक चैतन्य है, अतः वह परिच्छिन्न है। इसलिए विषयके साथ उसका सम्बन्धं न होनेसे घट आदिका प्रकाश नहीं

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वृत्तिके उपयोगका विचार] भापानुवादसहित १४५

घटादिकमवभासयति। वृत्तिद्वारा तत्संसृष्टविपयावच्छिन्नन्रह्मचैतन्या- मेदाभिव्यक्तौ तु तं विपयं प्रकाशयति। अथवा सर्वगोऽविद्यावृतोऽस न प्रकाशते। वुद्धावनावृतो वृत्तिभभावरणभासकः ॥ ६४ ॥ अथवा यद्यपि जीव व्यापक और अन्तःकरणावच्छेदेन अनावृत है, तथापि अविद्या- वृत होनेसे स्वयं अप्रकाशमान होकर विषयोंका प्रकाश नहीं करता है। वृचिद्वारा आवरणका भङ्ग होनेपर तो विपयोंका प्रकाश करता है॥६४॥ अथवा जीवः सर्वगतोऽप्यविद्यावृतत्वात् स्वयमप्यप्रकाशमानतया विपयाननवभासयन् विपयविशेपे वृत्युपरागादावावरणतिरोधानेन तत्रैवाडभि- कर सकता है। वृत्तिके द्वारा वृत्तिमान् अन्तःकरणके साथ सम्बद्ध विषयावच्छिन्न ब्रझ्मचैतन्यके साथ अन्तःकरणावच्छिन्न जीवचेतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेसे तो वह जीवचैतन्य पट आदि विपयका प्रकाश करता है*। + अथवा जीवके सर्वगत होनेपर भी अविद्यावृत होनेसे वह स्वयं भी

  • पहला परिहार-जीवको अविद्याप्रतिचिम्ब मान कर और उसे व्यापक स्वीकार करके किया गया है। इस 'यद्वा' पक्षमें जीवको अन्तःकरणोपाधिक मान कर उसे परिच्छन माना है, अतः इस मतमें सर्वत्ञत्वकी शक्ठा ही नहीं है, क्योंकि स्वल्प परिमाणवाले जीवका विपयोंके साथ संवन्ध न होनेसे वृत्तिके बिना वह प्रकाश नहीं कर सकता है, यह भाव है। इस मतमें अभेदा- भिव्यकि ही वृत्तिका प्रयोजन है, इस पक्षका अवलम्बन करके वृत्ति द्वारा विषयावच्छिन् चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन चतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेके बाद ही विषयोंका प्रकाश होगा, यह विशेष है। + अविदाप्रतिविम्बित चतन्य जीव है, इस प्रथम पक्षको मान कर इस 'अथवा' कल्पसे परि- द्वार करते हैं। यद्यपि इस पक्षमें जीव व्यापक और जगत्के प्रति अनुपादान है, तथापि उसका संसर्ग माना जाता है। 'सर्वगतोऽपि' इसको उपलक्षण मान कर 'विपयसंसरोऽपि' (विपयके साथ संसृष्ट होनेपर भी) यह भी जानना चाहिए। अन्यथा यह शक्त मूलमें हो सकती है कि जीवके व्यापक होनेपर भी विपयोंके साथ उसका संसर्ग न होनेसे जीव विपयका प्रकाश नहीं करता है, यह कह सकते हैं, फिर आवृत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यद्यपि 'मां न जानामि' (मैं अपनेको नहीं जानता हैँ) इस प्रकारका अनुभव नहीं होता है, इसलिए जीव आवृत नहीं हो सकता है, यह शक्ा हो सकती है, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तः- करणोपद्दित चैतन्य ही 'माम्' प्रतीतिका विपय होनेसे व्यापक जीवचतन्यमें अन्तःकरण- वच्छेदरूपसे आधृतत्वके न रहनेपर भी विपयदेशमें वह आधृत ही है, और 'व्यापकरूपसे में अपने को नहीं जानता हूँ' इस प्रकारका अनुभव भी होता है।

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१४६ सिद्धान्तलेश संग्रह [ग्रथम परिच्छेद

व्यक्तस्तमेव विषयं प्रकाशयति। एवं च चिदुपरागार्थत्वेन, विषयचैतन्या- भेदाभिव्यत्त्यर्थत्वेन, आवरणाभिभवार्थत्वेन वा वृत्तिनिर्गममपेक्ष्य तत्संसृष्ट- विषयमात्रावभासकत्वात् जीवस्य किश्चिज्ज्ञत्वमप्युपपद्यते इति ॥ १० ॥ वृत्तेश्चिदुपरागो वा अभेदव्यक्तिरेव वा। फलमावृतिभङ्गो वा तत्राSडद्यं कीदशं भवेत् ॥ ६५ । वृत्तिका प्रयोजन-चित्के साथ सम्बन्ध, अभेदाभिव्यक्ति अथवा आवरणका भङ्ग-है, उनमें से चित्के साथ सम्बन्ध कैसा होता है? ॥६५॥

वृच्याऽपि अत्र प्रथमपक्षे सर्वगतस्य जीवस्य वृत्त्यधीनः को विपयोपरागः ? हि पूर्वसिद्धयोनिष्क्रिययोविषयजीव चैतन्ययोस्तादात्म्यस्य संयोगस्य वा न सम्भवत्याधानम्। नैयायिकादिवत् केचिद्विपयत्वं स्वभावतः । कोई लोग कहते हैं कि जैसे नैयायिक लोग विषय-विपायभाव सम्बन्ध स्वभावसे मानते हैं, वैसे ही वृचिसे विपयविषयिभाव सम्बन्ध उत्पन्न होता है।

अप्रकाशमान है, इससे विपयोंका अवभास न करता हुआ किसी एक विषयमें वृत्तिके सम्बन्धसे आवरणका विनाश होनेके अनन्तर उसी विषयमें अभिव्यक्त होकर उसी विषयको प्रकाशित करता है। वृत्तिके बिना जीवचतन्य विषयका अवभासक नहीं होता है, ऐसा सिद्ध होनेपर चित्के साथ सम्बन्धके लिए, विषय- चैतन्य और जीवचतन्यके अमेदके लिए और आवरणके विनाशके लिए वृत्तिनिर्गमकी अपेक्षा करके वृत्तिके साथ सम्बद्धमात्र विषयका जीव प्रकाश करता है, इसलिए जीवमें अल्पज्ञत्वकी भी उपपत्ति होती है ॥१०॥ इन पूर्वोक्त तीन पक्षोंमें से प्रथम पक्षमें अर्थात् 'चिदुपरागार्था वृत्तिः'(चैतन्य- के साथ सम्बन्धके लिए वृत्ति है) इस पक्षमें सर्वतः व्यापक जीवका वृत्तिजन्य कौनसा सम्बन्ध है? अर्थात् कोई मी सम्वन्ध नहीं है, कारण कि क्रियारहित विषयचतन्य और जीवचैतन्यका वृत्तिसे भी तादारम्य या संयोग नहीं हो सकता है [भाव यह है कि जिनका तादात्म्य व्यवहारमें देखा जाता है, वह पहलेसे ही रहता है, बीचमें कहींसे नहीं आता है, अतः विषय या जीवचैतन्यका तादात्म्य सम्बन्ध प्रथमसे ही रहेगा, आगन्तुक नहीं होगा अर्थात् वृत्तिसे उत्पादित नहीं होगा और संयोग सम्बन्ध एककी क्रियासे या उभयकी क्रियासे उत्पन्न होता है,

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वृतिके साथ विषयका सम्बन्ध-विचार ] भापांतुवादसहित १४७

अत्र केचिदाहु :- विपयचिपयिभावसम्बन्ध एवेति। वृत्तिनिर्गम वैयथ्यादन्ये तद्द्वारसन्मम् ॥ ६६ ॥ कोई लोग कहते हैं कि केवल विषयविपयिभाव संसर्ग माना जायगा, तो वृचिका निकलना ही व्यर्थ होगा, अतः विपयसंयुक्तवृचितादात्म्यसम्बन्ध ही वृत्तिसे उत्पन्न होता है॥६६।। अन्ये तु-विपयविपयिभावमात्ननियामिका वृत्तिशेदनिर्गताया अप्यै- न्द्रियकवटत्तेस्तन्नियामकत्वं नातिप्रसङ्गावहमिति तननिर्गमाभ्यृपगमवैय्थर्या- पत्तेः स नाऽभिसंहितः। किं तु विपयसन्निहितजीत्चैतन्यतादात्म्यापन्नाया परन्तु विषयचैतन्य और जीवचतन्य स्वभावतः ही * निष्क्रिय हैं, अतः उनका कोई भी सन्निकर्ष नहीं हो सकता है, इसलिए 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' यह कहना असक्त है ]। इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि विपयविपयिभाव सम्त्रन्ध ही वृत्तिसे उत्पन्न होता है ।। कुछ लोग कहते हैं कि परोक्षापरोक्षस्थलसाधारणविषयविषयि- भावमात्रमें यदि वृत्ति म्रयोजक है, तो अनिर्गत इन्द्रियवृत्तिके भी विषयविषयिभाव सग्बन्धके नियामक होनेमें कोई अतिप्रसद्ग नहीं है, इससे वृत्तिका निर्गम व्यर्थ होगा, अतः विषयविपयिभावसम्बन्ध अभिप्रेत नहीं है, [तात्पर्य यह हे कि सिद्धान्तमें-परोक्षविपयस्थलम अनुमित्यादि वृत्तिसे उपहित जीवचतन्यका अनुमेय आदि विपयके साथ वृत्तिनिगमके • यथ्यपि-असे मुवर्ण आदिमें अन्यतर कर्म या उमय कर्मके न रहनेपर भी पार्थिव भाग और तेज भागका संयोग देखा जाता है, घैसे ही प्रकृतमें द्विषिधकर्मके न रहनेपर भी संयोगसम्बन्ध क्यों न माना जाय ? यह यहाँ रहा होती है, किन्तु यह युक नहीं है, क्योंकि विपयचेसन्य और जीवचतन्यका सुवर्णटप्ान्तके अनुसार आरम्भसे ही संयोगका स्वीकार किया जायगा तो उसिका अम्रीकार दी निरर्थक होगा, क्योंकि जो संयोग आरम्भसे ही सिद्ध है, उसकी उत्पत्ति -पृति कैसे करेगी, अतः आरम्भसे उनका संयोगसम्बन्ध नहीं माना जायगा, यह भाव है। + विपयचतन्य और जीवचतन्यका वृत्तिकी उत्पत्तिके पूर्वमें विपय-विपयिभव सम्बन्ध नहीं रहता हे, परन्तु पृत्तिके अनन्तर विषयविषयिभाव सम्बन्ध उत्पन्न होता है, और यह अनि- र्चनीय एवं अतिरिक है, यह आक्षपपरिदवार करनेवाले 'फेचित्त'का अभिप्नाय है, अर्थात् संयोग या तादास्म्यका पृत्तिये आधान-उत्पत्ति-नहीं होता है, परन्तु उक्त विषयविपयिभाव सम्वन्ध दी उतपन होता है, अतः दोप नहीं है, यह भाव है।

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१४८. सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

वृत्तेर्विषयसंयोगे तस्याऽपि तद्द्वारकः परम्परासम्बन्धो लभ्यते इति स एव चिदुपरागोऽभिसंहित इत्याहुः।

विषये वृत्तिसंसर्गाज्ीवसङ्गं परे विदुः ॥६७॥ जैसे तरङ्ग और तरुके स्पर्शसे वृक्षमें नदीका स्पर्श होता है, वैसे ही विपयमें वृत्तिके सम्बन्धसे जीवका सम्बन्ध होता है, ऐसा भी कोई कहते हैं॥६७/। अपरे तु-साक्षादपरोक्षचैतन्यसंसर्गिण एव सुखादेरापरोक्ष्यदर्शनात् अपरोक्षविपये साक्षात्संसर्ग एष्टव्यः। तस्माद् वृत्तेविपयसंयोगे वृत्तिरूपा-

बिना ही विषयविषयिभाव सम्वन्ध है-ऐसा माना गया है। परोक्षस्थलमें जैसे वृत्तिका बाहर निर्गमन न मान करके जीवचतन्यका विपयके साथ सम्बन्ध माना जाता है, वैसे ही अपरोक्षस्थलमें भी वृत्तिके निर्गमनके बिना जीवचतन्यका विषयके साथ विषयविषयिभाव सम्बन्ध मान करके 'जीवकी वृत्ति जिस अर्थको विषय करेगी उसी अर्थका जीव प्रकाश करेगा अन्यका नहीं इस नियमसे एक विषयके प्रकाशनकालमें अन्य विपयका प्रकाश प्रसक्त नहीं होगा, अतः अपरोक्षस्थलके लिए भी वृत्तिनिर्गमन व्यर्थसा है, इस प्रकार विचार करते हुए विवरणाचार्य, जो वृत्तिका निर्गम मानते हैं, विषय-विषयिभाव सम्बन्धको वृत्ति- जन्य नहीं मानते हैं, ] किन्तु विषयसन्निहितजीवचतन्यके साथ तादात्म्यापन्न वृत्तिका विषयके साथ संयोग होनेपर विषयसन्निहितजीवचैतन्यका भी वृत्ति और विषयके संयोग द्वारा जो विपयसंयुंक्तवृत्तितादात्म्यरूप परम्परासम्बन्ध प्राप्त होता है, वही चिदुपरागशब्दसे कहा गया है, ऐसा मानते हैं *। कोई लोग कहते हैं कि जीवचतन्यके साथ साक्षात् सम्बद्ध ही सुख आदिका आपरोक्ष्य (प्रत्यक्ष ) देखा जाता है, इससे अपरोक्ष विषयमें जीव- चैतन्यका (सर्वत्र) साक्षात्सम्बन्ध ही वाञ्छनीय है, परम्परासम्वन्ध नहीं। [तात्पर्य यह है कि सुख आदि आभ्यन्तर पदार्थोंके साक्षात्कारमें जीवचतन्यका ·- उनके साथ साक्षात्सम्बन्ध ही देखा जाता है, इसलिए घट आदि अपरोक्ष विषयोंके साक्षात्कारमें भी साक्षात् सम्बन्धको ही प्रयोजक मानना चाहिए, यदि ऐसा न मान * विषयको व्याप्त करनेवाली वृत्तिका अधिष्ठान है-विषयसमीपवर्ती जीवचैतन्य, इसलिए वृत्तिका तादात्म्य जीवचतन्यमें है।

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वृत्तिके साथविपयका सम्बन्ध-विचार] भापानुवादसहित १४९

वच्छेदकलाभात् तदवच्छेदेन तदुपादानस्य जीवस्याऽपि संयोगजसंयोग: सम्भवति। कारणाकारणसंयोगात् कार्याकार्यसंयोगवत् कार्याकार्यसंयोगात् कारणाकारणसंयोगस्याऽपि युक्तितोल्येनाऽभ्युपगन्तुं युक्तत्वादित्याहुः। द्वितीयपक्षे जीवस्याऽसर्वगत्वादसङ्करात्।

'अभेदाभिव्यक्यथा वृतत्तिः' इस द्वितीय पक्षमें जीवके अव्यापक होनेके कारण उसके साथ साककर्य न होनेसे विषयावच्छिन्न व्रद्ाचैतन्यके साथ अमेदाभिव्यक्तिकं द्वारा विषयके साथ तादात्म्य-सम्पादन ही वृत्तिका प्रयोजन है, ऐसा कोई लोग कहते हैं॥ ६८ ॥ कर, कहींपर साक्षात्सम्बन्ध कहींपर परम्परासम्बन्ध माना जाय, तो कार्य- कारणभावोंमें भेद होनेसे गौरव ही होगा, इसलिए एक ही साक्षात्सम्बन्ध साक्षात्कारमें प्रयोजक है, परम्परासंसर्ग (विपयसंयुक्तवृत्तितादात्म्य) प्रयोजक नहीं है]। इससे वृत्तिका विषयके साथ संयोग होनेके बाद वृत्तिरूप विशेषणका लाभ होनेसे वृत्त्यवच्छेदेन वृत्तिके उपादानभूत जीवका भी संयोगजन्य सयोग साक्षात् संसर्ग होता है[ तात्पर्य यह है कि वृत्ति जीवचैतन्यका कार्य है और '. विषय अकार्य है, जीवचतन्य वृत्तिका उपादान कारण है और विषय वृत्तिका उपादान कारण नहीं है, इसलिए जीवचतन्यके क्रमशः कार्य और अकार्यरूप जीवचतन्य और विषयके संयोगसे वृत्तिके प्रति क्रमशः कारण और अकारणरूप जीवचतन्य और विपयका संयोग होता है, यही संयोगज संयोगरूप साक्षात्सम्बन्ध अपरोक्षविपयक साक्षात्कारमें प्रयोजक है] जैसे कारण और अकारणके संयोगसे कार्य और अकार्यका संयोग होता है, वैसे ही कार्य और अकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग होता है, ऐसा तुल्य युक्तिसे माननेमं कोई दोष नहीं है *। तात्पर्य यह है कि कारण और अकारणके संयोगसे कार्य और अकार्यका संयोग, तो नैयायिक लोगोंने माना है, जैसे-दस्त और वृक्षके संयोगसे काय और वृक्षका संयोग होता है, इसमें कायरूप (शरीररूप) कार्यके प्रति कारण है-हस्त और अकारण है-वृक्ष, इसी प्रकार हस्तका कार्य है-काय, और उसका अकार्य है-यृक्ष, शरीरके प्रति कारणीभूत हस्त और उस्के प्रति अकारणीभूत वृक्षके संयोगसे हस्तके कार्य शरीरका और उसके (हस्तके) अकार्य घृक्षका संयोग होता है। परन्तु कार्य और अकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग नहीं माना है, रसीपर मूलमें कहा गया कि उक्त रीतिके समान होनेसे कार्याकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग भी हो सकता है, क्योंकि ऐसा माननेमें कोई दरकत नहीं है।

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१५० सिद्धान्तलैशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

एकदेशिनस्तु-अन्तःकरणोपहितस्य विपयाऽवभासकचैतन्यस्य विपय- विपयतादात्म्यसम्पादनमेव चिदुपरागोऽभिसंहितः । सर्वगततया सर्वविपयसन्निहितस्याऽपि जीवस्य तेन रूपेण विषयाऽवभासकत्वे तस्य साधारणतया पुरुषविशेपापरोक्ष्यव्यवस्थित्य- योगेन तस्याऽन्तःकरणोपहितत्वरूपेणैव विपयाजवभासकत्वात्। एवं च विषयापरोक्ष्ये आध्यासिकसम्बन्धो नियामक इति सिद्धान्तोऽपि सङ्गच्छते।

कुछ एकदेशियोंका मत है कि अन्तःकरणसे उपहित घट आदि विषयोंके अवभासक जीवचैतन्यका-विषयोंके साथ तादात्म्यरूपको प्राप्त हुए ब्रद्मा- चैतन्यके साथ अभेदकी अभिव्यक्ति द्वारा-घट आदि विषयके साथ तादात्म्य- का सम्पादन ही चिदुपरागशब्दसे कहा जाता है। जीवके व्यापक (सर्वगत) होनेसे सव विषयोंका सन्निधान होनेपर भी उसको सर्वगतरूपसे विषयोंका अवभासक माना जायगा, तो प्रत्येक पुरुपके प्रति जीवके साधारण होनेसे पुरुष विशेषके आपरोक्ष्यकी व्यवस्थिति नहीं होगी, इसलिए उसको-अन्तःकरणो- पहितत्वरूपसे t ही-विषयोंका अवभासक माना जाता है। विपयावभासक जीवचैतन्यका वृत्तिसे विषयतादात्म्य सम्पादनके स्वीकार होनेपर विषयके

*ं इन एकदेशियोंका कहना है कि अन्तःकरणके प्रति यदि जीवचतन्य उपादान हो तो अन्तःकरणवृत्तिका भी उपादान और अधिष्ठान होकर उसके साथ वृत्तिका तादात्म्य हो, परन्तु यह नहीं है, इसलिए विवरणाचार्यको उक्त परम्परासम्बन्ध अभिप्रेत नहीं है। कारण कि खुद विवरणाचार्यने कहा है-'एवं विषयासङ्गयपि जीवः स्वभावादन्तःकरणेन संसज्यते' (यद्यपि जीवका विषयोंके साथ सम्बन्ध नहीं है, तथापि स्वभावसे ही अन्तःकरणके सांथ उसका सम्बन्ध रहता है) गोत्वादि जातिका जैसे स्वभावसे गोव्यकिमें सम्बन्ध होता है, वैसे ही अन्तःकरणके प्रति जीवके उपादान न होनेपर भी उसका स्वभावतः अन्तःकरणसे ही संसर्ग है, अतः संयोगजसंयोग भी विवरणाचार्यको अभिमत नहीं है, इसलिए एकदेशीके मतका उपक्रम है। यद्यपि विम्बभूत व्रह्म चैतन्यके विषयोंके प्रति उपादान होनेसे ब्रह्म और विषयका तादात्म्य पूर्वसे ही सिद्ध है, तथापि विषयतादात्म्यापन्न ब्रह्मकी और विषयावभासक जीवचैतन्यकी वृत्तिद्वारा अभेदा- भिव्यकि होनेसे जीवचैतन्यका विषयके साथ वृत्तिसे ही तादात्म्य सिद्ध होता है, अतः वृत्तिमें तादात्म्य निर्वाहकत्वकी अनुपपत्ति नहीं है। + अर्थात जीव सर्वगत है, तथापि जिस पुरुषके अन्तःकरणसे उपहित होकर जिस अर्थका अवभास करेगा, वही अर्थ उसीको अपरोक्ष होगा अन्यको नहीं, इस प्रकारकी व्यवस्था-सिद्धिके लिए अन्तःकरणोपहितत्व दिया गया है, यह भाव है।

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वृत्तिके साथ विषयका सम्बन्ध-विचार] भापानुवादसहित १५१

न चैवं द्वितीयपक्षसाङ्कर्यम्। जीवस्य सर्वगतत्वे प्रथमः पक्ष:, परिच्छिन्नत्वे द्वितीय इत्येव तयोर्भेदादित्याद्कः ॥११॥ साक्षात्कारम (आपरोक्ष्यमें) अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्ध ही नियामक है, ऐसा सिद्धान्त भी सद्त होता है, द्वितीय पक्षके साथ साक्कर्य भी नहीं है t, क्योंकि जीवके व्यापकत्वपक्षमें प्रथम पक्ष है, और परिच्छिन्नत्वपक्षम द्वितीय पक्ष है, इस प्रकारका उनमें मेद है॥१ १।।

सम्बन्धके लिए वृत्ति है, यह प्रथम पक्ष है, अभेदाभिव्यकतिके लिए यृत्ति है, यह द्वितीय पक्ष दे और आवरणाभिभवके लिए वृत्ति है, यह तृतीय पक्ष है। इनमें से प्रथम पक्षमें भी वृत्तिसे अमेदाभिज्यक्ि ही मानी जाय, तो द्वितीय पक्षसे प्रथम पक्षमें कोई वैलक्षण्य नहीं होगा, यह राक्ा चरनेयालेका भाव है। इसपर उत्तर है कि जीवको व्यापक माननेवालोंके मतसे प्रथम पक्ष है और जो परिच्छिन्न मानते हैं, अर्थात् जिनके मतमें अन्तःकरणोपाधिक जीव है, उस मतसे द्वितीय पक्ष है, अतः साङर्य नदीं है। तात्पर्य यद है कि यदपि प्रथम और द्वितीय पक्षमें वृत्तिजन्य अभेदाभि- व्यक्ति समान है, तो भी प्रथम पक्षमें अमेदकी अभिव्यक्ति द्वारा विपयावभासक जीवचैतन्यके विपयके छाथ तादात्म्यका सम्पादन वृक्ति करती है। और द्वितीय पक्षमें वृत्तिसे-विपयावभासक जीव चतन्य और विपयावन्िन्न चतन्य-की ही-अभेदाभिव्यक्ति होती है, अतः परस्पर उन गकषोंमें सांद्र्य नहीं है। अथवा प्रथम पक्षमें व्यापक होनेसे विपयदेशमें सदा सन्निहित विपयावभासक जीवचतन्यका विपयतादात्म्यापन्न व्रह्माचेतन्यकी अमेदाभिव्यक्ति करनेके लिए वृत्ति है और द्वितीय पक्षमें जीवके परिच्छिन्न होनेसे मृत्ति उसफो विषयके सान्निध्यमें ले जाती है, उसके वाद विषया- पिट्टान म्हानेतन्य के साथ उसकी 'परिच्छिन जीवकी' अभेदाभिव्यक्तिका भी सम्पादन करती है, अतः उनका नादर्य नहीं है। इस प्रकारका यह परिद्वार मूलमें कहे गये सर्वगतत्व और परिच्छ्सत्व पदोंसे सूचित होता है और पूर्वका परिद्वार 'प्रथमपक्ष' और 'द्वितीयपक्ष' पदोंसे सूचित होता है। वस्तुतस्मु सान्चर्यका परिदार होता ही नहीं है, क्योंकि 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' इस पक्षमें सम्यन्य दी उद्देश्यरुपसे ज्ञात होता है और 'अभेदाभिव्यत््यर्था वृततिः' इस पक्षमें अभेदाभिव्यकि दी उद्देस्य रुपसे प्रतीत होती है, और पूर्वोंक परिदारसे भी दोनों पक्षोंमें अभेदाभिकि ही पृत्तिक प्रयोजन मालम होता है, अतः साशर्यका परिदार करना केवल वालुकाप्रासादावरोहणमात्र है, इमलिए 'एकदेशिनस्तु' ऐसे एकदेशीके पक्षरे ही इसका उपन्यास किया गया है। वस्तुस्थितिमें 'सम्बन्धार्था गततिः' (सम्बन्धके लिए पृत्ति है) इस प्रकार कदनेवाले आचायोंका अभिगाय यह है-विपयों के अवगावक रूपसे अभिमत जीवचेतन्यका घट आदि विपयोंके साथ व्यजयव्यक्षकरूप सम्बन्ध तत्तत विपयोसे संसष्ट वृत्तिसे उत्पन्न हुआ विवक्षित है। अमरे-अन्तःकरण अत्यन्त स्वच्छ दोनेसे स्वयं ही चैतन्यके अभिव्यज्ञनमें समर्थ है, पैसे पद आदि चेतन्यको अभिव्यक नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वे अस्वच्छ हैं, किन्तु जय घद

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१५२ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

अथ द्वितीये काडभेदव्यक्तिस्तन्राऽपि केचन। कुल्याद्वारेव सा वृत्या क्षेत्रकासारवारिणोः ॥ ६९ ॥ द्वितीय पक्षमें अभेदाभिव्यक्ति क्या है? इस प्रश्नके उत्तरमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे खेत और तालाबका जल नाली द्वारा एक होता है, वैसे ही वृचि द्वारा विपया- वच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यका एक होना अभेदागिव्यक्ति है॥६१।। अथ द्वितीयपक्षे केयमभेदाभिव्यक्ति: ? केचिदाहु :- कुल्याद्वारा तडागकेदारसलिलयोरिव विपयान्तःकरणा- वच्छिन्नचैतन्ययोर्वृत्तिद्वारा एकीभावोडभेदाभिव्यक्ति: एवं च यद्यपि वृत्तिका प्रयोजन अभेदकी अभिव्यक्ति है, ऐसा जो द्वितीय कल्प कहा गया है, उसमें अमेदाव्यक्तिका स्वरूप क्या है *? इस आक्षेपके समाघानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे नालीद्वारा तालाव और खेतके जलका एकीभाव-अभेदाभित्र्यक्ति होती है, वैसे ही विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चतन्यका जो वृत्ति- द्वारा एकीभाव है, वही अभेदाभित्यक्ति है ।। इस रीतिसे यद्यपि आदिको वृत्ति व्याप्त करती है, तव घट आदिमें रहनेवाली अस्वच्छता उस्र घृत्तिसे तिरस्कृत हो जाती है, इसलिए घट आदिमें चैतन्याभिव्यञनकी योग्यताका आधान वृत्ति करती है अतः 'अन्तःकरणं हि स्वस्मित्निव स्वसंसर्गिण्यपि घटादौ चैतन्याभिव्यक्कियोग्यतामापा्यति' (अन्तःकरण ही अपनी नाई अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले घट आदिमें भी चैतन्यकी अभिव्यक्िकी योग्यताका सम्पादन करता है), यह कथन भी उपपन्न होता है। लोकमें यह देसा भी जाता है कि जो स्वतः अस्वच्छ है, वह स्वच्छद्रव्यके संयोगसे प्रतिविम्ब आदिका ग्रहण करता है,जैसे भित्ति स्वतः अस्वच्छ है, परन्तु जल आदि स्वच्छ द्रव्यके साथ सम्वन्ध होनेसे उसमें प्रतिविम्बग्रहण करनेकी योग्यता आ जाती है। घट आदिमें स्वसन्निहित जीव चैतन्यकी प्रतिविम्वग्नाहिता ही जीवचैतन्यकी व्यञ्ञकता है और प्रतिविम्वितत्व चैतन्यका व्यजयत्व है। विवरणमें भी इसी प्रकारके व्यङ्ञयव्य्ञकतारूप सम्बन्धके लिए वृत्तिके निर्गमनका वर्णन किया गया है। और वृत्तिद्वारा सम्पादित इसी सम्वन्धस घट आदिका अवभास होता है। प्रश्नकतोका तात्पर्य यह है कि अभेदाभिव्यक्ति वृत्तिका प्रयोजन है, यह द्वितीयपक्ष. जीवको परिच्छिन्न मानकर कहा गया है। इसलिए इस मतमें अन्तःकरणोपाधिक जीवकी और बिम्बभूत विषयावच्छिन ब्रह्मचैतन्यकी वृत्तिसे अभेदाभिव्यक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जैसे अखण्डव्रह्माकारवृत्ति उपाधिकी निवर्तक है, वैसे घटायाकारवृत्ति उपाधिकी निवर्तक नहीं है, अतः भेद करनवाली उपाधिके (अन्तःकरण और विषयके) रहनेसे जीव और ब्रह्मका अभेद अभिव्यक्त नहीं हो सकता, इसलिए इस मतें अभेदाभिव्यकति क्या है, यह प्रश्न है। * तात्पर्य यह है कि यद्यपि उपाधि ही उपधेयका भेद करनेवाली है। परन्तु वह यदि एकदेशस्थ हो जाय अर्थात उपाधि और उपधेय एकदेशमें रह जाँय, तो भेदक नहीं होती,

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अभेदाभिव्यक्तिका स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १५३

विपयावच्छिनं त्रह्मचैतन्यमेव विपयप्रकाशकम्, तथाऽपि तस्य वृत्ति- द्वारा एकीभावेन जीवत्वं सम्पन्नमिति जीवस्य विपयप्रकाशोपपत्तिरिति। सत्युपाधौ दृढं विम्वप्रतिविम्वभिदास्थितेः। वृत्त्यग्रे विषयस्फृर्त्याभासार्पणमितीतरे ॥ ७० ॥ कोई लोग कहते हैं कि उपाधिके रहनेपर विम्ब और प्रतिविम्बका भेद अवश्य रहता है, इससे वृचतिके अग्रभागमें न्रहाचैतन्य विषयके प्रकाशक प्रतिविम्बका अर्पण करता है[ और इस प्रतियिम्बका जीवके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति है]। ७० ॥ अन्ये त्वाहु :- विम्वस्थानीयस्य विपयावच्छिन्स्य त्रह्मणः प्रतिविम्ब- भृतेन जीवेन एकीमावो नाडभेदाभिव्यक्तिः। व्यावर्तकोपाधौ दर्पण इव

विषयावच्छिन्न न्रवाचैतन्य ही विषयका अवभासक होता है, जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं होता, तथापि विपयावच्छिन्न व्रद्मचैतन्यका वृत्ति द्वारा अन्तःकरणा- वच्छिन्न चैतन्यके साथ एकीभाव होनेसे उसमें (विपयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यमें) जीवत्वका सम्भन हे, इसलिए 'जीव विपयका प्रकाशक हे' ऐसा उपपन्न होता है।। कोई लोग कहते हैं कि विम्ब्नस्थानापन्न विपयावच्छिन्न ्रह्मका प्रति- विम्बभूत जीवके साथ एकीभाव अमेदाभिव्यक्ति नहीं है, क्योंकि व्यावर्तक

जैसे घट यदि मटमें रहे तो घटावच्छिन आकाश और मठावच्छिन आकाश भिन्न नहीं होते, क्योंकि मठ और घट एकदेशमें रहते हैं, पैसे हो प्रकृतमें अन्तःकरण और विपय यद्यपि अलग अलग हैं,सयापि वृत्तिद्वारा वे दोनों एकदेशस्थ हुए, इसलिए विपयावच्छिन् चेतन्य और अन्तःकरणा- व्छिन चंतन्य भिस्न भिजन नदीं हुए फिन्तु एक हुए, यही अभेदाव्यकि वृत्तिद्वारा अभीप्सित है। वाराश यह है कि अभेदाभिव्यक्ति होनेपर भी जीवचतन्य विषयका अवभासक नहीं दो सकता है, क्योंकि वह विपयके प्रति उपादान नहीं है; अतः उसका (जीवचेतन्यका) विपयके साथ तादात्म्य नहीं है। गदि यह कहा जाय कि वहाचतन्य ही उपादान होनेसे विपयोंका अवभासक दो, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'आलोकसे घट प्रकाशित हुआ' दख मनीतिके समान 'मैंने घट जाना' ऐसी जीव द्वारा घट आदिका अवभास बोधक- प्रतीति होती है। इमलिए नचितन्य ही विपयका अवभासक है, क्योंकि विपयादिके साथ उग्रीका यस्तुतः तादात्म्य दे। इसपर उत्तर दिया जाता है कि गद्यपि उकत शका ठीक है, तथापि वृत्िके द्वारा जीवनैतन्य और व्रदानेतन्यके एक होनेसे महाचैतन्य यदि विषयोपादान है, तो जीवचतन्य भी विपयोपादान हुआ ही और पद आदिके साथ उसका भी तादात्म्य है, अतः जीवमें विषयावभासकत्वकी अनुपपत्ति नहीं है, इसलिए 'मैंने घट जाना' इत्यादि प्रतीतिकी उपपति भी दो सफती है, २०

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१५४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

जाग्रति तयोरेकीभावायोगात्। वृत्तिकृता भेदाभिव्यक्त्या विपयावच्छिन्नस्य ब्रह्मणो जीवैत्वप्राप्तौ न्रह्मणस्तदा तद्विषयसंसर्गाभावेन तद्द्रष्टृत्वासम्भवे सति तस्य सर्वज्ञत्वा- भावापत्तेश्र। किन्तु विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यं विपयसंसृष्टाया वृत्तेरग्रभागे

दर्पण आदि उपाधिके रहनेपर प्रतिविम्ब और विम्बका एकीभाव होगा ही नहीं। [ भाव यह है कि जैसे दर्पणके रहनेपर दर्पणंमें पड़ा हुआ प्रतिविम्ब और विम्बस्थानीय मुख आदिका अमेद अभिव्यक्त नहीं होता, क्योंकि उस स्थलमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका स्पष्टरूपसे भेद भासता है, वैसे ही प्रकृत स्थलमें विपय और अन्तःकरणरूप व्यावर्तक उपाधिके रहते विम्बभूत ब्रह्मचैतन्य और प्रतिविम्व- भूत जीवचतन्यका अभेद भी अभिव्यक्त नहीं हो सकता, इसलिए वृत्िसे अभेदाभिव्यक्ति होती है, यह कहना उचित नहीं है ]। * और कथश्चित् यह मान भी लिया जाय कि वृत्तिसे अभेद अभिव्यक्त होता है, तो यह आपत्ति आचेगी कि वृत्तिद्वारा अभेदाभिव्यक्तिसे विपयावच्छिन्न ब्रह्ममें भी जीवत्वकी प्राप्ति होनेसे उस समयमें ब्रह्मका उस विषयके साथ सम्बन्ध न होनेसे ब्रह्मको उस विषयका अवभास नहीं' होगा, इससे ब्रह्म असर्वज्ञ होगा। [तात्पर्य यह है कि विषयावच्छिन्न ब्रह्मके जीव होनेपर उससे ईश्वरत्वकी निवृत्ति अवश्य माननी होगी, इस परिस्थितिमें ब्रक्मकी जीवावस्थामें घटादि विषयके साथ व्रह्मका संसर्ग नहीं है, इसलिए घटादि विषयका द्रष्टा भी ब्रह्म नहीं होगा। अतः ब्रह्मको विषयका परिज्ञान न होनेसे ब्रह्ममें असर्वज्ञत्व स्पष्ट ही प्रसक्त होगा ]।

  • द्वितीय दोष देनेका तात्पर्य यह है कि तत्त्वसाक्षात्कारसे जैसी अभेदाभिव्याक होती है, प्रकृतमें वैसी अभेदाभिव्याक्ति विवक्षित नहीं है, किन्तु एक पात्रमें क्षीर और नीरके रखनेसे जैसा उनका अभेद प्रतीत होता है, वैसा ही वृत्तिसे अन्तःकरण और विषयरूप उपाधिके एक- देशस्थ होनेसे तन्निबन्धन विषयावछत चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन चैतन्यकी केवल औपचारिक अभेदाभिव्यक्ति विवक्षत है। इस औपाचारिक अभेदाभिव्यक्तिमें व्यावहारिक उपाधि- प्रयुक्त दोष नहीं है, अर्थात् उपाधिके रहनेपर अभेद नहीं हो सकता, यह दोष नहीं है; क्योंकि 'मेरा ही सुख दर्पणमें भासता है' इस प्रकार प्रतििम्ब और बिम्बका अभेद अभिव्यक्त होता है। इसलिए अभेदाभिव्यक्तिपक्षमें निर्वाई हो सकता है, अतः 'विम्बस्थानीयस्य' इत्यादिसे कड़ा गया दोष युक्त नहीं है, इस अस्वरससे 'वृत्तिकता•' इत्यादिसे द्वितीय दोष कहते हैं।

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अभेदाभिव्यक्तिका स्वरूपविचार] भापानुंवादसहित १५५

विपयप्रकाशकं ग्रतिविम्वं समर्पयतीति तस्य प्रतिविम्वस्य जीवेनैकीभावः । -एवं चाऽन्त:करणतद्द्ृत्तिविपयावच्छिन्नचैतन्यानां प्रमातप्रमाणग्रमेयभावेन असङ्करोऽप्युपपद्यते। न च वृत्युपहितचैतन्यस्य विपयप्रमात्वे तस्य विपया- घिष्टानचैतन्यस्येव विपयेणाSध्यासिकसम्बन्धाभावात् विषयापरोक्ष्ये आध्या- सिकसम्बन्धस्तन्त्रं न स्यादिति वाच्यम्, विषयाधिष्ठानचतन्यस्यैव

इसलिए विम्बस्थानीय ब्रह्मका जीवके साथ एकीमाव अमेदाभिव्यक्ति नहीं है, किन्तु विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य विषयसंसृष्ट वृत्तिके अग्र भागमें विषयका प्रकाश करनेवाले अपने प्रतिविम्बका समर्पण करता है, इसलिए उसके प्रतिविम्वका ही जीवके साथ एकीभाव है। [और यही प्रतिबिम्बके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति है, तात्पर्य यह है कि जैसे कौस्तुभमणि या किसी रक्नकी प्रभा अपने स्थानसे निकलती हुई बड़े आकारमे परिणत होकर विषय- देशपर्य्यन्त जाती है, वैसे ही हृदयदेशमें रहनेवाले अन्तःकरणकी वृत्ति अन्तःकरणसे लेकर विषयपर्यन्त अवच्छिनरूपसे जाती है, इस वृत्तिका विषयके साथ सम्बद्ध भाग अग्रभाग कहा जाता है। उस अग्रभागमें पड़े हुए ब्रह्मके विषयप्रकाशक प्रतिविम्बके साथ जीवका एकीभाव 'अमेदाभिव्यक्ति' है। वृत्ति और वृत्तिमान्का अभेद होनेसे वृत्ति और वृत्तिमान्में प्रतिविग्वित वस्तुका भी अमेद हो सकता है], इसलिए-वृच्तिविग्वित चैतन्यका वस्तुतः अन्तःकरणप्रतिविम्वित चैतन्यसे मेद ही है, परन्तु वृत्तिके द्वारा अभेदा- भिव्यक्ति होनेपर उनमें विपयावभासकत्वका स्वीकार करनेसे अन्तःकरण, अन्त:करणकी वृत्ति और विपय-इन तीनोंसे अवच्छिन्न चतन्योंका ग्रमाता, प्रमाण और ग्रमेय रूपसे असक्कर (मेद) भी उपपन्न होता है।* यदि वृत्तिसे उपहित (वृत्तिरूप उपाधिसे युक्त ) चैतन्य प्रमा मानी जायगी, तो उसका विपयाधिष्ठान चैतन्यके समान विपयके साथ आध्यासिक सम्बन्ध न होनेसे विपयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध तन्त्र नहीं होगा, इस प्रकारकी

• अन्तःकरणावच्छिन चैतन्य प्रमाता है, अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन चैतन्य प्रमाण है और विपयावच्छिन ब्रह्मचैतन्य ग्रमेय है, इस प्रकार अन्तःकरणप्रतिविम्वित और अन्तःकरणवृत्ति- प्रतिविम्वित चैतन्य प्रमाता और प्रमाण चैतन्य हैं। इस प्रकारका भेद उपपन्न होता है, यह भाव है।

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१५६ सिद्धान्त लेश संग्रह [ग्रथम परिच्छेद

विषयेणाजवच्छिन्नस्य वृत्तौ-प्रतिविम्विततया तदभेदेन तत्सम्बन्घसच्वादिति। विम्वत्वयुक्तं ब्राह्मं स्यात् जैवं तद्पलक्षितम्। वृत्तौ विषयचैतन्यं तदभेदं च तां परे॥ ७१ ॥ बिम्बत्वसे युक्त ब्रह्म-चैतन्य है और विग्वत्वसे उपलक्षित जीवचैतन्य है, वृचिके होनेपर जो विषयचैतन्य है, उसका अभेद ही अभेदाभिव्यक्ति है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।। ७१ ॥ अपरे त्वाहु :- विम्बभूतविषयाधिष्ठानचतन्यमेव साक्षादाध्यासिक- सम्बन्धलाभात् विषयप्रकाशकमिति तस्यैव विम्वत्वविशिष्टरूपेण भेद- सन्भावेऽपि तदुपलक्षितचैतन्यात्मना एकीभावोऽभेदाभिव्यक्तिः । न चैवं सति जीवब्रह्मसाङ्कर्यम्, न वा ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वविरोधः विम्बात्मना तस्य यथापूर्वमवस्थानादिति ॥।१२।।

आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि विपयसे अवच्छिन्न चैतन्यका ही, जो विषयका अघिष्ठानभूत चैतन्य है, वृत्तिमें प्रतिविम्ब है, अतः उसके साथ अमेद होनेसे अधिष्ठानके साथ आध्यासिक सम्बन्ध भी है। [भाव यह है कि विषयके आपरोक्ष्यमें आध्यासिक सम्बन्ध अर्थात् अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्ध नियामक माना गया है-इसका निर्वचन 'एवञ्च विषयापारोक्ष्ये आध्यासिक- सम्बन्धो नियामकः इति सिद्धान्तोऽपि सङ्गच्छते' इत्यादिसे किया गया है। अध्याससिद्धतादात्म्य अर्थात् विषयाधिष्ठानचतन्यका विपयके साथ तादात्म्य। प्रकृतमें वृत्तिप्रतिविम्वितचतन्य ही अधिष्ठानचैतन्य है, अतः अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्धकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है] कोई लोग कहते हैं कि विषयका अविष्ठानभूत बिम्वस्वरूप ब्रह्मचैतन्य ही, साक्षात् आध्यासिक सम्बन्धका लाभ होनेसे, विषयका प्रकाशक है, इस- लिए बिम्बत्वविशिष्टचैतन्यका बिम्बत्वरूपसे प्रतिविम्वत्वविशिष्ट चैतन्यरूप जीवके साथ भेद होनेपर भी विम्बत्व और प्रतिविम्वत्व रूपसे उपलक्षित शुद्धचैतन्य- रूपसे जो एकीभाव है वही अभेदाभिव्यक्ति है। उपलक्षित चतन्यरूपसे अभेदाभित्र्यक्तिके माननेपर जीव और ब्रह्मका साङ्कर्य अथवा ब्रह्मके सर्वज्ञत्व्रका विरोध भी नहीं है, क्योंकि बिम्बरूपसे ब्रह्मकी यथापूर्व अवस्थिति है ही ॥१२॥

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आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित. १५७

अथावरणभङ्गोऽपि तृतीये कीदशो मतः । मोहनाशः स चेदिष्टो मोक्षः स्याद् घटवेदनात् ॥ ७२॥ तृतीय पक्षमें आवरणभद्ट क्या है? इसके समाधानमें यदि कहा जाय कि अज्ञानका विनाश आवरणभक्ट है, तो घटशानसे ही, सम्पूर्ण प्रपञ्चनाशका सम्भव होनेसे, मोक्ष हो जायगा ॥ ७२ ॥ अथ तृतीयपक्षे को नामाऽडवरणाभिभवः१ अज्ञाननाशश्ेत्, घटज्ञाने- नैव्राऽज्ञानमूलः प्रपश्ची निवर्तेतेति चेत्। खद्योत्तेनेव तमसरिछद्रं केचित् प्रचक्षते। कटवद्वेष्टनं भीतभटवद्दा पलायनम् ॥ ७३ ॥। जैसे अन्धकारमें जुगनके प्रकाशसे छिद्र होता है वैसे ज्ञानसे अज्ञानके एक देश्यमें छिद्र या चटाईके समान अज्ञानका वेष्टन, या भीत भट (सैनिक) के समान पलायन आवरणभंग है।। ७३ ॥। अत्र केचिदाहु :- चैतन्यमात्रावारकस्याऽज्ञानस्य विपयावच्छिन्नप्रदेशे खद्योतादिप्रकाशेन महान्धकारस्येव ज्ञानेनैकदेशेन नाशो वा, कटवत् संचेष्टनं वा, भीतभटवदपसरणं वाऽभिभव इति।

'आवरणाभिभवके लिए वृत्ति है' इस तृतीय पक्षमें आवरणका अभिभव क्या है अर्थात् आवरणाभिभव किसे कहते हैं? यदि अज्ञानका नाश आव- रणाभिभव है, तो अज्ञानके एक होनेसे घटज्ञानसे सम्पूर्ण अज्ञानका नाश होनेके कारण तन्मूलक 'समस्त प्रपश्चकी निवृत्ति भी प्रसक्त होगी [ परन्तु प्रपञ्च- की नवृत्ति तो होती नहीं है, अतः अज्ञानका विनाश आवरणाभिभव नहीं हो सकता है ]। इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते है कि जैसे महान्धकारमं जुगनूके प्रकाशसे महान्धकारका एकदेशसे विनाश होता है, सम्पूर्णका विनाश नहीं होता, वसे ही साक्षीसे अन्य चैतन्यमात्रका आवरण करनेवाले महान् अज्ञानान्धकारके विपयावच्छिन्न प्रदेशमें-एक देशका ही जञानसे विनाश होता है, सम्पूर्णका विनाश नहीं होता, अतः घटज़ानसे सम्पूर्ण प्रपश्चका विनाश नहीं होता, क्योंकि उस जानसे अज्ञानके एकदेशका ही विनाश होता है। अथवा चटाईके समान ज्ञानसे विपयावच्छिन्न अज्ञानका कुछ वे्टन होता है, वही आवरणाभिभव है, या

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१५८ सिद्धान्त लेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

पुनः कन्दलनादन्येऽनावृतिं वृत्त्यनेहसम्। अज्ञोऽहमिति विज्ञानात् स्वाश्रितेनाऽप्यनावृतिम् ॥७४॥ पुनः आवरणके होनेसे वृत्तिकालपर्यर्यन्त विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण न रहना ही आवरणभंग है। 'मैं अज्ञ हूँ' इत्यादि अनुभवसे अहमर्थके अज्ञानाश्रय होनेपर भी अहमर्थको वह आवृत नहीं करता है। ७४॥ अन्ये तु-अज्ञानस्यैकदेशेन नाशे उपादानाभावात् पुनस्तत्र कन्द- लनायोगेन संकृदपगते समयान्तरेऽप्यावरणाभावप्रसङ्गात्, निष्क्रियस्याऽप- सरणसंवेष्टनयोरसम्भवाच्च न यथोक्तरूपोऽभिभवः सम्भवति। अतः चैतन्यमात्रावारकस्याऽप्यज्ञानस्य तत्तदाकारवृत्तिसंसृष्टावस्थविपयावच्छिन्न- चैतन्यानावारकत्वस्वाभाव्यमेवाभिभवः । न च विषयावगुण्ठनपटवद्विपय चैतन्यमाश्रित्य स्थितस्याज्ञानस्य कथ तदनावारकत्वं युज्यते इति शङ्कचम्, 'अहमज्ञः' इति प्रतीत्याऽहमनुभवे प्रकाशमानचैतन्यमाश्रयत एव तस्य तदनावारकत्वप्रतिपचेरित्याहुः।

युद्धमें डरे हुए योद्धाके समान अज्ञान ज्ञान द्वारा विपयावच्छिन्न प्रदेशसे पलायन करता है, वही आवरणाभिभव है। कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अज्ञानका एकदेशसे विनाश, संवेष्टन या अपसरण आवरणाभिभव नहीं है, क्योंकि अज्ञानका एकदेशसे विनाश होनेपर उपादान कारणके न रहनेसे विषयावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशमें फिर आवरणकी उत्पत्ति नहीं होगी, इस प्रकार एक बार अज्ञानका नाश होनेपर अन्य समयमें भी आवरणाभावका प्रसङ्ग होगा और क्रियारहित अज्ञानका वेष्टन या अपसरण भी नहीं हो सकता है। इससे चतन्यमात्रके आवरक (आवरणकर्ता) अज्ञानका तत्-तत् विषयाकार वृत्तिसे सम्पृक्त अवस्थावाले विषयावच्छिन्न चतन्यका आवरण न करना-यह जो स्वभाव है वही स्वभाव आवरणाभिभव है। परन्तु जैसे घट आदि विषयका अवगुण्ठन करके अर्थात् घटको व्याप्तकर स्थित पट घटको आवृत ... करता है वैसें ही अज्ञान भी विषयचैतन्यको आवृत करेगा ही, तो यह कल्पना कैसे हो सकती है कि उसका अनावारकत्व स्वभाव है। यदि इस प्रकार शड्ढा की जाय तो युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहमज्ञः' 'मैं अज्ञ हूँ' इस प्रकार अनुभव होता है, इसलिए 'अहम्' अनुभवमें प्रकाशमान जीवचतन्यका अज्ञान

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आवरणाभिभव-स्वरूपावचार ] भापानुवादसहित १५९

वृत्तिनाइयं परे वृत्तिसमसङ्खयं प्रचक्षते। 1

अवस्थाज्ञानमज्ञानं नष्टमित्यनुभृतितः ॥७५॥ वृचिसे नष्ट होनेवाले और संख्यामें वृचिके बरावर अवस्थारूप अज्ञान अनेक हैं, क्योंकि 'एक अज्ञान नष्ट हुआ' ऐसा अनुभव होता है, यहाँ वृचिसे अवस्थारूप अज्ञानका विनाश आवरणभंग है॥। ७५ ।। अपरे तु-'घटं न जानामि' इति घटज्ञानविरोधित्वेन, घटज्ञाने सति घटाज्ञानं निवृत्तमिति तन्निवर्त्यत्वेन चाडनुभूयमानं न मूलाज्ञानम्। शुद्धचैतन्यविपयस्य तज्ज्ञाननिवर्त्यस्य च तस्य तथात्वायोगात्। किन्तु घटावच्छिन्नचैतन्यविपयं मूलाज्ञानस्यावस्थाभेदरूपमज्ञानान्तरमिति तनाश एवाडभिभवः। न चैवमेकेन ज्ञानेन तन्नाशे तत्समानविपयाणां ज्ञानान्तराणामावरणाभिभावकत्वानापत्तिः । यावन्ति ज्ञानानि, तावन्ति अज्ञानानी त्यभ्युपगमादित्याङ्गुः ।

आश्रय करता ही है, परन्तु वह अज्ञान उसको आवृत नहीं करता, यह भी ज्ञात होता है, [अतः पटटृष्टान्तसे यह विलक्षण है, और दहराधिकरणमें जीवको आवृत माननेमें सभी व्यवहारोंकी लोपप्रसक्ति होगी, ऐसा साधन किया है, और इस ग्रन्थमं साक्षी चतन्यकी अनावृति मी कहेंगे, यह भाव है] कुछ लोग कहते हैं कि 'घटं' न जानामि' (मैं घटको नहीं जानता हूँ) इस प्रकार घटज्ञानके विरोधीरूपसे और 'घटज्ञान होनेपर घटका अज्ञान निवृत हुआ' इस प्रकार घटज्ञानके निवत्यरूपसे अनुभूयमान अज्ञान मूलाज्ञान नहीं है, कारण कि शुद्धचतन्यविषयक शुद्धचैतन्यज्ञानसे निवृत्त होनेवाला अज्ञान घटावच्छिन्नचैतन्यविषयक और घटज्ञानसे निवर्त्य नहीं हो सकता। परन्तु घटावच्छिन्न चैतन्यको अवलम्बन करनेवाले मूलाज्ञानका अवस्था- विशेष कोई अन्य ही अज्ञान है, इसलिए उस अवस्थाविशेपरूप अज्ञानका विनाश ही आवरणाभिभव है। एक ज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानका नाश होनेपर तत्समानविषयक अन्य ज्ञान आवरणके नाशक नहीं होंगे, यह आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जितने (संसारमं) ज्ञान हैं, उतने ही अज्ञान भी हैं, ऐेसा स्वीकार है।

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१६० सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

कचिदूचुरनाददिं मूलाज्ञानसिव- कोई लोग कहते हैं कि अवस्थारूप अज्ञान मूलाज्ञानके समान अनादि है। इमानि चाऽवस्थारूपाणि अज्ञानानि मूलाज्ञानवदज्ञानत्वादनादी- नीति केचित्। इतरे। सादि निद्रादिवत्, तत्रानादित्वे कस्य नाश्यता॥ ७६॥ अन्य लोग कहते हैं कि अवस्थारूप अज्ञान निद्रा आदिके समान सादि है, यदि अवस्थारूप अज्ञानको अनादि मानें तो नाश किसका होगा ? व्यावहारिकौ जगज्जीवावावृत्य स्वामौ जगज्ीवौ विक्षिपन्ती निद्रा तावदावरणविक्षेपशक्तियोगात् अज्ञानावस्थाभेदरूपा। तथा निद्रा सुपुप्ता- वस्थाऽप्यन्तःकरणादौ विलीने 'सुखमहमस्वाप्स न किश्िदवेदिपम्' इति परामर्शदर्शनात् मूलाज्ञानवत् सुपुप्तिकाले अनुभूयमानाज्ञानावस्थाभेदरूपैव। तयोश्र जाग्रद्भोगप्रदकर्मोपरमे सत्येवोद्द्वाद् सादित्वम्, तद्वद् अन्यदप्य-

कुछ लोग यह कहते हैं कि जो ये अवस्थारूप अज्ञान हैं, वे सवके सब मूल अज्ञानके समान अनादि ही हैं, क्योंकि अज्ञानत्व धर्म अवस्थारूप अज्ञानमें भी है *। जाग्रत् अवस्थाके जगत् और जीवका आवरण करके स्वम्नावस्थावाले जगत् और जीवकी उत्पत्ति करती हुई निद्रा अज्ञानकी ही विशेष अवस्था है, क्योंकि निद्रामें भी आवरण और विक्षेपशक्तिका योग है। इसी प्रकार अन्तःकरण आदिके विलीन होनेपर 'मैं सुखसे सोया था, मैंने कुछ भी नहीं जाना' इस प्रकारके स्मरणके देखनेसे सुषुप्तिकालमें मूलाज्ञानके समान अनुभूयमान सुषुप्ति अवस्था भी अज्ञानकी विशेष अवस्था ही है। जागत्कालीन भोगके देनेवाले कर्मका क्षय होनेपर ही निद्रा और सुपुप्तिकी उत्पत्ति होती है, अतः वे सादि

  • अवस्थाऽज्ञानानि अनादीनि, अज्ञानत्वात्, मूलाज्ञानवत्, अर्थात् अवस्थारूप अज्ञान अनादि हैं,अज्ञानत्व होनेसे, मूलाज्ञानके समान, यह अनुमानप्रमाण अवस्थारूप अज्ञानके अनादित्वका साधक है। देवताधिकरणमें (त्र० सू० अ० १ पा० ३ सू० २६) इस मूल अज्ञानको अनादि सिद्ध किया है, अतः दष्टान्तासिद्धि नहीं है।

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आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १६१

ज्ञानमवस्थारूपं सादीत्यन्ये। नन्वनादित्वपक्षे घटे ग्रथममुत्पन्नेनैव ज्ञानेन सर्वतदज्ञाननाशो भवेत्, विनिगमनाविरहात; तदवच्छिन्नचैतन्यावरकसर्वाज्ञानानाशे विषयप्रकाशा-

हैं, इसीके समान अन्य घटादिविपयावच्छिन्न चतन्यका आवरण करनेवाला अज्ञान भी सादि + है। [ यदि अवस्थारूप अज्ञान सादि माने जायँ, तो प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे पूर्वकालिक घटका आवरण करके स्थित अज्ञानका नाश होनेपर भी पुनः उत्पन्न अवस्थारप अज्ञानसे उसका आवरण होगा, इससे सादिपक्षमें तो व्यवस्था हो सकती है, परन्तु अनादित्वपक्षमं व्यवस्था नहीं हो सकती, यह शक्का करते हैं-] अज्ञानके अनादित्वपक्षमे प्रथम उत्पन्न घटविपयक ज्ञानसे ही सम्पूर्ण घटविपयक अज्ञानका नाश होगा, क्योंकि 'प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही अज्ञान नष्ट होता है, अन्य अज्ञान नष्ट नहीं होते, इसमें कोई विनिगमक (युक्तिविशेप) नहीं है और घटावच्छिन चतन्यका आवरण करनेवाले सम्पूर्ण अज्ञानका विनाश न माना जाय, अर्थात् प्रथम उत्पन्न घटज़ानसे एक आवरण अज्ञानका नाश माना जाय, तो [ एक आवरणके विनष्ट होनेपर मी अन्य आवरणोंके रहनेसे ] विपय- प्रकाशकी अनुपपत्ति होगी, [अर्थात् एक आवरणका नाश होनेपर भी अन्य आवरणोंसे घट आदिके आवृत होनेसे घटादिका कदापि प्रकाश होगा ही नहीं, अतः सम्पूर्ण आवरणोंका एक ज्ञानसे नाश मानना होगा, यह भाव है,]। इससे-प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे सम्पूर्ण अज्ञानका नाश माननेसे- उत्तरकालीन ज्ञान आवरणके अभिभावक नहीं होंगे, यह दोप तदवस्थ ही है, अर्थात् प्रथम उत्पन्न घटजानसे ही घटके सत् आवरणोंका विनाश हुआ, तो उत्तरज्ञान-द्वितीय कालमें उत्पन्न हुआ घटज्ञान-किस आवरणका विनाश + विमतानि अवस्थाऽज्ञानानि आदिमन्ति, अवस्थाज्ञानत्वात, निद्रावत्, सुप्िवच्; अर्थात् अवस्थारूप अज्षान सादि हैं, क्योंकि अवस्थारप अज्ञानत्व धर्म उनमें है, निद्रा और मुक्ि रूप अवस्थाउज्ञानके समान, इस अनुमानसे उन अवस्थारूप अज्ञानोंमें सादित्वकी सिद्धि की जाती है, पूर्वीक अनादित्वसाधक अनुमानसे विरोध नहीं है, क्योंकि वह अनुमान मूलाजानमें ही अनादित्वका साधक है, अवस्थारूप अज्ञानमें नहीं। मूलाज्ञानमें अनादित्वका सिद्धान्त में अभ्युपगम है, अतः सिद्धान्तसे विरोध नहीं है। २१

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१६२ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

अत्र केचित् स्वभावेन व्यवस्थां प्रागभाववत्। सत्स्वप्यावरकेव्वर्थप्रकाशं च प्रचक्षते ।। ७७॥ इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि प्रागभावके समान आवारक अज्ञानोंके रहते हुए भी विपयोंका प्रकाश और व्यवस्था स्वभावतः हो सकती है॥७। अत्र केचिदाहु :- यथा ज्ञानप्रागभावानामनेकेपां सच्चेऽप्येकज्ञानोदये एक एव आगभावो निवतते। संशयादिजननशक्ततया तदावरणरूपेपु प्रागभावान्तरेपु सत्स्वपि विषयावभास:। तथकज्ञानोदये एकमेवाजजञानं निवर्तते, अज्ञानान्तरेप सत्स्वपि विपयावभास इति। करेगा? किसीका नहीं, क्योंकि आवरण रहे, तो उसका नाश करे, परन्तु आवरण तो है ही नहीं, यह शङ्काका तात्पर्य है। इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे ज्ञानके प्रागभावोंके अनेक होनेपर भी एक ज्ञानकी उत्पत्तिसे एक ही ज्ञानके भागभावका विनाश होता है। संशय, विपर्यय आदिकी उत्पत्तिमं समर्थ ज्ञानके आवरणरूप अन्य प्रागभावोंके रहते हुए भी विपयका अवभास होता है, चैसे ही एक जानके उदयसे एक ही अज्ञानका निवर्तन होता है और अन्य अन्ञानोंके रहते हुए भी विषयोंका अवभास होता है। [तात्पर्यार्थ यह है कि नैयायिकोंके मतमं चार प्रकारके अभाव हैं-प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव। इनमें ग्रागभाव है-वस्तु सत्ताके पूर्वकालमें प्रतीत होनेवाला और वस्तुके उत्पन्न होनेपर नष्ट होनेवाला अभाव, जितने घट या घटज्ञान आदि होते हैं, उतने ही उनके प्रागभाव होते हैं। प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही ज्ञानपागभावकी निवृत्ति होती है और अन्य प्रागभाव यथापूर्व रहते हैं, उन दूसरे प्रागभावोंके रहते हुए भी न्यायमतमें विषयका प्रकाश माना जाता है, इसी प्रकार प्रकृतम इतर आवरणोंके रहते हुए भी प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही आवरणका विनाश होगा और विषयका प्रकाश होगा, इसमें कोई बाधा नहीं है। यद्यपि यहांपर यह शह्का हो सकती है कि अभावरूप प्रागभाव विषयका आवारक नहीं है और भावरूप अज्ञान- विषयोंको आवृत करता है, इसलिए यह दष्टान्त असङगत है, तथापि यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञानमें आवारकत्व यही है कि अज्ञातत्वरूपसे अभिमत वस्तुमें संशय, विपर्यय आदिके जननमें (उत्पादनमें) सामर्थ्य, उसे नैयायिक ज्ञानपरागभावमें भी मानते हैं, इसलिए दष्टान्तकी असङ्गति नहीं है]।

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आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १६३

विशेपदर्शनाभावकूटात् संशयसम्भवात्। आवृतस्याऽप्रकाशाच पर्यायेणाSडवृतिं परे ॥ ७८॥ विशेपददनके अभावसमुदायसे संशयका सम्भव है और आवृतका अप्रकाय ऐोनेसे नमदाः अज़ान विपयको आवृत करते हैं, अर्थात् एक ज्ञानसे एक अज्ञानकी निवृचि होगी अनन्तर उसका उपशम होनेपर अन्य अज्ञान आवरण करेगा, ऐसा भी कोई लोग कहते है॥। ७८॥ अन्ये तु-आवृतस्याऽडपरोक्ष्यं चिरुद्म्। एकज्ञानोदये च प्रागभा- वान्तरसच्चेऽपि यावद्विशेपदर्शनाभावकूटरूपमावरणं विशेषदर्शनान्नास्तीति मन्यमाना वदन्ति-यदा यदज्ञानमावृणोति, तदा तेन ज्ञानेन तस्यैव नाथ:। सर्व च सर्वदा नाऽऽवृणोति, वैयर्थ्यात्। किन्त्वावरकाज्ञाने वृत्या नाशिते तद्धृत्युपरमे अज्ञानान्तरमावृणोति।

पर्वतीय वहि आदि जो आवृत हैं, उनका आपरोक्ष्य नहीं माना जाता है, किन्तु सिद्धान्तमें उनका परोक्ष ज्ञान ही माना गया है। एक ज्ञानके उदित होनेपर अन्य प्रागभावोंकी सचाम भी सम्पूर्ण विशेपदर्शनका अभाव- समुदायरूप जो आवरण है, वह विशेपके दर्दनसे है ही नहीं, ऐसा मानते हुए कुछ लोग कहते हैं कि जिस कालमें जो अन्ञान जिस वस्तुका आवरण करता है, उस कालमें उस वस्तुके ज्ञानसे उसी अज्ञानका नाश होता है। सब अज्ञान सर्वदा आवृत नहीं करते, क्योंकि ऐसा मानना व्यर्थ है, परन्तु अन्य वृत्तिसे आवरण करनेवाले अनानका नाथ होनेपर, उस वृत्तिका जब उपशम होता है, तव अन्य अज्ञान उसको आवृत करता है। * भान यह हे कि स्थापु आदिमें अर्थात् स्थाणु आदिविपयक-संशयात्मक ज्ञानको ददश्न करनेमें-संजय आर्दिक प्रति विरोधिभृत विशेष दर्शनका प्रागभावमात्र समर्थ नहीं है, कर्गोकि ऐसा माननेपर 'अर्य स्थाणु:' (यद स्थाणु है) इस प्रकारके निश्चयकालमें भी समाननिषयक अन्य निशमका पागभाव होनेसे पुरुपत्वकी स्मृतिवाले पुरुपको फिर संदयों आपति होगी, इसलिए नैयायिक यह मानते हैं कि संशय आदिके समानविपयक जितने निश्नयात्मक ज्ञान है, उन सबके प्रागभावोंका समुदाय संशय आदिकी उत्पत्तिमें समथे है और वही आवरण है। एकके निधयकालमें आवरणरूपसे सम्मत सम्पूर्ण विशेष दर्शन नागभावकूटरप विदेपादर्शनका अभाव होनेसे पुनः संशयकी आपत्ति नहीं हो सकती है और प्राथमिक घटश्ञानकालम न्यायमतमें विषयप्रकाशकी अनुपपत्ति भी नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रागभावकटरूप आवरण नहीं है। इसलिए 'संशयादिजनक-

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१६४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ग्रथम परिच्छेद

न चाडनावरकाज्ञानशेषो मुक्ती प्रसज्यते। मूलाज्ञानच्छिदा छेद्यास्तदवस्था इमा यत: ।। ७९ ।। मुक्ति अवस्थामें आवरण न करनेवाले अज्ञानोंका अवशेष प्रसक्त नहीं होता, क्योंकि उस दशामें मूलाज्ञानका विनाश होनेसे अवस्थारूप अज्ञान भी विनष्ट होते हैं॥७९॥ न चैवं ब्रह्मावगमोत्पत्तिकालेऽनावरकत्वेन स्थितानामज्ञानानां ततोऽप्यनिवृत्तिप्रसङ्ग: । तेपां साक्षात्तद्विरोधित्वाभावेऽपि तन्निवर्त्यमूला- ज्ञानपरतन्त्रतया अज्ञानसम्बन्धादिवत् तन्निवृत्त्यैव निवृत्युपपत्तेः। एतदर्थ- सेव तेपां तदवस्थाभेदरूपतया तत्पारतन्त्र्यमिष्यत इति।

यदि सर्वदा सब अज्ञान आवारक न हों, तो न्रह्मनञानके उत्पत्ति- कालमें अनावारक (आवरण नहीं करनेवाले) रूपसे विद्यमान अज्ञानोंकी ब्रह्मज्ञानसे भी निवृत्ति नहीं होगी, [भाव यह है कि ब्रह्मज्ञानके उत्पत्तिकालमें भूल अज्ञानके समान अवस्थाजज्ञान भी व्रह्मचतन्यको विपय प्रदेशमें आवृत करके रहेंगे, तो ब्रह्मज्ञानसे ब्रह्मविषयक मूलाज्ञानकी नाई उन चैतन्यके आवारक अवस्थारूप अज्ञानोंकी भी निवृत्ति होगी, यदि अवस्थारूप अज्ञान आवारकरूप नहीं होंगे, तो उनकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि समानविषयमें ज्ञाना- ज्ञानका निवर्त्यनिवर्तकभाव होनेसे ब्रह्मज्ञानका समानविषयक अवस्थारूप अज्ञान नहीं है]। नहीं, ब्रह्मज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानोंकी भी निवृत्ति होगी, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानोंके साक्षात् न्रह्मज्ञानके विरोधी न होनेपर भी वे (अवस्थारूप अज्ञान) ब्रह्मज्ञानसे निवृत्त होनेवाले मूलाज्ञानके परतन्त्र अधीन हैं, इसलिए जैसे अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर अज्ञानपरतन्त्र चैतन्य और अज्ञानके सम्बन्धकी निवृत्ति होती है, वैसे ही अज्ञानकी निवृत्तिसे ही अवस्थारूप अज्ञानकी भी निवृत्ति होती है। जैसे अज्ञानकी निवृत्तिसे संसारकी निवृत्ति होनेसे संसार अज्ञानपरतन्त्र माना जाता है, वैसे ही अज्ञानकी निवृत्तिसे अवस्थारूप अज्ञानके निवृत्त होनेसे घटादिविषयक अज्ञान, मूलाज्ञानके अवस्था- विशेषरूप होनेसे, मूलाज्ञानके अधीन माने जाते हैं।

तया' इत्यादिखे जो पूर्वमें दष्टान्त दिया गया है, वह नहीं घटता है, इसी अस्वरससे यह 'अन्ये तु' मत है।

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आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १६५

अन्ये त्वेकस्य विच्छेदमितरेपां पराभवम्। तं चावरणशकीनां प्रतिवन्धं प्रचक्षते ।। ८० ॥। कोई लोग कहते हैं कि एक ज्ञानसे एक ही अज्ञानका नाश होता है और इतरोंका पराभव होता है, और अज्ञानोंकी आवरणशक्तियोंका प्रतिबन्ध पराभव कहा जाता है॥८॥ अपरे तु-अज्ञानस्य सविपयत्वस्वभावत्वात् उत्सर्गतः सर्व सर्व- दाऽडवृणोत्येव। न च विपयोत्पत्तेः प्रागावरणीयाभावेनाऽडवरकत्वं न युज्यते इति वाच्यम्, तदाऽपि सूक्ष्मरूपेण तत्सत्वादिति मन्यमाना: कल्पयन्ति- यथा बहुजनसमाकुले प्रदेशे कस्यचित् शिरसि पतन्नशनिरितरानप्य- पसारयति। यथा वा सन्निपातहरमौपधमेकं दोपं निवर्तयद्दोपान्तरमपि दूरीकरोति, एवमेकमज्ञानं नाशयत् ज्ञानमज्ञानान्तराण्यपि तिरस्क्ररोति। तिरस्कारश्र यावद् ज्ञानस्थिति: तावद् आवरणशक्तिप्रतिवन्ध इति। अज्ञानका सविषयत्व स्वभाव है अर्थात् अज्ञान किसी विपयका अवलम्वन किये विना नहीं रहता, इससे स्वभावतः सभी अज्ञान अपनी सत्त्वदशामें सदा विषयका आवरण करते ही हैं। यदि यह शङ्का हो कि घट आदि विपयकी उत्पत्तिके पूर्वमें * आवरणीय (आवरण करने योग्य) विपयके न रहनेसे. आवारकत्वकी उपपत्ति नहीं होगी: नहीं, यह शक्रा युक्त नहीं है, क्योंकि उत्पत्तिके पूर्वकालमं भी सूक्ष्मरूपसे वह कार्य है, अतः आवारकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, ऐसा मानते हुए कुछ लोग कल्पना करते हैं कि जैसे अनेक जनोंसे युक्तदेशमें किसी एक पुरुपके मस्तकके ऊपर गिरता हुआ वज्र अन्य पुरुषोंको हटा देता है। अथवा जसे सन्निपातको हरण करनेवाली औषधि एक दोपका विनाश करती हुई अन्य दोपोंका भी निराकरण करती है, इसी प्रकार एक अज्ञानका विनाश करता हुआ ज्ञान इतर अज्ञानोंका भी तिरस्कार करता है। और जब तक ज्ञानकी स्थिति रहती है, तब तक आवरणशक्तिका प्रतिवन्ध होता है। तात्पर्य यह है कि इस मतमें यह कहते हैं कि सब अज्ञान सब विपयोंको सदा भवृत करते हैं, इसलिए घटकी उत्पत्तिके पूर्वमें घट आदि विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण करता है, यह ग्रतीत होता है, परन्तु यह नहीं हो सकता, क्योंकि अज्ञानका सविपयत्व स्वभाव होनेसे विषयके न रहनेके कारण तदचच्छिन चंतन्यरूप आावरणीय भी नहीं है।

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१६६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

तत्र धारावहज्ञानेष्वाद्येनेव पराभवात्। अज्ञानानां द्वितीयादे: साफल्यं कथमुच्यते ॥८१॥ शङ्का होती है कि धारावाहिक स्थलमें प्रथम ज्ञानसे ही अज्ञानका विनाश होगा, फिर द्वितीय आदि ज्ञानोंकी सफलता कैसे होगी? अर्थात् द्वितीयादि वृत्ति निरर्थक होगी यह भाव है।। ८१ ॥ नन्वेवं सति धारावाहिकस्थले द्वितीयादिवृत्तीनामावरणानभिभाव- कत्वे वैफल्यं स्यात्, अ्रथमज्ञानेनैव निवर्तनतिरस्काराभ्यामावरणमात्र- स्याभिभवादिति।

अत्राहुर्दीपधारेव तिरस्कृत्य तमः स्थिता। वृत्तिधारेत्यनावारो वृत्तीनां क्षेमतः फलम् ॥ ८२॥ ..

तमका तिरस्कार करके रहनेवाली दीपधाराके समान वृत्तिकी धारा है, अतः उन वृत्तियोंका आवरणाभिभव-आवरणप्रागभावरक्षण ही फल है, इस प्रकार पूर्वोक्त आक्षेपके समाधनमें कोई लोग कहते हैं ।। ८२ ॥

अत्राहु :- वृत्तितिरस्कृतमप्यज्ञानं तटुपरमे पुनरावृणोति प्रदीपतिर- स्कृतं तम इव प्रदीपोपरमे। वृत्युपरमसमये वृत्यन्तरोदये तु तिरस्कृतम- ज्ञानं तथवाजवतिष्ठते प्रदीपोपरमसमये प्रदीपान्तरोदये तम इव। तथा च

परन्तु एक ज्ञानसे एक अज्ञानका नाश होता है और अन्य अज्ञानोंका तिरस्कार होता है, ऐसा माननेमें धारावाहिक ज्ञानके स्थलमें द्वितीय आदि वृत्तियाँ आवरणकी अभिभावक न होनेसे निरर्थक हो जायँगी, क्योंकि प्रथम ज्ञानसे अज्ञानके निवर्तन और तिरस्कार-इन दोनोंसे आवरणशक्तिका निराकरण होता है। इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे प्रदीपके विनष्ट होनेपर प्रदीप द्वारा तिरस्कृत अन्धकार (घट आदिको) आवृत करता है, वैसे ही वृत्तिद्वारा तिरस्कृत अज्ञान भी घटज्ञानके (घटवृत्तिके) विनष्ट होनेपर विषयको आवृत करता है। एक प्रदीपके विनाशकालमें यदि अन्य दीपका उदय हो, तो जैसे अन्धकारका विनाश और तिरस्कार होता है, वैसे ही यदि वृत्तिके उपरामकालमें

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आवरणाभिभवस्वरूप-विचार] भापानुवादसहित १६७

'यस्मिन् सति अग्रिमक्षणे यस्य सच्वम्, यश्रतिरेके चाऽसत्त्वम्, तत् तज्जन्यम्' इति प्रागभावपरिपालनसाधारणलक्षणानुरोधेनाऽनावरणस्य द्वितीयादिवृत्तिकार्यत्वस्याऽपि लाभान्न तद्वैफल्यमिति । पर्यायेणावृति्न्याय चन्द्रिकाकृ्भिरीरिता। अर्थस्य मोहैवोधिन स्वकालावरणक्षतिः ।।८३।। घट आदि विषयका अज्ञानसे क्रमशः आवरण होता है और ज्ञानसे अपनी विद्यमान दशामें ही अशानका नाद होता है, ऐसा न्यायचन्द्रिकाकारका मत है॥८३॥ न्यायचन्द्रिकाकृतस्त्वाहु :- केनचिज्ज्ञानेन कस्यचिदज्ञानस्य नाश एव। न त्वावरकाणामप्यज्ञानान्तराणां तिरस्कारः। तथा च धारावाहिक- द्वितीयादिवृत्तीनामप्येककाज्ञाननाशकत्वेन साफल्यम्। अन्य (तद्विपयक ) वृत्तिका उदय हो, तो वह अज्ञानतिरस्कृत ही रहता है। इस परिस्थितिमं 'जिसके रहनेपर उत्तर क्षणमें जिसका अस्तित्व होता है और जिसके न रहनेपर जिसका अस्तित्व नहीं होता, वह तज्जन्य अर्थात् उससे उत्पन्न होता है, इस प्रागभावके परिपालनमें साधारणजन्यत्वके लक्षणा- नुरोघसे + द्वितीयादि वृत्तिका अनावरणरूप (आवरणाभाव) कार्यका भी लाग हो सकता है, अतः द्वितीयादि वृत्तिका घैफल्य नहीं है। न्यायचन्द्रिकाकार कहते हैं-किसी एक ज्ञानसे किसी एक अज्ञानका नाथ होता ही है, अन्य आवारक अज्ञानोंका तिरस्कार नहीं होता, इसलिए धारावाहिक दूसरी वृत्तियोंसे भी एक-एक अज्ञानका नाश होता है, अतः उनकी निप्फलता नहीं है।

  • तात्पर्य यद है कि 'यद घट है' इस प्रकार प्रत्यक्ष ज्ञान एक अज्ञानका विनाश करता है और अन्यका तिरस्कार, और वह तिरस्कृत अज्ञान घटज्ञानके विनाशकालमें फिर उसी चिपयको आवृत करता है। यदि विशेष जाननेकी इच्छासे प्रथम उत्पन्न घटज्ञानके विनाश- समयमें अन्य पटप्रतक्ष उत्पन्न हो तो, वद तिरस्कृत अज्ञान चैसा ही रदता है। + तात्पर्य यद ह कि सादि और अनादि साधारण जन्यत्व-साध्यत्वका यह लक्षण है, कि जिसके रहनेपर जो रहे और न रहनेपर न रहे, वद उससे जन्य है। एस लक्षणका समन्यय इस प्रफार है-यस्मिन् सति-जिसके रहनेपर अर्थात् दण्डके रहनेपर अप्रिम क्षणमें-उत्तरक्षणमें घटरूप कार्य रहता है और दण्डके न रहनेपर घटरूप कार्य नहीं रहता है, अतः घट दण्टरो साध्य है। घैसे ही प्रायश्चितके होनेपर उत्तरक्षणमें उःमप्रागभावकी सत्ता है और उसके न रद्नेपर नहीं है, अतः दुःसप्रागभावका प्रायथ्चित

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१६८ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

न चैवं ज्ञानोदयेऽप्यावरणसम्भवाद्विपयानवभासप्रसङ्ग: । अवस्था- रूपाण्यज्ञानानि हि तत्तत्कालोपलक्षितस्वरूपावरकाणि, ज्ञानानि च याव- त्स्वकालोपलक्षित विपयावरकाज्ञाननाशकानि । तथा च किश्चिज्ज्ञानोदये तत्कालीन विपयावरकाज्ञानस्य नाशात् विद्यमानानामज्ञानान्तराणामन्यका- लीनविपयावारकत्वाच्च न तत्कालीनविपयावभासे काचिदनुपपत्तिः ।

यदि शक्का हो कि प्रथम ज्ञानसे आवारक अन्य अज्ञानोंका तिरस्कार न माना जाय, तो प्रथम ज्ञानकी उत्पत्ति होनेपर भी विषयका प्रकाश नहीं होगा क्योंकि अन्य अज्ञानकृत आवरणोंका सम्भव है? नहीं, यह शक्का युक्त नहीं है, कारण कि अवस्थारूप जो अज्ञान हैं, वे तत्-तत् कालसे उपलक्षित स्वरूपका आवरण करते हैं और ज्ञान अपनी अवस्थिति तकका जो सम्पूर्ण- काल है उससे उपलक्षित विपयावच्छिन्न चैतन्यके आवरकरूपसे विद्यमान अज्ञानके विनाशक हैं। [तात्पर्यार्थ यह है कि अवस्थारूप जितने अज्ञान हैं वे सबके सव मूलाविद्याके समान सर्वदा विपयावच्छिन्न चैतन्यको आवृत करनेवाले नहीं हैं, क्योंकि ऐसा मानना व्यर्थ है, किन्तु यह उचित है कि कुछ काल तक कोई अज्ञान विषयचतन्यका आवरण करता है और कोई अन्य कालमें आवरण करता है, इस प्रकार कालकी सीमासे वे अवस्थारूप अज्ञान आवारक है सम्पूर्ण काल तक आवरक नहीं हैं। अतः प्रथम उत्पन्न घटविपयक ज्ञान अपनी स्थितिके यावत्कालमें तदावारक अज्ञानका अवश्य नाश करेगा, इसलिए ज्ञानके उदित होनेपर विषयके अनवभासका प्रसङ्क नहीं है, क्योंकि ज्ञानका यह स्वभाव है कि अपने उदयकालमें अपने विपयको आवृत करके वैठे हुए अज्ञानका निवर्तन करता है, इसलिए उक्त शङ्काका अवसर नहीं है ]। इस प्रक्रियासे एक ज्ञानकालमें अज्ञानान्तरके अनावारकत्व सिद्ध होनेपर घटादिविषयक किसी एक ज्ञानके उत्पन्न होनेपर उस ज्ञानके उदयकालमें विपयावारक एक अज्ञानका नाश होता है, और उस कालमें विद्यमान इतर अज्ञान अन्य कालमें विपयोंको आवृत करते हैं, अतः तात्कालिक चिपयके

से परिपालन होनेसे दुःखरप्रागभाव प्रायथ्ित्तसाध्य है। वैसे ही द्वितीय वृत्तिके उदयसे प्रथम ज्ञान सिद्ध आवरणतिरस्कारकी उत्तरक्षणमें सत्ता है और उसके न रहनेसे नहीं है, अतः द्वितीयावृत्तिका फल आवरणतिरस्कार हो सकता है, यह भाव है।

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आवश्णाभिभव-स्वरूपविचार] भापानुवादसहित १६९

कारीरीफले वृष्टावासनसमयस्येवाऽज्ञानविपये घटादी तत्कालस्योपलक्षणतया विपयकोटाव ननुप्रवेशेन सूक्ष्मतत्कालमेदाविपयैधारावाहिकद्वितीयादिज्ञानैर- ज्ञानानां निवृत्तावपि न काचिदनुपपत्तिरिति। केचिदाहुर्घटाज्ञानमाद्यज्ञानेन हन्यते। द्वितीयाद्येस्तु कालादिविशिष्टाज्ञानवाधनम् ॥।८४॥

अवभासग कोई अनुपपत्ति नहीं है। जस कारीरीके फलभृत वृष्टिमें आसन्न समयके (कारीरीनामक इष्टिसमापिके उत्तरक्षणके) उपलक्षण होनेसे विपयकोटिमं प्रवेश नहीं है, वैसे ही अज्ञानके विपयीमूत घट आदिमं भी तत्-तत् कालके उपलक्षण होनेसे विपयकोटिमें प्रवेश नहीं है। इससे सूक्ष्म कालविशेपको विपय न करनेवाले धारावाहिक द्वितीय आदि ज्ञानोंसे अज्ञानोंकी निवृत्ति होनेमें कोई आपत्ति नहीं है। [तात्पर्यार्थ यह है कि कोई लोग शक्का करते हैं-तत्-तत् अज्ञान तत्-तत् कालविशेषविशिष्ट विपयका ही आवरण करते हैं। इस प्रकार काल- विशेषका आवरणीय विषयकोटिमं विद्येषणरूपसे प्रवेश न कर उपलक्षणरूपसे उसका कयों प्रवेश करते हैं? इसपर उत्तर है कि यदि उसका विशेषणरूंपसे प्रवेश किया जायगा, तो धारावाहिक ज्ञानस्थलमं द्वितीयादि ज्ञान अज्ञानके निवतक नहीं होंगे, क्योंकि तत्-तत् सूक्ष्मकालके अप्रत्यक्ष होनेसे तत-तत् काल- घैशिष्टच का विषयमें अवभास न होनेके कारण तत्-तत् कालविशिष्टविषय कत्वका भी ज्ञानमें भान नहीं होगा, और असगानविषयक ज्ञान अनञानका विरोधी नहीं होता है। अतः उपलक्षणरूपसे ही उन उन कालोंका प्रवेश है, विशेपण- रूपसे प्रवेश नहीं है, इसगें द्ष्टान्त है कारीरीफल-वृष्टि। अर्थात् 'वृष्टिकामः कारीर्या यजेत' (वृषटिका अभिलापी कारीरी याग करे) यह वृष्टिरूप फल कारीरी नामके यागके उत्तर क्षणमें ही होना चाहिए, अन्य कालमं नहीं; क्योंकि उस कालमें सूखते हुए धानोंका जीवन कालान्तरीय वृष्टिसे सुरक्षित नहीं होगा, परन्तु वह समीपवतीं इष्टिका उत्तर काल वृष्टिरुप फलमें विशेषणरूपसे विवक्षित नहीं है, कारण कि इष्टिके बिना भी समयविशेपमें वृष्टि होती ही है, किन्तु इतर समयकी व्यावृत्ति करनेके लिए वृष्टिरूप-कारीरी नामक यागके फलमें जसे आसन्नसमयका उपलक्षणरूपसे प्रवेश है, वैसे ही प्रकृतमें भी तत्-तत कालका विशेषणरूपसे प्रवेश है, यह भाव है ]।

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१७० सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

वृत्तिश्िरस्थितैकैव स्याद्धारावाहिकस्थले। भिन्ना वा वृत्तय: सन्तु स्थूलकालार्थगोचराः ॥८५॥ उपास्तिवद्मानानि सन्तु वाऽनाद्यवृत्तयः । गृहीतग्रहणात् सूक्ष्मकालस्याऽतीन्द्रियत्वतः ॥ ८६॥ कुछ लोग कहते हैं कि प्रथम ज्ञानसे घट आदिका अज्ञान नष्ट होता है और द्वितीयादि ज्ञानसे तत्-तत् कालसे विशिष्ट अज्ञान नष्ट होता है। और धारा- वाहिक ज्ञानस्थलमें एक ही दीर्घकालावस्थायी वृत्ति है अथवा स्थूल कालको विषय करने- वाली भिन्न भिन्न ही वृत्तियाँ हों अथवा उपासनाके समान द्वितीयादि वृत्तियाँ अप्रमाण हों, क्योंकि वे अवगत अर्थका ही ग्रहण करती हैं और सूक्ष्म काल तो अतीन्द्रिय है, अतः उसका ग्रहण नहीं करती हैं ।। ८४।। ८५।। ८६ ।। केचितु प्रथमज्ञाननिवर्त्यमेवाऽज्ञानं स्वरूपावारकम्। द्वितीयादिज्ञान- निवर्त्यानि तु देशकालादिविशेषणान्तरविशिष्टविपयाणि। अत एव सत्ता- निश्चयरूपे अज्ञाननिवर्तके चैत्रदर्शने सकृज्जाते 'चैत्रं न जानामि' इति स्वरूपावरणं नाऽनुभूयते, किन्तु 'इदानीं स कुत्रेति न जानामि' इत्यादिरूपेण विशिष्टावरणमेव। विस्मरणशालिनः क्वचित् सकृत् दृष्टेऽपि 'न जानामि' इति स्वरूपावरणं दृश्यते चेतु, तत्र तथाऽस्तु। अन्यत्र सकृद्दृष्टे विशिष्ट- विषयाण्येवाऽज्ञानानि ज्ञानानि च।

कोई लोग कहते हैं कि प्रथम ज्ञानसे निवृत्त होनेवाला अज्ञान ही स्वरूप- को आवृत करनेवाला है। और धारास्थलमें द्वितीयादि ज्ञानसे देश, काल आदि अन्य विशेषणोंसे विशिष्टविषयक अज्ञान निवृत्त होते हैं। इसीलिए अज्ञान- निवृत्ति करनेमें समर्थ सत्तानिश्चयरूप चैत्रदर्शनके एक बार होनेपर भी- 'चैत्रको नहीं जानता हूँ' इस प्रकार स्वरूपावरणका अनुभव नहीं होता है, किन्तु 'इस समय वह कहाँ है, यह मैं नहीं जानता हूँ' इस प्रकार विशिष्टका ही आवरण अनुभूत होता है। कहींपर विस्मरणशील पुरुषको एक बार देखनेपर भी 'नहीं जानता हूँ' इस प्रकार स्वरूपके आवरणका अनुभव होता है, यदि- ऐसी शङ्का करें, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें, अर्थात् जहाँ फिर भी स्वरूपके आवरणका अनुभव होता है, द्वितीय आदि ज्ञान भी स्वरूपके आवारक अज्ञानका ही नाश करते हैं और अन्यत्र-विस्मरणाभाव- स्थलमें विषयके एक बार हृष्ट होनेपर अज्ञान और ज्ञान विशिष्टविषयक ही

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आवरणाभिभव-स्वरूपविचार] भापातुवादसहित १७१

न चैवं सति धारावाहिकद्वितीयादिज्ञानानामज्ञाननिवर्तकत्वं न स्यात, स्थूलकालविशिष्टाज्ञानस्य प्रथमज्ञानेनैव निवृत्तेः। पूर्वापरज्ञानव्यावृत्तसूक्ष्म- कालविशिष्टाज्ञानस्य तद्विपयैर्द्वितीयादिज्ञानैनिवृत्ययोगादिति वाच्यम्, धारावहनस्थले प्रथमोत्पन्नाया एव वृत्तेस्तावत्कालावस्थायित्वसम्भवेन वृत्ति- भेदानभ्युपगमात्। तदभ्युपगमेपि बहुकालावस्थायिपश्चपवृत्तिरूपत्व- सम्भवेन परस्परव्यावृत्तस्थूलकालादिविशेषणभेदविपयत्वोपपत्तेः । ग्रति

त्रविपयतया प्रामाण्याभावेनाSSवरणानिवर्तकत्वेऽप्यहानेश्व। नहि विपया-

हैं। अर्थात् धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीय आदि ज्ञान विशिष्टविषयक हैं और अज्ञान भी विशिष्टविषयक हैं, अतः समानविपयक होनेसे उनका परस्पर निवत्यनिवर्तकभाव हो सकता है, यह भाव है। द्वितीयादि ज्ञानके और इनसे निवर्त्य अज्ञानके स्वभावतः विशिष्टविषयक होनेपर धारावाहिक द्वितीय आदि ज्ञान अज्ञानके निवर्तक नहीं होंगे, क्योंकि स्थूलकालविशिष्ट अज्ञानकी प्रथमज्ञानसे ही निवृत्ति हो जाती है, अतः ज्ञानके पूर्वापर कालसे व्यावृत्त जो सूक्ष्म काल-क्षण है उससे विशिष्ट विषयको आवृत करनेवाले अज्ञानका, सूक्ष्मकालविशिष्ट विपयका अवगाहन न करनेवाले द्वितीयादि ज्ञानसे, निरास नहीं होगा, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि धारावाहिक स्थलमं (अर्थात् जहाँ यह घट है, यह घट है, इत्यादिरूपसे ज्ञानकी धारा चलती हो, वहाँ) प्रथम कालमें उत्पन्न वृत्तिकी ही धारावाहिक कालपर्यन्त स्थिति मानते हैं, इससे वृत्तिका भेद ही नहीं माना जाता है। यदि वृत्तिका भेद माना जाय, तो भी धाराकी दीर्घकालपर्यन्त रहनेवाली पाँच छः वृत्तियोंका सम्भव होनेसे परस्पर व्यावृत्त स्थूलकाल आदि विशेषण-विशेष विषयत्वकी उपपत्ति हो सकती है। यदि ज्ञानधाराको-प्रतिक्षणमें उत्पन्न होनेवाली वृत्तियोंका प्रवाह-माने तो भी प्रथमवृत्तिसे उत्तरकालीन वृत्तियोंमें, केवल अधिगतार्थविपयकत्व होनेसे, प्रामाण्य न होनेके कारण आवरणके

  • शक्तका तास्पर्य यह है कि पूर्व अ्रन्थमें धारावाहिक ज्ञानमें एक ही वृत्ति मानी गई है, उसके अनन्तर 'तदभ्युपगमेऽपि' इत्यादिसे धारा एकपृत्तिरूप नहीं मानी गई है किन्तु अनेक वृत्तिरूप मानी गई है, क्योंकि भाष्य आदिमें धारावाहिक ज्ञान अनेक वृत्तिरूप ही माना गया है।

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१७२ सिद्धान्तलेश संग्रह i प्रंथम पारेच्छेद

बाधमात्रं प्रामाण्यम्। आ्रगवगतानवगतयोः पर्वततद्वृत्तिपावकयोरनुमिति- विषययोरवाधस्याऽविशेषेण उभयत्राऽप्यनुमितेः प्रामाण्यप्रसङ्गात्। न चेष्टा- पत्तिः। 'वह्मावनुमितिः प्रमाणम्' इतिवत् 'पर्वतेऽप्यनुमितिः प्रमाणम्' इति व्यवहारादर्शनात्।

(अज्ञानके) अनिवर्तक होनेपर भी 'ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है' इस नियमका भङ्ग नहीं हो सकता है, क्योंकि केवल विषयका अवाध प्रामाण्य नहीं है अंर्थात् जिस ज्ञानके विषयका बाघ न हो वही प्रमाण है, ऐसा प्रामाण्यका लक्षण नहीं है, कारण कि उसके प्रामाण्यलक्षण होनेपर 'पर्वतो वहिमान्' ' (पवर्तमें वह्नि है ) इत्यादि अनुमितिके विषयीभूत पर्वत और उसमें रहनेवाली वहिका, जो क्रमशः अनुमितिके पूर्वमें ज्ञात और अज्ञात हैं, सामान्यरूपसे बाध नहीं है, अतः पवर्तांश और वह्यंशमें अनुमितिके प्रामाण्यकी प्रसक्ति होगी, और इसे इष्टापत्ति नहीं मान सकते हैं, कारण कि लोकमें जैसे 'वहिमें अनुमिति प्रमाण है', यह व्यवहार देखा जाता है, वैसे 'पर्वतमें भी अनुमिति प्रमाण है', यह व्यवहार नहीं देखा जाता। और पराभिमत अभावरूप अज्ञानकी व्यावृत्तिका बोध करानेके लिए प्रयुक्त अनुमान आदिका-यद्यपि साक्षी द्वारा सिद्ध अज्ञान-विपय

वे वृत्तियाँ न्यायमतके समान प्रतिक्षणावस्थायिनी नहीं मानी गई हैं, प्रत्युत पांच छः क्षणावस्थायिनी मानी गई हैं, इसके वाद 'प्रतिक्षणो०इत्यादि ग्रन्थसे न्यायमतका स्व्रीकार करके प्रतिक्षणावस्थायिनी वृत्तियोंका अभ्युपगम कर ज्ञानधाराकी उपपत्ति की है। इस मतमें यह शक्का होती है कि प्रथम क्षणमें उत्पन्न वृत्तिसे ही अज्ञानका नाश होनेपर अनन्तर कालमें उत्पन्न हुई क्षणिक वृत्तियोंसे किस अज्ञानका नाश होगा? यदि उत्तरकालीन वृत्यात्मक ज्ञान अज्ञानकी निवृत्ति नहीं करेगा, तो 'ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है' इस नियमका व्यभिचार होगा। इसपर उत्तर देते हैं कि ठीक है-ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, परन्तु वही ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है, जो प्रमाण हो। और प्रमाण ज्ञान उसे कहते हैं जो अनधिगत और अवाधित विषयका अवगाइन करता हो, द्वितीयकालीन वृत्तिज्ञान अवाधितार्थविषयक है, परन्तु अनधिगतार्थविषयक नहीं है, क्योंकि वह स्मृतिके समान अधिगत विषयका ही अवगाहन करता है, पर्वतांशमें वह्य- नुमितिका प्रामाण्य न हो, इसलिए केवल अवाधितार्थविषयकत्व-प्रामाण्य नहीं कह सकते हैं, अतः द्वितीयकालिक वृतियोंके अमाण न होनेसे उनके अज्ञाननिवर्तक न होनेपर भी कोई हानि नहीं है।

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सावरणानिभय-व्पलपविधार) भापानुवादसहित १७३

पयत्वेऽपि प्रमाणवेद्यत्वोक्तेय। तस्मात् द्वितीयादिवृत्तीनां प्रामाण्याभावात्

है. तयापि वह विवर्णर्मे ममाणावेय वह (प्रगितिका अविपय) कहा गया है। तहत्यगे यह है कि विवरणकारको भी प्रमाका लक्षण अनधिगतत्व- पटिन ही अभिमेत है, अभीत् अनधिगतावामितार्थचिपयक ज्ानत्वरूप प्रमासन अनिमेत है। इसीसि उन्होंने वज्ञानके अनुमितिविषय होनेपर भी उसे पमितिका विषन नी माना, कर्योंकि 'अन्ञोऽम' (मैं अत्ञ है) इस अनुभव- नूप साक्षीने ही अमानकी सिति हुई है, अतः अनुगिति आदिके नातार्थ- िदयक हनिसे उक पहासापरत प्रमास अनुनिति आदिमें नहीं है, अतः ममलमकपिपियत अजानन नहीं आया, कर्योंकि अज्ञानांशम पर्वताघेशके समान अनुमिति अरमाण है। इसी अभिमायसे प्रमाणवेमत्वका विवरणगें कमन है। सावीवुपजानका अज्ञन विषय है, अतः चह प्रमाणवेध है, ऐसा भी नरी कह सकते, क्योंकि नाक्षीरूप ज्ञान तभी प्रमाणनान हो सकता है, ज्म कि क दिसी ममररणसी उत्पन दो, परन्तु वह तो नित्य है, अतः मद्षीन्तवशान प्रमा का अममाफी कोटिमें प्रविष्ट नहीं होता। इसी प्रकार अन्य मनावर्ता्विर्योने भी इपरानकी म्रमात्व और अमगात्वसे रहित ही माना है। अथया साक्षीसे अतिरिक प्रमाणज्ञानसे अवेवत भी प्रमाणाचेद्यत्वका सर्थ से सरना है, इसनिए अग्ञावलघटित ही प्रमाणका लक्षण मानना रोका,] इससे अर्वीव मवानत्पटिन भ्रमालक्षणके न रहनेसे धारावाहिक समरी हलोपकारिक पृणियेोकि प्रामाण्य न होनके कारण उपासनादि वृत्तियोंके समान* उनके अधानके निरव्तक न हीनेपर भी फोई दोप नहीं है, क्योंकि मनाणइुरियां ही अज्ञानकी निवतक होती हैं, पसा स्वीकार किया गया है।

बढलपे अरस्ष नही होगो, औऱ मन तो सानफ बरण नहीं है, इबका विचार लागे किया सगणा इशनए प्पमना्क्षण गमन शदिके समान विवास है, कर्योकि गह पुरुष कृतियाष मै, कतः यद्र अपने उपारसके वतारक अझाना निवारण नदीं करती है। इसी पथाु हूरछ बदि गी मपने िपमरन असानका निवारण नहीं करते हैं। दसी प्रकार-दवतीयादि मातिसां महनद निवार नही दसी है, वर्ो पे भी अधिगतार्थपिषयफ हैं, अतः स्मृतिके

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१७४ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रंथम परिच्छेद

ननु नाज्ञानविच्छित्तिः परोक्षज्ञानतस्ततः । भ्रान्तिजिज्ञासयोर्द्ष्टेरत्र केचित् समादधुः ॥८७॥ परोक्ष ज्ञानसे अज्ञानका विनाश नहीं होता है, क्योंकि परोक्ष ज्ञानके बाद भ्रान्ति और जिज्ञासा होती है, इस शङ्काका कोई लोग निम्नलिखितरूपसे समाधान करते हैं।। ८७ ॥ ननु नाडयमपि नियम:, परोक्षवृत्तेर निर्गमे नाऽज्ञानानिवर्तकत्वादिति चेत्। द्विविधं विपयाज्ञानं साक्षिविक्षेपसङ्गतेः । अर्थगं पौरुषं चेति परोक्षात् पौरुपक्षयः ॥ ८८॥ साक्षीके और विक्षेपके सम्बन्धसे विपयका आवारक अज्ञान दो प्रकारका है- एक विपयमें रहनेवाला और दूसरा पुरुपमें रहनेवाला, इसलिए परोक्षज्ञानसे पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान विनष्ट होता है।। ८८ ।। अत्र केचिदाहु :- द्विविधं विपयाचरकमज्ञानम् । एक विपयाश्रितं रज्ज्वादिविक्षेपोपादानभूत कार्यकल्प्यम्। अन्यत् पुरुपाश्रितम् 'इदमहं न जनामि' इत्यनुभूयमानम्। पुरुपाश्रितस्य विषयसंभिन्नविक्षेपोपादानत्वा सम्भवेन, विपयाश्रितस्य 'इदमहं न जानामि' इति साक्षिरूपप्रकाशसंसर्गा- योगेन द्विविधस्याऽप्यावश्यकत्वात्। एवं च परोक्षस्थले वृत्तेनिर्गमनाभावाद्

अव फिर शक्का करते हैं कि यह भी नियम नहीं है कि प्रत्येक प्रमा अज्ञानकी निवृत्ति करती है, क्योंकि परोक्ष वृत्तिका निर्गम नहीं होता है, अतः वह परोक्षवृत्तिरूप प्रमा अज्ञानकी निवर्तक नहीं हो सकती। [और है तो वह प्रमा अतः 'प्रमामात्रमज्ञाननिवर्तकम्' इस नियममें व्यभिचार है, यह भाव है ]। इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं-विषयको आवरण करने- वाले अज्ञान दो प्रकारके होते हैं-एक तो विषयमें रहनेवाला रज्जु आदिके विक्षेपका (सर्प आदिरूप विवर्तका) उपादानकारणभूत कार्य द्वारा कल्पित अज्ञान और दूसरा 'मैं इसे नहीं जानता हूँ' इस प्रकारसे अनुभूयमान पुरुषमें रहनेवाला अ़ज्ञान। जो पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान है, वह अधिष्ठानभूत रज्जु आदि विषयके साथ तादात्म्यापन्न सर्पादि विक्षेपका उपादान नहीं हो सकता और जो विषयमें रहनेवाला अज्ञान है उसका 'मैं इसे नहीं जानता हूँ' इस प्रकारके साक्षीरूप प्रकाशके साथ सम्बन्ध नहीं है, इसलिए अज्ञानके दो भेद मानने

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आवरणाभिभवस्वरूप-विचार] भापानुवादसहित १७५

दूरस्थवृक्षे आप्वाक्यात् परिमाणविशेपावगमेऽपि तद्विपरीतपरिमाणविक्षेप- दर्शनाच विपयगताज्ञानानिवृत्तावपि पुरुपगताज्ञाननिवृत्तिरस्त्येव। 'शास्त्रार्थ न जानामि' इत्यनुभृताज्ञानस्य तदुपदेशानन्तरं निवृत्यनुभवात्। अत एव 'अनुमेयादौ सुपुपिव्यावृत्तिः' इति विवरणस्य तद्विपयाज्ञाननिवृत्तिरर्थ इत्युक्तं तच्वदीपने इति। अन्ये पारुपमज्ञानमाहु: शक्तिद्वयाश्रयम्। परोक्षज्ञानतस्तन्राऽSवरणांशपरिक्षयम् ॥८९॥ कोई लोग कहते हैं कि पुरुपवृत्ति एक ही अज्ञान आवरण और विक्षेप रूप दो शक्तियोंसे युक्त है, उनमें से परोक्षज्ञानसे आवरणांशका विनाश होता है॥ ८९ ॥

अत्यन्त आवश्यक हैं। दो प्रकारके अज्ञान होनेपर और परोक्षस्थलमें वृत्तिका निर्गम न होनेसे दूर देशमें स्थित वृक्षमें शिष्टके * वाक्यसे परिमाणविशेपका अवगम होनेपर भी उस परिमाणसे विपरीत परिमाणरूप (अल्पपरिमाणरूप) विक्षेप देखा जाता है, अतः विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति न होनेपर मी पुरुपगत अन्ञानकी निवृत्ति होती ही है। क्योंकि 'मैं शास्त्रार्थको + (शास्त्रोक्त अर्थको) नहीं जानता हूँ' इस प्रकार अनुभूत शास्त्रार्थके अज्ञानकी शास्त्रके अर्थके उपदेशके अनन्तर निवृत्ति होती है, ऐसा अनुभव होता है। इसीसे 'अनुमेयादौ सुपुप्तित्यावृत्तिः' इस विवरणका तत्त्वदीपनमें यह अर्थ कहा है कि अनुमेय आदि विपयमं अनुमिति आदि परोक्ष ज्ञानसे (पुरुपगत) अज्ञानकी निवृत्ति होती है। * भाव यह है कि किसी शिष्ट पुरुपने कहा कि दूरस्थ वृक्ष छोटा नहीं है, किन्तु समीपके वृक्षके समान बढ़ा है, इस वाक्यसे जो ज्ञान होगा, वह परोक्ष होगा। उससे यदि चिपयगत अज्ञानकी निवृत्ति मानी जाय, तो विपरीत परिमाणकी जो दूरस्थ वृक्षमें उपलब्धि होती है, वह नहीं दोगी, अतः उससे पुरुपगत अज्ञान ही निवृत्त होता है। + इसका यह भाव है-'मैं शासके अर्थको नहीं जानता हूँ' इस वाक्यसे अनुभूत अज्ञानकी शास्त्राथके उपदेशके अनन्तर 'शास्त्रार्थका अज्ञान अय निवृत्त हुआ' इस प्रकार अज्ञान निवृत्तिका "अनुभव होता है। शासत्रका अर्थ दो प्रकारका है-धर्मरूप और ब्रह्मरूप। धर्मरूप जो शास्त्रका अर्थ है उसमें उपदेशजन्य ज्ञान परोक्ष ही है, अपरोक्ष नहीं है, इसलिए धर्मरूप विषयमें रहनेवाल अज्ञानकी निवृत्तिका प्रसद्ध नहीं है। अतः वहां पुरुपगत अज्ञानकी निधृत्ति होती है, यह कहना होगा। उपदेशजन्य त्रदारूप अर्थमें भी परोक्षज्ञान होता है अन्यथा मनन आदिके विधानकी असफ्ति होगी, वह भी पुरुषगत अज्ञानकी ही निवृत्ति करेगा। अतः परोक्षज्ञान अज्ञानका निचर्तन नहीं करता है, यह कहना असमत है।

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१७६ सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम परिच्छेद

अन्ये तु-नयनपटलवत् पुरुपाश्रितमेवाऽज्ञानं विषयावरणम्। न तदति- रेकेण विषयगताज्ञाने प्रमाणमस्ति। न च पुरुपाश्रितस्य विषयगतविक्षेप परिणामित्वं न सम्भवति। तत्संभवे वा दूरस्थवृक्षपरिमाणे परोक्षज्ञानाद- ज्ञाननिवृत्तौ विपरीतपरिमाणविक्षेपो न सम्भवतीति वाच्यम्, वाचस्पतिमते सर्वस्य प्रपश्चस्य जीवाश्रिताज्ञानविपयीकृतत्रह्ाविवर्तत्वेन तद्वच्छक्तिरजतादेः पुरुषाश्रिताज्ञानविषयीकृतन्रह्मविवर्तत्वोपपत्तेः । परोक्षवृत्या एकावस्थानि- घृत्तावपि अवस्थान्तरेण विपरीतपरिमाणविक्षेपोपपत्तश्रेत्याहुः । कुछ लोग कहते हैं कि जैसे नेत्रमें रहनेवाले पटल (काचादि दोष) विषयको आवृत करते हैं, वैसे ही पुरुषगत अज्ञान ही विषयको आवृत करता है, इससे भिन्न विषयगत अज्ञानमें प्रमाण नहीं है। परन्तु यदि 'एक ही पुरुषगत अज्ञान माना जाय, तो वह विषयगत विक्षेपका परिणामी-उपादान- नहीं होगा। यथा कथंचित् पुरुषगत अज्ञानके विपयगत विक्षेपके उपादान होनेपर भी दूर देशवती वृक्षके परिमाणमें आप्त (सच्च) पुरुषके उपदेशसे जन्य ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उत्पत्ति नहीं होगी' इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि * वाचस्पतिमिश्रके मतमें सम्पूर्ण प्रपञ्च जीवमें रहनेवाली अविद्याके विषय ब्रह्मका विवर्त है, अतः पुरुषगत अज्ञानके विषय ब्रह्मके शुक्ति-रजत आदि विवर्त हो सकते हैं। परोक्ष वृत्तिसे एक अवस्था (आवरण) की निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपरूप अन्य अवस्थासे विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उपपत्ति हो सकती है।

  • तात्पर्य यह है कि यदि शुक्ति-रजत आदि अज्ञानके परिणाम माने जायँ, तो अज्ञानको अवश्य विषयचतन्यगत मानना चाहिए। और वे अज्ञानके परिणाम न माने जायँ, तो अज्ञानको विषयचैतन्यगत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। दार्ष्टान्तिकमे अर्थात् 'पुरुपाश्रित' इत्यादिमें ब्रह्मपद शुक्तयवच्छिन् चैतन्यरूप अथमें प्रयुक है, पूर्ण व्रह्मरूप अर्थमें प्रयुक्त नहीं है। क्योंकि अवच्छिन चैतन्य ही शुकतिरजत आदिका अधिष्ठान है। + जैसे परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति अनुभूत होती है, वैसे ही दूरस्थवृक्षस्थलमें परोक्षज्ञान होनेपर भी विपरीत परिमाणकी उत्पत्ति भी अनुभून होती है, अतः दो अनुभवोंके अधारपर पुरुषवृत्ति अज्ञानका एक देश परोक्षज्ञानसे निवृत्त होता है और अन्य देश अनुवृत्त होता है, ऐसी कल्पनाकी जाती है, दो प्रकारका अज्ञान है, ऐसी कल्पना नहींकी जाती, क्योंकि ऐसा माननेमें गौरव है। वस्तुतस्तु परोक्षज्ञानको अज्ञानका

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आरणाभिगव-स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १७७

विषयस्थं परे मोहं मूलाज्ञानांशरूपकम्। अंशांशिनोरभेदाच साक्षिणा तस्य सङ्गतिम् ॥ ९० ॥ विपयमे रहनेवाला अज्ञान मूलाज्ञानका अंशरूप है, और उसीका साक्षीके साथ सम्बन्न होता है, क्योंकि अंश और अंशीका अभेद होता है, ऐसा भी कोई लोग कदते हैं॥ ९० ॥

विपयगतमेवाऽज्ञानं तदावरणम्। न च तथा सति अज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेण ततः प्रकाशानुपपत्तिः, परोक्षवृत्तिनिवर्त्यत्वासम्भवश्च दोप इति वाच्यम्, अवस्थारूपाज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेऽपि तत्संसृष्टमूलाज्ञानस्यैच 'शुक्तिमहं न

कुछ लोग कहते हैं कि शुक्तिरजत आदि परिणामकी उपपत्तिका सामल्जस्य हो, इसलिए विपयको आवृत्त करके रहनेवाले पटके समान विषयगत ही अज्ञान विपयका भावरण करता है।। विपयावरक अज्ञानके विपयगत होनेपर साक्षीके साथ अज्ञानका सम्बन्ध न होनेसे साक्षीसे अज्ञानका प्रकाश नहीं होगा और परोक्ष वृत्तिका विपयदेशमें गमन न होनेसे उससे उसकी निवृत्ति भी नहीं होगी? नहीं, यह शंक्ा युक्त नहीं है, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानका साक्षीके साथ सम्बन्ध भले ही न हो, परन्तु 'गुक्तिको मैं नहीं जानता हूँ'

निवर्तक माना जाम, तो भी प्रतिबन्धकरहित परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसा ही सीकार फरना चाहिए। प्रकृतमें अरमके अनुरोधसे दूरत्व आदि दोपोंसे प्रतियद्ध दोनेके कारण आपयाक्यजन्य भो ज्ान पुरुपगत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, अतः विपरीत परिमाणकी उपपत्ति और अनुपपलिकी शका नहीं है, यद भाव है। * पूर्वमें अप्रतियद ज्ञानमात्र अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमके अनुसार अव्यभिचारके लिए परोक्षजान अज्ञानका निवर्तक है, ऐसा प्रतिपादन किया गया है। अब 'अपरे तु' अ्रन्थसे 'अप्रतिवद्ध अपरोक्षमान ही अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमका अभीकार करके परोक्षज्ञानमें व्यभिचारश्ाका निरास करते हैं। तात्पर्य यह है कि लोकमें घट आदि मृत्तिकाके परिणामी देखे जाते हैं, इसी प्रकार मुिरजत आदि भो किसीके परिणाम है,ऐसा मानना चाहिए। उनका परमाणी अन्वय और व्यति- रेकसे अज्ञान ही सिद होता है, क्योंकि प्रातिभाषिक शुकिरजतके प्रति शुककि आदि उपादान नहीं दो सकते है, जैमरे युफिद्वारा विपय नैतन्यगत अज्ञान रजत आदि विक्षेपके प्रति उपादान सिद्ध दो सकता है, वैसे पुरपपृत्ति अज्ञान नहीं हो सकता है, इसलिए विपयगत अज्ञान ही अवस्था- रूप है। यथपि पुरुषगत अज्ञान प्रभान्यायसे रजत आदिके प्रति उपादान दो सकता है, तथापि यह युक नहीं है, क्योंकि जैसे मलाजानमें किया नहीं होती है, चैसे ही अवस्थारूप अज्ञानमें भी किया नहीं होती, अतः प्रमान्यायका प्रसा् नहीं हो सकता है।

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१७८ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

जानामि' इति प्रकाशोपपत्तेः। शुक्त्यादेरपि मूलाज्ञानविपयचैतन्याभि- न्नतया तद्विषयत्वानुभवाविरोधात्। विवरणादिपु मूलाज्ञानसाधनप्रसङ्गे एच 'इदमहं न जानामि' इति प्रत्यक्षप्रमाणोपदर्शनाच। 'अहमज्ञ:' इति सामान्यतोऽज्ञानानुभव एव मूला- ज्ञानविपयः । 'शुक्तिमहं न जानामि' इत्यादिविपयविशेपालिङ्गिताज्ञानानु-

सूलाज्ञानस्य साक्षिसंसर्गाद्वा साक्षिविषयचैतन्ययोः वास्तवैक्याद्वा विपयगत- स्याऽप्यवस्थाऽज्ञानस्य साक्षिविपयत्वोपपत्तेः। परीक्षज्ञानस्याऽज्ञानानिवर्त-

इत्यादि अनुभवसे साक्षिसंसष्टमूलाज्ञानका ही प्रकाश होता है। शुक्ति आदिका भी मूलाज्ञानके विषयीभूत चैतन्यके साथ अभेद होनेसे शुक्त्यादिविपयत्वके अनुभवमे विरोध नहीं है। और विवरण आदि अ्न्थोंमें मूलाज्ञानके साधनके प्रसङ्गमे ही 'इदमहं न जानामि' (इसे मैं नहीं जानता हूँ) इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रमाणका उपन्यास भी किया है। * 'मैं अज्ञ हूँ' इस प्रकार सामान्यतः अज्ञानका अनुभव ही मूलाज्ञानका अवगाहन करता है। 'शुक्तिको मैं नहीं जानता हूँ' इत्यादि जो किसी विषयविशेषसे युक्त अज्ञानका अनुभव होता है, वह तो अवस्थारूप अज्ञानका अवगाहन करता है, इस प्रकार विशेषका यदि स्वीकार किया जाय, तो भी अवस्था और अवस्था- वान्का तादात्म्य होनेके कारण मूलाज्ञानका साक्षीके साथ साक्षात् सम्बन्ध होनेसे अथवा साक्षिचैतन्य और विषयचैतन्यका वस्तुतः ऐक्य होनेसे विषयगत अज्ञानमें भी साक्षात् साक्षीके विषयत्वकी उपपत्ति हो सकती है। यद्यपि परोक्ष-

  • 'अहमज्ञः' यही अनुभव सामान्य मूलाज्ञानका साधक है और 'शुकि न जानामि' (मैं शुकि नहीं जानता हूँ) इत्यादि अनुभव अवस्थारूप अज्ञानका ही साधक है, विवरणकारने 'शुकि न जानामि' इत्यादि प्रतीति मूलाज्ञानके साधक प्रकरणम कही है, अतः वह मूलाज्ञानका साधन करती है अवस्थारूप अज्ञानका साधन नहीं करती, यह नहीं कह सकते, क्योंकि शुक्तिरजत आदि परिणामकी उपपत्तिक लिए अवस्थारूप अज्ञानकी सिद्धिकी अपेक्षा होनेसे मूलाज्ञानके साधनप्रकरणमें भी उसका प्रसन्ग है। इससे 'शुर्कि न जानामि' इत्यादि अनुभवोंके मूलाज्ञानविषय कत्वमें प्रमाण न होनेसे विषयगत अवस्थारूप अज्ञानकी सिद्धि होगी, इस परिस्थितिमें उसका साक्षीके साथ सम्बन्ध न होनेसे उसका अनुभव नहीं हो सकता, इस आशयवाली शङ्गाका अनुवाद करते हैं, 'अहमज्ञः' इत्यादि ग्रन्थसे।

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आवरणाभिभव-स्वरूपविचारं] भीपानुवादसहितं १७९

ननुभवनिवन्धनभ्रान्तित्वोपपचे: अपरोक्षज्ञानस्यैवाजज्ञान निर्व्तकत्वनियमा- भ्युपगमादित्याहुः । सुखादिगोचरा वृत्तिर्ननु नाऽज्ञानातिनी। मैवम्, मोहसुखादीनां साक्षिवेद्यत्वनिर्णयात् ।।९१। मुख आदिको विषय करनेवाली वृत्ति अज्ञानकी निवृत्ति नहीं करती इस प्रकार शक्ा नहीं कर सकते, क्योंकि अज्ञान, मुख आदिमे केवल साक्षीविद्यत्वका ही निर्णय किया गया है, अतः वृत्तिरूप अपरोक्ष ज्ञान अवश्य अज्ञानका निवारण करता है॥ ९१ ॥ ननु नाडयमपि नियम:, अविद्याडहङ्कारसुखदुःखादितद्वर्म्रत्यक्षस्याङ- ज्ञाननिवर्तकत्वानभ्युपगमादिति चेत्, न; अविद्यादिप्रत्यक्षस्य साक्षि-

क: साक्षी १ तत्र कूटस्थदीपे कूटस्थचित् स्वयम्। स्वाध्यस्तदेहयुग्मादेः साक्षीति पतिपादितः ॥९२॥

साक्षी कौन है? इस प्रदनके उत्तरमें कूटत्थदीपमं प्रतिपादन किया गया है कि स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अधिष्ठानभूत कूटस्थचैतन्य ही स्वयं साक्षी है॥ ९२ ॥

ज्ञान अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तथापि परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्तिका जो अनुभव होता है, वह, सत्तानिश्चयरूप परोक्ष वृत्ति जो प्रतिवन्धक है उससे प्रयुक्त अज्ञानका अनुमव न होनेसे, आ्रान्तिमात्र है, अतः अपरोक्ष ज्ञान ही सज्ञानका निवर्तक है, ऐसा नियम ही स्वीकार किया गया है। फोई लोग शक्ा करते हैं कि अविद्या, अहक्वार, सुख, दुःख आदि अहकारके वर्मोंका प्रत्यक्ष अज्ञानका निवर्तक नहीं माना गया है, अतः अप्रति- बद्दू अपरोक्षज्ञानमात्र अज्ञानका निवर्तक है, यह नियम भी नहीं वन सकता है, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि वृत्तिरूप अपरोक्षज्ञान अज्ञानावरणका निवर्तक है, ऐसा नियम है और अविद्या आदिका प्रत्यक्ष साक्षीरूप है, अतः उक्त नियममें कोई व्याघात नहीं है।। १३ ।।

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१८० सिद्धान्तलेशसंग्रहं [प्रथम परिच्छेद

अथ कोडयं साक्षी जीवातिरेकेण व्यवहियते? अत्रोक्तं कूटस्थदीपे-देहद्याविष्ठानभृतं कूटस्थचैतन्यं स्वावच्छेद- कस्य देहद्वयस्य साक्षादीक्षणान्निविकारत्वाच् साक्षीत्युच्यते। लोकेऽपि हयौदासीन्यवोधाभ्यामेव साक्षित्वं प्रसिद्धम् । यद्यपि जीवस्य वृत्तयः सन्ति देहद्वयभासिकाः, तथाऽपि सर्वतः प्रसृतेन स्वावच्छिनेन कूटस्थ-

अब शङ्का करते हैं कि जीवभिन्न जो साक्षीका व्यवहार किया जाता है, वह कौन है? [ तात्पर्य यह है कि सुख आदिके धर्मी अहक्कार साक्षि- प्रत्यक्षका विषय कहा गया है, इससे यह प्रतीत होता है कि जीवभिन्न कोई साक्षी है, क्योंकि सुख आदिके धर्मी अहद्कारमें जीवत्वकी ही प्रसिद्धि है। इसलिए जीवभिन्न साक्षीमें कोई प्रमाण न होनेसे उसका स्वीकार अयुक्त है ]। इस शङ्ाके समाधानमें कूटस्थदीपमें कहा गया है कि स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अधिष्ठानभूत कूटस्थ चैतन्य अपने अवच्छेदक उक्त दो शरीरोंका साक्षात् द्रष्टा है और कर्तृत्व आादि विकारोंसे शून्य है, अतः वह साक्षी कहा जाता है, लोकमें भी औदासीन्य और ज्ञानसे ही साक्षित्व प्रसिद्ध है अर्थात् लोकमें वही साक्षी होता है, जो उदासीन और ज्ञाता होता है। [ इसी प्रकार प्रकृतमें भी साक्षी उदासीन और द्रष्टा ही सिद्ध होता है, यह भाव है ]। यद्यपि दोनों शरीरोंका अवभास करनेवाली जीवकी-अन्तःकरणकी-वृत्तियां हैं, अतः उन्हींसे काम चलेगा, * तथापि सर्वत्र व्यापक देहद्वयावच्छिन्न

  • 'साक्षात् द्रष्टरि संज्ञायाम्' इस सूत्से द्रष्ट अर्थमें साक्षात्शब्दसे इनि प्रत्यय करके साक्षी शब्द वना है। साक्षीका लक्षण भी वोद्धा होकर जो उदासीन हो अर्थात् 'द्रष्टत्वे सति उदासीनत्वं साक्षित्वम्' यही होता है। लोकमें दो आदमियोंमें जहाँ झगड़ा होता है, वहाँ साक्षी वही वन सकता है, जो उनके विवादका द्रष्टा हो और स्वयं उदासीन हो। केवल उदासीनत्व भी साक्षीका लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि समीपवर्ती स्तम्भ आदि अनेक उदासीन हैं, अतः उनमें साक्षीका उक्त लक्षण चला जायगा, यदि केवल द्रश्टृत्न साक्षीका लक्षण कहा जाय .. तो झगढ़ा करनेवाला भी द्रष्टा है, लेकिन वह साक्षी नहीं होता है, अतः कथित लक्षण ही युक है। * शङ्ठाका तात्पर्य यह है कि जीवसे अतिरिक स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अवभासक नित्यसाक्षिचतन्य क्यों माना जाता है? क्योंकि उक्त देहद्वयका अवभास तो प्रकाशरूप अन्त :- करणकी धृत्तियोंसे भी हो सकता है, इसी भावसे 'यद्यपि' इत्यादिसे शक्का की गई है, जीव शब्दका अर्थ अन्तःकरण है। इसपर कहते हैं कि साक्षीके विना स्थूल सूक्षम शरीरका

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सक्षि -स्वरूपविचार ] भापांनुवादसहित १८१

चैतन्येन ईपत् सदा भास्यमेव देहद्वयं जीवचैंतन्यस्वरूपग्रतिविम्बगर्भादन्त :- करणाद् विच्छिद्य विच्छिद्योद्गच्छद्धिर्वृत्तिज्ञा न र्ास्ा ते । अ्ताल ा ले तु सह वृत्यभावैः कृटस्थचैतन्येनैच भास्यते। अत एवाऽहंकारादीनां सर्वदा प्रकाशसंसर्गाद संशयाद्यगोचरत्वम्। अन्यज्ञानधाराकालीनाSहंकारस्य 'एता- चन्तं कालमिद्महं पश्यन्नेवाऽSसम्' इत्यनुसन्धानं च। न च कूटस्थप्रकाशिते

कूटस्थ चैतन्य द्वारा साधारणरूपसे सदा भासमान ही उभय-स्थूल और सूक्ष्म -- शरीर जीवचेतन्य-रूप प्रतिविम्ब्रसे युक्त अन्तःकरणसे-विच्छिन्न विच्छिन्न होकर कुछ कालके अनन्तर-निकलनेवाली वृत्तियोंसे स्पष्ट भासते हैं। अन्तरालकालमें अर्थात् कुछ-कुछ समयक व्यवधानसे होनेवाली वृत्तियोंके मध्य कालमें तो वृत्तिध्वंसोंके साथ कटस्थ नैंतन्यसे ही दोनों देह भासते हैं। इसीलिए अहकवार आदिका प्रकाशके साथ सर्वदा सग्बन्ध होनेसे संशय + आदिकी विपयता उनमें नहीं आती है। और अन्य धारावाटिक ज्ञानकालिक 'अहम्' अर्थका-'इतने समय तक मैं इसे देखता ही रद्दा' इस प्रकार-स्मरण भी उपपन्न होता है। यदि अहमर्थ और

अनमाछ नहीं होगा, प्नोंकि दीप आदिके समान वृक्तियों के प्रकाशात्मक होनेपर भी वे स्वतः जद ै, अतः मे स्यूल और सूक्षम देदफो प्रकाशित करनेमें असमर्थ हैं। अतः साक्षिचैतन्य मानना बादिए। दूगरी बात यद दे कि पृत्ियों के मध्यकालमें शरीरयका अस्सष भान होता है, और ववक अनन्तर में हमूल ह' और "मैं कर्ता है' इत्यादिकपसे स्पट भान होता है। इसलिए अध्पद मानकी उपपतिके लिए पृतिक्ञानये अतिरिक याक्षी अवश्य मानना चाहिए। किय, गरि गाक्षो न माना जाय, तो प्री उतप्ति और मृत्तिका विनाश जो प्रत्यक्षरूपसे भासते है, उनका मान नहीं होगा, क्योंकि अपनेसे अपना विनाश और उत्पत्ति नहीं देसी जाती है। दपये भी गाशिवेतन्य अपेकित है। हैं वहत्पर नद ह कि जैसे पट आदिमें अधिक प्रफाश आदिके सम्बन्धसे संशय आदि नहीं होते, पैमे ही भै हं या नहीं 'मीं जीता हूँ या नहीं' इय प्रकार अदछार आदिका अस्तित्व-संशय वियोसो नहीं होता है और म्रदा अपरोक भान दोता है, इसलिए नित्य प्रकाशके साथ उसका सम्बन्ध है. देया मानना नादिए, मद प्रकाश साक्षी दी ै, गद भाव है। * जय भगवान रामनन्द्ररी नूर्षिका दोर्घफाल तक ध्यान करते दै, उमर समयमें मृर्ति- विशय् मृदियोंकी भारा मलती है, इम धाराके गमयमे अद्मर्थका और तद्ोचर नृत्तियोंका राःहालजन्यानुमन न दोनेसे तहिपयर संस्कार नदीं होंगे। इससे उत्तरकालमें अह्दमर्थका स्मरण नदीं दोगा, दसरलिए अन्य धाराकालीन अहंकारका वाक्षीरपसे अनुसन्धान होता है, अतः शाश्री मानना नादिए। यदि माराकालमें जन्यानुभव माना जाय, तो धाराके विच्छेदका प्रसभ आांषगा, यह भाव हे।

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१८२ सिद्धान्तलेश संग्रह प्रंथंम परिच्छेद

कथ जीवस्य व्यवहारस्मृत्यादिकमिति शङ््यम्, अन्योऽन्याध्यासेन जीवकत्वापच्या कूटस्थस्य जीवान्तरङ्गत्वाद। न च जीवचैतन्यमेव साक्षी भवतु, कि कूटस्थेनेति वाच्यम्, लौकिकवैदिकव्यवहारकर्तुस्तस्योदासीन- द्रष्टृ्त्वासम्भवेन 'साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्र' इति अत्युक्तसाक्षित्वा- योगात्। 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वच्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' इति कर्मफलभोक्तुर्जीवादुदासीनप्रकाशरूपस्य साक्षिणः पृथगाम्नानाचेति। उक्तो नाटकदीपेडसौ नृत्यशालास्थदीपवत्। नेशो जीवोऽप्यसौ तत्त्वदीपे ब्रह्मेति वर्णनात् ॥९३।। नृत्यशालामें विद्यमान दीपके समान साक्षी जीव और ईश्वरसे विलक्षण है, ऐसा नाटकदीपमें कहा गया है और तत्वदीपमें भी शुद्ध ब्रह्म ही साक्षी कहा गया है।। ९३ ॥।

दर्शितः । तथा हि- नाटकदीपेऽपि नृत्यशालास्थदीपद्ृष्टान्तेन साक्षी जीवाद्विविच्य

वृत्ति आदिका अनुभव साक्षीको ही होता है, तो जीवके व्यवहार और स्मरण क्यों होते हैं, क्योंकि अन्यसे अनुभूत वस्तुका अन्यको स्मरण नहीं हो सकता है? यह शक्का यद्यपि हो सकती है, तथापि अयुक्त है, क्योंकि अन्योऽन्य तादात्म्यके अध्याससे कूटस्थके साथ ऐक्य होनेके कारण कूटस्थ जीवका अत्यन्त अन्तरङ्क है। यदि शङ्का की जाय कि जीवचैतन्य ही साक्षी हो, कूटस्थ चैतन्य- रूप अतिरिक्त साक्षीको माननेकी क्या आवश्यकतां है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि लौकिकव्यवहार और वैदिकव्यवहारको अविरतरूपसे करनेवाले जीवा- त्मामें औदासीन्य और द्रष्टत्त्वके न रहनेसे 'साक्षी०' (बोद्धा, उदासीन और गुणरहित चैतन्य साक्षी है) इस श्रुति द्वारा प्रतिपादित साक्षित्वकी उपपत्ति ही नहीं हो सकती है और 'तयोरन्य:' (जीव और कूटस्थ चतन्योंमें से कूटस्थ- भिन्न जीव कर्मफलका भोग करता है और अन्य-कूटस्थ नहीं खाता हुआ वुद्धि आदिके साक्षीरूपसे अपरोक्षतया प्रकाशित होता है।) इस श्रतिसे कर्म- फलभोक्ता जीवसे पृथक उदासीन प्रकाशरूप साक्षीका प्रतिपादन भी है। नाटकदीपमें भी नृत्यशालामें स्थित प्रदीपके दष्टान्तसे जीवसे अतिरिक्त साक्षी- की सिद्धि की है, जैसे-'नृत्यशालास्थितो दीप:०' (जैसे एकरूपसे स्थित नृत्यशालास्थ दीप स्वामी, सभ्य और नर्तकी आदिको सामानरूपसे ही प्रकाशित करता है, प्रभुके (नृत्य करानेवाले अर्थात् नृत्यके अभिमानीके)

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साक्षि स्वरूपविचार ] भापानुवादसहित १८३

नृत्यशालास्थितो दीपः प्रभुं सभ्यांश्र नर्तकीम्। दीपयेदविशेपेण तदभावेऽपि दीप्यते ।।११।। तथा चिदाभासविशिष्टाऽहंकाररूपं जीवं विपयभोगसाकल्यचैकल्याभि- मानप्रयुक्तहर्पविपादवच्वात् नृत्याऽभिमानिप्रभुतुल्यम्, तत्परिसरवर्तित्वेऽपि तद्राहित्यात् सभ्यपुरुपतुल्यान् विपयान्, नानाविधविकारवत्तित्वान्नर्तकी- तुल्यां धियं च दीपयन् सुपुप्त्यादाहंकाराद्यभावेऽपि दीप्यमान: चिदा- - जीवाद्विेचितोडयं साक्षी न त्रह्मकोटिरपि, किन्तु अस्प्ृष्टजीवेश्वरविभागं चैतन्यमित्युक्तं कूटस्थदीपे।

प्रफाशमें बड़ा रुप, सभ्योंके प्रकाशमं मध्यम स्वरूप और नर्तकी आदिके प्रकाश़में निकृष्ट स्वरूपको धारण नहीं करता और स्वामी आदिके अभावमें भी स्वयं प्रकाशित रहता है, वैसे अहक्कार प्रभु है, विषय सभ्य हैं और बुद्धि नर्तकी है-इनका साक्षी प्रकाश करता है और इनके अभावमें भी स्वयं प्रकाशित रहता है)। इसी दष्टान्तके अनुसार चैतन्यके आभाससे युक्त अद्ह्वाररूप जीव विषयभोगकी समग्रता और असगग्रताके अभिमानसे हर्प या विपादयुक्त होता है, इसलिए जीव नृत्यागिमानी स्वामीके समान है, यद्यपि जीवके परिसरवर्ती विषय हैं, तथापि स्वागीकी समानताके साधक हर्प, विपाद आदिके नहीं रद्दनेसे वे सभ्यपुरुपके समान ही हैं। अनेक प्रकारके विकारोंसे युक्त होनेसे बुद्धि नर्तकीके समान ही है। और जैसे ताल आदि देनेवाले पुरुप नर्तकीका अनुसरण करते हैं, वसे ही इन्द्रियाँ भी वुद्धिका ही अनुसरण करती हैं, अतः वे ताल आदिधारी पुरुषके तुल्य हैं-इन सभीको प्रकाशित करता हुआ सुपुप्ति आदिमें अदकार आदिके न रहनेपर भी स्वयं प्रकाशित होनेवाला चिदाभासविशिष्ट अदक्वाररूप जीवके अ्रमका अधिष्ठानभूत कूटस्थ चतन्यरूप आत्मा साक्षी है। इसी प्रकार जीवसे पृथकरूपसे प्रतिपादित यह साक्षी नाकोटिमें भी प्रविष्ट नहीं होता है, किन्तु जीव और ईश्वरके विभागका आश्रय न करता हुआ चैतन्य ही है, ऐसा कृटस्थदीपमें कहा गया है।

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१८४ सिद्धान्त लेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

तच्वप्रदीपिकायामपि मायाशवलिते सगुणे परमेश्वरे 'केवलो निर्गुणः' इति विशेषणानुपपत्तेः सर्वप्रत्या्भूतं विशुद्धं न्रह्म जीवाभेदेन साक्षीति प्रतिपद्यते इत्युदितम्। ईशस्य रूपमेदोऽसौ कारणत्वादिवर्जितः । जीवान्तरङ्ग: कौमुदयां प्राज्ञाख्यः परिकीर्तित: ॥९४। कारणत्व आदि धर्मोंसे रित इंश्वरका स्वरूपविशेप, जीवका अत्यन्त अन्तरभ्त, प्राज् नामका साक्षी है, ऐसा कौसुदीमें प्रतिपादन किया गया है॥ ९४ ॥ कौमुद्यान्तु- एको देवः सर्वभ्ृतेपु गूढः सर्वव्यापी सर्वभृतान्तरात्मा। कर्माध्यक्ष: सर्वभूताघिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च। इति

तत्त्वप्रदीपिकामें कहा गया है कि सम्पूर्ण अन्तःकरणमें प्रतिविम्वित चैतन्यात्मक जीवोंके अधिष्ठानरूपसे अत्यन्त अन्तरङ्ग स्वरूपभूत, जीवत्व, ईश्वरत्व आदि धर्मोंसे रहित और तत्-तत् जीवोंका अधिष्ठान होनेसे उन-उन जीवोंके साथ (ब्रह्मका) तादातम्य होनेके कारण प्रत्येक शरीरमें भेदको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही साक्षी है, ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि मायोपहित सगुण परमेश्वरमे 'केवलो निर्गुणश्च' (शुद्ध और गुणरहित) इत्यादि विशेषणकी उपपत्ति नहीं हो सकती है। [ तात्पर्य यह है कि पूर्वके ग्रन्थमें जीव और ईश्वरसे विलक्षण साक्षी है, ऐसा कहा गया है, क्योंकि यद्यपि उसका जीवकोटिमें अन्तर्भाव किया जाय, तो वह उदासीन नहीं होगा और ईश्वरमें अन्तर्भाव किया जाय तो भी उदासीन नहीं होगा, क्योंकि ईश्वर जगत् आदिके करनेमें व्यापृत है, अतः वह उदासीन नहीं हो सकता, इससे इन दोनोंसे उसे पृथक् मानना चाहिए, इसमें तत्त्वप्रदीपिकाकार चित्सुखाचार्यकी भी सम्मति है, क्योंकि उन्होंने भी जीव और ईश्वरसे रहित शुद्ध चिदात्माको ही साक्षी माना है ]। कौमुदीमें तो कहा है कि- 'एको देव:०' (परमात्मा एक है, सब भूतोंमें गूढ है, आकाशके समान व्यापी है, ब्रह्मसे लेकर स्तम्वपर्य्यन्त सव भूतोंका अन्तरात्मा है, जीवकृत- कर्मोंका साक्षी है, सव भूतोंका अिष्ठान है, जीवोंका भी साक्षी है, वोद्धा, शुद्ध और निर्गुण है) इस देवत्व आदिकी प्रतिपादक श्रुतिसे परमेश्वरका ही

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साक्षीका स्वरूप-विचार] भापानुवादसहित १८५

देवत्वादिश्रुतेः परमेश्वरस्पैव रूपभेद: कथ्षिजीवप्रवृत्तिनिवृत्योरतुमन्ता स्व्रयमुदासीनः साक्षी नाम। स च कारणत्वादिधर्मानास्पदत्वाद् अपरोक्षो जीवगतमज्ञानाद्यवभासयंत्व जीवस्याऽन्तरङ्ग। सुपुप्त्यादौ च कार्यकारणो परमे जीवगताज्ञानमात्रस्य व्यजक: प्राज्ञशन्दितः । 'तद्था प्रियया खिया सम्परिप्वक्तो न वाहं किंचन वेद नान्तरमेव- मेवाडयं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिप्वक्तो न वाह्यं किंचन वेद नान्तरम्' 'प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारढ उत्सर्जन्याति' इति श्रुतिवाक्याम्यां सुपुप्त्युत्क्रा- न्त्यवस्थयोरजीवभेदेन प्रतिपादितः परमेश्वर इति सुपुप्त्युत्क्रान्त्यधिकरण-

कोरई स्वरूपविशेष साक्षी है, जो जीवकी प्रवृत्ति और निवृत्तिका सर्वदा जानने- वाला और स्वतः उदासीन है। ईश्वरका स्वरूपविशेष होनेपर भी वह कारणत आदि धर्मोंके न रहनेसे अपरोक्ष है और जीवगत अज्ञान आदिका अवभासक दोनेसे जीवका अत्यन्त अन्तरत्न भी है। सुपुप्ति आदिमें अन्तःकरण और अन्तःकारणकी वृत्तिका उपशम होनेसे जीवगत अज्ञान मात्रका ही व्यञ्ञक है, अतः पाजशव्दसे भी साक्षी कहा जाता है। [ तात्पर्य यह है कि यदि ईश्वरका स्वरूप साक्षी हे, तो उसका प्रत्यक्ष जीवको नहीं होना चाहिये, क्योंकि ईशवरके सर्वज्ञत्व आदि धर्म जीवके प्रति प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं। साक्षीका अपरोक्षावभास नहीं होता है, यह भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि साक्षी अन्तःकरण, अज्ञान आदिफा अनुभवरूप है, इसपर कौमुदीकारने कहा कि यद्यपि साक्षी ईश्वरका ही स्वरूपविशेष है, तथापि उसमें जीवके प्रत्यक्षके अयोग्य सर्वज्ञत्व, कारणत्व आदि धमोंके न रहनेसे उसके अपरोक्ष अवभासमें कोई विरोध नहीं है; ]। 'तद्था' (जिसे मिय अम्ासे आलिक्ित पुरुष वाह-मार्ग आदिके वृत्तान्तको और आन्तर-गृद्दकृत्यको नहीं जानता है, वैसे ही सुपुप्िमें उपाधिके चिलयसे परमात्माके साथ एकीभावको प्राप्त हुआ जीव वाह जगत्रूप प्रपश्चको और आन्तर स्वम-प्रप्को नहीं जानता है), 'प्राज्ञेन०' (प्राज्ञ आत्मासे अधिष्ठित जीव वेदनासे शव्द करता हुआ शरीरसे बाहर निकलता है) इन दो श्रुतिवाक्योंसे 'मुपुप्ति और उत्कान्ति (अन्यत्र गमन) में जीवसे पृथक् परमेशवरका प्रतिपादन किया है, इस प्रकारका जो * सुपुप्त्युत्क्ान्तिके अधिकरणमें 2 एम अधिकरणफा सन है-'मपुप्सुत्कान्त्गोर्भेदेन'। सुपुत्ति और उत्कान्तिमें जीवसे भिन्न

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१८६ सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम परिच्छेद

(उ० मी० अ० १ पा० ३ अधि० १४ सू० ४२) निर्णयोऽपि साक्षिपर इत्युपचर्णितम्। शुक्तीदमंशवदसौ तत्वशुद्धौ च वणितः। जैसे शुक्तिका 'इदम्' अंश प्रातिभासिकरूपसे रजतकोटिमें प्रविष्ट भासता है, वैसे ही ब्रह्मकोटिमें प्रविष्ट भी साक्षी प्रातिभासिकरूपसे जीवकोटिमें प्रविष्ट भासता है, ऐसा तत्त्वशुद्धिकारका मत है। तच्वशुद्धावपि यथा 'इदं रजतम्' इति भ्रमस्थले वस्तुतः शुक्तिको-

प्रतिपादित निर्णय है वह भी साक्षिपरक ही है, ऐसा वर्णन (कौमुदीमें) किया गया है। तत्त्वशुद्धिमें भी-जैसे 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस प्रकारके भ्रम- स्थलमें वस्तुतः 'इदम्' अंश शुक्तिकोटिमें यद्यपि अन्तभूत है, तो भी प्रतिभास

ईश्वरका प्रतिपादन होनेसे परमेश्वरका ही ग्रहण करना चाहिए, संसारी जीवका नहीं, यह उक्क सूत्रका अक्षरार्थ है। तात्परय यह है कि 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः' (आत्मा कौन है ? जो विज्ञानमय है, वह आत्मा है) इत्यादि अनेक वाक्य वृहदारण्यकके पष्ठ अध्यायमें उपलब्ध होते हैं, वे क्या जीवके कथनमें पर्य्यवसतित है या ईश्वरके वोधनमें पर्यवसन्न है? इस प्रकारके संशयमें पूर्वपक्ष प्राप्त होता है कि वे जीवके अनु- वादमें अपना तात्पर्य रखते हैं, क्योंकि 'योऽयं विज्ञानमयः' इत्यादि उपकम, उपसहार आदि संसारी जीवके प्रतिपादनमें ही कटिवद्ध हैं। इसपर सिद्धान्तीका कहना है कि वृहदा- रण्यकका षष्ट प्रपाठक जीवका अनुवाद नहीं करता है, परन्तु परमेश्वरका ही वोध करता है, कारण कि 'तद्यथा प्रियया' इत्यादि वाक्य सुपुप्ति और उत्क्रान्तिमें जीवसे भिन्न परमेश्वरका तृतीयाविभक्त्यन्त प्राज्ञशब्दसे प्रतिपादन करते हैं, और ऐसा इसलिए प्रतिपादन किया जाता है कि लोकसिद्ध जीवका ईश्वरके साथ अभेदप्रतिपादन हो। 'स वा एप महानज आत्मा' (वद व्यापक, नित्य, आत्मा है) इस प्रकारके वाक्यशेषमें साक्षात् ईश्वरका ही स्वरूप वतलाया गया है, अतः उपक्रम, और उपसंहारके आधारपर वृहदारण्यकीय पष्ठ प्रपाठकस्थ आत्मपरक यावत् श्रतिवाक्योंमें जीवातिरिक्त ईशवरका ही जीवानुवादसे तदभिन्नताके लिए प्रतिपादन किया गया है, यह उक्त सुषुप्त्युत्कान्त्यधिकरणका निर्णय है। परन्तु इससे उदासीन, ईश्वरस्वरूप साक्षीकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि इस प्रकरणमें 'एष भूताधिपतिः, एप सर्वेश्वरः' इत्यादि ग्रन्थसे सर्वेश्वरत्व इत्यादि गुणोंका कथन है। इस प्रश्नका उत्तर यह है कि ज्ञेय ब्रह्मके प्रकरणमें सर्वेश्वरत्व आदि गुणोंके प्रतिपादक वाक्य स्तुतिपरक हैं, अतः सर्वेश्वरत्व आदिके प्रतिपादनमें उनका तात्पर्य न होनेसे उदासीन साक्षीकी सिद्धि होती है।

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साक्षीका स्वरूपं-विचारं ] भापानुवादसहित فےف

ट्यन्तर्गतोऽपीदमंशः प्रतिभासतो रजतकोटिः, तथा ब्रह्माकोटिरेव साक्षी प्रतिभासतो जीवकोटिरिति जीवस्य मुखादिव्यवहारे तस्योपयोग इत्युक्त्वाडयमेव पक्ष: समर्थितः ।

अज्ञानोपहितः केश्रित्-

फोई लोग कहते हैं कि अविद्यारूप उपाधिसे उपहित जीव ही साक्षी है।

केचितु-अविद्योपाघिको जीव एव साक्षाद् द्रष्ट्ृत्वात् साक्षी। लोकेऽपि हकर्तृत्वे सति द्रष्टृत्वं साक्षित्वं प्रसिद्धम्। तच्चाऽसद्गोदासीन-

रूपसे रजतकोटिमें प्रविष्ट है, वैसे ही यद्यपि वस्तुतः ब्रह्मकोटिमें ही साक्षीका अन्तर्भाव है, तथापि प्रतिभाससे जीवकोटिमं प्रविष्ट है, अतः जीवके सुख आदि व्यवहारमें उपयोग है, ऐसा कहकर-इसी कौमुदीकारके मतका समर्थन किया गया है। [तात्पर्यार्थ यह है कि यदपि 'इदं रजतम्' इस अममें रजतके अमेदरूपसे इदमंशका प्रतिभास होता है, तथापि उसका रजतकोटिमें अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि 'नेदं रजतम्' इस वाधक ज्ञानसे रजतका केवल बाध होता है, इदमंशका नहीं। और शुक्ति-अंशर्में भी उसका अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे, जैसे शुक्ति अज्ञात है, घैसे ही 'इदम्' अंशम भी अज्ञातत्व प्रसक्त हो जायगा, इसलिए यह मानना आवश्यक है कि वस्तुस्थितिमं इदमंश शुक्तिरूप है और प्रातिभासिक- रूपसे रजतसे अभिन्न है। बस, इसी युक्तिके अनुसार साक्षीस्थलमें भी वस्तुतः साक्षी ईश्वरस्वरूप है और 'अहं सुखमनुभवामि' (मैं सुखका अनुभव करता हूँ) इत्यादि प्रतिभास होनेसे कल्पित तत्-तत् जीवोंके अधिष्ठानरूप सुख आदि- का अनुभवकर्ता साक्षी जीवसे अभिन्नरूपसा ज्ञात होता है। अतः जीवके सुख -आदि के व्यवहारमें सुख आदिके अनुभवकर्ता साक्षीका उपयोग है, इस प्रकार तत्त्शुद्धिमें कहकर इसी कोमुदीके पक्षका समर्थन किया गया है ]। कुछ लोग कहते हैं कि अविद्यासे उपहित-अविद्याप्रतिविम्बित-चैतन्यरूप जीव- ही साक्षात् द्रष्टा होनेसे साक्षी है, क्योंकि लोकमं भी यही प्रसिद्धि है-कर्ता न होकर जो द्रष्ट होता है, वही साक्षी कहलाता है, इस प्रकार साक्षीका लक्षण

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१८८ सिद्धान्तलेश संग्रेह [ प्रथम परिच्छेद

प्रकाशरूपे जीवे एव साक्षात् सम्भवति, जीवस्याऽन्तःकरणतादात्म्यापत्या कर्तृत्वाद्यारोपभाक्त्वेऽपि स्व्यमुदासीनत्वात्। 'एको देवः' इति मन्त्रस्तु ब्रह्मणो जीवभावाभिप्रायेण साक्षित्वप्रतिपादकः । 'द्वा सुपणा' इति मन्त्रः गुहाधिकरणन्यायेन (उ० मी० अ० १ पा०२ अधि ३ सू० ११) असङ्ग, उदासीन और प्रकाशरूप जीवमें ही साक्षात् * घट सकता है, कारण कि अन्तःकरणके तादात्म्यसे जीवमें कर्तृत्व आदि धर्मोंका आरोप होता है, तो भी स्वयं उदासीन है। 'एको देव:० यह मन्त्र ब्रह्ममें जीवभावके अभिप्रायसे ही साक्षित्वका प्रतिपादन + करता है। गुहाधिकरणके न्यायसे # भाव यह है कि जव अविद्याप्रतिविम्वित चैतन्यरूप जीवमें ही साक्षित्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो फिर उससे अतिरिक् साक्षी माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यदि इसपर भी अतिरिक साक्षी माननेकी जबरदस्ती की जाय, तो केवल गौरवके सिवा और कुछ हाथ न लगेगा। और जीव वास्तविकमें उदासीन ही है, परन्तु बुद्धितादात्म्यापन्न होनेसे उसमें औपचारिक कर्तृत्व आदि है, वस्तुतः नहीं, अतः उसे साक्षी स्वीकार करनेमें आपत्ति नहीं है। * तात्पर्य यह है कि यदि जीव ही पूर्वोंक रीतिसे साक्षी माना जाय, तो 'एको देवः' इत्यादि मन्त्रके साथ, जो कि जीवातिरिकक उदासीन साक्षीका प्रतिपादन करता है, अवश्य विरोध होगा। इसपर जीवमें साक्षित्वका प्रतिपादन करनेवाले कहते हैं कि नहीं, विरोध नहीं होगा, क्योंकि यह भी मन्त्र जीवमें ही साक्षित्वका प्रतिपादन करता है, उससे भिन्नमें नहीं। भाव यह है-यह बार वार कहा गया है कि जो साक्षी है वह जीवका अपरोक्ष है, यदि इश्वरको साक्षी माना जाय, तो वह जीवका अपरोक्ष नहीं होगा, क्योंकि प्रतिविम्व और विम्बरूपसे जीव और ईश्वरका औपाधिक भेद होनेके कारण जीवके प्रति जीवान्तरके स्रमान (अर्थात् जसे यज्ञदत्तजीव विष्णुमिन्रजीवका अपरोक्ष नहीं कर सकता है, वैसे) इश्वरका भी अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं हो सकेगा, इससे जीवभावापन्न व्रह्म ही अपरोक्ष होनेसे साक्षी है, यह 'एको देवः' इत्यादि मन्त्रके साक्षीका प्रतिपादन करनेवाले अंशका भाव है। यहाँ शङ्ा करनेवालेका तात्पर्य यह है कि जैसे 'गुदं प्रविष्टो' यह मन्त्र जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिपादन करता है, वैसे ही 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र भी जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिपादन करता है, यह (ब्रह्मसूत्रके) भाष्यमें कहा गया है। इस अवस्थामें 'द्वा सुपर्णो' इस मन्न्रमें 'तयोरन्यः पिप्पलम्' यह वाक्य भी जीवपरक ही होगा 'अनश्नन्' -- इत्यादि वाक्य ईश्वरपरक होगा, यह ज्ञात होता है, ऐसी परिस्थितिमें 'जीव साक्षी है' इस पक्षमें 'अनश्नन्रन्यः' इस मन्त्रभागके साथ, जो ्जीवातिरिकत साक्षीका प्रतिपादन करता है, विरोध होगा, इस शक्षाके समाधानमें कहते हैं कि 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र जिस पक्षमें ईश्वर परक और जीवपरक है उस पक्षमें भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि 'एको देवः' इस मन्न्रकी नाई 'ह्ा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र भी जीवभावापन् परमात्माका वोध करता है, ऐसा

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साक्षीका स्वरूंप-विचार ] भापानुवांदसहित १८९

जीवेश्वरोभयपरः, प्रकारेण जीवान्तःकरणोभयपरो वेति न कश्रिद्विरोध इत्याहुः। 1

लिन्गेरुपहित: परेंः ॥९५॥ और कोई लोग कहते हैं कि अन्तःकरणसे उपहित जीवचैतन्य ही साक्षी है॥९५॥

'द्वा सुपर्णा' यह मन्त्र जीव और ईश्वर उभयपरक है अथवा गुहाधिकरणके भाप्यमें उदाहरणरूपसे दिये गये पैद्गीरहस्यव्राह्मणके व्याख्यानप्रकारसे जीव और अन्तःकरणपरक है, इसलिए कोई विरोध नहीं है।

स्वीकार करेंगे। 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्रको जीवेश्वरपरक माननेमें गुहाधिकरण न्याय ही हेतु दे। सुद्धाधिकरणमें प्रथम सूत् है-'गुद्दां प्रविशवात्मानो न तदर्शनात्'। सूत्नार्थ यह है कि 'अतं पिचन्ती मुकृतस्य लोके गु्द प्रचिष्टी परमे परार्धे' (अपने किये हुए कमोंके अवश्य भावी फलोंका उपभोग करते हुए और अपने शरीरस्व हृदयकी आकाशरूप गुद्दामें प्रविष्ट हुए) इस मन्त्र में जीव और ईश्रका प्रद्दण किया जाता है, क्योंकि 'गुद्दाहितं गह्रेष्टम्' इत्यादिमें वैस दो देया जाता है। इमी न्यायके अनुसार 'द्वा सुपर्णा' इत्यादिमें भी जीव और ईश्वरका ही मदण है। रसका सात्पर्य गदद दे कि गुद्दाधिकरणमें पेसिरहस्यवाहणका उदाहरण दिया गया है। गद दस प्रकार हे-'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वति इति सतत्म्, अनश्नजन्योऽभिचाकशीति इत्य- इनदन्योजभिपस्यति सः, तायेतां सचत्चक्षत्रशी। (उन दोनोंमें एक जो कर्मफलका उपभोग करता दे, वह सश्व-अन्तःकरण हे और अन्य जो उपभोग नहीं करता हुआ देखता है, वह ज्ञ- भेन्रय दे, इस प्रकार वे वथ्व और क्षेत्रश है) इस आह्मणसे अदनवाक्य अन्तःकरणपरक और अनशनवाय क्षत्रशपरक है, ऐसा व्याखयान प्रतिपादित है, यह ज्ञान होता है। इस अवस्थामें माध्यकारने कसे उक्क वाक्यको जीवेश्वरपरक माना? यह राह्ा हो सकती है, परन्तु यह युक नदीं है, कर्योंकि अभ्युपगमवादमान्रसे कथन होनेके कारण म्ाहणव्या्यान और भाष्यका परस्पर विरोध नहीं है। इस अवस्थामें यदि अन्तःकरणप्रतिविम्चित धतन्य ही पैतिरहस्यका अनिमत क्षेत्रम हो, तो यदी 'अनश्नन्' इलादि वायनोक साक्षी दोगा, अविद्याप्रतिविम्बित चतन्य नहीं दोगा, ऐसी परिस्थितिम अविद्याप्रतिविम्बित महस्वभाव जीवचतन्य साक्षी है, यह पक्ष पेपिआदगनिर्शोतार्यक 'हा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्रभागसे विरुद्ध होगा, इस विरोधका 'गुहाधिकरण माध्योदाहत' इत्यादिसे परिदार किया गया है, परिदारका अभिप्राय यह है कि पेदि्ाह्वाणमें कदा गया स्षेघश अन्तःकरणगत नतन्यप्रतिबिम्वरूप जीव नहीं है, क्योंकि उसके कर्तृत्वादि- सवभाव दोनेे 'अनशनन्' इत्यादि वाक्यसे कहे गये साक्षित्वका उसमें सम्भव नहीं है, किन्तु अखम, उदासीन और प्रफाशरूप अविद्याप्रतिविम्बरूप जीव ही अभिप्रेत है, और वद अनशनन् याक्योक साक्षीरप दो सकता है, इसका पूर्धमें कथन हुआ है। अतः अविद्या- प्रतिविम्ब जोयके वाकित्वपक्षमे पेतिवादाणके पाथ विरोध नहीं है।

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१९० सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रंथम परिच्छेद

अन्ये तु-सत्यं जीव एव साक्षी, न तु सर्वगतेनाऽविद्योपहितेन रूपेण। पुरुपान्तरान्तःकरणादीनामपि पुरुषान्तरं प्रति. स्वान्तःकरणभासकसाक्षि- संसर्गाविशेषेण प्रत्यक्षत्वापतेः । न चाऽन्तःकरणभेदेन प्रमातभेदात् तद- नापत्तिः। साक्षिभास्येऽन्तःकरणादौ सर्वत्र साक्ष्यभेदे सति प्रमातृभेदस्याऽ- प्रयोजकत्वाद्। तस्मादन्त:करणोपधानेन जीवः साक्षी। तथा च प्रतिपुरुपं साक्षिभेदात् पुरुपान्तरान्तःकरणादेः पुरुपान्तरसाक्ष्यसंसर्गाद्वा तदयोग्य- इतर लोग कहते हैं कि जीव ही साक्षी है, यह ठीक है परन्तु सर्वगत अविद्यासे उपहितरूपसे जीव साक्षी नहीं है। यदि अविद्योपहितरूपसे साक्षी माने, तो अन्य पुरुषको अन्य पुरुषोंके अन्तःकरण आदिका प्रत्यक्ष हो जायगा, क्योंकि उसके अन्तःकरणके अवभासक साक्षीके साथ सामान्यरूपसे पुरुपान्तरके अन्तःकरणादिका संसर्ग है। परन्तु साक्षीके एक होनेपर भी अन्तःकरणप्रयुक्त प्रमाताओंके भिन्न-भिन्न होनेसे पूर्वोक्त आपत्ति नहीं आ सकती है? नहीं, यह समाधान युक्त नहीं हो सकता, क्योंकि साक्षिभास्य सम्पूर्ण अन्तःकरण आदिमें साक्षीके एक होनेपर प्रमाताका भेद अकिञ्चित्कर + है। इससे अन्तःकरणो- पहित चैतन्यरूपसे ही जीव साक्षी है। तव साक्षीके मेदमें प्रयोजकीभूत उपाधिका भेद होनेपर प्रतिपुरुष साक्षीका भेद सिद्ध होता है, इससे अन्य पुरुषोंके अन्तःकरण आदिका अन्य पुरुषके साक्षीके साथ सम्बन्ध न होनेसे

  • तात्पर्य यह है कि देवद त्तके अन्तःकरणका अवभासक जो साक्षी है, उस साक्षीके साथ देघदत्तीय अन्तःकरणके समान यज्ञदत्तके अन्तःकरण आदिका भी सम्बन्ध होनेसे जसे देव- दत्तको अपने अन्तःकरणका भान होता है, वैसे ही यज्ञदत्तके अन्तःकरणका भी भान हो जायगा, इसी प्रकार यज्ञदत्तके अन्तःकरणकी वृत्तियोंका भी प्रत्यक्ष हो जायगा, इसलिए व्यापकीभूत अविद्यामें प्रतिबिम्वितचिदूप ईश्वरको साक्षी नहीं मानना चाहिए, किन्तु वक्ष्यमाण अन्तःकरणोपहित जीवको ही साक्षी मानना चाहिए। + तातर्य यह है कि देवदलके प्रति देवदत्तके अन्तःकरणके प्रत्यक्षमें देवदतके साक्षीका संसर्ग प्रयोजक है, इसलिए देवदततके साक्षीका संसर्ग अविशेषसे यक्षदत्तके अन्तःकरणके साथ भी- होनेसे यज्ञदत्तके अन्तःकरण आदिका प्रत्यक्ष देवदत्तको अवश्य प्रसक होगा, इसलिए इसका परिहार साक्षीके संसर्गभेदसे ही हो सकता है, अप्रयोजक प्रमाताके भेदसे नहीं, अतः प्रमाता- के भेदसे यह व्यवस्था नहीं हो सकती है कि देवदत्तका अन्तःकरण देवदत्तके प्रति प्रत्यक्ष है, अन्य यज्ञदत्तका अन्तःकरण प्रत्यक्ष नहीं है। इसलिए भी अपरिच्छिन्न अविद्याविम्व्र- रूप चैतन्य साक्षो नहीं है।

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भाक्षीका स्वरूप-विचार] भापानुवादसहित १९१

त्वाद्वा अप्रकाश उपपद्यते। सुपप्तावपि सूक्ष्मरूपेणाऽन्तःकरणसन्द्ाचात् तदुपहितः साक्षी तदाऽप्यस्त्येव। न चाऽन्त:करणोपहितस्य प्रमातृत्वेन न तस्य साक्षित्वम्, सुपप्ती प्रमात्रभावेऽपि साक्षिसत्वेन तयोरभेदयाऽवर्य चक्तव्य इति वाच्यम् । विशेपणोपाध्योरभेदस्य सिद्धान्तसम्मतत्वेनाऽन्त:करणविशिष्टः प्रमाता, तदुपहितः साक्षीति भेदोपपत्तेरित्याहुः ॥ १४ ॥ अविद्ययाSSवृतः साक्षी तेनाऽन्यस्य प्रथा कथम् ?। साक्षी अविद्यासे आवृत रहता है, अतः उससे अविद्या, अहंकार आदिका प्रकाश कैसे होगा ?।

अथवा पुरुषान्तरके प्रति आयोग्यत्वकी कल्पनासे अग्रकाश -प्रत्यक्षत्वका अभाव- उपपन्न होता है। सुपुप्िमॅ भी सूक्ष्मरूपसे अन्तःकरणका अस्तित्व होनेसे उस अन्तःकरणसे उपहित साक्षी सुपुप्तिकालमें भी रहता ही है। यदि कोई शक्का करे कि जो अन्तःकरणसे उपहित चैतन्य है, वह प्रमाता है, साक्षी नहीं हैं, क्योंकि सुपुप्तिमें प्रमाताके न रहनेपर भी साक्षीके रहनेसे उन दोनोंका भेद अवश्य मानना होगा, तो यह शक्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि विशेषण और उपाधिके मेदका सिद्धान्तमें स्वीकार होनेसे अन्तःकरणरूप विशेपणसे विशिष्ट चैतन्य प्रमाता है और अन्तःकरणसे उपहित चैतन्य साक्षी है, इस प्रकार प्रमाता और साक्षीका भेद उपपन्न X होता है।। १४ ॥

1 सुपुप्तिकालमें साक्षीकी अवश्य सत्ता है, यह मानना चाहिए, क्योंकि 'त्रिपु धामसु' (तीनों अवस्थाओंमें [साक्षीकी सत्ता है]) इत्यादि श्रुतियाँ साक्षीके अस्तित्वका जाप्रत्, सुपुप्ति और स्वम्रावस्थामें प्रतिपादन करती हैं। और सुपुप्तिकालमें साक्षी द्वारा अनुभून अज्ञानका 'मैंने कुछ नहीं जाना' इत्यादि रूपसे स्मरण भी होता है। अनेक प्रमाताके पलयका प्रतिपादन करनेवाली अनेक क्ुतियोंके साथ विरोध होनेसे 'अद्मस्वाप्सम्' (मैं सोया था) इत्यादि स्मरणको अद्दमर्थ घ्माताके अंशमें अनुभव ही मानना चाहिए, सुपुप्तिमें प्रमाताकी सत्ता नहीं "माननी चाहिए। इसलिए सुपुप्िमें सत्त्व और असत्वरूपसे साक्षी और प्रमाताका अवश्य भेद है, अतः प्रमातासे साक्षीका अवश्य भद मानना ही चाहिए, तथा प्रमाता और साक्षीको एकरूप माना जाय, तो साक्षोमें उदासीनत्व आदिका प्रतिपादन भी विरुद्ध होगा, यह भाव है। अविद्योपाधिक जीवमें अन्तःकरण प्रमांतृत्वका विशेषणत्वरूपसे प्रयोजक है और उपाधित्वरूपसे साक्षित्वका प्रयोजक है। इसीलिए विशिष्ट और उपहित प्रभाता एवं

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१९२ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

[टिप्पणी ]

साक्षीका भी भेद है। यदपि अन्तःकरणसे विशिष्ट चैतन्यमें कर्तृत्व आदि स्वभाव हैं, तथापि उपहित चैतन्यमें, स्वतः उदासीन होनसे साक्षित्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है। अब प्रसप्गतः विशेषण और उपाधिका निर्वचन करते हैं, जो प्रकृतमें अत्यन्त उपादेय है। चिशेषणका लक्षण है-कार्यान्वयित्व सति व्यावर्तकत्वम् अर्थात् विधेयके साथ अन्वयी हो कर जो लक्ष्यकी अन्य पदारथासे व्यावृत्ति करे। जैसे 'नीलोत्पलमानय' (नील कमल लाओ) इत्यादिमें नील है-विशेषण, विधेय-आनयनमें नीलका उत्पल द्वारा अन्वय भी होता है और रक्त उत्पलसे व्यावृत्ति भी करता है। इसलिए उत्पलका नैल्य विशेषण है। उपलक्षणीभूत पदारथमें अतिव्याप्तिका निवारण करनेके लिए 'कार्यान्वयित्वे सति' यह विशेपण दिया गया है, जस 'यत् काकचत्, तत् देवदत्तगृहम्' (जो कौआवाला है, वह देवदत्तका घर है) इसमें विधेय है देवदत्तगृहत्व, उसका काकके साथ किसी प्रकारस अन्वय है नहीं, परन्तु अन्य गृहकी व्यावृत्ति तो काक करता है, इसलिए उपलक्षण काकमें दोषनिवारण करनेके लिए सत्यन्त है। यदि केवल यही विशेषणका लक्षण किया जाय कि जो कार्यान्वयी हो वह विशेषण है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विधयके साथ विशेष्यका भी अन्वय होता है, अतः विशष्यमॅ विशेषणत्वका प्रसङ्ग हटानेके लिए विशष्यदल-व्यावतकत्वदल-अवश्य देना चाहिए। उसके देनेसे विशेष्यमें अतिप्रसभ्न नहीं है। 'कार्यानन्वयित्वे सति व्यावतकत्वे सति कार्यान्वयकाले विद्यमानत्वम् उपाधिलक्षणम्' अर्थात् विधेयके साथ अन्वयी न होकर, विशेष्यका व्यावर्तक होकर कार्यान्वयकालमें विद्यमान हो, वह उपाधि-है। जसे-लोहिंत स्फटिकमानय' (रक्त स्फटिक लाओ) इसमें स्फटिकसनिहित जपाकुसुम स्फटिकका विशेषण नहीं है, उपाधि है, क्योंकि आनयनरूप विधेयमें जपाकुसुमका किसी प्रकारसे अन्वय नहीं होता है और अन्य स्फटिकसे व्यावृत्ति अवश्य करता है। इसमें 'कार्यानन्वयित्वे सति' यदद सत्यन्त विशेषणमें अतिप्रसक्तिके निरासके लिए दिया गया है, और द्वितीय सत्यन्त देनेका प्रयोजन इस प्रकार है, कहींपर यह कहा जाय कि 'काकवद् गृहं प्रविश' (काकवत् गृहमें प्रवश करो) इसमें प्रवेशरूपकार्यके अन्वयकालमें कदाचित् दैवयोगसे उपलक्षणीभूत काक अन्यत्र चला गया और दूसरा कौआ उस स्थलमें आ गया उस समयमें आये हुए नवीन काकमें कार्यानन्व- यित्वे सति अन्वयकालविद्यमानत्वरूप उपाधिका लक्षण होनेसे अतिव्याप्ति हो जायगी, अतः इसके भङ्गके लिए द्वितीय सत्यन्त दिया, इसके देनेसे आगत नवीन काकमें दोष नहीं है, क्योंकि वह व्यावतक नहीं है, इसी स्थलमें उपलक्षण काकमें अतिव्याप्तिके वारण करनेके लिए कार्यान्वयकालमें विद्यमानत्वरूप विशेष्य दल दिया । कार्यके अन्वयकालमें दैव योगसे. उपलक्षण काककी स्थिति हो सकती है। इससे उपलक्षणमें अतिव्याप्तिके वारणके लिए विद्यमानत्वमें 'नियमन' यह विशेषण भी देना चाहिये, इसलिए कार्यान्वयकालमें नियमतः जो रहे, यह विशेष्य भागका अर्थ है। कार्यान्वयकालमें नियमतः काक रहता नहीं है, अतः दोष नहीं है, यह भाव है। इसका अधिक विचार अन्यन्न कृष्णालङ्गार व्याख्यामें पृ० १९५ चौ० सु० काशीमें देखना चाहिए।

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साक्षीकी अनावृतनाका विचार] भापानुवादसहित १९३

ननक्तरूपस्य साक्षिणः चैतन्यमात्रावरकेणाऽ़ज्ञानेनाSSवरणमवर्जनीय- 1

अन्राहू राहुवत् केचित् तस्य स्वादृतभास्यताम् ॥ ९६ ॥ इस विषयमें-राहुके समान अर्थात् जैसे राहुका प्रकाश राहुस आवृत चन्द्रमण्डलसे द होता है, चैसे हो अविच्याका प्रकाश अविदयासे आवृत साक्षीसे ही होता है, ऐव भी-कुछ लोग कहते है॥९६॥ राहुवद विद्या स्वावृतप्रकाशाप्रकाश्येति केचित्।

अव यह शक्ा होती है कि पूर्वोक्त लक्षणसे लक्षित साक्षी अवश्य चैतन्यमात्रको आवृतकरनेवाले अज्ञानसे आवृत होगा, अतः अज्ञानावरणसे आवृत साक्षीसे अहक्वार आदिका भान कैसे होगा ?* अर्थात् किसी प्रकारसे मी नहीं हो सकेगा, परन्तु यह शक्का युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि -- राहुके समान अविद्या स्वावृत प्रकाशसे प्रकाशित होती है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। [तात्पर्य यह हे कि अहणके समयमें चन्द्रमण्डल राहुसे आच्छादित होता है, परन्तु उस समयमं राहुका प्रकाश चन्द्रसे ही होता है, जो कि चन्द्र राहुसे आवृत है। इसी प्रकार यद्यपि अविद्यासे साक्षी आवृत है, तथापि उस अविद्याका प्रकाश स्वावृत साक्षीसे ही होता है]।

  • वाक्षिगोचर अपरोक्ष वृतिये साक्षीके आवरणका मग्ग होनेपर आवरणसे रहित वाक्षीये अविया आदिका मान दो सकता है, यह नहीं कहना चाहिए, क्योंकि 'अविद्या आदिका मान केवल साक्षीये दी होता है' इस सिद्धान्तके साथ विरोध होगा, कारण कि उनके गानमें इस प्रकार गृतिका अवलम्बन करनेसे साक्षीसे अतिरिक तृततिकी भी अपेक्षा हुई। दूसरी यात यह भी है कि मनमें करणत्वका भी आगे चलकर निरास किया जायगा, इससे करणके अभावये साक्षीको अवलम्बन करनेवाली तदाकार धृत्ति भी नहीं दो सकती है। और अदक्वार आदिकी सत्ताके कालें उनके संशय आदि नहीं होते हैं, इसलिए सदा उनका प्रकाशस्वरुप साक्षीके साथ सम्बन्ध है, यह कहना चाहिए, यदि कादाचित्क वत्तिसे उनका भान माना जाय, तो उनके सदा भासमानत्वके साथ भी विरोध होगा, इसलिए केवल साक्षिमास्यत्व दी अद्दकार आदिमें स्वीकार करना चाहिए, परन्तु यह नहीं हो सकता है, यर्गोंकि चद साक्षिचेतन्य तो अज्ञानये आघृत है। और साक्षीरूप चतन्यसे अन्य चतन्यका ही अज्ञान आवरण करता है, यह भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि अज्ञानका सम्पूर्ण चैतन्यको आयृत करना स्वमाव दै, यदि ठात् इसे नहीं माना जाय, तो साक्षि- सैतन्यसे अन्य नतन्यमें भी शावरणका अभाव प्रसक दोगा, यह प्रश्नका आदाय है। २५

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१९४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

कल्प्यते वस्तुतस्तेपु संशयादेरदर्शनात्॥९७ ॥ वस्तुतः अविद्या, अन्तःकरण और अन्तःकरणके धर्मोंके अवभासक साक्षीरूप चैतन्यको छोड़कर अन्य चैतन्यको अविद्या आवृत करती है, इस प्रकार-अविद्या आदिमें संशय आदिके न देखनेसे-कल्पना की जाती है।।९७।। वस्तुतोऽविद्याऽन्तःकरणतद्धर्मावभासकं साक्षिचैतन्यं विहायैवाऽ़ज्ञानं चैतन्यमावृणोतीत्यनुभवानुसारेण कल्पनान् कश्चिदोपः। अत एव सर्वदा तेपामनावृतप्रकाशसंसर्गात अज्ञानविपरी तज्ञानसंशयागोचरत्वम्। स्याच्चेदनावृतः साक्षी भासेताऽस्य सुखात्मता। प्रेमास्पदत्वाद् भात्येव परिच्छेदादतृप्तता।९८॥ यदि साक्षी चैतन्य आवृत नहीं है, तो सर्वदा तदभिन्न आनन्दका प्रकाश होना चाहिए? (कहते हैं) होता ही है, क्योंकि आत्मा परम प्रेमका विषय है, उपाधिसे आनन्दके परिच्छिन्न होनेसे तृति नहीं होती है॥१८। साक्षिचैतन्यस्याऽनावृतत्वे तत्स्वरूपभृतस्याऽडनन्दस्याऽि प्रकाशा- पत्तिरिति चेत्, न; इष्टापत्तेः। आनन्दरूपप्रकाशप्रयुक्तस्याऽडत्मनि निरुपा- वस्तुस्थितिमें साक्षिचैतन्यको, जो अविद्या, अन्तःकरण और अन्तः- करणके धर्म सुख आदिका प्रकाशक है, छोड़ कर अन्य चैतन्यको ही अज्ञान आवृत करता है, ऐसी अनुभवके अनुसार कल्पना करनी चाहिए, इसलिए किसी दोषकी प्रसक्ति नहीं है। अतएव-साक्षी चैतन्यसे अतिरिक चैतन्यका ही अज्ञान आवरण करता है, इसीसे-वे अन्तःकरण और तद्धर्म आदि सदा अनावृत प्रकाशके साथ सम्बद्ध होनेके कारण अज्ञान, विपरीत ज्ञान और संशय आदिके विषय नहीं + होते हैं। यदि साक्षी चैतन्य सदा अनावृत है, तो उसके स्वरूपभृत आनन्दका मी साथ-साथ प्रकाश होना चाहिए? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यह. + अविद्याके भावरूपत्वमें, अहङ्ठारके अनात्मत्वमें, सुख, दुःख आदि वृत्तियोंके अनात्म- धमत्वमें अज्ञान, विपरीतज्ञान आदिके होनेसे यह कैसे कह सकते हैं कि अविद्या आदि संशय आदिके गोचर नहीं है? इस शङ्कापर यह उत्तर है कि अविद्या आदिके सत्त्वकालमें अविद्यादिसत्त्वप्रकारक अज्ञान, संशय आदि नहीं होते हैं, इसलिए पूर्वोक्त आशदा नहीं हो सकती है, यद भाव है !

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सांक्षीरूपं आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भांपानुंवादसहितं १९५

धिकग्रेम्णो दर्शनात्। 'भासत एव परमप्रेमास्पदत्वलक्षणं सुखम्' इति विवरणाच्च ॥१५ ॥ स्यादेतत्-इदानीमप्यानन्दप्रकाशे मुक्तिसंसारयोरविशेपप्रसङ्गः । ननु कल्पितभेदस्य साक्ष्यानन्दस्य प्रकराशेऽपि अनवच्छिन्नस्य त्रक्मा- नन्दस्याऽडवृतस्य संसारदशायामप्रकाशेन विशेषोऽस्तीति चेत, न; आन- आपत्ति इष ही है अर्थात् उस साक्षीके स्वरूपभूत आनन्दका प्रकाश होता ही है, क्योंकि आनन्दरूपके प्रकाश होनेसे ही आत्मामें निरुपाधिक प्रेम देखा जाता है। इस प्रकृत अर्थमें विवरणकारने कहा भी है कि जिस सुखका लक्षण परम प्रेम-विषयत्व है, वह सुख भासता ही है [कारण कि वह सुख (आनन्द) साक्षिचैतन्यसे अभिन्न है, अतः स्वरूपानन्दके प्रकाशमें कोई हानि नहीं है,]।। १५।। यह शक्का होती है कि यदि संसारदशामें भी आत्मस्वरूप आनन्दका प्रकाश होता है, तो मुक्ति और संसारमें कोई विशेष नहीं होगा? [इससे साक्षि- स्वरूप आनन्दका संसारदशामं प्रकाश मानना अयुक्त है, यह पूर्वपक्षीका भाव है]। परन्तु इस शक्ाका अवसर नहीं है, क्योंकि साक्षिस्वरूप आनन्दका, जिसका कि विम्बभूत आनन्दसे मेद कल्पित है, प्रकाश होनेपर भी संसार- दशामें आघृत होनेके कारण अनवच्छिन्न न्रमानन्दका प्रकाश न होनेसे मुक्ति और संसार दशामें विशेष हो सकता है, तो यह भी समाधान युक्त नहीं है, * तात्पर्य गद है कि लोकमें जिन जिन पुरुपोंको आनन्दका अनुभव होता है, उन उन मुगयों के अनुभवके विपय आनन्दमे धीति अनुभवसिद्ध है। इसलिए प्रकाशमान आनन्द श्रीतिका विषय हे, यह सिद्ध होता है, अतः दुःसदशामें भी प्राणिमात्रको अपने-अपने आत्मामें प्रीतिके देखनेसे आत्मविपयक प्रीतति भी प्रकाशमान आनन्दविपयक है, यह सिद्ध होता है, पधादिविषयक जो प्रीति है, वह तो औपाधिक है, ययोंकि वहांपर पुन्नादिमें जो सुखसाधनता- रूप उपाधि है, तत-प्रयुक्त दी आत्मसुसकी अिव्यकि देसी जाती है और उसके अभावमें अनारम पुत्र आदिमें प्रीति नहीं देखी जाती है। इसीलिए यह श्ुति है-'आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रिय अवति' (आत्माके स्वार्थसे दी सभी प्रिय होते है) अतः आत्माका आनन्द प्रकाशित होता है, यह अवश्य मानना चाहिए, यदि न माना जाय, तो श्रुतिसिद्ध निरुपाधिक प्रीति आत्मामें नहीं दोगी, क्योंकि भीति प्रकाशमान आनन्दिषयक ही होती है। अतः साक्ष्यानन्दके प्रकाशमें कटापति युकक दी है।

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१९६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रैथेम परिच्छेदे

न्देऽन वच्छेदांश स्याऽपुरुपार्थत्वादानन्दापरोक्षमात्रस्य चेदानीमपि सच्चात्। नन्ववच्छिनः साक्ष्यानन्दः सातिशयः, सुपुप्तिसाधारणादनतिस्पष्टात् ततो -- वैषयिकानन्देष्वतिशयानुभवाद्। अनवच्छिनो व्रह्मानन्दस्तु निरतिशयः। क्योंकि आनन्दमें अनवच्छेद अंश पुरुषार्थ नहीं है और केवल आनन्दका संसार दशामें भी अपरोक्ष प्रकाश होता है। [शङ्का तथा समाधानका तात्पर्य यह है कि साक्षीरूप आनन्दका अर्थ है-अविद्यामें आनन्दका प्रतिविग्व, इस ग्रतिविम्बभूत आनन्दका विम्बभूत आनन्दसे अवश्य कल्पित मेद है, अन्यथा विम्बप्नतिविम्ब- भावकी उपपत्ति ही नहीं हो सकेगी। इसलिए संसारदशामं अनावृत साक्षि- स्वरूप प्रतिविम्चानन्दका प्रकाश होनेपर भी विम्ब्रभूत ब्रह्मानन्दका प्रकाश नहीं होता है। और दूसरी बात यह भी है कि प्रतिशरीर साक्षीरूप आनन्द भिन्न-भिन्न है और अनवच्छिन्न आनन्द प्रतिशरीरमें भिन्न नहीं है, अतः संसारदशा और मुक्ति- दशामें अवश्य भेद है। इससे मुक्ति और संसारदशामें अविशेषप्रसक्तिरूप दोष नहीं है। इसपर उत्तर दाताका वक्तव्य यह है कि संसारदशासे मोक्षमें जो विशेष है, क्या वह अनवच्छिन आनन्दके स्फुरणसे है या केवल आनन्द ही के स्फुरणसे है? प्रथमकल्प युक्त नहीं है, क्योंकि अनवच्छिन्न शब्दका अर्थ है-मेदाभाव, इसको यदि आनन्दसे भिन्न माने, तो वह पुरुषार्थ नहीं होगा, अतः अपुरुषार्थवस्तुनिवन्धन विशेष अर्थात् अनवच्छेदप्रयुक्त वैशिष्ट्य मुक्तिमें अप्रयोजक है, यदि अवच्छेदाभावको आनन्दरूप माना जाय, तो द्वितीय कल्प ही पर्यवसन्न होगा अर्थात् आनन्दका स्फुरणमात्र ही मोक्षमें विशेष है, परन्तु यह भी अयुक्त है, क्योंकि संसारदशामें भी आनन्दका स्फुरणमात्र तो है ही, अतः संसार और सुक्तिमें अविशेषप्रसङ्गका भङ्ग कोई भी नहीं कर सकता है]। प्रकारान्तरसे आशक्का होती है कि संसारदशामें प्रति- शरीरमें एकरूपसे प्रकाशित न होनेवाला साक्षीरूप आनन्द उत्कर्ष और अपकर्ष- रूप अतिशयसे युक्त होता है, क्योंकि सुषुप्तिसाधारण आनन्दसे, जो अति- स्पष्टतासे रहित है, स्रक्, चन्दन आदि विषयजन्य आनन्दोंमें अतिस्पष्टता भासती है। और मुक्तिकालीन ब्रह्मानन्द एकरूपसे प्रकाशमान एवम् उत्कर्ष *कल्पित अभाव अधिष्ठानरूप होता है, इसलिए आनन्दरूप अधिधानमें रहनेवाला भेदाभाव आनन्दरूप ही होगा, तदतिरिक नहीं होगा यह भाव है।

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साक्षी रूप आनन्दका अनावृत्व-विचार] भापानुंवादसहित १९७

आनन्दवल्ल्यां मानुपानन्दाद्युत्तरोत्तरशतगुणोत्कर्पोपवर्णनस्य ब्रह्मानन्दे समापनादिति चेत्, न; सिद्धान्ते साक्ष्यानन्दविपयानन्दव्रह्मानन्दानां वस्तुत एकत्वेनोत्कर्पापकर्पासम्भवाद्। मानुपानन्दादीनामुत्तरोत्तरमुत्कर्प और अपकर्षसे रहित है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि सुपुप्तिकालमें प्रकाशमान साक्षीरूप आनन्द अवश्य स्पष्ट है, इसीलिए तो जागद् अवस्थामें 'मैं सुखपूर्वक सोया' यह स्मरण होता है, लोकमें स्पष्टरूपसे जिस आनन्दका अनुभव किया जाता है, उसीका पुनः स्मरण होता हे, स्पष्टतया अननुभृत आनन्दका स्मरण नहीं होता है, परन्तु सौपुप्त आनन्दकी अपेक्षासे कुसुममाला, चन्दन आदिसे प्रादुर्भृत आनन्द अधिक स्पष्ट होता है, इसलिए सांसारिक आनन्द सातिशय और प्रतिशरीर मिन्न-भिन्न हुआ करते हैं, मुक्तिकालमें ऐसी अवस्था नहीं है, क्योंकि उस आनन्दका कल्पित भेद या अतिशय नहीं भासता है, किन्तु उस कालमें एकरूप, शुद्ध और उत्कर्प एवं अपकर्ष आदि धर्मोसे शून्य ब्रह्मरूप आनन्द भासता है, अतः संसार और मुक्तिमें विशेष नहीं है, यह कहना अनुचित है ]। क्योंकि आनन्दवल्लीमं मनुष्यके आनन्दसे लेकर उत्तरोत्तर आनन्दोंमें किया हुआ शतगुण उत्कर्पका वर्णन न्रम्मानन्दमें ही समाप्त किया गया है, [अतः सांसारिक आनन्द सातिशय है, और वह मुक्तिमें नहीं रहता है], परन्तु यह भी शक्का अनुपपन्न है, क्योंकि सिद्धान्तम साक्षीरूप आनन्द, विपयानन्द और न्रम्मानन्द वस्तुतः अभिन्न ही हैं, अतः उत्कर्ष और अपकर्ष आनन्दमें हो ही नहीं सकता। यदि इसमें शक्का हो कि मनुष्य आदिके

  • आनन्द्वलरीकी क्ुतिमें ऐखा वर्णन मिलता है-एक सार्वभौम राजाके आनन्दसे सौगुना मनुष्यगन्धर्वको आनन्द होता है, और एक श्रन्निय कामरहित (ब्राह्मण) को भी होता है, और इनके आनन्दसे सौगुना आनन्द एक देवगन्धवको होता है, इस प्रकार क्रमशः वर्णन करते करते आखिर अक्में सम्पूर्ण आनन्दोंकी परिसमाप्ति बतलाई गई है, अर्थात् व्रह्मानन्दसे यढ़ फर और कोई आनन्द नहीं है, अन्य सब आनन्द उस व्रमानन्दसे निकृष्ट-निकृष्टतर ही है, ऐसा कहा गया है। इस विपयको अधिक जाननेके लिए निम्नलिखित मन्त्र देखिये। येपानन्दस्य मीर्माक्ञा गयति। युवा स्यात् रााधु युवाध्यापकः । आशिष्ठो द्रठिष्ठो वलिए:। तस्य्य पृथियी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः। ते ये शतं मानुपा आनन्दाः। स एको मनुष्यगन्घर्वाणामानन्दः । श्रोत्रिगस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वीणा- मानन्दा:। स एको वेयगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोननियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं देवगन्ध- र्घाणामानन्दा:। एत्यादि[तैत्तिरीयोपनिपत् ब्रम्मानन्दवली अनुवा० ८]।

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१९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रंथम परिच्छेद

श्रुतिर्वदतीति चेत्?। को वा त्रूते श्रुतिर्न वदतीति। किन्तु अद्वैतवादे तदुपपादनमशक्यमित्युच्यते। नन्वेकस्यैव सौरालोकस्य करतलस्फटिकदर्पणाद्यभिव्यञ्ञकविशेपोप-

पधानेनाऽभिव्यक्तितारतम्यरूपसुत्कर्पापकर्षवत्वं युक्तमिति चेत्, न; दृष्टा- न्तासंप्रतिपत्तेः । सर्वतः प्रसृमरस्य सौरालोकस्य गगने विना करतलादि- सम्बन्धमस्पष्ट प्रकाशमानस्य निम्नतले प्रसृमरस्य जलस्येव करतलसम्बन्धेन

आनन्दका उत्तरोत्तर उत्कर्ष श्रुति कहती है, तो यह कौन कहता है कि श्रुति नहीं कहती है? अर्थात् श्रुति आनन्दका उत्कर्ष कहती तो अवश्य है, परन्तु अद्वैतवादमें उसका उपपादन करना असम्भव है, यह हमारा (पूर्वपक्षी का) अभिप्राय है। यदि यह कहा जाय कि जैसे सूर्यके तेजके एक होनेपर भी करतल, स्फटिक और दर्पण आदि विशेष अभिव्यञ्जक पदार्थोंके * उपधान से आलोकाभिव्यक्तिमें कुछ तारतम्य देखा जाता है, वैसे ही यद्यपि स्वतः आनन्द एकरूप है, तथापि अभिव्यञ्जक सुखवृत्तिविशेषके उपधानसे आनन्दकी अभिव्यक्तिमें तारतम्यरूप उत्कर्ष और अपकर्ष हो सकते हैं? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आपका दिया हुआ जो दष्टान्त है, उसमें हमारी सम्प्रतिपत्ति-सम्मति नहीं + है, क्योंकि जसे स्वभावतः निन्नभू-भागमें गमनशील जलकी करतलके सम्बन्धसे गतिका प्रतिबन्ध होनेपर एकस्थानमें उसका अधिक जमाव हो जाता है, वैसे ही सर्वत्र गमनशील सूर्यका तेज, जो गगनमें किसी करतल आदिके सम्वन्घके बिना

  • तात्पर्य यह है कि करतल आदिके सम्वन्धके विना तेजकीजो आकाशमें अभिव्यक्ति होती है, उसकी अपेक्षासे करतलमें अधिक अभिव्यक्ति होती है, करतलकी अपेक्षा स्फटिकमें अधिक होती है, उसकी अपेक्षा दर्पणमें अधिक होती है, यह अनुभवसिद्ध है, इसीके अनुसार आनन्दकी अभिव्यक्चक वृत्तियोंके प्रभावसे साक्षीरूप आनन्दमें भी उत्कर्ष और अपकर्ष हो सकता है, यह पूर्वपक्षकर्ता (सिद्धान्ती)-का वक्तव्य है। + उत्तर देनेवाले पूर्ववादीका भाव यह है कि आपका आनन्दके विपयमें आलोकदष्टान्त तभी हमें मंजूर हो सकता है, जव कि स्वतः तेज एक व्यक्ति हो, परन्तु आलोक एक व्यक्ति तो है नहीं, क्योंकि वह अनेक किरणोंका समूहरूप है और एक स्वरूप भी नहीं है, कारण कि ततू-तद स्थानोंमें किरणोंकी अल्पता और वाहुल्य आदि नाना स्वरूप उपलब्ध होते हैं, अतः आलोकके दृष्टान्तसे साक्षीरूप आनन्दका तारतम्य नहीं सिद्ध कर सकते है।

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साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भापानुवादसहित १९९

गतिप्रतिहता बहुलीभावादधिकप्रकाशः, भास्व्रदर्पणादिसम्चन्धेन गति- - प्रतिहतौ बहुलीभावात् तदीयदीपिसंलनाच ततोऽप्यधिकप्रकाश इति तवS-

च गगनप्रसृतसौरालोकवत् अनवच्छिनानन्दस्यास्पप्टता, करतलाद्यव्छन सौरालोकवत् सुखवृत्त्यवच्छिन्नानन्दस्याऽधिकाभिव्यक्तिरिति मुक्तितः संसारस्यैवाऽभ्यर्हितत्वापत्तेश। एतेन 'संसारदशायां प्रकाशमानोऽप्यानन्दो मिथ्याज्ञानतत्संस्कारविक्षिप्तया तीत्रवायुविक्षिपप्रदीपप्रभावदस्पष्टं प्रकाशते, मुक्तौ तदभावात् यथावदवभासते' इत्यपि निरस्तम्। निर्विशेपस्वरूपानन्दे

अस्पष्ट प्रकाशमान है, उसकी करतलके सम्वन्धसे गति सक जाती है, इस अवस्थामें वह (तेज) एकत्र जमा होकर अधिक प्रकाश करता है और अति निर्मल दर्पण आदिके सम्वन्धसे तेजकी गतिका प्रतिरोध होनेपर तेजकी जमावटसे और दर्पणकी प्रभाके सम्मिश्रणसे करतलगत प्रकाशसे भी अधिक प्रकाश होता है, अतः तेजस्थलमें अभिव्यञ्ञक उपाधिके तारतम्यसे अभिव्यक्तिमें तारतम्य नहीं माना जाता है। किन्तु जमावट प्रयुक्त ही तारतम्य है] यदि कथश्चित् दृष्टान्तको मान लॅ, तो गगनमें गतिशील सूर्यके आलोकके समान अनवच्छिन्न आनन्दमें अस्पष्टता होगी और करतल आदिसे युक्त सूर्यके आलोकके समान सुखाकार वृत्तिसे युक्त आनन्दकी अधिक अभिव्यक्ति होगी, इसलिए मुक्तिकी अपेक्षासे संसार ही अभ्यर्हित-सभीका अभीष्ट प्रसक्त होगा। इससे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि संसारकालमें आनन्द प्रकाशमान है, तो भी मिथ्या- ज्ञान + और मिथ्याज्ञानके संस्कारसे विक्षिप् होनेके कारण तीव्र वायुसे संचालित दीपकी प्रभाके समान वह अस्पष्ट-सा प्रकाशित होता है, और मुक्तिमें तो मिथ्याज्ञान

  • अर्थात् सांसारिक सुख ही मुक्ति सुखकी अपेक्षासे अधिक उत्कृष्ट और स्थायी सिद्ध होंगे, अतः मुकिके उद्देश्यसे मुक्तिके साधनोंमें किसीकी प्रवृत्ति नहीं होगी, यह भाव है। देहादि अनात्म पदार्थोमें आत्मत्वग्रह और वस्तुतः आत्माके सम्वन्धसे वश्चित पुत्रादिमें आत्मीयत्वप्रद्द ही मिथ्याज्ञान है, यही मिथ्याज्ञान जाग्रत् अवस्थामें स्वरूपानन्दके प्रकाशनमें विक्षेपक और उसकी अस्पषताका आपादक है, और इसी मिथ्याज्ञानसे उत्पन्न हुए संस्कारके सुपुप्तिकालमें प्रकाशमान आनन्दके विक्षेपक और पुरुपार्थत्वका विनाशक हैं, क्योंकि प्रारब्ध- कर्मके वलसे सभी जीव सौपुप्र आनन्दका त्यागकर जाग्रत् में आ जाते हैं, अतः मुमुक्षु लोग सौयुप्त आनन्दकी अभिलाषा नहीं करते हैं, यह रहाका भाव है, और दीपप्रभा द्ृषटान्त है।

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२०० सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम परिच्छेद

प्रकाशमाने तत्र विक्षेपदोपादप्रकाशमानस्य सुक्त्यन्वयिनोSतिशयस्या सम्भवाल्। तस्मात् साक्ष्यानन्दस्याऽनावृतत्त्वकल्पनमयुक्तम्। साक्षिण्युपाधिमालिन्यादध्यस्तादपकर्षतः । सुखापकर्पमद्वैतविद्याचार्याः प्रचक्षते॥ ९९ ॥ अद्वैताचार्य कहते हैं कि संसारावस्थामें साक्षीमॅ अध्यस्त उपाधिके मालिन्यरूप अपकर्पसे सुखका अपकर्ष अर्थात् तारतम्य है॥९९॥ अम्राहुरद्वैतविद्याचार्या :- यथाऽत्युत्कष्टस्यैकस्यैव घवलरूपस्य मालि- आदिके न रहनेसे पूर्णरूपसे आनन्द प्रकाशित होता है, अतः संसार और मुक्तिदशामें विशेष है, क्योंकि जब निर्विशेष आत्मस्वरूप आनन्द प्रकाशमान है, तो उस दशामें विक्षेपदोपसे अप्रकाशमान और मुक्तिदशामं * प्रकाशमान आनन्दका दष्टान्तके समान कोई जातिरूप या अवयवरूप विशेष हो ही नहीं सकता है, इससे साक्षीरूप आनन्दको अनावृत मानना अयुक्त है। इस आक्षेपके समाधानमें अद्वैत विद्याचार्य + कहते हैं कि जैसे अत्यन्त * दीपप्रभाके सावयव होनेसे प्रवल वायुके प्रभावसे उसके कुछ अवयवोंके विनाशरूप विक्षेपसे अथवा प्रभागत भास्वरत्वके वायु द्वारा प्रतिचन्धरूप विक्षेपसे दीपप्रभाके प्रकाशमान होनेपर भी उसमें अस्पष्ट प्रकाशता उपपन्न हो सकती है, परन्तु अवयव, गुण आदि विशपसे रहित ब्रह्मानन्दके-न तो संस्कार या मिथ्याज्ञानसे-अवयवका विनाश या किसी गुणविशेपका प्रतिबन्ध हो सकता है, अतः तत्प्रयुक्त अस्पष् प्रकाशता साक्ष्यानन्दमें नहीं आ सकती है, अतः पूर्वोंक्त पक्ष असफत है अर्थात् इस रीतिसे भी मुक्ति और संसारमें वैलक्षण्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह पूर्वपक्षीका भाव है। + जैसे साधारण मलिन दर्पणमें पड़े हुए धवलरूपके प्रतिविम्बमें साधारण अपकर्ष अध्यस्त होता है, और मध्यम रीतिसे मलिन दर्पणमें प्रतिचिम्वित घवलरूपमे पूर्वकी अपेक्षासे अधिक अपकर्ष अध्यस्त होता है इसी रीतिसे अत्यन्त मलिन दर्पणमें प्रतिविम्वित धावल्यमें पूर्वकी अपेक्षा अत्यन्त निकृष्ट अपकर्ष अध्यस्त होता है, वैसे ही अन्तःकरणमें जव निरतिशय और अद्वितीय आनन्दका प्रतिविम्ब होता है, तब साक्षीरूप आनन्द कहा जाता है अर्थात् साक्षी- रूप आनन्दभावको प्राप्त होता है और पूर्व जन्मके किसी विशेष पुण्यकर्मके परिपाकसे स्क्, चन्दन आदि सुन्दर विषयोंके आकारमे अन्तःकरणकी वृत्ति होती है, तब उस वृतिमें प्रति- विम्वित आनन्द विषयानन्दके नामसे प्रसिद्ध होता है। यहांपर यह विशेपरूपसे जानने लायक वार्ता है-अन्तःकरणका-वृत्ति द्वारा यदि उत्कृष्ट विषय-विशषोंके साथ-सम्पर्क हुआ है, तो उन उत्कृष्ट विषयोंके साथ अन्तःकरणके सत्वगुणका सम्बन्ध होनेसे उत्कर्ष होगा, यदि निकृष्ट चिषयोंके साथ सस्बन्ध होगा, तो अकर्प होगा। इसके अनन्तर अन्तःकरणके सत्त्वांशके

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साक्षीकी अनावृतताका विचार] भापातुवादसहित २०१

न्यतारतम्ययुक्तेप्वनेकेषु दर्पणेपु प्रतिविम्बे सत्युपाधिमालिन्यतारतम्यात् तत्र तत्र प्रतिविम्ब्रे धावल्यापकर्पस्तारतम्येनाऽध्यस्यते, एवं वस्तुतो निरतिशयस्पै- कस्पैव स्वरूपानन्दस्याऽन्तःकरणप्रतिरिम्निततया साक्ष्यानन्दभावे प्राक्तन- सुकृत संपत्यधीनविपयविशेष संपर्कप्रयु क्तसत्च्वोत्कर्पापकर्परूपशुद्धितारतम्ययुक्त- सुखरूपान्तःकरणवृत्तिप्रतिविम्निततया विपयानन्दभावे च तमोगुणरूपो- पाधिमालिन्यतारतम्यदोपादपकर्पस्तारतम्येनाऽध्यस्यते इति संसारदशायां प्रकाशमानेऽप्यानन्दे अध्यस्तापकर्पतारतम्येन सातिशयत्वादतृप्तिः। विद्यो- वत्कृष्ट एक ही श्वेत रूपके-मालिन्यके तारतम्यसे युक्त अनेक दर्पणोंमें- प्रतिविम्वित होनेपर उपाधिकी मलिनिताके तारतम्यसे तत्-तत् प्रतिविम्बमें धवलताका अपकर्प तारतम्यसे अध्यस्त होता है, वैसे ही वस्तुतः निरविशय एक ही स्वरूपानन्दके अन्तःकरणम प्रतिविम्धित होनेके कारण साक्षीरूप आनन्द- भावके प्राप्त होनेपर और पूर्व पुण्यके परिपाकके अधीन विषयविशेपके सम्पर्कसे हुए सत्त्वके उत्कर्ष और अपकर्पसे शुद्धिके तारतम्यसे युक्त सुखाकार वृत्तियोंमें प्रतिविम्वित होनेके कारण विपयानन्द्त्वके प्राप्त होनेपर तमोगुणरूप उपाधिकी मलिनताके तारतम्यदोपसे अपकर्ष भी तारतम्यसे अध्यस्त होता है। इसलिए संसारदशाम * आनन्दके प्रकाशित होनेपर भी अध्यस्त अपकर्षके तारतम्यसे

परिणामरप वृतियाँ स्वरूपागन्दविपयक होंगी, तो अवश्य उत्कर्ष और अपकर्पसे युक्त होंगी, अतः उनमें पडा हुआ आनन्दका प्रतिबिम्य भी उत्कृष्ट और अपकृष्ट अवश्य होगा। इसलिए संसारदशामें प्रकाशमान आनन्दके उत्कर्पापकरपसे युक्त होनेसे सातिशय होनेके कारण तृप्ति नहीं होती है। और मुफिदशामें इस प्रकार स्ातिशयत्व न होनेसे तृप्ति ही रहती है, अतः विशेषकी उपपत्ति दो सकती है, यह तात्पर्य है। 1. अन्तःकरणके सत्त्व, रज और तम स्वरूप दोनेसे उसकी वृत्तिमें भी तमोगुणकी अनुपृति अवश्य होगी, और उसी तमोगुणसे अपकर्षतारतम्यात्मक मालिन्यतारतम्यदोप ऋृतिनिष्ट भी दोगा, दधी दोपके चलसे सत्त्ववृत्तिके प्रतिविम्बमें भी अर्थात् विपयानन्दमें भी तारनम्य अध्यस्त दोता है, यह भाव है। 8 संसारदशामें जो प्रकाशमान आनन्दमें अपकर्पतारतम्य अध्यस्त होता है, उससे वद आनन्द सातिशय होगा, इस अवस्थामें जो अत्यन्त साधारण भानन्दका अनुभव कर रहा है, वह अवश्य उत्कृष्ट आनन्दकी अभिलापा करेगा और उसके सम्पादन करनेमें जीतोड़ यस्न करता हुआ आनन्दसाधनत्वकी धान्तिसे कदाचित् दुःसके साधनोंमें भी पवृत्त होकर अनेक योनिमें जन्मप्रयुच दुःसकी-अनर्थकी-ही प्राप्ति करेगा, अतः कभी भी दुःखक़े निशृत्त न होनेसे उसे तृप्ति नदीं दोगी, यद्द भाव है। २६

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२०२ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

दये निखिलापकर्पाध्यासनिवृत्तेरारोपितसातिशयत्वापायात् कृतकृत्यतेति विशेषोपपत्तेः निरुपाधिकप्रेमगोचरतया प्रकाशमानस्साक्ष्यानन्दोनावृत एवेति। सुखांशोऽस्यावृतो नाडस्ति न भातीत्यनुभूतितः । चिदंशोऽनावृतो वृत्या सौख्यव्यक्तिरितीतरे ॥१००। साक्षीका सुखांश आवृत रहता है, क्योंकि 'हमें आनन्द नहीं है, आनन्द नहीं भासता है' ऐसा अनुभव होता है। और साक्षीका चिदंश तो अनावृत है। सुखकी अभिव्यक्ति-प्रकाश-अन्तःकरणकी वृत्तिसे होती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं॥ १०० ॥ अन्ये तु-प्रकाशमानोऽप्यानन्दो 'मयि नास्ति, न प्रकाशते' इत्या-

सातिशयता होनेके कारण तृप्ति नहीं होती है। विद्याका आविर्भाव होनेके पीछे, तो सम्पूर्ण अपकर्षाध्यासकी निवृत्ति होनेसे आरोपित सातिशयत्वका निरास होनेसे कृतकृत्यता + होती है, इस प्रकार संसार और मुक्तिमें विशेष हो सकता है, अतः निरुपाधिक प्रेमकी विषयता होनेसे प्रकाशमान साक्षीरूप आनन्द अनावृत ही है। * कुछ लोग यह कहते हैं कि यद्यपि आनन्द प्रकाशमान है, तथापि

  • ज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति होनेसे मूलाज्ञानके कार्यकी भी अवश्य निधृत्ति होगी, इससे तत्कृत अपकर्ष आदि अध्यासकी निवृत्ति हो जानेसे मुकिदशामें कृतकृत्यता है। कृतकृत्यता- शब्दका अथ है-कृत्यम्-कतव्यजातम्, कृतम्-सम्पादितं येन,, इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे- जिसने अपना वास्तविक कर्तव्य सम्पादन कर लिया है, ऐसा पुरुष। तात्पर्य यह है कि पुरुषको जव तक ज्ञान नहीं हुआ है, तव तक दुःखकी निवृत्ति या सुखकी प्राप्तिके लिए अनेक प्रकारके यत्न करने पड़ते हैं और विद्याके उदित होनेपर तो सम्पूर्ण दुःखोंके विनष्ट होनेसे उत्कृष्ट धवल रूपका जैसे निर्मल दर्पणमें आविर्भाव होता है, वैसे ही-निरतिशय ब्रह्मस्वरूप आनन्दका आविर्भाव होता है, अतः दुःखकी निवृत्ति या सुखकी प्राप्तिके लिए कोई यलकी आवश्यकता नहीं रहती है। इसीलिए भगवान् पूर्णावतार श्रीकृष्णचन्द्रने गीतामें कहा है कि- 'एतड् वुध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत।' अर्थात् हे अर्जुन ! निरतिशय व्रह्मस्वरूप आनन्दको अपरोक्षरूपसे जानकर बुद्धिमान् (पण्डित) और कृतकृत्य हो जाता है, यह इसका भाव है। * इन लोगोंके मतमें पूर्वमतसे यह भेद है-साक्षीरूप चैतन्यको अनावृत माननेपर तदमिन्न आनन्द भी प्रकाशित होगा, अतः संसार और मुकतिमें कोई विशेष नहीं होगा, इस आक्षेपके समाधानमें अह्वैतविद्याचार्यने कहा है कि साक्षीरूप आनन्दको अनावृत मानें, तो.

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साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भापानुवादसहित २०३

वरणानुभवात् आवृत एव। एकस्मिन्नपि साक्षिण्यविद्याकल्पितरूपभेद- सम्भवेन चैतन्यरूपेणाSनावरणस्याऽडनन्दरूपेणाSऽवरणस्य चाऽविरोधात्। स्वरूपप्रकाशस्याSSवरणनिवर्तकतया प्रकाशमाने आवरणस्याSविरोधाच्। 'खदु-

'मयि नास्ति, न प्रकाशते' (मेरेमं वेदान्तप्रतिपाद्य ब्रह्मस्वरूप आनन्द नहीं है, हम उस आनन्दका प्रकाश नहीं होता है) इस प्रकारसे आवरणका अनुभव होनेसे आवृत ही है। यदपि साक्षी एक है, तो भी अविद्यासे कल्पित रूपमेदके होनेसे चैतन्यरूपसे अनावरण और आनन्दरूपसे आवरणके होनेमें कोई विरोध नहीं है। और [आगन्तुक वृत्तिरूप प्रकाशके ही आवरणका विरोधी होनेसे ] स्वरूपप्रकाश आवरणका निवर्तक नहीं है, अंतः स्वरूपके प्रकाश- मान होनेपर भी आवरणका विरोध+ नहीं है। 'तदुक्तमर्थ न जानामि'

भी संसार और मुक्तिमें विशेपता दो सकती है, इस मतमें साक्षीरूप आनन्दको आवृत मानकर पूर्वोक्त आक्षेपका परिदार करके संसार और मोक्षमें भिन्नताका प्रतिपादन किया गया है, साक्षीरूप आनन्दको आवृत माननेसे ही यह प्रतीति उपपन्न होती है-'वेदान्तप्रतिपाद स्वरूपानन्द सुकमें नहीं है और प्रकाशित नहीं होता है', यदि उसे आवृत न मानें, तो व्यवदारमें अतिप्रसिद्ध इस प्रतीतिका लोप प्राप्त होगा, इसलिए आनन्दके प्रकाशमान होनेपर भी संसारदशामें उसे आवृत मानना और मुकतिमें आवरणके विध्वस्त होनेसे उस परिपूर्णानन्दका स्फुरण मानना चाहिए। इसमें यह शक्रा अवश्य होती है कि यदि उसे आवृत माने तो अनोपाधिक प्रेमविषयत्व आत्मामें सदा नहीं होगा, क्योंकि वृत्ति द्वारा हुआ आनन्दका स्कुरण कादाचित्क हुआ करता है, परन्तु यद शह्ा अयुक्त है, क्योंकि आवृत्त और प्रकाशमान आनन्दमें फलवलसे निरुपाधिक प्रेमविषयत्वकी कल्पना करते हैं। इसीसे 'मासते एव परमप्रेमास्पदत्वलक्षणं सुखम्' (परम प्रेमास्पदत्वरूप सुख्न भासता है) इस विनरणके वचनका भी इसीमें तात्पर्य है। इसी अभिप्नायसे 'प्रकाशमान' यह आनन्दका विशेषण दिया गया है, अन्यथा प्रकाशमान आनन्दको आवृत मानना अतिचिरुद्ध होगा यद भाव है। +तात्पर्य यह है कि जैसे वस्तुस्थितिमें एक ही चैतन्यमें जीवख और ईशवरत्व रूप दो धर्म माने जाते हैं, क्योंकि 'में ईखवर नहीं हैँ, किन्तु संसारी हूँ' और 'मैं साक्षात् परमात्मा हूँ संसारी नहीं हूँ' ऐसरा अवस्थामेदसे व्यवदार होता है, ैसे ही 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान भानन्द नहीं है, इस रुपसे अहकारके अवमासके ज्ञानका आनन्दसे भेद-व्यवहार होता है, इसलिए चित्व और आनन्दत्व दो स्वरूप चैतन्यमें मानने ही चाहिएँ। इसी प्रकार जैसे एक ही चेतन्यमें जीवत्वावन्छेदेन अज्ञान और ईश्वरत्वावच्छेदेन अज्ञानके अभावकी कल्पना की जाती है, घैसे ही अहंकारके अवगासक चितमें आनन्दावच्छेदेन आघृतत्व और चित्वा- चच्छेदेन अनारृतत्वकी फल्पना फलके अनुसार करनी चाहिए।

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सिद्धान्तलेशंसंग्रह [प्रथम पीरच्छेद

कमर्थ न जानामि' इति प्रकाशमाने एवाSSवरणदर्शनाच्। न च तत्राऽनावृत- सामान्याकारावच्छेदेन विशेषावरणमेवाऽनुभूयते इति वाच्यम्, अन्यावरण- स्याऽन्यावच्छेदेन भानेऽतिप्रसङ्गाद्। न च सामान्यविशेषभावो नियामक इति नाऽतिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, व्याप्यव्यापकभावातिरिक्तसामान्यविशेष- भावाभावेन 'वहिं न जानामि' इति धूमावरकाज्ञानानुभवप्रसङ्गात्। तस्माद्यदवच्छिन्नमज्ञानं प्रकाशते, तदेवाऽडवृतमिति प्रकाशमानेऽप्यज्ञानं (तुमसे कथित अर्थको मैं नहीं जानता हूँ) इत्यादि स्थलमें सामान्यरूपसे आत्माके प्रकाश होनेपर भी आवरण देखा जाता है। इस विषयमें शक्का होती है कितदुक्तमर्थ०' इत्यादि स्थलमें आवरणरहित जो सामान्य आकार है, तदवच्छेदेन विशेषके आवरणका अनुभव होता है, प्रकाशमान सामान्यमें सामान्यका आवरण अनुमूत नहीं होता है, परन्तु यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्यके आवरणका अन्यावच्छेदेन भान नहीं होता है। इसपर यदि यह शङ्टा की जाय कि सामान्यविशेषभाव नियामक है, अतः दोष नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें यह प्रष्टव्य होता है कि सामान्य- विशेषभाव, क्या व्याप्य-व्यापकभावरूप है, या उससे अतिरिक्त है। द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि व्याप्यव्यापकभावसे अतिरिक्त सामान्यविशेषभावका निरूपण ही नहीं कर सकते हैं, यदि व्याप्यव्यापकभावरूप ही सामान्यविशेष भाव माना जाय, तो 'वहिको मैं नहीं जानता हूँ' इस प्रकार वहिके आवारक अज्ञानके अनुभवस्थलमें धूमके आवारक अज्ञानका भी अनुभव प्राप्त होगा। इससे यदवच्छिन्न (जिस वस्उसे विशेषित) अज्ञान प्रकाशित होता हो, वही वस्तु आवृत होती है, ऐसा मानना चाहिए, अतः वस्तुके प्रकाशमान होनेपर भी * गुरुने किसी एक शिष्यको उपदेश दिया-'आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र परमात्मा ही वेदान्तोंसे ज्ञातव्य है और वह परमात्मा दुर्जनोंसे नहीं जाना जाता है।' परन्तु इसपर भी मन्द शिष्यको अज्ञान रहता है कि आपने जिस् परमात्माके विषयमें उपदेश दिया है, उसे में नहीं जानता। शिष्यका तात्पर्य यह है कि महाराज ! आप्त वाक्य होनेसे आपके वाक्यका सामान्यतः। कुछ अर्थ तो है, किन्तु वह विशेष रूपसे प्रतीत नहीं होता है, इससे उक्त वाक्यसे वाक्यार्थत्वरूपसे सामान्य आकारके ज्ञात होनेपर भी वही सामान्य आकार विशेष चस्तुके आवारक सज्ञानके विषयरूपसे प्रकाशित होता है। इसलिए 'त्वदुकमर्थ न जानामि' इत्यादिमें, जो आवरणका विषय है, वह प्रकाशमान नहीं है और जो प्रकाशमान है, वह आवरणका विषय नहीं है, अतः उक्त अनुभष प्रकाशमान वस्तुके आधृ्तत्वमें प्रमाण नहीं है, यह शक्का करनेवालेका भाव है।

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सांक्षीरूप आनन्दका अनावृततत्व-विचार] भापानुवादसहित २०५

युज्यते। अज्ञानं च यथा साक्ष्यंशं विहाय चैतन्यमावृणोति, एवमा- नन्दमपि तत्तत्सुस्रूपवृत्तिकवलीकृतं विहायवाSवृणोति। स एव वैपयिका- नन्दस्याऽडवरणाभिभवः।सचाऽडवरणाभिभवः प्रत्यूपसमये वाह्याडवरणा डभिभववत् कारणविशेपप्रयुक्तवृत्तिविशेपवशात्तरतमभावेन भवति। अतः स्वरूपानन्दविपयानन्दयोः विपयानन्दानां च परस्परभेदसिद्धिरिति चदन्ति। सर्वथाऽपि साक्षिचैतन्यस्याऽनावृतत्वेनाऽSवरणाभिभवार्थ वृत्तिमनपेक्ष्यैव तेनाऽहङ्कारादिप्रकाशनमिति तुल्यमेव ।१६।। अहक्कारादिन: साक्षिभास्यस्य स्मरणं कथम्। सूक्ष्मावस्था हि संस्कारो वृत्तीनां स्यान्न साक्षिण: ॥१०१।। साक्षीसे प्रकाशित होनेवाले अहंकार आदिका स्मरण कैसे होगा? सूक्षमावस्थारूप संस्कार नृत्तियों का दो सकता है, साक्षीरूप नित्य चैतन्यका नहीं हो सकता है [और संस्कारके बिना स्मरण नहीं होता है]।१०१।। तद्विपयक अज्ञान रहता है, यह युक्त है। जैसे अज्ञान साक्षी अंशका त्यागकर अन्य चैतन्यका आवरण करता है, वैसे ही तत्-तत् सुखरूप वृत्तिके विषयी- भूत आनन्दका परित्यागकर अन्य आनन्दको ही आवृत करता है। यही अर्थात् सुखवृत्तिविपयत्वनिबन्धन अनावरकत्वस्वभाव ही-विपयप्रयुक्त आनन्दका (वृत्तिकृत) आवरणाभिभव है। जसे उपाकालम सूर्यके प्रकाशके तारतम्यसे वाह अन्धकारका अभिभव होता है, वैसे ही वृत्तिकृत वह आवरणा- भिभव भी विषयविशेपरूप कारणविशेपसे जन्य वृत्तिविशेषके आधारपर ही उत्कर्प और अपकर्परूप तारतम्यसे युक्त होता है। इसीसे *स्वरूपानन्द, विपयानन्दका एवं सनेक विपयानन्दोंका परस्पर भेद सिद्ध होता है, ऐसा कहा जाता है। साक्षीरूप चैतन्यके किसी अंशसे आवृत न होनेके कारण आवरणाभिभवके लिए वृत्तिकी अपेक्षा न करके ही उस साक्षीसे अहंकार आदिका प्रकाश होता है, यह तो दोनोंके + मतमें समान है॥। १६ ॥ * दशीसे अर्थात् वस्तुतः आनन्दके एक होनेपर भी उपाधियुक्त आनन्दका भेद माननेसे ही सवरपानन्द आदिका भेद होता है। तात्पर्य यह है कि विद्यासे आवरणकी निवृत्ति होनेसे प्रकाशमान आनन्द स्वरूपानन्द है, और अविद्याकी अनिवृत्तिदशामें घृत्षिके सम्चन्धसे प्रकाशमान आनन्द विपयानन्द कहा जाता है, इसी प्रकार वृत्तियोंके अनेक होनेसे विषयामन्द मी अनेक होते है, अतः विपयानन्दोंका भी परस्पर भेद है, यह जानना चाहिए। 1 सरूपानन्द के आश्तत्व पक्षमें अथवा अनायृतत्व पक्षमें, सह अर्थ है।

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२०६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

नन्वेवं कथमहङ्कारादीनामनुसन्धानम्, ज्ञानसूक्ष्मावस्थारूपस्य संस्का- रस्य ज्ञाने सत्ययोगेन नित्येन साक्षिणा तदाधानासम्भवात्। शृणु यद्वृत्यवच्छिन्नसाक्षिणा यत् प्रकाशयते। तत्संस्कारे हि सा धत्ते न त्वाकारव्यवस्थया ॥१०२।। सुनो, जिस वृत्तिसे अवच्छिन्न साक्षीसे जिस वस्तुका प्रकाश होता है, वह वृचि उस विषयके संस्कारको पैदा करती है, आकारव्यवस्थासे संस्कारको पैदा नहीं करती है। अथात् जिसके आकारमें परिणत जो वृत्ति हो, वह उसकिा संस्कार उत्पन्न करे, ऐसा नियम नहीं है।। १०२॥।

अन्ये तु विपयाकारवृत्तिस्थानित्यसाक्षिणा। त्रिपुटी भासिनाSSधानात् संस्कारस्य स्मृति जगु:॥।१०३।।

इतर लोग कहते हैं कि विपयाकार वृत्तिमें प्रतिफलित त्रिपुटीको प्रकाशित करनेवाले अनित्य साक्षीसे ही संस्कारके आधानसे स्मृति उत्पन्न होती है॥ १०३ ॥

यदि अहंकार आदिके अवभासमें अन्तःकरणकी अहक्काराद्याकार वृत्ति न मानी जाय, तो अहक्कार आदिका स्मरण कैसे होगा ? क्योंकि ज्ञानकी सूक्ष्म अवस्थारूप संस्कारके ज्ञानके अस्तित्वमें सम्भव न होनेसे नित्य साक्षीसे संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है। [तात्पर्यार्थ यह है कि वस्तुका अनुभव होनेसे उस अनुभवसे संस्कार उत्पन्न होते हैं, और उसी संस्कारसे कालान्तरमें उस वस्तुका 'स्मरण होता है। सिद्धान्तमें अनुभवके विनाशको अर्थात् अनुभवकी सूक्ष्मा- वस्थाको ही संस्कार माना है, इसलिए साक्षीकी जब तक अवस्थिति रहेगी तब तक उसका विनाश-सूक्ष्मावस्था-नहीं हो सकती है, और साक्षी तो स्वयं नित्य है, अतः उसकी किसी समयमें भी सूक्ष्मावस्था या विनाश होने- वाला ही नहीं, अतः संस्कारका अभाव होनेसे अहक्कार आदिके स्मरणका सम्भव नहीं है। आवरणाभिभवके लिए अहक्कार आदि गोचर अन्तः- करणकी वृत्ति भले ही न हो। परन्तु स्मरणकी उपपत्तिके लिए तो अवश्य अन्तःकरणकी वृत्ति माननी ही चाहिए ]।

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अहङ्गार आदिके अनुसन्धानका विचार] भापानुवादसहित २०७

अत्र केचिदाहु :- स्वसंसृष्टेन साक्षिणा सदा भास्यमानोऽहङ्गारस्तत्त्- घटादिविषपवृत्त्याकारपरिणतस्वावच्छिन्नेनापि साक्षिणा भास्यते इति तस्याऽनित्यत्वात् सम्भवति संस्काराधानं घटादौ विपये इव । नहि स्वाकारवृत्यवच्छिन्नसाक्षिणैव स्वगोचरसंस्काराधानमिति नियमोडस्ति । तथा सति वृत्तिगोचरसंस्कारासम्भवेन धृत्तेरस्मरणप्रसङ्गात्। अनवस्था-

इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि अहक्कारके साथ सम्बद्ध साक्षीसे सर्वदा भासमान अहक्कार तत्-तत् घट आदि विषयक वृत्तिके आकारसे परिणत अहक्वारावच्छिन्न साक्षीसे भी भासमान होता है, अतः घटादिविपयक वृत्तिसे अवच्छिन्न साक्षी चतन्यके अनित्य होनेके कारण घटादि विषयमें संस्काराधानके समान अहक्कारमें भी संस्कारका आधान होता है। [ तात्पर्यार्थ यह है कि अहक्कार आदिकी स्मरणोपपत्तिके लिए अहङ्कार आदि विषयक अन्तःकरणवृत्ति माननेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसके विना भी संस्कारकी उत्पत्ति द्वारा अहक्कारादिका अनुसन्धान हो सकता है, कारण कि जैसे अहक्वार साक्षीसे भासता है, से ही घट, पट आदि विपयाकार वृत्ति प्रतिविग्धित साक्षीसे भी भासता है, अतः वृत्त्यवच्छिन्न साक्षीरूप चैतन्यके वृत्तिप्रयुक्त अनित्य होनेसे उसकी सूक्ष्मावस्था हो सकती है, इसलिए सूक्ष्मा- वस्थारूप संस्कार द्वारा अहक्वार आदिके स्मरण होनेमें कोई वाधक नहीं है, क्योंकि अनित्य होनेसे घटादिविषयक वृत्त्यवच्छिन्न साक्षीरूप चैतन्य जैसे घटादि विपयोंमें संस्कारोंका आधान करता है, वेसे ही उसी वृत्त्यवच्छिन्न साक्षी रूप चैतन्यसे अहक्कार आदिमें भी संस्काराधान कर सकता है]। कारण कि यह नियम नहीं है-स्वाकारवृत्त्यवच्छिन्न साक्षीसे ही स्वविपयक संस्कारका आधान हो, क्योंकि ऐसा माननेसे वृत्तिगोचर संस्कारके असम्भव होनेसे वृत्तिका स्मरण भी नहीं होगा,

*तात्पर्य यह है कि दट्टके अनुसार ही किसी वस्तुकी कल्पना होती है, दष्ट विरुद्ध नहीं होती, अंतः अदद्वारसे भिन्न घट आदि स्थलोंमें घटाकार वृत्तिसे युकक चैतन्यसे ही घटका संस्कार उत्पन्न दोता है, यह देसा जाता है। इसलिए यही नियम लब्ध होता है कि स्वगोचरवृत्तिसे दी स्वगोचर संस्कारोंका आधान होता है, स्वशब्द प्रकृतमें घटादिपरक है। इस परिस्थितिमें कैसे मान सकते हैं कि अद्दारमें अन्य वृत्तिसे संस्कार उत्पन्न होते हैं? इस शाझाके समाधानमें कहते हैं कि यद्यपि दशानुमारी दी कल्पना होती है, तथापि इस नियममें कोई प्रमाण नहीं है, जिससे कि वह नियम माना जाय। यदि नियम मानो, तो वृत्तिकी स्मृतिके

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२०८ सिद्धान्त लेश संग्रह ['प्रथम परिच्छेद

पत्या वृत्तिगोचरवृध्यन्तरस्यानुव्यवसायनिरसनेन निरस्वत्वाद्। किन्तु यद्वृत्यवच्छिन्नचैतन्येन यत् प्रकाशते, तद्वृच्या तद्गोचरसंस्कारा- धानमित्येव नियमः । एवं च ज्ञानसुखादयोऽप्यन्तःकरणपृत्तयः तसाय :-

कारण कि अनवस्थाके भयसे वृत्तिगोचर अन्य वृत्तिका अनुव्यवसायके निराससे निरास किया गया है, किन्तु जिस वृत्तिसे युक्त चैतन्यसे जिसका प्रकाश होता हो, उस वृत्तिसे उस वस्तुके संस्कारोंका आधान होता है, ऐसा ही नियम है । इससे तपे हुए लोहेके पिण्डसे निकलते हुए विस्फुलिन्नका-जैसे

लिए अन्य वृत्ति माननी पड़ेगी, इस अवस्थामें अनवस्थासे अतिरिक् कुछ हाथ नहीं लगेगा, क्योंकि जैसे प्रथम वृत्तिके स्मरण आदिके लिए द्वितीय वृत्ति मानेंगे, वैसे ही द्वितीय वृत्तिके स्मरणके लिए तृतीय वृत्ति और तृतीय वृत्तिके स्मरणके लिए चतुर्थ धृत्ति, इस कमसे अनस्था प्रसक होगी। अनवस्थाशव्दका अर्थ है अप्नामाणिक-अनन्तपदार्थकल्पनाप्रयुक्तअनिष्ट प्रसन्न अथवा क्लम वस्तुसे सजातीय वस्तुओंकी परम्पराकी कल्पनाके विरामका अभाव, इसलिए वृत्तिगोचर अन्य वृत्ति नहीं मान रीकते हैं, अतः प्रकृतमें उक्त शक्ाका स्थान है नहीं। * इस नियमका भाव यह है-यह बात पूर्वमें ही कही जा चुकी है कि अप्रयोजक होनेसे स्व्राकार वृत्तिसे युक्त साक्षीसे ही स्वगोचर संस्कारोंका आधान होता है, यह नियम नहीं है, किन्तु जिस वस्तुके आकारमें परिणत धृत्तिमॅ ग्रतिफलित चैतन्यमे जितनी वस्तुओंका आभास होता हो, उस वस्तुके आकारमें परिणत वृत्तिसे प्रकाशित सम्पूर्ण वस्तुंमें संस्कारोंका आधान होता है। घटाकार वृत्तिसे अवच्छित्न चैतन्यमें पटका प्रकाश नहीं होता है, अतः उस वृत्तिस्े पटके संस्कारका आधान नहीं होता है, इसलिए पूर्वोंक्त अतिमंकुचित नियम माननेकी आवश्यकता नहीं है। घटाय्याकार उत्त्यवच्छित चैतन्यमें अह्द्वारका भी प्रकाश होता है, इस विषयका निरूपण मूलमॅं ही 'स्वसंसष्ट' इत्यादि अ्रन्थसे किया गया है, अतः अहकर- गोचर संस्कारका आधान होगा। प्रकृतमें और एक शङ्का होती है कि यद्यपि अहकवार आदिका उक्त वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे प्रकाश होनेसे तद्रोचर संस्कारका आधान हो सकता है, तथापि उक्त चैतन्यसे वृत्तिका तथा सुख और दुःख आदिका प्रकाशन नहीं होनेसे उससे धृत्ति आदिमें संस्कारका आधान कैसे होगा? इस राङ्ाके समाघानार्थ यदि वृत्ति आदि गोचर वृत्ति मानी जायगी, तो अनवस्था प्रसक होगी? और यदि वृत्ति आदिकी वृत्तियोंको कियारूप न मानकर ज्ञानरूप स्वीकार करके अनवस्थाका परिहार किया जाय, तो भी युकतियुक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानरूप वृत्तिका उत्पादक ही कोई नहीं है-मन ज्ञानका करण नहीं है, इसका भगे विचार किया जायगा, क्रियारूप मानेंगे, तो अनवस्थापिशाचिनी अवश्य उतरेगी, इससे वृत्ति आादिके संस्कारोंकी अनुपपत्तिका प्रसद्व कैसे हटेगा? इसपर 'एवं च' इत्यादि प्रन्धसे परिहार करते हैं। भाव यह है कि अन्तःकरणमें जिन-जिन वृत्तियोंका उद्धव होता है, वे चाहे ज्ञानरूप हों या ज्ञानरुप न हो, परन्तु वे सबकी-सव सवसे (अहज़ार या ज्ञान) और स

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अहक्वार आदिके अनुसन्धानका विचार] भापानुवादसहित २०९

पिण्डाद् व्युचरन्तो विस्फुलिङ्गा इव स्वस्व्रावच्छिन्नन वह्निनेव स्वस्त्रवच्छिन्ने- -नाऽनित्येन साक्षिणा भास्यन्ते इति युक्तं तेष्वपि संस्काराधानम्। यस्तु- 'घटैकाकारधीस्था चिद् घटमेवाऽवभासयेत्। घटस्य ज्ञातता न्रह्मचैतन्येनावभासते॥४॥ इति कूटस्थदीपोक्तो विपयविशेपणस्य ज्ञानस्य विपयावच्छिन्नत्रम्म- चैतन्यावभास्यत्वपक्षः, यक्ष तत्त्वप्रदीपिकोक्तो ज्ञानेच्छादीनामनवच्छिन्न- शुद्धचैतन्यरूपनित्यसाक्षिभास्यत्वपक्षः, तयोरपि चैतन्यस्य स्वसंसृष्टापरोक्ष रुपत्वाद् वृत्तिसंसर्गोऽवश्यं वाच्य इति तत्संसृष्टानित्यरूपसद्भावान्न तेपु संस्काराधाने काचिद्नुपपन्तिरिति। विस्फुलिन्से युक्त वहनिसे प्रकाश होता है, वैसे ही ज्ञान, सुख आदि अन्तःकरण- वृत्तियोंका स्व-स्वावच्छिन्न अनित्य साक्षीसे प्रकाश होता है। अतः अहक्कार आदिमं संस्कारोंका आघान युक्त ही है। जो कि-'घटैकाकारधीस्था०' (घटाकारवृत्तिम स्थित चिदाभास अर्थात् घटाकारवृत्तिप्रतिविम्वित घटज्ञान घटको ही प्रकाशित करता है और घटकी ज्ञातता [घटमें रहनेवाली वटज्ञानकी विपयता अर्थात् विषयतासम्बन्धेन विषयनिष्ठ ज्ञान ] न्रवाचैतन्यसे ही प्रकाशित होती है) इस प्रकार कूट- स्थदीपमं कहा गया-चिपयके विशेषणीभूत ज्ञानका विपयार्वच्छन्न त्रश्चेतन्यसे प्रकाश होता है-यह पक्ष और तत्त्वप्रदीपिकामें कहा गया-'ज्ञान, इच्छा आदि अनवच्छिन्न-शुद्ध चेतन्यरूप नित्य साक्षीसे प्रकाशित होते हैं'-यह पक्ष-इन दोनों पक्षोंमें भी चतन्यके स्वसंसृष्ट वस्तुके अपरोक्ष ज्ञानरूप होनेसे वृत्तिका सम्बन्ध अवश्य अपेक्षित है, इसलिए इच्छा आदि-वृत्तिसे संसृष्ट साक्षीका अनित्यरूप होनेसे इच्छा आदिमें संस्कारके आधानमं कोई अनुपपत्ति नहीं है*। (पततिये) अवच्छित वैतन्य साक्षीसे प्रकाशित होती हैं। चैतन्यके सचमुच नित्य होनेपर भी मास्यरुपसे अवच्छेदयरूपसे उत्पद्यमान अद्कार आदि धर्मोके अनित्य होनेसे उन धर्मोंसे विशिष्ट उनका अवभासक चैतान्य अनित्य है, अतः उसकी सूक्ष्मावस्थारूप उन धर्मोका संस्कार उत्पन्न हो सकता है, इसलिए पत्ति आदिका स्वगोचर संस्कार द्वारा स्मरण हो सकता है। अ्रकृतमें स्वपद्से अद्क्वारका और द्वितीय स्वपदसे वृत्तिका ्रदण है। यद्यपि साक्षी वस्तुतः नित्य दै, तथापि औपाधिक अनित्यत्व उसमें है, यह भाव है। * प्रकृतमें शक्काका भाव यह है कि ऊपरके 'घटैकाकार' इत्यादि कहे गये दो पक्षोंमें यह २७

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२१० सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

अन्ये त्वविद्यावृत्त्येव सौपुप्तस्मृतिक्लृप्या। अहङ्कारादिभानेन संस्कारं सम्प्रचक्षते ॥ २०४ ॥ कोई लोग कहते हैं कि सुपुसिकालीन अविद्याकी स्मृतिमें कलस अविद्या- वृत्तिसे ही अहंकार आदिका भान होनेसे उसीसे अहमर्थके संस्कारका आधान होता है॥। १०४ ॥ अन्ये तु सुषुप्तावप्यविद्याद्यनुसन्धानसिद्धये कल्पितामविद्यावृत्तिमह- माकारामङ्गीकृत्याऽहमर्थे संस्कारसुपपादयन्ति। न चाऽस्मिन् पक्षे 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवासम्' इति अन्य- ज्ञानधाराकालीनाहमर्थानुसन्धानानुपपत्तिः। अवच्छेदकभेदेन सुखदुःख-

कुछ लोग-उठनेके बाद अविद्या आदिके स्मरणकी उपपत्तिके लिए सुपुप्ति अवस्थामें अहमाकार अविद्याकी वृत्तिको मान कर-अहमर्थम संस्कारका उपपादन करते हैं। इसपर शक्का होती है कि इस पक्षमें 'एतावन्तं कालम्" 'इतने समयतक मैं इसे देखता ही रहा' इस प्रकार अन्य वस्तुके ज्ञानकी धाराके कालके अहमर्थका अनुसन्धान (स्मरण) नहीं होगा? क्योंकि एक

ज्ञात होता है कि ज्ञान, इच्छा आदिका अवभासक नित्य चतन्य ही है, इसलिए उसकी सूक्ष्मावस्था न होनेके कारण उन ज्ञान आदिमें संस्कारोंका आधान नहीं हो सकेगा। यंदि यूर्वोंक् रीतिसे ज्ञानादिको स्व-स्वावच्छिन साक्षिचतन्यभास्य मानकर इन पक्षोंमें संस्कारोंका आधान माना जाय, तो 'ज्ञातताशब्दसे कहा जानेवाला घटादिगोचर वृत्तिप्रतिविम्वित ज्ञान घटाकार वृत्तिसे अयुक्त विषयाधिष्ठानरूप ब्रह्माचैतन्यसे ास्य है' इस कथनसे विरोध होगा और ज्ञान, इच्छा आदि अनवच्छिन साक्षीसे मास्य हैं, इस द्वितीय पक्षके साथ भी विरोध होगा, अतः इन पक्षोंमें संस्कारों का आधान कैसे होगा? इसपर 'तयोरपि' इस गन्थसे उत्तर देते हैं। सारांश यह है कि विषयावच्छिन व्रह्मचैतन्य ज्ञातताका अवभासक है, इस मतमें वद ब्रह्मचैतन्य ज्ञातताका अपरोक्षज्ञानरू ही माना जाता है, क्योंकि 'यह घट ज्ञात है' इस प्रकार ज्ञातताका अपरोक्ष अवभास होता है। तथा अनवच्छिस् शुद्ध चतन्यको भी ज्ञान आदिका अपरोक्ष अवभासरूप मानना चाहिए, क्योंकि उन वृत्तियोंका भी अपरोक्ष भान होता है। इस परिस्थितिमें उक्त दो प्रकारके चैतन्यका स्व्रविपय ज्ञान, इच्छा आदिके साथ सम्वन्ध अवश्य होगा, क्योंकि जो अपरोक्ष ज्ञान होता है, वह अपने तादात्म्यापन्न विपयोंका अनुभवरूप है, ऐसा नियम है। इसलिए अपने विषयभूत ज्ञान, इच्छा आदिके विनाश समयमें ज्ञानादिस विशिष्ट उक्त द्विविध चतन्य भी अवश्य विनष्ट होगा, अतः चतन्यविनाशरूप संस्कार- का आधान, इन पक्षोंमें भी उपपत्न हो सकता है। • इस मत में पूर्वमतसे विशष यह है कि यदि 'स्वाकारवृत्तिसे ही संस्कारोंका आघान

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अंहकार आदिके अनुसन्धानका विचार] भाषातुंवादसहित २११

  • माकाराविद्यावृत्तिसन्तानसम्भवादिति। उपास्तिवन्मनोदृत्तिरियं न ज्ञानमिष्यते। प्रत्यमिज्ञा स्मृतिज्ञानं तत्तांश इति चापरे ॥ १०५ ॥ यह अहमाकारवृत्ति मनोवृत्ति है और वह उपासनाके समान क्ान नहीं है, प्रत्यभिन्ा मी तत्तांशमे सी त्मृतिवान है, सहमंक्मे नहीं, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं॥। १०५॥

कालमं दो वृत्तियाँ नहीं हो सकती, नहीं, यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदक । सिर, पैर आदि देशके नेदसे जैसे सुख़ और दुःख दोनों एक ही समयंम माने जाते हैं, वसे ही एक कालमें दो वृत्तियोंका स्वीकार करनेमें किसी प्रकारके विरोधके न होनेसे ज्ञानान्तरकी धाराके समयमं भी अहमाकार अविद्यार्की वृत्तिका प्रवाह हो सकता है।

होता है' यद नियम माना जाय, तो भी कोई अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि अविद्या पृत्तियोंसे, जो कि अहहार और तदमोंको विषय करती हैं, अद्दद्वार आदिमें संस्कारोंक आवान होगा। अविद्ापृत्ति अनुमके योग्य नहीं है, अतः ज्ञान या संसकारके लिए अन्य वृत्ति माननी नहीं पढ़ेगी, इसलिए पूर्वोचा अनवस्था भी नहीं होगी। मुघुपिमें अज्ञान आदिका अनुभव दोनेमे अविदावृत्ति माननी भी पढती है, अतः यह कल्पना नवीन भी नहीं होगी। अददाराकार अविद्यापृत्तिके स्वीकार करनेमे अदक्वार आदि केवल साक्षीसे वेद हैं, इस सिद्धान्तके साथ विरोध होगा? नहीं, क्योंकि केवल वाक्षीवेद्यत्वका अर्थ हे-ज्ञानात्मकपृत्तिसे अनुपहित माक्षीसे वेघ, क्लम ज्ञानकारणसे जन्य न होनेके कारण अविद्ापृत्तिको ज्ञानरूप नहीं मानते हैं। अवच्छेदशब्दका प्रकृतमे अर्थ है-मप्तमीविभकिसे निर्देश्य विलक्षण विशेषण। प्रकृतमें 'शिरधि मे वेदना' 'पादे मे मुखम्' (माथेमें मुझे दर्द है, और पैरमें मुख है) इसमें 'शिरमि' और 'पादे' इस सप्मी चिमकिसे विलक्षण अवच्छेदक-विशेषण-कहा जाता है, अतः इन अवच्छेदकोंके भेदसे जैसे एक कालमें सुख और दुःख दोनों माने जाते हैं, वैसे - ही एक कालमें अर्थान अन्य ज्ञानधाराकालमें अन्य वस्तुविषयक अन्तःकरणकी वृत्ति और अदमाकार अविद्याकी पृत्ति प्रमातामें अवच्छेदकमेदसे मानेंगे। इसमें कोई विरोध नहीं है, यह तात्पये है। अर्यात् अन्तःकरणकी वृत्तियोंका जो प्रवाद है, वही धारा है, इसलिए तत्कालीन

है, यह भाव हे। अविदाशनि भी सन्ततिरप ही होगी, इस सम्भावनामात्रसे गूलमें 'अविद्याृत्तिसन्तान' कहा गया

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सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रंथम परिच्छेद

अपरे तु-अहमाकारा वृत्तिरन्तःकरणवृत्तिरेव। किन्तु उपासनादि- वृत्तिवन्न ज्ञानम्, क्लप्ततत्करणाजन्यत्वात्। नहि तत्र चक्षुरादिप्रत्यक्ष- लक्षणं सम्भवति, न वा लिङ्गादिकम्। लिङ्गादिग्रतिसन्धानशून्यस्याऽप्य- हङ्कारानुसन्धानदर्शनात्। नाऽपि मनः करणम्, तस्योपादानभूतस्य क्कचि- दृपि करणत्वाक्लस्तेः। तर्हिं अहमर्थप्रत्यभिज्ञाऽपि ज्ञानं न स्यादिति चेद्, न; तस्या अहमंशे ज्ञानत्वाभावेऽपि तत्तांशे स्मृतिकरणत्वेन क्लपसंस्कार-

कुछ* लोग कहते हैं कि अहमाकार वृत्ति अन्तःकरणकी वृत्ति ही है, [अविद्याकी वृत्ति नहीं है ] किन्तु अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्ति- उपासना आदि वृत्तियोंके समान ज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि क्लस् जो ज्ञानके चक्षुरादि करण हैं, उनसे ( वह वृत्ति) जन्य नहीं है। क्योंकि न तो उस वृत्तिमें चक्षु आदि इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष प्रमाण हैं और न हेतु आदि अनुमानादि प्रमाण हैं। तथा लिद्गादि-ज्ञानके विरहकालमें भी अहमर्थका अनुसंधान होता है, इससे भी लिंगादि अन्तःकरणवृत्तिके कारण नहीं हैं। और मन भी ज्ञानका करण नहीं है, क्योंकि उसके उपादान होनेके कारण + किसी भी वृत्तिज्ञानका वह करण नहीं हो सकता है। इस परिस्थितिमें शङ्का होती है कि अन्तःकरणसे होनेवाली अहमर्थकी प्रत्यभिज्ञा भी ज्ञानात्मक नहीं होगी? नहीं, यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उस प्रत्यभिज्ञाके 'अहम्' अंशमें ज्ञानत्व न होनेपर भी तत्ता अंशमें ज्ञानत्व है, कारण कि स्मृतिके करणरूपसे

  • इन लोगोंका कहना है कि जव अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्तिसे ही अहमर्थमें संस्कारोंका आधान हो सकता है, तो अविद्याकी वृत्ति क्यों मानना? यदि शङ्का हो कि सुख और दुःख तो एक कालमें हो सकते हैं, परन्तु एक कालमें दो ज्ञान नहीं हो सकते हैं, अतः अंहमर्थगोचर अन्तःकरणवृत्ति अन्य ज्ञानकी धारा कालमें कैस होगी, तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि जो अन्तःकरणकी अहमाकारवृत्ति संस्कारार्थ है, वह ज्ञानरूप नहीं है, अतः दोष नहीं है। + जो जिस कार्यका उपादान होता है, वह उस कार्यका करण नहीं होता, क्योंकि करण धही होता है, जो व्यापारवान् होकर असाधारण कारण हो। घटकी उपादान कारण मृत्तिकामें घटकरणत्वका व्यवहार नहीं होता है, अतः अन्तःकरणवृत्तिके प्रति अन्तःकरण, जो उस् वृत्तिका उपादान है, करण नहीं होगा, इस अभिमानसे सूलमें 'तस्योपादानभूतस्य' इत्यादिसे मनमें करणत्वका निरास करते हैं, यह भाव है।

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अंहंक्क्रार आदिके अनुसन्धानका विचार] भापानुवादसहित २१३

जन्यतया ज्ञानत्वात्। अंशभेदेन ज्ञाने परोक्षत्वापरोक्षत्ववत् प्रमात्वा- - प्रमात्ववच् ज्ञानत्वाज्ञानत्वयोरपि अविरोधादित्याहुः। इतरे ज्ञानमेवेयं मनसोऽपीन्द्रियत्वतः। वाद्यार्थेप्वेव वृत्तीनामावृत्यभिभवः फलम् ॥ १०६॥ मन मी इन्द्रिय है, अतः अह्मर्थाकार मनकी वृत्ति ज्ञान ही है। और आवरणका विनाश करना वृियोंका फल वाह अथोमें ही है॥ १०६ ॥ इतरे तु-अहमाकाराऽपि वृत्तिर्ज्ञानमेव, 'मामहं जानामि' इत्यनुभ- वात्। न च करणासम्भवः, अनुभवानुसारेण मनस एवजन्तरिन्द्रियस्य करणत्वस्यापि कल्पनादित्याहुः ॥१७॥ निश्चित संस्कारसे वह जन्य है। अंशके मेदसे + ज्ञानमें जैसे परोक्षत्व और अपरोक्षत्व माना है, और अंशके मेदसे ममात्व और अप्रमात्व माना जाता है, वैसे ही अंशके मेदसे ज्ञानत्व और अज्ञानत्वके एकत्र अवस्थानमें भी कोई विरोध नहीं है। कुल लोग तो यह कहते हैं कि अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्ति ज्ञान ही है। कारण कि 'मामह्म्०' (मैं अपनेको जानता हूँ) ऐसा अहमर्थाकार वृत्तिमें साक्षात् ज्ञानत्वका अनुभव होता है। परन्तु मनके करणत्वका तो निरास है? नहीं, क्योंकि अनुभवके अनुसार मनमं, जो कि अन्दरकी इन्द्रिय है, ज्ञान- करणत्वकी भी कल्पना की जा सकती है* ॥ १७ ॥

1 जये 'पर्वतो वद्िमान्' इत्यादि अनुमितिमें पर्वत अंशमें अपरोक्षत्व है और वदि अंशमें परोक्षत्व है, तथा 'इद रजतम्' इसमें इदमंशमें प्रामाण्य है और रजत अंशमें अप्रामाण्य है, वैसे ही 'जिस मैंने स्वपमें श्रीकृष्णका अनुभव किया है, पदी में इस समयमें उसका स्मरण करता हूँ' इस प्रत्यभिज्ञामें अदमंशमें ज्ञानत्वाभाव और तत्तांशमें ज्ञानत्वका स्वीकार किया जाता दै, क्योंकि अनुभव वैखा ही होता है। प्रत्यमिज्ञा-संस्कार और इन्द्रिय दोनोंसे होनेवाला जान, यह भाव है। *ैं इख मतानुयायियों का कहना है कि पूर्वकी टिप्पणीमें जिस प्रत्यमिशाका उल्लेख किया है, उसको अह्मर्थमें भी ज्ञान ही मानना चाहिए। अन्यथा सूत्र और भाष्यमें अन्त :- फरणोपदित चैतन्यात्मक अदमर्थ जीवकी प्रत्यभिश्ञाके वलसे जो स्थायिताका साधन किया गया है, वह विरुद्ध होगा। इख अर्थमें प्रमाणभूत म्रहासूत्र भी है-'अनुस्मृतेय' [अ० २ पा० २ सृ २५] अनुस्मृति-प्रत्यभिक्षा। इसी प्रकार इस सूत्रके भाष्यमें कहा ह-'य एवाडं पूर्वशुर्द्राक्षम्, स एवाउदमद्र स्मरामि' (जिस मने प्रथम दिन देखा था, वही

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२१४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [पंथम परिच्छेद

एवं सति वाह्यविषयापरोक्षवृत्तीनामेवावरणाभिभावकत्वनियमः पर्यवसन्नः । शुक्तयादौ नन्विदंवृत्त्याSSवरणाभिभवो नहि। रूप्याव्यासाद्यसंसिद्धेरत्र केचित् प्रचक्षते ।। १०७ ॥। परन्तु वाह्यवृत्तियोंका भी आवरणका अभिभव फल नहीं हो सकता है, क्योंकि शुक्तिरजतादि स्थलमें इदमाकार वाह्यवृतिसे अज्ञानका अभिभव नहीं देखा जाता है, यदि उक्त स्थलमें आवरणाभिभव फलको हठात् मानोगे, तो शुक्तिमें रजतका अध्यास ही सिद्ध नहीं होगा, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।। १०७ ॥ नतु नाऽ्यमपि नियम:, शुक्तिरजतस्थले इदमाकारवृत्तेरज्ञानानभि- भावकत्वात्। अन्यथोपादानाभावेन रजतोत्पच्ययोगादिति चेत्,

इस अवस्थामें अर्थात् अहमाकार अपरोक्ष वृत्तिके स्वीकार करनेपर यही नियम प्राप्त होता है कि वाह्यके घट आदि विषयाकारोंमें परिणत वृचियां ही आवरणकी अभिभावक हैं-विनाशक हैं। परन्तु यह भी नियम नहीं हो सकता है-वाह्यविषयगोचर अपरोक्ष- वृत्ति अज्ञानकी विनाशक है, क्योंकि शुक्तिरजतभ्रमस्थलमें इदमाकार (वाह्यगोचर) अपरोक्षवृत्तिके होनेपर भी वहां अज्ञानका विनाश नहीं होता

मैं आज स्मरण करता हूँ) इसलिए प्रत्यभिज्ञाके अहमर्यमें ज्ञानत्वाभावका कथन अयुक्त ही है। 'मैं अपने को जानता हूँ' इसमें अह्मर्थ वृत्तिमें अतिस्फुट ज्ञानत्वका अनुभव होता है। 'बुद्धे: करणत्वाभ्युपगमात' (अन्तःकरण करण माना जाता है) इस (व्र० सू० अ० २ पा० ३ सू० ४० के) भाष्यके अनुसार मनको करण माननेमें कोई हानि भी नहीं है। इसीसे भाष्यकारने मनमें प्राणपादमें इन्द्रियत्वका साधन भी किया है। इस मतमें 'अज्ञान आदि केवल साक्षीसे भास्य है, यह सिद्धान्त भी अहमर्थव्यतिरिक् अज्ञान, सुख आदि विषयक है। यदि मन इन्द्रिय माना जाय, तो रूपके प्रत्यक्षमें जैसे चक्षु प्रमाण है, वैसे अहमर्थमें वह भी प्रमाण हो जायगा, और वह हो नहीं सकता, क्योंकि अज्ञातज्ञापकतवरूप (अज्ञात वस्तुका ज्ञापन) प्रमाणका लक्षण मनमें नहीं घटता है, कारण कि अहमर्थके अनावृत साक्षीरूप चतन्यमें अध्यस्त होनेके कारण अहमर्थ अज्ञात नहीं है? यह शङ्का नहीं हो सकती है, क्योंकि अवाधितानुभवत्व या तद्दति तत्प्रकारकज्ञानत्व ही प्रमात्व है, इस मतके अनुरोधसे मनको अहमाकार ज्ञानके प्रति करण माननेमें विरोध नहीं है, अतः अहमाकार ज्ञानको प्रमा और उसके करण मनको प्रमाण माननेमें हानि नहीं है।

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सकारण अध्यासका विचार] भापानुवादसहित २१५

इदमाकारवृत्येदमंशे मोहक्षिताषपि। शुक्त्याद्यंशेऽक्षितत्वेन. रजताद्युन्भवस्ततः ॥ १०८॥ अत एव स्फुरन् भ्रान्तावाधार इदमंशकः । शुक्तयाद्यंशस्त्वधिष्ठानं सकार्याज्ञानगोचरः ॥ १०९॥ इदमाकार वृचिसे इदमंत्र्मे आवरणका नाश होनेपर भी शुक्ति आदि अंशमें आवरणका विनाश न होनेसे उस अज्ञानसे रजतका उन्दव होता है। इसीसे भ्रान्तिमें स्फुरनेवाला इदमंश आधार ऐ और रजतादिविक्षेपके साथ अज्ञानका विषय शुक्ति आदि अंद अधिषठान है॥ १०८॥ १०९ ॥

अत्राहु :- इदमाकारवृत्या इदमंशाज्ञाननिवृत्तावपि शुक्तित्वादिविशेपां- शाज्ञानानिवृत्ते: तदेव रजतोपादानम्, शुक्तित्वाद्यज्ञाने रजताध्यासस्य वज्ाने तदभावस्थाऽनुभूयमानत्वात्। अध्यासभास्यटीकाविवरणे अनुभूय- मानान्व्रयव्यति रेकस्यैवाऽज्ञानस्य रजताद्यध्यासोपादानत्वोक्तेः।

है, [अतः व्यभिचार है ] यदि इदमाकार वृत्तिको उक्त स्थलमें अज्ञानका अभिभावक मानेंगे, तो अज्ञानरूप रजतोपादानका अभाव होनेसे शुक्तिमें रजतकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकेगी ? इस आक्षेपके समाधानमें कोई कहते हैं कि इदमाकार वृत्तिसे इदमंशके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर भी शुक्तित्व आादि विशेप-अंशके अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होनेसे वही विशेष अंशका अज्ञान रजत आदिका उपादान है, क्योंकि शुक्ित्व आदिके अज्ञानके होनेपर रजतका अध्यास होता है और शुक्तित्व आदिके अज्ञानके न होनेपर रजतका अध्यास नहीं होता है, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक देखे जाते हैं। और अध्यासभाष्यकी पश्चपादिका नामकी टीकाके विवरणमें *- जिसके अन्वय और व्यतिरेक अनुभूयमान हैं,

  • श्रीपद्मपादाचार्यकृत पवपादिका शाहरभाष्यकी टीका है, वह सम्पूर्ण भाष्यके ऊपर उपलब्ध नहीं होती। प्रकाशात्मयतिकृत विचरण इसकी टीका है, ये दोनों चतुःसूत्री तक सुद्रित है। इस विचरण में अन्वय और व्यतिरेकसे अज्ञान अध्यासका उपादान कारण माना गया ३ै, हाँकी कुछ पंचियां इस प्रकार है- 'ननु कथ मिथ्याऽज्ञानमध्यासस्योपादानम्? तस्मिन् सति अध्यासस्योदयादसति चानुदया- दिति बृमः । ननु अध्यासस्य प्रतिबन्धकं तत्त्वज्ञानं तदभावश्ाज्ञानमिति प्रतिन्धकाभाव

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२१६ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

अत एव शुक्त्यंशोऽघिष्ठानम्, इदमंश आधारः। सविलासाज्ञानवि- पयोऽधिष्ठानम्, अतद्रूपोऽपि तद्रूपेणाSडरोप्यबुद्धौ स्फुरन्राधार इति संक्षेपशा- रीरकेऽपि विवेचनादिति।

ऐसा-अज्ञान ही रजत आदि अध्यासके प्रति उपादान कहा गया है। * इसीसे शुक्त्यंश अर्थात् शुक्तित्वरूप विशेषधर्मसे पुरोवर्ती पदार्थावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है और इदमंश आघार है। क्योंकि अधिष्ठानका अर्थ है- रजत आदि विक्षेपसे युक्त अज्ञानका विषय, और आधारशव्दका अर्थ है- तद्ूप न होनेपर भी तद्रूपसे आरोप्यवुद्धिमें स्फुरनेवाला अर्थात् सचमुच अध्यस्त रजत आदिरूप न होकर रजत आदिरूपसे रजतादि वुद्धिमें भासने-

विषयतयाSज्ञानस्याSध्यासेनSन्वयव्यतिरेकावन्यथासिद्धौ, नैतत्सारम्, पुष्कलकारणे हि सति कार्योत्पादविरोधि प्रतिवन्धकम्, न चाऽध्यासपुष्कलकारणे सति तत्त्वज्ञानोदयः, तस्मानान्वयव्य- तिरेकौ प्रतिबन्धकाभावविषयौ, तथापि विरोधिसंसर्गाभाव इति चेत्' ............. मिध्याज्ञान- मेवाध्यासोपादानम्, नात्मान्तःकरणकाचादिदोषा इति सूकतम्, [दरष्टव्य-भामती, आदि नव- व्याख्यायुत शाङ्गरभाष्य पृ० ८९ कलकत्ता सुद्रित ] शङ्गा-मिथ्याज्ञान अध्यासका उपादान कैसे है? समाधान-मिथ्याज्ञानके रहनेपर अध्यास होता है और न रहनेपर नहीं होता है, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक ही प्रमाण हैं। शङ्का-अध्यासका प्रतिवन्धक तत्त्वज्ञान है और तत्त्वज्ञानका अभाव अज्ञान है, इस प्रकार प्रतिवन्धकाभावविषयक होनेसे अज्ञानके साथ अन्वय और व्यतिरेक अन्यथासिद्ध हैं? समाधान-नहीं, क्योंकि प्रतिबन्धकका अर्थ है-पुष्कल (सव) कारणके रहते कार्यकी उत्पत्तिमें विरोधी। और अध्यासके कारणोंके रहते तत्त्वज्ञान नहीं होता है, इससे उक्त अन्वय और व्यतिरेक प्रतिबन्धकाभावविषयक नहीं हैं, शङ्का-तथापि विरोधिससगाभावविषयक होंगे? नहीं .... "इत्यादिसे अनेक प्रकारकी आशङ्का करके अन्तमें स्थिर किया गया है कि अध्यासका उपादान कारण मिथ्या अज्ञान ही है, आत्मा, अन्तःकरण या काचादि दोष नहीं हैं, यह उपर्युक्त पडक्तियोंका आशय है। *. तात्पर्ये यह है कि शुक्तित्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट पुरोवर्तीं पदार्थ ही यदि प्रातिभाषिक रजतके कारण अज्ञानसे आवृत माना जाय, तो वह रजत्त्वादि विशिष्ट द्रव्य अधिष्ठान होगा, इदन्त्वविशिष्ट इदमंश नह्दीं होगा, क्योंकि जो अज्ञानसे आवृत होता है, वही अधिष्ठान होता है,- इस अवस्थामें अधिष्ठान और आरोप्यके एकज्ञानविषयत्व नियमसे 'शुक्ति रजत है' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, 'इदं रजतम्' यह प्रतीति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इदमंश अधिष्ठान नहीं है, इसलिए अधिष्ठान और आधारका लक्षण पृथक् पृथक करते हैं, इस पारस्थितिमें इस मतके अनुकूल यही नियम होगा कि आधार और आरोप्य (आरोपके विषय) ही एक ज्ञानके विषय होंगे, अधिष्ठान और आरोग्य नहीं।

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सकारण अध्यासका विचार] भापानुवादसहित २१

अन्ये वृत्येदमज्ञानावरणांशपरिक्षयात्। विक्षेपांशेन रजतं जीवन्मुक्ती जगद्यथा ।। ११० ॥ कुछ लोग कहते हैं कि वृचिसे इदमंशके अश्ञानके आवरणांशके नष्ट होनेपर भी : उसके विक्षेप अंशसे रजतकी उत्पत्ति होती है, जैसे जीवन्मुक्तिमें जगत् ॥ ११० ॥ अपरे तु-'इदं रजतम्' इति इदमंशसम्भिन्नत्वेन प्रतीयमानस्य रजतस्य इदमंशाज्ञानमेवोपादानम्। तस्य चेदमाकारवृत्या आवरणशक्ति- मात्रनिवृत्तावपि विक्षेपशक्त्या सह तदनुवृत्तेः नोपादानत्वासम्भवः । जल- प्रतिनिम्बितवृक्षाधोऽग्रत्वाध्यासे जीवन्मुक्त्यनुवृत्ते प्रपश्चाध्यासे च सर्वा-

वाला, इस प्रकार अधिष्ठान और आधारका संक्षेपशारीरकमें भी विवेचन + किया गया है ? $ 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस प्रकार इदमंशके तादात्म्यरूपसे प्रतीयमान रजतके प्रति इदम् अंशका अज्ञान ही उपादान कारण है। इदमाकार वृत्तिसे उस अज्ञानकी आवरणशक्तिका विनाश होनेपर भी विक्षेप- शक्तिके साथ उसकी निवृत्ति न होनेसे रजत आदिके प्रति वह उपादान माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, क्योंकि जलमें प्रतिविष्वित वृक्षके अधोअत्वके (जिसका अग्रमाग नीचे है, ऐसे वृक्षके अधोग्रत्वके) अध्यासमें और जीवन्मुक्तिमें अनुवर्तमान प्रपञ्चके अध्यासमें सर्वाशसे अधिष्ठानका साक्षात्कार

  • सुंक्षपशारीरकमें अधिष्वान और आधारकी भिननताका सूचक एक इलोकार्द है, वद इस प्रकार ऐ- 'संविदा सविलासमोदचिपये वस्तुन्यधिष्ठानगी नांधारेऽव्ययनस्प वस्तुनि ततोऽस्थाने महान् संभ्रमः' इत्यादि। [अ० १ इलोक ३१] अर्थात् कार्यये युकता अशानसे आयृत वस्तुमें दी अध्यासके अधिष्टानका व्यवहार होता है, आधारमें-आरोप्य पदार्थके साथ तादात्म्यरुपसे प्रतीयमान वस्तुमें-नहीं होता है, यद इय शलोकार्थका भाव है। अधिष्वान और आरोष दोनों ी एक ज्ञानके विषय होते हैं, यही मत भाष्यादि नियन्धोंये शात होता है, इसलिए पूर्वोक मत सर्वसम्मत नहीं है, इस अरुचिसे 'अपरे तु' का मन कढ़ते हैं। • रजत आदि भ्रमस्थलमें अधिष्ठानका सर्धात्मना साक्षात्कार नहीं होता है, क्योंकि शुचित्व आदि विशेपरुपसे शुकिका साक्षात्कार नहीं होता है, इसलिए शुकिरजतस्थलमें इदमंशके अश्ञानकी निमृत्ति टोनेपर भी विशेषांशके अज्ञानकी निवृत्ति न दोनेसे उसमें अध्यासकी उपादानता

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२१८ सिद्धान्तलेशसग्रह [प्रथम परिच्छेद

त्मना अधिष्ठानसाक्षात्कारानन्तरभाविन्यामावरणनिवृत्तावपि विक्षेपशक्ति सहिताज्ञानमात्रस्योपादानत्वसम्प्रतिपत्तेरित्याहुः। नृसिंहभट्टोपाध्यायः पूर्वं रजतविभ्रमात्। न मानमिदमाकारवृत्ताविति समभ्यधात् ॥१११ ॥ नृसिंहभट्टोपाध्यायने कहा है कि रजतभ्रमके पूर्वमें इदमाकार वृचिमें कोई प्रमाण नहीं है, [अतः वह अज्ञानकी निवर्तक है या नहीं, यह विचार ही असङ्गत है]॥१११॥ कवितार्किक चक्रवर्तिनृसिंहभट्टोपाध्यायास्तु-'इदं रजतम्' इति भ्रम- रूपवृत्तिव्यतिरेकेण रजतोत्पत्तेः प्रागिदमाकारा वृत्तिरेव नास्तीति तस्या अज्ञाननिवर्तकत्वसदसन्भावविचारं निरालम्वनं मन्यन्ते।

होनेके अनन्तर आवरणकी निवृत्ति होनेपर भी केवल विक्षेपशक्तिसे युक्त अज्ञान उपादान कारण माना जाता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं। * कवितार्किकचक्रवर्ती नृसिंहभट्टोपाध्याय तो-'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस स्थलमें अ्मवृत्तिसे पृथक् रजतकी उत्पत्तिके पूर्वमें इदमाकार -- अन्य वृत्ति ही नहीं है, इससे इदमाकार वृत्तिमें अज्ञाननिवर्तकत्वका और अज्ञान- निवर्तकत्वाभावका विचार निरालम्बन ही है-ऐसा मानते हैं। हो सकती है। प्रतिविम्वविभ्रमस्थलमें-जलके किनारेके वृक्षोंका जलमें प्रतिविम्य पढ़ता है वहां जो वृक्षका अग्रभाग ऊपर है उसका जलमें नीचे भान होता है, इस स्थलमें-'जलमें वृक्ष नहीं है और वृक्षका अभभाग ऊपर ही है' इस प्रकार सर्वाशसे विशेष दर्शन होनेसे विशेषांशका अज्ञान निवृत्त नहीं है और सामान्यांशका निवृत्त है, इस प्रकार विभाग न होनेसे विशेषका अज्ञान उस प्रतिविम्वाध्यास में कारण है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, इससे इस अध्यासके अनुरोघसे, यह कहना होगा कि एक ही अज्ञानके आवरणांशके निवृत्त होनेपर भी विक्षेपशक्तिवाले अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है और यही अध्यासमें कारण है। इसी प्रकार जीवन्मुक्तिमें भी ब्रह्मतत्त्वके साक्षात्कारसे आवरणांशकी निवृत्ति होती है और विक्षेपशक्तिवाले अंशकी निवृत्ति नहीं होती है। यह मानना चाहिए, इसलिए रजताध्यासमें भी विक्षेपशक्तिसे युकत इदमंशका अज्ञान ही कारण है, ऐसा मानना चाहिए, यह भाव है। + इनके मतमें जब पहले इदमाकार वृत्ति होती ही नहीं है, तो व्यमिचार-शक्का और उसकां समाधान करना व्यथे ही है, इसलिए पूर्वोक्त विचार निरर्थक है, यही पूर्वोंक्त मतमें अरुचि है। पूर्वमतमें इदमाकार वृत्तिके होनेसे उस वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्य ही शुकतिरजतादि ज्ञान है, वृत्त्यात्मक ज्ञान नहीं है। और इस मतमें अ्रमसे पहले इदमाकार वृत्तिके न होनेसे वृत्तिरूंप ही शुकिरजत ज्ञान है, ऐसा समझना चाहिए यह वात विशेषरूपसे आगे स्पष्ट होगी, यह भाव है!

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सकारणे अध्योसका विचार] भांपानुंवादसहित २१९

तथाहि-न तावत् भ्रमरूपवृत्तिव्यतिरेकेण इदमाकारा वृत्तिरतुभव- सिद्धा; ज्ञानद्वित्वाननुभवात्। नाप्यधिष्ठानसामान्यज्ञानमध्यासकारणमिति कार्यकल्प्या; तस्यास्तत्कारणत्वे मानाभावात्। न चाडघिष्ठानसम्प्रयोगाभावे रजताद्यनुत्पत्तिस्तत्र मानम्; ततो दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगस्यैवाध्यासकारणत्व- प्राप्तेः। न च सम्प्रयोगो न सर्वत्र भ्रमव्यापी, अधिष्ठानस्फुरणं तु स्वतः

कारण कि [ 'इदं रजतम्' इत्यादि अ्रमस्थलमें ] भ्रमवृत्तिसे अलग इदमाकार वृत्तिका अनुभव होता ही नहीं है, क्योंकि उस स्थलमं 'इदम्' और 'इदं रजतम्' इस प्रकार दो ज्ञानोंका अनुभव नहीं होता है। और अध्यासके प्रति अविष्ठानका सामान्यज्ञान कारण भी नहीं है, जिससे कि अध्यासरूप कार्यके वलपर इदमाकार वृत्तिकी कल्पना की जाय, क्योंकि इदमाकार सामान्य वृत्तिको अध्यासके प्रति कारण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। शक्का-अघिष्ठान- के साथ इन्द्रिय आदिका सम्बन्ध न होनेपर रजतकी उत्पत्ति नहीं होगी, अतः यही अनुपपत्ति अध्यासके प्रति अधिष्ठानके सामान्य ज्ञानकी कारणतामें * प्रमाण है? नहीं, यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त प्रमाणसे दुष्ट इन्द्रिय- का सम्बन्ध ही अध्यासके प्रति कारण प्राप्त होता है, अधिष्ठानका सामान्यज्ञान अध्यासके प्रति कारण प्राप्त नहीं होता है। अब शक्का होती है कि इन्द्रियका सम्प्रयोग सर्वत्र स्रमव्यापी (भ्रमका अव्यभिचारी कारण) नहीं है [अर्थात् जहाँ जहाँ

क अध्यासके प्रति अधिष्ठानका सामान्य ज्ञान कारण है, इस कार्यकारणभावमें कोई प्रमाण नहीं है, ऐसा पहले कहा जा चुका, अय शक्ा करते है कि उक्त कार्यकारणभावमें प्रमाण है, क्योंकि अधिष्ठानके साथ जवतक चक्ष आदिका सम्बन्ध नहीं होता है, तवतक रजत आदिकी उत्पत्ति नहीं होती है, और सम्बन्ध होनेसे होती है, इसी अन्वय और व्यतिरेकरूप प्रमाणसे अधिष्टानसामान्यके ज्ञानको अध्यासका कारण मानेंगे। यदि इसपर राका की जाय कि उक अन्वय-व्यतिरेकसे इन्द्रियके सम्बन्धमें ही अध्यासकारणताका ग्रह होता है, अधिष्टान सामान्य शानमें नहीं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अहदार आदिके अध्यासमें इन्द्रिय- सम्प्रयोगके न होनेसे व्यभिचार दोगा? जो अन्वय और व्यतिरेक सम्प्रयोगमें अध्यासकी कारणताके प्राहक है, उन्ही अन्वय और व्यतिरेकसे शुकि-रजत आदि स्थलमें इन्द्रियसम्बन्ध- साध्य धर्मिशानको ही कारण मानते हैं, इस अवस्थामें अधिष्ठानके सामान्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेमें तथा कथित अन्वय और व्यतिरेक प्रमाण हैं, यह प्रकृतमें पूर्वपक्षीका गूढ़ अभिप्राय है, परन्तु इसकी ओर ध्यान न देकर ही 'ततः' इत्यादिसे उत्तर देते हैं। 'ततः' का अन्वय और व्यतिरकेके चलसे, यह अर्थ है।

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३२० सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

प्रकाशमाने प्रत्यगात्मनि अहङ्काराध्यासमपि व्याप्नोतीति वाच्यम्; तस्याऽपि घटादयध्यासाव्यापित्वात्। वटादिप्रत्यक्षात् ग्राक् तद्धिष्ठानभूतनीरूप-

योगात् आगपि तदवच्छिन्चैतन्यरूपग्रकाशस्याSऽवृतस्य वद्धावेन तदाडप्य- व्यासापचेः। न चाडव्याससामान्ये अधिष्ठानप्रकाशसामान्यं हेतुः, प्राति- भासिकाध्यासेऽभिव्यक्ताधिष्ठानप्रकाश इति नाडतिप्रसङ्ग:, सामान्ये सामा-

भ्रम होता है, वहाँ वहाँ इन्द्रियसम्प्रयोग रहता है, यह बात नहीं है, क्योंकि अहक्कार आदिके अध्यासमें इन्द्रियसम्प्रयोग नहीं है] और अघिष्ठानका सामान्य ज्ञान तो स्वतः प्रकाशमान प्रत्यगात्मरूप अधिष्ठानमं अहङ्कार आदि. अध्यासको भी व्याप्त करता है, अतः सामान्यतः अधिष्ठानका ज्ञान ही अध्यासके प्रति कारण है, इन्द्रियसम्प्रयोग कारण नहीं है? यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अघिष्ठानका सामान्य स्फुरण भी घटादि-अध्यासका व्यापी नहीं है, कारण कि घट आदिके प्रत्यक्षसे पूर्व घटके अधिष्ठानभूत नीरूप (रूपरहित) ब्रक्ममात्रको विषय करने- वाली चक्षुकी वृत्ति [उक्त स्थलमें ] नहीं होती है। और स्वरूपप्रकाशके आवृत होनेसे [ अधिष्ठानभूत ब्रह्मका स्वतः स्फुरण भी नहीं हो सकता है ]। यदि आवृत और अनावृत साधारण + अधिष्ठानका प्रकाशमात्र अध्यासके प्रति कारण माना जाय, तो भी शुक्तिके इदमंशके साथ इन्द्रियसम्व्न्धसे पूर्व आवृत शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप प्रकाशके होनेसे उस समयम भी रजता- ध्यासकी प्रसक्ति होगी। अब पुनः शक्का करते हैं कि अध्याससामान्यमें अधिष्ठानका प्रकाशसामान्य कारण मानेंगे और प्रातिभासिक अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश कारण मानेंगे, इससे पूर्वोक्त दोष नहीं है? क्योंकि

  • शङ्काका तात्पर्य यह है कि अध्यासके प्रति अधिष्ठानका प्रकाशमान्र कारण मानते हैं, अभिव्यक अधिष्ठानका ज्ञान कारण नहीं मानते हैं, क्योंकि उसके माननेमें लाघव है, इससे 'सन् घटः, सन् पटः' इत्यादि अध्यासोंके अधिप्ठानभूत सदूप न्रह्मका प्रकाश होनेसे अधिष्ठान प्रकाश है, इसलिए व्यभिचार नहीं है, क्योंकि ब्रह्मके स्वप्रकाश होनेसे उक्त स्थलमें त्रह्म का प्रकाश तो होता ही है।

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संकारण अंध्यासका विचार] भापातुवादसहित २२१

न्यस्य विशेपे विशेपस्य हेतुत्वौचित्यादिति वाच्यम्, एवमपि प्रातिभासिक- - शङ्पीतिमकूपजलनैल्याद्यध्यासाव्यापनात्। रूपानुपहितचाक्षुपप्रत्ययायोगेन तदानीं शङ्गादिगतशौकयोपलम्भाभावेन चाऽध्यासात् प्राकू शङ्घादिनीरूपा- -

सामान्यम सामान्य और विशेपमें विशेष कारण मानना उचित है, परन्तु यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शङ्गमें प्रातिभासिकपीतिमरूपके और कूपजलमें प्रातिभासिक नैल्यके अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानके प्रत्यक्षकी व्याप्ति नहीं है, कारण कि रूपरहितकी* चाक्षुपवृत्ति न होनेके कारण और अध्यासके पूर्वकालमें शङ्क आदिके शुक्करूपका उपलम्भ न होनेके कारण उस समयमें रुपरहित शङ् आदि अघिष्ठानोंकी अपरोक्षवृत्ति नहीं + हो सकती है।

8 रूपरहित जितने पदार्थ हैं, उनकी चाक्षुप शृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि यदि रूपरहितकी चाक्षुपधृत्ति मानी जाय, तो वायुकी भी चाक्षुष वृत्ति प्राप्त होगी और उसका चक्षुमे प्रत्यक्ष होने लगेगा। शंखमें पीत रूपके अध्याससे पूर्वकालमें यदि उसमें शुक्लरूपकी उपलब्धि मानी जाय, तो 'पीतः शङ्गः' यह अध्यास ही नहीं होगा, इसलिए धर्मीके ज्ञानको जो अध्यासके प्रति कारण मानते हैं, उनका पक्ष अत्यन्त असझत है, क्योंकि उनके मतमें अभि- व्यक शद्द और जल आदिसे अवच्छिन चैतन्यमें पीत और नील आदि रूपोंका अध्यास होता है, इसलिए उनके मतमें पहले 'इदम्' इत्याकारक वृत्तिकी उत्पत्ति होती है, और उस वृत्तिसे अभिव्यक पूर्वोक्त पदार्थवच्छिन्न चेतन्यमें पीतादिरूप अध्यस्त होते है। परन्तु उनसे (धर्भिज्ञानकारणवादियोंसे) पूछना चाहिए कि उस स्थलमें इदमाकार वृत्ति केवल शंखमात्रको अव- लम्बन करती है, या रूपविशिष्ट शंखको? इनमें प्रथम पक्ष तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि रूपाविपयक चाक्षुपपृत्ति नहीं होती, इसका ऊपर अभी निरूपण किया गया है। द्वितीय पक्षमें भी यह प्रष्टव्य हो सकता है कि क्या शुकरूप विशिष्ट शङ्गको वह विपय करती है, अथवा पीतरूपविशिष्ट शंखको? इसमें द्वितीय पक्षका अवलम्बन करेंगे, तो वह वर्मिज्ञान नहीं है, क्योंकि आरोप्य पीत रूप विशिष्ट शङ्गज्ञान ही तो भ्रान्ति है। और प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासके पूर्वकालमें यदि शुर रूप ग्रतीत हो, तो पीत शंखाध्यास ही विलीन हो जायगा, इसलिए व्यभिचार होनेसे धर्मिज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेवालोंका पक्ष असङ्गत ही है, यह नसिहभद्टोपाध्यायका मत है। + वस्तुतस्तु अध्याससे पूर्व द्रव्यमात्ररपसे शङ्कादिविपयक वृत्तिका उदय होता ही है, क्योंकि द्रव्यगोचर चाक्षुपवृत्तिमें रूपविपयकत्व नियम अप्रयोजक है। वायुका चाक्षुपप्रसभ् भी नहीं आा सकता है, क्योंकि द्रव्यके चाकुष प्रत्यक्षमें उद्भूनरूप प्रयोजक है, इससे अध्यासके

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२२२ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रंथम परिच्छेदे

न च प्रातिभासिकेष्वपि रजताद्यध्यासमात्रे निरुक्तो विशेषहेतुरास्ता- मिति वाच्यम्; तथा सति सम्प्रयोगात् प्राक् पीतशङ्गाद्यध्यासाप्सङ्गाय तदध्यासे दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगः कारणमित्यवश्यं वक्तव्यतया तस्यैव सामा- न्यतः प्रातिभासिकाध्यासमान्नरे लाघवात् कारणत्वसिद्धौ, तत एव रजता-

शक्का करते हैं कि प्रातिभांसिक अध्यासोंमें से भी केवल रजत आदि अध्यासमें ही उक्त अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाशविशेष हेतु है, पीतशंख आदि अध्यासोंमें हेतु नहीं है? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यदि पीतशंख आदि अध्यासोंमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश हेतु न माना जाय, तो . इन्द्रियसम्प्रयोगसे पूर्वमें भी पीतशङ्ग आदि अध्यासकी प्रसक्ति हो जायगी, वह न हो, इसलिए उन अध्यासोंमें दुष्ट इन्द्रियोंके सम्प्रयोगको अवश्य कारण कहना होगा, इससे उसी इन्द्रियके सम्प्रयोगमें सामान्यतः प्रातिभासिक अध्यासमात्रकके प्रति लाघवसे कारणत्वकी सिद्धि होनेपर उसीसे रजताध्यासके * कादाचित्कत्व-

पूर्वमें द्रव्यका ग्रहण होनेपर भी दोपविशेषसे जैसे शाक्तित्वका ग्रहण नहीं होता है, वैसे ही दोषविशेषसे शुक्करूपमात्रका अप्रहण हो सकता है, इसीसे भामतीकारने भी कहा है कि- 'शङ्श्च दोषाच्छादितशुक्किमानमननुभवन्' [पृ० २१ निर्णयसागर भामतीकल्पतरु ] अर्थात् दोपसे शङ्के शुकरूपका अनुभव न करके, यह उक्त पंक्तिका आशय है। अयवा यह मान भी लिया जाय कि उक्त स्थलमें अध्यासके पू्वमें शुक्करूपविशिष्ट शंसका ग्रहण होता है, तो भी अध्यासकी अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि दोषवलसे शुझत्वका ्रहण नहीं होता है, इसीसे उपपत्ति हो सकती है। इससे प्रातिभासिक अध्यासोंमें अभिव्यक्त अधिष्ठानसामान्य- ज्ञान कारण माना जाय, तो भी व्यभिचार नहीं है, अंतः धर्मिज्ञानरूप इदमाकार वृत्ति सिद्ध होती है। उसकी सिद्धि होनेसे उसमें आवरणनिवर्तकत्व शक्ति है या नहीं है, उसका विचार सालम्वन ही है निरालम्वन नहीं है, यही अस्वरस इस मतमें 'उपाध्याया मन्यन्ते' इससे सूचित किया गया है, इसे नहीं भूलना चाहिए। धर्मिज्ञानको कारण माननेवाले कहते हैं कि सवदा अध्यासका प्रसज्न न हो, इसलिए अभिव्यक अघिष्ठानसामान्यके ज्ञानको कारण मानना चाहिए, उसके माननेसे शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप अधिष्ठानप्रकाशके आवृत होनेसे सदा उसकी अभिव्यकतिक़े न रहनेसे सर्वदा अध्यासकी प्रसक्ति नहीं होती है। इसलिए सवेदा, अध्यासके प्रसङ्गका अभाव है। परन्तु यह प्रसङ्ग धर्मिज्ञानकी कारणताका खण्डन करनेवालोंके मतमें भी नहीं होता है, क्योंकि उसका परिहार पीतशङकस्थलमें क्लप्तसम्प्रयोगसे भी हो सकता है, यह भाव है।

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सकारण अध्यासका विचार] भापानुवादसहित २२३

ध्यासकादाचित्कत्वस्याऽपि निर्वाहाद्धिष्ठानप्रकाशस्य सामान्यतो विशेपतो ' वाऽध्यासकारणत्वस्यासिद्धेः। ननु सादृश्यनिरपेक्षे अध्यासान्तरे अकारणत्वेऽपि तत्सापेक्षे रजताद्

की भी उपपत्ति हो सकनेसे सामान्यरूपसे या विशेषरूपसे अविष्ठानके प्रकाशमें अध्यासके. प्रति कारणता +सिद्ध नहीं होती है। * जिस अध्यासमं सादृश्यकी अपेक्षा नहीं है, ऐसे पीतशङ्ग आदि अन्य अध्यासोंम अविष्ठानसामान्यज्ञान भले ही कारण न हो, परन्तु सादंश्यकी

  • तात्पर्य यह है कि अधिष्ठानका प्रकाशमात्र सम्पूर्ण अध्यासके प्रति कारण है और अभिच्यक अधिष्ठानका प्रकाश प्रातिभासिक अध्यासके प्रति कारण है, इस प्रकारके सामान्य और विशष कार्यकारणभाव सिद्ध नहीं होते हैं। गयहाँपर कोई विचार करते हैं कि मूलमें जो प्रातिभाषिक अध्यासमान्रमें दुष्टेन्द्रिय का सम्प्रयोग कारण माना गया है, वद्द अवम्वत है, क्योंकि अहंकाराध्यासमें और साक्षीमें स्वाप्नाध्यासस्थलमें इन्द्रियसम्प्रयोगके न होनेसे व्यभिचार है, यदि इसपर कहें कि अहक्वार- . .३ का अध्यास व्यावहारिक है, प्रातिभाषिक नहीं है, अतः व्यभिचार नहीं है, तो यह भी युक्त नदी है, क्योंकि जो अहद्वाराध्यासको प्रातिभासिक मानते हैं, उनके मतमें व्यभिचारका परिदार नहीं दो सकेगा। यदि कहें कि स्वप्नप्पखके अध्यासमें अभिव्यक्त अघिष्ठानका ज्ञान ही कारण होगा? तो यद भी युक्त नहीं है, क्योंकि दो कार्यकारणभाव माननकी अपेक्षा एक कायकारणगाव माननेमें लाघव होनेसे अभिव्यक्ताघिष्ठान ज्ञानको कारण मानने हीमें लाघद दै, क्योंकि दुटेन्द्रियसम्प्रयोगकी (विपयके सराथ दुष्ट इन्द्रियोंके सम्बन्धकी) अधिष्ठान चेतन्याभिव्यअक गृतिके उत्पादनमें ही सफलता दे, अतः वह अध्यासके प्रति कारण नहीं दो सकता है। और पीतशंस आदि अध्यासोंमें भी अधिष्ठान चैतन्याभिव्यज्ञक वृत्तिके सम्भवका पूर्वकी टिप्पणीमें उस्ेस किया गया है, अतः इन सब युक्तियोंका विचार करनेसे यद्यपि धर्मिज्ञानको अध्यासके प्रति कारण मानना यही पक्ष युक्तियुक्त भासता है तथापि सूक्ष्मदृष्टिये विचार करनेपर यही पक्ष ठीक है, किन्तु स्थूल दृष्टिसे लाघवतः इन्द्रियसम्प्रयोग कारण माना गया है, यद जानना चाहिए। *धर्मिज्ञानको कारण मानना चाहिए, इसमें अन्य युक्तिका प्रदर्शन करते हैं-'ननु, सादृश्य०' इत्यादिसे। तात्पर्य यह है कि पीतरूपके साथ शंखका सादृश्य न होनेसे 'पीत शंख है' इस अध्यासमें साहश्यज्ञान कारण नहीं है, परन्तु शुक्तिरजतस्थलमें रजतके साथ शुक्ति आदिका रूपविशेपसे अवश्य सादृश्य है, इसलिए उक्त रूपसे विशिष्ट धर्मिज्ञान हो सकता है और उस्तीसे रजताध्यास होगा, तो शुक्त्यादि अध्जासके प्रति अधिष्ठानश्ञान कारण क्यों न माना जाय ?- यदि लाघवसे कहेंगे कि इन्द्रिगसम्प्रयोग कारण है, तो इंगालमें भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी।

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२२४ सिद्धान्तलेश संग्रह [ प्रथम परिच्छेद

ध्यासे, रजतादिसा दश्यभूत रूपविशेषा दिवि शिष्टधर्मिज्ञानरूपमधिष्ठानसामान्य- ज्ञानं कारणमवश्यं वाच्यम्, दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगमान्नस्य कारणत्वे शुक्ति- वदिङ्गालेऽपि तद्रजताध्यासग्रसङ्गात्। न च सादृशयमपि विषयदोपत्वेन कारणमिति वाच्यम्; विसदशेऽपि सादृश्यभ्रमे सत्यध्याससद्भावाद् जलधिसलिलपूरे दूरे नीलशिलातलत्वारोप- दर्शनात्। न च 'तद्धेतोरेव' इति न्यायात् सादृश्यज्ञानसामग्र्येवाध्यास- कारणमस्त्विति युक्तम्, ज्ञानसामग्रचा अर्थकारणत्वस्य क्वचिदप्यद्ष्टेः । ततस्सादृश्यज्ञानत्वस्यैव लघुत्वाच।

अपेक्षा रखनेवाले रजत आदिके अध्यासमें, रजत आदिके सदश रूपसे युक्त घर्मीका ज्ञानरूप जो अविषानसामान्यज्ञान है, उसे कारण अवश्य मानना चाहिए। यदि सादृश्यकी अपेक्षा न करके केवल दुष्ट इन्द्रियके सम्बन्धको ही कारण माना जाय, तो शुक्तिके समान इद्गालमें-कोयलोंमें-भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी। * यदि कहो कि विषयके दोषरूपसे सादृश्य भी आध्यासका कारण माना जायगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सादृश्यसे रहित पदार्थोंमें सादृश्यके अ्रमसे अध्यास होता है, कारण कि दूरस्थ समुद्रके जलप्रवाहमें नील शिलातलका आरोप-भ्रम देखा जाता है। यदि कहें कि तद्धेतोरेव + इस न्यायसे सादश्यज्ञानकी सामग्री ही अध्यासकी कारण हो, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानकी सामग्रीमें अर्थकी कारणता कहींपर भी नहीं देखी जाती है। और सादश्यज्ञानकी सामग्रीत्वको कारणतावच्छेदक माननेकी अपेक्षासे सादृश्य- ज्ञानत्वको अध्यासके प्रति कारणतावच्छेदक माननेमॅ लाघव भी है।

  • इसका तात्मर्य यह है कि यद्यपि सादृश्य अध्यासोंमें अवश्य अपेक्षित है, तथापि वह स्वरूपतः कारण है, ज्ञात कारण नहीं है, अतः इंगालमें रजताध्यासकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है, इसलिए धर्मिज्ञानको कारण माननेकी आवश्यकता नहीं है। + इस न्यायका यह स्वरूप है-'तद्वेतोरेवास्तु तद्वेतुत्वम् मध्ये कि तेन' अर्थात् जिसको तुम हेतु-कारण मानते हो, उसीके कारणसे यदि कार्य हो सकता है, तो मध्यमें उसको कारण मानना व्यथ है, प्रकृतमें साद््यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेकी अपेक्षा उसकी कारण सामग्रीको ही अध्यासके प्रति कारण माननेसे उपपत्ति हो सकती है, फिर उसे वोचमें कारण मानना व्यर्थ ही है, यह भाव है।

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सकारण अध्यासका विचार] भापानुवादसहित २२५

न च स्वतश्शुभ्रेऽपि शुभ्रकलधौतभृङ्गारगतेऽपि स्वच्छे जले एव नैल्याध्यास, न मुक्ताफले इति व्यवस्थावत् वस्तुस्त्रभावादेव शुक्तो रजताध्यासः नेङ्गालादाविति व्यवस्था, न तु सादश्यज्ञानापेक्षणादिति वाच्यम् ; स्वतः पटखण्डे पुण्डरीकमुकुलत्वानध्यासेऽपि तत्रैव कर्तनादि- घटिततदाकारे तदध्यासदर्शनेन तदध्यासस्य वस्तुस्व्रभावमननुरुध्य सादश्य- ज्ञानभावाभावानुरोधित्वनिश्चयात्। अन्यथाऽन्यदाऽपि तत्र तदध्यास- प्रसङ्गात्। उच्यते-सादश्यज्ञानस्याऽध्यासकारणत्ववाढेडपि विशेपदर्शनप्रतिवध्येपु यदि शक्का की जाय कि जैसे स्वतः शुग्र, सफेद रजतके पात्र विशेपमें स्थित निर्मल जलमें ही नीलिमाका अध्यास होता है, मोतीमें नहीं होता, इस प्रकार वस्तुके स्वभावविरेपसे व्यवस्था होती है, वैसे ही शुक्तिमें रजतका अध्यास होता है, इनालमं नहीं होता, इस प्रकारकी व्यवस्था भी स्वभावसे हो सकती है, सादृश्य- जञानकी अपेक्षासे नहीं होती है, तो यह भी शन्ा युक्त नहीं है, क्योंकि साक्षात् वम्नके खण्डम कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास न होनेपर भी केंचीसे कतर कर कमलाकार वनानेसे उसमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास देखा जाता है, इससे कमलाध्यासमें-वस्तुस्वभावका अनुरोध न करके+ सादृश्यनानके होनेपर होता है और न होनेपर नहीं होता-इस प्रकार सादय्यज्के अनुरोधका निश्चय किया जाता है। अन्यथा अर्थात् वस्तुस्वभावको अध्यासके प्रति कारण माननेपर पटमें कतरनेके पूर्व भी कमलकी मुकुलावस्थाके अध्यासकी प्रसक्ति होगी। * उक्त शक्काका समाधान कहते हैं कि सादड्यज्ञान अध्यासका कारण है, 1 अर्थात कतरनेसे सादश्यज्ञान होनेपर ही कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास होता है, और उसके न होनेपर नहीं होता, अतः वस्तुस्वभावकी अपेक्षा न करके अन्वयव्यतिरेकसे अध्यास सादृश्यज्ञानकी अपेक्षा करता है, यह भाव है। .. * विशेष अध्यासमें कारणरुपसे प्राप्त सादश्यज्ञान द्वारा समादत धर्मिज्ञानकी कारणताका परिदार करते है-'उच्यते' इत्गादि अ्न्थसे। परिहारका तात्पर्य यह है कि विशेपदर्शनसे जिनकी उत्पत्ति नहीं होती, ऐसे 'शुकौ इदं रजतम्' इत्यादि अध्यासोंमें ही सादृश्यज्ञान कारण है और विशेपदर्शनसे जिन अध्यासोंका प्रतिबन्ध नहीं होता है, ऐसे अध्यासोंमें सादृश्यज्ञान कारण नहीं है, इस वातको धर्मिज्ञानकारणवादी अवश्य स्वीकार करेंगे शुकिरजतस्थलमे 'रजतत्वाभावव्याप्यशुकित्ववान्, अयम्' (रजतत्वके अभावसे व्याप्य जो २९

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२२६ सिद्धान्तलेश संग्रह् [प्रथम परिच्छेद

रजताद्यध्यासेष्वेव तस्य कारणत्वं वाच्यम् ; न तु तदग्रतिवध्येपु पीत- शङ्गाद्यध्यासेषु, असम्भवात्। विशेपदर्शनप्रतिवध्येपु च प्रतिबन्धकज्ञान- सामगन्याः अतिवन्धकत्वनियमेन विशेषदर्शनसामग्रचप्यवश्यं प्रतिचन्धिका वाच्येति तत एव सर्वव्यवस्थोपपचेः, कि सादृश्यज्ञानस्य कारणत्वकल्पनया ? तथाहि-इङ्गालादौ चक्षुःसम्प्रयुक्ते तदीयनैल्यादिरूपविशेपदर्शनसाम- ग्रीसच्ान्न रजताध्यासः शुक्त्यादावपि नीलभागादिव्यापिचक्षुःसम्प्रयोगे

इस वादमें भी विशेषदर्शनसे प्रतिवध्य रजत आदि अध्यासोंमें ही सादृश्यज्ञानको कारण मानना चाहिए, विशेषदर्शनसे जो प्रतिवध्य नहीं हैं, ऐसे पीत शङ्ग आदि अध्यासोंमें उसे कारण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि वस्तुतः उन स्थलोंमें सादृश्य है ही नहीं। और विशेषदर्शनसे जिनका प्रतिवन्ध होता है, ऐसे शुक्तिरजत आदि अध्यासोंमें प्रतिवन्धक ज्ञानकी सामग्रीके + प्रतिवन्धकत्व- नियमसे विशेषदर्शनसामग्रीको भी अवश्य प्रतिन्धक मानना चाहिए, इसलिए उसीसे सव व्यवस्थाकी उपपत्ति हो सकती है, तो सादश्यज्ञानको - क्यों कारण मानना? अर्थात् उसे कारण माननेकी आवश्यकता नहीं है। चक्षुसे संयुक्त इद्वाल आदिमें उनके नीलरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीके होनेसे-रजतका अध्यास नहीं होता है। शुक्तिरजत आदि स्थलमें भी, जिसका कि नील भाग चक्षुसे संयुक्त है, विशेपदर्शन सामग्रीके होनेसे रजतका अध्यास

शुफित्व तदाश्रय यह है) इस विशेपदर्शनसे 'इद रजतम्' यह भ्रम नहीं होता है, किन्तु उसके अभावमें ही होता है, अतः विशेपदर्शनसे वह रजताध्यास प्रतिवध्य कहलाता है, 'पीतत्वाभावव्याप्यशङ्गतवान् अयम्' इस प्रकारके विशपदर्शनके होनेपर भी 'पीतः शङ्ग:' यह अध्यास होता है, अतः विशेप दर्शनसे यह प्रतिबध्य नहीं है, इसलिए धर्मिज्ञान इसमें कारण नहीं होगा, क्योंकि सचमुच पीत पदार्थका सादृश्य शंखमे है ही नहीं, यह भाव है। * प्रतिबन्धक ज्ञानसे यहां विशेपदर्शनात्मक ज्ञान ही विवक्षित है। जसे रजतादि अध्यासमें विशेपदर्शन प्रतिबन्धक है, वैसे ही उसकी सामग्री भी प्रतिवन्धक है, दाइकी प्रतिवन्धक मणिकी सामग्री लोकमें दाहके प्रतिबन्धकरूपसे प्रसिद्ध नहीं है, अतः ज्ञान पदका उपादान किया गया है, जो धर्मिज्ञान है, उसमें प्रतिवन्धकज्ञानत्व नहीं है, अतः उसमें भी प्रतिवन्धकत्वकी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि वह अध्यासका अनुगुण ही है। इसीलिए नैयायिकोंने पक्षमें साध्याभाववत्ता ज्ञानको आत्याभावका अवगाहन करनेसे प्रतिवन्धक माना है। उसमें साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानको प्रतिवन्धक ज्ञानकी सामग्रीके रूपसे अनुमितिका प्रतिवन्धक माना है। इस परिस्थितिमें इसी प्रतिवन्धकी सामग्रीके प्रभावसे अध्यासके कादाचिकत्व

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संकारण अंध्यासंका विचार] भांपानुवादसहित २२७

तत्सच्वान् तदध्यासः । सदशभागमात्रसम्प्रयोगे तदभावादध्यासः । तदाऽपि शुक्तित्वरूपविशेपदर्शनसामग्रीसच्वादनध्यासग्रसङ्ग इति चेत्, न; अध्यास- समये शुक्तित्वदर्शनाभावेन तत्पूर्वं तत्सामग्न्यभावस्य त्वयाऽपि वाच्यत्वात्। मम सादृश्यज्ञानरूपाध्यासकारणदोपेण प्रतिवन्धात् तदा शुक्तित्वदर्शन- सामग्न्यभावाभ्युपगमः । तव तथाऽभ्युपगमे तु वट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त इति

नहीं होता है। केवल समान भागमें ही इन्द्रियकां सम्बन्ध होनेसे विशेष- दर्शनकी सामग्रीके न होनेके कारण रजतका अध्यास होता है। इसपर शक्का होती है कि रजतके सदश शुक्तिके किसी हिस्सेके साथ संप्रयोगके समयमं भी शुक्तित्वरूप विशेपदर्शनकी सामग्रीके होनेसे रजतका अध्यास नहीं होना चाहिए, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासके पूर्वमें तुमको भी शुक्तित्व- रूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव कहना होगा, क्योंकि अध्यासके समयम शुक्तित्वका न्ञान नहीं है। यदि शक्का हो कि हमें + तो सादृश्य- ज्ञानरूप अध्यासके कारण दोपसे प्रतिवन्ध होनेके कारण अध्यासकालमें शुक्तित्वदर्शनकी सामग्रीका अभाव है, यदि तुम सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण मानते हो, तो घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त ही हुआ अर्थात्

आदिकी व्यवस्था हो सफती है, तो धर्मिज्ञानरूप इदमाकारवृत्तिको माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, यद भाव है। * तात्पर्य यह है कि केवल शुकिके रजतसदश भागके साथ सम्वन्धकालमें जय चक्षुःसंयुंक तादात्म्यरूप शुफित्वदर्शनकी सामग्री रहती है, तव भी अध्यास देखा जाता है, इससे शुकितित्वरूप विशेषदर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक कोई दोप अवश्य कहना चाहिए, वह दोप प्रत्यासत्या दूरत्व आदि होगा-साटश्यज्ञान नहीं होगा, अतः दोपरूपसे भी धर्म्मिशान अध्यासके प्रति कारण नहीं हो सकेगा। यह सादृश्यज्ञानकी अध्यासकारणताका खण्डन करनेवालेका मन्तव्य है। इदमाकारषृतिरुप धर्मिज्ञानमें अध्यासकी कारणता माननेवालेको। धर्मिज्ञानकी कारणताके सण्ठनमें प्रवृत तुम यदि सादश्यज्ञानको कारण मानोगे, तो घटकुटी- प्रभातवृत्तान्त होगा। उक्त वृत्तान्तका आशय यह है-चुंगीके भयसे रात्रिको ही माल लेकर व्यापारी निकल पढा, परन्तु उसका जहाँ सवेरा हुआ, चहोंपर चुंगीका ऑफिस आ गया, फलतः उसे अपनी मालकी सारी चुंगी देनी पयी, वैसे ही सादृश्यज्ञानकी कारणताका खण्डन करनेमें तो प्रवृत्त हुए, परन्तु प्रकारान्तरसे सादृश्यज्ञानमें कारणता माननी ही पड़ी, अतः घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त उनके ऊपर लागू हुआ। घटकुटी कहते हैं चुंगीके ऑफिस़को।

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.२२८ सिद्धान्तलेशसंग्रहं प्रंथमं परिच्छेद

चेद्, न; समीपोपसर्पणानन्तर रजतसादश्यरूपे चाकचिक्ये दश्यमाने एव शुक्तित्वोपलम्भेन तस्य तत्सामग्रीप्रतिवन्धकत्वासिद्धौ दूरत्वादिदोपेण प्रति- बन्धाद्वा व्यञ्जकनीलपृष्ठत्वादिग्राहकासमवधानाद्वा तत्सामग्रयभावस्य वक्तव्यत्वात्। एवं जलधिजले नियतनीलरूपाध्यासप्रयोजकदोपेण दूरे नीरत्वव्यञ्ञक-

सादश्यज्ञान अध्यासका कारण नहीं है, इस प्रकारके तुम्हारे सिद्धान्तका भङ्ग हुआ, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिके पास जानेके अनन्तर रजतके सदश चाकचिक्यके देखनेपर भी शुक्तित्वका ज्ञान होता है, इससे सादश्यज्ञान शुकित्वरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका प्रतिवन्धक सिद्ध नहीं होता है और दूरत्व आदि दोषोंसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अथवा शुक्तित्वको अभिव्यक्त करनेवाले नीलपृष्ठत्व आदिके ग्हक साधनोंके न रहनेसे शुक्तित्वरूप विशेपके दर्शनकी सामग्री- का अभाव तुम्हें और हमें दोनोंको कहना होगा। इसी प्रकार अर्थात् जैसे सादश्यज्ञानरूप दोपके विना शुक्तिमें रजतका अध्यास होता है, वैसे ही दूरस्थ समुद्रके जलमें नील शिलातलत्वका अध्यास

प्रकृतमें एक बात और ध्यान देने लायक है-किसी समयमें दूरस्थ पुरुपको भी छाकिमें शुकित्वग्रहण होता है, अतः सादश्यज्ञानके समान दूरत्वदोपमें भी व्यभिचार समान ही है, इसी प्रकार रजतके लिए अत्यन्त लालायित पुरुषको समीपमें जानेपर भी शुक्तिकी प्रमा नहीं होती, इसलिए दूरत्व दोप ही नहीं होगा। यदि किसी विशेप अध्यासके प्रति किसी समय कोई दोष होता है, और किसी समयमें नहीं इस प्रकार व्यवस्था करेंगे, तो वही दीपज्वाला है, इस भ्रमकी, सादश्यज्ञानरूप दोपसे ही लोकमें, प्रसिद्धि होनेसे साह्यज्ञानको भी अध्यासके प्रति कारणता अनिवार्य होगी। देवताधिकरणमें भाष्यकारने भी कहा है कि 'सादश्यात् प्रत्यभिज्ञानं केशादिप्विव' केशोंके समान सादश्यज्ञानसे प्रत्यभिज्ञा होती है-वही दीपज्वाला है इत्यादि। और वौद्धाधिकरणमें भी 'सादृश्यनिमित्तं प्रत्यभिज्ञानम्' अर्थात् सादृश्यसे ही प्रत्यभिज्ञान होता है-ऐसा कहा गया है। अतः सादश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारणत्वका निराकरण करना असमत है, यह शङ्का यद्यपि हो सकती है, तथापि प्रकृतमें स्थूल विचार होनेसे-वह दोषावह नहीं है, सूक्ष्मदृ्टिसे तो सादश्यज्ञानमें अध्यासकारणतव है ही, यह भाव है। प्राहकसाधनोंसे शुक्ति आदिके नीलपृष्ठ आदि भागोंके साथ चक्षःसंयोग आदिका ग्रहण करना चाहिए।

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सकारण अध्यासका विचार] भांपानुवादसहित २२९

भावाच्छिलातलत्वाद्यध्यासः। विस्तृते पटे परिणाहरूपविशेषदर्शनसामग्री 1

सत्वात् न पुण्डरीकमुकुलत्वाध्यास :; कर्तनादिघटिततदाकारे तदभावात्तद- व्यास इति।

हो सकता है, क्योंकि अध्यासके कारणभूत नियत नीलरूप दोपसे, और दूर होनेसे नीरत्वके अभिव्यल्जक तरत आदिका ग्हण करनेवाले साधनोंका समवधान न होनेसे शुकरूप, जलराशित्व आदि विशेपोंके दर्शनकी सामग्रीका अभाव है।। और विस्तृत वस्त्रमें इसलिए कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास नहीं होता है कि उस समयमें विस्ताररूप विशेषदर्शनकी सामग्री है, और कतरनेसे कमलाकार हो जानेसे विस्ताररूप विशेपदर्शनकी सामग्रीके न होनेसे उसनें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास होता है ।। राहर्ग यह है कि जनमें जो नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है, उसमें शुक़रूपात्मक रिरेपश परिज्ान या जन्स्वरुप विरेपका परिदर्शन प्रतिचन्धक है, और इन विशेषदर्शनोंकी मानयी भी प्रतियन्मक होगी, इसलिए इन विशेषोंके परिजानकी सामग्रीका अमाव होनेसे ही जन्मे नोलशोलातलत्थ अध्याग होता है। पह्ले जलमें नैल्यका अध्यास होनेके बाद मररस्मानके दतस्ष ऐोनिसे उसमें नीलशीलातललका अध्यास होता है, यह बात नहीं है, दरसय समुदजलमें तथा यमीपस्थ समुद्रके जलमें नैल्यका नियमतः अध्यास होता है, अतः सन्नें नैस्याप्याख नियत मे शुसल, जलत् आदि विशेषके ग्रहणकी सामग्री अप्रतिबद्ध नहीं है, द्योंकि नस्यके अध्यासये शुक रुपकी ग्रादक सामग्री प्रतिषद्ध दो गई है और जलत्वके व्यझ्ञक तम्भ आदिके प्र हफश भी दरत्य दोपये सविधान नहीं है, इसलिए जलत्वका भी ग्रहण नहीं ऐता हे, शतः उक् प्रतियन्धक दो ज्ञानोंकी सामग्रोका अभाव होनेसे समुदजलमें नीलशिलात- मत्र सगाग से चसता है, नह भव है। े यहॉपर धर्निज्ञानमें पारणत्ववादियों का नत यह है कि समुद्रके जलमें उक्त प्रकारसे विशेष- दर्शनदामप्रीया अनाव अपंशित है, तथापि उतनेसे ही उसमें वह अध्यास नहीं हो सकता, हिन्तु प्रथम उलनें नीलरपके अभ्याससे नीलशिलातलरके सादृश्यकी प्रसकि होगी और उसरे बाद जलमें नीलनिलातलसफा सध्पारा दोगा, इसलिए दूरसे समुद्रजलमें उक्त अध्यास हरेनाले नवुद्ररे पास जाफर काते है कि इस समुद्रके जलमें दूरसे नीलत, निक्लत आदिकी यमानताये नीलशिलातललका अध्यास हमें हुआ था, परन्तु अब वह निश्त हो गया, दय प्रहारके लोकम्पवहारके देखनेसे साहृस्यश्ञान ही दोपरूपसे अध्यासके प्रति कारण होता है, केंवल विशेषदर्शनफी ग्रामप्रीका अभाव नहीं। * अध्यासके प्रति विशेषदर्शनकी सामप्रीके अभाषको जो कारण मानते हैं, उनके प्रति 'स्वरः पदखण्टे' (प्र. २२५) इन्यादिसे सादश्यज्ञानके कारणत्यकी सिद्धिके लिए अन्वय और

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२३० सिद्धान्तलेशसंग्रह [संथम परिच्छेद

नन्वेवं करस्पृष्टे लोहशकले तदीयनीलरूपविशेषदर्शनसामग्न्यभावाद् रजताध्यासः कि न भवेत्? सादृश्यज्ञानानपेक्षणादिति चेद्; भवत्येच; किन्तु ताम्रादिव्यावर्तकविशेषदर्शनसामग्यभावात् तदध्यासेनाऽपि भाव्यमिति क्वचिदनेकाध्यासे संशयगोचरो भवति। क्वचित्तु रजतप्राये कोशगरहादौ रजताध्यास एव भवति। क्वचित् सत्यपि सादश्यज्ञाने शुक्तिकादौ कदाचित् करणदोपाद्यभावेनाऽध्यासानुदयवदध्यासानुदयेऽपि न हानिः।

इस विषयमें एक शक्का होती है वह यह कि यदि सादश्यज्ञानके विना केवल विशेषदर्शनकी सामग्रीके अभावसे ही अध्यासकी उत्पत्ति होती है, ऐसा माना जाय, तो लोहेके टुकुड़ेको हाथसे छूनेपर उसमें रजतका अध्यास क्यों नहीं होता है: क्योंकि लोहेके नीलरूपविशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव उस स्थलमें है, परन्तु यह भी शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें लोहेके टुकुड़ेमें रजतका अध्यास होता ही है। किन्तु ताम्र आदिकी व्यावृत्ति करने- वाली विशेषदर्शनकी सामग्रीका अभाव होनेसे ताम्र आदिका अध्यास भी हो सकता है, इस प्रकार हाथोंसे स्पृष्ट लोहेके टुकुड़ेमें अनेक अध्यास- अध्यस्त वस्तुएँ-संशयके विपय होते हैं, [ अर्थात् यह रजत है या ताम्र है अथवा सुवर्ण है, इस तरह संशय होता है ]। किसी स्थलमे अर्थात् जिस खजानेमें + रजतका ही आधिक्य है, ऐसे स्थानमें तो लोहेमें रजतका ही अध्यास होता है। जैसे सादश्यज्ञानके रहनेपर भी शुक्ति आदिमें-कदाचित् करण-दोषके अभावसे-रजतका अध्यास नहीं होता है, वैसे ही हमारे मतमें भी कदाचित् अध्यास नहीं हो, तो भी हानि नहीं है।

व्यतिरेक दिखाये गये हैं, उसीका 'विस्तृते पटे' इत्यादिसे खण्डन किया गया है, अर्थात् लम्बे पटमें जो पटका विस्तार देखा जाता है वही अध्यास्षमें प्रतिबन्धक है और कैंचीसे ठोक उसकी कमलाकृति वना लेनेपर उसमें उक्त सामग्रीके अभावसे कमलकी मुकुलवस्थाका अध्यास हो सकता है, अतः सादश्यज्ञान अपेक्षित नहीं है, यह प्रकृतमें भाव है। * जिसमें सदा रजत ही रखा जाता है, ऐसे कोशगृहमें प्राप्त पुरुप को, दैवसे किसी लोहेके टुकुड़ेको छनेपर भी उसमें उसे रजतका ही अध्यास होता है, क्योंकि उस कोशगरहमें लोहेकी सम्भावना ही उसे नहीं है, इसलिए ऐसे स्थलमें रजत है, या ताम्र है, ऐसा संशयात्मक अध्यास नहीं होता है। और जहाँ ऐसी स्थिति नहीं है वहाँ तो मूलोकत रीतिसे संजय होता ही है, यह भाव है।

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सकारण अध्यासका विचार] भापासुवादसहित २३१

तरमान कार्यकल्प्या इदमाकारवृत्तिः, नाऽप्यप्रतिबद्धेदमर्थसम्प्रयोग- कारणकल्प्या; ततो भवन्त्या एवेदंवृत्तेदुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगक्षुभिताविद्या-

ज्ञानसमानकालोत्पत्तिके प्रतिभासमान्नविपरिवर्तिनि रजते तत्ग्राचीन सम्प्रयोगाभावेऽपि तत्तादात्म्याश्रयेदमर्थसम्प्रयोगादेव तस्याऽपि चक्षुग्राह्य- त्वोपपत्तेः। 'चक्षुपा रजतं पश्यामि' इति प्रातिभासिकरजतस्य स्वसम्प्र- योगाभावेऽपि चाक्षुपत्वानुभवात्।

उक्त रीतिसे धर्मिज्ञानके सध्यासके प्रति हेतु न होनेके कारण इदमा- फारवृत्तिकी (अध्यासरूप) कार्यसे कल्पना नहीं करनी चाहिए और प्रति- बन्धसे शून्य इदमर्थके साथ इन्द्रिय संयोगरूप कारणसे भी उसकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इन्द्रियसम्प्रयोगसे उत्पन्न होनेवाली इदमाकार वृत्तिका ही-दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे क्षुभित अविद्याका परिणामभूत तथा इदमाकारवृत्तिके समानकालम उत्पन्न हुआ रजत विपय होता. है, ऐसा हम कहते हैं। [तात्पर्य यह है कि इदमर्थावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली रजताकारमें परिणम्यमान अविद्या-अध्यासमें निमित्तभृत दोपसे युक्त चक्षु सादिके सम्प्रयोगसे क्षोभको अर्थात् कार्योन्मुखताको प्राप्त होती है, इसके बाद रजतरूपसे परिणत होती है, इसी प्रकार दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे वृत्ति भी उसी कालमें होती है, इसलिए अप्रतिबद्ध इन्द्रियके सम्प्रयोगसे होनेवाली इृदंवृत्ति अपने समानकालमें उत्पन्न हुए रजतसे विशिष्ट इदमर्थको विपय करती है]। अमस्थलमं ज्ञानके समानकालमें उत्पन्न तथा प्रतीतिकालमें ही जिसकी सता है, ऐसे रजतमं, रजतप्रतिभाससे पूर्व, सम्प्रयोग न होनेपर भी रजततादात्म्यके आश्रय इदमर्थके सम्प्रयोगसे ही रजत चक्षुसे गृहीत होता है, क्योंकि 'आँखसे रजतको देखता हूँ' इस प्रकार अपने साथ इन्द्रियसम्प्रयोगके न रहते भी परातिभासिक रजतका चक्षुसे प्रत्यक्ष देखा जाता है।

*इख सब्दका अर्थ है-प्रतिभारकालमात्रे विपरिवर्तनम्-सत्वं यस्य तव प्रतिभासमान्न- विपरिवर्ति, तस्मिन प्रतिभागमान्नविपरिचर्तिनि अर्थात् जिसका अस्तित्व केवल प्रतीतिकालमें दी है-प्रतीतिसे व्याप्य है सचा जिसकी ऐसा रजत, यद भाव है।

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२३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

न च स्वसम्प्रयोगाभावादेव वाधकान् तच्चाक्षुपम्, नाऽपि दुष्टेन्द्रिय- सभ्प्रयोगजन्यम् इदवृत्तिसमकालम्, ज्ञानकारणस्येन्द्रियसम्प्रयोगस्याऽर्थका- रणत्वाक्लस्तेः । किन्त्विदंवृत्त्यनन्तरभावि तज्जन्यं तद्भिव्यक्ते साक्षिण्य- ध्यासात् तन्द्ास्यम्। चाक्षुपत्वानुभवस्तु स्वभासकचैतन्याभिव्यञ्जकेद- वृत्तिजनकत्वेन परम्परया चक्षुरपेक्षामात्रेणेति वाच्यम्, तथा सति पीत-

शङ्का होती है-'इदं रजतम्' इसमें रजतका चाक्षुप प्रत्यक्ष ही नहीं, हो सकता है, क्योंकि उसके साथ इन्द्रियसम्प्रयोग ही नहीं है, यह वाधक है। और इदंवृत्तिके समानकालमें वह रजत दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे उत्पन्न भी नहीं हो सकता है, क्योंकि जो इन्द्रियसंयोग ज्ञानके प्रति करणरूपसे क्लप् है, वह अर्थके प्रति कहींपर भी कारणरूपसे निश्चित नहीं है। किन्तु वृत्तिके उत्तर कालमें वृत्तिसे ही उत्पन्न होता है और वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यमें उसका अध्यास होनेसे साक्षीसे ही वह रजत भास्य * है, और रजतमें जो चाक्षुषत्वका अनुभव होता है, वह तो शुक्तिरजतके अवभासक इदमवच्छिन्न चतन्यकी अभिव्यञ्जक इदंवृत्तिके प्रति [चक्षके कारण होनेसे] परम्परया + चक्षुकी अपेक्षा है, इसलिए होता है, परन्तु यह शक्का युक्त

  • पहले इन्द्रियकें सम्प्रयोगसे केवल 'इदम्' अर्थको विषय करनेवाली वृत्ति उदित होती है, और अध्यासकी निमित्तकारण इस इदवृत्तिस अविद्या कार्योन्मुखताको प्राप्त कर रजताकारसे परिणत होती है, परिणत रजतका अधिष्ठान होगा-इदमाकारवृत्तिसे अभिव्यक्त इदमर्वच्छिन चैतन्य, इसलिए अहङ्ार आदिके समान वृत्तिके बिना ही अध्यस्त रजत आदिका अवभास होगा, इदमाकार वृत्तिके कादाचिकत्व होनेसे रजताध्यासकी सर्वेदा प्रसक्ति नहीं हो सकती है, यदि इस विषयमें शङ्गा हो कि शुक्तिरूप्य, जो वाह्यचैतन्यसे ही भास्य है, अहद्ारके समान साक्षीसे भास्य कैसे होगा? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि साक्षिभास्य शब्दका अर्थे है-विषयकी ज्ञानरूप वृत्तिसे अनुपहित चैतन्यसे जिसका अवभास होता हो, इसलिए अहद्कार आदिका अवभासक चैतन्य अविद्या विषयके अज्ञानात्मक वृत्तिसे उपहित नहीं होता है, वैसे शुक्तिरजतका अवभासक चैतन्य भी शुक्तिरजत आदि विषयक ज्ञानात्मक वृत्तिसे उपहित नहीं. होता है, अतः वह साक्षिभास्य है, इसलिए उक्त शङ्काका अवसर नहीं है, यह भाव है। * परम्परयाका तात्पर्य यह है कि यद्यपि 'इदं रजतम्' इसमें रजतांशका चक्षुसे ज्ञान होता है, यह अनुभव है, तथापि वह गौण है, प्राधान्यसे नहीं है क्योंकि उस स्थलमे इदमर्थ रूप अधिष्ठानकी वृत्तिके लिए चक्षुकी अपेक्षा होती है। रजतगोचर वृत्तिके लिए नहीं, इसलिए किसी अंशमें चक्षुकी अपेक्षा होनेके कारण चाक्षुषत्वकी रजतांशमें परम्परया उपपत्ति होती है।

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सकारण अध्यासका विचार ] भापानुवादसहित २३३

शहभ्रमे चक्षुरनपेक्षाप्रसङ्गाद्। नहि तत्र शङ्गग्रहणे चक्षुरपेक्षा; रूपं i विना केवलशङ्स्य चक्षुर्ग्राह्यत्वायोगाव्। नाडपि पीतिमग्रहणे, आरोप्ये एन्ट्रियकत्वानभ्युपगमात्। न च पीतिमा स्व्ररूपती नाडध्यस्यते, किन्तु नयनगतपित्तपीतिम्नोऽ- नुभूयमानस्य शह्गसंसर्गमात्रमध्यस्यत इति पीतिमाऽनुभवार्थमेव चक्षुर- पेक्षेति वाच्यम् ; तथा सति शङ्गतत्संसगयोरप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । नयन-

वाद्। पीतिमसंसृष्टशङ्गगोचरैकवृत्यनभ्युपगमाचच ।

नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे अर्थात् अधिष्ठानके इन्द्रियजन्यज्ञानके लिए ही इन्द्रियकी अपेक्षा है और आरोप्यके इन्द्रियजन्यज्ञानके लिए इन्द्रियकी अपेक्षा नहीं है, ऐसा स्वीकार करनेसे पीत शङ्गके भ्रमस्थलमॅ चक्षुकी अपेक्षा नहीं होगी, क्योंकि वहाँ शङके ग्रहणमें चक्षुकी अपेक्षा ही नहीं है, कारण कि रूपके विना शुद्ध शङ्का चक्षसे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, 6 और पीतिमाके ग्रहणमं भी चक्षुकी अपेक्षा नहीं है, क्योंकि आरोप्य पदार्थका इन्द्रिय ज्ञान गाना ही नहीं गया है। भी होती है कि शङमें स्वरूपतः * पीतरूंपका अध्यास नहीं होता ८, किन्तु अनुभूयमान चक्षुमें रहनेवाले पितदोपके पीतरूपका शङ्गमें सम्बन्ध- मात्र अध्यस्त होता है, इसलिए पीतिमाके अनुभवके लिए चक्षुकी अपेक्षा है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि नेत्रगत पित्तद्रव्यके ही पीत- रूपका अनुभवस्वरीकार किया जाय, तो शह और पीतके संसर्गका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा, क्योंकि नेत्रप्रदेयमें रहनेवाले पितद्रव्यका जो पीतरूप है, उस पीताकारवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यरूप साक्षीके साथ शङ्ग और शह्में आरोपित पीतसंसर्गका सम्बन्ध न होनेके कारण शङ्ग और पीतसंसर्गका • जैसे शुधिमें रजतका स्वरुपसे अध्यास होता है, वैसे ही शहमें पीतरूपका स्वरूपसे अध्यास नहीं होता, किन्तु नेत्रमें विद्यमान पीतरूपसे युक्त जो पितलक्षण द्रव्य है, उसकी जो पीतिमा है, जिसका कि उर पित्तद्रव्यमें अनुभव होता है, उसका शङ्में सम्वन्ध- मात्र प्रतीत होता है, जैसे लोदित कुमुममें अनुभूयमान रकरूपके संसर्गका समीपवर्ती स्फटिकमें अध्याय होता है, इस विपयमें किसीको यदि शक्त हो कि अन्यके रूपका अन्यत्र भारोप करेंगे, तो अन्यथागयातिकी प्रसकि होगी? तो कहिए कि अन्यथाख्यातिकी ३०

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२३४ सिद्धान्तलेशसग्रह [प्रथम परिच्छेद

न च नयनप्रदेशस्थितस्य पित्तपीतिम्नो दोपाच्छङ्वे संसर्गाध्यासो नोपेयते; किन्तु नयवरश्मिभिः सह निर्गतस्य विषयव्यापिनस्तस्य तत्र संसर्गाध्यासः। कुसुम्भारुणित इव कौसुम्भ इति सम्भवति तदा- कारवृत्यभिव्यक्तसाक्षिसंसर्ग इति वाच्यम् : तथा सति सुवर्णलिप इव पित्तोपहतनयनेन वीक्ष्यमाणे शङ्गें तदितरेषामपि पीतिमधीप्रसङ्गात्। न च स पीतिमा समीपे गरहीत एव दूरे ग्रहीतुं शक्य:, विहायसि उपर्युत्पतन्विहङ्गम इव इतरेषां च समीपे न ग्रहणमिति वाच्यम्;

साक्षीसे भान ही नहीं होगा और पीतिमासे सम्बद्ध शङ्गविपयक एक वृत्तिका अङ्गीकार भी नहीं है, [ जिससे कि उसके द्वारा भी उनका प्रत्यक्ष हो ]। यदि कहो कि नेत्रप्रदेशमें स्थित पित्द्रव्यकी पीतिमाके दोपसे शङ्गमें संसर्गाध्यास नहीं होता है, किन्तु नयनर्मियोंके साथ निकलकर विपय- देशको अर्थात् शङ्गरूप अघिष्ठानको व्याप्त पित्तद्रव्यकी पीतिमाका ही शङ्गमें संसर्गाध्यास होता है, जैसे रक्तरङसे व्याप्त पटमें रक्तरङ्गमें अनुभूयमान रक्रूपके ही संसर्गका भान होता है, इसलिए पित्तपीतमाकारवृत्तिसे शङ्गदेशमें चतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे शङ्पित्तपीतिमाके संसर्गका अपरोक्षानुभव हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे सुवर्णसे लिप पदार्थ सभी को पीत भासता है, वैसे ही पितदोषसे दुष्ट नेत्र द्वारा देखे गये शङ्गमें सभीको पीतिमबुद्धिकी प्रसक्ति होगी [कारण कि नयनगत पित्तपीतिमाका, जिसका कि अन्य भी अनुभव कर रहे हैं, उनको भी शङ्गके साथ उसका सम्बन्ध होनेसे 'पीतः शङ्:' इस ज्ञानकी प्रसक्ति होगी, यह भाव है ]। यदि कहो कि उस पीतिमाका दूरमें तभी ग्रहण हो सकता है, जब कि उसका समीपमें ग्रहण हुआ हो, जैसे आकाशमें ऊपर उड़े हुए पक्षीका तभी ग्रहण हो सकता है, जब कि उसका समीपमें ग्रहण हुआ हो, वैसे ही उस पित्तद्रव्यकी., पीतिमाका समीपमें दूसरोंने ग्रहण नहीं किया, अतः उसका दूसरोंको अनुभव

प्रसक्ति नहीं होगी, क्योंकि वहांपर अध्यस्यमान अनिर्वचनीय संसर्गकी ही उत्पत्ति मानते हैं, इसलिए अन्यथाख्यातिवादकी प्रसक्ति नहीं है, अन्यथाख्यातिवादी अनिवचनीय पदार्थकी उत्पत्ति नहीं मानते हैं, इसलिए अन्यथाख्यातिवादसे संसर्गाध्यास् अवश्य विलक्षण है, यह भाव है।

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सकारेण अध्यांसंका विचार] भापानुवादंसहितं २३५

इतरेपामपि तच्चक्षुरनिकटन्यस्तचक्षुपां पीतिमसामीप्यसच्चेन तद्ग्रहणस्य दुर्वारत्वात्। एवमप्यतिधवलसिकतामयतलप्रवहदच्छनदीजले नैल्याध्यासे गगननैल्याध्यासे च रक्तवस्रेपु निशि चन्द्रिकायां नैल्याध्यासे चाऽनुभूय- मानारोपस्य वक्तुमशक्यत्वेन तत्र नैल्यसंसृष्टाधिष्ठानगोचरचाक्षुपवृत्यनभ्यु- पगमे चक्षुरनुपयोगस्य दुष्परिहरत्वाच्च। वालस्य मधुरे तिक्तताऽवभासो जन्मान्तरानुभवजन्यसंस्कारहेतुकः' इति प्रतिपादयता पश्चपादिकाग्रन्थेन

नहीं * होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस पुरुपके पाण्डरोगी चक्षुकी सन्निधिम चक्षुओंको ले जानेवाले अन्य पुरुपोंको भी पीतिमाका समीप्य होनेसे 'पीतः शङ' यह ज्ञान दुर्वार हो जायगा ।। ऐसे ही अत्यन्त श्वेत वालुकामय तलमें वहनेवाले स्वच्छ नदी जलमें नीलत्वके अध्यासमें, गगनमें नैल्यके अध्यासमें तथा चाँदनी रातमें रक्त वस्त्रमें नैल्यके अध्यासम आरोप्यके सवर्था अनुभूयमान न होनेसे वहाँ नीलतासे संयुक्त अधिष्ठानविपयक नेत्रवृत्तिका स्वीकार न होनेके कारण चक्षुकी अनुपयोगिताका परिहार किया ही नहीं जा सकता। 'इस जन्ममें जिसने अपनी रसनासे तिक्तताका (तीतेपनका) अनुभन्र नहीं किया है, ऐसे वालकको मधुर दृधमें तिक्तताका अवभास-साक्षात्कार-जन्मा- न्तरके अनुभूत तिक्तरसके संस्कारसे होता है, इस प्रकारसे प्रतिपादन करने- *तात्पर्य यह है कि नेन्नदेशसे विपयके प्रति पित्तद्रव्यके जानेके समय जैसे पितणे युक पुरष नयनदेशसे लेकर विपयदेशतक पीतिमाका ग्रहण करता है, वैसे ही अन्य- सुर्य भी नेनदेवासे लेकर विपयदेशतक यदि उसका ग्रहण करें, तो उनको 'पीतः शङ्गः' यद प्रतषीति दो, परन्तु भ्रहण नहीं करते हैं, अतः उसका ग्रहण नहीं होता है, जैसे आकाशमें उदने के समयमे पक्षीका भूदेशसे लेकर ऊपर तक जो पुरुप ग्रहण करता है वही पुरुप आकाशमें दूर जानपर भी पक्षीफा ग्रहण करता है, अन्य ग्रहण नहीं कर सकते हैं, चैसे प्रकृतमें भी है। + आशय यह ह-आफाशमं ऊपरको गये हुए पक्षीको देखता हुआ कोई पुरुप अन्यके प्रति यदि कहे कि जिघर मेरी आसें गई हे उघर ही तुम भी अपनी आंखें लगाओ तो तुम्हें भी यद पक्षी दिखाई पढ़ेगा, ऐसा करनेपर अन्य पुरुप भी उस पक्षीको देखता है, वैसे प्रकृतमें नहीं है। # इस प्रन्थमें तिकताका अवर्भास संस्कारसे सद्कृत रसनाजन्य है, ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि उसको फेवल संरकारजन्य माननेसे स्मृतित्वकी प्रसकि होगी। इसलिए तिकताके अध्यासके

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२३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

स्वरूपतोऽध्यस्यमानस्यैव तिक्तरसस्यैन्द्रियकत्वस्फुटीकरणाच। अन्यथा तत्र रसनाव्यापारापेक्षाऽनुपपत्तेः ।

वृत्तिसमकालोदयोऽव्यास: तस्या वृत्तेरविषय इति तस्य चाक्षुपत्वमभ्युपगन्त- व्यम्। रूपं विना केवलाधिष्ठानगोचरवृत्यभावे च विपयचैतन्याभिव्यकत्य- भावेन जलतदध्यस्तनैल्यादीनां तद्ध्ास्यत्वायोगाद। तिक्तरसाध्यासस्थले त्वधिष्ठानाध्यासयोरेकेन्द्रियग्राह्यत्वाभावात् त्वगिन्द्रियजन्याधिष्ठानगोचर- वृत्या तदवच्छिन्नचतन्याभिव्यक्तौ पित्तोपहतरसनसम्प्रयोगादेव तत्र

वाले पञ्चपादिकाग्रन्थसे स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्तरसमें ही इन्द्रियजन्यज्ञान- विषयत्वका स्पष्टीकरण किया गया है, अन्यथा अर्थात् आरोप्य तिक्तरस यदि इन्द्रियका विषय न माना जाय, तो वालकको तिक्तत्वके अवभासमें रसनाके व्यापारकी अपेक्षा ही नहीं + होगी। इससे जिन नैल्य आदिके अध्यासोंका कथन किया गया है, उन अध्यास स्थलोंमें अघिष्ठानके सम्प्रयोगसे ही अघिष्ठानविषयक चाक्षुषवृत्तिके समकालमें उत्पन्न होनेवाले नीलरूप आदि अध्यास-अध्यस्त पदार्थ-उस वृत्तिके विपय होते हैं, इससे उस अध्यासको चक्षुसे जन्य मानना चाहिए। रूपके बिना केवल अिष्ठान- विषयक वृत्तिके न होनेपर अर्थात् आरोपित पीतरूप आदिसे विशिष्ट शङ्ग आदि अधिष्ठानविषयक वृत्तिका स्वीकार न होनेपर विषयावच्छिन्न चैतन्यकी अभि- व्यक्ति न होनेसे जल आदि तथा उससे अवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्त नीलरूप आदिका चैतन्यसे अवभास ही नहीं होगा। तीतेपनका [ जिस स्थलमें बालकको दुग्धमें ] अध्यास होता है, उस स्थलमें, तो अधिष्ठान और अध्यासका एक इन्द्रियसे ग्रहण न होनेके कारण त्वक इन्द्रियसे उत्पन्न अधिष्ठानको विषय कंरनेवाली वृच्तिसे मधुर आदि द्रव्यरूप अघिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर पित्तदोषसे दूषित रसनाके सम्प्रयोगसे ही अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यमें अधिष्ठानभूत मधुर द्रव्यका रसनासे प्रत्यक्ष होनेके कारण परिशेषात् स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्त रसमें ही रसनेन्द्रियजन्यव्ृत्तिविषयत्व है, ऐसा स्पष्ट किया गया, अतः यह ग्रन्थ आरोप्यके ऐन्द्रिंयकत्व होनेमें प्रमाण है, यह भाव है। * अर्थोद अव्यस्यमान पदार्थको जो साक्षिभास्य मानते हैं, उनके सतमें पीतशङ्ग आदि अध्यासोंमें चक्षुकी अनुपयोगिताके परिहारका असम्भव होनेसे, यह अर्थ है।

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सकारण अध्यासका विचार] भोपातुवादसहित २३७

तिक्तरसाध्यासः तन्मात्रविपयरासनवृत्तिश्व समकालमुदेतीति तिक्तरसस्य

चतन्यभास्ये तिक्तरसे परम्परयाऽपि रसनोपयोगाभावेन तत्र कथमपि प्रकारान्तरेण रासनत्वानुभवसमर्थनासम्भवात्। तथैव रजतस्याऽपि चाक्षुप- त्वोपपत्तेः 'पश्यामि' इत्यनुभवो न वाधनीयः। न चाऽसम्प्रयुर्तुस्य रजतस्य चाकुपत्वे 'प्रत्यक्षमात्ने विपयेन्द्रियसन्निकर्षः कारणम्,' 'द्रव्यप्रत्यक्षे

अध्यस्त तिक्तरसका और तिक्तमात्रको विषय करनेवाली रासनवृत्तिका एक कालमं उदय होता है, अतः तिक्त रसका रसनासे प्रत्यक्ष होता है, यह गानना चाहिए, क्योंकि त्वगिन्द्रियसे उत्पन्न होनेवाली अविष्ठानविपयकवृत्तिसे अभिव्यक्त नैतन्यसे भास्य तिकतरसमें रसनाका परम्परया भी उपयोग नहीं होता है, इसलिए अन्य किसी प्रकारसे भी तिक्तरसका रसनासे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है। वैसे ही अर्थात् जैसे रसना (जिह्ा) इन्द्रियकी वृत्तिको लेकर तिक्तरसमें रासनत्वका अनुभव माना गया, वैसे ही चक्षुकी वृत्तिके आधारपर रजत आदिमें चाक्षुपत्वानुभवका समर्थन हो सकता है, अतः 'रजतं पश्यामि' (रजतको देखता हूँ) इस प्रकार चाक्षुपानुभवका + वाध मानना युक्तियुक्त नहीं ह। यदि शक्ा हो कि इन्द्रियसे असम्प्रयुक्त रजतका प्रत्यक्ष माननेपर 'प्रत्यक्षमात्रमे विषय और इन्द्रियका संसर्ग कारण है, 'द्रव्यके प्रत्यक्षमें

" ताससर्य यह है कि पित्तरूप दोषसे तिरस्ृत जो रसनेन्द्रिय है, उसके साथ मधुर द्रव्य- रूप अधिष्ठानका सम्बन्ध ोनेगे मधुरदव्यावच्छिन चैतन्यमें तिकरसाध्यास उत्पन्न होता है, दयीके गाथ-साथ जध्यस्यमान तिकरसको ही विषय करनेवाली रासनवृत्ति भी उत्पन्न होती है, इमलए तिफरवका रसनासे अनुभव होता है, चाधुप स्थलमें जैसे अभिष्ान और आरोप्यके एक परत्तिनिषयत्व दोनसे हृन्दियजन्यज्ञान विपयता है, वैसे प्रकृत में नहीं है। अथात जसे रजत आदिके अभ्यासस्थलमें धर्मिविषयक वृत्तिके उत्पादनद्वारा चाक्षपत्वका समर्थन किया जाता है, पैसे प्रऊतमें मधुरद्रव्यरूप धर्मिविपयक पृत्तिके उत्पादनद्वारा रासनत्वका समर्थन नहीं कर गकते है, कर्योंकि मधुरद्रव्यरूप धर्मी सर्वथा रसनाके अयोग्य है- दृव्यके ग्रहणमें रसनाफी सामर्थ्य नहीं है। इसलिए परम्परास भी तिक रसका रसनासे ग्रहण नहीं ो खकता है, अतः रसनावृत्तिकी समकालमें उत्पत्ति माननी पढ़ती है। यद्यपि साक्षीसे भावित स्वामिक पदार्थोमें रासनस्व्र, चाछपत्व आदिके आरोपका जैसे आगे प्रतिपादन किया जायगा, वैसे ही प्रशतस्थलमें रासनत्व आदिकी उपपत्ति कर सकते हैं, तथापि वस़ निषयके ऊपर दष्टि न देकर दी गह कहा गया है।

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२३८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रंथम परिच्छेद

तत्संयोग: कारणम्,' 'रजतप्रत्यक्षे रजतसंयोग: कारणम्' इति गृहीतानेक- कार्यकारणभावनियमभङ्ग: स्यादिति वाच्यम्, सन्निकर्पत्वस्य संयोगाद्यनु- गतस्यैकस्याऽभावेन आद्यनियमासिद्धे:। द्वितीयनियमस्य नैयायिकरीत्या तमसीव संयोगायोग्ये क्वचिदद्रव्येऽपि द्रव्यत्वाध्याससम्भवाद् व्यवहारदष्टया

द्रव्यके साथ इन्द्रियसंयोग कारण है और 'रजतके प्रत्यक्षमें रजतका संयोग कारण है, इस प्रकार निश्चित किये गये अनेक कार्यकारणभावोंका भंग-त्याग होगा, तो यह शङ्ा युक्त नहीं है, क्योंकि संयोग आदिमें अनुगत एक सन्निकर्ष- तवके न होनेसे प्रत्यक्षमात्रमें * विपयेन्द्रियसन्निकर्ष कारण है, इस प्रकार प्रथम कार्यकारणभाव ही असिद्ध है। जैसे नैयायिकोंके मतमें + संयोगके सर्वथा अयोग्य तममें (अन्धकारमें) द्रव्यत्वका अध्यास होता है, वैसे ही संयोगके सर्वथा अयोग्य कहीं अद्रव्य (गुण) आदिमें भी ! द्रव्यत्वका अध्यास

  • इस नियमका ठीक-ठोक आकार यह है-शान्दभिन्न जन्यप्रत्यक्षमात्रमें विषय-इन्द्रियका सननिकष कारण है, शब्दरजन्य ज्ञानको जो अपरोक्ष मानते हैं, उनके मतसे शब्दज्ञानमें व्यमिचारवारण करनेके लिए शाव्दभिन्न विशेषण है और साक्षीरूप प्रलक्षमें अतिव्याप्ति वारण करनेके लिए जन्यत्व विशेषण दिया गया है। यहाँपर यह ज्ञातव्य है कि सन्निकपत्वका संयोगाद्यन्यतमत्वरूपसे अनुगम हो सकता है, अथवा नैयायिकोंके मतमें अभावत्वको जसे अखण्डोपाधि मानते हैं, वैसे ही सननिकषत्वको अखण्डोपाधि मान करके अनुगम कर सकते हैं, अतः प्रथम नियमके साथ विरोध ही है। + तात्पर्य यह है कि 'द्रव्य प्रत्यक्षमें विषय और इन्द्रियसंयोग कारण है' इस नियमका अर्थ आपको करना होगा व्यवहारमें जो द्रव्यत्वका अधिकरण है उस विषय और इन्द्रियका संयोग कारण है, क्योंकि 'एकत्वम् एकम्' (एकत्व एक है) इस प्रकार गुणमें भी एकत्वका भ्रम होनेसे द्रव्यत्वका भ्रम हो सकता है, पर वहाँ द्रव्यके साथ संयोग न होनेके कारण उक्त नियमका व्यभिचार होगा, इसलिए व्यावहारिक दृष्टिसे द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोगको कारण मानना होगा। यदि इसे स्वीकार न किया जाय, तो तममें द्रव्यत्वका भ्रम होनेके अनन्तर उसका प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि वहाँ द्रव्यसंयोग नहीं है, कारण कि तमके नैयायि करीतिसे अभावरूप होनेके कारण उसके साथ इन्द्रियसंयोग ही नहीं हो सकता है, अतः नैयायिकोंको भी अगत्या व्यावहारिक द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है, यह मानना होगा और माननेपर विरोध नहीं है, कारण कि शुकिरजतके प्रत्यक्षमें उस नियमकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि शुक्तिरजत व्यावहारिक द्रव्यत्वका अधिकरण नहीं है, यह भाव है। इस विषयमें कोई लोग शङ्का करते हैं कि घठादिके समान तुकिरजतमें भी स्वतः द्रव्यत्व रहता है, अन्यथा उस रजतमें रजतत्व भी नहीं रहेगा, इटापत्ति नहीं हो सकती, कारण कि प्रातिभाषिक रजतमें रजतस्वका साधन किया गया है, इसलिए घुक्तिरजत भो

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सकारण अध्यासका विचार] भापानुवादसहित २३९

यद् द्रव्यत्वाधिकरणं तद्विपयत्वेन प्रातिभासिकरजते द्रव्यत्वस्याऽधिष्ठान गवस्यवेदंत्ववदध्यासात् प्रतीत्यभ्युपगमेन च द्वितीयनियमाविरोधात्। द्वितीयनियमरुपसामान्यकार्यकारणभावातिरेकेण विशिष्याऽपि कार्यका- रणभावकल्पनाया गौरवपराहतत्वेन तृतीयनियमासिद्धेः । यत्सामान्ये यत्सा- मान्यं हेतुः, तद्विशेपे तद्विशेपो हेतुः' इति न्यायस्यापि यत्र वीजाङ्कुरादौ

हो सकता है, अतः द्वितीय नियमका यह अर्थ करना होगा कि व्यवहारकी द्ृष्टिसे जो द्रव्यत्वका अधिकरण हो, उसके प्रत्यक्षम इन्द्रियसंयोग कारण है, अतः प्रातिभासिक रजतमें इदंत्वके समान अधिष्ठानमें रहनेवाले द्रव्यत्वका भी मध्यास होनेसे प्रतीति होती है, इसलिए द्वितीय नियमके साथ विरोध नहीं है। और 'रजतके प्रत्यक्षमें रजतका संयोग कारण है' इस प्रकारका जो तृतीय नियम है, ह भी असिद्ध है, क्योंकि सामान्य कार्यकारणभावात्मक द्वितीय नियमसे (दव्यपत्यक्षम इन्द्रिवसंयोग कारण है, इससे) अतिरिक्त विशेष तृतीय कार्यकारण- 1 भावकी कलपना करनेमे केवल गौरव ही है। जिस सामान्यमें * जो सामान्य कारण होता है उसके विशेषमं उसका विशेष कारण होता है इस न्यायसे तृतीय कार्यकारणभावकी कल्पना करेंगे? इस प्रकार यदि शक्का हो, तो वह

व्यावदारिक दव्गतका अधिकरण है, ऐसा मानना होगा, क्योंकि व्यवहारदशामें जसे रजतका बाध देगा जाता है, पेस शुफिरजतमें रजतत्वका या द्रव्यत्वका बाध नहीं देखा जाता। इस परिस्थितिनें इृन्द्रियासंयुकत रजतमें इन्द्रियपृत्ति म नी जायगी, तो द्वितीय नियमका विरोध निधृत्त चदापि नदीं दोगा, एस पूर्वपक्षके उत्तरमें यद कहा जाता है कि शुक्तिरजत आदिमें शुकित्व, द्रव्यत्व आदि धर्म नहीं है, ऐखा स्वीकार करनेवालोंके मतसे यह कहा गया है अर्थात् व्यावदारिक दशाफा दव्यत्व या शुफित्व नहीं है परन्तु प्रातीतिक दे, अतः इसी अभिप्रायसे मूलमें 'प्रातिभामिकरजते' इत्यादि कहा है। *तात्पर्य यह है कि 'द्ृव्यप्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है' इस सामान्य नियमके माननेखे 'रजतप्रत्यक्षमे रजतेन्द्रियसंयोग कारण है' इस विशेष नियमका लाभ होता है, यर्योंकि जिस सामान्यमें जो सामान्य कारण होता है उसके विशेषमें उसका चिशेष कारण होता है, प्रकृतमें यामान्य प्रव्य प्रत्यक्षमे सामान्य-विपयसंयोग कारण है, अतः रजतरूप पिशेपद्रव्यके प्रत्यक्षमें विद्ेष रजतसीयोग कारण होगा, अतः इन्द्रियसंयोगके विना यदि रजतकी वृक्ति मानी जायगी, तो तृतीय नियमके साथ विरोध होगा, यह प्रश्न है, इसका उत्तर है कि उस विशेप नियमका तभी स्वीकार किया जाय, जव कि सामान्यमें वाध हो, : परन्तु वाध हे नहीं, अतः उसको नदीं मानते हैं।

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२४० सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

सामान्यकार्यकारणभावाभ्युपगमे तद्विपयत्वेन ततोऽजागलस्तनायमानविशेपकार्यकारणभावासिद्धेः। .न चान्राऽपि 'द्रव्यप्रत्यक्षे द्रव्यसंयोग: कारणम्' इति सामान्यनियम- मात्रोपगमे अन्यसंयोगादन्यद्रव्यप्रत्यक्षापत्तिरिति अतिप्रसङ्गोडस्तीति वाच्यम् : 'तत्तद्द्रव्यप्रत्यक्षे तत्तद्द्रव्यसंयोगः कारणम्' इति नियमाभ्युपग- मात् ; अन्यथा तृतीय नियमेऽप्यतिग्रसङ्गस्य दूर्वारत्वाद्; तस्मान्नास्ति क्ल्स नियमभङ्गप्रसङ्ग: ।

युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त जो 'यत्सामान्ये' यह न्याय है, वह भी वहींपर प्रंवृत्त होता है, जहां बीज आदि स्थलमें+ केवल सामान्य कार्यकारणभाव माननेमे बीजान्तरसे अङ्करान्तरकी उत्पत्ति प्रसक्त होती है अर्थात् सामान्य कार्यकारण- भावका जहाँ अतिप्रसङ्ग होता है, वहाँ यह न्याय प्रवृत्त होता है, अन्यत्र नहीं, इसलिए उक्त न्यायसे अजागलस्तनके + समान निरर्थक उक्त विशेष कार्यकारण- भावकी सिद्धि नहीं होती है। यदि शङ्का हो कि 'द्रव्य प्रत्यक्षमें द्रव्यसंयोग कारण है' इस प्रकारके केवल सामान्य नियमके माननेपर अन्य संयोगसे अन्य द्रव्यके प्रत्यक्षकी आपत्ति आ सकती है, इसलिए अतिप्रसङ्क है [ अतः उक्त तृतीय नियम मानना अत्यन्त आवश्यक है] तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तत्-तत् द्रव्यके प्रत्यक्षमें तत्-तत्. द्रव्यसंयोग कारण है, इस प्रकारका नियम माननेसे भी अतिप्रसङ्जका परिहार हो सकता है। यदि उक्तन्यायसे तृतीय नियमकी कल्पना की जायगी, तो उसमें भी अतिप्रसङ्गका परिहार नहीं हो सकता है, इससे उक्त नियमके भक्गकी प्रसक्ति नहीं है।

वकरीके गलेमें लटकनेवाले लम्बे स्तनको अजागलस्तन कहते हैं, जैसे वे वकरीके स्तन किसी काममें नहीं आते हैं, निर्थक हैं, वैसे ही प्रकृतमें विशेषनियमकी कोई आवश्यकता न. होनेसे वह निरर्थक है, यह भाव है। * अङ्करसामान्यके प्रति वीजसामान्यको कारण माननेसे अन्य बीजसे अन्य अङ्करकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग आ सकता है, इसलिए सामान्यनियममें वाधक होने से जैसे तत-तत् अङ्कुरकी उत्पत्तिके प्रति तत्-तत् बीज ही कारण माना जाता है, वैसे ही तत्-तत द्रव्यके प्रत्यक्षके प्रति तत्-तत् द्रव्यसंयोगव्यक्तिको कारण मानना चाहिए, इससे अन्य द्रव्यके संयोगसे अन्य द्रव्यके प्रत्यक्षकी आपत्ति नहीं है, इसपर भी यदि तृतीय नियमका अङ्गीकार किया।

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सकारण अध्यासका विचार] भापानुवादसहित २४१

कि चाऽत्र कलप्नियमभङ्गपि न दोप:, 'इद रजतं पश्यामि, नीलं जलं पश्यामि', इत्यादेरनन्यथासिद्धस्याऽनुभवस्य प्रथमगृहीतानामपि 'परत्यक्षमात्े विषयसन्निकर्ष: कारणम्' इत्यादिनियमानां व्यावहारिकघिपये सङ्गोच- कल्पनमन्तरेणोपपादनासम्भवाद्। न चैंवं सति 'प्रमायां सन्निकर्षः कारणम्, न भ्रमे' इत्यपि सङ्गोच- कल्पनासम्भवाद् असन्निकष्टस्यैव देशान्तरस्थस्य रजतस्य इहाऽडरोपापत्तिरिति अन्यथाख्यातिवादप्रसारिका; अभिव्यक्तचैतन्याचगुण्ठनशन्यस्य देशान्तर- किश्, झुक्तिरजत आदि स्थलमं नियमका भङ्र होनेपर भी दोप नहीं है, क्योंकि 'इस रजतको देखता हूँ' 'नील जलको देखता हूँ' इत्यादि अनन्यथासिद्ध अनुभवकी-'प्रत्यक्षमात्रमें विपयका संन्निकर्ष कारण है' इत्यादि प्रथमतः गृहीत नियमोंका व्यावहारिक विषयमं संकोच किये विना-उपपत्ति हो ही नहीं सकती है।। यदि शब्ा हो कि 'प्रमामे सन्निकर्ष कारण है, अममें नहीं' इस प्रकारसे भी नियनके संकोचकी कल्पना हो सकनेसे शुक्तिमें असन्निकृष्ट अन्यदेशस्थ रजतके ही आरोपकी आपत्ति होगी, इसलिए अन्यथास्यातिवाद भी प्रसक्त होता है; नहीं, यह शक्ा युक्त नहीं है, क्योंकि अभिव्यक्त चतन्यके तादात््यसे शुन्य अन्यदेशस्थ रजतकी अपरोक्षता ही नहीं हो सकती। और ख्याति (अपरोक्ष-

जायना, तो अन्य रजतके संयोगसे अन्य रजतके प्रत्यक्षकी आपत्ति रहेगी ही। इससे अर्थात् प्रथम और तृतीय नियमके असिद होनेसे और द्वितीय नियमके साथ विरोध न होनेसे क नियमोंके साथ असंयुक्त (प्रातिभासिक) पदार्थकी चाक्षुप वृत्ति मानी जाय, तो भी विरोध नदीं है, यह भाव है। + तात्पर्य यह है कि जैसे स्वपप्रपसके केवल साक्षिभास्य दोनेपर भी उसमें चाक्षुपत्वक अनुभव दोता है, परन्तु उग दशामें चक्षु आदिका उपराम होनेसे उनके साथ उन विपयोंका सम्बन्ध नहीं दै, इसी प्रकार झुफिरजत आदिमें 'रजत देखता हूँ' इत्यादि अनुभव होनेसे उनका चाक्ुपत्व स्वीकार किया जाता है, इसलिए उफ नियमोंके सछकुचित होनेपर भी कोई आपतति नहीं है। * शद्वा और समाधानका तात्पर्य यह है-पूर्वमें इसका प्रतिपादन हुआ है कि 'प्रत्यक्ष- मातमें विषयसनिकर्ष कारण है' इस सामान्य नियमका अनुभचके अनुसार व्यावहारिक विपयमें संकोच करना चाहिए, इसलिए प्रातीतिक पदार्थोंके अनुभवमें उक्क नियम वाधक नहीं है, इसपर 'न धैवं सति' इत्यादिसे पुनः शक्षा करते हैं कि जब उक्त नियमका संकोच करना अभीष्ट है, तो

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२४२ सिद्धान्तलेश संग्रह [प्रथम परिच्छेद

निर्वचनीयत्वसिद्धेश्व। न चाउधिष्ठानसम्प्रयोगमात्रात् प्रातिभासिकस्यैन्द्रियकत्वोपगमे शुक्ति- रजताध्याससमये तत्रैव कालान्तरे अध्यसनीयस्य रङ्गस्याऽपि चाक्षुपत्वं

रूपसे रजतकी प्रतीति) एवं बाघकी अनुपपत्ति आदिसे अ्रमज्ञानके विषय अनिवर्चनीयत्व ही सिद्ध होता है। शङ्का होती है कि यदि केवल अधिष्ठानके सम्प्रयोगसे ही प्रातिमासिक रज- तादिमें इन्द्रियजन्य ज्ञानकी विषयताका स्वीकार करते हो, तो शुक्तिमें ही काला- न्तरमें अध्यस्त होनेवाले रङ्गका भी शुक्तिरजताध्यासके समयमें चक्षुसे ग्रहण

तुल्ययुक्तिसे उस नियमका यही संकोच क्यों न किया जाय कि प्रमामें संनिकर्ष कारण है, और भ्रममें कारण नहीं है, क्योंकि नैयायिकोंका मत है कि भ्रमका विपय है देशान्तरस्थ रजत, इस विषयमें अन्य वादियोंने शङ्डा की हे कि असन्निकृष्ट रजतका प्रत्यक्ष कैसे होगा? तव नैया -- यिकोंने उत्तर दिया है कि 'प्रत्यक्षमें सन्निकर्प कारण है' इस नियमका जैसे आप व्यावहारिक पदार्थ प्रत्यक्षविषयत्वरूपसे संकोच करते हैं, वैसे हमारे मतमें 'प्रमा-प्रत्यक्षमें सननिकर्ष कारण है' इस प्रकार संकोच कर सकते हैं, अतः नैयायिकोंके मतमें कोई दोप नहीं है। इसलिए नैयायिकाभिमत उक्त नियमका संकोच भी प्राप्त हो सकता है और छुकिरजतस्थलमें देशा- न्तरस्थ रजतकी प्राप्ति होनेसे अन्यथाख्यातिवाद प्रसत्त हो सकता है, अनिवर्चनीयवाद नहीं, इसपर उत्तर दिया जाता है-विषयप्रत्यक्षत्वमें इन्द्रियसनिकृष्टत्व प्रयोजक नहीं है, किन्तु अभिव्यक चैतन्याभिन्नत्व ही प्रयोजक है, इसका विचार भी आगे किया जायगा। इसलिए यदि शुक्ति-रजतको देशान्तरस्थ ही माना जायगा, तो अभिव्यकत चैतन्याभेदका . असम्भव होनेसे उस रजतका प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा, अतः अभिव्यक चैतन्यके अभेदके लिए अवश्य शुक्तिदेशोत्पन्न रजत ही मानना चाहिए। तथा ख्याति और वाधकी अनुपत्तिसे भी अनिवचनीय रजत ही सिद्ध होगा, क्योंकि ख्याति शब्दका अर्थ है-अपरोक्ष प्रतीति, शुक्ति रजतके देशान्तरस्थ होनेपर उसकी अपरोक्षप्रतीति नहीं हो सकती है, और उसे असत् माननेपर भी नहीं हो सकती है, अतः यही प्रतीति शुक्ति-रजतमें असत्त्व और देशान्तर- स्थत्वकां निरास करती है, और वाधक प्रतीति है-तीनों, कालमें भी यह रजत नहीं है, इस वाधक प्रतीतिसे रजतस्रमयमें भी शुक्तिमें रजतका अभाव सिद्ध होता है, अव देखिये कि यदि शुक्तिमें रजत नहीं है, तो उसकी ख्याति अपरोक्षप्रतीति नहीं होगी, यदि शुक्तिमें रजत सत्य होगा, तो उसका वाध नहीं होगा, क्योंकि सत्य शुक्तित्वका उसमें वाध नहीं होता है, अतः इस प्रकारके ख्याति और वाधकी अनुपपत्तिसे रजतमें अनिर्वचनीयत्वकी भी सिंद्धि होती है, अतः पूर्वोक्त रीतिसे किया हुआ नियमका संकोच ही युक्त है।

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संकारण अंध्यासका विचार] भापानुंघादसहित २४३

कुतो न स्यादिति वाच्यम् ; रजताध्याससमये रङ्गरजतसाधारणचाकचक्य- दर्शनाविशेपेऽपि यतो रागादिरूपपुरुपदोपाभावादितस्तत्र तदा न रङ्गाध्या- सः, तत एव मया तद्विपयवृ्त्यनुदयस्याऽभ्युपगमात्। तस्मादिदमंशसंभिन्न- रजतगोचरकैत्र वृत्तिरिन्द्रियजन्या। न ततः प्रागिदमाकारा वृत्तिरिति

क्यों नहीं होता है।? यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि रजतके अध्यासके समयमें र और रजतके साधारण चाकचक्य दर्शनके समान होनेपर भी जिस रागादि पुरुषदोपके अभावसे शुक्तिमं रजताध्यास कालमें रङ्गका अध्यास तुम नहीं मानते हो, उसी कारणसे हम रञविषयक वृत्तिकी उत्पत्ति नहीं मानते हैं, इसलिए रञ्का अध्यास रजताध्यासकालमं नहीं होता है। इससे अर्थात् धर्मिज्ञानको कारण न माननेसे 'इदं रजतम्' इसमें इदमंशसे सम्मिलित रजतविषयक एक ही वृत्ति इन्द्रियस उत्पन्न होती है। उससे पूर्व इदमाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं होती है, इसलिए प्रकृतमें अज्ञाननिवर्तकत्वके सद्धाव असद्धावकी चिन्ता करना वधर्थ है।

है वहाका तात्पर्य यद है कि यदि अधिष्ठानके सम्प्रयोगमात्रसे ही प्रातिभासिक पदार्थोंका दन्द्रियम्ञान होता दे, तो युकिगें अन्य कालमें अध्यस्त होनेवाला र रजतके अध्यासकालमें चाक्षुप गृसिका निषय पर्नोन हो? कारण कि वह चाक्षुपवृत्ति जैसे रजततादात्म्याथय इृदमर्थसम्प्रयोगजन्य है, घैसे ही कानन्तरीय रमतादातम्याश्रय इृदमर्थम्प्रयोगजन्य भी है, इसलिए सम्प्रयोग वृत्तिका हेतु नहीं ऐै, किन्तु वाहश्यविशिष्ट धणिशानका हेतु दे, और वह्दी साहश्यज्ञान दोपरूपसे और धर्मिज्ञान- रूपसे रजताध्यासमें कारण है, इस्ी प्रकार रजत साक्षिभास्य है, चही मानना चाहिए। इसपर उत्तर देत है कि तुम्दारे मतमें भी रजताध्यासके समयमें रस आदिका अध्यास क्यों नहीं होता है, इखका उत्तर देना होगा, यदि कदोगे कि चाकचक्य आदि ज्ञानके समान होनेपर भी रजतके अध्यासय्मयगें रंगविषयक राग आदि, जो पुरुपदोप हैं, उनके न रहनेसे रजताध्यास- फालमें रहाध्यास नहीं होता है, तो इसी प्रकार हम (कविसार्किमतानुयायी) भी कहते हैं कि सगादि पुरुपदोयों के न होनेसे रजताध्याय्यकालमें रपृत्तिका उदय नहीं होता है, यह कविता- फिकमत ही युक है, ऐसा 'तस्मात' इत्यादिरे उपसंदार किया है।

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सिद्धान्तलेशसंग्रहं [ प्रंथम परिच्छेद

अन्ये त्वेकैव सामान्यवृत्तिर्वा भ्रान्तिकारणम्। तत्साक्षिभास्यमध्यस्तमलं वृत्त्येति मेनिरे ॥११२॥ कुछ लोग कहते हैं कि (अ्रमस्थलमें) इदमाकार सामान्य वृत्ति एक ही है, और वही अध्यासके प्रति कारण है अध्यस्तका उस वृत्तिसे अभिव्यक्त साक्षिचैतन्यसे भान होता है, अतः रजताकार द्वितीय वृत्ति निरर्थक है॥११२॥। अन्ये तु-'अधिष्ठानज्ञानमध्यासकारणम्' इति इदमाकारां वृत्तिमुपेत्य तदभिव्यक्तनैव साक्षिणा तदध्यस्तस्य रजतस्याञवभाससम्भवात् तन्द्ासक- साक्ष्यभिव्यञ्ञिकया तयैवेदंवृत्या रजतविपयसंस्काराधानोपपत्तेश् रजताकार- वृत्तिव्यर्थेति मन्यन्ते। वृत्तिरेकेदमाकारा सामान्यज्ञानरूपिणी। इदंरजततादात्म्यगोचराऽन्येति केचन ॥११३।। कोई लोग कहते हैं कि ('इदं रजतम्' इत्यादि स्थलमें) सामान्य ज्ञानात्मक एक इदमाकार वृत्ति होती है, और दूसरी इदं और रजतके तादात्म्यका अवगाहन करनेवाली वृत्ति होती है॥११३।। ज्ञानद्वयपक्षे 'इदस्' इत्येका वृत्तिरध्यासकारणभृता। 'इद रजतम्' इति * कुछ लोग तो-अधिष्ठानज्ञान अध्यासके प्रति कारण है, इसलिए इदमा- कार वृत्तिका अङ्गीकार करके, इदमाकार वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यरूप साक्षीसे ही उसमें (इदमवच्छिन्न चैतन्यमें) अध्यस्त रजतका अवभास होनेसे और अध्यस्त रजत आदिके अवभासक साक्षीरूप चैतन्यकी अभिव्यञ्जक इदमाकार वृचिसे ही रजत- विषयक संस्कारोंका आधान हो सकनेसे रजताकार वृत्ति व्यर्थ ही है-ऐसा मानते हैं। दो ज्ञान माननेवालोंके पक्षमें अर्थात 'इदं रजतम्' इसमें * पूर्व टिप्पणीमें कहा गया है कि धर्मिज्ञानमें अध्यासकी कारणताका जो खण्डन किया गया है, वह ऊपरी दृष्टिसे किया गया है, वस्तुतः नहीं, इसलिए धर्मिन्ञानवादीका मत कहते हैं-'अन्ये तु' इत्यादिसे। । जिस वृत्तिसे युक्त चैतन्यमें जितने पदार्थ भासते हों, उतने पदार्थोंमें उस वृत्तिसे संस्कारोंका आधान होता है, इस पूर्वोक्त नियमसे इदमाकार वृत्तिसे ही रजतका संस्कार हो। सकता है, इसलिए रजताकार वृत्ति व्यर्थ है, यह 'अन्ये तु' मतका तात्मर्य है, और इस मतमें उक्त नियम न मानकर स्वगोचरतृतिसे ही स्वमें संस्कारोंका आधान होता है, यही नियम माना गया है, इसलिए 'इस मतमें अध्यस्त रजतविषयक भी वृत्ति मानी गई है, इसीका 'केचित्' और 'अन्ये तु' सतसे विचार हुआ है। इसमें भी पहले मतमें अध्यस्तरजतव्ृत्ति अध्यस्तरजतविशिष्टधर्मीको विषय करती है, और दूसरे मतमें अध्यस्तरजतमात्रको विषय करती है, यह भेद है।

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संकारण अंध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २४५ द्वितीया वृत्तिरध्यस्तरजतविपया, न त्विदमंशं विनाऽव्यस्तमात्रगोचरा सा। 'इदं रजतं जानामि' इति तस्या इदमर्थतादात्म्यापन्नरजतविपयत्वानु- भवादिति केचित्। इदं तद्वृ्त्यवच्छिन्नचिन्मोहौ तत्तदन्विते। युगपद्रूष्यतद्वृत्ती कुर्वांते इति चाडपरे ॥११४॥ कुछ लोग कहते हैं कि इदमवच्छिन्न चैतन्यमें और इदमंश्र-विपय वृत्तिसे अव- च्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अज्ञान रजत और रजतज्ञानरूपसे परिणत होते हैं ॥११४॥ अन्ये तु-यथा इदमंशावच्छिन्चतन्यस्थाडविद्या रजताकारेण विवर्तते, एव मिदमंशविषय वृत्तिज्ञानावच्छिन्नचैतन्यस्थाडविद्या रजतज्ञानाभासाकारेण विवर्तते, न त्विदमंशवृत्तिवद्नध्यस्तं रजतज्ञानमस्ति। तथा च रजतस्य अधिष्ठानगतेदंत्वसंसर्गभानव तज्ज्ञानस्याऽप्यधिष्ठानगतेदंत्व वयत्ससर्ग्ा- नोपपत्तेः, न तस्याऽपीदंविषयत्वमभ्युपगन्तव्यम्। न च रजतत्ववद्ध्यस्तस्य रजतेदंत्वसंसर्गस्य रजतज्ञानगोचरत्वाद 'इदम्' और 'इदं रजतम्' ये दो ज्ञान होते हैं इस पक्षमें 'इदम्' इत्याकारक इदमाकारवृत्ति अध्यासकी कारणभूत है और 'इदं रजतम्' इत्याकारक दूसरी वृत्ति अध्यस्त रजतको अवगाहन करती है, इदमंशको छोड़कर केवल अध्यस्त पदार्थको अवगाहन नहीं करती है, क्योंकि 'मैं इस रजतको जानता हूँ' इस प्रकार उस वृत्तिमें इदमर्थके साथ तादात्यापन्न रजतविषयत्वका अनुभव होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं। इतर लोग कहते हैं कि जैसे इदमंशसे युक्त चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या रजताकारसे परिणत होती है, वैसे ही इदमंशविपयक वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या अध्यस्त रजतमात्रको विपय करनेवाली वृत्तिके आकारमें परिणत होती है, इदम् अंशकी वृत्तिके समान अध्यस्त रजतगोचरवृत्ति अनध्यस्त नहीं है अर्थात् रजतज्ञानाभासरूप रजतज्ञान प्रातिभासिक ही है। इसलिए जसे रजतके अधिष्ठानमें रहनेवाले इदन्त्वका रजतमें संसर्गका भान होता है, वैसे ही रजतके ज्ञानमें भी अधिष्ठानगत इदन्त्वविपयत्वके संसर्गका भान होता है, अतः 'इंद रजतम्' इस द्वितीय ज्ञानको इदंविषयक नहीं मानना चाहिए। यदि शक्का हो कि रजतत्वके समान अध्यस्त रजत और इदन्त्वके संसर्गमें रजतज्ञानकी विषयता होनेसे उस संसर्गकें प्रतियोगी हदन्त्वमें भी रजतन्ञानकी

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२४६ सिद्धान्तलेशसंग्रहं [परंथम परिच्छेद

तत्प्रतियोगिन इदंत्वस्याऽपि तद्विपयत्वं वक्तव्यमिति वाच्यम् ; स्व्रतादा- त्म्याश्रयस्य इदत्वविषयत्वादेव तस्य तत्संसर्गविषयत्वे अतिप्रसङ्गाभावात्। न चाउिष्ठानाध्यासयोरेकस्मिन् ज्ञाने प्रकाशनियमस्य सम्भावनाभाष्य- विवरणे प्रतिपादनाद् एकवृत्तिविपयत्वं वत्तव्यमिति वाच्यम् ; वृत्तिभेदेऽ- पीदमाकारवृत्यभिव्यक्ते एकस्मिन् साक्षिणि तयोः प्रकाशोपगमा- दित्याहुः ।१८।। - विषयता होनी चाहिए? [अन्यथा घटत्व आदिके संसर्गप्रत्यक्षमें घटत्वादिविप- यताका भी अभाव प्रसक्त होनेसे अतिप्रसङ्ग होगा, तात्पर्य यह है कि पूर्वमें कहा गया है कि अध्यस्तरजतवृत्तिको इदंविपयक नहीं मानना चाहिए, क्योंकि अन्य रीतिसे उपपत्ति हो सकती है, इसपर शङ्का करनेवाला कहता है कि ज्ञानाभाससे रजतका ग्रहण करनेपर इदन्त्व संसर्गका यदि ग्रहण होता है, तो संसर्गका प्रतियो- गिभूत इदन्त्व भी अवश्य गृहीत होगा, इस अवस्थामें अध्यस्त रजतज्ञानमें इदन्त्व- विषयकत्व आनेसे अध्यस्तरजतविशिष्ट इदंविपयकत्व सिद्ध ही हुआ, फिर कैसे कह सकते हैं कि ज्ञानाभास रजतमात्रविपयक ही होता है?] तो यह मी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानाभासके साथ तादातम्यापन्न इदमंशज्ञानके इदन्त्वविषयक होने ही से रजतज्ञानमें रजतेदन्त्वसंसर्गकी विपयता होनेसे अति- प्रसङ्ग नहीं है। [भाव यह है कि यद्यपि प्रातिभासिक-अध्यस्त रजतज्ञानका इदन्त्वरूप संसर्गप्रतियोगी विषय नहीं है, तथापि ज्ञानाभासके प्रति अविष्ठान होनेके कारण इदमंश ज्ञानके साथ रजतज्ञानाभासका तादात्म्य है, जो इदमंश ज्ञान है, उसमें इदन्त्वरूप प्रतियोगिविषयकत्व है, अतः ज्ञानाभासमें भी इदन्त्व- संसर्गविषयकत्वका अवगाहन होता है, ] पुनः यदि शक्का हो कि अघिष्ठान और अध्यासका एक ज्ञानमें प्रकाश होता है, इसका सम्भावनाभाष्यके विवरणमें प्रतिपादन होनेके कारण उनमें एकवृत्तिविषयता होनी चाहिए, तो यह ्भी युक्त नहीं है, कारण कि अविष्ठान और अध्यासकी भिन्न-भिन्न वृत्ति मानी जाय, तो भी इदमाकारवृत्तिमें अभिव्यक्त एक साक्षीमें ही उनका प्रकाश माना गया है, [ तात्पर्यार्थ यह है कि अध्यस्तमात्रको विषय करनेवाली वृत्तिका विवरणकारने ही अज्गीकार किया है, इसलिए 'एकस्मिन् ज्ञाने' (एक ज्ञानमें अधिष्ठान और अध्यासका प्रकाश होता है) इत्यादि नियममें कथित ज्ञानशब्द साक्षीका ही वाची है, वृत्तिका वाची नहीं है, इसलिए दोष नहीं है] ।।१८।।

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वृत्तिके निर्गमकी आवश्यकताका विचार] भापानुवादसहित २४७

ननु हेतुनियम्यत्वात् परोक्षत्वापरोक्षयोः। वृत्तेर्निर्गमनं व्यर्थमेवं केचित् समादघु:॥११५॥ परोक्षत्व और अपरोक्षत्वकी विलक्षणताके करणंविश्ेपके अधीन हो सकनेसे वृत्तिका निगमन व्यर्थ है, इस प्रकारकी शक्का होनेपर कोई लोग इस प्रकार समाधान करते हैं॥११५॥ ननु सर्वपदार्थानां साक्षिप्रसादादेव प्रकाशोपपत्तेः कि वृत्या? घटादिविपयक्संस्काराधानाद्युपपत्तये तदपेक्षणेऽपि तन्निर्गमाभ्युपगमो व्यर्थ :; परोक्षस्थल इचाऽनिर्गत वृत्यवच्छिन्नसाक्षिणव घटादेरपि प्रकाशोपपत्ते:। न च तथा सति परोक्षापरोक्षवैलक्षण्यानुपपत्तिः; शाव्दानुमित्योरिव करणविशेपप्रयुक्तुवृत्तिवैजात्यादेव तदुपपत्ते:। अन शक्का होती है कि सम्पूर्ण पदार्थोंका साक्षीसे ही प्रकाश हो सकता है, तो फिर वृत्तिको मानना व्यर्थ ही है। घटादि विपयोंके संस्कारके आधानके लिए वृत्तिकी उत्पत्ति यदि मान भी ली जाय, तो भी वृत्तिका वहिर्निर्गम अर्थात् चक्षु आदि द्वारा घटाकार अन्तःकरणकी वृत्ति वाहर निकलती है, यह मानना व्यर्थ "है, क्योंकि परोक्षस्थलके समान अनिर्गतवृत्तिसे युक्त साक्षीसे ही घट आदिका भी प्रकाश हो सकता है [तात्पर्यार्थ यह है-जैसे 'पर्वतो वहिमान् धूमात्' (पर्वत वहिमान् है, धूम होनेसे) इस अनुमितिस्थलमें बहिर्देशमें वृत्तिके न जानेपर मी साक्षीसे उसका प्रकाश होता है, वैसे ही घट आदि देशमें अन्त :- करणकी वृत्तिके न जानेपर भी उसका प्रकाश हो सकता है, अतः वृत्तिका वाहर निकलना सर्वथा अनुपयुक्त है ]। इसपर यदि शक्का हो कि वृत्तिका वहिर्गमन न माना जाय, तो परोक्ष और अपरोक्षस्थलमें कोई विशेप नहीं होगा, [अतः वृत्तिका' अपरोक्षस्थलमे वाहर निकलना जरूरी है, अन्यथा परोक्ष ज्ञान और अपरोक्ष ज्ञानमें वलक्षण्यका वृत्तिके निकलनेसे और न निकलनेसे जो स्वीकार किया + गया है, वह न होगा] * तात्पर्य यह है कि यदि वृत्ति न मानी जाय, तो कालान्तरमें किसी भी पदार्थका स्मरण ननहीं होगा क्योंकि तत्-तत् विपयोंके अनुभव साक्षीरूप होनेके कारण नित्य होंगे, अतः अनुभवके विनाशरूप संस्कार नहीं होंगे, और संस्कारके न होनेसे स्मरण नहीं होगा, इसलिए अवश्य शृत्ति माननी होगी, अतः 'कि वृत्या?' इसको छोड़कर दूसरा प्रश्न किया गया कि वृत्तिका चहिर्निगम क्यों माना जाता है? *· वहिर्निर्गतधृत्त्यवच्छिनन चैतन्य अपरोक्षज्ञान है, अनिर्गतवृत्त्यवच्छिन चैतन्य परोक्षज्ञान है, इस प्रकारका प्रत्यक्ष और परोक्षमें वैलक्षण्य केवल वृत्तिप्रयुक्त है, अःवृत्तिनिर्गमन

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२४८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

कल्प्यते निर्गमो वृत्तेः परोक्षेगतिकल्पना ॥११६॥ आश्रय (विषयाकार) वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे भासित होनेवाले अर्थोमें अपरोक्षता होनेसे प्रत्यक्ष स्थलमें वृत्तिका निर्गम माना जाता है, और परोक्षस्थलम वृत्तिनिर्गमकी कल्पना नहीं करते हैं ॥११६॥ अत्र केचिदाहु :- प्रत्यक्षस्थले विपयाधिष्ठानतया तदवच्छिन्नमेव चैतन्यं विषयप्रकाशः। साक्षात्तादात्म्यरूपसम्बन्धसम्भवे स्वरूपसम्वन्घस्य वाऽन्यस्य वा कल्पनायोगादिति तदभिव्यकत्यर्थ युक्तो वृत्तिनिर्गमा- स्युपगमः । परोक्षस्थले व्यवहिते चह्नयादौ वृत्तिसंसर्गायोगादिन्द्रियवदन्व्रयव्यति-

तो यह मी युक्त नहीं है, क्योंकि शाव्दवोध और अनुमितिमें जैसे करण- विशेषसे वैलक्षण्यका प्रतिपादन किया गया है, वैसे ही प्रत्यक्ष, अनुमान आदिमें करणविशेषके आधारपर ही वैलक्षण्यकी उपपत्ति हो सकती है। इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं-प्रत्यक्षस्थलमे विपयाव- च्छिन्न चैतन्य ही विषयका अघिष्ठान है, अतः वही विषयावच्छिन्न चतन्य विपयका प्रकाश है, [जीवचतन्य नहीं है, क्योंकि जीवचैतन्य विपयके प्रति उपादान नहीं है, अतः उसके साथ विषयका तादात्म्य नहीं हो सकता है] क्योंकि साक्षात्तादात्म्यसम्बन्धका सम्भव होनेपर स्वरूपसम्वन्धकी अन्य परम्परास- म्वन्धकी कल्पना नहीं की जाती है, अतः विषयावच्छिन्न न्रह्मचैतन्यके ही विषयप्रकाशक होनेसे उसके आवरणके अभिभवके लिए वृत्तिका वाहर निकलना आवश्यक है। अनुमिति आदि परोक्षस्थलमें व्यवहित वहि आदि विषयम वृत्तिसंसर्ग- के न होनेसे और इन्द्रियके समान अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त वृत्तिके निकलनेके लिए किसी द्वारकी उपलन्धि न होनेसे अनिर्गत

नहीं मानना चाहिए, यह वृत्तिनिर्गमवादीका कहना है, इसपर उत्तर दिया कि 'इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, और इन्द्रियाजन्यम् ज्ञानं परोक्षम्' इस प्रकारसे अपरोक्ष और परोक्षके वैलक्षण्यका उपपादन हो सकता है, क्योंकि अनुमिति और शाब्दमें भी अनुमानादिप्रयुक्त वैलक्षण्य ही है, अतः वृत्तिनिर्गमनकी कोई आवश्यकता नहीं है, यह भाव है।

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पृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भापानुवादसहित २४९

साक्षात् प्रमातृसभ्पर्के सुखादेरापरोक्ष्यतः । अन्यताऽपि तथेत्याहुर्वृत्तेनिर्गमनात् परे ॥११७॥ नुम आदिका अपरोक्षानुमन वैतन्यके अथ साक्षात् सम्बन्ध होनेके कारण ही होता है, अवः अन्यव घट आदि प्रतययत्थलें भी चैतन्यके साथ नैस ही सम्बन्ध रनेस अवरोधानुनय होता है, इसन्टिए गरचिनिगमन है, ऐगा भी कुछ लोग हहते है ।११७॥।

मिति घटादावि विपयवंसृष्टमेव चैतन्यमापरोक्ष्यहेतुरिति तदभिव्यक्तये वृनिनिगमं समर्थयन्ते।

न नानुमितमाधर्य र्पष्टमास्वादिन यथा ॥११८।। दस मनके किए वृतिका निर्वमन अवदय होना नाहिए, क्योंकि अनुमानगम्य मापुर्ष प्रलन आलादिय माकुयंके समान तरछ नहीं होता है, पेसा भी कुछ लोग

पनरे तु-शध्दानुमानावगतभ्यः प्रत्यक्षावगते स्पष्टता तावदतु- धूयने। नहि रमालपरिमलादिविशेपे ज्तवारमासोपदिष्टेऽपि प्रत्यक्षाव- किसे बुक्त वेतन्न ही सवरपसम्बन्धसे विषयका प्राशक है, ऐसा अर्थतः अगत्या स्ीकार किया जाता है। अदंकार, सुम्, दुःस आदि विषयोंमें, जिनका कि साक्षात् चैतन्यके साथ तादाल्य है, अपरोक्षना चलम हे, अतः घट आदिमें भी विषयतादात्म्यापन्न सनन्य ही अपरोक्षत्वका कारण होगा, इसलिए विषयावच्छिन्न न्रमचतन्यकी अभिव्यकतिके लिए ही वृचिनिगमन अपेक्षित है, कुछ लोग ऐसा भी सगर्थन करते हैं। अन्य लोग कहते हैं कि शव्द, अनुमान आदि प्रमाणोंसे ज्ञात अर्थोकी अपेक्षा प्रत्यक्षसे श्रवगत पदार्थमं अधिक स्पष्टता अनुभूत होती है, क्योंकि आमके परिमल (सुगन्ध), रस आदिके विषयमें आप पुरुप यदि सौ वार उपदेश करे, तो भी म्रत्यक्षसे ज्ञात वस्तुके समान उसमें स्पष्टता नहीं भासती है, क्योंकि

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२५० सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

गत इव स्पष्टताऽस्ति । तदनन्तरसपि 'कथ तद्?' इति जिज्ञासाऽनुवृत्ते:। न च शब्दान्माघुर्यमात्रावगमेऽपि रसालमाधुर्यादिवृत्त्यवान्तरजाति- विशेषवाचिशव्दाभावात्, तत्सच्वेऽपि श्रोत्रात्तस्याऽगृहीतसङ्गतिकत्वात् शब्दादसाधारणजातिविशेषावच्छिनसाधुर्यावगमो नास्तीति जिज्ञासाऽनु- वृत्तिर्युक्तेति शङ्कथम्, 'रसाले सर्वातिशायी मार्धुयविशेपोऽस्ति' इत्य- स्माच्छन्दात्तद्गतावान्तरजाति विशेपस्याऽप्यचगमाद्। नह्ययं विशेपशब्द- स्तद्गतविशेषं विहायान्यगतं विशेषं तत्र वोधयति, अप्रामाण्यापत्तेः। न च तद्गतसेव विशेषं विशेषत्वेन सामान्येन रूपेण चोधयति, न उपदेशके अनन्तर भी वह कैसा है ? या वह किस प्रकारका है? ऐसी जिज्ञासा बनी रहती है *। यदि शङ्का हो कि 'आम्र-फलमें मधुर रस आदि हैं' इस प्रकारके सौ बार उपदिष्ट आप्वाक्यसे केवल मधुर रसके ज्ञात होनेपर भी आमके माधुर्य आदिमें रहनेवाली अवान्तर जातिके बोधक शब्दका अभाव होनेसे और उसके बोधक शब्दके अस्तित्वम भी श्रोत्रसे (कानसे) अवान्तर जाति- विशेषके वाचकशब्दकी शक्तिका ग्रहण न होनेसे उक्तशव्दसे (वाक्यसे) असाधारण जातिविशेषसे युक्त माधुर्यका ज्ञान नहीं होता, इसलिए उक्त स्थलमें जिज्ञासाकी अनुवृत्ति हुआ करती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'रसाले सर्वातिशायी माधुर्यविशेषोऽस्ति' (आममें सबको मात करनेवाला माधुर्यविशेष है) इस शब्दसे माधुर्यगत अवान्तरजातिविशेपका भी अवगम होता है, [परन्तु प्रत्यक्षके समान स्पष्टता नहीं भासती है और जिज्ञासा रहती है] क्योंकि यह वाक्यविशेष माधुर्यगत विशेषका बोधन न कर अन्यगत विशेषका बोधन करता है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा माननेसे वाक्यमें अप्रामाण्यापत्ति होगी और यह मी शङ्का नहीं कर सकते हैं कि माधुर्यगत जो विशेष है, उसका उक्त शब्द * सामान्यतः विशेषरूपसे बोध करता है, * 'आममें वड़ी सुगन्ध और अत्यन्त मीठा रस है, इस विषयके किसी प्रामाणिक पुरुषके हजार बार कहनेपर भी निःसंशय रसादिका ज्ञान नहीं होता है, क्योंकि 'वह मीठा रस कैसा है?' यह जिज्ञासा उपदेशके बाद भी वनी रहती है, यह भाव है। + तात्पर्य यह है कि उक्त आप्तशब्दसे आमके माधुर्यका विशेषत्व विशषरूप सामान्यधर्मसे गृहीत होता है, विशेषवृत्ति विशषरूपसे गरहीत नहीं होता है, अतः जिज्ञासा होती है, यह राझाका

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भापानुवादसहित २५१

विशिप्येति जिज्ञासेति वाच्यम, प्रत्यक्षेणापि मधुररसविशेपणस्य जाति- विशेपस्य स्वरूपत एव विपयीकरणेन जाति विशेषगतविशेपान्तराविपयी-

तम्मात् प्रत्यक्षग्राह्येऽभिव्यक्तापरोक्ष्य कर सचैतन्यावगुण्ठनात् स्पष्टता जिन्ञासानिवर्तनक्षमा, शव्दादिगम्ये तु तद्भावादस्पप्टतेति व्यवस्थाऽभ्यु- पगन्तव्या। अत एव साक्षिवेद्यस्य सुखादे: स्पष्टता। शाव्दवृत्तिवेद्यस्याऽपि

विशेपतः विशेपरूपसे वोध नहीं करता है, इसलिए जिज्ञासा होती है, तो यह मी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षस्थलमें भी मधुर रसमें विशेपणरूपसे रहनेवाले जातिविशेषका प्रत्यक्षसे स्वरूपतः ग्रहण होनेके कारण जातिविशेपमें रहनेवाले विशेपान्तरका ग्रहण न होनेसे जिज्ञासाकी निवृत्ति नहीं होगी। इससे अर्थात् प्रत्यक्षसे अवगत पदार्थकी अपेक्षा शब्द आदिगम्य पदाथोंगें स्पष्टत्वके न होनेसे प्रत्यक्षसे गृहीत पदार्थमें अभिव्यक्त स्वप्रकाश और एकरूप नवचतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे जिज्ञासाकी निवृत्ति करनेमें 4 समर्थ विपयताविद्योपरूप स्पष्टता होती है, और शब्द आदि द्वारा गृहीत पदार्थमं अभिव्यक्त चैतन्यके साथ तादात्म्य न होनेके कारण स्पष्टत्व नहीं प्रतीत होता है, इस प्रकारकी व्यवस्था करनी चाहिए, अभिव्यक्त चैतन्यका सम्बन्ध होनेसे ही साक्षीसे वेद्य सुख आदिमं स्पष्टता प्रतीत होती है। शब्द- जन्यवृचतिसे वेद्य नसमें भी मनन आदिसे पूर्व अज्ञानकी निवृत्तिके न होनेसे

आाय हे, दसपर उत्तरदाताफा कहना है कि माधुर्यगत जातिविशेपमें रहनेवाला असाधारण धर्म जातिरुप ऐ या उपाधिरूप है? जातिरूप तो नहीं हो सकता है, क्योंकि उसकी जातितामें प्रमाण नहीं ह और जातिमें उसका अंगीकार भी नहीं है, यदि उपाधिरूप मानेगे, तो वह उपाधि होगी-जातिविशषाश्रयातिरिक्तापृत्तितवे सति जातिविशेपाश्रयवृत्तित्वम्, अर्थात् जाति विशेपके आभ्रयये भिननमें न रहकर जातिविशेपके आश्रयमें रहे। परन्तु यह भी युक्त नहीं रोगा, क्योंकि प्रत्यक्ष स्थलमें भी आमके माधुर्येके जातिविशेषमें प्रत्यक्षसे उसका प्रहण न होनेके कारण जिशासाकी अनुवृत्ति दोगी। * अथात् मृशि द्वारा अभिव्यक्त नैतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे प्रत्यक्ष भराष्य पदार्थोंमें स्पषत्वकी प्रतीति होती है, इसके बिना नहीं होती। इससे विपयमें रहनेवाली स्पष्ताका प्रयोजक जो आवरणनिवतिरूप विषय चेतन्याभिव्यक्ति है, उसकी सिद्धिके लिए पृततिका निर्गमन अपेक्षित है, गद्द सूचित हुआ।

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२५२ सिद्धान्तलेशसंग्रहं [प्रथम परिच्छेद

ब्रह्मणो मननादे: परागज्ञानानिवृत्तावस्पष्टता, तदनन्तरं तन्निवृत्तौ स्पष्टतेति वृत्तिनिर्गमसुपपादयन्ति। न चावरणविच्छेद: स्पष्टता तामनिर्गता। करोतु तुल्यविषयतत्तदज्ञाननाशिनी ॥११९।। यदि शङ्का हो कि आवरणविच्छेदरूप स्पष्टता अनिर्गत वृचिसे ही होगी, क्योंकि समानविषयक अज्ञानका समानविषयक वृततिज्ञान विनाश करता है॥११९॥ नन्वेतावताऽपि विषयावरकाज्ञाननिवृत्यर्थ वृत्तिनिर्गम इत्युक्तम्। तद्युक्त्तम्। विपयावच्छिन्नचैतन्यगतस्य तदावरकाज्ञानस्यानिर्गतवृत्त्या निवृत्यभ्युपगमेऽप्यनतिप्रसङ्गात्। न च तथा सति देवदत्तीयघटज्ञानेन यज्ञदत्तीयघटाज्ञानस्यापि निवृत्तिप्रसङ्ग:, समानविपयकत्वस्य सच्वाद्।

अस्पष्टता ही है और मनन आदिके बाद अज्ञानकी निवृत्ति हो जानेसे ब्रम्ममें स्पष्टता प्रतीत होती है, अतः वृत्तिका बाहर निकलना अत्यन्त अपेक्षित है। शङ्का होती है कि इतने ग्रन्थसे अर्थात् 'अन्र केचिदाहुः' इत्यादि अ्न्थसे भी यही कहा गया है-विषयको आवृत करनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिकी आवश्यकता है, परन्तु यह अयुक्त है, क्योंकि विषयावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले विषयावरक अज्ञानकी अनिगर्तवृत्तिसे यदि निवृत्ति मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है। यदि शक्का हो कि ऐसा होनेपर देवदत्तके घटज्ञानसे यज्ञदत्तके भी घटाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, क्योंकि उनमें समानविषयकत्व*

  • 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यजन्य वृत्ति मनन आदिके अनुष्ठानके पूर्वमें असम्भावना और विपरीतभावनासे सर्वथा प्रतिवद्ध है, अतः वह मनन आदिके पूर्वमें अज्ञानकी निर्वतक नहीं है,और उसके वाद तो असम्भावना और विपरीतभावनाके निवृत्त होनेसे वह वृत्ति अज्ञानकी निर्वतक होगी और व्रह्ममें स्पष्टत्वका अवगम करावेगी, यह भाव है। विषयको आवृत करनेवाला अज्ञान किसीके मतसे विषयमें रहता है और किसीके मतसे पुरुषमें रहता है, जो लोग पुरुषमें अज्ञान मानते हैं, उनके मतसे वृत्तिके निर्गमके बिना भी-अनिर्गत वृत्तिसे भी, अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, परन्तु जिनके मतसे विषयगत अज्ञान अर्थात विषयावच्छिन्नचतन्यनिष्ठ अज्ञान है, उनके मतमें भी अनिगत वृत्तिसे अज्ञान- की निवृत्ति यदि मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, यदि इसपर शङा हो कि ज्ञान और अज्ञानके निवत्य-निवतकरूप विरोधमें समानाश्रयत्व होकर समानविषयकत्व प्रयोजक है। यदि वृत्तिका निगमन नहीं माना जायगा, तो केवल ज्ञान और अज्ञानमें समानाश्रयत्वके लब्घ न होनेसे केवल समानविषयकत्व ही प्रयोजक होगा, अतः देवदत्तीय घटज्ञानसे यशदत्तीय

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यंकतांका विचार] भापानुवादसहित २५३

अहमर्थविपयचैतन्यनिष्ठयोर्ज्ञानाज्ञानयोर्भिन्नाथयत्वेन तयोर्विरोधे समाना- "शयत्वस्याऽतन्त्रत्वादिति वाच्यम्। समानाश्रयविपयत्वं ज्ञानाज्ञानयोविरोध- प्रयोजकमङ्गीकृत्य वृत्तिनिर्गमनाभ्युपगमेऽपि देवदत्तीयघटवृत्ते: यज्ञदत्ती-

'यदज्ञानं यं पुरुपं प्रति यद्विपयावरकं, तत् तदीयतद्विपयकज्ञाननिवर्त्थम्' इति प्रृथगेव विरोधप्रयोजकस्य वक्तव्यतया समानाश्रयत्वस्याऽनपेक्षणाद्। मैवं, परोक्षवृत्त्याऽपि मोहोच्छेदप्रसङ्गतः । आपरोक्ष्यं तु नो जातिरांशिकत्वाच्च सङ्करात् ॥१२०॥ तो उक्त शङ्का युक्त नहीं है, क्योोंकि परोक्षवृचिसे भी अज्ञानका विनाश प्रसक्त होगा और अपरोक्षत्व जाति भी नहीं है, क्योंकि आंशिक होनेसे सङ्करदोपसे दुष्ट है ॥१२०॥ अत्राहु :- वृत्तिनिर्गमनानभ्युपगमे ज्ञानाज्ञानयोविरोधप्रयोजकमेव दुर्नि- रूपम्। 'यदज्ञानं यं पुरुपं प्रति' इत्याद्युक्तमिति चेत्, न; परोक्षज्ञानेनाऽपि विपयगताज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्गात्। हैं। कारण कि वृत्तिनिर्गमके न होनेसे अहमर्थ और विषयचैतन्यमें रहनेवाले क्रमशः ज्ञान और अज्ञानका असमानाश्रय होनेसे ज्ञान और अज्ञानके विरोधमें समानाश्रत्व प्रयोजक नहीं है, किन्तु समानविषयत्व ही प्रयोजक है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञान और अज्ञानके विरोधमें समानाश्रयत्वविशिष्ट समानविपयकत्वको प्रयोजक मान कर वृत्तिके निर्गमका अङ्गीकार करनेपर भी देवदत्तकी घटवृत्तिका और यज्ञदत्तके घटाज्ञानका घटावच्छिन्न चैतन्यरूप एक आश्रय होनेसे वृत्तिनिर्गमनपक्षमें भी अतिप्रसक्तिके तदवस्थ होनेसे 'यदज्ञानम्' (जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विपयका आवारक हो, वह अज्ञान उस पुरुपके उस विपयके ज्ञानसे निवृत्त होता है) इस प्रकार अलग ही विरोधका प्रयोजक मानना होगा, इससे समानाश्रयत्वकी अपेक्षा ही नहीं है, [इससे वृत्तिनिर्गम व्यर्थ है, यह शक्काका स्वरूप है ]। इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं-वृत्तिका वहिर्निर्गमन न माना जाय, तो ज्ञान और अज्ञानके परस्पर विरोधके प्रयोजकका निरूपण ही नहीं हो सकेगा। यदि कहो कि 'यदज्ञानम्' इत्यादिसे विरोधके हेतुका घटाज्षान नष्ट होना चाहिए? परन्तु यह शक्ा युक्त्त नहीं है, क्योंकि इसका उत्तर 'समानाश्रय' इत्यादि ्रन्थसे दिया गया है।

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२५४ सिद्धान्तलेशसंग्रहं [संथम परिच्छेद

अपरोक्षत्वमपि निवर्तकज्ञानविशेपणमिति चेत्, किं तदपरोक्षत्वम्? न तावज्ाति: । 'दण्ड्ययमासीत्' इति संस्कारोपनीतदण्ड विशिष्टपुरुप- विषयकस्य चाक्षुपज्ञानस्य दण्डांशेऽपि तत्सच्वे तन्रापि विपयगताज्ञान- निवृत्यापातात्। 'दण्डं साक्षात्करोमि' इति तदंशेऽप्यापरोक्ष्यानुभवा- पत्तेश्र। अननुभवेऽपि संस्कारं सन्निकर्ष परिकल्प्य इन्द्रियसन्निकर्पजन्य- तया तत्र काल्पनिकापरोक्ष्यास्युपगमे अनुमित्यादावपि लिङ्गज्ञानादिकं सन्निकर्ष परिकल्प्य तदङ्गीकारापत्तेः। दण्डांशे आपरोक्ष्यासच्वे तु तस्य निरूपण किया ही जा चुका है, यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे परोक्षज्ञानसे भी विपयके अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी। यदि शक्का हो कि अज्ञानके निवर्तक ज्ञानमें अपरोक्षत्व विशेषण देंगे, [अर्थात् अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्तक होता हे अन्य नहीं, अतः अपरोक्ष ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है] यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपरोक्षत्व क्या है ? [ उसका निवचन करना होगा, तात्पर्य यह है कि ज्ञानमें जो अपरोक्षत्व विशेषण देते हैं, वह जातिरूप है या उपाविरूप है ?] जातिरूप नहीं हो सकता है, क्योंकि 'अयं दण्डी आसीत' (यह दण्डी था) इस प्रकार संस्कारसे उपनीत दण्डसे युक्त पुरुषविपयक चाक्षुप ज्ञानके दण्ड अंशमें यदि अपरोक्षत्व जाति है, तो उसमें भी विपयके अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी। अनुभव न होनेपर भी यदि दण्डांशमें संस्काररूप सन्निकर्पकी कल्पना करके इन्द्रियसन्निकर्पसे जन्य होनेके कारण उसमें काल्पनिक अपरोक्षत्वकी कल्पना की जाय, तो अनुमिति आदिमें भी लिव्ज्ञान आदि सन्निकर्षकी। कल्पना करके-अपरोक्षत्वप्रसक्ति होगी। दण्ड अंशमें अपरोक्षत्व *तात्पर्य यह है कि किसी समयमें दण्डसे युक्त विष्णुमित्रका ग्रहण हुआ था, कालान्तरमें दण्डरहित विष्णुमित्रको देखकर संस्कार और इन्द्रियसे ज्ञान होता है कि 'यह विष्णुमित्र दण्डी था'। यहां पर शङ्का होती है-इसमें दण्डांशमें प्रत्यक्षत्व है, या नहीं है। यदि प्रत्यक्षत्व माना जाय, तो दण्डांशमें अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक् होगी। इषापति नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह दण्ड कैसा था, इस प्रकार जिज्ञासा होती है, यदि तद्गत अज्ञानकी निशत्ति होती, तो यह जिज्ञासा उदित नहीं होती। * तात्पर्य यह है कि 'स्वविषय प्रत्यासत्तिः सन्निकर्षः' (स्वविषयके साथ सम्बन्ध सन्िकर्ष है) इस मतका अप्ीकार करके संस्कारकी कल्पनाकर इन्द्रियसन्निकर्पजन्यत्वरूप कल्पनाके

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सृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकता का विचार] भापानुवादसहित २५५

जातित्वायोगाद्, जातेर्व्याप्यवृत्तित्वनियमात्। तदनियमेऽप्यवच्छेदकोपा- धिभेदा निरूपणेन तस्याव्याप्यवृत्तिजातित्वायोगाच। नाप्युपाधिः, तद्निर्वचनात्। इन्द्रियजन्यत्वमिति चेत्, न; साक्षि- प्रत्यक्षाव्यापनात्। विशेपणांशातिव्यापनाच। करणान्तराभावेन तदंशे परोक्षेप्युपनयसहकारि- न माना जाय, तो अपरोक्षत्व जाति नहीं होगी, क्योंकि जाति सर्वदा व्याप्य- वृत्ति हुआ करती है, यह नियम है, यदि 'जाति व्याप्यवृत्ति होती है' यह नियम न माना जाय, तो भी अवच्छेदक उपाधियोंका निरूपण न हो सकनेसे अपरोक्षत्व जाति अध्याप्यवृत्ति नहीं हो सकती है* । अपरोक्षत्व उपावि भी नहीं है, क्योंकि उसका निर्वचन ही नहीं हो सकता, यदि कहो कि इन्द्रियजन्यत्व (इन्द्रियसे उत्पन्न होना) अपरोक्षत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सुख आदिकी नित्यसाक्षीरूप प्रत्यक्षमें अध्याप्ति हो जायगी। और अनुमितिसे एवं शव्दजन्य ज्ञानसे उपनीत गुरुता आदिसे विशिष्ट घटके प्रत्यक्षमें विशेपणीभूत गुरुत्वमं उक्त लक्षणकी अतित्याप्ति हो जायगी।। क्योंकि गुरुत्वमे मरत्यक्षत्वसम्पादक अन्य करणके न होनेसे गुरुत्वांशके परोक्ष होनेपर भी उपनयकी सहकारितासे आघरपर दृण्जासमें अपरोक्षत्वकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि लिप्नशान आदि सन्िक्षशी कलपना कर के अनुमिति आदिमें अपरोक्षत्वका अग्ीकार प्रसक दोगा, यदि दण्डाक्षमें अयरोभत्व न माना जाय, तो 'दण्डी विष्णुमित्र आसीत्' इत्यादि प्रत्यगिज्ञानात्मक एक ज्ञानमें स्वृतित और अपरोक्षत्वके रनेसे यहर हो जायगा, इसलिए अपरोक्षत्व जाति नहीं हो सकती, पर्गोंकि जो जाति होती ऐ, वह व्याप्यपत्ति होती है, यह नियम है। • माय गद दै कि यदि जाति व्याप्यगृत्िन मानी जाय, तो भी प्रत्यमिशामें विष्णुमिन्न अंदमें प्रत्यक्षत्व और दण्ड अंशमें तदभाव मानना नादिए, परन्तु वह तभी उपपनन हो सकता है, जब कि उपाधिभेद माना जाय, क्योंकि अवच्छेदकके मेदसे दी प्रतियोगी और तदभावकी अवस्यिति एकत रहती है, प्रकृतमें उपाधिभेदका निरूपण अवक्य है, इसलिए अपरोक्षत्वमें (सयमानाधिकरणात्यन्तामावप्रतियोगित्वरूप, स्वके आश्रयमें ही स्व का अभाव हो) अव्याप्य गृतित्वके अगम्भव होनेस व्याप्यपृ्ति ही जाति होगी, अतः पूर्वोक दोप तदवस्थ ही रद्देगा। +अर्थात जिस घटमें सच्दसे या अनुमानसे गुरुत्वका अनुभव किया गया है, उस घटके ग्राथ दन्दियसम्बन्ध होनेपर 'घटोडयं गुरुः' (यह घढ़ा घजनदार है), ऐया प्रत्यक्ष दोता है। इसरमें विशेषणीभून गुरुस्वगें अतिव्याति दोगी, अतः इन्द्रियजन्यत्व प्रत्यक्षका लक्षण युक नदीं है।

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२५६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथम परिच्छेद

सामर्थ्यादिन्द्रियस्यैव जनकत्वात्, अनुगतजन्यतावच्छेदकाग्रहेणाSनेकेप्वि- न्द्रियजन्यत्वस्य दुर्ग्रहत्वाच। तद्ग्रहे च तस्यैव प्रथमप्रतीतस्याऽपरोक्षरूप- त्वोपपत्तौ प्रत्यक्षानुभवायोग्यस्य इन्द्रियजन्यत्वस्य वद्योग्यापरोक्षरूपत्व- कल्पनायोगात्। एतेन 'इन्द्रिसन्निकर्पजन्यत्वमापरोक्ष्यम्। उपनयसहकृतेन्द्रियजन्य- परोक्षांशे च न सन्निकर्पजन्यत्वम्। अनुमितावप्युपनीतभानसच्वेन ग्रमा· अनुमितिमें जैसे मन करण है, वैसे ही प्रकृतम इन्द्रियाँ करण हैं। और अनुगत इन्द्रियजन्यतावच्छेदकका ग्रह न होनेके कारण अनेक अपरोक्ष ज्ञानोंमें इन्द्रिय- जन्यत्वका ग्रह भी नहीं हो सकता है। यदि 'अहं साक्षात्करोमि' (मैं साक्षात्कार करता हूँ) इत्यादि अनुभवसे सिद्ध कोई अनुगत जन्यतावच्छेदक माना जाय, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रथमतः प्रतीयमान वही वर्म* अपरोक्षत्व हो सकेगा तो प्रत्यक्ष अनुभवके अयोग्य इन्द्रियजन्यत्वमें उस अनुभवके योग्य अपरोक्षत्वंकी कल्पना असङ्गत होगी। अव्याप्ति आदि दोपोंके होनेसे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि इन्द्रिय-सन्निकर्षजन्यत्वरूप अपरोक्षत्व+ है, उपनयसहित इन्द्रियसे जन्य परोक्ष- अंशमें सन्निकर्षजन्यता नहीं है, अतः गुरुत्व आदिमें दोप नहीं है, अनुमिति * अवच्छेद्यरूप जन्यत्वके ज्ञानके पूर्व अवच्छेदकका ज्ञान अपेक्षित होता है, अतः 'साक्षात्कार करता हूँ' इत्यादि प्रतीतिरूप अनुभवके योग्य जन्यतावच्छेदकरूपसे स्वीकृत जो धर्म है, उसीमें अपरोक्षत्व्रकी उपपत्ति हो सकती है, फिर अयोग्य इन्द्रियजन्यत्वको अपरोक्षत्वरूप माननेकी आवश्यकता नहीं है। यदि शक्का हो कि वही जन्यतावच्छेदक उपाधि अपरोक्षत्वरूप हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि वह उपाधि व्याप्यवृत्ति है या अव्याप्यधृत्ति? यदि प्रथम पक्ष माना जाय, तो 'दण्डी अयम् आसीत्' इत्यादिमें दण्डादि अशमें व्यभिचार होगा, यदि द्वितीयपक्षका अवलम्बन किया जाय, तो अवच्छेदक उपाधिका निरूपण दुर्घट होनेसे भव्याप्य- वृत्तित्व ही नहीं होगा, अतः उस जन्यतावच्छेदकको अपरोक्षत्व नहीं कह सकते हैं। + इन्द्रिय और अर्थके सम्बन्धसे होनेवाला ज्ञान अपरोक्ष है, जैसे-घटविपय-भर्थ है उसके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध होनेसे अर्थात् संयोगसम्बन्ध होनेसे 'घटं साक्षात्कारोमि' (घटका साक्षात्कार करता हूँ) ऐसा अनुभव होता है। ये सन्निकर्ष संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्तसमवतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय और स्वरूपसम्बन्ध, इस प्रकारसे छः है, इनका द्रव्य, गुण, गुणत्व, शब्द, शब्दत्व और अभाव आदिके प्रत्यक्षमें क्रमशः उपयोग न्यायमतमें माना गया है। इसलिए इन्द्रियार्थसन्निकर्जन्यत्व अपरोक्षत्व हो सकता है, यह पूर्वपक्षीका अभिप्राय है।

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भापानुवादसहित २५७

णान्तरसाधारणस्योपनयस्याऽसन्निकर्पत्वात्' इृत्यपि शङ्का निरस्ता। संयोगा-

यत्तवाऽमिमतमापरोक्ष्यम्, तदेव ममाऽप्यस्त्व्रिति चेत्, न; तस्य शाब्दा- परोक्षनिरूपणप्रस्तावे प्रतिपादनीयस्य तंत्रैव दर्शानीयया रीत्या अज्ञान-

आदिमें भी उपनीत मानके होनेसे अन्य ग्रमाण साधारण उपनयमे सन्निकर्षत्व नहीं है। और दूसरी बात यह भी है कि संयोग आदि सन्निकर्षोका अनुगम न होनेके कारण इन्द्रियसन्निकर्पजन्यत्वरूप अपरोक्षत्व भी अनुगत नहीं होगा। यदि कहो कि जो तुम (सिद्धान्ती) अपरोक्षत्व मानते हो, वही हमारे मतमें भी होगा। [इसलिए अज्ञाननिवर्तक ज्ञानमें अपरोक्षत्व विशेषण देनेसे परोक्षज्ञानकी निवृत्ति प्रसक नहीं होगी], तो यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि शव्दज्ञानके अपरोक्षत्वनिरूपणके प्रकरणमं प्रतिपादनीय सिद्धान्तीका अपरोक्षत्व, उसी प्रकरणमें मदर्शित रीतिसे, अन्ञाननिवृत्तिसे प्रयोज्य है, अतः वह अज्ञान- निवृत्तिके प्रति प्रयोजक (कारण) रूपसे निवर्तक ज्ञानमें विशेषण नहीं हो सकता है।

• झानमें जो अपरोक्षत् हे, बद करणविशेपये प्रयुक नहीं है, किन्तु अपरोक्ष अर्थसे अभिकत्वरूप है, और नह जो अपरोक्षार्यामिघवलरूप अपरोक्षत्व है, वह विपयाचभासक नन्यरपज्ाननिष्ठ है, पृतिनिष्ठ नहीं है, इसलिए साक्षिपत्यक्षमें अव्याप्ति नहीं है, और अथमें अपरोकत अर्थव्यवारके अनुकूल सतन्याभितत्व है अर्थात् विपयके व्यचहारमें उपयुक् नतन्गसे अनिवल हे। निपयव्यवदार में अनुूल चतन्य है-जिसका कि आवरण नष्ट दुआ है-ऐसा वम विपयना अधिष्ठानभूत नेतन्य, इसीलिए अपने व्यवदारमें अनु- कूल एवगोचर पर्तिय अभिय्यक अधिष्वाननेतन्यके साथ चटादि विषयोंका तादात्म्यरूप- अगेद होनेके कारण उनमें अपने व्यवदारमें अनुकल चैतन्याभिज्नत्व है। अह्कार आदि सपनोंनें भी अद्दवारके अषिष्रानभृत याक्षिरप शञानकी और वाल घट आदिमें तत्-तत् वृत्तयु- पदित पढादि प्रत्वक्ञानात्मक जो घट थादिका अधिष्ठानभूत चैतन्य है, उसकी उन-उन निपयोंक माथ तादात्यापति होनेसे अपरोक्षार्थगिनत्वरूप अपरोक्षत्व उपपन है। यह रीति शाब्दापरोक्षप्रकरणमें बतलाई गई ह। इस अवस्थामें विपयावच्छिन नतन्यगत अज्ञानकी निषृत्ति होनेपर दी घटादिय्यपदारके अनुकूल चैतन्यके साथ घटादिघिपयका अभेदरूप अपरोक्षत्व प्राप्त सो सकता है, विषन जब अपरोक्ष होगा, तब विपयके ज्ञानमें भी अपरोक्षार्या- निम्नल ऐोगा, इवलिए विषयचतन्यमें रहनेवाले अज्ञानकी निधृत्तिके पूर्वमें ज्ञानमें अपरो- सषत्यकी सिद्षि नहीं हो सकती है, अतः सिद्धान्तीका अभिमत ज्ञानगत अपरोक्षत्व, जो ६३

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२५८ सिद्धान्त लेश संग्रह् [प्रथम परिच्छेद

शोकमात्मविद्' इति श्रुतस्य ब्रह्मज्ञानस्य मूलाज्ञानाश्रयभूतसर्वोपादान- ब्रह्मसंसर्गनियतस्य मूलाज्ञाननिवर्तकत्वात्। 'ऐन्द्रियकवृत्तयस्तत्तदिन्द्रिय- सन्निकर्पसामर्थ्यात् तत्तद्विपयावच्छिन्नचैतन्यसंसृष्टा एव उत्पद्यन्ते' इति नियमंभुपेत्याऽज्ञानाश्रय चैतन्यसंसर्गनियतत्वं निचर्तकज्ञानविशेषणं चाच्यम्। तथा च 'यद् अज्ञानं यं पुरुषं अ्रति यद्विपयावरकम्, तत् तदीयतद्विपयतद- ज्ञानाश्रयचैतन्यसंसर्गनियतात्मलाभज्ञाननिवर्त्यम्' इति ज्ञानाज्ञानयोविरोध- प्रयोजकं निरूपितं भवति।

इससे अर्थात् 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्यादि नियममें अपरोक्षत्वका निवर्तकज्ञानके विशेषणरूपसे प्रवेश नहीं हो सकनेसे 'तरति०' (आत्मज्ञानी अज्ञानको तर जाता है अर्थात् ज्ञानीका अज्ञान निवृत हो जाता है) यह श्रुत न्द्मज्ञान, जो कि मूलाज्ञानके आश्रयभूत तथा सम्पूर्ण जगत्के प्रति उपादानभूत न्रह्ममें नियमतः संसृष्ट है, मूलाज्ञानका निवर्तक है। अतः तत्- तत् इन्द्रियोंकी सामार्थ्यसे इन्द्रियजन्य वृत्तियाँ भी तत्-तत् विपयोंसे युक्त चैतन्यसे संसृष्ट ही उत्पन्न होती हैं, ऐसा नियम मानकर अज्ञानाश्रय चैतन्यके संसर्गसे नियतत्व निवर्तक ज्ञानमें विशेषण देना चाहिए। इससे 'जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवरक होता है, वह + तदीय और तद्विपयक तदज्ञानके आश्रय चैतन्यके संसर्गसे नियतात्मलाभवाले ज्ञानसे निवत्य है', इस प्रकार ज्ञान और अज्ञानके विरोधके प्रयोजकका स्वरूप निरूपित होता है। विषयचतन्यगत अज्ञानकी निवृत्तिसे प्रयोज्य है, अज्ञानकी निवृत्तिमें कारण कैसे होगा, अर्थात् कदापि नहीं हो सकता है, इसलिए वह अज्ञाननिघृत्तिके प्रति निवर्तकज्ञानका प्रयोजकत्वरूपसे विशेषण नहीं हो सकता है, यह भाव है। * तात्पर्य यह है कि जव ब्रह्मविषयक ज्ञानकी (वृत्तिकी) उत्पत्ति होती है, तव नियमतः वह ज्रह्मसंसष्ट ही उत्पन्न होती है, क्योंकि ब्रह्म सभीका उपादान है, कार्यमात्र जन्मसे लेकर उपादानभूत बह्मके साथ संसष्ट होता है, इसीलिए ब्रह्मविषयक वृत्तिज्ञानका भी स्व्रनिवर्त्य मूलाज्ञानके आश्रयीभूत ब्रह्ममें संसर्गनियम अर्थसिद्ध है। + घटवच्छिन चैतन्यमें घटको आवृत करनेवाले अनेक अज्ञान है, उनमें से कोई देवदसके प्रति आवारक हैं, तो कोई यश्ञदत्तके प्रति, इस प्रकारसे प्रतिविषय पुरुषके भेदसे अनेक अज्ञान हैं, इसलिए विषयावारक अज्ञानोंमें से जो अज्ञान जिस देवदत्तके प्रति जिस विषयको आवृत्त करता है, वह अज्ञान उसी देवदत्तके घटविषयक उस अज्ञानके आश्रयभूत चैतन्यके संसर्गसे नियतात्मलाभवाले (नियत है उत्पत्ति जिसकी, ऐसे) ज्ञानसे निवर्त्य है, अर्थात, देवदत्तके प्रति घढ़ावारक जो अज्ञान है, उसका

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भापांनुवादसहित २५९

विपयसंसर्ग विनाडपि शाव्दज्ञानसम्भवेन तत्संसर्गनियतात्मलाभत्वाभावाद्। तस्माज्ज्ञानाज्ञानविरोधनिर्वाहाय वृत्तिनिर्गमो वक्तव्य इति। ऐसा होनेपर 'हृदयपुण्डरीकम नाडियाँ हैं' इस प्रकार शब्दसे उत्पन्न हुए नाडी और हृदयके स्वरूपावगाही ज्ञानमें अज्ञाननिवर्तकत्वका प्रसक् नहीं है, क्योंकि देववशसे उक्त शव्दजन्यज्ञानका (वृत्तिका) नाडी और हृदयसे अवच्छिन् चैतन्यके साथ सम्बन्ध होनेपर भी (किसी समय) विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ सम्वन्धके बिना भी उक्त शव्दजन्यवृत्तिकी उत्पतति हो सकती है, अतः चैतन्यसंसगसे नियतात्मलाभवाला ज्ञान नहीं है। [ तात्पर्यार्थ यह है कि 'यदज्ञानं यं पुरुपं प्रति' इृत्यादि विरोध प्रयोजकको नियमगर्भित माननेसे परोक्षवृत्तियोंका विपयावच्छिन्न चतन्यके साथ संसर्ग न होनेके कारण उनमें अज्ञान निवर्तकत्वकी प्रसक्ति नहीं है, ऐसा कहा जा चुका है, इसपर शक्का होती है कि यह कहना असदत है, क्योंकि परोक्षवृत्तिका भी किसी स्थलमें विपयावच्छिन्न चतन्यके साथ संसर्ग देखा जाता है, जैसे कि 'हृदयपुण्डरीकमें नाडियाँ हैं' इस वाक्यसे उत्पन्न हुई वृत्तिके देवयोगसे हृदयपुण्डरीकस्थ अन्तः- फरणमं नाड़ी या हृदय दोनोंमें से किसी एकसे अवच्छिन्नरूपसे उत्पन्न होनेपर उस धृत्तिका नाड़ी या हृदयसे युक्त चैतन्यमं संसर्ग होनेके कारण उस वृत्तिमें भी अनानके निवर्तकत्वकी प्रसकि आवेगी : इस प्रश्नका उत्तर देते हैं कि नहीं, उक्त प्रसक्ति नहीं आ सकती है, कारण कि विरोधका प्रयोजक जो तथाकथित नियम है, वह नियम व्यापकता से घटित है। भाव यह है कि जव जब नाड़ी, हृदयादिविपयक शब्दजन्य वृत्तिका उदय होता है, तब तव उस धृत्तिका नाड़ी आदिसे युक्त चैतन्यमं संसर्ग होता है, यह नियम नहीं है, कारण कि इन्द्रिय- आययीभूत जो घटापच्छित चतन्य है, उसमें संसर्गसे नियत है उत्पत्ति जिसकी, ऐसे ज्ञानसे उक शज्ञान निगर्य है। जय-जय घटेन्द्रियसजिकर्पसे घटविपयक पृत्िज्ञान की उत्पत्ति होती रै, तय-तय पटायच्छिल नैतन्यमें घटविपयक पतिशानकी उत्पत्ति होती है, यह नियम है। एसीलिए 'ऐन्ड्रियमत्तयः तसतहिपयार्वाच्छिनरसभ एव उत्पद्यन्ते, इति नियममुपेत्य' अर्थात् जब इन्द्रियजन्यपृत्षियोंकी उत्पत्ति होती है, सब उन नृतियोंका विपयावच्छित चैतन्यमें संरार्गे ऐ, ऐसा का गया है दूसी प्कार इस नियमका अन्यन्न भी उपयोग जानना चाहिए।

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२६० सिद्धान्तलेश संग्रहं [प्रथम परिच्छेद

अन्ये विषयसम्मोहभेदनाय तमास्थिताः । परे चिदुपरागार्थम् अभेदव्यक्तयेऽपरे ॥१२१॥ कोई लोग कहते हैं किं विषयगत अज्ञानकी निवृचतिके लिए वृचिका निर्गमन है, कुछ लोग कहते हैं कि चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिए वृचिका निर्गमन अपेक्षित है और कोई लोग अभेदाभिव्यक्तिके लिए वृचिका निगमन मानते हैं ॥१२१॥ अन्ये तु-विषयगताज्ञानस्य लाघवात् समानाधिकरणाज्ञाननिवर्त्य- त्वसिद्धौ वृत्तिनिर्गमः फलतीत्याहुः। अपरे तु-वाह्यप्रकाशस्य वाह्यतमोनिवर्तकत्वं सामानाधिकरण्ये सत्येव जन्य वृत्तियाँ तो तत्-तत् इन्द्रियगोलकसे युक्त अन्तःकरणप्रदेशमें होती हैं, अतः उनमें उक्त नियम घटता है, परन्तु अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियनिरपेक्ष- वृत्तियोंके प्रदेशनियममें कारण न होनेसे हृदयादिविपयक शव्दवृत्ति कदाचित् हृदयादिदेशस्थ अन्तःकरणमें उत्पन्न होती है और कदाचित् पैर आदि देशसे युक्त अन्तःकरणमें उत्पन्न होती है। अतः उक्त नियम नहीं हो सकता है, कारण कि पैरमें जव उक्त वृत्ति होगी तव नाड़ीसे जवच्छिन चैतन्य ही नहीं है, अतः उसका संसर्ग भी नाड़ीयुक्त चैतन्यमें नहीं होगा]। इससे-वृततिज्ञानमें अज्ञानाश्रयीभूत चैतन्यके साथ सम्बन्धके विना अनञान निवर्तकत्व न होनेके कारण-ज्ञान और अज्ञानके विरोधके निर्वाहके लिए वृत्तिका निर्गम मानना चाहिए। कोई लोग कहते हैं कि विपयगत अज्ञानकी निवृत्ति लाघवसे* समानाघिकरण ज्ञानसे ही सिद्ध होती है, अतः वृत्तिनिर्गमन अर्थतः प्राप्त होता है। कुछ लोग कहते हैं किं सामानाधिकरण्यके रहनेपर ही वाहय प्रकाश वाह्य *अन्वय और व्यतिरेक्से विपयगत अज्ञानके ज्ञाननिवर्त्यत्वपरिज्ञानदशामें ग्रथमतः समानाधिकरणज्ञाननिवर्त्यत्व ही अज्ञानमें लाघवसे गहीत होता है व्यधिकरणज्ञान- निवर्त्यत्व गृहीत नहीं होता है, अतः वृत्तिनिर्गमनके विना ज्ञान और अज्ञानका सामाना- धिकरण्य (एकाधिकरणवृत्तिता) हो ही नहीं सकता है, इसलिए वृत्तिनिर्गम मानना चाहिए। तात्पर्य यह है कि घटावच्छिन चैतन्यमें, घटका आवारक अज्ञान है इसलिए अज्ञाननिवृत्तिरूप ज्ञानका कार्य भी विषयवच्छिन चैतन्में ही होगा। इसलिए अज्ञाननिवृत्ति- रूप कार्यका, अपने कारण ज्ञानके साथ इन्द्रिय सननिकर्षकी सामर्थ्यसे, सामानाधिकरण्यरूप सम्बन्धके सम्भव होनेपर उसका परित्याग नहीं कर सकते हैं, क्योंकि कार्य और कारणका सामाना- धिकरण्य औत्सर्गिक है।

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वृतिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भापानुवादसहित २६१

दृष्टमिति दृष्टान्तानुरोधाद् वृत्तिनिर्गम: सिद्ध्यतीत्याहुः । केचिनु-आवरणाभिभवार्थ वृत्तिनिर्गमानपेक्षायामपि चिदुपरागार्थ 7

प्रमातृचैतन्यस्य पेक्षेत्याहुः। अभेदो जीवपरयोः सिद्धो वेदान्तमानकः । यतोऽत्र सर्ववेदान्तास्तात्पयेण समन्वियुः ॥१२२॥ जीव और ब्रह्माका अभेद वेदान्तप्रमाणसे सिद्ध है, क्योंकि सभी वेदान्तोंका तात्पर्य अद्वैत ब्रह्मके बोधनमें ही है ॥१२२॥

ति श्रीमद्गङ्गाघर सरस्वतीविरचितवेदान्तसिद्धानतसूक्तिमज्जर्या प्रथमपरिच्छेद: समाप्ः ।

अथ किंप्रमाणकोडयं जीवत्रह्मणोरभेदः, यो वृच्याऽभिव्यज्यते?

अन्धकारका निवर्तक देखा गया है, इसलिए दृष्टान्तके अनुसार वृत्तिका निर्गम सिद्ध होता है *। कोई लोग कहते हैं कि यद्यपि आवरणके अभिभवके लिए वृत्तिके निर्ग- मनकी अपेक्षा नहीं है, तथापि चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिए अथवा प्रमातृ- चैतन्य और विषयप्रकाशक ब्रह्मचैतन्यकी अमेदाभिव्यक्तिके लिए उसकी (वृत्तिनिर्गमक्की) अपेक्षा है।। अव शच्का होती है कि जीव और ब्रझ्मके अभेदमें क्या प्रमाण है, जो वृत्तिसे अभिव्यक्त होता है।

भाव यह है कि लोकमें दूसरे देशके प्रकाशसे दूसरे देशके अन्धकारकी निधृत्ति नहीं होती है, किन्तु समानदेशमें ही स्थित अंधकार और प्रकाशका परस्पर निवत्यनिवर्तक भाव होता है, इसी हथन्तके, अनुसार ज्ञान और अज्ञानका, जो कि प्रकाश और अन्धकाररूप है, निवर्लय-निवर्तक भाव सामानाधिकरण्यसे ही होगा। उनका सामानाधिकरण्य अज्ञानके आश्रय विपयावच्छिन्न चैतन्यमें ही हो सकता है, अतः सामानाधिकरण्यके लिए अर्थात् विपयावच्छिन्न चैतन्यमें वृत्तिज्ञानके संसर्गके लिए वृत्तिका निर्गमन मानना ही चाहिए। * यदि विपयचैतन्यगत अज्ञानकी निधृत्तिके लिए वृत्तिका निगमन न भी माना जाय, तो भी पृत्तिका निर्गम मानना चाहिए, इस अभिप्रायसे 'केचितु' का मत है।

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ससेद्धान्तलेशर्सग्रह [प्रथम परिच्छेद

'वेदान्तप्रमाणकः' इति घण्टाघोषः । सर्वेडपि वेदान्ता उपक्रमोप- संहारैकरूप्यादितात्पर्यलिङ्गैविमृश्यमानाः प्रत्यगभिन्ने त्रह्मण्यद्वितीये समन्व- यन्ति। यथा चायमर्थः, तथा शास्त्रे एव समन्वयाध्याये प्रपश्चितः । विस्तरभयान्नेह प्रदर्श्यंते इति ॥१९॥ इति सिद्धान्तलेशसड्ग्रहे प्रथम: परिच्छेद: समाप्रः।

इस शङ्काका परिहार करते हैं कि जीव और ब्रझ्मके अभेदमें वेदान्त (उप- निषत्-वाक्य) ही प्रमाण हैं, यह घण्टाघोष है अर्थात् उक्त अभेदमें वेदान्त ही प्रमाण हैं, यह बात जगत्प्रसिद्ध है, क्योंकि सभी वेदान्तोंका उपक्रम, और उपसंहारके ऐक्यरूप* आदि तात्पर्यलिङ्गोंसे विचार करनेपर जीवाभिन्न अद्वितीय ज्रह्ममें ही पर्यवसान होता है। जिस प्रणालीसे वेदान्तोंका तात्पंर्य- विषयीभूत जीवाभिन्न अद्वितीय ब्रह्म है, उसका शास्त्रमें -- समन्वयाध्यायमें-विचार किया गया है। विस्तारके भयसे प्रकृतमें उसका प्रपञ्च नहीं किया जाता है।

इति श्रीसिद्धान्तलेशसंग्रहके वेदान्ताचार्य-श्रीपण्डितमूलशक्करव्यासविरचित भाषानुवादमें प्रथम परिच्छेद समाप्त

  • उपक्रम आदिका (३३ वें पेजकी ) टिप्पणीमेंविचार और लक्षण वतलाए गये हैं, अतः वहींसे उपक्रमादिके लक्षणोंका अवधान करना चाहिए।

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प्रत्यक्षसे अद्वैवश्ृतिके जनाधितत्वका विचार] भापानुवादसहित २६३

नगः परमातमने द्वितीय परिच्छेद -6-

ननूपजीव्यप्रत्यक्षविरुद्धं श्रुतियुक्तिभिः। नोध्यते कथम्द्दैतम्, यदापर शद्ा होती है कि सभी प्रमाणोंके उपजीव्य-कारण-प्रत्यक्षप्रमाणसे विरोध दोनेके कारण क्षति और युक्तियोंये अदैतका बोध कैसे दो सकता है? अथ फथमद्वितीये त्रम्मणि वेदान्तानां समन्वयः, प्रत्यक्षादिविरोधाद्। इृति चेन्, न आरम्भणाधिकरणो-(उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४)- दाहतश्रुतियृक्तिभिः प्रत्यक्षाद्यघिगम्यस्य प्रपश्चस्य ब्रह्मविवर्त- तया मिध्यात्वावगमात्। नतु न श्रुतियुक्तिभिः प्रपश्चस्य मिथ्यात्वं

  • यहां पर शक्रा होती है कि वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य अह्वैत ब्र्में कैसे हो सकता है: क्योंकि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे विरोध है, [अर्थात् न्रद्भिन्न घटादि-प्रपस्नके प्रत्यक्ष आदिसे सिद्ध होनेके कारण न्रप्ममं अद्वितीयत्व वाघित है, अतः शुतिका वाधित अर्थमें तात्पर्य माना जायगा, तो अप्रामाण्य प्रसक्त होगा, इसलिए वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य अद्वितीय त्रदामें नहीं हो सकता है, यह शझाका भाव है], नहीं, यह यक्ा युक्त नहीं है, क्योंकि आरम्भणा- धिकरणमें उदाहत श्रति और युक्तियोंसे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे गृहीत पदार्थकि व्रक्निवत होनेसे उनमें मिध्यात्वका ही अनुमान होता है। यदि शक्ा दो कि श्रुति और युक्तियोसे प्रपस्नमें मिथ्यात्वका साधन हो ही

*प्रयमपरिच्योदमें अदलकषणनिचार के प्रमगमे, मतमेदसे शेय नद्ममें लक्षणकी पृतिता हे और ईस्रमर असमें भी है, ऐया निरपण करनेसे 'तत्वमसि' इस मदावाक्यके 'तत्' सन्दफे सइ्प और वाच्य अर्थका निरुपण किया गया है। उसके बाद जीव और जीव- खासीके निरुपणये 'वम्' पदके बाच्चार्थ और लक्ष्यार्थका भौ विषेचन किया गया है, और इनके निरयणण अभेदरूप नाकगार्षका भी अर्थात् निरुपण किया गया है, इसलिए प्रथम परिच्छेदमें जीयामिम निर्विदेय मक्षमें पेदान्तवामन्वयरुप प्रथमाध्यायार्थका िात्पर्यनिरुपण दो जाता है। अब द्ितीयाध्पायार्थरप वेदान्तवमन्वयका मानान्तरसे विरोधके परिदारका निरुपण करंनके लिए द्वितीय परिच्छेदफा गारम्ग करते हैं-"अथ" इत्यादिसे, यद भाव है।

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२६४ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

अत्याययितुं शक्यते; 'घटः सन्' इत्यादिघटादिसत्त्वग्रा हिप्रत्यक्षादिविरोधात्। तत्त्वशुद्धिकृतो विदुः ॥ १॥ शुकीदन्तेव सन्मात्रं सर्वा्यक्षेपु गोचरः । रूप्यवद्धट मेदादिभ्रान्तेरित्यविरुद्वता॥ २ ॥ उक्त शङ्काके परिहारमॅ तत्त्वगुद्धिकार कहते हैं कि झुक्तिमें इदन्त्वके समान सभी प्रत्यक्षाम सन्मात्रका अवगाहन होता है और झुकतिमें रूप्यका ज्ञान भ्रन्तिसे ही होता है, वैसे ही सन्मान्रमें घट आदिका भ्रान्तिसे ही अवभास होता है, अतः विरोध नहीं है।। १ ॥ २ ॥। अन्राहुस्तरवशुद्धिकारा :- न प्रत्यक्षं घटपठादि तत्सत्वं वा गृह्णाति, किन्तु अधिष्ठानत्वेन घटाद्यनुगतं सन्मात्रम्। तथा च प्रत्यक्षमपि सदुरूप- ब्रह्माद्वैतसिद्धयनुकूलमेव। तथा सति 'सद्' 'सद्' इत्येव ग्रत्यक्षं स्यात्, न तु 'घटः सन्' इत्यादि प्रत्यक्षमिन्द्रियान्व्रयव्यतिरेकानुविधायीति चेद, न; यथा भ्रमेष्विदमंशस्याऽघिष्ठानस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणम्, इन्द्रियान्व्रय- व्यतिरेकयोः तन्नैवोपक्षयः। रजतांशस्य त्वारोपितस्य भ्रान्त्या प्रतिभास:,

नहीं सकता है, क्योंकि 'घटः सन्' (घट सत् है) इस प्रकारके घट आदिमें सत्त्वके ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्ष आदिके साथ विरोध होगा। इस आक्षेपके समाधानमें तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं-प्रत्यक्षसे घट, पट आदि विषयोंका अथवा उनमं रहनेवाले सत्त्वका ग्रहण नहीं होता है, किन्तु अधिष्ठानत्वरूपसे घट, पट आदिमें अनुगत सन्मात्रका ही ग्रहण होता है, इसलिए प्रत्यक्षप्रमाण भी सद्रूप, अद्वितीय त्रह्मकी सिद्धिमें अनुकूल ही है। पुनः शक्का होती है कि यदि प्रत्यक्ष सन्मात्रविषय ही है, तो 'सत्' 'सत्' इसी प्रकारसे प्रत्यक्ष होना चाहिए, 'घट सत् है, इस प्रकार इन्द्रियके साथ अन्वय और व्यतिरेकका अनुविघायी प्रत्यक्ष नहीं होना चाहिए, तो यह शक्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अ्रमात्मक ज्ञानमें इदमंशरूप अघिष्ठानका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है। इन्द्रियंके अन्वय और व्यतिरेक अधिष्ठानप्रत्यक्षमे ही चरितार्थ हैं, और आरोपित रजतांशका प्रतिभास साक्षीरूप भ्रान्तिसे होता है, वैसे ही सर्वत्र इन्द्रियोंसे सन्मात्र अधिष्ठानका ही ग्रहण होता है, इन्द्रियोंका व्यापार उसीके प्रत्यक्षमं समाप्त होता है, और घट, पढ़ आदि वस्तुका प्रतिभास भ्रन्तिसे होता है.

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प्रत्यक्षसे अद्वैतभुतिका अवाधितत्वविचार] भापानुवादसहित २६५

तथा सर्वत्र सन्मात्रस्य ग्रत्यक्षेण ग्रहणम्, तत्रैवेन्द्रियव्यापारः। घटादि- भेदवस्तुप्रतिभासो आ्रान्त्येत्यभ्युपगमात्। ननु तद्दिह वाधादर्शनात् तथाऽभ्युपगम एव निर्मूल इति चेत्, न; वाघादर्शनेऽपि देशकालव्यवहितवस्तुवद् घटादिभेदवस्तुनः प्रत्यक्षा योग्यत्वस्पैव तत्र मूलत्वात्। तथाहि-इन्द्रियव्यापारानन्तरं प्रतीयमानो घटादि: सर्वतो भिन्न एव प्रतीयते। तदा तत्र घटादिभेदे संशयविपर्ययादर्शनात्। यत्राऽपि स्थाण्घादी पुरुषत्वादिसंशयः तत्राऽपि तश्मतिरिक्तेभ्यो भेदोऽसन्दिग्ध- विपर्यस्तत्वान् प्रकाशते एव। मेदस्य च ग्रतियोगिसहोपलम्भनियमवतो

नर्थात् इन्द्रियजन्यव्रसतिसे अभिव्यक्त सन्मात्ररूप साक्षिचेतन्यरूप आ्रन्तिसे होता है, ऐसा स्वीकार किया गया है। बदि कह़ो कि शुक्तिरजत आदिके समान घटादि द्वेतप्रपश्चका चाध नहीं देखा जाता है, अतः घटादिप्रपस्न भ्रान्तिसिद्ध है, यह कहना अनु- चित है? यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि वाधका दर्शन न होनेपर भी देश, काल आदिसे व्यवहित वस्तुके समान घट आ्दिमें रहनेवाले मेदरूप वस्तुओंका प्रत्यक्षायोग्यत्व ही घटादिके आन्तिसिद्धत्वम प्रयोजक है। जैसे कि इन्द्रियव्यापारके अनन्तर प्रतीयमान घट आदि अन्य सभी से मिन्नर दी प्रतीत होते हैं, कर्योंकि उस समय घटादिमें रहनेवाले भेदमें संशय और विषर्ययका अवभास नहीं होता है। और जहांपर स्थाणुप्रभृतिमें पुरुपत्व आदिका सन्देह होता है, वहाँ भी पुरुपत्वादिसे अन्य पदार्थोका असंदिग्ध

•सात्पर्य यद है कि सुचिमें रजतका ध्रम दोनेके अनन्तर दोप आदिकी निवृत्ति होनेपर "द रजतम' (यह रजत नहीं है) इस प्रकार वाघशान होता है, इसी प्रफार घटादि मेतपरपमका बाध नहीं दोता है, दसलिए पटादि द्वेतप्रपमको भ्रान्तिसिद्ध कैये मानना? एस प्रकारका संशय होनेपर नररदाता कहता है कि द्वेतप्रपथका बाध नहीं देखा जाता है, दका क्या यर्थ दे, क्या थोतवाणका अदर्शन अर्थ है या प्रत्यक्षवाधका अदर्शन अर्थ है, अथवा योसिक्वापका अदर्शन अर्थ है। प्रथग पक्ष युक नहीं है, वर्गोंकि 'नेह नानास्ति किवन' इत्यादि क्षतिये बाध देगा जाता है, वितीयका अगोकार करके तृतीयका 'चाधादर्शनेऽपि' इत्यादिसे निंषन करते है।

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२६६ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्विताय परिच्छेद

न प्रत्यक्षेण ग्रहणं सम्भवति। देशकालव्यवधानेनाडसन्निकष्टानामपि ग्रति- योगिनां सम्भवात्। भेदज्ञानं प्रतियोग्यंशे संस्कारापेक्षणात् स्मृतिरूप- मस्तु प्रत्यभिज्ञानमिव तत्तांशे इति चेत्, न;तथाऽपि भेदगतप्रतियोगिवैशि- ष्टयांशे तदभावात्। न च कनकाचलो भेदप्रतियोगी, वस्तुत्वादिति भेदे प्रतियोगिवेशि- ष्ठयगोचरानुमित्या तत्संस्कारसम्भवः । भेदे ज्ञानं विनाऽनुमित्यभावेनाSड-

और विपर्यासशून्य मेद प्रकाशित होता है, प्रतियोगीके साथ ही * जिसकी उपलन्धि नियत है, ऐसे भेदका प्रत्यक्षप्रमाणसे अर्थात् चक्षुरादिसे ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि देश और कालके व्यवधानसे असम्बद्ध भी प्रतियोगी हो सकते हैं। यदि कहो कि प्रतियोगी अशमे भेदका ज्ञान संस्कारकी अपेक्षा रखता है, अतः स्मृतिरूप ही प्रतियोगी अंशमे ज्ञान होगा, जसे प्रत्यभिज्ञा तचांशमें स्मरणात्मक होती है, यह शक्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर भी भेदप्रतियोगीके सम्बन्धांशमें स्मृतिरूप ज्ञान नहीं हो सकता है।। यदि शक्का हो कि कनकाचल भेदका प्रतियोगी है, वस्तु होनेसे, इस प्रकार की, भेदमें प्रतियोगीके वैशिष्टको विषय करनेवाली, अनुमितिसे भेदगत

  • सारांश यह है कि ससम्बधिक पदार्थके प्रत्यक्षमें सम्पूर्णसम्चन्धिविषयकत्व और सम्पूणसम्वन्धिप्रत्यक्षजन्यत्व, संयोग आदिके प्रत्यक्षमें क्लप्त है, अतः भेदप्रत्यक्षमे भी यावत्प्रतियोगिविषयकत्व और यावत् प्रतियोगिप्रत्यक्षजन्यत्व मानना पड़ेगा, क्योंकि भेदप्रत्यक्ष भी ससम्वन्धिकपदार्थप्रत्यक्ष है, इस परिस्थितिमें संसारभरके सारे प्रतियोगियोंका प्रत्यक्ष न हो सकनेके कारण क्लृप्त सामग्रीके न होनेसे भेदप्रत्यक्ष प्रमाणके योग्य नहीं हो सकेगा, इसलिए उसको भ्रान्तिसिद्ध ही मानना पढ़ेगा। सिद्धान्तमें भेद- पत्यक्षके नित्यसाक्षीरूप होनेसे कारणकी भी अपेक्षा नहीं है। + वस्तुतस्तु भेदज्ञानमें प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे प्रतियोगीके ज्ञानको भेदवादी कारण मानते हैं, और यहाँ प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे सम्पूर्ण प्रतियोगियोंका अनुभव नहीं होनेसे संस्कारकी उत्पत्ति नहीं होगी, अतः असननिकृष्ट पदार्थमें स्मृतिरूपत्वकी उपपत्ति कैसे होगी? अर्थात् नहीं होगी। यदि कर्थचित् मान भी लिया जाय कि स्मरण होता है, तो भी जो कनकाचलका भेद समीपस्थ घटमें अनुभूत होता है, वह नहीं होना चाहिए, क्योंकि कनकाचलका कदापि ग्रहण न होनेके कारण तज्जन्य संस्कार हो ही नहीं सकता। और उसमें स्मृत्तित्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है।

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प्रत्यक्षसे अद्वैत श्रुतिका अवाधितत्वविचार] भापानुवादसहित २६७

त्माश्रयापनेः । पक्षसाध्यहेतुपक्षताद्यभेदभ्रमे सति सिद्धसाधनादिनाऽनु- मानाप्रवृच्या तदभेदज्ञानविघटनीयस्य तन्ेदज्ञानस्याऽपेक्षितत्वात्। अस्तु तर्हि भेदांगे इव प्रतियोगिवैशिष्ट्यांशेऽपि प्रत्यक्षमिति चेत्, न; प्रतियोगिनोऽप्रत्यक्षत्वे तद्वैशिष्ठाप्रत्यक्षायोगात् सम्वन्धिद्वयप्रत्यक्ष विना सम्बन्धप्रत्यक्षासम्भवात्। तस्मात् प्रत्यक्षायोग्यस्य प्रतियोगिनो भ्रान्ति- रूप एव प्रतिभास इति तदेकवित्तिवेद्यत्वनियतस्य भेदस्य भेदैकवित्ति- वेद्यत्वनियतस्य वटादेश अ्रमैकविपयत्वात् प्रत्यक्ष निर्विशेपसन्मात्रग्राह्याद्वैत- सिद्धूयनुकलमिति। प्रतियोगीके सम्बन्धके संस्कारका आधान हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मेदज्ञानके विना अनुमितिके न होनेसे आत्माश्रय होगा, [तात्पर्य यह है कि अनुमिति तभी हो सकती है जब पक्षादिके भेदका ज्ञान हो, और पक्षादि- मेदज्ञान तभी हो सकता है जब अनुमिति हो, इससे अपने ज्ञानमें अपनी ही - अपेक्षा होनेसे आत्माश्रय दोप होगा। अतः आत्माश्रयरूप दोपसे दुष्ट होनेके कारण उक्त अनुमिति नहीं हो सकती है और अनुमितिके न होनेसे मेदगत प्रतियोगीके वैशिप्टवका भान भी नहीं हो सकता है ], क्योंकि पक्ष, साध्य, हेतु और सपक्ष आदिका अमेदभ्रम होनेपर सिद्धसाधन आदिसे अनुमानकी प्रवृत्तिके न होनेके कारण उनके अमेदज्ञानके विघटनके लिए मेदज्ञानकी अपेक्षा है। यदि प्रतियोगिवेशिष्ट्यांशका स्मृतिरूप ज्ञान सम्भव नहीं है, तो भेदांशके समान वेशिष्टवांशमें भी प्रत्यक्षरूप ही हो? तो यह भी नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रतियोगीका प्रत्यक्ष न होनेके कारण प्रतियोगीके वेशिष्ट्यका भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, क्योंकि दो सम्बन्धियोंके ज्ञानके बिना सम्वन्धका प्रत्यक्ष नह्दी हो सकता है। इससे प्रत्यक्षके लिए सर्वथा अयोग्य प्रतियोगीका प्रतिभास- केवल श्रान्तिसे ही होता है, अतः प्रतियोगिप्रत्यक्षवेद्यत्वसे नियत मेदमें और नियमतः मेदज्ञानमें विषयीभूत घट आदिमें केवल आन्तिज्ञानकी विपयता ,4 दोनेसे निर्विशेष संद्रृपका केवल ग्रहण करनेवाला प्रत्यक्ष प्रमाण भी अद्वैत सिद्धिमं अनुकूल ही है *। • प्रतियोगीका प्रत्यक्ष न होनेसे भेदका प्रत्यक्ष नहीं दो सकता है, और भेदके प्रत्यक्ष के पिना घट आदिका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, प्रतियोगी प्रत्यक्षयोग्य नहीं है, तथापि उसका जो प्रतिभार दोता दै, घह ध्रान्तिमान है, अतः भ्रमात्मक प्रतियोगीके ज्ञानका विषय भेद तथा

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२६८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

ब्रह्मसत्तानुविद्धं हि विश्वमिन्द्रियगोचरः ।

ब्रह्मसत्तासे अनुविद्ध (युक्त) ही सम्पूर्ण जगत् इन्द्रियका गोचर होता है, त्वतः नहीं, अतः प्रत्यक्षसे विरोध नहीं है, ऐसा न्यायसुधाकार कहते हैं॥ ३ ॥ न्यायसुधाककृतस्त्वाहु :- घटादेरैन्द्रियकत्वेऽपि 'सन् घटः' इत्यादि- रधिष्ठानसत्तानुवेध इति न विरोधः । एवं 'नीलो घटः' इत्यादिरधि- ष्ठाननैल्यानुवेधः किंन स्यादिति चेत्, न; ध्रुत्या सदरूपस्य वस्तुनो जगदुपादानत्वमुक्तमविरोधात् सर्वसम्मतमिति, तदनुवेधेनैव 'सन् घटः' इत्यादिप्रतिभासोपपत्तौ घटादावपि सत्ताकल्पने गौरवम्। तस्य रूपादि- हीनत्वाद्, नैल्यादिकं घटादावेव कल्पनीयमिति चैपम्यादिति। * न्यायसुधाकार कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थ इन्द्रियजन्य प्रत्यक्षके विपय अवश्य हैं, तथापि 'सन् घटः' इस प्रकार जो घट आदिमें सत्ताका प्रतिभास होता है, वह अधिष्ठानकी सत्ताके सम्बन्धको ही विषय करता है, अतः विरोध नहीं है। यदि शद्का हो कि 'नीलो घटः' (घट नीला है) इस प्रत्यक्षसे घटादिमें भासमान नैल्यका प्रतिभास भी (सन् घटः, इस ज्ञानके समान) अधिष्ठानगत नैल्यको ही विषय करेगा, वस्तुतः नैल्यका अवगाहन नहीं करेगा, [अतः ब्रह्म भी रूपवान् होगा,] तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि श्रुतिने सद्रृप न्रम्मवस्तुमें जगत्के प्रति जो उपादान कारणता कही है, वह विरोध न होनेके कारण सभीको सम्मत है, इसलिए अधिष्ठानकी सत्ताको लेकर ही 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षकी उपपत्ि हो सकती है, तो घटादिमें सत्ताकी कल्पना करना केवल गौरवमात्र है। और जगत्के अधिष्ठानभूत ब्रह्ममें रूप न होनेके कारण नीलिमाकी कल्पना घटमें ही करनी चाहिए, यह वैपम्य है।

भ्रमात्मक भेदज्ञानके विषय घट आदि भी ध्रान्तिसिद्ध होगें, इसलिए प्रत्यक्ष अधिष्टानभूत सद्वस्तुके ग्रहणमें ही प्रमाण है, यह भाव है। * न्याय सुधाकारका वहना है कि घट आदिमें चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानकी विषयता है, इसलिए उन्हें अनुभवके अनुसार चाक्षुप मानना पढ़ता है, तथापि प्रपथमें मिथ्या- त्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रतिके साथ उसका विरोध नहीं है, क्योंकि घट आदिमें जिंस सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, वह अतिरिक्त अर्थात् अधिष्ठानसत्तासे अलग सत्ता नहीं है, जैसे स्फटिकमें स्वतः रक्तिमा न होनेपर भी अपाकुसुमगत रक्तिमाका ग्रहण होता है, वैसे ही घटमें स्वतःसत्ता न होनेपर भी ब्रह्ासत्ताका ही घटादिमें प्रतिभास होता है, यह भाव है।

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प्रत्यक्षसे अद्वतश्रुतिका अवाधितत्व विचार] भापानुवादसहित २६९

जडेप्वावरणायोगाचक्षुरादेन तात्विकी । मानतेत्यविरुद्धत्वं संक्षेपाचार्यदर्शने ॥४॥ घटादि जड़ पदार्थोंमें आवरणका योग न होनेके कारण चक्षु आदिकी भ्रामा- णिकता तात्विक नदीं है, अतः प्रत्यक्षसे श्रुतिपतिपादित अद्वैतका विरोध नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरिककार कदते हैं॥४॥ संक्षेपशारीरकाचार्यास्त्वाहु :- प्रत्यक्षस्य घटादिसत्चग्राहित्वेऽपि परा- ग्विपयस्य प्रत्यक्षादेस्त्त्वावेदकत्वलक्षणप्रामाण्याभावादू न तद्विरोधेनाउद्वैत-

आचार्य संक्षेपशारीरककार कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थकी सचाका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, तथापि जड़मात्र वस्तुको विषय करनेवाले प्रत्यक्ष आदिम तत्त्वावदेकत्वरूप प्रामाण्यके न रहनेसे प्रत्यक्षादिके विरोधसे

प्रमाणका लक्षण है-तत्वावेदकत्व, तत्त्वशब्दार्थ है-अनधिगत होकर जो अव- घित हो, इस तत्व वस्तुका आवेदक-बोधक जो प्रमाण होगा, वही प्रमाण कहलाचेगा। 'प्रत्यक्ष आदि जो हैं, वे तत्वावेदक याने अज्षात और अवाधित वस्तुके बोधक नहीं है, यर्गोंकि प्रत्यक्ष आदि घदादि वाह वस्तुओंको ही विपय करते है, घटादि वाह वस्तु अज्ञात (अनधिगत-भावरूप अज्ञानके विषय) नहीं है। क्योंकि घटादि चाह वस्तुके अवाधित होनेपर भी उसके अश्ञातत्वमें फोई भी प्रमाण नहीं है। इस अर्थका प्रतिपादन करनेके लिए सक्षेपशारीरककारने कद्ा है- 'अज्ञातमर्थमययोधयदेव मानं

न प्रत्यगात्मविपयादपरस्य तभ मानस्य संभवति वस्यचिदत्र युक्तया ।८।।

मेवं प्रमाणमसिलं जववस्तुनिष्ठम्। किन्त्वप्रबुद्ध पुरुपं व्यवहारकाले संशित्य संजनयति व्यवहारमान्नम्॥२१॥' अर्वात् अक्षात अर्थका अवयोधक ग्रमाण ही अपने विपयको प्रकाशित करनेमें समर्थ होता है, ऐसा बदे-चहे तन्न्नकारोंका गत है, इसलिए अज्ञातार्थ चोधकत्वरूप प्रामाण्य आत्मविपयक प्रमाणसे भिम्न प्रत्यक्षादिमें युचिपूर्वक विचारनेसे भी नहीं हो सकता है। इस रीतिसे प्रत्यक्षादि प्रमाण अज्ञात वस्तुका यद्यपि बोध नहीं कराते है, तथापि अज्ञानी पुरुपका अवलम्बन करके व्यवदारकालमें व्यवहारगात्रफी उपपत्ति कराते हैं। इस विपयमें अधिक विचार संक्षप- घारीरकके द्वितीय अध्यायके टवें ्ोकमें किया गया है, अतः वहीसे अधिक युक्तियोंका अनुसन्धान करना चाहिए, विस्तारके भयसे उसका प्रकृतस्थलमें विचार नहीं किया आता है।

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२७० सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

श्रुत्यादिवाधशङ्का। अज्ञातबोधकं हि प्रमाणम्। न च प्रत्यक्षादिविपयस्य घटादेरज्ञातत्वमस्ति, जडे आवरणकृत्याभावेनाज्ञानविपयत्वानुपगमात्। स्वप्रकाशतया प्रसक्त्तप्रकाशं ब्रह्मैवाऽज्ञानविषय इति तद्वोधकमेव तच्वावदेकं प्रमाणम्, तदेव प्रमितिविपयः । अत एव श्रुतिरपि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यात्मन एव अ्मेयत्वमिति नियच्छति। नहि 'द्रष्टव्यः' इत्यनेन दर्शनं विधीयते, प्रमाणपरतन्त्रस्य तस्य विध्यगोचरत्वात्, किन्तु 'आत्मा दर्शनार्हः' इति। अज्ञातत्वादात्मन एव प्रमेयत्वसुचितम्, नाऽन्यस्येति नियम्यते इति। अद्वैत बोधकश्रुति आदिके वाधकी शङ्का ही नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रमाण वही होता है जो अज्ञातका बोध करावे, प्रत्यक्ष आदिके विपय अज्ञात नहीं हैं, जड़पदार्थमें आवरण कार्य न होनेसे अज्ञानविषयत्वरूप अज्ञातत्व नहीं माना गया है। स्वप्रकाश होनेके कारण जिसकी प्रकाशता प्रसक्त है, उसी व्रह्ममें अज्ञानकी विषयता भी है, इसलिए अज्ञात ब्रह्मवस्तुका बोध करानेवाली 'तत्त्वमसि' आदि श्रुतियां ही तत्त्वावेदक प्रमाण हैं, और वही ब्रह्मपमितिका विषय भी हो सकती हैं। ब्रह्मके अज्ञात होनेसे ही 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (अरे मैत्रेयि ! आत्माका साक्षात्कार करना चाहिए) इत्यादि श्रुति भी आत्मामें ही प्रमाविष- यत्वका समर्पण करती है। यदि शङ्का हो कि 'द्रष्टव्यः' इससे विधान होता है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रमाणाधीन आत्मदर्शनमें विधि- विषयता हो ही नहीं सकती है। [यदि शक्का हो कि विधायक तव्यप्रत्ययकी क्या व्यवस्था होगी? तो इसका यही उत्तर है कि वह तव्यप्रत्यय अर्हार्थक है ]-अर्थात् आत्मा साक्षात्कारके योग्य है, इस अर्थका बोधक है। इससे आत्माके अज्ञात होनेसे उसीमें प्रमेयत्व (प्रमाज्ञानकी विषयता) मानना उचित है, अन्यत्र नहीं, इस प्रकार नियम होता है। विधान उसका होता है, जिसमें कि पुरुष स्वतन्त्र अर्थात् कर्तुमन्यथाकर्तु समर्थ हो, ज्ञानमें पुरुष स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि प्रमाणोंके रहनेसे ज्ञान तो अपने आप ही हो जाता है, इसलिए प्रमाण पराधीन-प्रमाणमात्रसे ही जिसकी उत्पत्ति हो सकती है, ऐसे-आत्मसाक्षात्कारमें 'द्रष्टव्यः' विधि नहीं हो सकती है, यह भाव है। + अर्थात् संसारमें एक आत्मा ही ज्ञातव्य है, अन्य नहीं, क्योंकि वही सम्पूर्ण दुःखग्रामका

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प्रत्यक्षसे अह्वैतश्रुतिका अवाधितत्वविचार ] भापानुवादसहित २७१

जाततिकालादिकं सत्वमिष्टमव्यक्षगोचर: ।

जातिरूप या देश, कालादि सम्बन्धरूप सत्व प्रत्यक्षका गोचर है, अतः भ्रुतिसे प्रतिपादित मिध्यात्वसे प्रत्यक्षका घिरोध नदीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं॥ ५ ॥ केचित्तु-घटादिसत्त ग्राहिणः प्रत्यक्षस्य प्रामाण्ये ब्रह्मप्रमाणन्यूनताS- नवगमेऽपि तद्ग्राह्यं सत्मनुगतप्रत्ययात् सत्ताजातिरूपं वा, इहेदानीं घटोस्ति' इति देशकालसम्बन्धप्रतीतेः तत्तदेशकालसम्बन्धरूपं वा, 'नास्ति घटः' इति स्वरूपनिपेधप्रतीतेर्वटादिस्वरूपं वा पर्यवस्यति। तच स्वमिथ्यात्वेन न विरुध्यते। नहि मिथ्यात्ववादिनाऽपि घटादे: स्वरूपं

  • कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थोंकी सत्ता ग्रहण करने- वाले प्रत्यक्षके प्रामाण्यम न्रवाप्रतिपादक श्रुतिप्रमाणोंसे स्वल्प मी न्यूनता नहीं है, तथापि प्रत्यक्षप्रमाणसे ग्रहण किया जानेवाला सत्त्व 'घटः सन्, पटः सन्' इत्यादि अनुगत प्रत्यय होनेसे सत्ता जातिरूप ही है, अथवा यहाँ इस समय घट है, इस मकारसे घट आदिमें देश, कालके सम्बन्धकी प्रतीति होनेसे, तत्-तव् देशकालके सम्बन्धरूप ही है, अथवा 'घट नहीं है' इस प्रकार घटके स्वरूप- निषेधकी प्रतीतिसे घटादिस्वरूप ही है। परन्तु वह सत्त्वके मिथ्या होनेपर भी विरुद्ध नहीं है, क्योंकि मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाला भी घटादिका स्वरूप, उसका देशकालसंसर्ग अथवा घट आदिमं जाति आदि नहीं मानता है, ऐसा नहीं है, किन्तु उनमें अत्ाध्यत्व ही नहीं मानता है। यदि शक्का हो कि

अभिमावक है, इस प्रकार आत्मार्के शातज्यमें विशेष योग्यताका सूचन करनेके लिए 'द्रष्टव्यः' में सव्यप्रस्यय दे, विधायक नदी से, यद भाव है। * रस केचिसुके गतका यह भाव है कि जैसे श्रुति यथार्थ चस्तुका ही ग्रहण करती है, वैगे प्रत्यक्ष भी तास्विक अर्थात् सत्य ही घट आदि पदार्थका ग्रददण करता है, परन्तु घट आदिमें प्रतिमात होनेवाली सत्ता महायता (त्रिकालावाधित सत्ता) नहीं है, किन्तु 'घटः सन्' इत्यादि अनुगत प्रत्ययसे विन्ध हुई ससा जाति ही है, अतः श्रुति और प्रत्यक्षके भिन्न-भिन्न विपग होनके कारण प्रत्यक्षविरद होनेसे श्रुतिमें अप्रामाण्यकी शक् नहीं हो सकती है। और यह भी आमद नदीं है कि घटादिमें गासमान सता जातिरूप ही है। परन्तु जातिरुप हो या देवकालसम्बन्यरय हो या मदादिस्यरु हो, इनको जगत्मिथ्यावादी भी व्यवदारदशामें मानता दी है, अतः विरोभ नहीं है।

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२७२ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

वा, तस्य देशकालसम्बन्धो वा, तत्र जात्यादिकं वा नाभ्युपगम्यते, किन्तु तेषामवाध्यत्वम्। न चाडवाध्यत्वमेव सच्वं प्रत्यक्षग्राह्यमस्त्वितिवाच्यम्, 'कालन्रयेऽपि नाडस्य वाघः' इति वर्तमानमात्रग्राहिणा प्रत्यक्षेण ग्रहीतुम- शक्यत्वादित्याहुः । अयावज्ज्ञानवाध्यत्वमवाध्यत्वमिति द्विधा। सत्त्वयोमेंदमाश्रित्याविरोधमितरे जगुः ॥ ६ ॥ कुछ-कालतक अर्थात् त्रह्मज्ञानपय्यन्त अवाध्यत्वरूप सत्ताके दो भेद मान करके प्रत्यक्ष और श्षुतिके अविरोधका समाधान कोई लोग करते हैं ॥ ६ ॥ अन्ये तु-अवाध्यत्वरूपसत्यत्वस्य अ्त्यक्षग्राह्यत्वेऽि 'प्राणा वै सत्यं तेपामेप सत्यम्' इतिश्चित्या प्रधानभूतप्राणग्रहणोपलक्षितस्य कृत्स्नस्य अपश्चस्य न्रह्मणश्च सत्यत्वोत्कर्पापकर्पप्रतीतेः, सत्यत्वे चावाध्यत्वरूपे सर्वदैवावाध्यत्वं किश्चित्कालमवाध्यत्वमित्येवंविधोत्कर्षापकर्ष विना 'राजराजो सन्मथमन्मथः' इत्यादिशव्दतात्पर्यंगोचरनियन्तृत्वसौन्दर्यादी

अवाध्यत्वरूप सत्त्वका ही प्रत्यक्षसे ग्रहण क्यों नहीं होता है? तो युक्त नहीं है, क्योंकि 'तीनों कालोंमें इस विषयका वाध नहीं है, इस प्रकार अवाध्यत्वका प्रत्यक्षसे, जो कि केवल वर्तमान विषयका ही ग्रहण करनेमॅ पट् है, अहण नहीं हो सकता है। और कुछ लोग कहते हैं कि कदाचित् यह मान भी लिया जाय, कि घटादिमें अवाध्यत्वरूप सचाका ही प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, तो भी 'प्राणा वै सत्यम्०' (प्राण सत्य हैं) इत्यादि श्रुतिसे सूत्रात्मक जगत्के विधारक सुर्य प्राणसे उपलक्षित सम्पूर्ण प्रपञ्च और ब्रह्ममें सत्यत्वका उत्कर्ष और अपकर्ष प्रतीत होता है। यदि अवाध्यत्वरूप ही सत्यत्व है, तो सर्वदा अवाध्यत्व और कुछ कालतक अवाध्यत्व, इस प्रकार उत्कर्ष और अपकर्षकी करपनाके विना, 'राजराजः' और 'मन्मथमन्मथः' इत्यादि शन्दोंके तात्पर्म * राजशब्दका अर्थ है-पालकत्वरूप नियासकत्व, और वह पाल्य (जिसका पालन किया जाय) वस्तुसे सापेक्ष है, इस अवस्थामॅ 'विष्णुशर्मा राजराजः' (विष्णुशर्मा राजाका भी राजा है) ऐसे प्रयोगमें विष्णुशर्माका अन्य राजाओंकी अपेक्षासे कुछ उत्कर्ष सूचित होता है और अन्य राजाओंमें अपकर्प सूचित होता है, वे उत्कर्ष और अपकर्ष पालनके अधिकदेश- विपयकत्व और अल्पदेशविषयकत्वरूप हैं, इसी प्रकार 'श्रीरामः मन्मथमन्मथः' (भगवान्

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प्रत्यक्षसे अर्द्वैतश्वृतिका अवाधितत्व्र-विचार] भापानुवादसहित २७३

नामित भृयोविपयत्वाल्पविषयत्वादिरूपोत्कर्पापकर्पासम्भवाद्, विधान्तरेण

एव पर्यवसानाच प्रत्यक्षग्राहं घटादिसत्यत्वं यावद्रक्षज्ञानमवाध्यत्वरूपमिति न मिश्यात्वश्ुतिविरोध इत्याहुः। प्रत्यक्षं वाध्यमाचर्युरपच्छेदनयात् परे। यतः शद्गितदोपं तनिर्दोपा वाधते श्रुतिः ।।७।। अपच्छेदन्यापसे प्रत्यक्ष वाधित दोता है, क्योंकि जिसके विषयमें दोपकी शक्चा हो सफती है, ऐसे प्रत्यक्षका निर्दुष क्षुति बाध करती है, ऐस भी कुछ लोग नहते ह॥ ५ ॥

विषयीमूत नियन्तृत्व और सौन्दर्यादिके समान अधिकविपयता और न्यून- विषयना आदिरूप उत्कर्ष और अपकर्ष ह। नहीं सकता है। यद्यपि त्रिकाला- वाध्यत्वरूप सत्त्वका अग्रीकार करके अन्य रीतिसे + भी उत्कर्ष और अपकर्पका निरूपण कर सकते हैं, तथापि प्रपश्चमें न्रपज्ञानवाध्यत्वका प्रतिपादन करनेवाली अन्य भ्ुतिके साथ एकार्यत्वके लिए, सर्थात् उससे विरोध न हो इसलिए, तथा- कथित उदकर्ष और अपकर्पमें ही पय्यवसान होनेसे प्रत्यक्षसे गृहीत होनेवाला पट आदिका सत्यत्व न्वज्ञानकी उत्पचि तक ही अवाध्यरूप ह, अतः मिथ्या- त्वप्रतिपादक श्रुतिके साथ प्रत्यक्षानि प्रमाणका विरोध नहीं है। रामचन्दनी कनदेव के भो कामदेव है अर्वात् कामदेवसे भी अत्गन्त सुन्दर हैं) इस प्रयोगका अन्त ग्रीन्दर्गक चोधके लिए ही व्यपहार किया जाता है, साधारण सौन्दर्यका अर्थ उत्कृष्ट स्वदिगरव और असाधारण ग्रन्दर्ष अर्थ उससे भी अत्युत्कृष्ट रपादिमत्व है, प्रकृत स्थलमें व्यावदायि्कि यरत और पारमार्षिक सत्य में भी संसारकालमें अवाध्यत्व और त्रिकालावाध्यत्व- रुपर उत्ड्न्न और अपकृष्ठलय आपादन कर सकते है, यह भाव है। *े. अकुतमें पाठाका भाव यद है कि छेवल अवाधितत्वरूप सत्ताका अग्ीकार करके भी अन्य प्रकारख सत्कर्ष और अपकषका सम्भव हो सकता है, चद इस प्रकार है-व्रदा और प्रपथमें विकालावाप्यसपसत सत्य समान दे, परन्तु नदामें त्रिकालावाध्यत्व क्षुतिगम्य है और प्रपथमें लेरिक प्रमाणगम्य दे, अतः भेदिकप्रमाणगम्य होनेये महाका सर्व उत्कृष्ट हे और प्रपथका सतव लोफिक प्रमाणवेध दोनेये अपकष्ट है, इस परिस्थितिमें मिध्यात्वविरुद् सत्त्वका प्रपथ्में प्रत्यक्षादिसे भदण होनिके गारण विरोध को सकता है, दस्रपर कदा गया कि 'प्राणा वे सत्यम्' इत्यादि शुतिगे यदि लौकिक प्रपथमे मिकालावाधित सत्ताका ही प्रहण किया जाय, तो लौफिक प्रपथमे असत्यलका प्रतिपादन करनेवाली अन्य क्षुतिके साथ विरोध होगा, अतः उक्त उत्कर्षा- पका़ नहीं कर सफते है, यह भाव है।

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२७४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

अपरे तु-प्रपश्चस्य मिथ्यात्वसत्यत्वग्राहिणोः श्रुतिप्रत्यक्षयोविरोधेऽपि: दोपशङ्धाकलङ्गितात् प्रथमप्रवृत्तात् अत्यक्षाद् निर्दोपत्वादपच्छेदन्यायेन परत्वाच्च श्रतिरेव वलीयसी। 'प्रावल्यमागमस्यैव जात्या तेषु त्रिपु स्मृतम्' इति स्मरणाच। न च वेदैकगम्यार्थविषयकमिदं स्मरणम्, तत्र प्रत्यक्षविरोधशङ्गाङ- भावेन शङ्कितप्रत्यक्षविरोधे एव वेदार्थे वेदस्य प्रावल्योक्त्यौचित्याद्। * कुछ लोग कहते हैं-प्रपश्चमं मिथ्यात्व और सत्यत्वका ग्रहण करने- वाले श्रुतिप्रमाण और प्रत्यक्षप्रमाणका परस्पर विरोध होनेपर भी दोषकी आशङ्कासे कलड्टित, तथा प्रथम प्रवृत्त प्रत्यक्षसे निर्दुष्ट होनेके कारण और अपच्छेदन्यायसे पर होनेके कारण श्रुति ही वलवती है, अतः श्रुतिका प्रत्यक्षसे बाध नहीं हो सकता है, यह भाव है। और 'प्रावल्यम्०' (आगम होने से ही प्रत्यक्ष आदि तीनों प्रमाणोंमें से आगमप्रमाण वलवान् है, यह प्रसिद्ध है) इस प्रकार शास्त्रके वलवत्तर प्रामाण्यमें स्मृति भी प्रमाण है। यदि शङ्का हो कि केवल वेदगम्य अर्थोमें ही उक्त स्मृति है, अर्थात् उक्त स्मृतिवाक्य उसी आगमको चलवत्तर कहता है, जो वेदैकगम्य स्वर्ग- साधनत्वादिका प्रतिपादन करते हैं, मिथ्यात्व केवल वेदगम्य नहीं है, क्योंकि अनुमानादिसे भी मिथ्यात्वकी सिद्धि होती है, अतः मिथ्यात्वप्रतिपादक श्रतिमें उक्त स्मृतिसे प्रबलता सिद्ध नहीं होगी? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि वेदैकगम्य पदार्थमें प्रत्यक्षसे विरोधकी शङ्काका उदय ही न होगा, अतः [उक्त वचनको वेदैकगम्य अर्थविपयक माननेमें प्रावल्य-बोधक वचन व्यर्थ हो जायगा, इससे ] जिस वेदोक्त अर्थका प्रत्यक्षके साथ विरोध शङ्कित हो, १ उसी वेदार्थमं वेदको प्रबल कहना उचित है।

  • इन लोगोंके मतमें घटादिनिष्ट सत्त्व त्रिकालावाध्यरूप ही है, और उसी सत्ताको प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, अतः प्रत्यक्ष और आगमका अवश्य ही विरोध है, तथापि पर होनेसे अपच्छेदन्यायसे प्रत्यक्षका आगम वाध करता है, यह विशेष है। अपच्छेदन्यायका आगे वर्णन किया जायगा। * शङ्चितप्रत्यक्षविरोध-शङ्कितः प्रत्यक्षेण सह विरोधो यस्य मिथ्यात्वरूपस्य वेदार्थस्य स तथा, इस व्युत्पत्तिसे जिस मिथ्यात्व आदि वेदोक्त अर्थका प्रत्यक्षसे विरोध शङित हो वह़ी

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मंत्यक्षसे अद्वैतश्तुतिका अवाधितत्व-विचार] भापानुवादसहित २७५

'तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हृव्यवाडिव। न तलं विद्यते व्योम न खद्योतो हुताशनः ॥ १ ॥ तस्मात् प्रत्यक्षदष्टेऽपि युक्तमर्थे परीक्षितुम्। परीक्ष्य ज्ञापयन्नर्थान्न धर्माद् परिहीयते । २ ॥' इति नारदस्मृतौ साक्षिप्रकरणे अत्यक्षदष्टस्याऽि प्रत्यक्षमविश्वस्य प्रमाणोपदेशादिभिः परीक्षणीयत्वग्रतिपादनाच्च। नहि नभोनैल्यप्रत्यक्षं

'तलवत्०' (आकाश इन्द्रनीलमणिसे वनी हुई कढ़ाईके सदश दीखता है और जुगनूँ अग्निके सदश दिखाई देता है, परन्तु आकाश न तो कटाह है और न जुगनूँ अगि ही है; अतः प्रत्यक्षसे गृहीत अर्थमें भी खूब परीक्षा करनी चाहिए। यदि परीक्षा करके आचार्य अपने शिष्यवर्गको उपदेश करे, तो शिष्यवर्ग ध्येयसे भ्रष्ट नहीं होता।) इस प्रकार नारदस्मृतिके साक्षीके प्रकरणमें प्रत्यक्षसे गृहीत अर्थकी, प्रत्यक्षप्रमाणका अविश्वास करके प्रमाण (आगमप्रमाण), उपदेश आदिसे परीक्षा करनेका प्रतिपादन किया गया है। आकाशकी नीलिमाका जो प्रत्यक्ष

पर आगम प्रत्यक्षसे चलवान् होता है, तात्पर्य यह है कि जिस अर्थमें वेद और चेदसे इतर प्रमाणका परस्पर विरोध प्रसक्त हो, वहींपर एक अर्थमें दोनोंका प्रामाण्य न होनेके कारण उन दोनोमेंसे किस्री एकका बाध होता है, इस अवस्थामें यही प्राप्त होता है कि जो वलवान् है, उससे दुर्यल प्रमाणका चाध करना चाहिए। कौन दुर्बल है? इस प्रकार जिज्ञासा होनेपर अपेक्षित अर्थका समर्पक दोनेसे वचन सार्थक है, इस विपयमें एक शक्का होती है, वह यह है कि प्रत्यक्षप्रमाण कहींपर अप्रमाण दो, तो प्रपसत्यत्वके ग्रहक प्रत्यक्षमें भी मिथ्यात्व- रप विरुद्ध कोटिका अनुगन्धान करनेवालोंको अग्रामण्यकी शक्त हो, और इससे शक्ितदोप- प्रध्यक्ष निर्दुष्ट प्रबल क्षुतिसे बाधित हो, परन्तु वह नहीं होगा, क्योंकि कहींपर भी प्रत्यक्षमें अप्रामाण्यकी अवगति नदीं हुई है, परन्तु रा्यातिवादियोंकी यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'तलवद्' इत्यादि नारदरमृतिये यद अर्थ स्पषट प्रतीत होता है, और व्यवहारमें आकाशमें जो नीलादिकी प्रतीति होती है, वह विरुद ही है, अतः प्रत्यक्षप्रमाणमें कहींपर अप्नामाण्य गृदीत नहीं होता, यह कथन अय्मत है। नारदस्पृतिमें इन शरोकोंका पाठ साक्षिप्रकरणमें है, उस् प्रकरणणें यह शह्धा हुई है कि आत्मागें साक्षित्व नहीं हो सकता है, कारण कि यद्यपि वह झाता दे, परन्तु उदासीन नहीं है, फ्योंकि 'मैं करता हूँ' इस प्रकार सच को कर्तृत्वका अनुभव होता है। इसपर इन शलोकोंसे यही कहा गया कि लोकमें जसे आकाशादिमें नीलिमा आदिका प्रहण होता है, परन्तु वह वास्तविक नहीं है, यैसे ही आत्मामें कर्तृत्व आदिका प्रहण वास्तघिक नहीं है, अतः आत्मामें साक्षित्वकी अनुपपत्ति नहीं है, यह भाव है।

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२७६ सिद्धांन्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

नभसः शब्दादिषु पश्चसु शब्दैकगुणत्वप्रतिपादकागमोपदेशमन्तरेण ग्रत्य- क्षादिना शक्यमपवदितुम्। न च 'नभसि समीपे नैल्यानुपलम्भाद दूरे तद्धीर्दूरत्वदोपजन्या' इति निश्वयेन तद्वाधः। दूरे नैल्यदर्शनात् समीपे तदतुपलम्भस्तुहिनावगुण्ठानानुपलम्भवत् सामीप्यदोपजन्य इत्यपि सम्भवाद्। अनुभववलाद् नभोनैल्यमव्याप्यवृत्तीत्युपपत्तेश्र। नाऽपि दूरस्थस्य पुंसो यत्र भूसन्निहिते नभःप्रदेशे नैल्यधीः, तत्रैव समीपं गतस्य तस्या नैल्यवुद्धेरभावप्रत्यक्षेण वाघः। उपरिस्थितस्यैच

होता है, उसका-शब्द आदि पाँच गुणोंमें से आकाशमं केवल शव्दगुणा- श्रयत्वका प्रतिपादन करनेवाले शासत्रोपदेशके सिवा-प्रत्यक्षसे अपवाद नहीं कर सकते हैं। यदि कहो कि आगमके विना भी आकाशमें नैल्यका वाध होता है, जैसे कि 'आकाशमें समीपसे नैल्यका उपलम्भ न होनेसे दूरमें नेल्य- बुद्धि दूरत्व आदि दोषसे जन्य है' इस प्रकारके निश्चयसे नैल्यका वाध होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जसे वृक्षमें हिमका आवरण दूरसे दिखाई देता है समीपमें नहीं दिखाई देता, क्योंकि समीपम उसका (हिमा- वरणका) सामीप्यदोषसे अनुपलम्भ ही है, वैसे ही आकाशमें दूरसे नैल्यका प्रत्यक्ष होता है और समीपमें प्रत्यक्ष नहीं होता, इसमें मुख्य कारण सामीप्य दोष ही है, अतः आकाशमें नैल्यरूपका अभाव प्रसक्त नहीं होगा, इस प्रकार भी कल्पना कर सकते हैं और अनुभवके आधारपर आकाशके नैल्यको अव्याप्यवृत्ति मानकर भी उक्त उपपत्ि कर सकते हैं। * और यह भी शह्का नहीं करनी चाहिए कि अत्यन्त दूर प्रदेशमें खड़े हुए पुरुषको जहाँ पृथ्वीसन्निहित आकाशमें नैल्यवुद्धि होती है, वहींपर यदि पुरुष समीपमें जाय, तो उसको वह नीलवुद्धि नहीं होती है, अतः इसी अभावप्रत्यक्षसे आकाशमें नैल्यका वाघ होता है, क्योंकि ऊपरके देशमें अवस्थित नैल्यका ही (मेघ)· *सामीप्यदोषके अधीन है अवस्थिति जिसकी, ऐस। अनुपलम्भ (ज्ञानका अभाव) यह सामीप्यदोषजन्यका अर्थ करना चाहिए, अन्य अनुपलम्भशब्दका अर्थ है-उपलम्भका प्रागभाव, वह जन्य कैसे हो सकता है। सामीप्यदोपसे उपलम्भके निरुद्ध होनेपर, तो उसके प्रागभावका विनाश न होनेके कारण दोषाधीन स्थिति हो सकती है, अतः असन्ञति नहीं होगी, यह भाव है।

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प्रत्यक्षसे वर्द्वतश्रुतिका अवाधितत्व-विचार] भापातुंवादसांहेत २७७ नैल्यस्याऽभ्रनक्षत्रादेरिय दूरत्वदोपाद् भूसननिधानावभास पृथिव्यादिप सद्कीर्णतया प्रतीयमानानां गन्धादीनाम्- इत्युपपत्तेः ।

'उपलभ्याऽप्मु चेद्रन्धं केचिद् त्रयुरनैपुणाः । प्ृथिव्यामेव तं विद्यादपो वायुं च संश्रितम् ॥१॥' इत्यादिभिरागमरेव व्यवस्थाया वत्तव्यत्वेन प्रत्यक्षादागमग्रावल्यस्य निविशक्वत्वाच। नह्याजानसिद्धजलोपट्टम्भादिगतं गन्धादि 'प्ृथिवीगुण एव गन्धः, न जलादिगुणः' इत्यादिरूपेणाऽस्मदादिभि: प्रत्यक्षेण शक्यं विवेचयितुम्। प्रथिव्यादीनां प्रायः परस्परसंसृष्टतयाऽन्यधर्मस्याऽन्यत्राऽव भासः सम्भवति इति शदितिदोपं प्रत्यक्षम्। अतस्तत्राऽडगमेन शिक्ष्यत इति चेत्, तहि इहाडपि ब्रह्मप्रपश्चयोरुपादानोपादेयभावेन परस्परसंसृष्टतयाऽन्य- धर्मस्याऽन्यत्राऽवभासः सम्भाव्यते इति शङ्गितदोपं प्रत्यक्षम्- बादल या नक्षत्र आदिके समान दरत्वदोपसे पृथ्वीकी सन्निधिमे अवभास होता हे, इस प्रकार भी उपपत्ति कर सकते हैं। और 'उपलभ्याप्मु०' (पृथ्वीके समान जल और वायुमें गन्धका ग्रहण करके यदि कोई अपरिपकबुद्धि कहे कि 'जल और वायुमें भी स्वाभाविक गन्व है' तो उसका वैसा कहना युक्त नहीं है, किन्तु, जल और वायुम उपलभ्यमान गन्ध उनके अन्तर्गत पृथ्वीका ही है, ऐसा जानना चाहिए।) इत्यादि आगमप्रमाणोंसे ही पृथ्वी आदिमें संकीर्णरूपसे प्रतीयमान गन्ध आदिकी भी व्यवस्था कह सकते हैं, अतः प्रत्यक्षसे आगमप्रमाणकी बलवत्तरतामें कोई शक्का नहीं है। स्वभावतः सिद्ध जलोपष्टम्भ पार्थित द्रव्यमें रहनेवाले गन्ध आदि 'पृथ्वीके ही गुण हैं, जलके गुण नहीं है' इस प्रकार हम लोग प्रत्यक्षसे विवेक नहीं कर सकते हैं,[ क्योंकि जलमें भी कहींपर स्वाभाविक गन्ध है, और कहींपर औपा- घिक् है, ऐसी भी कल्पना हो सकती है] प्रायः पृथ्वी आदिके परस्पर संसृष्ट होनेके कारण अन्य धर्मोका अन्यमे अवभास होता है, इसलिए प्रत्यक्ष शक्कितदोपसे कलद्वित है, इसलिए यदि जलादिमं गन्धके प्रत्यक्षका उक्त शास्त्रसे बाध होता है? तो प्रकृतमें भी व्रह् और प्रपश्नके परस्पर उपादानो- पादेयभाव होनेके कारण अन्योऽन्य तादात्म्यापन्न होकर अन्यके धर्मोंका अन्यत्रमें अवश्य अवभास हो सकता है, इसलिए प्रपञ्चमें सत्यत्वका प्रत्यक्ष मी दोपशक्कासे फलकित ही है। अतः समान रीतिसे उस प्रत्यक्षकी-

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२७८ सिद्धान्तलेश संग्रहं [द्वितीय परिच्छेद

'अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपश्चकम्। आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगदूप ततो द्वयम् ॥१।' इति वृद्धोक्तप्रकारेणाSडगमेन व्यवस्थाप्यतामिति तुल्यम्। न चैवमुप- जीव्यविरोधः । आगमप्रमाणेन वर्णपद्वाक्यादिस्वरूपांशप्रत्यक्षमुपजीव्याड- नुपजीव्यतत्सत्यत्वांशोपमर्दनादित्याहुः ॥

  • 'अस्ति भाति प्रियं०' (घट है, घट प्रकाशित होता है, घट प्रिय है, ये तीन अंश ब्रह्मरूप हैं और घट यह नाम अंश और घढादिका कम्बुग्रीवादिमत्त्व आदिरूप अंश ये दोनों जगत्रूप हैं) इस प्रकारके वृद्धोक्त आगमसे- व्यवस्था करनी चाहिए। यदि कहो कि आगमसे प्रत्यक्षका वाध होगा, तो उपजीव्यके साथ विरोध होगा? तो यह शक्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि वर्ण, पद, वाक्य आदि स्वरूपांशके प्रत्यक्षको उपजीव्य करके आगम- प्रमाण अनुपजीव्य प्रत्यक्षगत सत्यत्वांशका उपमर्दन कर सकता है। ॥१ ॥

*ब्रह्ममें अध्यस्त होनेके कारण घटमें अस्तित्वका, चैतन्यका और आनन्दका अव भास होता है-घट है, घट भासता है, और घट प्रिय है, इसलिए घटमें भासनेवाले ये तीन अंश ब्रह्मके ही हैं, घटके नहीं हैं घटादि नाम और उनका स्वरूप व्रह्मरूप नहीं है, क्योंकि ब्रह्म नाम और रूपसे विनिमुक्त है। इसलिए जगत्में भासनेवालोंमें से प्रथम तीन रूप ब्रह्मके और इतर दो रूप जगत् के हैं, सभी जगत्के पदार्थोमें पांच अंश अवश्य भासते हैं, यह निर्विवाद है, क्योंकि शत्रु आदिका दुःख सवको प्रिय भासता है। अतः जगत्के पच्चांशमें कोई विरोध नहीं है, यह भाव है। शङाका तात्पर्ये यह था कि प्रत्यक्षशब्दका उपजीव्य है अर्थात् प्रत्यक्षके विना शब्द स्वार्थका बोध कर ही नहीं सकता है, अतः शब्दप्रमाण अपने अर्थके वोधनमें प्रत्यक्षकी अपेक्षा करेगा, अतः उपजीव्य है, यदि शन्दप्रमाण अपने उपजीव्यका विरोध करेगा, तो स्वार्थका बोध ही नहीं करेगा, इसलिए आगमका प्रत्यक्षसे वाध करना असङत है? इस शङ्का- पर उत्तर है कि अवश्य प्रत्यक्षशब्दका उपजीव्य है, परन्तु वह कौनसा प्रत्यक्ष है? वर्ण, पद और वाक्यात्मक शब्दका श्रोत्रसे होनेवाला प्रत्यक्ष, क्योंकि शव्दज्ञानके बिना शाब्दवोध नहीं हो सकता है। इस परिस्थितिमें यदि श्रुति सम्पूर्ण प्रत्यक्षका वाध करेगी, तो उपजीव्य प्रत्यक्षका भी विरोध प्रसक्त होगा, परन्तु श्रोत्र इन्द्रियसे उत्पन्न होनेवाला शब्द प्रत्यक्ष, जो शब्दात्मक ही है, उसका सत्व भी ग्रहण करता है, और श्रुतिसे प्रत्यक्षके सत्त्वांशका बाध होता है, परन्तु यह शब्दका उपजीव्य नहीं है, क्योंकि कल्पित शब्दसे भी शाब्दवोध हो सकता है, तो उसकी सत्ता मानना निरर्थक है, और शब्दस्व्ररूपांशके प्रत्यक्षरूप उप- जीव्यका वाध नहीं करता है, अतः उपजीव्यके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है।

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अत्यक्षमे अद्वैतक्षुतिका अवाधितत्व-विचार] भापानुवादसहित २७९

ननु सोमपदे नैवं भवेन्मत्वर्थलक्षणा। मस्तरा यजमान: स्याद् यदि आगम प्रत्यक्षसे बलवान है, तो 'सोमेन यजेत' इसमें सोमपदकी गत्वर्थमें लकणा नहीं दोगी और प्रस्तर यजमान भी होगा। नन्वागमस्य प्रत्यक्षाद् वलीयस्त्वे 'यजमान: प्रस्तरः' इत्यत्र प्रत्य- आविरोधाय यजमानशव्दस्य ग्रस्तरे गॉणी वृत्तिर्न कल्पनीया। तथा 'सोमेन यजेन' इत्यत्र वैयधिकरण्घेनाऽन्वये यागे इष्टसाधनत्वम्, सोमलतायां अन्र शक्ा होती है कि यदि आगमको प्रत्यक्षसे वलवान् माना जाय, तो 'यज्मान: प्स्तरः' (कुशमुष्टि यजमान है) इस श्रुतिमें प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिहारके लिए यजमानशव्दकी कुशमुष्टिमें गौणी वृत्ति नहीं माननी चाहिए, [वात्पयार्थ यह है कि चूंकि कुशमुष्टि यजमान (याग करनेवाला) नहीं हो सरती है, अतः 'यजमानः भस्तरः' इस श्रुतिसे प्रस्तरको जो यजमान कहा गया है, वह मुख्य नहीं है अर्थात् उक्त श्रुतिका तात्पर्य प्रस्तरको यजमान कहने में नहीं है, किन्तु केवल लाक्षणिक है, यह सिद्धान्त किया गया है, परन्तु अव इस सिद्धान्तकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षसे आगम चलवान् ही ठहरा, अतः गौण कल्पना निरर्थक है,] वैसे 'सोगेन यजेत' (सोमवल्ली- चाले यागसे अमीष्ट प्राप्त करे) इस श्रुतिमें कहा गया है-वैयधिकरण्यसे सोम और यागका अन्वय हो, तो यागगें इषसाधनत्व और सोमलतामें याग- • 'सोमन सजत' (खोनयागसे सटफा सम्पादन फर) इस श्ुतिमें शका हुई कि सोम- सन्दका सन्यय धालय यागमें सामानाभिकरण्यसे करना या वैयधिकरण्यसे? सामानाधिकरण्य- नन्दका अर्थ है- एकार्थक अर्थात् अमेद, वैयधिकरण्यका अर्थ होगा भिन्नार्थकत्व। और जहीं जही सामानाधिकरण्पमे अन्वन दोता है, चहाँ वदों अगेद दी देसा जाता है, जैसे 'गोडयं देवदरः' (बदी देववत है) इसलिए यदि सामानाधिकरण्यसे अन्वय करें, तो 'सोमेन नजेत' दसफा अर्भ दोगा सोगरुप यागसे एटफा सम्पादन करे, परन्तु यह नहीं हो सकता दे, दर्योंकि दव्यदपतात्मक गाग गोम नदीं दो सकता है, इसमें केवल प्रत्यक्ष दी प्रमाण है। यदि वैयभिकरण्णणे सन्यय मानेंगे, तो यह अर्थ दोगा-याग इटका साधन हे और सोम- यागका साधन है, इस परिस्थितिमें एक बार श्रुतविधिप्रत्ययकी दो व्यापारोंमें लक्षणा माननी होगी, इयलिए उस व्यापारसे घटित वाकयका भी द्विविध व्यापार दोगा, अतः वाकय- गद प्रसक होगा, यह माव है, इनमें ग्रामानाधिकरण्यसे अन्वयका प्रत्यक्षविरोधसे परित्याग किगा जाता है, परन्तु प्रत्यक्षमे क्षुति के बलवती होनेये सामानाधिकरण्यसे अन्वय हो सकता है, तो क्यों उस़का परिल्माग किया जाता है, गह पूर्यपक्षका माव है।

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२८० सिद्धान्त लेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

यागसाधनत्वं च वोधनीयमिति व्यापारभेदेन वाक्यभेदापत्तेः । सामाना धिकरण्येनाऽन्वये वत्तव्ये प्रत्यक्षाविरोधाय 'सोमवता यागेन' इति मत्वर्थ- लक्षणा न कल्पनीया। उभयत्राऽपि सत्यपि प्रत्यक्षविरोधे तदनाहत्याऽड- गमेन वलीयसा प्रस्तरे यजमानाभेदस्य, यागे सोमाभेदस्य च सिद्धि- सम्भवादिति चेत्, अन्नाऽडहुभमतीकृतः ॥८॥ मानान्तरादलवती श्रुतिस्तात्पर्यगोचरे। अन्यन्र त्वविरुद्धार्थे देवताविग्रहादिके॥ ९ ॥ इस आक्षेपके समाधानमें भामतीकार कहते हैं कि तात्र्यविषयपदार्थमें अन्य प्रमाणोंसे श्रुति वलवती हे और अन्यत्र देवताघरीर आदि अनिरुद्ध अर्थमें श्रुतिप्रमाण है।। ८ ।। ९ ।। अत्रोक्तं भागतीनिवन्धे-तात्पर्यवती ध्रुतिः प्रत्यक्षात् चलवती

साधनत्वकी कल्पना करनी होगी, अतः व्यापारके भेदसे वाक्यभेद प्रसक्त होगा, यदि सामानाधिकरण्यसे अन्वय किया जायगा, तो प्रत्यक्षसे विरोध होगा, अतः मत्वर्थमें लक्षणा करनी होगी, परन्तु अब प्रत्यक्षके साथ अविरोधके लिए मत्वर्थमं लक्षणा करनेकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि दोनों स्थलोंमें प्रत्यक्ष विरोध होनेपर भी उसकी परवा न कर वलवान् आगमप्रमाणसे प्रस्तरमें यज- मानका अभेद और यागमें सोमका अमेद सिद्ध हो सकता है। परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इस विपयम भामतीकारने कहा है कि तात्पर्यसे युक्त श्रुति ही प्रत्यक्षसे बलवती होती है, श्रुतिमात्र (सन्न श्रुति) वलवती नहीं होती है। मन्त्रोंका और अर्थवादवाक्योंका स्तुतिके

  • जव तात्पर्यवाली श्रुति ही प्रमाण है, तो 'सोमन यजेत' इत्यादि श्रुतियोंका सोम और याग आदिके सम्बन्धमें तात्पर्य न होनेसे श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष द्ी बलवान् होगा, इसलिए प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिह्ारके लिए सोमशब्दकी मत्वर्थमें लक्षणा करनी चाहिए, वैसे ही 'यजमान: प्रस्तरः' यह श्रति भी, स्वार्थमें तात्पर्य न होनेसे, गौणार्थक ही माननी चाहिए, प्रपश्चमें मिथ्यात्वप्रतिपादक श्रुतियोंका स्व्रार्थके प्रतिपादनमें ही तात्पर्य होनेसे, प्रत्यक्षकी अपेक्षा श्रुति ही वलवती होती है, अतः उन श्रुतियोंसे प्रत्यक्षका वाध होना अनिष्टकारक है, यह समाधानका भाव है।

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्रावत्य-विचार] भापानुवादसहित २८१

न श्ुतिमात्रम्। मन्त्रार्थवादानां तु स्तुतिद्वारभूतेऽ्थे वाक्यार्थद्वारभूते पदार्थ इव न तात्पर्यम्। तात्पर्याभावे मानान्तराविरुद्धदेवताविग्रहादिकं न तेभ्यः सिध्येत्। तात्पर्यवत्येव शव्दस्य आ्रामाण्यनियमादिति चेत्, न;

द्वारभूत अर्थमें अर्थात् विधान करनेके लिए अमीष्ट अर्थोंकी स्तुति आदिके द्वारभूत + अर्थमें वाक्यार्थके द्वारभूत पदार्थके समान तात्पर्य नहीं होता है। यदि! शक्ा हो कि मन्त्र और अर्थवादोंका स्वार्थके प्रतिपादनमं अगर तात्पर्थ नहीं है, तो मानान्तरसे (प्रत्यक्ष आदि अन्य प्रमाणोंसे) अविरुद्ध देवताओंके शरीर आदिकी उन वाक्योंसे सिद्धि नहीं होगी? क्योंकि तात्पर्यविषय अर्थमें ही शव्दका (श्रुतिका) प्रामाण्य है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि

मन्तादिका स्वार्थमें, फल न होनेसे और गौरव होनेसे, तात्पर्य नहीं है, इसलिए 'देवस्य त्वा' इत्यादि मन्त्रोंकी और 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादि अर्थवादोंकी विधेयगत स्तुतिमें दी लक्षणारत्तिका आध्रयण करना चाहिए। इस अवस्थामें द्रव्यदेवतादिरूप मन्त्र आदि वायगार्थोका लक्षणागम्य स्तुतिके साथ सम्बन्ध करना चाहिए, इसलिए स्तुतिमें लक्षणाका मन्त्र आदिका अर्थ द्वारभृत है, जैसे कि गगापदकी तीररूप अर्थमें जो लक्षणा है उसमें प्रवाहरूप अर्थ करभूत हे अयवा वाययार्थके तात्पर्यख प्रयुच पदोंका वाक्यार्थके ज्ञानमें द्वारभूत स्मारित पदोंका अर्थ द्वार है, परन्तु गमाशब्दका तात्पर्य प्रवाहमें नहीं है और वाक्योंका तात्पर्य स्मारित पदाधोन नहीं है, वेये ही मन्त्र आदिका भी स्तुतिके द्वारभूत स्वारथोमें तात्पर्य नहीं है, इखसे तात्पर्यरदित मन्त्रवावर्योंका प्रलक्षप्रमाणके अनुकूल ही अर्थ करना चाहिए, गद भाव हे। * शझधका तात्पर्ग यह है कि यदि मन्त्र, अर्थवाद आदिका स्वार्थमें तात्पर्य न माना जाय, तो देवताओंके शरीरोंको वतलानेवाले 'वजहस्तः पुरन्दरः' (बज् है हाथमें जिसके, ऐसे पुरन्दर) इत्यादि अर्थवादोंका देवताफे विग्रह आदि स्वार्थमें तात्पर्य न ोनेके कारण देवताओंके शरीरका ज्ञान उन वाक्योसे नहीं होगा, क्योंकि वेदतात्पर्यविषयत्व वेदजन्य- गयार्धज्ञानविषयत्वके प्रति व्यापक है अर्थात् जदां जहां वेदजन्य यथार्थ ज्ञानकी विषयता रदेगी, यहां यदां बेदकी तात्यर्यविषयता अवश्य रदेगी, प्रकृतमें वेदके तात्पर्यकी विषयता नहीं है, अतः देवताके शरीरमें भी वेदजन्य यथार्थ ज्ञानकी विपयता नहीं रदेगी, क्योंकि व्यापकके अभावसे व्याप्यके अभावका ज्ञान होता है, इस अवस्थामें तात्मयवती दी श्रुति प्रमाण है, इय नियमके होनेरो 'बजदस्तः' इत्यादि वाक्यसे वोधित इन्द्रका शरीर सिद्ध नहीं होगा। ३६

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२८२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

'एतस्यैव रेवतीषु वारवन्तीयमग्निष्टोमसाम कृत्वा पशुकामो ह्येतेन यजेत' इति विशिष्टविधेस्तात्पर्यागोचरेऽपि विशेषणस्वरूपे प्रामाण्यदर्शनेन उक्त- नियमासिद्धेः। अत्र हि रेवतीऋगाधारं वारवन्तीयं साम विशेषणय्। न चैतत् सोमादिविशेषणवल्लोकसिद्धम्। येन तद्विशिष्टयागविधिमात्रे प्रामाण्यं वाक्यस्य स्यात्। नाऽपि विशिष्टविधिना विशेपणाक्षेपः । आक्षेपाद्विशेपण- प्रतिपत्तौ विशिष्टगोचरो विधिः। तस्मिंश्र सति तेन विशेषणाक्षेपः इति परस्पराश्रयापत्तेः । अतो विशिष्टविधिपरस्थैव वाक्यस्य विशेषणस्वरूपेऽपि 'एतस्यैव०' इत्यादि विशिष्टविधिके-तात्पर्यका विषय न होनेपर भी विशेषण- स्वरूपमें-प्रामण्यके देखनेसे पूर्वोक्त नियम नहीं हो सकता है। प्रकृतमें रेवती नामकी ऋचाओंमें वारवन्तीयनामक साम विशेषण है, परन्तु यह + वारवन्तीय साम सोम आदि विशेषणके समान लोकसिद्ध नहीं है, जिससे कि उक्त साम- विशिष्ट यागकी विधिमात्रमें वाक्यका प्रामाण्य हो। और विशिष्टविघिसे विशेषणका आक्षेप भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि आक्षेपसे विशेषणके ज्ञात होनेपर विशिष्टविधि होगी और विशिष्टविषयकविधिके ज्ञात होनेपर उससे विशेषणका आक्षेप होगा, इस प्रकार अन्योन्याश्रय प्रसक्त होगा। इससे विशिष्टविधिके

'एतस्यैच०' (रेवत्यधिकरणवाले वारवन्तीयनामक सामसाध्य अगिष्टोमस्तोत्रविशिष्ट प्रकृत अग्निष्टत धर्मवाले यागसे पश्चुकी अभिलाषा करनेवाला इष् सम्पादन करे) रेवती ऋचा- जिसमें 'रे' शब्द आता है, ऐसी 'खतीनः' इत्यादि कचा। वारवन्तीयम्-'अश्वं न त्वा वारवन्तम्' इस ऋचामें गेय साम। अग्निष्टोम साम-'यज्ञा यज्ञा वो अग्नय' इसमें गेय साम। प्रकृतमें इस रेवत्याधारकवारवन्तीयसामादिविशषणविशिष्ट कतुभावनाविधिका तात्पर्यविषय विशेषणस्वरूप नहीं है, परन्तु विशेषणस्वरूपमे प्रामाण्य होनेसे उक्त नियम अर्थात् शब्दतात्पर्यविषयत्व शान्दप्रमितिविषयताके प्रति व्यापक है, यह नियम सिद्ध नहीं हो सकता है, इसी ग्रन्थका 'अन्न हि' इत्यादि ग्रन्थसे विवरण किया गया है। * रेवती ऋचाधारक वारवन्तीयनामक साम विशेषण है, और यह किसी लौकिक प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, यदि वह किसी लौकिक प्रमाणसे प्राप्त होता, तो वारवन्तीय सामरूप विशेषणकी दधि आदिके समान लोकतः प्राप्ति होनेसे 'एतस्यैव' इत्यादि वाक्यका उससे अतिरिक्त अर्थमें प्रमितिजनकत्वरूप प्रामाण्य होता, परन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि वारवन्तीय साम अन्य ऋचाओंमें अध्ययनसिद्ध है, अतः उक्त वाक्यसे हीरेवतीऋचाधारकवारवन्तीयसामरूप विशेषणकी प्रमिति कहनी चाहिए, यह भाव है। * तात्पर्य यह है कि विशेषणगुणविषयक विधिकी कल्पनाके पूर्वमें विशिष्टविधिसे विशेषणका स्वरूप प्रमित है या नहीं ? प्रथम पक्ष मानें, तो विशेषगोचरविधिकी कल्पना व्यर्थ है द्वितीय

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका श्रांवल्य-विचार] भापानुवादसहितं २८३

प्रामाण्यं चक्तव्यम्। अथ च न तन्र तात्पर्यम्। उभयत्र तात्पर्ये वाक्यभेदापत्ेः। एवमर्थवादानामपि विधेयस्तुतिपराणां स्तुतिद्वारभृतेऽथे न तात्पर्य- मिति तेभ्यः अत्यक्षस्यैव वलवच्चात् तदविरोधाय तेपु वृत्यन्तरकल्पनम्। 'सोमेन यजेत' इत्यत्र विशिष्टविधिपरे वाक्ये सोमद्रव्याभिन्नयागरूपं

बोधक वाक्यमें ही विशेषणके स्वरूपमें भी प्रामाण्य कहना चाहिए, यदि कहोगे कि वहां तात्पर्य नहीं है, तो दोनों जगहोंमें तात्पर्यको माननेसे वाक्यमेदकी आपत्ति * प्रसक्त होगी। विशिष्टविधिके विशेषणस्वरूपके समान अर्थात् जैसे विशिष्टविधि- घोधकवाक्यका विशिषद्वारा विशेषणांशम प्रामाण्य है, स्वतः नहीं है, वैसे अर्थ- बाद वाक्योका भी, जो विधेयभूत अर्थके स्तावक हैं, स्तुतिद्वारभूत अर्थमें, तात्पर्य नहीं है[ तथापि देवताओंके शरीर आदिके ज्ञानके प्रति कारण हो सकते हैं] +, इसलिए तात्पर्यरहित उन मन्त्र और अर्थवादोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षपमाण ही बलवान् है, यतः उनके (प्रत्यक्ष आदिके) साथ अविरोधके लिए मन्त्र और अर्थवाद आदिकी अन्यवृत्ति माननी चाहिए। 'सोमेन यजेत' इत्यादि विशिष्टविधिके बोधकवाक्यमें यदि 'सोमलतारूप द्रव्यसे अभिन्न यागरूप

पक्ष मानें, तो विधिका आक्षेप दो ही नहीं सकता है, क्योंकि जो प्मित है अर्थोत् जिसका यथार्थ ज्ञान हुआ है, ऐसा द्रव्यदेवतासम्बन्धयागविधिका आक्षेपक होता है, इस अवस्थामें विशिषविधिसे विशेषणविधिका आक्षेप है, एख प्रकार जो कहनेवाला है उसको आक्षेपसे पूर्वमें निशेषणको जानना चाहिए, उसका प्रमापक कौन है ? इस शाक्ामें आप कल्पित विधिको ही प्रमापक मानेंगे, इसमे आत्िपविधिसे विश्ेषणस्वरूपके शञात होनेपर प्रकृत विधि विशिष्ट विपयक होगी और उसर विधिके विशिष्टविपयक होनपर उस विशिष्टविधिसे विशेषणविधिका आक्षिप होगा, इसलिए परस्पराशय दोपकी प्रसकि होनेसे विशेषणविधिका आक्षेप ही असिद होगा। • यदि त्रकृतमें कोई शक्त करे कि 'यत्परः शब्द स वाक्यार्थः' (वही शब्दका अर्थ होता है जो शब्द तातपर्यसे गम्य होता है) इस नियमके अनुसार उक्त वाक्योंका तथाकथित अर्थोंमें (विशेषण आदि अर्थोमें) तात्पर्य न होनेसे उनका बोध नहीं होना चाहिए, तो यह भी युक नहीं दे, गर्योंकि 'यत्परः' इत्यादि मियम औत्सर्गिक है, और गौरवसे घाध भी होता है, यह भाष है। * इसलिए जंग्रे तात्पर्थके अविपय रवती वारवन्तीय विशेषणस्वरूप अर्थमें भी श्रुति प्रमा उत्पन्न करती है, घैसे अन्यपरक मन्त्र भी देयताके शरीर आदिका बोध करते हैं, अतः देवताधिकरणके साथ विरोध नहीं है, यह गाव है।

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२८४ सिद्धान्त लेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेंद

विशिष्टं विधेयमित्युपगमे तस्य विधेयस्य 'दध्ना जुहोति' इत्यादौ विधेयस्य दध्यादेरिय लोकसिद्धत्वाभावेन विधिपराद्वाक्यादेव रेवत्याधारवा रन्तीयविशेपणस्येव विना तात्पर्य सिद्धिरेष्टव्या। नहि तात्पर्यविरहिता- दागमाद्यागसोमलताभेदग्राहिप्रत्यक्षविरुद्धार्थः सिध्यतीति तत्राऽपि तदविरो- धाय मत्वर्थलक्षणाश्रयणम्। अद्वैतश्रुतिस्तु उपक्मोपसंहारैंकरूप्यादिपड् विधलिङ्गावगमिताद्वैतता- त्पर्या प्रत्यक्षाद् वलवतीति ततः प्रत्यक्षस्यैव वाघः, न तदविरोधाय श्रुतेरन्यथानयनमिति। कथंचिद्विपयप्राप्त्या मानान्तरसमर्थने॥ श्रुतिर्वलीयसी नो चेद्िप्रीतं वलावलम् ॥१०॥ यदि प्रत्यक्ष आदिकी व्यावहारिक विषयोंसे उपपत्ति हो सकती है, अतः प्रत्यभ् आदिकी अपेक्षा श्रुति ही बलवती है। व्यावदारिक विषयोंसे प्रत्यक्ष आदिकी उपपत्ति न हो, तो चल और अबल विपरीत होंगे याने निरवकाश होनेसे श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष आदि ही वलवान् होंगे ॥१०॥ विवरणवार्तिके तु ग्रतिपादितम्-न तात्पर्यवत्वेन श्रतेः प्रत्यक्षात् प्राचल्यम्। 'कृप्णलं अ्रपयेद्' इति विधे: अ्पणस्य कृप्णलार्थत्वप्रतिपादने विशिष्टका विधान मानेंगे, तो उस विधेयकी अर्थात् सोमसे अभिन्न यागरूप विशिष्टकी-'दधा जुहोति' (दधिसे होम करे) इत्यादिमें विधेय दधिके समान लोकसे-सिद्धि न होनेके कारण, रेवती कचा है आधार जिसका, ऐसे वारवन्तीय सामरूप विशेषणके समान तात्पर्यके बिना ही विशिष्टविधायकवाक्यसे उसकी सिद्धि माननी होगी, परन्तु तात्पर्यरहित आगमसे-सोमलतासे भेदको ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थ-सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः 'सोमेन यजत' इत्यादि स्थलमें भी प्रत्यक्षके साथ विरोध न आवे, इसलिए मत्वर्थमें लक्षणाका आश्रयण होता है। अद्वैतव्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका तो उपक्रम और उपसंहारके ऐक्य आदि छः लिङ्गोंसे अद्वैतमें ही तात्पर्य जाना जाता है, अतः प्रत्यक्षसे श्रुति वलवती है, इसलिए अद्वैतश्रुतिसे प्रत्यक्षका ही वाघ होता है, अतः प्रत्यक्षके साथ अविरोधके लिए अद्वैतश्रुतिका गौण अर्थ नहीं कर सकते हैं। विवरणवार्तिकमें, तो प्रतिपादन किया गया है कि तात्पर्यवती ्रुतिका भी प्रत्यक्षसे प्रावल्य नहीं है, क्योंकि 'कृष्णलं अ्रपयेत्' (सोनेके वने हुए छोटे-

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प्रत्यक्षसे श्रतिका प्रावल्य-विचार] भापानुवादसहित २८५

तात्पर्येऽपि कृष्णले रूपरसपरावृत्तिप्रादुर्भावपर्यन्तमुख्यश्रपणसम्बन्धः प्रत्यक्ष- विरुद्ध इति तदविरोधाय श्रपणशव्दस्य उष्णीकरणमात्रे लक्षणाभ्युपगमात्। 'तत्वमसि' इति वाक्यस्य जीवन्रह्माभेदग्रतिपादने तात्पर्येऽपि त्वम्पदवाच्यस्य तत्पदवाच्याभेदः प्रत्यक्षचिरुद्ध इति तदविरोधाय निष्कृष्ट- चैतन्ये लक्षणाभ्युपगमाच्च।

छोटे मापोंका पाक करे) इस विधिका तात्पर्य यद्यपि कृप्णलोंके अङ्रभूत श्रपणमें ही है, तथापि कृष्णलोंमें मुख्यपाकका सम्बन्ध-जो कि रूप और रसकी परावृत्तिके प्रादुर्भावपर्य्यन्त है, प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे-नहीं हो सकता है, इसलिए उसके अविरोधके लिए श्पणशब्दकी उप्णीकरणमात्रमें लक्षणाका स्वीकार है। +और 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंका जीव और ब्रह्मके अभेद प्रतिपादनमं तात्पर्य होनेपर भी, 'त्वम्पद' वाच्य जीवका 'तत्पद' वाच्य ब्रह्मके • साथ अमेद प्रत्यक्षविरुद्ध है, अतः उसके अविरोधके लिए विशिष्टरूप वाच्यसे अर्थसे-अलग किये हुए केवल विशेष्यरूप चैतन्यमॅ लक्षणा मानी जाती है।

  • प्रकृतमें कृप्णलशव्द्का अर्थ सुवर्णके विकारभूत माप किया गया है, और 'कृष्णलं अपयेत्' इत्यादिसे कृप्णलके अप्ञभूत श्रपण (पाक) का विधान किया जाता है। परन्तु कृष्णलका सुर्य पाक नहीं हो सकता है, क्योंकि रूपरसपरावृत्तिपर्य्यन्त अधिश्रयणादि व्यापार अर्थात् पूर्वके रूप और रस आदिके विनाशपूर्वक अन्यरूप और अन्य रस आदिकी उत्पत्ति तक अधिश्रयण आदि व्यापार ही मुख्य अपणशब्दका अर्थ है, और इस पाकके साथ कृप्णलका वस्तुतः सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि कृष्णलोंमें अधिश्रयण (पाकानुकूल व्यापार) आदिके करनेपर भी रूपरसादिकी परावृत्ति या प्रादुभाव नहीं देखा जाता है। * 'कृप्णलं अपयेत्' इस ध्रुतिसे श्रपणका ही विधान होता है, और वह प्रत्यक्षसे वाधित भी नहीं है, क्योंकि ज्वालाविथ्रयण आदि कियारूप पाककी ही श्रपणशब्दसे विवक्षा है, इसलिए कृण्णलमें वह पाक हो सकता है, पूर्वरूपपराशृत्ति या प्रादुर्भाव घात्वर्थके अन्तर्गत नहीं होनेसे उसके न रहनपर भी कोई हानि नहीं है, किन्तु कर्मत्वरूप पाकका फल वह द्वितीयार्थ ही है, और जो फल होता है, वह विधिके योग्य नहीं होता है, इसलिए वह विधेयभूत अपणात्मक भी नहीं है, इस अवस्थामें विधेयभूत अ्रपणका कोई हट्फल न होनेसे अदष्टार्थक ही पर्यवसन्न होता है, अतः श्रुतिके तात्पर्यके विपयीभूत अ्रपणमें कोई प्रत्यक्ष विरोध न होनेसे उसमें श्रपण- शब्दकी लक्षणा करना व्यर्थ है, इस प्रकार यदि किसीको शक्ा हो, तो उसके लिए 'तत्त्वमसि' इत्यादिसे अन्य रषान्त कहते हैं। * सात्पर्य यह है कि 'तत्वमसि' आदि जितने महावाक्य है, उन सयका तात्पर्य अखण्ड,

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२८६ सिद्धान्तलेशसंग्रहं i द्वितीय परिच्छेदं

अर्थवादानामपि प्रयाजाद्यङ्गविधिवाक्यानामिव स्वार्थग्रमितावनन्यार्थ- तया प्रमितानामेवार्डर्थानां प्रयोजनवशादन्यार्थतेति प्रयाजादिवाक्यवत्तेपा- मप्यवान्तरसंसर्गे तात्पर्यमस्त्येव, वाक्यैकवाक्यत्वात्। पदैकवाक्यतायामेव

अर्थवादवाक्योंके भी-प्रयाज आदि अङ्गोंके विधायक वाक्योंके समान- स्वार्थका अववोध होनेपर अन्य प्रयोजन न होनेसे प्रमित अर्थोंका ही किसी प्रयोजनवशसे उन अर्थवादोंमें अन्यार्थपरता है, अतः प्रयाज आदि वाक्योंके समान अर्थवादोंका भी अवान्तरपदार्थसंसर्गके बोघमें तात्पर्य है ही, अर्थात् अर्थवाद वाक्योंका भी विधिके अन्वयके पूर्वकालमें स्वरसतः प्रतीयमान देवताके विग्रह (शरीर) आदिके संसर्गमें भी अवान्तर तात्पर्य माननेमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि वाक्यैकवाक्यता है अर्थात् विधिवाक्योंके साथ अर्थवादवाक्योंकी

एकरस चैतन्यरूप वस्तुके प्रतिपादनमें ही है, क्योंकि 'तमेवेक जानय आत्मानम्' (हे मुमुक्षु लोगो उसी आत्माको जानो, जिसमें यह समस्त जगत् अध्यस्त है) 'तमेव विदित्वाऽति- मृत्युमेति' (उसी प्रकृत पर आत्माको जानकर संसाररूप मृत्युको तैर जाता है) 'एकवेवानुदष्टव्यम्' (शास्त्र और आचार्यके उपदेशके वाद एकरूपसे आत्माको जानना चाहिए) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे मुकिके प्रति साधनभृत महावाक्यार्थके ज्ञानके प्रति केवल उक्त चतन्यात्मक वस्तुका ही नियमन होता है, इस प्रकारकी वस्तुके बोधनमें तात्पर्य रखनेवाले महावाक्योंकी जब तक लक्षणा न मानी जाय, तब तक उच्त तात्पर्यका निर्वाह नहीं हो सकता है, अतः उन महा- वाक्योंमें तात्पर्यके अनुसार लक्षणाका अभ्युपगम किया गया है, प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिहार- के लिए लक्षणका अभ्युपगम नहीं किया गया है। और जो 'प्रत्यक्षविरोधके परिहारके लिए महावाक्योंमें लक्षणाका स्वीकार किया गया है, इस प्रकार निवन्धोंमें व्यवहार होता है, वह केवल इसीलिए होता है कि 'तद' और 'लम्' शब्दकी केवल चैतन्यमें लक्षणा स्वीकार करके वाक्यार्थवोध माननेसे प्रत्यक्षके साथ विरोधका भी परिहार हो जाता है।

तात्पर्यार्थ यह है कि 'समिधो यजति' इत्यादिसे अवगत समिध्, प्रयाज आदिका दर्श- पूर्णमासके साथ अन्वय अवश्य होता है, क्योंकि उनका परस्पर उपजीन्योपजीवकभाव है, परन्तु 'समिधो यजति' इत्यादि जितने अङ्गविधिवाक्य हैं, वे पहले स्वार्थकी प्रमितिमें अन्यार्थ- रुपसे अवश्य प्रमित होंगे, पीछे उनका देश आदिके साथ सम्बन्ध होगा, वैसे ही अर्थवाद- वाक्य भी स्वायाशमें पूर्वमें प्रमित होते हैं अनन्तर उनका स्वार्थज्ञानमान्रसे कोई फल न होनेके कारण विधेयके स्तावकरूपसे विधिके साथ एकवाक्यताकी कल्पना करते हैं, इसलिए अर्थवादवाक्योंका भी विधिके साथ अन्वयके पूर्वमें स्वरसतः प्रतीयमान देवताके शरीर आदिके संसर्गमें अवान्तर तात्पर्य है।

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका मावल्य-विचार] भापानुचादसहित २८७

परमवान्तरतात्पर्यानभ्युपगमादिति विवरणा चार्यर्न्यायनिर्णये व्यवस्थापनेन 'यजमान: ग्रस्तरः' इत्यादीनामपि मुर्यार्थतात्पर्यप्रसक्ती प्रत्यक्षाविरो- धायव लक्षणाऽभ्यृपगमाच्च। कथं तहिं श्रुतेः प्रावल्यम्१ उच्यते-निर्दोपत्वात् परत्वाच श्रुति- मात्रस्य प्रत्यक्षात् प्रावल्यमित्युत्सर्ग: किन्तु श्रुतिवाधितमपि अ्रत्यक्षं कर्थ- एकवाक्यता है, पदैकवाक्यतामं ही अवान्तरतात्पर्यका अभ्युपगम नहीं माना जाता है, ऐसी विवरणाचार्यने न्यायनिर्णयमॅ व्यवस्था की है, अतः 'यजमान: प्रस्तरः इत्यादि वाक्योका मुख्य अर्थमें तात्पर्यकी प्रसक्ति होनेपर म्रत्यक्षके साथ विरोध होगा, अतः उसकी निवृत्ति करनेके लिए ही लक्षणा मानी गई है। तब श्रुति प्रबल कैसे होती है: निर्दोष होनेसे और प्रत्यक्षकी अपेक्षासे पर होनेसे, ऐसा कहते हैं। सम्पूर्ण श्रुति प्रत्यक्षकी अपेक्षासे प्रवल है, यह नियम उत्सग-सामान्य है, [तात्पर्य यह है कि श्रुति और उससे भिन्न प्रमाणोंकी जहाँ परस्पर विप्रतिपत्ति (विरोध) होती है, वहींपर श्रुति चलवती है और जहाँ, श्रुतिवाधित प्रत्यक्ष प्रमाण अवकाशरहित होता है, वहाँ निरवकाश प्रमाणसे श्रुतिका चाध होता है, क्योंकि यह एक नियम है कि सावकाश और निरवकाशमें निरवकाश प्रमाण ही लवान् होता है, ] किन्तु श्रुतिसे यद्यपि प्रत्यक्षका बाध किया गया हो, तथापि उसकी उचित विपयके

• चाक्योंके होनेपर ही वाक्योंकी विधियाक्यके साथ एकवाक्यता मानी गई है, कारण कि वाक्योंका वाक्यार्थमें ही स्व्मावतः तात्पर्य है। पदोंके होनेपर ही एक वाक्यार्थके बोधनसे एकवाक्यता होती दै, अतः पदेकवाक्यता कहलाती है। इस पदैक- वाक्यतामें जो पदार्थ है, वे वाक्यार्थके समान अपूर्व नहीं हैं, अतः उनका अवान्तर तात्पर्ये भी नहीं है, दसीसे रेवत्याधारकवारवन्तीयसामरूप विश्ेषणमें भी तात्पर्य है, यह समझना चादिए, क्योंकि स्वभावतः वाक्यार्थमें ही वाक्यका तात्पर्य है, विशिष्टविधिका तात्यर्य विशिषटभावनामें है, अतः उसका विशेपणमें भी तात्पर्य अर्थतः सिद्ध होता है। यदि विशिष्ट विधिका तात्पर्य केवल विशेषणमें माना जाय, तो उसके विशिष्टविपयकत्वकी सिद्धि नहीं होगी, मीमांसकोंके यहाँ 'विशिष्टविधिका विशेषणमें तात्पर्य नहीं है' इस प्रकारका व्यवहार प्रत्येकमें विशिश्नविधिकी विपयत्षा नहीं है, इसी तात्पर्यसे होता है, 'तात्पर्यविपयमें ही वेद प्रमाज्ञानका जनक है' इर प्रकारके नियम न्यायनिर्णयमें विधरणाचार्यने भी माना है, अतः 'यजमानः प्रस्तरः' इसका प्रस्तराभेदमें यदि तात्पर्य माना जाय, तो प्रत्यक्षसे वाधित होगा, अतः उसके साथ विरोध न हो, इसलिए उसकी लक्षणा मानी जाती है, यद भाव हे।

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२८८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

चित् स्त्रोचितविपयोपहारेग सम्भावनीयम्, निविपयज्ञानायोगान्। अत एवाडद्वैतभ्ुतिविरोधेन तच्वावेदनात प्रच्यावितं सत्यत्वम् अर्थक्रियासमर्थच्या- चहारिकविपयसमर्पणेनोपपादते। कि बहुना 'नेद रजतम्' इति सर्वसिद्ध- प्रत्यक्षवाधितमपि शुक्तिरजतप्रत्यक्षमनुभवातुरोधात् पुरोदेशे शुक्तिसंभिन्न- रजतोपगमेन समर्थ्यते, न तु तद्विरोघेन व्यवहितमान्तरमसदेच वा रजतं

उपहारसे (समर्पणसे) उपपत्ति करनी चाहिए, क्योंकि जितने ज्ञान होते हैं, वे सत्न सविषयक होते हैं अर्थात् प्रत्यक्षजन्य ज्ञानका कोई विषय नहीं होता, तो उसके ज्ञानत्वकी व्याहति होगी, इससे ज्ञानकी उपपत्तिके लिए उस ज्ञानमें योग्य विषयकी कल्पना करनी चाहिए, यह भाव है ]। इसीलिए अर्थात् प्रत्यक्ष आदि ज्ञान अविपयक नहीं हो सकते हैं, इससे [ भाष्य आदि निवन्धोंम] अद्वैतब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे [द्वैतप्रपश्चमें तात्त्विकत्व न होनेके कारण द्वेतवोधक प्रत्यक्षमं ] तत्त्व्रावेदकरूप प्रामाण्यसे रहित सत्यत्वकी अर्थक्रियामं समर्थ व्यावहारिक विपयके समर्पणसे उपपत्ति करते हैं। अधिक क्या कहा जाय, * 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं ह) इस प्रकार वाघक प्रत्यक्षसे, जो सभीको सम्मत है, शुक्तिमें रजतका यद्यपि प्रत्यक्ष चाघित है, तथापि अनुभवके अनुसार पुरोवर्तीं प्रदेशमें शुकिके साथ तादात्म्यापन्न रजतकी उत्पत्ति मानकर उस प्रत्यक्षकी उपपत्ति की जाती है, परन्तु रजतम इदमर्थके साथ अभिन्नत्वानुभवके विरोधसे अन्यदेशस्थ या ज्ञानाकार रजत विषय नहीं माना जाता है, [तात्पर्य यह है कि देशान्तरस्थ रजतको 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इत्याकारक भ्रमज्ञानमें विपय मानेंगे अथवा ज्ञानाकार रजतको विषय मानेंगे, तो 'इदं रजतम्' इस प्रकार पुरोवर्ती प्रत्यय नहीं होगा अर्थात् इदमर्थके साथ अभेदको वह प्रत्यक्ष अवगाहन नहीं करेगा, क्योंकि देशान्तरमें रहनेवाला

अद्वैतधुतिवाधित घट आदिका प्रत्यक्ष निर्विषयक माना जाय, तो जैसा सन्पूर्ण व्यवहार- का लोपप्रसङ्ग वावक है, वैसा छुकतिरजत आदि प्रत्यक्ष निर्विपयक माने जानेपर वावक नहीं है, क्योंकि कहींपर असत् रजत आदिका भो मान माना गया है, तथापि सिद्धान्तमें गुकिरजतत्थलमें तात्कालिक रजतकी उत्पत्ति मान कर उसी रजतको झुक्तिरजत प्रत्यक्षका विषय मानते हैं, क्योंकि निर्धिपयक प्रत्यक्ष नहीं होता है, इससे श्रुतिवाधित प्रत्यक्ष जहाँ निरकाश होता है, वहाँ उस प्रत्यक्षसे श्रुतिका बाघ युक्त और सिद्धान्तसम्मत' ह्ै, अ़तः श्ुतिका प्रावल्य औत्सर्गिक है!

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्रावल्य-विचार ] भापानुवादसहित २८९

विपय इति परिकल्प्यते। एवं च प्रस्तरे यजमानभेदग्राहिणो यावड्ूह्व- ज्ञानमर्थक्रियासंवादेनाऽनुवर्तमानस्य प्रत्यक्षस्य प्रातिभासिकविपयत्वाभ्युप- गमेनोपपादनायोगाद् 'यजमान: प्रस्तरः' इति क्रुतिवाध्यत्वे सर्वथा निर्विंप- यत्वं स्यादिति तत्परिहाराय उत्सर्गमपोद श्रुतिरेव तत्सिद्धयधिकरणादि- प्नतिपादित प्रकारेणाजन्यथानीयते।

रजत और ज्ञानाकार रजत पुरोवर्ती (सामने) नहीं हो सकते हैं, इससे इृदमर्थसम्मिन्नत्वका विरोध होगा यह भाव है,] विरोधके रहते अन्य प्रमाणोंसे श्रुतिका वाध होना न्याय्य है, इसलिए न्रद्मज्ञान जव तक न हो तब तक अर्थक्रियामें समर्थ भेदविषयकत्वरूपसे अनुवर्तमान यजमान और प्रस्तरके परस्पर मेदको ग्हण करनेवाले प्रत्यक्षकी, प्रातिभासिकविपयक मानकर, उपपत्ति नहीं कर सकते हैं, अतः परस्पर अर्थात् कुशसुष्टिमॅ यजमानका मेद ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षका 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादि श्रुतिसे वाघ किया जायगा, तो सरवथा उक्त प्रत्यक्ष निरवकाश हो जायगा, अतः उक्त प्रत्यक्षम निरवकाशत्वके परिहारके लिए उक्त सामान्य नियमका वाध करके श्रुतिको ही + 'तत्सिद्धि' अधिकरणमं प्रतिपादित प्रकारसे गौण मानना चाहिए। यदि शक्षा हो कि अद्वैतश्रुति और प्रत्यक्षके परस्पर विरोध होनेपर जैसे श्रुतिका विषय अह्वैत पारमार्थिक माना जाता है और प्रत्यक्षका विपय व्यावहारिक द्वेत माना जाता है, वैसे ही प्रकृतस्थलमं भी 'यजमानः प्रस्तरः' इस श्रुतिका और प्रत्यक्षका-यजमान और प्रस्तरका पारमार्थिक अमेद और व्यावहारिक • प्रस्तरमें (कुशमुष्टिमें)।यजमानभेदविपयक प्रत्यक्ष प्रातिभासिक भेदविपयक नहीं हो सकता दै, क्योंकि वमज्ञानके बिना उसका बाध नहीं होता है, व्यावहारिक भेद भी उसका विषय नहीं हो सकता, क्योंकि उसका खण्टन आगेके अ्रन्थमें ही होनेवाला है। यदि पारमार्थिक भेद माना जाय, तो अद्वैतथ्ुतिके साथ विरोध होगा, इसलिए वह निरवकाश होगा, अतः "वयजमान: ग्रस्तरः' उसफो गौण मानना पढता है, यह भाव है। तत्मिद्धि अधिकरणका सूत् है-'तत्सिद्धिजातिसारप्यप्रशंसाभूमलिप्वसमवाया इति गुणाश्रयः' [पू० मी० १४१३ ] यद्यपि इतना वढा सून्न एक ही है, परन्तु 'ततिसिद्धिः, जातिः' इत्यादि विभागशः उपलब्धि केवल व्याख्यासोकर्यार्थ दी है, 'परिधिपरिधान' आदि यजमानके कार्यफी कुशसुष्िसे (प्रस्तरये ) सिद्धि होती है, अतः 'यजमान' शब्द गोणीवृत्तिये प्रस्तरका स्तापक हे, ग्रद्द भाव है।

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२९० सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

विषयत्वोपगमेन अत्यक्षोपपादनं कर्तु शक्यम्। त्रह्मातिरिक्तसकलमिथ्यात्व- प्रतिपाद कपड्विधतात्पर्यलिङ्गोपपन्नानेकश्रुतिचिरुद्वेन एकेनारऽर्थवादेन प्रस्तरे यजमानतादात्म्यस्य तान्विकस्य ग्रतिपादनासम्भवाद्। एवं 'तच्वमसि' वा- क्येन त्वंपदवाच्यस्य सर्वज्ञत्वाभोक्तृत्वाकर्तत्वादिविशिष्टत्रह्मस्व्ररूपत्वघोधने तत्राऽसर्वज्ञत्वभोक्तृत्वादिग्रत्यक्षमत्यन्तं निरालम्वनं स्यादिति तत्परिहाराय अहङ्कारशवलितस्य भोक्तृत्वादि, ततो निष्कृष्टस्य शुद्धस्य उदासीनब्रह्म- स्वरूपत्वम्' इति व्यवस्थामाश्रित्य भागत्यागलक्षणाSSश्रीयते। एवं

भेद क्रमशः-विषय हैं, इस ग्रकार मानकर मी प्रत्यक्षका उपपादन कर सकते हैं? तो यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि छः प्रकारके उपक्रम आदि तात्पर्यके वोवक प्रमाणोंसे युक्त, व्रह्मसे अतिरिक्त समस्त संसारके मिथ्यात्वका प्रतिपादन करने- वाली अनेक श्रुतियोंके साथ अत्यन्त विरुद्ध एक अर्थवादवाक्यसे यजमान और प्रस्तरके तात्त्विक अमेदका प्रतिपादन नहीं हो सकता है। इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' + इत्यादि वाक्यसे 'त्वंशब्द' के वाच्य जीवमें सर्वज्ञत्व, अभोक्तृत्व, अकर्तृत्व आदिसे युक्त न्रह्मरूपताका वोधन करनेमें उस जीवमें असर्वज्ञत्व, भोकतृत्व आदिका जो प्रत्यक्ष है, वह अत्यन्त निरालम्ब होगा, इसलिए उसके परिहारके लिए अहक्वारसे उपहित अर्थात् अन्तःकरणसे विशिष्ट चैतन्यमें भोक्तृत्वादि और उससे रहित शुद्धमें उदासीन न्रह्मस्वरूपता है, इस प्रकारकी

  • यदि इस स्थलमें कोई शक्ता करे कि यजमान और प्रस्तरका व्यावहारिक अभेद ही श्रुतिसे बोधित होता है, इससे व्यावहारिक अभेदप्रतिपादक श्रुतिसते वाधित भेदप्रत्यक्ष भी व्यावहारिक भेदविषयक ही होगा, तो यह भी युक्त नहीं है,क्योंकि समानसत्ताकभेद और अभेद एक जगह नहीं रहते हैं, और श्रुतिसे प्रस्तर और यजमानका प्रातिभासिक अभेद भी बोधित नहीं होता है, क्योंकि शुकिमें रजतके अभेदके समान प्रस्तरमें यजमानके अभेदका किसीसे ग्रदण नहीं होता है। * 'तत्त्वमसि' इस वाक्यसे किश्विज्ज्ञत्व आदि धर्मोसे युक्त चैतन्यात्मक जीवमें उससे विरुद्ध' सर्वज्ञत्वादिस युक्त चतन्यात्मक व्रह्मके साथ सदातन अमेदका प्रतिपादन होता है, इसके अनुरोधस यदि जीवमें सर्वतत्वादि धर्मोंका अङ्गीकार किया जाय, तो असर्वज्ञत्वादिरूप संसारका अवगाही प्रत्यक्ष विरुद्ध होगा, अतः सांसारिक निरवकाश प्रत्यक्षसे श्रुतिका वाध करना चाहिए, और वह बाध विशेष्य चैतन्यांशमात्रका सङोचरूप ही है, 'यजमान: प्रस्तरः' इत्यादिके समान सर्वथा मुख्यार्थका त्याम करके गौण अर्थकी कल्पनारूप नहीं है, यह भाव है।

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प्रत्यक्षसे ्रुतिका प्रांवल्य-विचार] भापानुवादसहित २९१

'कृष्णलं अ्रपयेद्' इत्यादावपि प्रत्यक्षस्याऽत्यन्तनिर्विंषयत्वप्रसक्तौ तत्परि- हाराय श्रुतौ लक्षणा उष्णीकरणे। 'नेह नानाऽस्ति किश्चन' इत्यन्न प्रत्यक्षस्य कथश्चिद्विपयोपपादनसम्भवे तु न प्रवलाया: भ्रुतेरन्यथानयन- मिति न कश्िदप्यव्यवस्थाप्रसङ्ग: । अथवा कृष्णलेऽरशक्तेलक्षणा श्रपयोदिह। व्यवस्थेत्थं विवरणवा्तिके समुदीरिता ।। ११ ॥ अथवा कृप्णलके पाकमें किसीकी सामर्थ्य न होनेसे 'अपयेत्' की उष्णीकरणमें लक्षणा मानी जाती है, इस प्रकार विवरणवार्तिकमें व्यवस्था कही गई है।

व्यवस्थाका आश्रयण करके भाग-त्याग लक्षणाका * आश्रयण किया जाता है। इसी प्रकार 'कृष्णलं अपयेत्' इत्यादि + स्थलोंमें भी प्रत्यक्षकी निर्विपयता प्रसक्त्त होनेसे उसका परिहार करनेके लिए श्रुतिमें 'श्रपयेत्' की केवल गर्म करनेमें लक्षणा की जाती है। 'नेह नानाऽस्ति किश्चन' (ब्रद्ममें कोई द्वैत है ही नहीं) इत्यादिमें यदिI किसी प्रकारसे मी प्रत्यक्षके सविपयकत्वका उपपादन कर सकते हैं, तो प्रवलश्रुतिकी लक्षणा नहीं माननी चाहिए, इस प्रकारसे कोई अव्यवस्था प्रसक्त नहीं है।

  • 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यमें 'त्वम्' शब्दका अर्थ है-'अन्तःकरणविशष्ट चेतन' इसमें दो भाग हैं-एक विशेषण और दूमरा विशेष्य, उनमेंसे विशेषणभागका-अन्तःकर्ण- शका-त्याग करके चैतन्यमात्र विशेष्य दलका परिग्रहण करना चाहिए। वैसे ही 'तत्' शब्दके-मायाचिशिष्ट चैतन्यरूप अर्थमें भी दो भाग करके विशेष्यमात्रमें ही लक्षणा करनी चाहिए, यद भाव है। +'कृप्णलं अपेत्' इस श्रुतिके जोरसे कृष्णलोंमें रूपरसादिकी परावृत्तिके प्रादुर्भाव पर्यन्त पाक माना जाय, तो उनमें थरपणाभावका जो प्रत्यक्ष होता है, उसका कोई विषय ही नहीं होगा। और कृष्णलोंमें अनुभूयमान जो अ्रपणका अभाव है, वह पारमार्थिक नहीं है, क्योंकि अद्वैत श्रुतिके साथ विरोध होगा, अतः व्यावहारिक ही मानना होगा, इससे अ्तिद्वारा उक्त श्रपण भी व्यावहारिक मानना होगा, इस परिस्थितिमें कृष्णलोंमें व्यावहारिक श्रपणका अभाव कैसे रहेगा और उसे प्रातिभासिक भी नहीं मान सकते हैं, क्योंकि उसका व्यवहारकालमें वाघ नहीं होता है, अतः अ्पणाभावका प्रत्यक्ष अवश्य निर्विपयक होगा, अतः श्रपणकी उप्णीकरणमें (अर्थात् कृप्णलोंको केवल अग्निसे गर्म करनेमें ) ही लक्षणा करनी चाहिए। इसी प्रकार 'सोमन यजेत' इत्यादि स्थलमें भी सोम और यागका अभेद प्रत्यक्षसे वाधित है, अतः मत्वथमें लक्षणा करनी चाहिए, यह भाव है। 1 द्वेतमें मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंके और द्वैतमें सत्यत्वग्राही प्त्यक्षके

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२९२ सिद्धान्वलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

अथवा 'कृष्णलं अ्रपयेत्' 'सोमेन यजेत' इत्यादौ न प्रत्यक्षा- तुरोधेन लक्षणाश्रयणम्, किन्तु अनुष्ठानाशक्त्या। नहि कृष्णले उष्णी- करणमात्रमिव मुख्यः पाकोऽनुष्ठातुं शक्यते। न वा सोमद्रव्यकरणको याग इव तदभिन्नो याग: केनचिदनुष्ठातुं शक्यते। न चाऽनुष्ठेयत्वाभिम- तस्य प्रत्यक्षविरोध एवाऽनुष्ठानाशक्तिरिति शव्दान्तरेण व्यवहियते इति वाच्यम्। 'शशिमण्डलं कान्तिमत् कुर्याद्' इति विधौ अनुष्ठेयत्वाभि- सतस्य शशिमण्डले कान्तिमत्वस्य प्रत्यक्षाविरोधेऽप्युनुष्ठानाशक्तिदर्शनेन तस्यास्ततो भिन्नत्वात्। तथा च तत्र तत एव लक्षणाऽडश्रयणम्।.

  • अथवा 'कृष्णलं श्रपयेत्' और 'सोमेन यजेत' इत्यादि स्थलम प्रत्यक्षके अनुरोधसे लक्षणाका आश्रयण नहीं करते हैं, किन्तु [मुख्यार्थक माननेसे ] अनुष्ठान ही नहीं हो सकता है, अतः लक्षणाका आश्रयण करते हैं, कारण कि कृष्णलमें (सुवर्णमाषोंमें ) उष्णीकरणके सिवा मुख्य पाक नहीं कर सकते हैं, - [ इसी प्रकार 'सोमेन' इत्यादिमें भी सोम और यागका अभेद नहीं हो सकता है] तथा सोमद्रव्य है उपकरण जिसमें, ऐसे यागके समान सोमद्रव्यसे अभिन्न यागका कोई पुरुष अनुष्ठान नहीं कर सकता है। यदि शङ्का हो कि अनुष्ठेयत्वेन जो अभिमत है, उसके साथ प्रत्यक्ष- विरोध ही शव्दान्तरसे 'अनुष्ठानकी अशक्ति' कहलाता है? तो यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'शशिमण्डलं कान्तिमत् कुर्यात्' (चन्द्रमण्डलको कान्तियुक्त बनावे) इस विधिमें अनुष्ठेयत्वरूपसे अभिमत जो चन्द्रमण्डलमें कान्तिमत्व (कान्ति) है, उसमें प्रत्यक्षविरोध न होनेपर भी अनुष्ठानकी अशक्ति दिखती है, अतः यह स्वीकार करना होगा कि प्रत्यक्ष-विरोध और

विरोधस्थलमें श्रुतिसे प्रत्यक्षके वाधित होने पर भी उसमें निरवकाशत्व नहीं है, क्योंकि कल्पितद्वैत और तद्गतसत्ता आदिसे उपपत्ति हो सकती है, यह तात्पर्य है। * पूवके ग्रन्थसे प्रत्यक्षसे श्रुतिके वाधमें अनेक उदाहरण दिखलाये गये, परन्तु थ्रुतिसे अत्यक्षका बाध होता है, इसमें अधिक दष्टान्त नहीं वतलाये गये, अर्थात एक ही वतलाया है। इस अवस्थामें 'श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष वलवान् है' इसी उत्सर्गकी सिद्धि हो सकती है, प्रत्यक्षस श्रुति वलवती है, इसकी सिद्धि नहीं हो सकती है-इस अस्वरससे 'अथना' इस पक्षको कहते हैं, यह भाव है।

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परत्यक्षसे श्रुतिका प्रावल्य-विचार] भापानुवादसहित २९३

तस्मादपच्छेदन्यायादिसिद्धस्य श्रुतिवलीयस्त्वस्य न कश्िद् चाघ इति। अथ कथमत्रापच्छेदन्यायप्रवृत्तिः १ उच्यते-यथा ज्योतिष्टोमे

अनुष्ठानाशक्ति दो अलग-अलग पदार्थ हैं। इसलिए 'सोमेन यजेत' इत्यादिमें अनुष्ठानकी अशक्ति ही लक्षणाके स्वीकारमें बीज है। इससे अपच्छेदन्यायसे सिद्ध श्रुतिके प्रावल्यके साथ कोई विरोध या बाध नहीं है । अब शक्का होती है कि प्रकृतमें अपच्छेद न्यायकी प्रवृत्ति कैसे होती है? कहते हैं-ज्योतिष्टोम यागमें वहिप्पवमानके * लिए जाते हुए ऋत्विजोंमें से यदि उद्ाताका अपच्छेद (विच्छेद) हो जाय, तो 'यधुद्वाताऽपच्छिद्येता०' (यदि उद्गाताका विच्छेद हो, तो दक्षिणाके बिना उस यागको करके फिर उस यागको करे) इस श्रुतिके देखनेसे उद्गाताके विच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित करनेका

  • अनुष्ठानकी अशकिसे ही लक्षणाके आश्रयण करनेसे और प्रत्यक्षविरोधसे लक्षणा न माननेसे श्षुतिसे प्रत्यक्षका प्रावल्य सिद्ध नहीं होता है, आगमसे वाधित गगन- नल्य आदिके प्रत्यक्ष वतलाये गये हैं, अतः आगम ही प्रवल है, यह औत्सर्गिक है, अर्थात् वाधित होनेपर उसका त्याग किया जायगा, अतः यदि प्रत्यक्षसे आगम चलवान् होगा, तो 'यजमान और प्रस्तरका' परस्पर अगेद हो जायगा, इत्यादि वाघोका प्रसम्न, जो पहले आशंकित था, अब नहीं है, यद भाव है। * वहिप्पवमाननामक स्तोत्र है और वह स्तोत्र 'उपास्म गायता नरः' 'दविदुतत्या रुचा' 'पयमानस्य ते कने' इत्यादि तीन सूकोंके गानसे साध्य है। + वहिप्पयमान स्तोत्रके लिए एक दूसरेका कच्छ पकड़ करके जाते हुए ऋत्विजोंमें से यदि उद्दाताका विच्छेद हो जाय, तो जिस यागका आरम्भ किया है, उसको दक्षिणाके बिना समाप्त करके यजमानको पुनः उस यागका आरम्भ करना चाहिए। यदि प्रतिदतोका विच्छेद हो जाय, तो यजमानको सर्वस्व्र दक्षिणा दे देनी चाहिए। ये दो विरुद्ध प्रायक्षित सुननेमें आते हैं, एक तो अदक्षिगापूर्वक यागकी समाप्ति और (पुनः याग) और दूसरा सर्वस्वदानपूर्वक यागकी समाप्ति। इस अवस्थामें यदि कमसे दोनोंका विच्छेद हो जाय, तो कौन प्रायक्चित करना चाहिए, क्योंकि विरुद्ध प्रायश्चित्ोंका एक कालमें तो अनुष्ठान नहीं हो सकता है, इसलिए कया पूर्वनिमित्तक प्रायथ्वित्त करना चाहिए या परनिमित्तक? इस प्रकारका संशय होनेपर निर्णय किया गया है कि पूर्वसे पर बलवान् है, अर्थात् अनन्तर होनेवाला ज्ञान पूवमें अप्रामाण्यका निथय करके होता है, जैसे झुकिमें रजतज्ञानके उत्तरमें जायमान 'नेदं रजतम्' इस प्रकारका वाधज्ञान पूर्वज्ञानमें अग्नामाण्यका निक्षय करके ही प्रवृत्त होता है, वैसे ही पूर्वनिमितक प्रायथितसे उत्तरनिमित्तक प्रायश्वित वलवान् होगा और उत्तर प्रायशचितसे पूर्वका वाध होता है, यद भाव है।

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२९४ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

यज्ञमिष्टा तेन पुनर्यजेत' इति त्रुतिनिरीक्षणेन जाता उद्धात्रपच्छेदनिमित्त कप्रायश्चित्तकर्तव्यतावुद्धि: पश्चात् प्रतिहर्त्रपच्छेदे सति 'यदि प्रतिहर्ताs- पच्छिद्येत सर्ववेदसं दद्याद्' इति श्रुतिनिरीक्षणेन जातया तद्विरुद्धप्रति- हर्त्रपच्छेदनिमित्तप्रायश्चित्तकर्तव्यताबुद्धया वाध्यते। एवं पूर्व घटादिसत्यत्वप्रत्यक्षं परया तन्मिथ्यात्वश्रुतिजन्यबुद्धया बाध्यते। न चोदाहृतस्थले पूर्वनैमित्तिककर्तव्यतावुद्धेः परनैमित्तिककर्त- व्यतावुद्ध्या वाधेऽपि पूर्वनैमित्तिककर्तव्यताजनकं शास्त्रं यंत्रोद्गातृमात्रा- पच्छेद:, उभयोरपि युगपदपच्छेदौ वा, उद्धात्रपच्छेदस्य परत्वं वा, तत्र सावकाशम्, प्रत्यक्षं तु अद्वैतश्रुत्या वाधे विपयान्तराभावान्निरालम्वनं स्यादिति वैपम्यं शङ्कनीयम्। यत्र घटादौ श्रुत्या वाध्यं प्रत्यक्षं प्रवर्तते, तत्रैव व्यावहारिकं विपयं लब्ध्वा कृतार्थस्य तस्य परापच्छेदस्थले सर्वथा वाधितस्य पूर्वापच्छेदशास्त्रस्येव विपयान्तरान्वेपणाभावाद्। इहाऽपि सर्व-

ज्ञान होता है, उसके बाद 'यदि प्रतिहर्ता०' (यदि प्रतिहर्ताका विच्छेद हो, तो सर्वस्व दान दे दे) इस प्रकारकी श्रुतिके देखनेसे उत्पन्न हुई उद्गाताके विच्छेदनिमित्तकर्तव्यतासे विरुद्ध प्रतिहर्ताके विच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित- कर्तव्यवुद्धिसे प्राक्तन वुद्धिका वाध होता है। इसी प्रकार पूर्वमें घट आदिमें होनेवाला सत्यत्वविषयक प्रत्यक्ष अनन्तरमें होनेवाले श्रुतिजन्य मिथ्यात्वविषयक बुद्धिसे वाधित होता है, यदि शक्का हो कि पूर्वके उदाहृतस्थलमें अर्थात् जहाँ प्रथम उद्गाताका अपच्छेद हुआ है, उस स्थलमें प्राथमिक नैमित्तिकप्रायश्चितकर्तव्यत्व ज्ञानसे पश्चात् हुई नैमित्तिक कर्तव्यताका बोधक शास्त्र-जहाँ केवल उद्गाताका विभाग हुआ है, वहाँ अथवा एक कालमें दोनोंका जहाँ विच्छेद हुआ है, वहाँ अथवा जहाँ उद्धाताका विच्छेद पीछे हुआ है, वहाँ-सावकाश है और प्रत्यक्ष, तो अद्वैतश्रुतिसे वाध होनेपर अन्य किसी विषयके न होनेसे, निरालम्बन है, अतः वैषम्य है? तो यह भी- शङ्का युक्त नहीं है; कारण कि जिस घट आदिमें श्रुतिसे वाध्य प्रत्यक्ष प्रवृत्त होता है, उसी घट आदिमें व्यावहारिक-व्यवहार करनेमें उपयुक्त-सत्तारूप विषय- की प्राप्ति करके कृतार्थ प्रत्यक्षको, जैसे पर अपच्छेदस्थलमें सर्वथा बाघित पूर्व अपच्छेद शास्त्रको अन्य विषयकी अन्वेषणा करनी पड़ती है, वैसे

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प्रत्यक्षसे श्रृतिका नावल्य-विचार ] भापानुवादसहित २९५

प्रत्ययवेद्यत्रह्सत्तायां सावकाय अ्रत्यक्षमिति चक्तुं शक्यत्त्वाच्च । यच्वेकस्मिन्नपि प्रयोगे क्रमिकाभ्यां निमित्ताभ्यां क्रतौ तत्तनैमित्तिक- कर्तच्यतयोर्वदरफले व्यामरक्तरूपयोरिच क्रमेणोत्पादाद् रूपज्ञानद्वयचत् कर्तव्यताज्ञानद्वयमपि प्रमाणमेवेति न परेण पूर्वज्ञानवाधे अपच्छेदन्याय उदाहरणम्। अत एवापच्छेदाधिकरणे (पू० मी० अ० ६ पा० ५ अधि० १९)

प्रकृतमें अन्य विषयकी अन्वेपणा नहीं करनी पड़ती है। और इस स्थलमं भी सम्पूर्ण प्रतीतिम वेद्य त्द्मसत्तारूप विपयको लेकर प्रत्यक्ष सावकाश है। फोई लोग कहते हैं कि जैसे एक चदर (बेर) के फलमें क्रमशः पहले हरारूप उत्पन्न होता है, अनन्तर पाकवशात् पूर्वरूपके नाशके वाद पीला या रकरूप उत्पन्न होता है, और दोनों रूप कालमेदसे प्रामाणिक हैं, वैसे ही एक ही कतु (याग) के प्रयोगमें क्रमशः उत्पन्न हुए निमिचोंसे (अर्थात् उद्गाताका अपच्छेद और प्रतिहर्ताका अपच्छेदरूप निमित्तोंसे) तद् तत् प्रायश्चित कर्तव्यताओंमें दो ज्ञान भी प्रमाण ही हैं, अतः परज्ञानसे पूर्वज्ञानके वाधमें अपच्छेदन्याय उदाहरण नहीं हो सकता है। इसीसे अपच्छेदाधिकरणमं 'नेमितिकशास्त्रका (किसी निमितको लेकर

•म्रहामें पारमार्भिक यश् है, घट आदिमें व्यावदारिक सता है और झुकिरजतमें ग्राति- मासिक सत्ता है, एय प्रशारकी तीन सत्ताओंके स्वीकारपक्षमें घटादिसत्तके प्रत्यक्षके लिए कोर्द विपयान्तरकी अन्येषणा करनी नदीं पढती है, क्योंकि घट आदि में विद्यमान व्यावहारिक भता ही म प्रायक्षकी विषय हो सकती है, और 'एक ही सर्वन् सत्ता है' इस पक्षमें व्यावहारिक और प्रातिभासिक सत्ताफे न रटनेसे घटादिसत्वप्रत्यक्षका अन्य विपय खोजना होगा। जैसे कि उत्तर वालमें उत्पन्न विर्व अपच्छेदसे बाधित पूर्वापच्छेदनिमित्तक प्रायथित अपने विषयकी अन्वेषणा करता है। परन्तु एकसत्तायादियोंके मतसे भी कोई विरोध नहीं है, कारण कि घटादिवतवत्वप्रत्यक्ष पटादिमें सत्ताके न रहनेपर भी निरवकाश नहीं है, क्योंकि एपिष्ठान सत्ाफो लेकर टस प्रत्यक्षकी सावकाशता दो सकती है। इसलिए कहते हैं 'इहापि' अर्यात् 'एकसतापक्षमें भी संखारमें जितने प्रत्यय मनमें क्फुरित होते हैं, उन सवमें सत् वस्तु र्कृर्ति है, अतः सभी जगत्की सता सर्वप्रत्ययवेद है और वह सभौके अधिष्ठान- भून प्हाकी ही सता है, उससे अतिरिक नहीं है, क्योंकि अतिरिक सत्ता माननेमें गौरव है, गद भाव दे।

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२९६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

'नैमित्तिकशास्त्रस्य ह्ययमर्थः-निमित्तोपजननात् प्रागन्यथाकर्तव्योऽपि क्रतुर्निमित्ते सत्यन्यथाकर्तव्यः' इति शास्त्रदीपिकाचचनमिति, तन्न; अङ्गस्य सतः कर्तव्यत्वम्। न च पश्चाद्धाविप्रतिहर्त्रपच्छेदवति कतौ

पदहोमातिरिक्त होमविपयत्ववद् 'यद्युद्गाताऽपच्छिद्येत' इति शास्त्रस्य पथ्रा- ्ाविप्रतिहर्त्रपच्छेदर हित क्रतु विपयत्वात्। उक्त् हि न्यायरत्नमालायाम्- 'साधारणस्य शास्त्रस्य विशेषविपयादिना। संकोच: क्लपरूपस्य ग्राप्तवाधोऽभिधीयते ।।' प्रवृत्त हुए शास्तरको नैमित्तिक शास्त्र कहा जाता है) यह अर्थ है-निमिचके उत्पन्न होनेके पूर्वमें अन्यरूपसे अर्थात् उत्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदके पूर्वमें अदक्षिणारूपसे किया जानेवाला भी यज्ञ निमित्तके आ जानेपर अन्य रीतिसे अर्थात् अनन्तर प्रतिहर्ताके विच्छेद होनेपर सर्वस्वदक्षिणारूपसे किया जाता है' इस प्रकारका शास्त्रदीपिकाकारका वचन भी उपपन्न होता है। परन्तु यह सब कल्पना असङ्गत है, क्योंकि [विरुद्ध प्रकारसे जहाँ अपच्छेद हुए हैं, वहाँ यदि ] पूर्व नैमित्तिककर्तव्यता क्रतुके प्रति अङ्ग हो, तो उसमें कर्तव्यत्व आ सकता है, परन्तु क्रतुके प्रति उसके अङ्गत्वमें प्रमाण नहीं है, अतः पूर्वकी प्रसक्ति हो ही नहीं सकती है। और पश्चात् कालमें उत्पन्न होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदवाले क्रतुमें पूर्वकालमें उत्पन्न उद्गाताके अपच्छेदसे हुए प्रायश्चित अ्ञ नहीं है]।* 'आवहनीये जुहोति' इस आवहनीयशास्त्रकी पदहोमातिरिक्त होममें ही जैसे विषयता है, वैसे ही 'यदि उद्गाता विच्छेद करे' इत्यादि शास्त्रकी भी पीछे कालमें होनेवाले प्रतिहर्ताके अपच्छेदसे शून्य क्रतुमें विषयता है। न्यायरत्मालामें कहा भी है- 'साघारणस्य शास्त्रस्य०' प्रत्यक्षसिद्ध और होममात्रमें प्रवृत्त साधारणशास्त्र- आहवहनीये जुहोति (आवहनीय अझिमें होम करे) इत्यादिका 'पदे जुहोति' (गौके सप्तम पादविक्षेपमें [सप्तम खुर जहाँ पड़ा हो, उसमें] होम करे) इस 'आवहनीये जुहोति' इस शास्त्रका 'पदे जुहोति' इस वाक्यसे संकोच होता है, इसीको प्राप्तवाध कहा जाता है, इसका आगेके न्यायरत्मालाके श्रोकमें विचार किया जायगा।

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका मावल्य-विचार] भापानुवादसहित २९७

इति उक्तलक्षणम्राप्तवाधविवेचने, 'तत्रैवं सति शास्त्रार्थो भवति, पथ्रा- : द्वाव्युद्वान्रपच्छेदविधुरप्रतिहर्त्रपच्छेदवतः क्रतोस्सर्ववेदसदानमङ्गम्, एव- सुदात्रपच्छेदेपि द्रष्टव्यम्' इति। यत्तु शास्त्रदीपिकावचनमुदाहृतम्, तदपि-'तेनोत्पन्नमपि पूर्वप्रायश्चित्त- ज्ञानं मिध्या भवति, वाधितत्वाद्, उत्तरस्य तु न किश्न्िद्वाघकमस्ति' इति

प्राछनिमित्तोपजननं विनानिमित्तोपजननाभावे सति अन्यथा कर्तव्यो-

विदेषविपयक शासत्रसे संकोच होता है अर्थात् पदहोमातिरिक्त स्थलमें आवहनीय होम करे, इस प्रकार जो संकोच होता है; उसे प्राप्तवाध कहते हैं। तात्पर्यार्थ यह हुआ कि इस स्थानमें जैसे सामान्यशास्त्रका विशेष शास्त्र वाधक है, वसे ही सामान्यशास्त्रोंमें भी किसी विपयमं विरोध होनेपर पूर्वकालमें प्राप्त नमिच्तकशासत्रका उत्तरकालमें प्राप्त नमित्तिकशासत्रसे वाध होता है, जैसे कि विरुद्ध अपच्छेदनिमित्तकशास्त्रोंमें। इससे श्लोकस्थ विशेष विपयादिमें पठित आदि शव्दसे 'परशास्त्र' आदिका संग्रह होता है यह बात शोकमं उक्तरक्षण प्राप्तवाधके विचेचनके अवसरमें कही गई है। अपच्छेद स्थलमें उत्तरजानसे पूर्वज्ञानका बाध होनेपर उक्त नैमित्तिक शास्त्रका यह अभि- प्राय होता है कि उत्तरकालमें होनेवाले उद्गाताके अपच्छेदसे रहित प्रतिहर्ताके विच्छेदसे युक्त कतुका सर्वस्वदान अक्र है और पश्चात्कालमें होनेवाले प्रतिहतीके अपच्छेदसे रहित उद्धाताके विच्छेदसे युक्त कतुकी दक्षिणाके विना सगाप्ति करना अन्र है-यह ध्यान रखना चाहिए। जो कि पूर्वमें शास्त्रदीपिकाकार (पार्थसारथिमिश्र) का 'नैमित्तिकशास्त्रस्य' इत्यादि वाक्य उदाहरणरूपसे दिया गया है, वह भी -पूर्वकालमें प्रवृत्त नेमित्तिकशास्त्रसे उत्पन्न होनेपर भी प्राक्तनप्रायश्चितज्ञान उत्तर नैमित्तिक शास्त्रसे वाधित होनेसे गिथ्या ही होता है, और उत्तरकालमें उत्पन्न हुए प्रायश्चित ज्ञानका कोई वाधक नहीं है, इस प्रकार पूर्वकर्तव्यतामें बाध्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले अरन्थके उपसंहारमं पढ़ा गया है, अतः निमित्तकी उत्पत्तिके विना अर्थात् निमित्तके उत्पन्न न होनेपर अन्यरूपसे भी कर्तव्य हैं इस प्रकार-

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२९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

कर्तव्यता चस्तुत आसीदित्येवंपरम्, पूर्वग्रन्थसन्दर्भविरोधापत्ेः।

कृत्वाचिन्तापरक है, उत्तरनिमित्तके उत्पन्न होनेसे पूर्व उसमें वस्तुतः कर्तव्यता थी, इस अर्थका प्रतिपादक वह ग्रन्थ नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे पूर्व ग्रन्थके साथ विरोध होगा *।

*शास्त्रदीपिकाकारका वचन 'नैमित्तिकशास्त्रस्य०' (निर्णयनागरनुद्रित पुस्तकमें शास्त्रदीपिकामें 'नैमित्तिकशास्त्राणां ह्ययमर्थः' ऐसा पाठ उपलब्ध होता है, और इस प्रन्थमें 'नैमित्तिकशास्त्रस्य' इत्यादिरूपस पाठ उपलब्ध होता है, अतः अन्य पुस्तकोंनें कदाचित् एकवचनान्त पाठ भी होगा यह ज्ञात होता है) इत्यादिका उपन्यास इसलिए किया गया है कि दो रूपज्ञानके समान अर्थात् एक ही घटमें क्रमिक रूपद्यज्ञान जैसे ग्रामाणिक है, वैसे एक ही कतुमें क्रमिक नैमित्तिकप्रायश्चित्तद्वयज्ञान भी प्रामाणिक हो सकते हैं, अतः पूर्वसे परका वाघ या परसे पूर्वका वाध करनेकी चिन्ता ही नहीं हो सकती है। इसपर सिद्ान्ती कहते है कि नहीं उक्त ग्रन्थका आपके मतानुसार अर्थ नहीं है, परन्तु उसका अभिग्राय कुछ दूतर ही है। 'नैमित्तिकशात्त्रस्य' इत्यादि वाक्य उपसंहारभागमें पठित है, इसलिए उसका अभिप्राय उपक्रम ग्रन्थके अनुसार ही होगा और उपक्रमस्य वाक्य है-'तेनोत्पन्नमपि' इत्यादि। इसका तात्पर्यार्थ यह है कि पहले घट्ठा की गई कि जिस् स्यलमें क्रमिक वद्ाता और प्रतिहर्ताका विभाग हुआ हो, वहाँपर पूर्वनिमित्तक ही प्रायथित्त करना चाहिए, क्योंकि उसका कोई विरोधी नहीं है, अतः अनायास उसका परिज्ञान हो जाता है। और उत्तरनिमित्तक प्रायश्चितका पूर्व- निमित्तक प्रायश्चित्तसे विरुद्ध होनेके कारण ज्ञान नहीं हो सकता है, इसलिए पूर्व ही चलवान् है। इस परिस्थितिमें 'तेनोत्पन्नम्' इत्यादिसे कहा कि यद्यपि पूर्वनमित्तिकशावरवे उम्र पूर्व प्रायश्चितकी अवगति होती है, तथापि वह वाघित होनेसे मिथ्या है। भाव यह है कि यधुद्दातापच्छिन्धात्' इत्यादि प्रत्यक्षशास्त्रसे पूर्वनिमित्तक प्रायश्चितका ज्ञान होता है, परन्तु जो उत्तरनिमित्तक प्रायश्चित्तका ज्ञान है, वह अपनसे विरुद्ध पूर्वज्ञानका वाघ करके ही प्रवृत्त होता है, लोकमें भी 'गुकिरजतम्' और 'नेदं रजतम्' इत्यादिस्थलमें, ऐसा देखा गया है; अतः पूर्वज्ञान मिथ्या है, इसलिए वह वलवान् नहीं है। इस अवस्थामें 'तेनोत्पन्नमपि' इत्यादि उपकरम ग्रन्थके अनुमार 'निमित्तोपनननं विना' इत्यादिका यही अर्थ होगा कि जिस कतुमे दो प्रकारके कनिक विरुद्ध अपच्छेद न हो, उस स्थलमॅ यदि द्वितीय निमित्तकी उत्पत्ति न हो, तो पूर्वनिमित्तके वलसे इस कतुका प्रयोग अन्य रीतिसे हो सकता है, परन्तु प्रकृतमें तो ऐसा है नहीं अर्थात् द्वितीय निमित्तकी उत्पत्ति हो गई है, अतः उत्तरनिमित्तक प्रायथिवितज्ञान पूर्वका वाघ करेगा ही, इस प्रकार पूर्वनिमित्तसे अन्यथाकर्तव्यत्वकी क्रतुमें केवल संभावना होती है, वस्तुतः उसकी सत्ता निश्चित नहीं होती है कि अन्यथाकर्तव्य याग था, इसलिए शास्त्रदीपिकावचन भी दो ज्ञानोंमें प्रामण्यका प्रतिपादक नहीं है, यह भाव है। ज्योतिष्टोम यत्ञ सोमयागका ही प्रकार है 'ज्योतीषि स्तोमा यस्य सः=ज्योतिष्टोमः' इस

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्रावल्य-विचार] भापानुवादसहित २९९

[टिप्पणी ] प्रकार ज्योतिरुप स्तोम जिसमें हो उसे ज्योतिषोम कहना चाहिए, यह अर्थ लब्ध होता है। तरिरत, पन्चदश, सप्तदश एकविंश इस प्रकार चार स्तोम होते हैं इसमें 'त्रिवृत्पञ्चददः सप्रदश एकपिंश एतानि चाव ज्योतीपि य एतस्य स्तोमा:' (ते० ब्रा० १।५।११) यह वाक्य प्रमाण है। इस ज्योतिशेम यागमें दषिर्धानसे वहिप्पवमान देशके प्रति जाते हुए ऋत्विजोंका अन्वारम्भ सुना जाता है अर्यात् अधपर्यु प्रस्तोताके कच्छको पकसे और उद्गाता प्रस्तोताके कच्छको, प्रतिहर्ता उद्गातांक चछको, चक्षा प्रतिदताफे कच्छको, यजमान ब्रद्माके कच्छको और प्रशास्ता यजमानके कच्छको पच्चे। इस प्रकार एक दूसरेका कच्छ पकढ़ कर जाते हुए ऋत्विजोंमेंसे एकका विच्छेद होनेपर प्रायथित करना पढ़ता है-वह इस प्रकार है-प्रस्तोता अपच्छेद करे तो मझाको वर दे। यदि प्रतिदर्ता अपच्छेद करे तो सर्वस्त्र दे। यदि उद्गाता अपच्छेद करे, तो उस यक्को दक्षिणा बिना सगाप्त कर पुनः याग करे। उसमें वही दक्षिणा दे जो पूर्वमें दो जानेवाली थी। टक प्रायथिसोंके विपयमें एक यद भी विचार प्रस्तुत होता है कि यदि एक कालमें उद्गाता औौर प्रतिद्तांका अपच्छेद हो जाय तो क्या प्रायथ्ित करना चाहिए या नहीं? इस सन्देहमें पूर्यपक्षी गह कहता है कि ऐवी स्थितिमें प्रायथित नहीं करना चाहिए, क्योंकि एककालमें प्रतिहता औौर उद्गाताका जहींपर विच्छेद हुआ हो, चहाँपर सापेक्ष दोनेसे यह निश्चित नहीं होता हे कि विच्छेदका कौन प्रायथित किया जाय। इसलिए युगपत् अपच्छेदकालमें प्रायक्ित करनेकी कोई सावदयकता नहीं है, इस पूर्वपक्षके परिहारमें सिद्धानतीका कहना है-युगपत् अपच्छेदमें भी प्रायमिस होता ही है, क्योंकि चिभजन (अपच्छेद) करियाके प्रति जो कर्ता है वह सापेक्ष नहीं है, किन्तु निरपेक्ष ही है, अतः विच्छेदकियाके प्रति एक एकमें भी कर्तृता है, विशेष इसना दी है कि युगपत् अपच्छेदमें काल एक है। तात्पर्यार्थ यह है कि अपच्छेदशव्दका अर्थ है- विभाग। और वद्यपि विभाग उभयमें समवायसम्बन्धसे रहता है, तथापि जिसकी कियासे उत्न्न होगा तत्कसंक ही कहा जाता है। प्रकृतमें यद्यपि दोनों पुरुषोंकी (प्रतिहता और उद्गालाकी) त्रियाधे विभागकी उत्पत्ति हुई हे, अतः प्रत्येकमें निरपेक्ष कर्तृता न होनेके कारण इस अपच्छेदमें एककतृ कत्वका व्यवदार नहीं दोगा यह शका हो सकती है; तथापि अन्य स्थलमें अर्थात् एककी किरयाे जन्य विभागमें एक पुरुपकी ही वर्तृता भामती है, इससे दैवात् एक यालमें दोनों कर्ताओंका समापेद होनेपर भी प्रत्येकमें ही क्तृत्व निरपेक्ष है, अतः अवश्य प्रायकित फरना होगा। अच गदा युगपत् विच्छेदमें शछा दोती है कि क्या दोनों ही प्रायथ्वित करने चाहिएँ या विकल्पसे एक; एस संगयमें पूर्वपक्ष होता है कि दोनों प्रायशवित करने चाहिएँ, क्योंकि युगपत् अपच्छेदमें समुचय करना ही न्याय्य है, कारण कि प्रयोग एक है। अथवा अदक्षि- जात्व और सर्यस्वरदक्षिणात्वका विरोध है, तो प्रयोगभेदसे व्यवस्था अर्थात् विकल्प करना चाहिए-अपच्छदयुक प्रथम प्रयोगमें दक्षिणा न देनी चाहिए और उत्तर प्रयोगमें सर्वसु व- दक्षिणा देनी चादिए, इसपर सिद्धान्त यह दोता है कि उत्तर प्रयोगमें अपच्छेद नहीं है, इखलिए निमित्तके बिना नैमितिक प्रायश्चित हो नहीं सकता, इससे पूर्वके प्रयोगमें दोनों निमित्तोंके होनसे प्रायश्रित होते, परन्तु वे अन्योऽन्य विरुद्ध हैं, अतः विकल्प मानना उचित है, इसलिए

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३०० सिद्धान्तलेश संग्रह [ द्वितीय पंरिच्छेद

[टिप्पणी ] युगपद्पच्छेदमें प्रायश्चित्तका विकल्प है अर्थात् सर्वस्वदान करे या प्रथम प्रयोगको समाप्त करके पुनः याग करे। क्रमिक प्रायश्चित स्थलमें भी विचार किया गया है कि जहां पद्दले उद्राताका विच्छेद हुआ अनन्तर अतिहर्ताका, वहाँपर क्या पूर्व प्रायक्षित्त करना चाहिए या उत्तरनिमित्तकप्रायथ्ित करना चाहिए? ऐसा संशय होनेपर पूर्वपक्षी कहता है कि पूर्व ही करना चाहिए, क्योंकि वह असब्जात- विरोधी है अर्थात् श्रुति, लिङ्ग आदि स्थलमें असज्ञात विरोध होनेसे पूर्व-पूर्व ही चलवान् होते हैं और उत्तरकी प्रवृत्ति रुक जाती है, वैसे ही प्रकृतमें भी पूर्वनिमित्तकप्रायथितसे उत्तरनिमित्तकप्रायथ्षित्त रुक जायगा अर्थात वह प्रवृत्त ही न होगा, अतः पूर्व ही चलवान् है, इस प्रकार पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर सिद्धान्त किया जाता है कि ध्रुति, लिद्व आदिके दृष्टान्तसे पूर्वनिमित्तकप्नायश्चितको प्रवल नहीं मान सकते हैं, क्योंकि श्रुति, लिम्न आदि स्थलमें उत्तर पूर्वकी अपेक्षा रखते हैं, इसलिए पूर्वके साथ विरोध होनेपर उत्तरकी उत्पत्ति ही नहीं होगी, और प्रकृतमें दोनों ज्ञान परस्पर निरपेक्ष होकर दो वाक्योंसे उत्पन्न होते हैं, उत्पद्यमान उत्तर ज्ञान पूर्वका वाध करके ही उत्पन्न होता है। यद्यपि निरपेक्षत्वांश दोनोंमें समान है, तथापि पूर्वज्ञानकी उत्पत्ति- दशामें अविद्यमान उत्तरज्ञान वाघित नहीं होता है। उत्तरकालमें स्वयं वाधित पूर्वज्ञान उत्तरका वाधक कैसे होगा? अर्थात नहीं होगा। और दूसरा कोई कारण भी नहीं है जिससे कि उसका वाधक हो सके। इसलिए क्रमिक प्रायथित्तस्थलमें उत्तरकालीन अपच्छेदनिमितक प्राय- शित्तका ही अनुष्टान करना चाहिए। इस प्रकारके अपच्छेदाधिकरणका निम्नश्ठोंकोंसे विचार किया गया है- 'उद्गातुः प्रतिहर्तुथ सहापच्छेदनेऽस्ति न।

एकैकस्यैव विच्छेद-कर्तृत्वान्त विहन्यते। कालमान्नं तु तत्रैकप्रायश्चित्तमतो भवेत्।। समुचयो विकल्पो वा प्रायश्चितद्वयेऽग्रिमः । अदक्षिणत्वं पूर्वस्मिन् प्रयोगेऽन्यत्तु पश्चिमे।। प्रयोगे पश्चिमे नास्ति निमितं तेन तद्द्वयम्। प्राप्तमेकप्रयोगेऽतो विरुद्धत्वाद्विकल्प्यते ॥ अपच्छेदक्रमे पूर्वः ग्रवल: स्यादुतोत्तर:। असंजातविरोधेन पूर्वेणोत्तरवाधनम् ॥। निरपेक्षोत्तरज्ञानं जायते पूर्ववाधया। न वाधकान्तरं तस्य तेन प्रवलमुत्तरम् ।।' [अ० न्या० पृ० ३४८ शलो० २१-२६ आनन्दाश्रम ] इस प्रकारसे अपच्छेदन्यायके कुछ अंशका निरूपण किया गया है। इस न्यायसे भी श्रुति पर होनेसे वलवती ही है और पूर्वभावी प्रत्यक्ष निर्वल है। इसका अन्य ग्रन्थोंमें भी अर्थाद अद्वैतसिद्धि आदि ग्रन्थोंमें भी विचार करके पूर्वभावी प्रत्यक्षको निर्बल निश्चित करते हुए आगम ही वलवान् माना गया है।

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पत्यक्षसे श्रृतिका मावल्य-विचार] भापानुवादसहित ३०१

आस्तां मीमांसकमर्यादा। श्यामतदुत्तररक्तरूपन्यायेन क्रमिककर्तव्य- -ताद्व्योत्प्युपगमे को विरोध: ? उच्यते-तथा हि कि तत् कर्तव्यत्वम्, यत् परनैमित्तिककर्तव्य तोत्पच्या निवरतत। न तावत् पूर्वनमित्तिकस्य कृतिसाध्यत्वयोग्यत्वम्। तस्य पश्चादप्यनपायात्। नापि फलमुखं कृतिसाध्यत्वम्, तस्य पूर्वमप्य- जननाद्। नापि यदननुष्ठाने क्तोरवैक्कल्यं तत्वम्, अद्गतत्वं वा। अनतु- थोड़ी देरके लिग मीमांसकोंकी *परिपाटी अलग ही रहे, श्यामरूप और उसके उत्तरकालमे उत्पन्न होनेवाले रक्तरूपके द्ष्टान्तसे क्रमिक दो कर्तव्यताओं- की उत्पत्ति यदि मानी जाय, तो विरोध क्या है? अर्थात् कुछ नहीं है। इसे कहते हैं-वह कौनसी कर्तव्यता है जो उत्तरकालीन नैमित्तिक कर्तव्यताकी उत्पततिसे निवृत्त होगी : यदि कहो कि पूर्वकालीन निमिचसे जाय- मान प्रायधितम कृतिसाध्यताकी योग्यतारूप है, तो यह युक्त नहीं है, कारण कि उस कर्तव्यत्वकी अनुवृत्ति पीछे भी होती है।। और यदि कहो कि फलमुख कृतिसाध्यत्व कार्यत्व है, तो यह भी असऊ्त है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति पहले भी नहीं है। यदि कहो कि जिसके x अनुष्ान न करनेसे

*तास्पर्य यह ऐ कि घटमें पहले श्यामरप रहता है, उत्तर क्षणमें पाकसे श्यमरूपका नादा और रचरूपकी उत्पत्ति जैसे होती है, वेसे ही उत्तरनैमित्तिक कर्तव्यकी उत्पत्तिसे विनट होनेवाला यदि पूर्वनिमित्तक कर्तव्यत्व माना जाय, तो उस कर्तव्यत्वका निरूपण प्रंथम फरना चाटिग और वह अशवय है, इसी बातको मूलमें 'उच्यते' इत्यादिसे कदते हैं। ह अर्थात् उत्तरालीन प्रायमितके कर्तव्यत्वयालमें भी उचतलक्षणलक्षित पूर्वनिमित्तक छसव्यत्वकी अनुवृत्ति होती है, अतः उत्तरकालीन कर्तव्यतासे पूर्वकालीन कर्तव्यताका चिनाश दो ही नहीं सकता, दसलिए 'बेर' के श्याम और रकरूपके समान उन कर्तव्यताओंमें क्रमिकत्वका स्वीकार नहीं फर सकते है, यह गाव है। पलमुसकतिसाध्यतवका अर्थ है-फलोन्मुसकृतिसाध्यत्व, फलकार्य उससे उन्मुस-युक्त अर्थात् वर्तव्यत्व उसे कहते हैं जो कृतिसाध्य होकर उत्पत्तिसे युक दो, प्रकृतमें यह नहीं है, क्योंकि उस फर्तव्यत्वकी उत्पत्ति पह्दले भी नहीं हुई है, जब उसकी उत्पत्ति हो, तब उसमें फलमुमकृतिसाध्यत्व रहे, परन्तु घेखा है नहीं। इस अवस्थामें पूर्वनैमित्तिक ज्ञानमें भ्रगत्व दी भीमांसकोंके अनुसार सिद्ध होता है, श्याम और रकरूपके समान प्रमात्व सिद्ध नदी होता है। इसलिए कर्तव्यतादय प्रमाण सिद्द नहीं है, यह भाव है। X जिसके अनुष्ठानाभावये कतुमें वु्छ न्यूनता हो अर्थात् कतुके चैकल्यमें ्रयोजक अननुष्टानके पतियोगीभूत अनुष्ठानका जो आश्य हो, वह कर्तव्य है। जहाँ प्रथम उद्गाताफा

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३०२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

क्रतुमें वैकल्य हो जाय, वह कर्तव्यत्व है, अथवा क्रतुके प्रति अङ्गता कर्तव्यता

अपच्छेद हुआ हो, पश्चात प्रतिहर्ताका अपच्छेद हुआ हो, वहाँ उद्गाताके प्रायश्चित्तका अननुषान कतुके वैकल्यका प्रयोजक है अथवा वह प्रायथ्चित कतुका अप्र है, इस प्रकार कहनेवालेको यह कहना चाहिए कि पूर्व प्रायश्चित्तके अननुष्ठानमें वैकल्यप्रयोजकतव क्या है, क्या चैकल्योत्मादकता है अथवा वैकल्यव्यापकता है अथवा वैकल्यव्याप्यता है? आदय पक्ष युक नहीं है, क्योंकि अभावरूप अननुष्टान किसीका उत्पादक नहीं हो सकता है और कतुवैकल्यके फतुके उपकारके प्रागभावरूप होनेसे वह उत्पाद्य भी नहीं हो सकता है और द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिस यक्षमें केवल उद्गाताका अपच्छेद हुआ है उस यक्षमें तन्निमित्तके प्रायक्चित भी किया है और किसी अन्य कारणसे कतुका चैकल्य भी हुआ है, उस यागमें उद्गाताके प्रायक्षितका अननुप्टान नहीं होनेसे व्यभिचार हो जायगा, अतः परिशेषत् तृतीय पक्ष ही अवशिष्ट रहता है अर्थात् कतुवैकल्यव्याप्यता ही कतुवैकल्यप्रयोजकत्व है और प्रायश्चित्तको कत्वङ्न माननेपर उसमें दो प्रकारसे अग्वता मान सकते हैं एक तो फलोप- कारित्वरूप और दूसरी सन्निपत्यो कारित्वरूप। फलोपकारित्वरूप अर्थात् परमापूर्वरूप (सुख्य अपूर्व) के प्रति अदष्ट द्वारा जिसकी कारणता हो, जैसे प्रयाज आदि अट्द्वारा परमापूर्वमें उपकारक होते हैं। इसी प्रकार सन्निपत्योपकारकका अर्थ है यागके स्वरूपका उपकारक जैसे द्रव्य और देवता, ये दोनों यागके स्वरूपमें ही उपकारक हैं। यदि कतुवैक्ल्य प्रयोजकत्व और कत्वऋञत्व कतुवैकल्यव्याप्यत्व और फलोपकारित्व या सन्निपत्योपकारिकत्वरूप क्रमशः माना जाय तो क्या हानि है? इसपर यह प्रश्न हो सकता है कि क्रमशः उत्पन्न हुए विरुद्ध प्रायश्चित्तोंसे युक्त कतुमें पूर्वप्रायश्चितके अननुष्ठानमें रहनेवाले कतुवैकल्यव्याप्यत्वरूप कतु- प्रयोजकत्व और उसी पूर्वप्रायक्षितमें रहनेवाला अज्ञत्व द्वितीय निमिसकी उत्पत्तिके वाद अनुवर्तमान होता है, या नहीं ? यदि अनुवृत्ति मानी जाय, तो कतुवकत्यप्रयोजक अननुष्टानके प्रतियोगी अनुष्ठानशालित्वरूप पूर्वप्रायश्चित्तगतकर्तव्यत्वका और उस प्रायथितगत अम्तत्वत्वका उत्तरनैमित्तिक प्रायश्चित्तकर्तव्यतासे जो विनाश माना गया है, उसका भक् प्रसक्त होगा, यदि द्वितीय कल्प माने, तो यही अर्थ पर्य्यवसन होगा कि पूर्व प्रायश्चित्तके अननुष्ठानमें कतुवेकल्य व्याप्यत्व द्वितीय निमित्तकी उत्पत्तिके पूर्वमें ही होगा, उसकी उत्पत्तिके वाद नहीं होगा, इसी प्रकार पूर्वप्रायश्चित्तगत अज्ञत्वरूप कर्तव्यता द्वितीय निमित्तके उत्पन्न होनेके पूर्वमे ही पूर्वप्राय- शित्तमें है, अनन्तर नहीं है। इस अवस्थामें व्याप्यत्व और कारणत्वकी अपने आधरयमें सत्ता कादाचित्की (कुछ समयके लिए) ही प्रसकत होगी, अतः कादाचित्कत्व प्रसङ्गके निरासके लिए अर्थात् अज्गत्व और प्रयोजकत्वके यावदाश्रयभावित्वरूप स्वाभाविकत्वके निर्वाहके लिए यही कहना होगा-अनन्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले विरुद्ध अपच्छेदके अभावसे युक्त कतुका पूर्वापच्छेद- निमित्तक प्रायश्चित्त अङ्ग है अर्थात् पूर्वके अपच्छेदसे किया जानेवाला प्रायश्चित्त वहींपर कतुका अङ्ग होता है जहाँपर उत्तरकालीन अपच्छेद न हुआ हो, इसी प्रकार पशचात् भावी अपच्छेदसे विधुर ऋतुमें पूर्वकालिक अपच्छेदनिमित्तिक प्रायश्चित्तका अननुध्ठान उस कतुके वैकल्यका सम्पादक है। इस परिस्थितिमें जव उत्तर अपच्छेद होगा, तब उस अपच्छेदसे युक्त कतुमे पूर्वापच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित्तमें अजत्व और उस्ी पूर्वनिमित्तक प्रायश्चित्तके अननुधनमें

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प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्रावल्य-विचार] भापानुवादस हित ३०३

प्ठाने ऋतुवैकल्यप्रयोजकत्वस्य नियमविशेपरूपत्वेन कर्माङ्गत्वस्य फलोप- कारितया सन्निपातितया वा कारणत्वविशेपरूपत्वेन च तयोः कादाचित्क- त्वायोगेन स्वाभाविकत्वनिर्वाहाय पश्चाद्भाविविरुद्धापच्छेदाभाववतः क्रतोः पूर्वापच्छेदनैमित्तिकमङ्गम्। तत्रैव तदननुष्ठानं क्रतुघैक्कल्यप्रयोजकमिति विशेपणीयतया पाथ्यात्यापच्छेदान्तरवति कतौ पूर्वापच्छेदनैमित्तिके क्रत्व-

है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अनुष्ठानके न करनेमें-अनुष्ठानके अभावमें- जो कतुके वैंकल्यके प्रति प्रयोजकत्व (हेतुत्व) हे, वह नियमविशेपरूप है अर्थात् कतुवैकल्यव्याप्यत्वरूप * है, और कर्मके प्रति जो अद्गत्व है, वह फलोपकारितारूपसे अथवा + सन्निपातितारूपसे कारणत्वविशोपरूप है, इसलिए उनमें अर्थात् कतुवैकल्यप्रयोजकत्व और कर्माङ्ृत्वम कादाचित्कत्वके न होनेसे स्वाभाविकत्व्रके निर्वाह करनेके लिए उत्तरकालमं होनेवाले विरुद्ध अप- च्छेदके अभावसे युक्त क्रतुका पूर्वकालीन निमित्तसे जायमान ग्रायश्चित अङ्ग है, और उसीमें उसका अननुष्ठान करतुकी विकलतामें कारण है, इस प्रकार विशेषण देना होगा, इससे पश्चाद्भावी अपच्छेदसे युक्त कतुमें पूर्वकालीन

अनुधेकल्पकी प्रयोजकताके पाश्चात्य अपच्छेदोत्पत्तिके पूर्वमें न होनेसे भ्रान्ति ही होगी, अतः

वैकल्पप्रयोजकाननुष्टानप्रतियोग्यनुष्टानश्ञालित्वरूप कतव्यत्व अथवा तादृय अव्ञत्व (पथ्ाद्भा- व्यपच्छदाभ ववत्कतुं प्रति फलोपकारित्वेन सत्िपत्योपकारित्वेन कारणत्वरूप अज्ञतव) को भी कर्तव्यत्व नहीं मान सकते है, यद भाव दै। •कनुधेकल्यव्याप्यत्वका अर्थ है-जहाँ-जदीं अनुष्ठानका अभाव हो वहाँ चहाँ ऋतुमें वेकस्य होना चाहिए, व्याप्यके अस्तित्वमें व्यापकका अस्तित्व अवश्य रहता है, जैसे धूमके रहनेपर वहफी सत्ता पर्वतमें अवश्य रहती है, इसलिए प्रायशरित्तके अननुष्ठानमें क्रतुचैकल्य- व्याप्यता अवश्य रहेगी। +अपच्छेदसंयुद् प्रायधित्तमें कनुकी अग्ता मानी जाय, तो वह दो प्रकारसे घटेगी सर्धात् साक्षात् या परम्परया। कनुके स्व्पमें जो कारण होगा वह फलोपकारी अज् होगा और कनुजन्य परमापू्षका अटष्टद्वारा सम्पादक जो कारण होगा वह सन्निपाती अत्ष होगा, इसलिए मूलमें 'फलोपकारितया' और 'सशिपातितया' इत्यादि कहा गया है, यह भाव है। व्याप्यत्व और अप्वाका कादानिकत्व प्रसश किस प्रकार है, उसका निरूपण पूर्वमें किया जा चुका है। इसके परिारके लिए ऋतुबेकल्य प्रयोजकका और क्रत्वप्रका क्रमशः उतरकालिक विरुद्ध अपच्छेदसे रहित कतुका ही पूर्व प्रायश्रित अप्त है, ऐसा अर्थ करना होगा, इससे उक्क व्याप्यत्व और अग्त्वका स्वाभाविकत्व सिद्ध होगा, अन्यथा नहीं होता है, यह भाव है।

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३०४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

इत्वस्य, तदननुष्ठाने क्रतुवैकल्यप्रयोजकत्वस्य वा पाश्चात्यापच्छेदोत्पत्ते: पूर्वमसम्भवात्। नहि वस्तु किश्च्िद्वस्त्वन्तंर ग्रति कश्चित्कालं व्याप्यं पश्चान्नेति वा, कश्चित्कालं कारणं पश्चान्नेति वा, कचिद् दृष्टम्, युक्तं वा। नापि कर्तव्यत्वं नाम धर्मान्तरसेवाऽडगमापाययोग्यं कल्प्यम्, मानाभावात्। अपच्छेदनिमित्तक प्रायश्चितकी अङ्गताका और उसके अनुष्ठान न करनेपर विकलताके हेतुत्वका परकालीन अपच्छेदके पूर्वकालमें भी असम्भव ही है। क्योंकि ऐसा कहींपर नहीं देखा गया है और युक्त भी नहीं है कि * कोई वस्तु किसी वस्तुके प्रति कुछ कालतक व्याप्य होती है, और पीछे व्याप्य नहीं होती है तथा किसी भी वस्तुके प्रति कोई वस्तु अल्प समयतक कारण रहती हो और पीछे कारण नहीं रहती हो। और + आगम और विनाशके योग्य कोई धर्मान्तर भी कर्तव्यत्व नहीं हो सकता है, क्योंकि उसमें कोई प्रमाण नहीं है। विरुद्ध जो अपच्छेदशास्त्र है, उनकी 'पदे जुहोति' और 'आवहनीये जुहोति' इन दो शास्त्रोंके समान व्यवस्था हो सकती है, इसलिए क्रमिक दो कर्तव्यताओंके उपपादक वचन अप्रमाण हैं।

  • व्याप्यत्व और अज्गत्व (कारणत्व) कादाचित्क नहीं होते हैं, स्वाभाविक ही होते हैं, उसमें प्रसिद्ध दशान्त देते हैं कि वहिके प्रति धूम व्याप्य है, उसमें व्याप्यता कुछ समयतक रहती है और कुछ समयतक नहीं रहती है, यह देखा नहीं गया है और किसी युक्तिसे सिद्ध भी नहीं है। यदि कदाचित् जवरदस्ती मान लिया जाय कि वहिकी धूममें व्याप्यता कुछकाल तक ही रहती है, तो आपत्ति यह होगी कि तो 'वहिमान् धूमात्' (धूम होनेसे पर्वत वहिमान् है) इस स्थलको सोपाधिकता प्रसक्त होगी, क्योंकि व्याप्वत्वा- भाचमें उपाधि प्रयोजक है, इसीलिए 'धूमवान् वहेः' इस स्थलमे वहविहेतु सोपाधिक होता है। इसी प्रकार कारणमें कारणत्व कादाचित्क होगा, तो धूमादिकार्यके लिए चहिरूप कारणके ग्रहणमें देवदृत्त आदिकी जो प्रवृत्ति होती है, उसमें अव निष्कम्प प्रवृत्ति नहीं होगी, अतः व्याप्यत्व और अज्गत्वको (कारणत्वको) कदाचित्क नहीं मान सकते हैं, यह भाव है। * यदि कर्तव्यत्वका यह अर्थ किया जाय कि जो धर्म आगम (उत्पत्ति) और अपाय (विनाश) योग्य हो, अर्थात् जो प्रथम निमित्तके जननके अनन्तर ही आगमयोग्य हो और द्वितीय निमित्तके उत्पन्न होनेके बाद ही विनाशके योग्य कोई अन्य धर्मसे-ठक्तलक्षणलक्षित धर्मों भिन्न-कर्तव्यत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे विलक्षण धर्ममें कोई प्रमाण ही नहीं है। अतः जैसे-'आवहनीये जुहोति' इस शास्त्र की पदहोमातिरिक स्थलमें विषयता है, वैसे ही करमिक विरुद्ध प्रायश्चिततकी व्यवस्था भी हो सकती है, अतः क्रमिक कर्तव्यद्वयकी उत्पत्ति मानना निरालम्व है, यह भाव है।.

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प्त्यक्षसे श्रुतिका प्रावल्य-विचार ] भापानुवादसहित ३०५

विरुद्धापच्छेदशास्त्रयोः पदाहयनीयशास्त्रवद् व्यवस्थोपपत्तेः । तस्मान्निरा- लम्वनं क्रमिककर्तव्यताद्वयोत्पत्तिवचः । ननूपक्रमवत् पूर्व प्रत्यक्षं चलवच्छतेः ।

यदि यह शका हो कि उपकमके समान प्रत्यक्ष पूर्वभावी है, अतः श्रुतिसे प्रत्यक्ष बलवान् है, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि परस्पर एकवाक्यता स्थलमें ही उपक्रम- न्यायसे पूर्व चलवान् होता है, यहाँ तो अपच्छेदन्यायसे प्रत्यक्षसे पर श्रुति ही वलवती दै॥ १२ ॥ ननु चोपक्रमाधिकरणन्यायेनाऽसज्जात विरोधित्वात् प्रत्यक्षमेवाऽडगमाद् चलीयः कि न स्यात्? उच्यते-यत्रैकवाक्यता प्रतीयते, तत्रैकस्मिन्नेवार्थे पर्यवसानेन भाव्यम्, अर्थमेदे प्रतीतैकवाक्यताभङ्गप्रसङ्गात्। अतस्तत्र ग्रथममसञ्जातग्रतिपक्षेण अय शक्का होती है कि उपक्रमाधिकरणन्यायसे असज्जातविरोधी होनेके कारण प्रत्यक्ष ही आगमसे वलवान् क्यों न होगा? अर्थात् आगमकी अपेक्षा प्रत्यक्ष ही वलचान् है। [तात्पर्य यह है कि जसे उपक्रमवाक्यके अर्थज्ञानके सगयम उपसंहारवाक्यार्थका परिज्ञान न होनेसे किसी विरोधीका परिस्फुरण नहीं होता है, अतः उपक्रम असज्जातविरोधी है, वैसे ही द्वैतमें सत्यत्वके प्रत्यक्ष- समयम विरोधी अर्थ, अर्थात् द्वेतमिथ्यात्वग्राहक श्रुतिका अर्थ, अनुभूत नहीं होता है, अतः विरोधकी परिस्कृर्ति न होनेसे प्रत्यक्ष असञ्जातविरोधी है, इस- लिए वह चलवान् हो सकता है।] इस यक्षेपके समाधानंगं कहते हैं कि जहाँपर एकवाक्यता प्रतीत होती है, चहां एक ही अर्थमें वाक्यका पर्यवसान होता है, यदि ऐसे स्थलमं अर्थभेद माना जाय, तो प्रतीत मकवाक्यताका भम होगा [ अर्थात् भिन्न-भिन्न अर्थोंके रहते पकवाक्यताका ज्ञान नहीं हो सकता है, अतः एकवाक्यतामें-उपक्रम

उपकमाधिकरणन्यायरी उपनम्म ही चलवान् होता है, क्योंकि उपक्रम-आरम्भ जय होता है, तब अन्य विरोधी नहीं होता, अतः इसी उपकमन्यायये प्रत्यक्षके असातविरोधी- (न सजातो विरोधी यस्य सः, अर्थात् जिसका प्रतिदन्द्वी उत्पन्न न हुआ हो) दोनेसे शब्दफी सपेक्षा वदी बलवान् दोगा, प्रत्गक्ष जय प्रशृत्त होगा, तव मिथ्यात्वबोधक क्षुतियोंकी प्रृत्ति न दोनेके फारण पद अववातविरोधी है ही। ३९

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३०६ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद.

'प्रजापतिर्वरुणायाश्वमनयद्' इत्याद्युपक्रमेण परकृतिसरूपार्थवादेन दातु- रिष्टौ बुद्धिमधिरोपितायां तद्विरुद्धार्थ 'यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णीयात्तावतो वारुणान् चतुष्कपालान्निर्वपेद्' इत्युपसंहारगतं पदजातसुपजातप्रतिपक्ष- ·त्वाद्यथाश्जतार्थसमर्पणेन तदेकवाक्यतामप्रतिपद्यमानसेकवाक्यतानिर्वाहाय णिजर्थमन्तर्भाव्य तदानुगुण्येनैवाऽऽत्मान लभते इति उपक्रमस्य प्रावल्यम्। यत्र तु परस्परमेकवाक्यता न प्तीयते, तत्र पूर्ववृत्तमविगणय्य लव्घा- त्मकं विरुद्धार्थकं वाक्यं स्वार्थ बोधयत्येवेति न तत्र पूर्ववृत्तस्य प्वल्यम्। अत एव षोडशिग्रहणवाक्यं पूर्ववृत्तमविगणय्य तदग्रहणवाक्यस्यापि और उपसंहार आदिकी एकवाक्यतामें-एक ही अर्थका प्रतिभास होना चाहिए, यह भाव है। इससे पूर्वकालमें जिसका विरोधी उत्पन्न न हुआ हो, ऐसे परकृति के सदश 'प्रजापतिर्व०' (प्रजापतिने वरुणको अश्व दिया) इत्यादि अर्थवादके उपक्रमसे दाताकी इष्टिके बुद्धिमें आरूढ़ होनेपर 'यावतोऽश्वान्०' (जितने अश्वोंका प्रतिग्रह करावे + उतने वारुणचतुष्कपालोंका निर्वाप करे) इस प्रकारके उपक्रमसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाला उपसंहारस्थ वाक्य संजात- विरोधी है, अतः आपाततः प्रतीयमान अर्थका वोधन करनेपर उपक्रमवाक्यके साथ एकवाक्यता प्राप्त नहीं कर सकता है, अतः उपक्रमवाक्यके साथ एक- वाक्यता की उपपत्ति करनेके लिए णिच्के अर्थका अन्तर्भाव करके ही उपक्रमके अनुकूल एकवाक्यता होती है, अतः उपक्रमवाक्य बलवान् है। और जहांपर उपक्रम और उपसंहारकी एकवाक्यताकी प्रतीति किसी भी रीतिसे नहीं होती है, वहांपर पूर्ववृत्तान्तपर ध्यान न दे करके अपनी सत्तासे विरुद्धार्थक वाक्य अपने स्वार्थका बोधन करता ही है, अतः उस स्थलमें पूर्ववृत्त- पूर्ववाक्य-प्रबल नहीं होता है। इसीलिए पूर्ववृत्त षोडशिग्रहणवाक्यकी अर्थात् 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्गाति'- * 'परकृतिः-परस्य-प्रजापतेः कृतिः-अनुष्ठानम्' इस व्युत्पत्तिसे यद्यपि प्रजापतिका अनुष्ठान परकृतिशब्दका अर्थ प्रतीत होता है, तथापि यहाँपर उस अनुष्ठानका प्रतिपादक वाक्य परकृति-शब्दका अर्थ है। + प्रतिगृद्नीयात् (प्रतिग्रह्द करे) इस शब्दमें णिजर्थका अन्तर्भाव करके 'प्रतिग्राहयेत' (प्रतिग्रह करावे) ऐसा अर्थ आगे ग्रन्थकार ही करेंगे। इस वाक्यसे-जितने अश्व दे, वरुणदेवताके उद्देश्यसे उतने ही चतुष्कपालोंका निर्वाप करे। कपालशब्दका अर्थ है-पुरोडाश बनानेके लिए वनाया हुआ मिट्टीका पात्रविशेष।

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पत्यक्षसे श्रुतिका प्रातल्य-विचारं] भापांनुवादसंहित ३०७

तत्रैघ् विकल्पानुष्ठानमिप्यते। एवं चाउद्वैतागमस्य अत्यक्षेण कवाक्यत्वशङ्काऽभावात् पूर्ववृत्तमपि तद्- विगणय्य स्वार्थनोधकत्वमप्रतिहतम् । तदर्धवोधजनने च- 'पूर्व परमजातत्वादवाधित्वैव जायते। परस्यानन्यथोत्पादान्नाद्यायाधेन सम्भवः ॥।' इत्यपच्छेदन्यायस्पैव प्रवृत्तिः, नोपक्रमन्यायस्य। अत एव लोकेऽपि प्रथमवृत्तं शुक्तिरूप्यप्रत्यक्षमाप्तोपदेशेन वाध्यते इति ॥२॥ इस वाक्यकी 'नातिरात्रे पोडशिनं गृहाति' यह वाक्य भी अपेक्षा न करके ही स्वार्थबोधक है, ऐसा स्वीकार किया गया है, परन्तु विशेप इतना है कि पोडशीके ग्हण और अग्रहणका अन्य विषय नहीं है, अतः जगत्या यर्थात् समुचचयका भी असम्भव होनेसे अतिरात्रमं ही विकल्पसे अनुषठान माना जाता है। एवं अर्थात् उपक्रमन्यायके प्रतीतेक्यवाक्यविपयक होनेसे अद्वैत- बोधिक शासकी प्रत्यक्षके साथ एकवाक्यताकी शक्का भी नहीं हो सकती है, इसीलिए प्रत्यक्ष यर्द्यपि पूर्ववृत्त है, तथापि उसका ख्याल न करके आगम अपने सर्थका घोधन करता ही है। आगम अपने अर्थका बोध करता है, इसलिए- 'पूर्व परमजातत्वात०' (पूर्व यर्थात् प्रथम अपच्छेदनिमित्तक प्रायश्चित कर्तव्यताज्ान परका अर्थात् दूसरे कालमें होनेवाले नमित्तिक कर्तव्यज्ञानकी उत्पत्ति न होनेसे उसका बाघ न करके ही प्रवृत्त होता है और परशास्त्रकी पूर्वके वाधके बिना उत्पत्ति नहीं हो सफती है, अतः वह पूर्वका वाध करके ही उत्पन्न होता है)। इसीसे व्यवदारमें भी प्रथमकालमं प्रवृत्त शुक्ति-रजतका प्रत्यक्ष उत्तरकालमं मवृच आत्ोपदेशसे बाधित होता है ॥।२॥ पोउशषिनामक स्तोत्रके याद जहाँ अतिरात् सामोका गान किया जाता है, उस पयोतिषोमच नाम अतिरात है।

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३०८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

ननूपजीव्यप्रत्यक्षविरुद्वेडर्थे श्रुतेः कथम्। मानत्वं युक्तमिति चेद्, यदि शङ्का हो कि उपजीव्यभूत प्रत्यक्षसे विरु्द् अर्थका प्रतिपादन करनेवाले आगममें प्रामाण्य कैसे होगा, क्योंकि अवाधितार्थवोधकत्व ही प्रामाण्य है, ननु तथाऽप्युपजीव्यत्वेन अत्यक्षस्यैव प्रावल्यं दुर्वारम्। अपच्छेद- शास्त्रयोर्हि न पूर्व परस्योपजीव्यमिति युक्त: परेण पूर्वस्य वाघः। इह तु वर्णपदादिस्वरूपग्राहकतया मिथ्यात्ववोधकागमं प्रति प्रत्यक्षस्योपजीव्य- त्वाद् आगमस्यैव तद्विरुद्धमिध्यात्वावोधकत्वरूपो वाधो युज्यते। न च मिथ्यात्वथ्ुत्या वर्णपदादिसत्यत्वांशोपमर्देऽपि उपजीव्यस्वरूपांशोपमर्दा- भावान्नोपजीव्यविरोध इति वाच्यम्, 'नेह नानास्ति किश्चन' इत्यादि- भ्रतिभि: स्वरूपेणैच प्रपश्चाभाववोधनाद्। अव पुनः शङ्का होती है कि* यद्यपि आगमके समान प्रत्यक्ष स्वतः वलवान् नहीं है, तथापि आगमका उपजीव्य होनेसे प्रत्यक्ष ही वलवान् है, अपच्छेदशास्त्रोंमें पूर्व परका उपजीव्य (कारण) नहीं है, अतः उनमें पर पूर्वका वाघ अवश्य करता है, और प्रकृतमें अर्थात् आगम और प्रत्यक्ष- स्थलम मिथ्यात्ववोधक 'नेह नानास्ति किश्चन' इत्यादि आगम (शास्त्र) का- वर्ण, पद आदि स्वरूपका ग्रहक होनेसे-प्रत्यक्ष उपजीव्य है, अतः प्रत्यक्षविरुद्ध मिथ्यात्वरूप अर्थका वोधक होनेसे आगमका ही वाघ युक्त है। इस विषयमें यदि शक्का हो कि मिध्यात्व्रवोधक श्रुतिसे वर्ण, पद आदिमे सत्यत्व अंशका उपमर्द (ाघ) होनेपर भी उपजीव्यस्वरूपांशका वाध न होनेसे उपजीव्यभूत प्रत्यक्षसे आगमका विरोध नहीं है? तो यह भी शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतियोंसे स्वरूपका ही निषेध होता है, [अतः उपजीव्यके साथ सर्वथा विरोध होनेसे प्रत्यक्ष ही वलवान् है आगम वलवान् नहीं है, यह भाव है ]।

  • यद्यपि इस शङ्डाका 'न चमुपजीव्यविरोधः' इत्यादिस उत्यान और परिदार किया गवा है, तथापि उस परिहारका फिर आक्षेप करनेके लिए इस अन्धका उद्ेख किया गया है, 'नेह नानास्ति' इत्यादि भ्रुतिसे प्रपश्वका स्वरूप ही निपिद्ध होता है, अतः उपजीव्य स्वरूपका उपमर्द होनेसे उपजीव्य विरोधका निरास नहीं है, इसलिए अनधिकगतावाधितविपयकत्व न होनेके कारण श्रप्रामाण्यापत्ति दुर्वार है, यह भाव है।

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उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अवाधितत्व-विचार] भापानुवादसहित ३०९

अन्र केचित् प्रचक्षते । १३ ॥ न पदज्ञानमानत्वनियता शा्दमानता। 4- चृपभादिपदे भ्रान्त्या न्यूनाधिक्येऽपि दर्शनात् ॥१४ ॥ इस यकाके परिहारमें कुछ लोग कहते हैं कि प्रमात्मक शान्दवोध प्रमात्मक पदशानसे नियत नहीं है, क्योंकि वृपभ आदि पदोंमें भ्रमात्मक ज्ञानसे भी शाव्दवोध देखा जाता है, अतः उक्त दोप नहीं है ॥ १२ ॥ १४ ॥ अत्र केचिदाहु :- 'वृपमानय' इत्यादिवाक्यं श्रवणदोपाद् 'वृपभ- मानय' इत्यादिरूपेण शृण्वतोऽपि शाव्दप्रमितिदर्शनेन शाव्दग्रमितौ वर्ण- पदादिप्रत्यक्षं प्रमाभ्रमसाधारणमेवापेक्षितमित्यद्वैवागमेन वर्णपदादिप्रत्यक्ष- मात्रमुपजीव्यम्, न तत्प्रमा। तथा च वर्णपदादिस्वरूपोपमर्देऽपि नोप- जीव्यविरोध इति। असद्विलक्षणं रूपमुपजीव्यं न तात्विकम्।

कुछ लोग कहते हैं कि पदका असद्विलक्षणस्वरूप ही शाव्दप्रमाके प्रति उपजीव्य है,ताश्यिक स्वरूप उपजीव्य नहीं है, असदविलक्षणत्वरूप को अनिर्वचनीय प्रपञ्में माननेसे भी विरोध नहीं है, अतः उक्त दोपकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है।। १५ ॥

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग फहते हैं-'वृपमानय' (वैलको लाओ) यह शब्द किसीसे कोई कहता है परन्तु कानके दोपसे वह 'वृषभमानय' ऐसा सुनता हे फिर भी उसको 'बैल लायो' इस प्रकार यथार्थ शा्द ज्ञान होता है, इससे शाव्दज्ञानमें ग्रमपमासाधारण वर्ण, पद आदिका प्रत्यक्षमात्र उपजीव्य है, उसका प्रमात्मक प्रत्यक्ष उपजीव्य-कारण नहीं है, इसलिए आगम उसके स्वरूपांशका उपमर्द भले करे, तो भी उपजीव्यके साथ विरोध नहीं होगा। [तातर्यार्थ यह है कि प्रपश्वके सत्यत्व पक्षमें भी 'वृपमानय' इस दष्टान्तके अनुरोधसे अ्रमप्रमासाधारण शब्दपत्यक्ष, अर्थात् शव्दका प्रत्यक्ष भ्रमात्मक हो चाहे प्रमात्मक हो, शाव्द्बोधका उपजीव्य है, ऐसा कहना होगा, हमारे (वेदा- न्तियोंके) मत्मे निपेधश्रुतिके वलसे भ्रमरूप प्रत्यक्ष ही सर्वत्र शाब्दवोधमें और अन्य व्यवहारोमें कारण है, यह विशेप है, अतः शाब्दबोधके प्रति उपजीव्यविरोध नहीं है, क्योंकि शब्दस्वरूप उपजीव्य नहीं है ]।

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३१० सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

अन्ये त्वाहु :- शाब्दप्रमितौ वर्णपदादिस्वरूपसिद्धनपेक्षायामप्य- योग्यशव्दात् अ्रमित्यनुदयाद्योग्यतास्वरूपसिद््यपेक्षाऽस्ति। तदपेक्षायामपि नोपजीव्यविरोधः । 'नेह नानास्ति' इति श्रुत्या निपेधेऽपि यावद्रह्न-

अन्यथा प्रत्यक्षादीनां व्यावहारिकप्रमाणानां निरविषयत्वप्रसङ्गात्! न च स्वरूपेण निपेधेऽपि कथ प्रपश्चस्वरूपस्यात्मलाभः । निपेधस्य प्रतियोग्यप्रतिक्षेपरूपत्वे व्याघातादिति वाच्यम्, शुक्तो 'इदं रजतम्' 'नेदं रजतम्' इति प्रतीतिद्वयानुरोधेनाधिष्ठानगताध्यस्ताभावस्य वाध-

कुछ लोग उक्त उपजीव्यविरोधका अन्य प्रकारसे समाधान करते हैं-यद्यपि शाव्दवोधमें वर्ण, पद आदिके स्वरूपकी सिद्धि अपेक्षित नहीं है, तथापि अयोग्य शब्दसे शाव्दज्ञानकी उत्पत्ति न होनेके कारण योग्यता- स्वरूपकी सिद्धि अपेक्षित है। उस योग्यताकी अपेक्षा होनेपर भी उपजीन्यके साथ विरोध नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति किश्चन' इत्यादि श्रुतिसे व्रह्मातिरिक्त समस्त प्रपश्चका निषेध होनेपर भी व्रह्मज्ञानपर्यन्त अनुवर्तमान तथा अर्थक्रियामॅ समर्थ असत् पदार्थोसे विलक्षण प्रपश्नके स्वरूपका अङ्गीकार किया जाता है। यदि असत् (शशशृद्ग) पदार्थसे विलक्षण प्रपञ्चस्वरूप न माना जाय, तो जितने व्यावहारिक प्रमाण हैं, वे सब निर्विपयक हो जायेंगे। शङ्का होती है कि स्वरूपतः प्रपञ्चके निपिद्ध होनेपर प्रपश्नस्वरूपके अस्तित्वका लाभ कैसे होगा? क्योंकि यदि निपेधको प्रतियोगीका अभावरूप न माना जाय, तो व्याघात होगा। परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिमें 'इदं रजतम्' नेदं रजतम्' (यह रजत है और यह रजत नहीं है) इस प्रकार दो प्रतीतियोंके अनुरोधसे अधिष्ठानमें अध्यस्तका अभाव-वाधपर्यन्त अनुवृत्त होने-

  • इस मतका अवलम्बन करनेवालोंका कहना है कि पूर्व मतमें केवल शब्दका प्रत्यक्षज्ञान., शान्दवोधमें प्रयोजक है, वह चाहे प्रमात्मक हो चाहे भ्रमात्मक हो, परन्तु वर्ण, पद आदिका स्वरूप कारण नहीं है, लेकिन यह उनका कहना युक नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष निविंषयक नहीं होता है; अतः वर्णादिस्वरूपका अवश्य शान्दवोधके कारणरूपसे अज्गीकार करना चाहिए। इस परिस्थितिमें पूर्वमतमें भी उपजीव्य विरोध अवश्य है, अतः पूर्वोक्त समाधान युक नहीं है, अतः मतान्तर कहते हैं, यह भाव है।

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उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अवाधितत्व-विचार] भापानुवादसहित ३११

पर्यन्तानुवृत्तिकास द्विलक्षणप्रतियोगिस्व रूपसहिप्णुत्वाभ्युपगमाद् । एतेन प्रपश्चस्य स्वरूपेण निपेधे शशशृङ्गवदसच्वमेव स्यादिति निर- स्तम्, न्रक्ष्ञाननिवर्त्यस्वरूपाङ्गीकारेण वैपम्यात्। न चाऽस्याध्यस्तस्याऽविष्ठाने स्वरूपेण निषेधे अन्यत्र तस्य स्वरूपेण निषेधः स्वतः सिद्ध इति तस्य सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वा- पच्या अस्त्वं दुर्वारम्। 'सर्वदेशकालसम्चन्धिनिपेधप्रतियोगित्वमस्च्वम्'

वाले असद्विलक्षण प्रतियोगिस्वरूपका-सहिप्णु है, ऐसा माना जाता है*। इससे अर्थात् वक्ष्यप्रमाणन्द्मज्ञाननिवर्त्यरूप प्रपश्नस्वरूपका अङ्गीकार करनेसे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि 'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतिसे प्रपश्चका स्वरूपतः निपेध करनेपर शशशृद्रके समान प्रपश् असत् ही होगा, क्योंकि व्रस्ज्ञानसे निवृत्त होनेवाले स्वरूपसे युक्त उस प्रपश्चका स्वीकार किया गया है। अतः शशशृमसे वैपम्य है। यदि शक्का हो कि अध्यस्तका अधिष्ठानमें स्वरूपतः निपेध किया जाय, तो अन्यन्न अर्थात् अघिष्ठानसे अतिरिक्त देश, कालमं अध्यस्तका निषेध स्वतः सिद्ध है ही; इसलिए वह असत् हो जायगा, क्योंकि सब देश और कालके साथ सम्बन्ध रखनेवाले अभावका वह प्रतियोगी है। असत्त्वका निर्वचन भी यही है

े पाद्ासामाधानका तात्पर्य यद है कि अधिष्ठानभूत वह्ममें प्रपथस्वरूप और प्रपथवका निषेध दोनों एक कालमें नहीं मान सकते हैं, यदि निषध क्ुतिके अनुसार प्रपश-निषेध ब्रहममें माना जाय, तो प्रपमकी अवस्थिति नहीं होगी, क्योंकि अभाव प्रतियोगीकी स्थितिका विरोधी होता है, यदि कथनित् जवदस्ती मान लिया जाय कि प्रतियोगी और अभाव एकत्र रहते है, तो निषधतवका व्याघात होगा, क्योंकि निषेधत्व (अभावत्व) प्रतियोग्यवस्थितिविरोधित्वरूप है, अतः स्वरपतः प्रपथका निपेध करनेपर प्रपथस्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः प्रपबको सत्य मानना चाहिए, यद पूर्वपक्षका तात्पर्य है, इसपर सिद्धान्त कहते हैं कि कल्पितपदार्थ- प्रतियोगिक अभाव अधिष्ठनये अन्यत्र प्रतियोगीके साथ भले ही विरोधी दो, परन्तु अधि- मानमें कुछ काल तक अविरोधी रहता है अर्थात् अधिष्ठानमें रदनेवाला कल्पितप्रतियोगिक अमाव प्रतियोगीकी अवस्थितिको सहन करता है, ऐसी कल्पनामें द्वैतग्राही प्रत्यक्ष और निषधक्षति प्रमाणरूपसे इमको मिल रहे हैं, जैसे न्यायमें घटत्वाद्यभावको प्रतियोगीके साथ घटायधिकरणमें विरोधी मानते हैं, तथापि संयोगादिके अभावको प्रतियोगीके साथ विरोधी नंही मानते हैं अयात संयोगाधिकरणमें भी संयोगाभाव माना जाता है, वसे ही हम लोग भी मान, तो क्यों मानि है अर्यात् कुछ दानि नहीं हैं।

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३१२ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

इत्येवाऽसच्वनिर्वचनाद, विधान्तरेण तन्निर्वचनायोगादिति वाच्यम् ; असतः सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वसुपगच्छता, तथात्वे-प्रत्यक्षस्य सर्व- देशकालयोः प्रत्यक्षीकरणायोगेन, आगमस्य तादृशागमानुपलम्भेन च प्रमाणयितुमशक्यतयाऽनुमानमेव प्रमाणयितव्यमिति तदनुमाने यत् स्यावृत्त लिङ्गं वाच्यम्, तस्यैव प्रथमप्रतीतस्यासच्निर्वचनत्वो- पपंत्तेरित्याहुः । पारमार्थिकसत्यत्वं नेह नानेति नुद्यते। व्यावहारिकसत्यत्वं न निषिद्धमितीतरे ॥ १६ ॥ 'नेह नानारिति' इत्यादि भ्ुतिसे प्रपञ्चके पारमार्थिक रूपका ही वाघ होता है, व्यावहारिक स्वरूपका बाध नहीं होता, इससे आगमका उपजीव्य प्रत्यक्षसे विरोध नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।। १६ ॥

कि सब देश और काल आदिके साथ सम्बन्ध रखनेवाले निषेधका जो प्रतियोगी हो, इसके सिवा अन्य कोई प्रकार नहीं है, जिससे कि असत्का निर्वचन हो सके; तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि जो महाशय असत्को सर्वदेशकाल- सम्वन्धी निपेधका प्रतियोगी मानते हैं, वे उस प्रकारके असत्वमं प्रत्यक्षको प्रमाण नहीं दे सकते हैं, क्योंकि सव देश और कालका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, उसी प्रकार शशश्रृद्ध आदि सर्वदेशकालसम्ब्न्धिनिपेधके प्रतियोगी हैं इसमें आगम भी प्रमाण नहीं हो सकता है, क्योंकि उस प्रकारका असत्त्वयोधक कोई आगम मिलता ही नहीं, अतः अनुमान ही प्रमाणको कहना होगा। उस अनुमानमें जो8 सद्यावृत्त हेतु करोगे उसीको, प्रथमोपस्थित होनेके कारण, असत्का लक्षण मानेंगे।

  • सत् पदार्थमें नहीं जानेवाला जो हेतु करोगे वही असत्का लक्षण होगा अर्थात् शशमङ्ग असत् है, निःस्वरूप होनेसे, जो निःस्वरूप नहीं है वह असत् भी नहीं है, जसे ब्रह्म इस प्रकारके अनुमानसे ही शशश््र आदिमें तुम्हें असत्त्वकी सिद्धि करनी होगी, इसलिए प्रथमो- पस्थित होनेसे निःस्वरूपत्व ही असत्का निर्दुष्ट लक्षण हो सकता है, तो किसलिए सर्वदेशकाल सम्वन्धिनिषधप्रतियोगित्वरूप असत्त्व मानना चाहिए? नहीं मानना चाहिए, प्रकृतमें ज्ञान- निवर्त्य त्वरूप स्वरूप प्रपथ्चमें है, इसलिए प्रपश्नमें निःस्व्ररूपत्वरूप असत्त्व नहीं है, अतः शशश्ङ्गादिसे प्रपश्व विलक्षण हो सकता है, यह भाव है।

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उपजीव्य प्रत्यक्षते श्रुतिका अवाधितत्व-विचार] भापानुवादसहित ३१३

अपरे तु 'नेह नानास्ति' इति श्रुतेः सत्यत्वेन प्रपश्चनिपेधे एव :तात्पर्येम्, न स्वरूपेण। निपेधस्य स्वरूपाप्रतिक्षेपकत्वे तस्य तननिपेधत्वा- योगाद्। तत्प्रतिक्षेपकत्वे प्रत्यक्षविरोधाद्। न च सत्यत्वस्यापि 'सन् घटः' इत्यादिप्रत्यक्षसिद्धत्वाद् न तेनापि रूपेण निपेधो युक्त इति वाच्यम्, प्रत्यक्षस्य अत्यविरोधाय सत्यत्वा

कुछ लोग कहते हैं कि 'नेह नानास्ति किश्चन' (न्षमें द्वैत प्रपश्च नहीं है) इस श्रुतिका (ब्रस्ममं) अपश्चका सत्यत्वरूपसे निषेधमें ही तात्पर्य है, प्रपश्चके स्वरूपसे निपेधमें तात्पर्य नहीं है। यदि वक्षमें प्रपश्चका स्वरूपसे निषेध प्रतियोगीका प्रतिक्षेपक-विरोधी न माना जाय, तो वह प्रपश्चका स्वरूपसे निषेध ही नहीं रहेगा। यदि निषेध पतियोगीका विरोधी माना जाय, तो प्रत्यक्षविरोध होगा, [इससे प्रपश्वके अविकरणीभूत न्रक्षमं प्रपश्नका स्वरूपसे निषेध श्रुति नहीं करती है, किन्तु प्रपश्चका सत्यत्वरूपसे निषेध करती है, अतः प्रतियोगी और अभावके भिन्नाधिकरणक होनेसे, कोई दोप नहीं है, यह तात्पर्यार्थ है] *यदि शक्का हो कि 'घटः सन्' (घट सत् है) इत्यादि प्रत्यक्षसे घटादि- प्रप्चंमें भी सत्यत्व सिद्ध है, अतः सत्यत्वरूपसे भी प्रपञ्चका निषेध नहीं कर सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि श्ुतिके साथ विरोध न हो, इसलिए सत्यत्वाभासरूप व्यावहारिक सत्यत्व ही 'घटः सन्' इत्यादि प्रत्यक्षका विषय है। • क्म अन्यका तात्पगीर्य यह है कि अक्षमें जैसे प्रपथ प्रत्यक्षसिद्ध है, घैसे प्रपथमें सस्सस्व भी 'पटः सन्' इत्यादिखे प्रत्यक्षमिद्द् दे, इससे निपेधश्रुतिका तात्पर्य प्रपशके सत्यत्वके निषेपमें भी नहीं हो सफता है, क्योंकि प्रपममें सत्यत्व है और उसीमें उसका निषेध करना दे, अतः निषेध और प्रतियोगीकी अवस्पिति एकत्र हो जानेके कारण निषेधत्वका पूर्वोक रीतिसे व्याघात सी दोगा, इसपर उच्तर देते दें कि घट आदिमें जिस सत्यत्वका प्रत्यक्ष होता है, वह अदपत्गसवके समान पारमार्थिक नहीं है, विन्तु व्यावदारिक सत्यत्वरूप है, ऐसी कलपना को जाती है, इसलिए नक दोष नहीं है, ययोंकि प्रपथमें व्यावदारिक सत्यत्वका निपेध नहीं करते हैं, किनतु पारमार्थिकत्वका ही निपेध करते हैं, इसलिए शुकिमें जो रजतका निपेध किया जाता है, वह सलरजतका ही निषेध किया जाता है, कल्पित रजतका निषेध नहीं किया जाता है, क्योंकि इय मतमें शुक्यादिमें कल्पित रजतादिका निषेध नहीं माना जाता है, किन्तु देशान्तरस्य रात्य रजतादिका ी निषेध किया जाता है, इसीमें 'अत एव' इत्यादि प्रग्थसे युकि दी गई है, और इस गतमें सस्ताफे श्रेविध्यका अशीकार भी है।

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३१४ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

भासरूपव्यावहारिकसत्यत्वविषयत्वोपपत्तेः । न चैवं सति पारमार्थिक- सत्यत्वस्य ब्रह्मगतस्य प्रपश्चे प्रसत्त्यभावात् तेन रूपेण प्रपश्चनिपेधानु- पपत्तिः। यथा शुक्तौ रजताभासप्रतीतिरेव सत्यरजतप्रसक्तिरिति तन्नि- षेधः, 'अत एव 'नेदं रजतम्, किन्तु तत्', 'नेयं मदीया गौः, किन्तु सैव,' 'नान्न वर्तमानश्चैत्र, किन्त्वपवरके' इति निपिध्यमानस्याऽन्यत्र सच्वमवगम्यते, एवं सत्यत्वाभासप्रतीतिरेव सत्यत्वप्रसक्तिरिति तन्नि-

विरोध इत्याहुः। अन्येऽविवेकादेकैव ब्रह्मसत्ता वटादिषु। असन्निकृष्टे ह्यध्यासोऽन्यत्र संसर्गकल्पनम्॥१७॥

एक ही ब्रह्मसत्ता घट आदिमें अविवेकसे गहीत होती है। असन्निकृष्ट स्थलमें अध्यास होता है और अन्यत्र-सन्निकृष्ट स्थलमें संसर्गकी कल्पना की जाती है॥ १७॥ अन्ये तु. ब्रह्मणि पारमार्थिकसत्यत्वम्, प्रपश्चे व्यावहारिकसत्यत्वं सत्यत्वाभासरूपम्, शुक्तिरजतादौ पतिभासिकसत्यत्वं ततोऽपि निकृष्ट-

यदि शक्का हो कि प्रपञ्चमें व्यावहारिक सत्यत्व माननेपर ब्रह्ममें रहनेवाले पारमार्थिक सत्यत्वकी प्रपञ्चमें प्रसक्ति न होनेके कारण पारमार्थिक सत्यत्वरूपसे प्रपञ्चका निषेध नहीं हो सकता है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे शुक्तिमें रजताभासकी प्रतीति ही सत्य रजतकी प्रसक्ति है, इससे उसका निषेध होता है, इसीलिए यह रजत नहीं है, किन्तु वह रजत है, यह मेरी गाय नहीं है, किन्तु वह मेरी गाय है, यहाँ चैन्र वर्तमान नहीं है, किन्तु भीतर है, इस प्रकारका निषेध होता है, उनकी अन्यत्र सचा ज्ञात होती है, वैसे ही सत्यत्वा- भासप्रतीति ही सत्यत्वप्रसक्ति है, इसलिए उस सत्यत्वका प्रपञ्चमें निषेध हो सकता है। इससे वर्ण, पद, योग्यता आदि स्वरूपोपमर्दकी शङ्का न होनेसे उपजीव्यके साथ कोई विरोध नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्ममें पारमार्थिक सत्यत्व प्रपञ्चमें सत्यत्वाभासरूप व्यावहारिक सत्यत्व और शुकतिरजत आदिमें व्यावहारिक सत्यतासे निकृष्ट प्रातिभासिक सत्यत्व, इस प्रकार सत्ताका त्ैविध्य नहीं हैं? किन्दु ब्रह्मरूप

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प्रतिविम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भांपांनुवांदसहित ३१५

मिति सत्तात्रैविध्यं नोपेयते, अधिष्ठानव्रह्मगतपारमार्थिकसत्ताऽनुवेधादेव घटादौ शुक्तिरजतादौ च सच्चाभिमानोपपत्या सत्यत्वाभासकल्पनस्य निष्प्रभाणकत्वात्। एवं च प्रपंश्चे सत्यत्वप्रतीत्यभावाद्, तत्तादात्म्या- पन्ने त्रह्मणि तत्प्रतीतेरेवाविवेकेन प्रपश्चे तत्प्रसक्त्युपपत्तेश्र सत्यत्वेन प्रपश्च- निपेधे नोपजीव्यविरोधः, न वा अप्रसक्तनिपेधनम्। न च ब्रह्मगतपारमार्थिकसत्ताऽतिरेकेण प्रपञ्चे सच्ाभासानुपगमे व्यवहितसत्यरजतातिरेकेण शुक्तौ रजताभासोत्पत्तिः किमर्थमुपेयत इति वाच्यम्, व्यवहितस्याऽसन्निकष्टस्याऽडपरोक्ष्यासम्भवात् तन्निर्वाहाय वदुपगमात्॥ ३ ।। नन्वेवं स्वमुखं स्वस्यासन्निकृष्टमितीतरत्। दर्पणेऽध्यस्तताSSपन्नं प्रतिविम्वं भृपेति चेद् ॥ १८ ॥ रजताभासकी उत्पत्ति माननेपर दपणर्में अध्यस्त अपना सुख भी असन्निकृष्ट होनेसे अन्य अनिर्वचनीय उत्पन्न होगा, अतः वह मिथ्या होगा, यदि इस प्रकार शक्का हो तो युक्त नहीं है।। १८ ।। अधिष्ठानमें रहनेवाले पारमार्थिक सत्यत्वके सम्बन्धसे ही घट आदिमें और शुक्तिरजत आदिमें सत्ताका भान हो सकता है, फिर सत्यत्वाभासरूप सचान्तरकी कल्पना प्रमाणशून्य है। इस परिस्थितिमें प्रपञ्चमें सत्यत्वकी प्रतीति न होनेसे प्रपञ्चतादात्म्यापन्न व्रक्ममें सत्यत्वकी प्रतीतिसे ही अविवेकसे प्रपञ्चमें सत्यत्वकी प्रसक्ति है, अतः सत्यत्वरूपधर्मसे यदि ब्रह्ममें प्रपञ्चका निपेध किया जाय, तो उपजीव्य विरोध नहीं है और अप्रसक्तका निषेध भी नहीं है। यदि शक्का हो कि व्रह्ममें रहनेवाली पारमार्थिक सत्तासे अतिरिक्त प्रपञ्चमें सत्वाभासरूप सचाके न माननेपर शुक्तिमें भी व्यवहित (दूरस्थ) रजतसे अतिरिक्त प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि व्यवहित रजतके साथ इन्द्रियका सम्वन्ध न होनेके कारण उसकी अपरोक्षता नहीं हो सकती है, इसलिए अपरोक्षत्वका निर्वाह करनेके लिए प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति मानी जाती है।३॥ * इस परिस्थितिमें अर्थात् 'सत्' रूपसे प्रतीयमान घटादितादात्म्यापन्न सद्वस्त्वंशरूप वह्ममें ही 'सन् घटः' इत्याकारक प्रतीतिकी विपयता है, जैसे 'मृद्धटः' इत्यादि प्रतीतिकी मृदंशमें मृद्विपयता है और ब्रह्ममें सत्ताप्रंतीति होनेसे ही घटादिमें सत्ताव्यवहार होता है, यह भाव है।

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३१६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

नन्वेवं अतिविम्बभ्रमस्थलेऽपि ग्रीवास्थमुखातिरेकेण दर्पणे मुखा- भासोत्पत्तिरुपेया स्यात्। स्वकीये ग्रीवास्थमुखे नासाद्यवच्छिन्नप्रदेशा- परोक्ष्यसम्भवेऽपि नयनगोलकललाटादिप्रदेशापरोक्ष्यायोगात्। प्रतिविम्व- भ्रमे नयनगोलकादिप्रदेशापरोक्ष्यदर्शनाच्च । न च विम्घातिरिक्तप्रति- विम्बाभ्युपगमे इष्टापत्तिः । ब्रह्मप्रतिविम्बजीवस्यापि ततो भेदेन मिथ्यात्वापत्तेः।

रजतकी अपरोक्षताके लिए यदि शुक्तिमें अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति मानी जायगी, तो जहाँपर प्रतिविम्बका भ्रम होता है, वहाँ भी ग्रीवास्थ मुखसे अतिरिक्त दर्पणमें अनिर्वचनीय सुखाभास की उत्पत्ति माननी ही होगी, क्योंकि प्रतिविम्वत्वरूपसे स्वीकृत अपने ग्रीवास्थ मुंखमें नासिका आदिसे युक्त प्रदेशका अपरोक्षत्व होनेपर भी नेत्रके गोलक और ललाट आदि प्रदेशका आपरोक्ष्य नहीं होगा, [क्योंकि उस अंशके साथ इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं है, यह भाव है ]। और प्रतिविम्बविभ्रममें नयनके गोलक आदि प्रदेशोंका आपरोक्ष्य देखा भी जाता है। यदि शङ्का हो कि विम्वसे अतिरिक्त प्रतिविम्ब माननेमें इष्टापत्ति ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवभूत ब्रह्मप्रतिविम्व्रके व्रह्मभिन्न होनेपर जीवमें मिथ्यात्वकी प्रसक्ति होगी। [तात्पर्यार्थ यह है कि विम्ब और प्रतिविम्वको यदि एक माना जायगा, तो प्रतिबिम्बका आपरोक्ष्य (प्रत्यक्षात्मक ज्ञान) नहीं होगा, क्योंकि विम्बभूत मुखमें रहनेवाले आँखके गोलक तथा ललाट आदिके साथ इन्द्रिय आदिका सन्निकर्प न होनेके कारण तदभिन्न प्रतिविम्बका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा, और यदि प्रत्यक्षकी उपपत्तिके लिए विग्व्नसे अतिरिक्त प्रतिबिम्ब मानोगे, तो उसको मिथ्या ही मानना होगा, अन्यथा अद्दतकी हानि होगी। इस अवस्थामें ब्रह्मप्रतिविम्बरूपसे माने गये जीवका भी ब्रह्मसे भेद और उसको मिथ्या मानना होगा, क्योंकि जीव ब्रह्मसे स्वरूपतः मिन्न है, ब्रह्मप्रतिबिम्ब होनेसे, मुखप्रतिविम्नव्, इस अनुमानसे जीवमें ब्रह्मका. भेद सिद्ध करनेपर-जीव मिथ्या है, ब्रह्मभिन्न होनेके कारण, घट आदिके समान, इस अनुमानसे जीवमें मिथ्यात्वप्रसक्ति होगी, इसे इष्टापत्ति नहीं मान सकते हैं, अतः सुखाभासादिकी उत्पत्ति नहीं मान सकते हैं, यह शङ्ककका कहना है ]।

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प्रतिविम्न की सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३१७

दर्पणादिपराधृत्तैनिजेर्नयनरश्मिभिः । सन्निकृष्टं मुखं तत्रोपाध्यन्तःस्थितिविस्रमः ॥१९॥ न दर्पणे मुखाध्यासः संस्कारादेरसंभवात्। ममेदमिति भानाच्चेत्याहुविवरणानुगाः॥ २० ॥ क्योंकि दर्पण आदिसे परावृत्त अपनी नयनकी रश्मियाँ ही सन्निकष्ट मुखका ग्रहण करती हैं और उसमें केवल उपाध्यन्तःस्थत्व आदि का अध्यास होता है। दर्पणमें मुखका अध्यास उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि संस्कार नहीं है और 'मेरा यह मुख है' इस प्रकार अभेदानुभवें भी होता है, ऐसा विवरणानुसारी लोग कहते है॥ १९॥ २०॥ अन्र विवरणानुसारिगः प्राहु :- ग्रीवास्थ एव सुखे दर्पणोपाधिसन्नि- धानदोपाद् दर्पणस्थत्वप्रत्यङ्मुखत्वविम्नभेदानामध्याससम्भवेन न दर्पणे मुखस्याध्यास: कल्पनीयः, गौरवाद्। 'दर्पणे मुखं नास्ति' इति संसर्ग- मात्रयाधात्। मिध्यावस्त्वन्तरत्वे 'नेदं मुखम्' इति स्वरूपवाधापत्तेः। 'दर्पणे मम मुखं भाति' इति स्वमुखाभेदप्रत्यभिज्ञानाच। * इस आक्षेपके समाधानम विवरणानुसारी कहते हैं-ग्रीवास्थ मुखमें ही दर्पणरूप उपाधिके सान्निध्यरूप दोपसे दर्पणस्थत्व, प्रत्यङ्मुखत्व, विम्ध भिन्नस्व आादिका अध्यास हो सकता है, इसलिए दर्पणमें मुखाध्यासकी कल्पना ..

करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि धर्माध्यासकी अपेक्षा धर्मीका अध्यास माननेमें गौरव है। और 'दर्पणमें मुख नहीं है' इस प्रकार जो चाघ होता है, वह दर्पणस्थत्वादि संसर्गका ही वाघ है, प्रतिविम्धस्वरूपका वाध नहीं है, [अतः दर्पणस्थत् आदि संसर्ग मिथ्या हैं और प्रतिविम्व सत्य हैं, यह भाव है]। यदि यह मान लिया जाय कि प्रतिविम्न [शुक्तिरजतके समान विम्वभूत वस्तुसे मिथ्याभृत अन्य वस्तु है] तो 'नेदं मुखम्' (यह मुख नहीं है) इस प्रकार स्वरूपवाध ही होता, परन्तु ऐसा तो होता नहीं है, अतः प्रतिचिम्बको मिश्या वस्तु नहीं मान सकते हैं। और प्रतिविग्वको सत्यस्वरूप मानने में और भी कारण है कि 'दर्पणमें मेरा मुख है' इस प्रकार अपने विम्बभूत मुखके साथ समेदकी प्रत्यभिज्ञा होती है। [इसलिए प्रतिबिम्ब मिथ्या नहीं है, उसके विषयमें अनुमानसे यह फलित होगा-विम्बके समान प्रतिविम्ब सत्य है, विग्वाभिन्न होनेसे और वाधागाव होनेसे। इससे प्रतिविम्वभृत जीवका भी सत्यत्व ही सिद्ध होगा, * दूख विवरणके मतमें विम्ब और प्रतिबिम्यका ऐक्य होनेसे विम्वभिन्नत्व हेतुसे मिथ्यात्वका अनुमान नहीं फर सकते हैं, यह भाव हे।

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३१८ सिद्धान्तलैशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

न च ग्रीवास्थमुखस्याधिष्ठानस्यापरोक्ष्यासम्भवः, उपाधिप्रतिहत- नयनरश्मीनां परावृत्य विम्वग्राहित्वनियमाभ्युपगमाल्लवादिवद्। तन्निय- मानभ्युपगमे परमाणोः, कुड्यादिव्यवहितस्थूलस्यापि चाक्षुपग्रतिविम्ब- अ्रमप्रसङ्गात्। न च 'अव्यवहितंस्थूलोन्जूतरुपवत एव चाक्षुपप्रतिविम्न - भ्रम:, नान्यस्य' इति नियम इति वाच्यम्, विम्बस्थौल्योद्भूतरूपयोः कलप्ेन चाक्षुपज्ञानजननेन उपयोगसम्भवे विधान्तरेणोपयोगकल्पनानु-

क्योंकि उसके ब्रह्मप्रतिबिम्ध होनेपर भी वह ब्रह्मसे अभिन्न है, यह भाव है। यदि शङ्का हो कि बिम्ब और प्रतिबिम्बको एक माना जायगा, तो प्रति- बिम्बका सर्वाशसे प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि ग्रीवास्थमुखके (जो प्रतिविम्त्नत्व आदिका अघिष्ठानभूत है) नयनगोलक आदिके साथ स्वकीय चक्षुका सन्निकर्ष नहीं है, परन्तु यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि उपाधिसे प्रतिहत नेत्र- रश्मियाँ निवृत्त होकर विम्वको ही ग्रहण करती हैं, जैसे कि ऊपर चढ़ती हुई लताएँ प्रतिहत होकर पुनः नीचे आ जाती हैं, ऐसा नियम माना गया है। यदि यह नियम न माना जाय, तो परमाणु और दिवाल आदि व्यवघानग्रस्त स्थूल पदार्थोंका भी प्रतिविम्ब प्रसक्त होगा। [तात्पर्यार्थ यह हे कि प्रति- विम्बस्थलमें नेत्रकी किरणें चक्षुगोलकमं से निकलकर दर्पण आदि स्वच्छ द्रव्यरूप उपाधिके समीप जाती हैं और उस उपाधिसे आघात खाकर पुनः वापस लोटती हैं और ग्रीवास्थ मुख और उसके अवयवोंसे संसृष्ट हो जाती हैं। इसके बाद वहीं रश्मियाँ जसे सामनेके पदार्थोंका साक्षात्कार करती हैं, वैसे ही स्वकीयग्रीवास्थ मुखका सर्वांशसे प्रत्यक्ष करती हैं। इसपर यदि कोई शक्का करे कि परावृत्त नयनकी रश्मियाँ गोलक द्वारा अन्तर्लीन हो जाती हैं, यह अन्यत्र कहा गया है, इससे यहांपर लौटकर वे मुखसन्निकृष्ट होकर मुखको देखती हैं, यह कल्पना गौरवग्रस्त है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जो प्रतिविम्वकी उत्पत्ति मानते हैं, उनको भी यह कहना होगा कि चक्षुसन्निकृष्ट पदार्थ ही- बिम्ब होता है, असन्निकृष्ट नहीं, इससे उक्त नियम अवश्य मानना होगा। यदि सन्निकृष्ट विम्ब न माना जाय, तो व्यवहित पदार्थका भी प्रतिविम्ब- विभ्रम प्रसक्त होगा, अतः ग्रीवास्थ मुखके नयनगोलक आदिके साथ स्वचक्षु:सन्निकर्ष होनेसे प्रतिबिम्बका. सर्वांशतः प्रत्यक्ष होगा। यदि

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प्रतिविम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३१९

पपत्तेः। कुड्यादिव्यवधानस्य प्रतिहतनयनरश्मिसम्बन्धविघटनं चिनैवेह प्रतिवन्धकत्वे तथैव घटप्रत्यक्षादिस्थलेऽपि तस्य प्रतिचन्धकत्वसम्भवेन

शक्का हो कि उसी द्रव्यका चाक्षुपप्रतिबिम्ब होता अ्रभ है, जो कि व्यवधान रहित, उद्भूतरूपवान् और स्थूल हो, दूसरेका चाक्षुप प्रतिविम्ध भ्रम नहीं होता है, ऐसा नियम है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विम्वगत* स्थूलत्व और उद्भूतरूपका कलप्त चक्षुरिन्द्रयजन्य ज्ञान द्वारा उपयोग हो सकता है, फिर उनका उपयोग प्रकारान्तरसे मानना अर्थात् स्थूलता और उद्भूतरूपका उनके आश्रय विम्न्न द्वारा प्रतिविम्बभ्रमकी उत्पत्तिमें उपयोग मानना अनुचित है। और इस अवस्थामें यह भी आपति हो सकती है-व्यवधानभूत दिवाल आदि पदार्थोंमें प्रतिहत नेत्ररह्मि आदिके सम्बन्धके विघटनके बिना ही प्रतिविम्बविभ्रम- स्थलम प्रतिबन्धकत्व होनेपर घट आदिके प्रत्यक्षस्थलम भी सन्निकर्पविघटनके विना भित्ति आदि व्यवधानोंमें प्रतिबन्धकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो

  • समाधानका तात्पर्य यह है कि द्रव्यके चाक्षुपप्रत्यक्षमें द्रव्यगत महत्त्व और उद्भूतरूप कारण है, यह मानी हुई वात है। इसी प्रकार वाह वस्तुके प्रत्यक्षके प्रति दिवाल आदि पदार्थ सन्निकर्षके निरसन द्वारा ही प्रतिवन्धक है, यह चलृत् है। इस अवस्थामे प्रतिबिम्व और विम्बके अभेदपक्षमें विम्बका चाक्षुप प्रत्यक्ष ही प्रतिविम्बका चाक्षुप प्रत्यक्ष है, अतः विम्बभूत मुख आदिमें रहनेवाले स्थूलत्व और उद्भूतरूपको वलप् चाक्षप प्रत्यक्षसे अन्यत्र कारण नहीं मांनना पढता है, अतः लाघव है, और शुक्तिरजतके समान साक्षीसे भास्य अनिर्वचनीय प्रतिचिम्बाध्यासकी उत्पत्तिपक्षमं, तो प्रतिविम्ाध्यासमें प्तिविम्वसन्िकर्पको कारण माननेसे, चायु और परमाणु आदिके चाक्षुप प्रसङ्गके निवारणके लिए विम्त्रगत महत्त्व और उद्भृतरूपको-महत्त्व और स्योल्यका आश्रयीभृत द्रव्यरूप विम्बसे उत्पन्न होनेवाले प्रति- बिम्बके अध्यासकी उत्पत्तिमें भी-कारण मानना होगा, यह गौरव है। इसी प्रकार विम्व और प्रतिविम्बके अभेदपक्षमें यह माना जाता है कि नयनर्मियाँ परावृत होकर विम्बके साथ सम्बद्ध होती है; इससे प्रतिविम्बविभ्रममें भी विम्वसननिकर्षके हेतु होनेसे घट आदिके चक्षुर्जन्य ज्ञानके समान प्रतिविम्बके चाक्षुपमें भी दिवाल आदि सन्निकपके विघटनद्वारा ही प्रतिबन्धक होगें, अक्लृप्र साक्षात् प्रतिवन्धक नहीं होंगें, अतः लाघव है, प्रतिविम्वके अध्यासपक्षमें तो विम्बसन्निकर्पके हेतुत्वका अभ्युपगम न होनेसे कुख्यादिमें (दिवाल आदिमें) क्लप सननिकर्षविघटकत्व कह नहीं सकते है, अतः कुड्यादिमें प्रतिबिम्ब अध्यासके प्रति साक्षात् ही प्रतिवन्धकताकी ही कल्पना करनी होगी, अन्यथा व्यवहितका भी प्रतिबिम्ब प्रसक होगा, इसलिए गौरव है, अतः 'अव्यवहित' इत्यादि ग्रन्थोक्त नियमसे भी उपपत्ति नहीं हो सकती है।

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३२० सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

चक्षुःसन्निकर्पमात्रस्य कारणत्वविलोपप्रसङ्गाच्च। दर्पणे मिथ्यामुखाध्यास- चादिनाऽपि कारणत्रयान्तर्गतसंस्कारसिद्धचर्थ नयनरकमीनां कदाचिद्- परावृत्य स्व्रमुखग्राहकत्वकल्पनयैव पूर्वानुभवस्य समर्थनीयत्वांच्च। न च नासादिप्रवेशावच्छिन्नपूर्वानुभवादेव संस्कारोपपत्तिः। तावता नयनगोल कादिप्रतिविम्बाध्यासानुपपत्तेः तटाकसलिले तटविटपिसमारूढादृष्टचर- पुरुषप्रतिविम्धाध्यासस्थले कथमपि पूर्वानुभवस्य दुर्वचत्वाच्च। एवं चोपाधिप्रतिहतनयनरश्मीनां विम्वं प्रप्य तद्ग्राहकत्वेऽवशयं वक्तव्ये फलवलादर्पणाद्यभिहतानासेव विम्वं प्राप्य तद्ग्राहकत्वम्, न शिलादि-

फिर चक्षुःसन्निकर्पमात्रमें प्रत्यक्षकारणत्वका विलोप प्रसक्त हो जायगा। और यह मी बात है कि जो दर्पणमें मिथ्याभूत मुखप्रतिविम्ब मानता है, उसको भी दोष, सम्प्रयोग और संस्कार इन तीन कारणोंके अन्तर्गत संस्कारकी सिद्धिके लिए किसी समयमें नयनररिमियाँ परावृत्त होकर ही स्वमुखकी आ्हक होती हैं, इस प्रकारकी कल्पना करके पूर्वानुभवका समर्थन करना पढ़ेगा। यदि शङ्का हो कि नासिका आदि प्रदेशसे युक्त पूर्वके अनुभवसे ही उक्त स्थलमें संस्कारकी उपपत्ति हो सकती है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि नासिका आदि प्रदेशसे युक्त पूर्वानुभवसे नयनगोलक आदि प्रतिविम्बाध्यासकी उपपत्ति नहीं हो सकती है और तालावके जलमें किसी समयमें नहीं देखे गये और किनारेके वृक्षके ऊपर चढ़े हुए पुरुपके प्रतिविम्वस्थलमें किसी रीतिसे भी पूर्वानुभवका समर्थन भी नहीं कर सकते हैं। इस अवस्थामें उक्त प्रकारसे उपाघिसे आहत होकर चक्षुकी रश्मियाँ लौटकर विम्बको अ्हण करती हैं, इस प्रकार अवश्य कहना होगा, परन्तु अनुभवके आधारपर यह भी कहना होगा कि दर्पण आदि स्वच्छ उपाधिके प्रतिघातसे लौटी हुई रश्मियाँ ही बिम्बका ग्रहण करती हैं, शिला आदिसे आहत हुई रश्मियाँ नहीं अहण करती हैं, अतः शिला आदिमें प्रतिविम्ब नहीं होता है। जो- उपाधियाँ अत्यन्त स्वच्छ नहीं हैं, ऐसी ताम्र आदि उपाधियोंसे आहत नयन- रश्मियाँ मलिन उपाधिके सम्बन्धसे मुख आदि विम्त्रभूत पदार्थोंके नयन- गोलक आदि संस्थानोंका ग्रहण नहीं कर सकती हैं, [अतः शिलादिसे वैलक्षण्य होनेपर भी उनमें कार्त्स्येन प्रतिविम्वग्राहकत्व नहीं है, यह भाव है।] और

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प्रतिषिम्नकी सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३२१

प्रतिहतानाम्। अनतिस्वच्छताम्रादिप्रतिहतानां मलिनोपाधिसम्वन्धदोपाद् मुखादिसंस्थानविशेपग्राहकत्वं साक्षात् सूर्य प्रेप्सूनामिव उपाधिं आ्प्य निवृत्तानां न तथा सौरतेजसा प्रतिहतिरिति न प्रतिविम्बसूर्यावलोकने साक्षान्दवलोकने इवाऽशक्यत्वम्। जलाद्युपाधिसन्निकर्षे केपांचिदुपाधि- प्रतिहतानां विम्बप्राप्तावपि केपांचित्तदन्तर्गमनेनान्तरसिकतादिग्रहण- मित्यादिकल्पनान्न कक्षिद् दोप इति। अद्वैतविद्यांचार्यास्तु पाश्वस्थि्मेंददर्शनात्। ग्रीवास्थादन्यदध्यस्तं प्रतिविम्बमुखं विद्ुः ॥ २१ ॥ अह्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि समीपस्थ मनुष्य मुख्य मुखसे प्रतिबिम्बभूत मुखका भेद देखते हैं, अतः ग्रीवास्थ मुखसे अध्यस्त प्रतिविम्बभूत मुख भिन्न है॥२१॥ अद्वैत विद्याकृतस्तु प्रतिविम्वस्य मिथ्यात्वमभ्युपगच्छतां त्रिविधजीय- वादिनां विद्यारण्यगुरुप्रभृतीनामभिप्रायमेवमाहु :-

साक्षात् सूर्यको देखनेकी इच्छासे प्रवृत हुईं नयनरश्मियाँ जैसे सूर्यके तेजसे पराहत होती हैं, वैसे उपाधिके प्रति जाकर लौटी हुईं नेत्रकी रश्मियाँ सूर्यके तेजसे आहत नहीं होती हैं, इसलिए साक्षात् सूर्यके अवलोकनमें जैसी कठिनाई होती है, वैसी प्रतिविम्नित सूर्यके अवलोकनमें नहीं होती है। जल आदि उपाधिके सन्निकर्षमें कुछ नेत्रकी किरणें उपाधिसे आहत होकर विम्बदेश तक जाती हैं, तो भी अवशिष्ट कुछ रश्मियाँ उपाधिके भीतर जाकर उसमें की वालू आदिका ग्रहण करती हैं, इत्यादि कल्पना करनेसे कुछ भी *दोप नहीं है। प्रतिविम्बको मिथ्या और जीवको पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक मेदसे त्रिविध माननेवाले श्रीविद्यारण्यप्रभृतियोंका अभिपाय अद्वैताचार्य निम्न प्रकारसे कहते हैं-

  • नयनरदिमियों पराशत होकर विम्बको ग्रहण करती हैं, यही सुरेश्वराचार्यजीका भी मत है- 'दर्पणाभिहता दृषटिः पराशृत्य खमाननम्। व्याप्नुवत्याभिमुरूयेन व्यत्यस्तं दर्शयेन्मुखम्।' अर्थात् दर्पण आदि उपाधियोंस प्रतिहत दृष्टि लौटकर अपने त्रीवास्थ सुखको व्याप्त करती हुई त्रिपरीत मुखका आभिमुर्यमे ग्रहण कराती है, यह भाव है। .. ४१

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३२२ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

चैत्रमुखाद् मेदेन तत्सदशत्वेन च पार्श्स्थैः स्पष्ट निरीक्ष्यमाणं दर्पणे तत्प्रतिविम्वं ततो मिनं स्वरूपतो मिथ्यैव, स्वकंरगतादिव रजंताच्छु -~ क्तिरजतम्। न च 'दर्पणे मम सुखं भाति' इति विम्वाभेदज्ञानविरोधः, स्पष्टभेदद्वित्व प्रत्यङ्सुखत्वादिज्ञानविरोधेनाSमेदज्ञानासम्भवाद्। 'दर्पणे मम सुखम्' इति व्यपदेशस्य स्वच्छायामुखे स्वमुखव्यपदेशवद् गौणत्वाच्। न चाडभेदज्ञानविरोधाद् भेदव्यपदेश एव गौणः कि न स्यादिति शङ्चम्, वालानां प्रतिविस्वे पुरुपान्तरभ्रमस्य हानोपादित्सादर्थक्रियापर्यन्त- चैत्र जिस कालमें अपना मुख दर्पणमें देखता है, उस कालमें पासके मनुष्य ग्रीवास्थ विम्वभृत चैत्रके सुखसे भिन्न और सदश प्रतिविम्ब्भूत मुखको स्पष्टरूपसे देखते हैं और वह स्वरूपतः मिथ्या ही है, जसे कि अपने हाथके रजतसे मिन्न और उसके सदश स्पष्ट दिखनेवाला शुक्तिरजत स्वरूपतः मिथ्या होता है। यदि शक्का हो कि प्रतिविम्व विम्वसे भिन्न कैसे हो सकता है, क्योंकि 'दर्पणमें मेरा मुख भासता है' इस प्रकार विम्वसे प्रतिविम्बका अभेद भासता है, तो यह मी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिविम्ब और विम्वका स्पष्टभेद, द्वित्व, प्रत्यङ्मुखत्व, प्राङ्मुखत्व आदिके ज्ञानसे विरोध होनेके कारण अभेदज्ञान हो ही नहीं सकता है। और 'दर्पणमें मेरा सुख है' इस प्रकारका व्यपदेश तो जैसे अपने छायामुखमें अपने सुखका व्यवहार होता है, वैसे ही गौण है#। इसपर यदि शक्का हो कि अभेदज्ञानके विरोघसे. मेदव्यपदेश ही तुल्ययुक्तिसे गौण क्यों न माना जाय? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वालकोंको प्रतिविम्बमे अन्य पुरुषका भ्रम होता है, जिससे हान (त्याग), उपादित्सा (ग्रहण करनेकी इच्छा) आदि जो उसकी अर्थक्रिया होती है, उसका अपलाप किसी रीतिसे नहीं कर सकते हैं।। इसपर भी यदि पुनः शङ्का हो कि बुद्धिमान् पुरुष भी

*'दर्पणमॅ मेरा सुख दिखता है', 'मेरा मुख मलिन है', 'मेरा सुख दीर्घ है', 'दर्पण आदिमें मेरा त्रीवास्थ मुख ही है' इत्यादि अनेक अभेदोंका अनुभव होता है, अतः अभेदानुभव/ ही मुख्य है, आर भदानुभव तो अभेदानुभवके विरोघसे केवल औपचारिक है, अतः विम्ब और प्रतिविम्बका वास्तविक भेद न होनेपर भी कल्पित भेद मान करके उक्त अमेदा- नुभवोंकी उपपत्ति हो सकती है, यह पूर्वपक्षका भाव है। + तात्पर्य यह कि प्रतिविम्वविपयक प्रवृत्ति आदि लोकमें होती है, अतः उसका अवश्य भेद सानना चाहिए, इसीलिए अज्ञानी चालक जलाशय आदिमें अत्यन्त भयंकर प्रतिविम्बको देखकर

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प्रतििम्वकी सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुंवादसहित ३२३

स्याऽपलपितुमशक्यत्वाद्। न च प्रेक्षावतामपि स्व्रमुखविशेपपरिज्ञानाय दर्पणाद्युपादानदर्शनाद् अभेदज्ञानमप्यर्थक्रियापर्यन्तमिति वाच्यम्, भेदेऽपि प्रतिविम्वस्य विम्वसमानाकारत्वनियमविशेपपरिज्ञानादेव तदुपादानोपपत्तेः।

  • अपने मुखकी विशेपता जाननेकी इच्छासे दर्पण आदिका परिग्रह करते हैं, अतः अर्थक्रियापर्यन्त, तो अभेदज्ञान भी है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विम्त्र और प्रतिविम्बका स्वरूपतः भेद प्रतीत होनेपर भी प्रतिबिम्ब विम्वका समानाकार ही होता है, इस नियमविशेपके परिज्ञानसे ही दर्पण आदिके ग्रहणमं प्रेक्षावान्की + प्रवृत्ति होती है।

पलायन करते हैं, सोम्य और प्रीतिकर प्रतिचिम्त्रको देखकर उसको ग्रहण करनेकी इच्छा करते हैं और प्रतिबिम्बप्रदेश तक जाते हैं, अतः प्रतिविम्न और विम्वका परस्पर भेद अवश्य मानना चाहिए, अभेद नहीं। • दाका करनेवालेका भाव यह है कि यदि विम्ध और प्रतिविम्बका वस्तुतः भेद ही है, तो परीक्षकोंको उस्का परिज्ञान ठीक ठीक होगा ही। इस अवस्थामें वे जो अपने मुखकी विशेषता जानने के लिए दर्पण आदिका ग्रहण करते हैं, वह नहीं होना चाहिए। परन्तु उनकी प्रवृत्ति दर्पण आदिके परिग्रहमें होती है, अतः विम्ब और प्रतिबिम्बका अभेद है, यह निर्विवाद है। * समाधानका खारांश यह है कि विम्ब और प्रतिविम्बके स्वरूपतः भेदका निश्चय पूर्वोंक सुकियोंसे उन परीक्षकोंको यद्यप है, तथापि प्रतिविम्तमें चिम्वसमानाकारत्व नियमविशेपके परिज्ञानरे दर्पण आदिका ग्रहण करनेमें उनकी प्रघृत्ति होती है। वस्तुतस्तु चिम्ब और प्रतिबिम्बमें अमेदपक्षकी कल्पना ही युक्त है, क्योंकि उसमें लाघव है और विम्बप्रतिविम्य भावापमत्वरूपसे श्षतिसिद्ध जीव और न्रह्मके अभेदकी प्रतिपत्तिमें उपयोगी होनेके कारण लौफिक चिम्ब और प्रतिविम्बका अभेद श्रुतिसे प्रमाणित भी है। प्रतिबिम्बभूत जीव दी जय ब्रह्माभिनन हो सकता है, तो तदतिरिक पारमार्थिक अवच्छिन जीवकी आवश्यकता ही क्यां है? विम्ब और प्रतिचिम्बके अभेदमें 'यथा हायं ज्योति•' इत्यादि श्रुति भी प्रमाण हो सकती है-जसे एक सूर्य अनेक जल आदि उपाधियोंमें प्रतिविम्बित होनेसे नाना होता है, और स्वतः एक दी है। इन प्रमाणोसे विम्ध और प्रतिबिम्बका अभेद ही सिद्ध होता है, भेद सिद्ध नहीं छोता, इसलिए पूर्वोंक विवरणकारका ही मत श्रेष्ठ है, यद्यपि सूक्ष्म विचारसे अभेदपक्ष ही ठीक है, इसीलिए भामती आदि प्रन्थोंमें लोफिकचिम्ब और प्रतिचिम्बके दृष्टानतसे ही जीव और ब्ा्मका अगेद व्यवस्थित किया गया है, तथापि यह प्रतिविम्वोत्पत्तिपक्रिया मन्दाधिकारियोंके लिए अर्थात् उनको अपनी बुद्धिके अनुसार तत्त्वका अधिगम हो, इसलिए प्रतिपादित है। अधिकांश कृष्णालंकार टीका पृ० ३१६ काशी चौ० मु० में देखना चाहिए।

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३२४ सिद्धान्तलैशंसँग्रह [द्वितीय परिच्छेद

यत्तु 'नात्र सुखम्' इति दर्पणे मुखसंसर्गमात्रस्य बाधः, न मुखस्येति। तन्न; 'नेदं रजतम्' इत्यत्रापि इदमर्थे रजततादात्म्यमात्रस्य वाघो, न. रजतस्येत्यापत्तेः । यदि च इदमंशे रजतस्य तादात्म्येनाथ्यासाद् 'नेदं रजतम्' इति तादात्म्येन रजतस्यैव बाध:, न तादात्म्यमात्रस्य, तदा दर्पणे सुखस्य संसर्र्गिितयाऽध्यासाद् 'नात् मुखम्' इति संसर्गितया सुखस्यैव बाधः, न संसर्गमात्रस्येति तुल्यम्। यत्तु धर्मिणोऽप्यध्यासकल्पने गौरवमिति, तद् रजताभासकलपना- गौरववत् प्रमाणिकत्वान्न दोपः। स्वनेत्रगोलकादिप्रतिविम्वभ्रमस्थले विम्बापरोक्ष्यकल्पनोपायाभावात्। नयनरश्मीनासुपाधिप्रतिहतानां विम्व- प्राप्तिकल्पने हि दष्टविरुद्धं बह्वापदयते। कथ हि जलसन्निकर्पे केषुचिन्न- और पूर्वमें जो कहा गया है कि 'यहाँ मुख नहीं है, इस प्रकारका जो बाध होता है, वह दर्पणमें सुखसंसर्गका ही वाध होता है, मुखका वाघ नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस बाधस्थलमें भी तुल्ययुक्तिसे इदमर्थमें रजतके तादात्म्यमात्रका वाघ प्रसक्त होगा, रजतका नहीं होगा। यह भी आपत्ति आ सकती है। यदि कहा जाय कि इदमंशमें रजतका तादात्म्यसे अध्यास होता है, इसलिए 'नेदं रजतम्' इससे तादातम्येन रजतका ही बाघ होता है, तादात््यमात्रका नहीं होता, तो हम भी इस रीतिसे कह सकते हैं कि दर्पणमें मुखका संसर्गरूपसे ही अध्यास होता है, अतः 'नात्र सुखम्' इससे संसर्गरूपसे मुखका ही बाघ होता है, केवल संसर्गका बाध नहीं होता है। और जो यह कहा है कि धर्मीके अध्यासकी कल्पनामें गौरव है, तो वह भी युक्त नहीं है, शुक्तिमें रजताध्यासकी कल्पनामें जैसे गौरव प्रामाणिक है, वैसे ही प्रतिबिम्बाध्यास भी * प्रामाणिक है, अतः गौरव दोष नहीं है। और स्वकीय नेत्रगोलक आदिके प्रतिबिम्धविभ्रमस्थलमें बिम्तभूत मुखकी अप- रोक्षताकी कल्पनामें कोई हेतु भी नहीं है। यदि उक्त दोषके परिहारके लिए नयनकी रश्मियोंका उपाधिके आघातसे बिम्बके प्रति गमन माना जाय, तो प्रमाणविरुद्ध भी अनेक प्रसङ्ग आ सकते हैं। [इसी दष्टविरुद्ध अर्थात् वाधकज्ञान उभयन्न समानरुपसे प्रमाण है, यह भाव है।

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प्रतिविम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३२५

यनरश्मिपु अग्रतिहतमन्तर्गच्छत्सु अन्ये जलसम्बन्धेनाऽपि प्रतिहन्यमाना नितान्तमृदव: सकलनयनरश्मिप्रतिघातिनं किरणसमूहं निर्जित्य तन्मध्यगतं सूर्यमण्डलं प्रविशेयुः। कथं च चन्द्रावलोकन इव तत्प्रतिविम्बावलोकनेऽपि अमृतशीतलं तद्विम्वसन्निकर्पाविशेपे लोचनयोः शैत्याभिव्यक्त्या आप्या- यनं न स्यात्। कथं च जलसम्बन्धेनाऽपि प्रतिहन्यमाना: शिलादिसम्बन्धेन न प्रतिहन्येरन्। तत्प्रतिहत्या परावृत्तौ वा नयनगोलकादिभिर्न संसृज्वेरन्। तत्संसर्गे वा संसृष्टं न साक्षात्कारयेयुः। दोपेणापि हि विशेपां- शग्रहणमात्रं प्रतिवध्यामनं दशयते, न तु सन्निकृष्टधर्मिस्वरूपग्रहणमपि।

प्रसङ्गका उपपादन करते हैं]। और जलके साथ सन्निकर्प होनेपर कुछ नयन- रश्मियाँ अप्रतिहृतरूपसे भीतर (जलके अन्दर) जाती हैं, यह माननेपर भी जलके सम्बन्धसे प्रतिहत होनेवाले, अत एव सर्वथा कोमल अन्य रश्ियाँ- सम्पूर्ण नयनरश्मियोंका प्रतिघात करनेवाले सूर्यकिरणके समूहको जीत कर, अर्थात् उसको दवाकर उनके मध्यवर्ती सूर्यमण्डलमें कैसे प्रवेश करेंगी? अर्थात् कभी सूर्यमण्डलको ग्रहण नहीं कर सकती हैं। और विम्बभूत चन्द्रके दर्शनके समान उसके प्रतिविम्वके दर्शनसे भी नेत्रोंमें शैत्यकी अभिव्यक्ति द्वारा उप्णताकी शान्ति क्यों नहीं होती है? अर्थात् विम्त् और प्रतिविम्त्नका अभेद- माननेवालोंके पक्षमें प्रतिविम्बके दर्शनसे मी नेत्रोंकी गर्मी शान्त होनी चाहिए, क्योंकि समृतके समान अत्यन्त शीतल चन्द्रविम्बके साथ सन्निकर्ष (विम्व प्रतिबिम्बामेदवादियोंके मतमें) समान ही है। और जिन नेत्ररश्मियोंका जलादि जैसे पदार्थोसे आघात होता है, उनका शिला आदिके सम्वन्धसे प्रतिघात क्यों नहीं होता है: अर्थात् शिलादिसे उनका प्रतिवात होना ही चाहिए, यह भाव है, यदि माना जाय कि शिला आदिसे भी प्रतिघात होता है, तो फिर लौटकर नयनगोलकके साथ सम्बन्ध क्यों नहीं होता है? यदि इसपर कहो कि नेत्रगोलकके साथ उनका सम्बन्ध होता है, तो वे नयनगोलक आदिका ग्रहण क्यों नहीं करती है ? यदि दोषविशेपसे इस प्रश्नका परिहार करेंगे, तो उसका यही उत्तर है कि दोपसे विशेष अंशका केवल ग्रहण ही प्रतिबद्ध देखा जाता है, सन्निकृष्ट (सम्बद्ध) धर्मीके स्वरूपका ग्रहण प्रतिबद्ध नहीं देखा जाता है।

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३२६ सिद्धान्तलेशसँग्रह [द्वितीय परिच्छेद

प्रतिमुखाध्यासपक्षे तु न किश्िद् दृष्टविरुद्धं कल्पनीयम्। तथा हि-अव्यव् हितस्थूलोन्धूतरूपस्येव चाक्षुपाध्यासदर्शनाद् विम्वगत स्थौल्योन्लूतरूपयो: स्वाश्रयसाक्षात्कारकारणत्वेन वलपयोः स्वाश्रयग्रति- विम्वाध्यासेऽपि कारणत्वम्, कुड्याद्यावरणद्रव्यस्य त्वगिन्द्रियादिन्यावेन प्राप्यकारितयाऽवगतनयनसन्निकर्विघट न दवारा व्यहस्तुसाक्षात्कार - प्रतिबन्धकत्वेन वलसस्य व्यवहितप्रतिविम्नाध्यासेऽपि विनैव द्वारान्तरं प्रतिवन्धकत्वं च कल्पनीयम्। तत्र को विरोध: क्वचित् कारणत्वादिना कलसस्य फलवलादन्यत्रापि कारणत्वादिकल्पने।

जिस पक्षमें विम्व और प्रतिविम्धका अभेद न मानकर अनिवचनीय प्रतिविम्बाध्यासकी ही उत्पत्ति मानी जाती है, उस पक्षमें किसी भी व्यवहार- विरुद्ध कारण या प्रतिवन्धककी कल्पना नहीं की जाती है। किसी पकारके व्यवधानसे रहित स्थूल और उद्भूत रूपनान्का ही चाक्षुप अध्यास लोकमें देखा जाता है, इससे विम्नमें रहनेवाले स्थूलत्व और. उद्धूतरूप, जो अपने आधारके प्रत्यक्षम * कारणतारूपसे विनिश्चित हैं, वे आश्रयके प्रतिविम्वाध्यासमें भी कारण हैं, ऐसी कल्पना कर सकते हैं। दिवाल आदि जितने आवारक द्रव्य हैं, वे-तवगिन्द्रियके समान + प्राप्य- कारित्वरुपसे निश्चित नेत्रके सन्निकर्षके विघटन द्वारा ही व्यवहित वस्तुके साक्षात्कारमें प्रतिबन्धक क्लप्त हैं, अतः व्यवहितके प्रतिम्बाध्यासमें भी किसी द्वारविशेपकी अपेक्षा न करके ही वे प्रतिबन्धक हैं, ऐसी कल्पना की जाती है। कहींपर कारणत्व् आदि रूपसे निश्चित वस्तुमें फलके वलसे यदि अन्यत्र भी कारणत्त्र आदिकी कल्पना की जाय, तो उसमें क्या विरोध है, अर्थात् कुछ भी विरोध नहीं है, यह भाव है।

  • अर्थात् महत्त्व और उद्भूतरूप इन दोनोंमें उनके आथयीभूत द्रव्यविपयक चाक्षप- प्रत्यक्षमान्रके प्रति कारणता है। यह पटादि प्रत्यक्ष स्थलमें देखा गया है, अतः क्लप् है। * जैसे त्वगिन्द्रय विपयदेशको प्राप्त होकर ही उस विषयका ग्रहण करती है, वैसे ही चक्षुरिन्द्रिय भी विषयदेश को प्राप्त करके ही विपयका ग्रहण करती है, अतः उनको प्राप्यकारी कह्ा जाता है। अतः पूर्वमें-दिवाल आदिमें साक्षातकार प्रतिवन्धकत्व माननेसे सननिकर्पमात्रका विलोप प्रसङ्ग होगा, यह जो कहा था, वह निराकृत हुआ समझना चाहिए, क्योंकि सननिकषमें हेतुत्वग्राहक प्रमाणके अनुरोधसे सननिकर्षके विघटन द्वारा ही कुस्यादिमॅ प्रत्यक्षकी प्रतिवन्धकता मानी जाती है,

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प्रतिविम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३२७

एतेनोपाधिप्रतिहतनयनर्मीनां विम्वप्राप्त्यनुपगमे व्यवहितस्यो- दधूतरूपादिरहितस्य च चाक्षुपप्रतिविम्बभ्रमग्रसङ्ग इति निरस्तम्। किं च तदुपगमे एव उक्तदूपणप्रसङ्ग: । कथम् साक्षात् सूर्याव- लोकन इय विना चक्षुर्विक्षेपमवनतमौलिना निरीक्ष्यमाणे सलिले ततः प्रतिहतानां नयनरश्मीनामूर्ध्वमुत्प्लत्य विम्धसूर्यग्राहकत्ववत् तिर्यक्चक्षुर्विक्षेपं विना ऋजुचक्षुपा दर्पणे विलोक्यमाने तत्प्रतिहतानां पार्शर्वस्थमुखग्राह. कत्ववच्च चदनसाचीकरणाभावेऽपयुपाधिप्रतिहतानां पृष्ठभागव्यवहितग्राहकत्वं

इससे अर्थात् विम्बगत अन्यवहितत्व, स्थूलत्व और उद्धूतरूपत्व आदिकी प्रतिविम्वध्यासके प्रति हेतुता होनेसे-उपाधिसे आहृत नयनरश्मियोंका विम्वके प्रति गमन न माना जाय, तो व्यवहित या उद्भूतरूप आदिसे रहित वस्तुका चाक्षुप प्रतिविम्नाध्यास प्रसक्त होगा-इस आपचिका भी निरास हुआ ही समझना चाहिए। किश्ञ, आहत रश्मियोंका विम्वके प्रति गमन माननेमें ही व्यवहितका प्रतिविम्ब मसक्त होगा। कैसे होगा? इस प्रकार होगा-जसे साक्षात् गगनस्थ सूर्यमण्डलको देखनेके लिए चक्षुका विक्षेप (चक्षुको सूर्यकी ओर करना) आवश्यक है, परन्तु उसके विना अधोमुखसे निरीक्ष्यमाण जलमें उससे (जलसे) प्रतिहृत नयनकी किरणें ऊपर जाकर विम्वका ग्रहण करती हैं, और जैसे [ पार्श्वस्थ (समीपस्थ) पुरुपको ग्रहण करनेके लिए चक्षुके तिरछेपनकी आवश्यकता होती है ] तिरछे देखे विना सीधे नेत्रोंसे देखे जाते हुए दर्पणमें उससे (दर्पणसे) प्रतिहत नेत्ररश्मियाँ पार्श्वस्थ मुखको ग्रहण करती हैं, वैसे ही वदनके साचीकरणके* बिना भी दर्पण आदि उपाधिसे प्रतिहत रश्मियोंसे पृष्ठभागसे व्यवहित पदार्थोका भी ग्रहण होना

प्रकृतमें प्रतिचिम्बाध्यासमें कुध्यादिव्यवहित मुखादि साक्षात्प्रतिवन्धक माना जाय, तो भी मकोई हानि नहीं है, अन्यथा प्रतिबिम्धकी उत्पत्तिम विम्बसनिकर्षको कारण न माननेके कारण व्यवदित वस्तुका भी प्रसा आ सकता है, अतः दिवाल आदिसे व्यवहित मुखादिमें प्रितिबिम्वो- त्पत्तिकी प्रतिबन्धकता माननी चाहिए, यह भाव है। * चक्षसे पृष्ठभागसे व्यवहित पदार्थका ग्रह्ण करनेमें उपयुक्त मुखका व्यापार अर्थात् पीछेके पदार्थको देखनेमें सुखको जो उसकी ओर घूमाना पढ़ता है, इसी व्यापार की प्रकृतमें स्राचीकरणशच्दसे विवक्षा की गई है, यह भाव है।

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३२८ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

तावद् दुर्वारम्। उपाधिप्रतिहतनयनरक्ष्मीनां प्रतिनिवृत्तिनियमं विहाय यत्र विम्बं तत्रैव गमनोपगमात्। तथा मलिनदर्पणे श्यामतया गौरमुखप्रति- विम्बस्थले विद्यमानस्यापि विम्बगतगौररूपस्य चाक्षुपज्ञानेऽनुपयोगितया पीतशङ्मत्रमन्यायेनारोप्यरूपवैशिष्टचेनैव विम्वमुखस्य चाक्षुपत्वं निर्वाह्य- मिति, तथैव नीरूपस्यापि दर्पणोपाधिश्यामत्ववैशिष्टयेन चाक्षुपप्रतिबिम्ब- भ्रमविषयत्वमपि दुर्वारम्। स्वतो नीरूपस्याि नभसोऽध्यस्तनल्यवैशिष्टचेन

चाहिए, क्योंकि उपाधिसे प्रतिहत नेत्ररश्मियोंके प्रतिनिवृत्तिनियंमका परित्याग करके जहाँ बिम्ब हो, वहीं गमनका उपगम है। तथा इसी प्रकारसे मलिन दर्पणमें गौरमुखके प्रतिचिम्वित होनेपर उस प्रतिविम्वका इयामरूपसे भान होता है, गौर रूपसे नहीं, इससे विम्बमें गौर रूपके रहनेपर भी उसका चाक्षुष ज्ञानमें उपयोग न होनेसे पीतशङ्गभ्रमन्यायसे* आरोपित रूपके सम्बन्धसे ही विम्बकी चाक्षुषताका निर्वाह करना चाहिए, इस अवस्थामें नीरूप आकाश आदिका भी दर्पण आदिके श्यामत्व सम्बन्धसे चाक्षुषप्रतिविम्नग्रम हो सकता है, क्योंकि + आकाशके स्वतः नीरूप होनेपर भी अध्यस्त नैल्यके प्रतिनिवृत्तिनियम-नेत्रगोलकके अभिमुख विषयसे आहत रश्मियाँ फिर गोलकके द्वारा शरीरके भीतर जाती हैं, इस प्रकारका नियम। * उपाधिप्रतिहृत नयनरश्मियोंके प्रतिनिवृत्तिनियमाभाव पक्षमें पृष्ठभागव्यवहित प्रति- बिम्वकी आपत्ति हो सकती है, वैसे ही नीरूप वायुका भी चाक्षुष प्रतिविम्ब प्रसक्त हो सकता है, इस प्रकार दूषणान्तरके समुच्चयके लिये तथा शब्द है। कवितार्किकमतके उपपादनके अवसरमें शंखका आरोप्य पीतरूपके सम्बन्धसे ही भ्रम हो सकता है, अन्यथा नहीं, यह कहा जा चुका है, इसी पीतशङ्गन्यायसे, यह भाव है। वस्तुतस्तु 'द्रव्यके चाक्षुष प्रत्यक्षमें द्रव्यगत उद्भूतरुप ही कारण है' इस नियमके विद्यमान होनेसे नीरूप द्रव्यका चाक्षुष प्रतिविम्व-त्रम हो ही नहीं सकता है। मलिन दर्पणसें गौर मुखके प्रतिविम्ब भ्रमस्थलमें और पीतशङ्ग आदि भ्रमस्थलमें 'श्याम मुख' और 'पीतशङ्ग' इस प्रकारके अमके पूर्वमें अध्यासके प्रति कारणभून धर्मिज्ञानमें गौर और शुक्ल आदि कारण होनेसे उपयोगके अभावकी सिद्धि नहीं हो सकती है, अर्थात् विम्वगत गौर रूप आदिकी उपयोगिता धर्मिज्ञानके लिए अवश्य है। द्रव्य चाक्षुषमें रूपविषय कत्वनियमाभाव कवितार्किकके मतमें दिखलाया भो जा चुका है। + कवितार्किकमतसे ही आरोप्यरूपविशिष्टत्वेन आकाशका चाळुप ज्ञान माना जाता है, वस्तुतस्व अन्य पूर्वाचा्योंको यह स्वीकृत नहीं है, उनके मतसे गगनमें समन्ताद् व्याप्त

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प्रतिविम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार ] भापानुवादसहित ३२९ चाक्षुपत्वसंप्नतिपत्तेः । तस्मात् स्वरूपतः प्रतिमुखाध्यासपक्ष एव श्रेयान्। सामान्यतोऽपि संस्कारो विशेपारोपकारणम् । स्वसे तथेव वाच्यत्वादिह विम्बानुसारिता ॥ २२ ॥ सामान्यतः संस्कार विद्येपारोपमें कारण होता है, क्योंकि रवपम अदष्टानुरोघसे पुरुपाकृति विशेषका अध्यास कहा गया है, अतः प्रकृतमें विम्नानुसारितासे मुखाकृतिका अध्यास होगा ।। २२॥ न च तत्रापि पूर्वानुभवसंस्कारदौर्घटयम्, पुरुपसामान्यानुभवसंस्कार-

इयांस्तु भेद :- स्वभेपु शुभाशुभहेत्वद्ष्टानुरोधेन पुरुपाकृतिविशेपा-

संसर्गसे चाक्षुपत्व माना गया है, इसलिए स्वरूपतः प्रतिविम्नाध्यासकी उत्पत्ति होती हे, यही पक्ष अधिकारी विशेपके लिए श्रेयस्कर है। प्रतिविम्ब्ाध्यास पक्षमें अध्यासके कारण संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि अध्यस्यमान मुखके सजातीय मुखका * पूर्वमें कदापि अनुभव हुआ ही नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि जैसे सामान्य पुरुषविपयक अनुभवसे जायमान संस्कारमात्रसे स्वप्नमें किसी समय अननुभूत पुरुपका अध्यास होता है, वैसे ही मुखके सामान्य अनुभवसे जायमान संस्कारमात्रसे दर्पणमें मुखविशेपका अध्यास हो सकता है। स्वप्न और प्रतिविम्वाध्यासमें केवल इतना ही विशेष है कि स्वप्नमें शुभ और

सूर्यके आलोक आदिविपयक चाक्षुप घृत्तिसे आलोक आदिसे अवच्छिन चैतन्यकी अभिव्यकतिके कालमें आलोक आदिमें अनुगत गगनसे अवच्छिन चैतन्यकी भी अभिव्यक्ति मानकर अभिव्यक्त गगनावच्छिन साक्षीमें नैल्य आदिका अध्यास मान कर नल्य आदिस विशिष्ट गगन साक्षीसे भासता है, यह प्रकृतमें ज्ञातव्य है। पहले यह जो कहा गया है कि उपाधिसे प्रतिद्दत नयनरश्मियोंका विम्वके प्रतति गमन न माना जाय, तो अध्यस्यमान मुखसदृश मुखविपयक अनुभवके पूर्वमें न होनेके कारण अध्यासके कारण संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः उपाधिसे टकर खाकर रश्मिर्या बिम्बको ग्रहण करती हैं, यह मानना चाहिए, इसका प्रकृत अ्रन्धसें खण्डन करते हैं। ४२

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३३० सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

ध्यास:, इह तु विम्बसन्निधानानुरोधेन सुखाकृतिविशेाध्यास इति। न च प्रतिविम्वस्य स्वरूपतो मिथ्यात्वे ब्रह्मप्रतिविम्बजीवस्यापि- मिथ्यात्वापत्तिर्दोपः । प्रतिविम्वजीवस्य तथात्वेऽप्यवच्छिन्नजीवस्य सत्यतयां मुक्तिभाकत्वोपपत्तेरिति। न च्छाया नापि वस्त्वन्यत्प्रतिविम्वमसंभवात्। प्रतिविम्ब् विम्बकी न छाया है और न अन्य वस्तु है क्योंकि उन दोनोंका सम्भव नहीं है। यत्तु प्रतिविम्वं दर्पणादिपु सुखच्छायाविशेपरूपतया सत्यमेवेति कस्य- चिन्मतम्, तन्न। छाया हि नाम शरीरादेस्तत्तदवयवैरालोके कियद्देश- व्यापिनि निरुद्धे तत्र देशे लब्धात्मकं तम एव। न च मौक्तिक- अशुभके हेतुभूत अदृष्टके अनुरोधसे पुरुपाकृतिविशेषका अध्यास होता है और प्रकृतमें विम्बके सामीप्यके अनुरोधसे मुखाकृतिविशेषका अध्यास होता है। यदि प्रतिविम्ब स्वरूपसे मिथ्या माना जाय, तो ब्रह्मके प्रतिविम्ब जीवमें भी मिथ्यात्व प्रसक्त होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिविम्बभूत : जीव मिथ्या है, तो भी अवच्छिन्न जीवके सत्यस्वरूप होनेसे मुक्तिभागिता हो सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि दर्पण आदिमें दिखनेवाला प्रतिविम्न मुखकी छायाविशेष है और वह सत्यस्वरूप ही है, परन्तु उन लोगोंका मत युक्त नहीं है, कारण कि शरीर आदिकी जो छाया है-वह कुछ देशमे व्याप् आलोकके शरीरके उन-उन अवयवोंसे निरुद्ध होनेपर उन उन देशोंमें आने- वाला-तमोरूप ही है, अन्य कोई पदार्थ नहीं है, और मौक्तिक, माणिक्य *प्रतिमुखके अध्यासमें मुखसामान्यानुभवजन्य संस्कार यदि कारण माना जाय, तो चैत्रमुख और दर्पणके परस्पर सान्निध्यमें अन्य मुखका भी स्वप्नके समान अध्यास प्रसक्त होगा, इसीका 'इयांस्तु' ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। * यद्यपि वृक्ष आदिकी छायामें नैल्यका भास होता है, और प्रतिविम्बमें प्रायः नैल्य नहीं देखा जाता है, इससे प्रतिविम्वको छाया मानना एक प्रकारसे अनुचित सा ही है, तथापि उसको छायाविशेष माननेमें कोई दोष नहीं है अर्थात वृक्ष आदिकी नीलरूप युक्त जैसे छाया है, वैस ही दर्पण आदिमें पढ़नेवाला प्रतिविम्व भी विलक्षण छायाभेद ही है, इसलिए विम्वसे छायाके भिन्न होनेपर भी वृक्ष आदिकी छायाके समान वह सत्य ही है, असत्य नहीं है, क्योंकि छायाका लोकमें मिथ्यात्वेन ग्रहण नहीं हो सकता है इसी विशेष अर्थका सूचन करनेके लिए मूलकारने 'छायाविशेष' में विशेष पद दिया है, यह भाव है।

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प्रतिविम्व्रफी सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३३१

• युक्तम्। न वा तमोरूपच्छायारहिततपनादिप्रतिविम्वस्य तथात्वमुपपन्नम्। ननु तर्हि प्रतिविम्बरूपच्छायायास्तमोरूपत्वासम्भवे द्रव्यान्तरत्वमस्तु, कलसतद्रव्यानन्तर्भावे तमोवद् द्रव्यान्तरत्वाकल्पनोपपत्तेरिति चेद, तत् किं द्रव्यान्तरं प्रतीयमानरूपपरिमाणसंस्थानविशेपप्रत्यङ्मुखत्वादिधर्म- युक्तम्, तद्रहितं वा स्यात्: अन्त्ये न तेन द्रव्यान्तरेण रूपविशेपादि-

आदिका मतिबिग्व, जो कि तमसे अत्यन्त विरुद्ध श्ेत और रक्त है, वह अन्धकाररूप छाया केसे हो सकता है, अर्थात किसी प्रकारसे भी मोती आदि की छाया सन्धकार रूप नहीं + हो सकती है। और अन्धकाररूप छायासे रहित सूर्यके प्रतिनिम्त्रको छाया रूप मानना युक्तियुक्त नहीं हो सकता है, अतः उनका मत तुच्छ है। यदि पुनः इस विपयम शक्का हो कि प्रतिविम्बरूप छाया अन्धकाररूप भले दी न हो सके, परन्तु अन्य द्रव्यरूप हो सकेगी, क्योंकि उसका पृथ्वी आदि दव्यमें अन्तर्भाव न होनेपर भी अन्धकारके समान उसे अन्य द्रव्य मान सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमं विकल्प हो सकता है कि पतिविम्वरूप वह द्रव्यान्तर क्या प्रतीयमान रूप, परिमाण, संस्थान- विशेष और प्रत्यस्मुख़त्व आदि धर्मोंसे युक्त है या उनसे रहित है ? यदि द्वितीय पक्षका अद्रीकार करो, तो उस कल्पित द्रव्यान्तरसे रूपविशेप

नें. तह्पर्य यद है कि अन्धकार द्रव्यका गुण है नीलरूप, मोती, माणिक्य, आदिके प्रति- विन्च छायामें भी फ्रमशः देत और रक (लोहित) रूप ही देसे जाते हैं, अतः उन्हें सन्यकार फेसे मान सकते है, क्योंकि वह अत्यन्त विरुद् है। यदि करथचित ऐसा मान भी लिया जाय, तो भी जिसकी कभी छाया(अन्धकार) ही नहीं है, ऐसे अन्धकारके अनाथय सूरचका जल आदिमें प्रतििम्ब देसा जाता है, उस प्रतिचिम्बको अन्धकाररूप छाया केसे माम सफते हैं, अतः प्रतिबिम्यको अन्यकाररूप छाया नहीं मान सकते है। अत एव छायाके दष्टान्तसे उसे सत्य भी नहीं मान सकते है, गह प्रतिबिम्बमिध्यात्ववादियोंका मत है। * अद्यपि नैयाधिक लोग अन्धकारको प्रकृष्ठ प्रकाशक तेजोभावरूप मानते है, तथापि विद्वान्तम वह अभावरु नहीं है, किन्तु पृथ्वी आदि नौ द्रव्योंके समान दशम द्रव्यरूप माना गया है, इसी प्रकार प्रतिबिम्बको भी अन्धकारके समान एकादशयाँ द्रव्य गानेगे, यह गाय है।

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३३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

घटित प्रतिविस्वोपलम्भनिर्वाह इति व्यर्थं तत्कल्पनम्। प्रथमे तु कथमे- कस्मिन्नल्पपरिमाणे युगपदसंकीर्णतया प्रतीयमानानां महापरिमाणानाम- नेकमुख प्रतिबिम्बानां सत्यतानिर्वाहः१ कथं च निचिडावयवानुस्यूते दर्पणे तथैवाऽवतिष्ठमाने तदन्तर्हतुनासिकाद्यनेकनिम्नोन्नतप्रदेशवतो द्रव्यान्त- रस्योत्पत्तिः १ किं च सितपीतरक्ताद्यनेकवर्णादिमतः प्रतिबिम्वस्योत्पत्तौ दर्पणमध्ये स्थितं तत्सन्निहितं न ताद्दशं कारणमस्ति । यद्ुच्येत-'उपाधिमध्यविश्रान्तियोग्यपरिमाणानामेव प्रतिविम्वानां महापरिमाणज्ञानं तादशनिम्नोनतादिज्ञानं च भ्रम एव। यथापूर्वं दर्पण-

आदिसे युक्त उपलभ्यमान प्रतिबिम्बका निर्वाह नहीं हो सकता है, अतः ऐसे निरर्थक द्रव्यान्तरको मानना अयुक्त है। प्रथम पक्ष मानो, तो अल्प परिमाणवाले एक ही दर्पणमें युगपत् ( एक कालमें) असंकीर्णरूपसे ग्रतीयमान बड़े परि- माणवाले अनेक सुखप्रतिबिम्बोंमें सत्यताका निर्वाह कैसे हो सकेगा ।। अर्थात् सत्यताका निर्वाह नहीं हो सकेगा। और दूसरी बात यह भी है कि अत्यन्त घने अवयवोंसे अनुस्यूत दर्पण, जो ज्योंका त्यों है, उसमें हनु, नासिका आदि अनेक निन्न उन्नत प्रदेशोंसे युक्त अन्य द्रव्यकी उत्पत्ति भी कैसे हो सकती है? किश्च, श्वेत, पीत, रक्त आदि अनेक रक्गोंसे युक्त प्रति- बिम्बकी उत्पत्तिमें दर्पणके भीतर स्थित, अथवा उसके समीपवर्ती कोई श्वेत आदि वर्णोंसे युक्त कारण भी नहीं है, जिससे कि उस प्रतिविम्न्रात्मक द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति भी हो सके। यदि कहा जाय कि दर्पण आदि उपाधियोंके वीचमें जिस परिमाणसे विश्रान्ति कर सके, ऐसे ही परिमाणसे युक्त प्रतिविम्ब उत्पन्न होते हैं, और उनमें महापरिमाणका जो अवभास होता है और हनु, नासिका आदि जो निभ्नोन्नतादि ज्ञान होता है, वह भ्रमात्मक ही है। एवं उसके अवयवोंकी अव- * अर्थात् प्रतिविम्वको रूपादिरहित माननेपर रूपादियुक्त प्रतिविम्वका जो प्रत्यक्ष होता- है, उसके साथ विरोध होगा, यह भाव है। * तात्पर्य यह है कि छोटे दर्पणमें एक कालमें ही अनेक बड़े बड़े असंकीर्णरूपसे प्रतीयमान प्रतिविम्बोंके द्रव्यान्तर होनेपर भी उन्हें सत्यस्वरूप नहीं मान सकते हैं। मिथ्या माननेपर तो जैसे स्वप्नावस्थामें छोटे शरीरान्तराकाशमें बड़े वड़े रथ, गज आदिका उपलम्भ होता है, वैसे ही स्वल्प परिमाणवाले दर्पणोंमें उनकी उपपत्ति हो सकती है। -

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पतिचिम्चकी सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित

कल्प्यम्' इति। तहि शुक्तिरजतमपि सत्यमस्तु। तत्रापि शुक्तौ यथापूर्वे स्थितायामेव तत्तादात्म्यापन्नरजतोत्पादनसमर्थ किश्चित्कारणं परिकल्प्य

किं 'शुक्तिरजतमसत्यम्, प्रतितनिम्बः सत्यः' इत्यर्धजरतीयन्यायेन। न च तथा सति 'रजतम्' इति दशयमानायाः शुक्तेरयौ प्रक्षेपे रजतचद् द्रवीभा-

स्थिति पूर्ववत् ही रहे, इसलिए उनका अविरोधी तथा उस प्रतिबिम्बके उत्पादनमं समर्थ किसी कारण द्रव्यकी भी कल्पना करनी चाहिए । इसलिए प्रतिविग्व्रके द्रव्यान्तर और सत्य होनेमें कोई विरोध नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस यु्तिसे शुक्तिरजत भी सत्य हो जायगा। अर्थात् शुक्ति- रजतम भी यथापूर्व अवस्थित शुक्तिमें ही शुक्तितादात्म्यापन्न रजतके उत्पादनमें समर्थ किसी कारणविशेषकी कल्पना करके उस रजतम दोपत्वसे अभिमत फारण सदकृत इन्द्रियग्राहस् नियमको मानकर उपपत्ति हो सकती हे फिर . 'शुक्तिरजत असत्य है' और प्रतिबिम्ब सत्य है ? इस अर्धजरतीयन्यायके अ्ीकारका प्रयोजन ही क्या है? यदि शक्ा हो कि शुक्तिरजतको सत्य नहीं मान सकते हैं, कारण कि उनके सत्य होनेपर रजतरूपसे देखी गई शुक्ति का अधिंगे प्रक्षेप करनेपर रजतके समान द्रवीभावकी आपति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अधि और कस्तूरीके प्रतिविम्बम जसे उप्णता और

  • नेगे मोघरके अवयनोगें मोहोके अवयय भीमांसिकोंने माने है, घैसे ही दर्पणके अयगनोंमें संख प्रतिबिम्यके अचयर्वोकी भी पल़पना करनी चाहिए, यह तात्पर्य है। यहाँ शका करनेयालेका भार गद दैकि प्रतिबिम्य स्वर्यं सत्य दे और उसमें ग्रतीयमान धर्म अस्त्य है। हर यहि शुिरवत मत्य माना जायगा तो उसका अस्तित्व यदा झुकिमें होनेके वरण शुदिप्रत्यक्षकानमें भी रजतका प्रत्यक्ष होना चाटिए, इम शक्ाका इस नियमसे परिहार किया गया अगात शुचिमें रत्क दोनेपर भी उसका प्रत्यक्ष तभी होगा जय इन्द्रिय दोपमदकूत रोगी, अबः पूर्वीध दोप नहीं आ सफता है, यह भाव है। + जरती-पदा, उसके आधे दिस्सेकी सुस आदिकी अमिलापा करना और अवशिष्ट भागकी इचछा नहीं करना, इसमें कोई युफि नहीं है, ैसे प्कृसमें शुकतिरजतको मिथ्या मानना वोर प्रतिबिम्यको सत्य मानना, युकिवितुर है।

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३३४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेंद

रजतस्य द्रवीभावयोग्यताराहित्योपपत्तेः । अथोच्येत-'नेदं रजतम्', 'मिथ्यैव रजतमभाद्' इति सर्वसंप्रति- पन्नवाधान्न शुक्तिरजतं सत्यम्' इति। तर्हि 'दर्पणे मुख नास्ति, मिथ्यवात्र दर्पणे मुखमभाद्' इत्यादिसर्वसिद्धवाधात् प्रतिविम्धमप्यसत्यमित्येव युक्तम्। तस्माद्सङ्गतः प्रतिविम्वसत्यत्ववादः ।

प्रतिविम्ब मिथ्या है यह कथन भी अयुक्त है क्योंकि शुक्तिर नतके समान उसके उपादान कारण अज्ञान का नाश हो गया है ।। २३॥। ननु तन्मिथ्यात्ववादो्ययुक्त, शुक्तिरजत इव कस्यचिदन्वय- सौगन्ध्य नहीं है, वैसे ही शुक्तिरजतमें द्रवीभावकी योग्यता नहीं है, इस प्रकार कह सकते हैं। यदि कहा जाय कि 'यह रजत नहीं है' 'मिथ्या ही रजत देखा गया' इस प्रकार जगत्प्रसिद्ध वाघसे शुक्तिरजत सत्य नहीं हो सकता, तो तुल्य- युक्त्या यह भी कह सकते हैं कि दर्पणमें मिथ्या ही मुख देखा गया, इस प्रकारके सर्वजनीन वाधके अनुभवसे प्रतिविम्ध भी असत्यं हो सकता है। इसलिए प्रतिविम्ब सत्यत्ववाद असङ्गत है। यदि शङ्का + हो कि प्रतिविम्वका मिथ्यात्ववाद भी युक्तिहीन ही है, जिस पक्षमें विम्व और प्रतिविम्वका अभेद है, उस पक्षमें प्रतिविम्वमें जो मिथ्यात्वका अनुभव होता है, वह प्रतिविम्वत्वरूपसे प्रतिविम्बको विपय करता है, स्वरूपतः प्रतिविम्बको विषय नहीं करता है, यह ज्ञातव्य है। यदि शङ्गा हो कि शुक्तिरजतमें जो मिथ्यात्वक अनुभव होता है, वह इदमर्थ तादात्म्यापन्नत्वरूपसे रजतको दिपय करता है, स्वरूपतः रजतको विषय नहीं करता है, इस प्रकार शुक्तिरजतस्थलमें कहकर रजत और इदमर्थका तादात्म्य ही कल्पित है, रजत कल्पित नहीं है? तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि शुकिमें अनिर्वरचनीय रजतकी उत्पत्ति यदि नहीं मानी जायगी, तो रजतका प्रत्यक्ष हो ही नहीं सकता है, अतः उसकी उत्पत्ति अवश्य माननी चाहिए। उसकी उत्पत्तिमे अन्वय और व्यतिरेकसे अनिर्वचनीय अज्ञान ही- कारण है, अन्य नहीं है, अतः वह मिथ्या ही हो सकता है, क्योंकि शुक्तिरजतमें सत्यत्व- साधक अनन्यथासिद्ध कोई प्रमाण नहीं है, जैसे कि विम्ब और प्रतिविम्बके अभेद पक्षमें प्रतिविम्वमें सत्यत्वसाधक प्रमाण पूर्वमें हैं। अतः शुक्तिरजतमें मिथ्यात्वावगाही अनुभव स्वरूपतः रजतका अवगाहन करता है इससे शुक्तिरजत मिथ्या ही है, यह भाव है। + प्रतिविम्वाध्यासमें अज्ञान उपादान कारण नहीं है, क्योंकि दर्पण आदि अधिष्टानोंकी

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प्तिविम्त्रका सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३३५

व्यति रेकशालिन: कारणस्याऽज्ञानस्य निवर्तकस्य च ज्ञानस्य चाऽनिरूपणात्। अध केचिदविद्याऽन्ाऽडवरणांशे विनश्यति। विक्षेपांशे तु विम्वादिमतिवद्धाऽस्य कारणम् ॥ २४ ॥ इसपर कुछ लोग कहते है कि यदांपर अज्ञानका आवरण अंशसे नाय हो जाता है और विक्षेप अंशसे अज्ञान रहता है। वही विम्बसम्बद्ध प्रतिविम्व मुखका कारण होता है॥ २४ ॥ अत्र केचित्-यद्यपि सर्वात्मनाऽधिष्ठानज्ञानानन्तरमपि जायमाने प्रतिविम्वाध्यासे नाऽिष्टानावरणमज्ञानमुपादानम्, न वाउधिष्ठानविशेपांश- ज्ञानं निवर्तकम्, तथाऽप्यधिष्ठानाज्ञानस्यावरणशक्त्यंशेन निवृत्तावपि विक्षेप-

व्योंकि शुक्तिरजतके समान किसी अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त अज्ञानरूप कारणका और निवर्तक ज्ञानका निरुषण नहीं हो सकता है? इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि सामान्य और विशेपरूपसे अधिष्ठानके ज्ञानके अनन्तर उत्पन्न होनेवाले प्रतिविम्बाध्यासमें अधिष्ठानका आवारक अज्ञान उपादान नहीं है और अधिष्ठानके विशेपांशका ज्ञान प्रतिविम्वाध्यासका निवर्तक नहीं है, तथापि आवरणशक्तिसे युक्त

अभिगति सर्वोत्मना होनेके कारण अज्ञान निवृत हो गया है, आर अधिष्वान साक्षातकारके रहते प्रतिविम्याध्यसरो अनुपृति होनेके कारण ज्ञान अधिष्ठानज्ञान निवर्त्यत्वरूप मिध्यात्व भी उमनें नहीं है, अतः प्रतिबिन्य मिथ्यात्यवाद अगवत है, यह पूर्वपक्षका भाव है। अग गुफिरजत अगरथलमें शुकिका अज्ञान अन्वय और व्यततरेकमे शुक्तिरजताध्यासका कारण हे, जग़ा कि निकषण किया जा नुा है, वैसे प्रतिबिम्याध्यासमें दर्षणका अज्ञान होनेपर प्रतिबिन्बाध्याय होगा और उसके अभावगें नहदीं होगा। इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेकसे युत्त जमानका निसतपण नहीं कर सकते हैं और प्रतिविम्बाध्याखका निर्वतक ज्ञान भी उपलब्ध नहीं होता है, खतः प्रतिबिम्वमिध्यात्ववाद अरकत है। • सुषिमें जय रजतफा अध्यार दोता है, तब पूर्यमें शुक्तिका इदन्त्वसामान्यरूपसे ज्ञान दोता ऐ युकित्वादिविशेपरपये नहीं होता है, अतः शुकिरजतमें अधिष्टानके विशेषका आवरण अज्ञान उपादान हो सकता है, प्रकृतमें प्रतिविम्वाध्यासके पूर्वमें इदन्त्व सामान्यसे और दर्पणत्वविद्योपये अमिश्वानका साक्षात्कार होनेके कारण सर्वाशमें ही दर्पण आदिका साक्षात्कार है, अतः अधिष्टानविशेर्पाशावरणस्व अज्ञानके निवृत होनेके कारण वह प्रतिविम्वाध्यासके प्रति उपादान नदीं हो सकता है, यह नुक है, तथापि अज्ञानके एकदेशकी निवृत्ति होनेके कारण अवशिषविक्षेपाशियुकत जशान दी प्रतिविम्नाध्यासके प्रति उपादान है, अतः विरोध नहीं है, यह भाव है।

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३३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

शक्त्यंशेनानुवृत्तिसम्भवात् तदेवोपादानम्। विम्ब्रोपाधिसन्निधिनिवृत्ति सचिवं चाऽघिष्ठानज्ञानं सोपादानस्य तस्य निवर्तकमिति। मूलाविद्याऽथवा हेतुर्विक्षेपांशेन संस्थिता। विम्वादिदोपजन्यत्वान्मिथ्येत्यन्ये प्रचक्षते ।। २५ ॥। अथवा विक्षप अशसे स्थित मूलाऽविद्या प्रतिविम्वाध्यासकी हेतु है विम्ब आदिके दोपसे जन्य होनेके कारण प्रतिविम्ब मिथ्या है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं॥ २५॥ अन्ये तु ज्ञानस्य विक्षेपशकत्यंशं विहायाऽवरणशक्त्यंशमात्रनिवर्तकत्वं न स्वाभाविकम्, त्रह्मज्ञानेन मूलाज्ञानस्य शुक्त्यादिज्ञानेनाऽवस्थाऽज्ञा- नस्य चाऽडवरणशक्त्यंशमात्रनिवृत्तौ तस्य विक्षेपशक्त्या सर्वदाऽनुवृत्ति-

प्रयुक्तं तद्। विम्योपाधिसन्निधानात् प्रागेव विम्व्े चैत्रमुखे दर्पणसंसर्गाद्य-

अधिष्ठानके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपशक्तिरूप अंशसे युक्त अज्ञानकी अनुवृत्ति होनेसे वही विक्षेपशक्तिरूप अंशसे युक्त अज्ञान प्रतिबिम्ना- ध्यासके प्रति कारण है। विम्त्र और उपाधिकी सन्निधिकी निवृत्तिसे युक्त अघिष्ठान- ज्ञान (दर्पणमें मेरा मुख नहीं है) उपादानसहित अध्यासका निवर्तक है। कुछ लोग तो कहते हैं कि अज्ञानके विक्षेपशक्तिरूप अंशको छोड़कर केवल आवरणशक्त्यंशका निवर्तक ज्ञान स्वभावतः नहीं हो सकता है, क्योंकि, ब्रह्मज्ञान- से मूलाज्ञानका और शुक्ति आदिके ज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानका केवल आवरण शक्त्यंश ही यदि निवृत्त होगा, तो विक्षेपशक्त्यंशसे युक्त अज्ञानकी सर्वदा अर्थात् विदेहकवल्यावस्थामें मी अनुवृत्ति प्रसक्त होगी। यदि शङ्का हो कि विम्त और उपाधि (दर्पण आदि) के सान्निध्यरूप विक्षेप शक्त्यंशकी निवृत्तिके प्रतिबन्धकसे युक्त ही ज्ञान केवल आवरण शक्त्यंशको निवृत्त करता है, स्वभावतः नहीं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि * विम्ब और दर्पण आदि उपाधिके आभिमुख्यलक्षण

  • प्रतिविम्ब और विम्बके अभेदपक्षमें प्रतिविम्बकी उत्पत्ति न होनेपर भी विम्बभूत चैत्र के मुखमें विम्वत्व और प्रतिविम्वत्व आदि अनिर्वचनीय धर्म उत्पन्न होते हैं, ऐसा माना गया है, अतः चैन्नके सुखावच्छिन चैतन्यमें रहनेवाला अज्ञान ही उसका कारण होगा, दर्पणकी सन्निधिके पूर्वमें विष्णुमित्र द्वारा चन्रमुखके निरीक्ष्यमाण होनेपर उस समय प्रतिवन्धकके न •रहनसे चन्नमुखविपयक विष्णुमित्रके साक्षात्कारसे विक्षेपशक्तिसे युकत उस अज्ञानकी निवत्ति

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प्रतिविम्त्की सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३३७

भावे दर्पणे चैत्रमुखाभावे वा प्रत्यक्षतोऽवगम्यमाने विक्षेपशक्त्यंशस्यापि निवृत्यवश्यम्भावेन तत्काले तयोस्सन्निधाने सति उपादानाभावेन प्रति- विम्नभ्रमाभावप्रसङ्गात्। अतो सूलाज्ञानमेव प्रतिविम्वाध्यासस्योपादानम्। न चाऽत्राऽप्युक्तदोपतोल्यम्। पराग्विपयवृत्तिपरिणामानां स्वस्वविपया- चच्छिन्नचतन्यप्रदेशे मूलाज्ञानावरणशक्त्यंशाभिभावकत्वेऽपि तदीयविक्षेप-

विलयापचेः ।

सन्निधानके पूर्वक्षणमें ही विग्वभूत चत्रके सुखमें दर्पणस्थत्व आदि दर्पण- संसर्गके अभावका अर्थात् चैत्रमुखमें दर्पणस्थत्वादि नहीं हैं, इस प्रकारके अभावका अथवा दर्पणमें चैत्रका मुख नहीं है, इस प्रकार प्रत्यक्षसे दर्पणमें चैत्र- मुखके अभावका ग्रहण होनेपर प्रतिबन्धकके न रहनेसे विक्षेपशक्त्यंशसे युक्त अज्ञानकी भी निवृत्ति अवश्य होगी, इस परिस्थितिमं विक्षेपशक्त्यंशनिवर्तक साक्षात्कारकी उत्चतिके द्वितीय क्षणमें चैत्रमुख और उपाधिका सान्निध्य होने- पर मी उपादानके (विक्षेपशक्त्यंशयुक्त अवस्थारूप अज्ञानके) न होनेके कारण अधिष्ठानसे युक्त विष्णुमित्रको 'दर्पणमें चैत्रमुख है' इस प्रकार प्रति- चिन्नाध्यास नहीं होगा, अतः-अवस्थारूप अज्ञानके प्रतिबिम्वाध्यासके प्रति कारण न होनेसे-उसके प्रति मूलाज्ञानको ही उपादानकारण मानना चाहिए। यदि शक्ञा हो कि इसमें भी पूर्वोक्त दोष तुल्य ही है, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि पुरोवर्ती घटादिविपय आकारसे परिणत अन्तःकरणकी वृत्तियां यद्यपि अपने-अपने विषयावच्छिन्न चैतन्यप्रदेशमें मूलाज्ञानके आवरण शक्त्यंशकी निवृत्ति करती हैं, तथापि वे वृत्तियाँ अज्ञानके विक्षेपांशकी निवृत्ति नदीं करती हैं, ऐसा अभ्युपगम है। यदि यह न माना जाय, तो उस-उस प्रदेशमं स्थित व्यावहारिक विषयोंका भी विलोप हो जायगा।

होती है। त्तर क्षणमें ही चैत्रमुसका दर्पणाभिमुख्य होनेपर विष्णुमित्रको 'दर्पणमें चेन्नका मुल है' दस प्रकार भ्रम होता, उसमें दर्पणस्थत्व आदिकी उत्पत्ति नहीं दोगी, क्योंकि विकपशचिसे युछ अज्ञानरूप उपादान नहीं है, इस अभिप्नायसे 'विम्बोपाधि' एलादिये उपाधिवलिधानरूप विदवपशतयंशनिवृत्तिप्रतिवन्धकप्रयुकत ज्ञानमें आवणशात्तयंश निवतकत्वका खण्ठन किया जाता है, यह भाव है।

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३३८ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

न च प्रतिविम्वस्य मूलाज्ञानकार्यत्वे व्याघहारिकत्वापत्तिः । अविद्यातिरिक्तदोषाजन्यत्वस्य व्यावहारिकत्वप्रयोजकत्वात्। ग्रकृते च तद्तिरिक्तविम्वोपाधिसन्निधानदोपसद्धावेन प्रातिभासिकत्वोपपचेः। विम्वापसरणाध्यक्षाद्विक्षेपांशस्य वाधनम्। विरोधादथवा बह्ज्ञानेनवास्य वाधनम् ॥ २६ ॥ विम्बकी सन्निधिकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कारसे विक्षेप अंग का वाघ होता है, क्योंकि दोनोंका परस्पर विरोध है अथवा केवल ब्रहाज्ञानसे ही विक्षेप अंशका नाश होता है।। २६ ॥ न चैंवं सति विम्बोपाधिसन्निधिनिवृत्तिसहकृतस्याप्यघिष्ठान- ज्ञानस्य प्रतिविम्बाध्यासानिवर्तकत्वप्रसङ्ग:, तन्मूलाज्ञाननिवर्तकत्वाभावा- दिति वाच्यम्, विरोधाभावाद्। त्रह्माज्ञानानिवर्तकत्वेऽपि तदुपादानक- यदि शक्का हो कि प्रतिविम्बाध्यासके प्रति मूलाज्ञान उपादान माना जायगा, तो घटादिके समान वे भी व्यावहारिक होंगे, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि व्यावहारिकत्वके प्रति केवल अविद्या ही कारण होती है, और यहांपर अविद्यासे अतिरिक्त विम्ब और उपाधिके सान्निध्य आदि दोपोंका भी कारणत्वरूपसे अवस्थान होनेसे व्यावहारिकत्वकी आपत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु प्रातिभासिकत्वकी ही उपपत्ति हो सकती है। यदि पुनः शङ्का हो कि प्रतिविम्वाध्यास सूलाज्ञानका कार्य होगा, तो बिम्ब और उपाधिके सान्निध्यकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कार भी प्रति- बिम्बाध्यासका निवर्तक नहीं हो सकेगा, क्योंकि शुकिरजत आदि स्थलमें केवल अघिष्ठानका साक्षात्कार ही निवर्तक देखा गया है, अतः उक्त सान्निध्य- निवृत्तिसहकृत अधिष्ठानसाक्षात्कार मूलाज्ञानका निवर्तक नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विरोधके न होनेसे * अधिष्ठानसाक्षात्कार ब्रह्माज्ञानका निवर्तक न होनेपर भी न्रम्माज्ञान (मूलाज्ञान). है उपादान ज्ञान और अज्ञानका वहींपर ही विरोध होता है, जहाँपर वे दोनों समानविपयक हो, इसीसे पटाज्ञानकी घटज्ञानसे निवृत्ति नहीं होती है। प्रकृतमें सूलाज्ञान ब्रह्मविपयक है, और प्रतिविम्वाध्यासका अधिष्ठानसाक्षात्कार दर्पणाय्यवच्छिनन चैतन्वय है, अः उनका समानविषयकत्वरूप विरोधका प्रयोजक न होनेसे विरोध नहीं है, अतः यदि उक्त अधिष्ठानके ज्ञानको त्रह्माज्ञानका निवतेक न माना जाय, तो भी ग्रन्थोक्तरीतिसे अधिष्ठानज्ञानमें अध्यासके निवर्तकत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है।

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प्रतिविम्धकी सत्यताका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३३९

प्रति विम्ाध्यास विरोधिविपयकतयाऽघिष्ठानयाथात्म्यज्ञानस्य प्रतिबन्धकवि- .रहसचितस्य तन्निवर्तकत्वोपपत्तेः । अवस्थाऽज्ञानोपादानत्वपक्षेऽपि तस्य आचीनाघिष्टानज्ञाननिवर्तितावरणशक्तिकस्य समानविपयत्वभङ्गेन प्रतिबन्ध- काभावकाली नाघिष्ठानज्ञानेन निवर्तयितुमशक्यतया प्रति विम्बाध्यासमात्र- स्यैव तन्निवर्त्यत्वस्योपेयत्वात्। अथवा स्वोपादानाज्ञाननिवर्तकत्रह्मज्ञान-

जिसका, ऐसे प्रतिविम्वाध्यासके प्रति विरोधिविपयक हेोनेसे-'दर्पणमें सुख नहीं हे, इत्यादिरूप अधिष्ठानयथार्थज्ञानके अभावविपयक होनेसे-प्रति- चन्धक (उक्त सन्निधान ) की निवृत्तिसहकृत अधिष्ठानयथार्थज्ञान मूलाज्ञानका निवर्तक हो सकता है। जो लोग अवस्थारूप अज्ञानको प्रतिबिम्वाध्यासका उपादान मानते हैं, उनके पक्षमें भी * अवस्थारूप अज्ञानके, जिसकी कि आवशरणशक्ि 'दर्पणमें मुख नहीं है' इस प्रकारके प्रतिविम्वाध्यासके प्राक्तन अधिष्ठानसाक्षात्कारसे निवृत्त हो गई है, समानविपयत्वका भङ्ग होनेसे चिम्ब और उपाधिकी सन्निधिरूप प्रतिबन्धकके अभावकालीन अघिष्ठानज्ञानसे 4 उस अवस्थारूप अज्ञानकी निवृत्ति नहीं कर सकते हैं, अतः प्रतिविम्बा- ध्यासमात्र ही अघिष्ठानसाक्षात्कारसे निवृत्त होता है, ऐसा माना गया है। सथवा प्रतिविम्वाध्यासके प्रति उपादानभूत अज्ञानके निवर्तक न्रह्मज्ञानसे

• जिस पक्षमें प्रतिविम्बाध्यासको अवस्थारूप अशानसे जन्य मानते हैं, उस पक्षमें भी विम्ब और उपाधिके स्रान्निध्यकी निरत्तिसे युक अधिष्ठानसाक्षात्कार ही उस क्षध्यासके उपादानका (अज्ञानका) निवतक होता है, यह मानना दोगा, दसीसे जान अज्ञानका ही निवर्तक है और अज्ञानका कार्य तो उपादानकी निमृत्तिये निवृत्त होता है, इस प्रकारका पञ्चपादिकाकारका वचन सार्धक दोता है, इस प्रकार आशक् करके अवस्थारूप अज्ञानके उपादानत्वपक्षसे प्रतिषिम्याध्यासकी निरृततका प्रकार बतलाते हैं, यह भाव है। + आवरणके विनष् होनेपर दर्पणाद्यवच्छित चतन्य अवस्वारप अज्ञानका विपय नहीं हो सफता है, अतः अधिष्ानश्ञान अवस्यारुव अज्ञानका समानविषयक नहीं होगा, एस् परिस्थितिमें उनका परस्पर निवत्य-निवर्तकभाव नहीं हो सकता है, केवल प्रति- विम्बाय्याममान्नकी सी निृत्ति ज्ञान करता है, यह अवस्थारुप अज्ञानके प्रतििम्वाध्यासो- पादानत्वपक्षमें मानना होगा, यद भाव है। 1 उक पक्षके अनुवार निवत्यनिवर्तकभावकी उपपत्ति करनेपर भी 'ज्ञान अज्ञानका दी निवतफ है, इस पञ्चपादिकाकारके वचनके साथ अविरोध नहीं होता है, अतः 'अथवा' पक्ष है।

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३४० सिद्धान्तलेश संग्रंह [द्वितीय परिच्छेद

निवर्त्य एंवायमध्यासोऽस्तु। व्यावहारिकत्वापत्तिस्तु अविद्यातिरिक्तदोप- जन्यत्वेन प्रत्युक्तेत्याहुः ॥४॥ सुपुप्त्याख्यं तमोऽज्ञानं तद्वीजं स्वमवोधयोः। इत्याचार्योकित: स्वाम्नांध्यासोऽप्येवं प्रतीयताम् ॥२७ ॥ जो सुषुत्तिनामक अज्ञानरूप अंधकार है वह स्वन्न और जगरणका कारण है ऐसा आचार्योंका वचन है, अतएव स्वाप्र अध्यासको भी प्रातिभासिक ही समझना चाहिय।। २७ ।।

'सुषुप्त्याख्यं तमोऽज्ञानं यद् वीज स्वमवोधयोः'। इति आचार्याणं स्वमजाग्रत्प्रश्चयोरेकाज्ञानकार्यत्वोक्तेश्र सूलाज्ञानका-

जन्यतयैव प्तिभासिकत्वमिति केचिदाहुः। जाग्रत्मवोधवाध्यत्वमन्ये स्वमनस्य मन्वते। दण्डभ्रान्तेराहिभ्रान्त्या दृढयेवात्र वाधनम् ॥ २८॥ और लोग मानते हैं कि जैसे हढ सर्पभ्रम से दण्डभ्रम का वाघ होता है, चैसे ही स्वाप्त अध्यास का आग्रत्-ज्ञान से बाध होता है॥ २८॥

ही इस अध्यासकी निवृत्ति होती है, और इसे व्यावहारिक तो इसलिए नहीं मान सकते हैं कि यह अविद्यासे अतिरिक्त दोषसे जन्य है ॥। ४ ॥ पूर्वोक्त न्यायके अनुसार स्त्रम्नाध्यास भी मूलाविद्याका कार्य है, क्योंकि अहङ्कार आदिसे अनवच्छिन्न अथवा अहक्कारसे अवच्छिन्न चैतन्यमें, जो अवस्थारूप अज्ञानसे शून्य है, अध्यास होता है और जो सुपुप्तिरूप अज्ञानाख्य अन्धकार है, वह जाग्त् और सुषुप्तिका कारण है, इस प्रकार आचार्योंने जाग्रत् और स्वमप्पञ्चको एक ही अज्ञानका कार्य कहा है, अतः अपने उपादान मूलाविद्याके निवर्तक ब्रह्माज्ञानसे ही उसकी निवृत्ति होती है और वह अविद्यातिरिक्त निद्रा आदि दोषसे जन्य है, अतः प्रातिभासिक है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।

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स्वाम पद़ार्थोके अधिष्ठानका विचार] भाषानुवादसहित ३४१

अन्ये तु 'वाध्यन्ते चते रथादयः स्वप्नदृष्टाः प्रबोधे' इति .. भाष्योक्तेः, 'अविद्यात्मकवन्वप्रत्यनीकत्वाद् जाग्रद्वोधवद्' इति विवरण- दर्शनाद्, उत्थितस्य स्वन्नमिथ्यात्वानुमवाच्च जाग्रद्योधस्स्वामाध्यास- निव्तक इति वद्मज्ञानेतरज्ञानवाध्यतयैव तस्य प्रातिभासिकत्वम्। न चाऽघिष्ठानयाथात्म्यागोचरं स्वोपादानाज्ञानानिवर्तकं ज्ञानं कथमध्यास- निवर्तकं स्यादिति वाच्यम्, रज्जुसर्पाध्यासस्य स्वोपादानाज्ञाननिवर्तका- धिष्ठानयाथात्म्यज्ञानेनेव तत्रैव स्वानन्तरोत्पन्नदण्डभ्रमेणापि निवृत्ति- दर्शनादित्याहुः । जाग्रत्मपञ्चमावृत्य जीवं निद्रा तमोमयी। स्वाप्नमाविष्करोत्यर्थ वोध्यं प्राग्जवघयोधतः ॥ २९ ।। जायत्कालीन प्रपत् और जीवको आवृत करके अन्धकाररूप निद्रा जवतक कि जीचको ज्ञान नहीं होता तवतक प्रातिभासिक स्वम्नप्नपश्तकी उत्पत्ति करती है॥ २९॥ कुछ लोग कहते हें कि स्वमाध्यास जाग्रत्कालीन ज्ञानसे निवृत्त : होता है, अतः त्राज्ञानसे इतर ज्ञानसे निवत्य होनेके कारण ही वह प्राति- भासिक है, क्योंकि स्वमम दीखनेवाले रथ आदिकी जागत्कालीन ज्ञानसे निवृत्ति होती है, इस प्रकारकी भाप्योकि है तथा अविद्यात्मक अर्थाद अविद्याकार्य होनेसे अविद्यारूप प्रपञ्चके जायत्कालीन ज्ञानके समान निवर्तक होनेसे, इस प्रकारका विघरण अ्ंन्थ है और सुपुपिसे उठनेके वाद स्वममे मिथ्यात्वका अनुभव है, अतः स्वमाध्यासकी जायत्कालीन बोधसे ही निवृत्ति होती है, अतः ब्रह्मज्ञानेतर ज्ञानसे वाब्य होनेसे ही स्वमप्रपञ्व प्रातिभासिक है। यदि शक्का हो कि अधिष्ठानके यथार्थ स्वरूपका अवगाहन न करनेवाला और स्वप्नोपादान मूलाज्ञानको निवृत्त न करनेवाला जाग्त्कालीन ज्ञान स्वमाध्यासका निवर्तक नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जसे रज्जुर्मे उत्पन्न हुए सर्पाध्यासकी उसके उपादानभृत रज्जुके अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाले अधिष्ठानयथार्थज्ञानसे निवृत्ति होती है, वैसे ही उसी रज्जुम बादको उत्पन्न हुए दण्डके अमसे भी सर्पाध्यासकी निवृत्ति देखी जाती है, इसी प्रकार प्रकृतमें अधिष्ठानके याथात्यका अवगाहन न करे तो भी जायद्बोध स्वमाध्यासकी निवृत्ति कर सकता है। * अविद्यातिरिकदोपजन्यत्व दी प्रातिभासिकत्वप्रयोजक है, इस मतके अनुसार निद्रा आदि दोषजन्यत्व दी स्वप्नप्रप्चमें प्रातिभासिकत्व है, इसका उपपादन किया गया। अव

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३४२ सिद्धान्त लेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

अपरे तु जाग्रद्भोगप्रदकर्मोपरमे सति जाग्रत्प्रपश्चद्रष्टारं ग्रतिबिम्ध- रूपं व्यावहारिकं जीवं तद्दृश्यं जाग्रत्प्रपञ्चमप्यावृत्य जायमानो निद्रा- रूपो मूलाज्ञानस्यावस्थाभेद: स्वाप्नप्रपश्चाध्यासोपादानम्, न मूल- ज्ञानम्। न च निद्राया अवस्थाज्ञानरूपत्वे मानाभावः। मूलाज्ञानेना- वृतस्य जाग्रत्प्रपश्चद्रष्टुः व्यावहारिकजीवस्य 'मनुष्योहम्, त्राह्मणोऽहम्, देवदत्तपुत्रोऽहम्' इत्यादिना स्वात्मानमसन्दिग्धाविपर्यस्तमभिमन्यमानस्य तदीयचिरपरिचयेन तं प्रति सर्वदा अनावृतैकरूपस्याऽनुभृतस्व्रपितामहात्य- * कोई लोग कहते हैं कि जाग्रत् भोगको देनेवाले कर्मके उपरत होने- पर जात् प्रपञ्चको देखनेवाले प्रतिविम्बरूप व्यावहारिक जीव और उस जीवसे दीखनेवाले जाग्रत्पपञ्चको भी आवृत करके उत्पन्न होनेवाले मुलाज्ञानकी अवस्थारूप निद्रा-दोष स्वामाध्यासका उपादान है, मूलाज्ञान उपादान नहीं है। यदि शक्का हो कि निद्राके अवस्थारूप अज्ञान होनेमें प्रमाण नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि निद्राको अवस्थारूप अज्ञान न माना जायगा, तो मूलाज्ञानसे आवृत जायत् प्रपश्चको देखनेवाला व्यावहारिक जीव जो कि अपने आत्माके विषयमें 'मैं मनुष्य हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ, मैं देवदचका पुत्र हूँ' इत्यादिरुपसे असन्दिग्ध और अविपर्यस्त अभिमान करता है, उसका और अपने दीर्घकालके परिचयसे अपने प्रति सर्वदा अनावृत और एकरूपसे अनुभूत स्वकीय व्यवहारकालमें जिसका वाध हो, वह प्रातिभासिक है, इस सिद्धान्तका अनुसरण करके स्वप्नप्रपञ्चमें प्रातिभासिकत्वका उपपादन करते हैं। + अधिष्ठानका यथार्थज्ञान अध्यासका निवर्तक है, ऐसा यदि नियम माना जाय, तो भी प्रकृतमें कोई हानि नहीं है, ऐसा मान कर 'अपरे तु' के पक्षका उत्थान है। इस मतमें व्यावहारिक जीव स्वप्नको देखनेवाले जोघका अधिष्ठान माना जाता है और व्यावहारिक जगत् स्वाप्नजगत्का अधिष्ठान माना जाता है, अनवच्छिन चतन्य आदि नहीं, उक्त दो प्रकारके अधिष्ठानके आवरण द्वारा ही निद्ारूप अवस्थाSज्ञान दष्ा और दशयात्मक प्रपथ्वका उपादान है, मूल अज्ञान नहीं, क्योंकि वह मूलाजान केवल ब्रह्मचतन्यका ही आवारक है, अतः व्यावहारिक जीवादिका आवारक नहीं हो सकता है। इसलिए व्यावहारिक जीव और जगद्विपयक ज्ञानसे- जो कि अधिष्ठानका यथार्थ ज्ञानात्मक है, स्वप्राध्यासकी निधृत्ति होगी, यह भाव है। देवदत्तका पुत्र अपने पितामह आदिके मरणका अनुभव करके पीछे प्रतिमास या प्रतिवत्सर श्राद्ध, तर्पण आदि करता है, अतः उनके मरणविपयक अनुभव और स्मरणका पुनःपुनः अभ्यास ही चिरपरिचय है, इसलिए अपने पितामहके अत्यय आदिमें जरा भी सन्देह और अ्रम नहीं है, अतः एकरूपसे ही स्वकीय पिताम हादिविनाशसे प्रपथ्वकी अनुवृत्ति होती है, यह भाव है।

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स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका-विचार] भापानुवादसहित ३४३

यादिआग्रत्प्रपञ्चवृत्तान्तस्य च स्वपसमये केनचिदावरणाभावे जागरण इब स्वमेऽपि 'व्याघ्रोऽहम्, शद्रोऽहम्, यज्ञदत्तपुत्रोऽहम्' इत्यादिभ्रमस्य स्व्रपितामहजीवद्दशादिभ्रमस्य चाभावग्रसङ्गेन निद्राया एव तत्कालोत्पन्न- व्यावहारिकजगजीवावारकाज्ञानावस्थाभेदरूपत्वसिद्धेः। न चैव्रं जीवस्याS- प्यावृतत्वात् स्वमप्रपश्चस्य द्रष्टभावप्रसङ्गः । स्व्रमप्रपश्चेन सह द्रष्टर्जीव- स्यापि प्रातिभासिकाध्यासात्। एवं च पुनर्जाग्रन्नोगग्रदकर्मोह्धूते वोधे व्यावहारिकजीवस्वरूपज्ञानात् स्वोपादाननिद्रारूपाज्ञाननिवर्तकादेव स्वम- प्रपश्नवाधः। न चैंवं तद्द्रष्टः प्रातिभासिकजीवस्यापि ततो वाधे 'रवमे करिणमन्वभूवम्' इत्यनुसन्धानं न स्यादिति वाच्यम्। व्यावहारिकजीवे

पितामह्के विनाश आदि जातत्पपश्चका स्वम्नकालमें किसी कारणसे आवरणका सभाव होनेपर जागरणके समान स्वममें भी 'मैं न्राह्मण हूँ, 'मैं शूद्ध हूँ, 'मैं यक्ष- दत्तका पुत्र हूँ' इत्यादि अ्रमका और स्व्रकीय पितामहके जीवनदशा आदि ग्रमका सभाव प्रसक्त हो जायगा, इसलिए निद्राको ही निद्राकालमें उत्पन्न व्यावहारिक जगत् और जीवको यावृत्त करनेवाली अज्ञानकी अवस्था मानना चाहिए। यदि फिर शक्का हो कि जीव भी यदि उस कालमें आवृत होगा, तो स्वमप्रपस्तका द्रष्टा नहीं होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वन- प्रपख्नके साथ-साथ द्रष्टारूप जीव भी प्रातिभासिक उत्पन्न होता है। व्यावहारिक जीव और जगत्के स्वम जीव और जगत्के अधिष्टान सिद्ध होनेपर फिर जाग्त्कालीन भोगके देनेवाले कर्मसे उत्पन्न जागरण होनेपर 'में मनुष्य हूँ' इत्यादि रूपसे व्यावहारिक जीवके स्वरूप जानसे ही जो अपने उपादानभूत निद्रारूप अज्ञानका निवर्तक है, स्व्राम प्रपश्वका वाघ होता है। यदि फिर शङ्का हो कि स्वाम्न प्रपश्चके .. द्रष्टा प्रातिभासिक जीवका भी जागरणसे चाघ होगा, तो 'स्वप्नमे हाथीका मने अनुभन किया था' इस प्रकारका स्मरण नहीं होगा, तो यह भी युक्त नहीं हैं, क्योंकि व्यावहारिक जीवम प्रातिभासिक जीवके अध्यस्त होनेके कारण प्राति- मासिक जीवके अनुभवसे व्यावहारिक जीवका अनुसन्धान माना जाय तो भी कोई हानि नहीं है।

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३४४ सिद्धान्तलेश संग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

नन्वहड्कृत्यवच्छिन्नेऽनवच्छिन्ने च नोचितः

अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यमें तथा अहङ्कारानवच्छन्न चैतन्यमें स्वाप्नाध्यास होना युक्त नहीं है, क्योंकि स्वापपदार्थोंके साक्षीसे भिन्नदेशस्थ होनेसे साक्षात् तथा चक्षु आदिके उपरत होनेसे उनके द्वारा भी अहवृत्ति नहीं हो सकती है॥ ३० ॥ नन्वन वच्छिनचैतन्ये अहङ्कारोपहितचतन्ये वा स्वामप्रपञ्चाध्यास इति प्रागुक्तं पक्षद्वयमप्ययुक्तम्। आद्ये स्वन्गजादेरहङ्कारोपहित साक्षिणो विच्छि- न्नदेशत्वेन सुखादिवदन्तःकरणवृत्तिसंसर्गमनपेक्ष्य तेन प्रकाशनस्य चक्षुरादी- नामुपरततया वृत्युदयासम्भवेन तेन प्रकाशनस्य चाडयोगात्। द्वितीये 'इंदं रजतस्' इतिवत् 'अहं गजः' इति वा 'अहं सुखी' इतिवद् 'अहं गजवान्' इति चाडध्यासप्रसङ्गात्। अत्र द्वितीय आचर्युः केचिद्देहान्तरेव तम्। = यहाँपर द्वितीय पक्षमें कोई लोग समाधान देते हैं ककि देहके भीतर ही स्वाप् पदाथोंको विषय करनेवाली वृत्तिसे अभिव्यक्त शुद्ध चैतन्यमें स्वाप्न पदार्थोंका अध्यास होता है॥। ३१ ॥।

अब शङ्का होती है अनवच्छिन्न चैतन्यमें अथवा अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यमें स्वाम् प्रपञ्चका अध्यास होता है, ऐसा जो पक्षद्वय पूर्वमें कहा गया है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि अनवच्छिन्न चैतन्याविष्ठानत्व-पक्षमें [स्वप्कालीन गंज आदिको शरीरसे अन्य देशस्थत्व ही कहना होगा, इसमें यह विकल्प हो सकता है कि क्या उन स्वान पदार्थोंका साक्षीसे भास होता है, या इन्द्रियोंसे ? प्रथम कल्प, तो युक्त नहीं है, क्योंकि ] स्वाप्न गज आदि पदार्थोंका अहङ्कारो- पहित साक्षीरूप चैतन्यसे पृथक्देशस्थ होनेके कारण सुख आदिके समान अन्तः- करणकी वृत्तिकी अपेक्षा न करके उस साक्षीसे उन स्वास पदार्थोंका अवभास नहीं हो सकता है; द्वितीय कल्प मी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वन्न समयमें चक्षु आदिके उपरत होनेसे वृत्तिका सम्भव न होनेके कारण वृत्तिसंसर्गकी अपेक्षा- करके भी साक्षीसे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है। अहङ्कारावच्छिन्न चतन्यके स्वम्ा- ध्यासाधिष्ठानत्वपक्षमें 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस प्रकारका जैसे ज्ञान होता है, वैसे ही 'अहं गजः' (मैं हाथी हूँ) इस प्रकारका अथवा 'मैं सुखी हूँ' इस ज्ञानके समान मैं गजवान् हूँ' इस प्रकारका अध्यास प्रसक्त होगा।.

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स्वाप्न पदार्थोके अधिष्ठानका विचार] भापानुवादसहित ३४५

अत्र केचिदादयपक्षं समर्थयन्ते-अहङ्कारानवच्छिन्चैतन्यं.न देहाद्वहिः स्ामप्रपश्चस्याऽधिष्ठानमुपेयते, किन्तु तदन्तरेव। अत एव दृश्यमानपरिमा- णोचितदेशसम्पत्यभावात् स्वाप्नगजादीनां मायामयत्वमुच्यते। एवं चाऽन्त:करणस्य देहाद्रहिरस्वातन्त्र्याज्ागरणे वाहशुक्तीद मंशादिगोचरवृष्यु- त्पादाय चक्षुराद्यपेक्षायामपि देहान्तरन्तःकरणस्य स्वतन्त्रस्य स्व्रयमेव

न काचिदनुपपत्तिः। अत एत यथा जागरणे सम्प्रयोगजन्यवृत्त्यभिव्यक्त- शुक्तीद मंशावच्छिन्नचैंतन्यस्थिताSविद्या रुप्याकारेण विवर्तते, तथा स्वप्ने-

विद्या अदष्टोद्ोधितनानाविषयसंस्कारसहिता प्रपश्चाकारेण विवर्ततामिति विवरणोपन्यासे भारतीतीर्थचचनमिति। यहांपर कुछ लोग प्रथम पक्षका ही समर्थन करते हैं-अहक्कारादिसे अनवच्छिन्न चतन्य देहसे चाहर स्वाम प्रपश्चका अविष्ठान नहीं होता है, किन्तु देहके भीतर ही अविष्ठान होता है। इसीसे अर्थात् आन्तर चैतन्यके अविष्ठान होनेसे ही दश्यमान परिमाणसे युक्त हाथी आदिका शरीरके भीतर उचित स्थान न होनेके कारण उनको सूत्रकार बादरायणने प्रातिभासिक कहा है। इस युक्तिके अनुसार आन्तर चैतन्यके स्वामाध्यासाधिष्ठानत्वकी सिद्धि होनेपर यद्यपि देहके वाहर अन्तःकरण स्वतन्त्र नहीं है, अतः जाग्रत् अवस्थामें वाहा शुक्तिके इदमंाकारवृत्तिको उत्पन्न करनेके लिए वह चक्षुकी अपेक्षा करता है, तथापि देहके अवान्तर प्रदेशमं अन्तःकरणकी स्वतन्त्रता होनेके कारण चक्षु आदिकी अपेक्षा न करके ही उसकी स्वतः वृत्ति हो सकती है, अतः देहके भीतर अन्तःकरणकी वृत्तिसे अभिव्यक्त अनवच्छिन्न चतन्यको अधिष्ठान माननेपर मी कोई विरोध नहीं है। इसीसे-'जैसे जाग्रत् अवस्थामें सम्प्रयोगजन्य (इृन्द्रियके सम्बन्धसे उत्पन्न ) वृत्तिसे अभिव्यक्त शुक्तिके इद- मंशसे अवच्छिन्न चैतन्यम रहनेवाली अविद्या रजताकारसे परिणत होती है, वेसे ही स्वममे भी निद्रा, पितोद्ेक आदि दोपोंसे उपहित देहके अवान्तर भागमें अन्तःकरणकी वृत्तिगें अमिव्यक्त चतन्यमें रहनेवाली अविद्या, जो कि अदष्ट- विशेपसे उद्दोधित अनेक विपयोंके संस्कारसे युक्त है, विचित्र प्रपश्चके आकारमें परिणत होती है-इस प्रकारका विवरणोपन्यासमें भारतीतीर्थमुनिका वचन भी है।

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३४६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

तन्भास्यं तदधिष्ठानवृत्त्या मातरि तत्प्रथाम् ॥ ३२॥ अहङ्कारसे अवच्छिन्न अविद्यारमे प्रतिविम्बित चैतन्यमें ही स्वाप्नाध्यास होता है और उसीसे उसका प्रकाश होता है, प्रमातामें स्वप्नका प्रकाश, तो अधिष्ठानविषयक अन्तःकरणवृत्तिकृत अभेदाभिव्यक्तिसे होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥३२॥

अन्ये त्वनवच्छिन्नचैतन्यं न वृत्यभिव्यक्तं सत् स्वाप्नप्रपश्चस्याऽधि- ष्टानम्, अशब्दमूलकानवच्छिन्नचैतन्यगोचरवृत्युदयासम्भवाद् अहङ्गाराध- वच्छिन्नचैतन्य एवाजहमाकारवृत्युदयदर्शनात्। तस्मात् स्वतोऽपरोक्षमहङ्का- रादनवच्छिन्नचैतन्यं तदधिष्ठानम्। अत एव संक्षेपशारीरके-(सं० शा० अ० १ श्रो० ४१) 'अपरोक्षरूपविपयभ्रमधीरपरोक्षमास्पदमपेक्ष्य भवेत्। मनसा स्वतो नयनतो यदि वा स्वपनभ्रमादिषु तथा प्रथितेः ॥ इति श्लोकेनाडपरोक्षाध्यासापेक्षितमिष्ठानापरोक्ष्यं क्वचित् स्वतः

कुछ लोग कहते हैं कि अनवच्छिन्न चैतन्य वृत्तिद्वारा अभिव्यक्त होकर स्वाम प्रपञ्चका अधिष्ठान नहीं होता है, क्योंकि शास्त्रसे अतिरिक्त प्रमाणसे जन्य अनवच्छिन्नचैतन्यविषयक वृत्तिकी उत्पत्ति हो ही नहीं सकती है, क्योंकि अहङ्कार, शरीर आदिसे अवच्छिन्न चैतन्यविषयक ही अहमाकार वृत्तिकी उत्पत्ति देखी जाती है। इससे स्वतः अर्थात् वृत्तिके चिना अभिव्यक्त अपरोक्ष चैतन्य ही स्वाम प्रपश्चका अधिष्ठान है। स्वतः अपरोक्ष चैतन्यको स्वन्नाध्यासका अघिष्ठान स्वीकार करनेसे ही संक्षेपशारीरकमें- 'अपरोक्ष०' (अपरोक्षरूप जो शुक्तिरजतादिविषयक भ्रमरूप वुद्धि है, अथवा अपरोक्ष रूप जो शुक्ति रजतादि, तद् विषयक अ्रमरूप जो बुद्धि है, वह अपरोक्ष अघिष्ठानकी अपेक्षा रखकर होती है, और यह अघिष्ठानापारोक्ष्य मनसे, स्वतः अथवा चक्षुसे होता है, क्योंकि स्वप्नभ्रममें अन्वय-व्यतिरेकसे वैसा ही देखा जाता है) इस कोकसे अपरोक्षाध्यासके लिए अपेक्षित अघिष्वानका आप-

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स्वाप पदार्थोके अधिष्ठानका विचार] भांपातुवाद सहित ३४७

क्वचिन्मानसवृत्या, क्वचिद् चहिरिन्द्रयवृश्येत्यभिधाय, 'स्व्तोऽपरोक्षा चितिरत्र विभ्रमस्तथाऽपि रूपाकृतिरेव जायते। मनोनिमित्ं स्वपने मुहुर्मुहुर्विनाऽपि चक्षुर्विपयं स्वमास्पदम्।। मनोऽवगम्येऽप्यपरोक्षतावलात्तथाऽम्बरे रूपमुपोल्लिखन् भ्रमः । सितादिभेदैर्वहुधा समीक्ष्यते तथाऽक्षिगम्ये रजतादिविभ्रमे।।' इत्याद्यनन्रश्लोकेन स्वप्नाध्यासे स्वरतोऽधिष्ठानापरोक्ष्यमुदाहृतम्। न चाडहृद्कारानवच्छिन्नचैतन्यमात्रमावृतमिति वृत्तिमन्तरेण न तदभिव्यक्ति- रिति वाच्यम्, व्रह्मचैतन्यमेवावृतमविद्याप्रतिविम्बजीव चैतन्यमहङ्कारान-

माने स्वाप्नगजादौ तत्समनियताधिष्ठानगोचरान्तःकरणादिवृत्तिकृता- रोक्ष्य * कहीं स्वतः, कहीं मानसवृत्तिसे कहीं वहिरिन्द्रियजन्य वृत्तिसे उत्पन्न होता है, ऐसा कह कर 'स्वतोऽपरोक्षा०' (यद्यपि स्वप्नाध्यासरूप भ्रमका स्वतः अपरोक्ष चैतन्य ही अधिष्ठान है, तथापि उस चतन्यमें मनोगत वुद्धिवासनाके प्रभावसे चक्षुर्गल वाह रूपादि आलम्बनके बिना अनेक विषयाकारोंसे युक्त वह भ्रम बार- बार उत्पन्न होता है, वैसे मनोगम्य आकाशम अपरोक्षताके वलसे अपरोक्ष चिदात्माके साथ अमेदाभित्र्यक्तिसे-रूपोलेखी विश्रम होता है, वैसे ही चक्षुसे दिखनेवाले रजतादिविभ्रममें श्वेत आदि अनेक प्रकार देखे जाते हैं।) इत्यादि अनन्तरके श्रोकोंसे स्वप्नाध्यासमें अधिष्ठानका आपरोक्ष्य (प्रत्यक्ष) स्वतः ही दिखलाया है। यदि शक्का हो कि अहक्कारानवच्छिन्न चतन्यमात्र तो आवृत है, अतः वृत्तिके विना उसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि न्रहचतन्य ही आवृत है, और अविद्यामें प्रतिविम्बित अहक्कारसे अनवच्छिन्न मी जीवचैतन्य अनावृत है, ऐसा स्वीकार किया गया है, इस अवस्थाम अर्थात् स्वतः अपरोक्ष जीवचैतन्यके अधिष्ठान होनेपर अहक्कारानवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्यमान स्वप्नके गज आदि प्रपश्चमें स्वाप्न पपश्चके समनियत + अधिष्ठानविपयक अन्तःकरण आदिकी वृत्तियोंसे सम्पादित * शुकि-रजत स्थलमें नयनसजिकर्पसे अधिष्ठानका आपरोक्ष्य है, गगननीलत्वके अध्यासमें मनसे अधिष्ठानापारोक्ष्प है और स्वम्नाध्यासमें स्वतः अधिषठानका आपरोकष् है, यह भाव है। . जय गज आदिका अध्यास होता है, तव अधिष्ठानविपयक अन्तःकरणकी अविद्याृतति उत्पन्न होती ही है, इसलिए स्वाप्र प्रपथके अधिष्ठानभूत चतन्यके साथ प्ृतियुक्त अन्तःकरणके

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३४८ सिद्धान्तलेशसंग्रहं [द्वितीय परिच्छेद

भेदाभिव्यक्त्या प्रमातृचैतन्यस्याऽपि 'इदं पशयामि' इति व्यवहार इत्याङ्ु:।

अहन्ताधीप्रसक्तिस्तु नाहङ्काराविशेषणात् ॥ २३ ।। अहङ्कारसे उपहित चैतन्याभास स्वप्नका अधिष्ठान है, अतः आद्यपक्षमें-अदक्कारा- वच्छिन्न चैतन्याधिष्ठानत्वपक्षमें-अहङ्गारका विशेषण रूपसे प्रवेश न होनेके कारण 'अहं गजः' इत्यादि प्रतीति नहीं होती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं॥ ३३॥। अपरे तु द्वितीयं पक्षं समर्थयन्ते-अहङ्काराचच्छिन्नचैतन्यमधि- छ्ानमित्यहङ्कारस्य विशेषणभावेनाऽधिष्ठानकोटिप्रवेशो नोपेयते, किं त्वहङ्का- रोपहितं तत्प्रतिविम्बरूपचैतन्यमात्रमधिष्ठानमिति, अतो न'अहं गजः' इत्याद्यनुभवप्रसङ्ग इति । इदंवृत्तिचिदाभासे इत्थं रजतकल्पनात्। नाहं रजतधा्तिद्वृदनन्यनरवेद्यता ॥। ३४ । इसी प्रकार इदमाकार वृचतिसे उपहित चिदाभासमें रजतकी कल्पना होनेसे 'अह रजतम्' ऐसी प्रतीति नहीं होती है और अन्य पुरुप वेद्यता भी नहीं है।। ३४॥ एवं शुक्तिरजतमपि शुक्तीदमंशावच्छिन्नचैतन्यप्रतितिम्वे वृत्तिमदन्तः- करणगतेऽध्यस्पते। छुक्तीदमंशावच्छिन्नविम्वचैतन्ये सर्वसाधारणे तस्या- अमेदाभिव्यक्तिसे प्रमातृचैतन्यमें भी 'मैं यह देखता हूँ' इस प्रकार व्यवहार देखा जाता है। कुछ लोग तो द्वितीय पक्षका-अहक्कारसे अवच्छिन्न चैतन्य स्वप्नाध्यासका अधिष्ठान है, इसीका-समर्थन करते हैं-अहक्वारावच्छिन्न चैतन्य अविष्ठान है, इससे अंहङ्कारका अिष्ठानकोटिमें विशेषणरूपसे प्रवेश नहीं करते हैं, किन्तु अहङ्कारसे उपहित अहक्कारमें प्रतिविम्वित चैतन्य ही अविष्ठान होता है, ऐसा अङ्गीकार करते हैं, इसलिए 'अहं गजः' (मैं हाथी हूँ) ऐसा अनुभव नहीं होता है। इसी प्रकार शुक्तिरजत भी शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यके वृत्ति युक्त अन्तःकरणमें पड़े हुए प्रतिविम्बमें अध्यस्त होता है, शुक्तीदमंशावच्छिन्न विम्ब सम्बन्ध होनेपर प्रमातृत्वकी प्राप्ति होनेपर प्रमातामें स्वमद्रष्टृत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है।

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स्वान्त पदार्थोंके अनुभवप्रकारका विचार] भापानुवादसहित ३४९

ध्यासे सुखादिवदनन्यवेद्यत्वाभावप्रसङ्गादिति केचित्। अन्ये तु विम्वचेतन्ये रजताध्यास्वादिनः ।

कुछ लोगोंका कहना है कि विम्बचैतन्यमें रजतका अध्यास होता है और तत्-तत् पुरुषोंके अश्ञानसे उत्पन्न तत्-तत् रजतका तत्-तत् पुरुषापोंको प्रत्यक्ष होता है॥ ३५॥ केचिनु विम्बचैतन्य एव तदध्यासमुपेत्य 'यदीयाज्ञानोपादानकं यद्, तत्तस्यैच प्रत्यक्षम्, न जीवान्तरस्य इत्यनन्यवेद्यत्वृपपाद्यन्त।। नन्वस्तु रजताध्यासे कथन्विच्चाक्षुपत्वधीः । कथं स्वप्नगजज्ञाने तस्याः साधु समर्थनम् ॥३६ ॥ अब शका होती है कि यद्यपि रजताध्यासमें कथज्ित् चाक्षुपत्वका उपपादन हो सकता है, तथापि स्वाप्नगजादिज्ञानमे चाक्षुपत्वका समर्थन कैसे कर सकते है?॥ ३६॥ ननु शुक्तिरजताध्यासे चाक्षुपत्वानुभवः साक्षाद्वाऽघिष्ठानज्ञानद्वारा तदपेक्षणाद्वा समर्थ्यते। स्वाप्नगजादिचाक्षुपत्वानुभवः कर्थ समर्थनीयः।

चैतन्यमं, जो सर्वसाधारण है, उसका अध्यास माना जायगा, तो सुखादिके समान अनन्यवेदयत्वके अभावका प्रसन् होगा, ऐसा मी कुछ लोग कहते हैं। कुछ लोग तो विम्वचैतन्यमं ही रजतादिका अध्यास होता है, ऐसा मान कर जिसके अज्ञानरूप उपादानसे जिसकी उत्पत्ति हुई हो, वह उसी जीवको प्रत्यक्ष होता है, जीवान्तरको नहीं, इस प्रकार अनन्यवेद्यत्वका उपपादन करते हैं ॥ ५॥ - अत्र शका होती है कि शुक्तिमें रजतका जो अध्यास होता है, उसमें चक्षुरिन्द्रियग्रास्यत्वका जो अनुभव होता है, वह साक्षात् अथवा अधि- एानके ज्ञानद्वारा चक्षुकी अपेक्षा होनेसे होता है। [ स्वमप्रपञ्चके अघिष्ठानका निरूपण करके स्वाम पदार्थोंके अनुभवका उपपादन करनेके लिए इस अन्थका उपक्रम है। शुक्तिरजतका अनुभव इन्द्रियसे होता है, इस प्रकारके पूर्वमें उक्त कवितार्किक मतके अनुसार 'साक्षात्' कहा गया है। और जिस मतमें शुक्तिरजत आदि भ्रान्त पदार्थ साक्षिमास्य हैं, उस मतसे 'अधिष्ठान- ज्ञानद्वारा' इत्यादि ग्रन्थका कथन है, क्योंकि इस मतमें भी धर्मिज्ञानद्वारा

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३५० सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

खानां विरामादग्राह्यप्रातिभासिकनिहवात्। स्वयञ्ज्योतिष्टवादाच्च न स्वामेन्द्रियकल्पना ॥ ३७ ।। -4

उक्त शङ्काके परिहारमें कहते हैं कि स्वप्नमें इन्द्रियोंके उपरत होनेसे, तथा अग्राह्य इन्द्रियों के प्रातिभसिक न होनेसे और स्वयंप्रकाशत्वकी उक्ति होनेसे स्वाप्न इन्द्रियोंकी कल्पना नहीं है, अतः स्वाप्नपदार्थोंमें चाक्षुषत्वका भी भ्रम है॥ ३७॥ उच्यते-न तावत् तत्समर्थनाय स्वाप्नदेहवद्विपयवच्च इन्द्रियाणामपि प्रातिभासिको विवर्तः शक्यते वक्तुम्, प्रातिभासिकस्याऽज्ञातसच्वा- भावात्। इन्द्रियाणां चातीन्द्रियाणां सत्वेऽज्ञातसच्वस्य वाच्यत्वात्। नापि व्यावहारिकाणामेवेन्द्रियाणां स्वस्त्रगोलकेभ्यों निष्क्रम्य स्वाम- देहमाश्रित्य स्वस्वविषयग्राहकत्वं वक्तुं शक्यते, स्वमसमये तेपां व्यापारराहित्यरूपोपरतिश्रवणात्। व्यावहारिकस्य स्पर्शनेन्द्रियस्य स्व्रो- चितव्यावहारिकदेशसम्पत्तिविधुरान्तःशरीरे स्वाधिकपरिमाणकृत्स्नस्वाम- शरीरव्यापित्वायोगाच्च। तदेकदेशाश्रयत्वे च तस्य स्वामजलावगाहनजन्य-

चक्षुकी अपेक्षा शुक्तिरजतके लिए होती ही है, यह भाव है ]। परन्तु स्वाप्न गज आदिके चाक्षुषत्वका जो अनुभव होता है, उसका समर्थन कैसे किया जाता है? इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं-स्वाप्न प्रपश्नमें चाक्षुपत्वका प्रतिपादन करनेके लिए स्वाप्न देह और विपयोंकी नाई इन्द्रियोंका भी प्राति- भासिक विवर्त नहीं मान सकते हैं, क्योंकि प्रातिभासिक पदार्थकी अज्ञात सचा नहीं मानी जाती है। अतीन्द्रिय इन्द्रियोंका यदि प्रातिभासिक विवर्त माना जाय, तो उनकी भी अज्ञात सता ही कही जायगी, [ क्योंकि वे सर्वत्र व्यवहारमें अज्ञात सत्तावाली ही देखी जाती हैं।] और यह भी नहीं कह सकते हैं कि व्यावहारिक इन्द्रियाँ अपने अपने गोलकसे (स्थानसे) निकलकर स्वाप्न शरीरका आश्रय करके अपने-अपने विषयोंका ग्रहण करती हैं, क्योंकि स्वप्नके। समयमें उनका व्यापार नहीं होता है अर्थात् स्वप्नमें इन्द्रियाँ उपरत रहती हैं, ऐसा श्रुतिमें कहा गया है और व्यावहारिक स्पर्शेन्द्रिय (त्वक्) का अपने उपयुक्त व्यावहारिक देशकी सम्पत्तिसे शून्य शरीरके भीतर अपनेसे अधिक परिमाण- वाले स्वाप्न शरीरमें व्यापित्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है। यदि उस

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स्वाप्न पदार्थोंके अनुभवप्रकारका विचार] भापानुवादसहित ३५१

अत एव 'स्वप्ने जाग्रदिन्द्रियाणामुपरतावपि तैजसव्यवहारोप- युक्तानि सूक्ष्मशरीरावयवभूतानि सूक्ष्मेन्द्रियाणि सन्तीति तैस्स्वामपदार्था- नामन्द्रियकत्वम्, इत्युपपादनशङ्गाऽपि निरस्ता। जाग्रदिन्द्रियव्यतिरिक्त- सूक्ष्मेन्द्रिया प्रसिद्धेः । किश्च, 'अ्रायं पुरुपः स्वयञ्ज्योतिः' इति जागरे आदित्यादिज्योति- वर्यतिकराच्चक्षुरादिवृत्तिसश्वाराच्च दुर्विवेकमात्मनः स्त्रयंज्योतिष्द्वमिति स्वमावस्थामधिकृत्य तत्राऽत्मनः स्वयञ्ज्योतिष्टं प्रतिपादयति। अन्यथा तस्य सर्वदा स्वयञ्ज्योतिष्ट्वेनाञ्त्रति वैयर्थ्यात्। तत्र यदि स्वमेऽपि चक्षु- रादिवृत्तिसश्चारः कल्प्येत, तदा तत्राऽपि जागर इव तस्य स्वयञ्ज्योतिष्दवं दुर्विवेचं स्यादित्युदाहृता क्ुतिः पीड्येत।

स्पर्शेन्द्रियका-स्वाप्न शरीरका-एक देश-आश्रय-माना जाय, तो स्वाप्नजलमें अवगाहन करनेसे सम्पूर्ण अम्ोंमें जो शत्यका अनुभव होता है, उसका निर्वाद्द नहीं हो सकेगा। इसीसे 'स्वप्नमं जाग्रत् इन्द्रियोंके उपरत होनेपर भी तैजस और व्यवहारके लिए उपयुक्त सूक्ष्म शरीरके अवयवभूत सूक्ष्म इन्द्रियाँ हैं, इसलिए उन्हींसे स्वाप्न पदार्थोका ऐन्ट्रियकज्ञान होता है' इस प्रकारकी उपपादन-शक्का भी निरस्त हुई, क्योंकि जायत् इन्द्रियोंके समान उनसे भिन्न सूक्ष्म इन्द्रियाँ प्रसिद्ध नहीं हैं। किश्ज, 'अन्रायं पुरुपः स्वयंज्योतिः' (स्वम्नावस्थामं पुरुप स्वयंज्योति- स्वम्काश है) यह श्रुति-जाअ्रत् अवस्थामें आदित्य आदिके प्रकाशके सम्पर्कसे और चक्षु आदिकी वृत्तियोंका संचार होनेसे आत्मामे स्वयंग्रकाशत्वका निर्वचन अशक्य है, अतः स्वप्नावस्थाका अधिकार करके ही आत्मामें स्वयं- ज्योतिष्ट्रका-प्रतिपादन करती है, यदि वैसा न माना जाय, तो आत्माके सर्वदा स्वप्रकाश होनेके कारण श्रुतिमें उक्त 'अन्र' शब्द् व्यर्थ होगा। उक्त प्रकारके अमिप्राय सिद्ध होनेपर यदि स्वप्नमं भी चक्षु आदिका संचार माना जाय, तो स्वप्नम भी जाग्रत् अवस्थाके समान स्वयंज्योतिष्ट्रका निर्वचन अशक्य होनेसे उदाहृत श्रतिके साथ विरोध प्रसक्त होगा।

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३५२ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

ननु रवने चक्षुराद्युपरमकल्पनेऽपि अन्तःकरणमनुपरतमास्त इति परिशेपासिद्धेर्न स्वयञ्ज्योतिष्ट्रविचेक :; मैवम्, 'कर्ता शास्त्रार्थवच्वाद्' इत्यधिकरणे (उ० मी० अ० २ पा०३ सू० ३३) न्यायनिर्णयोक्तरी- त्याऽन्तःकरणस्य चक्षुरादिकरणान्तरनिरपेक्षस्य ज्ञानसाधनत्वाभावाद्ा, तत्वप्रदीपिकोक्तरीत्या रवन्ने तस्यैव गजाद्याकारेण परिणामेन ज्ञानकर्म- तयाऽवस्थितत्वेन तदानीं ज्ञानसाधनत्वायोगाद्वा परिशेपोपपचेः। न च स्वमेऽन्तःकरणवृत्त्यभावे उत्थितस्य स्वपदष्टगजाद्यनुसन्धानानुप- पत्ति :; सुपुप्िक्लसया अविद्यावृत्या तदुपपत्तेः । सुपुप्ी तदवस्थोपहित- मेव स्वरूपचतन्यमज्ञानसुखादिप्रकाशः उत्थितस्याऽनुसन्धानमुपाधिभृता- वस्थाविनाशजन्यरूपसंस्कारेणेति वेदान्तकौमुदयभिमते सुपुप्ताचविद्या- यदि शक्का हो कि स्वप्नावस्थामें चक्षु आदिके उपरत होनेपर भी अन्तः- करण अनुपरत ही रहता है, इसलिए परिशेपकी-अवभासकान्तराभावकी- असिद्धि होनेसे आत्मामें स्वयंज्योतिप्वकी हानि तो वनी ही है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात' * इस अधिकरणमें न्यायनिर्णयके कथनानुसार चक्षु आदि अन्य करणोंसे निरपेक्ष ज्ञानसाधनताका अभाव अन्तःकरणमें है, अर्थात् स्वप्नज्ञानका मन उपादान है, करण नहीं है, क्योंकि ऊपादान और करण एक नहीं होता है, यह भाव है। अथवा तत्त्वप्रदीपिकाके वचनके अनुसार स्वप्नमें अन्तःकरण ही गज आदिके आकारमें परिणत होता है, अतः ज्ञानकर्म- त्वरूपसे अवस्थित अन्तःकरण स्वप्नावस्थामें ज्ञानसाधन हो ही नहीं सकता है। यदि शङ्का हो कि रवममे अन्तःकरणकी वृत्ति न मानी जाय, तो. स्वप्नमें देखे गये गज आदिका अनुसन्धान नहीं होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सुपुप्तिमें क्लप् अविद्यावृत्तिसे अनुसन्घानकी (स्मृतिकी) उपपत्ति हो सकती है। सुपुप्तिमॅ निद्रावस्थासे युक्त स्वरूपचैतन्य ही अज्ञान, सुख आदिका प्रकाश है, जागनेपर जो उनका स्मरण होता है, वह उपाधिभूत अवस्थाके विनाशसे उत्पन्न होनेवाले संस्कारसे ही आत्मा ही कर्ता है वुद्धि नहीं है, क्योंकि कर्ताके लिए अपेक्षित उपायोंका बोध करानेमें समर्थ विधिशास्त्र उपलब्ध होता है, यह सूत्रका अर्थ है। 'चक्षुरादीनां चैतन्येन विपय सम्ब- न्घार्थत्वात्' (ब्रह्मसूत्र शा० भा० १४७९ प्ृ० अच्युतग्रन्थमाला काशी सृ०) इत्यादि न्यायनिणेयकी पडक्ि है!

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स्वाप्न पदार्थोंके अनुभव-प्रकारका विचार] भापानुवादसहित ३५३

वृत्त्यभावपक्षे इहापि स्व्रामगजादिभासकचतन्योपाधिभूतस्वमावस्थाविनाश रूपसंस्कारादनुसन्धानोपपत्तेश्। अथवा 'तदेतत् सच्वं येन स्वमं पश्यति' इत्यादिश्रुतेरस्तु स्वमेऽपि कल्पतरूक्तरीत्या स्वामगजादिगोचरान्तःकरणवृत्तिः। न च तावता परिशेपासिद्धिः। अन्तःकरणस्य 'अहम्' इति गृह्यमाणस्य सर्वात्मना जीवै- कयेनाऽध्यस्ततया लोकटष्टा तस्य तन्नतिरेकाप्रसिद्धेः परिशेपार्थ चक्षुरा- दिव्यापाराभावमात्रस्थैवाडपेक्षितत्वात्। 'प्रसिद्धदृश्यमात्रं ढगवभासयोग्यम्' इति निश्वयसत्वेन परिशेपार्थमन्यानपेक्षणात्।

होता है, इस प्रकार वेदान्तकौमुदीमें स्वीकृत सुपुप्तिमें अविद्यावृत्तिके अभाव- पक्षमें स्वप्नावस्थाम भी स्वाप्न गज आदिके अवभासक चतन्यके उपाधिभूत स्वप्नावस्थाके विनाशसे उत्पन्न संस्कारसे स्मरणकी उपपत्ति हो सकती है। अथवा 'तदेतत् सत्त्वम्०' (वही सत्त्व-अन्तःकरण है, जिससे स्वप्न देखा जाता है) इत्यादि श्ुतिसे * करपतरुकारके कथनानुसार स्वाप्न रथ, गज आदि पदार्थोंको विषय करनेवाली अन्तःकरणकी वृत्ति रहे तो भी कोई हानि नहीं है। यदि शक्का हो कि स्वप्नमें यदि अन्तःकरणकी अव- स्थिति मानी जाय, तो परिशेषकी असिद्धि होगी: तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहम्' रूपसे गृह्यमाण अन्तःकरणके सर्वात्मना जीवतादात्म्यरूपसे अंध्यस्त होनेसे व्यवहारदष्टिसे अन्तःकरणमं जीवभेदकी असिद्धि होनेके कारण परिशेषके लिए चक्षु आदि वाह्य करणोंके व्यापारका अभावमात्र ही अपेक्षित है; कारण कि प्रसिद्ध दृशयमात्र पदार्थ द्रष्टाके अवभासयोग्य हैं, इस प्रकार निश्चय होनेसे परिशेपके लिए अन्य चक्षु आदि व्यापारकी अपेक्षा नहीं होती है। [ तात्पर्यार्थ यह है कि जागरणके समान स्वप्नमें भी गज आदि स्वाप्न पदार्थोका अवगाहन करनेवाली वृत्ति यदि मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, इसीसे जाअत् होनेपर संस्कार द्वारा सुपुप्िके अज्ञान आदिके

  • कल्पतरकारने कहा है कि सत्त्वशब्दसे कहलानेवाले अन्तःकरणकी तृतीया क्षुतिसे स्वाप्नगजादिविपयकज्ञानकरणता है, इसलिए क्षुतिके आधारसे (तदेतत् इत्यादि श्रुतिसे) स्वप्रमं चाकुपयतिक न होनेपर भी मानसवृत्ति है, अतः संस्कारकी अनुपपत्ति नहीं है, यदद भाव है। ४५

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३५४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

अन्राऽडहुरत एवाडन्र चाक्षुषत्वादिर्धाभ्रमः ॥ स्वप्नमें चक्षु आदिके व्यापारके न होनेसे स्वाप्न पदार्थोंमें व्ाक्षुषत्व आदिका ज्ञान भ्रमात्मक ही है, ऐसा कहते हैं। तस्मात् सर्वथापि स्वमे चक्षुरादिव्यापारासम्भवात् स्वाम्नगजादौ व्ाक्षुपत्वाद्यनुभवो भ्रम एव । अन्वयव्यतिरेकादि कल्पनाSप्यक्षिकल्पना ।।३८।। असंभावितसाह स्रदर्शनात् स्वप्नदशने॥ इत्थमेव हि शुक्त्यादौ रूप्याद्यध्यक्षधीगतिः ॥३९॥ स्वाम् अ्रममें चक्षुके साथ ज्ञानका अन्वय-व्यतिरेक और चक्षु आदि कल्पित ही हैं, क्योंकि स्वप्नमें असम्भावित हजारों पदार्थ देखे जाते हैं, इसी प्रकारकी छुक्ति आदिमें रूप्य आदिके प्रत्यक्ष ज्ञानकी भी गति है॥३८॥३९॥ ननु स्वमेऽपि चक्षुरुन्मीलने गजाद्यनुभवः, तन्निमीलने नेति जागर

स्मरण कोई बाधक नहीं है। इसपर शङ्का यह होती है कि स्वप्नमें अन्तःकरणके माननेपर 'अन्रायम्' इत्यादि श्रुतिसे आत्माका जो अवशेष कहा गया है वह वाधित होगा, तथा स्वयंज्योतिष्ट भी उपपन्न नहीं होगा है, परन्तु यह शक्का ठीक नहीं है, क्योंकि सर्वतोभावेन अन्तःकरणका जीवचैतन्यके साथ ऐक्य 'मैं देखता हूँ' इत्यादि रूपसे अध्यस्त होनेके कारण उसका द्रष्टत्वरूपसे ग्रहण होता है, इसलिए अज्ञ पुरुषोंकी दृष्टिसे चिदात्माका अन्तःकरणसे भेद ही गृहीत नहीं होता है, अतः परिशेषके लिए लोकप्रसिद्ध द्रष्ट भिन्न चक्षु आदिके व्यापारका अभाव ही अपेक्षित है, अन्तःकरणवृत्तिलक्षण व्यापारका द्रष्टाके व्यापाररूपसे ग्रहण होता है, अतः उसके रहनेपर भी परिशेषकी असिद्धि नहीं है ]। इससे स्वप्नमें किसी प्रकारसे भी चक्षु आदिके व्यापारका सम्भव न होनेके कारण स्वाप्न गज आदि पदार्थोंमें होनेवाला चाक्षुषत्वानुभव भ्रमात्मक ही है, यह भाव है। यदि शङ्का हो कि स्वम्नावस्थामें भी क्षुके खोलनेपर स्वाम्र गज आदि पदार्थोंका अनुभव होता है, और चक्षुओंके वन्द.करनेपर उन पदार्थोंका भान

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स्वाप्न पदार्थोंके अनुभव-प्रकारका विचारं] भापांनुवादसहित ३५५

इव गजाद्यनुभवस्य चक्षुरुन्मीलनाद्यनुविधानं प्रतीयते इति चेत्, 'चक्षुपा रजतादिकं पश्यामि'इत्यनुभववद्यमपि कक्ित् स्वमभ्रमो भविष्यति यत् केवलसाक्षिरूपे स्वामगजाद्यनुभवे चक्षुराद्यनुविधानं तदनुविधायिनी धृत्तिर्वाऽध्यस्यते। किमिव हि दुर्घटमपि भ्रमं माया न करोति विशेपतो निद्रारूपेण परिणता, यस्या माहात्म्यात् रवभे रथः प्रतीतः क्षणेन मनुष्यः प्रतीयते, स च क्षणेन मार्जारः । स्वमद्रष्टुश् न पूर्वापर विरोधानुसन्धानम्। तस्मादन्वयाद्यनुविधानप्रतीतितौल्येऽपि जाग्रद्गजाद्यनुभव एव चक्षुरादि- जन्य:, न स्वाप्नगजाद्यनुभय:॥ .

अर्थसृष्टेः पुराडर्येपु सन्निकर्पादसम्भवात् ॥४०। दष्टिवष्टिवादियोंका करना है कि जागरत्कालीन घटादिके ज्ञानोंकी भी स्वन्नकालीन पदार्थोंके शञानको नाहे ही गि है, क्योंकि अर्थदृष्टिके पूर्वमें अर्थोंमें इन्द्रियोंका सनिकर्ष नहीं है॥४०।।

नहीं होता है, इसलिए जागत् गज आदिके अनुभवके समान चक्षुरुन्मीलनके साथ अन्वय-व्यतिरेक देखा जाता है, अतः स्वाम पदार्थोंके चाक्षुपत्वानुभवको भ्रमात्मक कैसे मान सकते हैं? तो यह भी शक्ा युक्त नहीं है, क्योंकि 'चक्षुसे रजत आदि देखता है' इस अ्रमात्मक अनुभवके समान यह भी कोई स्वम्नग्रम दोगा, जो कि केवल साक्षीरूप स्वामगज आदिके अनुभवमें चक्षु आदिका अन्वयव्यतिरेक या चक्षु आदिके अन्वय-व्यतिरेकसे युक्त मानसवृत्ति (अर्थात् पूर्वें कलपतरुके वचनके अनुसार कल्पित स्वाम प्रपञ्चगोचर मानसवृत्तिमें चक्षु आदिका अनुविधान) अध्यस्त होती है। क्योंकि ऐसा कौन दुर्घट भ्रमरूप कार्य है जिसे माया नहीं कर सकती हो, वहाँपर भी विशेषतः निद्रारूपसे परिणत माया तो सभी कुछ कर सकती है। कारण कि निद्धारूपसे परिणत जिस मायाके प्रभावसे स्वमंमें रथरूपसे देखा गया पदार्थ क्षणमें मनुष्य बन जाता है, वही एक क्षणमें चिल्ली प्रतीत होता है और सवमके द्रष्टाको पूर्वापरके विरोधकी मी प्रतीति नहीं होती है। इसलिए चक्षु आदिके अन्वय-व्यतिरेककी प्रतीति होनेपर भी जागत् गज आदिका अनुभव ही चक्षु आदिसे जन्य है, स्वामगजादिका अनुभव चक्षु आदिसे जन्य नहीं है।

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३५६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

दृष्टिसृष्टिवादिनस्तु कल्पितस्याऽज्ञातसत्वमनुपपन्नमिति कृत्स्नस्य जाग्रत्प्रपश्चस्य दृष्टिसमसमयां सृष्टिसुपेत्य घटादि दष्टेश्रक्षुःसन्निकर्पानुविधान- प्रतीति दृष्टे: पूर्व घटाद्यभावेनासङ्गच्छमानां स्वप्नवदेवं समर्थयमानाः जाग्रदूगजाद्यनुभवोऽपि न चाक्षुष इत्याहुः॥ निरुपाधिरथाऽन्यो वा कल्पकः प्रथमे भवेत्।। सुक्तस्य संसृति: को वा द्वितीये मोहकल्पकः ॥४१॥ प्रपञ्चका कल्पक निरुपाधिक आत्मा है अथवा सोपाधिक आत्मा है? प्रथम पक्षमें मुक्त पुरुषको संसारप्रासि होगी और द्वितीय पक्षमें अज्ञानका कल्पक कौन होगा॥४१॥ ननु दृष्टिसृष्टिमवलम्व्य कृत्स्नस्य जागत्प्रपश्चस्य कल्पितत्वोपगमे कस्तस्य कल्पक :- निरुपाधिरात्मा वा, अविद्योपहितो वा ! नाद: मोक्षेपि साधनान्तरनिरपेक्षस्य कल्पकस्य सच्वेन ग्रपश्चानुवृत्या संसारा-

  • दृष्टिसृष्टिवादियोंका कहना है कि जो पदार्थ कल्पित है, उसकी अज्ञातसत्ता हो ही नहीं सकती है, अतः सम्पूर्ण जागत्प्रपश्चकी दृष्टि- समकालीन सृष्टि मानकर घटादिदष्टिमें चक्षुके सन्निकर्षका अनुविधानप्रत्यय दृष्टिके पूर्वमें घटादिका अभाव होनेसे नहीं हो सकता है, अतः सवमके समान जाअ्रत् कालीन घट आदिका अनुभव भी चाक्षुष नहीं है॥।६।l अब शङ्का होती है कि यदि दृष्टिसृष्टिका अवलम्बन करके सम्पूर्ण प्रंपश्च कलि्पित माना जाय, तो उसकी कल्पना करनेवाला कौन है? अविद्यारूप उपाधिसे रहित आत्मा है अथवा अविद्यारूप उपाधिसे उपहित आत्मा है? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि मोक्षमें भी, अन्य साधनोंकी अपेक्षा न करनेवाले निरुपाचिक कल्पक आत्माकी अवस्थिति होनेके कारण, प्रपश्चकी अनुवृत्ति होगी, इससे मोक्ष और संसारमें कोई अन्तर नहीं रह जायगा। अविद्यासे उपहित आत्मा

  • अनेक पुण्यकमोंके अनुष्ठानसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, ऐसे शुंद्धसत्त्त्व पुरुष स्वप्रपपज्से जाम्त्प्रपप्तगें कुछ भी विलक्षणता नहीं देखते हैं, उन व्रह्माविद्याभिलापियोंका लक्ष्य करके स्वम्र और जग्नत् अवस्थामें समस्त संसारकी उत्पत्ति और लयका प्रतिपाद करनेवाली श्रतिका अनुसरण करके दृष्टिसष्टिवादका पूर्वाचार्योने निरूपण करिया है, इसी वादका अवलम्वन करके प्रसभ्गवश जाग्रतपदार्थोंमें भी चाक्षुषत्वानुभवको भ्रान्त वतलाते हैं, यह भाव है।

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सृष्टिकल्पकका-विचार] भापानुवादसहित ३५७

विशेषप्रसङ्गात्। न द्वितीयः, अविद्याया अपि कल्पनीयत्वेन तत्कल्पना- त्प्रागेव कल्पकसिद्धेर्वक्तव्यत्वात्। अत्राहु: पूर्वसक्लप्तमोहयुक्तोऽन्यकल्पकः ॥ उकक शकाके समाधानमें कोई लोग कहते है कि पूर्व-पूर्व कस्पित अविद्यासे युक्त आत्मा ही उत्तर उत्तर अविद्याका कल्पक है। अत्र केचिदाहु :- पूर्वपूर्वक ल्पिता विद्योपहित उत्तरोत्तराविद्याकल्पकः । अनिदंप्रथमत्वाच्च कलपककल्पनाप्रवाहस्य नानवस्थादोपः। न चाडविद्याया अनादित्वोपगमाच्छृक्तिरजतवत् कल्पितत्वं न युज्यते, अन्यथा सादयनादि- विभागानुपपचतेरिति वाच्यम्, यथा स्वप्ने कल्प्यमानं गोपुरादि किश्चित्

संसारका कल्पक है, यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अविद्या भी कश्पित ही है, इससे उस अविद्याकी करपनासे पहले ही कल्पक अविद्योपहित आत्माका अस्तित्व मानना होगा, [परन्तु वह तो है नहीं, अतः अविद्याकी सृष्टि हो ही नहीं सकेगी ]। इस आक्षेपके परिहारमें कोई लोग कहते हैं कि पूर्व-पूर्व कल्पित अविद्यासे उपहित आत्मा ही उत्तर-उत्तर अविद्याका कल्पक है। यह अविद्या प्रथम कल्पित हे यह बात नहीं होगी, इससे कल्पक और कल्पनाके प्रवाहमें अनवस्था दोष नहीं है, [क्योंकि प्रपश्चकल्पकत्वरूपसे श्रुतिसिद्ध अविद्योपहित आत्मा पूव-पूर्व अविद्याके बिना प्रपश्चका कल्पक ही नहीं हो सकता है]। यदि यह शक्का हो कि अविधाका अनादिरूपसे स्वीकार किया गया है, इसलिए शुक्ति- रजतके समान उसको कस्पित नहीं मान सकते हैं, यदि हठात् उसे कल्पित मानोगे तो सादि और अनादिका जो विभाग किया गया है, वह असक्गत होगा, तो यह मी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे स्वम्म कल्प्यमान किसी गोपुर आदिकी-

  • 'जीव ऐशो विशक चित्तथा जीवेशयोर्भिदा। अविद्या सम्पितोर्योंग: पडकस्माकममादयः ॥' जीच, ईखर, विशुद्ध वरदम, जीव और ईखरफा भेद, अविद्ा, अचिया और चैतन्यका सम्बन्ध, ये छः-पदार्थ वेदान्तमतमें अनादि है और अन्य सादि हैं, यह छोकका अर्थ है, यदि अविद्या फल्पित मानी जाय, तो इस श्ोफसे अनादि और सादिका जो विभाग किया गया है, वह विरुद्ध होगा, यद भाव है।

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३५८ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्विताय परिच्छेद

पूर्वसिद्धत्वेन कल्प्यते, किश्चित्दानीमुत्पाद्यमानत्वेन, एवं जागरेऽपि किश्चित् कल्प्यमानं सादित्वेन कल्प्यते, किश्च्िदन्यथेति तावता साद्यना- दिविभागोपपचेः । एतेन कार्यकारणविभागोऽपि व्याख्यात इति। अविद्याव्यतिरिक्ते वा दष्टिसष्टिरितीतरे ॥।४२।।

कुछ लोग कहते हैं कि अविद्या आदिसे अतिरिक्त पदाथोमें ही दृष्टिसृष्टि है॥४२॥ अन्ये तु वस्तुतोऽनाद्येवाSविद्याSऽदि। तत्र दृष्टिसृप्टिर्नोपेयते, किन्तु ततोऽन्यत्र प्रपश्चमात्रे इत्याहु:॥ नन्वेवं श्रौतसर्गस्य कल्पकः को न कश्चन ।। अध्यारोप्यापवादो हि निष्प्रपञ्चत्वसिद्धये ।४३।

यदि शङ्का हो कि श्रौत संसारका कल्पक कौन है? तो कहिए कि-कोई नहीं है, क्योंकि निष्प्रपञ्च ब्रह्मकी सिद्धिके लिए ही आरोप करके अपवाद है॥४३॥

पूर्वसिद्धरूपसे कल्पना की जाती है और किसीकी उसी कालमें उत्पद्यमानरूपसे कल्पना की जाती है, वैसे ही जागरणमें भी किसीकी-आकाशादि कल्व्य- मान पदार्थकी-सादिरूपसे कल्पना की जाती है और किसी की-अविद्यादि पदार्थ की-अनादिरूपसे कल्पना की जाती है, इस कल्पनासे सादि और अनादि पदार्थोंके विभागकी उपपत्ति हो सकती है। सादिअनादि-विभागकी उपपत्तिके कथनसे कार्यकारणभावकी भी उपपत्ति हुई समझनी चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि अविद्या जीव आदि छः पदार्थ वस्तुतः-अनादि ही हैं, उनमें दृष्टि-सृष्टि नहीं मानते हैं, किन्तु अविद्यादिसे भिन्न सम्पूर्ण कार्य प्रपश्चमें दष्टिसृष्टि मानते हैं, अतः दोष नहीं है।

*प्रत्यक्षके प्रति घट आदि विषय जो.कारण हैं, उनको घटादिप्रत्यक्षसे पूर्व अज्ञात ही मानना पढ़ेगा, अन्यथा कार्य-कारणभावका विघात होगा, इसी प्रकार अविद्यासे उपहित एक चिदात्मा ही यदि अपनेमें संसारकी कल्पना करता है, तो संसारी जीवके एक होनसे गुरुशिष्यविभाग और देवतियगादिविभाग अनुपपन्ञ होगा, ऐसी शङ्का करके कहते हैं कि सादि- अनादि-विभागके युकतिसिद्धत्वका प्रतिपादिपादन करनेमे यह मालूम होता है कि वस्तुतः प्रत्यक्ष के प्रति विषय के कारण न होनेपर भी उसकी कारणरूपसे कल्पना है, यह भाव है।

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सृ्टिके कल्पकका विचार ] भापानुवादसहित ३५९

नन्वेवमपि श्रुतिमात्रप्रतीतस्य वियदादिसर्गतत्क्रमादे: क: कल्पकः ? । न कोडपि। किमालम्बना तहि 'आत्मन आकाशः सम्भूतः' इत्यादि- श्रुतिः १ निष्प्रपश्चन्रह्मात्मक्यावलम्वनेत्यवेहि। अध्यारोपापवादाभ्यां

यदि शक्का हो कि अविद्यासे उपहित आत्मा पूर्वोक्त युक्तिसे प्रत्यक्ष वस्तुका करुपक भले ही। हो, परन्तु केवल श्रुतिमात्रसे प्रतीत आकाश आदि प्रपञ्च और उनके कम आदिका कल्पक कौन होगा? अर्थात् कोई नहीं होगा, तो यह शक्ा भी युक्त नहीं है, क्योंकि वस्तुतः उसका कोई कल्पक नहीं है। इस परिस्थितिमं पूर्वपक्षी पूछता है कि 'आत्मन:०' (आत्मासे आकाशकी उत्पति हुई) इत्यादि श्रुति निरालम्ब होगी, नहीं, निरालम्ब नहीं होगी, कयोंकि पूर्वपक्षीको यह जानना चाहिए कि उन श्रुतियोंका आलम्वन प्रपश्चशून्य नक्ष और जीवका ऐक्य है, [अतः उनके प्रामाण्यके विपयमें पूर्वपक्ष नहीं हो सकता है।। अध्यारोप और अपवादसे प्रपश्नशून्य ब्रह्मकी अवगति

• 'दृष्टियमये एव प्रपथवछिः' (दृष्टिफालमें दी प्रपत सषटि) इस मतमें दृष्टिशव्दसे प्रत्यक्षप्रतीति दी विवकित दे, परोक्षप्रतीति विवक्षित नहीं है ययोंकि प्रत्यक्षप्रतीति ही विपयाभिन होनेसे प्राति- भासिक पदार्थकी खाधक हो सफती दे, दस परिस्थितिमें वियदादि पदार्थ प्रातिभासिक सिद्ध नहीं दोमें, क्योंकि वे फेवल श्रुतिमात्रगम्य है, यदि आकाशादि प्रपत्र-धुति और प्रत्यक्ष दोनोंसे- प्रसीत होते, तो प्रत्यक्षके विषय होनसे घटादिके समान वे आकाशादि पदार्थ भी प्रातिभासिक सिद्ध होते, परन्तु पेसा दोता नहीं, अतः आकाशादि, जो केवल क्रतिसे सिद्ध हैं, उनका कल्पक कौन है? यह प्रश्नकर्ताका भाय है। + अध्यारोपशव्दका अर्थ है किशी सत्यवस्तुमें असत्यवस्तुका आरोप, जैसे कि सत्य रज्तुम सर्पक आरोप करके ही 'यह सर्प है' ऐसी प्रतीति होती है। और इसी आरोपित वस्तुफा बाध अपवाद है। यद वाध धौत, यौकिक और प्रत्यक्ष भेदसे तीन प्रकारका है 'नेद नानास्ति' दत्यादि बाघ श्रीत है, कटक, कुण्डल आदि अपने उपादान भूत सुवर्णये भिमन नहीं है, ऐखा निथय करके दृश्यमान घटादिमें मिथ्यात्वके अवधारणसे पपथमें म्रझात्मकत्वका जो निश्य होता है, वह गौफिक वाघ है और यह रज्जु है, सर्प नहीं, दय प्रत्यक्षसे जैसे सर्पका बाध होता है, वैसे ही तत्वमस्यादि वाक्यसे उत्पन्न सविदानन्दात्मक मदा में हैं, इम्र प्रत्यक्षसे व्रपात्मत्वनिव्य होता है, वह प्रत्गक्षवाध है। इस प्रकारके अध्यारोप और अपवाद से निष्प्पथ बद्मकी प्रतिपति होती है, यह भाव है, लोकमें जैसे आफादस्वरूपके परिज्ञान करानेके लिए प्रवृत पुरुष पदले नैत्य और विशालता आदिका प्रद्दण कराकर अनन्तर 'गद आकाश वस्तुतः नील नहीं है' इस प्रकारके अपवादसे नीरूप, व्यापक औोर उदायीन गगनतत्वका निवय कराता है, पैस्रे ही वेदान्त भी पट्ले वियदादिका कारण

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३६० सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

निष्परपश्चब्रह्मप्रतिपत्तिर्भवतीति तत्प्रतिपच्युपायतया श्रुतिपु सृष्टिप्रलयो- पन्यास:, न तात्पर्येणेति भाष्याद्युद्दोपः। व्यर्थस्तर्हिं तात्पर्याभावे वियत्प्राण- पादयोवियदा दिसर्गतत्क्रमादिविषयश्रुतीनां परस्परविरोधपरिहाराय यतन :? न व्यर्थः। न्यायव्युत्पत्यर्थमभ्युपेत्य तात्पर्यं तत्प्नवृत्तेः । सूत्रेषु सृष्टिचिन्ता तु कृत्वाचिन्ताप्रदर्शनम्।। स्वान्नवत्फलसंवाद: शुद्धिर्वा कर्मणां फलम् ॥४४॥ सूत्रोंमें सृष्टिका विचार तो, कृत्वाचिन्ताका प्रदर्शन ही है, और वैदिक कर्मोंका फलसंवाद स्वप्नके समान है, अथवा उनका फल अन्तःकरणकी शुद्धि है॥४४॥ उक्त हि शास्त्रदर्पणे- 'श्रतीनां सृष्टितात्पर्यं स्वीकृत्येदमिहेरितम्। ब्रह्मात्मैक्यपरत्वान्तु तासां तन्नैव विद्यते॥' इति।

होती है, इसलिए समस्त प्रपञ्नशून्य ब्रह्मकी अवगतिके उपायरूपसे श्रुतियोंमें सृष्टि और पलयका कथन किया गया है, वस्तुतः सृष्टि आदिका प्रतिपादन करना श्रुतियोंका तात्पर्यविपयीभूत अर्थ नहीं है, इस प्रकार भाष्य आदि ड़े बड़े निबन्धोंमें सहस्शः प्रतिपादन किया गया है। यदि वियदादिसर्ग और उसके क्रमके प्रतिपादनमें श्रुतियोंका तात्पर्य नहीं है, तो वियत्पाद और प्राणपादमें परस्पर विरोधके परिहारमें जिस प्रयत्नका अवलम्बन सूत्रकार, भाव्यकार प्रभृतिने किया है, वह व्यर्थ होगा। नहीं, व्यर्थ नहीं होगा, क्योंकि न्यायोंकी व्युत्पत्तिके लिए कथश्चित् तात्पर्यका अङ्गीकार करके वियत्पाद और प्राणपादमें यत्नानुष्ठान किया है। * शास्त्र दर्पणमें कहा भी है- 'श्रुतीनां सृष्टि० ('स इमाल्ँलोकानसृजत' इत्यादि सृष्टिपतिपादक ब्रह्म है, ऐसा सृष्टि-वाक्योंसे ग्रहण करा कर पीछे निषेधवाक्योंसे आरोपित संसार- कारणतवके निषेधसे जीव और प्रप्वशन्य व्रह्मके ऐक्यका-प्रतिपादन करते हैं। इसलिए सृष्टिवाक्योंका-निपेधवःक्योंमें अपेक्षित निपेध्योंका समर्पण करके, उनके साथ एकचाक्यतापन् होकर निष्प्रपश्च ब्रह्मक्म प्रतिपादन ही-प्रयोजन है, स्वार्थमात्र प्रतिपादनप्रयोजन नहीं है, यह भाव है। * जिन अनुभवानन्द स्वामीजीके शिष्य श्रीअमलानन्द स्वामीजीने भामतीके ऊपर कल्पतरु व्याख्या की है, उन्हींके स्वरचित ब्रह्मसूत्रानुगामी 'शास्त्रदर्पण' नामक ग्रन्थमें यह श्लोक है, [दष्टव्य-अ० १ पा० ४ सू० ४ पृ० ८७ वाणीविलास प्रेस, श्रीरजम्]।

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सृष्टिके कल्पकका विचार] भापानुवादसहित ३६१

ज्योतिष्टोमादिश्रुतिवोधितानुष्ठानात् फलसिद्धिः स्वाप्नश्रुतिबोधिता- नुष्ठानप्रयुक्तफलसंवादतुल्या। ज्योतिष्टोमादिश्रुतीनां च सत्शुद्धिद्वारा

ग्रन्थेपु द्रष्टव्यः। अयमेको दृष्टिसमसमया विश्वसृष्टिरिति दृष्टिसृष्टिवादः। दृष्टिरेव हि विश्वस्य सृष्टिरित्यपरा विधा। ज्ञानस्व रूपमेवाSSहुरित्येतत्स्मृ तियानिकाः।8५। स्मृत्यनुसारी कुछ लोग दृष्टि ही संसारसषटि है, ऐसा इष्टिसष्टिका अन्य प्रकार है और यह संसार ज्ञानस्वरूप है, ऐसा कहते हैं।।४५।। श्रुतियोंका स्वार्थमें तात्पर्य मानकर ही वियत्पाद और प्राणपादमें विरोधका समाधान किया गया है, क्योंकि सृष्टिप्रतिपादक श्रुतियोंका तात्पर्य वस्तुतः ब्रह्मात्मैक्यमें ही होनेसे सृष्टिके प्रतिपादनमें उनका अभिप्राय है ही नहीं)। 'ज्योतिष्टोमेन यजेत स्वर्गकामः' (स्वर्गको + चाहनेवाला ज्योतिष्टोम याग करे) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित अनुष्ठानसे स्वर्गरूप फलकी सिद्धि वैसी ही है, जैसी कि स्वमावस्थामें उक्त श्रुतिकी कल्पना करके उससे ज्योतिष्टोम आदिका परिज्ञान प्राप्त कर उसके अनुष्ठानसे फलकी प्राप्ति हो अर्थात् जैसे पुरुप स्वम्रकालमें परिकल्पित श्रुतियोंसे स्वर्ग आदिके साधनविशेपोंको जानकर उनके अनुष्ठानसे मिथ्या ही फल प्राप्त करता है, वैसे ही जागरणमें भी उन श्रुतियोंसे साधनविशेषोंकी अवगति द्वारा उनका अनुष्ठान करके मिथ्या स्वर्गादि फल प्राप्त करता है, यह भाव है। और अन्तःकरणकी शुद्धि द्वारा ज्योतिष्टोमादि यागकी प्रतिपादक श्रुतियाँ! त्रप्मका ही परिज्ञान कराती हैं, अतः वे निष्प्रमाण नहीं हैं, इत्यादि दृष्टिसृष्टिवादका विवेचन-प्रकार आकर ग्रन्थोंमें देखना चाहिए। एक यह-दृष्टि समकालीन ही संसारकी उत्पत्ति है, इस प्रकारका-दष्टिसष्टिवाद है। + 'यन्न दुःसेन सम्भिन्नं न च प्रस्तमनन्तरम्। अभिलापोपनीतञ्च तत्सुखं स्वःपदास्पदम्' अर्थात् जिस मुसमें दुःसकी मात्रा न हो, जिसका नाश न हो-जो चिरस्थायी हो और जो इच्छानुसार प्राप्त होता दो, वह मुस स्वर्गशब्दसे कहा जाता है। *कर्मप्रतिपादफ वार्क्योंसे और उपासनाप्रतिपादक वाक्योंसे विहित कर्म और उपासनाओं- का अनुष्टान करनेवाले पुरुषका ही चित्त शुद्ध होता है, झुदूचित्त अधिकारी पुरुपको वेदान्त- शास्त्र व्हाज्ञान कराता है, अतः कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड अधिकारित्वकी प्राप्ति द्वारा ब्रह्म- जानके ही अश हैं, इसलिए उन दोनों काण्डोंका भी ब्रह्ममें ही तात्पर्य है, स्वर्गसाधनत्वरूप स्वार्थमें नहीं है, अतः उनमें अप्रामाण्य शक्ता नदीं है, यह भाव है। ४६

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३६२ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

अन्यस्तु दृष्टिरेव विश्वसृष्टिः। दश्यस्य दृष्टिभेदे प्रमाणाभावात्। 'ज्ञानस्वरूपमेवाऽडहुजगदेतद्विचक्षणाः। अर्थस्वरूपं भ्राम्यन्तः पशयन्त्यन्ये कुदृष्टयः॥।' इति स्मृतेश्रेति सिद्धान्तमुक्तावल्यादिदर्शिंतो दृष्टिसृष्टिवादः। सृष्टिदृष्टिं परे प्राहुः संस्काराद्यनपक्षणात्॥ तथाऽपि विश्वं मिथ्येव वाव्यत्वाच्छूतिमानतः ॥४६॥ यद्यपि संस्कार आदिकी अपेक्षा न होनेके कारण कुछ लोग सृष्टिदृष्टिवादका ही आश्रयण करते हैं, तथापि श्रुति वाधित होनेसे संसार मिथ्या है॥४६॥ द्विविधेऽपि दृष्टिसृष्टिवादे मनःप्रत्ययमलभमानाः केचिदाचायाः सृष्टिदृष्टिवादं रोचयन्ते। श्रुतिदशितेन क्रमेण परमेश्वरसृष्टमज्ञातसन्तायुक्तमेव विश्वं तत्तद्विषयप्रमाणावतरणे तस्य तस्य दष्टिसिद्धिरिति।

  • सिद्धान्तमुक्तावली आदिमें दूसरे ही दष्टिसष्टिवादका निरूपण किया गया है-दृष्टि ही विश्वसृष्टि है, [सर्थात् स्वप्रकाशज्ञानस्वरूपा दृष्टि ही प्रपश्चकी सृष्टि है, दृष्टिसमकालीन अन्य प्रपश्चकी सृष्टि नहीं है, क्योंकि ] दृश्य पदार्थको स्वप्रकाशज्ञानस्वरूपसे पृथक् माननेमें कोई प्रमाण नहीं है, और इस अर्थकी प्रतिपादिका स्मृति भी है कि विवेकी पुरुष इस प्रत्यक्षसिद्ध जगत्को ज्ञानात्मक ही कहते हैं, परन्तु कुछ कुदृष्टि-भ्रान्त पुरुप-इसी ज्ञानरूप जगत् को ज्ञानसत्तासे भिन्न देखते हैं। उक्त दो प्रकारके दृष्टिसृष्टिवादमें विश्वास न रखते हुए। कुछ आचार्य सृष्टिदृष्टिवादमें अपनी अभिरुचि रखते हैं। श्रुतिमें वतलाये गये क्रमके अनुसार परमेश्वरसे वना हुआ जगत् अज्ञात सत्तासे ही युक्त है, और उन-उन विषयोंमें प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होनेपर उन-उन विषयोंका ज्ञान सिद्ध होता है।

*द्रष्टव्य-जीवानन्द विद्यासागर द्वारा कलकत्तामें सुद्रित सिद्धान्तमुक्तवलीके ३१५ वें पेजमें इस दृष्टिसष्टिवादका विस्तारसे वर्णन किया गया है-कोऽयं विकार: द्वैतं तद्दृदष्टिवा? इत्यादिसे। + मनःप्रत्ययशब्दका अर्थ है-विश्वास अर्थात् दृष्टिसृष्टिवादमें प्रामाणिकत्वका निश्चय नहीं है, इसमें हेतु यह है कि जाग्तप्रपश्वमें प्रातिभासिकत्वका अज्गीकार, आकाश आदि सृष्टिका अपलाप, कर्मोपासनाकाण्डमें वर्णित अर्थोंके अनुष्ठानसे होनेवाले स्वर्ग आदिका अपलाप आदि। अतः सृष्टि- दृष्टिवाद ही युक्त है अर्थोत क्षतिमें जिस आकाशादिकमसे सृष्टिका प्रतिपादन किया गया है, उसी

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सृष्टिके कल्पकका विचार] भापांनुवादसहित ३६३

न चैवं प्रपश्चस्य कल्पितत्वाभावे शुत्यादिप्रतिपन्नस्य सृष्टिप्रलयादिमतः प्रत्यक्षादिप्नतिपन्नार्थक्रियाकारिणश्च तस्य सत्यत्वमेवाऽभ्युपगतं स्यादिति चाच्यम्, शुक्तिरजतादिवत् सम्प्रयोगसंस्कारदोपरूपेण, अधिष्ठानज्ञानसंस्कार- दोपरूपेण वा कारणत्रयेणाजजन्यतया कल्पनासमसमयत्वाभावेडपि ज्ञानैकनिव-

यदि शक्का हो कि * उक्त रीतिसे प्रपञ्चको यदि कस्पित न माना जाय, तो श्रुति, स्मृति आदिसे ज्ञात सृष्टि, प्रतय आदिसे युक्त तथा प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञात अर्थक्रियाकारित्वसे युक्त संसारमें सत्यता ही स्वीकृत होगी? तो यह शक्का + युकत नहीं है, क्योंकि यद्यपि शुक्ति-रजत आदिके समान सम्मयोग, संस्कार और दोपरूप अथवा अधिष्ठानज्ञान, संस्कार और दोपरूप तीन कारणोंसे जन्य न होनेके कारण वियदादि प्रपश्च कल्पनासमानकालीन नहीं है, तथापि

कमये परगेदवरसे वष्टि उत्पन होती है, और वह अज्ञात सत्तावाली है, तत्-तत् विषयोंमें तवू-चन प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होनेके अनन्तर आवरणमता द्वारा तत्-तत् विपयोंका अपरोक्षावभास (दषि) होता दै, अतः दृषटि दी मृषि नहीं है, यद सृष्टिदृष्टिवादियोंका भाव है। * दाहाका तालाये यद है कि वष्टिटहटिवादके अनुसार प्रपथ कल्पित न माना जाय, तो प्रपम सत्य ही विद्द दोगा, क्योंकि प्रपथ सत्य है, अ्रुतिसिद्ध होनेसे, बह्मके समान, यह अनुमान प्रमाण है। सदपि प्रप स्वरूपत: प्रखससे सिद्ध है, तथापि सृषि, प्रलय आदियुक्तत्वरूपसे श्रुंति, स्मृति आदिये ही सिद्ध है, दसी प्रकार प्रपथव सत्य है, अर्थकियाकारी होनेसे, सृष्टि आदि अगोिगा कारी बस्षके समान, यह हेतु स्वरूपासिद् भी नहीं है, क्योंकि पृथ्वी, जल आदिमें उक हेनु प्रतयक्षसे विद् हो दै। + सनाभानका सातपर्न यह दै-गद्यपि आकाश्ष आदि प्रपथमें कल्पना-समान-कालिकत्व नहीं है, जिसे कि दष्ियाचादियोंने माना है, क्योंकि वहींपर कल्ननासमानकालिकतव होता है, जहाँपर सम्पयोग यदि वारणतयजन्यत्व रहता है, तथापि पारमार्थिक सत्यत्वसे विरुद्ध मिथ्यात्व, जिस्रका (तीन प्रकारोंसे मूलमें निर्वचन किया है) वियदादि परपथमें वर्तमान है, अतः इस वादमें भी प्रपम पारमार्मिक मत्य नहीं हो साकता है। :केवल ज्ञाननियत्यत्व-जिव्रका बाध केवल अधिष्ठानतत्व्साक्षात्कार हीसे हो, वह मिध्यात्य ह। जये सुधिमें उत्न रजतकी निवृत्त शुचिरूप अधिष्ठानके तत्त्वसाक्षातकारसे होती है, अतः वद्द मिथ्या है। शदयदिलक्षणत्व-जो सत (त्रिफलावाधित) से और असत् (किसी समयमे भी प्रतीत न दोनेवाले) से विलक्षण हो, वह मिथ्या है, जसे शुकिरजत न सद है और न शक्म्छके ममान असत दै, अतः शुकिरजत मिथ्या है। केवल सदिलक्षणको मिथ्या कहनेसे असत् दरयमें दोप होगा और असदिलक्षणमात्र कहनसे नम्ममें अतिव्याप्ति होगी, इसलिए सदस- दिलसण मिथ्याका लक्षण कहा गया है।

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३६४ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

त्र्यत्वरूपस्य, सदसद्विलक्षणत्वरूपस्य, प्रतिपत्नोपाधिगतत्रकालिकनिषेध- प्रतियोगित्वरूपस्य वा मिथ्यात्वस्याऽभ्युपगमात्। सत्यत्वपक्षे प्रपञ्च उक्त -: रूपमिथ्यात्वाभावेन ततो भेदात्। अहङ्गरादीमिथ्यात्वं नन्वेवं सम्प्रसिध्यति। तदध्यासाय टीकादौ व्यर्था कारणकल्पना॥४७॥ शङ्का-जव आकाश आदिके समान अहङ्ार और उसके धर्म मिथ्या सिद्ध होते हैं, तब उसके मिथ्यात्वके लिए भाष्य, टीका और विवरणमें कारणत्रयकी की गई कल्पना व्यर्थ ही है॥४७॥ नन्वेवमहङ्कारतद्धर्माणामपि उत्तरूपमिथ्यात्वं वियदादिवत् कल्पितत्वा-

केवल ज्ञानसे निवर्त्यत्वरूप, सदसद्विलक्षणत्वरूप अथवा प्रतिपन्नोपाधिगतत्रकालिक निषेधप्रतियोगित्वरूप मिथ्यात्व आकाश आदि प्रपञ्चमें सिद्ध ही है। [अतः सत्यत्वविरोधी उक्त त्रिविध लक्षणोंसे लक्षित मिथ्यात्वके विद्यमान होनेसे उनमें सत्यत्वकी प्रसक्ति नहीं है, यह भाव है]। घटादिके सत्यत्वपक्षमें प्रपञ्चमें उक्त मिथ्यात्वके न होनेसे सत्यत्वपक्षसे दृष्टिसृष्टिपक्षमें मेद है ही। यदि शक्का हो कि * ज्ञाननिवर्त्यत्व आदि यदि मिथ्यात्वके स्वरूप माने जाय, तो आकाशादि प्रपश्चके समान अहक्कार और उसके धर्मोंमें कथित मिथ्यात्व

तृतीय प्रतिपन्नोपाधिगतत्रकालिकनिषेध प्रतियोगित्व मिथ्यात्वका लक्षण है-अर्थात् अधिष्ठानमें ज्ञात जो अत्यन्ताभाव उसका जो प्रतियोगी हो, वह मिथ्या है, जैसे शुककिरजतका अधिष्ठान है शुक्ति, उसमें रहनेवाला त्रैकालिक निषेध अत्यन्ताभाव है-शुक्तिमें रजत नहीं है, नहीं था और होगा भी नहीं, इसका प्रतियोगी हुआ रजत, इसलिए रजत मिथ्या है। ये मिथ्याके तीनों लक्षण प्रपन्नमें घटते हैं, क्योंकि आकाश आदि प्रपश्वका ब्रह्मरूप अधि- छानतत्त्वसाक्षातकारसे वाध होता है, प्रपश्व सत् एवं असत्से विलक्षण है और व्रह्मरूप जो उपाधि-अधिष्ठान है, उसमें प्रपश्वका जो त्रैकालिक निषेध है यह उसका प्रतियोगी भी प्रपश्व है। * 'तथान्तःकरणधर्मान्-कामसङ्कल्पविचिकित्सा .... एवमहं प्रत्ययिनम्•' इत्यादि भाष्य, युष्मदर्थलक्षणापन्नोऽइ्ङ्कारोऽध्यस्त इति .... ननु वहिरर्थकरणदोषोर्थगतः .... न त्विह कारणन्तरायत्ता इत्यादि टीका (प्ृ० २५६ भामत्यादि टीकानवकोपेत भाष्य कलकत्ता सुद्रित) और इसी पत्रस्थ अद्वितीयचैतन्यात्मनि ...... इत्यादि विवरण, जिनसे अदङ्कारादि अध्यास सिद्ध किया गया है, इस प्रकृत शझ्काके बीज हैं, यह भाव है।

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सृष्टिके कल्पकका विचार] भापानुवादसहित ३६५

भावेऽपि सिध्यतीति भाष्यटीकाविवरणेपु तदध्यासे कारणंत्रितयसम्पादना- दियत्नो व्यर्थ इति चेदू, अन्नाहु: साक्षिवेधत्वाद हक्कारस्पृहादिकम्। प्रातिभासिकमेवेति चित्सुखाचार्ययोगिन: ॥४८।l उक्त शकाके समाधानमें योगी चित्सुखाचार्य कहते हैं कि अदकार और उसके धर्म साक्षिषेच होनेसे [ युक्तिरजतके समान ] प्रातिभासिक ही हैं॥४८। अहक्कारादीनामपि केवलसाक्षिवेद्यतया शुक्तिरजतवत् प्रातिभासिकत्व- मभिमतमिति चित्मुखाचार्याः॥ चैतन्यस्याSममाणस्य प्रमाणत्वेन कीर्तनात्। तं तु रामाद्वयाचार्या: मरौदिवादं प्रचक्षते ।।४९। अप्रनाणभूव चैतन्यमें प्रमाणत्वये कथनसे उस कारणतरितय प्रतिपादक भाप्यटीकादि गन्थको रामादयाचार्य प्रोटिवादमाच मानते हैं॥४९॥ अभ्युपेत्यवादमात्रं तत्, 'अद्वितीयाघिष्ठानत्रम्मात्मप्रमाणस्य चैतन्यस्य' इत्यादिततत्यकारणत्रितयसम्पादनग्रन्थस्य चैतन्यस्य ग्रमाकरणत्वे वेदान्त- उन अहक्वारादिके प्रातिभासिक न माननेपर भी हो सकता है, फिर भाष्य, टीका और विवरणमं अहक्वार आदिके अध्यासमें कारणत्रयके सम्पादन आदिमें जो प्रयक किया गया है, वह व्यर्थ ही है? नहीं, व्यर्थ नहीं हैं, क्योंकि केवल साक्षीसे वेद्य होनेके कारण शुक्ति- रूजतके समान सहद्वार आदि प्रातिभासिक ही हैं, ऐसा चित्सुखाचार्य मानते हैं। + उक्त विषयमें रामादवयाचार्यका कहना है कि भाष्य; टीका आदि सब अन्थ केवल अन्युपेत्यवाद दी हैं अर्थात् अहद्वार आदिमं प्रातिभासिकत्वका केवल आपाततः स्वीकार करके माप्य, टीकादिमें कारणत्यका सम्पादन किया गया है, वस्तुस्थितिका अग्रीकार करके नहीं किया गया है, क्योंकि वहाँके 'यद्वितीया०' (अद्वितीय अधिष्ठानरूप न्रममात्मामें चैतन्य ही प्रमाण है) इत्यादि + इनका सास्पर्य यह है कि अद्कार आदि भले ही फेवल साक्षीसे वेद्य हों, परन्तु उन्हें जुफिरजतार्दिक समान प्रातिभासिक मानना अयुक है, क्योंकि अद्दक्वार आदिका व्यवदारकालमें बाध नहीं देखा जाता है, इसलिए वे वस्तुतः प्रातिभासिक नहीं है, परन्तु उनके प्रातिभासिकत्व- का आपाततः अद्ीकार करके कारणप्यजन्यत्वका समर्थन भाष्य आदिमें किया गया है।

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३६६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

करणत्वादिकल्पनाभङ्गप्रसङ्गेन औ्रौढिवादत्वस्य स्फुटत्वादिति रामाद्व- याचार्या: ॥७॥ ननु प्रपञ्चो भिथ्यात्वात् कथमर्थक्रियाक्षमः। यदि शङ्का हो कि प्रपञ्च मिथ्या होनेसे अर्थक्रियामें समर्थ कैसे होगा ? (८) ननु दृष्टिसृष्टिवादे, सृष्टिदृष्टिवादे च मिथ्यात्वसम्प्रतिपत्तेः

केचित् स्वप्नवदत्राऽऽहुः समसत्ताकतत्कियाम् ॥ ५०॥ उक्त शङ्काके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि रवप्नके समान जागरणमें भी समानसत्ताक अर्थक्रिया होगी ॥५०॥ स्वमवदिति बूमः । ननु स्वाप्नजलादिसाध्यावगाहनादिरूपारऽर्थक्रिया

कारणत्रयसम्पादक ग्रन्थकी प्रौढिवादता स्पष्ट है, [ यदि उसे प्रौढिवाद न माना जाय, तो चैतन्यके प्रमाकरण होनेसे वेदान्त ही न्रह्मप्रमाके करण हैं, इत्यादि कल्पनाका भङ्ग होगा]॥७ अब * शङ्का होती है कि दृष्टि-सृष्टिवादमें और सृष्टि-दृष्टिवादमें प्रपश्चके मिथ्यात्वका अङ्गीकार होनेसे मिथ्याभूत प्रपञ्च अर्थक्रियाकारी कैसे होगा? इस + आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि स्वन्नके समान जाग्रत्में अर्थक्रियाकारित्व हो सकता है, अर्थात् जैसे मिथ्याभूत स्वाप्न जलमें स्नान आदि अर्थकरिया देखी जाती है, परन्तु उन पदार्थोंमें सत्यत्व नहीं है, वैसे ही उक्त दो वादोंमें प्रपञ्चके सत्य न होनेपर भी अर्थक्रिया हो सकती है, यह भाव है। यदि शक्का हो कि रवमके जल आदिसे होनेवाली अवगाहन आदि अर्थक्रिया असत्य ही है, सत्य नहीं है, जाग्रत्में अवगाहनादि अर्थ सत्य

  • अर्थक्रियाकारित्व प्रपश्वके पारमार्थिकत्वमें प्रयोजक नहीं है, ऐसा पूर्वमें कहा जा चुका है, परन्तु शङ्ा करनेवाला कहता है-वह अयुक्त है, क्योंकि जो मिथ्याभूत पदार्थ है, उसमें अर्थकियाकारित्व रह नहीं सकता है, कारण कि मिथ्याभूत शुक्तिरजतसे कटक आदि अर्थ- क्रिया नहीं देखी जाती है, अतः प्रप्च मिथ्या नहीं है, यह शङ्का करनेवालेका अभिप्राय है। अर्थक्रियाकारित्व हेतुसे भी पपश्वमें सत्यत्वका साधन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि स्वाम्र पदार्थोंमें व्यभिचार है, यह इस अन्थसे कहा जाता है।

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मिथ्या पदार्थोकी अर्थक्रियाकारिताका उपपादन-विचार] भापानुवादसहित २६७

असत्यैव, किन्तु जाग्रज्लादिसाध्या सा सत्या? अविशिष्टमुभयत्रापि स्वसमानसत्ताकार्थक्रियाकारित्वमिति केचित्। स्वमोत्थमयकम्पादेर्जागरेऽप्यनुवर्तनात्। अद्वैतविद्याचार्याणां समसत्ता न सम्मता ॥५१॥ सवमनसे जागनेवाले मनुप्यके भय, कम्प आदि जागरणमें देखे जाते हैं, अतः अद्वैतविद्याचार्य समसत्ताक अर्थक्रिया नहीं मानते हैं॥५१।। अद्वैतविद्याचार्यास्त्वाहु :- स्वामपदार्थानां न केवलं प्रवोधवाध्यार्थ- क्रियामात्रकारित्वम्। सवामाङ्गनाधुजङ्गमादीनां तदवाध्यसुखभयादिजन-

है? तो यह भी शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे प्रश्न करनेवालोंसे यह पूछा जा सकता है कि क्या जाअत्कालीन जलादिसे साध्य अवगाहनादि अर्थक्रिया सत्य है? अर्थात् उसे भी सत्य नहीं मान सकते हैं, इसलिए सत्यार्थक्रियाकारित्वसे भी प्रपञ्चमें सत्यत्व सिद्ध नहीं कर सकते हैं। स्वसमानसत्ताक अर्थक्रियाकारित्व तो स्वम और जागत् दोनोंमें समान है, [ परन्तु इससे प्रपश्चमें सत्यत्व सिद्ध नहीं हो सकता है ]। * पूर्वोक्त आक्षेपके समाधानमें अद्वेतविद्याचार्य कहते हैं-स्वन्नकालीन पदार्थोकी केवल वही अर्थक्रियाकारिता नहीं है, जो कि प्रवोधसे वाधित होती

*तत्पर्य यह है कि केवल अर्थकियाकारिता सत्यत्वप्रयोजक नहीं है, परन्तु सत्यार्थ कियाकारिता दी सत्यत्यकी प्रयोजक है। आकाश, घट आदिकी अर्थकिया सत्य है, इसलिए वे आकाशादि मिध्या नहीं दो सकते हैं, स्वाम् जलादिकी अर्थ किया असत्य है, अतः उनमें सत्यत्व सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः घटादि प्रपथ्व सत्य है, सत्यार्थक्रियाकारी होनेसे इस अनुमानसे प्रपथमें सत्यत्व सिद्ध हो सकता है, तथापि यह असम्नत है, क्योंकि जागत्कालीन अर्थोकी अर्थकिया भी सत्य-त्रिकालावाघित-नहीं है, अतः उसे नहीं मान सकते हैं। अर्थकियाकारिता, तो दोनोंमें समान है। •अद्देतविद्याचार्यके मतमें र्वम्नकालीन पदार्थोकी भी अर्थकिया सत्य मानी गई है, अतः पूर्व मतोंसे इसमें वेलक्षण्य है। तात्पर्य यह है कि प्रवोधसे वाध्य अर्थकिया प्रातिभासिक अर्थकिया होती है, और जो प्रयोधम बाधित अर्थकरिया नहीं होती है, वह भले ही स्वम- कालीन क्यों न दो परन्तु अप्रातिभासिक-सत्य-ही अर्थक्किया होती है। इसलिए स्वम्- कालके सभी पदार्योमें असत्य अर्थकियाकारिता नहीं रदती है, किन्तु व्यावहारिक अर्थ- कियाकारित्य भी रदता ही है। क्योंकि स्वमाग्रना आदिसे ऐसे सुख आदि होते हैं, जिनका जागरणमें बाध नहीं होता है, इसी प्रकार व्यावदारिक पदार्थोंमें व्यावदारिकार्थक्रियाकारिता

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३६८ सिद्धान्तलेश संग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

कत्वस्यापि दर्शनात्। स्वाम्नविपयजन्यस्यापि हि सुखभयादे: प्रघोधानन्तरं न बाधोऽनुभूयते, प्रत्युत प्रवोधानन्तरमपि मनःप्रसादशरीरकम्पनादिना सह तदनुवृत्तिदर्शनात् प्रागपि सच्चमेवाऽवसीयते। अत एव प्राणिनां पुनरपि सुखजनक्विपयगोचरस्वप्ने वाञ्छा, अतादृदशे च स्वप्ने प्रद्वेपः । सम्भवति च स्वप्नेऽपि ज्ञानवद् अन्तःकरणवृत्तिरूपस्य सुखभयादेरुदयः । न च स्वाप्राङ्गनादिज्ञानमेव सुखादिजनकम्, तच्च सदेवेति वाच्यम्, तस्यापि

है, क्योंकि स्वम्नकालीन अज्वना, भयक्कर सर्प आदिसे जागरणमें वाधित न होनेवाले सुख, भय आदि भी देखे जाते हैं। यद्यपि स्वामिक अङ्गना आदि विषयोंसे आनन्द और भय आदि उत्पन्न हुये हैं, तथापि उनका 'स्वसमें सुख, भय आदि मुझे नहीं हुए' इस प्रकार प्रवोधमें वाध नहीं देखा जाता है, प्रत्युत उठनेके बाद भीं मनकी + प्रसन्नता और शरीरके कम्प आदिके साथ सुखादिकी अनुवृत्ति देखी जाती है, अतः उठनेके पूर्वमें भी उनकी सचा निश्चित होती है। इसीसे आनन्दपद विषयोंसे युक्त स्वप्की प्राणियोंको फिर भी इच्छा होती है और जो स्वम्न सुखप्रद विषयोंसे युक्त नहीं है, उसकी इच्छा नहीं होती है- उसमें द्वेष होता है। स्वममें ज्ञानके समान अन्तःकरणके वृत्तिरूप सुख, भय आदि उत्पन्न होते हैं। यदि शङ्का हो कि स्वमकालिक अङ्गना आदिका ज्ञान ही सुख आदिका कारण है, और वह ज्ञान तो सत्य ही है, इसलिए कोई अनुपपत्ति

सिद्ध हो सकती है, इसलिए अर्थक्रियाकारिताकी मिथ्यात्वपक्षमें अनुपपत्ति नहीं हो सकती है, यह भाव है। + सुखानुभवसे मनःप्रसाद हुआ करता है और भय या दुःखके अनुभवसे शरीरकम्प आदि हुआ करता है, इन्हींसे ज्ञात होता है कि जागनेके वाद भी सुख, भय आदिकी अनुतृत्ति होती है, इसलिए उनकी जाग्रतूकालमें अनुवृत्ति होनेसे प्रवोधके पूर्वमें भी उनकी सत्यता सावित होती है, यह भाव है। इस विषयमें अनुमान भी करते हैं-स्व्रप्नकालीन भय और सुख आदि, जाप्रत् सुख आदिके स्रमान व्यावहारिक सत्य हैं, प्रातिभासिक नहीं हैं, क्योंकि प्रचोघके बाद भी उनका वाध नहीं होता है और जाग्रत् कालमें उनकी अनुृत्ति भी होती है। 1 'तदेतत्वत्त्वम् येन स्वमं पश्यति इस श्रतिके आधारपर कल्पतरुकारने मानसवृत्तिरूप ज्ञान, स्वप्नमें माना है, इसी प्रकार मानसवृत्तिरूप अन्तःकरण वृत्तिरूप-भय आदि भी व्याव- हारिक हो सकते हैं, यह भाव है।,

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मिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भापानुवादसहित ३६९

दर्शनस्पर्शनादिवृत्तिरूपस्य स्व्रननप्नपश्चसाक्षिण्यध्यस्तस्य कल्पनामात्रसिद्ध- त्वाद, नह्युपरतेन्द्रियस्य चक्षुरादिवृत्तयः सत्याः सम्भवन्ति। न च तद्विपयापरोक्ष्यमात्रं सुखजनकम्, तच्च साक्षिरूपं सदेवेति वाच्यम्, दर्शनात् स्पर्शने कामिन्या:, पदा स्पर्शनाद पाणिना स्पर्शने; सुजङ्गस्पाड- नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वहज्ञान भी, जो कि दर्शन, स्पर्शन आदि वृत्तिरुप और स्वम्नप्रप्वके साक्षीमें अध्यस्त है, केवल कल्पनासे ही सिद्ध है, क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ उपरत हुई हैं, ऐसे पुरुपके चक्षु आदिकी वृत्तियाँ सत्य नहीं हो सकती हैं। यदि शक्का हो कि स्वास विपयका आपरोक्ष्य ही सुख- जनक है और वह साक्षीरूप होनेसे सत्य है, अतः अनुपपत्ति नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जागरणमं सुन्दरीके दर्शनकी अपेक्षा स्पर्श करनेमें।

"शद्ा समाधानका तात्पर्य यह है कि स्वान् सुख आदिकी उत्पत्ति स्वाप्र अज्ञना आदिसे नहीं होती है, किन्तु उनके ज्ञानसे होती है, अतः असत्यसे सत्यकी उत्पत्ति • नहीं हो सकती है, किन्तु सत्यसे सत्यकी उत्पत्ति होती है। प्रकृतमें स्वाप्र अज्ञना आदिका ज्ञान साक्षीरप है, अतः अनुपति नहीं है, यह पूर्वपक्षका आशय है, इसका उत्तर है कि मनोमान्रजन्य वृत्िरप ज्ञान सत्य है या चक्षुरादिजन्य वृत्तिरुप ज्ञान सत्य हे अथवा केवल साक्षीरूप ज्ञान सत्य है। इस विकल्पमें प्रथम पक्ष युक नहीं है, क्योंकि इसमें भी यह निर्ल दो सकता है कि केवल उत्त धृत्ति ही भयादिकी हेतु है या स्वाप् भुज् आदिरप विपयसे विशेषित मृत्ति हेतु है? इसमें पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि यतुकिधित् वृत्तिये भी मुख आदिकी रममें उत्पत्ति होने लगेगी, द्वितीय पक्ष भी युक नहीं दै, क्योंकि पृत्तिमात्रके सत्य होनेपर भी विषयोंके असत्य होनेसे उन विपयोंसे विशिष्ट वृत्ति असत्य दोगी, इसलिए प्रातिभासि ज्ञानसे व्यावहारिक अर्थक्रिया उत्पन्न हो सकती दै, अतः तक उदादरण युकत ही है, ऐसा समक्ष कर प्रथम कहे गये विकल्पमेंसे द्वितीय पक्ष का अर्थात् चक्षुरदिजन्य वृत्तिरूप ज्ञानस्वरूपका 'ज्ञानस्यापि' इत्यादि मूलसे परिदार किया गया है। तृतीय विकल्पका 'न च तदविपया' इत्यादिसे परिहार किया गया है। अतः 'स्वाम अगनादिज्ान सत्य है, यह कहना असमत है। + जागरण अवस्थामें यद अकसर देखा गया है और अनुभवसिद्ध भी है कि किसी रमणीके दर्शनकी अपेक्षा स्पर्शसे अधिक गुख होता है, एवमेव स्पेके पुच्छस्पर्शकी अपेक्षा खिरके स्पर्शये मय अधिक होता है। अतः यह मानना आवश्यक है कि केवल विषयापरोक्ष्यसे मुख, भय आदिकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु दर्शन, स्पर्शन आदि रूपयृत्तिचिशेपसे युक्त विपयोंके आपरोक्ष्यसे ही सुख आदिकी उत्पत्ति होती है, इसी प्रकार स्वगमें भी तत् तत् विषयोंके केवल आपरोक्ष्यसे सुखादिकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु ताहसृत्तिविशेपोसे विशेपित विपयोंके आपरोक्ष्यसे ही उनकी उत्पत्ति होती है। इसलिए केवल ४७

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३७० सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

सर्मस्थले स्पर्शनाद् मर्मस्थले स्पर्शने सुखविशेषस्य भयविशेषस्य चाऽनुभव सिद्धत्वेन स्वमेऽपि तत्तत्सुखभयादिविशेपस्य कल्पितदर्शनस्पर्शनादिव्टच्ति- 1 विशेषजन्यत्वस्य वक्तव्यत्वादिति।

स्वप्में चाह्यपुरुपसे अव्यस्त घरके भीतरके अंधकारम अर्थकरिया-वटाद्यावरण और दीपादिनाश्यता-देखी जाती है, अतः पूर्वोंक्त अद्वैताचार्यसम्मत पक्ष युक्त ही है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।। ५२। तथा जागरे घटादिग्रकाशनक्षमतत्रत्यपुरुपान्तर निरीक्ष्यमाणालोकवत्य पवरके सद्ः प्रविष्टेन पुंसा कल्पितस्य सन्तमसस्य ग्रसिद्धसन्तमसोचि- तार्थक्रियाकारित्वं दष्टम्। तेन तं प्रति वटाद्यावरणम्, दीपाद्यानयने तदप- सरणम्, तन्नयने पुनरावरणमित्यादेर्दर्शनादित्यपि केचित्।

और वहां मी पैरसे स्पर्शकी अपेक्षा हस्तसे स्पर्श करनेमें, और सर्पके अमर्म- स्थलके स्पर्शकी अपेक्षा मर्मस्थलके स्पर्श करनेमें क्रमशः अधिक सुखविशेप और भयविशेष अनुभवसिद्ध है, इसलिए स्वममें भी तत्-तत् सुख, भय आदि विशेष- कल्पित दर्शन, स्पर्शन आदि वृत्तिविशेपोंसे-जन्य हैं, यह कह सकते हैं। इसी * प्रकार जाग्रदवस्थामें घट आदि पदार्थोंका प्रकाशन करनेमें समर्थ तथा छोटे घरमें स्थित अन्य पुरुषों द्वारा द्ृश्यमान तेजसे युक्त छोटे घर में भी तत्क्षण प्रविष्ट पुरुष द्वारा कल्पित अन्धकार, प्रसिद्ध अन्ध- कारके सद्दश, अर्थक्रियाकारी देखा जाता है, क्योंकि उस अन्धकारसे उस पुरुपके प्रति घटादिका आवरण, दीप आदिके लानेपर उसका अपसरण और दीप आदिके हटानेपर पुनः संवरण आदि अनुभूत होते हैं-ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।

विपयापरोक्ष्यके सत्य होनेपर भी उक्त विशिष्ट आपरोक्ष्यके प्रातिभासिक होनेके कारण प्राति- भासिकसे व्यावहारिक सत्यकी उत्पत्ति हो सकती है, यह भाव है। * पूर्वोंकत प्रकारसे स्वप्नावस्थामें असत्यसे सत्य अर्थक्कियाका उपपादन किया गया, जागरणमें भी असत्यसे सत्य अर्थक्रिया होती है, यह भी कुछ लोगों का सम्मत पक्ष है, अब उसे कहते हैं।.

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मिथ्यां पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भापानुंवादसहित ३७१.

अन्ये तु हेतुसत्यत्वापेक्षा नाडर्थक्रियां प्रति । मरीचिताये तोयत्वजात्यभावान्न तत्क्रिया ॥ ५३॥ कुछ लोग कहते हैं-अर्थक्रियाके प्रति हेतुकी सत्यता अपेक्षित नहीं है, मरु- मरीचिका जलमें अर्थकरिया इसलिए नहीं होती है कि उसमें अवगाहनादि कार्यका कारण- तावच्छेदक जलत्व जाति नहीं है ।५३।। अन्ये तु पानावगाहनादर्थक्रियायां जलादिस्वरुपमात्रसुपयोगि, न तद्गतं सत्यत्वम्। तस्य कारणत्वतदवच्छेदकत्वयोरभावादिति कि तेन। न चैंव सति मरुमरीचिकोदकशुक्तिरजतादेरपि ग्रसिद्धोदका- घ्ुचितार्थक्रियाकारित्वप्रसङ्ग:। 'मरीचिकोदकादाबुदकत्वादिजातिर्नी स्तीति तद्विपयकभ्रमस्य उदकशन्दोलेखित्वं तदुल्लेखिपूर्वानुभवसंस्कारजन्य-

कुछ लोग कहते हैं कि जलपान और स्नान आदि अर्थक्रियामें केवल जल आदिका स्वरूप ही अपेक्षित है, जलादिफी सत्यता अपेक्षित नहीं है, क्योंकि जलादिगत सत्यतामें न तो उक्त अर्थक्रियाकी कारणता है और न तो कारणतावच्छेदकता है, इससे उसकी सत्यताका प्रकृतमें कुछ प्रयोजन नहीं है। यदि शक्का हो कि सत्यताको यदि कारणावच्छेदक न माना जाय, तो मरुमरीचिकोदक + और शुक्ति-रजतमें भी व्यावहारिक जलके योग्य अर्थक्रियाकारिता प्रसक्त होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'मरीचिकाजल आदिमें उदकत्व आदि जाति ही नहीं है, और मरु-मरीचिका- जलविपयक अममें 'यह जल है' इत्याकारक जो जलावगाही प्रत्यय होता है। वह तो उदकशव्दोलेखी पूर्वानुभवसे उत्पन्न होनेवाले संस्कारसे उक्त भ्रम उत्पन्न होता है-इसलिए होता है। इस प्रकारके तत्त्तशुद्धिकार आदिके मतसे मरु-मरीचिकाजल आदिमें तत्-तत् अर्थक्रियाओंके प्रति हेतुभूत

  • मरभूमिग सम्पृकत किरणोंमें आरोपित जलको 'मरुमरीचिकोदक' कहते हैं। 1 व्यावहारिक जलकी पान आदि जो अर्थक्रियाएँ हैं, उनमें उदकत्व जाति प्रयोजक है, क्योंकि जलके बिना पान हो ही नहीं सकता है। इसी प्रकार प्रसिद्ध रजत आादिकी कटक, कुण्डल आदि अर्थकियामें भी रजतत्व आदि प्रयोजक है, क्योंकि रजतत्वादिस रहित मृतिका आदिसे कटक आदि नहीं हो सकते हैं, इस परिस्थितिमें प्रातिभासिक मरुमरीचिका जलमें वस्तुतः जलत्वादि अर्थकिया प्रयोजक धर्मोंके न रहनेसे उनसे अर्थक्रिया नहीं हो सकती है, यद भाव है। .'

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३७२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

त्वप्रयुक्तम्' इति तच्वशुद्धिकारादिमते तत्तदर्थक्रियाप्रयोजकोदकत्वादिजात्य- भावादेव तदप्रसङ्गात्। अन्ये तु जातिरस्त्येव काचिदर्थक्रियाऽपि च। हेतूच्छेदेन वाधेनाऽनध्यासेन च नाडखिला ॥५४॥ कुछ लोग कहते हैं कि मरुमरीचिका जल आदिमें उदकत्व आददि जाति है और उक्तस्थलमें कोई अर्थक्रिया भी वहाँ होती है, परन्तु हेतुके उच्छेदसे, वाघसे और अनध्याससे सम्पूर्ण अर्थक्रियाएँ नहीं होती हैं॥ ५४॥ तत्राप्युदकत्वादिजातिरस्ति। अन्यथा तद्वेंशिष्टयोल्लेखिभ्रमविरोधाद्, उदकाद्यर्थिनस्तत्र अरवृत्यभावप्रसङ्गाच्चेति प्रातिभासिके पूर्वदृष्टसजातीयत्व- व्यवहारानुरोघिनां मते क्वचिदघिष्ठानविशेपज्ञानेन समूलाव्यासनाशात, उदकत्व आदि जाति ही नहीं है, अतः तथाकथित प्रसिद्ध उदक आदिसे होनेवाली अर्थक्रियाओंका प्रातिभासिक जलादिसे प्रसङ् नहीं है, यह भाव है। * मरीचिकाजल आदिमें भी उदकत्व आदि जातियाँ हैं। यदि उनमें उदकत्वादि जातियाँ न मानी जाँय, तो उदकत्व आदि जातियोंका अवगाहन करनेवाले भ्रमोंके साथ विरोध होगा, और दूसरी वात यह है कि जलादि के अभिलाषुकोंकी प्रवृत्ति ही उन स्थलोंमें नहीं होगी , इस प्रकारसे प्रातिभासिक पदार्थोंमें जो पूर्वदृष्ट पदार्थोंकी सजातीयता मानते हैं, उनके मतमें तत्-तत् अ्रमविषयीभूत पदार्थोंमें तत्-तत् अर्थक्रियाकारिता इसलिए नहीं होती है कि कहींपर X अविष्ठानगत विशेषांशके परिज्ञानसे समूल-अध्यासका विनाश प्रातिभासिक जलादि पदार्थोंमें जलतव आदि जातिका अज्ञीकार करके भी उक्त अति- प्रसङ्गका निवारण कुछ लोग करते हैं-'तत्रापि' इस ग्रन्थसे। े क्योंकि प्रवृत्तिके प्रति इषतावच्छेदकविशिष्टका ज्ञान प्रयोजक है, प्रकृत प्रातिभासिक जलादि पदार्थोंमें यदि जलत्वादि घर्मोंका अज्गीकार न किया जाय, तो इषतावच्छेदक जलत्वादि- वैशिष्टयावगाही ज्ञानके न होनेसे जलार्थींकी प्रवृत्ति ही नहीं होगी। परन्तु होती है, अतः' जलत्वादि जातियाँ माननी चाहिएँ, यह भाव है। तात्पर्य यह है कि प्रातिभसिक और व्यावहारिक जलमें एक जातिके न माननेपर भाष्यादिमे प्रतिभासिकाध्यासोंमें पूर्वदृष्टकी सजातीयताका जो व्यवहार किया गया है, वह भी- विरुद्ध होगा, यदि प्रातिभासिक जलमें जलत्वादि न माने जाँग तो। * मनुष्य दूरसे मरीचिकामें जलकी म्रांन्तिके वाद स्नान आदिके लिए उनके पास गया, जानेके

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मिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भापानुवादसहित ३७३

क्वचिद घिष्ठानसामान्यज्ञानोपरमेणं केवलाध्यासनाशात, कचित् गुज्जापुज्जादौ

तत्र तत्राऽर्थक्रियाभावोपपत्तेः । कचित् कासांचिदर्थक्रियाणामिष्यमाणत्वाच्च। मरीचिकोद कादिव्यावर्तकस्यार्डर्थक्रियोपयोगिरुपस्य वक्तव्यत्वे च श्रुतिचिरुद्धं अ्रत्यक्षादिना दुर्ग्रहं त्रिकालावाध्यत्वं विहाय दोपविशेपाजन्यरजतत्वादेरेव रजतादयुचितार्थक्रियोपयोगिरूपस्य वक्तुं शक्पत्वाच्च। तस्मान्मिथ्यात्वेऽप्य-

हुआ है, कहींपर अधिष्ठानके सामान्यांशज्ञानके उपरत होनेसे केवल अध्यास- का नाश हुआ है और किसी स्थलम गुझ्ला-पुञ्ज आदिमें चक्षुसे वहि आादिके अध्यासस्थलमें दाह, पाक अर्थक्रियाके हेतुभूत उप्णस्पर्श आदि सध्यस्त नहीं होते हैं। और किसी स्थलविशेपमें कुछ अर्थक्रियाओंका अङ्गी- कार भी करते हैं t। मरीचिकाजल आदिमें न रहनेवाले अर्थात् केवल व्यावहारिक पदार्थोंमें रहनेवाले अर्थक्रियामें उपयुक्त धर्मका यदि निर्वचन करता है, तो मिथ्यात्वश्रुतिसे विरुद्ध तथा प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे ग्रहण न होनेवाले त्रिकालावाध्यत्वरूप सत्यत्वको छोड़कर दोपविशेषसे अजन्य रजतादिवृत्ति रजतत्व आदि रजतादिकी उपयुक्त अर्थक्रियाके प्रति कारणतावच्छेद धर्म है, ऐसा कह सकते हैं। इससे अ्थोंके मिथ्या

अनन्तर उसे श्ञात होता है कि यह जल नहीं है, किन्तु केवल मरीचिका है, इस प्रकार विंशपदर्शनसे अपने उपादान अज्ञानके साथ जलाध्यास निवृत्त होता है, अतः इससे अर्थ- क्रियाकी प्रसकि नहीं होती है, यह भाव है। * जिस झुफिरजतादि स्थलमें विशेपदर्शन नहीं हुआ हो, उस स्थलमें अिष्ठान- सामान्यज्षानरूप कारणका नाश होनसे ही उक्त स्थलमें अर्थकियाकारिता नहीं है, यह भाव है। + 'स्व्रप्नवदिति घ्रूमः' इस ग्रन्थसे सवममें जिन पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिता मानी गई है, उन पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिता इष है, यह भाव है। * तात्पर्य यह है कि अर्थकियाके प्रति कारणतावच्छेदक सत्यत्व है, ऐसा पूर्वमें कहा गया है, परन्तु उसे नहीं मान सकते हैं, क्योंकि सद्ृपरजतसे कटक आदि कार्य होते हैं, और तद्द्रिन्न शुक्तिरजतसे नहीं होते हैं, इस प्रकारके अन्वय और व्यतिरेकस सहकृत प्रत्यक्षसे ही अर्थक्रियाफारितावच्छेदकरूपसे सत्वका परिजान तुम्हें करना होगा, परन्तु यह सत्त्व मिध्यात्वका विरोधी कालप्रयावाध्यतरूप नहीं हो सकता है, क्योंकि उसका प्रत्यक्षसे त्र्हण नहीं हो सकता है, अतः उससे पृथक् ही कहना होगा।

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३७४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

र्थक्रियाकारित्वसम्भवान्मिथ्यैव प्रपश्चः, न सत्य इति ।।८। ननु मिथ्यात्वसत्यत्वे न्रहैक्यश्रुतिर्पाडनम्। तन्मिध्यात्वे तु विश्वस्य सत्यत्वं केन वार्यते ॥५५॥ शङ्का होती है कि मिथ्यात्वको सत्य माननेसे त्रैक्यश्रुति वाधित होगी, उसके मिथ्या होनेपर भी विश्वकी सत्यता का निराकरण होगा ॥५५॥ नतु मिथ्यात्वस्य प्रपश्चधर्मस्य सत्यत्वे त्रह्माद्वैतक्षतेस्तदपि मिथ्यैव वक्तव्यमिति कुतः प्रपश्चस्य सत्यत्वक्षतिः १ मिथ्याभृतं त्रह्मणः सप्र- पश्चत्वं न निष्प्रपश्चत्वविरोधीति त्वदुक्तरीत्या मिथ्याभृतमिथ्यात्वस्य सत्यत्वाविरोधात्। सत्यमत्रोक्तमद्वैतदीपिकायां विरोधिनीम्। स्वधर्म्यन्यूनसत्ताकं मिथ्यात्वं सत्यतां हरेत् ॥५६॥ इस प्रश्नके समाधानमें अद्वैतदीपिकामें कहा है कि अपने धर्मीकी अन्यून सत्ता- वाला मिथ्यात्व अपने से विरुद्ध सत्यत्वका अपहरण करता है॥। ५६॥

होनेपर भी अर्थक्रियाकारिताका सम्भव होनेसे प्रपश्च मिथ्या ही है, सत्य नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ८ ॥ अब शङ्का होती है कि प्रपञ्चमें रहनेवाला मिथ्यात्व यदि सत्य है, तो अद्वैत ब्रह्मकी क्षति होगी अर्थात् अद्वितीय ब्रह्म सिद्ध नहीं होगा, इसलिए सिद्धान्तीको उसे भी मिथ्या ही कहना होगा। इस परिस्थितिमें प्रपञ्चकी सत्यताका निरास केसे होगा? क्योंकि ब्रह्मका मिथ्याभूत प्रपश्नतादात्म्य * प्रपश्चशून्यताका विरोधी नहीं है, इस प्रकारके तुम्हारे ही कथनके अनुसार मिथ्याभूत मिथ्यात्व सत्यत्वका विरोधी नहीं हो सकता है। इस + आक्षेपके समाधानमें अद्वैतदीपिकामें कहा है कि मिथ्यात्वका

प्रपञ्चतादात्म्य ही सप्रपश्वत्व है और निष्प्रपव्वत्व प्रप्वा्यन्ताभावरूप है, इस प्रकारका निष्प्रपश्चतव वास्तविक है, क्योंकि, व्यावहारिक प्रपश्वका अत्यन्ताभाव ब्रह्ममें पारमार्थिक माना गया है, इससे एक ब्रह्ममें सप्रपश्वत्व और निष्प्रपस्चत्वका विरोध नहीं है, वैसे ही मिध्यात्व और सत्यत्वका विरोध नहीं है। + मिथ्यात्वधर्म मिथ्याभूत ही है, इस पक्षका ग्रहण करके समाधान करते हैं-आकाश

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मिथ्याके मिथ्या होनेपर भी प्रपञ्चमिथ्यात्व-विचार] भापानुवादसहित ३७५

तच्च धर्मिणः सत्यत्वप्रतिक्षेपकम्। धर्मस्य स्वचिरुद्ध्धर्मप्रतिक्षेपकत्वे हि उभयवादिसिद्धं धर्मिसमसत्त्वं तन्त्रम्, न पारमार्थिकत्वम्। अघटत्वादिप्रति- क्षेपके पढत्वादावस्माकं पारमार्थिकत्वासम्प्रतिपत्तेः। ब्रह्मणः सम्रपश्चत्वं न धर्मिसमसत्ताकमिति न निष्पपश्चत्वप्रतिक्षेपकम्। अत एव मिथ्यात्वस्य व्यावहारिकत्वे तद्विरोधिनोऽप्रातिभासिकस्य आकाश आदि प्रपश्चके साथ समानस्वभाव है अर्थात् आकाश आदि पदार्थों- की जैसी सत्ा है, ैसी ही सचा मिथ्यात्वकी भी है। और वह मिथ्यात्व धर्मीके सत्यत्वका विरोधी-विघातक-है, अपने विरुद्ध धर्मका विरोध करनेमें धर्मका धर्मीसे समानसत्ताकत्व वादी और प्रतिवादी दोनोंके मतमें प्रयोजक है, धर्मकी पारमार्थिकता प्रयोजक नहीं है, क्योंकि अघटत्वके पतिक्षेपक पटत्व आर्दिम हमारे (वेदान्तीके) मतसे पारमार्थिकत्व सम्प्रतिपन्न-निश्चित-नहीं है। व्रक्षका प्रपश्नतादात्म्य धर्मिसमानसत्ताक नहीं है, अतः निष्प्रपञ्चत्वका प्रति- क्षेपक नहीं है। इसीसे यह मी प्रश्न निरस्त हुआ समझना चाहिए कि यदि मिथ्यात्व व्यावहारिक हो, तो उसका विरोधी अप्रातिभासिक प्रपञ्चसत्यत्व पारमार्थिक

आदि पदा्थोंकी व्यावदारिक सत्ता है, इसलिए मिथ्यात्वकी भी व्यावहारिक सत्ता होगी। इस विपयमें यदि शद्ठा हो कि आरोपित घटत्व आदि आरोपाधिकरणीभूत अपने आश्रय पटादिमें विरुद्व अघटत्व आदिके विघातक नहीं देखे जाते हैं, अतः सत्य घटत्व आदि स्वविरुद्ध धर्मोके स्वाधयमें प्रतिस्ेपक होंगे? इस दशामें मिथ्याभूत मिथ्यात्व ग्रपसंके सत्यत्वका कैसे विरोधी होगा, तो यह युकत नहीं है, क्योंकि स्वविरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक वही धर्म होता है, जो धर्मियरमानसत्तावाला हो, इस प्रकारका उभयवादिसिद्ध एक प्रयोजक मानना चाहिए, संदिग्ध नहीं मानना चाहिए, क्योंकि परमतमें घटत्वादिकी सत्ता पारमार्थिक है, और हमारे मतमें नहीं है, अतः सत्यत्व धर्म स्वाश्रयमें स्वविरुद्ध धर्मका ग्रतिक्षेपक नहीं हो सकता है, किन्तु मूलोक धर्मिसमानसत्ताक धर्म ही प्रतिक्षेपक हो सकता है, यह भाव है। * प्रकृतमें यद शक्ा हो सकती है कि प्रपथ्वगतमिथ्यात्वके मिथ्यात्वपक्षमे उस मिथ्यात्वको व्यावह्दारिक ही मानना चाहिए, क्योंकि उसकी निवृत्ति केवल ब्रह्मज्ञानसे होती है, इसलिए उसे प्रातिभासिक, या पारमार्थिक नहीं मान सकते, क्योंकि प्रातिभासिक पदार्थकी निवृत्ति ब्रह्मज्ञानके सिवा अन्य ज्ञानसे भी होती है और पारमार्थिककी कभी भी निवृत्ति नहीं होती है। और उसके व्यावद्दारिक होनेपर ग्रपच्वगतसत्यत्व पारमार्थिक सिद्ध होता है, क्योंकि 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षसे सिद्ध प्रपथ्वका सत्यत्व ब्रह्मज्ञान तक अनुवृत्त होता है अतः प्रातिभासिक नहीं मान सकते हैं और व्यावदवारिक मिथ्यात्वधर्मसे-युक्त प्रपन्वमें सत्यत्वको व्यावहारिक नहीं मान सकते

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३७६ सिद्धान्त लेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद.

प्रपश्चसत्यत्वस्य पारमार्थिकत्वं स्यादिति निरस्तम्। धर्मिसमसत्ताकस्य मिथ्यात्वस्य व्यावहारिकत्वे धर्मिणोऽपि व्यावहारिकत्वनियमात्। स्वधर्मीक्षाऽक्षतो धर्मः स्वविरुद्धहरोऽथवा ॥ अथवा अपने धर्मीके साक्षात्कारसे निवृत्त न होनेवाला धर्म अपने विरुद्ध धर्मका अपहरण करता है। अथवा यो यस्य स्वविपयसाक्षात्कारानिवत्यों धर्मः, स तत्र स्व्रवि- रुद्धर्मप्रतिक्षेपकः । शुक्तौ शुक्तितादात्म्यं तद्विपयसाक्षात्कारानिवर्त्यम् होगा, क्योंकि धर्मीके समान सत्तावाले मिथ्यात्वके व्यावहारिक होनेपर धर्मी भी व्यावहारिक ही होता है, ऐसा नियम है। अथवा * जिसका जो धर्म अपने विषयके साक्षात्कारसे निवृत्त न होता हो, वह धर्म उस धर्मीमें अपने विरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक होता है अर्थात् अपने विरुद्ध धर्मकी स्थिति नहीं होने देता है, यह भाव है। शुक्तिमें रहनेवाला शुक्तितादात्म्य शुक्तिविषयक साक्षात्कारसे निवृत्त नहीं होता है, इसलिए वह हैं। इस परिस्थितिमें प्रपश्वगत सत्यत्व जव पारमार्थिक है, तो उसका धर्मी प्रपश्व भी पारमार्थिक अवश्य हो सकता है, अतः ब्रह्माद्वेतकी क्षति होगी, इस प्रश्नका समाधान 'अतएव' इस ग्रन्थस किया जाता है। तात्पर्य यह है कि मिध्यात्वरूप ध्ममें धर्मिसमानमत्ताकत्वके आधारपर व्यावहारिकत्वका अङ्गीकार करके मिथ्यात्वाश्रय प्रपश्चमें सत्यत्वपर्यवसायी पारमार्थिकत्वका आपादन, विरोध होनेके कारण, हो ही नहीं सकता है। यदि प्रपश्चमें अनुभूयमानसत्यत्वका व्यावहारिकरूपसे अङ्गीकार किया जाय, तो भी कोई हानि नहीं है। यदि शक्ा हो कि समानसत्तावाले मिथ्यात्व और सत्यत्व एक जगहपर रहेंगे कैसे ? क्योंकि उनका विरोध है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जव तक तत्त्वज्ञान न हो, तव तक वाधित न होनेवाले प्रत्यक्षका विषय, तथा मिथ्यात्वका अविरुद्ध सत्यत्व प्रपथ्वमें रहता है, ऐसा वार वार पूर्वमें कहा गया है, यह भाव है। # इस पक्षका अवलम्वन करनेवालोंका मत है कि सर्वन्न ब्सता ही प्रतीत होती है, उससे भिन्न व्यावद्दारिक अथवा प्रातिभासिक सत्ता है ही नहीं, इसलिए 'धर्भिसमानससताकत्व' आदिसे कहा गया समाधान युक्क्त नहीं है, अतः स्वाभिमत समाधान 'अथवा' इस ग्रन्थसे कहते हैं। तात्पर्य यह है कि वही धर्म अपने विरोधी धर्मकी स्थितिका निर्वतक होता है, जो अपने आश्रयके प्रत्यक्षसे निवृत्त न होता हो, इसलिए स्वाश्रयसाक्षात्कारानिवत्यत्व ही वर्मके स्व- विरुद्धधमप्रतिक्षेपकत्वमें प्रयोजक है, यह फलित है। पारमार्थिकत्व या धर्भिसमानसत्ताकत्व प्रयोजक नहीं है, शुक्ति रजतभ्रमस्थलमें शुक्तित्व धर्मकी शुकतिका साक्षात्कार होनेपर भी निवृत्ति नहीं होती है, इसलिये शुकित्व धर्म अशुक्तित्वविरोधी है, यह सर्वानुभवसिद्ध है, अतः इस प्रयोजकके स्वीकार करनमें विरोध नहीं है, यह भाव है।

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मिध्यात्वके मिथ्या होनेपर प्रपज्वमिथ्यात्वप्रकार-विचार] भापानुवादसहित ३७७

अशुक्तित्वस्य विरोधि, तत्रैव रजततादात्म्यं तन्निवर्त्यमरजतत्वाविरोधीति व्यवस्थादर्शनात्। एवं च प्रपश्चमिथ्यात्वं कल्पितमपि अ्पश्चसाक्षात्कार- निवर्त्यमिति सत्यत्वप्रतिक्षेपकमेव। त्रह्मणः सप्रपश्चत्वं तु त्रह्मसाक्षात्कारा- निवर्त्यमिति न निष्प्रपश्चत्वप्रतिक्षेपकमिति। शान्दप्रामाण्ययोग्यत्वसत्त्वं लौकिकमप्यलम् ॥५७॥ शावदवान प्रामाण्य और शब्दकी योग्यता में व्यावदारिक सच्वसे भी पारमार्थिक नहकी सिद्धि हो सकती है।।५७। एतेन शव्द्गम्यस्य त्रह्मणः सत्यत्वे शव्दयोग्यतायाः, शाव्दधी- प्रामाण्यस्य च सत्यत्वं चक्तव्यम्। प्रातिभासिकयोग्यताचताऽनाप्वाक्येन

अशुक्तित्वका-रजतत्वका-विरोधी है, और इसी स्थलमें जो रजततादात्म्य है, वह शुक्तके साक्षारकारसे निवृच होता है, अतः शुक्तित्वका विरोधी नहीं हो सकता है। ऐसा होनेपर यद्यपि प्रपश्चका मिथ्यात्व कल्पित है, तथापि प्रपञ्चसाक्षात्कार- से निषृत्त नहीं होता है, इससे अर्थात् उक्त प्रमाणोंसे स्वाश्रय साक्षात्कारसे अनिवर्स्य धर्म स्वाश्रयमें अपनेसे विरुद्ध धर्मकी स्थितिमें विरोधी है ऐसा निश्चित होनेपर सत्यत्वका विरोधी ही हे, त्रद्मका प्रपश्चतादारम्य ब्रह्मके साक्षात्कारसे निवृत्त होता है, इससे प्रपश्वतादात्म्य निप्पपश्चत्वका विरोधी नहीं है। इसीसे अर्थात् चक्ष्यमाण हेतुसे यह भी शक्का निरस्त हुई कि यदि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे ज्ञेय व्रद्ा सत्य है, तो शब्दकी योग्यताको + और शब्दज्ञानके म्रामाण्यको भी सत्य कहना चाहिए, क्योंकि प्रातिभासिक योग्यतासे युक्त अनाप्त पुरुपके वाक्यसे व्यावहारिक अर्थ और व्यावहारिक योग्यतावाले 'अगिहोत्रं जुहेति' (अगिहोत्र होम करे) इत्यादि वाक्योंसे तात्विक अर्थकी र वाघ निश्चयका अभाव योग्यता है, वह शाब्दवोधमें कारण है। जैसे 'जलेन सिव्वति' जलसे सिबबन करता है, इत्यादि स्थलमें सिन्धनकरणताके वाधका निश्चय नहीं है, अतः इससे शा्दबोध होता है और 'बहिना सन्धति' (अगिसे सिबन करता है) इस स्थलमें चहिमें सिश्धन- करणताका वाघ निश्चित है, इसलिए इस वाक्यसे शाब्द वोध नहीं होता है। प्रकृतमें जिस उपनिपत् वाक्यसे व्रदाका बोध दोगा उस उपनिपद् वाक्यकी योग्यता अवश्य अपेक्षित है, अन्यथा उससे व्रममजान हो ही नहीं सकेगा, इस परिस्थितिमें द्वैतापति दोप देते हैं। ४८

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३७८ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

वा सिद्धूचभावेन योग्यतासमानसत्ताकस्यैव शव्दार्थसिद्धिनियमाद्। अर्थावाधरूपप्रामाण्यस्याऽसत्यत्वे अर्थस्य सत्यत्वायोगाच्च। तथा च न्रह्मातिरिक्तसत्यवस्तुसच्वेन द्वैतावश्यम्भाव इति वियदादिग्रपश्चोऽपि सत्योऽ स्त्विति निरस्तम्। व्यावहारिकस्याऽर्थक्रियाकारित्वस्य व्यवस्थापितत्वेन व्यावहारिक- योग्यताया अपि सत्यत्रह्मसिद्धिसम्भवाद्। ब्रह्मपरे वेदान्ते सत्यादिपद- सच्ाद् व्रह्मसत्यत्वसिद्धेः। अग्निहोत्रादिवाक्ये तादशपदाभावात्, तत्स- नवेडपि प्रवलन्रह्माद्वैतश्रुतिविरोधात् तदसिद्धिरित्येत वैपम्योपपचेः । शब्दार्थयोग्यतयोः समानसत्ताकत्वनियमस्य निष्प्रमाणकत्वाद्। चटज्ञान-

सिद्धि न होनेके कारण योग्यतासमानसत्ताक शब्दार्थकी सिद्धि होती है, यह नियम प्राप्त होता है और अर्थावाधरूप * प्रामाण्यके असत्य होनेपर अर्थ भी सत्य नहीं हो सकता है, इस अवस्थामं त्रह्मसे पृथक् योग्यता आदि अवाधित अर्थोंका अस्तित्व होनेपर द्वैत ही सिद्ध होगा, इससे आकाशादि प्रपश्चमें भी सत्यत्व प्रसक्त होगा। व्यावहारिक प्रपञ्चकी अर्थक्रियाकारिताका अद्वैतवादम अन्गीकार होनेसे उसी व्यावहारिक योग्यतासे सत्य-त्रिकालावाधित-ब्रह्मकी सिद्धि हो सकती है। ब्रह्मपरक वेदान्तोंमें सत्यादि पदोंके होनेसे त्रह्मकी सत्यता सिद्ध होती है। और 'अशिहोत्रं जुहोति' इत्यादि वाक्योंमें सत्यादि पदोंके न रहनेसे अगनिहोत्रादि त्रिकालावाधित सिद्ध नहीं होते हैं। यदि अभि होत्रादि प्रकरणमें सत्यादि पद हैं, तो मी प्रवल न्रह्माह्वैत श्रुतिका विरोध होनेसे अशिहोत्रादिकी सत्यता सिद्ध नहीं होती है, इस प्रकार वैपम्यकी उपपत्ति होती है। शव्दार्थ और योग्यताके समानसच्ताकत्वके नियममें कोई प्रमाण भी नहीं है। जैसे घट-

1 जैसी योग्यताकी सत्ता होगी, वैसी ही सत्तासे युक्त शब्दार्थकी सिद्धि होगी, यह नियम अवश्य मानना चाहिए, अन्यथा प्रातिभासिक योग्यतावाले शब्दसे भी व्यावहारिक नर्यकी सिद्धि हो जायगी, यह भाव है। * जिस ज्ञानके विषयका वाध होता है, वह ज्ञान प्रमाण नहीं माना जाता है, जैसे छुकिमें रजतज्ञान, अतः वही ज्ञान प्रमाण है, जिसका अर्थ वाघित न होता हो, इसलिए अर्थावाध अर्थात् अवाधितार्थत्वरूप ही प्रामाण्य है, यह भाव है।

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मिथ्यात्वके मिथ्या होनेपर प्रपञ्चमिथ्यात्वप्रकार-विचार] भांपातुवादसहित ३७९

मिध्यात्वोपपत्तेश। तस्माद् (उ० मी० अ० २ पा० १ अघि० ६) आरम्भणाधिकरणोक्तन्यावेन कृत्सस्य वियदादिग्रपश्चस्य मिध्यात्वं चन्नरलेपायते ॥ ९ ॥ न जीवेः सद्वितीयत्वं न्रह्मणस्तदभेदतः । तेपां च भोगसाक्कर्य वारणीयमुपाधिभिः ॥५८॥ जीवों को लेकर व्रदामें द्वेतत्व प्रसक्त नहीं होता, क्योंकि जीव ब्रहासे भिन्न नहीं है, और उनके भोगके साड्कर्य का परिदार उपाधिके आधारपर करना चाहिए।। ५८॥। नतु आरम्भणशब्दादिभिरचेतनस्य वियदादिग्रपञ्चस्य मिथ्यात्व- सिद्धावषि चेतनानामपवर्गभाजां मिथ्यात्वायोगाद् अद्वितीये ब्रह्मणि ज्ञानके प्रामाण्यमं अघटत्वका, वैसे ही सत्यात्मक न्रम्मज्ञानके भामाण्यमें *ब्रक्ष- भिन्न त्रद्यत्वका सम्बन्ध होनेसे मिथर्यात्वकी उपपत्ति है। इससे आरम्भणाधिकरणमें + कहे गये सिद्धान्तके अनुसार सम्पूर्ण आकाश आदि प्रपश् मिथ्या ही है॥९॥ यदि यह शक्रा हो कि आरम्भणाधिकरणके सिद्धान्सके अनुसार सचेतन आकाश आदि प्रपश्च मिथ्या हो सकता है, परन्तु सुक्त चेतन जीचोंमें मिथ्यात्व- का सम्बन्ध न होनेसे अद्वितीय न्रक्ामे समन्वय नहीं हो सकता है, और पूर्वमें

*अश्सत्वाधिकरण नक्षमें अमत्वप्रकारक अनुभवत्वरूप जो व्रह्मज्ञानका प्रामाण्य है, वह अदासे भिगन अदास्वके सम्बन्धसे युक है, अतः वह भी मिथ्या ही है, यह भाव है। यदि कहा जाय कि महाजानमें रहनेवाला प्रामाण्य अवाधितार्थानुभवत्वरूप है, और केवल योग्य विपयस्वरूपमें उसका पर्व्यवयान है। वह प्रामाण्य अखण्डार्थक वेदान्तोंमें ब्रद्मारूप ही है, तदतिरिक घटित नहीं है, इसलिए वह सत्य ही है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसके सत्य होनेपर भी कोई दोप नहीं है, कारण कि वह केवल ब्रहास्वरूप ही है, अतः इससे भी त्रद्मातिरिक सत्य चस्नुकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह भाव है। +. तदनन्यत्मारम्मणशव्दादिभ्यः 'बरहारूप अभिन्ननिमित्तोपादान कारणसे यह कार्य अलग नहीं है' क्योंकि 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं भृतिकेव सत्यम्' 'ऐतदातम्यमिद सर्वम्' 'ब्र्मैवेदम्' (विकार केयल वाचारम्भण ही है मृत्तिका सत्य है-अर्थात् कारण सत्य है, यह सब सत्य- रूप है, यह सब बरदा ही है) इत्यादि क्षति प्रमाण है, यद् सूत्रका अर्थ है। इसका अधिक विस्तार अच्युतग्रन्थमालागुद्वित त्रह्मासूत्रशाहरभाष्यरत्नप्रभा भापानुवादमें देखना चाहिए [प्ृ० १००० द्वितीय सण्ट ]।

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३८० सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

समन्वयो न युक्त्तः। न च तेपां व्रह्माभेद: प्रागुक्तो युक्त:, परस्पर- भिन्नानां तेपास् एकेन ब्रह्मणाऽभेदासम्भवात्। न च तज्जेदासिद्धि:। सुखदुःखादिव्यवस्थया तत्सिद्धेरिति चेद्, न ; तेपामभेदेऽपि उपाधिभेदा- देव तव्वस्थोपपत्तेः ॥ १० ॥ नन्वन्यभेदादन्यस्य कथं साङ्कर्यवारणम्। यदि शङ्का हो कि दूसरे के भेदसे दूसरे का भोगसाङ्कर्यं कैसे परिहृत होगा? ननु उपाधिभेदेऽपि तदभेदानपायात् कथं व्यवस्था। नह्याश्रय- भेदेनोपपादनीयो विरुदूधर्मासङकरस्तदतिरिक्तस्य कस्यचि्व्ेदोपगमेन सिध्यति। अत्राहुर्ना्यताऽसङ्गे भोक्तृतादात्म्यकल्पनात् ॥ ५९॥ इसके परिहारमें कहते हैं कि अन्यत्व है ही नहीं, क्योंकि असन्न आत्मामें भोक्तृ- तादात्म्य कल्पित है ॥ ६९ ॥ अत्र केचिदाहु :- सिध्यत्येवाऽन्तःकरणोपाधिभेदेन सुखदुःखादिव्य- उनके साथ ब्रह्मका जो अमेद कहा गया है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो परस्पर भिन्न हैं, उनका एक ब्रह्मके साथ अभेद नहीं हो सकता है। और मेदकी असिद्धि है, यह भी नहीं हो सकता है, क्योंकि सुख और दुःख आदिकी व्यवस्थासे उसकी सिद्धि है। तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन अपवर्गभागी जीवोंका वस्तुतः ब्रह्मके साथ अभेद ही है, तथापि उपाधिके बलसे उनका भेद हो सकता है ॥१०॥ यदि शङ्का हो कि उपाधिके भिन्न होनेपर भी आत्माके अभेदका विनाश न होनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था कैसे होगी? क्योंकि जिन विरुद्ध धर्मोंके असाङ्कर्यका-आश्रयके भेदसे-उपपादन करना है, उनकी किसी भिन्न वस्तुके भेदसे उपपत्ति कैसे हो सकती है? इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं-अन्तःकरणरूप उपाधि- * अन्तःकरण ही क्तृत्वादि प्रपन्नका आश्रय है और 'अहम्' अनुभवका गोचर है, आत्मा नहीं, क्योंकि वह कूटस्थ है, इसलिए आश्रयके भेदसे व्यवस्था हो सकती है, यह 'केचित' पक्षका भाव है।

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जीवोपाधिभेंद-विचार] भापानुवांदसहित ३८१

वस्था। 'कामस्संकल्पी विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिहीर्धीर्भीरित्ये- i तत्सर्वं मन एव' 'विज्ञानं यज्ञं तनुते' इत्यादिश्रुतिभिस्तस्यैव निखिला- नर्थाश्रयत्वप्रतिपादनात्। 'असङ्गो ह्ययं पुरुपः' 'असङ्गो नहि सज्जते' इत्यादिश्रुतिभिः चेतनस्य सर्वात्मनौदासीन्यप्रतिपादनाच्च। न चैवं सति कर्तृत्वादिवन्धस्य चैतन्यसामानाधिकरण्यानुभवविरोधः । अन्तःकरणस्य चेतनतादात्म्येनाध्यस्ततया तद्धर्माणां चैतन्यसामानाधि- करण्यानुभवोपपत्तेः । न चाऽन्तःकरणस्य कर्तृत्वादिवन्धाश्रयत्वे चेतनः

मेदसे सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था सिद्ध ही है, क्योंकि 'कामस्संकल्पो०' (इच्छा, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि और भय ये सब अन्तःकरणके परिणाम होनेसे मन ही हैं) 'विज्ञानं यज्ञं तनुते' (अन्त :- करण शास्त्रीय कर्म करता है) इत्यादि श्रुतियाँ उसी अन्तःकरणका सम्पूर्ण अनर्थोके आथयरूपसे प्रतिपादन करती हैं। और 'असङ्गो ह्वयं पुरुषः' (सर्वदा चैतन्यात्मा व्रह्म असङ्ग-किसी धर्म विशेपका आश्रय नहीं है) 'असङ्गो नहि सज्जते' (असक्भ होनेके कारण आत्मा किसी पदार्थसे सम्बद्ध नहीं होता है) इत्यादि अनेक श्रुतियाँ चेतन ब्रह्ममें सर्वथा औदासीन्यका ही प्रतिपादन करती हैं। यदि यह शङ्का हो कि अन्तःकरण ही सम्पूर्ण कर्तृत्व आदि प्रपश्चका यदि आश्रय माना जाय, तो 'मैं कर्ता हूँ' 'मैं भोक्ता हूँ' इत्यादिरूपसे जो कर्तृत्व आदि प्रपश्चका चतन्यके साथ सामानाधिकरण्य अनुभूत होता है, वह वाधित होगा, तो यह युक्त नहीं हे, क्योंकि अन्तःकरणका जो अध्यास हुआ है, वह चेतनके साथ तादात्म्यरूपसे हुआ है, अतः अन्तःकरणके धर्मोंका चैतन्यके सामानाधिकरण्य- रूपसे भान होता है।। यदि यह शङ्का हो कि कर्तृत्व आदि प्रपञ्चका आश्रय 1 यदि अन्तःकरण ही है, तो चेतन आत्मा संसारका भागी नहीं होगा

  • तात्पर्य यह है कि यद्यपि आत्मा चतन्गरूप है, तथापि भेदकल्पनासे चैतन्य आत्माके धर्मरूपसे भासता है, वैसे ही आत्मा और अन्तःकरणका ऐवयाध्यास होनेसे उनके वर्मोंका अर्थात् चैतन्य, कर्तृत्य आदिका सामानाधिकरण्य भासता है इस प्रक्रियासे उक्त अनुभवके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है।

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३८२ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

संसारी न स्यादिति वाच्यम्, कर्तृत्वादिवन्धाश्रयाहङ्गारग्रन्थितादात्म्या- व्यासाधिष्ठानभाव एव तस्य संसारः' इत्युपगमात्। तावतैव भीप- णत्वाश्रयसर्पतादात्म्याध्यासाधिष्ठाने रज्ज्वादौ 'अयं भीपणः' इत्यभि- मानवद् आत्मनोऽनर्थाश्रयत्वाभिमानोपपत्तेः। एतदभिप्रायेणैव 'ध्याय- तीव लेलायतीव' 'अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते' इत्यादि- श्रुतिस्मृतिदर्शनाच्च। न चैकस्मिन्नेवाऽडत्मनि विचित्रसुखदुःखाश्रयतत्तदन्तःकरणानामध्या- तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि कर्तृत्व आदि प्रपञ्चके आश्रयीभूत अहङ्कार (अन्तःकरण) के साथ ग्रन्थिरूप तादात्म्यके अध्यासका जब आत्मा अधिष्ठान भाव है, तमी वही आत्माका संसार है, ऐसा स्वीकार किया गया है। उपाधि ही संसारकी आश्रय है, इसीसे + जसे भयकारणत्वके आश्रयीभूत सर्पके तादात्म्याध्यासके अधिष्ठानभूत रस्सीमें 'यही भय हेतु है' इस प्रकार अभिमान होता है, वैसे ही आत्मा (अन्तःकरणतादात्म्या- ध्यासाधिष्ठान होनेसे ) अनर्थका आश्रय है, यह अभिमानमात्र (त्रान्तिमात्र) है। वुद्धिका ही संसार आत्मामें आरोपित है, इसी भावसे-ध्यायतीव०' (वुद्धिके ध्यान करनेसे मानो आत्मा ध्यान करता है, वुद्धिके चलनेपर आत्मा मानो चलता है, ऐसा प्रतीत होता है) 'अहङ्कार०' (कर्तृत्वाश्रय अहक्कारके साथ तादात्म्यापन्न होनेसे ही आत्मा अपनेको कर्ता मानता है) इस प्रकारकी श्रुति-स्मृतियाँ देखी जाती हैं। यदि शङ्का हो कि बुद्धिके धर्मोंकी व्यवस्था होनेपर भी विचित्र सुख, दुःखके आश्रयीभृत तत्-तत् अन्तःकरणोंका एक ही आत्मामें अध्यास होनेसे चेतन स्वतः संसारका आश्रय नहीं है, तथापि बुद्धिमें रहनेवाले संसारका, (जो कि

है, यह भाव है। साक्षीसे अनुभूत है,) उसमें आरोप हो सकता है, इसलिए आरोपित संसाराश्रयत्व आत्मामें

  • तावतैव-केवल उपाधिके संसाराश्रयत्व होनेसे प्रकृतमें यदि शङ्का हो कि अन्यनिष्ठ संसारका आत्मामें आरोप यदि माना जाय, तो अन्यथारुयाति प्रसक्त होगी? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अनुभूयमान आरोपस्थलमें आरोप और अधिष्ठानके अनिर्वचनीय संसर्गकी उत्पत्ति मानी जाती है, अन्यथाख्यातिवादमें उसकी उत्पत्ति नहीं मानी जाती है, यह वैषम्य है। * बुद्धि स्वतः संसारकी आश्रय है और आत्मामें संसारकी केवल भ्रान्ति है, इस व्यवस्थाको

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जीवोपाधिमेद-विचार ] भापानुवादसहित ३८३

साद् आत्मन्याभिमानिकसुखदुःखादिव्यवस्थैवमपि न सिध्यतीति वाच्यम्, आध्यासिकतादात्म्यापन्नान्तःकरणगतानर्थजातस्येव तद्गतपरस्परभेद- स्यापि अभिमानत आत्मीयतया आत्मनो यादृशमनर्थभाक्त्वम्, तादृशेन भेदेन तव्नवस्थोपपत्तेः। एतेन सुखदुःखादीनामन्तःकरणधर्मत्वेऽपि तदनुभवः साक्षिरूप इति तस्यैकत्वात् सुखदुःखानुभवरूपभोगव्यवस्था न सिध्यतीति निरस्तम्। तत्तदन्त:करणतादात्म्यापच्या तत्तदन्त:करणभेदेन भेदवत एव साक्षि- णस्तत्तदन्त:करणसुखदुःखाद्यनुभवरूपत्वेन तव्ववस्थाया अप्युपपत्तेरिति। आत्मामें आभिमानिक सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासपाप्त तादात्म्यसे युक्त अन्तःकरणमें रहने- वाले अनर्थ समुदायके समान उस अन्तःकरणमें रहनेवाले पारस्परिक भेद मी अभिमानसे आत्माके सम्बन्धी होते हैं अर्थात् आत्मामें आ जाते हैं, इसलिए आत्मामें जसे अनर्थकी व्यवस्था होती है, वैसे ही अन्तःकरणके मेदसे जीवमें भेदकी व्यवस्था हो सकती है। यदि किसीको यह शक्का हो कि भले ही सुख, दुःख आदि अन्तःकरणके धर्म हों, परन्तु अनुभव तो साक्षीरूप है, इसलिए साक्षीके एक होनेसे सुख- दुःखका अनुभव जो व्यवस्थितरूपसे देखा जाता है, वह नहीं होगा ? तो यह शक्का मी वक्ष्यमाण हेतुसे निरस्त हुई समझनी चाहिए, क्योंकि तत्-तत् अन्तःकरणके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हुआ साक्षी तत्-तत् अन्तःकरणोंके मेदसे भेदवान् होकर ही उन-उन अन्तःकरणोंमें रहनेवाले सुखदुःख आदिका अनुभवरूप होता है, इसलिए उक्त व्यवस्था भी उपपन्न हो सकती है। मानने पर प्रतिशरीर बुद्धिके भेदसे बुद्धिगत धर्मोंकी व्यवस्था हो सकती है, परन्तु प्रतिशरीर आत्माका भेद न होनेसे आत्माके प्रपथकी व्यवस्था नहीं हो सकती है? यह शक्ाका भाव है, समाधानका यह भाव हैकि बुद्धिगत संसारका जैसे आत्मामें आरोप होता है, वैसे वुद्धिमें रहनेवाले भेदका भी आत्मामे आरोप होता है, इसलिए उक्त अव्यवस्था नहीं है। * अर्थात् मुम्न और दुःखका अनुभव साक्षीरूप है, इसलिए उसके एक होनेसे देवदत्तका मुसानुभन यज्दसतका भी मुखानुभव होगा, इस परिस्थितिमें जिस समय देवदत्तको सुखका अनुभव हुआ, उसी समयमें उसी देवदत्तके सुखानुभवको लेकर यज्षदत्तको भी 'मैं सुखी हूँ' इस प्रकार भनुभव होना चाहिए, यह शछाका भाव है। + अर्थात् जैसे अन्तःकरणका भेंद आत्मामें अध्यस्त होता है, वैसे ही उसका भेद साक्षीमें

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३८४ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

अन्ये भोक्ता चिदाभास: कूटस्थेक्येन कल्पितः । अतो न भिन्नगामित्वमित्याहुर्वन्धमोक्षयोः ॥ ६० ॥ कुछ लोग कहते हैं कि कूटस्थके तादात्म्यरूपसे कल्पित चिदाभास ही भोक्ता है, अतः बन्ध और मोक्षका वैयधिकरण्य नहीं है॥ ६० ॥ अन्ये तु जडस्य कर्तृत्वादिचन्धाश्रयत्वानुपपत्तेः 'कर्ता शास्त्रार्थ- चच्वाद्' इति चेतनस्यैव तदाश्रयत्वप्रतिपादकसूत्रेणान्तःकरणे चिदाभासो वन्धाश्रयः । तस्य चाऽसत्यस् विम्बाद्भिन्नस्य प्रत्यन्तःकरणभेदाद्विद्वदविद्व- त्सुखिदुःखिकर्त्रकर्त्रादिव्यवस्था। न चैवमध्यस्तस्य वन्धाश्रयत्वे वन्धमोक्ष- योवैयधिकरण्यापत्तिः। अस्य चिदाभास्यान्तःकरणावच्छिन्ने स्वरूपतस्स- त्यतया मुक्त्यन्वयिनि परमार्थजीवेऽव्यस्ततया कर्तृत्वाश्रयचिदाभासतादा- त्म्याध्यासाधिष्ठानभावस्तस्य वन्ध इत्यभ्युपगमादित्याङ्कः ।

कुछ लोग कहते हैं कि जड़ अन्तःकरण कर्तृत्व आदि धर्मोंका आश्रय नहीं हो सकता है, इसलिए 'कर्ता शास्त्रार्थवत्वात्' इस-चेतनमें कर्तृत्वादि धर्मोंका प्रतिपादन करनेवाले-सूत्रके आधारपर अन्तःकरणमें पड़ा हुआ चैतन्याभास (चैतन्यप्रतिविम्ब) कर्तृत्वादि प्रपञ्चका आश्रय है। विम्वसे भिन्न मिथ्यारूप उस प्रतिविम्बका प्रत्येक अन्तःकरणमें मेद होनेके कारण विद्वान् और अविद्वान्, सुखी और दुःखी, कर्ता और अकर्ता आदिकी व्यवस्था हो सकती है। यदि शङ्का हो कि विम्ब और प्रतिविम्बका भेद माननेपर जो अध्यस्त चैतन्य है, वह वन्धका (कर्तृत्वादि प्रपश्चका ) आश्रय होगा और अनध्यस्त विम्बचतन्य मोक्षका आश्रय होगा, इस अवस्थामें बन्ध और मोक्षका सामाना- धिकरण्य नहीं होगा? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यह चिदाभास अन्तःकरणावच्छिन्न पारमार्थिक जीवमें, जो ख-

भी अध्यस्त होता है, इसलिए. तथाकथित अव्यवस्थाका आपादन नहीं हो सकता है, यह समाधानका भाव है। * आत्माके ऐक्यपक्षमें यह अन्य समाधान कहते हैं, जड़ अन्तःकरण कर्ता-नहीं है, किन्तु आत्मा है, इसमें 'कर्ता शास्त्रार्थवत्वात्' (व्र० सू० अ० २ पा० ३ अधि० १४ सूत्र ३३) यह सूत्र प्रमाण है, क्योंकि इस सूत्नमें कर्ता आत्मा ही है वुद्धि (अन्तःकरण) नहीं है, ऐसा प्रतिपादन किया गया है।

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जीवोपाधिभेद-विचार] भापानुवादसहित ३८५

अन्ये विशिष्टो भोक्ताडन्र संशुद्धो मुक्तिसङ्गतः । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तमित्यादिश्रुतिदर्शनात् ॥६१ ॥ अन्य लोग कहते हैं कि विशिष्ट आत्मा भोक्ता है और शुद्ध आत्मा मुक्तिका भागी है, क्योंकि 'आात्मेन्द्रियमनोयुक्तम्' इत्यादि श्रुति देखी जाती है ॥ ६१ ॥ अपरे तु-

इति सहकारित्वेन देहेन्द्रियैः तादात्म्येन मनसा च युक्तस्य चेतनस्य भोक्तृत्वश्रवणादन्तःकरणभेदेन तदिशिष्टभेदाद् व्यवस्था। न चैवं विशिष्टस्य चन्धः, शुद्धस्य मोक्ष इति वैयधिकरण्यम्, विशिष्टगतस्य वन्घस्य विशेप्येऽनन्व्याभावाद् विशिष्टस्याऽनतिरेकादित्याहुः ।

कोई लोग कहते हैं कि * 'आत्मेन्द्रिय०' (देह, इन्द्रिय और अन्तः- करणसे युक्त चैतन्य भोका है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं) इस प्रकारकी श्ुतिसे यही ज्ञात होता है कि सहकारित्वरूपसे देह और इन्द्रियोंसे युक्त तथा तादात्यरूपसे अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य ही भोक्ता है, इससे अन्त :- करणके मेदसे ही अन्तःकरणविशिष्ट चेतनका भेद होनेसे सुखित्व, दुःखित्व आदिकी व्यवस्था होती है। इसमें यदि शक्का हो कि विशिष्टमें + वन्ध है और शुद्धमें मोक्ष है, इसलिए संसार और मोक्षका वैयधिकरण्य ही है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विशिष्टमें रहनेवाला बन्ध विशेष्यमें अन्वित होता है, क्योंकि विशिष्ट विशेष्यसे भिन्न नहीं है।

  • सच शरीरोंमें यद्यपि चिदात्मा एक है, तथापि केवल वही संसारका आश्रय नहीं है, किन्तु बुद्धिविशिष्ट चिदात्मा उसका आश्रय है। और वुद्धिविशिष्ट चिदात्माके प्रतिशारीर भिन्न दोनक कारण गुख-दुःसादिका सादर्य नहीं है, इस प्रकार अन्यमतवाले कहते है, यह भाव है। पखफा भाव यह है कि बुद्धिविशिष्ट आत्मा केवल आत्मासे भिन्न है, क्योंकि विशिष्ट शुद्ध नहीं है, ऐखी प्रतीति होती है, कारण कि विशिष्टमें रहनेवाला शुद्धप्रतियोगिक भेद विशेष्यमॅ रहता है, यह नियम है, इस अवस्थामें विशिष्ात्मगत संसारका विशेष्यमें सम्बन्ध होनेपर भी मुकिमें अन्वित केवल चैतन्यमें संसारके न होनेसे वैयधिकरण्य तदवस्थ है। * तात्पर्य यह है कि विशिष्ट और शुद्धमें कोई भेदे नहीं है, लोकमें दण्डसे युकत पुरुपमें शुर्धू पुरुषका अभेद प्रत्यभिज्ञात होता है अर्थात् वही पुरुप है, इस प्रकार शुद्ध पुरुपका अयगाहन करनेवाली प्रत्यभिशा होती है और इस प्रत्यमिज्ञामें कोई वाधक भी नहीं है, इसलिए ४९

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३८६ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

परे कर्तृमन:सङ्गाद्भोक्तृताडन्या घकल्प्यते। स्फटिके्विव लौहित्यं श्रोत्रवत्तव्यवस्थितिः ॥ ६२ ॥ कुछ लोग कहते हैं कि कर्तृरूप मनके सान्निध्यसे आत्मामें अन्य भोक्तृता कल्पित है, जैसे कि जपाकुसमके सान्निध्यसे स्फटिकमें अन्य ही लौहित्य कल्पित होता है, धोत्रकें समान व्यवस्था हो सकती है ॥ ६२ ॥ इतरे तु अस्तु केवलश्चेतनः कर्तृत्वादिवन्धाश्रयः । स्फाटिकलौहि- त्यन्यायेनाऽन्तःकरणस्य, तद्विशिष्टस्य वा कर्तृत्वाद्याश्रयस्य सन्निधा- नाच्चेतनेऽपि कर्तृत्वाध्यन्तरस्याऽव्यासोपगमात्। न च तस्यैकत्वाद् व्यवस्था नुपपत्तिः, उपाधिभेदादेव तदुपपत्तेः। न चाऽन्यभेदादन्यत्र विरुद्ध्धर्म-

अन्य लोग कहते हैं कि केवल चैतन्य ही कर्तृत्वादि प्रपश्चका आश्रय है। स्फटिकलौहित्यन्यायसे X अन्तःकरणके अथवा अन्तःकरणविशिष्ट कर्तृत्वादि- के आश्रयीभूत चैतन्यके सन्निधानसे चेतनमें भी अन्य कर्तृत्वादि धर्म अध्यस्त हो सकते हैं। यदि शङ्का हो कि चैतन्यके एक होनेसे कोई सुखी, कोई दुःखी है, आदि व्यवस्था नहीं होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उपाघिके भेदसे ही उक्त व्यवस्था हो सकती है। पुनः यदि शक्का हो कि अन्यके ेदसे अन्यत्र विरुद्ध धर्मोंकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, तो यह

विशिष्टके अन्तर्गत विशेष्यका और शुद्धका परस्पर अभेद स्वाभाविक है और भेद काल्पनिक है, प्रकृतमें विशिष्ट आत्मामें रहनेवाले बन्धका शुदमें भी अन्वय होता है, अतः संसार और मोक्षके वैयधिकरण्यका संभव नहीं है, यह भाव है। x जैसे लौहित्य .(रकरूप) के आश्रयीभूत जपाकुसमके सन्निधानसे स्फटिकमें उपाधिगत लौहित्यसे अन्य प्रतिविम्बभूत लौहित्य उत्पन्न होता है, वैसे ही चिदात्मामें अन्त :- करण आदिमें रदनेवाल संसारसे अन्य ही विलक्षण अध्यासात्मक कर्तृत्वादि प्रपथवकी उत्पत्ति होती है, यह तात्पर्य है। यदि शङ्का हो कि साक्षीद्वारा अन्तःकरण आदिमें अनुभूयमान प्रपथ्वका ही चिदात्मामें संसर्गाध्यास माननेसे वैयधिकरण्यशक्धाका समाधान हो सकता है, फिर वुद्धि आदिमें रहनेवाले प्रपश्चके सदश अन्य प्रपश्वकी उत्पत्ति माननेमें कोई प्रमाण ही नहीं है? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'वुद्धेर्गुणेन" .. आSSराग्रमान्रो हवरः' (अन्तःकरणके गुणसे जीव आराके अम्र भागके समान अर्थात अत्यल्पपरिमाण है) इस श्रुतिसे बुद्धिके गुणसे ही जीवमें अल्पपरिमाणका प्रतिपादन किया गया है, इस न्यायसे युद्धिधमके सदश वतृत्वादिकी भी आत्मामें उपपत्ति हो सकती है, अतः उक्त कल्पना प्रमाणशून्य नहीं है, यह भाव है।

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जीवोपाधिभेद-विचार] भापानुवादसहित ३८७

व्यवस्था न युज्यते इति वाच्यम्, सूलाग्ररूपोपाधिभेदमात्रेण वृक्षे संयोगतदभावव्यवस्थादर्शनात। तत्ततपुरुपकर्णपुटोपाधिभेदेन श्रोत्रभाव सुपगतस्याऽडकाशस्य तत्र-तत्र शब्दोपलम्भकत्वातुपलम्भकत्वतारमन्द्रेष्टानिष्ट- शब्द्रोपलम्भकत्वा दिवैचित्यदर्शनाच्चेत्याहुः। एके त्वनाश्रितोपाधिभेदभेदप्रकल्पनम्।

अनाश्रित उपाधिभेद भेदका कल्पक है, और प्रतिविम्वोंमें उपाधिधमोंकी व्यवस्थाके समान प्रकृतमें भी व्यवस्था हो जाती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥६३।। एके तु यद्याश्रयभेदादेव विरुद्ध्धर्मव्यवस्थोपादननियमः, तदा

भी युक्त नहीं है, क्योंकि मूल और अग्ररूप उपाधिके मेदसे ही एक वृक्षमें संयोग और संयोगाभावकी व्यवस्था देखी जाती हैछ। और इसी प्रकार तत्-तत् पुरुपोंके कर्णपुटरूप उपाधिके मेदसे श्रोत्रेन्द्रियत्वको प्राप्त हुए आकाशमे तत्- तत् स्थलमं शब्दके उपलम्भकत्व और अनुपलम्भकत्व तथा तार, मन्द्र, इष और अनिष्ट शब्दके उपलम्भकत्व आदि वैचित्य देखे जाते हैं। कुछ लोग तो कहते हैं कि यदि आश्रयके मेदसे ही विरुद्ध धर्मोंकी व्यवस्था उपपादित होती है, यह नियम है, तो अन्तःकरणसे उपहित निष्कृष्ट

  • तातपर्य यह हे कि संयोग और संयोगाभाव अव्याप्यवृत्ति है अर्थात अपने अभावाघिकरणमें भी उनकी स्थिति रहती है, पक्षमें स्ंयोग भी है और उसका अभाव भी है, परन्तु उनमें अवच्छेदफ अलम अलग है, संयोगके अवस्थानमें शासा अवच्छेदफ है और संयोगाभावके अवस्थानमें मूल अवच्छेदक है, इसी रीतिसे उपाधिके (अवच्छेदकके) भेदसे एक आत्मामें मुसित्व और ुःसित्वफी व्यवस्था हो सकती है। + कणेपुटरो-कर्णविचरये अवच्छिन आकाश ही श्रोत्-इन्द्रिय है, अन्य आकाश श्रोत्रेन्द्रिय नहीं है, दसीलिए, श्रोत् पदार्थके निवचनमें 'कर्णविवरावच्छिन्नकाशः श्रो्म् ऐसा कहा गया है। 4. तार शब्द-नाद विशेपका वाची है, इस विपयमें समीतरलाकरमें इस प्रकारका विवरण मिलता है- नादोऽतिसूक्षम: सूक्ष्मश्र. नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विदुः । जातः प्राणामिसंयोगात्तेन नादोऽभिधीयते ।६।। व्ययदारे त्वसी त्रेधा हृदि मन्द्रोडभिधीयते। छण्ठे मध्यो मूर्मि तारो द्विगुणध्ोत्तरोत्तर:।।v।। [ संगीतरत्नाकर स्वराध्याय प्रकरण तृतीय]

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३८८ सिद्धान्तलेश संग्रह [द्वितीय परिच्छेद

चेतने निष्कृष्टे एवोपाधिवशाद् भेदकल्पनाऽस्तु। अकल्पिताश्रयभेद एव व्यवस्थाप्रयोजक इति क्काप्यसम्प्रतिपत्तेः। मणिमुकुरकृपाणाद्युपाधिकल्पितेन/

तेन भेदेन दीपे पाश्चात्यपौरस्त्यादिघर्माणां च व्यवस्थासम्प्रतिपत्ते- रित्याङ्कः ॥ ११ ॥ क उपाधिरिह- प्रकृतिमें उपाधि कौन है ? एवमुपाधिवशाद् व्यवस्थोपपादने सम्भाविते जीवानां परस्परसुखाद्य- नतुसन्धानप्रयोजक उपाधि: क इति निरूपणीयम्। प्रहुर्भोगायतनभिन्नताम्। भोगायतन (भोगाश्रय) शरीर आदिका भेद ही उपाधि है, ऐश कोई लोग कहते हैं ।।

चैतनमें ही उपाधिसे भेदकी कल्पना रहे। अकलित आश्रयका मेद ही व्यवस्थाका प्रयोजक (कारण) है, ऐसा कहींपर भी अद्यावधि निश्चित नहीं है, क्योंकि सुखमें मणि, सुकुर (दर्पण), कृपाण (तलवार) आदि उपाघिके कल्पित मेदसे श्यामत्व, अवदातत्व (स्वच्छत्व), वर्तुलत्व, दीर्घत्व आदि धर्मोंकी और दीपमें अङ्गुलि आदि उपाधिके अवलम्वनसे परिकल्पित मेदसे पाश्चात्य, पौरस्त्य आदि धर्मोंकी व्यवस्था देखी जाती है ॥११॥ उक्त प्रकारकी उपाधिके आधारपर भले ही व्यवस्थाका उपपादन हो, परन्तु जीवोंके सुख आदिका परस्पर अनुसन्धान और अननुसन्धानकी प्रयोजक उपाधि कौन है ? इसका निरूपण अवश्य करना चाहिए। 1 अर्थात् दीपके आगे अङ्गुली रख देनेसे सामने अन्धकार हो जाता है, इससे कुछ ऊपर अड्गुलीसे आद कर देनेसे कुछ ऊपरके हिर्सेमें अन्धकार हो जाता है, और निम्न देशमें प्रकाश होता है। अर्थात् देवदत्त अपने सुखका आप ही अनुभव करता है, यज्ञदत्तके सुखका अनुभव नहीं करता है, इसी प्रकार एक ही देवदत्त चरणमें दुःखका अनुभव करता है, हस्तमें नहीं करता है, इसमें अवश्य कोई प्रयोजक उपाधि होनी चाहिए, अन्यथा किसी एकके प्रति अनुभव और किसी एकके प्रति अननुभवकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, अतः उस उपाधिके निर्वचनके लिए यह प्रश्न किया गया है, यह भाव है।

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जीवोपाधिभेद-विचार] भापानुवादसहित ३८९

अत्र केचिदाहु :- भोगायतनाभेदतड्ेदावनुमन्धानाननुसन्धानप्रयोज- कोपाधी, शरीरावच्छिन्नवेदनायास्तदवच्छिन्नेनाऽनुसन्धानात् चरणाव- च्छिन्नवेदनाया हस्तावच्छिनेनाऽनुस न्धा नाच्च । 'हस्तावच्छिन्नोहं ाा वच्छिन्नवेदनामनुभवामि' इत्यप्रत्ययात्। कथ तर्हि चरणलयकण्टकोद्धाराय हस्तव्यापार: १ नाडयं हस्तव्यापार:, हस्तावच्छिन्नानुसन्धानात, किन्तु अवयवावयविनोश्वरणशरीरयोरभेदासच्वेन चरणावच्छिन्नवेदना शरीरा- वच्छिनेन 'अहं चरणे वेदानावान्' इृत्यनुसन्धीयते इति तदनुसन्धानात्। एवं. चैत्रमैत्रशरीरयोरभेदाभावाद् चैत्रशरीरावच्छिन्नवेदना न मैन्नशरीरा- इस आदेपके समाधानमं कुछ लोग कहते हैं कि भोगायतनका+ अमेद और उसका मेद सुखादिके अनुसन्धान और अननुसन्धानमं क्रमशः प्रयोजक उपाधि हें, क्योंकि शरीरावच्छिन्न वेदनाका-सुख-दुःखका-शरीरावच्छिन्न आात्मासे ही अनुसन्धान होता है और चरणावच्छिन्न वेदनाका हस्तावच्छिन्न आत्मासे अनुसन्धान नहीं होता है, कारण कि 'हस्तावच्छिन्न मैं चरणावच्छिन्न वेदनाका अनुभव करता हूँ' इस प्रकारका अनुभव नहीं होता है। तो पैरमें लगे हुए काटेको निकालनेके लिए हाथ व्यापार क्यों करता है? नहीं यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि हाथका यह व्यापार (कण्टकोद्धारक व्यापार) हस्तावच्छिन्न चतन्यवृत्ति दुःखादिके अनुसन्धानसे नहीं होता है, किन्तु चरण और शरीरका (जो कि अवयव और अवयवीरूप हैं) परस्पर भेद न होनेसे चरणसे अर्वच्छिन्न आत्ममि रहनेवाली वेदनाका 'में चरणम दुःखी हूँ' इस प्रकार शरीरा- वच्छिन्न मात्मा ही अनुसन्धान करता है, अतः शरीरावच्छिन्न आत्माको चरणा- वच्छिन् आत्मामें रहनेवाले दुःखादिका अनुसन्धान होनेसे उस स्थलमे हस्तादि- व्यापार होता है। इसीलिए चत्र और मैत्रके शरीरोंका परस्पर तादात्म्य न होनेसे चैत्रशरीरावच्छिन्न आत्मांगें रहनेवाली वेदनाका मैत्रशरीरावच्छिन्न आत्मा अनुसन्धान नहीं करता है। और चैत्र तथा मैत्र दोनोंके शरीरोंमें अनुस्यूत-

भोगायतनशन्दका अर्थ है अवच्छदकतासम्बन्घसे सुख या दुःखके साक्षातकारका आश्रय, यद शरीर है अथया दस्त, पाद आदि अवयव हैं। इनकी अभिन्नतासे सुख आदिका अनुमव है, और मिननतासे अगनुगव होता है, देतदतका शरीर एक है, इसलिए देवदत- शरीरावच्किन आत्मामें रहनेपाले मुग, दुःस आदिका देवदत्तको अनुसन्धान होता है, यज्ञदत्त- फा शरीर भिन्न है, अतः उसके सुसादिका अनुभव नहीं होता।

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३९० [द्वितीय परिच्छेद

सन्धीयते। उभयानुस्यूतस्यावयविनो भोगायतनस्यैवाडभावादिति न चैत्र-/- शरीरलग्नकण्टकोद्धाराय मैत्रशरीरव्यापारप्रसङ्ग इति। अन्ये विश्लिष्टतन्भेदं भोगासाङ्कर्यकारणम् ॥ ६४ ॥ अन्य लोग विश्लिष्ट उपाधिका भेद भोगके असाङ्कर्यका प्रयोजक है, ऐसा कहते हैं।। ६४ ॥ अन्ये तु विश्लिष्टोपाधिभेदोऽननुसन्धानप्रयोजकः । तथा च हस्ता- वच्छिन्नस्य चरणावच्छिन्नवेदनानुस्धाना्ुपगमेपि नदोः । न चैवं सति गर्भस्थस्य मातृसुखानुसन्धानप्रसङ्ग:। एकस्मिन्नत्रयविन्य- वयवभावेनाऽननुप्रविष्टयोर्विश्लिष्टशब्देन विवक्षितत्वाद् मातृगर्भशरीरयोस्त- थात्वादित्याहुः। रूपसे अनुवर्तमान किसी अन्य अवयवीसे अवच्छिन्न आत्मासे भी अनुसन्धान नहीं हो सकता है, क्योंकि उभय अर्थात् चैत्र और मैन्र दोनोंके शरीरमें अनु- वर्तमान सुखदुःखका आश्रयीभूत कोई अवयवी ही नहीं है, इसलिए चैत्रके शरीरमें लगे हुए कण्टकके निकालनेके लिए मैत्रके शरीरका व्यापार प्रसक्त नहीं होता है। कुछ लोग कहते हैं कि विश्िष्ट (विक्रेष-विभाग-को प्राप्त हुई) भोगायतनरूप उपाधिका भेद अननुसन्धानका प्रयोजक है। इसलिए हस्ता- वच्छिन्न आत्माको चरणावच्छिन्न आत्मामें रहनेवाले दुःखादिका अनुभव होगा, तो भी कोई हानि नहीं है। यदि शक्का हो कि उक्त विश्किष्ट उपाधिको ही अननुसन्धानका प्रयोजक माना जाय, तो गर्भस्थ जीवको माताके सुखका अनुसन्धान प्रसक्त होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिनका एक अवयवीमें अवयवभावसे प्रवेश नहीं है, उन्हींको विश्िष्टशव्दसे कहा जाता है, अतः माताके और गर्भके शरीरका एक अवयवीमें अवयवरूपसे प्रवेश न होनेसे उक्त दोष नहीं है। * भोगायतनभूत हस्त और चरणका परस्पर भेद होनेपर भी वे विश्लिष्ट नहीं है, अतः विश्िष्ट भोगायतनभेदरूप अननुसन्धानके प्रयोजक नहीं होनेसे चरणावच्छिन् आत्माके दुःख आदिका हस्तावच्छिन्नसे यदि अनुभव हो, तो भी दोप नहीं है, यह भाव है।

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जीवोपाधिभेद-विचार] भापानुांदसहित ३९१

न च- 'उद्यतायुधदोर्दण्डाः पतितस्वशिरोऽक्षिमिः। पश्यन्त: पातयन्ति स कवन्धा अप्यरीनिह।' इति भारतोक्त्या विश्लेपेऽप्यनुसन्धानमवगतमिति वाच्यम्, तत्रापि

नानन्तरं मूर्छामरणयोरन्यतरावश्यंभावेन दष्टविरुंद्धार्थस्य तादृशवचनस्य कैमुत्यन्यायेन योधोत्साहातिशयप्रशंसापरत्वात्। ताटकूप्रभावयुक्तपुरुप- यदि शक्का हो कि 'उद्यतायुघ' (जिनके भुजदण्डमें आयुध उद्यत हैं, ऐसे कबन्ध भी-[ जिन योधाओंके सिर छिन्न हो गए हैं, वे कवन्ध कहे जाते हैं ] गिरे हुए अपने सिरको अक्षियोंसे देखते हुए रणभूमिमें शत्रुओके प्राण लेते हैं।) इस महाभारतकी उक्तिसे ज्ञात होता है कि उपाधिका विश्रेष होने- पर भी + अनुसन्धान होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस स्थलमें भी सिर और कबन्धका एक अवयवीमे अवयवरूपसे पूर्वमें प्रवेश होनेसे मस्तक छेदनके वाद मूर्च्छा या मरण इन दोनोंमें से कोई अवश्य होता है, इस- लिए प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले उक्त वचनको कैसुतिक- न्यायसे योद्धाओंके उत्साहातिशयका मशंसार्थक ही मानना होगा। अथवा विशिष्ट X प्रभावसे युक्त पुरुपविशेपविषयक होनेसे उक्त वचनको यथार्थ + जसे चैत्र और मैत्रके शरीर चिश्लिष्ट हैं, वैसे ही कबन्ध और उसका मस्तक चिश्लिष्ट है, तो भी विम्विष्ट शिरोवच्छिन्न चतन्यसे कवन्धावच्छिन आत्माके योद्ापनका अनुसन्धान होता है, अतः व्यभिचार है, यह भाव है। अर्थात जव कबन्ध भी शत्रुओंसे टक्कर लेते हैं, तव अन्य जीवित योद्वाओंके उत्साहमें क्या कहना है, यह भाव है। X तात्पर्य यह है कि उक्त महाभारतका वचन प्रशंसार्थक नहीं है, प्रत्युत यथार्थ है, क्योंकि योगप्रभावसे या चरदानके माहात्म्यसे मस्तक छेदनके अनन्तर भी युद्धका अनु- सन्धान हो सकता है, तो फिर विश्विष्ट उपाधि अननुसन्धानकी प्रयोजक है, इस नियमका व्यमिचार तो स्थिर ही है, इस प्रकारकी शक्ता हो, तो इसका 'ताहक' इत्यादि मूलसे परिहार करते हैं-अर्थात् उक्त महाभारतका वचन उन्हीं पुरुषोंको उद्देंश्य कर कहता है, जो वीर पुरुष योगी या चरदान प्राप्त किये हुए थे, उनके मस्तकका छेदन होनेपर भी अपने गिरे हुए सिर आदिसे अनुसन्धान करके वे अपने शत्तुओंसे लड़ते थे, इसलिए योगादिप्रभावविधुर पुरुपोंके अननुसन्धानमें विश्लिष्ट उपाधि प्रयोजक है, योगादिप्रभावयुक्त पुरुषोंके प्रति वढ प्रयोजक नहीं है।

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३९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

विशेषविषयत्वेन भूतार्थवादत्वेऽपि निरुक्तस्योत्सर्गतोऽननुसन्धानतन्त्रत्वा- विघाताच्च। अत एवोक्तवक्ष्यमाणपक्षेपु योगिनां जातिस्मराणां च/ शरीरान्तरवृत्तान्तानुसन्धाने न दोपप्रसक्ति:। देहभेदं परे प्राहुवाल्यादिपु न त्विदा। माययाऽपचयी देहो दीपवन्नेव चाणुभिः ॥६५ ॥ अन्य लोग कहते हैं कि 'शरीरका भेद भोगके असाक्कर्थका प्रयोजक है' वाल्या- वस्था आदिका शरीर भिन्न नहीं है दीपकके समान मायासे छोटा और बड़ा शरीर होता हैं, अणुओंसे नहीं होता है।। ६५ ।। अपरे तु शरीरैक्यभेदावनुसन्धानतदभावप्रयोजकोपाधी, वाल्यभवा- न्वरानुभूतयोरनुसन्धानतदभावद्दष्टेः । न च वाल्ययोनयो शरीरभेद: शङ्कनीय:, प्रत्यभिज्ञानात्। न च परिमाणभेदेन तद्भेदावगमः,

मान लिया जाय, तो भी उक्त विश्विष्टोपाधिभेदके स्वाभाविक अननुसन्धानके प्रयोजकत्वका व्याघात नहीं हो सकता है। उक्त प्रयोजकके औत्सर्गिक होनेसे कहे हुए और कहे जानेवाले पक्षम योगी और पूर्वकी जातिस्मरण करनेवालोंके अन्य शरीरके वृत्तान्तके अनुसन्धानमॅ कोई दोप नहीं है। कुछ लोग तो कहते हैं कि शरीरका ऐक्य और शरीरका भेद ही अनु- सन्धान और अननुसन्धानमें क्रमशः प्रयोजक उपाधि हैं, क्योंकि वाल्यावस्थामें और जन्मान्तरमें अनुभून पदार्थोंका वृद्धावस्थामें अनुसन्धान और इस जन्ममें अननुसन्धान देखा* जाता है। यदि शक्का हो कि वाल्यावस्था और युवास्थाके शरीरोंका भेद है? तो यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'वही यह शरीर है' इस प्रकार उनकी ऐक्यावगाहिनी प्रत्यभिज्ञा होती है। यदि शक्का हो कि वाल्य और युवावस्थाके शरीरोंका परिमाणके मेदसे भेद है, तो यह भी युक्त नहीं

अर्थात् वाल्यावस्थामें जिस किसी पदार्थविशपका अनुभव किया गया है, उसका युवावस्थामें स्मरण होता है, उसका कारण यही है, कि वाल्य और यौवन अवस्थाका शरीर एक है, और जन्मान्तरमें अनुभूत पदार्थका जो स्मरण नहीं होता है, उसमें कारण यही है कि जन्मान्तरका शरीर और इस जन्मकाशरीर परस्पर भिन्न है, अतः इम अनुभवसे अनुसन्धान और अननुसन्धानमें शरीरैक्य और शरीरभेदको क्रमशः प्रयोजक माननेमें कोई हानि नहीं है, यह भाव है।

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जीवोपाधि-विचार ] भापानुादसहित . ३९३

एकस्मिन् वृक्षे मूलाग्रभेदेनेव कालभेदेनैकस्मिनननेकपरिमाणान्वयोपपत्तेः। नन्ववयवोपचयमन्तरेण न परिमाणभेदः । अवयवाश् पथ्चादापतन्तो न पूर्वसिद्धं शरीरं परियुज्यन्ते इति परिमाणभेदे शरीरभेद आवश्यक इति चेत्, न; प्रदीपारोपणसमसमयसौधोदरव्यापिप्रभामण्डलविकासत- त्पिधानसमसमयतत्सङ्कोचाद्यननुरोधिनः परमाणुप्रक्रिययोरसम्भवादस्यान- भ्युपगमात्। विवर्तवाढे चन्द्रजालिकदर्शितशरीरद् विनैचाऽवयवोपचयं मायया शरीरस्य वृद्धय्ुपपत्तेरित्याङ्गुः। लिनभेदं परेs- कुछ लोग अन्तःकरणके भेदको असक्कर्यका प्रयोजक मानते हैं। इतरे त्वन्त:करणा भेदतद्व्वेदाभ्यामनुसन्धानाननुसन्धानव्यचस्थामाहुः। अयं च पक्ष: प्रागुपपादितः ।

है, क्योंकि एक ही वृक्षमें मूल और अग्रके मेदसे जसे मेदका अवभास होता है, वैसे ही एक ही शरीरमें कालमेदसे अनेक परिमाणोंका सम्बन्ध हो सकता है, यह भाव है। यदि शक्का हो कि अवयवोंकी वृद्धिके बिना परिमाणका मेद नहीं हो सकता है। और पीछेसे आनेवाले अवयव पूर्वसिद्ध शरीरके साथ सम्बद्ध नहीं हो सकते हैं, इससे परिमाणके मेदसे शरीरका + भेद आवश्यक है, तो यह भी युक्त नहीं हे, क्योंकि प्रदीपके जलानेके समयमें ही महलके अन्दर व्याप्त होनेवाले प्रभामण्डलके विकासका और प्रदीपके आच्छादनकालमें ही उक्त प्रभामण्डलके संकोचका अनुसरण न करनेवालेकी परमाणुपक्रियाका सम्भव न होनेसे उक्त परिमाणमेदका अक्ञीकार ही नहीं है। विवर्तवादमें तो पन्द्रजालिकसे दिखलाये गये शरीरके समान अवयवकी वृद्धिके बिना ही मायासे शरीरकी वृद्धि हो सकती है। कुछ लोग कहते है कि अन्तःकरणके अमेद और उसके मेदसे ही अनु- सन्धान और अननुसन्धानकी उपपत्ति हो सकती है। इस पक्षका पूर्वमें उपपादन किया जा चुका है। + तात्पर्य यह है कि पूर्विद्न शरीर उत्तरकालभावी बढे शरीरके प्रति उपादान नहीं दो सकता है, इसलिए पूर्व पारीरका नाश दोनेफे बाद पूर्व शरीरके अचयव और पीछे आनेवाले ५०

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३९४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

विद्याभेद्मन्ये प्रचक्षते। कोई लोग अज्ञानके भेदको उक्त असाङ्कर्यका प्रयोजक कहते हैं। केचितु 'अज्ञानानि जीवभेदोपाधिभूतानि नाना' इति स्व्रीकृत्य तज्जेदा- भैदान्याम् अनुसन्धानाननुसन्धानव्यवस्थामाह्गः ॥१२॥ अहष्टानियमादिभ्यः कारणादेर्व्यवस्थितिः ॥ ६६ ॥ अदष्टानियम आदिसे कारण आदिकी व्यवस्था होती है॥ ६६ ॥। अत्र केचिद् (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३) 'अंशो नाना- व्यपदेशाद्' इत्यधिकरणे 'अद्ृष्टानियमात्' (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ५१) 'अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम्' (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ५२) 'प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावाद्' (उ० मी० अ० २ पा० ३

कुछ लोग जीवके उपाघिभूत अज्ञान अनेक हैं, इस प्रकार अङ्गीकार करके अज्ञानके अमेद और मेदसे अनुसन्धान और अननुसन्ानकी व्यवस्थाका उपपादन करते हैं ॥। १२ ॥। इस विषयमें कुछ लोग कहते हैं 'अंशो नानाव्यपदेशात्' 'अदृष्टानिय- माठ्' + 'अभिसन्ध्यादिष्नपि चैवम्' 'प्रदेशादिचेन्नानतर्भावात्' इन सूत्रोंकी

उपचित अचयव दोनों मिलकर अन्य शरीरका द्यणुकादिकरमसे आरम्भ करते हैं, अतः शरीरोंके परिमाणके भेदसे शरीरोंका भी भेद अवश्य मानना चाहिए, यह पूर्वपक्षका भाव है। * जीव ब्रह्मका अंश है, क्योंकि 'य आत्मनि' श्रुतिमें जीव और त्रह्मका नानात्व व्यपदिष्ट है। इस विषयमें यदि शङ्का हो कि व्रह्म तो अंशवान् नहीं है ऐसी परिस्थितिमें जीव ब्रह्मका अंश कैसे होगा? तो यह युक नहीं है, क्योंकि जैसे घटादिसे अवच्छिन्न आकाश महाकाशका अंश होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी हो सकता है अर्थात् अवच्छिन चैतन्य अनवच्छिन् चैतन्यका अंश है, ऐचा माना जा सकता है, वस्तुतः नहीं है, यह सूत्रका एक हिस्सा है, परन्तु सुत्रका पूर्णस्वरूप-'अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके इतना है, इसका विस्तार अच्युत- अ्रन्थमालामुद्ित भाषानुवादसहित शाहरभाष्यके पृ० १५०८ में देखना चाहिए। 'अटृष्टानियमात्' साड्ख्यमतमें प्रधानमें रहनेवाला अदृष्ट और न्यायमतमें अदष्टका हेतु' आत्ममनःसंयोग हरएक आत्माके प्रति साधारण है, अतः 'यह इसका अदृष्ट है' इस प्रकार व्यवस्था न होनेके कारण भोगादिका साङ्कर्य उनके मतमें भी समान है, यह इस सूत्रका अर्थ है। साधारण मनके संयोग आदिसे होनेवाले सह्ल्प आदि भी अदृष्ट नियमके सम्पादक नहीं हैं, अतः भोगका साङर्य ज्योका त्यों है। प्रदेशभेदादिति चेन्नान्तर्भावात्-आत्माओंके विभु होनेपर भी शरीरावच्छिन आत्म-

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पाधिभेद होनेपर भी सुखाद्यनुसन्धानका साङ्कर्यांपादन] भापातुंवादसहित ३९५

सू० ५३) इतिसूत्रतद्भतभाव्यरीतिमनुसृत्य एकस्मिन्नात्मन्युपाधिमेदेन व्यवस्थानुपगमे कणभुगादिरीत्याऽडत्मभेदवादेऽपि व्यवस्थानुपपत्ति- तौल्यमाहुः। तथाहि-चैत्रचरणलग्नकण्टकेन चैत्रस्य वेदनोत्पादनसमये अन्येपा- मप्यात्मनां कुतो वेदना न जायते। सर्वात्मना सर्वगतत्वेन चैत्रशरीरान्त- र्भावाविशेपात्। न च 'यस्य शरीरे कण्टकवेधादि, तस्यैव वेदना, नाऽन्येपाम्' इति व्यवसथा। 'सर्वात्मसन्निधावुत्पद्यमानं शरीरं कस्यचिदेव, नाऽन्येपाम्' इति नियन्तुमशक्यत्वात्। न च 'यददृष्टोत्पादितं यच्छरीरम्, तत्तदीयम्' इति नियमः । अद्ृष्ट-

और इनके भाष्यकी प्रणालीका अनुसरण करके एक आत्मामे उपाधिकी भिन्नतासे व्यवस्थाका अक्रीकार न करनेपर कणाद आदिकी रीतिसे आत्माके मेदवादमं भी सुख आदिकी व्यवस्था नहीं हो सकती है। * जैसे कि चैत्रके पैरमें चुभे हुए कण्टकसे जब चैत्रको दुःख उत्पन्न होता है, उस कालमं दूसरे जीवोंको भी दुःख क्यों नहीं होता है? क्योंकि सभी आत्माओंके व्यापक होनेसे चैत्रके शरीरमें भी उनका अन्तर्भाव समान ही है। यदि शक्रा हो कि 'जिसके शरीरमें कांटा चुभा हो, उसीके शरीरमें वेदना होती है' ऐसा नियम है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्येक आात्माके सामीप्यमं उत्पन्न हुआ शरीर 'किसी व्यक्तिविशेषका होता है, दूसरोंका नहीं होता' इस प्रकार नियम नहीं कर सकते हैं। यदि शक्षा हो कि 'जिस अटप्टसे जिसका शरीर उत्पन्न हुआ है, वह सीका है' ऐसा नियम हे, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस प्रकार अट्सटका भी नियम नहीं कर सकते हैं, कारण कि जब उसी प्रकारके अदष्टके

प्रदेशसे अभिसन्धि (संकल्प) आदिकी व्यवस्था हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मामें विभुत्य होनेरे राभीमें सबका सम्बन्ध होनेके कारण 'यह इसका शरीर है' यद नियम नहीं हो सकता है, अतः उक दोप समान है, यह भाव है। *इस अ्न्थसे 'अद्ट्टानियमात्' इत्यादि सूत्रोंका, जो कि पूर्वमें मूलमें ही उपन्यस्त हैं, उनका स्पष्टोकरण करते हैं, इसरो यह निश्चित होगा कि उपाधिभेदके बिना आत्माओंको नाना मान कर भी भोगादिके साक्कर्यका परिदार नहीं कर सकते हैं।

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३९६ सिद्धान्तलेशसंग्रेह [द्वितीय परिच्छेद

स्याऽपि नियमासिद्धेः। यदा हि तद्दृष्टोत्पादनाय केनचिदात्मना संयुज्यते मनः, संयुज्यत एव तदाऽन्यैरपि। कथ कारणसाधारण्ये क्वचिदेव तद्दृष्टमुत्पद्येत। ननु मनस्संयोगमात्रसाधारण्येऽपि 'अहमिदं फलं ग्राम्म. चान् इति अभिसन्धिरदष्टोत्पादककर्मानुकूलकृतिरित्येवमादि व्यवस्थित- मिति तत एवाऽटष्टनियमो भविष्यतीति चेत्, न; अभिसन्ध्यादीनामपि साधारणमनस्संयोगादिनिष्पाद्यत्या व्यवस्थित्यसिद्धेः। ननु स्वकीयमन- स्सयोगोऽभिसन्ध्यादिकारणमिति मनस्संयोग एवाडसाधारणो भविष्यतीति, न; 'नित्यं सर्वात्मसंयुक्तं मनः कस्यचिदेव स्व्रम्' इति नियन्तुमशक्यत्वाद्।

दृष्टस्य पूर्वचद् व्यवस्थित्यसिद्धेः ।

उत्पादनके लिए किसी आत्माके साथ मनका सम्बन्ध होता, तब दूसरे आत्माओं- के साथ भी मनका सम्बन्ध है ही, [ क्योंकि आत्मा व्यापक है] । इसलिए आत्ममन:संयोगरूप असमवायिकारण और समवायिकारणरूप आत्माके साधारण होनेसे किसी स्थलविशेषमें वह उत्पन्न होता है, यह कैसे होगा। यदि शङ्का हो कि केवल आत्ममनःसंयोगके साधारण होनेपर भी 'मैं इस फलको प्राप्त करूँ' इस प्रकार अभिसन्धि (फलकी इच्छा) और अदष्टके उत्पादक कमोंके अनुकूल कृति आदि नियमित हैं, अतः उन्हींसे ही उक्त अदृष्टका नियम होगा? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अभिसन्धि (फलेच्छा) अभृति भी सर्वसाधारण आत्ममनःसंयोगसे ही निष्पादित होते हैं, अतः अभिसन्धि आदि भी नियमत नहीं हो सकते हैं। यदि शङ्का हो कि स्वकीय मनःसंयोग ही अभिसन्धि आदिका कारण है, इसलिए मनःसंयोग ही असाधारण कारण है, सामान्य कारण नहीं है, अतः अदष्टनियम हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, नित्य और सभी आत्माओंके साथ सम्बद्ध मन किसी व्यक्ति विशेषका होकर स्वकीय होता है, ऐसा मी नियम नहीं हो सकता है। यदि शङ्का हो कि अदृष्टविशेषसे ही तत्-तत् आत्मा तत्-तत् मनोंके स्वामी हैं? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस अदष्टकी पूर्वके समान व्यवस्था नहीं हो सकती है।

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अपाधिमेद होनेपर भी सुखाद्यनुसन्धानका सांकर्यापादन] भापानुवादसहित ३९७

नन्वात्मनां विभ्ुत्वेऽपि तेपां प्रदेशविशेपा एव वन्धभाज इति आत्मान्तराणां चैत्रशरीरे तत्प्रदेशविशेपाभावात् सुखदुःखादिव्यवस्था भविष्यतीति, न; यस्मिन् प्रदेशे चैत्र: सुखाद्यनुभूय तस्मात् प्रदेशादप- क्रान्तस्तस्मिन्नेव मैत्रे समागते तस्यापि तत्र सुखदुःखादिदर्शनेन शरीरान्तरे आत्मान्तरप्रदेश विशेषस्याऽप्यन्तर्भावात्। तस्मादात्मभेदेऽपि व्यवस्था दुरुप- पादैव। क्थचित्तदुपपादने च श्रुत्यतुरोधाल्लाघवाचचकात्म्यमङ्गीकृत्य तत्रैव तदुपपादनं कर्तु युक्तमिति॥१३॥

यदि शङ्का हो कि आत्माओंके स्वतः व्यापक होनेपर भी उनके प्रदेशविशेष ही सुख, दुःख आदि वन्धके आश्रय हैं, अतः चैत्रशरीरमें अन्य आत्माओंके प्रदेशविशेषोंकी अवस्थिति न रहनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था होगी? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिस * प्रदेशमें चैत्रने सुख, दुःख आदिका अनुभव किया हो, उस प्रदेशसे उसके हट जानेपर उसी प्रदेशमें आये हुए मैत्रके भी सुख, दुःख आदि देखे जाते हैं, अतः अन्य शरीरमें दूसरे आत्माके प्रदेश भी अन्तर्भूत हैं, इससे आत्माभेद पक्षमें भी व्यवस्थाका उपपादन अशक्य ही है, किसी प्रकारसे सुख, दुःख आदिके साङ्कर्य- का परिहार किया जाय, तो भी श्रुतिके + अनुसार और लाघवसे एक आत्माका अद्गीकार करके उसीमें सुखादिकी व्यवस्था करनी चाहिए।१३॥।

4 पूर्धपक्षसे यह नियम फलित होता है कि एक शरीरमें एक ही आत्माकां प्रदेश है, अन्य आत्माफा नहीं, परन्तु यह असक्रत है, क्योंकि प्रदेशसे वही आत्माका प्रदेश लिया जायगा जो कि अद्ट्का आश्रय होगा, क्योंकि सुख, दुःख आदि अव्याप्यवृत्ति हैं, इस अवस्थामें जिस् आसन आदि प्रदेशमें चत्रका शरीर अवस्थित होकर चन्रसुखका आश्रय होता है, उसी प्रदेशमें चैन्नशरीरके इट जानेपर मैत्रका शरीर बैठ जाय तो वह सुखाश्रय देखा जाता है। इस अवस्थामें पीछे आये हुए मैत्रशरीरमें चैन्न और मैत्रके आत्म प्रदेशोंका, ओ कि अदषके आश्रय है, प्रवेश होनेसे उसमें (मैत्रशरीरमें) चैत्र और मैत्र दोनोंके भोगका प्रसम होगा। यदि इसमें शद्ा हो कि पूर्वके शरीरके अपकरान्त होनेपर उसके साथ साथ चत्रशरीरमें रहनेवाले आत्माके प्रदेशका भी अपसरण होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रदेशवाले आत्माके स्थिर होनेके कारण, प्रदेशका चलना वन ही नहीं सकता। इसी प्रणालीके अनुसार इतर आत्माओंमें भी प्रदेशान्तभार्वप्रयुक्त साङ्चर्य तदवस्थ ही है, अतः आत्मभेदवादियोंका मत सर्वथा अश्रद्वेय तथा युकि और प्रमाणसे विधुर है, यह भाव है। +'तत्त्वमसि' 'एकमेवाद्ितीयं ब्रम्म' इत्यादि क्षुतियोंके अननुसार आत्माका भेद भासता ही

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सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

एवमण्वात्मवादेऽपि भोगश्रेशे प्रसज्यते। तथाऽन्ये वहवो दोषा विद्वद्भिः संग्रदर्शिताः ॥६७॥ इसी प्रकार आत्माके अणुत्ववादमें भी ईश्वरमें भोगकी प्रसक्ति होगी, इसी प्रकार विद्वानोंने दूसरे अनेक दोष अणुवादमें कहे हैं॥ ६७ ॥ सन्तु तर्ह्यणव एवात्मानः, यदि विभुत्वे व्यवस्था न सुवचा। मैवम्, आत्मनामणुत्वे कदाचित् सवाङ्गीणसुखोदयस्य करशिरश्वरणाघिष्ठानस्य - चाऽनुपपत्तेः ।

हैवैष आत्मा यं वा एते सिनीतः पुण्यं च पापं च' 'वालाग्रशतभागस्य' इत्यादिश्रुतिषु साक्षादणुत्वश्रवणेन च अणव एव जीवाः। तेपामणुत्वेऽपि

यदि जीवोंको विभु माननेपर व्यवस्था नहीं होती है, तो अणुपरिमाण ही मानो इस प्रकारकी यदि शङ्का हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि आत्माको अणु माननेपर किसी समय जो सम्पूर्ण शरीरमें सुखानुभव होता है, उसकी और कभी एक ही समयमें हाथ, मस्तक और चरणकी जो प्रेरणा होती है, उसकी अनुपपत्ति होगी। इस विषयमें कुछ अर्वाचीनोंने कल्पना की है कि आत्माकी उत्क्रान्ति *, गति और आगति आदिकी अनुपपत्ति न हो, इसलिए और 'अणुहेवेष'०' (जिस आत्माको पुण्य और पाप ाँधते हैं, वह आत्मा अणु है) 'वालाग्र०' (केशके अग्रभागका सौवां भाग जीव है) इत्यादि श्रुतियोंमें तो साक्षात् जीवके अणुत्वका प्रतिपादन है, इसलिए जीव अणुपरिमाणवाले ही हैं। उनके अणुपरिमाण होनेपर भी दीपप्रभाके+ दष्टान्तसे

नहीं है, किन्तु आत्माका ऐक्य ही बुद्धिपथमें उतरता है, और अनेक आत्माओंके अङ्गीकारकी अपेक्षा एक आत्मा माननेमें कितना लाघव और विरोधाभाव है, यह वेदान्तरसिक जानते ही हैं, यह तात्पर्य है। 'समु्कानतम् इत्यदि श्त आत्माका उत्क्रम आदि दिखलाती है। + जैसे दीपकी प्रभा अपने आश्रय दीपको छोड़कर अन्य गृहोदरादि प्रदेशमें व्याप्त होती है, वैसे ही ज्ञान, सुख आदि अपने आश्रय अणु आत्माको छोड़कर शरीर आदिमें व्याप्त हो सकते हैं, यह भाव है।

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जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ३९९

ज्ञानसुखादीनां ग्दीपप्रभान्यायेन आश्रयातिरिक्तप्रदेशविशेषव्यापिगुणतया न सरवाङ्गीणसुखानुपलब्धिः। 'द्रोणं वृहस्पतेर्भागम्' इत्यादिस्मृत्यनुरोधेन जीवानामंशसच्ाद्। करशिरश्वरणाद्यनुगतेपु सुखदुःखादियोगपद्यं कायव्यूह- गतेपु योगिनां भोगवैचित्र्यं चेति न काचिदनुपपत्तिः। एवं च जीवाना- मणुत्वेनाऽसङ्कराद सुख दुःखादिव्यवस्था चिभोरीश्वराद् भेदय्रेति। अत्रोक्तमद्वैतदीपिकायाम्-एवमपि क्थ व्यवस्थासिद्धिः। चैत्रस्य 'पादे वेदना, शिरसि सुखम्' इति स्वांशभेदगतसुखदुःखानुसन्धानवद् सुख, दुःख आदि आश्रयसे अतिरिक्त प्रदेशविशेपमें व्यापी गुण हैं, अतः सर्वाङ्गीण सुख, दुःखोंकी अनुपलव्धि भी नहीं है। और 'द्रोणं बृहस्प०' (द्रोणाचार्य देवाचार्य वृहस्पतिका अंश है) इस स्मृतिके आधारपर जीव सांश भी सिद्धू होते हैं, अतः हाथ, सिर, पैर आदिमें जीवांशोंके अनुगत होनेसे ही सुख, दुःख आदिका यौगपद और अनेक शरीरोंके समूहोंमें जीवांशोंके जानेसे योगी लोगोंके भोगका वैचित्र्य होता है, इसलिए जीवाणुवादमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। इस प्रकार जीवोंके अणु होनेपर भी एक शरीरमें सभी जीवोंका प्रवेश न होनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था और विभु ईश्वरसे भेद भी हो सकता है, [जीवको विभु माननेसे दोनोंके लक्षणमें भेद न होनेके कारण ईश्वरसे जीवका भेद सिद्ध नहीं होगा। जीवको अणु माननेसे तो उन दोनोंमें अत्यन्त वैलक्षण्य होनेके कारण भेद स्पष्टरूपसे सिद्ध होता है, यह भाव है ]। इस प्रकारकी अर्वाचीनोंकी कल्पनाका अद्वैतदीपिका नामके ग्रन्थमें परिहार किया गया है कि जीवमें अणुत्व और सांशत्वके माननेपर भी व्यवस्था किस प्रकार हो सकती हैं? क्योंकि चत्रके 'पैरमें वेदना है, सिरमें सुख है' इस प्रकार जीवके भिन्न अंशोंमें रहनेवाले सुख, दुःखोंका जसे अनुभव होता * अपने अंशमे रहनेवाले सुख् आदिका जीव अनुभव करता है और अन्यजीवगत सुखादिका अनुभव नहीं करता, इस प्रकार स्वीकार करते हुए पूर्वपक्षीको कहना होगा कि भेद अननुसन्धानका प्रयोजक है और अभेद अनुसन्धानका प्रयोजक है, इसमें यह विकल्प हो सकता है-जो अननुसन्धानका प्रयोजक भेद है, वह भेदमात्र है अथवा शुद्ध भेद है? प्रथम पक्षमें अपने अंशवृत्ति सुख आदिका भी चैन्र अनुभव नहीं कर सकेगा, क्योंकि अननुसन्धानमें हेतु वहाँ भेद है, यदि भेदके विद्यमान होनेपर भी वह सुखादिका अनुसन्धान करता है, यह स्वीकार करोगे तो यह भी मानना पढ़ेगा कि चैन्नगत सखादिका अनुसन्धान मैत्र भी

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४०० सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

मैत्रगतसुखदुःखानुसन्धानस्यापि दुर्वारत्वात्। अविशेपो हि चैत्रजीवात्दंशयो मैत्रस्य च भेदः। कायव्यूहस्थले वियुज्याऽन्यत्र प्रसरणसमर्थानामंशानां जीवाद् भेदावश्यंभावाद् अंशांशिनोस्त्वया भेदाभेदाभ्युपगमाच्च। न च शुद्धभेदोऽननुसन्धानप्रयोजक इति वाच्यम्, शुद्धत्वं हि भेदस्यांडशांशि- भावासहचरितत्वं वा अभेदासहचरितत्वं वा स्यात् ? नाऽडद्यः, 'अंशो ह्वोष परमस्य' 'ममैवांशो जीवलोके' 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इति श्रुति- स्मृतिसूत्रैरजीवस्य ब्रह्मांशत्वप्रतिपादनेन त्रह्मनीवयोभोंगसाङ्कर्यप्रसङ्गाद्। ननु जीवांशानां जीवं प्रतीव जीवस्य ब्रह्म प्रति नांशत्वम्, किन्तु

है, वैसे ही मैन्रमें रहनेवाले सुख, दुःखोंके अनुभवका भी कैसे परिहार कर सकते हैं, क्योंकि जैसे चैत्रके जीवसे उसके अंशोंका भेद है, वैसे ही चैंत्रजीवसे मैत्रका भी भेद है। योगीके कायव्यूह स्थलम अंशीसे विभक्त होकर अन्य स्थलमें प्रसक्त होनेवाले अंशोंका जीवसे मेद अवश्य होगा, और तुम अंश और अंशीका भेदाभेद स्वीकार करते हो। यदि शक्का हो कि शुद्ध भेद ही अननुसन्धानका प्रयोजक है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुद्धभेदका अर्थ क्या अंशांशिभावका असाहचर्य है, अथवा अमेदका असाहचर्य है? इसमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि + 'अंशो ह्वेप परमस्य' 'ममैवांशो जीवलोके' 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इस प्रकारकी श्रुति, स्मृति और सूत्रोंसे जीवमें ब्रह्मांशत्वका प्रतिपादन होनेसे जीव और ब्रह्ममें भोगसाङ्कर्य प्रसक्त होगा। * यदि शक्का हो कि जीवके प्रति जीवांश जैसे मुख्य अंश है, वैसे ब्रद्मके.

करता है, इसी वातको 'चैत्रस्य' इत्यादि मूलसे वतलाते हैं। द्वितीय पक्षका 'न च' इत्यादि अन्थस आशङ्कापूर्वक परिहार स्वयं प्रन्थकार करेंगे। + जीव परमात्माका अंश है, लोकमें जीवरूप मेरा (ईश्वरका) ही अंश हैं, और जीव परमात्माका अंश है, क्योंकि नानाव्यपदेश है, क्रमशः श्रुति, स्मृति और सूत्रका यह अर्थ है। इसलिए अननुसन्धानका प्रयोजक शुद्धभेद अर्थात् अंशांशिभावसे रहित भेद माना जाय, तो त्रकृतमें जीव और ईश्वरका अंशांशिभावसे असहकृत भेद न होनेसे अननुसन्धान नहीं होगा, किन्तु परस्परके भोगोंका अन्योन्यको अनुसन्धान होगा, यह भाव है। * प्रकृतमें शाङ्काकरनेवालेका भाव यह है कि अननुसन्धानमें शुद्धभेद प्रयोजक है, इसमें शुद्धत्त केवल अंशाशिभावासद्कृतत्व नहीं है,किन्दु मुख्यांशाशिभावासदकृतत्व है,

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जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ४०१

'चन्द्रविम्वस्य गुरुविम्वः शतांशः' इतिवत् 'सद्शत्वे सति ततो न्यून- त्वमात्रम्' औपचारिकांशत्वमिति चेत्, कि तदतिरेकेण सुख्यमंशत्वं जीवांशानां जीवं प्रति, यदत्राननुसन्धानप्रयोजकशरीरे निवेश्यते । न तावद पटं प्रति तन्तूनामिवाऽडरम्भकत्वम्। जीवस्याऽनादित्वात्। नाडपि महाकाश प्रति घटाकाशादीनामिव प्रदेशत्वम्, टङ्कच्छिन्नपापाणशकला- दीनामित खण्डत्वं वा, अणुत्वेन निष्प्रदेशत्वादच्छेद्यत्वाच्च। भिन्ना-

प्रति जीव मुख्य अंश नहीं है, किन्तु 'चन्द्रविम्बका गुरुविम्ब शतांश है' यहांपर जैसे गुरुचिम्वमें चन्द्रविम्वका औपचारिक अंशत्व प्रतीत होता है, घैसे ही प्रकृतमें जीव ईश्वरके सदश तथा उससे न्यून है, अतः जीवमें औप- चारिक अंशत्व भासित होता है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इसमें यह प्रश्न होता है कि जीवके प्रति जीवांशोंमें मुख्यांशत्व, जो कि औपचारिकांशत्वसे भिन्न है +, क्या है, जिसका कि अननुसन्धानके प्रयोजकीभूत शरीरमें (नियमस्वरूपमें) विशेषणरूपसे निवेश करते हो: यदि कहो कि जैसे पटके प्रति तन्तु आरम्भक हें, अत एव वे पटके सुख्य अंश कहे जाते हैं, वैसे ही प्रकतमें आरम्भकत्वरूप मुख्य अंशत्व है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जीव अनादि है, [अर्थात् जीवांशोंमें जीवके प्रति मुख्य अंशत्व है, ऐसा पूर्वमें जो तुमने कहा है, यह नहीं हो सकता है, क्योंकि जीव अनादि है, इसलिए वे जीवांश जीवके भरम्भक नहीं हो सकते हैं, अतः उनमें आरम्भकत्वरूप मुख्य अंशत्व नहीं हो सकता है, यह भाव है। ] यदि कहो कि महाकाशके प्रति घटाकाश आदिमें जैसे प्रदेशत्वरूप अंशत्व है, वैसे ही प्रकृतमें प्रदेशत्वरूप अथवा टक्कसे तोड़े हुए पत्थरके टकुड़ोंके समान खण्डत्वरूप मुख्यांशत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव अणु है, अतः उसका प्रदेश नहीं है और इसीसे उसका टकुड़ा भी नहीं

जीव और ईशवरफा अशाशिभाव मुख्य नहीं है, किन्तु गौण है, इसलिए उनका शुद्ध भेद होनेसे परस्पर अनुसन्धानका सा्कर्य नहीं है और जीव और उसके अंशोंमें मुख्यांशांशिभावत्वके होनेसे शुद्ध भेद उनका नदीं है, अतः अनुसन्धानकी उपपत्ति भी हो सकती है, यह भाव है। + अर्थात् आरम्भकावयवत्व, प्रदेशत्व, सण्डत्व अथवा भिन्नाभिन्नत्वरूप मुख्यांशत्व है। यद प्रश्नका आशय है, इनमें प्रत्येक पक्षका मूलकारने ही क्रमशः खण्डन किया है।

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४०२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

भिन्नद्रव्यत्वमंशत्वमभिमतमिति चेद्, न; तथा सति जीवेश्वरयोजीवानां च भोगसाङ्कर्यप्रसङ्गाद्। स्वतो भिन्नानां तेपां चेतनत्वादिना अभेदस्यापि त्वयाङ्गीकाराठ्, समूहसमूहिनोरभेंदाभेदवादिनस्तव मते एकसमूहान्त- र्गतजीवानां परस्परमध्यभेदसत्वाच्च स्वाभिन्नसमूहाभिन्नेन स्वस्याऽव्य- भेदस्य दुर्वारत्वाद्। यदि संयोगादीनां जातेश्वाऽनेकाश्रितत्वं स्यात्, वदा गुणगुण्यादेरभेदाद् घटाभिन्नसंयोगाभिन्नपटादेरपि घटाभेद: प्रसज्ये- हो सकता है, जिससे कि प्रदेशत्व और खण्डत्वरूप जीवके अंशोंमें मुख्यांशत्त्र हो। यदि कहो कि भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वरूप अंशत्व प्रकृतमें अभिमत है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा होनेपर जीव और ईश्वरका और जीवोंका परस्पर भोगसाङ्कर्य प्रसक्त होगा, क्योंकि जीव और ईश्वर तथा अनेक जीव स्वरूपत: परस्पर मिन्न * हैं, तथापि वे चेतनत्व आदि घमोंसे अभिन्न हैं, ऐसा तुम मानते हो और दूसरी वात यह है कि तुम समूह और समूहीका मेदामेद मानते हो, इसलिए तुम्हारे मतमें एक समूहमें विद्यमान सम्पूर्ण जीवोंका + परस्पर अमेद मी है, कारण कि अपनेसे अभिन्न समूहके साथ अभेद होनेसे अपना भी दूसरेके साथ अमेद है, इसका निवारण नहीं कर सकते हैं, क्योंकि गुण और गुणीका अमेद मानकर यदि संयोग, विभाग आदि अनेकाश्रित माने जाँय, तथा जाति और व्यक्तिका अभेद मान कर यदि जातिको अनेकाश्रित माना जाय, तो गुण और गुणीका अमेद होनेसे घटाभिन्न संयोगसे अभिन्न पटमें भी घटाभेद म्रसक्त्त होगा, ऐसा कहते हुंए तुमने 'तदभिन्ना- अननुसन्धानमें प्रयोजकीभूत जो भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासद्दकृत भेद है, वह जीव और ईश्वरम भी है, अतः जीव और ईश्वरके भोगका साङ्खर्य प्रसक होगा, क्योंकि घट और पटका परस्पर घटत्वादि विशेष धमोंसे भेद होनेपर भी द्रव्वत्वरूप व्यापक धर्मसे जैसे समेद है, वैसे ही जीवत्व और ईश्वरत्वरूप धर्मोंसे उनका परस्पर भेद होनेपर भी सत्व, द्रव्यत्व, चैत- नत्व आदि धर्मोंसे उनका अभेद है, यह भाव है। तात्पर्य यह है कि समूह और समूही का स्वरूपतः भेद और व्यापक धर्मास अमेद तुम मानते हो, इस अवस्थामॅ उत्सवनें एकत्र मिलित मनुप्योंका परस्पर मेदाभेद होनेके कारण भिन्नाभिन्नद्रव्यत्वासहकृत छुद्धभेदके न रहनेसे उस उत्सवमें संमिलित यावत् व्यक्तियोंके भोगका साङ्ड्य प्रसक होगा, क्योंकि एंक समूही देवदत्तसे अभिन्न समूहका यज्ञदत्तके साथ अभेद होनेसे देवदत्तका यज्ञदत्तके साथ अभेद निरस्त नहीं हो सकता है,. अथात समूहको लेकर देवदत्तका यज्ञदसतके साथ अवश्य अमेद है, इसलिए भोगसाङ्गर्यका प्रसम् है ही।

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जीवके अणुत्वकां निराकरण-विचार] भोपानुवादसहित

तेत्यादि वदता त्वया तद्भिन्नाभिन्नस्य तदमेदनियमाभ्युपगमात्। न च जीवान्तरसाधारणचेत नत्वादिधर्म करूप्यैकसमूहान्तर्गतत्वादि-

यदनानतिपसक्लाय विवक्ष्वेत। तथा सति तस्यैय विशिष्य निर्वक्तव्यत्वा-

भिन्नस्य # तदभिन्नत्वम्' यह नियम माना है। * और अंश और अंशीका मेद रहनेपर भी अनुसन्धानका प्रयोजक-अन्य जीवोंमें रहनेवाले चेतनत्व आदि धर्गोसे होनेवाले तथा एक समूदान्तर्गतत्वरूपसे होनेवाले अमेदसे विलक्षण-अन्य-अमेद भी उनका नहीं है, जिसकी कि अति- प्रसन्नके वारणके लिए विवक्षा की जाय, क्योंकि अंश और अंशीका विलक्षण मेद माननेपर उसका भी विशेपरूपसे निर्वचन करना पड़ेगा। यदि कहो कि अंश और अंशीके अमेदमें धर्मोसे होनेवाली एकरूपता आदि अमेदप्रयोजक नहीं है, यही विशेष है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव और उसके अंशोमें चेतनत्वादि धर्मोसे एकरूपता और एक शरीरावच्छेदम एवम् कार्य- समूहके मेलनमें उनका समूह + होनेसे जीव और उसके अंशोंके अभेदमें

:तदभिभ्नानिववस्य रदभिव्त्वनियमः इस नियमको नैयायिक लोगोंने माना है, अपनये अभिष पदार्थसे जो अभिष पदार्थ है, वह आपसे भी अभिन्न होता है, यह उक्क नियमका अर्थ दै, जैसे मु और गुणोका जो अभेद मानते हैं, उनके मतमें उक्क नियमके आगरपर नैवायिक्ोने दोप दिगा दै कि घटसे अभिन संयोग है और उससे अभिन पट है, अतः पट और पटश भी अमेद प्रमफ दो सफता है, यद भाव है। पकृतनें दइका गद कारण है कि जीव और ईवर तथा जीवांदोंका एवं समूहाभिन्न जीवों- का जो मतनलादि धर्मप्रमुक अमेद हे, उससे विलक्षण दी जीव और उसके अगोंका अभेद है, इखलिए जीव और उसके अेतोंका भेद रोनेपर भी परस्पार अनुपन्धानं होता है, जीव और ईशसफा चतनर्वादि धमागे समेद होनेपर नी उत्त विलक्षण अभेदके न रहनेसे परस्पर । अनुमन्भानकी अमकि नहीं है, अतः भिनाभिनदव्यत्वायद्दकृत गेद शुद्धभेद है, और वह अननुषन्धानरा प्रयोजक है, इममें जो अभेद प्रविष् है, वह जीव और उसके अंशोंका अनुसन्धानप्रयोगक निलक्षण अमेद ऐ, इसलिए उकक भिशनाभिनद्रव्यत्वासदकृत भेदरूप शुद्धमदमें दोप नहीं है, गह भाव ऐै। + जखे जीय और उग्रके अंशोंकी चेतनत्व दिसे एकरूपता है, ैसे जीव और उसके अवयवोंका एक शरोसमें अनुप्रवेश कालमें टस शरीरावच्छेदेन समूद भी है, चैधे योगीके जीवके अवय्योंका कायच्यूद्से फहलाभिवाल अनेंकु शरीरोंमें प्रवेश होनेरी कदाचित् उन शरीरी जीवोंका मेल न

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४०४. सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

पत्तेः। धर्मैकरूप्याद्यप्रयुक्तत्वमंश्ांशिनोरभेदे विशेष इति चेत्, न; जीवतदंशयोश्चेतनत्वादिधर्मैकरूप्यसच्वेन एकशरीरावच्छेदे कायव्यूहमेलने, च समूहत्वेन च तयोरभेदे धर्मैकरूप्यादिप्रयुक्तत्वस्यापि सन्भावात्। धर्मैकरूप्यादिप्रयुक्ताभेदान्तरसच्वेऽपि जीवतदंशयोरंशांशिभावप्रयोजका- भेदो न तत्प्रयुक्त इति चेद्, न ; तयोरभेदद्वयाभावात् त्वन्मतेऽिकर- णैक्ये सति भेदस्याऽभेदस्यवा प्रतियोगिभेदेन तदाकारभेदेन वा अनेकत्वा- नंभ्युपगमात्। तस्मादाद्यपक्षे सुस्थोऽतिग्रसङ्ग: । एतेनैव द्वितीयपक्षोऽपि निरस्तः।अभेदासहचरितभेदस्याऽननुसन्धान- प्रयोजकत्वे उक्तरीत्या त्वन्मते जीवन्रह्मणोर्जीवानां चाडभेदस्यापि सच्वेनाति- प्रसङ्गस्य दुर्वारत्वाद्। ननु 'अभेदम्रत्यक्षमनुसन्धाने प्रयोजकम्'इति तदभावेऽननुसन्धानम्। धमैक्यरूप आदि प्रयोजक हैं। यदि शङ्का हो कि जीव और उसके अंशोमें धर्मैक्यरूप्यसे होनेवाला कोई दूसरा अभेद भले ही रहे, परन्तु जीव और उसके अंशोंमें रहनेवाला अंशांशिभावप्रयोजक अभेद धर्मैक्यरूप्य आदिसे नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अंश और अंशीमें दो अमेद रह ही नहीं सकते हैं, तुमारे मतमें भी अधिकरणकी एकता होनेपर मेद और अभेद प्रतियोगीके भेदसे या प्रतियोगीके आकारके भेद अनेक नहीं माने जाते हैं। इससे प्रथम पक्षमें (भेदके अंशांशिभावासहचरितत्वरूप शुद्धत्व पक्षमें) अतिप्रसङ्क विद्यमान ही है। इसीसे द्वितीय पक्ष भी निरस्त हुआ ही समझना चाहिए, क्योंकि अमेदसे असहकृत भेद अननुसन्धानका प्रयोजक माना जाय, तो उक्त रीतिसे चेतनत्वादि धर्मैक्यरूप्य आदि पङ़्क्तसे कही गई रीतिसे) तुम्हारे मतमें मी जीव और न्रह्म और जीवोंका भी परस्पर अमेद होनेके कारण अतिम्रसक दुर्वार ही है। यदि शङ्का हो कि 'अभेदप्रत्यक्ष अनुसन्धानमें प्रयोजक है' इसलिए अभेदप्रत्यक्षके न होनेपर अननुसन्धान होगा। अंशीका अपना अमेद और होनेपर योगी जीवके अंशियोंके साथ समूह भी है, इसलिए धमैकरूप्यप्रचुक्त अभेद होनेसे तदप्रयुक्तत्वका असम्भव है, यह भाव है।

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जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भापानुवादसहिते ४०५

स्वस्य स्वाभेद: स्वांशामेदश्व प्रत्यक्ष इति तद्द्रष्डर्दुःखाद्यनुसन्धानम्, जीवान्तरेणाडमेदसच्वेऽपि तस्याऽप्रत्यक्षत्वान्न तद्दुःखाद्यनुसन्धानम्। जाति- स्मरस्य आ्ग्भवीयात्मनाऽपि अभेदस्य प्रत्यक्षसच्वात् तद्वृत्तान्तानु- सन्धानम्, अन्येपां तदभावाद् नेत्यादि सर्व सङ्गच्छते इति चेत्, तर्ह्ेका- त्म्यवादेऽपि सर्वात्मतावरकाज्ञानावरणाच्वैत्रस्य न मैत्रात्माद्यभेदप्रत्यक्षमिति तत एव सर्वव्यवस्थोपपत्तेर्व्यर्थः श्रुतिविरुद्ध आत्मभेदाभ्युपगमः । न चेत्थमपि प्रपश्चतत्ववादिनस्तव व्यवस्थानिर्वाहः, सर्वज्ञस्येश्वरस्य वस्तुसज्जीवान्तराभेदप्रत्यक्षाचश््यंभावेन जीवेपु दुःखवत्सु 'अहं दुःखी'इत्यनु-

अपने अंशोका अभेद प्रत्यक्ष है, इसलिए अभेददर्शीको दुःख आदिका अनुसन्धान होता है और जीवान्तरके साथ अभेद होनेपर मी उसका प्रत्यक्ष नहीं है, अतः उसे अन्यका दुःख अनुभूत नहीं होता है, पूर्वकी जातिका स्मरण करनेवाले वामदेव प्रभृतिको भ्राग्भवीय आत्माके साथ अभेदका प्रत्यक्ष है, इसलिए उनको पूर्ववृत्तान्तका अनुसन्धान होता है, दूसरोंको उसका प्रत्यक्ष न होनेसे अनुसन्धान नहीं होता है, इत्यादि सभी व्यवस्थाकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह मी युक्त नहीं है, क्योंकि इस अवस्थामें एकात्मवादमें भी सर्वात्मताके आवारक अज्ञानका आवरण होनेसे चैत्रको मैत्रात्माके साथ अभेदका प्रत्यक्ष नहीं है, इसलिए उसीसे * सब व्यवस्थाकी यदि उपपत्ति हो सकती है, तो श्रुतिविरुद्ध आत्माके भेदकी कल्पना व्यर्थ ही है। और + इस प्रकारकी कल्पनासे अर्थात् अभेदप्रत्यक्ष अनुसन्धानमें प्रयो- जक है, इस कल्पनासे भी प्रपश्चको तातत्विक माननेवाले तुम्हारे मतमें व्यवस्था- का निर्वाह नहीं हो सकता है, क्योंकि सर्वज्ञ ईश्वरको वस्तुसत् अन्य जीवोंके अभेदका प्रत्यक्ष अवश्य होनेसे जीवोंके दुःखसे 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार

• अर्थात् चंत्र, मैत्र आदि सभोको परस्परमें अभेदप्रत्यक्ष नहीं होनेसे ही व्यवस्थितिरूपसे मुख आदिके अनुसन्धानकी उपपतति हो सकती है, इसीसे, यह अर्थ है। * अभेदप्रत्यक्षको अनुसन्धानका प्रयोजक मानकर अन्य मतमें आत्मभेदकल्पनामें गौरव और श्रुतिका विरोध कहा गया, अब इस ग्रन्थसे-आत्माके अभेदप्रत्यक्षको अनुसन्धान- प्रयोजक मान भी नहीं सकते हैं, यह कहते हैं। *: यदि ईश्वर अन्य जीवसे अन्य जीवका पारमार्थिक अभेदको जानता नहीं है, यह मान लिया जाय, तो ईश्वर सर्वज नहीं हो सकेगा, यह भाव है।

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सिद्धान्तलैशसंग्रह i द्वितीय परिच्छेद

भवापत्तेः। अस्मन्मते त्वीश्वरः स्वाभिन्ने जीवे संसारं प्रतिबिम्वमुखे मालिन्यमिव पश््यन्नपि मिथ्यात्वनिश्चयान्न शोचतीति नैप प्रसङ्ग: । स्यादेतत्-मा भूदंशभेद: करशिरश्चरणादीनां कायव्यूहस्य चाडविष्ठा- नम्, आत्मदीपस्याऽनपायिनी ज्ञानप्रभाऽस्ति व्यापिनीति सैव सर्वाधिष्ठानं ईश्वरको भी दुःखित्वका अनुभव प्रसक्त होगा। हम वेदान्तियोंके मतमें तो ब्रह्माभिन्न जीवमें-प्रतिविम्बभूत मुखमें दर्पणकी मलिनता देखनेपर भी उसे जैसे मिथ्या मानते हैं, वैसे ही-संसारको देखता हुआ भी ईश्वर उसे मिथ्या मानता है, अतः उसके विषयमें कुछ नहीं सोचता है, अतः उक्त दोप नहीं * है। अब इस प्रकार जीवाणुवादियोंकी शङ्का है कि जीवके अंशविशेप-हाथ, सिर, पैर आदिका और कायव्यूहका-अधिष्ठान (प्रेरक) भले ही न हो, परन्तु आत्मारूप दीपककी अविनाशिनी ज्ञानात्मक व्यापक प्रभा है, *

  • कुछ लोगोंने कहा है कि जीवोंके सांश होनेसे हाथ, सिर, पैर आदिमें जीवांशोंके अनुगत होनेपर सुख, दुःख आदिका यौगपद्य हो सकता है, और कायव्यूहमें योगीके जीवावयवोंके- जानेपर योगियोंको भी युगपत् सुख, दुःख आदिके भोगका वेचित्र्य हो सकता है, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, जीवके प्रति उसके अंशोंमें मुख्य अंशत्व नहीं है, इसका निराकरण हो चुका है, और जीवाणुवादमें जीवसदश होकर जोवसे न्यूनपरिमाणत्वरूप औपचारिक अंशत्वका भी बाध है, क्योंकि जीवका अणुपरिमाण होनेसे उससे न्यूनपरिमाण ही नहीं हो सकता है, और सदशत्व होकर न्यूनपरिणामत्वरूप जो औपचारिक अशत्व है, वह तो चन्द्रविम्ब और गुरुविम्बके समान जीवांशोंके अत्यन्त भेदका प्रयोजक है, अतः जीवको अपने अंशगत दुःखादिके प्रति अनुसन्धातृत्व भी नहीं हो सकता है, वैसे ही योगोके जीवांश फायव्यूहके अधिष्ठाता हैं, तथापि उनसे अत्यन्त भिन्न योगीका जीव कायव्यूहका अधिष्ठाता नहीं हो सकता है, इसी प्रकार शरीराधिष्ठाता जीव और अवयवोक अधिष्ठाता अंश अत्यन्त भिन्न-भिन्न हैं। अतः एक ही शरीरमें अनेक भोकाओंकी प्रसक्ति होगी, औरं जीवको सांश माननेमें कोई प्रमाण भी नहीं है, 'द्रोणं वृहस्पतेर्भागम्' इत्यादि वाक्य-उक्त प्रकारसे अंशपरक न होनेसे वृहस्पति आदि अपने योग प्रभावसे पृथ्वीका भार हरण करना आदि देवताओंके कार्यके लिए अन्य शरीरका परिग्रहण करते हैं-यही बोध कराता है। इससे यह भी खण्डित हुआ समझना चाहिए कि राम, कृष्ण आदि विष्णुके अंश हैं। • जीव स्वयं अणु भले ही हो, परन्तु उसकी नित्य और व्यापक ज्ञानात्मक प्रभा है, इससे उसके एकदेशमें रहनेपर भी अपनेमें रहनेवाले ज्ञानके प्रभावसे हाथ आदि शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंमें और कायव्यूहमें वह अधिष्ठित होता है, अतः निरंश जीवके अधिष्ठातृत्व आदिकी अनुपपत्ति नहीं है, यह शङ्काका तात्पर्य है।

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जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ] भापानुवादसहित ४०७

भविष्यतीति चेद्, न; ज्ञानवद् आत्मधर्मस्य सुखदुःखभोगस्य ज्ञान- माश्रित्य उत्पत्यसम्भवेन करचरणाद्यवयव भेदेनाऽवयविनः, कायव्यूहृवतः कायभेदेन च भोगवैचित्र्याभावप्रसङ्गात् । 'सुखदुःखभोगादि ज्ञानधर्म एव, नात्मधर्मः इत्यभ्युपगमे तद्वैचित्र्येण आत्मगुणस्य ज्ञानस्य भेद- सिद्धावप्यात्मनो भेदासिद्धया भोगवैचित्र्यादिनाऽडत्माभेदप्रतिक्षेपायोगात्। 'मोगाद्याश्रयस्याऽऽत्मनोऽणुत्वेन प्रतिशरीरं विच्छिन्नतया तव्यापित्ववाद इव

अतः वही प्रभा हाथ आदिकी प्रेरक होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि+ ज्ञानके समान आत्माम रहनेवाले सुख-दुःखात्मक भोगकी ज्ञानको आश्रय करके-ज्ञानमं-उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः हाथ, पैर आदि अवयवोंके मेदसे अवयवी जीवको और अनेक शरीरवाले योगीको, शरीरोंके मेदसे, विचित्र भोग नहीं हो सकते हैं। सुख-दुःखात्मक भोग आदि ज्ञानके ही धर्म हैं, आत्माके धर्म नहीं हैं, ऐसा यदि मानो, तो उक्त भोगके वैचिव्यसे आत्माके गुणभूत ज्ञानका भेद सिद्ध होनेपर मी आत्माका मेद सिद्ध नहीं हो 14 सकता है, इससे भोगके वैचित्यसे आत्माके अभेदका अपाकरण नहीं कर सकते हैं। और 'भोग आदिका आश्रय आत्मा अणु होनेसे प्रत्येक शरीरमें विच्छिन-भिन्न है, अतः जीवके व्यापकवादके समान और जीव और ईशके

1 समाधानकताका भाव यह है-पूर्वपक्षीके मतसे ज्ञान ही व्यापक ठहरा, यदि व्यापक ज्ञानमें सुखादिकी उत्पत्ति मानी जाय, तो शरीरके प्रत्येक अवयवमें और कायव्यूहमें युगपत् मुसादिका अनुभव हो सकता है, परन्तु पूर्वपक्षी सुखादिको ज्ञानधर्म नहीं मानता, किन्तु अणु आत्माका दी धर्म मानता है, इसलिए ज्ञानके व्यापक होनेपर भी हाथ आदि अवयवोमें और कायव्यूद्दमें युगपत् भोगके वेचिन्सकी उपपत्ति नहीं हो सकती है। और योगियोंके भोगका वैचिव्य है इसमें स्मृति प्रमाण भी है- आत्मरना च सहस्राणि वहनि भरतपर्भ। योगी कुर्यात् वलं प्राप्य तैश्च सर्वा महीं चरेत्।।. प्राप्नुयात् विपयान कश्चित कश्चिदुप्रं तपश्चरेतू। सद्क्षिपेथ्र पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव॥ अर्थात् योगी योगके प्रभावसे अनेक शरीरोंको धारणकर सम्पूर्ण पृथ्वीमें जा सकता है, कुछ शरीरोंसे वह अनेक भोग करता है और कई एक शरीरोंसे उम्र तप भी करता है, और उन शरीरोंको पुनः अपनेमे लीन भी कर लेता है जैसे सूर्य अपनी किरणोंको समेद लेता है, यह उपर्युकत शलोकोंका भाव है।

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४०८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

तदमेदवाद इव च न सर्वधर्मसङ्करापत्िः' इति मतहानेश्र। तस्माज्जीवस्याऽ- णुत्वोपगमेन व्यवस्थोपपादनं न युक्तमिति। नाडपि तेन तस्येश्वराद् भेदसाधनं युक्तम्, उत्क्रान्त्यादिश्रवणाद्, साक्षादणुत्वश्रवणाच 'अणुर्जीवः' इति वदतः तव मते 'तद् सृप्टा तदे- वानुप्राविशत्' 'अन्तः ग्रविष्टशशास्ता जनानाम्' 'गुहां प्रतिष्टों परमे पराध्ये' इत्यादिश्रुतिपु प्रवेशादिश्रवणात्, 'स एपोऽणिमा एप म आत्माऽन्तहृदयेऽणीयान् त्रीहेर्वा यवाद्ा' इति श्रुतौ साक्षादणुत्वश्रवणाच्च परोऽप्यणुरेव सिध्येदिति कुतः परजीवयोविभुत्वाणुत्वाभ्यां मेदसिद्धिः ।

अमेदवादके समान सत धर्मोंका साङ्कर्य प्रसक्त नहीं है' इस प्रकारके अपने मतकी हानि भी प्रसक्त होगी, इससे जीवको अणु माननेपर भी व्यवस्थाका उपपादन नहीं हो सकता है। और जीवको अणु मानकर उसका ईश्वरसे भेद भी पूर्वपक्षी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उत्क्रान्ति आदिके और साक्षात् अणुत्के श्रवणसे 'जीवको अणु माननेवाले पूर्वपक्षीके मतमें 'तत्सष्टा०' (जगत्को बना करके परमात्मा- ने जगत्में ही प्रवेश किया) 'अन्तः०' (शरीरके भीतर प्रविष्ट हुआ, परमात्मा जनोंका नियन्ता है) 'गुहां०' (पराध्य हृदयाकाशमं जो वुद्धिरूप गुहा है, उसमें जीव और ईश्वर प्रविष्ट हैं) इत्यादि श्रुतियोंसे जगत् आदिमें ईश्वर- के प्रवेश प्रभृति सुने जाते हैं और 'स एपोऽणिमा०' (यह परमात्मा अणु है, मेरे हृदयमें यही मात्मा है, जो त्रीहि और यवसे छोटा है, इस श्रुतिमें साक्षात् अणुत्वका कथन है, इससे ईश्वर भी अणु ही सिद्ध होगा, इसलिए पूर्वपक्षीके मतमें भी अणुत्व और विभुत्वसे जीव और ईश्वरका मेद कैसे सिद्ध होगा? ।

  • परार्ध्य शब्दका अर्थ है-परस्य अर्वम्-स्थानम् अर्दतीति परार्ध्यम् अर्थात् ईश्वरके स्थानके लिए जो योग्य है, ऐसा हृदयाकाश। * पूर्वपक्षी श्रुतियोंके आधारपर जीवमें अणुत्वकी और ईश्वरमें व्यापकत्वकी सिद्धि करता है, और इन्हीं अणुत्व और विभुत्वरूप विरुद्ध धर्मोसे जीव और ईशवरके भेदका भी साधन करता है, परन्तु ईश्वरमें उक्त श्रुतियोंसे अणुत्वकी सिद्धि ही हुई, इसलिए पूर्वपक्षीके मतसे दोनोंमें रहनेवाले एक अणुत्वमे उन दोनोंका भेद कैसे सिद्ध हो सकता है?, अर्थात् कभी नहीं होगा। अंतः पूर्वपक्षी अपने अभीष्ट जीवेशवरके भेदकी भी सिद्धि जीवको अण मानकर नहीं कर सकता है, यह भाव है।

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जीवके मणुत्वका निराकरण-विचार ] भापानुवादसहित ४०९

ननु 'आकाशवत् सर्वगतश्व नित्यः' 'उ्यायान् दिवो ज्यायानन्त- रिक्षाद' इत्यादिश्रवणाद, सर्वप्रपश्चोपादानत्वाच्च परस सर्वगतत्वसिद्धे: तदणुत्वश्रुतयः उपासनार्थाः, दुर्ग्रहत्वाभिप्राया वा उन्नेयाः। प्रवेशकुतयश्च शरीराद्युपाधिना निर्वाहयाः। न च जीवोत्क्रान्त्यादिश्वुतयोऽपि बुद्धया उपाधिना निर्वोदं शक्या इति शाङ्गयम्, 'तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति'

यदि शक् हो कि 'आकाशवत्०' (ईश्वर आकाशके समान सर्वगत और नित्य है) 'ज्यायान् दिवो०' (ईश्वर घुलोक और अन्तरिक्षसे बड़ा है) इत्यादि श्रुतिसे और सब प्रपञ्चके प्रति ईश्वरकी उपादानता श्रुत होनेसे परमात्मा व्यापक ही सिद्ध होता है। इससे ईश्वरमें अणुत्वकी प्रतिपादक श्रुतियाँ उपासनाके लिए अथवा ईश्वरमें दुर्ग्रहत्वके प्रतिपादनके लिए हैं। एवं प्रवेशश्रुतियोंका शरीर आदि उपाधिसे निर्वाह करना चाहिए। यदि शक्का हो कि जीवमें उत्क्रमण आदिकी प्रतिपादक श्रुतियोंका भी बुद्धिरूप उपाधिसे निर्वाह कर सकते हैं, तो फिर उक्त युक्तिसे जीवका अणुन् सिद्धू नहीं होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'तमुल्कामन्तम्०' (जीवके उत्क्रान्त ह्ोनेपर प्राण उत्क्रमण करता है) इत्यादि श्रुतिसे प्राणात्मक

1 पूर्पक्षी अपने मतकी स्थिरताके लिए कहता है कि अनेक श्रुतियां ईश्वरमें विभुत्वका प्रतिपादन करती है, अतः विशुत्व-प्रतिपादक ्रुतियों के आधारपर अणुत्वबोधक क्रुतियाँ उपासनार्थ है अथना ईसवर वाधारण प्रयमये शात नहीं हो सकता है, अपि तु उसको जाननेके लिए अत्यन्त छठिन प्रगत्न करना गादिए वद सूचन करती हैं। और जीवको अणु माननेमें अनेक प्रत्यक्ष भुतियाँ हे, अतः जीव अणु और ईश्वर व्यापक दी सिद्ध होता है। * सिदान्तीकी घीचमें यह शद्ा है-जैसे ईश्वरमें विभुत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्ुतियाँ थोपचारिक नहीं हैं, और अणुत्वप्रतिपादक ध्ुतियाँ मुर्य है, ऐसा तुल्ययुत्तया क्यों न माना जाग ? इसपर 'तमुन्फामन्तम्' इत्यादिये पूर्यपक्षी उत्तर देता है। इसमें फिर शख्ाकी जाय कि यद्यपि श्ुतिमें प्राणके उत्कमणके पू्वमें जीवकी उत्कान्ति सुनी जाती है, तथापि केवल जीवकी उत्कान्ति नहीं होती है, परन्तु बुद्धिविशिष्ट जीवकी उत्कान्ति सुनीजाती है? तो यह भी युक्त नहीं हे, कर्योंकि बुद्धि और प्राण अभिग-एक-ही है, शुतिने कहा भी है-'यो वे प्राणः सा प्रज्ञा' (जो प्राण है, परी युदि है)। अतः अनेक क्षुतियोंषे साक्षात् जीवकी उत्कान्ति, आदिका ज्ञान होता है, इससे जीवको अशु : मानना ही युक्त है, विशु मानना युक नहीं है। इससे जीव और ईशका भेद सिन्द दो सफता है, यद पूर्वपक्षीका भाव है। ५३

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४१० सिद्धान्त लेशसंग्रह [द्वितीय परिच्छेद

इति प्राणाख्यवुद्ध्युत्क्रान्तेः प्रागेव जीवोत्क्रान्तिवचनात्। तथा 'विद्वा न्रामरूपाद्वियुक्त: परात्परं पुरुपसुपैति दिव्यम्' इति नामरूपविमोक्षानन्तर-/- भपि गतिश्रवणाच्च। 'तद्यथाऽनस्सुसमाहितमुत्सर्जन् यायादेवमेवायं शारीर आत्मा प्रज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन् याति' इति स्वाभाविक- गत्याश्रयशकटद्प्टान्तोक्तेश्रेति चेद्, नैतत्सारम्; 'स. वा एप महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः।' घटसंवृतमाकाशं नीयमाने घटे यथा। घटो वीयेत नाकाशं तद्वज्ीचो नभोपमः॥' इत्यादिश्वितिपु जीवस्यापि विभ्ुत्वश्रवणात्। त्वन्मते प्रकृतेरेव जगदु- पादानत्वेन त्रह्मणो जगदुपादानत्वाभावाज्जीवस्य कायव्यूहगतविचित्रसुख- बुद्धिकी उत्क्रान्तिसे पूर्व ही जीवकी उत्क्रान्ति ज्ञात होती है, इसी प्रकार 'विद्वान्नाम' (आत्मतत्वज्ञानी नाम और रूपसे विमुक्त होकर दिव्य पर पुरुषके प्रति जाता है) इत्यादि श्रुतिसे नामे और रुपसे मोक्ष होनेके वाद भी जीवकी गति सुनी जाती है। और 'तद्यथा०' (जैसे अनेक सामानोंसे भरपूर बैलगाड़ी शब्द करती हुई जाती है, वैसे ही शरीरमें रहनेवाला यहं जीव ईश्वरकी प्रेरणासे प्रेरित होकरं जाता है) इस प्रकारकी ्रुतिसे जीवमें गाड़ीके द्ष्टान्तसे स्वाभाविक गति कही भी गई है? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि 'स वा एष०' (वह विज्ञानमय जीवं बड़ा व्यापक है) 'घटसंवृत्माकांशं' (घटसे सम्बद्ध आंकाश जैसे घटके ले जानेपर जाता है, परन्तु स्वतः नहीं जाता है, वैसे ही जीव भी उपाधिके गमनसे जाता है, स्वतः नहीं जाता है, अर्थात् आकाशके समान है) इत्यादि श्रुतियोंसे- जीवमें भी विभुत्वका श्रवण है। तुम्हारे मतमें + माया ही जगत्की उपादान होनेसे ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं है और जीवको अणु माननेपर भी जसे शरीर- * नाम और रूपसे अर्थात् अज्ञानसे होनेवाले सम्पूर्ण संसारसे मुकत होकर परमात्माके प्रति जाता है, यह भाव है। + सिद्धान्ती उक्त पूर्वपक्षीके मतका खण्डन करता है, भाव यह है कि जैसे परमात्माके प्रकरणमें प्रतिपादित परमेश्वरका विभुत्व औपचारिक नहीं हो सकता है, वैसे ही जीवप्रकरणमें सुना गया जीवका विभुत्व भी औपचारिक नहीं हो सकता है, अतः जीवप्रकरणमें पदित अनेक वाक्य 'स वा' इत्यादिसे चतलाये हैं।

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जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ४११

दुःखोपादानत्ववदणुत्वेऽपि जगदुपादानत्वसम्भवाच्च, ततस्तस्य सर्वगत- त्वासिद्धेः। तत्प्रवेशश्रुतीनां शरीरोपाधिकत्वकल्पने जीवोत्क्रान्त्यादि-

(उ० मी० अ० २ पा० ४ सू० १२) इति सूत्रभाष्ये बुद्धिप्राणयोः कार्यभेदान्ज्ेदस्य प्रतिपादितत्वेन बुद्ध्युपाधिके जीवे अ्रथममुत्क्रामति प्राणस्यानूत्क्रमणोपपत्तेः। नामरूपविमोक्षानन्तरं ब्रह्मप्राप्तश्रवणस्य प्राप्तरि

समुदायम विचित्र सुख, दुःख आदिके प्रति उसे उपादान मानते हो, वैसे ही वह जगत्का उपादान भी हो सकता है, अतः ईश्वरमें व्यापकत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती है*। ब्रह्मकी प्रवेशवोधक श्रुंतियोंकी शरीररूप उपाधिसे जैसे उपपत्ति करते ह, वैसे ही जीवकी उत्क्रान्ति आदि बोधक श्रुतियोंकी भी बुद्धि आदि उपाधियोंसे उपपत्ति कर सकते हैं। + 'पन्नवृत्तिर्मनोवद्यपदिश्यते' इस सूत्रके माप्यमें कार्यके पार्थक्यसे प्राण और वुद्धिमें पंरस्पर मेदका प्रतिपादन किया गया है, अतः बुद्धिरूप उपाधिसे उपहित जीव प्रंथम उत्क्रमण करता है, फिर प्राणका उत्क्रमण उपपन्न हो सकता है। नाम और रूपसे विमुक्त होनेके वाद न्पकी प्राप्तिकी जो श्रुति है, यह प्राप्त करनेवालै जीवमें

  • दस पन्यसे सिद्धान्तीने कहा कि पूर्वपक्षी ईश्वरमें विभुत्वका भी साधन नहीं कर सकता है, इससे सुत्र उसके मतमें जीव और दशरभेद भी असिद्ध ही है, क्योंकि ईश्वरमें व्यापकत्व तभी हो सकता है, जब कि ईश्वर जगत् का उपादान हो परन्तु पूर्वपक्षीने ईशरको जगत्का उपादान महीं माना है, किन्तु प्रकृतिको माना है, अतः ईशवरमें व्यापकत्व सिद्ध नहीं हो सकता है, और जीवमें अणुत्वकी भी विद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि सुखदुःखके प्रति जसे जीवको उपादान तुमने माना है, चेसे ही युकिसे यह संसारका भी उपादान हो सकता है, इससे उपादान होनेके कारण जोवमें भी व्यापकत्वकी सिद्धि हो सकती है। + पशपृत्तिर्मनोवद व्यपदिश्यते इसका यह अर्थ है-मनके समान अर्थात जसे मनकी श्रोत्र, चक्षु मादिके भेदसे शब्द आदि विपयक पांच प्रकारकी यृत्तियाँ होती हैं, वैसे ही प्राणकी प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान रूपसे पाँच प्रकारकी वृत्तियाँ होती हैं, अतः प्राण मनके समान भुतिमें कहा गया है। इसमें दष्टान्त और दार्शन्तिककी उपपत्तिके लिए अवश्य प्राण और मनका भेद मानना चाहिए, 'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा' इत्यादिसे प्राण और प्रज्ञाका जो अभेद कदा गया है, यह प्रशा और प्राणरूप उपाधिसे उपहित प्रत्यगात्माके एक होनेसे उपहित आत्माकी सुख्यतासे कहा गया है, यह समझना चाहिए।

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४१२ सिद्धान्तलैशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

जीव इव प्राप्तव्ये ब्रह्मण्यपि विभ्ुत्वविरोधित्वात् । प्राकृतनामरूपविमोक्षा- नन्तरमपि अप्राकृतलोकविग्रहाद्युपधानेन

विरोधात् स्वाभाविकगत्याश्रयशकटदृष्टान्तश्रवणमात्राद् जीवस्य स्वाभा- विकप्रवेशाश्रयजीवसमभिव्याहारेण ब्रह्मणोऽपि स्व्राभाविकम्रवेशसिद्धिसम्भ- वाद्। ब्रह्मजीवोभयान्वयिन एकस्य प्रविष्टपदस्य एकरूपप्रवेशपरत्वस्य जैसे विभुत्वकी विरोधी है, वैसे ही प्राप्तव्य ब्रह्ममें मी विभुत्वकी विरोधी हो सकती है। और दूसरी बात यह भी है कि प्राकृत नाम और रूपसे विमोक्ष होनेके अनन्तर भी अप्राकृत लोक-विग्रह आदि उपाधिसे ब्रह्ममें प्राप्तव्यता है, इस प्रकार कहनेवाले तुम्हारे मतमें ब्रह्मपराप्ति करनेवाले जीवको भी अप्राकृत शरीर, इन्द्रिय आदि हैं, अतः उन उपाधियोंके आधारपर ब्रद्म- प्राप्तिका विरोध भी नहीं है, इससे स्वाभाविक गमनक्रियाके आश्रय शकटके दृष्टान्तमात्रसे जीवमें स्वाभाविक गति आदिकी सिद्धि होनेपर 'गुहां प्रविष्टौ' इससे स्वाभाविक प्रवेश करनेवाले जीवके सान्निध्यसे ब्रह्ममें भी स्वाभाविक प्रवेशकी भी सिद्धि हो सकती है।। क्योंकि ब्रह्म और जीव दोनोंमें सम्बन्ध रखनेवाले एक प्रविष्टपदकी एकरूपप्रवेशवोधकता ही कहनी चाहिए *।

  • अर्वाचीनोंके मतमें व्यापकत्वरूपसे ब्रह्म मुकतोंका प्राप्य नहीं है, किन्तु लोकविशेष आदि उपहितत्वरूपसे ब्रह्म मुक्तोंका प्राध्य है, अतः उपहितत्वरूपसे व्रह्ममें रहनेवाली प्राप्तव्यता ब्रह्मकी स्वरूपतः व्यापकत्वविरोधी नहीं है, ऐसी आशक्का करके जीवमें भी तुल्ययुत्तया यह प्रकार हो सकता है, ऐसा 'प्राकृत' इत्यादि ग्रन्थसे कहते हैं। तात्पर्य यह है कि 'विद्वान् नाम रूपाद्विसुक्तः' इस श्रुतिमें 'प्राकृतनामरूपसे विमुक्त' इस अर्थकी कल्पना करके अवाचीन ज्ञानी जीवके अप्राकृत नाम-रूपका स्वीकार करते हैं, इसलिए स्व्रतः दिभु जीव, जो कि अप्राकृत नाम-रूप उपाधिसे परिच्छिनन है, ब्रह्मके प्रति गन्ता (गमनकर्ता) हो सकता है, अतः जीवविषयक विभुत्व- श्रुतियोंका वाध न करना उचित नहीं है, यह भाव है। 1. तात्पर्य यह है-एक वार कहा गया पद अनेकार्थक नहीं होता है, यह नियम है, इससे 'गुहां प्रविष्टौ' इसमें एक प्रविष्टशब्दकी जीवमें स्वाभाविकार्यकता और ब्रह्ममें औपाधि- कार्थकता माननी अयुक्त है, अतः ब्रह्ममें पूर्वपक्षीको स्वाभाविक गति प्राप्त होगी, यदि ईश्वरमें विभुत्वप्रतिपादक क्रुतिके अनुरोघसे प्रविष्टश्रुतिका सामान्यप्रवेश अर्थ मानते हो, तो जीवमें भी विभुत्वप्रतिपादक श्रुतिके आधारपर शकटदष्टान्तमें गमनादिका साम्यमात्र पदर्शित है, स्व्ाभाविकगत्याश्रयत्व प्रतिपादित नहीं है, ऐसा मान सकते हैं; यह भाव है।

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जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार] भापानुवादसहित ४१३

वक्तव्यत्वात। तस्मात् परमते घ्रह्मजीवयोर्विभुत्वाणुत्वव्यवस्थित्यसिद्धेर्न ततो भेदसिद्धिं प्रत्याशा। अस्मन्मते त्रह्मात्मैक्यपरमहावाक्यानुरोधेनाऽ्वा- न्वरवाक्यानां नेयत्वात् स्वरूपेण जीवस्य विश्ुत्वम्, औपाधिकरूपेण परिच्छेद इत्यादिग्नकारेण जीवन्रह्मभेदग्रापकश्चुतीनामुपपादनं भाष्यादिपु व्यक्तम्।

इससे पर-जीवाणुवादीके मतमें जीव और वरक्ममें अणुत्व और विभुत्वकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, अतः उससे मेदसिद्धिकी आशा नहीं करनी चाहिए। हमारे मतमें ब्रद्म और जीवके ऐक्यबोधक 'तत्त्वमसि' आदि महा- वाक्यके अनुरोधसे भवान्तर वाक्योंका अर्थ करना चाहिए, अतः जीव स्वरूपतः + व्यापक है और औपाधिकरूपसे परिच्छिन्न है, इत्यादिरूपसे जीव और नसके मेदका बोध करानेवाली श्रुतियोंकी उपपत्ति भाष्य आदिमें स्पष्ट है।

  • जये अर्वांचीनों के पक्षमें-जीव और दशवर दोनोंमें विभुत्व और अणुत्व प्रतिपादक श्तिनों के समान दोनेसे और उन दोनों श्षुतियोंकी अन्यथासिद्धिके समान होनके कारण उनमें अपुन्व और विभुल समान रूपसे दी सिद्व होंगे, एक अणु और दूसरा विभु, इस प्रकार व्यवस्था विद्र नदीं दोगी-यह दोप दिया गया है। वसे ही दोप सिद्धान्तमें भी आ सकते है,क्योंकि जीवके परिचिछ्न्नत्व और विशुतका प्रतिपादक क्ुतिलिद्ध समान ही है, अतः जीवमें विभुत्य स्वाभाधिक् हे और परिच्छिसत्य औपाधिक है, इस प्रकार व्यवस्था नहीं हो सकती है, इसपर विद्वान्ती 'अस्तन्मते' इत्यादिसे कह्ते हैं कि नहीं-हमारे मतमें अव्यवस्था नहीं हो सफती है, यर्योंकि मदावाक्यके अनुसार ही अवान्तर वाक्योंका अर्थ होता है, प्रकृतमें महा- पापय 'तत्वगदि' आदि वाक्य हैं, क्योंकि मुकिका साधनीभूत जो व्रक्मात्मैयज्ञान है, उसके प्रति तश्यमस्वादि पापय जनक है, और अवान्तर वाक्य 'स एपीडणिमा' इत्यादि हैं, क्योंकि य महावाफ्यागेज्ञानके कारणीभृत तत और त्वम्' पदार्थके ज्ञानके प्रति साधन हैं, और जितने पदार्थप्रतिपादकवाकय होते है, ये सबके सब मदावाक्यके अम् होते हैं, अतः सिद्धान्तमें अच्यवरधा नही है, गद मान दे। 1. यदि स्वरूपतः जीव व्यापक न लो, तो महावाक्यसे प्रतिपाद्य महके साथ भेद अनुपपज् होगा, अतः जीवको स्वरूपतः व्यापक ही मानना चाहिए।

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४१४ सिद्धान्तलेशसंग्रह -: [द्वितीय परिच्छेंद

तस्मात् प्रपञ्चमिथ्यात्ववात् पराभेदाच्च देहिनः । मानान्तराविरोधेन सिद्धोऽद्वैते समन्वयः ॥६८॥ इससे प्रपञ्चके मिथ्या होनेसे, परमात्माके साथ जीवका अभेद होनेसे और अन्य किसी प्रमाणके साथ विरोध न होनेसे अद्वैत ब्रहामें वेदान्तोंका समन्वय सिद्ध ही है॥६८॥ इति श्रीमद्गङ्गाधरसरस्वतीविरचितायां वेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जर्यां द्वितीय: परिच्छेद: समाप्तः ।

तस्मादचेतनस्य प्रपश्चस्य मिथ्यात्वात् चेतनप्रपश्चस्य ब्रह्माभेदाच्च न वेदान्तानामद्वितीये ब्रह्मणि विद्यैकप्राप्ये समन्वयस्य कश्चिद्विरोध इति॥ इति सिद्धान्तलेशसंग्रहे द्वितीयः परिच्छेद: समाप्तः ।

इससे अचेतन प्रपख्चके मिथ्या होनेसे और चेतनप्रपञ्चका ब्रह्मके साथ अमेद होनेसे केवल विद्यासे प्राप्य अद्वितीय ब्रह्ममें वेदान्तोंका तात्पर्य है, इसमें कोई विरोध नहीं है।

इति पं० मूलशङ्करव्यासविरचित सिद्धान्तलेशसंग्रहके भाषानुवादमें द्वितीय परिच्छेद समाप्त

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ज्ञानोत्पत्तिमें क्रमोंके उपयोगका विचार] भापानुवादसहित ४१५

नमः परमात्मने तृतीय: परिच्छेद:

ज्ञानेनेव कथं मुक्ति: कर्मभिश्चापि तत्स्मृतेः। नाविद्यकत्वांद् वन्घस्य नान्यं: पन्था इति श्रुतेः ॥१॥ यादि शक्का हो कि ज्ञान ही से मुक्ति कैसे होगी? क्योंकि कर्मसे भी मुक्ति होती है, ऐसी स्मृति है, तो यह युंक्त नहीं है, क्योंकि समग्रप्रप्ञ अविद्यासे होता है, और 'नान्यः पन्था' इत्यादि भ्ुति है॥ १ ॥

हेतुत्वं स्मर्यते- ननु क्थ विद्ययैव न्रह्मप्रापतिः। यावता कर्मणामपि तत्परापति

'तत्म्नाप्तिहेतुर्विज्ञानं कर्म चोक्तं महामुने!' इतिं। सत्यंम्, 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' इति श्रतेः, नित्यंसिद्ध-

छअब शक्का होती है कि विद्यासे ही बराकी प्राप्ति होती है, ऐसाकैसे कहते हो जब कि कर्म भी त्रह्मपापिके प्रति साधनरूपसे स्मृतिमें कहे गये हैं- 'तत्मापिहेतुर्विज्ञानम्ं०' (हे महामुने ! ब्रह्ममासिके प्रति साधन कर्म और विज्ञान दोनों हीt कहे गये हैं)। ठीक है, तथापि शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'नान्यः पन्था०' (मुक्तिके लिए ज्ञानको छोड़कर अन्य मार्ग ही नहीं है) ऐसी श्रुति हैt, और सर्वदा

पूर्व परिच्छेद के अन्तमें ब्रह्मपराप्तिरूप मोक्ष केवल विद्यासे होता है, ऐसा कहा गया है, इस विपयंमें समु्यवादी शक्ठा करता है कि केवल विद्यासे ही मुक्ति होती है, यह नहीं हो सकता, क्योंकि कर्म भी साधनरूपसे स्मृति आदिमें वतलाए गये हैं, यह भाव है। * अर्थात् 'तेनैति बह्मवित् पुण्यकृत्' (ब्रह्मज्ञान और पुण्य दोनोंके समुचचयमें ब्रह्मज्ञानी . बह्मको प्राप्त करता है) इस श्रुतिमें कहा गया है, यह भाव है। * अर्थात् पूर्वपक्षीका समुच्यवाद युक्त नहीं है, क्योंकि युक्तिसे उपवृंददित 'नान्यः पन्थाः' इत्यादि श्रुतिसे समुघ्यका बाध होता है, श्रुतिका अर्थ यह है, केवल ब्रह्मज्ञानसे अन्य-ज्ञानकर्म- समुप्यरूप अथवा केवल कर्मरूप मार्ग मोक्षके लिए है ही नहीं। और मोक्ष तो आत्माका सर्वदा है ही, परन्तु उसमें अप्राप्तमान्न भ्रम है, इस ध्रमकी निवृत्ति ही मोक्ष है, अतः अज्ञान निधृत्ति केवल शानसे ही हो सकती है, कर्मसे नहीं हो सकती, यह लोकमें दष्टचर है, जैसे कण्ठमें मालाके रहते हुए भी अ्रमसे वह अप्राप्तस्ी प्रतीत होती है, और अमके निधृत होनेपर मनुष्य उसे

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४१६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

साधनत्वासम्भवाच्च। ब्रह्मावाप्ती परम्परया कर्मापेक्षामात्रपरा तादृशी स्मृतिः, क तर्हिं कर्मणामुपयोगः ? कर्मणामुपयोगस्तु भामतीकृन्मते स्थितः । तमेतमिति वाक्येन सुख्ये विविदिपोन्रवे ॥ २ ॥ भामतीकारके मतमें कर्मोंका उपयोग 'तमेतम्' इत्यादि वाक्यसे मुख्य विवि- दिषामें है॥। २ ॥ अत्र भामतीमतानुवर्तिन आहु :- 'तमेतं वेदानुवचनेन व्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन' इति श्रतेर्विद्यासम्पादनद्वारा ब्रह्मावाप्त्युपायभृतायां विविदिपायासुपयोगः । ननु इष्यमाणविद्याया

सिद्ध (प्राप्त) ब्रह्मकी प्राप्तिमें, जे। कि गलेमें होते हुए भी विस्मृत सुवर्ण- मालाकी प्राप्तिके समान है, विद्यासे (ज्ञानसे) भिन्न कोई साधन हो ही नहीं सकता। अतः उक्त श्रुति ब्रह्मकी प्राप्तिमें केवल परम्परासे कर्मोंकी अपेक्षा ही। बतलाती है, तो कर्मोंका उपयोग कहाँ है? इस विषयमें भामतीकारके अनुयायी कहते हैं कि 'तमेतं वेदा०' (ब्रझ्माभिन्न जीवको स्वाध्याय, यज्ञ, दान और अनाशक * तपसे न्राह्मण लोग जाननेकी इच्छा करते हैं) इस श्रुतिसे विद्याकी प्राप्ति द्वारा न्रह्मपाप्तिकी हेतुभूत विविदिषामें + कर्मोंका उपयोग है। यदि शङ्का हो कि इष्यमाण विद्यामें ही कर्मोंका उप-

प्राप्त हुई समझता है, वैसे ही मोक्षके प्राप्त होनेपर भ्रमकी निवृत्तिसे अप्राप्त वस्तु प्राप्त हुई, ऐसा समझता है, अतः समुचयवाद असज्ञत ही है, यह भाव है। अर्थात ऐसा तप करना चाहिए जिससे कि शरीरका विनाश न हो, इसलिए हित, मित, तथा पवित्र अशन करके ही तप करना चाहिए, अनशन आदि शरीरनाशक तप नहीं करना चाहिए, यह भाव है। + ब्रह्मज्ञानकी इच्छा, जो कि रुचिरूप है उसमें, यह अर्थ है। * शङ्ाका वीज यह है कि विद्या ही साक्षात् मुक्तिके प्रति कारण है, इसलिए उसके प्रति ही यज्ञ आदिको कारण क्यों न माना जाय, जैसे अन्यन्न स्वर्गादिके प्रति, जो इष्यमाण-इच्छाके विषय हैं, यज्ञ आदिका विनियोग किया जाता है, प्रकृतमें इच्छाकी विषय विद्या है, इसलिए उस्ीमें यज्ञादिका अन्वय होना अभीष् है, यह भाव है।

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ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार ] भापानुवादसहित ४१७

मेवोपयोग: कि न स्यात् १ न स्याद् ; प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यात्। 'विद्या- संयोगात् प्रत्यासन्नानि विद्यासाधनानि शमदमादीनि, विविदिपासंयोगानु बाह्यतराणि यज्ञादीनि' इति सर्वापेक्षाधिकरणभाष्याच् (उ० मी० अ० ३ पा० ४ अधि० ६ सू० २७)। ननु विविदिपार्थं यज्ञाद्यनुष्ठातुर्वेदनगोचरे- च्छावच्वे विविदिपायाः सिद्धत्वेन तदभावे वेदनोपायविविदिपायां कामनाड- सम्भवेन च विविदिपार्थ यज्ञाद्यनुष्ठानायोगाद न यज्ञादीनां विविदिपायां योग क्यों नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकृत्यर्थ और प्रत्ययार्थ- में प्रत्ययार्थ ही X प्रधान होता है। और 'विद्याके साक्षात् साधन होनेसे शम, दम आदि विद्याके अन्तरङ कारण विद्याकी उत्पत्ति तक अनुष्ठेय हैं। तथा ब्रह्मज्ञानेच्छाके साधन होनेके कारण वहिरङ्ग यज्ञ आदि साधन विविदिपाकी उत्पत्ति तक ही अनुष्ठेय हैं, इस प्रकारका सर्वापेक्षाधिकरण-भाष्य + भी है। यदि शक्का हो कि विविदिपाके लिए यज्ञ आदिका अनुष्ठान करनेवाले पुरुपको ज्ञानविपयक यदि पूर्वसे इच्छा विद्यमान है, तो विविदिपा सिद्ध ही है, यदि ज्ञानविपयिणी इच्छा उसे नहीं है, तो ज्ञानकी कारण विविदिपामें भी इच्छा नहीं हो सकती, अतः उभय था विविदिपाके लिए यज्ञादिका अनुष्ठान हो ही नहीं सकता है*, इसलिए विविदिपामें यज्ञ आदिका विनियोग युक्ति-युक्त नहीं है, तो

x तात्पर्य यह है कि 'स्वर्गकामो ज्योतिष्टोमेन यजेत' इत्यादि स्थलमें याग आदिमें विधिप्रत्ययसे इष-साधनता वोधित होती है, वह इष क्या है? इस प्रकारकी विशेष जिज्ञासा होनेपर पुरुपके विशेषणरूपसे भ्ुत कामना और स्वर्ग दोनोंमें से किसी एककी भी शब्दतः प्रधानता प्रतीत न होनेसे आर्थिक प्रधानताका आश्रयण किया जाता है, और अर्थतः प्रधान है-स्वर्ग, इसलिए फलरूपसे उसीका अन्वय किया गया है-याग स्वर्गका साधन है। प्रकृतमें शानेच्छाका ही फलरूपसे अन्वय होता है, क्योंकि शब्दसे वही प्रधान प्रतीत होती है, इसलिए फलप्रत्यासत्ि आदि अकिश्वित्कर हैं। प्रकृतमें भगवान् भाष्यकारकी भी सम्मति है। * विदिदिपामें ही कर्मोंका विनियोग है, इसमें भाष्य भी प्रमाण है, 'सर्वापेक्षा च यज्ञादि- "अतेरश््रयत्', इस सूनरसे यह सर्वापेक्षाधिकरण आरब्ध है, देखिए-प्ृ० २२२२ अच्युतग्रन्थ- मालामुद्रित शाद्रभाष्य। प्रकारान्तरसे विविदिषाविनियोगका आक्षप करते हैं, भाव यह है कि यदि ज्ञानेच्छा यज्ञ आदिका फल है, तो ज्ञानेच्छाविपयक ज्ञानसे यज आदिका अनुष्ठान करना चाहिए और ज्ञानेच्छाके स्व्रतः फलत्व न होनेसे ज्ञान द्वासा ही उसमें मुक्तिफलकत्व होगा, इससे यह क्रम प्राप्त होगा कि पहले मुकिमें स्वतः पुरुपार्थत्वके ज्ञानसे इच्छा होगी, उसके वाद ब्रह्मज्ञानमें मुकि ५३

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४१८ सिद्धान्तलेश संग्रह [तृतीयपरिच्छेद

विनियोगो युक्त इति चेद्, न; अन्नद्वेपेण काश्य प्राप्तस्य तत्परिहारायाऽन्न- विषयौत्कण्ठ्यलक्षणायामिच्छायां सत्यामप्युत्कटाजीर्णादिप्रयुक्तधातुवैपम्य- दोषात् तत्र प्रवृत्तिपर्यन्ता रुचिर्न जायते इति तद्रोचकौपधविधिवद् निरतिशयानन्दरूपं ब्रह्म तत्प्राप्तौ विद्यासाधनमित्यर्थे प्राचीनवहुजन्मानु-

विश्वासस्य पुरुपस्य ब्रह्मावाप्ती विद्यायां च तदोन्मुख्यलक्षणायामिच्छायां

यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अन्नमें द्वेपसे अर्थात् किसी दोषवशसे अन्न न खानेसे जिसको शरीरमें कृशता प्राप्त है, उसे अपने शरीरके दौर्बल्यका परिहार करनेके लिए अन्नमें उत्कण्ठारूप इच्छा, तो अवश्य होती है, परन्तु बड़े उत्कट अजीर्णरूप दोषसे उत्पन्न धातुवैपम्यसे अन्न- खानेमें प्रवृत्ति करानेवाली रुचि नहीं होती है, इसलिए अन्नमें रुचिके सम्पादक औषधका उपचार किया जाना आवश्यक होता है, वैसे ही 'ब्रह्म निरतिशय : आनन्दरूप है और उसकी प्राप्तिका साधन विद्या है' इस विषयमें पहलेके अनेक जन्मोंमें फलकी इच्छाके विना अनुष्ठित अनेक नित्य, नैमित्तिक क्मोंसे उत्पन्न हुई चित्तकी प्रसन्नतासे जिस पुरुषको-विश्वास हुआ है, उस पुरुषको ब्रह्मकी प्राप्तिमें और विद्यामें उत्सुकतारूप इच्छा तो अवश्य होती है,परन्तु जैसे आस्तिक + कामी पुरुषकी निन्दित कर्ममें प्रवृत्ति होती है, वैसे ही विषय-

साधनत्वके ज्ञानसे इच्छा होगी, उसके वाद वेदनेच्छामें वेदनसाधनत्वज्ञानसे इच्छा होगी, इस इच्छाके अनन्तर यज्ञ आदिका अनुष्ठान होगा, इस परिस्थितिमें वेदनेच्छारूप विविदिषाके उद्देश्यसे यज्ञादिमें प्रवृत्त पुरुषको विविदिषाके फलभूत ब्रह्मज्ञानमें इच्छा है, या नहीं है? प्रथम पक्षमें यज्ञ आदिका अनुष्ठान व्यर्थ होगा, द्वितीय पक्षमे यज्ञ आदिका अनुष्ठान ही नहीं प्रसक होगा, क्योंकि विचिदिषाके फलमें (वेदनमें) कामनाके. न रहनेसे विविदिपामें भी इच्छा नहीं है, अतः विविदिषामें यज्ञादिका विनियोग नहीं हो सकता है, यह पूर्वपक्षका भाव है। +जिस पुरुषने पूर्वके अनेक जन्मोंमें अनेक कर्मोंका अनुष्ठान किया है, उन्हीं क्रमोंसे जव उसकी चित्तशुद्धि हुई है, और ब्रह्मविद्यामें जिसका विश्वास भी हुआ है, तो कैसे वह विषयभोगमें प्रवृत्त होगा? इस शङ्गाके परिहारमें यह 'आस्तिककामुकस्य' दष्टान्त है, सारांश यह है कि जिसको कि वदविहित कर्मोंके, करनेसे अवश्य वल्याण होता है,

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ज्ञांनकी उत्पत्तिमें कमोंके उपयोगका विचार ] भापानुवांदसहित ४१९

विपयभोगे ग्रावण्यं सम्पादयता प्रतिबन्धाद्विद्यासाधने श्रवणादौ प्रवृत्ति- पर्यन्ता रुचिर्न जायत इति प्रतिबन्धनिरासपूर्व तत्सम्पादकयज्ञादिविधा- नोपपत्तेरिति। स्वर्गवत्काम्यमाने तं ज्ञाने विवरणानुगाः। जिज्ञासितव्यं श्रुतिमिर्व्रह्ेत्यत्र श्रुतेरिव ।।३।। विवरणानुसारी कहते हैं कि स्वर्गके समान अभिलषित ज्ञानमें ही कर्मोंका उपयोग है, जैसे कि 'श्रुतियोंसे व्रहा जानना चाहिए' इसमें श्रुतियोंका व्रह्मज्ञानमें उपयोग है॥३॥

भोगमें दक्षताका सम्पादन करानेवाले अनेक जन्मोंके सश्च्ित पापोंके प्रभावसे प्रतिबन्ध होनेके कारण विद्याके साधन श्रवण आदिमें पुरुषकी प्रवृत्ति करानेवाली रुचिलक्षण इच्छा नहीं होती है, अतः प्रतिवन्धके निरासपूर्वक विविदिपाशव्दसे कहलानेवाली श्रवणादिमें प्रवृत्तिपर्यन्त रुचिकी उत्पत्तिके लिए यज्ञादिका अनुष्ठान करना चाहिए। [सारांश यह है कि ज्ञानकी इच्छा दो प्रकारकी है-एक तो विद्यामें उत्कण्ठारूप और दूसरी रुचिरूप, पहली इच्छा, यज्ञ आदिके अनुष्ठानके पूर्वमें भी है, अतः उसीको लेकर ज्ञानकी कारण विविदिपामें कामना होती है, इससे विविदिपाके लिए यज्ञ आदिका अनुषठान होता है, दूसरी रुचिरूंप इच्छा यज्ञ आदिके अनुछानके वाद होती है, अतः उस रुच्यात्मक विविदिपामें यज्ञ आदिका विनियोग कर सकते हैं, इसलिए पूर्वपक्षीकी उक्त शक्का उपपत्तिशून्य है * ]।

और उनका अनुष्ठान न करनेसे पाप होता है, इस प्रकार शास्त्रपरिशीलनसे ज्ञान है, ऐसे किसी पुरुपको भी कामोद्रेक होता है और पापविशपसे निपिद्धाचरण करता है, वैसे मुसुक्षुको भी पापविशेपसे विपयमें प्रवृत्ति हो सकती है, यह भाव है। * इस भामतीकारके अनुसारी मतमें-'अस्यार्थ :- 'विविदिपन्ति यज्ञन' इति तृतीयाधुत्या यज्षादीनामप्त्वेन ब्रह्मज्ञाने विनियोगात् ....... नित्यस्वाध्यायेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति, न तु- विन्दन्ति, वस्तुतः प्रधानस्यापि वेदनस्य प्रकृत्यर्थतया शब्दतो गुणत्वात, इच्छायाश्र प्रत्ययार्थतया प्राधान्यात्, प्रधानेन च कार्यसम्प्रत्ययात्' यह साक्षात् वाचस्पतिकी उकि-प्रमाणभूत है, तात्पर्य यह है कि 'विविदिपन्ति यज्ञन' इसमें 'यज्ञन' इस तृतीयाविभक्त्यन्तक्षुतिसे ब्रह्मज्ञानमें यन आदिका अप्त्वरूपसे विनियोग होता है ......... नित्य स्वाध्यायसे ब्राह्मण व्रह्मज्ञानकी इच्छा करते हैं, न कि जानते हैं, यद्यपि वस्तुतः वेदन (ज्ञान) प्रधान है, तथापि शब्दमर्यादासे वह अप्रधान है, और इच्छा प्रत्ययार्थ होनेके कारण प्रधान है, और प्रधानमें अन्यका सम्वन्ध होता है, [व्रष्टव्य-पृ० ५१ और ६१ कल्पतरुसहित भामती निर्णयसागर प्रेसमें मुद्रित ]।

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४२० सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

विवरणानुसारिणस्त्वाहु :- 'प्रकृतिप्रत्ययार्थयोः प्रत्ययार्थस्य प्राधा- न्यम्' इति सामान्यन्यायाद् 'इच्छाविपयतया शब्दवोध्ये एव शब्दसाधनता- न्वयः' इति स्वर्गकामादिवाक्ये क्लप्तविशेषन्यायस्य वलवच्चात्। 'अश्वेन जिगमिपति' 'असिना जिघांसति' इत्यादिलौकिकप्रयोगे अश्वादिरूपसाधनस्य, 'तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यं' 'मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इत्यादि- वैदिकप्रयोगे तव्यार्थभूतविधेश्च सन्प्रत्ययाभिहितेच्छाविपये एव गमनादा-

विवरणानुसारी लोग कहते हैं कि + 'प्रकृति०' (प्रकृति और प्रत्ययके अर्थोंमें प्रत्ययका अर्थ ही प्रधान होता है) इस सामान्य नियमसे स्वर्ग- कामादि वाक्यमें क्लप् 'इच्छाविषय होनेसे शब्दवोध्य अर्थमें ही शव्दसाघनताका अन्वय होता है' यह न्याय वलवान् है। और 'घोड़ेसे जानेकी इच्छा करता है, तलवारसे मारनेकी अभिलापा करता है' इत्यादि लौकिकप्रयोगमें . अश्व आदिरूपसाधनका और 'तदन्वेष्टव्यम्०' (उसकी-परमात्माकी- खोज करनी चाहिए, उसकी जिज्ञासा करनी चाहिए, आत्माका मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए) इत्यादि वैदिकपयोगमें तव्यार्थभूत विधिका सन्प्रत्ययसे कही गई इच्छाके विपयभूत गमन आदिमें ही अन्वय

  • भामत्यादि नवटीकोपेत शाङ्रभाष्यके पृ० ६८३ में इस मतकी पोपक विवरणकी पंक्रियाँ हैं-'नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानैः संस्कृतस्य।Sतमनो यदि श्रवणमननध्यानाभ्यासादीनि ज्ञान- साधनानि सम्पयन्ते, तदा संस्कारकर्माणि सहकारिविशषादात्मज्ञानमवतारयन्ति-हत्यादि । इसी प्रकार और अनेक वाक्योंसे भी इसी अर्थका प्रतिपादन क्षुति और स्मृतिके विरोधपरिहारपूर्वक किया गया है। * 'विविदिषन्ति यज्ञन' इसमें सनूरूप प्रत्ययका अर्थ है-इच्छा और विद्धातुरूप प्रकृतिक। अर्थ है-ज्ञान, इनमें प्रत्ययार्थ इच्छा ही प्रधान है, इसलिए शब्दतः प्रधानरूपसे प्रतीत होनेवाली इच्छामें ही यज्ञादिका विनियोग प्राप्त है, परन्तु इस नियमका औत्सर्गिक होनसे वाघ हो सकता है। अतः 'स्वर्गकामो यजत' इस विधिवाक्यमें विधायकप्रत्ययसे इष्टसाधनत्वरूपसे अवगत यागके इष्ट विशेषकी आकाङ्क्षामें शब्दतः स्वर्गके प्रधान न होनेपर भी फलत्वरूपसे अन्वय किया गया है, इसलिए 'इष्यमाणसमभिव्याह्ारे इष्यमाणस्यैव प्राधान्यम्' न तु इच्छायाः' (इच्छा और इच्छाविषयके सामीप्य रहते इच्छाका विपय ही प्रधान होता है, हच्छा नहीं) इस प्रकारका विशेषनियम, जो कि पूर्व सामान्यनियमका वाधक है, बलवान् है, यह भाव है!

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ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंके उपयोगका विचार] भाषानुवादसहित ४२१

वन्वयस्य व्युत्पन्नत्वाच प्रकृत्यभिहितायां विद्यायां यज्ञादीनां विनियोग:। ननु तथा सति यावद्विद्योदयं कर्मानुष्ठानाप्या 'त्यजतैव हि तज्ज्ञेयम् इत्यादिश्युतिप्रसिद्धं कर्मत्यागरूपस्य सन्न्यासस्य विद्यार्थत्वं पीच्चेतेति चेट्, न ; ग्राग् वीजावापात् कर्पणम्, तदनन्तरमकपर्णमिति कर्पणाकर्पणाभ्यां चीह्यादिनिप्पत्तिवद्- 'आरुरुक्षोर्मुनेयोंगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।' इत्यादिवचनानुसारेण चेतसः शुद्धौ विविदिपादिरूपप्रत्यक्म्राव्रण्यो-

व्युत्पन्न है, अतः प्रकृतिसे अभिहित (कथित) विद्यामें ही यज्ञ आदिका X विनियोग है। यदि शक्वा हो कि ऐसा होनेपर विद्याकी उत्पत्ति तक कर्मानुष्ठानकी परसक्ति होनेसे 'त्यजतेव०' (सब कर्मोका त्याग करके ही पुरुपको) प्रत्यगात्मरूप व्रद्मका साक्षात्कार करना चाहिए, त्याग किये बिना नहीं) इत्यादि श्रुतिसे* सिद्ध कर्मत्यागरूप संन्यासमें विद्यार्थता वाधित होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे वीज बोनेके पूर्तमें हल जोतना पड़ता है, उसके बाद नहीं, इससे कर्पण और अकर्पणसे न्रीहिकी उत्पत्ति होती है, घैसे ही- 'आरुरूक्षोमु०' (योगकी सिद्धि होनेके पूर्वमें उसके प्रति कर्म कारण हैं और योगसिद्ध होनेके बाद उन कर्मोंका शम (संन्यास) कारण है, ऐसा कहा जाता है) इस चचनके अनुसार अन्तःकरणकी ुद्धिमें विविदिपारूप प्रत्यक्पावण्य

x यदि इसमें कोई शका करे कि उदाहत वाक्योंमें अर्थात् 'अश्ेन जिगमिपति' इत्यादि पाचयोंमें अश्व आदिका इच्छामें अन्यय नहीं हो सकता है, इसलिए इच्छान्वयका परित्याग किया है? तो यह टीक नहीं है, क्योंकि तुल्ययुकतिसे यह भी कदद सकते हैं कि वेदनेच्छाके भी यशन्वयमें अगोग्य दोनेसे उसमें यश्ञादिका विनियोग नहीं हो सकता है और ब्रह्मवेदनका, जो कि प्रमानन्दसाशारकाररूप है, फलरूपसे अन्वय दो सकता है, यह भाव है। • 'अभ परिवास' दय प्रकारसे उपकम करके 'अ्रक्मभूयाय कल्पते' इत्यादि कही गई अन्य शुसिये परियादशब्दये कथित संन्यास अहमसाक्षासकारका कारण बतलाया गया है, इसी प्रकार जन्य श्रुतियोंमें भी कहा गया है, यद अभिप्राय है।

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४२२ सिद्धान्तलैशसंग्रंह [तृत्तीय परिच्छेद

दयपर्यन्तं कर्मानुष्ठानम्, ततः कर्मतत्सन्न्यासाभ्यां विद्यानिष्पत्यभ्युपगमात्। उक्त हि नैष्कर्म्यसिद्धौ- 'प्रत्यंकूप्रवणतां बुद्धेः कर्माण्यापाद्य शुद्धितः। कृतार्थान्यस्तमायान्ति प्रावृडन्तें घना इव ॥' इति कर्मणां विद्यार्थत्वपक्षेऽपि विविदिषापर्यन्तमेव कर्मानुष्ठाने विविदिपार्थ- त्वपक्षात् को भेद इति चेद्, अयं भेद :- कर्मणां विद्यार्थत्वपक्षे द्वारभूत- विविदिपासिद्धयनन्तरसुपरतावपि फलपर्यन्तानि विशिष्टगुरुलाभान्निर्विन्न श्रवणमननादिसाधनानि निवृत्तिप्रमुखानि सम्पाद्य विद्योत्पादकत्वनियमोऽ स्ति। विविदिपार्थत्वपक्षे तु श्रवणादिप्रवृत्तिजननसमर्थोत्कटेच्छासम्पादन- मात्रेण कृतार्थतेति नाऽवश्यं विद्योत्पादकत्वनियमः। 'यस्यैतेचत्वारिंशद्

(योग) के उदयतक कमोंका अनुष्ठान और उसके बाद संन्यास है, इस रीतिसे कर्म और कर्मके त्यागसे विद्याकी उत्पत्ति होती है, ऐसा माना है। नैष्कर्म्यसिद्धिमें भी कहा है- 'प्रत्यकूप्रवणताम्०' (चितशुद्धिद्वारा वुद्धिमें विविदिषा, वैराग्य आदि प्रत्यकपरावण्यकी प्राप्ति करनेके बाद कर्मोंका प्रयोजन प्राप्त हो जानेसे वे कर्म वर्षाकालके बाद मेघके समान अस्त हो जाते हैं। ) यदि शक्का हो कि कर्मोंके विद्यार्थत्वपक्षमें भी विविदिषातक ही उनका अनुष्ठान होनेसे कर्मोंकें विविदिषार्थत्वपक्षसे क्या भेद हुआ! तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भेद इस प्रकारसे है-कमोंके विविदिषार्थत्वपक्षमें द्वारभूत विविदिषाकी सिद्धिके बाद उनका त्याग होनेपर भी अदष्टद्वारा फलकी उत्पत्तितक विशिष्ट गुरुकी पराप्तिसे निवृत्तिप्रमुख (निवृत्तिसहित) श्रवण, मनन आदिका सम्पादन करके वे कर्म विद्याके उत्पादक होते हैं, ऐसा नियम है और विविदिषार्थत्वपक्षमें, तो अर्थात् जिस पक्षमें कर्मोंका प्रयोजन केवल ब्रह्मज्ञानकी इच्छा पैदा करना है, उस पक्षमें तो श्रवण आदिमें प्रंवृत्ति करानेमें समर्थ, ऐसी उत्कट इच्छाके सम्पादनमात्रसे कृतार्थता है, इसलिए उनमें अवश्य विद्योत्पादकत्व * है, * विविदिषार्थतवपक्षमें यज्ञ आदिसे उत्पन्न अदृष्ट श्रवण आदिमें प्रवृत्ति तक रुचिका (विविदिषाका)-उत्पादन करके नष्ट हो जाता है, क्योंकि अदष्टका फलोत्पत्तिके वाद विनाश होता है, यह नियम है। और विविदिषाकी उत्पत्तिके अनन्तर श्रवण आदिके प्रंति वाधक न

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श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेपोंका कथन] भापानुवादसहित ४२३

संस्काराः' इति स्मृतिमूले कर्मणामात्मज्ञानयोग्यतापादकमलापकर्पणगुणा- धानलक्षणसंस्कारार्थत्वपक्षे इचेति वदन्ति ॥ १ ॥ तत्रोपयोग: कथितः केश्रिदाश्रमकर्मणाम्। कोई लोग कहते हैं कि आश्रम-कर्मोंका ब्रढ्मविद्या आदिमें उपयोग है। ननु केपां कर्मणामुदाहृतश्ुत्या विनियोगो वोष्यते ? अत्र कैश्चिदुक्तम्- 'वेदानुवचनेन' इति ब्रम्मचारिघर्माणाम्, 'यज्ञेन दानेन' इति गृहस्थधर्मा- णाम्, 'तपसाऽनाशकेन' इति वानप्रस्थधर्माणां च उपलक्षणमित्याश्रमधर्मा-

ऐसा नियम नहीं है। जैसे कि 'यस्यैते०' (जिस पुरुषके श्रौत, स्मार्त आदि चालीस संस्कार हैं) इत्यादि स्मृतिसे प्रतिपादित कर्मोंके संस्कारार्थत्वपक्षमें, जो कि संस्कार आत्मज्ञानकी योग्यताके सम्पादक मलापकर्यणरूप और गुणके आधानरूप हैं, उक्त नियम नहीं है।। १ ॥ अब शक्का होती है कि पूर्वोक्त श्रुतिसे किन कर्मोंका विनियोग ज्ञात होता है? इस शक्धाके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि 'वेदानुवचनेन' * यह ब्रम्मचारीके धर्मोका, 'यज्ञेन दानेन' यह गृहस्थ धर्मोंका और 'तपसाऽनाशकेन' यह वानप्रस्थधमोंका उपलक्षण है, इसलिए समी आश्रमधर्म विद्यामें उपयुक्त

रहनेसे विविदिपासे ही श्रवणादि द्वारा ब्रद्ज्ञान प्राप्त होता है, श्रवण आदिके प्रतिवन्धक पापके रहनेपर यल करनेपर भी श्रवण आदि नहीं होते हैं, इसलिए दुरितसत्ताका निश्चय करके उसकी निपृत्तिका उपाय करता है, प्रायः निवर्तक उपायके न करनेसे श्रवण आदि नहीं हो सकते हैं, इसलिए ज्ञान भी नहीं होता है, जैसे औपघसे अनके भक्षणमें रुचिकी उत्पत्ति करके यदि अन प्राप्त छो, तो उसके भक्षणसे कृशता निकल जाती है, परन्तु यदि यत्न करनेपर भी अन्न नहीं मिला, तो कृशता ज्योंकी त्यों बनी रहती है, इसलिए उनमें अवश्य विद्योत्पादकता है, यह नियम नहीं है, यह भाव है। इसीमें दष्टान्त है-जो लोग कर्मोंका संस्काररूप फल मानते हैं, उनके पक्षमें यदि कर्मोसे संस्कृत पुरुप को श्रवणादिसाधन मिले, तो उसे तत्त्वज्ञान द्वारा ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यदि न मिले तो पुण्यलोककी प्राप्ति होती है, यह सिद्धान्तं किया गया हैं, इसलिए करमोंके संस्कारार्थत्वपक्षमें कर्मोंमें विद्योत्पादकता अवश्य ही है, ऐसा नियम नहीं है, वैसे विविदिपार्थत्ववादियोंके मतमें भी है, यह भाव है। शिष्य वेदका उच्चारण गुरुवचनके अनन्तर करता है, अतः वेदानुवचनशब्दसे वेदाध्ययनका प्रहण किया जाता है, चह ब्रह्मचारीके धर्मोमें प्रधान ही है, इसलिए चेदाध्ययनसे ब्रह्मचारीके सम्पूर्ण धर्मोका ग्रहण किया जाता है। इसी प्रकार उत्तरोत्तर उपलक्षणमें चीज समझना चाहिए।

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४२४ सिद्धान्तलेश संग्रह [तृतीय परिच्छेद

णामेव विद्योपयोगः। अत एव 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि' (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३२) इति शारीरकसूत्रे विद्यार्थकर्मस्वाश्रमकर्म- पदप्रयोग इति ॥ परैस्तु वैधुरादीनामपि कल्पतरूक्तितः ॥४॥ कोई लोग कल्पतरुकी उक्तिके अनुसार आश्रमरहित विधुर आदिकोंके कर्मोंका भी उपयोग कहते हैं॥। ४ ॥ कल्पतरौ तु नाऽडश्रमधर्माणामेव विद्योपयोग:, 'अन्तरा चाउपि तु तद् दृष्टेः' (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ६६) इत्यधिकरणे आश्रमरहितविधु- राद्यनुष्ठित कर्मणामपि विद्योपयोगनिरूपणात्। न च विधुरादीनामनाश्रमिणां प्राग्जन्मानुष्ठितयज्ञाद्युत्पादितविविदिषाणां विद्यासाधनश्रवणादावधिकारनि- रूपणमात्रपरं तदधिकरणम्, न तु तदनुष्ठितकर्मणां विद्योपयोगनिरूपणपर- मिति शङ्कयम्। 'विशेषानुग्रहश्च' इति (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू०३८) हैं, इसीलिए 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्माSपि' इस शारीरिकसूत्रमें विद्याके. उपयोगी कर्मोमं 'आश्रमकर्म' पदका प्रयोग किया गया है। कल्पतरुमें + तो कहा है कि आश्रमधमोंका ही विद्याम उपयोग है, ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि 'अन्तरा चाडपि' इस अधिकरणमें आश्रमरहित विधुर आदिसे अनुष्ठित कर्मोंका भी विद्यामें उपयोगनिरूपण किया गया है। यदि शज्का हो कि पूर्वजन्ममें अनुष्ठित यज्ञ आदिसे जिन्होंने विविदिषाकी उत्पत्ति की है, ऐसे अनाश्रमी विधुरोंका विद्याके साधन श्रत्रण आदिमं अधिकार है, इसीका निरूपण उक्त अधिकरणमें किया गया है, न कि विधुरोंसे इसी जन्ममें अनुष्ठित कमोंका विद्यामे उपयोगका निरूपण किया गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'विशेषानुग्इश्र' * सूत्रका यह अर्थ है कि कर्मफलोंकी अभिलाषा न करनेवाले आश्रमीको भी आश्रम- कमोंका अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि आश्रमीके प्रति उन कमोंका शास्त्रोंमें विधान है, अन्यथा प्रत्यवाय होगा, यह भाव है। + इस सूत्र का यह अर्थ है-आश्रमके बिना रहे हुए पुरुषोंका भी ब्रह्म-विद्यामें अधिकार है, क्योंकि रैक्वप्रभृति अनाश्रमी पुरुषोंको भी ब्रह्मविद्या हुई है, यह भाव है। देवताराधन आदि विशषधर्मोंसे चित्तशुद्धिद्वारा रैक्वप्रभृतिको आध्रमधर्मोंके समानं विद्याका अनुपह देखा गया है, अतः अनाश्रमियोंका कर्म भी विद्याका साधन है, इसीलिए- 'जप्येनव संसिद्धयतू व्राह्मणो नाऽन्न संशयः । कुर्योदन्यन्न वा कुर्यात् मैत्रो ब्राह्मण उच्यते.॥' अर्थात जपसे भी व्राह्मण सिद्धि प्राप्त करता है, उसमें तनिक भी संशय नहीं है। वह + कर्म करे या न करे, क्योंकि ब्राह्मण दयावान् कहलाता है, यह भाव है।

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श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेपोंका कथन ] भाषानुवादसहित ४२५

तदधिकरणसूत्रतद्धाष्ययोस्तदनुष्ठितानां ादिरुवर्णमात्रधर्माणामपि विद्यो पयोगस्य कण्ठत उक्तेः। 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्मापि' इति सूत्रे आश्रम- कर्मपदस्य वर्णधर्माणामप्युपलक्षणत्वादित्यभिप्रायेणोक्तम्- तत्र क्लप्तफलत्वेन नित्यानामेव कैश्चन। कोई लोग कहते हैं कि क्लूप्त फल होनेसे नित्य कर्म ही विद्याके उपयोगी हैं। आश्रमधर्मव्यतिरिक्तानामप्यस्ति विद्योपयोगः, किन्तु नित्यानामेव। तेपां हि फलं दुरितक्षयं विद्याडपेक्षते, न काम्यानां फलं स्वर्गादि। तत्र यथा प्रकृतौ क्लप्ोपकाराणामङ्गानामतिदेशे सति न प्राकृतोपकारा- इस प्रकारके उसके अधिकरणके सूत्र और भाष्यमें जपादिरूप सम्पूर्ण धर्मोका उपयोग साक्षात् कहा गया है। 'विहितत्वाच्चाश्रमकर्माSपि' इस सूत्रमें 'आश्रम कर्मशब्द सभी वर्णधर्मोका उपलक्षण है' अर्थात् आश्रमकर्मसे मिन्न इतर वर्णधर्मोंका भी ग्रहण करना चाहिए, यह भाव है-इसी अभिप्रायसे कल्पतरुमें पक्तियां भी हैं- यद्यपि आश्रमध्मोंसे*इतर धर्म भी विद्याके उपयोगी हैं, तथापि वे नित्यधर्म ही हैं, क्योंकि उनका दुरितक्षयरूप जो फल है, उसीकी अपेक्षा विद्या करती है, काम्यकमोंसे होनेवाले स्वर्ग आदि फलकी 1

अपेक्षा नहीं करती है, इस परिस्थितिमें अर्थात् विद्यामें उपयोगी उपकारकी हेतुताके काम्यकमोंमें न होनेसे जैसे प्रकृतियागमें + प्रसिद्ध उपकारी अक्गोंका विकृतिमे अतिदेश होनेपर प्रकृतिमें किये हुए उनके उपकारसे * इन पंक्ियोंको कल्पतरुमें, जिसके प्रणेता अमलानन्दस्त्रामी हैं,देखिएं पृ० ६२ भामतीकल्पतरुसदित शायुरभाव्य। इससे यही सिद्ध होता है कि 'विविदिपन्ति' इत्यादि विविदिपाक्ुतिस्न जिन यक् आदि धर्मोंका विद्यामें उपयोग कहा गया है, वे निल्य ही धर्म लेने चाहिएँ, काम्य नहीं, क्योंकि काम्योंका यदि ग्रहण किया जायगा, तो काम्य कर्मोंके स्वाभाविक फलका परित्याग करके उनका नित्यसाधारण पापक्षयरूप फल मानना होगा, कारण कि-विद्या पपक्षयकी अपेक्षा रखती है, स्वर्ग आदिकी नहीं, इससे केवल गौरव होगा, यह भाव है। प्रकृतियाग उसे कहते हैं, जो अतिदिश्यमान अझ्ञका प्रतियोगी हो। प्रतियोगी उसे कहना चाहिए कि जिस यागके अङ्ग अतिदिष्ट होते हों, और विकृतियागका अर्थ है अति- दिश्यमान अज्ञोंका अनुयोगी, जिसमें अप्ल अतिदिष्ट हों, वह अनुयोगी है। प्रकृतियागमें क्षुत पदार्थकी विकृर्तिमें कल्पना करना अतिदेश कहलाता है। दर्शपूर्णमास प्रकृतियाग है, क्योंकि इसके पदार्थोका विकृतिभूत सौर्य पत्रुयाग आदिमें अतिदेश होता है, और सौर्य पछुयाग आदि विकृतियाग हैं, क्योंकि वे अतिदिश्यमान दर्शपूर्णमास्यागके,पदार्थोके अन्ञयोगी हैं, यह भाव है। ५४

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४२६ सिद्धान्तलेश संग्रह [तृतीय, परिच्छेद

तिरिक्तोपकारकल्पनम्, एवं ज्ञाने विनियुक्तानां यज्ञादीनां कलप्नित्यफल- पापक्षयाति रेकेण न नित्यकाम्यसाधारणविद्योपयोग्युपकारकल्पनमिति। काम्यानामपि संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ ५॥ न चोपकारसंक्लप्तिद्वारं वाक्यं प्रतीक्षते। प्राप्तर्वचनवैयर्थ्य द्वारभेदेऽविशिष्टता ॥ ६ ॥ संक्षेपशारीरककारके मतमें काम्यकर्म भी विद्याके उपयोगी हैं, वाक्य उपकार- संकृत्तिरूप द्वारकी अर्थात् अन्यत्र जिस उपकार की प्राप्ति हुई हो, उसकी अपेक्षा नहीं करता है, क्योंकि उसकी प्राप्ति होनेसे वाक्य ही व्यर्थ होगा, यदि द्वारभेद मार्नेंगे, तो समानता ही प्रसक्त होगी ।। ५॥। ६।। संक्षेपशारीरके तु नित्यानां काम्यानां च कर्मणां विनियोग उक्त:, यज्ञादिशब्दाविशेषाठ्। प्रकृतौ क्लपोपकाराणां पदार्थानां क्लप्प्राकृतो- भिन्न उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, वैसे ही ज्ञानमें विनियुक्त [नित्य] यज्ञोंका नित्यकर्मोंके फलरूपसे प्रसिद्ध पापविनाशसे अतिरिक्त नित्य और काम्यकरमोंके साधारण विद्यामें उपयुक्त उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, कारण कि वैसी कल्पना करनेमें गौरव है। * संक्षेपशारीरकमें तो नित्य और काम्य 'दोनों कर्मोंका विद्यामे विनियोग कहा है, क्योंकि 'तमेतम्' इत्यादि श्रुतिमें सामान्यरूपसे यज्ञ आदि शब्दोंका कंथन किया गया है। प्रकृतियागमें जिनका उपकार प्रसिद्ध है, ऐसे पदार्थों- का-क्लृप प्रकृतियागीयके उपकारके अतिदेशसे ही विकृतियागमें अतिदेशसे-

  • संक्षपशारीरककारका यह भाव है कि 'विविदिषन्ति यज्ञेन' इसमॅ यज्ञशब्द जैसे 'नित्य यज्ञोंमें रूढ है, वैसे ही काम्ययज्ञोंमें भी रूढ है, इसलिए नित्य कर्मोंके समान काम्य-क्मोंका भी विद्यामें उपयोग प्रतीत होता है, अतः नित्यकाम्य साधारण किसी उपकारविशेषकी कल्पनामें कोई विरोध नहीं है। + नित्यकाम्यसाधारण विद्यामें उपयुक्त उपकारकी यदि कल्पना की जाय, तो पूर्वमीमांसाके न्यायके साथ विरोध होगा, ऐसा समझ कर कल्पतरुमें विकृतिमें अतिदिष्ट अज्गोंका दृष्टान्त दिया गया है, उसका परिहार इस ग्रन्थसे. करते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रकृतियागमें जिन पदार्थोंका उपकार क्लृप्त है, उनका पहले अतिदेश होता है, अनन्तर उन पदार्थोंके उपकारका विकृतिमें अतिदेश होता है, पह्ले प्राकृतिके पदार्थोंके अतिदेशसे विकृतिमं विनियोग करनेके बाद उनके उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए प्रकतिविकृतिस्थलमें क्लप् उपकारका

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श्रंतिसे विनिंयुक्त कर्मविशेपोंका कथनं ] भांपानुवांदसहित ४२७

पकारातिदेशमुखेनैव विकृतिष्वतिदेशेन सम्चन्धः, न तु पदार्थानामति- देशानन्तरमुपकारकल्पनेति न तत्र प्राकृतोपकारातिरिक्तोपकारकल्पना- प्रसक्तिः। इह तु प्रत्यक्षश्रुत्या प्रथममेव विनियुक्तानां यज्ञादीनासुप- दिष्टानामङ्गानामिव पश्चात् कल्पनीय उपकारः प्रथमावगतविनियोग- निर्वाहायाक्लप्ोऽपि सामान्यशव्दोपात्तसकलनित्यकाम्यसाधारणः कथं न कल्प्यः । अध्यरेषु अध्वरमीमांसकैरपि हि 'उपकारमुखेन पदार्थान्वये एव क्लप्ोपकारनियम:, पदार्थान्वयानन्तरम् उपकारकल्पने त्वक्लपोऽपि विनियुक्तपदार्थानुगुण एव उपकार: कल्पनीयः' इति सम्प्रतिपद्यैव वाध-

सम्बन्ध होता है, पदार्थोंके अतिदेशके वाद उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए विकृतिस्थलमें प्रकृतिस्थपदार्थोंके उपकारसे पृथक उपकारकी कर्पना प्रसक्त नहीं हे, प्रकृतस्थलमं+ तो साक्षात् 'यज्ञेन' इस श्रुतिसे पहले ही विनियुक्त यज्ञ आदिके-जैसे* उपदिष्ट अक्गोंका प्रथम अवंगत विनियोगके निर्वाहके लिए अवलप्त दष्टाटएरूप उपकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही प्रथम अवगत विनियोगका निवाह करनेके लिए अक्लप्त होनेपर भी सामान्य यज्ञशव्दसे नित्यकाम्य साधारण पश्चात् कल्पनीय-उपकारकी करुपना क्यों न की जाय? अर्थात् अवश्य की जाय, यह भाव है। प्रथम उपकारके. अतिदेशके अनन्तर जहाँ पदार्थोका अन्वय किया जाता है, वहींपर क्लस अर्थात् प्रथमतः ज्ञात उपकारकी कल्पना होती है, अन्य की नहीं, यह नियम है और जहाँपर पदार्थोंके अन्वयके पीछे उपकारकी कलपना की जाती है, वहींपर अवलप्त हेनेपर भी विनियुक्त पदार्थोंके अनुकूल ही उपकारकी करपना की परित्याग करके अन्य उपकारकी कल्पना नहीं की जाती है, इसलिए दष्टान्त विषम है अर्थात् प्रकृतस्थलमं तो पदले यश आदिका विनियोग करनेके बाद उपकारकी कल्पना की जाती है और अतिदेशस्थलमें प्रकृतिम उपकारकी कल्पना करनेके वाद प्रकृतियक्षके पदार्थोंका विक्ृतिमें विनियोग होता है। * दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें अथवा अन्य स्थलमें जो पदार्थ उपदिष्ट हैं अर्थात् साक्षात् श्रुतिसे घोधित हैं उनका श्रुति, लिग आदि प्रमाणोंसे पहले ही दर्श, पूर्णमास आदिमें विनियोग हो जाता है, अनन्तर ख विनियोगके निर्याहके लिए दष्ट और अदट्टरूप किसी फलरूप द्वारकी कल्पना- की जाती है, इसी प्रफार 'विविदिपन्ति यझ्न' इत्यादि श्रुतिसे प्रथमतः ही यज्ञ आदिका विविदिपामे चिनियोग हो जाता है, इसलिए इस विनियोगको सफल करनेके लिए अक्लप्त उपकारकी यदि कल्पना की जाय, तो भी कोई द्ानि नहीं है, यह भाव है।

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४२८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

लक्षणारम्भसिद्धयर्थमुपकारमुखेन विकृतिषु प्राकृतान्वयो दशमाद्ये सम- र्थिंतः । किश्व 'क्लपोपकाराला भान्नित्यानामेवाडयं विनियोगः' इत्यभ्यु- पगमे नित्येभ्यो दुरितक्षयस्य तस्माच ज्ञानोत्पत्तेरन्यतः सिद्धौ व्यर्थोडयं जाती है, इस प्रकार कमोंके विषयमें अङ्गीकार करके ही पूर्वमीमांसकोंने बाधाध्यायके आरम्भके लिए उपकारका अतिदेश करनेके बाद विकृतिमें प्रंकृतिस्थ पदार्थोका सम्बन्ध * दशम अध्यायके प्रथम पादमें बतलाया है। किञ्च, क्लप उपकारकी काम्योंमें प्राप्ति न होनेसे नित्य कमांका ही यह विद्यामें विनियोग है, ऐसा माननेपर नित्य कर्मोंसे पापका विनाश और विविदिया- वाक्यसे मिन्न वाक्यसे ज्ञानोत्पत्ति यदि सिद्ध है, तो यह विनियोग ही

  • प्रकृतियागके अङ्गभूत पदार्थाकी, अतिदेशसे विक्ृतियागमें, प्राप्ति दिखलाई गई है। तात्पर्य यह है कि पूर्वमीमांसाके दशम अध्यायमें विकृतिमें अतिदिष्ट अज्ञोंका प्रकृतिमें वलप्न उपकारका सम्भव न होनेपर वाधका निरूपण किया गया है। उस वाधनिरूपणकी, यदि विकृतिमें अति- देशसे पदार्थप्राप्तिके वाद उपकारकी कल्पना की जाय, तो सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि जसे प्रकृतिमें श्रुति आदिसे विनियुक्त पदार्थोंका दृष्ट फल न रहनेपर अदृष्ट उपकारकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अतिदेशसे विकृतियागमें विनियुक्त पदार्थोंका दृष्ट उपकारके न रहनेपर अदृंष उपकारकी भी कल्पना हो सकनेंसे उसकी सिद्धिके लिए सभी अज्ञोंका अनुष्ान अवश्यं- भावी होनेके कारण कुछ अङ्ोंका अनुष्ठान या उसके अंशातिदेशप्रामाण्यरूप वाघका असम्भव हैं, इसलिए वाधनिरूपणकी सिद्धिके लिए प्रकृतिमें क्लृप्त उपकारके अतिदेशसे ही विकृतिमें प्रकृतिस्थ पदार्थोका अन्वय है, इस प्रकार दशम अध्यायके प्रथम अधिकरणमें निश्चित किया गया है, इसलिए जहांपर पदार्थोंके विनियोगके अनन्तर उपकारकी कल्पना की गई हो, वहाँपर उन पदार्थोंकी अपनी सामर्थ्यके अनुसार प्रथमतः ज्ञात विनियोगके निर्वाहके लिए अक्लप्त उपकारकी फल्पना मीमांसकं सम्मत है, ऐसा प्रतीत होता है। यदि विनियोगके वाद जहाँ उपकारकी कल्पना की गई हो, उस स्थलमें भी क्लृप् उपकारका सम्भव न होनेपर विनियुक्त पदार्थका परिष्याग ही इष्ट हो, अक्लूप्त उपकारकी कल्पना इछ न हो, ऐसा माना जाय, तो 'उपकारमुखन' इत्यादि निरूपण करनेवाला अधिकरण ही व्यर्थ होगा, क्योंकि श्रपण, अवघात आदि पदार्थोका अतिदेशसे विनियोग होनेपर भी विकृतियागस्थ कृष्णल आदिमें श्रपण आदिके विक्कित्ति, तुषविमोक आदि लोकसिद्ध दृष्टोपकारका अमाव होनेसे और अकलृप्त उपकारकी कल्पनाका स्वीकार न होनेसे अ्रपणादिका अननुष्ठानलक्षण वाघ, जिसका कि दशम अध्यायमें निरूपण किया गया है, हो सकता है, फिर उसके लिए 'उपकारमुखेन' इत्यादि- निरूपण करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इससे विविदिषावाक्यसे सामान्यतः नित्यकाम्य साधारण विनियोगके प्रथम अवगत होनेपर उसकी उपपत्तिके लिए अवलत्त उपकारकी कल्पना युक ही है, यह भाव है।

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श्रुतिसे विनियुक्त कर्मविशेपोंका कथन] भापानुवादसहित ४२९:

विनियोग :; अन्यतस्तदसिद्धौ ज्ञानापेक्षितोपकारजनकत्वं तेष्वक्लप्तमित्य- विशेपाद् नित्यकाम्यसाधारणो विनियोगो दुर्वारः। ननु नित्यानां दुरितक्षयमात्रहेतुत्वस्याऽन्यतः सिद्धावपि विशिष्य ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धक- दुरितनिवर्हकत्वं न सिद्धम्, किन्तु अस्मिन् विनियोगे सति ज्ञानो- द्देशेन नित्यान्यनुतिष्ठतोऽवश्यं ज्ञानं भवति; इतरथा शुद्धिमात्रम्, न नियता ज्ञानोत्पत्तिरिति सार्थकोडयं विनियोग इति चेत्, तर्हिं नित्याना

व्यर्थ है, यदि दूसरेसे सिद्ध नहीं है, तो ज्ञानके लिए अपेक्षित उपकार जनकता नित्योंमें क्लप्त ही नहीं है, इसलिए ? नित्य और काम्य कर्मोंके साधारण विनियोगका निवारण कर ही नहीं सकते हैं। यदि शक्का हो कि नित्य कर्मोमें केवल दुरितक्षयकी हेतुताकी अन्यसे सिद्धि होनेपर भी ज्ञानकी उत्पत्तिमं प्रतिबन्धक पापक्षयहेतुता अन्य प्रमाणसे विशेपरूपतया सिद्ध नहीं है, किन्तु इस विनियोगसे ही यह सिद्ध होता है कि ज्ञानके उद्देशसे यदि पुरुप नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करे, तो अवश्य ज्ञान उत्पन्न होता है, इस विनियोगके + न रहते केवल शुद्धिमात्र ही होती है, नियमसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, इसलिए यह विनियोग सार्थक है? तो यह भी युक्त

  • शशाका तात्पर्य यह ै कि दुरित दो प्रकारके हैं-एक तो ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक और दूमरा ज्ञानकी उत्पत्तिमें उदासीन होकर नरकादि देनेवाला। इस अवस्थामें यदि नित्य- कमोंका ज्ञानमें विनियोग न किया जाय, तो नित्यकर्मोसे ज्ानप्रतिबन्धक दुरितका क्षय होता है, इसमें प्रमाण नहीं है, 'धर्मेण पापमपनुदति' (धर्मसे पाप हट जाता है) 'यजो दानं तपश्चव पावनानि मनीपिणाम्' (यश, दान और तप मनीषियोंको पावन करनेवाले हैं) इस प्रकारके श्रुति-स्मृति-चचन भी नित्य फर्मोंमें सामान्यपापक्षयकी हेतुताका प्रतिपादन करते हैं। इससे नित्य कमोमें नियमतः ज्ञानप्रतिबन्धकदुरितक्षयदतुता दूसरेसे प्राप्त ही नहीं है, इसलिए उसकी प्राप्ति करानेके लिए यह विनियोग है, अर्धात् यह वात अन्यतः सिद्धिपक्षका अवलम्वन करके चिनियोगकी सार्थकता बतलाती है, यह भाव है। + तात्पर्य यह है कि यश आदिका ज्ञानमें विनियोग न होनेपर नित्य आदिके अनुष्ानसे दूरितविनाशरूप शुद्धि ही प्राप्त दोती है, परन्तु ज्ञानकी उत्पत्तिमें प्रतिचन्धक दुरित् क्षयरूप शुद्धि प्राप्त नहीं होती, क्योंकि ज्ञानके उद्देशसे नित्यकर्मोंका अनुष्ठान नहीं है, इस अवस्थामें अनेक जन्मोंसे जिसने नित्यकर्मोंका अनुष्टन किया है, उसको भी नियमतः ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं दोगी, क्योंकि कदाचित् दैवयोगसे ज्ञानप्रतिबन्धक चुरितसमूहका सम्पूर्ण क्षय होनेपर भी ज्ञान कदाचित् होता है, इस प्रकार अनियत ज्ञानोत्पत्ति होगी।

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४३० सिद्धान्तलैशसंग्रह [तृतीय परिच्छद

मपि अक्लप्तमेव ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकदुरितनिवर्हेणत्वम्, ज्ञानसाधन- विशिष्टगुरुलाभश्रवणमननादिसम्पादकापूर्वं च द्वारं कल्पनीयमित्यक्लप्तो- पक्कारकल्पनाऽविशेषान्न सामान्यश्रुत्यापादितो नित्यकाम्यसाधारणो विनि- योगो भञ्जनीय इति ॥ २ ॥ बाह्मणग्रहणं चाऽन् न्रैवर्णिकनिदर्शनम्।

'विविदिषन्ति ब्राह्मणाः इस श्रुतिमें ब्राह्मणग्रद्ण त्रैवर्णिकका उपलक्षण है, क्योंकि इस अर्थका पोपक वार्तिककारका वचन है और ब्राहमाणपदकी उद्देश्यविशेषण- तया भी विवक्षा नहीं है।। ७।।

नहीं है, क्योंकि नित्य कर्मोंमें ज्ञानोपकारकत्वनियमके असिद्ध होनेपर नित्यकर्मोंमें भी ज्ञानकी उत्पत्तिमें अक्लप्त ही प्रतिवन्धक दुरितके विनाश- कारणतारूप और ज्ञानके प्रति साधनभूत श्रोत्रिय न्रह्मनिष्ठ गुरुका लाभ,- श्रवण, मनन आदिको प्राप्त करानेवाले अदृष्टरूप द्वारकी कल्पना करनी होगी, इसलिए अक्लप्त कल्पनाके सामान्य हेोनेसे 'यज्ञेन' इस सामान्यश्रुतिसे प्राप्त नित्य और काम्यकर्मोंके साधारण विनियोगको नहीं हटाना चाहिए ।।२।।

'ज्ञानमें अपेक्षित उपकार नित्योंमें वलप्त है' यह मत प्रमाणशून्य है, ऐसा मानकर काम्योंके समान नित्यमें भी अकलृप्त उपकारकी कल्पना समान है, इस अभिप्रायसे दूपित करते हैं, यह भाव है।

  • यदि प्रकृतमें शङ्डा हो कि नित्यकर्मोंके विनियोग पक्षमें ही विधिका लाघव है, क्योंकि पक्षमें उनकी ज्ञानप्रतिवन्धकपापविनाशकी जनकता अन्य वचनसे प्राप्त होनेके कारण केवल नियम विधिसे लभ्य है, और काम्यकर्मोकी ज्ञानप्रतिवन्धकदुरितविनाशकारणता किसीसे प्राप्त नहीं है, अतः ज्ञानमें काम्य कर्मोंके विनियोग पक्षमें विधिका गौरव अपरिहार्य है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है,-क्योंकि इस परिस्थितिमें भी यज्ञ आदि श्रुतियोंके सक्कोचरूप वाधके परिहारके लिए काम्य कर्मोंका भी विनियोग अवश्य है, इसीमें तात्पर्य है। यद्पि नित्यकमोंसे ज्ञान- प्रतिबन्धक दुरित-विनाशरूप विशेषशुद्धिका लाभ होनेपर भी उतने मान्रसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती है। क्योंकि प्रमाणप्रमेयासम्भावना आदि प्रत्यक्ष प्रतिवन्धक हैं, तथापि उन प्रतिवन्धकोंके निरासके लिए नित्योंमें उच्च गुरु तथा उनसे श्रवण आदिके सम्पादक अक्लृप्त अदष्टकारणताकी विविदिषावाक्यके वलसे कल्पना करनी चाहिए, यह भाव है।

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विद्यार्थ कर्मोमे त्रैवणिकोंका अधिकार ] भापानुवादसहित ४३१

नन्वेवमपि कथम्- 'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।' इत्यादिस्मरणनिर्वाहः ? न च तस्य विद्यार्थकर्मानुष्ठानपरत्वम्, विविदिपावाचये ब्राह्मणग्रहणेन ब्राह्मणानामेव विद्यार्थकर्मण्यधिकारप्रतीतेः । अतो जनकाद्यनुष्टितकर्मणां साक्षादेव सुक्त्युपयोगो वक्तव्य:, मैवम्; विविदिपााक्ये त्राह्मणग्रहणस्य त्रैवर्णिकोपलक्षणत्वाद्। अव शक् होती है कि यद्यपि 'तत्प्राप्तिहेतुर्विज्ञानं कर्म चोक्तं महासुने' इत्यादि ज्ञान और कर्मके समुच्चयका प्रतिपादन करनेवाली स्मृतिका विविदिषावाक्यके साथ विरोध न हो, इसलिए 'ज्ञान साक्षात् मुक्तिका साधन है और कर्म विद्याकी प्राप्ति द्वारा मुक्तिमें साधन है, इस प्रकार क्रमसमुच्चयसे निरूपण किया गया, तो भी 'कर्मणव' (जनक प्रभृति महानुभावोंने कर्मोंके द्वारा ही मुकि प्राप्त की) इत्यादि स्मृतिकी उपपत्ति कैसे हो सकती है, [क्योंकि इसमें 'कर्मणैव' (कर्मसे ही) इस अवधारणसे मुक्तिके प्रति कर्मांतिरिक्त साधनताका खण्डन किया गया है, इसलिए साक्षात् मुक्तिके प्रति ही कर्मोंका उपयोग प्रतीत होता है]। यदि शङ्का हो कि 'कर्मणैव' इत्यादि स्मृतिका तात्पर्य विद्याके लिए कर्मोंके अनुष्ठानमें ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'ब्राह्मणाः चिविदिपन्ति' इत्यादि विविदिषाश्चुतिमें 'ब्राह्मण' शब्दके कथनसे यही प्रतीत होता है-ब्राह्मणोंका ही विद्याके प्रयोजक कर्मोंमें अधिकार है। इसलिए * जनक आदि द्वारा अनुष्ठित कर्मोंका साक्षात् ही मुक्तिमें उपयोग है, ऐसा कहना चाहिए? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त विविदिषावाक्यमें ब्राह्मणका अ्रहण त्रवर्णिकोंका + उपलक्षण है।

  • अर्थात् 'विविदिपन्ति' इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात विद्यासाधन कर्मोंमें त्रवर्णिक अधिकृत नहीं है, इसलिए, यह अर्थ है। । जव विविदिपावाक्यमें ब्राह्मणग्रहण उपलक्षण है, तव विद्याके प्रयोजक कर्मोंमें जनक आदिका भी अधिकार है, अतः 'कर्मणैव' इत्यादि स्मृतिका वचन विद्याप्रयोजक कर्मके अनुषठानमें ही पर्यवसित है, इसलिए उंक वचनसे 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' (आत्मसाक्षात्कारसे ही मृत्युका-संसारका-अतिक्रमण कर सकते हैं, उससे अन्य संसारके अतिक्रमणके लिए मार्ग नहीं है) इस श्रुतिसे विरुद्ध साक्षात् कर्मोंमें मुकिसा- धनता चोधित नहीं होती है, यह भाव है।

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४३२ सिद्धान्त लेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

यथाऽडहुरत्रभवन्तो वार्तिककारा :- ब्राह्मणग्रहण चाऽत्र द्विजानामुपलक्षणम्। अविशिष्टाधिकारित्वात् सर्वेषामात्मवोधने ॥।' इति। नहि 'विद्याकामो यज्ञादीननुतिष्ठेद्'इति चिपरिणमिते विद्याकामा धिकारविधौ ब्राह्मणपदस्याऽधिकारिविशेपसमर्पकत्वं युज्यते; उद्देश्ये विशेषणायोगात्।

इस विषयमें पूजनीय वार्तिककार कहते हैं- 'ब्राह्मणग्रहणं चाsत०' (विविदिषावाक्यमें ब्राह्मण-ग्रहण द्विजोंका अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यका उपलक्षण है, क्योंकि आत्मज्ञानके साधनभूत कर्मोंमें ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यका अधिकार सामान्यरूपसे सुना गया है *)। और 'विद्याकामो यज्ञादीननुतिष्ठेत्' (विद्याका अभिलापी यज्ञ आदिका अनुष्ठान करे) इस प्रकार + विपरिणत विद्याकामकी अधिकार 1 विघिमें न्राह्मण पद अधिकारीका समर्पक (वोधक) है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, कारण कि विद्याकामरूप उद्देश्यमें विशेषणका सम्बन्ध नहीं हो सकता है।

इस वार्तिकको सुरेक्षराचार्य विरचित वार्तिकके १८८९-वृष्ट मे चतुर्थ अध्याय चतुर्थ न्राह्मणमें देखना चाहिए। * क्योंकि विद्याप्रयोजक कर्मोंका ही अधिकार प्रकृत है, यह भाव है, यदि इस विषयमें किसीको शङ्का हो कि विविदिपावाक्यमें ब्राह्मणशन्दमें त्रवर्णिकोपलणत्वके सिद्ध होनेपर तीनों वणोंका सामान्यरूपसे विद्याप्रयोजंक कमोंमें अधिकार सिद्ध होगा और तीनों वर्णोका सामान्यतः कर्मोंमें अधिकार सिद्ध होनेपर उसके अनुरोधसे ब्राह्मणग्रहणको उपलेक्षण मान सकते हैं, इसलिए अन्योऽन्याथ्रय होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्राह्मणपदमें सामान्यतः द्विजोपलक्षणताका अनाश्रय करके ही सभी द्विजोंका विद्यार्थकर्मोंमें अधिकार वार्तिक वंचनमें कहा गया है। * तात्पर्य यह है कि किसीको यदि शङ्का हो-विविदिषावाक्य में ब्राह्मण शब्दके ग्रहणसे ब्राह्मणका ही विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार प्रतीयमान होता है, तो फिर वर्णत्रयसाधारण अधिकारकी सिद्धि कैसे होती है? तो इसपर कहना चाहिए कि क्या ब्राह्मणशब्द यज्ञ आदि विधिके उद्देश्यमें विशेषणके समर्पकरूपसे ब्राह्मणमात्रकी अधिकारिताका बोधक है, अथवा विधेयभूत कताके समपकरूपसे अथवा इन दोनोंके सरमर्पक न होते हुए भी अन्य गति न होनेसे अपनी केवल सननिधिमात्रसे व्राह्मणमात्रके अधिकारका बोधक है? इस प्रकार तीन विकल्पोंमें प्रथम

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विद्यार्थ कर्मोंमें त्रैवर्णिकोंका अधिकार] भापानुवादसहित ४३३

नापि 'राजा स्वाराज्यकामो राजसूयेन यजेत' इति स्वाराज्यकामा- घिकारे राजसूयविधौ 'स्वाराज्यकामो राजकर्तृकेण राजसूयेन यजेत' इति कतृतया यागविशेषणत्वेन विधेयस्य राजो राजकर्तकराजसूयस्याऽराज्ञा सम्पादयितुमशक्पत्वाद् अर्थादधिकारिकोटिनिवेशवद्, इह यज्ञादिकर्तृतया विधेयस्य त्राह्मणस्याऽर्थादधिकारिकोटिनिवेश इति युज्यते। 'सर्वथांपि त एवोभयलिङ्गाद्' इति सूत्रे (उ० मी० अ० ३ पा० ४ सू० ३४) यदि शक्का हो कि जैसे 'राजा स्वाराज्यकामो०' (स्वाराज्यको चाहनेवाल। राजा राजसूयनामक यज्ञ करे ) स्वाराज्य चाहनेवालेकी अधिकार- वोधिका इस राजसूयविधिमॅ 'स्वाराज्यके अभिलाषी राजा द्वारा किये जानेवाले राजसूय यज्ञसे अपना अभीष्ट सम्पादन करे' इस प्रकार कर्तृत्वरूपसे यागके विशेषण विधेयभूत राजाका-केवल राजासे किये जानेवाले राजसूयका राजासे इतर अनुष्ठान नहीं कर सकता है, इससे अर्थतः-अधिकारी कोटिम विशेषणरूपसे निवेश होता है, वैसे ही प्रकृतमें 'विद्याका अभिलापी पुरुप ब्राम्मणकर्तृक याग आदिका अनुषान करे, इस प्रकार विधेयभूत न्राद्मणका अर्थतः अधिकारी कोटिमें निवेश होगा? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'सर्वथाऽपि त एवोभयलिक्वात्' इस ब्रसूत्रमें इस प्रकारकी व्यवस्था विकल्पका दय अन्थसे परिदार करते हैं। विद्यामें यज्ञ आदिका विनियोगयोधक विधिमें विद्याभिलापीका अधिकार सिद्ध ही है, इसलिए व्ाहमाण्यविशिष्ट विद्याकामका अधिकार विवक्षित रै, ऐसा स्वोकार कर न्रामाणपदमें विशेप अधिकारिसमर्पकताका अभीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि विधेयभूग यक्ष आदिकी वद्देश्यता केवल विद्याभिलापीमें ही प्रतीत होती है, अतः म्राहाण्यरूप विशेषणकी आकोक्षा नहीं है, इसलिए अनाकाक्षितका विद्याकामके प्रति विशेपण रुपसे अन्वय नहीं हो सकता है। यदि विशिष्टको उद्देश्य माने, तो गौरव होगा, विद्याकाम और म्द्ाण्य प्रतयेकको उद्देश्य मानें, तो वाक्यभेद प्रसक होगा अर्थात् विद्याका अभिलापी यज्ञ आदि करे' और 'ब्राह्मण यश् आदि करे' इस प्रकार वाक्यभेद होगा, यह भाव है। *तक तीन विकल्पोंमें से द्वितीय विकल्पका इस पन्थसे शक्त्रापूर्वक परिहार करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वाराज्यकाम वाक्यमें स्वाराज्याभिलापीके प्रति राजपदका पूर्वोंक्त रीतिसे विशेषणत्व रूपसे सम्बन्ध नहीं हो सकता है, इसलिए क्तृविधायकताका अग्रीकार करके यदि स्वाराज्यफामी राजा हो, तो राजसूय यश करे, ऐसा प्रतिपादन किया गया है। इससे अर्थात् जसे राजाका अधिकारी कोटिमें प्रचेश हुआ है वैसे ही ब्राह्मण्य का अधिकारीकी कुक्षिमें प्रवेश क्यों नहीं, यह पाछाका भाव है। *'सर्वधापि त एयोभयलि्ात' इस सूत्का अर्थ यो है-सर्वया अपि-यज्ष आदिके ५५

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४३४ सिद्धान्त लेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

'अन्यत्र विहितानामेव यज्ञादीनां विविदिपावाकये फलविशेपसम्बन्ध- विधि:, नापूर्वयज्ञादिविधिः इति व्यवस्थापितत्वेन प्राप्तयज्ञाद्नुवादेन एकस्मिन् वाक्ये 'कर्तृरूपगुणचिधिः, फलसम्बन्धविघिश्' इत्युभयविधा- नाद्वाक्यभेदापत्तेः । नापि राजसूयवाक्ये राज्ञ: कर्ततया विधेयत्वाभावपक्षे राजपदसम- सिव्याहारमात्राद्विशिष्टकर्तृत्वलाभवद् इह वाक्याभेदाय कर्तृतया ब्राह्मणा- विधानेऽपि ब्राह्मणपदसमभिव्याहारमात्रेण त्राह्मणकर्तृकत्वालाभात् तद्धि-

की गई है कि 'कर्मकाण्डम विहित यज्ञ आदिको उद्देश्य करके ही विविदिषावाक्यमें फलविशेषके सम्बन्घकी विधि है, अपूर्व यज्ञ आदिकी विधि नहीं है, और यदि पूर्वसे प्राप्त यज्ञ आदिका अनुवाद कर एक वाक्यमें कर्तृरूप गुण और फल- सम्बन्ध इन दोनोंकी विधि मानें, तो वाक्यमेदकी आपत्ति होगी*। + यदि शक्का हो कि जैसे राजसूयवाक्यमें कर्तृरूपसे राजामें विधेयत्वके अभाव पक्षमें राजपदके सान्निध्यमात्रसे विशिष्ट कर्तृताका लाभ होता है, वैसे.' ही प्रकृतमें वाक्यभेदके परिहारके लिए कर्तृरूंपसे न्राह्मणका विधान न हेोनेपर भी, ब्राह्मणपदके समभिव्याहारमात्रसे (सान्निध्यमात्रसे) न्राह्मणकी कर्तृताका.

आश्रमकर्मत्वपक्षमें या उनके विद्यासहकारित्वपक्षमे एवं-'यावजीवमग्निद्दोन्रं जुहुयाठ' इत्यादि वाक्योंमें जो अग्निदोत्र आदि धर्म हैं, वे ही विहित हैं, क्योंकि 'उभयलित्ात्' अर्थाद् श्रुति और स्मृति-दोनों प्रमाण हैं, श्रुतिसे 'विविदिषन्ति यज्ञेन' इत्यादि क्षुति लेनी चाहिए और स्मृतिसे 'अनाश्रित: कर्मफलम्' (कर्मफलकी अभिलाषा न करके जो यज्ञ आदिका अनुष्ठान करता है, उसे विद्या-प्राप्ति होती है) इत्यादिका ग्रहण करना चाहिए। * राजसूयवाक्यमें कर्त्रादिगुणविशिष्ट अपूर्व कर्मकी ही विधि मानी गई है, अतः वाक्य- भेद प्रसक्त नहीं है, अतः उसमें राजशब्दकी कर्तृरूप गुणविधायकता युक्त है, यह भाव है। * पूर्वोंकत तीन विकल्पोंमें से तृतीय दिकल्पका इस अ्रन्थसे परिदार करते हैं। कर्तृत्वरूपसें। राजामें विधेयताके न होनेपर भीं राजाकां ही राजसूय यज्ञमें अधिकार सिद्ध होता है, क्योंकि/: राजशब्दकी सत्निधिसे स्वाराज्यकामशब्द क्षन्नियपरक है, ऐसा स्त्रभांवतः ज्ञात हो सकता है, अन्यथा राजपद व्य्थे होगा, इस अभिप्रायसें जिनके मतमें राजाकी कर्तृत्वरूपसे विधिं नहीं मानी जाती है, उनके मतमें, यह अर्थ हैं। क्योंकि विद्याके हेतु यज्ञ आदिमें जैसे शूद्का निषेध है, वैसे क्षत्रिय और वैश्यका निषेध नहीं है, अतः ब्राह्मणके समान उनका भी अधिकार है, यह भाव है।

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विद्यार्थ कमोंमें झुद्रका अनधिकार] भापानुवादसहित ४३५

कारपर्यवसानमित्युपपद्यते। अन्यत्र त्रैवर्णिकाधिकारिकत्वेन क्लप्ाना- मिहापि त्रैवर्णिकाधिकारात्मविद्यार्थत्वेन विधीयमानानां यज्ञादीनां त्रैवर्णि काधिकारित्वस्य युक्ततया विधिसंसर्गहीनत्राह्मणपदसमभिव्याहारमात्रा- दधिकारसंकोचासम्भवेन ब्राह्मणपदस्य यथाप्राप्तविद्याधिकारिमात्रोपलक्षण- त्वौचित्याद्॥। ३ ॥ वैदिकत्वात्तु विद्याया: शूद्रस्यानधिकारिता। विद्याके वैदिक दोनेसे-वेदगम्य दोनेसे-उसमें शूद्का अधिकार नहीं है। ननु विद्याधिकारिमात्रोपलक्षणत्वे शुद्रास्यापि विद्यायामर्थित्वादि-

लाभ होता है अतः त्रासणका+ही अधिकार फलतः सिद्ध होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिन यज्ञोंमें तीनों व्णोंका अधिकार कर्मकाण्डमे निश्चित किया गया है, चे ही यज्ञ प्रकृत विविदिपा वाक्यमें आत्मज्ञानके, जिनमें कि तीनों वर्ण अधिकृत हैं, उत्पादन के लिए-विधीयमान हैं, अतः उनमें तीनों वर्णोंका अधिकार युक्तियुक्त हेोनेसे विधिसंसर्गसे* हीन ब्रा्मणपदकी सन्निधिसे अधिकारका सककोच नहीं हो सकता है, अतः 'ब्राक्मणा विविदिपन्ति' इस श्रुतिमें न्राक्मणशब्द यथाप्राप्त सामान्य विद्याधिकारीका उपलक्षण है, यही मानना उचित है॥ ३॥ + अब शका होती है कि यदि विविदिपावाक्यमें ब्राह्मणशव्दको विद्याधिकारीमात्रका उंपलक्षण माना जाय, तो शुद् भी विद्यामें अभिलापा आादि कर सकता है, अतः वह भी विद्याके उपयुक्त कर्मोंमें अधिकृत होगा?

• विधियंगर्गद्दीन अर्यात् उद्देश्यके समर्पण द्वारा अथवा विधेयके समर्पण द्वारा विधि- धाक्यार्थके अन्ययवोधमें म्ाह्यणशब्द अनुपयोगी है, राजसूय यक्षका अन्यत्र विधान न होनेसे वर्णन्रयाधिकारता उसमें वल्प्त नहीं है, अतः विधिसंसर्गह्ीन राजपदके समभिव्याहारसे राजसूयवाक्यमें राजकतृताका नियम है। यदि शङ्ता हो कि उक्त प्रकारसे विद्यार्थ कर्मोंमें क्षत्रिय और वैश्यके समान म्राहाणका भी अधिकार सिद्ध ही है, तो म्राह्मण भ्रहण व्यर्थ है, तो युक नहीं है, क्योंकि विद्यार्थ कर्मोंमें व्राप्मणका मुख्य अंधिकार है, एसा सूचित करनेके लिए मादाणका प्रहण है, यह भाव है। मे. शकतका तात्पर्य यह है कि विद्या तो विधेय नहीं है, अतः उसमें अधिकार विद्यार्थितवरूंप ही होगा, और यद अर्थित्वरूप अधिकार शूद्रको भी हो सकता है, इसलिए क्षत्रिय आदिके समान शूद्रका भी विद्यार्थ करमोंमें अधिकार निधृत्त नहीं कर सकते हैं।

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४३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

सम्भवेन तस्यापि विद्यार्थकर्माधिकारप्रसङ्ग इति चेद्, न; 'अध्ययन- गृहीतस्व्राध्यायजन्यतदर्थज्ञानवत एव वैदिकेष्वधिकारः' इत्यपशद्राधिकरणे (उ० मी० अ० १ पा० ३ सृ० ३४) अध्ययनवेदवाक्यश्रव्णादिविधुरस्य शूद्रस्य विद्याधिकारनिपेधात्। 'न झद्राय मति दद्याद्' इति स्मृतेरापा- ततोऽपि तस्य विद्यामहिम्नाऽवगत्युपायासम्भवेन तदथित्वानुपपत्तेश तस्प विद्यायामनधिकारादिति केचित्। केचित् पौराणिके ज्ञाने तस्याप्याहुरधिक्रियाम् ॥८॥ कोई लोग पौराणिक ज्ञानमें शुद्रका भी अधिकार मानते हैं। ८ ॥ अन्ये त्वाहु :- शद्रस्याप्यस्त्येव विद्यार्थकर्माधिकार, तस्य वेदानु

ो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विधिवत् अध्ययनसे [वेदसे ] उत्पन्न होने- वाले जानसे युक्त पुरुपको ही वैदिक क्मोंमं अधिकार है, अन्यका नहीं, इस प्रकार अध्ययनसे प्राप्त वेदवार्क्योंके श्रवणसे रहित शृद्रका अपशद्राधिकरणमें । विद्यामें अधिकारनिषेव किया गया है और 'न शुद्धाय नति दद्यात्' (शद्को शास्त्रार्थ ज्ञान नहीं देना चाहिए) इस प्रकार की स्मृतिसे साधारणरूपसे भी विद्याकी महिमासे अर्थात् विद्यारूप त्रह्मपापितके साधनले ज्ञानसावनका असन्मव होनेसे शुद्मं विद्यार्थिता ही नहीं हो सकती हे, अतः शदका विद्या्में अधिकार है ही नहीं, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। अन्य कुछ लोग कहते हैं कि शूदका भी विद्याके उपयोगी कमोंमें अधिकार है। यद्यपि शूद्का वेदाध्ययन और अगनिहोत्र आदिमें अविकार नहीं

• 'शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदादवणात् सूच्यते दि' इस सृत्से आरच्य अधिकरण अप- शुद्राधिकरण कहलाता है, इसनें निर्णय किया गया है कि झृद्का ध्रुतिप्रतिपादित सगुण विद्यामें और निर्गुण ब्रह्मविद्याके साघन वक्ष आदिने अधिकार नहीं है, क्योंकि उसने वेदाध्ययन नहीं किया है। और वेदार्थानष्टानमें अध्ययनविधिसे सम्पादित वेदजन्य ज्ञान अपेक्षित है, अतः सगुण और निर्गुण म्रह्मविद्यामें शूद्रका अधिकार है दी नहीं, इसीलिए तस्माच्ूदो यक्ेऽन- चवलप्त: (तै-सं) 'शूद्रो विद्यायामनववलप्तः' ये उक्तार्यमें प्रनाणभून भी है। *'शूद्रका भी विद्यार्थ कर्मोंमें अधिकार प्रमक होगा' इसे हटापति मानकर उक आरपका समाधान करते हैं।

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विद्यार्थ कर्मोमे शूद्र का अनधिकार ] भापानुवादसहित ४३७

वचनाग्रिहोत्राद्यम्भवेि ण्ठोर्ववर्णाधिकारश्री पश्चाक्ष मन्त्रराज वविद्या दिजयपापक्षय हेतुतपोदानपांकयज्ञादिसम्भवाद; 'वेदानुचचनेन यज्ञेन दानेन' इत्यादिपृथकारकविभक्तिश्रुतेः विधुरादीनां विद्यार्थजपदानादिमात्रानुष्ठाना- नुमतेश्च वेदानुवचनादिसमुच्चयानपेक्षणात्। न च शूद्रस्य विद्याया- मर्थित्वासम्भनः ।

है, तथापि जिनमें सब वर्णोके अधिकारका प्रतिपादन किया गया है, ऐसे श्रीपश्चाक्षररूप मन्त्राधिराज विद्या आदिका जप, पापक्षयके हेतुभूत तप, दान, पाकयज्ञ आदिमें अधिकार है और 'वेदानुवचनेन' (वेदाध्ययनसे), 'यज्ञेन' (यज्ञसे ) 'दानेन' (दानसे) इत्यादि अलग अलग कारकविभक्तिका श्रवण होनेसे विधुर आदिको विद्यार्थ जप, दान आदिके अनुष्ठानकी अनुमति होनेसे वेदानुवचन आदिके समुच्चयकी अपेक्षा नहीं है। और शुद्रकी विद्यामें अर्थिता (अधिकारिता) नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि

कि तस्य वहुगिर्मन्त्रै: कि तीर्थ: कि तपोधरेः। यस्यों नमः शिवायेति मन्त्रो हृदयगोचरः ॥ मन्त्राधिराजराजो यस्ाववेदान्तशेसरः। सर्वज्ाननिधानय सोऽयं शेवपरक्षरः॥ प्रणवेन बिना मन्त्रः सोडयं पयाक्षर: स्मृतः । स्रीमिस्यृद्रेय सद्वीर्णध्यायते मुक्िकादिक्षभिः ।(ब्रह्मोत्तर खण्ट) अर्थात् इन प्रमाणोंसे यह प्रतीत होता है कि जिसफे हृदयमें ॐ नमः शिवाय यह मन्त्र है, उसको अनेक मन्धोंसे, अनेक तीर्थोसे एवं अनेक प्रकारके तप और यशोंसे कुछ भी प्रयोजन नहीं है। यह सब मन्तोंका अधिराज है, सव चेदान्तोंका मूर्धन्य है, सच ज्ञानोंका खजाना है। और यह'ॐ नमः शिवाय' मन्त्र यदि ग्रणम (ॐ कार) से रहित हो, तो इसे पशाक्षर कहते है, दसी पश्चाक्षर मन्त्रको मुक्तिके अभिलापी स्त्री, शूद्र आदि तथा सकीर्ण जातिके लोग मुधिके लिए भजते हैं। 'वेदानुवचनेन विविदिपन्ति' 'यज्षेन विविदिपन्ति' इत्यादि रूपसे प्रत्येकमें साधनताकी प्रतीति होनसे समुचयकी अपेक्षा नहीं है, यदि समुचयकी विवक्षा होती, तो 'चेदानुवचनयज्ञदान- तपोभिर्धिचिदिपन्ति' ऐसा वाक्य होता और पृथक् कारकविमकतिके श्रवणमें भी वेदानुवचनेन च, यशषेन च, इत्यादि चकारघठित वाक्य होता, अतः समुचयफी विवक्षा नहीं है, यह भाव है।

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४३८ [तृतीय परिच्छेद

'आवयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः'। इतीतिहासपुराणश्रवणे चातुर्वर्याधिकारस्मरणेन पुराणाद्ययगतविद्या माहात्म्यस्य तस्यापि तदर्थित्वसम्भवाद्। 'न शुद्राय भ्ति दद्याद' इति

तस्य स्व्वर्णधर्मस्याप्यवगत्युपायासम्भवेन 'शद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजाति- स्तस्यापि सत्यमक्रोधवशौचमाचमनार्थे पाणिपादक्षालनमेवेके श्राद्धकर्म सृत्यभरणं स्वदारतुष्टिः परिचर्या चोत्तरेपाम्' इत्यादितद्ूर्मविभाजक्-

'श्रावयेत्०' (ब्राह्मण चार वर्णोंका पुराण आदि सुनावे, यदि क्षत्रिय आदिको पुराण आदि सुनाना हो तो ब्राह्मणको आगे करे) इस प्रकार स्मृति, पुराण और इतिहासके श्रवणमें चारों वर्णोंका अधिकार प्रतिपादित हेनेसे जिस शूदने पुराण आदिसे विद्याका माहात्म्य जाना है, ऐसे शूद्रको भी विद्याकी अधि- कारिता प्राप्त हो सकती है। 'न शूदाय' इस प्रकारकी पूर्वोक्त स्मृति शूद्के अनुष्ठानके अनुपयोगी अगनिहोत्रादि कर्म, ज्ञान और दानका निषेध करनेवाली है। यदि सम्पूर्ण शास्त्रविषयक ज्ञानके निषधमें ही 'न शूद्धाय' इत्यादि वचनका तात्पर्य माना जाय, तो उसको अपने वर्णधर्मके ज्ञानका साधन भी नहीं रहेगा, इससे 'शुद्श्वतुर्थों वर्ण:०' अर्थाद शूद्ध चौथा वर्ण है, उसका एक ही जन्म है (क्योंकि उपनयनरूप द्वितीय जन्म उसका नहीं है) उसका भी सत्य, अक्रोध, शुद्धता किसीके मतसे आचमनकी जगहमें हाथ और पैरका प्रक्षालनमात्र, श्राद्धकर्म, भृत्य, स्त्री आदिका पोषण, अपनी समानजातीय ार्यासे निर्वाह और ऊपरके ब्राह्मण आदि तीनवर्णोंकी

*गौतम धर्मसूत्रके दशम अध्यायमें ४९ वें सूत्रसे इस शूद्धधर्मका विभाग किया गया है, तात्पर्य यह है कि यद्यपि 'न शूदाय मति दद्याव्' इत्यादि शास्रसे शूद्धोंको शास्रारयज्ञानका दान निषिद्ध भासता है, तथापि वृद्धो च मातापितरौं भार्या साध्ी सुतः शिछुः। अप्यकार्येशतं कृत्वा भतेव्या मनुरववीद्। इत्यादि वचनके अनुसार जो न्राह्मण अपने माता, पिता, सती खी, और पुत्र आदिका पोषण करनेके लिए शद्धोंके प्रति पुराण आदिके पठनमें प्रवृत होते हैं उनसे इदोंको अपना कर्तव्य और विद्यामाहात्म्य अवश्य ज्ञात हो सकता है, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं हैं, यह भाव है।

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विद्यार्थ कमोंमें शुद्रका अनधिकार] भापानुवादसहित ४३९

वचनानामननुष्ठानलक्षणाप्रामाण्यापत्तेः। न चैवं सत्यपशद्राधिकरणस्य निर्विपयत्वरम्। तस्य- 'न शद्रे पातकं किंचित् न च संस्कारमईति।' शद्रस्य सगुणविद्यासु निर्गुणविद्यासाधनवेदान्तश्रव्णादिपु चाधिकारनिषेधपरत्वाद् निर्गुणविद्यारयां शूद्रस्यापि विपयसौन्दर्यप्रयुक्तार्थित्वस्य निषेद्धुमशक्य-

सेवा) इत्यादि शद्धधमोंके विभाजक वचनोंका अननुष्ठानात्मक अमामाण्य प्रसक्त होगा। यदि शक्ञा ह कि उक्त प्रकारसे यदि शुद्रका भी विद्याके उपयोगी कर्मोमें अधिकार माना जाय, तो अपशुद्धाधिकरण निर्विपयक अर्थात् व्यर्थ-सा होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस अधिकरणका- 'न शूद्धे पातकं किश्िन्०' (शूद्रको अभक्ष्यभक्षण आदिसे कोई पाप नहीं होता है और अध्ययनाऊ उपनयनात्मक संस्कार अथवा विद्याङ्क उपगमना- स्मक संस्कार भी उसके नहीं होते हैं) इत्यादि स्मृतिसे गुरूपसदनात्मक* विद्याके प्रति अन्रभूत उपनयनरूप संस्कारसे रहित शुद्धका सगुण विद्यामें और निर्गुण विद्याके साधन वेदान्तके श्रवण आदिमें-अधिकारके निपेधमं ही तात्पर्य है, इससे निर्गुण विद्यामें विपयकी सुन्दरतासे होनेवाली शुह्की अर्थिताका निषेध नहीं कर सकते हैं। निर्गुण विद्याके विधेयों न होनेसे उससे भिन्न अधिकारिताकी प्रसक्ति नहीं है, अतः निर्गुण विद्याम विषयसौन्दर्यप्रयुक्त अर्थित्वका निषेध

  • अपश्ह्धाधिकरणमें शुद्रका विद्यामें अनधिकार वतलाया गया है, विद्यामें उपयुक करमोमें शदका अधिकार नहीं है, यह चतलानेके लिए नहीं है, किन्तु वेदान्तके धवण आदिमें शुद्धका अधिकार नहीं है, इस प्रकार प्रपिपादन करता है, इस सभिप्रायणे 'तस्य न मृद्रे' इत्यादि प्रन्थसे परिदार करते हैं। *. दिम्परूपे सगोफार करके अपने समीपम स्थापनरूप विद्यास उपनयन आचार्य करता है, इस उपनयनको गुरुपग्रदन इसलिए कहते हैं कि वद शिष्यकर्तृक गुरूपसदनपूर्वक है, 'तदिज्ञानार्थ रा गुरुमेवोपगच्छेत' (मक्षके जाननेके लिए गुरुजीके पास जाना चाहिए.) एष भ्ुतिरे विदयाअरुपसे गुरूपसदनका विधान है 'तं दोपनिन्ये' (उसका उपनयन किया) इय क्षुतिसे विदयाप्ष उपनयन भी प्रतीत होता है। + स्वर्गानुमवके समान प्रमानन्दरूप निर्गुण विद्याफे फलरूप होनेसे उसमें विधेयता नहीं है, क्योंकि जो फल होता है, वह विधेय नहीं होता, इसलिए जैसे स्वर्गानुभव आदि फलमें स्वर्गार्धितामात्र अधिकार हे, चैसे निर्गुण विद्यामें भी निर्गुणविद्यार्थितारूप ही अधिकार है,

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४४० सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

त्वात्। अविधेयायां च तस्यां . तद्तिरिक्ताधिकाराप्रसक्त्या तन्निपेधा- योगाच। न च तस्य वेदान्तश्रवणासम्भवे विद्यार्थकर्मानुष्ठानसम्भवेऽपि विद्यानुत्पत्तेस्तस्य तदर्थकर्मानुष्ठानं व्यर्थमिति वाच्यम्, तस्य वेदान्त- श्रव्णाधिकाराभावेपि भगवत्पादैः-'श्रावयेच्चतुरो वर्णान्' इति चेतिहास- पुराणाधिगमे चातुर्वर्ण्याधिकारस्मरणाद् वेदपूर्वस्तु नास्त्यधिकारः शुद्रा णामिति स्थितम्' इति अपशुद्राधिकरणोपसंहारभाष्ये ब्रह्मात्मैक्यपर- पुराणादिश्रवणे विद्यासाधनेऽधिकारस्य दर्शितत्वाद्। विद्योत्पत्तियोग्य- नहीं कर सकते हैं। यदि शङ्का हो कि शूद्का वेदान्तके श्रवणमें अपशूद्धा- धिकरणन्यायसे अधिकार न होनेके कारण विद्यार्थ जपादि कर्मोंका अनुष्ठान करनेपर भी विद्याकी उत्पत्ति नहीं होगी, इसलिए विद्याके लिए किया गया कर्म निरर्थक ही है? तो यह मी युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि वेदान्त श्रवणमें शूद्का अधिकार नहीं है, तथापि 'श्रावयेत् चतुरो वर्णान्' इस प्रकार इतिहास और पुराणके ज्ञानमें चारों वणोंके अधिकारप्रतिपादक स्मृतिवचन होनेसे शूद्धोंका वेदपूर्वक ही अधिकार नहीं है, यह बात ज्ञात होती है, इस प्रकारके अपशद्राधिकरणके उपसंहारभाष्यमें भगवान् श्रीशङ्कराचार्यने जीव-ब्रह्मके ऐक्यबोधक पुराण आदिके श्रवणमें, जो कि ब्रह्मज्ञानका साधन है, अधिकार बतलाया है। विद्याकी उत्पत्तिमें योग्या शुद्ध दिव्य शरीरके उसका निषेध नहीं कर सकते हैं, क्योंकि विधेयभूत उपासना आदिमें अन्य अधिकारि विशेषणकी अपेक्षा होती है, इसलिए दष्टान्त विषम है, यह भाव है। * यद्यपि 'श्रावयेत् चतुरो वर्णान्' इस वचनसे शूद्रको पुराण आदिके श्रवणमें आज्ञा मिलती है, तथापि, मनन आदिमें आज्ञाके न होनेसे मनन आदिका अनुष्ठान नहीं हो सकता है, यदि शङ्का हो कि मनन आदि तो श्रवणके अङ्ग ही है, अतः उनका अज्गीके अस्यनुज्ञानसे ही अभ्यनुज्ञान होगा? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रयाज और दर्शपूर्णमासके समान प्रकृतमें अभ्ञात्ति- भाववोधक प्रमाणके न रहनेसे श्रवण, मनन आदिमें परस्पर अज्गात्विभावव्यवहार केवल औपचारिक ही प्रतीत होता है, इसलिए शूद्रका अद्वैतवेदान्तश्रवणमें अधिकारके न रहनेपर भी उससे विद्याकी उत्पत्ति नहीं होनेके कारण विद्यार्थ कर्मोंके अनुष्ठानका नैरर्थक्य ज्यों का त्यों है, इस अस्वरससे इस अन्थकरा उपक्रम है। अथवा 'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुप वृंदयेत्' (इतिहास और पुराणोंसे वेदका उपबृंद्दण करे अर्थात् मीमांसानुसारी इतिहास और पुराणोंके वचनानुसार यथार्थ निर्णातार्थमें वेदका स्थापन करे) इत्यादि वचनोंसे इतिहास आदिका ब्रह्मात्मैक्यवोधकभाग वेदान्तश्रवणजनित वेदान्तार्थ ज्ञानका उपकारकमात्र प्रतीत होता है, वेदान्तश्रवणकी उपेक्षा करके स्वतन्त्ररूपसे ्रंह्मात्मैक्यज्ञानजनक. प्रतीत नहीं होता है, इसीसे

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विद्यामें संन्यासकी उपयोगिताका निरूंपण] भापानुवादसहित ४४१

विमलदेवशरीरनिष्पादनद्वारा मुक्त्यर्थत्वं भविष्यतीति त्रैवर्णिकानां क्रम- मुक्तिफलकसगुणविद्यार्थकर्मानुष्ठानवद् वेदान्तश्रवणयोग्यत्रैवर्णिकशरीर- निष्पादनद्वारा विद्योत्पत्यर्थत्वं भविष्यतीति शुद्रस्य विद्यार्थकर्मानुष्ठाना- विरोधाच्च। तस्मात् विविदिपावाक्ये घ्राह्मणपदस्य यथाप्राप्तविद्याऽधि- का रिमात्रविपयत्वेन शुद्रस्याऽपि विद्यार्थकर्माधिकार: सिध्यत्येवेति ॥४॥ सन्न्यासस्याSन किन्द्वारेणोपयोग :- विद्यामे संन्यासका किस द्वारा उपयोग है? नन्वस्तु कर्मणां चित्तशुद्धिद्वारा विद्योपयोग, सन्न्यासस्य किंद्वारा तदुपयोगः १।

उत्पादन द्वारा सगुण ब्रह्मकी उपासना भी मुक्तिके लिए होगी, इस प्रकारके निश्चयसे तीनों वणोंका सगुण विद्याके लिए जिसका क्रमिक सुक्ति ही फल है, कर्मानुषान जसे होता है, वैसे ही वेदान्तश्रवणके लिए योग्य त्रैवर्णिक शरीरके निप्पादन द्वारा हमारे द्वारा किये गये धर्म विद्याकी उत्पत्तिमे हेतु होंगे, इस प्रकारके निश्वयसे शुद्का विद्याके लिए कर्मोंके अनुष्ठानमें कोई विरोध नहीं है। इससे विविदिपाचाक्यमें व्रासणशव्द सामान्यतः प्राप्त सम्पूर्ण विद्याघिकारीके लिए ही प्रयुक्त है, इसलिए शूद्का भी न्रह्मज्ञानमें हेतुमृत कर्मोंमें अधिकार सिद्ध ही है।। ४ । अब शक्ा होती है कि कर्म चित्तशुद्धिके द्वारा ब्रह्विद्यामें उपयोगी भले दी हों, परन्तु संन्यासका बदाविद्यामें किस द्वारा उपयोग है? [अर्थात् अदृष्ट उक्त वचनका पूर्वार्ध-'विभेत्यल्पधुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति' समत होता है। इस पूर्वार्धका यद भाय हे-जिय पुरुपने केवल चेदका ही विचार किया है और इतिहास तथा पुराण नहीं देसे हैं, ऐये पुरुपसे चेद उरता है कि यह अल्पश्रुत पुरुष मुझे मार डालेगा अर्थात मेरे विचार- रूप मीमासमें न्यायाभासत्वादिशक्काये हमारा अन्य अर्थ करेगा। इस अवस्थामें वेदान्तश्रवणसे · रहित यृद् कदाचित् पुराणादि विजञान सम्पादन करे, तथापि उससे उसको ज्ञान नहीं हो सकता है। 'आवयेत् चतुरे वर्णान्' इत्यादि वचन भी शद्रके अद्वैतपरक पुराण आदिका श्रत्रण अद्याथर्क है इस अभ्यनुशापरंक है। अपशृद्ाधिकरणके भाप्यमें भी सृद्का अह्वैतं प्रतिपादक पुराणादिश्रवणमें अधिकारका वर्णन 'चिभेत्यल्पश्नुताद्' इत्यादि वचन नहीं है, यह मान कर ही किया गया है, अतः माप्यसे विरोध भी नहीं है। इसलिए वेदान्तअ्रवणमात्रसे साध्य विद्या श्रवण आदिकें अभावमें शूदरो सिद्ध नदीं हो सकती है, इस अस्वरससे यह 'विद्योत्पत्तियोग्य' इृत्यादि ग्रन्थ है, यह माघ है। ५६

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[तृवीय परिच्छेद ४४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह

अन्र कचन ।

इस विपयमे कुछ लोग कहते हैं कि जिस पापका कर्मसे विनाव नहीं होता है, उस पापके विनाश द्वारा सन्यास विद्यामें उपयोगी है।। १॥ केचिदाहु :- विद्योतपत्ति प्रतिबन्धकदुरितानामनन्वत्वात् किन्चिद् यज्ञाद्यनुष्ठाननिवत्यम्, किश्चित् सन्न्यासापूर्वनिवत्यमिति कर्मवच्चित- शुद्धिद्वारैव्र सन्न्यासस्याऽपि तदुपयोगः । तथा च गृहस्थादीनां कर्मच्छि- द्रेषु श्रत्रणाद्यनुतिष्ठतां न तस्मिन् जन्मनि विद्यावाप्तः, कि जन्मान्तरे द्वारा संन्यास ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है या दष्टद्वारा? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि विद्याकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक पापोकी यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे उत्पन्न अदृष्टसे ही निवृत्ति होती है, अतः संन्यास निरर्थक ही है, द्वितीय पक्ष मी युक्त नहीं है, क्योंकि कोई दष्ट द्वार देखा ही नहीं जाता है, अतः संन्यासका विद्यामें कोई उपयोग नहीं है, यह आक्षेपकर्ताका अभिाय है।] # इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं-त्रह्मविद्याके प्रादुर्भावमें प्रतिबन्धक अनेक पाप हैं, अतः उनमें से कई एक चज् आादिके मनुष्ठानसे निवृत्त होते हैं और कई एक संन्यासजनित अपूर्वसे निवृत्त होते हैं, + इस- लिए संन्यास भी चित्तकी शुद्धि द्वारा ही न्रह्मविद्यामें उपयोगी है। इस परिस्थितिमं गृहस्थ आदि कमोंके अवकाश कालमें अ्रवंण सादिका अनुष्ठान भले ही करें, तयापि उस जन्ममें उनको ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति नहीं होती है, किन्तु

  • अदष्ट द्वारा संन्वास विद्यानें उपयोगी है, इस मतंका इस अन्यसे समर्थन करते हैं। यदि इसमें किसीको राड्ठा हो कि सन्यासनन्य सपूर्व विद्याकी सत्पतिमें हेतु नहीं है, क्योंकि जिन्होंने संन्यास नहीं लिया है, उनमें से कोई एक विद्याके द्देशसे श्रवण सदिका लनुषान करते हैं, और कई एकको संन्यासके बिना ही विद्या भी हुई है, ऐमा देखा जाता है। इस रहाचा 'तथा च' इससे परिहार किया जाता है। विद्याके पति संन्यासका दट द्वार नहीं देखा जाता है, अतः संन्यासविधिसे अदष् द्वारा ही विद्याप्राप्तिके प्रति संन्यासकी हेतुता सिद्ध होनेसे, यह अर्थ है। यदि शट्ठा हो कि संन्यानका भी चित्तविक्षेपनिवृत्तिरूप हट द्वार हो सकता है, क्योंकि विक्षिसचित पुरुपको न्रह्मज्ञान नहीं हो सकता है, तो यह भी चुक नहीं है, क्योंकि लौकिकवैदिक-कर्म करनेवाले पुरुपका भी चित्तविक्षेप प्रायः नहीं देखा जाता है, सतः संन्यास ही चित्तविक्षपकी निवृत्तिमें कारण नहीं हो सकता है, यह साव है।

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विद्यामे संन्योसकी उपयोगितांका निरूपण] भापातुवादसहित

सन्न्यासं ल्ध्वैव। येपां तु गृहस्थानामेव सतां जनकादीनां विद्या विद्यते, तेपां पूर्वजन्मनि सन्न्यासात् द्विद्याजवाप्तिः। अतो न विद्यायां

अन्ये त्वहष्टद्वारेण श्रवणेऽस्याडङ्गतां जगु: । कुछ लोग कहते हैं कि अदष्ट द्वारा संन्यास श्रवणमें अङ्ग है। अन्ये तु 'शान्तो दान्त उपरतः' इत्यादिश्रुतौ उपरतशब्दगृहीततया सन्न्यासस्य साधनचतुष्टयान्तर्गतत्वात्, 'सहकार्यन्तरविधिः' इति (उ० भी० अ० ३ पा० ४ सू० ४७) सूत्रभाष्ये 'तद्तो विद्यावतः सन्न्या-

दूसरे जन्ममें संन्यास लेकर ही न्रद्मविद्याकी प्राप्ति होती है। जिन जनक प्रभृति गृहस्थाश्रमियोको ही न्रह्मविद्याकी प्राप्ति हुई है, उनको पूर्व जन्मके संन्याससे व्रद्ाविद्याकी प्रप्ि हुई है, ऐसा समझना चाहिए। इसलिए संन्यासजनित अपूर्वका न्रप्मविद्यामें व्यभिचार नहीं है। * कुछ लोग कहते हैं कि 'शान्तो दान्त उपरतः' (शमसे युक्त, दमसे युक्त, और नित्यकमोंके त्यागसे युक्त) इत्यादि श्रुतिमें संन्यासका उपरतिशन्दसे कथन होनेके कारण, वह साधनचतुष्टयके अन्तर्गत ही है, अतः 'सहकार्यन्तर- विधिः' इस सूत्रके भाप्यमें-'तद्वतो' अर्थात् श्रवण आदिके अनुषानमें उपयोगी सामान्यज्ञानसे युक्त संन्यासीके लिए वाल्य और पाण्डित्यकी

•संन्यासके अट्टद्वारफत्यपक्षका अवलम्बन करके ही संभ्यासापूर्वका श्रवण आदिके अधिकारीके विशेपणरूपसे विद्यामें उपयोग है, इसे सप्रमाण साित करते हैं। 'शान्तो दान्त उपरतः' के आगे 'तितिक्षुः समाहितः श्रद्वावित्तो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत' इतना और श्रुतिका भाग है। शम :- आन्तर इन्द्रियोंका निद, दम :- वाह इन्द्रियोंका निग्रह्, उपरति :- नित्यकमोंका त्याग, तितिक्षुः-शीतोप्णादि-दवन्द्वसहिप्णु अर्थात् शीतोष्णजन्य दुंःखादिका • सहन करनेवाला, समाहित :- भ्रवण आदिके लिए अपेक्षित चित्तकी एकाग्रता, श्रद्धावित्त-देवता, वेदान्तवाक्य आदिमें विश्वास ही द्रव्य जिसका है, ऐसा होकर अपने कार्यकारणसंघातमें कार्यकरणसंघातके साक्षीरूप आत्माको 'में आत्मा हूँ' इस प्रकार देखे, यह उक् श्रुतिका अर्थ है। वद्यपि 'शान्तो दान्तः' इस प्रकार शम और दमकी विधायक श्रुतिये ही कर्ममात्रका निवारण हो सफता है, इससे उपरतिविधायक अभिम श्रुति व्यर्थसी भासती है, तथांपि वह व्यर्थ नहीं है, क्योंकि राम, दम विधायकश्षुतिके सामान्य होनेसे उसका नित्यकर्मविधायक विशेपशास्त्रसे वाध हो सकता है, अतः उपरतिविधायकश्षुतिकी आवश्यकता है।

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सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेदं

सिनो वाल्यपाण्डित्यापेक्षया तृतीयसिदं मौनं विधीयते, 'तस्मात् ब्राह्मण: पाण्डित्यम्' इत्यादिश्चुतौ ततः प्राग् 'भिक्षाचर्यचरन्ति' इति 'सन्न्यासाधिकाराद्' इति प्रतिप्रादनाद, 'त्यक्ताशेपक्रियस्यैच संसारं प्रजिहासतः । जिज्ञासोरेव चैकात्म्यं त्रय्यन्तेष्वधिकारिता।।' इति वार्तिकोक्तेश् सन्न्यासापूर्वस्य ज्ञानसाधनवेदान्तश्रवणाद्यधिकारि- विशेषणत्वमिति तस्य विद्योपयोगमाहुः। दृष्टेन निर्विक्षेपेण नियमं त्वितरे वुधाः ॥१०॥ कई एक विद्वान् कहते हैं कि विक्षेपाभावरूप हष्ट द्वारा अर्थात् अनन्यव्यापारता- · रूप दष्टद्वारा संन्यासका विद्यामें उपयोग है ॥ १० ॥। अपरे तु 'श्रवणादङ्गतयाऽऽत्मज्ञानफलता सन्न्यासस्य सिद्धा' इति

(श्रवण और मननकी) अपेक्षा तीसरे निदिध्यासनका विधान किया जाता है, क्योंकि 'मृतकालीन व्रक्माणोंने साधारणरूपसे आत्माको जानकर तत्त्वसाक्षा- तकारके लिए संन्यासका ग्रहण किया था, इससे आधुनिक मुमुक्षु ब्राह्मण मी सैन्यासका अहण करके श्रवण आदिका अनुष्ठान करें' इस प्रकारकी श्रुतिमें 'तस्मात् ब्राम्मणः इसके पूर्व 'भिक्षाचर्या चरन्ति' (भिक्षावृत्तिका अनुष्ठान करते हैं) इस तरह संन्यासका अधिकार है-ऐसा प्रतिपादन किया गया है। और * 'त्यक्ताशेप०' (जो ऐहिक आमुष्मिक विषयभोगका त्याग करनेकी इच्छा रखता है, जो सम्पूर्ण नित्यनैमित्तिक क्रियाओंका परित्याग करके स्थित है और जो जीव ब्रह्मके ऐक्यको जाननेकी इच्छा करता है, उसीका वैदान्तशास्त्रोंमें अधिकार है) इस प्रकार वांर्तिककारकी उक्तिसे ज्ञात होता है कि संन्यासजनित अपूर्वका ज्ञानके प्रति साधनभूत वेदान्तके श्रवण आदिमें अधिकारीके विशेषणरूपसे कथन है, अतः संन्यासका विद्यामें ही उपयोग है। कुछ लोग कहते हैं कि 'श्रवण मादिके अद्ग होनेके कारण संन्यासका

  • सम्बन्ध वार्तिकके १० वें पृष्ठमें यह श्लोक है [आनन्दाश्रम, पूना भुद्रेत ]। *संन्यासका दष्ट द्वारा विद्यामें उपयोग है, इस द्वितीय पक्षका अवलम्बन करके उसका समर्थन करते हैं। 'श्रवणावक्तया' इत्यादि विवरणका तात्पर्य, यह है कि कुछ समयके लिए अनुष्ठित श्रवण विद्योदयद्वारा अमृतत्वका साधन नहीं हो सकता, किन्तु सर्वदा करिया हुआ

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विद्यामें संन्यासकी उपयोगिताका निरूपण ] भापानुवादसहित ४४५

विवरणोक्तेरनन्यव्यापारतया श्रव्रणादिनिप्पादनं कुर्वतस्तस्य विद्यायासु- पयोगः, दृष्टद्वारे सम्भवति अदष्टकल्पनायोगात्। यदि त्वनलसस्य धीमतः पुरुपधौरेयस्याऽडश्रमान्तरस्थस्याऽपि कर्मच्छिंद्रेपु थवणादि सम्पद्यते, फल ब्रह्मज्ञान सिद्ध ही है' इस प्रकारकी विवरणकारकी उक्तिसे अनन्य- व्यापाररूपसे श्रवण आदिकी उत्पत्ति कराता हुआ सन्न्यास विद्यामे ही उपयोगी है, जब दृष्ट द्वार मिल सकता है, तब तो अदष द्वारकी कल्पना करना अयुक्त ही है। यदि अन्य आश्रमस्थ होते हुए भी आलस्यरहित किसी बुद्धिमान् + धीर पुरुषको कर्मजालमें रहते श्रवण आदिकी उत्पत्ति हो

श्रवण ही अमृतत्वका (मोकका) साधन होता है, क्योंकि 'म्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' 'आसुप्े- रामृते: कालं नयेद्वेदान्तचिन्तया'इत्यादि भनेक श्रुति और स्मृतियाँ हैं' इसलिए अनन्यव्यापाररूपसे भ्रव्ण आदिके अनुष्टानका विधान करनेवाला शास्त्र संन्यासकी अवश्य अपक्षा रखता है, अतः गृदस्याथमी-प्रमृति अपने आध्रमस्य कर्मोंमें सदा व्यग्र होनेके कारण श्रवण आदिका अनुष्ठान नदीं कर सकते पै, पधी प्रकार विद्याके साधनरूपरो संन्यासका विधान करनेवाला शात्त्र भी द्वाररूपये निरन्तर श्रवण आदिकी अपेक्षा करता है, क्योंकि संन्यास साक्षात् विद्याका साधन नहीं है, और यह भी कारण है कि जब ष द्वार मिलता हो, तो अदष द्वारकी कल्पना भी नहीं की जाती है, इसमें भी श्रवण आदि तत्वफे व्यक्षक होनेसे अर्थतः प्रधान हैं और तत्वका व्यअक न होनसे गंन्यास गौण है, इस रीतिसे श्रवण आदिकी विधि और संन्यासकी विधिकी परस्पर अपेक्षा होनेके कारण एकवाकयता होनेसे उन दो वाक्योंसे संन्यासरूप अप्से युक्त मनन- निदिच्यासनसहित अवणका विधान होता है, अतः संन्यासके श्रवणास्त्वयोधक शासके न होनेपर भी कोई दानि नदीं है। अधवा उर विवरणकारके कथनका भाव यह है कि अ्रवणविधि अपने साधनरूपसे विक्षेपशी निषृति और विक्षेपनिवृततिके प्रति साधन संन्यासफी अपेक्षा करती है, क्योंकि विक्षिपचित पुष्षकी अ्रवण आदिके अनुष्ठानमें प्रृति नहीं हो सकती है। गृहस्थ आदि भी अपने विहित कमोंके अनुष्ठान कालमे अर्तिरिक कालमें भी अनेक चिपयोंसे व्यप्र होनेके कारण विक्षिप्त ही रहते हैं, और सन्यासविधिये भी, जो कि विक्षेपनिवृत्तिरूप दष्ट द्वारा श्रवण आदिका सम्पादन कराकर विद्याका सम्पादन कराती है, संन्यासका विधान होनेसे उसका चारितरथर्ये हो सकता दे, तो अटट्वारा विद्याके साधनीभूत संन्यासका विधान नहीं हो सकता, इसलिए पूर्वप्रतिपादन- प्रकारके अनुसार विद्याफे अहरूपसे संन्यासकी दी विद्या फल है, अद्ष्ट द्वारा नहीं है, यह सिद्ध रे, इसर पक्षमें 'अनन्यव्यापारतया' इसका विश्ेपनिवृतिद्वारा, यह अर्थ विवक्षित है। + विपयोंसे इन्द्रियोको टानेकी अर्थात् इन्द्रियनिग्रह करनेकी सामर्थ्य जिस पुरुपमें हे, और जो सत्यगुणप्रधान है एवं विपयोंमें दोपदर्शन जिसने किया है, ऐसे पुरुषको शांसारिक पदार्थोसे गृदस्याथममें रहनेपर भी विक्षेप नहीं हो सकता है, अतः संन्यासका फंल जो

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४४६. सिद्धान्तलैश संग्रह [ तृतीय परिच्छेद

तदा 'चतुर्ष्वाश्रमेपु, संन्यांसाश्रमपरिग्रहेणैव श्रवणादि निर्वर्तनीयम्' इति नियमोऽभ्युपेय इति ॥५॥ क्षत्रियादेरसन्न्यासाच्छ्वणादि कथ भवेद्। संन्यास न होनेके कारण श्रवण क्षत्रियादिको कैसे हो सकता है? नन्वस्मिन् पक्षद्वये क्षत्त्रियवश््ययोः कथं वेदान्तश्रवणाद्यनुष्ठानम्; सन्न्यासस्य ब्राह्मणाधिकारित्वाद् 'ब्राह्मणो निर्वेदमायाद्' 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' 'ब्राह्मणः प्रव्रजेद्' इति सन्न्यासविधिषु त्राह्मणग्रहणात्। 'अधिकारिविशेषस्य ज्ञानाय न्राह्मणग्रहः। न सन्न्यासविधिर्यस्माच्छुतौ क्षत्रियवैश्ययोः ॥' इति- वार्तिकोक्तेश्रेति चेतू, तन्न केचन सन्न्यासमाहु: क्षत्रियवैश्ययोः ॥।११॥ इस विषय कोई लोग कहते हैं कि क्षत्रिय और वैश्योंका भी संन्यास है।११॥

सकती है, तो यह नियम मानना चाहिए कि चारों आश्रमोंमें संन्यास आश्रमका अहण करके ही श्रवण आदिका सम्पादन करना चाहिए।।५।। अव शङ्का होती है कि इन दो पक्षोंमें अर्थात् संन्यासके अधिकारीके प्रति विशेषणत्व और श्रवणाज्वत्व पक्षमें क्षत्रिय और वैश्य वेदान्तके श्रव्रण आदिका अनुषान कैसे कर सकते हैं, क्योंकि ब्राह्मण ही संन्यासमें अधिकारी है, कारण कि 'ब्राह्मणो०' (ब्राह्मण ही वैराग्यपूर्वक संन्यास करे) 'ब्राक्मणो व्युत्थाय' (ब्राह्ण संन्यासका ग्रहण करके) 'ब्राह्मणः प्रनजेत' (ब्राह्मण संन्यासका ग्रहण करे) इत्यादि संन्यासके विधायक वाक्योंमें ब्राह्मणका ही ग्रहण किया गया है। और 'अधिकारिविशेषस्य०' (विशेष अधिकारीके परिज्ञानके लिए ब्राद्मण का भ्हण किया गया है, क्योंकि श्षुतिमें कहींपर भी क्षत्रिय और वैश्यकी संन्यासविधि नहीं है) ऐसा वार्तिकका वचन भी है।

विक्षेपका अभाघ है, वह संन्याससे भिन्न साधन द्वारा भी प्राप्त होता है, इसलिए विधित्सितं (विधानके लिए अभीष्ट) संन्यासकी श्रवणादिमें अपेक्षित विक्षेप-निवृत्तिके प्रति पक्षमें प्राप्ति और पक्षमें अप्राप्ति दोनों हो सकती है, अतः संन्यासविधिको अपूर्वविधि नहीं मानना चाहिए, किन्तु नियमविधि ही माननी चाहिए।

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क्षत्रिय और वैश्यका श्रवण आदिमें अधिकार ] भापानुवादसहित ४४७

अन्न केचित्-'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रघजेद्, गृहाद्वा, वनाद्वा' इत्याद्यविशेषश्रुत्या, 'न्ाम्मणः क्षत्रियो वाडपि वैश्यो वा प्रग्रजेद् गृह्दाद् । त्याणामपि चर्णानाममी चत्वार आश्रमाः।।' इति स्मृत्यनुगृद्दीततया क्षत्रियवैश्ययोरपि सन्न्यासाधिकारसिद्धे: श्रुत्य- न्वरेपु त्राह्मणग्रहणं त्रयाणासुपलक्षणम् ; अत एव वार्तिकेऽपि 'अधि- कारिविशेपस्य' इति शोकेन भाष्याभिप्रायमुक्त्ा- 'घयाणामविशेषेण सन्न्यासः श्रृयते थ्रुतौ। यदोपलक्षणाथं स्यात् न्राह्मणग्रहणं तदा ।।' इत्यनन्तरश्ोकेन सवमते क्षत्रियवैश्ययोरपि सन्न्यासाधिकरो दर्शित इति तयो: श्रवणाद्यनुष्टानसिद्धिं समर्थयन्ते। अन्ये तु आाद्ाणस्पेव सन्न्यासो बहुधा श्रुतेः । देयादियदसन्न्पासश्रवणं क्षत्रवैदययोः ॥१२॥ कुछ लोग कहते है कि अनेक क्षुतियोंसे संन्यास केवल ब्रादाणके लिए है, क्षत्रिय और नैश्यफो देवादिके समान सन्यासके विना घवण है॥ १२ ।।

इस आछपके समाधानमें कोई लोग कहते है कि 'यदि वेतरथा०' (यदि अक्षचर्य अवस्थामें ही वैरान्य उत्पन्न हुआ, तो न्रमचर्यावस्थासे ही संन्यासका परिमदण करना चाहिए अथवा गृहस्थाश्रमसे या वानपस्थसे संन्यास लेना चाहिप) इस प्ृतिसे, 'नाषणः क्षत्रियो वाडपि०' (न्राषण, क्षत्रिय अथवा वैश्य गृहस्थाश्रमसे संन्यासी हो सकते हैं, क्योंकि तीनों वणोंके लिए ये चार आथ्म हैं) इस स्मृतिके अनुगृदीत रूपसे, क्षत्रिय और वैश्यका भी संन्यासमें अधिकार सिद्ध है, अतः अन्य श्षतियोंमं न्राद्णग्रहण तीनों वणोंका उपलक्षण है, इसीलिए वार्तिकमें 'अधिकारिविशेषस्य' इत्यादिसे भाप्यके अभिप्रायको कहकर- 'नयाणाम्०' (जब कि व्राष्ण, क्षत्रिय और वैश्य तीनोंका श्रुतिमें सामान्यरूपसे श्रव्रण होता है, तब ब्राह्मणशब्द तीनों वर्णोंका उपलक्षण ही है) इस प्रकारके पीछेके श्रोफसे अपने मतमे चार्तिककारने क्षत्रिय और वैश्यके भी श्रवण आदिके अनुषानमें अधिकारका समर्थन किया है।

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४४८ सिद्धान्तलेशसंग्रह. [तृतीय परिच्छेद

अन्ये त्वनेकेपु सन्न्यासविधिवाकयेपु. ब्राह्मणग्रहणात् उदाहतजावा- लक्षतौ सन्न्यासविधिवाक्ये ब्राह्मणग्रहणाभावेऽपि अ्वत्यन्तरसिद्धूं त्राह्मणा -* धिकारमेव: सिद्धूं कृत्वा 'सन्न्यासावस्थायामयज्ञोपवीती कथं ब्राह्मणः' इति ब्राह्मणपरामशाच्च ब्राह्मणस्यैव सन्न्यासाधिकारः। विरोधाधिकरण- न्यायेन (पू० मी०अ० १ पा० ३ अधि० २) श्रुत्यविरुद्धस्यैवस्मृत्यर्थस्य माष्यका अनुसरण करनेवाले कई लोग कहते हैं कि संन्यासके विधायक अनेक वाक्योंमें ब्राह्मणशब्दके ग्रहणसे 'यदि वेतरथा' इत्यादि जावालश्रुतिके संन्यासविधायक वाक्यमें ब्राह्मणग्रहणके न होनेपर भी अन्य श्रुतिसे सिद्ध अर्थात् 'ब्राह्मणो व्युत्थाय' इत्यादि श्रुतिसे ब्राह्मणका अधिकार. निश्चित करके 'संन्यासावस्थायाम्' (संन्यासावस्थामें यज्ञोपवीत न हेनेके कारण वह कैसे ब्राह्मण हो सकता है?) इस प्रकार ब्राह्मणका परामर्श करके संन्यासमें ब्राह्मणके ही अधिकारका प्रतिपादन किया गया है। क्योंकि विरोधाधिकरण न्यायसे+ उसी स्मृतिके अर्थका परिग्रहण करना चाहिए, जो ्रुतिसे विरुद्ध

  • अंर्थात् तन्तुनिर्मित यज्ञोपवीत आदि ही ब्राह्मणत्वके व्यज्ञक है, अतः तन्तुनिर्मित यज्ञोपवीत आदिके न होनेसे यह परमहंस संन्यासी ब्राह्मण कैसे हो सकता है, यह आक्षेपका अभिप्राय है, यदि प्रकृतमें क्षत्रिय और वैश्यका भी संन्यास विवक्षित होता, तो 'कथ ब्राह्मणः' इसके समान 'कथं क्षत्रियः' 'कथं वैश्यः' ऐसा भी सुना जाता, परन्तु नहीं सुना जाता है, अतः उनका संन्यासमें अधिकार नहीं है, यह समुदितका भाव है। 4 इस अधिकरणमें श्रुति और स्मृतिके विरोधमें श्रुतिका ही प्रामाण्य अज्ञीकार किया गया है, जैसे कि ऐन्द्र यागमें सुना जाता है कि 'औदुम्वरी स्पृश्वोद्रायेत' और 'औदुम्बरी सर्वा वेष्टयितव्या' पूर्वकी श्रुति है और दूसरी कात्यायनस्मृति है। आदुम्बरीसे उदुम्बरकी शाखा अथवा उदुम्वरकी बनाई हुई पशु वन्धनके लिए स्थूणा-यूप-विवक्षित है, इस अवस्यामें दोनोंका एक समय यागमें अनुष्ठान नहीं हो सकता, क्योंकि यदि स्मृतिके अनुसार औदुम्बरीका वस्रसे वेष्टन करेंगे, तो उसका स्पर्श नहीं हो सकेगा, श्षतिके अनुसार स्पर्श माने, तो वेष्टन नहीं होगा, इसपर सिद्धान्त किया गया है-'भुत्या स्मृतिर्वाध्यते' अर्थात् श्रुतिसे स्मृतिका बाध होता है, इससे कात्यायनस्मृतिका उक्त्त श्रुतिसे वाध होगा, क्योंकि' स्मृति को प्रीमाण्य श्रुतिमूलक है, स्वतः नहीं, और उक्त स्मृतिसे श्रुतिकी कल्पना भी नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यक्ष 'औडुम्बरीं स्पृषवोद्गायेत्' इत्यादि श्रुतिसे उसकी कल्पकत्वशक्ति व्याहत होगी, प्रकृतमें भी 'तस्माद् ब्राह्मगः' इत्यादि श्रुतिमें संन्यासके अनुरोघसे 'ब्राह्मण संन्यास लेकर पाण्डित्य आदिका अनुछान करे'इस प्रकारके वाक्यार्थका लाभ होनेसे विविदिपु द्वारा क्रियमाण विद्यार्थ संन्यासमें ब्राह्मणका ही अधिकार है' यह भगवान् वार्तिक कारका मत है, यदि वार्तिकवचनका तात्पर्य

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क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणादिमें अधिकार] भापातुवादसहितं ४४९

सह्ग्राह्यत्वाद। यत्तु सन्न्यासस सर्वाधिकारित्वेन वार्तिकवचनं तत् 'विद्वत्संन्यासविपयम्, न तु आतुरविविदिपासन्न्यासे भाव्याभिग्रायविरुद्ध- सर्वाधिकारप्रतिपादनपरम्। 'सर्वाधिकारविच्छेदि विज्ञानं चेदुपेयते। फुतोडधिकारनियमो व्युत्थाने क्रियते चलात्।।' इत्यनन्त्रक्षोकेन त्रह्मज्ञानोदयानन्तर जीवन्मुक्तिकाले विद्वत्सन्यास

नहीं हो। और जो कि 'संन्यासमें सभी त्रैवर्णिकोंका अधिकार है' इस अर्थकी पुष्टिमें पूर्वमें चार्तिककारका वचन दिया गया है' वह तो विद्वत्संन्यासविपयक है, आतुर और विविदिपासंन्यासमें भाप्यसे असम्मत सभीके अधिकारका प्रतिपादनविपयक नहीं है। *'सर्वाधिकार०' (क्षत्रिय और वैश्यको यदि सर्वाधिकारविच्छेदी विज्ञान हो जाय, तो सम्पूर्ण कर्मकी निवृत्तिरूप विद्वत्संन्यासमें भी विविदिपासन्यासके समान ब्रादाणोंका अधिकार है, यह नियम किस वलसे कर सकते हैं? अर्थाद् किसी प्रमाणके वलसे नहीं कर सकते हैं' इस प्रकारके पीछेके श्रोकसे न्रपज्ञानकी उत्पत्तिके बाद जीवन्मुक्तिकालमें विद्वत्संन्यासमें ही अधिकारके

माध्यपि्द अर्थमें माना जाय, तो संन्यासका सर्वसराधारणरूपसे प्रतिपादन करनेवाले स्मृतिवचन के समान वार्तिकवनन भी देय-व्याज्य होगा, अतः वार्तिकवचन भी माप्यके अविरुद्ध अर्थमें ही पयचरल है, दसी अभिप्रायस 'तद् निद्वत्संन्यासविपयम्' इस अिम मूलका उल्लेस किया गया है। * पिविदिपागन्यानें समीका अधिकार नहीं है, इसमें यह दूसरा भी हेतु है, तात्पर्य वह है-शधिय और वैश्यके तरवज्ञानका अभीकार है या नहीं? यदि नहीं है, तो जनक प्रभृतिके त्वज्ञानके प्रतिपादक अनेक वचन विरु्द् होंगे। यदि है, तो तत्वज्ञानसे कर्माधिकार प्रयोजक वर्णाथमादि अध्यावकी नितृतति होनेसे सकलकर्मनियृत्तिरुप विद्वत्संन्यासमें क्षत्रिय और मैश्यक अधिकारका वारण नहीं कर सकते हैं, अतः विचिदिपासन्यासके समान विद्त्संन्यासमें भी मादाणका दी अधिकार ऐे, यह नियग नहीं चनेगा, विविदिपार्सन्याय उसको कहते हैं-जिसका 1 कि एख जन्ममें या जन्मान्तरमें अनुष्ठित पेदानुवचन आदिव उत्पन्न ब्रह्मशानकी इच्छासे भ्रद्ण किया जाय अ्थात जिसमें दण्ठ आदिका ग्रहण किया, जाता है, ऐसा परमहंसाश्रम। और विद्त्सन्यास कये कहते हैं-जिसका कि श्रवण, मनन और निदिध्यासनसे परतृत्वको जानकर ग्रहण किया जाता है, जेसे कि साश्ञनल्क्य प्रमृतिने भ्रद्दण किया था। ५५

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४५० सिद्धान्तलेश संग्रह [तृतीय परिच्छेद

एवाऽधिकारनियमनिराकरणात्। एवं च ब्राह्मणानामेव श्रवणाद्यनुष्ठाने सन्न्यासोडङ्गम्: क्षत्नियवैश्ययोस्तन्निरपेक्षः श्रवणाद्यधिकार इति तयो श्रवणाद्यनुष्ठाननिर्वाहः। नहि सन्न्यासस्य श्रवणापेक्षितत्वपक्षे श्रवणमा- त्रस्य तदपेक्षा नियन्तुं शक्यते; क्रममुक्तिफलकसगुणोपासनया देवभावं प्रासस्य श्रवणादौ सन्न्यासनैरपेक्ष्यस्याऽवश्यं वक्तव्यत्वाद् देवानां कर्मानु- छ्वानाप्रसक्त्या तच्यागरूपस्य सन्न्यासस्य तेष्वसम्भवादित्याहुः। ब्रह्म संस्थश्रुतेन्यासी मुख्यः श्रवणविद्ययो: । क्षत्रियादेरनुमति जन्मान्तरफलां परे ॥ १३॥ 'ब्रह्मसंस्थो' इत्यादि श्रुतिसे श्रवण और विद्यामें संन्यासी ही मुख्य अधिकारी हैं, और क्षत्रिय आदिकी जन्मान्तरमें फलके लिए श्रवणकी अनुमति है ऐस भी कुछ लोग कहते हैं॥ १२॥

नियमका खण्डन किया गया है। एवश्च अर्थात् श्रवणके अङ्ञरूपसे अथवा अधिकारीके विशेपणरूपसे विद्याके साधन विविदिपासंन्यासमें ब्राह्मण का ही अधिकार है, ऐसा सिद्ध होनेपर यह फलित होता है-ब्राह्मणोंके ही श्रवण आदिके अनुष्ठानमें संन्यास अङ्ग है और क्षत्रिय एवं वैश्यका संन्यासके बिना ही श्रवण आदिके अनुष्ठानमें अधिकार है, अतः उनके श्रवण आदिका अनुष्ठान उपपन्न हो सकता है, और संन्यासके श्रवणापेक्षित्वपक्षमें अर्थात् श्रवणके अङ्गरूपसे या अधिकारीके विशेषणरूपसे श्रवण संन्यासकी अपेक्षा रखता है, इस पक्षमें श्रवणमात्रको (अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आदि सभीके श्रव्रणको) संन्यासकी अपेक्षा है, ऐसा नियम भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि क्रमसे मुक्ति जिसका फल है, ऐसी सगुण उपासनासे देवभावको जो प्राप्त हुआ है, उसके श्रवण आदिमें संन्यासकी अपेक्षा अवश्य कहनी होगी, परन्तु देवताओंको कर्मानुष्ठानकी प्राप्ति ही नहीं है, अतः उसका त्यागरूप संन्यास हो ही नहीं सकता है। देवभावको प्राप्त हुए सगुण उपासकके श्रवणमें संन्यासका व्यभिचार है, यह कथन अयुक्त है, क्योंकि उसे सगुण विद्याकी साम्थ्यसे ही निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार हो सकता है, इसलिए श्रव्रण आदिका अनुषठान व्यर्थ है, यदि इस प्रकार शक्का हो, तो अयुक्त है, क्योंकि देवताधिकरणमें देवभावको प्राप्त हुए उपासकको लेकर श्रवणादिमे देव आदिके अधिकारका निरूपण किया गया है, अतः उनको भी श्रवण आदिके विना विद्या नहीं हो सकती

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क्षत्रिय और वैडयका श्रंवणादिमें अधिकारं] भांपानुवांदंसहितं ४५१

अपरे तु 'ब्ह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इति श्रत्युदिता यस्य त्रह्मणि संस्था-समापति :- अनन्यव्यापारत्वरूपं तन्निष्ठात्वम्-तस्य श्रवणादिपु मुर्याधिकार:। 'गच्छतस्तिष्ठतो चाऽपि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा। न विचारपरं चेतो यस्याऽसौ मृत उच्यते॥' 'आसुप्तेरामृतेः कालं नयेत् वेदान्तचिन्तया।' इत्यादिस्मृतिपु सर्वदा विचारविधानात्। सा च ब्रह्मणि संस्था विना सन्न्यासमाश्रमान्तरस्थस्य न सम्भवति; स्व्स्वाश्रमविहितकर्मानुष्ठानवे- यग्न्यात् इति सन्न्यासरहितयोः क्षत्रियवैश्ययोन सुख्यः श्रवणाद्यधिकारः। *कुछ लोग कहते हैं कि 'ब्रक्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस श्रुतिसे प्रतिपादित जिसकी न्क्षमें संस्था-समाप्ति अर्थात् दूसरे सब व्यापारको छोड़कर केवल त्रस्मं निष्ठा है, उसीका श्रवणमें अधिकार है। 'गच्छतः- (जागते, सोते, जाते और चैठते हुए जिस पुरुषका चित्त ब्रह्म- विचारसे युक्त नहीं है, उसे मरा हुआ समझना चाहिए, सोने और मरने तक चेदान्तविचारसे दी समयका यापन करना चाहिए') इत्यादि स्मृतिसे सदा ब्रह्म- विचारका ही विधान किया गया है। और इस प्रकारकी जो त्रह्ममें संस्था है, वह संन्यासके बिना अन्य आश्रममें रहकर नहीं हो सकती, क्योंकि अपने अपने आथ्रममें विहित कमोंका अनुषठान करनेसे चित्तकी व्यग्रता हो सकती है, अतः संन्याससे रहित क्षत्रिय और वैश्यका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकारt मै, दसलिए व्यमिचार होनेके कारण संन्यास श्रवणमात्रका अम् नहीं है, किन्तु ब्राह्मगकर्तृक भ्रवणका दी संन्यासकां अत् है, अतः क्षत्रिय और वैश्यका संन्यासमें अधिकार न रदनेपर भी भ्रवण आदिका निर्वाद दो सफता है, यह भाव है। देयवतृकृथयणमें संन्यावाध्रमका यदि व्यभिचार है, तो उसका निचारण करनेके. लिए श्रैवणिक मनुष्योंके अवणमें ही संन्यासाथमको हेतु मानना चाहिए, ब्राह्मणमात्रकर्तृक अव्वणमें संन्यासाधमफी देनुसा नहीं माननी चाहिए, क्योंकि वैसे संकोचमें कोई प्रमाण नहीं है, क्चोंकि आागे दी कहा है कि चार आथर्मोंमें सन्यासाथ्रमका परिप्रह करके ही श्रवण आदिका गम्पादन करना चाहिए, और आश्रमविभाग तीनों वणोंके लिए साधारण है, केवल ब्राह्मणके लिए नहीं है। इस अवस्थामें व्ाअण-संन्यासीफे समान संन्याससे हीन क्षत्रिय और वैश्यका श्रवणमें अधिकार कैसे हो सकता है, इस अस्वरससे यह 'अपरे तु' मत कहा जाता है। * तासपर्य यद है 'न्रद्मासंस्थोऽगृतत्वमेति' इस कषुतिसे पाण्डित्य क्षुतिके समान न्रह्निष्टा- धर्मचाले संन्यायाधमक विधान होता है, क्योंकि ममसंस्थाश्वसे कहलानेवाली ब्रह्मनिष्ठा

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४५२ सिद्धान्तलेश संग्रीह i तृतीय परिच्छेद

कि तु 'दृष्टार्थी च विद्या प्रतिपेधाभावमात्रेणाऽप्यर्थिनमधिकरोति श्रवणा- नहीं है। किन्तु 'प्रतिषेधाभावमात्रसे दष्टार्थ विद्या श्रवण आदिमें अर्थी पुरुषको संन्यासाश्रममें ही हो सकती है, इस प्रकार सन्यासाधिकरण भाष्यमें प्रतिपादन किया गया है, इसलिए व्रह्मनिष्ठाका संन्यासके धर्मरूपसे विधान होनेके कारण ब्राह्मणसन्यासीकी न्रह्मनिष्ठा धर्म है, अतः संन्यासीका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार है, क्योंकि न्रह्मनिष्ठाके व्यतिक्रमसे अ्रत्यवाय सुना जाता है- काष्ठदण्डो घृतो येन सर्चाशी ज्ञानवर्जितः । स याति नरकान् घोरान् महारै।रसंज्ञकान्।' (परमहंसोपनिपत्) अर्थात् संन्यास आश्रमका धारण करनेवाला पुरुप ज्ञानरहित होकर अपनी वाहा, और आभ्यन्तर इन्द्रियोंको यदि कावूमें नहीं रखता है, तो वह महारौख आदि नरकोंमें गिरता है। और जैसे संन्यासीकी ज्ञाननिष्ठाका विधान करनेवाली 'संन्यस्य श्रवथं कुर्यात्' 'गच्छत- स्तिष्ठतो वाऽपि' इत्यादि अनेक स्मृतियां हैं, वैसे ही उनका परित्याग करनेसे वह पतित होता है, इस अर्थकी प्रतिपादिका स्भृतियां भी अनेक हैं- 'त्वंपदार्थविवेकाय संन्यासः सर्वकर्मणाम्। श्रुत्या विधीयत यस्मात्तत्यागी पतितो भवेत् ।। नित्यं कर्म परित्यज्य चेदान्तथ्रवणं विना। वर्तमानस्तु संन्यासी पतत्येव न संशय: ।।' अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यघटक त्वंपदके विवेकके लिए सब कर्मोंके त्यागरूप संन्यासका श्रुतिसे विधान किया गया है, इसलिए संन्यासके त्याग देनेसे पतित होता है, अपने नित्यकर्मका परित्याग करके वेदान्तभ्रवण आदि कुछ नहीं करता है, तो वह संन्यासी पतित हो जाता है। और अपने आश्रमधर्मका परित्याग करनेसे महान् अनर्थ होता है। इस विषयमें सचचिदानन्द आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णने अपने साक्षाव श्रीमुखसे भी कहा है कि- 'श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मोत्स्वनुष्ठिताद्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मों भयावद्यः ।।' अर्थात् अपना स्वकीय धर्म भले ही विगुण हो, परन्तु दूसरे धर्मोसे अच्छा ही है, अतः अपने धर्ममें मरना भी अच्छा है, परन्तु परधर्मका अनुष्ठान भयावह है। इन सब प्रमाणोंके ऊपर दृष्टि रखते हुए भगवान् भाष्यकारने उस संन्यासीके लिए, जो संन्यासी अनन्य- भावनासे श्रवण आदि नहीं करता है, पातित्यका भी सूचन किया है-'शम, दम आदिसे वर्धित ब्रह्मनिष्ठा ही संन्यासीका स्वकीय आश्रमविदित धर्म है, और अन्य लोगोंका यक्ष आदि धर्म है, उनका अनुष्ठान न करनेसे उनको प्रत्यवाय होता है' इत्यादि। इससे भ्रवण आदिका भिक्षुके प्रति विधान होनेसे और उनके न करनेसे प्रत्यवायका श्रवण होनेसे संन्यासीका ही श्रवणादिमें मुख्य अधिकार है, और संन्यास-आश्रमसे जो विधुर हैं, उनके प्रति भ्रवण आदिका विधान न होनेसे और प्रत्यवायकी श्रुति न होनेसे उनका श्रवण आदिमें मुख्य अधिकार नहीं है। छष्टफल-अज्ञाननिधृत्तिरूप दृष्ट फल है-जिसका, ऐसी विद्या प्रतिषधाभावमात्रसे अर्थात् विघातक निषेधके अभावसे पुरुषको श्रवण आदिमें प्रवृत्त कराती है, श्रवणके लिए

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क्षत्रिय और बैड़यका श्रवणादि में अधिकार] भापानुवादसहित ४५३

दिपु' इति 'अन्तरा चाऽपि तु तद्दृष्टेः' इत्यधिकरणभाष्योक्तन्यायेन

कारमात्रेण श्रवणाद्यनुमतिः। नहि 'अन्तरा चाऽपि तु तद्दृष्टेः' इृत्य- धिकरणे विधुरादीनामङ्गीकृतशश्रवणाद्यधिकारो सुख्य इति वक्तुं शक्यते; 'अतस्त्वतरज्ज्यायो लिद्गान्' (उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ३९) अधिकृत करती है' इस प्रकारके 'अन्तरा चाऽपि' इत्यादि अधिकरणोक्त भाष्यके अभिमायसे शृद्के समान अप्रतिपिद्ध क्षत्रिय और वैश्यका विधुर आदिके समान जन्मान्तरमें विद्याकोX प्राप्त करानेवाले अमुख्याधिकारमात्रसे श्रवण आदिन अनुमति दी गई है। और 'अन्तरा चाऽपि' इस अधिकरणमें विधुर आदि पुरुपका जो श्रवण आदिमें अधिकार स्वीकार किया गया है, वह मुख्य है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'अतस्त्वतरज्ज्यायो लिन्नाच' इस प्रकार

संन्यासकी कोई आवस्यकता नहीं है, क्योंकि श्रवणके प्रंति संन्यास अभ्त नहीं है, यह भाव है, यह माध्यफी पंकि 'विदेषानुमहश्र' (व्र. अ. ३पा०४सू०३८) इस सूत्रके अन्तिम भाष्यभागमें है। * तालरय यह है कि सुख्य अधिकारियों द्वारा प्रतिदिन किये जानेवाले श्रवण आदि ओ अगकुनितित अदाचय, अदिंसा, शम, दम आदिसे युक हैं, इसी जन्ममें प्रायः विद्याक उत्पादक हैं, और जो सुसन अधिकारी नहीं है, उनके अनन्यव्यापारत्वके न होनेके कारण श्रवण आदि इस जन्ममें विद्याके उस्ादनमें योग्य नहीं है, किन्तु भावी अनेक जन्मोंसे विशिष्ट श्रवण आदिका सम्पादन करके अन्य देहमें विद्याकी उत्पत्ति होगी, इसलिए गौण और सुर्य अधिकारीमें मदान फ्लंभद है, इसमें प्रमाण स्मृति भी है- 'अनंक जन्मसंसिदस्ततो याति परा गतिम्'। थयात अनेक जन्मोंमें सिद (प्ञानी) होकर उत्कृष्ट गतिको ग्राप्त करता है। 3 'अतस्यतरजजगायो लिहच' दय सूत्रका यह अर्थ है-अनाश्रमी पुरुषों द्वारा अनुष्ठित विद्यायाधनों की अपेक्षा आश्मियों द्वारा अनुष्टित विद्यासाधन प्रेष्ट है, क्योंकि इस अर्थमें ध्रुति और स्मृति प्रमाण है 'तेनेति म्रदावित्पुण्यकृत्' यह श्रुति और 'अनाश्रमी न तिद्ेत' इत्यादि स्मृति प्रमाण है, पुण्यवान् पुरुप पुण्यसे प्राप्त शानसे ब्रह्म पाता है, गह उक क्तिका सर्थ है। इसमें पुण्यरूपसे प्रसिद्ध आथ्रमधरमोंकी ही विशेपरुपसे मह्मपाप्तिके प्रति साधनताका प्रतिपादन किया गया है, इसलिए यद्यपि अनाश्रमी पुरुपोंस सम्पादित धर्म 'विशेपानुप्द्थ' इर सूम्षके अनुसार विद्याके उपयोगी है, तथापि उनका अपकर्ष ही प्रतीत होता दे, और वह अपकर्ष विद्यार्थ शवण आदि कमोंमें विधुर आदिका अमुख्य अधिकार होनेसे दी है, क्योंकि ऐखा माननेमें और कोई कारण नहीं है और अनाश्रमित्वकी निन्दा भी की गई है, इससे कर्म और ज्ानमें मुख्याधिकारी निन्दाका पात्र नहीं है, यह सूत्र और माध्यका अमिप्राय है, यह भाष है।

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४५४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

तेपाममुख्याधिकारस्फुटीकरणात्। न च तत्र तेपां श्रवणाद्यधिकार एव नोक्त, किन्तु तदीयकर्मणां विद्याऽनुग्राहकत्वमिति शङ्गम् ; दष्टार्था च विद्या' इत्युदाहृततदधिकरणभाष्यविरोधात। न च क्षत्रियवैश्ययोः सन्न्यासाभावाद अपुख्याधिकारे तत एव देवाना- मपि श्रवणादिष्वमुख्य एवाडधिकार: स्यात्, तथा च क्रममुक्तिफलक- सगुणविद्यया देवदेहं आप्य श्रवणाद्यनुतिष्ठतां विद्याप्राप्त्यर्थ सन्न्यासाहं पुनर्व्राह्मणजन्म वक्तव्यमिति 'ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते' 'न च पुनरावर्तते' 'अनावृत्तिश्शब्दाद्' इत्यादिश्रुतिसूत्रविरोध इति वाच्यम्, देवानामनुष्ठेयकर्मवैयग््याभावात् स्वत एवानन्यव्यापारत्वं सम्भवतीति

सुख्याधिकाराभ्युपगमादित्याङुः ॥६ ॥ के सूत्रसे सूत्रकारने ही उनके अमुख्य अधिकारका स्पष्टीकरण किया है। यदि शक्का हो कि विधुराधिकरणमें विधुर आदिका श्रवण आदिमें अधिकार ही नहीं कहा गया है, किन्तु उनके द्वारा किये गये कर्म विद्यानुग्राहक अर्थात् विद्योत्पादक हैं, यह कहा गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'दृष्ट प्रयोजनके लिए विद्या है' इत्यादि पूर्व कथित अन्तराधिकरणोक्त भाप्यसे विरोध होगा। यदि शङ्का हो कि क्षत्रिय और वैश्यका संन्यास न होनेसे यदि श्रवण आदिमें अधिकार मुख्य नहीं है, तो देवोंको संन्यासमें अधिकार न होनेके कारण उनका भी श्रवण आदिमें अमुख्य अधिकार ही होगा। इस परस्थितिमं क्रमशः युक्तिरूप फल देनेवाली सगुण विद्यासे देवताशरीरको प्राप्त करके श्रवण आदिका अनुष्ठान करनेवाले जीवोंको विद्याकी प्राप्तिके लिए संन्यासयोग्य फिर ब्राह्मण जन्म होगा, यह कहना पड़ेगा, इस परिस्थितिमें 'ब्रह्मलोक०' (त्रह्मलोक प्राप्त करता है) 'न च पुन०' (ब्रह्मलोक प्राप्त करके फिर इस लोकमें नहीं आता है) 'अनावृत्ति: शव्दात्०' (उक्त दो श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि न्रह्मलोकसे पुनः आना नहीं पड़ता है) इत्यादि श्रुति और सूत्रके साथ विरोध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि देवताओंको विधेय कर्मोंसे व्यग्रता नहीं है, इससे स्वतः ही अनन्यव्यापारता हो सकती है, इसलिए क्रमशः मुक्ति देनेवाली सगुण विद्याका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रके प्रामाण्यसे संन्यासके बिना भी उनका श्रवणादि में अधिकार मुख्य है, ऐसा स्वीकार किया जाता है॥६॥

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अमुरूपाधिकारीके श्रवणमें जन्मातरीय विद्योपयोगिता] भापानुवादसहित ४५५

श्रवणं नन्वसन्न्यासं जन्मान्तरफलं कथम्।

संन्याससे रहित भ्रवण जन्गान्तरीय फलके प्रति हेतु कैसे होगा ? क्योंकि श्रचण षार्थक है, उसका फल अदए भी नंहीं हो सकता है, क्योंकि वह संन्यासरूप अङ्गसे क नहीं है॥। १४ ।।

विचारवत् क्रियमाणो वेदान्तविचार: कथ जन्मान्तरविद्यावाप्तावुपयुज्यते। न खलु विचारस्य दिनान्तरीयविचार्यावगतिहेतुत्वमपि युज्यते। दूरे जन्मा- न्तरीयतद्वेतुत्वम्। न च वाच्यं सुख्याधिकारिणा परिघ्ाजकेन क्रियमाण मपि श्रवण दष्टार्थमेव, अवगतेर्द्टष्टार्थत्वात्। तस्य यथा प्रारब्धकर्मविशेष- रूपप्रतिवन्धादिह जन्मनि फलमजनयतो जन्मान्तरे प्रतिबन्धकापगमेन फलजनकत्वम् 'ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतित्रन्धे तद्दर्शनाद' इत्यधिकरणे (उ०

अव शक्का होती है कि प्रत्यक्ष फलरूप वाक्यार्थज्ञानके लिए अमुख्य " सधिकारी द्वारा किया गया वेदान्त-विचार अविहित अन्य न्याय आदि शास्त्रोंकें विचारके समान भावी जन्मान्तरकी विद्यामें उपयुक्त कैसे होगा? क्योंकि (आजका ) विचार (कलके) विचार्य अर्थके ज्ञानके प्रति भी हेतु नहीं हो सकता है, तो फिर (इस जन्मके) विचारमें जन्मान्तरके विचार्य अर्थके ज्ञानके प्रति हेतुता कैसे हो सकती है अर्थात् कभी नहीं हो सकती। यदि कोई कहे कि जिस प्रकार सुख्याधिकारी परिवाजकसे (संन्यासीसे) किये गये श्रवणका भी फल हष्ट ही है, क्योंकि अवगति-विद्या-दृष्ट अर्थ है, और प्रारब्ध कर्म- विशेषके प्रतिबन्धसे इस जन्ममें वह श्रवण यद्यपि दष्टफलकी उत्पत्ति नहीं कर सकता है, तथापि दूसरे जन्ममें प्रतिबन्धकके निरसनसे अवश्य उसमें फल -- जनकता है, * ऐसा 'ऐहिकमप्य०' इत्यादि अधिकरणमें निर्णय किया गया राखका भाव यह है कि जैसे मुख्य अधिकारी द्वारा सम्पादित श्रवण किसी प्रतिवन्धककी सामर्थ्यसे इस जन्ममें विद्योदय नहीं करता है, और जन्मान्तरमें उस प्रतिचन्धकके निरसन द्वारा विद्याके प्रति कारण होता है, वैसे ही अमुख्याधिकारी द्वारा सम्पादित थ्रवण जन्मान्तरमें प्रतिवन्धकके विगम द्वारा विद्याके प्रति साधन हो सकता है, इस अर्थका 'ऐहिकमप्य प्रस्तुतप्रतिबन्धे तहर्शनात' इस सूत्रमें निर्णय भी किया गया है, सूत्रका अर्थ है कि किसी प्रस्तुत प्रतिबन्धके न रहते इसी जन्ममें विद्या उत्पन्न होती है, यदि कोई प्रतिबन्धक

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४५६ सिद्धान्तलेश संग्रह [तृतीय परिच्छेद

भी० अ० ३ पा० ४ सू० ५१) तथा निर्णयाद, एवममुख्याधिकारि- कृतस्यापि स्यादिति। यतश्शास्त्रीयाङ्गयुक्तं श्रवणमपूर्वविधित्वपक्षे फल.२ पर्यम्तमपूर्वम्, नियमविधित्वपक्षे नियमादष्टं वा जनयति। तच जाति- स्मरत्वप्रापकादृष्टवत् प्राग्भवीयसंस्कारमुद्धोध्य तन्मूलभूतस्य विचारस्य जन्मान्तरीयविद्योपयोगितां घटयतीति युज्यते। शास्त्रीयाङ्गविधुरं श्रवणं नादष्टोत्पादकमिति कुतस्तस्य जन्मान्तरीयविद्योपयोगित्वमुपपद्यते। घटका- दृष्टं विना जन्मान्तरीयप्रमाणव्यापारस्य जन्मान्तरीयावगतिहेतुत्वोपगमे अतिप्रसङ्गात्। है, उसी प्रकार अमुख्य अधिकारीसे किये गये श्रवणमें भी जन्मान्तरीय विद्याकी हेतुता हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि शास्त्रीय अङ्ग- संन्याससे युक्त श्रवण अर्थात् संन्यासी द्वारा अनुष्ठित श्रवण + अपूर्वविधि- पक्षमें विद्यारूप फलकी उत्पत्ति तक अदष्टकी उत्पत्ति करता है और नियम- विधिपक्षमें नियमविशिष्ट होकर उक्त श्रवण फलपर्यन्त नियमादषको उत्पन्न करता है, और इस प्रकारका श्रवणजन्य उभयविघ अदृष्ट जैसे पूर्व- जन्मका स्मरणसम्पादक अदृष्ट पूर्वजन्म और तदीय वृत्तान्तके अनुभवजन्य संस्कारके इस जन्ममें उद्घोधन द्वारा पूर्वजन्म और उसके वृत्तान्तका स्मरण कराता है, वैसे ही पूर्व जन्मके श्रवण आदिसे उत्पन्न हुए संस्कारका उद्वोधन करके उस संस्कारके कारणीभूत श्रवणकी भावी जन्ममें विद्याके प्रति उप- योगिताका सम्पादन कर सकता है। शास्त्रीय अङ्गसे रहित श्रवण अदृष्टका उत्पादक नहीं होता है, इसलिए ऐसे श्रवणको जन्मान्तरीय विद्यामें उपयोगी मानना कैसे उपपन्न हो सकता है ? यदि घटक (सम्पादक) अदष्टके बिना जन्मा- न्तरीय प्रमाणोंका व्यापार जन्मान्तरीय विद्याका हेतु माना जाय, तो अतिप्रसङ्ग होगा, अर्थात् जन्मान्तरके अनुभूत सकल पदार्थोंका स्मरण प्रसक्त होगा, यह भाव है।

रह जाय, तो जन्मान्तरमें होती है, क्योंकि प्रतिवन्धोंके इसी जन्ममें रहते जन्मान्तरमें विद्याकी उत्पत्ति होती है, यह वामदेव प्रभृतिमें देखा जाता है। ह जिस पक्षमें श्रवणविधि अपूर्वविधि है, उस पक्षमें, यह अर्थ है। *जिस पक्षमें श्रवणविधि नियमविधि है, उस क्षमे, यह अर्थ है, इन दोनोंका उपपादन प्रथम परिच्छेदमें विधिनिरूपण के प्रसङ्गमें सविस्तर किया गया है।

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अमुख्याधिकार कि श्रवणमें जन्मान्तरीय-विद्योपयोगिता] भापानुवादसहित ४५७

उच्यते यज्ञजादष्टजातमेतत्फलावधि। उत्पाद्य तेन निर्वासयमिति न द्वारकल्पना ।१५॥ कहते हैं-यज्ञजन्य विविदिषोत्पादक विद्यारूप फलपर्य्यन्तस्थायी अदष्टकी उत्पत्ति करके उसी अदृष्ट द्वारा जन्मान्तरीय श्रवण जन्मान्तरीय फलका हेतु हो सकता है, फिर अ्रवणविधिजन्य अपूर्वाख्य द्वारकी कल्पना नहीं करनी चाहिए।। १५।। उच्यते-अमुख्याधिकारिणाऽपि उत्पन्नविविदिपेण क्रियमाणं श्रवणं

चाडपूर्व विद्यारूपफलपर्यन्तं व्याप्रियमाणं जन्मान्तरीयायामपि विद्यारया स्वकारितश्रवणस्य उपकारितां घठयतीति नानुपपत्तिः। श्रवणादौ विध्य- भावपक्षे तु सन्न्यासपूर्वकं कृतस्याऽपि श्रवणस्याऽदष्टानुत्पादकत्वाद् सति प्रतिचन्धे तस्य जन्मान्तरीयविद्याहेतुत्वमित्थमेव निर्वाह्यम्।

आवृत्तं नियमाहष्टं निप्पाद्य फलदं यत: ॥१६।। आचार्य विवरणकार नियमचिधिपक्षमें भी उसी प्रकारका समाधान करते हैं, क्योंकि दोपके विनाशपर्यन्त बार बार किया हुआ श्रवण नियमादष्टकी उत्पत्ति करके फल देनेवाला होता है॥। १६ ॥। आचार्यास्तु नियमविधिपक्षेऽपि अयमेव निर्वाहः। श्रवणमभ्यस्यतः

इस आक्षेपके समाधानम कहते हैं कि जिसको ब्रदाज्ञानकी इच्छा हुई है, ऐसे अमुर्य अधिकारी द्वारा क्रियमाण श्रवण-द्वारीभृत ब्रह्मविविदिपाके उत्पादक प्राचीन (पूर्वके) विद्याप्रयोजक यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे उत्पन्न हुए अदट्टसे ही- उत्पन्न होता है, इसलिए वही यज्ञादिके अनुष्ानसे जन्य अद्ृष् विद्यारूप फलकी उत्पत्ति तक व्यापृत होता हुआ जन्मान्तरीय विद्यामं भी अपने प्रभावसे हुए श्रवणकी उपकारिताका सम्पादन कराता है, इसलिए कोई अनुपपत्ति नहीं है। * विवरणाचार्य कहते हैं कि नियमविधिपक्षम भी इसी उक्त प्रकारसे * यशादिभिर्षिद्यारयां सम्पादनीयार्या द्वारभूता या विविदिपा तस्या उत्पादकं प्राचीनव्व यत् विद्यार्थयश्ञादनुष्टानम् तज्जन्येत्यर्थः, स्वपदं यज्ञादनुष्ठानजन्यापूर्वपरमिति भाव:। + विवरणाचार्यका तात्पर्य यद है-भ्रवणका फल है-प्रमाणकी असम्भाचनाकी निधृत्ति, मननका फल है-प्रमेयकी असम्भावनाकी निधृत्ति, निदिध्यासनका फल है-विपरीतभावनाकी निषृत्ति, जिय मुर्य अधिकारीफे ये तीने श्रवण आदि त्रिविध प्रतिचन्धककी निधृत्तिरूप फलो- रपसिके कालतक आवर्त्यमान हुए हैं, उसका नियमादृष्ट उत्पन्न हुआ ही है, इस प्रकार यदि

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४५८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

फलप्राप्तेरर्वाक् प्रायेण तन्नियमादृष्टानुत्पत्तेः । तस्य फलपर्यन्तावृत्तिगुणक- श्रवणानुष्ठाननियमसाध्यत्वात्। नहि नियमादृष्टजनकशश्रवणनियम: फल- पर्यन्तमावर्तनीयस्य श्रवणस्योपक्रममात्रेण निवर्तितो भवति; येन तञ्जन्य- नियमादृष्टस्याऽपि फलपर्यन्तश्रवणावृत्तेः प्रागेवोत्पत्तिः सम्भाव्येत। अवघात- चदावृत्तिगुणकस्यैव श्रवणस्य फलसाधनत्वेन फलसाधनपदार्थनिष्पत्ते: प्राक निर्वाह करना चाहिए, क्योंकि श्रवणका जो अभ्यास करता है, उसे प्रतिबन्ध- निवृत्तिरूप फलकी उत्पत्ति होनेके पूर्वमें प्रायः श्रवणनियमजन्य अदष्टकी उत्पत्ति नहीं होती है, कारण कि फलपरय्यन्त् श्रवणानुष्ठानकी आवृत्ति करनेसे उत्पन्न श्रवण नियमसे ही नियमादष्ट उत्पन्न होता है, क्योंकि नियमादष्टका कारणी- भूत श्रवणनियम फलनिष्पत्ति तक आवर्तनीय श्रवणके उपक्रममान्नसे उत्पन्न नहीं होता है, जिससे कि श्रवणनियमजन्य नियमादृष्ट भी फलपर्यन्त श्रवणकी आवृत्तिके पूर्वमें ही उत्पन्न हो जाय, क्योंकि अवघातकी नाईं साधनसम्पत्तिके रहते भी प्रतिवन्धकसे विद्याकी उत्पत्ति नहीं हुई, तो पुनर्जन्मकी प्राक्ति कर प्रतिवन्धोंके निरसन द्वारा फिर विचारकी अपेक्षा न करके ही विद्या उत्पन्न होती है, जसे कि वामदेव, हिरण्यगर्भ आदिको हुई है, और जिस पुरुपको तथाकथित तीन प्रतिबन्धोंकी निवृत्तिपर्यन्त श्रवण आदिकी आवृत्ति नहीं हुई है, और वीचमें मरण हुआ है, वह भले ही मुख्य अधिकारी हो, परन्तु नियमादृष्टकी उत्पत्ति नहीं होती, इसलिए उसको दूसरे जन्ममें उन प्रतिवन्धोंकी निवृत्तिपर्यन्त श्रवणादिका अभ्यास करके श्रवणादिके नियमादष्टसे विद्या- प्रतिवन्धक पापोंके विनाश द्वारा विद्या प्राप्त होती है, इसीको भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है- 'तत्र तं बुद्धिसयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूयस्संसिद्धौ कुरुनन्दन ।I' अर्थात् सच्चरित्र कुलमें जन्म प्राप्त करके पूर्वदेहसे उत्पन्न और इस शरीरमें संस्कार- रूपसे अनुवर्तमान वुद्धिसंयोग अर्थात् श्रवणादि कर्तव्यवुद्धिसे सम्बन्ध पाता है, इसलिए पूर्वजन्मके यत्नकी अपेक्षा इस जन्ममें सिद्धिके लिए अधिक यत्न करता है।, इससे फलपर्य्यन्त आवृत्तिगुणसे रहित जो योगभ्रष्ट है, उसे तो नियमादृष्टके न होनेसे यज्ञ आदिसे जनित अदष्टसे कथश्चित निर्वाह करना चाहिए। * नियमादष्ट केवल श्रवणसे उत्पन्न नहीं होता है, किन्तु श्रवण-नियमसे उत्पन्न होता है, श्रवणनियम तभी हो सकता है, जवकि फलपर्यन्त श्रवणादिकी आवृत्ति की जाय, इसलिए फलकी उत्पत्तिके पूर्वमें श्रवणादि नियमके न होनेसे नियमादष्टकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, यह भाव है। जैसे तण्डुलकी उत्पत्तितक अवघातकी आवृत्ति करनी पड़ती है, अतः आवृत्तिविशिष्ट अवघात ही तण्डुलके प्रति जनक लोकमें देखा जाता है, आवृत्तिसे रहित नहीं देखा जाता,

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अर्मुख्याधिकांरीके श्रवणमें जन्मान्तरीय-विद्योपयोगिता] मापानुवादसहित ४५५

तन्नियमनिर्वर्तिचचनस्य निरालम्वनत्वात, श्रवणावघाताद्युपक्रममात्रेण नियमनिप्पत्तौ तावतैव नियमशास्त्रानुष्ठानं सिद्धमिति तदनावृत्तावप्यचै- कल्यप्रसङ्गाच्ेत्याहः। कृष््राशीतिफलस्मृत्याSSधानवत् कर्तृसंस्कृतेः । तद्द्वारा श्रवणं केचिजन्मान्तरफलं जगुः ॥। १७॥ अरवणसे अस्सी कृच्छूका फल होता है, ऐसी स्मृति होनेके कारण आघानके समान कर्ताके संस्कारार्थ भी ऐोनेसे उसी संस्कार द्वारा श्रवण जन्मान्तरका फल देनेवाला है, ऐखा भी कुछ लोग कहते हैं। १७ ॥ केचितु दृष्टार्थस्यैव वेदान्तश्रवणस्य- 'दिने दिने तु वेदान्तथ्रव्रणाद् भक्तिसंयुताद्। गुरुशुशृपया लच्धात् कृछाशीतिफलं लभेद्॥' इत्यादिवचनप्रामाण्यात् स्व्तन्त्रादष्टोत्पादकत्वमप्यस्ति। यथा अगि-

आवृत्िगुणसे युक्त श्रवण ही अपने फलके प्रति जनक होता है, इससे फलके साधन पदार्थकी-आवृत्तियुक्त श्रवणकी-उत्पत्तिके पूर्वमें श्रवणनियम निष्पन्न हो जाता है-यह वाक्य निरालम्बन है और श्रवण एवं अवघात आदिके उपक्रममात्रसे यदि नियमकी उत्पति मानी जाय, तो उसीसे नियमशास्त्रके अनुष्ठानकी सिद्धि होनेसे उसफी आवृत्ति न करनेपर भी वैकल्य प्रसक्त नहीं होगा। कुछ लोग तो कहते हैं कि दष्टार्थ ही वेदान्तश्रवण-'दिने दिने०' (गुरुशुश्रपासे प्राप्त भक्तियुक्त वेदान्तके श्रवणसे प्रतिदिन पुरुष अस्सी कृछधरका पुण्य मराप्त करता है) इत्यादि वचन प्रमाण होनेसे-स्वतन्त्र अहए-

दवी प्रकार आरतिविशिष्ट श्रवण ही विद्यात्मक फलके प्रति जनक होगा, यदि इसे न माना जाय, तो 'फरपय्गन्त भ्रवणरे ही अप्राप्तांश परिपूरणरूप नियम सम्पन्न होता है, पूर्वमें नहीं, दैस प्रफारका वचन निराळम्बन अर्थात् निर्विपयक हो जायगा, यह भाव है। मुख्य या अमुरूय अधिकारी द्वारा प्रतिदिन किया जानेवाला वेदान्तथवण जैसे प्रतिबन्धकभी निवृतिरूप दष्ट फल उत्पनन करता है, वैसे ही अदट्की उत्पत्ति भी करता है, इस- लिए अट्यके वलसे जन्मान्तरमें विचारकी विद्योपयोगिता घट सफती है, इस अभिप्रायसे यह 'केचिसु' का मत दे, यह भाव है। 1यद कृचछनामफा मस अनेक प्रकारसे होता है, इसका निर्वचन मिताक्षरा आदि धर्मशासके निबन्धोंमें अनेक प्रकारये मिलता है।

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४६० सिद्धान्तलैशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद

संस्कारार्थस्याऽडधानस्य पुरुपसंस्कारेषु परिगणनात् तदर्थत्वमपि, एवं वचन- बलादुभयार्थत्वोपपत्तेः । तथा च प्रतिदिनश्रवणजनितादृट्टमहिम्नैवाऽSमु. ष्मिकविद्योपयोगित्वं श्रवणमननादिसाधनानामित्याहुः ॥७॥ श्रवणादेरिव ज्ञानसाधनत्वं समर्थितम्।

अनक श्रुत्यादि प्रमाणोंके आधारपर श्रीभारतीतार्थ सुनिजीने श्रवण आदिके समान निर्गुण उपासनामें भी ज्ञानकी साधनता मानी है॥ १८ ॥ एवं 'श्रवणमननादिसाधनानुष्ठानप्रणाल्या विद्याऽवाप्तिः' इत्यस्मिन्नर्थे सर्वसम्प्रतिपन्ने स्थिते भारतीतीर्था ध्यानदीपे विद्याडवासी उपायान्तर- मप्याहुः। 'तत् कारणं साङ््ययोगाभिपन्नम्' 'यत्साङ्यैः प्राप्यते स्थानं की उत्पत्ति करता है, जैसे X अग्निके संस्कारके लिए किया हुआ आधान पुरुषके संस्कारोंमें परिगणित होनेसे पुरुपार्थ भी है, वैसे प्रकृतमें भी अनेक वचन मिलते हैं, अतः उभयार्थता हो सकती है, इसलिए प्रतिदिन श्रवणसे उत्पन्न अद्ष्टकी सामर्थ्यसे ही श्रवण, मनन आदि आमुष्मिक विद्याके प्रति उपयोगी हैं ॥ ७ ॥ उक्त प्रकारसे श्रवण, मनन और निदिध्यासनके अनुष्ठान द्वारा विद्याकी प्राप्ति होती है, इस प्रकारसे सब श्रुति और स्मृतियोंसे सम्मत अर्थके निश्चित होनेपर विद्याकी प्राप्तिमें अन्य उपायका भी ध्यानदीपमें * भारतीतीर्थ स्वामी- जीने निरूपण किया है-'तत् कारणं' (वह कारणत्वरूपसे उपलक्षित ब्रह्म साङ्खय और योगसे + विद्या द्वारा प्राप्त होता है) 'यत् साङ्गयः०' (जिस x जैसे 'अग्नीनादधीत' इत्यादि वाक्योंसे विहित आधान अग्निके संस्कारके लिए है, वैसे ही 'अग्न्याधेयमभिहोत्रम्' इत्यादि पुरुप संस्कारके वोधक सूत्रमें अग्न्याधानका भी पाठ होनेसे पुरुषसंस्कारार्थ भी है, यह प्रतीत होता है, इसी प्रकार श्रवण भी उभयार्थ हो सकता है, यह भाव है। * पश्चदशीके नवम ध्यानदीपप्रकरणमें 'संवादिभ्रमवद् व्रह्म' इत्यादि श्रोकोंसे योगशब्दसे कहलानेवाली उपासनासे भी ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार होता है, इसका सविस्तर निरूपण किया गया है, अतः इस विचारका विस्तर वहींपर देखना चाहिए। सांख्यशब्दका अर्थ है-मनन आदिसे संस्कृत वेदान्तविचार अथवा उस विचारसे युक्त पुरुष, योगशब्दार्थ है-निर्गुण ब्रह्मंकी उपासना अथवा उसका उपासक।

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विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण] भीपानुंवादसहित ४६१

वद्योगैरपि गम्यते' इतिथ्रुतिस्मृतिदर्शनाद्। यथा साङ्गवं नाम वेदान्त- 1 विचारः श्रवणशव्दितो मननादिसहकृतो विद्याऽवाप्त्युपायः, एवं योग- शव्दितं निर्गुणन्रह्मोपासनमपि। न च निर्गुणस्योपासनमेव नाडस्तीति शङ्क्म्, प्रश्नोपनिपदि शैव्यप्रश्ने 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोङ्कारेण परं पुरुपमभिध्यायीत' इति निर्गुणस्थैवोपासनप्रतिपादनात्। तदनन्तरम् 'स ब्रह्मकी प्राप्ति साङ््य-श्रवण आदिसे युक्त पुरुप-करते हैं, उसी ब्रह्मकी निर्गुण ब्रह्मोपासक भी प्राप्ति करते हैं) इत्यादि अनेक श्रुति और स्मृतिके पर्य्यालोचन- से यह ज्ञात होता है कि जैसे साङ्यनामक श्रवणशव्दसे कहलानेवाला मनन आदिसहकृत वेदान्तविचार ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें हेतु है, वैसे ही योगशव्दसे कहलानेवाली निर्गुणन्रह्मोपासना भी ब्रह्मविद्यामें उपयोगी है। यदि शक्का हो कि जो निर्गुण पदार्थ है, उसकी उपासना ही नहीं हो सकती। तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रश्नोपनिपत्में शव्यके प्रक्नमें 'यः पुनरेतम्०' (जो कि इस अकार, उकार और मकारात्मक तीन मात्राओंसे युक्त ओंकारसे सूर्यान्तर्गत परम पुरुपका ध्यान करता है) इस श्रुतिसे निर्गुण ब्रह्मकी उपा-

यदि प्रकृतमें शक्का हो कि निर्गुणपदार्थकी उपासना नहीं होती है, तो यह शक्का नहीं हो सकती, क्योंकि 'तत्कारणं साद्ख्ययोगाभिपन्नम्' और 'यत्साङ्ख्येः' इत्यादि क्रुति और स्मृतिका प्रमाणरूपसे उपन्यास किया गया है। यदि इसका उत्तर दें कि उक्त श्रुति और स्मृतिमें वर्तमान योगशब्दका मर्थ सगुणोपासना है, अतः यह शद्ा हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भिन्नविषयक उपासना और साक्षातकारका आपसमें कार्यकारणभाव नहीं हो सकता है, अतः निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति निर्गुण उपासनाको ही हेतु मानना होगा। यदि इसमें भी शक्का हो कि 'यत्साद्रूयैः' इस वाक्यमें योगशब्दका अर्थ उपासना नहीं है, किन्तु उसके भाष्यमें योगशब्द कर्मयोगपरक माना गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'यत्साङ्ख्यैः' इस वचनका चस्तुतः निर्गुणोपासनामें तात्पर्य रहते ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने कर्मके विपयमें उदाहरण दिया है, इस अभिप्रायसे उक्त व्यारयान किया है। और योगशब्दकी ध्यानमें ही रूदि होनेसे वस्तुतः वह कर्मका बोधक है भी नहीं, इससे उस स्मृतिकी मूलभूत 'सत्कारणम्' इत्यादि श्रुतिमें योगशब्दकी ध्यानार्थमें भगवान् भाष्यकारने शारीरकभाष्यमें वृत्ति मानी है, अतः कर्मयोग मुख्ययोग द्वारा ब्रह्माप्नाप्तिका साधन है, साक्षात् नहीं-इस अर्थको सूचन करनेके लिए भगवान्नेउक्त वचनका कर्मपरकरूपसे उदाहरण दिया है, इसलिए प्रमाणा- भावकी शद्ा युक्त नहीं है, तो यह भी युक्क नहीं है, क्योंकि उदाहृत श्रुति और स्मृतिको छोड़कर अन्यत्र कहींपर भी निर्गुण उपासनाका प्रतिपादन नहीं किया गया है, अतः शक्का उपपन्न दो सकती है।

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४६२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

एतस्माज्जीवघनात् परात् परं पुरिशयं पुरुपमीक्षते' इति उपासना- फलवाक्ये 'ईक्षतिकर्मत्वेन निर्दिष्ट यन्निर्गुणं ब्रह्म, तदेवोपासनावाक्येऽपि ध्यायतिकर्म, नाऽन्यत्; ईक्षतिव्यानयोः कार्यकारणभूतयोरेकविषयत्व- नियमाद्' इत्यस्यारऽर्थस्य ईक्षतिकर्माधिकरणे भाष्यकारादिभिरङ्गीकृतत्वाद्। अन्यत्राऽपि तापनीयकठवल्लयादिश्वत्यन्तरे निर्गुणोपास्तेः प्रपश्चितत्वाद्। सनाका प्रतिपादन किया गया है। और ध्यानवाक्यके अनन्तर 'स एतस्मात्०' (इस जीवघनसे उत्कृष्ट बुद्धिके साक्षीरूपसे हृदयाकाशमें वर्तमान निरु- पाधिक पुरुषका वह ध्याता पुरुष साक्षात्कार करता है) इस प्रकारके उपा- सनाके फलवोधक वाक्यमें 'ईक्षतिके कर्मरूपसे निर्दिष्ट जो निर्गुण न्रह्म है, वही । उपासनावाक्यमें ध्यानका कर्म (विपय) है, अन्य नहीं, क्योंकि कार्यकारणात्मक जो ईक्षति और ध्यान है, उनका एक विषय होता है, यह नियम है', इस प्रकारसे उक्त ही अर्थका ईक्षतिकर्माघिकरणमें भगवान् भाष्यकारने भी स्वीकार किया है। तापनीय, x कठवल्ली आदि अन्य श्रुतियों-

  • जीवघन :- जीवरूपो घन :- परमात्मनो मूर्ति :- घट का व ् पाि प ररि च्छि ात्मा तस्मात् जीवधनात अथात् जीवरूप परमात्माकी मूर्ति (ब्रह्मलोक) जीवघनशब्दका अर्थ है। 'परं पुरुषमभ्याध्यायीत' इस प्रकारके उपासनावाक्यमें यह अर्थ है। # 'ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः' (त्र० सू० अ० १ पा० ३ सृ० १३) इस सन्नके भाष्यमें इस विषयक उपपादन किया गया है, क्योंकि अन्यके ध्यानसे अन्यका साक्षात्कार नहीं देखा जाता है। इस विपयमें किसीको राङ्ा हो कि कल्पतरुकारके सतसे निर्गुण पदार्थकी उपासना नहीं हो सकती है, क्योंकि 'स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः' इत्यादि सम्पत्तिप्रतिपादक वचनके अनुसार ध्येय पदार्थका सूर्यान्तःस्थत्व विशेषण उन्होंने दिया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त सूर्यसरम्पत्तिवोधक वचन अचिरादि मार्गका वोधक है, ऐसा व्यवस्थापन स्वयं कल्पतरुकारने चतुथाव्यायमें किया है। सूर्य अथवा तदन्तःस्थ ईश्वरप्राप्तिका चोधक नहीं है, और वस्तुतः कल्पतरुकारके अन्य वचनको देखनेसे और उक्त क्ुतिके मार्गघटक होनेसे सूर्यान्त:स्थत्व विशेषण देनेमें तात्पर्थ नहीं है, यह भी ज्ञात होता है। x 'देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन् अणोरणीयाँसमिममात्मानमोद्वारं नो व्याचक्ष्त' (प्रजापतिके पास जाकर देवताओंने कहा कि सूक्षमसे सूक्ष्म ओंकारगम्य प्रत्यगात्माको कहो) इत्यादि तापनीयोपनिपद्की क्ति है। 'एतद्ध्यैवाक्षरं न्रह्म' (यही अक्षर न्रह्म है) 'ॐँ मित्येदक्षरमिदं सर्वम्' (यह सब ऊँकार अक्षर ही है) 'अमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्' (ओंकारसे आत्माका ध्यान करना चाहिए) इस प्रकारकी करमशः कठवल्ली और आदिशन्दसे गहीत माण्डक्य और मुण्डककी श्रुतियाँ भी हैं।

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विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण] भापानुवादसहित ४६३

सूत्रकृताऽप्युपासगुणपरिच्छेदार्थमारब्धे गुणोपसंहारपादे निर्गुणेऽपि 'आन- न्दादय: प्रधानस्य'-इति सूत्रेण (उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ११) भावरुपाणां ज्ञानानन्दादिगुणानाम्, 'अक्षरधियां त्ववरोधः' इत्यादिसूत्रेण (उ० मी० अ० ३ पा० ३ सू० ३३) अभावरूपाणामस्थूलत्वादि- गुणानां चोपसंहारस्य दशितत्वाच्। ननु आनन्दादिगुणोपसंहारे उपास्यं निर्गुणमेव न स्यादिति चेद्, न आनन्दादिभिरस्थूलत्वादिभिश्वोप- लक्षितमखण्डकरसं त्रह्माऽस्मीति निर्गुणत्वानुपमर्देन उपासनासम्भवाद्। में भी निर्गुण वस्मकी उपासनाका अन्रीकार किया गया है, सूत्रकारने भी- उपास्य गुणोंका निश्चय करनेके लिए आर्घ गुणोपसंहार पादमें 'आानन्दादयः प्रधानस्य'* इस सूत्रसे निर्गुण नरक्षमें ज्ञान, आनन्द आदि भावरूप गुणोंक्ता और 'अक्षरधियान्त्ववरोधः' + इत्यादि सूत्रसे अस्थूलत्व आदि अभाव- रूप धर्मोंका-उपसंहार दिखलाया है। यदि शक्का हो कि आनन्दादि गुणोंका यदि उक्त सूत्रोंसे व्रद्मामें उपसंहार किया गया हैं, तो फिर इसीसे उपास्य न्रम्ट निर्गुण नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मानन्द आदि और अस्थूलत्व आदि गुणोंसे उपलक्षित अखण्डैकरस 'में ही ब्रह्म हूं' इस प्रकार निर्गुणत्वके अनुपमदसे उपासना हो सकती है। यदि शङ्का हो कि

• 'आनन्दादयः प्रधानस्य' आनन्द, सत्य, ज्ञान आदि धर्म भले ही कहींपर सुने गये हों, परन्तु उनका उपसंदार अगमें सर्वत समक्ष लेना चाहिए, क्योंकि प्रधानभूत ब्रह्मके एक होनेसे महाविद्या भी सब वेदान्तोंमें एक है, यद भाव है। + वह सूतफा एक भागगात्र है, परन्तु सूत्का स्वरूप तो 'अक्षरधियान्त्ववरोधः सामान्य- तद्मावान्यामोपसद्वतदुक्कम् इतना वदा है अक्षरार्थ यह है-अक्षर ब्रह्ममें द्वेतनिपेध बुदिओंका सयत्र उपसंदार करना चाहिए, क्योंकि द्वैतके निपेधसे सर्वेत्र श्रुतियोंमें ब्रह्मका प्रतिपादन और प्रतिपादय बद्मका एकत्वरूपसे प्रत्यभिज्ञान भी समान है, जैसे पुरोडाशके अज्ञभूत ओपगद मन्त्रोंका अन्यत्र भ्रवण होनेपर अध्वर्युके साथ सम्बन्ध होता है। समाधानका तात्पर्य यह है कि उपास्यकोटिमें आनन्दादि गुणोंका प्रवेश नहीं किया गया है, जिमसे कि उपास्य मद्में सगुणत्वकी सिद्धि हो, किन्तु उपास्य पदार्थके निर्गुणत्व- निर्णय द्वारा फेवल उपारानामें उनका उपयोगमात्र सीकार किया गया है, इसलिए आनन्दादि गुणों के उपसंदारसे केवल आनन्दादिगुणवाचक पदोंका साथ उप्पारणमात्र विवक्षित है। इय परिस्थितिमें उपाधिविशिष्ट चैतन्यवाचक आनन्दादिशब्दोंसे और स्ील्याद्यभावविशिष्टवाचक अस्थूल आदि पदोंसे खब वाच्याथोंमें अनुगत अखैण्डकरस जिस ब्रह्मकी लक्षणासे प्रतीति

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४६४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छ्रेद

ननु 'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदसुपासते' इति श्रुतेः न परं त्रह्मोपा स्यमिति चेत्, 'अन्यदेव तद्विदिताद्' इति श्रुतेस्तस्य वेद्यत्वस्याऽप्य- सिद्ध्यापातात्। शुत्यन्तरेपु त्रह्मवेदनग्रसिद्धेरवेद्यत्वश्ुतिवास्तवावेद्य- त्वपरा चेद्, आथर्वणादौ तदुपासनाग्रसिद्वेस्तदनुपास्यत्वथ्रुतिरपि वस्तु वृत्तपराजस्तु । एवं च 'श्रवणायापि बह्ुभियों न लभ्यः' इति श्रवणाद् येपां बुद्धिमान्द्याद्, न्यायव्युत्पादनकुशलविशिष्टगुर्वलाभाद्वा श्रवणादि न 'तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि०' (वुद्धि आदिके साक्षी चतन्यको ही व्रद्म जानो, यह ब्रह्म नहीं है, जिसकी उपासना होती है) इस श्रुतिसे परव्रह्म उपास्य नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'न्यदेव तद्विदितात्' (वेदन- विषयसे ब्रम्म अन्य ही है, अर्थात् ब्रह्म वेद्य नहीं है) इस श्रुतिसे न्रह्ममें वेद्यत्वकी असिद्धि भी है। यदि शङ्का हो कि अन्य श्रुतियोंमें न्रह्मज्ञानकी प्रसिद्धि होनेसे अवेद्यत्वश्रुतिका भी तात्पर्य वस्तुतः अवेद्यत्ववोघनमें ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्तया आथर्वण श्रुतिमें ब्रह्मोपासनाकी प्रसिद्धि होनेसे ब्रह्मकी अनुपास्यत्वश्रुतिका भी वस्तुतः अनुपास्यत्वमें ही तात्पर्य क्यों न हो, अर्थात् ब्रह्ममें उपास्यत्व या वेद्यत्व वस्तुतः नहीं है, यही निषेधश्रुतिका तात्पर्य है, यह भाव है। निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाके सप्रमाण सिद्ध होनेपर 'श्रवणायापि०' (अनेक लोगोंको आत्माका श्रवण भी प्राप्त नहीं होता) इत्यादि श्रुतिके वलसे जिनको बुद्धिकी मन्दतासे । अथवा न्याय- होती है 'वही में हूँ' इस प्रकार उपासना हो सकती है, अतः ध्यानदीपमें कहा भी है- योऽखण्डेकरसस्सो ऽहमस्मीत्येवमुपासते ।।' :अर्थात् वेदान्तोंमें आनन्दादि और अस्थूलादि शब्दोंसे जो अखण्डेकरस आत्मा लक्षित है, 'वही मैं हूँ' इस प्रकार उपासना करते हैं। * कुछ मुमुक्षुओंको श्रवणका लाभ नहीं होता है, उसमें यह प्रमाण दिखलाते है। अर्थात अनेक पुरुषोंको श्रवण नहीं होता, इस प्रकार श्रुतिने जों प्रतिपादन किया है, उसमें श्रुत्युक्त ये दोनों कारण हैं, अर्थात् वुद्धिकी मन्दतासे ध्रवण नहीं होता है, अथवा कदाचित् परिष्कृत बुद्धि है, परन्तु सामग्री नहीं है, तो भी श्रवण नहीं होता, इसमें ध्यानदीपका यह शलोक भी प्रमाण है- 'अत्यन्तवुद्धिमान्याद्वा सामय्या वाप्यसम्भवात्। यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत स्रोऽनिशम्।'

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विद्योपगोगी योगमार्गका निरुपण] भापानुवादसहित ४६५

तद्विचार विनंय प्रश्नोपनिपदाययुक्तमार्पग्रन्थेषु त्ाह्मवासिष्ठादिकल्पेपु पश्ची-

त्रिधारितानुष्ठानप्रकार निर्गुणोपासनं सम्प्रदायमात्रविद्यो गुरुम्योऽवधार्य नदनुष्ानात् क्रमेणोपास्यभृतनिर्गुणत्र्साक्षारकार: सम्पदते। अवि-

न्युत्पतिके सम्पादनमें कुशल आचार्यके प्राप्त न होनेसे श्रवण आदि नहीं हो सकते, अध्ययनसम्पदित वेदान्तोंसे सामान्यतः जीवन्रपक्य जाननेवाले उन पुरुषोंको- उसके घिनारके बिना ही जैसे अनेक शाखाओंमें विप्रकीणे-विशकलित-रूपसे अपनबन पदार्योंके उपसदारसे अगिदोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान प्रकार निश्चित रोता है, वैसे ही। न्रास, वासिष्ठ आदि ऋपिनिर्मित ग्रन्थोंमें और पच्चीकरण आदि प्रन्थोंगें 1 विशकलितरूपसे अवस्थित अर्थोंका उपसहार द्वारा प्रश्नो- पनिपत् आदिमें उक्त निगुग त्रदोपासनाका प्रकारविशेष सम्प्रदायवेत्ता गुरुओं- से जानकर उसके अनुष्ठान करनेसे-कमशः उपास्यभूत निर्गुण न्रदका साक्षा- रकार होता है। अविसंवादिभम न्यायसे X उपासना भी कदाचित् फलकालमें

नमन सो दुदेशे बन्दतासे सथवा साममोे अभावसे पेदान्त श्रवणकी प्राप्ति न कर सकें, मे अरनय ससे टपायना परें, तामग गह दे कि भले दी वे चेदान्तथवणसे रहित हों, मन्तु अयने मामान्यत: उव्दे सालास परिजान सो, तो श्रवणके बिना हो गुरुओसे आत्माका ममेए मिमन बसके उपचे उपारानामे मवपारारकार कर सकते है। ै अमपुशन और योगपागिष्ट इलादि शार्प ग्रन्थ, यह माव है। म वद प्रह्समीं कर दो कि पभीघरणमें क़ा है कि वेदान्तके लक्ष्यभूत असण्डैकरस प्रनयमवाक ममसा प्रस्नके प्रतिमोपनपूर्वक मी वद्ष है एस प्रकार अगेदभावनारो अवसकान ही पनानि है, दसस और 'योज्णेकरयः सोडटगस्मि' पत्यादि उदाहृत ध्यानदीपके पचनमे पमूत निहण गयरविधे सी विवक्षा की गई है, प्रश्नोपनिपत्में शैव्यके प्रश्नमें तो शरीद रहप प्रशीक्में निमुश अदरति नियकित है, पेधे कठवारोंमें भी इसी प्रववारकी उपासना निन्नी हे। इग पि्वतिमें प्रकत नियुणोपासनामें यद प्रशोपनिपत्का वाकय प्रमाणरूपसे कैसे मदत से गफ्डा हे, सो यद पल्त मुक नदी है, पर्गोकि प्रकृत उपायना में तापनी, माण्ठूक्य आदि उपनिपत् दी प्रमा्कप्स विवकत हे और प्रक्ष, करवही आदिका उदाहरण तो यह चतलानेके ए दिया गना है कि निर्गन उपायना अन्मनन भी रष्ट है, यद भाव है। x अनिगंगादिध्रम न्याय एव शहारत है-किसी एक परमें श्रीकृण्णचन्द्रकी मूर्ति है, उसके प्रतिषिम्वका परंगे वादर मदसमें रिशत पुरुषको अवभारा दोनेपर 'ये श्रीकृष्णचन्द्र हैं' ५९

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४६६ सिद्धान्तलेश संग्रह [तृतीय परिच्छेद

संवादिभ्रमन्यायेन उपास्तेरपि क्वचित् फलकाले प्रमापर्यवसानसम्भवाद् !. पाणौ पञ्च वराटकाः पिधाय केनचित् 'करे कति चराटकाः'१ इति पृष्टे 'पश्च वराटकाः' इति तदुत्तरवकतुर्वाक्यप्रयोगमूलभृतसङ्वयाविशेष- ज्ञानस्य मूलप्रमाशून्यस्याऽडहार्यारोपरूपस्थापि यथार्थत्वव ननिर्गुणत्रलोपासन-

पासनाशास्त्रमात्रमवलम्व्य क्रियमाणस्यापि वस्तुतो यथार्थत्वेन दहराद्यु- प्रमाणमें पर्यवसित होती है। जैसे कोई अपने हाथमें पाँच कोडियोंको बन्द करके पूछे कि बतलाओ मेरे हाथमें कितनी कौड़ियाँ हैं ? इसके जवावमें किसीने अटकलसे कहा कि पाँच कौड़ियाँ हैं। इसमें जिस पुरुपने उत्तर दिया उसके वाक्यप्रयोगमं हेतुभूत जो संख्याविशेपज्ञान है, वह यद्यपि मूल प्रमाणसे शुन्य और आहार्य्यारोप है, तथापि वह जसे यथार्थ माना जाता है, वैसे ही अर्थतथात्वनिश्चायक मूल प्रमाणसे निरपेक्ष क्रियमाण त्रक्षोपासना भी दहरादि उपासनाके समान केवल शास्त्रका अवलम्बन करके वस्तुतः.

इस प्रकार भ्रम उत्पन्न होता है, इस अमके वाद उस पुरुपके प्रतिविम्बाध्यासकी उपाधिकी सन्निधिमें जानेसे सत्य कृष्णचन्द्रविपयक प्रमा दोतो है, यह देखा जाता है। इस स्थलमें प्रतिविम्ब स्थलमें उत्पन्न विम्बभूत कृष्णचन्द्रका भ्रम अविसंवादी (सफल) कहलाता है। प्रकृतमें जैसे उस अमसे प्रवृत्त पुरुपको श्रीकृप्णप्राप्तिरूप फलके समयमे श्रीकृप्णकी प्रमा उत्पन्न होती है, वैसे ही निगुण उपासनामें प्रवृत्त पुरुपको वरह्मप्राप्तिरूप फलकालमें निर्गुन ब्रह्मकी प्रमा होती है, यह भाव है। पूर्वमें संवादिभ्रमके दृष्टान्तसे निर्गुण उपासनका प्रमामें पर्यवसान है, यह जो कहा गया है, वह युक नहीं है, क्योंकि दष्टान्त विपम है, कारण कि कृष्णके प्रतिबिन्ब- विभ्रमस्थलमें उपाधिके पास जानेके वाद चक्षुके सननिकर्पस श्रीकृप्णी प्रमा होती, संवादी अमसे नहीं होती, प्रकृतमें प्रमाके उत्पादनमें निर्गुण उपासनाकी सामर्थर्य नहीं है और न तो कोई अन्य सामग्री है, इसलिए उसका प्रमामें पर्यवसान कैसे हो सकता है? इस प्रकारकी आशख करके निर्गुण उपासनामें स्वसमान विपयकी प्रमाके उत्पादनमें सामर्थ्य है, उसका प्रतिपादन ! करनेके लिए उसकी यथाथताका सदष्टान्त उपपादन इस ग्रन्थसे करते हैं। * ब्रह्मरूप अर्थके प्रत्यगरूपत्व, निष्प्रपन्वत्वरूप तथात्वका निर्णायक जो अन्यार्थचोधकत्व- शुन्य मूलभूत श्रुति प्रमाण है उसकी अपेक्षा नहीं रखनेवाली अरथात निदिध्यासनके समान प्रकृत निर्गुणोपासना विचारपूर्वक नहीं है, अतः निर्विचिकित्स त्त्वनिरणयपूर्वकत्वप्रयुक्त यह यथार्थता नहीं है, यह भाव है। * सगुण उपासनामें जैसे सगुण ईश्वरमें विचारपूर्वक जीवाभिन्नताका निर्णय नहीं

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मदासाक्षात्कारमें करण-विचार] भापानुवादसहित ४६७

पासनेनेव निगुणोपासनेन जन्यस्य स्वविपयसाक्षात्कारस्य श्रवणादि-

डयांस्तु विशेप :- प्रतिबन्धरहितिस्य पुंसः श्रवणादिग्रणाड्या ब्रह्मसा- क्षात्कारो झटिति सिध्यतीति साङ्गचमार्गो सुखयः कल्प: उपास्त्या तु विलम्वेनेति योगमागोऽनुकल्प इति ॥८॥ ननु फि करणं मझसाक्षात्कारे बसके साक्षास्कारमें करण क्या है? नन्वस्मिन् पक्षद्वयेऽपि ब्रह्मसाक्षात्कारे कि करणम् १। अन्न केचन । प्रत्ययाधृत्तिमाचरूयुः साङ्रये योगे च सम्भवात् ॥१९ ॥ इस विषयमें कुछ लोग कहते हैं कि साङ्गय और योग दोनों मार्गमें प्रत्ययावृत्ति ही महाके साक्षातकारमें करण है।। १९ ।।

बथार्थ होनेके कोरण दहरादि उपासनाके समान निर्गुण उपासनासे जन्य स्वविषयक साक्षात्कार श्रवणादि कमसे उत्पन्न साक्षात्कारके समान तत्त्वार्थ- विषयकत्व अवदय हो सकता है। विशेग केवल इतना ही है कि प्रतिबन्धकोंसे शन्य पुरुपको श्रवणादि क्रमसे ही वद्यसाक्षात्कार श्रीम होता है, इसलिए सांख्यमार्ग मुख्य कल्प है और उपा- सनासे न्रदासाक्षात्कार विलम्बसे होता है, अतः योगमार्ग गौण कल्प है ।।८।। यहांपर * शुक्का होती है कि इन दो पक्षोंमें मी अर्थात् सांख्यमार्ग और योगमार्गमें मी त्रदासाक्षारकारमें करण कौन है?

है, सयाधि 'समुण ईश्वरकी अभिघ्नताये अपनी उपायना करनी चाहिए' इस प्रकारके उपासना- विधिशासतरी यामपसे सगुग उपासना की जाती है, वैसे ही 'निर्गुण उपासना करनी चाहिए' इस शास्त्र के आधारपर निर्गुण उपागना करनी चाहिए, यद भाव है। * यदि शतता दो कि यह प्रश पक्षतयसाधारण नहीं दो सकता है, क्योंकि योगमार्गमें निर्गुण उपासना दी सगुण उपायनाके सश्न्तसे पूर्वमें करण कही गई है, तो यह शक्का युक्त नहीं है, धर्योकि यह प्रश्न प्रमाणके अभिप्रायसे पूछा गया है, पहले निर्गुण उपासनामें ब्रह्म- म्राक्षाकारफी हेतुना बतलाई गई है, करणता नहीं, इसलिए इस प्रथ्नकी अनुपपत्ति नहीं है, अर्थात योगमार्गम उपाराना ही करण है, या अन्य कोई यह प्रश्न दो सकता है, यह भाव है।

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४६८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृत्तीय परिच्छेद

केचिदाहु :- प्रत्ययाभ्यासरूपं प्रसङ्मयानमेव। योगमार्गे आदित आरभ्योपासनरूपस्य साङ्ग्यमार्गे मननानन्तरनिदिध्यासनरूपस्य च तस्य सच्चात्। न च तस्य ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वे मानाभावः, 'वतस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः इति श्रवणात्। कामातुरस्य व्यवहित- कामिनीसाक्षात्कारे प्रसङ्चानस्य करणत्वकलप्ेश्व। 'आ प्रायणात् त्रापि हि दप्टस्' (उ० मी० अ० ४ पा० १ सू० १२) इत्यधिकरणे, 'विकल्पोऽ- विशिष्टफलत्वादू (उ० मी० अ० ३ पा०३ सृ० ५९) इत्यधिकरणे च दहराद्यहंग्रहोपासकानां प्रसङ्गयानाटुपास्यसगुणब्रह्मसाक्षात्काराङ्गी- काराच। ननु च प्रसङ््यानस्य प्रमाणपरिगणनेष्वपरिगणनात् तज्जन्यो ब्रह्मसाक्षात्कार: प्रमा न स्यात्। न च काकतालीयसंचादिवराटकसङ्खया- इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि प्रत्ययाभ्यासरूप प्रसंख्यान ही व्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण है, क्योंकि योगमार्गमें पहलेसे लेकर उपासना- रूप और सांख्यमार्गमें मननके बाद निदिध्यासनरूप प्रसंख्यान विद्यमान ही है। यदि शङ्का हो कि प्रसंख्यानको ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण माननेमें कोई: प्रमाण नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'ततस्तु०' (निर्विशेप परमा- त्माका ध्यान करनेवाला पुरुप उस ध्यानसे परमात्माको देखता है) इस प्रकार- की श्रुति प्रत्ययाभ्यासरूप प्रसंख्यानको साक्षात्कारके प्रति करण माननेमॅ प्रमाण है।t और कामातुरके असन्निकृष्टकामिनीके साक्षात्कारमें प्रसंख्यानकी करणता दृष्ट भी है। 'आप्रायणात् तत्रापि हि दष्टम्' इस अधिकरणमें और 'विकल्पोSविशिष्टफलत्वात्' X इस अधिकरणमें दहरादि और अहंग्रह के उपासकोंके उपास्य सगुण ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति प्रसंख्यानको करण माना भी गया है। यदि शङ्का हो कि प्रमाणकी गिनतीमें प्रसंख्यानका परिगणन न होनेसे उससे उत्पन्न होनेवाला व्रह्मसाक्षात्कार पमा नहीं होगी। और काकतालीय कौड़ीकी + इस स्थलमें कामिनीके साथ चक्षुका संसर्ग न होनेके कारण और मनका वाह्याथमें स्वातन्त्र्य न होनेके कारण कामिनीविषयक प्रसड्ख्यान ही कामिनीसाक्षात्कारमें करण है, यह तात्पर्य है। मरणपर्येन्त सगुण उपासनाकी आवृत्ति करनी चाहिए, क्योंकि मरणकालमें भी योगी लोग ब्रह्मकी उपासना करते हैं, यह श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है, इसलिए सरवेदा जवतक व्रह्मचिन्तन न किया जाय, तबतक मरणकालमें वह नहीं हो सकता है, यह सूत्रका अर्थ है। X सगुण उपासनाओंका विकल्प मानना ही युकत है, क्योंकि ब्रह्मसाक्षात्काररूप फल सामान्यरूपसे सरवत्र एक ही है, यह 'विकल्पो' इत्यादि सूत्रका अक्षरार्थ है।

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बससांक्षात्कारमें करण-विचार] भापातुवादसहित ४६९

विशेपाहार्यज्ञानवद् अर्थावाधेन अ्रमात्वोपपत्तिः, ग्रमाणामूलकप्रमात्वा- योगात्। आहार्यवृत्तेश्व उपासनावृत्तिवद् ज्ञानभिन्नमानसक्रियारूपतया इच्छादिवद अवाधितार्थविपयत्वेऽपि प्रमाणत्वानभ्युपगमात्। मैवम्, क्लस- प्रमाकरणामूलकत्वेऽपीश्वरमायावृत्तिवत् प्रमात्वोपपत्तेः। विपयाघाधतौ- ल्यात्। मार्गद्वयेऽपि प्रसङ्मधानस्य विचारितादविचारिताद्वा वेदान्तात्

मूलकत्वाच्च। उक्त च कल्पतरुकार :- संख्याविशेपके सफल ज्ञानके समान अर्थके वाघित न होनेपर भी ब्रह्मसाक्षा- त्कारको प्रमा नहीं मान सकते हैं, क्योंकि प्रमाणसे अनुत्पन्न ज्ञान प्रमा नहीं होता, यह नियम है, जसी उपासना वृत्ति ज्ञानभिन्न क्रियारूप है, वैसे ही माहार्थवृत्ति भी * मानस क्रियारूप ही है, इसलिए उसके अवाधितार्थविपयक होनेपर भी इच्छा आदिके समान उसमं प्रमात्व नहीं माना जा सकता है, तो यह भी शक्ञा युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि न्रह्मसाक्षात्कार प्रसिद्ध प्रमाणजन्य नहीं है, तथापि ईश्वरकी + मायावृततिके समान उसमें प्रमात्वकी उपपत्ति हो सकती है, क्योंकि विपयका अवाध समान ही है। और उक्त दो मार्गोमें प्रसंख्यानके मृलविचारित या अविचारित चेदान्तसे x होनेवाली जीवन्रद्ैक्यविपयक अवगतिके होनेसे प्रसंग्यानजन्य त्रह्मसाक्षात्कार भी प्रमाणमूलक ही हो सकता है।. इस विपयम कल्पतरुकारने कहा भी हैं।

• अविसंवादी चराटकसंरया आदिको विपय करनेवाली वृत्ति आहर्थ्य पृत्ि कहलाती है, अयवा चाधफालीन इच्छाजन्य पृत्ति आहार्यपृत्ति है। + रसरकी माया इृत्तिमें भी यदि ज्ञानस्वका अग्रीकार न किया जायगा, तो 'यः सर्वजः स सरववित' दत्यादि श्तिकी उपपति नहीं दोगी, कारण कि ईशवरमें सर्वज्ञताफी भी मायावृत्तिके आधारपर दी उपपत्ि हे, गद भाव है। 1 इच्छाया वारण करनेके लिए इच्छानिजत्वर विशेषण देना चाहिए, अंतः इच्छामें जानत्वकी प्रसकि नहीं दे, अन्यथा इच्छाके अवाधितार्थकत्व दोनेसे उसमें भी क्षानत्वकी प्रसकि, होगी गहद भाव है। x अविचारित वदान्तसे व्रहाम्यक्यज्ञान होता है, यह योगमार्गाभिप्रायंसे कहा गया है, और यांर्यमार्गमें विचारित वेदान्तये महात्म्यैक्यावगति होती है, इस अभिप्रायसे 'विचारितात्' यह विशेषण है, यदि शका हो कि विचारित या अविचारित वेदान्तसे ही म्रह्मावगति हो

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४७० सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

'वेदान्तवाक्यजज्ञानभावनाजाऽपरोक्षघीः । सूलप्रमाणदार्त्येन न भ्रमत्वं ग्रपद्यते।। न च प्रामाण्यपरतस्त्वापत्तिस्तु प्रसज्यते। अपवादनिरासाय सूलशुद्ध यतुरोधनाद् ॥।' इति। अन्ये तु मन एवाहुरेनां तत्सह कारिणीम्। कुछ लोग कहते हैं कि मन ही द्रह्मसाश्वात्कारमें कारण है और प्रत्ययात्ृत्ति मनकी सहकारी कारण है। अन्ये तु 'एपोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः', 'दृधयते त्वग्न्यया वुद्धया' इत्यादिश्वुतेरमन एव त्रह्मसाक्षात्कारे करणम्, तस्य सोपाधि-

अर्थात् वेदान्तवाक्योंके ज्ञानरूप अभ्याससे होनेवाली अपरोक्ष बुद्धि वेदान्तवाक्यकी अथवा इससे होनेवाली प्रमाकी दृढ़तासे (अविग्रतिपन्न प्रामाण्य होनेसे) भ्रम नहीं होती है। इससे परतः प्रामाण्यापत्ति भी प्रसक् नहीं है, क्योंकि अपवादके (अप्रामाण्य शक्काके) निरासके लिए मूल प्रमाणकी शुद्धिकी सपेक्षा की गई है। कुछ लोग कहते हैं कि 'एपोडणुरात्मा०' (इस अत्यन्त सूक्ष्म आत्माको मनसे जानना चाहिए) 'दश्यते०' (कुशाग् बुद्धिसे आत्मा देखा जाता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे आत्मसाक्षात्कारमं मन ही कारण प्रतीत होता है, क्योंकि मनमें सोपाधिक आत्माके अहमाकार वृत्तिरूप प्रमात्मक साक्षात्कारके प्रति करणता लोकमें ग्रसिद्ध है, और 'प्रातिभासिक स्वम प्रपश्वसे विपरीत व्यावहारिक ममाता आदि पदारथोंके ज्ञानके प्रति साघनभूत अन्तःकरणके' इत्यादि प्रपञ्चपादिका आादि विवरणन्थोंसे प्रमाताशव्दसे कहलानेवाले सोपाधिक सकती है, तो प्रंस्यानकी क्या आवद्यकता है? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रसंख्यानके पूर्वमें अविद्याके निवतक अप्रतिवद्ध ब्रह्मानगति उत्पन्न नहीं हो सकती है, यह भाव है। *केवल प्रसङ्ख्यान ही ्रह्मपाक्षात्कारके प्रति करण नहीं है, किन्तु तत्सहकत अन्तः करण ही न्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण है, इस प्रकारके मतका अवलम्बन करनेवालोंके मतका निरूपण इस ग्रन्यसे करते हैं।

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महमासाक्षात्कारमें करण-विचार ] भापानुवादसहित ४७१

प्रतिपादनात्। 'अहमेवेद सर्व सर्वोडस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः' इति श्रुत्युक्ते स्व्नामे त्रक्षसाक्षात्कारे एव मनसः करणत्वसम्प्रतिपत्तेश। वदा करणान्तराभावात्। ग्रसङ्गयानं तु मनस्सहकारिभावेनापि उप- सुज्यते। 'वाक्यार्थभावनापरिपाकसहितमन्तःकरणं त्वंपदार्थस्यापरोक्षस्य तत्पदार्थतामाविर्भाववयति'-इति भामती- चचनान्। 'ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं व्याय- मान:' इति श्रुतावपि ज्ञानप्रसादशव्दितचित्तैकाग्यहेतुतयैव ध्यानोपा- दानात्। न तु प्रसह्ग्यानं स्वयं करणम्, तस्य क्वचिदपि ज्ञानकणरत्वा- चलसेः। कामातुरकामिनीसाक्षात्कारादावपि प्रसद्धयानसहकतस्य मनस

आत्मसाक्षात्कारके प्रति मनकी करणताका प्रतिपादन किया गया है। और 'अहमेवेदम्०' (सब वस्तुओंमें सद्रूपसे अनुभूयमान यह सर्वात्मक ब्रक्ष में ही हैँ, इसलिए सभी में हूँ, ऐसा स्वममे ब्रम्मवित् मानता है, यह इसका उच् लोक है) इस श्रुतिसे प्रतिपादित स्वम्कालीन निर्गुण ब्रह्मसाक्षारकारके पति मन ही करण माना गया है, क्योंकि स्वमकालमें मनके सिवा अन्य करण नहीं रहते हैं। आत्मसाक्षात्कारके प्रति प्रसड्ख्यान मनकी सहकारितारूपसे उपयुक्त होता है, क्योंकि 'महावाक्यार्थकी भावनाके परिपाकसे युक्त अन्तःकरण तत्-तत् उपाधिके आकारके निपेधसे त्वंपदार्थके अपरोक्षानुभवमें तत्पदार्थत्वका आविभीव करता है' इस प्रकार भागतीकारका वचन भी है। 'ज्ञानप्रसादेन + विशुद्धसत्त्वस्ततम्तु' (ध्यानसे लब्ध चित्तकी एकाग्रतासे शुद्ध ब्रह्मको देखता है) इस श्षुतिमं भी 'ज्ञानप्रसाद' शव्दसे विक्षित चित्तकी एकाग्रताके प्रति हेतुरूपसे ही ध्यानशव्दका प्रयोग किया गया है। केवल प्रसंख्यान आत्मसाक्षात्कारमें करण नहीं है, क्योंकि कहीं भी उसकी ज्ञानके करणरूपसे प्रतीति नहीं होती है। और कामातुर पुरुपके कामिनीसाक्षात्कारकी प्रसङ्ख्यानसहकृत मनकी करणतासे ही उपपति हो सकती है, फिर ज्ञानके प्रति अक्लप्त अन्य करण माननेमं कोई प्रमाण नहीं है।

  • करण-व्युरपतिसे अर्थात् 'जायते अनेन' इत्यादि व्युत्पत्तिखे ज्ञानशब्दका अर्थ अन्त:करण है, उप्का प्रसाद-चित्तकी एकाप्रता, यह एकाप्रता ध्यानसे प्राप्त होती है,

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४७२ सिद्धान्त लेश संग्रह [तृतीय परिच्छेद

महावाक्यं परे प्राहुर्मनसः प्रतिपेधतः ॥ २० ॥ कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्मसाक्षात्कारमें तत्वमस्यादि महावाक्य ही करण है, क्योंकि अनेक श्रुतियोंमें मनकी करणताका प्रतिषेध किया गया है॥ २० ॥ अपरे तु 'तद्धास्य विजज्ञौ' 'तमसः पारं दर्शयति' 'आचार्यचान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरम्' इत्यादिश्ुतिपु आचार्योपदेशानन्तरमेव ब्रह्मसाक्षात्कारोदये. जीवन्मुक्तिश्रवणाद्, 'वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः' इति ज्ञानान्तरनैराकाङ्क्ष्यश्रवणात्, 'तं त्वौपनिपदं पुरुपम्' इति त्रह्मण उपनिपदेकगम्यत्वश्रवणाच् औपनिपदं महावाक्यमेव न्ह्मसाक्षात्कारे

कुछ लोग कहते हैं कि 'तद्धास्य विजज्ञौ' (उसने पिताके उपदेशसे उस ब्रह्मका साक्षात्कार किया) 'तमसः पारं दर्शयति०' (अविद्याके अघिष्ठानमूत न्रह्मको दिखलाता है) 'आचार्यवान्०' (आचार्यवाला पुरुष जानता है, विद्वान्की विदेह मुक्तिमें तबतक ही देर है, जवतक प्रारब्धसे वह मुक्त नहीं होता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंमें आचार्यके उपदेशके बाद ही न्रद्ासाक्षात्कारका उदय होनेपर; जीवन्मुक्तिका श्रवण है, इसलिए और 'वेदान्तविज्ञान०' * (वेदान्त वाक्योंके ज्ञानसे ही जिन्हे अर्थ निश्चित हो गया है) इससे ज्ञानके बाद किसी आकाङ्क्षाके न होनेसे एवं 'तन्त्वौपनिपदं पुरुपम्' (उस उपनिपत् प्रमाणगग्य पुरुषको) इस श्रुतिसे व्रह्मके उपनिपत्प्रमाणगम्यत्वके श्रवणसे [यही निश्चित होता है] ब्रह्मके साक्षात्कारके प्रति उपनिपत्के महावाक्य ही + करण हैं, मन

इसलिए ध्यानसे लब्ध चित्तकी एकाग्रतासे उस आत्माको देखता है, यह इस श्तिका तात्पर्य है। * जिन लोगोंके मतसे महावाक्य ही व्रहा-साक्षात्कारके प्रति कारण है, उनका मत इस अन्थस दिखलाया जाता है। प्रकृत श्रतिसे वैदान्तवाक्यजन्य ज्ञानसे ही व्रह्मात्म्यैक्यरूप अर्थका निश्य होता है, ऐसा कहनेसे वाक्यार्थज्ञानके बाद प्रसद्ख्यानका अनुष्ठान अपक्षित नहीं है, यह प्रतीत होता है, इसकी तभी उपपत्ति हो सकती है जव कि वाक्यस ही अपरोक्ष ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय, इससे 'वेदान्तविज्ञान' इत्यादि श्रुतिसे वाक्य ही अपरोक्षज्ञानमें करणत्वरूपसे निश्चित होता है, यह भाव है। + सांख्य और योगमार्गके अनुषानसे दृष्ट और अदष्टरूप सकल प्रतिवन्धकका विनाश होनेपर प्रतिवन्धकसे रहित वाक्य ही साक्षारकारको उत्पन्न करता है, इसलिए वाक्यके करणत्व- पक्षमें सांख्य और योगमार्गकी वैयर्थ्यशङ्का नहीं हो सकती है, यह भाव है।

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न्रक्ष साक्षारकारमें करणविचार ] भापानुवादसहित ४७३

करणम्, न मनः। 'यन्मनसा न मनुते' इति तस्य ब्रह्मसाक्षात्कारकरण त्वनिपेधात्। न चाऽपक्कमनोविपयमिदम्। 'येनाहुर्मनो मतम्' इति- वाक्यशेपे मनोमात्रग्रहणात्। न चैवं 'यद्वाचाऽनम्युदितम्' इति शब्द- स्यापि तत्करणत्वं निपिध्यते इति शङ्यम्, मनःकरणत्ववादिनामपि शब्दस्य निर्विशेपपरोक्षज्ञानकरणत्वस्याभ्युपगतत्वेन तस्य 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह इति श्रुत्यनुरोधेन शब्दार्थप्राप्तिरूपशक्ति- मुखेन शब्दस्य तत्करणत्वनिपेधे तात्पर्यस्य वक्तव्यतया शक्यसम्बन्ध रूपलक्षणामुखेन तस्य तत्कारणत्वाविरोधात्। न च 'मनसैचानुद्रष्टव्यम्' इति श्रुतिसिद्धं मनसोऽपि तत्करणत्वं न पराकर्तु शक्यमिति वाच्यम्,

नहीं। क्योंकि 'यन्मनसा न मनुते' (जिसका मनसे ज्ञान नहीं हो सकता है) इस श्रुतिसे व्रद्मासाक्षात्कारके प्रति मनकी साधनताका निषेध किया गया है। यदि शक्का हो कि वह निपेध अपक मनके लिए है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'येनाहुर्मनो मतम्' (जिस चैतन्यसे मनका प्रकाश 'होता है) इस प्रकारके वाक्यशेपमं सामान्य मनका ही ग्रहण है। यदि शद्का हो कि 'यद्धाचानभ्युदितम्' (जिस चैतन्यका वाणीसे प्रकाश नहीं होता है) इस श्रतिसे शव्दकी भी त्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारणताका खण्डन किया गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मन जिसके मतमें साक्षात्कारके प्रति करण है, उसके मतमें भी शव्दको निर्विशेष चस्तुके परोक्षज्ञानके प्रति करण मानते हैं, अतः 'यद्वाचानभ्युदितम्' इत्यादि निषेधका 'यतो वाचो०' (मनके साथ वाणी भी प्राप्ति न कर जिससे निवृत्त होती है) इस प्रकारकी श्रुतिके अनुरोधसे शब्दकी अर्थप्राप्तिरूपा शक्तिके निपेध द्वारा शव्दनिष्ठ साक्षातकारके निपेधमें तात्पर्य है, ऐसा कहना होगा, इसलिए शक्यसम्बन्धरूप लक्षणाके द्वारा शब्दमें न्रम्मसाक्षात्कारकी करणताका निषेध नहीं है। यदि शक्का हो कि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही न्झ्का साक्षात्कार करना चाहिए) इस श्रुतिसे मनमें सिद्ध हुई साक्षात्कारकरणताका निषेध नहीं कर सकते हैं, तो यह भी

  • अर्थात् पूर्वापरवाक्योंके अनुयन्धानसे यही ज्ञात होता है, कि शब्द शकतिपृत्तिसे अद्ाका बोधक नहीं है, परन्तु लक्षणावृत्तिसे बोधक नहीं है, यह नहीं मान सकते हैं, यद गाव है।

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४७४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

शाब्दसाक्षात्कारजननेऽपि तदैकाग््यस्यापेक्षितत्वेन हेतुत्वमात्रेण तृतीयो- पपत्तेः। 'मनसा ह्वेष पश्यति मनसा शृणोति' इत्यादौ तथा दर्शनाद्। गीताविवरणे भाष्यकारीयमनःकरणत्ववचनस्य मतान्तराभिप्रायेण प्रवृत्ते- रित्याह्कः ॥ ९ ॥ ननु तथाऽपि शब्दस्य परोक्षज्ञानजनकत्वस्वभावस्याऽपरोक्षज्ञानजन- कत्वं न सङ्गच्छते इति चेत्, मानान्तरस्याप्नसरात्परोक्षेण भ्रमाक्षयात्। सहकारिविधानाच शब्दादप्यपरोक्षघीः ॥ २१ ॥ ब्रह्ममें किसी अन्य प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं होनेसे, परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति न होनेसे और सहकारी (मनन आदि) का विधान होनेसे शब्दसे भी अप- रोक्ष ज्ञान हो सकता है ॥२१॥ अत्र केचित्-स्वतोऽसमर्थोऽपि शब्दः शास्त्रश्रवणमननपूर्वकप्रत्य-

युक्त नहीं है, क्योंकि शब्दसाक्षात्कारके उत्पादनमें भी मनकी एकाग्रताकी अपेक्षा होनेसे केवल हेतु अर्थमें भी उक्त तृतीयाकी (मनसा) उपपत्ति हो सकती है। 'मनसा ह्येष' (यह मनसे देखता है और मनसे सुनता है) इत्यादि स्थलमें चाक्षुष आदि ज्ञानमें मनकी करणताके न होनेपर भी केवल हेतुत्वरूपसे तृतीयाकी उपलब्धि है। गीताके विवरणमें मनमें करणताका प्रतिपादक जो भाष्यकारका वचन है, उसकी किसी मतान्तरसे (वृत्तिकारके मतसे) प्रवृत्ति हुई है, खास निजी मतसे नहीं, अतः कोई अनुपपत्ि नहीं है॥९॥ अब शङ्का होती है कि शब्दके ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वपक्षमें श्रुति और भाष्यका विरोध यद्यपि नहीं है, तथापि जिस शब्दका स्वभाव परोक्षज्ञान- जनकंता है, उसकी अपरोक्षज्ञानजनकता कैसे सङ्गत हो सकती है? इस प्रश्नके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि शब्द स्वतः अपरोक्ष- ज्ञान करनेमें समर्थ नहीं है, तथापि शास्त्रश्रवणमननपूर्वक प्रत्ययाभ्याससे उत्पन्न अनेक संस्कारोंसे प्राप्त ब्रह्मैकायरघसे युक्त चित्तरूप दर्पणसे * अनुगृहीत छ जसे चक्षु अपने आप प्रतिविम्वका ग्रहण नहीं करता है, तथापि दर्पणके समवधानसे प्रतिविम्वका ग्रहण करता है, वैसे ही प्रकृतमें चित्ताख्य दर्पणसे युक शब्द अपरोक्षज्ञानको पैदा करता है, यह भाव है।

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ब्रेह्ंज्ञांनकी शा्द अंपरोक्षतां ] मापांतुवीदसहित ४७५

त्पादयति शास्त्रीयसंस्कारसंस्कृताग्न्यधिकरणक इव होमोऽपूर्वमिति कल्प्यते। 'तरति शोकमात्मविद्' इति शास्त्रपामाण्याद्। अपरोक्षस्य कर्तृत्वाध्यासस्यापरोक्षाधिष्ठानज्ञानं विना निवृत्त्ययोगाद् औपनिपढ़े ब्रह्मणि मानान्तराप्रवृत्ते: शब्दादप्यपरोक्षज्ञानानुत्पत्तौ अनिर्मोक्षप्रसङ्गादित्याङ्कः । भावनाSSवृत्तिसचिवाद्विघुरस्येव मानसात्। कामिन्या इव श्दात्तामितरे सम्प्रचक्षते ॥। २२ ॥ भावनाकी भावृत्तिसे युक्त अन्तःकरणसे जैसे विधुर पुरुपको कामिनीका साक्षात्कार होता है, वैसे ही भावनाकी आवृत्तिसे युक्त शब्दसे भी ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।।२२।।

शब्द अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न करता है, जैसे कि शास्त्रीय संस्कारसे संस्कृत + अभिमें होनेवाला होम अपूर्वकी उत्पत्ति करता है, क्योंकि 'तरति शोकमात्मवित्' यह श्रुति प्रमाण है। और अपरोक्षरूप कर्तृत्वादि अध्यासकी अविष्ठानविपयक अपरोक्ष ज्ञानके विना X निवृत्ति नहीं हो सकती है, इसलिए जिसमें अन्य प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं है, ऐसे केवल उपनिषत् प्रमाणगम्य ब्रह्मकी शब्दसे भी अपरोक्षानुभूति न मानी जाय, तो मोक्षकी अप्रसक्ति होगी।

  • अर्थात् आधान आदि संस्कारोंसे संस्कृत अग्निमें किया हुआ होम (त्यक्क द्रव्यका अग्निमें प्रक्षेप) ही अपूर्वकी उत्पत्ति करता है, क्योंकि आधान आदि संस्कार से रहित अग्निमें किया हुआ होम अपूर्वकी उत्पत्तिमें समर्थ नहीं है, इसी प्रकार शब्द भी उक्त चित्तदर्पणानुगृहीत होकर अपरोक्षज्ञानकी उत्पत्ति करता है, यह भाव है। X कारण कि श्रवण आदिसे उत्पन्न परोक्षज्ञानके रहते हुए भी कर्तृत्वादि अध्यासकी निवृत्ति नहीं होती है, यदि परोक्षज्ञानमात्रसे अध्यासकी निवृत्ति मानी जाय, तो मनन आदिका- विधान व्यर्थ होगा और अपरोक्ष दिग्भ्रम अपरोक्ष साक्षातकारके विना निधृत्त भी नहीं होता, भतः अपरोक्षकतृत्वादि अध्यासकी निवृत्ति करनेके लिए अवश्य झब्दसे अपरोक्ष ज्ञान मानना चाहिए, यह भाव है। * तात्पर्य यह है कि अतीन्द्रिय मनको यदि ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण माना जाय, तो केवल उपनिपत्प्रमाणसे ही ब्रह्मका ज्ञान होता है, इस औपनिषदत्वक्षतिके साथ विरोध होनेसे अह्ममें किसी शब्दभिन्न प्रमाणकी प्रवृत्ति न होनेपर शब्दकी भी यदि प्रपृत्ति न मानी जाय, तो ब्रह्मसाक्षातकारकरणके लब्ध न होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कार भी नहीं होगा और सुतरां मोक्षवोधक सम्पूर्ण शास्त्रोंकी अप्रामाण्यप्रसकि होगी, इसलिए मोक्षवोधकशास्त्रोंके प्रामाण्यके लिए अवश्य शब्दको साक्षारकारके प्रति करण मानना चाहिए, यह भाव है।

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४७६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृत्तीय परिच्छेद

अन्ये तु भावनाप्रचयसाहित्ये सति चहिरसमर्थस्यापि मनसो नष्ट- वनितासाक्षात्कारजनकत्वदर्शनाद् निदिध्यासनसांहित्येन शव्दस्याप्यपरो- क्षज्ञानजनकत्वं युक्तमिति दृष्टानुरोधेन समर्थयन्ते। विज्ञातृचिद्भिन्नस्य विषयस्यापराक्ष्यतः । पारोक्ष्यासम्भवादन्ये ग्राहु: शब्दापरोक्षताम् ॥ २३॥ कुछ लोग कहते हैं कि प्रमातृचैतन्वसे अभिन्न विपयका अपरोक्षत्व होनेसे और शब्दसे परोक्षज्ञानका सम्भव न होनेसे शब्दसे ही ब्रह्मका अपरोक्ष होता है।२३॥ अपरे तु अपरोक्षार्थविपयत्वं ज्ञानस्याऽपरोक्षत्वं नाम, अन्यानिरुक्तेः । अर्थापरोक्षत्वं तु नापरोक्षज्ञानविपयत्वम्, येनाऽन्योन्याश्रयो भवेत्। किन्तु तत्तत्पुरुपीयचतन्याभेदः। अन्तःकरणतद्धर्माणां साक्षिणि कल्पिततया

  • कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि वाह्य पदार्थके ग्रहण करनेमें स्वतः मन असमर्थ है, तथापि भावनाधिक्यके सहकारसे वह अन्तःकरण विनष्ट वनिताके साक्षात्कारमें जैसे जनक देखा जाता है, वैसे ही निदिध्यासनके सहकारसे शब्द भी अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न कर सकता है। + अन्य लोग कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व है, क्योंकि उसका (अपरोक्षत्वका ) निर्वचन अन्य प्रकारसे नहीं हो सकता है। अर्थनिष्ठ अपरोक्षत्व अपरोक्षज्ञानविपयत्वरूप नहीं है, जिससे कि अन्योन्याश्रय हो, किन्तु तत्-तत् पुरुपोंके चैतन्यके साथ अमेद है, अन्त.करणोंके धर्मोंकी

  • शात प्रमाण कदाचित् न लिया जाय और केवल युकतिके आधारपर ही विचार किया जाय, तो भी अपरोक्षज्ञानजनकत्व घट सकता है, ऐसा इस मतसे प्रतिपादन करते हैं। 1 अब शब्दमें परोक्षत्ञानजनकत्व है ही नहीं, अतः नित अपरोक्षम्रह्मके साक्षात्कारमें वेदान्तोंकी करणता अवाघित है, इस प्रकारके मतान्तरको कहते हैं। * तात्पर्य यह है कि अन्य प्रकारकी अनुपलब्धि होनेसे अर्थका अपरोक्षत्व यदि अपरोक्ष- ज्ञानविषयत्व माना जायगा, तो अन्योऽन्याश्रय होगा, क्योंकि अर्थके अपरोक्षत्वकाज्ञान होनेपर ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होगा और ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होनेपर अर्थ की अपरोक्षताका ज्ञान होगा, इसलिए अपरोक्षज्ञानविषय कत्वको अर्थका अपरोक्षत्व नहीं कह सकते है, किन्तु तत्-तत प्रमातृचैतन्यसे अभिन्नत्व ही उन उन विषयोंका तत्-तत् प्रमाताके प्रति अपरोक्षत्व है। अर्थात् तत्-सत प्रमातृचनन्यसे अभिन्न अर्थविषयक ज्ञान ही तव्-तत् प्रम तृचैतन्याभिन्न विषयमें अपरोक्षज्ञान है। यदि शक्का हो कि इस प्रकारके अर्थापरोक्षत्वका अनुगम नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपरोक्षन्वकी जातिरूपता

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ब्रह्मज्ञानकी शाच्द अपरोक्षता] भापानुवादसहित ४७७

तदभेदसत्वाद्। चाहयचैतन्ये कल्पितानां घटादीनां वाहचैतन्ये वृत्ति- कृततत्तन्पुरुपी यचेतन्याभेदाभिव्यकत्या तदभेदसच्ाच्च न कवाप्यव्यापिः। न चान्तःकरणतद्धर्माणां ज्ञानादीनामित धर्माधर्मसंस्काराणामपि साक्षिणि कल्पितत्वाविशेपाद् आपरोक्ष्यापत्तिः। तेपामनुद्धतत्वाद् उद्धूतस्यैव जडस्य चैतन्याभेद आपरोक्ष्यमित्यम्युपगमात्। एवं च सर्वदा सर्वपुरुप- चैतन्याभिन्नत्वाद् 'यत्साक्षादपरोक्षाद् त्रह्म' इति शुत्या स्वत एवाऽपरोक्षं साक्षीमें कल्पना होनेके कारण साक्षी चैतन्यके साथ अमेद है ही +। वाहय घटावच्छिन्न चेतन्यमें कस्पित घट आदिका चाह चैतन्यम वृत्ति द्वारा x तत्- तन् पुरुषके चतन्यके साथ अमेदाभित्र्यक्तिसे तत्-तत् पुरुपके चतन्यके साथ अमेद होनेले कोई अनुपपति नहीं है। यदि शक्का हो कि अन्तःकरण और उसके ज्ञान आदि धर्मोंके समान धर्म, अधर्म और संस्कारोकी मी साक्षीमें ही कलपना होनेसे उनका भी आपरोक्ष्य (प्रत्यक्षत्व्) प्रसक्त होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि धर्म आदिके अनुद्धूत होनेसे उद्भूत जड़ पदार्थका चैतन्यके साथ समेद ही अर्थका अपरोक्षत्व है, * ऐसा स्वीकार किया गया है। इस अवस्थामें सदा सब पुरुषोंके चेतन्यके साथ अमेद होनेसे 'यत् साक्षादपरोक्षात् मक्षा' (साक्षाद् अपरोक्ष ही न्रद् है) इस ्रुतिके अनुसार ब्रह्म स्वतः अपरोक्ष

और उपाधिस्पतामा पूवमं ही निरास किया गया है, दसलिए उसका यदि अननुगम हो, तो भी कोडे दानि नहीं है। 4 माक्षीदव्दगे विवकषित प्रणातृनैतन्यके साथ अभेद है, यह भाव है, अर्थापरोक्षत्वके निवचनमें कल्पितारुस्सित साधारण अभदका प्रवेश होनेसे प्रमातृचैतन्य और जढ़का वास्तविक अभेद न दोनेपर भी 'जर्ड रात्' इग प्रतीतिये कल्पित अभेदके होनेसे दोप नहीं है, यह तात्पर्य हैं। X वातविपयावच्छिन वैतन्यमें चक्षुरादिद्वारा निर्गतवृत्तिका संसर्ग होनेपर वृत्षि और वृतिमान्का अमेद सिद्ध दोगा, इसये वृत्तिमान, अन्तःकरणके साथ भी संसर्ग प्राप्त दोगा, दमरलिए मदासे संग्रष्ट वाा्य नैतन्य ही अन्तःकरणके सम्बन्धसे तत्-तत्पुरुषीय चतन्य होगा, अतः दभी प्रकारके वाह्यमेतन्यमे गृत्तिकृत तत्-तत्पुरुषीय चैतन्याभेदकी अभिव्यक्ति भी हेती है, यह माव है। * अर्थात् उद्भूनत्वे खति प्रमातृचतन्याभिन्नत्वम् अर्थापरोक्षत्वम्, अर्थात् उद्भूत होकर प्रमातृ पैतन्यके साथ जो अभिनन हो, वही अर्थापरोक्षत्व है, उद्भूतत्व है, फलके वलसे कल्पित स्वमायविरेष, वह उद्भूतत्व धर्म आविमें नहीं है और घट आदिमें है, यह समाधानका तास्पर्य है।

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४७८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीये परिच्छेद

त्रह्मेति अपरोक्षार्थविपयत्वात् शव्दस्यापि त्रह्मज्ञानस्याऽपरोक्षत्ववाचो-

अ्द्दैतविद्याचार्यास्तु स्वसुखज्ञानसङ्ग्रहात्। आपराक्ष्यं स्फुरचित्त्वं तदभेदात्त तघ्ुजि ॥ २४ ॥ अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि त्वरूपसुखके अपरोक्षज्ञानका संग्रह करनेके लिए प्रकाशमान चैतन्वत्व ही अपरोक्षत्व है और चैतन्यके साथ अभेद होनेसे अर्थमें भी अपरोक्षत्व रह सकता है ॥२४॥ अद्वैतविद्याचार्यास्तु नापरोक्षार्थविपयत्वं ज्ञानस्याऽडपरोक्ष्यम्, स्वरू- पसुखापरोक्षरूपस्व रूपज्ञा नाव्यापनात् स्वविपय त्वलक्षणस्व्रप्रणाशत्वनिपेधात्। किन्तु यथा तत्तदर्थस्य स्व्च्यवहारानुकलचतन्याभेदोऽर्धापरोक्ष्यम्, ही है। इसलिए अपरोक्ष अर्थको विषय करनेवाला होनेसे शव्दजन्य न्रस्म- ज्ञानमें भी अपरोक्षत्वका कथन युक्ति-युक्त है। * अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व्व नहीं है, क्योंकि स्वविषयत्वलक्षण स्वप्रक्काशत्वका निपेध होनेसे स्वरूपसुखके अपरोक्षरूप स्वरुपज्ञानमें उक्त लक्षण अव्याप्त होगा, किन्तु जैसे तत्-तव् अर्थोका अपने व्यवहारानुकूल चैतन्यके साथ अभेद ही अर्थका आपरोक्ष्य है। +पूर्वोंक्त ज्ञानापरोक्षत्व और अर्थापरोक्षत्वका अन्य प्रकारमे निर्वचन करते हैं, तातर्ये यह है कि स्वर्पमुखके अपरोक्षरूप स्वरज्ञानमें अपरोक्षार्थविषयकत्वके न होनेसे सपरो- क्षार्थनिपयकत्वर्प अपरोक्षत्वकी उसमें अन्स्थिति नहीं होगी, यदि कहा जाय, किं आलम- स्वरूप सुखानुभव साक्षिचंतन्यात्क है, इसलिए उसके स्वप्रकाश होनेसे और स्वप्रकाशत्वके स्वनिपयकत्वरूप होनेसे स्वरूपसुखनिपयकतवरूप अपरोक्षत्व रह सकता है, तो यह भी चुक्त नहीं है, क्योंकि एक ही चतन्यमें विपयविपयिभाव लक्षण सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि सम्बन् दो में रहता है, अतः उक लक्षणोंमें मव्याप्ति है दी। * अपने व्यहारके अनुकूल चैतन्यके साथ अभिन्नत्व ही अर्थका अपरोक्षत्व है, अन्तःकरण और उसके धर्मोका अपने व्यवदारमें अनुकूल साक्षिचैतन्य के साथ अभेद है, क्योंकि साक्षिचतन्यमें उनका अध्यास है, वैसे ही घट आदिका भी उनके व्यवहारमें अनुकूल घटाकार- वृत्तिमे उपहित घटादिके अधिष्वान चतन्यके साथ अभेद है, वैसे ब्रम्मचा भी अपने व्यवहारमें अनुकूल स्वविषयक वृत्तिमे उपहित सा्षिचैतन्यके साथ अभेद है, इसलिए कहीं- पर भी अव्साप्ति नहीं है। घट आदि अर्थोकी चैत्रन्यमें ही कल्पना होनेमे चैतन्यके साथ अभेद तो है, परन्तु अपरोक्षत्वर सदा नहीं है, इसलिए स्वव्यवहारानुकूल विशेषण दिया

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अह्ाज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता] भापानुवादसहित ४७९

एवं तत्तव्वहारानुकूलचैतन्यस्य तत्तदर्थाभेदो। तथा च चैतन्यधर्म एवाSड- *परोक्ष्यम्, न त्वनुमितित्वादिवद् अन्तःकरणवृत्तिधर्मः। अत एव सुखा- दिप्रकाशरूपे साक्षिणि स्वरूपसुखप्रकाशरूपे चैतन्ये चाऽडपरोक्ष्यम्। न च घटादेन्द्रियकवृत्तो तदतुभवविरोधः। अनुभवस्य वृत्यवच्छिन्नचैतन्

ननूक्तं ज्ञानार्थयोरापरोक्ष्यं हृदयादिगोचरशाव्दवृत्तिशाव्दविपययोर-

वैसे ही तत्-तत् व्यवहारके अनुकूर चैतन्यके साथ तत्-तत् अर्थोका अमेद ज्ञानका अपरोक्षत्व है। इस परिस्थितिमें अर्थात् चैतन्यके ही तत्-तत् व्यवहारमें अनुकूलाचेन विक्षित होनेपर, अपरोक्षत्व चैतन्यका ही धर्म है, अनुमितित्व आदिके समान अन्तःकरणकी वृत्तिका धर्म नहीं है, इससे अर्थात अपरोक्षत्वके चतन्य- धर्म होनेसे सुख आदिके प्रकाशरूप साक्षीमें और स्वरूपसुखप्रकाशरूप चैतन्यमें अपरोक्षत्व हो सकता है। यदि शक्ञा हो कि ज्ञानापरोक्षत्वको चैतन्य धर्म माना जाय, तो घटादि विपयाकारवृत्तिमें अपरोक्षत्वव्यवहार विरुद्ध होगा, तो यह मी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त अनुभवकी-वृत्त्यवच्छिन्न चतन्यमें रहनेवाले अपरोक्षत्वको विषय मान करके भी-उपपत्ति हो सकती है। यदि शक्का + हो कि ज्ञान और अर्थके आपरोक्ष्यकी हृदय आदिविषयक

गया दै, घट आदि विषयक वृत्तिकी अवस्थामें ह घट आदि अधिष्ठानभूत चैतन्य उनके व्यवहारमें अनुकूल होता है, सर्वदा नदीं होता, इसलिए अतिप्रसत नहीं है, यह भाव है। * यदि अपरोकत्वको पृत्िधर्म माना जायगा, तो सुख, दुःख आदि पदार्थोकी अपरोक्षपृतिका अश्ोकार न होनेसे और सुखादिके अवभासक साक्षिचैतन्यमें अपरोक्षत्वरूप धुनिधर्मके न दोनेसे मुसा आदिका अपरोक्षत्वानुभव विरुद्ध होगा, इसलिए अपरोक्षत्वको ज्ञानका की धर्म मानना चाहिए, मृत्तिका नहीं, यह तात्पर्य है। अपरोक्षत्वका परिष्कृत लक्षण यह हुआ-तत्तदर्थव्यवदारानुकृलत्वे सति तत्तदर्थाभिन्नत्वम् अर्थात् उन उन पदार्थोंके व्यवदारमें अनुकूल दोकर उन उन पदार्थासे जो अभिजत्व है, वह ज्ञानापरोक्षत्व है। वदिधिविषयक अनुमित्यात्मक मृत्तिये उपहित जीव चैत्तन्यमें भी जो वद्धिव्यवहारका अनुकूल है, सरत्यन्त -अर्थात् तत्-तदर्थव्यवहारानुकूलत है, अतः उसमें अतिव्याप्तिवारण करनेके लिए विदेष्य दल है। घटादिविपयक ज्ञानके अभावकालमें भी घटाययवच्छित्त चेतन्यमें घटायर्थाभितत्व है, इसलिए उसके वारणके लिए विशेषण दल है, यह भाव है। + पलाका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणमें उत्पद्यमान सारे शरीरमें व्याप्त होनेवाली हृदय, नादी और धर्म आदिको विषय करनेवाली शब्दवृत्ति देवयोगसे कदाचित् हृदय,

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४८० सिद्धान्तलेश संग्रह [तृतीय परिच्छेद.

तिप्रसक्तम्। तत्र दैवात् कदाचित् वृत्तिविपयसंसर्गे सति वृत्यवच्छिन्न- चैतन्यस्य विपयावच्छिन्नचैतन्यस्य चाडभेदाभिव्यक्तेरवर्जनीयत्वादिति चेद्, न; परोक्षवृत्तेविषयावच्छिन्नचतन्याज्ञाननवर्त नाक्षमा तज्ानेनS वृतस्य विषयचैतन्यस्यानावृतेन वृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिचैतन्येनाभेदाभि्क भावादापरोक्ष्याप्रसक्तेः। अत एव जीवस्य संसारदशायां वस्तुतस्सत्यपि ब्रह्माभेदे न तदापरोक्ष्यम्, अज्ञानावरणकृतभेदसत्वात्। न चैवर त्रह्मणो शब्दवृत्ति और शाव्दज्ञान विपयमं अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि उस स्थरमें दैवसे कदाचित् वृत्ति और विपयका परस्पर संसर्ग होनेसे वृत्तिसे अवच्छिन् चैतन्य और विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अमेदाभित्यक्ति अवश्य हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है t, क्योंकि परोक्षवृत्ति विषयावच्छिन्न चतन्यम रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्ति नहीं कर सकती है, इसलिए उक्त स्थलमं अज्ञानसे आवृत विपय चैतन्यका अनावृत वत्त्यवच्छिन्न साक्षीरूप चतन्यके साथ अमेदकी अभित्रयक्ति नहीं हो सकती है, इससे अपरोक्षत्व्रकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है। इसीसे संसारदशामें ब्रह्मके साथ जीवका अमेद है, तो भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, क्योंकि अज्ञानके आवरणसे भेद है।

नाडी आर्दिसे अवच्छिनन अन्तःकरणके प्रदेशमें उत्पन्न हो, तो हृदय आदिरूप विपयसे श्रवच्छिन चैतन्यका और हृदय आदिविपयक शब्वृत्तिसे अवच्छित चतन्यका परस्पर अवश्य अभद अभिव्यक्त होगा, क्योंकि घटादिस्थलमें वृत्तिका विषयके साथ सम्बन्य होनेपर वृत्त्यवच्छिन और विपयावच्छिन चैतन्यकी अमेदाभिव्यक्ति मानी गई है। इस अवस्थामें हृदय आदिविपयक शाव्द और अनुमिति आविवृत्तिसे अवच्छित चेतन्यरूप परोक्ष ज्ञानमें, जो कि हृदय आदि अर्थोसे अभिन है और उनके व्यवशरमें अनुकूल है, ज्ञानके अपरोक्षत्वरूप लक्षणकी अतिव्याप्ति अवश्य हो सकती है, अतः तथाकथित ज्ञानका अपरोक्षत्व असिद्ध है। * समाधानका तात्पर्य यह है कि जिन चतन्योंका परस्पर अभेद विवक्षित है उनका अनावृतत्व भी अपक्षित है, क्योंकि उनमें से एक भी चैतन्य यदि आवृत हो, तो उनका अभेद अभिव्यक्त नहीं हो सकता है, इसलिए हृदय आदि विपयको अवगाहन करनेवाली शव्दवृति स्थलमें उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं हो सकती है। *तात्पर्य यह है कि अभेदाभिव्यक्तिमें ही अपरोक्षत्वप्रयोजकताका अग्ञोकार होनेसे तत्त्वसाक्षात्कारके पूर्वकालमें व्रह्मका अपने व्यवहारमें अनुकूल जीव चैतन्यके साथ अभेद होनेपर भी अभेदांभिव्यकति न होनेसे ब्रह्मका अपरोक्षत्व नहीं होता है।

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वह्षज्ञानके शाब्दापरोक्षत्वका विचार ] भापानुवादसहित ४८१

जीवापरोक्ष्यासम्भवादसर्वज्ञत्वापत्ति :; अज्ञानस्य ईश्वरं प्रत्यनावारकतया तं प्रति जीवमेदानापादनात्। यद् अज्ञानं यं प्रत्याचरकम्, तस्य तं प्रत्येव स्वाश्रयभेदापादकत्वात्। अत एव चत्रज्ञानेन तस्य घटाज्ञाने निवृत्ते अनिवृत्त मैत्राज्ञानं मैत्रं प्रत्येव विषयचैतन्यस्य भेदापादकमिति न चैत्रस्य

यदि शक्का हो कि अज्ञानकृत मेदके अमेदाभिव्यक्तिका प्रतिवन्धक होनेपर ब्रम्मको जीवका प्रत्यक्ष न होनेसे ईश्वरमें असर्वज्ञत्वकीं प्रसक्ति * होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि + ईश्वरके प्रति अज्ञान आवरण नहीं करता है, अतः ईश्वरके प्रति जीवके मेदका वह अज्ञान आपादन नहीं करता है, क्योंकि जो यज्ञान जिसके प्रति आवरण करता हो वह उसीके प्रति अपने आश्नयके मेदका आपादन करता है। इसीसे X चैत्रके ज्ञानसे उसके घटाज्ञानके निवृत्त- होनेपर भी अनिवृत्त मैत्रका अज्ञान मैत्रके प्रति विपयचैतन्यके भेदका आपादक

राषका तात्पर्य यह है कि जीवका में साक्षात्कार करता हूँ' जोव मुक्षे अपरोक्ष है, इत्यादि जीवचिपयक व्यवहारमें अनुकूल जो ब्रह्मका ज्ञान है, वह मायावृत्तिसे उपहित नहीं है, किन्तु न्रह्मचेतन्य ही है, इस परिस्थितिमें ब्रह्मकर्तृक व्यवहारके विपयीभूत जीवका और ब्रह्मकर्तृक व्यवदारमे अनुकूल उत्त व्रह्मचतन्यका परस्पर अभेद होनेपर भी अभेदकी अभिव्यक्ति नहीं होनेसे बम्मके प्रति जीव अपरोक्ष नहीं होगा, इसलिए ब्रह्मको सर्वज्ञत्व नहीं होगा, यदि कहा जाय कि दाके जीवविपयक परोक्षज्ञानसे दी सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युकत नहीं है, क्योंकि ईश्वरके परोक्षज्ञानका अभ्नीकार नहीं है। जो अज्ञान है, वह जीववर्मिक ब्रह्मप्रतियोगिक भेदका प्रयोजक है, क्योंकि जीवको ही मैं व्रहा नहीं हूँ' इस प्रकार अनुभव होता है, इसलिए ब्रह्मघर्मिक जीवप्रति- योगिक भेदका अज्ञान प्रयोजक नहीं है, क्योंकि 'मैं (ब्ह्म) जीव नहीं हूँ' इस प्रकारके व्रह्मंके अनुभवमें प्रमाण नहीं है। इस अवस्थामें व्रह्मके प्रति जीवकी ब्रह्मके साथ अभेदाव्यक्तिमें प्रतिवन्धक अज्ञानकृत मेदके न होनेसे उक्त दोप नहीं है, इस अभिप्रायसे उक्त आक्षेपका परिहार करते हैं। और दूसरी वात यह भी है कि 'मैं अज्ञानी हूँ' इस प्रकार ईश्वरको अनुभव भी नहीं होता है, अतः ईशवरके प्रति जीवका आवारक भी अज्ञान नहीं होता है। * अर्थात् जिस जीवके प्रति जो अज्ञान विपयचतन्यका आवारक है, उसी जीवके प्रति वह अज्ञान अपने आथ्रयभूत विपयचतन्यप्रतियोगिक भेदका प्रयोजक होता है, यह भाव है। X प्रकतमें भाव यह है कि जैसे घटावच्छित् चतन्यमें चैत्रके प्रति घटावच्छिन चैतन्यका आवारक वज्ञान रहता है, वैसे ही मैत्रके प्रति भी घटचैतन्यका आवारक अज्ञान भी उसमें रहता है। इससे चैन्नीय घटके ज्ञानसे चैत्नीय घटाज्ञानके-जो कि अपने आश्रय विषयचतन्यके भेदका आपादक है-निवृत्त होनेपर भी चैत्रीय घटज्ञानसे अनिवृत्त घटचैतन्यमें रहनेवाला मैन्रके प्रति ६१

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४८२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

घटापरोक्ष्यानुभवानुपपत्तिरपि। नन्वेवं वृत्तिविपयचतन्याभेदाभिव्यक्ति

ननिवृत्तिप्रयोजकत्वायोगाद् ज्ञानमात्रमज्ञाननिवर्तकं भवेदिति चेद्, नः 'यद् ज्ञानमुत्पद्यमान स्वकारणमहिम्ना विपयसंसृष्टमेवोत्पद्यते, तदेवा- ज्ञाननिवर्तकम्' इति विशेपणाद, ऐन्द्रियकज्ञानानां तथात्वाद्। एवं च शव्दादुत्पद्यमानमपि ब्रह्मज्ञान सर्वोपादानभूतस्व्रविपयत्रह्मसंसृष्मेव

है, इसलिए चैत्रको घटके अपरोक्षत्वका अनुभव भी नहीं होता है। शयदि शङ्का हो कि ऐसा माननेपर अर्थात् वृत्त्यवच्छिन्न और विपयावच्छिन्न चैतन्यके अभेदकी अभिव्यक्तिरूप अपरोक्षत्वके अपने विषयमे रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिसे प्रयोज्य होनेपर उसमें अज्ञाननिवृत्तिकी प्रयोजकताका अभाव होनेसे ज्ञानमात्र ही अज्ञानका निवर्तक प्रसक्त होगा? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो उत्पद्यमान ज्ञान अपने कारणकी सामर्थ्यसे विपयसंसृष्ट ही उत्पन्न होता है, वही अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसा विशेषण होनेसे इन्द्रियजन्य ज्ञान ही. अज्ञानके निवर्तक होते हैं, सब ज्ञान नहीं। इसी प्रकार शब्दसे उत्पद्यमान ब्रह्मज्ञान भी सबके प्रति उपादानभूत अपने विपयरूप ब्रह्मसे संसृष्ट ही उत्पन्न

घटावारक अज्ञान मैन्नके प्रति ही स्वाश्रयभृत घटचैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक होगा, मैत्रका अज्ञान चेत्रके प्रति घटावच्छिन चैतन्यका अनावारक है, तथापि चैन्रके प्रति स्वाश्रय- भूत घटावच्छिन्न चैतन्यप्रतियोगिक भेदका आपादक नहीं है, इस अवस्थामे चैत्रके घटज्ञानसे चैन्र के अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे तत्कृत भेदकी निवृत्ति होनेपर भी चैत्र और घटावच्छिम चैतन्यका परस्पर मैन्नाज्ञानकृत भेद होनेसे अभेदकी अभिव्यकि नहीं है, अतः चैत्रको घटके अपरोक्षत्वका अनुभव अनुपपन्न ही होगा, इससे मैत्रका अज्ञान मैत्रके प्रति जसे स्वाश्रय चैतन्यका अभेदापादक है, वैसे चैत्रके प्रति स्वाथ्यचैतन्यंप्रतियोगिक भेदका आपादंक नहीं है, क्योंकि चैत्रके प्रति स्वाश्रय चैतन्यका आवारक नहीं है, ऐसा कहना होगा, इसलिए उक् व्यवस्थाकी सिद्धि होगी। * तात्पर्य यह है कि 'अपरोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है' इस प्रकारसे ज्ञानके अज्ञान- निवर्तकत्वमें अपरोक्षत्वको प्रयोजक नहीं मान सकते हैं, क्योंकि ज्ञानगत अपरोक्षत्व अज्ञानकी निवृत्तिके अधीन है, यदि कहो कि ज्ञानगत अपरोक्षत्व अज्ञाननिवृत्तिका प्रयोजक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननसे ज्ञानमात्रमें अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसकि होनेसे परोक्षज्ञानमें भी अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसकि होगी, इस अभिन्नायसे इस अ्न्थसे शङ्ा करते हैं। ..

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मेंक्षज्ञानके शांन्दापरोक्षत्वका विचार] भांपानुवीदसहहित ४८३

उत्पद्यत इति तस्याऽज्ञाननिवर्तकत्वमज्ञाननिवृत्तौ तन्मूलभेदप्रविलयादा- परोक्ष्यं चेत्युपपद्यतेतराम्। नन्वव्ययनकालेऽपि शब्दात् स्यादपरोक्षधीः। सत्ताधृतिर्विचाराच्चेन्मननादिश्रमो वृथा॥२५॥ मैंवं पुन्दोपशान्त्यर्थं मननादेर्विधानतः । तत्तत्संसृष्टवृत्त्येत्थं तदज्ञाननिवर्हणम् ॥२६॥ यदि शक्का हो कि अध्ययनकालमें भी वेदान्तशव्दसे अपरोक्ष ज्ञानके होनेसे विचार व्यर्थ है, यदि कहें। कि म्रदासत्ताके निध्वयात्मक ज्ञानके लिए उसकी आवश्यकता है, तो मनन आदिकी निरर्थकता होगी, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि पुरुपदोपकी निवृत्ति करनेके लिए मनन आदिका विधान होनेसे तत्-तत् अर्थोसे संसष्ठ वृत्तिके तत्तद्विपयक अज्ञानकी निवृत्ति होती है ॥ २५॥ २६॥। नन्वेवमध्ययनगृहीतवेदान्तजन्येनापि 'तज्ज्ञानेन मूलाज्ञाननिवृत्या आपरोक्ष्यं किं न स्यात्। न च तत्सत्तानिश्वयरूपत्वाभावाद नाज्ञान निवर्तकमिति वाच्यम्, तथाऽपि कृतश्रवणस्य निर्विचिकित्सशान्दज्ञानेन तन्निव्टत्या मननादिवैयर्थर्यापत्तिरिति चेद्, न; सत्यपि श्रवणाद् निर्वि- चिकित्सज्ञाने चित्तविक्षेपदोपेण प्रतिचन्धाद् अज्ञानानिवृत्या तन्निराकरणे

होता है, इसलिए उसमें अज्ञानकी निवर्तकता है और अज्ञानकी निवृचिहोनेसे तन्मूलक मेदका विनाश होनेसे अपरोक्षत्वकी भी उपपत्ति हो सकती है। यदि शक्का हो कि ऐसा होनेपर अध्ययनसे सम्पादित वेदान्तसे उत्पन्न न्सज्ञानसे भी मूलभृत अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे अपरोक्षत्व क्यों नहीं होता? यदि कहो कि विचारके पूर्व अध्ययनगृहीत वेदान्तजन्य ज्ञान सत्तानिश्चयात्मक नहीं है, अतः अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि निवर्तक ज्ञानमें सचानिश्चयरूपत्व विशेषण देनेपर भी कृतश्रवण पुरुपको सत्तानिश्वयात्मक शाव्दज्ञान होनेसे उसीसे अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, फिर मनन आदि निरर्थक प्रसक्त होंगे, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रवणसे सत्ता- निश्चयात्मक ज्ञानके होनेपर भी चित्तके विक्षेपात्मक दोषसे प्रतिवन्ध होनेके कारण अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, अतः उसके (अज्ञानके) निराकरण • अर्थात जो ज्ञान नियमतः विपयसंसटरूपसे उत्पन्न हो, वही ज्ञान अक्षानका निवर्तक होता है, ऐसे नियमका अशीकार करनेसे, यह भाव है।

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सिद्धांन्तलेश संग्रह i तृतीय पेरिच्छेद

मनननिदिध्यासननियमविध्यर्थानुष्ठानस्यारडर्थवत्ाद्, भवान्तरीयमननाद- जुष्ठाननिरस्तचित्तविक्षेपस्य उपदेशमात्राद् न्रह्मापरोक्ष्यस्य इष्यमाण- त्वाचत्याहुः ॥१०॥ नन्वेवं वृत्त्यभिव्यक्तचिदंशे विपयेक्यतः । श्रवणादिमतो नश्येन्मूलाज्ञानं घटेक्षणात् ॥ २७ ॥ अब शङ्का होती है कि वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यांशमें विषयका ऐक्य दोनेसे श्रवणादिसे युक्त पुरुषको घटके ज्ञानसे भी भूलाज्ञानका विनाश होना चाहिए ।२७।। अथैवमपि कृतनिदिध्यासनस्य वेदान्तजन्यन्रह्मज्ञानेनेव घटादिज्ञाने- नाऽपि व्रह्माज्ञाननिवृत्तिः कि न स्यात्। न च तस्य व्रह्माविपयत्वाद् न ततो ब्रह्माज्ञाननिवृत्तिरिति वाच्यम्, 'घटस्सन्' इत्यादिवुद्धिवृत्तेः सद्रूप- करनेके लिए मनन और निदिध्यासनकी नियमविधिसे प्राप्त अर्थके अनुष्ठानकी अवश्य अपेक्षा है, और जन्मान्तरीय + मनन आदिके अनुष्ठानसे जिसके चिचकी अस्थिरता (विक्षेप) निवृत्ति हुई है, ऐसे पुरुपको केवल उपदेशमात्रसे भी न्रह्मा- परोक्ष इष्ट ही है ॥१०॥ * अब शक्का होती है कि विक्षेपदोपकी निवृत्तिके लिए मनन आदिकी अपेक्षा होनेपर भी जिसने निदिध्यासन किया है, ऐसे पुरुपको वेदान्तोंसे उत्पन्न ब्रह्मज्ञानसे जैसे ब्रह्मविषयक अज्ञानकी निवृत्ति होती है, वैसे ही उसके घटादि- ज्ञानसे भी अज्ञानकी निवृत्ति क्यों नहीं होती है ? यदि कहो कि घटविपयक ज्ञान अह्मविषयक नहीं है, अतः वह न्रह्माज्ञानका निवर्तक नहीं है, तो यह भी

  • तात्पर्य यह है कि यदि मनन आदिका प्रयोजन विक्षेपशब्दसे कहलानेवाले असम्भावना, विपरीत भावना आदिकी निवृत्ति है, तो जिस अधिकारी पुरुपका जन्मान्तरीय मनन आदिके सहित श्रवणके अनुष्ठानसे समस्त विक्षेपदोप निषृत हो गया है, उस पुरुपको उपदेशमात्रसे भी सत्तानिश्चेयात्मक और अप्रतिवद्ध म्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है, इसलिए उसको इस जन्ममें श्रवण, मनन, आदिके अनुष्ठानके विना भी मूलाज्ञानकी निवृत्ि और ब्रह्मका अपरोक्षज्ञान हो सकता है, इसलिए उक्त पुरुषको श्रवणादिके अनुष्ठानके बिना ही यदि म्रह्मज्ञान माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है। * शङ्ाका अभिप्राय यह है कि जिसने निदिप्यासम किया है, ऐसे पुरुपको म्रह्मज्ञानसे जैसे मूलाज्ञानकी निधृत्ति होती है, वैसे ही घटज्ञानसे भी मूल अज्ञानकी निवृत्ति होनी चाहिए, क्योंकि घटादिवृत्ति भी मूलाज्ञानके विषयभूत चैतन्यको ही विपय फरती है।

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अज्ञानके निवत्तकका निरूपण] भांपानुंवादसहित ४८५

व्रह्मविपयत्वोपगमात्। न च तत्र घटाद्याकारवृत्या तदज्ञाननिवृत्ता स्वतः स्फुरणादेव तद्वच्छिन्नं चैतन्यं सदिति अकाशते, न तस्य घटा- द्याकारवृत्तिविपयत्वमिति वाच्यम्, तदभावे घटविपयं ज्ञानं तदवच्छिन्न चैतन्यविपयमज्ञानमिति भिन्नविपयेण ज्ञानेन तदज्ञाननिवृत्तेरयोगाद्, जडे आवरणकृत्याभावेन घटस्याज्ञानाविपयत्वाद्। न च घटादिवृत्तेस्त- दर्वच्छिन्नचतन्यविपयत्वेऽपि अखण्डानन्दाकारत्वाभावाद् न ततो मूला- ज्ञाननिवृत्तिरिति वाच्यम्, वेदान्तजन्यसाक्षात्कारेऽपि तदभावाद। न हि

युक्त नहीं है, क्योंकि 'घटः सन्' (घट सत् है) इत्यादि अन्तःकरणकी वृत्तिको भी सदुरूप न्रह्मविपयक माना गया है। यदि शक्का हो कि घटादिस्थलमे घटाकारवृत्तिसे घटाज्ञानकी निवृत्ति होनेपर स्वतः स्फुरणसे ही घटावच्छिन्न चैतन्य का सदरूपसे प्रकाश होता है, अतः ब्रह्ममें घटाकारवृत्तिविषयता नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यको यदि घटादिवृत्तिका विषय न माना जाय, तो ज्ञान घटविपयक होगा और अज्ञान घटावच्छिन्नचतन्यविपयक होगा, इसलिए भिन्नविपयक ज्ञानसे घटाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, और जड़में आवरण कार्यका अभाव होनेके कारण घट अज्ञानका विषय ही नहीं होगा। यदि शक्ा हो कि घटादिके आकारमें परिणत वृत्ति घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यको अवश्य विषय करती हे, तथापि वह अखण्ड आनन्दाकार नहीं है, इसलिए घटज़ानसे मलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वेदान्तजन्य साक्षातकारमें भी अनवच्छितानन्दाकारत्व नहीं भासता है, अतः उससे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि वेदान्तज्ञानमें अखण्डत्व (अन- वच्छिन्नत्व) या आनन्दाकारत्व कोई धर्म है ही नहीं। यदि वेदान्तजन्य ज्ञानमें

  • यदि शक्ा हो कि केयल घटविपयक शानसे घटावच्छिनन चतन्यविपयक अज्ञानकी नियृत्ति नहीं सो सकती है, क्योंकि ज्ञान और अज्ञान समानविपयक नहीं है, अतः घट जञानके साथ अज्ञानकी समानविपयकता लानेके लिए अज्ञानको भी केवल घटादि जड़विपयक मानना चादिए, इखपर 'जब् आवरणयृत्याभावेन' इससे पूर्वपक्षी कहता है कि जढ़में तो स्वतः जवत्व देनुसे प्रमाणकी अपरवृत्तिरशामें अप्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है, फिर जडके अप्रकाशके लिए आवरणकी कर्पना व्यर्थ है, इस अवस्थामें वेदान्तजन्य ज्ञानके समान पदादिजान भी बचितन्यविपयक होनेसे मूलाजञानका समानविपयक है, अतः उससे भी अज्ानकी निषृत्तिका प्रसन आ सकता है, यह माघ है।

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४८६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

तत्राखण्डत्वमानन्दत्वं वा कश्चिदस्ति प्रकारः। वेदान्तानां संसर्गागोचर- प्रमाजनकत्वलक्षणाखण्डार्थत्वहानापत्तेः। न च वेदान्तजन्यज्ञानादेव तन्निवृत्तिनियम इति वाच्यम्, क्लप्ताज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजकस्य रूपस्य ज्ञानान्तरेऽपि सद्भावे तथा नियन्तुमशक्यत्वात्। न च घटाद्याकारवृत्ति- विषयस्याऽ्वच्छिन्नचैतन्यस्यापि कल्पितत्वेन यन्मूलाज्ञानविषयभूतं सत्य- • मनवच्छिन्नं चैतन्यम्, वद्विपयत्वाभावाद् घटादिवृत्तीनां निवर्त्यत्वाभि

अखण्डत्व, आनन्दत्वादि माने जाँय, तो संसर्गाविपयकपमाजनकत्वरूप अखण्डार्थत्वका व्याघात होगा। यदि शङ्का हो कि वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही मूला- ज्ञानकी निवृत्ति होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञाननिवर्तकत्वमें प्रयोजकीभूत क्लप्त स्वरूपका अन्यज्ञानमें भी अवस्थान होनेसे वैसा नियम कर ही * नहीं सकते हैं। यदि शक्का हो कि घटाद्याकारवृत्तिके विषय अवच्छिन्न चैतन्यके कल्पित होनेसे सत्य अनवच्छिन चतन्य उसका विपय नहीं है, अतः घटादि वृत्तियोंमें निवत्यत्वरूपसे अभिमत अज्ञानसमानविषयत्वरूप क्लप्त प्रयोजक ही नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसमें अर्थात् अवच्छिन्न चैतन्यमें।

*वेदान्तजन्य ज्ञानमें क्लप्त मूलाज्ञानसमानविपयकत्वरूप सत्तानिश्वयत्वरूप अप्रति- बद्धत्वात्मक जो मूलाज्ञाननिवतकत्वरूप प्रयोजत्व है, वह निदिध्यामनके परिपाककालमें चक्ष आदिसे उत्पन्न होनेवाली घटादि वृत्तिमें भी है, अतः वेदान्तजन्य ज्ञानसे ही नूलाज्ञानकी निवृति होती है, घटादि ज्ञानसे नहीं होती है, इस प्रकार नियमन नहीं कर सकते है, क्योंकि सतां- निश्चयत्वके समान वेदान्तजन्यत्वको प्रयोजकके विशेषण करनेमें गौरव है, यह भाव है। अवच्छेय चैतन्यांश भी, जो कि घटादिवृत्तिका विपय है, अकल्पित मूलाज्ञानका विषयीभूत ब्रह्मचैतन्यात्मक ही है, अतः घटायवच्छिन् चैतन्यविषयक वृत्तिमें भी-निवर्त्यलवेन अभिमत जो अज्ञान है, उसका समाननिपयकत्वरूप वेदान्तजन्य ज्ञानमें वलप्त-प्रयोजक है, तात्पर्य यह है कि घटायवच्छिन्न चैतन्य कल्पित है, इसमें चैतन्यको अकल्पित मानने पर यह दोष है, यदि कल्पित मानेंगे, तो घट आदिके समान उक अवच्छिन चेतन्य जढ़ ही होगा, इस परिस्थितिमें उसके अज्ञानविपयत्व न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति मूलाज्ञान- का विषयभूत ब्रह्मचैतन्य ही विपय कहना होगा, क्योंकि निर्विपयक अज्ञान नहीं होता, इस अवस्थामें व्रह्मचैतन्यविपयक अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तकत्वकी उपपत्तिके लिए घटादि- वृत्तियोंमें भी मूलाज्ञानविषय म्रह्मचैतन्यविपयकत्व मानना पंड़गा, क्योंकि घटादिवृत्तियोंके सत्यब्रह्मविषयक न होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके साथ समानविपयकत्वके न होनेसे आ- त्तियोंमें अवस्थारूप अज्ञाननिवर्तकत्वकी प्रसकति नहीं होगी।

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अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भापानुवादसहित ४८७

मताज्ञानसमानविपयत्वलक्षणं क्लपं ग्रयोजकमेव नाऽस्तीति वाच्यम्;

न्यरूपत्वात्, तस्य कल्पितत्वे घटवज्जडतया अवस्थाऽज्ञानं प्रत्यपि विपय- त्वायोगेनाडवस्थाऽज्ञानस्य मूलाज्ञानविपयाकल्पितचैतन्यविपयत्वस्य वक्त- व्यतया तन्निवर्तकघटादिज्ञानस्याऽपि तद्विपयत्वावश्यम्भावेन तत्पक्षेऽ्रपि

मैषमत्राहुराचार्या न सन्दश इति श्रुतेः। चित् चक्षुराद्ययोग्येव चिद्द्वाराऽस्त्यावृतिर्जंडे॥ २८॥ "उक्त पूर्वपक्षके उत्तरमें आंचार्य कहते हैं कि 'न सन्दशे' इस श्रुतिषे ब्रद्मचैतन्य चक्षु आदिका अयोग्य दी है। जड़मॅ चैतन्य द्वारा अज्ञानका आवरण होता है॥ २८ ॥ अंत्राऽडहुराचार्या :- न चैतन्यं चक्षुरादिजन्यवृत्तिविपयः।

अवच्छेदक अंशके कलपित होने पर भी अवच्छेद अंश मूलाज्ञानका विपयीभूत अकल्पित न्रस्चेतन्यात्मक है, यदि अवच्छेद अंशको कल्पित माना जाय, तो घटके समान जड़ होनेसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति भी वह विषय नहीं हो सकता है, इसलिए अवस्थारूप अज्ञानको भी मूलभूत अज्ञानका विषयभूत अकल्पित चतन्यविपयकं कहना होगा, इससे अवस्थारूप अज्ञानके निवर्तक घटादिज्ञानमें भी मूलाज्ानका विपयीभूत ब्रह्मचैतन्यविपयकत्व अवश्य प्रसक्त होगा, अतः अवच्छेद्यांशके कल्पितत्वपक्षमें भी घटादिज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसभ् हटा नहीं सकते हैं। इस विषयम आचार्य कहते हैं कि * चक्षु आदिसे उत्पन्न हुई

पूर्वोंकक आक्षेपकर्ताका भाव यही सिद्ध होता है कि घटादिज्ञान भी मूलाज्ञानका निर्वतक होगा, क्योंकि वह भी चैतन्यविपयक है, जसे कि वेदान्तजन्यज्ञान चैतन्यविषयक होता है। परन्तु इस अनुमानमें हेतुकी सिद्धि नहीं है, इस अभिप्रायसे उक्त पूर्वपक्षका परिहार करते हैं, अर्थात् चश्ष आदिसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान यदि आत्माको विषय करनेवाला है, तो उससे मूलाजानकी निवृत्तिका प्रसश आ सकता है, परन्तु चक्षरादिजन्यज्ञान वेदान्तजन्यज्ञानके समान आत्माको विषय करनेवाला है दी नहीं, अतः उक्त अतिप्रसभ्ग नहीं है, इसमें प्रमाण भी 'न सन्टरे इत्यादि श्रुति है, इस क्षुतिका तात्पर्य यही है कि चक्षु आदि इन्द्रियोंकी सामर्थ्य पटादि जद़ पदार्थके अवगाहन करनेमें ही है, आत्माके अवगाहन करनेमें नहीं, इससे परमाणु आदिके ग्रद्दणमें जैसे चक्षकी योग्यता नहीं है, वैसे आत्माके ग्रहरणमें भी इसकी सासथर्य

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४८८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीय परिच्छेद

'न सन्द्शे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुपा पश्यति कथ्चनैनम्। पराश्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्' इत्यादिश्रुत्या तस्य परमाण्वादिवत् चक्षुराद्ययोग्यत्वोपदेशाद्, पनिषदम्' इति विशेषणाच्। न च- 'सर्वप्रत्ययवेधे वा ब्रह्मरूपे व्यवस्थिते'। इत्यादिवार्तिकविरोध: ; तस्य घटाद्याकारवृत्युदये सति आवरणा- भिभवात् स्वप्रभं सद्दूयं व्रह्म 'घटस्सन्' इति घटवद् व्यवहार्य भवतीत्यौ- वृत्तिका विषय चैतन्य नहीं है, क्योंकि 'न सन्दशे०' (आत्माका स्वरूप चक्षुके योग्य नहीं है, इसलिए आत्माको कोई भी चक्षुसे नहीं देखता है, इन्द्रियाँ ईश्वरसे जड़ अर्थोंके ग्रहण करनेके लिए ही बनाई गई है, अतः वाह् पदार्थोंका ही इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं, अन्तरात्माका-चैतन्यका-ग्रहण नहीं करती हैं) इत्यादि श्रुतिसे परमात्माको परमाणु आदिके समान चक्षुका अयोग्य ही बतलाया है और 'औपनिपदम्' (केवल उपनिपत्परमाणसे गम्य) ऐसा ,٦ आत्मामें विशेषण भी दिया गया है। यदि शङ्का हो कि 'सर्वप्रत्ययवेदे०' (सब प्रत्ययोंमें वेद्यरूपसे व्यवस्थित ब्रह्मरूप वस्तुमें) इत्यादि वार्तिकके साथ विरोध होगा? नहीं, नहीं होगा, क्योंकि उस वार्तिकवचनका तात्पर्य यह है-घटाधाकारवृत्तिके उदित होने पर आवरणके विनष्ट होनेसे स्वप्काश सद्रप ब्रह्म 'घटः सन्' इस प्रकार घटके संमान व्यवहृत किया जाता है, इसलिए वह गौणरूपसे वृत्तिसे वेद्य है*। नहीं है, अतः पूर्वोक्त प्रसज्ञ अनुचित है, यदि 'सर्वप्रत्ययवेधे' इत्ादि ारतिकके आधारपर शांक्कां की जाय कि सभी घटादिज्ञानोंमें ब्रह्मका प्रकाश होता है, तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि उक्त श्रुतिके जवरदस्त प्रमाण होनेसे उच्त वार्तिक गौणार्थक है, अर्थात् जैसे घटमें घटविषयक वृत्तिके अधीन व्यवहारकी विपयता है, वैसे ही घट आदिका अधिष्ठानभूत सदूप ब्रह्म भी घटादिके आकारमें परिणत अन्तःकरणकी वृत्तिके अधीन व्यवद्वारका विषय है, इसलिए 'सद्रूप ब्रह्म घटादिज्ञानसे वेद्य है' इस प्रकारका औपचारिक व्यवहार होता है। यदि शङ्का हो कि परोक्षवृत्तियोंमें आवरणाभिभावकत्वका अभाव होनेसे वहां पर उक्त व्यवस्था नहीं घट सकती है, तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि उक्त वार्तिकमे उक्त प्रत्ययशब्दका अर्थ है-आवरणाभिभावक वृत्ति, अतः पूर्वोंक्त आक्षेप सर्वथा अनुपपन्न है, यह समझना चाहिए। * इसका प्रकृतमें तात्पर्य यह है कि उक्क प्रकारसे घटादि वृत्तिको यदि चैतन्यविषयक न माना ज़ाय, तो घटज्ञानसे घटावच्छिन्न चैतन्यावारक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि समानविषयक

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अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भापानुंवादसहित ४८९

पचारिकघटादिवृत्तिवेद्यत्वपरत्वाद्। आवरणाभिभावकत्वं च घटादिज्ञा- नस्य वादिविपयत्वादेव उपपनम्, घाे्ज्ञानवियत्वाद् 'घट न जानामि' 'घटज्ञानेन घटाज्ञाने नष्टम्' इति अवस्थाऽज्ञानस्य घटादिविपय त्वानुभवात्। न च तत्राऽडवरणकृत्याभावादज्ञानाङ्गीकारो न युक्त:, वद्द्ा- सकस्य तदवच्छिन्नचैतन्यस्याऽऽवरणादेव तदप्रकाशोपपत्तेरिति वाच्यम्, उक्तभङ्गया जडस्य साक्षादज्ञानविपयत्वप्रतिक्षेपेऽपि जडावच्छिन्नचैतन्य- घटादिज्ञानमें आवरणका अभिभावकत्व तो घटादिविषयत्वकी शक्ति होनेसे ही उपपन्न है, क्योंकि घट आदि भी अज्ञानका विषय होता है, कारण कि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ" 'घटके ज्ञानसे घटका अज्ञान नष्ट हुआ' इस प्रकार अवस्थारूप अज्ञान घट आदिको विषय करनेवाला है, ऐसा अनुभव होता है। यदि शक्का हो कि घटादि जड़ वस्तुओंमें आवरणरूप कार्य न होनेसे अज्ञानका अङ्गीकार युक्त नहीं है, क्योंकि जड़वस्तुके अवभासक जड़ावच्छिन्न चैतन्यके आवरणसे ही जड़के अप्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त प्रणालीसे अर्थात् 'जडमें आवरणकार्य न होनेसे अज्ञानका अङ्गीकार युक्त ज्ञानाज्ञानका परस्पर विरोध है, असमानविषयकका नहीं है, इसपर 'आवरणाभिभावकत्व'का निर्वचन करते हैं, अर्थात् अनुभवके अनुसार अज्ञानका विपय जद भी होता है, क्योंकि 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' ऐसी लोकप्रसिद्धप्रतीति अवाधितरूपसे हुआ करती है, अतः उक् सतिप्रसज्ज नहीं है, यह भाव है। * तात्पर्य यह है कि अज्ञानाश्रय जढ़ नहीं हो सकता है, क्योंकि जड़में आवरण ही नहीं है, कारण कि आवरणका कोई कार्य जढ़ वस्तुमें देखा नहीं जाता। 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' इस प्रकारकी प्रतीति घट और घटाघिष्ठान चैतन्यके परस्पर तादात्म्य होनेसे उपपन्न हो सकती है। यदि शछ्ठा हो कि जदमें यदि आवरण नहीं है, तो उसका सर्वदा प्रकाश होना चाहिए, तो यह युक नहीं है, क्योंकि घट आदिके प्रकाशक चतन्यका उसके साथ सम्बन्ध नहीं है, अतः उसका प्रकाश नहीं होता है। आवरणके वलसे प्रकाश नहीं होता यह बात नहीं है। यदि कहो कि चतन्यमें जड़का अध्यास होनेसे सर्वेदा चतन्यके साथ सम्वन्ध है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस चैतन्यके आवरणसे घटका भी अप्रकाश हो सकता है, अतः जड़में अज्ञान क्यों माना जाय ? यह पूर्वपक्षीका मन्तव्य है। * समाधानका तात्पर्य यह है कि 'तन्रावरणकृत्याभावात्' इत्यादि प्रन्थसे साक्षात् अज्षान विषयत्वका निषेध होनेपर भी, अनुभवके आघारपर परम्परया अज्ञानविषयता जड़में मानी जाती है, अतः साक्षात् या परम्परया जो अज्ञानका विपय है, तद्विपयक ज्ञानसे अज्ञानकी निशृत्ति होती है, इस प्रकार निवर्ल्य-निवर्तकभावका निर्वचन करनेसे सच दोपोंका निरास हो सकता है, इसी भावको 'उक्तमन्या' इत्यादि प्रन्थसे कहते हैं।, ६२

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४९० सिद्धान्तलेश संग्रह [ तृतीय परिच्छेद

प्रकाशस्याऽज्ञानेनाSSवरणम्, ततो नित्यचैतन्यप्रकाशसंसर्गेपि जडस्य 'नास्ति', 'न प्रकाशते' इत्यादिव्यवहारयोग्यत्वमिति परम्परया अज्ञान-, विपयत्वाभ्युपगमात् साक्षाद परम्परया वा यदज्ञानावरणीयम्, तद्विपय- त्वस्यैय ज्ञानस्य तदज्ञाननिवर्तकत्वप्रयोजकशरीरे निवेशात्। न चैवं घटा- दीनामुक्तरीत्या मूलाज्ञानविपयत्वमपीति घटादिसाक्षात्कारादेव मूला- ज्ञाननिवृत्त्यापात:, फलवलात्तदज्ञानकार्यातिरिक्त त द्विपय विपयकत्वस्यैव तन्निवर्तकत्वे तन्त्रत्वाद्।

नहीं है' इत्यादि वाक्यसे जड़में साक्षात् अज्ञानविपयताका निषेध करनेपर मी जड़वच्छिन्न चैतन्यके प्रकाशका अज्ञानसे आवरण है, इससे नित्य चैतन्य प्रकाशका सम्बन्ध होनेपर भी जड़में 'नहीं है, प्रकाशित नहीं है' इस प्रकारका व्यवहारयोग्यतारूप आवरण है' इस प्रकार परम्परासे जढ़में अज्ञानकी विषयताका स्वीकार होनेसे साक्षात् या परम्परासे जो अज्ञानसे आवृत है तद्विपयकत्वका ही ज्ञानके (तद्) अज्ञाननिव्तकत्वप्रयोजक शरीरमें निवेश करना चाहिए। यदि शक्का हो कि उक्त रीतिसे * घट आदि मी मूलाज्ञानके विषय हैं, इसलिए घट आदिके साक्षात्कारसे मूलाज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि फलके वलसे+ अज्ञाननिवर्तकत्वमें अज्ञानकार्या- तिरिक्ततद्विषयकत्व ही प्रयोजक है।

शङाका तात्पर्य यह है कि जैसे अवस्थारूप अज्ञानके प्रति परम्परासे विषयीभूत जड़ पदार्थके साक्षात्कारसे घटायवच्छिन चैतन्यनिष्ठ अवस्यारूप अज्ञानकी निवृत्ति होती है, चैसे ही मूलाज्ञानमें परम्परया विषयीभूत जड़के साक्षात्कारसे भी ब्रह्मचैतन्यनिष्ठ मूला- ज्ञानकी निवृत्ति प्रसक होगी।

  • समाधानका तात्पर्य यह है कि उक्त आपत्ति नहीं हो सकती है, अर्धात् घटसाक्षा त्कारसे ब्रह्मचैतन्यनिष्ठ अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि घट आदिका साक्षात्कार होनेपर भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है, यह अनुभव है, इससे मूलाज्ञान और सूलाज्ञानके कार्यसे अतिरिक्त जो मूलाज्ञानका विषयीभूत चैतन्यमात्र है, तद्विषयक ज्ञान ही मूलाज्ञानक्त निवर्तक है, ऐंसी कल्पना की जायगी, इसलिए घटादिज्ञानके उक्क अज्ञानतत्कार्यातिरिक- चैतन्यमात्र विषय न होनेसे उससे मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसकक नहीं होगी।

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अंज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भापानुवादसहित ४९१

मूलाज्ञानस्याडविपयों जड एवाडथवाडन्यथा। चक्षुपा सौरभं भायाद् वृत्तिव्यक्तचिदन्वयात् ॥ २९ ।। अथवा नूलाशानका ही जड़ विषय नहीं होता है, अवस्थाऽज्ञानका तो तत्तत् जड़ ही विषय होता है, यदि ऐसा न माना जाय, तो चक्षुसे चन्दनखण्डवृत्ति सौगन्व्यका भी प्रत्यक्ष दोने लगेगा, क्योंकि चन्दनाकार वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यका उसमें भी अन्यय ६ै॥ २९ ।। अथवा सूलाज्ञानस्यैव जडं न विपयः। अवस्थाजज्ञानानां त्ववच्छि- नचेतन्याशितानां तत्तज्डमेव विपयः। अन्यथा चाक्षुपवृत्या चन्दन- खण्डचैतन्याभिव्यक्ती तत्संसर्गिणो गन्धस्याप्यापरोक्ष्यापत्तेः । तदन- भिव्यक्ती चन्द्नतद्रपयोरप्यप्रकाशापत्ते:। न च चाक्षुपवृच्या चन्दन- तद्रूपावच्छिन्नचैतन्ययोरभिव्यक्त्या तयोः प्रकाश:, गन्धाकारवृत्त्त्यभावेन गन्घावच्छिन्नचतन्यसाऽनभिव्यक्त्या तस्याप्रकाशशेति वाच्यम्, चैतन्यस्य अथवा मूलाज्ञानका ही जड़ विषय नहीं होता है। अवच्छिन्नचैतन्यमें आश्रित अवस्थारूप अज्ञानोंके तो तत्-तत् जड़ पदार्थ ही विषय होते हैं। यदि जड़ अनावृत माना जाय, तो चक्षुरिन्द्रियजन्य वृत्तिसे चन्दनखण्डावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर चन्दनखण्डके साथ सम्बन्ध रखनेवाले गन्धका भी अपरोक्ष अनुमव हो जायगा। यदि चन्दनखण्डावच्छिन्न चेतन्यकी अभिव्यक्ति न मानी जाय, तो चन्दन और चन्दनके रूपका भी प्रकाश नहीं होगा। यदि शक्का की जाय कि चाक्षुवृततिसे चन्दन और उसके रूपसे अवच्छिन्न चैतन्यकी अभित्यक्ति होनेसे उनका प्रकाश होता है, और गन्धाकार वृत्तिके न होनेसे गन्धावच्छिन्न अप्मान्रविषयक पंसे अपच्छित्न चेतन्यके आवारक अशानका विनाश केसे होता है, कर्वोकि से मिसविययक दै, इम प्रकारकी शसतके दोनेपर अवस्थारूप अज्ञान अवच्छिन नेतन्यके आयरण द्वारा जयको भी आघृत करता है, अतः जयमान्नविपयक वृत्ति भी अवस्था- रष अज्ञानकी नियृत्ति कर सकती है, ऐसा समाधान किया गया हे। अब ठफ शकाका प्रकारन्तरसे भो 'अथवा' इत्यादि पन्थसे रमाधान करते हैं, इस पक्षमें जितने जब पदार्थ हैं, वे सयके सब मूलाजानके विषय नहीं है, तथापि अवस्यारुप अज्ञानके विषय हे, क्योंकि 'में घटको नहीं जानता है दय प्रकार भी प्रतीति दोती है, यदि जय अवस्थारूप अज्ञानका विपय न माना जाय, सी नन्दनके हुफदके आकारमें परिणत वाकुपरत्तिसे अभिव्यक चैतन्यसे चन्दनमें रहनेवाले गन्धका भी प्रकाश दोने लगेगा, अतः ततू-तत् जय पदार्थोको अवश्य अवस्थारूप अज्ञानोंसे आयृत नानना चादिए, दर्मीये 'जद अज्ञानका विषय नदीं दोता' इस विद्धान्तके साथ विरोध भी नदीं दे, क्योंकि यद विद्ान्त गूलाशानमात्रविपयक है, यह भाव है।

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४९२ सिद्धान्तलैशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

द्विगुणीकृत्य वृत्ययोगेन चैकद्रव्यगुणानां स्वाश्रये सर्वत्र व्याप्य वर्त- मानानां पृथक पृथकू गगनावच्छेदकत्वस्येत्र चैतन्याव्च्छेकत्वस्याप्यस- म्भवात्, तेषां स्वाश्रयद्रव्यावच्छिन्नचैतन्येनैव शुक्तीदमंशावच्छिन्न चैतन्येन शुक्तिरजतवत् प्रकाश्यतया तस्याभिव्यक्तौ गन्धस्यापि प्रका- शस्य, अनभिव्यक्तिो रजतादेरप्यप्रकाशस्य चापत्तेः । न च गन्धाकार- वृत्युपरक्ते एव चैतन्ये गन्धः प्रकाशते इति नियमः, प्रकाशसंसर्ग- स्यैव प्रकाशमानशब्दार्थत्वेनाऽसत्यामपि तदाकारवृत्तावनावृतप्रकाशसंसगे

चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेके कारण गन्धका प्रकाश नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यकी द्विगुणित * वृत्तिके न होनेसे तथा अपने आश्रयमें व्याप्यवृत्तित्वरूपसे वर्तमान एक द्रव्यमें अवस्थित गुणों का गगनावच्छेदकत्वके समान पृथक्-पृथक् चैतन्यावच्छेदत्वका भी सम्भव न होनेसे जैसे शुक्तिके इदमंशावच्छिन्न चैतन्यसे शुक्तिरजतका + प्रकाश होता है, वैसे ही उन गुणोंका भी अपने आश्रय द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यसे ही प्रकाश होता है, इससे द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यके अभिव्यक्त होनेपर गन्धका प्रकाश भी प्रसक्त होगा, और यदि उक्त चैतन्यकी अभिव्यक्ति न मानी जाय, तो रजत आदिका भी प्रकाश नहीं होगा। यदि शक्ा हो कि गन्धाकार वृत्तिसे उपरक्त चैतन्यके प्रकाशित होनेसे ही गन्घका प्रकाश होता है, यह नियम है ? सो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकाशसंसर्गके ही प्रकाशमानशब्दका अर्थ

  • तात्पर्य यह है कि चैतन्य निरवयव है, इसलिए निरवयव चैतन्यमें द्रव्यावच्छेदेन एक और गुणावच्छेदेन दूसरी वृत्ति नहीं हो सकती है, और एक ही द्रव्यमें गन्ध आदि गुणोंका प्रदेशके भेदसे यदि अवस्थान माना जाय, तो एक द्रव्यमें गन्घादिके भेदसे चैतन्यका भी भेद प्रसक्त होगा, परन्तु गन्ध आदि गुण अव्याप्यवृत्ति नहीं हैं, किन्तु व्याप्यवृत्ति हैं, अतः उक्त शङ्गा भी नहीं हो सकती है। और घट आदि द्रव्य गगनके अवच्छेदक होते हैं, इससे उनके भेदसे गगनका भेद होता है, परन्तु गन्ध गगनका अवच्छेदक नहीं होता, वैसे ही गन्ध चतन्यका भी. अवच्छेदक नहीं होता। जिससे कि गन्घादिके भदसे चैतन्यका भी भेद प्रसक्त हो। + अर्थात् शुक्तिके इदमंशावच्छिन् चैतन्यमें रजतका अध्यास होनेसे रजतका शुक्तिके इदमंशावच्छिन चतन्यसे अवभास होता है, उससे अतिरिक्त चैतन्यसे अवभास नहीं होता है, वैसे ही द्रव्यावच्छिन चतन्यमें कल्पितरूप आदिका भी द्रव्यावच्छिन्न चैतन्यसे भी अवभास होता है, यह भाव है।

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अज्ञानके निव्त्तकका निरूपण] भापानुवादसहित ४९३

अप्रकाशमानत्वकल्पनस्य विरुद्धत्वाद्। अभिव्यक्तस्य गन्धोपादानचै- तन्यस्यं गन्धासंसर्गोक्त्यसम्भवात्। तस्माद् यथा चत्रस्प घटवृत्तौ तं प्रत्यावरकस्यैवाज्ञानस्य निवृत्तिरिति तस्यैय विपयप्रकाशो, नान्यस्य, तथा तत्तद्विपयाकारवृत्त्या तत्तदावरकाज्ञानस्यैव निवृत्तेर्न विपयान्तर- स्यापरोक्ष्यम्, 'अनावृतार्थस्पैव संविदभेदाद् आपरोक्ष्यम्' हत्यभ्युपग- मादिति। प्रमातभेदेनेव विपयभेदेनाप्यकेत्र चैतन्ये अवस्थाऽज्ञानभेदस्य वक्तव्यतया अवस्थाऽज्ञानानां तत्तञ्ञडविपयकत्वमिति घटादिवृत्तीनां

होनेसे गन्धाकार वृत्िके न होनेपर भी अनावृत प्रकाशके संसर्गसे अप्रकाश- मानत्वकी कल्पना हो ही नहीं सकती है, कारण कि अभिव्यक्त गन्धोपादान नैतन्य गन्धका संसर्गी नहीं है, इत्याकारक उक्तिका असम्भव ही है। इससे जैसे चंत्रकी घटाकार वृत्ति होनेपर चैत्रके प्रति आवारण करनेवाले मन्ञानकी दी निवृत्ति होती है, इससे चैत्रको ही घटका प्रकाश होता है, अन्यको नहीं होता, वैसे ही तत्-तत् विषयाकार वृत्तिसे तत्-तत् विषयोंके आवारक अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है, अतः अन्य विपयोंके अपरोक्षत्वकी पस्षक्ति नहीं है, क्योंकि अनावृत्त अर्थ ही चैतन्यसे अभिन्न होनेसे अपरोक्ष होता है, ऐसा सिद्धान्त है *। प्रमातृचतन्यके मेदसे जैसे एक विपयम अनेक अज्ञान माने जाते हैं 1 वैसे ही विपयके मेदसे भी एक चैतन्यम अवस्थारूप अज्ञानोंका मेद कहना होगा, इससे अवस्थारूप अज्ञान

*तात्पर्य यह दे कि जडमें आवरणकी सिद्धि होनेसे जसे चैन्नके घटचिपयक अज्ञानकी निशृि चैत्रके घटविषयफ शानसे ही होती है, अन्यके जञानसे नहीं होती, वैसे ही गुण और गुणीका सादातम्य होनेपर भी मेदके भी अवस्थित दोनेसे चन्दनविपयक चाकुपपृततिसे गन्धविपयक अपरीक्ष ज्ञानकी प्रमकि नहीं होती, क्योंकि जो अज्ञानकृत आवरणसे रहित अर्थ होता दे, यही चतन्यसे अभिन होता है, यह नियम है। 1े. तात्पर्य यद है कि जैसे एफ ही विपयमे चैत्र, मेत्र, देयदस आदि अनेक प्रमाताओंके मेदये अज्ञान अनेक है, घैसे ही एक ही चन्दनादिविपयवच्छिन चैतन्यमें गन्ध आदि विपयोंके मी नदसे अज्ञान अनेक हैं, अतः चन्दनकी अपरोक्षतादशम गन्धका अवभास न होनेके कारण उस कालमें गन्ध आदिमें आघरण है, य अवश्य मानना होगा, इसलिए चन्दनके चाछुप प्रत्यक्षफालमें गन्धका प्रत्यक्ष नहीं होता है।

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४९४ सिद्धान्तलैशसंग्रह [तृतीय पंरिच्छेद

नावस्थाऽज्ञाननिवर्तकत्वे काचिदनुपपत्तिः। न वा मूलाज्ञाननिवर्तकत्वापत्तिः। साक्षिणः स्वप्रकाशत्वान्नाहंवृत्याऽपि तत्क्षयः । तथा कालादिवैशिष्टयगोचरप्रत्यभिज्ञया ॥ ३० ॥ साक्षीके स्वप्रकाश होनेसे अहंवृत्तिसे भी मूलाज्ञानका नाश नहीं होता है, तथा काल आदिस सम्बन्धका अवगाहन करनेवाली प्रत्यभिश्ञासे भी मूलाज्ञानका विनाश नहीं होता है।। ३०।। न चैवमपि जीवविपयाया अहमाकारवृत्तेर्मूलाज्ञाननिवर्तकत्वापत्तिः।

तत्-तत् जड़विषयक है, अतः घटादिवृत्तियोंके अवस्थारूप अंज्ञाननिवर्त- कत्वमें कोई अनुपपत्ति नहीं है, और घटादि वृत्तियोंके अथवा मूलाज्ञान निवर्तकत्वकी भी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि वे चैतन्यविषयक नहीं है। यदि शङ्का हो कि ऐसा * माननेपर भी अहमाकार वृचिम मूलाज्ञान निवर्तकत्वकी प्रसक्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अहमाकार

  • तात्पर्य यह है कि घटादिवृत्तियोंके चैतन्यविषयक न होनसे ज्ञान और अज्ञानमें परस्परविरोधप्रयोजक समानविषयकत्व नहीं है, क्योंकि घटादिवृत्तियाँ केवल जडपदार्थ- विषयक है और अज्ञान केवल चतन्यविपयक है, इसी प्रकार जदमें आवरण माननेपर भी अपसिद्धान्तकी आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जड़में आवरणका अनभ्युपगम मूलाज्ञान- विषयक है। वैसे तत्-तत् जड़ पदार्थोंके आवारक अज्ञान यदि अनेक माने जायँ, तो भी उनके एकत्वसिद्धान्तका विरोध नहीं है, क्योंकि वस्तुतः वह एक ही है, इसी अमिप्रायसे कोई आपत्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं, घटादिवृत्तियाँ सूलाज्ञानविषयभूतन्रद्मविषयक नहीं है, अतः घटादिवृत्तियोंमें अज्ञाननिवर्तकत्व नहीं हैं, अतः पूर्वपक्षियोंका मत सर्वेथा अनुपपन्न है। इसलिए ब्रह्मचतन्यमें सर्वप्रत्ययवेद्यत्वप्रतिपादक पूर्वमें उदाहृत वार्तिकवाक्यकी भी उपपत्ति हो सकती है। घटादिवृत्तियोंके चैतन्यविषयक न होनेपर भी अहंशब्दका अर्थभूत जो जीव है, वह चित् और अचित्से सम्पृक्त है, इससे अहंृत्तिके चैतन्यविषयक होनेसे उससे अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, यह पूर्वपक्षीका तात्पर्य है, इसपर सिद्धान्तीका कहना है कि स्वप्रकाश होनेके कारण प्रकाशमान चतन्यमें चित्तादात्म्यरूपसे अध्यस्यमान अचिदशमान्रका ही अवगाहन करनेसे अहमाकार वृत्ति भी चैतन्यावगाहिनी नहीं है। अन्यथा केवल उपनिषद् गम्यत्वका विरोध प्रसक होगा। इसी प्रकार 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णका अनुभव किया, वही में जागरणमें उसका स्मरण करता हूँ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा भी जैसे 'अहम्' इत्याकारक वृत्ति स्त्रप्रकाश चैतन्यमें अन्तःकरणतादात्म्यका अवगाहन करती है, वैसे ही. तत्तादिविशिष्टका भी अवगाहन करती है, स्वप्रकाश चैतन्यका अबगाहन नहीं करती है, यह भाव है।-

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अज्ञानके निवर्त्तकका निरूपण] भापानुवादसहित ४९५

तस्याः स्वयंप्रकाशमानचित्संवलिताचिदंशमात्रविपयत्वाद्। 'सोऽहम्' इति पत्यभिज्ञाया अपि स्वयम्प्रकाशचैतन्ये अन्तःकरणवैशिष्ठेन सह पूर्वापर का लवैंशिष्ठा मात्र विपयत्वेन चैतन्यविपयत्वाभावादिति।

वाक्यजं ज्ञानमेवाहुर्मूलाज्ञाननिवर्हणम्॥ ३१ ॥ कुछ लोग कहते हैं कि श्रोतव्यवाक्यनियमजन्य अटएसे जन्य दोपके विनाशसे युक्त तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञान दी मूलाशानका विनाशक है। ३१ ॥ केचिच घटादिवृत्तीनां तत्तदयच्छिन्नचैतन्यविपयत्वमभ्युपगम्य- 'सर्वमानप्रसक्तौ च सर्वमानफलाश्रयाद् । श्रोतव्येति वचः प्राह वेदान्तावरुरुत्सया ।।' इति वार्तिकोक्त्ते: श्रोतव्यवाक्यार्थवेदान्तनियम विध्यनुसारेण वेदान्तजन्य-

वृच्ि स्वयंप्रकाशमान चित्संवलित अचिदंशमात्रका ही अवगाहन करती है, और 'सोडहम्' (वही मैं हूँ) इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा भी स्वयंप्रकाशमान चतन्यम अन्तःकरणके सम्बन्धके साथ पूर्वापरकालके सम्बन्धमात्रको विषय करती है, अतः वह भी चितन्यविपयक नहीं है। कुछ + लोग घटादि वृत्तियोंमें तत्-तत् विपयोंसे अवच्छिन्न चैतन्य- विषयकत्वका अभ्गीकार करके 'सर्वमानपसक्त्तौ च०' (सभी प्रमाणोंके चतन्यविपयक होनेसे न्यासाक्षात्कारके प्रति सम्पूर्ण प्रमाणोंकी कारणता परसक्त होनेसे वेदान्तोंकी नियमेच्छासे 'श्रोतव्यः' यह वाक्य 'वेदान्तोंका ही' विचार करना चाहिए' ऐसा प्रतिपादन करता है) इस प्रकारकी वार्तिकोक्तिसे

घटादिविषयरु मृत्तियोंके चैतन्यविपयक ोनेसे चेदान्तजन्य ज्ञानके समान उनसे भी मूलाशानकी निवृत्ति प्रसक दोगी, ऐसा पूर्वपक्ष करके उसके समाधानमें हेत्वसिद्धिप्रयुक्त्त अतिप्रसभ पूर्वमें दिसलाया गया है, अब उन पृत्तियोंको यदि चतन्यविपयक माना जाय, तो . भी फोई हानि नहीं दै, इस प्रकार 'केचितु' मत कहते हैं। * इसमें यदि शह्ता की जाय कि चेतन्यको चक्षु आदिसे जन्य वृत्तिका विषय यदि माना जाय, तो चतन्यमें चछ्ष आदि इन्द्रियोसे जन्य पृत्ति चिपयताका श्षुतियोंसे जो निषेध किया गया है, उनके साथ विरोध दोगा, तो यद भी युक नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंसे चक्षुरादिजन्य- वृत्तियों में निरूपाधिक चैतन्यविषयकत्वका निपेध किया गया है, इसलिए अवच्छिजचैतन्यको विषय माननेमें कोई विरोध नहीं है।

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४९६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

मेव नियमादष्टसहितं ब्रह्मज्ञानमप्नतिवद्ध ब्रंह्माज्ञाननिवर्तकमिति घटादि- ज्ञानान्न तन्निवृत्तिप्रसङ्ग इत्याहुः। अन्ये स्वरूपसम्वन्धाद्वैजात्याद्वाऽपि वाक्यजात्। अखण्डाकारकं ज्ञानमाचर्युस्तन्निवर्तकम् ॥ ३२ ॥। कुछ लोग कहते हैं कि वाक्यजन्य स्वरूपसम्बन्धविशेपरूप अथवा वेजात्यसे उपलक्षित अखण्डाकारक ज्ञान मूलाज्ञानका निवर्तक है॥ ३२ ॥ अन्ये तु तच्वमस्यादिवाक्यजन्यं जीवव्रक्माभेदगोचरमेव ज्ञानं मूला ज्ञाननिवर्तकम्, सूलाज्ञानस्य तदभेदगोचरत्वादिति न चैतन्यस्वरूपमात्र- गोचराद् घटादिज्ञानात् तन्निवृत्तिप्रसङ्गः। न चाडभेदस्य तच्वावेदकप्रमाण- बोध्यस्य चतन्यातिरेके द्वैतापत्तेः 'चैतन्यमात्रमभेदः' इति तद्गोचरं घटा-

श्रोतव्य वाक्यके अर्थभूतवेदान्तनियम विधिके अनुसार वेदान्तजन्यनियमा- दष्टसे युक्त अप्रतिबद्ध ब्रह्मज्ञान ही * न्रह्मविषयक अज्ञानका निवर्तक है, इसलिए घटादि ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त नहीं है-यह कहते हैं। + और कुछ लोग कहते हैं कि 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यसे उत्पन्न जीव और ब्रह्मके अभेदको विषय करनेवाला ज्ञान ही मूलभूत अज्ञानका निवर्तक है, क्योंकि मूलाज्ञान जीव और ब्रह्मके अभेदको विषय करता है, इसलिए केवल चैतन्यस्वरूपको अवगाहन करनेवाले घटादिविषयक ज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है। यदि शङ्का हो कि तत्वावेदक प्रमाणसे वोध्य जीव और ज्रह्मका अभेद चैतन्यसे अतिरिक्त माना जाय, तो द्वैतकी मसक्ति होनेसे * अर्थात् नियमादष्टसे प्रतिवन्धकीभूत दुरितका विनाश होता है, इसलिए अप्रतिवद्ध ब्रह्मज्ञानका निर्वतक है, यह भाव है। + 'तत्त्वमस्यादिवाक्योत्यं ज्ञानं मोक्षस्य साधनम्' अर्थात् 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि महावाक्यजन्य ज्ञान मोक्षका साधन है, इत्यादि नारदजीके वचनके दर्शनसे और- तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं यज्जीवपरमात्मनोः। तादात्म्यविषयं ज्ञानं तदिदं मुक्तिसाधनम् ॥ अर्थोत् तत्त्वमस्यादिवाक्यसे होनेवाला जोजीव और परमात्माका तादात्म्यविषयक विज्ञान है, वही मुक्तिका साधन है, इत्यादि, भगवत्पादके वचनके दर्शनसे और मूलाज्ञान जीव और ब्रह्मके अभेदको ही आवृत्त करता है, इससे जीव और न्ह्मका ऐक्यलक्षणतादात्म्य- विषयक जो विज्ञान् है, वही मुक्तिका साधन है, अतः पूर्वोक्त अतिप्रसन्न नहीं है, इस अभिप्रायसे यह मत है।

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अज्ञानके निवर्तकका निरूपण] भापानुवादसहित ४९७

दिज्ञानमप्यमेदगोचरमिति वाच्यम्। नह्यभेदज्ञानमिति विपयतो विशेषं

केवल चतन्य ही अमेद होगा, अतः परमार्थ वस्तुका अवगाहन करनेवाला घटादिविषयक ज्ञान भी अमेदविषयक है, इससे घटादि ज्ञानसे भी मूलाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीव- न्रदामेदविपयक ज्ञानकी विपयप्रयुक्त विशेषता नहीं है x। किन्तु तत् और

*सर्थात् अभद और चैतन्यके एक होनेसे घटज्ञान यदि चैतन्यविपयक हुआ, तो जीव और म्रहमका अभेदविपयक भी हुआ, इसलिए अभेदावगाही घटके ज्ञानसे भी अज्ञानकी निषृत्ति हो सकती दै, वह प्रश्नम आशय है। X घटादिज्ञानमें चिपयरूपसे चैतन्य भासता है, अभेद नहीं मासता है और मदावाक्यजन्य ज्ञानमें तो जीव और न्रक्मका ममेद भामता है। इस प्रकार घटा- दिज्ञानकी अपेक्षासे महावाक्यजन्य ज्ञानकी विषयप्रयुक्त विशेपता नहीं है, जिससे कि उक्त अतिप्रमत्न दो, क्योंकि अभेद और चैतन्यके एक होनेसे घट आदि ज्ञानमें यदि चैतन्य विषय हुआ, तो अभेद भी विपय हुआ ही, अन्यथा द्वेतापति होगी। यदि शङ्ठा हो कि 'इदं रजतम्' इस अममें जितना अधिष्ठानांश भासता है, उसकी अपेक्षासे अधिक शुकित्व आदि विशेष को विषय करनेवाले शुक्त्यादिविपयक ज्ञानमें ही रजतादित्रमकी विरोधिता देखी जाती है, इसलिए 'मन् घटः' 'स्कुरति घटः' इत्यादि भ्रमोंमें जितना, अधिष्ठानभूत चतन्य विषय है उसकी अपेक्षा अधिक अभेदको विषय करनेवाला वाक्यजन्य ज्ञान न माना जाय, तो उसमें अ्रमनिवर्तकत्व हो ही न सकेगा, इसलिए विपयप्रयुक्त भेद अवदय मानना चाहिए, तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि अमसे अ्धिकविपयक ज्ञान ही अज्ञानके निव्तक हैं, ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि ऐखे अनेक स्थल देखे जाते हैं, जो अ्रमसे अधिकविषयक यद्यपि नहीं है, तथापि अमके निवर्तक हैं, जसे कि चस्नुतः घोपका आधारभूत ही गन्गाका तीर है, तथापि किसीको उसमें तटाकतीरत्वके भ्रमसे 'तटाकतीरे घोपः' ऐसा भ्रम होता है, उस पुरुपके प्रति 'गभ्गायां घोपः' इस प्रकारके वाक्यप्रयोगके होनेपर उसको 'गभातीरे घोपः' इस प्रकारका ज्ञान होता है और तटाकतीरत्वका त्रम भी निवृत होता है। इसमें भ्रमविपयकी अपेक्षा वाक्यजन्यज्ञानमें कोई अधिक विषय नहीं भासता है। यदि शाद्धा हो कि वाक्यजन्य ज्ञानमें तटाकतीरत्वकी व्याृत्ति करनेवाला गमातीरत्वरूप विशेप मासता है, अतः विशेष विपय नहीं भासता है, यह कहना * अयमत है, तो यद भी युक नहीं है, क्योंकि जहांपर तीरत्वमात्र विशेषणके तात्पर्यसे 'गङ्गार्यां घोप:' इस शब्दका प्रयोग किया, और उसी प्रकारका भ्रान्त पुरुपको तात्पर्यज्ञान हुआ, उस स्थलमें गगातीरत्वप्रकारक बोध यद्यपि नहीं है, तथापि भ्रमकी निवृत्ति देखी जाती है, इसलिए व्यमिचार तदवस्थ ही है। तथा किसी भी कपालसे तुपोंका उपवाप करना चाहिए, इस प्रकार जिस पुरपको भ्रम है उस पुरुपके प्रति कपालत्वमात्रविशेषणके तात्पर्यसे प्रयुक और उसी तात्पर्यसे गृहीत 'पुरोडाकपालेन तुपानुपवपति' इस वाक्यसे कपालसे तुपका उपवाप करना ६३

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४९८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

स्वरूपसंबन्धविशेषेण चैतन्यविपयत्वमेव तदभेदज्ञानत्वम्। यथा हि त्वं पदके वाक्यार्थभूत जो जीव और ईश्वर दो धर्मी हैं, उनके परामर्श आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेपसे चतन्यविषयकता ही

चाहिए, ऐसा ही उस पुरुषको वोध होता है। इसमें कपालांशमें कपालान्तरव्यावर्तकविशेपके गृहीत न होनेपर भी पुरोडाशकपालसे अतिरिक्त कपालोंमें तुपोपवापसाधनत्वकी निवृत्ति देखी जाती है, इसलिए भ्रभाधिकविपयक ज्ञानमें भ्रमनिवर्तकत्व नियम यदि माना जाय, तो इस स्थलमें भी व्यभिचार हो सकता है। इससे 'तीरे घोपः' (तीरमें घोप है) इस शान्दवोधमें गङ्गातीरत्वरूप विशषविषयत्वके न होनेपर भी उसके हेतुभृत पदार्थोपस्थितिके समयमें गज्ञा- सम्बन्धित्वरूपसे तीरकी उपस्थिति रहनेके कारण उपस्थितिकी सामर्थ्यसे वस्तुतः गभ्गातीर- विषयक ज्ञान जो कि भ्रमाधिकविषयक नहीं है, वह भ्रमका निवर्तक है, ऐसा कहना होगा। इसी प्रकार 'कपालसे तुषोंका उपवाप करना चाहिए' इत्यादि शाव्दवोधके स्त्रतः कपालान्तरकी व्यावृत्ति करनेवाले विशषविपयक न होनेपर भी उक्त शाब्दवोधके हेतुभूत पदार्थकी उपस्थिति- कालमें पुरोडाशकी सम्बन्धितारूपसे कपालकी उपस्थिति होनेसे उपस्थितिकी सामर्थ्यस उसके भ्रमाधिकविषयक न होनेपर भी भ्रमनिवर्तकत्वका अजञीकार करना होगा, इस परिस्थितिमें ज्ञानकी भ्रमविरोधितामें सामग्रीविशेषाधीनत्व ही प्रयोजक मानना होगा, भ्रमाधिकविषयत्व नहीं, क्योंकि उक्त स्थलमें व्यभिचार है। किन्च, महावाक्यजन्य जो ज्ञान है, उसमें संसारके मूलभूत अज्ञानकी विरोधिता श्रुति, स्मृति और अनुभवसे सिद्ध है, महावाक्योंसे चैतन्यस्वरूप मात्रका बोध होता है, इसका द्वितीय परिच्छेदमें साधन किया जा चुका है और अन्य निवन्धोंमें विस्तार भी किया गया है, इसलिए जैसे गुकिरजतादिस्थलमें भ्रमविरोधी भ्रमाधिकविषयक शुकतिज्ञानादिम भ्रमाधिकविपयता है, वैसे ही दोषाभाव आदिसे घटित सामग्रीविशेषाधीनत्वसे, अखडार्थक वेदान्तके अनुसारसे और पूर्वके उदाहृत व्यभिचार- स्थलोके अनुरोधसे भी ज्ञानकी भ्रमविरोधितामें सामग्रीविशेपाधीनत्व को ही अनुगत प्रयोजक कहना होगा, भ्रमाधिकविपयत्वका अङ्गीकार करके भ्रमाधिकविपयकत्वसे रहित महावाक्यार्थ ज्ञान भ्रमनिवर्तक नहीं हो सकता है, इसी अभिप्रायसे 'किन्तु' इत्यादि प्रन्थ है, तात्पर्य यह है कि 'तद' और त्वम् शब्दके वाच्यभूत जो ईश्वर और जीव दो धर्मी हैं, उन दो धर्मियोंका पहले 'तत्' और 'त्वम्' ज्न्दस शकतिपृत्तिके स्मृतिरूप परामर्श होता है, उसके बाद तत् और त्वम्पदके सामानाधिकरण्यसे जीव ईश्वरसे अभिन्न है, इस प्रकार उनकी (जीव और ईश्वरकी) विशेषण और विशेष्यभावसे अवगति होती है, अनन्तर 'तत्' और 'त्वम्', पद्से वाच्य अर्थभूत जो विशिष्ट हैं उनमें से विशेष्यरूप अभेदके योग्य जो चैतन्य हैं। उनकी लक्षणासे प्रतीति होती है, इसके वाद दोनों विशेष्यके अभेदको विषय करनेवाले शाब्दवोधका उदय होता है। इस क्रमसे होनेवाला महावाक्यजन्य ज्ञानका अपने विषयके साथ जो स्वरूप- सम्बन्ध है, उस सम्बन्घसे चतन्यविषयत्व ही घटादिज्ञानव्यावृत्त वाक्यजन्य जीव और ब्रह्मका अभेदज्ञान है, इसके वलसे वह अमेदज्ञान मूलाज्ञान और मिथ्याज्ञानका विरोधी होता है।

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अज्ञान के निवतकका निरूपण] भापानुवादसहित ४९९

विशेपणविशेष्यतत्सम्बन्धगोचरत्वाविशेपेऽपि विशिष्टज्ञानस्य विशेपणज्ञा मादिकारण विशेपाधीनस्वरुपसम्बन्धवियोपेण तत्रितयगोचर्त्वमेव समूहा- लम्बनव्यावृत्तं विशिष्टज्ञानत्वम्, यथा वा 'स्थाणृत्वपुरुपत्ववान्' इति आहार्यवृत्तिव्यावृत्तं संशयत्वं विपयतो विशेपानिरूपणात्, तथा घटादावपि 'सोडयं घटः' इत्यादिज्ञानस्य स्वरूपसम्त्रन्धविशेपेण घटादिविपयत्वमेव

वाक्यजन्य जीवत्रदामेदविपयक ज्ञानत्व है, क्योंकि जैसे विशेषण, विशेष्य और उनके संसर्गविषयताकी बरावरी होनेपर भी विशेषणज्ञान आदि कारणविशेपके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे उक्त त्रितयविषयता ही समूहालम्वनव्यावृत्त विशिष्टज्ञानत्व हे अथवा जैसे 'स्थाणुत्वपुरुपत्ववान्' इस प्रकार आहार्य- घृच्तिसे व्यावृत्त + संशयत्व है, क्योंकि विशिष्टज्ञानमें और 'स्थाणुर्वा पुरुपो वा' इस प्रकारके संग्रयात्मक ज्ञानमं विषयतः विशेषका निरूपण नहीं हो सकता है, वैसे + घटादिस्थलमें भी 'सोडयं घटः' (वही यह घट है) इत्यादि ज्ञानमें

• महावाक्यजन्य शानके घटादिजानकी अपेक्षासे चैतन्य अशमें विषयप्रयुक्त विशेषके न होनेपर भी सामप्रीविशेषये घटादिज्ञानकी अपेक्षा वैलकण्य है, उसका इस ग्रन्थसे स्पष्टी करण करते है, 'दण्डी पुरषः' (दण्टवान् पुरुप है) इस प्रकारके विशिष्ट ज्ञानमें तीन विषय हैं, इसी प्रकार 'दण्डपुरपसंयोगा:' इस प्रकारके समृदालम्बन ज्ञानमें भी ये तीन विषय हैं, इमलिए उक् विशिष्ट ज्ञान और समूहालम्बनात्मक ज्ञानका परस्पर विपय भेद नहीं कर सकते हैं। यगोकि विषय तो समान दे, इसलिए विशेषण, विशेष्य और संसर्गके ज्ञान आदि कारण विशोषके अधीन स्वरूपसम्वधविशेषय विशेषणादित्रयविपयकत्व ही समूहालम्वमश्ञानव्यावृत्त विशिष्टज्ञानत्व है, इस प्रफार सामभ्रीविरेपसे उक विशिष्टज्ञान और समूहालम्बनात्मक ज्ञानमें वेलकषण्य मानना दोगा, दस्री प्रकार तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञानमें भी सामग्रीप्रयुक्त ही घेलकषण्य है, यह भाव है। +.'स्थाणुत्ययिरयपुर्पत्ववान' (स्थाणुत्वसे विरुद्ध जो पुरुपत्व, तद्ान्) इस प्रकारका निश्चय संशययमानविपयक आदार्यवतिरूप कहलाता है, इससे व्याशत संशयत्व भी पिपय- प्रयुक नहीं है, विन्तु सामग्रोविशेपप्रयुक्त है, क्योंकि विपयकृत भेद तो आहार्यवृत्तिसे संशयमें नहीं आ सकता है, क्योंकि विषय समान है, यह भाव है। 1 उफ प्रकारकी व्यवस्था केवल 'तत्त्वमखि' आदि वाक्यजन्य ज्ञानके अभेद ज्ञानत्वमें ही नहीं है, किन्तु 'स्ोडयं घटः' 'सोडयं देवदस:' (यही यद घट है और वही यह देवदत्त है) इ तादि पाक्यजन्य ज्ञानके केवल घटशब्द और देवदत्तशब्दसे होनेवाले शानसे व्यावृत्त अभेद-

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4०० सिद्धान्तलेश संग्रह [ तृतीय परिच्छेद

केवलघटशव्दादिजन्यज्ञानव्यावृतं तदभेदज्ञानत्वम्। अतिरिक्ताभेदानि- रूपणात्। अभावसादृश्यादीनामधिकरणप्रतियोग्यादिभिः स्वरूपसम्बन्ध युक्तानामधिकरणेनाऽडधाराधेयभावरूपः स्वरूपेसम्बन्धविशेषः प्रतियोगिना प्रतियोग्यनुयोगिभावरूप इत्यादिप्रकारेण स्वरूपसम्बन्धे अवान्तरविशेष- कल्पनावद् वृत्तीनां विषयेऽपि संयोगतादात्म्ययोरतिप्रसक्त्या विपयैर्विषय- स्वरूपसम्बन्धविशेषसे घटादिविषयकत्व ही केवल घटशब्द आदिसे होनेवाले ज्ञानसे भिन्न घटाभेदविषयक ज्ञानत्व है, क्योंकि अतिरिक्त अभेदका निरूपण नहीं हो सकता है। और X अभाव एवं सादृश्य आदिका, जो कि अधिकरण और प्रतियोगी आदिके साथ स्वरूपसम्वन्धसे युक्त हैं, अधिकरणके साथ आधाराधेयभावरूप स्वरूपसम्बन्धविशेष है और प्रतियोगीके साथ प्रति- योग्यनुयोगिभावरूप स्वरूपसम्बन्धविशेष है, इस प्रकारसे जसे स्वरूपसम्बन्घमें अवान्तर भेदोंकी कल्पना की जाती है, वैसे ही वृत्तियोंके विषयीभूत निर्विशेष- चैतन्यमें भी संयोग और सादात्म्यसंसर्गकी अतिप्रसक्ति होनेके कारण

ज्ञानत्वमें भी वही व्यवस्था है, इसे इस अन्थसे कहते हैं। तात्पर्य यह है केवल घट आदि शब्दसे जन्य ज्ञानके विषयभूत घट आदिके स्वरूपकी अपेक्षा 'सोऽयं घटः' इत्यादि वाक्यसे वोधित अभेद अतिरिक्त नहीं है, क्योंकि भिन्न माननेमें प्रमाण नहीं है, इसलिए 'घटः' और 'सोऽयं घटः' इनमें विषयप्रयुक्त वैलक्षण्यके न होनेसे 'सोडयं घटः' इत्यादि स्थलमें भी 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यके समान 'सः' और 'अयम्' इन दो पदोंके वाक्यार्थरूप दो धर्मीके परामर्श आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्ध विशेषसे घटादिस्व्ररूपविषयकत्व ही घटाद्यभेद- ज्ञानत्व होगां, दूसरा नहीं, इसीका सर्वेत्र अनुसरण करना चाहिए। X प्रकृतमें वक्तव्य यह है कि केवल घटादिशब्दजन्य ज्ञानका भी विषयके साथ स्वरूप सम्वन्ध ही है, इस अवस्थामें स्वरूप सम्बन्धको लेकर अभेद ज्ञानत्वादिकी व्यवस्था कैसे कर सकते हैं। यदि इसमें शङ्का हो कि वृत्यात्मक ज्ञानोंका विषयोंके साथ विषयविषयिभाव प्रयोजक स्वरूपसम्बन्धोंके साधारण होनेपर भी उनमें विषय और उनके ज्ञानके स्वरूपात्मक सम्वन्धोंमें सामग्रीविशेषके प्रभावसे परस्पर वैलक्षण्यकी कल्पनासे व्यवस्थाकी उपपत्ति कर सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वरूपसम्वन्धोंका कहींपर भी वैलक्षण्य देखनेमें नहीं आता है, इसलिए वैसी कल्पना नहीं कर सकते हैं, इसपर 'अभाव सादृश्य' इत्यादि ग्रन्थसे स्वरूपसंसगोंके भेदका उपपादन करते हैं। * तात्पर्य यह है कि यहाँ किसीको शङ्ा हो कि वृत्तियोंका विपयके साथ विपयविषयिभाव स्वरूपसम्बन्धप्रयुक्त नहीं है, किन्तु संयोगादिप्रयुक्त है, अतः वृत्तियोंका विषयोंके सांथ स्वरूपसम्बन्धके असिद्ध होनेसे उन सम्बन्घोंमें वैलक्षण्यात्मक विषयकी कल्पना अयुक्त है,

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अज्ञानके निवर्तकका निरूपण] भापानुवादसहित ५०१

विपयिभावरूपस्वरूपसम्बन्धवतीनां विपयविशेपनिरूपणासम्भवे कलपे एव स्वरूपसम्बन्धे अवान्तरविशेपकल्पनेनाभेदज्ञानत्वादिपरस्परवैलक्षण्य- निर्वाहाच्। एवं च ब्रह्मज्ञानस्याभेदाख्य किश्चित्संसर्गगोचरत्वानभ्युपगमाद् न वेदान्तानामखण्डार्थत्वहानिरपीत्याङ्क: । ननु स्वहेतुमज्ञानं विरोधात्सा कर्थ हरेत्। वृत्तिर्मेवं विरुद्धत्वाद्दहिसंयोगवत् पटे॥ ३३ ॥ अब शङ्का होती है कि ब्रहमजञानसे, जिसका उपादान अज्ञान है, विरोध होनेसे अविद्याका विनाश कैसे हो सकता है, क्योंकि कार्यका उपादानके साथ विरोध नहीं हो सकता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्माकार अखण्ड वृत्तिके साथ अज्ञानका पटमें वह्निसंयोगके समान विरोध है, अतः ज्ञानसे अज्ञानका विनाश हो सकता है॥ ३३ ॥ ननु घटादिज्ञानवद् ब्रह्मज्ञानस्यापि न मूलाज्ञाननिवर्तकत्वं युक्तम्, विपयविशेपका निरूपण न होनेसे परिशेपसे विषयोंके साथ विषयविषयिभावरूप स्वरूपसम्बन्धसे युक्त उन वृत्तियोंके + वलप् स्वरूपसम्बन्धके अवान्तर विशेषकी कल्पनासे अभेदज्ञानत्व आदि परस्परविलक्षणत्वकी भी करपना कर सकते हैं। एव्च, ब्रह्मज्ञानकी अमेदरूप किसी संसर्गविपयताका स्वीकार न होनेसे वेदान्तोंकी अखण्डार्थताकी हानि भी नहीं है। यदि शब्चा हो कि जसे घट आदिका ज्ञान मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, वैसे ब्रह्मज्ञान भी मूलभूत अज्ञानका निवर्तक नहीं हो सकता है, क्योंकि तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि यदि वृत्तिका संयोग वृत्तिविषयत्वमें प्रयोजक माना जायगा, तो चक्षुके गोलक आदिका भी घटादिवृत्तिके साथ संयोग होनेसे उसमें वृत्तिविपयत्वकी प्रसक्ति होगी, यदि वृत्तिके तादात्म्यको वृत्तिविपयत्वमें प्रयोजक मानें, तो वृत्तिके अधिष्ठानत्वरूपसे धृत्तिके साथ तादात्म्यापन घटायवच्छिन चैतन्यमें घटाद्याकारवृत्तिविपयत्वका सम्भव होनेपर भी वृत्तितादात्म्यसे रहित घट आदिमें वृत्तिविपयत्वकी प्रसक्ति न होगी, और वृत्तिके परिणामी अन्तःकरणमें घटादिवृत्षिविषयत्वका प्रसन् होगा, क्योंकि परिणाम और परिणामीका परस्पर तादात्म्य होता है। स्वरूपसम्बन्ध वृत्ति आदिका स्वरूप है, इसलिए वह क्लृप्त है, अतः वलृप्र सम्वन्धके विशेषकी कल्पनामें लाघव दै, अन्य सम्बन्धकी कल्पना करके उसमें-सम्बन्धान्तरमें अभेद ज्ञानत्वादिका निर्वाहकविशेप माना जाय, तो गौरवमात्र है, इसलिए वृत्तियोंका विपयोंके साथ स्वरूपसम्बन्ध ही है, संयोग, तादात्म्यादि नहीं है। 1 अर्थात महावाक्यजन्य ज्ञानमें रहनेवाले अभेदज्ञानत्वंका प्रकारन्तरसे उपपादन किया गया है, अतः अभेदसंसर्गभानकी अपेक्षा नहीं है, यह भाव है।

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५०२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ तृतीयं परिच्छेद

निवर्तकत्वे तदवस्थानासहिष्णुत्वरूपस्य विरोधस्य तन्त्रत्वात्, कार्यस्य चोपादानेन सह ताद्ृशविरोधाभावादिति चेत, न; कार्यकारणयोरन्यत्र तादृशविरोधादर्शनेऽपि एकविषयज्ञानाज्ञानप्रयुक्तस्य तादृग्विरोधस्याऽन्र सच्चात्, कार्यकारणयोरप्यग्निसंयोगपटयोस्ताद्दशविरोधस्य दष्टेश्र। न चाड- स्निसंयोगादवयवविभागप्रक्रियया असमचायिकारणसंयोगनाशादेव पट- नाशा, नाऽगनिसंयोगादिति वाच्यम्, दग्धपटेऽपि पूर्वसंस्थानानुवृत्तिदर्शनेन सुद्गरचूर्णीकृतघटवद् अवयवविभागादर्शनाव्। तत्राऽवयवविभागादिकल्प- नाया अप्रामाणिकत्वात्। नाऽपि तत्र तन्तूनामपि दाहेन समवायिकारण-

निवर्तकत्वमें तदवस्थानासहिष्णुत्वरूप X विरोध कारण है और कार्यका अपने उपादानके साथ उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि कार्य और कारणका अन्य स्थलमें यद्यपि उक्त विरोध नहीं देखा जाता है, तथापि प्रकृतमें समानविषयक ज्ञान और अज्ञानप्रयुक्त उक्त विरोध विद्यमान है, और कार्यकारणात्मक अमिसंयोग और पटमें उक्त विरोध देखा जाता है। यदि इसमें शङ्का हो कि अगिके संयोगसे होनेवाले अवयवविभागकी प्रक्रिया द्वारा * असमवायिकारणभूत तन्तुसंयोगके नाशसे ही पटका नाश होता है, अझिके संयोगके नाशसे नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि दग्ध वस्त्रमें भी पूर्वकी संयुक्तावस्थाकी अनुवृत्ति होनेसे जैसे मुद्धरसे चूर्णित घटमें अवयवोंका विभाग देखा जाता है, वैसे ही पटके दग्ध होनेके पश्चात् दग्ध तन्तुओंमें अवयवविभागके दृष्ट न होनेसे पटके दाहस्थलमें अवयव- विभागकी कल्पना अप्रामाणिक है। और उक्त स्थलमें यह भी नहीं कह सकते हैं. कि तन्तुओंका भी दाहसे अर्थात अपने समवायिकारणका नाश होनेके कारण पट-

X निवर्त्य और निवर्तकका सहावस्थान अपेक्षित नहीं होता है, क्योंकि वे ही पदार्थ विरोधी होते हैं, जो सहावस्थानको सहन नहीं करते हैं, प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान और मूलाज्ञानका तत्शब्दसे निवत्य सहावस्थानासहिष्णुत्वलक्षण विरोध न होनेसे निवर्त्यनिवर्तकभाव नहीं हो सकता है, यह भाव है।

*अग्निके संयोगसे तन्तुमें क्रिया, उसके बाद तन्तुओंमें विभाग, उसके वाद पटके प्रति असमवायिकरणभूत तन्तुसंयोगका नाश, अनन्तर पटका विनाश, इस प्रकारकी वैशेषिक प्रक्रिया द्वारा, यह भाव है।

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बहाज्ञानके नाशकका विचार] भापानुवादसहित ५०३

नाशात् पटनाश इति युक्तम्। अंशुतन्त्वादिभिस्सह युगपदेव पटस्य दाह- दर्शनेन क्रमकल्पनायोगात्। यतोऽधस्तानावयवनाशः, तत्राऽवयचे अग्नि संयोगादेव नाशस्य वाच्यत्वात् ।। ११ ।। नन्वस्त्वेतदेवम्, तथाऽपि सविलासाज्ञाननाशकमिदं त्रह्मज्ञानं कर्थ नश्येद, नाशकान्तरस्याडभावादिति चेद्, हत्वा मोहं विनशयेत् सा कतकाब्धिन्दुवह्दयः ।

अज्ञानका विनाश करके ब्रझ्ाकार वृत्ति भी उसी प्रकार स्वयं नष्ट हो जाती है, जैसे कि जलमें प्रक्षिप् निर्मली जलके मलिन भागको अलग कर स्वयं अलग हो जाती है तप्तलोएपिण्डके ऊपर गिरे हुए जलके बिन्दु अग्निको शान्तकर स्वयं शान्त हो जाते हैं और अग्नि भूमिके तृणोंको नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाती है।। ३४ ॥। यथा कतकरजः सलिलेन संयुज्य पूर्वयुक्तरजोऽन्तरविश्रेपं जनयत् नाश हुआ है, क्योंकि अंशु और तन्तु आदिके साथ एक ही समयमें पटनाशके देखे जानेसे क्रमकी कल्पना अयुक्त है, और + जिस द्वयणुकावयव परमाणुका नाश नहीं होता है, उस अवयवका अग्निसयोगसे ही नाश मानना होगा॥ ११ ॥ अब शब्ा करते हैं कि उक्त प्रकारसे यद्यपि न्रद्मज्ञान ही अन्तःकरण द्वारा अपने उपादानभूत अज्ञानका नाशक भले ही हो, तथापि अपने विलास सहित मज्ञानका विनाशक ब्रह्मज्ञान कैसे नष्ट होगा? क्योंकि ब्रह्मज्ञानके सिवा अन्य कोई नाशक नहीं है। इस प्रकारकी शक्षाके समाधानम कोई लोग कहते हैं कि जसे कतकरज जलके साथ सम्बन्ध पाकर अपने संयोगसे पूर्व जलके साथ सम्पृक्त अन्य + तात्पर्य यद है कि व्णुकनाशके प्रति परमाणुनाश प्रयोजक नहीं हो सकता है, क्योंकि परमाणु नित्य है, इसलिए व्यणुकमें विद्यमान अग्निके संयोगसे ही व्यणुकका विनाश मानना होगा। अययविभागकी प्रत्रियाका अवलम्बन करके प्रकृतमें समाधान नहीं हो सकता है, क्योंकि अवयवविभागकी प्रक्रियाका पहले निरास किया जा चुका है। इसलिए अग्निसंयोगमें मपने उपादानभृत पटकी नाशकता भ्रान्त नहीं है। * समाधानका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मज्ञानसे व्यतिरिक समस्त पदार्थेका ब्रह्मज्ञानसे नाश होगा, पीछे अवशिष्ट मरहमाज्ञानका नाश होगा, इस प्रकार कम नहीं माना जाता है, किन्तु न्रम्मज्ञानसे जव अपने विलासके सहित अविद्याका विनाश प्रसक होगा उसीके साथ साथ म्रहमज्ञानका भी नाश होगा अपने नाशके प्रति व्रह्मज्ञान भी कारण माना जाता है। यह भी

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५०४ सिद्धान्तलेश संग्रह [तृतीय परिच्छेद

स्वविश्रलेपमपि जनयति, तथाऽऽत्मन्यध्यस्यमानं ब्रह्मज्ञानं पूर्वाध्यस्तसर्व- अपञ्चं निवर्तयत् स्वात्मानमपि निवर्तयतीति केचित्। अन्ये तुअन्यन्निवर्त्य स्वयमपि निधृत्ता दग्धलोहपीताम्चुन्यायमुदाहरन्ति। अपरे त्वन्न दग्धतृणकूटदहनोदाहरणमाहुः। न च ध्वंसस्य प्रतियो- ग्यतिरिक्तजन्यत्वनियमः, अप्रयोजकत्वात्। निरिन्धनदहनादिध्वंसे व्यभिचाराच्च। न च ध्वंसस्य प्रतियोगिमात्रजन्यत्वेऽतिप्रसङ्गातू कारणा-

रजका पृथकरण करके अपने विश्रेषको भी उत्पन्न करता है, वैसे ही आत्मामें अध्यस्त ब्रह्मज्ञान पूर्वके अध्यस्त समस्त प्रपश्चकी निवृत्ति करके अपने आपकी भी निवृत्ति करता है। कुछ लोग तो इस विषयमें अन्यकी निवृत्ति करके अपनी निवृत्तिमें दग्ध- लोहपीताम्वुन्यायको + दष्टान्तरूपसे देते हैं। अन्य कुछ लोग दग्धतृणकूटदहनको दष्टान्तरूपसे कहते हैं। यदि शक्का हो कि ध्वंस प्रतियोगीसे भिन्न कारणसे उत्पन्न होता है, यह नियम है,तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त नियमके अङ्गीकारमें कोई प्रमाण नहीं है, और इन्धनशून्य अभनि आदिके ध्वंसमें व्यभिचार भी है। (तात्पर्य यह है इन्घनोंका निःशेष ध्वंस होनेके पश्चात् अगनिका स्वतः ही नाश देखा जाता है, एवं सुषुप्तिके अव्यवहित पूर्वकालमें जो ज्ञानका विनाश होता है, वह भी प्रति- योगिमात्रसे होता है, अतः उक्त नियममें व्यभिचार दोष है, अतः प्रयोजक- शून्य निरर्थक नियमका अङ्गीकार नहीं करना चाहिए)। यदि शङ्का हो कि

शङ्ठा नहीं हो सकती है कि एक वस्तु अपने और दूसरेके नाशके प्रति कारण कैसे हो सकती है, क्योंकि कतकरजमें (निमली जिससे मलिन जल साफ होता है) स्व और परकी विरोधिता देखी जाती है, अतः यह पूर्वपक्ष युक्त नहीं है कि सव प्रपञ्चका ब्रह्मज्ञानसे भले ही नाश हो, परन्तु ब्रह्मज्ञानका नाश नहीं होगा, क्योंकि अन्य नाशक नहीं है, क्योंकि व्रह्मज्ञानका ब्रह्मज्ञानसे ही नाश उक्त रीतिसे हो सकता है। + 'दग्धलोहपीताम्वुन्याय' यह न्याय इस प्रकारका है कि जसे अगिसे तपे हुए लोहे के गोलेमें पानी यदि फेंका जाय, तो उस जलका लोहेमें रहनेवाला अग्नि.नाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है, ैसे ही प्रकृतमें ब्रह्मज्ञान भी अपनेस व्यतिरिक्त सम्पूर्ण प्रपश्चका विनाश करता है और स्वयं भी नष्ट हो जाता है।. * जैसे अग्नि तृणके समुदायको नष्ट करती है, और स्वयं भी नष्ट हो जाती है, वैसे ही त्रह्मज्ञान सम्पूर्ण प्रपश्वका विनाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाता है, यह तात्पर्य है। .. ...

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ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार] भापानुवादसहित ५०५

न्तरमवश्यं वाच्यम्, निरिन्धनदहनादिध्वंसेऽपि कालादृष्टेश्वरेच्छादिकार- मान्तरमस्तीति वाच्यम्, अतिप्रसङ्गापरिज्ञानात्। न च घटादिध्वंस स्यापि कारणान्तरनिरपेक्षत्वं स्यादित्यतिप्रसङ्ग:, ध्वंसमात्रे कारणान्तर- नैरपेक्ष्यानभिधानात्। न च वटध्वंसदष्टान्तेन ब्रह्मज्ञानध्वंसस्य कारणान्तरा- पेक्षासाधनम्, तद्दृष्टान्तेन मुद्धरपतनापेक्षाया अपि साधनापत्तेः। नापि ज्ञानध्वंसत्वसाम्याद् घटज्ञानादिध्वंसस्यापि कारणान्तरनैरपेक्ष्यं स्थादित्य- तिप्रसङ्ग:, सेन्धनानलध्वंसस्य जलसेकादिदृष्टकारणापेक्षत्वेऽपि निरि- न्धनानलध्वंसस्य तदनपेक्षत्ववद्, जाग्रज्ज्ञानध्वंसस्य विरोधिविशेपगुणा-

धवंसको केवल प्रतियोगिजन्य माना जायगा, तो अतिम्रसङ्ग होगा, इसलिए उसके प्रति अवश्य कारणान्तर भी मानना चाहिए, और निरिन्धन दहन आदिके ध्वंसमें भी काल, अष्ट, ईश्वर आदि अन्य कारण हैं ही, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अतिपसक्लोंका + परिज्ञान हो ही नहीं सकता है। यदि कहें कि घट आदिके ध्वंसको भी कारणान्तरनिरपेक्षत्व प्रसक्त होगा, यही अतिपसत है, तो यह भी अयुक्त है, क्योंकि हम सम्पूर्ण ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी निरपेक्षता नहीं कहते हैं, और यदि घटध्वंसके दष्टान्तसे नद्यन्ानवंसको कारणान्तरकी अपेक्षा माने, तो उसी घटध्वंसके टष्टानतसे मुद्गर्पातकी अपेक्षाका भी साधन प्रसक्त होगा। और ज्ञान- ध्वंसत्वके दष्टानतसे घटज्ञानध्वंसके प्रति भी अन्य कारणकी निरपेक्षता प्रसक्त दोगी, इस प्रकार भी अतिप्रसभ नहीं दे सकते हैं, क्योंकि जैसे इन्धनसे बुक्त वदिके ध्वंसके प्रति जलसिश्वन आदि अन्य कारणकी अपेक्षा होनेपर भी इन्यनरहित अगिध्वंसके प्रति कारणान्तरकी आवश्यकता नहीं होती है और जसे जागत्कालीन ज्ञानध्वंसोंके प्रति विरोधी अन्य विशेष

  • यदि कोई शहा करे कि अतिप्रमम्वोंका परिज्ञान क्यों नहीं होता है, तो इसपर कहना पार्हिये कि मदाज्ञानका मंस यदि प्रतियोगीसे अतिरिक कारणसे जन्य न हो, तो घटादिप्वंस भी, प्रतियोगीये अतिरिक फारणसापेक्ष नहीं होगा, इस प्रकारका अतिप्रसत् है अथवा चटादिध्यंसके समान अयजानका ध्वंस भी प्रतियोगीसे अतिरिक कारणसे सापेक्ष होगा, यह अतिप्रमम दे अथया मदाजानके असके समान घटादिज्ञानका ध्ंस भी कारणान्तरसे निरपेक्ष होगा यह अतिशसभ दे अथवा व्रद्म्ञानका अपनी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें नाश होगा, गह अतिप्रयश दे, इनमें से प्रत्येकका अग्रिम प्रन्थसे खण्टन किया गया है। ६४

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५०६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

न्वरापेक्षत्वेऽपि सुपुप्तिपूर्वज्ञानध्वंसस्य तदनपेक्षत्ववच मूाज्ञानानिवर्तक- ज्ञानध्वंसस्य कारणान्तरसापेक्षत्वेऽपि तन्निवर्तकज्ञानव्वंसस्य तदनपेक्षत्वोन पपत्तेः। नापि कारणान्तरनैरपेक्ष्ये स्वोत्पत्युत्तरक्षणे एव नाशः स्यादित्य तिप्रसङ्ग:। इष्टापत्तेः, तदुत्पच्युत्तरक्षणे एव ब्रह्माध्यस्तनिखिलप्रपश्चदाहेन तदन्तर्गतस्य तस्यापि तदैव दाहाभ्युपगमात्। निरिन्धनदहनध्वंसन्यायेन

सर्वप्रपश्चनिवृत्यनन्तरमेकशेपस्य त्रह्मज्ञानस्य निवृत्तिरित्यनभ्युपगमेन युगपत्

गुणोंकी अपेक्षा होनेपर भी सुपु्िके पूर्वकालीन ज्ञानध्वंसके प्रति उनकी अपेक्षा नहीं होती है, वैसे ही मूलाज्ञानके अनिवर्तक ज्ञानके ध्वंसके प्रति- कारणान्तरकी अपेक्षा होनेपर भी मूलाज्ञानके निवर्तक ज्ञानके ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी अपेक्षा न मानना युक्तियुक्त ही है। और यह भी अतिप्रसज्ग नहीं हो सकता है कि न्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति कारणान्तरकी अपेक्षा न मानी जाय, तो व्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके उत्तरक्षणमें ही नाशकी उसके प्रसक्ति होगी, क्योंकि यह तो इष्ट ही है, कारण कि न्रह्मज्ञानकी उत्पत्तिके द्वितीय क्षणमें ही ब्रह्ममें अध्यस्त सकल प्रपश्चका दाह होनेसे प्रपश्नके अन्तर्गत ब्रह्मज्ञानका भी उसी उत्तरक्षणमें विनाश माना जाता है। और इन्धनशून्य अगनिके ध्वंसके उदाहरणसे यह भी मान लिया जाय कि ब्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति * काल, अदष्ट, ईश्वरकी इच्छा आदि अन्य कारण हैं, तो भी कोई विरोध नहीं है। कारण कि सव प्रपञ्चकी निवृत्तिके वाद एक अवशिष्ट न्रह्मज्ञानकी निवृत्ति होती है, ऐसा स्वीकार न होनेसे एक ही कालमें सव

  • कार्यमात्रके प्रति काल, अदृष्ट आदि कारण होते हैं, अतः न्रह्मज्ञानके ध्वंसके प्रति यदि वे कारण माने जांय, तो कोई हानि नहीं है, यदि यहां पर यह शङ्गा हो कि पहले ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति हुई, पीछे वासनासहित अविद्याकी निवृत्ति और इसके वाद तृतीय क्षणमें ब्रह्मज्ञानकी निवृत्ति होगी, इस प्रकार यदि क्रम स्व्रीकार किया जाय, तो न्रह्मज्ञाननाशके पूर्वक्षणमें काल आदिकी अवस्थिति न होनेके कारण ब्रह्मज्ञानके नाशके प्रति उनमें हेतुता कैसे आ सकती है, तो यह शङ्का युक्क नही है, कारण कि 'सब प्रपञ्वकी निवृत्तिके पीछे एक व्रह्मज्ञान वचता है' इस प्रकार नहीं माना जाता है, किन्तु व्रह्मज्ञानसे एक ही क्षणमें सभीका विनाश होता है, ऐसा माना जाता है, इसलिए पूर्वेक्षणमें काल, अदृष्ट आदि अवश्य कारणरूपसे रह सकते हैं, यह भाव है।

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बहाज्ञानके नाशकका विचार ] भीपातुवादसहित ५०७

सर्वदाहे पूर्वक्षणे चिदविद्यासम्बन्धरूपस्य द्रव्यान्तररूपस्य वा कालस्य, ईश्वरप्सादरूपस्यान्तःकरणगुणविशेषस्य वाऽट्स्य, अन्येपां च सच्चात्। न च तत्र ज्ञानातिरिक्तकारणापेक्षणे त्रह्मज्ञानस्यामिथ्यात्वप्रसङ्ग:, ज्ञानैक निवर्त्यत्वं मिथ्यात्वमित्यभ्युपगमादिति वाच्यम्; ज्ञानाघटितसामग्न्यनि- वर्त्यत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वस्य तदर्थत्वात्। 'नान्यः पन्थाः' इति क्षुतेरपि तत्रैव तात्पर्यात्। अतो युक्त एव दग्धृदाहयदहनादिन्यायः।

प्रपश्चके विनाशके प्रति पूर्वकालमें चित् और अविद्याका सम्बन्धरूप अथवा द्रव्या- न्तररूप काल, ईश्वरका प्रसादरूप अथवा अन्तःकरणका गुणविशेपरूप अदष्ट, ईश्वर और दिया आदि साधारण कारण विद्यमान हैं। यदि शक्वा हो कि ब्रह्मज्ञानके धवंसमें ज्ञानसे अतिरिक्त कारणकी अपेक्षा मानी जाय, तो ब्रम्मज्ञानमें सत्यत्वकी प्रसक्ति होगी? क्योंकि मिथ्यात्वका लक्षण यही माना गया है कि जो केवल ज्ञानसे निवत्यमान हो वह मिथ्यात्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मिथ्या- रका लक्षण यही है-ज्ञानसे अघटित सामग्रीसे * अनिवर्त्य होकर जो ज्ञानसे निवत्य दो, 'नान्यः पन्था:०' (ज्ञानको छोड़कर मुक्तिके लिए अन्य मार्ग नहीं है) इस श्षुतिका भी उसीमें तात्पर्य है, इसलिए दग्धृदाहदहनादिन्याय युक्त ही है।

•इनसे अर्घटित जो सामग्री उससे निवत्य न हो करके जो ज्ञानस निवृत्त होता हो, बदी मिध्या है, जो लोग प्रपसको सत्य मानसे हैं उनके मतमें भी ज्ञानसे घटादिकी निवृत्ति दोती है, पर्योकि 'में घटका विनाश करता हूँ' इस प्रकारके ज्ञानके अनन्तर ही मुद्रके प्रहारसे घटा विनाश देया जाता है, अतः उनके प्रपथके मिथ्यात्व के परिदवारके लिए प्रथम सत्यन्त पद दिया गया है, उनके गतमें पटादिके विनाश में नियमतः ज्ञानपूर्वकत्वके न होनेसे ज्ञानाघटित सामग्रीसे निश्त होनेवाले पटादिनें ज्ञानाघटितसामग्रीसे अनिवत्यत्व नहीं है। यदि पाक्ता हो कि प्रपथ- मत्ययादियों के मसमें नायमाध ऐश्वरीयज्ञानघटित सामग्रीजन्य है, अतः ईश्वरके ज्ञानको लेकर कार्यमान्में ज्ञानापटितयमग् गनिवत्यत्वे सति ज्ञाननिवर्त्येत्वरूप मिथ्यात्व है, इसलिए इस प्रशरका मिव्याल मी युधिगु नहीं है, तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि 'ज्ञानाघटित' व्यादिलक्षणमें जो ज्ञानपद है, वद जीवके ज्ञानके अभिप्रायसे कहा गया है अतः उक्त दोप नहीं है। निशेष्य दल दिया है-आतमामें दोपके निवारणके लिए है, इसीलिए 'नान्यः प्थाः' दत्यादि भुतिका तात्पर्य यह नहीं है कि मोक्षके प्रति केवल ज्ञान ही कारण है और अन्य कारण नदीं है, किन्तु जो कारण है, वद्द जानसे अघटित नहीं है, किन्तु ज्ञानघटित है, अतः कार्यमात्रके प्रति कालादिके कारण होनेसे मूलाजानथ्वंसरूप मोक्षमें भी उनको कारण माना जाय, तो भी इस श्रुतिके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है।

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५०८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [तृतीय परिच्छेद

आहुरन्ये तु वृत्तीद्ध आत्मैवाज्ञानतत्कृतम्। प्रदहेत्सूर्यकान्तेद्धा सूर्यकान्तिस्तृणं यथा ॥ ३५ ॥ 7. कुछ लोग कहते हैं कि वृिमें आरूढ़ आत्मा ही अज्ञान और अज्ञानकृत प्रपञ्चका निवर्तक है, जैसे किं सूर्यकान्त मणिके ऊपर आरूढ़ सूर्यकी किरणें तृणको दग्ध करती हैं॥। ३५ ॥। केचितु वृत्तिरूपं ब्रह्मज्ञानं नाज्ञानतन्मूलप्रपश्चनिवर्हकम्, अज्ञानस्य प्रकाशनिवर्त्यत्वनियसेन जडरूपवृत्तिनिवर्त्यत्वायोगात्। किन्तु तदारूढ- चैतन्यप्रकाशस्तन्निवर्तक, स्वरूपेण तस्याज्ञानादिसाक्षितया तदनिवर्त- कत्वेऽप्यखण्डाकारवृत्युपारूढस्य तस्य तन्निवर्तकत्वोपपत्तेः । 'तृणादेर्भासिकाऽप्येषा सूर्यदीपिस्तृणं दहेद। सूर्यकान्तमुपारुह्य तन्न्यायं तत्र योजयेत् ।।' इत्यभियुक्तोक्तेः । एवं च यथा किश्चित् काष्ठमुपारुह्य ग्रामनगरादिकं दहन वहिर्दहत्येव तदपि काष्ठम्, तथा चरमधृत्तिमुपारुह्य निखिलप्रपश्च-

कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिरूप न्रह्मज्ञान अज्ञान और अज्ञानमूलक प्रपञ्चका विनाशक नहीं है, क्योंकि अज्ञानकी निवृत्ति प्रकाशसे होती है, इसलिए जड़रूप वृत्तिसे अज्ञानकी निवृत्ति हो नहीं सकती, किन्तु वृत्तिमें आरूढ़ जो चैतन्यात्मक प्रकाश है, वह उसका निवर्तक है, यद्यपि स्वरूपतः चैतन्य अज्ञान आदिका साक्षी है, अतः अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तथापि अखण्डाकार वृत्तिमें आरूढ़ होकर वह अज्ञानका निवर्तक होता है। 'तृणादेः०' (यद्यपि सूर्यकी कान्ति तृण आदिकी प्रकाशिका है, तथापि सूर्यकान्तमणिमें आरूढ़ होकर तृण आदिको दग्ध करती है, यही न्याय प्रकृतमें भी लगाना चाहिए, इस प्रकारकी पण्डितोंकी उक्ति भी है। एवञ्र * जैसे किसी काष्ठका अवलम्बन कर अग्नि ग्राम, नगर आदिका दाह करता हुआ उस काष्ठका भी दाह करता है, वैसे चरमवृत्तिका अवलम्बनका * कुछ लोग शङ्का करते हैं कि सूर्यकान्तमणिमें आरूढ सूर्यकी कान्ति उस मणिसे भिन्न तृण आदिका जसे विनाश करती है, मणिका विनाश नहीं करती है, वैसे ही वृ्त्तमें आरूढ चैतन्य वृत्तिसे व्यतिरिक अज्ञान आदिका विनाश करता है, वृत्तिको नहीं, इसलिए ब्रह्मज्ञानका नाश कैसे हो सकता है, क्योंकि अन्य नाशक नहीं है-इस शङ्ाका समाधान करनेके लिए 'प्रपश्न' यह अन्थ है।

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ब्रह्मज्ञानके नाशकका विचार] भापातुवादसहित

सुन्मूलयन्नखण्डचैतन्यप्रक्ाशस्तन्निवर्तनेऽपि प्रकल्पते इति न तननाशे का

उपादानक्षयादन्ये विश्वोच्छेदं प्रचक्षते। जीवन्मुक्तस्य भोगोSत्राविद्यालेशेन युज्यते ॥। ३६ ॥। अन्य लोग कहते हैं कि उपादानके नष्ट होनेसे ही सम्पूर्ण प्रपञ्चका नाश होता है और जीवन्मुक्त पुरुषको अविद्याके लेशसे भोग हो सकता है॥ ३६ ॥ इति श्रीगङ्गाघरसरस्वतीविरचितवेदान्तसिद्धान्तसूक्तिम ञ्जर्या तृतीय: परिच्छेदः। अन्ये तु ब्रह्मज्ञानमज्ञानस्यैव निवर्तकम्, ज्ञानाज्ञानयोरेव साक्षाद्वि- रोधात्। प्रपश्चस्य तूपादाननाशान्नाश इति प्रपश्चान्तर्गतस्य ब्रह्मज्ञानस्यापि तत एव नाश:। न च प्रपश्चस्य ज्ञानानिवर्त्यत्वे मिथ्यात्वानुपपत्तिः। प्रपश्चनिवृत्तेस्साक्षाद् ज्ञानजन्यत्वाभावेऽपि ज्ञानजन्याज्ञाननाशजन्यत्वाद्। 'साक्षात् परम्पराया वा ज्ञानैकनिवर्त्यत्वं मिथ्यात्वम्' इत्यङ्गीकाराद। एवं च तत्वसाक्षात्कारोदयेऽपि जीवन्मुक्तस्य देहादिप्रतिभास उपपद्यते। प्रार्धकर्मणा प्रतिवन्धेन तत्वसाक्षात्कारोदयेऽपि प्रारब्धकर्मतत्कार्यदेहादि-

कर सम्पूर्ण प्रपश्चका उच्छेद करता हुआ चैतन्यात्मक प्रकाश चरमवृत्तिके विनाश करनेमें भी समर्थ होता है, इसलिर उसके विनाशमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। अन्य कुछ लोग कहते हैं कि ब्रम्मज्ञान अज्ञानका ही निवर्तक है। क्योंकि ज्ञान और अज्ञानका साक्षात् विरोध है, प्रपश्चका तो उपादानके नाशसे नाश होता है, इसलिए प्रपञ्चके अन्तर्गत ब्रह्मज्ञानका भी उपादानके नाशसे नाश होता है। यदि शङ्का हो कि प्पञ्नकी निवृत्ति ज्ञानसे न मानी जाय, तो मिथ्यात्वकी अनुपपत्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रपञ्चनिवृत्ति यद्यपि साक्षात् ज्ञानजन्य नहीं है, तथापि ज्ञानजन्य अज्ञान नाशसे जन्य है, अतः मिथ्यात्वकी उपपत्ति हो सकती है, क्योंकि साक्षात् अथवा परम्परया केवल ज्ञाननिवत्यत्वको मिथ्यात्वका अञ्गीकार किया जाता है, एचश् * तत्वसाक्षातकारके उत्पन्न होनेपर भी जीवन्मुक्त पुरुषको

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५१० सिद्धान्तलैश संग्रह [तृतीय परिच्छेद

प्रतिभासानुवृत्योपादानाविद्यालेशानुवृत्युपपत्तेः। अज्ञानवत् प्रपश्चस्यापि साक्षाद् ब्रह्मसाक्षात्कारनिवर्त्यत्वे नायमुपपद्यते। विरोधिनि ब्रह्मसाक्षात्काये सति प्रारब्धकर्मणः स्वयमेवावस्थानासम्भवेनाविद्यालेशनिवृत्तिप्रतिबन्धक- त्वायोगादित्याहुः। इति श्रीसिद्धान्तलेशसंग्रहे तृतीय: परिच्छेद: समाप्तः ।

देहादिप्रतिभासकी उपपत्ति हो सकती है, कारण कि प्रारब्ध कर्मके + प्रतिबन्धक होनेके कारण तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर भी प्रारब्ध कर्म और उसके कार्य देहादिप्रतिभासकी अनुवृत्तिसे उपादानभूत अविद्यालेशकी अनुवृत्ति उपपन्न हो सकती है। यदि अज्ञानके समान प्रशश्चको भी ब्रह्मसाक्षात्कारसे साक्षात निवर्त्य माना जाय, तो जीवन्मुक्तके देहादि प्रतिभासकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी, क्योंकि ब्रह्मसाक्षात्काररूप विरोधीके होनेसे प्रारब्ध कर्मकी स्वतः अवस्थिति न होनेके कारण अविद्यालेशनिवृत्तिके प्रति प्रतिवन्धकत्वका सम्भव नहीं है।

श्रीसिद्धान्तलेशके वेदान्ताचार्य श्री पं० मूलशक्करव्यासविरचित भाषानुवादमें तृतीय परिच्छेद समाप्त।

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अविद्यालेशका निरूपण ] भापानुवादसहित ५११

नमः परमात्मने चतुर्थः परिच्छेदः।

अथ कोडयमविद्याया लेशो यदनुवर्तनात्। देहादे: प्रतिभासेन जीवन्मुक्तिरिहोच्यते ॥ १ ॥ अब शका होती है कि यह अविद्यालेश क्या चीज है, जिसके अनुवर्तनसे देह आदिका प्रतिभास होनेसे यहाँ जीवन्मुक्ति कही जाती है॥ १ ॥ अथ कोऽयमविद्यालेशः, यदनुवृच्या जीवन्मुक्ति: १। ज्ञानेनावरणे नष्टे विक्षेपांशोऽनुवर्तते। प्रारब्धप्रतिवन्धेन स लेशस्तेन जीवनम् ॥ २ ॥ जानसे आवरणके नष्ट होनेपर भी प्रारब्ध कर्मसे जो अज्ञानका विक्षेपांश अनुवृत्त होता है, वही अविद्याका लेश है, और उसीसे जीवन है।। २ ।। आवरणविक्षेपशक्तिमत्या सूलाविद्यायाः प्रार्धकर्मवर्तमानदेहाद्यनु- वृत्तिप्रयोजको विक्षेपशत्तयंश इति केचित्।

  • अन्न यह अविद्यालेश क्या चीज है, जिसके अनुवर्तनसे जीवन्मुक्ति कहलाती है। + इस प्रश्नके उत्तरमें कुछ लोग कहते हैं कि आवरण और विक्षेप- शक्तिसे युक्त मूलाविद्याका-प्रारब्ध कर्म और वर्तमान शरीर आदिकी अनुदृत्तिमं प्रयोजकीभून-जो विक्षेपशक्ति अंश है, वही अविद्याका लेश है।

*तृतीय परिच्छदमें मुकिके साधन व्रम्मज्ञानका निरूपण बड़े ऊहापोहके साथ किया गया हे, दस चनुर्थ परिच्छेदमें परहाजानकी फलभूत मुकिका निरूमण किया जाता है, इसलिए 'अथ कोऽयम्' एस मूल प्रन्थमें पढे हुए अथशब्दका साधननिरूपणके लिए प्रस्तुत तृतीय परिच्छेदके अनन्तर-यह अर्थ है। शक्ाका तात्पर्य यह है कि अविद्यालेश' शब्दमें लेशशब्दका अवयय अर्थ दे, परन्तु अविद्याका अवयव नहीं हो सकता है, क्योंकि अविद्या सावयच नहीं है, कारण कि जो कार्य होता है, चही सावयव होता है, इसलिए अविद्यालेय हो ही नहीं सकता है। + अविद्यामें दो प्रार की दाक्तियाँ होती हैं, एक तो आवरणशक्ति और दूसरी विशेपशककि, उनमेंसे घृत्यात्मक आत्मसाक्षात्कारसे अविद्याकी आवरणंशक्तिका विनाश होता है, और जो

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५१२ सिद्धान्तलेश संग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

क्षालितेष्विव हिङ्गवादिपात्रेष्वन्ये तु वासना । कुछ लोग कहते हैं कि हिंग आदिके पात्रोंके धोनेपर भी जैसे उसकी वासना रह जाती है, वैसे ही अज्ञान की वासना का रहना ही अविद्याका लेश है। क्षालितलशुनभाण्डानुवृत्तलश्ुनवास नाकल्पोSविद्या संस्कार इत्यन्ये ।

  • कुछ लोग कहते हैं कि अत्यन्त स्वच्छ किये हुए लशुनके पात्रमें अनुवर्तमान लशुनकी वासनाके समान अनुवर्तमान अविद्याकी वासना (संस्कार) ही अविद्याका लेश है।

विक्षेपशक्तियुक्त अविद्या है, उसका-प्रतिवन्धकीभूत प्रारब्कर्मके क्षीण होनेपर पूर्वमें अनावृतरूपसे अवस्थित चैतन्य ही-विनाशक है, ऐसा स्वीकार होनेसे तत्त्वज्ञानसे विक्षेपशक्तियुक्त अविद्यारूप अविद्यालेशकी निवृत्ति न होनेसे उसका विनाशक कौन है, इस प्रकारकी शङ्रा ही नहीं हो सकती है, यह तात्पर्य है। * तात्पर्य यह है कि तत्त्वज्ञानसे अन्तःकरणकी उपादानभूत अविद्याकी निवृत्ति होनेपर भी अविद्याजन्य कोई देहकी अवस्थितिमें प्रयोजक वासनाविशेष रहता है, उसी वासनाविशेप को अविद्यालेश कहा जाता है। यदि इसमें शङ्ा की जाय कि उपादानभूत अविद्याका नाश होनेपर कार्यका अवस्थान कैसे होगा? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे अन्य मतावलम्बी पटके नाशक्षणमें पटके रूपादिकी अवस्थिति मानते हैं, वैसे ही हमारे मतमें भी उपादानके नाश होनेपर भी वासनाविशेषकी अवस्थिति माननेमें कोई ह्ानि नहीं है। यदि शक्का हो कि समवायिकारणका नाशरूप जो अनवस्थितिमें कारण है, उसकी प्रतीक्षासे उपादानके अभावकालमें भी रूपादिकी अवस्थिति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस परिस्थितिमें तो प्रकृतमें भी तत्त्वज्ञानसे उत्पन्न देहादिके प्रति उपादानभूत अविद्याका विनाश, जो देहादिके विनाशमें कारणभूत है, प्रारब्धकमसे प्रतिवद्ध है, इसलिए प्रतिबन्धकरहित अविद्याके विनाशकी प्रतीक्षासे देह आदिकी भी अवस्थिति हो सकती है। यदि शक्ा हो कि प्रारब्धकमको प्रतिबन्धक मानना प्रमाणशून्य है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवन्मुक्तिप्रतिपादक शास्त्र और तत्व- वेत्ताओंका अनुभव उसमें प्रमाण है। किव्च, पट और उसके रूपकी एक ही क्षणमें निवृत्ति देखनेमें आती है, अतः परमतमें ही तथाविध अनियमाङ्गीकारमें प्रमाण नहीं है, इसीलिए विद्यारण्य स्वामीजीने कहा है कि चिना क्षोदक्षमं मानं तैर्वृथा परिकल्प्यते। श्रुतियुत्त्यनुभूतिभ्यो वदतां किं नु दुःशकम्॥ अर्थात् अन्यमतावलम्वी किसी प्रमाणविशेषके विना वृथा ही वस्तुका अग्ञीकार करते हैं, तो हम लोगोंके लिए, जो कि श्रति, युक्ि और अनुभवके अनुसार वस्तुकी सिद्धि कहते हैं, क्या असाध्य है।

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अविद्यालशंका निरूपण] भापानुवादसहित ५१३

नष्टानुवृत्तिमाचर्युरन्ये दग्घपटे यथा ॥ ३ ॥। जैसे दग्यपट में उसके आकांरकी अनुवृत्ति होती है, वैसे कार्याक्षम मूलाविद्या ही अवविद्याका लेश कहलाता है॥ ३ ॥ दग्धपटन्यायेनानुवृत्ता मूलाविद्यैवेत्यपरे। विरोधिन्युदिते शेपासम्भवादर्थवादताम्। सर्वज्ञात्मगुरु: प्राह जीवन्मुक्तिश्रुतेः स्फुटम् ॥ ४ ॥ सर्वशात्मगु कहते हैं कि विरोधी ब्रदाज्ानके उदित द्ोनेपर कुछ भी अज्ञान आदि अयशिष्ट नहीं रह सकता, जीवन्मुक्तिप्रतिपादक ्ुि अर्थवादमान्र है ।। ४ ॥ सर्वज्ञात्मगुरवस्तु-चिरोधिसाक्षात्कारोदये लेशतोऽप्यविद्याऽनुवृत्य-

X द्ध्घपटन्यायसे अनुवर्तमान मूलाविद्या ही अविद्याका लेश है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं। * सर्वज्ञात्मगुरु तो इस प्रकारके पक्षको भी कहते हैं कि अविद्याके विरोधी तत्वसाक्षातकारके उदित होनेपर लेशरूपसे भी अविद्याकी अनुवृत्ति

x 'दग्घपटन्यायेन' दग्धपटन्याय उसको कहते हैं-किसी वस्त्रके अग्निमें जल जानेपर भी उसका आकार पूरववत् ज्योंका त्यों देसा जाता है, परन्तु उससे परिधान आदि क्रिया नदीं दो सफती है, दमरी प्रकार तश्वज्ञानसे मूलाविद्याका विनाश हो गया है, परन्तु वह दग्घपटके समान अनुवर्तमान और अपन कार्यमें असमर्य है, अतः यही अनुवर्तमान अविया अविद्यालेश कही जाती है, यही इस मतका भाव है। * इन सर्वशारम गुरुफें मतमें जीवन्मुक्ि है ही नहीं, क्योंकि अज्ञानके विरोधी ज्ञानके होनेपर उस अज्ञानका अनने कार्यके साथ नापा होनेसे उसका अंश भी नहीं रह सकता है, जीवन्युकिके प्रतिपादक जो 'तस्य तावदेव चिरम्' (उसको-तत्वज्ञानीको-मुक्त होनेके लिए उतनी ही देर है, जयतक कि उसकी शरीरसे मुक्ति न हो) इत्यादि शास्त्र है, चे तो केवल भ्वण आदिमें प्रवृत्ति करानेके लिए हैं, अतः जोवन्मुफिके लिए अविद्याका लेश मानना या उसका निर्वचन फरना सर्वथा अशक्य है, यह माव है। वस्तुतस्तु 'तस्य तावदेव चिरम्' इ्यादि जीवन्मुकतिके प्रतिपादक शास्त्र अवणादिके अर्थवाद है, तथापि वे सालम्बन हैं, क्योंकि निरालम्बन अर्थवाद नहीं हो सकता है, अतः अर्थवादके आलम्वनत्वरूपसे जीवन्मुकिका अप्ीकर अवश्य करना होगा, और लोकमें रज्जुमें उत्पन्न हुए सर्पभ्रमकी रज्जुतत्त्वके साक्षा- त्कारखे नियृत्ति होनेपर भी उस उर्पभ्रमके अध्याससंस्कारसे फिर भी कुछ फाल तक जैसे भय आ्षादिकी अनुपृत्ति देखी जाती है, वैसे ही तत्वज्ञानसे अविद्याका विनाश होनेपर भी अविद्याके संस्कार कुछ काल तफ रहते हैं, अतः उन संस्कारोंसे शरीरादिकी अनपृत्ति होनेसे जीवन्मुकिकी ६५

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५१४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

सम्भवाद् जीवन्मुक्तिशास्त्रं श्रवर्णादिव्रिध्यर्थव्राद्मात्नम्। शास्त्रस्य जीवन्मुक्तिप्रतिपादने प्रयोजनाभावात्। अतः कृतनिदिध्यासनस्य साक्षात्कारोदयमात्रेण पक्षमाहुः ॥ १ ॥ *. का निवृत्तिरविद्याया: १ ब्रह्मसिद्धिकृतां नये। -आत्मैव, तदभावो हि मोहस्वत्संक्षयश्र सः ॥५।। अविद्याकी निवृत्ति किसे कहते हैं ? इस प्रश्नके उत्तरमें ब्रह्मसिद्धिकार कहते हैं कि आत्मा ही अविद्याकी निवृत्ति है,अविद्यानिवृत्तिका अभाव मोह है और मोहकां विनाश आत्मा है।। ५ ॥ अथ केयमविद्यानिवृत्तिः १ आत्मैवेति त्रह्मसिद्धिकाराः ॥ न च तस्य नित्यसिद्धत्वाद् ज्ञानवैयर्थ्यम्, असति ज्ञानेऽनर्थहेत्व- नहीं हो सकती है, इसलिए जीवन्मुक्तिका प्रतिपादक शास्त्र श्रवण आदि विधिका केवल अर्थवाद है, क्योंकि जीवन्मुक्तिके प्रतिपादनमें शास्त्रका कुछ भी प्रयोजन नहीं है, इससे जिस पुरुषने निदिध्यासन किया है, उस पुरुषको ब्रह्मसाक्षातकारकी उत्पत्तिमात्रसे विलास (कार्य) और वासनाके साथ अविद्याकी निवृत्ति हो ही जाती है॥ १ ॥ + अब शक्का होती है कि अविद्याकी निवृत्ति क्या है? [अर्थात् प्रकृतमें अविद्याकी निवृत्तिका स्वरूप क्या है, यह प्रश्नकाभाव है] . इस आक्षेपके समाधानमें ब्रह्मसिद्धिकार कहते हैं कि आत्मा ही अविद्याकी निवृत्ति है। यदि शङ्का हो कि आत्मा ही यदि अविद्याकी निवृत्ति है, तो उसकी स्वतःसिद्धि होनेसे अविद्याकी निवृत्तिके लिए तत्त्वज्ञान निरर्थक ही है? उपपत्ति हो सकती है, इसी गूढ़ अभिप्रायसेर 'इत्यपि कव्वित्पक्षमाहुः' इसमें अपि शब्दका प्रयोग किया गया है। : शङाका भाव है-यदि अविद्यानिवृत्ति पदार्थ आत्मरूप माना जाय, तो अविद्यानिवृत्ति ज्ञानजन्य नहीं होगी, क्योंकि वह नित्य ठद्री, यदि उसको अतिरिक मानें तो द्वैतापत्ति होगी, अतः अविद्यानिवृत्तिका स्वुरूप क्या है, यह प्रश्नकर्ता पूछता है।

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अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचारं] भापातुवांदसहित ५१५

विद्याया विद्यमानतया अनर्थमपि तिष्ठेदिति तदन्वेपणाद्। 'यस्मिन् सति अग्रिमक्षणे यस्य सच्तम्, यव्तिरेके चाऽभाव:, तत् तत्साध्यम्' इति तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानके न होनेपर अनर्थकी कारणीभृत अविद्याके विद्यमान हेनेसे अनर्थकी अवस्थिति अवश्य होगी, इसलिए अनर्थ- निवृत्तिकी अभिलापा करके ज्ञानकी अन्वेपणा हो सकती है [ पूर्वपक्ष तथा . समाधानका तात्पर्य यह है कि यदि अविद्याकी निवृत्ति आत्मस्वरूप मानी जाय, तो अविद्यानिवृत्तिरूप आत्माके सर्वदा प्राप्त होनेसे उसकी प्राप्तिके लिए कोई भी यत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है, इसलिए अविद्याकी निवृत्तिका हेतुभूत तत्वज्ञान व्यर्थ ही है। यह पुर्वपक्षीका कहना है। इसपर समाधान कर्ता पूर्वपक्षीसे पूछता है कि तत्वज्ञानको व्यर्थ वतलानेके पहले तुम्हें कहना चाहिए कि तत्वज्ञान क्यों व्यर्थ है, क्या तत्त्वज्ञानका कुछ प्रयोजन नहीं है, इसलिए तत्त्वज्ञान व्यर्थ है अथवा अविद्यानिवृत्तिके आत्मस्वरूप हेनेपर उसके अनादि हैनेसे ज्ञानके बिना भी वह सिद्ध है, अतः अविद्यानिवृत्ति ज्ञानसाध्य नहीं हो सकती इसलिए तत्वज्ञान व्यर्थ है? इसमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अनर्थनिवृत्तिके उद्देश्यसे ज्ञानसाधनके अनुष्ठानमें प्रवृत्ति हो सकती है, क्योंकि ज्ञानके न रहनेपर अनर्थकी हेतुभूत अविद्याके रहनेसे अनर्थका भी अवस्थान हो सकता है, इस प्रकार ज्ञानाभावदशाम अनर्थका सम्भव हो सकता है, इसलिए अनर्थनिवृत्तिके उद्देश्यसे ज्ञानके साधनोंके अनुष्ठांनमें भी पुरुपकी प्रवृत्ति होती है, अतः प्रयोजनके अभावसे ज्ञान- व्यर्थ है, ऐसा नहीं कह सकते हो। द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ]* जिसके रहनेपर उत्तर क्षणमें जिसकी सता हो और जिसका अभाव हेोनेपर जिसका अभाव हो, वह उससे साध्य होता है, इस प्रकारके साध्यलक्षणके अनुरोधसे आत्मस्वरूप

साध्यका लक्षण दो प्रकारका होता है, एक तो फेवल सादिपदार्थके लिए जन्यत्वरूप और दुसरा सादि और अनादि पदार्थोंके लिए 'यस्मिन्सति' इत्यादिरूप, इसलिए आत्मस्वरूप अविद्यांनिशृस्तिमें जन्यत्वरूप प्रथम लक्षणके न होनेपर भी द्वितीय लक्षण है, अतः अविद्यानिवृत्तिमें ज्ञानय्ाध्यत्वकी उपपति हो सकती है। जसे घटके प्रति मृत्तिका कारण है और घट मृत्तिकासे साध्य है, इसमें यह लक्षण घटता है, क्योंकि मृत्तिकाके रहनेपर उत्तरक्षणमें घटकी सत्ता है और मृशिकाके अभावमें घटंका भी अभाव है, इसलिए घट मृत्तिकासे साध्य कहलाता है, इस प्रकार लक्षणयमन्वय करना चाहिए, यह माव है।

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५१६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

लक्षणानुरोधेनाऽऽत्मरूपाया अप्यविद्यानिवृत्तेः ज्ञानसाध्यत्वाच। ज्ञाने सति अग्रिमक्षणे आत्मरूपाविद्यानिवृत्तिसच्वम्, तव्तरेके तत्प्रतियोग्य विद्यारूपस्तद्भाव इति उक्तलक्षणसच्वाठ्। आनन्दवोधार्चायास्तु युक्तिभि। पञ्चमीं विधाम्। सदसत्सदसन्मिथ्याभिन्नामात्मनि तां विदुः ॥ ६॥ आनन्दबोधाचार्य कहते हैं कि अविद्याकी निवृत्तिका पक्चम प्रकार ही युक्तियोंसे सिद्ध होता है अर्थात् अविद्यानिवृत्ति सत्, असत्, सदसत् और अनिर्वचनीयसे भिन्न ही है॥ ६ ॥ आत्मान्यैवाऽविद्यानिवृत्तिः। सा च न सती, अद्वैतहानेः । नाऽप्य सती, ज्ञानसाध्यत्वायोगात।नाऽपि सदसद्रूपा, विरोधात्। नाऽप्यनिर्वाच्या, अनिर्वोच्यस्य सादेरज्ञानोपादानकत्वनियमेन मुक्तावपि तदुपादानाज्ञाना- नुवृत्यापत्ते:, ज्ञाननिवत्यत्वापत्तेश्र। किन्तु उक्तमकारचतुष्टयोत्तीर्णा पश्चमप्रकारेत्यानन्दवोधाचार्याः।

अविद्यानिवृत्ति ज्ञानसाध्य हो सकती है, क्योंकि जञानके होनेपर उससे उत्तर क्षणमें आत्मरूप अविद्यानिवृंत्िकी सत्ता है और ज्ञानके न रहनेपर सविदा- निवृत्तिकी प्रतियोगिभूत जो अविद्या है तद्रूप अभाव है अर्थात् अविद्या- निवृत्तिंका अभाव है, इसलिए "साध्यत्वका उक्तं लक्षण अविद्यानिवृत्तिमें घट जाता है। ' आत्मासे मिन्न ही अविद्यानिवृत्ति पदार्थ है, और वह अविद्यानिवृत्ति पदार्थ संत्य नहीं है, क्योंकि उसे सत्य माननेसे अद्वैतकी हानि होगी, और असत् भी नहीं मान सकते, क्योंकि ऐसा माननेसे उसमें ज्ञानसाध्यत्व नहीं हो सकेगा, और सत् और असतूरूप भी नहीं मान सकते, क्योंकि सत्त्व और असत्वका विरोध होनेसे एकमें उनःविरुद्ध दो धर्मोंका समावेश नहीं हो सकता है। और अज्ञाननिवृत्तिको अनिर्वचनीय भी नहीं मान सकते हैं, क्योंकि सादि अनिर्वचनीय पदार्थोंके प्रति अज्ञान ही उपादानकारण होता है, ऐसा नियम होनेके कारण मुक्तिमें भी अपने उपादानकारण अविद्याकी अनुवृत्ि प्रसक्त होगी और मुक्तिमें ज्ञाननिवर्त्यत्वका भी प्रसङ्ग होगा। इसलिए उक्त चार प्रकारोंसे (सत्, असत्, सदसत् और अनिर्वचनीय इन चार प्रकारोंसे)

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अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भापानुवादसहित ५१७

उत्पत्तिरिव नाशोऽपि क्षणिका भावविक्रिया। अद्वैतविद्याचार्यास्तद्वृत्तिकालेति तां विद्दुः ॥७। उत्पत्तिके समान विनाश भी अविद्यावृत्तिकालिक क्षणिक, भावका विकार ही है, अतः अनिर्वचनीय है, ऐसा अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं॥। ७॥ अविद्यावन्तन्निवृत्तिरप्यनिर्वाच्यैव । न च तदतुधृत्तौ तदुपादानाज्ञान- स्याप्यनुवृत्तिनियमाद् अनिर्मोक्षप्रसङ्ग:, तदनुषृटत्तौ प्रमाणाभावात; उत्पत्ते: विलक्षण कोई पश्चम प्रकार ही अविद्यानिवृत्ति है, ऐसा आनन्दवोधाचार्य * कहते हैं। अविद्या जैसे अनिर्वचनीय है, वैसे ही अविद्याकी निवृत्ति भी अनि- र्वचनीय है। यदि शङ्का हो कि मुक्तिमें अविद्यानिवृत्तिकी अनुवृत्ति होगी, तो उसके उपादानभूत अविद्याकी भी अनुवृत्ति होनेसे अनिर्मोक्षकी प्रसक्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञाननिवृत्तिकी अनुवृत्तिमें कोई प्रमाण ही नहीं है, कारण कि जैसे घटादि पदार्थोंकी उत्पत्ति केवल

इस विपयमें आनन्दवोधाचार्यजीका विस्तृत विचार उनके बनाये हुए न्यायमकरन्द मन्थमें देखना चाहिए [पृ० ३५२ काशी चौखम्भा मुद्रित ] उसका कुछ अंश इस प्रकार है- नन्विद्याक्षतेः सरे सदितीयत्वमात्मनः । मिथ्याभावे त्वनिर्मोक्षो मूलाविद्याव्यवस्थितेः॥ उक्तमतदविद्यास्तमयो मोक्ष इति। तत्रैतद्विचार्यते-स कि सत्यो मिथ्या वेति" .... अतः कथमविद्याव्यावृत्तिरमोक्ष इति। न सन्नासन्न सदसन्नानिर्वाच्योऽपि ततक्षयः । यक्षानुरुपो हि वलिरित्याचार्या व्यचीचरन्॥ अर्थात् अविद्यानिपृंसिको सत्य माने, तो द्वैतापत्ति होगी, उसे मिथ्या मानें, तो अविद्याका अवस्थान प्रसक होगा क्योंकि मिथ्याभाव अविदया अथवा अविद्याका कार्य होता है, इसलिए अनिर्मोक्ष प्रसक होगा, पूर्वमें जो अविद्यास्तमय मोक्ष कहा गया है उसके वारेमें विचार किया जाता है कि वह सत्य हे या मिथ्या ...... ...... इस प्रकारके अनेक सत्यत्वादि चिकल्पोंसे अविदयानिवृत्तिका निर्वचन नहीं हो सकता, इसलिए अविद्यानिवृत्ति मोक्ष कैसे हो संकती है। इसपर कहते हैं-अविद्यानिघृत्ति सत् नहीं है, असत् नहीं है, सदसत नहीं है और अनि- धांच्य भी नहीं है, किन्तु इन चार कल्पोंसे भिन्न पश्म प्रकार ही अविद्यानिवृत्ति है, यह भाव है। + भाव यह है कि जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, उनमें उत्पत्ति नामका एक भावरूप विकार है, जो केवल एक ही क्षणमें याने उत्पत्त्यवच्छिन्न कालमें ही रहता है, सवदा नहीं रहता, यह अनुभवसिद्ध है, वैसे ही निवृत्ति भी (विनाश मी) पदार्थोका भावरूप धर्म ही है, जो

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५३८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

प्रथमसमयमात्रसंसर्गिभावविकारत्ववद् निवृत्तेरषि चरमसमयमात्रसंसार्गे- भावविकारत्वोपपत्तेः । अत एवं यथा पूर्व पश्चाच् 'उत्पत्स्यते, उत्पन्नः इति भाविभूतभावेन : व्यवहियमाणाया उत्पत्तेः प्रथमसमयमात्रे 'उत्पद्यते' इति वर्तमानव्यवहारः, तथा पूर्व पंश्चाच्च 'निवर्तिष्यते, निवृत्तः' इति भाविभूतभावेन व्यंवहियमाणाया निवृच्तेश्वरमसमयमात्रे 'निवर्तते, नश्यति, धवंसते' इति वर्तमानव्यपदेशः। निवृत्तेरनुवृत्तौ तु चिरशकलितेऽपि घटे 'इदानीं निवर्तते' इत्यादिव्यवहार: स्यात्, आख्यातानां प्रकृत्यर्थगतवर्त- मानत्वाद्यर्थाभिधायित्वाद्। प्रथम क्षणमात्रमें सम्वन्ध रखनेवाला भावविकार है, वैसे ही विनाश भी अन्तिम क्षणमात्रके साथ सम्बन्ध रखनेवाला भावभूत विकार ही है, अभावभूतं नहीं है, इसीसे अर्थात् निवृत्तिको क्षणिक भावविकार माननेसे ही जैसे उत्पत्तिके पूर्वमें 'घट उत्पन्न होगा' और उत्पत्तिके पीछे 'घट उत्पन्न हुआ' इस प्रकार भावी और भृतरूपसे व्यवहियमाण उत्पत्तिमें केवल प्रथम समयमे ही 'उत्पन्न होता है' इस प्रकार वर्तमानव्यवहार होता है और यह उत्पत्तिके क्षणिक भावविकारमें प्रयोजक है, वैसे ही निवृत्तिके पूर्वमें और निवृत्तिके. उत्तरकालमें 'निवृत्त होंगा और निवृत्त हुआ' इस प्रकार भावी और मृतरूपसे व्यवहियमाण निवृत्तिमें भी अन्तिम समयमांत्रमे 'निवृत्त होता है' 'नष्ट होता है' 'ध्वस्त होता है' इस प्रकारका वर्तमानत्वव्यवहार क्षणिकत्वका भी साधन करता है, निवृत्ति स्थायी मानी जाय, तो चिरकालसे ध्वस्त हुए घटमें भी 'अभी घट निवृत्त होता है, ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा। क्योंकि जितने आख्यात हैं, वे सवके सब अपने प्रकृत्यर्थमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका ही अभिधान करते हैं।

निवृत्त्यवच्छिनन कालमें ही रहता है, अन्यन्न नहीं रहता। उत्पत्ति और निवृत्ति आद्य और चरम कालको छोड़कर अन्य कालमें भी यदि रहें, तो चिरकालोत्पन्न घटमें और चिरशकलित. घटमें 'उत्पन्न होता है और नष्ट होता है', ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, अतः अविद्यानिवृत्ति, जो अत्यन्त क्षणिक पदार्थ है, उसकी अनुवृत्ति मोक्षकालमें नहीं हो सकती है, अतः अनिर्मोक्षका प्रसङ्ग नहीं है। * प्रकृत्यर्थ अर्थात् धातुका अर्थ, उसमें रहनेवाले वर्तमानत्व, अतीतत्व, भविष्यत्वका ज्ञान आख्यातसे (तिवादिसे) होता है, यह भाव है। :

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अविधानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भापानुवादसहित ५१९

ननु च. तेपां स्वाभिहितसङ्ग याश्रयप्रकृत्यर्थकर्तृकर्मगतवर्तमानत्वा-

भिधायकत्वं वाऽस्तु। तथा च. निधृत्तिक्रियाकर्तुश्षिरचूर्णितस्य घटस्य, तद्गतनिवृत्त्यनुकूलव्यापारस्य चाऽवर्तमानत्वाद् नोक्तातिप्रसङ्ग इति चेद्, न; आद्ये उत्पन्नेऽपि घटे 'उत्पद्यते' इति व्यवहारापतेः। उत्पत्तिक्रिया- कर्तुर्घटस्य वर्तमानत्वात्। द्वितीये आमवातजडीकृतकलेवरे उत्थानानु- कूलयत्नवति उत्थानानुदयेऽपि 'उत्तिष्ठति' इति व्यवहारापत्तेः। आख्या- तार्थस्य प्रकृत्यर्थभूतोत्थानानुकूलस्य यत्नरूपव्यापारस्य वर्तमानत्वात्।

*. यदि शङ्का हो कि वे आख्यात (तिप् आदि) अपने से अभिहित सङ्ग्याके आश्रयीभूत प्रकृत्यर्थ क्रियाके कर्ता, कर्म आदिमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका अथवा अपनेसे अभिहित प्रकृत्यर्थके अनुकूल व्यापारमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका अभिधान करते हैं, इसलिए निवृत्तिरूप क्रियाकेकर्ता चिरकालसे चूर्णित घटमें औरं उसमें रहनेवाले निवृत्तिके अनुकूल व्यापारमें वर्तमानत्वके न होनेसे उक्त आपत्ति अर्थात् चिरशकलित घटको लेकर अभी घट निवृत होता है, इस प्रकारकी आपत्ति नहीं आ सकती है, तो यह मी युक्त नहीं है, क्योंकि तथोक्त दो अर्थोंमें से पूर्वके अर्थमें उत्पन्न घटको लेकर घट उत्पन्न होता है, ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, क्योंकि उत्पत्तिरूप क्रियाका कर्ता घट वर्तमान है। और दूसरे पक्षमें यह दोप होगा कि आमवातसे जिसका कलेवर अकड़ गया है, ऐसा पुरुप उठनेके अनुकूलं यल् करता है, तथापि उत्थान नहीं होता, परन्तु 'उचिष्ठति' (उठता है) ऐसा व्यंवहार प्रसक्त होगा, क्योंकि प्रकृत्यर्थभूत उत्थानके अनुकूल यत्नरूप

• आख्यात-प्रकृत्यर्थमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका बोध नहीं करते हैं, किन्तु अन्यगत वर्तमानत्व आदिके बोधक हैं, इस प्रकार आशक्ता करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वामिहित- एकवचनत्व आदिरूपसे आरुयातोंसे अभिहित-जो सक्ख्या, उसर सड्ख्याके आधरयभूत- 'घटो निवर्तते, देवदत्त: पचति, तण्डुलाः पच्यन्ते' इत्यादि प्रयोगोंमें प्रकृत्यर्थभूत निवृत्त्यादि कियाओंका कर्तृकर्मादिरूप-जो घटादि हैं, उन घटादिमे रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका :अर्यात चोध कराते हैं अथवा 'घटो निवर्तते' (घट विनष्ट होता है) इत्यादि प्रयोगोंमें आख्यातसे अभिहिंत प्रकृत्यर्थभूत निधृत्तिके अनुकूल जो व्यापार है उस व्यापारमें रहनेवाले रवतमानत्व आदिका आख्यात बोधक है, परन्तु प्रकृत्यर्थगत वर्तमाचत्व आदिका बोधक नहीं है।।

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५२० सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

तस्मात् प्रकृत्यर्थगतमेव वर्तमानत्वादि आख्यातार्थ इति व्वंसस्य स्थायित्वे चिरनिवृत्तेऽपि घटे 'निवर्तते' इति व्यवहारो दुर्वारः। यदि च मुद्धरादिशंकलिते घटे ध्वंसो नाम कश्िदभावस्तत्प्रंतियोगिक: स्थायी भूतलाद्याश्रित उपेयते, तदा कपालमालापसरणे तदनपसरणेऽपि मणिकशरावादिकपालव्यावृत्तकपालसंस्थानविशेषादर्शने च किमिति : स

व्यापार, जो कि आख्यातार्थ है, वर्तमान है। इससे अर्थात् किसी अर्थान्तरके न होनेसे प्रकृत्यर्थगत वर्तमानत्व आदि ही आख्यातार्थ है, इससे ध्वंसको स्थायी माननेमें चिरनिवृत्त घटमें 'निवर्तते'. (अब निवृत होता है) ऐसा व्यवहार अवश्य होगा। * सुद्र आदिसे घटके शकलित (खण्डित) होनेपर धवंस नामका घटप्रतियोगिक स्थायी और भूतलमें रहनेवाला अभाव यदि माना जाय, तो + कपालमालाके अपसरणमें और अपसरणके अभावमें मणिक, शराव आदिके कपालोंसे व्यावृत्त कपालके संस्थान विशेषका दर्शन न होनेपर भी वह ध्वंस क्यों नहीं प्रत्यक्ष देखा जाता है। यदि शङ्का हो कि कपालोंके

*जो लोग अतिरिक्त अभावरूप धंसका अङ्गीकार करते हैं, वह ध्वंस क्या प्रत्यक्ष है या अनुमेय है, इस प्रकारके दो विकल्प करके क्रमशः उन विकल्पोंका अभ्रिम ग्रन्थसे निरास करते हैं, यहाँ समझना चाहिए कि घटके धवसके अनन्तर कपालमें जसे घटध्वंसकी प्रतीति होती है, वैसे ही खण्डित घटके अधिकरण भूतलमें भी 'यहाँ घट ध्वस्त हुआ' इस प्रतीतिके आधारपर भूतल आदि भी घटध्वंसके अधिकरण होते हैं, ऐसा कुछ. तार्किक मानते हैं, उन्हींके अनुसार यह पूर्वपक्ष है। * समाधानका तात्पर्य यह है कि यदि घटध्वंस भूतल आदिमें प्रत्यक्ष मानते हो, तो जहाँपर कपालोंकी कतार है, वहाँसे उस कतारको हटा देनेपर 'यहाँ घटका ध्वंस है' ऐसा प्रत्यक्ष होना चाहिए, परन्तु होता तो है नहीं, अतः ध्वंसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, यह मानना चाहिए। यदि शङ्ठा हो कि घटध्वंसके प्रत्यक्षके प्रति कपालमालाका प्रत्यक्ष भी कारण है, .अतः घटध्वंसका प्रत्यक्ष नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुम्हारे कथनके अनुसारए -कपाळमालाका अपसरण न करनेपर भी मणिक (मिट्टीका बड़ा पात्र) आदि अन्य पात्रोंसे -व्यावृत्त भूतलगत कपालोंमें घटके कपालोंका असाधारण रूप गृहीत.जिस कालमें नहीं हुआ उस कालमें भी घटधवंसका प्रत्यक्ष होना चाहिए; क्योंकि कपालमालाका प्रत्यक्ष विद्यमान है, अतः ध्वंस प्रत्यक्ष है, यह मत अनादरणीय है। वंस्तुतस्तु प्रध्वंसाभावके प्रत्यक्षमें इन्द्रियका सन्निकर्ष निरूपित नहीं होता, अतः प्र्यक्ष नहीं होता, यह भाव है।

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अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भापानुवांदसहित ५२.१

प्रत्यक्षो न स्यात्। कपालसंस्थानविशेपादिनाऽनुमेयो घटादिध्वंसो न प्रत्यक्ष इति चेत्, तर्हिं तेन मुद्रपातकालीनस्य उत्पत्तिवद् मातविकार- रूपतया प्रतियोग्याश्रितध्वंसस्याऽनुमानं सम्भवतीति न ततः पश्चादनुवर्त- मानप्रतियोग्यधिकरणाश्रिताभावरूपध्वंससिद्धिः। 'इह भूवले चटध्वंसः' इति भूतले ध्वंसाधिकरणत्वव्यवहारस्य 'इह भूतले घट उत्पन्नः' इतिवत् भावविकारयुक्तप्रतियोग्यधिकरणत्वविषयत्वोपपत्तेः। घटध्वंसानन्तरं भूतले घटाभावव्यवहारस्य घटापसरणानन्तरं तदभावव्यवहारवत् समयविशेप-

संस्थानविशेपसे घटादिध्वंस अनुमेय है, प्रत्यक्ष नहीं है, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसी कपालके संस्थानविशेष आदिसे उत्पत्तिके समान भावके विकाररूपसे अवस्थित मुद्गरपतनके समानकालीन प्रतियोगीमें आश्रित ध्वंसका मी अनुमान हो सकता है, इसलिए उस अनुमानसे प्रति- योगीके अविकरणमें रहनेवाले ध्वंसरूप अभावकी सिद्धि नहीं हो सकती है। 'इस भूतलमें घटका ध्वंस है' इस प्रकार जो भूतलमें ध्वंसाधिकरणत्वका जयवहार होता है, वह तो इस भूतलमें घट उत्पन्न हुआ, इस प्रकारके व्यवहारके समान भावभूत विकारसे युक्त प्रतियोगीके अधिकरणत्वकी विप- यताको लेकर मी उपपन्न हो सकता है। घटके ध्वंसके वाद भूतलमें जो घटाभावका व्यवहार होता है * वह भी घटके अपसरणके वाद होनेवाले

  • इस अनुमानसे भूतकालीन धंसका भी अनुमान हो सकता है, इसलिए उक्त अनुमानसे वंसमात्रकी सिद्धि होनेपर भी इससे तार्किकाभिमत धंसके स्थायित्वकी सिद्धि नहीं हो सकती ६, यह भाव दै। यदि शद्धा हो कि यह भूतल घटध्ंसका आश्रय है, कपालमालाविशेष होनेसे, जो कपालमालाविशेपका अधिकरण भूतल नहीं है, वह घटध्वंसका अधिकरण नहीं है, प्रकारके अनुमानसे घटाधित ध्वंसकी सिद्धि कैसे होगी, तो यह भी युक्क नहीं है, क्योंकि धसकी उत्पत्तिदशामें प्रतियोगीमें ही ध्वंस यद्यपि रहता है, तथापि प्रतियोगी हारा भूतलमें भी धंस रहता है, अतः उक् अनुमानकी विपयता भूतलाश्रित वंसमें भी है। तात्पर्य यद है कि घटके नष्ट हो जानेपर 'इस भूतलमें घट नहीं है' इस प्रकारका न्यवदार अलन्तामावका दी-जो कि अत्यन्ताभाव किसी समयविशेषमें अर्थोत् भूतल आदिमें घटादिसंयोगके अभावकालमें रहता है-अवलम्यन करता है, अतः इसी क्लप्त प्रत्यन्ताभाचये तथोक व्यवहारकी यदि उपपत्ति हो सकती है, तो फिर अतिरिक् धंसकी अक्ीकृति निष्फल प्रतीत होती है। और 'अतोऽन्यदार्तम्' (नित्य स्वप्रकाशचैतन्यसे. इतर ६६

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५२२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

सति घटोत्पनेः पूर्वं तदभावव्यवहारोऽप्यत्यन्ताभावेन चरितार्थ इति प्रागभावोऽपि न स्यादिति चेत्, सोडपि मा भूद। नन्वेवं 'पागभावा- धारकालः पूर्वकाल:, ध्वंसाधार उत्तरकालः' इति निर्वचनासम्भवात् काले पूर्वोत्तरादिव्यवहार: किमालम्वनस्स्यात्। घटादिपु प्रतियोगित्वा- दिव्यवहारवदखण्ड किश्च्िद्र्मगोचरोऽस्तु ।. अभावरूपस्थायिघ्वंसाभ्युपगमेऽ पि तेषु ध्वंसत्वादेरखण्डस्य वक्तव्यत्वात्। न च जन्याभावत्वरूपं सखण्ड- घटाभावव्यवहारके समान विशेषसमयमें सम्नन्ध रखनेवाले अत्यन्ताभावको ही अवलम्बन करता है, इसलिए उसको ध्वंसविषयक मानना अनुचित है। यदि इस परिस्थितिमें शङ्का हो कि घटकी उत्पत्तिके पूर्वमें घटाभावका व्यवहार भी अत्यन्ताभावसे ही उपपन्न हो सकता है, अतः प्रागभावकी भी सिद्धि नहीं होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रागभावका भी अङ्गीकार नहीं करते हैं। यदि शङ्का हो कि प्रागभाव और ध्वंस न माने जायँ, तो प्रागभावका आधारभूत काल पूर्वकाल है और ध्वंसका आधारभूत काल, उत्तरकाल है, इस प्रकारसे पूर्वकाल और उत्तरकालका निर्वचन नहीं कर सकते हैं, अतः कालमें जो पूर्वत्व और उत्तरत्व आदि व्यवहार होते हैं, वे किसको आलम्बन करेंगे? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे घुट आदिमें प्रतियोगित्व आदिका व्यवहार अखण्ड प्रतियोगित्वादि धर्मविषयक है, वैसे ही कालमें पूर्वत्वादि व्यवहार भी अखण्ड पूर्वत्वादि धर्मविपयक ही है। और अभावरूप स्थायी ध्वंसके माननेपर भी उस अभावमें ध्वंसत्व्र आदि अखण्ड धर्म ही मानने पड़ेंगे !। यदि शङ्ढा हो कि 'जन्यत्वे सति अभाव- त्वम्' अर्थात् जन्य होकर जो अभाव हो; वह ध्वंस है, ऐसा ध्वंसका निर्वचन करनेसे ध्वंसत्व सखण्ड ही सिद्ध होता है, अखण्ड नहीं; तो यह नश्वर है) इस श्रुतिसे पराभिमत नित्य घंसका खण्डन भी हो जाता है। अतः ऐसे-पदार्थोकी/ कल्पना प्रमाणशन्य है। घटनाशके उत्तरकालमें होनेवाले अभावव्यवहारकी सामयिक अत्यन्ताभावसे ही उपपत्ति हो सकती है, इस अवस्थामें, यह भाव है। * अर्थात घ्वंसत्व और प्रागभावत्व आदि धर्मोंको पूर्वपक्षी भी अखण्ड धर्म ही मानता है, अतः पूर्वत्वादि धर्मों को अखण्ड धर्म माननेमें गौरव नहीं है, यह भाव है।

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अविद्यानिषृात्तिके स्वरूपका विचार] भापानुवांदसहित ५२३

मेव ध्वंसत्वम् , ध्वंसपागभावरूपस्य घटस्य तद्ध्वंसत्वापचेः। • न च सप्मपदार्थरूपाभावत्वं विवक्षितम्, घटस्य ग्रागभावं प्रत्यपि ध्वंसत्वाभावप्रसङ्गेन घटकाले प्ागभावोत्तरकालत्वव्यवहारस्य निरालम्ब- नत्वापचेः । न च प्रतियोग्यतिरिक्तः प्रागभावंध्वंसः, तथा सति तुल्य- न्यायतया व्वंसप्रागभावोऽपि प्रतियोग्यतिरिक्तः स्यादिति प्रागभावध्वंस- स्यापि प्रागभावोऽन्यः, तस्यापि कश्चिद् ध्वंसः, तस्यापि प्रागभावोड-

भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वंसपागभावरूप घटमें भी घटध्वंसत्वकी प्रसक्ति होगी। यदि शक्रा हो कि 'जन्य होकर सप्तमपदार्थरूप अभाव'* ही ध्वंसका लक्षण विवक्षित हे, अतः दोप नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस लक्षणम प्रागभावके ध्वंसरूप घटमें मागभावध्वसत्वकी प्रसक्ति नहीं होगी, इसलिए घटकारलमे प्रागभावोत्तरकालीनत्वका व्यवहार निरालम्बन हो जायगा। यदि शक्षा हो कि प्रागभावका ध्वंस प्रतियोगीसे अतिरिक्त ही ह, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मागभावध्वंसके प्रतियोगीसे भिन्न होनेपर समानरीतिसे धवंसका प्रागभाव भी प्रतियोगीसे अतिरिक्त होगा, इससे प्रागभावध्वंसका भी जैन्य-दूसरा-प्रागभाव और उसका भी कोई अन्य ध्वंस, उसका भी अन्य प्रागभाय,

जन्य होकर जो सपम पदार्थरूप अभाव है, वही ध्वंस नामका अभाव है, यह इसका अर्थ है। केवल सप्म पदार्थरूप अभाव दी ध्यंस कहा जाय, तो अत्यन्ताभाव, प्रागभाव और अन्योऽन्याभावमें अविव्यापि दो जायगी, इसलिए जन्यत्व विशेषण दिया है। यदि केवल ऐसा ही छहा जाय कि 'जो जन्य हो, वह ध्वंसाभाव है' तो घट आदिमें भी ध्ंसका लक्षण चला जायगा, इसलिए जन्य रेकर जो सप्षम पदार्थरूप अभाव हो वही ध्वंस है, ऐसा लक्षण कहना होगा। इसपर ध्यान देना चाहिए कि द्रव्य, गुग, कर्म, सामान्य, विशेष, समयाय और अभाव ये सात पदार्थ है। 1. प्रागभावके ध्यंसफो अर्थात् घटादिप्रतियोगिक प्रागमावके सको घट दिप्रतियोगोसे यदि भिन्न माना जाय, तो इसी युकिसे घटध्वंसका प्रागभाव भी घटरूप ध्वंसके प्रतियोगीसे भिन्न दोगा। इस अवस्थामं जेसे घटप्ागभावका ध्वंद्र घटरूप प्रतियोगी से भिन्न है, घैसे ही घट- परागभायधंखके भी प्रागमावको घटप्ागमावसे भिन्न मानना होगा, क्योंकि ध्वंसप्रागभाव भी ध्यँसक प्रतियोगीस भिष्न है, इसी प्रकार अन्य प्रागभाव और अन्य धवंसका भी ध्वंस और पांगभाव प्रतियोगीसे अतिरिक्त होंगे, इसी प्रकार आगे भी परंम्परांमें विचार कर सकते हैं, इसलिए अनवस्या स्फुट है, यद भाव है।

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  1. सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

न्य इत्यप्रामाणिकानवधिकध्वंसप्रागभावकल्पनापत्ते: । न चान्यद् ध्वंसत्वमात्माश्रयादिशून्यं निर्वक्तुं शक्यम्। एवं प्रागभावत्वमपीत्य- न्यत्र विस्तस:। तस्मान पूर्व प्रागभाव:, न च पश्चात् ध्वंसाभावः। मध्ये परं कियत्कालमनिर्वचनीयोत्पत्तिस्थितिध्वंसरूपभावविकारवान् घटाद्यध्यासः।

इस रूपसे अनेक अप्रामाणिक ध्वंस और प्रागभावोंकी कल्पना करनी पड़ेगी, और आत्माश्रय दोषसे शून्य अन्य ध्वंसका निर्वचन भी नहीं हो सकता है*। इसी प्रकार प्रागभावत्वका भी निर्वचन नहीं हो सकता।। इस विषयमें अधिक विचार अन्य ग्रन्थोंमें देखना चाहिए। इससे उत्पत्तिसे पहले प्रागभाव भी नहीं है और उत्पत्तिके पश्चात् ध्वंस भी नहीं है, परन्तु बीचकी अवस्थामें कुछ कालतक अनिर्वचनीय, उत्पत्ति, स्थिति और ध्वरंसरूप भावविकारसे युक्त घटादिका अध्यास है। लोकमॅ घटादि

यदि कोई कहे कि जन्याभावत्वरूप धवंसत्व उक्त दोपसे दुष्ट है, तो 'ध्वंसाप्रतियोगित्वे सति त्रैकालिकभिन्नाभावत्वम्' (अर्थात् धंसका अनतियोगी हो करके अत्यन्ताभावसे या अन्यो- न्याभावसे जो भिन्न हो वह ध्वंस है) वंसका लक्षण करो, और इसमें प्रागभावको लेकर अति- व्याप्तिके वारणके लिए विशेषण दल है और अत्यन्ताभाव आदिके निरासके लिए विशेष्यदल है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि धँसके लक्षणमें धंसका प्रवेश होनेसे आत्माशय दोष होगा अर्थात अपने ज्ञानमें अपनी ही अपेक्षा हुई, अतः इप लक्षणसे भी व्ंसत्वको सरखण्ड नहीं वना सकते हैं। यदि कहें कि 'प्रागभावात्यन्ताभावान्योऽन्याभावभिन्नत्वे सति अभावत्वम् ध्वंसत्वम्' अर्थात् प्रागभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योभावसे भिन्न होकर जो अभाव हो वह घ्वंस है, तो यह भो युक्त नहीं है, क्योंकि इस लक्षणमें प्रागभावका निवेश है, इसलिए उसके निर्वचनमें घंसभिन्नंत्वका निवेश करना होगा, अतः अन्योन्याश्रय होगा। + तात्पर्य यह है कि 'अनादित्वे सति सान्तत्वम् प्रागभावत्वम्' अर्थात् अनादि होकर जो अन्तेवान् हो, उसे प्रागभाव कहते हैं, ऐसा कहा जाय, तो घटध्वंसके प्रागभावरूप घटमें अना- दित्वके न होनेसे अव्याप्ति होगी। और कदाचित् कहो कि 'प्रतियोगिजनकत्वे सति अभावत्वम्' अर्थात् प्रतियोगीके प्रति जो जनक अभाव है, वह प्रागभाव है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जनकत्वके लक्षणमें प्रविष्ट पूर्ववृत्तित्वके कार्यप्रागभाववृत्तिरूप होनेसे आत्माश्रय दोष होगा, इसलिए प्रागभावत्व भी सखण्ड धर्म नहीं हो सकता है। अन्य प्रतिपक्षियों द्वारा स्वीकृत प्रागभाव और ध्वंसके साधक प्रमाणोंके न होनेसे यह भाव है। .

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मोक्षके स्वंतःपुरुपार्थत्वका विचार] मापानुवादसहित ५२५

एवं चाऽविद्यानिवृत्तिरपि ब्रह्मसाक्षात्कारोदयानन्तरक्षणवर्ती कक्षिद्द्ावविकार इति तस्या मुक्तावनुवृ्त्यभावात्न तदनिवाच्यत्वे कश्चिद्दोप इत्यद्वैत- विद्याचार्याः ।।२।। नन्वेवं क्षणिकत्वं स्यान्मुक्तर्त्रा्तिोऽि नससौ। दु.खाभावः सुखं वेति पुरुषार्थत्रवर्जनात्॥८॥ यदि शक्ा हो कि अविद्यानिवृत्तिको क्षणिकत्व माननेसे मुकतिमें भी क्षणिकत्व प्रसक्त होगा, तो यह शक्का केवल भ्रान्ति है, क्योंकि यह अविद्यानिवृत्ति न तो दुःखा- माव द और न सुख है, इसलिए पुरुपार्थत्वसे रहित है। ८ ।। नन्वेवमविद्यानिवृत्तेः क्षणिकत्वे मोक्षः स्थिरपुरुपार्थो न स्यादिति चेदू, आ्रान्तोऽसि। नह्यविद्यानिवृत्तिः स्वयमेव्र पुरुपार्थ इति तस्या: ज्ञानसाध्यत्वमुपेयते, तस्या: सुखदुःखाभावेतरत्वाठ्। किन्तु अखण्डानन्दा- चारकसंसारदुःसहेत्वविद्योच्छेदे अखण्डानन्दस्फुरणम्, संसारदुःखोच्छेदश् भवतीति तदुपयोगितया तस्यास्तच्वज्ञानासाध्यत्वमुपेयते। धवंसके क्षणिक भावविकार सिद्ध होनेसे अविद्याकी निवृत्ति भी ब्रम्मसाक्षा- रकारकी उत्पत्ति होनेके अनन्तरक्षणमें रहनेवाला कोई भावभूत विकार ही है। इसलिए उसकी मुक्तिमें अनुवृत्ति न होनेके कारण उसके अनिवर्चनीय होनेपर भी कोई दोप नहीं है, इस प्रकार अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं ॥ २ ॥ * अब शक्का होती है कि यदि अविद्यानिव्ृत्ति क्षणिक मानी जाय, तो अविदयानिवृत्तिरूप मोक्ष स्थायी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमं तुमको भ्रम है, कारण कि अविधानिवृत्ति ही स्वयं पुरुपार्थ नहीं हे, इसीसे उसको ज्ञानजन्य मानते हैं, क्योंकि अविधानिवृत्ति न तो सुख है और न दुःखाभाव है, किन्तु मखण्ड आनन्दको आवृत्त करने- वाली और सांसारिक दुःखके हेतुभूत अविद्याका उच्छेद होनेसे अखण्ड आनन्दका प्रकाश हो जाता है और सांसारिक दुःखक्री निवृत्ति हो जाती है, इसलिए अखण्डानन्दकी प्राप्ति और दुःखाभावमें उपयोगी होनेसे अज्ञाननिवृत्तिको ज्ञानसाध्य मानते हैं। *ैं अविधानिवृत्ति मोक्षे प्रति साधनभून शानसे खाथ्य है, ऐसा पूर्वमें सिद्धान्तीने उपपादन किया, इसलिए पूर्यपक्षीको यह अम हुआ कि अविद्यानिमृत्ति दी मोक्ष पदार्थ है, इसलिए पूर्वपक्षीके अ्रमनिवारणके लिए इस मन्थसे शद्तापूर्वक समाधान करते हैं।

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५२६ सिद्धान्तलेश्सग्रह [चतुर्थ' परिच्छेद

दुःखं सुखविरोधीति तन्नाशोऽपि हि न स्वतः। पुमर्थः सुखमात्रं तु तथा चित्सुखदर्शने । ९॥ चित्सुखाचार्य की दृष्टिमें दुःख सुखका विरोधी है, इसलिए. दुःखका विनाश स्वतःपुरुषार्थ नहीं है, किन्तु केवल-सुख ही पुरुपार्थ. है॥ ९॥ चित्सुखाचार्यास्तु-दुःखाभावोऽपि मुक्तौ न स्वतःपुरुपार्थ:, सर्वत्र . . दुःखाभावस्य स्वरूपसुखाभिव्यक्तिप्रतिबन्धकाभावतया सुखयेषत्वात्; सुख- स्यैव स्वतःपुरुपार्थत्वम्। अन्येपां सर्वेपामपि तच्छेपत्वमिति सुखसाधनता- ज्ञानस्यैच प्रवर्तकत्वे सम्भवति दुःखाभावस्यापि स्वतःपुरुपार्थत्वं परिकल्प्य-

  • चित्सुखाचार्य कहते हैं कि मुक्तिमें दुःखाभाव स्वयं पुरुपार्थ नहीं है, क्योंकि सभी जगह + दुःखाभाव स्वरूपसुखकी अभित्रयक्तिमें प्रतिबन्धकीभूत पदार्थका अभावरूप होनेसे सुखका ही अङ्ग है, अतः सुख ही स्वतःपुरूपार्थ है। और जितने सुखके साधन हैं, उन सबको सुखाङ् मान करके सुखसाघनता, ज्ञानको प्रवर्तक मान लेने पर दुःखाभावको भी स्वतःपुरुपार्थ मान करके दुःखाभावके साधनोंमें दुःखाभावसाधनताज्ञानरूप प्रवर्तकके संग्रह

अविद्याकी निवृत्तिके समान दुःखकी निवृत्ति भी स्वतः पुरुपार्थ नहीं है, इसलिए ब्रह्मानन्द- स्फुरणके हेतुरूपसे ही अविद्यानिवृत्ति ज्ञानसाध्य है, इस प्रकारके चित्सुखाचार्यजीके मतको कहते हैं, यह मत इन्होंने अपने तत्त्वप्रदीपिकाप्रन्थमें, चतुर्थ परिच्छेद्में निम्नलिखित पङ्चियोंसे वतलाया है- 'नात्र दुःखाभावः स्वतन्त्रतया पुरुषार्थः, सुखाभिग्यक्तिशेपत्वातू। न च विपरीतवृत्तिप्रसन्गः, विकल्पासहत्वातू। कि सुखं दुःखाभावस्योत्पादकमुताभिव्यञ्जबम्, नोभयथापि ।' अर्थात् दुःखाभाव स्वतन्त्ररूपसे पुरुपार्थ नहीं है, प्रत्युत सुखाभिव्यक्तिका अम है। यदि शङ्गा हो कि सुख ही दुःखाभावका अङ्ग हैं, इप प्रकार उलटा प्रसभ्न क्यों नहीं आता ? नहीं, विपरीत प्रसङ्ग नहीं आ सकता है, क्योंकि विकल्पका सहन नहीं कर सकता है-क्या सुख दुःखाभावका उत्पादक है या उसका अभिव्यञ्जक है? दोनों ही प्रकार नहीं हो सकते हैं। : + दुःखकालमें आत्मस्वरूपभूत सुखकी अभिव्यंक्ि (स्फुरण) नं होनेसे दुःख सुखाभि- व्यक्तिमे प्रतिबन्धक माना जाता है, इसलिए दुःखाभावकी सुखाभिव्यक्तिके लिए ही कामना होती है, सुखके समान स्वतःपुरुषार्थत्वरूपसे नहीं होती है, यह भाव है।

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मोक्षके स्वतःपुरुपार्थत्त्का विचार.] भापानुवादसहित ५२७

तत्साधनप्रवर्तकसड्ग्रहाय इए्टसाधनताज्ानस्य इच्छाविपयत्वप्रवेशेन गुरु घटितस्य प्रवर्तकत्वकल्पनायोगाद्। न च दुःसाभाव एवं स्वतःपुरुपार्थ:, तच्छेपतया सुखं काम्यमिति वैपरीत्यापत्ति: बहुकालंदु:खसाध्येऽपि क्षणिकसुखंजनके निन्दितग्राम्य- करनेके लिए इष््साधनताज्ञानको भी प्रवर्तक मानना पड़ेगा, यह युक्त नहीं है, क्योंकि इष्साधनताज्ञानमें इच्छाविपयताका प्रवेश होनेसे पूर्व प्रवर्तककी अपेक्षा इसमें गौरव है। * यदि शक्का हो कि दुःखाभाव ही स्वयं पुरुपार्थ है। और सुख दुःखा- भावके मज्रूपसे ही काम्य है अर्थात् समीष्ट है, इस प्रकार वैपरीत्यकी भी प्रसक्ति हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि + अधिककाल तक दुःखसे साध्य निन्दित अगग्यागमन आदि क्षणिक सुखके साधनोंमें अनेक मनुप्योंकी * भ.व यह है कि दुःखाभावको मुखरेप माननेसे दुःखाभावके साधन भी सुससाधन ही गिने जायेंगे, इस अवस्थामे सुसके या दुःसाभावके साधनोंमें सर्वत्र सुखसाधनता ज्ञानको ही प्रंयर्तक माननेसे काम चल सकता है। यदि सुसके समान दुःखाभाव भी स्वतःपुरुपार्थ माना जायगा, तो दुःमाभावके स्ाधनोंमें सुससाधनताका चाघ होनेसे सुखसाधनत्वसे उनमें प्रवृति नहीं होगी। यदि शङ्ा हो कि दुःसाभायके साधनोंमें प्रवृत्तिके प्रति दुःखाभावसाधनता जञानको प्रवर्तक मानेंगे, इसलिए उनमें भी प्रवृतिकी उपपति हो सेकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस प्रकार माननेसे प्रवृत्तिके कारणका अनुगम नहीं होगा। यदि शक्ता हो कि दोनोंके लिए अर्थात् मुससाधनोंमें और दुःसाभावसाधनोंमें प्रृत्तिकी उपपततिके लिए इष- साधनताशानको दी प्रवर्तफ मानो, दुःखाभाव भी मुसके समान अभीष है, अतः इषशब्दसे उसका भी संप्रदद हो सफता है, तो यद भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रवृत्तिमात्रके प्रति जो तुमने इटसाधनताज्ञानको कारण माना है, उसमें प्रविष्ट इटाशमें सुसत्वजातिका अज्ञीकार करो तो कंथनित् लाघव हो सकता है, परन्तु इशांशमें सुखत्वजातिके अग्रीकारमें किसी प्रमाणके न रोनेसे उपाधि ही माननी होगी। इस-परिस्थितिमें कारणतावच्छेदकप्रयुक्त गौरव ही प्रसफ रोगा, इसलिए दुःाभावको सुखरेप मानना दी युक्त है। * कुछ लोग इस प्रश्नके विपयमें तर्क फरते हैं कि यह पाक्ा हो ही नहीं सकती, क्योंकि इस विपरीत पक्षमें दुःमाभाव साधनोंमें प्रवर्तक ज्ञानकारणतावच्छेदक शरीरमें दुःखाभावत्व- रुप उपाधिका की प्रपेश मानना पदेगा, इसलिए इच्छाविपयत्वरूप उपाधिके प्रचेशकेसमान गौरव ही है, तो यह तर्क युक नहीं है, क्योंकि सिद्धान्तमें सुख आत्मरूप है, इसलिए आत्माके एक होनेसे मुसत्व जाति ही नहीं हो सकती है, अतः उसमें जातित्वका असम्भव है और उसे उपाधि मानना होगा, इसलिए प्रन्थमें उक्क शक्का हो सकती है। इच्छाविपयत्वके समान मुखखं भी उपाधिरुप दै, अतः सुखत्वका प्रचेश करनेपर भी कारणावच्छेदकप्रयुक्त गौरवके समान दोनेसे किंसी चिनिगमकके न रहनेसे चैपरीत्यकी आशङा हो सकती है, यह भाव है।

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५२८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थ परिच्छेंद

धर्मादौ प्रवृत्तिदर्शनात्। तत्र क्षणिकसुखकालीनदुःखाभावस्य पुरुपार्थत्वे तदर्थ बहुकालदुःखानुभवायोगात्। न च तत्र क्षणिकसुखस्य पुरुपार्थत्वेS पि दोपतौल्यम्, भावरूपे सुखे उत्कर्षापकर्पयोरनुभवसिद्धत्वेन क्षण: मप्यत्युत्कृष्टसुखार्थ बहुकालदुःखानुभवोपपचेः । दुःखाभावे चोत्कपाप- कर्षासम्भवात्। तस्मान्मुक्तौ संसारदु:खनिवृत्तिरप्यविद्यानिवृत्तिवत् सुखशेप. इत्यनवच्छिन्नानन्दप्राप्तिरेव स्वतापुरुपार्थ इत्याङ्ुः ॥ ३॥ प्रत्यगेव परानन्दस्तिरोभूतः स्वमोहतः। स्वकण्ठचामीकरवत् प्राप्तपाप्यः स्वविद्यया ॥ १० ।। अपने मोहसे प्रत्यगरूप परानन्द ही तिरोभूत हुआ है अतः प्रात होनेपर भी भूली हुई अपनी कण्ठगत सुर्वणमालाके समान अपनी विद्यासे प्राप्य होता है॥१०॥

प्रवृत्ति देखी जाती है। उस स्थलमें अर्थात् निन्दित उक्त प्रवृत्तिस्थलमें * क्षणिक सुखकालिक दुःखाभावमें पुरुपार्थताका यदि अङ्गीकार किया जाय, तो उसके लिए अधिककाल तक दुःखानुभव नहीं हो सकता है। यदि शज्ा हो कि निन्दित प्रवृत्तिस्थलमें क्षणिक सुख पुरुषार्थ माना जाय, तो भी दोष तो समान है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भावरूप सुखमें उत्कर्ष और अपकर्षका अनुभव होनेसे क्षणिक उत्कृष्ट सुखके लिए बहुत काल तक दुःखका अनुभव उपपन्न हो सकता है, और दुःखाभांवमें उत्कर्ष और अपकर्ष नहीं हो सकते हैं।। इससे अर्थात् दुःखाभावके स्वतः पुरुषार्थ न होनेसे संसाररूप दुःखकी निवृत्ति भी अविद्यानिवृत्तिके समान सुखकी अङ्ग है, अतः अनवच्छिन्न-शुद्ध-आनन्दकी प्राप्ति ही स्वतः- पुरुषार्थ है । ३ ॥

  • समाधान इस अभिप्रायसे देते हैं कि सुखव्यक्ति वस्तुतः एक है, तथापि उपाघिके भेदसे सुखका भेद होनेके कारण सुखत्व जाति अक्षत है, अतः सुखको स्वतः पुरुपार्थ माननेसे कारणतावच्छदकप्रयुक्त लाघव है। और दुखाभाव ही यदि स्वतः पुरुषार्थ होता, तो अधिक काल तक क्षणिक सुखके लिए अनेक पुरुष प्रतृत्त नहीं देखे जाते, अतः सुसको ही पुरुषार्थ मानना युक्ति-युक्त है। + कारण कि अभावमें उत्कर्षत्व और अपकर्षत्वरूप जाति नहीं मानी जाती है, यह भाव है।

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मोक्षके प्राप्यत्व और अप्राप्यत्वका विचार ] भापानुवादसहित ५२९

नन्वनवच्छिन्रानन्दः प्रत्यग्रूपतया नित्यमेव प्राप्तः। सत्यम्, नित्य- प्राप्तोऽपि अनवच्छिन्ानन्दस्तमावृत्य तद्विपरीतमर्थ प्रदर्शयन्त्या अविद्यया संसारदशायामसत्कल्पत्वं नीत इत्यकृतार्थताडभूत्। निवर्तितायां च तस्यां निरस्तनिखिलानर्थविक्षेपे स्वकण्ठगतविस्मृतकनकाभरणवत् ग्राप्यते इवेत्यौ- पचारिकी तस्य प्राप्तव्यतेति केचित्। अपाप्तिरपि तस्याऽभूत् संसतौ व्यावहारिकी। सा विद्यया निवृत्तेति सुख्यां प्राप्ति परे जगु ॥ ११ ॥ कुछ लोग कहते हैं कि संसारदशामें अनवच्छिन्न आनन्दकी व्यावहारिक अपरासि भी वह विद्यासे निवृच हुई, इसलिए उसकी मुख्य प्राप्ति हो सकती है॥११॥

यदि कोई शक्का करे कि अनवच्छिन्न आनन्द तो प्रत्यगात्मरूप है, अतः वह + सर्वदा प्राप्त ही है, इसलिए उसकी प्राप्तिके लिए कोई प्रयल करनेकी आवश्यकता नहीं है? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि वह अनवच्छिन्न आनन्द नित्य प्राप्त ही है, तथापि उस आनन्दको आावृत करके विपरीत अर्थको-दुःखात्मक संसारको-दिखलाती हुई अविद्या संसारदयामें उस आनन्दको नहींके समान बना देती है, अतः पूर्णानन्दकी अपाप्ति भासती है। उस अविद्याकी निवृत्ति हो जानेपर सम्पूर्ण अनर्थरूप विक्षेपकी निवृत्ति हो जानेसे अपने कण्ठमें स्थित सुवर्णहारको विस्मृतिके समान उस आनन्दकी भी प्राप्ति हो जाती है, अतः आनन्दमें औपचारिक प्राप्तिविषयता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।

+जीवको स्वस्परूप होनेसे म्रम्मानन्द नित्य प्राप्त दी है, अतः उसकी प्राप्तिके उद्देश्यसे आनन्द- प्राप्तिके साघनोंमें पुरुपकी प्रपृत्ति नहीं दोनी चाहिए, यद प्रश्नका तात्पर्य है। * जैसे अपने दारके गलेमें रहते भी, उसकी विस्मृतिसे उसे इूधर उधर खोजता दे, यदयपि द्वार प्राप्त दी है, अप्राप्त नदीं है, तधापि भ्रान्तिसे उसको अप्राप्तके समान मानता ह, जब उस्रकी ध्रान्ति निकल जाती है कि द्वार तो मरे गलेमें ही है, तब उसके प्राप्त रहनेपर भी मने अप्रास वस्तु प्राप्त की, ऐखा मानता दै, वस इसी प्रकार स्वरूप आनन्दके नित्य प्राप्त ऐोनेपर भी अनादि अविद्यासो आयृत दो जानेके कारण वद अप्राप्तके समान प्रतीत दोने लगता है, उस अविद्याके नियृत हो जानेपर, तो निखिल अनर्थरूप विक्षेपके निकल जानेसे स्वतः आनन्दफा स्फुरण दो जाता है, इसलिए अप्नाप्त वस्तुकी प्राप्ति हुई, ऐसा औपचारिक ज्यवदार है, यह भाष है। ६५

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५३०' सिद्धान्तलेश संग्रह - [चतुर्थ परिच्छद

अन्ये तु संसारदशायां 'नास्ति, न प्रकाशते' इति व्यवहारयोग्यत्व- रूपाज्ञानावरणप्रयुर्तस्य 'मम निरतिशयानन्दो नास्ति' इति प्रत्ययस्थ सर्वसिद्धत्वात् तदालम्वनभूतः कश्िद् त्रह्मानन्दस्याऽभावः काल्पनिको यावदविद्यमनुवर्तते, अविद्यानिवृच्ौ च तन्मूलत्वान्निवर्तते इति 'यस्मिन् .

सत्यग्रिमक्षणे' इत्यादिलक्षणानुरोधेन सुख्यमेव तस्य प्राप्यत्वमित्याहु:। परे प्रागावृतत्वेन पारोक्ष्यादपुमर्थताम्। सुक्े तु तदभिन्नत्वादात्मप्राप्त्या पुमर्थताम् ॥। १२ ॥ कुछ लोग कहते हैं कि संसारदशामें अनवच्छिन्न आनन्दमें आवृत होनेके कारण परोक्ष होनेसे, पुरुषार्थ नहीं है और मुक्तिमें तो अपरोक्ष होनेसे उसकी प्रा्ति होनेके कारण वह पुरुपार्थ है ॥१२॥।

कुछ लोग तो कहते हैं कि 'नास्ति, न प्रकाशते' (निरतिशय आनन्द नहीं है और उसका प्रकाश भी नहीं होता) इस प्रकारसे व्यवहारके योग्य अज्ञानरूप आवरणसे होनेवाला 'हमको निरतिशय आनन्द नहीं है' इस प्रकार ज्ञान सभीको अनुभव सिद्ध है, इसलिए- उस प्रकारके विज्ञानका विपयीभूत कोई काल्पनिक न्रह्मानन्दका अभाव अविद्याकी अवस्थिति तक अनुवर्तमान होता है। और अविद्याकी निवृत्ति हो जानेसे अविद्यामूलक उस काल्पनिक अभावकी निवृत्ति हो जाती है, इसलिए 'यस्मिन्सत्यग्रिमक्षणे' इत्यादि अग्निम लक्षणके अनुरोधसे ब्रह्मानन्दमें मुख्य ही प्राप्यता है।

  • 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्' इत्यादि वेदान्तोंसे प्रतिपादित निरतिशय आनन्दका सांसारिक पुरुपोंको अनुभव नहीं होता, यह जग- त्प्रसिद्ध है। इसलिए प्रत्यकरूपसे उस आनन्दके सर्वदा रहनेपर भी उसके अभावका अनुभव होनेसे वास्तविक अभावके न होनेपर भी काल्पनिक अविद्याप्रयुक्त निरतिशय आनन्दका अभाव माना जाता है, जो आनन्दाभाव व्यवहारका आलम्बन है, और यह अभाव जब तक अविद्या रहती है, तव तक रहता है, यह तात्पर्य है। *'यस्मिन् सति अगनिमक्षणे यस्य सत्त्वम् यदभावे च यस्य अभावः तत् तत्साध्यम्' अर्थात् जिसके अस्तित्वमें उत्तरक्षणमें जिसका अस्तित्व हो और जिसके अभावमें जिसका अभाव हो वह उससे साध्य होता है, प्रकृतमें ज्ञानके होनेपर उत्तरक्षणमें निरतिशय आनन्दकी अस्तिता है, और ज्ञानके अभावमें उक्त आनन्दका अभाव है, अतः ज्ञानसे वह साध्य है, इसलिए निरतिशय आनन्दमें प्राप्यता सुख्य है, यह भाव है।

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मोक्षके प्राप्यत्व और अंप्राप्यत्वका विचार ] भांपानुवादसहित ५३१

अपरे तु अवेद्यस्यापुरुपार्थत्वाद् ससारदशायां सदप्यनवच्छिन्सुख- आपरोक्ष्याभावान्न पुरुपार्थः । न च स्वरुपज्ञानेनाऽऽपरोक्ष्यं तदाऽप्यस्ति, तस्य सर्वदा स्वरूपसुखाभिन्नत्वाद। वृत्तिज्ञानेनाऽडपरोक्ष्यं तु न सुक्ताव- पीति वाच्यम्, नहि स्वव्यवहारानुकलचैतन्याभेदमात्रमापरोक्ष्यम्, घटा- वच्छिन्नचैतन्याभिव्यक्ती तदभिन्नस्थ घटगन्धस्याऽपि आपरोक्ष्यापत्तेः। किन्तु अनावृतार्थस्य तदभेदः। तथा चाऽनावृतत्वांशस्तच्वसाक्षात्कारे

*और कुछ लोग कहते हैं कि अवेद्य पुरुषार्थ नहीं होता है, अतः संसार- दश़ामें अनवच्छिन्न सुखके रहनेपर भी आपरोक्ष्यके न रहनेसे उसमें पुरुपार्थता नहीं है। यदि शह्ा हो कि स्वरूपज्ञानसे आपरोक्ष्य संसारदशामें भी उक्त ानन्दगें है, क्योंकि स्वरूपज्ञान सर्वदा स्वरूपसुखसे अभिन्न है, और वृत्तिज्ञानकृत अपरोक्षत्व तो मुक्तिमें भी नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, कर्योंकि अपने व्यवहारके अनुकूल चैतन्यका अभेद ही अपरोक्षत्व नहीं है, कारण कि यदि अमेदको ही अपरोक्षत्व माने, तो घटावच्छिन्न चैतन्यकी अभित्यक्ति होनेपर उस चैतन्यसे अभिन्न घटके गन्धका भी अपरोक्षत्व प्रसक्त होगा, किन्तु अनावृत अर्थका अनावृत चतन्यके साथ अमेद ही अपरोक्षत्व है। इस अवस्थामें अनवच्छिन्न सुखांशमें अनावृतत्वांशकी " पूगंमतसे इस मतमे यही विशेषता है कि पूर्वमतमें म्रह्मानन्दका स्वरूप ही पुरुपार्थ है और इस मतमें ब्रम्मानन्दका आपरोक्ष्य पुरुपार्थ दै, अविद्याके विद्यासे निवृत हो जानेपर अपरोक्षत्व प्राप्त होता है, अतः विद्यासाधनत्यकी उपपत्ति दो सकती है, यह भाव है। शहाका माव यह दे कि विदासे प्राप्त होनेवाला आनन्दापारोक्ष्य क्या स्वप्रकाश चतन्यरूप है, अथवा वृत्तिरूप दे! दोनों दी पक्ष नहीं वन सकते, क्योंकि स्वप्रकाशरूप चैतन्य तो संसारकालमें भी है, कारण कि स्वव्यवदारानुकूलचेतन्याभिन्नत्वरूपमें पर्य्यवसतित उक आपरोक्ष्यका संखारदशम अवत्य नहीं है। द्वितीय पक्ष-पृत्तिरूप कहेंगे, तोवह भी मुंक्तिमें नहीं है, अतः उमयथा आपरोक्ष्यका असम्भय है, यद भाव है। * समाधानका तात्पर्य यह हे कि स्वन्यवहारानुकूलचेतन्याभिन्नत्व। अर्थात् अपने व्यवहार में प्रयोजक (उपयोगी) चेतन्यके साथ वस्तुका अभेद केवल अपरोक्षत्व नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेस घटव्यवदारमें उपयोगी घटार्वच्छिन चेतन्यकी अभिव्यकति दोनेपर अभिव्यक चैतन्यके साथ अभिन घटवृत्ति गन्धका भी प्रत्यक्ष हो जायगा, क्योंकि उन दोनोंके अभेदमें प्रयोजक समानदशरवादि विथयमान ही है, अतः अनाधृत अर्थके साथ अनाधृत चैतन्यके अभेदको ही अपरोक्षत्व कहना दोगा, अतः उक दो प्रकारके अपरोक्षत्वको लेकर दोप नहीं हो सकता है, यह भाव है।

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५३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह i चतुर्थ परिच्छेद

सत्येवेति निरतिशयसुखापरोक्ष्यस्य पुरुपार्थस्य विद्याप्राप्यत्वं युक्त- मित्याहुः। अन्ये भूमसुखान्भ्ेदो जीवेऽव्यस्तोऽभवत् पुरा। मुक्ती तन्नाशतः प्राहुः प्राप्तिं स्फुटसुखात्मिकाम् ॥ १३॥ . इतर लोग कहते हैं कि संसारदशामें व्रद्ारूप सुखसे भेद भी जीवमें अध्यस्त हुंआ था, मुक्तिमें उसका नाश होनेसे सुखरूप की प्राप्ति होती है।१ ३॥ 2 इतरे तु अस्तु व्यवहारानुकूलचैतन्याभेदमात्रमापरोक्ष्यम्। तथाऽ- प्यंज्ञानमहिम्ना जीवभेदवच्चिदानन्दभेदोऽपि अध्यस्त इति संसारदशायां पुरुषान्तरस्य पुरुपान्तरचैतन्यापरोक्ष्यवद् अनवच्छिन्सुखवपारोक्ष्स्वापि उपपत्ति तत्त्वसाक्षात्कार होनेपर ही हो सकती है, इसलिए निरतिशय सुखके अपरोक्षत्वरूप पुरुषार्थमें विद्यापा्यत्व युक्त है। और कुछ लोग कहते हैं कि* यद्यपि स्वव्यवहारानुकूल चैतन्यका अभेदमात्र अपरोक्षत्व भले ही हो, तथापि अज्ञानके प्रभावसे जीवके मेदके समान चिदानन्दका भेद भी अध्यस्त है, इसलिए संसारदशामें पुरुपान्तरको अन्य पुरुषके चैतन्यका जैसे आपरोक्ष्य नहीं होता, उसके समान अनवच्छिन्न सुखका भी आपरोक्ष्य नहीं होता।। और अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर तो चिदानन्दमेदके भी

  • इस मतमें स्वव्यवहारानुकूल चैतन्याभिन्नत्व ही अपरोक्षत्वका लक्षण है, इसमें अनावृतत्व अश देने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसके न रहनेपर भी कोई दोप नहीं है। यदि शक्का हो कि घटावच्छिन चैतन्य की अभिव्यक्ति होनेपर घटवृत्ति गन्वका भी अपरोक्षत्व प्रसक होगा, अतः अनावृतत्व अंशकी आवश्यकता है, तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि धर्म आदिके साक्षीमें अध्यस्त होनेसे अनावृत साक्षीरूप चैतन्याभिन्नत्वके रहनेपर भी जैसे उनका अपरोक्षत्व नहीं माना जाता है, वैसे हो प्रकृतमें समझना चाहिए। यदि रद्ा हो कि धर्म आदि तो प्रत्यक्षके अयोग्य हैं, अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, तो यद भी युक्त नहीं है, क्योंकि इसी युक्तिके आधारपर प्रकृतमें भी चाक्षुपतृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यके प्रति अनुभवके अनुरोधसे गन्धको अयोग्य मानेंगे, अतः उक्त दोपका परिहार हो सकता है, ८ इसलिए केवल स्वव्यवहारानुकूलचतन्याभिन्नत्वको अपरोक्षत्वमाननेपर भी कोई दोप नहीं है, यह भाव है। + जैसे एक पुरुषको अन्य पुरुषके चतन्यका साक्षात्कार नहीं होता है, वैसे ही संसार- दशामें जीवको अनवच्छिन्न आनन्दका अपरोक्ष नहीं होता, क्योंकि जैसे जीवोंका अज्ञान- निवन्धन परस्परभेद अध्यस्त है, वैसे ही अज्ञाननिवन्धन साक्षी चैतन्य और ब्रक्मानन्दका

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मुक्तिके स्वरूपका विचार] भापांनुवादसहित ५३३

नास्ति। अज्ञाननिवृत्तौ तु चिदानन्दभेदप्रविलयांत्तदापरोक्ष्यमिति तस्य

अथ मुक्ती भवेच्छुद्ध उतेशोऽत्र निगद्यते। व्यक्ता जीवेक्यवादे हि शुद्ध महैकशेपता ॥।१४॥ अब शक्का दोती है कि मुक्त पुरुष शुद्ध चैतन्यस्वरूप हो जाता है अथवा ईश्वररूप होता जाता है? इस विषयमें कहते हैं कि एकजीववादमें शुद्ध चैतन्यस्वरूपसे उस जीवकी अवस्थिति व्यक्त दी है॥१४॥ अथ विद्योदये सत्यृपाधिविलयादपेतजीव भावस्य किम् ईश्वरभावापत्ति- रभवति, उत शुद्ध चैतन्यमात्ररूपेणावस्थानम्! इति विवेचनीयम्। उच्यते- एकजीववादे तदेकाज्ञानकल्पितस्य जीवेश्वरविभागादिकृत्स्नभेद- प्रपश्चस्य तद्विदयोदये विलयान्निर्विशेषचतन्यरूपेणैवाडवस्थानम्।

विनष्ट होनेसे उसकी अपरोक्षता हो सकती है, इसलिए उसमें विद्यासाध्यत्व हो सकता है।।४।। अव शक्का होती है कि विद्याका उदय होनेपर उपाधिका विनाश होनेसे - जिसका जीवभाव निवृत्त हो गया है, उस चतन्यकी क्या ईश्वरभावापचि- परमेश्वररूपता-होती है या उसका शुद्ध चतन्यमात्रसे अवस्थान होता है, इसका निर्वचन करना चाहिए? कहते हैं- एक जीवचादमें केवल जीवके I एंक अज्ञानसे कल्पित जीव और ईश्वरके विभाग आदि समस्त प्रपश्नका उस जीवकी विद्याका उदय- होनेपर विनाश होनेसे निर्विशेष चतन्यरूपसे जीवका अवस्थान होता है।

अनादि भेद अध्यस्त है, इसलिए म्रद्मानन्दका अपने व्यवहारमें अनुकूल साक्षी चैतन्यके साथ अभेद न दोनेसे परस्पर वस्तुतः जीवोंमें अभेदके रहनेपर भी उसके अषिघित्कर दोनेसे दोप नहीं है, यह भांव है। जीवके एक होनेसे उसका मूलाजान भी एक ही है, यह भाव है। इसलिए एक जीवके किसी भी अन्तःकरणमें तत्वपाक्षातकारके उदित होनेपर अज्ञानका देव,तिर्यक्, मनुष्य आादि सम्पूर्ण स्वकायोंके साथ उसी दम नाश हो जाता है। यदि इस विषयमें शक्ा हो कि शुक आदिके अन्तःकरणमें उत्पन्न तत्वज्ञानसे ही सब प्रमाताओंके संसारका समूल विलय हो जाना चाहिए, अतः इस समय संखारकी अनुपृत्ति कैसे देखी जाती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुक आदिकी मुंकिमें कोई प्रमाण ही नहीं है, और शुक् आदिके मुक्किप्रतिपादकवाक्य स्वार्थमें उपचरित हैं, अतः संसारकी अनुषृत्तिमेंकोई द्ानि नहीं है, यह भाव है।

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५३४ सिद्धान्तलेश संग्रह [ चतुर्थ परिच्छेदं

अनेकजीववादेऽपि प्रतिविम्वेशवादिनाम्। मुक्तस्य विम्वसन्द्ावाच्छुद्धता पर्यवस्यति ॥१५॥ अनेकजीववादेऽतो नाऽवच्छेदनयः शुभः । वद्धमुक्ताव्यवस्थानात्तदेशोपाधिवन्धनात् ॥ १६॥ अनेकजीववादमें भी जो मायामें चैतन्यके प्रतिबिम्धको ईश्वर कहते हैं, उनके मत्में बिम्बका अस्तित्व होनेसे मुक्तकी शुद्धता ही प्रसक्त होती है। इसीसे अनेकजीववादमें अवच्छेदवाद युक्त नहीं है, क्योंकि बद्ध और सुक्त की व्यवस्था नहीं हो सकती है कारण कि तत् तत् देशवर्ती उपाधिके साथ मुक्त जीवरूप चैतन्यका सम्बन्ध है॥१५॥१६॥ अनेकजीववादमभ्युपगम्य वद्धमुक्तव्यवस्थाङ्गीकारेऽपि यद्यपि कस्यचिद्विद्योदये तदविद्याकृतप्रपश्चकलियेऽपि वद्धपुरुपान्तराविद्याकृतो जीवेश्वरविभागादिप्रपश्चोऽनुवर्तते, तथाऽपि 'जीव इवेश्वरोऽपि प्रतिविम्ध- विशेष:' इति पक्षे मुक्तस्य विम्वभूतशुद्धचैतन्यरूपेणैवाऽवस्थानम्। अनेको- पाधिष्वेकस्य प्रतिबिम्बे सति एकोपाधिविलये तत्प्रतिविम्वस्य विम्न्न- 1 अनेकजीववादका अङ्गीकार करके बद्ध और मुक्तकी व्यवस्थाका अज्ञी- कार करनेपर भी जिस पुरुषको ज्ञानकी उत्पत्ति हुई है, उसी पुरुषके प्रति अविद्यादि समस्त प्रपञ्चका विलय होगा और अन्य वद्ध पुरुषोंकी अविधयासे जीव तथा ईश्वर विभाग आदि प्रपश्चकी यद्यपि अनुवृत्ति हो *सकती है, तथापि 'जीवके समान ईश्वर भी प्रतिबिम्त्रविशेष है' इस पक्षमें मुक्त पुरुप विम्बभूत शुद्ध चतन्यरूपसे ही अवस्थित रहता है। क्योंकि अनेक उपाधियोंमें एक ब्रह्म चैतन्यके प्रतिबिम्ब होनेपर एक उपाधिके विलयसे उस प्रतिविम्बका विम्व-

*अर्थात् अनेक जीववादमें वक्ष्पमाण प्रकारसे जव तक सबकी मुक्ति नहीं हो जाती तब तक मुक्त पुरुषकी अन्य पुरुपनिष्ट अविधाकृत ईश्वरभावप्राप्ति रहती है, यह भाव है। यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि सूल ग्रन्थमें 'यद्यपि' शब्द कहा गया है, इससे यह अर्थ होगा कि यद्यपि ईश्वरभावापत्ति हो सकती है, तथापि नहीं हो सकती है, यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि अनेकजीववाद का निरूपण अनेक प्रकारोंसे उपलब्ध होता है, इसलिए सब अनेक जीववादोंमें मुककी ईशरभावापत्ि नहीं हो सकती है, किन्तु जीवके समान ईश्वर भी प्रतिविम्व है, इस पक्षमें शुद्ध चैतन्यरूपसे जीवकी अवस्थिति होती है, इसी अर्थका सूचन करनेके लिए 'यद्यपि' श्न्द दिया गया है, यह भाव है।

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मुक्तिके स्वरूपका विचार ] भापानुवादसहित ५३५

पुनर्वन्धापत्तेः ।अत एवाडनेकजीववादे अवच्छेदपक्षो नाऽडद्रियते। यदवच्छे- देन मुक्तिस्तदवच्छेदेनाऽन्तःकरणान्तरसंसर्गे पुनरपि बन्धापत्ते:। विम्वेशवादे मुक्तः प्राक सर्वजीवविमोचनात्। ईशो भूत्वा ततः शुद्धे स्व्रभावे व्यवतिष्ठते ॥ १७ ॥ विम्ब चैतन्य ईश्वर है, इस पक्षमें जब तक सब जीवों की मुक्ति नहीं होती तब तक मुक्त जीच ईश्वर रहकर फिर सब जीवोंके मुक्त होनेपर शुद्धस्वभाव ब्रद्ा हो जाता है॥१७॥।

भावसे अवस्थान उचित है, अतः प्रतिविम्वान्तरभावकी आपत्ति नहीं हो सकती है। यदि उसका प्रतिविम्धान्तरभाव माना जाय, तो किसी समय उसका जीवरूप प्रतिविम्बान्तरभाव भी प्रसक्त हो सकता है, इसलिए अवच्छेद पक्षके समान मुक्त पुरुषको पुनः बन्धकी आपत्ति हो सकती है। इसीलिए अनेक जीववादमें अवच्छेद पक्षका अन्गीकार नहीं किया जाता है, क्योंकि यदवच्छेदेन सुक्ति हुई हो, तदवच्छेदेन अन्तःकरणान्तरका सम्बन्ध होनेपर फिर भी चन्धकी आपत्ति हो सकती है। पूर्ण चेतन्यमें जिस चैतन्यप्रदेशसे मुक्ि हो, उस प्रदेशमें चैतन्यके साथ अन्य उपाधिका सन्वन्ध होनेपर फिर वन्घकी आपत्ति हो सकती है, यह भाव है। चैतन्यप्रदेशसे सुकका प्रहण करना चाहिए। इस विपयमें एक विचार करना चाहिए कि चतन्य तो स्वतः नित्यमुक्त है, वह जय अनादि अविद्यादि उपाधिसे युच्ा होता है, तब उसमें जीवत्व या बन्धकी सम्भावना हो सकती है, यह चस्तुस्थिति है, इस अवस्थामें मुकिके पूर्वमें जिस उपाधिपरतन्त्रचतन्यप्रदेशमें बन्ध था, उसमें फिर बन्धकी आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि मुक्तिकालमें उस उपाधिकी निवृत्ति हो जानेसे उपाधिपरतन्त्र वन्धाश्रय चैतन्यकी भी निवृत्ति हो ही जाती है। और जुद्ध मुक्त चैतन्यमें भी बन्धका आपादन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उसमें बद्ध जीवान्तरकी उपाधिके संसर्गसे जीवान्तरत्वकी आपत्ति आ सकती है, तथापि जो वद्ध मुक्तिको प्राप्त हुआ है, उम्में पुनः बन्धकी प्रसकि नहीं हो सकती है, अतः उसमें वन्धकी आपत्ति होती है, यह कहना असगरत है, किस, मुक चैतन्यका अन्य अन्तःकरणके साथ संसर्ग होनेसे उससे जीवान्तरत्वकी आपत्ति होनेपर भी 'जो मैं पूर्वमें संसारी होकर मुक्त था, वही मैं पुनः संसारको प्राप्त हुआ' इस प्रकारका अनुसन्धान (प्रत्यभिज्ञा) नहीं हो सकती है, क्योंकि मुक्त जीव और वद जीवकी एक उपाधि नहीं है। इसलिए जीवान्तरत्वकी प्राप्ति जो मूलमें दी गई है, वह अफिनित्कर है। इसी प्रकार पूर्वोक्त प्रतििम्वरूप जीवान्तरत्वकी भी प्रसकि नहीं हो सकती है।

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५३६. सिद्धान्तलेशसंग्रह . [ चतुर्थ,परिच्छ्रेद:

'प्रतिविस्बो जीवः, विम्बस्थानीय ईश्वर, उभयानुस्यूतं शुङ्धः चैतन्यम्' इति पक्षे तु मुक्तस्य यावत्सर्वमुक्तिसवज्ञत्वसर्वकर्तत्वसर्वेश्वर- खसत्यकामत्वादिगुणपर मेश्वरभावापत्तिरिष्यते। यथा अनेकेषु दर्पणेपु एकस्य सुखस्य प्रतिविम्वे सति एकदर्पणापनये तत्प्रतिविम्बो. बिम्बभावे- नाऽवतिष्ठते, न तु मुखमात्ररूपेण, तदानीमपि दर्पणान्तरसन्निधानप्रयुक्तस्य सुखे विम्बत्वस्याऽनपायात, तथकस्य ब्रह्मचतन्यस्याऽनेकेपूपाधिपु प्रति- विम्बेसति, एकस्मिन् प्रतिबिम्बे विद्योदये तेन तदुपाधिविलये तत्प्रति- विस्वस्य विम्बभावेनाऽनवस्थानावश्यम्भावात् न.च मुक्तस्याडविद्याड- भावात् सत्यकामत्वादिगुणविशिष्टसर्वेश्वरत्वानुपपत्तिः । तदविद्याऽभावे- *ं. अविद्यायमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है, विम्बस्थानीय चैतन्य ईश्वर है और उभयमें अनुस्यृत चैतन्य शुद्ध चतन्य है, इस पक्षमें तो मुक्त पुरुषकी, जब तक कि सब जीव मुक्त न हों, तब तक सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वेश्वरंत्व, सत्यकामत्व आदि गुणोंसे विभूषित ईश्वरके साथ तादात्म्यरूपसे अवस्थिति मानी जाती है। जैसे अनेक दर्पणोंमें एक सुखके प्रतिविम्धित होनेपर उनमें से एक दर्पणके हटानेपर उसमें पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब विम्वरूपसे अवस्थित रहता है, सुखमात्रसे अवस्थित नहीं रहता, क्योंकि एक दर्पणके हटानेपर भी अन्य दर्पणके सव्निधानप्रयुक्त विम्वत्व मुखमें विद्यमान है, वैसे ही एक ब्रह्म- चैतन्यके अनेक उपाधियोंमें प्रतिविम्धित होनेपर एक प्रतिविम्बमें विद्याके उदित होनेपर उससे उस उपाधिके विलीन होनेके कारण उसमें पड़े हुए प्रतिबिम्बकी भी बिम्बरूपसे अवश्य अवस्थिति होगी। यदि शक्का हो कि उक्त पुरुषको अविद्याका अभाव होनेसे सत्यकामत्व आदि गुणोंसे युक्त सर्वेश्वरत्वकी अनुपपति हो जायगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस कालमें मुक्त पुरुवकी * यदि शङ्ा हो कि अनेक्र जीववादमें प्रतिविम्वेश्वरपक्षमे सुक्तको ईश्वरभावापत्ति नहीं हों सकती है और अवच्छेद पक्षमें तो मुक्ति ही नहीं है, तो फिर ईश्वरभावापत्ति किस पक्षमें होग़ी? तो इुस शङ्गाका उत्तर इस ग्रन्थसे देते हैं। * प्रकृत, प्रन्थमें अविद्याके नानात्वव्यवहारसे अनेक अविद्याओंमें प्रतिविम्वित अनेक ज़ीव हैं और अन्तःकरण तो उनमें रहनेवाले कर्तृत्व आदिकी उपाधि है, यह सूचित किया गया है, इसलिए मुक्त पुरुषका ऐश्वर्य. अविद्याप्रयुक्त है, ऐसा स्व्रीकार करनेसे परमार्थरूपसे एकरूप ही सर्वदा मुक्ति है,, अतः ब्रह्मसूत्रके तृतीयाध्यायके अन्तिम अधिकरणके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है।

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सुक्तके स्वरूपका विचार] भापानुवादसहित ५३७

पि तदानीं बद्धपुरुपान्तराविद्यासचात्। नहीश्वरस्येश्वरत्वं सत्यकामा- द्विगुणवैशिष्टं च स्वाविद्याकृतम्, तस्य निरञ्जनत्वात्, किन्तु बद्धपुरुपा- विद्याकृतमेव तत्सर्वमेष्टव्यम्। न च विद्यान्तरफले: साम्यं मोहपरिक्षयात्। तेपु भोगस्य साम्येऽपि जगद्यापारवर्जनात् ॥१८॥ सगुण उपासनाओंके फलोंके साथ मुक्तिका साम्य भी नहीं है, साम्य होनेपर भी जगद्व्यापार उसमें नहीं है॥ १८ ॥ न च 'यथाक्रतुरस्मिन् लोके पुरुपो भवति तथेतः प्रेत्य भवति' 'तं यथा यथोपासते' इत्यादिश्रुतिपु सगुणोपासकानामपीश्वरसायुज्यश्रवणाद् मुक्ते: सगुणविद्याफलाविशेपापत्तिः । सगुणोपासकानामखण्डसाक्षात्कारा-

अविद्या नहीं है, तथापि वद्ध पुरुपान्तरकी अविद्या विद्यमान है। और ईश्वरका ईश्वरत्व है, और सत्यकामत्वादिगुणवैशिष्ट् अपने आश्रित अविद्या- से जन्य नहीं हैं, क्योंकि ईश्वर तो निरञ्जन अर्थात सम्पूर्ण दोपोंसे रहित है, किन्तु बद्धपुरुपकी अविद्यासे ही उसमें ईश्वरत्व आदि हैं, यह समझना चाहिए। यदि शक्का हो कि 'यथाक्रतुरस्मिन् लोके०' (जिस गुणसे युक्त ब्रह्मकी इस लोकम पुरुप उपासना करता है उसी गुणसे युक्त ब्रह्मको मरणके बाद प्राप्त करता है) 'तं यथा यथोपासते' (उस ईश्वरकी जिन जिन गुणोंसे युक्ततया उपासना करता है, वह उस गुणसे विशिष्टको प्राप्त करता है) इत्यादि श्रुतियोंमें सगुण उपासककी भी ईश्वरसायुज्यरूप मुक्ति सुनी जाती है, असः सुक्ति भी * इसमें यदि किसीको शङ्का हो कि जीवकी संसारिता जैसे अपनी अविद्यासे होती है, वैसे ही ईशवरकी ईश्वरता मी उसकी उपाधिसे ही होगी, इसलिए मुक्त पुरुपमें उपाधिके न रहनेसे ऐश्वर्य नहीं हो सकता, इस शंकाका इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं-तात्पर्य यह है कि ईशवरकी उपाधि क्या अविद्या है या अविद्याभिन्न माया है? द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अविद्यामें विम्बभूत चेतन्यमें जीवाधित अविद्यासे ही ऐश्वर्य हो सकता है, तौ फिर अतिरिक मायारूप उपाधिकी कल्पना व्यर्थ ही है और तत्-तत् जीवगत तत्वज्ञानसे तत्-्तत् अविद्याकी निवृत्ति होगी, इस कमसे सव जीवोंकी मुक्तिके बाद भी मायाका निवर्तक न होनेसे उस्र समयमें भी माया अवश्य रहेगी। 'मम माया दुरत्यया' इत्यादि एकवचनान्त निर्देश जातिके अभिप्रायसे है, अतः अविद्याके नानात्वपक्षमें दोप नहीं है, प्रथम पक्ष भी युक नहीं है, क्योंकि ईश्वरका ऐश्वर्य स्वाविद्याकृत नहीं है, यह भाव है। ६८

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५३८ सिद्धान्तलेश संग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

भावाद् नाऽविद्यानिवृत्तिः, न वा तन्मूलाहङ्कारादेविलयः । आवरणा- निवृत्तेर्नाखण्डानन्दस्फुरणम् । 'जगव्यापारवर्ज प्रकररणादसन्निहितत्वाच्न' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० १७) 'भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च' ( उ० अ. ४ पा० ४ सू० २१) इत्यादिसूत्रोक्तन्यायेन तेपां पर- मेश्वरेण भोगसाम्येऽपि सङ्कल्पमात्रात् स्व्रभोगोपयुक्तदिव्यदेहेन्द्रियवनि- तादिसृष्टिसाम्थ्येऽपि सकलजगत्सृष्टिसंहारादिस्वातन्त्र्यलक्षणं न निरव- ग्रहमैश्वर्यम्। सुक्तानां तु निस्सन्धिवन्धमीश्वरभावं प्राप्तानां तत्सर्वमिति सगुणविद्याके फलके समान ही होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सगुणोपासकों- को अखण्डब्रह्मसाक्षात्कार नहीं होता है, अतः उनकी अविद्याकी निवृत्ति नहीं होती है और अविद्यामूलक अहङ्कार आदिकी भी निवृत्ति नहीं होती-। आवरणकी निवृत्ति न होनेके कारण अखण्ड आनन्दकी स्फूर्ति भी नहीं होती। 'जगद्व्यापारवर्जम्०' और 'भोगमात्रसाम्यलिक्गाच्च' + इत्यादि सूत्रोक्तन्यायसे यद्यपि उन सगुण उपासकोंका भोग परमेश्वरके साथ समान है और सङ्कल्पमात्रसे 1 अपने भोगके उपयुक्त दिव्य देह, इन्द्रिय, वनिता आदिकी सृष्टिमें सामर्थ्य है, तथापि सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि, संहार आदिमें स्वातन्तर्यरूप अप्रतिहत ऐश्वर्य नहीं है। और मुक्त पुरुषोंके, जो कि निर्गुण उपासनाके प्रभावसे सर्वात्मरूपसे ईश्वरभावको प्राप्त हुए हैं, पूर्वोक्त अविद्यानिवृत्ति

इस सूत्रका यह अर्थ है-सरम्पूर्ण जगत्की सृष्टि, स्थिति और संहार करनेकी ईश्वरमें जो शकति है उससे भिन्न अपने भोगमें उपयुक्त भोग्यभोगोपकरणमान्नकी उत्पत्ति करनेकी ही उपासकोंमें शक्ति हो जाती है, क्योंकि जगत्की सृष्टिमें 'आत्मनः आकाशः सम्भूतः' इत्यादिसे परमात्माका ही उल्लेख किया गया है और सृष्टिवाक्योंमेउपासकोंका सन्निधान भी नहीं है। + हिरण्यगर्भके शरीरमें प्रवेश करके भोग भोगनवाले परमेश्वरके साथ उपासकोंका केवल भोगमात्रमें ही साम्य है, क्योंकि उसमें प्रमाण है-'तमाह आपो वै खल मीयन्ते लोकोडसौ' अर्थात अपने पास आये हुए उपासकसे उसने कहा कि में अमृतरूप जलका भोग करता, हूँ, अतः तुम्हें भी इसी अमृतरूप जलका भोग करना चाहिए, यद भाव है। 1 'यं ये काम पित्रादिरूपं कामयते स स कामः सद्ठल्पादेव समुत्तिष्ठति' (उपासक पिता आदि जिन जिन पदार्थोकी अभिलापा करता है, वे सबके सब केवल इसके सदुल्ममात्रसे ही प्राप्त हो जाते हैं, इस श्चतिसे केवल भोग्य पदार्थ ही सङ्कल्पसिद्ध प्रतीत होते हैं, यह भाव है।

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मुक्तके स्वरूपका विचार] भांपातुवादसहित ५३९

महतो विशेषस्य सद्भावात्। न च परमेश्वरस्य रघुनाथाद्यवतारे तमस्वित्वदुःखसंसर्गादिश्रवणाद् मुक्तानामीश्वरभावे पुनर्वन्धापत्तिः, तस्य विग्रशापामोघत्वादिस्व्रकृतमर्यादापरिपालनाय क्थचिद् भृगुशापादिसत्यत्वं आदि. सभी विद्यमान हैं, अतः महान् अन्तर है। X यदि शङ्का हो कि. परमेश्वरको रामचन्द्र भादि अवतारोंम अज्ञान और दुःखसम्बन्ध आदि सुने जाते हैं, इसलिए मुक्त पुरुषोंका ईश्वरभाव होनेपर भी फिर वन्घकी आपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ब्राह्मणों द्वारा दिये गये शापोमें अमोघत्व आदि स्वकृत मर्यादाके परिपालनके लिए और किसी प्रकारसे भृगुऋषिके शापादिके सत्यत्वप्रख्यापनके लिए नरके समान वह केवल

X राबका तात्पर्ये यह है कि रामचन्द्र, श्रीकृष्ण आदि जितने ईशवरंके अवतार है, उनमें अज्ञान आदि चर्समान है, क्योंकि इस अर्थमें उन्हींके वाक्य उपलब्ध होते हैं, जैसे कि- 'सात्मानं मानुपं मन्ये रामं दशसथातमजम्' अर्थात् रामचन्द्रजी अपनेको दशरथका पुरुपरूप पुत्र समसने लगे, और- 'राज्यनाशो वने वासः सीता नष्ट दिजो हतः। रईदशीयं ममालक्ष्मीनिर्द्हेदपि पावकम्।' 'न मद्विधो दुष्कृतकर्मकारी' अर्यात् राज्यनाश, चनमें वास, सीताका नाश, ब्राह्मणका (रावणका) विनाश आदि मेरे महापातक अमिको भी दग्ध कर सकते हैं, मेरे जैसा संसारमें अन्य कोई दुष्कृत कर्म करनेवाला नहीं है, इत्यादि वावय रामचन्द्रजीको अत्यन्त दुःखी सूचन करते हैं और 'सुग्रीवं शरणं गतः' इत्यादिसे उनकी दीनता भी सूचित होती है। उत्तरका तात्पर्य यह है कि यद्यपि अज्ञान आदिका उक वचनोंसे इश्वरावतारमें श्रवण होता है, तथापि वह श्रवण केवल ईश्वरका नटके समान अमिनयमात्र बोधक ह अर्थात् ईदवरने संसारके निर्माणके समयमें उसकी ठीक ठीक व्यवस्था रहे इसलिए मर्यादा चनाई है, जसे ब्ाहणोंके शापमें अवन्ध्यत्व आदि। उस मयोदाका परिपालन करनेके लिए उसको भी वैसा ही आचरण लोकमें करना चाहिए जिससे कि मर्यादाका भग न हो। और श्रीरामचन्द्र स्वयं सर्वज्ञ एवं साक्षात ईशवर थे, तथापि महादेव; इन्द्र आदिके सामने विनयको सूचन करनेके लिए ही अपने आपको मनुष्य वतलाते हैं और अपनी उदण्टताका खण्ठन करते है। यदि अपने आप अपना अभिमान प्रकट करते, तो लोकमें भी इसका बुरा प्रभाव पढ़ता और लोकमें एक प्रकारसे अनर्थ फैलता, अतः लोककी शिक्षाके लिए वैसे वचन है, यह समझना चाहिए। इसी प्रकार अनेक मर्यादाओंके परिपालनके लिए तत्-तत् वचनोंकी सम्ति लगानी चाहिए, यह भाव है। * मृगुसापका अगीकार और उसकी सत्यताको लोकमें वतलानेके लिए ईश्वरका मनुष्य- रूपसे अवतार है, यद भाव है, इस विषयमें उत्तररामायणमें एक कथा उपलब्ध होती है

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सिद्धान्तलेशसंग्रह चतुर्थ परिच्छेद

प्रत्याययितुं नटवदीश्वरस्य तदभिनयमात्रपरत्वात्। अन्यथा तस्य

द्यावत्सर्वमुक्ति परमेश्वरभावो मुक्तस्येति विम्वेश्वरभावे न कश्चिदोपः।

अभिनयमात्र करता है, इसके सूचनके लिए ही रामादि अवतारोंम अज्ञानका कथन है, वस्तुतः नहीं। + यदि ऐसा न माना जाय, तो उस परमात्मामें नित्यमुक्तत्व, निरवग्रहस्वातन्व्र्य एवं सम और अभ्यघिकके राहित्य आदिका जो श्रुतिने प्रतिपादन किया है, उसका विरोध हो जायगा। इससे जब तक सभी जीवोंकी मुक्ति नहीं होती, तव तक मुक्त पुरुषका परमेश्वरके साथ तादात्म्य- रूपसे अवस्थान होता है, अतः विम्बभूत ईश्वरभावमें कोई दोष नहीं है।

और वह दशरथके प्रति दुर्वासासे कही गई है- एक समय देवताओंका और असुरोंका परस्पर भयद्र युद्ध हुआ, उस युद्धमें देवताओंने असुरोंका पराजय किया। असुर लोग अपनी रक्षाके लिए भृगु ऋपिकी पत्नोकी शरणमें गये, उसने असुरोंको अमयप्रदान किया और निर्भय होकर वे रहने लगे। भगवान्को जब यह मालूम हुआ तव उन्होंने क्ुद्ध होकर अपने चक्रसे मृगुपत्नीका माथा काट डाला। अपनी पल्नीका शिरश्छेद देखकर भृगुने विष्णुको सहसा शाप दिया कि अरे विष्णु । तुमने मेरी पत्नीका वध किया है, इसलिए तुम मनुष्ययोनिमें जन्म पाकर अपनी पत्नोके वियोगमें अनेक वर्पतक दुःख भोगोगे। परन्तु भगवान्की अमोघशकतिसे वह शाप भगवान्को नहीं लगा, चल्कि वापस आकर भृगुको ही सताने लगा। जव उन्होंने इस शापसे अत्यन्त दुःखी होकर शापसे भुक्त होनेके लिए अन्य ऋषियोंकी प्रार्थना की तव उन्होंने विष्णुकी उपासनाके लिए सलाह दी। सलाइके अनुसार भृगुने विष्णुकी उपासना की। फलतः भगवान् प्रसन्न हुए और कहा कि हे भृगु, तुम दुःखी मत होओ, तुम्हारा दिया हुआ शाप मैं वापिस ले लेता हूँ और तुम्हारे शापकी सत्यताके लिए में मनुष्य भी होऊँगा और पत्नोवियोगका कष्ट भी सहन करूँगा। तव भृगुने अनेक प्रकारसे भगवान्की अर्चना और स्तुति की। इस प्रकार शापकी रक्षाके लिए भगवानने नर बनकर यह सब अभिनय किया, यह भाव है। + 'एष त आत्मा सर्वान्तर्याम्यमृतः, एष सर्वेश्वरः, न तत्समश्राभ्यधिकक्ष दृश्यते, सोऽध्वन: पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्' (यही तुम्हारा आत्मा अमृत (नित्य) और। सवका अन्तर्यामी है, यही सबका नियामक है, इस आत्माकी वरावरी करनेवाला और इससे अधिक दूसरा नहीं है, निर्गुणोपासक संसारसे तर जाता है, वही परमपद है) इत्यादि श्रुतियोंसे 'नारायणात् ब्रह्मा जायते, अन्तर्वहिश्व तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः' (नारायणसे ब्रह्मा हुआ, वाहर और भीतर सवको व्याप्त करके नारायण अवस्थित है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे सिद्ध ईशवरमें नित्यमुक्तत्व आदि धर्म सुने जाते हैं, यह भाष है।

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भुक्तके स्वरूपका विचार ] भापातुवादसहितं ५४१

पक्षोडयं चरमः साधुः सूत्रभाष्यादिपु स्फुटः। आविर्भूतस्वरूपेऽपि गुणाष्टकनिरूपणात् ॥१९। यह अन्तिम पक्ष दी श्रेष्ठ है, क्योंकि सूच, भाष्य आदिमॅ इसीकी स्पष्टता पाई जाती है, रगुण अपरोक्ष वसानुभवसे ईश्वरस्वरूपमें आर्विभूत जीवमें आठ गुणोका निरूपण किया गया है ।। १९ ।। अयमेव पक्ष: श्रुतिसूत्रभाष्याद्यनुगुणः। तथा हि-समन्याध्याये तावद् 'दहर उत्तरेम्य:' (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० १४) इत्य- धिकरण 'अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोडस्मिन् अन्तराकानः' इत्यादिश्रुतिनिदिप्टो दहराकाशो न भूताकाशः, नापि जीवः, किन्तु परमेश्वरः, उत्तरेभ्यो वाक्यशेपेभ्यः। 'उभे अस्मिन् द्यावा- प्रथित्ी अन्तरव् समाहिते' 'यावान्वा अयमाकाशस्तावानेपोऽन्तर्हृदय आकाशः' 'एप आत्माऽपहृतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपि- पासः सत्यकामः सत्यसङ्धल्पः' इत्यादिना प्रतिपाद्यमानेभ्यो द्यावा- प्रथिच्याद्याधारत्वलक्षणगुणेभ्यो हेतुम् इति निर्णीय 'उत्तरा्चेदाविर्भूत यदी पक्ष श्रति, सूत्र और भाप्य आदि सम्मत है-क्योंकि समन्वया- ध्यायम 'ददर उत्तरेभ्यः' इस अधिकरणमं 'अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वश्म० इत्यादि श्रुतिमें उक्त दहराकाश भूताकाश नहीं है, और जीव भी नहीं है, किन्तु परमेश्वर ही है, 'उमे अस्मिन् दावापृथिवी' (इस प्रकृत दद्दराकाशमं अन्तः धुलोक और पृथ्वी स्थित हैं) 'यावान्वा०' (यह जितना बड़ा याहरका भूताकाश है उतना ही बड़ा हृदयके भीतर दहराकाश है) 'एप आत्मा०' (आत्मा पापसम्बन्धसे रहित है, जरासे रहित है, मृत्युसे रहित है, शोकसे रहित है, भोजनेच्छासे रहित है, पिपासासे रहित है, आत्मा सत्यकाम और सत्यसद्करप है) इत्यादि श्रुतिसे प्रतिपादित धु, पृथ्वी आदिके प्रति आश्रयत्व प्रंभृति मुणरूप हेतुओंसे दहराकाशसे परमात्माका ही ग्रहण+ है, ऐसा निर्णय करके * अख्षकी उपलब्धिमें देनुभूत जो यद शरीर है उसमें छोटे आकारका जो पुण्डरीक है, उसके भीतर ददर आकाश है, यह इस थुतिका अर्थ है। और 'ददर उत्तरेभ्यः' इस सूश्नसे, ददराकादा शब्दसे परमात्मा ही लिया जायगा, किससे उत्तरके वाक्यशेषोंसे, इस प्रकारा जो अर्थ होता है, उसीका ही इस अग्रिम ग्रन्थसे कथन है। + कारण कि ददराकाशशब्दसे यदि भूनाकाश लिया जाय, तो उसमें सत्यसङ्क्पत्व

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५४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह iचतुर्थ परिच्छेद

स्व्ररूपस्तु' (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० १९) इति सूत्रान्तरेण दुहरविद्यानन्तरमिन्द्रप्रज्ञापतिसंव्राढे 'य आत्माऽपहृतपाप्मा' इत्यादिना,

'उत्तराचदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इस प्रकारके अन्य सूत्रसे-वहरविद्याके वादके इन्द्रमजापतिके संवादमें 'य आत्माऽतपहृतपाप्मा'X (नो आात्मा हे, वह पाप- रहित है) इत्यादि अ्रुतिसे अपहतपाप्मत्व आदि गुणोसे युक्त उपदेष्टव्य आत्माक्ा- प्रस्ताव करके 'य एमोऽक्षिणि' (जो साँखमें पुरुष देखा जाता है, वही तुम्हारा-

आदि गुगोंकी अनुपपत्ति होगी। चदि जीव लिया जाय, तो उसमें पृथ्वी आदि जगरूच साधारत्व नहीं सा सकता है, अतः दहराकाश परमात्ना ही है, ऐसा निर्णय होता है, यह मात है। ै. इस सूत्रका यह सर्य है-उत्तरात् अ्यांत 'य एपोऽव्िणि' इत्यादि उत्तरके प्रजापि वाक्यमे अपहततपाम्मत्वादि गुणवाला जीव्व ही होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकिटस. तरनाकयनें नविभूतत्वरूवालेअपने त्रह्मस्वरूपको आ्ाप हुए जीवका ही कयन है, जीवत्वविशिष जीवका नहीं, अतः अपहृतपाप्नत्वादिविशिष परमातसल् ही है, जींव नहीं है, इससे दहराकाश जीन नहीं हो सकता, यह अथ है। X इन्त्र और विरोचन प्रजापतिके पास सातवनकी इच्छाये गये, तस समवके चे प्रजापतिक वाक्य हैं (छान्दोग्य ८-७-४ ) और ये वाक्य 'अपहृतपाप्मा' इत्यादि वाक्यसे पूछे गये आठ गुणोंसे युकत उपनेश्य आत्नाके उत्तररूपने कहे गये हैं, इसलिए आठ गुणोंसे युक्त ाता जीव ही प्रतीव होता है। यह स्यालमें रखना चाहिए कि इस ग्रन्यका दूर-तक सम्बन्ध है, इसमें पर्यायशब्द जो आये हुए हैं, उनका वर्थ-प्रकार या दरीक्ा, अयदा एक आतलप अथके बोधक वाक्य-करना चाहिए, सर्यात चार प्रकारसे मालाक बोध कराने के लिए प्रजापति द्वारा उक्त वाक्य, यह नूलप्रन्यने 'पर्याच' श्ब्दका अर्य होगा। ससुदिव. प्रन्यका तालय यह है करि 'य एपोऽक्षिणि' इत्यादि वाक्योंसे अपहृतपाम्मत आदि गुणोसे युक्त जीव भी प्रतीत होता है, इसलिए अपहृतपाम्मत् आदि आठ गुग दहराकाशनें परमेशवरके निर्णायक नहीं हो सक्ते है। यदि कयवविद् कहें कि प्रजापतिके चार वाक्योंनें से प्रथम वाक्यमें. नाप्रदवत्याक्ा वोवक कोई पढ नहीं है, अतः प्रजापतिके नार पर्थ्चायोंका तात्यें जीनके बोधनमें नहीं हो सकता है, इसलिए प्रजापतिके प्रथम वाकयसे परनाराक्ा ही प्रतिपादन हैं, तो यह भी चुश्त नहीं है, क्योंकि प्रच्ेक वाक्योंने पहले 'एवं लेब से भूयोऽनु- व्याख्यात्यानि' (इसी आताका [नाग्रदादि अवस्थापनन जीवका] फिर मुझ्े दपदेश करता हूँ) इस वाक्यकरे होनेसे प्रन्योकत चार प्रकारके श्रुतिवाक्योंसे जीवका ही प्रतिमादन है, इस प्रकारक्ी माशद्ा करके इस वट्ाका समाधान करते हुए सूत्रकारने 'उत्तराचेद निर्भूतत्वरूपस्तु' इस सत्रसे युक्त पुरुषकी इंशरभावापति स्पषूपसे बतलाई है।

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मुकके स्वरूपका विचार] भापानुवादसहित ५४३

पुरुपो दृश्यते एप आत्मा' इति जाग्रदवस्थायां द्रष्टृत्वेनाऽक्षिसन्निहितस्य य एप स्वप्ने महीयमानश्वरति एप आत्मा' इति स्वप्नावस्थापन्नस्य 'तद्यत्रैतत्सुप्तस्समस्तस्सम्प्रसन्न: स्वप्नं न विजानाति एप आत्मा इति सुपुप्त्यवस्थापन्नस्य 'एप सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाडभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुपः' इत्यवस्थात्रयोत्तीर्णस्य च जीवस्योपदेशाद् जीवेऽप्यस्ति अपहतपाप्म- त्वादिगुणाष्टकमिति न तद् दहाराकांशस्य परमेश्वरत्वनिर्णायकम्, "य एप स्वप्ने' इत्यादिपर्यायेपु प्रतिपर्यायम् 'एतं त्वेव ते भूयोऽनु-

आत्मा है) इस ख्ुतिसे जागदवस्थामं द्रष्टारूपसे अक्षिसन्निहित जीवका, 'य थप स्वप्ने०' (जो यह स्वप्रमं वनिता आदिसे पूज्यमान होकर विपयोंका अनुभव करता है, वह आत्मा है) इत्यादि श्रुतिसे स्वमावस्थापन्न जीवका, 'वदत्रैतत्सु- सम्समस्त:'जिस कालमं यह जीव सुपुप्तिको प्राप्त होता है और इसके समस्त करणोंका समुदाय विलीन हो जाता है, तब अपने स्वरूपभूत आनन्दमें मझ होकर सवमको भी नहीं देखता है, वही आत्मा है) इस प्रकारकी श्रुतिसे सुपुप्त्यवस्थापन्न जीवका और 'एप सम्प्रसादो०' (सुपुप्ति अवस्थासे उपलक्षित जीव शरीरसे उत्क्रमण करके देवयान मर्गको पा कर अपनी उपासनाके फलभूत ऐशयसे युक्त स्वरूपको प्राप्त करता है) इत्यादि श्रुतिसे अवस्थात्रयसे रहित जीवका उपदेश होनेसे जीवमें भी अपहृतपाप्मत्व आदि आठ गुण विधमान हैं, सतः वह गुणाष्टक दहराकायमें परमेश्वरत्वका निर्णायक नहीं हो सकता है, क्योंकि 'य+ एप स्वप्ने' इत्यादि पर्य्यायोंके प्रत्येक पर्य्यायमें 'एतं त्वेव भूयोऽनु- क दम्र साय्यका पूर्वपक्षकी रीतिये ब्रदालोकमें गया हुआ. उपासक, जीव उत्तमपुरष अर्थात् अपद्तपापात्व आदि गुर्णोवे युक्त होता है, यह अर्थ समझना चाहिए। * तात्पर्य यद है कि प्रजापतिवाकयमें चार पर्यायोंका सर्वथा जाग्रद् आदि अवस्थापन जीवमें वात्पर्य नहीं है, क्योंकि प्रथम परथ्यायमें किसी जाप्रदवस्थापनन जीववाची पदके न हेनेसे वह जामदवस्थापत जीवका घोधक नहीं हो सकता है। इसलिए प्रथम पय्यायसे इन्द्र और विरोचन द्वारा अपदतपाप्मत्वादि गुणोंसे युक्त जिस आत्माके विपयमें प्रश्न किया जाता है, वही आत्मा निदिष्ट है, और वह वरता है, इसलिए प्रजापतिवाक्यमें भी आठ गुणोंसे संयुकत ब्रह्मका ही उपदेश किया गया है, जीवका नहीं, अतः यद आशक नदीं दो सकती है कि गुणाष्टक ददराफादमें परमेश्वरत्का निर्णायक नदीं है, इस मध्यवर्ती पासाका इससे परिदार करते हैं।

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५४४ सिद्धान्तलेश संग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद

व्याख्यास्यामि' इति श्रवणेन स्फुटस्व्रप्नादिजीवलिङ्गानां द्वितीयादि- पर्यायाणामेव जीवविपयंत्वम्, प्रथमपर्यायस्य च त्रह्मविपयत्वमिति चोदानवकाशादित्याशङ्कय तत्र चतुर्थपर्याये निरूप्यमाणः सकलबन्ध- विनिर्मुक्तत्वेनाSSविर्भूतस्वरूपो जीव: प्रतिपाद्यः। न तु सांसारिकावस्था- व्याख्यास्यामि' (इसी आत्माका पुनः व्याख्यान करता हूँ) ऐसा श्रवण होनेसे-जिनमें स्वम्न आदि जीवलिक्क स्पष्टरूपसे प्रतीत होते हैं, ऐसे द्वितीय आदि पर्यायोंका ही जीव विषय है और प्रथम पर्य्यायका ब्रह्म विषय है, इस प्रकारके प्रश्नका-अवकाश नहीं है, ऐसी आशक्का करके 'उन चार पय्यायोंमें से चतुर्थ पर्य्यायमें निरूप्यमाण सम्पूर्ण सांसारिक वन्घनोंसे विनिर्मुक्त अपने स्वस्वरूपमें आविर्भूत जीव ही प्रतिपाद्य है, सांसारिक अवस्थाविशेषसे कलुषित जीव प्रतिपाद्य नहीं है, क्योंकि सांसारिक आत्मामे * सत्यसङ्कलपत्व

पूर्वपक्षीका यह भाव है कि द्वितीय आदि जो पर्य्यायवाक्य हैं, वे जीवपरक ही हैं, ऐसा तो निश्चित ही है। इसी प्रकार प्रथम पर्य्यायवाक्यका भी जीवको ही विषय मानना चाहिए, क्योंकि प्रथम पव्यायमें निर्दिष्ट आत्माका ही 'एतं त्वेव' इत्यादि वाक्यस्थित सर्वनाम 'एतत्' शब्दसे परामर्श होनेसे अर्थभेद माननेपर एतत्शब्दकी अनुपपत्ति होगी। इसीसे यह प्रइन भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि प्रथम पर्यायकी विपयता चक्षुःस्थ प्रतिविम्त्रमें है, और वह दृश्यमान भी है, क्योंकि द्वितीय पर्थ्यायगत एतत्शव्दसे प्रथमपयायमें ही निरदिष्ट अक्षिस्य पुरुषके अमृतत्व, अभयत्व, त्रह्मत्व आदिका कथन है, और इन सवकी प्रतिविम्बमें उपपत्ति नहीं हो सकती है। यदि शङ्का हो कि उन गुणोंकी जीवमें भी उपपत्ति नहीं हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जाप्रद् आदि अवस्थापन्न जीवमें उक्त गुण यद्यपि नहीं रह सकते हैं, तथापि उन अवस्थाओंसे रदित जीवमें उक्त गुण हैं, ऐसा प्रजापतिवाक्यसे प्रतीत होता है। * यदि शङ्ठा हो कि चौथे पय्यायमे भी प्रथमके तीन पर्व्यायोंके समान संसारी आत्माका पंतिपादन क्यों नहीं होता है, क्योंकि चतुर्थ पर्य्यायमें भी 'शरीरात् समुत्थाय' इससे शरीरसे उत्कान्तिसे युक्त संसारीकी स्पष्टरूपसे प्रतीति होती है, तो इस शङ्ाके परिहारके लिए 'उत्तरा- च्चेत्' इत्यादि सूत्रमें स्थित तुशब्दकी व्याख्या द्वारा इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। तात्पर्य यह है कि यदि चतुर्थ पय्यायमें भी संसारी आत्माका निरूपण होगा, तो इन्द्र द्वारा पूछे गये अपहत- पा्मत्वादिगुणविशिष्ट आत्माका प्रजापतिन उपदेश नहीं किया, यही सिद्ध होगा। इससे प्रजापति- वाक्य प्रतिवचन ही नहीं होगा, इसलिए चतुर्थ पर्य्याय उक् गुणोसे युक् मुक्त जीवपरक है, यही कहना चाहिए। यदि शद्ठा हो कि पूर्वपक्षीकी उकतिसे सगुणविद्यासे व्रह्मलोकमें गये हुए जीवमें अपहृतपाप्मत्व आदि आठ गुण रह सकते हैं, अतः चतुर्थ पर्य्याय आत्यन्तिक मुक्त जीवपरक नहीं है, तो यह भी युक नहीं है, क्योंकि सगुणविद्यासे आत्यन्तिक अविद्याकी

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मुक्तके स्वरूपका विचार] भापातुवादसहित ५४५

भेदकलुपितः, तत्र सत्यसङ्कल्पत्वादिगुणवाधात्। अवस्थात्रयोपन्यासस्य अत्तदवस्थादोपाभिधानेन चतुर्थपर्यायोपदेशशेपत्वप्रतिपत्तेरिति समादधानः सूत्रकारथ्रतुर्थपर्याये प्रतिपाद्यस्य मुक्तस्येश्वरभावापतति स्पष्टमाह। तदभावे

आादि गुणोंका बाघ है। और तीन अवस्थाओंके बोधक तीन्र पर्य्यायोंका इसलिए उपन्यास किया गया है कि तत्-तत् अवस्थाओंके दोषोंके अभिधान द्वारा उन तीन पर्य्यायोंमें चतुर्थ पर्थ्यायके उपदेशकी अऋ्ञत्वप्रतिपत्ति हो, इस प्रकारसे समाधान + करनेवाले सूत्रकारने चतुर्थ पर्य्यायमें प्रतिपाद्य मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापति स्पष्ट रीतिसे बतलायी है। मुक्तपुरुषकी यदि ईश्वरभावापत्ति न हो, तो मुक्तमें मी सत्यसङ्कल्पत्व

निवृत्ति न होनेसे निरकुश अपहृतपाप्मत्व आदि रह नहीं सकते और प्रजापतिवाक्यका निर्गुण ब्रह्ममें तात्पर्य सविस्तर वतलाया गया है, अतः निर्गुण ब्रह्मको जाननेवाले पुरुषमें उत्कान्ति आदिका सम्भव नहीं है, यह भाव है। इसलिए इस तात्पर्यके अनुसार 'शरीरात् समुत्याय' इत्यादि अ्रतिका यह अर्थ है-शरीरसे समुत्यान करके अर्थात् तीन शरीरोंसे विलक्षण सवम्पदके लक्ष्यका निर्णय करके परव्रह्मरूप ज्योतिका साक्षात्कार कर अपने स्वरूपको प्राप्त होता है, यह भाव है। • यदि शङ्ठा हो कि चतुर्थ पर्य्याय ही यदि जिज्ञासित आाठ गुणोंसे युक्त आात्माका प्रतिपादन करता है, तो पूर्वके तीन पर्य्याय निरर्थक ही होंगे ? तो इस शङ्गाका परिहार इस ग्रन्थसे करते हैं, तात्पर्य यह है कि, जाप्रदवस्थामें अन्घत्व आदि दोपोंके कथनसे, स्वप्नावस्थामें रोदन आदि दोपोंके अभिधानसे और सुपुप्तिमें अपने आपका और दूसरेका ज्ञान न होना आदि दोपोंके अभिधानसे तीन अवस्थाओंसे कलुपित लोकसिद्ध जीवके स्वरूपकी हेयताके वोधन द्वारा ठीक ठीक अधिकारी जिज्ञासुके वास्तविक स्वरूपका बोध करानेके लिए चतुर्थ पर्य्यायकी प्रवृत्ति है, ऐसा ज्ञात होता है, अतः पूर्व पर्ष्याय चतुर्थ पर्य्यायके अप्ञ हैं, ऐसा प्रसीत होता है, इसलिए पूर्व पर्याय व्यर्थ नहीं है, यह भाव है। + अपहृतपाम्मत्वादि आठ गुण दहराकाशमें नहीं रह सकते, क्योंकि प्रजापतिके वाक्यसे ये आठ गुण जीवमें भी हैं, अतः व्यभिचार होगा। इस प्रकारकी आशङ्ठा करके समाधान किया है कि प्रजापतिवाक्यसे मुक्त जीवमें ही आठ गुणोंका प्रतिपादन होता है, सांसारिक जीवमें नहीं, अतः उक्त आठ गुणोंकी सत्ता परमेश्वरसे अन्यत्र नहीं है, जिससे कि व्यभिचारकी शाद्ठा की जाय, यह भाव है। # तात्पर्य यह है कि कदाचित् मुकत पुरुपकी ईश्वरभावापत्ति न मानी जाय, तो बद्ध जीवके समान मुक्त जीवमें भी, जो उपाधियोंसे रहित है, सत्य-सङ्ल्पत्व आदि गुणोंका योग नहीं दोगा, इस प्रजापतिवाक्यमें आठ गुणोसे युक्त आत्माका निरूपण ही नहीं हो सकेगा, अतः

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५४६ सिद्धान्तलेश संग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

मुक्तेऽपि सत्यसङ्कल्पत्वाद्ययोगाद्, अनुक्रान्तस्य गुणाष्टकस्य ईश्वरादन्य- त्रापि भावे कृतशङ्कापरिहारालाभाच्च। तस्मिन् सूत्रे 'तस्मादविद्याप्रत्यु पस्थापितमपारमार्थिकं जैवं रूपं कर्तृत्वभोक्तृत्वरागद्वेपादिदोषकलुपितमने-

आदिका अयोग होगा, और यदि उपक्रममें श्रुत आठ गुणोंकी ईश्वरसे अन्यत्र भी सत्ता मानी जायगी, तो की गई शङ्काका परिहार भी नहीं हो सकेगा। और उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इस सूत्रमें भाष्यकारने भी 'जीवब्रह्माभेद ही वास्तविक है' इससे अविद्याप्रयुक्त अपारमार्थिक कर्तृत्व, भोक्तृत्व, राग, द्वेष आदि दोषसे

प्रजापतिवाक्यके आधारपर ईश्वरभावापत्ति द्वारा ही आठ गुणोंसे युक आत्माका अभिधान है, यह सूत्रकारका तात्पर्य स्पष्ट है, यह भाव है। + तात्पर्य यह है कि यदि शङ्का की जाय कि जीव और ईश्वरका वस्तुतः भेद होनेसे मुक्त जीवमें ईश्वरतादात्म्य नहीं हो सकता, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जो यह शङ्का हुई थी कि गुणाष्टकके जीवसाधारण होनेसे इश्वरका वह असाधारण ध्म नहीं है, अतः वह गुणाष्टक दहराकाशके ईश्वरत्वमें प्रमाण नहीं हो सकता है। इस शङ्ाका 'उत्तराच्चेद' इत्यादि सूत्रसे उस आत्माकी ईश्वरभावापत्ति द्वारा ही समाधान किया गया है, उसका विरोध होगा। इस विषयमें शाङ्का होती है-मुकतकी इश्वरभावापत्तिमें क्या प्रमाण है? 'उत्तराघ्वत्' इस सूत्रभागसे की गई शङ्काके परिधरका अलाभ प्रमाण है, अथवा प्रजापतिवाक्य? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि मुक्तका विम्वभूत ईश्वरभावापत्तिके विना यदि केवल चतन्यरूपसे भी अवस्थान माना जाय, तो ईशवरसे अन्यत्र सत्ताके न होनेसे उक्त आठ गुण जो केवल ईशवरमें ही असाधारणरूपसे वर्तमान हैं, दहराकाशमें ईश्वरत्वके निर्णायक हो सकते हैं। द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि निगुण विद्याके प्रतिपादक प्रजापति- वाक्यमें गुणोंकी विवक्षा न होनेसे मुक्त जीवमें भी गुणाष्टकका सम्बन्ध प्रतिपादित नहीं हो सकता है। और ज्ञेय ब्रह्ममें उन गुणोंका असम्वन्ध है, ऐसा आनन्दमयाधिकरणमें भी प्रति- पादन किया गया है। इसीसे वेदान्तसिद्धान्तमें ज्ञेयब्रह्मप्रतिपादक वाक्योंमें अखण्डार्थता मानी जाती है, जो,अखण्डार्थता संसर्गको विषय न करनेवाली प्रमितिके प्रति जनकरूप है। इसलिए प्रजापतिवाक्यके उपक्रममें सुने गये सत्यसङ्कल्पत्व आदि-वृहदारण्यकके छठे अध्यायमें सर्वेश्वरत्व आदि गुण जैसे ब्रह्मकी प्रशंसाके लिए वतलाये गये हैं वैसे ही- ब्रह्मकी प्रशंसाके लिए ही हैं अथवा उपलक्षणमात्र हैं, दहरविद्यामें श्रुत गुणोंके समान प्रतिपाद्य नहीं हैं, अतः भाष्यकी भी उपपत्ति हो सकती है, यह अधिक समझना चाहिए। इससे तथोक्त श्षति, सूत्र और भाष्य मुककी ईवरभावापत्तिमें प्रमाणरूपसे नहीं दिखलाए जा सकते हैं, यह इस पक्षमें अस्वरस है, अतः इसी अस्त्ररससे 'अविरोधाध्यायेऽपि' इत्यादि अन्यका उपकम है।

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मुकके स्वरूपका विचार] भापानुवादसहित कानर्थयोगि तद्विलयनेन तद्विपरीतमपहतपाप्मत्वादिगुणकं पारमेश्वरं रूपं विद्यया प्रतिपद्यते' इति भाष्यकारोऽप्यतिस्पष्टं मुक्तस्य सगुणेश्वर- भावापततिमाह।

निवारयन्िरग्रेऽपि विम्त्रभावमर्दशनात् ॥ २०॥ यदि इंश्वरंय जीवफी ईश्वरभावापत्ति मानी जाय, तो ईश्वरमें भी जीवके दुःख आदिकी परसकि से जायगी, इस पूर्वपक्षका समाधान करते हुए श्रीसूत्रकार आदिने मुछ तीयकी विभ्यभृत ईश्वरभावापत्तिके स्वीकार द्वारा समाधान किया है॥ २०॥ अविरोधाध्यायेऽपि 'एप सेव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेम्य उन्निनीपन एप उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनापत' इत्यादिश्रुतेस्तत्तत्कर्मकर्तृत्वेन तच्तत्कर्मकारयितृत्वेन च उप-

नावनारिते 'अंशो नानाव्यपदेयात्' (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३) कनुपिन जो अनेक अनर्थोसे सम्बन्ध रखनेवाला जीवका स्वरूप है, उसका विलय हो जानेसे तद्विपरीत अपहृतपाप्मत्वादि गुणवाले परमेश्वरस्वरूपको विद्यासे प्राप्त करता है, इस अ्रन्थसे स्पष्टरूपतया मुक्तमें सगुण ईश्वरत्व बतलाया गया है। अविरोधाध्यायमें 'ाप ऐोवर साधु कर्म कारयति०' (ईश्वर जिसको ऊपरके लोकमें चदाना चाहता है, उसीसे मच्छा कर्म कराता है और जिसको नीचेकी और ले जाना चाहता है उसीसे असत् कर्म कराता है) इस श्ुतिसे तत्- तत कमोंके कतृत्व और तत्-तत् कर्मोंके कारयितृत्वभावसे उपकार्य और उप- फार करूपसे ज्ञात जीव और ईशवरके अंशाशिभावरूप सम्बन्धका निर्णय करनेके लिए अवतारित + 'अंशो नानाव्यपदेशात' इस अधिकरणमें भाष्यकारने भी •अनिरोषाध्याययब्दपे महसूत्रका द्वितीय अध्याय लेना चाहिए, क्योंकि प्रथमाध्यायमें जिग्र पदार्थका निरुपण किया गया है, उसके साथ अन्य प्रमाणोंके विरोधका परिद्वार दितीयाधयागमें दी किया गया है। इस अविरोधाध्यायमें भी समाहित शहताप्रन्यसे भाष्यकारने सुकफो ऐसरभावापति स्षरूपये चतलायी है। दस प्रकार इस समुदित ग्रन्थका सार है गह् सममना नादिए। 1 जीन ईवरका अंश-अयगव है, क्योंकि नानात्वका-मेदका-यत्र तन् उपदेश- प.पन-देयद एस सूचके इस भागका अर्थ है। सम्पूर्ण सूत्र-'अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा नाषि कयिसत्वादित्य मधीयत् एक इतवा बदा है।

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५४८ सिद्धान्तलेश सँग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद

इत्यधिकरणे 'जीवस्येश्वरांशत्वाभ्युपगमे तदीयेन संसारदुःखभोगेन ईश्वर- स्यापि दुःखित्वं स्यात्। यथा लोके हस्तपादाद्यन्यतमांशगतेन दुःखे; नांशिनो देवदत्तस्यापि दुःखित्वम्, तद्वत्। ततश्च तत्प्राप्तानां महत्तरं दुःखं प्राप्नुयात्, ततो वरं पूर्वावस्था संसार एवास्त्विति सम्यग्ज्ञाना- नर्थक्यप्रसङ्ग:' इति श्ञङ्काग्रन्थेन भामत्यादिपु स्पष्टीकृतं विम्बप्रति- विम्वभावकृतासङ्करमुपादाय समाहितेन भाष्यकारो मुक्तस्य ईश्वरभावा- पर्ति स्पष्टीचकार। पराभिध्यानतः सत्यकामत्वादितिरोहिते: । नाशे सुक्तौ पुनस्तेपामाविर्भावस्य चेरणात् ॥। २१ ।। ईश्वरके बार वार अभिध्यानसे-संसारदशामे जो सत्यकामत्व आदि तिरोहित धर्म हैं, उनके तिरोधानंका विनाश होनेपर सुक्तिमें उन गुणोंका पुनः-आविर्भाव होता है, ऐसा साधनाध्यायमें कहा गया है, इससे भी सुक्तकी ईश्वरभावापात्ति मानी गई है॥२१॥

निश्न लिखित शक्काग्रन्थसे, जिसका कि भामती आदि निवन्धोंमें स्पष्टरूपसे- बतलाये गये विम्बप्रतिबिम्बभावकृत असङ्कर्यका ग्रहण करके ही समाधान किया गया है, मुक्तकी ईश्वरभाचापत्तिका ही विशदीकरण किया है। भाष्यका वह शङ्कागन्थ इस प्रकार है-'जीवको ईश्वरका अंश माननेपर जीवके सांसारिक दुःखके उपभोगसे अंशीरूप ईश्वरको भी दुःखका उपभोग वैसे ही प्रसक्त होगा, जैसे कि लोकमें हाथ, पैर आदि किसी अंशके दुःखित होनेपर अंशी देवदत्त भी दुःखित होता है। इससे ईश्वरभावको प्राप्त हुए जीवोंको बड़ा दुःख प्रसक्त होगा, इससे ईश्वरप्राप्तिकी अपेक्षा पहलेसे अवस्थित संसार ही उचित है, इस बुद्धिसे ईश्वरप्राप्तिके उपायभूत सम्यकज्ञानमें कोई भी प्रवृत नहीं होगा, इससे सम्यकूज्ञान निरर्थक हो जायगा।

  • भामतीमें साङ्डर्यका परिहार इस आशयसे किया गया है, अविद्यामें प्रतिविम्व जीव ही ईश्वरके अंशरूपसे कहे गये हैं, हाथ, पैर आदि अवयवोंके समान अवयवत्वरूपसे नहीं, वैसे ही ईश्वर भी विम्वरूपसे अंशी कहा गया है, अवयवित्वरूपसे नहीं, प्रतिविम्ब और बिम्बके धर्मोंका लोकमें परस्पर साङर्य नहीं देखा जाता है, अतः जीवके दुःखका ईधवरमें प्रसन्न नहीं है।

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सुक्तके स्वरूपका विचार] भापानुंवादसहित ५४९

साधनाध्यायेऽपि 'सन्ध्ये सृष्टिराह हि' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १) इत्यधिकरणे स्वमन्नपश्चस्य मिथ्यात्वे व्यवस्थापिते तत्र मिथ्या- भृते स्वमप्रपश्चे जीवस्य कर्तत्वमाशङ्य 'पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो हास्य चन्धविपर्ययो (उ० मी० अ० ३ पा०२ सू० ५) इति सूत्रेण

मिति न तस्य स्वमप्नपश्चे स्रप्टृत्वं सम्भवति' इति वदन् सूत्रकार:, तत्पु- नस्विरोहितं सत् परमभिध्यायतो यतमानस्य जन्तोर्विधृतच्वान्तस्य तिमिरतिरस्कृतत्वे क्छक्तिरोपधवीर्यादीश्वरप्रसादात्संसिद्धस्य कस्यचिदेवा- विर्भनति, न स्व्रभावत एव सर्वेपां जन्तूनाम्' इति तत्सूत्राभिप्रायं चर्णयन् साधनाध्यायमें भी''सन्ध्ये सृष्टिराह हि' इस अविकरणमें स्वम्प्रपञ्चके मिन्नात्वके व्यवस्थित होनेपर उस मिथ्याभून स्वसके प्रति जीवकी कर्तृताकी आशका करके+ 'पराभिध्यानाव्०' इस सूत्रसे-'जीव ईश्वरसे अभिन्न है, इसलिग वर्द्यपि उसमें सत्यसकल्पत्व आदि विद्यमान हैं, तथापि वे अविद्यादोपसे तिरोहित हैं, इसलिए जीव सवमका सष्टा नहीं हो सकता है'-इस प्रकार कहते हुए सूत्रकारने और 'यद्यपि वह सत्यसऋ्ल्पत्व आदि तिरोहित है, तथापि परमात्माकी उपासनामें प्रयव्शील किसी जीवविशेषको-तिमिररोगसे तिरस्कृत लोचनशक्ति औपधके प्रभावसे जसे प्राप्त होती है, वैसे ईश्वरके प्रसादसे अवियाके विनष होनेसे सत्यसकल्पत्व आदिका आविर्भाव होता है, स्वभावतः X सब प्राणियोंमें उसका आविर्भाव नहीं होता, इस क पाधनाप्यायमें अर्थात् महाविद्याके साधनीभूत वैराग्य आदिका प्रतिपादन करनेवाले नृतीय अध्यायमें सूपकारमे और उसके अभिप्रायका वर्णन करते हुए भाष्यकारने भी मुच पुध्यको ईवरमायापति बतलाई दे। इस प्रकार संक्षेपमें इस समुदित अ्न्यका भाव है। जप्रत, और नुमुसिक गरन्धिस्थानमें अर्थात्त स्वप्स्थानमें र्यादिसष्टि सत्य ही हो सकती है, क्योंकि 'अथ रथान' हत्यादि श्रुति उसके रात्यत्वमें प्रमाण है, यह सूत्रका आशय है। सृत्सकी आरहा करके अर्धोत् जिय्य प्रकारसे अमिके अंशभूत विस्फुलिसमें अग्निके समान दादकत्वशकि है, उस्री प्रकार परमेशरका अंश जीव भी स्वप् आदि सृष्टिमें प्रगोनक सत्यसक्जपतव आदि यामर्थ्ययुक्त है, अतः जीव स्वप्नसृष्टिका कर्ता हो सकता है, इस प्रफारफी आशदा करके, यह भाव है। : दय सूझफा तात्पर्य मूलमें दी रपष दे। x अर्थात् वैराग्य आदि साधनोंके बिना नहीं होता है, यह भाव है।

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५५० सिद्धान्तलेशसंग्रह [चंतुर्थ परिच्छेद

भाष्यकारथ्र मुक्तस्य स्वमसृष्ठ्ाद्युपयोगिसत्यसङ्कलपत्वाद्यभिव्यक्त्यङ्गी- कारेण परमेश्वरभावापत्ति स्पष्टीचकार। ब्राह्मचैतन्यमान्नत्वांविरोधस्य च कीर्तनात्।

ब्राह्म सत्यसङ्कल्पत्वादि धर्म और चतन्यमान्रत्व-इन दोनोंमें अविरोधका कथन होनेसे 'बिम्ब ईश और प्रतिबिम्ब जीव है' यह मत ठीक है और यह अविरोध माया- प्रतिविम्ब ईश है, इस मतमे और एक ही जीव है इस मतमें समज्त नहीं है॥। २२॥। फलाध्यायेऽपि 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इति सुच्यमानविपयायां श्रुतौ 'केन रूपेणाभिनिष्पत्तिविवक्षिता' इति वुभुत्सायाम् 'ब्राह्मेण जैमिनि- रूपन्यासादिभ्यः' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० ५) इति सूत्रेण त्राह्मं

प्रकारसे सूत्रके अभिप्रायको कहते हुए भाष्यकारने भी मुक्त पुरुपकी स्वम- सृष्टि आदिमें उपयोगी सत्यसक्कल्पत्व मादिकी अभित्यक्तिके अङ्गीकारसे परमे- श्वरभावापत्ति स्पष्टरूपसे वतलाई है। फलाध्यायमें भी 'स्वेन रूपेणाभिनिप्पद्यते' (अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है) इस प्रकारकी मुक्त पुरुषको अवलम्बन करनेवाली श्रुतिमें 'किस स्वरूपसे अभिव्यक्ति विवक्षित है' । इस प्रकारकी विशेष जिज्ञासाके होनेपर 'व्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः' इस सूत्रसे जमिनि मुनि कहते हैं-मुक्त पुरुषकी न्राह्मरूपसे अर्थात् अपहतपाप्मत्व आदिसे लेकर सत्यसङ्लपत्व- पर्यन्तरूपसे और सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व आदिरूपसे अमिनिष्पच्ि होती

फलाध्यायमें भी अर्थात् जिसमें मुक्तिरूप फलका चर्णन किया गया है, ऐसे ब्रह्मसूत्रके चतुर्थ सध्यायमें- क्या सुकत पुरुष सवज्त्व, सर्वेश्वरत्व आदि गुणविशिष्ट रूपोके अवस्थित होता है अथवा शुद्ध चिन्मात्रसे अवस्थित होता है, इस प्रकारकी विशपजिज्ञासा होनेपर, यह भाव है। 1 व्राह्मिण इत्यादि सूत्रका अर्थ है कि ब्रह्मका जो सर्वत्ञत्व आदि स्वरूप है, उस रूपसे ही मुक्त पुरुपकी अवस्थिति होती है, क्योंकि 'य आत्माऽपहतपाप्म।' इतादि श्रुतिसे उपक्रम करके 'सोऽन्वेष्टव्यः' (उसीकी अन्वेषणा करनी चाहिए) इस प्रकारके उपसंहारवाक्यसे विचारका विधान किया गया है, ऐसा जैसिनि आचार्य मानते हैं।

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मुक्तके स्वरूपका विचार] भापानुवादसहित ५५१ तेनाभिनिप्पत्तिः 'य आत्माऽपहृतपाप्मा' इत्याद्युपन्यासेन 'स तत्र पर्यति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्व' इत्यादैशर्यावेदनेन चेति जैमिनिमतम्। 'चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौड्लोभिः' (उ० मी० अ०४ पा० ४ सृ० ६) इत्यनन्तरमूत्रेण 'एवं वा अरेऽयमात्माऽन- न्तरोऽवाद्य: कत्सः प्रज्ञानधन एव इत्यादिशुत्या 'चैतन्यमात्रमात्म- स्वरूपम्' इत्यचगतेः 'तन्मात्रेणाभिनिष्पत्तिः' इति मतान्तरं चोपन्यस्य 'एवम प्युपन्यासात्पूर्वभावादविरोधं वादरायणः' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सृ० ७) इति सिद्धान्तमृत्रण 'वस्तुदृट्टष्टथ्या चैतन्यमात्नत्वेऽपि पूर्वोक्त- गुणकलापस्य उपन्यासाद्यवगतस्य मायामयस्य बद्धपुरुपव्यवहारटष्टथा सम्भवाद् न श्रुतिद्वयविरोध: इति अविरोधं वदन् सूत्रकार:, सूत्रत्रयमिद है, कर्योंकि 'य आत्माऽपहतपाप्मा' (जो आत्मा है, वह पापादिसम्बन्धसे रहित है) इत्यादि उपन्यास-उद्देश्यरूप वाक्यसमुदाय है और 'स तत्र पयेति०' (इँसता हुआ, खेलता हुआ और अनेक स्रियोंके साथ रमण करता हुआ वह आत्मा वहाँ जाता है) इत्यादि श्रुतिसे ऐश्वर्यका कथन भी है। चितितन्मान्नेण०'x इस उत्तरसूब्रसे-'एवं वा अरे०' (हे मैन्नेथि ! जसे लवणका पिण्ड बाहरसे और भीतरसे लवणरससे ही युक्त हे, वैसे ही यह आत्मा वाहर और भीतरसे चैतन्येकरस है) इस श्रुतिके आधारपर चतन्यमात्रसे मुक्त आत्माकी-अव- स्थिति है, ऐेसा वतलाकर 'एवमप्युपन्यासात्०' * इत्यादि सिद्धान्तसूत्रसे- 'परमार्थतः आत्माके चैतन्यस्वरूप होनेपर भी पूर्वोक्त गुणोंका समुदाय, जो उपन्यास आदिसे जाना गया है और मायामय है, वह आत्मामें संसारसे युक्त पुरुषकी व्यावहारिक दृष्टिसे ही हो सकता है, इसलिए उक्त दोनों श्रुतियोंमें विरोध नहीं है, इस प्रकार विरोधाभावको बतलाते हुए सूत्रकारने और x 'ितितन्माप्रण'वतन्यमान्रस्परूपसे मुक पुरप अवस्थित रहता है, ऐसा ओडु- लोमि आचार्य मानते हैं, यह भाव है। * यदि पारमार्थिक नैतन्यमात्रसे मुक्त पुरुपकी अवस्थिति मानी जाय, तो भी मुक्क आत्माके नपपतत्व और निप्प्रपम्त्वमें परस्पर विरोध नहीं है, क्योंकि उपन्यास आदि द्वेतुओंसे गर्वशत्य आदिके व्यावदारिक होनेसे चैतन्यमात्ररूपसे अवस्थितिप्रतिपादक ध्रुतिके साथ और ओटुलोमिके मतके समान सर्वशत्वादि धर्मोंके सिद्धान्तमें तुच्छ न होनेसे गुणकलापका प्रतिपादन करनेवाली ध्ुतिके साथ विरोध भी नहीं है, यह भाव है।

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५५२ सिद्धान्तलेश संग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

मुक्तार्थपरत्वेन व्याकुर्वन् भाष्यकारश्र मुक्तस्येश्वरभावापत्ति स्पष्टमनुमेने। भामतीनिवन्धप्रभृतयश्च अ्त्युपवृंहितमिदं सूत्रजातं भगवतो भाष्यकाश रस्य उदाहृतं वचनजातं च तथैवान्ववर्तन्त। न च श्रुत्युपवृंहितस्य एतावतः सूत्रभाष्यवचनजातस्य- ऐश्वर्यमज्ञानतिरोहितं सद् व्यानादभिव्यज्यत इत्यवोचत्। शरीरिणः सूत्रकृदस्य यन्तु तदभ्युपेत्योदितमुक्तहेतोः॥ अ. ३ श्रो.१७५ इति संक्षेपशारीरकोक्तरीत्याऽभ्युपेत्यवादत्वं युक्तं वक्तुम्।

विम्बेश्वरवादे दोपः। तदाहुः कल्पतरुकारा :- 'न मायाप्रतिविम्वस्य

इन तीनों सूत्रोंकी तथोक्त अर्थोंके वोधनमें ही शक्ति है, ऐसी व्याख्या करने- वाले भाष्यकारने भी मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्ट बतलाई है। भामती आादि निबन्धकारोंने श्रुविसे प्रमाणित उन सूत्रोंका और भगवान् भाप्यकारके उदाहव वाक्योंका ही अनुसरण किया है। और + श्रुति प्रमाणोंसे उपवृंहित उक्तर अनेक सूत्रकार और भाष्यकारके वचनोंको-'ऐश्वर्यज्ञान०' इत्यादि संक्षेप- शारीरकके कथनानुसार-अभ्युपेतयाद भी नहीं मान सकते हैं। इससे मुक्तोंकी ईश्वरभावापत्ति अवश्य स्वीकार्य है, अतः मतिविम्बको ईश्वर माननेवालोंके पक्षमें इसका असम्भव दोष है ही। कल्पतरुकारने इसे कहा भी है-मायाप्रतिबिम्बित ईश्वरकी मुक्तों द्वारा प्राप्यता नहीं हो सकती

यदि शङ्का हो कि ब्रह्मसूत्रोंके चार अध्यायोंके यद्यपि सूत्रोंसे और भाष्यकारके वचनोंसे सुककी इश्वरभावापत्ति ज्ञात होती है तथापि संक्षपशारीरकके वचनके साथ विरोध होता है, अतः उक्त वाक्योंमें उपचरितार्थता ही मानना युक्त है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उन सूत्रोंके जवरदस्त प्रामाण होनेके कारण संक्षेपशारीरककी उकिको ही। गौण मानना युक्त है। * इस वचनका यह अर्थ है-सूत्रकारने जो 'पराभिध्यानात्तु' इस सूत्रसे शरीरी जीवका ऐश्वर्य, जो अज्ञानसे तिरोहित है, वह ईश्वरके स्वरूपके ध्यानसे अभिव्यक्त होता है, ऐसा कह्दा है, वह अभ्युपेतमवादसे अर्थात् एकदेशीरीतिसे कहा है। *इससे अर्थात् उक्त प्रमाणोंके आघारसे, यह भाव है।

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मुक्तके स्वरूपका विचार] भापांनुवादसहित ५५३

विमुक्तरुपसृप्यता' इति। एतदसम्भवश्च एकजीववादपारमार्थिकजीव- भेदवादयोरपि दोप: ।

न च शक्त्यन्तरं जीवे प्रमाणफलवर्जनात् ॥ २३॥

शक्तं स्ववस्तु सुखचिद्यनमद्वितीयं मुकोपसृप्यमहमस्मि विशुद्धतत्त्वम्॥२४॥

रम्या राद्द्ान्तगश्वाठ्या रज्जयत्वखिलान् वुधान् ॥२५॥ यदि जीन और इश्रका भेद सत्य माना जाय, तो पूर्वोक्त समाधान असद्भत दो जायगा, और जनमें पापनाशक किसी अन्य शक्तिकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, पयोंकि उसमें प्रमाण और फन नदीं है। सम्पूर्ण जीधोंकी मुक्ति जय तक न हो तब तक अविययायपुरपछे कसत सत्यकाम और सलायंफल्पसे क्पित जगत्की स्थिति, एव और उत्पत्ति में सम्ये और मुक पुर्षों द्वारा माप्य स्वतः चिद्धन अद्वितीय वहा में हूँ। भुतिमय बस्पलताके कुससे उत्पन्न हुई अनेक सिद्धान्तरूपी सुगन्धिसे परिषूण सुन्दर मुकिमतरी सम्पूर्ण विद्ानोंका मनोरज्ञन करें ।२३॥।२४।।२५।।

पूज्यपाद शि्य गन्ा धरेन्द्र सरस्वत्या ख्य भिक्षुविरचिता वेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमब्जरी सम्पूर्णा।

है। और * इसका असम्भवरूप दोप एकजीववाद और पारमार्थिक जीव- मेदवादमें भी है।

• एरजीववादमें सुककी इश्वरभावापति नहीं दे, यह पदले ही वतलाया जा चुका है। और जीव एवं ईश्रफा मेद भी पारमार्थिक है, एस यादमें भी जीवकी ईश्वरभावापत्तिका जयम्मन सषट ही है, कि वहना। जीवेश्वर का पारमार्थिक भेद माननेचालोंके मतमें जीवका शुद्ध भतन्गस्वरूपसे अवस्थान भी नदीं चन सकता है, गद भाव है।

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५५४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

यत्तु कश्षिद् द्वैतिभिरुच्यते-भेदस्य पारमार्थिकत्वेन सुक्तौ जीवस्ये- श्वरभावाभावेऽपि तत्रापीश्वर इव पृथगपहतपाप्मत्वादिगुणसम्भवादविरोष इति, तन्तुच्छम्, तथा सति जीवस्यापहतपाप्मत्वादिकमस्तीति न तस्य ब्रह्मलिङ्गत्वमिति शङ्कापरिहारालाभेन 'उत्तराच्चेदाविर्भृतस्वरुपस्तु' इति सूत्रविरोधात्। 'ब्राह्मेण जैमिनिः' इति सूत्रे जीवगतस्यापहृतपाप्मत्वादेः, 'उपन्यासादिभ्यः' इत्यत्रादिशव्दार्थत्वेन परेपामप्यभिमतस्य 'जक्षन् क्रीडन् रममाण:' इत्यादिश्रुत्युदितस्य जक्षणादेश्च न्राह्मत्वनिर्देशविरो- * और कुछ द्वैतवादियोंने कहा है कि भेद पारमार्थिक है, इंसलिए यद्यपि जीवका ईश्वरभाव नहीं हो सकता है, तथापि मुक्त जीवमें ईश्वरके समान अलग अपहृतपाप्मत्व आदि गुणोंकी अवस्थिति हो सकती है, अतः कोई विरोध नहीं है, परन्तु यह पक्ष अत्यन्त तुच्छ है, क्योंकि ऐसा माननेपर जीवमें अप- हतपाप्मत्व आदि गुण रह सकते हैं, इसलिए वह गुणाष्टक ब्रह्मका बोध करानेमें लिङ्ग नहीं हो सकेगा, अतः शङ्काके समाधानका + लाभ न होनेके कारण 'उत्तराच्चेत्' इत्यादि सूत्रके साथ विरोध होगा, तथा 'ब्राह्मेण जैमिनिः' इस सूत्रमें जीवगत अपहतपाप्मत्व आदिकी और 'उपन्यासादिभ्यः' इसमें स्थित आदिशव्दके अर्थरूपसे दूसरों का भी अभिमत 'जक्षन् क्रीडन्' इत्यादि श्रुतिमें कथित जक्षण आदिकी ब्रह्मसम्बन्धिताका निर्देश भी विरुद्ध होगा। जीव और ज्रस्मके मेदपक्षमें

  • अव इस प्रन्थसे यह बतलाना चाहते हैं कि सिद्धान्तीने कहा है कि मुक्त पुरुपोंके अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण इश्वरभावापत्तिके बिना नहीं हो सकते हैं, अतः मुक पुरुपकी ईश्वरभावापत्ति कहनी चाहिए, और पारमार्थिक जीवेश्वरभेदवादमें मुकत पुरुपको लेकर कहे गये उक्त आठ गुगोंकी उपपत्ति नहीं हो सकती है, परन्तु इस विपयमें जीवेश्वरभेदका अवलम्बन करनेवाले कुछ लोग कहते हैं कि पारमार्थिक भदवादमें भी श्रुति और सूत्रोंसे निरूपित माठ गुण ईश्वरभावापत्तिके विना भी रह सकते हैं, इस मतके परिहारके लिए उक भेदवादियोंका अनुवाद करके खण्डन करते हैं। + तात्पयार्थ यह है कि यदि ईश्वरमें रहनेवाले अपहृत्तपाप्मत्व आदि की अपेक्षा जीवमें अलग ही अपहृतपाम्मत्व आदि गुण माने जायँ, तो 'उत्तराच्चेत' इस सूत्रके अंशसे पूर्वमें जो शङ्का की गई थी-उसका 'आविर्भूतस्वरूपस्तु' इस अंशसे परिहार किया गया है, इस परिहार- भागसे यदि मुक्त जीवमें आठ गुणोंका आविर्भाव माना जाय, तो भी ठीक ठीक परिहार नहीं होगा, क्योंकि मुक और ब्रह्मके भेदपक्षमें उक्त गुण जीवसाधारण होंगे, इससे ब्रह्मासाधाणत्वरूप ब्रह्म- लिसकी प्राप्ति न होनेके कारण ददराकाशमें ईश्वरत्वके निर्णायक आठ गुण नहीं होंगे, यह भाव है।

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मुक्तके स्वरूपका विचार] भापानुवादसांहेतं ५५५

धाच। भेदे तेपां गुणानां सत्यत्वेन 'चितितन्मात्रेण' इति सूत्रोक्तस्य मुक्तजीवानां चैतन्यमात्रत्वस्य 'एवमपि' इति सिद्धान्तसूत्रेऽङ्गीकारविरो- घाच, 'सम्पद्या विर्भावः' इत्यधिकरणविरोधाच। तत्र हि 'स्वेन रूपेणाभि- निष्पद्यते' इति शुतौ आगन्तुना केनचिद्रपेणाभिनिष्पत्तिर्नोच्यते स्वेन- शब्द्वैयर्थ्यापत्तेः। येन रूपेण आगन्तुना स्व्रयमभिनिष्पद्यते तस्या- तमीयत्वस्याऽवक्तव्यत्वात्। तस्मादात्मवाचिस्वशब्दोपादानाद् नित्य- सिद्धेन स्वस्वरूपेणैवाभिनिष्पत्तिर्विवक्षिता, न तु केनचिद्धर्मेणेति व्यवस्थापितम्। किश्चवेदमपहतपाप्मत्वादि जीवस्य मुक्तावागन्तुकं चेत्, 'सम्पद्या- विर्भान:' इति मुक्तवागन्तुकरूपनिपेधेन 'पराभिध्यानानतु तिरोहितम्' 'उत्तराचेदा विर्भूतस्व्रूपस्तु'

उन गुणोंके सत्य होनेसे 'चितितन्मात्रेण' इस सूत्रमें कथित मुक्त जीवोंके चैतन्य- मात्रत्वका जो 'एवमपि' इत्यादि सूत्रमें अग्गीकार किया गया है, वह विरुद्ध होगा और सम्पद्याविर्भावः' * इस अधिकरणके साथ भी विरोध होगा, क्योंकि सम्पद्याधि करणमें आगन्तुक किसी धर्मसे अभिनिप्पत्ति नहीं कही जा सकती है, क्योंकि वैसा माननेसे 'स्वेन रूपेणाभिनिप्पद्यते' इस श्रुतिमें उक्त स्वेनशब्दके साथ विरोध होगा, कारण कि जिस आगन्तुक स्वरूपसे अपने आप अभिव्यक्त होता है, उसमें आत्मीयत्व नहीं रह सकता, इससे आत्माके वाचक स्वशब्दका भ्रुतिमें उपादान होनेसे नित्यसिद्ध स्वरूपसे ही अभिनिष्पत्ति विवक्षित है, आगन्तुक किसी धर्मसे नहीं, ऐसा व्यवस्थापन किया गया है। किस्न, यदि अपहृतपाप्मत्व आदि धर्म मुक्तिमें जीवके आगन्तुक माने जायँगे तो 'सम्पद्याविर्भावः' इससे मुक्तिमें आगन्तुक धर्मोंके निषेधसे 'पराभिध्यानातु तिरोहितम्' 'उत्तराच्चेदाविर्भृतस्वरूपस्तु' इत्यादि सूत्रोंसे अपहृतपाष्मत्वादिका वन्ध और मुक्तिमें क्रमशः तिरोभाव और आविर्भावके

  • किव, अपहृतपाप्मत्व आदि आठ गुण मुक्तिमें उत्पन्न होते हैं अथवा स्वतःसिद्ध ही हैं, इस प्रकारके दो विकल्प करके प्रथम विक्ल्पके समाधानपूर्वक द्वितीयका इस प्रन्थसे एक प्रकारसे शेप रखते हैं, यह भाव है।

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५५६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चैतुर्थ परिच्छेद

विर्भावप्रतिपादनेन च विरोध: स्यादिति नित्यसिद्धं वाच्यमिति वन्घस्य मिथ्यात्वं दुर्वारम्, नित्यसिद्धमपहतपाष्मत्वं हि सर्वदा. पाप्मरहितत्वम्। न च वस्तुतः सर्वदा पाप्मरहिते पाप्मसम्बन्धः, तन्मूलककर्तत्वभो- कतृत्वसम्बन्धो वा पारमार्थिक: सम्भवति। एवं च जीवस्येश्वराभेदोऽपि दुर्वारः, श्रुतिवोध्यतदभेदविरोधिवन्धस्य सत्यत्वाभावात्। अन्यथा संसारिणि नित्यसिद्धसत्यसङ्कल्पतिरोधानोकत्ययोगाच। नहि जीवस्य संसारदशायाम-

प्रतिपादनसे विरोध होगा, इससे अपहृतपाप्मत्व आदिको नित्यसिद्ध मानना चाहिए, इससे वन्धका मिथ्यात्व दुर्वार है। क्योंकि नित्यसिद्धा अपहतपा- प्मत्व-सर्वदा पाप्मसम्बन्घसे रहितत्वरूप ही है। अतः वास्तविक पाप- सम्बन्घसे जो रहित है, उसमें पापका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता है, तथा पापसम्वन्धमूलक कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिके सम्बन्ध भी नहीं रह सकते। चन्घके मिथ्या होनेपर जीवका ईश्वरके साथ अमेद भी दुंर्वार है, कयोंकि श्रतिसे वोधित ब्रह्मामेदका विरोधी संसार सत्य नहीं हो सकता है। यदि संसारके मिथ्यात्वका अङ्गीकार न करके जीव और ब्रह्मका अमेद न माना जाय, तो नित्यसिद्ध सत्यसद्कल्पत्व आदिका तिरोधान जो 'पराभिध्या- नात्' इत्यादि सूत्रमें सूत्रकारने कहा है, वह अयुक्त हो जायगा, क्योंकि। अन्य लोग भी जीवकी संसारदशामें एकाव अर्थको विषय करनेवाला एक

*यदि यहांपर शङ्का हो कि संसारके मिथ्यात्वके प्रतिपादनसे क्या लाभ है, क्योंकि उसके खस्य होनेपर भी जीव और ब्रह्मका अभेद वोधित हो सकता है। इस प्रकारके भास्करके मतको. लेकर कहते हैं कि संसारको सत्य माननेपर परमात्मामें रहनेवाले नित्यमुक्तत्वका भी सत्यत्व- रुपसे ही अज्गीकार करना चाहिए, इससे परमार्थस्वरूप विरुद्ध धर्मोंसे आक्रान्त जीव्व और !. ब्रह्मका अग्नि और हिसके समान श्रुतिसे वोवित अमेद हो ही नहीं सकता है। * यदि शङ्ा हो कि तिरोधानका प्रयोग कैसे हो सकता है? तो इसपर कहना चाहिए कि जीवमें रहनेवाले नित्यसिद्ध सत्यसङ्गल्पत्वका तिरोधान 'पराभिध्यानातु०' इत्यादि सूत्रसे कहा जाता है। अथवा ईश्वरगत सत्यमद्ठल्पत्वका जीवके प्रति तिरोधान उक् सूत्रसे कहा जाता है। इस प्रकारके दो विकल्प करके प्रथम विकल्पक्ा इस अ्रन्थसे परिहार करते हैं, तात्पर्य यह है कि पूर्वपक्षी साधारण अर्थको विषय करनेवाले एक सत्यसङ्कल्पको भी तिरोहित नहीं मानता है, तो सब धर्मोंको विषय करनेवाले सत्यसङ्कल्पको कैसे मानेगा?

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मुक्तिके स्वरूपका विचार] भापानुवादसहिंत ५५७

नुवर्तमानो यत्किश्चिदर्थगोचरः कश्षिदस्त्यवितथसंकल्पस्तिरोहित इति परेरपीण्यते। किन्त्वीश्वरस्य यन्नित्यसिद्धं निरवग्रहं सत्यसङ्कल्पत्वम्, तदेव जीवस्य संसारदशायामीश्वराभेदानभिव्यत्तया स्वकीयत्वेनाऽनव- भासमानं तं प्रति तिरोहितमित्येव समर्थनीयमिति घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्तः। नन्यपहतपाप्मत्वं न पाप्मविरहः, किन्तु पाप्महेतुकर्माचरणेऽपि पापोत्पत्तिप्रतिचन्धकशक्तियोगित्वमिति न तस्य नित्यसिद्धत्वेन वन्घस्य मिथ्यात्वप्रसङ्ग:। एवं सत्यसङ्गल्पत्वमपि शक्तिरूपेण निर्वाच्यमिति

सत्यसळल्प तिरोहित है, ऐसा यदि नहीं मानते हैं, तो सर्वार्थको विपय करनेवाला सत्यसळ्लल्प तिरोहित है, ऐसा कैसे मान सकते हैं? किन्तु ईश्वरका निर्वद्य जो नित्यसिद्ध सत्यसक्ल्तत्व है, उसीका, जीवकी संसारदशामें ईश्वरके साथ अमेदकी अनभित्र्यक्तिसे अपने प्रति स्वसम्त्नन्धित्वेन अनवभासमान होकर उसके प्रति, तिरोधान होता है, ऐसा समर्थन करना होगा, इससे घट्टकुटीपभात वृतान्त ही प्रसक्क होगा। यदि शक्का हो कि* पापसम्बन्धसे रहितत्व अपहृतणष्मत्व नहीं है, किन्तु पापके हेतुभृत कर्मोका आचरण करनेपर भी पापकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक- शक्तिसम्बधितारूप है, इसलिए उसके नित्यसिद्ध होनेपर भी संसारमें मिथ्र्यात्वकी प्रसक्ति नहीं हे। सकती, इसी प्रकार शक्तिरूपसे सत्यसक्कल्पत्वकी भी व्यार्या करनी चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस प्रकारके

1 यदि द्वितीय चिकल्सका अगीकार किया जाय, तो आखिरमें सिद्धान्तीका ही पक्ष मानना रोगा, इससे पारमार्थिक भेद नहीं मान सकते हैं, यह भाव है। * दस प्रन्थसे भेदवादी यह शाक्ता करता दे कि अपटृतपाप्मखवका परिष्कार दम ऐसा करते है कि जिससे संसार वास्तविक माना जाय, तो भी अपहृतपाप्मत्वके साथ विरोध नहीं है। किस, निषिद्व कर्मोंका आचरण करनेपर भी पापकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धकरूप जिस थाकिकी तुम अपदतपाप्मशब्दके अर्थरूपसे कल्पना करते हो, उसकी क्या इसलिए कल्पना करते हो कि विद्याके उदयके पूर्वमें पापका प्रतिबन्ध हो, अथवा विद्याके वाद? तुम्हारे मतमें होनेवाली मुकिके पूर्यमें पापका प्रतिबं्ध हो अथवा तुम्हारे मतके अनुसार मुक्तिके कालमें देह आदिके रहनके कारण कदाचित् पापके देतुभूत निपिद्ध कर्मोंका आचरण हो सकता है, अतः उसका प्रतियन्ध हो? इस प्रकारके तीन विकल्पोंका मनमें निक्षय करके कमशः इस ग्रन्थसे उन विकल्पोंका परिदार करते हैं।

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५५८ सिद्धान्तलेश संग्रह [चतुर्थ परिच्छेद

नेश्वराभेदप्रसङ्ग इति चेत्, मैवम् ; एवं शब्दार्थकल्पने प्रमाणाभावाद्। नहि पापजननप्रतिवन्धिका शक्ति: संसाररूपपरिभ्रमणदशायां पापानुत्प न्यर्थ कल्पनीया, तदानीं तदुत्पत्तेरिष्टत्वात्। विद्योदयप्रभृति तु विद्या माहात्म्यादेवाऽश्लेपः 'तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेपविनाशौ तद्व चपदेशाद' (उ० मी० अ० ४ पा० १ सू० १३) इति सूत्रेण दर्शिितः। ततं एव सुक्तावम्यशलेप उपपद्यत इति व्यर्था शक्तिकल्पना। तस्मादुदाहृतश्रुतिसूत्रा- नुसारिभिर्मुक्तजीवानां यावत्सर्वमुक्ति वस्तुसच्चैतन्यमात्रत्वाविरोधिवद्ध पुरुषाविद्याकृतनिरव ग्रहैश्वर्यतदतुगुणगुणकलापविशिष्टनिरतिशयानन्दस्फुरण- समृद्धनिस्सन्घिवन्धपरमेश्वरभावापत्तिरादर्तव्येति सिद्धम् ॥।५।। विद्वद्गुरोरविहित विश्वजिदध्वरस्य श्रीसर्वतोसुखमहाव्रतयाजिसूनोः।

अपहृतपाष्मत्वका अर्थ करनेमें कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि पापोत्पत्तिमें प्रतिबन्धक शक्तिकी संसाररूपके विद्यमानत्वकालमें पापके अनुत्पादके लिए कल्पना नहीं कर सकते हैं, कारण कि उस कालमें पापकी उत्पत्ति इष्ट ही है। और विद्याके उदित होनेपर तो विद्याके प्रभावसे ही पापका सम्बन्ध नहीं रहेगा, यह 'तदघिगम०' इत्यादि सूत्रसे स्पष्ट बतलाया गया है, इसीसे मुक्तिमें भी पापका असम्बन्ध हो सकता है, इसलिए शक्तिकी कल्पना व्यर्थ है। इससे उदाहृत श्रुति और सूत्रोंका अनुसरण करनेवालेको यह माननां चाहिए कि जब तक सब जीवोंकी मुक्ति न हो जाय, तब तक मुक्त जीवोंकी-वस्तुसद् चैतन्यमान्नत्वका विरोध न करनेवाले बद्ध पुरुषकी अविद्यासे सम्पादित निरवग्रह ऐश्वर्य और इस ऐश्वर्यके अनुकूल गुणसमूइसे युक्त निरतिशया नन्दके स्फुरणसे समृद्ध-परमेश्वरभावापत्ि है ॥५॥ अनेक विद्वानोंके गुरु, विश्वजित् आदि अनेक याग करनेवांले, श्रीसर्वतो- मुखमहाव्र याजी आचार्य दीक्षितसे उत्पन्न, भगवान् शङ्करजीके परमभक्त श्रीरङ्ग-

  • तत्त्वसाक्षात्कारके प्राप्त होनेसे विद्याके पूर्वकालमें रहनेवाले पापका विनाश होता है और विद्याके उत्तरकालमें होनेवाले पापसे भी सम्बन्ध नहीं होता है, क्योंकि विद्यासे पूर्वोत्तर पापोंका नाश होता है, श्रुति, स्मृति आदि प्रमाणोंसे सिद्ध है, यह 'तदधिगमे' इत्यादि सूत्रका अर्थ है।

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मुक्तिके स्वरूपका विचार] भापानुवादसहित ५५९=

श्रीरङ्गराजमखिनः श्रितचन्द्रमौले- रस्त्यप्पदीक्षित इति प्रथितस्तनूजः ॥१।।

तन्त्नाण्यधीत्य सकलानि सदाऽ्वदात- व्याख्यानकौशलकला विशदी कृतानि। आस्नायमूलमनुरुध्य च सम्प्रदायम् सिद्धान्त भेदलवसङ्ग्रहमित्य का्पींद् ।।२।। सिद्धान्तरीतिपु मया भ्रमदूपितेन स्यादन्यथाऽपि लिखितं यदि किश्चिदस्य संशोधने सहृदया: सदया भतन्तु

। इति पदवाक्यप्रमाणपारावारपारीणसर्वतन्त्रस्वतन्त्रश्रीमदप्पदीक्षित विरचिते शास्त्रसिद्धान्तलेशसड्ग्रहे चतुर्थ: परिच्छेदः॥

राजाध्वरीके पुत्र प्रसिद्ध विद्वान् अप्पदीक्षितने व्याख्यानकी कुशलकलाओंसे विस्तारित अनेक शास्त्रोंका अध्ययन कर और सदा वेदानुसारी सम्प्रदायका अनुसरण करके अद्वैतवेदान्तसिद्धान्तके पृथक्-पृथक् स्वरूपोंका संक्षेपसे संग्रह किया है॥ १-२ ॥ यदि भ्रमवश सिद्धान्तोंकी रीतियोंमें मेरे द्वारा कुछ हेर-फेर हो गया हो, तो परिशुद्धसम्पदायके परिशीलनसे सन्देहरहित सहृदय पुरुप उसको शोधने फी दया करें। ३ ॥ श्रीसिद्धान्तलेशके वेदान्ताचार्यश्रीपं मूलशक्करव्यास-विरच्चित भापानुवादमें चतुर्थ परिच्छेदका भापानुवाद समाप/ द

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