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तर्पण सपस्या आ.दि परिमार्थ का फल [२०१

वेद, यज्ञ तथा मन्त्र आदि असत्य बोलने वाले ब्राह्मणों में कभी शोभा नहीं दियाकरते हैं। इसलिये सदा सत्यही बोलना चाहिये।३६। व्यासजी ने कहा-हे तपोधन ! अब समस्त वरोंके तथा ब्राह्मखोंके तपस्याके फलका वर्णन कीजिये। मेरी पुनः एकबार सुननेकी इच्छाहोती है।३७। सनतकुमार जी ने कहा-अब मैं समस्तकाम और अर्थका साधक और द्विजातियों द्वारा कठिनतासे करनेयोग्य तपके अध्यायका वर्णन करता हूँ। आपसब मुझसे स्वस करिये। ३८। तपको सबसे बड़ा बताया गया है, तपस्यासे ही विशेष फलकी प्राप्ति हुआ करती है,जो नित्यही तपश्चर्यासे अपनी प्रवृत्ति रखते हैं, वे देवताओं के सहित आनन्द का लाभ लिया करते हैं।३६। तपसे स्वर्ग मिलता है, तपहीसे यशकी प्राप्ति होती है, तपसे समस्त कामनाओंका लाभ होता है और तप ही सम्पूर्ण अर्थों का साधन होता।४०। तप से परम पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति होती है। तपसे ज्ञान तथा विज्ञान की सम्पत्ति मिलती है तपसे परम सौभाग्य और लोकोत्तर रूप-लावण्य प्राप्त होता है ।४१। मनुष्य तपके द्वारा अनेक तरहकी वस्तुओं को पा लेता है, अधिक क्या-क्या बताया जावे तपका ऐसा विलक्षण प्रभाव है कि इसमें रत वक्ति मन से जेो-जे। भी इच्छा करता है सो उसे मिल जाता है।४२। नातप्ततपसो यांति नातप्ततपसा ब्रह्मलोक कदाचन। प्राष्यः शङ्करः परमेश्वरः ॥४३॥ यत्कार्य किचिदास्थाय पुरुषस्तपते तपः। तत्सव समव,प्नीति परत्रेह च मानवः ।.४४। सुरापः परदारी च ब्रह्महा गुरुतल्पगः । तपसा तरते सर्व सर्वतश्च विमुगति ॥४५॥ अपि सर्वश्वरः स्थारगुर्दिष्णुश्चेव सनातनः । व्रह्मा हुताशनः शको ये चान्ये तपसान्तिः ॥.४६।। अष्टाशिति सहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् । तपसा दिवि मोदन्ते समेता दवतः सह ॥४७॥ तपसा लम्यते राज्यं स च शक्रः सुरश्चरः।

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२०२ 1 [ श्रीशिवपुराण

सूर्याचन्द्रमसौ देवी सर्वलोक्तहिते वृत्रहा ॥।४८।। रतौ। तपसैव प्रकाशन्ते नक्षत्राणि म्रहास्तथा।४६।। तपस्या के बिना न तो कभी ब्रह्म को पा सकते हैं और न परमेश्वर शिव ही प्राप्त किये जासकते हैं।४३। मनुष्य जिस कार्य का उद्देश्य लेकर तप किया करता है वह सभी इसलोक और परलोक में अवश्य ही प्राप्त हो जाता है।४२। मदिरा पान करने वाला, पराई स्त्री के साथ रमण करने वाला ब्रह्म-हत्यारा और गुरु-पत्नीसे गमन करने वाला महा पातकी भी तप से लर जाया करता है और समस्त प्रकार के पापों से छुटकारा पा जाता है।४५। सबके स्वामी शिव, सनातन विष्णु, जगत्स्रष्टा ब्रह्मा, देवेन्द्र, इन्द्र, अग्नि आदि सब तपसे युक्त हैं।४६। ऊर्ष्वरेता अट्ठासी सहस्र मुनिगण देवताओं के सहित सभी स्वर्ग लोक में तप से ही आनन्द करते हैं ।४७। तपके अतुल-असीम प्रभाव से राज्य की प्राप्ति होती है। सपसे सुरराज इन्द्र देव प्रति दिन सबका पालन किया करते हैं ।४८। समस्त लोकों के हित करने वाले सूर्य और चन्द्र देव, नक्षत्र, ग्रहादि सभी तप से ही नित्य प्रकाशित होते हैं।४६। न चास्ति तत्सुख लोके यदविना तपसा किल। तपसैव सुख सर्वमिति वेदविदो विदुः ॥५०॥ ज्ञानं विज्ञानमारोग्य रूपवत्वं तर्थव च । सौभाव्यं चंव तपसा प्राप्यते सर्वदा सुखम् ॥५१॥ तपसा सृज्यते विश्वं ब्रह्माविश्वं बिना श्रमम् । पाति विष्णुर्हरोऽप्येति धत्ते शेषोऽखिलाँ महीम् ॥५२॥ विश्बामित्रो गाधिसुतस्तपसव महामुने। क्षत्नियोऽथाभवद्धि प्रः प्रसिद्ध त्रिभवे त्विदम् ॥५३।। इत्युक्त ते महाप्राज्ञ तपोमाहात्म्यमुत्तमम् । शृण्वध्ययनमाहात्म्य तपसोऽघिकमुत्तमम् ॥:५४।। संसार में ऐसा केईभी सुख नहीं है जो बिना तपके प्राप्तहोजाताह। तपसे ही सब सुख मिलता है वेदके ज्ञाता ऐसा ही कहते हैं।५०। तपस्यासे

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पुराण माहात्म्य वणंन ] [२०३ ज्ञाव-विज्ञान, आरोग्य, रूपवत्ता और सौभाग्य,मुखादि निरन्तर प्राप्त हुआ करते हैं ।५१। तप से ब्रह्मा बिना किसी परिश्रम के संसार की विशाल रचना किया करते हैं, विष्शु इस महान् जगत्का रक्षणा एवं पोषण करते हैं, शिव इस समस्त विश्व का संहार करते हैं और शेष इस भूमण्डल को धारण कियाकरते हैं।५२हे महामुने ! तपसेही गानिके पुत्र विश्वामित्रजी ने क्षत्रिय जातिसे ब्राह्मणत्वको प्राप्तकिया और तीनोंलोकोंमें विख्यात होगये ।५३। हे महाप्राज्ञ ! मैंने यह तपका उत्तम महात्म्य बतादिया, अब तप से अधिक श्रेध्ठ अध्ययनका माहात्म्य वणनकरताहूं उसेआप श्रवण करें।५४। पुराण माहात्म्य वर्णन तपस्तपति योऽरण्ये वन्यमूलफलाशनः । योऽधीते ऋचमेकां हि फल स्यात्तत्समं मुने ॥ १ ॥ श्र तेरध्यनात्पुण्यं यदाप्नोति द्विजोत्तमः। तदध्यापनतश्चापि द्विगुएं फलमश्नुते ॥ २ ॥ अगतथा निरालोकं जायतेऽशशिभास्करम् । बिना तथा पुराणं ह्यव्येयमस्मान्मुने सदा ॥ ३ ॥ तव्यमानं सदाज्ञानान्निरये योऽपि शास्त्रतः । सम्बोधयति लोकं तं तस्मात्पूज्यः पुराणग ॥ ४। सर्वेषां चैंव पात्रागां मधये श्रष्ठ पुराणववित। पतनात्त्रायते यस्मात्तस्मात्पात्रमुदाहृतम् ।। ५ ॥ र्यबुद्धिर्म कतव्या पुरासज्ञ कदाचन। पुराज्ञः सर्ववेत्ता ब्रह्मा विष्णुहंरो गृरुः ॥६ ॥ धनं धान्यं हिरण्यं च वासांसि विविधानि च। देयं पुराणविज्ञाय परत्रेह च शर्मरो॥७॥ श्री सनत्कुमारजी ने कहा-हे मुने ! वन में कन्द, मूल, फल खाकर तप करने के तुल्य एक वेंद की ऋचा के पढ़ने का फल होता है।१। श्रेष्ठ ब्राह्मणा वेदके अध्ययनसे जो पुण्य प्राप्त करता है उसकेपाठ करनेसे दुगुना फल प्राप्त कियाकरता है।२। हे मुने ! जिस तरह बिना दिवाकर औरचंद्र

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२०४ ] [श्रीशिवपुराण

के जगत् प्रकाशहीन रहता है, उसी तरह बिना पुराणके ज्ञानके यह सारा संसार प्रकाशशूध्य-सा रहता है। अतः सदा पुराणों का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिए। ३। सर्वदा अज्ञानसे परिपूर्ण लोक का शास्त्र के द्वारा हो समझरा जाता है। पुरस अज्ञान का भली भाति निराकरणा कर देता है। इसलिये पुराणों का वक्ता सदा पूजा के योग्य होता है ।४। समस्त प्रकार के पात्रों के मध्य में पुराणों का ज्ञाता अत्यन्त श्रष्ठ होता है। यह वस्तुतः पतनसे रक्षा किया करता है इसलिये इसे पात्र वहा जाता है।५। पुराों के ज्ञान रखने वाले ब्राह्मण में मनुष्य बुद्धि कभी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि पुराणों का ज्ञानी विद्वान् सर्वज्ञ, ब्रह्मा, विष्ु, शिव गुरु होता है ।६। परलोक तथा इस लोक में अपने कल्याणके लिये पुराण के ज्ञाता विद्वानको धन धान्य, सुवर्णं और वस्त्रादि देने चाहिए ।७। यो ददाति महीप्रीत्या पुराणज्ञाय सज्जनः । पात्राय शुभवस्तूनि स याति परमां गतिम् ॥ ८ ॥ महीं गाँवा स्यदनांच गजानश्वांश्च कोभनान्। यः प्रयच्छति पाल्राय यस्य पुण्यफलं शृणु ।। ६।। अक्षयान्सवंकामाश्च परत्रेह च जन्मनि । अश्वमेधफल चापि स फल लंभते पुमान् ॥१०॥ महीं ददाति यस्तस्मै कृष्टां फलवती शुभाम्। स तारयति वंश्यान्दश पूर्वान्दश्ापरान् ॥११। इह भुक्त्वाखिलान्कामानते दिव्यशरीरवान्। विमानेन च दिव्येन शिवलोकं स गच्छति ॥१२॥ न यज्ञस्तुष्टिमायाति देवाः प्रोक्षणकैरपि। बलिभि: पुष्पपूजाभिर्यथा पुस्तकवाचनैः ॥१३॥। शंभोरायतने विष्णोरर्कस्य कस्यापि शृरगु तस्यापि तत्फलम् ।१४।। यस्तु कारयेद्धमंपुस्तकम् ।

राजसूयाश्चमेधानां फलमाप्नोति मानवः । सूर्यलोकं च भित्वाशु ब्रह्मलोकं स गच्छतति ॥१५॥

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पुराण माहात्म्य वर्णन ] [२०५

जो सत्पुरुष पुराणवेत्ता को जो कि सच्चा सुपात्र होता है, श्रेष्ठ पदार्थ सप्रम अपण करता है वह परम गतिको प्राप्त कियाकरता है।८। जो कोई उत्तम सुगन्नको भूमि, गौ,रथ, अश्व और शोभन हाथीदेता है उसके महापुण्य का फल यह है कि दातामनुष्य इस जन्ममें तथा परलोकमें अक्षय मनोरथों की प्राप्तिके साथ-साथ अश्वमेध यज्ञके पुण्यका फलभी प्राप्तकिया करता है ।-0 जो जुतीहुई सूफल देनेवली भूभिका दानकरता है वह दश पहिले और दश अगले वंशजोंको तार दिया करता है ।११। इस जन्म में समस्त भोगोंका उपभोग करके अन्तमें सुन्दर शरीर धारण करके दिव्य विमानके द्वारा वह शिव लोकमें चला जाता है।१२। सभी देव प्रोक्षणयुक्त यज्ञादि से तथा भेटोंसे और पुष्पादि उपचारों से, पूजा से इतने सन्तुष्ट नहीं होते जेसे कि पुराण-वाचनसे प्रसन्न होते हैं।१३। शिवालय अथवा विष्णुदेवा- लय तथा सूर्य या अन्य किसीभी देव-मन्दिर में धर्म पुस्तक पुराण आदि का वचन जो कोई भी व्यक्ति करता है उसका फल यह होता है कि वह राजसूर्य तथा अश्वमेध यज्ञोंके पुण्यका फल प्राप्त करता है और सूर्यलोक का भेदन करके सम्त में ब्रह्मलोक को चला जाता है।१४-१५। स्थित्वा कल्पशतान्यत्र राजा भवत भूतले । भुक्त निष्कटक भोगा न्नात्र कार्या विचारण ॥१६॥ अश्वमेधसहस्रस्य यत्फलं समुदाहृतम् । तत्फलं समवाप्नोति देवाग्रे यो जपं चरेद् ।।१७।। इतिहासपुरााभ्यां शम्भोरायतने शुभे। नान्यत्प्रीतकर शम्भोस्तथान्येषां दिवीकसाम् ॥१८॥ तस्मोत्सर्वप्रयत्नेन कार्यं पुस्तकवाचनम् । तथास्य श्रवण प्रेम्णा सवकामफलप्रदम् ॥ ६॥ पुराणश्रवणणाच्छभोनिष्पापो जायते नरः । भुकत्वा भोगान्सुविपुलाच्छिवलोकमवाप्नुयाम् ॥२०॥ राजसूयेन यत्पुण्यमग्निष्टोमशतेन च। तहपुण्य लभते शभोः कथास्त्रवणमात्रतः ॥२१।।

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२०६ ] [ बीशिवपुराण वह व्यक्ति ब्रह्मलोकमें सकड़ों कल्पोंतक निवास कर फिर पृथ्वी परा गजाहोता है और निष्कंटकरूपसे भोगोंका उपभोग किया करता है। इसमें तनिक भी सन्देहका कोई अवसरनहीं है।१६। देव प्रतिमाके सामनेबैठकर जोकोई जाप करता है वहभी सँकड़ों अश्वमेधोंके फलके तुल्यही पुण्य का भागी होता है।१७। शिवालयमें इतिहास पुराणों की गाथाके प्रवचन के बिना शिव तथा अन्यकिसी देवताको प्रसन्न एवं सन्तुष्टकरनेका अध्यकोई उपाय ही नहीं है।१८। इसीलिए पूर्ण प्रयत्न से पुराण ग्रन्थों का वाचन तथा श्रवण हरएक कल्याणकामी को करना चाहिए, क्योंकि यह एक ही उपाय ऐसा जो समस्तकामनाओंकी पूर्ति करदेनेवालाहोता है ।१६। शिव पुराणश्रवण करनेसे मनुष्य पापरहित होजाता है और समस्तभोगोंकोपाकर शिव लोकको जाता है ।२०। राजसूय यज्ञ से तथा सौ अग्निष्टोम यज्ञों के करनेसेजो पुण्य मिलना है वही पुण्य शिवकीकथा सुनने से होता है ।२१। सव तीर्थावगाहेन गर्वां कोटिप्रदानतः । तत् फलं लभते शम्भो कथाश्रवणतो मुने ॥२२॥ ये शृण्वन्ति कर्थां शम्भोः सदा भुवनपावनीम्। ते मनुष्या न मन्तव्या रुद्रा एव न संशयः ॥१३।। शृ्वतां शिवसत्कीर्ति सरतां कीर्तयतां ताम्। पदाम्बुजांस्येव तीर्थानि मुनयो विदुः ॥२४।। गतु निःश्रयप्तं स्थानं येऽभिवाँछन्ति देहिनः । कथां पौराणिकीं शैवीं भक्त्या शृण्वन्तु ते सदा ॥२५।। कथां पौराशिकीं श्रोतु यद्यशक्तः सदा भवेत् । नियतात्मा प्रतिदिन शृशुयाद्वा मुहुर्टकम् ॥२६॥ यदि प्रतिदिनं श्रोतुमशक्ता मानदी भवेत् । पुण्यमासादिषु मुने शृणुयाच्छांकरी कथाम् ।।२७। शैवी कर्था हि श्रण्वानः पुरुषो हि मुनीश्वर। स निस्तरति ससारं दग्धवा कर्ममहाटवीम् ॥२८॥ हे मुने ! समस्त शुभ तीर्थोंमें स्नान से तथा करोड़ गोदानसे जो महा- पुण्यका उदयहीता है वही फल मनुष्य शिवकी गाथाके सुनने यो बांचनेसे

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पुराण माहात्म्य वर्णन । [२०७

प्राप्त कर लेता है।२२। जो कोई लोक पावनी शिव-कथा सुनते हैं वेदर असल मनुष्य नहीं माने जाने चाहिए, किन्तु वे तो साक्षात रुद्रही हैं- इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। २३। भगवान् शिव की सुन्दर कीति का श्रवण करने वालों तथा कहने वालों के चरण की धूलि को मुनिगण ने पवित्र तीर्थ बताया है।२४। जो मनुष्य किसी भी कल्याकारण स्थान को प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि सदा नियम पूर्णक शिवपुराण की कथा का श्रवण या वाचन किया करें।२५-२६। यदि सदा पुराण- कथा सुनने में किन्हीं कारणों से असमर्थ हों तो किसी पुण्य मास में एक बार अवश्य ही कथा का श्रवण करें ।२७। हे मुनीश्वर ! जो मनुष्य शिव कथा सुनते हैं वे अपने कर्म रूपी विशाल वन को भस्म करके संसार से तर जाते हैं ।२८। कथाँ शंवीं मुहत वा तदद्ध वा क्षर्ण च वा। ये श्रण्वंति नरा भक्त्या य तेषां दुर्गतिर्भवेत ॥२६॥। यत्पुण्यं सवदानेषु सर्वयज्ञेषु वा मुने। शंभोः पुराणश्रवणात्तत्फलं निश्चल भवेत् ॥३०। विशेषतः कली व्यास पुराण श्रवणाद्दते। परो धर्मो न पुसां हि मुक्तिध्यानपरः स्मृतः ॥३१॥ पुराणश्रवर शंभोनामिर्सकीतनं तथा। कल्पद्र मफलं मनुष्याणां न संशय: ॥३२॥ कलौ दुमेंधसां पुसां धर्माचरोज्भितात्मनाम्। हिताय विदधे शंभु पुराणाख्य सुधारसम् ३३॥ एकोऽजरामर: स्याद्व पिवन्नवामृतं पुमान्। शंभोः कथ।मृतापोनात्कुलमेवाजरामरम् ॥३४॥ या गतिः पुण्यशीलानां यज्विनाँ च तपस्विनाम् । सा गतिः सहसा तात पुराणश्रवणात्खलु ॥३५॥ जो पुरुष क्षणमात्र भी भक्तिपूर्णक शिवकी कथा सुनते हैं उनकी कभी भी दुर्गीत नहीं होती है।२६। हे मुने जो समस्त दानोंमें या सम्पूणं यज्ञों में पुष्य होता है वह फल भगवान् शिकके पुराणके सुननेमात्रसेही होजाप्ा

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२०८ ] [ श्रीशिवपुराण है. इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ।३०। हे व्यासजी ! कलयुग में खास तोर से पुराण स्रवण के बिना मनुष्यों को मुक्ति दान में परायण अन्य कोई भी धर्म नहीं कहा गया है।३१। मनुष्यके लिये शिवपुराणका स्रवण और नाम-संकीतन कलपबृक्ष के फलके समान सुन्दर बताया गया है, इसमें कुछभी संशय नहीं है।३२। इस कलियुग में धर्माचार के त्याग देने वाले दुर्बुद्धि मानवों के हितके लिये भगवान् शिवने अपने नाम वाला पुराण नामक अमृत रसका विधान किया है।३३। अमृत के पान से केवल पान करने वाला एकही मानव अजर-अमर हो जाता है, किन्तु शिव-कथारूपी अमृत के पान करनेसे समृत के पान करने से समस्त कुलही अजर-अमर होता है।३। हे तात ! पुण्यात्माओं की तथा यज्ञकर्त्ता और तारसों की जो गतिहोती है वही गति एकबार पुराणके स्रवण करने से होती है।३५ ज्ञानावाप्तिर्यदा न स्याद्योगशास्त्र:णि यत्नतः । अध्येतव्यानि पौराणं शास्त्र श्रोतव्यमेव च ॥३६॥। पापं संक्षीयते नित्य धमश्चव विवद्धते। पुराणस्रवणज्ज्ञानी न संसारं प्रपद्यते ।३७॥ अतएव पुराणानि स्रोतव्यानि प्रयत्नत: । धर्माथकमलाभाय मोक्षमार्गाप्तये तथा ॥३८॥ यक्षैर्दानिस्तपोभिस्तु यत्फलं ती्थसेवया। तत्फलं समवात्नोति न भवेयुः पुराणानि धर्ममार्गेक्षणानि तु। यद्यत्र यद्व्रती स्थाता चात्र पारत्रिकीं कथाम्।।४०।। षडविशतिपूराणानां मध्येऽप्येकं शृशति यः । पठेद्वा भक्तियुक्तस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ॥४१॥ अन्यो न दृष्टः सुखदा हि मार्गः पूराणमार्गो हि सदा वरिष्ठः। शास्त्रं बिना सर्वमिदं न भाति सूर्येण हीना इव जीवलोका: :४२। ज्ञानकी प्राप्ति के अभावमें यत्न सहित योग-शास्त्रों को पढ़ना चाहिए और परायसा शास्त्रोंका स्रवण करना चाहिये।३६। पुराश के स्त्रवससे पाप

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प्रायश्चित वर्शान ] [ २०६ छूटते हैं, धर्म नित्यबढ़ता है। उससे यहहोता है कि वह ज्ञानीहोकर संसार के आवागमनसे मुक्त होजाता है।३७। इसीसे धर्म,अर्थ,काम एवं मोक्ष की प्राप्तिके लिये यत्नपूर्वक पुरागोंका श्रवण प्रत्येकको करना चाहिये।३८। यज्ञ, दान, तप तथा तीर्थ सेवन से जो फल मिलता है वही पुरास श्रवर से मनुष्य प्राप्त कर लेता है।३६। यदि धर्म के मार्ग दर्शक पुराण न होते *तो इस लोक ओर परलोक की कथा सुनाने वाला कोई बती न रहता ।४। छब्त्रीस पुराशों में किसी एक भी कोई श्रवण कर लेता है अथवा भक्ति के साथ पढ़ लेता है तो वह निस्सन्देह मुक्त हो जाता हैं।४१। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी सुखप्रद मार्ग देखने में नहीं आता है। पुराख श्रवण का मार्ग ही परम श्रेष्ठ है। बिना शास्त्र के यह संसार भी इस तरह शोभायुक्त नहीं है, जिस प्रकार बिना सूर्य देव के यह जीव लोक शोभा नहीं पाया है॥४२॥ किस पाप के फल से किस नरक में जाना पड़ता है तथा प्रायश्चित वन तेषां मूद्धोपपरिष्ठाद्व नरकास्ताञ्छरुष्व च। मत्तो रौरव: मुनिवरश्रष्ट पच्यन्ते यत्र पापिनः ॥ १॥ शूकरो राधस्ताला विवमनस्तथा। महाज्वालस्तप्तकुम्भो लवरोऽपि विलोहितः ॥ २ ॥ वंतरणी पूयवहा कृमिशः कृमिभोजनः । असिपत्रवनं घोरं लालाभक्षश्च दारुखः ॥ ३ ॥ तथा पूयवहः प्रायो वहिर्ज्वालो ह्यधशिराः । सदशः कालसूत्रश्च तमश्चावीचिरोधनः ।।४।। श्वभोजनोऽथ रुष्टश्च महारौरवशाल्मली। इत्याद्या बहवस्तत्र नरका दूःखदायकाः ॥५॥ पच्यते तेषु पुरुषाः पापकर्मरतास्तु ये। क्रमदवक्ष्ये तु तान् व्यास सावधानतया शृशु ॥ ६॥

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२१० ) (श्री शिवपुराण प्र

३ टसाक्ष्यं तु यो वक्ति विना विप्रान् सुराश्च गाः । सदाऽनृतंवदेद्यस्तु स नरो याति रौरवम्॥ ७॥ प श्री सनत्कुमारजीने कहा-हे मुनिश्रध्ठ ! उन लोगोंके ऊपर जो नरक स हैं उनका बृत्तान्त अब आप मुझसे श्रवणकरो जहाँपर पापात्माजीव जाकर दुःख भोगा करते हैं ।१। रौरव,शूकर, रोध, ताल तथा विवसन, महाज्वाल, पु क तप्तकुम्भ,लवण विलोहित,वैतरणी,पूयवहा,कृमी-कृमि भोजन,घोर असिपत्र, क वन, दारुण, लालाभक्ष, पूयवह, बहि्ज्वांल, अधश्शिर, सदश कालसूत्र, तम- क श्चावी, चिरोधन, श्वभोजन, रुष्ट,महारौरव, शाल्मि, इत्यादि वहाँ बहुत से क परमदुःखदायक नरक हैं।२-५। हे व्यासजी ! इन नरकोंमें जोभी पापात्मा द्वि पुरुषोंका पातनकियाजाता है मैं उनके विषयमें क्रमसे सबसुनाता हूं। आप सावधान चित्तसे श्रवणकरें ।६। जो मनुष्य बिना ब्राह्मण, बिना देवता और पि बिना गौ के कूटसाक्ष्य अर्थांन् भूठी गवाही देता है और सर्वथा मिथ्या भ बोलता है वह रौरव नामक नरक में डाला जाता है।।७।। म भ्र णहा स्वर्णहर्ता च गोरोधी विश्वघातकः । श सुरापो ब्रह्महंता च परद्रव्यापहारकः ॥८॥ यस्तत्सङ्गी स वै याति मृतो व्यासगुरोर्नधात्। ततः कुम्भ स्वसुर्मातुर्गोश्चव दुहितुस्तथा ॥ ६॥ साध्व्या विक्रय च्चाथ वार्द्धकी केशविक्रयी। तप्तलोहेषु पच्येत यश्च भक्त परित्यजेत् ॥१s॥ अवमंता गुरूणां यः पश्चाद् भोक्ता नराधमः । देवदूषयिता चैव देवविक्रयिकश्ठा यः ॥११॥ अगम्यगामी यश्चांते याति सप्तबलं द्विज । चौरो गोध्नो हि पसितो मर्यादादूषकस्तथा ।१२।। देवद्विजपितृद्वष्टा रत्नदूषयिता घ यः । स याति कमिभक्ष वै कृमिमत्ति दुरिष्टकृत् ॥१३। पितृदेवसुरान् यस्तु पर्यश्नाति नराधमः । लालाभक्ष सय त्यज्ञो यः शास्त्रवटकृत्नरः ॥१४॥

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प्रायश्चित वर्णन ) १ २११

जो भ्रूण हत्यारा, सुवर्ण चोर, विश्वासघातक, यद्यपी, ब्रह्म हत्यारा परधनापहारी और गायको रोकनेवालाहोता है तथा हे व्यासजी!जाइनका सङ्ग-साथ देने वाला होता है ये सब और गुरुके वधकर्ता, बहिन,माता, गौ पुत्रीके वधकरने वाला तप्तकुम्भ नामक नरकमें जाते हैं।८-६।साध्वी स्त्रो को बेच देनेवाला, व्याज खानेवाला,केशोंका बेचनेवाला और भक्तोंकात्याग करनेवाला ये सब 'तप्तलोह' नामक नरकमें जायाकरते हैं।१०।जो गुरुजन का तिरस्कार करने वाला पीछे भोजन करने वाला, मनुष्योंमें नीचदेवताओं को दूषित बताने वाला और जो देव प्रतिमाओंका विक्रय करनेवाला है, हे द्विज ! जो अगम्य स्त्रीमें गमनकरता है-ये सब तप्त बलके अन्तमें जाते हैं। चोर, गौ हत्या करने वाला, पतित, मर्यादा तोड़ने वाला,देव, ब्राह्मण और पितरोंसे द्वषकरनेवाला और रत्नोंमें मेलमिलाप करनेवाला-ये सब कृमि- भक्ष नामक नरकमेंजाते हैं और वहाँ कीड़ोंको खाते हैं।११-१३। जोनीच मनुष्य देवता, पितर, मनुष्य और अतिथियों के बिना स्वयं खाता है तथा शस्त्रकूट है, वह लालाभक्ष नामक नरक में जाता है।१४। सश्चांत्यजेन ससेव्यो ह्यसद्वाही तु यो दिजः । अयाज्ययाजकश्चैव तथैवाभक्ष्यभक्षकः ।१५।। रुधिरौधे पतंत्येते सोमविक्रयिणश्च ये। मधुहा ग्रामहा याति कूरां वैतरणी नदीम् ।।१६।। नवयौवनमत्ताश्च मर्यादाभेदिनश्च ये। ते कृम्य यांत्यशौचाश्च कुलकाजीविनश्च ये ।१७।। असिपत्रवनं याति वृक्षच्छेदी वृथैव यः । क्षरभ्रका मृगव्याधा वह्नज्वाले पतंति तेः ॥१८॥ भ्रष्टाचारो हि यो विप्र: क्षत्रियो वैश्य एव च । यात्यंते दिज ततरैव यः श्वकाकेषु वह्नियः ॥१६॥ व्रतस्य लोपका ये च स्वाश्रमादिच्युताश्च ये। संदशयातनामध्ये पतति भृशदारुणे ॥२०॥

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२१२ ] । श्री शिवपुराण्ड वीर्य स्वप्नेष स्कदेयुर्ये नरा ब्रह्मचारिणः । पुत्रा नाध्यपिता यश्च ते पतित इवभोजने ॥२१।। ब्राह्मगा होकर अन्त्यज के सथ सेबन करने वाला दुर्जनों से ब्रहसा करने वाला, बिना याचकों के यज्ञ कराने वाला तथा अभक्ष्य पदार्थो को खाने वाला सोमसको बेचने वाला-ये सब रुधिरौध नामक नरक में जाते हैं। मधुका हरख करने वाला, ग्राम की हत्या करने वाला-ये क्रर वंतरणी नदी में जाया करते हैं ।१५-१६। जो अपने नये यौवन मे उन्मत्त होकर मर्यादा तोड़ने वाला अपवित्र हैं-जो स्त्री के द्वारा अपनी जीविका चलाते हैं वे सब कृम्य नामक वाले नरक में जाया करते हैं।१७, बृथाही वृक्षों को काटने वाले जो होते हैं वे असिपत्रकन नामक नरक में जाते है। जो क्षरम्रक और मृग हिंसक व्याघ्र हैं वे वहिन-ज्वाला नाम वाले नरक में जाते है।१-। हे द्विज ! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय या वश्य अपने आचार से भ्रष्ट है श्वफाक में आग देने वाले हैं वे सब अन्तमें उक्त नरकों में जा करते हैं ।१२। जो व्रत के लोप करने वाले तथा जो अपने अ श्रम से भ्रष्ट है ये सब मति कठोर नामक तथा रुदृश यातना में जाकर पढ़ते हैं।२०। जो ब्रह्मचारा मनुष्य स्वप्न में वीर्य को सखलित करते हैं बे ्वभोजन नामक नरक में पड़ते हैं ।२१।। एतं चान्य च नरका: शतशीऽथ शहस्त्रशः । यषु दुष्कमंकर्माणः पच्यत यातनामता: ॥२२। तथव पापन्युक्तनि तथान्यनि सहस्नश। भुज्यत पुरुषैनरकांतरगौवरैः "२३॥ बर्णाममवरुद्ध च कम कुर्वन्ति ये नराः । कमरा मनसा वाचा निरये तु पतन्ति त ।२४।। अध:शरामिट्ट श्यन्ते नरका दिव दैवतैः। दवानधामुखान्सवानधः पश्यन्ति नारका: ।२५७ थावरा: कृमषाकाइ्च पक्षिणः पशवो मृगाः । छममव सत्रदशारतदन्मो६ णइच यथाव्रमम् २६।।

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प्रायश्चित वर्गान ] । २१३

यावंतो जंतवः स्वर्गें तावंतो नरकोकस।। पापकृद्याति नरकं प्रायश्चित्तपराङ्ग्मुखः ॥२७॥ गुरूणि गुरुभिश्चैव लघूनि लघुभिस्तथा। प्रायश्चित्तानि ह्यन्येच मनुः स्वायम्भुवोऽव्रवीत ।२८।। ये पूर्वोक्त तथा अन्य सकड़ों एवं सहस्रों नरक हैं जिनमें पापात्मा मनुष्य यातना भोगने के लिये पटके जाते हैं ।२२। पापभी सहस्रों प्रकार के होते हैं। ये बताये गए तथा अन्यभी बहुतसे हैं जिनके कारण मनुष्य नरकों में पड़कर उनका फल भोगा करते हैं।१२' जो मनुष्य मन, वाणी और कर्म से आने वर्ण तथा आस्रम के विपरीत कर्म किया करते हैं वे निश्चय ही नरकगामी होते हैं।२४। ऐसे नरकों में निवास करने वाले पुरुष देवों के द्वारा नीचेकी ओर मुख करके देखे जाते हैं जोर नरकवासी स्वयं मीचेकी ओर मुख करके देवों को देखा करते हैं। २५। जिस तरह स्थावर कृमिपाक पक्षी मृग है इसी तरह क्रमसे वार्षिक स्वर्ग-मोक्ष वाले जीव हैं।२६। जितने जीव-जन्तु स्वर्ग में रहते हैं ठीक उतने ही नरक में स्थित होते हैं। जो मनुष्य अपने किए हुए दुष्कर्मों का कोई भी प्राय- श्चित शास्त्रानुसार नहीं किया करते हैं वे ही पापात्मा प्राणी नरक में जाया करते हैं।२७। स्वायम्भुव मनुने तथा अन्य महर्षियों ने भी बड़े पारों के बड़े प्रयश्चित शौर छोटे-छोटे पाप कमों के छोटे प्रायश्चित बतलाये है।२८। यानि तेषामशेषाणां कर्मा्युक्तानि तेषु गै। प्रायश्चित्तमशेषेण हरानुस्मरणं परम् ॥२६॥ प्रायश्चित्तं तु यस्यवं पापं पुसः प्रजायते । कृते पापेऽनुतापोऽपि शिवसंस्मरणं परम्॥३०॥ महेश्वरमवाप्नोति मध्याह्न दिषु संस्मरन् । प्रातर्निशि च सन्ध्यायां क्षीणपापो भवेन्नरः ॥३१॥ मुक्ति प्रयाति स्वर्ग वा समस्तक्लेवसंक्षयम् । शिवस्य स्मरगादेव तस्य शंभोरुमापतेः ॥३२॥ पापास्तरायो विपेन्द्र जवहोमार्चनादि च। भवत्येव न कुत्रापि त्रंलोक्ये मुनिसत्तम ॥३३॥

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११४ ) ( श्री शिवपुराण महेश्वरे मतियस्य जपहोमार्चनादिषु । यत्युण्प्र तत्कृत तेन देवेन्द्रत्वादिकं फलम् ॥३४॥ पुमान्न नरकं याति यः स्परेद् भक्तितो मुने। अहर्निशं शिवं तस्मात्स क्षीणाशेषहातकः ॥३५॥ उनमें जितनेभी कर्म बतलाये हैं उन सभीके सम्पूर्ण प्रायश्चित भी हैं, किन्तु भगवान्शिवका स्मरणार्चनकरना समस्तप्रायश्चित्तोंसे बड़ा है। इसी रीतिसे जिसव्यक्तिको प्रायश्चितकरना है उसे पापकर्म कियेजानेका पश्चा- त्ताप करके शिवका स्मरण करना बतलाया गया है।२६-३०। जो प्राणी प्रातःकालमें सन्धामें,रात्रिमें और मध्याह्नकेसमयमें किसीभी समयमें नित्य नियमसे भगवान्शिवका स्मरणकरता है वह समस्तपापोंसे विमुक्तहोजाता है।३१। ऐसा दुष्कर्मकर्त्ता पापात्मा प्राणी उभेस्वर शिवके केवल स्मरणसे ही समस्त दुःखोंसे दूर होकर स्वर्ग या मोक्ष पदको पहुंच जाता है।३२। विपेन्द्र ! हे मुनिवर ! त्रिभुवनों में कहींभी पापोंका प्रायस्चित जप, होम और अर्चन आदि कुछभी नहीं होते हैं और जिसकी बुद्धि शिवके चरणोंमें संलग्नहो उसको जप, होम अर्चनादिसे जो पुण्यमिलता है वह सबपुन्यऔर देवराजइन्द्रका पद फल प्राप्त करता है।३३-३४। हे मुनिराज ! जो मनुष्य अहर्निश भक्तिपूर्वक शिवकास्मरण कियाकरता है वहकभी नरकगामीनहीं होता है, क्योंकि इससे ही वह पापरहित हो जाया करता है॥३५॥ नरकस्वर्गसंज्ञायै पापपुण्यै द्विजोत्तम। दयोस्त्वेक तु दुःखायान्यत्सूखायोद्भवाय च ।३६।। तदेव पीयते भूत्वा पुनदुःखाय जायते। तस्माद् द्:खात्मकं नास्ति न किंचित्सुखात्मकम्।३७।।

ज्ञानमेव परं ब्रह्मज्ञानं तत्वाय कल्पते ॥३८॥ मनसः पारणामोऽयं सुखदु:खोपलक्षणः ।

ज्ञानात्मकामिद विश्वं सकलं सचराचरम् । परविज्ञानतः किंचिद्विद्यते न परं मुने ॥३६॥ हे द्विजोत्तम ! ये पाप और पुन्य ही नरक और स्वर्गके नामोंके अर्थ हैं। इन दोनों स्थानों में पाप दुःखोंके भोगके वास्ते और पुन्य सुखोपभोग

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के लिये हुआ करते हैं ।३६। ऐसा भी होता है कि वही पुन्य प्राप्तिके लिये होकर फिर दुखके लिये भी हो जाता है। इस कारणसे न कुछ दुःख देने वाला है और कुछ सुख देनेवाला है।३७। यह प्राणियोंके मनकापरिणाम ही दुःख-सुखका लक्षण होता है। इसलिये ज्ञान ही परव्रह्म का स्वरूप है और ज्ञानहीकी तत्वके लिये कल्पना की जाती है।३८। हे मुनिवर ! यह चराचरात्मक समस्त संसार ज्ञानात्मक है परा विज्ञानसे अधिक अन्य कुछ भी नहीं है ।३६।। तप से शिव लोक की प्राप्ति तथा मनुष्य जन्म की श्रेष्ठता सनत्कुमार सर्वज्ञ तत्प्राप्तिं वद सत्तम। यदूगत्वा न निवर्तन्ते शिवभक्तियुता नरः ॥ १ ॥ पराशरसुत व्यास शृणु प्रीत्या शुभां गतिम् । व्रत हि शुद्धभक्तानां तथा शुद्ध तपस्विनाम् ॥ २ ॥ ये शिवं शुद्धकर्माणः सुशुद्धतपसान्विताः । समर्चयन्ति त नित्यं वन्द्यास्ते सर्वथान्वहम् । ३॥ नातप्ततपसो य याँति शिवलोकमनामयम् । शिवानुग्रहसद्ध तुस्तप एव महामुने ॥ ४ ॥ तपसा दिवि भोगन्ते प्रत्यक्ष देवतागणः । ऋषयोमुनयश्चैव सत्यं जानीहि मद्चः ॥ ५ ।। सुदुर्द्धर दुराध्यं सुधूरं दुरतिक्रमम् । तत्सर्व तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ ६ ॥ सुस्थितस्तपसि ब्रह्मा नित्यं विष्णुर्हरस्तथा। देवा देव्योऽखिलाः प्राप्तस्तपसा दुर्लभं फलम् ॥ ७॥ श्री व्यास्नजीने कहा-हे सनत्कुमारजी ! अब आपकृपाकर उस पदकी प्राप्तिके विषयमें वर्णनकररजहाँ प्राप्तहोकरश्रीशिवकी परम भक्तिमेंपरा- सण प्राणी नहीं लौटा करते हैं।१। सनत्कुमारजीने कहा-हे पराशर पुत्र श्री व्यासजी ! अच्छा अब आप मुझसे वही शुभगति तथा शुद्ध एवं पवित्र भक्त और तपस्वियों के व्रतके विषयमें श्रवण करे।२। जो भी शुद्ध कर्मोवे

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२१६ ] [ श्री शिवपुराण करने वाले तथा शुद्ध तपस्या में युक्त मनुष्य शिवका अचन कियाकरते हैं वे सर्वदा सभीके बन्दनीय और पूजा करने के योग्य होते हैं।२। हे महा- मुने ! बिना तप किये नीरोग भी शिवलोक नहीं जाया करते हैं शिवकी कृपा भी तपश्चर्यासे बतलाईगई है।४। आप सब मेरे इस कथनको सर्वथा सत्य समभें कि तपसे ही देवगण प्रश्यक्ष होकर स्वर्गमें आनन्दोपभोग किया करते हैं. और तपश्चर्या से ही ऋषि-मुनि भी परमहर्षितहोते हैं ।५। जो सबसे कठिन, दुराराध्य और धुरधारी तथा अत्यन्त कठिनाई से अतिक्रमण करने के योग्य होता है, वह सब तपस्यासे साध्य हो जाता है किन्तु यह तपही एक परम दुस्साध्य वस्तु है ।६। इसी तपमें ब्रह्मा स्थित रहा करते हैं-तपमें ही विष्शु मग्न रहते हैं और तपस्या में शिव सदा प्रवृत्त रहते हैं तथा समस्त देवगणा और देवियोंने भी तपके प्रभावसे ही दुलभ फलकी प्राप्ति की है।७।। येन येन हि भावेन स्थित्वा यत्क्रियते तपः । ततः संप्राप्यतेऽसी तैरिह लोके न संशयः ॥८॥ सात्विकं राजसं चैव तामसं त्रिविध स्मृतम । विज्ञेयं हि तपो व्यास नून हि सर्वसाधनम् ॥ ६॥ सात्विकं दैवतानां हि यतीनामूर्ध्वरेतसाम्। राजसं दानवानां हि मनुष्यार्णगा तर्थव च ।।१०।। त्रिविधं तत्फलं प्रोक्त मुनिभिस्तत्वदशिभिः । जपो ध्यानं तु देवानामर्चनं भक्तिवः शुभम् ॥११॥ सात्विकं तद्धि निर्दिष्टमशेषफलसाधकम् । इह लोके परे चंव मनोभिप्रतसाधनम् ॥१२॥ कामनाभलमुद्दिश्य निजदेह सुसंपीडघ राजसं तप उच्यते। देहशोषकदु:सहैः ॥१३॥ तपस्तामसमुदिष्ट मनोऽभिश्रेतसाधनम् ॥१४॥ यह तप जिस-जिस भावना से स्थित होकर किया जाता है वही फल इस लोकमें उन करने वालोंको निश्चय ही मिलता है। इस कथनमें संशय नहीं करना चाहिए।द। हे व्यासजी ! यह तप सात्विक-राजस और तामस

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मनुष्य जन्मकी श्र४्ठता [ २१७ तीन तरहका होता है। तपही सबका साधन है,देवगणा तथा संभ्यासियों का एवं ब्रह्मचारियों का तप सात्विक अर्थात् सतोमुणी होती है। दैत्य और मनुष्यों का तप राजस अर्थात् रजोगुणी होता है और राक्षस लोग तथा दुष्ट कर्म करने वालोंका तप तामस हुआ करता है ।१०। तत्वदर्शी मुनियोने तप का फलभी तीन प्रकार का ही बतलाया है। जप-ध्यान और भक्ति के सहित देवताओं का अर्चनकरना यह सात्विकतप समस्त फलों का प्रदाता एवं साधक बतलाया गया है। यह इसलोकमें एवं पर- लोकमें मानवों की ममोकामनाओं का पूर्ण करने वाला होता है।११-१२। कामना के फलका उद्देश्य करके देह के शोषक तपस्या से जो शरीर को पीड़िस किया जाता है वह राजस तपकहा गया है ।१३। जो केवल अपने मनोरथों की सिद्धि के लिए ही तप किया जाता है वह तामस तप कहा जाता है ।१४। उत्तमं सात्विकं विद्याद्ध्मंबुद्धिश्च निश्चला । स्नान पूजा जपो होमः शुद्धशौचमहिंसनम् ॥१५॥ व्रतोपवासचर्या च मौनमिन्द्रियनिग्रहः। धीविद्या सत्यमक्रोधो दानं क्षाँतिर्दमो दया ।१६।। वापीकुपतड़ागादेः प्रासादस्य च कल्पना। कृच्छ चा्द्रायरं यज्ञः सुतीर्थान्याश्रमाः पुनः ॥१७। धर्मस्थानानि चंतानि सुखदांनि मनीषिणाम् । सुधर्मः परमोः व्यास शिवभक्तइच कारणम् ॥१८॥ संक्रांतिरविषवद्योगो नादमुक्त नियुज्वताम्। ध्यानं त्रकालिकं ज्योतिरुन्मनीभावधारणा ॥१६। रेचक: पूरकः कुम्भः प्राणायामस्त्रिधा स्मृतः । नाडी संचारविज्ञानं प्रत्याहारनिरोधनम् ॥२०॥ तुरीयं तदधो बुद्धिरणिमाद्यष्टसंयुतम् । पूर्वोत्तमं समुददिष्ट परज्ञानप्रसाधनम् ॥२१॥ सात्विक तप सबसे उत्तम तप समझना चाहिए। इसमें निश्चय धर्म की बुद्धि,स्नान पूजा, जप, होम,शुद्धि शोच, अहिंसा ये होते हैं।१५। इस

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२१८ ) (श्री शिवपुराण

तप में व्रत, उश्वासचार्या, मौन, इन्द्रिय,निरोध,बुद्धि,विद्या,सत्य,अक्रोध, दान, शा,नम और दया का भाव होता है।१६। सात्विक तपमें बाबड़ी कूा, सरोवर एवं महल आदिका निर्मण, कृच्छनान्द्रायण, वज्ञ, श्रेध्ठ तीर्थोंका अटन और आश्रय करना होता है।१७। हे ग्यासजी ! ये सब धर्म के स्थान हैं, बुद्धिमानोंको सुख देने वाले और शिवकी भक्तिके कारण स्वरूप होते हैं १८ संक्राम्ति विषुवत् योग नादयुक्त हमें प्रयोग करना चहिए, तोनों कालोंगें ध्यान,रति उमपनी-भाव यह धारण कही जाती ह।१६ रेचक, पूरक और कुम्भक ये तीन प्रकार का प्राशयाम कहा जाता है 1 नाड़ी सञ्चारका ज्ञानकरना सथा प्रत्याहारका रोकनाहोत। है २० ऋतुथ अ्रशिमा आदि बाठ सिद्धियोंके सित अधोबुद्धि करता यह पू तति पर +ज पका साधन बताया गया है। २। क छ्ावस्था मृतावस्था हरिता वेति कीतिताः। न .- ोपलब्धयो ह्यं ता: सर्वपापप्रणाशनाः ।२२।। नारी शधा तथा पनं व त्रधूविलेपनम्। ताम्बूलभक्षरं पंच राजेश्वर्यावभृतयः ॥२३।। हेमभारस्वथा ताम्र गृहाइत्र रत्नधेनवः । पां डत्यं वदशास्त्राणाँ गीतनृत्य विभूषसम् ॥२४॥ शङ्येणा मृदङ्ग:इच भाग रूपागि गजेन्द्रश्छतचामरे। चैतानि एभिः सन्कोऽनुरज्यते ।२५॥। आदशवन्म ने स्मेहैरितिलवहप अर गच्छेत न पीषचते। चाप्येनं कुरुते ज्ञानमोहित: ।२६। जानन्नोह संसारे भ्रमते घटियन्त्रवद्। सर्वयोनिष् दुलातंः स्थावरेष् घरेषृ स ॥२७॥ एवं योतिषु सर्धासु प्रतिकम्य भ्रमेण तु। कालांतरवशादात मानुष्यमतिदुर्लभम्।२८॥ काष्ठावस्था,मृतावस्था और हरितावस्था ये तीन अवस्थायें कही गयी है। ये अनेक तरहकी उपलब्ि्धियाँ और समस्त पापोंको नाश करने वाली

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मनुष्य जन्म की श्रेष्ठता ) होती है।२२। नारी-शय्या-पान-वस्त्र-धूप-लेपन और ताम्बूल भक्षण-ये पाँच राजैश्वर्य विभूतियाँ होती हैं।२३। हेम भार-ताम्र-गृह-रत्न-धेनु-वेद- ये सब उपादान भोगस्वरूप हैं। इनमें आरक्तहुआ मानव अनुरागको प्राप्त होजाया करता है।२४-२५। हे मुनिवर ! जो संसारी प्राणी हैं वे दर्प णके तुल्य तथा तेलके तिलोंकी भाँति पेरेजाते हैं। भ्रमणको प्राप्तहोकर इनको ज्ञानसे मोहित करता है।२६। सब कुछ ज्ञान रखता हुआ भी इस संसारमें घड़ीके यन्त्रके समान भ्रमण किया करता है और स्थावर एवं चर स्वरूप समस्त योनियोंमें परम दुःखित होकर विचरण करता रहता है ।२७। ईस तरह समस्त योनियों में पर्यटन करके कालान्तर में जाकर कहीं उसे यह मनुष्य योनि प्राप्त हुआ करती है। यह मानव-जन्मका प्राप्तकरना अत्यन्त टुर्लभ होता है।२८। व्युत्क्रमेणापि मानुष्यं प्राप्यते पुण्यगौरवात् । विचित्रा गतयः प्रोक्ताः कर्मणां गुरुलाघवात् ॥२६॥ मानुष्यं च समासाद्य स्वर्गमोक्षप्रसाधनम्। न चरत्यामनः श्रेयः स मृतः शोचते चिरम् ।३०। देवासुराणां सर्वेषां मानुष्यं चातिदुर्लभम् । तत्संप्राप्य तथा कुर्यान्न गच्छेन्नरकं यथा ।३१। स्वर्गाग्वगलाभाय यदि नास्ति समुद्यमः । दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं बृथा तज्जन्म कीरतितम् ।३२1 सर्वस्य मूलं मानुष्यं चतुवर्गस्य कीतितम्। संप्राप्य धर्मंतो ब्यास तद्यत्नादनुपालयेत् ।३३। धर्ममूलं हि मानुष्यं लब्ध्वा सर्वार्थसाधकम्। यदि लाभाय यत्न: स्यान्मूलं रक्षेत्स्वय ततः ।३४। मानुष्येऽपि च विप्रत्नं यः प्राप्य खलु दुर्लभम् । नाचरत्यात्मनः श्रयः कोऽन्यस्तमादचेतनः ।३५। व्युत्क्रम से भी पुण्य की गुरुता से यह मानव-जन्म प्राप्त किया जाता

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२२० J [श्री शिवपुरा है। क्मोके बड़ेहोने तथा छोटेपनकी अत्यन्त अद्भुतगति बतल।ई गई है। ।२६ जो जीवात्मा स्वर्ग प्राप्ति तथा मोक्ष के साधक इस अत्यन्त दुर्लभ मानव शरीरमें जन्मपाकर भी अपने वल्याशाकारक कर्म नहीं कियाकरता है वह मृत्युके पश्चात् बहुत समय तक शोक एवं चिन्तोमें डूवा रहता है 1३ समस्त देवग और असुरोंमें भी यह मनुष्यशरीरका जन्मपरदुर्लभ होता है। इस मानवशरीरको सौभाग्यसे प्राप्तकरके ऐसाही करना चाडिये जिससे नरकों में गमन न करना पड़े।६१। यदि इस परम दुर्लभ मनुष्य कै.जम्मका लाभ प्राप्तकरके भी स्व्म तथा अपवर्गकी प्राप्तिकेलिए कुछ उद्य महींकिया जावे तो यह मानव-जन्मही व्यर्थ समभनाचाहिए।३२। हे व्यासजी ! स्मेस्त धर्म-अर्थ, काम और मोक्षका आदिकारण मनुष्य योनि में जन्म ग्रहण करना ही बतलाया मया है। इसलिये इस प्राश्तकरके अवश्यही धानिक-पद्यति से यत्नपूर्वक इसका यथोचित उपयोग करतेहुए पालन करना चाहिए।३३। यर्दि समस्त पदार्थोंके साधन स्वरूप एवं धर्मकेपंलक तथा मलभूत मनुष्य के जन्मको प्राप्तकर अपने लाभक लिये यत्न किया जावे तो स्वयं मूलकी रक्षा होजावे।३४ इस मानव जन्म में भी ब्राह्मण का शरीर प्राप्त करना महान् दुलभ होता है। इसे पाकर भी जो अपने कल्याण कारक क्म नहीं किया करता है उससे अधिक मूढ़ एवं जड़ और कौन होगा ? ॥३४ दोपाना मेव सर्वषां कर्मभूरियममुच्यते। इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च प्राप्यत समुपार्जित: ॥३६। देशेऽस्मिन्भारत वर्ष प्राष्य मानुष्यमध्रवम। न कुयादात्मनः श्रयस्तनात्मा खलु वांचतः ।।३७। कर्ममूमिरिय विप्र फलभूमिरसी स्मृता। इह यत्क्रियत कम स्त्रर्में तदनुभुज्यते ॥३८॥ यावत्स्वास्थ्य शरीरस्य ताव्र्म समाचरेद। अध्र वेण शरीरेण ध्रव यो न प्रसाधनेव । ध्र व तस्य परिभ्रष्टमध्रव नष्टमेत्र च ॥४०।

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मनुष्य जन्म की श्र 8्ठता ] [ २२१

आयुषः खंडखंडानि निपतति तदग्रतः । अहोनात्रोपदेशेन किमर्थ नावबुध्यते ॥४१॥ यदा न ज्ञायते मृत्यः का कस्य भविष्यति । आकस्मिके हि मरसो धृर्ति विदति कस्तर्था ॥४२।। समस्त द्वीपों में इस भूमि को कर्म करने का क्षेत्र बतलायागया है। यहाँ पर स्वर्ग और मोक्ष का अर्जन कियाजाता है।३६। इस भारववर्ष में इस अति अस्थिर मानव शरीर को प्राप्त कर यदि अपना कल्याण नहों किया जाता है तो यही कहनाचाहिए कि निश्चितरूपसे उसनेअपनी आत्मा को वञ्वित किया है ।३७। हे विप्र ! यह क्मभूमि बतलाई गई है और यही फलभूमि भी बताई गई है। यहाँ पर जो सत्कर्म किया जाता है वह स्वग में जाकर भोगा जाया करता है ३७. जब तक यह सत्कम का साधन भूत शरीर स्वस्थता प्राप्ति किये हुए रहे तभी तक धर्म के कृत्य करे, क्योंकि स्व्रस्थताके अभाव में औरों की प्रेरणाप्रप्त करतेहुयेभी फिर कुछ भी नहीं कर सकता है और अस्वस्थ शरीर में कोई भी उत्साह शेष नहीं रहा करता है।३ह जो मनुष्य इस अनिश्चित क्षण.भंगुर शरीर के द्वारा परम स्थिर एवं निश्चल धर्म की सिद्ध नहीं करता है उसका ध्रव धर्म तो नष्ट हो ही जाता है और अध्र व यह शरीर है वह तो निश्चय ही नष्ट होने वला होता ही है।४०। इस मानव शरीर की आयु के खण्ड २ होकर यों ही उसके आगे नष्ट होते चले जाते हैं। दिन और रात सदा उपदेश दे रहे हैं फिर भी नहीं जगते है ।४१। जब कि यह नहीं ज्ञात रहता है कि वब किसकी मृत्यु होती है फिर अचानक मृत्यु हो जाने थर कोन ऐश्वर्य की खोज करता है।४२। पररित्यज्य यदा सर्वमेकाकी यास्यति ध्र्वम्। न ददाति कदा कस्मात्पाथेयार्थमदं धनम् ॥४३।। गृहीतदानपाथेय: सुख याति यमालगम् । अन्यथा कलिश्यते जंतुः पाथेयरहिते पथि ।४४॥। येषां कालेय पुण्य नि परिपूर्णांनि सर्वतः।

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२२२ ) (श्री शिवपुराण गच्छतां स्वर्मदेशं हि तेषां लाभ: पदे पदे ।४५। इति ज्ञात्वा नरः पुण्यं कुर्यात्पापं विवर्जयेत् । पुण्येन याति देवत्वमपुण्यो नरकं व्रजेत् ॥४६। ये मनागपि देवेश प्रपन्ना शरणं शिवम्। तेऽपि धोरं न पश्यति यमं न नरकं तथा।४७। किंतु पापैर्महामोहैः किंचित्काले शिवाज्ञया। वसंति तत्र मानुष्यास्ततो यान्ति शिवास्पदम् ।४८। ये पुनः सर्वभावेन प्रतिपन्नाः महेश्वरम्। न ते लिम्पन्ति पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।४६। मृत्यु के प्राप्त होने पर प्राणी अपने समस्त धनादि व भव को यहीं त्याग करके अकेला निश्चय ही चला जायेगा तो फिर मार्गमेंअपने पाथेय के लिये धनका दान क्योंनहीं करताहै?।४३। जिस प्राणीने दानरूपी चबेना अपने साथ बाँध लिया है वह सुखपूर्णक यमलोककी यात्राकियाकरता है। अन्यथा यहदान पुण्यके बिना यमलोककी यात्रामें बहुत दुःखहोता है।४४। हे व्यासदेव ! जिन प रुषों के प ण्यसभीओरसे परिपूर्ण हैं स्वर्गलोकमें जाने वाले उन प्राणियों को पद-पदमें लाभहोता है।४५। यही समझकर मनुष्य को सर्गदा पुण्य-कार्य अवश्य ही करने चाहिए। मानवको पाप कभी नहीं करने चाहिये। पुण्य से ही देवत्वकी प्राप्ति होती है औरपापकर्मोसे नरक की प्राप्ति हुआ करती है ।४६। जो मनुष्य किसी भी प्रकार से भगवान् शिव की शरण में प्राप्तहोजाते हैं वे फिर कभी भी यमराजको तथा उसके द्वारा दिये जाने वाले नरक को नहीं देखते हैं ।४७। पापों से और महामोह के कारण थोड़े से समय के लिये शिवकी आज्ञासे नरक में निवास किया करते हैं और इसके पश्चात् वे शिव लोक की प्राप्ति किया करते हैं ।४८। जो अपने सम्पूर्ण भाव से भगवान् शिव को प्राप्त किया करते हैं, वे जलसे कमल की भाँति अर्थात् कमल पत्रके समान पापोसे लिप्त नहींहोते हैं।४६। उक्त शिवेति यैर्नाम तथा हरहरेति च। न तेषाँ नरकाद भीतिर्यमाद्धि मुनिसत्तम ।५०।

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मृत्यु काल का ज्ञान ) (: २२३

परलोकस्य पाथेयं मोक्षोपायमनामयम् । पुण्यसंघैकनिलयं शिव इत्यक्षरद्वयम् ।५१। शिवनामैव संसारमहारोगैकशमाकम् । नान्यत्संसार रोगस्य शामकं दृश्यते मया ।५२। ब्रह्महत्यासहस्त्राणि पुरा कृत्वा तु पुल्कशः । शिवेति नाम विमलं श्रत्वा मोक्षं गतः पुरा ।५३। तस्माद्विवद्ध येद् भक्तिमीश्वरे सततब्रधः । शिवभक्त्या महाप्राज्ञ भुक्ति मुक्ति च विंदति ।५४। जिन्होंने कभी भी अपने मुख से भगवान् शिव का नाम था 'हर- हर' ऐसा कहा है, हे मुनिसत्तम ! उनको नरकों का और यमराजका कुछ भी भय नहीं रहता है।५०। परलोक का चबेना और निरामय मोक्षका उपाय, पृण्य समुदायका एकमात्र स्थान 'शिब' ये महेश्वर नामके दो अक्षर ही होते हैं-ऐसा शास्त्र बताते हैं ।५१। यह भगवान् शिवका परम पावन नाम ही संसार के समस्त महारोगों को शान्तकरनेका एकमात्र उपाय है। इसके अतिरिक्त संसार के महारोबों के शमन करने वाला अन्य कोई भी उपाय नहीं देखाजाताहै।५२। प्राचीनसमयमें सहस्रोंकी सँख्यामें ब्रह्महत्या जैसा पाप करने वाले लोगोंने 'शिव-शिव'-यह निर्मल नाम का श्रवण करके मोक्षपद की प्राप्तिकी है ।५३। हेमहाप्राज्ञ। इसलिए विद्वान् व्यक्ति का कत्त व्य है कि वह निरन्तर शिवकी भक्तिको हृदयमें बढ़ावे। शिय बक्तिसे मुक्ति और मुक्ति दोनों की प्राप्ति होती है।५४। ॥ मृत्यु काल का ज्ञान ।। भगवन्स्त्वप्रसादेन ज्ञात मे सकलं मतम्। यथाचैन तु ते देव यो मन्त्रश्च यथाविधि । १। अद्यापि संशयस्त्वेकः कालचक्र प्रति प्रभो । मृत्युचिह्नं यथा देव किं प्रमाणं तथायुषः । २। सर्व कथय मे नाथ यद्यहं वल्लभा। इति पृष्ठस्तया देव्या प्रत्युवाच महेश्वरः । ३।

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२२४ ] । श्री शिवचुराण सत्यं ते कथयिष्यामि शास्त्र सर्वोत्तमं प्रिये। ये न शास्त्रेण देवेशिनरैः काल: प्रबुध्यते ॥ ४ ॥ अहः पक्षं तथा मासमृतु चायनवत्सरौ। स्थू लसूक्ष्मग तश्चिहन वाहरंतर्गतेस्तथा ॥ ५॥ तत्तेऽह सम्प्रवक्ष्यामि शृण तत्वेन सुन्दरि। लोकानामुपकारार्थ वैराग्यार्थमुमेऽधुना ॥६॥ अकस्मात्पांडुर देहमूध्वराग समंततः। तदा मृत्यु विजानीयाषण्मासाभ्यन्तरे प्रिये॥ ७॥ पावंतीजी ने कहा-हे भगवन् ! आपकी कृपा से मैंने सबज्ञान प्राप्त कर लिया है। हे देव ! यन्त्रोंसे तथा मश्त्रों से जिस तरह विधि के सहित आपका अर्धन किया जाता है वह अब कृपा करके मुझे बतलाइये।१। हे प्रभो ! हे देव। इस काल चंक्रके विषयमें मुझते अभीतक संशय होता है। मृत्यु का चिम्ह और आयुका प्रमाण जिस तरह होता है वह मुझे बताने की कृपा करें।२ हे स्वामिन ! यदि आप मुझपर अपनी परम प्रिया समभ कर प्यार करते हैं तो मुझे सब बातें बताइये। इस रीतिसे देवी के द्वारा कहे जाने पर शिवजी ने कहना प्रारम्भ किया।३। शिधजी ने कहा-हे प्रिये ! हे देवेशि ! मैं अब तुमको उस परम सत्य शास्त्र का वर्णन करता हूँ जिसके द्वारा मनुष्यों के काल का ज्ञान हो जाता है।४। जिस तरह मृत्युके चिहनों का ज्ञान होता है वे चिह्न दिन, पक्ष, मास ऋतु, अयन और वत्सर आदि होते हैं। ये बाहरी तथा भीतरी स्थूल तथां सूक्ष्म हुआ करते हैं।५। हे सुन्दरी ! हे पावती ! मैं ये सभी लौर्को के उपकार तथा वैराग्य के लिये तुम्हें बतलाता हूँ सो तुम भलीभाँति श्रवण करो।६। हे प्रिये । यदि अकस्मातही चारों ओरसे पीत वर्ण वाला शरीर W WAW TO ऊपरसे लाल होजावे तो छः महीने के अन्दर मृत्यु जाव लेनी चाहिये।७। मुख कणौ तथा चक्षुर्निह्वास्तम्भो यदा भवेत। तदा मृत्यु विजानीत्यात्पण्मासाभ्यन्तरे प्रिये ॥ ८ ॥ रोरवानुगत भद्रे ध्वनि नाकर्णयेद्द्रतम्। षण्मासाभ्यन्तरे मृत्युर्ज्ञांतव्यः कालवेदिभिः ॥ ६।।

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रविसोमाग्नि संयोगाद्यदोद्योतं न पश्यति । कष्णं सर्व समस्तं च षण्मासं जीवितं तथा ।१०। वामहस्तो यदा देवि सप्नाहं स्पंदते प्रिये। जीवितं तु तदा तस्य मासमेकं न संशय ।११। उन्मीलयंति गातराणि तालुकं शुष्यते यदा। जीवितं तु तदा तस्य मासमेक न संशयः ॥१२। नासा तु स्त्रवते यस्य त्रिदोषे पक्षजीवितम्। वक्तं कठ च शुष्येत षण्मासांते गतायुषः ।१३। स्थूलजिह्वा भवेद्यस्य द्विजा: क्लिद्यन्ति भामिनि । षण्मासाज्जायते मृत्युश्चिन्हैस्त रुपलक्ष'त् ।१४। हे प्रिये ! जिस समय मुख,कान, आँख और जिह्वाका स्तम्भ होजावे तो उस समय भी यह समझ लेना चाहिये कि छः मांसके भीतर मृत्यु हो जायगी ।८। हे भद्रे ! यदि कोई व्यक्ति मनुष्योंके समुदायके द्वारा की हुई ध्वनिको शीघ्रता से सुनने में असमर्थ होतो सालके ज्ञाताओंको छः मासके अन्दर उसकी मृत्यु जानलेनी चाहिये।६जो कोई सूरज, चाँद और अग्निके संयोगसे होने वाले प्रकाश को न देख पावे और सभी वस्तु काले वर्ण को दिखाईदें तो उसके जीवनके केवल छैमासही शेष समझ लेने चाहिए।१०। हे प्रिये ! हे देवि ! जो किसीका वामहस्त बराबर एकसप्ताहतक फड़कता रहे तो उस व्यक्ति का जीवन काल केवल एक मासका ही होता है, इसमें कुछभी सन्देह नहीं है ।११। जब शरीरके सभीअवयोंमें टूटनसी होवे और तालु बराबर सूखतारहे तो समझलेना चाहियेकि उसप्राणीका जीवनकाल एकमासही शेष रहगया है इसमें तनिकभी संशय नहीं है ।१२। बातपित्त कफ इन तीनोंके दूषित होने वाले त्रिदोष रोगमेंजिस प्राणीकी नाकबहती हो तो एकपक्ष उसका क्षेष जीवन कालहोता है और यदि मुख तथा गला सूखतारहता है छैमासकी शेष आयु समझलेनी चाहिये।१३। हे भामिनी हे द्विजगण ! जिस मनुष्यकी जीभ स्थल होजावे और दाँत एकसाथ कोट को प्राप्त हो जागे छैमासकी शेष आयु रहती है ।१४।

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अंबुतैलघृतस्थं तु दर्परो वरवणिनि । जो वर्षा न पश्यति यदात्मानं विकृतं पलमेव च ॥१५।। सके वह षण्मासायुः स विज्ञयः कालचक्र विजानता। देनेपर अन्यच्च शृु देवेशि येन मृत्युविशुद्ध यते ॥१६।। यदि उ शिरोहीनाँ यदा छायाँ स्वकीय भुपलक्षयेत् । रात्रि अथवा छायया हीनो मासमेकं न जीवति ॥१७॥। गिद्धअ आङ्गिकानि मयोक्तानि मृत्युचिन्हानि पार्वति । मर ज बाह्यस्थानि प्र वे भद्र चिन्हानि शृशु साँप्रतम् ॥१८॥ रश्मिहीनं यदा देवि भवेत्सोमार्कमण्डलम्। दृश्यते पाटलाकारं मासाद्वन विपद्यते ॥१६॥ अरुंधती महायानमिंदु लक्षणवजितम् । अदृष्टतारको योऽसौ मासमेकं स जीवति ॥२०॥ दृष्टे ग्रहे च दिड.मोहः षण्डमासाज्जायते ध्रवम् । उतथ्य न ध्रुवं पश्येद्यदि वा रविमण्डलम् ॥२१॥ रात्रौ धनुर्यदा पश्येन्मध्यान्हे चोल्कपातनम्। वेष्ट्यते ग्रध्काकश्च षण्डमासायुर्न संशयः ॥२२॥ जिस आदमी को जल, तेल और घृतमें अथवा निर्मल दपएमें अपना मुख न दिलाई दे किम्वा उसको अपनी शवल विकृत रूप में दिखलाई देवे तो काल-चक्रके ज्ञाता पुरुषका ऐसे व्यक्तिकी आयु सिर्फ छेमासकी हीबता देनीचाहिये। हे देवि ! मैं अब इनकेअतिरिक्त अन्यभी मौतहोजानेके लक्षण या चिहन तुम्हेंबताता हूं उन्हें सुनो।१५-६। जिस मनुष्यको अपनीछाया लाई विना शिरके दिखलाईदेवे किम्वा उसेअपनी परछाँई विल्कुल दिखलाईहीन चा देवे तो समभलो कि ऐसा व्यक्ति एकमहीना भी जीवित नहीं रहेगा।१७। है य हे गिरिजे! हे भद्र! यहाँतक मानवके अङ्गोसे सम्बन्धित मृत्युके चिह्टन में मैंने बतलाये हैं अब मैं अन्य बाहरीचिह्नभी बतलाता हूं। उन्ह तुमश्रवण की करो।१८। हे देबि ! जिसको सूर्यमण्डल तथा चन्द्रमण्डल बिनाकिरणोंके है लाल आकार वाला दिखलाई देवे तो वह पन्द्रह दिनमें मर जायगा ।१६। पर

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जो व्यक्ति अरुन्धती महायान, नागवीथी चन्द्रमा और तारागणको न देख सके वह एकमासही और जीवित रहाकरता है ।२०। जिसे ग्रहोंके दिखाई देनेपर भी दिशाओंका भ्रम होजावे तो उसकी छमासमें मौत आजाती है। थदि उतथ्य अथवा ध्रव एवं सूर्य-मण्डल को देखने में भी असमर्थ हो और रत्रि में धनुष दिखाई दे या मध्यान्ह के समय उल्कापात दृष्टिगत हो एवं गिद्ध और काकों से लिपटा दिखाई दे तो वह निस्सन्देह छमासमें अवश्य मर जायेगा। २१-२२।: ऋषयः स्वर्गपथाश् दृश्यते नैव चाम्बरे। षण्मासायुविजानीव त्प्ररुषैः कालवेदिभि: ॥।२३।। अकस्माद्राहुणा ग्रस्तं सूर्य वा सोममेव च। दिक्चक्र भ्राँतवत्पश्येत्षण्मासान्म्रियते स्फुटम् ॥२४॥ नीलाभिर्मक्षिकाभिश्च ह्यकस्माद्वष्ट्यते पुमान्। मासमेकं हि तस्यायुर्ज्ञातव्यं परमार्थतः ॥२५॥ मूध्नि काक: कपोतश्र शिरश्राकम्य तिष्ठति। शीघ्र त् म्रियते जतु र्मासैकेन न संशयः ॥२६॥ एव चारिष्टभेदस्त् बाह्यस्थः समुदाहृतः । मानुषाणां हितार्थाय संक्षेपेण वदाम्यहम् ।।२७। हस्तयोरुभयोदेवि यथा कालं विजानते । वामदक्षिणयोर्मध्ये प्रत्यक्षं चेत्युदाहृतम् ॥२८॥ यदि किसी व्यक्तिको स्वर्गके मार्ग वाले ऋषिगण आ शमें न दिख- लाईदेवें तो कालकेज्ञान रखने वालोंको उसकी छःमासकी आयु ममझलेनी चाहिये ।२३। जो अकेलाही राहसेग्रस्त चन्द्रमा अथवा सूरजको देखाकरता है या दिकचक्रको भ्रान्तिके साथ देखता है तो निश्चय रूपसे हो छःमास में मर जाया करता है।२४। जिस मानवका शरीर अचानकही नीले रंग की मक्खियों से व्याप्त हो जाता है वह एक मासकी ही आयु वाला होता है ।२५। जो मनुष्य गिद्ध काक और कबूतरोंके द्व रा आक्रमण करके शिर पर बठते देखे तो निस्सन्देह उसे समझ लेना चाहिये कि वह एक मास में

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अवश्य ही मृत्युके मुखमें चला जायगा।२६। इस रीतिसे मानवोंके हितार्थ मृत्युक ये बाहरी मौत के चिह्न तुम्हें बतला दिये हैं अब मैं संक्षेप में बतलाता हूं पक्ष हो ।२७। हे देवि जिस तरह वाम और दक्षिण दोनों हाथों के मध्यमें काल प्रत्यक्ष है सो बतला दिया।२८। हे प्रिये

एवं पक्षौ स्थितौ द्वौ त् समासात्सुरसुन्दरि । जोकि शुचिभ त्वा स्मरूदेवं सुस्नातः संयतेन्द्रियः ।२६। ज्ञान क

हस्तौ प्रक्ष ल्य दुग्घेनालक्तकेन विमर्दयेत् । 3

गंधैःपुष्पौ करो कृत्वा मृगय च्च शुभाशुभम् ।३०। क्ष

कनिष्टामादितःकृत्वा यावदगुष्ठक प्रिय। पर्वत्रयकमेणैव हस्तयोरुभयोरपि ।३१। प्रतिपदादि विन्यस्य तिथि प्रतिपदादितः । ए

सम्पुटाकारहस्तौ त पूर्वदिडमुखः संरथतः ।२। व

स्मरेन्नवात्मक मंत्रं यावदष्टोतर शतम् । निरीक्षययेत्ततो हस्तौ प्रतिपर्वणि यत्नतः ।३३। तस्मिन्पर्वणि सा रेखा दृश्यते भृङ्गसन्निभा । तत्तिथौ हि मृतिज्ञेया कृप्सो शुक्ले तथा प्रिये ।४। अधुना नादजं वक्ष्ये संक्षेपात्काललक्षणम् । त्र

गमागमं विदित्वा त् कर्म चुर्याच्छरणु प्रिये ।३५। हे सुरसुन्दरि ! इसतरह जब दोनोंही पक्ष स्थित हों उस समय पवित्र होकर भगवान्शिवका स्मरणकरता हुआ अच्छी तरह स्मानकर जितेन्द्रिय होगे।२६। उस समय हाथ धोकर दूध अथवा अलक्तसे केशोंको मले तथा हे

गन्ध और फूलोसे हाथोंकोभरकर शुभऔरअशुभ चिन्तवनकरना चाहिये। अर्थांन ।३०।हे प्रिये ! अपनी कनिष्ठिकाअगुलीसे लेकर अगुष्ठतक अपने दोनोंहाथों ऋत्ु, व में तीन पर्वके क्रमसे प्रतिपदा आदि तिथियोंकी गणना करके पूर्ण दिशाकी उपयुं ओर मुखकरलेगे और सम्पटाकार हाथोंसे एकसौ आठबार नौअक्षर वाला के मध मन्त्रका जाप करे और प्रत्येक पर्वमें यत्नके सहित हाथोंको देखे।३१-३२! प्रच्चीर ।३३।जिस पर्वमें भ्रमरके तुल्य वहरेखा दिखाई देवे, कृष्णपमहो या शुकल चुमक को वा

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मृत्युकाल का ज्ञान ) २२६ पक्ष हो, हे देवि ! उसही तिथि में उसकी मौत समझ लेनी चाहिये।३४। 'हे प्रिये ! अब नादकेद्वारा प्रकट होजाने वाले कालचक्रका वर्णन करता हूं जोकि अतिसक्षिप्त ही होगा। उसका श्रवणकरो। गमन और आगमनका ज्ञान करके ही कर्म करना चाहिये ।३५। आत्मविज्ञानं सुश्रोणि वारं ज्ञात्वा तु यत्नतः । क्षणं त्रटिर्लवं चैव निमेषं काष्टकालिकम् ॥३६।। मुहूतक त्वहोरात्रं पक्षमासर्तु वत्सरम् । अन्द युगं तथा कल्पं महाकल्पं तथैव च ।।३७। एवं स हरते काल: परिपाट्या सदाशिवः । वामदक्षिणमध्ये तु पथि त्रयमिद स्मृतम् ॥३८॥ दिनादि पञ्च चारभ्य पञ्चविशिनावधिः । वामाचारगतौ नादः प्रमाणं कथित तव ॥३६॥ भू ररंभ्र" दिशश्चैत्रः स्वजश्च वरवर्णिनि। वामचारगतो नादः प्रमाणं कालवेदिनः ॥४०॥ ऋतोर्विकारभ ताश्च गुणास्तत्रैव भामिनि । प्रमाणं दक्षिणं प्रोक्त ज्ञातव्य द्राणवेदिभिः ॥४१॥ भूतसंख्या यदा प्राणान्वहते च इडादयः । वषस्याभ्यंतरे तस्य जीवितं हि न संशयः ॥४२॥ हे सुश्रोणि ! आत्म विज्ञान को चार तरह के यत्नसे जानना चाहिए अर्थान् क्षण त्रुटि,लव,निमेष और काष्ठकालिक। मुहूर्त्त, दिनरात, पक्ष,मास ऋतु, वत्सर, अब्द, युग,कल्प और महाकल्प यह परिपाटी है ।३६-३७। इसी उपर्युक्त परिपाटीसे सदाशिव कालहरण कियाकरते हैं। वाम और दक्षिण के मध्यमें तीन मार्ग बतलाये गये हैं।३८। पाँच दिन से आरम्भ करके पच्चीसदिन पर्यन्त वामाचारगतिमें नादहोता है। यह नादका प्रमाण मैंने तुमको बतला दिया है ।३६। हे परमसुन्दर वर्णवाली! कालके वे त्ता पुरुष को वामचारगतिमें भूत, रन्ध्र,दिय्ा और ध्वजारूप नादजान लेना चाहिए । ४०। हे भामिनि ! यदि उसमें ऋतु के बिकार वाले गुण प्रतीत होते

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होंतो उसे प्रमाणके ज्ञानरखने वालोंके द्वारा दक्षिणा प्रमाणवाला नादकहा गया है।४१। जिससमय भूत सख्यक इडाआदि नाड़ी प्राणोंका वहनकिया करती है तो एकवर्षवे अन्दरही उसकी मृत्यु होजाया करती है, इसमें कुछ भी संशय नहीं होता है॥४२॥ दशघस्रप्रवाहेण ह्यब्दमानं स जीवति। पञ्चदसप्रवाहण ह्यब्दमेकं षण्मासं गतायुषम्।।४३।। विशदि्दनप्रवाहेण लक्षयेत्तदा । पञ्चत्रिशदि्दनमितं वहते वामनाडिका ॥४४।। जीनितं तु तदा तस्य त्रिमासँ हि गत युषः । षड विशदि्दतमानेन सप्तविशदि्दतमितं मासमेंकं समाख्यातं जीवित वामगोचरे ॥४६॥ वहते मासद्वयमुदाहृतम् ॥४५।। त्वत्यविश्रमा ।

एतत्प्रमाणं विज्ञ यं वामवायुप्रमाणतः । सव्येतरे दिनान्येव चत्वारश्चानुपूर्वशः ।।४७।। चतुःस्थाने स्थिता देवि षोडशैताः प्रकीतिताः । तेषाँ प्रमाणं यक्ष्यामि सांप्रतं हि यथार्थत ॥४८॥ षड दिनान्यादितः कृत्वा संख्यायाश्च यथाविधि । एतदन्तर्गते चैव वामरंध्र प्रकाशितम् ॥४६।। दश दिन पर्यन्त बराबर चलते रहने से वह वर्षभर तक जीजित रहा करता है और पन्द्रहदिनतक चलनेसे एकवर्षकी उसकी शेषआयु जानलेनी चाहिए।४३। बीसदिन के प्रवाहसे छःमासकी आयुही शेषसमभनीचाहिए। यदि वामनाड़ी पच्चीसदिन तक वहनकरती है तो तीनमास और छब्बीस दिनके मानसे दो मास शेष आयु होती है ।४४-४५। और यदि वामभाग से अविश्रान्त रूपसे सत्ताईस दिनतक नाड़ी चलतीरहे तो एकमापका ही शेष जीवन होता है।४६। इसी रीतिसे वाम वायुके प्रमाण से नाद को प्रमाण समभ लेना उचित है तथा दाहिनीं ओरके क्रमसे चारदिन तकही जीवन समझे ।४७। हे देवि ! चारस्थानोंमें नाडीस्थित हुआकरती है। इस

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सरह वे सभी सोलह नाड़ियाँ बतलाईगई हैं। अब मैं उन सबका यथातथ्य ठोक प्रमाण बतलाता हूँ।४८। छःदिनसेलेकर विधिके पाथ संख्याके अन्त- ्गत दिनों में वाम रन्ध्र में प्राणग प्रकाशित होता है।४है। षड् दिनानि यदारूढं द्विवर्ष स च जीवति। मासानष्टौ विजानीयाद्दिनान्यद्व च तानि तु ॥५०१ प्राणाः सप्तदशे चैव विद्धि वर्ष न संशयः । सप्तमासान्विजानीयादिनैः षड्भिर्न संशयः ॥५१॥ अष्टघस्रप्रभेदेन द्विवर्ष हि स जीवति। चतुर्मासा हि विज्ञ याश्चतुर्विशद्दिनावधि ॥५२। यदा नवदिन प्राणा वहँत्येव त्रिमासकम्। मासद्वयं च द्व मासे दिना द्वादश कीतिताः ।।५३। पूर्ववत्कथिता ये तु कालं तेषां तु पूर्वकम् । अवांतरदिना ये तु तेन मासेन कथ्यते ।।५४॥ एकादशप्रवाहेण वर्षमेकं स जीवति । मासा नव तथा प्रोक्ता दिरान्यष्टनितान्यपि ।।५५।। द्वादशेन प्रवाहेण वर्षमेकं स जीवति। मासान् सप्त विजानीय त्षड् घस्रांश्चाप्युदाहरेत् ।।५६।। जिस समय छः दिनतक नाद प्रारचढ़ा रहे तो समभनो वह आदमो दोवर्ष अ ठमहोने और आठदिनतक जीवित रहेगा ५ू०। जो सत्रह दिवस तक प्राशा आरूढ़रहे तो व इप्रारी एकवर्ष सातम्स,छःदिन कक जिन्दारहा करता है इसमें कुछभी सन्देह नहीं होता है ।५१। यदि आठ दिन बराबर चलेतो वह दोवर्ष चारमास और चौबीसदिनतक जीवित रहता है ।५२ अबकि नो दिनतक इसीओर प्राशवायु चले और पाँचमहीने बारहदिनतक इधरही प्रास चले तो दो मासका जीवनश्नेत्र रहाकरता है ।५३ जो प्रार पहलेकेतुल्य कहे हैं उनका काल पहिलेकेतुल्य बतायागया है और जोअन्त- मत दिन बताये हैं उनसे मास कहेजाते हैं ।५४।इधर ग्यारहदिन चलनेपर यह मनुष्य एकबर्ष नौमास और आठदिन तक जिन्दारहा करता है।५५।

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बारह दिन तक इधर चलने पर एक वर्ष सात मास छै दिन पर्यन्त जीवित रहना उसको होता है ।५६: नाडी यदा च वहति त्रयोदशदिनावधि। सवत्सरं मवेतस्य चत र्मासाः प्रकीर्तिता: ॥२७। चतु विशहिन शेषं जोवति च न संशयः । प्राणवाहा यदा वामे चतु ईश दिनानि त ।।५८।। संवत्सर मवेत्तस्य मासा: षट् च प्रकीतिताः । चत् विशहिनान्येव जीवित च न संशय: ॥५६॥। पञ्चदशप्रवाहेण नब मासान्स जीवति। चतुर्विशदिनान्येव कथितं कालनेदिभि: ४६०॥ षोडशाह प्रवा ण दशमासांस जीवति। चतु विशदनाधिक्यं कथित कालवेदिभि: ॥६१। सप्तदशप्रवाहण नवमामर्गतायुषम् । अष्टादश दिनान्यत्र कथित साधकेश्वरि ॥६२।। वामाचार यदा देवि ह्वष्टादश दिनावधि । जीवित चाष्टमासँ त् घस्रा द्वादस कीर्तिता: ॥६३॥ जव तेरहदिनतक इधरही नाड़ीचलती हे तो फिर उस व्यक्तिकी आयु एकवर्ष चारमास और चौबीस दिनकी शेष रहती है। इसमें कुछभी संशय नहीं है जब वाम भागमें चौदह दिन पर्यन्त प्राण वहन किया करते हैं तो उसका जीवन काल एक वर्ष छै मास चौवीस दिन तकका शेष रहता है- इसमें बिल्कुल भी सन्देह नहीं है ।५७-५८-५६७ कालके ज्ञाता लोगों का कथन है कि पन्द्रह दिनके प्रवाहमें मनुष्य नौ मास और चौवीस दिन तक जीवित रहा करता है।६०। सोलह दिनके प्रवाहमें दश मास चौवीस दिन का जीवन काल शेष रहता है ।६० हे साधकेश्वरि ! सत्रह दिन तकके प्रवाह होनेपर नौमास अद्टारह दिनतक जीवन शेष बताया गया है ।६१। हे देवि ! अठारह दिन तक यदि वामाचार होता है तो आठ मास बारह दिन तक जीवन रहता है ।६३।

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चतुर्विशद्दिनान्यत्र निश्चयेन वधारय। प्राणवाहो यदादेवि त्रयोविशद्दिनावधिः ।।६४।। चत्वार: कथिता मासा: षड् दिनानि तथोत्तरे। चतुर्विशप्रवाहेण त्रीन्मासांश्च स जीवति ॥६५।। दिनान्यत्र दशाष्टौ च संहरत्येव चारतः । अवांतरदिने यस्तु संक्षेपात्ते प्रकीर्तिताः ।६६।। वामचार: समाख्यातो दक्षिणं शृशु सांप्रतम् । अष्टाविंशप्रवाहेण तिथिमानेन जीवति ।।६७।। प्रवाहेण दशाहेन तत्संस्थेन विपद्यते। त्रिंशद्धस्रप्रवाहेण पञचाहेन बिपद्यते ।६८।। एकत्रिंशद्यदा देवि वहते च निरंतरम् । दिनत्रयं तदा तस्य जीवित हि न सँशयः ॥६६॥ द्वात्रिशत्प्राणसख्या च यदा हि वहते रविः । तदा तु जीवित तस्य द्विदिनं हि सँशयः ॥७०॥ दक्षिण: कथितः प्राणो मध्यस्थं कथयामि ते। एकभागगतो धावमानप्रवाहेण वायुप्रवाहो दिनमेकं स मुखमण्डले ।।७१।। जीवति। चक्रमेतत्परासोहिं पुराविद्भिरुदाहृतम् ।।७२।। एतत्त कथित देवि कालचकृ गतायुषः । लोकानाँ च हितार्थाय किमन्यच्छ्रोत मिच्छसि ।७३।। हे देवि ! तेईसदिन पर्यन्त प्राणप्रवाह होता है तो केवल चौवीसदिन तकका ही जीवन शेष रहता है यह निश्चित है।६४। यहाँ चारमास और छदिन अधिक बताये गये हैं। चौवीस दिनके प्रवाहमें वह तीन मास और अठारह दिन तक जीवित रहा करता है।६५। इस रीतिसे प्राणके सञ्चार से अवान्तरके दिनके कालवर्णन तुम्हारे सामने करदिया है ।६६। अबतक वाम सञ्चार का वर्णनकिया अब दक्षिण संचार का वर्णन करते हैं उसका श्रवण करो। यदि अट्ठाईस के प्रवाहसे दक्षिणसंचार होता है तोवहव्यक्ति

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२३४ ] । श्रो शिवचुराण पन्द्रह दिन तक जीवित रहा करता है ।६७। दशदिनके प्रवाहमें दश ही दिनमें और तीसदिनके प्रवाहमें पाँच दिनमें मृत्युको प्राप्त होजाया करते हैं ।६८। हे देवि ! जिस समय इकत्तीस दिनतक प्रणचलते हैं तो निश्चयही तीनदिनतक उसका जीवन शेषरहता है ।६६। जब सूर्य बत्तीसकी संख्यामें वहनकिया करता है तो उसकाजीवन निस्सन्देह दोदिन शेषरहता है।७०। अबतक दक्षिण प्राणके संचारका वणंनकिया था अब आगे मध्यस्थ प्राण के विषयमें वर्णन किया जाता है जबकि वायुका प्रवाह एक भागसे मुखमें छोड़तेहुए प्रवाहसे रहता है तो वह व्यक्ति केवल एकही दिन जीघित रहा करता है। पूर्व वेत्ताओंने इसीप्रकारका कालचक्र बताया है।७१-७२।। हे देि! आयुके गतहोजाने वाले पुरुषोंका इस तरहका काल-चक्र लोकोंसे वल्याण के लिए ही वर्णिगत किया गया है, इसके आगे अन्य जो कुछ तुम सुनना चाहती हो सो मुझे बतलाओ।७३। ज्ञान,क्रिया, भक्तियोग तथा नवरात्रिकी श्रष्ठता का वर्शन व्यासशिष्य महाभाग सूत पौराणिकोत्तम । उभाया अपरं श्रोतुमिच्छामः किमप्याख्यानमीशितुः ॥ १॥ जगदम्बायाः क्रियायोगमनुत्तमम् । प्रोक्त सनत्कुमारेण व्यासाय च महात्मने ॥ २ ॥ धन्या यूयं महात्मानो देवीभक्तिदृढव्रताः । पराशक्त: परं गुप्त रहस्यं शृणुतावरात् ॥ ३।। सनत्कुमार सर्वज्ञ ब्रह्मपुत्र महामते। उमायाः श्रोतृमिच्छामि क्रियायोग महाद्भुत्म् ॥४॥ कोदक्च लक्षणं तस्य किं कृते च फलं भवेत्। प्रियं यच्च पराम्बायास्तदशेष वदस्व मे ॥ ५॥ द्वपायन यदेत्तत्वं रहस्यं परिपृच्छसि। तच्छुरगुष्व महाबुद्ध सर्ग मे सर्व वर्णयिष्यतः ॥ ६ ॥ ज्ञानयोगः क्रियायोगो भक्तियोगस्तथैव च। त्रयो मार्गा: समाख्याताः श्रीमातुरभुक्तिसुक्तिदाः ।। ७ ।।

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ज्ञान-क्रिया-भक्ति योग की श्रेष्ठता का वर्णन ] [२३५ मुनिगण ने कहा-हे व्यासजीके शिष्य ! हे महाभाग ! हे पौराणि- कोत्तम, हे सूतजी ! अब हमारी इच्छा शिवजीके और इतिहासके सुननेकी होती है।१ सनतकुमारजीके जगज्जननी पार्वतीजीका परम श्रेष्ठ क्रिया- योग व्यासजीसे कहा था। हम अब आपके मुखसे उसे ही श्रवण करनेकी इच्छा रखते हैं।२। सूतजी ने कहा-तुम सब लोग पूरे महात्मा एवं परम धन्यहो तथा देवीकी दृढ़भक्ति करनेमें भी दृढ़व्रतहो। अब में आपके समक्ष में पराशक्तिके अत्यन्त गुप्तरहस्यकी वर्णनकरता हूं। आपलोग आदरपूर्वक सुनें ।३। व्यासजी ने कहा-हे सनतकुमार ! हे सर्वज्ञ ! हे ब्रह्मपुत्र ! हे महामते ! मैं पावतीके परम सुन्दर क्रिया योगके सुननेका इच्छुक हूँ ।४। आपकृपाकरके मुझके यहबतानेकी उदारता अवश्यक रेंकि उसका क्यालक्षण है एवं उसके करनेसे क्या फलहोता है ? जोकि पराम्बाको अत्यन्तप्रिय है ।५। सनत्कुमारजी ने कहा हे व्यासजी ! हे महाबुद्ध ! आप जिस तरहके विषयमें पूछ रहे हैं में अब उसे पूर्ण रूपसे वर्गानकरता हूँ सो सव श्रवण करो।६। जगदम्वा श्रीमाताके भुक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाले ज्ञान योग, क्रिया-योग और भक्ति योग के तीन माग होते हैं। ७। ज्ञानयोगस्तु संयोगश्चित्तस्यैवात्मना त यः । यस्तु वाह्याथसयोगः क्रियायोग: स उच्यते ॥ ८ ॥ भक्तियोगो यतो देव्या आत्मनश्चैक्य भावनम् । त्रयाणामपि योगानां क्रियायोगः स उच्यते ॥ ६॥ कर्मणा जायते भक्तिर्भवत्या ज्ञान प्रयायते । ज्ञानात्प्रजायते मुक्तिरिति शास्त्रेषु निश्चयः ॥१०।। प्रधानं कारण यागो विमुक्तमुनिसत्तम । कियायोगस्तु योगस्य परमं ध्येयसाधनम् ॥११॥ मायाँ तु प्रकृति विद्यान्मायावि ब्रह्म शश्वतम् । अभिन्न तद्वपुर्ज्ञात्वा मुच्यते भवबन्धनात् ॥१२। यस्तु देव्यालय कुर्यात्पाषाणं दारवं तथा। मृन्मयं वाथ कालेय तस्य पुन्यफलं शृणु। अहन्यइनि योगेन यजतो यन्महाफलम् ॥१३॥

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२३६ ) ( श्री शिवपुराण प्राप्नोति तत्फलं देब्या यः कारयति मन्दिरम् । सहस्रकुलमागामि व्यतीतं च सहस्रकम् । स तारयति धर्मात्मा श्रीमातु र्धाम कारयन् ।१४।। मानवके चित्तका आत्माकेसाथ जो संयोग होजाता है यही ज्ञानयोग के नामसे कहा जाता है। जिसमें बाहरी अर्थोका सँयोग है वह क्रियायोग कहागया है ।५६। भगवतीदेवी और आत्माका एक होजाना ही भक्तियोग के नामसे विख्यात है। इन तीनों योगोंको क्रियाभोग कहते हैं। । कर्मसे ही भक्तिका उदय होता है और भक्तिसे ज्ञान उत्पन्न होता है तथा ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्ति हुआ करती है-ऐसाही शास्त्रकारोंने निश्चय किया है।१०। हे मुनिवर ! योगही मुक्तिका प्रमुख कारण होता है और क्रियायोम, योग का परमध्येय साधन होता है।११। प्रकृतिको मायाजानकर और सनातन ब्रह्म को मायावी समझकर तथा इन दोनों के अभिन्न शरीरका ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य सांसारिक बन्धन से विमुक्त हो जाता है।१२। हे व्यासजी ! जो कोई मनुष्य पाषाण-काष्ठ अथवा मिट्टीसे देवीके मन्दिर का निर्मांण करायाकरता है उसके पुण्यका महान्फल होता है। प्रतिदिन यजनकरनेसे जो पुण्य-फल मिलता है वही इस मन्दिरके निर्माण करानेसे होता है।१३। देवीके मन्दिरके करानेका फल नैत्यिक योग-यजनके ही तुल्य हुआ करता है। श्रीमाता के धामका निर्माता धर्मात्मा पुरुष अपने अतोत और आगामी एक-एक सहस्र कुलको तार दिया करता है ॥१४॥ कोटिजन्मकृतं पापं स्वल्पं वा यदि वा बहु। श्रीमात मन्दिरारम्भक्षणादेव प्रणश्यति।।१५।। नदीषु च यथा गंगा शोण: सर्वनदेषु च । क्षमायां च यथा पृथ्गो गांभीर्य्ये च यथोदधि: ॥१६।। ग्रहाणां च समस्तानां यथा सूर्यो विशिष्यते । तथा सर्वेषु देवेषु श्रीपराऽम्बा विशिष्यते ।१७।। सर्वदेवेषु सा मुख्या यस्तस्यः कारयेद् गृहम् । प्रतिष्टां सपवाप्नोति स जन्मनि जन्मनि ॥१८॥

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ज्ञान-क्रिया-भक्ति योग की श्रेष्ठता का वर्णन ] [ २३७

वाराणस्यां गंगासमुद्रतीरे कुरुक्षेत्रे प्रयागे पुष्करे तथा। च नैमिषेऽमरकण्टके ॥१६। श्रीपर्वने महापुण्ये गोकर्णे ज्ञानपर्वते। मथुरायामयोध्यां द्वारावत्यां तथैव च॥२०॥ इत्यादिपुण्यदेशेषु यत्र कुत्र स्थलेऽपि वा। कारयन्मात् रावासं मुक्ता भवति बन्धनात् ।।२१।। करोड़ों जन्म के किये हुए पाप तो माता के मन्दिर के निर्माण का आरम्भ करते ही नष्ट हो जाया करते हैं ।१५। समस्त नदियोंमें गङ्गा सम्पूर्ण नदोंमें शोण, क्षमामें भूमि और गाम्भीर्य में समुद्र सर्वोत्तम शिरो- मगि होता है। इसी प्रकार समस्त ग्रहों में भुवन भास्कर कहा गया है वे से हीसमस्त देवताओंमेंपराम्बासभीसे अधिक मानी गईहै'१६-१७।समस्त देवों में परम प्रधान देवीके धामका निर्माण कराने वाला प्रत्येक जन्म में प्रतिष्टा की प्राप्ति किया करता है।१८। वाराणसी, कुरुक्षेत्र, प्रयाग,पुस्कर में तथागङ्गाय! समुद्र तटपर, नैमिषारण्य में अमरकंटक में, महापवित्र पर्वत पर, गोक्ण में ज्ञान पर्वत पर, मथुरा,अयोध्या और द्वारका इत्यादि परम पवित्र स्थलोंमें अथवा अन्यकिसीभी समुचित स्थानमें जो देवी के मन्दिर का निर्मा कराता है वह मनुष्य निश्चयहीं संसार के बन्धनों से विमुक्त होजाता है ॥१६-२१-२२॥ इष्टकानां त विन्यासो यावद्वर्षाणि तिष्ठति। तावद्वर्षसहस्त्राणि मणिद्वीपे महीयते ॥२२॥ प्रतिमा: कारयेद्यस्त सर्वलक्षणलक्षिताः ।

देवीमूर्ति स उमाया: परं लोकं निर्भयो ब्रजति ध्रवम् ॥२३॥ प्रतिष्टाप्य कृतकृत्यो भवेन्मर्त्यो शुभत् ग्रहतारके। योगमायाप्रसादतः ॥२४।। ये भविष्यन्ति येऽतीता आकल्पात्पुरुषाःकुले । तांस्तास्तारयते देव्या मूर्ति संस्थाप्य शोभनाम् ।।२५।। त्रिलोकीस्थापनात्पुण्यं यद् भवेन्मुनिपुंगव। तत्कोटिगुणित पुण्पं श्रीदेवीस्थापनाद् भवेत् ।।२६।।

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२३८ 1 I श्री शिवपुराण मध्ये देवी स्थापयित्वा पंचायतनदेवताः । चतुदिदक्षु स्थापयेद्यस्तस्य पुण्यं न गण्यते ।२७। विष्णोरनाम्नां कोटिजपाद ग्रहर चन्द्रसूर्ययोः । यत्फलं लभ्यते तस्माच्छतकोटिगुणोत्तरम् ॥।२८।। मन्दिर की चुनाई में जो ईंट लगीहैं वे जितनेवर्षतकटिकी रहती हैं उतने वर्षोके सहस्र पर्यन्त निर्माता मनुष्य मणिद्वीपमें निवासकिया करता है ।२२। जो सभी सुलक्षणोंसे सम्पन्न देवीकी प्रतिमा निर्माण करता है वह निडर होकर पार्वतीके परमलोककी प्राप्ति किया करता है। शुभ ऋतु, ग्रेह, नक्षत्रादि के शुद्ध समय में जो देवीकी प्रतिमा को प्रप्तिष्ठितकरके विराजमान करता है वह योगमायाके प्रसाद से कृतकृत्य होजाताहै।२३। स् २४। कल्प के आरम्भसे लेकर जो भी वंशमें उत्पन्न हुयेथे या भविष्य में भी उत्पन्नहोंगे उन सबको देवीकी सुन्दर मूर्तिकी स्थापना करने वाला सं पुरुष तार देता है ।२५। हे मुनि श्रष्ठ ! इस त्रिभुवनके स्थापन करने से व जितना पुण्य होता है उससे एककरोड़ गुना पुण्य केवल भगवती देवी को व मूर्ति की स्थापनासे हुआ करता है।२६। जो कोई बीच में देवी को स्थापित करके उनके चारों ओर गणेश-गौरी आदि की पचायतन स्वरूप है देवताओं की स्थापना किया करता है उसका कोई भी पुण्य नहीं समझा जा सकता है।२७। चन्द्र तथा रूर्य के ग्रहण के समय में विष्णु के एक करोड़ नाम से जो फल मिलता है उससे सौ कोटि गुना फल प्राप्त र होता है।२। शिवनाम्नो जपादेव तस्मात्कोटिगुणोत्तरम् । श्रीदेवीनामजापत्त ततः कोटिगुणोत्तरम् ।।२६।। देव्याः प्रासादकरणात्पुण्यं तु समवाप्यते। स्थापिता येन सा देवी जगन्माता त्रयीमयी ।।३०। न तस्य दुर्लभं किंचिन्छोमातः करुणावशात् । वर्द्धन्ते पुत्रपौत्राद्या नश्यत्यखिलकश्मलम् ॥३१। मनसा ये चिकीषंन्ति मूर्तिस्थापनभुत्तमम् । तेऽप्युमायाः परं लौकं प्रयान्ति मुनिदुर्लभम् ।३२॥

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ज्ञान-क्रिया-भवितयोग की श्रेष्टता का वर्णन ) (२३६

क्रियमाणं तु यः प्रेक्ष्य केतसा ह्यनुचिन्तयेत् । कारयिष्याम्यहं यहिं संपन्मे सभविष्यति ॥३३।। .......... एवं तस्य कुलं सद्ो याति स्वर्ग न संशयः । महामायाप्रभावेण दुर्लभं किं जगत्त्रये ।।३४।। श्रीपराम्बां जगद्योनि केवलं ये समाश्रिताः । ते मनुष्या न मन्तव्याः साक्षाद् देवीगणाश्च ते ॥३५॥ ये ब्रजन्तः स्वपन्तश्च तिष्ठन्तो वाप्यहर्निशम् । उमेति द्वयक्षरं नाम व्रवते ते शिवागणा: ॥३६॥ शिव नाम के जपने से जो पुण्य-फल होता है। उसके करोड़ गुना फल श्रीदेवी के नाम के जाप से प्राप्त होता है।१६। तीनों देवताओं के स्वरूप वाली देवी को स्थापित किसी ने किया, उसका प्रसाद बनाने का भी पुण्य मिलता है। जिस पर श्री माता की कृपा हो जावे उसके लिये संसार में कुछ भी दुर्लभ वस्तु नहीं है। देवी के प्रसाद से समस्त पापों का क्षय और पुत्रपोत्रादि की वृद्धि होती है ।३०-३१। जो मन में भी कभी श्री माताकी उत्तममूत्ति की स्थापना करने की इच्छा रखते हैं बे मुनियों को भी अत्यन्त दुर्लभ पार्वती के लोक की प्राप्ति किया करते हैं।३२। जो मनुष्य किसी अन्य के द्वारा विनिर्मित मन्दिर को देखकर अपने चित्त में भी यह विचार करता है कि अगर मेरे पास धन हो जायगा तो मैं भी देवी का मन्दिर बनवाऊँगा, ऐसे मन के संकल्प से ही उसका समस्त कुल शीघ्र ही स्वर्ग को निस्सन्देह चला जाता है। श्री महामाया का ऐसा प्रभाव है कि उसे तीनों लोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं होता है ।६६-३४। जो इस मानव जगत् को उत्पन्न करने वाली श्री पराम्बा भगवती का केवल आश्रयही ग्रहण करते हैं उनको सामान्य मनुष्य नहीं समझना चाहिये। वे तो साक्षात् भगवती के गण ही होते हैं।३५। जो मनुष्य रात दिन स्थिति होतेहुये सोते-जागते उमा के दो अक्षरों के नाम का उच्चारण करते रहा करते हैं ये शिवा के गण होते हैं ॥३६॥ नित्ये नैमित्तिके देवीं ये यजन्ति पर्रा शिवाम् । पुष्पधू पैस्तथा दीपैस्ते प्रयास्यन्त्युमालयम् ।।३७।।

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२४० ] [ श्री शिवपुराण

ये देवीमण्डपं नित्यं गोमयेन मृदाऽथवा। उपलिम्पन्ति मार्जन्ति ते प्रयास्यत््युमालयम् ।।३८।। येर्देध्या मन्दिरं रम्यं निर्मापितमनुत्तमम् । तत्कुलानाञ्जनान्माता ह्याशिषः संप्रयच्छति ॥३६।। मदीयाः शतवर्षाणि जीवन्त प्रमभाजनाः । नापदामयनानीत्थं श्रीमातावक्त्यहनिशम् ।।४०।। येन मूर्तिर्महादेव्या उमायाः कारिता शुभा। नरायुत तत्कुलजं मणिद्वीपे महीयते ॥४१॥ स्थापयित्वा महामायामूर्ति सम्यक्तूप्रज्य च । य य प्राथयते काम तं त प्राप्नोति साधकः ॥४२॥ जो नित्य ही तथा नैमित्तिक कर्ममें पुष्प,धूप, दीप से पराश्री शिव का पूजनकिया करतेहैं, वे अन्त समयमें पार्वतीके धामको प्र प्तकियाकरते हैं।३७। जो प्रतिदिन देवीके मन्दिर या मण्डपको गोमय मिट्टीसे लीपते हैं तथा मण्डपका मार्जनकरते हैं वे पुरुषभी उमा के लोक को प्राप्तहोतेहैं ।३८। जिन्होंने माता के परम सुन्दर मन्दिर का निर्माण कराया है, उन कुलीन मनुष्यों को माता भगवती प्रसन्न होकर बहुत-से आशीरवद दिया करती है।३६। भगवती ऐसेभक्तोंके लिये आशीष देती है किमुभ्मेअनुरग रखने वाले मेरे भक्त सौ वर्षतक बिना आपत्िके जीवितरहें।४० जिसने जगदम्बाकी शुभमूर्तिका निर्मांण कराया और उसे स्थापित कियाहै उसके कुलके मनुष्य दशसहस्र वर्षतक मणिद्वीपजाकर निवासकियाकरतेहैं।४१। भगवती महामायाकी प्रतिमाकी स्थापना करके भलीभाँति उसका अर्चन किया करतेहैं, वेमनमें जो-जो भी कोईमनोरथकरतेहैं उन्हेंनिश्चित रूप से प्राप्तकिया करते हैं। देवी की मूर्तिकोऐसअद्भत चमत्कार है।४२। यः स्नापयति श्रीमात : स्थापितां मूतिमुत्तसाम् । घृतेन मधुनाऽडक्तन तत्फलं गणयेत्तु कः॥४६॥ चन्दना गुरुकपू रमांसीमुस्तादियुग्जलः । एकवर्णगवां क्षीरः स्नापयेत्परमेश्वरीम् ॥४४॥

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ज्ञान-क्रिया भक्तियोग की श्रष्ठता का वर्णन ] [ २४१ धूपेनाष्टादशांगेन दद्यादाहुतिमुत्तमाम्। नोराजन चरेद् देव्याः साज्यकर्पू रव्तिभिः ।४५ कृष्णाष्टम्यां नवम्यां वाज्मायां वा पचदिक्तियौ। पूजयेज्जगतां धात्री गधपुष्पर्विशेपतः ।४६ सपठञ्जननीसूक्त श्रीसूक्तमथवा पठन्। दवीसूक्तमथो वाऽपि मूलमन्त्रमथापि वा ।४७ विष्णुक्रान्तां च तुलसीं वजयित्वाऽखिल शुभम्। वीप्रातिकर ज्ञय कमल तु विशेषतः ।४८ अपयेत्स्वर्णपुष्प यो देव्य राजतमेव वा। स याति परमं धाम सिद्धकोटिभिरन्वितम् ।४२ जो जनदम्बा भगवती की प्रतिमा की स्थापना कर उसका मधु धूत आदि से स्थन कराता है उसका ऐसा महान् फन होता है कि उसे कोई बता नहीं सकता है॥४३॥ भगबती के स्नान का विधान है कि चन्दन कपू र,अगर जटामांसी, नागरमोथा अदि परम सुगन्धित पदार्थो सेसमन्वित सलिलसेकिम्पा एकहीरंगवालीगाय के दूघसेपर मेश्वरीका स्नानाभिषेक करना चाहिए। ४४।। फिर इसके अनन्तर अठारह वस्तुओं मप्रस्तुत धूह की आहु- तियाँ दे- चाहिये और घत तथा कपूर की बतियों से भगवती जगदम्बा की आरती करनी चाहिए॥। ४५। कृष्णपक्ष की अष्टमी अथा नवमी एवं अमावस्या वा पंच दिकपालों की तिथियोंमें गन्धपुष्योंस जगद्धारिणी दवी का विशेषरूसे पूजनकरना चाहिये।।४६॥ देवीसूक्तपयवा श्रीसूक्तका पाठ करके या देवी के मूलमन्त्र (नवार्ण) का जाप करके विष्णुक्रान्ता या तुलसी दलोंको चढ़ाते हुए विशेष रूपमे कमलोंको देवी पर चढ़ा देवे कि ये सत नुषा देवी की प्रसनता के देनेवाले हैं ॥४७-४८॥ जा कोई भक्त देवीकीसेवासे स्त्र पुष्प या राजनिर्मित कुसुम समर्नित किया करता है वह करोड़ों सिद्धोंक सहित परम धाम को प्राप्त होता है। ४९॥ पजानाते सदा कार्य दार्सैरेन क्षमापनम्। प्रसीद परमेशानि जगदानददायिनि५०

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२४२ श्री शिवपुारण

इति वाक्यः स्तुवन्मन्त्री देवीभत्तिपरायणः । ध्यायेत्कण्ठीरवारूढ़ा वरदाभयपाणिकाम् ५१ इत्थ ध्यात्वा महेशानी भत्ताभीष्टफलप्रदाम्। नानाफलानि पक्वानि नैवेद्यत्वे प्रकत्पयेत् ।५२ नवेद्य भक्षयेद्यस्तु शंभुशक्त: परात्मनः। स निर्ध याखिल पङ्क निमलो मानवौ भवेत् ।५३ चैत्रशक्लतृतीयायां या भवानीव्रतं चरेत्। भवबन्धननिर्मुक्तः प्राप्नुयात्परम पदम्।५४ थस्यामेव तृतीयायां कुर्याद्दोलोत्सवं बुघः। पूजयेज्जगतां धात्रीमुमां शकरसंयुताम् ५५ कुसुमैंः कुकुमैर्वस्त्र: कर्पू रागुरुचन्दनः। धप र्द्दीप: सनवैद्य: स्त्रग्गन्धैरपर रपि । ५६ जब पूजनकी सम प्ति हो उस समय देवीके किकरो को हाथ जोड़कर सर्वदा पापोंका क्षमापनकराना उचित हैकि हे परमेशानि ! हे जगदानन्द- दायिनी ! आप हमपर प्रसरहोंवे ।५। मन्त्रोंकेपाठक इन उपयुंक्तवाक्यों के द्वारा देवीका स्तवनकर और परमभक्ति भावमें तत्परुहोते हुए मयूरपर समारूढ़ वर प्रदात्री तथा अभय धन देनेवालीं भगवती जगदम्बाका ध्यान करना चाहिए।५१। इस रीतिसे भक्तोंके अभीष्ट फलोंके प्रदान करनेवाली महेएवरीका ध्यानकर विविधफल तथा नैवेद्य अपणकरे ।५२। जोपरमेश्वरी जगदम्बाके प्रसाद स्वरूप नैवेद्यको भक्षण करता है वह अपने समस्त पाप रूपी कीचड़को धोकर निर्मल चित्त होजाता है ।५३। जो कोई चैत्र शुक्ला तृतीयाको भवानीके व्रतकोकरता है वह समस्तसाँसारिक वन्घनोंमेविमुक्ति होकर परभपदका लाभ कियाकरता।५४ पार्वतदेवी उसे अभीष्ट फलदिया करती है जो पूर्वोंक्त तृतीयाकेदिन देवीका सुन्दर दोलोत्सवकरे और जगत् के धारण करनेवाली पार्वतीकेसहित शिवका पूजनकरता है ।५५। पार्गती का अर्चन पुष्प, कु कुभ वस्त्र, कपूर,अगर चन्दन, धूग, दीप नैवेद्य तथा और भी अनेक अन्य सुन्दर गन्धों से करना चाहिए ।५६।।

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ज्ञान-क्रिया मक्तियोग की श्रष्ठता का वर्णन आनन्दोलयेत्ततो देवी महायाँ महेश्वरीम्। 1 २४३ श्रीगौरीं शिवस युक्तां सवकल्याणकारिजीम् ५७ प्रत्यब्द कुरुत योऽस्या ब्रतमान्दोलन तथा। नियमेन शिवा तस्म सर्वेमिष्ट प्रयच्छति ।५८ माधवस्य सिते पक्षे तृतीया याऽक्षयाभिधा। तस्याँ यो जगदम्बाया ब्रत कुर्यादतन्द्रितः ।९ मल्लिकामालती चंपाजपाबन्धूकप कजैः 1 कुसुम पूजयेद् गौरीं शङ्करेण समन्विताम्६० कोटिजन्मकृत पाद मनावाक्कायसम्भवम्। निर्धूय चतुरो वर्गानक्षयानिह सोजनुते :६१ ज्येष्ठशुक्लतृतीयायां ब्रत कृत्वा महेश्वरीम्। यो चं येत्परमप्रीत्या तस्यासाध्य न किंचन ।६२ आषाढ़शक्लपक्षीयतृतीयायां रथोत्सवम्। देव्या: प्रियतम कुर्य्याद्यथावित्तानुसारतः ।६३ इसके अनन्तर महामाता महेश्वरी श्री त्रिव से श्री गौरी की जो कि समस्त कल्याणोंकेप्रदान करनेवाली देवी हैं आन्दोलनाकरे ।५७। जो पुरुष इन तिथिमें हर एक वर्बन नियमपुर्वक व्रत तथा अन्दाकन कियाकरता है परमद्रसन्न पार्त्रतीदेवी उसके समस्त अभीष्षोंको प्रदान कियाकरती हैं ।५८। बंसाखनासके शुक्लपक्षमें होनेवाली अक्षय तृतीपाके दिन निरालस्य होकर जगदम्बाका ब्रत जो कोईसी करता है और मालती, मल्लिक, जपा चम्पा बन्धूक और कमलों से कुसुरीं से शिवके सहित भगवती पार्वलीकी अचना करता है वह मनुष्य करोड़ों जन्मके कियेहुए मनवचन और शरीरके महा- पापोंको नष्टकरधके अर्थ हनजीर मोक्ष इनवारों पुरुषायोंा लाभ करता है ।५९६०-६१। ज्वष्ठ शुका तृतीया कोी जो मनव इस माहेश्वरी व्रतको करतेहुए देधीकाअर्चन कियाकरता है उसको इस संमारम कुछभी असाध्य एवं अप्ाप्य नहीं रहता है ।६२। प्रत्येक मनुष्य का कतव्य है कि आपाढ़ शुक्लकी तृतीया तिथिकेदिन भगवदीके परम प्रिय रथात्सवको अपनी धन शक्ति अनुपार करे,६३।

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२४४ 1 । श्री शिव पुराण रथं पृथ्वीं विजानीयाद्रथाँगे चन्द्रभास्करौ। वेदानश्वान्विजानीयात्सारथिं पद्मसम्भवम् ।६४ नानामणिगणकीर्ण पुष्पमाला विराजितम्। एवं रथ कल्पयित्वा तस्मिन्सस्थापयेच्छिवाम्।६५ लोकसंरक्षणार्थाय लोक दृष्ट पराम्बिका। रथमध्ये सस्थितेति भावयेन्मतिमान्नरः ।६६ रथे प्रचलिते मन्दजयशब्दमुदीरयेत् पाहि देवि जनानस्मान्प्रपन्नान्दीनदत्सले।६७ इति वाक्यैस्तोषयेच्च नानावादित्रनिःस्वनैः। सीमांते तु रथ नीत्वा तत्र सपूजयेद्रथे।६८ नानास्तोत्रैस्तततःस्तुत्वाप्यानयेत्तां स्ववे मनि। प्रणिपातशत कृत्वा प्रार्थयेज्जगदम्बिकाम् ।६९ एवं यः कुरुते विद्वान्प जाव्रतरथोत्सवम्। एवं यः कुरुतेडम्बायाः पूजनं च यथाविधि ।७० इस भूमिको र्थ समझकर तथा चन्द्र एवं सूर्यको इस रथ के पहिये जानकर वेदोंको उसमें जोते जाने वाले अश्व तथा ब्रह्माजीकोउसकाहांकने वाला सारथि समझ कर अनेक मणि-रत्नों से परिपूरण पुष्प-मालाओं से सुशोभित होनेवाल रथकी इसीभाँति कल्पना करके उसमेंभगवती पार्वती का विराजमानकरना चाडिये।६४-६५/बुद्धिमानभक्तको चाहिये कि उस समय अपने मनमें ऐसी मावनाकरेकिभगवतीपराम्त्रिका लोकों के कल्याण, रक्षाऔर देखनेकेलियेही रथके मध्यमें आजविराजमानहो रहीहैं।६६। रथ जब धीरे-धीरे चलनेलगे तो जयकार का उच्चारणकरे औरमुखसे यह भो कहे-हे देवि ! हेदीनवत्सले। हम सबतुम्हारीशग गतिमेंआये हैं, आप हमारी सबकी रक्षाकरें६७। इस सुन्दर रीति से वाक्यों को कहतेहुए अनेकवाद्यों को वजाते-गाते भगवतीको पूर्ण सन्तुष्ट करे और रथ कोलोमाके अन्तिम स्धल तक ले जाकर फिर उसका पूजन करे ।६८। वहाँ अर्चन के पश्वात् अनेकोंस्तोधोंके द्वारा देवी का स्तवन कर्ना चाहिए। इसके उपरान्त देवीको घर लौटाकरलावेऔर प्रखाम करे एवं नगज्जननीकी प्रार्थनाकरनी

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ज्ञान क्रिया भक्तियोग की श्रष्टता का वर्णन ] [२४५

चाहिए ।।६९। जो प्रवीण भक्त इस विधिसे जगदम्बाका पूजन व्रत और रथोत्मव को किया करते हैं वह निस्सन्देह इस लोक में समस्त मोगों का उपभोग करके अन्त में देवीके पदको प्राप्त किया करता है ॥७०॥ शल्कायां तु तृतीयायामेवं श्रावणाभाद्रयोः। यो ब्रतं कुरुतेऽम्बायाः पूजन च यथाविधि ।७१ मोदिते पुत्रपौत्राद्येर्घंनाद्यैरिह सन्ततम्। सोऽन्तौ गच्छेदुमालोक सर्वलोकोपरि स्थितम् ७२ आश्विने धवले पक्ष नवरात्रव्रतं चरेत्। यत्कृते सकला: कामा: सिद्धयन्त्येव न सशय ।७३ नवरात्रव्रतस्यास्य प्रभाव वक्नुमीश्चरः। चतुरास्योन पञ्चास्यो न षडास्यो न कोऽपर।७४ वरात्रव्रतं कृत्वा भूपालो विरथात्मजः। हृतं राज्यं निज लेभे सुरथो मुनिसत्तमाः।७५ घ्रवसंधिसतो धीमानयोध्याधिपतिर्नृपः। सदर्शना हृतं राज्यं प्रापदस्य प्रभावतः ।७६ व्रतराजमिम कृत्वा ममाराध्य महेश्चरीम्। संसारवन्धनानमुक्तः समाधिमुक्तिभागभूत् ७७ इसी तरह से श्रावर मासतथा भाद्रपद मासकी शुवल पक्षकी तृतीया तिथके दिन जो मानव श्रीमातादेवीका व्रत तथासविधि समर्चनकरता है वह संसारमें अपने णैत्र-पोत्रादिके परमसुखतथा धन-धान्यादि की समृद्धि काअनुपम आनन्दप्राप्तकरजीवनके अन्तमे समस्तलोकोके ऊपरस्थित उमा के लोककोजायाकरताहै।७१७२। आश्विनमासको नवरात्रिकी तृतीया के दिन व्रत अवश्यही प्रत्येक को करनाचाहिये। इस व्रत के करने से समस्य मानव मनोरथोंकी सिद्धि हुआकरतीहै इसमेंकुछभी सन्देहका अवसर नहीं है:७३। नवरात्रिके व्रनका ऐसा अतुल एवम् अद्भुत माहात्म्यहोताहै जिसे ब्रह्मा,शिव,स्वामिकार्तिकेय तथा अन्य कोई देवभौ वणनकरने में असमर्थ होतेहैं।७४।। हे मुनिश्रष्ठो। इस नवरात्रिके ब्रतको करके पहिलेविरथ के

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२६ ) श्री शिवपुराण पुत्र राजा सुरधने अने अहृत राज्यकी प्राप्तिकी थी ।७५' इमी महाव्रत के प्रमावसे महापनीषो ध्र वमन्विके पुत्र अनोद्धाके अधीश्वर राजासुदशन ने छिने हुए राज्यको पुनः प्राप्त कर लिया था ।७६। इसी ब्रत को करके समाधि नामक वैश्य महेश्वरी भगवतींकी कृरासे उसकी आराधनाके द्वारा समारके बन्धनोंमे छूटकर मुक्त हो गया था ७७। तृतीवायां च पचम्थां प्रप्तम्पामट्ठमीतियौ। नवम्यां वा चतुर्दश्यां यो देवीं पूजयेन्नर: ।७८ आश्विनस्य सिते पक्षे ब्रतं कृत्वा विधानतः। तस्य सर्वमनोभीष्ट पूरयत्यनश शिवा: ।७९ यः कार्तिकस्य मार्गस्य पौषस्य तपसस्तथा। तपसस्य सिते पक्षे त तीयायां बर्त चरेत्।८० लोहितैः करत्रीराद्ये: पुष्पेधूंपै सुगन्धितः। पूजयेन्मङ्गलां देवीं स सर्वमङ्गल लभेत् ।८१ सौभाग्याय सदा स्त्रीभिः कार्यमेतन्महाब्रतम्। विद्याधनसनाप्त्यर्थ विधेयं पुरुषरपि ८२ उमामहेश्वरादोनि ब्रतान्यन्यानि यान्यपि। देवीनियाणि कार्याणि स्व्रभक्त्यैवं मुमुक्षभि ।८३ जो मनु तृनीया पञ्वनी सप्षमी, अष्टनी,नवमी और चतुर्दशी को भग- वती महामायका अर्चनकरता है और आश्विनके शुक्लपक्षने पूर्ण विधि- विध्ञानके साथ ब्रत किया करता है उसके सब्र मनोरयों की पूर्नि मगवता जगदम्बा सर्वदा पूर्णकिया करती है ।95-3र्द जो कानिक मार्गशीष पौश और माघ नारोंकी कृमपक्षी तृनीय को त्रककरना है और रक्त करवीर आदिके पुष्योंसे तथ सुगन्वित धूगिसे मङ्गलादेवीका यजनकिया करता है, उसे समस्त मङ्गलोंका लाभ अवश्वही होजतः है ।८०८१ यह महान् व्रत सौभाषप सुखक पाने के उद्देश्य सर्वदा स्त्रियों को करना चाहिए और विद्या धन एवं सन्नान पानके लिए पुरुषों को करना चाहिए :८२। इसी तरह इनके अतिरिक्त सभी बुक्तिकीइच्छा रखनवालोका भक्ति-भावकेसाथ ही करना चाहिए। इनने बड़ा लोकोत्तर कल्याग होना है ।६३।

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ज्ञ'न-क्रिया भक्तियोग की श्रष्ठता का वर्णन ] [ २४७

संहितेयं महापूण्या शिवभक्ति विवर्द्धिनी। नानाख्यान समायुक्ताभुक्तिमक्तिप्रदाशिवा:८४ य एनां शृणुयाद् भवत्या श्रावयेद्वा समाहितः। पठेद्वा पाउयेद्वा पि स याति परमां गतिम् ।८५ यस्य गेहे स्थिता चेय लिखिताललिताक्षरः। संपूजिता च विधिवत्सर्वान्कामान्स आप्नुयात् ।८६ भूतप्रेतपिशाचादिदुष्टेभ्यो न भयं क्वचित्। पुत्रपौत्रादिसम्पत्तिर्लभेदेव न संशयः ।८७ तस्मादिय महापुण्या रम्योमास हिता सदा। श्रोतव्या पठतव्या च शिवभक्तिमभीप्सुभि।८८ इस शिबकी भक्तिको बढ़ाने वाली और बहुत से ऐतिहासिक बातोंसे परिपूर्ण तथा भोग एवं मोक्ष दोनों दुर्ल भवस्तुके प्रदानकरने वाली महान् पुण्यदायक सहिताका जो श्रवणकिया करता है या सुनता है-पढ़ता है या पढ़ाता है वह परम गतिकी प्राप्ति किया करता है ।८४-८५। जिसके धरमें अत्यन्त सुन्दर अक्षरोंसे लिखीहुई यह संहिता विराजमानहो और नित्यही विधि के साथ इसकी पूजा की जाती हो वह घर का स्वामी अपने समस्त अमीष्ट मनोकामनाओं की प्राप्ति किया करता है ।८६। उस गृह स्वामीको कभी भी भूत प्रेत, विशाच आदि दुष्ोंसे तनिक भी भय नहीं हुआ करताहै और पुत्र-पौत्र,धन-धान्य आदिको सम्पत्तिका विस्तार अधिक होजाता है- इसमें कुछमी संशय नहीं है।८७। इसलिये शिव-भक्तिके इच्छुक पुरुषोंको इस महान् पुण्यवाली उमा-संहिता को नित्य ही नियमपूर्वक सुननी तथा पढ़नी चाहिए।द।

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कैलास-सहिता मुनियों को व्यास के प्रति ओंकार जिज्ञासा साधु साधु महाभागा मनयः क्षीणकल्मषाः । मतिर्द ढतरा जाता बुर्लभा साउपि दुष्कृताम्।१ पाराशर्येण गुरुणा नैमिषारण्यवासिनाम्। मनीनाम पदिष्ट यद्वक्ष्ये तन्म निपुगवा: ।२ यस्य श्रवणमात्रेण शिवभक्तिर्भवेन्नृणाम्। सावधाना भत्र तोड्द्य शृण्वन्तु परयाम दा।३ स्वारोचिषेउन्तरे पूर्ण तपस्यन्तो दृढब्रताः । ऋषयो न विमारण्ये सव सिद्धनिषेवित ।४ दीर्घ सत्र वितन्वन्तो रुद्रमध्वरनायकम्। प्रीणयन्तः पर भावमश्वर्यंज्ञ तुमिच्छवः ।५ निवसन्ति स्मस्ते सर्वे व्यासदर्शनकांक्षिणः । शिवभक्तिरता नित्यं भस्मरुद्राक्षधारिणाः। तेषां भावं समालोक्य भगवान्वादरायणाः । प्रादुर्बभूव सर्वात्मा पराशरतपः फलम :७ श्री सूतजी ने कहा-हे निष्पाप मुनिवृन्द ? आप लोग समी परमधन्य एवम महार भाग्यशाली हो इसमें कुछ भी सन्देह नहींहै। तुम्हारी ऐसी दृढ़ मति कभी भो दुष्कम करने वानों की नहीं हुआ करतीहै।। हमारे परम गुरुवर्य व्यासजी ने नैमिषारण्व के निवासींमुनियोको जोउपदेगदियाथावही उपदेश में आालोगोंको श्रवणकणताहू।शयह ऐसा अद्भुन उपदेश है कि इसके श्रत्रणकरने मात्रसे ही मनुष्योंके हृद ोम मगवान् शिवकी भक्ति का सञ्चर होजाता है। आपलाग साबयातहाकर सुनें और प्रसन्नता के साथ मनमें धारणकर ३। स्वरचष मन्तनरक अन्तसमयमे समस्त सिद्धियों के प्रदान करने वाले नैभिषारण् म दढ़ब्रत धारण कर तण्श्रर्या

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ज्ञिवजी का रार्वती को मन्त्र दीक्षा देना ] [ २४२ भी यही कहतीहैऔर यहएक परम निश्चतबात है।।:॥ मैंने यह खूब देख व समझ लिया है कि आाप लोगोंने यहां एक दीर्घ याग भगदान् शिव की, जो अम्बिका के स्वामी है,उपामन आरम्भ करदीहै ।४। इमलिये मैं आप लोगों को एक परम प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ हेआस्तिको ! यह परम पचित्र उम-महेश का ही लून्दर सम्वादहै।५ पुगतनसमयमें प्रजापनिदक्ष की पुत्री जगन्मातासती ने शित्र की निन्दा सुनकर पिता यज्ञ में ही अपने शरीर का त्याग कर दियाथा।६। इसके अनन्तर अपमी तपस्या के प्रभाव से हिमाचन के यहां दूसरा जन्म ग्रहणकिया औरदेवरषि नारव केउप देश से शिव कीप्राप्ति के लिए अति उग्र निश्चलतपस्याकी थी ।७। उस हिमाचल गिरिराज ने गिरिजाका स्वयम्बर विधानकीपद्धति से शिवके साथ विवाह कर दिया ।८' उपदिष्टास्त्वया देव मन्त्राः सप्रणवा मताः । तत्रादौ श्रोतुमिच्छामि प्रणवार्थ विनिश्चतम्।९ कथ प्रणव उत्पन्नः कथ प्रणाव उच्यते। मात्रा: कति समाख्याता: कथं वेदादिरुच्यते।१० देवता कति च प्रोक्ता: कर्थ वेदादि भावना। क्िया: कतिविधा: प्रोक्ता व्याप्यव्यापकता कथम् ।११ ब्रह्माणि पश्च मन्त्र1स्मिन्कथ तिङ््त्यनुक्रमात्। कला कत्रि समाख्यताः प्रपचात्मकता कथम् ।१२ वाच्यावाचकसम्बन्ध थानानि च कथं शिव। कोत्राधिकारी विज्ञयो विषयः क उदाहृतः १३ सम्वन्धः कोऽत्र विज्ञेयः किं प्रयोजनमुच्यते। उपासकस्तु किं रूपः किंवा स्थानमुपासनम् ।१४ पार्वती ने कह है दव! आपने ओंकर के सहित मन्त्रों का उपदेश किया है।९ इप के रण से मैं सर्व प्रथम प्रगव के अर्थ के ज्ञान का प्राप्न करनेकी इच्छा रखली हूँ।३। प्रथव की उत्पत्ति किस प्रकार से हुई ? वह प्रगव'-इस नाम से क्यो त्रिख्यातहुआ? प्रणव में वस्तुनः कितनी मत्रमें

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{ श्री शिवपुराण

बाणीसे गम्भीरतापूर्वक उन ऋृषियों से कहा व्यासजी बोलेहे ऋषियो ! आपके इस यज्ञमें सबतरहसे कुशलता तो हैं न ! क्या आप लोगोंनेयज्ञपति का भली भाँति सविधि पूजन कर लिया है ।९१०। जो महेश्वर अपनी प्रिया पार्वतीके सहित इस संसारके भयसे मुक्तकर देने वाले हैं उनका इस यज्ञमें आप लोगों ने किस इच्छा से प्रेरित होकर भक्तिभावके साथ पूजन किया है ! ११। मैं ऐसाजानता हूंकि यह आण लोगोंकी प्रवृत्ति तथासेवा पहिले ही से हैं जिससेकि अब मुक्तिकी भावनासे आपने शिवकी आराधना की है।१२। महातेजके धारण करने वाले महर्षि वसजीने जब इस तरह कहा नो नैमिषारण्य के निवासी-महापराक्रमी ऋषि अत्यन्त तेज पूणं पराशरकेपुत्र तथा शिवके प्रेममें परायण महात्माव्यासजीको प्रणामकरके कहने लगे ।१३-१४। भगवन्मुनिशार्दूल साक्षान्नारायणांशज। कृपानिधे महाप्राज्ञ सर्वविद्याधिप प्रभो १५ त्वं हि सर्वजगद्भर्तुमहादेवस्य वेधसः। साम्बस्य सगणस्यास्य प्रसादानां निधिः स्वयम्। त्वत्पादाब्जरसास्वादमधुपायितमानसाः । कृतार्था वयमद्यव भवत्पादाब्जदर्शनात्।१७ त्वदीयचरणाम्भोजदर्शन खल पापिनाम्। दुर्ल भ लब्धमस्माभिस्तस्मात्सुकृतिनी वयम् १८ अस्मिन्देशे महाभाग नैमिषारण्यसज्ञके। दीर्घसत्रान्विताः सर्वें प्रणवार्थप्रकाशका: ।१९ श्रोतव्यः मरमेशान इति कृत्वा विनिश्चिता। परस्पर चिन्तयन्तः पर भाव महेशितु: ।२० अज्ञातवन्त एवैते वय तस्माद् भवान्प्रभो। खेतुमहंसि तान्सर्वान्सशयानल्पचेतसाम् ।२१ ऋषियों ने कहा हे मगवान् ! हे मुनि शादूल! हे कृपासागर। है साज्ञात् नारयणके अशसेसमुत्पन्न। हे महाप्राज्ञ ! हे समस्त विद्याओं के

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अधिपति ! हे प्रमो! आपतो सबरजगत्के स्त्रामी,सृष्टिके कश्नेवाले महादेव की माया शक्ति तथा गगोंके प्रपादके ूर्णममुद्र हैं ।१५-१६। अपके चरण कमलोंके मधुर मकरन्दके अनुाम आस्वादन के लोलुप भ्रनरके स्वरूपवाले हम सव अब्र अगपके चरणकमलके दर्शनपाकर आनन्दमत्त एग कृनकृत्यहो गये हैं ।१७। आपके चरगों के दर्शन पापेतरों के लिये बहुन ही दुर्नभ हैं। आज हमलोग उप्राप्तकर अत्यन्नही कृनकृत्य होगये।१८। हे महाभाग ! हमलोग इम समय इस नैमिषारण्में ओंकारके अनकात्रकाशक दीर्ध यज्ञ का अनुषान कररहे हैं १९। परमेश्वरको सुनना तथा जाननाकहिए ऐना विवारकर परस्रमें महेश्वरका परनभव विचारकरते हैं।२० हे प्रभो ! हम उसको मनीभाँनि नहीं जानने हैं इसलिए अवआरकीशरगगनिमेंन्रस्तुन हुए हैं। आप समर्य हैं कृता करके हमरे अध् बुद्धि वाले मनके सन्देहका निवारण कर दीजिये।२१। त्वदन्यः संशयस्यास्याच्छेता न हि जगत्त्रये। तस्मादपारगभीरत्यामोहाब्धो निमज्जत: ।२२ तारयस्व शिवज्ञानपोतेनास्मान्दयानिधे। शिवसद्भक्तितत्व्रार्थ ज्ञातु शद्धालवो वयम् ।२३ एवमभ्यर्थितस्तत्र मुनिभिवदपारग: । सर्ववेदार्थविन्मुख्यः शक्रतातो महामुनिः। वेदान्तसारसर्वंस्वं प्रणब परमेश्वरम् ।२४ ध्यात्वा हृत्मणिकामव्ये सांब ससारमोचकम्। प्रहृष्टमानसो भूत्वा व्याजहार महामुनिः ।२५ इस त्रिभुवनमें अपक अतिरिक्त अन्य कोई भी इस तरहके सन्देहका निवारण करने वाला नी है अनएव हे दपाके सागर ! आप भ्रनके समुद्र में डबते हुये हम मब्रको शित्रके ज्ञान रूनिगी नौका मे नारदीजिये। हम सबके हृदयमें शित्रकी भक्तिक नत्तको जाननकी उत्कट अभिनाष है अ उसमें परम श्रद्धा भी है ।२२-२३। उप समय वेद क ज्ञना ऋृ षे में ने इन प्रकारसे महषि आावतेकी सवता की नब से नमपूर्ण वेहों के संूर्ग

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२५२ 1 श्री शिवपुराण अर्थ के-तत्व के ज्ञाता शुकद्ेवजीके पिता महामुनि व्यासजी ने वेदान्त शास्त्र सार स्वरूप एवं ओकारके स्वरूपमें स्थित तथा संमार से विमुक्त करने वाले उमा के सहित परशेश्वर शिव का अपने हृदय कमल में व्यान करके पर्म प्रसन्न मनसे उन ऋषियोंसे कहना आरम्भकिया।२४-२५ शिवजी का पार्व ती को मन्त्र दीक्षा देना साधु पृष्टमिद विप्रा भवद्भिर्भाग्यवत्तम। दुर्ल भ हि शिवज्ञान प्रणवार्थ प्रकाशकम् ।१ येषाँ प्रसन्नो भगवान्साक्षाच्छलवरायुधः । तेषामेव शिवज्ञान प्रणवार्थ प्रकाशकम् ।२ जायते न हि सन्देहो नेतरेषामिति श्रतिः। शिवभक्तिविहीनानाममिति तत्वार्थनिश्चय।३ दीर्घसत्रेण युष्माभिर्भगवानम्बिकापतिः। उपासित इतीद मे दृष्टमद्य विनिश्चतम्।४ तस्म द्वक्ष्यामि युष्माकमितिहास पुरातनम्। उमामहेशसंवादरूपपद्भुतमास्तिकाः ।३ पुराऽखिलजगन्माता सती दाक्षायणी तनुम्। शिवनिन्दाअसगेन त्यक्त्वा च जनकाध्वरे।६ तपः प्रभावात्सा देवी सुताऽभूद्धिमकद्गिरेः। शिवार्थ मतपत्सा वै नारदस्योपदेशतः ।७ तस्मिन्भूधरवर्यें तु स्वय वरविधानतः। देवेश च कृतोद्वाहे पार्वती सुखमाप सा ।८ महर्षि व्यासजी ने कहा हेमहान् भाग्य वाले ब्राह्मणो ! आपलोगों ने इस समय बहुतही अच्छाप्रश्न पूछा है। प्रणवके अर्यका प्रकाशक शिव का ज्ञान समारमें अत्यन्त दुर्लभ है।१ जिनके ऊपर त्रिशूल धारण करने वाले भगवात् शिवकी कृपाहोती है उन्हींको प्रणवके अर्थकाप्रकाश करने वाला शिबका ज्ञान प्राप्तहोताहै।२। इपमे कुछभी सन्देह नहीं है कि शिव के ज्ञानका प्रकाश शिवकी भक्तिसेरहित नीत्रोंकोकमीनहीं होता है। श्रति

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करने वाले ऋषिगण यज्ञों के स्वामी रुद्रदेव का एक सहस्त्र वर्ष में पूर्ण होने वाला यज्ञ करने में प्रवृत्त हो गये और ऐश्वर्य के जानने की इच्छा से भावनःपूर्वक प्रजाम किया ॥४५॥ महषि व्यासजी के दर्शन पाने की इच्छा से वे वहाँ निवास करने लगे और शिव-भक्ति में परायण होकर मस्म तथा रुद्राक्ष की माला धारण करने लग गये ।। ६॥ उन समस्त ऋषियों की प्रीति मावना को समझकर भगवान् व्यासजी जोकि नारायण के अंश से उत्पन्न समस्त जगत् के गुरु,पराशरऋषि के तपस्या के फल स्वरूप और सर्वात्मा हैं, वहाँ साक्षात् प्रकट हो गये।।७।। तं दृष्टवा मुनयः सदें प्रहृष्टवदनेक्षणाः। अम्युत्थानादिभि: सर्वरुफ्चाररुपाचरन् ।८ सत्कृत्य प्रददुस्तस्मै सौवर्णं विष्र शभम्। सुखोपविष्टः स तदा तस्मिन्सौवर्णविष्टरे। प्राह गम्भीरया वाचा पाराशर्य्यो महामुनि :९ कुशलं कि नु युस्माकं प्रब्र तास्मिन्महामखे। अरजितः किं नु युष्माभिः सर्म्यगध्वरनायक ।१० किमर्थ मत्र युष्माभिरध्वरे परमेश्चरः। स्वचितो भत्तिभावेन साम्बः संसारमोचकः ।११ युष्मत्प्रवृत्तिर्मे भात्ति शश्र षाऽपूर्व मेव हि। परभावे महेशस्य मुक्तिहेतोः शिवस्य च २ एवमुक्ता मुनीन्द्रेण व्यसेनामिततेजसा। मुनया नेमिषारण्यवासिनः परमौजसः।१३ प्रणिपत्य महात्मानं पराशय महामुनिम्। शिवानुरागसहृष्टमानस च त ब्रवन्।१४ उनका दर्शनकर मुनियों के मनमें और नेत्रों में अत्यन्त आनन्द हुआ और उनका आगे बढ़कर स्वागत सत्कार करते हुए सबने पूजन किया 1७।वहाँ सबमुनिगण ने महर्षिव्यासजी कोविराजमान करनेवे लिए सुवर्ण निर्मित्तआशन दिया।उसहेमासनपर बैठकर महामुनिव्यासजीनेअपनीपरममधूर

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२५४ ] [श्री शिवपुर ण होही हैं ? वह िनने वेहके आदि में कहा जाता हैं।१०। प्रगत्रके कितने देवता होने हैं। किन रोतिसे वेद आदि की भावना की जाया करती है। क्रियायें कितने प्रकार की होती हैं और इसकी व्यापव्यारकता किस प्रकार से होनी।११। इन आपके उपदिष्ट मन्त्रों में अनुक्रम से किस तरह पाँच ब्रह्म स्थिारहा करते हैं। कलायें कितनीहोतीहैं और प्रपञचात्मकता का क्या स्वरूप है।१२। हे शि! वाच्य-वाचर का सम्बन्ध और स्थान किस रीति से हाता है। आप यह बतानेकी कृताहरें कि इसका अधिकारी कौन है और बिना काा है ।१३। हे महश्वर ! कृशकर यह समझाइये के इपका सम्बन्ध और त्रगेजन क्या है। यहमी बताइये कि इसका उपासक केक्षा व्यक्ति होता हे और आसवा करनेका स्थान कौनसा उचित होना हैं॥१ ४।। उपास्यं वस्तु किरूप किंवा फनमुपासितः। अनुष्ठानविधि: कोवा पूजास्थान च कि प्रभो ।१५ पूजायां मण्डल किंवा किंवा ऋष्यादिक हर। न्यासजापविधि का वा को वा पूजाविधिक्रम।१६ एतत्सर्व महेशान समाचक्ष्व विशेषतः। श्रोतुमिच्छामि तत्वेन यद्यस्ति मयि ते कृपा ।१७ इतिदेव्या समापृष्ठो भगवानिन्दुभूषणः । तां प्रशस्य महशानी वक्तु समुपचक्रमे ॥१८ इसकी उपास्य वस्तु किस प्रकार की होरी है और इनकी नवसना करनेवालेको का फन मिनाकरता है। इसके अनुडानरुरनेकी तरिधिक्याँ होनी है और पूजाका कौन सा उायुक्त स्थन हुआ करना है ।१५। इसकी पूज केमण्डन और उनके ऋषपरादिैा होने हैं उसके न्यास आदि करने की विधि किस प्रकार की होनी है और उपका क्रम कया होना है।१६। हे शिव! यदि आप मुझरर वर्णकप रखने है तो मेरे सानने यह सबवर्णन कीजिए। मेी तत्तरोंके विषयों में श्रा कगने की बातही तीव्र अभिलाषा

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है।"७। जगदम्बा पार्वतीने यहेश्वरसे इस तरह बहुत-सी बातेंपूछी तो महादेवजी पार्वरतीके प्रश्नोंक सुनकर उनकी प्रशंसा करतेहुए कहो लगे।१८ ओ्ंकार का स्वरूप तथा विरजा होम विधि श्रणु देवि प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि। तस्य श्रवणमात्रेण जीवः साक्षाच्छिवो भवेत् ।१ प्रणपाथंपरिज्ञा मेव ज्ञान मदात्मकम् 1 बीज तत्सर्वविद्यानां मत्रं प्रणवनामकम्। अतिसूक्ष्म महार्थ च ज्ञेय तद् वटबीजवत्। वेदादि वेदसारं च मद्र पं च विशेषतः।३ देवो गुणत्रयातीत सर्वज्ञः सर्वकृत्प्रभुः । ओमित्येकाक्षरे मंत्र स्थितोऽहं सवगःशिवः।४ यदस्ति वस्तु तत्सव गुणाप्राधान्ययोगतः। समस्त व्यस्तमपि च प्रणवारथ प्रचक्षते ५ सर्वार्थ साधक तस्मादेक व्रह्म तदक्षरम्। तेनौमिति जगत्कृत्स्नं कुरुते प्रथम शिवः ।६ शिवो वा प्रणवो ह्यष प्रणवो वा शिवःस्म त। वाच्यवाचकयोर्भेदो नात्यंत वित्तते यतः।७ शिवजीने कहा हे देवि ! तुमने जितनी भी बातें पूछी हैं वह तुमसे सब कहता हूँ। इनके श्रवण करने मरसे ही यह जीवात्मा साक्षात् शिवके स्वरूप को प्राप्त कर लेता है ।१। प्रण वका अर्थ जान लेना ही मेरा ज्ञान प्राप्तकरा देता है, वहमन्त्र समस्त दिद्याओंका बीज होता हैं।२वह प्रणव वटका वृक्ष और उसके बीजके तुल्य महान् सूक्ष्म तथा बहुतही स्थ लहोता है। वही प्रणव वेदकाआदि सारतया मेरा रूपहोता है।३। वहीदेव तीनों गुणों से परे-सर्वज्ञ और सबका सृजन करने वाला है ऊ'-इस अक्षर वाले मन्त्र में सवंगत शिवजी विद्यमान रहते है।४। यह जो कुछभी वस्तुहै वह सवगुण और प्रधानके सयोगसे सतस्तसमष्टिरूप विराट् और व्यष्ठि स्वरूप स्थावर जङ्ङगमात्मक प्रणव का अर्थही होता है ।५। इस कारण से वहएक

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२५६ J (श्री शिवपुराण अक्षर वाला ब्रह्मही सम्पूर्ण अर्थ का साधक है। इरी सर्वार्थ साधकता से ॐ ऐसे आकार वाले प्रणवसे भगवान महेश्वर सर्वप्रथम इस समस्त जगत् का निर्माण किया करते हैं ।।६।। भगवान् शिव प्रणव स्वरूप हैं और प्रणव साक्षात् शिव स्वरूप हैं। वाच्यार्थ और उसके वाचक में कुछ भी भेद नहीं होता है।७। तस्मादेकाक्षर देवं माँ च ब्रह्मर्वेयो विदुः। वाच्यवाचः कयोरक्य मन्यमाना विपश्चितः ।८ अतस्तदेव जानीयात्प्रणव सर्वकारणम्। निर्विकारी मुमक्षर्मां निर्गुण परमेश्वरम् ।९ एनमेव हि देवेशि सर्वमन्त्रशि रोमणिम्। काश्यामहं प्रदास्यामि जीवानां मुक्तिहतवे ।१० तत्रादौ सम्प्रवक्ष्यामि प्रणवोद्धारमम्बिके। यस्य विज्ञानमात्रण सिद्धिश्च परमा भवेत् ।११ निवृत्तिम द्धरेत्पूर्व मिन्धन च ततः परम्। काल सम द्धरेत्पश्चाद्दण्डमीश्वरमव च।१२ वर्णपञचकरूपोऽयम व प्रणवउद्ध तः। त्रिमात्रबिन्दुनादात्मा मुक्तिदो जपतां सदा ।१३ ब्रह्मादिस्थावरान्तानां सर्वेषां प्राणिनां खलु। प्राणः प्रणव प्रवाय तस्मात्प्रणव ईरितः ॥१४ इसी कारण से व्रह्म ऋषि गुरु को एकाक्षर स्वरू कहा करते हैं। बाच्य और बाचक की एकता को मानते हुए जो विद्या होते हैं, मैं भी उन्होंके द्वारा प्राप्त होनेवाला होताहूँ।८ हे परमेश्वरि। इसलिये प्रणव को सबका कर्त्ता माननाचाहिए। जो मुसुक्षु या मुक्तहोतेहैं वे निर्गुणपर- श्वरको निर्तिकार अर्थात् समस्त विकृतियों से रहित ज्ञानतेहैं , ९ हे देव। काशीमें अपना प्राणत्याग करनेत्रालेप्र णियोंकोअन्यममयमें मैं इस समस्त मन्त्रों के शिरोमणि ओंकारक ही उपदेशकियाकरताहूँ ।१०। हे अम्बिके। मैं अब तुम्हारे सामने सबसे पहिले बवके उद्धारकोतणनकरता हू जिसके

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विज्ञान मात्रसेही परम सिद्धि प्राप्त हुआकरती है ।११। सर्वप्रथम ओङ्कार में अकारके आश्रित निवृत्ति कलाका उद्धारकरना चाहिए। उकारमें ईधन कलाका-मकारमें काल कलाका -- नाद में दण्ड कलाका और बिन्दुमें ईश्वर कलाका उद्धारकरना चाहिए ।१२। इस रीतिसे उक्त पाँचवर्णोंके रूपवाले प्रणव का उद्धार होता है। यह प्रणव तीन मात्रा और बिन्दु नाद स्वरूप जपने वालोंको महामुक्ति प्रदान करने वाला होता है।१३। ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त यह सम्पूर्ण प्राणियोंका प्राण होता है, इसी से इसका नाम 'प्रणव'-यह होता है।१४। आद्य वर्णमकार च उकारमुत्तरे तनः । मकार मध्यतश्चैव नादांतं तस्य चोमति ।१५ जलवद्वर्णमाद्य तुदक्षिणे चोत्तरे तथा। मध्ये मकार शुचिवदोंकारे मनिसत्तम ।१६ अकारश्चाप्युकारोजय मकारश्र त्रयं क्रमात्। तिस्रो मात्रा: समाख्याता अर्द्ध मात्रा ततः परम् :१७ अर्द्ध मात्रा महेशानि बिन्दुनास्वरूपिणी । वर्णनिया न वै चाद्धा ज्ञया ज्ञानभिरेव सा ।१८ ईशान: सर्वविधानामित्याद्याः श्रतयः प्रिये। मत्त एव भवन्तीति वेदाः सत्यां वदति हि ।१९ तस्माद् वेदादिरेवाहं प्रणवो मम वाचकः। वाचकत्वान्ममैषोऽपि वेदादिरिति कथ्यते ।२० अकारस्तु महद् बीज रजः स्रष्टा चतुमुख। उकारः प्रकृतिर्योनिः सत्वं पालयिता हरिः ।२१ अकार, उकार और मकार के क्रमसे से तीन मात्रा और पीछे आधी मात्रा होती है। इस तरह से 'ओम' होता है।१५। हे पार्वति। यह जल के तुल्य दक्षिण-उत्तरमें स्थित है। हे मुनिश्रेष्ठ ! इसकेमध्यमें मकारहोता है। इस तरह से इस ओंकार की स्थिति होती है ।१६। हे महेशानि ! अकार, उकार और मकार ये तीननात्रायें है इसके पीछे आधी मात्रा होती

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२५८ ) ( श्री शिवपुराण है।१७। हे परमेश्बरि ! वह आधी मात्राही नाद विन्दु स्वरूप वाली है। यहाँपर ईशान :: सर्व विद्यानां ईश्वरःसर्वभूतानाम्'और' यो वे ब्रह्माण विद- धाति पूर्वम्' इत्यादि श्र तिवचन प्रमाणहोते हैं ।१८। ये सब मुझसेही होते हैं, वेदोंने यह बात बिल्कुल सत्य प्रतिपादित की है ।१९। इस कारणसेवेद के आदिमेंओंकार त्मक भी मैं ही विद्यमान रहा करता हू। ओंकार मेरा वाचक होने से वेद के आदि मे कहा जाता है २०। अकार इसका महान् बीज है। इसी के रहोगुण से ब्रह्मा हुआ करते हैं। उकार उसकी प्रकृति योति है। सत्व गु के पालन करने वाले हरि होते हैं।२१। मकार: पुरुषो बीजी तमः संहारकोहरः । विन्दुर्महेश्वरो देवस्तिरोभाव उदाहृतः ।२२ नादः सदा शिव प्रोक्तः सर्वानुग्रहकारकः । नादमूद्ध नि सचिन्त्य- परात्परतर शिवः ।२३ स सर्वज्ञ सर्वकर्त्ता सवंशो निर्मलोऽव्ययः । अनिर्देश्यः परब्रह्म साक्षात्सदसतः परः ।२४ अकारादिषु वर्णेषु व्यापक चोत्तरोत्तरम् । व्याप्यं त्वधस्तन वर्णमेव सर्वत्र भावयेत् ।२५ सद्यादीशानपर्यतान्यकारादिष पञ्चस्। स्थितानि पञ्च ब्रह्माणि तानि मन्मूर्त्तयः क्रमात् ।२६ अष्टौ कला: समाख्याता अकारे सद्यजाः शिवे। उकारे वामरूपिथ्यस्त्रयोदश समीरिताः ।२७ अष्टावघोररूपिण्यो मकार संस्थिता कलाः। बिन्दौ चतस्र संभूता कला पुरुषगोचराः ।२८ इस मे मकार पुरुष बीज होता है। इसके तमोगुणसेयुक्त सृष्टिकेसंसार करनेवालेशिव हैं। बिन्दुम्वरूप साक्षात्महेश्वरदेव हैं,उससे पिरोभावहोता है ।२२। नाद स्वरूप सबके अनुग्रह करने वाले साक्षात् शिव हैं। नाद का मस्तकमें विचारकरवे ही वहाँ शिवध्यान करनेके योग्यहोते हैं। वे परात्पर मगल स्वरूप वाले हैं ॥२३। वे सर्वज्ञ हैं, सबके कर्त्ता -- सबके स्वामी -

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ओंकार का स्त्ररूप तथा विरजा होम विधि ] [ २५९ निर्मल-अविनाशी और अर्द्वैत हैं। निर्देशनकरनेमें अयोग्य सतुआसनसे भी परे साक्षान् परब्रह्म है।२४। अकार जिनके आदिमें है उन सब अक्षरों में क्रमसे व्यापक हैं,अकारकी अपेक्षा ओंकार व्यापक है, उकारसे अकर वर्ण नीचेके भागमें व्याप्त है। इसी तरहसे इनवणोंमें भी भावना करनीचाहिए ।२५।अकारादि पाँचवर्णोंमें ब्रह्मके स्वरूप वाले सद्य :- वाम देव घोर-पुरुष ईशान हैं वे सब क्रमसे से मेगे ही मूर्तियाँ हैं, २६। सद्य :- इससे होने वाले अकारके स्वरू शिवमें आठकलाओं का वर्णन कियागया है और उकार में वाम देव रूप तेरह कलाये हैं।२७। मकार में अघोर रूपिणी आठ कलायें विद्यमान हैं और बिन्दुमें पुरुष गोचर चार कलायें होती हैं।२८। नादे पंच समाख्याताः कला ईशानसभवाः। षड्विधैक्यानुसंधानात्प्रपचात्मकतोच्यते ।२९ मन्त्रो यन्त्र देवता च प्रपचो गुरुरेव च। शिष्यश्र षट्पदार्थानामेषामर्थं श्रणु प्रिये ।३० . पचवर्णसमष्टिः स्यान्मन्त्रः पूर्वमुदाहृतः । स एव यंत्रतां प्राप्तो वक्ष्ये तन्मण्डलक्रमम् ।३१ यन्त्र तु देवमारूप देवता विश्वरूपिणी । विश्वरूपो गुरुः प्रोक्त शिष्यो गुरुवपु स्मृत ।३२ ओमितीद सर्वमिति सर्वं ब्रह्मेति चशते। वाच्यवाचकसम्बन्धोऽप्ययमेवार्थ ईरितः ।३३ आधारो मणिपूरुश्र हृदय त ततः परम्! विशुद्धिराज्ञा च ततः शक्तिः शान्तिरिति क्रमात् ।३४ स्थानान्येतानि देवेोशि शान्भितीत परात्परम्। अधिकारी भवेद्यस्य वैराग्य जायते दृढम् ।३५ नादमें ईशान स्वरूपवाली पाँचकलाये स्थित हैं। आगे बताये जानें वाले छःपदार्थोंकी एकताके अनुसन्धानसे प्रणवकी प्रपञ्चात्मकता होती है ।।२९।। मंत्र-यंत्र-देवता विश्व और गुरु तथा शिष्य ये छै पदार्थ होते हैं। हे प्रिये ! अब मैं इनका अर्थ बतलाता हूँ उतको तुम श्रवण करो ।३०।

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२६० 3 ( श्री शिवपुराण

पूर्वक्त यह प्रण वमात्र पाँचवर्णोंकी सदष्टिस्वरूपहै। वही मंत्रकीस्वरूपता को प्राप्तकर लिया करता है अब उसके मण्डलका क्रम बतलाया जाता है ।३१। यन्त्र देवता रूप हैं, देवता विश्व रूप हैं और विश्वरूप गुरु है तथा शिष्य-गुरु का ही एक शरीर है।३२। 'ओमितीद सर्वम्' इसका अर्थ यह होता हैकि यह सब ओंकारस्वरूपही है-ऐसा श्रति कहती है वाच्य-वाचक के सम्बन्धका यही अर्थ होता है।३३। अब स्थान बतलाते हैं-आधार- मणिपुर-हृदय-विशुद्धि चक्र-आज्ञा चक्र-शक्ति और शान्त कला ये क्रम से स्थान बतलाये गये हैं।३४। हे देवि ! शान्त्यतीत को ही परात्पर कहा जाता है। जिसको दृढ़ वैराग्य हो जाता है वही इसका योग्य अधिकारी होता है ।६३। विषयः स्यामह देवि जीवब्रह्म क्यभावनात्। सम्यन्ध शृणु देवेशि विषयः सम्यगीरितः ।३६ जीवात्मनोम या साद्ध मैक्यस्य प्रणवस्य च। वाच्यवाचकभावोऽत्र सम्बन्धः समुदीरितः ।३७ व्रतादिनिरतः शान्तस्तपस्वी विजितेन्द्रियः। शौचाचारसमाय क्तो भूदेवो वेदनिष्ठित: ।३८ विषयेषु विरक्तः सन्न हिकाम ष्मिकेषु च । देवानां ब्राह्मणोऽपीह लोकजेष शिवव्रती ।३९ सर्वशास्त्रार्थतत्वज्ञ वेदान्तज्ञानपारगम् । आचार्यमपसंगम्य यति मतिमतां वरम ।४0 दीर्घ दण्डप्रणामाद्यस्तोषयेद्यत्नयः सुधीः । शांतादिगुणसंयुक्तः शिष्यः सौसील्यवान्वर ।४१ यो गुरु स शिवः प्रोक्तो य शिव स गुरु स्मृतः। इति निश्चत्य मनसा स्वविचार नित्रेदयेत् !।४२ हे देवि! मैं ही इसका विषय हुँ। जीव ब्रह्मकी एक भावना करनी चाहिए। हे देवि ! विषयको बतलादियागया अब सम्बन्धको श्रवणकरो ! ।३६। मेरे समेत जीवत्मा की प्रणव की एकता होती है। यहाँ बोध्य

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ओंकार का स्वरूप तथा विरजा होम विधि ] [ २६१

बोधक भावहोता है अर्थात् जीवात्मा और ब्रह्मकी एकताका बोधकप्रणव होता है यही सम्बन्ध है।७। व्रत आटिने तत्पर, शान्त तपस्वी,जितेन्द्रिय पवित्र आचरण वाला, ब्राह्मण,वेदमें निष्ठा रखने वाला,विषयोंसे विरक्त, लोक एवं परलोककी च्छासे दीन देवता और ब्राह्मण में भक्तिरखनेवाला, शिव व्रतको धारण करने वाला,सम्पृर्ण शास्त्रार्थके तत्व का ज्ञाता, वेदान्त ज्ञानके पारगामी यति, श्रष्ट बुद्धि वाला पुरुष आचार्य के पास जाकर दीर्घ दण्डके समान प्रणामकरे और यत्नपूर्वक आचार्यको पूर्णरूपसे सन्तृष्ट करे और शान्ति प्रभृति गुणों चे युक्त,शीलवान तथा शक्ति आदि गुण से यूक्त, बुद्धिमान् शिष्यको ऐसा जानना चाहिए कि जो ग रुदेव हैं सो साक्षात्शिव ही हैं और साक्षातशिव हैं वहीगृरुदेव हैं ऐसा अपनेमनमें सूदृढ़निश्चय करके ही पीछे उनमे अग्ना विचार निवेदित करें। ३ -- ३९-४०-४१-४२। लब्धानुज्ञस्त गरुणा द्रादशाहं पयोव्रती । सम द्रतीरे नद्यां च पर्वते वा शिवालये ।४३ श क्लपक्षे तु पचम्यामेकादश्यां तथारि वा। प्रातः स्नात्वा त शद्धात्मा कृतनित्यक्रिय सुधीः ।४४ गरुमाहुय विधिना नान्दीश्राद्ध विधाय च। क्षौर च कारियत्याऽथ कक्षोपस्थविवर्जितम।४५ केशरमश्र नखानां वै स्नात्वा नियतमानस। सक्त प्राश्याथ सायाह्न स्नात्वा स ध्याम पास्य च। सायमौपासनं कृत्वा गरुणा सहितो द्विजः । शास्त्रोक्तदक्षिणा दत्या शिवाय गरुरूपिणे :४७ होमद्रव्याणि सपाद् स्वसूत्रोक्तविधानतः । अग्निमाधाय विधिवल्लौकिकादिविभेदतः ।४८ अपने गुरुदेवकी आज्ञा प्राप्तकर बारह दिन पर्यन्त पयोव्रत करे अर्थात केवलजल का पान करके रहे। समुद्र तट पर अथवा पर्वत की चोटी या गुफा में किम्बा शिला पर निवास करे।४३। बुद्धिमान शिष्य को चाहिए

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२६२ । श्री शिवपुराज मासके शुक्ल पक्षका पञ्चमी अथवा एकादशीकेदिन परमपवित्र मनसेप्रातः कालमें नित्य क्रिया के उपरान्त स्नान करे।४४। फिर अपने गुरुदेव को बुलाकर विधि-विधानके सहित नान्दीमुख श्राद्धकरके बगल तथा उपस्थको छोड़कर क्षौर कर्मकरावे ।४५। माथेके केश,दाढ़ी-मूछ और नाखूनोंको दूर कराके जितेन्द्रिय रहते हुए स्नानकरके सायंकशलीन सन्धयोपासनाकरे।४६ सतूका आहारकरे औरफिर स्नानकर सन्ध्याकर्मकरे। इसतरह गुरुकेसहित ब्राहमण सन्ध्याकालकी उपासनाकरके शिवस्वरूप अपने गुरुदेवकी सेवा में वस्त्र और दक्षिणादेनी चाहिए।४। जोभी अपना सूत्र हा उसकी विधिके अनुसार होम द्रव्य लेकर विधि पूर्वक लौकिक आदिके भेदके साथ अम्न्या धान करना चाहिए ॥४द।। आहताग्निस्त यः कुर्यात्प्राजापत्येष्टिनाहिते। श्रौते वैश्वानरे सन्यक् सर्ववेद सदक्षिणम ।6९ अथाग्निमात्मन्यारोप्य ब्राझ्मणः प्रव्रजेद गृहात। श्रपयित्वा चरु तस्मिन्तमदन्नाज्यभेदतः ।५२ पौरुषेणैव सूक्तेन हुत्वा प्रत्य चमात्मवान्। हुत्वा च सौविष्टकृतीं स्वसूत्रोक्तविधानतः ।५४ हुत्वोपरिसात्तन्त्र च तेनाग्नेरुतरे बुधः । स्थित्वासने जपेन्मौनी चैलाजिनकुशोत्तरे। याबद् ब्राह्मसहुत त गायत्रीं दृढमानस: ।५२ ततः स्नात्वा यथापूव श्रपयित्वा चरु तत। पौरुष सूक्तमारभ्य विराजातं हुनेत बुधः :५३ वामदेवमतेनापि शौनकादिमतेन वां। तत्रं म र्य वामदेव्य गर्भयुक्तो यतो म नि:।५४ होमशेष समाप्याथ प्रातरौपासन हुनेत्। ततोऽग्निमात्मन्यारोप्य प्रातः सन्ध्याम गस्य च ।५५ सवितयुं दिते पश्चात्मावित्रीं द्राविमेत्क्रमात् एषणानां त्रयं त्यक्त्ता प्रेषम् च्चार्य च क्रमात् ।५६

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ओंकार का स्वरूप तथ विर्जा होम विधि । [ २६३ जो कोई अहिताग्नि प्राज्ञापत्य यज्ञ के अनुसार हवन कर चुकता है उसकोचाहिए अपने सर्वस्वधन की दक्षिणदेकर इस वेदोक्त वैश्वानर अग्नि को आत्मा में धारण कर ब्राह्मणको घरसे निकलकर संन्यामी हो जाना चाहिए। समिधा-अन्न और घृतयुक्त चरुलेकर पुरुषसूक्तके एकमत्रसे हवन कना चाहिए। इसके पश्चात् अपने सूक्तके व्िधानसे स्विष्टकृत सम्बन्धित आहुतियों से हवन करे ।४९-५०-५१। तन्त्र के आगे उत्तर दिशाकी तर्फ आसनपर बैठकर जोकि कुआका आसन होन।चाहिए स्वयं मृग चमं धारण करे,जब तक ब्राह्म मुहूत रहे तबतक मनकी पूर्ण दृढ़ताके साथ गायत्री का जाप करना चाहिए ।५२। इसके अनन्तर पुनः स्नान करके चरुका निर्माण करे और पुरुष सूक्तसे आरम्भकर विरजा होम पर्यन्त आहुतियाँ देवे।५३। चामदेव या शौनक मन्त्रसे हवनकरे। इनमें वामदेवका मतश्रेष्ठ है क्योंकि इसका कारण यही है कि यह महापुरुष गर्भ में स्थित ही मुक्त होकरफिर जीवन्मुत्त रहते हुए विचरण करते रहे हैं।५४। इसके पश्चात् शेषहवनको पूरा करे और फिर गतः कालीन उपासनाका हचन करना चाहिए। इसके पश्चात् पुनः अग्निको अपनी आत्मामें आरोपित कर प्रातःकालकी सन्ध्यो- पासना करनी चाहिए ।५५। लोकेषणा अर्थात् लोकमें मानादि की इच्छा रखना.वित्तषणा और पुत्रेषणा इनतीनोंका त्याग करके सूर्यके समुदित हो जानेपर क्रमपूर्वक गायत्रीका जपकरना चाहिए फिर क्रमसे प्रेषका उच्चा- रण करे ।५६ शिखोपवीते संत्यज्य कटिसूत्रादिक ततः । विसृ्य प्राड़मुखो गच्छेदुत्तराशामुखोऽपि वा ।५७ गृहणोयाद्दण्डकौपीनाद्युचिवृत लोकवर्तने। विरत्तश्चेन्न गृहणीयाल्लोकघृत्तिविचारिणे ५८ गुरो: समीपं गत्वाजथ दण्डवत्प्रणमेत्त्रयम् । समुत्थाय ततस्तिष्ठेद्गुरुपादसमीपतः ।५९ ततो गुरु: समादाय विरजानलजं सितम् । भस्म तेनैव तं शिष्य समुद्धूल्यं यथाविधि ।६०

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२६४ श्री शिवपुराण अग्निरित्यादिभिमंन्त्र स्त्रिपुण्ड धारयेत्ततः। हृत्पङ्गजे समासीन मां त्वया सह चिंतयेत् ।६१ हस्त निधाय शिरसि शिष्यस्य प्रीतमानसः। ऋृष्यादिसहित तस्य दक्षकर्णे समुच्चरेत् ।3२ प्रणवं त्रिप्रकार तु ततस्तस्यार्थ मादिशेद् । षड विधार्थ परिज्ञानसहित गुरुसत्तमः ।६३ इसके पश्चात् अपनी शिखा (चोटी), उपवीत (जनेऊ) और कटिसूत्र आदि सबको छोड़कर पूर्व या उत्तर दिशाका गमनकर चने जाना चाहिये ।५७। लोककी वृत्ति (व्यतरहार) के निभानेकेलिये केवल एक कोपीन और एकदण्डका ग्रहणकरे और यदि पूर्ण विरक्तिरें लोकवृतिकी कठिनाईप्रतीन होती होतो इनका विचारकर त्यागकर देना चाहिए ।५८। अने गुरुदेवके निकट पहुँचकर भूमिमें पतित दण्डके तुल्यगिरकर प्रणामकरे और उठकर श्री गुरुदेवके चरणोंमें स्थित होजावे ।५९। उससमय गुरुशव विरजाआग् से समुत्यन्न श्वेत मस्म उस समय शिष्य के शरीर में मलहर 'अग्नि रिति मस्म' -'वायु रिति भस्म' इत्यादि मन्त्रोंसे भहमसे तिलक करावें और फिर आपके सहित मेरा अर्थात् शिव और पार्वती का ध्यान करना चाहिए । ।६०-६१। हसके पश्चात् गुरुदेव प्रसन्न चित्तने शिष्यके मस्तक पर अपता हाथ रखकर ऋषि आदि का स्मरण कर उसके दाहिने कान में मन्त्र का उच्चारण करें ।६२, सूक्ष्म स्थूल आदि प्रणव, जो पहिले तीन प्रकार के बताये जाचुके हैं, उसका और उस प्रणवके अर्थका उपदेश करना चाहिए। शिष्यको उस समय छ प्रकारके प्रणवका ज्ञान प्राप्त करनेके जिये दण्डवत् करनी चाहिए ।५३। द्विषट्प्रकार स गुरुप्रणम्य भुवि दण्डवत्। तदधानो भवेन्नित्य वेदान्त सभ्यगभ्यसेत् ।६४ मामेव चिंतयेन्नित्य परमात्मानमात्मनि । विशुद्ध निर्विकार वै ब्रह्मसाक्षिणमव्ययम् ।६५ शमादिधर्मनिरतो वेदान्तज्ञानपारगः अत्राधिकाही स प्रोक्तो यतिर्विगतमत्सरः ।६६

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पूजा स्थान में मण्डल रचना विधि [ २६५ हृत्पुण्डरीकं विरज विशोक विशद परम् । अष्टपत्र केसराढयं कर्णिकोपरि शोभितम् ।६७ आधारशक्तिमारभ्य त्रितत्वान्तमय पदम् । विचिन्त्य मध्यतस्तस्य दहरं व्योमभावयेत् ।६८ ओमित्येकाक्षर प्रह्म व्याहरन्मां त्वया सह। चिंतयेन्मध्यतस्तस्य नित्यमुद्य क्तमानसः ।६९ एवं विधोपासकस्य मल्लोकगतिमेव च । मत्तो विज्ञानमासाद्य मत्सायुज्यफलं प्रिये ।७० इस तरहु बारह प्रकारसे गुरुदेवको प्रगाम करे औरफिर सदा गुरुदेव की अधीनता में रहकर नित्य प्रति वेदान्तका अभ्यास करना चाहिए।६४। सदा अपनो आत्मा में मुझ परमात्माका ध्यान करते रहना चाहिये जोकि विशुद्ध विना विकारोंवाला शुद्ध अविनाशी हैं।६५। शम-दम आदिकेधर्ममें विशेष रूपसे रति रखताहुअ वेदान्त दर्शनशास्त्रका पारगामी होकर अभि- मानसे एकदमरहित रहतेहुए जो रहता है वही यतिकहलाता है और ऐसा यति पुरुषह़ी इसका अधिकारी भी होता है।६६। हृदय पुण्डरीकमें विराज- मान, परम स्वच्छ शोक नहित अति उज्ज्वल अष्टदल कमलके तुल्य,मकरन्द से युक्त कर्णिका से शोभित हृदय-कमलके मध्यमें आधार शक्तिसे आरभ्भ करके मणिपूरक हृदयके तत्वान्तमय आधारका विचारकर उस समय दहर प्रकाश की भावना करनी चाहिए ।६७-६८। 'ॐ इस एकाक्षर मन्त्रका उच्चारण आपकेसहित मेराअत्यन्त उत्कण्ठाकेसाथ स्मरणकरता हुआ उस दहरा प्रकाशके मध्यमें नित्वही मेंरा स्मणकरता रहे ।६९। हे परम प्रिये ! इस विधिसे मेरी उपासतो करते रहनेव्राने पुरुषको मेरेलोककी प्राप्ति हुआ करती है और वह मुझसे ज्ञान प्राप्तकर अन्तमें मेरेही सायुज्य मोक्ष पदकी प्राप्ति किया करता है ।७०! पूजा स्थान में मण्डल रचना विधि परीक्ष्यं विधिवद्भूमि गंधवर्णरसादिभिः । मनोभिलषिते तत्र वितावितताम्बरे ।१

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२६६ श्री शिवपुराण

सुप्रलिपे महीपृष्ठ दर्पणोदरसन्निम । अरत्नियुग्ममानेन चत रस्त्र प्रकल्पयेत् ।२ तालपत्र समादाव तत्समायामविस्तरम् । तस्मिन्भायान्प्रकुर्वीत त्रयोदशसमां कलाम्३ तत्पत्र तत्र निःक्षिप्य पश्चिमाभिमुखः स्थित। तत्पूर्वभागे सुदृढ़ सूतमादाय रजितम् ।४ प्राक् प्रात्यग्दक्षिणोदक् च चत दिशि निपातयेत्। सूत्राणि देवदेवेशि नवशष्टयुत्तर शतम् ।५ कोष्ठानि स्युस्ततस्तस्य मध्य कोष्ठ त कर्णिका। कोष्ठाष्टकं बहिस्तस्य दलाष्टकमिहोच्यते ।६ दलानि श्वेतवर्णानि समग्राणि प्रकल्पयेत् । पीतरूपां कर्णिका च कृत्वा रक्तं च वृत्तकम् ।७ श्री भगबान् शिवने कहा-गन्ध, वर्ण, रस आदिसे पृथ्वीकी भली-भाँति परीक्षाकरके फिर अपने मनकी अभिलाषा के अनुसार जोभी परम अभीष्ट एवं सुन्दर हो वैसा एक वितान (चन्शेवा) वहाँ तानना चाहिये ।१। वहाँ भूरमिको लीपकर दर्पणके समान एकदम चिकनी बनादेवे। दो हाथकेबरा- बर चार अस्त्र चौकोर स्थानके मण्डपकी रचना वहाँ करे२। फिर ताल- पत्नोंसे उमीकेसमान लम्बे तथा चौड़ेस्थानमें बराबर तेरहमाग करनेचाहिए ।३। उस चतुरस्त्र मण्डलमें उस पत्रको रखकर फिर स्वयं पश्चिम दिशाकी ओर मुखकरके स्थित ह वे और उसके पूर्व भागमें कलायेसे पूर्वसे दक्षिण- उत्तरके क्रमसे चौदह डोरे वहाँ रखने चाहिए। हें देवि ! ऐसा करने पर उस कोषठमें एक सौ उनहत्तर कोठे बन जाँयगे ।४-५। कोष्ठोंके मध्य में जो कणिका है उससे आठ कोषठकके बाहर उस मध्य कोषठक का दलाष्टक होता है।६। इत्रेत वर्ण के दल और श्याम अग्र भाग की कल्पना करे, उसकी पीली करणिका बनाकर लाल-पीली रंग दे ।७। वनभिद्दलदक्षं त, समारभ्य सुरेश्वरि। रक्तकृष्णाः क्रमेणैव दलसन्धीन्विचित्ररोत् ।८

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पूजा स्थान में मण्डल रचना विधि ] 1 २६७

कर्णिकायां लिखेद्यत्र प्रणवार्थप्रकाशकम् । अधः पीठ समालिख्य श्रीकण्ठ च तदूर्ध्वत।९ तदुपर्यमरेश च महाकाल च मध्यतः । तन्मस्तकस्थं दन्ड च तत ईश्वरमालिखेत् ।१० श्यामेन पीठ पीतेन श्रीकन्ठ च विचित्रयेत्। अमरेश महाकाल रक्त कृष्णं च तौ क्रमात् ।११ कुर्यात्सधूम्र दन्ड च धवल चेश्वर बुधः । एवं यन्त्रं समालिख्य रक्त सद्येन वेष्टयेत् ।१२ तदुत्थेनैव नादेन विद्यादीशानमीश्वरि। तद्वासपकतीर्गृ हीयादाग्नेयादिक्रमेण वै ।१३ कोष्टानि कोणभागेषु चत्वार्येतादि सुन्दरि। शुक्लेनापूर्य वर्णादि चत ष्क रक्तधात भिः।१४ हे सुरेश्वरि ! इस तरह कमल के दलों को लाल तथा पीला बनाकर क्रमसे दलसन्धिको लल तथा काली बनावे । उसकी कर्णिकामें प्रणव अर्थका प्रकाशयन्त्र लिखनाचाहिए। उसके नीचे पीठ और उसकेऊपर श्री- कण्ठ लिखे ।९। इसके ऊपर अमरेश, मध्य में महाकाल और महाकाल के मस्तकके समीपमें दण्डलिखकर फिर ईश्वरको लिखनाचाहिये।१०। श्याम रंगसे सिहासनको चित्रितकरे तथा पीले रंगसे श्रीकण्ठको रगे। अमरेशको रक्त वणसे तथा महाकाल को कृष्ण वर्णसे रंगे ११। दण्ड का वर्ण धूम्र बनावे और ईश्वरकावर्ण धवलबनाना चाहिए। इसरीततसे लालयन्त्रलिख कर सद्योजात मन्त्र से आच्छदन करना चाहिये।१२। हे ईश्वरि ! उसमे उस्थित नादसे ईशानको भेद करे तथा नग्तय क्रमसे उसको वाह्य नंतिको ग्रहणकरे ।१३। हे सुन्दरि ! उसके कोणोंमें चारकोष्टोंको श्वेत और लाल धातुसे रगे औरफिर चारद्वारोंकी कल्पनाकरनी चाहिये और उसके इधर- उधरके कोष्ठपीले रगसे परिपूर्ण करे ।१४। आपूर्य तानि चत्वारि द्वाराणि परिकल्येत् । ततस्तत्पाश्वयोर्द्वद्व पीतेनव प्रप रयेन् ।१५

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२६८ श्री शिवपुरण आग्नेयकोष्ठमध्ये तु पीताभे चतुरस्त्रके अष्टपत्र लिखेत्पम्म रक्ताभ पीतकर्णिकम् ।१६ हकार विलिखेन्मध्ये विन्दुयुक्त समाहित। पद्मस्य नश्रते काष्ठे चतुस्स्र तदा लिखेत् ।१७ पद्ममष्टदल रक्त पीतर्किजल्ककणिकम् । शवर्गस्य तृतीय तु षष्टस्वरसमन्वितम् ।१८ चतुर्दशस्वरोपेत बिन्दुनादविभूषितम् i एतद्बीजवर भद्र पद्ममध्ये समालिखेत् ।१९ पद्मस्येशानकोष्ठे तु यथा पद्म समालिखेत्। कवर्गस्य तृतीयं तु पञ्मस्वरसयुतम् ।२० विलिखेन्मध्यतस्तस्य बिन्दुकण्ठे स्वल कृतम्। तद्बाह्यपक्तित्रियते पूर्वादिपरितः क्रमान् ।२१ अग्नेय दिशाके कोष्ठके मध्य चार अस्त्र प्रमाणवाला आठ दलका एक कमल बनावे। इसको पखुरीलालवर्णकी बनावे और कर्णिकाको पीतवर्ण की बनानी चाहिये।१५-१६। इससे मध्यमें बिन्दुयुक्त दकारलिखे औरफिर कमलकी नेऋत्यकीओरके कोष्ठमें चारअस्त्र मव्यवाला अष्टदल कमलबनावे। उसका रस् लाल बनावे और णिका का रंग पीला बनावे। शवर्ग का तीसरा अक्षर (स) छउवें स्वरसे संयुक्त (सू लिखे ।१७-१८। चौदहवाँ स्वर (ओ) बिन्दु नाद से युक्त (औ) यह बीज है। भद्र ! इसको पद्म मध्यमें लिखना चाहिए।१९। इसी तरहमे कमल के ईशान कोषठमें लिखे। कवर्ग का तृतीय अक्षर (ग) पंचम स्वर उकारके सहित (गु) लिखे।२०। उस ईशान दिशा के कमल के कन्ठ भागमें बिव्दु लिखे, इसकी बाहिर तीन पक्तियाँ है उनमें पूर्ण दिशाके क्रमसे लिखना चाहिए।२१। कोष्ठनि पश्च गृहणीयाद गिरिराजसुते शिवे। मध्ये तु कणिकां कुर्यात्पीतां रक्तं च वृत्तकम् ।२२ दलानि रक्तवर्णानि कल्पयेत्कल्पवित्तमः । दलबाह्य तु कृष्णेन रन्ध्राणि परिपूरयेत् ।२३

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पूजा स्थान में मण्डल रचना विधि २६९

आग्नेयादीनि चत्वारि शुक्लेनैव प्रपूरयेत् । पूर्व षड्बिन्दुसहित षटकोण कृष्णमालिखेत् २४ रक्तवर्ण दक्षिणतस्त्रिकोणं चोत्तरे ततः । श्वेताभमर्द्ध चन्द्र च पीतवर्ण च पश्चिमे ।२५ चतुरस्र क्रमातेषलिखेत् बीज चतुष्टयम। पूर्व बिन्दु समालिख्य शुभ्र कृष्ण त दक्षिण ।२६ उकारमुत्तरे रक्तं मकार पश्चिमे ततः । अकार पीतमेवं तु कृत्वा वर्ण चतुष्टयम् ।२७ सर्वोध्वपक्त्यधः पक्तौ समारभ्य च सुन्दरि। पीत श्वेतं च रक्तं च कृष्ण चेति चतुष्टयम् ।२८ तदधो धवल श्याम पीत रक्त चतष्टयम् । अधस्त्रिकोणके रक्तं शुक्लं पीतं वरानने ।२६ हे पार्वति ! पाँच कोषठ बनाकर उनमें मध्यकोंष्टका पीतवर्णका बनावे और शेष वृत्तको रक्तवर्णका बनाना चांहिये ।२२। विधिके ज्ञाता पुरुषको चाहिएकि कमल दलोंको लालवणंका बनावे और दलके बाहिरके छिद्रोंको कृष्णवणसे रङगनाचाहिये ।२३। अग्नि दिशाकी ओर वाले चार कोष्ठोंको शुक्ल रङ्गसे चित्रित करे और पूर्व दिशाके छ बिन्दुओंके सहितषट्कोणों को कृष्णवर्णमे लिखे ।२४। दक्षिण दिशासे उत्तर दिशाकी ओर तीनकोर्णों में लालरङ्ग तथा श्वेत कान्तिसेयुक्त अर्द्ध चन्द्रके आकारका पीतवर्ण पश्चिम कोणमे रङ्गना चाहिए । २५। चारों वीजों को क्रमसे चौकोरके प्रमाण से क्रमशः लिखना चाहिये। पूर्वको ओर तो शुभ बिन्दु तथा दक्षिणमें कृष्ण वर्णके लिखे ।२६। उत्तरकी ओर रक्त वर्ण उकार, मकार पश्चिमकी ओर लिखेहुए आकारको पीलेवर्णका करे। इस प्रकार से चारों वणोंमें लिखना चाहिये ।२७। हे सुन्दरि ! नीचे की पंक्ति से आरम्भ करके ऊपर वाली चारों पक्तियाँ पीत,श्वेत, रक्त और कृष्ण वर्णकी बनावे ।२८। उसके नीचे श्वेत,श्याम पीत और रक्त रङ्ग से रगे हुए नीचेके त्रिकोण में लाल, शुक्ल और पीत रङ्ग करना चाहिए।२९।

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२७० श्री शिवपुराब

एवं दक्षिणमारभ्य कुर्यात्सोमान्तमीश्वरि। तद्बाह्मपंकतौ पूर्वादिमध्यमान्त विचित्रयेत्।३० पीतं च कृष्णं च श्याम श्वेतं च पीतकम् । आग्नेयादि समारभ्य रक्तं श्याम सितं प्रिये । ३१ रक्तं कृष्णं च रकतां च षट्कमेवं प्रकीर्तितम्। दक्षिणाद्य महेशानि पूर्वाविधि समीरितम् ।३२ नेऋ ताद्य त विज्ञ यमाग्नेयावधि चेश्वरि। वारुण तु समारभ्य दक्षिणावधि चेरितम् ।३३ वायव्याध महादेवि नैऋतावधि चेरितम्। इशानाद्यत विज्ञयं वायव्यविधि चाम्बिके। इत्युक्तो मन्डलविधिर्मया तुभ्यं च पार्गति।३५ एवं मण्डलमालिख्य नियतात्मा यतिः स्वत। सौरपूजां प्रकुर्वीत सहि तद्वस्त तत्पर ।३६ हे ईश्वरि ! इस प्रकार दक्षिणस आरम्भकरके सोमान्ततक करे और उसकी बाह्य पंक्ति पूर्वादि मध्यमान्त में चित्रितकरे ३०। पीत, रक्र,श्वेत ध्याम, कृष्ण रंग आग्नेय दिशा से आरम्म करे, रक्त श्याम और श्वेत और लाल कृष्ण तथा लाल यह छं रंगभर, हे महेशानी ! यह दक्षिण के आदिसे लेकर पूर्वतक करनाचाहिए ।३१-३२। हे ईश्वरि ! नंतर त्यदिशासे आग्नेय दिशा पर्यन्त और वरुण दिशासे लेकर दक्षिण दिशा पर्यन्त,हे महादेवि ! वायव्यमे लेकर नैऋंत्य दिशातक,हे परमेश्व रे! पूर्ण आदिसे पश्चिमतक और ईशानसे लेकर वायव्य दिशापर्यन्त यही करे हे पार्गति ! यह समस्त मण्डलकी रचनाकरनेके पश्चात् ब्रह्ममें परायणहोकर भगवान्भुवनभास्कर सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिए ॥३३.से ।३६॥ आसन प्रासायाम विधान

दक्षिण मण्डलस्याथ वैयाध्र चर्मशोभनम्। आस्तीय शुद्धतोयेने प्रोक्षय दस्तम त्रतः ।१

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व्वासन प्राणायाम विधान १२७१

प्रणवं पूर्णमुद्ध त्य पश्रादाधारमुद्धरेत् । श्चाच्छक्तिकमलं चतुर्थ्यत नमोऽन्तकम् ।२ मनुमेव समुच्चार्य स्थित्वा तस्मिन्नुदड् मुख ।. प्राणानायम्य विधिवत्प्रणवोच्चारपूर्णकम् ।३ अग्निरित्यादिभिमत्र र्भस्म सधारयेत्ततः । शिरसि श्रीगुरु नत्वा मण्डल रचय त्पुनः ।४ त्रिकोणवृत बाह्येतु चतुरस्रात्मक क्रमात्। अभ्यच्यौंमिति साधारं स्वाप्य शख समर्चयेत् ।५ आपूर्य शुद्धतोय ने प्रणवेन सुगन्धिना । अभ्यरच्य गन्धपुष्पाद्य प्रणवेन च सप्तधा ।६ अभिम त्रय ततस्तस्मिन्धेनुमुद्रा प्रदशयत्। शङ्ङमुद्रां च तेनैव प्रोक्षय दस्त्रम त्रतः ।७ शिवजी ने कहा-दक्षिण मण्डल सुन्दर बाघम्बर बिछाकर अस्त्रमंत्रमे शुद्ध जलके द्वारा प्रोक्षण करना चाहिए।१। प्रथम प्रणव फिर आधार का उद्धार करे। इसके पश्चात् शक्ति कमल का उद्धार करे। इन सबके साथ चतुर्थी विभक्ति और अन्त में नमः' लगाकर उच्चारण करना चाहिए ।२। 'शक्ति कमलाय नमः' इत्यादि रीतिसे इसका उच्चारणकरना चाहिये ।३। "अग्निर्राति भस्म' इत्यादि मन्त्रोंसे भस्मधारण करे। श्री गुरुदेवको मस्तक भुकाकर नमस्कार करके फिर मन्डलकी रचनाका आरम्भ करना चाहिए १४ बाहर की ओर त्रिकोण वृत क्रमसे चार शस्त्र (चौकोन) प्रमाण करे 'ओम अर्वन'इस मन्त्रसे पीठको धारणकर शखङ्का अर्चनकरे ।४। प्रणव से शद्ध एवं सुगन्धित जल को अभिमन्त्रित करके गन्ध पुष्पादि से सात बार ओंकार से पूजन करना चाहिए ।५-६। इस रीति से मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके धेनु मद्राबनाकर दिखानी चाहिए और इसी तरह अस्त्रमन्त्रसे शख मुद्र भी दिखानी चाहिए ।७ आत्मानं गंधपुष्पादिपूजोपकरणानि च । प्राणायामत्रय कृत्वा ऋष्यादिकमथाचरेत् ।८

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२७२ ] श्री शिवपुारण

अस्य श्रीसौरमन्त्रस्य देवभाग ऋषिस्ततः। छन्दो गायत्रमित्युक्तं देवः सूर्यो महेश्वरः ।९ देवता स्यात्पडङ्गानि ह्रामित्यादीनि विन्यसेत् ततः सप्रोक्षटोत्पद्ममस्त्र णाग्नेरगोचरम ।१० तस्मिन्समर्चयेद्विद्वान् प्रभूतां विमलामपि । सारां चाथ समाराध्य पृर्वादिपरतः क्रमात् ।११ अथ कालाग्निरुद्र च शक्तिमाधारसंज्ञिताम्। अनन्तं पृथिवीं चेव रत्नद्वीप तथैव च ।१२ सङ्कल्पवृक्षोद्यान च गृह मणिमय ततः । रक्तपीठ च सपूज्य पादेषु प्रागुपक्रमात् ।१३ धर्म ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्य च चतष्टयम् । अर्धर्माग्निकोणादिकाणष च समचयोत् ।१४ इसके अनन्तर स्वयं अपनी आत्माको गन्ध क्षत पुष्पादि समस्तअर्चन। की सामग्रोसे शुद्धकर तानबार प्राशशन करे और ऋषि आदिका स्मरण करनाचाहिये,इससौरमन्त्रका देवभागऋृषि गायत्रीछन्द और सूर्यमहेश्वर देवता हैं।९ हाँ,हीं, 'ह्न'इत्यादि बीज मन्त्रों से छ अकों में सविधि न्यास करे फिर अस्त्रमन्त्र से अग्नि कोणके कमल का प्रोक्षण करनाचाहिए ।१०। साश्चक विद्वान्को उस आग्नेय दिशाके कमल का महा उज्जवलताके साथ सारदस्तुसे आराधनकर पूर्वादि दिशामें अर्चन करना चाहिए ।११। कालाग्नि,रुद्र,आध्वार शक्ति,अनन्त पृथ्वी,रत्नद्वीप,सकल्प वृक्ष का बगीचा मणिमय गह और चरणोंमें मनको संलग्न करके रक्त पीठका पूजनकरना चाहिये ।१२-१३। धर्म,ज्ञान,वैराग्य और ऐश्वय इन चारों का तथा अधर्म तथा अज्ञानादि का अग्तिकोण के कोनेमें पूजन करना चाहिए ।१४। मायाधश्छदन पश्चाद्विद्योध्वच्छदन ततः । सत्वं रजस्तमश्च व समभ्यर्त्या यथाक्रमम ।१५ सम्पूज्य पश्चात्सौराख्य योगपाठ समर्चयेत्। पीओेपरि समाकल्प्य मूर्ति मूलेन मूलवित् ।१६

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आसन प्राणायाम विधान । २७३

निरुद्धप्राण आसीनो मूलेनैव स्वमूलतः । शक्तिमुत्याप्य तत्त जः प्रभावात्पिगलाध्वना।१७ पुष्पांजलौ निर्गमय्य मण्डलस्थस्य भास्वतः। सिन्दूरारुणदेहस्य वामार्द्धदयितस्य च ।१८ अक्षस्रकपाशखट्वाङ्गकपालांकुशपङ्गजम् । शङ् चक्र दधानस्य चतुर्वक्त्रस्य लोचनैः १६ राजितस्य द्वादशभिस्तस्य हृत्पङ्गजोदरे। प्रणवं पूर्वमुद्धत्य ह्रांह्नींसस्तदनन्तरम् ।२० प्रकाशशक्तिसहितं मातण्ड च ततः परम्। आवाहयामि नम इत्यावाह्यावाहनाख्यया ।२१ मुद्रया स्थापनाद्याश्च मुद्राः संदर्शयेत्ततः । विन्यस्यांगानि ह्रांह्रौंहनू मेतेन मनुना तत ।२२ माया से नीचे के भाग का आच्छानन और विद्या से ऊर्ध्व भाग का आच्छादन करके फिर रज-तम इनका विधि के साथ पूजन करे ।१५। इस प्रकारसे पूजनकरके सौर नामक योग पीठकी पूजाकरनीचाहिये। सिंहासन पर मूलमन्त्रसे प्रतिमकी स्थापना करे ।१६। इसके अनन्तर मूलमन्त्रसे ही मूलाधारमें प्राज वायुको रोककर आसनपर बैठकर गला नाड़ीके प्रभाव से आधार शक्ति को उठाना चाहिये ।१७। वहाँ मण्डल में विराजमान, प्रकाशयुक्त,सिंदूरके तुल्य अरुण देहके धारणकरने वाले भगवान्को पार्वती के सहित पुष्पांजलि समर्पितिकरे ।१८। जो देव वहाँ रूद्राक्ष माला धारी पाश खट्वाङ्ग कपाल-अकुश-कमल-शख धारण करते हुए चार मुख और बारह नेत्र वाले हैं !१९। उनके हृदय कमल के मध्यमें प्रथम प्रणव का उद्धार करे इसके पश्चात् हनां हनीं सः'इस मन्त्रमे प्रकाश शक्तिधारी सूर्य का अवाहन करता हूँ-यह कहकर पीछे 'नमः' लगा कर उनका आवाहन करना चाहिये।२० २१। मुद्रादिक की स्थापना करके फिर मुद्रा बना कर दिखावें और समस्त अङ्गोंमें हना हनीं ह्न इन बीज मन्त्रोंसे अन्तके मंत्र से न्याय करना चाहिये।२२।

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२७४ श्री शिवपुरण पञचोपचारांसंकल्प्य मूलेनाभ्यरचंयेत्व्िधा। केशरेष च पद्मस्य षडङ्गानि महेश्वरि ।२३ वहनीशरक्षोवायूनां परितंः क्रमतः सुधीः । द्वितीयावरणे पूज्याञ्चतस्रो मूर्तय क्रमात् ।२४ पूर्वाद्य त्तरपयंतं दशमूलेषु पार्वति। आदित्यो भास्करो भानू रविश्चेत्यनुपूर्वश ।२५ अको ब्रह्मा तथा रुद्रो विष्णुश्चेति पूनप्रिये। ईशानादिष सपूज्यास्तृतीयावरणे पुनः ।२६ सोमँ कुजं बुधं जीवं कविं मंद तमस्तमः । समततौ यजेदेतान्पर्वांदिदलमध्यतः ।२७ अथवा द्वादशादित्यान् द्वितीयावरणे यजेत्। तृतीयावरणे चैव राशीन्द्वादश पूजयेत् ।२८ पञ्च उपचार करके संवल्प करे और तीनबार पूजन करनाचाहिये। हे महेश्वरि ! पद्मके केशरोंमें तथा छ्ैअङ्गोंमें यजनकरे।२३।अग्नि, ईश्वर राक्षस और वायु आदिकी चारोंप्रतिमाओंका दूसरे आवरणमें क्रमसे यजन करनाचाहिए।२४ हे पार्वति ! पूर्वसे आदि लेकर उत्तरपर्यन्त कमलदलके मूल में अदित्य, भानु रवि ओर भास्करकी क्रमके अनुसार अर्चनाकरे।२५। सूर्य ब्रह्मा, रुद्र और विष्ण तथा ईश्ानादि का तीसरे आवरण में यजन करना चाहिये ।२६। सोम, मंगल, बुध और महाबुद्धिमान् देवगुरु वृहस्पति तेजस्वी शुक्र, शनंश्रर और महा भीषण राहु तथा केतु का पूर्वादि दलके मध्य से चाें ओर पूजन करे ।२७। अथवा द्वितीय आवरण में बारह आदित्यों का ही यजन करे और तृतीय आवरण में बारह राशियों का पूजन करे।२८। सप्रसागरगङ्गाश्च बहिरस्य समततः । ऋषीन्देवशश्वि गंधर्वान्पन्नगानप्सरोगणान् ।२९ ग्रामण्यश्च तथा यक्षायातुधानांस्तथत हयान्। सप्त छन्दोमयश्चैव वालखिल्यांश्र पूजयेत् ।३०

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आासन-प्राणायान विधान ] २७K

एवं त्र्यावरणं देवं समभ्यच्यं दिवाकरम्। विरच्य मंडल पश्चाच्चत रस्र समाहितः ।३१ स्थाप्य साधारक त म्रपात्रं प्रस्थोदविस्तृतम्। पूरयिंत्वा जलः शद्धर्वासित: कुसुमादिभि: ।३२ अभ्यर्च्य गधपुष्पाद्यर्जानुभ्यामचनीं गतः । अर्ध्य पात्रं समादाय भूमध्यांतं समुद्धरेत् । ३३ ततो ब्र यादिमं मंत्र सावित्रं सर्वसिद्धिदम् । शृणु तच्च महादेवि भुक्तिमुक्रिप्रद सदा।३४ सिंदूरवर्णाय सुम्ण्डलाय नमोस्त वजाभरणाय तुभ्यम् । पद्माभनेत्राय सुपंकजाय ब्रह्मद्रनारायणकारणाय।३५ सरक्तचूर्ण ससुवर्णदोयं स्रवकु कुमाढय सकुशं सपुष्पम्। प्रदत्तमादाय सहेमपात्र प्रशस्तमर्ध्या भगवन्प्रसीद ।३६ सातों समुद्र, भागीरथी गङ्गा, इसके बारह देवता तथा ऋषि, गधव, पन्नग,अप्सराओं के गण, ग्रामीणयक्ष यातुधान सप्तछदमें बालखिल्यऋृषियों को लिखकर सबका यजन करे३०। इस रीतिसे तीनआवरण वाले दिवा- कर देवका यजनकरके पीछ अत्यन्न सावधानीसे चतुरस्र (चौकोर) मण्डल की रचनाकरनी चहिए ।३१। एकसेर जल आजाने वाले एक ताम्रमत्रकी स्थापनाकरके कुकुम आ्रदि वस्तुओंपे सुगन्थित कियेहुए जलको उसमें भर देवे।३२। इसके उपरान्त गन्धाक्षत पुष्पादिसे यजन करके जांधोंके बलपर पृथ्वीपर बैठकर अर्ध्यपात्रको बाहोंके मध्य तक लेजाकर भुक्तिमुक्तिप्रदान करने वाले सूर्य के मन्त्रका उच्चारण करते हुए अध्य देवे । ३३-३४।मिदूर के तुल्यवर्ण वाले सुन्दर मण्डलरे सुगोनित, हीरे आदिके अ भूषणोंमेभूषण आपको मेरा नमस्कार है। कमलके समान नेत्रबाले पङ्कज भू (ब्रह्मा) इन्द्र और नारायणके मी कारण आपकी नमस्कार है।३५ लल रङ्गक चूर्ण के समान अनि सुन्वर रङ्गका जल,माल, कुकु,कुश, पुष् ये सब हेमपात्र में रख कर मैं आपको अर्ध्य देता हूँ। हे भगवन ! आप मुझ पर प्रमन्न होव ।३६।

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२७६ ] । श्री शिवपुराण एवमुक्त्वा ततो दत्वा तदध्यं सूर्यमूत ये। नमस्कुर्यादिम मंत्र पठित्वा सुसमाहितः ।३७ नमः शिवाय साम्बाय सगणायादिहेतवे। रुद्राय विष्णवे तुभ्य ब्रह्मणे च त्रिम तये ।३८ एवमुक्त्वा मस्कृत्य स्वासने समवस्थितः। ऋष्यादिक पुन कृत्वाकर संशोध्य वारिणा ।३९ पुनश्र भस्म संमार्यं पूर्वोक्तेन व वत्मना। न्यासजात प्रकुर्वीत शिवभावविवृद्धये।४० पञ्चोपचारै सपूज्य शिरसा श्रीगुरु बुधः। प्रणव श्रीचतुर्थ्यत नमोऽन्तं प्रणमेत्ततः।४१ पञ्चात्मक बिन्दुयुत पश्चमस्वरसंयुतम्। तदेव बिन्दुसहित पश्चमस्वरवर्जितम्।४२ पश्चमस्वरसंयुक्त मत्रीशं च सबिबिन्दुकम् । उद्धत्य बिन्दुसहित सवर्तकमथोद्धरेत्।४३ यह करतेहुए सूर्य मूर्ति भगवान् को अर्ध्य देवे और इस अगले मन्त्रको पढ़कर सावधानीकेसाथ नमस्कार करे।३७। जगदम्बा भवानी तथा गणोंके समेत इस सभस्त विश्वके आदि कारणभूत भगवान् शिवको नमस्कार है। रुद्र ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य स्वरूप आपको सादर नमस्कार है।३८। इस तरहसे कहकर प्रणामकरे और अपने शसनपर संस्थित होकर ऋषि आदि का स्मरण कर जलसे हाथोंको शुद्धकरे।३९। उपयुक्तक विधिसे पुनः भस्म को धारण करना चाहिए और भगवान् शिव की भक्तिके लिए अङ्गन्यास करन्यासादि करनेचाहिए।४०।मतिमान् साधकका कर्त्तव्य है कि नतमस्तक होकर विनम्र भावसे पञ्चापचार द्वारा श्रीगुरुदेवका पूजन करे और श्री' पूर्व में-चतुर्थी विभक्तिलगाकर अन्तमें 'नमः' योजितकर'ॐ गुरवेनमः' इस तरह अर्चनमें उच्चारणकरता हुआही पूजनकरे ४१। पंचवर्षात्मक बिन्दु- युक्त पंचमस्वर उकारसहित और वहीं विन्दुसमेत पंचमस्वरसेरहित पंचम स्वरके सहित बिन्दु सहित मन्त्रोशका उद्धार करके बिन्दु एहित अकारका उच्च.रण करे ।४२।

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आसन-प्राणायाम विधान ] [ २७७

एतैरेव क्रमाद् बीजरुद्ध तंः प्रणमेद बुधः। भुजयोरूरुयुग्मे च गरु गणपति तथा।४४ दुर्गां च क्षेत्रपाल च बद्धाञ्जलिपुटः स्थितिः। ओस्राय फडित्युक्त्वा करौ संशोध्य षट् क्रमात् ।४५ ....... अपसर्पन्त्वित्ति प्रोच्यं प्रणव तदनतरम्। अस्त्राय फडिति प्रोच्य पाष्णिघातत्रयेण तु ।४६ उद्ध त्य विध्नान्भूयिष्ठान् करतालत्रयेण तु। अन्तरिक्षगतान्दृष्ट वा विलोक्य दिवि संस्थितान् ।४७ निरुद्धप्राण आसीनो हसमंत्रमनुस्मरन्। हृदिस्थं जोवचैतन्यं ब्रह्मनाडया समानयेत् ।४८ द्वादशांतः स्थविशदे सहस्रारमहाम्बुजे । चिच्चन्द्रमण्डलान्तःस्थं चिद्र,प परमेश्वरम् ।४९ इस प्रकारसे क्रमशः इन बीजोंका उद्धारकरके क्रमसे भुजा और दोनों जघाओंमें देवोंकाप्रणाम ध्यानकरे-भुजामें गुरु और गणपतिको और दोनों ऊरओंमें दुर्गादेवी और क्षेत्रपालको प्रणमकरे ओर दोनों हाथजोड़कर 'ॐ अस्त्राय फट'यह उच्चारणकर षडङ्गन्यासकरके अपने हाथोंको छबार शुद्ध शुद्धकरे ।४४-४५। इसके अनन्तर 'अपसर्पन्तु इत्यादि मन्त्रको पढ़कर फिर प्रणवका उच्चारखकर और 'अस्त्राय फट'कहकर भूमिमें तीन बार पा्णि- घातकरे ।४६। भूमिमेंसे विध्नोंका निवारणकरके तीनताली बजाकर अन्त- रिक्षमें जानेवाले विध्नोंको देखकर तथा स्वर्गके विध्नोंकोदेखकर उन्हें भी दूरकरे।४७। प्राण वायुको रोकते हुए स्थितरहकर हंस मन्त्रका उच्चारण करता हुआ हृदयमें स्थित जीव चंतन्यको सुषुम्ना नाड़ीकेद्वारा परमेश्वरसे मिला देवे।४८। इसके उपरान्त द्वादश कमल हृदय में स्थित परमोज्ज्वल सहस्त्र दलोंसेयुक्त महापद्ममें चिदात्मक चन्द्रमण्डल में विराजमान चित्स्वरूप परमेश्वर का ध्यान करना चाहिए ।४९। शीषदाहप्लवान् कुर्याद्र चकादिक्रमेण तु। सषोडश चतुष्षष्टिद्वात्रिशद्गणनायुतैः 1५०

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२७८ श्री शिवपुारण

वाय्वग्निसलिलाद्य स्तैः स्ववेदाद रनुक्रमात्। प्राणानायम्य मूलग्थां कुण्डलींब्रह्मरन्ध्रगाम्।५१ आनीय द्वादशांतःस्थमहस्राराम्बुजोमरे - चिच्चन्द्रमण्डलोद्भूतपरमामृतधारया ।५२ संसिकितायां यनौ भूयः शुद्धदेहुः सुभावनः । सोऽहमित्यवतीर्यांथ स्वात्मान हृदयाम्बुजे ।५३ आत्मन्यावेश्य चात्मानममत सृतिधारया। प्राणप्रतिष्ठां विधिवत्कुर्यादत्र समाहितः ।५४ एकाग्रमानसो योगी विमृश्यातां च भातृकाम् । तुष्टितां प्रणवेनाथ न्यसेद् ब्राह्य च मातृकाम् ।५५ पुनश्र संयतप्राणः कुर्यादृष्ट्यादिक बुधः । शङ्गर संस्मरश्चिते संन्यसेच्च विमत्सरः ।५६ अब्र भूत शुद्धि का प्रकार बतलाया जाता है रेचक आदि के क्रम से शोष और दाह दूरकरके सोलह चौसठ अथवा बत्तोस अपरादि वर्णोसेवायु अग्नि,जलके क्रमसे अकारादि वर्णवाले अने वेदके मंत्रोसे सावधान होकर सविधि प्राणायाम करे और व्रह्म रन्धुतक जाने वाली कुण्डलीको जगावे ।५०.५१। फिर जहाँसे चन्द्रमण्डलकी धारानिकलती है वहाँ द्व'दश कमल और सहस्त्रकमलमें उसको लेजावे ।५२। उसमें शरीरका स्नानकराकर देह की शुद्धिकरें और अपने हृदयकमलमें वह मैं हूँ-ऐसीभव्य भावनाकरे ।५३। आत्माके द्वाराही आत्माका अमृतींकरण करके ससृमि धारसे विधिके साथ प्राण प्रतिष्ठाकरे और बहुनही सात्रधानरहे ।५४। इस रीतिने योगी एकाग्र मनसे अन्सकी मात्राको प्रणवसे सपुटिनिकर उस पूर्वकथित मात्राको बहि- भाँग में स्थित करे ।५५। इसके पश्चात् प्राण और इृष्टि आदि को रोककर अपने चित्तमें भगवन् शङ्करका ध्यान करते हुए मात्मर्यका सर्वथा त्याग करके न्यास करना च हिये ।५६। प्रणवस्य ऋष्टिव्रह्मा देबि गायत्रीमीरितम् । छन्दोऽत्र देवताह वै परमात्मा सदाशिव ।५७

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आसन-प्रोणायाम विधान 1 २७१

अकारो बीजमाख्यातमुकारः शक्तिरुच्यते। मकार: कीलक प्रोक्त मोक्षार्थ विनियुज्यते ।५८ अगुष्ठद्वयमारस्भ तलांत परिमार्जयेत् । ओमित्युवत्वाथ देवेशि करन्यास समारभेत् ।५९ दक्षहस्तस्थितांगुष्ठं समारभ्य यथाक्रमम् । वामहस्तकनिष्ठांत विन्यत्सेपूर्णवत्क्रमात् ।६० अकारमप्युकार च मकार बिन्दुसयुतम्। नमोष्न्तं प्रोच्य सचत्र हृदयादौ न्यसेदथ ।६१ अकार पूर्व मुद्धृत्य ब्रह्मात्मानमथाचरेत्। डत नमोंत हृदये विनियुज्यात्तथा पुनः ।६२ उकारं विटणुसहितं शिरोदेशे प्रविन्यसेत् । मकार रुद्वसहितं शिखायां नु प्रविन्यसेत् ।६३ इसके पश्चात् ऋषि आदिका स्मरणकर उन्हें प्रणामकरे। प्रणवका व्रह्माऋषि, देवी गायत्री छन्द, सदाशिव परमात्मा देवता हैं ।५७। अकार वीज है-उकार शक्ति हे मकार कीलक हैं और मोक्षके लिये इसका प्रयोग किया जाता है ।५८। हे देवि ! दोनों अगूठेलेकर हथेली तक शुड्धकरफिर 'ओम्'ऐसा उच्चारण करके करन्यास करना चाहिए ।५९। दाहिने हाथके अगूठेसे प्रारम्भकरके बाँयेहाथकी कनिष्ठिका पर्यन्त दक्षिण हस्तकी तर्जनी आदिका क्रमसे न्यासकरे ।६०। ओंकार-उकार और बिन्दुकेसहित मकार सबके अन्तमें 'नमः -यह योजित हस्तमें करके हृदयमें न्यासकरना चाहिए ।६१। सर्वप्रथम अकारका उद्धारकर व्रह्म आत्मा उच्चारणकरे। यथा-'अ ब्रह्मात्मने नमः'-इस रीतिसे चतुर्थी विभक्तिके एक बचनके अन्तमें 'नमः' लगाकर हृदयमें न्यासकरे अर्थात् स्पर्शकरे।६२। उकार वा विष्णके नडित ध्यानकरके शिरोदेशमें विनियोग करे और रुद्रकेसहित मकारको शिखाके स्थानमें विनियोग करना चाहिए।६३। एवमुक्त्वा मुनिमंत्री कवचं नेत्रमस्तके। विन्यसेद्द वदेवेशि सावधानेन चेतसा /६४

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२८० श्री शिनपुराज अङ्गवक्त्रकलाभेदात्पश्च ब्रझ्मणि विन्यसेत्। शिरोवदनहृद्गुह्यपादेष्वेतानि विन्यसेत् ।६५ ईशानस्य कला: पश्च पश्चस्वेतेषु च क्रमात्। ततश्चतुर्षु वक्त्र षु पुरुषस्य कला अपि ।६६ चतस्रः प्रणिधातव्याः प र्वादिक्रमयोगतः। हृत्कंठांसेष नाभो च कुक्षौ पृष्ठ च वक्षसि।६७ अघोरस्य कलाश्राष्टौ पजनीया यथ क्रमम्। पश्चात्त्रयोदशकलाः पायुमेढ़ोरुजानुषु ।६८ जङ्डास्फिक्कटिपाश्चपु वामदेवस्य भावयेत्। सदयस्यापि कलाश्राष्टो नेत्रेषु च यथाक्रमम् ।६९ कीर्तितास्ता कलाश्चवं पादयोरपि हस्तयो। प्राणे शिरसि बाह्ोश्च कल्पयेत्कल्पवित्तम: :७० इसर तरह 'अ ब्रह्मातमने नमः' इत्यादिके क्रमसे कडकर कवच आदि का विधानकरे। हे देवि ! अस्र मंत्रसे नेत्रोंमें सावधानहोकर चित्तलगाकर अङ्ग,मुख,कलोके भेदमे पाँवईश नदिका न्यासकरे। पूर्वोक्त ईशानादिका शिर,वदन हृदय,गुह्य और चरणोंमें न्यासकरना चाहिए ।६४-६५। ईशान की पांच कलाकोक्रमपूर्वक शरीरके पाँचोंस्थानोंमें न्यासकरना चाहिए फिर पूर्व आदि दिवाके योगसे चारोंमुखोंमें पूर्व आदि क्रमसे पुरुषकी चारोंकला स्थितकरे हृदय, कण्ठ,स्बध,न भिकोष, पीठ छा रिइन स्थानोंसे अघोरकीआठ कला स्थित करे गेछे आायु जानुस्फिक कूला कमर,पार्श्व मागोंमें वामदेवकी तेरहकलाकी मावनाकरनीचाहिए। सद्योजातकी आठकला यथा क्रग नेत्रोंमें कल्पित करे।६८६५-६६ ६७। इन कलाओंकी कल्पना, हाथ, चरण, प्र.ण शिर और बाहुमें कल्पनाकरे ६८ से ७०। अष्टत्रिंशत्कलान्यासमेव कृत्वा त् सर्वशः । ।७१ बाहुद्वये कूप रयोस्तथा च मणिबन्धयौ। पाश्वतोदरजङ्गष पादयो पृष्टतस्तथा ।७२

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षिधान पूर्वक शिव पूजा २८१ 11

इत्थ प्रणयविन्यास कृत्वा न्यासविचक्षणः। हंसन्यास प्रकुर्ीत परमात्मविवोधिनि ।७३ दो में बाहु कूर्पर (कुहनी) तथा मणिबन्ध,पार्श्व,उदर,जघा, पाद और पीठमें न्यास करे। इन तरह बुद्धिमान् साधक को अट्ठईस कलाओं का न्याम करने के पश्चात् प्रणत्र का धयन करना च हिये। बुद्धिमान् पुरुष को इस रीति से प्रणत्र न्यास पहिले करके पीछे परमात्मा के बोघ कराने ाले इस न्यास को करना चाहिये ।७१.७२-७३। । ध्यान, आ्वाहन अर्ध्य विधान पूर्वक शिवपूजा ॥ स्ववामे चतुरस्र तु मण्डलं परिकल्पयेत् । औमित्यभ्यर्च्य तस्मिस्तु शंखमस्त्रोपशोधितम्। स्थाप्य साधारक त तु प्रणवेनाच येत्ततः । आपूर्य शुद्धतोयेन चन्दनादिसुगंधिना ।२ अभ्यच्यं गन्धपुष्पाद्यः प्रणवेन च सप्तधा । अभिमत्रय ततस्तस्मिन्धेनुमुद्रां प्रदर्शयेत् ।३ शखमुद्रां च पुरतश्चतुरस्र प्रकल्पयेत् । तदन्तरेऽ्द्ध चन्द्र च त्रिकोणं च तदन्तरे ।४ षट्कोण वृत्तमेवेद मण्डल परिकल्पयेत्। शभ्य्त्य गंधपुष्याद्यः प्रणवेनाथ मध्यतः ।५ साधारमर्ध्यपात्रं च स्थात्य गंधादिनार्चयेत्। आपूर्य शुद्धनोयेने तस्मिन्पात्र विनी क्षिपेत् ।६ कुशाग्रण्यक्षतांश्चव यवव्रीहितिलानपि । आज्यसिद्धाथपुष्पाणि भसितं च वरानने ।७ श्री ईश्वरने कहा-अपने बांई तरफ चतुरस्त्र (चौकोा) मण्डल की रचना करे और ॐ का इस प्रकार से अर्चन करके शंव अत्र से अर्थात् अस्त्रमन्त्र से शोधित करना चाहिये ।१। उसको आधार पर स्थित करके प्रणव से यजन करे और चन्दनादिकी सुगन्ध वाले जलसे पूर्णकरदेवे ।२ प्रणवके द्वारा सातबार गन्धाक्षत पुष्पादिसे पूजन करनाचाहिए इस प्रकार

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२८२ 1 श्री शिवपुर ण 【 . से अभिमन्त्रित करके उसमें धेनु-मुद्रा बनाकर दिखानी चाहिए ।१। इसके आगे चौकोन शंख मुद्रा की कल्पना करनी चाहिए। उसके अन्तर में अरध्ं चन्द्र और उसके अन्तरमें त्रिकोण की कल्पना करे।४ इसरीतिसे षट् कोण मण्डलकी रचना करनी चाहिये। औरउसके मध्यमेंही केवलओकार से गन्धाक्षत पुष्पादि के द्वारा अर्चना करे ।५। इसके पश्चात् उस आधार वाले अरध्य पात्रको स्थापित करके गन्धाक्षत'दि यजन करे और पवित्र जलसे उसे परिपूर्ण कर देवे।६ हे वरावने ! कुशका अग्र भाग, अक्षत, यव, ब्रीहि,तिल, घृत, श्वेत सरमोंके पुष्प और भस्म उस डाले ।७ सद्योजातादिभिर्मन्त्र: षडंगैः प्रणवेन च । अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्य रभिमंत्र्य च वर्मणा ।८ अवगुठयास्त्रमन्त्रेण सरक्षार्थं प्रदशयेत् । धेनुमुद्रां च तेनव प्रोक्षयेदस्त्रमन्त्रतः ।९ स्त्र त्मानं गन्धपुष्यादिपृजोपकरणान्यपि । पद्मस्येशानदिवपद्म प्रणवोच्चारपर्वकम् 1१० गुवर्सिनाय नम इत्यासन परिकल्पयेन् । गुरोमूर्ति च तत्रव कल्पयेदुपदेशतः ।११ प्रणवंगु गुरुभ्योऽन्ते नमःप्रोच्यापि देशिकभ्। समावाह्य ततो ध्यातेद्दक्षिणाभिमुखं स्थितम् ।१२ सुप्रसन्नमुख सोम्य शुद्धस्फटिकनिमंलम् । वरादाभयहस्तं च द्विनेत्र शिवविग्रहम् ।१३ एवं ध्यात्वा यजेद् गन्धपुष्पादिभिरणुक्रमात् पद्यप्य नैश्रमते पद्मे गणपत्यापनोपरिः ।१४ मूर्ति प्रकल्प्य तत्र व गणानां त्वेति मंत्रतः । समावाह्य ततो देवं ध्यायेदेकाग्रमानस: ।१५ सदयोजातादि मन्त्र षडङ्ग और प्र वसे गन्धाक्षत पुष्पादि उपचारोंके द्वारा अभिमन्त्रित करके फिर कवचमन्त्रसे अभिमत्रित करना चाहिये ।८। अस्त्र मन्त्रसे संयुक्त कर रक्षा के लिए धेनुमुद्राको उसे दिखाना चाहिये।

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विधान पूर्वकु शिवतूजा ] [ २८३

अस्त्र-मन्त्रके द्वाराही भेनुमुद्ाका प्रोक्षगकरे।९ अने आत्मा में गन्धाक्षत पुष्पादिकी पूजा सामग्रोमे अस्त्रमन्त्रके दारा प्रोक्षण करे और कमल के ईशान के तरफ की दिशामें कमल में ओंकारे के उरबारग के साथ 'गुरु आसनाय ननः' इन तरह कहने हुए आसनकी कलनाकरे और गुरुरे के उपदेशके अनुसार वहाँ पर श्रीगुरुदेव की प्रतिमा की कल्पना भी करनी चाहिए ।१०। 'प्रणत्रगु' गुरुमी नमः'-इस रीति से श्री गुरुदेव के प्रति कहकर दक्षिग दिशा के सामने स्थित होकर उनका आवाहन करके ध्यान कपना चाहिए।१२। धान करने का प्रकार बालाने हैं -सुन्दर एवं प्रसन्न मुख है-स्फटिक मणिके तुल्य अनि निर्मल वरदान करने वाले दोनों हाथहैं जापपयका दाननी साथमें किया करते हैं। दो नेत्रोंसेयुक्तऐमे शितके शरीर वाले गुरुदेव हैं ।१३। इस उक्तकारमे गुरुदेव काध्यानकरके क्र नशःगन्धाक्षत पुष्पादि उपवारों से उनका अर्चन करे और उस पद्म के नेऋत्य दिशाकी और वाले पद्म पर स्थित गणेशके अमन पर 'गणानां त्वा' इत्यादि मन्त्रन गगपतिकी मूर्ति की कल्पना कर देवता का वहाँ आवःहन करे तथा उनका ध्यान भी करना चाहिए।१४-१५। रक्तवर्ण महाकाय सर्वाभरणभूषितम् । पाशांकुशेष्टदशनन्दधानङ्गरपङ्गजः ।१६ गजानन प्रभु सर्व विघ्नौघध्नम् पासितुः । एत्र ध्यात्वा यजेद् गन्धपुष्पाद्यरुपचारकै :१७ कदलीनारिकेलाम्रफ नल ड् डुकपूर्वकम् नैवैद्य च समप्याय नमस्कुर्याद् गजाननम् ।१८ पद्मस्य वायुदिक्पद्म सकल्प् स्कान्दनासनम्। स्कन्दमूर्ति प्रकल्प्याथ स्कन्दमावाहयेद् बुध ।१९ उच्चार्य्य स्कन्दगायत्रीं ध्यायेदथ कुमारकम्। उप्रदादित्यस काश मयूरवरत्राहनम् ।२० चतुर्भुजम दारांग म्कुटादिविभूषितम्। वरदानयहस्तं च शक्तिकुककुटधारिणम् ।२१

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२८४ श्री शिवपुराण गणपति का लाल वर्ण है, महान् विशाल शरीर है जो कि तमस्त आभरणोंसे युक्त हैं। पाश अकुश दृष्ट दर्शन कर कमलों में धारण किये हुए हैं। इसनरह सब विध्नोंकेनाशकरनेवानेअस्त्ररूप प्रभु गणपतिकाध्यान करके फिर उनका षोड़श उपचारोसे विधिबत्पूजनकरनाचाहिए ।१६-७ कदलीफल, नूतन वस्तु, नारियल, आम, लड्डू आदि नैवेद्य सादर सर्मा,त करके श्रीगणेशजीको नमस्कार करे ।१८। कमलके वायुकोण के पद्म में स्कन्द का ओसनवलि तकरे उस पर भगवान् स्कन्दकी प्रतिमाकीकल्पना करे, फिर स्कादका आवाहन कनाचाहिये ।१९। स्कन्द गायत्रीका उच्च :- रणकर कुमारका आवाहन करे। भगवान् स्कन्द का ध्यान करेजो सूर्य के तुल्त कान्ति वाले हैं, मयूर ऊपर समारूढ़ हैं चार भुजा वाले, उदार शरीर, मुकुटआदि से विमूषितहैं, वर तथा अभयकेदान करने वाले हैं और शक्ति मुकुटके धारण करनेवालेहैं ऐसा ध्यान करेऔर गन्धाक्षत पुष्पादिसे सविधि अचनकरे। इसके पश्चात् पूर्वद्वारमेस्थिन अन्तःपुरके अधिप साक्षात् नंदी- श्वरकोपूजाकरे जो कि सुवर्णतुल्य समस्त आभूषणोंसेविभूषितहै।२०-२॥। एवं ध्यात्वाऽथ गधाद्य रुपचारैरनुक्रमात् । संपूज्य पूर्वद्वारस्य दक्षशाखामुपाश्रितम् ।२२ अन्तःपुराधिपं साक्षान्नन्दिन सम्यगर्चयेत् । चामीकराचलप्रख्य सर्वाभरणभूषितम् ।२३ बालेन्दुमुकुट सोम्यं त्रिनेत्रं च चतुर्भुजम् । दीप्तमूलमृजीटंकहेमवेत्रधर विभुम् ।२४ चद्रबिम्बाभवदन हरिवक्त्रमथापि वा। उत्तरस्यां तथातस्य भार्या च मरुतां सुताम् ।२५ सुयशां सुव्रतामम्बपादपण्डनतत्पराम् । संपूज्य विधिवद् गन्धपुष्पाद्य रुपचारकः ।२६ ततः संप्रोक्षयेत्पद्म सास्त्रशंखादबिदुभिः । कल्पयेदासन पश्चादाधारादि यथाक्रमम् ।२७ आधारशक्ति कल्याणीं श्यामध्यायेदधोभुवि। तस्या: पुरस्तादुत्कठमनन्तं कुडलाकृतिम् ।२८

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विधानपूर्वकु शिव पूजा ] २८५ नन्दीश्वर बाचनन्द्र का मुकुट धारन करने वाले, सौम्य मूर्ति, तीन नेत्र और चार भुजाये धारण करने वाले अतिशय दीप्तिसे युक्त हैं। शूल, मृगी, टंक और सुवर्णके नेत्र धारण करनेवालेहैं तथा सर्वज्ञ हैं। नन्दीश्वर चन्द्रमण्डल एव सिंहकेममान मुखवाले हैं। ऐसेनन्दीश्वरका पूजनकरे ।२४। २५। उत्तर की ओर मरुतों की कन्या उनकी मार्या सुयशा नाम की है जो शोभन ब्रत वाली पार्वतीके चरणकमलों में तत्परहो चन्दन पुष्पादि अनेक उपचारों मे यजन करे ।२६। इसके उपरान्त उसकमल को अस्त्र H.mA TA ITIAAN मन्त्रके सहित शंखके जलकी विन्दुओं मे प्रोक्षणकरे और इसके पश्चात् आधारादि आमन की कल्पना करनी चाहिये ।२७। आधार शक्ति श्याम स्वरूप कल्याणरूपकी नीचे भूमि में ध्यान करना चाहिये उसके आगे ऊर्ध्वं कण्ठमें कुण्डलाकार सुशोभित भगवान् अनन्तका ध्यान करे।२८। धवल पचफणिन लेलिहानमिवाम्बरम् ! तस्योपर्यासन भद्र कठीरवचतुष्पदम् ।२९ धर्मो ज्ञान च वेराग्यश्वर्यं च पदानि वै। आग्नेयादिश्वेतपीतरक्तश्यामानि वर्ण तः ।३० अधर्मादीनि पूर्वादीन्युत्तरांतान्यनुक्रमात्। राजादर्तमणिप्रख्यान्यस्य गात्राणि भावयेत्।३१ अधोर्ध्वच्छदन पश्चात्कंद नाल च कण्ठवान्। दलादिक कर्णिकाञ्च विभाव्य क्रमशोऽचयेत्। ३२ दलेषु सिद्धयश्चाष्टौ केसरेषु च शक्तिकाः । रुद्रां वामादयस्त्वष्टौ पर्वादिपरितः क्रमात् ।३३ कर्णिकायां च गैराग्यं बीजेषु नव शक्तयः । वामाद्या एव पूर्वादि तदन्ते च मनोन्मनी ।३४ अनन्तदेव का श्वेत वर्ण वाला शरीर है जोकि पाँच फल-मण्डलसे युक्तहै प्रोर आकाश को चाटते हुए हैं। उनके निकटही में सिहके समान आकार वाले, चार चरणोंसे युक्त धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वयंकेचरणों को आसन पर कल्पित कर। आग्नेयी आदि दिशा श्वेत, पीत,रक्त श्याम वर्णऔरअधर्मादिकों को पूर्व आदि दिशाके अनुक्रम सेपधारनेऔरराजावत

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R=E ] [ श्री शिपुररण नमकी मणि (एक तरहके उपरत्नका नाम हैं आरिकी इनके कलेवर में भाबनाकरे २९ से ३१। इसके पश्चात्नीचे तथाऊँवे मेइनजनन्त का इ-ा रत्न से आच्छदनकी कल्पना करे फिर स्कन्ददेवका नाल रुटक कमल के दन और कणिका की भावना करके क्रमशः यजन करश चाहिये।३२। दलों तोसिद्धिकी कलपना करनी चाहिये, केशरों में शक्ति ये कल्पना करे और पूर्वादि दिशाओमें रुद्र तथा नामादि आठ शक्तियों की कल्पना करनी चाहिे ।३३। कर्णिकामें वैराग् और बीजोंनं नत्रशक्तिकी कल्पना कर व.मवि शक्तियों की पर्वादि दिशा में कनना करे ।३४। कन्दे शिवात्मको धर्मो नाले ज्ञान शिवाश्रयम्। करणिकोपरि वाह्नय मण्डल सौरमैन्दवम् ।३५ आत्मविद्या शिवाख्य चतत्वत्रयमतः परम् । सर्वासनोपरि सुख विचित्रकुसुमोज्ज्वलम् ।३६ परव्योमावकाशाख्यवित्तयाऽतीव भास्घरम्। परिकल्प्यासन मूत्त' पुष्पविन्यासपूर्वकम् ।३७ आधारशक्तिमारभ्य शद्धविद्यासनावधि। ऊँथारादिचनुर्थ्यत नाममँत्रं नमोन्तकम् ।३८ उच्चार्य पूज्येद्विद्वान्सर्णत्र व विधिकभः । अङ्गवक्त्रकलाभेदात्पच ब्रह्माणि पूर्व वत् ।३९ यिन्यसे क्रमशौ मूतौं तत्तन्म द्राविचक्षणः । आवाहये ततो देवं पुष्पाञ्जलिपुटः स्थितः ३० सदोजात प्रपद्यामीत्यारभ्यौनन्तमच्चरन्। आधारोत्थितनाद तु द्वादशग्रन्थिभेदतः ।४१ ब्रह्मरध्रातम् च्चार्यं ध्यायेदोंकारगोचरम् । शुद्धस्फटिकसंकाश देव निष्कलमक्षरम ।४२ इसके पश्चात् मनोन्मनी शक्ति को कन्द में, शिवात्तक धर्म नालमें, शिशश्रप ज्ञानकर्णिकाके ऊर आग्नेयमण्डल चन्द्र सूर्यसम्बन्धिका धान कररानाडिये। ५ आत्मविद्याज्ञान शिवब्रह्मादंक तीन तत्व्रइममे पर

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विधानपू्वक शिव पूरा ! २८७ हैं। समस्तआमनों पर मुखके साथविचित्र उज्जवलपुष्प स्थित करे।३६। और दहर विद्या से महा उज्जवल आसन मूर्तिकी कनपना कर पुष्प रवखे 12ह। आधार शक्तिसे आरम्भ करके शुद्धविद्यासे आसन पर्यन्त ओद्कार सहितचतुर्थी विभत्तिसे अन्तमें "नमः"-यह लगाकरही सर्वत्र यजन कर। ।३८। विद्वान् साधको उचित है किसब स्थानों में विधि विधान के साथ पूजन करना चाहिये अङ्ग, मुख तथा कलाके भेदसेउन ईशान प्रभृति पञ्च ब्रह्मको पूर्वकी भाँति उनकी मूर्त्ति में सस्थित कर मुद्रो दिखावेइनके पश्चात पुष्पोंको अंजलि ग्रहण कराकर देवीका आवाहन कर ।३९-४०। 'सद्याजात प्रपद्यामि' यहाँसे आरम्भ करके शिवोंमें वस्तु सदा शिवोम्' यहाँ पर्यत उच्च रण कन मूलाघार से उठे हुए नाद वारहचक्रकी ग्रन्थि तोड़कर ब्रह्मरघूमे उच्चारण कर ओंकार गोचर परमेश्वर का ध्यान ऐसा करना चाहिए किशुद्धस्फटिकमणि के तृश्य हैं, कला से रहित हैं और अक्षर उनका स्वरूप हैं।४१-४२। कारण सर्वलोकानां सर्वलोकमय परम । अन्तर्बहिः स्थितं व्याप्य ह्यणोरल्प महत्त्मम् ।४३ भक्तनामप्रयत्नेन दृश्यमीश्वरमव्ययम् ब्रह्मन्द्रविष्णुरुद्रायरपि देवैरगोचरम् ।४४ वेदसार च विद्वदि्भरगोचरमिति श्रतम् । आदिमध्यान्तरहित भेषज भवरोगिणाम् i४५ समाहितेन मनसा ध्यात्वैबं परमेश्वरम् । आवाहनं स्थापनं च सन्निरोध निरीक्षणमू ।३६ नमस्कारं च कुर्वीत बद्ध्वा मुद्रांःपृथक्पृथक्। ध्यायेत्सदाशिव साक्षाद्दव सकलनिष्कलम् ।४७ शुद्धस्फटिककसंकाशं प्रसन्न शीतलद्युतिम्। विद्युद्वलयसंकाशं जटाम कटभूषितम ।४८ शादू लचर्मवसनं किंचित्स्मितम खाम्बुजमु। रक्तपझ्मदल प्रख्यपाणिपाक्तलाधरम्

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२८८ 1 श्री शिव पुराण सर्वलक्षणसम्पन्न सर्वाभरणभूषितम् । दिव्यायुधकरर्युक्तं दिव्यगन्धानुलेपनम् 1३० परमेश्वरका स्वरूप परम दिवा है और इन समस्त लोकों के कारण भूत है। समस्त देवोंसे परिपूर्ण रूप वाले हैं। पर अन्तर बाहरसर्वत्र व्याप्त रहने वाले और अणु स्वरू तथा परम महान् मीहैं।भक्तोंको बिना प्रयत्न कियेही दिखाई देने वाले ईश्वर हैं। उनका स्वरूप विनाश रहित है और ब्रह्मा इन्द्र, विष्णु रुद्र अ दि बड़े बड़े देवताओं को मी अगोचर अर्थात् न दिखलाई देने वाले हैं ।४३४०। परमात्मा का स्वरू वेदों का सारमय है और पूर्ण विद्वानों के द्वारा प्राप्त होने के योग्य होताहै। उनकास्वरून ऐसा अद्भुत है जिसमें अदि और अन्त कुछ मी नहीं होता है। परमेश्वर का स्वरूप संसार के रोगियों के रोग निवारग करनेकेलिए भेषजके समान होता हे ।४५। ऐसे उक्त विलक्षण गुणोंसे युक्त परमात्माका व्यानअत्वन्त सावधान मनसे करना चाहिय औरफिर उनका आवाहन,स्थापन,सन्निरोध दर्शन कर हाथों को जोड़कर नमस्कार करना चाहिय। पृथक् २ मुद्राये बाँधे और निष्फल साक्षात् देव शिवका ध्यानकर।४६-४७। अञ मगवान् शिव के ध्यान करनेके लिये उनके अड़तीस कलामय स्वरूपका वर्णनकिया जाताहै जिससे उसी प्रकारका ध्यान किया जा सके। विशुद्धस्फटिक मणि के तुल्य स्वच्छ स्वरू वाले, परम प्रसन्न रहने वाले,शीनलकांतिसे युक्न बिजली के बलय (रड़ा) के तुल्य और मस्त पर जट जूटोंक मुकुटजैसा घारण करने वाले शिवका स्वरू होता है।55। शादूल के वम का वस्त्र ओढ़े हुए हास्यसे युक्त मुख कमल वाले, रक्त कमलके तुल्य हस्तएवं चरण वाले तथा अधरों वाले, समस्त सुनक्षणों से युक्त तथा समूर्ण सुन्दर आभूषणों को धारण करने वाले, श्रष्ठ औरपरमदिव्य अनेकआयुधोंसे युक्त और दिव्य गन्धलेपको लगाने वाला भगवान् शिवका स्वरू है ।४९-५०। पच्चवव्त्र दशभुजश्व द्रखण्डशिखामणिम् । अस्य पूर्णमुख सौम्यं बाल कसदृशप्रभम् ।५१ त्रिलोचनारविन्दाढयं बालेन्दरुकृतशेखरम्। दक्षिण नीलजीमूतसमानरुचिरप्रभम् ।५२

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विधान पूर्वक शित पूजा 1 [ २८९

भ्र कुटीकुटिल घोरं रक्तवृतत्रिलोचनम् । दष्ट्राकराल दुष्प्रेक्ष्य स्फूरिताधारपल्लवम् ।५३ उत्तरं विद्र मप्रख्य नीलालकविभूषितम् । सद्विलास्र त्रिनयनं चन्द्रार्द्ध कृतशेखरम् ।५४ पश्चिमं पूर्णचन्द्राभं लोचनत्रितयोज्ज्वलम् । चन्द्रलेखाधरं सौम्य मदस्मितमनोहरम् ।५५ अतीवसौम्यमुत्फुल्ललोचनत्रितयोज्ज्वलम् ।५६ भगवान् शित्रका स्वरू पाँव मुख वाला, दश भुजाओं वाला, शिखा- मणिसे चन्द्रकलाको धारण करने और पूर्व दिशाकी ओर रहने वाला मुख परम सौम्य तथा सूर्य की कान्तिके तुल्यकांति वाला है ।५१। भगवान् शिव तीन नेत्र धारणकरनेवाले हैं और कमलके तुल्य शाभासेयुक्तहैं जिनके मस्तक पर सर्वदा बालचन्द्रमा बिराजनान रहता है और दक्षिण दिशाकी ओर रहने वाला मुख नील मेघके तुल्यकांति वाला होता है ।५२। भगबान् शिवके स्व्रूप का ध्योन ऐसा ही करना चाहिए कि उनकी भृकुटियाँ टेढ़ी रहती हैं, अतिघोर रक्त नेत्र हैं, बहुन ही भीषग कराल दाढ़े हैं और सर्वदा सृष्टि का सँहार करने की मुद्रा में ओठों को फड़काते रहते हैं ।५३। उत्तर की ओर वाला मुख मूगाकेतुल्यहैं, नीले वर्णवाली अनकें उस मुखके ऊपर शोभायमान हैं, परम सुन्दर विलाससे परिपूर्ण तीन नेत्र धारग करने वाले और मस्तक पर चन्द्रमाका अद्ध माग शोमितहोरहाहै ।५४। मनावान् शिव के पाँच मुख बतलाये गये हैं उनमें जो मुख पश्चिमदिशाकी ओरहै वह पूर्ण चन्द्र के समान कान्तिस युक्त होताहैं, वहाँमी उसमुघमें तीन नेत्र विराज- मानहैं और अर्ध चन्द्र शोभा दे रहा है तथा सौम्य एवं मन्द हास्यसे परभ मनोहर हैं ।५५। अब शिवके पञ्चन मुखका वर्णन कियाजाता है जिसक। ध्यान ऐसा करना चाहिये कि वह स्फटिकके समान उज्ज्वल,चन्द्र रेखा से युक्त, अत्यन्त समुज्ज्वल एवं मनोहर, तीन नेत्र से युक्त है ।५६। दक्षिरो शूलपरशवजखङ्गानलोज्ज्वलम् ।५९

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२९० ] I श्री शिवपुराण सर्वे पिनाकनाराचघष्टापाशांकुशोज्ज्वलम्। निवृत्या ज नुपर्यन्तमानाभि च प्रयिष्ठया ।५८ आकण्ठ विद्यया तद्वदाललाटं तु शान्तया। तद्र्ध्वं शान्त्यतीताख्यकलया परया तथा ।५९ पञ्चाध्वव्यापिनं तस्मात्कलाश्च्कविग्रहम। ईषानमुकुट देव पुरुषाख्यं पुरातनम् ।६० अधोरहृदय तद्वद्वामगुह्य महेश्वरम् । सद्योजातं च तन्मूर्तिमष्टविंशत्कलामयम् ।६१ मातृकामयमीशान पञ्चब्रह्ममय तथा। ऊँकाराख्यमय चंव हंसन्यासमय नथा ६२ पचाक्षरमय देव षडक्षरमय तथा। अगषटूकमयञ्चंव जातिषट्कसमन्वितम ।६३ दक्षिण भाग में शुल, परशु, वज्त और खग अग्नि के तुल्य उज्ज्वल है और वाँई ओर नाराच,घण्टा पाश औरअकुशसे अग्ति के समानउज्जवल हैं जो जानुनक निवृत्या नामकला और नामिमें प्रतिष्ठित नाम की कला से कण्ठ पर्यन्त विद्या तथा ललाट पर्यन्त शान्ता नामबाली कला और इससे मी उपर शान्त्यतीत पराकलासे युक्त तथा पाँच स्थानमें व्यापक होने के कारण निवृत्ति आदि पंच कलामयशरीर है। ईशानदेव मुकुट पुरुष पुरा- तन मुख है ।५७-५७-६०। अधोर हृदय है, बामदेव गुह्य है, सद्योजात चरण है, इस तरह अड़तीस कलाओं से पूर्ण उसकी मूरति है ।५१। ईशान मातृका पूर्णहै तथा पंच ब्रह्ममयहै, ओंकारमय तथा हसन्यासमयहै ६२यह देव पञ्चाक्षरमय है तथा षडक्षर है, छै अकमय और जातिसेयुक्त है।६३। एवं ध्यात्वाथ मद्वामभागे त्वां च मनोन्मनीम । गौरीरमिमाय मन्त्र ण प्रणवा द्येन भक्तितः ।६४ आवाह्य पूर्ववत्कुर्यान्नमस्कारान्तमीश्वरी। ध्यायेत्ततस्त्वां देवेशि समाहितमना मुनिः ।६५ प्रफुल्लोत्पलपत्राभां विस्तीर्णायतलोचनाम।

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पूर्णाचन्द्राभवदनां नीलकुचित्तमूद्ध जाम् ।६६ नीलोत्पलदलप्रख्यां चन्द्रार्धकृतशेखरामु। अतिव्रत्तघनोत्त गास्निग्धपीनपयोधराम् ।६७ मनुमध्यां पृथुश्रोणीं पीतरूक्ष्मतराम्बराम् । सर्वाभरणसम्पन्नां ललाट तलकोज्ज्वलाम ।६८ विचित्रपुष्पसंकीर्णकेशपाशोपशोभिताम्। सर्वतोऽनुगुणाकारां किञ्चिल्लज्जानताननाम् ।६६ हेमारविन्द विलसद्दधानां दक्षणो करे। दण्डवच्चामर हस्त न्यस्यासीनां सुखासने। दण्डवच्चामर हस्त न्यस्यासीनां सुखासने ।७० मेरे बाम भागमें आप मनोन्मनी रूप गौरी को लेकर स्थित है, ऐसा ध्यान करना चाहिए और 'गौरीमिमाय'-इस मन्त्र तथा ओंकारके सहित ध्यान करे ।६४। हे ईश्वरि ! आवाहन करके पूर्व की माँति नमस्कार करना चाहिए।६५। अब ध्यान करने का स्वरूप बतलाया जाता है, तरिक- सित कमलके तुल्य कांतिमे पूर्ण विशाल नेत्नों वाली हैं, पूर्ण चन्द्रमा के समान मुखवाली हैं, नीच वण वाले कुचित केशोंसे शोमित हैं।६६। नील वर्णके कमलके दलके समान अर्ध चन्द्रको मस्तकपर धारण करने बाली हैं निस्तीर्ण, घने, ऊँचे और स्निग्धपयोधरोंसे सुशोमित हैं ।६७। सूक्ष्म कटि तट वाली तथा परिपुष्ट श्रोणिभाग वाली, पीत तथा बारीक वस्त्र धारण करने वाली हैं,समस्त आभूषजों को धारण करने वाली हैं तथा मस्तक पर उज्जवल तिलक धारण किये हुए हैं।६। अद्भ त पुष्नों से सुशोभित केज्ञ पाप वाली हैं समस्त सद्गुणों से परिपूर्ण हैं, लज्ना के कारण अपना मुख नीचे की ओर करने वाली है ।६९। अपने दाहिने हाथ में क्रीड़ा के लिये सुवर्ण का कमल लियेहुए हैं और दूसरा हथ सिंहासनपररकखे हुए हैं ।७०। एवं मां त्वां च देवेशि ध्यात्वा नियतमानसः । स्नापयेच्छखतोयेन प्रणवप्रोक्षणक्रमात् ।७१ भवे क्तवेनातिभव इति पाध प्रकल्पयेत्।

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२९२ 1 [ श्री शिवपुराण

वामाय नम इत्युक्त्वा दद्यादाचमनीयकम् ।७२ ज्येष्टाय नम इत्युकत्वा शुभ्रवस्त्र प्रकल्पयेत् । श्रष्टाय नम इत्युक्त्वा दद्याद्यज्ञोपवीतकम् ।७३ रुद्राय नम इत्युक्त्वा पुनराचमनीयकम्। कालाय नम इत्युक्त्वा गन्ध दद्यात्सुसंस्कृतम् ७३ कलविकरणाय नमोऽक्षतं च परिकल्पयेत् । बलविकरणाय नम इति पुष्पाणि दापयेत् ।७५ बलाय नम इत्युक्त्वा धूप दद्यात्प्रयत्नतः । बलप्रमथनायेति सुदीपं चव दापयेत् ।७६ ब्रह्मभिश्र षडगँरच ततो मातृकया सह। प्रणवेन शिवेनैव शक्तियुक्तेन च क्रमात् ।७७ मुद्रा: प्रदर्शयेन्मह्य' तुभ्यञ्च वरवणिनि । मयि प्रकल्पयेत्पूर्व मुपचारांस्ततस्त्वयि ।७८ यदा त्वयि प्रकुर्वीत स्त्रीलिंग योजयेत्तदा । इयानेव हि भेदोऽस्ति नान्यः पार्वति कश्चन ।७९ एवं ध्यानं पूजन च कृत्वा सस्यग्विधानतः । ममावरणपूजां च प्रारभेत विचक्षणः ।८0 हे देवि ! इस तरहसे अपना मन लगाकर हमारा और आपका ध्यान किया करताहै तथा शंख के जल से स्नान कराकर ओंकार सेप्रोक्षणकिया करता है वह सिद्ध होता है ।७१। 'मवे भवेनाति भवे'-इसमन्त्रसे पाद्य तथा 'वामदेवाय नमः'-यह उच्चारण करके आचमन देना चाहिये ।७२। 'ज्येष्ठाय नमः' इसको पढ़कर शुभ्र वस्त्र समर्पित करे। 'श्रष्ठायनमः'-यह पढ़कर यज्ञोपवीत का समर्पण करना चाहिये ।७३। 'रुद्राय नमः'-इसको पढकर आचमन करावे और 'कालात नमः' इसको बोल कर सुन्दर गन्ध को देवे ।७४। 'कक्ष विकरणाय नमः'-यह मन्त्र पढ़कर अक्षत तथा बल- विकरणाय नमः'यह बोलकर पुष्पों का समर्पण करना चाहिये ।७५। 'बलाय नमः'-यह उच्चारण करधूपका आघापन करावे। बलप्रमथनाय

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शिव के आठ नामों का अर्थ ] ४६३

नमः-यह पढ़कर दीप दर्शनवरावे॥६। ब्रह्म षहुङ्ग और मात्रा के सहित प्रणव शिव और शक्तिकेसहित क्रमसे मुझे और तुमको मुद्रादिखावे सर्व- प्रथम मेरा पूजनकरे इमकेअनन्तर तुम्हारे पूजनके लिए समस्तवस्तु अर्पित करे ।७७-७८। जिसममय तुम्हारी पूजाकरे तब स्त्री-लिग लग।देनाचाहिए। केवल इतनाही भेदहोता है अन्यकुद नहीं है है।७९। हे देवि ! इसीविधिसे पूर्ण विधानकेसाथ ध्यान तथा पूजन करके फिर बुद्धिमान् साधक भक्तको मेरो आवरण पृजाका विधान करना चाहिये।८०। । शिव के आठ नामों का अर्थ और लिंग-पूजा विधि। शिवो महेश्वरचैव रुद्रो विष्णुः पितामहः । संसारवद्यः सर्वज्ञः परमात्मेति मुख्यतः ।१ नामाष्टकमिदं नित्य शिवस्य प्रतिपादकम्। आद्याग्तपश्चक तत्र शांत्यतीताद्यमुक्रमात् ।२ सज्ञा सदाशिवादीनां पश्चोपाधिपरिग्रहात्। उपाधधिनिवृत्तौ तु यथास्वं विनिवर्तते ।३ पदमेव हित नित्यमनित्या: पदिनः स्मृताः । पदानां परिवृत्तिः स्यांमुच्यंते पदिनो यतः ।४ परिवृत्यन्तरे त्वेवं भृयस्तस्याप्यपाधिना । आत्मांतराभिधानं स्यात्पदाद्यनामपश्चकम् 1५ अन्यतु त्रितयं नाम्नामुपादानादिभेदतः । त्रिविधोपाधिरचनाच्छिव एव तु वर्तते ।६ अनादिमलसश्लेषप्रागभावात्स्वभावतः 1 अत्यंतपरिशद्धा मेत्यतोऽयं शिव उच्यते ।७ ईश्वरने कहा-शिव, महेश्वर, रुद्र, विष्णु, पितामह, संसार वैद्य, सवंत्र, परमात्मा ये मुख्य आठ परमात्मा शिव के नाम हैं, जो शिव के नित्य प्रतिपादक हैं। इसमें पितामह तक प्रथम पाँच नामोंमें शांत्यतीत के कमसे पाँच उपाधियों के ग्रहण करने से शिवादि की संज्ञा ग्रहण की है। उपाधि के निवृत्त होने यह संज्ञा भी निवृत्त हो जाती है।१-२-३1 पद

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२९४ 1 [ श्री शिवपुराज सत्य है और सदाशिवादि मूर्ति अनित्य हैं पदोंका ही विनिमय होता है इससे मूर्ति अदि छूटजाती है।४। पदान्तरकी प्राप्तिमें फिर उपाधिसे उस पदकी प्राप्तिहोती है। जो यह आदिका पञ्चक अन्य आत्माकेजानने वाला होतो दूसरे तीननामोंका इसजगत्के उपादान कारणस्वरूप प्रकृति आदिके योगसे तीनतरहकी उपाधि कहनेके कारण ये तीननामभी शिव रूपही होते हैं ।५-६। अनादि मलके सङ्गके स्बभावसे जिस तरह जल स्वच्छ होता है तथा स्वादिष्ट होता है परन्तु वही जल अन्य देशमें प्राप्त हो जानेपर खारी तथा गदला होजाता है परन्तु जलका स्वभावतो निर्मलता युक्त हो होता है। इसीतरह उाधिरहिन होनेसे वह एकहो निर्मल श्रिव है जो उपाधि से युक्तहोनेपर अनेकनाम धारण कर लेते हैं। अब उन नामोंका अर्थ बत- लाया जाता है,अत्यन्त परिशुद्ध आत्मा होनेसे महादेवको शिव कहा करते है ।७ अथवा शेषकल्याणगुणैकघन ईश्वरः । शिव इत्युच्यते सद्भिः शेवतष्वार्थवेदिभि: ।८ त्रयाविशतितत्वेभ्यः पराः प्रकृतिरुच्यते । प्रकृतेस्तु पर प्राहुः पुरुषं पञ्चविशकम् ।९ यद्व दादो स्वर प्राहुर्वाच्यवाचकभावतः । वदंकवेद्य याथात्म्य द्वदान्ते च प्रतिष्टितम् ।१० स एव प्रकृतो लीना भोक्ता यः प्रकृतेर्य तः। तस्य प्रकृतिलीतस्य यः परःस महेश्वरः ।११ तदधानप्रवृत्तित्वात्वकृतेः पुरुषस्य च । अथवा त्रिगुणं तत्व माये यमिदमव्ययम् ।१२ म यां तु प्रकृतै वित्तान्मायिन तु महेश्वरम् । मायाविमाचकाऽनन्तो महेश्वरसमन्वयात् ।१३ रुद्दु ख दुःखहेतुर्वा तद्रावयति यः प्रभुः । रुद्र इत्युच्यते तस्माच्छिवः परमकारणम् ।१४ यस्माज्गदिदं सर्व विधिविष्ण्विन्द्र पूर्वकत। अथवा समस्त कल्याणकारी गुणों के एक ही आधार होने के कारण

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शिव के आठ नामों का अर्थ [ २९५

उन ईश्वरको शिव तत्ववेज्ञाता महात्मा लोग उन्हें शिव कहाकरते हैं।८। महेश्वर शब्दका अर्थ है तेईस तत्वों से परे प्रकृति है उस प्रकृतिसे भी परे पच्चीसवाँ पुरुष होता है।९। वाच्य तथा वाचक भाव से जिसको वेदके आदिमें ऊकार कहते है,वह बेदके द्वार ही जानने के योग्य है और आत्म- स्वरूप में वेदान्त में प्रतिष्रित है।१०। वह प्रकृति में उसके मोग के लिये लीनरहता है। उस लीन होनेवाले पुरुषसे भी जो परे है वही महेश्वरकहा ... 'Ahn TA जाता है ।११: प्रकृति और पुरुष की प्रकृति उसके ही अधीन है अथवा त्रिगुण तत्वकी कभी विनाश को प्राप्त न होने वाली यह माया है ।१२। माया को ही प्रकृति और मायी को महेश्वर जानना चाहिये। महेश्वर को प्राप्तिसे हो नारायण मायासे मोक्षपद प्रदान किया करते है।१३। रुद्र यह नाम रुद्र अर्थात् दुःखको अथवा दुःखके कारणको दूरकर देने से ही इनको नाम 'रुद्र' यह पड़ गया है और इसीलिये ही इन्हें रुद्र कहा करते है, वही परम कारण शिव है ।१४। ..... शिवतत्वादिभूम्यन्तं शरीरादि घटादि च । व्याव्याधितिष्टति शिवस्तस्माद्विष्णुरुदाहृत ।१५ जगतः पितृभूतानां शिवो मूर्त्यांत्मनामपि । पितृभावेन सर्वेषां पितामह उदीरितः ।१६ निदानज्ञो तथा वैद्यो रोगस्य विनिवर्त कः । उपाय भ षज स्तद्वल्लयभोगाधिकारक संसारस्येश्वरो नित्य स्थ लस्य विनिवर्त क। ।१७

संसारवैद्य इत्युक्तः सर्वतत्वार्थवेदिभि: ।१८ सर्वात्मा परमरेभिगुणनित्यसमन्वयात् । स्वस्मात्परात्मविरहात्परमात्मा शिवः स्वयम् ॥१६ इति स्तुत्वा महादेवं प्रणवात्मानमव्ययम् । दत्वा पराड् मुखाद्यञ्च पश्चादीशानमस्तके ।२० पुनरभ्यच्यं देवेशं प्रणवेन समाहितः । हस्तेन बद्धाञ्चलिना पूजापुष्पं प्रग्रह्य च ।२१

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२९६ 1 श्री शिव पुराण

शिवके तत्त्व्रादि पर्यन्त शरीर घटादि सबमें व्याप्तहोकर स्यित होनेके कारणही शिवको विष्ुकहते हैं।१५: इन समस्तजगत्के पितृस्वरूप ब्रह्मा- दिक और मूर्ति आत्मावाले होनेसे सबके पितामह वह पितामह कहलाते है ।१६। जिस प्रकार निदानका ज्ञाता वैद्य रोगको निवारण कर देने में समर्थ हुआकरता और उसका उगय तथा औषधिका ज्ञानरखता है इसी प्रकारसे भोग मोक्षके प्रदान करनेके पूर्ण अधिकार रखनेमे सम्पूर्ण संसार के ईश्वर स्थूल कारगकी निवृत्ति करनेवाले शिवतत्त्वके ज्ञाताओंके द्वारा यह ससार वैद्य-इस नामस कहे जाया करत है ।१७-८। वे सर्वज्ञ प्रभृति ममस्त गुण गणसे युक्त होकर सबके आत्मा-परे से भी परे अगने से और परमात्मा मे भी परे होनेसे स्वयंशिव परमात्मा कहे जाते हैं।१९। इस तरह प्रणवात्म अविनाशी महादेत्र के लिए प्रणाम करके अपने सन्मुख अध्य देना चाहिए ।२० फिर ईशानके मस्तकमें प्रणसेयुक्त देवेशका पूजनकरे और अञ्चलि बाँधकर अचनाक पुण्ों को करना चाहिये।२१। उन्मनांतं शिवं नीत्वावामनासापुटाव्वना । दैवीमुद्वास्य च ततो दक्षनासापुटाध्वना ।२२ शिव एवाहमस्मीति तदक्यमनुभूय च। सर्वावरणदेवांश्र पुनरुद्वासयेत् धृदि ।२३ विद्यापूजां गुराः पूजां कृत्वा पश्चाद्यथाक्रमम् । शङ्ग धपात्रमत्रांश्र हृदये वियसेत्क गत् ।२४ निर्माल्यश्च समार्प्याथ चण्डेशायेशगोचरे। पुनश्च संयतप्राण ऋष्यादिकमथोच्चरेत् ।२५ एतछु, त्वा महादेवी महादेवेन भाषितम् । स्तुत्वा विविघैः स्तोत्र देवं वेदार्थगर्भितः ।२६ श्रीमत्पादाब्जयोः पत्युः प्रणाम परमेश्वरी। अतिप्रहृष्ट्हृदया मुमोद मुनिसत्तमाः ।२७ अतिगुह्यमिद विप्राः प्रचवार्थप्रकाशकम् । शिवज्ञानपर ह्यतद् भवतामार्तिनाशनम् ।२८

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नान्दीश्राद्ध, ब्रह्मयज्ञादि विधि । I २९७

फिर वाम नासा पुटके मार्ग में उन्ननी नाड़ी के अन्न तक ले जाकर अर्थात् शिवको लेजाकर और दक्षिण नासा पुट के मार्ग से जगदम्श देवी को लेजाकर 'मैं स्वयं शिव हूँऐसा अनुभत करे इसके पश्चात् हृदयमें समस्त आवरणके देवताओंका ध्यान करना चाहिए।२२-२३। इसके अनंतर क्रमसे विद्या और गुरुदेवका अर्चन करे फिर शङ्द, अर्ध्यपात्र तथा अन्य मंत्रों को क्रमसे हृदयमें धारण करना चाहिये २४।इसके पश्चात् निर्माल्यको शिवके अर्थात् चण्डेशके आगे समपग करे और पश्चात् प्राणायाम करे तथा समस्त ऋषि आदिका स्मरण करना चाहिए।२५। व्यासजीने कहा-हे देवेशि !इस प्रकार शिवके बचनोंको सुनकर शिवजीके वेदार्थसे भरे हुए अनेक तरह के स्तोत्रोंसे स्तुति करती हुई परमेश्वरी श्रीमच्चरण कमलमें बारम्बार प्रणाम करने लगीं। हे मुनिगण! परमाह्नाद से मनमें पावती महाहर्षित हुई। TA ।२६-२७। हे ब्राह्मणो ! प्रणव के अथ का प्रकाश करने वाला यह परम गुप्त विधान है। यह भगवान् शिवका परम ज्ञान समस्त दुःखोंका विनाश करने वाला होता है।२८। नान्दो श्राद्ध, ब्रह्मयज्ञादि विधि साधु साधु महाभाग वामदेव मुनीश्वर। त्वमतीब शिवे भक्तः शिवज्ञानवतां दरः ।१। त्वया त्वविदितं किंचिन्नास्ति लोकेषु कुत्रचित् । तथापि तव वक्ष्यामि लोकानुग्रहकारिणः ।२। लोकेस्मिन्पशवः सर्वे नानाशास्रविमाहिताः। वञ्चिताः परमेशस्य माययाऽतिविचित्रया।३। न जानन्ति परं साक्षात्प्रणवार्थ महेश्वरम्। सगुण निर्गुण व्रह्म त्रिदेवजनक परम्।४। दक्षिण बाहुमुद्ध त्य शपथं प्रब्रवीमि ते। सत्य सत्य पुनः सत्य सत्यं सत्यं पुनः पुनः ।५ प्रणवार्थः शिवः साक्षात्प्राधान्येन प्रकीतितः। श्रतिषु स्मृतिशास्त्रष पुराणेष्वागमेषु च६।

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२९८ ] श्री शिवपुराण यतो वाचो निवत्तन्ते प्रप्राप्य मनसा सह। आनन्द यस्य वै विद्वन्न बिभेति कुतश्चन ।७ स्कन्दजीने कहा हे वामदेव मुने ! हे महाभाग ! आप धन्य हैं,आप धन्य हैं,आप परम शिवभक्त और शिवज्ञान के ज्ञाताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं ।१ त्रैलोक्य कुछमी ऐसा वहीं, जिसे आप जानते हों, फिरभी लोक कल्याण की दृष्टिसे मैं आपके प्रतिकहता हूँ।२।इस लोक में मनुष्य अनेकभाँतिके शास्त्रों के कारख भ्रमित होगये हैं तथा वे परमेश्वरी की अद्भुत मायासे वंचित हैं ।३। वे साक्षात् प्रणवरूप शिवको नहीं जानते,जो शिव सगुण-निगुण ब्रह्म हैं तथा त्रिदेव जिनके द्वारा प्रकट हुए हैं।४। मैं अपनी दक्षिणभुजा उठाकर सौगन्ध पूर्वक कहता हूँ कि यह नितान्त सत्य है इसमें सन्देह नहीं है ।५। स्वयं भगवान्शङ्कर ने ही प्रणवके अर्थोंका वर्णन किया है,यह बात श्रुति, स्मृति, शास्त्र,पुराण और आगम ग्रन्थोंने भी कही हैं।६। जहाँ पहुंच कर मनयुक्त वाणी की भी निवृत्ति होजाती है, जिनके द्वारा आनन्दको प्राप्त विद्वान् किसी प्रकार भी मयभीत नहीं होता है।७। यस्माज्जगदिदं सर्वं विधिविष्णिवन्द्र पूर्वकम्। सहभूतेन्द्रियग्रामंः प्रथमं संप्रसूयते।८। न सम्प्रसूयते यो वै कुतश्चन कदाचन। यस्मिन्न भासते विद्य न्न च सूर्य्यो न चन्द्रमा: ।९ यस्य भासा विभातीदञ्जगत्सर्व समन्ततः। सर्वेश्वर्येण सम्पन्नो नाम्ना सर्वेश्वरः स्वयम् ।१०। यो वै मुमुक्ष भिर्ध्येयः शम्भुराकाशमध्यगः । सर्व्वव्यापी प्रकाशात्मा भासरूपी हि चिन्मय: ।११। यस्य पुसां परा शक्तिर्भावगभ्या मनोहरा। निर्गुणा स्वगुणरेव निगूढा निष्कला शिवा ।१२। तदीयं त्रिविध रूप स्थूलं सूक्ष्मं परं ततः। ध्येय मुमुक्षुभिर्नित्यं क्रमतो योगिभिमुने ।१३। निष्कलः सर्वदेवानामादिदेवः सनातनः । ज्ञानक्रियास्वभावो यः परमात्मेति गीयते ।१४।

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जिससे ब्रह्मा,रुद्र, इन्द्र आदि यह सम्पूण विश्व प्रकट होना है, भूतेन्द्रिय सहित ये ही इस विश्व के उत्पत्तिकर्ता हैं।5। वह कहीं भी उत्पत्तिको प्राप्त नहीं होते, जिनमें विद्यु त भास्कर तथा चन्द्रमाभी प्रकाश करने योग्य नहीं हैं ।९। जिसके आमा से ही यह सम्पूर्ण विश्व प्रकाशवान् होता है, सम्पूर्ण ऐश्वर्य उनसे प्राप्त होने से ही वे परमेश्वर कहे जाते हैं ।१०। जो आकाशके मध्य निवास करने वाले शिव मुमुक्षुओं द्वारा ध्यान किये जाते हैं, जो सबमें व्याप्त, प्रकाश रूप आत्मस्व्ररूप एवं चिन्मय हैं ।११।जिसकी पराशक्ति का ज्ञान ज्ञानसे होता है वह निर्गुण निष्कल, सगुण एवं साक्षात् शिव हैं।१२। जिनके स्थूल सूक्ष्म और परे यह तीन भेद हैं,हे मुनोश्वर ! मुमुक्षुजनों को उसी का ध्यान करना श्रयकर है ।१३। यह सभी देवों के अधीश्वर, पनातन, कला-रहित तथा ज्ञान क्रिया के स्वभाव वाले होने से परमात्मा कहे जाते हैं।१४। तस्य देवाधिदेवस्य मूर्तिः साक्षात्सदाशिवः। पश्चमत्रतनुदवः कलापश्चकविग्रहः ।१५। शुद्धस्फटिकसकाशः प्रसन्नः शीतलद्य तिः। पञ्चवक्त्रो दशभुजस्त्रिपञ्चनयन; प्रभुः॥१६। ईशानमुकुटोपेतः पुरुषास्यः पुरातनः। अघोरहृदयो वामदेवगुह्यप्रदेशवान् ।१७। सद्यपादश् तन्मूर्तिः साक्षात्सकलनिष्कलः । सर्वज्ञत्वादिषट्शक्तिषडंगीकृतविग्रह:।१८। शब्दादिशक्तिस्फुरितहत्पङ्गजविराजितः ।१९। मन्त्रादिषड्विधार्थानामर्थोपन्यासमार्गतः। समष्टिव्यष्टिभावार्थ वक्ष्यामि प्रणवात्मकम्.२०। श्र तिस्मृत्युदितं कर्म कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यति। इत्युक्तं परमेशेन वेदमार्गप्रदर्शिना ।२१। उनकी मूर्ति सदाशिवस्वरूप है,वे पंच मंत्रात्मक देह वाले और पंचक

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३०० 1 श्री शिवपुराण विग्रह वाले देवता हैं।१५। स्वच्छ स्फटिक मणि जैसे प्रसन्न और शीतल कान्तिसे सम्पन्न,पञ्चमुख पञ्चदश नयन तथा दश भुजा वाले हैं।१६। वे मुक्तिसे सुशोभित ईशानदेव,पुरातन पुरुष अधोर हृदय,वामदेव गुह्यभूत तथा मूर्त स्वरूप हैं । १७। सद्यपाद तन्मूर्ति, सम्पूर्ण निष्फल मूर्ति.सर्वज्ञत्ब आदि छः शक्ति और छः प्रकारसे देहको अङ्गोकृत करने वाले ।१८। अब्द आदि से स्फुरित, हृदय पद्यमें प्रतिष्ठित तथा अपनी शक्तिसे वामभागमें सुशोभित हैं। १९।अब मैं मन्त्र आर्दिके छःप्रकार, उपन्यासके ढङ्ग तथा समष्टि-व्यष्टि के प्रणवात्मक अर्थको कहता हूँ, ध्यान से सुनो ।२०। श्रति, स्मृति द्वारा बताये गये धर्म के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त होती है,वेद मार्ग दर्शक ईश्वर का यही कथन है।२१। वर्णाश्रमाचारपुण्यरभ्यर्च्य परमेश्वरम्। तत्सायुज्यं गताः सर्वे बहवो मुनिसत्तमाः ।२२ ब्रह्मचर्येण सुनयो देवा यज्ञक्रियाऽध्वना। पितरः प्रजया तृप्ता इति हि श्रतिव्ररवीत् ।२३। एवं ऋणत्रयान्मुक्तो वानप्रस्थाश्रमं गतः। शीतोष्णसुखदुःखादिसहिष्णुर्विजितेन्द्रियः ।२४। तपस्वी विजिताहारो यमाद्य योगमभ्यसेत्। यथा दृढतरा बुद्धिरविचाल्या भवेत्तथा ।२५। एव क्रमण शुद्धात्मा सर्वकर्माणि विन्यसेत्। संन्यस्य सर्वकर्माणि ज्ञानपूजापरो भवेत् ।२६। सा हि साक्षाच्छिवंक्येन जीवन्मुक्तिफलप्रदा। सर्वोत्तमा हि विज्ञया निर्विकारा यतात्मनाम् ।७। तत्प्रकारमहं वक्ष्ये लोकानुग्रहकाम्यया। तव स्नेहहान्महाप्राज्ञ सावधानतया शृणु ।२८। वर्णाश्रमके आचार रूप पुण्यके द्वारा प्रभुपूजन करने से अनेकों मुनि- जन उनके सायुज्य पदको प्राप्त हो चुके हैं।२२। श्र तियों का कथन है कि ब्रह्म चर्यके द्वारा ऋषि,यज्ञ क्रियाके द्वारा देवता और स्ववाके द्वारा पितर