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श्री शिव पुरासा
(द्वितीय खएड)
॥ शिव का अश्वत्थामा के रूप में अ्रवतार ॥
सनत्कुमार सर्वज्ञ शिवस्य परमात्मनः । अवतार शृणु विभोरश्वत्थामाह्वय परम् ।१ बृहस्पतेर्महाबुद्ध देवर्षेरंशतो मुने। भरद्वाजात्समुत्पन्नो द्रोणोऽयोनिज आत्मवान् ।२ धनुर्भू ता वरः शूरो विप्रषिःसर्वशास्त्रवित् । बृहत्कीर्तिम हातेजा यः सर्वास्त्रविदुत्तमः ।३ धनुर्वेदे च वेदे च निष्णातं य विदुर्बुधाः । वरिष्ठ चित्रकर्माणं द्रोणं स्वकुलवर्धनम् ।४ कौरवाणां स आचार्य्य आसीत्स्वबलतो द्विज। महारथिष विख्यातः षटसु कौरवमध्यतः ।५ साहाय्यार्थं कोवारणां स तेपे विपुलं तपः। शिवमुद्दिश्य पुत्रार्थ द्रोणाचार्यो द्विजोत्तम ।६ ततः प्रसन्नो भगवाच्छंकरो भक्तवत्सलः । आविर्बभूव पुरतो द्रोणस्य मुनिसत्तम ।७
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६ ) श्री शिवपुराण
नन्दीश्वर ने कहा हे सर्वज्ञ ! हे सनतकुमार। अव आर सब में व्य प्त रहन वाले परमेश प्रभु शिव का 'अश्वत्थामा'-इस नाम से होने वाले उत्तम अवतार की कथा श्रबरण करो ॥१। हे मुने ! महा मनीषा से सम्पन्नदेवगुरु वृहस्पति के अश में भरद्वान ऋृषि के द्वारा द्रोण-इस नाम वाला एक अयो- निज पुत्र उत्पन्न हुआ।श।यह द्रोग संसार के समस्त धनुषधारियों में परम श्रध् अद्भुतवीर,विप्रर्षि,समस्त शास्त्रोंका ज्ञाता, कीतिसम्पन्न महान् तेजस्वी और सभी शस्त्रास्त्रों के चलाने की विधि का जानने वाला हुआ था।३। बुद्धिशाली द्रोण वाण विद्या का पारङ्गा पण्डित वेदार्थ ज्ञान का घूरन्दर विद्वान् एक से-एक अद्भुन कर्मों के करनेवाला अने कुल का वर्द्धक वरिष्ठ परन प्रसिद्ध था।४। हे द्विजवय ! यह महाबलवान् द्रोण कौरव कुन का आचार्य और छै मह रथियों में अत्यन्त प्रसिद्ध थे ।५। ब्राह्मणों में अत्युत्तम द्रोणाचार्यने कौरव कुलकी सहायना करनेकेलिए एकमहावीर पुत्रके उद्देश्य को लेकर शिवके प्रीतर्थ उग्र तपस्या की ६। द्राणके ता से मुनि सत्तम! भक्तों पर कृपा रखने वाले भगवान् शङ्कर प्रसन्न होकर द्रोणाचार्य के समक्ष में प्रकट हो गये ।७।
त दृष्टवा स द्विजो द्रोणास्तुष्टावाश प्रणम्य तम् । महाप्रसन्नहृदयो नतकः सुकृताञ्जलिः ।८ तस्य स्तुत्या च तपसा सन्तुष्टः शङ्करः प्रभु। वर ब्रहीति चोवाच द्रोणं तं भक्तवत्सलः ।६ तच्छू त्वा शम्भुवचन द्रोण: प्राहाथ सन्नतः। स्वांशज तनयं देहि सर्वाजेय महाबलम १० तच्छ्रत्वा द्रोणवचन शम्भु: प्रोचे तथ म्त्विति। अभूदन्तहिस्तात कौतुकी सखकृन्मूने ।११ द्रोणोऽपगच्छत्स्वं धाम महाहृष्टी गतभ्रमः । स्वपत्न्यै कथयामास तद्व त्त सकल म दा ।१२
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शिव का अश्वत्थामा के रूप में अवतार । ७
अथावसरमासाद्य द्ररुः सर्वान्तकः प्रभः । स्वांशने तनयो जज्ञ द्रोणस्य स महाबलः ।१३ अश्वष्थामेति विख्यातः स बभूव क्षितौ मने। प्रवीर: कञ्जपत्राक्षः शत्र पक्षक्षयङ्कर ।१४
मगवान् शिवका दर्शन कर ब्राह्मणोत्तम द्रोणाचार्य ने हृदयमें अत्यन्त प्रसन्न होकर हाथ जोड़ते हुए नम्र भावनासे शिवको प्रणाम किया।र द्रोण की स्तुति से तथा घोर तवश्रयस भक्तवत्मल शिव ने प्रसन्नता पूर्वक्द्रोणसे कहा-'जो चाहो वरदान माँगों।९ शिवके ऐमे आनन्दप्रद वचनोंको सुनकर द्रोणाचार्य ने नम्रता से प्रार्थना की कि सभी के द्वारा अजेय और अतुल बल शाली अपने ही अंश से सत्पन्न होने वाले पुत्र का वर दीजिये।१० हे तात हे मुनिवर द्रोणचार्य की इस प्रार्थना को सुनकर शिव ने कहा-ऐसा होगा। बस इतना कहनेके उपरान्त कौतुक करनेवालेसुखदायी शिवअतर्धान होगये ।११तबतो आचार्य द्रोण का संशय मिट गया और अत्यन्त प्रसन्नता के साथअपने निवास स्थानपर पहुँचकर शिवसे प्राप्त इस वरदानका समस्त वृत्तान्त अपनी पत्नी को कह सुनाया ।१२। इसके अन्तर समय आने पर जगत्के संहारक प्रभु शिव अपने अशसे आचार्य द्रोणके यहाँ महाबलशाली पुत्र के रूप में उत्पस्न हुए।१३। हे मुनिराज ! वह कमल दलके तुल्य सुन्दर नेत्र वाले और शत्र ओं के बलके नाश करने वाले महाबली शङ्कर संसारमें अश्वत्थामा-इस नाम से विख्यात हुए ।१४॥।
यो भारते रणे ख्यातः पितुराज्ञामवाप्य च । सहायकृंद्गभवाथ कौरवाणां महाबलः ।१५ यमाश्रित्य महावीर कौरवाः सुमहाबला। भीष्म दयो बभूव स्तेऽजेया अपि दिवौकसाम ।१६ यद्भयात्पाण्डवाः सर्वे कौरवाञ्जेतुमक्षमाः । आसन्नष्ट महावीरा अपि सर्वे च कोविदाः ।१७
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) श्री शिवपुराण कृष्णोपदेशतः शम्भोस्तपः कृत्वातिदारुणम्। प्राप्य चास्त्र शम्भुवराज्जिग्ये तानर्जुनस्ततः ।१८ अश्त्थामा महावीरो महादेवांशजो मने । तथापि तद्भक्तिवशः स्वप्रतापमदर्शयत् ।१९ विनाश्य पाण्डवसुताज्शिक्षितानपि यत्नतः । कृष्णादिभिर्महावीरैंरनिवार्य्य बलः पर: ।२० पुत्रशोकेन विकलमापतन्तं तमर्जुनम्। रथेनाच्युतवतं हि दृष्ठ वा स च पराद्रवत् ।२१ इस महान् बलशाली अश्वत्थामा ने महाभारत के युद्ध में अने पिता की आज्ञा से बड़ी ख्याति के साथ कौरव कुल के पक्ष की सहायता की थी॥ १५ ॥ इसी महावीर अश्वत्थामा का आश्रय पाकर पराक्रमी कौरव और पितामह भीष्म आदि समी देवों के द्वारा भी अजेय हो गये थे। २६ । जिस के भय होने के कारण बड़े भारी शूरवीर तथा परम विद्वान् पाण्डव कौरवों के जीत लेने में एकदम असमर्थ हो गये और प्रायः र नष्ट भ्रष्ट से हो गये थे। १७॥ तब भगवान् श्री कृष्ण के उपदेशको प्राप्त कर अर्जुन ने भगवान् शिव की अत्यन्त उग्र तपस्या की ओर उनकी कृपा से अनेक अभोघ अस्त्र प्राप्त कर कौरवों पर विजय प्राप्त की ॥१८॥ हे मुनीन्द्र ! अश्वत्थामा ने साक्षात् भगवान् शङ्कर के अंश से उत्पन्न होकर कौरवों की भक्ति के वश में आकर संग्राम में अपने प्रताप का वैभव दिखलाया था॥ १९। महान् बलशाली कृष्ण आदि शत्र ओंके द्वारा भी बड़े यत्त के साथ शिक्षा लिये हुए पाण्डवों के पुत्रों को अश्वत्थागा से मार गिराने पर भी उसकी बल-शक्ति को हटाया न जा सका था ॥२०॥ अपने मृत पुत्रों के शोक से अत्यन्त व्याकुल अर्जुन को श्री कृष्ण के साश रथ पर सवार होकर, दौड़कर आते हुए देखकर अश्वत्थामा भाग गया ॥। २१ ॥ अस्त्र ब्रह्मशिरो नाम तदुपर्य्य सृजत्स हि। ततः प्रादुरभूत्तजः प्रचण्ड सर्वतो दिशम् ।२२
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शिव का अश्वत्यामा के रूप में अवतार ] [ ९ प्राणापदमभिप्रेक्ष्य सोऽर्जुनः क्लेशसंयुतः । उवाच कृष्ण विक्लान्तो नष्टतेजा महाभय ।२३ किमिदं स्वित्कुतो वेति कृष्ण कृष्ण न वेद्म्यहम्। सर्वतोमुखमायाति तेजश्चद सुदुःसहम् ।२४ श्रत्वार्जुनवचश्चेद स कृष्णः शैवसत्तमः । दध्यौ शिव सदार च प्रत्याहारजुनमादरान् ।२५ वेत्थेद द्रोणापुत्रस्य ब्राह्मस्श महोल्बणम् । न ह्यस्यान्यतम किश्चिदस्त्र प्रत्यवकर्शनम् ।२६ शिव स्मर द्रतं शम्भु स्वप्रभु भक्तरक्षकम्। येन दत्त हि ते स्वास्त्र सवकार्यकर परम् ,२७ जह्यस्त्नतेज उन्नद्ध त्व तच्च वास्त्रतेजसा । इत्युक्त्वा च स्वय कृष्ण: शिवं दध्यौ तदर्थक: ।२८ उस समय भागकर जाते हुए भी अश्वत्यामा ने ब्रह्मशिर नाम वाला अस्त्र अर्जुन पर छोड़ दिया था कि जिसके परम प्रचण्ड तेज का प्रकाश समस्त दिशाओं में प्रकट हो गया ।२२। उस वक्त प्राणों पर आई हुई स विपत्ति को देखकर अर्जुन मय से व्याकुल हो उठा और उसके तेज से दुःखित होकर उसने श्रीकृष्ण से कहा ।२३। अजुद ने कहा-हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! यह कहाँ से किसका अति दुस्सह तेज सब ओर से चला आ रहा है और क्या है ? मैं इसको अभी तक नही समझ पा रहा हूँ।२४, नन्दीश्वर ने कहा-उस समय कातर अर्जुन के इन खेद भरे वचनों को सुनकर पार्वती के सहहित शङ्कर का ध्यान करते हुए भगवान् श्रं कृष्ण ने अजुन से कहा ।२५।- हे अजुन ! तुम जानते हो, यह आचार्यवर द्रोण के आत्मज अश्नत्थामा के द्वारा छोड़ा हुआ अत्यन्त त्र की तीपरतक व्रहमास्त्र है संसार में इसके समान अन्य कोई मी अस्त्र इतना थ की महान् घातक नही है।२६।अब तुम्हारा यही कर्त्त व्य हैकि बहुत शीघूअपने ने मन प्रभु और भक्तवत्सल शिवजी का आदर सहित ध्यान-स्मरण करो। उन्होंने कियह तुम्हें भी समस्त कार्य पूर्ण करने बाला महान् अस्त्रप्रदान किया हैं।२७।अब तुभ अपने उसी शैव अस्त्रसे इस ब्रह्मास्त्रके तेज का निवारण कर सकते हो।
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१० ] [श्री शिवपुराण
यह कहने हुए श्रोकृष्ण भीस्त्रय इसकी रक्षा के लिये श्री शिव का मन में धपान करने लगे ।२८। तच्छु, त्वा कृष्णबचनं पार्थः स्मृत्वा शिवं हृदि। स्पृष्ट्वापस्त प्रणम्याशु चिक्षेपास्त्र ततो मुने ।२९ यद्यप्यस्त्र ब्रह्मशिरस्त्वमोघञ्चाप्रतिक्रियम् । शैवास्त्रतेजसा सदयः समशाम्यन्महामुने ।३० मस्था मा ह्यतदाश्चर्य सर्वचित्रमये शिदे। यः स्वशक्तयाऽखिलं विश्व सृजत्यवति हन्त्यज। अश्वत्थामा ततो ज्ञात्वा वृत्तमेतच्छिवांशजः ।३१ शैवं न विव्यथे किश्विच्छिवेच्छातुष्टधीमुंने । ३२ अथ द्रौणिरिदं विश्व कृत्स्नं कर्तु मपाण्डवम् । उत्तरागर्भगं वाल नाशितु मन आदधे ।३३ ब्रह्मास्त्रमनिवार्य्यं तदन्य रस्त्रैम हाप्रभम् । उत्तरागर्भ मुदि्दिश्य चिक्षेप स महाप्रभु: ।३४ हे मुने ! इस प्रकार अजुन ने श्रीकृष्ण की आज्ञा पाते ही शिब के चरणों का स्मण अपने मनमें किया और उनको प्रणाम करते हुए जल का स्पर्श क के शिवके द्वारा प्रदत्तशवास्त्र को छोड़ दिया। ९। हे महामुने ! बहमगिर अस्त्र का तेज वद्यरि कभीं भी निष्फल होने वाला नहीं थातो भी उस शैवास्त्र के तेज के द्वारा वह उसी समय शान्त हो गया था।३०। इस प्रकारकी अत्यन्त विचित्र लीलाओंके दिखाने वाले श्रीशिव के विषयमें कमी मो अश्चर्य नहीं समझना चाहिए। वेपरम अजेयहैं और अपनी अजित एवं अपरिमित शक्तिके द्वारा इस ममस्त ससारकीउत्पत्ति तथा नाश कियाकरते हैं।३१ हे मुनीश्वर! उस वक्त शिव की अंश शक्ति से समुत्पन्न अश्वत्थामा ने शिव की इच्छा को जानकर सन्तुष्ट होते हुए उस शंवास्त्र का छेदननहीं किया।३२। इसके अनन्तर आचार्य द्रोण के आत्मज अश्वत्थामाने समस्त संसार को पाण्डवहीनकर देने की इच्छासे उत्तरा के गर्भमें रहनेबालेबालक के संहार करने का विचार मन में स्थिर किया।३३। इसके अनन्तर अश्व-
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शिव का अश्वत्थामा के रूप में अवतार ११
त्थामा ने परम कान्तिसे युक्त तथा अन्य किसी भी अस्शसे न हटाये जानेकी शका रखने वाले उस ब्रह्मास्त्रका उत्तरा के गभपर प्रहार करदिय ३४। ततश्च सोत्तरा जिष्णुवधूर्विकलमानसा । कृष्ण तुष्टाव लक्ष्मीश दह्यमाना तदस्त्रतः ।३५ ततः कृष्णः शिवं ध्यात्वा हृदा स्तुत्वा प्रणम्य च। अपाण्डवमिद कतु द्रौणरस्त्रमबुध्यत ।३६ स्व्ररक्षार्थेन्द्रदत्तन तदस्त्रण सुवर्चसा । सुदर्शनेन तस्याश्च व्यधाद्रक्षां शिवाज्ञया । ७ स्वरूप शकरादेशात्कृत शेववरेणा ह। कृष्णन चरित ज्ञात्वा विमनस्कः शनैरभूत् ।३८ ततः स कृष्णः प्रीतात्मा पाण्डवान्सकलानपि। अपातयत्तदध्रयोस्तु तुष्टये तस्य शैवराट् ।३६ अथ द्रौणिः प्रसन्नान्मा पाण्डवान्कृष्णमेव च। नानावरान्ददौ प्रीत्या सोऽश्वत्थामाऽनुगृह्य च। इत्थं महेश्वर स्तात चक्र लीलां परां प्रभु: । अवतीर्य्य क्षितो द्रौणिरूपेण मुनिसत्तम ।४१ शिवावतारोऽश्वत्थामा महाबलपराक्रमः । त्र लोक्यसुखदोडद्यापि वर्तते जाह्नवीतटे ।४२ अश्वत्थामावतारस्ते वणितः शङ्करपभोः । सर्वसिद्धिकरश्चापि भक्ताभीष्टफलप्रदः ।४३ य इद शृणुयाद् भक्त्या की येद्वा समाहित। स सिद्धिं प्राप्नुयादिष्टमन्ते शिवपुर व्रजेत् ।४४ इम ब्रह्मास्त्र के तेज से अत्यन्त व्याकुल मन वाली अर्जुन के पुत्र की भार्या उत्तरा जलकर मस्मीभून होती हुई लक्ष्मी पति मगवान् श्रीकृष्य की स्तुति करने लगी।३५।उत्तरा की स्तुति से सावधान होरर श्री कुष्ण ने मन में शिवका प्रगामपूर्वक ध्यान एवं स्तवन करतेहुए यह समझ लियाकियह
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१२ ( श्री शिवपुराण पाण्डव कुल के पूर्ण विनाश करने के लिये अश्वत्थामा के द्वारा छोड़े हुए ब्रहमास्त्र का प्रभाव है ।३६। उस समय श्रोशिव की ही आज्ञा से श्रीकृष्ण ने इन्द्र द्वारा अपनी सुरक्षा के लिये प्राप्त सुदर्शन चक्र से उत्तरा के गभ की रक्षा की, जिस सुदर्शन चक्र का भी अति दुस्सह तेज था॥३७॥ यह समस्त चरित्र समझकर शिव के परम भक्त श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गभ को शिवाज्ञा से अपना ही रूप बना दिया तो वह ब्रह्मास्त्र शर्नःशनैः शान्त हो गया ।३८। इसके पश्चात् शिव के परम भक्त श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर सव पाण्डवों को अश्वत्थामा की प्रसन्नता प्राप्त करके के लिये उसके चरणों में प्रणिपात के लिये गिरने की प्रेरणा दी।३९। इससे आचार्य द्रोण के पुत्र शिव के अश्यृावतारी अश्वत्थामा बहुत प्रसन्न हुए और प्रेमपूर्वक पाण्डवों तथा श्रीकृष्ण पर कृपा करंके उन्हें अनेक उत्तम वरदान भी दिये ।४०। हे तात ! हे मुनिश्रष्ठ! इस प्रकार से जगत् के प्रभु शिव ने अश्वत्थामा के रूप में अवतीर्ण होकर पृथ्वीतल में अनेकानेक अति अद्भुत लीलाएँ दिखलाई थीं ।४१। महान् बल तथा प्रबल पराक्रम वाले अश्वत्थामा का अवतार ग्रहण करने वाले शिव त्रिभुवन को परन सुखदायी अब तक भी गङ्गा के तट पर विराजमान हैं ।४२। मैंने यह शिव के अश्वत्थामा नाम वाले अवतार का चरित्र आपको सुना दिया, यह समस्त सिद्धियों का दाता और भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने वाला है ।४३। जो भी कोई मनुष्य इस पावन चरित्र को चित्त को सावधान करके सुनता है तथा भक्ति को भावना से इसका कीरतन करना है। वह अपने सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि प्राप्त कर अन्तिम काल में भगवान् शङ्कर के लोक चला जाता है।४४। ।। द्वादश ज्योतिलिंगावतार का वर्णन । अवताराञ्छ णु विभोर्द्वादशप्रमितान्पराम् । ज्योतिलिंङ्गस्वरूपान्वं परमोत्तमकान्मुने ।१ केदारो हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करः। वाराणस्यां च विश्व शस्त्र्यम्बको गौतमीतटे।२ सौराष्ट्र सोमनाथश्च श्रीशैले मल्लिकारजुन।
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द्वादश ज्योतिलिङ्गावतार का वर्णन ] १३ उज्जयिन्यां महाकाल ओंकारे चामरेश्वरः।३ वैद्यनाथश्चिताभूमो नागेशो दारुकावने। सेतुबन्धे च रामेशो घुश्मेशश्र शिवालये ।४ अवतारद्वादशकमेतच्छम्भोः परात्मनः । सर्वानन्दकर पुसा दर्शनात्स्पर्शनान्मुने ।५ तत्राद्यः सोमनाथो हि चन्द्रदुःखक्षयङ्करः। क्षयकुष्टादिरोगाणां नाशकः पूजनान्मुने ।६ शिवावतारः सोमेशो लिङ्गरूपेणा संस्थित। सौराष्ट्र शुभदेशे च शशिना पूजितः पुरा ।७ नन्दीश्वर ने कहा-हे मुने ! अब आप मुझ से सब् में व्यापक रहने वाले ज्योतिलिंङ्ग स्वरूप वाले बारह उत्तम अवतारों की की कथा सुनिये ।१। इन अवतारों के पीठ-स्थान इस प्रकार से हैं-हिमाचल पर केदार- नाथ, डाकिनी में श्री भीमशङ्कर, काशीपुरी में विश्वनाथ, गौतमी नदी के तट पर तथम्बकेश्वर, सोराष्ट्र देश में सोमनाथ स्वामी हैं। श्री शैल मैं मल्लिकार्जुन का स्वरूप है, उज्जयिनी में महाकालेश्वर, ओङ्कार में अमरनाथ, चिताभूमि में वैद्यनाथ भगवान्, दारुक वन में नागेश्बर, सेतु- वन्ध में श्री रामेश्वर तथा शिवालय में घुश्मेश्वर अवतार है।२-३-४। हे मुने ! परमेश भगवान् शिव के ये उक्त द्वादश अवतार हुए हैं। जिनके दर्शन एत्रं स्पर्श करने से मनुष्यों को परम आनन्द तथा सुख-सौभाग्य का लाभ होता है ।५। हे मुनिवर ! इन सब में प्रथम श्री सोमनाथ चन्द्रदेव के दुःख का नाश करने वाले हैं। इनके अर्चन करने से कुष्ठ और क्षय रोग का सर्वथा नाश हो जाता है ।६। श्री सोमनाथ इस पावन नाम से होने वाला अवतार सोराष्ट्र देश में हुआ था जो कि वहाँ लिङ्ग के स्वरूप में विराजमान है। इनका सवप्रथम पूजन चन्द्रदेव ने ही किया था ।७1 चन्द्रकुण्ड च तत्र व सवंपापविनाशम्। तत्र स्नात्वा नरो धीमान्सर्वरोगः प्रमुच्यते ।८ सोमेश्वर महातिङ्ग शिवस्य परमात्मकम्। दृष्ठ वा प्रमुच्यते पापाद्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।९
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१४ [श्री शिवपुर'ण
मल्लिकारजु नसंज्ञश्चावतारः शङ्करस्य वै। द्वितीय: श्रीगिरौ ताम भक्ताभीष्टफलप्रदः ।१० संस्तुतो लिङ्गरूपेण सुतदर्शनहेतुतः । गतस्तत्र महाप्रीत्या स शिवः स्वगिरेमुने ।११ ज्योतिलिङ्ग द्वितीय तद्दर्शनात्पूजनान्मुने। महासुखकर चान्ते मुक्तिद नात्र संशयः ।१२ महाकालाभिधस्तातावतारः शङ्करस्य वं। उज्जयिन्यां नगर्य्यां च बभूव स्वजनावनः ।१३
वह चन्द्र कुण्डके नाम से एक जलाशयहै। चतुर लोग बहाँ उस कुंड में स्तान करके समस्त रोगों से मुक्ति पा जाया करते हैं।।श्रीसोमनाथ का लिङ्ग स्वरूप साक्षात् श्रीशिवकेआ त्मरूप है। इस महाङग्रिके दशनसे पानों से छुटकारा पाकर मनुष्य भोग और मोक्ष दौनों की प्राप्ति कर लेतेहैं ।९। हे तात!भगवान् शङ्गर का द्वितीय अवतार मल्लिकार्जुन नाम वालाहै और वह श्रीगिरि पर्वत पर विरांजमान हैं तथा अपने भक्तजनों के मनचाहेफन प्रदान किया करते हैं ।१०हे मुनिवर ! पुत्रके मुख को देखने के लिये हाँ लिङ्ग के स्वरूपमें ही भगवान् शिव की स्तुति की गई थी।वहांसे फिरशिव प्रसन्नता के साथ कैलाश पर्वत के अपने निबास स्थानको चले गये हैं।११। हे मुने ! यह ही द्वादश अबतारों में द्वितीय ज्योलिंङ्ग है। इसके दर्शन से महान् सुख और जीवन के अन्तिम काल में निस्सन्देह मोक्ष प्राप्त होता है ।१२। हे मुनिराज ! हे तात ! अपने परिवार की रक्षा करने के लिये उज्जयिनी में महाकालेश्बर नाम वाला शिव का अवतार हुआ है ।१३ दूषणाख्यासुर यस्तु वेदधम प्रमर्दकम् । उज्जियिन्यां गतं विप्रद्वषिणं सर्वनाशनम् ।१४ वेदविप्रसुतध्यातो हुङ्कारेणव स द्रतम्। भस्मसाकृतवांस्तं च रत्नमालनिवासिनम् ॥१५
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द्वादश ज्योतिलिङ्गाबतार का वर्णन ] [ १५
तं हत्वा स महाकालो ज्योतिङ्गिंस्वरूपतः । देवंःस प्रार्थितोऽतिष्टरस्वभक्तपरिपालकः ।१६ महामालाह्वयं लिंङ्ग दृष्ट वाडभ्यर्च्य प्रयत्नतः। सर्वान्कामानवाप्नोति लभते परतो गतिम् ।१७ ओंकार: परमेशानो धृतः शम्भो परात्मनः। अवतारश्रतुर्थो हि भक्ताभीष्टफलप्रदः ।१८ विधिना स्थापितो भवत्या स्वलिङ्गोतपार्थिवान्मुने। प्रादुर्भूतो महादेवो विन्ध्यकामप्रपूरक: ।१९ देवैः सप्राथितस्तत्र द्विधारूपेण संस्थितः । भुक्तिमुक्तिप्रदो लिङ्गरूपो वै भक्तवत्सल ।२० प्रणवे चैव ओंकारनामासील्लिंगमुत्तमम् । परमेश्वरनामाऽडसीत्पार्थिवश्च मुनिश्वरः ।२१ महाकालेश्वर शिव ने उज्जयिनी में वेद एवं विप्रों से द्वष करनेवाले आये हुए दुरात्मा दूषण नाम वाले दैत्य को एक हूँकार से ही नष्ट करदिया था। यहाँ वह वेद-विप्रके पुत्र का वध करने के लिये आया था जोकिरत्न माल देश में भगवान् शङ्कर के ध्यान में सर्वदा निरत रहा करता था।१४ ११५। उसी समयमें दैत्य का संहार कर भक्तवत्सल शिवदेवगण से प्रार्थित होनेपर महाकालेश्वर नाम से ज्योतिरलिङ्ग के स्वरूप में उज्जयिनीनगरीमें विराजमान हुए हैं।१६।उज्जयिनीमें स्थित महाकालेश्वरके दर्शनका महान् फल होता है। जो इस ज्योतिलिङ्गके दर्शन तथा सयत्न समर्च नकरताहै, वह अपने सम्पूर्ण मनोरथ पाकर अन्त में निश्चय ही पर गतिकोप्राप्तकिया करता है।१७।शङ्कर का चतुर्थ अवतार ओङ्कारनाथ नाम वालाहै। यहभी भक्तोंके समस्त अमीष्ट फलों के प्रदान करने वाले हैं और अन्त में सद्गति दिया करते हैं।१८। हे मुनिवर ! ओङ्कारनाथ पार्थिव लिङ्ग के अनुसार सविधि भक्तिपूर्वकसंस्थापित महादेव ने प्रकट होकर विन्ध्यके मनोरथोंको पूर्ण किया ।१९।देवताओं से प्रार्थना किये जाने पर वहाँ शिव ने अपने दो
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१६ । श्री शिवपुराण स्वरूप धारण किये थे। भक्तों पर प्रेम करने वाले लिङ्ग रूप में बिरा- जमान शिव भुक्ति-मुक्ति के देने वाले हैं ।२०। हे मुने ! ओङ्कार नाम प्रणव में सर्वोतम लिङ्ग है और वहाँ परमेश्वर नाम वाले पार्यिवा रूक में प्रकट हुए हैं।२१। भक्ताभीष्टप्रदो ज्ञेया योऽपि ष्टोद्ट्चितो मुने। ज्योतिलिंगे महादिव्ये र्वणिते ते महामुने ।२२ केदारेशोऽवतारस्त् पश्चमः परमः शिवः । ज्योतिलिंगस्वरूपेण केदारे सस्थितः स च ।२३ नरनारायणा र्यौ याववतारौ हरेम ने। तत्प्राथितः शिवस्तत्स्थैः केदारे हिमभूधरे ।२४ ताभ्यां च पूजितो नित्यं केदारेश्वरसज्ञकः। भक्ताभीष्टप्रदः शम्धुर्दर्शनादर्चनादपि ।२५ अस्य खण्डस्य स स्वामी सर्वेशोऽपि विशेषतः। सर्वकामप्रदस्तात सोऽवतारः शिवस्य वै ।२६ भीमशङ्करसंज्ञस्त षष्ठः शम्भोर्महाप्रभोः । अवतारो महालीलो भीमासुरविनाशनः ।२७ सुदक्षिणाभिध भक्तङ्कामरूपेश्वर वृषम्। यो ररक्षाभ्दुत हत्वाऽसर त भक्तदुःखदम् ।२८ भीमशङ्करनामा स डाकिन्यां सस्थितः स्वयम्। ज्योतिरलिङ्गाय्वरूपेण प्रारथितस्तेन शङ्करः ।२९ हे मुने! शङ्कर के इस स्वरूप के दर्शन तथा पूजन से भक्तों के सभी अभीष्टफल प्राप्त होते हैं। मैंने तुम्हारे सामनेइस महान्दिव्य ज्योतिनिङ्ग का वर्णन मुना दिया है।२।शिव का पञ्चम ज्योतिलिङ्ग केदारेश्वर के नाम से अवतीण होकर केदारनाथ नामक स्थान में विराजमान है।२३। हे मुनि- वग! भगवान् विष्णु के नर ओर तारायण नाम वाले अवतारों द्वारा हिसा- चल पर शित की प्रार्थना को गई थी।२४।इनके पूर्जित ही शिव केवारनाथ नाम से विख्यात हुए हैं। इनके दर्शन तथा अर्चनसे मक्तजन के सभी अमीष्ट पूर्ण हो जाते हैं ।२५। हे तात ! यह शङ्कर का अवतार सबका स्त्राम एद
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द्वादश ज्योतिरलिङ्गावतार का वर्णन [ १७ समस्त कामनाओं को प्रदान करने वाला है और इस खण्ड का प्रभु है ।२६। महाप्रभु शङ्कर का षठ्ठ अवतार भीमशंकर नाम वाला है जो अनेक लीलाओं के करने वाला तथा भीमासुर का वध करने वाला था ।२३। शिवभक्तों को सताने वाले इस दैत्य का वध कर कामरूप देश के सुदक्षिण नाम वाले राजा की भगवान् शिव ने इस अवतार में रक्षा की थी।२८। तभी से शित्र भीमशंकर इस नाम से विख्यात होकर डाकिनी में अपने भक्त सुदक्षिण नृप से स्तुति किये जाने पर स्वयं लिङ्गरूप में वहाँ विराजमान हो गये ।२९। विश्वश्वरावतारस्तु काश्यां जातो हि सप्तमः । सर्वब्रह्माण्डरूपश्च भुक्तिमुक्तिप्रदो मुने ।३०। पूजितः सर्वदेवैश्रभक्त्या विष्ण्वादिभिः सदा। कैलासपतिना चापि भैरवेणापि नित्यशः ।३१। ज्योतिलिंगस्वरूपण संस्थितस्तत्र मुक्तिदः । स्वयं सिद्धस्वरूपो हि तथा स्वपुरि स प्रभु: ।३२। काशीविश्वेशयोर्भकत्या तन्नामजपकारकाः। निरलिप्ता: कर्मभिन्नित्यं केवल्यपदभागिनः।३३। त्रयम्बकाख्योऽवतारो यः सोऽष्टमो गौतमीतटे। प्राथितो गौतमेनाविर्बभूव शरिमौलिनः ।३४। गौतमस्य प्रार्थनया ज्योतलिंगस्वरूपतः । स्थितस्तत्राचलः प्रीत्या तन्मुनेः प्रीतिकाम्यया ।३५। तस्य सन्दर्शनात्स्पर्शाद्दर्शनाच्च महेशितुः । सर्वे कामाः प्रसिध्यन्ति ततो मुक्तिर्भवेदहो ।३६। शिवानुग्रहतस्तत्र गंगानाम्ना तु गौतमी। सस्थिता गौतमप्रीत्या पावनी शंकरप्रिया।३७। हे मुने ! शिवका सप्तम अवतार काशी में विश्वेश्वर इस नाम से हुआ था जो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वरूप है और भुक्ति-मुक्ति का प्रदान करने वाला है।३० उस समय भगवान् विष्णु आदि समस्त देवगणने उनकी स्तुति की। वह कैलाशके स्वामी यहाँ भैरव के एक रूप से स्थित हुए।३१। और
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[ श्री शिवपुराण एक अन्य ज्योतर्लिगके स्वरूप से वहाँ विराजमान हैं जो मुक्ति प्रदान करने वाले स्वयं सिद्ध स्वरूप एवं अपनी पुरी के प्रभु हैं।३२। काशीपुरी तथा वहाँ के स्वामी भगवान् विश्वनाथ की भक्तिभाव से अर्चना करने वाले और उनके पावन नाम का जप करने वाले पुरुष कर्म बन्धन से मुक्त होकर मोक्ष पद के अधिकारी हो जाते हैं।३३। शिव का त्र्यम्बक-इस नाम वाला अष्टम अब तार गौतम ऋषि की प्रार्थना से गौतमी नदी के तट पर हुआ है। ३४। शशि शेखर शिव गौतम मनिकी प्रम-मक्ति और कामनासे समन्वित प्रार्थनाके होने के कारण ही ज्योतिलिंगके सहित अचल होकर वहीं विराजमान हुएहैं।३५ यहाँ पर भगवान् शिवके दर्शन और स्पर्श न करने से मनुष्योंकी सम्पूर्ण काम- नायें परिपूर्ण हो जाती हैं और अन्त समय में मोक्षपद प्राप्त होता है।३६। गौतम मुनिकी उत्कृष्ट प्रीतिके कारणही शंकरभगवान्की कृपासे वहां गौतमी गंगा के नाम वाली परम प्रसिद्ध एवं अति पावन नदी स्थित रहती है।३७। वैद्यनाथवतारो हि नवमस्तत्र कीर्तितः। आविर्भू तो रावणार्थ बहुलीलाकरः प्रभु:।३८। तदानयनरूप हि व्याजं कृत्वा महेश्वरः। ज्योतिलिंगस्वरूपेण चिताभृमौ प्रतिष्टितः ।३९। र्वद्यनाथेश्वरो नाम्ना प्रसिद्धोऽभूज्जगत्त्रये। दर्शनात्पृजनाद् भक्त्या भुक्तिमुक्तिप्रदः स हि।४०। वैद्यनाथेश्वरशिवमाहात्म्यमनुशासनम्। पठतां शृण्वतां चारि भुक्तिमुक्तिप्रद मुने ।४१। नागेश्वरावतारस्तु दशमः परिकीर्तितः। अविर्भूतः स्वभवतार्थ दुष्टानां दण्डदः सदा।४२। हत्वा दारुकनामानं राक्षसं धर्मघातकम्। स्वभक्त वैश्यनायं च प्रारक्षत्सुप्रियाभिधम् ।४३। शिव का नवम अवतार वैद्यनाथ के नाम वाला हुआ है जो लकेश्वर रावणकेहित सम्पादन के लिये नाना प्रकारकी लीलायें प्रकट करने वाले थे ।३। शिवभक्त रावण उन्हें अपने साथलिये जानेकी इच्छाकर रहा था तब
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द्वादश ज्योतिर्लिगोंवतार का वर्णन 1 [ १९ उस समय बहाना करके चिता भूमि में वे ज्योतिलिंग के स्वरूप से स्थितहो गये।३९। उस स्थान पर भगवन् शिव वैद्यनाथेश्वरके नामसे सर्वत्र विख्यात होगये जिनके भकिूर्वक दर्शन करनेपर तथा पूजन करनेपर अपनीपूर्णं भक्ति एवं मुक्ति वे प्रदान करते हैं।४०। हे मुनीश्वर ! वैद्यनाथेश्वर शङ्गर अपने इस अनुशासनयुक्त महात्म्य को पठन एवं श्रवण करने वाले पुरुष का भुक्ति तथा मुक्ति दोनों ही प्रदान किया करते हैं।४१। भगवान् का दशम अवतार नागेश्वर नाम से प्रसिद्ध है जो अपने भक्जनों को अर्थ और दुष्टजनोंको दण्ड देने के लिये ही प्रकट हुए थे।४२। इस अवतार में शिव ने दारुक दैत्यका वध कर सुप्रिय नाम वाले अने परम भक्त एक वैश्य की रक्षा की थी।४३ लोकानामुपकारार्थ ज्योतिलिंगस्वरूपधृक्। सन्तस्थौ साम्बिकः शंभुर्बहुलीलाकरः परः।४४। तद् दृष्टवा शिवलिंगं तु मुने नागेश्वराभिधम्। विनश्यन्ति द्र तं चार्च्य महापातकराशयः ।४५। रामेश्वरावतारस्तु शिवस्यकादशः स्मृतः। रामचन्द्रप्रियकरो रामसंस्थापितो मुने ।४६। ददौ जयवरं प्रीत्या यो रामाय सुतोषितः । अविर्भू तः स लिंगस्तु शंकरो भक्तवत्सलः ।४७। रामेण प्रार्थितोऽत्यर्थ ज्योतिलिङ्गस्वरूपतः । सन्तस्थौ सेतुबन्धे च रामसंसेवितो मुने ।४८। रामेश्वरस्य महिमाद्भुतोऽभूद्भुवि चातुलः। भुक्तिमुक्तिप्रदश्च व सर्वेदा भक्तकामदः ।४९। नाना प्रकार की अद्सुत लीलायें करने वाले जगदम्बा भगवानोकेसहित शिव ज्योतिलिंग का स्वरूप धारण करके संसार के मनुष्योंकी भलाईके लिए वहाँ विराजमान हुए हैं।४४। हे मुने ! नागेश्वर नाम वाले भगवान् शित्रके लिग का दर्शनार्चन करने से बड़े से बड़े महान् पातकों के समूहभी शीघू ही समूल नष्ट हो जाया करते हैं।४४।हे मुनिराज ! भगवान शिव का रामेश्वर नाम वाला ग्यारहवाँ अवतार हुआहैजिसको श्रीरामचन्द्र भगवाननेस्थापित
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२० ] [ श्री शिवपुराणं किया था और उनका प्रिय कार्य करने वाले हुए हैं।४६॥ ज्योतिलिंग के सुन्दर स्वरूप में संस्थित भक्तवत्सल भगवान् शम्भु श्री रामचन्द्र जी की भक्ति-भावना से अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और उन्होंने श्रीराघवेन्द्र को विजय प्राप्त करने का वरदान दिया था।४७। हे मुने ! सेतुबन्थ में भगवाण श्रीरामचन्द्र ने उनकी अति सेवा की ओर उन्हीं की प्रार्थना से भगवान शङ्कर ज्योतिलिंग के स्वरूप में विराजमान हुए हैं ॥४८॥ इस भूमिमण्डल में श्रीरामेश्वर की बहुत अधिक तथा अत्यन्त अद्भुत महिमा है। रामेश्वर प्रभु मोग-मोक्ष और मन की सम्पूर्ण कामनाओं को पूरे करने वाले भक्तवत्सल हैं ।४९। त च गंगाजलेनैव स्नानपयिष्यति यो नरः। राभेश्वरं च सद्भक्त्या स जीवन्मुक्त एव हि ।५०। इह भुक्त्वाखिलान्भोगान्देवतादुर्ल्लंभानपि। अतः प्राप्य पर ज्ञानं कैवल्यं मोक्षमाप्नुयात् ।५१। घुश्मेश्वरावतारस्तु द्वादशः शंकरस्य हि। नानालीलाकरो घुश्मानन्ददो भक्तवत्सलः ।५२। दक्षिणस्यां दिशि मुने देवशैलसमीपतः। आविर्बभूव सरसि घुश्माप्रियकर: प्रभु ५३। सुदेह्यमारितं घुश्मापुत्र साकल्यतो मुने। तुष्टस्तद्भक्तितः शम्भर्योऽरक्षद्भत्तवत्सलः ।५४। तत्प्रार्थितः स वै शम्भस्तडागे तत्र कामदः। ज्योतिलिंङ्गस्वरूपेण तस्थौ घुश्मेश्वराभिधः ।५५। तं दृष्ट्वा शिवलिंग तु समभ्यर्च्य भक्तितः । इह सर्वमुखं भृक्त्वा ततो मुक्ति च विन्दति ।५६। जो मनुष्य श्रीरामेश्वर महादेव को दृढ़ भक्ति की भावना से गंगाजल से स्नान कराता है वह निश्चय ही जीवन्मुक्त हो जाता है ।५०। ऐसा पुरुष संसार में देव दुर्लभ परम सुख-सौभाग्यका उपभोगकर अत्यन्त ज्ञानकी प्राप्ति करता है और अन्त में उसका मोक्ष हो जाता है ।५१। भगवान् शिव का बारहवाँअवतार घुश्मेश्वर नाम वाला हुआहै। यहअवतार अपने अनन्यभक्तो के ऊपर अत्यन्त दया करने वाला हुआ है और इसने घुश्माको महान आनन्द
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द्वादश ज्योतिरलिङ्गावतार का वर्णन ] [ २१ का प्रदान किया है ।५२। हे मुनीश्वर ! दक्षिण दिशा में एक देवशैल है, वहाँ पर ही एक सरोवर के निकट महाप्रभु शिव प्रकट हुए हैं। जिन्होंने घुश्मा का प्रिय कार्य किया था ।५३। हे मुने ! भक्तों पर प्यार करने वाले भगवान् शङ्कर ने सुदेह्य नामक दैत्य के द्वारा मारे हुए घुश्मा के पुत्र के प्राणों की रक्षा भक्ति से सन्तुष्ट होकर की था ।५४। घुश्मा की प्रार्थना पर कामना देने वाले प्रभु शिव वहाँ एक सरोवर के समीप में ही घुश्मेश्वर नाम से ज्योतिलिङ्ग के स्वरूप में स्थित हो गये ।५५। इन ज्योतिलिङ्ग स्वरूप शिव के दर्शन एवं भक्ति समन्वित समर्चन से मनुष्य इहलौकिक सम्पूर्ण सुखों का आनन्दोपभोग करते हुए आगे चलकर मोक्षपद की सद्गति का लाभ प्राप्त किया करता है ।५६। इति ते हि समाख्याता ज्योतिलिङ्गावली मया। द्वादशप्रमिता दिव्या भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी।५७। एतां ज्योतिर्लिंगकथां यः पठेच्छणुयादपि। मुच्यते सर्वपापभ्यो भुवित मुविति च विन्दति ५८। शतरुद्राभिधा चेयं वाणिता सहिता मया। शतावतारः सत्कीर्तिः सर्वकामफलप्रदा ।५६। इमां यः पठते नित्यं श णुयाद्वा समाहितः । सर्वान्कामनवात्नोति ततो मुक्ति लभेद् घ्रवम् ।६०। हे मुनिराज ! मैंने तुम्हारे समक्ष में इन हादश संख्या वाले ज्योति- लिंगों का पूरा वर्णन कर दिया जिनके दर्शन स्पर्शन श्रवण और पठन से भुक्ति मुक्ति दोनों की प्राप्ति निस्सन्देह ही होती है ।५७। जो कोई मनुष्य संसार में इस ज्योतिलिंग की कथा को सुनता व सुनाता है वह समस्त पापों से छुटकारा पाकर भोग मोक्ष पाता है ।५८। हे मुने ! मैंने अब यह शतरुद्र संहिता का वर्णन सुना दिया है जो कि शिव के सौ अवतारों की कीर्तिस्वरूप है और सब मनोरथों का पूरा करने वाली होती हे ।५९। जो पुरुष पूर्णतया सावधान चित्त होकर इस शतरु्द्र सहिता को पढ़ता अथवा श्रवण करता है वह अपनी समस्त कामनाओं की प्राप्ति कर निश्चय ही पीछे मुविति को प्राप्त करता है॥६०॥
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कोटिरुद्र संहिता
। द्वादश ज्योतिलिंगों का साहात्म्य ।। यो धत्त निजमाययैव भुवनाकार विकारोज्झितो यस्याहु: करुणाकटाक्षविभवौ स्वर्गापवर्गाभिधौ। प्रत्यग्बोधसुखाद्वयं हृदि सदा पश्यन्ति यं योगिनः तस्मै शैलस्टाश्चितार्द्ध वपुषु शश्वन्नमस्तेजमे । कृपाललितवीक्षण स्मितमनोज्ञवक्त्राम्बुजं- शशांककलयोज्ज्वलं शमितघोरतापत्रयम्। करोतु किमपि स्फुरत्परमसौख्यसच्चिद्वपु- र्धराधरसुताभुजोद्वलयितमहो मङ्गलम् ।२। सम्यगुक्त त्वया सूत लोकानां हितकाम्यया। शिवावतारमाहात्म्यं नानाख्यानसमन्वितम् ।३' पुनश्र कथ्यतां तात शिवमहात्म्यमुत्तमम्। लिंगसम्वन्सिप्रीत्या धन्नस्त्व शैवसत्तमः ।४। शण्वन्तस्त्वन्मुखाम्भोजान्न तृप्ताःस्मो वय प्रभो। शैव यशोऽमृतं रम्य तदेव पुनरुच्यताम् ।५। पृथिव्यां यानि लिङ्गानि तीर्थे तीथ शुभानि हि। अन्यत्र वा स्थले यानि प्रसिद्धानि स्थितानि वै ।६ । तानि तानि च दिव्यानि लिङ्गामि परमेशितुः। व्यासशिष्य समाचक्ष्व लोकानां हितकाम्यया ।७। समस्त प्रकार के विकारों से रहित, स्वकी भुवनमोहिनी माया से सब भुवनों को धारण करने वाले और जगदम्बा पार्वतीको अपने आधे अङ्ग में धारण करते हुए ते नमय स्वरूप वाले भगवान् शङ्करको सर्वदा प्रणाम करता हूँ जिनके करुणापूर्ण कटाक्षसे स्वर्ग तथा अपवर्गके सम्पूर्ण वैभव उनके भक्तों को प्राप्त हो जाया करते हैं और योगीजन जिनका पूर्ण बोध सुख सर्वदा अपने हृदय में देखा करते हैं।१। आधिमौतिक आध्यात्मिक और आधिदैविक इन
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द्वादश ज्योति्लिंगों का माहात्मा ] तीनों तापों के संतार को शान्त कर देने वाले कृपा से परिपूर्ण सुन्दर दृष्टि- पात करने वाले, स्मित से मनोहर मुख कमल वाले, चन्द्रदेव की कला के परमोज्जवल स्वरूपयुक्त समस्त सुखों के दाता, स्कूर्तिमान्, सच्चिदानन्द स्वरूप तथा भवानीकी भुजाओं से अलिंगित भगवान् शङ्कर का वपु हमारा सर्वदा मंगल करे।२। ऋषिवों ने कहा-हे सूतजी ! आपने लोकों को भलाई के लिए बहुत ही अच्छी बात कहने की कृपा की है। अब यह प्रार्थना की है कि आप अनेक सुन्दर आख्यानों से पूर्ण भगवान् शिव के अवतारों का माहात्म्य हमको बताइये।३। हे तात ! आप भगवान् शिवके भक्तों में सर्व श्रष्ठ है और परम धन्य हैं। भगवान् शङ्कर के लिंगस्वरूप से सम्बन्धित माहात्म्यका वर्णन विस्तृत रूप से करने की कृपा करें ॥४॥ हे प्रमो ! आपके मुखाम्बुज से दिस्तृत शम्भ के यशो मृत का श्रदणों द्वारा पान करते हुए हमारे मनको तृप्ति नहीं हो रही है अतएव आपसे निवेदन है कि उसे पुनः सुनाने का अनुग्रह करें ।५। इस भूमण्डल में प्रत्येक तीर्थ में जहाँ पर भी जितने शिवके शुभ लिंग स्थापित किये हैं तथा अन्य स्थलों में जितने विख्यात शिव लिंग विराजमान हैं उन समस्त परमेश महेश के दिव्य ,लगो का आपको पूर्ण ज्ञान है। हे व्यासजी के शिष्य ! आप सब लोकों के कल्याण की कामना से ही हमारे रमक्ष में इस समय वर्णन करने का अनुग्रह करें।६-७॥। साधु पृष्ठमृषिश्रष्ठा लोकानां हितकाभ्यया। कथयामि भदत्स्नेहात्तानि संक्षेपतो द्विजाः ।८। सर्वेषां शिवलिंगानां मुने संख्या न विद्यते। सर्वां लिङ्गममी भूमि: सर्वं लिङ्गमयं जगत् ।९। लिंगयुक्त नि तीर्थानि सर्वलिंगे प्रतिष्टितम्। सख्या न विद्यते तेषां तानि किश्चिद् व्रवीम्यहम्।१०। यात्किचिद् दृश्यते दृश्यं वर्ण्यते स्मर्यंते च यत्। तत्सर्वं शिवरूपं हि नान्यदस्तीति किश्वन ।११। तथापि श्रतां प्रीत्या कथयामि यथा श्तम्। लिंगानि च ऋषिश्र श्ाः पृथिब्यां यानि तानि ह।१२।
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२४ 1 [श्री शिवपुराण पाताले चापि वर्थन्ते स्वर्गे चापि तथा भुवि। सर्वत्र तूज्यते शम्भु: सदेवासुरमानुषैः ।१३। त्रिजगच्छम्भुना व्याप्त सदेवासुरेमानुषम्। अनुग्रहाय लोकानां लिङ्गरूपेण सत्तमा:।१४। श्री सूतजी ने कहा-हे मुनिश्रष्ठ! इस समय आप लोगों ने समस्त लोकों के हिन की भावना लेकर अच्छा प्रश्न किया है हे ब्राह्मणो ! मुझे आप लोगों से बहुत ही स्नेह है अतः मैं सब कुछ सक्षिप्त रूप से आपके सामने वर्णन करता हूँ ।८। हे मुनीश्वर ! भगवान शिव के समस्त लिंगों की संख्या बाला देना असम्भव है और उन्हें पूर्णतया बतला देने की सामर्थ्य किसी में नहीं हो सकनी है क्योंकि सारा भूमण्डल एवं जगत् लिंगमय ही है ।९। समस्त तीर्थ लिंगमय हैं और सभी कुछ लिंग के द्वारा ही प्रतिष्ठित है तथा लिंग में ही स्थित है। उनकी संख्या वर्णनातीत है तथापि मैं दिव्य ज्योतिरलिंगों का बर्णन करता हूँ।१" इम जगतीतल में जो कुछ भी दर्शनीय पदार्थ हैं तथा जिनका भी वर्णन किया जाता है और स्मरण किया जाता है वह सब भगवान् शङ्कर का ही स्त्ररू है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है ।११। हे श्रष् ऋषिवृन्द ! तो भी पृथ्वी तल में जितने दिव्य लिंग हैं उनका वर्णने अपने श्रत के अनुसार मैं करता हूँ। आप प्रेमपूर्वक सुनो ।१२। भग- वान् शङ्कर के ज्योतिलिंग पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल में सर्वत्र विद्यमान हैं और वे देवे, असुर तथा मनुष्यों के द्वारा सभी स्थलों में पूजित एवं वन्दित होते हैं।१३ हे ऋषिश्रष्ठ ! देव, दैत्य और मानवों के सहित य त्रिभुवन महेश्वर से व्याप्त है और भगवान् शङ्गर संसार के कल्याण के लिये अनुग्रह करते हुए सर्वत्र लिंग स्वरूप में विराजमान रहते हैं।४ अनुग्रहाय लोकानां लिङ्गानि च महेश्वरः। दधाति विविधान्यत्र तीर्थे चान्यस्थले तथा ।१५। यत्र यत्र यदा शम्भुकत्वा भक्तैश्र संस्मृतः । तत्र तत्रावतीर्याथ कार्यं कृत्वा स्थितस्तदा।१६। लोकानामुपकारार्थ स्वलिंगं चात्यकल्पयत्। तल्लिङ्ग पूजयित्वा तु सिद्धिं समधिगच्छति ।१७।
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द्वादश ज्योतिर्लिंगों का माहात्म्प । [ २५ पृथिव्यां यानि लिङ्गानि तेषां सं्या न विद्यते। तथापि च प्रधाननि कथ्यते च मया द्विजाः ।१८। प्रधानेषु च यानीह मुख्यानि प्रवदाम्यहम् । यच्छत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवः क्षणात् ।१९। ज्योतिर्लिंगानि यानीह मुु्य मुख्यानि सतम। तान्यहं कथयाम्यद्य श्रुत्वा पाप व्यपोहति ।२०। सौराष्ट्र सोमनाथ च श्रीशदे मल्लिकार्जुनम्। ऊज्जयन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम् ।२१। भगवान् महेश्वर लोक कल्याणार्थ अनुग्रह करके समस्त तीर्थ स्थलों में विविध प्रकार के लिंगों का स्वरूप धारण करते हैं ।१५। जब जिस समय जहाँ जहाँ पर शिव भक्तों ने अपने अभीष्ट देव शिव का स्मरण किया है उसी समय वहाँ-वहाँ पर अवतार लेकर भक्त-कार्य पूर्ण करके महेश्वर विराजमान हो गये हैं।१६। सांसारिक लोगों के उपकार करने के लिये महेश्वर ने अपना लिंग स्वरूप प्रकट कर दिया है। उसी लिंग प्रतिमा का समर्चन कर संसार में मनुष्य अनेकानेक सिद्धियों को प्राप्त किया करते हैं।१७। हे द्विजवरो ! यद्यपि इस पृथ्वी तल पर विराज- मान लिंण भी गणना करने के योग्य नहीं हैं तथापि मैं कतिपय प्रमुख लिंगों का वर्णन करता हूँ।१८। इस भूमि मण्डल के प्रधान स्थलों में जहां-जहाँ पर भी मुख्य-मुख्य शिव की लिंग मूर्तियाँ विराजमान हैं मैं इस समय उन्हीं का वर्णन करना चाहता हूँ, जिनके अख्धानों का श्रवण कर मनुष्य उसी समय समस्त स्त्रविहित पापों से छुटकारा पा जाता है ।१६ हे सत्तम ! जितने भी मुख्य-मुख्य महेश्वर के ज्योतिलिंग हैं अब उनके ही विषय में कुछ वर्णन करता हूँ उसको सुनकर प्राणी पापों से विमुक्त हो जाता है।२०। सौराष्ट्र में सोमनाथ, उज्जयिनी पुरी में महा- काल, श्री शैल में मल्लिकार्जुन और ओद्कार में परमेश्वर ज्योतिलिंग के रूप में स्थित हैं।२१। केदारं हिमवत्पृष्ठ डाकिन्यां भीमशङ्करम्। वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।२२। वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने। सेतुबंधे च रामेश घुश्मेशं च शिवालये।२३।
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२६ ] । श्री शिवपुराण
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्। सर्वपापविनिरमुक्त सर्वसिद्धिफलं लभेत् ।२४। यं य काममपेक्ष पठिष्यन्ति नरोत्तमाः। प्राप्यंति कामं तं तं हि परत्र ह मुनीश्वरा:२५ ये निष्कामतया तानि पठिष्यन्ति श भाशयाः । तेषां च जननीगर्भे वासो नैव भविष्यति।२६। एतेषां पूजनेनैव वर्णानां दुःवनाषनम्। इक लोमे परत्रापि मुक्तर्भ वति निश्चितम् :२७। ग्राह्यम षां च नैवेद्य भाजनींयं प्रयत्नतः । - तत्कर्तु : सर्वपापानि भस्मसाद्यान्ति वै क्षणात् ।२८। हिमाचल पर बे दारनाथ, डाकिनी में भीमशङ्कर, वाराणसी पुरी में विश्वनाथ और गौतमी नदी के तट पर त्यश्बकेश्वर नामक ज्योतिलिंग हैं। ।२२। चिताभूमि में वैद्यनाथ, सेतुबन्ध में रामेश्वरनाथ,द ारुक वनमें नागेश और शिवालय में घुश्मेश्वर नाम वाम वाले शिवके ज्योतिलिंग सस्थितहैं२३ इन द्वादश शिव के नामों का जो प्रात कालमें उठते ही स्मरण करता हैं वह सब पापों से मुक्ति होकर समस्त सिद्धियाँ प्राप्त करताहै २४।हे मुनीश्वरो ! जो श्रष मानव हृदयमें जिस-जिम मनोरथका उद्दश्य लेकर इन द्वादश शम्भु के शुभ नामों का पाठ एवं स्मरण करेंगे वे उन मनोरथों को इस लोक और परलोक में अवश्य ही प्राप्त कर लेंगे । २५। जो मानव निष्काम भावनासे ही अपना कर्त्त व्य समझते हुए उपास्य देव श्री महादेव के इन बारह नामों का स्मरण करेंगे उन्हें फिर संसार में माता के गर्भ में आकर कष्ट नहीं भोगना पड़ेगा।२६। उपयुक्त द्वादश ज्योतिलिंगोंके अर्चन करने मात्रसे सभस्त वर्णों के दुःख-दारिद्रय का नाश होजाता है और इस लोकमें सुखोपभोग तथा पर लोक में मोक्ष मिलता है।२७। इन ज्योतिलिंग स्वरूप शिव प्रतिमाओं पर चढ़ा हुआ नैवेद् (मिठाई) ग्रहण करनी चाहिए और उसे सयत्न खालेना भी उचित है। ऐसा करने वालों के सभस्त पाप उसी समय भस्मीभूत हो जाया करते हैं।२८।
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द्वादश ज्योतिलिंयों का माहात्म्य 1 २७
ज्योतिषां चैव लिंगानां ब्रह्मदिभिरलं द्विजाः । विशेषनः फलं वक्तु शक्यते न नरैस्तया ।२९। एकं च पूजितं येन षग्मासं तन्निरन्तरम्। तस्य दुख न जायेत मातृकुक्षिसमुद्भवम् ।३०। हीनयौनौ यदा जातो ज्योतिरलिंग च पश्यति। तस्य जन्म भवेत्तत्र विमले सत्कुले पुनः ।३१। सत्कुले जन्म संप्राप्य धनाढ्यो वेदपारगः। शुभकर्म तदा कृत्वा मुक्ति यात्नपायिनीम् ।३२। म्लेच्छो वाप्यन्तजो वापि षण्णो वापि मुनीश्वराः। द्विजो भूत्वा भवेन्मुक्तस्तस्मात्तदर्शन चरेद् ।३३। ज्योतिषां चैव लिंगानां किंचित्प्रोक्तं फलं मया। ज्योतिषां चोपलिगानि श्रयन्ताम षिसत्तमाः ।३४। सोमेश्वरस्य यल्लिंगमन्तकेशमुदाहृतम्। मह्याः सागरसयोगे तल्लिंगमु्पललिंगकम् ।३५। हे द्विजवरो ! इन द्वादश ज्योतिलिंग का वन्दनार्चन द्वारा प्राप्त फल का यथातथ वर्णन करने की सामर्थ्य ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवताओं में भी नहीं है अन्य साधारण की तो बात ही क्या है ॥२९॥ जो पुरुष निरन्तर नित्य ही छै मास तक किसी भी एक ज्योतिलिंग का पूजन करता है उसे फिर माता की कुक्षि में निवास करने की पीड़ा नहीं भोगनी पड़ती है ॥३०॥ जो किसी निकृष्ट योनि में जन्म लेकर भी शित्र की लिंगमयी प्रतिमा का दर्शन करता है तो उसके अगले जन्म में श्रष्ठकुल प्राप्त हो जाता है।। ३१। इस तरह शुद्ध एवं श्रेष्ठ कुल में जन्म पाने के साथ धनाढय और वेद-शास्त्र का पारगामी विद्वान् भी हो जाता है जिससे श्रधुकर्न करके विनाश-विहीन विमुक्ति की प्राप्ति कर लेता है ॥०२॥ हे मुनीश्वरो! चाहे कोई म्लेच्छ हो अथवा अन्त्यज हो तथा नपुंसक हो-केसा भी कोई क्यों न हो, वह यदि शित्भक्त रोज शिव पूजन करता है तो दूसरे जन्म में द्विज होकर अवश्य ही मुक्त हो जाता है। अतएव महेश्वर के दर्शन हरएक को अवश्य ही करना चाहिए।३३। हे श्रेष्ट ऋृषि-
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२८ श्री शिवपुराण गण ! तभी तक मैने आप लोगों के सामने शिव के ज्योतिलिंग का पूजन एवं दर्शन के फल का वर्णन किया है। अब मैं उनके उप-लिंगों के फल का वर्णन करता हूँ आप उसे श्रवण करें ॥ ३४ ॥ भूमि और समुद्र के संयोग में सोमेश्वर का उपर्लिंग अन्तकेश नाम से प्रथित है।३५। मल्लिकार्जुनसंभूतम पलिंगम दाहमम्। रुद्रश्व रमिति ख्यात भृगुकक्षे सुखावहम् ।३६। महाकालभवं लिंग दुग्धेशमिति विश्र तम्। नर्मदायां प्रसिद्ध तत्सर्वंपापहर स्मृतम् ।३७। ॐ कारज च यल्लिङ्ग कर्दमेशमिति श्रतम्। प्रसिद्ध बिन्दुसरसि सर्वकामफलप्रदम् ।३८। केदारेश्वरसंजातं भूतेशं यमुनातटे। महापापहरं प्रोक्तं पश्यतामर्चंतां तथा।३९। भीमशङ्करसंभूतं भीमेश्वरमिति स्मृतम्। सह्यांचले प्रसिद्ध तन्महाबलविवर्द्धनम्।४०। नागेश्वरसमुद्भूत भूतेश्वरमुदाहृतम्। मल्लिकासरस्वतीतीरे दर्शनात्पापहारकम्।४१। रामेश्वरराच्च यज्जातं गुप्तेश्वरमिति स्मृतम्। घुशमेशाच्चैव यज्जातं व्याघ्रश्वरमिति स्सृतम् ।४२। ज्योतिलिंगोपलिंगानि प्रोक्तानीह मया द्विजाः। दर्श नात्पापहारीणि सर्वकामप्रदानि च ।४३। एतानि सुप्रधानानि मुख्यतां हि गतानि च। अन्यायि चापि मुख्यानि श्रयतामृषिसत्तमाः।४४। भृगु कक्ष में में मल्लिकार्जुन से प्रकट होने वाला परमसुख का दाता रुद्र श्वर नाम वाला उपलिंग कहा गया है।३६। नमदा नदी के तट पर महाकाल ज्योति लिग से उत्पन्न हुआ दुग्धेश नाम बाला उपलिंग है जोकि समस्त पापराशि का हरण करने वाला बताया गया है।३७।श्रीओद्कार से समुत्पन्न कर्दमेश नामक एक उपलिंग है जो कि विन्दु सरोवर में विख्यात है और सब कामनाओं का देने वाला बताया गया है।२श्रीसूर्य तनया यमुना
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अन्यान्य शिवर्लिंगों का माहात्म्य { २९
के तट पर केदारेश्वर ज्योतिलिंग से समुद्भुत होने वाला भूतेश नाम से विख्यात उपलिंग है जिसके दर्शन तथा पूजनार्चन करने से महापाप भी दूर हो जाया करते हैं।३९। भीम शंकर से समुत्पन्न मीमेश्वर नाम वाला उपलिंग है जो कि सह्य नामक पर्वत पर विख्यात है और बहुत भारी बल का प्रदान करने वाला है ।४०। मल्लिका सरस्वती नदी के तट पर नागेश्वर ज्योतिलिंग से उद्भव प्राप्त करने वाला भूतेश्वर नामक शिव का उपलिंग है जिसके केवल दर्शन मात्र से ही पापों से छुटकारा हो जाता है।४।। श्री रामेश्वर भगवान् से उत्पन्न होने वाले गुप्त श्वर तथा घुश्मेश शम्भु के ज्योतिलिंग से उत्पन्न व्याघूश्वर उपलिंग है ४२। हे द्विजगणों ! अब यह मैंने आप लोगों के सामने जयोतिलिंगों के समीपस्थ उपलिंगों का वर्णन किया है जिनके दर्शन का भी महान् पुण्य एवं फल होता है और समस्त पाप छूट करते हैं एवं सम्पूर्ण मनोरथ पूरे हो जाते हैं।४३। हेऋषिश्रष्ठो ! ये वर्णित सभी उपलिंग बहुत ही प्रसिद्ध हैं और मुख्य रूप से कहे गये हैं। इसके अनन्तर अव अन्य विख्यात लिंगों का वर्णन भी करता हूँ जिसे आप लोग श्रवण करेंगे ।४४। ।। अन्यान्य शिव लिंगों का माहात्या॥। गंगातीरे सुप्रसिद्धा काशी खलु विमुक्तिदा। सा हि लिंगमयी ज्ञया शिववासस्थली स्मृता ।१। लिंग तत्र व मुख्य च सम्प्रोक्तमविमुक्तकम्। कृत्तिवासेश्वरः साक्षात्तत्त त्यो सृद्धबालकः ।२। तिलभणडेश्व वर दशाश्वमेध एव च। गंगासागरसंयोगे संगमेश इति स्मृतः ।३। भ तेश्वरो यः संप्रोक्तो भक्तसर्वार्थवः सदा। नारीश्वर इति ख्यातः कौशिक्यः स समीपगः ।४ वर्तते गण्डकीतीरे वटुकेश्वर एव सः। पूरेश्वर इति ख्यातः कल्गुतीरे सुखप्रदः ।५
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३० ॥ श्री शिगपुराण सिद्धनाथेश्वरश्चव दर्श नात्सिद्धिदो नृणाम्। दरेश्वर इति ख्यातः पतने चोत्तरे तथा।६। शृगेश्वरश्च नाम्ना वै वैद्यनाथस्तथैव च। जप्येश्वरस्तथा ख्यातो यो दधीचिरणस्थले ।७। श्रो सूत जीन कह-भागीरथी के परम पावन तट पर बसी हुई मुक्ति के प्रदान करने वाली अति विख्यात काशी नाम की नगरी है वह समस्त लिंगमत्री तथा भगवान विश्वनाथ के निवास करने की भूमि कही गई है। ।१। काशीपुरी में मुक्ति के प्रदान करने वाली भगवान् शिव की मुख्य प्रतिमा विराजमान है और कृत्तिवास शिव भी वहाँ पर स्थित हैं। वहाँ काशी में नित्य निवास करने वाला, चाहे वृद्ध हो, बालक हो, साक्षात् शिव के तुल्य ही हो जाया करता है ।२। वहाँ तिलभाण्डेश्वर तथा दशाश्मेघ नाम वाले भी शिव हैं। गंगा सागर के संगम में संग- मेश नामक शिव विराजते हैं ।३। भूतेश्वर एवं नारीश्वर नामों से विरुपात होने वाले शिव कौशिकी नदी के समीप में विराजमान हैं जो अने शक्तों को निरन्तर समस्त वस्तुओं को प्रदान करने वाले हैं।४ गण्डकी नदी के तट पर बटुकेश्वर नाम वाले महादेव हैं और फल्गु नदी के किनारे पर सुख के दाता पूरेश्वर नाम वाले भगवान् शङ्कर हैं। उत्तर नगर में सिद्धनाथेश्वर शिव हैं जो दर्शन मात्र से ही मनुष्यों को सिद्धि देने वाले प्रसिद्ध हैं और वहाँ पर ही दूरेश्वर नामक भी शिव विराजमान हैं । ।५-६। दवीचि मुनि के युद्धस्थल में प्रसिद्ध होने वाले शृ गेश्वर वैद्यनाथ तथा जप्येश्वर नामक शिरवािग विराजमान है ।७! गोपेश्वरः समाख्तो रगेश्वर इति स्मतः। वाम श्वरश् नागेशः कामशो विमलेश्वरः ।८। व्यासेश्वरक्ष विख्यातः सुकेशश्र तथैव हि। भाण्डेश्वरश्र विख्यातो हुँकारेशस्तथैव च ।९। सुरोचनश्र विख्यातो भूनेश्वर इति स्वयम्। संगम शस्तथा प्रोक्तो महापातकनाशनः।१०। ततश् तप्तकातीरे कुमारेश्वर एव च।
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अन्याय शिवलिंगों का माहात्म्य] [ ३१ सिद्धश्वरश्च विख्यातः सेनेशश्र तथा स्मतः ।११। रामेश्वर इति प्रोक्तो कु भेशश्र परो मतः। नन्दीश्वरश्र पुजेशः पूर्णायां पूर्णकस्तथा।२ ब्रह्मश्वरः प्रयागे च ब्रह्मणा स्थापितः पुरा। दशाश्वमेघतीर्थे हि चतुर्वर्गभलप्रदः ।१३। तथा रामेश्वरस्तत्र सर्वापद्वि नवारकः। भारद्वाजेश्वरश्चव ब्रह्मवर्चः प्रवर्द्धकः ।१४। वहाँ पर गोपेश्वर, रंगेश्वर, वामेश्वर, नागेश, कामेश और विमले- शवर नाम वाली शिव की मूर्तियाँ स्थित हैं।८। इनके अतिरिक्त व्यासे- श्वर, सुकेश, भाडेश्वर, हुँकारेश नाम की प्रतिमाएं मी है ॥ ९ ॥ और भी सुरोचन, भूतेश्वर, तथा सगमेश नाम से परम विख्यात भगवान् शम्भु के ज्योतिर्लिंग हैं जिनके अर्शनारचन से मनुष्यों के पापों का श्रय हो जाता है ॥१०। तप्तका नाम की नदी के तट पर शिव की सिद्धश्वर, कुमारेश्वर और सेनेश नाम वाली प्रसिद्ध प्रतिमाऐं हैं॥ ११ ॥ पूर्ण में रामेश्वर, कुम्भेश, नन्दीश्वर; पुजेश और पूर्णक नाम वाले भगबान् शिव की मूर्त्तियाँ हैं ॥१२। प्रयाग में प्राचीन समय में ब्रह्माजी के द्वारा संस्थापित दशाश्वमेध तीर्थ पर ब्रह्म श्वर नामक शिव कर्म अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों फलों को देने वाले विराजमान हैं ॥१३॥ वहाँ पर सोमेश्वर नामधारी शिव समस्त आपत्तियों के हटा देने वाले हैं और भारद्वाजेश्वर ब्रह्मतेज के प्रदान करने वाले हैं ॥१४॥ शूलट केश्ररः साक्षात्कामनाप्रद ईरितः। माधवेशश्र तत्र व भक्तरक्षाविधायकः ।१५। नागेशाख्यः प्रमिद्धो हि साकेतनगरे द्विजाः । सूर्यवंशोद्भवानां च विशेषेण सुखप्रदः ।१६। पुरुषोत्तमपुर्यां तु भुवनेशः सुसिद्धिदः । लोकेशश्र महार्लिंग: सर्वानन्दप्रदायक: ।१७। कामेश्वरः शंभुरलिंगो गगेशः परश द्धिकृत्। शक्रेश्वरः शुक्रसिद्धो लोकानां हितकाम्यया।१८।
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३२ 1 [ श्री शिवपुराण तथा वटेश्वरः ख्यातः सर्वकामफलपदः। सिंधुतीरे कपालेशो वक्त्रशः सर्वपापहा।१९। धौतपापेश्वरः साक्षादशेन परमेश्वरः। भीमेश्वर इति प्रोक्त: सूर्येश्वर इति स्मृतः ।२०। नन्देश्वरश् विज्ञयो ज्ञानदो लोकपूजितः। नाकेश्वरो महापुण्यस्तथा रामेश्वरः स्मृतः ।२१। सम्पू" कामनाओं को पूर्ग करने वाले शूनटकेश्वर महादेव हैं तथा भगवान् माधवेश्वर अपने मक्तों की रक्षा करने वाले विराजमान है।१५। हे विप्रवृन्द ! अधोध्यापुरी में नागेश नामक परम प्रसिद्ध शिग हैं जो सूर्य वंशमें उत्पन्न होने वाले मनुष्यों को विशेष रूपसे सुख-सौभाग्य प्रदानकिय करते हैं।१६। पुरुषोत्तमपुरी में श्री भुवनेश शित्र की प्रतिमा बहुन प्रसिद्ध है और वहाँ लोकेश नाम वाले महालिंग मनुष्योंको पूर्ण आनन्द देने वाले हैं।१७। भगवान् शम्मु की कमेश्वर नामक मूर्ति ज्योतिरलिंग के रूप में है तथा गंगेश शुद्धि करने दाले और शुक्रेश्वर एवं शुक्र सिद्ध भगवान्शिश लोकों की हित सम्पादन करने की इच्छा से गहाँ स्थापित हुए हैं ॥१८॥ भगवान् वटेश्वर नामक परम प्रसिद्ध शिव समस्त कामनाओंके फलको प्रदान करने वालेहैं तथा सिन्धु नदीके तट पर श्रीकपालेश्वर और वक्त्रश समस्त पापों का हरण करने वाले हैं।१९। साक्षात् शिव के स्वरूप वाले वहाँ धौत पापेश्वर, भीमेश्वर और सूयेश्वर नाम से प्रसिद्ध प्रतिमाएं विराज- मान हैं॥२०॥ समस्त संसार में पूजित नन्देश्वर शिव ज्ञान के प्रकान करने वाले-नमस्कार महान पुण्य के प्रदाता तथा रामेश्वर भगवन् महान् पुण्य के फलों के देने वाले स्थित हैं॥ २१ ॥ विमलेश्वरनामा वकंटकेश्वर एव च। पूर्णसागरसयोगे धतु केशस्तथैव च ।२२। चन्द्र श्वरश्च विज्ञ यश्चन्द्रकान्तिफलप्रदः। सर्वकामप्रदरशर्चव सिद्धेश्वर इति स्मृतः ।२३। बिल्वेश्वरश्र विख्यातश्चान्धकेशस्तथैव च। यन पा अपको दैत्य: शङ्करेण हतः पुका ।२४।
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चन्द्रमाल पशुपति शिवलिंग माहात्म्य ३३
अयं स्वरूपमशेन धृत्वा शंभु: पुनः स्थितः । शरणेश्वरविख्यातो लोनांक सुखदः सदा ।२५। कर्दमेशः परः प्रोक्तः कोटिशश्चः बुदाचले। अचलेशश्च विख्यातो लोकानां सुखदः सदा ।२६। नागेश्वरवस्तु कौशिक्यास्तीरे तिष्ठति नित्यशः। अन्तेश्वरसंज्ञश्च कल्याणशुभभाजनः ।२७। योगेश्वरश्च विख्यातो वैद्यनाथेश्वरस्तथा। कोटोश्वरश्र विज्ञयः सप्तश्वर इति स्मृतः ।२८। भद्र श्वरश् विख्यातो भद्रनामा हरः स्वयम्। चण्डीश्वरस्तथा प्रोक्तः सगमेश्वर एव च ।२९। पूण सागर के संयोग के निकट में विमलेश्वर, कटकेश्वर और धर्तु केश शिव के ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं॥ २२॥ चन्द्रमा के समान कान्ति प्रदान करने वाले चन्द्रेश्वर और सब मनोरथ दाता सिद्धेश्वर शिव बताये गये हैं।। २३ ॥ जिस स्थान पर प्राचीन काल में भगवान शिव के अन्धक नाम वाले दैत्य का वध किया था वहाँ अन्धकेश तथा बिल्वेश्वर नाम से प्रथित हैं॥२४॥ भगवान् शम्भु ने अपने अश से यही स्वरूप धारण करके यहाँ पर शरणोश्वर नाम से प्रसिद्ध होकर अपनी स्थिति की है जो संसार के प्राणियों को परम सुख प्रदान करने वाले हुए हैं।२५। अबुद (आबू) नामक पर्वत पर सदा मनुष्यों को सुख प्रदान करने वाले कर्दमेश कोटीश और अचलेश नाम से भगवान् शिव विराजमान हैं।। २६ ॥ कौशिकी नामक नदी के तट पर नागेश्वर तथा अनन्तेश्वर नाम से विख्यात शिव प्रतिमाऐं कल्याण करने वाली हैं। ।।२७।। इनके अतिरिक्त यंगेश्वर, वैद्यनाथ, सप्तेश्वर और कोटिश्वर नाम वाले शिव परम विख्यात हैं॥ रत मद्र नामक साक्षात् शिव भद्रवर इस नाम से एवं चण्डीश्वर और संगमेश्वर नामों से विखुवात हैं ॥२९॥ उत्तर दिशा के चन्द्रभाल पशुपति शिवलिङ्ग माहात्म्य। श्ृणुतादरतो विप्रा औत्तराणां विशेषतः । नाहात्म्य शिवलिगानां प्रवदामि समासतः २०।
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३४ ] [ श्रीविष्णुपुराण
गोकर्ण क्षेत्रमपरं महापातकनाशनम्। महावन च तत्रास्ति पवित्रमतिविस्तरम् ।२। तत्रास्ति चन्द्रभालाख्यं शिवलिंगमनुत्तमम्। रावणेन समानीत सद्भक्त्या सर्वसिजिुदम्। ३। तस्य तत्र स्थितिर्वेद्यनाथस्येव मुनिश्वराः। सर्वलोकहितार्थाय करुणासागरस्य च।४। स्नान कृत्वा तु गोकर्णे चन्द्रभालं समर्च्य च। शिवलोकमवाप्नाति सत्यं सत्यं न सशयः ।५। चन्द्रभालस्य लिंगस्य महिमा परमाऽद्भुता। न शक्या र वणितु व्यासाद् भक्तिस्नेहतरस्य हि ।६। चन्द्रभालमहादेवलिंगस्य महिमा महान्। यथाकथंचित्संप्रोक्ता परलिंगस्य वै श्र णु ।७ श्री सूतजी ने कहा-हे विप्रवृन्द ! अब मैं आपके सामने उत्तर दिशा में विराजमान शिव के ज्योतिलिंगों के माहात्म्य का वर्णन संक्षेपसे करता हूँ उसे आप सभी परम आदर तथा प्रेम से श्रवण करो ॥१॥ महान् पातकों का नाश करने वाला अन्य गोकणंनाम वाला क्षेत्रहैऔर वहाँ अत्यन्त विशाल विस्तृत तथा परम पवित्र वन है ॥२।। उस स्थान पर चन्द्रभाल नाम से विख्यात शिवका एकश्रेष्ठ ज्योतिरलिंग रावण के द्वारा भक्तिसे सहित स्थापित किया हुआ है जो समस्त सिद्धियों का प्रदान करने वाला है।३ हे मुनिश्वर वृन्द ! समस्त संसार की मलाई के लिये दया के सागर भगवान चन्द्रभाल शिव के लिंग की वैद्यनाथ के तुल्य ही स्थिति है।४। यह सर्वथा पूर्ण सत्य हैऔर नितान्त निस्सन्देह है कि गोकर्णमें स्नानकर चन्द्रभाल शिरवर्लिंग का अर्चन-वदन करने वाले पुरुषों को शिवलोक की प्राप्ति हो जाती है ॥५॥ अष्यन्त सक्त-वत्सल चन्द्रभाल शङ्करकीमहिमा परम अद्भुतहैजिसका यथार्थ वर्णन करने में स्वयं व्यास मुनि भी असमर्थ होते है ।६। यद्यपि चन्द्रभाल शिव की महिमा बहुत ही बड़ी है तो भी मैं अपनी सानर्थ्य के अनुसार उसका कुछ वर्णन करता हूँ आप लोग उसको श्रवण करें॥७॥
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चन्द्रभाल पशुर शिवलिंग माहात्म्य [ ३५
दाधीचं शिवलिंग तु मिश्रषिंवरतीर्थके। दधीचिना सुनीशेन सुप्रीत्या च प्रतिष्ठितम् ।८। तत्र गत्वा च तत्तीर्थे स्नात्वा सम्यग्विधानतः। शिवलिंग समर्चेद्व दाधीश्वरमादरात् ।९। दधीचमूर्तिस्तत्र व समर्च्या विधिपूर्वकम् । शिवप्रीत्यर्थमेवाश तीर्थयात्राफलारथिभि:।१०। एवं कृते मुनिश्रष्टाः कृतकृत्यो भवेन्नरः। इह सर्वसुख भुक्त्वा परत्र पतिम प्नुयात् ।११। नैमिषारण्यतीर्थे तु निखिलर्षिप्रतिष्टितमे। ऋषिश्वरमिति ख्यातं शिवलिंग सुखप्रदम् ।१२। तद्दर्शनात्पूजनाच्च जनानां पापिनामपि। भुश्रिमुक्तिश्व तेषां तु परत्र ह मुनीश्वराः ।१३। हत्याहरणतीर्थे तु शिवलिंगमघापहम् पूजनीयं विशेषेण हत्याकोटिविनाशनम् ।१४। मिश्र (मिश्र ऋषिनामक तीर्थ पर दाधीच नाम वाला शिव का लिंग बिराजमान है जिसको दाधीच मुनि ने परम प्रीति एवं भक्ति के साथ वहाँ स्थापित किया था।८। वहाँ पहूँच कर सविधि स्नानादि करने के पश्चात् दाधीकेश्वर शिव की अचना करनी चाहिए।९। अतिशीध्र तीर्थ-यात्रा के फल प्राप्त करनेकी इच्छा रखने वालोंको भगवान् शिवके प्रसन्न करनेके लिए दाधीच ऋृषि की संस्थापित प्रतिमा का विधिपूर्वक पूजन करमा आवश्यकहै ।१०। हे श्रष्ठ मुनिय ! इस रीति से शिवार्चन करने से मनुष्य इस लोक में कृत-कृत्य होकर अन्त समयमें परलोककी सद्गतिको प्राप्त होजाया करता है।११। नंमिषारण्य की पवित्र तपो भूमि में वहाँ के तपोनिष्ठ ऋषिगण के द्वारा संस्थापित ऋषीश्वर नामधारी शिव का ज्योतिलिंग है, जो मनुष्योंको सदा सुख प्रदान किया करते हैं ॥१२। हे मुनिवृन्द ! भगवान् ऋषीश्वर के दशन से पापात्मा मनुष्यों का भी उद्धार हो जाता है और वे मी अपने समस्त पाप राशिसे उन्मुक्त होते हुए इस लोकमें भुक्ति और परलोकमें मुक्ति
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३६ ] [ श्री शिवपुराण
की प्राप्ति प्राप्त कर लिया करते हैं। १३ ॥ हत्याहरण नामक तीर्थ में सम्पूर्ण पापों के नाश करने वाले और खासतौर से करोड़ों हत्याओं के बिनाशक पगम पूज्य का लिङ्ग विराजमान है॥१४॥ देवप्रयागतीर्थे तु ललितेश्वरनामकम्। शिवलिंगं सदा पूज्य नरः सर्वाधनाशनम् ।१५। नयपालाख्यपुर्य्या तु प्रसिद्धायां महीतले। लिंगं पश पतीशाख्यं सर्वकामफलप्रदम् ।१६। शिरोभागस्वरूपेण शिवलिंग तदस्ति हि। तत्कथां वर्णयिष्यामि केदारेश्वरवर्णने।१७। तदारान्मुवितन थाख्यं शिवलिंग महाद्भुतम्। दर्शनादर्चनात्तस्य भुक्तिमुंक्तिश्च लभ्यते ।१८। इति वश्च समाख्यातं लिङ्गवर्णनमृत्तमम् । चतुर्दिक्ष मुनिश्र ष्ठाः किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ ।१९। देवप्रयग नामक तीर्थ के स्थान में सब पापों का क्षय करने वाले ललितेश्वर नाम वाले शिव का सब पुरुषों को पूजन अवश्य ही करना चाहिए।१५। परम विख्यात नयपालपुरी में अर्थात् नैपाल में पशुपतीश्वर नाम वाले अति प्रसिद्ध तथा समस्त मनोरथों की पूर्ति करने वाले ज्योति- लिंङ्ग विराजमान हैं ॥१६॥ यह शिव का लिंग शिर के माग के स्वरूप में ही संस्थित है। इनकी कथा का वर्णन मैं केदारेश्वर के इतिहास में बतलाऊगा। १७॥ इनके समीप मे ही मुक्तिनाथ वाले परम अद्भुत शिव का लिग है जो दर्शन देकर एवं पूजित होकर भ क्ति-मुक्ति दोनों को प्रदान किया करते हैं ॥१८॥ हे श्रेष्ठ मुनिगण ! इस प्रकार से चारों दिशाओं में विराजमान भगवान् शिव हैं। अब क्या श्रवण करना चाहते हो ? ॥१९। ।। विष्णु द्वारा शिव सहस्त्र नाम का कीर्तन।' श्र यतां भो ऋषिश्रष्ठा येन तुष्टो महेश्वरः। तदह कथयाम्यद्य शव नामसहस्त्रकम् ।१।
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विष्णु द्वारा शिव सहस्र नाम का कीर्तन ] ३७ शिवो हरो मृडो रुद्रः पुष्पलोचनः । अथिगस्यः सदाचारः सर्वः शंभुमहेश्व्वरः ।२। चन्द्रापीडश्चन्द्रमौलिरविश्वं विश्वम्भरेश्वरः। वेदान्तसारसदोहः कपाली नीललोहितः ।३। श्री सूतजी ने कहा-हे श्रष्ठ ऋषि वृन्द ! जैसा हमने सुना है वही अब बतलाते हैं। आप लोग इसका श्रवण ध्यानपूर्वक करें। विष्णु भग- वान् की प्रार्थना से श्री शिव जिससे परम सन्तुष्ट हुए थे वह परम पवित्र सहस्रनाम मैं आपको सुनाता हूँ ॥१। भगवान् विष्णु ने कहा-"शिवः"- यह मगवान् शङ्कर का नाम त्रिगुण से रहित परम मङ्गल वाचक होकर मङ़गल करने वाला है। शिव का "हर" यह नाम सृष्टि के अन्त में सब का संहार करने के कारण ही से पड़ा है। "मृड"-यह सुख का प्रदान करने से शिव का नाम पड़ गया है। "रुद्रः"-यह शिव का पवित्र नाम प्रजा को अन्त समय में सहार करते हुए रुलाने से हुआ है। अथवा समस्त दुःखों को दूर भगा देने से रुद्र नाम पड़ गया है। या दुष्टों को दुखों के दायक होने से रुद्र कहे जाते हैं। "पुष्कर"-यह पुष्टि करने से शिव का नाम हुआ है। 'पुष्पलोचनः"-यह नाम पुष्प अर्थात कमल के समान सुन्दर नेत्र वाले होने से हुआ है। "अर्थिगम्यः"-यह शिव का शुभ नाम मक्तों को स्वर्ग-मोक्षादि की कामना पूरी करने के कारण हुआ है। "सदाचारः"-यह नाम सत्पुरुषों के आचरण रखने वाले होने से हुआ है। "शर्व"-यह शिव का नाम समस्त प्रजा के अन्त करने से हुआ है। "शम्भुः"-यह शिव का शुभ नाम भक्तों को सुख देने से हुआ है। 'महेश्वर'-यह नाम अर्थात् परमेश्वर 'यः परः स महेश्वरः'-इस श्रवि वचन के अनुसार जो सबसे ऊपर है वह महेश्वर होता है सबसे बड़े स्वामी होने के कारण ही हुआ है॥२। भगवान् शिव का "चन्द्रापीड"-यह शुभ नाम अपने मस्तक में चन्द्रमा धारण करने के कारण से हुआ है। "चन्द्रमोंलि"- यह नाम अपने भस्तक का चन्द्रमाभूषण बनाने के कारण हुआ है। 'विश्वम् :- यह नाम शिवको परब्रह्म स्वरूप बतलाता है। "विश्वम्भरेश्वरः"-यह नाम संसार और समस्त देवों के स्वामी होने के कारण हुआ है। 'वेदान्त सार
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३८ श्री शिवपुराण सन्दीहः"-यह नाम वेदान्त शास्त्र के पूर्ण रूप से ज्ञाता होने से पड़ा है। "कपली" कपाल धारण करने से तथा 'नील लोहित'-यह नीले और लाल रंग वाली जटा धारण करने से नाम हुए हैं ।।३।। ध्यानाधरोऽपरिच्छेद्यो गोरीभर्त्ता गणेश्वरः। शष्टमूर्तिर्विश्वमूर्तित्त्रिवर्गः सगसाधनः ।४। ज्ञानगम्यो दृढप्रजो देवदेवत्रिलोचनः । वामदेवो महादेवो पटुः परिवृढ़ो दृढः ।५। विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीशः सुरसत्तमः । सर्वप्रमाणसवादी वृषाको वृषवाहनः ।६। 'ध्यानाधारः'-यह नाम योगियों के ध्यान का आधार बनने से हुआ है। "अपरिच्छेद्य"-यह नाम देश और काल से परिच्छिन्न न होने के कारण शिव का हुआ है। 'गौरीभर्त्ता"- यह पार्वती के पति होने से और प्रमथादि गणों के नियन्त्रण करने वाले होने से "गणेश्वर"- यह नाम हुआ है। आकाश आदि आठ मूर्तियों में स्थिति रखने के कारण शिव का "अष्ट मूर्ति" नाम हुआ है। समस्त जगत् ही मूर्ति स्वरूप होने से 'विश्वमूर्ति' नाम है। "त्रिवर्ग स्वर्गसाधनः"-यह शिव का शुभ नाम धर्म-अर्थ और काम एवं स्वर्ग के अचिन्त्य सुख के देने वाले होने के कारण हुआ है ।।४।। "ज्ञान गम्य"-यह नाम ज्ञान मात्र से ही वेदान्त के अर्थ जानने योग्य होने के कारण शिव का है। "दृढ प्रज्ञः"-यह नाम सर्वदा ज्ञान से युक्त-"देवदेवः"-यह देवों को भी कर देने वाले देवता अथवा शक्ति प्रदान कर उनको पूर्ण प्रकाश तथा आनन्द देने वाले-"त्रिलोचन"-तीन नेत्रों के धारण करने वाले अथवा तीन गुण तीन लोक और तीन वेदों के ज्ञान से युक्त विम्बा अकार उकार और मकार ओम् ये तीन अक्षर के नेत्र वाले यद्वा शास्त्र आचार्य और ध्यान त्रिदर्शन इन साधन स्वरूी तीन नेत्रों वाले होने से यह नाम पड़ा है। महाभारत ग्रन्थ की टीका के रचयिता नीलवष्ठ ने मीवही इसका अर्थ लिखा है। 'वामदेव"-यह नाम शिव का इसलिये हुआ है कि ये दुरात्माओं के मद को निकलवा देने वाले हैं अवथा लोकोत्तर एवं सुन्दर देवता हैं किम्बा कर्म फलों के विभाजन
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विष्णु द्वारा शिव सहस्त्रनाम का कीर्तन ] [ १९
करने के कारण सुन्दर देवता हैं "महादेव" इसका अर्थ ब्रह्मादि देवों के भी वन्दनीय बड़े देव हैं। "पटु" यह नाम दुःखों के नाश करने वाले अथवा अपने भक्तवर्ग के कल्याण करने में परम कुशल होने से हुआ है। "परिवृढ" जगत् के प्रभु-दृढ़-महाबलवान्-होने के कारण ये नाम हुए हैं ॥।५।। 'विश्वरूप' समस्त जगत्स्वरूप-'विरूपाक्ष' विषम नेत्र वाले-'वागीश' वेद वाणो के स्वाभी-'शुचि सत्तम' तीनों माया के गुणों से रहित होने के कारण परम विशुद्ध-सर्व प्रमाण संवादी'-वेद दि के समस्त प्रमाणों के वेत्ता - 'वृषाङ्ग' वृष के चिन्ह को धारण करने अथवा धर्मयुद्ध और 'वृषवाहन नन्दीश्वर नामक वृष के वाहन वाले होने से ये सब शिव के नाम हुए हैं ॥६॥। ईशपिनाकी खट्वांगी चित्रवेषश्चिरन्तनः । तमोहरो महायोगी गोप्ता ब्रह्माण्डहज्जटी। ७ कालकाल: कृत्तिवासाः सुभगः प्रणतात्मक'। उन्नध्रः पुरुषो जुष्यो दुर्धासाः पुरशासनः ॥८ दिव्यायुधः स्कन्दगुरु: परमेष्ठी परात्परः। अनादिमध्यनिधनो गिरीशो गिरिजाधव: ।९ 'ईश'-सम्पूर्ण जगत् के स्वामी-'पिनाकी' पिनाक नाम वाले धनुष को धारण करने वाले-'खट्वांग' खाट के एक अग को अपना आयुध बनाने वाले-"चित्र वेष" समय पर कार्य के अनुकूल अनेक वेषों के धारण करने वाले-'चिरन्तन' तीनों कालों से बाधा न पाने वाले अर्थात् परम प्राचीन- 'तमोहर' अज्ञान के अन्धकार को हरण करने वाले अर्थात् अविद्या नाशक- 'महायोगी' यम-नियम प्राणायामादि योग के आठों अंगों के तत्व ज्ञाता- 'गोप्ता' सर्वप्रकाश से रक्षा करने वाले - 'ब्रह्मा' जगत् में सभी कुछ की उत्पत्ति करने वाले और महान् समस्त गुणगणों से परिपूर्ण होने से उक्त सभी नाम भगवान् शिव के हुए हैं (५०) 'धूर्जटि'-सारभूत जटाओं वाले अथवा गंगा को जटाजट में धारण करने वाले हैं ।।८॥। 'काल-कलः' अर्थात् मृत्यु और यम के काल अर्थात संख्या करने वाले-'कृत्तिवासा'
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४० ] ।श्री शिवपुराण
अर्यात व्याघ् चर्मके वस्त्र धारण करने वाले शिव हैं। "पिनाक हस्त, कृत्ति- वासः"यह श्रति का भी वचन आता है अर्थात शिव पिनाक हाथ में धारण करने वाले तथा चर्म वस्त्र वाले हैं। 'सुभग'-सुन्दर स्व्रूप वाले अथवा अत्यन्त ऐश्वर्यधारी -'प्रणवात्मक' ओंकर के स्वरूप धारण करने वाले- यहां "अमित्येकाक्षर ब्रह्म" यह श्रति भी यही बतलाती है।'उन्नध्र'अर्थाल पापात्मा पुरुषों को पाश से बांधने वाले 'पुरुषः-यह शिव का नाम इसलिए हुआ है कि शिव सब के शरीर में व्याप्त हैं अथवा अन्तर्यामी रूप से शयन करते हैं, अथवा सब प्रकार से परिपूर्ण होने से भी शिव का नाम पुरुष है। 'जुष्य सबके मन वचन और कर्म के द्वारा सेवा करके के योग्य हैं-,दुर्वासा' यह नाम वल्कलादि के वस्त्रधारण करने से हुआ है अथवा दुर्बामा नाम अत्रि के यहाँ पुरुष रूप से अवतार होने वाले होने से नाम है। 'पुरुशासन' त्रिपुर नामक असुर के सहारकर्ता हैं। (६०) 'दिव्यायुध' पिनाक प्रभृति अत्युत्तम आयुधों के शरण करने वाले हैं। 'स्वन्द गुरु' अर्थात् षडानन कार्तिकेय के पिता हैं। 'परमेठ्ठी' अपनी अनन्त गुणमयी महिभा से युक्त और आकाश में स्थित होने से शिव के नाम हुए हैं ।परातर' अर्थात् अव्यक्त, पर से भी परे हैं 'अनादि मध्य निधनः' अर्थात् देश और काल से मी अपरिछिन्न हैं। 'गरीश' अर्थात् मेरु आदि समस्त परवतों के स्वामी हैं। 'गिरिजाधवः' अर्थात् शिव हिमाचल की पुत्री पार्वती के स्वामी हैं ॥८।।१।। कुवेरबन्धुः श्रीकण्ठो योकवणोत्तमो मृदुः। समाधिवेद्यः कोदडी नीलकंठ: परश्धी ॥१० विशालाक्षो मृगव्याधः सुरेशः सूर्यतापनः । धर्माध्यक्ष: क्षमाक्षेत्र भगवाग्भमनेगभित् ॥११ उग्र: पशुपतिस्तार्क्ष्यः प्रियभक्तः परंतपः। दाता दयाकरो दक्ष: कपर्दी कामशासनः ॥१२ 'कुबेरबन्धु' अर्थात् यक्षाधिपति कुबेर के माई हैं। 'श्रीकण्ठ' अर्थात् अपने कण्ठ में सुषमा किम्बा वे३ को रखने वाले हैं। यहाँ इसे शिव के शुभ नाम की पुष्टि-ऋचः सामानि यजु ऋषि सा हि श्रीरमृतास तास' वह
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[ विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन [ ४१ श्रुति के वचन से होती है। 'लोक वर्गोत्तम' अर्थान् शिव के भास्वद रूप को लोक द्वारा देखा जाता है अथवा लोक में ब्राह्मणादि से भी श्रष्ठ है (७०) 'मृदु' अर्थात् भक्तों के लिये सौम्य रूप वाले हैं। 'समाधि वेद्य' अर्थात् धनुर्धारी हैं। 'नीलकण्ठ' अर्थात् प्राणीमात्र के त्राण के लिये महाविष के पान करने से नीले कण्ठ वाले हैं। 'परश्वधी' अर्थात् अपना सर्व स्व धन देकर भत्तों को सुख पहुचाने वाले हैं, किम्बा भत्तों में अपनी जैसी बुद्धि प्रदान करने वाले हैं। (८०) 'विशालाक्ष' बड़ नेत्रों से युक्त- मृगव्याध-मृग पशु के समान जीव के संहार करने के लिये व्याध के सदृश अथवा अर्जुन पर कृपा करने के लिये व्याध का स्वरूप रखने वाले सुरेश-अर्थात् समस्त देवों के स्वामी। 'सूर्य तापन'-अर्थात् दुजनों को सूर्य की भाँति ताप प्रदान करने वाले किम्वा सूरय को भी तपा कर भय देने वाले हैं। इस बात का पूर्र पोषण करने वाला- भीषोदेति सूय" यह श्रति का वचन भी है। धर्माध्यक्ष-अर्थात् वर्ग और आश्रम प्रभृति धर्मों के स्थान हैं (८०) 'क्षमा क्षेत्रम्'-अर्थात् क्षमा के उद्भव के स्थान हैं। 'भगवान्' अर्थांत् भग नाम छै प्रकार के ऐश्वर्षों से संयुक्त हैं। भगनेत्रभित्-अर्थात् शिव दक्ष के यज्ञ में भग नामक देवता के नेत्रों का भेदन करने वाले हैं। उग्र :- अर्थात् महाप्रलय के समय में समस्त सृष्टि का संहार करने के कारण शिव उग्र रूप वाले हैं। पशुपति'-पशु-जीवों के पालन कर्त्ता शिव का स्वरूप होने से उनका यह नाम हुआ है। 'ता्क्ष्यः' अर्थात् कश्यप का स्वरूप हैं। 'प्रिय भक्तः'- अर्थात् अपने भक्तों के ऊपर अत्यन्त प्यार करने से उनके परम प्रिय शिव हैं। 'परन्तपः'- अर्थात् शत्रुओं को ताप देने वाले हैं। 'जहाँ प्रिय- माह ऐसा पाठ है वहाँ प्रिय भाषण करने वाले हैं। 'दाता-इसका मतलव है कि शिव भक्तों को ऐश्वर्य के देने वाले हैं। दयाकर :- भक्तजनों के उद्धार करने के लिये पूर्ण अनुग्रह करने वाले हैं 'दक्षः'- इस जगत् के स्वरूप में वृद्धि पकर समस्त कर्म- कलाप के करने में कुशल हैं। कपदी अर्थात् संन्यामी किम्बा कपरदी मुनीकृत भिक्षु सूत्रके जानने वाले अथवा कपदी के रूप से प्रकट होकर ज्ञान का दान करने वाले शिव हैं 'काम शासन' -अर्थात् कामदेव को भस्म करने वाले हैं॥ १२॥
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४२ 1 [ श्री शिवपुराण रमशाननिलयः सूक्ष्मः स्मशानस्थो महेश्वरः। लोककर्त्ता म गपतिम हाकर्त्ता महौषधिः ॥१३ सोमपोऽम तपः सौम्यो महातेजा महाद्युतिः । तेजोमयोऽम तमयोऽन्नमयश्च सुधापतिः ॥१४ उत्तमो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः । नीतिः सुनीतिः शुद्धात्मा सोमः सोमतर: सुखी ।१५ "पमशाननिलयः"-अर्थात् श्मशान भूमि में अपना निवास बनाने वाले शिव होते हैं। "सूक्ष्मः" -इनका अर्थ है शिव शब्दादि के स्थूल कारण से रहित हैं। यहाँ श्रति का वचन 'सर्वगतं सुसूक्ष्यम्'-यही बात पुष्टकर देता है। 'शमशानस्थः'अर्थाव् श्मशानमें ठहरने वाले हैं। 'महेश्वर'-सबसे बड़ स्वामी 'लोककर्त्ता' -- इस विश्व के बनाने वाले 'मृगपतिः' अर्थात् पशुओं की रक्षा करने वाले और 'महाकर्त्ता'-अर्थात् पाँच महाभूतोंके निर्माण करने वाले हैं। इस विषय के पोषक "विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता" इत्यादि आगमों के वचन भी हैं। यहाँ पर भगवान् शिवके सहस्र नामोंका एक शतक पूरा होता है। (१००) शिव का नाम 'महौषधि' भी है। इसका अर्थ होता है शिव ब्रीहि यवादिके रूप वालेहैं अथवा संसार बन्धन स्वरूप रोगके छुड़ादेने वाले हैं। 'सीमपः' यज्ञादिमें देव स्वरूपसे सोमके पान करने वाले हैं। किम्बा धर्म की मर्यादा को दिखाते हुए यजमान के स्वरूप से सोमपान करने वाले हैं। 'अमृतपः'-अर्थात् अपनी ही आत्मा का अमृतपान करने वाले हैं। 'सौम्यः'- भक्तों के लिये परम सौम्य शान्य स्वरूप वाले हैं। 'महातेजाः'-इसका अर्थ है परम तेजस्वीहैं जिनसे सूर्यादि तेजोनिधि भी तपतेहैं। यहाँ येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः' यह श्रति का वाक्य भी इसकी पुष्टि करने वाला है। 'महाद्य तिः'- अर्थात् महान् कान्ति वाले हैं। यहाँ भी 'स्वयज्योतिः' यह श्रति वचन है। कहीं पर 'महानीतिमहामतिः' ऐसा भी पाठान्तर है। "तेजोमयः" -- अर्थात् विश्व को प्रकाशित करने वालेहैं। किंबा तेजसे युक्तहैं। "अमृतमयः"-अर्थात् मरणसे रहित या जलमयहै। 'अमृतवा आपः'-यह श्रुति वचनहै। शिवकी अष्टमूर्ति के अन्तर्गत एक जल का स्वरूप भी है अथवा मोक्ष के आनन्द से परिपूर्ण है। "कन्नमय"-अर्थात् अन्न के स्वरूप वाले हैं। यहाँ पर भी
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विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] [ ४३ 'अन्नमय आत्मा'-'अन्नं ब्रह्म' इत्यादि श्र ति के वचन हैं। 'सुधापति'- अर्थात् देवोंको अमृत का पान कराने के लिये उसकी रक्षा करनेवाले स्वामीहें 'उत्तम' -- इसका अर्थ है शिव संसार में आवागमन के समूह से पार करने में सर्बोत्कृ2्ट हैं। यहाँ 'विश्वस्म दिद्र उत्तरः' यह श्रति का वचन भी इसका पोषक होता है। गोपतिः-अर्थात् पृथ्वी-स्वर्ग-पशु, वाणी, रश्मी और जल के स्वामी हैं। "गोप्ता"-समस्त भूतों के पालन करने वाले हैं। 'ज्ञानगम्य'-इस शिव के नाम का तात्पर्य होता है भगवान् शम्भु केवल कर्म से प्राप्त करने के पश्चात् समुत्पन्न ज्ञान से प्राप्त करने के योग्य हैं। 'पुरातनः'-काल से अपरि- च्छिन्न होने के कारण परम प्राचीन हैं। 'नीति'-दण्ड के योग्य व्यक्तियों को दण्ड के प्रणायन करने वाले हैं। "सुनीति"-अर्थात् निर्मल चित्त वाले, 'सोमः' अर्थात् चन्द्र के स्वरूप से औषधियों की पुष्टि करने वाले अथवा उमाके सहित रहने वाले हैं। ११०। 'सोमरतः'-चन्द्र अमृत या भोमलता के रस में अनुराग करने वाले हैं। "सुखी"-अर्थात् आनन्द से युक्त हैं। किम्बा भक्तों को सुख प्रदान करने वाले हैं। यहाँ-"एषह्य नानन्दयति" यह श्रति का वचन भी है।। ३-१४-१५ ।। अजातशत्रुरालोकसंभाव्यो हव्यवाहनः । सीकंकरो वेदकर: सूत्रकारः सनातनः ॥१६ महर्षिः कपिलाचार्य्यो विश्वदीप्तिस्त्रिलोचनः । पिनाकपाशिर्भूदेवः स्वस्तिदः सुकृतः सुधीः ॥१७ धातृधामा धामकर: सर्वदः सर्वगोचरः । वह्मसृग्विश्वसृक्सर्गः कर्णिकारप्रियः कवि: ॥१८ "अजातशत्रु"-शत्रु से रहित है क्योंकि आप शिव स्वयं ही सबके शासक हैं। "आलोकः'-अर्थाव स्वयं ही प्रकाश स्वरूप हैं। "संभाव्यः"- अर्थात् समस्त देव असुरों के माननीय हैं। "हृष्यवाहन"-अर्थात् शिव अग्नि स्वरूपसे समस्त देवों को हवि के पहुँचा देने वाले हैं। यहाँ पर'देवेभ्योहव्य वाहनः प्रजानम्" यह श्रति का वाक्य भी प्रमाशित करता है। 'लोककरः-लोकों के सृजन करने वाले, 'वेदकरः'-ऋग्वादि वेदों के
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४४ 1 श्री शिवपुराण प्रकाश करने वाले, 'सूत्रकारः'-व्यासादि के रूप में होकर सूत्रों की अ
रचना करने वाले और "सनातनः"-सदा सर्वदा रहने वाले शिव हैं। व "महर्षि कपिलाचार्यः"-सांख्य दर्शन के द्वारा शुद्ध आत्मा के जानने वाले कपिल के रूप में अवतीर्ण होने वाले हैं। जो वेद के एक ही देश को जानते हैं वे महर्षि कहे जाते हैं। यहाँ पर-"ऋषि प्रसूत कपिलं महान्तम्" यह श्रति वाक्य भी इसकी पुष्टि करता है। 'विश्वदीपि'- अर्थात् यह समस्त संसार शिव की ही दीपि का रूप है। यहाँ -'यर्य भासा सर्वमिदम्' यह वेद का वचन भी इसका पोषक है। 'त्रिलोचनः'-अर्थात् तीन नेत्रों वाले हैं। 'पिनाकपाणिः'-अर्थात् पिनाक धनुष अथवा त्रिशूल को हाथ में धारण करने वाले हैं। 'भूदेव'- भूमि में दुर्वासा आदि ब्राह्मण के स्वरूप से अवतीर्ण होने वाले हैं। 'स्वस्तिदः'-भक्तों को कल्याण प्रदान करने वाले हैं। सुकृतः-अर्थात् भक्तों के मङ्गल करने वाले हैं। 'सुधीः'-श्रष्ठ जान से परिपूर्ण हैं॥१७।। धातृधामा'-अर्थात् विश्व के धारण करने वाले तेज से युक्त हैं। 'धाम- कर:'-सूर्यादि तेज और समस्त प्राणियों की देह के बनाने वाले हैं। 'सर्वग;'-सब में व्याप्त रहने वाले शिव हैं। 'सर्वगोचरः' -सम्पूर्ण जगत् को प्रत्यक्ष करने वाले हैं। 'ब्रह्म सृक्'-अर्थात् ब्रह्मा अथवा वेद के सृजन करने वाले हैं। 'विश्वसृक्'-अर्थात् संसार की रचना करने वाले हैं। 'सर्गः'-स्वयं सृष्टि के स्वरूप में होने वाले, 'कविः'-सभी कुछ के ज्ञाता हैं। यहाँ पर श्रति का वचन है-'कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः' इत्यादि। 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' इत्यादि ॥ १६।१७।१८ ॥ शाखो शिशाखो गोशाखः शिवो भिषगनुत्तमः । गंगाप्लवोदको भव्यः पुष्कलः स्थपतिः स्थिरः ॥१६ विजितात्मा विधेयात्मा भूतवाहनसारथिः । सगणो गणकायश्र सुकीरतिश्छिन्नसंशयः ॥२० कामदेवः कामपालो भस्मोद्ध लितविग्रहः । भस्मप्रियो भस्मशायी कामी कान्तः कृतागमः ॥२१ 'शाखः'-इसी नाम वाले ऋषि का स्वरूप, 'विशाखः' एक ऋषि के स्वरूपधारी अथवा स्कन्द के स्वरूप से उत्पन्नहोने वाले हैं। 'गोशाखः शिव :-
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। विष्जु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन [ ४५ अर्थात् वेदों की शाखा के अश्रय स्वरूप, अथवा इस सम्पूर्ण जगत् के शयन करने का आधार किम्बा त्रिगुण रहित होने के कारण शिव हैं। यहाँ दोशब्दों का एक ही शिव का नाम है। यहाँ पर 'स ब्रह्मा स शिवः' इत्यादिश्र तिका वचत है। 'भिषक्'-धन्वन्तरि के स्वरूपमें अवतीर् होकर संसार के समस्त रोगों के नाशक हैं। यहाँ पर भी-'भिषक्तमं त्वा भिषजां शृणोमि इत्यादि श्रति के वचन हैं जो उक्त नाम की पूर्ण पुष्टि करते हैं। अनुत्तमः'-अर्थात् संसार में सबसे श्रष्ठ हैं यहाँ जिससे उत्तम कोई नहीं-ऐसा बहुव्रीहि समाज होता है। यहाँ 'यस्मात्परं नायमस्ति किंचित्' यह श्रति का वचन समर्थक है। 'गंगाप्लवोदकः'-भागीरथी गंगा के जल-प्रवाह के समान हैं। 'जन तारक:'-अर्थात् भक्तों के उद्धारक हैं। 'भव्य'-समस्त कल्याण से परिपूर्ण हैं। 'पुष्कलः'-सब में व्यापक रहने वाले हैं। 'स्थपतिः स्थिरः'-अर्थात् अनन्त. ब्रह्माण्डों के रचने वाले अथवा माया के कंचुकी हैं। यहाँ पर ये दोनों शब्द मिलकर शिव का एक ही नाम बतलाते हैं। 'विजितात्मा'-आत्मा को जीत लेने वाले हैं। 'विषयात्मा'-समस्त इस प्रपश् जगत् की आत्मा हैं। कहीं 'विधेयात्मा' यह पाठान्तर भी होता है। 'भूत वाहन सारथिः'-प्राणियों के कर्मफलों को प्राप्त करने वाले ब्रह्मा को अपना सारथी रखने वाले हैं। 'सगणः'- अर्थात् प्रथमादिगणों से युक्त रहने वाले। 'गणकाय'-गणों के शरीर वाले किम्बा अपरिच्छेद्य काया वाले। 'सुकीर्ति'-सुन्दर कीर्ति से युक्त। छिन्न संशयः-सर्वज्ञता के कारण सब प्रकार के संशयों से रहित हैं ॥१६।२० ॥ 'कामदेवः'-अर्थात् धर्मार्थादि पुरुषार्थों की इच्छा रखने वाले शिव हैं। 'कामपालः'-कामिजन की कामनाओं को पूरा करने वाले। 'भस्मोद्धू लित विग्रहः'-भस्म लगाने से धूलित शरीर वाले। 'भस्म प्रियौ भस्मशायी'-भस्म- प्यारी लगनेके कारण उसी में शयन करने वाले। यहाँ ये दोनों शब्द मिलकर एक ही शिव का नाम बतलाते हैं। 'कामी -पूर्णकाम अर्थात् जिनकी सभी कामनायें स्वतः परिपूर्ण हैं। 'यहाँ-'सोऽकामाय' इत्यादि श्र तिवाक्यभी उनको कामना रहित बतलाता है। 'कान्त'-मनोहर किम्बा द्विसीय परार्ध में ब्रह्मा के भी अन्त करने वाले हैं। 'कृतागमः'-श्रति तथा मृत आदि आगम स्वरूप लक्षण के व्यक्त करने वाले हैं॥ २१॥
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४६ ) (श्री शिवपुराण वि समावर्त्तो निवृत्तत्मा धर्म पुंजः सदा शिवः। अकल्म वश्च पुण्यात्मा चतुर्वाहर्दु रासदः ॥२२॥ दुर्ल भो दुगमा दुर्गः सर्वायुधविशारदः । अध्यात्मयोगनिलयः सुतंतुस्तस्तु वर्द्धनः ॥ २३ शुभांगो लोकसारङ्गी जगदीशो जनार्दनः। भस्नशुद्विकरोऽ भीरुरोजस्वी शुद्धविग्रहः ॥२४ शिव का एक नाम 'समावर्त्त' होता है। इसका अर्थं संसार रूपी चक्र के धुमाने वाला होता है। अनिव त्तात्मा-अर्थात् सर्वत्र व्याप्ति के कारण उनकी विद्यमानता रहती है। अतः अनिव त्त आत्मा वाले हैं। ध्म पुअ् धर्म की राशि रूप है सदाशिव -अर्थात् शिव सर्वदा कल्याणस्त्रूप वाले हैं। शिव का एक नाम अकल्मष है इसका अर्थ होता है नित्य शुद्ध रहने वाले ।, चतुर्बाहु'-अर्थात् चार भुजाओं वाले विष्ण का-सा स्वरूप वाले। 'दुरावासः' -- योगिजनों की समाधिमें भी बड़ी कठिनाई से ध्यानगत होने वाले। यहाँ 'सर्वावास ऐसा भी पाठान्तर मिलता है उसका अर्थ है सव त्र सब में निवास करने वाले शिव हैं। दुरासद बड़ी कठिनता से प्राप्त होने के योग्य सिव हैं ।। २। 'दुर्लभ : अर्थात् अत्यन्त भक्ति से ही प्राप्त होने वाले हैं। दुर्गम बड़ी कठिन मे हनत से जानने के योग्य ( १८० दुर्गं :- अर्थात् बहुत ही दुख उठाकर पाने के योग्य। सर्वायुधविशारद :- समस्त शस्त्रास्त्र की विद्याओं के पूर पण्डित। "अध्यात्म योग निलयः" -- अथांत् असंप्रज्ञात समाधि के स्थान सार की वृद्धि वा छेदन करने वाले ॥ २३ ॥ 'शुभांग' श्रेष्ठ अंगों वाल। लोक सारङ्ग -- सारग के सदृश लोक का सार ग्रहण करने वाले किम्बा ओंकार के द्वारा जानने के योग्य। जगदीश समस्त जगत् का नियन्त्रण करने वाले 'जनार्द नः'- इस जगत् के संहार करने वाले। भस्म शुद्धिकरः अर्थात् भस्म से शुद्धि करने वाले। (१६०) ॥ मेरु - पर्वत के स्वरूप में संस्थित । औजस्वी -आत्मा के बल ओज से परिपूर्ण। 'शुद्धि विग्रहः'-अर्थात् चित्स्वरूप वाले ॥ २२॥ २३।। २४।।
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असाध्यः साधुसाध्यश्र भृत्यमर्कंटरूपधृक्। हिरण्यरेता: पौराणो रिपुजीवहरो बली ॥२५ महाह्नदो महागर्तः सिद्धो वृन्दारवन्दितः । व्याघ्रचर्माम्बरो व्यालो महाभूतो महानिधिः ॥२६ अम तोऽम तपः श्रीमान्पाश्चजन्यः प्रभंजनः । पञ्चविशतितत्त्वस्थः पारिजातः परात्परः ॥२७ 'असाध्यः'-चरित्रहीन पुरुषों के द्वारा प्राप्त न होने वाले। 'साधु साध्यः'-सच्चरित एवं साधु वति वाले भक्तोंके द्वारा प्राप्त होने के योग्य है। 'भृत्यमर्कट रूप धृक्' अर्थात् हनुमान के स्वरूप में स्थित होने वाले। हिरण्य रेता:'-अग्निके सम स्वरूपवाले अर्थात् परम तेजस्वी। पौराण'-समस्तपुराणों के द्वारा ब्रह्म के रूप से प्रतिपादन करने के योग्य। 'रितु जीव हरः'-शत्रुओं के प्रारों का हरणा करने वाले। 'बलः'-महान् बल की शक्ति धारण करने वाले।(२००)॥(यहाँ शिव के नामों का द्वितीय शतक समाप्त हो गया है।) 'महाह्नदः'-ऐसे महान् सरोवर का स्वरूप जिसमें योगी विश्रामलेकर सर्वदा आनन्द में मग्न रहा करते हैं। 'महागर्त्तः' -महागर्त्त वाले किम्बा महान् दुरत्यय माया से युक्त। 'सिद्ध वृन्दारवन्दितः'-परम सिद्ध और देव समूह के द्वार वन्दना किये जाने वाले। 'व्याघ्र चर्माम्बरः'-अर्थात् बाघ के चर्म का वस्त्र धारण करने वाले। 'व्याली'-अर्थात् महान् विषधर वासुकि आदि अनेक सर्पों के भूषण धारी। 'महाभूतः'-महान् विराट्को उत्पन्न करनेवाले अथवा तीनों कालों में अवच्छिन्न महत्तत्त्व स्वरूप वाले। यहाँ यो ब्राह्मणं विदधाति पूर्वकम्' -यह श्रति का वचन भी पोषक होता है। 'महानिधि'- ऐसेविशाल स्वरूपके धारणकर्त्ता जिसमें समस्तप्रारणी समा जाते हैं।२५।२६। 'अमृताशः'-अपने आत्मानन्द रूपी अमृतका सदा पान करने वाले। 'अमृत वपुः'-मृत्यु रहित शरीर के धारण करने वाले। यहाँ-'अजरोऽपरः'-यह वेदका वाक्य भी शिवके मरणाभावकी पुष्टि करता है। 'पाञ्चजन्यः'-अर्थात् पाँच जनों में रहने वाले अग्नि स्वरूपी। यहाँ पर भी-'अग्निऋ षिः पवमानः पाश्चजन्यः पुरोहितः'-यह श्र ति वाक्य है। किसी जगह 'पश्चयज्ञ'-ऐसा भी
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[शिवपुराण fि ४८ ] उत्प पाठान्तर मिलता है। वहाँ इसका अर्थ यज्ञों के उत्पादक शिव हैं। 'प्रभअनः' अध -भक्तों के मायात्मक आवरण के नाशक अथवा वायु के स्वरूप में संस्थित। उत 'पञ्चविशति तत्त्वस्थः'-अर्थात् प्रकृति आदि पच्चीसतत्त्वोंमें विराजमान रहने क वाले। यहाँ-'तत्सृष्ट वा तदेवानु प्राविशत्'-यह श्रति का वचन उक्तार्थ का है
समर्थक है। 'पारिजातः'-अर्थात् मनुष्यों के मनोवांछित फल देने वाले कल्प य
व क्ष के स्वरूप से युक्त। परात्परः'ब्रह्म तथा जगत् के रूप वाले हैं ॥२७॥ क
सुलभः सुव्रतः शूरो वांग मयैकनिधिनिधिः। क
वर्णाश्रमगुरुवर्णी शत्रुजिच्छत्रतापनः ॥२८ आश्रमः श्रमणः क्षामो ज्ञानवानचलेश्वरः । प्रमाणभूतो दुज्ञेयः सुपर्णो वायुवाहनः ।।२६ धनुर्धरो धनुर्वेदो गुणः शशिगुणाकरः। सत्यः सत्यपरोऽदीनो कर्मो गोधमशासनः ॥३० 'सुलभः'-पत्र पुष्पादि के अत्यन्त साधारण उपचारों से पूजित होने पर प्राप्त होने वाले।'सुव्रतः शूरः अपने भक्तों की रक्षा करने का अच्छा व्रत लेने वाले किम्बा भोजन नियत करने वाले शूर अर्थात् सूर्यके स्वरूप में स्थित यहाँ इन दोनों शब्दों से शिव का एक ही नाम व्यक्त होता है। 'ब्रह्म वेद निधि:'-वेदों के प्रादुर्भाव होने का स्थल। यहाँ-'अस्य महतो भूतस्य निःश्वासितमेतदृटग्वेदः'-अर्थाए इस महान् देवकाजो निःश्वास है वही ऋग्वेद है यह श्र तिका वचनभी उक्त नामार्थ की पुष्टि करताहै। 'वाङ मयैक निधिः' कहीं ऐसा भी पाठान्तर मिलता है। वर्णाश्रम गुरु :- अर्थात् योगिजन द्वारा स्थापित ब्राह्मण आदिवर्रोंऔर ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंके उद्भव करने वाले अथवा उपदेशक ॥२८।'वणी"-ब्रह्मचारी के स्वरूपमें रहने वाले॥(२२०)। 'शत्र जिच्छत्र तापनः'-देव शत्र को जीतने तथा उन्हें सन्ताप देने वाले। यहाँ भी दोनों शब्दों द्वारा एक हो शित्र का नाम होता है। 'आश्रमः'-आश्रम के सदृश संसार में भ्रमणाशीलों को विश्राम प्रदान करने वाले। 'क्षुष्ण'- निज भक्तों के पापों का क्षय करने वाले। 'क्षामः'-प्रलयकालमें प्रजा को क्षीणा करने वाले। 'ज्ञानवान्'-नित्यज्ञान से युक्त। 'अचलेश्वरः'-पृथ्वी पर्वत प्रभृति के स्वामी। 'प्रमाण भूतः'-प्रत्यक्षानुपानादि प्रमाणों के
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विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] [ ४९ उत्पादक। 'दुर्जञथः'-अत्यन्त चोर श्रन से जानने के योग्य। 'सुनर्णः'-धर्म अधर्म रूपी पक्षों से युक्त अथवा गरुड़ के स्वरून में संस्यिय किम्बा सबके उत्पन्न करने बाले यहाँ-'सुपर्णा विप्रा कवयो वचोभिरेक सन्त बहुधा कल्पवन्ति' इत्यादि श्रति वचन है जो उक्त नाम के अर्थ को बतलाता है। अथवा छन्द स्वरू पर्ण वाले। 'वायु वाहनः'-वायु सोनान से युक्त रथ वाले अथवा जिसके भय से वायु समस्त प्राणियों का वहन करता है। वहाँ उसका पोषक-'भीषा स्माद्वातः पर्वते' इत्यादि श्रति का वावय है। 'धनुर्धरो धनुर्वेद :- अर्थात् धनुर्वेद को प्रकट करने वाले पिनाक के धारक। यहाँ पर ये दोनों शब्द् एक ही शिव नाम के वाचक हाते हैं। 'गुणराशिर्गुणा करः'-योगादि गुणों के संघात वाले और योग, साँख्य, तप, विद्या, विधि, क्रिया' ऋत, सत्य, दया, श्रेष्ठ मति, अहिंसा, शांति, दम, ध्येय, ध्यान, मति, धृति, प्रथा, मेधा, नीति, कान्ति, दृष्टि, लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, सरस्त्रती, प्रासाद, क्रिया, प्रतिष्ठा आदि अनेक गुणों की खान। यहाँ भी दोनों शिव का एक ही नाम बतलाते हैं। 'सत्यः सत्यपरः' -साधुओं के समाज में सत्य स्वरूप वाले और यथार्थ कथन करने में निष्ठा रखने वाले। यहाँ पर भी दोनों शब्द एक ही नाम को प्रकट करते हैं। 'दीनः'-सामान्य बाह्य दृष्टि रखने वाले के लिये श्मशान में निवास करने से एक दरिद्रके समान दिखलाई देने वाले किम्बा अदीन अर्थात् सर्वदा परम सन्तुष्ट रहने वाले। 'गर्माङ्गो धर्म साधनः' - अर्थात् यज्ञादि के धार्मिक अंगों वाले। जैसा कि हरिवंश पुराण में प्रथम पर्व २१ अध्याय में विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है और लिखा है- वेद रूप चरण, यज्ञ स्तम्भ स्वच्प दष्ट्रा, यज्ञ रूप हाथ वाला वाराह मूर्तिरूप है और जिसका विति रूप मुख, अग्नि स्वरूप जिह्वा, डाम (कुश।) रूप रोम, ब्रह्मात्मक शिव, दिनरात्रि स्वरूप नेत्र, दिव्य वेदान्त तथा श्रति रूप आभरण, घृत रूप नासिका, स्त्र वा स्वरूप तुण्ड, साभ- वेदात्मक शब्द, धर्म सत्य स्वरूप शोभा, कर्म-विकम सत्क्रिया सयुत, प्रायश्चित रूपी नख और पशु रूप जानु और विकृत भुजा, उग्रता से युक्त होम स्वरूप वाला लिंग, फल बीज महौषधि वायु से समन्वित अन्त- रात्मा वाला वेदरूप फिर्चों से हुआ सोम स्वरूर रक्त, वेदी रूप स्कन्ध, हवि रूप गन्ध, हव्य-रव्य स्वरूप वेगवान्, प्राग्वंश रूपी शरीर विचित्र
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दीक्षाओंसे समर्पित, दक्षिणा रूपी हृदय, योगी और महायज्ञ से युक्त उपकर्म रूपी ओष्ठ,प्रवर्गावत्त रूप भूषण तथा अनेक प्रकारके वेदरूप गमन, गुप्त उप- निषद् रूपी आसन और छाया पत्नीके सहित मेंरु श्रृगके तुल्य उन्नत बाराह रूप है एवं धर्म के साधनोंके विधाता हैं। यहाँ पर भी दोनों शब्दों से एक ही शिव के नाम की व्यक्ति होती है ॥२८ से ३०॥ अनंतदृष्टिरानन्दो दंडो दमयिता दम। अभिचार्यो महामायो विश्वकर्मविशारद ॥३१ वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भूतभावनः । उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नो जितकामो जितेद्रिय: ॥३२ कल्याण प्रकृति कल्प सर्वलोकप्रजापति। तपस्वी तारको धीमान्प्रधान प्रभुरव्यय ।३३ 'अनन्त दृष्टिः'-अर्थात् असख्य दृष्टियों वाले। 'आनन्दः'-अर्थात् अत्यन्त सुख के स्वरूप हैं। यहाँ-आनन्द ब्रह्म' इत्यादि श्रति से भी उनका नाम व्यक्त होता है 'दंडो दमयिता'-दमन करने वालों को भी दण्ड रूप और इन्द्रादि के रूप से प्रजा के दमन करने वाले हैं। यहाँ भी दोनों का एक ही नाम होता है। 'दमः'-इन्द्रियों के निग्रह के स्वरूप वाले। 'अभिवाद्यो महामायः'-सुरासुरों द्वारा वन्दित और मायासंयुतों को मोहने वाले हैं। ये दोनों मी एक ही हैं।२४०। 'विश्वकर्मा विशारदः'-विश्व की रचना करने वाले और सकल कलाओंमें प्रवीण जिनके द्वारा श्रब्सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ है। ये दोनों एक ही हैं। 'वीतरागः'-भक्तों के राग-द्वेष को मिटाने वाले। 'विनीतात्मा'-भक्तोंके स्वभाव को विनम्र बना देने वाले। 'तपस्वी' अर्थात् तप से युक्त। 'भूत भावन'-प्राणियों की वृद्धि के लिये सम्पादक। 'उन्मत्त वेष, प्रच्छन्न'-दिगम्बर (नग्न) होने के कारण गूढ रूप वाले। यहाँ भी दोनों से एक ही नाम का प्रकाशन होता है। 'जितकामः'-कामदेव पर विजय प्राप्त करने वाले। 'अजित प्रियः'-विष्णु के प्यारे। किसीस्थान में-'जितरोचिः प्रियाकविः' ऐसा पाठन्तर भी है। 'कल्याण प्रकृति'-अर्थात् उत्तम स्वभाव से युक्त। 'कल्प' सब चराचर के
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आदि कारण। (२५०)। 'सर्वलोकप्रजापतिः'-सम्पूर्ण लोकों तथा समस्त प्रजा के पालक स्वामी। 'तपस्वी'-अपने भक्तों को रक्षा करने के कार्यमें वेग सहित शीघ्रता करने वाले। 'तारकः'-इस संसार रूपी सागर से तार देने वाले। 'श्रीमान'-श्रष्ठ बुद्धि एवं ज्ञान से युक्त। 'प्रधान प्रभु'-उस चराचर प्रकृति के स्वामी। 'अल्यपः'-नाश से नहित ।३१-३३। लोकपालोऽन्तरात्म च कल्पादिः कमलेक्षणः । चेदशास्त्रर्थतत्वज्ञो नियमी नियमाश्रयः ।३४। चन्द्रः सूर्य्यंः शनि केतुर्वरांग विद्रमच्छविः । भक्तवश्यः परं ब्रह्म मृगबाण र्पणोऽनघः ।३५। अद्रिरद्रयालयः कान्तः परमात्मा जगद्गुरुः। सर्वकर्मालयस्तुष्टो मङ्गल्यो मङ्गलावृतः ।२६। 'लोकपालः'-लोकों के पालन-पोषण करने वाले। 'अन्तरात्मा'- माया के प्रभाव से अपने स्वरूप को छिपा कर रखने वाले। 'कल्पादिः'- समस्त शास्त्रों के आदि कारण। 'कमलेक्षण :- कमल के तुल्य सुन्दर नेत्रों वाले किम्बा अपनी दृष्टि में लक्ष्मी का निवास रखने वाले।(२५०)। 'वेद शास्त्रार्थ तत्त्वज्ञः'-मुनियों को वेदों एवं शास्त्रों का असली तत्वार्थ का ज्ञान प्रदान करने वाले या स्वयं वेद शास्त्रों के तष्वार्थ के ज्ञाता। 'अनियम'- स्वयं शिक्षा से रहित अथवा सबको सिक्षा देने वाले। नियताश्रम' सम्पूर्ण जगत् के आधार स्वरूप ॥ ३४ ।। 'चन्द्रः' सबको प्रसन्नता देने से चन्द्र के स्वरूप वाले। 'सूय :'-कर्मों में सब लोकों को प्रेरित करने वाले आदित्य स्वरूप। 'शनि' -- शनि के रूप वाले। 'केतु' -- केतुवा धूमकेतु का स्वरूप वाले। वराँगः' शोभापूर्ण अंगों वाले। कहीं 'विरामः' ऐसा भी पाठान्तर होता है। 'विद्र मच्छवी'-मू गे के समान कान्ति वाले अर्थात् मंगल स्वरूप। 'भक्ति वश्यः'- भक्ति के द्वारा बस में हो जाने वाले ॥ (२७०) ॥ 'परब्रह्म'-परात्पर ब्रह्म के स्वरूप वाले। 'मृग बाणपूर्ण'-अर्थात् अपनेभक्तों के लिये मृग के अन्वेषण में मन रूपी बाण का अर्पण करने वाले। 'अनघ'-
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५२ ! श्री शिवपुराण सब प्रकार के पापों से रहित। 'अद्रिः' -मेरु आदि पवंत के स्वरूप वाले। अद्रयालयः,- कैलास पर्वत के निवास करने वाले। कान्तः'- अत्यन्त सुन्दर अथवा ब्रह्मा को अपना सारथि रखने वाले। 'परमात्मा'- सत में व्यापक होकर निवास करने से सर्वोत्कृष्ट नहान् आत्मा वाले अर्यात सर्वत्र विद्यमान। जगद्गुरु' सम्पूर्ण जगत् को हित का उपदेश देने वाले। सर्व कर्मालयः'-अर्थात सबके नित्य के तथ' नैमित्तिक कर्मों के अर्पण करने के आधार। 'तुष्टः' - परम सन्तोष तथा आनन्द के स्व- रूप। 'मगल्यो मंगलावृतः'-अने मक्तों के मंगल में हित स्वरूप तथा अनेक मंगलों से युक्त ये दोनों शब्द एक ही शिव के शुभ नाम के द्योतक - हैं। ३४-३५३६।। महातपा दीदीर्घतपा: स्थविष्ठः स्थविरो ध्रवः। अहः संवत्सरो व्याप्तिः प्रमाण परमं तप: ॥३७ संवत्सरकरो मन्त्रः प्रत्ययः सर्वतापनः । अजः सर्वेश्वरः सिद्धो महातेजा महाबलः ॥३८ योगी योग्यो महारेता: सिद्धिः सर्वादिरग्रहः। वसुर्वसुमनाः सत्यः सर्वपापहरो हरः ॥३९ 'महातपाः'-संसार के समुत्पन्न करने से महान् तप करने वाले। यहाँ 'यस्य ज्ञान मयं तपः'-इत्यादि वेद के वचन का प्रमाण है। 'दीर्घ- तपा:'-स्वयं अजर अमर होने से दीर्घतम तपस्या करने वाले भगवान् शिव हैं। 'स्थविष्टः'-अत्यन्त स्थूल। 'स्थविर:'-अत्यन्त वृद्ध अर्थात् सबसे प्राचीन बड़े। ध्रवः'-अटल स्वरूप वाले। 'अहः'-प्रकाश स्वरूप। 'संवत्सर:'-वर्षात्मक काल के स्वरूप से युक्त। 'व्याप्तिः'-सर्वत्र विद्यमानता रखने के स्वरूप वाले। 'प्रमाण:'-प्रमित स्वयं प्रमाण रूप। यहाँ श्रति वचन इसका पोषक-'प्रज्ञान ब्रह्म' होता है। 'परमम्'-पर शोभा से समन्वित अथवा मुक्ति स्वरूपिणी लक्ष्मी के दाता ।'तपः'-ऋृत सत्य आदि के स्वरूप से युक्त। 'ृत तपः'-इत्यादि श्रति वाक्य हैं ३७। संवत्सर कर:'-काल 'चक्र के प्रवर्त्तक अथवा प्रभव प्रभृति वत्सरों के उत्पन्न करने वाले। 'मन्त्र 'अत्ययः'-अर्थात् ऋग्यजुः साम स्वरूप मन्त्रोंके द्वारा प्रतीत होने वाले। 'सर्व
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विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] [५३ दर्शनः-सभी वुद का प्रत्यक्ष करने वाले। यहाँ 'विश्वतश्चक्षुविश्वाक्षम्' इत्यादि श्रति के वचन इस उक्त अर्थ की पुष्टि करने वाले हैं। 'सर्वेश्वरः'-ईश्वरों के भी परमेश्वर।' एष सर्वेश्वर ! इत्यादि वेद के वाक्य यहाँ पर पोषक हैं। सिद्ध' -- अर्थात् नित्य निष्पन्न स्वरूप। 'महा- रेता.' महान् वीर्य वाले। यहाँ 'ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षम्' -- यह श्रुति वचन है। 'महाबल'-महान् पराक्रम वाले ॥३८॥ 'योगी योग्यः,-नित्य योग से युक्त अर्थात् योग में प्रवृत्त होने वाले। यहाँ ये दोनों शब्द एक ही नाम को प्रकट करने वाले है। (शिव नामों का यह तृतीय शतक समाप्त हो गया। ) तेजोः' -- महान् प्रभाव से युक्त किम्बा दुष्टों के अत्या- चार न सहन करने वाले। 'सिद्धिः'-अनन्त काल का स्वरूप होने के कारण सिद्धियुक्त। 'सर्वादि:'-समस्त के आदि कारण। 'अग्रहः'- पुण्य से हीनों के द्वारा न ग्रहण करने के योग्य। 'वसेः'-अर्थात् समस्त प्राणियों को अपने अन्दर निवाह देने वाले। वसुमनाः' राग द्वेषादि से कालुज्ञ रहित चित्त वाले। 'सत्यः' अर्थात् आवर्तक स्वरूप। यहाँ-'सत्य' ज्ञानमनन्तं ब्रह्म यह वेद वचन इसका पोषक है। 'सर्व पाप हरोहर' अर्थात् कायिक प्रभृति समस्त पातकों के हरण करने वाल। यहाँ ये दोनों शब्द एक ही नाम को बतलाने वाले हैं।३९। सुकीर्तिः शोभनः स्रग्वो वेदांगों वेद्विन्मुनिः । भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता लोकनाथो दुराधरः ।४०। अमृतः शाश्वतः शान्तो बाणहस्तः प्रतापवान्: कमंडलुधरो धन्वी ह्यवाड् मनसगोचरः।४१। अतीन्द्रियो महामायः सर्वावासश्चतुष्पथः । कालयोगी महानादो महोत्साहो महाबलः ।४२। 'सुकीतिः' सुन्दर समुज्ज्वल यज्ञ से युक्त। शोभन-विविध प्रकार के वैभवोंसे युक्त शोभा वाले। (३०)। श्रीमान्-ऐश्वर्य,लक्षण शोभा की समस्त सामग्री से युक्त। 'अवाड्' मनस गोचरः' -- चक्षु आदि का तो कथन ही क्याहै वाणी और मनसे परे यहाँ, यतो वाचौ निवत्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' इत्यादि श्रति वचन पोषक हैं। 'अमृतः आश्वतः-अमर और नित्य। यहाँ पर भी-'अजरोऽमृतः' इत्यादि श्रति वाक्य हैं। ये भी दोनों एक ही
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होते हैं ।४c। 'कमण्डलु घरः,-कमण्डलु हाथ में धारण करने वाले 'धन्वी'-धनुष के धारक। वेदांग ;- वेद के बोधक अंग रूप। 'वेद्वि न्मुनिः,-वेदों के ज्ञाता मुनि स्वरूप। 'भ्राजिष्णुः'-एक रस प्रकाश के स्वरूप वाले। 'भोजनम्-इस मवनमोहिनी माया का भोजन करने वाले। 'भोक्ता' पुरुष स्वरूप से भोग करने वाले। 'लोकनाथ'-सम्पूर्ण लोकों के स्वामी किम्बा सबका शासन करने वाले। 'दुराधरः'-दैत्यादि के द्वारा आराधना करने के अयोग्य एवं अशक्य ।।४१॥। अतोन्द्रियो महामाय'-शब्दादि का स्वरूप न होने के कारण इन्द्रियों के अविषय। यहाँ-'अशब्द सम्पर्कम्' इत्यादि श्रति के वचन पुष्टिकारक हैं। जो स्वयं माया किया करते हैं उन पर भी माया का प्रभाव डालने वाले। यहाँ इन दोनों शब्दों से एक ही नाम की अभिव्यक्ति होती है। 'सर्व वास'-सव में निवास करने वाले। 'चतुष्पथः'-चारों पदार्थों के साधक मार्ग वाने। कालयोगी'-कर्म के परिपाक होने के समय प्राणियों को भोग की प्ररणा देने वाले। 'महाः नाद,-अयि गम्मीर ध्वनि से युक्त। 'महोत्वाह -- इस जगत् की उत्पत्ति स्थिति और संहृति करने के कार्य में उत्साहपूर्वक सर्वदा उद्यत रहने वाले। 'महाबलः'-बड़े मारी बल वालों से भी बली ।४२। महाबुद्धिर्महावीर्यो भूतचार पुरन्दरः। निशाचरः प्रेतचारी महाशक्तिर्महाद्यतिः ।४३। अनिर्देश्यवपुः श्रीमान्सर्वावार्यो मनोगतिः । बहुश्र तिर्महामायो नियतात्मा घ्र वोऽघ्र वः।४४। तेजस्तेजो द्यतिधरो जनकः सर्वशासनः। नृत्यप्रियो नित्यनृत्यः प्रकाशात्मा प्रशाशकः ।४५। 'महाबुद्धि:'-अर्थात् महान् बुद्धि के भण्डार। 'महावीर्य:'-इस जगत् के बड़ी भारी उत्पत्ति के कारणरूप वीर्य को धारक करने वाले। 'भूतचारी' -भूत पिशाच आदि के साथ सदा विचरण करने वाले। 'पुरन्दरः'-त्रिपुरासर का व्रिदारण करने बाले। निशाचरः'-रात्रि के
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समय में विचरण करने वाले। 'प्रेतचारी'-प्रेतों को साथ में लेकर गमन करने वाले। 'महाशक्तिर्महाद्य तिः-महान् शक्ति एवं महान् ज्योति के धारण करने वाले। यहां 'ज्योतिषाः' ज्योतिः' इत्यादि श्रति का अर्थ भी यही है कि वह प्रकाशकों की भी ज्योति है। ये दोनों एक ही हैं।४३। 'अनिर्देश्य वपुः'-ऐसे शरीर धारण करने वाले जिसका ज्ञान किसी को भी नहीं होता है। 'श्रीम न्' ऐश्वर्य की शोभा से युक्त ॥ (३४०) ॥ 'सर्वाचार्य मनोगतिः' समस्त आचार्यों के मन में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले। बहुश्रतः' ---- अनेक शास्त्रों का उद्भव करने वाल 'महामायः' --- बहुत बड़ी माया को उत्पन्न करने वाल। 'नियतात्मा धृवः'-नियत आत्मा स्वरूप में स्थित निश्चल। 'अधवः'-धू व जिससे नहीं है। 'ओजस्तेजो द्य तिधरः'-प्राण, बल, शौर्यांदि गुणों की दीप्ति को धारण करने वाले। 'नर्तकः' ---- ताण्डव नामक नृत्य के करने वाल सर्व शासक:' ---- समस्त प्राणियों के नियन्ता। यहाँ -- 'अन्त प्रविष्ट शास्त जनानां सर्थात्मा' यह श्रति वचन है। इसका अर्थ है अन्दर प्रविष्ट होता हुआ जीवों का शासक सबकी आत्मा है। 'नृत्य प्रियो नित्य नृत्य' ... नाच की प्रिय लगने के कारण नित्य ही शिव भक्तों के द्वारा उनके निकप नृत्य दिखाये जाने वाले। इन दोनों शब्दों के द्वारा एक ही नाम होता है। 'प्रकाशात्मा प्रकाशक.' ---- स्वयं तो प्रकाश स्वरूप है अत सबको प्रकाशित करने वाल हैं। ये दोनों एक ही हैं (३५०) ॥४४।।४५।। स्पष्टाक्षरो बुद्धो मन्त्रः समानः सारसंप्लवः। युगादिकृतद्य गावर्तो गम्भीरो वृषवाहनः ।४६। इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः सुलभः सारशोधनः। तीर्थरूपस्तीर्थनामा तीर्थद श्यस्तु तीर्थंदः।४७। अपां निधिरधिष्ठानं दुर्जतो जयकालवित्। प्रतिष्ठमः प्रमाणज्ञो हिरण्यकवचो हरिः ।४८। 'स्पष्टाक्षर,-ओङ्कार लक्षण वाल। 'बुध' -- सबका ज्ञान रखने वाल शिघृखिता से रहित। 'सार सप्लव वेदान्तके स्वरूपमेंस्थित होकरसंसार सागरसे पाप उतारनेमें साधना 'युगादि कृत युगावत्त' .- स्वयं काल स्वरूप
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५६ शिवपुराण होने के कारण युगादि के भेद करने वाले तथा य गोंके आवर्तन कर्ता ये दोनों शब्द भगवान् शित्र का ही नाम व्यक्त करते हैं। 'गम्भीरः-ज्ञान तथा ऐशर्य प्रभृति बल से अति गहन। 'वृष वाहनः' नन्दीश्वर नामक वृष को वाहन रखने वाले ॥४६॥ 'इष्ट'-अतिशयानन्द्र स्वरूप हो के कारक प्रिय किम्बा यज्ञादि के द्वारा समरचित। 'विशिष्टः' -- सबसे उत्कृष्ट ।(३६०)। शिष्टेष्टः' महापण्तिोंको प्रिय लगने वाले किम्बा शिष्ट पुरुषोंके द्वारा पूजित। 'शलभः' सर्वंत्र गमन करने वाले। 'शरमः'-शरभ के अवतार वारण करने वाले। 'धनुः'-पिनाक धनुष के धारण कर्त्ता। 'तीर्थरूपः'-सर्व विद्याओं के स्वरू से युक्त ।'तीर्थनामाः'-सांसारिक जीवों को सद्गति करने के लिए भागीरथी आदि के लाने वाले। 'तीर्थादश्य.' .- गंगादि तीर्थोंके द्वारा भी दुष्पाप्य होने वाले। स्तुतः'-अर्थात् ब्रह्मादि देवों के द्वारा स्तुति तथा वन्दना किये हुए। 'अर्थवः'-पुरुषार्थों के प्रदान करने वाले ॥४७॥ 'अगँनिधिः'-समुद्र के स्वरूप वाले ।अधिष्ठानम्'-उपादान कारण से समस्त प्राणियों के आधार।'विजय;' ज्ञान-वैराग्य आदि तधा ऐश्वर्य प्रभृति गुणों के द्वारा संसार पर विजय प्राप्त करने वाले।जयकाल वित्'-दैत्य तथा असुरों के नाश और देवों के विजय के समय का ज्ञान रखने वाले। 'प्रतिष्ठितः'-अर्थातू अपनी महिमामें स्थित। यहाँ स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्निं इत्यादि श्रत वचनसे उसके प्रतिष्ठित होने की पुष्टि होती है। 'प्रमाणज्ञ:'-प्रत्यक्षादि प्रमाणों मथा समस्त प्राणियोंके प्रमाके ज्ञाता। 'हिरण्य कवच' हेम के निमित कवच को धारण कयने वाले।'नमोहिरण्य वाहवे हिरण्प वर्णाय हिरण्य रूपाये, इत्यादि श्र तिके महा ववन से उक्त नाम के अर्थ का वर्णन होता है। 'हरिः'-समस्त पारों को हरण करन वाले ॥४८ विमोचनः सुरगणो विद्यशो बिन्दुसंश्रयः । वातारूपोऽमलोन्मायी विकर्ता गहनो गुहः ।४९। कारणं कारणं कर्त्ता सर्वबन्ध विमोचनः । व्यवसायो व्यवस्थानः स्थानदो जगदादिजः ।५०। गुरुदो ललितो भेदो नवात्मात्मनि संस्थितः । वीरेश्वरो वीरभद्रो वीरासनविधिर्गुरुः ।५१।
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'विमोचनः'-आध्यात्मिकादि तीनों प्रकार के नाशक। 'सुरगणः'-सर्व देव स्वरूप।'विद्य शः'-सम्पूर्ण विद्याओं के प्रवर्तक स्वामी।३८०)।'बिन्दु- संश्रयः'-प्रखव (ओङ्गार) के आत्मभूत। 'बालरूनः'-ब्रह्माके ललाट से समु- त्पन्न बालक के स्वरूप में स्थित। 'बलोत्मत्तः'-बल द्वारा समस्त शत्रुओंके नाशक। :विकर्त्ताः'-विचित्र भवन के करने वाले। 'गहन :: अपूर्व एव अद्भुत सामर्थ्य रखनेवाले ऐसे गम्भीरजिसे कोईभी जान नहीं सकता।'गुहः'-अपनी प्रवल मायाके द्वारा अपने सत्यस्वरूप का छिपाने वाले।'करणम्'-इस जगत् के उद्भव में साधक स्वरूप। 'कारणम्'-सृष्टि की रचना में उपादान तथा निमित्त कारण स्वरूप। 'कर्त्ता'-परम स्वतन्त्र अर्थात् सभीकुछ करने वाले। 'सर्वबन्धविमोचनः'-अपने ज्ञान के प्रदान से अविद्याकृत समस्त बन्धनों से विमुक्त कर देने वाले। 'व्यवसायः'-सत्-चित् और आनन्द के स्वरूप में स्थित।'व्यवस्थानः'-वर्णों और आश्रमोंके विभाग कर व्यवस्था करनेवाले। 'स्थानदः'-सबको उनके कर्मों के अनुसार स्थान के दाता। 'जगदादिजः'- हिरण्यगर्भ के स्वरूप से इस जगत्के आदिमें होने वाले ॥५०॥'गुरुदः'-शत्रुओं को अधिक रूप से खण्डन करने वाले। 'ललितः'-सर्वाधिक सुन्दर स्वरूप वाले। 'अभेदः'-अद्वत स्वरूप में स्थित। 'भावात्मात्मानि संस्थितः'-प्राणियों के पाँच भूतों द्वारा बने हुए शरीर और जीवात्मामें अन्तर्यामी रूपसे स्थित। 'वीरेश्वरः' शूरों के पति। 'वीरभद्रः'-वोरभद्र नाम वाले एक शिवके गण के स्वरूप में स्थित। (४००) (यहाँ चतुर्थ शतक नमों का समाप्त होता है।) 'वीरासन निधिः'-बीरों के आसन में विधान वाले 'विराट'-समस्त जगत् के स्वरूप में संस्थित ॥५१॥ वीरचूडामणिर्वेत्ता चिदानन्दो नन्दीश्वरः। आज्ञाधरस्त्रिशली च शिपिविष्टः शिवालयः ॥५२ बालखिल्यो महावीरस्तिग्मांशुबंधिरः खगः । अभिरामः सुशरणः सुब्रह्मण्यः सुधापति ॥५३ मघवा कौशिको गोमान्विरामः सर्वसाधनः। ललाटाक्षो विश्वदेहः सारः संसारचक्र भृत्॥५४
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५८ ] [श्री शिवपुराण 'वीर चूड़ामणि :- अर्थात् वीरों के शिरोभूषण। 'वेत्ता'-सब के ज्ञाता। 'तीब्रानन्दः'-अत्यन्त आनन्द स्वरूप। 'नदीधरः'-मस्तक पर मागीरथ के धारण करने वाले समुद्र स्वरूप। दाज्ञाधारः'-सन्तति स्वरूप जगत् के द्वारा अविच्छिन्न रूप से आज्ञा के आश्रय। 'त्रिशूली'- त्रिशूल आयुध के धारक। 'शिपिविष्टः-यज्ञ में विष्णु के रूप से विराजमान । 'यज्ञो वै विष्णुः पशवः शिषियज्ञ एवं पमुषु प्रविश्य तिष्ठति' इत्यादि श्रति का वचन प्रमाण है अथवा रश्मि में रहने वाले। 'शिवालयः' कल्याणयुक्त मंगलमय स्थानमें निवास करने वाले ॥४१०।५२ 'वालखिल्य'-बालखिल्य नामक ऋषि के स्वरूप में स्थित। महाचापे:' विदेह राजा जनक के द्वारा अथित धनुष वाले । 'तिर््माशु'- सूर्य स्वरूप में स्थित। 'वधिरः'-श्रोत्र न्द्रिय से रहित। 'खग-'-अन्तरिक्ष में विचरण करने वाले। 'अभिरामः'-समस्त योगियों के समूह रमण का आधार। सुशरणः' पीड़ित प्राणियों की शरण (रक्षक) रूप में हो कर त्रास देने वाले 'सुब्रह्मण्यः'-समस्त वेद ज्ञाति तथा ज्ञान के ज्ञाताओं के हित-सम्पादक। 'सुधापतिः' -- अमृतके स्वामी ।५३। 'मशवान् कौशिक :- इन्द्र के स्वरूप में विराजमान। यहाँ ये दीनों एक ही नाम के द्योतक हैं। (४२०) 'गोमान्' - ससार रूपी गौ बाले। इनकी कथा लिंग पुराण में वर्शित है। 'विरामः'-प्राणियों के अवसान का आथार। सर्व साधनः'- समस्त पुरुषार्थों के देने वाले साधनयुक्त। ललाटाक्षः' मम्तक में तृतीय नेत्र धारण करने वाले। 'विश्वदेहः' -- जगत् स्वरूपी देह वाले। सारः'- महाप्रलय काल में भी स्थित रहने वाले। 'संसार चक्र भृत्'-सम्पूर्ण जगत् के प्रपञ्चरूपी चक्र को धारण करने वाले ॥५४॥ अमोघदण्डो मध्यस्थो हरिणो ब्रह्मवर्चसः। परमार्थः परमाय संचयो व्याघ्रकोमलः ।५५ रुचिबंहुरुचिवै द्यो वाचस्पतिरहस्पतिः रविर्विरोचनः स्कन्दः शास्ता वैवस्वतो यमः ॥५६ युक्तिरुन्नतकीर्तिश्र सानुरागः पुरञ्जनः । कैलासाधिपतिः कान्तः सविता रविलोचन: ।५७
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विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] ५९ 'अमोध दण्डः'-सफल दण्ड वाले। 'मध्यस्थः'-न्याय में स्थित रहते हुए पक्षपात से रहित रहने वाले। 'हिरणः'-सुवर्ण अथवा तेज के स्वरूप में विराजमान। 'ब्रह्म वर्च स्वी'- ब्रह्म अथवा ब्रह्म की दीप्ि का प्रकाश वाले। परमार्थ .- मोक्ष स्वरूप अर्थ की सिद्धि प्रदान करने वाले। 'परोमायी'-उत्कृष्ट माया वाले। यहाँ दौनों एक ही हैं। 'शम्बर:'- परमोत्कृष्ट कल्याण के दाता किम्बा जल के स्वरूप में स्थित। व्याघ्र लोचनः'. अर्थात् वाघ के समान दुष्टों पर क्रूर नेत्र वाले ।५५।। 'रुचिः'-दीपि स्वरूप वाले। 'विरंचः'-ब्रह्माके स्वरूप में विराजमान 'स्वन्धुः' -स्वर्ग लोक में बन्धु भाव के रूप में फल प्रदान करने वाले। 'वाचस्पतिः'-समस्त विद्याओं केस वामी। ईशानः सर्व विद्यानाम्' इत्य।दि श्रुति वचन उनके स्वामी होने का समर्थन करता है। 'अहर्पतिः' सूय स्वरूप में स्थित। (४००! 'रविः'-रसों कों किरणों द्वारा ग्रहण करने वाले। विरोचनः'-अग्नि अथवा सूर्य स्वरूप में स्थित। स्कन्दः'-प्रमृत के रूप में सब में और वायुके रूप में शोषणकर्त्ता। ।शास्ता वैवस्वतो मुनः' सब पर शासन करने के लिये सूर्यपुत्र धर्मराज के तुल्य। यहाँ तीनों शब्दों के द्वारा एक ही को बतलाया जाता है। 'युक्तिरुन्नतकीर्तिः'-आठ अंगों वाले योग से युक्त किम्बा न्याय स्वरूप महती कीर्ति वाले। यहाँ दोनों एक हैं। 'सानुरागः'-भक्तों पर प्रीति रखने वाले। 'परञ्जयः'- शत्रओं को युद्ध में जीतने वाले। कैलाआधिपतिः-कैलास गिर के स्वामी। 'कान्तः'-परम सुन्दर। 'सविता'-समस्त जगत् को प्रसूत करने। (४५०) 'रविलोचनः'-सूर्य रूपी नेत्रों को धारण करने वाले। 'अग्नि मूर्धा चक्ष पी चन्द्रसूर्यों:' इत्यादि श्रतिका समर्थन यहाँ वचग है ॥५६॥ विश्वोत्तमो वीतभयो विश्वभर्ताः । नित्यो नियत कल्याण:पुण्यश्रवणकीत नः ।५८ दूरश्रवो विश्वसहो ध्येय दुःस्वप्ननाशनः। उत्तारणोटुष्कृतिहा विज्ञोयो दुःसहो धवः ।५९ अनादिर्भू वोलक्ष्मी:किरीटी त्रिदशाधिप ः। विश्वगोप्ता विश्वकर्ता सुवीरो रुचिरांगद: ।६०
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६० श्री शिवपुराण 'विश्वोत्तमः' शतिशय श्रष्ठता से युक्त। 'वीतभयः'-संसार के समस्त भय से शून्य। 'विश्वभर्त्ता'-समस्त विश्व के भरण-पोषण करने वाले। 'अनिवारितः'-कर्मफल देने में किसी के भी द्वारा न निवारण करने के योग्य। 'नित्यः'- उत्पत्ति एवं विनाश से रहित सर्वदा एक रस रहने वाले। -नियत कल्याण:'-निश्चित कल्याण से युक्त। 'पुण्य श्रवण कीर्तनः'-परम पावन श्रवण और कीर्त्तन वाले ॥५८॥ 'दूरश्रवाः'सुदूर देश में भी श्रवण करने बाले। 'विश्वसहः'-संसार के सहने वाले (४६०) । 'ध्येयः'- ध्यान तथा विचार करने योग्य। 'दुःस्वप्न नाशनः' -बुरे दिखलाई देने वाले स्वप्नों के नाशक। 'उत्तारणः' - संसार से पार कर देने वाले। 'दुष्कृतिहा'-दुष्टों के नाश करने वाले। 'विक्षेपः'- विशेष रूप से जानने के योग्य। 'दुःसहः'- दुख के साथ भी असुरादि के द्वारा सहन न करने योग्य। 'अभवः'-जन्म से रहित ॥५१।। 'अनादि:'-सब चराचर के कारण होने आदि से रहित। 'भूभुवो लक्ष्मी:' -- भूर्भु वस्वःस्वरूप लोक की लक्ष्मी की आत्म-विद्या वाले 'किरोटी' -किरीट नामक शिरोभूषण धारण करने वाले। (४४०)। 'त्रिदशा- धिपः' देवगण के स्वामी। 'विश्वगोप्ता'-समस्त जगत् के रक्षक। 'विश्व कर्त्ता'-इस जगत् के उत्पन्न करने वाले। 'सुवीरः'-अनेक तरह की गति वाले। 'रुचिरांगद.' सुन्दर बाजूबन्द धारण करने वाले ॥६०॥ जननो जनजन्मादिः प्रीतिमान्नीतिमान्ध्र वः। वसिष्टः कश्यपो भानुर्भीमो भीमपराक्रमः ।६? प्रणवः सत्यथाचारी महाकोशो महाधनः । जन्माधिपो महादेवः शकलागमपारगः ॥६२ तत्वं तत्वविदेधात्मा विभूर्विष्णुविभूषणः । ऋषिर्ब्राह्मण ऐश्वर्य्य जन्ममृत्युजरातिगः ॥६३ 'जनन'-समस्त प्राणियों की उत्पत्ति करने वाले। जन-जन्मादिः'- समस्त प्राणियों के जन्म के आदि कारण। 'प्रीतिमान्'-नित्यही प्रीतिसे पूर्ण। 'नीतिमान्'- सर्वदा नीति से युक्त। 'ध्र वः'-सबके स्वामी।४८०। 'वसिष्ठाः'- प्रलय के समय में भी दिदयमान। 'कश्यपः'-कश्यप नामक ऋृषि के स्वरूप में अवस्थित। 'मानुः'-प्रकाश से युक्त। 'तमेव मान्तमनु भागि सवेंम्'- इत्यादि
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विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] ६१ श्रुति का वचन भी यहाँ इसका प्रतिपादक है। 'मीमः'- दुष्टों के लिये भय कारण स्वरूप। 'भीम पराक्रमः'-असुरादि दुरात्माओं को भययुक्त पराक्रम वाले ।।६१।। 'प्रणवः'-ओंकार स्वरूप। शिव अथवंशीर्ष में लिखा है-'अथ कस्मादुच्यते प्रणवो यस्भादुच्चार्यमाण एवर्चो यजूषि सामान्यथर्वांगिरसश्च यज्ञ ब्रह्म ब्राह्मरोभ्यः प्रणमयति तस्मादुच्यते प्रणवः'। अर्थात् ओङ्कार कणव क्यों कहा जाता है-वह प्रश्न पूर्वक उत्तर में कहते हैं कि जिससे ऋचाओं यजुवद के तथा सामानि अथर्वाङ्गिरसम् के मन्त्रों के उच्चार्यमाण होने पर यज्ञ में ब्रह्म-ब्राह्मणों के लिये प्रणाम करवाता है अतएव इसे 'प्रणव' कहते हैं। 'सत्याद्याचारः'-अर्थात् सन्माग में गमन करने वाले। 'महाकोशः'- अन्नमय प्रभृति महाकोंशों से युक्त । 'महाधनः'-असीम धनैश्वर्य वाले। 'जन्माधिपः'-जन्म और उत्पत्ति के स्वामी। (४००) । 'महादेवः'- समस्त भावों को त्यागते हुए आत्म ज्ञान के ही ऐश्वर्य में पहुँचने से महान् देव हैं। 'सकलागमपारगः'-सम्पूर्ण वेदों के अन्त तक ज्ञान रखने वाले ।।६१। 'तत्वमू-ब्रह्म के स्वरूप में स्थित। 'तत्ववित्'-ब्रह्म के स्वरूप को ठीक-ठीक जानने वाले। 'एकात्मा'-एक ही आत्मा स्वरूप। 'आत्मा वा इदनेव एवाग्र आसीत्'-इत्यादि श्र दि वचन उक्तार्थ का पूर्ण पोषक है। 'विभुः'- सबमें व्यापक । 'विश्वभूषणः'-जगत् के भूषण अथवा जगत् के आभरण वाले। 'ऋृषिः'-इन्द्रियों से पर ज्ञान रखने वाले अर्थात् जो अगोचर है उसे भी जानने वाले। यहाँ 'विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः'-इत्यादि वेद वाक्य इसको प्रमाणित करता है। 'ब्राह्मणः'- उत्तर वर्ण स्वरूप। ऐश्वर्यं जन्म मृत्यु जरातिगः'-अपने ऐश्वर्य से जन्म प्रभृति षट् विकारों का अतिक्रमण करने वाले शिव हैं। (५००) । (यहाँ पाँचवाँ शतक समाप्त हो गया) ॥ ६३।। पञ्चतत्व समुत्पत्तिर्विश्वेशो विमलोदयः। अनाद्यन्तो ह्यात्मयोनिर्वत्सलो भूतलोकधृक् ।६४ गायत्रीवल्लभः पाशविश्वावासः प्रभाकरः। शिशगिरिरतः सम्राट् सुषेणः सुरशत्र हा॥ अनेमिरिष्टनेमिश्र मुकुन्दो विगतज्वरः। स्वयंज्योतिर्महाज्योतिस्तनुज्योर्तिरचंचलः ॥६६
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६२ ] श्री शिवपुराण 'पञ्चयज्ञ समुत्त्तिः'-देवादि पञ्च यज्ञो की उत्पत्ति करने वाले। 'विश्वेशः-समस्त विश्त्र के स्वामी। 'विमलोदयः'-समस्त मङ्गलोंके उदय करने वाले। आत्मयोनि:'-सब चराचरके कारण स्वरूप। अना- द्यन्तः' -आदि तथा अन्त दोनों से रहित। व सलः'-सब पर प्यार करने वाले अर्थात् प्रिय। 'भक्तलोकधृक'-भक्तजनों के धारण करने वाले ॥६४॥ गायत्री वल्लभः' शिव गायत्री रूपिणी त्रिया व ले । प्रांशुः'-सुषुम्ना प्रभृति किरणों के प्रकृष्ट स्वरूप से युक्त। 'विश्वावास'-संसार में व्याप्त। (५१०) 'प्रभाकर:'-अत्यन्त दीपि का प्रकाश करने वाले। 'शिशुः'- बालक के स्वरूप में स्थित रहने वाले। इस सम्बन्ध में एक कथा लिंग पुराण में पार्वती स्वयम्यर के प्रकरण में लिखित है। 'गिरिरतः' - कैलास पर्वत के निवास को प्रिय समझने वाले । 'सम्राट'-सबके अधिपति प्रभु किम्बा नियन्ता। 'सुषेणः सुरशत्रुहा'- गणों की एक विशाल एवं सुन्दर सेना के स्वरामी और देव शत्रुओं के संहारक। यह दोनों एक ही हैं। 'अमोघोऽरिष्टनेमिः'-स्तुति करने पर प्रसन्न होकर सब कुछ फन देने वाले। 'सत्यवंकल्रः'-यह श्रति इसको प्रमाणित करती है। शुभाशुभ फल दान रूी-अर्थात् शुभ और बुरे फलों के दान करने वाले स्वरूप में स्थित। ये दोनों शब्द एक ही हैं। 'कुमुदः'- भार को हटाकर पृथ्वी को परम प्रसन्नता देने वाल। यहाँ मुकुन्दो मुक्तिद:'-ऐसा पाठान्तर मिलता है। 'विगतज्व्ररः'-समस्त तापों के सन्ताप से पृथक् रंहने वाल। 'स्वयं ज्योतिस्तनु ज्योतिः'-स्वप्रकाशात्मक सूक्ष्म तेज के स्वरूप वाल शिव हैं। यहाँ 'नीवार शूकवत्तत्वी पीता भावत्यणूपमा। तस्याः शिखाया मध्ये च परमात्या व्यवस्थितः'-इत्यादिश्रुति वचन से से इस उक्तार्थ की पुष्टि स्पष्ट है। ये दोनों एक ही हैं। 'आत्मज्योतिः'-अत्मा स्वरूप ज्योति वाल। 'येन सूर्य: पति तेजसद्धः'-इत्यादि श्रति के वचन से यह समर्थितार्थ है। (५२०)। 'अचञ्चलः' स्थिर स्वरूप वाल । 'वृक्ष इत्र स्तब्धो दिवि तिष्ठति'-इत्यादि श्रति वाक्य है जिससे स्थिरता की पुष्टि हो जाती है ।६५-६६॥ पिङ्गल: कपिलश्मश्र रभालनेत्रस्त्रयीतनुः। ज्ञानस्कन्धा महानोतिविश्वोत्पत्तिरुपप्लव: ।६७
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विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन [ ६३ भयो विवस्वानादित्यो गतपारो बृहस्पतिः । कल्याणगुणनामा च पापहा पुण्यदर्शनः ।६८ उदारकीत्तिरुद्योगी सद्योगी सदतत्त्रप,। नक्षत्रमाली नाकेशः' स्वाधिष्ठानः पडाश्रय ॥६९ पिंगल :- बाध के चर्माम्बर धारण करने के कारण पिंगल वर्ण वाले। 'कपिलश्मश्र ः'-पिंगल वर्ण की दाढ़ीमूछ रखने वाले। 'भाल- नेत्र :- मस्तक में तृतीय नेत्र रखने वाले। 'त्रयी तनुः'-बेदमय शरीर के धारी। 'ज्ञान स्कन्दो महानीतिः'-अर्थात् ज्ञान के दान द्वारा भक्तों को मोक्षदाता और संसार रूपी समुद्र के शोषक। इस जगत् स्वरूप यन्त्र की निर्वाह साधन करने वाली नीति रखने वाले प्रभु शिव हैं। 'विश्वो- त्पत्तिः'-इस समस्त विश्व को उत्पन्न करने वाले। उपप्लवः'-दुष्टों को पीडित करने वाले। 'भगोविवस्व्रानादित्यः'-भग-विवस्वान् और आदित्य देवों के स्वरूप रखने वाले। यहाँ ये तीनों शब्दों के द्वारा एक ही शिव का नाम होता है। 'योगपारः'-योग के साँग ज्ञान रखने से सम्पूर्णता वाले। 'योगाधारः' अर्थात् योग के पूर्ण आश्रय ऐसा ही पाठान्तर होता है। (५३०)। 'दिवस्पतिः'-स्वर्ग के स्वामी इन्द्र के स्वरूप वाले। 'कल्याण गुणनामा' शिव शम्भुआदि मंगल वाचक नामों वाले। 'पापहा'-भक्तों के पापों का नाश करने वाले। 'पुण्य दर्शनः'-परम पावन पुण्यस्वरूप दर्शन वाले ।६७-६८॥ 'उदार कीतिः'-वन्दनीय सुन्दर कीति वाले। 'उदोगी'-जगतू को सृष्टि-रचना करने के कार्य में अतिशय उद्योग करने वालो। 'सद्योगी' सवंदा सुग्दर योग के साधन में परायण। 'सदसन्मयः-भले बुरे इस जगत् के स्वरूप में अवस्थित। 'नक्षत्र माली'-आकाश्व के स्वरूप में विराजमान होकर नक्षत्र रूपी मालाओं के धारण करने वाले। 'नाकेशः' स्वर्ग के अधिपति। कही 'लोकेश'-ऐसा भी पाठान्तर मिलता है (५४०) 'स्वाविष्ठान षडाश्रयः'-निज स्वरूप में लय स्थान वालों के आधारभूत /६९ पवित्रः पापनाशश्च मणिपूरो नभोगतिः। हृत्पुण्ड रीकमासीनः शकः शान्तिर्वृषाकपि: ।७०
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६४ ) शिवपुराण
उष्णो गृहपतिः कृष्णः समर्थोऽनर्थनाशनः। अधर्मशत्रुरज्ञयः पुरुहूतः पुरुश्रतः ।७९ व्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः । जगद्धितैषी सुगतः कुमारः फुशलागः ॥७२ पवित्रः पापहारी'-परम पुनीत और भक्तों के पापों के हरण करने वाले। 'मणिपूर'-रत्नादि के द्वारा भक्तों के मनोरथों को पूर्ण करने वाले। 'नभोगति'-आकाश में विचरण करने वाले। 'हृत्पुण्डरीकमासीन' -योगिजनों के हृदय रूपो कमलमें सर्वदा निवास करने वाले। 'शक्र'- इन्द्र के स्वरूप में स्थित रहने वाले। 'शांतः'-सर्वदा शांतिमय स्वरूप वाले। वृषाकपि:'- धर्म की स्थिरता रखने के कारणभूत ॥७०॥ 'उष्ण' हलाहल महा विष के पान करने के कारण उष्णता से पूर्ण। 'गृहपतिः-सब गृहों के पालन करने वाले। (५५०) । 'कृष्ण:' -काले कंठ वाले अथवा कृष्ण गोचर स्वरूप। 'समर्थः'-समस्त कार्यों के करने की सामर्थ्य वाले। अनर्थ नाशनः-संसार के समस्त दुःखों का नाश करने वाले। 'अधर्म शत्र'-अधर्म करने में तत्र पापियों के नाशक किम्बा दुष्टों पर शासन करने वाले। 'अज्ञय'-योगिजन के द्वारा भी न जानने योग्य किम्बा अगम्य। 'पुरुहूनः पुरुत्र नः'-बहुतों के द्वारा उपासना में रहने वाले। कहीं 'पुरुहत पुरुष्टतः'-ऐसा भी पाठान्तर है। अर्थात् बहुतसे गुरुओं के द्वारा श्रवण होने वाले। यहां ये दोनों एकही नाम बताने वाले हैं ॥७१। व्रह्मगर्भ' अपने गर्भ में वेदों की स्थिति रखने वाले। वृहद्गर्भ :- इस महान् ब्रह्माण्ड को गर्भ में धारण करने वाले। 'धर्मधेनुः'-धर्मोतत्ति के स्थान स्वरूप। 'धनागमः'-समस्त प्रकार के धन-वैभव के आगम करने वाले। (५६.)। 'जगद्धितैषी'-इस समस्त जगती तलके कल्याण करनेकी कामना रखनेवाले। 'सुगनः'-संपार का मोह न करने के कारण भगवान् बुद्ध के स्वरूपमें अवतीर्ण होने वाले। 'कुमारः':वाल स्वरूप में स्थित किम्बा अपने सम्मुख कामदेवको पगाजित कर देने वाले। 'कुशकागम्ः-'अर्थात् समस्त कल्याणों के प्रदान
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विष्णु द्वा्रा शिव सहस्रनामका कीर्तन । ६५ हिरण्यवर्णो ज्योतिष्मान्नानाभूतरतो ध्वनिः । आराज्ञो नयनाध्यक्षो विश्वामित्रो धनेश्वरः॥७३ ब्रह्मज्योतिर्वसुर्धामा महाज्योतिरनुत्तमः। मातामहो मातरिश्वानभस्वान्नागहारधृक्।।७४ पुलस्त्यः पुलहोऽगस्त्यो जातूकर्ण्यः पराशरः। निरावरणनिर्वारौ वैरञ्च्यो विष्टरश्ववाः ॥७५ 'हिरण्य वर्णः' -स्वर्ण के समान कान्ति वाल। नमो हिरण्य वर्णा- श्रतेः' ये दोनों एक ही हैं। 'नानाभूत रतः'- अर्थात् भूत पिशाचादि में रमणानन्द लेने वाल ।'ध्वनिः'-नारद स्वरूप वेषधारो। 'अरागः'- राग से रहित। 'नयनाध्यक्षः'-समस्त लोकों के नेत्रों वर्तमान रहेंने के कारण चक्षओं के प्रवर्त्तन कराने वाल । 'विश्वामित्रः'-अर्थात् विश्वामित्र नाम वाल गाधितनय के स्वरूप में प्रवस्थित ऋषि रूप वाल। (५००) 'धनेश्वरः'-कुवेर के स्वरूप में विराजमान। 'ब्रह्म- ज्योति:'-सबको प्रकार देने वाले ब्रह्म स्वरूप। 'वसुधामा'-धन रूपी तेज वाल। महाज्योतिरनुत्तमः'-अति महान् तेज वाल होने क कारण सबसे परमात्कृष्ट। ये दोनों एक हैं। 'मातामहः' --- जगत् की माता के भी पिता। 'मातरिश्वान्' भास्वान् --- वायु के स्वरूप में स्थित। 'नाग- हार धृक'-सर्पों के हारों को धारण करने वाल ।७३।७४।। 'पुलस्त्य नामक ऋृषि के स्वरूप में स्थित रहने वाल। 'पुलहः'- पुलह नामधारी ऋषि के स्वरूप में स्थित। 'अगस्त्यः' -- अर्थात्् अगस्त्य नाम वाले ऋषि के रूप में स्थित। (५८०) 'जातूकर्ण्यः'-जातूकण्यं ऋषि के स्वरूप में स्थित ।'पराशरः' पराशरके स्वरूप में रहने वाल। 'निसवरण निर्वादः' अर्थात् माया के वन्धन से परे होने के कारण चारण करने में अशक्य। 'निरावरण विज्ञान:'-कहीं ऐसा भी पाठान्तर होता है । 'वैरंच्यः'- अर्थात् ब्रह्मा के स्वरूप में प्रादुर्भूत । 'विष्ठरश्रवाः' -- विष्णु के स्वरूप में स्थित ॥७५।। आत्मभूरनिरुद्धोऽन्रिर्ज्ञानमूर्तिर्महायशाः। लोकनींराग्रणीर्वीरश्चन्द्रः सत्यपराक्रमः ॥७६ व्यालकल्पो महाकल्पः कल्पवृक्षः कलाधरः। अलकरिष्णुरचलो रोचिष्णविक्रमोन्नतः ।७७
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६६ 1 श्री शिवपुराण आयुः शब्दपतिर्वाग्मी प्लवनः शिखिसारथिः। असस्पृष्टोऽतिथिः शत्र: प्रमाथी पादपासनः ।७८। 'आत्मभू:'-स्वयं प्रकाश स्वरूप। 'अनिरुद्धः'-किसी भी आदुर्भाव में कभी किसीके द्वारा निरुद्ध न होने वाले। 'अत्रि' अत्रि नामक ऋषि के स्वरूपमें स्थित । 'ज्ञान मूर्तिः'-ज्ञानके स्वरूप वाले। यहाँ 'सत्यज्ञान मनन्त ब्रह्म' इत्यादि श्रति वाक्य इसका पोषक है। 'महायशाः' अतुल कीतिधारी। (५९० 'लोक वीराग्रणी:' लोक के वीर विष्णु आदि से भी परम श्रष्ठ एवं प्रमुख। 'वीरः'-महान् शूर। 'चण्ड'-दुष्ट जीवों पर अत्यन्त क्रोध करने वाले। 'सत्य पराक्रम'-सफल शक्तिके धारणा करने वाले ।७६। 'व्याल कल्पः'-महाविषधर सपोंके भूषणोंसे विभूषित। 'महाकल्पः' -- अत्यन्त साम्य्य वाले। कल्पवृक्षः-भक्तोंके मनकी काम- नाओंको पूर्ण करने वाले। 'कलाधरः' -भक्तजनोंके मन प्रसन्न करने के कारण चन्द्रके स्वरूप वाले। 'अलङ्करिष्णु'-अलंकृत करने के कारण विशेष कान्ति वाले। 'अचलः'-स्थिर स्वरूप वाले। (६००) यहाँ भग- वान् शिवके नामों का छठवाँ शतक समाप्त होगया है।) 'रोचिष्णु' -- अत्यन्त दीप्ति वाले। तिक्रमोन्नतः' -नाना प्रकारके पराक्रमसे युक्त होने के कारण सबसे वड़े हैं ।७। 'आयुः शब्दपतिः'-अर्थात् समस्त प्राणियों को आयु और वेदकी वाणीके नियन्त्रण करने वाले। वाग्मीष्लवनः'- अर्थात् बहुत शीघ्रताके साथ भक्तोंके सम्पूर्ण मनोरयों को पूर्ण करने वाले। यहाँ ये दोनों एक ही को बताते हैं। 'शिखिसारथिः'-अग्नि की सहायता वाले। 'अससृष्ट'-अर्थात् माया के सब तरहके संसर्गसे शून्य। 'अथितिः'- अपने मक्तजनकी अर्चा अतिथिके स्वरूप से ग्रहण करने वाले। 'शत्र प्रमाथि'-असुरोंको सेनाके विलोडन करनेमें पूरी तरह समर्थ। 'पाद- पासनः'-बृक्षके समीप अपना आसन जमाकर बैठने वाले ॥७८॥ वसुश्रवाः कव्यवाहः प्रतप्तो विश्वभोजनः। जप्यो जरादिशमनो लोहितश्च तन नपात् ।७९। वृहदश्वो नभोयोनिः सुप्रतीकस्तमिस्रहा।
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विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] ६७ निदाघस्तपनो मेघभक्षः परपुरञ्जयः।८०। सुखानिलः सुनिष्पन्नः सुरभिः शिशरात्मकः। वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बीजवाहना ।८१। 'वसुश्रवाः'-मधुर श्रवणसे युक्त। (६१०) 'हव्यवाहः'-देवगणों के समीप हबिको प्रःप्त कराने वाले अग्नि के स्वरूप में समवस्थित। 'प्रतप्तः'- उग्र तपस्या करने वाले। 'विश्वभोजनः'-समस्त विश्व का पोषण करने वाले। 'जप्य' -जप तथा उपासना करने के योग्य। 'जरादि शमनः'बाधक्य- आदिकी पीड़ाको शान्त करने वाले। 'लोहितात्मा तनूनपात्'-भक्तोंके शरीरको न गिराने वाले रक्त बर्णसे रुक्त अग्नि के स्वरूपमें स्थित। यह ये दोनों शब्द एक ही को बताने वाले हैं ।७९। 'वहदश्व'-बड़े अश्वोंसे युक्त वाले। 'निभोयोनिः'-सभी के कारण होनेके कारण आकाशके भी कारण है। 'सुप्रतीक'-सुरम्य अवयवोंस संयुक्त। 'तमिस्र हो'-अज्ञानके अन्धकार को दूर भगा देने बाले। (६२०) 'निदाघस्तपन'-ग्रीष्मके और मूर्यके स्वरूपमें स्थित। ये दोनों एक ही हैं। 'मेघ'-मेघके स्वरूप में विद्यमान रहने वाले। 'स्वक्ष'-परम सुन्दर नेत्नों वाले। पर पुरकजय'-शत्र ओके पुरको जय करने वाल ॥८०॥ 'सुखानिल' सुखप्रद वायुके समुत्पन्न करने वाले। 'सुनिष्पन्न' -- इस परम सुन्दर जगत् को उत्पन्न करने वाले। 'सुरभिः शिशिरात्मकः'-अर्थात् अत्यन्त प्रसन्नता के प्रदान करने वाले शिशिर ऋतुके स्वरूप में स्थित। यहाँ दोनों एक ही हैं। वसन्तो माधव'-बकरन्दसे युक्त बसन्त ऋृतु स्वरुप में स्थिर रहने वाले। 'ग्रीष्म'-समस्त रसोंके शोषण करने वाले ग्रीष्म ऋतुके स्वरूप में अवस्थित। 'नभस्य'-श्रावण मास में होने वाली वर्षा ऋतु के रूप में संस्थित। (६३०) 'बीज वाहन'-धान्यकी प्राप्ति कराने वाले शरद और हेमन्त ऋतुओं के स्वरूप में स्थित ॥।८१।। अ्गिरागुरुरात्रेयो विमलो विश्वाहनः। पावनः पुरजिच्छक्रस्त्र विद्यो नववारणः ।८२। मनोबुद्धिरहङ्कार: क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालकः।
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६८ ] [श्रीशिवपुराण जमदग्निर्जलनिधिर्विगालौ विश्वगालवः ।८३। अघोरौऽनुत्तरो यज्ञः श्रष्ठे निःश्रयसप्रदः। शैलो गगनकुन्दाभो दानवारिररिन्दमः ।८४। 'अद्गिरा'-अगिरा नामक ऋषि के स्वरूप में स्थित रहने वाले। 'गुरुरात्रयः'-दत्तात्रेय के स्वरू में स्थित गुरु। यहाँ ये दोनों शब्द एक ही शिव के नाम को प्रकट करने वाले हैं। 'बिमलः'-मलसे रहित परम शुद्ध। 'विश्व वाहनः'-सम्पूर्ण जगत् के निर्वहन करने वाले। 'पावनः'-पापों का नाश कर पवित्र बना देने वाले। 'सुमतिविद्वान्'- श्रेष्ठबुद्धि वाले होने के कारण सभी कुछ के ज्ञाता। ये दोनों एक ही हैं। 'त्र विद्यः'-ऋग्-यजु और साम-इन तीनों वेद विद्याओं के ज्ञाता। 'नरवाहनः' -- यक्षराज कुबेर के रूप में स्थित ।।८२॥ 'मनोबुद्धिः'-मन के सहित बुद्धि स्वरूप । (६४० ) 'अहङ्कारः' -अहंकार नामक तत्व के रूप में स्थित रहने वाले। क्षेत्रज्ञ :- लिंग शरीर स्वरूप क्षेत्र के ज्ञाता। 'क्षेत्र पालकः' - सिद्ध स्थानों की रक्षा करने वाले। जमदग्निः'-जम- दग्नि नाम बाले ऋृषि के रूप में स्थित। 'बल निधिः-समस्त शक्तियों के अधिष्ठान स्वरूप में स्थित। 'बिगाल.'-मोक्षरूपी अमृत का विशेष रूप से स्रवण करने वाले। 'विश्वागालवः'-संसार में गालव नाम वाले ऋषि के स्वरूप में स्थित ॥८३।। 'अधीरः' -- धीरता से रहित होकर अति अभयंकर। 'अनुत्तरः'-सबसे महान् अर्थात् जिनके आगे अन्य कोई भी बड़ा नहीं है। 'यज्ञः' -- ज्योतिष्टोम प्रभृति यज्ञों के 1वरूप वाले। (६५०) 'श्रयः'-कल्याण 1वरूप वाले ।'निःश्रयसां पथ -- समस्त कल्याणों के मार्ग स्वरूप। 'शैलः'-शिला से समुत्पन्न अर्थात् नमंदा नदी में लिंगात्मक। 'गगन कुन्दाभ.'-गमन कुन्द के पुष्प के समान कान्ति वाले। 'दानबारि.' -- दैत्य दानवों के संहारक। 'अरि- न्दम;' ---- अपने भक्तजन के शत्रओं के नाशक ॥८४।। रजनी जनकश्चारुनिःशल्यो लोकशल्यधृक्। चतुवेदश्चतुर्भावश्वतुरप्रिय: ।८५। आम्नायोऽथ समाम्नायस्तीर्थदेवः शिवालयः । बहुरूपो महारूप: सर्वरूपश्चराचरः ।८६।
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विष्णु द्वारा शिव तहस्रनाम का कीर्तन ] ६१ न्यायनिर्मायको नेयो न्यायगम्यो निरञ्जनः। सहृस्रमूर्द्धा देवेन्द्रः सर्वशास्त्रप्रभंजन: ।।८७ 'रजनी जनकः'- कालरात्री रूपिणी शक्ति के उत्पादक। 'चारु विशल्यः'-दुःखों से रहित रखने वाली सूक्ष्म बुद्धि से युक्त। 'लोक कल्प शृक्:'-लोकों की-सृष्ठि पुष्ठि आदि के धारण करने वाले। 'लोक शल्य- धृक' ऐसा भी कहीं पाठान्तर प्राप्त होता है। यहाँ लोकों के दुःखों का हर्त्ता अर्थ होता है। 'चतुर्वेद:'-चारों वेदों का प्रादुर्भाव करने वाले। (६६०) ।। 'चतुर्भावः'-धर्म अर्थ आदि चारों भावों को प्रकट करने वाल ,चतुरश्चतुर प्रियः'-परम प्रवीण और कुशलों से प्रेम करने वाल। यहाँ दोनों एक ही नाम के बोधक हैं ।।८५॥ 'आम्नायः'-वेद स्वरूप। समाम्नाय ::- वेद के भी प्रमाणभूत किम्बा वह जिससे सबके प्रमाण स्वरूप वेद का प्राकटय है अथवा वेद के तुल्य। 'तीर्थ देव शिवालयः'-तीर्थों में स्थित देवों के कल्याण के स्थान। बहुरूप:'- असंख्य स्वरूप वाल। 'महारूपः'-महान् एवं पूज्य स्वरूप के धारण करने वाल। 'सर्व रूपः'-जगत् की समस्त वस्तुओं के स्वरूप वाल। 'चराचरः'-अस्थित लक्ष्मी के आश्रय स्वरूप ॥८६।। 'न्याय निर्मायकों न्यायी'-सदा सत्पक्ष के निर्वाह करने वाल और नीति से युक्त। यहाँ दोनों एक ही नाम के बोधक हैं ॥।(६७०)। 'याय गभ्यः'-नीति से जानने के योग्य । 'निरन्तरः'-भेद ल रहित। 'सहस्रमूर्धां -- एक सहस्र अथवा असंख्य शिरों वाल। देवेन्द्र :- समस्त देवगण के स्वामी। 'सर्व शस्त्र प्रभंजनः' समस्त प्रकार के शस्त्रों के जोड़ने वाल ॥८७॥ मुंडी विरूपो विकृतो दंडी दानी गुणोत्तमः । पिंगलाक्षो हि बव्हक्षो नीलग्रीवो निरामयः ।८८ सहस्रबाहुः सर्वेशः शरण्यः सर्वलोकधृक्। पत्मासन: परंज्योतिः पारम्पर्य्य फलप्रदः ।।८९ पद्मगर्भो महागर्भो विश्वगर्भो विचक्षणः । परावरज्ञो वरदो वरेण्यश्च महास्वनः।९० मुण्डः' -- लुचित केशों वाल। 'विरूपः' -- सबसे श्रेष्ठ रूप-लावण्य
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1 श्री शिवपुराण वाले। 'विक्रान्त'-अत्यन्त महान् बल-विक्रम वाले। 'दण्डी'-काल दण्ड को धारणा करने वाले। 'शान्त'-इमनशील अर्थात इन्द्रियोंको जीतने वाले। (६८०) 'गुणोत्तम' -श्रेष्ठ गुण-गण से युक्त । 'पिङ्गलाक्षः'-निगल वर्णके नेत्रों वाले। 'जनाव्यक्ष'-समस्त मनुष्योके स्वामी। 'नीलग्रीव'- हलाहल महाविषको कण्ठमें रख लेने के कारण नीले रंग की गर्दन वाले। 'निरामयः' -- समस्त रोगोंसे शून्य अथांत् परम स्वस्थ ।८। 'सहस्त्रवाहु' -- एक सहस्त्र अथवाअसंख्य भुजाओं वाले। सर्वेश' -- सबके अधिपति। 'शरण्य' स्के रक्षक अर्थात् शरणागति में समागतके पालक। 'सर्वलोकधक'-भू प्रभृति समस्त लोकोंके धारणकर्त्ता ।, पद्मासन' विद्यासनसे विराजमान अथवा हृदय कमलमें पद्मासनसे स्थित। (६९०) 'पर ज्योतिा -- सर्वाधिक तेज दाले। 'परम्पार' -- संसार दुःखसे अत्यन्त खििन्नोंको पार लगा देने वाले। 'परं फलम्' -- परम पुरुषार्थ (मोक्षपद) स्वरूप ।८९। 'पद्यगरभ'-समस्त संसार को अपने गर्भमें रखने वाले अथवा हृदय कमलकी कणिका में उपासकोंके ध्यानके लिये विराजमान। 'महागभ :-- महा वन्दनीय विराट् स्वरूप 'विश्वगर्भ' सम्पूर्ण जगतको अपने गर्भ में रखने वाले। 'विचक्षणः' -विशेष रूपसे वेदादिके ज्ञान का कथन करने वाले। 'वरद'-मक्तोंको अमीष्ट वरदान देने वाले। 'बरेश'-बरदान के प्रदाताओंमें सर्वश्रष्ठ (७००) (यहाँ श्री शिवके नामोंका यह सप्तम शतक समाप्त हो गया) 'महाबल' समस्त महा शक्तियोंके समुत्पादक ।९०। देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः। देवासुरमहामित्रो देवासुरमहेश्वरः ।९१। देवासुरेश्वरो दिव्यो देव सुरमहाश्रयः। देवदेवोऽनयोऽचिंत्यो देवतात्मात्मसम्भवः।९२। सद्योनिह्यसुरव्याधो देवसिंहो दिवाकर:। विबुधाग्रवरः श्रष्टः सर्वदेवोत्तमोत्तमः ।६३। 'देवासुर महाश्रयः' देदगण और असुर समूह के महान् अधार
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विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] [ ७१
स्वरूप से स्थित। देवासुर गुरुदेवः'-देव और असुरों को उपदेश देने वाले वे भी ज्ञानदाता गुरु। यहाँ ये दोनों एक ही हैं। 'देवादिदेवः'- ब्रह्मादिक के भी उत्पन्न करने वाले देवों के आदि देव। 'देवाग्निः'- अग्नि को प्रकाशवान् करने वाले। 'देवाग्निसुखदः प्रभुः'- देवगण को अग्नि के द्वारा सुख प्रदाता और स्वतन्त्र। ये दोनों एक ही शिव नाम को बताते हैं ॥९१।। 'देवासुरश्वरः'-देवगण और मसुर वर्ग के स्यामी। 'दिव्यः'-अलीकिक उत्तम स्वरूप वाले। 'नेवासुरमहेश्वरः'-देवगण और असुरों के परम पूजनीय प्रभु स्वरूप । 'देवदेवमयः' -- देवताओं के पूज्य देव ब्रह्मादि स्वरूप वाने ॥(७१०)। 'अचिन्त्यः'-ध्यान करने पर भी चिन्तन में न आने वाले । 'देव देवात्म सम्भवः' -ब्रह्मादिक देवों के भी देवता जिस ब्रह्मा से समस्त जीवों की सृष्टि हुई है ॥६१॥ 'मद्योनिः'-संसार की समस्त वस्तुओं के कारण ।,असुर व्याघ्र'-असुरों के लिने बाध के तुल्य भयंकर प्रहारक । 'देर्वासहः- देवगण में सिंह के सदृश। विवाकरः-दिन के बनाने वाले सूर्य स्वरूप। 'विवुधाग्रवर श्रेष्ठ हैं शिव उन ब्रह्मासे मी श्रेष्ठ हैं।९१।९३। शिवज्ञानरतः श्रीमांछिखी श्रीपवेतप्रियः। वजूहस्तः सिद्धखड्गो नरसिहनिपातनः ।९४। ब्रह्मचारी लोकचारी धर्मचारी धनाधिपः। नन्दीं नन्दीश्वरोऽनन्तो नग्नवृत्तिधर: शृचिः ।९५। लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो युगाध्यक्षो युगापहाँ। स्वर्धामा स्वर्गतः स्वर्गी स्वर स्वरमय स्वन. ।९६। 'शिवज्ञानरतः'-अपने स्परूप के ज्ञान में सदा तत्पर। 'श्रोमासे'- त्रवर्ण सम्पत्ति से युक्त होने वाले ॥७२०॥ 'शिखि श्री पर्वत प्रियः'- च ड़ाधारी कुमार कार्तिकेय के लिए श्री पर्वत से प्रेम करने वाले। यह कथा 'ज्योतिरलिंग माहात्म्य' में देखनी चाहिए 'वज्रहस्तः'-हाथ में वज्र-व धारी इन्द्र के स्वरूप में स्थित। 'सिद्धिखड्गी'-समस्त सिद्धियों से सम- न्वितख ड्ग कोधारण करनेवाले।'नरसिहनिपातनः' शरभके रूसेनृसिंहकाग
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७२ श्री शिवपुराण चूर-चूर करने वाल ।।९४॥। 'ब्रह्मचारी' -वेद में शील सम्पन्ना 'लोक चारी' -भूप्रभृति लोकों में विचरणशील। 'धर्मचारी'-धर्म के कार्य करने वाले। 'धनाधिपः'-समस्त प्रकार के धन वैभवों के स्वामी। 'नन्दी' -- नन्दीश्वर नाम वाल अपने ही गण के स्वरूप में स्थित। 'नन्दी- श्वरूप नाम वाल अपने ही गण के स्वरूप में स्थित। 'नन्दीश्वर-'- नन्दियों के स्वामी॥(७३०)। 'अनन्तः' -- देश औप काल के परिच्छेद से शृत्य। 'नग्न व्रतधरः'-दिगम्बर रहने के वृत (नियम) को रखने वाले अर्थात् सब भूत वेष को धारण करने वाल। 'शुचिः'-सम्पूर्ण दोषों से हीन अर्थात् पुर्ण निर्दोष ।६५॥ 'लिगाध्यक्षः'-वाण आदि निंग (चिन्ह) रूप में सबके अध्यक्ष अथवा लिंग रूप देह में अधिष्ठित । 'सुराध्यक्षः' समस्त देवों के स्वामी। 'योगाध्यक्षः' योग शास्त्र के प्रव - तक परमाचार्य। 'युगावहः' - सतयुग त्रता आदि युग प्रभृति की सम- यानुमार प्राप्ति करने वाले। 'स्त्रधर्मा'-जगत् की रचना करने के अपने धम से युक्त। 'स्वगतः' स्त्रग' में निवास करने वाले । 'स्वर्ग स्वरः' स्वग लोक में गमन वाले। 'स्वरमयःस्वनः' षडज ऋषमादि संगीत के सात स्वरों के समुत्पत्ति कारक ध्वनि वाले ॥ ६॥ वाणाध्यक्षो बीजकर्त्ता कर्मकृद्धमंसभ्भवः। दम्भो लोभोऽथ वै शम्भुः सर्बभूतमहेश्वरः ॥९७ श्मशाननिलयस्त्र्यक्षः सेतुरप्रतिमाकृतिः। लोकोत्तरस्फुटो लोकस्त्र्यम्बको नागभूषण: ।।९८ अन्धकारिर्मद्वषी विष्णकन्धरपातनः । हीनदोषोऽक्षयगुणो दक्षारि: षूषदन्तभित् ।९९ वाणाध्यक्ष:'-बाणासुर के अधिपति। 'बीजकर्त्ता'-शुक्रके उत्पा- दक। 'धमकृद्ध ्मसम्मबः' -- परम पुण्य करने वालों के धर्म का प्रादुर्भाव करने वाल 'दम्मः'-अपन भक्तों की परीक्षा करन के लिये माया से विविध रूप धारण करने वाले । 'अलोभः' लोभ से रहित। 'अर्थ- विच्छम्भु:'-वेदशास्त्र आदि धर्म के ज्ञाताओं को सम्भावना करने वाले 'सर्वभूत महेश्बरः'-समस्त प्राणियों के सबसे बड़े स्वामी ॥९७॥ 'इमशाव निलयः'-समस्त मृत्युगत प्रणियों के महा अनिष्ठा स्वरूप महा द्रलय के नाशक स्थान में निबास करने वाल: 'त्र्यक्षः'-तीन नेत्रों को धारण करने वाल ।.(७३०)॥
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विष्णु द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] [ ७३ 'सेतुः'-इस संसार रूप सागर से तारने के लिए सेतु रूप। 'अप्रति माकृतिः' -उपमा से शून्य आकृति वाले। 'लोकोत्तरस्फुटालोक:' - अति उत्तम आत्म-स्वरूप वाले जिसे नेत्रों के द्वारा ग्रहण किया जाता है। 'व्यम्बकः-तीन नेत्रों से युक्त। 'नागभूषणः' सर्पों के विविध भूषणों से भूषित जिनमें शेषनागादि प्रमुख सर्प भी हैं॥६८॥। "अन्धकारिः'-अन्धक नामक दैत्य के मारने वाले। 'मखद्वृषी'-प्रजापति दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाले। 'विष्ण कन्धर पातनः'-दक्ष के यज्ञ में विष्ण के कन्धर का निपात कर देने वाले। 'हीनदोषः' विषमतादि दोषों से रहित। 'अक्षयगुणः' -नाशशून्य अनेक अद्भुत गुणगण से युक्त। (७६० )। 'दक्षारिः'-अपने श्वसुर दक्ष प्रजापति के शत्रु। 'पूषदन्तभित्' पूषा के दाँतों के तोड़ने वाले ६६।। पूर्णं : पूरयिता पुण्य: सुकुमारः सुनोचनः । सन्मार्गपः प्रियो धूर्त्तः पुणकीत्तिर नामय: ।९०० मनोजवस्तीर्थकरो जटिलो नियमेश्वरः। जीवितान्तकरो नित्यो वसुरेता वसुप्रदः ॥१०१ सद्गतिः सिद्धदः सिद्धः सज्जातिः खलकंटकः । कलाधरो महाकालभूतः सत्यपरायणः ॥१०२ 'पूर्ण:'- सम्पूर्ण कलाओ से युक्त । 'पूरयिता' -सबको अतुल सम्पति प्रदान कर पूर्ण बना देने वाले। 'पुण्यः'-स्मरण मात्र से पापो से छुटकारा देने वाले। 'सुकुमारः'-स्कन्द के सदृश सुन्दर पुत्र वाले। 'सुलोचनः'-सुन्दर नेत्रों वाले। 'सामगेय प्रियः'-सामवेद का गायन करने वालों को अत्यन्त प्रिय लगने वाले। 'अक्र र:' -- क्र रता से रहित। 'पुण्य कीतिः' पाप नाशक यश वाले। (७८०) । 'अनामयः'- व्याधियों से रहित ॥१००॥ 'मनोजवः' -भक्तों के दुःख दूर करने के कार्य में मन के समान वेग वाले। 'तीर्थकरः' -शास्त्रों के प्रमाणों के निर्माता। 'जटिलः'-शिर पर सुन्दर जट जूट धारण करने वाले। 'जीवितेश्वरः'-समस्त प्राणियों को प्रारणों का दान करने वाले स्वामी। 'जीवितान्तकरो नित्यः'-सब प्राणियों के संहारक तथा नित्य। 'बसुरेताः' सुवर्ण के वर्णग तुल्य वीर्य वाले। 'वसुपदः'-अपने भक्तों के विविध
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७४ ] [श्री शिवपुराण रत्नों को प्रदाता ॥१०१। 'सद्गतिः'-प्राणियों को अव्यभिचारिणी अच्छी गति के प्रदान करने वाले अथवा ब्रह्मादि सन्तों के द्वारा प्राप्त होने वाले। यहाँ पर 'सन्तमेनं ततो विदुः'- इत्यादि श्रुति का वचन इस अर्थ को प्रमाणित करता है। 'संस्कृतिः- जगती तल के रक्षक करने वाली आकृति से युक्त (७६०)। 'सिद्धिः'-समस्त वस्तुओं में संचित रूप अथवा अत्यन्त फल रूप। 'सज्जातिः'-साधु लोगों की जाति को जन्म देने वाले। 'कालकण्टकः' -काल के भी वेधन करने वाले। 'कलाधरः' शिल्पादि चौंमठ कलाओं से युक्त। 'महाकालः' - काल के भी काल। भूत सत्य परायणः'- समस्त प्राणियों के परम आश्रय ॥१०२॥ लोकलावण्यकर्त्ता च लोकोत्तरसुखालयः । चन्द्रसंजीवनः शास्ता लोकग्राहो महाधिप: ॥१०३ लोकबन्धुर्लोकनाथः कृतज्ञः कृत्तिभूषितः । अनपायोऽक्षरः कान्तः सर्वशास्त्रभृतां वरः ॥१०४ तेजोमयो द्युतिधरो लोकमानी घृगार्णवः । शुचिस्मितः प्रसन्नात्मा ह्यजेयो दुरतिकरमः॥१०५ 'लोक लावण्य कर्ता-लोकों की सुन्दरता के निर्माता। 'लोको- त्तर सुखालयः'-सबसे उत्कृष्ट सुख- सौभाग्य को अपने अधीन रखने वाले। 'चन्द्र संजीवनः'-चन्द्र को संजीवन देकर लोक-पीड़ा के नाशक। 'शास्ता'-दुरा माओं को शिक्षा देने वाले। (८००) यहाँ शिव के नामों का अष्टम शतक समाप्त हो गया। 'लोक गूढः' मानवो की बुद्धि रूपिणी गुहा के आश्रय होने कारण अप्रत्यक्ष। 'महाधिपः'- सबसे महान् स्वामी ॥१०३॥ 'लोकबन्धु'- लोकों के लिये बन्धु के तुल्य। 'कृत्य' जोकि श्रुति और स्मृति के स्वरूप में स्थित हैं, उसको हिताहित के रूप में उपदेग करने वाले। 'लोकनाथः'- चौदह भुवनों के ईश्वर। 'कृतञ्व्वः- प्राशियों के द्वारा किये हुये पुण्य और अपुण्य कर्मके ज्ञाता। कीर्ति- 'भूषणः'- यश रूपी भूषण से विभूषित। अनपा- योक्षर:'- नाशरहित होने के कारण नित्य स्वरूप। यहाँ दोनों एक ही नाम को बताते हैं। 'कान्तः'- यमराज के भी नाशक। 'सर्वशस्त्र भृतां वरः- समस्त शस्त्रधारियों में अति श्रष्ठ ॥१०४॥ 'तेजोमयो द्युतिधर:'- अतिशय तेज की कान्ति के धारण करने वाले। (८१०)
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विष्ण द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] ७५ 'लोकानामग्रणी:' -सब लोको में परम श्रष्ठ। अरः' -अत्यन्तसूक्ष्म स्वरूप। यहाँ 'एषोऽणरात्मा चेतसा वेदितव्यः'-इत्यादि श्रुति बचन है जो इस अर्थ वाले नाम को बताता है। 'शुचिस्मित:' - मन्द हास से युक्त। 'प्रसन्नत्मा'-प्रसाद युक्त स्वभाव वाले। 'दुर्जेयः,- महा- बलबान् शत्र ओं के द्वारा भी न जीते जाने वाले। 'दुरतिक्रमः'-दुख से भी अतिफ्रमण के अयोग्य अर्थांत् भय के कारशा सूर्तांदि को भी भीति देने वाले। यहाँ 'भयादस्माद वातः पवते भयात्तपतिः सूर्य भया- दिन्द्रश्वाग्नश्व मृत्युर्धावति पर्जन्य:'-इत्यादि श्रति का वाक्य प्रमारग है।१०५।। ज्योतिर्मयो जगन्नाथो निराकारो जलेश्वरः । तुम्बवीणो महाकोप: विशोक: शोकनाशनः ॥१०६ त्रिलोकपस्त्रिलोकेश: सर्वशुद्धिरधोक्षजः । अञ्यक्तलक्षणो देवो व्यक्तोऽव्यक्तो विशांपतिः ॥१०७ परः शिवो वसुर्नासिासारो मानधरो मयः । ब्रह्मा विष्णुः प्रजापालो हंसो हंसगतिर्वयः ॥१०८ 'ज्योतिर्मयः- तेज के पुज। 'जगन्नाथः'-अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के अधीश्वर। 'निराकारः'- बिना आकार वाले अथवा निर्गुण स्वरूप। 'जलेश्वर:'- भौतिक जल अथवा सुर नदी भागीरथी के स्वामी। (८२०)। तुम्बवीर' तुम्बी फल की निर्मित बीर से युक्त। 'महाकोप:'- सृष्टि के सहार करने की बेला में महान् क्रोध करने वाले। 'शोकनाशन:'- भक्तों के शोक नाश करने वाला ॥१०६॥ 'त्रिलोकपः- त्रिभुवनों के पालक। त्रिलोकेश:'- त्रिभुवन को अपनी आज्ञा से कर्मों में प्रवृत्त कराने वाले प्रभु। 'सर्वशुद्धिः'- समस्त प्राणियों की शुद्धि करने वाल। 'अधोक्षजः'- इन्द्रिय जन्य ज्ञान को नीचे पतित करने वाले। 'अव्यक्त लक्षणो देव:'-अस्पष्ट चिन्ह वाले तेज पुज के स्वरूप में अवस्थित देव। यहाँ दोनों एक ही के बोधक हैं। 'व्यक्ताव्यक्त:'- साकार स्वरूप में गुण- उपाधि व्यक्त होते हुये भी निर्गुए निराकार रूप होने से अव्यक्त। (८३०)। 'विशांपतिः'-समस्त प्रजा के पालक स्वामी ॥ १० ॥ 'वरशीलः' -सर्वोत्तम शीलयुक्त किम्बा
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७६ ] - श्री शिवपुराण श्रे४ठ शील के दाता। 'वरगुणः'-सर्वश्रष्ठ गुण-गए से अलंकृत। 'मारो- मानधनः' अत्यन्त बल वाले और दुष्टों के नाश करने के मान को धन समझने वाले। यहाँ दोनों एक ही हैं। 'मयः'-सुख के स्वरूप में स्थित। 'ब्रह्मा'-अपनी विभूति रूप चतुरानन के स्वरूप में स्थित करने वाले। 'विष्ण: प्रजापालः'-व्यापक होते हुए प्रजा का गासन करने के कारण विष्ण स्वरूप में स्थित। ये दोनों एक ही नाम के बोधक हैं। 'हसः'- अज्ञान के नाश करने वाले परमात्मा के स्वरूप में विराजमान। 'हँस- गतिः'-योगिजन की गति अर्थात् उद्धारक। 'वयः'- पक्षी के स्वरूप में स्थित। यहाँ 'एकः सुपर्गः स समुद्रमाविवेश स इदं विश्वं भवन विचष्ठे द्वा सुपर्गगा'-इत्यादि श्रुति वचन प्रमाण है ॥(८४०) ॥१०८॥ वेधाविाधाता धाता च सृष्ठा हर्त्ता चतुर्मुख.। कैलासशिखरावासी सर्वावामी सदागति. ।१०९ हिरणयगर्भो द्र हिरो भूतपालोऽथ भूपति। सद्योगी योगविद्योगी वरदो ब्रह्माणप्रियः ॥ ११० देवप्रियो देवनाथो देवकी देवचिन्तकः । विषमाक्षो विरूपाक्षो वृषदो वृषवर्द्धन. ।। १११ 'वेधा विधाता धाता'-शिव इस जगत् की उत्पत्ति करने के कारण वेधा नाम वाले, सांसारिक मानवों के कर्म तथा उनके फल का दान करने के कारण विधाता कहे जाते हैं और विविध रूप से समस्त जगत् को धारण करने के कारण धाता हैं। यहाँ ये तीनों शब्द एक ही नाम के बोधक होते हैं। 'सृष्टा' संसार को उत्पन्न करने वाले। 'हर्त्ता'- जगत् के संहारक। 'चतुमु'खः'-हिरण्य गर्भ के स्वरूप से अवस्थित कैलासशिखरवासी' -कैलास नामक गिरि की चोटी पर निवास करने वाले। 'सर्वावासीः' -सब में अन्तर्यामी स्वरूप से वास करने वाले। सदागतिः'-सब जीवों को गति देने वाले ॥१०६॥ 'हिरण्य गर्भ:' - हिरण्य गर्भ को उत्पन्न करने वाले किम्बा हिरण्य- मय में व्याप्त होने से हिरण्यगर्भ अथवा ब्रह्मा के स्वरूप में अपनी ही आत्मा से स्थित। यहाँ 'हिरण्यगर्भ' समवत्त ताग्र :- इत्यादि श्र ति वचन उक्तार्थ को प्रमाणित करता है। द्र हिणः' -ब्रह्मा के स्वरूप में
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विष्ण द्वारा शिव सहस्रनाम का कीर्तन ] [ ७७ स्थित। 'भूतपालः'-प्राणिगयों के पालक ॥ (८५० ) ॥ 'भूपतिः'- भूमि के स्वामी। 'सद्योगी' --- सत्कर्मों की योजना करने वाले। 'योग- विद्योगी' -- योग के पूर्ण ज्ञाताओं को भी योग में प्रवृत्त कराने वाले। 'वरदः'-प्राणियों को वरदान देने वाले। 'ब्राह्मणप्रियः'- विप्रों पर अत्यधिक प्यार करने वाले किम्बा विप्रों को प्रिय लगने वाले ॥११०॥ 'देवप्रियः' -- देवगण के प्यारे अथवा देवों पर प्यार करने वाले। 'देवनाथः' --- देवगण के स्वामी। 'देवज्ञ:' --- देवों को ज्ञानी बनाने वाले। 'देव चिन्तकः'-देवताओं के द्वारा चिन्तित होने वाले। 'विषमाक्षः'-विषम अर्थात् तीन नेत्र वाले। (८६०) 'विशालाक्षः' -बड़ नेत्रों वाले । 'वृषदो वृष वर्द्ध नः'-उपदेशक के द्वारा धर्म के वर्धक तथा जिनसे धर्म समृद्ध होता है। यहाँ दोनों एक ही हैं ।। १११ ।। निर्ममो निरहङ्कारो निर्मोही निरुपद्रवः । दर्पहा दर्पदो दृप्तः सर्वर्तु परिवर्त्तकः ॥११२ सहस्त्राचिभू तिभूषः स्निग्धाकृतिरदक्षिणः । भूतभव्यभवन्नाथो विभवो भूतिनाशनः ॥११३ अर्थोऽनर्थो महाकोशः परकार्येकपण्डितः । निष्कंटक: कृतानन्दो निर्व्याजो व्याजमर्दनः ॥११४ 'निममः'-ममता के भाव से शून्य। 'निरहङ्कारः'-अहद्कार से रहित। 'निर्मोहः' -बिना मोह वाले। 'निरुपद्रवः' -उपद्रवों से रहित। 'दर्णहा दर्णदः'-सबके अभिमान का हनन करने वाले तथा शत्रुओं के दर्प के दलनकर्त्ता। ये दोनों एक ही हैं। 'हप्तः'-अपने ही आत्मा के सुधार- सास्वाद से सदा परम प्रसन्न। 'मर्वतु' परिवर्त्तकः'-समस्त ऋतुओं के परिवर्तनकर्त्ता ॥। १२ ॥। 'सपस्रजित्'-अनन्त असंख्य शत्र ओ पर जय प्राप्त करने वाले। (८७०) 'सहस्राचिः'-असंख्य दीप्तियों से युक्त। 'स्निग्ध प्रकृति दक्षिणाः' -स्वाभाविक स्नेह के कारण कुशल एवं सरल। 'भूत भव्य भवन्नाथः'-त्रिकाल के स्वामी। 'प्रभवः'-संसार को अकृष्टता से उत्पन्न करने वाले। 'भूति नाशनः'-शत्रु ओं की सम्पत्ति के नाशक ॥११३। 'अर्थः'-सबके द्वारा प्राथनीय। 'अनर्थः'-सब प्रकार के प्रयोजनों से रहित। 'महाकोशः' -महान् धन सम्पन्न ।
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७८ ) ( श्री शिवपुराण परकार्येकपण्डितः- मोक्ष प्रदान करने के कार्यमें महापण्डित। 'निष्कण्टक;'-कामादि क्षद्र शत्र ओं से रहित। (८८०) कृताधुन्दः'- अविच्छिन्न परमानन्द से युक्त। 'निर्व्याजो व्याज मर्दनः'-स्वयं कपट के दूषित भाव से दूर रहते हुए अन्य के कपट के नाशक। ये दोनों एक ही हैं॥ ११४॥ सत्त्यवान्सात्त्विकः सत्यः कृतस्नेहः कृतागमः । अकम्पितो गुधाग्रहो नैकात्मा नैककर्मकृत् ॥११५ सुप्रीतः सुखद्ः सूक्ष्मः सुकरो दक्षिणानिलः। नन्दिस्कन्ध धरो धुर्य्य: प्रकटः प्रीतिवर्धनः ॥ ११६ अपराजितः सर्वसहो गोविन्दः सत्त्ववाहनः । अधुतः स्त्रधुतः सिद्धः पूतमूर्तिर्यशोधनः ॥११७ 'सत्त्ववान्:'- शौर्य वीर्यादि गुणों से युक्त। 'त्त्विकः'- सत्त्व गुण की प्रधानता रखने दाले। 'सत्य कीतिः'-वास्तविक कीर्ति से युक्त। 'स्नेह कृतागम:'-अपने भक्तोंपर अमित स्नेह होने के कारण उनके हित के लिये ही शस्त्रों का प्रकाश करने वाले। 'अकम्पितः'- कम्पसे रहित अर्थात् निश्चल। 'गुणाग्राही' -अपने भक्तनों के सामान्य गुरों को भी आदर से ग्रहण कर कृपा करने वाले। 'नैकात्म। नैक कर्मकृत्'-अनेक स्वरूपों से युक्त तथा समस्त कर्मों के कर्त्ता ॥।११५॥ सुप्रीत ;- श्रष्ठ प्रीति से युक्त रहने वाले। 'सूक्ष्मः' -अत्यन्त सूक्ष्म स्त्ररूपसे सब में व्याप्त रहने वाले। यहाँ सर्वगतं सुसूक्ष्मम्: इत्यादि श्रुति वाक्य इस कवितार्थ में प्रमाण हैं। 'सुकरः'- भक्तों को वरदान देने के कारण सुन्दर कर (हाथ) वाले। 'दक्षिणानित'' -- आनन्द करने के कारण मलयाचल से समात वायु के स्वरूप में अवस्थित । 'नन्दिस्कन्धधरः' -नन्दी के कन्ध पर विराजमान। धुर्य :- समस्त प्राणियों के जन्म प्रभृति लक्षणों को धारण करने वाले। प्रकट ;- सूर्यादि के स्वरूप से सवको प्रत्यक्ष दर्शन देने वाले। यहाँ पर -उतैन गोपा अदृशान्ना दहार्य -यह श्रुति का वाक्य है जो उक्तार्थ का समर्थन करता है। 'प्रीति वर्द्धनः'-भक्तों के प्रम को बढ़ाने वाले ॥११६॥ 'अपराजितः'-शत्र ओं से कभी भी न हारे जाने वाले।
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विष्णा द्वारा शिव सहस्रनाम का कोर्तन ] 'सर्वसत्वः'- समस्त प्रणिगयों का उद्भव करने वाले। (६००) यहाँ श्री शिव के नाम का नवम शतक समाप्त हो गया है।) 'गोविन्दः'- स्वर्ग अथवा गो-भक्तों को देने वाले। 'सत्त्व वाहनः'-मोक्ष के उपयोगी 'पराक्म के प्रदाता। 'स्ववृतः' -अपनी आत्मा से धारण किये हुए। अधृतः' -अनन्य आधार। 'सिद्धः'-समस्त प्रकार की सिद्धियों से पूर्ण। 'पूतमूत्ति:'-पवित्र एवं विशुद्ध मूर्ति वाले। 'यशोधनः'-यश रूपी धन से सम्पन्न ॥११७॥ बाराह श्रृङ्गधक ऋङ्गी बलवानेकनायकः । श्रुतिप्रकाश: श्रुतिमानेकबन्धुरनेक धृक् ॥ ११८ श्रीवत्सल, शिवारम्भः शान्तभद्रः समो यशः । भूशयो भूषणो भूतिर्भूतिकृद् भूतभावनः ॥ ११६ अकपो भक्तिकायस्तु कालहानि कालविभु: । सत्यव्रती महात्यागी नित्यः शान्ति परायण: १२० 'वाराह शृङ्ग धृक्छङ्गी'-वाराह का दन्त शिखर तथा शृङ्ग धारण करने वाले शृङ्गी। ये दोनों एक ही नाम को व्यक्त करते हैं। 'बलवान्'-सब प्रकार की शक्तिसे युक्त। 'एक नायकः'-अद्वितीय स्वामी ।६१०॥ 'श्रति प्रकाश:'-वेदों के द्वारा प्रकाशित। यहाँ-तन्त्वौपनिषदं पुरुष पृच्छामि' इत्यादि श्रति वाक्य इसको प्रमाणित करता है। 'श्र तिमान्'-सर्वदा वेदों से युक्त। 'एकबन्धुः'-अद्वितीय बन्धु। 'अनेककृत्' -अपने आपके स्वरूप को अनेक बना लेने वाले। यहाँ पर 'बहुस्यां प्रजायेति तदात्मानं स्वयम् कुरुत' इत्यादि वेद बचनसे पुष्टि होती है॥११८॥ 'श्री वत्सलः शिवारम्भः'-लक्ष्मी के प्रिय विष्णके मंगल के लिये आरम्भ करने वाले। 'शान्त भद्र:'-सत्पुरुषों के मङ्गल के कर्त्ता। 'समोयशः' - समस्त प्राणियों में समान किम्बा सब ऐश्वर्य लंक्ष्मी के सहित यश वाले। यहाँ दोनों शब्दों द्वारा एक ही शिव का नाम बताया गया है। कहीं 'समज्जसः' -ऐसा पाठान्तर दिखलाई देता है। 'भूशयः'- भूमि में शयन करने वाले। 'भूषणः'-सबको भूषित बनाने वाले। 'भूतिः' - समस्त सम्पत्तियों के स्वरूप में स्थित। (६२' )
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८0 ) .श्री शिवपुराण 'भूतकृत्'-समस्त प्राणियों की उत्पत्ति करने वाले। 'भूतवाहनः'- सम्पूर्ण जीवों का यथातथा निर्वाह करने वाले ॥११६॥ 'अकम्प;'- वे
कम्प अर्थात् चश्चलता से रहित स्थिर स्वरूप में स्थित। 'भक्तिकायः'- भक्तिरूपी काया के धर्त्ता। 'कालहा'-सबको भक्षणा कर जाने वाले महाबली काल के भी नाशक। 'नीललोहितः'-कण्ठ में नीलवर्ण होने पर स्वयं वर्ण वाले। 'सत्यव्रत महात्यागी'-सत्यव्रत से सम्पन्न तथा समस्त पुरुषार्थों को देकर अत्यन्त त्याग करने वाले। नित्य शान्ति परायणः' - त्रिकाल में अवाध्य शान्ति के आगार ॥१२०॥ परार्थबृत्तिर्वरदो विरक्तस्तु विशारदः । शुभदः शुभकर्त्ता च शुभनामा शुभ: स्वयम् ॥१२१ अनर्थितो गुणग्राही ह्यकर्त्ताकनकप्रभः । स्वभावभद्रो मध्यस्थः शत्रुघ्नोविघ्ननाशनः॥१२२ शिखण्डी कवची शूली जटी मुण्डी च कुण्डली। अम त्यु: सर्वदक् सहस्तजोराशर्महामाणिः ।।१२३ 'परार्थ वृत्तिर्वरद:'-प्राणियों को परार्थ वरदान देने वाली वृत्ति से युक्त माया के आवरण को खण्डित करने वाले अथवा वरदाता। यहाँ दोनों एक ही के बोधक हैं। यहाँ पर 'तत् सृद्वा तदेवानु प्राविशत्' इत्यादि श्रुति का वाक्य प्रमाण है। अथवा भक्तों के हृदय में सर्वदा प्रवेश की इच्छा रखने वाले ॥(६३०)॥ 'विशारद ;- समस्त विद्याओं की कलाओं में नितान्त निपुण। 'शुभदः'-अपने भक्तों को शुभ का दान करने वाले। 'शुभ कर्त्ता' भक्तों के कल्याण के उत्पादन करने वाले। 'शुभ नामा शुभः'-शुभ नाम के धारण करने वाले होने के कारण स्वयं भी परम कल्याण से सम्पन्न। यहाँ दोनों शब्द एक ही के बोधक हैं ॥१२१। 'अनर्थितः' -- याचना से रहित रहने वाले। 'अगुणः' -- गुण रहित अर्थात निराकार स्वरूप। 'साक्षी ह्यकर्ता' -- इस समस्त चराचर जवत् के द्रष्टा होने के कारण अकर्त्ता हैं और मायाकी उपाधि से युक्त होने के कारण ईश्वर को जगत् का कर्त्ता होना माना जाता है। अतः ईश्वर स्वयं कर्त्ता नहीं है। यहाँ दोनों एक ही के बोधक हैं। 'कनक प्रभ :- स्वयं
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के तुल्य दिव्य एवं ज्वलन्त कान्निके धारण करने वाले। 'स्त्रभाव ' भद्र :- स्वकीय भक्तोंकी भावनाके कारण ही मंगल स्वरूप अथवा मंगलों के दाता। 'मध्यस्थः'-ब्रह्मा और विष्णुके मध्यमें संस्थित । (९४०)। 'शीघ्रगः'-निज भक्तोंके कार्य सम्पादनके करनेके लिये शीघ्रतासे गमन करने वाले। 'शीघ्रनाशना'-भक्तोंके दुःखोंको अति शीघ नाश कर देने वाले ॥१२२॥ 'शिखगडी, कवची, शूली चड़ा, कवच और त्रिशूल धारण करने वाले। यहाँ तीनों शब्द एक ही नामका बोध कराते हैं। 'जटी, मुण्डी, कुण्डली'- शिरपर जटा-जूटसे युक्त, मुण्डित शिर वाले और सर्पोंके कुण्डल धारण करने वाले। तीनों शब्द यहाँ एकही शिव नाम के बोधक हैं। 'अमृत्युः'-मौतसे रहित रहने वाले। 'सर्वहृक् सहिंः'-सब के द्रष्टा तथा दुष्टोंके सहार करने में सिहके स्वरूप वाले। यहाँ ये दोनों एकही नामके बोधाक हैं। 'तेजो राशिर्महामणिः'-तेजका स्वरूप होने के कारण महान्मणि कौस्तुभ आदिके रूप वाले। यहाँ दोनों एक हैं ॥१२३॥ असंख्येयोऽप्रमेथात्मा वीर्य्यवान् वीर्यकोविदः । वेद्यश्च वै वियोगात्मा परावरमुनीश्वरः ॥१२४ अनुत्तमो दुराधर्षो मधुरः प्रियदर्शनः। सुरेशः स्मरण: शर्व शब्दः प्रतपतां वरः॥१२५ कालपक्ष: कालकालः सुकृती कृतवासुकिः । -महेष्वासो महीभर्त्ता निष्कलङ्को विशृङ्ङलः ॥१२६ 'असंख्येय: प्रमेयात्माः'-अपार एवं अपरिच्छेद्य स्वरूप वाल। 'वीर्य वान्बीर्य कोविदः'-वीर्य सम्पन्न तथा समस्त पराक्रमोंमें परम प्रबीा। वेद्यः'-मुक्तिके इच्छ क पुरुषोंके द्वारा जानने योग्य॥ (९५०) ॥ वियो- गात्मा'-विशिष्ट योगसे युक्त आत्मा अर्थात् स्वरूप वाले। 'परावर मुनी- श्वर पर अवर और मुनिगणके भी ईश्वर।१२४। अनुत्तमो दुराघर्षः'- सबसे उत्तम अर्थात् परम श्रष्ठ और असह्य तेजयुक्त जिसके तेजको कोई भी आसानीसे सहन नहीं कर सकता है। 'मधुर प्रिय दर्शनः'-परमसौम्य एवं मध र स्वरूप वाले तथा सबको प्रिय दर्शन वाल। 'सुरेशः'-देवगणके
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८२ ! । श्री शिवपुराण स्वामी। 'शरणम्'-सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करने वाले। 'पर्वः'-विश्वके स्वरूप वाले विराजमान। 'शब्द ब्रह्म सताँ गतिः' वेदके स्वरूपमें संस्थित तथा साधु पुरुषों की गति अर्थात् उद्धारक। यहां दोनों एकही हैं ॥१२५॥ र्कालपक्ष:'-सृष्टिकी रचनादि के कार्य में-कालकी सहायता वाले। 'कला- कारी'-सबके उत्पादक कालको उत्पन्न करने वाले : (९३०) 'कङ्कणीकृत वासुकि :- वासुकि सर्पको अपना कङ्कण बना लेने वाले। 'महेश्वासः'-अक्षय महान् धनुष के धारी। 'महीभर्त्ता'-इस समस्त जगत् के धारण करने वाले। 'निष्कलङ्क:'-अविद्याके दोषसे रहित। 'विशृ- द्लः-मायाके बन्धनसे मुक्त ॥१२६॥ द्य तिमणिस्तरणिर्धन्यः सिद्धिदःसिद्धिसाधनः । विश्वतः सम्द्रवृत्तस्तु व्यूढोरस्को महाभुजः ॥१७ सर्वयोनिर्निरातङ्को नरनारायणप्रियः । निर्लेपो यतिसङ्गात्मा निर्व्यङ्गो व्यङ्गनाशनः॥१२८ स्वतः स्तुतिप्रियः स्तोताव्याप्तमूर्तिनिराकुलः । निरवद्यमयोपायो विद्याराशिश्च सत्कृतः ॥१२९ 'द्य मणि स्तर'-सूर्यके स्वरूपमें स्थित होकर संसाररुपी सागरसे तारने वाले। 'धन्यः'- परम कृत्त कृय। 'सिद्धिदः सिद्ध माधनः'-अणिमा महिदादि अष्ट सिद्धियोंके प्रदाता होनेके साधनों द्वारा समस्त पुरुषार्थों के प्रदान करने वाले। ये दोनों एक ही हैं । 'विश्वतः सवृतः'-सब ओरसे •मायाके द्वारा आच्छादित स्वरूप वाले। 'स्तुल्या'-देव, दनुज और मानवों द्वारा स्तुति करनेके योग्य ।९७०॥ 'व्पूढोरस्कः'-परम विस्तृत वक्षःस्थल वाले। 'महाभुजः'-लम्बी भुजाओं से युक्त ॥१२७ ॥ 'सर्वयोनिः'-सम्पूर्ण उत्पन्न करनेके स्थल तथा कारण। 'निरातङ्क:' सांसारिक व्याधि अथवा लौकिक सन्तापसे रहित। 'नरःनारायण प्रियः'-नर-नारायण मुनियों पर अतिशय प्यारकरने वाले। 'नल'पः निष्प्रपञ्चात्मा'-कर्मके बन्धनोंसे विमुक्त होते हुक पञ्चभूतादिके समुदाय स्वरूप प्रपञ्चसे शून्य शरीके धारण करने वाले। यहाँ ये दोनों एकही शिवनामके प्रकाशक हैं। 'निर्व्य'गः'-विशिष्ट अङ्गयुक्त प्राणियोंके उत्पादक। 'व्यङ्गनाशनः'- व्यंग कर्मोंके नाश करने
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वाले ॥११८॥ 'स्तवाः'-स्तवन करने के योग्य। 'स्तव प्रियः'-स्तुति से प्रेम (प्यार) करने वाले ।९८०। 'स्तोता'-प्रेम पूर्वक भक्तों के द्वारा स्तुत होने वाले। 'व्यास मूर्तिः'-व्यास महर्षि की मूर्ति के स्वरूप में विराजमान। निरंकुश :- मायास्वरूप अकुश से शून्य। 'निरवद्यमयोपायः'-अनिन्द्य स्वधन स्वरूप मोक्ष से समन्न। 'विद्या राशिः'-समस्त विद्यारओं के समूहके स्व्ररूप में संस्थित। 'रस प्रियः' भक्ति रस पर प्यार करने वाले ॥१२९॥ प्रशान्तबुद्धिरक्ष्ण्णः संग्रहो नित्यसुन्दरः। वैयाघ्रधुर्यो धात्रीशः शाकल्यः शर्वरीपतिः ॥१३० परमार्थगुरुर्दत्तः सूरिराश्रितवत्सलः । सोमो रसज्ञो रसदः सर्वसत्वावलम्बनः ॥१३१ एवं नाम्नां सहस्र ण तुष्टाव हि हर हरिः। प्रार्थयामास शम्भु वै पूजयामास पंकजै:॥१३२ प्रशान्त बुद्धिः - परम शान्त एवं सौम्य बुद्धि वाले। 'अक्षुण्ण:' - दूसरों के द्वारा तिरस्कृत न होने वाले। 'सग्रहः'-मक्तजनों के संग्रह करने वाले। 'नित्य सुन्दरः' सवंदा सुन्दर दिखाई देने वाले ॥६९०॥ 'वैयाघू- धुर्यः'-बाघम्बर के सदा धारण करने वाले। 'धात्रोशः'-समस्त भूमण्डल के अधीश्वर। 'शाकल्यः'-शाकल्य नामक ऋृषि के स्वरूप में स्थिति करने वाले। शर्वरी पतिः'-रात्रियों के सर्वेश्वर ॥१३०॥ 'परमार्थ गुरुः'-तापक मन्त्र का उपदेश करते हुए मुक्ति पद प्राप्त कराने वाले गुरु। 'दृष्टिः'-चक्ष् के अधिष्ठाता देवता के स्वरूप वाले। 'शरीराश्रित वत्सलः'-शरीरधारी जोवों पर अतिशय दया करने वाले। 'सोमः'-उमाके सहित सर्वदा विराजमान। 'रसोज्ञपकः'-हलाहल महाविषके स्बादके ज्ञाता तथा वीर्य के प्रदान करने वाले। 'सर्वसत्वावलम्बनः'-संसार के समस्त प्राणियों के आश्रय भूत ॥१०००। यहाँ श्री शिवके एक सहस्र नामोंका वर्णन समाप्त होता है ॥१३१। इस तरह इन उक्न शिवके सहस्रनामों के द्वारा मवान् विष्णुने शिवकी स्तुतिकी और पद्म दलोंसे अर्चना करके उनकी प्रार्थना की ॥१३२॥
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। शिव सहस्त्रनाम स्तोत्र का फल ।।
श्रत्वा विष्णकृतं दिव्य परनामविभूषितम्। सहस्रनाम स्वस्तोत्र प्रसन्नोऽभ्न्महेश्चरः ।१। परीक्षार्थ हरेरीशः कमलेषु महेश्वरः। गोपयामास कमलं तदैकं भुवनेश्वरः।१। पंकजेष तदा तेष सहस्रे षु बभूव च। न्यूननेकं तदा विष्णुर्विकल: शिवपूजने।३। हृदा विचारितं तेन कृतो वै कमलं गतम, यातं यातु सुखेनैव मन्नेत्र कमलं न निम ।४ ज्ञात्वेति नेत्रमुद्ध त्य सर्वसत्वावलस्बनात्। पूजयामास भावेन स्तवयामास तेन च । ५। ततः स्तुतमथो दृष्ट वा तथाभूत हरो हरिम। मामेति व्यापरन्ननेव प्रादुरासांज्जगद्गुरु: ।६। तस्मादवतताराशु मंडलात्पार्थिवस्य च। प्रतिठितस्य हरिणा स्वलिगस्य महेश्वरः ।७। सूतजी ने कहा-उस समय विष्णु द्वारा निर्भित सुन्दर नामों से विभू- षित अपने सहस्रनाम नाम स्तोत्रका श्रवण कर शिवको परम प्रसन्नता हुई ॥१। समस्त लोकों के स्वामी महेश्वर ने विष्णु भगवान्की परीक्षा करने के लिए उन सहस्र कमलों में से एक कमल को छिपा लिया ॥२॥ शिव समर्चनके लिए लायेगये सहस्र कमलोंमें जब एक कमल कम हुआ तो विष्णु अगवान् पूजाकी साङ्ग सम्पूर्णता के अभावसे पहिले कुछ व्याकुल हुये और सोचाकि एक कमल कहाँ गया ? यदि कम है तो रहे उसकी पूर्तिके लिये मेरा नेत्ररूपी कमल उपस्थित है।३-४।। भगवान् विष्णु ने ऐसा जानकर तुरन्त अपना नेत्र उखाड़ डाला और विदिध सत्व के अवलम्ब शिव का स्वभाविक रूप से पूजन एवं स्तवन किया ।।५। इस प्रकार से विष्णु को स्तवन करते हुए देखकर जगत्के गुरु महेश्वर ने ऐसा मत करो ऐसा मत
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शिव सहस्रनाम स्तोत्र का फल ) (८५ करो।' यह कहके हुए समक्ष में अपना आविभ वि किया।६।भगवान् विष्णुके द्वारा प्रतिष्ठित अपने पार्थिव लिंगसे मण्डल शम्भु शीधूही प्रकट हो गये।७। यथोक्तरूपिणं शम्भु तेजोराशिसमुत्थितम्। नमस्कृत्य पुरः स्थित्वा स तुष्टाव विशेषतः ।८। तदा प्राह मादेवः प्रसन्नः प्रहसन्निव। सम्प्रेक्ष्य कृपया विष्णु कृतांजललिपुट स्थितम् ।९ ज्ञातं मयेदं सकल तव चित्त प्सितं हरे। देवकार्य्य विशेषेण देवकार्य्यरतात्मनः ।१०। देवसार्य्यस्य सिद्धयर्थ दैत्यनाशाय चाश्रमम्। सुदर्शसाख्यं चक्र वै ददामि तव शोभनम् ।११। यद्र पं भवता दृष्ट सर्वलोकसुखावहम्। हिताय तव देवेश धृतं भावय तद् ध्रवम् ।१२। रणाजिरे स्मृतं तद्व देवानां दुःखनाशनम्। इदं चक्रमिदं रूपमिदं नामसहस्त्रकम्।१३1 ये शृण्वन्ति सदा भकत्वा सिद्धिः स्यादनपाथिनो। कामनां सकलां चैवं प्रसादान्मम सब्रत ।१४। शास्त्रमें लिखेहुए स्वरूपमें स्थित परमोज्ज्वल तेजके पुञ्ज समक्षमेंप्रकट हुए शिवका दर्शन कर विष्णु ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया और फिर विशेष रूपसे उनकी स्तुति करनेमें प्रवृत्त होगये ।८। उस समय परमप्रसन्न शिव हाथजोड़कर समक्षमें भगवान् विष्णको देखकर हसते हुए कहने लगे। ।९। शिवने कहा-हे विष्णो ! आपके मनमें जोभी कुछ विचारहै वह मैंने सबर समझ लिया है तुत इस समय देवगणके कार्य उत्पादन में तत्पर होते हुए उनका समस्त कार्य पूरा करनेके इच्छुक हो ।१०। देवगण के कार्योंकी सिद्धि के लिये और बिना श्रम के दैत्योंका संहार करने के लिये मैं प्रसन्न होकर आपको 'सुदर्शन' नाम वाला परम शोभन चक्र देता हूँ॥११॥ हे देवेश ! हे विष्णु ! आपने समस्त लोकों का सुखदायक जो स्वरूप देखा है उसका निश्चय ही ध्यान करो। इससे आपका परम हित होगा ॥१२॥
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८६ ) श्री शिवपुराण रणभूमि में यदि उस रूपकाका ध्यानकिया जावेतो देवताओंका सम्पूर्णदुःख दूर हो जाता है। यह सुदर्शनचक्र यह रूप और सहसुनाम स्तोत्र महान फल देने वाले हैं ॥१३॥ हे सुव्रत ! जोभी कोई पुरुष दृढ़ भक्तिके साथ इस स्तोत्रका श्रवण किया करते हैं और नित्य ही सुनते हैं उनको मेरी कृपा से समस्त अभीप्सितोंकी अक्षय सिद्धि अवश्य ही हो जाती है।१४। एवमुक्त्वा ददौ चक्र सूर्य्यायुतसमप्रभम्। सुदर्दन ख्वपादोत्थ सर्वशत्रुविनाशनम् ।१५। विष्णुश्चापि सुसंस्कृत्य जग्राहोदडमुखस्तदा। नमस्कृत्य महादेव विष्णुर्वचनमब्रवी ।१६। श्र णु देव मया ध्येयं पठनीयं च कि प्रभो। दुःखानां नाशनार्थ हि वद त्वं लोकशङ्कर ।१७। इति पृष्ठस्तदा तेन सन्तुष्टस्तु शिवोऽब्रवीत्। प्रसन्नमानसो भूत्वा विष्णु देवसहायकम् ।१८। रूपं ध्येय हरे मे हि सर्वानर्थ प्रशान्तये। अनेकदुःखनाशार्थं पठ नामसहस्रकम् ।१९। धार्य्य चक्र सदा मे हि सर्वाभीष्ठस्य सिद्धये। त्वया विष्णो प्रयत्नेन सर्वचक्रवरं त्विदम् ।२०। अन्ये च ये पठिप्यन्ति पाठयिष्यग्ति नित्यशः। . तेषां दु.ख न स्वप्नेऽपि जायते नात्र संशयः ।२१। सूत ने कहा -- शिव ने ऐसा कहते हुए सहसों सूर्यों के तुल्य कान्ति वाले अपने चरणसे समुत्पन्न सम्पूर्ण शत्र ओं के नाशक सुदर्शनचक्र को दे दिया।१५॥ इसके अनन्तर उस समय उत्तर दिशाकी ओर अपना मुख करके मली-माँति संस्कारके साथ सुदर्शनचक्रको ग्रहणकिया और भगवान् महेशको नमस्कार करके विष्णु ने प्रार्शना की ॥१६॥ विष्ण ने कहा हे प्रभो ! हे देव ! हे लोकोंके कल्याण करनेवाले ! मेरे ध्यानकरने के योग्य क्या है और मेरेद्वारा पढ़नेके योग्य क्या २ है ? यह सभी दुःखोंके निवारण --- कपया बतला देवे ।३७। सूतजी ने कहा-विष्णु भगवान
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शिव सहस्त्रनाम स्तोत्र का फल ८७
के द्वारा इस तरह पूछने पर शिव मनमें परम प्रसन्न एव अत्यन्त सन्तुष्ट होकर देवोंकी सहायता करनेवाले वचन विष्णुने करने लगे ॥१८॥ शिवने कहा-हे विष्णो! समस्त उपद्रवोंकी शांतिकेलिये मेरे मङ्गलमय स्वरूप का ध्यान करना चाहिए और समस्त दुःखो के नाश होनेकेलिये मेरे सहस्रनाम स्तोत्रका पाठ करना चाहिये। ९॥ हे विष्णो ! समस्त कामनाकों की सिद्धिके लिये चक्रोमें परमश्रध्ठ मरे चक्रको जिसका नाम सुदर्शन है सर्वदा प्रयत्न पूर्वक धारण करना चाहिए ॥२०॥ जो मानव मेरे इस शिव सह- नाम वाले स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करेंगे या श्रवण करायेंगे उनको कभी स्वप्नमें भी दुःख नहीं सतायेंगे-इसमें तनिकभी संदेह नहीं है।२१। राज्ञां च संकटे प्राप्त शतावृत्ति चरेद्यदा। साङ्ग च विधिसयुक्त कल्याणं लभते नरः ।२२। रोगनाशंकर ह्यतद्विद्यावित्तदमुद्यमम्। सर्वकामप्रद पुण्यं शिवभक्तिप्रदं सदा।२३। यदुदि्दश्य फलं श्रेष्ट पठिष्यन्ति नरास्त्विह। यप्स्यन्ते नात्र संदेहः फलं तत्सत्यमुत्तमम् ।२४। यश्च प्रातः समुत्थाय पूजां कृत्वा मदीयिकाम्। पठने मत्समक्ष वै नित्यं सिद्धिर्न दूरतः ।२५। ऐहिकी सिद्धिमाप्नोति निखिलां सर्वकामिकाम्। अन्ते सायुज्यमुक्ति वै प्राप्नोत्यत्र न संशयः ।२६। एवमुक्त्वा तदा विष्णु शंकरः प्रीतिमानसः। उपस्पृश्य कराभ्यां तमुवाच गिरिशः पुनः ।२७। वरदोऽस्मि सुरश्रेष्ट वरान्वृणु यथेप्सितान्। भक्त्या यशीकृनो नूनं स्तवेनानेन सुव्रत ।२८। इत्युक्तो देवदेवेन देवदेवं प्रणम्य तम। सुप्रसन्नतरो विष्णुः सांजलिर्वाक्यमब्रवीत् ।२९। यथेदानीं कृपा नाथ क्रियते चान्यतः पराः। कार्य्या चैब त्रिशेषेण वृपालुत्वात्वया प्रभो ।३०।
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[शिवपुराण
यदि भूगतियोंके द्वारा सङ्कट आनेका अवसर आवेतो सविधि अङ्ग- व्यास पूर्वक सहस्रनाम की एकशत आवृत्ति करने पर दुःख दूर होकर निश्चय ही कल्याग होता है ॥२२। यह शिव सहस्रनाम स्तोत्र रोगनाशक विद्या और वैभवका दाता तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करने वाला एवं निरन्तर पवित्र शिवकी भक्तिके प्रदान करने वाला है ॥२३॥ मनुष्य जिस किसी भी श्रध्ठ फल प्राप्त करने के उद्देश्य से इसका पाठ करेंगे वे निह्स- न्देह इम लोक में उस श्रेष्ठ फलकी प्राप्ति करेंगे ॥२४॥ जो भी कोई मनुष्य नित्य बहुत तड़के उठकर मेरी अर्चा करके इस स्तोत्रका पाठ करेगे उनसे सत्सिद्धि दूर नहीं रहती है ।२५॥ जो सहस्रनामका नित्व पाठ करता है वह लोकमें समस्त कामनाओं को सिद्ध करने वाली सम्पत्ति पाता है और अन्त में सायुन्य मुक्ति का पद प्राप्त करता इसमें कुछ भी संशय नहीं है। ।२६ । सूत जीने कहा-इस तरह विष्णु के कहने के पश्चात् शङ्कर प्रसन्न मन होकर विष्णु भगवान की अपने दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए कहने लगे ।२७॥ शितने कहा-हे देवगण में श्रष्ठ विष्णो ! मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम अपने मनोवाञ्छितं बरोंको स्व्रीकार करो। हे परम शोभन व्रत वाले ! भक्ति पूर्वक इस स्तोत्र रत्नके पाठसे निश्चय ही शिव वशीभूत हो जाते हैं ।।२८।। सूतजीने कहा-इस प्रकार से देवों के सी पूज्य देव महादेवके कहने पर उनको प्रणाम करके परम प्रसन्न विष्णु उनसे हत्थ जोड़कर फिर प्रार्थना करने लगे ।२१॥ भगवान् विष्णु ने कहा-हे नाथ ! हे प्रभो ! इस समय आपने जैसा अनुग्रह किया है, हे दयालो वैसी ही कृता आगे भी आपको करनी चाहिए।:३०।। । नारद का शिवतत्व श्रवण ।। सूत सूत महाभाग ज्ञानवानसि सुव्रत। पुनरेव शिवस्यैव चरितं व्र हि विस्तरात् ॥१ पुरातनाश्च राजान ऋषर्यो देवतास्तथा। आराधनञ्च तस्यैव चक्रुर्देववरस्य हि॥२ साधुपृष्टमृषिश्रष्टाः श्रयतां कथयामि किम्। चरित्र शङ्धर रम्य शृण्वतां भुक्तिमुक्तिदम् ।३
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नारद का शिवतत्व श्रवण एतदेव पुरा पृष्ठो नारदेन पितामहः। प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा नारदं मुनिसत्तमम् ॥४ श्रणृ नारद सुप्रीत्या शंकर चरितं वरम्। प्रवक्ष्यामि भवत्स्नेहान्महापातकनाशनम् ।।५ रभवा सहितो विष्णु शिवपूजां चकार ह। कृपया परमेशस्य सर्वान्कामानवाप हि॥६ अहं पितामहश्चापि शिवपूजनकारकः। तस्यैव कृपया तात विश्वसृष्टिकरः सदा॥७ ऋषियोंने कहा हे महान् भाग्य वाले ! हे सुब्रत ! हे सूतजी ! आप अत्यन्त ज्ञान वाले हैं, अनएव हमारी विनीत प्रार्थना है कि आप अब भगवान् शङ्करके चरित्रका विस्तारके सहित वर्णन करें ॥१॥ पहिले होने वाले राजा लोगों ने एवं ऋषिगण और देववृन्दने सर्वश्रेष्ट भगवान् शिव का ही आराधन किया है ॥२॥ सूतजीने कहा-हे ऋषिप्रवर ! इस समय आपने अति उत्तम प्रश्न किया है। मैं आपके सामने अब परम सुन्दर एवं श्रोताओंको भोग और मोक्ष दोनों ही के दाता भगवान् शिवका विस्तृत चरित्र सुनाता हूँ। आप सब ध्यानके साथ सुनिये ॥३। यही बात पहिले एक समय नारदजीने ब्रह्माजीसे पूछी थी। परम प्रसन्न होकर ब्रह्मा जीने नारदजीसे कहा था ।४।। ब्रह्माजीने कहा-हे नारद ! तुम प्रम पूर्वक सुनो, मैं आपके स्नेह से वशीभूत होकर ही महापातकों का नाशक शिवेश्वरके चरित्रका वर्णन करता हूँ॥५॥ अपनी प्रिय लक्ष्मी को साथ में लेकर भगवान् विष्णुने एकबार शिवका पूजन किया था तब उनके सभी मनोरथ पूर्णं हो गये थे ।६॥ हे तात ! मैं जगत् का विधाता ब्रह्मा भी शिव-समर्चन के अतुल प्रभाव के कारण ही उनकी कृपा से इस सुविस्तृत संसार की रचना किया करता हूँ।।७।। शिवपूजाकरा नितयं मत्पुत्रा: परमर्षयः। अन्ये च ऋषयो ये ते शिवपूजन कारकाः ॥८ नारद त्वं विशेषेण शिवपूजनकारकः। सप्तर्षयो वसिष्ठायाः शिवपूजनकारकाः ॥९
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अरुधती महासाध्वी लोपामुद्रा तथैव च। अहल्या गोतमस्त्री च शिवपूजनकारकाः ।१०। दुर्वासा: कौशिकः शक्तिर्दधीचो गोतमस्थता। कणादो भार्गवो जीवो वैशपायन एव च ।१॥। एते च मनुयः सर्वे शिवपूजाकरा मताः। तथा पराशरो ध्यास: शिवपूजारतः सदा ।१२। उपमन्युर्महाभक्तः शिवस्य परमात्मनः । याज्ञवल्क्यो महाशवो जैमिनिर्गर्ग एव च ।१३। शुकश्र शौनकाद्याश्च शंकरस्य प्रपूजकाः । अन्येऽपि बहवः सन्ति मुनयो मुनिसत्तमाः ।१४। हे श्रष्ठऋषिवृन्द ! मेरे पुत्र भी नित्यप्रति भगवान्शिवका पूजनकरते हैं तथा अन्यभी बहुतसे ऋषिगण शिवकी पूजा करने वाले हुए हैं ॥८॥ हे नारदजी ! तुमभी विशेष रूपसे भगवान्शिवका पूजनकरने वाले हो और अन्य ऋृषि लोग भी शिवके समाराधकः हुए हैं ॥९॥ परम पतिव्रत धर्मके पालन करने वाली अरुन्धती, लोपामुद्रा और गौतम की पत्नी अहिल्या भी शङ्करकी पूजा-अर्चन करने वाली हैं ॥१०॥ इनके अतिरिक्त दुर्वासा विश्वा मित्र, शक्ति, दधौच, गौतम, कणाद, भार्गव, बृहस्पति, वैशम्पायन आदि ये समस्त ऋषि, मुनि भगवानुशिवकी पूजोपासना करने वाले हैं यथा पराशर और व्यासमुनि निरन्तर शिवको आराधनामें परायण रहा करते हैं॥११- १२।। उपमन्यु महर्षि भी परमेश्वर शिवके महान्भक्त हुए है। याज्ञवल्कय, जैमिनि तथा गर्ग भी परम शैव थे ॥१३॥ शुक्र एवं शौनक आदि भी भग- वान्शिवके पूजक हैं। हे मुनिश्रेष्ठो ! अन्य भी बहुत से ऋषि हैं जो एक मात्र शङ्कर भगवान् की पूजा करने वाले हैं ॥१४॥ अदितिदर्देवमाता च नित्य प्रीत्या चकार ह। पार्थिवीं शैवपूजां वै सा वधू: प्रेमतत्परा।१५। शक्रादयो लोकपाला वसवश्च सुरास्तथा। महाराजिकदेवाश्र साध्याश्च शिवपूजकाः ।१६।
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नारद का शिवतत्व श्रवण 1 [ ११
गन्धर्वाः किन्नराद्याश्चोपसुराः शिवपूजकाः । तथाऽसुरा महात्मानः शिवपूजाकरा मताः ॥१७ हिरण्यकशिपुर्देत्यः सानुजः ससुतो मुने। शिवपूजाकरो नित्यं विरोचनबली तथा ॥१८ महाशैबः स्मृतो बाणो हिरण्याक्षसुतास्तथा। वृषपर्वा दनुस्तात दानवाः शिवपूजकाः ॥१९ शेषश्र वासुकिश्चैव तक्षकश्च तथाऽपरे। शिवभक्ता महानागा गरुडाद्याश् पक्षिण: ।।२० सूर्यचन्द्रावुभौ देवौ पृथ्व्यां वंशप्रव्त्त कौं। शिवसेवारतौ नित्य सर्वश्यां तौ मुनीश्वर ॥२१ देवगणकी माता अदितिने अपनी वधूके सहित परम प्रम मग्न होकर प्रीति-भक्तिके साथ पार्थिव शिवका पूजन किया था ॥१५॥ इन्द्र आदि समस्त लोकगालोंने-आठ वसुयोंने और सभी देवताओंने महाराजिकगण के साथ एव साध्योंके सहित भगवान् महेश्चरका पूजन किया था ॥१६॥ इनके अतिरिकत किन्नर गन्धर्व, प्रभृति तथा महान्आत्मा वाले दैत्यलोग मी सब शिवके उपासक हुए हैं ॥१७॥ हे मुनिवर ! महान् दैत्यराज हिरण्य- कशिपु अपने भाई एवं पुत्रके साथ नित्यही शिवका पूजन किया करता था। विरोचनमी शिव-पूजक हुआ है।१८। हे तात ! वाणासुर और हिरण्याक्ष पुत्र वृषपर्वा, दुनुदैत्य और उसकेपुत्र ये सभी शिवकी आराधना करने वाले हुए हैं।१६॥ मगवान् शेष, वासुक, तक्षक और अन्यभी नागजातिके बड़े बड़े नाग एत्र गरुड अदि पक्षीभी शिवकी उपासना करने वाले परम शिव भक्त हुए हैं॥३०॥ हे मुनीश्वर ! इस भूमण्डलपर सोम और सूर्य ये दोनों अपने-अपने महान् वंशके चलाने वाले माने गये हैं वे भी सभी स्त्रकीय वशजोंके साथ शिवके अनन्य उपापक एवं परम भक्त हुए हैं ॥१।। मनवश्च तथा चक्रः स्वायंभुवपुर सराः । शिवपूजां वित्र षेण शिववेशधरा मुने ॥२२ प्रियव्रतश्च तत्पुत्रस्तथा चोत्तानपात्सुतः । तद्व शाश्चव राजानः शिवपूजनकारकाः ।२३
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९२ ] श्री शिवपुराण घ्र वश्च ऋषभश्चैव भरतो नवयोगिनः। तद्भ्रातरः परे चापि शिवपूजनकारकः ।२४। वैवस्वतसतास्तार्क्ष्य इक्ष्वाकुप्रमुखा नृपाः । शिवपूजारतात्मानः सर्वदा सुखभोगिनः ।२५। ककुत्स्थश्चापि मांधाता सगरः शैवसत्तमः। मुचकुन्दो हरिश्चन्द्रः कल्माषांघिस्तर्थव च।२६। भगीरथादयो भूपा बहवो नृपसत्तमाः। शिवपूजाकरा ज्ञया: शिववेषविधायिनः ।२७। खट्वांगश्र महाराजो देवसाहाय्यकारकः। विधितः पार्थिवीं मूर्ति शिवस्यापूजयत्सदा।२८। हे मुने ! स्वायम्भुव आदि जो मनु हुए हैं वे सब्र नित्य शिवकी वेष- भूषा धारण करके ही शिवका पूजन किया करते थे ॥२२। महाराज प्रियब्रत तथा उसके पुत्र और उत्तानपाद के पुत्र एवं उनके वंश में जो भी राजा हुये वे सभा शिवके पूजनको करने वाले हुए है ॥२३॥ इनके अति- रिक्त धूव, ऋषभ, भरत नवयोगी तथा अन्य उनके समस्त भाई ये सब परम शिव-पूजक हुए हैं ॥२४॥ वैवस्वत मनुके पुत्र ताक्ष्य तथा इक्ष्वाकु, प्रभृति नृपगण सी शंकर की पूजा के प्रेमी और इसीके प्रभावसे निरन्तर सुखके भोक्ता हुए हैं। २५। ककुत्स्थमान्धाता, राजा सगर, मुचुकुन्द, राजा हरिशचन्द्र और कल्माषपाद भी शैवों में परम श्रेष्ठ हुए हैं ।२६। भगीरथ आदि अनेक महान पुरुषार्थी राजा शिवका वेष धारण करने वाले तथा शिवके पूजन करने वाले हुए में ।२७। देवोंके सहायक राजा खट्वाङ्गने सविधि शिवका पार्थिव पूजव किया था ॥२८॥ तत्पुत्रो हि दिलीपश्च शिवपूजनकृत्सदा। रघुस्ततनयः शव सुप्रीत्या शिवपूजकः ।२९। अजः शिवार्चकस्तस्य तनयो धर्मयुद्धकृत। जातो दशरथो भूपो महाराजो विशेषतः ।३०। पुत्र र थे पार्थिवी मूर्तिशैवीं दशरथो हि सः। समानच विशेषेण वसिष्ठस्याज्ञया मुनेः ।३१।
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नारद का शिवतत्व श्रदण ] [ ९३ पुत्रेष्टिं च चकारासौ पार्थिवो भवभक्तिमान्। ऋष्यशृ गमुनेराज्ञां सप्राप्य नृपसत्तमः ॥३२ कौसल्या तत्प्रिया मूर्ति पार्थिवी शांकरों मुदा। ऋृष्यशृ गसमादिष्टा समानच सुताप्तये ॥३३ सुमित्रा च शिवं प्रीत्या कैकेयी नृपवल्लभा। पूजयामास सत्पुत्रप्राप्तये मुनिसत्तम ॥३४ शिवप्रसादतस्ता वै पुत्रान्प्रापुः शुभकरान्। महाप्रत पितो वीरान्सन्मार्गनिरतान्मुने ॥३५ इसी वंशमें उनके पुत्र महाराज दिलीप एवं इनके पुत्र राजा रघुशव होकर परम प्रीति से शिवका वेष खकर उनका पूजन किया करते थे। ।२९।। महाराज रघुके पुत्र अज नृप जिन्होंने धर्मसे युद्ध किया था वे शिव के परम प्रिय भक्त हुये थे इसके अनन्तर गजादशस्थ तो विशेष रूपसे शिव की उपासना करने वाले हुए हैं॥३०॥ राजा दशरथ अपने गुरु वसिष्ठ मुनिकी आज्ञा से पुत्र-प्राप्ति के लिये शिवकी पार्थिव मूर्ति का निर्माणकर विशेष रूपसे नित्य ही महादेवका पूजन किया करते थे ॥३१॥ भत्तिमन् महाराज दशरथने ऋशि शङ्ध मुनिकी आज्ञासे पुत्रेष्टि योग किया था।३२। दशरथकी पत्नी कौशत्याने ऋष्य श्रृङ्ग मुनिकी आज्ञासे रोज ही शिवकी पार्थिव मूर्ति बनाकर अपने पुत्र की प्राप्तिके लिये शिवका पूजन किया था ।३३। हे मुनिश्रेष्ठ ! दशरथ नृपकी अन्य महारानी सुमित्रा तथा कैके ईने भी श्रष्ठ पुत्रकी प्राप्तिकी कामनासे शिवका अर्चन किया था।३३। हे मुने ! उन सभी रानियोंने भगवान महेशके प्रसादसे महान् प्रताप वाले, परम वीर, सन्मार्गगामी एवं अतिशय कल्याणकारी पुत्रोंको प्राप्त किया था।३५। ततः शिवाज्ञया तस्मात्तासु राज्ञः स्वय हरिः। चतुर्भिशश्च व रूपैश्चाविर्बंभूव नृपात्मजः ॥३६ कौसल्यायाः सतो राम: सुमित्रायाश्च लक्ष्मण। शत्रुध्नश्चव ककेय्या भरतश्चेति सव्रताः ॥३७ राम: ससहजो नित्यं पार्थिवं समपूजयत्। भस्मरुद्राक्षघारी च विरजो योगमास्थितः ।३८
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९४ ] [ श्री शिवपुराण
तद्वशे ये समुत्पन्ना राजानः सानुगा मुने। ते सर्व पार्थिवं लिंग शिवस्य समपूजयन् ।३९। सुद्य म्नश्र महाराजः शैवों मुनिसुतो मुने। शिवशापात्प्रियाहेतोरभून्नारी ससेवकः ।४०। पार्थिवेशसमर्चातः पुनः सोडभूत्पुमान्वरः। मासं स्त्री पुरुषो मासमेवं स्त्रीत्वं त्यवर्त्तत।४१। ततो राज्यं परित्यज्य शिवधर्मपरायणः । शिववेषधरो भक्तया दुर्लभ मोक्षमाप्तवान्।४२। इसी शिव-पूजनके प्रभाव से शिवकी आज्ञा पाकर विष्णु महाराज दशरथके द्वारा चतुर्भु जी मूर्तिके स्व्ररूपमें श्रीरामचन्द्र रूपसे प्रकट हुए थे। ।।३६।। इस प्रकार से दशरथ की तीनों रानियों के पुत्र हुए। महारानी कौशल्याके श्रीराम, सुमित्राके लक्ष्मण और शत्रघन तथा कैकेयीके भरत नामवाले पुत्र प्रकट हुए थे।३७॥ भगवान् श्रीरामचन्द्रभी नित्यही पार्थिव मूर्ति बनाकर शिवका बड़ेही प्रेमके साथ पूजन किया करते थे ओर मस्म तथा रुद्राक्षमाला धारणकरके विरक्तिके मार्गमें स्थित रहा करते थे।३८। हे मुने ! इसके पश्चात् भी उनके वंशमें जोभी राजा हुए हैं वे सभी शिव का पार्थिव पूजनकरने वाले थे।३९ हे मुनीश्वर! ऋषिके पुत्र परम शिव के भक्त महाराज सुद्यम्न शिवके शापसे अपनी स्त्री और समस्त अनुचरों के साथ स्त्रीके रूपमें होगये थे॥४०॥ राजा सुद्य मनने नित्य पार्थिव शिवके पूजनका नियम ग्रहण किया और इसके प्रभावसे पुनः पुरुष रूप हुए किन्तु महेशके शापका फिर भी इतना प्रभाव रहा कि एकमास पर्यन्त पुरुष और एंकमास तक स्त्री रहते थे। इस तरह स्त्रीत्वसे उन्होंने छुटकारा पाया था। इसके पश्चात् वे अपना राज्य त्यागकर शिवोपासनामें तत्पर होकर अन्त में मोक्षपदकी प्राप्ति के अधिकारी हो गये थे ॥४१-४२॥ पुरूरवाश्र तत्पुत्रो महाराजः सुपूजकः । शिवस्य देवदेवस्य तत्सुतः शिवप जकः।४३। भरतस्तु महापूजाँ शिवस्यैव सदाऽकरोत्। नहुषश्च महाशैवः शिवपूजारतो ह्यभूत् ।४४।
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ययाति: शिवपूजातः सर्वान्कामानवाप्तवान्। अजीजनत्सुतान्पश्च शिवधर्मपरायणान् ।।४५ तत्सुता यदुमुख्याश्र पञ्चापि शिवपूजकाः। शिवंपूजाप्रभावेण सर्वान्कामांश्र लेभिरे॥४६ अन्येऽपि ये महाभागाः समानचु: शिवं हिते। तद्व' श्या अन्यवश्यश्च भुक्तिमुक्तिप्रद मुने ।।४७ कृष्शोन च कृत नित्य बदरीपर्णतोत्तमे। पूजनं तु शिवस्यैव सप्तमासावधि स्वयम् ॥ प्रसन्नाद् भागवांस्तस्माद्वरान्दिव्याननेकशः । सम्प्राप्य च जगत्सर्गं वशेऽनयत शङ्गरात् ।।४९ राजा चुरूरवा तथा उनका पुत्र शिवके पूजक एवं परम भक्त हुए हैं। शिवके पूजनके अतुल प्रभावसे उनके सभी मनोरथ पूर्ण भी हुए थे ।४३। राजा भरत शिवकी महासमर्चा किया करते थे तथा महाराज नहुष महा शंव थे और निरन्तर शिवके समाराधनामें तत्पर रहा करते थे ॥४४॥ राजा ययातिने भी भगवान् शङ्करकी पूजाके प्रभावसे अपनी समस्त कामनाओंकी प्राप्तिकी और शिव धर्ममें तत्पर पाँच पुत्रोंको जन्म दिया था ॥४५॥ यदुवंशमें मुख्य उनके पाँचपुत्र शिवके परम पूजक हुए और भगवान् शिवकी कृपासे अपनी समस्त अभीष्ट कामनाओंकी उन्हेंने प्राप्ति की थी ।४६॥ हे मुने ! इनके अतिरिक्त अन्य भी जो महान् भाग्यशाली राजा इस संसारमें हुए हैं उन सबने भी शिवका पूजन किया था। उनके गंशज सभी राजाओंने भोग और मोक्षके प्रदाता शिवका समर्चन किया था। ।४७। महात्मा श्री कृष्ण ने बदरी गिरिपर सातमास पर्यन्त स्वयं बड़ी तत्परताके साथ शिवका पूजन किया था ॥४८। उस समय परम प्रसन्न होने वाले शिवसे श्री कृष्ण ने अनेक दिव्य वरदान प्राप्त किये और उन्हींके प्रभावसे समस्त जगत्को अपने वशमें कर लिया था॥४९॥ प्रद्य ग्नः तत्सुतस्तात शिवपूजाकरः सदा। अन्ये च काष्णिप्रबराः साम्बाद्याः शिवपूजकाः ॥५०
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९६ १ श्री शिवपुराज जरासंधो महाशैवस्तद्वश्थाश्र नृपास्तथा। निमि शैवश्च जनकस्तत्पुत्राः शिवपूजकाः ।५१। नलेन च कृता पूजा वीरसेनसतेन वै। पूर्वजन्मनि यो भिल्लो वने पान्थसुरक्षक: ।५२। यातिश्च रक्षितस्तेन पुरा हरसनीपतःः। स्वय व्याघ्रदिभी रात्रौ भक्षितश्च मृतो वृषात् ।५३। तेन पुण्यप्रभावेण स भिल्लो हि नलोऽभवत्। चक्रवर्ती महाराजो दमयन्तीप्रियोऽभवत् ।५४। इति ते कथितं तात यत्पृष्टं भवताऽनघः । शांकर चरित दिव्यं किमन्यत्प्रष्टुमिच्छसि ।५ ५। हे तात ! भगवान् श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्य म्नजी सदा शिवकी पूजा किया करते थे और साम्ब प्रभृति सभी श्रीकृष्णके वंशजोंने शिवकी परम मक्तिका आश्रय लिया था ।५०। महान, शिव भक्त राजा जरासन्ध तथा उनके अण्य वंशज सभी शिवोपासक थे। राजा निमि और जनक तथा उनके पुत्र सभी लोग शिवके परम भक्त हुए हैं॥५१॥ वीरसेन राजा के पुत्र नल राजा ने मी शिवकी पूजाकी थी जोकि अपने पहिले जन्ममें वनके भील रहकर वन-मार्गकी रक्षा किया करते थे। ५२॥ मील के जीवन में उसने एक बार शिवके समीपमें स्थित एक सन्यासी की रक्षा की थी और भाग्य वश ही बाघ के भक्षण करने से उसका रक्षणकरनेके कारण मृत्युगत होगया था ।५३। इसी महान पुण्य कार्य के प्रभाव से अपने दूसरे जन्ममें राजा नल के रूप में उत्पन्त हुआ और चक्रवर्ती राजा नल दमयन्तीरानी के परम प्रिय पति हुए ।।५४। हे तात ! हे पापशून्य आपने जो प्रश्न मुझसे पूछा सो मैंने महेश्वर शिवका अनिदिव्य चरित्र तुम्हारे सामने वर्णनकर दिया। अब तुम बताओ और मुझसे क्या-क्या पूछना चाहने हो ।५४। । शिवरात्रि ब्रत का माहात्म्य।। धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि जीवितं स फल तव। यच्द्रावयसि नस्तात महेश्वरकथां शभाम् ।१।
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शिवरात्रिव्रत का माहात्म्प ] [ ९७ बहुभिश्चषिंभि: सूत श्रतं यद्यपि वस्तु सत्। सन्देहो न गतोऽस्माकं तदेतत्कथयामि ते ।२। केन ब्रतेन सन्तुष्टः शिक्रो यच्छति सत्सुखम्। कुंशल: शिवकृत्ये त्वं तस्मात्पृच्छामहे वयम् ।३। भुक्तिर्मुक्तिश्च लभ्येत भक्तैर्येन व्रतेन वै। तद्वद त्वं विशेषेण व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते।5 सम्यक्पृष्टसृषिश्रेष्ठा भवद्भिः करुणात्भभिः । स्मृत्वा शिवपदाभोज कथयामि यथाश्र तम् ।५। यथा भवद्भिः पृच्छयेत तथा पृष्ट हि वेधसा। हरिणा शिवया चैव तथा वै शङ्करं प्रतिः ।६। कस्मिश्चित्सतये तैस्तु पृष्ट च परमात्मने। केन श्रतेन सन्तुष्टो भुक्ति मुक्ति च यच्छसि ।७। ऋषियोने कहा-हे सूतजी ! आप भगवान् शिवकी शुभ कथारा श्रवण कगते रहते हैं ।।१ हे सूतजी ! हमने अन्य बहुतसे ऋषियों के द्वारा अनेक उपाखन सुने हैं किन्तु उनसे हमारे हृदयके संशयका नाश नहीं होसका इसी कारणसे हम अब आपसे प्रार्थना करते हैं ॥२॥ आपतो परम कुशल शिव भक्त और उनके कृत्योंके ज्ञाता है। इसीलिये हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि भगवान् शङ्कर किस व्रतसे सन्ुष्ट होकर सच्चा सुख प्रदान किया करते हैं॥३॥ हे व्यासजीके प्रमुख शिष्य सूतजी ! जिस व्रतके करनेसे मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति किया करता है अब आप उसे विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिये। हम आपको नमस्कार करते हैं ।।४।। सूतजीने कहा-हे श्रष्ठ ऋषिवृन्द ! सांसारिक प्राणियों पर दया करते हुए आपने बहुत ही सुन्दर बात पूछी हैं। मैंने जैसाभी सुना है वही भगवान् शिवके चरण कमलका स्मरण करके आपकी सुनाता हूँ॥५॥ आज आप लोगोंने जैसी बात पूछी है वैसा ही प्रश्न एकवार ब्रह्मा, विष्णु और जगदम्वा पार्वतीने सी शिवसे पूछा था ॥६॥ किसी समय शिवको प्रसन्न देखकर इन सबने परमेश शिव्रसे पूछ था कि हे शिव! किस ब्रत से सन्तुष्ट होकर आप भोग-मोक्ष दोनों दिया करते हैं॥इ॥।
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I श्री शिवपुराण
इति पृष्टास्तदा तैस्तु हरिण तेन वै तदा। तदहं कथयाम्यद्य शृण्घतां यापहारकम् ।८। भूरि ब्रतानि मे सन्ति भुक्ति मुक्तिप्रदानि च। मुख्योनि तत्र ज्ञेयानि दशसंख्यानि तानि वं ।९। दश शैबब्रतान्याहुर्जाबालश्र तिपारगाः। तानि ब्रतानि यत्नेन कार्याण्येव द्विजैः सदा ।१०। प्रत्यष्टम्यां प्रयत्नेन कर्तव्यं नक्तभोजनम्। कालाष्टम्यां विशेषेण हरे त्याज्यं हि भोजनम् ।११। एकादश्या सिताया तु त्याज्यं विष्णोऽन्नि भोजनम्। असितायां तु भोक्तव्यं नक्तमभ्यर्च्य मां हरे।१२ त्रयोदश्यां सिताया तु कर्तव्यं निशि भोजनम्। असितायां तु भूतायां तन्न कार्यं शिवब्रर्तः ।१३ निशि यत्नेन वर्तव्य भोजन सोमवासरे। उभयो: पक्षयोर्विष्णो सर्वस्मिञ्छिववत्परैः।१४। इस प्रकार सबके और विशेष रूपसे विष्णुके द्वारा किये गये इस प्रश्न को सुनकर उस समय शिवजीने जो उत्तर दिया था, मैं श्रोताओंके उसी पापनाशक उपायको बतलाता हूँ।। श्रींशिवने कहा-हे देनवृन्द ! यों तो भोग ओर मोक्ष दोक्ष दोनोंको प्रदान करने वाले मेरे विविध व्रत हैंकिन्तु उन सब में दशब्रत परममुख्य होते हैं।९। वेदोंके पारगामी जाबाल आदि मुनियों ने ये दशह़ी व्रत बतलाये हैं। इन दशव्रतोंको द्विजाति मात्रको यत्नपूर्वक करना चाहिए ।१०! हे विष्णो ! प्रत्येक अष्टमीके दिन एकबार रात्रिमें ही भोजन करना चाहिए। कालाष्टमीकेदिन तो खासतौरसे रात्रिके भोजनका भी त्याग करदेना चाहिए ।११। हे विष्णुदेव ! मासके शुक्लपक्षकी एका- दशीकेदिन विशेषरूपसे मोजनको सर्वथा छोड़ ही देना चाहिए। हे हरे ! कुष्णदक्षकी एकादकीवे दिन मेरा पूजनकरके रान्रिमें एकबार मोजन करना उचित है।१२। शुक्लपक्षकी त्रयोदशीके दिन रात्रिमें एकबार भोजनकरे और कृष्णपक्षकी त्रयोवशीके दिन तो शिवके व्रत धारण करने वालोंको सर्वथा
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शिवरात्रि व्रत का माहात्म्य [ ९९
कदापि भोजन नहीं करना चाहिए ।१६। हे विष्णों! कृष्ण और शुक्ल दोनोंपक्षोमें जो भी सोमवार पड़े उनमें शित्र व्रतियों को केवल एकबार रात्रिमें ही यत्नके साथ भोजन करना उचित है ।१४।
ब्रतेष्वेनेषु सवष् शैवा भोज्याः प्रयत्नतः । यथाशक्ति द्विजश्रेष्ठा व्रत संपूर्तिहेतवे ।१५। व्रतान्येतानि नियमात्कर्तव्यानि द्विजन्मभिः । व्रतान्येतानि तु त्यक्त्वा जायन्ते तस्करा द्विजा: ।१६। मुक्तिमार्गप्रवीणैश्च कर्तव्य नियमादिति। मुक्तेस्तु प्रापक चैव चतुष्टयमुदाहृतम् ।१७। शिवार्चनं रुद्रजप उपवासः शिवालये। वाराणस्यां च मरण मुक्तिरेषा सनातनी।१८। अष्टमी सोमवारे च कृष्णपक्षे चतुर्दशी। चतुर्ष्वपि बलिष्ठ हि शिवरात्रिव्रतं हरे। तस्मात्तदेव कर्त्त व्य भुक्तिफलेप्सुभि।२०। एतस्माच्च व्रतादन्यन्नास्ति नृणां हितावहम्। एतद् व्रतं तु सर्वेषा धर्मसाधनमुत्तमम् ।२१।
हे द्विजवरो! इनसब व्रतोंमें शिव सेवियोंको यथाशक्ति ब्रतकी समाप्ति परही भोजन करना चाहिये । १५। हे द्विजवृन्द ! ये समस्तव्रत द्विजातियों को बहुतही नियमके साथ करने चाहिये। जो लोग इन ब्रतोंका त्यागकर दिया करते हैं वे दूसरे जन्ममें चोर होते हैं ॥१६॥ जो मुक्तिके मार्ग को जाना चहते हैं उन्हें ये ब्रत नियमपूर्वक अवश्य ही करने चाहिए। इसका कारण यही है कि ये चारोंबाते मोक्ष के देनेवाली होती हैं।१७! शितका समर्चन रुद्रका जप शिवालयमें रहकर उपवासऔर काशीपुरीमें मृत्यु इनसे सनतनी मुक्ति होती है ।१८॥ कृष्णपक्ष में सोमवारसे युक्त अष्टमी तथा चन्द्रवारसेयुक्त चतुर्दशी होतो येदोनों भगवान्शिवके परमप्रसन्नता देनेवाले दिन होते है। इसमें कुछमी चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥१९॥ हे भगवन् !
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१०० ] [ श्री शिवपुराप
ऊपर बतलाये हुए चारों ब्रतोंसे भी शिवरात्रिका व्रत बहुत अधिक बलवान् होता है। अत एद मोग-मोक्षके दोनों फल प्राप्त करने की इच्छा बालों को यह व्रत अवश्य ही करना चाहिये ॥२०॥ शिवरात्रिके व्रतके दिनसे अधिक अन्य कोई भी ब्रत मनुष्यों के हित करने वाला नहीं है। यह व्रत मनुष्यके समस्त उत्तम धर्मोका साधन है ॥२१॥ निष्कामानां सकामानां सर्वेषां च नृणां तथा। वर्णानामाश्रमाणां च स्त्रीबालानां तथा हरे।२२ दासानां दासिकानां च देवादीनां तथैव च। श.रीरिणां च सर्वेषां हितमेतद् व्रतं वरम् ।२३। ताघस्य ह्यसिते पक्षे विशिष्टा साति कीर्तिता। निशीथव्यापिनी ग्राह्या हत्याकोटि विनाशिनी ।२४। तदिदने चैव यत्कार्य प्रातरारम्य केशव। श्र यतां तन्मनो दत्वा सुप्रीत्या कथयामि ते ।२५। प्रातरुत्थाय मेधावी परमानन्दसंयुतः । समाचरेन्नित्यक्रतं स्नानादिकमतन्द्वितः ।२६। शिवालये ततो गत्वा पूजयित्वा यथाविधि। मनस्कृत्य शिवं पश्चात्सङ्कल्पं सम्यगाचरेत् ।२७। देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोस्तु ते। कर्त्त मिच्छाम्यह देव शिवरात्रिब्रतं तव ।२८। हे विष्णो ! यह व्रत सकाम तथा निष्काम मनुष्योंके-चारोवर्णों व ले तथा चारोंआश्रमों वाले मानवोंके-स्त्री-वर्ग और बालक वृन्दके धर्मका श्रेष साधन माना गया है ॥२२। यह ऐसा शिवका श्रष्टव्रत है जो समस्त दास दासियोंका सब देवता आदिका तथा सम्पूर्ण देहधारी मनुष्यों का हित सम्पादन करने वाला है।२३। माघ मासके कृष्णपक्षमें त्रयोदशी तिथि किसी अन्य तिथिसे ममश्रित तथा रात्रिमें व्याप्त होने वाली होतो उसे ग्रहण करना चाहिए क्योकि ऐसी त्रयोदशी अत्यन्त श्रेष्ठ कही गई है और ऐसी पतथि कोटि (करोड़) हत्याओं के पापोंकी भी नाशकारणी बताई गई