1. Siva Samhita Tika of Gosvami Ramchanr Puri Venkateswara Steam Press
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Barcode : 2990100073049 Title - Sri Siva Samhita Author - K Krishna Das Language - sanskrit Pages - 218 Publication Year - 1960 Barcode EAN.UCC-13
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॥ श्रीः ।।
30 शिवसंहिता.
(भाषाटीकासहिता.)
श्रीमत्पर महंसपरिव्राजकंयोगिराजश्री ६ स्वा- मिस्वयं प्रकाशानन्द सरस्वतीनामाज्ञानुसा-
भाषानुवादेन सिता।
सेयं खेमराज श्रीकृष्णदासश्रेष्ठिना मुम्वय्यां स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम ) यन्त्रालये मुद्भित्वा मकाशं नीता.
श्रावण संवत् १९६०, शके १८२५.
सर्वाधिकार "श्रीवेङ्गटेश्वर" यन्त्रालयाधीशने स्वाधीन रक्खा है।
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प्रस्तावना.
सर्व मोक्षकांक्षी महापुरुषोंको विदित होय कि, यह "शिवसंहिता" नामक ग्रंथ जो संसारके उपकारार्थ पूर्व श्रीपार्वतीजीके प्रश्नोत्तर योगमार्गउत्पत्तिकर्ता श्रीशि- वजीने कृपापूर्वक योगोपदेश किया सो यह ग्रंथ यो- गाभ्यासी जनोंको अति उपकारक है इस हेतुसे कि,श्री- शिवजीने इसमें ब्रह्मज्ञान और हठयोगक्रिया राजयो- गसहित उत्तम सरलरीतिसे उपदेश किया है इसको प- रिश्रमसे लाभ करके योगाभ्यासी और मोक्षकांक्षी जनोंके उपकारार्थ श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकयोगीराज श्री ६ स्वामी स्वयंप्रकाशानन्दसरस्वतीजीके साधक शिष्य काशीनिवासी गोस्वामी रामचरणपुरीजीके द्वारा भाषानुवाद कराय अब तीसरी वार शुद्ध करके निज "श्रीवेङकटेश्वर" (स्टीम्) मुद्रायन्त्रालयमें मुद्रित कर प्रसिद्ध किया। अब सर्व शास्त्रवेत्ता बुद्धिमान्जनोंसे प्रार्थना है कि, इस ग्रंथके मूल वा टीकामें जहां कहीं दृष्टिदोषसे अशुद्ध रहा होय उसको कृपापूर्वक सुधारदें,
भवदीय शुभाकांक्षी- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङकटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्ष-मुंबई.
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शिवसंहितास्थविषयानुक्रमणिका।
षया: पृष्ठांका: विषया: पृष्ठांका: प्रथम: पटलः १८ वज्रोलीमुद्राकथनम्. ११३
अथ मंगलाचरणम्. १ १९ शक्तिचालनकथनम्. १२१
१ अथ लयप्रकरणम्. २ पञ्चम: पटलः द्वितीय: पटलः २० अथ योगविन्नादिकथनम्. १२४
३ अथ तत्त्वज्ञानोपदेशः ३६ २१ धर्मरूपयोगविन्नकथनस. १२५
तृतीयः पटलः २२ ज्ञानरूपयोगविन्नकथनम्. १२६
३ अथ ये.गानुष्ठानपद्धतिर्यो- २३ चतु र्वैधबोधकथनम्. १२८
गाभ्यासवर्णनञ्च. ५७ २४ मृदुसाधकलक्षणम्. १२९
४ सिद्धासनकथनम्. ८५ २५ अधिमात्रसाधकलक्षणम्. १३०
५ पझासनकथनम्. ८६ २६ अधिमात्रतमसाधकलक्ष-
६ उग्रासनकथनम्. णम्. १३१
७ स्वस्तिकासनकथनम्. ८९ २७ प्रतीकोपासनाकथनम्. १३२
चतुर्थः पटलः २८ मूलाधारपद्मविवरणम्. १३८
८ अथ मुद्राकथनम्. ९० २९ स्वाधिष्ठानचकविवरणम्. १५५
९ योनिमुद्राकथनम्. .९२ ३० मणिपूरचक्रविवरणम्. १५७
१० महामुद्राकथनम्. ९७ ३१ अनाहतचकविवरणम्. १५८
११ महाबंधकथनम्. १०० ३२ विशुद्धचक् ववरणम् १६१
१२ महावेषकथनम्. १.२ ३३ आज्ञाचकविवरणम्. १६३
:३ खेचरीमुद्राकथनम्. १०५ ३४ सहस्रारपझ्मविवरणम् १७२
१४ जालन्धरबन्धकथनम्. १०८ ३५ राजयोगकथनम्. १८२
१५ मूलबन्धकथनम्. १०९ ३६ राजाधिराजयोगकथनम्. १९५ १६ विपरीतकरणीकयनम्. ११० ६७ शिवसंहिताफलकथनम्. २०३ १७ उड्डाणबन्धकथनम्. १११ ३८ उमामहेश्वर माहात्म्यम् २०५ इत्यनुकमणिका।
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ओ ३ म् श्रीगणेशाय नमः। अथ शिवसाहता।
मंगलाचरणम्। विन्नहरण गणनाथजी, बुद्धिगेह तुअ माहिं। विन्न बुद्धि दोनों विकल, नशत जात जगमाहिं॥9॥ बुद्धिराज दीजे हमें, बुद्धि पुत्र गौरीश।। योगयुक्ति भाषा करों, धरि गुरुआज्ञा शीश ॥ २।। शिव आलयमें जायके होत जीव भवपार।। पाय कृपा गुरु शम्भुकी, भञ्जन चहों केंवार।। ३ ।। गौरी अब मोहिं दीजिए, अनुशासन सुत जानि।। शिवभाषित भाषा रचों, छूटों भवभ्रम जानि ॥।8 ।। फिर नहिं आवों जगतमें, योग युक्ति सब जानि। मातु कृपा मोपर करहु, शिक्षहुदेहुमोहिंज्ञान॥५ ॥ नाम हमारोहै नहीं, नहीं कर्म गुण त्ास।। मातु पुकारत पै अहौं, रामचरणपुरि दास ॥६॥ श्लोक-यंज्ञातुमेवयतिनो मतिपूर्वमेतत संसारसृत्वरकलत्रसुतादिसर्वम् ।। त्यक्कासमाधिविधिमेवसमाश्रयन्ते
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शिवसंहिता भाषाटीका।
मथमपटल: मूलम्-एकज्ञानं नित्यमाद्यन्तशून्यं ना- न्यत् किश्चिद्वर्त्तते वस्तु सत्यम्।। यद्धे- दोस्मि त्नि्द्रियोपाधिना वै ज्ञानस्यायं भासते नान्यथैव ॥१ ॥ टीका-केवल एक ज्ञान नित्य आदि अन्तरहित है ज्ञानसे अलग अन्य कोई वस्तु सत्य संसारमें वर्त्तमान नहीं है केवल इन्द्रियोपाधिद्वारा संसार जो भिन्न भिन्न बोध होताहै सो यह ज्ञानमात्रही प्रकाश होता है और कुछ नहीं है अर्थात ज्ञानसे भिन्न कुछ नहीं है॥। १॥। भूलम्-अथ भक्तानुरक्तोऽहं वक्ष्ये योगानु- शासनम्॥ ई-श्वरः सर्वभूतानामात्ममुक्ति- प्रदायकः॥ २॥ त्यक्का विवादशीलानां मतं दुर्जानहेतुकम्॥ आत्मज्ञानाय भूता- नामनन्यगतिचेतसाम॥ ३ ॥ टीका-सर्व प्राणिमात्रके ईश्वरआत्ममुक्तिप्रदायक भक्तवत्सल जिन मनुष्योंको सिवाय आत्मज्ञानके अन्य गति नहीं है उनके हेतु कृपापूर्वक योगोप-
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पथमपटलः।
दझा करतेहैं विवादशील लोगोंका मत दुर्ज्ानका हेतु है यह त्यागनेके योग्य है ॥ २ ॥ । ै ॥ मूलम्-सत्यं केचित्पशंसन्ति तपः शौचं तथापरे॥ क्षर्मा केचित्प्रशंसंतितथैव श- ममार्जवम॥४॥ के चिद्दानं प्रशंसन्ति पि- तृकर्म तथापरे॥ केचित्कर्म प्रशंसन्ति
टीका-कोई सत्यकी प्रशंता करते हैं, कोई तपस्या- की, कोई शेचाचारकी, कोई क्षमाकी प्रशंसा, कोई स- मताकी, कोई सरलताकी, कोई दानकी प्रशंसा, कोई पितृकर्मकी, कोई सकान उपासनाकी कोई पुरुष वैराग्यको उत्तम कहतेहैं ॥४ ॥५ ॥ मूलभ्-केचिद्ृ हस्थकर्माणि प्रशसन्ति विच- क्षणाः॥ अभिहोत्रादिक कर्म तथा केचि- त्परं विदुः ॥ ६। मन्त्रयोगं प्रशंसन्ति केचित्तीर्थानुसेवनम्॥ एवं बहूनुपायां- स्तु प्रवदन्ति विमुक्तये॥७॥ टीका-कोई पुरुष गृहस्थकर्मकी प्रशंसा करते हैं, कोई बुद्धिमान् पुरुष अगनिहोत्रादिक कर्मकी प्रशंसा करतेहैं कोई मंत्रादि कोईतीर्थेसेवन करना सुख्य
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(४) शितर्मंहिता सावाटी करासमेना "। समझते हैं इसी प्रकार मनुष्य बहुतसे उपाय सुक्तिके हेतु अपने मतिके अनुसार करते हैं ॥ ६॥। ७ ॥ मूलम्-एवं व्यवसिता लोके कृत्याकृत्यवि दो जनाः॥ व्यामोहमेव गच्छंति विमु- क्ा: पापकमामिः॥८ ॥।एतन्मतावलम्बी यो लब्ध्वा दुरितपुण्यके। भ्रमतीत्यव- शः सोऽत जन्ममृत्युपरम्पराम॥९॥ टीका-इसीतरह विधिनिषेध कर्मके जाननेवाले लोग पापकर्मैसे रहित होके मोहमेंही पड़तेहैं और जो मनुष्य पुण्यपापका अनुष्ठान पहिले जो मत कहा है उसके आसरे होके करते हैं उसका फल यह होता है कि, मनुष्य वारंवार संसारमें जनमता और मरता है अर्थात् शुभाशुभ कर्म करनेसे कदापि मोक्ष नहीं होता परन्तु शुभकर्म करनेसे केवल चित्तकी शुद्धि होतीहै। ८ ।। ९ ।। मूलम्-अन्यैर्मतिमतां श्रेष्ठैर्गप्तालोकनतत्प रैः।। आत्मानो बहवःप्रोक्ता नित्याः सर्व- गतास्तथा॥ १०॥ यद्यत्प्रत्यक्षविषयं तदन्यत्नास्ति चक्षते॥ कुतः स्वर्गांदयः सन्तीत्यन्ये निश्चितमानसाः ॥५१॥
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प्रथमपटल:। (५) टीका-कोई कोई बुद्धिमान् गुप्तशास्त्रके जानमेमें तत्पर अर्थात गूढदर्शी बहुत आत्मा नित्य और सर्व- व्यापक कहते हैं बहुत प्रत्यक्षवादी यह कहते हैं कि, जो वस्तु प्रत्यक्ष देखनेमें आताहै वही सत्य है और कुछ नहीं है जिनकी बुद्धि स्वर्गादिकके न माननेमें निश्चित है॥१०॥११॥ मूलं-ज्ञानप्रवाह इत्यन्ये शून्यं केचित्परं वि- दुः ॥ द्वावेव तत्त्वं मन्यन्तेऽपरे प्रकृति पूरुषो ॥ १२ ॥ टीका-कोई मनुष्य कहते हैं कि, सिवाय ज्ञान- धाराके और कुछ नहीं है जो वस्तु संसारमें वर्तमान देखने या सुननेमें आती है या किसी प्रकारसे उसका होना निश्चय होताहै वह सब ज्ञानही है कोई पुरुष यही जानता है कि सिवाय अून्यके और कुछ नहीं है इसीतरह कोई मनुष्य प्रकृतिपुरुष दोनोंको तत्त्व मानते हैं॥१२॥ मूलम्-अत्यन्तभिन्नमतयः परमार्थपराङ्- खाः॥ एवमन्ये तु संचिन्त्य यथामति य थाश्रुतम्॥१३॥ निरीश्वरमिदं प्राहुः सेश्वरञ्च तथापरे। वदन्ति विविधैभैंदैः संयुक्त्यत स्थिकातराः।।१४।।
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(६) शिवसंहिता आषाटीकासमेता। टीका-बहुतसे परमा्थेसे वहिमुख जिनकी भिन्न मिन्न मति है अपने मतिके अनुसार कर्मोंको मानते और करते हैं कोई कहते हैं कि, ईश्वर नहीं है इसीतरह बहुत लोग कहते हैं कि, यह संसार बिना ईध्वरके नहीं है अर्थात् इश्वरहीसे है यही निश्चय जानते हैं अपनी युक्तिसे बहुत २ भेद कहते और उसमें स्थिरतासे तत्पर रहते हैं ॥ १३॥१४॥ मूलम-एते चान्ये च सुनिभिः संज्ञाभेदाः पथग्विधाः॥ शास्ेषु काथेता होते लोक
नां मतं वक्तुं न शक्यते। भ्रमन्त्यस्मि- अना: सर्वे मुक्तिमार्गवहिष्कृताः । १६।। टीका-ऐसे बहुत मुनिलोगोंने नानाप्रकारके मत शास्त्रमें स्थापन किये हैं यह संसारके मोह अ्रममें पड़नेका हेतु है अर्थात झास्त्रमें बहुतप्रकारके मत दे- खनेसे मनुष्यके चित्तमें अ्रम उत्पन्न होता है उस भ्रम- का फल यह है कि, अपनी बुद्धिके अनुसार कोई एक मत ग्रहण करके मरणपर्यत उसमें तत्पर मनुष्य रह ताहै परंतु अमृत लाभ नहीं होता ऐसे विवादशील लोगोंका मत वर्णन करनेको हम शक्य नहीं हैं ।
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पथमपटलः। (७) मुक्तिमार्गसे विमुख होके सब मनुष्य संसारमें भ्रमण कर- ते हैं ॥ १५॥१६॥ मूलम्-आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ॥ इदमेकं सुनिष्पन्नं योग- शास्त्रं परं मतमू॥ १७॥ टीका-श्रीमहादेवजी कहते हैं कि, सब शास्त्रोंको देखके और वारंवार विचारके यह निश्चित हुआ कि, एक यह योगशास्त्र उत्तम परमसंमत है अर्थात् यह सबसे उत्तम है तात्पर्य यह है कि, ऐसे मतको छोड़कर जिसकी प्रशंसा ईश्वर अपने मुखारविन्दसे करते हैं और जिसके ग्रहण करनेसे ब्रह्म करामलकवत जानपडता है मनुष्य विक्षि- सके तरह इधर उधर चित्तको दौड़ाते हैं और बहुत लोग यह विचारते हैं कि, यह बड़ा कठिन है आश्चर्यकी बात है कि, मनुष्यशरीरसे जब ऐसा उत्तम श्रम न होगा तो जान पडता है कि, रोगांदिकसे शरीरके नाश होनेसे पीछे फिर जब पशुका जन्म होगा तब कुछ ईशरके जाननेमें श्रम करें गे । १७ ॥ मूलमू-यस्मि ्ज्ञाते सर्वमिदं ज्ञातं भवति निश्चितम् ॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यः
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(e) शिवसंहिता आषाटीकासमता। टीका-निश्चय जिसके जाननेसे स्षब संसार जाना जाता है ऐसे योगशास्त्रके जाननेमें परिश्रम करना अवश्य उ- चितहै फिर अन्य शास् जो कहेहैं उनका क्या प्रयोजन है अर्थात कुछ प्रयोजन नहीं तात्पर्य यह है कि, पंडित लोग वृथा विवाद करके जो लोग सुमार्गमें जानेकी इच्छा करतेहैं उनको भी भ्रष्ट कर देते हैं ॥। १८।l मूलम्-योगशास्त्रमिदं गोप्यमस्माभि: परि- भाषितम्॥ सुभक्ताय प्रदातव्यं त्रैलोक्ये च महात्मने ॥१९ ॥ टीका-यह योगशास्त्र जो हमने कहाहै सो परम गोपनीय है यह त्रैलोक्यमें महात्मा और अच्छे भक्त जनोंको दे- ना उचित है तात्पर्य यह है कि, विना ईश्वर- के भक्तिके यह शुभकर्म सिद्ध नहीं होता न उधर चित्तकी वृत्ति जातीहै -इस हेतुसे अभक्तजनोंको देना उचित नहाहै॥ १९॥ मूलम्-कर्मकाण्डं ज्ञानकाण्डमिति वेदो द्वि धा मतः॥ भवति द्विविधो भेदो ज्ञानका- ण्डस्य कर्मणः ॥ २० ॥ द्विविधः कर्म काण्डः स्यान्निषेधविधिपूर्वकः॥ निषिद्ध- कर्मकरणे पापं भवति निश्चितम्॥ विधि-
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(१) शिवसंहिता भाषाटी कासमेता। है तात्पर्य यह है कि, जैसा जो मनुष्य शुभाशुभ कर्म करता है वैसेही नरक वा स्वगमें जाताहै॥ २३॥ मूलम्-पुण्यकर्मणि वै स्वर्गो नरक: पापक- रमणि॥ कर्मबंधमयी सृष्टिर्नान्यथा भव ति ध्रुवम्॥ २४॥ टीका-पुण्यकर्म करनेसे स्वर्गमें जाताहै और पापक- मैसे नरकमें जाताहै. संसार कर्मसे निश्चय करके बंधाहै दूसरा हेतु नहीं है तात्पर्य यह है कि, जो ईश्वरको जानके कर्माकर्मसे अपनेको रहित समझेगा वह इस बंधसे छूटजायगा॥ २४ ॥ मूलम्-जन्तुमिश्चानुभूगंते सवरगे नानासुखा- नि च। नानाविधानि दुःखानि नरके दु :- सहानि वै ॥ २५ ॥ टीका-प्राणी स्वर्गमें नानाप्रकारके सुखका अनुभव करता है ऐसेही बहुत प्रकारके दुःसह दुःख नरकमें भी भोगता है ॥२५॥
तस्मात्सुखार्थी विविधं पुण्यं प्रकुरुते ध्रुवं२६ टीका-पापकर्म करनेसे दुःखहोता है और पुण्यकर्म करनेसे सुख होताहै इस हेतुसे निश्चय करके सुखार्थी पुरुष नानाप्रकारके पुण्य करते हैं ॥ २६ ॥।
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नथमपटल:
मूलनू-नापभोगावसाने तु पुनर्ज्न्म भवे- तखलु। पुण्यमोगावसाने तु नान्यथा भवति घ्रुवम् ॥ २७॥ टीका-पापका फल भोगनेके पीछे अवश्य फिर जन्म होताहै ऐसही घुण्यफल भोगनेके अंतमें निश्चय फिर जन्म होता है अन्वया नहीं होता ॥२७॥ मूलम्-सवर्गदपि दुःसंभोग: परस्तीदर्शना- दुवके।। ततो दुःखमिदं सर्व भवेत्रास्त्यत्र संशय:॥२८॥। टीका-स्वर्गमेंभी दुःखहैं इस काइणसे कि, उस स्था- नमें परस्त्रीका दर्शन अवश्य होताहै उसकी अप्रातिमें मानसिक व्यथा उत्पन्न होती है अन्य भी राग द्वेषादि बहुतसे कारण हैं कि, प्राणीके चित्तको स्वर्गमें भी स्थिर नहीं रहने देते इस हेतसे संसारमें सिवाय दुःखके सुख नहीं है॥। २८ ।। मूलस्-तत्कर्मकल्पकैः प्रोक्त्तं पुण्यंपापमि ति दविधा। पुण्यपापमयो बन्धो देहिनां भवति क्रमात्॥ २९ ॥ टीका-बुद्धिमान् लोगोंने पुंण्य और पाप दोप्रकारक
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(१२) शिवसंहिता नाषाटीकासमेता। कर्म कहाहै इसी पुण्य पापसे शरीर बंधायमान है अर्थात् वारंवार शरीरधारण करनेका कारण है॥२९॥ मूलम-इहामुत्र फलद्वेषी सफलं कर्म सं- त्यजेत ।I नित्यनैमित्तिके संगं त्यक्का योगे प्रवर्तते॥३० ॥ टीका-इस लोकका भोग वा परलोकके फलकी इच्छा और नित्य नैमित्तिक आदि कर्मोको फलसहित त्यागके योगाभ्यास अर्थात् परब्रह्मके विचारमें महात्मा जनोंके तत्पर रहना उचित है॥३०॥ मूलं-कर्मकाण्डस्य माहात्म्यं ज्ञात्वा यो- गी त्यजेत्सुधीः॥ पुण्यपापद्रयं त्यक्का ज्ञानकाण्डे प्रवर्तते ॥ ३१॥ टीका-कर्मकाण्डके माहात्म्यको जानके योगीको उचितहै कि, पुण्य फाप दोनोंको तृणवत् विचारके त्याग दे और ज्ञानकाण्डमें तत्पर होरहे॥ ३१ ॥ मूलम्-आत्मा वारे च श्रोतव्यो मंतव्य इति यच्छ्रुतिः॥ सा सेव्या तत्प्रयत्नेन मुक्तिदा हेतुदायिनी॥ ३२॥ टीका-यह श्रुतिका वाक्य है कि, आत्माको सुनो और आत्माको मनन करो अर्थात् जो कुछ
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प्रथमपटल:।
है सो आत्माही है सो श्रुति मुक्तिकी देनेवाली है यत्र करके सेवनके योग्य है ॥ ३२ ॥ मूलम्-दुरितेषु च पुण्येषु यो धीवृत्ति प्रचो- दयात्॥ सोऽहं प्रवर्तते मत्तो जगत्सर्व चराचरम्॥ ३३ ॥ सर्व च दृश्यते मत्तः सर्वै च मयि लीयते॥ न तद्िन्रोऽ- हमस्मीह मद्भित्रो न तु किंचन॥ ३४॥ टीका-पाप पुण्य दोनोंमें समानरूपकी बुद्धिको जो वृत्ति प्रेरणा करती है सो हम हैं और हमसेही सब जगत् चराचर उत्पन्न है॥ ३३ ।।और जो देख पड़ताहै वह सब हम हैं हममेंही सब लीन होताहै न वह हमसे भिन्न है न हम उससे किंचित्मात्र भिन्न हैं ता- त्पर्य यह है कि, वह आत्मा जिससे यह जगत् उत्पन्नहै हमसे भिन्न नहीं है इस हेतुसे इस संसारके स्थिति संहार कर्त्ता हम हैं ऐसी वृत्ति योगीकी रहती है॥३४॥ मूलम्-जलपूर्णेष्वसंख्येषु शरावेषु यथा- भवेत्॥ एकस्य भात्यसंख्यत्वं तद्वेदोऽत्र न दृश्यते ॥ ३५॥ उपाधिषु शरावेषुया संख्या वर्तते परा॥ सा संख्या भवति यथा रवौ चात्मनि तत्तथा॥ ३६॥
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(:१४) शिवसंहिता आापाटीकासमेता ! टीका-जलसे भग असरूय भाशाव अ्यात मृतिका आदिके पात्रमें एक सूर्यका अनेक प्रतिविष देख- पडता है वास्तवमें भेढ नहीं है जो भेद देख पडता है वह शशबके संख्याका भेड है। ३ै५ ॥ जिस प्रकारसे शरावके संख्यासे पड़ता है उसी प्रकार मायाकी उपािसे सँसर भिन्न सूर्थमें भेह जा
भिन्न जान पडता है वस्तुन: केवल एव म है।३६।। मूलम-य्थक: कल्पक: सवमे नानावि- धतयेष्यते।। जागरोप तथाप्येकस्तथव बहुधा जगत् ॥ ३७॥ टीका-जैसे स्वम अवस्थामें एकसे अनेक कल्पना होतीहै निद्धाच्युत होजानेपर कुछ नहीं रहता उसी प्रकार मायाके आवरणसे अनेक संसार जान पडता है जव ज्ञानरूपी खड्गसे मायाका पटल कटजाता है तव सिवाय शुद्धब्रह्मके औरु कुछ नहीं रहजाता ॥ ३॥ मूलम्-सर्पबुद्धिर्यथा रज्नौशुक्तौवा रजतब्र- मः॥३८॥ तद्देवमिद विश्व वित्वृरतं पर- मात्मनि॥ रज्जुज्ञानाद्यथा सर्पो मिथ्या रूपो निवतते॥ ३९॥ आत्मज्ञानात्तथा याति मिथ्याभुतमनिदिं जगत्॥ रौप्यभ्रा- न्तिरियं याति शाकज्ञानादथा खल ४०
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प्रथमपटलः। (१५)
टीका-रस्सीमें सर्पकी भ्रान्ति और सीपीमें चाँदीकी भ्रान्ति होतीहै ।।३ट।।उसी प्रकार शुद्धतह्ममें संसारकी झूँठी भ्रान्ति होती है रस्सीके ज्ञान होनेसे झूँठे सर्पका अभाव होजाता है।।३९।। उसी तरह आत्मज्ञान होनेसे यह संसार नहीं रहजाता सीपीकोभी अच्छी तरह निश्चय जानलेनेसे चाँदीकी भ्रांति दूर होती है॥४० ॥ मूलम्-जगद्धान्तिरियं याति चात्मज्ञानाद्य था तथा॥ यथा रज्जूरगभ्रान्तिर्भवेद्धे दवशाज्जगत् ।। ४१ ॥ तथा जगदिदं भ्रांतिरध्यासकल्पनाज्जगत्॥ आत्मज्ञा- नादथा नास्ति रज्जुज्ञानाडुजङ्गमः॥४२॥ टीका-वैसेही आत्मज्ञान होनेसे जगत्की भ्रान्ति दूर होती है जैसे रस्सीमें सर्पकी भ्रांति होतीहै॥४१॥ उसी तरह आत्मामें अध्यास कल्पनामात्र जगत्की भ्रांति है रज्जुवत् ज्ञान होनेसे फिर जगवका तीनों कालसे अभाव हो जाताहै॥ ४२ ॥ मूलम्-यथा दोषवशाच्छकःपीतोभवति ना- न्येथा॥ अज्ञानदोषादात्मापि जगद्वति दुस्त्यजम ॥४३॥ दोषनाशे यथा शुक्को
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(१६) शिवसंहिता आषार्टीकासमेता ।
बरे रोगिया त्वयना कहज्ञानात्तथाऽ- जञाननाशादात्मा तथा कृतः॥ ४४।। टीका-जैसे मनुष्यको कवलकी व्याधि अर्थात् पत्तदिकके दोषसे सव वस्तु निश्चय पीतवर्ण देख भढ़ता हैं उसी प्रकार अज्ञानरूपी दोषसे शुद्ध आत्मा की नवात होताहै परन्तु यह झूँठा संसार देख पड़ता हे ऐला अज्ञान बड़े कष्टसे दूर होताहै जैसे पित्तादिक दोषके नाश होनेसे फिर यथार्थ देखपडता है उसी प्रकार अज्ञान दूर होनेसे शुद्धब्रह्म निर्विकार जानप- डता है तात्पर्य यह है कि, मनुष्यके पीछे एक अज्ञान की व्याधि बहुत बडी लगी है इसकी औषधि आत्म- ज्ञान है यह बात निश्चय है कि, व्याधि विना औषधिके दूर नहीं होती॥ ४३।। ४४ ।। मूलम्-कालत्रयेफिन यथा रज्जुःसर्पो भवे- दिति॥ तथात्मा न भवेद्विश्वं गुणातीतो निरअनः॥४। टीका-जिस तरह रस्सी तीनों कालमें सर्प नहीं ह। सकती उसी तरह आत्माभी तीनों कालमें कदापि सं- सार नहीं हो सक्ता अर्थात् नहीं है इस हेतुसे कि, आ- त्मा गुणातीत है अर्थात् गुणसे रहित है।। ४५ ।।.
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पथमपटल:। (१७ )
श्वरादयः॥ आत्मबोधेन केनापि शास्त्रा- देतद्विनिश्चितम्॥४६॥ टीका-वह शास्त्र जिसमें आत्मवोधका निरूपण किया है उससे निश्चय है कि, इंद्रादि देवताभी जो ईश्वर कहे जाते हैं नित्यभावसे रहित हैं अर्थात् उनकाशी जनन मरण होताहै॥ ४६ ॥ मूलम्-यथा वातवशात्सिन्धावुत्पन्नाः फेन- बुद्धदाः ॥ तथात्मनि समुद्धतं संसारं क्षणभंगरम्॥ ४७॥ टीका-जैसे वायुकी उपाधिसे समुद्रमें फेन और बुद्बुदे उत्पन्न होते हैं क्षणभरमें फिर उसीमें लय हो- जाते हैं तैसेही आत्मासे संसार मायाकी उपाघिसे क्षण- भंगी उत्पन्न होताहै फिर उसीमें लेय होजाताहै॥४७ ॥ मूलम्-अभेदो भासते नित्यं वस्तुभेदो न भासते। द्विात्रिधादिभेदोडयं भ्रमत्वे पर्यवस्यति॥४८॥ सेका-परमात्माका संसारसे सदा अभेद है और किसी वस्तुमें भेद नहीं है एक दो तीन ऐसा जो वस्तु का-भेद जानपडताहै दह अ्रमका कारण है॥। ४८ ।
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(१) शिवसंहिता आषाटीकासमेता । मूलम्-यद्धूतं यच्च भाव्यं वै मूर्तामूर्त तथैव च। सर्वमेव जगदिदं विद्ृतं परमा- त्मनि॥४९ ॥ टीका- जो भया है और जो होगा मृर्तिमान वा अमूर्तिमान् यह सव जगत् आत्मासे मिलाहै अर्थात् उससे भिन्न नहीं है॥। ४९। मूलम्-कल्पकैः कल्पिता विद्या मिथ्या जाता मृषात्मिका॥ एतन्मूलं जगदिदं कथं सत्यं भविष्यति॥५०॥ टीका-यह संसार मिथ्याभूत अविद्याकल्पनासे कल्पित भया है बडे आश्चर्यकी बात है कि, जिसकी जड मिथ्या है वह आप कब सत्य होसका है अर्थात् सब झुँठ है॥ ५०॥. मूलं-चैतन्यात्सवमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम्॥ तस्मात्सर्व परित्यज्य चैतन्यं त समाश्रयेत् ॥५१॥ टीका-केवल एक चैतन्य ब्रंह्से जरायुज, अंडज, स्वेदज, उद्धिज् आदि सकल चरांचर संसार उत्पन्न भया है इस हेतुस सबको त्यागिके केवल उसी एक
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चतन्य आत्माके आसरे होना उचित है क्यों कि वही नैतन्य सबका करण है।५१।। मूलम्-वटस्याम्यंतरे वाहये यथाकाशं प्रव- तते।। तथात्माभ्यंतरे बाहे ब्रह्मांडस्य प्रवतते ॥५२ ॥ टीका-जैसे घटके भीतर बाहर आकाश व्याप्त है तैसेही इस ब्रहाण्डके भीतर बाहर आत्मा परिपूर्ण व्याह है॥ ५२॥ मूलन-सतते सर्वभूतेषु यथाकाशं प्रवर्तते।। तथात्माम्यतरे माहे ब्रह्मांडस्य अ्वर्त- ते ॥५३॥ वर्तते सर्वभूतेषु यथाकाशं स- मंततः। तथात्माभ्यंतरे बाह्ये कार्यवर्गेषु नित्यशः ॥५४।। टीका-जिपनकार आकाश सब चराचरमें व्याप्त है उसीतरह आत्माभी इस जगतमें व्याप है अर्थात् आका- शदत सब वस्तुमें आत्मा परिपूर्ण व्याप है॥५३।।५४। मूलम-असलवं यथाकार्श मिथ्याभृतेषु पं चसु॥ असंलग्रस्तथात्मा तु कार्यवर्गेषु नान्यथा॥५५॥
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(२० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। टीका-जिसतरह आकाश सव वस्तुमें मिला है और सबसे अलग है उसीतरह परमात्मा सब वस्तु चराचरमें व्याप् है और सबसे अलग है ॥।५५॥ मूलम्-ईश्वरादिजगत्सर्वमात्मव्याप्यं सम- न्ततः ॥ एकोऽस्ति सच्चिदानंदः पूर्णों द्वैतविवर्जितः ॥५६॥ टीका-ब्रह्मा आदि सब जगतमें वही एक आत्मा परि- पूर्ण व्याप है वह एक सच्चिदानन्दपरिपूर्ण द्वैतरहित है अर्थात दूसरा कुछ नहीं है॥ ५६॥ मूलम्-यस्मात्प्रकाशको नास्ति स्वप्रकाशो भवेत्ततः॥ स्वप्रकाशो यतस्तस्मादात्मा ज्योतिःस्वरूपकः ॥५७॥ टीका-जिसका कोई प्रकाशक नहीं है वह आपही प्रकाशमान है जो आपही प्रकाशमान है वह आत्मा ज्योतिःस्वरूप है॥ ५७॥ मूलम्-अवच्छिन्नो यतो नास्ति देशकाल स्वरूपतः ॥ आत्मनः सर्वथा तस्मा- दात्मा पूर्णों भवेत्खल ॥ ५८ ॥। टीका-देश करके वा कालके प्रमाणसे वह परि- च्छित्न नहीं है अर्थात् उसका इयतापरिमाण नहीं है न
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पथंमपटल:। (२१)
उसमें कालका नियम है इस हेतुसे आत्मा सरवथा निश्चय परिपूर्ण है।५८॥ मूलम्-यस्मान्न विद्यते नाश: पंचभूतैर्षथा- त्मकैः। तस्मादात्मा भवेन्नित्यस्तन्नाशो न भवेत्खल।।५९।। टीका-यह जो मिथ्या पंचभूत हैं इनसे उसका नाझ नहीं है इस कारणसे आत्मा नित्य है और यह निश्चय है कि उसका कभी नाश नहीं होता ।।५९॥ मूलम्-यस्मात्तदन्यो नास्तीह तस्मादेकोड- स्ति सर्वदा।यस्मात्तदन्यो मिथ्या स्या- दात्मा सत्यो भवेत्खलु ॥६०। टीका-जब दूसरा कुछ नहीं है तो एक वही सर्वदा अद्वैत है जब उसके सिवाय अर्थात् उससे अन्य सब मिथ्या है तो वही एक शुद्ध आत्मा सत्य है॥ ६० ॥ मूलम्-अविद्याभूते संसारे दुःखनाशे सुखं यतः ॥ ज्ञानादाद्यंतशून्यं स्यात्तस्मा- दात्मा भवेत्सुखम् ॥ ६१॥ टीका-यह संसार अविद्यासे उत्पन्न भया है इस- में द्ुःखका नाश होनेपर सुख होता है और ज्ञानसे
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(३३) शिवमहिता आपाटी कासमेना । दुःखका आदि अंत शून्य है इस हेतुसे निश्रय आत्मा सुखस्वरूप है। ६१ ।। मूलम्-यस्मान्राशितमज्ञानं ज्ञानेन विश्व- कारणम्॥ तस्मादात्मा भवेज्ज्ञानं ज्ञानं तस्मात्सनातनम् ॥ ६२ टीका-जिसकरके अज्ञान नाशा होताहै और यह जान पडताहै कि अज्ञानही संसारका कारण है सोई आत्मज्ञान है और ज्ञानही नित्य है॥ ६२ ॥ मूलम्-कालतो विविधं विश्व यदा चैव भवे- दिदम्॥ तदेकोड्ति स छवात्मा कल्प- नापथवर्जितः ॥६३।। टीका-काल पायके अनेक प्रकारका संसार उत्पन्न होताहै, सो वह एक आत्मा है वह कल्पनापथ वर्जित है अर्थात कल्पना नहीं होसकी॥ ६३ ५ मूलम्-बाह्यानि सर्वभूतानि विनाश यान्ति कालतः॥ यतो वाचो निव्त्तते आत्मा द्वैतविवर्जितः ॥ ६४ ॥ टीका-आत्मासे जो अतिरिक्त वश्तु उत्पन्न है वह काल पायके नाश होजाती हैं आत्मा हवैतरहित है,
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प्रथमपटलः । (२३) अर्थात् एक है इसका वर्णन नहीं होसका तात्पर्थ यह है कि यावत् वस्तु उत्पन्न होती है उसको काल खाजा- ताहै परन्तु आत्मामें कालकाभी नाश होजाताहै।६४। मूलम-न खं वायुर्न चायिश्र न जलं पृथिवी न च। नैतत्कार्य नेश्वरादि पूर्णेकात्मा भवेत्खलु ॥ ६५ ॥ टीका-वह आकाश नहीं है इस हेतुसे कि उसमें शब्द नहीं है वायु नहीं है क्यों कि उसमें स्पर्श नहीं है अग्नि नहीं है काहेसे कि उसमें तेजभाव नहीं है जल नहीं है क्यों कि उसमें रस नहीं है वह पृथ्वी नहीं है क्यों कि गन्धरहित है वह कार्य नहीं है क्यों कि उसका कारण नहीं है वह ब्रह्मा इंद्र आदि ईश्वर नहीं है इस हेतुसे कि उसका नाश नहीं होता अर्थात् वह आत्मा न आकाश न वायु न अगनि न जल न पृथ्वी कुछ नहीं है निश्चय केवल एक परिपूर्णब्रह्म है ॥ ६५ ॥ मूलम्-आत्मानमात्मनो योगी पश्यत्या- त्मनि निश्चितम्। सर्वसंकल्पसंन्यासी त्यक्तमिथ्याभवग्रहः॥ ६६॥ टीकां-यह मिथ्या संसाररूपी गृहको त्यागके सर्व
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(२४) शिवसंहिता आाषाटी का समेता संकल्पसे रहित होके योगी आत्मासे आत्माको आत्मामें देखता है ॥ ६६ ॥ मूलम्-आत्मनात्मनि चात्मानं दृद्दानन्तं सुखात्मकम्॥विस्मृत्य विश्वंरमते समा- धेस्तीवतस्तथा॥ ६७॥ टीका-संसार विस्मृति करके अर्थात सुलाके आत्मासे आत्माको आत्मारूप होके देखता और आत्माके आनन्द सुखरूपी तीव्रसमाधिमें योगी रम- ण करता है।। ६७ ।। मूलम्-मायैव विश्वजननी नान्या तत्त्वधिया परा॥ यदा नाशं समायाति विश्वं नास्ति तदा खलु ॥ ६८ ।। टीका-माया संसारकी माता है अर्थात मायासेही रंसार उत्पन्न भयाहै यह निश्चय है कि दुसरा हेतु इस जगत्के उत्पत्तिका नहीं है ज्ञान करके इस मायाके नाश होनेसे संसारका अभाव निश्चय जानपडताहै।।६८।। मूलम्-हेयं सर्वमिदं यस्थ मायाविलसितं यतः ॥ ततो न प्रीतिविषयस्तनुवित्तसु- खात्मकः ॥६९॥
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प्रथमपटलः । (२५)
टीका-यह जूँठा मायाका प्रपंच विषयसुख धन शरीर है इनमें प्रीति करना उचित नहीं है यह सब त्यागनेके योग्य है॥ ६९ ॥ मूलम्-अरिर्मित्रमुदासीनख्तिरिविधं स्यादिदं जगत् ।। व्यवहारेषु नियतं दृश्यते नान्यथा पुनः॥ ७0॥ टीका-शत्रु मित्र उदासीनता यही तीन प्रकारके व्यवहारका प्रवाह इस संसारमें निश्चय देखपड़ता है।।७।। मूलम्-प्रियाप्रियादिभेदस्तु वस्तुषु नियतः स्फुटम्॥ आत्मोपाधिवशादेवं भवेत्पुत्रा- दि नान्यथा॥७१। मायाविलसितं विश्वं ज्ञात्वैवं श्रुतियुक्तितः ॥ अध्यारोपापवा- दाभ्यां लयं कुर्वन्ति योगिनः॥ ७२॥ टीका-और प्रिय अप्रिय यही दो भेदसे जगत् बँधा है।। आत्माके उपाधिसे पिता पुत्रादि होतेहैं यह जगत् मायासे विलसितहै यह श्रुति प्रमाणसे जानके योगी लोग अध्यारोप अपवादसे आत्मामें लय करतेहैं अ- र्थात शुद्धचैतन्यका मनन करते हैं॥ ७१॥। ७२ ।। मूलम-कर्मजन्यं विश्वमिदं नत्वकर्मणि
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(२६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । वेदना ॥ निखिलोपाधिहीनो वै यदा भवति पूरुषः ॥ ७३॥ टीका-इस जगत्की स्थिति कर्मसे है अर्थात् सुख दुःख जन्म मरण आदि क्ेशोंका कारण कर्मही है अकर्म होजानेसे फिर कुछ दुःख नहीं है यावत् मायाके उपाधिको जब पुरुष जीतके उससे रहित होजाताहै॥ ७३॥ मूलम्-तदा विजयतेऽखंडज्ञानरूपी निरं- जनः॥ सहि कामयते पुरुषः सृजते च प्रजा: स्वयम् ॥ ७॥ टीका-तब अखंडज्ञानरुपी निरंजनका भान हो- ताहै।। आत्मा अपने इच्छासे जगत् सृजता अर्थात उत्पन्न करता है।। ७४॥ मूलम्-अविद्या भासते यस्मात्तस्मान्मि- थ्या स्वभावतः ॥ शुद्धे ब्रह्मणि संवद्धो विद्यया सहजो भवेत् ॥ ७५ ॥ टीका-यह इच्छा अविद्याका कार्य है अविद्या नाम मिथ्याका है तो जब इच्छाही मिथ्या मायासे उत्पन्न है तो उस इच्छाका कार्य कब सत्य होसकाहै तात्पर्य यह है कि, मायाके उपाधिसे आत्माका यह इच्छाभूत
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प्रथमपटलः। (२७) संसार मनोराज्यवत् है. जैसे मनुष्यका मनोराज्य मि- थ्या है, उसी प्रकार आत्माका इच्छाभूत यह जगत्भी मिथ्याहै शुद्धत्रह्ममें ज्ञानरूपी विद्याका संबन्ध है।।७4।। मूलम्-ब्रह्मतेजोंऽशतो याति तत आभास ते नभः ॥ तस्मात्प्रकाशते वायुर्वायोर- ग्निस्ततो जलम्॥ ७६॥ प्रकाशते ततः पृथ्वी कल्पनेयं स्थिता सति॥ आकाशा- द्रायुराकाशपवनादग्रिसंभवः॥ ७७॥ टीका-उस ब्रह्मके तेजअंशसे आकाश उत्पन्नभया, आकाशसे वायु उत्पन्न भया, वायुसे अग्नि उत्पन्न भया अग्निसे जल भया, जलसे पृथ्वी उत्पन्न भई, यह कल्प- ना है आकाशसे वायु उत्पन्न भया और आकाश वायुसे तेज उत्पन्न भया ॥ ७६॥ ७| मूलम्-खवाताग्रेर्जलं व्योमवाताग्रिवारि तोमही॥ खंशब्दलक्षणं वायुश्चंचलः स्प- र्शलक्षणः ॥७८।। स्याद्रूपलक्षणं तेजः संलिलं रसलक्षणम् ।I गन्धलक्षणिका पृथ्वी नान्यथा भवति ध्रुवम्॥ ९ ॥
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(२८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। विशेषगुणा: प्रस्फुरंति यतः शास्त्रादि- निर्णयः ॥ शब्दैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते॥ ८० ॥तथैव त्रिगणं तेजो भ- वन्त्यापश्चतुर्गणाः॥ शब्द: स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च॥८१॥ एतत्पंच गुणा पृथ्वी कल्पकैः कल्प्यतेऽधुना।चक्षु- षा गृह्यते रूपं गन्धो व्राणेन ग्ृह्यते।।८२।।
टीका-और आकाश वायु अग्निसे जल उत्पन्न भया और इन चारोंसे पृथ्वी उत्पन्न भई, शब्दगुण आकाश- का है और स्पर्श गुण वायुका है, रूपगुण तेजका है, रसगुण जलका है और पृथ्वीका गुण गंध है. इन The she gho ' पांच तत्त्वोंमें यह गुण जो ऊपर कहा है विशेष है यह शास्त्रसे निर्णय भयाहै अन्यथा नहीं है निश्चय है कि, आकाशमें एक शब्द गुणहै, वायुमें दो गुण हैं, अगनिमें तीन गुण हैं और जलमें चार गुण हैं, पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, यह पांचों गुण कल्पित हैं नेत्र रूपको ग्रहण करताहै और नासिका गंध ग्रहण करती sho मूलम्-रसो रसनयां स्पर्शस्त्वचा संगृद्यते
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पथमपटलः। (२९)
परम्॥श्रोत्रेण गृह्यते शब्दो नियतं भाति नान्यथा॥ ८३॥ टीका-और जिह्वासे रस ग्रहण होताहै और स्पर्श त्वंचा अर्थात् शरीरके चर्मसे ग्रहण होताहै वा बोध होताहै और शब्द कर्णसे ग्रहण होता है यह निश्चयहै इसमें अन्यथा नहीं है।। ८३ ।। भूलम्-चैतन्यात्सर्वमुत्पन्नं जगदेतच्चराच- रम॥ अस्तिचेत्कल्पनेयं स्यान्नास्ति चेदस्ति चिन्मयम् ॥ ८४॥ टीका-सब जगत् चराचर उसी एक चैतन्यसे उत्पन्न भयाहै यदि संसार सत्य मानाजाय तो इस प्रका- रसे कल्पना भईहै और जो संसारका अभावहै अर्थात् नहीं है तो वही एक चैतन्य आत्माहै और कुछ नहीं है।। ८४ ।। मूलम्-पृथ्वी शीर्णा जले मग्रा जलं मग्रश्च तेज़सि। लीनं वायौ तथा तेजो व्योम्नि वातो लयं ययौ॥ ८५॥ . टीका-पृथ्वी जलमें मग्र अर्थात लय होजाती है जला
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(३०) शिवसंहिता भाषाटी का समेता । अग्निमें लयभावको प्राप्त होताहै और अग्नि वायुमें लय होजाताहै और वायु आकाशमें लीन होजाताहै॥ ८५॥ मूलम्-अविद्यायां महाकाशो लीयते परमे पदे ।। विक्षेपावरणाशक्तिर्दुरन्ता दुःख- रूपिणी॥८६।।जडरूपा महामाया रजः- सत्त्वतमोगुणा ॥ सा मायावरणाशत्त्या- वृताविज्ञानरुपिणी॥८७॥ टीका-और आकाश अविद्यामें लयभावको प्राप्त होजाताहै और यह अविद्या मायाभी परमपदको पहुँच जाती है अर्थात् आत्मामें लय होजातीहै. तात्पर्य यह है कि, जो उत्पन्न भयाहै उसका अवश्य नाशहै. ईश्वरकी यह दो शक्ति विक्षेप और आवरण हैं, इनका अंत नहींहैं यह महामाया दुःखरूपिणीमें रज, सत्त्व, तम, तीनों गुण हैं समय समयपर इन गुणोंको धारण कर लेतीहै सो माया आवरणशाक्ति ज्ञानको आवृत करके अर्थात् छिपाके अज्ञानरूपिणी होजा- तीहै।। ८६।।८७ ।1 मूलम्-दर्शयेज्जगदाकारं तं.विक्षेपस्वभाव तः।तमोगणाधिकाविद्या या सा दुर्गा भवे- तस्वयम्॥८८।ईश्वरं तदुपहितं चैतन्यं तद-
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प्रथमपटलः । (३१ ) भृद्धवम्॥सत्त्वाधिका च या विद्या लक्ष्मी: स्यादिव्य रुपिणी।।८९।।चैतन्यं तदुपहितं विष्णुर्भवति नान्यथा ॥ रजोगुणाधिका विद्या ज्ञेया सा वै सरस्वती॥ यश्चि- त्स्वरूपो भवति ब्रह्मातदुपधारकः।।९०॥ टीका-और संसारके आकारको देखातीहै यह विक्षेप करना उसका स्वभाव है माया जव तमोगुण धारण करती है तब दुर्गारूप होके चैतन्य ईश्वरको उत्पन्न कर- तीहै और जब सतोगुणको धारण करतीहै तब लक्ष्मी रूप होके चैतन्य जो विष्णु हैं उनको उत्पन्न करतीहै जब रजोगुणको धारण करतीहै तब सरस्वतीरूप होके चैतन्य जो ब्रह्मा हैं उनको उत्पन्न करती है अर्थात् सबके उत्पत्तिका कारण यही जगन्माता महा- माया है ।। ८८ ॥।८९ ।। ९0 ।1
मूलम्-ईशाद्याः सकला देवा दृश्यन्ते पर- मात्मनि॥ शरीरादिजडं सर्वे सा विद्या तत्तथा तथा।।९१।।एवंरुपेण कल्पन्ते क- ल्पका विश्वसम्भवम्।।तत्त्वातत्त्वं भवंती हकल्पनान्येन-मोदिता॥९२॥
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(३२ ) शिवसंहिता भाषाटी का समेता । टीका-हमारे आदि सकल देवता उसी एक परमा- त्मामें देख पड़ते हैं और शरीरआदि सब जड पदार्थ उसी एक विद्या अर्थात् आत्मामें भिन्न भिन्न जान पड़तेहैं इसी तरह बुद्धिमान् लोगोंने संसारके स्थितिकी कल्पना कियाहै कि, तत्त्व अतत्त्व दोनों भयाहै अर्थात आत्मासेही सब सृष्टिकी उत्पत्ति केवल कल्पनामा- तहै और कुछ किसीने कहा नहीं है॥। ९१।।९२।। मूलम्-प्रमेयत्वादिरूपेण सर्व वस्तु प्रका- श्यते।।तथैव वस्तुनास्त्येव भासको वर्त- क: पर:॥९३॥स्वरूपत्वेन रूपेण स्वरूपं वस्तु भाष्यते॥ विशेषशब्दोपादाने भेदो भवति नान्यथा॥ ९४॥ टीका-प्रमेयरूप. अर्थात यावत वस्तु संसारमें दश्यमान हैं वह सबके प्रकाशका कारण वही एक आत्मा है उपाधिभेदसे मिन्न भिन्न स्वरूपदे खपड़ता है विशेष करके नामभेदसे भेद है अर्थात ज्ञान और ज्ञेय दोनों वहींहै और कुछ नहीं है।। ९३।।९४।। मूलम्-एक: सत्तापूरितानन्दरूपः पूर्णों व्यापी वर्त्तते नास्ति किश्चित्॥।एतज्ज्ञानं
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पथमपटल:। (३३ ) यः करोत्येव नित्यं भुक्त:स स्यान्मृत्युसं सारदुःखातू ॥ ९५॥ टीका-एक सत्तामान्र पूरित आनन्दस्वरूप परि- पूर्ण व्यापी सर्वदा वर्त्तमानहै और दूसरा कुछ नहीं है ऐसा ज्ञान जिसको है और सर्वदा वह यही मनन कर- ताहै सो भुक्त है अर्थात् संसारके जन्ममरणआदि दुःखले वह रहित है॥ ९५ ।। मूलम्-यस्यारोपापवादाभ्यां यत्र सर्वे लयं गताः। स एको वर्तते नान्यत्तच्वित्तेना- वधार्यते॥ ९६॥ टीका-जहां ज्ञानद्वारा संसारके कार्योंका लय होजाता है अर्थात् उससे अभेद होजाते हैं उसी एक सर्वदा वर्तमान आत्मामें मनको लय करे अर्थात् आत्माकाही ध्यान धारण करे ॥९६॥ मूलम्-पितुरन्नमयात्कोशाज्जायते पूर्वक- र्मणः॥ शरीरं वै जडं दुःखं स्वप्राग्भोगाय सुन्दरम् ॥ ९७॥ टीका-पूर्वकर्मके अनुसार प्राणी पिताके अन्न- मय कोशसे दुःख भोंगनेके कारण जड शरीर सुन्दर भोगरूप उत्पन्न होताहै।। ९७॥
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(३४ ) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । मूलम्-मांसास्थिस्नायुमज्जादिनिर्मितं भो- गमन्दिरम्॥ केवलं दुःखभोगाय नाडीसं- ततिगंफितम् ॥९८॥ टीका-मांस अस्थि सायु मज्ा आदि नाडियोंसे बँधाहुआ यह भोगमन्दिर अर्थात् शरीर केवल दुःखका कारण है, तात्पर्य यह है कि, ऐसा शरीर जिसके उत्पत्ति स्थितिके स्मरण करनेसे घृणा होतीहै उसमें व्यर्थ मनु- ष्य मायामें फँसके मोह और अभिमान करताहै ।।९८॥ मूलम्-पारमेष्ठयमिदं गात्रं पंचभूतविनि- मितम ब्रह्माण्डसंज्ञकं दुःखसुखभोगाय कल्पितम् ॥९९ ॥ टीका-यह शरीर ब्रह्माके द्वारा पंचभूतसे निर्मित ब्रह्मांडसंज्ञा सुख दुःख.भोगनेके हेतु कल्पितहै।।९९।। मूलम्-बिन्दुः शिवो रजः शक्तिरुभयोर्मि- लनात्स्वयम् ॥ स्वप्रभूतानि जायन्ते स्वशत्त्या जडरूपया॥। १०० ॥। टीका-शिवरूप बिन्दु और शक्तिरूप रज इन दो- नोंके संबन्धसे ईश्वरकी शक्ति जडरूपा महामाया अ- पनी प्रसुतास शरीरोंको उत्पन्न करती है॥। १००. ॥
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प्रथमपटलः । (३५) मूलम्-तत्पश्चीकरणात्स्थूलान्यसंख्यानि चराचरम्॥ ब्रह्मांडस्थानि वस्तूनि यत्र जीवोऽस्तिकर्मभिः॥१०१॥ तदूतपश्च- कात्सर्व भोगाय जीवसंजञिता॥ १०२ ॥ टीका-उसी पंचीकरणसे अनेक स्थूल वस्तु इस संसारमें चराचर उत्पन्न होती हैं यह जीवभी अपने कर्मके अनुसार भोग भोगनेके हेतु उसी पांच भूतसे जीवसंज्ञा करके प्रगट होता है ॥ १०१॥१०२॥ मूलम्-पूर्वकर्मानुरोधेन करोमि घटनामहं॥ अजडः सर्वभूतान्वै जडस्थित्या भुनक्ति तान् ॥ १०३ ॥ टीका-ईश्वर कहते हैंकि, प्राणीको पूर्व कर्मके अनु- सार हम उत्पन्न करतेहैं और सर्व, भूतोंसे हम भजड अर्थात् भिन्न और अविनाशी हैं परंतु जडरूप होके सब- को हम खाजाते हैं अर्थांत् सबका नाश करते हैं॥१०३॥ मूलम्-जडात्स्वकर्मभिर्बद्धो जीवाख्यो वि- विधो भवेत्॥ भोगायोत्पद्यते कर्म ब्रह्मां डांख्ये पुनः पुनः।।जीवश्च लीयते भोगाव- साने च स्वकर्मणः ॥ :१०४ ॥
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३६) शिवसंहिता आाषादी का समेता । टीका-जीव अपने कर्ममें बंधके नाना प्रकारके जड शरीर धारण करता है और अपने कर्मके फल भोगनेके हेतु संसारमें वारंवार उत्पन्न होता है और सब कर्मोंके अवसानमें अर्थात् जव ज्ञानद्वारा सब कर्मोसे रहित होजाता है तब उसी ज्ञानस्वरूप आ- त्मामें लय होजाताहै॥ १०४ ॥ इति श्रीशिव संहितायां हरगौरीसंवादे लयप्रकरणे भाषाटीकायां प्रथम: पटलः॥१॥
अथ द्वितीयपटलः। मूलम्-देहेऽस्मिन्वर्तते मेरुःसप्नद्ी पस मन्वि तः।सरितःसागरा: शैलाकक्षेत्राणि क्षेत्रपा- लकाः॥9।ऋपयो मुनय: सर्वें नक्षत्राणा ग्रहास्तथा॥ पुण्यतीर्थानि पीठानि वर्त- न्ते पीठदेवताः॥२॥ टीका-प्राणीके इस शरीरमें सतद्वीपसहित सुमेरु है और नदी समुद्रआदि पर्वत और क्षेत्र क्षेत्रपाल ऋषि मुनि और सब नक्षत्र ग्रह पुण्यतीर्थ और पीठ देवता आदि सब इसी शरीरमें वर्तमान हैं। तात्पर्य यह है कि, मनुष्य तीथोंमें स्नान दर्शनके हेतु भटकता फिरता है, परंतु इस शरीरस्थ तीर्थ और देवसाको नहीं जानता न
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द्वितीयपटलः। (३७ )
मनको शुद्ध करके उनके जाननेमें प्रयास करताहै।१॥२॥ मूलम्-सृष्टिसंहारकर्तारौ भ्रमन्तौ शशि- भास्करौ।नभो वायुश्च वह्निश्च जलं पृथ्वी तथैव च ॥ ३ ॥ टीका-सृष्टिके स्थिति संहारके कर्ता चन्द्रमा और सूर्य इस शरीरमें भ्रमण करते हैं और आकाश, वायु, अधनि, जल, पृथ्वी, अर्थात् पांचों तत्त्व सर्वेदा शरीरमें वर्तमान रहतेहैं. तात्पर्थ यह है कि, सब इसी शरीरमें हैं परंतु विना गुरुकी कृपाके देख नहींपड़ते॥ ३ ॥ मूलम्-त्रैलोक्ये यानि भूतानि तानि सर्वा- णि देहतः॥ मेरुं संवेष्टय सर्वत्र व्यवहार: प्रवर्तते॥ जानाति य: सर्वमिदं स योगी नात्र संशय: ॥४ ॥ टीका-जो त्रैलोक्यमें चराचर वस्तु हैं सो सब इसी शरीरमें मेरुके आश्रय होके सर्वत्र अपने २ व्यवहार को वर्तते हैं जो मनुष्य यह सब जानताहै सो योगी है इसमें संशय नहीं है॥। ४॥ मूलम्-ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे यथादेशं व्यव- स्थितः॥ मेरुशृंगे सुधारश्मिर्बहिरष्टक- लायुतः॥ ५॥
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(३८) सिवसाहिता भाषाटी का समेता । टीका-यह शरीर ब्रह्माण्डसंज्ञकहै जिस तरह संसा- रमें सब देश और सुमेरु पर्वतहै उसी तरह शरीरमें मेरु है उसके ऊपर सुधाकर अर्थात् चन्द्रमा आठ क- लासे स्थितहै॥ ५॥ मूलम्-वर्ततेऽहर्निशं सोऽपि सुधांवर्षत्य धोमुखः ॥ ६॥ ततोऽमृतं द्विधाभूतं याति सूक्ष्मं यथा च वै।। इडामार्गेण पुष्टयर्थ याति मन्दाकिनीजलम्॥पुष्णाति सकलं देहमिडामार्गेण निश्चितम् ॥ ७। टीका-सोई चन्द्रमा रात्रि दिवस अधोमुख होके अमृतकी वर्षा करते हैं वह अमृत सूक्ष्म दो भाग हो- जाता है सो मन्दाकिनीके जलके समान देहके रक्षार्थ इडा जो वामनाडी है उसके रन्ध्रसे सकल शरीरको पोषण करता है ॥ ६।७ ।। मूलम्-एष पीथूपरश्मिर्हि वामपार्श्वे व्य- वस्थितः ॥ ८। अपरः शुद्धदुग्धाभो ह- ठात्कर्षति मण्डलात् ॥ रन्ध्रमार्गेण सृ- ष्टयर्थ मेरौ संयाति चन्द्रमाः ॥९ ॥ टीका-वही सुधाकिरण संयुक्त इडा नाडीकी स्थिति वामभागमें है और शुद्ध दूधके सरमान मेरुमें चन्द्रम
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द्वितीयपटलः । (३९)
प्रसन्नतापूर्वक अपने मण्डलसे इडाके रन्ध्रमागसे आ- यके देहीका पोषण करते हैं।। ८॥९ ॥ मूलम्-मेरुमूले स्थितः सूर्यः कलाद्वादशसं- युतः॥ दक्षिणे पथ रश्मिभिर्वहत्यूर्ध्व प्र- जापतिः॥१०॥ टीका-मेरुदण्डके मूलमें अर्थात् नीचे बारह कला- संयुक्त सूर्य स्थित हैं दक्षिणपथ अर्थात् पिङ्गलानाडी द्वारा प्रजापति स्वरूपकी गति ऊपरको है॥ १० ॥ मूलम्-पीयूपरश्मिनिर्यासं धातूंश्च ग्ररुति ध्रुवम् । समीरमण्डले मूर्यो भ्रमते सर्व- विग्रहे।। ११॥ टीका-सूर्य अमृतधातुको अपने किरण शक्तिसे ग्रापत करजातेहैं और वायुमण्डलके साथ सव शरीरमें भ्रमण करतेहैं॥ ११॥ मूलम्-एषा सूर्यपरा मूर्तिर्निर्वाणं दक्षिणे प- थि।। वहते लग्नयोगेन सृष्टिसंहारका- रकः ॥ १२॥ टीका-यह सूर्यकी अपर निर्वाण मूर्ति है अर्थात् पिङ्गलानाडी दक्षिणभागमें स्थितहै सूर्य सृष्टिसंहार करतां लग्नयोगसे नाडीद्वारा प्रंवाह करतेहैं ॥ १२ ॥
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(४०) शिवसंहिता भाषाटी का स मेत । मूलम्-सार्धलक्षत्रयं नाड्य: सन्ति देहान्तरे नृणाम् ॥ प्रधानभृता नाड्यस्तु तासु मु- ख्याश्चतुर्दश॥ १३॥सुषुम्णेडा पिंगला च गांधारी हस्तिजिबिका । कुहू: सरस्व- ती पूषा शंखिनी चपयसिविनी॥१४॥ वा- रुणालम्बुसा चैव विश्वोदरी यशस्विनी॥ एतासु तिस्रो मुख्या: स्यु: पिङ्गलेडा सु- पुम्णिका।।१५॥ टीका-शरीरमें बहुत नाडी हैं परंतु उनमें प्रधान नाडी साढेतीन लक्षहैं उनमेंसे सुख्य यह चौदह ना- डी हैं १ सुपुम्णा २ इडा ३ पिङ्गंला ४ गान्धारी ५ हस्ति- जिह्वा ६ कुहू ७ सरस्वती ८ पूषा ९ शंखिनी १० पय- स्विनी ११ वारुणा १२ अलंबुसा १३ विश्वोदरी१४ यश- स्विनी इन चौदहमें भी तीन नाडी सुख्यहैं इडा, पिङ्ग- ला सुषुम्णा ॥३॥१४॥ ॥ मूलम्-तिसृष्वेका सुषुम्णैव मुख्या सा योगिवल्लभा॥ अन्यास्तदाश्रयं कृत्वा नाड्य: सन्ति हि देहिनाम् ॥ १६॥ टीका-इडा, पिङ्गला, सुषुम्णा इन तीन नाडियोंमें
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भी एकही सुषुम्णा मुख्य है इस कारणसे कि, पस्मपदकी दाताहै योगी लोगोंको हितकारी है अन्य नाडी उसके आश्रय शरीरमें रहती हैं ॥ १६ ॥ मूलम्-नाडयस्तु ता अधोवदनाःपद्मतन्तु- निमा: स्थिताः ॥ पृष्ठवंशं समाश्रित्य सोमसूर्याग्रिरुपिणी ॥१७॥ टीका-यह तीनों नाडी अधोवदनाहैं अर्थात् नीचेको मुख कमलतन्तुके सदश है और चन्द्र सूर्य अग्निके समान हैं अर्थात् इडा चन्द्ररूप और पिङ्गला सूर्यरूप और सुषुम्णा अगनिरूप है यह तीनों नाडी मेरुदंडके आश्रय स्थित हैं॥९७॥ मूलम्-तासां मध्ये गता नाडी चित्रा सा मम वलभा॥ ब्रह्मरन्भ्रश्च तत्रैव सूक्ष्मा- त्सूक्ष्मतरं शुभम् ॥१८॥ टीका-उन तीनों नाडियोंके मध्यमें जो चित्रा नाडी है वह हमको प्रिय है उसी स्थानमें बहुत सूक्ष्म ब्रह्मरंत्र शोभायमान है॥१८ ॥ मूलम्-पञ्चवर्णोज्जवला शुद्धा सुषुम्णा मध्यचारिणी॥ देहस्योपाधिरूपा सा सुषुम्णा मध्यरूपिणी॥१९ ॥
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(४२) शिवसंहिता आषाटीकासमेता । टीका-वह चित्रानाडी पंचवर्ण अतिउज्जवल शुद्ध है और देहके उपाधिका कारणभी वही सुषुम्णान्त- गता अर्थात् चित्रा नाडी है. तात्पर्य यह है कि, आत्म- स्वरूप वही है॥। १९॥। मूलम्-दिव्यमार्गमिदं प्रोक्तममृतानन्द- कारकम्॥ ध्यानमात्रेण योगींद्रो दुरि- तौघं विनाशयेत् ॥२०॥ टीका-यह मार्ग बहुत श्रेष्ट अमृतानन्दकारक सु- किका दाता हमने कहा है जिसके ध्यानमात्रसे योगी लोगोंके पापका समूह नाश होजाताहै॥२०॥ मूलम्-गुदात्तु द्यंगुलादूध्व मेद्रात्तु दयंगुला- दधः ॥ चतुरंगलविस्तारमाधारं वर्तते समम् ॥२१॥ टीका-गुदासे दो अंगुल ऊपर और मे द्रसे दो अं- गुल नीचे मध्यमें चार अंगुल विस्तार आधारपझ्म है॥। २ १ ॥। मूलम्-तस्मिन्नाधारपन्मे च कर्णिकार्यां सु- शोभना॥ त्रिकोणा वर्त्तते योनिः सर्वतं- त्रेषु गोपिता ॥। २२॥ टीका-उस आधारपझ्मके कर्णिकामें अर्थात डंड़ीमें
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त्रिकोण योनि है यह योनि सव तंत्रों करके गोपित है अर्थात् इसके प्रकाशकरनेकी आज्ञा किसी शास्त्रमें नहीं है।। २२ ।। मूलम्-तत्र विदुल्ताकारा कुण्डली परदे वता। सार्द्धत्रिकरा कुटिला सुषुम्णा मार्ग संस्थिता ॥ २३॥ टीका-उसी स्थानमें कुण्डलिनी देवता साढेतीन हात कुटिला अर्थात् टेढी जिसकी प्रभा विद्युत्के समान है सुषुम्णाके मार्गमें स्थित है॥ २३ ॥ मूलम्-जगत्संसृष्टिरूपा सा निर्माणे सत- तोदता॥ वाचामवाच्या वाग्देवी सदा देवैर्नमस्कृता॥२४॥ टीका-सोई कुण्डलिनी जगत्के बहुत प्रकारसे उत्साहपूर्वक रचना करनेकी रूप है और वाग्देवी है अर्थात् उसीसे वाक्यका उच्चारण होताहै इस कुण्डलि- नी देवीको देवतालोग नमस्कार करते हैं॥ २४ ॥ मूलम्-इडानाम्नी तु या नाडी वाममागे व्यवस्थिता ॥ सुषुम्णायां समाश्ठिष्य दक्षनासापुटे गता॥ २५॥ •टीका-जो इडा नाम नाड़ी वामभागमें है वह सु-
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(४४) शिवसंहिता आषाटीकासमेता । पुम्णाको आवृत करती हुई अर्थात् उससे मिलीहुई नासिकाके दक्षिणद्वारको गई है॥ २५ ॥ मूलम्-पिङ्गला नाम या नाडी दक्षमार्गे व्यवस्थिता॥ सुषुम्णा सा समाश्चिष्य वामनासापुटे गता ॥२६ ।। टीका-दक्षिणमार्गमें जो पिङ्गला नाडी है वह सुपु- म्णाक़े आसरे होके नासिकाके वामद्वारको गई है।।२६।। मूलम्-इडापिंगलयोर्मध्ये सुषुम्णा या भ- वेत्खल॥ पट्स्थानेषु च षट्शक्तिं षट्- पझ्मं योगिनो विद्ुः ॥२७।। टीका-इडा पिङ्गलाके मध्यमें सुषुम्णा है इस सुषु- म्णाके छः स्थानमें छः शाक्त हैं इनके नाम यह हैं डा- किनी, हाकिनी, काकिनी, लाकिनी; राकिनी, शाकिनी, और इन्हीं छः स्थानोंमें छः पद्म हैं उनके नाम यह हैं आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा यह अपने ज्ञानसे योगी लोग जानते हैं॥ २७॥ मूलम्-पंचस्थानं सुषुम्णाया नामानि स्युर्वहूनि च। प्रयोजनवशात्तानि ज्ञात- नीहन शास्त्रतः ॥ २८।।
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द्वितीयपटलः । (४५) टीका-सुषुम्णाके पांच स्थान हैं उनके नाम बहुत हैं प्रयोजनसे शास्त्रकरके जाना जाताहै॥२८॥ मूलम्-अन्या याडस्त्यपरा नाडी मूलाधा- रात्समुत्थिताः। रसनामेटनयनं पादांगुष्ठे च श्रोत्रकम् ॥२९॥ कुक्षिकक्षांयष्ठकर्ण सर्वागं पायुकुक्षिकम।।लब्घवातां वै निव- र्तन्ते यथादेशसमुद्धवाः॥३०॥ टीका-और अन्य नाडी मूलाधारसे उठीहैं और जिह्वा, मेठ्र, नेत्र, पादका अङ्ुष्ट, कर्ण, कुक्षि, कक्ष, हस्ताङगुष्ट, पायु, उपस्थ, इन सब अङ्गोंमें इनका अन्त भयाहै अर्थात मूलाधारसे उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें जाके निवृत्त होगई हैं॥ २९॥३०॥ मूलम्-एताभ्य एव नाडीभ्यः शाखोपशा- खतः क्रमात्॥ सार्धलक्षत्रयं जातं यथा- भागं व्यवस्थितम ॥३१।। एता भोगवहा नाडयो वायुसञ्चारदक्षकाः ॥ ओतप्रोताः सुसंव्याप्य तिष्ठन्त्यस्मिन्कलेवरे॥ ३२ ॥ टीका-इन्हीं नाडियोंमेंसे शाखोपशाख क्रमसे साढेतीनलक्ष नाडी उत्पन्न होके अपने अपने स्थानमें स्थित हैं यह सब भोगवहांनाडी वायुके संचारमें
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(४६) शिवसंहिता आषाटीका समेता। दक्षहैं ओतप्रोत अर्थात संयोग वियोगसे इस शरीरमें व्याप्त हैं॥। ३१ ॥ ३२ ।। मूलम्-सूर्यमण्डलमध्यस्थः कलाद्वादश- संयुत·।।वस्तिदेशे ज्वलद्वह्िर्वर्तते चान्न- पाचकः॥ ३३ ॥ वैश्वानराग्रिरेषो वै मम तेजोंशसम्भवः ॥ करोति विविधं पाकं प्राणिनां देहमास्थितः॥ ३४॥
टीका-द्वादशकलासंयुक्त सूर्यमण्डलके मध्यमें प्रज्वलित अग्नि है सो बस्तिदेशमें अन्नका पाचन करती है वह वैश्वानर अग्नि हमारे तेजसे उत्पन्न है प्राणीके शरीरमें स्थित होकर नाना प्रकारका पाक करती है॥ ३३॥३४॥ मूलम्-आयुःप्रदायको वह्निर्बलं पुष्टिं द- दाति सः ॥ शरीरपाटवश्चापि ध्वस्तरोग समुद्वः॥३५॥ टीका-सो वैश्वानर अग्नि आयु, बल और पुष्टता और शरीरमें कान्तिका देनेवाला है और यावत् रोगों को नाश करनेवाला है॥ ३५ ॥ मूलम-तस्माद्वैश्वानरामिश्च प्रज्वाल्य वि-
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द्वितीयपटलः। (४७) धिवत्सुधीः॥ तस्मिन्नन्नं हुनेद्योगी प्रत्य- हं गरुशिक्षया॥ ३६ ॥ टीका-इस वैश्वानर अग्निको गुरुके शिक्षापूर्वक प्रज्वलित करके नित्य उसमें अन्नका होम करै अर्थात् भोजन करै॥ ३६॥ मूलम्-ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे स्थानानि स्युर्ब- हूनि च ॥ मयोक्तानि प्रधानानि ज्ञात- व्यानीह शास्त्रके ।।३७।। नानाप्रकारना- मानि स्थानानि विविधानि च। वर्तन्ते विग्रहे तानि कथितुं नैव शक्यते॥ ३८॥ टीका-यह शरीर ब्रह्माण्डसंज्ञक है इसमें बहुत स्थान हैं हमने प्रधान प्रधान स्थान कहे हैं ये शास्त्रसे जाने जाते हैं बहुत प्रकारके स्थान और नाम उन स्थानोंके हैं जो इस शरीरमें वर्तमानहैं उनके वर्णन करनेको हम शक्य नहींहै अर्थात् बहुत विस्तारहै उसके कहनेमें व्यर्थ परिश्रम है॥ ३७॥३८ । मूलम्-इत्थं प्रकल्पिते देहे जीवो वसति सर्व्वगः ॥ अनादिवासनामालाऽलंकृतः कर्मशृङ्गलः ॥३९ ॥ टीका-इसी तरह शरीर कल्पित है और जीव पूर्व-
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(४८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। वासनारूपी वेडीमें फँसके मालाके तरह धूमा करता है॥ ३९॥ भूलम-नानाविधगुणोपेतः सर्वव्यापारका- इकः ॥ पूर्वार्जितानि कर्माणि भुनक्ति विविधानि च ॥ ४० ॥
टीका-सोई जीव नानाप्रकारके गुण ग्रहण करताहै और संसारमें बहुत प्रकारके व्यापार करताहै यह सब पूर्वार्जित शुभाशुभ कर्मके फल भोगताहै॥४ ॥ मूलम्-यद्यत्संदृश्यते लोके सर्व तत्कर्मस- म्भवम्॥ सर्व: कर्मानुसारेण जन्तुर्भोगा- न्भुनक्ति वै ॥ ४१ ॥ टीका-जो जो शुभाशुभ कर्म संसारमें देखपड- ताहै वह सबका आदिकारण कर्मही है प्राणीमात्र अपने कर्मके अनुसार भोग भोगता है॥४१ ॥ मूलम-ये ये कामादयो दोषा: सुखदुःख- प्रदायकाः॥। ते ते सर्वे प्रवर्तन्ते जीवकर्मा- नुसारतः ॥ ४२॥ टीका-जो जो काम क्ोध आदिसे सुख दुःख होताहै सो सब जीवके कर्महीके अनुसार वर्तताहै॥ ४२॥l
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द्वितीयपटलः। (४९) भूलम्-पुण्योपरक्तचैतन्ये प्राणान्प्रीणाति केवलम्॥ बाहये पुण्यमयं प्राप्य भोज्यव- स्तु स्वयम्भवेत् ॥ ४३ ॥ टीका-पुण्यकर्मके अनुष्ठान करनेसे प्राणीको सुख होता है और वाह्य वस्तु श्रेष्ठ भोजनआदि नानाप्र- कारकी वस्तु आपही मिल जातीहै॥ ४३ ॥ मूलम्-ततः कर्भबलात्युंस: सुखं वा दुःखमे- वच॥ पापोपरक्तचैतन्यं नैव तिष्ठति नि- श्वितम् ॥४४॥ न तद्भिन्नो भवेत्सोऽपि त- द्विन्नो न तु किश्चन । मायोपहितचैत- न्यात्सर्व वस्तु प्रजायते॥४५ ॥ टीका-यह ग्राणी अपने कर्मके वलसे सुख वा दुःख भोगताहै, जीव जब पापसें आसक होताहै तब दुःख भोगताहै, फिर उसको सुखलाभ नहीं होता. जीव अपने कर्मके अनुसार सुख वा दुःख भोगताहै इसमें भिन्नता नहीं है अर्थात् कर्ता भोक्तामें भेद नहीं चैतन्य आत्मा जब मायोपहित होताहै तब सब वस्तु उत्पन्न होताहै॥४४॥ ४५ ॥ मूलम्-यथाकालेपि भोगाय जन्तूनां विवि-
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(५०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। धोद्वः॥ यथा दोषवशाच्छक्तौ रजता- रोपणं भवेत्॥ तथा स्वकर्मदोषाद्वै ब्रह्म- ण्यारोप्यते जगत् ॥ ४६ ॥ टीका-जैसा काल भोगके हेतु निश्चय रहता है उसमें प्राणी नानापकारसे भोग भोगनेके लिये उत्पन्न होताहै जैसे नेत्रके विकारके कारणसे सीपीमें चाँदीका आरोप होताहै वैसेही अपने कर्मके दोषसे प्राणी त्र- ह्ममें मिथ्या जगत्का आरोप करताहै॥ ४६ ।।
मर्थनम्॥ उत्पन्नश्चेदीदृशं स्याज्ज्ञानं मोक्षप्रसाधनम ॥ ४७॥ टीका-वासनासे भ्रम उत्पन्न होताहै जवतक वासनाकी जड नहीं जाती तबतक कदापि भ्रम दूर नहीं होता इसी तरह जब ज्ञान उत्पन्न होताहै तब कुछ नहीं रहजाता इस हेतुसे ज्ञानही मोक्षका साधन है॥ ४७ ॥ मूलम-साक्षाद्वैशेपदृष्टिस्तु साक्षात्कारिणि विश्रमे॥ करणं नान्यथा युत्त्या संत्यं सत्यं मयोदितम् ॥४८॥ टीका-विशेष करके दृष्टिसे साक्षात् जो देखपड-
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ताहै वही साक्षात् अ्रमका कारणहै अर्थात् इसी साक्षा- तमें मनुष्य फँसाहै मायाके आवरणसे बुद्धि आगे नहीं जाती और दूसरा कारण कुछ नहीं है यह हम सत्य कहते हैं ॥४८ ।। साक्षात्साक्षा- त्कारिणि नाशयेत्॥ सो हि नास्तीति संसारे भ्रमो नैव निवतते॥ ४९ ॥ टीका-यह साक्षात चटपट आदिका भ्रम ब्रह्मके प्रत्यक्ष होनेसे नाश होताहै बिना आत्माके प्रत्यक्ष भये ब्रह्म संसारमें नहीं है यह भ्रम निवृत्त नहीं होता ॥।४९।। मूलम्-मिथ्याज्ञाननिवृत्तिस्तु विशेषदर्शना- द्दवेत॥ अन्यथा न निवृत्ति: स्याहृश्य- ते रजतभ्रम:॥५0 ॥ टीका-यह मिथ्या संसारका ज्ञान आत्माका विशे- ष दर्शन होनेसे निवृत्त होता है और किसीप्रकार इस अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती. जैसे सीपीमें चाँदीका भ्रम विना सीपीके निश्चय भये दूर नहीं होता ॥५०॥ मूलम्-यावन्नोत्पद्यते ज्ञानं साक्षात्कारे निरञ्जने॥ तावत्सर्वाणि भूतानि दृश्य- न्तें विविधानि च ॥५ं१॥
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(५२) शिवसंहिता आषाटीकासमेता। टीका-जबतक आत्माका साक्षात्कार ज्ञान नहीं होता तवतक सब प्राणी संसार आदि नाना प्रकारके देखपडते हैं॥। ५१॥ मूलम्-यदा कर्मार्जितं देहं निर्वाणे साधनं भवेत्॥ तदा शरीरवहनं सफलं स्यान्न चान्यथा ॥५२॥। टीका-जो यह कर्मार्जित इीर है इससे निर्वाण अर्थात् आत्मज्ञानका साधन होय तब इसका जन्म और स्थिति सुफल है नहीं तो व्यर्थ है. तात्पर्य यह है कि, जिस मनुष्यको आत्मज्ञान नहीं हुआ या इस वि- षयका उसने साधन नहीं किया उसका जन्म केवल माताके दुःख देने और पृथ्वीपर भारके हेतु भया।।५२।। मूलम्-यादशी वासना मूला वर्त्तते जीवसं- गिनी॥ तादृशं वहते जन्तुः कृत्याकृत्य- विधौ भ्रमम् ॥५३॥ टीका-जैसी वासना जीवके संग रहती है वैसेही प्राणी शुभाशुभ कर्म अ्रमके वश होके करताहै और उ- सी वासनासे उत्पन्न और नाश होता रहताहै॥ ५३॥ मूलम्-संसारसागरं तर्त्तु यदीच्छेद्योगसा- धकः॥ कृत्वा वर्णाश्रमं कर्म फलवर्ज तदाचरेत् ॥५४ ॥
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टीका-योगसाधक यदि संसारसे तरनेकी इच्छा करे तो यावत् वर्णाश्रमका कर्म फलरहित करना उचित है।। ५४ ॥ मूलम्-विषयासक्तपुरुषा विषयेषु सुखेप्स- वः॥ वाचाभिरुद्वनिर्वाणा वर्न्ते पापक- र्मणि ॥ ५५॥ टीका-विषयासक्त पुरुष सुख और विषयकी इच्छा में सर्वदा रहते हैं और पापकर्ममें ऐसे तत्पर रहते? कि, वाक्यभी उनका परमार्थ विषयमें रुद्ध रहता है अर्थात् मोक्षका साधन तो बहुत दूर है परन्तु परमार्थकी चर्चासेभी उनको ज्वर चढ़ताहै॥ ५५॥ मूलम्-आत्मानमात्मना पश्यत्न किश्िदि ह पश्यति।तदा कर्मपरित्यागे न दोषोड- स्नि मतं मम ॥ ५६॥ टीका-जब ज्ञानी आत्मासे आत्माको देखे और सब वस्तुका अभाव जानपडे तब कर्मको त्यागदेनेमें कुछ दोष नहीं है यह हमारा मतहै ऐसा श्रीशिवजी जगन्माता पार्वतीजीसे कहते हैं ॥ ५६ ॥ मूलम्-कामादयो विलीयन्ते ज्ञानादेव न चान्यथा॥ अभावे सर्वतत्त्वानां स्वयंत- र्वं प्रकाशते ॥५७ ॥:
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(५४) शिवसंहिता भापाटीकासमेता । टीका-ज्ञानमें काम क्ोधादि सकल पदार्थ लय होजाते हैं इसमें अन्यथा नहीं है, जब स्वयंतत्त्व अ- र्थात् आत्मज्ञान प्रकाश होताहै तब सब तत्त्वोंका अभाव होजाताहै।५७॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगप्रकथने तत्त्त्वज्ञानोपदेशो नाम द्वितीय: पटलः ॥२॥
अथ तृतीयपटलः। मूलम्-हद्यस्ति पङ्कजं दिव्यं दिव्यलिङ्गेन भूषितम्॥ कादिठान्ताक्षरोपेतं दवादशार्ण विभूषितम् ॥ १ ॥ टीका-प्राणीके हृदयस्थानमें एक पद्म सुन्दर दि- व्यलिङ्गसे शोभायमानहै यह पद्म क-से-ठ-तक द्वादश वर्ण करके शोभित है अर्थात् क-ख-ग-घ-ड-च-छ-ज- झ-भ-टे-ठ ॥ १ ॥ मूलम्-प्राणो वसति तत्रैव वासनाभिरलंकृ- तः॥ अनादिकर्मसंछिष्टः प्राप्याहङ्गार- संयुत:॥२॥ टीका-उसी पद्ममें प्राणकी स्थितिहै और अनादि कर्म अहंकारसंयुक्त वासनासे अलंकृतहै॥ २॥
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तृतीयपटलः । (५५) मूलम्-प्राणस्य वृत्तिभेदेन नामानि विवि- धानि च। वर्तन्ते तानि सर्वाणि कथितुं नैव शक्यते ॥ ३ ॥ टीका-प्राणके वृत्तिभेदसे जो इस शरीरमें वायु व- तमान हैं उनके बहुतप्रकारके नाम हैं जिनके वर्णन करनेको हम शक्य नहीं हैं अर्थात् यहां उनके वर्णन का प्रयोजन नहीं है।। ३ ।। मूलम्-प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यान- श् पञ्चमः। नागः कूर्मश्चककरो देवदत्तो
योक्तानीह शास्त्र के।। कुर्वन्तितेऽत्रकार्या णि प्रेरितानि स्वकर्ममिः ॥५॥ टीका-प्राणके सुख्य भेदोंका नाम प्राण, अपान, समान, उदान, पाँचवां व्यान और नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय, यह दश वायु सुख्य हैं हम शास्त्रप्र- माणसे कहते हैं शरीरमें यह वायु अपने कर्मसे प्रेरित होके कार्य करते हैं ॥४ ॥ ५ ॥ मूलम्-अत्रापि वायवः पश्च मुख्याः स्युर्द- शतः पुनः॥ तत्रापि श्रेष्ठकर्त्तारौ प्राणा- पानौं मयोदितौ॥ ६॥
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(५६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। टीका-वह दश वायुमें पांच सुख्य हैं फिर उनमेंभी निश्चय करके श्रेष्ट करता श्रीमहादेवजी कहते हैं कि, हमने प्राण और अपानको कहाहै॥ ६ ॥ मूलम्-हदि प्राणोगदेऽपानः समानोनाभि- मण्डले।। उदान: कण्ठदेशस्थो व्यानः सर्वशरीरगः॥ ७॥ नागादिवायवः पञ्च कुर्वन्ति ते च विग्रहे॥ उद्धारोन्मीलनंक्ष- तृड्ज़म्भा हिक्का च पश्चम:॥८।। टीका-दृदयस्थानमें प्राणकी स्थिति है और गु- दामें अपान और नाभिमण्डलमें समान और कण्ठ- में उदान और व्यान सब झरीरमें व्यातहै और नाग आदि जो पांच वायु हैं वह शरीरमें डकार, हिचकी, जँभाई, भुधा, पिपासा, उन्मीलन अर्थात निद्धासे जाग्रत् होनेके समय जो नेत्रके खुलनेका हेतु है यह सव कार्य करतेहैं॥ ७॥८।। मूलम्-अनेन विधिना यो वै ब्रह्माण्डं वेत्ति विग्रहम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्त: स याति परमां गतिम् ॥९ ॥ टीका-इस विधानसे जो पहिले कहा है झरीरको जो मनुष्य ब्रह्माण्ड जानता है वह सर्व पापोंसे मुक्त होके
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परमगतिको प्राप्त होताहै अर्थात् मोक्ष होताहै॥९ ॥ मूलम् -- अधुना कथयष्यामि क्षिप्रं योगस्य सिद्धये॥। यज्ज्ञात्वा नावसीदन्ति योगि नो योगसाधने॥ १०॥ टीका-अब जो हम कहते हैं इस विधिसे बहुत शीत्र योग सिद्ध होता है और इसके जान लेनेसे योगीको योगसाधनमें कष्ट नहीं होता॥ १०॥ भूलम्-भवेदीर्यवती विद्या गुरुवकसमुद्ध- वा। अन्यथा फलहीना स्यान्निवीर्याप्य- तिदुःखदा॥ ११ ॥ टीका-जो विद्या गुरुके सुखसे सुनी वा जानी जाती है वह वीर्यवती होतीहै और अन्य प्रकारसे विद्या फलहीन निर्वीर्या और अतिदुःखकी देनेवाली होती है. तात्पर्य यह है कि, योगविद्या वा अन्यविद्या भलेप्रकार गुरुसे जानकरके करना उचित है जो लोक पुस्तकसे वा किसीको करते देखते योगादिक क्रिया आरम्भ करदे- ते हैं उनका कल्याण नहीं होता यथार्थ न जाननेसे कष्टही होताहै॥३१ ॥ मूलम्-गुरुं सन्तोष्य यत्नेन ये वै विद्याम पासते॥ अवलम्बेन .विद्यायास्तस्याः फलमवाप्रुयु:॥.१२॥:
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(५८) शिवसंहिता आषाटीकासमेता।
टीका-गुरुको सब तरहसे प्रसन्न करके जो विद्या मिलतीहै उस विद्याका फल शीघ्र होताहै अर्थात् थोडे कालमें सिद्ध होजातीहै॥ १२ ॥ मूलम्-गुरु: पितागुरुर्माता गुरुर्देवो नसंश- यः॥ कर्मणा मनसा वाचा तस्मात्सवै: प्रसेव्यते॥१३। गुरुप्रसादतः सर्वे लभ्य- ते गुभमात्मनः । तस्मात्सेव्यो गुरुर्नि- त्यमन्यथा नशुभं भवेत्॥ ५४। प्रदक्षि- णत्रयं कृत्वा स्पृद्वा सव्येन पाणिना।।
टीका-गुरु पिता और गुरु माता और गुरु देवता है इसमें संशय नहीं है इस हेतुसे गुरुको कर्मसे मनसे वाक्यसे सब प्रकारसे सेवा करना उचितहै गुरुके प्र- सादसे आत्माका सब शुभ होजाता है. इसलिये गुरु- की नित्य सेवा करना उचित है. दूसरी तरह शुभ नहीं है गुरुको तीन प्रदक्षिणा करके दक्षिण हाथसे स्पश करके गुरुके चरणकमलमें साष्टांग नमस्कार करना उचित है॥१३॥ १४॥१५॥ मूउम्-श्रद्वयात्मवतां पुंसां सिद्धिर्भवति नान्यथा ॥ अन्यषाश्च न.सिद्धि: स्यात्त- स्माद्यत्नन साधयेत्॥१६ ॥
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टीका-जिस पुरुषको श्रद्धा है उसको निश्चय कर- के विद्या सिद्ध होती है दूसरेको नहीं होती. इस हेतुसे साधकको उचित है कि यत्नसे साधन करे॥ १६॥ मूलम्-न भवेत्संगयुक्तानां तथाऽविश्वासि- नाभपि। गुरुपूजाविहीनानां तथा च व- हुसंगिनाम् ॥१७॥ मिथ्यावादरतानां च तथा निष्ठुर भाषिणाम्॥ गुरुसन्तोपहीना- नां न सिद्धि: स्यात्कदाचन ॥। १८॥। टीका-जिस पुरुषका किसी व्यवहारी मनुष्यसे अतिसङ्ग है उसको योगविद्या सिद्ध नहीं होती ऐसेही अविश्वासी और जो गुरुपूजासे हीन हैं और जिनका बहुत लोगोंसे संग है और वह लोग जो झूठ और कठोर वचन बोला करते हैं और वह लोग जो गुरुको प्रसन्न नहीं करते इन लोगोंको, कदापि सिद्धि नहीं होती ॥१७॥१८॥ मूलम्-फलिष्यतीति विश्वास: सिद्धे: प्रथम- लक्षणम्।। द्वितीयं श्रद्धया युक्तं तृतीयं गु- रुपूजनम्॥१९॥चतुर्थ समताभावं पश्चमे न्द्रियनिग्रहम्॥ षठ्ठं च प्रमिताहारं सप्त- मृं नैव विद्यते॥२०॥:
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(६०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-योगसिद्धि होनेका प्रथम लक्षण यह है कि, उसके पिद्धिमें विश्वास हो दूसरे श्रद्धायुक्त तीसरे गुरु- पूजारत हो चौथे ग्राणीमात्रमें समताभाव रक्खे पांचवें इन्द्रियोंका निग्रह रहे छठवें परिमित भोजन करै यह छः लक्षण योनसिद्धिके हैं और सातवाँ नहीं है॥१९।।२० ।। मूलम्-योगोपदेशं संप्राप्य लब्घवा योग विदं गुरुम्॥ गुरू पदिष्टविधिना घिया निश्चित्य साधयेत् ॥२१॥ टीका-योगवेत्ता गुरुसे योग उपदेश लेके जिस विधिसे गुरु उपदेश करे उस विधिसे बुद्धि निश्चय क रके साधन करे॥ २१ ॥ मूलम्-सुशोभने मठे योगी पझ्मासनसम- न्वितः॥ आसनोपरि संविश्य पवनाभ्या- समाचरेत् ॥ २२ ॥ टीका-उपद्रवरहित सुन्दर स्वच्छ और उसका सू- क्षम रन्ध्र होय उस मठमें पद्मासनसंयुक्त आसनपर बैठके योगी पवनका अभ्यास करे ॥ २२ ॥ मूलम्-समकायः प्राञ्जलिश्च प्रणम्य च गुरून् सुधीः।दक्षे वामे चविघ्नेशं क्षेत्रपा- लांबिकां पुनः।।३३।।
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टीका-समकायः अर्थात सीधा शरीर करके हाथ जोडके गुरुको प्रणाम करे और दक्षिण वामभागमें गणेशजीको प्रणाम करे और क्षेत्रपाल और जगन्माता देवीको प्रणाम करना उचित है॥ २३॥ मूलम्-ततश्च दक्षाद्ष्टेन निरुद्य् पिंगलां सुधीः॥ इडया पूरयेद्रायुं यथाशत्त्या तु कुम्भयेत् ॥२४॥ ततस्त्यक्क्का पिंगलया शनैरेव न वेगतः॥ घुनः पिंगलयाऽडपूर्य यथाशत्त्या तु कुम्भयेत।।२५।इडया रे- चयेद्रायुं न वेगेन शनैःशनैः।।इदं योगवि- धानेन कुर्याद्विंशतिकुम्भकानू॥ सर्वद्र न्द्वविनिर्मुक्त: प्रत्यहं विगतालसः ॥२६। टीका-इसके पश्चात् दहिने हाथके अंगष्ठसे पिंग- लाको रोककरके इडासे वायुपूरक करे अर्थात ग्राह करे और यथाशक्ति वायुको रोके फिर पिंगलासे शनैः इनैः रेचक अर्थात् वायुको बाहरकरे इसीप्रकार फिर पिंगलासे पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करे फिर इडा से धीरे धीरे रेचक करे वेगसे कदापि न करे इस योगविधा नसे बीस कुम्भक करे और सर्वद्रन्द्रसे रहेत होजाय अर्थात् एकाकार वृत्ति रक्खे. और नित्य आलस्यको त्याग करके अभ्यास करे॥ २४ ॥ २५॥ २६ ॥
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(६२) शिवसंहिता आाषाटीकासमेता। मूलम्-प्रातःकाले च मध्याह्वे सूर्यास्ते चार्दरात्रके। कुर्यादेवं चतुर्वारं कालेष्वे- तेषु कुम्भकान् ॥। २७।। टीका-पूर्वोक्त विधिते प्रातःकाल और मध्याह्में और सायकालमें और अर्द्धरात्रिमें इसीतरह चार बार नित्य कुम्भक करना उचित है॥ २७॥ मूलमू-इत्थं मासत्रयं कुर्यादनालस्योदिने दिने॥ ततो नाडीविशुद्धि: स्यादविल- म्बेन निश्चितथ॥२८। टीका-इसीप्रकार आलस्यको छोडकरके तीन मास नित्यकरे तो उस पुरुषकी नाडी बहुत शीत्र शुद्ध होजाय यह निश्चय है॥।२८ ॥ मूलम्-यदा तु नाडीशुद्धि: स्याद्योगिन- स्तत्त्वदर्शिनः ॥ तदा विध्वस्तदोषश्च भवेदारम्भसम्भवैः ॥ २९॥ टीका-तत्त्वदर्शी योगीकी जब नाडी शुद्ध होगी तब सर्व दोषका नाश होगा और आरम्भका सम्भव होगा ॥ २९॥ मूलम्-चिह्नानि योगिनो देहे दृश्यन्ते ना- डिशुद्धितः ॥ कथ्यन्ते तु समस्तान्यङ्गा- नि संक्षेपतो मया॥३०॥
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तृतीयपठलः । (६३ ) टीका-नाडी शुद्ध होनेपर जो योगीके शरीरमें चिह्न देखपडतेहैं उन सबको हम संक्षेपसे वर्णन करते हैं॥ ३६ ॥ मूलम्-समकाय: सुगन्धिश्चसुकान्तिःस्वर- साधक ॥३१॥ आरम्भघटकश्षैव यथा परिचयस्तदा॥। निष्पत्तिः सर्वयोगेषु योगावस्था भवन्ति ताः ॥। ३२ ॥ टीका-जब योगीकी नाडी शुद्ध होगी तब समकाय होजायगा अर्थात् न स्थूल न कृश न वक रहेगा और शरीरमें सुगधिसंयुक्त अच्छी कान्ति अर्थात् तेज रहेगा और वायुस्वरका साधन होजायगा और आरम्भका लक्षण जान पडेगा और सब योगका ज्ञान होजायगा इसको योगावस्था कहते हैं॥ ३१॥३२ ।। मूलम-आरम्भःकथितोऽस्माभिरधुना वा- युसिद्धये॥ अपरः कथ्यते पश्चात्सर्वदुः- खौघनाशनः ॥३३॥ टीका-अभी जो हमने कहा है सो प्राणवायु सिद्ध होनेके आरम्भमें यह चिह्न होता है और इसके पीछे जो सर्व दुःखका नाश होता है सो कहते हैं॥ ३३ ।। मूलम्-प्रौढवहनिःसुभोगीं च सुखीसर्वांङ्गसु-
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(६४) शिवसंहिता आषाटीकासमेता । न्दरः। संपूर्णहृदयो योगी सर्वोत्साहब- लान्वितः। जायते योगिनोऽवश्यमेत- त्सर्वै कलेवरे ॥ ३४ ॥ टीका-साघकके इरीरमें जठराम विशेष प्ज्वलित होगी और सर्व अङ्ग सुन्दर सुखपूर्वक सुन्दर भोजन करेगा और वलसंयुक्त सर्व उत्साहसे दृदय योगीका प्रशन्न रहेगा इतने गुण योगीके शरीरमें अवश्य होगे।३४ भूलम्-अथ वर्ज्य प्रवक्ष्यामि योगविघ्नकरं परम्॥ येन संसारदुःखाब्धिं तीर्तवा या- स्यन्ति योगिनः ॥ ३५ ॥ टीका-अब जो योगमें विन्न हैं उनको हम कहते हैं जिनको त्यागके यह संसाररूपी जो दुःखका समुद्र है योगी उसके पार होजाताहै॥ ३५॥ मलम्-आम्लं रूक्षं तथा तीक्ष्णंलवणंसार्ष- पं कटुमू।।बहुलं भ्रमणं प्रातः स्नानं तैल- विदाहकम॥३६।।स्तेयं हिंसां जनद्वेषञ्चा-
व्ञ प्राणिपीडनम्॥३७॥ स्त्रीसङ्गमग्निसेवां च बहालापं पियाप्रियम॥।अतीव भोजनं योगी त्यजेदेतानि निश्चित ।।३८ ।।.
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तृतीयपटलः । (६५)
टीका-खट्टा रुखा तीक्ष्ण लोन सरमों कडुभा बहुत भ्रमण करना प्रातःकाल खान शरीरमें तेल म- देन करना ॥ ३६। स्वर्णआदिककी चोरी हिंता म- नुष्यसे द्वेष व अहंकार अनार्जव अर्थात मनुष्यसे प्रेम न रखना उपवास, झूठ, ममता, प्राणीको पीडा देना।।३७।। स्त्रीका सङ्ग, अभिसेवन, प्रिय, अिय, बहुत बोलना, बहुत भोजन करना योगीको उचित है कि यह सव अवश्य त्यागदे॥ ३८ ॥ मूलम्-उपायं च प्रवक्यामि क्षिमं योगस्य सिद्धये॥ गोपनीयं साधकानां येन सि- दविर्भवेत्खलु ॥ ३९ ॥ टीका-जब हम बहुत शीम्र योग सिद्ध होनेका उप- य कहते हैं इसको गोप्य रखनेसे साधकको योग निश्च य सिद्ध होजायगा॥ ३९ ॥ मूलम्-वृतं क्षीरं च मिष्टाननं ताम्बूलं चूर्णव- र्नितम। कर्पूरं निष्ठुरं मिएं सुमठं सूक्ष्मन- स्त्रकम् ॥४०॥ सिद्धान्तश्रषणं नित्यं वैरा- गयगृहसेवनम्॥ नामसङीतने विष्णो: सु- नादश्रवणं परम् ॥४१। धृति: क्षमा तपः शौचं ह्वीर्मतिर्गरुसेवनम्॥ सदैतानि परं योंगी नियमेन, समाचरेत् ॥। ४२ ।।
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(६६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-घृत दूध मधुर पदार्थ ताम्बूल कर्पूरवासित चूर्णरहित, कठोर शब्दरहित मधुर बोलना, सुन्दर सू- क्ष्मरन्ध्रके स्थानमें रहना, सूक्ष्म वस्त्र अर्थात महीन और थोडा वस्त्र धारण करे नित्य सिद्धांत अर्थात् वेदान्त श्रवण करे और दैराग्यसे गृहमें रहे ईश्वरका स्मरण करे अच्छा शब्द श्रवण करे धैर्य क्षमा तप शौच लज्जा गुरु- की सेवा योगी सदैव इसप्रकार नियमसंयुक्त रहे तो कल्याण होगा॥४ ॥४॥४२ ॥ मूलम्-अनिलेडर्क प्रवेशे च भोक्तव्यं योगि- भिः सदा॥ वायौ प्रविष्टे शशिनि शयनं साधकोत्तमैः॥ ४३॥ टीका-जव मर्यनाडी अर्थात् पिंगलानाडीका प्रवाह रहे तब योगी सदैव भोजन करे और जब चन्द्र अर्थात् इडानाडीसे वायुका प्रवाह रहे तब साधकके प्रति शयन करना उचित है॥ ४३ ।। मूलम्-सदो भुक्तेऽपि क्षुधिते नाभ्यासः क्रियते बुधैः॥ अभ्यासकाले प्रथमं कुर्या- त्क्षीराज्यभोजनम्॥४8॥ टीका-भोजन करके तुरंत उसी समय अथवा जब क्षुधित होय तब साधक कदापि अभ्यास न करे और अभ्यास कालमें प्रथम दूध वृत भोजन करे॥४४ ॥
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तृतीयपटलः । (६७)
मूलम-ततोऽभ्यासे स्थिरीभूते न तादड़िय- मग्रहः॥४५॥ अभ्यासिना विभोक्तव्यं स्तोकं स्तोकमनेकधा॥ पूर्वोंक्तकाले कुर्यात्तु कुम्भकान्प्रतिवासरे ॥४६ ॥ टीका-जब अभ्यास स्थिर होजाय तब पूर्वोक्त निय- मका कुछ प्रयोजन नहीं है॥ ४५॥ और अभ्यासीको उचित है कि, थोडा थोडा कईबार भोजनकरे और जिस- प्रकार पहिले कहा है उसीतरह नित्य कुम्भक करे॥४६॥। मूलम-ततो यथेष्टा शक्ति: स्याद्योगिनो वा- युधारणे ॥ यथेष्ट धारणाद्वायो: कुम्भक: सिद्धयति धुवम्॥ केंवले कुम्भके सि द्वे किं न स्यादिह योगिन:।।४७।। टीका-योगीको वायु धारण करनेकी शक्ति इच्छा- के अनुसार होजायगी. जब इच्छानुसार धारणशक्ति होजायगी तब कुंभक निश्चय सिद्ध होगा और केवल कुम्भक सिद्ध होनेसे योगी क्या नहीं करतकता अर्थात सब सिद्ध करसकता है॥ ४७॥ मूलम्-स्वेद:संजायते देहे योगिन: प्रथमो- दयमे॥४८॥ यदा संजायते स्वेो मर् नं
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(६e) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कारयेत्सुधीः॥ अन्यथा विग्रहे धातुर्न- ष्टो भवति योगिनः ॥ ४९॥ टीका-योगीके शरीरमें प्रथम स्वेद अर्थात् पसीना उत्पन्न होता है जब स्वेद उत्पन्न होथ तो उसको शरी- रमें मर्दन करे अन्यथा अर्थात् मर्दन न करनेसे योगी- के शरीरका धातु नष्ट होजाता है॥४८॥४९ ॥ मूलम्-द्वितीये हि भवेत्कम्पो दार्दुरी मध्यमे मतः ॥ ततोऽधिकतराम्यासा दगनेचरसाधकः ॥५० ॥ टीका-दूसरे भूमिकामें कंप होताहै तीसरेमें दार्दु रीवृत्ति होती है अर्थात् आसन उठता है फिर भूमिपर आयजाता है उससे अधिक अभ्यात होनेसे योगी गगनमें स्वेच्छाचारी होजाता है॥ ५० ॥ मूलम्-योगी पद्मासनस्थोऽपि भुवमुत्सृज्य वर्तते। वायुसिद्धिस्तदा ज्ञेया संसारध्वा न्तनाशिनी ॥ ५१ ॥ टीका-योगी पद्मासनस्थ होके पृथ्वीको त्यागके आकाशमें स्थिर रहे तब जाने कि, संसारके अन्धकार नाश करनेवाली वायु सिद्ध होगई ॥ ५१॥ मूलम्-तावत्कालं प्रकुर्वीत योगोक्तनियम-
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(७०) शिवसंहिता आषाटीकासमेता। रनेसे कष्ट न होगा और योगीको अभ्याससे भूचरी सिद्धि होजायगी जैसे दर्दुरजन्तु पाणि ताडन करनेसे पृथ्वीपर उड्डान करताहै उसी प्रकार योगीभी पृथ्वीपर उड्डान करता है ॥ ५५ ॥ मूलम्-सन्त्यत्र बहवो विन्ना दारुणा दुर्नि- वारणाः ॥ तथापि साधयेद्योगी प्राणैः कंठगतैरपि॥ ५६॥ टीका-इस योगसाधनमें बहुत दारुण विन्न होते हैं जिसका निवारण बहुत कठिन है. परन्तु साधकको उचित है कि, यदि कंठगतभी प्राण होजाँय तोभी साधन न छोढ़े ॥५६॥ मूलम्-ततो रहस्युपाविष्टः साधकः संयते- न्द्रियः।प्रणवं प्रजपेद्दीर्घ विध्नानां नाशहे- तवे॥५७॥ टीका-साधकको उचित है कि, विधोंके नाशके हेतु इन्द्रियोंके संयममें अर्थात उनके कार्यको रोकके विधि- पूर्वक एकान्तमें बैठके दीर्घमात्रासे अर्थात् स्पष्ट अक्ष- रके उच्चारणसे प्रणवका जप करे॥५७ ॥। मूलम्-पूर्वार्जितानि कर्माणि प्राणायामेन निश्चितम्॥ नाशयेत्साधको धीमानिह लोकोद्भवानि च ॥|५८।।
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तृर्वायपटलः । (७१ ) टीका-पूर्वार्जित कर्म और जो इस जन्ममें किया है यह दोनोंके फलको बुद्धिमान् साधक प्राणायामसे निश्चय है कि, नाश करदेता है॥५८॥ मूलम्-पूर्वार्जिता नि पापानि पुण्यानि विवि- धानि च । नाशयेत्वोडशप्राणायामेन योगिपुंगवः ।५९।। टीका-श्रेष्टयोगी पूर्वार्जित नानाप्रकारका पाप और पुण्य केवल सोलह प्राणायामसे नाश कर- देताहै॥ ५९॥ मूलम्-पापतूलचयानाहो प्रलयेत्प्रलयाशि- ना।। ततः पापविनिर्भुक्त: पश्चात्पुण्या- नि नाशयेत ॥ ६० । टीका-साधक पाप राशिको तूलके समान प्राणा- यामरूपी अगिसे प्रलय करदेताहै अर्थात् जलादेताहै. इसप्रकारसे मुक्तहोके पश्चात् पुण्यकोभी उसी अग्निमें नाश करदेताहै॥ ६० ॥ मूलम्-प्राणायामेन योगीन्द्रो लब्ध्वैश्वर्या- ष्टंकानि वै।। पापपुण्योदधि तीत्वा तैलो- क्यचरतामियात्ँ॥६१॥ टीका-योगी ग्राणायामके, प्रभावसे आठ ऐश्वर्य
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(७२) शिवसंहिता आषाटीकासमेता।
जिसको अष्टसिद्धि कहते हैं अर्थात् अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, ग्राकाम्य ईशिता और वशिता प्राप्त करता है अब इन आठों सिद्धिके लक्षण कहते हैं योगीका शरीर इच्छामात्रसे परमाणुवत् होजाय उस- को अणिमा कहते हैं और योगी इच्छापूर्वक प्रकृति- को अपनेमें करके आकाशवत् स्थूल होजाय उसको महिमा कहतेहैं और अति हलके शरीरका पर्वतके समान भारी होजाना उसको गरिमा कहते हैं और बहुत भारी पर्षतके समानको रुईके सदश होजाना इसको लचिमा कहते हैं और सर्व पदार्थ इच्छामात्रसे योगीके समीप होजाय उसको प्राप्ति कहते हैं और दशयादृशय अर्थात् कभी देख पडे कभी न देखपडे इसको प्राकाम्य कहतेहैं और सूत भविष्य पदार्थको जन्म मरणकी रचना करनेमें समर्थ होय उसको ईशि ता कहते हैं और भूत भविष्य वर्तमान पदार्थको इच्छा से अपने आधीन करलेना इसको वशित्वसिद्धि कहते हैं और योगी पाप पुण्यके समुद्को तरके अपनी इच्छा पूर्वक तैलोक्यमें विचरताहै॥ ६१ ॥ मूलम्-ततोऽभ्यासकमेणैव घटिकात्रितयं भवेत्। येन स्यात्सकलासिद्धियोगिन: स्वेप्सिता झृवम्॥। ६२।।
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तृतीयपटलः । (७३)
टीका-पूर्वोक्त क्रमस प्राणायाम जब तीन घडीतक स्थिर होजायगा तब योगीको उसके इच्छाके अनुसार सब सिद्ध होजायगा यह निश्चय है॥ ६२ ॥ मूलम्-वाक्सिद्धि: कामचारित्वं दूरदृष्टि- स्तथैव च॥ दूरश्रुतिः सूक्ष्मदृष्टिः परका- यप्रवेशनम् ॥६३। विष्मूत्रलेपने स्वर्णम- दृश्यकरणं तथा॥ भवन्त्येतानि सर्वां- णि खेचरत्वं च योगिनाम्॥६४।। टीका-वाक्यसिद्धी स्वेच्छाचारी दूरष्टी दूर शब्द श्रवण अतिसूक्ष्म दर्शन दूसरके शरीरमें प्रवेश करने- की शक्ति होय और योगी अन्यधातुमें अपने मल मूत्र लेपनमात्रसे स्वर्ण करे और योगीको अदृशय होजाने की शक्ति और आकाशमें गमन करनेकी सिद्धि यह सब योगीको कुम्भक सिद्ध होजानेसे स्वयं सिद्ध हो- जायगा इसमें संशय नहीं है। ६३॥ ६४ ।। मूलम्-यदा भवेद्धटावस्था पवनाभ्यासने
यन्न साधयेत् ॥६॥ टीका-जब योगोंकी घटावस्था होगी अर्थात उसमें
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(७४) शिवसंहिता भाषाटी का समेता । योगकी घटना होगी तब यह संसारचक योगीको कुछ असाध्य न रहैगा ॥ ६५ ॥ मूलम्-प्राणापाननादबिंदुजीवात्मपरमात्म नः॥ मिलित्वा घटते यस्मात्तस्माद्वै घट उच्यते ॥ ६६ ॥ टीका-प्राण अपान नाद बिन्दु जीव आत्मा और परमात्मा इनको एकत्र घटना होनेसे इसको चटास्था कहते हैं ॥ ६६ ॥ मूलम्-याममात्रं यदा धर्त्तु समर्थ: स्यात- दाद्भुतः ॥ प्रत्याहारस्तदैव स्यान्नांतरा भवति ध्रुवम् ॥६७ ॥ टीका-एक प्रहर मात्र जब वायु धारण करनेकी सामर्थ्य होगी तब अद्भुत प्रत्याहारकी शक्ति होगी और साधनसे न होगी निश्चय है॥ ६७ ।। मूलम्-यं यं जानाति योगीन्द्रस्तं तमात्मे- ति भावयेत॥ यैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदि- ्द्रियजयो भवेत् ॥ ६८ ।। टीका-योगी जो ज़ो पदार्थ जाने सो सो पदार्थमें आत्माकाही भावना करे जो इंदरिमसे जिस पदार्थका बोध होगा उस पदार्थमें वही आत्मभावनासे वह इंद्रिय
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तृतीयपटल:। (७५)
जय हो जायगी अर्थात् जैसे नेत्रसे रूपका बोध होताहै तो जब रूपमें आत्मभावना होगी तब उस भावनासे चक्षु इन्द्रिय रूपमें कदापि आसक्त न होगी जव वह आसकत न भई तब वह इन्द्रिय आपही जय होगई॥६८॥ मूलम्-याममात्रं यदा पूर्ण भवेदभ्यासयो- गतः।। एकवारं प्रकुर्षीत तदा योगी च कु- म्भकम्॥६९।।दण्डाष्टकं यदा वायुर्निश्र- लो योगिनो भवेत्॥ स्वसा मर्थ्यात्तदाँग- ष्ठे तिष्ठेद्धातुलवत्सुधीः॥७०॥ टीका-जब एकवारमें पूर्ण एक प्रहरतक योगीका अभ्याससे कुम्भक स्थिर रहेगा अर्थाव आठ घडीतक योगीका वायु निश्चल रहे तब वह अपने सामर्थ्यसे अङ्ड- षमात्रके बलसे अचल अबोधवत् खडा रहसक्ता है अर्थात् यह सामर्थ्य भी योगीको होगी और अपने सा- मर्थ्यको गोप्य रखनेके हेतु विक्षिपकी चेष्टा योगी दिख लावैगा ॥ ६९॥ ७॥ मूलम-ततःपरिचयावस्था योगिनोऽभ्यास- तो भवेत॥यदा वायुश्चंद्रसूर्य त्यक्का ति- ष्ठति निश्चलम् ॥ ७१ ।। वायुः परिचितो वायुः सुषुम्ना व्योति संचरेत्॥
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(७६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
टीका-इस अन्तरमें योगीकी अभ्याससे पश्चिया- वस्था होगी जब वायु इडा पिङ्गलाको त्यागके निश्चल स्थिर रहेगा॥ ७१ ॥ तव परिचित होके सुषुम्नाके र- नधरसे प्राणवायु आकाशको गमन करेगा॥ मूलम्-क्रियाशक्ति गृहीत्वैव चक्रान्मित्त्वा सुनिश्चितम् ॥ ७२॥ यदा परिचयावस्था भवेदभ्यासयोगतः । त्रिकूटं कर्मणां योगी तदा पश्यति निश्चितम् ॥ ७३॥ टीका-कियाशक्तिको ग्रहण करके योगी निश्चय सब चक्रको वेधेगा॥७२। और जब योग अभ्याससे परिचया वस्था होगी तब त्रिकूट कर्मोंको योगी निश्चय देखेगा तात्पर्य यह है कि, जब योगीका पूर्वोक्त अभ्यास सिद्ध होजायगा तब त्रिकूट अर्थात आध्यात्मिक आधिभौ- तिक आधिदैविक मानसिक दुःखको आध्यात्मिक कह- ते हैं और भूत पिशाचीदिसे जो कष्ट होता है उसको आधिभौतिक कहते हैं और देवता आदिसे जो कमानु- सार कष्ट होताहै उसको आधिदैविक कहते हैं यह त्रिकूटकर्मोंका ज्ञान योगीको होजाता है॥ ७३ ॥ मूलम्-ततश्चकर्मकूटानि प्रणवेन विनाश- येत्॥ स योगी , कर्मभोगाय कायव्यूहं समाचरेत॥ ७8 ॥
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तृतीयपटलः। (७७ )
टीका-इस कर्मकूटको योगी प्रणवद्वारा नाश कर- देताहै और यदि पूर्वकृत कर्मफल भोगनेकी इच्छा करे तो अपने इच्छानुसार इसी जन्ममें इसी शरीरसे भोगलेगा॥ ७8 ॥ मूलमू-अस्मिन्कालेमहायोगी पंचधा धा- रणं चरेत्॥ येन भूरादिसिद्धि: स्यात्ततो भूतभयापहा॥७५।आधारे घटिकाः पंच- लिंगस्थाने तथैव च।। तदूर्ध्व घटिकाः पञ्च नाभिहन्मध्यके तथा ॥७६॥ ध्रूम- ध्योर्ध्व तथा पंच घटिका धारयेत्सुधीः॥ तथा भूरादिना नष्टो योगीन्द्रो न भवे त्खलु॥ ७७॥ टीका-जिसकालमें महायोगी पश्चधाधारणा सिद्ध करलेगा तब यह पश्चभूत सिद्ध होजायँगे और इनसे कोई कष्टका भय नहोगा. अव धारणाका निर्णय करतेहैं कि, आधारचक्रमें पांचघडी वायू धारणकरे इसी क्रमसे स्वाधिष्ठान मणिपूर अनाहत विशुद्ध आज्ञाचक्रमें अर्थात् गुदा लिङ्ध नाभि हृदय कंठ भृकुटीके मध्यमें ऊपर कहेहुए प्रमाणसे वायु धारणकरेगा तो योगी पश्च भूतसे निश्चय नाझ न होगा ॥७॥ ७६॥७॥
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(७) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-मेधावी सर्वभृतानां धारणांयः सम- भ्यसेत ।। शतब्रह्ममृतेनापि मृत्युस्त- स्य न विद्यते॥ ७८ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी अभ्याससे पश्चभूतकी धार- णा करेगा तो यदि एकशत ब्रह्माभी मृत्युको प्राप्त होंगे तबभी उसकी मृत्यु न होगी॥ ७८॥ मूलम्-ततोऽभ्यासक मेणैव निष्पत्तियोगि नो भवेत् । अनादि कर्मवीजानियेन ती- र्त्वाडमृतं पिबेत् ॥ ७९ ॥ टीका-इस अभ्यासकमसे योगीको ज्ञान होता है और अनादिकर्म बीजको तरके अर्थात नाश करके योगी अमृतपान करताहै॥ ७९॥ मूलम्-यदा निष्पत्तिर्भवति समाधे: स्वेन कर्मणा॥ जीवन्मुक्तस्य शांतस्य भवेद्दी- रस्य योगिनः॥ ८०॥ यदा निष्पत्तिसं- पन्नः समाधि:स्वेच्छया भवेत्॥ ८१ ॥ गृहीत्वा चेतनां वायुः क्रियाशक्ति च वेग- वान्।। सर्वोश्चकान्विजित्वा चज्ञान- शक्तौ विलीयते ॥ ८२॥
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तृतीयपटलः। (७१) टीका-जब अपने अभ्यासकर्मसे योगीको समाधी- का ज्ञान होगा तब जविन्मुक्त शान्त होके योगीको ज्ञानसम्पन्न स्वेच्छासमाधी होगी और मन वाशु क्रिया- शक्तिसहित सर्व चकोंको बेधके ज्ञानशक्तीमें लीन हो- जायगा॥८० ॥८१।८२॥ मूलम्-इदानीं केशहान्यर्थ वक्तव्यं वायु- साधनम्॥ येन संसारचक्र्ेस्मिन्रोगहा निर्भवेदुवस्॥ ८३ ॥ दीका-हे देवि। अव केशहानी के अर्थ वायुसाधन कहते हैं जिससे इस संसारचक्र्में निश्चय रोगादिक नाश होजाय और साधकको कष्ट न हो।। ८३॥ मूलम्-रसनां तालुमूले यः स्थापयित्वा विचक्षणः।।पिवेत्ग्राणानिलं तस्य रोगाणां संक्षयो भवेत॥ ८४ ॥. टीका-जिह्वाको तालुके मूलमें स्थितकरके बुद्धि मान साधक यदि प्राणवायुको पान करे तो उसके सर्व रोगोंका नाश होजायना॥। ८४ ॥ मूलम्-काकचंच्ा पिबेद्धायुं शीतलं यो वि- चक्षणः। प्राणापानविधानज्ञः स भवे-
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(८०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जो बुद्धिमान साधक प्राण अपानके विधा नका ज्ञाता कावचञ्चू अर्थात् अधरको काकके चोंचके समान लम्बा करके शीतल वायु पान करता है सो योगी मुक्तिभाजन है अर्थात् मुक्तिपात्र है।। ८५।। मूलम्-सरसं यः पिबेद्रायुं प्रत्यहं विधिना सुधीः॥नशयंति योगिनस्तस्य श्रमदाह- जरामयाः॥ ८६॥। टकिा-जो साधक नित्य विधानपूर्वक रससहित वायुपान करता है उसके सर्व रोग और श्रम दाह जरा अर्थात् वृद्धावस्थादि नाश होजाते हैं अर्थात् यह सब उसके समीप नहीं आते॥ ८६॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगांकृत्वा यश्चन्द्रे सलिलं पिवेत॥ मासमात्रेण योगीन्द्रो मृत्युं ज- यति निश्चितम् ॥ ८७॥ टीका-जो योगी जिह्वाको ऊपर करके चंद्रमासे विगलित सुधारसको पान करताहै सो योगी एक मासमें निश्चय मृत्युको जीत लेता है इस जगह जिह्वा ऊपर करनेसे तात्पर्य खेचरी मुद्रासे है सो खेचरीमुद्रा गुरु सुखसे जानना उचितहै।।८७॥ मूलम्-राजदंतबिलं गाढं संपीडय विधिना
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तृतीयपटलः १ (८g) पिषेत्॥ ध्यात्वा कुण्डलिनीं देवीं षण्मा- सेन कविर्भवेत् ॥ ८८ ॥l टीका-जो साधक राजदन्तको नीचेके दांतसे द- बायके उसके रन्त्रद्वारा विघिसे वायुपान करे और उस कालमें कुण्डलिनी देवीका ध्यान करेगा तो निश्चय छः मासमें कवि होगा।। ८८॥l मूलम्-काक चंच्वा पिवेद्रायुं सन्ध्ययोरुभ- योरि ॥ कुण्डलिन्या मुखे ध्यात्वा क्षयरोगस्य शान्तये॥।८९॥ टीका-पूर्वोक्त काकचञ्चूसे विघिसे दोनों सन्ध्यामें जो कुण्डलनीकी सुखका ध्यान करके वायुपान करे- गा उसका क्षयरोग नाश होजायगा॥।८९। मूलम्-अहर्निशं पिबेद्योगी काकचंच्वा वि- चक्षणः॥ पिवेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां संक्षयो भवेत् ॥ दूरश्रुतिर्दूरद्ाष्टिस्तथा स्यादर्शनं खलु ॥९० ॥ टीका-जो योगी बुद्धिमान् रात्रि दिवस काकच- चूसे प्राणवायु पान करतेहैं उनके रोगोंका नाश हो- जाताहै और दूरका शब्द श्रवण होताहै और दूरकी व- स्तु देख पडती है तथा निश्चय मूक्ष्म दर्शन होताहै।।९०।।
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(८ २) शिवसंहिता आाषादीकासमेता। मूलम्-दन्तैर्दन्तान्समापीडय पिवेद्रायुं शनैः शनैः॥ ऊर्ध्वजिह्वः सुमेधावी मृत्युं जयति सोचिरात् ॥९१॥ टीका-जो बुद्धिमान् दांतसे दाँतको पीडित करके धीरे धीरे वायुपान करेगा और जिह्वा ऊपर करके अ मृतपान करेगा सो शीघ्र मृत्युको जीतलेगा ॥ ९ मूलम्-षण्मासमात्रमभ्यासं य: करोति दि- नेदिने । सर्वपापविनिर्षक्त्तो रोगान्नाश- यते हि सः॥९२॥ संव्वत्सरकृतान्या सान्मृत्युं जयति निश्चितम्॥ तस्मादति- प्रयत्नेन साधयेद्योगसाधक: ॥९३।। वर्ष- त्रयकृताऽम्यासादैरवो भवति ध्रुवम्।। अणिमादिगुणालन्धवा जितभूतगणः स्वयम् ॥९४ ॥ टीका-जो पहिले कहेहुए अभ्यासको नित्य छः मास करे तो सब रोगोंका नाश होजायगा और सब पापसे मुक्त होजाय और उसी अभ्यासको एकवर्ष करे तो मृत्युको निश्चय जीतले इस हेतुसे साधक इस कि- याका यत् करक़े अवइम साधन करे और यदि इसका अभ्यास तीनवष के तो निश्चप भैरव होजाय और
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तृतीयपटलः। (८ ३)
अष्टसिद्धिका लाभ होय और सर्व भूतगण आपही वश में होजाय ॥ ९२॥९३॥९४॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वंगां कृत्वा क्षणार्ध यदि तिष्ठति॥क्षणेन मुच्यते योगी व्याधिमृ- त्युजरादिभि:॥९५॥ टीका-योगीकी जिह्वा यदि क्षणमात्र ऊपर स्थिर होजाय तो उसी क्षणसे सर्वव्याधि और वृद्धावस्था और मृत्युका नाश होजाय. तात्पर्य यह है कि, खेचरीसुद्रासे किश्चित्मात्र भी अमृतपान करलेगा तो उसकी मृत्यु न होगी॥ ९५ ॥ मूलम्-इसनां प्राणसंयुक्तां पीडचमानां वि- चिंतयेत्॥ न तस्य जायते मृत्युः सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ९६॥ टीका-जिद्वाको प्राणसहित पीडित करके जो पुरुष ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यानसंयुक्त स्थिर करेगा. हेदेवी! हम वार- वार कहतेहैं कि, निश्चय उसकी मृत्यु न होगी॥ ९६॥ मूलम्-एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्विती- यक:॥ न क्षुधा न तृषा निद्रा नैव मूरच्छा प्रजायते॥१७॥ टीका-इस योगअम्याससे जो पहिले कहाहै वह
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(८४) शिवसंहिता आपाटीका समेता । पुरुष दूसरा कामदेव होजायगा अर्थात् कामदेवके समान शोभितहोगा और उसको क्षुधा तृषा निद्रा मूर्च्छा कभी न उत्पन्न होगी॥ ९७॥ मूलम्-अनेनैव विधानेन योगीन्द्रोऽवनिम- ण्डले॥। भवेत्स्वच्छन्दचारी च सर्वाप- त्परिवर्जितः॥९८॥ न तस्य पुनरावृत्ति- रमोंदते ससुरैरपि।। पुण्यपापैन लिप्येत एतदाचरणेन सः ॥ ९९॥ टीका-इस विधानसे योगी संसारमें सर्व दुःखसे रहित होके स्वेच्छाचारी होजायगा और इस आचर- णसे योगी पुण्यपापमें लिप नहीं होगा न फिर संसा- रमें उसका जन्म होगा और देवतोंके साथ आनन्दपूर्वक विचरेगा ॥ ९८॥९९॥ मूलम्-चतुरशीत्यासनानि सन्ति नानावि- धानि च॥ १०० ॥ तेभ्यश्चतुष्कमादाय मयोक्तानि त्रवीम्यहम्॥ सिद्धासनं ततः पद्मासनश्चोग्रं च स्वस्तिकम् ॥१०१॥ टीका-बहुत प्रकार के चौऱ्याशी आसनहैं उनमें उत्तम जो चार आसन हैं उनको हग कहते हैं, सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन,स्वस्तिकासन.तात्पर्य यह है कि, और
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तृतीयपटलः। (<५)
आसन करनेसे नाडी शुद्ध होतीहै परन्तु यह चार आ- सनसे वायु धारण करकै बैठनेमें कष्ट नहीं होता और प्रधान नाडी शीघ्र वश होजाती है॥१००॥१०१॥ मूलम्-योनिं संपीड्य यत्नेन पादमूलेन सा- धकः ॥ मेठ्रोपरि पादमूलं विन्यसेद्योग- वित्सदा॥ १०२॥ ऊर्ध्व निरीक्ष्य भ्रूम- ध्यं निश्चलः संयतेन्द्रियः॥ विशेषोऽवक्र कायश्च रहस्युद्वेगवर्जितः । एतत्सिद्धा- सनं ज्ञेयं सिद्धानां सिद्धिदायकम्॥१०३॥। टीका-योगवेत्ता साधक पादमूल अर्थात् एडीसे योनिस्थानको पीडित करे और दूसरे पादके एडीको मेद्र अर्थात् लिंगके मूलस्थानपर रक्खे और ऊपर भ्रूके मध्यमें निश्चल दृष्टि रक्खे जितेन्द्रियपुरुष विशेष सीधा शरीर करके विधानपूर्वक वेगवर्जित सावधान होके बैठे इसको सिद्धासन कहते हैं यह आसन सिद्धों- को सिद्धि देनेवालाहै॥ १०२॥१०३॥ मूलम्-येनाम्यासवशाच्छीघ्रं योगनिष्पत्ति माघ्टयात्॥सिद्धासनं सदा सेव्यं पवना भ्यासिना परम् ॥ १०४॥ टीका-इस अम्याससे जो पहिले कहाहै शीघ्र योग-
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(८ ६) शिवसंहिता आषाटीकासमता । का ज्ञान होताहै इस हेतुसे यह सिद्धासन पवनाम्या- सीको सदा सेवने के योग्यहै॥ १०४॥ मूलम्-येन संसारमुत्सृज्य लभते परमां गातिम् ॥१०५॥ नातः परतरं गुह्यमासनं विद्यते भुवि॥ येनानुध्यानमात्रेण योगी पापाद्विमुच्यते॥१०६॥ टीका-इस सिद्धासनके प्रभावसे साधक संसारको छोडके परमगतिको पाताहै और इससे उत्तन वा गोप्य संसारमें दूसरा आसन नहीं है जिसके ध्यानमात्रसे यो- गी सर्व पापसे मुक्त होजाताहै॥१०५॥१०६॥ मूलम-उत्तानौ चरणौ कृत्वा ऊरुसंस्थौ प्रयत्नतः॥ ऊरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी कृत्वा तु तादशौ ॥ १०७॥ नासाग्रे वि- न्यसेदृष्टिं दन्तमूलश्च जिहया॥ उत्तोल्य चिबुकं वक्ष उत्थाप्य पवनं शनैः ॥१०८॥ यथाशत्त्या समाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः॥ यथा शक्त्यैव पश्चात्तु रेचयेदविरोधतः । १०९॥ इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधि- विनाशनम्॥ दुर्लभं येन केनापि धीमता लभ्यते परम् ॥ ९१० ॥.
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तृतीयाटलः । (८७)
टोका-दोनों चरणोंको उत्तान करके यनसे ऊरू अर्थात जवापर रक्खे उततीप्रकार दोनों हाथको सीधा करके उहुके मध्यमें रकखे और नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि और दांतके सूलमें जिह्वा स्थितकरे और वक्ष अर्भ- त् हृदयस्थानपर चित्ुक अर्थात् ठोडी स्थापन करे और अपानवायुको उठाके पाणको शनैःशनैः यथाशकि पूरक करके धारणाकरे पश्चात धीरे धीरे रेचक अर्थात् वायुको त्यागदे इसको पझ्मासन कहते हैं यह सर्व व्याधिका ना- शक है यह आतन बहुत दुर्लमहै परंतु कोई बुद्धिमान् साधकको प्राप्त होताहै॥१०७०८९।११॥ मूलम्-अनुष्ठाने कृते प्राणः समश्चलति त- तक्षणात् । भवेदभ्यासने सम्यकसाध- कस्य न संशयः॥ १११॥ टीका-पनोत्त अनुष्ठान करनेसे उसी समय प्राण सम होके सुषुम्णामें प्रवेश करेगा अभ्याससे साधक- का वायु सम होजायगा इसमें संशय नहीं॥ १११॥ मूलम्-पद्मासने स्थितो योगी प्राणापान विधानतः ॥ पूरयेत्स विमुक्तः स्यात्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥११२॥ टीका-ईश्वर श्रीपार्वतीजीसे कहते हैं कि पझासन-
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(८८) शशवसंहिता भाषाटी कासमेवा। ८.
स्थित योगी प्राण अपानके विधानसे वायु पूरण करेगा सो संसारवन्धसे मुक्तहोजायगा इसमें संशय नहीं है हम सत्य कहते हैं॥ ११२॥ मूलम्-प्रसार्यं चरणद्रन्द्वं परस्परमसंयुतं। स्वपाणिभ्यां दढं घृत्वा जानूपरि िरो न्यसेत्॥ ११३॥ आसनोग्रमिदं प्रोक्तं भवेदनिलदीपनम्॥ देहावसानहरणं प- श्विमो त्तानसंज्ञकम्॥११४॥यएतदासनं श्रेष्ठं प्रत्यहं साधयेत्सुधीः॥ वायुः पश्चि ममार्गेण तस्य सश्चरति प्राम् ॥११५॥ टीका-दोनों चरणोंको संग पररपर लम्बाकरके दोनों हाथोंसे बलसे धरे और जानुपर शिरको स्थित करे उसको उग्रासन कहतेहैं, और पश्चिमतान भी संज्ञा इससे वायुदीपन होताहै और मृत्युका नाशकरता है यह सब आसनोंमें श्रेष्ठ है और बुद्धिमान् इसको नित्य साधन करे तो उसका वायु पश्चिम मार्गसे अवश्य स्चार करेगा॥ ११३॥ ११४॥११५॥ मूलम्-एतदभ्यासशीलानां सर्वसिद्धि: प्र- जायते ॥ तस्माद्योगी प्रयत्नेन साधये- त्सिद्धमात्मनः ॥११६॥
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तृतीयपटलः। (<९)
टीका-ऐसे पूर्वोक्त अभ्यासमें जो लोग तत्परहैं उन- को सर्व सिद्धि उत्पन्न होती है. इस हेतुसे यत्न करके योगी आत्माके सिद्धहोनेकी साधना करे॥११६॥ मूलम्-गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्यकस्य चित्।। येन शीघ्रं मरुत्सिद्धिर्भवेद्ठःखौ- घनाशिनी॥९९७॥ टीका-यह आसन जो पहिले कहा है यत्नसे गोप- नीयहै सबको देना उचित नहीं है परंतु अधिकारीको देना योग्यहै इससे बहुत शीघ्र वायु सिद्ध होजाताहै और यह सिद्धि दुःखके समूहको नाश करने- वाली है॥ ११७ । मूलम्-जानूर्वोरन्तरे सम्यग्धृत्वा पादतले उभे॥ समकायः सुखासीनः स्व्स्तिकं तत्प्रचक्षते॥ ११८॥अनेन विधिना यो- गी मारुतं साधयेत्सुधीः ॥ देहे न क्र्मते व्याधिस्तस्य वायुश्च सिध्यति॥११९। सुखासनमिदं प्रोक्त सर्वदुःखप्रणाशनम॥ स्वस्तिक योगिभिरगोष्यं स्वस्तीकरण- सुत्तमम् ॥ १२० ॥ टीकां-जानु और, उरूके मध्यमें बराबर पादको
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(९०) शिवसंहिता आषाटीकासमेता। ऊपर नीचे धरे और समकाय अर्थात बरावर शरीर करके सुखपूर्वक बैठे उसको स्वस्तिकासन कहतेहैं. इस विधानये बुद्धिमान् योगी वायुका साधनकरे तौ उसके शरीरमें व्याधी प्रवेश नहीं करती और उसको वायु सिद्धहोजातीहै इसको सुखासन कहतेहैं यह सर्वदुःखका नाशक है यह स्वस्तिकासन योगी लोगोंको गोप्य रख- ना उचितहै इसकारणसे की उत्तम कल्याणका का- रक है ॥१८॥११९॥१२०॥ इति श्रीशिवसंहितायां हर गौरीसंवादे योगाभ्यासतत्त्त्व- कथनं नाम तृतीय: पटल: समापः ॥३॥ अथ चदर्थपटलः। मूलमू-आदौ पूर कयोगेन स्वाधारे पूरये- न्मनः॥ गुदभेद्रान्तरे योनिस्तामाकुंच्य प्रवर्तते॥ १॥ टीका-पहिले पूरक योगविधानसे आधारपम्ममें वायुको मन सहित पूरक करके स्थित करे और गुदामे- ढ़के मध्यमें जो योनिस्थान है उसको पत्नसे आबुशचन करनेमें पवृतहोय ।। १।। मूलम्-ब्रह्मयोनिगतं ध्यात्वा कामं कन्दुक- सन्निभम्॥ सूर्यकोदिप्रतीकाशचन्द्रकोटि-
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चतुर्थपटलः। (९१) सुशीतलम्॥।२॥तस्योर्ध्वेतु शिखामूक्ष्मा चिद्रूपा परमाकला॥ तया सहितमात्मा- नमेकीभूतं विचिन्तयेत्॥ ३॥ टीका-ब्रह्मयोनिके मध्यमें कामपुष्प अर्थात् काम- बाणके समान कोटिसूर्यके सदश प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल कामदेवका ध्यान करे और उसके ऊर्ध्व भागमें सूक्ष्म ज्योति शिखा चैतन्यस्वरू- पा परमाशक्तिसहित एक परमात्माका चिन्तन करै॥ २ा ३ ॥ मूलम्-गच्छतिव्रह्ममार्गेण लिंगत्रयक्रमेण ै।। मूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसशी तलम्॥४।।अमृतं तद्दि स्वर्गस्थं परमान न्दलक्षणम्।श्वेतरक्तं तेजसाढयं सुधाधा- राप्रवर्षिणम् ॥५॥ पीत्वा कुलामृतं दि- व्यं पुनरेव विशेत्कुलम्॥ टीका-उसी ब्रह्मयोनिसे जीव सुषुम्णा रन्त्रद्वारा कमसे तीन लिङ्ग अर्थात् स्थूल सूक्ष्म कारणस्परूपसे प्रस्थान करताहै और स्वगस्थ अमृत परम आनन्द- का लक्षण श्वेत रक्तवर्ण कोदि सूर्यके सदश तेज प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल सुधाधारा-
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(९२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। वर्षी दिव्यकुलामृतको पान करके फिर योनिमंडल- में स्थित होजाताहै॥४॥५॥ मूलम्-पुनरेव कुलं गच्छेन्मात्रायोगेन ना- न्यथा। साच प्राणसमाख्याता ह्यस्मि- स्तन्त्रे मयोदिता ॥ ६ ॥ टीका-फिर ब्रह्मयोनिसे प्राणायामयोग करके प्राण कुलमंडलमें जाताहै इस तंत्रमें जो हमने कहाहै हे देवी! उस ब्रह्मयोनिको प्राणके समान कहते हैं ॥ ६॥ मूलम्-पुनःप्रलीयते तस्यां कालाग्न्यादि- शिवात्मकम् ॥ ७॥ योनिमुद्रा पराह्येषा बन्धस्तस्याः प्रकीर्तितः॥ तस्यास्तु बन्धमात्रेण तन्नास्ति यन्र साधयेत्॥८ ॥ टीका-फिर तीसरे बार काल अग्नि आदि शिवा- त्मक जीव प्रस्थानपूर्वक चंद्रमण्डलमें दिव्य अमृत- पान करके फिर ब्रह्मयोनिमें लय होजाता है हे देवी! इस बन्धको योनिमुद्रा कहते हैं केवल बन्धमात्रसे संसारमें असाध्य कोई वस्तु नहीं है अर्थात् सब सिद्ध होसकाहै॥ ७॥८ ।। मूलम्-छिन्नरूपास्त ये मन्त्राः कीलिताः स्तंभिताश्च ये॥ दग्धा मन्त्रा: शिरोहीना
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चतुर्थपटलः। (९३) मलिनास्तु तिरस्कृताः ॥९॥ मन्दा बा- लास्तथा वृद्धा: प्रौढा यौवनगर्विताः॥भे- दिनो भ्रमसंयुक्ता: सप्ताहं मूर्चिछताश्च ये॥ १०॥ अरिपक्षे स्थिता ये च निर्वी- र्याः सत्त्ववर्जिताः।। तथा सत्त्वेन हीनाश्च खण्डिताः शतधाकृताः॥११ विधानेन च संयुक्ता: प्रभवन्त्यचिरेण तु। सिद्धिमोक्षप्रदाः सर्वे गुरुणा वि- नियोजिताः॥ १२॥ यद्यदुच्चरते योगी मंत्ररूपं शुभाशुभम्।।तत्सिद्धिं समवापो- ति योनिमुद्रानिधन्धनात्॥ १३॥दीक्ष यित्वा विधानेन अभिषिच्य सहस्रधा। ततो मंत्राधिकारार्थमेषा मुद्रा प्रकी- र्तिता॥ १४ ॥
टीका-जो मन्त्र छिन्नरूप हैं और कीलित हैं स्तम्मि- त हैं और जो मन्त्र दग्ध हैं शिरहीन हैं मलीन हैं और जिनका अनादर है और मन्द हैं बाल हैं वृद्धहैं प्रौढ हैं और जो यौवनगर्वित हैं और अदितहैं भ्रमसंयुक्त हैं सताहसे मूर्च्छित हैं और जो शत्रुके पक्षमें हैं निर्वीर्य हैं
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(९४) शिवसंहिता आाषाटी का समेता । सत्वरहित हैं खण्डितहैं सौ खण्ड होगएहैं इस विधिसे युक्त होके साधन करनेसे शीघ्र प्रकर्ष करके सिद्ध होजायगा गुरुशिक्षासे सब सिद्ध और मोक्षप्रद होजाताहै योगीसे जो मन्त्र झुभ वा अशुभरूप उच्चा- रण होताहै सो सब योनिमुद्राके बन्धनमात्रसे सिद्ध होजाताहै विधानपूर्वक मंत्रके अधिकारार्थ गुरुको उचि- तहै कि इस योनिमुद्राके दीक्षाका अभिषेक सहस्रपा शिष्यको करे ॥९॥॥१॥२॥३३॥४ ॥ मूलम्-ब्रह्महत्यासहस्राणि त्रैलोक्यमपि घातयेतु॥ नासौ लिप्यति पापेन योनि- मुद्रानिबन्धनात्॥ १५ ॥ टीका-यदि एक सहत्र ब्रह्महत्याकरके और वैलो- क्यकाभी घात करदे अर्थात् प्राणिमात्रका नाश करदे तो भी वह इस योनिमुद्राके बन्धमात्रसे पापमें लिप न होगा अर्थात् उसको पाप नलगेगा ॥ १५ ॥ मूलम्-गुरुहा च सुरापी च स्तेयी च गुरुत- ल्पग:॥ एतैः पापैन बच्येत योनिमुद्रा- निबन्धनात् ॥१६॥ टीका-गुरुषातक मद्यपाई चोर सुरुकी शय्यामें रमण करनेवाला ऐसे अनेक पातकसेमी साघक यो- निमुद्राके बन्धप्रभावसे बन्यायमान नहोगा॥ १६॥
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चतुर्थपटलः । (९५) मूलम्-तस्मादभ्यसनं नित्यं कर्तव्यं मोक्ष कांक्षिमि:॥ अभ्यासाजायते सिद्धिर-
टीका-इस हेतुसे मोक्षकांक्षीको उचित है कि, नित्य अभ्यास करे अभ्याससे सिद्धि होती है और अभ्यासही- से मुक्ति प्राप्त होती है।। १७॥
वर्तते॥ मुद्राणां सिद्धिरम्यासादम्यासा- द्वायुसाधनम् ॥१८ ॥ कालवञ्चनमभ्या- सात्तथा मृत्युज्जयो भवेत् ॥ वाक्सिद्दि: कामचारित्वं भवेदभ्यासयोगतः ।।५९।। टीका-अभ्याससे ज्ञान प्रापत होताहै और अभ्याससे योगमें प्रवृत्ति होती है और अभ्याससे मुद्रा सिद्ध होती हैं और अभ्यासले वायुका साधन होताहै और अभ्याससे मनुष्य काळसे बचताहै और अभ्याससे मृत्युंजय होजाताहै और अभ्यापयोगसे वाक्यसिद्धि और मनुष्य इच्छाचारी होजाताहै. तात्पर्य यह है कि, सब वस्तुके सिद्धिका कारण अभ्यास है. इस हे तुते अ- लस्यको छोडके जिक् वस्तुमें मनुष्य अभ्यासकरेगा वह अवश्य सिद्ध होजा यगा ॥ १८॥ १९ ॥
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(९६) शिवसंहिता आाषाटीका समेता ।
मूलम्-योनिमद्रा परं गोप्या न देया यस्य कस्यचित्। सर्वथा नैव दातव्या प्राणैः कण्ठगतैरपि॥ २० ॥ टीका-यह योनिमुद्रा परमगोपनीय है अनधिका- रीको कदापि न दे यह सर्वथा देनेके योग्य नहीं है यदि कण्ठगत प्राण होजायँ तो भी देना उचित नहीं है॥२०॥ मूलम्-अधुना कथायेष्यामि योगसिद्धि- करं परम्॥ गोपनीयं सुसिद्धानां योगं परमदुर्लभम्॥ २१ ॥ टीका-हे देवी ! अब जो योग कहैंगे वह परमसतिद्धिका देनेवाला है सिद्ध लोगोंको इस परम दुर्लभ योगको गोप्य रखना उचितहै॥ २१॥ मूल न्-मुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कु- ण्डली॥। तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रन्थयोपि च ॥ २२ ॥ टीका-गुरुके प्रसादसे निद्रिता कुण्डलिनी देवी जब जागृत होती है तव सर्व पद्म और सर्व ग्रंथी वेधित हो जाती हैं अर्थात् सुषुम्णा रन्ध्रद्वारा प्राणवायु ब्रह्मरन्ध्र- पर्यत संचार करने लगजाताहै॥२२॥ मूलम्-तस्मात्सर्वप्रयत्ेन प्रबोधयितुमीश्व-
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चतुर्थपटलः। (९७ )
रीम्॥ ब्रह्मरन्ध्रमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासंस माचरेत्॥ २३ ॥ टीका-इसकारणसे यत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रके सुखमें जो ईश्वरी कुण्डलिनी देवी शयन करती हैं उनको उठानेके अर्थ मुद्राका अभ्यास उचित है॥ २३॥। मूलम्-महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खे- चरी। जालंधरो मूलबंधो विपरीतकृति- स्तथा ॥२४। उड्डानं चैव वजोली दशमे शक्तिचालनम्॥ इदं हि मुद्रादशकं मुद्रा णामुत्तमोत्तमम् ॥ २५॥ टीका-अब उत्तम मुद्राबन्ध वेध कहते हैं महामुद्रा, महावन्ध, महावेध, खेचरीमुद्रा, जालन्धरबन्ध, मूल- बन्ध, विपरीतकरणीमुद्रा, उड्डानबन्ध, व्रोलीमुद्रा और दशवीं शक्तिचालनमुद्रा, यह दशों मुद्रा सबमें अतिउत्तम हैं॥२४ ॥२५॥ अथ महामुद्राकथनम्। मूलम्-महामुद्रां प्रवक्ष्यामि तन्त्रेडस्मिन्म- मवलभे। यां प्राप्य सिद्धाः सिद्धिं च कपिलाद्याः पुरा-गताः ।२६॥ ५
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(९८) शिवसंहिता भाषाटी कासमेता। टीका-हे परिये पार्वती! इस तन्त्रमें महामुद्रा जो हम कहतेहैं इसको लाभ करके पूर्व कपिलआदिक सिद्ध- वरको सिद्धि प्राप्त भई ॥ २६ ॥ मूलम्-अपसव्येन संपीडय पादमूलेन सा- दरम्॥ गुरूपदेशतो योनिं गुदमेद्रान्तरा- लगाम् ॥२७॥।सव्यं प्रसारितं पादं धृत्वा पाणियुगेन वै॥ नवद्वाराणि संयम्य चि- बुकं हृदयोपरि॥ २८ ॥ चित्तं चित्तपथे दत्त्वा प्रभवेद्ायुसाधनम्॥ महामुद्रा भ- वेदेषा सर्वेतन्त्रेषु गोपिता।। २९।वामाङ्गे न समभ्यस्य दक्षाङ्गेनाभ्यसेत्पुनः ॥ प्रा- णायामं समं कृत्वा योगी नियतमा- नसः॥ ३०॥ टीका-वामपादके एडीसे गुदा और मेद्रके मध्यमें जो योनि है उसको आदरसहित गुरुके उपदेशपूर्वक पीडितकरे अर्थात् दवावे और दक्षिणपाद प्रसारके अ- र्थात लम्बा करके दोनों हाथोंसे धरे और नवद्रारोंको रोक करके चिबुक अर्थात ठोडीको ह्ृदयपर स्थित करे और चित्तवृत्तिको चैतन्यमें स्थिर करके वायुका साधन कर- ना उचित है यह महामुद्री सर्वतन्त्रोंके प्रमाणसे गो-
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चतुर्थेपटलः । (९९)
प्यहै पहिले वामांगसे अभ्यास करके फिर दक्षिण अं- गसे अभ्यास करे योगी स्थिरवुद्धिको उचित है कि, इस प्रकारसे प्राणायामको समकरे ॥२७।।२८।।२९।।३०।। मूलम्-अनेन विधिना योगी मन्दभाग्यो- पि सिध्यति॥ सर्वासामेव नाडीनां चालनं बिन्दुमारणम्॥३१॥जीवनन्तु कपायस्य पातकानां विनाशनम् ॥ कुण्डलीतापनं वायोर्ब्रह्मरन्ध्रप्रवेशनम्॥ ३२ ॥ सर्वरो- गोपशमनं जठराग्निविवर्धनम्॥ वपुषा कान्तिममलांजरामृत्युविनाशनम्॥३३।। वांछितार्थफलं सौख्यमिन्द्रियाणाश्च मा- रणम्।।एतदुक्तानि सर्वाणि योगारूढस्य योगिन:॥ ३४॥ भवेदम्यासतोव5यं नात्र कार्या विचारणा॥ टीका-इस विधानसे मन्दभाग्य योगीभी सिद्ध होजा- यगा और इस महासुद्ाके प्रभावसे सर्व नाडीका च- लन सिद्ध होजायगा और बिन्दु स्थिर होगा और जी- वनको आकर्षित रक्खेगा और सर्व-पातकका नाश हो- जायगा और कुण्डलिनीको हठात-उठाय वायुको ब्रह्मर- नध्रमें प्रवेश करेगा और जठरा्नि प्रज्वलित होके सर्वरो-
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(१००) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
गोंका नाश करदेगा और शरीशमें सुन्दर कान्ति होगी और वृद्धावस्थासहित मृत्युका नाश होजायगा और सुखसहित वा्छित फल लाभ होगा और इन्द्रियोंका निग्रह रहेगा यह सब जो कहा है सो योगारूढ यो- गीको अभ्याससे वश होजाताहै इसमें संशय नहीं है निश्चय है॥ ३१॥३२॥३३॥३४॥ मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजि- ते॥ यां तु प्राप्य भवाम्भोधेः पारं गच्छ- न्ति योगिन:॥ ३५ ॥ टीका-हेसुरपूजिते देवी! यह मुद्रा यत्र करके गो- पनीय है योगीलोग इसको लाभ करके संसाररूपी स- मुद्रके पार होजाते हैं ॥ ३५ ॥ मूलम्-मुद्रा कामदुघा ह्येषा साधकानां म- योदिता॥ गुप्ताचारेण कर्त्तव्या न देया यस्य कस्यचित्ं॥ ३६।। टीका-हेदेवी! यह मुद्रा जो हमने कही है साधकोंको कामधेनुरूप है अर्थात वाञ्छितफलकी दाता है इसको गुप्त करके अभ्यास करना उचित है और सबको अर्थात् अनधिकारीको देना उचित नहीं है॥ ३६॥ अथ महाबन्धकथनम्। मूलम्-ततः प्रसारितः पादो विन्यस्य तमुरू-
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चतुर्थपटलः । (१०१) परि॥३७॥ गुदयोनिं समाकुंच्य कृत्वा चापानमूर्ध्वगम्॥ योजयित्वा समानेन कृत्वा प्राणमधोमुखम् ॥३८॥ बन्धयेद- धर्वगत्यर्थ प्राणापानेन यः सुधीः॥ कथि- तोऽयं महाबन्धः सिद्धिमार्गप्रदायकः ॥ । ३९ ॥ नाडीजालाद्रसव्यूहो मूर्धानं याति योगिनः॥ उभाभ्यां साधयेत्प- द्वयामेकैकं सुप्रयत्नतः॥४० । टीका-तदनन्तर पादको प्रसारके अर्थात फैलाके दक्षिणचरणको वाम उरूपर स्थित करके और गुदा और योनिको आकुश्चन करके अपानको उर्ध्व करके समानवायुके साथ सम्बन्ध करके और प्राणवायुको अधोमुख करे यह बन्ध प्राण अपानके उर्द्धगतिके हेतु बुद्धिमान् साधकके प्रति कहाहै और यह महाबन्ध सिद्धिमार्गका दाता है और योगीलोगोंके नाडियोंका रससमूह इस बन्धसे ऊपरको गमन करताहै यह दोनों मुद्रा और बन्ध एक एकको दोनों अंगसे यत्न करके करना उचितहै॥ ३७॥३८॥३९॥४ ॥ मूलम्-भवेदभ्यासतो वायुः सुषुम्नामध्य- सङ्गतः।।अनेन वपुषः पुंष्टिर्द्ढबन्धोडस्थि-
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(१०२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पञ्जरे॥ ४१॥ संपूर्णहृदयो योगी भव- न्त्येतानि योगिनः॥ बन्धेनानेन योगी- न्द्र: साधयेत्सर्वमीप्सितम्॥।४२॥। टीका-अभ्याससे प्राणवायु सुषुम्णाके मध्यमें स्थित होगा और इस महाबंधके प्रभावसे शरीर पुष्ट रहैगा और अस्थिपंजर और शरीरका सब बन्ध दृढ अर्थात बलिष्ठ होजायगा और योगीका हृदय सन्तोषसे पूर्ण और आनन्दित रहेगा. यह सब योगीको इस महा- बन्धके प्रभावसे स्वयं लाभ होजायगा और इसो बन्धके साघनसे योगी अपनी इच्छाके अनुसार सब सिद्ध करलेगा ॥४१ ॥ ४२ ॥ अथ महावेधकथनम्। मूलम्-अपान प्राणयोरैक्यं कृत्वा त्रिभुवने- श्वरी॥महावेधस्थितो योगी कुक्षिमापूर्य वायुना॥ स्फिचौ संताडयेद्वीमान्वेधो- 5यं कीर्तितो मया॥ ४३॥ टीका-हे त्रिभुवनेश्वरी! अपान और प्राणको एक करके महावेस्थित योगी उदरको वायुसे पूर्ण करके बुद्धिमान् दोनों स्फिच् अर्थात पार्श्वको ताडन करे इसको हमने वेध कहा है।। ४३।।
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चतुर्थपटलः। (१०३) मूलम्-वेधेनानेन संविध्य वायुनायोगिपुंग- वः॥ ग्रंथिं सुषुम्णामार्गेण ब्रह्मग्रंथि भि- नत्त्यसौ ॥४४॥ टीका-बुद्धिमान् योगी इस वेधद्वारा वायुसे सर्व ग्रन्थीको वेधन करके सुषुम्णारन्त्रद्वारा ब्रह्मग्रंथीको भेदन करताहै॥ ४४ ॥ मूलम्-यःकरोति सदाभ्यासं महावेधं सुगो- पितम् ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य जरामरण नाशिनी॥ ४५ ॥ टीका-जो मनुष्य इस उत्तम महावेधको गोपित करके सर्वदा अभ्यास करेगा उसकी जरामरण नाश- नी वायुसिद्धि होजायगी॥४५। मूलम्-चक्रमध्ये स्थिता देवाः कम्पन्ति वायुताडनात्॥ कुण्डल्यपि महामाया कैलासे सा विलीयते ॥ ४६ ॥ टीका-शरीरस्थ चक्रमें जो देवता हैं वह वायुके ताडनसे कम्पायमान होते हैं और महामाया कुण्डालि- नी देवी कैलास अर्थात ब्रह्मस्थानमें लय होती है तात्प- ्य यह है कि, चक्रस्थित देवता अर्थात् गणेशजी, ब्रह्मा, विष्णु, महादेवजी, मायाधीश ज्योतिस्वरूप ईश्वर क्रमसे
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(१०४) शिवसंहिता भाषाटी का समेता। आधार, स्वाधिष्टान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञाच- कमें जो स्थित हैं वायुके वेगसे चक्ररन्त्रको छोडदेते हैं तब वायुका प्रवेश होताहै इसहेतुसे यह महावेध अवश्य करना उचित है॥ ४६॥ मूलम्-महामुद्रामहाबन्धौ निष्फलौ वेधव- जिंतौ। तस्माद्योगी प्रयत्नेन करोति त्रितयं क्रमात्॥४७॥ टीका-महामुद्रा और महाबन्ध विना वेधके निष्फ- ल हैं अर्थात् वेध न करनेसे मुद्रा और बन्धका कुछ फल नहोगा इसहेतुसे योगीको उचित है कि, यत्नपूर्वक क्रम- से मुद्रा, बन्ध, वेध तीनोंका अभ्यास करे॥ ४७ ॥ मूलम्-एतत्त्रयं प्रयत्नेन चतुर्वारं करोति यः॥ षण्मासाभ्यन्तरं मृत्युं जयत्येव न संशयः॥४८ ॥ टीका-जो यह मुद्रा बन्ध वेध तीनोंका अभ्यास यत्न करके रात्रि दिवसमें चारवार करेगा सो छःमास- में निश्चय मृत्युको जीतलेगा इसमें संशय नहीं है॥।४८।। मूलम्-एतत्रयस्य माहात्म्यं सिद्धो जाना- तिनेतरः ॥ यज्ज्ञात्वा साधकाः सर्वे सिद्धिं सम्यग्लभन्ति वै ॥ ४९ ॥
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चतुर्थपटलः । (१०५)
टीका-यह तीनोंके माहात्म्यको सिद्धलोक जानते हैं इतरलोग अर्थात् सांसारिक मनुष्य नहीं जानते इसके जानलेनेसे साधकलोगों को सर्वसिद्विलाभ होती है॥४९।। मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन साधकैः सिद्धि मीप्सुभिः ॥ अन्यथा च न सिद्धि: स्यान्मुद्राणामेष निश्चयः॥५०॥ टीका-सिद्धिकांक्षी साधकको उचित है कि, यह सब मुद्राको यत्नपूर्वक गोप्य रक्खे इनको प्रकाश करनेसे कदापि सिद्धि नहोगी यह निश्चय है॥ ५० ।। अथ खेचरीमुद्राकथनम्। मूलम्-भ्रुवोरन्तर्गतां दृष्टि विधाय सुदृढां सुधीः॥५१॥ उपविश्यासने वज्रे नानो- पद्रववर्जितः ॥ लम्बिकोर्ध्व स्थिते गर्तें रसनां विपरीतगाम्॥ ५२ ॥ संयोजये- त्प्रयत्नेन सुधाकूपे विचक्षणः ॥ मुद्रैषा खेचरी प्रोक्ता भक्तानामनुरोधतः॥५३।। टीका-बुद्धिमान् साधक दोनों भ्रू अर्थात् भुकुटी के मध्यमें दृढ करके दृष्टिको स्थिर करके और नाना उपद्रवरहित होके वज्रासन अर्थात् सिद्धासनसे स्थित होयके जिह्वाको विपरीत अर्थात् ऊपर सुधाकूप स्वरूप
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(१०६) शिवसंहिता आषाटीकासमेता । तालूविवरमें यत्नसे बुद्धिमान् साधक संयोजित करे अर्थात् संबन्धकरे हेपार्वती! भक्तोंके प्रति हमने प्रकाश करके यह खेचरीमुद्रा कही है ॥ ५१।।५२।।५३।। मूलम्-सिद्धीनां जननी ह्वेषा मम प्राणा- धिकप्रिया॥ निरन्तर कृताभ्यासात्पी- यूषं प्रत्यहं पिवेत्॥ तेन विग्रहसिद्धि: स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी ॥५४॥ टीका-यह खेचरीमुद्रा सवीसिद्धिकी माता है और हेदेवी! हमको प्राणसेभी अधिक प्रिय है जो निरंतर इ- सके अभ्याससे नित्य अमृतपान करताहै उस कारणसे शरीर सिद्ध होजाताहै अर्थात नाश नहीं होता और मृत्युरूप हस्तीको यह खेचरीरूपी सिंह हन्ताहै॥ ५४॥ मूलम्-अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा॥ खेचरी यस्य शुद्धातु स शुद्धो नात्र संशयः॥५५॥। टीका-अपवित्र होय वा पवित्र होय अथवा किसी अवस्थामें होय जिसको यह खेचरीमुद्रा सिद्ध है वह सर्वदा शुद्ध है इसमें संझञय नहीं है॥ ५५॥ मूलम्-क्षणार्ध कुरुते यस्तु तीत्वीं पापम- हार्णवम् । दिव्यभोगात्प्रभुक्कता च सत्कुले स प्रजायते॥ ५६॥
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चतुर्थेपटलः । (१०७) टीका-जो इस खेचरीमुद्राको क्षणार्धभी करेगा वह महापापसागरके पार होके सुखपूर्वक स्वर्गका भोग भोगेगा पश्चात् उत्तमकुलमें उसका जन्म होगा ॥५६॥ मूलम-सुद्रैपा खेचरी यस्तु स्वस्थचित्तो ह्यतन्द्रितः ॥ शतब्रह्मगतेनापि क्षणार्ध मन्यते हिसः ॥५७॥ टीका-जो मनुष्य इस खेचरीमुद्राको स्वस्थचित्त ब्रह्मपरायणहोके करेगा उसको यदि शतव्रह्माभी गत भावको प्राप्तहों क्षणार्ध प्रतीत होगा ॥५७॥ मूलम्-गुरूपदेशतो भुद्रां यो वेत्ति खेचरी- मिमाम्। नानापापरतो धीमान्सयाति परमां गतिम् ॥५८।। टीका-गुरुपदेशसे जिसको यह खेचरीमुद्रा लाभ होगी वह यदि नानापापरत होगा तो भी बुद्धिमान् साधक परमगतिको प्रातहोगा अर्थात् मोक्ष होजा- यगा॥५८ ॥ मूलम्-सा प्राणसदृशी मुद्रा यस्मिन्क- स्मिन्न दीयते।। प्रच्छाद्यते प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजिते॥ ५९.॥ टीका-हे सुरपूजिते पार्वती : यह खेचरीमुद्रा प्राणके
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(१०८) शिवसंहिता आषाटीकासमेता। बरावर है सामान्य मनुष्यको देना उचित नहीं है इस मुद्राको यत्न करके गोपित रखनेमें कल्याण है ॥५९॥ अथ जालन्धरबन्ध। मूलम्-बद्धागलशिराजालं हृदये चिबुकं न्यसेत्।। बन्धो जालन्धरः प्रोक्तो देवाना मपि दुर्लभ:॥६०॥ नाभिस्थवह्निर्जन्तूनां सहस्रकमलच्युतम्॥पिवेत्पीयूषविस्तारं तदर्थ बन्धयेदिमम्॥६१ ॥ टीका-गुरूपदेशद्वारा गलशिराजालको वांधके चिबुक अर्थात् ठोडीको हृदयमें स्थित करे इसको जा- लन्धरबन्ध कहते हैं यह देवतोंकोभी दुर्लभ है नाभी- स्थित जीव जठरानल सहस्रदल कमलसे जो अमृत स्त्रवताहै उसको पान करजाताहै इस हेतुसे यह जाल- न्धरवन्ध करना उचित है तात्पर्य यह है कि, नाभिस्थित सूर्य अमृतको पान करजाते हैं इसीकारणसे मृत्यु हो- तीहै इस जालन्धरबन्धके करनेसे चंद्रमण्डलच्युत अमृत सूर्यमण्डलमें नहीं जाता योगी आपही पान करके चिरं- जीव रहताहै ॥ ६० ॥ ६१ ।। मूलम्-बन्धेनानेन पीयूषं स्वयं पिवति बु- द्विमान्॥ अमरत्वञ्च सम्प्राप्य मोदते भुवनत्रये॥६२ ।।
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चतुर्थपटलः। (१०९)
टीका-इस जालन्धरबन्धके प्रभावसे बुद्धिमान् योगी स्वयं अमृत पान करताहै और अमरत्वको पाय- के तीनोंलोकमें आनन्दपूर्वक विचरता है॥ ६२ ॥ मूलम्-जालन्धरो बन्ध एष सिद्धानां सि- द्विदायक॥। अभ्यासः क्रियते नित्यं यो- गिना सिद्धिमिच्छता ॥ ६३।। टीका-यह जालन्धरबन्ध सिद्धोंको सिद्धिदेनेवाला है इस कारणसे सिद्धिकांक्षी योगीको इसका नित्य अ- भ्यास करना उचित है ॥ ॥६३ ॥ अथ मूलबन्धः। मूलम्-पादमूलेन संपीडय गुदमार्गेषु य- न्त्रितम्॥६४॥बलादपानमाकृष्य क्रमा दूर्ध्व सुचारयेत्॥ कल्पितोऽयं मूलबन्धो जरामरणनाशनः ॥ ६५॥ टीका-पादमूल अर्थात् एडीसे गुदामार्गको आकु- श्चन करके पीडितकरे और बलसे अपानवायुको आक- र्षण करके ऊर्ध्वको लेजाय अर्थात प्राणके साथ सम्बन्धकरे इसको मूलबन्ध कहतेहैं यहबन्ध जरा मरणका नाश करनेवाला ह॥ ६४ ॥ ६५ः॥ मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं प्रकरोत्यधि-
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(११०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। कल्पितम्॥ बन्धेनानेन सुतरां योनिमुद्रा प्रसिद्धयति॥६६ ॥ टीका-इस कल्पितवन्धसे अपान और ग्राणको एक करे और इसी मूलवन्धके प्रभावसे योनिमुद्रा आपही सिद्ध होजायगी ॥ ६६॥ मूलम-सिद्धायां योनिमुद्रायां किं न सिध्य- ति भूतले॥ बन्धस्यास्य प्रसादेन गगने विजितानिल:॥ पद्मासने स्थितो योगी भुवमुत्सृज्य वर्तते ॥६७॥ टीका-योनिमुद्राके सिद्ध होनेसे सिद्धलोगोंको इस संसारमें सब सिद्ध होसकाहै इस मूलबन्धके प्रसा- दसे वायुको योगी जीतके पझ्मासनस्थित होके भूमिक त्याग देगा और आकाशमें गमन करेगा ॥ ६७ ॥ मूलम्-सुगुप्ते निर्जने देशे बन्धमेनं सम- भ्यसेत्॥ संसारसागरं तर्तु यदीच्छेद्यो- गिपुंगवः ॥ ६८।। टीका-पवित्र योगी यदि संसारसागरसे पार होने- की इच्छा करे तो निर्जनदेश और गुप्तस्थानमें इस मूलबन्धका अभ्यास करना उचित है॥। ६८ ।। अथ विपरीतकरणी मुद्रा। मूलम्-भूतले स्वशिरोदत्त्वा खे नयेच्चरणंद्व
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चतुर्थपटलः। (१११)
यम्॥ विपरीतकृतिश्चैषा सर्वतन्त्रेषु गो- पिता ॥ ६९॥ टीका-साधक अपने शिरको भूमिपर धरे और दोनों चरणोंको ऊपर आकाश़में निरालम्ब स्थिर करे यह विपरीतकरणी मुद्रा सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है अर्थात् प्रकाश करने योग्य नहीं है ॥ ६९ ।। मूलम्-एतद्यः कुरुते नित्यमभ्यासं याम- मात्रतः ॥ मृत्युं जयति योगीशः प्रलये नापि सीदति॥ ७० ॥ टीका-इसप्रकारसे इस मुद्राका अभ्यास नित्य एक प्रहर करे तो योगी निश्चय मृत्युको जीतलेगा और प्रलयमेंभी उसको कुछ कष्ट न होगा॥७०॥ मूलम्-कुरुतेऽमृतपानं यः सिद्धानां सम- तामियात्॥ स सेव्य: सर्वलोकानां बन्ध- मेनं करोति यः॥ ७१ ॥ टीका-जो पुरुष शरीरस्थअमृतपान करता है उस- को सिद्धोंकी समता प्राप्त होती है और इस मुद्राबन्ध- को जो करताहै वह सर्वलोकमें पूज़नीय है॥ ७१॥ मूलम्-नाभेरुर्ध्वमधश्चापि तानं पश्चिम- माचरेत्॥ उड्डयानबंध एष स्यात्सर्वदु :-
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(११२) शिवसंहिता आषाटीकासमेता। खौघनाशनः॥ ७२। उदरे पश्चिमं तानं नाभेरुर्ध्व तु कारयेत्॥ उड्डयानाख्यो- Sत्र बन्धोयं मृत्युमातङ्गकेसरी॥ ७३॥ टीका-नाभिसे ऊपर और नीचेको आकुञ्चन करे इसको उड्डयानबन्ध कहते हैं यह दुःखके समूहको नाशकरनेवाला है उदरको पीछे आकर्षण करे और नाभिसे ऊपर भागमें आकुश्चन करे यह उड्डचानबन्ध है और मृत्युरूपी मातङ्गका नाशकरनेवाला यह बंध- रूपी सिंह है॥ ७२॥ ७३॥ मूलम्-नित्यं य: कुरुते योगी चतुर्वारं दिने दिने। तस्य नाभेस्तु शुद्धि:स्याद्येन सिद्धो भवेन्मरुत्॥ ७४॥ टीका-जो योगी नित्य इस बंधको चारवार अ- भ्यास करेगा उसका नाभिचक्र शुद्ध होके वायु सिद्ध होजायगा॥ ७8॥ मूलम्-षण्मासमभ्यसन्योगी मृत्युं जयति निश्चितम्॥ तस्योदराग्रिर्ज्वलति रसवृ- द्विः प्रजायते ॥ ७५ ॥ टीका-योगी यदि छः मास इस बंधका अभ्यास करे तो निश्चय मृत्युको जीतलेगा और उसका जठरा-
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(११४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-स्वेच्छया वर्तमानोपि योगोक्तनिय- मैर्विना। मुक्तो भवति गार्हस्थो वज्रोल्य- भ्यासयोगतः। ७९।। टीका-गृहस्थ अपनी इच्छापूर्वक गृहमें भोग करे- गा और योगमें जो नियम कहा है उसके विना इस व- ज्रोलीमुद्राके योग अभ्याससे मुक्त होजायगा॥ ७९॥ मूलम्-वज्रोल्यभ्यासयोगोऽयं भोगयुक्ते- पि मुक्तिदः ॥ तस्मादतिप्रयत्नेन कर्त- व्यो योगिभि: सदा॥ ८० ॥। टीका-यह वज्रोलीका योगअभ्यास भोगयुक्त म- नुष्योंके प्रति मुक्तिका दाता है इसकारणसे अतियत्र करके सर्वदा योगीको अभ्यास करना उचित है॥ ८०॥ मूलम्-आदौ रजःस्ति्रियो योन्या यत्नेन वि- धिवत्सुधीः ॥ आकुंच्य लिंगनालेन स्व- शरीरे प्रवेशयेत्॥ ८१॥ स्वकं बिंदुश्च स- सबन्ध्य लिंगचालनमाचरेत्॥ दैवाच्चल- ति चेदूर्ध्व निवद्धो योनिमुद्रया॥८२॥ वाममार्गेऽपि तद्िन्दुं नीत्वा लिङ्गं निवार- येत्।। क्षणमात्रं योनितो यः पुमांश्चालन-
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चतुर्थपटलः। (११५) माचरेत्॥ ८३॥गुरूपदेशतो योगी हुंहु- ङ्ारेण योनितः॥ अपानवायुमाकुंच्य बलादाकृष्य तद्रजः। ८४॥। टीका-प्रथम बुद्धिमान् साधक यत करके विधान पूर्वक स्त्नीके योनिसे रजको लिद्गनालमें आकर्षणक- रके अपने शरीरमें प्रवेश करे और अपने बिन्दुको नि- रोध करके लिद्ध चालनकरे यदि दैवात बिन्दु अपने स्थानसे चले तो योनिमुद्रासे निरोध करके ऊपरको आकर्षण करे और उस बिन्दुको वामभागमें स्थित क- रके क्षणमात्र लिङ्गचालन निवारण करे फिर गुरुपदे- शद्धारा योगी हुंहुंकार शब्द उच्चरणपूर्वक योनिमें लिद्ग चालन करे और बलसे अपानवायुको आकुश्चन करके खीके रजको आकर्षण करे इसको वत्रोली मुद्रा कहते हैं ॥। ८१॥८२३।।८४ ।।I मूलम्-अनेन विधिना योगी क्षिप्रं योगस्य सिद्धये। गव्यभुक्करुते योगी गरुपा- दाब्जपूर्वकः ।। ८५ ।। टीका-इस विधानसे योगीको शीघ्र योग सिद्ध हो- गा और गुरुपादपअ्पूजक योगी शरीरस्थ अमृतपान करेगा ॥ ८५ ॥
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(११६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-बिन्दुर्विधुमयो ज्ञेयो रजः सूर्यमय स्तथा॥ उभयोर्मेलनं कार्य स्वशरीरे प्र- वेशयेत्॥ ८६॥ टीका-बिन्दुरूपी चन्द्र और रजरूपी सूर्य यह जानकर दोनोंका सम्बन्ध करके अपने शरीरमें प्रवेश करना उचित है।। ८६॥ मूलम्-अहं बिन्दू रजः शक्तिरुमयोर्मेंलनं यदा॥ योगिनां साधनावस्था भवेदिव्यं वपुस्तदा॥ ८७ ॥ टीका-यदि शिवरुपी बिन्दु और रजरूपी शाक्ति यह दोनोंका सम्बन्ध होगा तब योगीका साधनसे दिव्य शरीर अर्थात् देवतोंके समान शरीर होगा तात्पर्य यह है कि शिवशाक्ति अर्थात् माया ईश्वरके सम्बन्ध वा मायाको ईश्वरमें लय करनेसे जिसको अध्यारोप अप- वाद कहते हैं योगी मोक्ष होता है अभिप्राय यह है कि, रजबिन्दुका सम्बन्ध जिस साधकको सिद्ध होजाताहै वह मुक्त है।। ८७॥ मूलम्-मरणं बिन्दुपातेन जीवनं विन्दुधा- रणे। तस्मादतिप्रयत्नेन कुरुते बिन्दुधा- रणम् ॥ ८८ ॥
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चतुर्थपटलः। (१९७) टीका-बिन्दुपात होनेसे मृत्यु होती है और बिन्दु- के धारणसे प्राणी जीवताहै इस कारणसे यत्नसे बिन्दु- को धारण रखना उचित है॥। ८८॥ मूलम्-जायते म्रियते लोके बिन्दुना नात्र संशयः॥ एतज्ज्ञात्वा सदा योगी बिन्दु- धारणमाचरेत्॥।८९॥ टीका-प्राणीका जन्म मरण बिन्दुसे होताहै इसमें संशय नहीं है. इस हेतुसे इसको विचारके योगीको उ- चित है कि, बिन्दुको सर्वदा धारण रक्खे ।।८९।। मूलम्-सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिध्य- ति भूतले॥। यस्य प्रसादान्महिमा ममा- प्येवादशो भवेत् ॥९०॥ टीका-हे पार्वती ! यत्नपूर्वक बिन्दुके सिद्ध होनेसे संसारमें क्या नहीं सिद्ध होसक्ता अर्थात् सब सिद्ध हो सक्ताहै इसीके प्रसादसे हमारी ऐसी महिमा है ॥९०॥ मूलम्-बिन्दुः करोति सर्वेषां सुखं दुःखश्च संस्थितः॥ संसारिणां विमूढानां जरामर- णशालिनाम् ॥ ९१॥ अयंच शांकरो योगो योगिनामुत्तमोत्तम: ।।९२ ।। टीका-बिन्दु संसारी मनुष्योंके सुख और दुःखका
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(११८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। कारण है और मूढलोगों के मूढताका और जरामरण शील लोगोंका अर्थात् सबका यही विन्दु हेतु है योगी लोगोंके प्रति यह हमारा उत्तम योग है ॥९१॥ ९२।।
क्तोऽपि मानवः॥ सकलः साधितार्थोपि सिद्धो भवति भूतले ॥ ९३ ॥ टीका-भोगयुक्त मनुष्योंकोभी अभ्याससे सिद्धि प्राप्त होतीहै और सकल वा्छितफल संसारमें सिद्ध होजाते हैं ॥ ९३ ॥ मूलम्-भुक्का भोगानशेषान् वै योगेनानेन निश्चितम्॥ अनेन सकला सिद्धिरयोगिनां भवति ध्रुवम्॥ सुखभोगेन महता तस्मा- देनं समभ्यसेत् ।। ९४। टीका-इस योगअभ्यासद्वारा निश्चय अशेषभोग भोगनेसे सुखी होगा और योगीलोगोंको इस वज्रो- लीमुद्रासे सकल सिद्धी अवशय प्राप्तहोती हैं और महानसुख भोगते हुए यह साधना सिद्ध होगी इसलि ये इसका अभ्यास करना उचित है॥ ९४॥ मूलम्-सहजोल्यमरोली च वज्रोल्या भेद- तो भवेत्। येन केन प्रकारेण बिन्दुं योगी प्रधारयेत् ॥९५॥।
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चतुर्थपटलः। (१३९)
टीका-बञ्रोलीके भेदसे सहजोली और अमरोली मुद्राकी संज्ञा है योगीको उचित है कि सवत्रकारसे बिन्दुको धारण करे ॥ ९५ ॥ मूलम्-दैवाच्चलति चेद्रेगे मेलनं चन्द्रसूर्य- योः॥ अमरोलिरियं प्रोक्ता लिंगनालेन शोषयेत् ॥ ९६॥ टीका-यदि हठात् वेगवश बिन्दु चले और रजविन्दु- का सम्बन्ध होजाय तो इसको अमरोली कहते हैं परंतु लिङ्ग नालद्वारा रजबिन्दु दोनोंको शोषण करे॥ ९६॥ मूलम्-गतं बिन्दुं स्वकं योगी बन्धयेद्योनिमु- द्रया। सहजोलिरियं प्रोक्ता सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥ ९७॥ टीका-निजबिन्दु चलायमान होय तो योगी योनि- मुद्राके बन्धसे अवरोध करे इसको सहजोली कहते हैं यह सर्वतन्त्रों करके शोपनीय है॥ ९७॥ मूलम्-संज्ञाभेदाद्धवेद्ेद: कार्य तुल्यग तिर्यदि। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन साध्यते योगिभि: सदा॥९८।।. टीका-यदि कार्य एक समान है परन्तु संज्ञासे अमसेली और सहजोली दो भेंद भपा है इस हेतुते
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(१२०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । योगीको उचित है कि, यह दोनों अमरोली और सहजो लीका यत्रपूर्वक सर्वदा साधन करे। ९८ ॥ मूलम्-अयं योगो मया प्रोक्तो भक्तानां स्नेहतः प्रिये॥ गोपनीयः प्रयत्नेन न देयो यस्य कस्यचित्।।९९।। टीका-हेप्रिये पार्वती! हम भक्तोंपर प्रेम करके यह योग जो कहा है यत्नपूर्वक गोपनीय है सामान्य मनुष्य- को कदापि देना उचित नहीं है।। ९९।। मूलम्-एतज्ह्यतमं ग्रह्यं न भूतं न भविष्य ति॥ तस्मादेतत्प्रयत्नेन गोपनीयं सदा बुधैः॥१०० ॥ टीका-इस वज्रोलीमुद्रासे अधिक गोपनीय न कुछ भया है न होगा. इसकारणसे बुद्धिमान साधकको यत्नपूर्वक इसको गोप्य रखना उचित है॥ १००॥ मूलम्-स्वमूत्रोत्सर्गकाले यो बलादाकृ- ष्य वायुना॥ स्तोकं स्तोकं त्यजेन्मूत्रमू- र्दमाकृष्य तत्पुनः॥१०१॥गुरूपदिष्टमा र्गेण प्रत्यहं यः समाचरेत॥ बिन्दुसिद्धि- र्भवेत्तस्य महासिद्धिप्रदायिंका।। १०२।।
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चतुर्थपटलः। (१२१ )
टीका-गुरुके उपदेशपूर्वक सवंदा मूत्रत्यागनेके समय बलकरके वायुसे आकर्षणपूर्वक थोडा थोडा मूत्र त्यागकरे फिर ऊपरको आकर्षण करे तो उसका बिन्दु सिद्ध होजायगा यह बिन्दुकी सिद्धी महासिद्धीकी दाता है अर्थात् परमपदको प्राप्त करती है॥१०॥१०२ मूलम्-षण्मासमभ्यसेद्यो वै प्रत्यहं गुरु शिक्षया ॥ शतांगनेपि भोगेषि तस्य बि- न्दुर्न नश्यति ॥ १०३॥ टीका-गुरू के शिक्षापूर्वक योगी यदि छःमास नि- त्य इसका अभ्यासकरे तो शत स्त्रीसे भोगकरेगा तो भी उसका विन्दुषात नहोगा ॥ १०३॥ भूलम्-सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिद्धय- ति पार्वति॥ ईशत्वं यत्प्रसादेन ममापि दुर्लभं भवेत्॥ १०४॥ टीका-हेपार्वती! जब महायत्नसे बिन्दु सिद्ध होजा- यगा तब क्या नहीं सिद्धहोगा अर्थात् सब सिद्ध हो- जायगा इसके प्रसादसे यह दुर्लभ ईशत्व हमको प्राप्त भयाहै॥। १०४॥ अथ शक्तिचालनमुद्रा। मूलम्-आधारकमले सुपां चालयेत्कुण्ड-
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(१२२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। लीं दढाम्।। अपानवायुमारुह्य बलादाकृ- ष्य बुद्धिमान॥ १०५॥ शक्तिचालनमु- द्रेयं सर्वशक्तिप्रदायिनी॥१०६॥ टीका-आधारकमलमें घोर निद्धित कुण्डलिनीको बुद्धिमान् अपानवायुपर आरूढहोके आकर्षणपूर्वक हठात चलावे अर्थात् प्रमावे यह शक्तिचालनमुद्रा सर्वशक्तिकी दाता है॥५॥६॥ मूलम्-शक्तिचालनमेवं हि प्रत्यहं यः स- माचरेत्॥ आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य रोगाणां च विनाशनम्॥१०७॥ टीका-यह शक्तिचालनमुद्रा जो प्रतिदिन करे तो उसके आयुकी वृद्धी होगी और सर्वरोगोंका इस सुद्धाके प्रभावसे नाझ होजायगा॥१०७॥ मूलम्-विहाय निद्रां भुजगी स्वयमूध्वे भवेत्खल॥ तस्मादभ्यासनं कार्य योगि- ना सिद्धिमिच्छता॥ १०८॥ टीका-इस शक्तिचालनके साधनसे कुण्डलिनी नि द्राको त्यागके आपही उर्ध्वगामी होजायगी यह नि- श्रय है. इस हेतुसे सिद्धिकी इच्छा करनेवाले योगीको उचित है कि, इसका अभ्यास करे॥ १०८॥
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चतुर्थपटलः । (१२३)
मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं शक्तिचाल- नमुत्तमम्॥ येन विग्रहसिद्धि: स्यादणि- मादिगुणप्रदा॥ गुरूपदेशविधिना तस्य मृत्युभयं कुतः॥ १०९॥ टीका-यदि इस उत्तमशक्तिचालनमुद्राका सदा अभ्यासकरे तो उसका शरीर सिद्ध अर्थात् अमर हो- जायगा और यह मुद्रा अणिमादिक सिद्धिकी दाता है. गुरुके उपदेशपूर्वक विधानसे जो इसका अभ्यास करे तो उसको मृत्युका भय नहीं है।। १०९॥ भूलम्-मुहूर्तद्यपर्यन्तं विधिना शक्ति- चालनम्॥११०॥यः करोति प्रयत्नेन त- स्य सिद्धिरदूरतः॥ युक्तासनेन कर्तव्यं योगिभि: शक्तिचालनम्॥ १११॥ टीका-जो विधानपूर्वक यत्नसे यदि दोमुहूतैपर्यत शक्तिचालन करे तो उसको सर्वसिद्धिकी प्राप्ति होगी. योगीको उचित है कि, गुहुके उपदेशानुसार योगासनसे युक्त होके शक्तिचालनका अभ्यास करे॥११॥॥ मूलम्-एतत्सुमुद्रादशकं न भूतं न भविष्य- ति।! एकैकाभ्यासने सिद्धि: सिद्धो भव- ति नान्यथा/।१२।
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(१२४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हे पार्वती! यह दशमुद्रा जो हमने कहा है इसके समान न कुछ भया है न होगा इसके एक एकके अ- भ्यास सिद्ध होनेसे साधक सिद्ध होजायगा॥११२॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे मुद्राकथनं नाम चतुर्थपटल: समापः॥४॥ अथ पश्चम: पटलः। मूलम्-श्रीदेव्युवाच। ब्रहि मे वाक्यमी- शान परमार्थधियं प्रति। ये विघ्ाः सन्ति लोकानां वद मे प्रिय शङ्कर॥ १ ॥ टीका-श्रीपार्वतीजी कहती है कि, हेईश्वर! हे प्रिय शङ्कर ! योगाभ्यासी लोगोंके प्रति जो विन्न संसारमें हैं सो भक्तोंपर कृपा करके हमको कहो।। १ ॥ मूलम्-ईश्वर उवाच॥ शृणु देवि प्रवक्ष्या मि यथा विन्नाः स्थिता: सदा॥मुक्ति प्र- ति नराणाञ्च भोग: परमबन्धनः ॥ २॥ टीका-श्रीईश्वर कंहते हैं कि, हे देवी! योगसाधनमें जो विन्न हैं सो हम कहते हैं सुनो मनुष्योंके मुक्तिके प्रति भोग परमबन्धन है॥ २ ॥ अथ भोगरूपयोगवित्रविद्याकथनम्॥ मूलम्-नारी शय्यांसनं वस्त्रं धनमस्यं विड-
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पंचमपटलः । (१२५)
म्बनम्॥ ताम्बूलभक्षयानानि राज्यैश्वर्य- विभूतयः ॥३॥हैमं रौप्यं तथा ताम्रं रत्न- श्वागरुधेनवः।।पाण्डित्यं वेदशास्त्राणि नृ- त्यं गीतं विभूषणम्॥४॥ वंशी वीणा मृद- दाश्च गजेंद्रश्चाश्वाहनम्॥ दारापत्यानि विषया विन्ना एते प्रकीर्तिताः। भोगरूपा इमे विध्ना धर्मरूपानिमान्छणु॥५॥ टीका-नारीसेसर्ग शय्या उत्तमआसन वस्त्र धन यह सब मोक्षके प्रति विडम्बना हैं ताम्बूलसेवन रथ शिविका आदि सवारी राजऐश्वर्य भोग स्वर्ण रजत ताम्र अनेकप्रकारके रत्न गोधन आदिका संग्रह पा- ण्डित्य करना वेदशास्त्रमें तर्क करना नृत्य गीत भूषण वंशी वीणा मृदङ्गादिक वाद्य बजाना गज अश्व आदि वाहन स्त्री पुत्र केवल गुरुकी सेवा छोडके हे पार्वती यह जो कहा है सो भोगरूप विन्न है अब धर्मरूप विन्न कहतेहैं श्रवण करो ॥ ३ ॥४॥५॥
मूलम्-स्नानं पूजाविधिरहोमं तथा मोक्ष- मयी स्थितिः। व्रतोपवासनियममौ-
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पँचमपटल:। (१२७) सुनो-अन्तःशुद्धिके अर्थ गोमुखके सदश वस्त्र भक्षण करके तब धौति प्रक्षालन करना अर्थात् धौतियोग करना नाडीचालनका ज्ञान वायुका प्रत्याहार निरोध करना कुण्डलिनीके बोधार्थ उदरको भ्रमावना इन्द्रिय- द्वारा शीघ्र प्रवेश नाडीकर्म अर्थात् नाडीशुद्धिके हेतु आहारीय विचार यह सब ज्ञानरूप विन्न हैं हैदेवी क ल्याणी ! नाडीशुद्धिके अर्थ जो भोजनविधि है सो हम कहतेहैं सुनो॥९॥१०॥१9॥ मूलम्-नवधातुरसं छिन्धि शुण्ठिकास्ता- डयेत्पुनः॥ एककालं समाधि: स्यालिं- गभूतमिदं शृण ॥१२॥ टीका-नवीन रससहित भोजन वस्तु और शुण्ठी चूर्ण भोजनकरे इससे शीघ्र समाधि होजायगी हे देवी! अब उसका चिह्न कहतेहैं सुनो ॥ १२॥ मूलम्-सङ्गमं गच्छ साघूनां सङ्गोचं भज दुर्जनात । प्रवेशनिर्गमे वायोर्गरुलक्षं विलोकयेत् ॥१३ ॥ टीका-साधुके सङ्गकी अभिलाषा और दुर्जनसे अ- लग रहनेका विचार रखना और वायुके प्रवेश निर्गममें और वायुके निरोध समय मात्रासे गुरुलघुके विचा- रार्थ संख्या करना ॥ १३॥
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(१२८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
मूलम्-पिण्डस्थं रूपसंस्थञ्च रूपस्थं रूप- वर्जितम्॥ ब्रह्मैतस्मिन्मतावस्था हृदयश्च प्रशाम्यति॥ इत्येते कथिता विध्ा ज्ञान- रूपे व्यवस्थिताः॥१४॥। टीका-शरीरस्थरूपका विचार रखना और रूप कु- रूपका निर्णय करना और यह जगत् ब्रह्म है ऐसे वि- चारसे हृदयमें स्थिरता रखना. हेपार्वती ! यह जो कहा है सो सव ज्ञानरूप विन्न हैं॥ १४ ॥ अथ चतुर्विधयोगकथनम्।
कः ॥ चतुर्थों राजयोगः स्यात्स द्विधा भाववर्जितः ॥१५।। टीका-योग चार प्रकारका है-मन्त्रयोग, हठयोग, और तीसरा लययोग और चौथा राजयोग है. यह राज- योग द्वैतभादसे रहित है अर्थात् राजयोग सिद्धहो जानेसे जीव ईश्वरमें लयहोजाता है और कुछ बोध नहीं होता ॥ १३ ॥ मूलम्-चतुर्धा साधको ज्ञेयो मृदुमध्याधि- मात्रकाः ॥ अधिमात्रतमः श्रेष्ठो भवा- ब्धौ लंघनक्षमः॥१६॥
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पंचमपटलः । ( १२९ )
टीका-यह योगचतुष्टथके साधकभी चार प्रकारके होते हैं अर्थात् मृदु मध्यम अधिमात्र और अधिमात्र- तम यह अधिमात्रतम साधक सबमें श्रेष्ठ है एही सा- धक संसाररूपी समुद्रके पार होनेमें समर्थ होताहै।१६॥ अथ मृदुसाधकलक्षणम्। मूलम्-मन्दोत्साही सुसंमूटो व्याधिस्थो गु रुदूषकः॥ लोभी पापमतिश्चैव बह्ाशी वनिताश्रयः॥१७॥चपलः कातरो रोगी पराधीनोऽतिनिष्ठुरः॥ मन्दाचारो मन्द- वीर्यो ज्ञातव्यो मृदुमानवः ॥ १८॥ द्वाद- शाब्दे भवेत्सिद्धिरेतस्य यत्नतः परम्।। मन्त्रयोगाधिकारी स ज्ञातव्यो गुरुणा ध्रुवम्॥ १९॥ टीका-अब मृदुसाधकलक्षण कहते हैं मन्द उत्सा- ही मूढचित्त व्याधिग्रसित गुरुनिन्दक लोभी जिसकी सवेदा पापबुद्धि रहै बहुत भोजन करनेवाला स्त्रीके वशमें हो चश्चल हो कातर हो रोगी हो पराधीन हो कठोर बोलनेवाला हो जिसके मन्द कर्म हों मंदवीर्यवाला हो ऐसे पुरुषको मृदु मानव कहते हैं यह मन्त्रयोगका अधिकोरी है यत्रकरनेसे और-गुरुकी कृपासे इसकोभी
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(१३०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
बारह वषमें सिद्धि प्राप्त होगी ॥१७॥८॥॥ मूलम्-समबुद्धि: क्षमायुक्त: पुण्यकांक्षी प्रियँव्वदः।। मध्यस्थः सर्वकार्येषु सामा- न्यः स्यान्न संशयः॥२०॥एतज्ज्ञात्वैव गुरुभिर्दीयते मुक्तितो लयः॥२१॥ टीका-अव मध्यसाघकलक्षण कहतेहैं-सामान्य बुद्धि हो क्षमावानहो पुण्यकर्म करनेमें इच्छा रखताहो प्रिय बोलताहो सर्वकार्यमें मध्यस्थ रहताहो अर्थात् न हर्ष न विषाद इसको मध्यसाघक कहतेहैं यह निश्च य है गुरु इसको विचारके मुक्तिमार्ग जो लययोग है उसका उपदेश करे॥ २० ॥२१ ॥ अथ अधिमात्रसाधकलक्षणम्। मूलम्-स्थिरबुद्धिलये युक्त: स्वाधीनो वी- र्यवानपि॥ महाशयो दयायुक्त: क्षमावा- न् सत्यवानपि ॥२२। शूरो वयःस्थः श्र- द्वावान् गुरुपादाव्जपूजक: ॥ योगाभ्या- सरतश्चैव ज्ञातव्यश्चाधिमात्रकः ॥२३॥ एतस्य सिद्धिः षड्वर्षेभवेदभ्यासयोग- तः ॥ एतस्मै दीयते धीरो हठयोगश्च साङगतः ॥ २४॥ टीका-अब अधिमात्र साधक लक्षण कहतेहैं स्थिर
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पंचमपटलः । (१३१ ) वुद्धि हो लययोगमें समर्थ हो स्वतन्त्र ह। अयीत किसाके आधीन न हो वीर्यवान हो महाशय हो दयावान हो क्षमा- वान हो सत्यवादी हो झूर हो समाधियोगमें श्रद्धा हो गुरुपादपझ्मपूजक हो योगाभ्यासरत हो ऐसे गुणवाले पुरुषको अधिमात्र कहतेहैं योगाभ्याससे ऐसे पुरुष- को छःवरषमें सिद्धि प्राप्त होगी. गुरुको उचित है कि, ऐसे धीर पुरुषको अङ्गसहित हठयोगका उपदेश करे ॥ २२ ॥ २३॥२४॥ अथ अधिमात्रतमसाघकलक्षणम्। भूलम्-महावीर्यान्वितोत्साही मनोजः शौ- र्यवानपि। शास्त्रज्ञोऽभ्यासशीलश्च निर्मो- हश्च निराकुलः ॥२५॥नवयौवनसम्पन्नो मिताहारी जितेंद्रियः ॥ निर्भयश्च शुचि- र्दक्षो दाता सर्वजनाश्रयः॥२६॥ अधि- कारी स्थिरो धीमान् यथेच्छावस्थितः क्षमी॥ सुशीलो धर्मचारी च ग्प्तचेष्टः प्रि- यँव्वदः॥२७॥ शास्त्रविश्वाससम्पन्नो देवतागुरुपूजकः ॥ जनसंगविरक्त्तश्च म- हाव्याधिविवर्जितः ॥ २८॥ अधिमात्र- तमो ज्ञैयःसर्वयोगस्य साधकः॥ त्रिभि:
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(१३२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । सँव्वत्सरैः सिद्धिरेतस्य नात्र संशयः॥ सर्वयोगाधिकारी स नात्र कार्या विचा रणा ॥ २९॥ टीका-महावीर्यवान् उत्साहयुक्त स्वरूपवान् शूर- तासम्पन्न शास्त्रज्ञ अभ्यासशील अर्थात् श्रुतिधर मो- हसे हीन आकुलतारहित अर्थात् सावधान नवीन यौवनसम्पन्न अर्थात् तरुण प्रमाणभोजी जितेन्द्रिय निर्भय पवित्रआचार सर्वकर्ममें निपुण दानशील झरणागतपालक स्थिरचित्त वुद्धिमान् सन्तोषयुक्त क्षमावान् शीलवान् धार्मिक कर्मोको गोप्य रखनेवाला प्रियसत्यवादी शास्त्रमें विश्वास देवता और गुरुपूजक जनसङ्गाहित महाव्याधिरहित ऐसे गुण जिसमें हो वह अधिमात्रतम है और सर्व योगका साधक है इसको तीनवर्षमें सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है. यह सर्वयोगका अधिकारी है ऐसे पुरुषको गुरु समस्त योगका उपदेश करदें इसमें विचारका कुछ प्रयोजन नहीं है॥२५॥२६।।२७।।२८।।२९।। अथ प्रतीकोपासनम्। मूलम्-प्रती कोपासना कार्या दष्टाटष्टफल प्रदा॥ पुनाति दर्शनादत्र नात्र कार्या विचारणा॥ ३० ॥
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पंचमपटलः । ( eee) टीका-अब प्रतीकउपासना कहतेहैं प्रतीकउपास- नासे दष्टादृष्टफल लाभ होताहै और उसके दर्शनसे मनुष्य पवित्र होता है इसमें संशय नहीं है॥ ३०।। मूलम्-गाढातपे स्वप्रतिविम्वितेश्वरं निरी- क्ष्य विस्फारितलोचनद्यम्॥ यदा नभः पश्यति स्वप्रतीकं नभोङ्गणे तत्क्षणमेव पश्यति॥३१॥ टीका-गाढआतपमें अर्थात् गहरेधूपमें स्वईश्वरका प्रतिबिम्ध नेत्र्थिर करके देखे जब अपने छायाका प्रतिबिम्ब शून्यमें देखपडे तब ऊपर आकाशमें अपना प्रतिविम्ब अवश्य देखेगा ॥ ३१ ।। मूलम्-प्रत्यहं पश्यते यो वै स्वप्रतीकं नभो- ङणे॥आयुर्वृद्विर्भवेत्तस्यन मृत्यु: स्या - त्कदाचन ॥ ३२ ॥ टीका-जो नित्य आकाशमें स्वप्रतीक अर्थात् अपना प्रतिबिम्ब देखेगा उसके आयुकी वृद्धि होगी और उसकी मृत्यु कभी न होगी अर्थात् चिरंजीवी हो जायगा ॥ ३२ ॥ मूलम्-यदापश्यतिसम्पूरणैस्वप्रतीकंनभो-
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(१३४) शिवसंहिता आषाटीकासमेता ।
ङणे। तदा जयं सभायाञ्च युद्धे निर्जित्य सश्चरेत् ॥ ३३॥ टीका-जव सम्पूर्ण अपना प्रतिबिम्ब आकाशमें देखे तब सभामें उसकी जय होय और युद्धमें शत्रुको जीतलेगा ॥ ३३ ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं चात्मानं वन्दते परम्। पूर्णानन्दैकपुरुषं स्वप्रती- कप्रसादतः॥३४॥ टीका-जो सर्वदा स्वप्रतीक उपासनाका अभ्यास करे तो उसको आत्माकी प्राप्ति होगी और उसी स्वप्र तीकके प्रसादसे पूर्णानन्द स्वरूप अर्थात् आत्माका दर्शन होगा. तात्पर्य यह है कि, जब हृदयाकाशमें अपने स्वरूपका अनुभव होगा तब आत्माकी परम ज्योतिका प्रकाश होगा ॥ ३४ ॥ मूलम्-यात्राकाले विवाहे च शुभे कर्मणि सङ्गटे।। पापक्षये पुण्यवृद्धौ प्रतीकोपा- सनश्चरेत् ॥ ३५॥ टीका-यात्राकालमें और विवाहके समयमें और शुभकर्ममें और पापक्षयमें और पुण्यवृद्धिके अर्थ स्वप्र- तीक अर्थात् अपने प्रतिबिम्बका दर्शन करे तो सर्वदा कल्याण होगा ॥ ३५॥
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पंचसपटलः । (३३५)
मूलम्-निरन्तरकृताम्यासाइन्तरे पश्यात ध्रुवम्॥ तदा मुक्तिमवापोति योगी नि- यतमानसः ॥ ३६ ॥ टीका-सर्वदा प्रतीकोपासनाके अभ्यास करनेसे निश्चय हृदयाकाशमें अपना प्रतिबिंध भान होगा तब निश्चयआत्मा योगीको मुक्ति प्राप्त होगी॥ ३६॥ मूलम्-अंग्रष्ठाभ्यामुभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां द्विलोचने। नासारन्त्रे च मध्याभ्याम- नामाभ्यां मुखं हुढम् ॥ ३७ ॥ निरुध्य मारुतं योगी यदैव कुरुते भृशम्॥ तदा तत्क्षणमात्मानं ज्योतीरूपं स पश्यति३८ टीका-दोनों अंगुष्ठसे दोनों कर्ण बंद करे और दो- नों तर्जनीसे दोनों नेत्रोंको बंद करे और दोनों मध्य- मा अंगुलीसे दोनों नासारंश्रको बंद करे और दोनों अनामिका अंगुली और कनिष्ठासे सुखको बंद करे यदि इसप्रकार योगी वायुको निरोध करके इसका वारंवार अभ्यास करे तो आत्मा ज्योतिस्वरूपका हृदयाकाशमें भान होगा ॥ ३७॥३८ ॥ मूलम्-तत्तेजो दृश्यते येन क्षणमात्रं निरा- कुलम् ॥ सर्वपापविनिर्मुंक्त: स याति परमाँ गतिम्॥३९॥
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(१३६) शिवसंहिता आषादी क समेता । टीका-आत्माका यह परमतेज जो पुरुष स्थिर- चित्त होके क्षणमात्रभी देखेगा वह सर्वपापसे मुक्त होके परमगतिको प्राप्तहोगा ॥ ३९॥ मूलम् -- निरन्तरकृताभ्यासाद्योगीविगतक- लमपः ॥ सर्वदेहादि विस्मृत्य तदभिन्नः स्वयं गतः॥ ४० ॥ टीका-निरंतर जो योगी शुद्धचित्त होके यह प्र तीकोपासनाका अभ्यास करेगा वह सव देहादिक- मैसे रहित होके आत्मासे अभिन्न होजायगा अर्थात आत्मास्वरूप होजायगा॥४० ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं गप्ताचारेण मानवः।। स वै ब्रह्मविलीनः स्यात्पापकर्म- रतो यदि॥४१ ॥ टीका-जो मनुष्य, गुप्ताचारसे इसका सर्वदा अभ्या- स करताहै सो यदि पापकर्मरतभी हो तथापि उसका मोक्ष होगा॥४१॥ मूलम-गोपनीय: प्रयत्नेन सद्ः प्रत्यय- कारकः॥ निर्वाणदायको लोके योगोयं मम वल्लभः॥ नाद: संजायते तस्य क्रमे- णाभ्यासतश्च यः॥। ४२॥
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पंचमपटलः । (१३७ )
टीका-जो इसका अभ्यास करेगा उसको कमसे नाद उत्पन्न होगा. हेदेवी। यह प्रतीकोपासना निर्वाण योगका दाता है इसहेतुसे हमको अतिप्िय है यह शीघ्र फलदाता है इसको यत्नसे गोप्य रखना उचि- त है॥ ४२ ॥ मूलम्-मत्तभृङ्गवेणवीणासदशः प्रथमोध्व- निः॥ ४३॥ एवमम्यासतः पश्चात् संसा- रध्वान्तनाशनम्॥ घण्टानादसम: पश्चात् ध्वनिमेंघरवोपमः॥४४॥ धवनौ त्मि- न्मनो दत्त्वा यदा तिष्ठति निर्भरः॥ तदा संजायते तस्य लयस्य मम वलमे॥४॥ टीका-योगअभ्यासद्वारा प्रथम मत्त भ्रमरकी नाई शब्द और वेणु और वीणाके समान शब्द उत्पन्न होगा इसी तरह संसारतम नाशक योगअभ्याससे फिर घंटानाद समान शब्द होगा. फिर मेव गर्जनके समान ध्वनि होगी. हे प्रिये पार्वती! उस ध्वनिमें यदि मन निश्चल स्थित हो जाय तव मोक्षका दाता लय उत्पन्न होगा॥४३॥ ४४॥४ ॥ मूलम्-तत्र नादे यदा चित्तं रमते योगिनो भृशम्॥ विस्मृत्य सकल वाह्यं नादेन सह शाम्यति ॥४६ ॥
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(१३८) शिवसंहिता आाषाटीकासमेता। टीका-जब योगीका चित्त उस नादमें निरंतर रम- णकरेगा तब सकल विषयसे स्मरणरहित होके चित्त समाधिमें लय होजायगा॥ ४६॥ सूलस्-एतदभ्यासयोगेन जित्वा सम्य- ग्युणान्वहून्॥सर्वारम्भपरित्यागी चिदा- काशे विलीयते॥ ४७ ॥ टीका-इसीप्रकार योगअभ्यासद्वारा सर्व गुणोंको जीतके और सब कार्योंके आरंभको त्यागके योगी आनंदपूर्वक चैतन्यस्वरूप हृदयाकाशमें लय होजायगा॥ ४७॥ मूलम्-नासनं सिद्धसदृदशं न कुम्भसदशं वलम्॥ न खेचरीसमा मुद्रा न नादसढ- शोलयः॥ ४८ ॥ टीका-हेदेवी! सिद्धासनके समान कोई और आस- न नहीं है और न कुम्भकके समान कोई बल है और न खेचरीके समान कोई मुद्रा है और न नादके समान कोई दूसरा लय है।। ४८ ॥ अथ मूलाधारपद्मविवरणम्। मूलम्-इदानीं कथयिष्यामि मुक्तस्यानुभवं
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पंचमपटलः । (१३९ ) प्रिये॥। यज्ज्ञाला लभते मुक्तिं पापयुक्तो पि साधकः ॥। ४९ ॥ टीका-हेपिये पार्वती! अव मुक्तिका अनुभव तुमसे कहतेहैं जिसके ज्ञानसे पापयुक्त साधकभी मुक्तिलाभ करताहै॥ ४९ ॥ मूलम्-समभ्यर्च्येश्वरं सम्यक्कृत्वा च योगमुत्तमम्॥ गृह्ीयात्सुस्थितो भूत्वा गुरुं सन्तोष्य बुद्धिमान् ॥५० ॥ टीका-योगाकांक्षी साधक सम्यकप्रकारसे ईश्वरकी पूजा करके स्वस्थचित्तसे योगासनपर बैठके बुद्धिमान् गुरुको सर्वप्रकारसे प्रसन्न करके यह उत्तम योग ग्रह- णकरे ॥५० ॥ मूलम्-जीवादि सकलं वस्तु दत्त्वा योग- विदं गुरुम्॥ सन्तोप्यादिप्रयत्नेन योगोयं गरृह्यते बुधैः ॥५१॥ टीका-बुद्धिमान् साधक जीवादि सकल पदार्थ योगविद गुरुके अर्पण करकेउनके प्रसन्नतापूर्वक यत्न करके यह योग ग्रहण करते हैं॥५१॥ मूलम्-विप्रान्सन्तोष्य मेघावी नानामं- गलसंयुत: ॥, ममालये शुंचिर्भृत्वा गृह्नी- याच्छुभमात्मनः ॥५२॥
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(१४०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
टीका-योगग्रहणके समय वुद्धिमान् साधक ब्राह्म- णको सन्तोष करके अर्थात् द्रव्यादिक प्रदानपूर्वक प्रसन्न करके अनेक आग्ञीर्वाद श्रवण करके पवित्रता से शिवमंदिरमें बैठके आत्माके अर्थ जो यह शुभयोग है इसको ग्रहणकरे ॥५२॥ मूलम्-संन्यस्यानेन विधिना प्राक्तनं विग्रहादिकम्॥ भूत्वा दिव्यवपुर्योगा गृह्लीयाद्रक्ष्यमाणकमू ॥ ५३॥ टीका-साधक इस विधानसे पर्व शरीर गुरुकी कृ. पासे त्यागके दिव्य शरीर होके जा आगे कहैं गे वह योग ग्रहण करे. तात्पर्य यह है कि, योगग्रहणके समयसे साधकका शरीर दिव्य होजाताहै व्याधि और अज्ञान- का शरीर नहीं रहजाता इस हेतुसे योगग्रहणके समय साधक यह चिंतनकरे कि, पूर्व शरीरको हमने त्यागके दिव्यशरीर धारण किया॥५३॥ मूलम्-पद्मासनस्थितो योगी जनसंगविव-
निरोधयेत् ॥५४॥ टीका-योगी संगरहित पद्मासनमें स्थित होके दो- नों विज्ञाननाडी अर्थात् इडा और पिंगलाको दो अंगु- लीसे निरोध करे॥ ५४ ॥
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पंचमपटलः । ( १४१)
मूलम्-सिद्धेस्तदाविर्भवति सुखरूपी निर- अनः॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यों येन सि- द्वो भवेत्खलु ॥५५॥ टीका-यह योग सिद्ध होनेसे साधकके हृदयमें सुखरूपी निरंजन परब्रह्म चैतन्यस्वरूपका प्रकाशहोगा इस हेतुसे यह योगमें साधकको परिश्रम कर्तव्य है, इससे निश्चय यह योग सिद्ध होजायगा ॥५५॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं तस्य सिद्धि- न दूरतः॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमादेव न संशयः ॥५६॥ टीका-जोमनुष्य इस योगका सर्वदा अभ्यास करे- गा उसको स्वसिद्धि प्राप्त होगी और निश्चय आपही कमसे वायु सिद्ध होजायगा ॥ ५६॥ भूलम्-सकृद्य: कुरुते योगी पापौघं नाशये- दुवम् ॥ तस्य स्यान्मध्यमे वायोः प्रवेशो नात्र संशय:॥५७॥ टीका-ज़ो योगी प्रतिदिन एकवार यह अभ्यास करे तो उसके सर्व पापोंका नाश होजायगा और उसका प्राणवायु निश्चय सुषुम्णामें प्रवेश करेगा ॥ ५७॥ मूलम्-एतदभ्यासशीलो यः स योगी देव-
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(१४२) शिवसंहिता आषाटीकासमेता । पूजितः॥ अणिमादिगणांल्लब्ध्वा विचरे- डुवनत्रये ॥ ५८ ॥ टीका-यह अभ्यासशील योगी देवतोंसे पूजित है और अणिमादिक सिद्धि लाभ करके तीनों लोकमें इच्छापूर्वक विचरेगा ॥ ५८ ॥
स्य विग्रहः॥ तिष्ठेदात्मनि मेधावी संयुतः क्रीडते भृशमू ॥५९॥ टीका-जिस प्रकार वायुका अभ्यास करेगा उसी तरह साधकका शरीर सिद्ध हो जायगा और बुद्धिमान पुरुष आत्मामें स्थितहोके सर्वदा क्रीडा करेगा ॥ ५९॥ मूलम्-एतद्योगं परं गोप्यं न देयं यस्य कस्यचित्॥ यः प्रमाणैः समायुक्तस्तमेव कथ्यते ध्रुवम्॥६०॥ टीका-यह योग परमगोपनीयहै अनधिकारीको कदापि देनेके योग्य नहीं है परन्तु प्रमाणयुक्त अर्थात् पूर्वोक्त लक्षणयुक्त साधकको अवश्य देना उचितहै।६०।। मूलम्-योगी पद्मासने तिष्ठेत्कण्ठकूपे य- दा स्मरन्।। जिहां कृत्वा तालुमूले क्षुत्पि- पासा निवर्तते॥६१ ॥
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पंचमपटलः । (१४३) टीका-पदमासनस्थित योगी जब कण्ठकूपका स्मरण अर्थात् उस स्थानमें मनको लय करके जिह्वा- को तालु पूलमें स्थित करेगा तव क्षुधा और पिपासा- से रहित हो जायगा ॥ ६१ ।। मूलम्-कण्ठकूपादधः स्थाने कूर्मनाडय- स्ति शोभना। तस्मिन् योगी मनो दत्त्वा चित्तस्थैय लभेद्ृशम् ॥६२ ॥ टीका-कंठकूपके नीचे कूर्मनाडी शोभित है उस नाडीमें योगी मनको स्थिर करके अत्यंत चित्तकी स्थिरता पावेगा ॥ ६२ ॥ मूलम्-शिर:कपाले रुद्राक्षं विवर चिन्तये- ददा।तदा ज्योति:प्रकाश: स्थाद्विद्ुत्पु- अ्समप्रभ:॥६३॥ एतच्चिन्तनमात्रेण पा- पानां संक्षयो भवेत्॥ दुराचारोऽपि पुरुषो लभते परमं पदम्॥ ६४ ।। टीका-शिर कपालमें जो रुद्राक्ष विवर है उसमें यदि चिंतना करे तो विद्युत्पुञ्जके समान आत्मज्यो- तिका प्रकाश होगा और इसके चिन्तनमात्रसे योगीका सर्व पाप नष्ट होजायगा. यदि हुराचारमेंभी जो पुरुष भासक्त है वहभी परमगतिको प्राप्त होगा ॥६३॥। ६ु४॥
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(१४४) शिवसंहिता आाषाटीकासमेता। मूलम्-अहर्निशं यदा चिन्तां तत्करोति वि- चक्षणः॥ सिद्धानां दर्शनं तस्य भाषणश्च भवेद्ुवम् ॥६५॥ टीका-जो वुद्धिमान् साधक रात्रि दिवस यह चि- न्तवन करते हैं उनको सिद्धलोगोंका अवश्य दर्शन और उनसे भाषण होताहै॥ ६५ ॥ मूलम्-तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् भुअन् ध्या- येच्छन्यमहर्निशम। तदाकाशमयो यो गी चिदाकाशे विलीयते॥६६॥ टीका-जो पुरुष चलते बैठते सोते भोजन करते रा- त्रिदिवस यह ध्यान करते हैं सो आकाशस्वरूप योगी चिदाकाश अर्थात् परमात्मामें लय होजाते हैं ॥ ६६ ॥ मूलम-एतज्ज्ञानं सदा कार्य योगिना सि- द्विमिच्छता॥ निरन्तरकृताभ्यासान्मम तुल्यो भवेदूदम्। एतज्ज्ञानवलाद्योगी सर्वेषां वलभो भवेत् ॥ ६७ ।। टीका-सिद्धिकांक्षी योगीको इस ध्यानका सर्वदा अभ्यास करना उचचित है सर्वदा अभ्यास करनेसे हेपा- वती! हमारे तुल्य होजायगा निश्धय, इस ज्ञानव लसे योगी सबको अर्थात् त्ैलाक्यको प्रिय होजाताहै॥ ६७ ॥
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(१४६) शिवसंहिता आाषाटीकासमेता । टीका-बुद्धिमान् योगी भूमिमें उत्तानशयन करके निरन्तर ध्यान करे तो तत्काल आपही श्रमका नाश होजायगा और शिरके पृष्ठभागका ध्यान करनेसे योगी मृत्युका जीतनेवाला होजायगा और भ्रूके मध्यमें जो दृष्टिमात्रसे फल होताहै सो हेदेवि! हम पहले कह- चुके हैं।। ७१।। ७२।। मूलम्-चतुर्विधस्य चान्नस्य रसस्रेधा वि- भज्यते।तत्र सारतमो लिंगदेहस्य परि- पोषकः ॥ ७३॥ सप्तधातुमयं पिण्डमे ति पुष्णाति मध्यगः ॥ याति विण्मूत्र- रूपेण तृतीयः सप्ततो बहिः॥७४॥ आ- द्यभागद्यं नाड्ः प्रोक्तास्ताः सकला अपि। पोषयन्ति वपुवीयुमापादतल- मस्तकम् ॥ ७५'॥ टीका-चार विधि अन्नभोजन करनेसे तीनप्रकार- का रस उत्पन्नहोताहै उसमें जो प्रथम सारभूत रस है वह लिङ्गशरीरको पोषण करता है और जो दूसगा रस है वह सपतधातुमय पिण्डको पोषण करताहै और तीसरा रस सप्तधातुके बाहर मल मूत्ररूप है पहिले जो दोभाग रस कहाहै वही सकल नाडीरूप है और
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पंचमपटलः । (१४७)
पादसे लेकर मस्तकपर्यत शरीरके वायुका पोषणक- रते हैं॥ ७३॥७॥७॥ मूलम्-नाडीभिराभि: सर्वाभिर्वायुः सश्चर- ते यदा। तदैवान्नरसो देहे साम्येनेह प्रव- सेते॥ ७६ ॥ टीका-जब सब नाडीके साथ वायु चलताहै तब अन्नका रस शरीरमें समभावसे प्रवृत्त होता है॥ ७६॥ मूलम्-चतुर्दशानां तत्रेह व्यापारे मुख्य- भागतः ॥ ता अनुग्रत्वहीनाश्च प्राणस- श्वारनाडिकाः॥७७॥ टीका-सर्व नाडियोंमें पूर्वोक्त चौदह नाडी शरीर के सुख्य व्यापारको करती हैं यह प्राण सश्चार करने- वाली चौदह नाडीमें परस्पर कोई किसीसे न्यून अधिक नहीं है।। ७७॥ मूलम्-गुदाद्ट्यंगुलतश्चोर्ध्व मेट्ैकांगुलत- स्त्वधः॥ एवश्चास्ति समं कन्दं समता चतुरंगलम्॥७८ ॥ टीका-गुदासे दो अङ़ल ऊ़पर और मेठू अर्थात् लिङ्गमूलसे एक अंगुल नीचे चार अंगुल विस्तारक- न्दका प्रमाण है।। ७८ ।।
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(१४८) शिवसंहिता आषाटीकासमेता । मूलम्-पश्चिमाभिमुखी योनिर्गुदमेद्रान्त- रालगा॥ तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ति कुण्डली सदा॥ ७९॥ संवेष्टय सकला नाडी: सार्द्वत्रिकुटिलाकृतिः॥मुखे निवे- शय सा पुच्छं सुपुम्णाविवरे स्थिता॥८०।। टीका-गुदा और मेढ़के मध्यमें जो योनि है वह पश्चिमाभिमुखी अर्थात् पीछेको सुख है उसी स्थानमें कन्दहै और उसी स्थानमें सर्वदा कुण्डलनीकी स्थिति है यह कुण्डलनी सकल नाडीको घेरके साढे तीन फेरा कुटिल आकृतिसे अपने मुखमें पुच्छको लेके सुषुम्णा विवरमें स्थित है ।। ७९ ॥८०॥ मूलम्-सुप्ता नागोपमा ह्वेषा स्फुरन्ती प्रभया स्वया॥ अहिवत्सन्धिसंस्थाना वाग्देवी बीजसंजिका ॥ ८१॥ टीका-यह कुण्डलिनी सर्पके समान निद्रिता अपनी प्रभासे प्रकाशमान है और सर्पके सदश संधि- में स्थित है और वाग्देवी है अर्थात् कुण्डलिनीहीसे वाक्य उच्चारण होताहै और बीज संज्ञक है अर्थात् सं- सारकी बीज है।। ८१ ॥ मूलम्-जेया शक्तिरियं विष्णोर्निर्मला स्वर्ण
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पंचमपटलः। (१४९) भास्वरा॥सत्त्वं रजस्तमश्रेति गुणत्रयप्र- सूतिका ॥ ८२ ॥ टीका-यह कुण्डलिनी देवी ईश्वरकी शक्तिमें तप्त स्वर्णके समान निर्मल तेजप्रभा है और तत्व, रज, तम, यह तीनों गुणकी माता है ।। ८२ ॥। मूलम्-तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकी- र्तितम्॥ कलहेमसमं योगे प्रयुक्ताक्षररू- पिणम् ॥ ८३ ॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी है उसी स्थानमें बन्धूकपुष्पके समान रत्तवर्ण कामवीजकी स्थिति कहीगई है वह कामबीज तप्तस्वर्णके समान स्वरूप- योगयुक्तद्वारा चिंतनीय है।। ८३ ।। मूलम्-सुषुम्णापि च संश्िष्टा बीजं तत्र वरं
रत्स्थितम्॥८४ ॥मूर्यकोटिप्रतीकाशं च- न्द्रकोटिसुशीतलम् ।। एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरबी॥बीजसंज्ञं परंतेजस्तदे- व परिकीर्तितम॥८५ !। टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्णा उसी स्थानमें कामवीजके साथ स्थित है और वह बीज
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(१५०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
शरच्न्द्रके समान प्रकाशमान तेज है और वह आप- ही कोटि सूर्यके समान प्रकाश और कोटिचंद्रके समान शीतल है यह तीनों मिलके अर्थात् कुण्डलिनी सुषुम्णा, बीजकुण्डलिनीका नाम त्रिपुरभैरवी देवी है यह कुण्ड- लिनी परमतेजमानहै और उसकी बीजसंज्ञाहै।।८४।।८।। मूलम्-क्रियाविज्ञानशक्तिम्यां युतं यत्प-
सूक्ष्मं शोणशिखायुतम्।योनिस्थं तत्परं तेज: स्वयंभूलिंगसंजितम्॥८७। टीका-वह बीज क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्तिसे युक्त होके शरीरमें भ्रमण करताहै और कभी ऊर्ध्वगामी हो- ताहै और कभी जलमें प्रवेश करताहै और सूक्ष्म प्रज्व- लित अग्निके समान शिखायुत परमतेजवीर्यकी स्थिति योनिस्थानमें है और स्वयम्भू लिङ्गसंज्ञा है॥८६।।८७।। मूलम्-आधारपन्ममेतद्धि योनिर्यस्यास्ति कन्दतः ॥ परिस्फुरद्रादिसान्तचतुर्वर्ण चतुर्दलम् ॥ ८८ ॥ टीका-यह जो कहाहै इसको आधारपद् कहते हैं और इस पझमके मूलमें योनिकी स्थितिहै यह पद्म परम प्रकाशमान-व-से स-तक, अर्थात व-श-ष-स चारवर्ण और चारदल करके शोभित है।। ८८ ।
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पंचमपटलः। (३५१) मूलम्-कुलाभिधं सुवर्णाभं स्वयम्भूलि- ङ्संगतम् । द्विरण्डो यत्र सिद्धोस्ति डाकिनी यत्र देवता॥८९॥तत्पन्ममध्य- गा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता॥ त- स्याऊर्ध्वे स्फुरत्तेज: कामबीजं भ्रमन्मत- म॥९॥य: करोति सदा ध्यानं मूला- धारे विचक्षणः॥ तस्य स्यादार्दुरी सिद्धि- भूमित्यागक्रमेण वै॥ ९१॥
टीका-वह कमल कुलाभिध है अर्थात् कुलनाम है और स्वर्णके समान कांतिहै और स्वयंभूलिङ्गसे युक्त है और उस पद्ममें द्विरण्डनामक सिद्ध और डाकिनी देवता अधिष्ठात्री है और गणेश देवता है और उस पद्मके मध्यमें योनि है उस योनिमें कुण्डलिनीकी स्थि- तिहै और उस कुण्डलिनीके ऊपर दीप्तिमान् तेजस्व- रूप कामवीज भ्रमण करताहै जो बुद्विमान् पुरुष इस मूलाधार पद्मका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको दार्दुरी वृत्ति सिद्ध होती है और कमसे भूमिको त्यागके आ- काशगमन करते हैं ॥८९॥ ॥ ९१॥ मूलम्-वपुषः कान्तिरुत्कृष्टा जठराग्रिविव-
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(१५२) शिवसंहिता आषाटीकासमेता। र्धनम्॥ आरोग्यश्च पटुत्वश्च सर्वज्ञत्वश्च जायते । ९२ । टीका-यह ध्यान करनेसे शरीरमें उत्तम कांति होती है और जठराग्ि वर्धित होताहै और शरीर आरोग्य रहताहै और पटुता और सर्वज्ञता अर्थांत सर्व वस्तुका ज्ञान उत्पन्न होता है॥ ९२॥ मूलम्-भूतं भव्यं भविष्यच्च वेत्ति सर्व सका- रणम्॥ अश्रुतान्यपि शास्त्राणि सरहस्यं वदेुवम् ॥ ९३॥ टीका-फिर भूत, भविष्य, वर्तमान तीनोंकाल और सर्व वस्तुके कारणका ज्ञान होताहै और जो शास्त्र कभी श्रवण नहीं कियाहै उसको रहस्यसहित व्या- ख्या करनेकी शक्ति निश्चय उत्पन्न होती है। ९३ ॥। मूलम्-वक्े सरस्वती देवी सदा नृत्यति नि- र्भरम्॥ मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य जपादेव न संशयः ॥ ९४॥ टीका-योगीके मुखमें सर्वदा निरंतर सरस्वती दे- वी नृत्य करती है और योगीकी जपमात्रसे मन्त्रादिकी सिद्धि होती है इममें संशय् नहीं है॥। ९४ ॥ मूलम्-जरामरणद्ुःखौघान्नाशयति गरोर्व-
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पंचमपटल:। (३५३ ) चः।इदं ध्यानं सदा कार्य पवनाभ्यासि- ना परम्। ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो सु- च्यते सर्वकिल्विषात् ॥९५॥ टीका-गुरुका वचन जग मृत्यु आदि जो दुःखका समूह है उसको नाश करदेताहै पवनाभ्यासी साधकको यह परमध्यान सर्वदा करनेके योग्य है ध्यानमात्रसे योगीन्द्र सर्वपापसे मुक्त होजाताहै॥ ९५॥ मूलम्-मूलपझ्मं यदा ध्यायेद्योगी स्वार्यं- म्भुलिङ्गकम्॥ तदा तत्क्षणमात्रेण पापौ- घं नाशयेदुवम् ॥ ९६॥ टीका-योगी जब मूलाधार पद्म स्वयम्भूलिङ्गसंयु- कका ध्यानकरे तो उसीक्षण निश्चय पापके समूहका नाश करदेगा ॥ ९६ ॥ मूलम्-यं यं कामयते चित्ते तंतं फलमवा- प्रुयात्॥ निरन्तरकृताभ्यासात्तं पश्यति विमुक्तिदम् ॥९७॥ वहिरभ्यन्तरे श्रेष्ठं पू- जनीयं प्रयत्नतः॥ ततः श्रेष्ठतमं ह्येतन्ना- न्यदस्ति मतं मम ॥ ९८॥ टीका-जो साधक मूलाधार पझका ध्यान करते हैं वह अपने चित्तमें जोजो वस्तुकी इच्छा करते हैं सो सो
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(१५४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। सर्वे वस्तु उनको प्राप्त होती हैं और सर्वदा यत्नपूर्वक यह अभ्यास करनेसे बाहर भीतर श्रेष्ट पूजनीय मुक्ति- दायी परमात्माको देखते हैं हे पार्वति ! इससे श्रेष्ठतम दूसरा योग नहीं है यह हमारा मतहै ॥ ९७॥ ९८॥ मूलम्-आत्मसंस्थं शिवं त्यत्क्का बहिःस्थं यः समर्चयेत॥ हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य भ्रमते जीविताशया॥ ९९॥ टीका-मनुष्य शरीरस्थ शिवको त्यागके बाहरके देवताको पूजते हैं जैसे हाथके पिंडको त्यागके जीवके रक्षार्थ अन्य पिंडके हेतु लोग भ्रमण करतेहैं ॥ ९९॥ मूलम्-आत्मलिंगार्चनं कुर्यादनालस्यं दि- ने दिने॥ तस्य स्यात्सकलासिद्धिनात्र कार्या विचारणा ॥१००॥ निरन्तरकृता-
वायुप्रवेशोपि सुषुम्णायाम्भवेद्ुवम् ॥ ॥ १०१॥ मनोजयञ्च लभते वायुबिन्दु- विधारणात्॥ ऐहिकाभुष्मिकीसिद्धिर्भ- वेन्नैवात्र संशयः॥ १०२॥ टीका-जो आलस्यको त्यागके शरीरस्थ परमा- त्माका नित्य पूजन करेगा उसको सकलसिद्धि प्राप्त-
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पंचमपटलः। (१५५) होगी इसमें संशय नहीं है यदि इसका अभ्यास निर- न्तर करे तो छामातमें सिद्धि प्रातहोगी और उसके सुषुम्णानाडीमें निश्चय वायु प्रवेश करेगा और मनको जीतलेगा और वायु बिन्दुका धारण सिद्धहोगा और इसलोक और परलो डकी सिद्धि म्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है॥१०० ॥१०१॥१०२॥ अथ स्वाधिष्ठानचक्र्विवरणम्। मूलक्-द्वितीयन्तु सरोज्च लिंगमूले व्य- वस्थितमू। बादिलान्तं च पड़वर्ण परिभा- स्वरपड्दलमू॥ १०३॥ स्वाधिष्ठानाभिधं तत्तु पंकजं शोणरूपकमू। बाणाख्योय- त्रसिद्धोऽस्ति देवी यत्रास्ति शाकिणी १०४ टीका-दूसरा पद्म जो लिद्ग-मूलमें स्थितहै वह- व से
है और छः दलसे शोभितहै.यह रक्तवर्णपझ्मका नाम स्वा- घिष्ठानहै और इस स्थानमें वाणनामक सिद्ध और राकि- णी देवी अधिष्ठात्रीहै और ब्रह्मा देवता हैं॥१०३॥१०४॥ मूलम्-यो ध्यायति सदा. दिव्यं स्वाधिष्ठा- नारविन्दकम्.॥ तस्य कांमाङ्गना: सर्वा भजन्ते काममोहिताः॥१०५॥
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(१५६) शिवसंहिता ाषाटी कासमेता । टीका-जो पुरुष यह दिव्य स्वाधिष्ठानपझ्मका सर्वेदा ध्यान करते हैं उनको कामरूपिणी स्त्री कामसे मोहित होके भजतीहैं अर्थात् हेवा करती हैं॥ १०५॥। मूलम्-विविधश्चाश्रुतं शासत्र निःशङ्गोवै व- देख्ुवम्॥ सर्वरोगविनिर्मक्तो लोके चरति निर्भयः ॥१०६॥ टीका-विविधश्ञास्त्र जो कभी श्रवण नहीं किय हो उसकोभी इस पझ्मके ध्यानके प्रभावसे निःशंक कहेगा और सर्वरोगसे मुक्तहोके आनन्दपूर्वक संसारमें विचरेगा ॥ १०६॥ मूलम्-मरणं खाद्यते तेन स केनापि न खा- द्यते॥ तस्य स्यात्परमा सिद्धिरणिमादि- गुणप्रदा ॥१०७। वायुः सश्चरते देहे रस- वृद्धिर्भवेद्ुवम्॥ आकाशपङ्गजगलत्पीयू- षमपि वर्द्धते ॥ १०८॥ टीका-यह साधक मृत्युको नाश करदेताहै और वह किसीसे नष्ट नहीं होता और उस साधकको गुण देनेवाली अणिमादि सिद्धि प्राप्त होती हैं और उसके इरीरमें वायु संचार करताहै अर्थात् सुषुम्णामें प्रवेश करताहै और निश्चय रसकी वृद्धि होतीहै और सह-
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पंचमपटलः । (१५७ ) स्त्रदलकमलसे जो अमृत सवताहै उसकी वृद्धि होती है ॥ १०७॥१०८॥ अथ मणिपूरचक्रविवरणम्। मूलम्-तृतीयं पङ्गजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञ कमू॥दशारंडादिफान्तार्ण शोभितं हेमवर्ण कम्॥ १०९॥ रुद्राख्यो यत्र सिद्धोऽस्ति सर्वमङ्गलदायकः ॥ तत्रस्था लाकिनी- नाम्नी देवी परमधार्मिका॥ ११०॥ टीका-मणिपूरनामक तीसरा पद्म जो नाभिस्थलमें है वह हेमवर्ण दशदलकरके शोभितहै और-ड-से फ-तक अर्थात् डनढ-ण-त-थ-द-ध-न-प-फ-यह दश- वर्णसे युक्त है और उस स्थानमें सर्वमंगलदाता रु- द्रनामक सिद्ध और लाकिनी देवी अधिष्ठात्री और विष्णुदेवता हैं॥ १०९॥११०॥ मूलम्-तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके॥ तस्य पातालसिद्धि: स्यान्नि- रन्तरसुखावहा॥१११। ईप्सितश्च भवे- लोके दुःखरोगविनाशनम्॥ कालस्य व- श्चनश्चापि परदेहप्रवेशनम्ं॥११२॥ टीकां-जो साधक इस घणिपूर चक्रको सर्वदा ध्या-
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(१५८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। न करतेहैं सो सर्वसिद्धिदानी जो पातालसिद्धि है उसको लाभ करते हैं और उनका दुःख रोगविनाश होके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और कालको नि- रादर कर देतेहैं और परदेहमें प्रवेश करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है।। १११॥। ११२।। मूलम्-जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत्॥ ओषधीदर्शनश्वापि निधीनां द- र्शनं भवेत् ॥ ११३॥ टीका-यह साघकको स्वर्णआदि रचना करने की शक्ति होनीहै और देवतोंका दर्शन और निधि और ओषधीका दर्शन होताहै॥ ११३॥ मूलम्-हदयेडनाहतंनाम चतुर्थ पङ्गजं भ- वेतु ॥११४॥कादिठान्ताणसंस्थानं द्वाद- शारसमन्वितम् ॥ अतिशोणं वायुबीजं प्रसादस्थानमीरितम् ॥ ११५॥ टीका-दृदयस्थानमें जो अनाहतनामक चतुर्थ पद्म है वह-क-से-ठ-तक अर्थात् क-ख-ग-घ-ड-च-छ- ज-झ-भ-टठ-यह बारह वर्ण और वारहदलसे युक्त है और अति उज्जवल रक्तवर्णसे शोभायमान है और
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पंचमपटलः । (१५९)
वह प्रसन्नस्थान वायुका वीज अर्थात प्राणवाछुका आधार है।। ११४ ।। ११५।। मूलम-पद्मस्थं तत्पर तेजो वाणलिंगं प्रकीर्तितम॥ यस्य स्मरणमात्रेग दष्टा- दृष्टफलं लभेतु ॥ ११६॥ टीका-उस सृदयकमलमें जो परमतेज है उसीको बाणलिङ्ग कहते हैं जिसके ध्यानमात्रसे साधक इस लोक और परलोकका उत्तमफल आनंदपूर्वक लाभ करते हैं ॥ ११६॥l मूलम-सिद्धः पिनाकी यत्रास्ते काकिनी यत्र देवता॥ एत्मिन्सततं ध्यानं ह- त्पाथोजे करोति यः ॥ क्षुभ्यन्ते तस्य कान्ता वै कामार्ता दिव्ययोषितः ॥११७॥ टीका-जिस पद्ममें पिनाकी, सिद्ध और काकिनी देवी अधिष्ठात्री हैं उस हृदयस्थपद्ममें जो साधक सर्वदा ध्यान करताहै उसके समीप कामार्ता सुन्दर स्त्री अप्सरा आदि मोहित होजाती हैं॥ ११७ ॥ मूलम्-ज्ञानञ्चाप्रतिमं तस्य त्रिकालवि- षयम्भवेत्। दूरश्रुतिर्द्वरदृष्टिः स्वेच्छया खगतां व्रजेत् ॥११८॥
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(९६०) शिवसंहिता आापाटी कासमेता । टीका-उस साधकको अपूर्वज्ञान उत्पन्न होताहै और तिकालदर्शी होताहै और दूरशब्द श्रवण करने और दूरकी सूक्ष्मवस्तु देखनेकी शक्ति उत्पन्न होती है और स्वेच्छासे आकाशमें गमन करताहै॥ ११८॥ मूलम्-सिद्धानां दर्शनश्चापि योगिनीदर्शनं तथा॥ भवेत्खेचरसिद्धिश्च खेचराणां जयन्तथा॥११९।यो ध्यायति परं नित्यं बाणलिंगं द्वितीयकम्। खेचरी भूचरी सिद्धिर्भवेत्तस्य न संशयः ॥ १२०॥ टीका-जो साधक यह दूसरे परमवाणलिङ्गका नि- त्य ध्यान करताहै उसको देवता और योगिनीका दर्शन होताहै और आकाशमें गमन करनेकी शाक्ति होजाती है और आकाशगामीसे जय प्राप्त होतीहै और खेचरी भूचरी सिद्ध होती है इसमें संशय नहीं है॥११९।१२०। मूलम्-एतद्वयानस्य माहात्म्यं काेतुं नै- व शक्यते।। ब्रह्माद्याः सकला देवा गोपा- यन्ति परन्त्विदम्॥ १२१॥ टीका-हे देवी! इस अनाहत पद्मके ध्यानके माहात्म्य- को कोई नहीं कहसकता और इस ध्यानको ब्रह्मा आदि सकलदेवता गोप्य रखते हैं॥ १२१ ॥
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पँचमपटलः । (१६३ )
अथ विशुद्धचक्रविवरणम्। मूलम्-कण्ठस्थानस्थितं पद्मं विशुद्ध नाम- पश्चमम्॥ १२२॥ सुहेमाभं स्वरोपेतं षोडशस्वरसंयुतम्॥ छगलाण्डोडस्ति सिद्धोत्र शाकिनी चाधिदेवता॥ १२३॥ टीका-कंठस्थानमें जो पांचवां विशुद्धनामक क- मल है वह स्वर्णके समान कांतिसे शोभित है और सो- लह स्वर अर्थात् अ-आ-इ-ई-उ-ऊ-ऋ-ऋु-ल-ह-ए-ऐ- ओ-औ-अं-अः-से युक्त है और छगलांड सिद्ध और झा- किनीदेवी अधिष्ठात्री और जीवात्मा देवता इस स्थान- में सदा विराजमान है॥ १२२ ॥। १२३ ।। मूलम्-ध्यानं करोति यो नित्यं स योगीश्व- रपण्डितः।। किन्त्वस्य योगिनोऽन्यत्र वि- शुद्धाख्ये सरोरुहे॥ चतुर्वेदा विभासन्ते सरहस्या निधेरिव॥ १२४॥ टीका-जो पुरुष इस विशुद्धपझमका नित्य ध्यान करतेहैं सो योगीश्वर पंडित हैं और इस विशुद्धपद्में उस पुरुषको चारोवेद रहत्यसहित समुद्रके रत्वत प्रकाश होते हैं ॥ १२४ ॥ मूलमूं-इह स्थाने स्थितो योगी यदा क्रोध-
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(१६२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । वशो भवेत्॥तदा समस्तं त्रैलोक्यं कम्प- ते नात्र संशयः ॥ १२५॥। टीका-यह विशुद्धपझमें जब योगी मन और प्रा- णको स्थित करके यदि क्रोध करे तो अवश्य चराचर वैलोक्य कम्पायमान होजाय इसमें सन्देह नहीं॥१२५॥ मूलम्-इह स्थाने मनो यस्य दैवाद्याति लयं यदा॥ तदा बाह्यं परित्यज्य स्वा- न्तरे रमते घ्रुवम् ॥ १२६॥ टीका-यह कमलमें साधकका मन दैवात् जब ठय होताहै तब सकल बाह्यविषयको त्यागके योगी- का मन और प्राण शरीरके अंतरहीमें निश्चय रमण करताहै ॥ १२६ ॥ मूलम-तस्य न क्षतिमायाति स्वशरीरस्य शक्तितः॥ संवत्सरसहस्रेऽपि वज्रातिक- ठिनस्य वै ॥ १२७॥ यदा त्यजति त- द्यानं योगींद्रोज्वनिमण्डले॥ तदा वर्ष- सहस्राणि मन्यते तत्क्षणं कृती॥ १२८॥ टीका-उस योगीका शरीर वज्रसेभी कठोर होजा- ताहै और उसको स्वशरीरकी शक्तिसे किसीप्रकारकी दानि नहीं होतीहै और सहस्रवर्ष समाधिके पीछे जब
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पंचमपटलः । (१६३) उस ध्यानको छोडके योगीकी चित्तवृत्ति संसारमें आ- वेगी तब उस सहस्रवर्षके योगी सकक्षण व्यतीत भया मानेगा ॥ १२७॥ १२८ ॥ अथ आज्ञाचकविवरणम्। मूलम्-आज्ञापझं आुवोमध्ये हक्षोपेतं द्विप- त्रकम्॥ शुक्काभं तन्महाकाल: सिद्धो दे- व्यत्र हाकिनी ॥ १२९ ॥ टीका-मूके मध्यमें जो आज्ञापद है उसमें हं-क्षं- दो बीज हैं और सुंदर श्वेतवर्ण दो पत्र हैं और उस स्था- नमें महाकाल सिद्ध है और हाकिनीदेवी अधिष्ठात्री और परमात्मा देवता है॥ १२९॥ मूलम्-शरचंद्रनिमं तत्राक्षर बीजं विजंभितं। पुमान् परमहंसोऽयं यज्ज्ञात्वा नावसी- दति॥ १३०॥तत्र देव: परन्तेजः सर्वत- न्त्रेषु मन्त्रिणः॥ चिन्तयित्ा परां सिद्धिं लभते नात्र संशयः ॥ १३१॥ टीका-उस आझापझके मध्यमें शरचंद्रके समा न परमतेज चंद्रबीज अर्थात् ठं बीन विरजमान है इसके ज्ञान होनेसे परमहंस पुरुषको कभी कष्ट नहीं होता यह परमतेजका प्रकाश सर्वतंत्रोंकरके गो-
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(१६४) शिवसंहिता आाषाटीकासमेता । पित है इसके चिंतनमात्रसे अवश्य परम सिद्धिलाभ होताहै॥ १३०॥१३१॥ मूलम्-तुरीयं त्रितयं लिंग तदाहं मुक्तिदा- यक:॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मत्समो भवति धुवम् ॥१३२॥ टीका-हे पार्वती! उस स्थानमें तुरीया तृतीयलिंग हमों मुक्तिके दाता हैं इसके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र निश्चय हमारे तुल्य होजायगा॥ १३२॥ मूलम्-इडा हि पिंगला ख्याता वरणासीति होच्यते। वाराणसी तयोर्मध्ये विश्वना- थोत्र भाषितः ॥ १३३।। टीका-इस झरीरमें जो दो इडा और पिंगला ना- डी हैं उनको वरणा और असी कहते हैं यह वरणा और असकि मध्यमें स्वयं विश्वनाथजी विगाजमान हैं. ता- त्पर्य यह है कि, यह इडा और पिंगलाके मध्यमें जो स्थानहै उसीको शिवजीने वाराणसी कहाहै ॥ १३३ ॥ मूलम्-एतन्क्षेत्रस्य माहात्म्यमृषिभिस्त- त्वदर्शिभिः ॥ शास्त्रेषु बहुधा प्रोक्तं परं तत्त्वं सुभाषितम्॥ १३४ ॥ टीका-यह वाराणसी क्षेत्रके माहात्म्यको तत्त्वद-
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पंचमपटलः। (१६५) र्ी ऋषिलोगोंने अनेक शास्त्रों में बहुत प्रकारसे परम- तत्त्व कहाहै॥ १३४॥ मूलम्-सुषुम्णा मेरुणा याता ब्रह्मरन्ध्रं य- तोऽस्ति वै॥ ततश्रेषा परावृत्त्य तदाज्ञा- पदमदक्षिणे॥ १३५॥ वामनासापुटं या- ति गंगेति परिगीयते ॥ १३६॥ टीका-सुषुम्णानाडी मेरुदंडद्वारा जहां ब्रह्मरन्त्र है उस स्थानमें गई है और इडानाडी मेरुतक जायके लौटीहै और आज्ञाचक्र के दक्षिणभाग होके वामनासापु- टको गई है इसको गङ्गा कहतेहैं ॥ १३५॥ १३६॥ मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रे हि यत्पद्मं सहस्रारं व्यव- स्थितम्।तत्र कन्देहि या योनिस्तस्यां च- न्द्रो व्यवस्थित: ॥१३७।। त्रिकोणाकार- तस्तस्या: सुधा क्षरति सन्वतम्।।इडाया- ममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमा:१३८।। अमृतं वहति द्वारा धारारूपं निरन्तरम्॥ वामनासापुटं याति गंगेत्युक्ता हि यो- गिमिः॥ १३९॥ टीका-ब्रह्मरन्त्रमें जो सहस्रदल पद्म है उस पझ्मके कन्दमें योनि है उस योनिमें चन्द्रमा विराजमान है
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(१६६) शिवसंहिता आाषाटी का स मेता और वही त्रिकोणाकार योनीसे चन्द्रविगलित अमृत सर्वदा स्रवता है सो अमृत चंद्रमासे इडानाडीद्वारा समभावसे निरन्तर धारारूप गमन करता है और उस इडानाडीकी गति वामनासापुटमें है उस हेतुसे योगी लोग इस नाडीको गंगा कहतेहैं ॥१३७॥३३८॥१३९॥
ता।। उदग्वहेति तत्रेडा गंगेति समुदा- हता॥ १४० ! टीका-वह इडानाडी आज्ञापदके दक्षिणभागसे वामनासापुटको गमन करती है इसीको उदग्वाहिनी गंगा कहते हैं॥ १४०॥ मूलम्-ततो द्योरहिं मध्ये तु वाराणसी वि- चिन्तयेत्। तदाकारा पिंगलापि तदाज्ञा कमलोत्तरे।। दक्षनासापुटे याति प्रोक्ता- स्माभिरसीति वै ॥ १४१ ॥ टीका-यह इडा और पिङ्गलाके मध्यस्थानको वाराणसी चिन्तनाकरे और इडानाडीके समान पि- ङलाभी उस आज्ञाकमलके वामभागसे दक्ष नासा- पुटको गई है इस हेतुसे हेदेवी ! इस पिङ्गलाको हमने असी कहाहै॥ १४१॥
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पँचमपटलः। (१६७ ) मूलम्-मूलाधारे हि यत्पझ्मं चतुष्पत्रं व्यव- स्थितमू।तत्र कन्देस्ति या योनिस्तस्यां सूर्यो व्यवस्थितः ॥ १४२॥ टीका-जो मूलाधारपझ चारदलसे युक्तहै उस कमल- के कन्दमें जो योनिहै इस योनिमें सूर्य स्थितहै॥१४२॥ भूलम्-तत्मूर्यमण्डलद्ाराद्रिपं क्षरति सन्ततम्॥१४३।पिंगलायाँ विपं तत्र सम- पयति तापनः॥ विप तत्र वहन्ती या धा- रारूपं निरन्तरम्॥ दक्षनासापुटे याति कल्पितेयन्तु घूर्ववत् ॥१४४॥ टीका-वही सूर्यमण्डलसे निरन्तर विष स््नवताहै और पिङ्गलाद्वारा गमन करताहै और वह विष सर्वेदा धारारूप पिङ्गलानाडीसे प्रवाहित रहताहै और यह पिङ्गलानाडी दक्षिणनासापुदमें गईहै॥ १४३॥ मूलम्-आज्ञापङ्गजवामास्यादक्षनासापुटं गता ॥ उदग्वहापिंगलापि पुरासीति प्रकीर्तिता ॥ १४५॥ टीका-यह नाडी आज्ञाकमलके वामभागसे दक्षिण नासिकापुटको गई है इस हेतुसे यह पिङ्गलानाडीको असी कहते हैं॥ १४5॥
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(१६८) शिवसंहिता भापाटीकास मेता । मूलम-आज्ञापद्ममिदं प्रोक्तं यत्र देवो महे- श्वरः॥१४६॥ पीठत्रयं ततश्चोर्ध्व निरु- क्त्तं योगचिन्तकैः। तद्विन्दुनादशत्त्या- खूयं मालपद्मे व्यवस्थितम्॥१४७॥ टीका-इस स्थानमें महेश्वर देवताहै इसको आज्ञापझ्म कहते हैं और योगचिन्तक लोग कहते हैं कि, इस पझमके ऊपर पीठत्रथकी स्थिति है अर्थांत् नाद, विंदु, शक्ति, यह तीनों इस भाळपद्ममें विराज- मान हैं ॥ १४६॥ १४७॥ मूलम-यः करोति सदाध्यानमाज्ञापझ्मस्य गोपितम्। पूर्वजन्मकृतं कर्म विनश्येद- विरोधतः॥ १४८॥॥ टीका-जो पुरुष सर्वदा गोपित करके इस आज्ञा- कमलका ध्यान करते हैं उनका पूर्वजन्मकृत कर्मफल सकल निर्विन्न नाझ होजाताहै॥ १४८॥ मूलम-इह स्थितः सदा योगी ध्यानं कुर्या- न्निरन्तरमू॥ तदा करोति प्रतिमाँ प्रति- जापमनर्थवत्॥१४९॥ टीका-जब योगी यह ध्यान सर्वदा निरन्तर करे
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पंचमपटलः। (१६९) तो उसका प्रतिमाधूजन करना वा जप करना सर्वथा अनर्थवत् है॥ १४९॥ मूलम्-यक्षराक्षसगन्धर्वा अप्सरोगणकिन्न- राः॥ सेवन्ते चरणौ तस्य सर्वे तस्य व- शानुगाः ॥१५०॥ टीका-यक्ष और गक्षस और गन्वर्वे और अप्सरा और किन्नर आदि सब इस ध्यानयुक्त योगीके वशमें होजाते हैं और उसके चरणकी सेवा करते हैं ॥१५०॥ मूलम्-करोति रसनां योगी प्रविष्टां विपरी- तगामू।। लम्बिकोर्ध्वेषु गर्तेषु धृत्वा ध्या- नं भयापह्म् ॥ १५१॥ अस्मिन् स्था- ने मनो यस्य क्षणार्ध वर्ततेऽचलम्॥ तस्य सर्वाणि पापानि संक्षयं यान्ति तत्क्ष- णात् ॥१५२ ॥ टीका-जो योगी विपरीतगामी जिह्वाको ऊपर तालुमूलमें प्रवेश करके यह भयनाशक आज्ञाकमल- का ध्यान अर्धक्षणभी मन अचल स्थिरतापूर्वक करते हैं उनका सकल पातक उसीक्षण नाश होजाताहै॥ १५१॥ १५२॥ मूलम्-यानि यानि हि प्रोक्तानि पंचपझ्ने फ-
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(१७०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। लानि वै। तानि सर्वाणि सुतरामेतज्ज्ञा- नाद्वन्ति हि ॥ १५३ ॥। टीका-पंच पद्मका जो जो फल पहिले कहाहै सो सबका समस्त फल आपही इस आज्ञाकमलके ध्यान- सेही प्राप्त होजायगा॥१५३॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासमाज्ञापझ्मे वि- चक्षणः॥ वासनाया महाबन्धं तिरस्कृ- त्य प्रमोदते ॥ १५४ ॥ टीका-जो बुद्धिमान् सर्वेदा मन स्थिर करके यह आज्ञापद्मका अभ्यास करते हैं वह वासनारुपी महा- बन्धको निरादर करके आनन्द लाभ करते हैं॥१५४॥
न्सुधीः। त्युजेत्प्राणं सधर्मांत्मा परमा- त्मनि लायते ॥-१५५॥ टीका-जो बुद्धिमान् मृत्युके समय उस आज्ञापद्म- का ध्यान करेगा सो धर्मात्मा प्राणको त्यागके परमा- त्मामें लय होजायगा ॥ १५५ ॥ मूलम्-तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् जाग्रत यो- ध्यानं कुरुते नरः॥ पापकर्म विकुर्वाणो नहि मज्जति किल्बिषे॥ १५६ ॥
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पंचमपटलः। (१७१)
टीका-जो मनुष्य बैठे चलते जाग्रतमें स्वप्नमें सर्वदा इस कमलका ध्यान करते हैं सो यदि पापकर्म रतभी हों तोभी मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ १५६॥ मूलम-राजयोगाधिकारी स्यादेतच्विन्तन- तो ध्रुषम्।। योगी बन्धाद्विनिर्मुक्त: स्वीयया प्रभया स्वयम् ॥१५७॥ द्विदलध्यानमा- हात्म्यं कथितुं नैव शक्यते॥ ब्रह्मादिदे- वताश्रैव किश्चिन्मत्तो विदन्ति ते ॥१५८॥ टीका-जो इस कमलका ध्यान करता है वह निश्चय राजयोगका अधिकारी है योगी स्वयं अपने प्रभासे सकलबन्धसे मुक्त होजाता है हे देवि! इस द्विदलपझ्मके माहात्म्यको कोई कहनेमें समर्थ नहीं है ब्रह्मा आदि देवता इस पद्मके माहात्म्यको किशश्वित् हमारे द्वारा जानते हैं ॥ १५७॥ १५८॥ मूलम्-अत ऊर्ध्व तालुमूले सहस्त्रारं सरोरु- हम्॥ अस्ति यत्र सुषुम्णाया मूलं सविव- रं स्थिंतम् ॥१५९॥ टीका-इस आज्ञापझके ऊपर तालुमूलमें सहस्र दल कमल शोभायमान है उसी स्थानमें ब्रह्मरन्त्रके विवरमूलमें सुपुम्णा स्थित है॥१५९॥
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(१७२) शिवसंहिता आषाटी कासमेता। मूलम्-तालुमूले सुषुम्णास्य अधोवक्रा प्रव- तते॥ मूलाधारेण योन्यस्ताः सर्वनाडयः समाश्रिताः ॥ ता बीजभूतास्तत्त्वस्य त्र- ह्ममार्गप्रदायिकाः ॥ १६०॥ टीका-वह सुषुम्णाका झुख तालुमूल अर्थात् ब्र- ह्मरन्त्रमें नीचेको वर्तमान है और मूलाधारसे योनि पर्यत जो सकल नाडी हैं वह इस तत्त्वज्ञानवीजस्वरूप ब्रह्ममार्गकी दाता सुषुम्णाके अधोवदनके अवलम्बसे स्थित हैं ॥ १६० ॥ मूलम्-तालुस्थाने च यत्पझमं सहसत्रारं पुरो- दितमू॥।तत्कन्दे योनिरेकास्ति पश्चिमा- भिमुखी मता॥ १६१॥ तस्य मध्ये सुषु- म्णाया मूलं सविवर स्थितम। ब्रह्मरन्ध्रं तदेवोक्तमामूलाधारपङ्गजम् ॥१६२॥ टीका-तालुस्थानमें जो सहस्रदल कमल कहाग- या है उसके कन्दमें एक योनि पश्चिमाभिसुखी है अर्थात् पीछेको मुख है उस योनिके मध्यमें जो मूलविर है उसमें सुषुम्णा ज्ञाननाडी स्थित है हे देवी! इसको ब्रह्मरन्ध्र और इसीको मूलाधारपझभी कहते हैं॥। १६१॥। १६२ ॥। मूलम्-तत्रांतरन्ध्रे चिच्छक्ति: सुषुम्णा कु-
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ण्डली सदा॥१६३॥ सुषुम्णायां स्थिता नाडी चित्रास्यान्मम वलभे॥ तस्यां म- म मते कार्या ब्रह्मरन्ध्रादिकल्पना॥१६४।। टीका-यह सुषुम्णानाडीके रन्त्रमें कुण्डलिनी शक्ति सर्वदा विराजमान है वह सुषुम्णा अन्तर्गता शक्तिको चित्रानाडी कहते हैं हे परिये पार्वति ! हमारे मतमें इसी चित्रासे ब्रह्मरन्त्र आदि कल्पना भई है॥१६३॥१६४।। मूलम्-यस्याः स्मरणमात्रेण ब्रह्मज्ञत्वं प्र- जायते॥ पापक्षयश्च भवतिन भूय: पुरु- षो भवेत ॥ १६५ ॥ टीका-यह चित्रानाडीके ध्यानमात्रसे ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है और पाप क्षय होजाता है और फिर संसाररुपी बन्धमें योगी नहीं पडता अर्थात् मोक्ष होजाता है॥ १६५॥ मूलम्-प्रवेशितं चलाङष्ठं मुखे स्वस्य निवे- शयेत॥। तेनात्र न वहत्येव देहचारी स- मीरण ॥ १६६ ॥ टीका-दक्षिणहाथके अदुश्वको सुखमें प्रवेश कर- के सुखको बन्द करलेनेसे देहचारी जो प्राणवायु है वह निश्चय स्थिर होजाता है॥१६६॥
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(१७४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-तेन संसारचक्रेस्मिन्न भ्रमन्ते चस- र्वदा।तदर्थ ये प्रवर्तन्ते योगिनः प्राणधार- णे॥१६तत एवाखिला नाडी निरुद- चाष्टवेष्टनम्॥ इयं कुण्डलिनी शक्ती रन्ध्र त्यजति नान्यथा ॥१६८।। टीका-यह प्राणवायुके स्थिर होजानेसे इस संसार चक्रमें सर्वदा भ्रमण करना छूटजाता है अर्थाद मोक्ष होजाता है इसहेतुसे योगी प्राणवायुके धारण करनेमें प्रवृत्त होते हैं और इसधारणसे सकलनाडी जो मल और काम क्रोधादि आठप्रकारसे बन्धनमें हैं वह खुल जाती हैं तब यह कुण्डलिनीशक्ति ब्रह्मरन्ध्रको निश्चय त्याग देती है इसके त्यागदेनेसे जीव ब्रह्मका सम्बन्ध होजाता है ॥ १६७॥ १६८॥ मूलम्-यदा पूर्णांसु नाडीषु सन्निरुद्धानिला स्तदा। बन्धत्यागेन कुण्डल्या मुखं र- न्ध्राद्वहिर्भवेत्॥ सुषुम्णायां सदैवायं व- हेत्प्राणसमीरणः ॥ १६९ ॥ टीका-जब वायु निरोध होके सकलनाडीमें पूर्ण होजायगा तब कुण्डलिनी अपने बन्धको त्याग- के ब्रह्मरन्त्रके सुखको त्यागदेगी तब प्राणवायुका
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पंचमपटल.। (१७५) प्रवाह सदैव सुषुम्णामें होजायगा ॥ १६९ ॥ मूलम्-मूलपद्मस्थिता योनिर्वामदक्षिण- कोणतः।।इडापिंगलयोर्मध्ये सुषुम्णा यो- निमध्यगा॥ १७०॥ ब्रह्मरध्रन्तु तत्रैव सुधुम्णाधारमण्डले ॥ यो जानाति स मुक्त: स्यात्कर्मबन्धाद्विचक्षणः॥१७१॥ टीका-मूलाधारपझमस्थित जो योनि है उस योनिके वाम दक्षिण भागमें इडा और पिंगला नाडी स्थित और दोनों नाडीके बीचमें अर्थात् योनिके मध्यमें सुषुम्णाकी स्थिति है उसी सुषुम्णाके आधारमंडलमें अर्थात् उसके मध्यमें ब्रह्मरन्त्र है जो इसको जानता है सो बुद्धिमान् कर्मबन्धसे मुक्त है॥१७०॥ १७१ ॥ मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रमुखे तासां संगम: स्याद- संशयः॥ तस्मिन्स्नाने स्नातकानां मुक्ति: स्यादविरोधतः॥१७२॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्के सुखमें इन तीनों नाडीका नि- श्रय सम्बन्ध है इसमें स्नान करनेसे ज्ञानीलोगोंको मुक्तिलाम्- होगी॥ १७२ ॥ मूलम्-गंगायमुनयोर्मध्ये वहत्येषा सरस्व- ती।तासां तु संगमे स्नात्वा धन्यो याति परांगतिम् ॥१७३॥
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(१७६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। टीका-गंगा यमुनाके मध्यमें सरस्वतीका प्रवाह यह त्रिवेणीसंगममें सनान करनेसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है॥ १७३॥ मूलम्-इडा गंगा पुरा प्रोक्ता पिंगला चार्कपु त्रिका॥ मध्या सरस्वती प्रोक्ता तासां संगोऽतिदुर्लभः॥ १७४॥ टीका-इडा गंगा है और पिंगला यमुना है और मध्यमें सुषुम्णा सरस्वती है यह त्रिवेणी संगम कहा गया है इसका स्नान अतिदुर्लभ है॥ १७४ ॥ मूलम्-सितासिते संगमे यो मनसा स्ना- नमाचरेत् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो याति ब्रह्मसनातनम् ॥ १७५॥ टीका-यह इडा और पिंगलाके संगममें मानसिक खनान करनेसे साधक सर्व पापसे सुक्त होके सनातन ब्रह्ममें लय होजाताहै॥ १७३ ॥ मूलम्-त्रिवेण्यां संगमे यो वै पितृकर्म स- माचरेत्॥ तारयित्वा पितृन्सर्वान्स याति परमां गतिम् ॥१७६॥ टीका-जो पुरुष इस त्रिवेणीसंगममें पितृकर्मका
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पंचमपटलः। (१७७ ) अनुष्ठान करते हैं वह सर्व पितृकुलको तारके परम गतिको लाभ करते हैं ॥ १७६ ॥ मूलम्-नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रत्यहं यः समाचरेत्।मनसा चिन्तयित्वा तु सोडक्ष- यं फलमापुयात्॥१७७॥ टीका-उसी संगमस्थानमें जो साधक नित्य और नै मित्तिक और काम्य कर्मका अनुष्ठान सर्वदा मनसे चिन्त- नपूर्वक करते हैं सो अक्षय फललाभ करते हैं॥ १७७ ॥ मूलम्-सकृद्य: कुरुते स्नानं स्वर्गे सौख्यं भु- नक्ति सः॥दग्ध्वा पापानशेषान्वै योगी शुद्धमतिः स्वयम्॥१७८॥अपवित्रः पवि- त्रोवा सर्वावस्थां गतोपि वा।स्नानाचर- णमात्रेण पूतो भवति नान्यथा॥ १७९॥ टीका-जो पवित्रमति योगी एकवार इस संगममें स्नान करते हैं वह सर्व पापको दग्धकरके स्वर्गका दिव्य भोग भोगते हैं और यह साधक पवित्र हो वा अपवित्र हो वा किसी अवस्थामें हो यह संगमके ध्यानरूपी स्नानमात्रसे निश्चय पवित्र होजायगा॥१७८॥१७९॥ मूलम्-मृत्युकांले प्लुतं देहं त्रिवेण्या:सलि-
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पंचमपटलः। (१७९) टीका-हे पार्वती! इस ब्रह्मरन्ध्रमें जिसका मन लीन होय सो पुरुषोत्तम योगी अणिमादिगुणोंको भोगके इच्छापूर्वक हमारेमें लथ होजायगा ॥ १८३॥ मूलम्-एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारे स्मिन्वल्भो मे भवेत्सः ॥ पापान् जि- त्वा मुक्तिमार्गा धिकारी ज्ञानं दत्त्वा तार- यत्यद्धुतं वै ॥१८४ ॥ टीका-हे देवी! इस ब्रह्मरन्धके ध्यानमात्रसे यह सं- सारमें प्राणी हमको प्रिय होजाता है और पापराशिको जीतके यह साधक मुक्तिमार्गका अधिकारी होजाता है और अनेक मनुष्योंको ज्ञान उपदेश करके संसार- से परित्राण करदेता है॥१८४ ॥ मूलम्-चतुर्मुखादित्रिदशैरगम्यं योगिवल- भम्। प्रयत्नेन सुगोप्यं तद्रह्मरन्ध्रं म- योदितम् ॥१८५॥ टीका-हे देवी! यह ब्रह्मरन्धरका ध्यान जो हमने कहा है इसको यत्न करके मोपित रखना उचित है यह ज्ञान योगीलोगोंको अतिप्रिय है इसका मार्ग ब्रह्मा आदि देवताओंकोभी अगम्य हैं॥ १८५॥ मृलमं-पुरा मयोक्ता या योनि: सहस्त्रारे स-
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(१८०) शिवसंहिता भाषाटी कास मेता । रोरुहे ॥ तस्याडधो वर्तते चन्द्रस्तद्चानं क्रियते बुधैः ॥ १८६॥ टीका-हे देवि! पहिले जो सहस्रदलकमलके मध्यमें योनिमण्डल हमने कहा है उस योनिके अधोभागमें चन्द्रमा स्थित हैं यह चन्द्रमण्डलका बुद्धिमान् लोग सर्वदा ध्यान करते हैं॥ १८६॥ मूलम्-यस्य स्मरणमात्रेण योगीन्द्रोऽव- निमण्ड ले।।पूज्यो भवति देवानां सिद्धानां सम्मतो भवेत ॥ १८७ ॥ टीका-इस चन्द्रमंडलके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र संसारमें पूजनीय होजाता है और देवता और सिद्ध- लोगोंके तुल्य होजाता है॥१८७॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे ध्यायेदुग्धमहो- दधिम्॥ तत्र स्थित्वा सहस्रारे पझ्मे चन्द्रं विचिन्तयेत् ॥१८८॥ टीका-शिरस्थित जो कपालविवर है उसमें क्षीर समुद्रका ध्यान करे उसी स्थानमें स्थितिपूर्वक सहस्र- दलकमलमें चन्द्रमाका चिन्तन करे॥ १८८ ॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे द्विरष्टकलयायु- तः॥ पीयूषभानुहंसाख्यं भावयेत्तं निरं-
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पंचमपटलः (१८१) जनम् ॥१८९॥ निरन्तरकृताभ्यासात्ि- दिने पश्यति ध्रुवम्। दृष्टिमात्रेण पापौघं दहत्येव स साधकः ॥ १९०॥ टीका-वह शिरःस्थित कपालविवरमें सोलह कलासं- युक्त अमृतकिरणसे युक्त हंससंज्ञक निरंजनका चिन्तन करे निरन्तर तीन दिन यह अभ्यास करनेसे निरञ्जनका साक्षात् साघकको अवश्य प्रकाश होगा सो साधकदृष्टिमा- तसे सर्वे पातकोंको दहन करडालेगा ॥ १८९॥१९०॥ मूलम्-अनागतञ्च स्फुरति चित्तशुद्धिभवे- त्खलु। सद: कृत्वापि दहति महापात- कपश्चकम् ॥१९१॥ टीका-यह ध्यान करनेसे अनागतविषयकी स्फू- र्ति होगी अर्थात् जो विषय कभी उत्पन्न नहीं भया है उसकी स्फूर्ति होगी और चित्तकी शुद्धि होगी और सा- धक ध्यानमात्रसे उसी क्षण पश्चमहापातक दहन कर- डालेगा॥ १९१ ॥ मूलम्-आनुकूल्यं ग्रहा यान्ति सर्वे नश्य- न्त्युपद्रवाः॥ उपसर्गाः शमं यान्ति युद्धे जयमवाप्तुयात्॥।१९२॥ खेचरीभूचरी- सिद्धिर्भवेत्क्षीरेन्दुदशनात्॥। ध्यानादेव
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(१८२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। भवेत्सर्व नात्र कार्या विचारणा ॥ १९३॥ सन्तताभ्यासयोगेन सिद्धो भवति मा- नवः। सत्यं सत्यं पुनः सत्यं मम तुल्यो भवेहुवम्॥ योगशास्त्रं च परमंयोगिनां सिद्धिदायकम् ॥ १९४॥ टीका-शिरःस्थचन्द्रमाका ध्यान करनेसे सर्व ग्रह अनुकूल होजाते हैं और समस्त उपद्रवका नाश होजा- ताहै और उपसर्ग प्रशमित होते हैं और युद्धमें जय लाभ होता है और खेचरी भूचरीकी सिद्धि प्राप्त होती है इसमें सन्देह नहीं है और निरन्तर यह योगाभ्यास करनेसे अवश्य साधक सिद्ध होजाता है हे पार्वती! हम सत्य सत्य वारंवार कहते हैं कि हमारे तुल्य होजाय गा इसमें सन्देह नहीं है यह परमयोग योगीलोगोंके सिद्धिका दाता है ॥ १९२॥ १९३॥ १९४॥ अथ राजयोगकथनम्। मूलम-अत ऊर्ध्व दिव्यरूपंसहस्त्रारं सरोरु- हम्। ब्रह्माण्डाख्यस्य देहस्य बाह्ये तिष्ठति मुक्तिदम्॥१९५॥ कैलासो नाम तस्यैव महेशो यत्रं तिष्ठति॥अकुलाख्योऽ- विनाशी च क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥ १९६॥
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पंचमपटलः । (१८३)
टोका-तालुके ऊपरभागमें दिव्य सहस्रदल कमल है यह कमल मुक्तिदाता ब्रह्माण्डरूपी शरीरके वाहर स्थित है अर्थात् शरीरके ऊपर अंतमें है इसी कमल- को कैलास कहते हैं इसी स्थानमें महेश्वरकी स्थिति है यह ईश्वर निराकुल अविनाशी और क्षयवद्विरहित है॥ १९५॥ १९६ ॥ मूलम्-स्थानस्यास्य ज्ञानमात्रेण नृणां सं सारेऽस्मिन्सम्भवो नैव भूय: ॥ भूतग्रा- मं सन्तताभ्यासयोगात्कर्तु हर्तु स्याच्च शक्ति: समग्रा ॥ १९७॥ टीका-इस स्थानके ज्ञानमात्रसे जीवका यह सं- सारमें फिर जन्म नहीं होता और सर्वदा यह ज्ञानयोग अभ्यास करनेसे जीवमात्रके स्थिति संहार करनेकी झक्ति उत्पन्न होती है। १९७॥ मूलम्-स्थाने परे हंसनिवासभूते कैलासना- म्नीह निविष्टचेताः।।योगी हतव्याधिरधः कृताधिर्वायुश्चिरं जीवति मृत्युमुक्त: १९८॥ टीकान्यह कैलासनामक स्थानमें परमहंसका निवास है सो सहस्रदलकमलमें जो साधक मनको स्थिर करता है उसकी सकल व्याधि नाश होजाती है और भृत्युसे छूटके अमर होजाताहै।। १९८ ॥
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(१८४) शिवसंहिता भाषाटीका समेता । मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना कुलाख्ये पर- मेश्वरे॥तदा समाधिसाम्येन योगी निश्च- लतां ब्रजेत्॥१९९॥ टीका-जब साधक यह कुलनामक ईश्वरमें चित्त- को लीन करदेगा तब योगीकी समाधि निश्चल सम होजायगी ॥ १९९ ॥ मूलम्-निरन्तरकृते ध्याने जगद्विस्मरणं भवेत्।I तदा विचित्रसामर्थ्य योगिनो भवति ध्रुवम् ॥२००॥ टीका-यह निरन्तर ध्यान करनेसे जगत् विस्मरण होजायगा तब योगीको अवश्य विचित्र सामर्थ्य हो- जायगी ॥ २०० ॥ मूलम्-तस्माद्वलितपीयूषं पिबेद्योगी निर- न्तरम्।। मृत्योमृत्युं विधायाशु कुलं जि- त्वा सरोरुहे॥ २०१॥ अत्र कुण्डलिनी शक्तिर्लयं याति कुलाभिधा॥ तदा चतु- विधा सृष्टिलीयते परमात्मनि॥ २०२॥ टीका-सहस्रदलकमलसे जो अमृत स्त्रवता है उ- सको योगी निरन्तर पान करता है सो योगी अपने मृ- त्युका मृत्युविधानपूर्वक कुलसहित जय करके चिरं-
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पैचमपटलः । (9€4) जीवी होजाता है और यही सहसदलकमलमें कुटरूपा कुण्डलिनी शक्तिका लय होजाता है तब यह चतुर्विध सृष्टिभी परमात्मामें लय होजाती है॥२०१॥२०२॥ मूलम्-यज्ज्ञात्वा प्राप्य विषयं चित्तवृत्ति- र्विलीयते। तस्मिन्परिश्रमं योगी करो- ति निरपेक्षकः ॥ २०३॥ टीका-यह सहस्त्रदलकमलके ज्ञान होनेसे अर्थीत् इस विषयको प्राप्त करनेसे चित्तवृत्तिका लय होजाता है इस हेतुसे इसके ज्ञानार्थ निरपेक्षरूपसे योगी परिश्र म करे ॥ २०३॥ मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन्योगी भवेद्धुवमू॥ तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपो निरञ्नः॥२०४॥ टीका-जब योगीकी चित्तवृन्ति इसमें निश्चय लय होजायगी तब अखण्ड ज्ञानरूपी निरजनका प्रकाश होगा अर्थात् ज्ञान होगा॥२०॥ मूलम्-ब्रह्मांडवाह्ये संचिंत्य स्वप्रतीकं य- थोदितम्॥ तमावेश्य महच्छून्यं चिन्त- येदविरोधतः।।२०५।। टीका-ब्रह्माण्डके बाहर अर्थात् ब्रहमांडरूप शरीरके
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(१८६) शिवसंहिता आाषाटीकासमेता ।
बाहर पूर्वोंक्त स्वप्रतीकका चिन्तन करे उससे चित्तको स्थिर करके महत शून्यका शुद्धवृत्तिसे चिन्तन करे२०५ मूलम्-आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यस- मप्रभम् ॥ चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाशुयात् ॥२०६॥। टीका-आदि अंत मव्य शून्य यह सर्वत्र शून्यमें कोटि सूर्यके समान प्रभा और कोटिचन्द्रके समान शीतलप्रकाशके देखनेका अभ्यास करनेसे साधकको परमसिद्धि लाभ होगी ॥२०६॥ मूलम्-एतद्चानं सदा कुर्यादनालस्यं दिने दिने। तस्य स्यात्सकला सिद्धिर्व- त्सरान्नात्र संशयः॥२०७॥ टीका-जो पुरुष आलस्यको त्यागके सर्वेदा प्रति- दिन इस शून्यका ध्यान करेगा उसको निश्चय एकवर्ष में सकल सिद्धि लाभ होगी॥२०७॥ मूलम्-क्षणार्ध निश्चलं तत्र मनो यस्य भ- वेदवम्॥स एव योगी सद्धक्त: सर्वलोकेषु पूजितः ॥ तस्य कल्मषसङतस्ततक्षणा- देव नश्यति ॥ २ं०८॥ टीका-धो साधक इस शून्यमें अर्धक्षणभी मनको
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पंचमपटलः। (१८७) निश्चल स्थिर रक्खेगा वही निश्चय यथार्थभक्त योगी है और वह सर्वलोकमें पूजित होता है और उसके पाप- का समूह उसी क्षण नष्ट होजाता है॥ २०८॥ मूलम्-यं दृद्वा न प्रवर्तते मृत्युसंसारव- तर्मनि।अभ्यसेत्तं प्रयतनेन स्वाधिष्ठानेन वर्त्मना ॥ २०९॥ टीका-इसके अवलोकन करनेसे मृत्युरूप जो सं- सारपथ है इसमें भ्रमण करना छूट जायगा अर्थात् जन्ममरणसे रहित होजायगा इसका अभ्यास स्वाधि- ष्ठानमार्ग से यत्न करके करना उचित है॥२०९॥ मूलम्-एतद्वयानस्य माहात्म्यं मया वत्तुं न शक्यते ॥ यः साधयति जानाति सोस्माकमपि सम्मतः ॥ २१०॥ टीका-हे देवी! इस झून्यके ध्यानके माहात्म्यको हम नहीं कहसकते अ्थीत् बहुत विशेष है जो योगी इसका अभ्यास करते हैं सो जानते हैं और वह हमारे बरावर हैं॥२१०॥ मूलम्-ध्यानादेव विजानाति विचित्रफल- सम्भवम् ॥ अणिमादिगुणोपेतो भवत्ये- व न संशयः ॥२११॥
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(१८८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। टीका-यह शून्यके ध्यानका विचित्र फल ध्यानसे ही जाना जाता है इसके प्रभावसे साधकको अणिमादि अष्टसिद्धि अवश्य प्राप्त होती है॥२११॥ मूलम्-राजयोगो मयाख्यातः सर्वतन्त्रेषु गोपितः ॥राजाधिराजयोगोडयं कथया- मि समासतः॥ २१२।। टीका-हे पार्वती! यह राजयोग सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है सो तुमसे हमने कहा है अब राजाधिराज यो- ग विस्तारसहित कहते हैं श्रवण करो॥२१२॥ मूलम्-स्वस्तिकश्चासनं कृत्वा सुमठे जन्तु- वर्जिते॥ गुरुं संपूज्य यत्नेन ध्यानमेत- त्समाचरेत् ॥ २१३॥ टीका-साधक एकांतस्थान जनरहित सुन्दर मठमें यत्नपूर्वक गुरुकी पूजा करके स्वस्तिकासनसे स्थित होके यह ध्यान करे॥ २१३॥ मूलम्-निरालम्वं भवेज्जीवं ज्ञात्वा वेदान्त- युक्तितः। निरालम्बंमनः कृला न किश्चि- च्िन्तयेत्सुधीः॥२१४॥ टीका-बुद्धिमान् योगी वेदांतयुक्ति अनुसार जीव को और मनको निरालम्ब करके चिन्तन करे इसके सिवाय और कुछ चिन्तना न करे॥ २१४॥
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पंचमपटलः । (१८९) मूलम्-एतद्चानान्महासिद्धिर्भवत्येव न संशयः ॥ वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णरूपं स्वयं भवेत् ॥२१५ ॥ टीका-इसप्रकार ध्यान करनेसे महासिद्धि उत्पन्न होगी इसमें संशय नहीं है ऐसेही मनको वृत्तिहीन करके साधक आपही पूर्ण आत्मस्वरूप होजायगा ॥ २१५॥ मूलम्-साधयेत्सततं यो वै सयोगी विगत- स्ृहः॥ अहंनाम न कोप्यस्ति सर्वदा- त्मैव विद्यते॥ २१६॥ टीका-जो योगी निरन्तर इसप्रकार साधन करे सो इच्छारहित है अर्थात् उसको किसी वस्तुकी इच्छा न होगी और उसके वदनसे अहंशब्द कभी उच्चारण न होगी वह सर्वदा सर्ववस्तुको आत्मस्वरूपही देखेगा॥ २१६॥ मूलम्-को बन्धः कस्य वा मोक्ष एकं पशये- त्सदा हिसः॥ २१७॥ एतत्करोति यो नित्यं समुक्तो नात्र संशयः॥।स एव योगी सद्धक्त: सर्वलोकेषु पूजितः ॥२१८॥ टीका-कौन बन्ध है और क्या मोक्ष है सर्वदा एक परिपूर्ण आत्माको देखे जो योगी यह नित्य चिन्तन क-
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(१९०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। रता है सो मुक्त है इसमें संशय नहीं है और निश्चय वही योगी सद्दक्त है और सर्वलोकमें पूजनीय है२१७॥२१८।। मूलम्-अहमस्मीति यन्मत्वा जीवात्मपर- मात्मनोः।।अहं त्वमेतदुभयं त्यक्काखण्डं विचिन्तयेत्॥२१९। अध्यारोपापवादा- भ्यां यत्र सर्वे विलीयते॥ तद्रीजमाश्रये- द्योगी सर्वसंगविवर्जितः॥२२०॥ टीका-योगी अपनेको और जीवात्मा और परमा- त्माको तुल्य माने अर्थात् भेदरहित होजाय और हम और तुम यह दोनों भावको त्यागके एक अखण्ड ब्रह्मका चिन्तन करे अध्यारोपअपवादद्वारा जिसमें सर्व वस्तुका लय होजाता है योगी सर्वसङ्गसे रहित होके उसी बीजके आश्रय होजाय अर्थात् चित्तवृत्ति- को आत्मामें लय करदे ॥२१९॥२२०॥ मूलम्-अपरोक्षं चिदानन्दं पूर्ण त्यक्का भ्र माकुलाः॥ परोक्षं चापरोक्षं च कृत्वा मूढा भ्रमन्ति वै॥ २२१॥ टीका-मूढबुद्धिके मनुष्य अपरोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष परि- पूर्णब्रह्मको छोड करके भ्ममें पडके परोक्ष और अप- रोक्षका रात्रि दिवस निर्णय करते फिरते हैं॥२२१॥
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पंचमपटलः। (१९१)
मूलम्-चराचरमिदं विश्वं परोक्षं यः करो- ति च॥ अपरोक्षं परं ब्रह्म त्यक्तं लस्मिन् प्रलीयते ॥२२२ ॥ टीका-जो मनुष्य यह चराचरसंसारको शास्त्रसे विवाद करके परोक्ष करते हैं और अपरोक्ष परत्रह्मको त्यागदेते हैं अर्थात् ब्रह्मभी प्राप्त नहीं होता वह अज्ञानी संसारमें लय होते हैं अर्थात् उनका मोक्ष नहीं होता है॥। २२२ ।। मूलम-ज्ञानकारणमज्ञानं यथा नोत्पद्यते भृशम्॥ अभ्यासं कुरुते योगी सदा सङ्गविवर्जितम् ॥ २२३।। टीका-जिससे ज्ञान उत्पन्न होता है और अज्ञान- का नाश होता है इसी योगअभ्यासको योगी सर्वदा सङ्गरहित होके अभ्यास करे ॥ २२३ ॥। मूलम्-सर्वेन्द्रियाणि संयम्य विषयेभ्यो विचक्षणः।। विषयेभ्यः सुषुप्यैव तिष्ठेत्संग- विवर्जितः॥२२४॥ टीका-बुद्धिमान् योगी विषयोंसे इंद्रियोंको रोकके सङ्गरहित होके विषयके त्यागमें सुषुतिके समान स्थिर रहते हैं॥२२४॥
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(१९२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता।
मूलम्-एवमभ्यासतो नित्यं स्वप्नकाश प्र- काशते॥ श्रोतुं बुद्धिसमर्थार्थ निवर्तन्ते गुरोर्गिरः॥ तदभ्यासवशादेकं स्वती ज्ञा- नं प्रवर्तते ॥२२५॥ टीका-इसी प्रकार नित्य अभ्यास करनेसे साधक- को आरही ज्ञानका प्रकाश़ होगा तब गुरुके वचनकी निवृत्ति होगी अर्थात गुरुके उपदेशका अंत हो जा- यगा जन इतरवाकय श्रवण करनेकी इच्छा निवृत्त होजायगी तब यह योगअभ्यासद्वारा आपही एक अद्वैतज्ञानमें प्रवृत्ति होगी ॥२२५ ॥ मूलम्-यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मन- सा सहा। साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद्गरवम् ॥ २२६ ॥ टीका-यह ब्रह्म किसी प्रकार प्राप्त नहीं होता मन वाक्यकाभी गगन नहीं है परन्तु यह योगसाधनसे आ- पही निर्मल ज्ञान प्रकाश होता है॥ २२६.।। मूलम्-हठं बिना राजयोगो राजयोगं विना हठः॥ तस्मात्प्रवर्तते योगी हठे सहुरु मार्गतः ॥ २२७॥
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पंचमपटलः। (१९३) टीका-हठयोगके विना राजयोग और राजयोगके बिना हठयोग सिद्ध नहीं होता इस हेतुसे योगीको उचित है कि, योगवेत्ता सद्गरुद्वाग हठयोगमें प्रवृत्त हो ॥ २२७॥ मूलम्-स्थिते देहे जीवात च योगं न श्रि- यते भृशम्॥ इन्द्रियार्थोपभोगेषु स जी वति न संशयः ॥ २२८॥ टीका-जो मनुष्य इस शरौरसे योगका आसग नहीं ग्रहण करते हैं वह केवल इंद्रियोंके भोग भोगनेके अर्थ संसारमें जीते हैं इसमें संशय नहीं है॥ २२८॥ मूलम्-अभ्यासपाकपर्यन्तं मितान्नं स्मर- णं भवेत।। अन्यथा साधनं धीमान्कर्तु पारयतीह न ॥ २२९॥ टीका-बुद्धिमान् साधक योग अभ्यासके आरंभसे अभ्याससिद्धिपर्यत मिताहारी रहे अर्थात् प्रमाणका भोजन करे अन्यथा अर्थात् अप्रमाण भोजन करनेसे योग अभ्यासके, पार न होगा अर्थात सिद्ध न होगा ॥२२१॥ मूलम्-अतीवसाधुसंलापं साधुसम्मति बुद्धिमान्॥करोति पिण्डरक्षार्थ बह्वालाप-
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(१९४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विवर्जितः॥२३०। त्याज्यते त्यज्यते स- ङ्ं सर्वथा त्यज्यते भृशम्॥अन्यथा न ल- भेन्मुक्तिं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥२३१।। टीका-वुद्धिमान् साधक सभामें साधुके समान थोडा और प्रमाण वाक्य बोले और शरीरके रक्षार्थ थोडा भोजन करे और संगको सर्व प्रकारसे तजदे कदापि किसीके संगमें लिप् न होय हे पार्वति ! और दूसरे प्रकार कदापि मुक्ति नहीं पावेगा यह हम सर्वथा सत्य कहते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२३०।। २३१।। मूलम्-ग्रत्यैव क्रियतेऽभ्यास: संगं त्यक्का तदन्तरे। व्यवहाराय कर्तव्यो वाह्यसं- गो न रागतः।। २३२॥ स्वे स्वे कर्मणि वर्तन्ते सर्वें ते कर्मसम्भवाः।निमित्तमात्रं करणे न दोषोस्ति कदाचन ॥ २३३॥ टीका-साधक संगरहित होके एकान्त स्थानमें योगसाधन करे यदि संसारी मनुष्योंसे व्यवहार वर्त- नेकी इच्छा करे तो अन्तर प्रीतिरहित होके बाह्यसंग करे और अपना आश्रम धर्म कर्मभी इसी प्रकार कर- ता रहै इस हेतुसे कि, ज्ञानादि यावत कर्म हैं सब कर्मा- नुसार होते हैं फलइच्छारहित होके केवल निमित्त
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पंचमपटलः । (१९५) मात्र कर्म करनेसे कदापि दोष नहीं है।।२३२।।२३३।। मूलम्-एवं निश्चित्य सुधिया गृहस्थोपि यदाचरेत्॥। तदा सिद्धिमवापोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २३४ ॥। टीका-इसी प्रकार निश्चयबुद्धिसे यदि गृहस्थभी योगअभ्यास करे तो वह अवश्य सिद्धि लाभ करेगा इसमें संशय नहीं है॥। २३४।। मूलम्-पापपुण्यविनिर्मुक्त: परित्यक्ताङ्गसा- धकः॥यो भवेत्स विमुक्तः स्याद्हे ति- धन्सदा गृही॥ २३५ ॥ न पापपुण्यैर्लि- प्येत योगयुक्तो यदा गृही॥ कुर्वन्नपि तदा पापान्स्वकार्ये लोकसंग्रहे॥२३६ ॥ टोका-जो साधक पाप पुण्यसे निर्लित इन्द्रियसं- गत्यागी है सोई गृही साधक गृहमें रहके मुक्त है योग- युक्त गृही पाप पुण्यमें बद्ध नहीं होता यदि संसारके संग्रहमें पापभी करेगा तो वह ्पाप उसको स्पर्श न करेगा ॥ २३५ ॥ २३६॥ मूलम्-अधुना संप्रवक्ष्यामि मन्त्रसाधन- मुत्तमम्॥ ऐहिकामुष्मिंकसुखं येन स्या- दविरोधतः ।। २३७॥
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(१९६) शिवसंहिता आषा/टीकासमेता । टीका-हे देवि ! अब उत्तम मन्त्रसाधन हम कहते हैं जिससे इस लोक और परलोक दोनों स्थानमें साधक आनन्दपूर्वक सुख भोगेगा ॥ २३७ ॥ मूलम्-यस्मिन्मन्त्रेवरे ज्ञाते योगसिद्धिर्भ- वेत्खल॥ योगेन साधकेन्द्रस्य सर्वैश्वर्य- सुखम्रदा ॥ २३८ । टीका-यह उत्तम मन्त्रके ज्ञान होनेसे निश्चय योग सिद्ध होता है साधकेन्द्रको यह योग सर्व ऐश्रर्य सुखका दाता है ॥ २३८ ।। मूलम-मूलाधारेस्ति यत्पदं चतुर्दलसम- न्वितम् । तन्मध्ये वाग्भवं बीज विस्फु रन्तं तडित्प्रभम् ॥२३९। हदये कामबी- जंतु बन्धूककुसुमप्रभम्॥ आज्ञारविन्दे शत्त्याख्यं चन्द्रकोटिसम प्रभम्॥२४०। बीजत्रयमिद गोप्यं भुक्तिमुक्तिफलप्र- दम्॥ एतन्मन्त्रत्रयं योगी साधयेत्सि- द्विसाधकः ॥ २४१ ॥ टीका-जो मूलाधार चतुर्दलसंयुक्त पद्म है उसमें विद्युत्के समान प्रभायुक्त वाग्बीजकी स्थिति है और हृदयकमलमें बन्धूकपुष्यके समान प्रभायुक्त कीमबी
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पंचमपटलः। (१९७) जकी स्थिति है और आज्ञाकमलमें कोटिचन्द्रके समान प्रभायुक्त शक्तिबीजकी स्थिति है यह वीजत्रय परम गोपनीय भोग और सुक्तिके दाता हैं यह तीनों मन्त्रका साधक योगी अवश्यसाधन करे॥२३९॥२४०॥२४१॥ मूलम् -- एतन्मन्त्रं गुरोर्लब्धा न दुतं न वि- लम्बितम्॥। अक्षराक्षरसन्धानं निःसन्दि- ग्धमना जपेत् ॥ २४२॥ टीका-साधक गुरुसे यह मन्त्रका उपदेश लेके धी- रे धीरे अक्षर अक्षर स्पष्ट उच्चारणपूर्वक स्थिर मन हो- के जप करे॥ २४२ ॥
सुधीः।। देव्यास्तु पुरतो लक्षें हुत्वा लक्ष- त्रयं जपेत् ॥ २४३ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक एकाग्रचित्तसे शास्त्रवि- घिअनुसार देवीके समीपमें एक लक्ष होम करके ती- नलक्ष जप करे॥ २४३॥ मूलम्-करवीर प्रसूनन्तु गुडक्षीराज्यसंयु- तम् ॥ कुण्डे योन्याकृते धीमाअ्जपान्ते जुहुयात्सुधीः॥ २४४॥ टीका-बुद्धिमांन् साधकं जपके पीछे योन्याकार-
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(१९८) शिवसंहिता आषाटीकासमेता । कुण्ड बनायके कनेरपुष्पके साथ गुड और दूध और धृत मिलायके होम करे ॥ २४४॥ मूलम्-अनुष्ठाने कृते धीमान्पूर्वसेवा कृता भवेत्॥ ततो ददाति कामान्वै देवी त्रिपु- रभैरवी ॥ २४५॥ टीका-बुद्धिमान् साधक इसीप्रकार अनुष्ठानपूर्वक आराधना करके त्रिपुरभैरवी देवीको सन्तुष्ट करे तो उसको इच्छापूर्वक देवी फल देती है ॥ २४५॥ मूलम्-गुरुं सन्तोष्य विधिवलब्ध्वा म- न्त्रवरोत्तमम् । अनेन विधिना युक्तो म- न्दभाग्योऽपि सिद्धचति॥२४६ ॥ टीका-साधक विधिपूर्वक गुरुको संतोष करके यह उत्तम मन्त्र ग्रहण करे इस विधानसंयुक्त ग्रहण कर- नेसे मन्दभाग्य साधकभी सिद्धि लाभ करते हैं ॥२४६।। मूलम्-लक्षमेकं जपेद्यस्तु साधको विजिते- न्द्रियः॥ २४७ ॥ दर्शनात्तस्य क्षुभ्यन्ते योषितो मदनातुराः ॥ पतन्ति साधक- स्याग्रे निर्लज्ा भयवर्जिताः। २४८॥ टीका-योगी इन्द्रियनिग्रहपूर्वक एक लक्ष जप करे तो उसके दर्शनमात्रसे कामातुर स्त्रियें मोहित
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पंचमपटलः । ( ३९९ ) होयके साघकके आगे निर्लेज् और भयरहित होके गिरती हैं॥ २४७॥२४८॥ मूलम् -- जप्ेन च द्विलक्षेण ये यस्मिन्विपये स्थिताः॥आगच्छन्ति यथातीर्थ विमुक्त कुल विग्यहाः ॥ददति तस्य सर्वस्वं तस्यै- व च वशे स्थिताः॥२४९।। टीका-यह मन्त्र दो लक्ष जप करनेसे कामिनी स्तिरियें साधकके समीप इसप्रकार आतीहैं कि, जैसे कुलीना तीथोंमें भय लज्ा रहित होके जाती हैं और साधकके वशमें होके अपना सर्वस्व उसको देती हैं॥२४९॥
मण्डला:॥२५०॥ वशमायान्ति ते सरवे नात्र कार्या विचारणाI पड़िर्लक्षैर्म हीपालं सभृत्यबलवाहनम् ॥ २५१ ॥ टीका-तीन लक्ष जप करनेसे मंडलसहित मंडल- पती राजा साधकके वशमें होजाँयगे इसमें संशय नहीं है और छः लक्ष जप करनेसे बुल वाहन संयुक्त राजा साधकके वश होज़ायगा॥ २५०॥२५१॥ मूलम्-लक्षैर्द्रांदश भिर्जप्ैर्यक्षरक्षोरगेश्व-
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(२०0) शिवसंहिता आषाटीकासमेता । राः।वशमायान्ति ते सव आज्ञां कुर्वन्ति नित्यशः॥२५२॥ टीका-यह मन्त्र बारह लक्ष जप करनेसे यक्ष और राक्षस और पन्नग यह सब बशमें होके साधककी नि- त्य आज्ञा पालन करतेहैं ॥ २५२ ॥ मूलम्-त्रिपश्चलक्षजप्ैस्तु साधकेन्द्रस्य धीमतः।।सिद्धविद्याघराश्चैव गन्धर्वाप्सर- सांगणा:॥२५३॥ वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा ॥ हठाच्छ्रवणवि- ज्ञानं सर्वेजत्वं प्रजायते ॥ २५४ ॥ टीका-पन्द्रहलक्ष जप करनेसे सिद्ध आर विद्याधर और गंधर्व और अप्सरा यह सब बुद्धिमान् साधकके वशमें होजाते हैं इसमें संदेह नहीं है और साधकको हठसे विशेष श्रवणशक्ति होगी और सर्ववस्तुका ज्ञान उत्पन्न होगा॥ २५३॥२५४॥ मूलम्-तथाष्टादशभिर्लेक्षैदेहेनानेन साध- कः॥ उत्तिष्ठेन्मेदिनीं त्यक्का दिव्यदेह- स्तु जायते॥ भ्रमते स्वेच्छया लोके छि- द्रां पश्यति मेदिनीम्॥२५५॥ टीका-जो साधक अठारह लक्ष जप करेगा वह भू-
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पंचमपटलः । (२०१) मिको त्यागके दिव्य देह होके आकाशमार्गस संसारमें इच्छापूर्वक भ्रमण करेगा और पृथ्वीके छिद्धोंको देखे- गा अर्थात पृथ्वीमें प्रवेश करनेके मार्ग देखेगा॥२५५।
वेत॥। साधकस्तु भवेद्ीमान्कामरूपो म- हाबलः ॥ २५६॥ त्रिंशलक्षैस्तथाजसैर्व- ह्रविष्णुसमो भवेत् ॥ रुदरत्वं पष्टिभिर्लक्षै- रमरत्वमशीतिभिः॥२५७॥ कोटचैकया महायोगी लीयते परमे पदे॥ साधकस्तु भवद्यागी त्रैलोक्ये सोडतिदुर्लभः॥।२५८॥ टीका-जो बुद्धिमान् साधक अट्ठाईस लक्ष जप करे- गा वह महावल कामरूपी और विद्याधरपति होजायगा और तीस लक्ष जप करनेसे साधक ब्रह्मा विष्णुके समान होजायगा और साठ लक्ष जप करनेसे रुद्रके समान हो- जायगा और अस्सी लक्ष जप करनेसे साधक सर्व भूतोंको प्रिय देव होजायगा और एककोटि जप करनेसे साधक महायोगी होयके परमपदमें लीन होजाताहै हे पार्वति ! इसप्रकार योगी त्रिसुवनमें दुर्लभहै॥२५६॥२५७२५८।। मूलम्-त्रिपुरे त्रिपुरन्त्वेकं शिवं परमकार णमे ॥२५९॥ अक्षर्य तत्पदं शान्तमप्र-
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(२०२) शिवसंहिता भाषाटी कासमेता। मेयमनामयम्।। लभतेऽसौ नसन्देहोधी- मान्सर्वमभीप्सितम् ॥ २६० ॥ टीका-हे पार्वति! त्रिपुरस्थानमें एक शिवही परमका- पर स्वरूप हैं उनका चरणकमल अक्षय शान्त अप्रमेय अर्थात् प्रमाणरहित अनामय अर्थात रोगरहित है उनका पद बुद्धिमान् योगीलोगही इच्छापूर्वक लाभ करहते हैं इसमें संदेह नहीं है॥ २५९॥२६०।। मूलम्-शिवविद्या महाविद्या गप्ा चाग्रे महे- श्वरी॥ मद्भाषितमिदं शासत्रं गोपनीयमतो बुधैः॥ २६१ ॥ टीका-हे महादेवि! यह हमारी कहीहुई महाविद्या- कोही शिवविद्या कहते हैं यह विद्या सर्वप्रकार गोपनीय है इस योगशास्त्रको बुद्धिमान् लोग कदापि प्रकाश नहीं करते हैं॥ २६१॥ मूलम्-हठविद्या परंगोप्या योगिना सिद्धि- मिच्छता॥ भवेद्ीर्यवती गप्ता निर्वीर्या च प्रकाशिता ॥ २६२।। टीका-सिद्धिकांक्षी योगीलोग इस हठविद्याको अतिगोपित रक्खें यह गोप्य रखनेसे वीर्यवती रहतीहै और प्रकाश करनेसे निर्वीयाँ होजातीहैं॥२६२॥
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पंचमपटलः । (२०३) मूलम्-य इदं पठते नित्यमाद्योपान्तं विच- क्षण: ॥ योगसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमेणैव न संशयः॥स मोक्षं लभते धीमान्य इदं नित्यमर्चयेत् ॥ २६३ ॥ टीका-जो विद्रान् यह शिवसंहिताका नित्य आ दयोपान्त पाठ करेगा उसको कमसे अवशय योगसिद्धि होगी और जो बुद्धिमान् इस ग्रन्थका नित्य पूजन क- रेगा उसको मुक्ति लाभ होगी॥ २६३॥ मूलम्-मोक्षार्थिभ्यश्च सर्वेम्यः साधुभ्यः श्रावयेदपि॥२६४॥क्रियायुक्तस्य सिद्धि: स्यादक्रियस्य कथम्भवेत्॥तस्मात्किया विधानेन कर्तव्या योगिपुंगवैः ॥ २६५॥ यदच्छालाभसन्तुष्टः सन्त्यक्तान्तरसंग- कः। गृहस्थश्चाप्यनासक्त स मुक्तो यो- गसाधनात्॥ २६६ ॥।. टीका-मोक्षार्थी और सर्व साधु मनुष्य उनको यह शिवसंहिताग्रंथ सुनाना. जो क्रियासे युक्त होगा उसको सिद्धि प्राप्त होगी कियाहीन मनुष्यको क्या होसकताहै अर्थात सिद्धि लाभ नहीं होसकती विधानपूर्वक क्रियाका अनुष्ठान करे तो इच्छापूर्वक लाभसे सन्तुष्ट होगा और
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(२०४ ) शिवसंहिता भाषाटी का समेता । जो गृहस्थ होगा और इन्द्रियोंमें आसक न होगा सो मनु- षव योगसाधनसे मुकतहोगा॥ २६४॥२६५।।२६६।। मूलम्-गृहस्थानां भवेत्सिद्धिरीश्वराणां जपेन वै।। योगक्रियाभियुक्तानां तस्मा- त्संयतते गृही ॥ २६७॥ टीका-योगक्रियावान् गृहस्थ लोगोंको जप करनेसे सिद्धि प्राप्तहोगी इस हेतुसे योगसाधनमें गृहस्थ मनु- षयको यत्न करना उचित है॥। २६७ ।। मूलम्-गेहे स्थित्वा पुत्रदारादिपूर्णः सङ्कं त्यक्का चान्तरे योगमार्गे।। सिद्धेश्चिह्नं वी- क्ष्य पश्चाद् गृहस्थः क्रीडेत्सो वै सम्मतं साधयित्वा ॥ २६८ ॥ टीका-जो गृहस्थ गृहमें रहके स्त्रीपुत्रादिसे पूर्ण होके अंतरीय सबसे त्यागपूर्वक योगसाधनसे प्रवृत्त होय सो सिद्धिचिह्न अवलोकनपूर्वक साधना करके सर्वदा आनन्दमें क्रीडा करेगा ॥ २६८ ॥। इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगशास्त्रे पंचम: पटलः समाप्ः ॥५।। शुभम्-। समाप्तोऽयं ग्रन्थ: । पुस्तक मिळनेका ठिकाना- खेमराज, श्रीरष्णदास, "श्ीवेङटेश्वर" छापाखाना, खेतवाड़ी-बंबई.
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श्रीः। उमामहेश्वरमाहात्म्यम्। उमा भगवतीयेयं ब्रह्मवद्यति कीर्तिता। रूपयौवनसम्पन्ना वघूर्भूत्वात्र सा स्थि ता।१॥ नानाजातिवधूनां हि विंबभूताम हेश्वरी॥२॥ यस्याः प्रसादतः सर्वः स्वर्र मोक्षं च गच्छति।इह लोके सुखं तद्ज्जं तुर्देवादिकोपि वा ॥ ३॥ ब्रह्मा विष्णुस्त था रुद्र: शक्राद्या:सर्वदेवताः। कटाक्षपा ततो यस्या भवंति न भवंति च।।४।। पीनो न्नतस्तनी प्रौढजघना च कृशोदरी।चंद्रा नना मीननेत्रा केशभ्रुमरमंडिता ॥५॥ सर्वागसुंदरी देवी धैर्यपुंजविनाशिनी॥ कांचीगुणेन चित्रेण वलयांगदनूपुरैः॥६॥ हारैर्मुक्तादिसंजातैः कंठाद्याभरणैरपि।। मुकुटेनापि चित्रण कुंडलादैः सहस्त्र- शः ॥ ७। विराजिता ह्यनौपम्यरूपा भूष- णभृषणा। जननी सर्वजगतो द्यष्टव- रषां चिरंतनी ॥cII तयां समेतं पुरुषं तत्प-
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(२०६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । तिं तहुणाधिकम्॥ ब्रह्मादीनां पमु नाना- सर्वभूषणभूषितम ॥ ९॥ द्वीपिचम्वृतं शश्वदथवापि दिगंबरम्।भस्मोद्दलितस- र्वौंगं ब्रह्ममूर्धोघमालिनम्॥१०॥तथैव चं- द्रखंडेन विराजितजटातटम् ॥ गंगाधरं स्मरमुखं गोक्षीरधवलोज्ज्वलम् ॥ ११॥ कंदर्पकोटिसदशं सूर्यकोटिसमप्रभम्॥ सृष्टिस्थित्यंतकरणं सृष्टिस्थित्यंतवर्जि- तम् ॥ १२ ॥ पूर्णेन्दुवदनांभोज मूर्यसो- माग्निवर्चसम्॥सर्वोन सुंदर कंबुग्रीवं चा- तिमनोहरम्॥ १३॥ आजानुबाहुं पुरुषं नागयज्ञोपवीतिनम्॥ पद्मासनसमासी नं नासाग्रन्यस्तलोचनम्॥ १४॥ वाम- देवं महादेवं गुरुणां प्रथमं गुरुम्॥स्वयं- ज्योतिःस्वरूपं तमानंदात्मानमद्यम् ॥१५। यतो हिरण्यगर्भोयं विराजो जनकः पुमान्॥ जातः समस्तदेवानाम- न्येषां च नियामकः ॥१६॥ नीलकंठम- मुं देवं विश्वेशं पापनाशनम् ॥ हृदि पंद्े
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उमामहेश्वरमाहात्म्यम्। (२०७) थवा सूर्ये वहनौ वा चंद्रमंडले॥१७॥कैला सादिगिरौ वापि चिंतयेद्योगमाश्रितः॥। एवं चिंतयतस्तस्य योगिनो मानसंस्थि- रभ॥१८॥ यदा जातं तदा सर्वप्रपंचरहितं शिवम्॥ प्रपंचकरणं देवमवाङ्मनसगो- चरम्॥११॥ प्रयाति स्वात्मना योगी पु- रुपं दिव्यमद्धतमू॥तमसः स्वात्ममोहस्य परं तेन विवर्जितमू॥२०।साक्षिणं सर्वबु- द्वीनां बुद्धयादिपरिवर्जितम्॥ उमासहा- यो भगवान्सगण: परिकीर्तितः॥।२१।।नि- गुणश्च स एवायं न यतोन्योस्ति कश्चन।। ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र: शक्रो देवसमन्वि तः ॥ २२॥ अगि: सूर्यस्तथा चंद्रः कालः मृष्टयादिकारणम्॥। एकादशेंद्रियाण्यंतः करणं च चतुर्विधम्॥ २३।प्राणाः पंचम- हाभूतपंचकेन समन्विताः ॥ दिशश्च प्र दिशस्तद्रदुपरिष्टादधोपि च ॥।२४ ।।स्वे- दजादीनि भृंतानि ब्रह्मांडं च विराड़पुः।
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(२०८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। विराड्हिरण्यगर्भश्च जीव ईश्वर एव च ॥२५॥ मायातत्कार्यमखिलं वर्तते स. दसच्च यत्॥ यच्च भूतं यच्च भव्यं तत्सर्व स महेश्वरः ॥ २६ ॥ इति श्रीमदुमामहेश्वरमाहात्म्यं संपूर्णम्।
पुस्तक मिलनेका ठिकाना. खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्गटेश्वर छापखाना (मुंबई.)
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क्य्यपुस्तकैं-(योगशास्त्रग्रंथाः ।)
नाम. की. रु. आ. पातंजलयोगदर्शन-अत्युत्तम भाषानुवाद सहित १-० सांख्यदर्शन अत्युत्तम आाषातुवाद सहित ... १-८ वैशेषिकदर्शन सुबोध ाषानुवाद समेत ... ०-१२ हृठयोगप्रदीपिका उत्तम भाषाटीका सहित १-४ शिवस्वरोदय भाषाटीका ... .. .. -८ शिवसंहिता भाषाटीका सह (योगशास्त्र) १-० गोरखपद्धति भाषाटीका (योगसाधनविधि ) ०-१२ स्वरोदयसार चरणदासकृत .. 0-२ योगतत्त्वपकाशभाषा (योगाभ्यासकी प्रणाली परमोपयोगी है) .. ... 0-२ स्वरदर्पण सटीक १ स्वर प्रश्नवर्णित हैं ... ०-४ वेदान्तग्रन्थाः। ब्रह्मसूत्र (शारीरक) वेदान्ततत्त्वपकाश भाषा- भाष्य समेत श्रीप्रभुदयालुविरचित बहुत सरल सुबोध है .. .. ... ४-० ब्रह्ममूत्र (शारीरक)भाषाटीका ... ... १-८ वेदान्तपरिभाषा शिखामणि टीका और मणि प्नभा टीकासमेत ... २-८ वेदान्तपरिभाषा अर्थदीपिका टीकासमेत ... १-० वेदान्तपरिभाषा अत्युत्तम भाषाटीका समेन. १-४ वेदान्तसार संस्कृत मूल और संस्कृतटीका त्था भाषाटीकासहित. ... ०-१२ पंचदशीसटीक (संस्कत टीका) .... २-०
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२ जाहिरात.
पंचदशी पं० मिहिरचंद्रकृत अत्युत्तम भाषाटीका सहित ... ... ४-० पंचदशी भाषा-आत्मस्वरूपजीकृत ... ... ३-० शारीरक ब्रह्मसूत्रम्-मध्वभाष्यसमेतं तत्त्वप्रका- शिका टीकोपेतं च ... ५-० गीता चिद्घनानंदस्वामिकृत गूढ़ार्थदीपिका मूल अन्वय पदच्छेदके सहिल भाषाटीका ... 9-० गीता आनंदगिरिकृतभाषाटीका .. .. २-८ श्रीमद्भगवद्गीता सान्वय बजभाषा दोहा सहित १-४ गीतामृततरं गिणी भाषाटीका (रघुनाथप्रसा- दकृत) अक्षरबड़ा ... १-० गीतामृततरंगिणी भाषाटीका पाकिटबुक ... ०-१२ श्रीरामगीता मूल ... .. ... 0-२ श्रीरामगीता भाषाटीका पदपकाशिका अनुवा- दसमुच्चय और विषमपदीके सहित ... 06 श्रीमद्भगवद्गीतापंचरत्न अक्षर मोटा गुटका रेशमी ... ... १-० " पंचरत्न अक्षरबड़ा खुलापत्रा छोटीसंची १-८ "पंचरत्न अक्षरबड़ा लंबीसंची खुला १-० "पंचरत्न भाषाटीका २-० गीता श्रीधरीटीका साहेत ... १-० गीता बड़े अक्षरकी १६ पेजी गुटका .. ०-१२ गीता बड़े अक्षरकी खुली १२ पेजी ... .. o-१० गीता गुटका विष्णुसहत्रनाम सहित गीता पंचरत्न और एकादशरत्न " पंचरत्न द्वादशरत्न ... 0-१२ ० १०
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जाहिरात. ३
शीतापंचरत्न नवरत्न पाकिटबुक ... 0-9 गीता गुटका पाकिट बुक् .... ०-५ अष्टावक्रगीता अत्युत्तम सान्वय भषाटीका ... १-० शिवगाता भाषाटीकासहित .. ०-१२ गणेशगीता भाषाटीकासहित .. ... ०-६ गीतापंचदश भाषाटीका [काश्यपगीता, शान- कगीता, अष्टावक्रगीता, नहुषगीता, सरस्व- तीगीता, युधिष्ठिरगीता, बकगीता, धर्मव्या- धगीता, श्रीकृष्णगीतादि ] .. ... ०-१२ पाण्डवगीता भाषाटीका सह .. 0-३ तथा मूल ४ रत्न बड़ा अक्षर देवीगीता भाषाटीका .. 0-6 अपगेक्षानुभूति संस्कृतटीका भाषाटीका सहित ०-१० आत्मबोध भाषाटीका .. ... ०-३ तत्त्वबोध भाषाटीका .. ... 0-२ वेदांतग्रंथपंचकम् (वाक्यप्रदीप:, वाक्यसुधारस, हस्तामलकः, निर्वाणपंचकं,मनीषापंचक स० 0-८ वेदस्तुति भाषाटीका सह ... .. गीता रामानुजभाष्य २-० भगवद्गीता भावप्रकाशटीकायाप्र ३-० वैराग्यभास्कर भाषाटीका .. 0-6 सिद्धांतचंद्रिका सटीक (वेदांत) .. 0-6 द्वादशमहावाक्यविवरण ०-४ वेदांतरामायण भाषाटीका सह १-८ वेदान्तसंज्ञा भाषाटीका प्रश्नोत्तरमुक्तावली भाषाटीका (वेदान्त)
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४ जाहिरात.
जीवन्मुक्तगीता भाषाटीका ... ०-१ भक्तिमीमांसा-शांडिल्यऋषिप्रणीता आचार्य स्वमेश्वरविरचितेन भाष्येण संयुता ... 0-८ योगवासिष्ठ सटीक संस्कृत .. ... २०-० कंपिलगीता भाषाटीका ... ... 0-६ अवधूतगीता गुटका रेशमी ... ... .. -५ नारदगीता मूल ... ... ... 0-१ प्रश्नोत्तरी भाषाटीका ... ... 0-२ वेदान्त भाषा । आत्मपुराण भाषा [चिद्धनानन्द स्वामिकृत ] १२-० योगवासिष्ठभाषा बड़ा संपृर्ण ... १२-० योगवासिष्ठगुटका वैराग्य सुमुक्षु प्रकरण वेदान्त उत्तम कागज अक्षर बड़ा ... ... ०-१२ वासिष्ठसार भाषा वेदान्त ६ प्रकरण ... ... २-० मोक्षगीता (सवालक्ष) रामनाम ... ... १-० वृत्तिप्रभाकर स्वामी निश्चलदासकृत (वेदान्तका अ्रंथ शुद्धकर नया छपा है) .. ३-० विचारसागर सटीक निश्चलदासजीकृत .. 2-० एकादशस्कंध भाषा चत़ारदासकृत ... ०-१२ अमृतधारा वेदान्त .. ०-१२ संतोषसुरतरु वेदांत ... 0-6 संतप्रभाव वेदांत .. ०-६ विचारमालासटीकश्रीगोविन्ददासजीकीटी काल. ०-१२ अभिलाषसागर भाषा (वेदांत) ... १-८ संपूर्ण पुस्तकोंका "बड़ांसूच)पत्र" अलगहै मँगालीजिये। ....
खेमराज श्रीकष्णदास "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीमू प्रेस-बंबई.