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शिवरात्रि व्रत का माहात्म्य ) ( १०१ है।।२४।। हे केशव ! शिव चतुर्दशीके दिन प्रातःकालके समयसे लेकर जो-जो भी कर्तव्य पालन करने चाहिये उन्हें अब मैं तुभको बतलता हूँ आप सब ध्यानपूर्व क श्रवण करो ॥२५॥ धर्मरत बुद्धिमान् मनुष्यको प्रातः कालमें शिवरात्रिके दिन सानन्द शय्यासे उठकर आलस्यका त्याग करते हुए स्नान आदि नित्य-कर्म करना चाहिये ।२६। इस अपने आहिनक कर्म के सांग सम्पन्न होने पर शिवालयमें जाकर विधिपूर्व क भगवान् शिवका अचन करे और अन्तमें नमस्कार करके पीछे सम्यक रीतिसे सत्संकल्प करे॥२७॥ हे देवोंके देव ! हे नीलकण्ठ ! आपको मेरा प्रणाम है। मैं आपके इस शिवरात्रिके व्रतको करनेकी सदिच्छा रखता हूँ ॥२८॥ तव प्रभावाद् देवेश निर्विध्नेन भवेदिति। कामाद्याः शत्रवो मां व पीडां कुर्वन्तु नैव हि।२९ एवं संकल्पमास्थाय पूजाद्रव्यं समाहरेत्। सुस्थले चैव यल्लिंग प्रसिद्ध चागमेषु वै ॥३० रात्रौ तत्र स्वयं गत्वा संपाद्य विधिमुत्तमम्। शिवस्य दक्षिरो भागे पश्चिमे वा स्थले शुभे ॥३१ निधाय चैव यद् द्रव्यं पूजार्थ शिवसन्निधौ। पुनः स्नायात्तदा तत्र विधिपूर्व नरोत्तमः ॥३२ परिधाय शुभं वस्त्रमन्तर्वासः शुभ तथा। आचम्य च त्रिवारं हि पूजारम्भ समाचरेत् ॥३३ यस्य मंत्रस्य यद्द्रव्यं तेन पूजां समाचरेत्। अमंत्रक न कर्तव्यं पूजनं तु हरस्य च ॥३४ गीर्तर्वांद्यस्तथा नृत्यर्भवितभावसमन्वितः। पजन प्रथमे याम कृत्वा मंत्र जपेद् बुधः ॥३५ हे देवेश ! मेरी प्रार्थना है कि आपके प्रभावसे मेरा यह व्रत निर्विध्न होजावे और काम, क्रोधादि महाशत्र मुझे पीड़ा न देवें ।।२९।। इस रीतिसे सङ्कल्पकरके पूजनकी समस्त वस्तुयें एकत्रितकरे और इसके पश्चात् शास्त्रों में प्रसिद्ध ज्योतिलिंगकी सुरभ्भ स्थलमें स्थापना करनीचाहिए।३०। रात्रि

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१०२ ] श्री शिवपुराण में वहाँ स्त्रयं जाकर श्रेष्ठ विधानके साथ भगवान्शिवके दक्षिण भागमें अयव्रा पश्चिम भागमें स्थलमें उनसमस्त पूजाके उपचारोंको शिव्रकु समीन रक्खे और फिर ब्रतकरने वालेको स्नान करना चाहिए। ये कार्य समुचित विधिसे ही करनेचाहिए।३१-३२। अन्दरके वस्त्रके साथ शुभ वस्त्र धारण कर तीनबार आचमन करनेचाहिए इसके पश्चात् शिवके पूजनका आरम्भ करे ॥३३॥ जो पूजनका द्रव्य अपितकरे वह उसीके मन्त्रके सहित समर्पित करनाचाहिए। मन्त्रोंके बिना शिवका पूजन वैसेही कभी नहीं करे।३४। गायन-वादन तथा नर्तनके साथ परमभक्तिकी भावनासे दुद्धिमानको प्रथन प्रहरमें शितका पूजन करके फिर 'ॐ शिवाय नमः' अथवा ॐ नमः शिवायः' इस पञ्चाक्षरी मन्त्रका जाय करना चाहिए ॥३५।। पार्थिव च तदा श्रेष्ट विदध्यान्मंत्रबान्यदि। कृतनित्यक्रिय: पश्चात्पार्थिवं च समर्चयेत् ।३६। प्रथमं पाथिवं कृत्वा पश्च त्स्थापनमाचरेत्। स्तोत्र र्तानाविधैर्देवं तोषयेद्व षभध्वजम् ।३७। माहत्म्यं ब्रतसंभूत पठितव्य सुधीमता। श्रोतव्यं भक्तवर्यण व्रतसम्प तिकाम्यया ।३८। चतुर्ष्वपि च यामेषु भूर्तिना च चतुष्टयम्। कृत्वाऽवाहतप र्व हि विसर्गावधि वै क्रमात् ।३९! काय जागरण प्रीत्या महोत्सवसमन्वितम्। प्रातः स्नात्वा पुनस्तत्र स्थापयेत्प जयेच्छिनम् ।४० ततः सप्राथयेच्भु नतस्कन्धः कृताञ्जलिः। करपंपर्णव्रतको नृत्वा तं च पुनः पुनः।४१। नियमो यो महादेव कृतरचैव त्वदाज्ञया। विसृज्यते मया स्वामिन्व्रतं जातमनुत्तमम् ।४२। इस प्रकारसे इस उक्त मन्त्रका जपकरते हुएही परमश्रेष्ठ पार्थिवलिग का निर्माणकरे फिर उसे स्थापितकरे और नित्य-क्रिया करके पार्थिव्ललिंग का पूजनकरे और अनेक प्रकार के स्तोत्रों द्वारा स्तवन करके भगवान्शिव

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शिवरात्रि ब्रत का माहात्म्य [ १०३ को सन्तृष्ट एवं प्रसन्नकरे ॥३६-३७।। इसके अनन्तर बुद्धिमान शिव-भक्त को व्रत सम्बन्धी याहात्म्यका पाठ करनाचाहिए। व्रतकी साङ्ग समाप्तिकी इच्छासे व्रत माहात्म्यका श्रवण करे ॥३८॥ इस प्रकार शिव महारात्रिके चारों प्रहरोंमें आदिमें आवाहनसे लेकर क्रमशः विसर्जन पर्यन्त मगवान् शिवकी चारोंमूर्तियोंका अर्चनकरना चाहिए ॥३९॥ इसमहारात्रिमें बड़ेही उत्साहकेसाथ विशेष उत्सव करते हुए प्रीति और भत्तिके सहित जागरण करना चाहिए, और दूसरेदिन प्रातःकाल होनेपर पुनः शिवकी स्थापनाकर पूजनकरना चाहिए ॥४०।। इसके अनन्तर अपनेकाधोंको भुकाकर विनम्र मावसे हाथों को जोड़ते हुए सदाशिव की प्रार्थना करे। इस नरह सम्पूर्ण व्रत विधिको समाप्तकर भगवान्शिदको बारम्बार नमस्कार करके प्रार्थना करनी चाहिए ॥३१॥ हे स्वामिन् ! हे महादेव ! आपकी आज्ञासे मैंने जो ब्रतका नियम ग्रहण किया था बह अब समाप्त हो गया है। अब मैं आपका विसर्जन करना चाहता हूँ॥४२॥ व्रतेनानेन देवेश यथाशक्ति कृतेन च। सन्तुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि ।४३ पुष्पाञ्जलिं शिवे दत्वा दद्याद्दान यथाविधि। नमस्कृत्य शिवायैव नियमं तं विसर्जयेत्।४४। यथाशक्ति द्विजाञ्छ्ैवान्यतिनश्च विशेषतः। भोजयित्वा सुसन्तोष्य स्वयं भोजनमाचरेत् : ४५। यामे यामे यथा पूजा कार्या भक्तवरैहरे। शिवरात्रौ विशेषेण तामहं कथयामि ते ।४६। प्रथमे चैव यामे च स्थापितं पार्थिवं हरे। पूजयेत्परया भक्त्या सूपचाररनेवशः।४७। पंचद्रव्यैश्च प्रथम पजनीयो हर सदा। तस्य तस्य च मन्त्र ण पृथग्द्रव्यं समप येत् ।४८। तच्च द्रव्यं समर्प्येव जलधारां रुदेन वै। पश्चाच्च जलधाराभिर्द्र व्याप्युत्तारयेद् बुधः ।४९।

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१०४ ] [ श्री शिवपुराण

हे देवेश्वर ! हे सर्वाद्य ! आप मेरे यथा शक्ति किये हुए इस व्रतसे सन्तुष्ट तथा प्रसन्न होकर मुझ सेवकपर कृपाकी दृष्टि करें ॥४३॥ इसके पश्चात् भगवान् शंकरको पुष्पोंकी अञ्जलि समर्पित करके सविधि दान देवे तथा शिवको प्रणामकरके अपने गृहीत नियमका विसर्जन करे ।४४। शिव के भक्त एवं उपासक ब्राह्मणोंको और विशेष रूपसे संन्यासियोंको अपनी शक्तिकेअनुपार तृप्तिपूर्गक भोजनकराकर पूर्ण सन्तुष्टकरे। और फिर स्वयं भी भगवान के प्रसाद के स्त्ररूप में प्राप्त भोजन करे॥४५॥ हे विष्णो ! शिविके श्रष्ठुभक्तोंको जसे प्रत्येक प्रहरमें महाशिवरात्रिके दिन विशेष पूजन करनाचाहिए, उसपूजनके विधानको आपको सुनाता हूँ।४६। हे विष्णुदेव ! पहिले प्रहरमें संस्थापित पार्थिव शिवलिंगका अनेक उपचारोंके द्वारा परम भक्तिपूर्णक अर्चन करे।४७। सर्वप्रथम पाँचकृत्यों द्वारा शिवकापूजन करे प्रत्येक वस्तुके मन्त्रसे उसे समर्पित करना चाहिए, प्रत्येक द्रव्यका पृथक् २ समर्पण करे।४। पूजनके द्रव्योंके समर्पणके साथ प्रत्येक द्रव्यके पश्चाद् जलकी धारा चढ़ानी चाहिए। इसके अनन्तर विद्वान व्रत करने वालेको जलकी धारासे ही समर्पष किये हुए द्रव्यको उतारना चाहिए ॥४९॥

शतमष्टोत्तरं मन्त्र पठित्वा जलधारया। पूजयेच्च शिव तत्रनिरगुणं गुणरूपिणम् ॥५० गुरुदत्त न मंत्र ण पूजयेद् वृषभध्वजम्। अन्यथा नाममत्रेण पूजयेद्व सदाशिवम् ॥५१ चन्दनेन विचित्रण तण्दुलैश्चाप्यखण्डितैः। कृष्णैशचंव तिलैः पूजा कार्या शभो: परात्मनः ॥५२ कुष्पश्च शतपत्रइच करवीरैस्तथा पुनः। अष्टभिरनाममंत्र श्चार्पयेत्पुष्पाणि शंकरे ५३ भव शर्णस्तथा रुद्रः पुनः पशुपतिस्तथा। उग्रो महांस्तथा भीम ईशान इति तानि व ।५४ श्रीपूर्वैश्च चतुर्थ्यन्तैर्नामभि पूजपेच्छिवम्। पश्चाद् धूप च दीप च नैव द्य च ततः परम्।५५

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शिवरात्रि ब्रत का माहात्म्य ) १०५

आद्य यामे च नैवेद पक्त्रान्न कारतेद् बुवः । अर्घ च श्रीफलं दत्वा ताम्बूलं च वेदयेत् ।५६। उस समय एकसौ आठवार ॐ नमःशिवायः' इस परमविरुषात पञ्चा क्षरी मन्त्रको पढ़कर निर्गुण एवं सगुणस्वरूप शिवका पूजनकरना चाहिए ।५०। गुरुसे उपदिष्ट मन्त्रके द्वारा अयवा नाम मन्त्रसे सदाशिवका समर्चन करना चाहिए ।५१।। शिवका पूजन सुन्दर चन्दन अखण्डित अक्षन (चावल) काले तिलोंसे करना उचित है।५२। कमलके दल, सौन और कनेरसे शिवका पूजन करे और शिव भगवान्के ऊपर शिवके आठों नाम मन्त्रोंके द्वारा पुष्प चढ़ावे i।५३॥ भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, महान् भीम, उग्र ईशान-ये शिव भगवानके आठ नाम हैं ॥५४।। 'श्री' पहिले लगाकर नामके अगे चतुर्थी विमक्ति लगावे। तथा 'ॐ श्री भावय नमः इत्यादि वत् सब नामोंसे शिवकी अर्चना करे। इसके पश्चात् धूप, दीप, नैवेद आदि चढ़ाना चाहिए ।।५५।। प्रथम प्रहरमें बुद्धिमान् मक्तोंको पकवान्न सहित नवैदयका समर्पण करना चाहिये तथा अर्घ, श्रीफल, विल्व, नारियल चढ़ाकर अन्तमें ताम्बूल समर्पित करे ॥५५॥ नमस्कार ततो ध्यान जपःरप्रोक्तो गुरोर्मनोः। अन्यथा पञ्चवर्णेन तोषयेत्त न शंकरम् ।५७। धेनुमुद्रां प्रदर्श्याय सुजलेस्तर्पण चरेत्। पञ्चब्राह्मणभोज च कल्ययेद्व यथाबलम् ।५८: महोत्सवश्च कर्तव्यो यावद् यामो भवेदिह। ततः प जाफल तस्मे निवेद्य च विसर्जयेत् ।५९। पुनद्वितीये यामे च संकल्प सुसमावरेत्। अथवैकन्रैव संकल्प्य कुर्यात्प जां तथाविधाम् ।६०। द्रव्यै: पूर्णेस्तथा पजा कृत्वा धारा समर्णंयेत्। पर्वतो द्विगुण मन्त्र समुच्चार्यार्चयेच्छिवम्।६१। पर्वेस्तिलयवैश्चाथ कमलंः प जयेच्छिवम्। बिल्वपत्र विशेषेण पू जयेत्परमेश्वरम् ।६२।

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१०६ ] श्री शिवपुराण

अर्ध्यां च बीजप रेण नैवेद्य पायसं तथा। मन्त्रावृत्तिस्तु द्विगुणा पूर्व तोऽपि जनार्दन।६३। इसके पश्चात् नमस्कार और ध्यान करके गुरूदिष्ट मन्त्रका अथवा मेरे मन्त्रका जापकरना चाहिए : किम्बा पञ्चाक्षरी मन्त्रसे शिवको सन्दुष्ट करे ।५७। इसके पश्चात् धेनुमुद्राको प्रदर्शित कर निर्मल जलके द्वारा महे- श्वरकी तृप्ति करे और अपनी शक्तिके अनुसार पाँच ब्राह्मणोंको भोजन करावे ।५=। इसके पश्चात् शेष जितनाभी समय रहे भहोत्सव करता रहे। इसके अनन्तर समस्त पूजाके फलोंको देकर देवका विसजन करना चाहिए ।५१। यहाँ तक प्रथम प्रहरको पूजा हुंई। अब द्वितीय प्रहरके आरम्भमें भली-भाँति सङ्कल्प करे अथवा आरम्ममें एकहीबार सङ्कल्प करे पूजनका आरम्भ करे जोकि पूर्ववत ही होवे ।६०॥ पृर्वकी भाँतिही प्रथम द्रव्योंसे पूजाकरके फिर जलकी धारा समर्पित करे। इस दूसरे प्रहरमें प्रथम प्रहर की अपेक्षा द्रिगुण मन्त्रोंकाजाप करते हुए शिवार्चन करना चाहिए।६१।। प्रथम प्रहरके पूजनसे शेष रवखे हुए तिल, जौ, चावल और कमलोंसे और विशेषरूपसे बिल्वपत्रोंसे सदाशिवका पूजनकरना चाहिए।६२। हे विष्णो! बिजौरा नीबूका अर्ध्य तथा खीरके नैवेदयका अर्पण कर और पहिलेसे भी दुगुने मन्त्रोंका जाप करना चाहिए ।६३।। ततश्च ब्राह्मणानां हि भोज्यसंकल्पमाचरेत्। अन्यत्सर्व तथा कुर्याद्यावच्च द्वितयावधि ।६४। यामे प्राप्त तृतीये च पूर्वत्प जन चरेत्। यवस्थाने च गोधूमाः पुष्पाण्यर्कभवानि च ।६५। धूणैश्च विविरधस्तत्र दीपैर्नानाविघैरपि। नैवेद्याप पकर्विष्णोः शाकर्नानाविधैरपि ।६६। कृत्वैवं चाथ कप रैरारातिक्रविधि चरेत्। अध्य च ताडिम दद्याद् द्विगुणं जपम चरेत् :६७। ततश्च ब्रह्मभोजस्य संकल्प च सदक्षिणम्। उत्सवं पू र्व वत्कुर्ताद्यानद्यामावधिर्भवेत् ।६८।

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शिवरात्रि ब्रत का माहात्म्य [१०७ - यामे चतुर्थ संप्राप्त कुर्यात्तस्य विसर्जनम्। प्रयोगादि पुना कृत्वा पुजां विधिवदाचरेत् ।६र ६। माषः प्रियंगुभिर्मु द्रगै सप्तधान्य स्तथाथवा। शङ्गीपुष्पैबिल्वपत्र : पू जयेत्परमेश्वरम् ।०। इसके पीछे योग्य ब्राह्मणोंके भोजन करनेका सङ्कल्प करे बाकी सम्पूर्ण पूजनको प्रथमप्रहरके समान द्वितीय प्रहरकी समाप्तितक करता रहे ।६४।। यहाँ द्वितीय प्रहरकी अर्चना समाप्त हो जाती हैं और अब तीसरे प्रहरके पूजनका विधान आरम्भहोता है। इस प्रहरमें मी पूर्ववत् पूजनका क्रम करना चाहिये। यज्ञोके स्थानमें गेहूँ तथा आकके पुष्प चढ़ावे ।६५॥ हे विष्णुदेव ! तोसरे प्रहरमें अनेक तरहकी उत्तम धृप, बहुतसे दीपक पुआ का नैवेद्य और अनेक भाँतिके शाकोंसे पूजन करे ।५६। इस तरह पूजन करके शिवकी आरती कपूरसे करे। अनारनका अ्ध्य देवे और पहिले की अपेक्षा द्विगुणित मन्त्र जाप करना चाहिए ।६७। इसके अनन्तर दक्षिणाके साथ ब्रह्ममोज करानेका सङ्कल्प करे और तृतीय प्रहरकी समाप्तिके पर्यन्त पहिले की तरह उत्सव करता ही करे ॥६८॥ यह तीसरे प्रहरकी पूजा समाप्त होती है अब चौथेप्रहरकी अर्चन का आरम्भ होजाता है जब चतुर्थ प्रहरकी पूजाका अवसर आवे तो पहिलेका विसर्जनकर देवे और फिर नये सिरेसे आवाहन आदि करके पूर्ण बिधि-विधानसे पूजन करे ॥६९॥ अञ उड़द, मूंग, काँगनी अथवा सात धान्यों, शङ्को-पुष्प और विल्वपत्रोंसे शिवका अचंन करना चाहिए।।७।। नैवेद्य तत्र दद्याद्व मधुरैविविधैरपि। अथवा चैव माषान्नैस्तोषयेच्च सदाशिवम् ।9१। अर्ध दद्यात्कदल्यश्च फलेनैवाथ वा हरे। विविधैश्च फलैश्चैव दद्यादर्ध्यां शिवाय च ।७२। पूर्णतो द्विगुणं कुर्यान्मन्त्रजाप नरोत्तमः। सकल्प ब्रह्मभोजस्य यथाशक्ति चरेद् बुधः ।७३। गीतैर्वांद्य स्तथा नृत्यौर्नयेत्कालं च भक्तितः ।

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मयौत्सव वैर्भक्तजनैर्यावत्स्यादरुणोदयः ।७४। उदये च तथा जाते पुनः स्नात्वार्चयेच्छ्िवम्। नानाप जोपहारैश्च स्वाभिषेकमथाचरेत् ।७५। नानाविधानि दानानि भोज्य च विविध तथा। ब्राह्मणानां यतीना च कर्तव्यं यामसंख्यया।७६। शकराय नमस्कृत्यञ्जलिमथाचरेत्। प्रार्थयेत्सुस्तुति कृत्वा मंत्र रेतैर्विचक्षणः ।७। इसके पश्चात् अनेक प्रकारके मिष्ठान्न नैवेद्योंको शिवके लिये समर्पित करे अथव, उड़दके बने हुए पक्वान्नसे शिवको सन्तुष्ट करना चाहिए ।७१। हे हरे ! इस समय वेलाकी गैरका अर्ध्य देवे किम्बा ऋतुके विविध फलों मे भगवान् शिवको अर्ध्य देना चाहिए ।७२।। इसके पश्चात् विद्वान् शिवव्रनी व्यक्तिको पहिलेसे दुगुना मन्त्र जापकर अपनी शक्तिके अनुकूल ब्राह्मण-मोजन करानेका सङ्कल्प करना चाहिए ॥७३।। भक्तिपूर्वक गायन, वाद्य, नर्तन आदिको करते हुए भक्तोके सहित महान् उत्सवका समारोह अरुणोदय पर्यन्त करके समयके शेष भागको व्यतीतकरना चाहिए ॥७४॥ भुवन भास्करके समुदित होने पर स्नान करके पुनः शिवका अर्चन करना चाहिए। तत्पश्चात् अनेक पूजाके योग्य भेंटोके द्वारा अपना अभिषेक करना चाहिए ।७५।। इसके अनन्तर प्रहरोंके अनुसार अर्थात् प्रहरोंकी संख्याके अनुकूल विविध तरहके दान, विभिन्न प्रकारके भोजन ब्राह्मणों तथा संन्यासियोंको अपने संङल्पानुरूप सम्पित करने चाहिए ॥७६।। इसके पश्चा शिवको प्रणामकर पुष्पाञ्जलि समर्पित करे और फिर सुबुद्धि भक्तको निम्नप्रकारके मन्त्रोंसे प्रार्थना करनी चाहिए ।७७।। तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽह सदा मृड। कृपानिधे इति ज्ञात्वा यथा योग्यं तथा कुरु ।७८। अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपप जामिक मया। कृपानिधित्वाज्ज्ञात्वैव भूनाथ प्रसीद मे ॥७९। अनेनैवोपवासेन यज्जातं फलमेव च।

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तैनैव प्रीयतां देवः शंकरः सुखदायक: ८०। कुले मम महादेव भजनं तेडस्तु सर्वदा। माभू त्तस्य कुले जन्म यत्र त्वं न हि देवता ।८१। पुष्पाँजलि समर्प्येव तिलकाशिष एव च गृहणीयाद् ब्राह्मरोभ्यश्च ततः शम्भु विसर्जयेत् ।८२। एव ब्रतं कृतं येन तस्माद् दूरो हरो न हि। न शक्यते फलं वक्तु नादेयं विद्यते मम ।८३। अनायासतया चेद्व कृतं व्रतमिद परम्। तस्य वै मुक्तिबीजं च जात नात्र विचारणा ।८४। हे कृपानिधे ! हे शिवजी ! मैं आपका हूँ और आपकेही प्राणों वाला तथा आपवेही चित्त वाल हूँ - यही समझकर जी भी उचित हो वही आप करें।७८। हे भूतनाथ ! मुझ सेवक के द्वारा अज्ञानवश पूजन तथा जप आदि किया गया है उससे आप अपनो स्वाभाविक दयालुता के कारण से मुझ पर प्रसन्नहोवें ।७९ इस परमपावन व्रतसे जोभी उत्तम फल होता है। उससे आप सनस्त सुखों के प्रदान करने वाले मुझपर प्रसन्नता करें 1८0। हे महादेव ! मैं यही चाहता हूँ कि मेरे कुल में सदा आपका भजन पूजन करते रहें और मैं कभीभी ऐसे वशमें न होऊ जिसमें आपका नाम संकीर्तन न होता हो ।८१। इस रीति से निवेदन करके पुष्पाँजलि समर्दित कर ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद के तिलोंका ग्रहण करे और इसके अनन्तर शिव का विसर्जन कर देवे ।८२। इस प्रकार से जो भी व्रत करते, 'उनसे भग- वान शम्भु कभी दूर नहीं रहा करते हैं। इस व्रतका पूर्ण फल मैं नहीं कह सकया हूँ। ऐसे भक्त को मुझे कुछ भी अदेय वस्तु नहीं होती ।८३। यदि बिना कुछ श्रमके भी यह परम श्रष्ठ व्रत किया गया हो, उसकोभी मोक्ष बीज अवश्य होता है-इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।८४। प्रतिामसं वृतं चैव कर्तव्यं भवितितौ नरैः। उद्यापनविधि पश्चात्कृत्वा सांगभल लभेत् ॥।८ ५ ब्रतस्य करणान्न न शिवोऽहं सर्वदुःखहा।

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दद्मि भुक्ति मुक्ति च सर्ग वै वाच्छितं फलम् ।८६। इति शिववचनं निशम्य विष्णुहिंततरमद्भुतमाजगाम धाम। तदनु व्रतमुत्तमं जनेष समचरदात्महितेषु च तदेव ।८७। कदाचिन्नारदायाथ शिवरात्रिव्रतन्त्विदम्। भुक्तिमुक्तिप्रद दिव्यं कथयामास केशवः ।८८। ससारमें मनुष्योंका कर्तव्य हैकि शिवदेवको प्रसन्नकरनेके लिये प्रत्येक मासमें चतुर्दशीके दिन इस ब्रतको करना चाहिए और भक्तिके साथ पीछे उदयापन करके पूर्ण अङ्गोंवाला इसके फलका लाभ प्राप्त करे ॥८५॥ इस ब्रतके करने वालेका निश्चत रूपसे अवश्यही मैं सारा दुःख दूर भगा देता हूँ और उसे भुक्ति मुक्ति दोनों प्रदानकर सम्पूर्ण अभीप्सित फल दिया करता हूँ।८६। सूतजीने कहा-भगवान् विष्णुदेव महेश्वरके इस प्रकार के परम हितप्रद बचनोंको श्रवणकर अद्भुत एवं अतुल तेजको प्राप्तहुए और इसके उपरान्त उन्होंने अपने हित चाहने वाले मनुष्योंके निकटमें उपस्थित होकर यह शिवका परम श्रष्ठ व्रत किया ।८७। एकबार इसी दिव्य शिवके व्रनके विषयमें भगवान् विष्णुने श्रीनारदजी से कहा था कि यह भोग मोक्ष दोनों का देने वाला सर्वोत्तम ब्रत है ॥८८।। । शिवरात्रि ब्रत का उद्यापन उद्यापनविधि ब्र हि शिवरात्रिव्रतस्य च। यत्कृत्वा शंकरः साक्षात्प्रसन्नो भवति घ्र वम्। श्र यतामृषयो भक्तया तदुधापनमादराद। यस्यानुश्ठनतः पूर्ण भवति तद् धू वम् ।२। चतुशांब्दं कर्तव्य शिवरात्रिव्रतं शभम्। एकभक्त त्रयोदश्यां चतुर्दश्यामुपोषणम् ।३। शिवरात्रिदिने प्राप्ते मित्य संपाद्य वै विधिम्। शिवालय ततो गत्वा पूजा कृत्वा यथाविधि।४। ततश्च करायेदि्दव्यं मण्डलं तत्र यत्नतः ।

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शिवरात्रि व्रत का उद्यापन ] [ १११

गौरीतिलकनाम्ना वै प्रसिद्ध भुवनत्रये ॥५ तन्मध्ये लेखयेदि्दव्यं लिंगतोभद्रमण्डलम्। अथवा सर्वतोभद्र मण्डपान्तः प्रल्पयेत् ॥६ कुभास्तत्र प्रकर्तव्याः प्राजापत्यविसंज्ञया। सर्वस्त्रा सफलास्तत्र दक्षिणाससिताः शभ्यः ।७ ऋृषियोंने कहा-अब आप महाशिवरात्रिके व्रतकी उद्यापनकी विधि का वर्णन करें जिसके करने से साक्षात् भगवान् शिव निश्चित रूपसे प्रसन्न होजाया करते हैं॥१॥ सूतजीने कहा-हे ऋषिगण ! अब आप पूर्ण मक्तिके साथ आदरपूर्व क महाशिवरात्रि के व्रतके उद्यापन करनेके विधान को परम प्रमपूर्वक श्रवण करो जिसके कर देनेसे यह महाव्रत निश्चिय ही पूर्ण हो जाया करता है॥२॥ इस परम शुभ शिवरात्रिका ब्रत चौदहवर्ष तक करना चाहिये। इस ब्रतमें त्रयोदशीके दिन एकबार भोजन करे और चतुर्दशीकेदिन उपवास करनाचाहित॥। ३॥ शिवरात्रिके दिन नैत्यिक विधि को समाप्त करके भगवान् शिवके मन्दिरमें जाकर सविधि उनका अर्चन करना चाहिए ॥४॥। इसके अनन्तर भगवान् शम्भुके समीपमें यत्नके साथ दिव्य मण्डलकी रचना करानी चाहिए जिस मण्डल की विभूवनमें गौरी- तिलकके शुभ नामसे ख्याति है ॥५॥ इसके मध्यमें सुन्दर लिंगतोभद्र- मण्डलको बनावे अथवा उस मंडलके अन्दर सर्वतोभद्र चक्रका निर्माण करना चाहिये।६। उस जगह प्राजापत्यके नामसे वस्त्र फल और दक्षिणा के सहित शुभ घटोंकी स्थापना करे॥७॥ मण्डलस्य च पारश्वे वै स्थापनीयाः प्रयत्नतः । मध्ये चक्रश् संस्थाप्यः सोवर्णो वापरो धटः ॥८ तत्रोमासहितां शभुमूर्ति निर्माय हाटकीम्। पलेन वा तदर्द्धन यथाशक्तयाऽथवा ब्रती॥९ निधाय वामभागे तु शिवामूर्तिमतन्द्रितः। मदीयां दक्षिणे भागे कृत्वा रात्रौ प्रपूजयेत् ॥१० आचार्य वरयेत्तत्रचत्विग्भिः सहितं शुचिम्।

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११२ ] [ श्री शिवपुराण अनुज्ञातश्च तैर्भक्तया शिवपूजां समाचरेत् ॥११ रात्रौ,जागरण कुर्यात्प जां यामोद्भवां चरन्। रात्रिमाक्रमयेत्सर्त्रा गीतनृत्यादिना व्रती ॥१२ एवं सम्पज्य विधिवत्सतोष्य प्रतिरेव च। पुनः पूजां ततः कृत्वा हौमं कुर्याद्यथाविधि ॥१३ यथाशक्ति विधान च प्राजाप्रत्यं समाचरेत्। ब्राह्मणान्भोजय त्प्रीत्या दद्यादुदानानि भक्तितः ।। उस मण्डपके समीप मध्यमें एक या दो सुवर्ण कलशोंकी स्थापना करनी चाहिए जहाँकि शिवके व्रत करनेवाले व्यक्ति एक अथवा आधेपल की सुवर्णकी पार्वतीकेसाथ शिवकीप्रतिमा स्थापित करे ॥८॥९॥आलस्य का त्यागकर वहाँपर वामभागमें जगदम्बा पार्वतीकी प्रतिमा और दक्षिण भागमें भगवान् शिवकी मूर्तिकी स्थापना सविधिकर रात्रिमें उनका अर्चन करना चाहिए ।१०। उस मण्डा योग्य ऋत्विजों और आचार्यका वरण मी करे जिनकी आज्ञाके अनुसारही भक्ति-भावके साथ शिवकी वन्दनार्चन करना चाहिये॥११॥ प्रत्येक प्रहरमें पूजन करते हुई रात्रिका जागरण करे और बड़े उत्साह के साथ गीत भजन तथा नृत्य आदिसे उस रात्रिका समय व्यतीत करे ॥१२॥ इस रीतिसे रात्रिको सविधि शिवपृजनकर शिव को सन्तुष्ट करे और फिन प्रातःकालमें पुनः शिवार्चन कर हवन करना चाहिये। १३। इस प्रकार अपनी शक्तिके अनुसार प्राजापत्य व्रतका विधान करे और इसके उपरान्म प्रेमपूर्वक ब्रह्मभोज कराके दान देवे। इस समस्त विधानमें पूर्ण भक्तिकी भावना होनी चाहिये ।१४।। ऋत्विजश्च सपत्नीकान्वस्त्रालकारभूपणैः । अलंकृत्य विधानेन दद्याद्दानं प थक्प थक ।।१५ गां सवत्सां विधानेन यथोपस्करसंय ताम्। उक्त्वा चार्याय वै दद्याच्छिवो मे प्रीयतामिति ।१६ ततः सकुम्भां तन्मूर्ति सवस्त्रां वृषभे स्थिताम्। वालंकारसहितामाचार्याय निवेदये त् ॥१७

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शिवरात्रि व्रत का उद्यापन ) ११३

ततः संप्रार्थयेद्द्व महेशानं महाप्रभुम्। कृतांजलिर्नतस्कन्धः सुप्रीत्या गद्गदाक्षरः ।१८। देवदेव महादेव शरणागतवत्सल। ब्रतेनानेन देवेशं कृपां कुरु ममोपरि ।१९। मया भक्तयनुसारेण व्रतमेतत्कृत शिव। न्यूनं सम्पूर्णतां यातु प्रासाद्रात्तव शङ्कर।२०। अज्ञानादयदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिक मया। कृतं तदस्तु कृपया सफलं तव शङ्कर ।२१। एवं पुष्पाञ्जलिं दत्वा शिवाय परमात्मने। नमस्कार्र ततः कुर्पात्प्रार्थनाँ पुनखे च। २। एवं ब्रतं कृतं येन न्यूनं तस्य न विद्यते। मनोऽभीष्टां ततः सिद्धिं लभते नात्र संशयः ।२३। जो बरण किये हुए ऋत्विज हो उन्हें सपतनीक वस्त्राभूषण आदि से सुसज्जित कर विधिके साथ पृथक पृथक् उन्हें दान देना चाहिए ।१५॥ सवत्सा दूध देने वाली गौका दान समस्त वस्तुओं के साथ आचार्यको देवे और यह कहकर देना चाहिए कि भगवान्शिव मुझपर प्रसन्न होवें ॥१६॥ इसके उपरान्त कलश तथा वस्रादिके साथ वृषभपर विराजामान शिवकी प्रतिमाको वस्राभूषगों से युक्त आचार्य को समर्पित कर देवे ॥१७॥ इसके पवात् अपने कन्धोंको नीचेकी ओर भुकाकर विनम्र भावसे दोनों हाथ जोड़कर शित्रके समीप गद्गद् वाणी से प्रार्थता करे।१८। हे देवों के देव ! हे महादेव ! हे शरणागत वत्सल ! हे देवेश ! आप अब इस ब्रत से मेरे ऊपर प्रसन्नहोकर कृपाकी दृष्टि करें ॥१९॥ हे शिव ! भक्तकी भावनाका आश्रयलेकर मैंने इसब्रतको किया है सो हे शङ्कर ! इसमें कुछ न्यूनताभी रह गई हो तो आपकी प्रसन्नता से पूर्णताको प्राप्त हो ॥२०॥ हे श ङ्कर ! मैंने ज्ञान या अज्ञानसे जो कुछभी आपका पूजन तथा जप आदि किया है सो सव आपकी अपनी कृपासे सफल होवे।।२१। इसविधिसे नम्र प्रार्थना के सहित पुष्पोंकी अञ्जलि समर्पित कर शिवको प्रणाम करे ॥२२॥ इस

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११४ ] [ श्री शिवपुराण तरह जिसने भी इस व्रतको किया है उसमें कोई भी न्यूनता नहीं रहा करती है और वह शिवब्रती मनकी चाही हुई सिद्धि ही प्राप्त कर लेता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥२३॥ व्याध-कथा प्रसंग में शिवरात्रि माहात्म्य वर्णन सूत ते वचन श्रत्वा परानन्द वयं गताः। विस्तरात्कथय प्रीत्या तदेव प्रतमुत्तमम् ।१। कृत पुरा च केनेह सूत तद् व्रतमुत्तमम्। कृत्वाप्यज्ञानतश्चैव प्राप्त कि फलमुत्तमम् ।२। श्र यतामषयः सर्वे कथयामि पुरातनम्। इतिहासं निषादस्य सर्वपापप्रणाशनम्।३। पुरा कश्द्वने भिल्लो नाम्ना ह्यासीद् गुरुद्र हः। कुटुम्बी बलवान्क्र र: क्र रकर्मपरायणः ।४। निरन्तर वने गत्वा मृगान्हन्ति स्म नित्यशः। चौर्य्य च विविधं तत्र करोति स्म वने वसन् ।५। बाल्यादारभ्य तेनेह कृतं किंचिच्छुभ न हि। महान्कालो व्यतीयाय वने तस्य दुरात्मनः।६। कदाचिच्छिवरात्रिश्च प्राप्तासीत्तत्र शोभना। न दुरात्मा स्म जानाति महष्टननिवासकृत् ।७। ऋषियोने कहा-हे सूतजी ! आपके बचन सुनकर हम सबको अत्यन्त आनन्द हुआ हे। अब आप कृपाकर उसी परम श्रेष्ठ ब्रतको प्रीत-पूर्वक विस्तारसे कहिए।१। हे सूतजी ! इस संसारमें सर्व प्रथम यह व्रत किसने किया था और अज्ञानसे मी इस श्रष्ठ व्रतको करनेसे क्या फल प्राप्त होता है ? कृपाकर यहसब बताइये।२। सूतजीने कहा-हे ऋषिगण ! इस सम्बन्ध में मैं एक परम प्राचीन तथा समस्त पापोंका नाशक निषादका आख्यान तुमको सुनता हूँ।३। बहुतपहिले पुरानेसमयमें गुरुद्र ह नामसे विख्यात, बहु कुटुम्बी और अतिबलवान् एकभील बनमें रहाकरता था जोकि सर्वदा हत्या आदि करने के बुरेसे बुर कर्मोंमें तत्पर रहता था ॥४॥ उसका यह नित्य

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शिवरात्रि माहात्म्य वर्णन 1 ११५

का काम था कि बनमें मृगोंकी शिकार करे और वहाँ आते-जाते लोगों के धनका अपहरण करे।५। उसने अपने बचपनसे लेकर युवावस्थातक कोई भी शुभ कर्म कभी नहीं किया और इसी रीतिसे बनमें रहते हुऐ उस दुरात्माका बहुत समय व्यतीत हो गया ।६। इस तरह रहते हुए उसे शुभ महाशिवरात्रिका समय अ गया किन्तु उस दुष्ट बुद्धिकी इस परम पावन दिनका कुछ भी ज्ञान नहीं हुआ ।।७॥ एतस्मिन्समये भिल्लो मात्रा पित्रा स्त्रिया तथा। प्राश्चितश्च क्षधाविष्टर्भक्ष्य देहि वनेचर ।८। इति संप्रार्थितः सोऽपि धनुरादाय सत्वरम् । जगाम मृगहिसार्थ बभ्राम सकलं वनम् ।९। दवयोगात्तदा तेन न प्राप्त किंचदेव हि। अस्तं प्राप्तस्तदा सूर्यः स वै दुःखमुपागतः ।१०। किं कर्तव्यं कव गतव्यं न प्राप्त मेजद्य किंचन। बाल श्र ये गृहे तेषां कि पित्रोश् भविष्यति ।११। मीदय वै कलत्रं च तस्या: किचिद् भविष्यति। किंचिद् गृहीत्वा हि मया गन्तव्यं नान्यथा भवेत् ।१२। इत्थं विचार्य स व्याधो जलाशयसमीपगः । जलावतरण यत्र तत्र गत्वा स्वयं स्थितन ।१३। अवश्यमत्र कश्िद्व जीवश्चैवागमिष्यति। त हत्वा स्वगृह प्रीत्या यास्याभि कृतकार्यकः ।१४। उसी समय उसके माता-पिता और पत्नीने उससे कहा-हम भूखसे अत्यन्तही व्याकुल होरहे हैं,हमको कहींसे भोजन दो ।5। माता-पिता और पत्नीकी इस बातको सुनकर वह अपता धनुष उठाकर शीघ्रही मृग मारने के लिये घोर वनमें गया और चारों और बहुत घूमा-फिरा किन्तु देवयोग से उसदिन उसे कुछ शिकार नही मिली। जब सूर्य अस्ताचलगामी होगए तो उसे बड़ी चिन्ता हुई और वह अत्यन्त दुःखित हुआ ॥९-१०॥उसने बनमें सोचा-क्या वरू और अब कहाँ जाऊ? खेदकी बात है कि आज

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११६ ] [ श्री शिवपुराण

मुझे कुछभी मोजनकासाधन नहीं मिला है। में अपने माता-पिताऔर पुत्र पत्नीको क्या खिलाऊँगा? ॥११॥ मेरी स्त्री गर्भवती है अतः उसके लिये अवश्यही कुछ खानेकी वस्तु लेजाना आवश्यक है। अतः अब मैं भोजनका सामान लिये बिना घरको नहीं वापिस लौटूगा।१२। ऐसा विचार करके वह भील एक सरोवरके तटपर जाकर बैठ गया ॥१३॥ उसने सोचा यह जलपीनेका घाट है इसलिये यहाँ अवश्य ही कोई न कोई जीव आवेगा। उसका वध करके सफल होकर ही आनन्दसे घरमें जाऊंगा । १४॥ इति मत्वा स वै वृक्षमेकं विल्वेमिसंज्ञकम्। समारुह्य स्थितस्तत्र जलमादाय भिल्लकः ।१५। कदा यास्यति कश्रिद्व कदा हन्यामहं पुनः। इति बुद्धिं समास्थाय स्थितोऽसौ क्ष त्तषान्वितः ।१६। तद्रात्रौ प्रथमे यामे मृगी त्वेका समागत। तृषार्ता चकिता सा च प्रोत्फाल कुर्वती तदा ।१७। तां दृष्टवा च तदा तेद तद्वधार्थमथो शरः। सहृष्टेन द्र वं बाणं धनुषि स्वे हि सदधे ।१८। इत्येवं कुर्वतस्तस्य जलं बिल्वदलानि च। पतितानि ह्यधस्तत्र शिवलिगमभूत्ततः ।१९। यामस्य प्रथमस्यंव पूजा जाता शिवस्य च। तन्महिम्ना हि तस्यैव पातक गलित तदा।२०। तत्रत्यं चैव तच्छब्दं श्रत्वां सा हरिणी भिया। व्याधं दृष्टवा व्याकुल हि तचनं चेद्मव्रतीत् ।२१। वह भील अपने दिलमें एसा विचार करके जल लेकर एक बेलके वृक्ष पर चढ़ गया और वहाँ बैठगया ॥१५॥ कब कोई जीव आवे और कब मैं उसे मारू-यही मनमें विचार करके भूखा-प्यासा वह भील वहां प्रतीक्षा में स्थित हो गया ॥१६॥। जब रात्रिका प्रथम प्रहर हो गया तो एक हिरनी प्याससे वेचैन होकर हाँपती हुई वहाँ आई ।।१७॥ हे विष्णुदेव ! उसी मृगीको देखकर उस व्याधको नहुत प्रसन्नता हुई और उसने हिरनीको

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शिवरात्रि माहात्म्य वर्णन ] ११७

मारनेके लिए तुरन्त ही धनुषपर बाण चढ़ा लिया ।१८। धनुष और तीर को साधनेके प्रयत्नमें उनके हाथसे बेलपत्र और जल नीचे गिरगये जहाँकि एक शिवका ज्योतिलिंङ्ग स्थापित था ॥१९॥ इस तरह से अनजाने ही उसके द्वारा अनायास भगवान् शिवके प्रथम प्रहरका अर्चन हो गया। इस महारात्रि में शिव-पूजनके प्रभावसे उसके समस्त पापोंका क्षय हो गया। ।२०। उसके धनुषकी ध्वनिको सुनकर और मीलको वधके लिये प्रस्तुत देखकर वह हिरनी अत्यन्त भयभीत होकर उससे कहनी लगी।२१। किं कर्तुमिच्छसि व्याघ सत्यं वद ममाग्रतः । तच्छ् त्वा हरिणीवाक्यं व्याधो वचनमब्रवीत् ।२२। कुदुम्ब क्ष धितं मेडद्य हत्वा त्वं तर्पयाम्यहम्। दारुणं तद्वच: श्रत्वा दृष्ट्वा तं दुद्धरं खलम् ।२३। किं करोमि क्व गच्छामि ह्य पायं रचयाम्यहम्। इत्थ विचार्य्यं सा तत्र वचन चेदमब्रवीत् ।२४। मन्मांसेन सुखं ते स्याद्देहस्यानर्थकारिणः। अधिक किं महत्पुण्यं धन्याहं नात्र संशयः ।२५। उपकारकरस्यव यत्पुण्यं जायते त्विह। तत्पुण्यं शक्यते नैव वक्तु वर्षशतैरपि ।२६। परं तु शिशवौ मेऽद्य वर्तन्ते स्वाश्रमेऽखिलाः। भगिन्यौ तान्समप्यव प्रायास्ये स्वामिनेऽथवा।२७। न मे मिथ्यावचस्त्वं हि विजानीहि वनेचर। आयास्येह पुनश्चाह समीप ते न सशयः ।२८। हिरनीने कहा-हे व्याध ! तुम्हारी क्या करनेकी इच्छा है ? मेरे सामने अपना सत्य विचार प्रगट करो, मृगीकी इस बातको सुनकर वह मील कहने लगा ॥२२॥ व्याधने कहा-आज मेरा समस्त कुटुम्ब भूखा है, तुझ मारकर अपने परिवार वालोंके प्राणोंकी रक्षा करूँगा। मीलके इस उत्तर को सुनकर और मीषण व्याध के स्वरूप को देखकर हिरनी अपने मन में सोचने लगी ।२३। इस प्राणोंकी बाधाका समय उपस्थित होजानेपरमैं कहाँ

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११८ ] श्री शिवपुराण जाऊ और क्या करू! अच्छा कोई उपायरचता हूँ-ऐसा मनमें विचारकरके उसने कहा-।२४। मृगीने कहा-आज महान् अनर्थ करनेवाले इसमेरे शरीर से यदि आपको सुखमिले तो मेरा इससे अधिक और क्या महान् पुण्य हो सकता है। मैं आज बिना किसी संदेहके निश्चय ही बड़ी भाग्यशालिनी हूँ ।२५। इसलोकमें उपकार करनेवाले प्राणिका जितना पुण्य होता है उसका वर्णन एक सौ वर्ष में भी नहीं किया जा सकता है ॥२६॥ किन्तु केवल यही प्रार्थना हैकि इस समय मेरे सबबच्चे अपने स्थानमें अकेले हैं मैं उन्हें अपनी भगिनी अथवा स्वामीके पास सौंपकर तुरन्त आपके समीप में आ जाऊगी ।२७। हे वनचर ! आप मेरे इस वचनको असत्य मत मानना, मैं तुम्हारे पास निश्चय ही आऊँगी-इसमें कुछ सन्देह नहीं ।२८। स्थिता सत्येन धरणी सत्येनैव च वारधिः। सत्येन जलधाराश्र सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ।२९। इत्य क्तोऽपि तथा व्याधो न मेने तद्वचो यदा। तदा सुविस्मिता भीता वचन साव्रवीन्पुनः ।३०। शृणु व्याधप्रवक्ष्यामि शपथ हि करोम्यहम,। अगच्छेय यथा ते न समीप स्वगृहाद्गता।३१। ब्राह्मणो वेदविक्रता सन्ध्याहीनस्त्रिकालकम। स्त्रियः स्वस्वामिनो ह्याज्ञां उल्लंध्य क्रियान्वितः ।३२१ कृतध्ने चैव यत्पापं यत्पाप विमुखे हरे:। द्रोहिणश्चव यत्पापं यत्पाप धर्मलघने ।३३। विश्वासघातके यच्च तथा वै छलकर्तार। तेन पापेन लिम्पामि यद्यह नागमे पुनः।३४। इत्याद्यनेकशपथं मृगी कृत्वा स्थिता यदा। तदा व्याधः स विश्वस्य गच्छेति गृहमब्रबीत् ।३५। मृगी हृष्टा जलं पीत्वा गता स्वाश्रममण्डलम् । तावच्च प्रथमो यामस्तस्य निद्रां विना गत।३६। सत्यके प्रभावसे यह भ मि स्थित है और सत्य ही से सागर तथा जल

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शिवरात्रि म हात्म्य वर्णन 1 [ ११६ धारा स्थित है,निष्कषार्थ यही है कि सत्यमें सभी कुछ स्थित है।२९।सूतजी ने कहा-उस हिरनीकी ऐसी प्रार्थना सुनकर भी व्याधने नहीं माना तो वह अति आश्चर्यान्वित होकर बहुत डर गई और उसने फिर कहा ॥३०॥ मृगीने कहा-हे व्याध मैं जो भो कुछ निवेदन करती हूँ उसे आप सुनो मैं आपके समक्षमें शपथ खाकर कहती हूँ कि मैं अपने बचनकापलन अवश्य करूंगी अर्थात् मैं अवश्य ही वापिस आऊंगी। ३१॥ वेदों के बेचने वाले और त्रिकालमें मन्ध्या न करनेवाले ब्राह्णकोजो पापहोता है तथा कामों में आसक्त हुई रित्रयों को उपनी स्वामी की आज्ञाके उल्लंघन में जो पाप होता है एवं विश्वास घात करने वाले-कृतघ्नी-छल करने वाले और शिवसे विमुख रहने वालेको जोभी पाप होता है और धर्मको तोड़ने वाले को जोभी पातक लगता है मैं भी उसी पापकी भागिनी होऊगी यदि मैं कहकर आपके पास लौटकर वाटिस न आऊं ॥३२-३३-३४॥ इस तरह बहुत सी शपथ खाकर वह जब रिथत हुई तो व्याधने हिरनी से कहा, मैं विश्वास करता हू तू चली जा।३५॥ इसके पश्चात् जब तक वह हिरनी जल पीकर प्रसन्न हो अपने स्थानको गई तव तक प्रथम प्रहर बिना नींद लिये उस व्याधका व्यतीत हो गया ।३६।। तदीया भगिनी या वै मृगी च परिभाविता। तस्या मार्ग विचिन्वन्तो ह्याजगाम जलाथिनी।३७। तां दृष्ट वा च स्वयं भिल्लोऽकार्षीद् वाणस्य कर्षशाम पूर्ववज्जलपत्राणि पतितानि शिवोपरि।३८। यामस्य च द्वितीयस्य तेन शम्भोर्महात्मनः। पूजा जाता प्रसगेन व्याधस्य सुखदायिनी।३९। मगी सा प्राह त दृष्ठ वा कि करोषि वनेचर। पूर्ववत्कथित तेव तच्छुत्वाऽहं म गी पुनः।४०। धन्याऽहंव्र यता व्याध सफलं देहधारणम। अनित्येन शरीरेण ह्य पकारो भवष्यति ।४१। परन्तु मम बालाश्र गृहे तिष्टन्ति चाभैकाः। भत्र ताश्र सम्प्यव ह्यागमिष्याम्यह पुनः ।४२।

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१२० ! श्री शिवपुराण

इसके उपरान्त मृगीकी एक दूसरी बहिन उसकी खोज करने हुई जलपीनेको वहाँ आ पहुँची ॥३७॥ इस दूसरी हिरनी को देखकर मोलने इसका वध करनेके लिए फिर ज्यों ही धनुष खींचा कि उसके हाथसे पुनः पूर्ववत् बेलपत्र और जल शिव लिंग पर गिर पड़े ॥३८॥ यह इस प्रकारसे द्वितीय प्रहरका शिवार्चन व्याध का अनजाने ही सुसम्पन्न हो गया जो कि महान् सुख देनेवाला होता है ॥३९। उस समय वह हिरनी मीलको देख कर कहने लगी-यह आप क्या करना चाहते हैं ? व्याध ने पूर्ववत् उसके वध करने का उत्तर दिया। यह सुनकर मृगी कहने लगी ।४०।। मृगीने कहा-हे व्याध मैं परम धन्य हूँ, मेरा यह शरीर धारण करना आज सफल हो गया क्योंकि इस नाशवान् मेरे शरीर से आपका उपकार होगा-परन्तु केवल छोटीसी प्रार्थना यही है कि मेरे बच्चे सब एकाकी घर पर मेरी प्रतीक्षामें होंगे, मैं उन्हें अपने स्व्रामीके मुपर्द कर आऊं और फिर आपके समीप बहुत शीघ्र वापिस आती हूँ॥४१-४२॥ त्वया चोक्त न मन्येऽहं हन्मि त्वां नात्र सशयः। तच्छ् त्वा हरिणी प्राह शपथ कुर्वती हरे।४३। शृणु व्याध प्रवक्ष्यामि नागच्छेय पुनर्यदि। वाचा विचलितो यस्तु सुकृत तेन हारितम ।४४। परिणीतां स्त्रिय हित्वा गच्छत्यन्यां च यः पुनाम् । वेदधर्म समुल्लध्य कल्पितेन च तो ब्रजेत् ।४५ विष्णुभक्तिसमाय क्तः शिवनिन्दां करोति यः। पित्रो क्षयाहमासाध शून्य चैवाक्रमेदिह ।४६। कृत्वा च परितापं हि करोति वचनं पुनः। तेन पापेन लिम्पामि नागच्छेय पुनर्यदि ।४७। इत्य क्तश्च तथा व्याधो गच्छेत्याह म गीं च सः। सा म गीच जलं पीत्वा हृष्टाऽगच्छत्स्वमाश्रमम ।४८। तावद् द्वितीयो यामो वै तस्य निद्रां बिना गतः। एतस्मिन्समये तत्र प्राप्त यामे तृतीयके ।४९।

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मीलने कहा यह तेरा कथन मैं नहीं मान सकता-मैं अब अवश्यही मारूंगा, इसमें कुछभी सन्देह नहीं है। हे हरे ! यह व्याधके वचन सुनकर वह मृगी शपथ करती हुई कहने लगी।४३। मृगीने कहा-हे व्याध ! यदि मैं वापिस लौटकर आपके समीप न आऊ तो वचन के विधान से मेरा समस्त पुण्य चला जायगा ।४४ जो मनुष्य अपनी विवाहिता पत्नी का त्यागकर अन्य स्त्री से भोग करता हैतथा जो वेद विहित धर्मका उल्लंघन करके कल्पित मार्गका अनुगमन करता है-जो विष्णु भक्त बनकर शिव की निग्दा करता है, जो माता-पिता की दाह तिथि को बिना ब्राह्मण भोजनके खाली जाने देता है, जो दूसरेको दुखःदेकर पीछे मधुर बचन बोलता है मैं उस पापसे लिप्त हो जाऊ यदि मैं वापिस लौटकर आपके पास न आऊं ।४५-४६। सूतजी ने कहा-उस मील ने इस तरह शतथ पूर्वक कहने पर मृगीसे कहा-'तू चली जा'। तब वह मृगी परम प्रसन्न होकर जल पान करके अपने घर चली गई ।४७। तब तक उस व्याध को विना निद्रा लिये दूसरा प्रहर व्यतीत हो गया और फिर तीसरे प्रहर के आरम्भ होने पर उसने देखाकि वे हिरनियाँ वापिस नहीं आई हैं।४९। ज्ञात्वा विलब चकितस्तदन्वेषणातप्परः। तद्यामे मृगमद्राक्षीज्जलमार्गगत ततः ।५०। पुष्टं मृग तं दृष्टवा हृष्टो वनचरः स वै। शर धनुषि संधाय हन्तु त हि प्रचक्रमे ।५१। तदैवं कुर्वतस्तस्य बिल्वपत्राणि कानिचित्। तत्प्रारब्धवशाद्विष्णो पतितानि शिवोपरि ।५२। तेन तृतीययामस्य तदात्रौ तस्य भाग्यतः । पूजा जाता शिवस्यैव कृपालुत्वं प्रदशितम् ।५३। श्रुत्वा तत्र च तं शब्द कि करोषीति प्राह सः। कुटुम्बार्थमह हन्मि त्वां व्याधश्चेति सोऽब्रबीत् ।५४। तच्छ्र त्वा व्याधवचनं हरिणो हृष्टमानसः । द्र तमेव च तं व्याध वचनं चेदमब्रवीत् ।५५।

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१२२ I श्री शिवपुराण

धन्योऽहं पुष्टिमानद्य भवत्त प्तिर्भविष्यति। यम्यांग नोपकारार्थ तस्य सर्व वृथा गतम् ॥५६ हिरनियों के वापिस आने में विलम्ब देखकर व्याध चकित होकर उनकी खोज करनेमें तत्पर होगया किन्तु उसी समय उसने जलके मार्गमे आता हुआ एक हिरण देखा ॥५०। उस परम पुष्ट शरीर वाले हिरणको देखकर व्याधने अपने धनुष पर वाण चढ़ा लिया और वह उसका वध करनेको उद्यत होगया ॥५१॥ हे विष्णुदेव ! जब उसने धनुष-वाणका सन्धान किया तो माग्यवश कुछ बेलपत्र शिवके ऊपर उसके हाथसे गिर गये। उसने उम रात्रिमें भीलके माग्यसे तीसरे प्रहरकी शिवकी पूजा सम्पन्न होगई। इस तरह उस व्याध पर शिवने अपनी कृपालुता दिखलाई थी ॥५२।५३॥ धनुषके शब्दको सुनकर मृगने कहा-हे भील ! यह तुम क्या कर रहे हो! व्याधने कहा-मैं अपने कुटुम्बके पोषणके लिये तुझे मारना चाहता हुँ॥।५४।यह भीलके वचन सुनकर हिरन पर्मप्रसन्न चित्तरे व्याधसे कहने लगा-।।५५॥। मृगने कहा-मैं आज अतिशय धन्य भाग्य वाला हूं, मैं पुष्टि वाला हूँ क्योंकि मेरे शरीरसे आपकी तृप्ति होगी। जिसके शीरीरसे दूसरेका कोई उपकार नहीं बनता, उसका शरीर धारण करना ही सर्वथा निष्फल है ॥५६॥ यो वै सामर्थ्ययुक्तश् नोपकारं करोति वे तत्सामर्थ्य भवेद् व्यर्थ परत्र नरक ब्रजेत् ॥५७ परन्तु बालकान् स्वांश्र समर्प्य जननी शिशून । आश्चास्याप्यथ तान् सर्वानागमिष्याम्यह पुनः ॥५८ इत्युक्तस्तेन स व्याधो विस्मतोऽतीब चेतसिः। मताक् शुद्धमना नष्टपापपुञ्जो वचोब्रवीत् ।५९ ये य समागताश्चात्र ते ते सर्वे त्वया यथा। कथयित्वा गता ह्यत्र नायान्त्यद्यापि बन्धका ॥६० त्वं चापि सङ्कटे प्राप्तो व्यलीक गमिष्यसि। मम संजीवन चाद्य भविष्यति कथ मुधा॥६१

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शिवरात्रि माहात्म्य वर्णन ] [ १२३

शृणु व्याथ प्रवक्ष्यामि नानृतं विद्यते मयि। सत्येन सर्व ब्रह्माण्ड तिष्ठत्येव चराचरम् ॥६२ यस्य वाणी व्यलीका हि तत्पुण्यं गलित क्षणात्। तथापि शृणु वै सत्यां प्रतिज्ञां मम भिल्लक ॥६३ जिस प्राणी में सामर्थ्य हो और उससे वह दूसरों की मलाई नहीं करता है तो उसकी समस्तसमर्थता व्यर्थही है। ऐसाप्राणी परलोकमें नरक • का गामी होता है।५७॥ किन्तु सिर्फ कुछक्षण आपसे चाहता हुँकि अपने बालकोंको माताको सोंपतेहुए धीरजबंधाकर शीघ आपकी सेवामेंउपस्थित हो सकू ।५८। मृगके इस तरह कथनसे व्याधको बड़ा आश्चर्य हुआ और शिवार्चनके प्रभावसे कुछ मनकी शुद्धि हो जानेसे तथा पापोंका क्षय होनेसे उस भीलने कहा-॥५६। व्याधने कहा-हे मृग जो-जो भी जीव यहाँ आये सब तेरी भाँतिही कहकर यहाँसे चलेगये और वे सब अभी तकभी वापिस नहीं आये हैं ।६०। हे मृग ! उसी तरह तू भी प्राण सङ्कटमें प्राप्त होकर असत्य का आश्रय लेकर समय निकालेगा, तू ही बता ! मेरा जीवन इस तरह केसे रहेगा। ॥६ १। मृगने कहा-हे व्याध ! मैं जो कुछ भी आपसे कहता हूं उसेआप सुनिये। मैं कभी असत्य नहीं बोलता हूं। सत्यके प्रवल प्रभावसे ही यह चराचरमय सभस्तव्रह्माण्ड स्थित होरहा है।६२। जिसकी वाणीमें असत्यता रहती है उसका सारा पुण्य तुरन्त ही नष्ट होजाता है। हे भील ! अव आप मेरी सत्यतापूर्ण प्रतिज्ञाका श्रवण करिये ।६३।। सन्ध्यायां मथुने धस्र शिंवरात्र्यां च भोजन। कूटसाक्ष्ये न्यासंहारे सन्ध्याहीने द्विजे तथा ॥६४ शिवहीनं मुख यस्य नोपकर्ता क्षमोऽपि सन्। पर्वणि श्रीफलस्यैव त्रोटनेऽभक्ष्यभक्षणे ॥६५ असपज्य शिव भस्मरहितश्चान्नभुक् च यः । एतेषां पातक मे स्यान्नागच्छेय पुनर्यदि ॥६६ इतिश्रत्वा वचस्तस्य गच्छ शीघ्र समाव्रज। स व्याधेनैवमुक्तस्तु जलं पीत्वा गतो मृग: ।६७

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१२४ ) श्री शिवपुराण ते सर्वे मिलितास्तन्न स्वाधमे कृतसुप्रणाः। धृत्तांतं चैव तं सर्वं श्र त्वा सम्यक् परस्परम् ।५८। गन्तध्य निश्च्येनेति सत्यपाशेन यंत्रिताः। आश्वास्या बालकांस्तत्र गन्तुमुत्कण्ठितास्तदा।६९। मृगी ज्येष्टा च या तत्र स्वामिनं वाक्यमब्रवीद्। त्वां विना बालका ह्यत्र कथ स्थास्यन्ति वै मृग ।७०' संध्याके समय मथुनकरनेसे, शिवरात्रिको दिनमें भोजन करनेसे झूठी गवाही देनेसे, किसीकी रक्खी हुई धरोहरको मारकर पचा जानेसे तथा ब्राह्मण को सन्ध्यावन्दन न करने से जो पाप होता है तथा जिसका मुख शिव मजनसे रहित है,जो सर्वसमर्थ होकरभी उपकार नहीं करता है, पर्वं के दिन बेल तोड़ने और अभक्ष्यका मक्षण करनेसे, शिवार्चनके पूर्व भोतन करनेमे, भस्म रहित अङ्ग रहनेसे जो जो महापातक होते हैं वे सभी मुझे लगें अगर मैं वचनदेकर आपके पास वापिस न आऊ ।६४। ६६।श्रीशिवने ty 16 कहा-ऐसे उस मृगके बचनों को सुनककर व्याधने कहा-'चले खाओ' शोघ वापिस आना'। तब वह हिरन जल पीकर सकुशल अपने निवास स्थानपर ट

चला गया।६७। इसके उपरान्त वे सब हिरनी और हिरन अपने रहनेके ब

स्थानमें एकत्रितहोकर मिले औरएकदूसरेने परस्परमें प्रणाम करके व्याघ क

की वातचीतका समस्त हाल कहा और सूना, फिर वे कहने लगे ।६ ८। हम श्र

सबको अवश्यही अब वहाँ उस व्याधके पास जानाही चाहिए। इस प्रकार स्व सत्य पाशके बन्धनमें बधे हुए उन्होंने अपने बच्चोंको धीरज बंधाकर वहाँ जै जानेका निश्चय किया ।६८। उनमें जो सबसेबड़ी हिरनी थी उसने अपने सि पतिसे कहा-हे मृग ! आपके बिना ये बच्चे वहाँ कैसे रह सकेंगे ।७०। से प्रथम ते मया तत्र प्रतिज्ञा च कृता प्रभो। की तस्मान्मया च गन्तव्यं भवद्भ्यां स्थीयतामिह ।७१। आर इति तद्वचन श्रत्वा कनिष्टा वाक्यमव्रवीत्। चढ़ अहं त्वेत्सेदिका चाद्य गच्छामि स्थीयतां त्वया ।७२। तच्छ्र त्वा च मृगः प्राह गम्यते तत्र वै मया। का भवत्यौ तिष्टतां चात्र मातृतः शिशुरक्षणम ।७३। समू

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शिवरात्रि व्रत का माहात्म्य ) ( १२४

तत्स्वामिवचन श्रत्वा मेनाते तन्न धर्मतः। प्रोचुः प्रीत्या स्वभर्तारं वैधव्ये जीवित च धिक ।७४। बालानाश्वास्य तांस्तत्र समर्प्य सहवासिनः । गतास्ते सव एवाश यत्रास्ते व्याधसत्तमः ।७५। ते वाला अपि सर्वे वै विलोवयानु समागताः। एतेषां या गतिः स्याद्व ह्यस्माक सा भवत्विति ।७६। तान् दृष्टवा हर्षितो व्याधो वाण धनुषि संदधे। पुनश्च जलपत्राणि पतितारि शिवोपनि : ७७। तन जाता चतुर्थस्य पूजा यामस्य वै शुभा। तस्य पाप तदा सर्व भस्मसादभवत् क्षणात् ।७८। हे पतिदेव ! सबसे प्रथम मैंने ही वहाँ पहुँचने का बचन दिया है। इसलिये मुभे वहाँ पहुँच जाना चाहिए। आप दोनों यहाँपर ही रहें।७१। बड़ी मृगीके इस बचन को सुनकर रबसे छोटी कहने लगी-मैं तो आपकी टहलनी हूँ। मैं वहाँ जाती हूँ। आप सब यहीं रहें ।७२। मृगियों के यह बचन सुनकर हिरन ने कहा मैं जाता हूँ, तुम सब यहाँ रही क्योंकि बच्चों की रक्षा करने वाली माता ही हुआ करती है ।७३। अपने पति के बचन श्रवणकर उन दोनों मृगियोंने अपने धर्मका ध्यानकरते हुए उस बातको न स्वीकार कर प्रेमके साथ पतिसे कहा-वैधव्यमें जीना स्त्रीके लिये धिक्कार जंसा है ।७४। इस तरह बातचीत करके अपने बच्चोंको धीरज देकर पड़ौ सियोंके सुपर्दकरते हुए सभी वहाँ चलेगये जहाँ व्याध बंठा था ।७५। पीछे से सबबच्चे भी वहीं चल दिये और मनमें ठानलिया कि हमारे माता-पिता की जो दशा होगी वही दशा हमभी मोग लेंगे ।७६। उससमय उन सबको आये हुए देखकर व्याध मनमें बहुतही प्रसन्न होते हुए अपने धनुषपर वाण चढ़ाने लगा। उस समय भी उसके धनुषके सन्धान करनेमें हाथसे शिवकी मूर्तिपर जल तथा बेलपत्र गिर गये ।७७। इससे भगवानशिवके चौथे प्रहर का भी अर्चन सम्पन्न होगया और इसके प्रभावसे व्याधवे समस्त पापोंका समूल विनाश हो गया ॥७८॥

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१२६ ) श्री शिवपुराण म गी म गी म गश्रोचुः शीघ वै व्याधसत्तम। अस्माक सार्थक देह कुरु त्वं हि कृपा कुरु ।७९। इति तषां वच: श्रत्वा व्याधो विस्मयमागतः । शिवपूजाप्रभावेण ज्ञानं दुर्ल भमाप्तवान् ।८0। एत धन्या म गाश्रद ज्ञानहीना: सुसमताः। स्वीयेनव शरीरेण परोपकरणे रताः ।८१। मानुष्यं जन्म सप्राप्य साधित कि मयाधुना। परकीय च सपीडय शरीर पोषित मया। ८र कुटुम्ब पोषित नित्य कृत्वा पापन्यनेकशः। एवं पापानि हा कृत्वा का गतिम भविष्यतिः ।८३। कां वा गति गमिष्यामि पातक जन्मतः कृतम्। इदानी चिन्तयाम्येवं धिग्धिक जीवन मम ।८४। उस समय वहाँ पहुँचकर मृग ओर मृगी शीघू व्याधसे बोले-हे व्याध श्रेष्ठ! अब आप हमारे सबके शरीरोंको सार्थक बनादो और कृपा करो। ।७९। शिवने कहा-उन सबके इन बचनों को सुनकर उस भील को बड़ा विस्मय हुआ और शिवपूजनके प्रभावसे उसे देव-दुर्लम ज्ञानप्राप्त होगया। ।50। उसने मनमें सोचा-परस्पर मिले हुए ज्ञान रहित इस पशु योनि में उत्तन्न मृग परम धन्य हैं जो अपनेनश्वर शरीरसे परोपकार करनेमेंतत्पर होरहे हैं।८१। इस मनुष्य देह को प्राप्तकर मैंने क्या फल प्राप्तकिया, जो दूमरे प्राणियोंके शरीरको पीड़ा देकर जन्मभर अपना शरीर पाला ।८१। मेंने सदा बहुतसे पापकर्म करके अपने कुटुम्बका पालन किया! ऐसे- ऐसे बुरे पापकर्म करने वाले मेरी क्या गति होगी ।८३। मैं नहीं समझता मेरी क्या दुर्गति होगी। क्योंकि जन्मसे ही पाप कर्म किये आज मैं ऐसी चिन्ता कर रहा हूँ। मेरे जीवनको धिक्कार है ॥।८४। इति ज्ञान समापन्नो वाणं संवारयंस्तदा। गम्यतां च मृगश्रे ष्टा धन्या: स्थ इति चाब्रवीत् ।८५। इत्युक्ते च तदा तेन प्रसन्नः शङ्करस्तदा। पूजित च स्वरूपं हि दशयामास समतम् ।८६।

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शिवरात्रि माहात्म्य बर्णन 1 १२७

संस्पृश्य कृपया शम्भुस्त व्याधं प्रीतितोऽब्रवीत्। वरं व्रहि प्रसन्नोडस्मि व्रत नानेन भिल्लक ।5७। व्याधोऽपि शिवरूपं च दृष्ट्वा मुक्तोऽभवत्क्षणात्। पपात शिवपादाग्र सर्व प्राप्तमिति ब्र वन ।८5। शिवोऽपि प्रसन्नात्मा नाम दत्वा गुहेति च। विलोक्य तं कृपादृष्ट्या तस्मै दिव्यान्वरानदात् ।८९। श्र णु व्याधाद्य भागांस्त्वं भुक्ष्व दिव्यान्यथेप्सितान्। राजधानीं समाश्चित्य श्र ङ्गवेरपुरे पराम ।९०। अपनाया वंशवृद्धि: श्लाघनीयः सुरैरपि। गृहे रामस्तव व्याध समायास्यति निश्चितम् ।६१। इस तरह ज्ञानके उदयसे सद्विचार वाले उस व्याधने धनुषसे वाण हटालिया और कहने लगा-हे मृगबरो ! तुम सब परमधन्य एवं सत्यनिष्ठ हो, अब आप सब अपने निवासस्थानको चलेजाओ ।८५। शिवजीने कहा- उससमय जब उसभीलने मृगोंसे यह कहा तो भगवान्शंकर बहुतहो प्रसन्न हुए औरफिर उन्होंने उसभीलको शास्त्रानुमत अपना पूज्यस्वरूप दिखलाया ।८६। शिव कृपासे पूर्ण होकर भीलके शरीरको हाथसे स्पश करते हुए प्रीतिपूर्वक वाले-हे मील ! मैं तेरे इसव्रत एवं जागरण तथा अचनसेबहुत ही प्रसन्न और सन्तुष्ट हूँ, तू अब वर माँग ले ॥८७॥ तब भगवान् शिवके स्वरूपका दर्शनकर व्याधभी क्षणमात्रमें मुक्तहोगया और 'हे भगवन् मैंने सभी कुछ प्रास्तकर लिया -यह कहते हुए शिव के चरणोंमें गिर पड़ा ।८८। अत्यम्त प्रसन्न शिवने उसका 'गुह'-यह नाम देकर कृपाभरी दृष्टिसे देखते हुए उसे दिव्य बरदान दिये ।८९। शिवजीने कहा-हे व्याधर्षे ! अब तू मनोऽभिलषत दिव्य भोगोंका उपभोगकर तथा शृगवेरपुरमें अपनी उत्तम राजधानी बनाकर वहाँ राजाके रूपमें निवासकर।९०। हे व्याध ! तुम्हारी वंशवृद्धि कभी नाशको प्राप्त नहीं होगी और उसकी प्रशंसा देवगण भी करेंगे। नेतामें मगवान् श्रीरामचन्द्रजी साक्षात्त् तुम्हारे घर पर पधारेंगे इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।९१।

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१२८ ) श्री शिवपुराण करिष्यति त्वया मैत्री गद्भक्तसहकारकः। मत्सेवासक्तचेतास्त्वं मुक्ति यास्यसि दुर्लभाम ।९२। एतस्सिन्नन्तरे ते तु कृत्वा शङ्करवर्शनम्। सर्वे प्रणम्य सन्मुक्ति मृगयोने: प्रपेदिरे।९३। विमान च समारुह्य दिव्यद हा गतास्तदा। शिवदर्शनमात्र ण शापान्मुक्ता दिव गता ।४। व्याधेश्वरः शिवो जातः पर्वते ह्यर्बुदाचले। दर्शनात्पूजनात्सदो मुक्ति मु क्तप्रदायक: ।९५। व्याधोऽपि तदिदमान्न न भोग्रान्स सुरसत्तम। भुकत्वा रामकृपां प्राप्य शित्रसायुज्यमाप्तत्रान् ।९६। अज्ञानत्स व्रतञ्ज तत्कृत्वा सायुज्यमापवान्।. कि पुनर्भकविपमपत्रा पान्ति तम्मप्ता शुभाम ।९७। विचार्य सर्वशास्त्राणि धर्माश्चैताप्यनेकशः । शिवरात्रिब्रतमिद सर्वोक्कृष्ट प्रकीर्तितम ।९८। मेरे भक्तोंपर विशेष कृपा वाले श्रीराम तुम्हारे साथ मैत्री भाव रकखेंगे और तुम मेरी सेवामें चित्तलगाकर दुर्लभ मोक्षपदको प्राप्तकरोगे। ।९२। इसी समयमें उन मृग और मृिने भी साक्ष त् शिव के दर्शन प्रान्न किये और उनको प्रणामकरके वे भी मुक्तहोगये। उनकी वह मृगयोनि छूट गई ।९३। फिर वे दिव्यदेह् धारण करके विमानारूढ़ होकर शिवके दर्शन मात्रसे शापसे छुटकारा पा गये और शिव लोकके दिव्य धाम में चले गये ।९४। उस समयसे अर्बुदाचलको मुक्त करनेवाले शिव 'व्याधेश्वर' इसनाम से प्रसिद्धहोकर स्थापित होगये और और वे दशर्चनसे मनुष्योंको तुरन्त भोग-मोक्ष प्रदान किया करते हैं।९५। हे देवेंमें श्रष्ठ ! उस समय से वह भीलभी संसारके समस्त भोगों को भोगकर श्रीरामचन्द्रकी कृपासे शिबको सायुज्य मुक्तिके पदको प्राप्त हो गया।९६। भीलने तो अज्ञान से शिवका व्रतकिया और विवशनामें व्रत बनाड़ा तब उसे भुक्ति मुक्तिमिलगई तोजो भक्तिवाले इसके द्वारा शुभगतिको पालेवे तो क्या आश्वर्यकी बात है।९७।

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मुक्ति निरूपण । [ १२९

सम्पूर्ण शास्त्रोंका मंथन कर और विविध धर्मोंका विवेचन करके सर्वोत्तम महाशिवरात्रिके व्रतको बतलाया गया है ॥६८॥ व्रतानि विधिधान्यत्र तीर्थानि विविधानि च । दानानि क विचित्राणि मखाश्च विविधास्तथा ॥९९ तपांसि विविधान्येव जपाश्चैवाप्यनेकशः। नैतेन समतां यान्ति शिवरात्रिव्रतेन च ॥१०० तस्माच्छुभतरं चैतत्कर्तव्यं हितमीप्सुभिः। शिवरात्रिव्रतं दिव्यं भुक्ति मुक्तिप्रद सदा ।१०१ एतत्सर्व समाख्यातं शिवरात्रिव्रत शृभम्। ब्रतराजेति विख्यात किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥१०२ यों तो इस लोक में विविध व्रत, अनेक तीर्थ, सैकड़ों प्रकार से दान बहुत से यज्ञ नाना भाँतिके तप एवम् जप हैं परन्तु इम महाशिवरात्रि के व्रतोपवास तथा शिवार्चनकी समताको कोईभी प्राप्तनहीं होसकते हैं।९९- १००।इसीलिये अपना कल्याणचाहने वालोंको यह परमश्रष्ठ,भोग-मोक्ष का दाता शिवरात्रि का ब्रत अवश्यही करनाचाहिए ।१०१।अव तक हमने शिवरात्रिके व्रतका आख्यान और महान्फल भली माँति बतला दिया है। यह सबव्रतोंमें श्रष्ठ होनेके कारण ही 'व्रतराज' कहा है। अब और आप क्या श्रवण करना चाहते हैं ॥१०२॥ ॥ मुक्ति निरुपण॥ मुक्तिर्नाम त्वया प्रोक्ता तस्यां किं नु भवेदिह। अवस्था कीदृशी भवेदिति सर्वं वदस्व नः॥१ मक्तिश्चर्विधा प्रोवता श्रयतां कथयामि वः। ससारक्लेशसंहर्त्री परमानन्ददायिनी।२। सारूप्या चैव सालोक्या सान्निध्या च तथा परा। सायज्या च चतुर्थी सा व्रतेनानेन या भवेत्।३। मुक्तेर्दाता मुनिश्रष्ठा केवलं शिव उच्यते। ब्रह्माद्या न हि ते ज्ञेयाः केवल च त्रिवर्गदाः ।४

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१३० ] [ श्री शिवपुरास ब्रह्माद्यास्त्रिगुणाधीशाः शिवस्त्रिगुणतः परः। निर्विकारी परब्रह्म तुर्यः प्रकृतितः परः ॥५ ज्ञानरूपोऽव्यय: पाक्षी ज्ञानगम्योऽ्दवयः स्वयम्। कैवल्यमुक्तिदः सोडत्र त्रिवर्गस्य प्रदोऽपि हि ।६। कैवल्याख्या पश्चमी च दुर्लभा सर्वथा नृणाम्। तल्लक्षण प्रवक्ष्यामि श्रयतामषिसत्तमाः ७। ऋृषियों ने कहा-आपने जो मुक्ति का होना बतलाया है,उसमें क्या हुआ करता है और मुक्तिपाने पर क्या दशा होजातीहै-यह सब कृराकर हमको बताइथे।१। सूतजीने कहा-मोक्ष चार तरहकी होती है। वह मोक्ष साँसारिक क्लेश, पीड़ाकी हर्त्ता होती है और पूर्णआनन्दप्रिय है। मैं उसका स्वरूप आपको बतलारहा हूँ२। चारों प्रकार की मुक्तियोके नाम-सारूप्य, सालोक्य सान्निध्य और सायुज्य हैं जोकि शिवके व्रमे प्राप्तहुआ करती हैं ३ हे मुनिश्रेष्ठो! ब्रह्मा और विष्णुआदि वेदधर्म-अर्थ और काम इन तीन पदार्थोंके वर्गको ही दे सकते है मुक्ति को नहीं। मोक्ष परम पुरुषार्थको देने वाले तो केवल एकमहेश्वरही हैं।४। ब्रह्मादिकदेव तो तीनोंगुणोंके स्वामी हैं और भगवान् तीनोंगुणोंसे परे हैं तथा जो निर्विकारी परब्रह्महैं वे चतुर्थ हैं जो प्रकृतिसे मी परे हैं।५। वे ज्ञान स्वरूपी महान्देव अविनाशी, साक्षी ज्ञानसे जानने योग्य, अद्वैत,कवल्य मुक्तिके दाता और धर्मादि त्रिदर्गके मी देनेवाले हैं।। हे ऋषिश्रष्ठो ! यह पाँचवीं 'कैवल्य" नाम वाली मुक्ति होती है को सभीप्रकार के मनुष्योंको दुर्लभ हुआकरती है। अब हम उसके पूरे लक्षण बताते हैं उन्हें आप लोग श्रवण करें ॥१४॥ उत्पद्यते यतः सर्वं येनैतत्पाल्यते जगत्। यस्मिश्च लीयते तद्धि येन सर्वमिर्द ततम् ।८। तदेव शिवरूपं हि पठ्यते च मुनीश्वराः। सकल निष्फल चेति द्विविध वेदवणितम्॥९ विष्णुना तच्च न ज्ञात ब्रह्मणा न च तत्तथा। कुमारादर्च न ज्ञात न ज्ञात नारदेन वै ॥१०

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शुकेन व्यासपुत्रेण व्यासेन च मुनीश्वरैः। तत्पवै श्राखिलदेव वर्देः शास्त्र स्तथा न हि ॥११ सत्य ज्ञानमनन्त च सच्चिदानन्दसज्ञितम्। निग णो निरुपाधिश्चाव्ययः शुद्धो निरञ्जनः ॥ न रक्तो नंत्र पीतश्च न श्वेतो नील एवं च। न ह्रस्वो न च दीर्वश्च न स्थलः सक्ष्म एव च॥१३ यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। तदेव परम ग्रोक्त ब्रह्मव शिवसज्ञकम् ॥ जिससे यह सब जगत् उत्पन्न होता है और जिसके द्वारा उस समस्त जगत् का पालन-पोषण होता है तथा जिसमहान मेंजाकर इसजगत्कालय होता है एव जिसशक्तिने इस सबका पूर्णविस्तारकिया है, हे मुनिगण ! वे शिवरूप कहे जाते हैं। वेदने उनको कलाओसेपूर्ण तथा कलओंसेरहित दो प्रकारका वर्णनकिया है। ८.९। वह ऐसा विलक्षणस्व्रू है जिसकाज्ञान ब्रह्मा विष्णु कुमार चतुष्टय और देवर्षि नारदजीको भी नहीं है।१०। यही नहीं किन्तु उसे व्यासपुत्र शुकदेवमुनि, अन्यमहामुनिश्वर,समस्तदेवगण और वेद-शास्त्र आदि किमीनेभी नहीं जानपाया है ।११। यहसत्य,ज्ञान, अनन्त, सत्-चित् आनन्दस्वरू है तथा बिना उपाधिवाला निर्गुणअव्यय,शुद्ध और निरञ्जन है।१२। वह परमात्म तत्व रक्तश्वेत,पीत और नीलनहीं हैं और ह्रस्व,दीघ स्थूल और सूक्ष्मभी नहीं होता है।१३। जहाँ मनके सहित वाणी की पहुँच नहीं होती वही शिवसंज्ञावाला परव्रहम कहा जाता है।१४। आकाश व्यापक यद्वत्तथैव व्यापक त्विदम्। मायातीत परात्मान द्वन्द्वातीत विमत्सरम् ॥१५ तत्प्राप्तिश्च भवेद्त्र शिवज्ञानोदयाद ध्र वम्। भजनाद्वा शिवस्यैव सूक्ष्ममत्या सतां द्विजाः ॥१६ ज्ञान तु दुष्कर लोके भजन सुकर मतम्। तस्माच्छिव च भजत मुक्तयर्थमपि सत्तमाः ॥१७ शिवो हि भजनाधीनी ज्ञानात्ना मोत्रदः परः।

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१३२ ] श्री शिवपुरग भक्त्यैव ब्रह्वः सिद्धां मुक्ति प्राय: परां मुदा ॥१८ ज्ञानमाता शम्भुभक्तिर्मुक्तिप्रदा सदा। सुलभा यत्प्रसादाद्धि सत्प्र मांकुरलक्षणा ।१९ सा भक्तिर्विविधा ज्ञया सगणा द्विजाः। वैधी स्वाभाविकी या या वरा सा सा स्मृता परा ॥२० नैष्ठिक्यनैष्टिकी भेदाद् द्विविधव हि कीर्तिता। षड विधा नैष्टिकी ज्ञया द्वितीय कविधा स्मृता। २१ यह परमब्रह्म आकाशकी भाँति सर्वव्यापक है और मायासे परे द्वन्द्व- रहित और मत्सरता से हीन यह परम आत्मतत्व होता है ।१५। हे द्विज- गण ! इस संसार में भगवान् शिवके ज्ञान का उदय हो जाने पर अथवा भक्ति-मावसे शिवकाभजन करनेसे या सत्पुरुषों जैसी सूक्ष्म मतिसे उनकी प्राप्ति हुआ करती है।१३। हे मुनिश्रश्ो ! इस संसार में ज्ञानका प्राप्त कर लेना अतिकठिन है और मजनोपासना करना सुगम बताया गया है। इस- लिये मुक्तिपानेके लिए शिवका भजन ही करनाचाहिए ।१७' मगवान्शिव भजनके अधीन रहा करते हैं। वे ज्ञानकी आत्मा तथा मोक्षके दाता नर पुरुष हैं। अनेक सिद्ध भक्ति के द्वारा ही सानन्द परम मोक्ष की प्राप्ति कर लिया करते हैं।१८। महेश्रकी भक्तिको ज्ञान उत्पन्न करने वाली जननी और नित्य मुक्ति एव भोगदात्री कहा जाता है। जिस परम प्रसाद से वह सुलभ हुआ करती है वह सत्य प्रेमके अहङ्कारवाले लक्षणयुक्त बताई गई है ।१९। हे द्विजगण ! वह भक्ति निगुंण तथा सगुण आदिके भेद से बहुत प्रकार की होती है। इनमें जो वैधी और स्वाभाविक हो वही श्रष्ठ और अधिक समझनी चाहिए ।२०। फिरभी वह नैष्ठिकी और अनैष्ठिकीके भेदसे दो तरहकी होतो है। इनमें अनैष्ठिकी तो एकही प्रकारकी होती है किन्तु नैष्ठिकी भक्ति छै प्रकारकी होती है ।२१। विहिताविहिताभेदात्तामनेकां विदुबुधाः। तयोरबहुविधत्वाच्च विस्तारो न हि वण्यते ॥२२ ते नवांगे उभे ज्ञये श्रवणादिकभेदतः।

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शिव का सगृण-निर्गुण स्वरूप ] १३३ सुदुष्करे तत्प्रसाद विना च सुकरे ततः ।२३ भक्तिज्ञाने न भिन्न हि शम्मुना वणिते द्विजाः। तस्माद् भेदो न कर्तव्यस्तत्कर्तु : सर्व दा सुखम् ।२४ विज्ञानं न भवत्येद द्विजा भक्तिविरोधिनः । शम्भुभक्तिकरस्यैव भवेज्ज्ञानोदयो द्रतम् ।२५ तस्माद् भकतिर्महेशस्य साधनीया मुनीश्वराः। तथैव निखिलं सिद्ध भविष्ववि न संशयः ।२६ इति पृष्ट भवद्भिर्यत्तदेव कथित मया। तच्छुत्वा सर्वपातेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः।२७ इसमें भी शास्त्रों के ज्ञाता विद्वान् लोग विहिता और अविहिता इन भेदों वाली उसे अनेक तरहकी बतलाते हैं इन दोनोंके भेद-प्रभेद करने से बहुतसे प्रकारकी हो जाती हैं, जिसके विस्तार का वर्णन नहीं किया जा सकता है।२२। ये दोनों प्रकारकी भक्ति श्रवण, कीर्तम अर्चनादि के भेदों से नौ नौ अङ्गोंवाली होती हैं। ये सब शिवकी प्रसन्नताकेबिना प्राप्तकरना अत्यन्त कठिन है। केवल शिवके प्रसादसे ही इनका पाना सुगम होता है ।२३। हे द्विजो ! शिवने वणनकरके बतलाया हैकि भक्ति औरज्ञान आपस में भिन्न नहों होते हैं। अतएव भक्ति तथा ज्ञान वालों को नित्य सुख की प्राप्ति होती है। इन दोनोंमें भेदका मानना उचित नहीं हैं।२४। हे विप्र- गण ! जोभक्तिका विरोध करने वाला होता है, उसे विशेषज्ञान कभी नहीं होता है। शिवकीभक्तिसे ज्ञानकाउदय शीघ्रही होजाता है ।२५। हे मुनी- श्वरो! इस कारण से मगवान् महेश्वर की भक्ति सबको अवश्य ही करनी चाहिए। उसीके करनेसे सभीकुछ सिद्धहोता है। इसमें कुछमी सन्देहनहीं है ।२६। आपने जोकुछभी मुझसे पूछा है,वहसभी मैंने वर्णनकरके आपको सुना दिया है। इसके श्रवणकरनेसे मनुष्योंके समस्तपापोका क्षयहोता है, यह सुनिश्चित बात है।२७। शिवका सगुणा निर्गुए स्वरूप शिवः को वा हरिः वो वा रुद्रः को वा विधिश्चकः। एतेषु निर्गृणः को वा ह्यतं नश्छिन्धि संशयम् ॥१

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१३४ ] श्री शिवपुराण यच्चादौ हि समुत्पन्न निर्गणात्परमात्मनः। तदेव शिवसज्ञ हि वेदवेदांतिनो विदुः ॥२ तस्मा प्रकृतिरुत्पन्ना पुरुषेण समन्विता। ताम्यां तपः कृतं तत्र मूलस्थे च जले सुधोः॥३ पञ्चक्रोशीति विख्याता काशी सर्वातिवल्लभा। व्याप्त च सकल ह्यततज्जलं विश्वती गतम् ॥४ संभाव्य मायया यकतस्तत्र सुप्तो हरि सः वै। नारायणेति विख्यातः प्रकृतिर्नारायणी मता ॥५ तन्नाभिकमले यो व जातः स च पितामहः । तेनेव तपसा दष्टः स वै विष्णुरुद हृतः ॥६ उभयोर्वामशमने यद्र पदशित पुवाः। महादेवेति विख्यात निर्गुणे शिवेत हि॥७ ऋषियोंन कहा-शिव कौन हैं, विष्णु कौन हैं और रुद्र कौन हैं तथा ब्रह्मा कौन है? इनसबमें निर्गुण कौन हैं। हमारेमनमें इनके विषय में बहुत बड़ा सन्देहरहता है,सो आप कृपाकरके यहसब बतलाकर संशयको दूरकरें ।१। सूतजी ने कहा-इस विश्वकी सृष्टिके आरम्भ जो निर्गुण निर्विकार परमात्मासे उत्पग्न हुल हैं उन्हेंही वेद वेदान्तके ज्ञाताओंने 'शिव' इस नाम वाला बतलाया है।२। हे ज्ञानियो ! उन्हीं शिवसे पुरुषकेसहित प्रकृतिका उदभव हुआ है। फिर वहाँ पर उन दोनों ने मूल में स्थित होकर जल में तपस्याकी है।३। वही 'पञ्चकोसी' इस नामसे विख्यात् होने दाली काशी है जो सबको अत्यन्तप्रिय है। उसका जल सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त होगया है।४ यह जानकर विध्यु असी जासकेरय उसी जलमें शयनकर गये और वे हरि नारायण'के नामने प्रसिद्ध हुए और प्रकृति 'नारायणो' नामसे विख्यात हुई ।५। उनकी नामिमें उत्न्त कमलसे उद्भूत होने वालेका नाम ब्रह्मा पड़ाऔर उन ब्रह्माजीने अपनी तरस्यामें जिनके दर्शन कियेवे विष्णु हैं ।६। हे पण्डितो ! निर्गुण स्वरूवाले शिवत ब्रहमा और विष्णु के मध्यमें उठे हुए पारस्परिक विवाद को शान्त करनेके लिए जिस स्वरूप का प्रदशन कराया वही महादेव नामसे विख्यात हुए हैं ।9।

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शिव का सगुण-निर्गुण स्वरूप ] १३५

तेन प्रोक्तमह शम्भर्भविष्याभि कपालतः । रुद्रो नाम स विख्पातो लोकानुग्रहकारक: ।८ ध्यानार्थ चैव सर्वपामरूपवानभूत्। स एव च शिवः साक्षाद् भक्तवात्सल्यकारक: ।९ शिवे त्रिगुणसम्भिन्न रुद्र तु गुणधामनि। वस्तुतो न हि भेदोऽस्ति स्वर्णे तनभूषणे यथा ।१० समानरूपकर्माणौ समभक्तगतिप्रदौ। समानाखिलससेव्यौ नानालीलाविहारिरौ ।११ सर्वथा शिवरूपो हि रुदो रौद्रपराक्रमः । उत्पन्नो भक्तकार्यार्थ हरिब्रह्मसहायकृत ।१२ अन्ये च ये समुत्पन्ना यथानुक्रमतो लयम्। यांति नैव तथा रुद्रः शिवे रुद्रो विलीयते ।१३ ते वै रुद्र मिलित्वा तु प्रयान्ति प्रकृता इमे। इमान रुद्रो मिलित्वा तु न याति श्र तिशासनम ।१४ उन्होंने वह था मैं शम्भ विधाताके मस्तकसे प्रकटहोऊंगा उससमय लोकोंपर कृपादृष्टि रखनेवाले वे ही शंभ् 'रुद्र'-इस नामसे प्रसिद्ध हुए ।८। अपने भक्तोंपर अनुग्रह करने वाले साक्षात् शिव स्वयं रूपसे रहित होतेहुए भी सबके ध्यानमें आनेके लिये रूपवान् हुए ।६०। माया के तीनों गुणों से रहितहोकर स्थितशिवमैं तथा सगुण रुद्रमें वस्तुन: कुददभी भेदनहीं है जिस प्रकार स्वर्णमें और स्वण से निर्मित भूषणमें कुछभी अन्तर नहीं होता है ।१०। ये दोनोंही समान स्वरूप और समानकर्मवाले अपनेभक्तोंको समान रूप से ही गति देने वाले हैं और सबके द्वारा तुल्य माबसे ही सेवन करनेके योग्य हैं तथा ये दोनों अनेकप्रकारकी लीलायें करनेवाले हैं ।११। अत्यन्त पराक्रम वाले रुद्र सबतरहसे शिवकेही स्वरूप हैं। ये ब्रहमा और विष्णुकी सहायताकरनेवाले अपने भक्तोंकेलिये उनकाकार्य पूरोकरनेकोही अवतीर्ण हुए हैं। १२। संसार में जोभी उत्पन्न हुए हैं वे सभी क्रमके अनुसार लय को प्राप्त हेते हैं। उस तरह रुद्रका लय कभी नहीं होता वे केवल शिवके स्वरूप ही लय होते हैं१३। वे सब सामान्य हुए रुद्रमेंमिलकर लय होते

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१३६ l श्री शिवपुराण हैं, परन्तु वह रुद्र विष्णु आदिमें मिलकर कमी लयकोप्राप्त नहीं होते हैं इस विषयमें शास्त्र यही आज्ञा देता है।४ सर्वे रुद्र भजन्त्येव रुद्रः कंचिद् भजेन्न हि। स्वात्मना भक्तवात्सल्याद् भजत्येव कदाचन ।१५ अन्यं भजन्ति ये नित्यं तस्मिस्ते लीनतां गताः । तेनैव रुद्र प्राप्ता: कालेन महता बुधाः ।१६ रुद्रभक्तास्तु ये केचितत्क्षण शिवतां गताः। अन्यापेक्षा न वै तेषां श्रतिरेषा सनातनी ।१७ अशान विविध ह्यतद्विज्ञानं विविध न हि। तत्प्रकारमह वक्ष्ये श्र णुतादरतो द्विजा।१८ ब्रह्मादितृणपर्यन्त यत्किचिद् दृश्यत त्विह तत्सर्वं शिव एवास्ति मिथ्या नानात्वकल्पना ।१९ सृष्टः पूर्व शिवः प्रोक्तः सृष्टरमंध्ये शिवस्तथा। सृष्टेरन्ते शिवः प्रोक्तः सर्वशून्ये सदादिवः ।२०। तस्साच्चतुर्गुणः प्रोक्तः शिव एव मुनीश्वराा। स एव सगुणो ज्ञयः शच्तिमत्वाद् द्विधापि सः ।२१। ये सब रुद्रको भजते हैं परन्तु रुद्र किसीको भी नहीं मजते हैं। कमी- कभी अपने भक्तजनपर दया करनेके कारणसे अपने आपकोही भजा करते हैं ।१५। हे विद्वद्गण ! जोसर्वदा अन्यदेवोंका भजनकियाकरते हैं वे अन्त में उसीसे लयभी होते हैं और इसतरह बहुतसमयके पश्चात् रुद्रकी प्राप्ति कर पाते हैं।१६। किन्तु जो रुद्रकोही भक्ति मावसे भजते हैं, वे उसी समय शिवकेभावको प्राप्तकरलिया करते हैं। उन रुद्रदेवकी किसीभी अन्यदेवता की आवश्यकता नहीं हुआ करती है-यह सनातनी अर्थात् सदा चले आने व

वालीश्रति है ।१७। हे द्विजगण ! संसारमेंअज्ञान तो बहुत तरह का होता स

है, किन्तु विज्ञान अनेक प्रकारका कभीनहीं होता। अबउसी के भेद तुम्हारे २

सामने वर्णन करता हूँ। आप उसे श्रवण करो।१८। इस लोक मैं ब्रह्मामे अ

लेकर तिनकेतक जोकुछभी दिखलाई देता है वहसब शिवकाही स्वरून है। क है

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शित्र का सगुण निर्गुण स्वरूप ) १३७

इस में विविधभाँतिकी कल्पनाकरना मिथ्या एवं व्यर्थही है ।१९। सृष्टिकेपूर्व शिव हैं तथा इस ससारको रचनाके मध्यकालमें भी शिव हैं और सृष्टि के अन्तमेंमी शिवही रहते हैं। जब सर्वशून्य होता है तबभी सदाशिव विद्य- मान रहते हैं।२० हे मुनीश्वरो ! इसरीतिसे भगवान्शिव चारगुणों वाले हैं। वे दोप्रकारके स्वरूमें स्थित होते हुए भी सबप्रकारकी शक्तिसे पूर्णता रखनेके कारण सगुणही हैं-ऐसा हो समझना चांहिए ।२१। येनैव विष्णवे दत्ताः सर्वे वेदाः सनातनाः । वर्णा माता ह्यनेकाश्र ध्यान स्वस्य च पूजनम् । २२ ईशान: सर्वविद्यानां श्रतिरेषा सनातनी। वेदकर्त्ता वेदपतिस्तस्माच्छम्भुरुदाहृतः ।।२३ स एवं शङ्करः साक्षात्सर्वानुग्रहकारकः। कर्त्तां भर्त्ता च हर्त्ता च सरक्षी निर्गुण एव सः ॥२२ अन्येषां कालमानं च कालस्य कलनाः न हि। महाकाल: स्वयं साक्षान्महाकालीसमाश्रितः ।२५ तथा च ब्राह्मणा रुद्र तथा काली प्रचुक्षते। सर्व ताभ्यां ततः प्राप्तमिच्छया सत्यलीलया ॥२६ न तस्योत्पादकः कश्रििद् भर्त्ता न तस्य हि। स्वयं सर्वस्य हेतुस्ते कार्यभूतच्य तादयः ॥२७ स्वय च कारण कार्य स्वस्य नैव कदाचन। एकोऽयनेकतां यतोऽप्यनेकोप्येकतां ब्रजेत् ॥२८ जिनने भगवान् विष्णुको समस्त सनातन वेदोंका उपदेश, उनेक वर्ण वाला तथा मात्राओंसे युक्त अपना ध्यान एवं अर्चन बताया है, इससे शिव समस्त विद्य ओंके स्वामी,वेदोंकेनिर्माता और वेदोंके अर्धश्वर कहे हैं।२२- २३। वे साक्षात् शिवही सबपर दयाकरने वाले, सबके उत्पादक, पालनकर्त्ता और विनाश करनेवाले साक्षी एवं निर्गुण हैं।२४। इस सृष्टिमें सबकेसमय का प्रमाणहोता है, किन्तु यहकाल ऐसा है जिसकीकोई कलनाही नहींहोती है। वह स्वयं महाकालीके सेबित साक्षात् महाकाल हैं।२५। ब्राह्मण लोग

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रुद्र तथा महाकालीकोही ऐसा कहाकरते हैं। उन्होंने (दोनोंने) अपनी सत्य लीलाके सहित इच्छासे सभीकुछ प्राप्तकिया है।२६। इनका कोई भी अन्य उत्पादक, पालक और विनाशकरनेवाला नहींहोता है किन्तु वे स्वयंही सबके कारण हैं और विष्णुआदि अन्य समस्तदेवता कार्यभूत हैं।२७/भगवान्शिव तो स्वयं कारण और कार्यस्वरूप हैं। इनका अन्यकोईभी कारण नहींहोता है। वे एक होते हुएभी अनेकस्वरू धारणकरलेते हैं तथा अनेक होकरभी फिर एकही स्वरूपमें स्थित होजाते हैं ॥२८॥ एक बीजं बहिर्भू त्वा पु र्बीज च जायते। लहुत्वे च स्वय सव शिवरूपी महेश्वरः ।२९ एतत्पर शिवज्ञानं तत्वतस्तदुदाहृतम्। जानाति ज्ञानवानेव नान्य: कश्रिदृषीश्राः ॥३० ज्ञान सलक्षण ब्र हि यज्ज्ञात्वा शिवतां ब्रजेत्। कथं शिवश्च तत्सर्ग सर्ववा शिव एव च ॥३१ एतदाकर्ण्य वचनं सूतः पीराणिकोत्तमः। स्मृत्वा शिवपदाम्भाजं मुनीस्तानब्रवीहच: ॥३२ एक बीज फलसे बाहिर होकर फिर वह बीज होता है। इसी तरह बहुत होनेपर मी सभीकुछ वस्तु रूपसे स्वयं शिवके रूप वाले महेश्वर ही हैं।२९। हे ऋषीश्व वृन्द ! यह शिवका ज्ञान अत्यन्त श्रेष्ठ है। इसे मैंने तुम्हारेसामने यथा र्थरूपसे बतादिया है। इस भगवानशिवके ज्ञानको ज्ञानी हीसमझता या जानता है अन्यकोई साधारणव्यक्ति इसेनहीं जानसकता है ।३०। मुनियोंने कहा-इस शिव ज्ञानके ठीक लक्षण और स्वरूपको भली- भाँति बताइये जिसको प्राप्तकर शिवका स्वरूप प्राप्त होता है ।अब आप खुलासाकरके समझाइयेकि किसतरह वे शिव सभीकुछ हैं और किसप्रकार से संसार की सभी वस्तुयें शिव स्वरूप हैं ? । ३१। व्यासजी ने कहा-यह सुनकर पौराणिक विद्वानोंमें श्रष्ठ सूतजी भगवान्शिवके चरण कमलों का स्मरणकरके उन मुनियोंसे कहने लगे।३२।

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ज्ञाननिरूपण और शिव-विज्ञान १३९

त्ाननिरूपण और शिव-विज्ञान श्रयताम षयः सर्व शिवज्ञ नं तथा श्र तम्। कथयामि महागुह्य परम कितिस्वरूपकम् ।१ श्री नारदकुमाराणां व्यासस्य कपिलस्य च। एतेषां च समाजे तैनिश्रित्य सम दाहृतम् ।२ इति ज्ञानं सदा ज्ञयं सर्वं शिवमय जगत्। शिवःसर्वमयो ज्ञेयः सर्वंज्ञ न विपाश्चता।३ आब्रह्मतृणपर्यन्त यत्किचिद् दृश्यते जगद्। सत्सव शिव एवास्ति स देवः शिव उच्यते ।४ यदेच्छ्रा तस्य जायेत तदा च क्रिवते त्विदम्। सर्व स एवं जानाति तं न जानाति कश्चन ।५ रचयित्वा स्वयं तच्च प्रतिश्य दूरतः स्थितः । न तत्र च प्रविष्टेऽसौ निर्लिप्तश्चित्स्वरूपबान् ।६ यथा च ज्योतिषश्चैव जलादौ प्रतिर्बिबता। वस्तुतो न प्रवेशो वै तथैव च शिवः स्बयम् ।७ सूतजी ने कहा-हे ऋषिवृन्द ! शिव का ज्ञान अत्यन्त गोपनीय और मोक्षपद स्वरूपवाला है। मैंने इसे जितनाभी सुना एवं समझा वह तुम्हारे सामने वर्णन करता हूँ, आप सब सववधान होकर सुनो ।१। शौनक,स्वामि कार्तिके, नारद, वेदव्यासजी और कपिलदेव, इन सबके समक्षमें उन्होंने शास्त्रोंसे निश्चय करके कहा है।२। यह समस्त चराचर जगत् शिवमयही है-ऐसा ज्ञान सदा रखना चाहिए जो तर्वज्ञाता विद्वान् है उसे शिवको भी सर्व जगन्मय ही जानना चाहिए ।३ परब्रह्मके स्वरूपसे लेकर तृणपर्यन्त जो कुछभी इस संसारका स्वरूप दिखाईदेता है वह समस्त शिवही का एक रूप है अर्थात् शिवही हैं। इस तरह वे शिव कहलाते हैं ।४। जबभी कभी उनके हृदयमें रचनाकरनेकी इच्छा उत्पन्न होतीहै तमी इस समस्त विश्व का निर्माण कर दिया करते हैं। वे स्वयं सबको खूब अच्छी तरह जानते हैं किन्तु उनको कोईभी नहीं जानपाता है ।५। इस सम्पूर्ण जगत्की रचना

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करके स्वयं इसमें प्रविष्टहोते हुयेभी सबसेपृथक स्थितरहाकरते हैं। वे इस में प्रविष्ट नहीं होते हैं और न कभी उनका लयही होता है वेतो केवल ज्ञानके स्वरूप वाले हैं।६। जिस तरह जलमें अग्नि प्रभृति के तेजकी परछाईका भान ऐसाही होता हैकि यह उसके अन्दर विद्यमान है किन्तु वास्तवमें जल में उसका प्रबेश सर्वथा नहीं होता है,उसीतरह इसजगत् में साक्षात् शिवका मान मात्र ही होता है और वे इसमें लिप्त नहीं होते हैं ।७। वस्तुतस्तु स्वयं सर्वः क्रमो हि भासते शुभः । अज्ञानं च मतेर्भेदो नास्त्यन्यच्च द्वयं पुनः ।८ दर्शनेषु च सर्वेष मतिभेदः प्रदर्श्यते। पर वेदान्तिनो नित्यमद्वतं प्रतिचक्षते ।९ स्वस्याप्यशस्य जीवोंशो ह्यविद्यामोहितोऽवशः। अन्योऽहमिति जानाति तया मुक्तो भवेच्छिवः ।१० सर्व व्याप्य शिवः साक्षाद् व्यापाक: सर्वजन्तुषु। चेतना चेतनेशोऽपि सर्वत्र शङ्करः स्वयम् ।११ उपायं यः करोत्यस्य दर्शनार्थं विचक्षणः। वेदान्तमार्गमाश्रित्य तद्दर्शनफलं लभेत् ।१२ यथाग्निर्व्यापकश्चैव काष्ट काष्ट च तिष्ठति। यो वै मन्थति तत्काष्ठ स वै पश्यत्यसंशयम् ।१३ भक्त्यादिसाधनानीह यः कपोति विचक्षणः । स वै पश्यत्यवश्य हि तं शिवं नात्र संशयः ।१४ अर्थात् रूपसे वह शुभ परब्रह्म वेदाक्रमणकरके सवको भासते हैं। बुद्धि के भ्रमको ही अज्ञान कहाजाता है अन्य कुछ भी नहीं है ।८। समस्त दर्शन शास्त्रोंमें मतिका भेदस्पष्ट दिखलाई दिया करता है क्योंकि प्रत्येक सिद्धान्त भिन्न स्वरूप वाले होते हैं,किन्तु वेदान्ती लोग नित्य परमेश्वरको अर्द्वंतही कहा करते हैं।९। अपने ही अशके स्वरूपमें स्थित् यह जीवात्मा अविद्यासे मोहितहोकर 'मैं और तू'-ऐमा समझता है,परन्तु शिव उसअविद्यासे सर्वथा रहित हैं।१०। सबमें व्यापक साक्षात् कगवान्शिव सबकोव्याप्तकरके समस्त

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ज्ञानरूपण और-शिवविज्ञान ] [ १४१

जीवोंमें स्थितरहाकरते हैं और समस्तचराचरके प्रभुशिव साक्षात् कल्याण के करनेवाले होते हैं।११। जो बुद्धिमान् मानव शिवके दर्शनप्राप्त करनेके लिये उपाय करता है वह वेदान्तके मार्गका आश्रय ग्रहण करके ही उनके दर्शन प्राप्त किया करता है ।१२। जिस प्रकार प्रत्येक काष्ठ में अग्नि व्याप्त होकरही स्थित रहाकरती है किन्तु जो कोई उस काष्ठका मन्थन करता है वही उसमें अग्यिके दर्शनका फल प्राप्त कर पाता है ।१३। इसी प्रकारजो विद्वानुमानव भक्तिअ दिके साधनोंसे आगे बढ़ता है वह अवश्यही उनशिव का साक्षात् दर्शन प्राप्त कर लेता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ।१४। शिवः शिवः शिवश्चैव नान्यदस्तीति किंचन। भ्रान्त्या नानास्वरूपो हि भासते शंकरः सदा: ।१५ यथा समुद्रो मृच्चैव सुवर्णमथवा पुनः। उपाधितो हि नानात्वं लभते शङ्करस्थता।१६ कार्यकारणयोर्भेदो वस्तुतो न प्रवर्तते। केवलं भ्रान्तिबुद्धयव तदभावे स नश्यति ।१७ तदा बीजात्प्ररोहश्च् नानात्वं हि प्रकाशयेत्। अन्ते च बीजमेव स्यात्तत्प्ररोहश्च न नश्यति ।१८ ज्ञानी च बीजमेव स्यात्प्ररोहो विकृतिर्मता। तन्निवृतौ पुनर्ज्ञांनी नात्र कार्या विचारणा।१र्६ सर्व शिवः शिवः सर्वो नास्ति भेदश्र कश्चन। कथं च विविध पश्यत्येकत्व च कथं पुनः ।२० तथ क चव सूर्यांख्यं ज्योतिर्नानाधिभं जनैः। जलादी च विशेषेण दृश्यते तत्तथैव सः।२१ शिव-भक्तकी भावना ऐसीही होनी चाहिए कि सर्वत्र शिवही हैं शिव के अतिरिक्त स सारमें अन्य कुछमी नही हैं, भ्रान्तिवश वहीशिव यहाँ नाना स्वरूप में भासमान होते हैं जिस तरह मिट्टी, सागर और सुवर्ण विभिन्न उपाधियोंके कारण अनेक रूपमें दिखलाई दिया करते हैं वैसेहीशिव उपा- धियोंके कारण नाना स्वरूप में रहते हैं। १५-१६। वास्तवमें विचार करके

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१४२ ! 1 श्री शिवपुराण देखा जावे तो यहाँ कारण और कार्यमें कुछभी भेद नहीं होता हैं। यहभेद जो प्रतीत होता है वह केवल अपनी बुद्धिकी भ्रान्तिके होनेसे ही होता है। जव यह बुद्धिकी त्रांति स्वरूपअज्ञान न नष्ट होजाता है तो यह अन्तरफिर नहीं दिखाईदेता है और दूर हो जाता है।१७। कारणस्वरूप बीजसेहीवृक्ष अनेकरूपताका प्राप्तकिया करता है किन्तु अन्तमें वहवृक्ष तो नष्ट होआता है और बीजही शेष रहता है।१द।यहां ज्ञान सम्पन्न जीवात्मा बीजस्वरूप है और वह समस्त प्रकृति स्वरूपिणी विकृति वृक्षके तुल्य है। फिर भी उसकी निवृत्तिमें ज्ञानीही होता है इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।१९। यह समस्त जगत् शिव है तथा शिवही में सम्पूर्ण जगत् है। इन दोनोंमें वस्तुतः कोई भी भेद नहीं होता है। यह कैसे अनेक स्वरूप में दिखाईदेता है और कैसे फिर एकता दिखलाई दिया करनीहै-इसे समझाते हैं।२०। जिस प्रकार एक ही सू्यं के स्वरूप जलमें मनुष्यों को अनेक सूर्य दिखाई देते हैं उनी तरहसे वह शित्र एक होते हुए भी म्रान्तिके कारणही अनेक रूप में भासमान हुआ करते हैं।२१। सर्वंत्र व्यापकश्चव स्वर्शत्व न विबध्यते। तथैव व्यापको देवो बध्यते न क्वचित्स वं ।२२ साहकारस्तथा जीवस्तन्मुक्तः शङ्करः स्वयम्। जीवस्तुच्छः कर्मभोगी निर्विप्तः शङ्गरो महान् ।२३ यथैकं च सुवर्णादि मिलिपं रजतादिना। अल्पमूल्यं प्रजायेत तथाजीवोऽप्ब्रहयुतः ।२४ यथैव हि सुवर्णादि क्षारादेः शोधित शुभम्। पूर्यवन्मूल्यतां याति तथा जोवोऽपि संस्कृतेः ।२५ प्रथम सद्गुरु प्राय्य भक्तिभावसमन्वितः । शिवबुद्धया करोत्युच्चेःप जनं स्मरणादिकम् ।२६ तद्बुद्धया देहतो याति सर्वंपापादिको मलः। तदाऽज्ञानं च नश्येत ज्ञानवाञ्जायते यदा ।२७ तदाह कारनिर्मु क्तो जीवो निर्मलबुद्धिमान्। श ङ्गरस्य प्रसादेन याति शङ्गरतां पुनः ।२८

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ज्ञाननिरूपण और शिव-दिज्ञान [ १४३

जिसतरह आकाश व्यापकहोकर भी किसीके स्पर्शकरनेमें नहीं आता है, उसीप्रकारसे वह सर्वव्यापक परमात्माभी कहीं बद्ध नहीं होता है।२२। यह जीवात्मा अहद्वातसेयुत्त है और शिव स्वयं उस अहङ्कारसे रहित हैं। जीवएकतुच्छ और कृत शुभाशुभ कर्मोंका भोगनेवाला है किन्तु शङ्करपरम महान् और निरन्तर नितात निर्लिप्त है।३। शुद्धजीवभी अहङ्कारसे युक्त होनेके कारण तृच्छबनजाता है जैसे सुवर्ण मूल्यवान् होतेहुएभी चाँदी आदि के मिल जानेपर स्वल्प मूल्य वाला बनजाता है ।२४। तेजाब और अग्नि एवं क्षार आदिसे शोधित किए जानेपर जिसतरह सुवर्णकी शुद्धि होजाती और पूर्ववत् समृच्ति मूत्य वाला बनजाता है,उसी माँति संस्कारोंके द्वारा यह अहकारी जीवात्माभी शुद्धस्वरप वाला होजाया करता है।२५। जीव का वर्तव्य है कि सर्वप्रथम तरि सीसुयोग्य श्रष्टशुरुसे ज्ञानकीदीक्षा प्राप्तकरे, फिर परम भक्ति के भाव से शिव बुद्धि से उनका पूजन तथा उच्च स्वरसे उनके नामका स्मरण करना चाहिए।२६। इस प्रकार की बुद्धिबना लेनेपर इस देहके समस्त पाप एवं मलदूर होजाया करते हैं और साराअज्ञान नष्ट होकर ज्ञानउत्पन्न होता है।२७। जबयह जीवात्मा ज्ञानसम्पन्न होजाता है और अहंकारसे छूटजाता है तो उसकीबुद्धि अत्यन्तनिर्मल होजाती है तथा शिवके प्रसादसे शिवके स्वरूप को प्राप्त कर लिया करता है ।२८। यथाऽदर्शस्वरूपे च स्वीयं रूपं प्रदृश्यते। तथा सर्वत्रगं शम्भु पश्यतीति सुनिश्चितम् ।२९। जीवन्मुक्तः स एवासौ देहः शीर्णः शिवे मिलेत्। प्रारब्धवशगो देहस्तद्भिन्नो ज्ञानवान् मतः ।३०। शुभ लब्ध्वा न हृष्येत कुप्येल्लब्धवाऽशुभ नहि। द्वन्द्व षु समता यस्य ज्ञानवानुच्यते हि सः।३१ आत्मयोगेन तत्वानामथवाच विवेकतः। यथा शरीरतो यास्याच्छरीर मुक्तिमिच्छता।३२ सदाशिवो विलीयेत मुक्तो विरहमेव च। ज्ञानमूलं तथाध्यात्म्यं तस्य भवितिः शिवस्य च ।३३

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१४४ ) (श्री शिवपुराण

भक्तेश्र प्रेम संप्रोक्त प्रेम्णश्च श्रवण तथा। श्रयणाच्चापि सत्सङ्ग: सत्सङ्गाच्च गुरुबु धः।३४ सम्पन्न च तथा ज्ञाने मुक्तो भवति निश्चितम्। इति चेज्ज्ञानवान्यो वै शम्भुमेव सदा भजेत् ।३५ जिम तरह दर्वण में अपना स्वरू दिखाई देता है उसी तरह शिवको स्वंत्र व्यापक जानते हैं, यह निश्चव ही समझ लेना चाहिये ।२१। वह जीवात्मा फिर मुक्तहोकर देहसे रहितहोकर शिवकेही स्वरूपमें जाकरमिल जाया करता है। यह देह प्रारब्धके वशीभूत होनेके कारणही मिलाकरता है किन्तु ज्ञानीका शरीरके रहते हुएमी उससे रहिनही मानागया है।३०। ज्ञानवान्जीव वही है जो अपनी प्रियवस्तुसे परमहर्षित नहीं होता है और नि किसीभी अप्रियवस्तु या दश में शोकयाक्रोध नहींकरता है और सुख तथा श दुःखमें जो समान ही भावना रखता है ३१। मुक्तिका इच्छु क पुरुष अपने आत्माके योगसे या तत्वोंके विचारसे अनने शरीरसे शरीरका त्यागकिया जी ब्रा करता है।३२। जो सदाशिवमें लीनहोजाता है,वह समस्त व्यथापीड़ाओंसे वा छ टकारा पाकर ज्ञानके मूल स्वरूप अध्यात्मकी प्राप्ति करता है औफिर उसे शिवकी अनपायिनी भक्ति मिलनी है।३३। भक्ति से प्रेम उत्पन्नहोता बु

है, प्रभसे श्रवण और श्रव्रण से सत्सङ्ग का लाभ होता है और सत्सङ्गसे लिं वि संसारमें विद्वान् उद्धारक्र गुरुद्ेव की प्राप्ति हुआकरती है।३४। गुरुसे को जब ज्ञानप्राप्त होता हैं तो निश्चयही मुक्ति हो जाया करती है। जो नित्य उप निरन्तर शिव की उपासना करता है वह इसी रीति से ज्ञान सम्पन्न हो मह जाया करता है।३५। जि अन्याया च भक्त्या व युतः शम्भु भजेत्पुनः । के अन्ते च म क्तिमायाति नात्र कार्या विचारणा।३६ अतोधिको न देवोस्ति म क्तिप्राप्त्यै च शङ्करात्। चर

शरणं प्राप्य यञ्चैव संसाराद्विनिवर्तते ।६७ प्रका आप इति मे विविधं वाक्यम सीणं च समागतैः। कर निश्चित्य कथित विप्रा धिता धार्यं प्रयत्नतः ।३८

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शिव का सगुण-निर्गुण स्वरूप ] [ १४५

प्रथमं वष्णवे दत्त शंभुना लिंगसम्मुखे। विष्णुनां ब्रह्मरो दत्त ब्रह्मणां सनकांदिषु।३९ नारदाय ततः प्रोक्त तज्ज्ञानं सनकादिभिः। व्यासाय नारदेनोक्त तेन मह्य कृपालुना ।४० मया चैव भवद्भयश्च भविद्भर्ल्लोंकहेतवे। स्थापनीय प्रयत्नेन शिवाप्राप्तिकर च तत् ।४१ इति वश्च समाख्यातं यन्पृष्टोऽह मुनीश्वराः। गोपनीयं प्रयत्नेन किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ ।४२ जो मानव अत्यन्त भक्ति की भाबना से शिवका भजन करता है वह निश्चयही अन्तमें मुक्तिके परमपदकी प्राप्तिकिया करता है ।३६। भगवान् शङ्कर से अधिक अन्य कोई भी देवता नहीं जिसकी शरण में जाकर यह जीवात्मा संसार के समस्तबन्धनोंको तोड़कर विमुक्त हो जाता है।३७। हे ब्राह्मणो ! मैंने ऋषियों के समागम से ही यह ज्ञान प्राप्त होने वाले अनेक वाक्य पूर्ण निश्चय करके तुमसे कहे हैं। सब आपको यत्नपूर्वक अपनी बुद्धिमें धारण करने चाहिए ।३८। सर्वप्रथमभगवान्शिवने अपने ज्योति लिंङ्गके समक्षमें मगवान् बिष्णुदेव को यहज्ञान प्रदानकियाथा। इसके अनन्तर विष्णुने ब्रह्माजी को इसका उपदेश दिया और ब्रह्माने सनकादिक ऋषियों को इस ज्ञान का उपदेश दिया था।३९। सनकादिकने इसी दिव्य ज्ञानका उपदेश नारदजीको दिया था। देवषि नारद ने व्यासजीको और वेदव्यास महर्षि ने मुझ यह ज्ञान प्रदान किया है ।४० अब मैंने आपकी उत्कट जिज्ञासा जानकर इसज्ञानको आपको दिया है। आप सबको संसारके हित के लिए इस ज्ञान को यत्नपूर्वक सुरक्षित रखना चाहिये। यह ज्ञान शिवके चरणों की प्राप्ति करा देने वाला है ।४१। हे मुनीश्वरो ! आपने जिस प्रकारसे मुझसे पूछा वह मैंने भली भाँति सभी आपको बतला दिया है। आप इस ज्ञान को यत्नपूर्वक छिपाकर रखें। अब आप मुझसे क्या श्रवण करना चाहते हैं ? ।४२। एतच्छ्ू त्वा तु ऋषय आनन्द परमं गताः।

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हर्षगद्गदया वाचा नत्वा तुष्टुवमु हुमुक्ष ।४३ व्यास नमस्तेऽस्तु धन्यस्त्वं शैवसत्तमः । श्राविंत नः पर वस्तु शैव ज्ञानमनुत्तन्।४४ अस्माकं चेतसो भ्रान्तिर्गता हि कृपया तव। सन्तुष्टाः शिवसज्ज्ञानं प्राप्यस्ततो विमुक्तिदम्।४५ नास्तिकाय न वक्तव्यमश्रद्धाय शठाय च। अभक्ताय महेशस्य न चाश श्रषवे द्विजाः ।४६ इतिहासपुराणानि वेदांछास्त्राणि चासकृत्। विचार्योद्ध तत्सार मह्य व्यासेन भाषितम्।४७ एतच्छुत्वा ह्यकवारं भवेपाप हि भस्मसात्। अभक्तो भक्तिमाय्नोति भक्तस्य भक्तिवर्द्ध नम् ।४८ पुन.श्रुते च सद्र्भक्तिर्म् क्ति स्याच्च फ्रतेः पूनः। तस्मात्पुनः पुनः श्राव्यं भुक्ति मुक्तिफलेप्सुभिः ।४९ व्यासजीने कहा-यह सुनकर उन सब ऋृषियों को बहुतही प्रसन्नताहुई और हर्षांतिरेकसे गद्गदवाणोसे नमस्कारपूर्वक बारम्बार स्तुति करने लगे ४:।ऋृ षियोंने कहा हे व्यासमहर्षिके शिष्य सूतजी ! तुम शिवके उपासकों में परमश्रष्ठ एवं धन्यहो। आपने बड़ाभारी अनुग्रह करके हम सबको परम तत्वरूपी शिव सम्बन्धी ज्ञानका श्रवण कराया है ।४४। आपके अनुग्रह से हमारे मनकीभ्रान्ति एककम हटगई और आपके सुखसे मुक्तिदायक शिवका ज्ञानपाकर हम लोग पूर्ण सन्तुष्ट हुए हैं ।४५। सूतजीने कहा-हे द्विजवरो ! इस तत्व तथा इतिहास को आप लोग किसी नास्तिक-शिव-भक्ति रहित श्रद्धाहीन-शठ और जो सुनकर अनुराग नहीं रखता है उससे कभी मत कहना। यह परम गोप्य है।४६। यह सारा वृतान्त अनेक इतिहास- पुराण-शास्त्र और वेदोंका बार-बार मनन करके उनके सारांश स्वरूप व्यासजी ने मुझसे कहा है ।४७। इसका एक ही बार श्रवण करने से समस्तपाप भस्मीभूत होज ते हैं। यह अभक्तको भक्तिदेत है और जोभक्त हैं उनकी भक्तिको विशेष बढ़ा देता है ।४८। इनके दोबार श्रवण करने से

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ज्ञाननिरूपण और शिव-विज्ञान [ १४७

परम श्रेष्ठ भक्तिकी प्राप्ति होती है और इसके भी आगे सुनने से मोक्ष पद मिल जाता है। अतरव भोग-मोक्ष के इच्छुकु जीवों को इसका बारबार श्रवण करना चाहिए।४६। आवृत्तय: पञ्च मार्याः समुदिश्य फलं परम्। तत्प्राप्नोति न सन्देहो व्यास्य वचनं त्विदम् ।५० न दुर्लभ हि तस्यैव येनेद श्रतमुत्तमम् । पञ्चकृत्वास्तदा वृत्या लभ्यते शिवदर्शनन् ५० पुरातनाश्च राजानो विप्रा बैश्याश्च सत्तमाः। · इदं श्रत्वा पश्चकृत्वो धिया सिद्धिं परां गता :।५२ प्रोष्यत्यद्यापि यश्चेद मानवो भक्तितत्परः । विज्ञानं शिवसंज्ञ वै भुक्ति मुक्ति लभेच्च सः ।५३ इति तद्वचनं श्रत्वा परमानन्दसागताः । समानचुइच ते सूतं नानावस्तुभिरादरात् ।५४ नमस्कारैः स्तवैश्चैव स्वस्तिवाचनपूर्वकम् । आशीर्भिर्वद्धयामासुः सन्तुष्टाश्छिन्नसंशया ।५५ परस्पर च सन्तुष्टाः सूत ते च सुबुद्धयः । शम्भु देव पर मत्वा नमन्ति स्म भजन्ति च ।५६ यदि किसी विशेष फल का उद्देश्य चित्तमें हो तो इसकी पाँच बार आवृत्ति अवश्यहीकरे। व्यासजीने कहा हैकि जो ऐसाकरते हैं उनके उद्देश्य की सिद्धिके साथही उन्हें मुक्ति भी अवश्य मिलती है, इसमें कुछमी सन्देह नहीं है ।५०। जिस किसी ने भी इसपरमउत्तम इतिहासको श्रवण किया है उसको कोईमी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती है। इसका पाँचवार पाठ करने से भगवान्शिवके दर्शनभी प्राप्त होजाते हैं ।५१। प्राचीनकालमें अनेक राजा, ब्राह्मण तथा वैश्यलोग इसकी पाँचआवृत्ति इसी बुद्धिसे करलेने के पश्चात् परम सिद्धियों का लाभ उठाचुके हैं ।५२। इस समय में भी जो मनुष्य भक्ति भावमें तत्परहोकर इसका श्रवण करेगा वह शिव-विज्ञानको भुक्ति और मुक्तिको प्राप्त कर लेगा॥५३॥ व्यासजी ने कहा सूतजी के ऐसे

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१४८ ) श्री शिवपुराण

दचन सुनकर ऋषिमों को अत्यधिक आनन्द हुआ और बड़े आदर के साथ अनेक पूजोपचारोंसे सूतजी का वे अर्चन करने लगे ।५४। परमसन्तुष्ट और सन्देहरहितहोकर स्वस्तिवाचन करतेहुए नमस्कारों तथा आशीर्बादोंसे उन्हे बढ़ाने लगे ।५५। तबसे बुद्धिशाली वे ऋषिगण तथा सूतजी शिवको ही पर्वोपरि शिरोमणिदेव मानकर उन्हें नमस्कार करते हुए पूजने लगे ।५६। एतच्छितसुविज्ञानं शिवस्यातिप्रिय महत् । भुक्ति मुक्तिप्रदं दिव्यं शिवभक्तिविवर्द्ध नम् ।५७ इय हि संहिता पुण्या कोटिरुदाह्यया परा। चतुर्थी शिवपुराणस्य कथिता मे मुदावहा ।५८ एतां यःश्र णुयाद् भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः। स भुक््वेहाखिलान्भोगान्नते परगति लभेत् ।५३ यह भगवान् शिवका विज्ञान शिवको अत्यधिक प्रसन्न करने वाला है. भुक्ति एव मुक्तिका दायक तथा दिव्य भक्तिको वढ़ाने वाला है ।५७। यह अल्यन्त 'कोटि रुद्र' नाम वाली शिवपुराणकी संहिताका वर्णन मैंने किया जो महान् आनन्द की देने वाली है ।५८। जो मनुष्य सावधान चित्त से भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है वह नित्य ही समस्त भोगों का उपभोग कया करता हे और अन्त समय में परमगति कोप्राप्त होता है ।५९।

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उमा-संहिता

सनत्कुमार का महापातक वर्शगन ये पापनिरता जीवा महानरकहेतवः । भगवंस्तान्समाचक्ष्व ब्रह्मपुत्र नमोऽस्तु ते ।१ ये पापनिरता जीवा महानरकहेतवः । ते समासेन कथ्यन्ते सावधानतया श्रणु ।२ - अकार्याभिनिवेशश्च चतुर्द्धा कर्म मानसम्।३ अविबद्धप्रलापत्वमसत्य चाप्रिथं च यत् । परोक्षतश्च पैशन्यं चतुर्द्धा कर्म वाचिकम् ।४ अभक्ष्यभक्षण हिंसा मिथ्याकार्यनिवेशनम् । परस्वानामुपादनं चतुर्द्धा कर्म कायिकम् ।५ इत्येतद् द्वादशविध कर्मप्रोक्त त्रिसाधनम् । अस्य भेदान्पुनर्वक्ष्ये येषां फलमनंतकम् ।६ ये द्विषन्ति महादेवं संसारार्णवतारकम् । सुमहत्पातक तेषां निरयाणवगामिनाम् ।७ श्रीव्यासजीने कहा-हे भगवन् ! हे ब्राह्मपुत्र ! अब आप कृपाकर उन जीवोंका वर्णनकीजिये जो महापापी हैं और नरक गमनकरनेके अधिकारी होते हैं। हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।१। सनत्कुभारजी ने कहा जो जीवात्मा सवदा पापकरमोंमें परायणहोकर महाघोरनरक के अधिकारी हैं उनका वर्शगन मैं अति संक्षेप के साथ करता हूँ। आप सावधान होकर श्रवण करें ।२। मानसिक कर्म भी चार प्रकार का होता है। दूसरों के धन तथा स्त्रीके प्राप्त करनेकी इच्छा करना, अपने चित्तमें दूसरों का बुरा विचारना, काम-वासना विचार तथा अभिनिवश करना-ये चार मनके कर्म

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१५० J [ श्री शिवपुराण कहे गये हैं।३। इसी तरह चारही प्रकारका वाचिक कर्म भी होता है- असङ्गत सम्माषण करना,असत्य तथा अप्रियबातें कहना, पीठपीछे चुगल- खोरी करना-ये वाणीके कर्म हैं ।४। ऐमेही चार तरहके शारीरिक कर्म हैं-अमक्ष्यका भक्षण करना हिंसा करना,झू ठे कार्य करना और दूसरों का धन उड़ालेनाये शरीरके कर्म कहेजाते हैं ।५ यहाँ तक शारीरिक,वाचिक और मानसिक बारहतरहका कर्म बतलाया है। इसकेआगे इनभेदोंके प्रभेद बतलाते हैं जिनकाकि अनन्त फल हुआकरता है ।६। जोमनुष्य इस संसार रूपी महान् अगाधसागरसे तारनेवाले महादेवकी निन्दाकरते हैं उनका यह महापाप नरकके समुन्द्रमें जानेके लायक होता है ।७' ये शिवज्ञानवक्तार निन्दन्ति च तपस्विनन् : ग रुन्पितृनथोन्मत्तास्ते यांति निरयार्णवम् 1८ शिवनिन्दा गुरोनिन्दा शिवज्ञानस्य दूषणम् । देवद्रव्यापहरणं द्विजद्रव्यविनाशम् हरन्ति ये च समूढ़ाः शिवज्ञानस्य पुस्तकम् । महांति पातकान्याहुरनन्तफलदानि षट 1१० नाभिनन्दति ये दृष्ट्वा शिवपूजां प्रकल्पिताम्। न नभत्यर्चित दृष्टवा शिवलिङ्ग स्तुवति न ।११ स्थानस स्कापूजां च ये न कुर्वति पर्वसु। विधिवद्धा गुरुणां च कर्मयागव्यवस्थिताः ।१२ यचेष्टचेष्टा निः शङ्काः सतिष्टन्ति रमति च । उपवारनिनिम क्ताः शिव ग्र गरुसन्निधौ ।१२ ये त्यजति शिवा व र शिवभक्तान्द्विषन्ति च। असंपूज्य शिवज्ञान येऽधीयन्ते लिखन्ति च ।१४ जो महा उन्मत्त पुरुष शिव की गाथा कहने वाले तपस्वी तथा अपने गुरुकी एवं पितरोंकी निन्दाकिया करते हैं वे दुरात्मा जीव भी नरकगामी होते हैं।८। शिवकी निन्दा-गुरुकी निन्दा, शिव-ज्ञानमें दोष लगाना और ब्राह्मणोंके धनका अपहहण या नाश करना, शिवज्ञानीकी पुस्तकका हरण

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ये छः अनन्त फल देने पातक बताये गये हैं ।९-१०। जो कल्पित हुई शिव-पूजाको देखकर भी हर्षित नहीं होते है अवा शिवके पार्थिवलिङ्गको पूजित देखकर भी उन्हें प्रणाम नहींकरते हैं तथा उनका स्तवन नहीं करते हैं।११। जो सर्वदा अपनीइच्छा के अनुकूलही निस्सन्देह स्थितिरखते हैंतथा रमण कियाकरते हैं और शिवजीके आगे एवं गुरुके निकट उपचारसे भ्रष्ट होते हैं। ।१२। जो पर्दोमेंस्नान और संस्कार-पूजानहींकरते हैं तथाकमयोग में व्यवस्थितरहकर सविधिअपने गुरुजनकाअर्चन नहीं कियाकरते हैं।१३। जो शिवाचारसेयुक्त शिवके भक्तोंसे द्वषभावरखते हैं और जो शिव-विज्ञान का बिनापूजनके ही पाठकिया करते हैं या लिखते हैं ।१४। अन्यायतः प्रयच्छन्ति श्रण्वन्त्युच्चारयतति च। विक्रीडन्ति च लोभेन कुशाननियमेन च ।१५. असस्कृतप्रदेशेष यथेष्ट स्वापयन्ति च । शिवज्ञानकथाऽक्षेपं यः कृत्वान्यत्प्रभाषते ।१६ न व्रवीती च यः सत्य न प्रदानं करोति च। अशुचिवांऽशुचिस्थाने यः प्रवक्ति श्रणोति ।१७ गुरुपूजामकृत्वैवः यः शास्त्र श्रोतुमिच्छति । न करोति च शुश्र षामास्थां च भत्तिभावतः ।१८ नाभिनन्दति तद्वाक्यमुत्तरं च प्रयच्छति । गुरुकर्मण्यसाध्यं यत्तदुपेक्षां करोति च ।१९ गरुमार्तमशक्त च विदेश प्रस्थित तथा। वैरिभि: परिभूत वा यः संत्यजति पापकृत ।२० तद्भार्य्यापुत्रमित्र यश्चावज्ञां करोति च। एवं सुवाचकस्यापि गुरोर्धर्मानुदशिनः ।२१ जो अन्यायसे दान करते, सुनते तथा उच्चारण करते हैं एवं लालच के वशीभूत होकर कुत्सित ज्ञानके नियमसे बुरी-बुरी क्रीड़ा करते हैं ।१५। जो लोग अपनीहीइच्छासे असंस्कृत स्थानों में सोते या सुलाते हैं औरशिव की ज्ञान-कथामें विक्षेपकरते या आक्षेपकरके कुछकुतक करते हैं।१३जो

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१५२ ] [श्री शिवपुराण कभी सत्य नहींबोलते हैं, कनी कुछ प्रदान नहींकरते हैं और स्वयं पतरित्र हो या अपवित्रहो ऐसे स्थानमें कुछ कहते या सुनते हैं।१७। जो बिना गुरुके पूजन किये ही शास्त्रोंको सुनते हैं या श्रवण करना चाहते हैं औरजोअपने गुरुकी सप्रेम भक्तिकेसाथ सेवा नहीं करते हैं याउनकी आज्ञाकापालन नहीं करते हैं।१८।जो गुरुजवोंके वाक्योंका आदर नहीं करतेहैं या उनको उत्तर देदेते हैं और जो गुरुके कार्यको असाध्य बताकर उसकी लापरवाही किया करते हैं ।१६। जो पापीगुरु,रोगी, असमर्थ तथा परदेशमें स्थित या शत्रुओं द्वारा घिरेहुए या तिरस्कृत मनुष्यको छोड़देते हैं।२० जो उनकी स्त्री, पुत्र और मित्रोंका तिरस्कार करते हैं तथा श्रष्ठवक्ता,ध्म दर्शक गुरुकी मार्या, पुत्र और मित्रकी अवज्ञा किया करते हैं।२१। एतानि खलु सर्वाणि कर्माणि मुनिसत्तम । सुमहत्पातकान्याहुः शिवनिन्दासमानि च ।२२ ब्रह्मघ्नश्र सुरापश्र स्तेयी च गुरुतल्पगः । महापातकिनस्त्वेते तत्संयोगी च पञ्चम: ।२३ क्रोधाल्लोभाद् भयाद् द्वषाद् ब्राह्मणस्य वधे समः। मर्मांतिक महादोषमुक्त्वा स ब्रह्महा भवेत् ।२४ ब्राह्मण यः समाहूय दत्वा यश्चाददाति च। निर्दोष दूषयेद्यस्तुस नरो ब्रह्महा भवेत् ।२५ यश्च विद्याभिमानेन निस्तेजयति सुद्विजम्। उदासीन सभामध्ये ब्रह्महा स प्रकीर्तितः ।२६ मिथ्यागुणैयं आत्मान नयत्युत्कर्षतां बलात्। गुणानापि निरुद्वास्य स च वै ब्रह्महा भवेत् ।२७ गवां बृषाभिभूतानां द्विजानां गुरुपूर्वंकम् । यः समाचरते विध्नं तमाहुब्र ह्मघातकम् ।२८ हे मुनिश्रेष्ठ! ये उपयुक्त समस्तकर्म शिवकी निन्दाके तुल्यही महा- पाप कहे जाते हैं।१२। ब्राह्मण की हत्या करने वाला मदिराका पान करने वाला, चारीकरने वाला और अपने गुरुकी पत्नीका गमन करने वाला तथा

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पाँचवाँ इनके साथ मेल मोहब्बत रखने वाला ये सब महापापी कहेजाते हैं ।२३। क्रोधसे, भयसे, द्व षसे जो ब्रह्माण के बधमें मर्मोंको भेदन करने वाले महादोषोंको कहता है दहभी ब्रह्महत्यारा माना जाता है२४। जोव्र ह्राण को बुलाकर दियेहुए दानकोभी फिर वापिस लेलेता है और जो दोषरहित पवित्र व्यक्ति को भी दोषलगाता है वह भी ब्रह्म हत्यारा कहाता है।२५। जो मनुष्य अपनी पठित विद्या के अभिमान में चूर होकर किसी उदासीन श्रध्ध ब्राह्मणको निस्तेज करता है वहमी ब्रह्न-हत्यारेके तुल्य ही महापापी माता जाता है२६। जो सपने मिथ्यागणों से बलात् अपने ऐसे गुणों का प्रकटकरके आपही उन्नतिके पदकीप्राप्ति कियाकरता है वहभी ब्रह्म-हत्यारे के समान ही कहा गया है।२७। बैल आदि मे तिरस्क। हुई गायोंको तथा गुरु के सहित ब्राह्मणों को विध्न उपस्थिन करता है वह भी ब्रह्म-हत्यारा माना गया है।२८। देवद्विजगवां भूमि प्रदत्तां हरते तु यः । प्रनष्टामपि कालेन तमाहुत्र त्रघातकम् ।२९ देवद्विजस्वहरणमन्यायेनारजित तु यत् । ब्रह्महत्यासम ज्ञय पातक नात्र सशय ।३० अधीत्य यो द्विजो वेद ब्रह्मज्ञान शिवात्मकम्। यदि त्यजति यो मूढ़ः सुरापानस्य तत्समम् ।३१ यत्किचिद्धि ब्रतं गृह्य नियम यजन तथा। संत्याम: पञ्चयज्ञानां सुरापानस्य तत्समम् ।३२ पितृमातृपरित्यागः कूटसाक्ष्यं द्विजानृतम् । आमिष शिवभक्तानामभक्ष्यस्य च भक्षणम् :३३ बने निरपराधानां प्राणिनां चापघातनम् । द्विजार्थ प्रक्षिपेत्साधुन धर्मार्थ नियोजयेत् ।३४ गवां मागे वने ग्रामे यैश्चैवाग्नि प्रदीयते। इति पापानि घोराणि ब्रह्महत्यासमानि च । ३५ जो देवता, विप्र और गौओके लिये कृष्णार्पग की हुई भूमि को काल-

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वश नष्ट होनेपर भी हरणकर लेता है उसमनुष्यको भी ब्रह्म-हत्यारा कहा जाता है।२९। वि सीभीदेव तथा ब्राह्मणकेधनका हरणकरना तथा अनीति से धन एकनित करना-यहभी कर्म ब्रह्म-हत्याके समानहोते हैं और इनका पाप भी ब्रह्म-हत्यारे के तुल्य ही लगता है इसमें तनिक मी सन्देहनहीं है ३०जोमहामूढ़ विप्रवेदोंको पढ़करभी शिवके ब्रह्मज्ञानका त्यागकरदेता है वह मदिरा पानके समान पाप बतलालागया है।३१। किसी भी नियम या ब्रतको ग्रहणकरके पञ्च-महायज्ञका त्यागककरदेना भी मदिरा-पानकेसमान महापाप माना गया है ।३२। अपने पूज्य माता-पिताका त्याग कर देना, मिथ्या माषण करना, शिवके सेवक भक्तोंके माँसका सेवन करना और जो भक्षण के अय ग्यव्स्तु है उसका मक्षण करना।३३। वनमें निरपराधबिचारे १शुओंका वध करता और साधु- ब्राह्णों के लिये तथा धर्मके कार्यके लिये प्राणोंका मोह करना।३४। गौओंकी राहमें तथा ग्राममें आग लगा देना- ये सभी ब्रह्म-हत्याके तुल्यही महापाप कहे जाते हैं।३५। दीनसर्वस्वहरण नरस्त्रीगजवाजिनाम्। गोभूरजतवस्त्राणामोषधीनां रसस्य ।३७ चन्दनागरुकर्पू रकस्तूरीपट टवाससाम् विक्रयस्त्वविपत्तौ यः कृतो ज्ञानाद् द्विजातिभि: ।३८ हस्तन्यासापहरण रुक्मस्तेयसमं स्मृतम् । कन्यानां वरयोग्यानामदानं सदृशे वरे ।३८ पुत्रमित्रकलशेषु गमनं भगिनीषु च । कुमारीसाहसं घोर मद्यपस्त्रीनिषेवणम् ।३६ सवर्णायाश्च गमनं गुरुभार्यासम स्मतम् । महापापापि चोक्तानि श्रणु त्वमुपप तकम्।४० किसी भी दीन-हीन का सर्वस्व हरण कर लेना-पुरुष, स्त्री, हाथी, घोड़ा, गो-भूमि, चाँदी वस्त्र, औषध,रस,चन्दन, अगर,कपूर, कस्तूरी और पट्ट वस्त्र आदि के बेचनेका काम करना और द्विजातियोंके द्वारा ही इन कामों काज्ञ नपूर्वक कराना ।३६। हाथ से रखी हुई किसी धरोहरको मार लेना

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सुवर्शके चुराने के समान है। जो कन्याए वरके देने योग्य हैं उन्हें उनके समान वरोंको न देना, पुत्र-मित्रकी स्त्रियोंकेसाथ तथा बहिनोंकेसाथ गमन करना, कुमारीके साथ बलात्कार करना, मदिरा-पान करनेवाली स्त्रीकेसाथ गमन करना,सवर्ण स्त्रीके साथ गमन करना गुरु-पत्नीके गमन के समानही होता है-ये सभी ऊपर बतायेहुए महाघोरनाप कहे गये हैं, इसके आगे मे अब उपपातकों का वर्णन करता हूँ उनको आप सुनें ॥३७-३८-३९-४०। विभिन्न पापों का स्वरूप वरन द्विजद्रव्यापहरणमपि दायव्यातिक्रम 1 अतिमानोऽतिकोपश्च दांभिकत्व कृतघ्नतः ।१ अत्यन्तविषयासक्ति: कार्पण्यं साधुमत्सरम् । परदाराभिगमन साधुकन्यासु दुषणम् ।२ परिवित्तिःपरिवेत्ता च यया च परिविद्यते। तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम्।३ शिवाश्रमतरूणां च पुष्पारामविनाशनम् । यः पीडामाश्रमस्थानामचरेदल्पिकामपि ।४ सभृत्यपरिवारस्य पशुधान्यधनस्ध च । कुप्यघान्यपशुस्तेयमपां व्यापावन तथा ।५ यज्ञारामतडागानां दारापत्यास्त विक्रयम्। तीर्थयात्रोपवासानां व्रतोपनयकर्मिणाम ।६

अप्क्षण च नारीणां मायथा स्त्रीनिषेवणम् ।७ श्रीसनत्कुमारजीने कहा ये नीचे बताये हुए सभी उपपातक कहे जाते है-ब्राहमणोंके धनकोछीन लेना, किसी भी अन्यके भागको स्वयं पचाकर उसे नहीं देना, अत्यन्त घमण्डकरना,अति पाखण्डकरना और किसी के किए हुए उपकारको न मानना।१। सांसारिक विषयों में ज्यादा मनकी प्रवृत्ति रखना, कंजूसी करना, सज्जन मनुष्यों के साथ ईष्याका भावरखना,दूसरोंकी स्त्रीके साथ गमन करना तथा श्रष्ठ कन्याओमें कोई भी दोष लगाना ।२।

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[श्री शिदपुराण لسما

पर विति परवेत्ता तथा जिसके द्वारा जाना जाता है इन दोनों को कन्या का दानकरना इन दोनोंन उज्ञकराना।३। शिवके आश्रममें स्थित वृक्ष बाग या पुष्पोंको नष्ट करना,आश्रममें रहने वाले मनुष्यों को पीड़ा देना-ये सभी उपपातक कहे जाते हैं ।४ सेवक परिवार के सहित पशु,धान्य,धनका दान कया धान्य पशुओं का चराना, जलको अपवित्र करना ।५। यज्ञ बाग, गरोवर, स्त्री और अपनी सन्तानको बेचडालना,तीर्थ यात्री तथा तीर्थ-स्थल उपवास, व्रत, उपनयन कने वालोंको विक्रय करदेना भी उपपातक होते हैं ६। स्त्री के धनसे वृत्त करना, स्त्रियों के द्वारा जीते हुए होना, स्त्रियों के रक्षण करने कपटमे लनभोग करना ।७। कलागताप्रदानं च धान्यवृष्टयुपसेवनम् । निन्दिताच्च धनादानं पण्यानां कूटजीवनम् 1८ विषमारण्यपत्राणां सतत वृषवाहनम् । उच्चाटनाभिचारं च धन्यादान भिषविक्रया।९ जिह्वा कामोपभोगाथ यस्यारल्भः सुकमसु। मूलेनाध्यापको नित्य वेदज्ञानादिक च यत् ।१० ब्राह्मयादिव्रतसत्यागश्चान्याचारनिषेवणम् । असच्छास्त्रागि नं शुष्कतर्कावलम्बनम् ११ देवाग्निगुरुस्राधुनां निन्दया ब्राह्मणस्य च। प्रत्यक्ष वा परोक्ष वा राज्ञां मण्डलिनामानि।१२ उत्सन्नपितृदेदेज्याः स्वकर्मत्यागिनश्च ये। दु शीला नास्तिका: पापाः सदा वाऽसत्यवादिनः ।१३ पर्वकाले दिवा वाप्सु वियोनौ पश्योनिषु । रजस्वलाया योनौ च मैथुन यः समाचरेत् ।१४ समय पर आयेहुए को भी कुछ न देना धान्य वृद्धिका सेवन करना,निन्दित धनको लेना और व्यापार में कूट-जीवन बिताना भी उपपातक बताये गये हैंद। विषम जङगलों के पत्तोंका तोड़ डालना, बैलका वाहन करना किसी के उच्चाटन या मारण का प्रयोग करना, धान्य का छीन लेना तथा वैद्य

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वृत्तिका करना-ये सभी उपपातक होते हैं।१।अपनी जिह्वाके रसभोग की कामनासे बुरेगमे्वृतहोना और वेदज्ञान आदिमें केवल मूलको पढ़ाना मी उपपातक होता है। १० ब्राहम आदि व्रतका त्याग कर देना, अन्योके आचारका सेवन बुरे शास्त्रोका अध्यय्षन और शुष्क तर्कका सहारा लेनाभी उपपोतक है।११। देवता, ब्राहमण,,ग्नि,साधु और चक्रवर्ती राजाकी पीछे मे निन्दा करना,पितृमज्ञ,यज्ञका त्याग करना, अपने स्वाभाविक कर्मका न्यागकर देना, दुराचरणकरना, नास्तिक भावरखना,पाप-वृत्तिकरना और मिथ्या बोलना-ये सभ्ी उपपातक कहेगये हैं।१२-१३। पर्वके सयममें, दिन के समयमे जलके मध्यम, वियोनि में, पशु योनिमें और रजस्वला योनिमे गमन करना उपपातक होते हैं ।१४। स्त्रीपुत्रमि संप्राप्तौ आशाच्छेदकराश्र ये। जनस्याप्रियवंक्तार: क्रराः समयवेदिनः ।१५ भेत्तां तडागकूपान संक्रयाणां रसस्य च। एकपंक्तिस्थितानां च पाकभेदं करोति यः ॥१६ इत्येतैः स्त्रीनराः पार्परुपातकिनः स्मृताः । युक्ता एभिस्तधान्येऽपि शृणु तांस्तु ब्रवीमिते।१७ ये गोब्राह्मणकन्यानां स्वामिमित्रतपस्विनाम्। विनाशयन्ति कर्माणि ते नरा नारकाःस्मृता ।१८ परस्त्रियाऽभितप्यंते ये परद्रव्यसूचकाः । परद्रव्यहरा नित्य तौलमिथ्यानुसारकाः ।१र्६ द्विजदुःखकरा ये च प्रहार चोद्धरति ये। सेवन्ते तु द्विजाःशूद्रां सुरां बध्नति कामतः ।२० ये पापनिरता:क्ररा येऽपि हिसाप्रिया नरा। वृत्यर्थ येऽपि कुवन्ति दानयज्ञादिकाःक्रियाः ।२१ जो स्रा-पुत्र और मित्रों के प्राप्त होने पर आशा को तोड़ देते हैं-तथा मनुष्योंकेसाथ स्वदा कटुभाषणकरते हैं और क्रूर,समयकाज्ञान नहों रखते हैं, ये सभीउपपातकी माननेजाते हैं।१५।तालाब-कूपतथा किसीभी जलाशय

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और रसोंका भेदनकरना एव एकही पंक्तिमें बैठेहुए लोगोंके भोजनमें भेद- भावकरना भी उपपातक होते हैं।२६। इन सभी ऊपर बताये हुए कर्मोंक करने से स्त्री हो या पुरुषहो सब उपपातकी कहे जाते हैं। जोभी कोई इन पातकोसे युक्त हैं तथा अन्यपापोंसे मी युक्तहोते हैं उन सबका वर्णन करते हैं आपलोग श्रवणकरें।१७। जो पुरुष नौ, ब्राह्मण,कन्या,स्वामी,मित्र और तपस्वियों के कार्यों को बिगाड़ डालते हैं वे निश्चयही नरकके गामी हुआ करने हैं। १८। जो अन्योंकी स्त्रियों से दुःखित होते हैं तथा जो पराये धन के सूचक हैं एवं नित्यही दूसरोके धनका हर॥ करने वाले हैं और मिथ्या तोल करने वाले होते हैं. वे नरक के अधिकारी हैं ।॥१९॥ जो ब्राह्मणोंको सताते हैं और उन पर प्रहार किया करते हैं-जो सिद्ध होकर शूद्र की स्त्री का सेवन किया करते हैं और कामसे मदिराको बाँधते हैं ॥१०॥जी सदा पापमय कर्मों में ही परायण रहा करते हैं-जो अत्यन्त क्रर हैं-जो सर्वदा हिंसा किया करते हैं और जो अपनी जीविकाके लिए ही दान यज्ञ आदि किया करते हैं।२१। गोष्ठाग्निजलरथ्यासु तरुच्छायानगेष। त्यजन्ति ये पुरीषाद्यानारामायतनेषु च ।२२ लज्जाश्रमप्रसादेष मद्यपानरताश्र ये। कृतकेलिभुजग:इ्च रन्घ्रान्वेषणतत्पर: ।२३ वशेष्टकालिकाकाष्ठः श गैःशंकुभिरेव च। ये मार्गमनुरुधति परसीमां हरन्ति ये ।२४ कूटशासनकर्त्तार: कूटकर्मक्रियारतः । कूटपाकान्नवस्त्राणां कूटसंव्यवहारिणः ।२५ धनुषः शस्त्रशल्यानां कर्त्ता यःक्रयवक्रयी। निद्र्देयोऽतीव भृत्येषु पशूनां दमनश्र यः :२६ मिथ्या प्रवदतो वाचआकर्णयति या शनै। स्वामिभित्रगुरुद्रोही मायावी चपलः शठ,२७ ये यारय्यापुत्रमित्राणिबालवृद्धकृशातुरान्। भृत्यानतिथिबधूश्र त्यक्त्वाश्ननति बुभुक्षितान् ।२६

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जो गोशाला, अग्निकुण्ड, जलाशय, गलीकी राह, वृक्षोंकीछाया,पर्वत शिखर और निवासस्थान में लल-मूत्र करते हैं या फेंकते ।-२। जो लज्जा के आश्रम तथा महलोंमें मद्यपान किया करते हैं। दूसरोंकेछिद्रों की खोज करने में ततर सर्पोंकेसम न क्रीड़ा करते हैं-वे सभी नरकगामी होते हैं। ।१२। जी पुरुष बांस,ईट,पत्थर,काठ्ठ,सींग और कालों से मार्ग को रोकदेते हैं तथा दूसरेंकी सीमाका हरण करलेते हैं ये सभी नरकके अधिकारी होते हैं।२४। जो कटपसे शिक्षा देने वाले, छल भद कर्म एवं व्यापारमें तत्पर रहा करते हैं और कपटपूर्ण पाक, अन्न तथा वस्त्रोंका व्यवहार करनेवाले होते हैं वे सब नरकगामी है ।२५। जो पुरुष धनुष, शस्त्र और शल्यों के निर्माण करने वाले हैं तथा इनकी खरीद फरोख्त किया करते हैं-अपने भृत्यों (नौकरों) केसाथ निर्दयताका व्यवहार कियाकरते हैं और जो पशुओं को बुरी तरहसे मारते हैं ये सब नरककेगमन करनेवाले होते हैं।२६। जो मनुष्य ूठी बातको धीरे-धीरे सुनाता है-अपने मित्र, स्वामी और गुरुसे द्रोहकरने वाले हैं कपट व्यवहारकरने वाले,ठग और चपल हैं-ये सब नरक के अधिकारीहोते हैं। २७। जो मनुष्य अपनी स्त्री-पुत्र,मित्र, बान्धव, वृद्ध दुर्बल,रोगी, भृत्य,अतिथि और बान्धवोंको न खिलातेहुए,भूखा ही छोड़ कर भोजनकर लिया करते हैं-ये सभी नरकके जाने वाले उतपातकी होते हैं।२६। यः स्वयमिष्टमश्नाति विप्रेभ्यो न प्रयच्छति। वृथापकः स विज्ञयो ब्रह्मवादिषु गहितः ।२९ नियमान्स्वयमादाय ये त्यजन्त्यजितेन्द्रियाः। प्रव्रज्यावासिता ये सरस्यास्य प्रभेदका: ।३० ये ताडयन्ति यां क्रूरा दमयते मुहुमुहुः । दुर्बलान्ये न पुष्णन्ति सतत यं त्यजन्ति च ।३१ पीडयंत्ययिभारेणासहत वाहयंति च । योजयन्नकृताहारान्न विमुचंचि संयतान् ।३२ ये भारक्षतरोगार्तान्गोवृषाँश्र क्ष धातुरान्।. न पालयन्ति यन्नेन गोध्नास्तेनारकाःस्मृता । ३३

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१६० श्री शिवपुराण

वृषाणां वृषणास्ये च पापिष्ठा गालयन्ति च। वाहयंति च गां बन्ध्यां महानारकिनोनरा: । ३४ आशया समनुप्राप्तान्क्षृतृष्णाश्रमकाशितान् । अतीथींश्च तथा नाथान्स्वतन्त्रान्गृहमागतान्।४५ अन्नाभिलाषान्दीनान्वा बालवृद्धकुशातुरान्। नानुकपति ये सूढ़ास्ते यांति नरकार्णवम् ।३६ जो स्वयं नियमोंको स्वीकारकरके इन्द्रियोको जीतनेबाला नर है ओर स्वीकृतनियमोंका त्यागकरदेते है और संन्यासग्रहणकरके घर में रहते हैं तथा शिव प्रतिमाका भेदन करते हैं ये सब नरकगामी होते हैं ।२९-३०। जी अत्यन्य क्रा नासे गायोंको मारते है तथा बारम्बार दमनकिया करते है,जो दुर्बलोंका सेषण नहीं कियाकरते हैं तथा उनको सर्बद्ा त्यागदेते हैं-वे नरक- गामीहोते हैं।३१। जो अत्यन्तबोझालादकर पीड़ादेते हैं,न सहनकरने वाले पशुकीभी बरावर जोततेरहाकरते हैं और जिनपशुओंको खाना न मिलाहो ऐने भूखे पशुओंको भी जोतते या बधाहुआ रखते है बे मनुप्य नरक यातना भोगनेके अधिकारी हुआ करते हैं।३२। जो अत्यन्त असह्य सार से पीड़ित एवं घायल, रोगी और क्षुदा पीड़ित गाय, बैलोंका समुचित रूपसे पालन पोषण नहीं कियाकरते हैं वे निस्सन्देह गौ हतारे, महापारी नरक के दुःख f भोगनेवाले होते हैं।३३। जो पापात्मा विचारबैलोंके अण्डकोशोंको पिटया कर उन्हें बधिया बनाया करते हैं तथा बाँझ गौओको भी जोताकरते हैं-वे पुरुष महानुनरककी यातनाभोगते हैं।३४। कुछ आशालेकर प्रप्तन्नोनेव ले, भूख-प्याम अर परिश्रमके कारण विकल, अभ्यागत तथा अनाथोको, अन्न पाने की इच्छासे समागनों का दीन, बालक वृद्ध,दुर्बल और रोसियो पर जो दया नहीं रहने हैं, वे महान् मूर्ख अवश्य ही घोरनरकमें जते हैं।२५-३६। गृहेप्वर्था निवर्तन्ते रमशानादपि बांधवाः। सुकृत दुष्कृत चैव गच्छन्तमनुगच्छति :३७ आजीविको माहिषिक: सामुद्रो वृषलीपतिः। शूद्रवत्क्षत्रवृत्तिश्च नारकी स्याद् द्विजाधमः ।३८

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विभिन्न पापोंका स्वरूप वर्णगन ] [ १६१

यश्चोचितमतिक्रम्य नरके स्वेच्छयंवाहरेत्करम् ॥३६॥ पच्यते सोऽपि योपि दण्डरुचिर्नरः ॥४०॥ उत्कोचक रुचिक्रीतस्तस्करैश्च प्रपीडयते। यस्य राज्ञः प्रजा राष्ट्र पच्यते नरकेषु सः ॥४१॥ ये द्विजा परिगृह्कान्ति नृपस्यान्यायवर्तिनः । मनुष्य मृत्युगत होजानेपर साराधन एश्वर्य घरमेंही पड़ाछोड़जाता है, उसे रमशानमें पहुँताकर भाई-बन्धुभी सब घर लौट आते हैं। केवल वहीं एक जीवात्मा अकेला किये हुए पाप तथा पुण्यों को साथ लेकर परलोक में जाया करता है। वहाँ अपने कर्मोंका भोग भोगना पड़ता है। अतः सदा सत्कर्म ही करना चाहिये, यही इसका तात्पर्याथ है।३७। बकरी, भैंसका क्रय-विक्रय करनेवाला नीच ब्राह्मण, समुद्र पर रहनेवाला, शूद्रा स्त्री का पति, शूद्रकेतुल्य और क्षत्रियको वृत्ति करनेवाला महानीच होकर नरकगामी होता है।३८। जो शास्त्रोक्त उचित करना उल्लंघन करके अपनी ही इच्छा से कर वसूल या हरण करता है और जो सवंदा दण्ड देनेकी रुचि रखता है वह अवश्यही नरकको भोगता है।३६-४०। जिस राजाके राज्य में प्रजाजन घूंसखोर और अपनी इच्छाके ही अनुसार क्रय विक्रय करने वाले हों तथा प्रजाके लोग तस्कारोंसे उत्पीड़ित रहते हों, वह राजाभी नरकगामी होता हैं ।४१। जो ब्राह्मणा अन्यायी राजा का दियाहुआ दान लेते हैं, वे भी घोर नरकमें निश्चयही जायाकरते हैं ।४३। ते प्रयांति तु घोरेषु नरकेषु न संशयः ॥४२॥ अभ्यायात्समुपादाय द्विजेभ्यो यः प्रयच्छति । प्रजाभ्यः पच्यते सोऽपि नरकेषु नृपो यथा ।॥४३। पारदारिकचौराणाँ चण्डानाँ विद्यते त्वघम्। पारदारितस्यापि राज्ञो भवति नित्यश: ॥४४॥ अचौरं चौरवत्पश्येच्चौरं वाऽचौररूपिणाम् । अविचार्य्य नृपस्तमाद्धातयन्नरकं ब्रजेत ॥४५॥ घृततैलान्नपापानि मधुमांससुरासवम्। गुडेक्षुशाक दुग्धानि दधिमूलफलानि च ॥४६॥

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..... ....... १६२ ] [श्रीशिवपुराण

तृरां काष्ट पत्रपुष्पमौषधं चात्मभोजनम् । उपानच्छत्रशकटमासनं च कमंडलुम् ॥४७॥ तामसीसत्पुः शस्त्रं श्ङ्ाद्य च जलोद्भवम् । वैद्य च वैणवं चान्यद् गृहोपरकरणानि च ॥४८॥ औण्ण कार्पास कौमेय पट्ट सूतोद्भवानि च। स्थूलसूक्ष्माणि वस्त्राणि ये लोभाद्धि हरन्ति च ॥४६॥ जो राजा प्रजाको दबाकर अन्यायपूर्क धनलेकर ब्राह्मरोंका दानरूप में देता है वह राजा अपनी अनीतिसे युक्त पापसे कारण नरकगामी होता है।३४। पराई स्त्रियों के साथ भोग तथा चोरी करने वाले पुरुषोंको तथा नित्य ही पर-स्त्रीमें रत राजाको बड़ा पाप लगता है और उसके लिए वह नरक की यातना भोगते हैं ।४४। जो राजा चोरी न करने वाले चोर और चोरीकाकाम करनेवाले तस्करपुरुषोंको सत्पूरुष समभ्कता है और बिना- भली भाँति विचारकियेही ताड़ना एवं दण्डदेता है, वह नरकगामो होता है।४५। जो निम्न वस्तुओंके चोरहोते हैं वे नरकगामी होते हैं यथा-घी, तेल, पीनेकी वस्तु-अन्न, शराब, माँस,अर्क,ईख, गुड़, शाक, दूध,दही, फल, मूल, घास, काष्ठपत्र, फूल, औषध, अपना, भोजन जूता, छाता, गाड़ी,कमण्डल, आसन, लोहा,ताम्र, सीसा,रांग, शस्त्र, शङ्ङ,जलसे उत्पन्न वस्तु-वंद्य लकड़ी, घरके काममें आने वाली वस्तु-ऊनी, सूती, रेशमी, रामवास आदि एवं छालके निरमित मोटे व वारीक वस्त्रोंका जो भी कोई लालच वश चुरा लेते हैं-वे निश्चय ही नरककी यातना भोगते हैं ।४६-४७-४८-४६। एवमादीनि चान्यानि द्रव्याणि विविधानि च। नरकेषु ध्रवं यान्ति चापहृत्याल्पकानि च ॥।५०। यद्वा तद्वा परद्रव्यमपि सर्षपमात्नकम् । अपहृत्य नरा यान्ति नरकं नात्र संशयः ।५१॥ एवमादयर्नर: पापैरुत्क्रांतसमनन्तरम् । शरीर यातनार्थाय सर्वाकारमवाप्नुयात् ॥।५२।। यमलोक ब्रजन्त्येते शगीरेण यमाज्ञया। ग्रमदूतैर्महाघोरैर्नीयमाना: सुदुः खिता ॥५३॥

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विभिन्न पापो का स्वरूप वर्णन ] [ १६३

देयतियङ मनुष्याणामधर्मनिरतात्मनाम् । धर्मराजः स्मृतः शास्ता सुघोरंविविधर्वर्धः ॥५४।। नियमाचारयुक्तानां प्रमादात्स्खलितात्मनाम् । प्रार्यश्चित्तगुरुः शास्ता न बुधैरिष्यते यमः ।५५। परदारिकचौराणामन्यायव्यवहारिणाम् 1 नृपतिः शासकः प्रोक्तः प्रच्छन्तानां स धर्मराट ॥५६।। मस्मात्कृतस्य पापस्य प्रायश्चित्त समाचरेत्। नाभुक्तस्य न्यथा नाशः कल्नकोटियत्तरपि ।५७॥ य करोति स्वयं कर्म कारयेच्चानुमोदयेतु। कायेन मनसा वाचा तस्य पापगतिः फलम् ॥५८॥ इसके अतिरिक्त भी अनेक प्रकार के बहुत से द्रव्य हैं, जिनका हरण करनेसे चाहे स्वल्प मात्रामेंही क्योंन हो,निश्चयही नरकगामीहोते हैं।५० कुछधी क्यों न हो, पराई वस्तु तो चाहे सरसोंके दानेके बराबर भी चुराईं जावेते इसका बुरा परिणाम नरकयातना अवश्यही सहनापड़ता है, इसमें तनिकभी संशय नहीं है।५१। मनुष्य उपयुक्त चोरी करनेके पापोंसे नरक भोगनेके पीछे शारीरिक कष्टउठानेके लिए समस्त आकारकी प्राप्तिकरता है ॥५ २। ऐसे पापकर्म करने वाले पापी शरीरको लेकर मेरे आदेशसे भीष- रवपु वाले यमदूतों के द्वारा पकड़े हुए अत्यन्त दुःखसे भरकर यमराज के लोकको जाते हैं ।५३। धर्मराज अनेक प्रकारके वधोंके द्वारा देव-मनुष्य और पक्षी सबको जो अधर्म करते हैं, दण्ड दिया करता है ।५४। जे नियम और सदाचारों में तत्पर रहा करते हैं, कभी अज्ञानवश गिरजाते हैं तो ऐसे लोगों को अनेक प्रकार के प्रायश्चितों द्वारा गुरु ही शिक्षा दे दिया करते हैं। ऐसे लोगों को शिक्षा पाने के लिए धर्मराजके पास नहीं जाना पड़ता है। ऐसा पण्डित लोग कहते हैं ।५५। पराई स्त्रियों से प्रसङ्ग करने वाले-चोर और अन्याय से व्यवहार करने वालों को दण्ड देकर शिक्षा देने बाला राजा बताया गया है। जो गुप्त महा- पाप किया करते हैं, उनको यमराज ही दण्ड देते हैं ।५६। इसलिये किये हुए पापों से शुद्धि प्राप्त करने को प्रायश्चित अवश्य ही करना चाहिए

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१६४ ] : [ श्री शिवपुरराण

अन्यथा पापोंका फल बिना भोगेहुए करोड़ों कल्पों में भी नष्ट नहीं होता है १५७1 पापकमं स्वयं करे या मन वागी या शरीरके द्वारा पापकर्म करावे अथवा इनका अनुमोदन करे-उसको उनका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है ।५८। नरकलोकका मार्ग और यमदूतोंका स्वरूप वर्णान अथ पापनंरा यांति यमलोक चतुविध:। संत्नासजननं घोरं विवशाः सर्वदेहिनः ॥ १ ॥ गर्भस्थैर्जायमानैश्च बालस्तरुणमध्यमः । स्त्रीपुन्नपु सकर्जीवेर्ज्ञातव्यं सर्वजन्तुषु ॥ २ ॥ शुभाशुभफल चात्र देहिनाँ संविचार्यते। चित्रगुप्तादिभिः सवैर्वसिष्ठप्रमुर्खस्तथा ॥ ३॥ न केचित्प्राणनः सन्ति ये न यान्ति यमक्षयम् । अवश्यं हि कृतं कर्म भोक्तव्यं तद्विचार्य्यताम् ॥४॥ तत्र ये शुभ कर्मागाः सौम्यचित्ता दयान्विताः । ते नरा यान्ति सोम्येन पूर्व यमनिकेतनम् ।५॥ पे पुनः पापकर्माणः पापा दानविवर्जिताः । ते घोरेण पथा यान्ति दश्रिशोन यमलायम ॥ ६॥ षडशीतिसहस्त्राणि योजनानामतीत्य तद। ववस्वतपुर ज्ञय नानारूपमवस्थितम् ॥७॥ श्री सनत्कुमारजी ने कहा- समस्तप्राणी चार तरहके पापोंमें त्रासपैदा करनेवाले अत्यन्त भयङ्कर यमराजके लोकको जाया करते हैं और मजबूर होकर उन्हें वहाँ अवश्य ही जाना पड़ता है।१। गर्भ में स्थित रहकर जन्म धारण करने वाले बालक युवा, प्रौढ़ और वृद्ध तथा स्त्री एवं पुरुष और अपुँसक सभीको यह बात भलीभाति जान व समझलेनी चाहिए।२। वहाँ पर लेखा-जोखा रखनेवाले धर्मराजके मंत्री चंद्रगुप्तआदि तया महर्षि वशिष्ठ आदि मुनियों द्वारा समस्त जीवोंके शुभाशुभ कर्मका विचार कियाजाता है । है। अपना किया हुआ कर्म सभीको अवश्यही भोगनापड़ता है। इसलिये

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ऐसे कोई भी प्राखी नहीं है जो यमराज के लोकको नहीं जाते हैं। शुभ- अश्ुभ कर्मोंका निररय वहाँ परही होता है।४। इन प्राशियों में जो शुभ कर्म करने वाले और सौम्य चित्तवाले कृपापूर्र मनुष्य होते हैं वे वहाँ यमलोक में सोम्य मार्न से पूर्णद्वार के जाया करते हैं ।५। जेो अनेक पापकर्म करने वाले महपातरी एवं दानशून्य प्रारमी होते हैं, वे घोर दक्षिणा दिशाके मार्भसे यमराज के लोकको जाया करते हैं।६। वह नैवस्वतपुर अनेक रूप में स्थित हैं और वहाँ जानेके लिए छियासीहजार योजन कोसों का फासला तय करके जाना पड़ता है।७। समोपस्थमिवाभाति नराणां पुष्यकर्मखाम्। पापिनामतिदूरस्थं यथा रौद्रेण गच्छताम् ॥ ८ ॥ तीक्ष्णंकटकयुक्तेन णाकराविचितेन च। क्षुरधारानिभेस्तीक्ष्सीः राषाएं रचितेन च । ६॥ क्वचित्पकेन महता उरुतोकश्व पातको। लोहसूचीनिभर्दर्भैः सम्पन्नेन पथा क्वचित् ॥१०॥ तट प्रायातिविषयं: पर्वतवृक्षसंकुलँः । प्रतप्तांगारयुवतेन यांति मार्गेण दु:खता ॥११॥ वर्वाच द्विषमगर्तेश्च क्वचिल्लोष्ठः सुदुष्करैः । सुतप्तबालुकाभिश्च तथा तीक्ष्णांर्च शकुभि: ॥१२॥ अनेकशाखाविततेर्व्याप्तं बंशवनैः क्वाचत्। कष्टेन तमसा मार्गे नानालब्बेन कुत्रचित ।१३।। अयः शृंगाटकैस्तीक्ष्सा: क्वचिद्दाव्नाग्निना पुनः । क्वचित्तप्तशिलाभिश्च वर्वचिद्वयाप्तं हिमेन च ॥१४। यही यमलोक पुण्शत्माओंकेा तो अत्यन्त समीपमें स्थित जैसा प्रतीत होता है और पापियोंको अत्यन्तही दूरमें स्थितजैसा लगता है। पापीप्राणी बड़ेभयड्कर मार्गसे होकर इस लम्बी यात्राका पार करतेहुए वहाँ पहुँचपाते 11७। मार्गमें कहीं भयानक काँटे बिछेह्ए हैं तो कहीं बालू रेतही रेत भरी बड़ी है। किसी जगह छेरेकी तीखीधारके तुल्य चीरदेने वाला पाषाण बिछे

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१६६ ] [ बीशिवपुराण हुए हैं ऐसे मार्गसे जानापड़ता है।। वह मार्ग कहींतो बहुतभारी दल- दल से युक्त की चड़वाला होता है-किसीजगह उरुतोक पापोंसेयुक्त तो कहीं लोहे की सुईकेसमान तीखी कुशाओं से युक्त होता है ।१०। उस मार्ग में कहीं-कहीं तटप्रय प्रदेशोंके अत्यन्त कठिक पर्वतहोते हैं और किसीजगह घने वृक्षों का भयानक जगल होता है। किसी स्थान पर तपेहुए अगार भरे होते हैं। ऐसे मार्गमें प्राणगी बहुतही दुःखित होते हुए जाया करते हैं ।११। यमलोक के मार्गमें किसीजगह बहुत भारी गहरे गर्त आते हैं, कहीं ऊचे टीलेहोते हैं और कहींपर खूब तपीहुई बालू होती है तथा तीखे कीले गड़े होते हैं।१२। यमपुरका राहता बहुतही कठिन होता है, कहीं भयानक शाखायुक्त बाँसोंका जंगलहोता है और किसीजगह घोर अन्धकार छाया रहता है तथा उसमार्ग में ऐसे बहुतसे आधार रहाकरते है।१३। वह रास्ता कहीं लोहेके सिंघाड़ों से व्याप्त रहता है जो बहुतही तोखेहोते हैं। किसी जगह दाबानलसे व्याप्त रहता है, किसी स्थानपर तपीहुई पाषाए शिलाएँ मिलती हैं, तो कहीं बहुत ठण्डी बर्फ जमी हुई रहती है ।१४। वयचिद्वालुकया व्याप्तामाकठांकी प्रवेशया। वर्वाचद् दुष्टाम्बुना व्याप्त क्वचच्च करिषाग्निना ॥१५:। ववचिति्सिहैवृ कर्व्याघ्र मेशकैश्च सुदारुण: । ववचिन्महाजलीकाभिः द्वचच्वाजगरैस्तथा ॥१६॥ मक्षिकाभिश्च रौद्राभि: वर्वाचत्सर्वैविषोल्वणैः । मत्तमार्तंगयूथैश्च बलोन्मतैः प्रमाथिभि: ।१७१। पंथानमुल्लिखद्भभिश्च सूकरंस्तीक्ष्णदष्रिभिः । लीक्षशृ गैश्च मात्रिषैः सर्वभृतश्च श्वापदः ॥१८॥ डाकिनीभिश्च शैद्राभिर्विकरालैश्च राक्षसैः । व्याधिभिश्च महाघोरैः पीडयमाना ब्रजति हि ॥१६॥ महाधूलिविमिश्रेण महाचण्डेन वायुना। महापाषाणवर्षेण हन्यमानानिराश्रया ॥२०।। बर्वाचद्विद्य त्प्रपातेन दह्यमाना ब्रजन्ति महता वाणवर्षेण विध्यमानाश्च सर्वतः ॥२१॥

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नरक-लोक मार्ग ] {१६७ उस यमपुरके मार्ग में कहीं कण्ठ पर्यन्त गड़ जाने वाली तप्तबालू हैं तो किसी जगह दूषित गन्दाजल भरारहता है। किसी स्थानपर करीषकी अग्नि व्याप्त रहा करती है ।१५। मार्गमें किसी स्थान पर सिंह-बाध और और भेड़ियाआदि हिंसक एवं भयानक जीव होते हैं। कहीं पर अजगर भरेहुए हैं तो कहीं भयानक मच्छर तथा जौंक मिला करती हैं ।१६। यमपुरका मार्ग विषैली मक्खी, सर्प और मतवाले बलोन्मत्त हाथियों से पू्रं रहता है जोकि बीच-बीचमें जहाँ-तहाँ मिलाकरते हैं और भयदेते हैं ।१७। यह रास्ता सब और भयावह जीवोसे भरा-पूरारहता है। कहीं सीकसदाढ़ों से जमीन खोदने वाले जंगलीशूकर हैं तो कही पैनेसीगों वाले भंसे रहाकरते हैं। सभी प्रकार के हिंसक जानवर वहाँ मिला करते हैं १८। मार्गमें बहुतविकट डाँकिनी, विकरालराक्षस दिखार्ईदेते हैं। इस- तरह उस मार्गमें अत्यन्तघोर व्याधियोंसे पीड़ितहोकर जायाकरते हैं।१६ इस यमपुरके मारगकी प्रारी भयानक धूल से व्याप्त होकर प्रचण्ड वायुके भोंकों से भकभोरते हुए होकर और बृधदगाषाण वृष्टिसे निराश्रय एवं परम क्लेशित होकर बड़ी कठिनाईसे तय किया करते हैं।२०। किसी जगह बिजलीके सन्ताप से झुनसते हुए और किसी जगह चारों ओर से होने वाली वाों की वर्षा से पीड़ित होते हुए इस यमपुर के मार्ग को पूरा करते हैं।२१। पतद्भिरवज्रपातैश्च उल्कापातैश्च दारुणः । प्रदीप्तांगारवर्षेण दह्यमानाश्च सांत हि ॥२२।। महता पाँसुवर्षेण पूर्य्यमाणा रुदंति च। महामेघरवंधौंरस्त्रस्यते च निशितायुधवर्षेण भिद्यमानाशच मुहूमुहुः ॥२३॥ सर्चत:। महाक्षाराम्बुधाराभिः सिच्यमाना वृजति च ॥१४। महाशीतेन मगुता रूक्षेण परुषेण च। समताद् बाध्यमानाश्च शुष्यते संकुचन्ति च ॥२५॥ इत्य मार्गेण रौद्रेण पाथेयरहितेन च। निरालम्बेन दुर्गेण निर्जलेन समंततः ॥२६॥।

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१६= ] [श्री शिवपुराण विषमेणैव महता निर्ज्जनापाश्रयेश च। तमोरूपेण कष्टेन सर्वदुष्टाश्रयेण च ॥२७।। नीयते देहिन: सर्वे ये मूढ़ाः पापकम्मिएः। ॥२८॥ कहींपर प्राशियोंपर वब्जपात होता है,कहीं अत्यन्त दारुण उल्काग्नि का पातहोता है और किसी जगह अङ्गारोंकी एकदम वर्षा होती है जिससे शरीरमें भस्मीभूत होनेका कष्ट होता है।२२। प्राणी मार्गमें धूलसे व्याप्त होकर रुदनकरते हैं और भयानक मेघोंसे भयभीत होते हैं।२३। पापत्मा प्राणणी यमपुरके मार्गमें चारों ओरसे तीखे शस्त्रोंकी बृष्टिसे भेदित होते हुए और महाखारी समुद्रकी लहरोंसे सिचित होकर जाया करते हैं।२४। मार्ग में बहुत रूखी व कठोर वायु लगती है, जिससे शुष्क और सुकड़े हुए हो जाते हैं ।२५। इसरीतिसे वह मार्ग बहुतही अधिक भयङ्गर होता है जिसमें न कुछ चबेना है और न कोई आधार ही। उसमें पीनेके लिये जल भी प्राप्त नहीं होता है ।२६। बड़े ही विषम, निर्जन आश्रयहीन, अन्धकार पूर्ण तथा दुरात्माओं से घिरा हुआ यमपुरीका मार्ग है, जिससे पापीजीव आाया करते हैं।२७1 जो मूर्ख पापात्मा प्राणी होते हैं उन्हें यमराज के आज्ञाकारी महाघोर दूतों के द्वारा बलारकार से लेजाया जाता है।२८। एकाकिन: पराधीना मित्रबन्धुविवर्जिताः शोचन्तः स्वानि कर्माण रुदंतश्च मुहमुहः ॥२६॥ प्रेता भूत्वा विवस्त्राश्च शुष्ककण्ठौष्ठतलुकाः । असोम्या भदभीताश्च दह्यमाना: क्षुधान्विताः ॥३०॥ बद्धा: शृङ्ङलया केचिदुत्त नपादका नराः । कृष्यते कृष्यमाणाइच यमदूतैर्बलोत्कटैः ।।३१।। उरसाऽधोमुखाश्चान्ये धृष्यमाणा: सुदुःखिताः । केशपाशनिबन्धेन संकृष्यन्ते च रज्जुना ॥३२॥ ललाटे चाँकुशेनान्ये भिन्ना दुष्यंति देहिनः । उत्ताना: कटकपथा क्वाचदगारवर्त्मना ।३३।।

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नरक-कोक का मार्ग । [ १६६ पश्चाद्वाहुनिबद्धाश्च जठरेण प्रपीडिताः । पूरिता शृङ्खलाभिश्च हस्तयोश्च सुकीलिता: ॥३४। ग्रीवापाशेन कृष्यन्ते प्रयांत्यन्ये सुदुःखिताः । जिह्वाँकुशप्रवेशेन रज्ज्वाऽडकृष्यन्त एव ते ॥३५॥ नासाभेदेन रज्ज्वा च व्याकृष्यन्ते तथापरे। भिन्ना कपोलयो रज्ज्वा कृष्यतेऽ्न्ये तथौष्टयोः ॥३६॥ पापी जीव यमदूतों के द्वारा पकड़े हुए अकेले-पराधीन-विवश-मित्र तथा बन्धु-बान्धवों से विमुक्त होकर अपने कुकर्मों पर चिन्ता करते हुए और बारम्बार रोते हुए मार्गमें जायाकरते है।२६ पापीप्राणणी जब प्र त होते हैं तेो वस्त्ररहित उनका गला होता है, ओठ और तालू सूखे हुए हैं, सोम्यता से रहित भयभीत-परम सन्तप्त और भूखसे परम कलेशित होकर यमपुरी की यात्रा करते हैं ।३०। उन पातियों में कुछ साकलोंसे बंधेहुए हैं ते कुछ ऊपरका पैर कियेहुए हैं। उन्हें बलवानु यमदूत जबर्दस्तीसे खींच- कर लेजाते हैं।३१। पापी जीवों में कुछ उत्तान होकर मस्तकपर अकुश से विदीर्ण होते हुए परम दुःखित है ते। केई हृदय से नीचे मुख कियेहुए घिसटे चले जाते हैं, कुछ काल की पाशों से बँधी हुई रस्सीसे खिंचे हुए ले जाये जाते हैं। के।ई अत्यन्त क्लेशित हैं जाकि कण्टकाकीर्ण तथा अङ्गारपूर्ण मार्ग से ले जाये जाते हैं ।३२-३३। कुछ पापियोंकेा। यमदूतोंके द्वारा मार्ग में भुजाओं के। बाँधकर लेजाया जाता है। कोई शृङ्गलाओंसे खूब कसकर वंधेहुए उदर से पोड़ित होकर जाते हैं कुछके हाथों में कीले ठुकी हुई रहा करती हैं।३४। केोई केई पापात्मा गर्दन के फाँसेसे खींचे जाते हैं। केोई जिह्वाँकुश प्रवेश वाली रस्सीसे खींचेहुए परमदुःखित होकर यमपुरीके मार्गमें जाते हैं। कुछ लोग नासिकाके भेदन वाली रस्सीके द्वारा तथा कुछ कपोल और होठोंका भेदन वाली रस्सी के द्वारा मार्गमें यमके दूतोंसे खींचेहुए होकर जाया करते हैं। ३५-३६। छिन्नाग्रपादहस्ताश्च छिन्नकर्णगोष्टनासिकाः । संछछिन्नशिश्न वृषणा:

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१७० ] [श्रीशिवपुराण

आभिद्यमाना: कुतश्च भिद्यमानारच सायकः । इतश्चेतश्च धावतः क्रन्दमाना निराश्रयाः ॥३=।। मुद्गर र्लोहदण्डैश्च हन्यमाना मुहूमुहुः। कटकविविधंर्धो रेज्बलनार्कसमप्रभैः भिन्दिपालेविर्भिद्य ते स्रवंतः पूयशोणितम् । शकृतांकृमिदिग्धाश्च नीयते विवशा नराः ॥४०। याचमानाश्च स लिलमन्न वापि बुभुक्षिताः । छायां प्रार्थयमानाश्च शीतार्ताश्चानल पुनः ।४१। दानहीना: प्रयांत्येवं प्राथयंतः सुखं नराः । गृहीतदानपाथेयाः सुख यांति यमालयम् ॥४२॥ उन पापात्माओंमें कुछ आगेके हाथ-पेरोंसे छिन्न होते हैं-केई कान- ओठ और नाकसेछिन्न तथा कुछ अण्डकोष एवं लिंगसेछिन्न और कुछ अगों के जोड़ोंसे छिन्न-भिन्नहोकर लेजाये जाते हैं।३७। यमदूतोंके द्वारा अत्यन्त त्रासको प्राप्त पापात्मा यमपुरीके मार्ग में अलकोंसे विद्यमान होकर वारणोंसे विदीर्ण-निराश्रय और इधर-उधर के। रोकर दौड़ते भागते हुए लेजाये जाते हैं।३८। कुछपर मुग्दर से तथा लाहेके डन्डोंसे बारम्बार प्रहार किये जाते हैं और वे घोरपरम सन्तप्तसूर्यके समान काँटोंसे पीड़ित होते हैं।३६। वहाँ मार्गमें कुछपापी भिन्दिपाल अस्त्रोंसे भेदित किये जाते हैं। विष्ठाके कीड़ों से, जिनस रुधिर औप मवाद टपकता रहता है, कुछ पापात्मा नोचे जाते हैं जिनके कष्टसे विवश होते हुए यमपुरीका जाया करते हैं।४०। यमपुरके मार्गमें उन पापियोंको खानका अन्न तथा पीनेके। जल नहीं मिलता है इसलिये वे अत्यन्त व्याकुल होकर अन्नकी और जल की याचना करतेहुए तथा शीताधिक्य से बेचैन अग्नि तापको माँगते हुए यमदूतों द्वारा ले जाये जाते हैं ।४१। जिन्होंने संसारमें कभी कुछभी दान नहीं दिया, वे दान हान मनुष्यही ऐसी याचना भूख निवारसक लिये करते हुए जाते हैं। जिन्होंने दानदिया है वे चवेना ग्रहणकर सुखसे यम- लोकको जाया करते हैं।४२। एवं न्यायेन कष्टेन प्राप्ताः प्रेतपुर यदा। प्रज्ञ।पितास्ततौ दूत निवेश्यते यमाग्रत: ॥४३।

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नरक-लोक का मार्ग । [१७१

तत्र ये शुभकर्माणस्तांस्तु सम्मानयेद्यमः । स्वागतासनदानेन पाद्यार्ध्येण प्रियेण च।४४।। धन्या यूय महात्मानो निगमोदितकारिणः । यंश्च दिव्यसुखार्थाय भवद्भि: सुकृतं कृतम् ।।४५।। दिव्यं विमानमारुह्य दिव्यस्त्रीभोगभूषितम् । स्वर्गे गच्छध्वममलं सर्वकामसमन्वितम् ॥४६॥ तत्र भुक्त्वा महाभोगानते पुण्यस्य संक्षयात। य त्किचिदल्पमशुभं पुनस्तदिह भोक्ष्यथ ॥४७। धर्मात्मानो नरा ये च मित्रभूता इवात्मनः । सौम्य मुखं प्रपश्यति धर्मराजानमेव च ॥४८॥ ये पुनः क्र रकर्मारस्ते पश्यन्ति भयानकम् दष्ट्रकरालवदनं भृकुटीकुटिलेक्ष म् ॥४६॥। इस प्रकारसे वहाँ मार्गमें ही कर्मोंका न्याय प्राप्त करते हुए जीवात्मा घष्टके साथ प्रतपुरोमे पहुँचते हैं और यमदृत उन्हें बताकर यमराजकेसमक्ष में खड़ा करते हैं।४३। उन प्राशियों में जे। शुभ कर्म करने वाले होते हैं उनका धर्मराजभी स्वागतकरते अर्ध्य पाद्य और आसनदेकर सम्मानकिया करते हैं।४४। उन धार्मिक प्राशियोंसे यमराज कहा करते हैं-आप सब शास्त्रके अनुकल कमं करने वले परममहात्मा और धन्यहो। आप लोगने दिव्य सुख प्राप्य करनेके लिएही पुण्य कमे किये हैं ।८५। यमराज धार्मिक प्राशियोसे कहते हैं आपलोग दिव्यविमानोपर आरूढ़होकर दिर्व्याँगनाओं के उपभोगका आनन्दस्वाद करतेहुए समस्त कामनाओंके प्रदान करने वाले निर्मल स्वर्गमें जाओ। वहाँ महाभोगोंके अन्तमें पुण्यके क्षोण हो जाने पर जेो कुछ थोड़ा नाप शेष रहा होगा तो उसे यहाँ भोगोगे ।४६-४७। जो धर्मात्मा मित्रस्वरूप ऐसीआत्माके पुण्यपुरुष हैं वे धर्मराजकेरूपमेंभी सौम्य मुख पाते हैं।४८। जो क्रूर तथा बुरे पापकर्म करनेवाले पुरुषहोते हैं उन्हें यमराजका स्वरूपही अत्यन्त डरावना और विकराल दिखलाई देता है। उनके सामने तो यमराज बड़ी भयानक दाढ़ों से युक्त िकराल मुखकृति

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वाले और चढ़ी हुई टेड़ी भृकुटियों से कुटिल दृष्टि वाले दिखलाई दिया- करते हैं।४ह। उध्वंकेशं महारमश्र मूर्द्धप्रस्फुरिताधरम् । अष्टादशभुजक्र द्वं नीलांजनचयोपमम् ॥५०॥ सर्वायुधोधोद्ध तकरं सर्व दण्डेन तर्जयन्। सुमहामहिषारूढ दीप्ताग्निसमलोचनम् ॥५१। रक्तमाल्यांबरधरं महामेरुमिवोच्छ्रितम् । प्रलयाम्बुदनिर्घोषं पिवन्निव महोद्षधिम् ॥५२॥। ग्रसंतमिव शंलेनद्रमुद्गिरन्तमिवानलम्। मृन्युश्चंव समीपस्थः कालानलसमप्रभः । ५३॥ कालशचांजनसंकाशः कृतांतश्च भयानकः । मारी चोग्रमहामारी कालरात्रिश्च दारुणा ॥५४।। विविधा व्याधमः कुष्ठा नानारूपा भयावहाः । शक्तिशू नाकुशधरा: पाशचक्रासिपारयः ।।५५।। वज्रतुडधरा रुद्रा: क्षुरतूणधनुद्धराः । नानायुधधराः सर्वे प्रहावीरा भयङ्कराः ॥५६॥ पापियोंके समक्ष उनका स्वरूप शिरपर लम्बे केश-बड़ी दाढ़ी-मूँछ-फड़- फड़ाते हुए अधर-अठारह भुजा क्रोधसे पूर्ण और अञ्जनके समान वर्ण वाला होता है।५०। पापात्मा जीवोंक सामने तो धर्मराज समस्त शस्त्रों से सुसज्जित हाथों वाले-सब प्रकारके दण्ड देने फटकार देने वाले-महा महिषपर आरूढ़ और जलतीहुई आगके समानरक्त एवं तेजपूर्गा नेत्रों वाले दिखाई देते हैं ।५१। पापी प्राशियोंके लिये यमका स्वरूप रक्तमाला और वस्त्नतुल्य भयानक घोरगर्जना करने वाले और समुद्रका पान करते हुए से स्थित दिखाईदेते हैं ।५२। उस समय यमराज ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे हिमाचल पर्वतका निगल रहे हैं-अग्निका वमन कररहे हैं ऐसे स्वरूप में धर्मराज स्वयंस्थित रहते हैं बोर उनके समीपमें कालानलके तुल्य कांति वाले मृत्यु स्थित रहते हैं। यमराज के दूतभी इधर-उधर रहते हैं जिनका

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स्वरूपभी भयाभह होता है और इनके अतिरिक्त अञ्जनके समान कृष्ण वर्ण वाला काल-भयानक राजमारी-उग्र महामारी तथा दारुण कालरात्रि भी वहाँ यमके निकटमें विद्यमान रहते हैं ।५३-५४। वहाँ अनेक रूपवाले रोग, नाना विधि कुष्ठादि, शक्ति, त्रिशूल, ब कुश, पाश, चक्र खड्ग हाथों में धारण करने वाले दूत उपस्थित रहते हैं ।५५। यमद्रतोंके पास वज्त, तुण्डधारी रुद्र, छुरे तकस और धनुष होते हैं। ये सभी नाना भांतिके अस्त्रों को घारण करने वाले हैं, महान् वीर और अत्यन्त भयानक होते हैं ।५६। असंख्याता महावीरा: कालाञ्जनसमप्रभाः । सर्वायुधोद्यतकरा यमदूता भयानका: ।।५७।। अनेन परिचारेण वृत त घोरदशंनम् । यमं पश्यन्ति पापिष्ठाश्चित्रगुप्त च भीषणाम् ॥५८॥ निर्भत्सयति चात्यन्तं यमस्तान्पापकर्मरः । चित्रगुप्तश्च भगान्धर्मवाक्यः प्रबोधयेत् ॥५६॥ यमदूतों की संख्या ही नहीं है अर्थात् असंख्य होते हैं। वर्णसे विल्कूल काजलके तुल्य काले और सभी हाथों में अस्त्र-शस्त्र रखने वाले परम भयानक होते हैं।६७। ऐसे परिकरसे घिरे हुए धर्मराजके भयानक स्वरूप को, अति भयङ्गर चित्रगुप्त को पापी प्राणणी देखाकरते हैं ।५८। उस समय पापियों के सामने आतेही यमराज बुरीतरह ललकारके साथ डांटते हैं। चित्रगुप्त अनेक धर्मके बचनोंसे बोधन किया करते हैं।५६। नरकों के विभिन्न भेद वर्णन भो भो दुष्कृतकर्माणः परद्रव्यापहारका। । गर्विता रूपीवीर्य्येण परदारावमर्द्दकाः ॥१॥ यत्स्वयं क्रियते कर्म तदिद भुज्यते पुनः । तत्किमात्मोपघातार्थ भवद्भिर्दूष्कृतं कृतम् ॥ २ ॥ इदानीं कि प्रलप्यध्वं पीडयमाना: स्वकर्मभिः । भुज्यताँ स्वानि कर्माणि नास्ति दोषो हि कस्यचित् ।।३॥

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एवं ते पृथिवीपाला: सप्राप्तास्तत्समीपतः। स्वकीयैः तानपि क्रोधसंयुक्तश्चित्रगुप्तो महाप्रभुः । संशिक्षयत धर्मज्ञो यमराजानुशिक्षया ॥ ५॥ भो भी नृपा दुराचारा: प्रजाविध्वसकारिणः । अल्पकालस्य राज्यस्कृते कि दुष्कृत कृतम् ॥ ६॥ राज्यभोगेन मोहेन बलादन्यायतः प्रजाः । यद्दण्डिता: फलं तस्य भुज्यतामधुना नृपाः ॥७॥ महाराज चित्रगुप्त ने पापात्मा प्राशियोंसे कहा-अरे महान् पाप-कर्म करने वालो ! दूसरोंके धनका हरणा करने वालो ! अनेक रूप-लावण्य तथा वीर्य-पराक्रम से गर्वित होने वालो ! दूसरोकी स्त्रीसे रमण करने वालो ! तुमनेजो संसारमें ऐसे बुरेकर्म किये हैं अब उनके दण्डभोग भोगने पड़ेंगे। बताओ तुमने ही क्लेश के उत्पन्न करने के लिये ऐसे पाप क्यों किये थे ? ।१-२। इस समय तुम अपनेही कर्मोंसे उत्पीड़ित होतेहुए क्यों रोते चिल्लाते हो ? अब कमोंके फलोंको भोगो, इसमें अन्य किसीका कुछ भी दोष नहीं है।३। सनत्कुमारजी ने कहा-इसी प्रकारसे अपने महाघोर बुरे कर्मोंसे युक्त और बलका घमण्ड रखने वाले राजालोग भी यमराजके सामने खड़े कियेजाते हैं ।४। महाप्रभ धर्मात्मा चित्रगुप्त यमराजके आदेश से अत्यन्त क्रोधके साथ उन राजाओं को शिक्षा देते हैं ।५। चित्रगुप्त कहते हैं-अरे दुराचारमग्न ! प्रजाकासर्वनाश करनेवाले राजाओ ! तुमने बहुतही स्वल्प समयतक राज्यभोग करनेमें भी ऐसा पाप क्यों किया ? ।६। हे नृपवृन्द ! आप लोगोंने राज्य भोगनेके कारण अन्याय और वलसे प्रजाकोदण्ड किया है। अब प्रजाके सतानेका फल भोगेो ।७। वक तद्राज्यं कलत्रं च यदर्थमशुभ कृतम्। तत्सवं संपरित्यज्य यूयमेकाकिनः स्थिताः ॥८॥ पश्यामि तत्बलं नष्ट येन विध्वंसिता: प्रजाः । यमदूतर्योज्यमाना अधुना कीदृश भवेत् ॥ १॥

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यमेन ते। स्वानि कर्माणि शोचंति तूष्णीं तिष्ठति पार्थिवा ॥१०॥ इति कर्म समुद्दिश्य नृपाणां घर्मराडयमः । तत्पापपंकशुद्धयथंमिदं दुतानव्रबीत् च ॥११॥ भो भोश्चण्ड महाचण्ड गृहीत्वा नृपतीन्वलात्। नियमेन विशुद्धयध्वं क्रमेण नरकाग्निषु ॥१२॥ ततः शीघ्र समादाय नृपान्संगृह्य पादयोः । म्रामयित्वा तु वेगेन निक्षिप्योध्वं प्रगृह्य च ।।१३। सवप्रायेण महताऽतीव तृप्ते शिलातले। आस्फ लय ते तरसा वज्रेशोव महाद्र मा ॥१४॥ अब वह तुम्हाराज्य और स्त्री कहाँ हैं जिनके लिये तुमने महान् पाप किये थे? अब यहाँपर ता तुम सबको छोड़कर अकेलेही उपस्थित हो ।८ .. मैं इससमय तुम्हारा वह समस्तबल नष्टहुआ देखरहाहूँ जिससे तुमने अपनी प्रजाका विध्वंस करडाला था। अबतो यमदूतोंके द्वारा अपराधीकी भाति बँधेहुए कंसे हो ।ह। सनतकुमारजी ने कहा-यमराज के ऐसे अनेक बचन सुनकर राजा लोग चुपचाप अपने कर्मोंको सोचते और पछताते हैं।१०। धर्मका न्याय करने वाले यमराज राजाओंके उन कर्मोंके उद्देश्यको लेकर उनके पापपंकसे शुद्धि पानेके लिये अपने दूतोंको आदेशदेते हैं। यमराजने कहा-हे चण्ड ! हे महाचण्ड ! तुम जबर्दस्ती इन राजाओं को पकड़ कर क्रमसे नरकरूपी आगमें डालदो और इनकी शुद्धिकरो और नियमका पूर्ण पालन करो ।११-१२। सनतकुमारजीने कहा-यमराजकी आज्ञापातेही दूतों ने बलात्कार से राजाओंको पकड़ लिया और उनके दोनों परों को पकड़ कर जोरसे घुमाया और ऊपर उठाकर नीचे फेंक दिया।१३। यम- दूत विशाल सन्तप्त शिलाओं को तलपर उन्हें पटककर महावृक्षके समान वज्त्र से बड़े बेगके साथ ताड़न करते हैं।१४। ततः सः रक्त श्रोत्रेण स्रवते जर्जरीकृतः । निसंज्ञः स तदा देही निश्चेष्टः संप्राजायते ॥१५॥

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ततः स वायुना स्पष्टः स तरुज्जीवितः पुनः । ततः पापबिशुद्धयर्थ क्षिपन्ति नरकार्णवे ॥१६॥ अष्टाविशतिसंख्याभिः क्षित्यध सप्तकोटयः । सप्तमस्य तलस्यान्ते घोरे तमसि संस्थितः ।१७।। घोराख्या प्रथमा कोटि: सुघोरा तदधः स्थिता । अतिघोरा महाघोरा घोररूपा च पञ्चमी ॥१८॥ षष्ठी तलातलाख्या च सप्तमी च भयानका। अष्टमी कालरात्रिश्च नवमो च भयोत्कटा ॥ १६ ॥ दशमी तदधश्चण्डा महाचण्डा ततोऽप्यघः । चण्डकोलाहला चान्या प्रचडा चंडनायिका ॥२०॥ पद्मा पद्मावती भीता भीमा भीषणनायिका। कराला दिकराला च वज्रा विशतिमा स्मृता ॥२१। उस समय जब उनके कानोंसे रक्त टनकता है तब प्राणी जर्जर होकर चेतनाशून्य हो जाता है।१५। फिर वायुका स्पर्शपाकर पुनः उनके द्वारा जीवित करके पापसे शुद्धि पानेके लिये नरकमें डाल दिया जाता है।१६। वह नगर पृथ्वीके नीचे सातकरोड़ अट्ठाईसयोजन दूर सातवेंतलके अन्तमें धोर अन्धकारोंमें स्थित है ।१७। उन नरकोंके नाम इस प्रकार हैं प्रथम कोटि 'घोर' नामक है। उसके नीचे 'सुघोर' फिर क्रमसे अतिघोर, महा- घोर और पांचवीं यातना का नाम धोर रूप है। ई८। छटी तलातल, सातवीं भयानक आठवीं कालरात्रि और नवमी यातनाका नाम भयोत्कटा है ।१६ इसकेभी नीचे दशवीं चण्ड, फिर महाचण्ड, चण्ड कोलाहल, प्रचण्ड चण्ड नामक हैं।२०। इसी तरह फिर आगे पद्मा, पझ्मावती, भीता, भीमा, भीषण नायिका, कराला, विकराला और बीसबीं वज्रा नामक है।२१। त्रिकोणा पञ्चकोणा च सुदीर्घा चाखिलातिदा। समा भीमबलात्युग्रा दीप्तिप्रायेति चाष्ठमी ॥२२॥ इति ते नामतः प्रोक्ता घोरा नरककोटयः । अष्टाविशतिरेवैताः पापानां यातनात्मिका: ।१३।।

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नरकों के विविध भेद वर्णन । [१७७ तासां क्रमेण विज्ञयाः पश्च पञ्चंव नायकाः । प्रत्येक सवंकोटोनां नामतः सन्निबोधतः ॥२४॥ रौरवः प्रथमस्तेषाँ रुवते यत्र देहिनः । रुदत ततः शीतं तथा चोष्णं पंचाद्या नायका: स्मृताः । च ॥।२५।

सुधोरः सुमहातीक्ष्णस्तया संजीवनः स्मृतः ॥२६॥ महातमो विलोमश्च विलोश्चापि कंटकः। ती ब्रवेगः करालश्च विकरालः प्रकंपनः ॥२७।। महावक्रर्च कालसूत्र: प्रगर्जनः । सूची मुखः सुनेतिश्च खादकः सुप्रपीडनः ॥२८॥ इनके बाद में त्रिकोणा, पञ्चकोना, सुदीर्घा, अख्िलात्तिदा, समा- भीमवला, अभोग्रा और अन्तिम दीक्षमाया है ।२२। इस तरह घोर नरक कोटि के नामों वाली ये अट्ठाईस पापों की यातनायें होती हैं।२३। उनमें से क्रम पाँच-पाँच नायक यातना समभनी चाहिये। इनमें से सब केोटियों में प्रत्येक नामसे विख्यात हैं।२४। उनमें से प्रथम 'रौरव' है जहां जाकरा सभी प्राणी पीड़ित होकर रोया करते हैं। महा रौरव की पीड़ा ता ऐसी विकट होती है कि बड़े पुरुष भी रुदन किया करते हैं।२५। इस के बाद शीत और उष्ण पाँच आद्य नायक है जिन्हें सुघोर, सुमहातीक्ष्ण तथा संजीवन कहा गया है ।२६। महातम, विलोम, कण्टक, तीव्रवेग, कराल, विकराल, प्रकपन ।२७। महावक्र, काल, कालसूत्र, प्रगर्जन, सूचीमुख, सुनेति, खादक, सुप्रपीडन ।२८। कुम्भीपाक सुपाकौ च क्रकचश्चातिदारुणः । अङ्गारराशिभवन मेदोऽसृक्प्रहितस्ततः ॥२६।। तीक्ष्णतुडश्च शकुनिर्महासंवर्तकः क्रतुः । तप्तजतुः पङ्कलेपः प्रतिमांसस्त्रपूद्भवः ।३०॥ उच्छ्वासः सुनिरुच्छसो सुदीर्घः कूटशाल्मलिः। दुरिष्टः सुमहावादः प्रवाहः सुप्रतापनः ॥३१॥

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ततो मेघो वृषः शाल्मः सिंहव्याघ्रगजाननः । श्वसूकराजमहिषघूक कोकवृकानना: ।३२॥। ग्रहकु' भीननक्राख्याः सर्पकूर्मायवायसाः । गृधोभूकजलोकाख्या: शादू लक्रथकर्कटाः ॥३३।। मडूक: पूतिववत्रश्च रक्ताक्ष: पृतिमृतिक: । कृमिगन्धिवपुस्तथा ॥३४।। अग्नीध्रश्चाप्रतिष्टश्च रुधिराभः इवभोजनः । लालाभक्षांत्रभक्षौ च सर्वभक्षः सुदारणः॥३५।। कुम्भीपाक, सुपाक, करकच, अतिदारुण, अगारराशिभ वन, मेरु, अमृकप्रहित।२३। तीक्ष्णतुण्ड, शकुनि, महासंवर्तक, क्रतु, तप्तजन्तु, पङ्कलेप, प्रतिमांस, त्रपूद्भव ।३०। उच्छ् वास, सुनिच्छवास, सुदीर्घ, कटशाल्मलि, दुरिष्ट, सुमहावाद, प्रवाह, सुप्रतापन, ।३१ और मेध वृष, शाल्म, सिंह, व्याध्, हाथीके मुखवाले।३२। मगर, कुम्भीन, नक्र नाम- वाले, स्पं, कच्छप, काग नामक, गिद्ध, उल्लू जलौका नाम वाले, गीदड़, ऊंट, कैंकड़े धाम वाले ।३३। मेंढ़क, प्रतिवक्त, रक्ताक्ष, पूति, मृतिका, कराधू म्र, अग्नि, कृमि, गन्धि वषु।।३४। अग्निध्र, अप्रतिष्ठ, रुधिराभ, श्वभोजन, लालाभक्ष, अन्त्र भक्ष, सर्वभक्ष, सुदारुण।३५। कंटक: सुबिशालश्च विकटः कटपूतनः । अम्वरीषः कठाहश्च कष्ठा वैतरणी नदी ॥३६॥ सुतप्तलोहशयन एकपादः प्रघुरण: । असितालवनं घोरमस्थिभंग: सुपूरणः॥३७॥ विलातसोडसुयंत्रोपि कूटपाश: प्रमद्द'नः। महाचूर्ण: सुचूर्णोऽपि तप्तलोहमयं तथा ॥३८॥ पर्वतः क्षुरधारा च तथा यमलपर्वतः । मूल्रविष्ठाश्र कूपश्च क्षारक्मश्च शीतलः ॥३६॥ मुसलोलूखलं यन्त्रं शिलाशकटलांगलम् । सालपत्रासिगहनं महाशकटमण्डपम् ॥४०॥

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नरक यातना वर्णन ] [ १७६ समोहमस्थिभगश्च तप्तचलमयोगुडम्। बहुदुखं महावलेशः कश्मलं शमल मलम् ॥४१॥ हालाहलो विरूपश्च स्वरूपश्च यमानुग: । एकपादस्त्रपादश्च तीब्रश्चाचीवरं तमः ॥४२॥ कण्टक, सुविशाल, विकट, कटपूतन, अम्बरीष, कटाह, कष्टदायक, वंतरणी, नदी 1३६। सुतप्त, लोहशयन, एकपाद, प्रपूरस, असितालवन, घोर अस्थिभङ्ग, सुपूरण ।३७ विलातस, असुयन्त्र, कूटपाश, प्रमर्दन, महाचूर्स, असुचूर्ण, तप्तलोहमय ।३८। पवंत, क्षुरधारा, यमल, पर्वत, मूत्र, विष्ठा, अश्र कूप, क्षारकूप, शीतल।३६। मूसल ऊखल, शिला, शकट, लांगल, तालपत्र, असिगहन, महाशटक मण्डप ।४०। समोह, अस्थिभंग, तप्त, चलमय, गुड़, बहुदुःख, महावलेश, शमल, मलात, ।४१। हलाहल, विरूप, स्वरूप, यमानुग, एकपाद, त्रिपाद, तीब्र, अचीवर, तम ।४२। अष्टाविशतिरित्येते क्रमत्ः पंचपंचकम् । कोटीनामानुपूर्व्येण पंच पंचंव नायकाः ।।४३।। रौरवाय प्रबोध्यन्त नरकाणां शतं स्मृतम् । चत्वारिशच्दतं प्रोक्त महानरकमण्डलम्॥४४॥ इति ते व्यास संप्रोक्ता नरकस्य स्थितिर्मया। प्रसंख्यानाच्च वैराग्य शृशु पापगति च ताम् ।।४५।। ये उपयुक्त्त क्रमसे सात सौ नरक हैं और प्रतिकोटि में से पाँच-पाँच नायक हैं ।४३। रौरव के ही सौ नरक कहे गये हैं और चालीस सौ महानरक मण्डल कहा गया है।४४। हे व्यासजी ! इस तरह मैंने आपको नरकों की स्थिति संख्याके सहित कही है। अब वंराग्य और उसकी पाप गति को भी सुनो /४५। नरक योतना वर्शान एषु पापात्मा: प्रपच्यन्ते शोष्यन्ते नरकाग्निषु। यातना: भिरविचित्राभिरास्वकर्मक्षयाद् भृशम् ॥ १॥

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स्वमलप्रक्षयाद्यद्वदग्नौ धास्यन्ति घावत:। तत्न पापक्षर्यात्पापा नरा: कर्मानुरूपतः । २ ।। सुगाढं हस्तयोर्बद्धा ततः शृङ्ङलया नराः । महावृक्षाग्रशाखासु लम्व्यन्ते यमकिकरैः ॥ ३॥ ततस्ते सर्वयत्नेन क्षिप्ता दोलन्ति किंकरः । दोल्यन्तश्चाति वेगेन विसज्ञा यांति योजनम् ॥४ ॥ अन्तरिक्षस्थितानां च लोहभारशतं पुनः । पादयोरबंध्यते तेषाँ यमदूतर्मंहाबलैः ॥५॥ तेन भारेण महता प्रभृश ताडिता नराः। ध्यायन्ति स्वानि कर्मागि तूष्णीं तिष्ठन्ति निश्चलाः ॥६॥ ततोऽकु शेरग्निवएर्लोहदडैश्च दारुखैः। हन्यन्ते किंकरर्घोंरैः समन्तात्पापकमिखः ॥ ७॥ श्री सनत्कुमार जी ने कहा-इन उक्त नरकों में पापात्मा प्राणणी गिराये जाते हैं और वे वहाँपर अनेक प्रकारकी यातनाओं द्वारा अपने कृत दुष्कर्मों के नाशहो जानेकर अत्यन्त तीव्र नरककी अग्नियोंमें सुखाये जाते हैं।१। धातुओं के मेल को हटने के लिये जैसे उन्हें तीक्ष्ण अग्निमें रखते हैं उसी तरह पापी प्राशियोंको पाप-नाशके उद्देश्यसे ही अपने कर्मोंके अनुसारही नरकोंमें गिराया जाता है। २। वहाँ यमराज के दूत पापियोंके हाथों को शृद्धलासे मजबूतीके साथ बाँधकर इसके पीछे महावृक्षकी शाखों में उन्हें लटकाते हैं।३। तब वे पूर्गा यत्नद्वारा यमकिकरों के फेंके हुए काँप उठते हैं और चेतना रहित होकर योजनों तक चले जाते हैं ।४। फिर महा बलवान यमदूत आकाशमें स्थितहोकर उनके पैरों में सौ भार लोहा बाँध देते हैं ।५। उस भारी बोभ से अत्यन्त ताड़ित मनुष्य अपने किये हुए दुष्कर्मों का स्मरण करते हैं और निश्चल एवं मौन रह जाया करते हैं ।६। इसके पश्चात् यमके दूत चारों ओर से अकुशों तथा अग्नि के तुल्य दारुण लोहे के दण्ड़ों से पीटते हैं ।७। ततः क्षारेण दीप्तेन वह्न रपि विशेषतः । समन्ततः प्रलिप्यन्ते तीव्रेणे तु पुनः पुनः ॥८॥

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द्रू तेनात्यंत लिप्तेन कृत्ताँगा जर्जरीकृताः। पुनर्विदार्ध्य चांगानि शिरसः प्रभृति क्रमात् ॥ ६ै॥ वृताकवतप्रपच्यते तप्तलोहकटाहकः । विष्ठा पूर्ण तथा कूपे कृमीणाँ निचये पुनः ॥१०॥ मेदोऽसृक्पूयरणाया वार्प्या क्षिप्यति ते पुनः । भक्ष्यंते कृमिभिस्तीक्ष्णार्लोहतुण्डैश्च वायसैः ॥११॥ श्वभिर्द्दसंवृकर्व्याघ्र शैद्रइच विक्रताननंः । पच्यकते मत्स्यवच्चाि प्रदीप्तांगारराशिषु॥११। भिन्ना: शूलः सुतीक्ष्णा इच नरा: पापेन कर्मणा। तैलयन्त्रेषु चाकम्य घोरं। कर्मभिरात्मन: ।१३। तिला इव प्रपीडयन्ते चक्राख्ये जनपिंडकाः। भ्रज्यते चातपे तप्ते लोहभाण्डेष्वनेकधा ।१४। इसके अनस्तर बार-बार अत्यन्त जलते हुए आगके अङ्गारों से उनका सारा शरीर लिप्त किया जाता है।5। अत्यन्त लिस होने के कारण छिन्नाङ्ग और अति ज्जरी भूत होकर क्रमशः मस्तक के विदीर्ण होनेपर पके हुए बैंगन के सदृश लोहे के संतस्त बड़े कड़ाह में पकाये जाते हैं। इसी तरह पुनः विष्टासे भरे हुए कूपमैं और क्रीड़ोंके समुदाय में डाल दिये जाया करते हैं।-१०। इसके अनन्तर उन पापी मनुष्यों को चर्बी, रुधिर और मवादसे परिपूर्ण बावड़ी में फेंक दिया जाया है। बहाँ से बुरी तरह बहुत ही तीक्ष्ण कीड़ोंके द्वारा तथा लोहे जैसी चोंचवाले कोओं से काटे और खाये जाते हैं।११। इसी तरह कुत्त डाँस, भेड़िये, भयानक और अत्यन्त विकट मुँह वाले बाघ आदि ैसिक पशुओं से काटे जाते हैं तथा जलते हुए अङ्गारों में मछली की भाँति पकाये जाते हैं ।१२। वहाँ फिर ये प्रासी अपनेही किये हुए बड़े-बड़े पापों के कारण अत्यन्त तेज त्रिशूल के छेदन हुए कोल्हू में डाल दिये जाते हैं।१३। वहां तिलों के समान उनके शरीर पीसे जाते हैं और खूब सन्तप्त एवं आग से तपे हुए लोहे के पात्रों में उनकी भुनाई की जाती है।१४। तैलपूण कटाहेषु सुतप्तेषु पुनः पुनः। वहुधा प्यते जिह्वा प्रपीडयोरसि पादयोः ॥१५॥

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श्रीशिवपुराण

यातनाश्च निःयेषनरकेष्वेवं महत्योऽत्र करीरस्यापि सर्वतः । क्रमन्ति क्रमशो नराः ॥१६। नरकेषु च सर्वयु विचित्रा यमयातनाः । याम्यंश्च दीयये व्यास सगिषु सुकष्टदाः ॥१७।। ज्वल दंगारमादाय मुखमापूयं ताडयते। ततः क्षारेण दीव्तेन त।्रेंण व पुनः पुनः ॥१८ा। धृतेनात्यन्ततप्तेन तदा तैलेन तन्मुखम्। इतस्ततः पीडयित्वा भृशमापूर्य हन्यते॥। ११॥ विष्ठाभि: कृमिभिश्चापि पूर्यमाणा: क्वचित्क्वचित। परिष्वजति चात्यग्रां प्रदीप्ता लोहशाल्मलीम् ॥२०॥ हन्यन्ते पृष्ठदेशे च पुनदीप्तमहाघनेः। दन्तुरेणातिकु ठेन क्रकचेन बलीयसा ॥२१। तेलमे पूर्ण गर्म-गर्म कड़ाहमें बार-बार उनके पर और हृदय में पीड़ा देकर जिह्वाको पकाया जाता है।१५। इसी प्रकारसे नरकों की बड़ी ही भयानक तीव्र यातनाय पाकर पापी मनुष्य समस्त नरक में क्रम से भेजे जाते हैं।१६। हे व्यासजी ! इन सम्पूर्र नरकोंकी बातनायें अत्यन्त वष्ट देने वाली बहुत ही अद्भुत होती है। वहाँ जबर्दस्ती से उन यमके द्वूतों के द्वारा मनुष्य के सभी अ्रगोंको महान वष्ट दिया जाता है।१७। जलते हुए अ गारे और कोयले मुँह में भरकर ताड़ना दी जाती है और संतप्त अगारों से तथा तामे की फलाकाओं से जलाया जाता है।१८। कभी- कभी गर्म तेल या घृत मुख में भरकर खब पीड़ा देवर पीटा जाता है।१६ कहौपर मल और कीड़ों से भरे हुए अत्यन्त उप्र लोहे की शाल्मली को लिपटा देते हैं।२०। इसके पश्चात् सुर्ख गम लोहे की धनों से पीठ में चोट दीजाती है और बड़े-बड़े दाँतोंवाले आरोसे चिराई की जाती है।२१ शिरः प्रभृति पीडयन्ते घोरः कर्मभिरात्मजः । खाद्य ते च स्वमांसानि पीयते शोणितं स्वकम् ॥२२।। अन्न पानं न दत्त यैः सर्वदा स्वात्मपोषकंः । इक्षुवत्त प्रपीडयते जर्जरीकृत्य मुद्गरः ॥२५॥

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नरक यातना वर्सन ] [१=३

असितालवने धोरे छिद्यते खण्डशस्ततः । सचीभिभिन्नसर्वांगास्तप्तशूलाग्ररोपिताः ।२४॥ संचाल्यमाना बहुशः क्लिश्यंते न म्रियंति च। तथा च सच्छरीराजि सुखदुःखसहानि च ॥२५१ देहादुत्पाटय मांसानि भिद्यते स्वश्ब मुद्दगरंः । दंतु राकृतिभिर्घोरयम दूतर्ब लोतक है: निरुच्छ वासे निरुच्छ वासास्तिष्ठन्ति नरके चिरम्। उत्ताडयन्ते तथोच्छ वाशे वालुकासदने नराः ॥१७॥ रौरवे रोदमानाशच पीड्यन्ते विविधर्वधैः । महारौरवपीडाभिर्महांतोऽि रुदेति च ॥२८॥ उनके ही घोर दुष्कर्मोंके कारण उनके मौस खाये तथा उनका रुविर पीया जाता है। वहाँ नरकोंमें पापात्मा पुरुष इसी भाति परम पीड़ित किये जाते हैं ।२२। जिन्होंने कभी किसीको अन्न का दान न देकर केवल अपने ही शरीर का पोषण किया था वे वहाँ बड़े-बड़े मुगदरों से खूबही कूढे सथा गन्ने के समान पेरे भी जाते हैं।२३, फिर महाघोर असिताल वन में खण्ड खण्ड करके छेदित होते हैं और सुईयों से उनके समस्त अग भिन्न हो जाते हैं। इसके पश्चात् तपाये हुए त्रिशूल पर रख दिया जाता हैं ।२४। इस तरह वहाँ उन पापी प्राशियों को अत्यन्त कष्ट का अनुभव होता है किन्तु मरते नहीं उनको तो केवल दुःखको अनुभव करनेके लिये ही ऐसी पीड़ा दा जाती है और उनका शरीर वह सभी सहन करनेके योग्य होता है।२५। अति बलवान् दन्तुर आकार वाले धोर यमदूतों के द्वारा मुग्दरों से देहका माँस उखाड़ कर भेदन किया जाता है।२६। निरुच्छास नाम वाले नरकमें बिना साँस लिये ही स्थिर रहना पड़ता है। उछवास नामक नरक में मनुष्य बालूके घर में ताड़ित कियेजाते हैं ।२७। ररव नामक नरक में रुदन करते हुए पापी मनुष्य अनेक वधों से पीड़ित होते हैं और महारोरव नरक में तो बड़े-बड़े पुरुप भी रो पड़ते ।२८। पत्सु वक्त्रे गुदे मुण्डे नेत्रयोश्चैत्र मस्तके। निहन्यंते घनैस्तीक्ष्णा: सुतप्तैर्लोहशकुभिः ॥२६॥

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१८४ ] [श्री शिवपुराख सुतप्तवालुकार्यां तु प्रयोज्यंते जतुपके भृशं तप्ते क्षिप्ता: कन्दन्ति विस्वरम् ॥३०॥ मुहू मु हुः ।

कुम्भीपाकेषु पच्यते तप्ततलेषु वे मुने। पापिनः क्ररकर्माणोऽसह्यषु सवथा पुनः ॥३१॥ लालाभक्षेषु पापास्ते पात्यंते दुःखदेषु वै। न.नास्थानेषु च तथा नरकेषु पुनः पुनः ।३२। सूचीमुखे महावलेशे नरके पात्यते नरः। पापी पुण्यविहीनश्च ताडयते यमकिंकरैः ॥३३॥ लोहकुम्भे विनिक्षिप्ता: रवसन्तरचशनैः शनैः। महाम्निना प्रपच्यते स्वपापैरेव मानवा ॥३४।। दृढं रज्ज्वादिभिर्बद्ध्बा प्रपीडयते शिलासु च। क्षिप्यंते चान्धकूपेषु दश्यते भ्रमरंभृ शम् ॥३५॥ पेरोंमें, मुदामें, मुखमें, शिरमें, नेत्रोंमें सर्वत्र अत्यन्त तपी हुई लोहेकी शलाकाके द्वारा अत्यन्त ताड़ना दीजाती है ।६। वहाँ खूब तपीहुई रेतमें उन्हें डालदिया जाता है तथा जीवोंसेरिपूर्ण कीचड़में फेकदेते हैं जहाँकि स्वरहीन होकर वे रुदन कियाकरते हैं:३०। वे मुने ! कुम्भीपाक नामवाले नरकमें अत्यन्त तपाये हुए तेलमें पापी लोगों क डालकर पकाते हैं। यह यातना उनको दीजाती है जे। बहुनही क्ररतासे पूर्र करनेवाले इस संसार में रहे होते हैं ।३१। नरकोंमें ऐसे उग्र दुष्कर्म करने वाले पापात्मा मनुष्यों का अत्यन्त कष्टदायक लालाभक्ष नरकों में तथा अनेक ऐसे ही भीषण नरकोंमें बारम्बार गिराया जाता है।३२ सवथा पुण्यसे हीन महापाफी प्राणियोंका महानक्लेश देनेवाले सूचीमुख नामक नरकमें यमदूतोंके द्वारा वलात् गिरा दियाजाता है और वहाँ अनेकतरहकी करसे ताड़नाभी दी जाती है।३३। लोहकुम्भमें पर्तितपापी धीरे-धीरे साँस लिया करते हैं। अपने पाप कर्मों के कारस वहाँ मनुष्य महान्नि के द्वारा पकाये जाते हैं ।३४दृढ़ रस्सीसे बाँधकर शिलाओं पर यातना दीजाती है तथा अन्ध कूपो में डाल दिये जाते हैं जहाँ भ्रमरोंसे वे खूब ही उसे जाया करते हैं। ३५।

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नरक यातना वर्णन ] [ १८५

कृमिभिभिन्नसर्वांगाः शतशो जर्जरीकृताः । सुतीक्ष्णक्षारकूपेषु क्षिप्यन्ते तदनन्तरम् ॥३६। महाज्वानेऽत्र नरके पापाः क्रदन्ति दुःखताः । इतश्चेतश्च धावान्ति दह्यमानास्तदतिषा। ३७।। पृष्ठे चानीय तुण्डाभ्याँ विन्यस्तस्कंधयोजिते । तयोर्मध्येन वाकृष्य बाहुपृष्ठेन बाढतः ॥३८॥ बद्धा: परस्पर सर्वे सुभृशं पाशरज्जुभिः । बद्धपिण्डास्तु दृश्यते महाज्वाले तृ यातना: ॥३६॥! रज्जुभिर्वष्टिताचव प्रलिप्ताः कर्द्दमेन च। करीषतुषवह्नो च पच्यंते न ्रियंति च।।४०।। सुतीक्ष्ण चरितास्ते हि कर्कशासु शिलासु च । आस्फाल्य शतशः पापाः रच्यते तृणवत्ततः ।४१।। शरीराम्यंतरगतैः प्रभूतैः कृमिभिनंराः। भक्ष्यते सीक्ष्णवदनेरात्मदेहक्ष याद् भृशम् ॥४२:। जब कीड़ों से काटे हुए होकर उनके सब अङ्ग छिन्न एवं विदीर्ण हो जाते हैं तो फिर उन्हें अत्यन्त तपी हुई भूमलमें फेंक देते हैं ।३६। इस महान् ज्वालावाले नरकमें पाषी परम उत्पीड़त एवं दुःखित होकर रोया करते हैं और इधर-उधर लपट से भस्मीभूत होकर दौड़ लगाया करते हैं ।३७। मुखों द्वारा पीठपर लाकर कन्धे पर रखके बाहु तथा पीठ से या दोनोंके मध्यभाग से अत्यन्त वेगसे खींचकर पापकी रस्सोसे बँधेहुए समस्त प्राणी महा-ज्वाल नामक नरकमें बद्ध पिण्ड हुए सब यातनाओं के। देख। करते हैं।३८-३६। नरक में पापी पुरुष रहसी से बद्ध तथा कीचड़ से लिप्त आरण्यक उपलों व भुस की अग्नि में पकाये जाते हैं और मरते नहीं हैं, कष्टका घोर अनुभव किया करते हैं ।४०1 कठोरतम शिलाओं पर बड़ी ते जीसे जाते हुए सैकड़ों स्थानों में ताड़न करके तिनकों की तरह भूने जाते हैं।४१। शरीरके अन्दर प्रविष्ट तीव्र मुख वाले कीड़ोंसे अपने देहके होने के कारण खबही खाये जाते हैं।४२।

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१८६ ] [श्रीशिवपुराण

कृमीणां निचये क्षिप्ता: पूयमांसस्थिराशिषु। तिष्ठत्युद्विग्नाहृदया पर्वताभ्यां निपीडिताः ॥४२। तप्तेन न वज्तलेपेन शरीरमनुलिप्यते।

वदनांतः अधोमुखोर्ष्वपादश्च तातप्यंते स्म वह्निना ॥४३।। प्रविन्यस्तां सुप्रतप्तामयोगदाम् । ते खादन्ति पराधीनास्तिस्ताड्यन्ते च मुद्गरैः ॥४४॥ इत्थं व्यास कुकर्माणो नरकेषु परचंति हि। वर्ण यामि विविणत्व तेषां तत्वाथ क्रर्मिराम् ॥४५।। कीड़ों के समुदाय में फैंके हुए तथा पीब माँस और अस्थियों के मध्यमें डालेहुए अत्यम्त दुःखित मनमें उन्हें रहना पड़ता है ।४२। तपेहुए वज्त्रलेप से उनका शरीर लिप्त रहता है और उनका मुख नीचे की ओर और पैर ऊपर करके फिर ताप दिया जाता है जिसके कारण बड़ी वेदना होती है। ।४३। वर्हाँ पापी पुरुषों के मुखमें अन्दर अत्यन्त तप्त लोहेकी गदा दी जाती है जिसे वे विवश होकर खाते हैं और यमके दूतोंके द्वारा ऊपरसे खूब ही ताड़ित भी किया जाता है।४४ हे व्यास जी ! इस संसार में बुरे कर्म करने वाले प्राणी परलोक में जाकर महान् से महान् नरकों की यातनाँयें भोगा करते हैं। अब मैं पापी पुरुषों के तत्व का वर्णन करता हूँ।४५। नरक के रिशेष कष्टों का वर्णन मिथ्यागमं प्रवृत्तस्तु द्विजिहवाख्ये च गच्छति। जिह्वाद्वकोशविस्तीण हलस्तीक्ष्ण: प्रपीडयते ॥ १ ॥ निर्भत्सयति यः कूरो मातर पितरं गुरुम्। विष्ठाभिः कृमिमिश्राभिमुखामापूर्य हन्यते ॥ २ ॥ ये शिवायतनारामवापीक पतडागकान्। विद्रवंति द्विजस्थानं नरास्तत्र रमन्ति च ॥ ३ ॥ काममुद्वर्तनाभ्यंगं सन नपानाम्बुभोजनम् । क्रीडनं मंथुनं द्यूतमाचरन्ति मदोद्धताः॥४॥

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नरकों के कष्टों का वर्णन । [१५७

पेचिरे विविधर्घोरैरिक्षुयंत्रादिपीडनंः । तिरयाग्निषु पच्यते यावदाभूतसंप्लवन् ।। ५॥ तेन देनैव रूपेण ताडयन्ते पारदारिकाः । गाढमालिंग्यते नारी सुतप्ता लोहनिर्मिताम् ॥ ६ ॥ पूर्वाकारा्च पुरुषाः प्रज्वलन्वि समंततः। दुश्चारिणीं स्त्रियं गाढमालिंगन्ति रुदति च ॥। ।।। श्री सनतकुमार जी ने कहा-मिथ्या शास्त्रमें प्रबृत्ति रखने वाला पुरुष द्विजिह्व नामक नरकमें जाता है और वहाँ जीव के समन आधे कोस तक फैले हुए हलों से पीड़ित होता है ।१। जो अत्यन्त क्रूर स्वभाव वाला पुरुष अपने माता-पिता को ललकारता है। तथा गुरुको फटकार देता है वह वहाँ कीड़ों से पूर्ण विष्ठा मुखमें भरकर पीटा जाता है।१। जो शिव के मन्दिर-बाग-बावड़ी तथा कूाको तोड़ते हैं या सरोवर को नष्ट करते हैं अथवा ऐसे स्थान का नाश किया करते हैं जहाँ मनुष्य रमख करते हैं किम्बा किमी ब्राह्मणा के स्थान को नष्ट हरट्ट करते हैं वे प्रलय काल तक नरक की अग्नि में पड़े रहा करते हैं।३। जो मनुष्य काम क्रीड़ा के मदमें डूबे हुए उद्ध त्तन (उबटन) स्नान-पान-अल-भोजन क्रीड़ा और मैथुन तथा द्यत करते हैं वे अनेक तरह के कोल्हू के घोर उत्पीड़िन से वहाँ नरक में कलेशित किये जाया करते हैं और प्रलयके समय पर्न्त नरक की महाग्नि में पड़े हुए दुःख भोगते रहते हैं ।४-५। जो पराई स्त्री के साथ भोग करते हैं वे वहाँ नरक में उसी प्रकार से ताड़ित किये जाते हैं। लोहे की सं प्त स्त्री से उन्हें आलिंगन कराया जाता है जिससे उनका सारा शरीर भुलसा जाता है।६। पूर्व के आर आकार वाले पुरुष सब ओर से जलते लगने लगते हैं और व्यभिचारिणी का बड़े बेग से आलिंगन करके रोते जाते है।७। ये शृण्वंति सताँ निदां तेषां कर्ण प्रपूरणम् । अग्तिवर्णभ्यः कीलैस्तप्तस्ताम्रादिनिमितः ॥८॥ त्रपुसीसारकूटाद्भिः क्षीरेण च पुनः पुनः । सुतप्ततीक्ष्ण तैलेन वज्तलेपेन वा पुनः ॥६॥

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१८८ ] [श्रो शिवपुराण

क्रमादापूर्य कर्णास्तु नरकेषु च यातनाः । अनुक्रमेण सर्वेषु भवंत्येताः समततः ॥१०॥ सर्वेन्द्रियाणामप्येवं क्रमात्प।पेन यातना:। भवन्ति घोराः प्रत्येकं शरीरेण कृतेन च ॥११॥ स्पशंदोषेण ये मूढ़ा: स्पृशंति च परस्त्रियम् । तेषाँ करोऽग्निवर्णाभिः पांसुभि, पूर्यते भृशम् ॥१२॥ तेषां क्षारादिभिः सर्वेः शरीरमनुलिप्यते। यातनाश्च महाकष्टाः सर्वेष नरवेष् च॥१३॥ कुर्वन्ति पित्रोभृ कुटिं करनेत्राणि ये नराः । वक्त्ाशिग तेषां साँतानि कीर्यते शंकुभिद्टढम्॥१४॥ जेो यहाँ सत्पुरुषोंकी निन्दा किया करते हैं उनके वहाँ नरक में आगके तुल्य तप्त लोहे तथा तामेकी कीलोंसे कान भर दिये जाते हैं।। इसके अनन्तर रांग और पीतल गलाकर जल-दूध या तप्त तेज तेलसे किम्बा बज्त लेपसे क्रमशः कानों को भरकर यह अत्यन्त वेदना सभी नरकों में क्रमसे दी जाती है ।-१०। इसीतरह सम्पूर्ण इन्द्रियोंके द्वारा किये गये पापों से तथा प्रत्येक शरीर के अगोंसे किये गये पापों के क्रम के अनुसार नरकमें बहुत सख्त यातना मिलती है।११। जो पुरुष केबल मूढ़ता वश स्पर्शके दोषसे ही पराई स्त्री का स्पर्श हाथ से किया करते हैं उनने हाथ अग्नि के समान सन्तप्त लाल धूलि से भरकर जलाये जाते हैं और उनका सम्पूर्ण शरीर गर्म राख आदिसे दिप्त किया जाता है। इस तरह सभी नरकों में बहुत ही कष्टदायक पीड़ा दी जाती है ।१२-१३। जा मनुष्य संसारमें अपने माता-पिता को हाथ या आखें दिखाया करते हैं उनके मुँह ऊपर तक दढ़ता के साथ कीलों से भर दिये जाते हैं।१४। गैरिन्द्रयौर्नरा ये च विकुर्वति परस्त्रियम् । इन्द्रियाशि च तेषाँ व विकुवि तथैव च ॥१५॥। परदारांश्च पश्यन्ति लुब्धाः स्तव्धेन चक्षुषा । नेत्रप्रपूरणम् ॥१६।।

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नरकों के कष्टों का वर्णन ] [ १८६

क्षाराद्यशच क्रमात्सर्वा इहैव यमयालनाः । भवन्ति मुनिशार्दूल सत्यं सत्यं न संशय: ॥१७! देवाग्निगुरुविप्रभ्यश्चानिवेद्य प्रभु जते। लोहकीलश्तस्तप्तस्तज्जिह्वास्यं च पूर्य्यते ॥१८॥ ये देवारामपुण्पाणि लोभात्सगृह्य पाणिना । जिघ्रन्ति च नरा भूय: शिरसा धारयन्ति च ॥१६॥ आपूर्यते शिरस्तेषां तप्तैर्लोहस्य शकुभिः । नासिका वातिबहुलैस्ततः क्षारादिभिभृशञम् ॥२०॥ ये निंदन्ति महात्मान वाचकं धर्मदेशिकम्। देवाग्निगुरुभक्तांश्च धर्मशास्त्र' च शाश्वतम् ॥२१॥ तेषामुरसि कण्ठे च जिह्वायां दंतसन्धिषु। तालुन्योष्ट नासिकायाँ मूध्नि सर्वांगसन्धिष् ॥२२। अग्निवर्णास्तु तप्ताश्च त्रिशाखा लोहशंकवः । आखिद्यते च बहुशः स्थानेष्वेतेषु मुद्चरैः ॥२३॥ जिस अपनी इन्द्रियों से मनुष्य पराईस्त्रीका दूषित कियाकरते है उनकी वही इन्द्रिय विकृत होजाती है।१५। रूपके लालची जो पुरुष चंचल नेत्रों से पराई स्त्रीको देखते हैं उनके नेत्र नरक में अग्नि के समान लाल गर्म सुईयेोंसे तथा गर्म राखसे भर दिये जाते हैं ।१६। हे श्रेष्ठ मुनिवर ! नरक में इस प्रकारसे यमराजके द्वारा दी हुई यातनायें प्राष्यहोती है-यह सर्वथा अक्षरशा सत्य है-इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ।१७। जो पुरुष देवता- अग्नि-गुरु और ब्राह्मणों को दिये बिना ही स्वयं खा लेते हैं, उनकी जीभ और मुँह लोहे की सकड़ों कीलों से भर दिये जाते हैं ।१८। जो मनुष्य देवता और बागके पुष्पों को हाथ से लेकर सूँघते हैं और फिर शिर पर धारण कर लेते हैं उनका शिर तप्त लोहे की कीलोंसे ठोका जाता है और उनकी नासिका में गर्म राख आदि भरदी जाया करती है।१६-२०। जो पुरुष महात्मा-धर्मात्मा-उपदेशक-देवता-अग्नि-गुरु और भक्तोंकी तथा सना- तन धर्म की एवं धर्मशास्त्रकी निन्दाकरते हैं उनके हृदय, कंठ तथा जिह्वा

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१६० ] [धीशिवपुराण

में तथा दाँतों की सन्धियों में, तालु में, ओटों में, नासिका में, मस्तक में तथा समस्त अंगों के जोड़ों में अग्नि के तुल्य तप्त तीन शिखा वाली कीलें मुद्गरों से ठोक दी जीती हैं।२१-२२-२३। ततः क्षारेण दीप्तेन पूर्यंते हि समंततः । यातनाइ्च महत्यो वै शरीरस्याति सर्वतः ॥२४॥ अशेषनरकेष्वेव क्रमन्ति क्रमश पुनः । ये गृहणन्ति परद्रव्य पद्म्यां विप्र स्पृशंति च ॥२५॥ शिवोपकरण गां च ज्ञानादिलिखित च यत् । हस्तपादादिभिस्तेषामापूर्यते समततः ॥२६॥ नरकेशु च सवेषु विचित्रा बहुयातनाः । भवन्ति बहुशः कष्टाः पाणिपादेसमुद्भवाः ॥२७॥ शिवायतनपयन्ते देवारामेषु कुत्रचिंत् । समुत्सृजति ये पापा: पुरीष मूत्रमेव च ॥२८॥। तषाँ शिश्नं सवृषण चूर्ण्यंते लोहमुद्गरैः । सूची भिरग्निवर्णाभिस्तथा त्वापूर्यते पुनः ॥२६।। इसके पश्चात् जलती हुई राखसे समस्त अंग में लेरन किया जाता है जिससे सम्पूर्ण शरीरमें पूरी यातना होती है।२४। जो कोई पराये धन को ले लेते हैं तथा परोंसे ब्राह्मण के शरीर का स्पर्श करते हैं वे क्रम से सभी नरकों में जाकर पूरी यातना भोगते हैं ।२५। जो शिव या किसी भी देवता की पूजा की वस्तुओं को, गायको मथा ज्ञान के लेख एवं ज्ञानपूर्ण ग्रन्थ को पैरों से छूते हैं उनके हाथ पैर आदि कीलों से ठोके जाते हैं।२४ उनको अन्य सभी नरकों में जाकर हाथ-पैरों की बहुत कड़ी यातनायें भोगनी पड़ती हैं जिनसे अत्यन्त कष्ट होता है। २७। जो पापात्मा पुरुष शिव-मन्दिर की सीमा में देवोद्यान में किसी भी स्थान पर मल या मूत्र का त्याग किया करते हैं उनकी अण्डले सहित उपस्थेन्द्रिय लोहे के मुद्गरों से पीसी जाती है तथा अग्निके समान तप्त सुइयोंसे पीसी जाती है।२८-२६ ततः क्षारेण महता तीव्रेण च पुनः पुनः ।

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नरकों के कष्टों का वर्णन ] [ १६१

द्र तेन पूर्यंते गाढं गुदे शिश्ने च देहिप: ।।३०।। मना सर्वेन्द्रियाणाँ च यस्माद् दुःखं प्रजायते। धने सत्यपि ये दान न प्रयच्छन्ति तृष्णया ॥ ३१। अतिथि चावमन्यंते काले प्राप्ते गृहाश्रमे । तस्मात्त दुष्कृतं प्राप्य गच्छन्ति निरयेऽशुचौ ॥३२॥ येऽन्न दत्वा हि भुजति न श्वभ्यः सह वायसैः । तेषाँ च विवृत्त वक्त्रं कीलकद्वयताडितम् ॥३३।। कृमिभिः प्राशिभिश्चोग्र र्लोहतुण्डश्च वायसैः । प्रपीड यते।।३४।। श्यामश्च शवलशचैव यममार्गानुरोधको। यो स्तस्ताम्यां प्रयच्छामि तो गृहणोतामिमं बलिम् ।३५।। ये वा वरुणवायव्यायाम्या नैन्र्त्यवायासाः। वायसाः पुण्यकर्माणस्ते प्रगृहणान्तु मे बलिम् ॥३६॥ शिवमभ्यच्य यत्नेन हुत्वाग्नो विधिपूर्व कम् । शैवैर्भन्त्रर्बीिं ये च ददन्ते न च ते यमम् ॥३७॥ इसके अनन्तर उस पापीकी गुदा और लिंगमें बहुत ही गर्म राख या खारो बस्तु भर दीजाती है ।३०। इसमें उन्हें ऐसी तीव्रवेदना होती है कि जिससे मन तथा समस्त इन्द्रियों को बड़ाही अधिक कष्टहोता है। जे। मनुष्य अपने पाप धन होने परभी तृष्णा या कृपणतासे बिल्कुल दान नहीं किया करते हैं और समयपर घरमें आये हुए अतिथिका तिरस्कार देते हैं इससे उन्हें बड़ाभारी पापलगता है और उस पापसे वे नरक में जाते हैं।३१-३२ जे। कुत्ते और काकोंको बलि न देकर स्वयं भोजनवर लेते हैं उनका कंठ और मुख दोनों कीलों के द्वारा नाड़ित किये जाते हैं।३३। ऐसे पापी प्र.णी कीड़े, हिंसक जन्तु, लोहेके समान सख्त चोंच वाले काकोंसे पीड़ित होते हैं और अन्य अनेक उपद्रवों से खूब ही नरकमें सताये जाते हैं। ३४। यमराज के श्याम और सबल नाम वाले दो श्वान हैं जो उनके मार्ग को रोका करते हैं-मैं उन दोनों को बलि समर्पित करता हूँ-वे दोनों इन

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१६२ ] [श्री शिवपुराण

बलि को ग्रहण करें। इस प्रकार से ही जो पश्चिम-वायव्य दिशाके तथा उत्तर-न ऋृत्य दिशाके पुण्यात्मा कहे हैं वे मेरा बलिदान ग्रहण करें। जो यत्न पूर्वक शिव की पूजा कर और विधि सहित अग्निसे हवन करके शिव मन्त्रों द्वारा बलिदान किया करते हैं वे फिर यमराज का मुख नहीं देखते हैं ।३५-३६-३७। पश्यंति त्रिदिवं याँति तस्माद्दद्यादिदने। मण्डलं चतुरस्त्रं तु कृत्वा गंधादिवासितम् ।३८॥ धन्वन्तर्यर्थमीशान्यां प्राच्यामिंद्राय नि क्षिपेत् । याम्यां यमाय वारुण्या सुदक्षोमाय दक्षिे ॥३६॥ पिपृभ्यस्तु विनिःक्षिप्य प्राच्यामर्यंमण ततः । धातुश्चैव विधातुश्च द्वारदेशे विनिक्षिपेत् ।।४०।।

देवः श्वभ्यश्च श्वपतिभ्यश्च वयोभ्यो विक्षिपेद् भुवि ।

वयोभिः पितृमनुष्यश्च प्रेतैभूतैः सगुह्यके ॥४१॥ कृमिकीटैश्च गृहस्थश्चोपजीव्यते। स्वाहाकारः स्वधाकारो वषट्कारस्तृतीयकः । ऐसा विधान नित्य नियमसे करने वाले लोग सीधे स्वर्ग लोक को ही चले जाते हैं। इसलिये प्रतिदिन चार हाथका मण्डल बनाकर उसे गन्धा- क्षतादिसे सुगन्धित करे। फिर ईशनदिशामें घन्वन्तरि गैद्य और पूर्वदिशा में इन्द्रदेवको बलिदानदेवे। उत्तरमें यमको और पश्चिम में सुदक्षोमको तथा दक्षिणमें पितरोंको बलिदेवे।३८-३६ प्राच्य दिशामें सूर्य को भाग देवे-द्वार देशमें धाता तथा विधाताको भाग देवे।४०।श्वानोंके लिये तथा श्वपतियों के वास्ते एवं पक्षियों के लिये जो भाग देना है उसे भूमि पर ही रख देना चाहिये। देवोंसे पितर और मनुष्यों से प्रेत-भूतेो से गुह्यको से पक्षी कृमि- कीटोंसे गृहस्थी मनुष्य उपजीवित होते हैं ।४१-४२। हंतकारस्तथैवान्यो धेन्वाः स्तनचतुष्ठयम । स्वहाकार स्तने देवा: स्वधां च पितरस्तथा ॥४३॥ वषट्कार तथैवान्ये देवा भूतेश्वरास्तथा ।

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नरकों के कष्टों का वर्णन ] ! १६३

हंतकारं मनुष्याश्च पिवंति सततं स्तनम् ॥४४। यस्त्वेताँ मानवो धेनु श्रद्धया ह्यनुपूर्विकाम् । करोति सतत काले साग्नित्वायीपकल्प्यते ।।४५।। यस्ताँ जहाति वा स्वस्थस्तामिस्र स तु मज्जति । तस्माद्ृत्वा बलि ताभ्यो द्वारस्थश्चितयेत्क्षणम् ।।४६।। क्षुधार्तमतिथि सम्यगेकग्रामनिवासिनम् । भोजयेत्त अतिथियस्य शुभान्नन यथाशक्तयात्मभोजनात् ॥४७।। भग्नाशो गृहातप्रतिनिवर्तते। स तस्म दुष्कृत्त दत्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥४८। ततोऽन्न प्रियमेवाश्नन्नरः शृङ्ङलवाशपुनः। जिह्वावेगेन विद्वोऽन्न चिरं काल स तिष्ठतति ॥४६।। स्वाहाकार-स्वाधाकार-वषट्कार तथा हन्तकार ये चारों गायकों स्तनों में रहते हैं। इस स्तन में से देवता स्वाहाकार को-पितृगण स्वधा को-देवता वषटको और भूतेश्वर भी इसी को एवं मनुष्य हं्तकार को निरन्तर पान करते हैं।४३-४४। जेो मनुष्य गाय को श्रद्धाके साथ निर- 1

न्तर समय पर स्वभोजन देता है उसकी कल्पना साग्नित्व की जाती है ।४५। जो गाय को त्याग देता है, वह अस्वस्थ रहता है और तामिस्र नामक नरक में जाया करता है इसलिये इन उपर्युक्त्त सबको बलि देकर एक क्षण के लिए अपने द्वार पर स्थित होकर विचार करना चाहिये ।४६ प्रत्येक मनुष्य का परम आवश्यक कर्तव्य है कि प्रतिदिन यथाशक्ति अपने भोजनमें से किसी एक भूखे अभ्यागत को या किसी भी ग्रामके निवासीको सविधि श्रेष्ठ अन्नसे भोजन करावे ४७। जिसके घरमें कोई अभ्यागत निराश लौटजाता है वह उस गृहस्थी को पापका पुञ्ज प्रदान समस्त पु्य के सञ्चय को लेकर चला जाया करता है।४८। अभ्यागत के निराश हो लोटजाने पर जो स्वयं भोजन करता है और स्वाद लिया करता है वह बहुत समय तक शृङ्धलायुक्त जीभ के वेग से विंधा हुआ रहता है ।४६। यतस्तन्मांसमुद्धृत्य तिलमात्रप्रमाणतः ।

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खादितु दीयते तेषां भिस्वा चंव तु शशोणितम् ।।५०।। निःशेषतः कशाभिस्तु पीडयते क्रमशः पुनः । बुभुक्षयातिकष्टं हि तथा चातिपिपासया ॥५१॥ एवमाद्या महाघोरा यातना: पःपकर्मणाम् । अन्ते यत्प्रतिपन्नहि तत्पक्षेपेण सशृरु ॥५२॥ यः करोति महापापं धर्म चरति नै लघु। धम गुरुतरं वापि तथाबस्थे तयोः शृखु ॥५३॥ सुकृतस्य फल नोवतं गुरूपापप्रभावतः । न मिनोति सुखं तत्न भोगैबंहुभिरन्वितः ।।५४।। तथोद्विम्नोऽतिसंतप्ता न भक्ष्यर्मन्यते सुखम् । अभाववादग्रतोऽन्यस्थ प्रतिकल्यं दिने दिने ॥५१। पुमान्यों गुरुघर्मापि सोपवासी यथा गृही। वित्तवान्न विजानाति पीडां नियमसंस्थितः । ५६॥ तानि पापानि धोराणि सन्ति यश्च नरो भुवि। शतंधा भेदमाप्नोति गिरिरवज्रहतो यथा ।।५७।। नरक में ऐसे पापात्मा प्राणी के जीभके माँस को उचेल कर तिल भर प्रमाण के जन्तुओं को खानेका दिया जाता है। फिर उसके रुघिरको भेदन करके सारे शरीरकेो क्रमशः पीड़ित एवम् ताड़ित कियाजाता है। तब उस प्राणणी से भूख-प्यासके कारंर रसं अत्यं्त कष्टके साथ चलाजाता है ।५०-५१ '43

इस रीति से संसार के जीवन में पापकर्म करनेवालों की बहुतसी यातनायें होती हैं। अन्त में जो भी कुछ उन्हें प्राप्त होता है उसको बतलानाहुँ,उसे ध्यानपूर्वक सुनो ।५२जें पुरुष पापतो बहुत बड़ा और पुष्यबहुतही स्वल्प करता है या बहुत धर्म केरता है-इन दोनींकों दशा बतलाता हूँ उसे श्रवस करो ।५३ बड़े पापका प्रभाव भी बड़ा होता है और उससे थोड़े धर्म का फल नहीं मिला करता है। उस पापके प्रभावसे बहुत भोगोंमें फँसाहुआ भी शैनमें सुख का अनुभव नहीं कियाकरता है।५४। ऐसा पुरुष परम दुःखित ·. एवं हृदय में जलेत्ा हुआ रहकर भोजनके योग्य पदाघोंमें कभी भी सुख नहीं

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माना करता है। वह सर्वदा अपने लिये उनका अभाव ही माना करता है और दूसरों के आगे देख कर उसे दुःख होता है।५५। जो अधिक धर्म करने वाला है वह उपवास करने वाले एक गृतस्थ के तुत्य घनव न् होकर सर्वदा नियममें स्थित रहकर अपनी पीड़ाका होना मानता ही नहीं है ।५६। ऐसे भी अत्यन्त महा घोर पाप है जिनके कारण मनुष्य पृथ्वी पर वच्तसे तड़ित हुए पर्णतके समान से कड़ों ही भेद वाला हो जाता है ।५७। ॥ तपंख तपस्या आदि परमार्थ का फल ।। पानीयदानं परमं दानानाभुत्तमं सदा। सर्वेषाँ जीवपुंजानां तरपण जीवनं स्मृतम् ॥१॥ प्रपादानमतः कुर्यातसुस्नेहादनिवाररितम् । जलाश्रयविनिमरिं महानन्दकर भवेत ॥ १॥ इह लोके परे वापि सत्य सत्यं न संशयः । तस्माद्वापीशच कूर्पांश्च तडागान्कारयेग्नर: । ३। अर्द्ध पापस्य हरित पुरुषस्य विकर्मणः। कूपः प्रवृत्तपानायः सुप्रवृत्तस्य नित्यशः ॥४॥ सर्व तारयते वंश यस्य खाते जलाशये। गावः पिवंति विप्राश्च साधवशच नराः सदा ।५ ॥ निदाघकाले पानीयं यस्य तिष्ठत्यवारितम्। सुदुर्ग विषमं कृच्छं न कदाचिदवाव्यते ॥ ६॥ तडागानां च बक्ष्यामि कृतानां ये गुणा: स्मृताः। त्रिषु लोकेषु सवंत्र पूजिलो यस्तडागवान्।। ७।। श्री सनत्कुमाजी ने कहा-जलका दान समस्त दानों में बहुत ही श्रेष्ठ एवं बड़ा दान है। यह सदा समस्त जीवोंकी पूर्णतृप्ति करनेवाला होता है। : यह जीवन देनेवाला मानागया है।१। इसलिये बड़े ही प्र म के साथ प्याऊ • लगाकर जलका दान करनाचाहिए। जलाशयोंका निर्माण कराना बहुत ही आनन्दका देने वाला होता है।२। मनुष्यको कूपतथा बावड़ी का निर्माण अवश्यही करना चाहिए। इससेइस लोक और परलोकदोनों स्थानों में पेरम

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आनन्दकी प्राप्ति होती है यह अक्षरशः सत्य है। इसमें कुछ भी किसी को सन्देह नहीं करना चाहिए।३। जल परिपूर्ण कूप नित्यही पापकर्ममें प्रवृत्त होनेवाले पुरुषका आधापाप नष्टकर देता है।४। जिसके द्वारा निर्मित भोल या सरोवरमें गौ,ब्राह्मण, साधु और मनुष्य सदा जलपीते हैं उसका वंशतर जाया करता है ।५। ग्रीष्म कालमें जिसका जल बिना रोके हुए ही स्थित रहता है वह निर्मणकर्त्ता कभी-कभी घोर कठिनता तथा बड़ा दुःख नहीं पाया करता है।६। बनाये हुए सरोवरोंके जा गुण बतलाये गये हैं अब मैं उनका वर्णन करता हूँ। जेो तालाबके निर्माण करानेवाला मनुष्य होता है वह तीनों लोकों में सर्वत्र आदर के सहित पूजित होता है।७। अथवा मित्रसदने मैत्रं मित्राविवर्जितम् । कातिसंजननं श्रष्ठ तडागानां निवेशनम्॥८ ॥ धर्मस्यार्थस्य वामस्य फलमाहुमंनीषिखः । तडागः सुकृती येन तस्य पुण्यमनन्तकम्॥ ६॥ चतुविधानां तडागः परमाद्ययः। तडागादीनि सर्वाणि दिशन्तिश्रियमुत्तमाम् ॥१०॥ देवा मनुष्या गन्धर्वाः पितरो नागराक्षसः । स्थावराणि च भूतानि संश्रयंति जलाशयम् ॥११॥ प्रवृड तो तडागे तु सलिलं यस्य तिष्ठति । अग्निहोत्रफलं तस्य (भवतीत्याह चात्मभूः ॥१२॥ शरत्काले तु शलिलं तडागे यस्य तिष्वत । गोसहस्रफल तस्य भवेन्नवात्र संशय ॥१३॥। हेमन्ते शिशरे चंव सलिलं यस्य तिष्ठति। स वैं बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते फलम् ॥१४॥ तालाबोंका निर्माण करना, मित्रके घर में मित्रसे दुःख रहित मित्रता तथा कीतिका विस्तारकराने वाला अत्यन्तश्रेष्ठ होता है।८। जिस व्यक्ति ने अपने किये हुए शुभ कर्मसे सरोवर बनवाया है उसका अनन्त पुण्य उसे मिलता है। बुद्धिमान मनुष्य धर्म अर्थ और कामको इस कारणसेही सफल

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तर्पण तपस्या आर्दि परमार्थ का फल ] [१६७ कहा करते हैं ।। सरोवर चारप्रकार के प्राणिणयोंका परमश्रय होता है। व्रड़ाग आदि समस्त जलाशय उत्तम लक्ष्मी के प्रदान करने वाले होते हैं 1१०। देव, मनुष्य, गन्घर्व, पितर, नाग, राक्षस, स्थावर, भूत (प्राणी) आादि सब जलाशय को आपका आश्रय बनाया करते हैं।११। जिसके द्वारा निर्मित जलाशयमें वर्षा ऋृतुमें जल रहता है उसकी अग्नि-होत्र करने के तुल्य पुष्य होता है ऐसा ब्रह्माजी ने कहा है।१२। जिसके बनायेहुए सरो- वरहे शरस्काल में जल भरा रहता है उसे एक सहस्र गोदान के समान पुण्यकी प्राप्ति हुआ करती है इसमें कुछभी सन्देह नहीं है। १३। जिसके सरोवरमें हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में जल ठहरता है वह अत्यधिक सुवर् के दान के समान पुष्व का फल प्राप्त करता है।१४। .. " वसंते च तथा ग्रीष्मे सलिलं यस्य तिष्ठति। अतिरात्राश्वमेधाना फलमाहुमनीषिणः ।१५।। मुने ब्यासाथवृक्षाणां रोपसो च गुाच्छ्रणु। प्रोक्त जलाशयफल जीवप्रींशनमुत्तमम् ॥१६॥ तारयेतु। कान्तारे वृक्षरोपी यस्तस्माद् वृक्षांस्तु रोपयेत् ।१७। तत्र पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः । पर लोक गतः सोऽपि लोकानाप्नोति चाक्षय न् ॥१८। पृष्पः सुरमणगान्सर्वा्फिलैश्चापि तथा पितृन् । छायया चातिथीन्सर्वान्पूजर्यन्यि महीरुहाः ।१६। कन्न रोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानरवः । तथैवर्षियणाश्चैव संश्रयंति महीरुहान् ॥२०॥ पुष्पिता: फलवंतश्च तर्पथतीह मानवान्। इह लोके परे चंव पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ॥२१॥ बसन्त और ग्रीष्म ऋतुमें जिसके निर्मित सरोवर में जल रहता है उसे जतिरात्रि तथा अश्वमेध यज्ञोंका फलप्राप्त होना मनीषी लोग करते हैं।१५ हे मुने ! हे व्यास महर्ष ! मैंने जीवोंको संतुष्ट करनेवाले जलाशयके निर्माण

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१६८ ] : [ श्री शिवपुराण का पुण्य फल बता दिया है। अब वृक्षों के पुण्य के विषयमें वर्णान करते हैं उसे आप श्रवण करें।१६। जो कोई व्यक्ति वन में वृक्षोंकों लगाता है वह व्यतीत हुए तथा आने आनेवाले समस्तपितृ-वंशोंका उद्धार करदेता है। इसलिये वृक्षारोपण का पुण्य कार्य अवश्यही करना चाहिये । १७। ये लगाये हुए वृक्ष दूसरे जग्म नें उस लगाने वाले के पुत्र सम होते हैं। इसमें कुछ भी मन्देह नहीं है। वह बृक्षारोपण कर्त्ता भी मृत्युगत होकर अक्षय लोकों को प्राप्त होता है।१य। लमाये हुए वृक्ष पुष्पोंके द्वारा देवगणा को, फलों से पितरों को, छाया से अतिथियों के इस तरह सबमें पूजक होते हैं ।१८। किन्नर, सर्प, राक्षस, देवता, गन्धर्व, मनुष्य यथा ऋषिगरसे सभी वृक्षों को अपया आश्य बनाया करते हैं। २०। लोक में पुष्पित तथा फलित वृक्ष मनुष्योंको पूर्छ मानसिक एवं शारीरीक सृप्ति प्रदान कियाकरते हैं। इसलिये वे इस लोक तथा परलोक में धर्मके पुत्र कहे जाते हैं।२१। तडागकृद् वृक्षरोपी चेष्टयज्ञश्च यो द्विजः । एते स्वर्गान्न हीयते ये चान्ये सत्यवादिनः ।।२२। सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः। सत्यमेव परो यज्ञः सत्यमेव पर श्रतम् ॥२३॥ सत्यं सुष्तेषु जागति सत्यं च परम पदम्। सत्येनंव धृता पृथ्वी सत्ये सव प्रतिष्ठितम् ॥२४॥। तथो यज्ञबथ पुण्यं देवर्षिपितृपूजने। आपो विद्या घ ते सर्वे सवं सत्ये प्रतिष्ठितम् ।२५। सत्यं यज्ञस्तपो दानं मन्त्रा देवी सरस्वती। ब्रह्मचर्य तथा सत्यमोंकारः सत्यमेव च ॥२६॥ सत्येन वायुरम्येति सत्येन तपते रविः । सत्येनागि्निर्दहति स्वर्गः सत्येन तिष्ठति ॥२७।। पालनं सर्व वेदानां सवतीर्थावमाहनम्। सत्येन वहते लोके सर्व माप्नोत्ससंशयम् ॥२७॥। जो द्विज सरोवर, बाग बनाने वाला तथा पंच महायज्ञ करने वाला होता है वह कभी भी स्वर्मलोकसे नीचे नहीं पतित होता है. २१। सत्य ही

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तर्पण तपस्या आदि परमार्थ का फल ] षरब्रह्म है, सत्य ही परम तप है, सत्य ही परम यज्ञ है औस सत्य ही परम आदरीय शस्त्र है ।२३। सत्य ही सोने वालोंकेा जगाता है, सत्यही परम पद है, इस सत्य ने ही पृथ्वी मंडल क धारण कररखा है, इस परम श्रध्ध सत्य ही में कुछ विद्यमान रहता है।२४। तप, यज्ञ, पुण्य, देव, ऋषि, पितृ, पूजन,जल और विद्या आदि सभी इस एक सुत्य ही में प्रतिष्ठित होते है । २५। सत्य ही बज्ञ, तप, दान, ब्रह्म वर्ष है। सत्य ही ओंकार है और सत्य ही मन्त्रों वाली देवी सरस्वती है ।२६। सत्यके प्रभाव से यह वायु चलता है। सत्यकी शक्तिसे सूर्य देव संसारमें तपा करते हैं। सत्यसे ही अग्नि बलती है और सत्यसेही स्वर्गकी प्राप्ति हुआकरती है।२७। समस्त वेदोंकी प्राप्ति तथासमस्त तीथों में स्नानकरने का फलकेवल एक सत्यसेही प्राप्त हो जाता है। सत्यसे सभीकुछ मिलजाता है, इसमें कुछभी संशय नहीं है ।२८। अश्वमेघसहस्र च सत्यं च तुलया धृतन् । लक्षाणि करतवश्चंव सत्यमेव विशिष्यते ॥२६॥ सत्येन देवा: पितरो मानवोरगराक्षसाः । प्रीयन्ते सत्यतः सर्वे लोकाश्च सचराचराः ।३०। सत्यमाहुः परं धर्मः सत्यमाहुः परं पदम् । सत्यमाहुः प ब्रह्म तस्मात्सत्य सदा वदेत ॥३१॥ मुनयः सत्यनिरतास्तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम। सत्यधर्मरतः सिद्धास्ततः स्ववंच ते गताः ॥३२॥ अप्स रोग सायं विष्टविमानै: परिमातृभिः । बत्तव्यं च सदा सक्यं न सत्याद्वद्यते परम् ॥३३। अगाधे विपुले सिद्ध सत्यतीर्थ शुचि हृदे। स्नातव्यं मनसा युक्त स्थानं तत्परमं स्मृनम् ॥३४॥ आत्मार्थें वा परार्थे वा पुत्रार्थे वाषि मानवाः । अनृतं ये न भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिन: ।३५॥ सहस्त्रों अश्वमेधों का फल तथा लाखों अन्य यज्ञों का पुण्य तराजू में एक ओर रखो और एक ओर दूसरे पलड़ेमें सत्यका रखो तो सत्य वाला

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पंलड़ा ही नीचेकी ओर भुकेगा। अतः सत्य इन सबसे विशेष होता है।२8 सत्यसे देवता, पितृगण, मनुष्य, स्पं, राक्षस आदि चर एवं अचरके सहित सम्पूर्ण लोक प्रसन्न होते हैं ।३०। सत्यही सबसे श्रष्ठ परम धर्म कहा गया है, सत्यही सवोंत्तम परमपद बतायागया है और सत्यहीको साक्षात् पर- ब्रह्मका स्वरूप माना गया है। इसलिये सर्वदा सत्यका ही भाषण करना चाहिये ।३१। सत्यमें परायण मुनि अति कठिन तपश्चर्या करके तथा सत्य स्वरूप धर्ममें प्रवृत्त सिद्ध सभी स्वर्गको प्राप्त हुए हैं ।३२। अप्सराओं से प्रविष्टहुए विमानों के सहित परिमाताओंको सदा सत्य कहना चाहिये क्यों कि सत्य से अधिक वर्म कुछभी नहीं है।३३। सत्यरूपी तीर्थंका ह्रद परम अगाध, परम सिद्ध एवं अतिपवित्र है इनमें मनसहित स्नान करके अतुल सुख प्राप्त करना चाहिए। इसे सर्वोपरि परम स्थान कहागया है।३४। जो सत्पुरुष अपने लिए, पराये काज के लिये या अपने पुत्र के हित के सि: भूंठ नहीं बोलते हैं वे मनुष्य निश्चय ही स्वर्ग के मामी होते हैं ।५५ वेदा यज्ञास्तथा मंत्राः संति विप्रषु नित्यशः। नो भात्यपि ह्यप्तत्येषु तम्मात्सत्य समाचरेत् ॥३६।। तपसो मे फल ब्रहि पुनरेव विशेषता। स्वर्षां चंव वर्णानां ब्रह्मणाना तपोधने ।३७।। प्रवक्ष्यामि तपोऽध्याय सर्वकामार्थधकम्। सुदुश्वर द्विजातीनां तन्मे निगदतः शृणु ॥३। तपो हि परमं प्रोक्त तपसा विद्यते फलम्। तपोरता हि ये नित्य मोदत सह दैवतः ॥.३६॥ तपसा प्राथ्यते स्वर्मस्तपसा प्राप्यते यशः । तपसा प्र. ८ते कामस्तपः सर्वार्थसाधनम् ॥४०॥ तपसा मोक्षमाध्नोति तपसा विदते महत। ज्ञानविज्ञानसंपसिः सौभाग्यं रूपमेव च।४१। नानाविधानि वस्तूनि तपसा लभते नरः । तपसा लभते सर्व मनसा यद्यदिच्छति ॥४२।।