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1. Svetasvatara Upanishad Hindi Translation Rajaram

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श्वेताश्वतर-उपेनिषंद्

पं.राजाराम प्रोफैसर डी.ए.वी. कालेज लाहौर प्रणीत सरल हिन्दी भाष्य समेत

सँव्चत् १८८१ विक्रम ।

बाब्बे मैशान प्रेम मोहनलाल रोड लाहौर में मैनेजर शरत्चन्द्र लखनपाल के प्रबन्ध से छपा। तीसरीवार १०००] [मूल्य 1-)

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उवताश्क्तर उपनिषद् श्वेवाश्वतर उपनिपद्-तैप्तिरीय (छृष्ण गजुर्वेद) से सम्बन्ध रखती है। वैशम्पायन को शिष्यपरम्परा में एक शवेता- शवतर ऋषि हुए हैं, जिन के नाम पर छप्णयजुर्वेद की एक शाखा श्वेताश्वतर नाम से है, यह उपनिपद् उसी शाखा की है, इस लिये इस को शवेताश्वतर उपनिपद कहते है। आज कल इस उपनिषट् के चिना श्चेताश्वतर शाखा का और कोई भाग नहीं मिलता है।। श्वेताश्वतर के दो अर्थ हो सकते हैं, सुफेद सचर वा सुफेद खचचरों घाला। यहां दूसरा भर्थ हीसमुचित है, क्योंफि इसी चाल पर अर्जुन का उपनाम जो श्वेताश्व है, वह इसलिये है, कि अर्जुन के घोड़े श्वेत थे, औौर ऐसे ही हर्यश्व जो उन्द्र के लिये प्रयुक होता है, उस को अर्थ है, हरे घोड़ों वाला। ऋग्वेद के मएडल ५ सूक ५२ से ६१ तक का ऋृषि जो श्यावाश् है, उस का अर्थ भी हमें काले घोड़ों वाला ही समुचित प्रतीत होता है न कि काला घोड़ा।। श्वेताश्वतर उपनिपद् प्रधान दस उपनिपद्रों में नहीं आती है, तथापि यह अपने विषय की अपेक्षा से बड़ी * श्वेताश्वतर के अनुयायी संव, श्वेताश्वतर कहलाते हैं, इसी लिये इस को 'श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषद्'=शवेता- शवतरों की मन्त्रोपनिषद् कहा है।

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२ श्वेताश्वतरोपनिषद्। मनोहर है, और पुराने आचार्यों ने इस का पूरा आादर किया है। वेदान्त सूत्रों में इस की किसी श्रुति का स्पष्ट पता देकर कोई सूत्र रचना हुई हो, यह कहना तो कठिन है, पर श्रीशंक- राचार्य ने १।१।१११॥४।८२।३।२२ इन तीन सूत्रों का लक्ष्य इस की श्रुतियों को चतलाया है, और विद्यारय ने सर्वोपनिषदर्थानुभृतिप्रकाश में जो १२ उपनिपदें. प्रमाणतया उद्धत की हैं, उन में यह भी है।। प्रथम अध्याय ओशम् बरह्मवादिनो वदन्ति-किं कारणं बूह्ष कुतः स्म जाता जीवाम केन क्च सम्प्रतिष्ठाः। अधिष्ठिता: केन सुखेतरेषु वर्तामहे बूह्मविदो व्यवस्थाम्।१। ब्रह्मवादी कहते हैं-का कारण ब्रह्म है* ? हम किस से जन्मे हैं, किस में जीते हैं, और किस में लीन होते हैं? है ब्रह्मवेत्ताओ ! [ हमें बतलाओ ] वह कौन अधिष्ठाता है; जिस की व्यवस्था पर हम सुखों में वा दुःखों में वतते हैं ॥१॥ * कइेर वेदवादी जिन्हों ने वेद से यह सीखा है कि व्रहा से इस जगत् का उेनन्म स्थिति और प्रलय होता है, वही हमारा अधिष्ठाता है, और ऊसी की व्यवस्थानुसार हम सुखों वा दुःखों को भोगते हैं, इस प्रकार से वेद में बतलाये हुए जगत्.

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अध्याय १ मं० २ ब्रह्म के घिना और जो २ कारण सम्भव हैं, घा बतलाए जाते हैं, उन की पहले परीक्षा करते हैं :- काल: स्वभावो नियतियहच्छाभूतानि य्योनि: पुरुष इति चिन्त्यम। संयोग एषां ना- नात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः॥।२॥ का फाल, वा सवभाच, वा नियति (होनी), वा यट्टच्छा के कारण म्रहमा को वह अय प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं, और देखना चाहते हैं, कि कई विद्वान जो यह कहते हैं, कि इस जगत् का कारण काल है, और दूसरे कहते हैं, स्वभाव है, इत्यादि चचनों में कहाँ तक तचाई है, इस घात को प्रत्यक्ष करने के लिये वह उन की शरण में साए हैं, जो ब्रह्मवेत्ता हैं। उन की शरण में आकर उन पर अपना अमिप्रीय इन शब्दों में प्रकट करते हैं, का कारण ब्रह्म है (अथवा काल आदि)? यद्यपि इस प्रश्न वाक्य में काल, स्भाव इत्यादि का नाम नहीं लिया, पर प्रश्न की वनावंट प्रकट करती है, कि म्रह्म के बिना ओं दूसरे कारण चतलाये जाते हैं, उनके तत्व को भी वे जानना चाहते हैं, अतएव इस से अगले मन्त्र में उन पर विचार किया गया है, प्रश्न वाक्य में काल आदि के स्पष्ट न कहने का हेतु यह है, कि इन जिज्ञासुओं को विश्वास यही है, कि कारण ब्रहम है, क्योंकि चेद से यही शिक्षा पाई है, और जिन के पास चैठे हैं, वह भी घ्रह्मषिदु हैं।।

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श्वेततश्वतरोनिषद्। (Chance) वा भूत कारण हैं* अथवा पुरुष (जीवात्मा) * हम प्रायः देखते रहते हैं, कि सब वस्तुएं अपने २ ऋतु में उत्पन्न होती वा फलती हैं। वस्तुतः जो नाम उत्पच्ति i है, उस सब के लिये एक न एक झृतु काल नियत है, यही हेतु है काल को कारण मानने में। पर हम दूसरी ओर यह देखते हैं, कि जो जिस का स्भाव (अपनी नेचर Nature) है, उस के सद्दश ही उस से कार्य्य होता है, विरुद्ध नहीं, और उसी से वह कार्य्य होता है, दूसरे से नहीं। अग्नि जलाती ही है, गलाती नहीं, और अगनि ही जलाती है, न कि पानी। गेहूं ही से गेहं, उगता है, न कि जौ से, और गेहूं ही गेहं ले उगता है, न कि जौ। यह हेतु है स्वभाव को कारण मानने में। फिर हम यह भी देखते हैं कि हम जोड़ मेल तो कुछ और ही करते रहते हैं, और हो कुछ और ही जाता है, यह हेतु है निर्यात (होनी) को कारण मानने में। अतएव अपने प्रयत से उलटा होता हुआ देख कर कहते हैं 'होनी वड़ी बलवान है'। फिर हम देखते हैं, कि जहां एक वड़ का वृक्ष है, वहां शीशम के उत्पन्न होने के लिये कोई रोक न थी, यह एक संयोग की बात है, कि वहाँ वड़ का वीज गिरा, न कि शीशम का, यदि शीशम का गिरंता तो शीशम ही होता, न कि बड़, सो यह एक संयोग (यद्टच्छा) की वात है, और सब जगह भी यही बात हो सकती है, इस पर निर्मूल लम्बे चौड़े विचार उठाना व्यर्थ है, सो यह हेतु है यटच्छा (इत्तिफाक Chance) को कांरण मानने में। और पांच महाभूतों को कारण मानने में यह हेतु है, कि हम जो फोई कार्य देखते हैं, वह इन्हीं से प्रकट होता हुआ देखते हैं।

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अध्याथ १ मं० ३

कारण है, यह विचारणीय है। इन का संयोग भी (कारण) नहीं हो सकता है, षयोंकि यह अनात्म पदार्थ (जड़ पदार्थ) हैं* और मात्मा (जीवात्मा) भी समर्थ नहीं, क्लोंकि वह स्वयं सुख दुःख में पड़ा है। ।।२।। इस प्रकार विचार द्वारा, उक्त कारणों में से किसी को भी स्वतन्त्र न पाकर, तव उन्होंने ध्यान और समाधि के द्वारा उस स्वतन्त्र शक्ति को प्रत्यक्ष किया, जो इन सारे कारणों की . अधिष्ठात्री होफर सब के अन्दर वर्तमान है, यह दिखलाते हैं :- ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ।३। (तब) उन्होंने ध्यान और समांधि में मग्न हो अपने कार्यों (सूर्य आदि) के अन्दर छिपी हुई, परमात्मा की निज शक्ति को प्रत्यक्ष देखा, जो (देव ) अकेला काल और आत्मा समेत उन (पूर्वोक्त) सारे कारणों का अधिष्ठाता है।।३।।

  • इन में से एक २ को कारण मानना तो दूर रहा, इन का समुदाय भी खतन्त्र कारण नहीं हो सकता है, फ्योंकि यह जड़ हैं, औौर जड़ पदार्थ कार्य करने में स्वतन्त्र नहीं होता है।। आत्मा चेतन होने से खतन्त्र तो है, पर वह भी जगत् के रचने में समर्थ नहीं, क्नोंफि वह सयं किसी दूसरी शक्ति के अधीन सुख दुःख भोगता है।।

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श्वेताश्वतरोपनिषद्। तमेकनोमें त्रिवृतं पोडशान्तं शतार्धारं विं- शति प्रत्यराभिः। अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैक- पाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम्।॥४।। (हम एक ऐसे रय को देखते हैं) जिस को १ नेमि है, ३ लपेटें हैं, १६ सिरे हैं, ५० सरे हैं, २० प्रत्यरे हैं, ६ अष्टकों (अट्ठों) से युक्त है, भांति २ के रंगों की उस में एक फांस है, उस के मार्ग तीन हैं, उस का एक घुमात्र है जिस के दो " निमित्त हैं# ॥४ ।

  • यह इस चलने हुए ब्रह्माएड का एक रथ के रूपक में वर्णन है। रथ का पहिया चनाने में कुछ कुबड़ी लकड़ियों को एक दूसरी के साथ गांठने से एक गोल पहिया वन जाता है, उस गोल पहिये के ऊपर की गोल रेखा नेमि कहलाती है, उसको ऊपर से ज़ो रबड़ से मढ़ देते हैं, वा लोहे का कड़ा चढाते हैं,वह उस की लपेट है, और पहिये की लकड़ियों के अलग सिरे हैं, नाभि और चक्र, के मध्य में जो लकड़ियां होती हैं, वह भरे हैं, और उन की दृढता के लिये जो साथ और छोटे २ अरे लगाए जाते हैं, वह प्रत्यरे (सहायक अरे) हैं। यहां १ नैमि प्रकृति। प्रकृति के ३ गुण सत्व, रजस, तमस, ३ लपेटे हैं। १६ सिरे, १६ विकार हैं, अर्थात् पृथ्वी,जल तेज, वायु, आकाश यह पांच महाभृत । वाणी, हस्त, पाद, पायु (गुद) और उपस्थ-यह पांच कर्मेन्द्रिय। नेत्र, श्रोत्रं, स्वचा, घ्राण और रसना यह पांच ज्ञानेन्द्रिय ।-और मन ।

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अध्याय १ मं ५.

पञ्चस््रोतोम्बु पञ्चयोन्युग्रवक्रांप्चमाणोरभि- पश्चबुद्धयादिमूलाम्। पञ्चावर्ता पञ्चदुःखौधवेगां पञ्चाशङ्देदां पञ्चपर्वामधीमः॥५॥

सांख्य सिद्धान्त में यह १६ केवल विकार (विकृति) माने हैं। अर्थात् प्रकृति के विकार के यह सोलह सिरे हैं, यहां विकार की समाप्ति है (देखो सांख्य सप्तति कारिका ३) ।। पंचास अर=पचास प्रत्यय भेद, जो इस प्रकार वर्णन किये हैं, (१) पांच विपर्य्यय=मिथ्या ज्ञान के पांच भेद अर्थात् तमस्, मोह महामोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र, वा पतञ्जलि के अनुसार अविद्या (मिथ्या ज्ञान) अस्मिता (आत्मा और अन्तः- करण की ग्रन्थि) राग द्वेष और अभिनिवेश (भय) (देखो सांख्य सूत्र ३।३७) (२) अठाईस अशक्तियां (सांख्य ३।३८) अर्थात् नौ तुष्टियां (सांख्य ३। ३८) और आठ सिद्धियां (सांख्य ३।४०) । यह सब मिला फर (५+a८+९+८) पंचांस अरे हैं (विस्तृत देखो सांख्य सूत्र ३ । ३७,४५, सांख्य कारिका ४७) बीस सहायक भर यह हैं, दस इन्द्रिय और दंस उन के विषय अर्थात् पांच कर्मेन्द्रिय-वाणी, हस्त, पाद, पायु, उपस्थ पांव इन के कर्मे, बोलना, पकडना, चलना, मल का स्यागनी और सन्तानोत्पादन । पांच ज्ञानेन्द्रिय, नेत्र, श्रोत्र, म्राण, रसना, त्वचा, और पांच इन के ज्ञान, देखना, सुनना, सूघना, चखना और छूना।।

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श्वेताश्वतरोनिषद्। v

वा हम एक नदो को ध्यान में लाते हैं, जिस का पानी पांच परवाहों का है, वह पांच चश्मों से निकल कर भयानक और रेढी बहती है, पांच प्राण उस में लहरे हैं, उसका (सिरा) पाँचों ज्ञानों का कारण है, उस में पांच भंवर हैं, उस के प्रवाह के वेग पांच दुःख हैं, उस के भेद पचास है, और जोड़ पांच हैं* ॥ ५ ॥ यद्यपि सूल में प्रकट नहीं किया है, कि यहां एक नेमि से प्रकृति अभिप्रेत है, इत्यादि, तथापि ऊपर कही हुई पक्रिया सांख्य में ज्यों की त्यों है, और इस उपनिषद् में मांख्य और योग की परिभाषाएं पाई जाती हैं। ६। १३ में सांख्य और योग को परव्रह्म की प्राप्ति का साधन भी बतलाया है, इस लिये हम ऊपर की संख्याओं में सांख्य और योग के अनुसार अर्थ लेने में असली अभिप्राय पर पहुंच जाते हैं। पर अष्टक छः से जो अभिप्राय है, वह पूरा स्पष्ट नहीं है, शंकराचार्य्य ने छः अष्टर यह लिखे हैं, आठ प्रकृतियें (गीता०७।४) आठ शरीर के धातु,-माठ ऐश्व्य, भाठ भाव (बुद्धि के भेद) भाठ (प्रकार के) देवता, आठ आत्मा के गुण। एक फांस, कामना (इच्छा) है, यह नाना रूपों वाली विषयभेद से है, अर्थाद खर्ग, पुत्र, अन्न आदि की इच्छां। तीन मार्ग=धर्म, अघर्म और अज्ञान। एक भूल ात्मा का मिथ्याज्ञान है, अर्थात् देह, इन्द्रिय मन बुद्धि इन अनात्म वस्तुओं को आत्मा जानना। इस के दो निमित्न पुएय और पाप हैं। * यहां फिर संसार को नदी के रूप में वर्णन किया है,

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मध्याय १ मं ७ . ६'

इस चक्र में आत्मा का घूमना, और उस से छुटने का उपाय वतलाते हैं :- सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते तस्मिन् हंसो आ्राम्यते बूह्मचक्रे। पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥६।। सब को जीवन देने चाले और सबको आश्रय देने वाले उस बड़े ब्रह्मचक्र में हंस (जीवात्मा) घुमाया जारहा है, जव वह (देह से) पृथक् (भात्मा) को, और उस के प्रेरक (घुमाने वाले परमात्मा) को जान लेता है, तव वह उस से प्यार किया हुआ अमृतश्व को प्राप्त होता है॥ ६। उद्गीतमेतत् परमं तु बूह्र तस्मिँस्त्रयं सु्र- तिष्ठाऽक्षरं च। अतान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना बूह्मणि तत्परा योनिमुक्ता:।।७।। पांच प्रवाह पांच श्ानेन्द्रिय हैं, पांच चश्मे पांच महाभूत हैं, पांच लहरें पांच प्राण हैं, सिरा मन है, जो वाहय ज्ञानं के पांचो प्रवाहों का मूल है, पांच भंवर, पांच क्षानेन्द्रियों के पांच विषय हैं, पांच वेग पांच दुःख हैं, गर्भ का दुःख, जन्म का दुःख,जरा फा दुःख व्याधि का दुःख और मृत्यु का दुःख । पचास भेद (टुकड़े) जो पूर्व ५० आारे कहे हैं पांच पर्व, पांच क्लेश अविद्या अस्मिता, राग द्वेष और अभिनिवेश ।।

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१०. श्वेताश्वतरोपनिपद्। (उपनिषदों में.) यह गाया गया है कि ब्रह्म (शुद्ध व्रह्म). सब से पर है, उस में ( तीनों) लोक हैं वह उत्तम आधय है और अविनाशि है, वेदवादी जिन्हों ने यहां उस को अन्दर (हदयाकाश में)ढूंढा, वह ब्रह्म में लीन हुए और तत्परायण हुए जन्म से छूट गए॥७॥ संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः। अनीशश्चात्मा वध्यते भोक्तृभा- वाजू ज्ञात्वा देवं सुच्यते सर्वपाशैः ।।<।। यह जो नाशवान् (कार्यय) और नाश रहित (कारण प्रकृति) है जो व्यक्त (प्रकट) और अध्यक है। इस सारे विश्वं का ईश्वर पालन पोषण करता है। जीवात्मा* जो कि अस- मर्थ है, वह (इस के फलों का) भोगने वाला होने के कारण (इंस में) बद्ध होता है, पर जब वह परमात्मा को जान लेता है, तो वह सोरी फांसों से छंट जाता है।। ८:। ज्ञाजौ द्वावजा वीशनीशावजा ह्येका भोक्ततृ- भोग्याथयुक्ता। अनन्तश्रात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दत्ते बूह्ममेतत्॥ ९॥ * जीवात्मा अल्पशक्ति है, वह प्रकृति पर वस नहीं रखता इसलिए प्रकृति उसको बांध लेती है, पर यह चन्धन वह आप अपने लिए डालता है, जब उसके रसों में फंस जाता है।

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अध्याय १ मं १० ११. वह दो हैं, एक जानने वाला (सर्वज, ईश्वर) और दूसरा अनजान (अल्पश, जीव) दोनों अजन्मा हैं, एक ईश (समर्थ, सर्वशक्ति) है और दूसरा अनीश (मसमर्थ, अल्प- शक्ति) है, और एक और अजन्मा अनादि है, जो भोकाओं के लिये भोग्य पदार्थो से युक्त है। अनन्त आत्मा विश्वरूप औौर अकर्ता है*। यह ब्रह्म का जो त्रिके है जब मनुष्य इसको पा लेता है, कि- क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एक:। तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्वभावा द्वयश्रान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥१०॥। प्रकृति परिणामिनी (बदलती रहने वाली) है, हर (पुरुष) अमृत है और अपरिणामी है, इन दोनों प्रकृति और पुरुप पर एक देव ईशन (हकमत) करता है। उस एक के ध्यान से, उस में जुड़ जाने से, तन्मय हो जाने से फिर अन्त में सारी माया हट जाती है (सब धोखे मिट जाते हैं) ।१०॥

  • शयलरूप में वह सब रूपों में चमक रहा है, और स्स्रूप में शान्त है, अकर्ता है। त्रिक, तीन का समुदाय, (१) परमात्मा, उत्पन्नः करने वाला और शासन करने वाला, (२) जीवात्मा, बन्ध: और मोक्ष का भागी (३) प्रकृंति, जो भोग्य वस्तुओं की जननी- है, देखो आगे ।। १२ ॥।

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१२ श्वेताश्यतरोपनिपद। ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानि: क्षीणैः क्लेशै- र्जन्ममृत्युप्रहाणिः। तस्याभिध्यानानृतीयं देह भेदे विश्वैश्वर्यं केवल आपकामः ॥११।। जब मनुष्य देव को जान लेता है, तो सारी फांसें छट जाती हैं, क्लेश (अचिद्या, अस्मिता, राग, द्वेप, अभिनिवेश) कषीण हो जाते हैं, और उन के क्षीण होने से जन्म मृत्यु बन्द हो जाते हैं। उस के ध्यान से देह ले अलग होने पर, (ब्रह्म लोक में) तीसरा जो पूर्ण ऐश्वर्य है, वह प्राप्त होता है, और तब पुरुष चे.चल हुआ आप्काम हो जाता है।।११।। एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातःपरं वेदि- तव्यं हि किञ्चिव। भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं बूह्ममेतत् ॥।१२।।

  • ब्रह्मलोक के ऐश्वर्य से नीचे दो ऐश्वर्य और हैं, मनु- व्यलोक का और पितृलोक का, यह दोनों इस तीसरे ऐश्वर्य से छोटे हैं (देखो उपननिषदों की शिक्षा, अ० पृष्ट १६८ से २०६ और म० ८ पृष्ट २५८)।। 1 ब्रह्मलोक में पहुंच कर उस ब्रह्म के दर्शन होते हैं, और वह केवल (अपने सवरूप में अवस्थित) होता है, और शान्त होता है। कामनाओं की हलचल वंद हो जाती है (देखो0 उपनिषद्ों की शिक्षा म० ८ पृष्ट २०६)।।

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अध्याय १ मं १२ १३

इस को जानो, जो सदा तुम्हारे आत्मा में वर्तमान है,#

  • इसको नियम से अपने भात्जा में दी जानना चाहिये, इस पर स्ामि शंकराचार्य ने शितवर्गीत्तर से यह प्रसाण दिये हैं :- शिवमात्मनि पश्यन्ति प्रतिमासु न योगिन: । आत्मस्थं यः परित्यज्य वदिस्थं यअले शिवम् ॥। हस्तस्थं पिएउमुत्सृज्य लिद्यात् कुर्परमात्नः। सर्वत्रावस्थितं शान्तं न पश्ययन्तीह राङ्कुरम्।। ज्ञान चक्षुर्विह्ीनत्वादन्ध: सूर्यं यधोदितम्। यः पश्येत सर्वगं शान्त तल्याध्यात्मस्थितः शिव:। आत्मस्थं ये न पश्यन्ति तीर्थे मागन्ति से शिवन्। आात्मस्थं तीर्थमुत्सृज्य वहिस्तीर्थादि यो बजेत। करस्थं स मदारत्नं त्यक्त्या काच विमार्गति ॥ योगीजन शिव को अपने आत्मा में देखते हैं, न कि: प्रतिमाओं में। जो आत्मस्थ शिव को छोड़ कर चहिसथ (चाहर स्थित) शिव को पूजता है, वह अपने हाथ पर रक्खे लड्डू को छोड़ कर अपनी कुहनी को गढता है। सर्वत्र वर्त- मांन, शान्त, शङ्कर को यहां (आत्मा) में नहीं देखते हैं, फ्चोंकि वहूं ज्ञान चक्षु से हीन हैं, जैसे अन्धा उदय हुए सूर्य को नहीं देखता है। जो सर्व व्यापक शान्त को देखे, उस के लिये शिव अपने अन्दर स्थित है। जो आत्मस्थ शिव को नहीं देखते हैं, वह शिव को तीर्थ पर ढंढते हैं। आत्मस्थ तीर्थ को छोड़कर जो चाहर के तीर्थ आदि को जाता है, वद दाथ में स्थित महारत. को छोड़ कर काच को ढूंढता है।

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-२४ श्वेताश्वतरोपनिषट्। -इस से परे कुछ जानने योग्य नहीं है, भोका (जीव) भोग्य (प्रकृति और उस के काय) और प्रेरक (ईश्वर) को समझ कंर सब समझा जाता है, यह त्रिक ब्रहम सम्वन्धी है। उसके दर्शन किस उपाय से होते हैं, यह दिखलाते हैं- वन्हेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः । स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्त- द्वोभयं वै प्रणवेन देहे ॥ १३ ॥ जैसा कि अर्राण में स्थित भी अग्नि की मूर्ति नहीं दीखती है और न ही उस के सूक्ष्मरूप (जो अरणि के अन्दर उस समय भी है) का नाश है, वह (अरणिगत अश्नि) फिर२ उत्तराणि और अधराणि (के रगड़ने) के द्वारा ग्रहण किया जाता है, इन दोनों बातों की न्याई आत्मा ओंकार के द्वारा देह में (ध्यान से पहले छिपा हुआ ध्यानाभ्यास से ग्रहण किया जाता है) *॥१३॥ * यज्ञ में अि उत्पन्न करने के लिये पीपल के दो काछ विशेष अपने नियत आकार में तच्यार किये जाते हैं, यह दोनों अरणियां कहलाती हैं, उन में से एक को नीचे रख कर और दूसरे को मथाने की तरह ऊपर रख कर मथन करके असि निकालते हैं, इन दोनों अरणियों में से निचली अधरारि और ऊपर की उत्तरारणि कहलाती है। यह अग्नि जो मथन' करने से प्रकट होती हैं, इस की परमात्मा के दर्शन ले तुलना की गई है। अग्नि पहले पहल नहीं दोखती है, यद्यपि उस का

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अध्याय १ मं १५ १५

स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम। "ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत्।१४। अपने देह को अधरारणि, और ओमू को उत्तरारणि चना कर, ध्यान की रगड़ के ार २ करने से छिपी आग की भांति उस परम ज्योति को देखे ।।१४॥। तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वर- णिषु चाभिः। एवमात्माऽत्मननि गृह्यतेऽसौ सत्ये- नैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥१५॥ जैसे तिलों में तैल, दही में मक्खन, स्रोतों में जल और अरणियों में अग्नि (पीलने, बिलोने, खोदने और रगड़ने से ग्रहण की जाती है) इस प्रकार परमात्मा आत्मा में ग्रहण किया जाता है, यदि कोई सत्य और तप से उसे देखता है।

सूक्ष्मरूप नष्ट नहीं हुआ, क्लोंकि जूंही अधरारणि को उत्तरारणि से मथन किया जाता है, तो अगनि प्रकट हो जाती है। इसी प्रकार परमात्मा इस देह में पहले (अज्ञानारस्था) में नहीं दीखता है, यद्यपि वह देह में सदा वर्तमान है. जूं ही ओोमू के द्वारा देह को बार २,मधन किया जाता है, तो चिंगाड़ी के दर्शन की तरह सांक्षात् दीख जाता है। * नदी जो सूखी पड़ी है उस के अन्दर छिपा हुआ पपानी है, जो थोड़ा सा ही खोदने से निकल आता है।

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१६ श्वेताश्यतरोपनिपद्र सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम्। आत्मविद्यातपोमूलं तद् बूह्मोपनिषत्परं। तद् वूह्मोपनिषत्परम्॥ १६ ॥ दूध में रमे हुए मक्खन की भांति हर एक में व्यापे हुए आत्मा को वह देखता है, उस की प्राप्ति का मूल आत्मविद्या और तप है। यह ब्रह्म है, जिस में उपनिषद् का तात्पर्य है, हां यह ब्रह्म है, जिस में उपनिषद् का तात्पर्य्य है॥ १६.॥.

दूसरा अध्याय प्रथम अध्याय में दिखलाया है, कि ऋषियों ने ध्यान. और समाधि के द्वारा छिपी हुई देवात्मशक्क्ति को देखा, अच. उस ध्यान और समाधि के सरूप को फलसहित वर्णन करते हैं :- युञ्जान: प्रथमं मनस्तत्वाय सविता धियः। अर्भि ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत ॥१।। सचिता पहले मन को जोड़ कर और बुद्धियों को फैला:। कर अग्नि की ज्योति को देख कर पृथ्वी से ऊपर लाया।।१।. *ै दो वार पाठ अध्याय की समाप्ति के लिये है। 1 इस अध्याय में आठवें मन्त्र से लैकर योग का वर्णन: है, उस से पहले सात मन्त्र सविता की महिमा में हैं, सविता

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मध्याप २ मं २

युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे। सुवर्गेयाय शक्त्यै ॥।२।। उद्य होते एुए खूय के सज्मन्ध से शवल रूप में परमात्मा का नाम है, योग की प्राप्ति के लिये ईश्वरपणिधान एक उत्तम उपाय है। (देखी योग १। २३) सो याग के आरम्भ में इन मन्शों के द्वारा परमात्मा की मदिमा गाने से ईश्वरमाण- धान सिसलाया है। इस लिए कि भकिविशेष से हम पैरमात्मा के अनुआाम हों, अन्तराय (विघ्न) हमारे रस्ने से इट जायें और दम निविध अस्यास से भात्मा औौर परंमात्मा के दुर्शन करें (देखो योग १. २६ ) दूमरा, इस अध्याय में ध्राम से यह वोधन किया है कि पदले हमें यम करने वाहियें उस के पीछे योगास्यास। कर्योंकि कर्मो के द्वारा शुद्ध हुआ अन्तःकरण ही योग के योग्य होता है, इस लिए कर्मो के पीछे योगाभ्यास, तबसमाधि, द्वारा ात्मा और परमात्मा का साक्षान दशन होता है। यह मंत्र तैप्विरीयसंदिता ४।११११२।६ वाजसनेयी संहिना [यजुर्वेद] ११। १; और शतपभ० ६। ३ १। १२। में है। तैतिरीय का पाठ उपनिषद् के साथ मिन्ना है, वाजसनेय पाठ में 'धिथा,' की जगह 'विगम' और 'अगि' की जगह 'सग्ने' है। पह ने पांत मंत्र अपि सयन के विषय में लगाए हैं। अभिप्राय यह है- सविता मन और इन्द्रियों को युक्त, घरके अर्थान पूरे

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श्वेताश्वतरोपनिषद्। सविता देव की अनुज्ा में युक्त हुए मन के द्वारा हम स्वर्गीय जीवन को प्राप्त हो * ॥।२।। युक्त्वाय मनसा देवान् सुवर्यतो धिया दिवस्।- बृहज्ज्योति: करिष्यतः सविता प्रसुवाति तानं ।३ सविता उन देवों को, जो चमकते हुए आकाश में चल रहे है, और जो बहुत बड़ी ज्योति को देगे, उनको मन औौर बुद्धि से प्रेरता है :। युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विश्रा विप्रस्य बृंहतो विपश्चितः । विहोन्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितु: परिष्ठुतिः।४। ज्ञानो जन अपने मन और विचारों को एक महान् और सर्वश् ऋषि में लगाते हैं वह जो नियमों का पहचानने छय न द्वारा ज्याति से अत्नि का पता लगाकर उस को मएडल (गोले) से ऊपर लाया है, जिस से हमारा जीवन है। * तैति० सं० ४।१,१११। ३ वाज सं० ११। २ शत० ६ १ ३। १। + तैति० सं० ४।१।१।१।२ वाज० सं० ११।३। तैति० में 'युक्त्वाय मनसा" पाठ है, और वाज० में युक्त्वाय सपिता'। 1 इस सौर जगत में विद्युदादि सारे देवसाओं फा प्रेरेंक सचिता है।

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अध्याय २ मं ४

वाला है (सचिता)। उस अफेले ने ही यक्ों का रचा है, सचिता देव की स्तुति हमारे चारों ओर फेली हुई है #ैं। युजे वां ब्रह्म पूर्व्य नमोभिर्विश्लोकएत पथ्येव सूरेः । शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आये धामानि दिव्यानि तस्थु: ।।५। (हे द्यावापृथ्वी) तुम दानो के ( अन्तर्यामा) अनादि म्ह्म को मैं नमरकार करता हूं। मेरा यश सूग्यं के माग की तरह फैले, अमृत (परमात्मा) के वे सारे पुत्र (मुक जन) सुनें, जो दिव्य स्थानों को पहुंचे हैं ।। अभिर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राभभियुञ्जते। सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र सञ्जायते मनः ॥६॥।

  • तैत्ति० सं० ४११११११।४।१।२६३।१। "१; वाज० सं० ५।१४:।११ ।३७।२७; ऋगु ५।८१। ३; शत० ब्रा० ३।५/३।११;६।३।१।१६।। 1

। तैति० सं० ४।१।१।२।१ ; चाज० सद ११। ६; ऋगु १०। १३ ।१ ; अथव० १८ /३/३१ । यहां हम ने वाजसनेय का पाठ दिया है, और वह ऋग्वेद के साथ मिलता है, तैत्तिरीय का पाठ 'बश्लोक पतु' की जगह 'िश्लोका यलिि';, 'सूरेः' की जगह'सूराः' और" '्टस वन्तु' की जगह 'भए वन्ति' है।। !

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श्वेताश्वतरोपनिषढ़।

जहां अत्नि मथन की जाती हैं, जहां वायु शब्द करता है, जहां सोम अधिक बहाया जाता है, वहां मन उत्पन्न होता है *, सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम्। तत्र यानिं कृण्वसे नहि ते पूर्व मक्षिपत् ।।७।। सविता की प्रेरणा से हम अनादि व्रह्म को प्यार करें, यदि त वहां (अनादि ब्रह्म में ) अपना स्थान बनाए, तो तुझे पहला कर्म हानि नहीं पहुंचाएगा।।।७।।

  • सोमयश् में अग्नि को जलाकर और वायु से उसे पदीप्ष करके ऋत्विज एकाग्र चिस्त होकर स्तोत्र गाते हैं, अथवा जहां अग्नि (अर्थान परमात्मा) जो सारी अविद्याओं की जला देता है, मथन किया जाना है, अर्थात् ओम् के सांथ देह में मथन करके प्रकाशिन किया जाता है, जहां रेखक आदि प्राणायाम करने से वायु शब्द करता है, वहां। मन ब्रह्माकार होता है, नकि अशुद्ध अन्तःकरण में (शंकरा- चार्गते।।। + केवल कर्म सांमारिक शभ फल देता है, संसारे से परे न्हीं लेजाता। पर जिसने अपने रहने का स्थान परमात्मा में-श निया है, वर्भ उसको संसार में नहीं बांधना, अपितु किद्शद् द्वागा उपासना मे महायक होता है ( देखो ईश, ९ * ) इसी लिए यहां पहले धर्म और पीछे उपासना का मधन है।।

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मध्याय २ मं १० मब योग को प्रक्रिया का वर्णन करते हुए आोसन, आणायाम औौर स्थान का वर्णन करते है- त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीर हृदीन्द्रियाणि मनसा सन्निवेश्य। ब्रह्मोडुपेन प्तरेत विद्वान् स्ोता सि सर्वाणि भयावहानि ॥८। प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छू- वसीत। दुष्टाश्वयुक्त्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो घारयेताप्रमत्तः ॥९। समे शुचौ शंर्करावन्हि बालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनो इनुकूले न तु चक्षुःपीडने गुहनिवाताशूयणे पयोजयेत् ॥१०॥ शरीर के तीन अगों (छाती, गर्दन और सिर) को सीधा रखकर इन्दियों को मनके साथ हृद्य में प्रवेश करके, ओंकर की नोका पर सवार होकर, भय के लाने वाले सारे प्रवाहों से पार उतर जाए। ९ । (शरीर की) सारी चेष्टाऑ को घश में करके प्रणों को रोके, और प्राण के ककषाण होने पर नासिका से श्वास ले सचेत सारथ जैसे घांड़ों की वश्चलता को रोकता है, इस प्रकार अप्रमस्त * गाता ५। २७। ऐसा हा अलङ्ार कंठ० ३।४-६ में है।

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श्वेताशवत गेपनिषद्।

होफ़र मन को रोके।।६ ऐसे स्थान पर यौंग का अस्यास करे, जो सम है, शुद्ध है, कंकर, वालू और अ्रग्नि से रहित है, जो शब्द जल और लता मएडप * आदि से मन के अनुकूल है, और नेत्रों को पीड़ा देने चाला नहीं है, एकान्त है; और वायु के फोकों से राहत है। १०। अब योगाभ्यास में सफलता के चिन्ह कहते हैं-" नीह रधूमाकानिल नलानां खद्योतविद्युत् स्फटिकशशीनाम्। एतानि रूपाणि पुरःसराि1 ब्रह्मण्यंभिव्यक्तिकराणि योगे ॥:१। पृथिव्या- प्यतेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे- प्रवृत्ते। न तस्य रोगो न जरा न दुःखं प्राप्तस्य योगागनिमयं शरीरम् ॥१२॥ लघुत्वमारोग्यम लोलुपत्वं वर्णप्रसाद: ग्वरसौष्ठवं च। गन्धःशुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति॥१३। जय अभ्यास पूरा होजाता है, तब पहले यह रूप दीखते हैं, कुहर, धुआं, सूर्य्य, वायु, अग्नि, जुगनूं, विद्युत, . खिलौर और चन्द्र, तब इनके पीछे ब्रह्म का प्रकाश होता है ।११।। शब्द,= शोग; जल जिस पर बहुत से लोग इकट्े होते हों, और आश्रय, मएडप इनसे भी वर्जित देश हो (शंकराचार्य)

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अध्याय २ मं १४ जब पृथियी, जल, तेज वायु औौर आाकाश प्रफट होते हैं, अर्थान् योग के पांत गुण प्रवृत्त होते हैं * तव फिर योगी के लिये न रोग है, न जरा है न दुःस है कयोंकि उसने वह शरीर पालिया है जो योग की अग्नि से बना है। १२। योम का पढला फल यद कदने हैं, शरोर दलका छोजाता है, आरोग्य रहना है, विषयों की लालसा मिट जानी है, कान्ति बढ़ जाती है, स्घर मधुर होजाता है, गन्ध शुभ होता है, मौर मलसूत्र थोड़ा होता है। १३। इस के पीछे उसे आत्मा के शुद्ध स्वरूप का साक्षात् होताहै- यथेव विम्बं मृदयोपलिसं तेजोमयं भ्राजते तत् सुधातम्। तद्वाऽत्मतत्वं प्रसमीक्ष्य देही एक: कृतार्थो भवते वीतशोक:॥१४।।

  • पंच महाभूत-पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश है, इनके पांन गुण-गन्ध, रस. रूप, स्पर्श और शब्द, योग के गुण हैं, संयम द्वारा इन का साक्षारकार योग प्रवृत्ति कहलाती है,जैसा कि नासिका के अग्न में सयम करने से दिव्य गंध का साक्षात्फार होता है। इसी प्रकार जिद्वा के अग्र में दिव्य रस का, तालु में दिव्यरूप का, जिह्वा के मध्य में दिव्य स्पर्श का और जिह्गा के मूल में संयम करने से दिव्य शब्द का साक्षात्कार होता है। इन के होने पर मन स्थिर होजाता, है, क्योंकि फिर उस को बाह्य विषय नहीं खींन सके [देखो योगसूत्र १। ३५]

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श्वेताश्वतगेपदिषद्। जैसे वहरत्न जो मट्ी से लिवड़ा हुआ है, चह जब धोया जाता है, तो फिर तजोमय हुआ चमकता है, इस प्रकार देही आत्मा फिर आत्सततव (आत्मा के. असली स्वरू) को देखकर शोक से पार हुआ हृतार्थ होजाता है।६४1 आात्मतत्व से म्रह्मतत्त्व को देखकर सुकत हाजाता है यदाऽऽत्मतत्वेन तु ब्रह्मतत्वं दीपोपमेनेह युक्त: प्रपश्येत्। अजं ध्रवं सर्वतत्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा -1 देवं सुच्यते सर्वपाशैः।१५। फर जब सावधान होकर आत्मतत्त्र, से ब्रह्मतत्व्र को देखता है, तब वह उस अजन्मा अटल (कूटस्थ) और सार त्च्ची से शुद्ध देव का जान कर सारी फांसों से छूट जाता है।१५। एष हि देव: प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वोहज़ातः सं उगर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाण: प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ १६॥ यो देवोजग्नो योऽप्सु.यो विश्वं भुवनमाविवेश। य ओषधिषु यो वनस्पतिषु तस्मैदेवाय नमोनम:॥१७॥ • यही शुद्ध स्वरूप है, जिसको मन, बाणी नहीं पहुंचते किंतु केवल आत्मतस्त्र से जाना जाता है।

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अध्याय ३ मं २ २५ यह देव है, जो सारी दिशाओों के साथ २ फैला हुआ है, यह (हिररायगर्भ रुपसे) पदले प्रकट हुआ, यह इस (ब्रामाएड) के बन्दर (अन्तर्यामी रूप से) है, । यह प्रकट हुआ है और वह प्रकट होगा। और वह सब लोगों के पीछे सर्वतोमुस (सब को देखता हुआ) उदरता है, ६॥ जो देध अत्नि में है, जो जलों में है, जो मारे भुघन में आवेश किये हुए है, जो ोषधियों में है, जो वनस्पतियों में है. उस देव की नमस्कार है, नमस्कार है।

तीसरा अध्याय। इस तीसरे अध्याय में ग्रह को दंश और रूत्र के रूप में रष्टि और प्रलय का कारण दिखला कर उससे परे शुद्ध सरुप और उस सरूप के ज्षान से अनृतच्य की प्राप्ति ददिखलाते हैं। य एको जालवानीशत ईशिनीभि: सर्वां- लोकानीशत ईशिनाभिः । य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥ १ ॥ एंको हि रुद्रो न द्वितायाय तस्थुर्य इमांलोका- नीशत ईशिनीभे: । प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति * वाज० सं० ३२४; तैति० आर० १०।२३ ।

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. २६ श्वेताश्वतरोपनिषद्। सञ्चुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥२॥ वह जालवान् * जी अकेला अपनी शक्तियों से ईशन करता है, जो सारे लोकों पर अपनी शक्तियों से ईशन करता है, जो अकेला ही है, जब उनको जन्म देता है, और भांगे बढ़ाता है, जो इसको जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते, हैंi१। क्योंकि रुद् एक हैं, उन्हों ने ( जानने वालों ने) दूसरा नहीं ठहराया है, जो अपनी शक्तियों से इन लोगों पर ईशन करता है। जो सब लोगों के पीछे खड़ा है, और सारे भुवनों को रचकर रक्षा करने वाला अन्तकाल में इस को समेट लेतां है ।१७।। विश्वतञ्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुतः विश्व तस्पात्। सं बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैर्द्या वाभूमी जनयन् देव एकः ॥३॥ यो देवनां प्रभवश्चोन्भश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षि: हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्व स नो बुद्धया शुभया संयुनक्तु॥।४।। जालवान्, मायी, यह माया जाल है, जिस ने इमें भ्रामाया हुआ है, और परमात्मा इसका मालिक है।

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अध्याय ३ मं ५ २७.

वह * एक देव, जिसके नेत्र, भुनाएं, और पाद दरएक जगह पर है, 1 वद यौ और पृथ्वी की उत्पन्न करता हुआ भुजाओं से और पंखों से एक साथ धमाता (धौंकता) है । ।।३0 जो ई देवताओं का रचने वाला और बढ़ाने वाला है. रुद, सब का मालिक, महर्षि (बड़ा देखने वाला) है, जिसने पहले पहल हिरयगर्भ को प्रकट किया, वह हमें शुभ वुद्धि से संयुक्त करें॥४।I या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशी

  • ऋृग०१०।८१।३; वाज० सं० १७।११ अथर्व० १३।२।२६तिति० सं० ४।६।२।४: तैत्ति० आर० १०। १ ३। उसके नेत्र सब जगह हैं अर्थान् चह सब जगह देखता है, सब पर उसकी दृषटि है; सब जगद्द मुस (चेहरा). : है अर्थान् सघ जगह उसके दर्शन मिल सक्ते हैं। सब जगह भुजाएं हैं अर्थाI उस की रक्षा सब जगह है। उसके पाद सब जगह हैं, अर्थात् वह सब जगह पहुंचा हुआ है। 1 घौ औौर भूमि को धौंफ कर गर्म करने से अभिप्राय है। शंकराचार्य ने 'संघमति'का अरथं 'संयोजयति'=संयुकत करता है' किया है और अभिप्राथ यह लिया है कि मनुष्यों को भुजाओं से और [पक्षियों को] पंखों से संयुक्त करता है। देखो ४।९२।

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श्वेताश्वतरोपनिषद्। हि। ५॥ यामिषुं गिरिशान्त हस्ते विभर्ष्य स्तवे। शिवां गिरित्रतां कुरु माहिशसी: पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥ * हे रुद्! १ हे गिरिशन्त (मेघ में रहने वासे) तेग स्वरूप को शिव है,मयानक नहीं, जिस से कीई पाप (क्रूरता) नही प्रकाशता, उस, सघ से बढ़कर कल्याणकारी खवरूप से हमारे ऊपर दृषटि डालो।५। है गिरिशिन्त जिस बाण को "फैंकने के लिए तुम हाथ में वारण करते हो, हे मंध के मालिक उसको कल्याणकारी बनाओी। मनुष्य और वशु को हानि :न पहुंचाओ ।६। ततः परं ब्ह्म परं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढस्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा- डमृता भवन्ति।७। वेदाहमेतं पुरुषं महान्त मादित्यवर्ण तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वा- इतिमृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय॥८॥ * देखो वाज० सं० १६। २; तैति० सं०४।५१॥। रद, कड़कते हुए मेघ के अदर जो अझनि है, उस अभि से भावती हुई महिमा को लेकर शबल रूप में परमात्मा का नाम है, उसके दोरून हैं-शिव [ कल्याणकारी ] और घोर -मयानफ। 1 ेमे वाज० सं० ६६।३;तैति० सं० ४।५११।१

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. अध्याय ३ मं० १० २९.

उस से परे परव्रह्म है, सारे फैला हुआ, सब भूतों के शरीर में छिपा हुआ, अकेला सारे विश्व को घेसने वाला इस ईश को जो जान लेते हैं, वे अमृत हा जाते हैं, 19. * मैं उस महान पुरुष को, जो सूर्ग के तुल्य चमक वाला है, और अन्घेरे से परे है t, जानना हैं जो मनुष्य उसको जान लेता है,वही मृत्यु से पार उतारता है, और कोई मार्ग (यहां) जाने. के लिये नहीं है ।5 यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्वित् यस्मान्ना- णीयो न ज्यायोऽस्ति किंचित्। वृक्ष इवस्तव्धो दिवितिष्ठत्येकस्तनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वस् ।९। ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयस्। य एतद्विदु- रमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति॥१०॥। जिस सेन कुछ परे है, न घरे है, जिस से न कुछ: सकषमतर है, न महत्तर है। वृक्ष को तरह जमकर वद अकेला आकश मे खड़ा है, उस पुरुष ने इस सब् को पूर्ण किया. हुआ है। ह। इस (लोक) से जो परे हैं, वह रूप से रहितः और दुःख सें रहित है जो इस को जान लेते हैं, वे अमृतः हो जात है, औौर दूसरे निःसदह दुःख में डूबते हैं ई॥ १० । "घाज० सं० २०।१८;तैसि०आर ३।१।७३१३।१ * मिलायो गीता ८। ६। 1 मिलाओ श्चेता० ६।६५। 5 संसार दुःख अर्थात् बा-रर का जन्म देखो वृह४३।२०-

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श्वेताश्वतरोपनिषद्। सर्वाननशिवरोग्रीवः सर्वभूतगहाशयः । सर्वव्यपी स भगवान् तस्मात् सर्वगतः शिवः ।.११। महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तक: । सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमशिानो ज्योतिरव्यय: ॥ १२। अङ्गष्ठमातः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । हृदा मनीषा मनसा डभिक्लृप्ो य एतद्विदरमृतास्ते भवन्ति॥१३॥ सब के मुख, सिर और गीवा (गर्दन) उसकी हैं. (=ह इन का मालिक है) वद सत भूतों की (हृदय की), गुफा में रहता है, वह भगवान् सबको घेरे हुए है, इस लिये वह सर्वगत (सर्वत्र उपस्थित) शिव है। ११। वह पुरुष, महान् प्रभु हैं, वह सच्व म का प्रेरक है, वह हर एक पदार्थं में अपनी पुएयतम प्राप्ति का मालिक है, वह ज्योति है, वह अव्यय (अविनाशि) है।१२। अंगूठा मात्र पुरुष सदा मनुष्यों के हृदय में रहता है, हृदय सें, बुदद्धि 1 से और मन *सच्च; जो नाम अस्तित्व (हंस्ता) है।. तैत्ति० आर० १०।७१; कठ० ४ ।१२१।। कठ ६। ६ और श्वेत० उप० ६।२० की तरह यहाँ श्री 'मनीषा' पाठ शुद्ध है, उपनिषद् में यहां 'मन्वीशः' पाया जाता है, जिसका अर्थ शंकराचार्य ने श्ानेश लिया है, पर

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अध्याय ३ मं० १५ से निश्चित होता है, जो इसको जान लेते हैं, वे अमृत दोजाते है। १३। सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष: सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ।१४। पुरुष एवेद सर्वं यद्धतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥१५॥ * वह पुरुष हजारों सिर, हजारों नेत्र, और हजारोँ पाओं वाला है. वह इस ब्रह्माएड को चारों ओर से घेर कर भी दस अंगुल उससे परे खड़ा हैt १४। पुरुष हो यह सब कुछ है, जो हुआ है, और जो होगा + वह ममृतत्व का भी यह अप्रयुक्त शन्द मनीपा से ही किसी तरह बद्लकर इस रूप में दो गया है।। * यह ऋवा ऋग० १०।६०।१, अथर्घ० १९।६। १. घाज० सं० ३१।१; तैतति० आर० ३।१२।१ । यहां फिर विराट रूप में परमात्मा का वणन है।। + अभिप्नाय यद है कि वद ब्रह्माएड को घेर कर उस से परे भी है। शंकरावायं ने दूसरे अर्थ में दशांगुल से हृदय लिया है, क्योंकि वह नाभि से दस अंगुल ऊपर है। अभिप्राथ यह है, कि वद ब्रह्माएड को घेर कर हृदय में स्थित है।। 1 यह विराट का वर्णन है, और यहां इस दश्यमान सम्टि जगत् रूपी शरीर से परमात्मा को शरीरी उदराया

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३२ श्वेताश्वतरोपनिषद्। - मालिक है, और (उमका भी मालिक है। जो अन्न से घढ़ता है* ॥१५/। सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमु- खम्। सर्वतः श्रतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ११६। सर्वेन्द्रियगुणाभामं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् सर्वेस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरण बृहृत् ।।१७।। सब जगह उसके हाथ और पाओं हैं, सब जगह उस के नेत्र, सिर और मुख हैं, सब जगह उसके कान हैं, वह लोक में सबको बेर कर खड़ा है।१६। सारे इन्दियों के गुर्णी से चमकता है, और सारे इन्द्रियों से रहित है, सबका प्रभु सब पर ईशन करने वाला है, सबका बड़ा शरण, (रक्षक, पनाह) -. हैं u१ख।। नवद्वारे पुरे देही ह५सो लेलायते बहिः। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य ।१८। है, इसलिये कदा है, जो हुआ है और होगा, वह पुरुष ही है। * जो गन्न से बढ़ता है.संसार में भोग भोग रहा है। अर्धारअमृतत्व (मुक्ति) का मालिक भी पुरुष है। और संसार का मालिक भी पुरुष है। मुक्ति औौर संसार दोनों उस की भाजा में है, मुक्ति में अमृत और संसार में भोगों का चाता वही है।।

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अध्याय ३ मं. २१ ३३

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः सं शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेचा तमाहुरग्रयं पुरुषं महान्तम् ।१९। अणोर: मोयान् महतो महीयानात्मा गुहायां निंहितो- उस्य जन्तोः । तमकतुं पश्यति वीतशोको धातु: प्रसादान्महिमानमीशम् ।२०। वेदाहमेत- मजरं पुराणं सवात्मानं सर्वगतं विभुत्वात्। जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥२१।। "

यह पुर (देह) जिसके नौ द्वार हैं, इसमें जो देह का मालिक हंस है, वह, बाहरखेलता. है. सारे लाक को वश * नौदार, देह के नौ छेद। सात छेद सिर के (दो आंख दो कान, दो नासा और मुख) और दो छेद नांचे के (मले मूंत्र के त्याग के) देखो गीता ५।१३। कठ ५ । ११ में ११ द्वार कहे हैं, वहाँ नाभि और ब्रह्मरन्ध्र अधिक साथ मिला कर गिने गये हैं।। + हंस, परमात्मा, वह वाहर खेलता है, सारे विश्व में उसकी लीला है, यद्यपि वह सारे विश्व में खेल रहां है, पर उसके दर्शन इमें उसकी राजधानी में मिलते हैं, उसकी राजधानी देह है, और हृदय में उसका सिंहासन है।।

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३४ में रखने वाला, स्थाघर को भी और चर को भी।१८। वह बिना हाथ के सबको पकड़े हुए है, बिना पाओों के वेगवाला है, घिना नेत्र के देखता है, बिना कानं के सुनता है, वह हर एक जानने की चस्तु को जानता है, पर उसका कोई जगनने वाला नहीं, उसको मुखिया और महान् पुरुप कहते हैं।१९ सूक्ष्म से सक्ष्मतर और महान् से महत्तर आत्ना इस जन्तु (जीत्र मात्र) की गुरुा (हृदय) में छिरा हुआ है। वह मनुष्य जो शोक से पार होगया है, वह धाता (परमात्मा) की कृपा से उस महिमा (महान्) को देखता है, जो 'ईशन कर रहा है, और कामनाओं से रहिन है ।२०। मैं इसको जानता हूं, जो अजर और पुराना हैं, सबका आात्मा है, और विभु है, इसलिये सर्वगत (सब जगह उपस्थित) है। उसके जन्म का अभाव बनलाते हैं, क्ाकि ब्रह्मवादो उसे नित्य बतलाते हैं ॥१२॥ चौथा अध्याय। चौथे अध्याय में प्रकति, पुरुष और परमात्मा के सरूप/ और उनके पररार सम्बन्ध और बन्ध ओर नोक्ष का वर्णन करते हैं।। य एकोऽवणों बहुधा शक्तियोगाद वर्णा-

+यह मन्त्र तैति० आर० १०।१२ और कट०२। २० में भी है। पाठ 'अकृतुम्' के स्थान 'अकतुः' और 'ईशम्' के स्थान 'आत्मा' है। तैति० भार० ३।१३।११।१२।७।।

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अध्याय ४ मं०२ ३५

ननेकान् निहिताथों दधाति। विचैति चान्ते विश्वमादौस देवः सनो बुद्धया शुभया संयु- नक्त ।।१।। जो बिना रंग के है, छिपे हुए प्रयोजन वाला # है, जो 1 अक्षेला अनेक प्रकार की अपनी शोकत के सम्पन्ध से अनेक ्रंगों को उत्पन्न करता है, जो आदि में इस विश्व को मिलाता है, और यन्त में अलग २ कर देता है t, वह दव हमें शुभचुद्धि से संयुक्त करे। १ ॥ तदेवाभिस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमा:। तदेव शुकं तद ब्रह्म तदापस्तत् प्रजापति:॥।२।। वही अग्नि है, वह सूय्यं है, वह वायु है, ह चन्द्रमा है, . वही शुक्र (चमकता हुआ, नक्षत्रादि) है, चह ब्रह्म (हिरएय- गर्भ) है, वह जल है, वह प्रजापनि (बिगट्) है.5 ॥२॥ * जो सार्थ से निरपेक्ष कंवल परार्थ रचना करता है। + भिन्न २ प्रकार की सृष्टि। 'विचैति चान्ते विश्वमादौ' श्रीशङ्कराचार्य्य ने इस "आदौ' पद के अर्थ को पूर्शर्ध के साथ मिला दिया है, पर यहां की बनावट में यह पद अपने अर्ध को यहीं मिलाता हुआ प्रतीत होता है,१।११ में 'यस्मित्निदं संच, विचैति सर्वम् इसी अर्थ का संघादी है।। 5 यहां शबल रूप में सर्वान्तर्यामी हो कर सब को शंक्ति.

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श्वेताश्वंतरोपनिषद्। त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वां कुंमारी। त्वं जीणों दण्डेंन वञ्चसि त्वं जाता भवसि विश्वतोमुखः ॥३॥ नीलः पतंङ्गो हरितो लोहिताक्षस्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः1 अनादिमत्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो. जातानि भुवनानि विश्वा। ४॥ * तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू कुमार है, तू कुमारी है, वू बूंढा हुआ दरडे से चलता है, तू प्रकट हो कर सब ओर मुख देता हुआ प्रकट किया है। (देखो उपनिपदों की शिक्षा, अध्याय १ पृष्ठ ११ से १२३ ।। *परमात्मा इस सारे जगत् का इतना चड़ा आश्रय है, कि इस का सर्वस वही है, अ्नि का अगिपन उस केसहारे है, और सूर्य्य का सूर्ययपन उसके सहारे है, इसी प्रकार यध्यपि . ईहम अपनी इच्छा से चलते फिरते हैं, पर वस्तुतः हमारी सारी शक्तियां इसी के आश्रय है, 'हुक्म बिना भूले नहीं पाता' वह हमोरे नेत्र में देखने की शक्ति और कान में सुनने की शक्ति देता हुआ वर्तमान है, इसी लिए उसे नेत्र का नैत्र और श्रोत्र का श्रोत कढ़ते हैं, इसी अभिप्राय से उसे कहा है 'वही अत्नि है, वही आदित्य है.और इसी अभिप्राय से कद्दा है, "तूसत्री है, तू पुरुष है,'अभिप्राय यही है, कि इन की सारी ननिज श्क्ति उस के आश्रित है। बृहदारएयक ६। १ में इसी

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अध्याय ४ मं० ५. वाला होता है ।।३।। तू नीला भौरा है, लाल नेत्रों वाला दरा तोता है, तू बिजली चाला मेघ है, त् ऋतुएं है, तू समुद्र है.। तेरा कोई आदि नहीं, क्योंकि त घिसु है, त ही है, जिस से सारे भुवन उत्पन्न हुए हैं।। ४ ॥ अय प्रकृति, उसका कार्य्य, और पुरुष का उसको भोगना और त्यागना दिखलाते हैं- अजामेकां लोहितशुक्तकृष्णां बह्नीः प्रजा: सृजमानां सरूपाम्। अजो ह्वेको जुषमाणोऽनु शेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ।।५।। एक अजा (अजत्मा स्त्री ) है, जो लाल, श्चेत और फाली है, समान रूप वाली है, और बहुत सी सन्तानों के उत्पन्न कर रही है। और एक अज (अजन्मा) पुरुष उसे प्रकार की कलपना से प्राण ओर इन्द्रियों का संवाद दिखला कर अन्त में यह प्रकट किया है, जय इन्दिरियों ने समझ लिया, किहम प्राण के बिना किसी काम के नहीं, तो बाणी ने सब से अच्छा होने का अभिमान त्यागा और प्राण को कहा कि मैं ज़ों सब से अच्छी हं, वह त दी है, इत्यादि। जैसे वहां प्राण मौर इन्द्रियों का भेद है, तथापि प्राण के आंश्रित उन की मंहिमा दिखलाने के लिए वाणी आदि की महिमा प्राण में दिखलाई है, और प्रश्नोपनिषद २। ५-१३ में प्राण को सर्व रफ में प्रतिपादन किया है। . * यद ऋचा अथर्व १०।८।१२ की है।

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३८ श्वेताश्वतरोपनिषद्। घयार करता हुआ उस के साथ सोता है, और दूसरा अज इसे छोड़ देता है, जब उसने इस के भोग भोग लिए हैं*॥१॥ पर मुकि केवल प्रकृति के त्याग से नहीं, किन्तु प्रकृति. को त्याग कर अपने साथी परमात्मा के दर्शन से होती है. यह दिखलाते हैं- 'ni': द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयो रन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यन -: श्रन्नन्यो अभिचाकशीति ॥६॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमओ्रो Sनीशया शोचति मुह्यमान:।जुषट यदा पश्यत्यन्यमीश मस्य महिमानमिति वीत- शोकः ॥।७।। दो पक्षी जो सदा साथ रहने वाले (कभी अलग नः.

  • यहां अजा प्रकृति है, लाल श्वेत और कृष्ण तीन गुणं अर्थात् रजस सत्व और तमस हैं, उस की पजा उस के कार्य हैं। पुरुष जब तक इस से प्यार करता है, तब तक इस के. भोगों को भोगता है। जब उसे आत्मा प्रेमास्पद हो जाता है, .. सो यह इसे छोड़ देता है, यहां अजा और अज शब्द अजन्मा के अर्थ में है, जैसा कि पूर्व १।९ मैं है। अजा वकरी और अज, चकरे के अर्थ में यहां नहीं, तथापि शत्रों का खेल ध्यन से इस अर्थ को प्रकोशित करता है।

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मध्याय ४ सं०द ३६

होने वाले) मित्र हैं, दोनों एक घृक्ष को आ्लिंगन किए हुए हैं, उन में से एक स्वादु फल खाता है और दूसरा न खाता हुआ ( केवल) देखता (ही) है॥६॥ उसी वृक्ष पर पुरुष निमनन छुन (इवा हुआ) असमर्थना (दुचलता, ज्ञान घल के अभाव) से धोखा खाता हुआ शोक में पड़ा है। जय उस प्रियतम दुसरे (साथी) ईश को देखता है और उस की महिमा को देखता है, तब यद शोक से पार हो जाता है।।।७.। ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन देवा अधि विश्वे निषेदुः। यस्तन्न वेद किमृचा करि व्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ।।८।। ऋचाएं (सारी) उस अधिनाशि परम आफाश (पर- मात्सा) में हैं ( अर्थात् उम को प्रतिपादन करती हैं,) जिस में सारे देवना स्थित हैं, जो उसको 'नहीं जानता' वह ऋचा से का करेगा? जो इस को जानते हैं, वही शान्ति से. रहते हैं ।।८ ।। * दो पक्षा, जीवात्मा और परमात्मा हैं। वृक्ष, शरीर है, जिस पर इन दोनों का धोंसला हैं, जीवात्मा इंस में अपने कर्मों के फळ भोगता है और परमात्मा उस को देखता है। मिलाओ ऋग १०। १६४ ।२ मुएड० ३।१११ निरुक ६४। ३० कठ ३। १। :- देखी मुएडक ३। १।२ + ऋग १।१६४। ३६; यह ऋचा नैति० भा० शश

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४० श्वेताश्वतरोपनिषद्। छन्दांसि यज्ञ: कतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्न वेदा वदन्ति। अस्मान्मायी सृजते विश्व- मेतत् तस्मिँश्रान्यो मायया संनिरुद्धः । ९; मार्या तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्। तस्यावयवभूतैस्तु व्यापं सर्ममिदं जगत् i१०। छन्द यज (हविर्यन) कतु (ज्योतिष्टोमादि,) व भूत, भी.ष्यत और जो कुछ और वेद बतलाते हैं इस सब को माया का मालिक (मायी) इस से रचता है, और उस में दूमरः (पुरुष) माया से रुका ( बन्धां) है। प्रकृति को माया ज.नो और महैश्वर को मायी, सारा विश्व उस (मायी, मांया शवल) के अंगों से व्याप है।। १७ ॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मित्निदं संच विचैि सर्वम्। तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेतिं ॥ १॥ 2: जो अकेला ही हर एक योनि (कारण) का अधिष्ठाती है, जिस में यह सब मिल जाता है (प्रलयकाल में ) और फफिर अलग २ होता है, उस मालिक, वरों के दाता, पूजा के योग्य, देव को जान कर सदा की शान्ति को प्राप्त होता दै।। और नृसिंह पूर्वतापिनी ४।५।२ में ओम् अक्षर के प्रकरण में आई है।

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अध्याय ४ मं०१४

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भ पश्यत जायमानं सनो चुद्धया शुभया संयुनक्तु ।१२। यो देवानामधिपो यस्मिलोका अधिश्रिताः । य ईशेऽस्य द्विपद- श्रतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥१३॥ * जो देवों का उत्पन्न करने वाला, और रक्षा करने लाला है, रुद्र. महपिं (बड़ा देखने वाला) सघ बा मालिक है, जिस ने प्रकट होते हुए हिरएयगर्भ को देखा, वह दमें शुभ वुद्धि से युक्त करे, ।१२। हम किस देव को हवि से पूजा करें ? उस की, जो देवों का अधिपति है, जिस में सब लोक आाश्रय लिये हैं, जो दोपाए और चौपाए परॉ ईशन करता है।१३। सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य सष्टार मनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शन्तिमत्यन्तमोति ॥१४॥ "जने क्षूक्ष्म से अतिसूक्ष्म, कलिल (गहनगभीर संसार). के मध्य में, विश्व का बनाने वाला, अनेक रूपों वाला, भकेला सारे विश्व को घेरने वाला है, उस शिन को जान फर अत्यन्त शान्ति को प्राप्त होता है ।१४।. * देवो पूर्व ३।४।'

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श्वेताश्वतरोपनिषद्। स एव काले भुवनस्यास्य गोप्ता विश्वाघिप: संर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देव- ताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनात्ति ।५। घृंतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्व भूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१६॥। वही समय पर इस भुवन का रक्षक होता है, सव का मालिक सब भूतों में छिपा हुआ, जिस में ब्रह्मर्षि और देवता युक्त हुए हैं, जो उस को जान लेता है वह मृत्यु की फांसों को काट देता है।१५। वह शिव जो घृत से परे मएड * की तग्ह अतिसूक्ष्म है, सब भूनों में छिपा हुआ.है, सारे विश्व. को भकेला चेरने वाला है, उस देव को जानकर सारी फांसों से छूट जाता है ॥१६॥। एष देवो विश्वकर्मा महात्मा संदा जनाना हृदये सन्निविष्टः। हृदा मनीषा मनसाऽभिक्ल सो य एतद्विदरमृतास्ते भवन्ति ॥१७॥ यदा- # मएड, कुप्पे में घी का कुछ हिस्सा जो ऊपर' २' पतला होता है, पंजाबी में जिस को पंग बोलते हैं, वह घीः का भी सार होता है, जैसे दूध की मलाई।

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अध्याय ४ मं० २०

इतमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्नचासच्छिव एव केवलः। तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात: प्रसृता पुराणी ॥१८।। वह देव, सब का बनाने वाला, महान् मात्मा, सदा, मनुष्यों के हृदय में रहता है, वह हृदय से, बुद्धि से, मन- से * प्रकाशित होता है, जो इस को जानते है, वे अमृत हो. जाते हैं। १०। जब प्रकाश उदय होता है, नो वहां न दिन, न रात है, न व्यक्त, न अध्यक है: वहां केवल शिव है। वह अचिनाशि है, वह सविता का पूत्रा के योग्य प्रकाश 1 है. सनातन पठा (वेद का ज्ञान) उससे फैली है। १८। नैनमूर्ध्वं न तियञ्च न मध्ये परिजग्रभत्। न तस्य प्रतिमा अ्ति यस्य नाम महदयश: ॥१९। न संदशेतिष्ठतिरूपमस्यन चक्षुषा पश्यतिः कश्चैननंम्। हृदा हृदिस्थं मनसा य एनमेवंविदुर मृतास्ते भवन्ति ।२०। * श्रद्धा भक्ति, धिवेक, और ध्यान इन के मेन से प्रकट होता है देखो पूर्व ३ । १३। . + अतमः, न अन्धेरा अर्थान् ज्ञान का प्रकाश। 1 गायत्री मन्त्र ।ऋगृ० ३।६२।१० की छाया इस- मन्न्र में है, और देखो श्वेता० उप० ५।४॥

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"82, * न-उसे कोई ऊपर से पकड़ सक्ता है, न. तिरछा, न मध्म में। उसकी कोई प्रतिमा (मूर्ति, वा तुलना) नहीं है, जिंस का नाम महद्व (बड़ा) यश है। १९। न कोई इस का रूप (आकार) देखा जाने के लिये हैं, न कोई नेत्र से उसे देख सकता है। जो उम को हृदय से और मन से हृदय में स्थित देखते हैं, वे अमृत हो जाते हैं। २०। अध्याय की समाप्ति में अपनी और अपनों की, रक्षा. के लिये रुद्र सं प्रार्थना करते हैं- अजात इत्येवं कश्चिद्धीरुः प्रतिपद्यते। रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ।२१। मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिष:। वीरान् मा नो रुद्र भामितोऽवधीहविष्मन्तः सदमित्त्वाः हवामहे॥२२॥। 'तू अजन्मा है' ऐसा कहता हुआ कोई पुरुप कांपता. डुआ तेरी शरण में आता है। हे रुद्र जो तंरा उत्साह देने चाला मुख (चेहरा) है, उससे मेरी सदा रक्षा कर २१६है * इस मंत्र का पूर्वार्ध यजु० ३२१२ का उत्तरार्ध है, औौर इसका उत्तरार्ध यजु ३२। ३ का पूर्वार्ध है।। -। ध्यान किया हुआ प्रसन्न करने वाला है। + यह ऋचा, ऋग्वेद ६११४।८; वाज० सं० १६५१६ की है। पाठ में यह भेद है, कि 'आयुषि' की जगह ऋग्वेद में

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अध्याय ५ मं०१ 84

रुद्र ! न हमारी सन्तान में न उस से अगली सन्तान (पोते" आदि) में हानि पहुंचाओ, न हमारो आयु में, न हमारी गौओं में, न हमारे घोड़ों में हानि पहुंचोओ। हे रुद! कोध में हमारें बीरों को न मारो, एम हवि लेफर सदा तुम्हें घुलते हैं ।।२२॥. पांचवां अध्याय। इस अध्याय में परमात्मा का अधिष्ठतृत्व और जीशत्मा का स्वरूप वर्णन करते हैं- द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये विहिते यत्र गूढे। क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्या- विद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः।।१।। परवहा, जो अधिनाशि, अनन्त और (सय भूतों में) गूढ़ है उस में विद्या (उपासना) और अविद्या (कर्म) दोनों ''आयौ' है, 'भामितः' की जगह वाजसनेय में 'मामिनः' पाठहै, और सब में 'भामितः' है। यहां उपनिषद् में जो 'भावितः' पाठ मिलता है. चह लेखक प्रमाद से है। चौथा पाद ऋग्वेद में 'हविष्मन्तः सदमिन्या हवामहे है, वाजसनेय संहिना में भी ऐसा ही है, तैत्तिरीय में 'हविष्मन्तो नमसा विधेमते' है, यहां उपनिषद् में 'हतिष्मन्तः सदसि स्वा हवामदे' है, शङ्करा- नन्द और विज्ञानात्ता ने अपनी व्याख्या में 'सदमित्वा' ही: माना है।।

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४६ श्वेताश्वतरोपनिषद्। स्थापित हैं, इन में से विद्या (कर्म) नाश होने वाली है, 'पर विद्या (उपासना) अमृत है, वह जो विद्या और मविद्या :पर ईशन कर रहा है, वह इन से अलग है ।।१॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋषिं प्रसूत कपिलं व्यस्तमग्रे ज्ञानैर्िभर्ति जायमानञ्च पश्येत् ॥।२। जो अकेला हर एक योनि पर निरीक्षण (निगहबानी) - :करता है, सब रूपों (आकारो) पर, और सब योनियों पर, जो पहले उत्पन्न हुए कपिल ऋृषि को ज्ञानों से भर देता है, और :उत्पन्न होते हुए पर दृष्टि डालता है ॥२ ॥ एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन क्षेत्रे संहरत्येष देव: । भूय: सृष्टवा यतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३॥ सर्वां दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक् प्रकाशयन् भ्राजते यद्वनड्- चान्। एवं स देवो भगवान् वरेण्यो योनिसव- भांवानधितिष्ठत्येकः॥४।। * कर्म और उपासना दोनों का परम तात्पर्य ब्रह की परात्ति है। अविद्या कर्म और विद्या उपासना (देखो. ईश ९ -- ११)

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अध्याय ५ मं०ई यह देव एक एक जाल को* इस क्षेत्र (लोक) में अनेक प्रकार से फैलाता हुआ फफ़र समेट लेता है,इसी प्रकारवह महान् आत्मा ईशहे यतियो ! वार २ रखकर सब पर ईशन करता है.।३। जैसे सूर्यय सारी दिशाओं में, ऊपर, नीचे और तिरछा प्रकाश देता हुआ सतरमकता है, इस प्रकार वह पूजनीय, भगचानू, देव, अकेला भिन्न २ योनियों के सवभावों पर निरीक्षण करता है।४॥ यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनि:पाच्यांश्च सर्वान् परिणामयेद्यः। सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठ- त्येको गुणांश्च सर्वान् विनियोजयेद्यः ॥५॥ तिद वेदगुह्योपनिषत्सु गूढ तद् ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम्। ये पूर्व देवा ऋषयश्च तद्विदुस्ते तन्मया अमृता वै बभूवु: ॥६॥। जो विश्वयोनि (सब का जन्मस्थान) (योनि योनि के) "स्वभाव की पकाता है ( दृढ़ करना है) और जो पकने योग्य है। उन को बदलता रहता है, जो अफेला.एक एक पर और सब पर निशीक्षण करता है, और जो सारे गुणों को विनियुक्त * मनुष्य पशुआदि के शरीर को। धीरे २ परिणत होते हुए उच्च अवस्था में आने योष्ठ है। 'पांच्यान्' की जगह 'प्राच्यान्' पाठ भी मिलता है, अथे पहले उत्पन्न हुओं को धीरे २ परिणत करता है।।

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श्वेताशवंतरोपनिषद्। करता है (काम में लगाता है, प्रजा के भोग के उपयोगी बनाता है। ।५।। वह वेद के गुह्य रहस्यों में छरिपा हुआ है, वह जो ब्रह्मा का कारण है, उस को वह जान पाता है, जो सच्चा ब्राह्मण है, पहिले जिन ऋषियों और देवताओं ने उस को जाना, वह तन्मय (उसी के रंग में रंगे हुए) होकर अमृत होगए ॥ ६ ।। अब छः मंत्रों मे जीवात्मा का वर्णन करते हैं- गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव संचोपभोक्ता। स विश्वरूपस्त्रगुणस्त्रिवरत्मी पाणाधिपः सञ्चरति स्वकर्माभिः ॥७॥ अङ्गुष्ठ- मात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहङ्कारसमन्वितो यः । बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोपि हष्टः॥८॥। पर वह (अपर, जीवात्मा) जो (वासनाओं) से युक्त है, फल वाले कर्मों का करने वाला है, और किए हुए उस (कर्म) का ही फल भोगने वाला है, वह सारे रूपों (देहों) घाला, तीन गुणों वाला, तीन मार्गो वाला. * प्राणो का * तीन गुण, सत्व, रजस् तमम्; देहधारियों के स्वभाव इन तीनों गुणों के अनुसार सचगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी होते हैं। और तीन मार्ग धर्म, अधर्म ज्ञान: (शुक्क, कृष्ण और अधोगति ) ।

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अध्याय.५ मं० १० मालिक अपने कर्मों से घूमता है। ७। वह जीवातमा (अपर) जो भार का अग्रमाय है, वह मन के गुण से अंगूठामात्र और सूर्य्य के तुल्य चसकता हुआ और संकल्प और अदङ्कार से युक्त देखा गया है *॥८॥ बालाग्रशतभागस्य शतघा कल्पितस्यच। भागो जीव: स विज्ञेय: सचानन्त्याय कल्पते।९। नैव स्त्री न पुमानेष नचैवायं नपुंसक: । यद्- च्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते॥१०॥. बाल की नोफ का जो सवा भाग है, वह सौ टुकड़े किया हुआ, उस का एक हिस्ला (अतोच सूक्ष्म) जीव का जानना चाहिये। और वह अनन्तता के लिए समर्थ होता है ।९ न यह स्त्री है, न पुरुप है, और न ही नपुंसक है, जिस २ शरीर को ग्रहण करता है, उस २ के साथे वंद - सम्बद्ध होता है। १० ॥ संकल्पनस्पर्शनदृष्टिमो हैर्ग्रासाम्बुवृष्टयाइडत्म * आर, चाबुक का पतला सिर, आरात्रमात्र, चावुक के सिरे का बिन्दुमात्र।स्तयं एक बिन्दुमात्र है, पर हृदय- देश में लिङ्ग शरीर के साथ अंगूठामात्र प्रतीत होता है और संकल्पों से युक्त होजाता है, अपने निजधर्म को लेकर वह रवितुल्य अर्थात् चैतन्य रूप और अहक्कार (अस्मिता, मैं हं) वाला प्रतीत होता है।

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श्वैताश्वतरोपनिषंद्। विवृद्धजन्म। कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसम्प्रपद्यते ॥११।। स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैवृणोति। क्रिया- गणैरातमगणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोपि दृष्ट:१२ संकल्प, छूना, देखना और मिथ्याज्ञान के द्वारा यह देही (जीव) मिन्न २ स्थांनों में कर्मों के अनुसार रूपों (देहों) को क्रम से प्राप्त होता है, जैसे मंत्र और जल से शरीर की वृद्धि होती है।११। देहधारी (आत्मा) अपने गुणों से स्थूल और सूक्ष्म बहुत से रूर्पी (आकारों), को चुनता है, और अपने कर्मों के धर्मीं (असरों) से और आत्मा के धर्मों (इच्छा आदि) से उन ( आकारों) के साथ अपने संयोग का हेतु होकर भिन्न २ दीखता है। १२ ॥ जीवात्मा का स्वरूप और उसका संसार में घूमना वर्णन करंके उसकी मुक्ति का उपाय बंतलाते हैं :- अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य सरष्टा- रमनकरूपम्। विश्वस्यैकं परिवेष्ठितारं ज्ञात्वा देवँ मुच्यते सर्वपाशैः।१३। भावग्राह्यमनीडाख्यं शंकराचाय के अनुसार अर्थ दे दिया है, यह वंवन रुप़ नहीं, पाठ भी कई प्रकार का मिसता है।।

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अध्याय ६म० १ भावाभावकरं शिवम्। कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जुहुस्तनुम्॥१४॥ * जिस का न आदि है न अन्त है, जो इस गहन गभीर (जगत्) के मध्य में, सारे विश्व का रचने वाला, अनेक़. रूपो वाला, अकेला सबका घेरने, वाला है, उस देव को जान फर सारी फांसों से छूट जाता है। १३। जो भावना (श्रद्धा, भक़्ि) से ग्रहण किया जाता है, जो निराधार कहलाता है, जो सृष्टि और प्रलय का करने वाला है, शिव (कल्याणरूप) है कलाओंो का रचने वाला है, जो उस देव को जानते हैं," वे शरीर को छोड़ देते हैं।। १४ । छटा अध्यायः। इस अन्तिम अध्याय में स्वभाव आदि को जगत् का कारण. ।मानने वालों का व्यामोह दिखालाते हुए ईश्वर की महिमा की पूणता दिखलाते हैं।. स्वभाव मेके कवयो वदन्ति कालं तथाड़न्ये परिमुह्यमानाः। देवस्यैष महिमा तु लोके येनेंदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम ॥१। येनावृतं नित्यमिदं हि. * मिलाओ ३७ ४। १४, १६।. + कलाएं, प्रश्नोपनिषद् (४।४) में कही, सोलह कलाएं- प्राण; श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, मल.वीर्य, तप, मन्त्र, फर्म, काल, नाम-।

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५२ श्वेताश्वतरोपनिषद्। सर्व ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथिव्याप्यतेजोऽनिलखानि चिन्त्यम्॥२॥ कई विद्वान् 'धोखा खाते हुए स्भाव को, और दूसरे कांल को (हर एक कार्य का कारण) चतलाते हैं #, पर लोक में यह महिमा देव की है, जिस से यह ब्रह्म चक्र घुमाया 'जा रहा है। १। जिल से यह सब सदा घिरा हुआ है, जो जानने- वाला, काल का काल, 1 गुभों से और सारी विद्याओं से युक्त है, उस से ईशन किया हुआ यह कार्य (सृष्टि) भिन्न रूपों में बदलता है, जो पृथिती, जल, तेज. वायु; और आकाश कहलाता है। २। तत् कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयस्तत्वस्य तत्वेन समेत्य योगम्। एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्ट- मिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मैः।३।आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावांश्च सर्वान् विनि- योजयेद्यः। तेषामभावे कृतकर्मनाशः कर्मक्षये याति स तत्वतोऽन्य: ॥४॥ पुत' कर्मको करके और फिर हट कर एक तचव *देखो.पूर्व ।१२। काल का भो नाशक, देखा आगें १६:

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अध्याय ६ मं ७

(नेनन) को दूसरे तच (जड) के सांथ मिलाकर-अर्थात् एक, दो, नीन और आठ के साथ काल के साथ और मन के सृक्ष्म गुणों के साथ मिठा कर,।१ जो (नीन) गुणो घाले कार्यों को आरम्भ करके सारे भारों को अपने २ काम में लगाता है, और जब उन का मभाव होता है, तो पले की हुई रचना का नाश होता है, रचना जब नाश होगई है, नो भी वह अपने स्वरूप से वर्नमान रहता है जो (इन सब से) भिन्न है।४ । आदि: स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकाला दकलोपिटृष्टः। तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं- स्त्रचित्तस्थमुपास्य पूर्वम्।५।सवृक्षकालाक्कतिभिः परोऽन्योयस्मात् प्रपच्च: परिवर्ततेजयम्।धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम।६। तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परम च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥७।। वह आदि है, संयोग के वारणों का कारण है. तीनों * एक, अबिदया दो सत्य, असत्य; तीन, सत्व, रजस्, नमस: आठ, पृथिधी, जल, तेऊ, वासु, आकाश, मन, बुद्धि, अहङार (शाङरानन्द)।

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५४ श्वेताश्वतरोपदिषद्। कालों से परे, बिना अवयतों के देखा गया. है, उस, अनेक् रूपों वाले, और (सब वस्तुओं के) सब्ने प्रभव, अपने चिस में स्थिन, पूजा के योग्य देव को पहले उपास करः।५। वह जो (संसार) वृक्ष * के और काल के आकाश़ों से परे, इन से न्यारा है, जिस.से यह सारा प्रपश्च घूमता है, उम, धर्म के लाने वाले और पाप से हटाने वाले, ऐश्वर्य के मालिक; सब के आश्रय, अमृत को अपने आत्मा में स्थित ज़ानकर, ।६ । उस, ईश्वर के परम ईश्वर, देवताओं के परमदेघता, पतियों के परमपति, परे से परे, भुवन के मालिक, पूजा के योग्य देव को ढूंढ पाए।७॥ न तस्य कांर्य करणं च विद्यते नः तत्सम- श्राभ्यधिकश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव: श्रयते स्व्राभाविकी ज्ञानवलक्किया च.।८।नः तस्य कश्चित्-पतिरस्ति लोके नचेशिता नैव च तस्य लिङ्गम। स कारणं करणािपाधिपो.न. चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिप: ।।९।। न उस का शरीर और इन्द्रिय हैं, न उस से कोई बढ़, कर, न उस के बराबर दीखता है, इंस को परा (ऊती) शक्ति अनेक प्रकार की सुनी जाती है। उस में ज्ञान और * संसार वृक्ष का वर्णन कठ० ६। १ में है। + सुनी जाती है, श्रृति द्वारा जानी गई है।

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अध्वीय ६ 'मं'१ ५५ "बल की शंक्ति 'स्वाभाविंक है। 16। लोक में कोई उस का पति नहीं है. न उस पर ईशन करने वाला, और न ही कोई उस का चिन्ह है, वह कारण है, इन्द्रियों के मालिकों का मालिक है । उसका न कोई मा चाप है, न मालिक है।। ६ । यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभि: प्रधानजैः स्व- भावतो देव एक: स्वमावृणोत्। स नो दधाद ·ब्रह्माप्ययम्-।। १० ।। . वह अकेला देव जो मकड़ी की नाईं प्रधान (मूल प्रकृति-) से उत्पन्न होने वाले तन्तुओं (कार्यों) से खभाचतः अपने आप को घेर लेता है S वह हमें ब्रह्म में लय [समाधि ] देवे॥१०॥ एको देवः सर्वभूतेषु गूढ: सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभृताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।११। एको वशी 1 वह खवभात से सब की जानता है, और स्भाव से हब की वश में रखे हुए है। 1 पन्दिरियों के मालिक, सारे जीवात्मा, उन सब का "भी मालिक है। जो कुछ उस ने रचा है, उसी के परदे में वह आप छिपा हुआ है।

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५६ श्वेताश्वतरोपनिषद्। निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीज बहुधा यः करोति। तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीग स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥१२। वह एक देव है, सब भूतों में छिपा हुआ है, सर्व. व्यापक, सब भूतों का अन्तर,त्मा (मन्तर्यामी आत्मा) कर्मो का अधिष्ठाता, सब भूतों में रहने वाला, सब का साक्षी, चेतन, केवल (एकतत्व) और निगुर्णु (सन्च, रजस् तमस्) इन गुणों से अरग) है। ११॥ * वह अकेला उन बहुतों.को वश में रखने वाला है, जो स्वाभाचिरु क्रिया वाले नहीं i हैं, वह एक बीज (प्रकृति) को अनेक प्रकार का बना देता है। जो धीर पुरुष उस को आत्मा में स्थित देखते हैं, उन को सदा सुख होता है, दूसरों को नहीं ॥ १२॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तत्कारणं सांख्ययोगाि गम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥१३॥नतत्र * देखो कठ० उप० ४ ।१२-१५।। + जड़ पदार्थ क्रिया करते हुए भी वस्तुतः निष्क्रिय हैं, क्योंकि वह स्वभावतः नहीं, किन्तु उसी के बल से परिचा- लित होकर क्रिया करते हैं। निष्क्रिय=जीव, क्योंकिप्राणियो की सारी क्रियाएं देह और इन्दियों में समवेन हैं, आत्मा में नहों (शंकराचार्य)

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अध्याय ६ मं १६

सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेया विद्युतो भान्ति कुतोऽयमनिः। तमेव भान्तमनु भाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥१४॥ नित्यों का नित्य, वेतनों का वेतन, जो अकेला ही बहुतों की कामनाओं को रचता है, उस देव को जो, कारण है और सांख्य और योग से जानने योग्य है, जानकर सारी फांसो से छुट जाता हैं। १३ । वहां न सूर्य चमकता है, न चन्द्र और तारे, न वहां बिजलियें चमकती हैं, यह अत्नि तो पमा। उसी केचमकने के साथ यह सब चमकता है, उस के प्रकाश से यह सब चनकता है॥१४॥ एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवासि: सलिले सन्निविष्टः। तमेव विदित्वाडतिमृत्यु मेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१५। सविश्वकृद -

विश्वविदात्मयोनिर्ज: कालकालो गुणी सववि- द्यः। प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थिति बन्धहेतुः ॥।१६।। एंक हंस इस सारे भुवन के मध्य में है। वही अध्नि होकर जल में प्रतिष्ट है, उसी को जानकर मृन्यु से पां # देखो कट ५११५ मुएंडक २११०, गीता ११। ६।

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श्वेताश्वतरोपनियद्। होता है, औौर कोई मार्ग चलने के लिए नहीं है,॥१५।। वह सय को बनाने धाला, सब का जानने वाला है, आत्मयोनि (स्यम्भू,) चेतन, काल का काल [काल का नाश करने वाला] शुगों से युरु, सारी विद्याओं से युक, प्रकुति का और जीवा- त्मा का माकिक, [तीनों ] गुणों का मालिक संसार के बन्ध, स्थिति और मोक्ष # का कारण है॥ १६॥ स तन्ययो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ः सर्वगो भुवन स्यास्य गोप्ता।य ईशे अस्य जगतो नित्य- मेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ।१७।। वह तन्मय अमृत है, ईश की मर्यादा वाला , जानने चाला, सब जगह पहुंचा हुआ, इस सारे भुशन का रक्षत है, सदा इस जगत् पर ईशन करता है, क्योंकि और कोई हेतु (इस जगत् पर ) ईशन करने के योग्य नहीं है। १७ ।। यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रक्काश मुमुक्षुरवे शरण महं प्रपद्ये ॥१८।। जो पहले ग्रहमा 5 को बनाता है, और जो वेदों को उस के लिप भेजता है, जो आत्मविद्या का प्रकाश करने वाला है, $उत्पच्ति, स्थिति, और प्रलय मथवा बन्घमोक्ष भार रक्षा। 1े तन्मय तदूप; पकही तच्य, विज्वान वन।. 1 इस जगत पर ईशन करने वाले, पवित्र आत्मा में जो मर्यादा सजती है, वह उस में पाई जाती है। 5 मक्मा, हिरययगम, महत्तश्वर का अधिष्ठाता वन कर

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अध्याय ६ मं० २० मुक्ति को घाहता हुआ मैं, उस देव की शरण लेता हं॥ १८॥l निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्य निरञ्जनम्। अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धन मिवानलम् ॥१९।। जो निरवयय, निश्ल, शान्त, निर्शोष और निर्लेप है अमृतन्व का परला सेतु ( =पुल) हैं-जिस का इन्धन जळ चुका दो पेसी अनि की नाई (शुद्ध, ज्योतिर्मय) है* ।१९। दुःख की समाप्ति परमातंमा के जाने बिना कभी नहीं होती यद दिखलात हैं।। यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवा:। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ।२०। जय लोग चर्म की नाईं आकाश को लपेट सफेंगे, तब केत के जाने चिना दु.स का अन्त होगा।।२॥ महसपतत के साथ शयल रुप में हिन्ययगर्भ कहलाता है. और मदतरत्र ही व्यप्टिरूप में बुद्धितत्त्र है, सो ऋंषियों की वुद्धि में वेदों का प्रकाश हिरएगभ से आया है, जैमा कि मुएडक [११] में भी कहा है। और हिरएयगर्भ में यह प्रकाश शुद्धग्रह्म से आया है। * यह शुद्ध का वर्णन है, जिस से वेद का प्रकाश शबल में प्रकाशित होता है। :' हृदय में परमात्मा को ढूंढे बिना दुःख फा. अन्त होना मसम्भष है, जैसे आकाश का लपेटना।

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६० श्वेताश्वतरोपनिषद्। समाप्ति में यह दिखलाते हैं कि पहले यह विद्या किस ने किन को उपदेश की है और अब इस के उंपदेश के अधि- कारी कोन हैं।। तपः प्रभावाद् देवप्रसादाच ब्रह्म ह शवेता श्वरोजथविद्वान् । अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं शोवाच सम्यगृषिसङ्घजुष्टम् ॥२॥॥ तप के प्रभाव से और परमात्मा की ऊपा से ज्ञानी श्वेताश्वतार ने ऋृषियों के संघ से प्यार किया हुआ यह परमपवित्र ब्रह्म [चेद, वेद का रहस्य ] संन्यासियों को ठीकर उपदेश दियां ॥ २१॥ वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम्। नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः ॥२२॥ यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महाः त्मनः ॥२३। यह, वेदान्त में परम रहस्य, जो पहले समय में उपदेश किया गया हैं, यह किसी ऐसे पुरुप को नहीं देना चाहिए, जो पूरा शान्त नहीं है, और ने पुत्र है, न शिष्य है।। २२।। यह विषय जो यहाँ बतलाए हैं, उस महापुरुप को प्रकाशित होते हैं, जिस की देत [ परमात्मा ] में परमभक्ति है। औौर जैसी देव में है, चैसी गुरु में है।। २३ ।।

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सूचीपत्र संस्कृत के अनमोल रत्न मर्धात् घेदों, उपनिपदों, दर्शनो, धर्मशाखों और इतिहास ग्रन्थों के शुद्ध, सरल और प्रामाणिक भाषा अनुवाद। ये भापानुवाद पं० राजाराम जी प्रोफैसर डी० ए० वी० कालेज लाऔौर के किये ऐसे बढ़िया हैं, कि इन पर गवर्नमैन्ट और यूनीष रसिरी से पं० जी को बहुत से इनाम मिले हैं। योग्य २ विद्वानों और समाचारपत्रों ने भी इनकी बहुत बढ़ी प्रशंस्ा फी है। इन प्राचीन माननीय भ्रन्थों को पढ़ों और जन्म सफल करो॥। (१) भी वाल्मीकि रामायण-भापा टीका समेत। वाल्मीकि कृत मूल श्ोकों के साथ २ सोकवार भाषा टीका है। टीका बड़ी सरल है। इस पर ७००) इनाम मिला है। भापा टीका समेत इसने बड़े प्रन्थ का मूल्य केवल ६।) (२) महाभारत-इस की भी टीका रामायण के तुल्य ही दै। दे भागों में छपा है। प्रथम भाग ६।I) द्वितीयभाग ६।) दोनों भाग १२) (५) भगवद्गीता-पद पद का अर्थ, अन्वयार्थ और व्वास्यान समेत। माषा बढ़ी सुपाव्य और सुबोध। इस पर ३००) इनाम मिळा है। मूल्य २1), गीता हमें कया सिखलाती है मूल्य 1-) गाता गुटका-सरल भाषा टीका समेत ।I) (६) ११ उपनिषदें-भाषा भाष्य सहित- -ईश उपानषद् ७-तैत्तिरीय उपनिषद् 11) १-फेन उपनिषद् ८-वेतरेयं उपनिषद ३-कठ उपनिषद १-छान्दोग्य उपनिषद २:) १-पभ् उपनिषद् १०-हृददारण्यक उपनिषद् २1) 4६-मुण्डक और माण्डरक्य १-अता सतर उपनिषद् रेनो इफट्ठी

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(७) मनुस्मृति-मनुस्मृति पर टीकापे तो बहुत हुई हैं, पर यह टीका अपने ढंग में सब से बढ़ गई है। क्योंकि एक तो संस्कृत की सारी पुरानी टीकाओं के भिन्न २ अर्थ इस में दे दिये हैं। दूसरा इसका हर एक विषय-दूसरी स्मृतियों में जहां २ आया है, सारे पते दे दिये हैं। तिस पर भी मूल्य केवल ३।) है।

९योगदशर्न, (८) निरुक्त-इस पर भी २००) इनाम मिला हैं ४॥) १॥ा)। १७-दिव्य जीवन १) १०-वेदान्त दर्शन ४) १८-आर्य पञ्चमहायज् पद्धति।-) ११-वैशेषिक दर्शन १i) १९-स्वाध्याय यक १२-सांख्य शास्त्र के तीन २०-वेदोपदेश १)

प्राचीन ग्रन्थ २१-वैदिक स्तुति प्रार्थना

१३-नवदर्शन संग्रह. १।) २२-पारस्कर गृह्यसूत्र १।I )

१४-आर्य-दर्शन २३-पाल व्याकरण, इस पर

१५-न्याय प्रवेशिका २००) इनाम मिला है 11= ) २४-सफल जीवन १६-आर्य-जीवन १॥) २५-प्रार्थना पुस्तक ~ २६-वात्स्यायन भाष्य सहित न्याय दर्शन भाष्य ४) २७-नल दमयन्ती-नूल और दमयन्ती के अद्वितीय पेम, विवाह विपद् तथा दमयन्ती के धैर्य कष्ट और पातिवत्य का वर्णन ।) वेद और महाभारतके उपदेश :- )।। । वेद मनु, और गीता के उपदेश-)। वेद और रामायण फे उपदेश-)।। अथववद का निघण्ट वैदिक आदर्श हिन्दी गुरुमुस्ी सामेवद के क्षुद्र सूत्र पज्ञांबी संस्कृत शब्दशाखत्र 1) शंकराचार्य का जीवन चरित्र और उन के शास्त्रार्थ, तथा कुमारिल- 11)

भट्ट का जीवन चरित्र I।I) आशनस धनुर्वेद।) उपदेश सप्तकें ॥) नोट-कार्यालय की इन अपनी पुस्तकों के सिवाय और भी लघ प्रकार की पुस्तकें रिआयत से भेजी जाती हैं। मैनेजर-आर्षग्रन्थावलि, लाहौर।