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1. Taittiriya Upanisad Bhashya Bhashya of Yamuna Shankar Pancholee (As Per Sankar)

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तैत्तिरीयोपनिषद्

कोलाखू्य-नगर-निवासी

पं. यमुनाशङ्कर पंचोली-कृत

भाषा-टीका-सहित

तीसरी बार

लखनऊ

केसरादास, सेड सुपरेंटेंडेंट द्वारा नवलकिशोर-प्रेस में सुद्रिम औरं प्रकाशिल

सतु १६२४ ६०

सर्वाधिकार सुरक्षित

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पथ तैत्तिरीयोपनिषद् का विज्ञापन। विदित होकि यह कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय शाखाकी संहिता के व्राह्मस भाग सम्बन्धी तैत्तिरीय नामक उपनिषद् (ब्रह्मविद्या) है, तिसका जो श्रीपरमहंस परिवाजकाचार्य्य श्रीशङ्कराचार्य्य जी कृत महाभाष्य अरु तिसपर आ्र्रनन्दगिरी टीका है, तिसके अनुसारही मूलमन्त्रसहित यह भाषा भाष्य में अतित्र्पल्पक्ष अर- विद्ान्ने अपने गुरु महाराज श्री १०५ स्वामी ब्रह्मानन्द सर- स्वतीजी महाराज की कृपादृष्टि के बलसे, अरु सर्व जनोपकारी परमधार्मिक ब्रह्मनिष्ट मुंशीनवलकिशोर (सी,आई,ई) की आाज्ञा से अनुवाद किया, अरु इस भाषाभाष्य को श्रीद्विजवर पसिडतराज पिताम्वरजी महाराज की टीकांनुसारही आनन्दगिरी टीका, भाष्य, अक्षरार्थ,को प्रायः लेखकियाहै, अरु कुछ स्वकल्पित भी है, अतएंव सर्वसुज्ञ विवेकी जनोंसे प्रार्थना करताहाँ कि इस भाषा भाष्यमें अरनुचित लेखहुआ हो तिसको सुभ सेवक पर कृपा- पूर्वेक क्षमा करना !!

चिह्हानां सूचीपत्रम्-।। पुष्टाक्षरों में उपनिषद्के सूलभन्त्र ।। २। इस चिह्हान्तर भाषानुवाद में मूलश्रुतिके वाक्य॥. ,इस चिह्नान्तर में मूल श्रुतिवाक्य के शक्षरार्थ। [] इस चिह्नान्तर में आननदगिरीका अनुवाद ॥ "इस चिह्नान्तर में अन्यश्रुति स्मृतित्र्रादिकों के प्र- माए अरु तिसके निकटही तिसका पक्षरार्थ'। इस चिह्न के पूर्व।I इस चिह्हान्तर प्रमाणमें केवल श्रुतिवाक्यार्थ॥ ७1 इस चिह्नान्तरमें भाषाकार करके कल्पित विचार॥ "इति"

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एकमेवाद्वितीय ततसइंहागो नमनना कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद् श्रीमच्छंकरा चार्य्यकृतभाष्यानुसारभाषाटी का प्रारम्यते ॥ तत्रादौ भाष्पकारकृतमंगलाचरसम्॥ ॐ यस्माज्जातं जगत्सर्व यस्मित्नेव विलीयते। येनेदं धार्य्यते चैव तस्मै ज्ञानात्मने नमः॥ अर्थं। यजुर्वेद की शाखाके भेदरूप तैत्तिरीय उपनिषद्का [वेदव्यास जीके शिष्य वैशम्पायन ऋषिके पासयाज्ञवल्क्यऋषिश्नादिक वि- द्यार्थी ब्रह्मचर्य्यादिव्रत धारण किये यजुर्वेदका अध्ययन करतेर हैं, तहां किसी एक निमित्तको पायके वैशम्पायनऋषि को ब्रह्महत्या आसहुई, तिसके निवारणार्थ सो वैशम्पायनऋषि याज्ञवल्क्यसे इतर अल्पव्ययवाले अपने विद्यार्थियोंके अर्थ नियमाचरख (प्रा यश्चिंत्तरूपकर्म) करनेका उपदेश करतेहुये, तब उन सुनि से उ- तम अधिकारी शौढ़ वयवाले याज्ञवल्क्यऋषि ने प्रार्थना किया कि हे भगवन्! यह अप्रतिकठिन प्रकार का नियमाचरण इनबालक विद्यार्थियों से होना अशक्यहै, और मैं परिपक्क वयवालाहौं अरु श- रीर करकेभी हढ़ हौं अतएंव अकेलाही मैं इस कठिन नियमाच- रखोंको करके आापकी ब्रह्महत्या निवारण करनेको समर्थ हैं, ताते आप इन कठिन नियमाचरण करनेकी मुझको आज्ञा करिये। इस प्रकार जब याज्ञवल्क्य ने अंपने उक्र गुरुसे विनय किया तब

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मंगलाचरए

ब्रह्महत्या होनेके सम्बन्धसे जिसकी बुद्धि विपर्यय हुई है (पाप- कर्मों से अवश्य चुद्धि विपरीत होती है) ऐसा जो वैशंपायनऋषि सो याज्ञवल्क्यप्रति कहताहुआ कि हे याज्ञवल्क्य!मैं मानता हौं कि तू बड़ा गर्विष्ट है और इन ब्राह्मणोंके बालक विद्यार्थियों का अपमान करताहुंआ है अतएवं अब तू मुझसे अध्ययन करीहुई विद्याको स्याग कर, नः करेगा तो तेरे अर्थ शीघही मरणका हेतु शाप देऊंगा। इसप्रकार वैशपायनने क्रोधित हो कहा तंब याज्ञ- वल्क्य ऋंषिउस शापके भय से तिस अध्ययन करी हुई वेदवि- व्याको गज क्रियावत् योगवलसे वंमन करके त्यागताहुंआ, तब तिस याज्ञवल्क्य करकेवमन करीहुई विद्याको अन्य कईएकब्रा- हांगोंके बालक विद्यार्थियोंने अपने गुरुकी आज्ञासे अपने बिषे तीतर नाम पक्षी विशेषका रूपधारके वो विद्या ग्रहण कर लिया, तब से उसविद्याका नाम तैत्तिरीयविद्या हुआ, अरु जिन ब्राह्मणों ने उस विद्या को धारण किया सो सर्व ब्राह्मण तैत्तिरीय शाखा वाले विख्यात हुये। अरु उनके वशमें जो हैं सो आाज पर्यन्त तैत्तिरीय शाखावाले कहेजाते हैं। शरौं तिस तैत्तिरीय शाखाका यह उपनिषद भी तैत्तिरीय उपनिषद् कहाजाता है] व्याख्यान करने को इच्छतेहुये भगवान् भाष्यकार तिस तैत्तिरीय उपनिषद् विषे प्रतिपादन किया जो ब्रह्म सौ.जगत्के जन्मादिक के कारपापने रूप तटस्थलक्षणसे [ जो लक्षण कदाचित् (किसी कालबिषे) हुआ व्यावर्तक (पृथक करनेवाला.) होय तिसको तटस्थलक्षण कहते हैं।जैसे देवदत्तके गृहपर बैठा जो काकनाम पक्षी सो या- वत उस गहपर स्थित है तावत् उस गहको अन्यगहोंसे पृथककरके लखावता है कि देखो जिसगहपर काकनाम पक्षी बैठा है. वो दे- वदत्तका गृह है, इस प्रकार वो काकपक्षी देवदत्तके गृहफा उपल- क्षल हैं, तैसही जगत्के जन्मादिकोंका कारणपना जो है सो क दाचित् (अज्ञानदशा विषेवा सष्टिकाल विषे) हुआ्नवेदबाह्यमत वादियोंकरके कल्पित जो परमाण प्रधानादिक जगत्के कारण ति-

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गुरुस्तुति ॥ यैरिमे गुरुभि: पू्व्व पदवाक्यप्रमारतः। व्याख्याताः सर्ववेदान्तास्तान्नित्यं प्रणमाम्यहम् १! नसे व्यावर्त्तक(पृथक् करनेवाला) होनेसे सोब्रह्मका तटस्थलक्षस है] मन्दबुद्धिवाले पुरुषों के अर्थ सामान्यभावकरके लक्ष्यकराया है औ।"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।" इत्यादि प्रमाण से सत्यचैतन्यः त्वादि स्वरूप लक्षणा से [ जो लक्षण सर्वदाहुआ व्यावर्तकहोय तिसको स्वरूप लक्षण कहते हैं, जैसे सर्वकाल वर्त्तमान हुआ देवदत्त के गृहका अन्यगृहों से व्यावर्त्तक (पृथक् करनेवाला) धवल (श्वेत) पना वा ऊंचापना सो उस देवदत्तके रहका र्व- रूप लक्षण है, तैसे सत्य ज्ञानादि रूपपना जो है सो न्रह्मविषे सर्वदा स्वरूपभूत वर्त्तमान हुआ अविद्यादिकों से व्यावर्त्तक (पृथक करनेवाला) होनेसे सो ब्रह्मका स्वरूप लक्षण है ] वि- शेषकरके निश्चय किया है, तिस ब्रह्म को नमस्कारके मिसक रके संक्षेपसे लक्ष करावे हैं।"यस्माज्जातं जगत्सर्व यस्मिन्नेव विलीयते। येनेदं धार्य्यते चैव तस्मै ज्ञानात्मने नमः"। जिससे सर्व जगत् जन्मता है औ जिसबिषे लीन होता है औ जिसकरके यह धारण किया है तिस ज्ञानात्मा को नमस्कार करते हैं? अ- थातू जिस ज्ञानस्वरूप परमात्मा परब्रह्मसे यह समस्त कार्य कारण नामरूपात्मक जगत् उत्पन्न होता है औौ जिस करके धारण किया वर्तताहै औ परिमाण में जिसबिषे लीन होता है तिस महाकारण परमाश्रय सर्वाधिष्ठानको नमस्कार करते हैं॥। हे सौम्य ! अ्रवगुरुभक्गिकोविद्याकी प्राप्तिबिषेजो मुख्यतासे .. अन्तरंग साधनपनाहै तिसको प्रकट प्रसिद्ध करने के अपर्थर.गुरुनको प्रशाम करते हैं जिन गुरुआंकरके पदवाक्य शर््र प्रमाण (व्याकरण, मीमांसा, न्याय) इनके विवेचन से यह सर्ववेदाम्तशास्त्रका व्या- ख्यान करते हैं तिनसद्गुरुओंके अर्थ में नित्य २ प्रणाम करताहौं

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: मंगलाचरण। तैत्तिरीयकसारस्यमयाSSचार्यप्रसादतः। विस्पष्टार्थ- रुचीनां हि व्यार्येयं सम्प्रीयते २॥ हे सौम्य! अरब व्याख्यान करने को इच्छित जो ग्रंथ तिसका कथन करते हैं[मनुशास्त्रके वोधवाले पुरुषों को पदोंसेही पदों के अर्थ की स्मृति का संभव है ताते, अरु पदोंकरके स्मरसहुये पदार्थोंके सम्बन्धकोही वाक्यार्थरूपताहै ताते, और सत्रकारकरके उपनिषदोंके तात्पर्य को निरूपरहुआ होने से भिन्न व्याख्यान का करना व्यर्थ है। यह शङ्का करके कहते हैं। यहां यह अर्थ है कि.अशास्त्रज्ञ मन्दवुद्धिवाले पुरुषों को स्वतःही सर्व पदों के अर्थों की स्मृति होने का अप्रसम्भवहै ताते, उपनिषद्गत सर्व पदों के अर्थोंके विशेष करके निःसंशय. ज्ञान होने को इच्छते हैं तिनके उपकारार्थ पृथकव्याख्यान करनेका प्रारम्भहै,।"विस्पष्टार्थरुची- नांहि"। :विशेष करके स्पष्ट अप्र्थकी रुचिवाले के अपर्थ,।"मया SSचार्यप्रसादतः"। मुझकरकेआ्र्प्राचार्यके प्रसादसे,।"तैत्तिरीयक- सारस्य व्याख्येयं सम्प्रणीयते"।:तैत्तिरीयक सारंका व्याखान सम्यक् कियाजाता है, अर्थात् विशेषकरके स्पष्ट अर्थ के जानने की इच्छावाले पुरुषों के उपकारार्थ सुभकरके आचार्यके प्रसादसे इस तैत्तिरीय उर्पनिषद् के सारका सम्यक प्रकार व्याख्धान कि- याजाता है ।। हे सौम्य ! उक्र प्रकारही इस समय प्रायः बहुत से मनुष्यों की संस्कृत विद्या में प्रवृत्ति न होनेसेउनको पद पदार्थों का ज्ञान रंचंकमात्रभी नहीं रु उन सर्व पुरुषों में से किसी एक पुएयशील पुरुषों को अपने पूर्व के अनेक जन्मों के उत्तम कर्म संस्कारोंके प्रभावसे उपनिषद् विद्या करके प्रतिपाद्य जो आरात्म- तत्व तिसके जानने की इच्छा होती है तिन पुरुषों के उपकारार्थ इस सांप्रतंकालके श्रेष्ट महात्मा पुरुषोंने उपनिषदादि बहुत से संस्कृतग्रन्थों को देशीय भाषावाणी में लिखा है, यह उन महात्मा पुरुषोंका सर्वजनों पर परम उपकार है। हे प्रियदर्शन!यह आात्म-

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६ तैत्तिरीयोपनिषद्। विद्या सनातनसेही अतिगुह्य औ दुःप्राप्य है, इस विद्याका कहने सुननेवाला लाखों मनुष्यों में कोई एक बिरला होता है, और श्रुति स्मृति भी ऐसाही कहती है। तथाच।"श्रवणायापि बहु- भिर्यो न लभ्यः शृएवन्तोऽपि वहवो यन्न विद्युः। आ्श्चर्योका कुशलोऽस्य लब्धाSSएचर्यो ज्ञाता कुश लानुशिष्टः"।"मनुष्या्णा सहस्रेषु कश्चिद्यनति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः"। इत्यादि, अतएव अंव सावधान चित्तकर के इस तेत्तिरीय ऋप्रादि उपनिषद् ब्रह्मविद्या को सम्यकूप्रकार श्रवस मनन निदि- ध्यासन करो २॥ अथ शिक्षाध्यायरूपा प्रथमावल्ली प्रारभ्यते॥ हरिः॥ ॐ ॥ शं.नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्व- र्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः ॥ नमो ब्रह्मयो। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वकारमवतु। ऋररवतु मामू। न्र्प्रवंतु वक्कारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥१॥ इति प्रथमोऽनुवाकः॥ "हे सौम्य![कर्म्मके विचार सेही उपनिषद् को, प्राप्त अर्थवाला होनेसे और उपनिषद्का प्रयोजन जो मोक्ष तिसके कर्म्मकरके ही सम्भव से इस उपनिषद्का पृथक् व्याख्यान करनेका आारंभ करना युक् नहीं। इस शङ्का को दूर करने के अर्थ यहां प्रथम कर्म्म- कांर्ड के अर्थ को कहते हैं। ] हे सौम्य,।यजुर्वेद बिषे इस तैचिरीय उपनिषद्से पूर्वग्रंथ बिषे . सश्चित पापों के क्षयार्थ नित्यरूप तरु फलार्थी पुरुषों के काम्य- रूप कर्म समाप्त किये हैं.[ कर्मकाराडके अर्थको कहके वहां अवि- चार किये उपनिषद्के अर्थ को यहां कहते हैं ] अब इस तैत्िरीय

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ७

उपनिषद् विषे कर्म्मके अनुष्ठानके हेतुकी निवृत्तिके अपर्थ ब्रह्मवि- व्याका आरम्भ करते हैं।[ कर्मके अप्रनुष्ठानका हेतु नियोग(नियम) है तिसको प्रमाण करके सिद्ध होने से विद्यासे विरोध नहीं है। यह शङ्ा करके कहै हैं। यहां यह तात्पर्य है कि इसका यह साधन है, इसप्रकार प्रथमशास्त्र करके बोधन किया है। जिसकी जहां अभि- लाषा है सो कामना से तहांहीं प्रवृत्त होता है, एतदर्थ नियोग को प्रवृत्ति करने की सम्भावना भी नहीं ] कर्म्मका हेतु कामना होती है क्योंकि पुरुषों की प्रवर्तकहै ताते। अरु पूर्णकाम पुरुषोंकी कामना के अपरभावहुये अपने आप आत्मा विषे स्थिति होनेसे, क- म्म विषे प्रवृत्तिका अप्रसम्भव है। [वांछित विषयकी प्रात्तिकी काम- नाकी निवृत्ति विषे हेतु आत्मविद्या नहीं है, अतएव कर्म्मके हेतु की निवृत्तिके अर्थ आत्मविद्याका आ्ारम्भ क्यों कर तेहो, यह शङ्का करके कहते हैं। यहां यह अर्थहै कि वाञ्छित विषय की प्राप्ति से तिसकाल विषे कामनाकी शान्तिमान्नही होती है, परन्तु कामना का नाश नहीं होता, क्योंकि पुनःभी विषयादिकों की आ्रकांक्षा आदिक देखने विषे आवते हैं। अरुनिरंकुश।"आत्मैववस्तुनान्य- ततोऽस्तीति"। आर्त्माहीवस्तु है ताते अन्यनहीं, इस रूपवाले आत्माकी कामना भी आत्मकामपने के होने से होती हैं, क्योंकि वाञ्छित वस्तुकी इच्छाका प्रभावहोने से। शौ जिसकरके प्रात्मा के अद्वैत परमानन्दरूपको न जाननेवालाही पुरुष, भिन्न विषयों को देखतसन्ते कामना करता है, ताने कामको आरप्रात्मविषयक परप्र- विद्यारूप मूलवाला होने से एक आत्मविद्याही तिसकी निवृत्ति का हेतु है] आत्मा की कामना के होने से पूर्णकामना होती है [आत्मविद्या कामनाकी विरोधी होवे तो छस्तु, पंरन्तु कम्म के हेतु की निवृत्तिके अर्थ ब्रह्मविद्याका आ्ारम्भ करते हैं इसप्रकार जो तुमने कहा सो किस प्रयोजन से कहा इस शङ्ापर कहते हैं यहां यह सिद्ध हुआ कि परमानन्दमयरूप परमात्मा को लेके यह श्रुति कही है। इस प्रकार प्रथम कर्म्मकाएड करके अंप्रांप्त अर्थ

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IS वाली होनेसे, अरु कर्म्म से अघटित जो मोक्षरूप प्रयोजन तिस वाली होने से उपनिषद्के व्याख्यान का आ्ररम्भ घटितही है ] आात्माही ब्रह्महै तिसके जाननेवाले को परव्रह्मही प्राप्ति आ्रागे कहेंगे। अतएव अविद्या की निवृत्ति के हुये अपने आात्मा विषे स्थितरूप परब्रह्मकी प्राप्ति होवे है, क्योंकि।"अभयं प्रतिष्ठां वि-

काको दूरकरके इस प्ररानन्दमय श्रभय प्रतिष्ठा (आश्रय) रूप आ्रत्मा को प्राप्त होता है; इस श्रुति के प्रमाससे [ पुनः भारं- भवादी के प्रयोजन को कहते हैं, यहां यह अर्थ है कि आत्यन्तिक आरगामी शरीरकी अनुत्पत्ति के होने से स्वरूप से स्थितिका नाम मोक्षहै, अरु शरीरकी जो तनुपपत्तिहे सो शरीरोत्पत्ति के हेतुके पभावसेही होवेगी, तब ज्ञान के अर्थ उपनिषद्द के आरंभसे क्या प्रयोजनहै]। शङ्ा, जो कहे काम्य त्रप्ररु निषिद्ध कर्मके अ्र्प्रनारंभ से, अरु प्रारब्धकर्मका भोगकरके क्षयहोनेसे शरु नित्य विहित कर्मो के अनुष्ठान से, सन्चितादि पापों के पभाव होनेसे, विनाही प्रयलनके किये स्वस्वरूप से स्थितिरूप मोक्ष होवेहै [ यहां आरान्य मत को भी कहते हैं, यहां अर्थ यह है कि जे स्वर्ग के साधक ज्यो- तिष्टोमादिक कर्म हैं सोई मोक्ष के साधन हैं, क्योंकि स्वर्ग पद के अर्थरूप निरतिशय प्रीति के मोक्ष से अन्य ठिकाने (मोक्षका) अ्रसम्भव है ताते, क्योंकि।'स्वर्ग से अ्ररन्यस्थानमें'। शरीर के होते क्रेश अवश्य होता है ताते ] अथवा स्वर्ग शब्दकी वाच्य निरति- शय प्रीतिहै सो कम्मरूप हेतुवाली है, ताते कर्म करकेही मोक्ष होता है।। सो कथन बने नहीं [अब एक भविकवादीके पक्षरूप प्रथम करी शंकावाले मतका निषेध करते हैं, यहां यह अर्थ है कि यथयपि मुमुक्षु वर्त्तमान शरीर करके काम्य अरु निषिद्ध कर्मों का आरम्भ न करेगा, तथापि। अनेकजन्मों के' अनेकप्रकारके संचित कर्मों के सम्भव से पुनः शरीरोत्पत्ति के ह्ेतु का अभाव सिद्ध है ] क्योंकि कर्म्मको अनेकरूपता है ताते,। अपरु जिस

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली।

करके फल के आरंभक श अनेक जन्मान्तर विपे किये विरुद्ध फलवाले [विशेष करके सर्वही संचित कर्म मिलके एक शरीरंकी ।' उत्पत्तिका। ्र्प्रारंभकरेहैं तहां सर्वकर्मोंका उपभोग से क्षयेहोने करके संचित कर्मही नहीं हैं, इस शंका के निवारणार्थ यहां 'विरुद्ध फलवाले' ऐसा कहा है। यहां यह अभिप्रायहै कि स्वर्ग नरकरूप फलवाले ज्योतिष्ठोमादिअ्प्ररु न्रह्महत्यादि कर्मों के एकही देहविषे भोगकरकेक्षय होनेका अरप्रसम्भवहै ताते, अरु विशेषकरके इसजीव को एकही शरीर में सर्वकर्मों के फलों के तप्रनुभव होने विषे प्रमाण का पभाव है ताते, धलवान् कर्मकरके प्रतिबंध को प्राप्तहुये दुर्बल कर्मकी स्थिति सम्भवे हैं] अ्नेक कर्म सम्भवे हैं, एतदर्थ उनकर्मों विषे फल के आररम्भसे रहित कर्मों के एक जन्मविषे उपभोगसेक्षय होनेका तप्र सम्भ व है ताते, शेष कर्मरूप निमित्ति से शरीर के ्ारम्भ होने का संभव अरुशेष कर्मों के सद्जावकी सिद्धिहोती है। क्योंकि ।"तद् इहरमसीयचरणा त्रप्रभ्यासोह यत्ते रमसीयां योनिमापद्ये-

शुभआचरण करते हैं सो शुभ योनिको प्राप्तहोते हैं' तरु 'तिसके पीछे कर्म शेषकरके'। अर्थात् मरण को पाय अपने कर्म फलका अनुभव करके पुनः कर्म शेषरहे जन्म को पावता है। इस प्रकार अ्रनेक प्रमाण हैं।। अरु जो ऐसा कहे कि, इष्ट अ्र्प्रनिष्ट फलवाले शरु फल के आरंभ से रहित कमोंके क्षयार्थ नित्य कर्म हैं, सो क- थन वने नहीं, क्योंकि तिस नित्य कर्म केन करने विषे प्रत्यवाय होने का श्रवण है ताते। शरु पापशब्द जो है सो अप्रनिष्ट फलका वाची है। अरु नित्यकर्म के न करने रूप निमित्तवाले दुःखरूप शगामी पाप के निवारणार्थ नित्यकर्म हैं, परन्तु फलके आर्प्रारंभसे। रहित संचित कर्मों के क्षयार्थ नहीं, इसप्रकार अंगीकार करनेसे यद्यपि फलके आ्ररंभ से रहित कर्मों के क्षयार्थ नित्य कर्मोको मा- निये, तथापि वो अशुभ संचित कर्मोकोही क्षय करेंगे शुभको नहीं, क्योंकि नित्य कर्मों का अरु शुभ कर्मोंका परस्पर में विरोध नहीं 1

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१० तैत्तिरीयोपनिषद्। ताते। अरु इष्टफलवाले कर्मको शुभरूप होने से तिसका नित्य विहिति कर्मों से विरोध नहीं सम्भवे है, शुभ अपरु अशुभकाही वि- रोधयुक्त है। अरु कर्म रूप हेतुवाले भोगोंकी ज्ञान के प्र्प्रभाव होनेसे निवृत्तिका अरप्रभाव है ताते सर्वकर्मों के क्षयका संभव नहीं है। जिस करके अनात्मवेत्ता पुरुषकोही काम (कामना) है क्योंकि वो प- नात्मरूप फलकोही विषय करनेवाला है ताते। शरु त्रपने त्र्ात्मा विषे काम (कामना) का असम्भव है क्योंकि अपना आप झात्मा नित्य प्राप्त है ताते, याते तर्ाप आप्रात्मा परत्रह्म है ऐसा कहा है। श्र नित्यकर्मों का जो न करना सो अ्रभावरूप है, तिस अभाव रूप कर्म से भावरूप पापका होना असम्भव है। [।"त्रकुर्व्वन् वि- हितंकर्म निन्दितञ्च समाचरन्। प्रसजश्चेन्द्रियार्थेषु नरः पतन- सृच्छतीति"। विहित कर्मो को न करता हुआ्रा, अरु निन्दित कर्मों को करताहुआ, अरुइन्द्रियोंके विषयों विषेतासक हुआर, मनुष्य पतनको पावता है। ऐसे पावताहै इस क्रियापद बिषे स्थित शतृ- प्रत्ययसे कर्मके न करने को भी पापका निमित्तपना जानाजाता है। यह शंका करके कहते हैं। यहां यह अर्थ है कि जब यथावत् नित्य अरु नैमित्तिक कर्मोका अनुष्टान होता तो तव संचित क्मों का क्षय होता, अरु जब यह पुरुष विहिति कर्मन करेगा तव तिस करके पाप होवेगा, इसप्रकार श्रेष्टपुरुषों करके लक्ष्यकरायाहै.। ताते शतृप्रत्ययको अन्यथा अर्थवाला होनेसे तिसके बलकरके विहित कर्मके न करनेविषे पापकी हेतुता जानने को शक्य होती नहीं] याते पूर्व के संचित पापों से प्राप्त होनेवाली पापरूप क्रियाका नित्यकर्मों का न करनाही लक्षताहै, इसप्रकार।"तप्रकुर्व्वन्विहितं कर्मेति " विहित कर्मोंको न करताहुआ्रा,। इस वाक्य विषे उक्र शतुप्रत्ययका त्संभव नहीं है।"क्रियाके लक्षणा तपररु हेतुषिषे, इसप्रकार शतृप्रत्यय को उभयस्थानमें विधान कियेहुये तिनमें क्रियाकी हेतुताकोही तुम क्यों नहीं ग्रहणा कहतेहौ। तहां कहते हैं, इसप्रकार प्रत्यक्षादि प्रमाय से जाना है। अपरु शतृप्रत्ययते

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ११ पभावको हेतु भावके कथनहुये सर्व प्रमाणोंका विरोध होवेगा] अन्यथा पभावसे भावकी उत्पत्तिके कथनसे सर्व प्रमाणोंका वि रोध होवेगा। [ननु तुमको भी शुभकर्मके न करने को पाप का लक्षसापना इ्टहै,अ्ररुभट्टअ्मरनुसारियोंकरके अ्र्प्रप्नतीतिको अ्र्प्रभा- व प्रमाका हेतुपना तरङ्गीकार किया है। अरु नैयायिककरके प्रति- बन्धके त्रभावको, अरु तिस तिस कार्यके प्राग्भावको तिस तिस कार्यकी स्थितिकी हेतुता ऋङ्गीकार कियाहै, ताते भावरूप वस्तु कोही कारगपना कैसे है, सो अन्य शास्त्र विषे कहाहै जैसे भावहै तैसे तपरभावको भी कार्यवत् कारण माना है। तहां कहते हैं। हम वेदान्तियों को प्रथम त्रप्रभावकी स्वरूपसे कारणता इष्ट नहीं, किंतु तिसके भानको पापकी सूचकता इसहै, तरु तिस रूपकरके पा- पकी जनकता अङ्गीकार नहीं करते, क्योंकि नित्यकर्मके न करने के ज्ञानविपे पापपनेका तप्रसङ्गहै ताते। परु भट्टके त्र्प्रनुसारियों को भी कईएक पुरुषों को ज्ञातहुई योग्य प्तीतिको त्रप्रभाव प्र- माकी हेतुताहै, परन्तु ध्वंसरूप होने करके प्रमाकी हेतुताके हुये अरभात प्रमाको प्रत्यक्षपनेकी प्राप्ति होवेगी। तपरु नैयायिकों को भी प्रतिबन्धके अरभावको कारणताके हुये अन्योन्याश्रयरूप दोष की प्राप्तिसे प्रमाशिकपना नहीं है। प्राग्भावको भी जिस करके यह कार्च पूर्व नहीं रहा, ताते यह अभी उपजा है, इस प्रकारके ज्ञातरूपसे वस्तुका झापकपनाही है, परन्तु प्राम्भावको जनक- पना नहीं है। अरु पूर्वकाल को नियमित प्राग्भाववाला होने करके जो कारसपना है सो अपने विपे कार्यके वर्त्तसानपनेकी प्रा- सिरूप है, त्रं तिसको प्राग्भावकरके युक्नपना भी अन्यथा सिद्ध है, इसप्रकार तत्त्वालोक नामक ग्रंथ विषे कहा है। जिस करके कर्म के न करनेरूप निमित्तवाले पापके निवारणार्थ नित्यकर्म नहीं है, किन्तु। "कर्म्मसापितृलोकः"।।"सर्वएतेपुएयलोकाभन्तिः इतिश्रुतेः" कर्मसे पितृलोक होताहै, ये सर्व पुएायलोकवाले होते हैं, इन श्रुतियोंके प्रमाससे नित्यकर्मोंक्का पितृलोककी प्राप्तिफल

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१२ तैत्तिरीयोपनिपद्। है, ताते उक्र पाचरणवाले मुमृक्षुको शरीरकी अनुत्पत्ति नहीं होतीहै, ऐसा कहते हैं] याते अप्रयलसे अरपने आ्रपरात्मा विपे स्थित रूप मोक्ष सो बने नहीं।[अब दूसरे मतका अनुवाद करके दू- षसा देते हैं] श्ौ जो कहा कि स्वर्गशब्दकी वाच्य निरतिशय प्रीति को कर्मरूप निमित्तवाली होने से कर्मसे आ्रारंभकियाही मोक्षहै। सो कथन बने नहीं क्योंकि मोक्षको नित्यपनाहै ताते। जिसकरके कुछभी नित्यवस्तु आ्रंभनहीं करते हैं, लोकविषे जो त्रारंभ करी हुई वस्तु है सो अनित्यही है, एतदर्थ कर्मसे आरंभकिया मोक्ष नहीं है। ऋरु जो कहे विद्यासहित कर्म्मको नित्यवस्तुके आ्र्प्रारंभ करनेका सामथ्यहै। सोभी वनेनहीं, क्योंकि नित्य अरु प्पारंभका विरोधहै ताते, नित्य है तर आरंभ करतेहैं यह कथन विरुद्द्नहै।। झरु जो ऐसाकहे कि जो वस्तु विनाशको प्राप्तहुईहै सोई उत्पन्न होवेनहीं, अतएव प्रध्वंसाभाववत् नित्यहुआ्र भी मोक्ष आारंभही करते हैं। सोभी वनेनहीं, क्योंकि मोक्ष को भावरूपता है ताते। [वास्तव करके प्रध्वंसको कार्यपनाभी नहीं है, ऐसा कहते हैं। यहां यह भावहै कि प्रध्वंसको प्रथम, जन्मका आाश्रयपनाहै कार्यपना नहीं है, क्योंकि तिसको अन्यरूप कहेहुये भाव विकारवानूपनेके पङ्गीकारसे,शररु पूर्व तरप्रविद्यमान वस्तुका सत्ता समवाय श्रादिरूप धर्म नहीं होताहै, क्योंकि कालके सम्बन्धका अभावहै ताते, अरु अवच्छेद रुत्न्रवच्छेदकभावरूपसम्बन्धको समवाय सम्वन्धरूप मूलवाला होनेसे, तरुअन्यसम्बन्धरूप मूलकरके युकताकात्र्पद- र्शन है ताते। छरु जो कहे कि उत्तरकालके प्रव्वंसकी त्रप्रवच्छेद- कतारूप स्वभाव है, तो अन्यकी अर्प्रवच्छेदकतारूप स्वभाव नहीं होवेगा। ताते शरभावको निर्विशेष (एकरस) रूप होनेसे तिस का कार्यपना कल्पनामात्रही है] भावकी विलक्षणताके त्रप्रभाव से प्रध्वसाभाव भी आ्र्ररम्भ करते हैं, यह कथन कल्पनामात्रहै। जिस करके अभाव जो है सो भावरूप प्रतियोगीवाला है, जैसे भिन्न एकरूप हुआ भी भाव, घट पट आदिकों करके भेदको

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। १३ पावताहै, परन्तु घटका भाव अरु पटका भाव भावरूप करके एक ही है। इसप्रकार अभिन्न एकरूपहुआर्र भी अभाव, भाव पभाव (उत्पत्तिविनाश) रूपक्रिया त्रपररु गुसके योगसे द्रव्य आदिक्ों- वत् भेदको पावता है। तरु भाव जो है सो कमल आदिकोंवत् विशेषणवाला नहीं है, क्योंकि विशेषणवान् ताके होने से सो अभाव भावरूपही होवेगा। अतएत प्रतियोगी के भेदसेअप्रभावका भेद है यह केवल कल्पनामान्रही है।। [ इसप्रकार प्रध्वंस के दष्टान्त करके विषय किये मोक्षके नित्यपने को निषेध करके, अन्य प्रकारसे जो आाशंका है तिसका निषेध करते हैं। यहां यह अर्थ है कि विद्या अरु कर्मका कर्त्ता नित्यहै, इसप्रकार साधन की नित्यतासे मोक्षरूप साध्यकी नित्यता कहने को योग्य नहीं है, क्योंकि कर्त्तापनेकी अरनिवृत्तिकेहुये मोक्षके अरप्रभावका प्रसंग है ताते, अरु कर्त्तापने की निवृत्तिके होने से साधनकी नित्यता के अभाव होनेसे मोक्षका विनाशहोवेगा] तपरु जो ऐसा कहे कि विद्या अरु कर्म्म के कर्त्ताको नित्य होने से, विद्या अरु कर्म्मरूप साधनके प्रवाहसे जनित मोक्ष की नित्यता है। सो कथन बने नहीं, क्योंकि इसप्रकार माननेसे गंगाके प्रवाहवत् कर्त्तापने को दुःखरूप होने से अरु कर्त्तापने की निवृत्तिके हुयें मोक्षका भंग होताहै ताते। अरु जिसकरके ब्रह्मज्ञानके विना मोक्षदुर्लभ sho dS o tho pho है, तिसप्रकार अविद्याकाम तरप्ररु कर्म्म के अर्प्रनुष्ठान हेतुकी निवृत्ति के होने से अपने आत्माविषे स्थितिरूप मोक्षहोवे है। जाते आप ही आात्मा ब्रह्महै तिसके विज्ञान से अविद्याकी निवृत्तिरूप मोक्ष होता है, अतएव ब्रह्मविज्ञान के अर्थ उपनिषद् का आरम्भ करते हैं [ ब्रह्मविद्याविषे उपनिषद् शब्दकी प्रससिद्धि जो है सोभी विद्या कीही मोक्षकी साधनताविषे प्रमाणहै, ऐसा कहते हैं ] ब्रह्मविद्या जो है सो तिसविषे तत्पर मुमुक्षुओं के गर्भ जन्म जरा आदिकों को शिथिल करे है, वा उन गर्भादिकों को विनाशकरे है, वा ब्रह्म को प्राप्त करनेवाली है वा इससे अन्य साधनों से परमश्रेय नहीं

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होवेहै, याते ब्रह्म विद्याको उपनिषद् कहते हैं। अरु तिस ब्रह्म- विद्या अर्थवाला होने से इस अ्रंथको भी उपनिषद् कहते हैं। इस प्रकार उपनिषद्के व्याख्यान के शररंभ की संभावना करके अब तिसके पद पद के व्याख्यान का प्रारंभ करते हैं। ।"शत्रोमिन्नः"। ६ मित्र सुखकारी होवो;अर्थात् प्रासवृत्तिका रु दिवसका अभिमानी देवतारूप जो मित्र सो हमको सुख- कारी होवो। तैसेही।"शंवरुणः"। ६ वरुण सुखकारीहोवो;ञ- र्थात् अ्रपान वृत्तिका तप्ररु रात्रिका अरप्रभिमानी देवतारूप जो वरुण सोहमको सुखकारी होवो। तैसेही।"शंनोभवत्वर्यमा"।[अर्य्यमा सुखकारीहोवो;अर्थात् चक्षुचिषेवा सूर्य्यविषेत्भिमानीदेवता जो अर्थ्यमा सो हमकोसुखकारी होवो। तैसेही।"शन्इन्द्रोवृहस्पतिः" ६ इन्द्र अरु बृहस्पति सुखकारीहोवो; अर्थात् वलविषे अभिमानी देवता जो इन्द्र, अरु वाणी अरु वुद्धि विषे अभिमानी देवता जो वृहस्पति सो उभय हमको सुखकारी होवो। तैसेही।"शंनोविष्णु रुरुक्रमः"। :उरुक्रम विष्णु सुखकारी होवो;अर्थात् वलिराजासे तीनपाद पृथिवी की याचनाकर सर्व राज्य के ग्रहगार्थ विश्वरूप धारके विस्तीर्स पादों के क्रमवाला अरु पादकाभिमानी देवता जो उरुक्रम उपेन्द्र नामवाला विष्णु सो हमको सुखकारी होवो। इत्यादिक अरध्यात्मरूप जो देवता है सो सर्व हमको सुखकारी होवो। इसप्रकार सर्व ठिकाने (अनुषंग पिछले पदका सम्बन्ध) है। अध्यात्मरूप प्राण परप्ररु करण (इन्द्रियन) के अभिमानी देवताओ्ं का सुखकारी होनेपना क्यों प्रार्थना करतेहौ, इस शंकाकेहुये। तहां कहते हैं। [ गुरुपादके समीप गमनपूर्वक वेदान्तकेतात्पर्यका निश्चय, श्रवण कहते हैं। अरु श्रवण किये अर्थका तपरविस्मरण- रूप धारणा कहते हैं। अरु शिष्यों के अर्थ निवेदन करना उप- योग कहते हैं ] उक्र देवताओरं के सुखकारी हुये अप्रप्रतिबन्ध से विद्याका श्रवाधारण अरु उपयोगहोता है, एतदर्थ।"शंनोभव"। 6 हमको सुखकारी होवो, इसप्रकार तिन पांच देवताओ्र््रं के

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सुखकारी होनेपनेकी प्रार्थना करते हैं। अरव ्रह्मविद्याके जानने की इच्छावाले मुमुक्षु करके ब्रह्मविद्या के शवणादिकों विषे विध्नों की निवृत्ति के अर्थ वायुको विषय करनेवाली. नमस्कार तपररु वंदना रूप क्रिया को करताहौं। क्योंकि सर्व क्रिया का फल तिस वायु के अधीनहै ताते। "नमोब्रह्मणे"। 'व्रह्मकें तरर्थ नम- स्कार है;।"नमस्तेवायो"।: वायुके अर्थ नमस्कारहै? अर्थात् ब्रह्मरूपजो वायु है तिसके अप्र्थ मैं नमस्कार करताहों,हे वायु ! तरे र्थ मैं नमस्कार करताहौं [ब्रह्म अन्य है, वायु अन्य है, इस प्रकार जो कोई शंका करे तो, यह शंका करने योग्य नहीं। यहां यह अर्थ है कि ब्रह्म' ऐसा परोक्षसे कहा है क्योंकि।"सब्ह्े- त्याचक्षत, इतिश्रुतेः"। सो ब्रह्महै ऐसा कहते हैं, इस श्रुतिने 'स' शब्द करके ब्रह्मको परोक्ष कहा है। तरु वायु शब्दसे प्रत्यक्ष- पनेसे कथनहै क्योंकि पाणवायुको प्रत्यक्षता है ताते।' प्रर्थात् एकही ब्रह्म आत्मरूप से परोक्ष है अरु प्राणरूप से प्रत्यक्ष है ताते ब्रह्म तररु वायुका भेद नहीं'। यहां परोक्ष अरु प्रत्यक्ष करके वायुकोही कहते हैं। यद्यपि सूत्र आत्मारूपसे वायु परोक्षहै, त- थापिअध्यात्मिक प्राणवायु रूपसे ब्रह्म शब्द का वाच्य हुयेभी वायु का अपरोक्षपना है ऐसा कहते हैं। यहां यह अर्थ है कि बाह्यके चक्षुरादिक जो हैं सो रूपके दर्शन आदिक लिंगसे अनुमान क- रने के योग्य हैं ताते, अन्तराय सहित है, अरु प्ाया तो अन्त- राय के तपभाव से साक्षी करके वेद्य है, तरु भोक़ा के समीप है एतदर्थ चक्षु तरादिकों की अपेक्षा से वायु प्रास प्रत्यक्ष है।] ।"सवमेव प्रत्यक्षंत्रह्मासि"। तूही प्रत्यक्ष ब्रह्म है, त्रर्थात् हे वायो!तूही चक्षुरादिकों की अपेक्षा करके बाह्य समीप औ त्ंत- रायसे रहित प्रत्यक्ष ब्रह्म है। [ यहां यह अर्थ है कि वृद्धि करने वाला होनेसे वायुको ब्रह्म कहते हैं। प्रासके किये श्वास ादि- . कों से वा भोजनादिकों से शरीरादिकों की वृद्धिहोनी प्रसिद्ध है। जैसे कोई एक राजा के दर्शनकी इच्छावाला मुमुक्षु हृदयग़त

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१६ तैत्तिरीयोपनिषद्। ब्रह्मके द्वारपाल को।"त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिप्यामि "। तुभ कोही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहताहौं, इस प्रकार कहताहै, ऐसी ब्रह्मका कथनरूप जो क्रिया है सो प्राणदेवताकी स्तुत्यर्थहै] अरप्रतएव मैं ।"त्वामेव प्रत्यक्षं त्रह्मवदिष्यामि"।तुभकोही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहता हौं,तरु जिसप्रकार शास्त्रोंचिषे कहाहै, अरु जैसे करनेको योग्यहै, ऐसा बुद्धिविषे सम्यक् प्रकार निश्चय किया जो अर्थ तिसको ऋत कहते हैं सोभी तेरे अधीनहै एतदर्थ तुभकोही।"ऋतंवदि- ष्यामि"। 'ऋतकहताहौं?। तरु वासी तप्ररु शरीर करके सम्पा- दनहुआर जो सत्यहै सोभी तेरे त्रधीनही सम्पादन करते हैं, एतदर्थ 'तुभकोही'।"सत्यंव्रदिष्यामि"। 'सत्य कहताहों,।"तन्मामवतु" 'सो सुझको (मेरी) रक्षा करो; अर्थात् सो सर्वात्मा वायुनाम वाला ब्रह्म मुझकरके स्तुतिको प्राप्तहुश मुझ विद्यार्थीकी विद्या बिषे जोड़ने करके रक्षाकरो! तरु।"तद्दक्रारमवतु"।१सो वक्रा की रक्षाकरो अर्थात् सोई ब्रह्म आचार्यको वक्रापने के सामर्थ्य विषे जोड़ने करके उसकी रक्षाकरो,।"अवतुमाम, त्र्रवतुवक्रा- रम्"। 'मुझकोरक्षाकरो, 'क्राको रक्षाकरो, यहां पुनःजो कथन सो मंगलाचरण के आदरार्थ है।"सत्यंवदिष्यामि पञ्चच"। 'सत्य कहताहौं तरु पांच, ॐ सत्यही कहताहौं।" शान्तिः शान्तिः शान्तिः"।शान्तिहोवे, शान्तिहोवे, शान्तिहोवे, यहां तीनबार जो शान्तिका कथन है सो विद्याकी प्रात्तिबिषे जो करा ध्यात्मिक,आधिभौतिक, आ्राषिदैविक, यह तीन प्रकार से होनेवाले जे विघ्नहैं तिनकी निवृत्तिके अर्थ है।। १ ।

इति प्रथमोऽनुवाक: १॥

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। १७ अथ द्वितीयोनुऽवाक: २॥ 3 शिक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः। स्वरः।मात्रा। वलम्। साम। सन्तानः । इत्युक्क: शिक्षाध्यायः॥ शिक्षां पञच ॥ २॥ इति द्वितीयोऽनुवाकः॥ हे सौम्य!तरपरव अर्थके ज्ञानको प्रधान होनेसे उपनिषद्ग्रन्थके पाठविषे 'स्वर, उष्म' औ व्यंजनरूप शक्षरोंके अपरप्रमादरूप प्र- य तकी निवृत्तिमत हो, इस अरभिप्रायसे शिक्षाध्याय का प्रारम्भ करतेहैं। जिस करके शिक्षा करते हैं। ऐसा जो वर्ष आादिकोंके उचचारण का लक्षण (शास्त्र) तिसको शिक्षा कहते हैं। वा जो शिक्षाको प्राप्तकरेहै ऐसे वर्ण आप्रदिक सो शिक्षा कहते हैं। शर जो शिक्षा है सोई वेदांग विषे शिक्षा इस नामसे कहा जाता है। ।"शीक्षां व्याख्यास्यामः"। : शिक्षा को स्पष्ट कथन करते हैं, अप्र'- र्थात् तिसशिक्षाको स्पष्ट जैसेहोय तैसे सर्व शोरसे कथन करतेहैं,। । "वर्सः । स्वरः। मात्रा। वलम्। साम। सन्तानः।इत्युक्र: शि- क्षाध्यायः"। [वर्ग,स्वर, मात्रा, वल, साम सन्तान,ऐसा शिक्षा- ध्याय कहा है; अर्थात्, तहां अकारादिवर्ण, अरु उदात आदिक स्वर,अरु इस्वआ्र्दिक मात्रा, अरु प्रयत्न विशेषरूप वल, अरु वर्णोंका मध्यम वृत्तिसे उच्चारणरूप साम (समता), अरु सन्तति (संहिता) रूप सन्तान, यहही सीखने योग्य अर्थरूप शिक्षा,जिस अध्याय बिषे है, ऐसा शिक्षाध्याय है, इस प्रकार आपागे कहा है ।"शिक्षां पंच"।पांच शिक्षांको अर्थात्, पांच प्रकार की शिक्षा को आागे कहेंगे।। इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥२॥ अप्रथ तृतीयोऽनुवाक: ३॥ सहनौ यशः। सहनौब्रह्मवर्चसम्।अथातःसथहिता- या उपनिषद व्याख्यास्यामः॥ पंचस्वधिकररेषु।अधि- लोकमधिज्योतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम्। ता म-

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१८ तैत्तिरीयोपनिषद्र। हासथंहिता इत्याचक्षते। अप्रथाधिलोकम्। एथिवीपूर्व- रूपम्। घौरुत्तर रुपम। तरप्राकाशः सन्धिः॥ ३॥ हे सौन्य! इच वरोंके सम्बन्धरूप संहिता की उपनिषद् अ्रप्पर्थात् उपासना कहते हैं। तहां संहितादिकों की उपासना के ज्ञानरूप निमितवाला जो यश सो प्रार्थना करते हैं,। "सहनौयशः"। यश हसको साथ, ही हो, अर्थात्, सो यश हम शिष्य अरुं आचार्य्य दोनोंको साथही हो, अरु। "सह नौ ब्रह्मवर्चसम्"। 'ब्रह्मवर्चस हमको साथ, ही हो अर्थात्, तिस यशरूप निसित्तवाला जो ब्रह्मवर्चेस (ब्रह्मतेज) है सो हम शिष्य अरु आचार्य्य दोनों को साथही हो। यहां प्रार्थनारूप शिष्यका वचन है। यहां शिष्यको ही कृतार्थ होनेके अर्थ प्रार्थनाका करना संभवे है,अरु तचार्य जो है सो तो पसिद्धही कृतार्थ होता है, एतदर्थ तचार्यको कृतार्था के अर्थ प्रार्थना करनी संभवे नहीं। अव पूर्व व्यतीतहुये तध्ययंन- रूप विधानकी अत्यन्त यंथसे निश्चित हुई जोबुद्धि, सो तत्कालही छार्थ के ज्ञानविषे प्रवर्तत करनेको शक्य होवे नहीं, अतएव अपनी शाखाकी संहितारूप ग्रंथके समीपवर्त्ती वणोंके सम्बन्धरूपसंहिता की उपासना को कहते हैं। [यहां।"पंचस्विति"।पांच बिपे, इस प्रकार जो सप्तमी विभक्ति कही है, सो तृतीया विभक्निके अर्थ करके पलटनेको योग्य है। अरु अधिकरणं शब्द है सो विषयका पर्य्याय है। ताते पांच पदार्थ करके विशिष्ट जो ज्ञान है सो त्रप्रक्षरों बिषे कहनेको योग्य है, जैसे शातिगाम प्रतिमाविष विष्णुका ज्ञानहै तैसे। यह अर्थ होता है ] पांच ताश्रयों (ज्ञानके विषय) विषे जो अधिलोक [लोकको आाश्रय करके जो ध्यान करने की योग्यता तिसको अधिलोक कहते हैं। छारु विद्या शब्द करके विद्या से सम्बन्धको पायात्रचार्य्यादिक कहने को इच्छित है। तैसेही प्रंजा शब्द करके प्रजासे सम्बन्धकों पाये पिता तर्ादिक कहनेको इच्छित जानो। अरु अध्यात्म शब्दसे भोका पात्माको आंश्रय करके व्ततते हैं ऐसे जे जिह्रा आदिक सो कहनेको योग्य जानो।

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। १६ परन्तु सर्व ठिकाने तिनतिनके अभिमानी देवताही ग्रहण करने को योग्य है, क्योंकि देवताओरों से अ्रन्यवस्तु को उपास्य होना छसंभव वा तरप्रयोग्य है ताते], अ््धिज्योतिष, अपरिविद्य,अधिप्र ज, ऋरु अध्यात्म, यह पांचरूप उपासना है, इन पांच विषयवाली उपासनाको लोकादिक महावस्तुत्प्रं को विषय करनेवाली होने से, अपररु संहिताको विषय करनेवाली होनेसे वेदके वेता ब्राह्मण उसको महासंहिता ऐसा कहते हैं।।"अथ अरप्रधिजञोकम्, पृथितरी पूर्वरूपं, धयौरुतररूपं, त्र्प्राकाशः सन्धिः"। (अव ऋधिलोक (तहां) पृथिवी पूर्वरूपहै, यौ उत्तररूपहै, आकाश संधिहै,'त्र्प्र. र्थात् अव जित प्रकार कहने को आ्रप्ररम्भ किया है तिस प्रकार उन पांच प्रकारकी उपासना के मध्य प्रथंम अधिलोकरूप उपा- सना को कहते हैं। यहां सर्व ठिकाने 'अथ' (अ़ब) शब्द जो है सो उपासना के क्रम देखावनेके अर्थ है। पृथिवी जो है सो पूर्व- रूप (पूर्व वर्स) है। अर्थात् संहिता के पूर्व वर्णविषे पृथिवी की दृष्टि कर्त्तव्यहै, ऐसा कहा होता है। तैसेही स्वर्गलोक उत्तररूप है, ऋरु आाकाश (अन्तरिक्षलोक) संधि है, अर्थात् संधि कहिये जिस लिषे पूर्वरूप पृथ्वी अररु उत्तररूप स्वर्ग मिलापको पावते हैं तिसमध्य अन्तरिक्ष को संवि कहते हैं । ३ ॥ वायुःसन्धानम्। इत्यधिलोकम। अथाधिज्योतिषस्। ऋपरग्निः पूर्वर्वरूपम्। शरप्रादित्यउत्तररूपम्। आापः सन्धिः वैद्युतः सन्धानम्। इत्यधिज्योतिषम्। अ्रथाधिविद्यण। उप्राचार्य्य: पूर्वरुपसू॥४ ॥ हे सौन्य!।"वायुः सन्धानम्" [वायु संधानहै, अर्थात् वायु जो है सो संधान है। जिसकरके मिलाप होय तिसको संधान कहते हैं, सो अन्तरिक्षरूप स्थलविषे पृथिवी तरु स्वर्गका मिलाप वायु करता है।।"इत्यधिलोकम्"। : इसप्रकार अधिलोक कहा? अर्थात् उकप्रकार अधिलोकरूप उपासना कही।"अर्रथाधि-

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२० तैत्तिरीयोपनिषद्। ज्योतिषम्"। त्रप्रब अ्र्प्रधिज्योतिष,अर्थात् त्रप्रव अरप्रधिज्योतिष- रूप उपासना कहते हैं, तहां।"तग्निः पूर्वरूपम्, आदित्य उत्तर- रूपम्, झापः सन्धिः, वैद्युतः संधानम्"। अ्रग्नि पूर्वरूप है, सूर्य्य उत्तर रूपहै, जलसंधि है, विद्युत संधानहै,।"इत्यधि ज्यो- तिषम्"। 5 यहअरप्रधिज्योतिष है, अर्थात् इस प्रकार अपरधिज्योतिष- रूप उपासना कही॥।"अथाधिविद्यम्"। 'ब तधिविद्यहै,अर्थात् अब ऋधिविद्यरूप उपासना कहते हैं। तहां।"तराचार्य्यः पूर्व- रूपम्"। 5 आ्राचार्य्य पूर्वरूप है?।४ ।। अन्तेवांस्युत्तररूपम्। विद्यासन्धिः प्रवचनथसन्धा- नमू। इत्यधिविद्यम्। अथाधिप्रजम्। मातापूर्व रुपम् । पितोत्तररूपम्। प्रजासन्धिः। प्रजननछसन्धानम्। इ- त्यधिप्रजम् ॥ ५ ॥ हे सौम्य!।"तन्तेवास्थुत्तररूपम्" 'अन्तेवासी उत्तररुपहे, र्थात् आ्रचार्य्य के गृह निवास करनेवाला शिष्य उत्तररूप है। छरु।"विद्यासन्धिः प्रवचनथंसन्धानम्"।६ विद्या सन्धि है प्र- वचन संधान है, अर्थात् प्रश्नोत्तररूपों का कथन संधान है।। ।"इत्यधिविद्यम्"। [यह अरप्रधिविद्य है, अर्थात् इसप्रकार अरधि- विद्यरूप उपासना कही॥।"अप्रथाधिप्रजम्"। ६त््प्रब अ्र्प्रधिप्रजहै, पितोत्तररूपम्, प्रजासन्धिः, प्रजननथसन्धानम्"।मातापूर्वरूप है, पिता उत्तररूप है, प्रजासंधिहै, प्रजनन संधानहै, पर्थात् माता जो है सो पूर्वरूपहै, अरु पिता उत्तररूप है, पुत्रादि प्रजासंधि है, अरु ऋतुकालबिषे स्व्रभार्यासे संभोग संधान है।।"इत्यधि- प्रजम्"। यह अधिप्रज है? अर्थात् इस उक्रप्रकारकी त्र्रधिप्रज- रूप उपासना कही है।। ५ ॥ ऋथाध्यात्मम्॥ अधराहनुः पूर्वरूपभ्। उत्तराहनु- रुत्तररूपम्। वाक्सन्धिः॥ जिह्कासधानम। इत्याध्या-

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। २१ त्मम्। इतीमामहासथंहिता। य एवमेतामहासथंहिता व्याख्याता वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्न्रह्मवर्चसेना- न्नाध्येन सुवर्गेरा लोकेन॥ सन्धिराचार्य्यः पूर्वरूपमित्य- धिप्रजं लोकेन ॥ ६ ॥ इति तृतीयोऽनुवाकः॥ हे सौम्य!।"अथाध्यात्मम्"। ६त्रव तप्रध्यात्म, श्रव करो, ।'अधराहनुः पूर्वरूपम, उत्तराहनुरुत्तररूपम्,वाक् सन्धिः,जिह्वा सन्धानम्"। ६ नीचे का हनु पूर्वरूप है, ऊपरका हनु उत्तररूपहै, वाक् संधिहै, जिह्वा संधान है,,अर्थात् नीचे का होठ पूर्व रूपहै रु ऊपर का होठ उत्तररूप है अरु वासी संधि है तरु जिह्वा संधान है।"इत्याध्यात्मम्"। 'यह अध्यात्महै' अर्थात् इसप्रकार अध्यात्मरूप उपासना कहीहै।। इन सर्व उपासनाओरंको जिस्र- कार प्रथम लोकोपासना कहीहै तिसप्रकार जाननां॥।"इतीमा महासऊहिताः"। [ऐसे यह महासंहिता, ग्रहण किया है? अ्र्प्र- र्थात् इस प्रकार यह कहीहुई महासंहिता, अधिकारियोंको विधि के देखावने के अर्थ ग्रहण करते हैं। जैसे दर्शतर्प्रादिक षट्यांग समुच्चयहुये फलके साधक हैं अधिकारी के अरंशसे अभेदता क- रके। तैसही यह उक्र पांच उपासना भी समुचयवालीही हुई प्रजा आररादिक फलकी कामनावाले पुरुषों को अनुष्ठान करने के योग्य हैं, इसप्रकार कंहते हैं। यहां यह भाव है कि फलकी का- मनावाले पुरुषों करके अनुष्ठान कीगई संहिता की उपासना वां- छित फलकी प्राप्तिके अपरथ होती है। अरु फलकी इच्छासे रहित निष्काम पुरुषों करके अनुष्ठान कींहुई उक्र उपासंना ब्रह्मविद्या की जिज्ञासा उपजावनेवाली होंतीहै। अरु बुद्धिरहित पुरुषों करके ब्रह्मका जानना अशक्य होनेसे बुद्धिंकी कामनावालें पुरुषों करके किया जप भी ब्रह्मविद्या के जाननेके अर्थ बुद्धिका प्रापक होता है। तरु धनसे रहित पुरुषों करके चित्तकी शुद्धिके अर्थ यज्ञादिकों का होना अशक्य है क्योंकि धन बिना यज्ञ होवे नहीं,

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२२ तैत्तिरीयोपनिषद्। ततएव धनकी कामनावाले पुरुषों करके किया इसका हवनभी धनकी प्राप्ति वा चित्तशुद्धि वा ब्रह्मविद्याविषे उपयोगी होताहै। इसप्रकार ब्रह्मविद्या की सन्निधिबिषे उपदेश किये हुये साधनोंका महत् तात्पर्य है, सो सर्वत्र देखलेना ]।"य एवमेता महासछ- हिता व्याख्याता वेद संधीयते प्रजया पशुभिर्ज्ञह्मव चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन"। [जो पुरुष उक्रप्रकार कथन की हुई इन महा- संहिता को जानताहै, सो प्रजाकरके पशुओं करके ब्रह्मतेज क रके अन्नादि करके अरु स्वर्गलोक करके जुड़ताहै, अर्थात् प्रजा पशु तेज अन्न धन स्वर्गादि फलको पावता है। अ।"संधि- राचार्य: पूर्वरूपनित्यधिप्रजं लोकेन"। संधि आ्रप्रचार्य पूर्व- रूप अधिप्रज लोक से, अर्थात् संधि आचार्य पूर्वरूप है इस प्रकार अप्रधिप्रज, लोकसे जुड़ता है। यहां जो कहाहै कि, जानता है, इस पढ़का अर्थ उपासना करता है यहही होताहै, क्योंकि ।"प्राचीन योग्योपास्व्रेति"। हे प्राचीनयोग्य!उपासनाकर।इस चतुर्दशवें वाक्य करके उपासना के अधिकार परत्वहै ताते।ञरु उपासना जो है सो शास्त्र के अनुसार तुल्य वृत्तियों के प्रवाहरूप मिश्रित अरथात् अन्य विषयाकार वृत्तिसे रहित है, एतदर्थ तदा- कार वृत्तियों करके शास्त्रोक आश्रय को विषय करनेवाली उपा. सना कहते हैं। लोकविषे गुरुको उपासताहै, राजाको उपासता है, इसप्रकार उपासना शब्द का अप्पर्थ प्रसिद्ध है। जो गुरु शर्प्रादि कों के निरंतर समीप बसता है सों उपासना करता है, अर्थात् उप कहले हैं समीप को अरु आासन कहते हैं स्थित होनेको ताते जो आ्राचार्य के समीप स्थित होयके उनकी सेवा शुश्रूषा करनी है तिसका नाम उपासना है। इसप्रकार कहते हैं। ऋरु सोई उ- पासनाके फलको पावताहै। अतएव यहांभी सो उपासना शब्द का अर्थ अरु तिसकरके उक्रफलकी प्राततिबने है॥ ६॥ इंति तृतीयोऽनुवाकः॥३॥

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। २३ अथ चतुर्थोडनुवाक: ४॥ यश्छन्दसामृषभो विश्वरूप: इन्दोग्योऽध्यमतात्स- स्बभूव। समेन्द्रो मेधया स्पणोतु। अमृतस्य देवधारणो. भयासम। शरीरं मे विचर्षरामू। जिंह्ा मे मधुमत्तमा। कर्णान्यां भरिविश्रुवम। ब्राह्मणः कोशोऽसिमेधया पि- हितः। श्रुतं मे गोपाय। उरहवन्ति वितन्वाना ॥७॥ हे सौम्य।"समेन्द्रो मेधया स्पृणोतु" तरु।"ततो मे श्रिय- सावहेति"। सो इन्द्र मुझको बुद्धिसे प्रसन्न वा, संमर्थ करो। अरु तिसके अनन्तर मेरे अर्थ लक्ष्मी को प्राप्त करो। इस मन्त्रबिषे अपररु-ऋरगिले मन्त्रबिषे कथन किये लिंग (चिह्न) के देखनेसें। यहां बुद्धिकी कामनावाले तपरु लक्ष्मी की कामनावाले पुरुषोंको ति सकी प्राप्तिके साधन जप अरु हवन कहते हैं।।"यश्छन्दसामृष- भो विश्वरूंपः छन्दोभ्योऽघ्यमृतात्तम्बभूव"। जो ॐकार वेदके सध्य श्रेष्टहै वेदरूंप अ्रमृतसे प्रतीतहोताहुआ्र अर्थात् जो ॐकार वेदके मध्य प्रधान होनेसे श्रेष्ठवत् श्रेष्ट है, रु"शंकुनेत्यादि"। सो जैसे शंकु (.कीले) करिके इत्यादि अन्यश्चुतियों करके, सर्व प्राणियोबिषे व्यात होनेसे विश्वरूपहै, अरु इसहीसे उकार का शेष्ठपनाहै। इसकरके उकार यहां उपासना करने को योग्य है। एतदर्थही ऋषभत्रादिक शब्दों से उकार स्तुति करने के यो- ग्यही है। अरु जो वेदरूप अमृत से प्रतीत होताहुआ्रा, अर्थात् लोक अरु वेदरूप व्याहतियों से सारिष्ट 'उत्तम भाग्य, को इच्छा करनेवाले अरु इसहीसे तपकरनेवाले प्रजापतिसे सारिष्ट' 'उत्तम भाग्य' रूप होनेकर के उकार प्रतीतहोता हुआ। ऋरु जिस करके नित्यरूपअकार की उत्पत्ति अनायास से नहीं कल्पना करते हैं, याते सो प्रतीत होता हुआ, यह तर्थ बनता है।"समेन्द्रो मेघया स्परशोतु"। ६ सो इन्द्र सुझको बुद्धिसे समर्थ करो,अर्थात् सो उक्र प्रकारकाॐकाररूप इन्द्र सर्व कामका स्वामी परमे-

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२४ तैत्तिरीयोपनिषद्। श्वर सुझको वुद्धिसे प्रसन्न वा समर्थ करो। तव वुद्धिके चल की प्रार्थना करते हैं।"अमृतस्य देवधारणोभयासम्"। ६हे देव! अमृतका धारण करनेवाला होहु?अर्थात् हे देव! तिस वुद्धिके ऋ्रधिकार से तरमर भावके हेतरूप ब्रह्मज्ञान का धारण करने वाला होवो।"अरु शरीरं मे विचर्षगाम्, जिह्वा मे मधुमत्तमाकर्णा. भ्यां भरिविश्रुवम्"। ६मेरा शरीर विचक्षसहोहु, मेरी जिह्वा विशेष करके मधुरभाषिणी होहु कर्णाकरके थोत्रा होहु, अर्थांत् मेरा शरीरयोग्य होहु, तरु मेरीवासी अतिशय करके मधुर भापए करनेवालीहो हु। अरु मैं दोनों कानों करके वेदका बहुत श्रोता होहुँ किंवा मेरा कार्य अरु करणरूप संघात जो है सो आत्मज्ञान केयोग्य होहु, यह वाक्यका अर्थ है। अरु।"न्रह्मणःकोशोसिमेघयाऽपि- हितः"। त्रह्मका कोशहैवुद्धिकरकेतप्रच्छादितहै,अर्थात् हे ॐकार! तू ब्रह्म (परमात्मा) का कोश कहिये म्यानहै, क्योंकि खड्गके कोश (म्यान)वत् ब्रह्मके प्राप्ति वा दर्शनका स्थानरूपहै ताते। तरु जिस करके तू ब्रह्मका प्रतीक (प्रतिमा)है याते तेरे विषेब्रह्मप्रात्तहोताहै। सो तू ब्रह्म का कोश हुआ लौकिक वुद्धिकरके आप्रच्छादितहै, अर्थात् मंदबुद्धिवाले पुरुषोंकरके तेरा सद्भाव्रज्ञातहै। अरु।"्रुतं मे गो. पाय"। हमेरे श्रुतको रक्षाकर,अर्थात् तू मेरे श्रवापूर्वक आरप्रात्मज्ञान आादिकों की रक्षा कर, तिसकी प्राप्तिके अरप्रविस्मरणादिकों को कर॥ यह मन्त्र बुद्धिकी कामनावाले पुरुषको जप करनेके अर्थ कहा। अब लक्ष्मीकी कामनावाले पुरुषको तिसकी प्राप्त्यर्थ हो- मार्थ जो मन्त्र है सो कहते हैं।" आाहवन्ती वितन्वाना"। ६ ल्यावनेवाली शर्रो विस्तारनेवाली;।। ७।। कुर्वाणाचीरमात्मनः। वासाथ्सिमम गावश्च। त्र्प्र- न्नपाने च सर्वदा। ततो मे श्रियमावह। लोमशां पशभिः सहस्वाहा। आर्मायन्तु ब्रह्म चारिणःस्वाहा। विमायन्तु ब्रह्मचारियाःस्वाहा।प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणःस्वाहा।दमाय-

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शिक्षाध्यार्य प्रथमावंल्ञी। २५ न्तुब्रह्मचारिय: स्वाहा। शमायन्तुब्रह्म चारिया:स्वाहा।।८॥।: हे सौम्य!।"कुर्वाणा चीरमात्मन:, वांसीथसिसमगावश्च,अ्रंन्न प्ानेचसर्वदा, तंतो मे भियमावह, लोमशां पशुभि: सह स्वाहा"। मात्माके वस्त्रोंको, गौओं को अन्नपानको सर्वदा निर्वाह करने वाली, पजा, भेड़ आादि करकेयुक, पशुकरके सहित तिंस लक्ष्मी को मेरे अर्थ ल्याव, स्वाहा अर्थात् मेरे वस्त्रोंको अर गौश्मोंको ऋरु अन्नमानों को निर्वाह करनेवाली जो लक्ष्मी है, अरु तिस अजा अरु भेड़ आादिकों करके युक अरु अन्य 'अश्वादि' पशुश्ों क्रकेयुक लक्ष्मीको वुद्धिके वर्धमान होनेके पश्चात् मेरे अर्थ प्राप्त कर, स्वाहा।अरुजिस कर के बुद्धिरहित पुरुषों कोलक्ष्मी की जो भासि है सो अनुर्थके अर्थही होती है, अतएव यहा चुद्धिकी वृद्धि होनेके पश्चात् लक्ष्मी को प्राप्तकर इसप्रकार कहा है।। प्रपररु यहां॥'ल्याव'। इ्रस क्रिया पद करकेॐकारही सरवे ओ्ोंरसे सम्बन्ध को पावता है।तरु यहां जो स्वाहा शब्दहै सो हवनके अरन्तके मन्त्ररूपत्रप्र्थके जना- वने के अरथहै।।"त्र्रामायन्तुव्रह्मचारिणःस्वाहा, विमायनंतुन्रह्मचां- रिया: स्वाहा, प्रमायन्तुव्रह्मचारिणः स्वाहा, दसायन्तुब्रह्मचारिणः स्वाहा, शमायन्तुवह्मचारिण:स्वाहा" बह्मचारी मेरे अ्रर्थ ल्याव स्वाहा, ब्रह्मचारी निष्कपंटभावको करो स्वाहा, ब्रह्मचारी प्रमाको करो स्वाहा, ब्रह्मचारी दमको करो स्वाहा, ब्ह्मचारी शमको करो स्वाहा, अर्थात् ब्रह्मचारी जो है सो मेरे अर्थ प्राप्त करो स्वाहा, ब्रह्म: * चारी जो हैं सो निष्कपट भावको प्रात्त करो स्वाहा, अरु ब्रह्मचारी जो है. सो यथार्थ ज्ञानको करो स्वाहा, अरु ब्रह्मचारी जो है सो इन्द्रियोंके दमनको करो स्वाहा, अरु ब्रह्मचारी, जो है. सो सनके निग्रहरूप शमको करो स्वांहा, ॥। ८ II

तं खाभग प्रविशानि स्वाहा। समाभग प्रविशस्वाहा। तस्मिस्तु सहस्रशाखे निभगाहत्वयिमृजे स्वाहा। यथा-

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२६ तैत्तिरीयोपनिषद्। S5प: प्रंवतायन्ति। यथामांसा=्प्रहर्जरम्। एवंमाब्रह्मचा- रिसःधातरायन्तुसर्वतः स्वाहा। प्रतिवेशोऽसिप्रमाभाहि- प्रमापद्यस्व ॥ वितन्वानाशमायन्तुब्रह्मचारिणःस्वाहा। धातरायन्तुसर्वतःस्वाहेकंच॥६॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः॥

हा,तं त्वाभग प्रविशानि स्वाहा, समाभगप्रविश स्वाहा, तरंमस्तु सहस्त्रशाखे निभगाऽहं त्वयि मृजे स्वाहा"। जनविषे यशहोवों स्वाहा, तरतिशय श्रेष्ठ अरत्यन्त धनवान्से धनवान् होवों स्वाहा, भगवन् तिस तेरे ताईं प्रवेश करु स्वाहा, भगवन् सो मेरे ताई प्रवेश कर स्वाहा, भगवन् तिस सहस्र शाखावाले तुझ विपे मैं शोधन करूंहूं अर्थात् मैं जनके समूहबिषे यशस्व्री होवों स्वाहा, मैं तरप्रतिशय अपररुश्रेष्ठ अरपत्यन्त धनवानोंसे भी-धनवान् होवों स्वाहा, किंवा हे भगवन्! हे पूजने योग्य ! तिस ब्रह्मके कोशरूप तेरे विषे प्रवेश करूं,अर्थात् तुभविषे प्रवेश करके अनन्य तेरा स्वरूपहीहोवों स्वाहा, हे भगवन् ! सो तूभी मेरेविषे प्रवेश कर, अर्थात् मेरी अपररु तेरी दोनोंकी पपभेद एकताहोवो स्वाहा, हे भगवन्! तिस सहस्र शाखावाले तुझविषे में अपने पापरूप क्म्मो को शोधन करों स्वाहा,।"यथाऽडपः प्रवतायन्ति, यथा मासा अहर्जरम्, एवं मां ब्रह्मचारिणः धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा"। जैसे जल नम्रदेश में जाता है अरु जैसे मास संवत्सरको, ऐसे धातः ब्रह्मचारी मेरे ताई सर्व ओरसे तरवो स्वाहा अर्थात् जैसे लोकों विषे जल जो है सो नीचेही स्थलको जाता है, अरु जैसे मास जो हैं सो संवत्सरको जाते हैं [ संवत्सर जो है सो दिवसों करके लोकों को जरावान् करता है, एतदर्थ संवत्सर को 'अहर्जर' इस नाम से कहते हैं अथवा दिवस जो हैं सो इस संवत्सर विषेशन्तरभाव को पावते हैं एतदर्थ सो दिवस वा मास 'अहर्जर' नाम से कहे जाते हैं ] इस प्रकार हे सर्वके विधाता ब्रह्मचारी ! जो है सो मेरे

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अर्थ पूर्वादि सर्व दिशाओं से प्राप्तहोवो, स्वाहा। अरु.।"प्रतिवे- शोऽसि प्रमा भाहि प्रमा पद्यस्व"। 'समीप का यह है मुभको प्रकाशकर आपके अपर्थर प्राप्तकर, अपर्थात् हे भगवन्। जैसे श्रमके निवारण का स्थान समीपका ग्रह होता है तैसे तू समीपके ग्रह- वत् समीप का ग्रहहै, अर्थात ते रे भक्नों को सर्वपाप अरु तिसके फल सर्व दुःख तिनके निवारणका स्थान तू है। एतदर्थ मेरेको

इसप्रमांण से लोहके शर करके वेधे हुये लोहे में वाणतारूप होता है तैसे तू मुझ़को अपना स्वरूप कर।" वितन्वाना शमायन्तु ब्रह्मचारिण: स्वाहा, धातरायन्तु सर्वतः स्वाहेकञ्च" ६विस्तार करतीहुई ब्रह्मचारीशमको करहु स्व्राहा, सर्वश्रोर से आावहु स्वाहा एक2अर्थात् हे घातः !(विघाता) विस्तार को करती हुई, ब्रह्मचारी जाहै सो शमको करो स्वाहा, तरु.सर्वश्ोरसे प्राप्त होवो स्वाहा, यह एक हैं।। इस विद्या के प्रकरण विषे जो लक्ष्मीकी कामना कथनकिया है सो धनके अर्थ है, अरु धनयज्ञादि कम्मों के अर्थ है अरु यज्ञादि कर्म सश्चित पापों के विनाशार्थ है अरुं पापों के विनाशहुयेब्रह्मविद्या प्रकाशती है। तथा स्मृतिः

पश्यन्त्यात्मानमात्मनीति"। पुरुषों को पापकर्मके क्षयहुये ज्ञान उपजता है। जैसे स्वच्छ दर्पण विषे 'मुख देखते हैं तैसे' आत्मा (बुद्धि) विषे (आत्मासाक्षी) को देखते हैं। इसस्मृति वाक्य प्रमासासे ॥ ६॥ इति चतुर्थोडनुवाकः ॥४ ॥ अथ पञ्चमोडनुवाक: ५॥ भूभुव: स्वरिति वा एतास्तिस्रोव्याहृतयः। तासासु- हस्मैतां चतुर्थी। महाचमस्य प्रवेदयते। मह इति त- दूब्रहा। स आात्मा। अङ्गान्यन्यादेवताः। भूरिति वा अयं

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२८ तैत्तिरीयोपनिपद्। लोक:। भुव इत्यन्तरिक्षम्। स्व इत्यसौ लोकः॥ १० ॥ हे सौम्य![पूर्व कहे अर्थके अ्रपनुवाद पूर्वक अ्र्प्रभ्रिम कहनेके अरप्रनु- बाढके सम्वन्धसे कहते हैं यहां यह अर्थ है कि व्याहृतियों को श्रद्धासे ग्रहण किया होनेसे, तिनको परित्याग करके उपदेशकिया जो ब्रह्म सो वुद्धि विषेस्थिरताको पावतानहीं, एतदर्थ व्याहतिरूप शरीरवाला हिररयगर्भनामक ब्रह्महृदयकेमध्य ध्येयहोने से उप- देशकरते हैं ] इसप्रकार वाणकेसम्बन्धरूपसंहिता को विषय करने वाली उपासना कहा! तिसके पश्चात् बुद्धिकी कामना परु लक्ष्मी की कामना के मन्त्र कहे। सो मन्त्र परम्पराकरके ब्रह्मविद्या के उपयोगार्थही है। यह सूचन किया। अ तिसके अरप्रनन्तर व्याहति- रूप ब्रह्मकीहृदयके मध्य स्वाराज्य फलवाली उपासना कहते हैं। ।"भूसु नूर्सुवः स्वरिति वा एतास्तिस्त्रो व्याहतय: तासामुहस्मैतांच- तुर्थी । महाचमस्य प्रवेदयते"।६भू: भुवःस्वः,यह प्रसिद्ध जो तीन वयाहृतियां स्मरण करते हैं तिनके मध्य इस चतुर्थ को महाच- मस जानताहुआ ]र्थात् 'भु:, भुवः, स्त्रः' यह. प्रसिद्ध जो.तीन व्याहृतियां। कि जिनको गायत्री आादिक मन्त्रों के साथ स्मरण 'करते हैं'। तिनके सध्य यह चतुर्थ व्याहृति महलोक है तिस च- तुर्थ व्याहृतिको महाचमसका पुत्र सहाचमस्य नामवाला ऋपि है सो जानता (देखता)हुआप्रा।"मह इति ब्रह्म, सत्रात्मा; अङ्गा- न्यन्या देवताः, भूरिति वा त्र्रयं लोक:, भुव इत्यन्तरिक्षम, स्व्र इस्यसौलोक:"। मह ऐसी सो ब्रह्महै, सो त्रात्मा है, श्रन्य दे- वता झंगहैं, भू: ऐसा प्रसिद्ध यह लोकहै सुवर यह त्न्तरिक्ष है, स्वर् ऐसा वह (स्वर्ग)लोक है? अर्थात् यहां उपदेशसे जो यह महाचमस्य ऋषिने देखीहुई महर् ऐसी व्याहृति है [ महर इस व्याहृतिविषे अंगी व्रह्मकी दृष्टि करनेको योग्य है। तिस व्याहृति श ब्रह्म वा अंग अंगीविषे क्या तुल्यता है। तहाँ कहते हैं, यहां यह अर्थ है कि जैसे देवदत्तके पादादिक कंग हैं अरु देहका म- ध्यभांग अंगी है, तिसको अन्य अरंगोंका प्ररांत्मा कहते हैं.क्योंकि

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शिक्षांध्याय प्रथमावल्ली। २.ह वो सर्व अंगोविषे व्याप है ताते। तैसेही महर्लोकरूप जो व्या हति है सो हिरएयगर्भरूप ब्रह्मका मध्यभाग है अतएवं उसको प्रात्मा ऐसी कल्पना करते हैं। अरु अन्य व्याहतियां जो हैं-सो पादादिक अवयवोंके भावसे कल्पना करते हैं तहां प्रथम व्याहति दोनों पाद स्थानी है, अपरु द्वितीय व्याहति दोनों बाहु स्थानी है, अरु तृतीया. व्याहति शिरस्थानी है ] सो ब्रह्म है। किस तुल्यता से। तहां कहते हैं। जिस करके ब्रेह्म महत है अरु व्याहनि महर् हैं, तिसकरके उनकी एकता वने है। पुनः सो महर् कयाहै। सो आांत्माहै। परु जिसकरके वो महर् व्याप्तिरूप कर्मवान् है तिसही से सो आत्माहै। अरु अन्य जो व्याहतिरुप 'लोक,देव, वेद, श प्रागाहैं' सो जिस करके। "मह इतिब्रह्म"। महर ब्रह्महै,। इस अ्रथ्रिम कहने के वाक्य के कथनाकिये व्याहतिरूंप ब्रह्म के 'देव, लोक' आप्रादिक स्वे अवयवरूप हैं। अरु जिस करके सो, 'सूर्य, चन्द्र' ब्रह्म अरु अन्नरूप करके व्याप होते हैं, एतदर्थ अन्य देवता जोहैं सो ब्रह्मके पादादिक पप्रवयव हैं। यहां जो.देवता का यहण है सों उक्र लोकादिकोंके ग्रहणार्थ है। अरु जिस करके।"मह इति ब्रह्म" महर ब्रह्म है,। इस अग्निम कहनेके वाक्य करके कथन किये व्या हृतिरूप ब्रह्मके 'श्रेव, लोक' आदिक सर्व अवयवरूप हैं, याते स ्यादिकों करके लोकादिक वृद्धि को पावते हैं। इस प्रकार भागे प्रुति कहती है भ: ऐसा प्रसिद्ध यह लोक है। भुवर यह अन्तः रिक्ष है! स्वर ऐसा यह स्वर्गलोक है॥ १० ॥ मह इत्यादित्यः। शप्रादित्येन वाव सर्वे लोकामही न्ते॥ भूरिति वा अर्प्रग्निः। भुव इति वायुः । स्वरित्या द्वेत्यः। मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव सर्वाणि योतीछंषि महीयन्ते॥ भरिति वा ऋचः।भुव इतिसा- नि। स्वरिति यजूथंषि।११।। के हेसौम्य!"मह इत्यादित्यः, आादित्येन वाव सर्वे लोका महीं-

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३० तैत्तिरीयोपनिषद्। यन्ते"। :महर् यह सूर्य है, सूर्य से प्रसिद्ध सर्वलोक वृद्धि को पावते हैं,। "भूरिति वा अग्निः। अव इति वायुः। स्व्ररित्यादि- त्यः । मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वा सर्वाि ज्योतीछपि महीयन्ते"।:भः यह प्रसिद्ध अ्र््रग्निहै, सुवर यह वायु है, स्वर् यह सूर्य्य है, महर् यह चन्दमा है, चन्द्रमासे प्रसिद्ध सर्वज्योति (तारा.) वृद्दिरिको पावते हैं; अरु।"भूरिति वा ऋचः, भुव इति सामानि, स्वरिति यजषि"। ६भः यह प्रसिद्ध ऋचा (ऋग्वेद) है, भुवर यह (सामवेद) है, स्वर् यह यजुर्वेद है; ॥ ११ ॥ मह इति ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते॥ भूरिति वै पणः । भुव इत्यपानः । स्वरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। ऋर्पन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते॥ तावा एताश्चतस्रश्चतुर्द्धा चतस्रश्चतस्रो व्याहतयः॥ता यो वेद सवेद ब्रह्म । सर्वेडस्मै देवा बलिमावहन्ति॥ त्र््रसौ लोको यजूथंषि वेदद्वे च ॥ १२॥ इति पञ्च मोऽनुवाकः॥ .हे सौम्य!।"मह इति ब्रह्म, ब्रह्मणावाव सर्वे वेदा महीयन्ते"। 'महर यह ब्रह्म (ॐकार) है, ब्रह्मसे प्रसिद्ध सर्व वेद वृद्धिको पावते हैं, अरु।"भरिति वै प्राणः भुवरित्यपानः, स्वरिति व्यानः, मह इत्यन्म्, त्रप्रन्नेन वाव सर्वे प्राणामहीयन्ते"। ६भः यह प्रसिद्ध प्राणहै, भुवर यह अपानहै, स्वर यह व्यानहै, महर यह अन्न है, अन्न से प्रसिद्ध सर्वप्राण वृद्धिको पावते हैं, अरु।"ता वा एताश्चतस्त्र- शतुद्धाचतस्त्रश्चतस्त्रो व्याहृतयः, ता यो वेदसवेदब्रह्म"। ६ सो प्रसिद्ध ऐसी चार व्याहतियां चारचार हुई चारप्रकारकी होती हैं तिनको जो जानताहै सो ब्रह्मको जानताहै ? अर्थात [एक एक वयाहतियां जब चारचारं प्रकारकी चिन्तन करते हैं तब षोडश कलात्मक पुरुष उपासना किया होताहै इस अभिप्राय करके; संक्षेपसे कहते हैं ] सो प्रसिद्ध जे भः सुवर् स्वर तरु महर् इसे प्रकारकी जो चार व्याहतियां हैं, सो व्याहृतियां जैसे कल्पना

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ३१ करी है, तैसेही तिनका उपदेश जो है सो उपासनाके नियमार्थ है, सो व्याहतियां जैसे कथन करी है, तिसप्रकार तिनको जो जानता है सो ब्रह्मको जानता है। ब्रह्मभावरूप स्वाराज्य की प्राप्तिके हुये। "सर्वेडस्मै देवा बलिमावहन्ति,असी लोको य़जथषि वेदडे च "15 सर्व देवता इसके अर्थ वलिदानको ल्यावते हैं, यह लोक अरु यजुर्वेद दोनोंको जानता है, अर्थात् सर्व देवता अरंग- भूतहुये उस विद्वान्के अर्थ बलिदान ल्यावते हैं तरु इसलोक अरु यजुर्वेद इन दोनोंको जानताहै। ननु।"तङ्ह्म स आत्मेति"। सो ज्रह्म है सो आत्माहै, इसप्रकार ब्रह्मको जानेहुये अज्ञात- वत्।"स वेद ब्रह्मेति"। सो ब्रह्मको जातना है इस प्रकार कहना योग्य नहीं [अधिकारकी अविधिरूप वाक्य विषे ब्रह्मका ज्ञान फलपने करके कहते नहीं, किन्तु अग्रिम कहने के अनुवाक से इसही ब्रह्मकी उपासना विषे गुण का विधान होगा, इसप्रकार सूचना करने को यह कहते हैं ] सो कहना बने नहीं, क्योंकि शास्त्र उसको विशेष कहनेकी इच्छावाला है ताते, यह दोष नहीं है, अरु यद्यपि चतुर्थ व्याहतिरूप ब्रह्म है, इसप्रकार जाना है, यह कहना सत्य है, तथापि उसका हृदय के मध्य प्राप्त होने के योग्यपने तरपरु मनोमय पनेसे आादि लेके।"शान्तिसमृद्धमिति"। रूप शान्ति से समृद्धिको पाया, इस विशेषण पर्यन्त जो विशेष्य है, सो नहीं जाना है। एतदर्थ विशेषस तरु विशेष्यरूप धर्मका समूह जनावते हैं। इसप्रकार तिसके कहने की इच्छावाला जो शास्त्र सो अज्ञातवत् ब्रह्म को मानके।"सवेद ब्रह्मेति"।।'सो ब्रह्म को जानता है,। इसप्रकार कहता है। एतदर्थ यह दोष नहीं है अपरु जिस करके जो अगिस कहने के धर्म्म के समूह करके युक् ब्रह्म को जानता है सोई ब्रह्मको जानताहै, यह अभिप्राय है। एतदर्थ अग्रिम कहने के षष्ठ अनुवाकसे इस पंचम अनुवाक की एक वाक्यताहै। अरु इन पंचम अरु षष्ठ दोनों अनुवाकों विषेउ पासना भी एकही है, क्योंकि [जब व्याहृतिरूप अवयव वालाही

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तैत्तिरोयोपनिषद्। क्रहम आंगे उपास्य कहते हैं, तंबहीं उपासक को प्रथम व्याहृति रिंप अग्निबिषे स्थित का कथन घढ़ितहै। एतदर्थ व्याहतिरूप देवताकी प्राप्ति के कथनरूप उपासना की एकता बिषे लिंगको कहतेहैं]।"भूरित्यग्नौ प्रतितिष्वतीति"। भू यह ऋग्तिचिषे स्थित होता है, इत्यादिरूप वाक्यमें उपासनाकी एकता विषे ज़ो लिंग झांगि कहाहै, तिसलिंगसे और भिन्न [एकठ़िकाने प्रधान विद्या की विधिहै, अरु दूंसरे-ठिकाने गुराविधि है इसप्रकार अनुवाक सेदरके कृत अरथहये अन्यप्रकार से असिद्ध भेढक प्रमाण पतीत होनेयोग्य नहीं है, ऐसा कहते हैं] उपासना के बोधक शब्द के अपभावसे यह उपासना की एकता बिषे कहा जो लिंग सो युकहै। पपररुजिसकरके यहां।"वेदोपासितव्य"! जानताहै सो उपासना करने, योग्य है,। इसप्रकार भिन्न उपासनाका बोधक कोईभी शब्द नहीं है; कयोंकि व्याहृति के बोधक पश्चम त्रपनुवाकविषे।"तायोवेदे ति"।.तिसको जो जानताहै,। ऐसा आमे कहने का अर्थ है ताते। एंतदर्थ उपासनाका सेदक शब्द नहीं है। अर तिन व्याहति के बोधक पंचम चनुवाक का अभिम कहनेके अंर्थेकरके युकपना जो हैं सो।"तद्विशेषविवक्षत्वादिति"! शास्त्र को, तिसके विशेष के कहनेकी इच्छावाला होने से, इत्यादि वाक्यों करके हमने पूर्वही कहां है॥ १२॥ इति पश्चमोऽनुवाक: ॥५॥

सय एषोतर्हृदय तरकाशः। तस्मिन्नयं पुरुषो मनो मयः। अमृतो हिररमयः। अन्तरेण तालुकेयएषस्तन इवावलम्बते i. सेन्द्रयोनिः यत्नासौ केशान्तो विवर्तत व्यप्ोह्य शीर्षकपाले॥ भूरित्यगनौ प्रतितिष्ठति। भुव इति वायौ १३॥ हे सौन्य।।"सय एषोंडतर्हृदय आाकाशः, तस्मिन्रयं पुरुषो अनोमयः"। हसो जो यह हृदय के सीतर आाका शहै, तिसविषे यह

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शिक्षाध्याय प्रथमावली। ३३ पुरुष है, मनोमय है, अर्थात्, 'भूः सुवर् स्वर' इन तीन व्या- हृतिरूप जो अरन्य देवता है, सो। "महइति ब्रह्म"। महर् ब्रह्म है, इस वाक्यसे हिरएयगर्भ व्याहतिरूप ब्रह्म के श्रंग हैं, इंसप्रकार कहा। अरु अव जिसके वो देवता अंगभूत हैं, तिस इस ब्रह्म के साक्षात् ज्ञानार्थ अपरु उपासनार्थ विष्सुके स्थानापन्न शालिगाम- वत् हृदयादि आ्राकाशरूप स्थान कहते हैं। शरु जिसकरके तिस स्थानविषे उपासना किया हुशप्र मनोसयपने आदिक धर्स्म करके युक् सो व्रह्म, हाथिषे शामलक नामवाला फल वा निर्मलजल- वत् साक्षात् जाना जाता है। एतदर्थ सो स्थान अरु सर्वात्म- भावकी प्राप्तिके अरथ मार्ग कहने को योग्य है, इस अभिप्नाय से यह षष् अनुवाक का आरारम्भ करते हैं। सो प्रसिद्ध जो यह हृदय के भीतर।' हाथ के कमएडलु के अन्तर के आकाशवत्। वा वेखु (बांस) के परव (पोइ) के मध्य आकशवत्'। श्ाकाश है तिस विषे सो यह पुरुष है, अर्थात् शरीररूप पुरों िषे पूर्णता से व्याप होवे। 'वा पुरीतती नाड़ीविषे सोवता होवे'। वा पृथिवी आदि लोक जिस करके पूर्णाहैं, एतदर्थ यहपुरुष है ऐसा कहतेहैं। सो पुरुष मनोमय है, अर्थात् ज्ञानरूप क्रियावाला होनेसे म़न जो विज्ञानवुद्धि, तिसरूप है, क्योंकि तिस विषे प्रतीयमान होता है ताते। वा जिसकरके मनुष्य मनन करते हैं ताते उसको मन कहते हैं। ताते ऐसा जो त्रन्तःकरण त्रपराकाशहै सो मनहै। अरु जिस करके पुरुष तिस मनका अभिमानी वा सनरूप लिंग ।' (चिह्न वा उपलक्षण)'। वाला है, तिस करके।'पुरुष को' तिस मनोमयरूप कहते हैं। अरु सो पुरुष अमृतरूप होने से भरख- धर्म रहित तमर है, अपररु हिरएय (प्रकाश) मय है। अब तिस उक्र प्रकार के लक्षणवाले हृदयाकाश बिषे साक्षात्कार किये से विद्वान् के आत्मरूप पुरुष के ऐसे स्वरूप के ज्ञानार्थ मार्ग क- हते हैं। हृदयसे ऊपर प्रवृत्त हुई ऋरु योगशास्त्रविषे प्रसिद्ध जो सुंबुम्णा नाम्नी नाड़ी है सो मुखसे प्रसिद्ध।"अन्तरेण तालुके-

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३४ य एषस्तन इवावलम्ब ते"। : तालुदेशके मध्य जो यह दोनों स्तनवत् स्थित है, तालुदेशके सध्य प्रास्त हुई है, छररु जो दोनों तालू के मध्य स्तनवत् मांस का पिएड स्थित है तिसके मध्य प्राप्त है। छरु।"सेन्द्रमोनि:, यत्रासी केशान्तो विवर्तते व्यपोह्य शीर्ष कपाले"। : जहां यह केशोंका त्रन्त विभाग करके वर्त्तता है सस्तक के कपाल को सेदन करके सो इन्द्रयोनि है? अर्थात् जहां यह केश का अन्त कहिये सूल विभाग करके वर्त्तता है ऐसा जो मस्तक देश लिस देशको प्राप्त होके मस्तक के कपालको भेदन करके जो निकली है, सोसुषम्णा नाम्री नाड़ी इन्द्रयोनि है, अर्थात् इन्द्र जो ब्रहम तिसकी नामक मार्ग कहिये स्वरूप प्राप्तिका द्वार है। अरु तिसही नाड़ीसे.मनोमयरूप आत्मा का देखनेवाला विद्वान् मस्तक से निकलके।"भरित्यग्नौप्रतितिष्ठति, भुवइतिवा- यौ"। ६भूः इस अ्रप्रग्निविषे स्थित होता है, सुवर इस वायुविषे; अर्थात् इस लोकका अररधिष्ठाता जो सः इस व्याहतिरूप महत् ब्रह्माएड का अंगरूप अग्ति है तिस अरग्निविषे स्थित होताहै, अपर्थात् श्रग्निरूपसे इसलोकको पावता है। तरु तैसेही सुवर इस द्वितीय व्याहतिरूप वायु विषेस्थित होताहै॥१३।।इत्यनु० ५॥ ऋथ षष्टोडनुवाकः६॥ स्वरित्यादित्ये। मह इति ब्रह्मषि। प्रान्नोति स्वारा- ज्यमू। तराप्तोति मनसस्पतिमू। वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः। श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः। एतत्तदो भवति। तरराकाशशरीरं ब्रह्म। सत्यात्मप्राणारा मंम नत्रपानन्दम्। शान्तिसमृद्ध-

इति षष्टोऽनुवाकः। हे सौम्य,!।"स्व्ररित्यादित्ये, महइति ब्रह्मशि, आाम्मोतिस्वा- राज्यम,आप्तोतिमनसस्पतिम्"। स्वर् इस सूर्य्यंबिषे, महर् इस ब्रह्मबिषे, स्वाराज्यको पावताहै, मनके पति को पावताहै, नर्थात्

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शिक्षाध्याय प्रथमावली। ३५ सवर् इस तृतीय व्याहतिरूप सूर्य्यविषे स्थित होताहै। अपरु महर् इस अंगी (ब्रह्मस्वरूप) भूत चतुर्थ व्याहतिरूप ब्रह्मविषे स्थित होताहै। तिन विषे आात्मभावसे स्थितहोयके ब्रह्मभूत हुआप्र स्वा- राज्यको पावताहै, अर्थात् [स्वाराज्य जो है सो जगत्के स्नधटायने आदिकरूप निरंकुश ऐश्वर्यरूप नहीं होताहै, इसप्रकारकहते हैं] जैसे ब्रह्महै तैसे त्रंगभूत देवताओ्ोंका शर्प्रधिपति होता है, अरु सर्व देव अंगभूत हुथे जैसे ब्रह्मको वलिदेते हैं, तैसे इसके अपर्थ बलि- दान (भेट) देतेहैं।अरु इसप्रकार जाननवाला जो विद्वान् है सो मनकें पतिको पावताहै। अरु जिस करके ब्रह्म सर्वात्मा है अरत जिस करके सो सर्व मनकरके मननकरतेहैं, इसहीसे वो ब्रह्म सर्व मनोंका पतिहै तिसको विद्वान् पावताहै। चरु।"वाकूपतिश्चक्षु- ष्पतिः, श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः, एतचदो भवति"। ६वाखियों का पति, चक्षुओंका पति, श्रोत्रोंका पति शरु विज्ञानों (बुष्ियों)का पति होताहे, अर्थात् वह सर्वात्सा होनेसे सर्व प्राणियोंके करणों (इन्द्रियों) करके।'सम्पन्न होनेसे'। तिस इन्द्रियोंवाला होताहै किंवा [ताते भी यह अप्रत्यन्त पधिक होता है; अपर्थात्। ताते भी यह अरपगग्रिम कहने का ब्रह्मका विशेषस अत्यन्त अधिक होता है।प्र० सोक्याहै। तहां कह ते हैं। "आाकाशशरीरंव्रह्म, सत्यात्मप्राखारामं, मनआानन्दम्, शान्तिसमृद्धममृत"। : शरकाशशरीरवाला ब्रह्म, सत्यस्वरूपहै, प्राणगारामहै, मन आ्र्परानन्दहै, शान्ति समृद्धिहै,छमृ- त है,, अर्थात् प्राकाशहै शरीर जिसका वा आ्रकाशवत् सूक्ष्महै शरीर जिसका ऐसा जो यह आकाश शरीरवाला इस प्रसंगबिष प्रास्त हुआप्र ब्रह्म सो सत्यस्वरूप है। मूर्त अरु अममय सत्य है स्वरूप कहिये स्वभाव जिसका ऐसा जो यह ब्रह्म सो सत्वरूप कहतेहैं। अरु सो प्राणाराम ऐसा कहते हैं। वा प्रा ओों काहै शराराम (रमख) जिस विषे ऐसा जो ब्रह्म तिसको प्ासाराम कहते हैं। घरुसो मन आ्ररानन्दहै। अपर्थात् मनहे आ्रानन्दरूप सुखकारी जि- सको ऐसा जो ब्रह्मं तिलको मन आनन्द कहतेहैं। छरु सो शांति

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तैत्तिरीयोपनिषङ्। समृद्धिहै। जिस करके शांति अरु समृद्धिको पायाहुआप्रा सो ब्रह्म प्रास्त होता है एतदर्थ उसको शांति समृद्धि कहते हैं, वा शांति से समृद्धि कहिये विभूतिको पायाहुआ प्राप्तहोवे है अतएव उसको शान्ति समृद्धि कहतेहैं। अरु सो त्रमृतहै। अपर्थात् जिस करके सो ब्रह्म सरया धर्मसे रहितहै तिसही करके अमरहै। यहांजो अप्रत्यन्त ऋधिक यह विशेषसहै तहांही पूर्व वाक्यविषे उक्र मनोमय शरदि- क पुरुषके विशेषय देखलेने।"इति प्राचीनयोग्योपास्व, वांयाव- मृतमेकंच"ऐसे प्राचीनयोग्यउपासनाकर वायुविषे तपरु त्र्प्रमृत- रूप एकहै; अर्थात इसप्रकार मनोमयपने आदि धर्मोकरके वि- शिष्ट उक्र प्रकार का जो ब्रह्म है तिसको हे प्राचीनयोग्यशिष्य!तू उपासना कर। यह जो आररचार्य के वचनोंका कथनहै सो आादरार्थ है। वायुविषे शरु अपधृतरूप एक है॥१४ ॥ इति षष्ठोऽनुवाक:॥। ६॥ अथ सप्तमोडनुवाक:७। छथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोवान्तरदिशः । अर्प्रग्नि- र्वायुरादित्यश्चन्द्रमानक्षत्राणि। आप्रापश्र्रोषधयो वनस्प-

गोऽपानोव्यान उदान:समानः। चक्षुःश्रोत्रंमनोवाक्त्वकू। चर्म्समाछ सथ स्नावास्थिमज्जा। एतदधिविधाय ऋ- षिरवोचत्। पाङ्क वा इदथसर्व्वम्। पाङ्क्ेनैवपाड्क्र- 2ंस्पणोतीतिसर्वमेकञ्च॥ १५॥ इतिसप्तमोऽनुवाकः ॥ हे सौन्य!आागे का अनुवाक भी अन्य प्रकार से हिरएयगर्भ कीही उपासना को विषय करनेवाला है इसप्रकार कहते हैं जो यह उपासना करने योग्य व्याहतिरूप ब्रह्म कहा, तिसही का पृथिवी ादिक पांक कहिये पांच के समुदायरूप से उपासना कहते हैं। अरु जिसकरके पृथिवी आदिकही पांचसंख्याके योग से पंकि नामक छन्दका सम्पादनहोवेहै, अतएत पृथिवी आदिक सर्वको पांकपना है। अरु यज्ञ जो हैं सो पांकहैं।"पांको यज्ञ इति

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ३७ श्रुतेः"। इस श्रुति प्रमाससे। पांच पादजो है सो पंकिरूप है, तिस वाला जो वेदका कोई छन्दहै, तिसको भी पंकि कहते हैं। अपररु जिस करके यज्ञजो है सो 'पत्नी, यजमान, दैव,मानुष, अरु वित्त' इन पांच करके सम्पादन करते हैं। एतदर्थ पंक्तिछन्दके सादश्य के सम्पादन से यह पांक कहते हैं तिस हेतुकरके जो यह लोक से आादिलेके आ्र्प्रात्मा पर्य्यन्त जगत् है तिसको यज्ञ भावरूप पांक कल्पना करते हैं। तिस कल्पित यज्ञ करके पांकरूप प्रजापति को पावताहै॥ सो यह प्रथिवी आादिक पांक कैसे हैं। तहां कहते हैं।"परथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्िशोऽवान्तरदिशः, अ्रग्निर्वायुरादित्य- श्चन्द्रमा नक्षत्रासि, आपरपत्र्रोषधयो वनस्पतयः, त्रराकास आ्रप्रात्मा इत्यधिभूतम्"। पृथिवी अन्तरिक्ष स्वर्गलोकदिशा अरु आररावा- न्तर दिश, अग्निवायु सर्य चन्द्रमा अरु नक्षत्र, जल शषधियां वनस्पतियांत्र्प्रकाशश्रपररु आर्प्रात्मा यहत्ररधिभूत है, अर्थात्, पृथिवी तन्तरिक्ष, स्वर्गलोक, दिशा, आप्रवान्तरदिशा, इस प्रकारका यह लाकरूप पांक है।। अररु'अग्ति, वायु, सर्य, चद्रभा, अरुनक्षत्र' यह देवतारूप पांक है।। अरु 'जल, ओषधियां, वनस्पतियां, श्र्रा- काश, अरु आत्मा' यह भतरूप पांकहै। यहां आात्मा जो कहा सो विरादरूप हुये अ्रत्मा के अधिकार कहिये मुख्यता से है। इसप्रकार अधिभूतरूप पांककहा। यहां अ्रधिभूत जोहै सो तरप्रधि- लोक अरु अधिदैवतरूप, दोनों पांकों के उपलक्षणार्थ है, क्यों- कि यहां लोक पांक अरु देवपांक को कथन कियाहै ताते।"अथा- ध्यात्मम्, प्राणो,डपानो व्यान उंदान: समनः, चक्षुः श्रोत्रंमनों- वाक्त्वक, चर्म्ममाछसथस्नावास्थिमज्जा, एतदधिविधायऋषि- रवोचत्"। अब अध्यात्म कहते हैं, प्राण, पप्रपान, व्यान, उदान, समान, चक्षः, श्रोत्र, मन, वाकू, त्वचा, । चर्म्म, मांस, नाड़ी, स्थि, मज्जा। इस प्रकार कल्पना करके ऋषषि कहताहुआ, अर्थात् शरब इसके अनन्तर अध्यात्मरूप तीन पांक्रको कहते हैं। शए तपान व्यान उदान अरु समान, यह वायुरूप पांक है।

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३८ तैत्तिरीयोपनिषद्। ऋरु चक्षु भरोत मन वाकू रु त्वचा, यह इन्द्रियरूप पांक् है। ऋरु चर्म सांस नाड़ी अस्थि शरु मज्जा, यह धातुरूप पांक् है।। एतनाही यह सर्व अध्यात्मअ्रन्तरत्र्प्ररुवाह्यरूप जगत् पांक्रुपह्नी है, इसप्रकार कल्पनाकरके वेद वा तिसके ज्ञानकरके सम्पन्नकोर्ई एक ऋषिजोहै सो कहताहुआ। क्या कहताहुआ। तहां कहते है।"पांङ्ंक्रंवाइद'सर्वम्, पाङ्क्रेनवपांडक उस्पृणोतीति, सर्ई- मेकश्व"। प्रसिद्ध यह सर्व पांक है पांक्से ही पांकको पूर्ण करे है, सर्वए कहै? अर्थात् प्रसिद्ध यह सर्व पांकै, अध्यात्मरूपपांक से ही संख्याकी तुल्यतासे वाह पांकको पूर्ण करे हैं [ निकृष्ट बिषे उत्क्ृष्ट की दष्टि फलवाली है, इस न्यायसे वाहय पांकरूप से आध्यात्मिक तीनपांक जानने को योग्य हैं, इस अ्र्रभिप्रायसे कहते हैं] अर्थात् एकरूप करके जानताहै। अर्थ यह जो यह सर्व पांक है, इस प्रकार जो जानता है। सो प्रजापतिरूपही होता है।। सर्व एकहै॥ १५॥ इति सपसोऽनुवाक:॥७॥ अथाष्टमोऽनुवाक: ८॥ अमितिब्रह्म । 3मितीदथसर्व्चम्। मित्येत- दनकृतिर्हस्म वात्प्रप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति। अमि- तिसामानिगायन्ति।3थंशोमिति शस्त्राशिशछसन्ति। 3मित्यध्व्य्युः प्रतिगरं प्रतिगणाति। 3मितिव्रह्मा प्रसौति। 3मित्यग्निहोत्रमनुजानाति। 3मितिब्राह्म- राः प्रंवंक्ष्यन्नाह। ब्रह्मोयाप्नुवानीति ब्रह्मैवोपाप्नोति ॐदश ॥ १६ ॥ इत्यष्टमोऽनुवाक:॥ हे सौम्य![ उक्रन्पर्थकेत्ननुवादपूर्वक अरग्रिम अ्ररष्टम अरनुवा- कको प्रकट करते हैं ]उक्रप्रकार प्रथम व्याह तिरूप ब्रह्मोपासना कही। तदनन्तर पांकरूपसे ब्रह्मोपासना कही। [यहां यह तरर्थ है कि जिसकर के वेदवेत्ता पुरुषोंकी सर्व क्रिया ऊकारके उच्चारण

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ३६ पूंर्वकप्रवर्त्त होतीहै, क्योंकि तिस उकारदो शद्धासे ग्रहणा किया होनेसे, छरु तिसको त्यागके उपदेश किया ब्रह्मबुद्धि विषेश्ारूढ़ होता नहीं, एनदर्थ तिस ॐकारको लेके उपासना का निर्धार क- रते हैं ]त्रब सर्व उपासना के अंगभूत ॐकारकी उपासना कहते हैं। जिसकरके पर अरु तपन्न्रह्मकी दृ्ष्टिसे उपासनाकरते हैं,ऐसा जो ॐकार सो शब्दमात्र हे, तथापि सो पर अरु अपर ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन होताह। अपरुविष्णुकी प्रतिमावत् सो ॐकार पर- ब्रह्म अरु अपरव्रह्मका आश्रय (आलम्बन)है।"एतेनैवायतनेनै- कतरमन्त्रेतीति श्रुतेः"। इसही आ्रराश्रय करके दोनों मेंसे एककोपा- वताहे, इस श्रुति प्रमाणसे। अरतएव यह अकार पर अरु अपरपर ब्रह्म की प्राप्तिका साधन संभवे है। "3मितिब्रह्म, अमितीद सर्व्चम्"। 'ॐ इसप्रकार का ब्रह्महै, ॐ इसप्रकार का यह सव्वहै, अर्थात् इसप्रकारकाशब्दरूपब्रह्महै, इसप्रकारमनकरके उपास- नाकरे। तपररुंइस प्रकार का शब्द यह सर्वहै, अर्थात् शब्दरूपयह सर्व प्रपंच ॐकारसे व्यातहै।"तदथा शंकुना इति श्रुत्यन्तरात्"। सो जैसे शंकु करके,। इसअन्य श्रुतिके प्रमाणसे। अरु जो वाच्य है सो वाचकके आधीनहै, एतदर्थ यह सर्व ॐकारहै ऐसा कहते हैं अब अग्रिम कहनेका जो ग्रंथहै सो कार की स्तुत्यर्थ है,क्योंकि तिस ॐकार को उपास्पना है ताते।"3मित्येतदनुक्कतिरहेस्मवा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयंति"।ॐ इसप्रकारका अनुकरण है प्र- सिद्धहै, ॐइसप्रकार श्रवसकराओ्रो,अरवणकरावते हैं, अर्थात्ॐं इसप्रकारका यह अनुकरण है। अरुजाते अन्यकरके। "करोमिया- स्यामिवेति"1 कत्ताहों पावताहौं इस प्रकार किये कथनको श्रवण करके अन्यपुरुषको उऐरेसा अनुकरण करता है। अतएव ॐकार अनुकरणहै, यह उंकार का अनुकरसपना प्रसिद्धहै। अरु उइस प्रकार अ्रवसा कराओ, इस कथनको पायके पुरुष तिस 3कांर के उच्चारणापूर्वकभ्वसकरावते हैं।"3मिति सामानिगायन्ति.ॐ

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४० इसप्रकार सानकोगायनकरते हैं, ॐशोऐसे शास्त्रकथनकरेहैं, ॐइसप्रकार अध्वर्युप्रतिगर प्रतिउच्चारताहै, अर्थात् तैसेही साम- वेदके गानकरनेवाले ॐइसप्रकार सामको गायनकरते हैं, अरुजो ऋचाके कहनेवाले हैं सो 'ॐशो'इसप्रकार यानरहित ऋचाको कहते हैं, तैसेही तध्वर्यु 'यज्ञबिषे यजुर्वेदी ब्राह्मण ऋत्विज्'सों ऐसे प्रतिगर'वेदके वाक्य विशेषको' होम करनेवालेके कथनकथन के प्रति उच्चार करताहै,।"3मिति ब्रह्माप्रसौति, मित्यग्नि- होत्रमनुजानाति, मिति ब्राह्माः प्रवक्ष्यन्नाह। इ् ह्मोपाघवा- नीति ब्रह्मैवोपासुवन्ति।ॐदश"। ब्रह्मा ॐऐसा तरनुमोदन करता है,ॐऐसा अग्निहोत्र को अनुमोदन करताहै, ब्राह्मण ॐऐसेही कहनेको इच्छताहुआर ॐकहता है ब्रह्मको पावोंगा, ऐसे ब्रह्मको ही पावताहै वा ब्रह्मको प्राप्तहोतोंगा, उदश, अर्थात् ब्रह्मा यज्ञ कर्म का कर्त्ता वा यज्ञके दक्षिए भागमें तृष्णी बैठनेवाला ऋत्विज् विशेष, सो इसप्रकार अनुमोदन करताहै,अरु ॐ इसप्रकार ग्निहोत्र को अनुमोदन करे है, अर्थात् होताकरके।"जुहोमी- त्युक्र:"। हवन करता हौं इसप्रकार कथन कियेहुये, ॐऐसाही पनुमोदन करता है, अरु जो ब्राह्मणाहै सो ॐ ऐसेही कहने को इच्छताहुआ अध्ययन करताहुआ ऐसेही कहताहै, अर्थात् अध्ययन करनेको ॐ ऐसा ग्रहण करताहै। अरु ब्रह्मनामकवेद को पावोंगा, इसप्रकार इच्छताहुआ ब्रह्मको प्राप्त होताहै। तपरथ- वा ब्रह्मनामक परमात्मा को प्राप्तहोवोंगा, इसप्रकार पप्रात्माको प्रासहोनेको इच्छताहुआ ॐइसप्रकारही कहताहै। सो चैतन्य- रूप उकारसे ब्रह्मको पावताही है।। इसप्रकार ॐकारपूर्वक प्रवृत्तहुई क्रियाको फलवानूपना (साफल्यता) है, अतएव ॐकाररूप ब्रह्मकी उपासना करे, यह समस्त वाक्यों का तात्प- य्यार्थ है॥ ॐ दश ॥ १६ ॥ इत्यष्टमोऽनुवाकः ॥८॥

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शिक्षाध्याय प्रथमावली। ४१ थ नवमोऽनुवाक:६। ऋतञ्च स्वाध्यायप्रवचनेच। सत्यञ्चस्वाध्यायप्र- वचनेच। तपश्चस्वाध्यायप्रवचनेच। दमश्चस्वाध्याय प्रवचनेच। शमश्चस्वाध्यायंप्रवचनेच। अ्र्प्रग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचनेच। अरप्रग्निहोत्रञचस्वाध्यायप्रवचने च। उप्रतिथयश्चस्वाध्यायप्रवचनेच। मानुषश्चस्वा- ध्यायप्रवचनेच। प्रजाचस्वाध्यायप्रवचनेच। प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचनेच। प्रजातिश्चस्वाध्यायप्रवचनेच।स- त्यमितिसत्यव चाराथीतरः। तपइति तपोनित्य: पौरुशि- ष्टिः स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्रल्यः। तितप- स्तद्धितपः। प्रजाचस्वाध्यायप्रवचनेच षट्च।। १७॥ इति नवमोऽनुवाक:॥ हे सौम्य,। "विज्ञानादेवान्नोति स्व्राराज्यमिति"।विज्ञानसेही स्वाराज्य को प्राप्त होता है, इसप्रकार कथन कियाहै ताते भ्रौत (वेदोक्न) अरु स्मार्त (स्मृतिउक्र) रूप कर्म्मोका व्यर्थपना प्राप्त हुआ, एतदर्थ उनको व्यर्थपना मत प्रासहो, इसप्रकार कम्मोंके पुरुषार्थ प्रति साधन भावके देखावने के अर्थ यह अथ्रिम अनु- वाकरूप ग्रन्थका. प्रारम्भ है।।"ऋतन्च स्वाध्यायप्रवचनेच,स- त्यश्च स्वाध्यायप्रवचनेच, तपश्च स्वाध्यायप्रवचनेच, दमश्च स्वाध्यायप्रवचनेच, शमश्च स्वाध्यायप्रवचनेच"। ६ ऋत पुनः स्वाध्याय अरु प्रवचन, सत्य पुनः स्वाध्याय ु प्रवचन, तप पुनः स्वाध्याय अरु प्रवचन, दम पुनः स्वाध्याय ऋरु प्रतचन, शम पुनः स्वाध्याय अरु प्रवचन, अर्थात् 'ऋत' कहिये शास्रा- दिकों करके बुद्धिविषे निश्चित सक्ष्म अर्थका होना, तरु 'स्वा- ध्याय' कहिये वेदादि अध्ययनकरना, अरु 'प्रवचन' कहिये अध्य- यन करावना वा वेदाध्ययन ब्रह्मयज्ञ का करना, यह सर्वप्रकार

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४२ तैत्तिरीयोपनिषद्। पप्रनुष्ठान करने योग्यहै, क्योंकि।"स्वाध्यायप्रवचनाम्यां न प्रम- दितव्यम्"। ऐसा आागे कहेंगे ताते। ऋरु'सत्य' कहिये सत्यचोलना वा यथार्थ कथनकिया अर्थ इसको सत्य कहते हैं, अरु स्वाध्याय झरु प्रवचन यह अपरनुष्ठान करनेकी योग्यहै। ऋरु 'तप' कहिये कृच्छू चान्द्रायण पजापत्यादि व्रत अरु स्वाध्यायप्रवचन, यह करने योग्य हैं। तरु 'दम' बाह्य चक्षरादि इन्द्रियोंका विषयों से नि- ग्रह, अरु स्वाध्याय प्रवचन यह करने योग्यहैं। तरु'शम'कहिये मनका निग्रह, अरु स्वाध्याय श्र प्रवचन यह करने योग्य है। अर्थात् स्वाध्याय अरु प्रवचनका जो करना है सो उक्र प्रकारके 'ऋत' सत्य, तप, दम, शम, इन करके युक्ही कर्त्तव्य है, नतु मिथ्याचार है।"अ्ग्नयश्च स्व्राध्यायप्रंवचनेच, अग्निहोत्रश्च स्वाध्यायप्रवचनेच, तरप्रतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचनेच, मानुपञ्च स्वाध्यायप्रवचनेच, प्रजाच स्वाध्यायप्रवचनेच, प्रजनश्च स्व्रा- ध्यायप्रवचनेच, प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचनेच," अग्नि तरुस्वा- ध्यायप्रवचन, अग्निहोत्र शपरुस्वाध्यायप्रवचन, तरप्रतिथि शपररु स्वा-

प्रवचन, अरुप्रजन परु स्वाध्यायप्रवचन, प्रजाति अरुस्व्ाध्याय प्वचन, अर्थात् अग्निजो है सो धारएकरनेयोग्य है तपररु तिसके साथ हीस्वाध्याय त्र्प्ररुप्रवचन यहभी धारण करनेयोग्य है।अपरु अ्र्प्रग्निहो- न् हवनकरनेयोग्यहै तैसे तिसके साथही स्वाध्याय तपरुप्रवचन यह भी करने योग्यहैं। ऋरु त्रतिथि जोहै सो पूजन करने योग्यहै रु तिसके साथही स्वाध्याय अरु प्रवचन यह भी करने योग्यहै। =रु मानुष कहिये विवाहादिक जे लौकिक व्यवहार सो जैसे जैसे प्राप्त होवें तैसे तैसे तिनका करना योग्य है, छरु तिसके साथही स्वा- ध्याय औ प्रवचन यह भी करनेको योग्य है। तरु प्रजा जो है सो उत्पन्न करने योग्य है। अरु तिसके साथही स्वाध्याय अरु प्रवचन यह भी करनेको योग्य है अरु प्रजन, कहिये ऋतु- काल विषे यथा शास्र प्रमाण भार्यागमन कर्त्तव्ययोग्य है, अरु

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शिक्षाध्याय प्रथमांवल्ली। ४३ स्वाध्याय प्रवचन यह करनेवोग्य है। अरु प्रजाति, कहिये पौत्र की उत्पत्ति अर्थात् पौत्रोत्पत्ति होनेसे पुत्रको अपने स्थानापन्न स्थापित करना योग्य है, अरु स्वाध्याय प्रवचन भी साथही करनयोग्य है,।।।'अर्थात् जैसे स्वाध्याय प्रवचन उक् प्रकारके ऋतसत्य तपदम शमादि करके सहितही करनेको योग्यहै तैसेही ग्नि सेवन से प्रजाति पर्यन्त जो जो कार्थ करने को योग्य हैं सो सो उक्र प्रकारके स्वाध्याय प्रवचन करके युक्ही करनेको योग्यहैं'।। यहां इन सर्व कर्म्म करके युक्क पुरुषको भी स्वाध्याय रु प्रवचन यल्से अ्रनुध्ठान करनेयोग्य है, अर्थात् गृहस्थ पुरुष को भी स्वाध्यार्य प्रेवचन के करने विषे प्रमाद कदापि कर्ततव्य नहीं। 'इसप्रयोजनको लेके सर्व कम्मोंके साथ स्वाध्यायं ऋरु प वचनका ग्रहणहै'। अरु स्वाध्यायके आ्रधीन अर्थका ज्ञानहै, तरु अर्थ ज्ञानके आाधीन परमश्नेय है। अस प्रवचन जो है सो तिसके विस्मरण न होनेके अर्थ है, वा धम्मकी वृद्धिके अर्थ है। एतदर्थ स्वाध्याय अरु प्रवचनविषे शदर करना योग्यही है। "सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः, तप इति तंपोनित्यः पौरुशिष्टिः, स्वाध्याय प्रवचने एवेति नाको मौद्ल्यः, तद्दितपस्तद्वितपः।प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च षंदू चग : सत्यही ऐले सत्य वचन नाम वाला राथीतर, अरु तपही ऐसे तपोनित्य नानवाला, पोरुशिष्ट, अपरु स्वाध्याय श्ररु प्रवचनही नाक नामवाला मौहल्य (मानते हैं) सोई तपहै, प्रजा तरु स्त्ाध्याय अरु प्रवचन अरु षट्, अ- र्थात् सत्यही अनुधान करने को योग्यहै, इसप्रकार सत्यवचन नामवाला रथीतर नामक कुलका गोत्र कहिये मूलपुरुष ऐसा जो राथीतर त्रचार्य मानता है। अरु तपही कर्त्तव्यहै, इसप्रकार तपोनित्य इस नामवाला पुरुशिष्टका पुत्र पोरुशिष्ट प्रचार्य सा- नता है।अरु स्वाध्याय अरु प्रवचनही अनुष्ठान करनेको योग्यहै, इसंप्रकार नाक नामवाला मुद्ल ऋषिका पुत्र मौहल्य आचार्य मानता है। जाते सोई स्वाध्याय अरु प्रवचन तपहै, सोई तप

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:४४ तैत्तिरीयोपनिषद्। है, ताते सो अनुषठान करनेको योग्यहै। पूर्व कथन किये भी 'सत्य' तप, स्वाध्याय शररु प्रवचनका जो पुनःग्रहसाहै सो आदरार्थ है।। पजा अरु स्वाध्याय शवचन रु षट् यह अनुष्ठानकरने को योग्यही है॥ १७॥ इति नवमोऽनुवाकः ॥ ६॥ छपथ दशमोऽनुवाक: १०॥ तहं वक्षस्य रेरिवा कीर्तिः एष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्वप- वित्रो वाजिनीव स्वमतमस्मि। द्रविराछं सुवर्चसम्। सुमेधा तररम्ृतोऽक्षितः इति। त्रिशङ्गोर्वेदानुवचनम्। ऋहथवर्ट्॥ १८ ॥। इति दशमोऽनुवाकः॥ हे सौम्य, [।"अहं वृक्षस्यरेरिवा" मैं वृक्षका प्रेरकहूं, इसमंत्र का त्रिशंकु्षिहै, पंक्रिछंद है, परमात्मा देवताहै, ब्रह्मविद्याकी प्राप्त्यर्थ इसके जपका विनियोग है ] मैं वृक्षका प्रेरक हौं, इस मंत्र का जो उपदेशहै सो स्वाध्याय कहिये जपके अर्थ है, छरु स्वाध्याय जो है सो प्रकरणसे विद्याकी उत्पत्तिके अर्थ है। अरु यह प्रकरख विद्याके अर्थ है अन्यके अर्थ नहीं, अतएव स्वाध्याय करके शुद्ध हुये अन्तःकरण वाले पुरुषको विद्याकी उत्पत्ति कल्पना करते हैं अ- र्थात् कहते हैं।"अहंवृक्षस्य रेरिवा कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव, ऊर्ध्वप- वित्रों वाजिनीव स्वमृतमस्मि"। ममैं वृक्षका प्रेरकहौं मेरी पर्वतके पृष्ठवत् कीतिहै 'ऊध्वपवित्रहौं सूर्यवत्शुद्ध त्रप्रमृतहौं, अर्थात् मैं उ- चछेदरूप संसार वृक्षका अन्तर्यामीरुपसे प्रेरकहौं, अरु मेरी पर्वत के पृष्ठ(शिखर) वत् कीर्ति उठी है, तरु मैं ऊर्ध्व पवित्रहौं अर्थात् ।' जिस मु सर्वात्मा का ऊर्ध्व कहिये कारण पवित्र ज्ञानस्वरूप परमात्मा है'।।"नहि ज्ञानेन सदशंपवित्रमिहविद्यते"।।'इसस्मृति प्रमासे। अपरतएव मैं ऊर्ध्व पवित्र हौं त्ररु मैं सूर्य्यवत् शुद्ध त्र्प्र- सृतरूपहौं, अर्थात् जैसे अनेक श्रुति स्मृतियोंके प्रमाण से सूर्य्य विषे शुद्ध त्रमृतरूप आ्र्प्रत्मतत्त्व है तैसे मैं शुद्ध अ्र्मृतमय आ्र्प्रात्म. तत्वहौं। शरु।"द्रविशाधसुवर्चसम्, सुमेधा अमृतोऽक्षितः इति"

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ४५ ६प्रकाशवान् धनहौं वा प्रकाशवाज्ञा धन मुभको प्राप्तहुआ है, सुमेधा हौं तमृतहौं श्रक्षीण हौं; अर्थात् मैं सर्व लक्षणावाली शो- भन है मेधा (बुद्धि) जिसकी ऐसा सुमेधाहौं, संसारकी उत्पति स्थिति अरु संहार करनेरूप कुशलताके योगसे मुझको सुमेधा- पना है, इसही करके मरसधर्म वर्जित अमृतरूप हाँ, अरु प्- क्षीण कहिये अव्यय क्षरभाव रहित वा अमरता युक् में हौं। इत्यादि ब्राह्मणा भागहै।"त्रिशंकोर्वेदानुवचनम्, अहथ षंदू"। ऐसा त्रिशंकु का वेदानुवचन है, मैं षट्रूप हौं ? अर्थात् इसप्रकार ब्रह्मभृत ब्रह्मवेत्ता त्रिशंकु नाम ऋषिकां वेदानुवंचन है।'वेद जो आरत्माकी एकता का विज्ञान तिसकी प्राप्त्यर्थ जो वचन तिसको वेदानुवचन कहते हैं'। अरु अपने को कृतकृत्य- ताकी प्रसिद्धि के अर्थ वामदेव ऋषिवत् त्रिशंकुऋषि ने ऋषि उक्क ज्ञानसे मन्त्रका आ्र्प्राम्नाय कहिये आरत्मविद्या कोश देखा है, यह अर्थ है।। तरु इस मन्त्रका जो जप /'बारम्बार मनन' करना है सो आत्मविद्या की उत्पत्ति के तर्थ जाना जाता है। अरु [केवल इस मन्त्रका जपही विद्याके अपर्थहै ऐसा नहीं किन्तु पूर्वोक कर्म्मभी विद्याके अर्थ है, ऐसा कहते हैं] 'ऋतु' इत्यादि नवम अनुचाक विषे कर्मके कहने के प्रारम्भसे लेके वेदातु वचन पर्यन्त पठन करने से यह जानाजाताहै कि ऐसे श्रौत स्मार्तरूप नित्यकर्मों विषे युक्रहुये निष्काम ऋरु परब्रह्मके जानने की इच्छा वाले पुरुषों को आात्मात्र्प्रादिकोंको विषय करनेवाले ऋषिउक्रज्ञान प्रकट होताहै॥ मैं षटरूपहौं॥ १८॥ इति दशमोऽनुधाकः॥१०॥ थ एकादशोऽनुवाक: ११॥ वेदमनूच्या चार्य्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यंवद। धर्म्मन्चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। ऋचार्यायप्रियंध- नमाहृत्य प्रजातंतुं माव्यवच्छेत्सीः ।संत्यान्न प्रमदि- तव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम कुशलान्न प्रमदितव्यम्।

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४६ तैत्तिरीयोपनिषद्। भृत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रम- दितव्यम॥ १६॥

के उपदेशका त्र्रंभ जोहै सो व्रह्मज्ञानहोनेसे पूर्व श्रत तरुस्मार्न- रूप कर्म्म नियमसे करने योग्य हैं, इस नियमके। 'लखावने। अर्थहै,क्योंकित्नुशासन(शिक्षा) करनेकीश्तिकोपुरुपकेसंस्कार- रूप अपर्थवाली होने से। तरु संस्कार करके युक्र शुद्ध चित्तवाले पुरुषको अ्रनायाससेही आात्मज्ञान उत्पन्न होताहै। तहां।"तपसा कल्मषंहन्ति विद्ययामृतमश्नुतइतिस्मृतिः"।तपकरके पापकोनाश करे हैं, विद्याकरके अमृत को पावता है, इस स्सृति प्रमाससे। ऋपररु यहां भी आरपरागे भृगुषल्ली विषे कहेंगे कि।"तपसा व्रह्म विजि- ज्ञासस्वति "। तपकरके न्रह्मको जान, इस वाक्य करके। ताते विद्याकी उत्पत्ति के अर्थ कर्मानुष्ठान करने योग्य है। अरु।"तर- नुशास्तीति"। शिक्षा करताहै, इसप्रकार 'अनुशासन' इस।'श्रुति वाक्यके'। हुये अनुशासन (शिक्षा) के उह्लंघन किये दोषोत्पत्ति होतीहै, क्योंकि केवल ब्रह्मविद्या के आरम्भसे पूर्व कर्मों के छा- रम्भसे तरु विद्या के उत्पन्न होनेसे।"तभयं प्रतिष्ठां विन्दते"। ।"नविभेति कृतश्चनेति"।।"किमहं साधुना करवमिति"।त्प्रभय स्थिति को पावता है, किसी से भी भयको पावता नहीं, क्या मैं शुभ कर्म्मको न करताहुआ, इत्यादि श्रुति वाक्यों करके जाते कर्म्म की निरपेक्षता त्रागे देखावेंगे, अतएव जानाजाता है कि केवल ब्रह्मिद्याकी उत्पत्ति से पूर्व पप्रारम्भ किये जो कर्म्महैं सो पूर्व संचय हुये पापके नाशद्वारा विद्याकी उत्पत्त्यर्थ है। क्योंकि ।"अ्रविद्यया मृत्युंतीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुतइति"त्रप्रविद्या(कर्म) से मृत्युको तरके विद्या (आत्मज्ञान) से शमृत को पावता है। यह ऋग्वेद का। 'वा यजुर्वेदका'। मन्त्र भी विद्योत्पत्ति से पूर्व ही कर्मानुष्ठान को सूचन करे है। पूर्व ऋत आदिक के उपदेश

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ४७ कियेकी व्यर्थताके निवारणार्थ कर्मानुष्ठान कहा, अरु यहां तो ज्ञानकी उत्पत्तिरूप अप्रर्थवाला होनेसे करनेकी योग्यता के नि- यमार्थ कर्मका अनुध्ठान कहते हैं। [अध्ययन किये वेदके अर्थका विचार किये विना गुरुके गह से ।'निवृत्त होय'। लौटना नहीं, किन्तु अध्ययनकी विधिको अर्थज्ञानद्वारा पुरुषार्थके त््रवधिपनेकी सिद्धयर्थ त्र्प्रक्षर ग्रहसके अनन्तर अर्थ के ज्ञानबिषे प्रयल्न करना योग्य है इसप्रकार कहते हैं। ।"वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिन- मनुशास्ति"। :वेद को पढ़ायके आाचार्य्य शिष्यके अर्थं शिक्षा करे हैं; अर्थात् वेदको पढ़ाय के आचार्य्य जो है सो अपने शि- ज्योंके पपर्थ ग्रन्थके धारणकिये पश्चात् शिक्षा करे है, अर्थात् तिस ।' पढ़ाये हुये वेद'। के अर्थ को ग्रहण करावे है। एतदर्थ जाना जाता है कि वेदाध्ययनवाले पुरुषको धर्म्म की जिज्ञासा न कर- के गुरुके गृहसे लौटना नहीं, क्योंकि।"बुद्धवा कर्म्मार चार- भेदिति स्पृतेश्च "। जानके कम्मों को त्र्प्रारम्भ करे, इस स्मृतिके प्रमाणसे॥ प्र० आचार्य कैसे शिक्षा करे है। उ० तहां कहते हैं, आप्राचार्य कहता है कि हे शिष्यो।"सत्यं वद, धर्म्मंचर"। :सत्य बोल अरु धर्माचरय कर3 अर्थात् सत्य 'प्रमाणके अ्रनुसार जानेहुये अर्थका कथनकर' तैसेही धर्म को आचरण कर। यहां जो धर्म शब्द है सो अनुष्ठान करने योग्य साधनों का तुल्यवा- चकहै, कयोंकि सत्यादिकोंकी विलक्षणताका कथनहै ताते, अरु ।"स्व्राध्यायान्सा प्रमदः, आचार्य्यार्य प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्त माव्यवच्छेत्सीः"। ६स्वाध्याय से प्रमाद मतकर, तरप्राचार्य के अर्थ प्रिय धन देके प्रजाका उच्छेदमतकरे, अर्थात् स्वाध्याय कहिये अपने वेदके अरध्ययन से प्रमाद मत करे, अरु आचार्य के अर्थ उनको प्रियधन देके।अर्थात्म्म्ाचार्य को जो वाञ्छित धनहै सो अपने पास न होय तो वो धन अन्यसे ल्याय कै आचार्य को देवे'। तदनन्तर आचार्य की आाज्ञा पायके। ब्रह्मचर्यसे समावर्नन पूर्व- क'।त्रपने। 'जाति कुलके'। समानस्त्रीसे विवाहकरके। प्रजोत्पादन

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8= तेत्तिरीयोपनिषद्। करें।प्रजाकाउच्छेद मतकरे।यहांअररभिप्रायय हहै कि पुत्र केश्र्प्रनुत्पन्न हुयेभी पुत्रोत्पत्तिके अप्र्थ।'दशरथादिवत् पुत्रेष्टित्ररादिक'। कामुकादि कमोंसे तिसकी उत्पत्तिके अपर्थ प्रयत् कर्तव्य है। क्योंकि प्रजा अ्जनन 'ऋतुकालविषे भार्यागमन' अरु प्रजाति 'पौत्रोत्पत्ति' इनतीनके उपदेश का साम्यअरपर्थ है ताते।अरु अन्यथा होता तो "प्रजनन" इस एकही को श्रुति कहती। ऋरु जिसकरके उक्र तीनों का श्रुतिविषे कथन कियाहै एतदर्थ इस कथनका उक्र अप्रभिप्राय घटितही है। परु।"सत्यान्न प्रमदितव्यम्, धर्म्मान्न प्रमदितव्यम्, कुशलान्न प्रमदितव्यम्, भूत्यै न प्रमदितव्यम्, स्व्राध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्"। ६सत्यसे प्रमाद क- रना योग्य नहीं, ध्म्मसे प्रमाद करना योग्य नहीं, कुशलसे प्र- माद करना योग्य नहीं, विभूतिके अर्थ प्रमाद करना योग्य नहीं, स्वाध्याय शरु प्रवचनसे प्रमाद करना योग्य नहीं, अपर्थांत् सत्यसे प्रमाद करनेको योग्य नहीं है, सत्यसे जो प्रमाद है सो भूठ का प्रसंग है क्योंकि प्रमाद शब्दका सामर्थ्य।असत्यविषे। है ताते एतदर्थ विस्मृति।'भूल'से भी रप्रसत्य करना योग्यनहीं यह अर्थहै। 'अन्यथा सत्यकेकथनका निषेधही होवेगा'। तरु।"समूलो वा एष परिशुष्यतियोऽृतमभिवदति"।'इस अ्न्यश्रुतिके प्रमाण से जो मिथ्याभाषण करताहै सो समूल सूखजा ता है।अतएव सत्यसे प्रमादकरना योग्य नहीं'। रु धर्म्मस प्रमादकरनेको योग्य नहीं, क्योंकिधर्मशब्द अ्ररनुष्ठानकरनेयोग्य साधनोंको विषय करनेवाला है। ताते अपररु साधनोंके त्र्प्रनुष्ठानकाश्र्परभाव प्रमादहै सो करनेयोग्य नहीं किंतु। 'साधनों का।््रनुष्ठान करनाही योग्यहै। अरु कुशल क- हिये अपने रक्षणरूप अर्थवाले कमोंसे प्रमादकरना योग्य नहीं। अररु विभूतिकहिये ऐश्वर्य तिसके अर्थ अर्थात् विभूतिरूप अर्थ वाले मङ्गलयुक्त कमोंसे प्रमादकर्तव्य योग्य नहीं। रु स्वाध्याय छरु प्रवचन इनसे भी प्रमाद कर्तव्य योग्य नहीं, किंतु यहदोनों नियमसे कर्तव्य योग्य ही है॥ १६ ॥

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ४६ देवपितृकार्य्याभ्यां न प्रमदितव्यस्। मातृदेवोभव। पितृदेवोभव। आचार्य्यदेवोभव। त्र्रतिथिदेवोभव। यान्यनवद्यानि कर्माि तानि सेवितव्यानि। नो इतरा- रिा।यान्यस्माकछसुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि॥ २॥ हे सौम्य,।"देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्"। ददेवपितृ- योंके काय्योंसे प्रमाद करना योग्य नहीं, अर्थात् देव अरु पितृ- के सम्वन्धी।'यज्ञश्राद्धादि'। कर्सकर्त्तव्यही हैं, उनसे प्रमाद करना योग्य नहीं।।' हेप्रियदर्शन'।"मातृदेवोभव, पितृदेवोभव,र्प्रा चार्यदेवोभव, तरप्रतिथिदेवोभव"। मातृदेवहो, पितृदेवहो, आरप्रा- चार्यदेव हो, ततिथिदेवहो; अर्थात् हेशिष्य तू माताहै देव जिस का ऐसा मातृदेव हो, अरु पिता है देव जिसका ऐसा पितृदेव हो, अरु आचार्य है देव जिसका ऐसा आचार्यदेव हो, शरु तति- थि है देव जिसका ऐसा तरतिथिदेव हो,। अर्थ यह जो माता से अतिथि,पर्यन्त कहे जे चार सो। 'शिवादि'। देवतावत् उपासनीय है।अतएव तू उक्र चारोंको देवतावत् मानके उनकी उपासना कर'।, "अरुं यान्यनवद्यानि कम्माशि तानि सेवितव्यानि, नो इतरामि, यान्यस्माकथंसुचरितानि, तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराि" :जो अनिन्दित कर्म्म हैं सो सेवन करने, योग्य हैं, इतर नहीं, अरु जो हमारे श्रेष्ट आचरण हैं सोई तुभकरके उपा- सना करने योग्य हैं, इतर नहीं, अर्थात् जो शन्थ शिष्टाचाररूप पनिंदित कर्म हैं सो तुभ करके सेवन करनेको योग्य हैं, अरु अन्य जे निंदित कर्म हैं सो यदि श्रेष्ठ पुरुषों करके किये हुये भी हैं, तथापि सो सेवन करनेको योग्य नहीं। त्रु जो हम आ्राचा- य्योंके वेदसे अविरुद्ध श्रेष्ठ आचरणहैं सोई तुभ करके उपासना करनेको योग्य हैं, अर्थात् जो वेदसे अविरुद्ध श्रेष्ट आाचरण हैं सो परुएयंकी उत्पत्ति के अर्थ नियमसे सेवने योग्य हैं। परु श्रेष्ट

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५0 से अन्य त्र्प्रश्रेष्ठ यदि तरप्राचार्य करकेभी सेवन किये हैं तथापि सो विपरीताचरण तुभ करके सेवन करने योग्य नहीं ॥२० ॥ एके चास्मच्छेयाछ, सो ब्राह्मणाः। तेषांत्वयासनेनप्र- श्वसितव्यम। श्रच्यादेयम्। ्श्रच्नयाऽदेयम्। श्रिया देयमू। हियादेयम्। मियादेयम्।संविदादेयम्। प्रथयदि ते कर्म्मविचिकित्सावाळत्तविचित्सावास्यात्॥२१॥ हे सौभ्य,।"एके चास्मच्छेयाछसो ब्राह्मणाः, तेपां त्वयाSS- सनेन प्रश्वसितव्यम्"। ६ कईएक हम सो अ्रत्यन्त श्रेष्ट ब्राह्मण EEVE tho हैं तिनका आसनके देनेसे तुझ करके श्रमका निवारण करने को योग्य है, अर्थात् जो कईएक आचार्य्यपने आादिक धम्मों करके विलक्षणता को प्राप्तहुये हम सो अत्यन्त श्रेष्ठ ब्राह्मणा हैं, क्षत्रिय आदिक नहीं। अरथात हे सौम्य आ्रचार्यपने श्रादिक उत्तम धर्म्मों करके विलक्षणता को प्राप्तहुये क्षत्रियों को श्रेष्ठपना है, परन्तु तत्यन्त श्रेष्ठपना तो उक्रप्रकार धर्म्माविष्ट ब्राह्मणको ही है सो क्षत्रिय को नहीं'। तिनका शरासन देने त्रादिक सेवासे तुभ- करके अरमका निवारण करना योग्यही है।' तरथांत् हे सौम्य जो कदापि आाचार्य कृपाकर के शिष्यके गृह पगधारे तो तिनके मार्ग- जन्य श्रमके निवारणार्थ शिष्यकरके तपर्ध पाद्य प्रक्षालन शासन देने आदि सेवा का करना सर्वदा उचितहीहै।' अथवा तिनकी वात्ताके निमित्तरूप आ्ररासनके सिद्धहुये श्रमका निवारण भी करने योग्य नहीं, किन्तु केवल उनके वाक्यके अर्थके सार कहिये लक्ष्य के गाही होना चाहिये, किम्वा जोकुछ देना होवे सो।"श्रद्टयादेयम्, पश्रद्धयाऽदेयम्, श्रिया देयम्, हियादेयम्, भियादेयम्, संवि- दादेयम्"। अद्ा से देना, तश्रद्धासे न देना, लक्ष्मी से देना, लज्जा से देना, भयसे देना, संविदासे देना, अर्थात् आचार्य को वा अन्य ब्राह्मसादिकों को जो कुछ देना सो श्रद्धासेही देना योग्य है।' क्योंकि श्रद्धासे किया दान फलके तर्थ होताहै ताते'।

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ५१ अरु अश्रद्धासे देनायोग्य नहीं।क्योंकि अपरश्नद्वासे दियादान फल के अर्थ होवे नहीं ताते' अरुलक्ष्मीसे देना योग्य।अर्थात् अरपने पास जो धनहै तो धन गऊभूमि त्रन्न आदिक ब्राह्ममादिकोंको दान

अपने दातापनेरूप अपभिमानसे लज्जाकरकेही करे क्योंकि अभि- मान तरप्रासुरीसम्पदा अ्ररश्रेष्ठहै ताते।तपरुभयसे देनायोग्यहै।अर्थांत् दानके न देनेसे संसारमें कृपणतारूप प्रपकीर्ततका अरुपुनर्जन्म में दरिद्रीहोनेके भयकरके भी दान देनायोग्यहै क्योंकि मुख्यकरके दानरूप धम्मही मनुष्यका कल्याणकारी है ताते'। अपरुसंविदाकहि- ये मित्रादिक तिनके कार्यमें देना योग्यहै।अर्थात् मित्र उपलक्षण करकेमित्र वा सम्बंधीजे निर्धन हैं तिनकेशुभाशुभकार्य्योंमें,धनकी पुनरावृत्तिकरने की इच्छात्याग के धनकादेना योग्य है'। तपरु ।"अथ यदि ते कर्म्म विचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात"। अथवा जब तुभको कर्म्मविषे संशयहोय वा आ्र्प्राचरणविषे संशय होय;अर्थात् तुभको इसप्रकार वर्त्तमानहोते जब कदाचित् श्रौत वा स्मार्च कर्म्मविषे वा आ्रप्राचरणविषे संशय होवै। २१॥ ये तत्र ब्राह्मयाः सम्मर्शिनः। युक्का श्प्रयुक्का: अरलू- क्षा धर्म्मकामा: स्युः।यथा ते तन्र वर्त्तेश्न्। तथा तन्र वर्तेथाः। अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मार्शि- नः युक्का अयुक्काः। अलूक्षा' धर्म्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरनू। तथातेषु वर्तेथाः। एषत्रादेशः। एषउप- देशः। एषा वेदोपनिषद् एतदनुशासनम्। एवमुपा- सितव्यम। एवसुचैतदुपास्यम् ॥ स्वाध्यायप्रवचनाम्यां न प्रमदितव्यम्। तानि त्वयोपास्यानि। विचिकित्सा वा स्यात्तेषु वर्त्तेरन् सप्तच॥२२।। इत्येकादशोडनुवाक:।। हे सौम्य,।"येतत्र ब्राह्मणाः सम्मर्िनः, युक्रा तयुक्रा,अलूक्षा

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५२ तैत्तिरीयोपनिषद्। धर्म्मकामा: स्युः यथा ते तत्र वर्चेरन् तथा तत्र वर्त्तेथाः"।जो तिस विषे विचारमें समर्थ, छान्यकार्यविषेलगे, अक्रूरवुद्टिवाले धर्म्मके अर्थी ब्राह्मण होवें वो जैसे तिस विषे वर्तमानहोवें तैसे तू भी तहां वर्त्तमान हो, अर्थात् तब जो तिस देशविषे वा कालविषे विचारमें समर्थ तरु कर्मविषे वा आचरणविपे जुड़े रु अन्य कार्यबिषे लगे स्वतन्त्र तरु। 'बुद्धिकी क्रूरता से रहित'।त्पररक्रर वुद्टि वाले धर्म्म वा पुंसायके अर्थी घरु भोगोंकी कामनासे रहित जो ब्राह्मण होवें वो जिस प्रकार तिन क्म्मोंविपे वा त्रपराचरणों विषे वर्तमानहोनें,तैसे तू भी तहां वर्त्तमान हो। अरु।"अथाभ्याख्या- तेषु, ये तत्र ब्राह्मणा: सम्मर्शिन: युक्रा परयुक्का परलूक्षा धर्म्म- कामा: स्युः, यथा ते तेषु वर्तेरन्, तथा तेषु वत्तेथाः"। संशयरहित दोषकरके युक्न तिनविषे जो तहां विचारमें समर्थ तन्य कांय्यों में लगे तक्रूर वुद्धिवाले धर्म्मके तपर्थी न्राह्मणाहोवें सो जैसे तिन विषे वर्त्तमान होवें तैसे तिनविषे वर्त्तमानहो; अपर्थात् किसी भी संशय रहित, ञरु आारोपित दोषकरके युक्र जो पुरुष हैं तिनों विषे जो तहां विचारमें समर्थ, तरु कर्म्सवा त्रराचरण विषेलगे छरु।'बुद्धिके क्रूरतादि दोषरहित'। त्रक्रूर वुद्धिवाले, ऋपरु धर्म्म वा पुरायके अर्थी जो ब्राह्म होवें वो जिसप्रकार तिनकर्म्मोविषे वा अन्य आचरमों'। बिपे वर्तमान होनें, तैसे तूं भी।'तिनचिषे। वर्समान हो।र्थात् पूर्वके भन्त्रके त्रन्तविषे कहा है कि जो कदाचित्तुभको श्रौतवा स्मार्नत कम्मोविषेवा तर्प्राचर शोंबिषे संशय होवे, तिस कथन से यहां इस मन्त्रके यहां पर्य्यन्त सम्बंध है कि जो तुझको शरौत वा स्मार्न कम्मोविषे वा अन्य आाचरणों विषे संशय होय तो उक्र प्रकारके ब्राह्मणा उनकर्म्म वा आ्र्रचरणोंविषे वर्ततते होवें तैसे तू भी तिनविषे वर्तमानहो'।। तरु।"एष प््रा- देशः, एष उपदेश:, एषावेदोपनिषद्, एतदनुशासनम्, एवमु- पासितव्यम, एवमुचैतदुपास्यम्"।यह आदेश है, यह उपदेश है,यह वेदका रहस्य है, यही अ्रनुशासनहै. ऐसे करनेको योग्य

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्नी। ५३ है, ऐसे प्रसिद्ध करनेको योग्य है, अर्थांत यह त्र्प्रादेश कहिये विधि- the the he gho है, अरु यही पुत्रादिकों को उपदेशहै, अरु यही वेद का सूक्ष्मर- हस्य वेदार्थ है, अरुयहही ईश्वर की तरज्ञारूप अ्नुशासन(शिक्षा) है, वा आप्रादेश वाक्यरूपा विधि को कथन किया होनेसे यह सर्क प्रमासरूप वाक्यों का अपरनुशासन है, एतदर्थ उक्रप्नकार का यह सर्व करनेको योग्य है, ऐसे प्रसिद्ध सर्व करने योग्यहै। यहां पुनः जो कथन है सो. यह सर्व करने को अयोग्य नहीं, इस आदरके अर्थ है।।।"स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्, तानि त्वयो: पास्यानि, विचिकित्सा वा स्यात्तेषु वर्त्तेरेन् सतच"। ्वाध्याय, छरु प्रवचनसे प्रमाद करना योग्य नहीं, वे तुभकरके करनेयोग्य हैं वा संशय होय, तिनविषे वर्त्तमानहोवे,सस्, ।। २२।। इति- एकादशोऽनुवाक:॥ ११॥ प्रथ द्वादशोडनुवाक: १२॥ शन्नो मित्रः शं वरुणः। शन्ोभवत्यय्यमा। शन्न इन्द्रो बृहस्पतिः। शत्रो विष्णुरुरुंक्रमः। नमोब्रह्मयो। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादि- षम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्क्वारमावीत्। श्र्प्रावीन्माम्। शर्प्रावीद्क्कारम्। सत्यम- वादिषं पञ्चच। ॐशान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥२३॥ हे सौम्य, अब कथन की हुई विद्या की प्राप्तिविषे विध्नों के निवारसार्थ शान्तिपाठ कहते हैं।"शत्नो मित्रः, शं वरुणः, शन्नो भवत्यर्यमा, शन्र इन्द्रो वृहस्पतिः, शन्नो विष्णुरुरुकमः"।मित्र हमको सुखकारीहो, वरुण हमको सुखकारी हो, अर्यमा हमको सुखकारी हो, इन्द्र हमको सुखकारी हो, बृहस्पति हमको सुख- कारी हो, विष्ण हमको सुखकारी हो, अर्थात् प्राण का अरु दिवस का अभिमानी जो मिन्रनामक देवता सो हमको सुख-

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५४ तौत्तिरीयोपनिषद्। कारीहो शरु वरुणा जो है सो भी हमको सुखकारी हो। अरु तै- सेही सूर्य्याभिमानी जो अर्थमा सोहमको सुखकारीहो। तैसेही इन्द्र छरु बृहस्पति हमको सुखकारीहो। तरु तैसेही उरुक्रम कहिये प्रथम वामन होयके पश्चात् विश्वरूप होनेवाला, ऐसा जो विष्णु सो हमको प्रसन्न हो।।"नमो ब्रह्मणे, नमस्ते वायो, त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि, त्वामेव प्रत्यक्षं व्रह्मावादिषम्। ऋ- तमवादिषम्। सत्यमवादिषम् "1 ्रह्मको नमस्कार करता हौं, वायु को नमस्कार करता हौं, तूही प्रत्यक्ष ब्रह्म है, तु- भही को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहताहौं, ऋत कहताहौं, सत्य कहताहौं, र्थात् ब्रह्मके त्र्थ मैं नमस्कार करता हौं, हे वायो! तेरे अर्थ मैं नमस्कार करताहौं, तपररु जिसकरके तू प्रत्यक्ष त्रह्म है, एतदर्थही मैं तुझको प्रत्यक्ष ब्रह्म कहताहौं, ऋत कहताहौं, तरु सत्य क- हताहौं,।।"तन्मामावीत्, तद्क्रारमांवीत्, उप्रावीन्माम्, त्ररावी- द्क्कारम्,"। सो सुझको रक्षाकरो, सो वक्राको रक्षाकरो, मु- भको रक्षाकरो, वक्राको रक्षाकरो,अर्थात् सो प्रत्यक्ष त्रपरन्रह्म वायु सुझ अपराविद्या के अर्थी को रक्षाकरो, परु तिस विद्या के वक्ना शचार्य को रक्षाकरो, मुझको रक्षाकरो, चक्राको रक्षाक्रो सत्यमवादिषम्, पश्चच। ॐशान्तिः शान्तिः शान्तिः 'सत्य कहताहौं अरु पांच,ॐशान्ति हो, शान्ति हो, शान्तिहो॥२३॥ शन्न: शिक्षाथं। सहनौ। यश्चन्दसां भूः । सयः प्टथिव्योमित्यृतञ्चाहं वेदमनूच्य । शन्नो द्ादश ॥ शन्नोमह इत्यादित्यो। नो इतरांणि। त्रयोविथं शतिः॥ हरिः अ। शन्नो वक्कारम्॥ २४॥ इतिदादशोऽनुवाकः॥ इति शिक्षाध्यायः प्रथमावल्ली १॥ हे सौम्य,।"शन्न: शिक्षाछ, सह नौ, यश्छन्दसां भूः सयः षृथिव्योमित्यृतश्चाहं वेदमनूच्य, शत्रो द्वादश"। 'हमको, सुख,

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ५-५: शिक्षा को, हमको, साथही, जो वेदके मध्य पृथ्वी, सो जो पृ- थिवीॐ, ऐसे ऋत अरु मैं वेदको पढ़ायके द्वादश तनुवांक ह- मको सुख,।"शन्नो मह इत्यादित्यो, नो इतराशि; त्रयोवियं शतिः हरिः ॐ, शन्नो वक्रारम्"। 'हमको सुख महर ऐसा सर्थ्य है, अरन्य नहीं। तेईस मन्त्र हैं हरि: ॐ। हमको सुख, वक्ा को सुख ॥ हे सौम्य ! त्र्प्रव यहां विद्या अपररु कर्मके भिन्न भिन्न फलके ल- खावनेके अपर्थ विचार कहते हैं, तहां प्रथम पांच विकल्प दिखावते हैं, सो यहहैं कि 'क्या केवल कर्मसही परमश्रेय होवैहै' वा विद्या की अपेक्षावाले कर्मसे परमश्नेय होवै है, तथवा विद्या तरु कर्म के समुच्चय सेवन करनेसे परमश्रेय होवै है, किंवा कर्मकी प्रपेक्षा -

वाली विद्यासे परमश्रेय होवै है, वा केवल विद्यासेही परमश्रेय होवे, यह ५ विकल्प हैं। तहां केवल कर्मसेही परमश्रेय होताहै, ऐसा प्रथम पक्षवादी कहते हैं क्योंकि समस्त वेदार्थ के जानने वाले पुरुषकों ही कर्मका अधिकारहै ताते। तरु "सरहस्यो दवि- जन्मनेति स्मरणात्" तीनवर्सक पुरुषोंकरके रहस्य सहित स- मस्तवेद त्रध्ययन करनेको योग्यहै, इस स्मृतिका प्रमाएकरके सम्पूर्ण वेदका अध्ययन जो है, सोउपनिषद् के अर्थ ऋपरु आत्मज्ञा- न कर के सहितही होताहै। तरु।"विद्वान्यजते।विद्वान्याजयति" विद्वान् यजन करता है, विद्वान् यजन करावताहै, इस प्रकार श्रुति प्रमाण करके विद्वान्कोही कर्मोविषे अधिकार देखाजाता है। अरु सर्व ठिकाने जानके ही अनुष्ठान होता है। अतएव समस्त वेद कर्मके अर्थहीहै, इसप्रकार कोईएक 'प्रथम विकल्प- वादी' मानते हैं, अरु कहते हैं कि जो कदापि कम्मोंसे परम श्रेय प्राप्त न होवे तो समस्तवेद व्यर्थ होवेगा["भतभव्यायोप- दिश्यत" उक्र अर्थ जो है सो अग्रिम कथन करनेके अर्थ उप- देश करते हैं, इस न्यायसे, ज्ञानको भी कर्म कर्त्ताका: संस्कार होनेकरके कर्म विधिका साधन है ताते'अरु श्रवएकिये फल.

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५६ तैत्तिरीयोपनिषद। को भी अर्थवाद मात्रपना ही है ताते, अतएव कर्मसेही परमश्रेय मोक्ष होवे है, यह 'केवल कर्नसेही मोक्ष होवे है' ऐसा पूर्वविकल्प वादियोंका पूर्वपक्ष है, तहां अरव सिद्धान्त कहते हैं] सो प्रथम पक्षवादी का कथन बने नहीं, क्योंकि मोक्ष नित्यहै ताते। तरप्ररु जिसकरके मोक्षको नित्यअ्रंगीकार करते हैं, अरु लोकविषे कर्मों के कार्योंको अप्रनित्यपना प्रसिद्ध ही है, एतदर्थ जवकमोंकरकेही मोक्ष होता होवे तो सो भी अनित्य होवेगा, सो इष्टनहीं॥ तरुजो ऐसाकहै कि काम्यअरु निषिद्धइनउभयक्मोंके तप्रनारंभसे, छरु प्रारब्ध कर्मके भोगद्वाराक्षय होनेसे, अरु नित्य विहित कर्मकेतप्रनु- ष्ठान करनेसे पाप कमोंके तप्रसंभव से, ज्ञानकी अपेक्षासे रहितही केवल कर्म करके मोक्ष है। [ यद्यपि तध्ययनरूप विधिकाविषय हुआ सर्व वेदों का अर्थ एकही पुरुषकर के विचार करनेयोग्य है, तथा- पि अध्ययन विधिबिषे प्रतिवाक्य का पढ़ावना उपररु प्रतिवाक्यके तपर्थका जो विचार है, सो व्यापार के भेदसे तिस २ कर्मके किये फलकी कामनावाले पुरुष को कर्मविषे उपयोगी वाक्योंके अर्थ के ज्ञानवान् होनेमात्र करके कर्मविषे अपधिकारके असंभवसे, अरु ब्रह्मसाक्षत्कार जो है तिसका उन कर्मविषे अनुपयोग है ताते, समस्त वेदार्थ के जाननेवाले पुरुषको कर्मके अधिकार विषे प्र माए नहीं। अर्थात् जिस पुरुषको स्वर्गादिकजिसवस्तु की का. मना होती है सो तिसफल के साधक कर्म विषे उपयोगी वेदमंत्र के अर्थको जानताहै,अरुवेदाध्ययनके साथ वेदान्तर जेब्रह्मसाक्षात्- कार बोधक वाक्य तिनोंकाभी अध्ययंन होताहै, परन्तु उनवाक्यों का कम्मों में उपयोग नहीं ताते उन वाक्यार्थज्ञान को जानते नहीं, अरु जो समस्त वेद वेदार्थ के जाननेवाला पुरुष है तिस -कोही कर्म विषे अधिकार है ऐसा कोई प्रमांष नहीं'। इसप्रकार कहते हैं ] सो क़थन बने नहीं। क्योंकि।'सश्चित कम्मों में से जो कर्म अरपना फल देनेको प्रारब्धरूपसे प्रवृत्तहुये तिनसे ' शेष (वाकी सश्चित कर्म रहनेका संभवहै, तरु उन शेष कर्म्मों के

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निमित्तवाली जो अन्य शरीरोंकी उत्पत्ति सो प्राप्तहोती है। अरु शेष।'संचित'। कर्मोका नित्यकर्मों से अविरोध है। 'क्योंकि नित्य कर्म्मही करने के पश्चात् सच्चितभाव को प्राप्त होता है। ताते नित्य कर्मके त्र्प्रनुष्ठान से शेष कर्मोका नाश होना त्रसंभ वहै'। इस प्रकार पूर्व कहा। पपरु सर्व वेदार्थ के ज्ञानवाले पुरुष को कर्म के अधिकार से केवल कर्मसे ही मोक्षहोगा, इत्यादिक जो कहा सो [यधपि अध्ययन विधिकी प्रेरणासेहुआ्रा जो वेदान्तका, विचार सो भी गुरुके गहविषे ही किया है, तथापि समस्त वेदार्थके जा- नने वाले पुरुष को तिसका अधिकार नहीं, क्योंकि उपासना करके साध्य जो ब्रह्म साक्षात्कार सो भिन्न है ताते, इस प्रकार कहते हैं। यहां यह अरथहै कि गुरुके गृह बिषे श्रव किये तपरु विचार किये वाक्यसे प्रप्रनुष्ठान विषे उपयोगी जो ज्ञानहोता है तितनेही ज्ञानमात्र करके कर्म विषे अधिकार को पावता है, परन्तु सो ज्ञान ब्रह्म साक्षात्काररूप फलवाली उपासना की पपेक्षा करता नहीं क्योंकि उपासना से उसके भेदका पभाव है ताते ] वने नहीं, क्योंकि उपासनाको श्रवण जन्य ज्ञानसे भिन्नता है ताते। अरु श्रवण ज्ञानमात्र से कर्म्मविषे शधिकार को पावता है, उपासना की अपेक्षा करता नहीं। अरु उपासना जो है, जो श्रवण किये तर्थ के ज्ञानसे अन्य अर्थरूप विधान करते हैं। अरु मोक्ष रूप जो फल है सो अन्य अपर्थ रूप प्रसिद्ध होता है। अरु ।"श्रोतव्यो"। श्रवण करनेयोग्य है,इस कथनकरके, ताते सिन्न ।"मन्तव्यो, निदिध्यासितव्यो"। मनन करने योग्यहै, निदिध्या- सन करने योग्य है, इस प्रकार अन्य प्रयत्न के विधान से मनन तरु निदिध्यासन करनेको श्रवण ज्ञानसे अन्य अर्थपना प्रसिद्ध है।। [केवल कर्म मोक्षका साधन है, इस प्रथम पक्षका निषेध करके. अपरव 'विद्या सहित कर्म मोक्षका साधन है' इस द्वितीय विकल्परूप पक्षका निषेध करते हैं ] अरु जब इस प्रकारहै,तब विद्याकी अपक्षावाले कर्मों से मोक्ष होवेगा, अरु विद्या सहित

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५८ तैत्तिरीयोपनिपद्। 1 कम्मोंको अन्य कार्य के आरंभ का सामर्थ्य होवेगा। जैसे स्वरूप सेही मरसा अरु ज्वर आदिक कार्य के आरम्भ करने के सामर्थ्य वाले हुयेभी विष ऋरु दधि। 'अर्थात् संखियादि विषका सरणरूप कार्यको, अरु दधिको ज्वररूप कार्यको, आरंभ करनेकासा सामर्थ्य स्वरूपसे ही है'। तिनको मन्त्र शरु शर्करा त्रदिकों करके स- हितहुये अन्यकार्य के आरंभ का सामर्थ्य है। इसप्रकार विद्यास- हित कर्मोंसे सोक्षरूप फल वा कार्य आ्रंभ करते हैं, इसप्रकार जो कहे, तो सो भी बने नहीं। क्योंकि पारंभ करीहुई वस्तु को ञनित्यता होती है ताते, अरु यह दोष पूर्व कह आाये हैं।। त्र्प्ररु जो कहे वचनसे आरंभ करने योग्य भीनित्यहीं है[।"नस पु- नरावर्चते"। सो पुनः आवृत्तिको पात्ता नहीं, इस वचनसे श्रा- रंभ किया भी मोक्ष नित्यहै, इसप्रकार कहने को शक्य नहीं है, क्योंकि प्रसिद्ध पदार्थकी योग्यताको लेके वचनको सम्बन्ध का ज्ञापकपनाहै ताते, अरु आरंभ करीहुई वस्तुको नित्य होने की योग्यता प्रसिद्ध नहीं है, अन्यथावचनको कारकताका प्रसंग है ताते, छरु अंधपुरुष मणिको पावताहुआ, इत्यादिक वारक्योंविषे भी योग्यताकी कल्पना का प्रसंग है ताते, इसप्रकार कहते हैं] सो बने नहीं, क्योंकि वचनको ज्ञापकता है ताते,। शरु वचन जो है सो विद्यमान अर्थका ज्ञापकहै परन्तु विद्यमान तर्थ का कर्त्ता नहीं। ऋरु शतशः वचनों करके भी नित्य वस्तुका आरंभ नहीं करते वा आरंस करी वस्तु अविनाशी नहीं होती है, इसहेतु से मिश्रितहुये विद्या शरु कर्मको मोक्षका आरंभकपना निषेध किया जानना । अरु जो कहे कि विद्या ऋरु कर्स जो हैं सो मोक्षविषे प्रतिबन्धके हेतु जे अविद्या अधम्सादिक तिनके निवर्त्तक हैं, सो भी बने नहीं क्योंकि कर्म के फल अन्य देखेजाते हैं ताते। तरु 'उत्पत्ति' संस्कार, विकार, अरु परत्तिरूप कर्म का फल देखते हैं ।'अर्थात् कर्मका जो फलहै सो उत्पत्ति संस्कार प्राप्ति, तरु वि- कारवा लाही होताहै'शरु सोक्ष जो है सो उत्पत्ति आरदिक रूप

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। कर्म्मके फलों से विलक्षसहै वा विपरीत है एतदर्थ सो कर््म का फलहै नहीं। अरु जो कहे कि।"सर्य्यद्वारेणतयोर्मायन्निति" सूर्यरूप द्वारकरके तिस सुषम्णानाड़ी करके ऊपरको जाता हुआ, इत्यादिक गमन प्रतिपादक श्रुतियों के प्रमाससे ब्रह्मांडके बाह्य प्राप्त होने योग्य मोक्ष है, सो भी बने नहीं क्योंकि ब्रह्म सर्वगत हैं ताते, अरु गमन करनेवाले पुरुषसे अभिन्नहै ताते। अरु जिस करके आकाशादिकोंका कारण होनेसे ब्रह्म सर्वगंत है अरु ब्रह्म से अभिन्न सर्वजीवहै, ततएव ब्रह्मांडके बाहिर जायके प्रातहोने योग्य मोक्ष नहीं। अरु गमन करनेवाले को अपने आपसे इतर विशेष करकें भिन्न देशही गमन करने योग्य होताहै।अर्थात् जो गमन करताहै सो अपने स्वरूपसे भिन्न देशकोही करताहै'। अरु जो जिससे अभिन्नहै सो तिससेही प्राप्तहोवे नहीं।'अर्थात्आ्रात्मा से ब्रह्म अभिन्न है ताते आत्माकरके ब्रह्म प्रात्त होवे नहीं क्योंकि आत्माका तो स्वरूंपही ब्रह्म है। यह अरनन्यभाव की प्रसिद्धि हैं। अरु "तत्सृष्ट्वातदेवानुप्राविशत्" तिसको सृजके तिसके अर्थही पीछे प्रवेश करताहुआ,। तररु "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्वि"क्षेत्रज्ञ भी मुझको जान,। इत्यादि सैकड़ोंश्रुतिस्मृतियों करके ब्रह्मंडसे बाह्य प्राप्त होने योग्य मोक्ष नहीं है। अरु जो कदापि ऐसा कहो कि उक्रप्रकार होनेसे गति रु ऐश्वयर्यादिकोंकी प्रतिपादकश्षुतियोंसे विरोघहोवे है, तो मोक्षब्रह्मांडसेवाहर प्राप्तहोने को योग्य है, यहगति प्रतिपादक श्रुतियोंका तात्पर्यहोता है।अर्ात्।"तयोईग मायन्न मृतत्वमेति"। इत्यादि जे मार्ग प्रतिपादक श्रुतियां हैं सो योगी- जनोंको सुषुम्णा नाड़ी द्वारा कपाल भेदनकरके ब्रह्मलोक प्राप्ति की बोधकहैं। अरुजोक़हे कि सो मोक्ष जब एकप्रकारका होय तब ।"पितृलोककामो भवति,स्त्रीमिवा यानैवा"। पितृलोककी कामना वाला होताहै, स्त्रियोंकरके वा वाहनों करके इत्यादि, श्रुतियोंका कोप होवेगा, सो बने नहीं क्योंकि उन श्रुतियों को कार्य ब्रह्म (हिरएयगर्भ वा) को विषय करनेवालीपनाहै ताते शरु कार्य दह

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६० तैत्तिरीयोपनिषद्। विषे स्त्री यानादिक होते हैं कारण ब्रह्मविषे नहीं। तरु।"एकमेवा द्वितीयं, यत् नान्यत्पश्यति, तत्केन कम्पश्येदित्यादि" एकही ऋद्वितीय है,। जहां अन्यको नहीं देखता है,। तहां किस करके किसको देखे,। इत्यादि प्रनेक श्रुतियोंसे विरोध होता है। छतदर्थ विद्या तरु कर्म्मके समुच्चय का पप्रसम्भव है। अरु कर्त्ता आदिक कारकों के भेदसे रहित तत्वको विषय करनेवाली जो विद्या है सो तिससे (अपने विषयसे) विपरीत कारकों करके साध्य कम्मोंसे विरोधको पावती है। तरु एकही वस्तु परमार्थ से कर्त्ता आदिक भेदवाली है, अरु तिससे रहित है, ऐसे उभय प्रकार से देखने को शक्य नहीं है। उन दोनोंमें से एक अवश्य ही मिथ्या होवेगा, शरु दोनोंमें से एकके मिथ्यापनेके प्रसंग के हुये जो स्वाभाविक तर्रज्ञानके त्र्प्राधीन द्वैतका मिथ्यापना है सो युक्कही होवेगा। क्योंकि "यत्र हि द्वैतमिव भवति, मृत्योः समृ- त्युमाम्तोति, अथ यत्रान्यत् पश्यति तदल्पम्, अन्योऽसावन्यो- हमस्मि उदरभन्तरं कुरुते तथ तस्य भयं भवति, इत्यादि" जहां ही द्वैतवत् होता है। सो मृत्युसे मृत्युको पावता है। तररु जहां अन्यको देखता है सो अल्प है। यह अन्य है मैं तन्यहूं। जो छल्पभी अ्रपन्तर (भेद) को करता है, पीछे तिसको भय होता है,। इत्यादिक सैकड़ों श्रुतियों से। अरु एकता का सत्यपना है, क्योंकि "एकघैवानुद्रष्टव्यं, एकमेवाद्वितीयम्, न्रह्मैवेद थ सर्व- भातमैवेद थ सर्वभित्यादि"एक प्रकार सेही देखनेको योग्य है, एकही ऋद्वितीय है, त्रह्मही यह सर्व है, आरात्माही यह सर्वहै,। इत्यादि श्रुतियों से। अरु संप्रदानादिक कारक भेदके त्रप्रदर्शन होने से कर्म संभवे नहीं, अरु विद्याके विषयिषे त्रन्य भावकी . दृष्टिका निषेध सहस्रशः श्रवणा करते हैं। एतदर्थ विद्या तरु कर्म का विरोध है, अरु इसही हेतु से उनके ससुच्चयका तसंभव है। अरु तहां जो कहा कि मिले हुये कर्म अरु विद्यासे। अर्थात् कर्म इरु विद्याके समुचचयसे'। नोक्ष होवे है, सो तघटित है, क्योंकि

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शिक्षाध्यायं प्रथमावंल्ली। ६१ [जब कर्त्ता आादिककारकों के भेदके सत्यतापने रूप अ्रप्रंशका वाध ब्रह्मज्ञान उपदेश करे है, तब उनको मिथ्याञर्थवाले होने से कम्मोंकी विधियोंकी अप्माणता होवेगी, इसप्रकार कहते हैं। इस शंकाके वर्णनका यहभाव है कि अध्ययन की विधि से ग्रहस करी श्रुतियों को पुरुषार्थ के उपदेशकी करनेवाली होने करके प्रमाणपना कहनेको योग्य है] कर्मों को विधान किया है ताते। तरु जो ऐसा कहे कि श्रुति का विरोध होवेगा, सो युक्र नहीं है, काहेते, जब सर्पादिकों की भ्रान्ति ज्ञानके नाशकं रज्जु आरादिकों को विषयकरनेवालेज्ञानवत् कर्त्तात्र्प्रादिक कारक भेदको नाश करके आरात्माकी एकताका ज्ञान विधानकिया है, तव कर्म विधि की श्रुतियों को निर्विषयहोने से विरोध प्राप्तहोय। जिस करके कर्म विधान किये हैं याहीते सो विरोध युक् नहीं है। अरुं जो ऐसा कहे कि श्रुतिको प्रमाशरूप होने से तिनका परस्पर विरोध है। अर्थात् एक श्रुति तो कहती है कि "कुर्व्वन्ने वेह क- मर्माशि" विहित क्म्मों को करे,।अरु एक श्रुति कहती है कि "न कर्मणा" कर्म से मोक्ष नहीं,। अरु श्चुति दोनोंही प्रमाण हैं ताते प्रमाण भूत श्रुतियों में परस्पर विरोध है' सो कथन बने नहीं, क्योंकि श्रुतियों को पुरुषार्थ के उपदेशकी परायणाता है ताते। तरु जिसकरके "संसारात्पुरुषो मोक्षयितव्य इति" पुरुष संसार से मोक्ष करनेको योग्य है,। यह जो विद्या के उपदेश के परायण श्रुति है, सो प्रथम संसार की हेतु जो अ्रविद्या तिसकी निवृत्ति करनेको योग्य है। इसप्रकार विद्याकी प्रकाशक होने कर- के प्रवृत्ति हुई है, एतदर्थ उनश्रुतियों का परस्पर विरोध नहीं है। अरु जो कहे कि उक्रप्रकार हुये भी कर्त्ता आदिक कारकों के स- द्वाव प्रतिपादन के परायण जो शास्त्रहै, सो विरोधको पावताही है, सो यह कथनभी बने नहीं, क्योंकि शास्त्र जो है सो मुमुक्षुओं को पूर्व सिद्धही कारकोंके सज्भावकों लेके सश्चितपापोंके क्षयार्थ कर्म्मो को विधान करता है,अरु फलकेअर्थी पुरुषों के अर्थ फल

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६२ तैत्तिरीयोपनिषद्। के साधनोंको विधान करताहै, परन्तु कारक के सद्भाव कहने विपे प्रवृत्त होतानहीं, याते सो विरोधको प्राप्त होतानहीं। अरु्सच्चित पांपरूप प्रतिबन्धके होतेहुये विद्या की उत्पत्ति होती नहीं, जव सश्चित पापरूप प्रतिवन्ध क्षयहोताहै तव विद्याकी उत्पत्ति होती है, अरु तिस विद्या की उत्पत्ति से अविद्या की निवृत्ति होती है, तब तिस करके संसार की आात्यन्तिक निवृत्ति होतीहै। किंवा त्रात्मदर्शी पुरुष को अनात्म पदार्थों को विपय करने वाली कामना होती नहीं, अरु कामना वाला पुरुप जो है सो कम्मों को करता है, तिसको तिसके फल भोगार्थ शरीरादिकों का ग्र- हणरूप संसार होताहै। तरु तिस कामनावाजे पुरुष से भिन्न आ. त्माकी एकताके दर्शीको विषय के अभावसे कामनाकी अरनुत्पत्ति होती है। रु आत्माचिषे अरभिन्न होने से अरु कामनाके असंभव से स्वस्वरूपविषे स्थितिरूपमोक्ष होवे है, पतदर्थ भी विद्या कारु कर्मों का विरोध है। अरु विरोधसेही विद्या जो है सो मोक्षके प्रति कर्मोंकी अपेक्षा करती नहीं, परन्तु नित्यकर्म जो है सो स्वस्वरूपके लाभहुये पूर्वसश्चितपापरूप प्रतिबन्धके नाशद्वारा विद्याकी हेतु- ताको प्राप्त होवेहैं।'अर्थात् प्रथम विहितकर्म करनेसे सश्चितपापों के क्षय हुये विद्याकी उत्पत्ति होतीहै अतएव विहितकर्म्मो को विद्या की उत्पत्ति में हेतुता है'। अरु इसहीसे इसप्रकरण विषे कम्मोंके कहने का आ्र्प्रारम्भकियाहै, इसप्रकार हमकहते हैं। ऐसेहुथे कर्मविधि की श्रुतियों का पुरुषार्थके उपदेशके परायण श्रुतियोंसे प्ररविरोध है, याते केवल विद्याही से परमश्रेयहोवेहै यह सिद्धहुआर। अरु जो कहै कि जबऐसेही हैतव अन्यच्र्पाश्रमोंका अपरसम्भवहावेगा, क्योंकि विद्याकीउत्पत्ति कर्म्मरूप निमित्तवालीहै ताते, तपरु कर्म्मजो हैंसो गृहस्थाश्रमविषे विधान किये हैं। इसप्रकार एक गृहस्थाश्रमही अ्रनुष्ठान करनेको योग्य है। तरपरु 'यावत्जीवे तावत् कर्मको करे' इत्यादिक कर्म्मे प्रतिपादक श्रुतियां अरत्यन्त अनुकूल होवेंगी, सो बने नहीं क्योंकि कर्म्मोको श्नेक रूपताहै ताते, अरु अग्निहोत्रा-

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शिक्षाध्याय प्रथमावल्ली। ६३ दिकही कर्म्म हैं ऐसा नहीं किन्तु विद्याकी उत्पत्ति विषे त्रत्यन्त साधक परु अन्य आश्रमविषे प्रसिद्ध जे ब्रह्मचर्य तप सत्यभाषण शम दम अहिंसादिक हैं, शरु ध्यान धारखादिकहैं, सो भी कर्म है, क्योंकि सो हिंसा आदिक निषिद्ध कमोंसे पमिश्रित हैं ताते। इसप्रकार यहां भी आागे कहेंगे "तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व्रेति" तपकरके ब्रह्मको जान, इस वाक्यकरके।अपरु गृहस्थाश्रमसे पूर्व भी जन्मान्तरविषे किये कम्मोंसे विद्याकी उत्पत्तिका सम्भव है ताते, अरु गृहस्थाश्रमकीप्राप्तिको कर्मकेश्र्प्र्थ होनेसे कर्मकरके साध्य विद्याके हुये ग्रृहस्थाश्रमकी प्राप्ति व्यर्थही है। तपरु पुत्रादिकों को लोकार्थ होनेसे पुत्रादिकों करकेसाध्य यहलोक तपररु पितृलोका- दिक लोकोंसे निवृत्तहुईहै कामनाजिसकी, तररु नित्यसिद्धत्र्प्रात्मा के ज्ञानकंरकेयुक अरु कर्म्मोविषे प्रयोजनके न देखनेवाले पुरुष की प्रवृत्तिकैसे सम्भवे किन्तु सर्वथा संभवे नहीं। किन्तुग्रहस्था- श्रम को प्राप्तहुये त्रप्ररुविद्याकी उत्पत्तिकेहुये श्र्प्रविद्याकी निवृत्तिसे विरक्रहुये शपरु कम्मौविषे प्रयोजनको न देखनेवाले ऐसे पुरुषोंकी क्म्मो से निवृत्तिहोवेहै क्योंकि "पवर्त्तयिष्यन् वाश्रपरेऽहमस्मात् स्थानादस्मीति" अरे मैं निश्चय करके इस स्थान से प्रवृत्ति करावता हुआ्रा हौं, इत्यादिक श्रुतिउक्र लिंग के देखने से। अरु जो कहे कि कर्मकी प्रति श्रुति से अधिकयत्रूप कर्मविषे बड़ाश्रम है क्योंकि अग्निहोत्रादिकों को त्रनेक सांधनों करके साध्यता है ताते, अपरु तपब्रह्मचर्य्यादिक अन्य आाश्रमके कम्मों को गृहस्था- श्रमविषे भी तुल्यता है ताते, शरु अन्य आाश्रमको तपरल्पसाधनों की अपेक्षाहै ताते, तिस गृहस्थाश्रम का विकल्प अन्य त्राश्रमी पुरुषों से तुल्यवत् युक्र नहींहै, सो कथन बने नहीं, क्योंकि जन्मा- न्तर विषे सम्पादन किये. तप्नुग्रहसे "कर्म्मणिश्रुतेरधिकोयल" कर्मविषेश्रुतिका अप्धिकयतहै,। इत्यादिक जो कहा, यहदोषनहीं है अरु जन्मान्तर विषे किये भी अग्निहोत्रादि अरु ब्रह्मचर्य्यादि रूप कर्म्म विद्याकी उत्पत्ति के प्रति पनुग्रहका करनेवाला होता

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६४ तैत्तिरीयोपनिषड़। है। तपररु कईक पुरुषों को जन्मसेही विरक्र देखतेहैं, अरु कई कों को कसोविषे प्रवृत्त अरु विरक्त न हुये विद्याके द्वेपी देखतेहैं, ताते जन्मान्तर के किये।'शमदमादि कर्मोंके'।संस्कारों से चिरक्रहुये -- पुरुषों के अर्थ अन्य त्राश्रमकी प्राप्तिही अरंगीकार करतेहैं। अरु कर्मों के फलकी बाहुल्यता से 'पुत्र' स्वर्ग, अरु ब्रह्मतेजादिरूप कम्मोंके फलको असंख्यातं होने से, अरु सो पुरुष पुरुष के प्रति कामना की बाहुल्यतासे तिनके अर्थ श्रुतिका कर्मोविपे अधिक यक्ष सम्भवे है। अपररु मुझ्को यहहोवे मुझको यह, ऐसे कामना की बाहुल्यता के देखनेसे अरु तिनका उपायरूप होनेसे कर्मजो हैं, सो विद्याके प्रति उपायरूपहैं इसप्रकार हम कहतेहैं। एतदर्थ उपाय विषे तप्रधिक यत् करने योग्य है, उपेय (उपाय करके प्राप्य) विषे नहीं। तरु जो ऐसा कहै कि विद्याको कर्मरूप निमि- तवाली होनेसे अन्य यत्की व्यर्थताहै, क्योंकि कम्मोंसेही सर्व सश्चित पापरूप प्रतिवन्धके क्षयहोनेसे विद्या उत्पन्नहोतीहै, याते कम्मोंस भिन्न उपनिषदोंका श्रवसादि यंत्र व्यर्थहै, सो कहना बने नहीं क्योंकि इसप्रकारके नियम का अभावहै ताते। तपररु प्रतिबंध के क्षय हुयेही विद्या उत्पन्न होवे नहीं, अरु ईश्वर की प्रसन्नता से रु ध्यानादिकों के अप्रनुष्ठान से विद्या उत्पन्न होवेहै, ऐसा भी नियम नहींहै, क्योंकि त्रहिंसा अरु ब्रह्मचर्य्यादिकोंको विद्या के प्रति उपकार कपना है ताते, तरु श्रव मनन निदिध्या- सनको विद्याके साक्षात्हीकारण होनेसे। इसकरके अन्यन्रश्रम सिद्धहुये, इरु सर्वको विद्याबिषे तप्रधिकार सिद्धहुत्र्प्रा, श्परु परम- श्रेय (मोक्ष·) केवल विद्या सेही सिद्ध होवे है यह भी सिद्ध हुआ॥ २४ ॥ इति द्वादशोनुवाकः॥१२॥ इतिश्रीतैत्तिरीयो पनिषद्गतशिक्षा वल्लीनामकप्रथ माध्याय FANM

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हरिः ॐ। सहनाववतु। सहनौ भुनक्तु। सह वीर्य्य करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु। माविद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।१॥ ॐ. ब्रह्मविदानोत्ति परम्। तदेषाडभ्युक्का। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायां। परमेव्यो मन्। सोडश्नुते सर्व्वान कामानू। सहब्राह्मणा विपश्चि- तेति। तस्माद्वा एतस्मादात्मन आ्रकाशः सम्भतः। पकाशादायुः। वायोरग्निः । अग्नेरापः । शरद्धयः प्थिवी। प्थिव्या श्रपोषधयः। श्र्प्रोषधीभ्योऽन्रम्। ग्रन्रनंा- द्रेतः। रेतसःपुरुषः।स वा एष पुरुषोऽन्रसमयः। तस्ये- दमेव शिरः। अयं दक्षिण: पक्षः।अयमुत्तर: पक्षः। नय- मात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येषश्लोकोभवति १।२५ इति प्रथमोडनुवाक: ॥। ऋप्रथ तैत्तिरीयोपनिषद्गतब्रह्मानन्दवल्लीनामक द्वितीयाध्यायभाषाभाष्यं प्रारभ्यते॥ हे सौम्य!पूर्व उक्कविद्याकी उत्कर्षताके प्रतिबन्धकी निधृत्ति के अर्थ शान्ति पठन किया, अब अगरिम कहने की ब्रह्मविद्याकी प्रात्ति विषे विध्नोंकी निवृत्ति के अर्थ प्रथम शान्तिपाठ करते हैं ।"सहनावंवतु,सहनौ सुनक्तु, सहवीर्य्यं करवावहै"। 'सोई परमे- श्वर हमको रक्षणकरो, सोई हमको भोगावो, सोई सामर्थ्यको सम्पादन करो; अर्थात्।' जो सर्वात्मरूपसे सर्वत्र सुशोभितहै'। सोई परमेश्वर हम शिष्य अरु आचार्य की सम्यक् प्रकार रक्षा करो, अरु सोई परमात्मा हम शिष्य अरु आचार्य को।' सत्या- दिकनसे'। पालन करो, अरुसोई। 'सर्व शक्िमान्'। हमकोविद्या रूप निमित्तवाले सामर्थ्य को सम्पादन करो।"तेजस्विनामधीत-

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६६ तैत्तिरीयोपनिषद्। मस्तु, सा विद्विपावहै"। :तेजस्वी हुये हमारा अध्ययन तेजस्व्री होवो, हम परस्पर द्वेषको मत प्राप्त होवें अर्थात् तेजस्त्री हुये हमारा अध्ययन तेजस्वी (त्रर्थज्ञानके योग्य) होवे, तररु विद्या ग्रहण के निमित्त शिष्य वा आ्र्प्राचार्थ के किये प्रमाद के ान्यायसे प्राप्तहुआ्प्रा जो द्वेष तिसकी निवृत्तिके अर्थ यह प्रार्थनाहै कि हम परस्पर द्वेषको न प्राप्त होवें।"ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः" "शान्ति हो, शान्ति हो, शान्ति हो,' यहां तीनवार जो शान्तिका कथन है सो आादरार्थ है, ।वा त्र्प्राध्यात्मिकादि तीनों प्रकारके विध्नविक्षेपकी निवृत्तिके अपर्थ है'। वा ञाग्रिम कहनेकी विद्या के विघ्न की निवृत्तिके अर्थ है। यह शान्तिपाठहै सो त्र्प्रविघ्नता से पात्मविद्याकी प्राप्तिकी प्रार्थना के अरथहै, तरु तिस आ्त्मविद्या की प्राप्तिरूप सूलवालाही परमश्नेयहै। [इस उक्क अर्थके अ्रनु- वादपूर्वक दूसरी त्रानन्दवल्ली के तात्पर्य को।साष्यकार स्वामी' कहते हैं ] पूर्वाध्यायविषे प्रथम संहिताको विषय करनेवाले त्रपररु कम्मों से तरविरुद्ध उपासना कही। तिसके पश्चात् व्याहतिरूप द्वार से अरु स्वाराज्यरूप फल से अन्तःकरस के भीतर सोपाधि- क आत्माका ज्ञान कहा। अरु इतने करके सम्पूर्ण संसारके वीज की निवृत्तिका साधन कोई एकहै, यह जानागया। एतदर्थ सर्व अनर्थों के बीजरूप श्रप्रज्ञानकी निवृत्तिके तपर्थ सर्व उपाधियों के भे द से रहित आरात्मा के 'सम्यक'। ज्ञानार्थ यह द्वितीय त्रध्यायका आ्रारंभ करते हैं। पपरु इस ब्रह्मविद्या का प्रयोजन अविद्या की। 'अशेष'। निवृत्ति है, ञरत् तिसकरके आ्र्प्रात्यन्तिक संसार का त्रप्रभाव होवेहै। इसप्रकार त्रप्रगिम।"विद्ान्न विभेति कुतश्चनेति"। विद्वान् किसी सेभी भयको प्राप्त होता नहीं। इस वाक्य करके यह श्रुति कहेगी। शपररु जिसकरके संसाररूप निमित्तके होते सन्ते।"त्रभयंप्रतिष्ठा- ञच विन्दत। कृताकृते पुएयपापे नतपत इति" त्भयस्थितिको पावताहै, अरु इलको किये अरु नं किये पुरय अरु पाप तपावते नहीं,। यह श्रुतिका कथन बनता नहीं, इसकरके जानाजाता है

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ६७ कि इस सर्वके आत्मारूप ब्रह्म को विषय करनेवाले विज्ञानसेआत्यं- तिक संसार का अपभाव होवे है। [अब प्रथम वाक्यके मध्यके तात्पर्य को कहते हैं। के वल़ विद्या कर केही मोक्षसाधने को शक्यहै।अरु, ब्रह्म- वित्, इस विशेषएसे सम्बन्धकज्ञानको पुरुषकीइच्छाका विषयहोने करके पर ब्रह्मकी प्राप्ति विद्याका प्रयोजनहै] इसप्रकार यह श्रुति "ब्रह्मविदापनोतिपरम्" ब्रह्मनेत्तापरब्रह्मको प्ाततहोताहै, इत्यादिक वाक्यों विषेही सम्बन्ध अरु प्रयोजनके जनावनेके अर्थप्रयोजन को कहते हैं। अरु संबन्ध अरु प्रयोजनके जानने से सुसुक्षु विद्या के अवस ग्रहणा अरु धारणं करनेके अभ्यासार्थ प्रवर्त होता है। पपंरु "श्रतव्यो.मन्तव्यो. निदिध्यासितव्यो"आत्मा अ्रवण करने योग्यहै, मनन करनेयोग्यहै, निद्धिध्यासन करनेयोग्यहै,। इत्यादिक अन्य श्रुतियोंके प्रमासासे श्रवणादि साधन पूर्वक "ब्रह्मविद्व- ह्वौव् भवति"ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मही होताहै,। इत्यादिरूप तरग्रिम कह- नेका विद्याका फल होताहै। एतदर्थ यहां श्रुति प्रथम विद्याके प्रयोजनको कहे है। परमात्मा अत्यन्त बड़ा होनेसे ब्रह्म कहाजा- ताहै। तिसको जो जानताहै सो ब्रह्मवेत्ताहै। अरु।"ब्रह्मविदानोति परम्"। ६ ब्रह्मवेत्ता परको पावताहै, अर्थात् यह ब्रह्मवेत्ता सर्वसे अधिक तिसही परव्रह्मको पावताहै।अरु अन्यके विज्ञानसे अन्य की प्राप्ति होती नहीं। अरु ऐसे "स यो ह वै तत्परमं ब्ह्म वेद ब्रह्मैव भत्नतीति"जो प्रसिद्धही तिस परब्रह्मको जानता है सो ब्रह्मही होताहै, इत्यादि रूप अन्यश्रुति स्पष्ट ब्रह्मवेत्ताको परब्रह्म की प्राप्तिही देखावे है, ताते ब्रह्मचेत्ता ब्रह्मको पाप होता है यह कथन योग्यही हैं। शंका॥ ननु सर्वगत।'सर्वका आत्मरूप'। बहाहै इसप्रकार यह श्रुति आागेकहेगी, ताते प्रासहोनेयोग्य ब्रह्म नहीं है। घरुं प्राप्ति जो है सो अन्य परिच्छिन्नकी अन्य परिच्छिन्नसे,देखी है इप्ररु ब्रह्म जो है सो अपरि्छिन्न अरु सर्का आत्माहै, पतदर्थ परि- चिछ्न्नवत् रु अनात्मवत् तिसकी प्राप्ति अघटित है।'तब श्रुति कैसे कहती है कि. ब्रह्मवेत्ता पर ब्रह्मको पावताहै।। समाधान॥।'।यंह

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६८ तैच्तिरीयोपनिषद्। दोष।' जो तुमने कहा सो' वने नहीं, क्योंकि ग्रह्म की प्रात्ति अरु त्र्प- प्रसिहै सोज्ञान इरु पपज्ञानकी अपरंपेक्षावाली है ताते। अरु परमा- र्थसे ब्रह्मरूपहुयेभी, त्ररु भूतोंके अंशकरके किये वाह परिच्छ्विन्न पन्नमयादि कोशोंविषे आ्ररात्मभावके देखनेवाले तपरु तिन श्र्परन्नम- यादिकोंविषे त्रपासक चित्तवाले इस जीवको दशमकी संख्याको पूर्ख करनेवाले अ्रन्तरायसे रहित हुयेभी, दशमके स्वरूपको वाहरके नवकी संख्यावाले पुरुषोविषे त्रपासक्र चित्तवाला होने करके स्वरूपके तप्रभावके ज्ञानवत् परमार्थ ब्रह्मस्वरूपके त्रप्रभावके

पनेकरके प्राप्तहुआप्र होनेसे, सो जैसे त्र्प्रन्नमयादिक अ्रनात्माओ्र्प्रोंसे मैं त्रन्य नहीं हौं, ऐसा मानताहै, इसप्रकार इस जीवको त्रविद्या से, आात्मरूपहुआ्रा भी ब्रह्म प्राप्त होताहै। [दर्शनका न होना ही है निमित जिसका ऐसी जो अप्राप्ति तिसका विवेचन क- रके अव दर्शनका होनाही है निमित्त जिसका ऐसी जो प्राप्ति तिस- का वर्न करते हैं ] परु जैसे दशकी संख्याको पूर्ण करनेवाले दशमके स्वरूपको अपरविद्यासे अप्रपाप् होतेसंते किसी भी आप्तपु- रुष करके स्सरण कराये हुये तिसहीकी विद्यासे प्राप्तहोवे हैं, तैसेही अरविद्यासे ब्रह्मस्वरूपकीतररप्रांत्तिवाले तिसही जीवको श्रुतिकरके उपदेशकिये सर्वात्मा ब्रह्मके आरपात्मभावके ज्ञानरूप विद्यासे तिस की प्राप्ति संभवेही है।।"ब्रह्मविदान्नौति परम्"ब्रह्मवेत्ता परत्रह्म को प्राप्तहोता है,। यह वाक्य समस्त वल्लीके तपर्थका सूचक होनेसे सूत्ररूप है "व्रह्मविदान्नोति परम्" व्रह्मवेत्ता परव्रह्मको पावता है,। इस वाक्यकरके जाननेयोग्य होनेसे सूचन किये, श्रपरु विशेष स्वरूपके निर्द्धारसे रहित ब्रह्मके सर्वसे भिन्नकरके जनाये विशेष स्वरूपके समर्पसाबिषे समर्थ लक्षणके कथनसे स्वरूपके निर्द्धारण करके, अरु [पूर्व ब्रह्मवित्, इस विशेषरसे जिस ब्रह्मका ज्ञान कहाहै तिस ब्रह्मका "योवेद निहितं गुहायां" जो गुहाविषे स्थित को जानताहै,। इस वाक्य करके प्रत्यगात्मरूपसे ज्ञान कहने को

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ६६ योग्यहै, इस अर्थ से अव ऋचा कहते हैं] सम्पूर् होनेकरके क- थनकिये ज्ञानवाले ब्रह्म के अग्रिम कहने के लक्षसके विशेषकर प्रत्यगात्मा होने करके अ्रप्रनन्यरूपसे जनावने की योग्यताके अर्थ ब्रह्मवे त्ताको जो परब्रह्मकी प्रात्तिरूप, ब्रह्मविद्याका फल कहां सोई है।। सो सर्व्वात्मभाव सर्व संसारके धर्म्म से रहित ब्रह्मस्वरूप भावहीहै, अन्यनहीं, इस अर्थ के लखावने के अर्थ यह नाचा कहते हैं। "तदेषाडभ्युकी। सत्यंज्ञानमनन्तंब्रह्म"। [तिसही बिषे यह उपदेश करिये है। सत्यज्ञान अनन्तन्रह्महै, अर्थात् तिसही ब्राह्मसवाक्य करके उक्क अर्थ बिषे यह ऋचा उपदेश कियाहै। सत्यज्ञान अनन्त ब्रह्महै, यह वाक्य ब्रह्मके स्वरूपलक्षण अरथे है अपररु सत्यादिक जे तीन पद हैं सो विशेष्यरूप ब्रह्म के विशेष- सार्थ हैं। अरु जानने योग्य होने करके कहने को इच्छित होने से, ब्रह्म विशेष्य है। अरु ब्रह्म जानने योग्य होने करके सुख्यता से कहने को इच्छित है, ताते विशेष्य रूप जानने के योग्यहै [वि- शेषणा तरु विशेष्य भावकी प्रतीति फाहेसे होतीहै, तहां कहते हैं। यहां यह अर्थ है कि नीलवर्ण अरु बड़ी सुगन्धिवाला कमल है,इत्यादिक वाक्यों बिषे विशेषण विशेष्य भावके होतेही समाना- धिकरसपने करके एक विभक्किरूप अ्र्रन्तवाले प्रसिद्धहैं, अरु यह भी तिस प्रकारके नांना अर्थगत विशेषण अरु विशष्यभाव के किये हैं, इस प्रकार जानते हैं] जिस करके अन्यः विशेषण वि- शेष्यभावके होनेसेही सत्यादिक एक विभक्तिवाले पद, समान (एक) अधिकरण (अर्थः) वाले हैं, एतदर्थ सत्यादिक तीन विशे- षणों करके विशेष्य हुआा जो ब्रह्म सो अन्य विशेष्यपनसे निर्द्धार करते हैं। तैसेही[ऋव विशेषण विशेष्यभावके फलको कहते हैं] जो अन्यों से निर्द्धार कियाहै, ऐसा तिसका ज्ञान होताहै। जैसे लोक-विषे नील अरु बड़ी सुगन्धिवाला कमल होता है। जब अ- नेक द्रव्य एक जातिवाले अरु त्र्प्रनेक विशेषणों के समबन्धी होवें, तच विशेषएको.अर्थवानूपना (सफलपना) होवे हैं, परन्तू एकही

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७० तैत्तिरीयोपनिषट। वस्तु विषे त्र्प्रन्य विशेषसंके त्प्रसम्बन्ध से विशेषएको अपर्थवान्पना नहींहै। जैसे यह एक सूर्यहै, तरुं तैसे एकही ब्रह्महै, अन्य ग्रह्म नहीं है; जिनसे नीलकसलवत् यह ब्रह्म विशेष्य (भिन्न किया) होवे,[सो विशेषण विशेष्यभावको तात्पयसे प्रतिपादन करनेको योग्यहोने से, अरु अज्याकृतादिक शास्त्र उक्र ब्रह्मपदके अर्थ के अवच्छेदसे अनिर्वाच्य विशेषण विशेष्यभाव के सम्बन्धसे तिस द्वारा ब्रह्मका लक्षण कहनेको इच्छितहै, ऐसा कहते हैं] यह क- थन वने नहीं, क्योंकि विशेषण लक्षण के तर्थ है ताते ! तरु वि- शेषणा जो हैं सो लक्षणरूप अप्र्थकी सुख्यतावाले हैं, विशेपसकी मुख्यतावालेही नहीं, याते यह दोष नहीं है।। शंका॥ ननु तव लक्षसं अरु लक्ष्यका वा विशेषस करु विशेष्यका कौन भेदहै।। समाधानातहां कहते हैं, विशेषस जोहै सो विशेष्य के समानजाति वाले द्रव्यनसेही निवर्तकहै, ऋरु लक्षण जो है सो लक्ष्यका सर्वसेही निर्वतक है,जैसे शरवकाशका देनेवाला आकाश है यहत्र्पाकाशका जो लक्षणहै सो आकाशरूप लक्ष्यका पृथिवी त्र्प्रादिक सर्वसे निवर्तक (भेदकरनेवाला)है, तैसे। तरुलक्षण अर्थ "सत्यंज्ञानमननतंन्ह्म" सत्यज्ञान अनन्त ब्रह्म है,। यह वाक्य है, इसप्रकार हम कहते हैं।। सत्यादिक शब्दजो हैं सो.परस्पर सम्बन्धको पावते नहीं, अन्य अर्थवालेहैं.ताते।शरु जिसकरके वे विशेष्य के अर्थ हैं, याते एक एक विशेषणारूप शब्द जो हैं, सो परस्परकी अपरपेक्षासे रहित हुआ्र "सत्यं ब्रह्म, ज्ञानं ब्रह्म, अनन्तं ब्रह्म"सत्य ब्रह्महै,। ज्ञान बह्म है,। अ्ररनन्त ब्रह्महै,। इसप्रकार ब्रह्मशब्दसे सम्बन्धको पाव- ताहै, अरु जिसरूपसे जो निश्चितहै, अरु जिसरूपकेअर्थ व्यभि- चारको पावता नहीं, सो सत्य है। रु जिस रूपसे निश्चितहु आरजो तिस रूप के अपर्थ व्यभिचार को पाव ताहै, सो मिथ्या, इसप्रकारकहते हैं। अरुइसही से विकार कहिये कार्यमिथ्याहै "वाचारम्भगं विकारो नामधयं मृत्तिकेत्येवसत्यम्" वासी से आारंभकिया विकार नाम- मात्रहै, रु सृत्तिकाही सत्यहै,। अरु ऐसे सत्ही सत्यहै, इस

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निश्चयसे। इसकरके "सत्यंत्रह्मेति"सत्य ब्रह्महै,। इसप्रकार सत्य शब्दजो है, सो ब्रह्मको विकारसे निवृत्त (पृथक्)करे है॥ इसकरके ब्रह्मको कारता प्राप्तहुई, तपरु कारणको कारकपना अरु वस्तुरूपता होने से सृत्तिकावत् जड़रूपता प्राप्तहुई, याते "ज्ञानंन्रह्मेति"ज्ञान ्रह्महै,। ऐसाकहते हैं। यहां ज्ञान शव्दजो है सो निर्विशेष चैतन्यमात्ररूप अर्वाला है, क्योंकि सत्य अरु प्रनन्त शब्दकरके सहित ब्रह्मका विशेषण है ताते। तरु सत्यंता अरु अ्नन्तता जोहै सो व्रह्मंको ज्ञानके कत्तापनेके हुये सम्भवे नहीं, अरु ज्ञानका कर्त्ता होने करके विकारवान हुआ्र.जो ब्रह्म सो सत्य तरु त्रनन्त कैसे होय, जो वस्तु किसी से भी विभाग को प्राप्तहोती नहीं सो त्रनन्त है। अरु ब्रह्मको ज्ञानके कर्त्तापने के होने से, सो ब्रह्म ज्ञेय अरु ज्ञान दोनों करके विभाग को पावेगा, याते तिसको त्र्प्रनन्तता नहीं होवेगी। क्योंकि "यत्र नान्यदविजा- नाति स भूमा, अथ यत्रान्यद्विजानाति तदल्पमिति "जहां अ्र- न्यको नहीं जानता है सो भूमा है, अरु जहां अन्यको जानताहै सो अल्प है,। इसतरन्य श्रुतिते॥ शरु जो कहे "नान्यद्विजानाति" अन्यको नहीं जानता है,। ऐसे प्रपंच के निषेध से आर्परात्मा को जा- नता है, सो कहना वने नहीं, क्योंकि उक्रवाक्य भूमा के लक्षएा के प्रकार के परायण है ताते। तरु "यत्र नान्यत्पश्यति" जहां अन्यको नहीं देखता,। इत्यादि रूप जो वाक्यहैं सो भूमाके लक्षण के प्रकार के परायण हैं। जैसे " यथा प्रसिद्धमेवान्यत्पश्य- तीति" प्रसिद्धही अन्यको देखताहै,। उसको लेके "यत्रतन्नासिति स भूमेति " जहां सो प्रसिद्ध अन्य वस्तु नहीं सो भूमा है,। इस प्रकार भूमा का स्व्ररूप तिस वाक्यविषे जनायाहै, अन्यके ग्रहण की प्राप्ति के निषेधरूप अर्थवाला होने से स्वस्व्ररूपविषे ज्ञानरूप (जाननेरूप) क्रिया नहीं है। याते यह उक्र,श्ुति वाक्य इसही अर्थ के परायण होहु। ऋरु स्वरस्वरूप विषे भेदके अभावके ज्ञान का असंभव है अरु त्र्प्रात्माको ज्ञेयपने के हुये ज्ञातापने के प्रसंग

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७२ तैत्तिरीयोपनिषट्। का अरभाव होवेगा, क्योंकि तिसको ज्ञेयपनेकरकेही उपयोग को प्रासतहुआ्र होनेसे।। त्रप्ररु जो ऐसा कहे कि एकही तर्प्रात्मा ज्ञेय परु ज्ञाता होने करके उभय प्रकारका होवे है, सो कथन बने नहीं, क्योंकि तिस तात्मा को एककालविषे निरवयवता है ताते। ऋरु निरवयव को एंककालविषे जेयपने का अरु ज्ञातापने का संभव नहीं है। अरु त्रप्रात्मा को घटादिकोंवंत् ज्ञेयपना होने से ज्ञानके उपदेश की व्यर्थता होवेगी। तरु जिसकरके घटादिकोंवत प्रसिद्ध वस्तु के ज्ञानका उपदेश अर्थवान् नहीं है, तिसकर के ब्रह्मको ज्ञाता- पना होने करके सत्यता अ्नन्तताका तप्रसंभव होवेगा। तपरु स- न्मान्नपना भी अरघटित होवेगा। अरु ज्ञानके कर्त्तापने आादिक विशेष करके युक्तपने के हुये सन्मात्रपना संभवे नहीं, क्योंकि "तत्सत्यमिति"सोसत्य है, इस अ्र्प्रन्य श्रुतिके प्रमाण से। अररु सत्य पररु त्र्प्रनन्त इन शब्द करके सहित ब्रह्मका विशेषण होने करके ज्ञान श्दके उच्चार से यह ज्ञान शब्द चेतनमात्ररूप अर्थवाला है। एतदर्थ ज्ञानशब्द जो है सो "ज्ञानं ब्रह्मेति" ज्ञान ब्रह्म है,। इसप्रकार कत्तापने आ्र्प्रादिक कारककी निवृत्ति के अर्थ तपरु मृत्तिका तरप्रादिकोंवत् जड़पने की निवृत्तिके अपपर्थथ चनता है।। त्रररु "ज्ञानं ब्रह्मेति "ज्ञानरूप ब्रह्म है,। इस वचन करके ब्रह्मको अन्तवान्पना प्राप्तहुत्ा, क्योंकि लौकिक ज्ञान को अन्तवानूपने करके युक्त देखते हैं ताते। एतदर्थ ज्ञानस्वरूप ब्रह्मविषे लौकिक ज्ञानवत् प्रात्तहुई अनन्तता तिसकी निवृ- त्तिके अर्थ ब्रह्म त्रनन्त है, इसप्रकार श्रुति कहती है। श्रपररु जो ऐसा कहे कि सत्यादिक विशेषणों को मिध्या त््प्रादिक धर्म्म की निवृत्ति के परायण होने से, अरु विशेष्य ब्रह्म को कमल आदिक विशेष्योंवत् अप्रसिद्ध होने से "मृगतृष्णाम्भसि स्नात: खपुष्पकृतशेखरः, एष बन्ध्यासुतो यातिशशशृङ्गधनुर्धरः इति " मृगतृष्णा के जलबिषे स्नान किये, अरु त्र्प्राकाशके पुष्प का किरीट मस्तकपर धारणकिये तरपररु शशक (खरगोश) के

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ७३ शृङ्गका बना ्र्प्रतिदृढ़ धनुष धारसकिये यह प्रत्यंक्ष बन्ध्याका पुत्र जाता है। 'इस वाक्यवृत् सत्यादिरूप वाक्यों को शन्यरूप अपर्थ- चानूपनाही प्राप्त होवेगा, सो बने नहीं [ सिद्धतासान्न करके विशेष्यताके सम्भवहुये अन्य प्रमाणा का विशेषण व्यर्थ होवेगा क्योंकि केवल व्यतिरेकके अभावसे परुरज्जु सर्पादिरूप मिथ्या अर्थ के सत्यरूप अधिष्ठानवानूपने के देखने से दृश्यता आरादिक हेतुओरंसे मिथ्यापने करके जाने हुये प्रपंचको भी सत्यरूप अ्रधि- ष्वानवानूपना संभवे है। अपरु प्रपंचका अिष्ठान होनेकरके नि- श्चय किये तिस ब्रह्मके स्वरूपके विशेष लक्षणार्थ यह वाक्य है, एतदर्थ इस वाक्य को अरसत् अर्थवानपना नहीं है, इसप्रकार कहते हैं ] क्योंकि सत्यादिरूप वाक्यों को लक्षणरूप अर्थवान्- पना है ताते। अरु सत्यादिपदों को विशेषरपने के हुये भी ल- क्षणरूप अर्थ की मुख्यता है, इसप्रकार, हमः कहते हैं। तरु जिस करके लक्ष्य को शून्यरूप हुये लक्षसाका वाक्य व्यर्थ,होता है; याते सत्यादिरूंप, वाक्यों को लक्षणारूप अर्थवाला होनेसे शन्यरूप अर्थवान्पना नहीं है, इसप्रकार हम मानते हैं। [सत्यादि शब्दोंकी विशेषणारूप अर्थवान्ताको अंगीकार करके कहते हैं। यहां यह अर्थहै कि नीलवर्ण महत्सुगंध, ऐसे विशेषण- रूप.जो पदहैं, सो अपने अर्थ के, समर्पपासे तिससे विरुद्ध, अर्थसे ञपने आंश्रय(विशेष्य)केव्यावर्तक(अन्यसेपृथकू करनेवाले) प्रसिद्ध है, तैसे सत्यश०्द भी अबाधित सत्ताबिषे बर्तताहै, अरु ज्ञान शब्द स्वप्रकांश संवेदन विषे वर्तता है करु अनन्तशब्द व्यापकविषे बंर्तताहै"अनन्तोपमाकाशः" अनन्तकी उपमावाला परराकाशहै, इत्यादिक स्थलमें अनन्तशब्द व्यापकविषे बर्तताहै। ताते अपने अर्थ के समर्पासे विरोधी अर्थ से अपने आश्रयक़े व्यावर्त्तक होनेसे सत्यादिश्दोंका व्यावत्तिमा रुप अर्थवविष े पर्यवसान(समात्तिवा बर्तना) नहीं है] सत्यादि शब्दोंको विशेषण- रूपं अर्थकरके युकहुये भी अपने अर्थका परित्याग होतानहीं। अरु

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७४ तैत्तिरीयोपनिषद्। जिस करके सत्यादि शब्दों को शून्यरूप अर्थ करके युक्हुये विशेष्य के नियामकपनेकां त्रसम्भव होवेगा, अररु सत्यादिरूप अर्थ करके अर्थवान्पनेके होनेसे तो तिससे विपरीत धर्मवाले विशेष्यों से ब्रह्मरूप स्वंविशेषका नियामकंपना सम्भवे है, याते ब्रह्मशब्द भी अपने अर्थकरके अपर्थवान्ही है। तहां अ्रपरनन्त शब्द जो है सो अन्तवानपने के निषेधद्वारा विशेषण है, तपरु सत्य और ज्ञान यह शब्द तो अपने अर्थ को।' ब्रह्मविषे' समर्पण करनेसेही विशेषण होतेहैं। [ "अरनन्तं" अनन्त है,। इस पदकरके न्रह्म की आत्मासे एकता कही है, इस अभिप्रायसे एकता चिषे शास्त्र के तातपर्य को देखावते हैं] "तस्माद्वाएतस्मादात्मन इति" तिस (ब्राह्मभाग करके प्रतिपाद्य) से वा इस (मन्त्रभागकरके प्रतिपाद्य) आप्रांत्मासे,। इस वाक्य ब्रह्मविषेही तर्रात्मशव्दके मिलांवने से, ज्ञाताका आत्माही ब्रह्म है। अरु "एतमानन्द- मयमात्मानमुपसङ्कामति" इस त्नन्दमय पात्माको प्रवेश करावताहै, । ऋंरु "तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशदिति" तिसकों सृजके तिसके प्रति पीछे प्रवेश करताहुआ, इसप्रकार तिसके प्रवेशसे। ऋपरु जिसकरके तिसही परव्रह्म के जीवरूप से शरींर विषे प्रवेशको श्रुति देखावे है, इसही करके ज्ञानवान्का स्वरूप ब्रह्म है।। [जब ब्रह्मकी आत्मासे एकता कहनी इच्छित है, तव ज्ञानशब्द की भावरूप साधनता की व्याख्या भङ्ग होवेगी, इस प्रकार पूर्वपक्षी कहताहै ] जब इस प्रकारहै तब आत्मा होनेसे ब्रह्मको ज्ञानका कर्त्तापना होवेगा। अरु जिस करके छ्रात्मा ज्ञाता है, यह प्रसिद्ध है, पररु "सोऽकामयंत" सो कामना करता हुआ,। इस प्रकार कामनावाले परमेश्वर को ज्ञानका कर्त्तापना प्रसिद्ध है, याते ज्ञानका कर्त्ता होनेकरके चेतनमात्र- रूप ब्रह्म है, यह कथन अयुक्र होवेगा तरु उक्र प्रकार माने हुये अनित्यता के पसङ्गसे जब ब्रह्मको चेतनमात्र ज्ञानस्व- रूपता है, तब अनित्यता तरु परतन्त्रता प्राप्त होवे है, क्योंकि

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ७५ धातुके अर्थको कारक की अपेक्षावानूपना है ताते। अपरु 'ज्ञान' धातु का अर्थ है, एतदर्थ इस ज्ञानको अनित्यता अरु परतन्त्रता है, सो कथन वने नहीं, क्योंकि स्वरूपसे भिन्न होने करके कार्य- पने के उपचार से। तरु चिन्मात्ररूप जो ज्ञानहै सो आत्माका स्वरूप है ताते भिन्न नहीं, याते नित्यही है, तथापि चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा विषयाकार परिणाम को पावनेवाली बुद्धिरूप उ- पाधिके जो शब्दादि विषयाकार प्रकाशहैं, सो आत्मस्वरूप ज्ञान के विषयरूप उत्पन्न हुयेही आत्मस्वरूप ज्ञानसे व्याप्त संभवे हैं, ताते आत्मस्वरूप विज्ञान के जो प्रकाश हैं. सो विज्ञान शब्द के वाच्य शरु धातुके अर्थरूप हुये आत्मा केही विकाररूप धर्म हैं, इसप्रकार अविवेकी पुरुषों करके कल्पना करी है। परन्तु जो ब्रह्म का विज्ञान है सो सूर्य के प्रकाशवत् तरु अग्निकी उष्पतावत् ब्रह्मस्वरूपसे अरप्रभिन्न हुआर्प्रा स्वरूपही है, अरु सो अन्य कारणकी अपेक्षावाला नहीं, क्योंकि नित्यस्वरूप है ताते।[।प्रश्न॥। ज्ञान जब नित्य है तव तिसविषे ब्रह्म के कर्तापने के पभाव हुये ब्रह्मको सर्वज्ञपना कैसे है। उत्तर॥ यहां यह अपर्थ है किज्ञानके अ्रप्न्तराय से विनाही वाह्यके विषयोंकी सिद्धि होती है, अरु सर्व वस्तु ज्ञान स्वभाववाले ब्रह्म से अंतरायरहित है, याते ब्रह्म सर्वज्ञ है, इस प्रकार आरोप करके कहते हैं ] अरु सर्व पदार्थों को तिसकरके अरमिन्न देश काल अरु आकाशादिक कारणवाले होने से अरु तिस ब्रह्म को निरतिशय सूक्ष्म होने से तिसको अन्य सूक्ष्म शर- न्तरायसहित दूरस्थित भूत भविष्यत् वा वर्त्तमान वस्तु जानने को योग्य नहीं है, ताते सो ब्रह्म सर्वेज्ञ है। अरु "अपाशिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षःसशृणोत्यकर्णः।सवेत्ति वेद्यन चत- स्यास्ति वेचा तमाहुरग्रधं पुरुपं महान्तमिति, मन्त्रवर्णात् "नहि विज्ञातुर्विज्ञस्ेर्विपरिलोपो विद्यतेविनाशित्वान्नतु तद्दद्वितीयो- इस्ति, इत्यादि श्रुतेश्च " हस्त पाद से रहित हुआ जानेवाला अरु ग्रहणाकंता है, अरु सो चक्षरहित हुआ देखताहै कर्णारहित

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७६ तैत्तिरीयोपनिषद। हुआ सुनता है, सो जानने योग्य वस्तु को जानताहै, तरु तिस का जाननेवाला कोई नहीं, तिसको सुख्य महत् पुरुष कहते हैं, इस मन्त्रके वर्णन से। अरु विज्ञाताकी विक्ञप्ति का लोप होता नहीं तविनाशी है ताते, तरु तिससे दूसरा नहीं है, इत्यादिक श्रुतियों से। [ब्रह्म नित्यहै, ज्ञानस्वरूप होने से, लौकिक ज्ञान- वत्, इत्यादिरूप जो प्रश्न है, सो कथन करी युक्रियों से निषेध किया ऐसा कहते हैं। यहां यह भाव है कि लौकिक ज्ञान को करसादिकों की छृपेक्षा सहित होनेसे अनित्यपना है, तरुआ्र्रात्म- स्वरूंप ज्ञान तो करणादिकों की प्रप्रपेक्षा सहित नहीं, क्योंकिं समस्त करणोंके व्यापारके उपरामहुयेभी सुषुप्तिविषे तिसज्ञानकां सन्भा- वहै ताते, इंप्ररु अन्यथा हुये सुपु्तिकी सिद्धताका त्पसंभवहै ताते, अरु सुषस्तिसे जागत् हुये पुरुषको सुपुत्िके स्मरणके संभ के प्रसंग से, याते श्रुतितात्पर्यके विषयरूप अर्थविषे सामान्यसे देखे हुये अर्थका प्रवेश नहीं है] तपररु विज्ञाताके स्वरूपकरके अ्र्प्रभेदसे करणादि निमित्तोंकी अपेक्षासे रहित होने से ब्रह्मको ज्ञानस्वरू- पताकें हुयेभी नित्यताकी सिद्धि है। एतदर्थ नित्यत्रात्मस्वरूप होने करके ब्रह्मरूप ज्ञान धातुका अर्थनहीं है, इसही से।अर्थात् नित्यहोने से'। ज्ञानका कर्ताब्रह्म नहीं है, तरु इसही हेतुसेज्ञानशब्द का वाच्यभी ब्रह्मनहीं है।[प्र०॥ तहां ज्ञानस्वरू पन्रह्महै, यहप्रयोग कैसे सिद्ध होवे है।।उ०।तहां कहते हैं ] तथापि तिसके। ज्ञानरूप ब्रह्मके'्भासके वाचक बुद्धिके जो धर्मविशेषहैं सो ज्ञानशव्दसे लखे जाते हैं परन्तु कहतेनहीं क्योंकि शब्दकी प्रवृत्तिके हेतु जाति प्रादिक धर्ससे रहितहै ताते। तैसे सत्य शब्द से भी वाच्य ब्रह्म नहीं है। ब्रह्म को सर्व प्रपंचकी निवृत्तिकरके युक्न स्वरूपवाला होनेसे, बाह्यसत्ता के भेदको विषयकरनेवाले सत्य शब्द से ब्रह्म सत्यहै, इसप्रकार लखते हैं, परन्तु सत्य शब्दका वाच्य ब्रह्म नहीं है।अर्थात् सत्यादि नामों का नामी ब्रह्म नहीं है किन्तु सत्यस्वरूप हैं'।[उक्कप्रकार एकएक पदके अपर्थको निरुपणकरके त्रव समस्त 1

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वाक्यके अर्थको कहते हैं। 'यहां यह अरथ है कि यद्यपि सत्यादि शब्दों का ब्रह्मसे मुख्य अन्वय है, तथापि वह सत्यादि शब्द परस्परकी सन्निधिके हुये परस्परकी व्यावृत्तिके नियामक होते हैं। तपररु ज्ञान- रूप विशेषकरके युक्र होनेसे सत्यशब्द जड़ कारण विषे बर्तता नहीं, अरु सत्यरूप विशेषण करके युक्त होनेसे ज्ञानशब्द जो हैं सोविषयकी अपेक्षासाहित जो ज्ञान है तिसविषे वर्तता नहीं, क्योंकि विषयापेक्षिक ज्ञान असत्यहै ताते॥। अरु ज्ञानस्वरूप विशेषस करके युक् होनेसे अनन्त शब्द ज्ञातासे भिन्न अर्थ विषे बर्तता नहीं। एतदर्थ सत्यादिशब्दोंसे लौकिकवाच्य जो है, तिससे विलं- क्षणअर्थ होनाचाहिये, इसप्रकार निश्चय करावतेहुये समस्तलौ- किक अध्यासों के अधिष्ठानको ब्रह्म होनेकरके लखावते हैं ] याते

जिससे तप्रपास्तहोयके मनसहित वाशियां निवृत्त होती हैं, तपरु इस वासीकें तरप्रविषय शपररु परप्राधारसे रहित ब्रह्मविषे अभय.स्थितिको पावताहै,। इत्यादिक श्रुतियोंकरकें प्रतिपादित ब्रह्मका अपरवाच्य- पना तपरु नीलकम लवत् वाक्यकां पर्थपना सिद्धहुआरा॥। उक्प्रकार कथनकिया जो ब्रह्म सो कार्यमय वुद्धिरूप गुहाविषे अनुस्यूत जो त्रव्याकृत (माया) नामवाला परमत्राकाश है तिसविषे स्थित है।। रु जिसकरके इस युद्धिविषे ज्ञान, ज्ञेय, रु ज्ञातारूपप- दार्थ गूढ़हुये वतते हैं याते बुद्धिको गुहाकरके कहते हैं। वा इस चुद्धिविपे भोग अरु मोक्ष यह उभय-पुरुषार्थ गूढ़ कहिये छ्विपेहुये. हैं एतदर्थ चुद्धिको गुहारूपसे वर्णान करते हैं। वा "एतस्मिन्खल्व- क्षरेगार्ग्याकाशः"हे गार्गगि!इसतप्रक्षरविपेनिश्चय करके.आकाशहै,। इसश्रुतिविषे अ्र्प्रव्याकृतको ब्रह्मकी सन्निधिसे परम आ्र्रकाशरूप- ताहै [व्योमशब्दकी जो भृताकाशविषेरूढ़िवृत्ति है तिसको परि- त्याग करके त्र्प्रव्याकृतको विषय करनेपना क्या व्याख्यान किया, इस शंकापर कहते हैं। यहां यह तर्थ है कि भूताकाशको कार्यहोने करके अरसृष्टपनाहै ताते, तपरुत्र्प्रव्याकृतरूप त्र्प्राकाशको कारणहोने

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तैत्तिरीयोपनिषद्। करके परमता (श्रेष्ठता) रूप विशेषणका संभवहै ताते, अरु अन्य शाखाके सत्पथनामक प्रकर एबिषे अक्षररूप ब्रह्मस तिस ऋव्या- कृत त्रराकाशकी समीपताका निश्चयहै ताते, यहां व्योमशब्द करके शव्याकृतको लखायाहै] सो अव्याकृतरूप आरकाशही गुहा है। क्योंकि तिसको तीनकाल चिषे कारणताहै ताते, अरु तिस को सक्ष्म होनेकरके तिसविषेभी सर्वपदार्थ गूढ़ हुये वर्तते हैं, एत- दर्थ उस अव्याकृतरूप आ्रकाशको गुहाकरके वर्रान करते हैं, तिस बिषे ब्रह्मस्थितहै। इसंप्रकार अन्योंके अ्रप्रभिप्रायसे व्याख्यानकर- के अपरव अपने तपरभिप्रायसे व्याख्यान करते हैं। [हृदयनामक मांस- पिंडीकरके तरप्रवच्छिन्न भूताकाशविषे जोवुद्धिरूपागुहाहै तिसविषे साक्षी होनेकरके निहित कहिये प्रकट ब्रह्महै, इसप्रकार व्याख्या- नकरना युक्है क्योंकि द्रष्टासे अभेदकरके ब्रह्मके अपरोक्षपनेका लाभहै ताते। तपरु अन्यथा समष्टिरूप तव्याकृति नामक माया तत्रबिषे स्थितब्रह्महै, इसप्रकार कहे हुये ब्रह्मको परोक्षपना प्राप्त होचेगा। अरु ब्रह्मका जो परोक्षपनेसे ज्ञानहै सो अपरोक्ष संसार के अध्यासका निवर्त्तक होवे नहीं। ताते अपरोक्षद्रष्टा चैतन्यसे अभेद करके ब्रह्मको अपने हृदयविषे प्रत्यक्षपनेकरके कहने को इ- च्छित है ताते, विज्ञानका साधनरूप हृदयाकाशही यहां व्योम. शब्दकरके कहनेको इच्छितहै ] अथवा हृदयावच्छिन्न जो भूता- काशहै सो परमव्योमहै, तिसविषे जो बुद्धिरूपा गुहाहै तिसविपे साक्षी होकरके ब्रह्मस्थित है, यह व्याख्यान युक्कहै; क्योंकि इस श्रुतिविषे ज्ञानकासाधन होनेकरके आ्र््रांकाशको कहना इच्छितहै ताते। अरु "योवैसबहिर्हपुरुषाकाशो योवैसोऽन्तःपुरुषाकाशः सोडयमन्तर्हदयाकाश इति" जो प्रसिद्ध बाहर पुरुषाकाशहै,अपरु जो प्रसिद्ध सो भार पुरुषाकाशहै, सो यह अन्तर हृदयाकाशहै,। इस अन्य श्रुतिसे भी हृदयाकाशका परम 'उत्कृष्ट' स्वरूप प्रसिद्ध है। तिस हृदयाकाशविषे जो बुद्धिनामक गुहा है तिसविषेस्थित जो ब्रह्महै सो वृत्तिसे सूक्ष्म होने करके जानिये है। अरु अन्यथा 1

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ७६ कहिये प्रतीति विना ब्रह्म को विशिष्ट, देश, अरु कालका, संबंध नहीं है, क्योंकि ब्रह्म सर्वगत है, ताते अरु सर्व उपाधि से रहित है ताते। इस प्रकार कथन किये बुद्धिरूपा गुहाविषे अनु- स्यूत अव्याकृत नामवाले परम आकाशबिषे वा हृदय करके अवचछित्न।"योवेदनिहितंगुहायां परमेव्योमन्। सोऽशनुतेस- वान्कामोन् सहव्रह्मणाविपश्चितेति"। परमत्रांकाशबिषे गुहा में स्थितको जो जानता है सो सर्वज्ञ ब्रह्मरूपसेही सर्वभोगों को एककाल विषे भोगता है, अर्थात् परमन्काश विषे वर्त्तमान बुद्धिरूपा गुहामें स्थित ब्रह्मको जो पुरुष जानताहै सो [ यहां यह अर्थ है कि तप्रविद्या अवस्थाविषेजो हिरएयगर्भादिक उपाधियों विषे भोग्यहोने करके माने हुये सुखके भेदहैं, तिन सर्वको ब्रह्मा- नन्दसे अभिन्न होने से ब्रह्मभूत जो विद्वान्है सो इन सर्व आ्ान- न्दों को भोगता है, इंसप्रकार उपचारसे बहुवचन है] सबभोगों को भोगता है।। प्रश्न ॥I क्या अस्मदादिकोंवत्। 'इस लोकमें'। पुत्र अरु।'परलोक में'। स्वर्गादि भोगोंको क्रमकरके भोगताहै। उ०वी तहां कहते हैं, एक क्षण बिषे आारूढही भोगोंको सर्य के प्रकाशवत् नित्य ब्रह्मस्वरूप अभिन्न, अरु जिसको सत्य त्रप्ररु ज्ञानरूप कहते हैं, ऐसे एकही ज्ञानकरके ब्रह्मरूप से भोगताहै, अर्थात् ब्रह्मभूत जो विद्ान् सो ज्ञानरूप होने से सर्वज्ञ ब्रह्मरूप से ही सर्वभोगों को एक काल बिषे भोगताहै। परन्तु जलगत सर्य अरु आकाशादिकोंचत् उपाधिकृत प्रतिषिंबभूत संसारीस्वरुपसे पुरायादिक निमित्तकी अपेक्षावाले अरु चक्षुरादि करणोंकी प्रपरपे- क्षावाले लोकविषे प्रसिद्धभोगोंको क्रमकरके भोगतानहीं, किन्तु उक्प्रकारसे सर्वज्ञ सर्वात्मा नित्य ब्रह्मात्मस्वरूपसे पुएयादिक निमित्तोंकी अपेक्षासे रहित अरु चक्षरादिक करणोंकी परपेक्षासे रहित सर्व भोगोंको साथही भोगता है,अु सर्वज्ञ ब्रह्मस्वरूपसे जो भोगताहै सो तिसका विपश्चित् कहिये पंडितपनाहै। अरु यहां मूलशब्द बिषे "इति" शब्द जो है सो मन्त्रकी समांतिके अर्थ

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50' है।।:अरु सर्वही वल्ली का अर्थ "बह्विदामोतिपरम"। 'ब्रह्मवेत्ता परज्रह्म को पावता है।। इस ब्राह्मंणचाक्य से सूचन किया, सो अर्थ संक्षेपसे मन्त्रकरके व्याख्यान किया, पुनः तिसही अर्थका विस्तारसे निर्णय कर्तव्य है, एतदर्थ उक् मन्त्र की व्याख्यान स्थानी अपरग्रिम ग्रंथ प्रारंम्भ करते हैं। तहां मन्त्रके आरप्रादि विषे "सत्यज्ञानमनन्तंब्रह्म" सत्य ज्ञान अ्रनन्त व्रह्म है,। इसप्रकार कहा, सो कैसेसत्य; ज्ञान, परनन्तरूप है, तहां पूर्वोक् अपर्थका अनुवादकरतेहुये कहते हैं, अनन्तपना जो है सो देशसे, कालसे, वस्तुसे; इनःभेदकरके तीनप्रकारकाहै। जैसे देशसे त्रनन्त प्रा काशहै तिसका देशसे परिच्छेद नहीं है, परन्तु :रप्राकाशका काल से रुवस्तुसे, अ्पनन्तपना नहीं है, क्योंकि प्ाकांश कार्यरूप है ताते। इसप्रकार ब्रह्मको प्प्रकाशवत् कालसे भी अन्तवान्पना नहीं है,! 'अरथातत्ररकाश उत्पत्तिमान् कार्यरूप त्ररु वस्तुरूंपहोने s sho sho i से अपनी उत्पत्तिक पूर्वकाल विषे है नहीं ताते आकाशको काल से र्तवान्पनाहै तैस वहमंको नहीं। क्योंकिअ्कार्यरूप है ताते, अरु.कार्यरूप जो वस्तुहै सो कालसे; परिच्छेद को पावती है, तरु ज्रह्म जो है सो अकार्यरूप है ताते कालसे भी अनन्त है। तैसेही ब्रह्मका वस्तुसे भी अरनन्तपनाहै; क्योंकि सर्व वस्तुओ्ंसे अभिन्न है ताते। अरुभिन्न जो वस्तु है, सो अन्यवस्तु का अन्तहोवे है ।, जैसेदेवदत्तके गहसे भिन्न समीप विष्यादत्तका गहहै सो देव- दतके गृहका अन्तहै क्योंकि विष्णुदत्तके गृहके स्थान में देवदत्त का गृह नहीं, अरु,एकठेका.ने दोवस्तुरहती नहीं, अरु जो सिन्नवस्तु हैं सो परस्पर में एक दूसरे का तं्त लखावे हैं'। रु जिसकरके जिसकी बु्धिकी निवृत्ति होतीहै, सो तिसका तरा तहै। जैसे गौपने की वुध्वि अशवपनेकी बुद्धिसे निवृत्त होती है, याते गौपना जो है सो अश्वपनेका'तरुअ्रृरश्वपनाहै सो गौपनेकां'। त्र्प्रन्त है, इस प्रकार सो अं्तवान्ही होते हैं। अरु सो अन्त अपनेस भिन्नवस्तु 'विषे देखते हैं। शरप्ररु ब्रह्मका किली से भी भेद है नहीं एतदर्थब्रह्म

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। =१ : का वस्तुसे भी अनन्तपनाहै॥प्र० ॥ पुनः ॥ ब्रह्मको सर्ववस्तुओ्ं से अभिन्नपना कैसे है,॥ उ०॥ तहां कहते हैं, व्ह्म सर्वस्तुत्रं का कारण है ताते ब्रह्मको सर्ववस्तुओं से अभिन्नपता है। अरु जिसकरके काल अरु आकाशादिक सर्ववस्तुओंका कारसब्रह्महै,. याते सो घटादिकोंसे त्रप्रभिन्न मृत्तिकावत् तरु सर्प दंड मालादिकों से अभिन्न रज्जुवत् सर्ववस्तुओपों से अभिन्न है। अरु जो ऐसा कहे कि कार्यकी अपरपेक्षा से ब्रह्मको वस्तुओ्रंसे श्रन्तवान्पना हो- वेगा, सो कहना वने नहीं, क्योंकि कार्यरूप वस्तुको मिध्यापनाहै साते। अरु जिसकरके वास्तव से कारण से भिन्नकार्य है नहीं, करु जिसकरके कारण के जाने हुये कार्यकी बुद्धि निवर्स होती है "वाचारम्भसं विकारो नामधयं मृत्तिकेत्येवसत्यं" "सदेवसत्य- मिति" वासीसे आरम्भ किया विकार नाममात्र है, मृत्िकाही सत्य है। ऐसे सत्रूपही सत्य है,। इन अन्य श्रुतियोंसे। तारते आकाशादिकोंका कारण होनेसे प्रथम देशसे अनन्तवरह्महै।ञरु आ्राकाश देशसे अ्रनन्तहै यह सर्वको प्रसिद्धहै, तिसा काशकायह कारएं है ताते त्रप्रात्माको देशसे अ्रप्रनन्तपना सिद्धही है। अरर जिसकरके व्यापक से व्यापक उत्पन्नहुआ ऐसा कुछ नहीं देखते। इस करके त्र्प्रात्माका जो देशसे तरु अकार्यरूप होने से काल से अरु तिस ात्मा से भिन्नवस्तु के पभावसे जो अनन्तपना है सो निरतिशय (सर्वसे अधिक) है अरु जिसकरके आात्माका निरतिशय अर्प्रनन्तपना है इसहीसे तिसका निरतिशय सत्यपन है [ इसप्रकार सृष्टिवाक्य के तात्पर्य को कहके अब पदोंका वि. भाग करते हैं अन्तके कार्यपर्यन्त सर्वत्र परमात्माके गरहसहोने से आकाशभावको प्राप्तहुये परमात्मासेही वायु उत्पन्नहुआ, याही से तिसके गुएं आगे अनुवृत्ति है। इसप्रकार जानना 1यहांइस कहनेके वाक्यवषे ज़ो।" तिस"। शबदहै तिसकरके मूलके वाकय से सूचनकिया ब्रह्म ग्रहण करतेहैं, अरु।"इस"। शब्दकरके जो ज्ह्मही ब्राह्मणुभागसे सूचन किया अरु जो "सत्यंज्ञानमनन्तं

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तैत्तिरीयोपनिषद्। *1 ज्रह्म" सत्यज्ञान अरप्रनन्त ब्रह्म है, इस वाक्य करके अनन्तरही लखाया है सो ग्रहण करते हैं। "तस्मादाएतस्मादात्मनभ्रकाशः सम्भूतः। त्राकाशाायुः। वायोरग्निः।अपगनेरापः। अ्यःपृथिवी। पृथिव्या शोषधयः। तर्ोषधीम्योऽन्नम्। त्न्नाद्रेतः ।रेतसःपुरुपः। सवाएषपुरुषोप्प्ञरसमयः"।तिस इस प्रप्रात्मासे आ्र्प्राकाश उत्पन्न हुत्रा, आ्राकाशले वायु, वायुसे श्र्प्रग्नि,अर्निसे जल, जलसे पृथिवी, पृथिवीसे त्र्प्रोषधियां, ओषधियोंसे त्रपन्न, त्रप्रन्नसे रेत, रेतसे पुरुष उत्पन्न हुआ्रा, सो प्रसिद्ध यह पुरुष त्र्प्रन्न रसमयहै;अर्थात् तिस इस आत्मस्वरूप न्रह्मसे आ्रप्रकाश उत्पन्नहुआर्प्र सो आरकाश शब्द गुसवाला है सो सूर्चरूप द्रव्योंको तरप्रवकाशका देनेवाला है। तिस पकाशसे अपने स्पर्श गुणकरके अप्ररुपूर्वके आ्रप्राकाशके शब्दगुए करके इतप्रकार उभयगुशवाला वायु उत्पन्नहुआ। अरु तिसवायु से अपनेरुप गुखकरके अपरत पूर्वके शब्द स्पर्श गुकरके युक्र तीन गुएवाला अग्नि उत्पन्नहुआ। अरुतरप्रग्निसे अपने रस गुएकरके ऋरु पूर्व के शब्द, स्पर्श, रूप, इन तीन गुणकरके युक्र वारगुण वाले जल उत्पन्नहुये। तरु तिसजलसे अपने गन्धगुएकरके अरु पूर्वके शब्द, स्पर्श, रूप, रस, इन चारगुएकरके युक्क पांचगुस वाली प्ृथिवी उत्पन्न हुई। पृथिवी से तरप्रोषधियां, त्रप्रोषधियों से ्न्न, अरन्नसे रेत कहिये वीर्य, तपरु वीर्य से मस्तक अरु हस्त पादादिक अवयव त्र्पराक्कतिवाला पुरुष उत्पन्नहुआ्प्रा [ पञ्चकोश के आरम्भ का तात्पर्य कहते हैं] सो प्रसिद्ध यह पुरुष त्पन्नरस- सय है, अर्थात् अन्नके रसका विकार है।। जिस करके सर्व अद्गों से उत्पन्नहुआ्रप्रा अपरत्र पुरुषके त्र्प्राकार से सम्भव को पाया जो तेज सो रेत अरु वीर्य कहते हैं। ताते जो जन्मता है सो भी तैसा पुरुषाकार वाला होता है, क्योंकि सर्वजातियों विषे उत्पन्न होने वाले शरीरको पिताके त्रपरकारसे।'होनेके'। नियमको देख तेहै ताते अरु सर्व शरीरोंको अन्नके रसकी निकारताके शरु ब्रह्मके वंशविषे उत्पत्ति की तुल्यता के हुये, यहां पुरुष (मनुष्य शरीर) ही किस

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द्वितीयाध्याय न्रह्मानन्दवली। कारणसे ग्रहण करते हौ तहां कहते हैं, प्रधान होनेसे।'अर्थात् विधिनिषेधके विधेकके सामर्थ्यकरकेयुक् है ताते'। यहां पुरुषही प्रहण करते हैं।प्र। पुनःपुरुषका प्रधानपना क्याहै।उ०॥ तहां कहते हैं, कर्म अरु ज्ञानका अधिकार पुरुष शरीरबिषेही है, क्योंकि तिसको समर्थता है ताते, अरुपनर्थे।' कामना'। वालाहै ताते अपरु जिसकरके अर्थीविद्वान् ऋरु समर्थहुआ पुरुषक्मत्ररुज्ञानविषेन्न्- धिकारकोपवताहै, इसकरके तिसकी प्रधानता है रु पुरुषपनेविषे ।'अर्थात् ब्राह्मणादि जातिवाले संनुष्यादि शरीरविषे' आात्मज्ञान के प्तिशयके देखावनेसे, पप्रतिशयकरके प्रकटहै। तरत् सो पुरुष विज्ञानकरके अत्यन्त सम्पन्न हुआ ज्ञात वस्तुको कहताहै, ज्ञात वस्तुकों देखता है कल होनेवाले कार्यको जानता है, अरु लोक अलोकको जानताहै; मरने योग्य।'शरीर' से अमृत(शक्षयपद) प्रास्तहोने की इच्छा करताहैं। इसप्रकार।प्रधानताकरके'। सम्पन्न है अरु"पशनामशनापिपासे एवाभिज्ञानमित्यादि" अन्य पशुओं के क्षुधा तृषाकाही ज्ञानहै,। इंत्यादिरूप ऐतरेयकश्षुति वाक्यके देखनेसे॥ सोई पुरुष यहां विद्यासे अत्यंत आंतरब्रह्म को प्रातत होनेकी इच्छा करताहै। रु जिसकी अनात्मरूप वाह आकारों के भेदोविषे किसीभी आश्रयके अर्थ आात्माकी भावनाको प्रातत हुई जो बुद्धि सो तत्काल अत्यन्त आन्तर प्रत्यगात्माको विषय करनेवाली ऋरु निराशय करने को अशक्य है, याते देखे हुये शरीररूप आ्ात्माकी सुल्यता की कल्पना से शाखा चन्द्र के दष्टान्तवत् भीतर प्रवेश करावते हुये कहते हैं।" तस्येदमेव शिर:,अयंदक्षिए: पक्ष:, अयमुत्तर: पक्ष:, अयसात्मा, इद पुच्छं प्रतिष। तदप्येष श्लोको सवति"। तिसका यहही शिर है,यह दक्षिणा पक्ष है, यह उत्तर पक्ष है, यह आत्माहै, यह पुच्छ प्रतिष्ठा है, तिसही चिषे यह श्लोक होताहै? अर्थात् तिस इस अ्रन्न रसमय पुरुषका यहही प्रसिद्ध शिर है। शिरसे रहित प्रायामयादि ।' कोशों 'विषे शिरभाव के।'श्रुति करके देखने से यहां।'त्रान्न.

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तैत्तिरीयोपनिषद्। मयकोशविषे' भी तिसका प्रसंग मत हो, इस श्रपरभिप्रायसे यहां यहही शिर है, ऐसा कहा है। इसप्रकार इसके पक्षादिक अर्गोविषे भी योजना करनी। अरु यह पूर्व दिशा के सममुख हुये पुरुपका जो दक्षि वाहु है सो दक्षिए दिशाकी त्रर होताहै ताते सो यहदक्षिापक्षहै।शरु यह वामवाहु।'जोपूर्वाभिमुखहोनेसे उत्तर दिशा की ओर होताहै'। सो 'यह उत्तरपक्षहै'अरुयह देहका मध्य- भाग अ्रव्य अंगोंका।झश्रय होने से'। आ्रात्मा है "मध्यं ह्येषा- सङ्गानामात्मेतिशुतेः " यह त्रंगोंका मध्य शरत्मा है, । इस श्रुति करके। शरु यह नाभि के नीचे जो पधो अंग है सो पुच्छ प्रतिष्ठा कहिथे आधार है। जिसकरके शरीर स्थित होता है ऐसे जे पाद तिलको प्रतिष्ठा कहते हैं। घरु जैसे गौका पुच्छहै तैसे यह नीचे के आाश्रयकी तुल्यतासे पुच्छवत् पुच्छ कहते हैं। [पक्ष ऋरु पुच्छशब्दके उच्चारससे पक्षिके आकारकी कल्पनाको देखावेहैं। पागे तिसकी कल्पनासे वाह्य विषयकी आासक्रिके निषेधकी हेतु बुद्धिके आत्मा विषे स्थिर करने के अर्थ है, उपासनाका विधान यहां कहनेको इच्छित नहीं ] इस कथनकरके तग्रिम कहने के प्रासमयादि कोशोंके, साचे विषे डालनेसे प्रगलितहुये ताम्रादि धातुओंकी प्रतिमावत्, रूपकपनेकी सिद्धिहोवे है।अर्थात् जिस पकारका सांघाहोताहै तिसमें पूर्णतासे तिसहीके आकार धातु की प्रतिमा होती है परन्तु सो प्रतिमा सांचे के अन्तर तिसके पू- साकार हुई भी सांचे अरु तिसके धर्मादिकोंसे पृथकूही होतीहै, तैसे अन्नमयकेनीतर प्राणमय तिसकेभीतरमनोमय तिसकेभी- तर विज्ञानसय तिसके भीतर आनन्दमय, इसप्रकार जानना'। तिसही व्राह्मसवाक्य करके उंक् अर्थविषे त्परन्नंमयके स्वरूप का बोधक यह श्लोक कहिये मन्त्र होताहै॥ २५॥

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। अप्रथ द्वितीयोऽनुवाक: २।

परथो तर्रन्नेनैव जीवन्ति। तथैनदपि यन्त्यन्ततः। ्र््रन्रं- छं हि भूतानां ज्येष्ठम। तस्मात्सर्वौषधमुच्यते। सर्वैवै तेऽन्नमाप्नुवन्ति। येऽन्नं ब्रह्मोपासते। त्र्पन्नछं हि भू- तानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वौष्धमुच्यते। अ्र्प्रन्नाङ्गूतानि जायन्ते। जातान्यन्नेनवर्द्धन्ते। अद्यतेऽत्ति च भूतानि तस्मादन्नं तदुच्यत इति॥ तस्माद्वा एतस्मादेन्नरसम- यात् अरप्रन्योऽन्तरात्मा प्ाखमयः। तेनैष पूर्णः। सवाएंष पुरुषविधएव। तस्य पुरुषविधताम् अ्रन्वयं पुरुषविधः । .तस्य प्राण एव शिरः। व्यानो दक्षिण: पक्षः। अपान उत्तर: पक्ष:। आरकाश आरात्मा। एथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति २६।। इति द्वितीयोडनुवाक:॥। हे सौम्य ![ यहां यह रहस्यहै कि उपक्रम अरु उपसंहारकी ब्रह्म ऋरु आत्माकी एकताके प्रतिपादनसेही, परिसमाप्तिसे ग्रंथ के मध्यमें उपासनाकी विधिविषे तात्पर्यके हुये वाक्य भेदके प्र संगसे, अरु इसही से "एवाङ्ेस्तुतिपरार्थत्व्ादिति" अन्त बिषे स्तुतिपर अर्थके होने से,। इस न्यायकरके जैसे प्रयाजादि फल. का अ्रवश अर्थवादहै,तैसेअन्ममयादिकोंके ज्ञानके फलका श्रवण भी अर्थवादहीहै, क्योंकि तिसतिस कोशबिषे बुद्धिके स्थिर करने को पूर्व पूर्व कोशगत बुद्धिके विलयसे आत्माके निश्चयका सा- धन होताहै ताते ]।' अर्थात् अन्नमयादि कोशोंके श्रवसका फल केवल अर्थवादमात्रही है तथापि कोशों का श्रवस कोशातीत परात्माके निश्चयमें साधनहै क्योंकि प्रथम अ्न्नमयके अ्रवखसे ुद्धि तिसविषे स्थिरताकोपावती है, पुनः प्रासमय जो अ्रन्नमय

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८६ तैत्तिरीयोपनिषद्। का तप्रन्तरात्माहै तिसके श्रवससेअ्नमयसे हटके वुद्धि प्रायामय में स्थितिको पावती है, इसप्रकार उत्तरोत्तर कोशों के अ्रवस से बुद्धि पूर्व पूर्व कोशों के विचार को त्यागती है, इसप्रकार जव बुद्धि अपन्तके आनन्दमयकोशके अरवससे तिसविषे स्थिरतां पायं पश्चात् उस आप्रानन्दमयके आधार त्र्प्राश्रय त्रह्मसे अ्रभिन्न सर्वकोशातीत पात्मा को श्रवण करतीहै तव त्र्प्रानन्दमय कोश से हट अपने परत्यगात्मा को यथार्थ निश्चयकर तिसविषे त्रचल स्थिरताको पावती हैं, ताते पंचकोशोंका श्रवणा मनन विचार अपनेआ्र््ाप पंचकोशातीत आ्ररात्माके यथार्थ निश्चयकका साधनहै। रसादि सप्तधासु भावसे परिणामको प्राप्तहुये।"त्र्रन्नाद्वैप्रजाः प्रजायन्ते, या: काश्च परथिवीथंथिता:, तथो अ्र्रन्नेनैवजीवन्ति, अथैनदपियन्त्यन्ततः, अन्नथहिभूतानां ज्येष्ठम, तस्मात्सर्वषध- मुच्यते सर्ववैतेऽन्रमाप्नुवन्ति, येऽन्नंब्रह्मोपासते"। ६त्रन्नसे प्रसिद्ध जे कोई पृथिवीको त्र्प्राश्रय करनेवाली प्रजाउत्पन्नहोती है, अन्न सेही जीवे है, पश्चात् शन्नविषे त्रन्नमेंही लीन होवेहै, ताते अन्न भूतोंके मध्य ज्येष्ठ है, ताते सर्वका औषध कहते हैं, जो पंन्नरूप ब्रह्मको उपासतेहैं, सो निश्चय करके सर्व त्रप्रन्न पावते है; अर्थात् त्रन्नसे प्रसिद्ध जे कोई विलक्षण पृथिवी को आराश्रय करनेवाली स्थावर जंगमरूप प्रजा है सो सर्व उत्पन्न होती है, ऋरु उत्पन्नहुये प्रजा त्रन्नसेही जीवे है, पीछे त्रन्तविषे। इर्थांत् आयुकी समाप्ति विषे इस अन्नरूपा पृथिवी मेंही लीन होवे है, क्योंकि जिसकरके तन्न जो है सो भूत कहिये प्राशधारियों के मध्य ज्येष्ठ है, अर्थात् प्रथम उत्पन्न हुआहै, शरु जिसकरके छरान्न, त्र्रन्नमयादिक अन्यभूतों का कारशाहै इसही करके सर्व प्रजा अन्नसे उत्पन्नहोती है, तरु अ्रन्नसेहीजीवे है, श्र्प्र त्रन्नबिषे लय होवेहै। जिसकरके ऐसे है ताते अन्न जो है सो सर्व प्राणियों के देहके दाहकी निवृति करनेवाला औषध कहते हैं।। तप्रब अ्न्न रूप ब्रह्म के जाननेवाले पुरुषके अर्थ फल कहते हैं। जो पुरुष उक्क

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ८ प्रकारके अ्रप्रन्नरूप ब्रह्मको उपासते हैं सो निश्चय करके सर्व त्- ननके समूह को पावते हैं। कैसे कि जिसकरके मैं ब्रह्मसे उपजा हौं अरु प्न्नरूप हौं। 'अन्नसेही जीवताहौं'। अरु अन्न विषेही लय होऊँगा, ताते अन्न ब्रह्म है, इसप्रकार जानते हैं।। पुनः अन्नरूप आ्र्रात्माकी जो उपासनाहै सो सर्व अन्नकी प्रातिरूप फलवाली कहते हैं। तहां। "अन्न्शहि भूतानां ज्येष्ठम, तस्मा- त्सर्वोषधमुच्यते, अन्नाद्द्रूतानि जायन्तें, जातान्यन्नेनवर्द्धन्ते, अद्यतेऽत्ति च भूतानि, तस्मादन्नं तदुच्यत इति"। जाते अ्र्प्र'्न भूतों के मध्य ज्येष्टहै, ताते सर्वका औषध कहते हैं, अन्नसे भूत उपजते हैं, उपजेहुये अन्नसे वृद्धिको प्राप्तहोते हैं, भक्षण करते हैं शरु भक्षण करे है, ताते सो अन्न कहते हैं, अर्थात् जिस करके अ्र्पन्न जो है सो सर्व भूतोंके मध्य बड़ाहै,क्योंकि प्रथम उपजाहै, ताते उसको सर्वका तषध कहते हैं, अरु तिसही से सर्व अन्नरूप आात्माके उपासकों को सर्व अपन्नकी प्राप्तिबने है, अरु अन्नसे भूत प्राणी उपजते हैं, अरु उपजे हुये अन्नसेही वृद्धि को पावते हैं,। यह पुनः जो कथनहै सो प्रसंग की समात्तिके अर्थ है।। अब अन्नशब्द का अर्थ कहते हैं, जिसकरके जो अन्नमय स्थूलशरीर भूतोंकरकें भक्षण कियाजाताहै, अरुआ्प भूतोंको भक्षण करताहै,ताते सो अन्न है ऐसा कहते हैं। अरु यहां मूल बिषे जो। "इति"। शब्द हैं सोप्रथम अन्नमय कोशके वर्ानकी परिसमातिके अर्थ है ॥।।हे सौम्य!भोजन किये अ्रन्नसे पुरुषके उदरबिषे शुक्र अरु स्त्री के उ-ं , दरविषे शोषिंत उत्पन्न होवे है, सो शुक्र शोगित जब स्त्री के गर्भ- स्थानविषे जन्म लेनहार जीवों के प्रारब्ध संस्कार से भोगालय स्थूल शरीर की उत्पत्ति के निमित्त से एकत्र होते हैं तब उस गर्भस्थान विषेएक बुद्बुद निर्माणहोय पश्चात् शिर हस्तपादादि अवयवों सहित यह शरीर निर्माण होता है पुनः सो माताके उदर में.अन्न के रसकरके वृद्धि को पावता है अरु गर्भ से बाहर आाये पश्चात् भी दुग्धादि अ्न्नके रसवा साक्षात्अ्रन्नसे वृद्धिको पावता

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तैत्तिरीयोपनिषद्। सता जीवताहै अरुआायुके समाप्हुये अन्तविषे अ्न्नरूपा पृथिवी में लयहोता है वा सिंहादि मांस आहारी जीवों का अन्न होता है, ताते इस अन्नमय स्थूलशरीर को अन्नमय कोश कहते हैं, ऋपररु शिर हस्त पादादिक अ्रवयवों सहित जो प्रत्यक्ष भासता है सोई इसका स्वरूप है, अरु जीवों को अपने शुभाशुभ कर्मों के सुखदुःखरूप फलके भोगने का स्थान भोगालय है, तरु जायते, तस्ति, इत्यादि षद् भाव विकार इसके धर्म हैं, ऐसा जो अन्नमय कोश अरन्नादि भूतों का कार्य अरु जड़ होने से यह ात्मा नहीं, आत्मा जो है सो "घटद्रष्टा घटान्िन्नः" इस न्याय से इस अन्नमय कोशका द्रष्टा साक्षी अन्नमयसे पृथकूही है, तररु इस अन्नमय का द्रष्टापना अपने बिषे पायाजाता है ताते इस परपरन्नमयके द्रष्टा चैतन्य साक्षी त्रप्रात्मा त्र्प्रपुन ञ्रन्नमय को शनहोय के इससे पृथकूही है, इसप्रकार विचारके अपपने आापको त्रन्नमय से पृथकूही निश्चय तपनुभव करना'।। त्ररब ञ्र्प्रन्नमयसे त्रादिलेके आप्रानन्दमय कोश पर्यन्त जो आ्ररात्मा हैं तिनसे अप्त्यन्त त्र्प्रान्तर जो ब्रह्महै, तिसको त्र्पनेक तुषाके दूरकरने करके तंदुलवत्।'वा त्रनेक मुंजको दूरकरके ईषिकावत्'। विद्यासे अविद्याकृतपं चकोशों के दूर करने करके प्रत्यगात्मारूपसे देखावने को इच्छताहुआ््र शास्त्र कहने का आरंभ करता है।।"तस्माद्वाएतस्मादन्नरसमयात् अ्र- न्योऽन्तरात्मा प्रासमयः,तेनैषपूर्ण:,सवाएषपुरुषविधएव"।तिस इसअन्नरसमय से अन्य अन्तरआरत्मा प्रामयहै, तिसकरके यह पूर्णहै, सो प्रसिद्ध पुरुषके आकार वालाही है, अर्थात् तिस इस कथन किये अन्नरसमय पिंडसे अन्य (भीतर) पिंडवत्ही आात्मापने करके मिथ्या कल्पित तपात्मा प्रासामय है, अर्थात् प्ाए जो वायु तिसरूप है.। तिस प्रासमय करके 'वायुसे, पूर्ण लोहकारके गृहकी:धमनी चर्मवत्' यह अन्नरसमय आरात्मापूणाँ है। सो प्रसिद्ध यह प्राएामयरूप आांत्मा शिर अरु पक्ष आदिक अंगोंसे पुरुष के आपकारवालाही है।। क्या सो आपही पुरुषाकार है,

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। तहां नहीं, ऐसा कहते हैं, प्रथम अन्नमयरूप आरात्मा को एरुष के आकार करके युक्रपना प्रसिद्ध है। "तस्य पुरुषविधताम् अन्वयं पुरुषविध: तस्य प्राए एव शिर:, व्यानो दक्षिण: पक्षः, अ्पपान उत्तर: पक्षः, प्र्राकाश आत्मा, पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा, तद- प्येष श्लोको भवति"। तिसकी पुरुषाकारतासे पीछे यह पुरुष के आाकारवाला है, तिसका प्रासही शिरहै, व्यान दक्षिण पक्ष है, अपान उत्तर पक्ष है, आकाश आरत्मा है, पृथिवी पुच्छरूप प्रतिष्ठ है, तिसही विषे यह श्लोक होता है, अर्थात् तिस अन्न रसमयकी पुरुषाकारताके पीछे सांचेचिषे डालेहुये प्रगलितताम्रा- दि धातुके प्रतिमावत् यह आसमय।'अन्रमय'। पुरुषके आररकार वालाहै, स्वरूपसे ही नहीं। इसप्रकार पूर्व पूर्वकोशकी पुरुषा- कारताके पीछे पिछला पिछला कोश पुरुषके आकारवाला होवे है रु पूर्वपूर्वकोश उत्तरउत्तरकोश करके पूर्ण है। इसप्रायामयको पुरुपकी प्रप्राकारता कैसे है तहां कहते हैं,।। तिस प्राशामय कोशरूप पक्षी का स्वयं प्राणहीशिरहै, अर्थात्।' "मुख नासिकाम्यां स्वयं प्राणाःप्रतिष्ठते"इत्यादिअ्न्यश्रुतियों के प्रमाणसे'। वायुके विकार पारामयकोशका मुख नासिकाके मार्गसे वाह्य निकलाहुआ वृत्ति विशेषरूप जो प्राणाहै सो शिरवत् कल्पना कियाहै, क्योंकि श्चति विपे कथन कियाहै ताते। इसप्रकार सर्व ठिकाने श्ुतिके कहने प्रमाणही पक्षादिकोंकी कल्पनाहै।। अरु तिस प्राएामयका व्यान नामक प्राण वृत्ति विशेषरूप दक्षिण पक्षहै। अरु अपान नामक प्राण वृत्ति विशेष उसका उत्तरपक्ष है। अरु आरकाश छात्मा है, अर्थात् अन्तराकाशमें समान नामवाला वृत्ति विशेषरूप प्रास है सो उसका आत्मा (मध्य शरीर) वत् आत्मा है, क्योंकि तिस समान को प्रासकी अन्य वृत्तिर्योविषे श्रेष्ठता है अरु नाभि के त्काश मध्यविषे स्थित है ताते, अरु अन्य अन्तविषे स्थित प्रासकी वृत्तियोंकी तप्रेक्षासे सो समान नामवाला वायु आ्रपरत्मा है:"मध्यंह्येषामंगानामात्मेति" इन अंगोंका मध्य झात्मा है,।

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तैत्तिरीयोपनिषद्। इस क्रतिबिषे मध्यभागमें स्थित वस्तुकातरप्रात्मापना प्रसिद्ध है। छरु इस प्रासामयकी प्ृथिवी पुच्छरूप प्रतिष्ठा (आधार) है। झरु अध्यात्मरूप प्रासाका पृथिवीरूप देवता धारण करनेवाला है, क्योंकि पृथिवी को स्थितकी हेतुताहै ताते॥ प्ररु "सैषापुरुप- स्यापानमवष्टभ्येति" सो यह पृथिवी पुरुपके अ्रप्रपानको धारण करके स्थित है,। यह अन्यश्रुतिका भी प्रमाण है ताते। अप्रन्यथा शरीरका उदाननामक प्रासवृत्तिसे।'जो उर्द्उत्कामण में मुख्य है,। ऊर्द्ध गमन होवेगा या भारी होने से पतन होवेगा, तस्मात् प्रशामय कोशरूप तरप्रात्माकी प्रथिवी देवता पुच्छरूप प्रतिष्ठा है। ऋरु तिसही अर्थबिषेअर्थात् प्राएम यश्ात्माके विषयमें यहश्लोक (मन्त्र) प्रमागाहै।।।' हे सौम्य!अप्रन्नमय कोशके अन्तर वायुरूपजो प्राशामयकोशहै सो घटान्तर वायुवत् त्रन्नमयमें तिसही के ्र्प्राकार पूंखतासे स्थित है'। तरु प्राणादि पंच प्राए ञरु वागादि पंचज्ञाने- न्द्रियांमिलके प्राएमयकोश हुआप्राहै अपररु प्रासकोकक्ियाशक्ति प्रधान होनेसे वागादिकमेंद्रियोविषे जो क्रियाशक्ति है सो प्राणकी होनेसे कर्मेन्द्रियों की भी प्रारामय में योजनाहै, अरु प्रासमय कोश को अप्रन्नमय से सूक्ष्म अरु तिसके अन्तर अरु तिसका धारकपना होने से त्न्नमय का आात्मा कहते हैं, अरु मुखनासिका के द्वारसे वाहर जाना अन्तर आावना लेना देना कूदना उछलना पसरना संकोचना अन्नरस को रोम रोम प्रति सर्व नाड़ियों में प्राप्त करना मलमूत्रका त्यागना, इत्यादि इसकी करियाहै, चंचलता स्वभावहै, क्षुधा पिपासा इसकी ऊर्मी (धर्म है) जड़ता इसमेंदोष हैं। ऐसा जो प्रसमयकोशहै सो आात्मानहीं, इस प्राामयका प्रकाशक ज्ञाता साक्षी आत्मा है, सो 'घट द्रष्ट घटाज्िन्नः ज्ञेयसे ज्ञाता पृथक् तरु चैतन्यहोता है, इसन्यायसे प्राएामयके ज्ञाता चैतन्य आत्मा त्पुन प्राशमय न होयके प्रासमयसे पृथक तिसका साक्षी प्रत्यगात्मा है, तपुन प्रायामय नहीं।। इसप्रकार प्रासमय से पृथक् अपने आपका यथार्थत्रनुभवकर निश्चयकरना।।इतिद्वितीयोऽनुवाकः॥

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। अथ ततीयोऽनुवाक: ३॥ प्रायं देवा अनुप्राशान्ति। मनुष्या: पशवश्च ये। प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यते। सर्व्वमेव त आप्रायुर्यन्ति। ये प्राणं ब्रह्मोपासते। प्राणो हि भूता- नामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति। तस्येष एव शा- रीर तरात्मा। यः पूर्वस्य॥ तस्माद्दा एतस्मात्प्रारमयात् अन्योऽन्तरात्मा मनोमयः। तैनैष पूर्णः। स वा एष पु- रुषविध एव। तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं पुरुषवि- धः। तस्य यजुरेव शिरः। ऋग् दृक्षिण: पक्षः। सामो त्तर: पक्ष: ।आादेश आर्रात्मा।अरथर्वाद्गिरसः पुच्छंप्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति॥ २७॥इति ततीयोऽनुवाकः॥३॥ हे सौम्य![श्रात्मशब्द के अरमुख्य अ्रर्थताके प्रसंग से, अप्रस प्रसंगविषे प्राप्त अर्थ के ग्राहक 'एतत्' शब्दके विरोधसे। एतदर्थ सर्व कोशों के अध्यासका अधिष्ठानरूप चिदात्माही यहां आात्म शब्दकरके कथनकरने को इच्छित है, इस तात्पर्य को कहते हैं। यहां अर्थ से।"इति"। इस,। इस शब्दका आरात्मशब्दके सामर्थ्य से अरु कल्पित को अधिष्ठानपने के असंभव से यह अर्थ है ] ।"प्राणं देवा अनुपाणान्ति, मनुष्या :पशवश्चये, प्रासोहि भूता- नामायुः, तस्मात्सर्वायुषमुच्यते, सर्वमेव त आरप्रयुर्यन्ति, ये प्रास न्रह्मउपासंते"। 'प्राण के पीछे देवा प्राणन को करते हैं, जे म- नुष्य अरु पशुहैं, जाते प्रासाभूतोंका आयुहै, ताते सर्वका आयु कहते हैं, प्राणब्रह्म को जो उपासते हैं सो सर्व ही आयु को पात्रते हैं; अर्थात् जिसकरके प्राणके पीछे देवता प्रासान 'जीवन' को करते हैं, अर्थात् अग्न्यादिक जे देवता हैं सो प्राशान कहिये जी- वनक्रिया की शक्रिवाले वायुरूप प्रासके पीछे तिसके स्वरूप भूतहुये प्रानरूप कर्म को करते हैं, अर्थात् प्रासनरूप क्रियासे

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६२ तैत्तिरीयोपनिषद्। क्रियावान् होते हैं, अथवा अध्यात्मरूप विकार के अधिकार से देव जे इन्द्रियां सो मुख्य प्रासके पीछे चेष्टा करते हैं। तैसे जो मनुष्य शरु पशु हैं सो प्राशन रूप क्रियासेही चेष्टवाले होते हैं। याते परिच्छिन्न पन्नमयरूप तरात्मासेही प्राणणी आात्मावाले नहीं होते, किन्तुतिसत्न्नमय के अन्तर्गत साधारणरूपही सर्व पिंड बिषे व्यापी प्रासामय सेभी मनुष्यादिक प्राणी आ्रात्मावाले होते हैं। इसप्रकार पूर्व पूर्व विषे व्यापी उत्तर उत्तर सूक्ष्मरूप आ्र्प्रकाशा- दिक भूतों से प्र्प्रारम्भ किये त्र्प्रविद्यारचित मनोमय से आरप्रदि लेके परानन्दमय पर्यन्त तात्मा से सर्व प्राणी त्परात्मा वाले होते हैं। तैसे आाकाशादिकों के कारण नित्य त्रविकारी सर्वगत सत्यज्ञान अनन्तरूप पंचकोशातीत सर्वस्वरूप स्वांभाविक त्रात्मा से भी सर्व प्राशी आात्मावाले होते हैं। अरु जिसकरके सो परमार्थ से सर्वका आत्मा है तिसकरकेही यह कथन वनता है। यह अर्थ.से कथन किया होता है।। प्रश्न॥ देवजो है सो प्राणके पीछे जीवन- रूप क्रिया को कहते हैं, इसप्रकार कहा तिसकरके क्या सिद्ध हुआा॥ उ०॥ तहां कहते हैं, जिसकरके प्राणा सर्व प्राणीमात्रका जीवनहै, "यावळय्मिञ्छरीरे प्राएं वसति तावदायुरिति"यावत्इसशरीर बिषे प्राण बसता है तावत् आयु है,। इसतन्य श्रुतिके वाक्य से ताते प्राण को सर्वका तरप्रायु कहते हैं। रु जिसकरके लोकविपेप्ाएके ममनहुये सरणकी प्रसिद्धि प्रख्यातहै ताते प्राणको सर्वका श्र्प्रायु पना प्रसिद्धही है, याते इस बाह्य असाधारण त्रन्ननयरूप प्रपात्मा से निकलके तिसविषे आात्मबुद्धिको त्यागके इसके भीतर साधा- रण प्रासमय प्रप्रात्मरूप ब्रह्मको "योऽहमस्मि प्राणः सर्वभूता- नामात्मायुर्जीवनहेतुत्वादिति" मैं प्राण हौं तपरु सर्व भूतों का आांत्मा जीवनका हेतु होने से श्ायुहौं,। इसप्रकार जो उपासते हैं सो इस लोक बिषे सर्वही आयुको पावते हैं, अर्थात् तरायुके क्षय से पूर्व अपमृत्युसे मरते नहीं "सर्वमायुरिति" सर्व आयुक्रो पा- वते हैं,। इस श्रुतिवाक्यकी प्रसिद्धिसे वे सौ (१००) वर्ष पर्यन्त

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। तो जीवते हैं, यह युकहै। तहां क्या कारण है कि। "प्रासोहि भू- -तानामायुः, तस्मात्सवायुषमुच्यत इति, तस्यैष एव शारीर झात्मा, य: पूर्वस्य, तस्माद्वा एतस्मात्प्रारामयात्।अन्योऽन्तरात्मा मनो- मयः, तेनैप पूर्णा:, सवा एष पुरुषविधएव, तस्य पुरुषविधताम्, ञन्वयंपुरुषविधः"। 'प्राणही भूतोंका प्र्पायुहै ताते सर्वायुष कहते हैं, यह ही तिस पूर्वके शरीरविषे होनेवाला आात्माहै, तिस प्रसिद्ध इस प्राएमयसे अ्रपन्य अन्तर वपात्मा मनोभय है, तिसकरके यह पूर्णा है, सो प्रसिद्ध पुरुषके आरप्रकारवाला है, तिसकी पुरुषाकारता के पीछे पुरुषके आ्प्राकारवालाहै; अपर्थात् जिसकरके प्राण भूतोंका पप्रायुहै, तिसकरके इसको सर्वका आरपरायु कहते हैं,। जो जिस गुण वाले ज्रह्म को उपासता है सो तिस गुवाला होता है। यहां विद्या के फलकी प्राप्तिके हेतु अर्थ पुनः कथन है। जो यह प्रासमय है यह ही तिस पूर्व के तन्नमयका शरीरविषे होनेवाला आत्मा है।। तिस प्रसिद्ध इस प्रासमयसे अरन्य अन्तरात्मा मनोमयहै, अर्थात् संकल्प विकल्पमय वृत्तिरूप त्रपन्तःकरण स्वरूप तो मनोमयहै सो यह। 'प्रासामयसे सूक्ष्महोने करके'। पाणमयके अन्तर तरपात्माहै। तिस मनोमय करके यह प्रासामय पूर्ाहै। सो प्रसिद्ध यह मनो- मय पुरुषके आरकारवालाहै। सो तिस प्रायामयकी पुरुषाकारता के पीछे यह मनोमय पुरुषके आ्रकारवालाहै। 'स्वरूपसेही नहीं'। ।"तस्य यजुरेवशिरः, ऋगूदक्षिणः पक्षः, सामोत्तर: पक्षः, आदेश पात्मा, अथर्वांगिरस: पुच्छं प्रतिष्ठा, तदप्येष श्लोको भवति"। ६तिसका यजुर्वेदही शिरहै, ऋग्वेद दक्षिण पक्ष है, सामवेद उ- त्तरपक्षहै, आप्रदेश आत्माहै, अथवांगिरस पुच्छप्रतिष्ठा है, तिसही विपे यह श्लोक होताहै; अर्थात् तिस मनोमयका यजुर्वेदही शिर है, अरु ऋग्वेद दक्षिणापक्षहै, सामवेद उत्तरपक्षहै, आदेश कहिये ब्राह्मरभाग आ्रपरात्माहै, अरु त्र्प्रथवांगिरस कहिये अपथर्ववेद पुच्छरूप प्रतिष्ठाहै। अप्रनियमित शरक्षरोंकरके युक्क अ्रन्तके पदवाला मन्त्र विशेष यज्जर कहते हैं, तिसके समान जातिवाले मन्त्रोंका वाची

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६४ तैत्तिरीयोपनिषद्। यजुःशब्दहै, तिसको मनोमयका शिरपनाहै, प्रधान होनेसे। ऋपरु जिसकरके स्वाहाकारादिक यजुर्वेदके मन्त्रों से हवी देते हैं, ताते यागादिकों विषे उपकार करने से तिसका प्रधानपना है। अथवा सर्वठिकाने जो शिर आ्र्प्रादिकों की कल्पना है सो कथनमात्र है। [यहां।"यजुः"। शब्दसे वाह्यका यज्जुर्वेद कहते हैं। तिस यज्ु- र्वेदको तरन्तर के मनोमय के प्रति शिरपना कैसे होवेगा, यह पा- शंका करके कहते हैं। यहांयह तर्थ है कि यद्यपि यज्जःशब्द वाह्य के शब्दों के समूह विषे वर्त्तता है, तथापि श्रुतिको श्र्प्रतिशय शंका करने के योग्य न होने से तिसके प्रमाण भावसे विशिष्ट मनकी वृत्ति यजुः के संकेतकी विषयभूत, शप्ररु "यज्जुर्वेदमधीमहे" य- जुर्वेद को हम पढ़ते हैं,। अरु इस क्रमवाले त्क्षर. यजुवेंदपने करके अध्ययन करने को योग्य है, इस संकल्परूप को। 'मनोमय का शिर'। ग्रहण करने योग्य है] यहां मनकी, स्थान,प्रचल,नाद, इप्ररु स्वरकरके पूर्णापद अप्ररु वाक्य को विषय करनेवाली तिन के संकल्परूप तिनकी भावनावाली जो वृत्तिहै, सो ओरोतादि करण- द्वारा यजुर्वेद के संकेतसे विशिष्टहुई यजुर, इसप्रकार कहते हैं। ऐसे ऋगूहै, अरु ऐसे सामहै। इसप्रकार मन्त्रों को मनोवृत्तिरूप- ताके होनेसे मनकी वृत्तिही तरप्रावर्त्तन करिये है, याते मानस जप संभवे है, अन्यथा विषयरूप होने से घटादिकोंवत् मन्त्र आावृत्ति (वारंवार जप) करने को शक्यनहीं है, याते मानसे जप संसवे नहीं, औ मन्त्रकी त्र्प्रवृत्ति संभवे है।। जो कहे कि बहुलताकरके कर्मोविषे त्रप्रक्षरों की स्मृतिकी आ्र्प्रवृत्ति से मन्त्रकी आ्र्प्रावृत्ति होती है, सोकथन वने नहीं क्योंकि मुख्य अर्थका असंभवहैताते, "त्रिःप्रथ- 'मामन्वाह त्रिरुत्तरामिति" तीनवार प्रथमकी ऋचाको पीछे कहे हैं, तीनिवार पिछली ऋ चाको पीछेक हेहैं,। इसप्रकार ऋचाकी प्रप्रावृत्ति सुनीजाती है। तहांक चाकी विषयताके हुयें तिसकी स्मृतिकी प्रपरावृ- स्तिसे मन्त्रकी आ्रावृत्तिके कियेहुंये "त्रिःप्रथमामन्वाहेति"तीनवार प्रथमकी ऋचाको पीछे कहे हैं इसप्रकार विधान किया जो ऋचा

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ह५ूः की आरवृत्तिरूप मुख्यार्थ तिसका परित्याग होवेगा। [मन्त्रों की मनोघृत्तिरूप ताको कहके अप्रब मनोवृत्तियों की सदा चेतन से व्याप्तहोने करकेही सिद्धिसे चेतनरूप ताको कहते हैं] ताते मनो- वृत्तिरूप उपाधि करके परिच्छिन्न मनोवृत्ति विषे स्थित त्रादि तपरन्तसे रहित तरपरात्म चैतन्य यज्ुःशब्दका वाच्य है, अरु आात्माके विज्ञानरूप मन्त्र हैं। ताते इसप्रकार होने से वेदोंको नित्यपने की प्राप्ति होती है, अन्यथा विषयरूप ताके हुये रूपादिरकोंवत् अपरनित्यता होवेगी सो युक्न नहीं। अरु "सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति समानसीन आप्रात्मेति" जहां सर्ववेद एकत्र होते हैं सो मनिषे स्थित पप्रात्मा है,। यह श्रुति नित्यरूप त्रप्रात्मासे ऋगादि वेदोंकी एकताको कहती हुई तिनकी नित्यताबिषे अनुकूल होवेगी, तरु "ॠचोऽक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन् देवाञ्रधिविश्वेनिषेदुरिति" विश्व के आधार तप्रक्षररूप इस परमाकाश विषे विधि निषेधमय घचारूप वेद तादात्म्य करकेस्थितहै, यह मन्त्रका वर्णन नित्यरूप आररात्मा से तिनकी एकताको दिखावे हैं। तपररु यहां आरादेशनाम ब्राह्मणभागका है, सो कर्त्तव्यके भेदका उपदेश करता है, ताते उसको आरप्रादेश कहते हैं। तरु तथर्वागिरा ऋषिने देखे जो मन्त्र छरु व्राह्मण तिनको आरंगिरस कहते हैं। सो शान्तिक अपरु पौ- ष्टिक आप्रादि प्रतिष्ठाके हेतु कर्मकी प्रधानतासे पुच्छरूप प्रतिष्ठाहै। तिसही अर्थविषे अर्थात् मनोमय तरप्रात्माका प्रकाशक, यह श्लोक कहिये मन्त्र। 'प्रमाण'। होता है।।'हे सौम्य!जैसे घटके भीतर तिसही के आकार पूर्णातासे व्याप ऋरु घटके धर्मादिकों से पृ- थकू वायु रहता है, अपरु तिस वायु से सूक्ष्म होने से वायुके भी. तर रु घटान्तर वायुकेही आकार अरु वायुके धर्मादिकों से र, हित पूर्णता से आरकाश होता है, तैसेही इस अन्नमय कोश के भीतर तिससे सूक्ष्म अरु नख शिख पर्यन्त तिसही के आकार ऋपरु तिसके धर्मादिकों से रहित वायुरूप प्रागामयकोश है, तिस प्राशामयसे सक्ष्म होनेसे प्राणमयके भीतर अरु नख शिख पर्यन्त

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६६ तैत्तिरीयोपनिषद्। पूर्णता से व्याप्त आ्रकाश भूतके वा पंचभूतों के समष्टि रजो- गुसात्मक मनोमय कोश है "मनो वै अ्रन्तराकाशः" तहां इर्प्रा- काशके रजोगुण के श्रोत्र, वायुके रजोगुएकीत्वक्, अप्रग्निके रजोगुख की चक्ष, जल के रजोगुसकी रसना, प्ृथवी के रजोगुसकी घ्राए, इन पांचों ज्ञानेन्द्रियों करके युक जो संकल्प विकल्पात्मक मन तिसको मनोसय कोश कहते हैं सो प्राणमयसे सूक्ष्म अरु भीतर हाने से तिसके आकार हुआ्र प्रासामय का आत्माहै,परु संकल्प विकल्पका करना इसका स्त्रभाव धर्म है,अरु नानाप्रकार के मनो- राज्य इसकी क्रिया है, चंचलता जड़ता रु विषयों की त्रपरोर गि- रना यह इसमें स्वाभाविक दोष हैं। ऐसा जो मनोमय कोश है सो त्रात्मा नहीं क्योंकि काम क्रोधादि वृत्तियों से युक् नियम र- हित स्वभाववाला है ताते, तरु "घटद्रश घटाद्भिन्नः" इस न्या- यसे इस मनोमय का ज्ञाता साक्षी चैतन्य आत्मा पृथक है सो मनोमय का साक्षित्व मेरे विषे होने से मैं मनोमय कोश न होके इसके जाननेवाला चैतन्य आात्मा इससे भिन्न मैं हौं, यह जड़ विकारी मनोभय कोशमय, नहीं तरु यह मेरा नहीं। इस प्रकार मनोमय कोशके पृथक् साक्षीरूप त्प्रपुनको यथार्थ त्रपरनुभवकरके निश्चय करना' ॥ २७ ॥ इति तृतीयोऽनुवाकः ॥३॥

थ चतुर्थोडनुवाक: ४॥

यतो वांचो निवर्तन्ते अर््रप्राष्य मनसा सह। तर्प्रानन्दं ब्रह्मणो विद्वान। न बिभेति कदाचनेति। तस्यैष एव शा- रीर आत्मा। य: पूर्वस्य॥ तस्माद्ा एतस्मान्मनोम- यात् तप्रन्योऽन्तर व्र्प्ात्मा विज्ञानमयः। तेनैष पूर्णः। स वा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधताम्। अरन्वयं पु- रुषविधः। तस्य श्रद्वैव शिरः। ऋतं दक्षिणः पक्षः।

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द्वितीयाध्याय ब्रम्मानन्दवल्ली। ६७ सत्यमुत्तर: पक्षः। योग आर्प्रात्मामहः पुच्छं प्रतिष्ठा। तद- प्येष श्लोको भवति ॥ २८॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः॥ हे सौम्य![यहां यह अर्थहै कि ब्रह्मको वाणी मन आ्प्रादिकों का विषयपना संभवे नहीं, क्योंकि अपनेस्वरूपविषे वर्ततनेका विरोधहै ताते,एतदर्थ वासी अरु मन करके विशिष्ट मनोमयसे मन साहत वासियां निवृत्त होतीहैं]।"यतोवाचो निवर्त्तन्ते श्रप्ाप्यमनसासह, आानन्दंब्रह्मणो विद्वान, नविभेति कदाचनेति, तस्यैष एव शारीर आत्मा, यः पूर्वस्य, तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात् अन्योऽन्तर पात्मा विज्ञानमयः"। जिससे मन सहित वाणियां अपाप्य होके निवर्त्त होती हैं, ब्ह्मको जाननेवाला कदाचित् भयको प्राप्त होता नहीं, जो यह मनोमय है यहही तिस पूर्वलेका शरीरबिषे स्थित आत्मा है। तिस प्रसिद्ध इस मनोमयसे अन्य अन्तरात्मा वि- ज्ञानमय है? अर्थात् जिससे मन सहित वासीआदि इन्द्रियां प्राप्त न होके निवृत्त होती हैं, अरु ब्रह्मको।' सम्यक् प्रकार' जाननेवाला।' विद्वान्'। कदाचित् भी भयको प्राप्त होता नहीं, परु जो यह मनोमय है सोई तिस पूर्वले प्राणमय का शरीर विषे स्थित आात्मा है, तिस प्रसिद्ध इस मनोमयसे अन्य अन्त- रात्मा विज्ञानमय है। अरु मनोमय जो है सो वेदरूप कहाहै, अरु वेदके अर्थको।'यथार्थ'। विषय करनेवाली जो निश्चया- त्मिका सुद्धि तिसको विज्ञान कहतेहैं, सो निश्चयरूप विज्ञान अन्त:करणाका धर्महै। अरु तिसरूपहुआ्प्र प्रमाणस्वरूप निश्चय- रूप ज्ञानोंसे निर्वाहकिया जो आरात्मा सो विज्ञानमय है। शरु जिसकरके प्रमाणके ज्ञानपूर्वक यज्ञादिक करते हैं, शरु तिस विज्ञानको जो यज्ञादिकों की हतुता है सो अग्रिम मन्त्रकरके कहेंगे इस प्रकार कहा जो विज्ञानमयहै।"तेनैष पूर्णः, सवाएष पुरुष. विध एव, तस्य पुरुषविधताम्, अन्वयं पुरुषविधः": तिसकरके यहपूणाँहै, सो प्रसिद्धयहपुरुषके आप्रांकारवालाही है, तिसकी पुरुषा- कारताके पीछे यह पुरुषाकारवाला होता है; अर्थात् तिसकरके

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तैत्तिरीयोपनिषद्। यह मनोमय पूर्ण है।'जैसे शब्दात्मक ऋगादिवेद अपने अ्रथोंकरके पूर्णहै, तैसेवेदरूप मनोमय अपरपने श्र्प्र्थरूप विज्ञानमयकरके पूर्णाहै, शरु जैसे वेदका अर्थ ज्ञान वेदके सीतर होता है, तैसेअर्थ ज्ञानरूप विज्ञानमय वेदरूप मनोमयकेभीतरहै'।पररु सोप्रसिद्धयहविज्ञान- मयपुरुषके आरंकारवालाही है। अरु तिसमनोमयकी पुरुपाकारता के पीछे यह विज्ञानमय पुरुषके आकारवांता होता है "तस्य श्र- द्वैव शिरः, ऋंतं दक्षिएं: पक्षः, संत्यमुत्तरः पक्ष:, योग आत्मा, महः पुच्छं प्रतिष्ठा, तदप्येष श्लोको भवति"। तिसका श्रद्धा ही शिरहै, अरु तिसका ऋत दक्षिए पक्ष है, तरु सत्य उत्तरपक्ष है, योग आत्मा है, महत्पना पुच्छ प्रतिष्ठा है, तिसहीविषे यह श्लोंक होता है; अर्थात् तिस विज्ञानमय का श्रद्धाही शिरहै, क्योंकि जिसकरके निश्चयरूप विज्ञानवाले पुरुषको करनेयोग्य रथोविषे पूर्वश्रंद्धा संभवे है, इस करके सो सर्व कर्त्तव्योंके मध्य प्रथम (मुख) होनेसे शिरवत्शिर है। अरु तिसका भतनाम दंक्षिापक्ष है, तरुं सत्यनाम उत्तरपक्ष है, अरु योग जो चित्तकी वृत्तिका निरोधरूप एकायता सो तर्पात्मावत्।'विज्ञानमय का'। आत्मा है, अर्थात् जिस करके समाधान चित्तवाले युक्र पुरुंष को श्रद्धादिक जो हैं सो अंगोवत् यथार्थ निश्चयविषे समर्थ होते हैं, ताते चिंत्तका समाधानरूप योग विज्ञानमयका आात्मा है। अरु प्रंथम उत्पन्न हुआ जो महत्पना सो पुच्छरूंप प्रतिष्ठा है "महद्यक्षं प्रथमजमिति"महान् यक्ष प्रथमजन्य है,। इस अ्रन्य श्रुतिके प्रमाणसे सो महत्पना प्रथम उत्पन्नहुआ है यंह कारण होनेसे महतूंपना पुच्छ प्रतिष्ठा है। जिस करके कारण जो है सो कार्य्यों की प्रतिष्ठा है, जैसे वृंक्ष अरु वल्लियों की प्रतिष्ठा कहिये आधार पृथ्वी है। तैसेही सर्व बुद्धिरूंप विज्ञानी का महत्- पंना कारण है। तिस हेतुकरके सो महत्तत्वं तिस विज्ञानमयरूप शस्मा की प्रतिष्ठा है। तिसहीं अर्थविषे अर्थात् विज्ञानमयरूप झपात्माकी बोधक प्रकांशक यह श्लोक कहिये मन्त्र होताहै। जैसे

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ब्राह्मराविषे उक्र अ्न्नमयादिकों के प्रकाशक श्लोक हैं तैसे। इसप्रकार सर्वमयको भी विज्ञानका कर्त्तापना है।।।'हे सौम्य!'। 'जैसे मृन्मय घटके अन्तर तिसही के आकार अरु तिससे भिन्न पूर्णतासे वायु होताहै, तरु तिस वायुके अन्तर तिसहीके आकार अरु तिससे पृथक् पकाश होताहै, तरु तिस आकाशके अन्तर शरु तिसहीके प्राकार तिससे पृथक तिसका प्रकाशक सक्ष्मतेज होताहै। तैसे अन्नमयकोशरूप घटके अन्तर तिसहीके आकार तिसके धर्म्मादिकों से पृथक् पूर्णतासे व्याप् तिसका आरात्मा प्रासमय है, तिस प्राशामयके अन्तर प्रासमय से सूक्ष्म प्रासामय के आकार शरु तिसके धर्मादिकों से पृथक् पूर्णता से व्याप प्रासामयका आत्मा मनोमय कोशहै। अरु तिस मनोमय के अन्तर तिससे सूक्ष्म तिसही के आकार तिसके धर्मादिकों से पृथक् पूर्णता से व्याप मनोमय का आ्रात्मा विज्ञानमय है। तहां चक्षरादि पांच ज्ञानेन्द्रियां अरु विज्ञानवती निश्चयात्मक वुद्धि मिलके विज्ञानमय कोश हुआहै सो मनोमय से सूक्ष्म अरु तिसके अन्तर होने से तिसका पप्रात्मा है, परन्तु साक्षी आात्मा. जो विज्ञानके भावाभाव का प्रकाशक है, तिसकी त्रप्रपेक्षा विज्ञा- नमय बुद्धि जड़ है, तरु सुषुपतिविषे चिदाभास सहित वा चिदा- भाससे प्रृथक हुई अपने कारण अविद्या में लय होतीहै, अरु पुनः जाग्रत्को पाय चिदाभास करके युक्क हुई नखशिख पर्यन्त व्याप होतीहै अरु जिस अरंगमें जहां कहीं दुःख वा सुख होताहै तहांहीं तिसको अनुभव करती है परन्तु साक्षी आत्माके प्ाभास करके युक्तहुई करती है केवल स्वरूपसेही नहीं, ऐसा जो विज्ञानमय कोश है तिसके भावाभाव धर्म कर्मादिकों के प्रकाशक साक्षी झात्मा अपुन है सो तपुन विज्ञानमयकोश न होके तिसके ज्ञाता तिससे पृथकूही है, ताते विज्ञानमय कोश अपरपुन नहीं अरु सो ध- पना नहीं इसप्रकार विज्ञानमय कोशसेप्टथक्सर्वकेसाक्षीअपनेश्ा- पकोयथार्थअनुभवकरकमिश्चयकरना।। इतिचतुर्थोडनुवाकः॥४॥

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१०० तैत्तिरीयोपनिषद्। विज्ञानं यज्ञ तनुते। कर्माि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे। ब्रह्मज्येष्ठमुपासते। विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद। त- तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा सर्व्चान् का- मानू समश्नुत। इति। तस्यैष एव शारीर त्रात्मा। य: पू- र्वस्य ।। तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तरत्प्र- त्माऽडनन्दमयः। तेनैष पूर्णः। सवा एष पुरुषविध एव। तस्य पुरुषविधताम। ऋ्रन्वयं पुरुषविधः। तस्य प्रिय- मेव शिरः। मोदो दक्षिणः पक्षः। प्रमोद उत्तरः पक्षः। आरानन्दं आात्मा। ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येष श्लोको भवति ॥ २६ ॥ इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥ हे सौभ्य!।"विज्ञानं यज्ञं तनुते, कर्माणि तनुतेऽपि च, विज्ञानं देवा; सर्वे, ब्रह्मज्येष्ठमुपासते, विज्ञानं ब्रह्म चेद्ेद, तस्माच्चेन्न प्र- माद्यति, शरीरे पाप्मनो हित्वा सर्व्वान् कामान् समश्नुत इति"। विज्ञान यज्ञको विस्तारताहै कर्मोंको विस्तारताहै, सर्व देवता विज्ञानरूप ज्येष्ट ब्रह्मको उपासते हैं, विज्ञानरूप ब्रह्मको जब जानता है, तिस करके जब प्रमाद को पावता नहीं, शरीरबिषे. पापों को छोड़के सर्व भोगोंको भोगता है., अर्थात् विज्ञानमय- यज्ञों को विस्तार करता है।'अर्थात् जिसकरके विज्ञान (शास्त्रीय ज्ञान) वान् पुरुष श्रद्धा पादिक अंगोंपूर्वक यज्ञोंको करता है, तिसही करके विज्ञानको यज्ञोंका कर्त्तापना है। अरु कर्मों को भी, विस्तार करताहै'। अर्थात् जिस करके सर्व विज्ञानका कर्तापना है तिसही से विज्ञानमयरूप आत्मा ज्रह्म है, यह कथन युकही है। किंवा सर्व इन्द्रियादिक देवता विज्ञानरूप ज्येष्ट (प्रथम उत्पन्न) ब्रह्मको उपासते हैं अर्थात् ध्यावते हैं, क्योंकि सर्व से प्रथम उ- स्पन्नहुआ है ताते, अथवा सर्व वृत्तियों को तिस विज्ञान के पू- धैंक होने से विज्ञानको प्रथम उत्पन्न हुआ कहते हैं। अरु जिस

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। 16001 १०१ करके उस विज्ञानमय ब्रह्मविषे अभिमान करके देवता उपासते हैं, तिस करके सो देवता महद्ब्ह्मकी उपासना से ज्ञान ऐश्व- र्यवाले होते हैं। तिस विज्ञानरूप ब्रह्मको जब जानता है, तरु केवल जाननाही है ऐसा नहीं, किन्तु [बाहिरके अनात्माविषेही आ्ात्मभावना के होनेसे विज्ञानरूप ब्रह्म विषे आत्माकी भावना से हुआ जो प्रमाद है, तिसकी निवृत्तिके तर्थ।"तस्माच्चेन्न प्र- माद्यति"। तिससे जव प्रमादको प्राप्त होता नहीं,। अर्थात् जब पपरन्नमयादिकों विषे श्र्प्रात्मभावको त्यागके केवल विज्ञानमय ब्रह्म विषे आात्मभाव की भावना करताहुआ्र स्थितहोवे, इस प्रकार कहते हैं ] तिस विज्ञानमय ब्रह्मसे जव प्रमादको पावता नहीं तव शरीर विषे पापों को त्यागके सर्व भोगों को भोगता है।ञ- र्थात् सर्वपाप शरीके अभिमानरूप निमित्तवाले हैं, अरु तिनका छत्रके नाशहुये छायाके नाशवत् विज्ञानमय ब्रह्मबिषे त्रप्रात्मा- भिमान से शरीर के अभिमान्रूप निमित्त के नाश हुये नाश सम्भवे है, ताते शरीर के अभिमानरूप निमित्तवाले तरु शरीर विषे होनेवाले सर्वपापोंको शरीरविषेही त्याग के विज्ञानमय ब्रह्म -. स्वरूपको प्राप्तहुआप्र तिसविषेस्थित सर्वभोगों को विज्ञानमयस्वरूप सेहीसम्यकप्रकार भोगताहै।अरु।"तस्यैषएवशारीरत्र्प्रात्मा,यःपू- र्वस्य, तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात् अन्योऽन्तर आ्रत्माSSनन्द- मयः, तेनैष पूर्ण:, सवाएष पुरुषविध एव, तस्य पुरुषविधताम्, अन्वयं, पुरुषविधः"। 'यहही तिस पूर्वलेका शरीरबिषे होनेवाला आत्माहै,तिसप्नसिद्ध इस विज्ञानमयसे अन्य अन्तरात्मा न्रानन्द- मयहै, तिसकरके यह पूर्णाहै, सो प्रसिद्ध यह (आनन्दमय) पुरुषके आकारवाला ही है, तिसकी पुरुषाकारताके पीछे यह पुरुष के आकारवाला है अर्थात् जो यह विज्ञानमयहै यहही तिसपूर्वले - मनोमयका शरीरी कहिये मनोमयविषे होनेवाला आत्माहै तिस प्रसिद्ध इसविज्ञानमयसे अन्य अन्तरात्मा आ्रनन्दमयहै।[आ्रानन्द मयकोश परमात्मा है, ऐसा वृत्तिकारोंने कहाहै तिनके निषेधसे

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१०२ तैत्तिरीयोपनिषद्। व्याख्यान करतेहैं ] मुख्यतासे अरु विकारके वाची, मय, शब्द करके यह आानन्दमय कार्यरूपसे प्रतीतिवाला है। तरु जिस करके अन्नमयादिक कार्यरूप भौतिक सुख्यता को यहां पावते हैं, छरु तिस मुख्यताको प्राप्तहुआ्रा आनंन्दमयहै, अरु यहां जो मय, शब्द है सो अन्नमयवत् विकाररूप अर्थविषे देखा है ताते। रु संक्रमण से, अर्थात् इस आ्र्प्रानन्दमय को लङ्विकै जानेसे, यह तप्रानन्दमय कार्यरूपही प्रतीति करने योग्य है। अ्रु "प्र्रानन्दम- थमात्मानसुपसंक्रम्य" पानन्दमयरूप आ्रत्माको लघिके जाता है,। इस प्रकार झागे षष्ट अनुवाकविषे कहेंगे। त्र्प्ररु कार्यरूप पनात्माको लङ्गना देखाहै। जैसे "अन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति" झन्नमय आात्मा को लदिके जाताहै,। इस वाक्य विषे उल्लंघन करनेरूप क्रियाका विषय होनेकरके अन्नंमयरूप आरात्माकोश्रवण

पात्माको लद्िके जाताहै;। इस वाक्यबिषे उल्लंघनरूप क्रियाका विषय होनेकरके आानन्दमय रूप श्नात्मा को श्रवसाकर तेहैं। एतदर्थ यह आनन्दमय कार्यरूपही प्रतिति करनेके योग्यहै। ऋरु आात्मा काही उल्लंघन करना होता नहीं, क्योंकि अधिकार का विरोध है ताते अरु आत्माका उल्लंघन पसमभवहै ताते तरुआत्माकर के ही पप्रात्माका उल्लंघन सम्भवे नहीं, क्योंककि स्वस्वरूपविषे भेदका तरभाव है ताते। अपरु तिस उद्लंघन करनेवाले का आात्मरूपही ब्रह्म है:। [पानन्दमयके परमात्म,भावकेत्रपरसम्भव विषे, तन्य हे- तुओंको भी कहते हैं]अरु तिसब्रह्मको शिर आदिक अयवोंकी कल्पनाका: तप्रसंभच है ताते। अरु. उक्र, लक्षएवाले त्र्प्रकाशादिकों के कारण अरु कार्यो बिषे, अपप्ाप्त ब्रह्मविषे शिर आदिक अवयव रूपकी कल्पना सम्भवेनहीं, क्योंकि"अश्येऽनत््येऽनिलयने- Sनिरुक़े, स्थूलमनशुनेति, नेत्यादि" ऋदृश्य, पशरीर, अवाच्य, अ्रनाधार, इस ब्रह्मबिषे, अरु,स्थूल नहीं, अणु. नहीं, ऐसे नहीं, ऐसे नहीं,। इत्यादि प्रपञ्चके निषेधकी श्रुतियों के प्रमायसे [जब

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १०३ ानन्दमयके परमात्मभावके कहने की इच्छा होय, तब मन्त्र करके तिसहीके असद्भावकी तराशंका कहनेको योग्यहै। परन्तु तिसका त्सम्भव है ताते, आनन्दमय जो है सो परमात्मभाव करके प्राप्तहोवे नहीं, इसप्रकार कहते हैं ] तरु मन्त्रके उदाहरण का असम्भवहै ताते। अरु जिस करके प्रियवृत्तिरूप शिरआदिक अवयव करके विशिष्ट प्रत्यक्ष अनुभूयमान आ्रानन्दमय आ्र्प्रात्मा- रूप ब्रह्मविषे, सो ब्रह्म नहीं है ऐसी आशंका का परभाव है ताते "असद्व्रह्मेति वेद चेत् असन्नेव भवति"जब तरस द्बह्महै, ऐसा जानता है तव असतूही होता है,। यह मन्त्रका उदाहरण यहां सम्भवे है। अपररु "ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा "ब्रह्मपुच्छरूप प्रतिष्ठा है,। इसप्रंकार श्र्प्राननदमय कोश से भिन्न करके जो ब्रह्मका प्रतिश्ठ (आधार)पनाकरके ग्रहगाहै सो अघटितं होवेगा, एतदर्थकार्योविषे प्रास्तहुआ जो यह आनन्दमय सो परमात्मरूप आनन्दनहीं है। इस प्रकार विद्या अरु कर्मका फलरूप,तिस परमात्मरूप प्रानन्दका विकार (कार्य) आनन्दमयहै। अरु [ विशिष्ट वस्तुको विशेषसं का कार्य होनेसे "अहंसुखी"। मैं सुखीहूं'। इसंप्रकार प्रतीयमान हुआभोक़ा आनन्दमयहै, ऐसे कहा। तिस त्रनन्दमय का विज्ञान- मयसे श्ररानतरपना कैसेहै, यहां यह अर्थहै कि कर्तापनेकी अपैक्षा से भोक्रापनेका पश्चात् होनेपना प्रसिद्धही श्रुतिने कहाहै]सो आनन्दमय, विज्ञानमयसे अन्तरहै, क्योंकि यंज्ञादिकोंके हेतु वि ज्ञानमयके अन्तरपनेकी श्रुतिसे कर्त्ताकी अपेक्षा भोकाको अ्न्त. रपना प्रसिद्ध है, [त्रव इसहीको स्पष्ट करते हैं। यहां यह अ्रप्रथहै कि आनन्दके साधक शरीरादिक से साध्य आरानन्दकरके विशिष्ट आनन्दमय अत्यन्त परानंतर सिद्धहोताहै। किंवा प्रिय अरु प्रिय के साधनका उद्देशकरके कर्त्ता जो विज्ञानमयहै सो उपासना अरु कर्मका अपनुष्ठान करंता है। ताते उद्देश के योग्य होनेसे इस आ- नन्दमयका अन्तरपना सिद्धहै, इसप्रकार कहते हैं] जिस करके ज्ञांन शरु कर्मका जो फलहै सो भोक्ाके अर्थ होनेसे अत्यन्त ऋा

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१०४ तैत्तिरीयोपनिषद्। न्तर होताहै, एतदर्थ आनन्दमयरूप आत्मा पूर्वले शन्नमयादिकों से अत्यन्त त्र्प्रान्तर है। तरु जिसकरके विद्या अरु कर्मको प्रिय आप्रादिक फलके अर्थक्रियमाण विद्या अरु कर्म्म हैं, ताते फलरूप प्रिय आदिक वृत्तियोंको आरप्रात्माके सम्बन्धसे विज्ञानमयको अ्रन्त- रपना सम्भवेहै। तपर रु जिसकर के स्वननंविषे प्रियंत्रादिकोंकी वासना 4 करके निर्वाह किया जो आानन्दमय सो विज्ञानमय के आाश्रित देखिये है, ताते तिस आ्ानन्दमयको सुख्य त्र्प्रात्मापना है नहीं। इसप्रकार कथन किया जो त्रानन्दमयरूप आररात्मा तिस करके यह विज्ञानमय पूर्ण है। सो प्रसिद्ध यह तनन्दमय पुरुषके तरप्रा- कारवालाही है। तरु सो तिस विज्ञानमयकी पुरुषाकारताके पीछे यह पानन्दमय पुरुषाकारवाला है। 'स्वरूपसेही नहीं'। ऋपरु।"तस्य प्रियमेव शिरः, मोदो दक्षिण: पक्षः, प्रमोद उत्तर: पक्षः,तप्रानन्द आत्मा, ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा, तदप्येष श्लोको भवति"। तिसका प्रियही शिरहै, मोद दक्षिणापक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्षहै, त्ानन्द आत्माहै, ब्रह्म पुच्छरूप प्रतिष्ठाहै,,अर्थात् तिस त्र्रानन्दमयरूप पत्माका, इष्ट पुत्रादिकोंकें दर्शनसे जन्य जो प्रियवृत्ति सोई शि- रवत् शिरहै, सुख्य होनेसे। अरु प्रियवस्तुके लाभरूप निमित्तसे होता जो है हर्ष तिसको मोद कहते हैं, सो.मोद।'आानन्दमयका' दक्षिण पक्ष है, अरु सोई हर्षरूप सोद त्प्रतिशय हुआ्र प्रमोद कहा जाता है, सो प्रमोद आनन्दमयका उत्तर (वाम)पक्षहै। अरु प्रिय त्रप्रादिक सुखके अवयवोंके मध्य सामान्य सुखरूप जो त्र्प्रा- नन्दहै सो।'आनंन्दमय का' आात्माहै।रु तिन प्रिय आरादिकों विषे अनुस्यूत होनेसे, ब्रह्मको आनन्द अरु पर (सर्वोत्कृष्ट) कहते हैं। तरु जिसकरके सो ब्रह्म, शुभ कर्मोंकरके पुत्र मित्रादि विषय विशेषरूप उपाधि के निकट स्थितहुयेअज्ञानकरके आरप्रावृत्त अरु प्रसन्न वा एकाग्रहुई जो तन्तःकरणकी वृत्तिविशेष तिसविषे प्र- कटहोवे है, ताते सो विषय सुख है, इसप्रकार लोकबिषे प्रसिद्ध है। तिस वृत्ति विशेषके कारण कर्मको प्रस्थिर होनेसे तिसबिषे

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवलली। १०५ सुखको क्षणिकपनाहै। सो जो अन्तःकरण अज्ञानके नाशक, तप, विद्या, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, करके यावत् निर्सलभावको पावता नहीं तावत् अन्तरसुख ऋरु प्रतन्न वा एकागहुये अन्तःकरणंकी वृत्ति विशेषविषेभनानन्द विशेषहोताहै।सो [ब्रह्मकी आानन्द स्वभावता विषेही स्या प्रमाणहै, तहां कहते हैं] पागे सक्षम अप्रनुवाकविषेक हेंगे "इसौवै सः, रसधह्ेवायं लव्च्ाSSनन्दीभपति, षष ह्येवानन्दया ति" "एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भतानि मात्रासुपजीवन्तीति" रसहीसो है, जिसले यह रसकोही पायके शरपानन्दी होवे है। ऐसे, अरु इसही आनन्दकी मात्रा कहिये किसका के ताई अन्यभूत उप- जीविकाको करेहैं।अर्थात् त्रह्मानन्दके लेशको पायके तप्रन्यभूत छपने जीवनको करते हैं'। इसनन्य भ्रतिके प्रभाशसे[अन्तःकरण की वृत्ति के उत्कर्पलेही आानन्दका सातिशयपना है, इसविषे में लिंग (चिह्न) कहते हैं, यहां यह अर्थहै कि जंब किसी एक विषय से जन्य होनेकरके नरानन्दका उत्कर्ष होताहै, तव निष्कामपुरुष को किसी विपयके उपभोग के त्रसम्भवसे आ्रानन्दके उत्कर्षका अवस नहीं होवेगा, परन्तु आात्मस्वभावरूपही जनन्दके त्रावि- र्भव करनेवाले अन्तःकरणकी शुद्धिका उत्कर्ष होताहै, इसप्र- कार होनेसे निष्कामता का उत्कर्ष संभवे है ] इसप्रकार हुये इच्छाकी निवृत्तिके अधिकताकी अ्रपेक्षासे श्र्प्रानन्द का शतगुखा ऋरधिक उत्कर्ष झागे कहेंगे। ऐसे [ उक्रप्रकार विषयानन्दकी पतिशयताके हुये तिसकरके विशिष्ट ञ्रानन्दमयका अरपरब्रह्मपना सिद्ध होवेहै, क्योंकि सातिशय होनेकर के प्रतिशरीरके ताईंभिन्न२ है ताते। अरुब्रह्म तो तिसके अध्यासका अरधिष्ठान अद्वैतरूपहै, इस प्रकार कहते हैं। यहा "एतस्मिनथे" इस अर्थबिषे,। यापद का त्र नन्दमयकी प्रतिष्ठारूप ब्रह्मके प्रकाश करनेमें तत्पर तप्र्थबिषे। यह अर्थ है।] हुये सातिशय करके युक्र आनन्दमयरूप आत्माका पर- मार्थ रूपब्रह्मके विज्ञानकी अप्पेक्षासे जो प्रसङ्गबिषे प्रात्तहुआ, सत्य, ज्ञान, आनन्दरूप परब्रह्मही है, अरु जिसकी प्राप्तिके अर्थ अन्नम,

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१०६ तैत्तिरीयोपनिषद्। यादिक पश्चकोशको आरप्ररम्भ कियेहैं। अरु जो उन कोशोंसे भीतर है। अरु जिसकरके सो सर्वकोश आरपरात्मावाले होते हैं, सो ब्रह्म पुच्छरूपहै अरु प्रतिष्ठाहै, तानन्दमयकी एकताका त्रवसान होने से। इसप्रकार तरविद्या कल्पितद्वैतका त्रवसानरूप जो शरप्रद्वैतव्रह्म सो प्रतिष्ठारूप पुच्छहै। तिसही अर्थविषे, अर्थात् आानन्दमयकी प्रतिष्ठारूप ब्रह्मके प्रकाशनेविषे तत्पर, यह श्लोक होताहै २६ ।। ।'है सौम्य!जैसे घटके भीतर घटसे सूक्ष्मघटके आरकारही पूर्ता से वायुहै, तरु तिस वायुसे सक्ष्मवायुके भीतर वायुकेही आ्रकार पूर्णतासे ताकाशहै, अप्ररु तिसआ्र्काशके भीतर आ्रकाश से सूक्ष्म तिसहीके आ्ाकार पूर्णातासे प्रकाशहै, तररु तिस प्रकाशके भीतर घरु सूक्ष्म तिसकेही त्राकार पूर्णतासे प्रकाशकत्व है। यह दृष्टांत एकके अपन्तर दूसरेकी तदाकार तपररु सूक्ष्मतासे स्थिति देखावनेके अर्थ कल्पितहै। हे सौम्य! दष्टान्त प्रमासही इस अ्रन्नमयकोशके भीतरं तिससे सूक्ष्म तिसके प्प्राकार तिसकी तपेक्षा चैतन्य ति- सका आत्मा पूर्णतासे स्थित प्रासमयकोश है। तिसही प्रकार प्रामयके भीतर पूर्णतासे व्याप्त तिसका आरप्रात्मा मनोमय कोश है। तरु तिस मनोमयके भीतर तिसके आप्राकार पूर्णतासे व्याप तिसका आत्मा विज्ञानमय कोश है, तिस विज्ञानमयके भीतर तिससे सूक्ष्म अरु पृथक् तिसहीके आराकार पूर्णतासे व्याप् तिस- का परपात्मा आरानन्दमय कोशहै। सो आनन्दमयकोश बादल आा- दिक पदार्थोवत् कदाचित् प्रकट होनेवालाहै, अर्थात् जैसे बादल सूक्ष्म सामान्यरूप करके अदृश्यहुआ्र परमाुरूपसे आकाश विषे रहे है सो जब अपने विशेषरूपसे प्रकट होनेका समयपावे है तव प्रकटहोय लोकोंिषे प्रत्यक्ष भासेहै, तैसे आ्रनन्दमयकोश अन्य. कोशों से सूक्ष्महुआ्ता अपने सामान्यरूप से विज्ञानमय के अन्तर व्याप्तहै सो जब अपने इष्ट पुत्रादि विषय वस्तुको देखता ैनब अपने प्रिय आदि अङ्गोंकी विशेषतासे लोकविषे प्रकट 7 एंतदर्थ आानन्दमयको क्वचित् होनेवाला कहते हैं, ताते

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द्विर्तीयाध्याय ब्रह्मानन्दवलली। १०७ क्षसिक है, शरु साक्षीआत्मा आनन्दमयकी क्षणिकता आदिकों का ज्ञाता उसके पृथक् है अरु आनन्दमयका कारण आधार त िष्ठान है उसहीके आश्रय आ्रानन्दमयके आ्प्रात्मापनेकी कल्पना होतीहै। ऋरु सो आानन्दमयके भावाभावका साक्षित्व तपनेविषे पायाजाता है ताते त्रानन्दमयसे पृथक् तिसके साक्षी चैतन्य परमात्मा परपुन हैं, अपुन आानन्दमयकोश नहीं अरु सो अपना नहीं। इसप्रकार अपने आापको आनन्दमय से पृथक यथार्थ अनुभवकर निश्चय करना॥ इति पश्चमोऽनुवाकः॥५॥ उ्रथ षष्ठोऽनुवाक: ६॥ प्रसन्नव भवति। अप्रसद्ब्रह्मेति वेद चेत्। त्र्प्रस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद। सन्तमेनं ततो विदुरिति। तस्यैष एव शारीर आर्परात्मा। यः पूर्वस्य। तरप्रथातोऽनुप्रशनाः॥ उता- विद्वानमुं लोकं प्रेत्य। कश्चन गच्छति ३॥ अहो विद्दा- नमुं लोकं प्रेत्य। कश्चित्समश्नुता ३॥ उ। सोडका- मयत बहुस्यां प्रजायेयेति। स तपोडतप्यत। सत- पस्तप्ता। इदथसर्वमसृजत। यदिदं किञ्च। तत् सृष्ट्वा। तदेवानुप्राविशत। तद्नुप्रविश्य सच्च त्यव्चाभ- वत्। निरुक्कञ्चानिरुक्कन्न। निलयनञ्चानिलयनञ्च। विज्ञानञ्चाविज्ञानञ्च। सत्य्चान्टतञ्च। सत्यमभवत्। यदिदं किञ्च। तत्सत्यमित्याचक्षते। तदप्येष श्लोको भवति ३०॥ इति षष्ठोनुवाकः ॥ हे सौम्य!।"अ्रप्रसन्नेव भवति, असद्ब्रह्मेति वेद चेत्, त्र्प्रस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद, सन्तमेनं ततो विदुरिति"। जजो पुरुष ब्रह्म असत् है इसप्रकार जब जानताहै, तब सो असत्ही होताहै, जब ब्रह्महै ऐसे जानता है, इस सत्रूप को जानते हैं तिस करके सो अ्रन्यों को ब्रह्मवत् जानने योग्य होताहै, अरथात् जो पुरुष ब्रह्म

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१०८ तैत्तिरीयोपनिषद। ञसत् कहिये अविद्यमान, है इसप्रकार जानताहै तब सो 'भ- सतके तुल्यही' नसत् होताहै।'मह तो जैसा कुछ है तैसा हैही परन्तु जो उसको असत् जानता है सो अपने शापको शसत् करताहै क्योंकि वास्तव करके वो व्रह्म से अभिन्न है ताते '।ञ- र्थात् जैसे तसत् पदार्थ पुरुषार्थ का सत्वन्धी होता नहीं, इस प्रकार सो।'ब्रह्म'। पुरुषार्थ का तम्बन्धी होता है। अरु जव तिस ।'असत्से'। विपरीत जो सर्वविकल्पों का न्र्प्राश्रय सर्व वृत्तियों का बीज शरु सर्व पपश्चालीत सो व्रह्म है इसप्रकार जानताहै। पुनः तहां कौनसी शंका है, तिस त्र्प्रस्तित्वभावविषे न्रह्मको व्यवहार से रहितपना है इसप्रकार हम कहते हैं। तरु जिसकरके वाचा- रंभमान्रव्यवहारके विषयविषे ञ्रस्तिपनेके भावकरकेयुक्र वुद्ि प्राप्त होतीहै, अरु तिसकरके विपरीत व्यवहार से रहित वस्तु विषे नासतिपना भी प्राप्त होताहै। जैसे घटादिक व्यवहार का विषय होनेकरके प्राप्तहुई वस्तु सत्है, अरु तिससे विपरीत वस्तु असत् है, यह लोकविषे प्रसिद्धहै, इसप्कार यहांभी तिसकेतुल्य ।'व्यवहारका अविषय'। होने करके ब्रह्मके नास्तिपने की शंका होती है। ताते।"अस्ति न्रह्मेति चेद्नेदेति"। न्रह्म है, इसप्रकार जब जानताहै,। इसप्रकार आररशंका लहित वचन कहते हैं। "तद- स्तीति"। सो ब्रह्म है, इसप्रकार जाननेवाले पुरुषको कया फल प्रासहोताहै, तहां कहते हैं। इस ऐसे जाननेवाले पुरुषको विद्य- मान ब्रह्मरूप करके परमार्थ सतूरूपको प्राप्तहुध्या ब्रह्मचेत्ता जा- नते हैं। तिस।'अस्तिभावके ज्ञान'। करके सो। 'नह्मवेत्ता'। अन्यों को ब्रह्मवत् जानने योग्य होता है, यह अर्थ वा फल है।। पपथवा, जो पुरुष न्रह्म नहीं है, ऐला मानता है, सो वर्णाश्रमादिकों की व्यवस्थारूप सर्वही सन्मार्ग के नास्तिकपने को प्राप्त होता है, कयोंकि तिस सन्मार्ग का ब्रह्मकी प्रात्तिके धर्थ होना है।'अर्थात् जिसके निश्चयमें ब्रह्म नहीं है तिसके निश्चय में दर्णाश्रम सरु तदाथित धर्म कुछभी नहीं क्योंकि वर्साश्रम के आश्रित धर्मका

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नो निष्कामता से अनुष्ठान करना है सो अन्तःकरकी, शुद्धि द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिके अर्थ है, सो प्राप्तहोने योग्य ब्रह्म जबहैही नहीं तव व्साश्रम शरु तिनके धर्मके अनुष्ठानकी कल्पना व्यर्थही हैं, इसप्रकार ब्रह्मको न माननेवाले पुरुषको वर्णाश्रम के धर्म्मोविषे नास्तिकभावकी प्राप्ति होती है'। इसकरके सो नास्तिक पुरुष लोकविषे त्सत् रलाधु कहेजाते हैं,। तव सो श्रद्धावान् होनेकरके तिस ब्रह्मकी प्राप्तिकेहेतु, वर्णाश्रमादिकों की व्यवस्थारूप सन्मार्ग को ज्योंकात्यों प्राप्तहोतांहै। तरु जिसकरके इसप्रकारहै, तिसही करके इसको साधुपुरुष सन्मार्गविषे स्थित जानते हैं। एतदर्थ ब्रह्म है इसप्रकार की प्रतीति करनेको योग्य है, यह वाक्यार्थ है ।"तस्यैष एव शारीर आ्रपरात्मा। यः पूर्वस्य, त्रथातोऽनुप्रश्नाः,।। उताविद्वानसुंलोकं प्रेत्य, कश्चन गच्छति ३, श्हो विद्वानसुंलोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता ३ उ"। ६ जो यहही तिस पूर्वलेका शरीरविषे होनेवाला आत्माहै, याते अनन्तर पीछे प्रश्न है, कोई एक अविद्ान् भी मरणको प्राप्तहोके इस लोकको प्रासतहोताहै, कोई एक विद्वान् मरणको पायके इस लोकको प्राप्त होता है; अर्थात् जो यह आ्रानन्दमय है यहही तिस अपने पूर्वले विज्ञान- मय शरीर। 'विज्ञानमय'। विषे होनेवाला आत्माहै [आ्रानन्दमय का प्रकाशक यह श्लोक है, इसप्रकार कईएक कहते हैं, तिन के अर्थ यहां कहते हैं ] तिसके प्रति शंका नहीं है, क्योंकि पूर्वली वस्तुका सद्दाव होनेसे अ्रन्तकी वस्तुका निषेध होतानहीं, परन्तु ब्रह्म को सर्व विशेष वाला होनेकरके प्रत्यक्षता है ताते। [ यहां यह अर्थ है कि सर्वको साधारण होनेसे ब्रह्मके व्यवहार करनेकी योग्यता सर्वके अर्थ होवेगी, छरु देखते नहीं, एतदर्थभी नास्ति- कपनेकी त्राशंका होती है] त्रु सर्वके अर्थ साधारण होने सेव्रह्म के नास्तिकपने की आशंका युकहै। अरु जिसकरके इसप्रकार है याते अनन्तर शिष्य के अवण करने को आचार्यकी उक्रिके पीछे प्रश्न है। जिस करके ब्रह्म आकाशादिकों का अर्थात् भूतों

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११० तैत्तिरीयोपनिषद्। सहित सर्वजीवोंका कारण होनेसे विद्वान् अरु अविद्वान्को सा- धारण।'समान' है, ताते तरप्रविद्वान् कोभी व्रह्मकी प्राप्तिकी आर्प्राशंका करते हैं।।'अर्थात् वह्म सर्व जीवादिकोंका कारणहोनेसे सर्वकोसमान ही प्रास्तहै तव अ्रविद्वान्कोभी तिसकी प्राप्तिहोतीहोगी'। कोईएक त्रविद्वान्भी यहाेमरणको पायके इस परमात्मरूप लोकको पा- वताहै, किवा नहीं पावताहै, यहां,किंवा नहीं प्राप्त होता है, ऐसा जो द्वितीय प्रश्न है सो।"अनुप्रश्नाः"। पीछे प्रश्न हैं,। इसवहु वचनके होनेसे जानना। अरु ञप्रव विद्वान् के अर्थ अन्य दो प्रश्न कहते हैं। जब अविद्वान् सामान्य कारणरूप भी ब्रह्मको नहीं प्राप्तहोता है, तब विद्वान् को भी ब्रह्म के अप्रप्राप् होने की आर्प्राशंका करते हैं। इसकरके उस विद्वान् के प्रति यह प्रश्नहै। कोई एक भी विद्वान् ब्रह्मवेत्ता यहां (इस शरीर) से मरणको पायके।'शरीर को त्यागके'। इस परमात्मरूप लोकको पावता है, किंवा जैसे अविद्वान् नहीं पावता तैसे विद्वान्भी नहीं पावता है, यह दूसरा प्रश्न है, वा विद्वान् अररु तरविद्ान् इन दोनोंको विषय करनेवाले दोनोंही प्रश्न हैं। अरु बहुवचन तो सामर्थ्य से प्राप्तहुये अ्रन्य प्रश्नकी तप्रपेक्षा से घटित है[।। प्र० ॥ किसके सामथ्यसे अरन्य प्रश्न प्राप्तहुन्न्राहै।उ०।। तहां कहते हैं, यहां।"चेच्छव्दात्"।चेत् शब्दसे,। इस पदका पक्षसे प्रात्तहुये सदभाव के ज्ञानके सामर्थ्य से यह अर्थहै। ]।"तरसद्त्रह्मेति वेद चेत्। श्रस्ति ब्रह्मेतिचेद्वेद"। ब्रह्म अप्रसंत्है इसप्रकार जब जानता है, अरु ब्रह्म है इस प्रकार जब जानता है,। इस अ्रवससे ब्रह्म है वा नहीं है, ऐसा संशय होता है। ताते क्या है वा नहीं है, ऐसा प्रथम प्रश्न अर्थसे प्राप्त हुआ। अरु ब्रह्मको अपक्षपाती।'सामान्य'। होनेसे अविद्वान् पावता है वा नहीं पावता।'अर्थात् ब्रह्मको यह पक्षपात नहीं जो मैं त्रप्रमुकको प्राप्त होवों, तरु अमुक्त को प्राप्त न होवों, अरु ब्रह्म आकाशादि सर्वकाकारण रु. पप्राकाशवत् सर्वत्रव्याक्ष तरु सर्वका आत्मा है ताते सर्वको समान है, इस कारण से उस

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १११ अपक्षपाती सामान्यब्रह्मको अविद्वान् पावता है वा नहीं पावता,। ऐसा द्वितीय प्रश्न प्रात्तहुआ। अरु ब्रह्मको समभाव के हुये भी अविद्वान्वत् विद्वान् को भी ताशङ्ा करते हैं कि विद्वान् क्या पावताहै वा नहीं पावता है।'अर्थात् जो ऐसा कहा जाय कि ब्रह्म को अपक्षपाती सामान्य होनेपर भी तरविद्वान् नहीं पावता,तो यह आाशङ्का होतीहै कि ब्रह्मको शपक्षपाती सामान्य समभाव के हुये भी जब अविद्वान् नहीं पावता तब अप्रिद्दान्वत् विद्वान् को भी तिसकी तप्राप्ति की त्राशङ्का होती है कि ब्रह्मको विद्वान् भी क्या पावता है वा नहीं'। इसप्रकार तृतीयप्रश्न प्राप्तह्ुआहै। इनतीनों प्रश्नोंके समाधानार्थ अप्रगिमग्रन्थका प्र्प्रारम्भ करते हैं। तहांप्रथम ब्रह्मका अस्तिपनाही कहतेहैं। जो पूर्व। "सत्यंज्ञानमनन्तंब्रह्म"। सत्य, ज्ञान, अनन्तरूप, व्रह्म है,। इस प्रकार कहा है। तहां सो न्रह्मका सत्यपना कैसे कहते हैं, ऐसा प्रश्न करनेको योग्य है, तहां यह ।'उत्तर'। कहते हैं कि, सन्भावके कथनसे ही ब्रह्मका सत्यपना कहते हैं। याते।"सदेवसत्यमिति"। सत्यही सत्य है। इसप्रकार श्रतिविषे कहा है, ताते सद्भाव के कथनसेही ब्रह्मका; सत्यपना कहते हैं।। प्रश्न ॥ इस ग्रन्थको इसप्रकारके अपर्थ करके युक्ता अर्थात् सत्यपनेके प्रतिपादनसे सत्य वस्तुकी विषयता, है सो कैसे जानिये, तहां।। उ० ॥ कहते हैं जिसकरके शब्दकी सूचनासे इसही अर्थकर के युक।"यदेषआकाश आनन्दोनस्यात्" जो यह आकाश विषे आनन्द न होवे, इत्यादि अगरिम कहने के वांक्य।"तत्सत्यमित्याचक्षते"। सोसत्यहै, ऐसा कहते हैं। इनकरके विदित होताहै कि इसग्रन्थको उक्कप्रकारके अर्थकरके युक्कताहै। [ब्रह्मके सत्यपनेका साधननाम अ्रसद्भाव की निवृत्तिही है, इस अभिप्रायसे. असंद्भावकी शङ्ाको प्रकट करते हैं। यहां यहभाव है कि विवादका विषय जो आकाशादिक सो सतपूर्वक हैं, क्योंकि घटादिकोंवत् कार्य है ताते। इसप्रंकार लौकिक व्यापिके आश्रय करके सत्रूप कारण प्रथम सिद्ध होवे है। अरु तिसको देशादि-

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११२ तैत्तिरीयोपनिषद्। कों का कारण होनेकरके देशादिकों से अपरिच्छिन्न होनेसे ब्रह्म- पदका वाच्यपना सिद्ध होता है। अरु तिसकी विशेषता से अप्रतीतिके हुये तिस विषयक तसद्भावकी शंका होती है, सो शंका उसको कारसपने करके निवारण करते हैं, परन्तु कारण होनेसे सद्भाव सिद्ध होवे नहीं, क्योंकि कार्य के आश्रय की अ- सिद्धि का प्रसङ्ग प्राप्त है ताते [तहां वादी 'त्रप्रसत्ही न्रह्म है इसप्रकार शङ्का करताहै, क्योंकि जो है सो विशेष करके ग्रह करते हैं।'अर्थात जानते हैं'। जैसे घटादिकों को है ऐसा जानते हैं तैसे।'अर्थात् जो वस्तु होती है सो घटादिकोंवत् विशेष (इदं प्रत्यय) करके ग्रहाहोती है'। अरु जो नहीं है सो नहीं जानिये है, जैसे शशश्रृंगादिक।्र्थात् जो वस्तु होती नहीं तिसको जानते भी नहीं जैसे शशशृङ्ग वा वन्ध्यासुतहै नहीं तव तिसको इदंकरके जानते भी नहीं जो यहहै, तथवा जो वस्तु घटादिकोंवत् इदंकरके नहीं जानी जाती वा नहीं ग्रहसहोती।' सो होती भी नहीं'। इस प्रकार ब्रह्म नहीं प्रतीत होता ताते विशेषकरके अग्रहसासे नहीं .

हैं।अर्थात् जिसकरके शशशङ्गवत् ब्रह्म भी प्रतीत होता नहीं एतदर्थ उसके घटवत् इदं करके ग्रहण के न हुये सो है नहीं।। इसप्रकार।'वादी'। शङ्ा करे है। तहां।'समाधान यह है कि। ब्रह्म को त्राकाशादिकों का काररपना होनेसे 'न्रह्म है' इसप्रकार जानिये है, क्योंकि जिसकरके आकाशादिक सर्व कार्य्य ब्रह्मसे उत्पन्नहुआ् ग्रहण करते हैं। अरु जिसकरके कुछ भी उपजता है सो है, इसप्रकार लोकबिषे देखाहैं।।'अर्थात् जिस वस्तुसे कुछ भी कार्य उत्पन्न होताहै तिसका त्स्तित्व लोकबिषे मानते देखा है।। जैसे घट ऋरु अंकुरादिकों का कारण सृत्तिका चरु चीजा- दिकहैं। तैसे त्राकाशादिकों का कारण न्रह्म है इसप्रकार जानते हैं।।'यहां स्व सरपाय के शिष्य शंका करेहै कि हे गुरो!आकाशादि कार्य के कारण ब्रह्मके तस्तित्व होनेके विषय में घट ऋरु त्रंकुर- रूप कार्य के दंष्न्तसे कहा कि जैसे घट तरु अंकुररूप कार्य के

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ११३ ग्रहासे तिनके कारण मृत्तिका तरपरु वीजके आपस्तित्वका ग्रहणहो- ताहै, तैसे आकाशादि कार्यके ग्रहसासे तिनके कारण ब्रह्मका अ- स्तित्व जानिये है, सोअस्तृ परन्तु जैसे कार्यरूपघट अप्ररु परपंकुर का इदंकरके प्रत्यक्ष ग्रहण होता है, तैसही तिनके कारण मृत्तिका अपररुतर वीजकाभी इदं करके ग्रहण होता है, तरु यह लोकबिषे प्रसिद्ध भी है कि जिसका कार्य प्रत्यक्ष इदं करके ग्रहण होताहै सो आप कारण भी प्रत्यक्ष इदं करके मृत्तिका बीज सुवर्स लोह तन्तुवत् ग्रहण होता है। परन्तु जैसे आकाशादिक कार्य इदं करके प्र -. त्यक्ष ग्रहण होते हैं तैसे इनका कारण जिसको ब्रह्म कहते हैं सो मृत्तिका वीजवत् इदं करके प्रत्यक्ष नहीं ग्रहण होता र्थात् नहीं जानाजाता, एतदर्थ तिसके तप्रस्तित्वविषे निश्चय भी नहीं होता ताते ब्रह्म नहीं है, अरु जो कदापिहै तो ऐसे दष्टान्तसे कहिये कि जिसकाकार्य प्रत्यक्षभासेतरप्ररु सोकारण प्रत्यक्षन भासकेभी होवे।। उ० ॥ हे सौम्य ! यहां जो तपंकुररूप कार्यका कारण बीज कहाहै सो तिस कहने से बीजान्तर सूक्ष्मसत्ताको जानना क्योंकि बीज को भी कार्यपनाहै ताते, अरु इस विषयमें छान्दोग्य उपनिषद् की श्रुति प्रमाण है। तथाच श्रुतिः।"न्यग्रोधफलमत शाहरेतीदं भगवइति भिन्धीतिभिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यराव्यइवे- माधाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्नाभगव इति किमत्र पश्यसीति किश्चन न भगव इंति१॥तथहोवाच यँ वै सोम्यैतम- सिमानं न निभालयसएतस्य वै सोम्यैषोऽगिम्न एवं महान्यग्रोध- स्तिष्ठति २॥"। श्वेतकेतु प्रति उद्दालकमुनिका वाक्य। हे पुत्र! जो तू इस जगत्के कारण महासूक्ष्म सत्कोप्रत्यक्ष देखनेको इच्छता है तो इस बड़ेवटके वृक्षसे एक फ़ललेआराव, तब वो लेआराया प्रपररु कहा कि हे भगवन्! वटके फलको लेआया, तब पिताने कहा इस को तोड़डालो, तव पुत्रने फलको तोड़के कहा कि हे भगवन्! तोड़ डाला, तब पिताने कहा कि अब इसमें क्या देखतेहौ, पुत्रने कहा है भनवन्! इसमें बहुतसे सूक्ष्मबीज देखताहौं,पिताने कहां कि हे पुत्र!

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११४ तैत्तिरीयोपनिषद्। इसमें से एक सूक्ष्म बीजको तोड़ो, पुत्रने कहा हे. भगवन्!तोड़ा, पिताने कहा हे पुत्र ! इस तोड़ेहुये सूक्ष्म वीजके अन्तर क्या दे खतेहौ सो कहो, पुत्रने कहा हे भगवन्! इसमें मैं कुछ भी नहीं दे- खता, पिताने कहा हे पुत्र ! वटके तोड़ेहुये सूक्ष्म वीजके अ्रन्तर अब तुम कुछभी नहीं देखते तथापि इस सक्ष्मवीज के अन्तर इस महास्थूल वटवृक्षका कारणभूत महासूक्ष्म सत्ताहै तिसही महासूक्ष्म अरदृश्यमान सच्ताका कार्यभूत यह अपने वीजादि . पवयवों सहित महास्थूल वटवृक्ष सुशोभित है। इरु बीजका परिशामरूप कार्य वृक्ष नहीं क्योंकि वीज की विद्यमानताही में वीज के अन्तर से अंकुर पत्रादिक प्रकट होते हैं अरु तिनकी वृद्धि से बीज नष्टहोजाता है, ताते वृक्षका कारण वीज न होके वीजो- 1 पलक्षित वीजसे पृथक् बीजान्तर कोई एकतदश्यमान सत्यरूप सूक्ष्मसत्ता है। हे साम्य!। तैसेही इन आकाशादि दृश्यमानकार्यका अदृश्यमान महासूक्ष्म सत्यरूपकारण ब्रह्महै ऐसा जानते हैं। यह इस भाषाभाष्यकारकी कल्पनायुक्किविशेषहै'।॥[इसकथन करने के हेतुसेभी जगत्के उपादान बिषे असंत्पनेकी आशंका करनेको योग्य नहीं, ऐसा कहते हैं ] तरु लोकविषे असत् वस्तुसे कुछ भी कार्य उत्पन्न हुआ देखते नहीं। जब असत्से नामरूपादि कार्य उत्पन्न होवे, तब व्रो कार्य निःस्वरूप होने से प्रतीत हुआ्र्प्रा न चा- हिये. अरु प्रतीत होताहै, ताते ब्रह्महै इसप्रकार जानते हैं।। अरु जब असत का कार्य ग्रहण होवे तब भी सो असत् करके युक्ही ग्रहण होचेगा। अरु.ऐसे है नहीं, ताते ब्रह्म है इसप्रकार जानिये है। अरु।"तत्कथमसतःसज्जायतेति"। भसत् से सो सत् कैसे उप- जताहै, यह जो अन्यश्रुतिहै, सो युक्किसे अपसत्से सत्के जन्म के पसंभव को कहे है। ताते सत्ही ब्रह्म है, इसप्रकार कहना युक्र ही है। [इसप्रकार ब्रह्म के सन्भावकी शंका को निषेध करके अब प्रसंगसे प्राप्त प्रधानवादी की अचेतनपने की आाशंका को निषेध करते हैं ] अरु जो ऐसा कहे कि सो ब्रह्म जब मृत्तिका छरुं

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। बीजादिकोंवत् कारणहोवे तब अचेतन।'जड़'। होवेगा, सो कहना बने नहीं, क्योंकि ब्रह्म इच्छावाला है ताते। अरु लोकबिषे इ- चछांवाली वस्तु अचेतन होती नहीं, अरु ब्रह्म सर्वज्ञही है, इस प्रकार हम श्रुतिके वेत्ता कहतेहैं, याते ब्रह्मको इच्छावान् होने- पनेका संभव है।। अरु जो ऐसा कहे कि ब्रह्म इच्छावाला होने से अस्मदादिवत् तपूर्णकाम होवेगा, सो कथन बने नहीं, क्योंकि: ब्रह्मस्वतन्त्र है ताते। जैसे कामादिदोष जीवोंको अपने वा परवस्तुः के वशकरके प्रवृत्त करे हैं, तैसे कामादिक ब्रह्मके प्रवर्तक नहीं॥ प्र० ॥ तब ब्रह्मको काम कैसे है,। उ० । तहां कहे हैं सत्य ज्ञान स्वरूपवाले ब्रह्म के कामहैं सो ब्रह्म के स्वरूपभूत होने से शुद्ध हैं, ताते तिन करके ब्रह्म प्रवर्त होतानहीं [ यहां यह कथन किया होताहै कि मायाविषे प्रतिबिम्बित हुआ ब्रह्म जगत्का कारणहै, सो मांया के परिणामरूपही कामना से कामनाका कर्त्ता होवेहै, शरु तिस मायाके परिणामों को अविद्या आदिकों से तिरस्कार को अप्राश हुये चेतन करके व्याप्त होनेसे सत्यज्ञान,रूपता है, अरु. ब्रह्मको तिसरूप होने से पुणयादिक करके स्पर्श के हुये शुद्धपना है। ताते ब्रह्मकी कामना को जीवों की कामनासे विलक्षणपना है यह सिद्ध हुआ ] किन्तु प्राणियों के कर्मों की अपेक्षा से सो ब्रह्म तिनका प्रवर्त्तक है। ताते कामों विषे ब्रह्मकी स्वतन्त्रता है।' एतदर्थ ब्रह्म अपूर्णकाम नहीं। अरु [कोमेना को शरीरादिकाके संबंधसे जन्यहोनेकी प्रसि्धि से ब्रह्मको शरीरादिकवान् होनेपने का. प्रसंग होवेगा, यह शंका करनेको योग्य नहीं, इसप्रकार कहते हैं यहां यह अर्थहै कि कां मना के संस्कारवाली मायासे ब्ह्म के तादा- त्म्यते तिस मायाके परिणानको ब्रह्मके तादात््य से शरीररूप निमित्तकी अपेक्षा नहीं है ] अ्न्य साधनकी अपेक्षा से रहित हो- नेसे भी ब्रह्म अपूर्ण काम नहीं है। किंवा जैसे ज़ीवोंको अपने से भिन्नकार्य अरु कारणका रूप अन्य साधनोंकी अपेक्षावाले होनेसे अनात्मरूप अरुध्मादिक निमित्तकी अपेक्षावाले काम हैं।अर्थात्

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११६ तैत्तिरीयोपनिषद्। जीवों की जो कामना है सो अपनी सिद्धताके अर्थ अहंकारादि 1

अनात्मरूप कारक अपरु धर्मादिरूप निमित्त की अपेक्षावाली है क्योंकि धर्म से अर्थादिक होते हैं ताते'।। तैसे ब्रह्म के काम को निमित्तादिकों की पेक्षावानूपना नहीं, किन्तु अपने स्वरूप से तपरभिन्न ब्रह्मके कामहैं।।'अर्थात् जीवों के जो काम (कामना) हैं सो अविद्या के परिणाम वा पंचभूतों के मिश्रित सत्वगुख के कार्य अन्तःकरण के निमित्तवाले हैं, वो अन्तःकरण अपने कारण आ्राकाशादिकों की उत्पत्ति से पूर्व तर्प्राकाशादिकोंके कारख ब्रह्म बिषे है नहीं ताते ब्रह्म के काम किसी भी अनात्मा के नि- मित्तवाले नहीं, अरु त्र्प्राकाशादिभूत तरु तिनके कार्य त्रन्तः- करणादि भौतिक तिन सर्व के पूर्व।"सो तप्रकामयत"। इत्यादि प्रमाण से ब्रह्मके काम हैं ताते सो काम अन्य निमित्त वाले न होके ब्रह्म की चैतन्यता वाले होने से उसके स्वरूप से अभिन्न उसके काम हैं'।। सो श्रुति वाक्य कहेहैं कि जिससे आरकाश उत्पन्न हुआ्प्रर सो आरप्रात्मा।"सोडकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति,स त- पोऽतप्यत, सतपस्तप्त्वा,। इदयसर्व्वमसृजत, यदिदंकिश्च"। सो कामना करता हुआ्रा कि बहुत होवों, सो तपको तपताहुआ, सोई तपको तपिके, इस सर्व को सजता हुआर, जो कुछ यह है; अ- र्थात् जिससे ्रकाश उत्पन्न हुआ ऐसा जो।'सर्वका कारण'। झ्ात्मा सो कामना करता हुआ॥प्र०॥सो कैसे वा क्या कामनाक- रता हुआ।।उ०।। बहुत होवों यह।'कामना करता हुआा'।॥प्र॥ एकको अन्य तर्थ बिषे त्रप्रवेशहुये बहुतपना कैसे होवेगा।उ०॥ तहां कहते हैं, प्रजाको उत्पन्न करो। जिस करके पुत्रकी उत्पत्ति सेही अन्य अर्थ को विषय करनेवाला बहुत होना होवे नहीं, इस करके प्रजाकी उत्पत्ति के अर्थ त्रद्वैतकी हानि होवे नहीं॥ प्र० ॥ तंब आपाप विषे स्थित अप्रकट हुआर जगत् नाम रूपकी प्रकटता से कैसे होता है,।। उ० । जब आप विषे स्थित अप्रकट हुये . नाम रूप प्रकट करते हैं, तब नामरूप के अपरित्यागसेही ब्रह्म

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से अविभाग को प्राप्तहुये वे नामरूप देशकालादिक सो सर्व अ- वस्थाविषे प्रकटकरिये है, तव सो नामरूपका प्रकट करना ब्रह्मका बहुतहोना संभवे, अन्यथा निरवयव ब्रह्मको बहुतपने की प्राप्ति वा अल्पपना सम्भवे नहीं। जैसे आकाश का अल्पपना अरु बहुतपना अन्य।'घटादि'। वस्तुओं का कियाही है, तैसे। एतदर्थ तिस नामरूपकी शकिरूप मायाके परिणाम द्वाराही आत्मा बहुतहोताहै। जिसकर के [जब नामरूपकी शक्रिरूप माया अ्रप्रंगी- कार किया तव सो प्रधानवत् 'ब्रह्म से भिन्न सत्यरूपहुई, इस करके अद्वैत की हानि होवेगी' यह आशंकाकरके कहते हैं। यहां यह भाव है कि आत्मा से भिन्न जो वस्तुहै, सो क्या आप- सेही सिद्धहोती है वा पर (अन्य)से।' सिद्धहोवरे है यह प्रष्टव्य है' तिनमें जो प्रथमपक्ष।कहे कि पात्मा से जो भिन्नवस्तु है सो आपसेही सिद्धहोवे है सो ' बने नहीं, क्योंकि तिस को जड़ता की हानिहोने से अरु तात्मा से भिन्नताकी हानिहोने से।'अ- र्थात् चैतन्य त्ररात्मा से जो भिन्नवस्तु है सो जड़ अनात्मा होवे है, अरु तिसकी जब अपने आपसे सिद्धता मानी तब तिसको जड़ताकी ऋपरु आरात्मा से अभिन्नताकी हानिहोवे है अरु तिस की हानि से उसको आत्मरूपताहोने से आत्मा से.भिन्नपने के अभावहुये सो वस्तुही नहीं यह सिद्धहोवे है ' अरु जो दूसरा पक्ष।'मानो कि आरप्रात्मा से भिन्नवस्तुकी पर (दूसरे) से सिद्धि होवे है तो सो ' भी वने नहीं, क्योंकि तिस से ज्ञान कहिये चैतन्य के संबंध का अनिरुपणाहै।'अर्थात् निरुपण नहीं' ताते शरु जिस करके भिन्नदेश कालवाली वस्तुओं का संयोग आदि सम्वन्ध संभवे नहीं, वा विषय विषयीभाव सम्बन्ध बने नहीं, क्योंकि नियामक के खोजने से। तरु तिनका स्वभावरूपही सम्बन्ध बनेनहीं, क्योंकि दोनों स्वभावों को सम्बन्धरूप होने करकेही कृतार्थहुये सम्बन्धी के अभाव का प्रसंग है ताते। अरु आपने प्रति अपनाही सम्बन्धीपना बने नहीं क्योंकि तिसकरके

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"११८. तैत्तिरीयोपनिषद्। आात्माश्रयरूप दोषकी प्राप्ति होती है ताते। तिसप्रकार के अर्थ के अभावहुये अरु व्यवहारमात्रकी प्रवर्तकता के होने से मिथ्या व्यवहारकी प्राप्ति से अरप्रनिर्वचनीय वादही सिद्ध होताहै] जिस करके आत्मा से अन्य अनात्मरूप अरु तिस (तरात्मा) से भिन्न देश कालवाला सूक्ष्म अन्तरायसहित दूर स्थित भूत भविष्यत वर्तमानरूप वस्तु नहीं है [जिस करके आ्रात्मा से भिन्न वस्तु सभवें नहीं ताते आात्मा के तादात्म्य सेही नामरूपकी सिद्धि- होवेहै, इसप्रकार कहते हैं]याते सर्व अवस्थावाले नामरूप ब्रह्म सेही स्वरूपवाले हैं.। अरु [तब ब्रह्मको प्रपंच सहितता का प्रसंग होवेगा, सो।' तुम्हारा'। कहना योग्य नहीं, ऐसा कहते हैं, यहां यह अर्थ है कि ब्रह्मं तिस प्रपंचरूप नहीं है क्योंकि जड़रूप नहीं ताते, अरु सुषुप्ति आदिकों विषे तिस प्रपंचकी निवृत्तिं होने से भी तहां ब्रह्मकी सिद्धिका संभव है ताते ] ब्रह्म तिसरूप नहीं है।[।। प्र० ॥ तब नामरूपको ब्रह्मरूपता कैसे है,।उ० ॥। तहां कहते हैं, यहां यह अर्थ है कि स्वनविषे आ्रकाशको भक्षण करनेवत् आारोपितकी अ्प्रनुभव के अंगीकार से सिद्धि के अ्र्प्रसंभव से, अनुभवके विषय जे नामरूप सो अ्नुभवरूप ब्रह्मस्वरूपही कहिये है, परन्तु एकता के अभिप्राय से नहीं ] सो नामरूपता के निषेध से 'सोई' इस वाक्य करंके तिसरूप कहते हैं। अरु तिसनामरूप उपाधि करके 'ज्ञाता' अरु ज्ञानरूप शब्द अरु अर्थ आररादिक सर्व्वविद्यमान व्यवहारका भजनेवाला ्रह्मंसो शात्मां है। सो आात्मा सृष्टिकी कामनावाला हुआ तपकों तपता भया। यहां तप शब्दकरके।ऊर्द्धबाहु जलस्थायी पंचाग्नि का तापना कृच्छ्र चांद्रायसादिकों.को, न कहके !! ज्ञानको कहते हैं, 1 क्योंकि।".तस्य ज्ञानमयं तपः" तिसका ज्ञान (विचार) मय ।'तपहै' इस अन्य श्रुंतिके प्रमांण से, अररु तिस।'आ्र्रात्मा' को आाप्त।पूर्ण'। कामहोने से अन्य।'उक्रप्रकार के'लोकप्रसिद्ध तप का असंभवही है। एतदर्थ सो आत्मा उत्पन्न करने योग्य

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। ११६ जगत की रचना को विषय करनेवाले विचारको करता हुआ, यह अर्थ होताहै। सोई तात्मा तपको तपिके अर्थात् विचार अवलोकन करके, प्राशियों के कर्म्मादिक निमित्तों के अनुसार देश, काल, नाम, अरु रूप से जिसप्रकार अनुभव किया है? तैसेही सर्व अवस्थावाले सर्व प्राशियों करके अनुभव किये हैं, ऐसे इस जगत्को सृजताहुआ।"तत् सृष्ट्ा, तदेवानुप्राविशत, तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत्"। तिसको सृजके, तिसहीके ताईं पीछे प्रवेश करता हुआ, सच्च त्यच्चरूप होताहुआ अर्थात्, तिस को सृरजिके तिसही सजेहुये जगत्के ताई पीछे प्रवेशकरतांहुआ। अव प्रवेशकी अ्रनिर्वचनीयताके प्रकाशने से जीवको ब्रह्मस्वरूप होने करके प्रवेश वाक्यके तात्पर्य के देखावनेको विचारंका झा- रंभ कहतेहैं। तहां कैसे पीछे प्रवेश करताहुआ, यह विचार करने को योग्यहै। किंवा सो सष्टा (सृष्टिकत्ता) तिसही स्वरूंप से प्रवेश करताहुआ, किंवा अन्य स्वरूंप से।'प्रवेश करता हुआप्रा'। यह दो विकल्प हैं। तिनमें प्रथम क्या युक्क है, तहां भ्रुतिके अनुसार जो स्त्रष्टाहै, सोई पीछे प्रवेश करताहुआ, यह युक्न है। इसप्रकार जव सिद्धान्तीने कहा, तब पूर्ववादी कहताहै। [ पूर्ववादी कहता है। यहां यह अर्थ है, कि सृष्टि क्रिया अरु प्रवेश क्रिया के पूर्व अरु पीछे के कालविषे होनेके असंभवंहुये तिनके कर्त्ताकी एकताश्चतिकर के बोधनकिया है, परन्तु प्रवेशकी पिछले कालविषे होनेकी योग्यता संभवेनहीं, क्योंकि सृष्टिके कालबिषेही उपादानको कार्य्यरूपसे स्थितहोनाहै तांते निनु, जव ब्रह्म मृत्तिकावत्कारगाहै तबकार्यको तिसत्रह्मरूपहोनेसेतिसा 'कार्य' केविषेतिस। 'कारण'। काप्रवेशयुक् नहीं है। जिसकरके कारणही कार्यरूपसे परिणामकों पावताहै, याते सो प्रविष्टवतहै, परन्तु कार्यकी उत्पत्तिके पीछे कार्य से भिन्न कारण का पुनः प्रवेश त्घटितहैं। अरु जिस करके घटके परि- गामसेभिन्न मृत्तिकाका घटविषेश्नवेश नहीं, इसकरके जगदाकार परिणामसे भिन्न ब्रह्मका जगत् बिषे प्रवेश अघंटितहै। अरु जो

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१२० तैत्तिरीयोपनिषद्। सिद्धान्तका एकदेशी कहे।"जीवेनात्मनानुप्रविश्येति"। इसजीव रूपसे पीछे प्रवेशकरके,। इस अन्य श्रुतिसे 'जैसे घटविषे चूर्ण रूपसे मृत्तिकाका पीछे प्रवेश होताहै, तैसे आ्रात्माका अन्यरूपसे नामरूपात्मक कार्यविषे पीछे प्रवेश होताहै' यह कथन युक् नहीं है, क्योंकि ब्रह्म एकरूप है ताते। अरु'मृत्तिकाके स्वरूपको तो अ्रनेक रूपताहै ताते, तप्ररु सावयवताहै ताते अरु मृत्तिका का चर्ण प्रवेश रहित देशवाला है ताते, मृत्तिकाका चूर्णरूपसे घटविषे पीछे प्रवेशयुक है, परन्तु आत्माको एकताके होनेसे तपरु निर- वयव होने से अरु प्रवेश रहित देश का अभाव होनेसे तिसका प्रवेश संभवेनहीं। अरु जो सिद्धान्तका एकदेशी कहे है कि [सृष्टि- कर्त्ता से अन्यका प्रवेश जब नहीं संभवे है, तव किसप्रकार प्रवेश कहनेको योग्यहै। इसप्रकार सिद्धान्तका एकदेशी कहताहै] तब कैसा प्रवेशयुक्न हैं, अरु प्रवेश नहीं है ऐसा नहीं कहना चाहिये, किन्तु। "तदेवानुप्राविशत्"। तिसही के ताई पीछेपवेश करताहुआ, इस श्रुतिकरके प्रवेश श्रवगाकिया है ताते प्रवेश कहना युक् है। याते तब सावयवरूपही ब्रह्म होवो, तरु तिसको सावयव होनेसे मुखबिषे हस्तके प्रवेश होनेवत् तिसका जीवरूप से नाम रूपा- त्मक कार्य बिषे प्रवेशयुक्ही होवेगा, सो कथन बने नहीं, क्योंकि शून्यदेशका त्र्प्रभाव है ताते। अररु जिसकरके कार्यरूप से परिणाम को प्रासतहुये ब्रह्मका नामरूप कार्यही देशहै, तिससे भिन्न आप करके शून्य अन्यदेशहै नहीं।'अर्थात् जिसको शून्य कहते हैं सो लक्षसवाला होनेसे नामरूपवाला ब्रह्मका कार्य है ताते ब्रह्म से भिन्न शून्यदेश कोई नहीं'। कि जिस प्रदेश के अर्थ जीवरूपसे प्रवेश करे। अरु [जो कारणही अन्य कार्यरूप से परिणाम को पाया है, तिसके प्रति कोई एक कार्य जीवरूपसे प्रवेश को पावेगा, यहं शंकाकरने योग्य नहीं है, इसप्रकार कहते हैं] जो कहै कारसही प्रवेशको पावेगा छरु जीवरूप को त्यागैगा। जैसे घ ृत्तिका के प्रवेश हुये घटभावको त्यागताहै तैसे, तो[कोई एककार्यकेप्रवेशको,

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १२१ ऋरपंगीकार करके जो दूषएकहा सो संभवे नहीं क्योंकि श्रुतिका . ' विरोधहै ताते, इसप्रकार कहते हैं]।"तदेवानुप्राविशत्"। तिसहीके ... M ** र्थ पीछे प्रवेश करताहुआ, इसश्रुतिवाक्यसे सो कारणका पीछे प्रवेशयुक्त नहीं हैं॥ [कारणके स्मारक तत् शब्दसे कार्यको लक्षणा से जानिके तिसविषे त्र्प्रन्य कार्य काप्रवेश कहते हैंक्योंकिप्राप्त देशका संभव है ताते। शरु इसकरके श्रुतिका विरोध नहीं है, इसप्र- कार सिद्धान्तके एक देशी के मतको प्रकटकरके दूषण देते हैं] जो कहे, अन्य, कार्यही होवे है, अर्थात्।"तदेवानुप्ाविशत्" ति- सही के ताई पीछे प्रवेश करताहुआ, इस श्रुति करके जो जीव- रूप कार्य सो नामरूपसे परिणामको प्राप्तहुये अपरन्य कार्यकोही प्राप्तहोता है सो बनेनहीं, क्योंकि ऐसेहुये श्रुतिसे विरोध होताहै ताते। अरु जिस करके घट अन्यघटको पावता नहीं तरुव्यति- रेक श्रुतियोंके विरोधसे। अरु जिस करके नामरूप कार्य से जीवकेभेदकी अनुवाद करनेवाली श्रुतियां विरोधको प्राततहोंगी। अरु जीवको अरन्य कार्यकी प्राप्ति के हुये मोक्षका असंभव होताहै ताते। तपरु जिस करके मुक होता है तिसही को पावता नहीं। अरु जिस करके वांधेहुये चौरादिकों को श्रृंखला (बेड़ी) की प्राप्ति होवे नहीं।' अर्थात् चौरादिकों को प्रथम बन्धन होता है छरु उसको श्ृंखलाकी प्राप्तिहुये उस बन्धनकी निवृत्ति होती है सो पुनः प्रातहोवे नहीं, एतदर्थ कहाहै कि जिससे मुक होताहै तिसको पावता नहीं। इस करके जीव अन्य कार्य को प्रातहोता है, यहकथन युक्नहीं ।। [ कारसके वाचक तत् शब्दसे कार्यकी लक्षणा विषे कहने को अनिच्छित लक्षण जन प्राप्त होवे, तब तत, शब्द कारण पर ही होवो इस प्रकार अन्य सिद्धान्तका एक देशी कहता है ] तरु जो कहे बाह्य अरु अन्तरके भेद से परिगामको पावता है, अर्थात सोई कारणरूप ब्रह्म शरीरादि- कों का आधार होनेकरके अरु तिन शरीरादिकों के भीतर ध्येय होनेकरके परिणाम को पावता है सो कहना बने नहीं; क्योंकि

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१२३ तैन्तिरीयोपनिपद्। वाह्यस्थित वस्तुके प्रवेशका संभवहै ताते। तरु जिसकरके जो वस्तु जिसके भीतर स्थित है सोई प्रवेशको पाया, ऐसा कहते नहीं, इसहीसे बाह्यस्थित वस्तुका अन्तर प्रवेश होताहै। श्ररु प्रवेश शब्दके अपर्थको इसप्रकार देखा होनेसे, जैसे गृहको रचि के प्रवेश करताहुआ, तैसे॥। छारु जो अन्य वेदान्ती कहे कि जल विषे सूर्यादिकों के प्रतिविम्ववत् ब्रह्मका प्रवेशहोवेगा सोभी कह- नावने नहीं, क्योंकि तह्म को पूर्रा ता है ताते त्रुत्प्रसूर्त (निराकार) है ताते, इरु परिच्छिन्न मूर्चरूप सूर्यादिकोंका प्रसन्नता (स्वच्छता) निर्मलता के स्वभाववाले तन्य जलादिकों विषे प्रतिविम्ब का उदय होता है।अर्थात् प्रतिबिम्ब प्रकट भासता है, परन्तु त्र्प्रा- त्माको प्रमूर्त होनेसे, अरु आाकाशादिकों के कारण त्रपात्मा को पूर्णा होनेसे तरु व्यापक होनेसे' अरु आात्मा से दूर देशवाले प्रतिबिम्बके आपरधार वस्तुका पपरभाव है ताते, तिसका प्रतिनिम्ब- वत् प्रवेश कहना युक नहीं।।।'अर्थात् हे सौम्य!' जैसे पुरुष के प्रतिबिम्ब का आधार स्वच्छ स्वभाववाला दर्पण पुरुषसे भिन्न देशमेंहोता है, अर्थात् जितने तरवकाशमें पुरुषके शरीरकीत्राकृति परिमेयता है तिससे पृथक दूरदेशवाले अवकाशस्थलमें दर्प के होनेसे प्रतिबिम्ब होता है, छरु साकार वस्तुका होता है अरु विम्बरूपसे अधिक स्वच्छस्वसाववाले दर्पणादिकों में प्रतिविम्ब होताहै, इसप्रकार जब प्रतििम्बके होनेकी सामग्री होती है तब प्रतिबिम्बहोताहै, सो प्रतिबिभ्वकी सामग्रीका एक अपरद्वैत त्ररात्मा विषे प्रभाव है, क्योंकि प्रथम तो आात्मा अरपने प्रतिविम्ब होनेके हेतु साकारतासे रहित निरवयव निराकार है, अरु सो छ्रात्मा निराकार हुआ परिपूर्ण है तिससे इतर कहिये खाली ऐसा क़ोई देश (स्थान) नहीं जहां उसके प्रतिबिम्व का आाधार दर्पस स्थानीय बुध््यादिक होने, अरु तिस त्र्प्रात्मासे भिन्न शरु तिससे ऋ्रधिक स्वच्छ कोई वस्तु नहीं कि जिस विषे उसका प्रतिबिम्ब होवे। ताते प्रतिबिम्ब होनेकी 'यावत् साकारता, दूरदेश, पृथक्

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। .१२३ LA पराधार' अरु तिसकी स्वच्छता आदिक सामग्री हैं, तिन सर्व का एक अद्वैत निराकार स्वयं प्रकाश त्रप्रतिस्वच्छ सर्वव्यापी परिपूर्ण आात्मा विषे अभाव है। ताते तिस आ्रात्मा का सूर्यादि- कों के प्रतिबिम्बवत् प्रतिबिम्बरूप से प्रवेश कहना युक्र नहीं॥ हे सौम्य! यहां इस।"तदेवानुप्राविशत्"। इस श्रति के अर्थ विषे भाष्यकारस्वामी श्रीशंकराचार्य्यजीने प्रतिबिम्बरूप से आात्मा के प्रवेश का खेंडन किया है, अरु छांदोग्य उपनिषद्के छठे अध्याय की।"जीवेनात्मनानुप्रविश्य"।।'इस श्रुतिके अर्थविषेन्न्यात्माका प्रतिविम्बरूपसे प्रवेश कहाहै, सो स्थान विशेष के भेदसे अर्थवि शेष का भेदहै ऐसे जानना, विरुद्धार्थन जानना'।। इसप्रकार सि- द्धान्तके एकदेशीकेमतकोनिषेधकर के पूर्ववादी की शंकाकी समाप्ति करेहैं। जब इसप्रकार है, तब ब्रह्मकाप्रवेश नहीं है। अरु।"तदेवानु- प्राविशत्"। इसके अपर्थपीछे प्रवेशकरताहुआ,।इस श्षतिके अन्यार्थ को हम पावतेनहीं। तरुश्चुति जो है सो हमको इन्द्रिय अगोचर ।'अर्थात् इन्द्रियों का तरविषय'। वस्तुके ज्ञानकी उत्पत्तिविषेनिमित्त है। अरु यत करनेवाले जे हम तिस हमको इस श्रुतिवाक्य से ज्ञानका होना संभवे नहीं, हा बड़ाकष्ट है। तब व्यर्थ होनेसे।"त- रसप्टातदेवानुप्राविशत्"। तिसको रचिके तिसके अर्थ पुनः प्रवेश करताहुआ,। यह वाक्य अंधपुरुष मशिको प्रात्तहुआ इसवाक्य- वत् [सो श्रुतिसृष्टिकर्त्ताके प्रवेशको कहे हैं, यहां यह अर्थ है कि सोश्षुति हम मीमांसकोंको प्रमायहै, ताते विरोधहुये अन्यकेप्रवेश की कल्पना युक्त नहीं है ] अर्थ से शून्यहै, [ शक्रिके विषयरूप अर्थका त्रसम्भव होनेसे अर्थ करके शून्यता है, अथवा तात्पर्थकें विषयके त्र्प्रसम्भवसे अर्थकर के शून्यताहै, तिनमें प्रथमपक्षबने नहीं क्योंकि समीप देशवाले भी जल में आकाशादिक सूर्च वस्तुकें प्रतिबिम्बके होनेवत् प्रमूर्त्तब्रह्मके भी त्रनिर्वचनीय अ्रविद्या का- दिकों विषे प्रतिबिम्ब होनेकी उत्पत्ति के अनन्तर कालके ताईं ञन्तःकर एादिकोविषे प्रतिबिम्ब के अप्रभाव के प्संभ वसेइसप्रकार

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१२४. तैत्तिरीयोपनिषद्। कहे हैं।"नेति"। नहीं इति,। तपररु द्वितीयपक्ष भी वने नहीं, ऐसा कहते हैं] सो कथन बने नहीं, क्योंकिइस श्रुतिवाक्यको अन्य अर्थवालापनाहै ताते।प्र० ॥ इस स्थान विषे किस तपर्थकी चर्चा करतेहौ।उ०॥ इस वाक्यका प्रसंगविषेप्राप्तहुआर यह अर्थ है, त- थापि कहने को इच्छित अन्य अर्थ है, सो स्मरण करनेको योग्यहै ।"ब्रह्मविदान्नोतिपरम्" ज्रह्मवेत्ता परत्रह्मको पावता है,।"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म"। सत्य ज्ञान त्र्प्नन्त ब्रह्म है,।"योवेदनिहितं गु- हायाम्"। जो गुहाबिषे स्थित ब्रह्मको जानताहै, ऐसे प्रसंगविषे प्रास हुआ जिस ब्रह्मका ज्ञान (जानना) सो कहनेको इच्छित - है। तपररु तिस ब्रह्मस्वरूपके जनावने के अर्थ प्रप्राकाशादिकों से लेके अन्नमयकोशपर्यन्त सर्वकार्यं देखाया। अरु ब्रह्मके जाननेका उपायआरम्भकिया है। तहां।"तन्नरसमयादन्योऽन्तरात्माप्राण- मयः"।अन्नरसमय त्ात्मासे अन्य भीतर छात्मा प्रासमय है,। अरु तिसके भीतर मनोमयहै, तिसके भीतर विज्ञानमय है, तरु इस विज्ञानमय बुद्धिरूपा गुहा बिषे प्रवेश को पाया त्ररानन्दमय- रूप विशिष्ट आरपरात्मा देखाया।[ बुद्धिरूपा गुहाविषे प्रवेशसे ञ्रन- न्तर आ्नन्दमयही विशिष्टार्थ है, क्योंकि लिंगकरके चेतनरूप विशेष्यके विशेष्यपने के तव्यभिचारको देखते हैं ताते। तिसके ज्ञानद्वारा प्रानन्दके वृद्धिका त्र््वधित्रात्मब्रह्मरूपी जो है, सो इस ही।'बुद्धिरूपा गुहाविषे जाननेको योग्यहै'। इस अ्रिप्रायसेजल विषे सूर्यके प्रवेशवत् अ्र्प्रनिर्वचनीय प्रवेश कहिये है। यह अर्थ है] याते पीछे आनन्दमयरूप लिंग।चिह्न'। के ज्ञानद्वारा प्रानन्दकी वृद्धिका त्रवधिरूप ब्रह्मपुच्छ प्रतिष्ठा सर्वविकल्पका आपराश्रय शरु निर्विकल्परूप जो आरात्माहै, सो इसही बुद्धिरूपा गुहाबिषे जानने को योग्यहै। इस रीतिसे तिसका प्रवेश कल्पना करते हैं।[ बुद्धि- रूपा गुहाविषेही ब्रह्मके ज्ञानका संभव होने से तहांहीं।'उसका'। प्रवेश कहनेको इच्छितहै, इसप्रकार कहते हैं] अरु जिस करके ब्रह्मनिर्विशेष है ताते अ्न्य ठिकाने जानाजाता नहीं। [ नसु

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ञप्रन्य ठिकाने प्रतीति के अयोग्य जो ब्रह्महै सौ बुद्धिबिषेही कैसे प्रतीत होताहै, यह आ्रप्राशंका करके ऐसाकहते हैं कि उपाधिकी कोई योग्यता के सम्भव होनेसे बुद्धि विषेही ब्रह्मप्रतीत होवे है यहां यह अर्थ है कि अन्तःकरणके सम्बन्धसेही देह अरु घटादिकोंविषे चैतन्यका ताविर्भाव होता है आपही से नहीं। अरु.अन्तःकरण जो है, सो अन्तराय से विनाही अन्वय अरु व्यतिरेकसे चैतन्य के आविर्भावका करने वालाहै,] अरु विशेषसे जो सम्बन्धहै.सोई ज्ञानका हेतु देखा है। जैसे।'अदृश्यमान'। राहुका चन्द्र अररु सूर्य करके विशिंष्ट सम्बन्ध है। 'सोई राहुके दर्शन का हेतु है'।। तैसे- ही अन्त:करय। वा बुद्धिका' रु आत्माक्का।'विशिष्ट' सम्बन्ध है सोई।'अ्रप्रविशिष्ट'। ब्रह्मके ज्ञानका हेतु है, क्योंकि अन्तःकरण ।'आत्माके'। समीपवर्ती है ताते अरु [जैसे अस्वच्छ (मलिन) स्वभाववाले घटादिकों विषे मुख प्रतिबिम्धको पावतानहीं। 'पर- र्थात् मुखका प्रतिबिम्ब होता नहीं'। अरु स्वच्छ (निर्मल)स्वभाव वाले जलादिकों विषे प्रतिबिम्बको पावता है। अर्थात् प्रतिबिम्ब होताहै'।। तैसेही शुद्ध सत्वगुण प्रधान अन्त:करणकी।'स्वच्छता'! अरु एकाग्रता के स्वभाव से तहांही ब्ह्मका ज्ञानघटे है।'घटवत् मलिन देहादिकोंविषे नहीं'। इसप्रकार कहते हैं] प्रकाशरूपहोने से।[ किं वा किरणांकार से विकाशको प्रात्तहुये जड़ सूर्यादिकों का अन्धकाररूप श्र्प्रावरण के तिरस्कारविषे समर्थ प्रकाश अ्रङ्गी- कार करते हैं, तैसे जड़ताके तुलहुये अरु वृत्तिके आराकार से परि- s It i ghe ाम को प्रांसहुये अन्तःकरण का ही तज्ञानरूप तावर के तिरस्कार का सामर्थ्य अङ्गीकार करने को योग्य है, ऐसा कहते हैं।'हे सौ्य!'। यहां जो दष्टान्त दारष्टान्त करके कहा कि सूर्यका अपनी किरणों करके अन्धकारके तिरस्कार करनेका सामर्थ्य है, इरु वृत्तिरूपसे परिणामको प्राततहुये अन्तःकरण का त्रज्ञानके तिरस्कार करनेका सामर्थ्य है,सो स्वयंज्योतिः चैतन्य आात्माके निमित्त का किया जानना उनके स्वरूप का ही नहीं क्योंकि सूर्य

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१२६ तैसिरीयोपनषद्। ऋरु अन्तःकरण का, अन्धकार रु अज्ञाननाशक सामर्थ्य उनके स्वभावस्वरूप का ही माननेसे।"तत्यभासासर्वमिदविभा- ति"। तपरु।"यदादित्यगतंतेजो जगन्भासयतेऽखिलम्"। इत्यादिं भ्रतिस्मृतियों से विरोध आवता है।] त्रपररु जैसे प्रकाश करके विशिष्ट घटादिकों का ज्ञान होता है, तैसे वुद्धि वृत्तिरूप प्रकाश करके विशिष्ट आत्माका ज्ञान होवेहै, ताते ज्ञानकी हेतु बुद्धिरूंप गुहाविषे स्थित, ऐसे प्रसंगविषे प्रासहुआ। 'जो ब्रह्म' सो वुद्धि वृत्तिरूप स्थानवाला ब्रह्मही यहां पुनः।"तत्सष्ट्वातदेवानुप्राविश- त्"। तिसको सृजिके तिसके ही तर्थ पीछे प्रवेश करताहुआ्;। इसप्रकार कहिये है। सोई यह ताकाशादिकोंका कारण ब्रह्म सो कार्यको सृजके तिसके अर्थ पीछे प्रवेशहुयेवत् बुद्धिरूपा गुहाके भीतर।'द्रष, श्रोता, मन्ता अारु विज्ञाता, ऐसे विशेषवत् प्रतीत होताहै'। सोई तिसका प्रवेश है। एतदुर्थ सोएगारूप ब्रह्महै, ञ्रु सो तप्रस्थिभाव के होनेसे है, इसप्रपके भीतर विज्ञानेग्यं है। सो तिस कार्य के ताईं पीछे प्रवेश करके स्प्रवेश को पाया स्थूलरूप) घरु त्यन्च कहिये त््प्रमूर्त्त (सूक्ष्मरूप) हृपा गुहाविषे प्र जिसकर के पप्पकट नामरूपमय र्प्रात्माविषेस्थितसूक लिंगकरके, यह दोनों अपने अ्र्प्रन्तर्गत आर्प्रात्मासे प्रकट करते हैं। दख़तदर्थ वे सूर्त तरु प्रमूर्त शब्दके वाच्यहैं। जरु वे आरप्रात्मासे विभागरहित देशकाल- वाले हैं, एतदर्थही सो। 'मूर्त असूर्त' दोनोंरूप आात्मा होताहुआ इसप्रकार कहिये है.।।"ब्रह्मणो वा दे रूपे मूत्तञ्चामूरत्तञ्च"।।'श्रु- त्यन्तरे'।। कि वा समान अरु असमान जातिवाले पदाथोंसे नि- कृष्टहुआप्ा देश तपररु काल तिनकर के विशिष्ट होनेसे। "इदंतत्"। यह छरु सो,। ऐसे कथन किया जो।"निरुक्श्चानिरुक्ञ्व, निलयन- ख्वानिलयनञ्च, विज्ञानश्चाविज्ञानश्च, सत्यञ्चानृतञ्व, सत्यमभ- वत्, यदिदं किश्च,तत्सत्यमित्या चक्षते, तदप्येष श्लोको भवति"। निरुक्त अरुं अ्रपरनिरुक्त, निलयन तरु अ्रनिलयन, विज्ञानशरु: अविज्ञान, सत्य शरु असत्य, सत्यरूप होताहुआ, तिसको सत्य

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द्वितीयाध्याय न्रह्मानन्दवंल्ली। १२७ ऐसे कहते हैं, तिसविषे यह श्लोक होताहै; अर्थात् 'यह अरुं सो' इसप्रकार कथन किया जो निरुक्त अरु तिससे विपरीत सो तपनिरुक् ।अर्थात् यह निरुक् अरु अ्निरुक्त यह भी सूर्त तर्प्र- सूर्चके ही विशेषयाहैं, जैसे प्रत्यक्ष शरु परोक्षरूप अपपर्थवाले सच्च परु त्यच्चरूप विशेषण हैं तैसे'। शरु निलयन अरु त्रनिलयन ।निलयन जो तरराश्रय सो मूर्तकाही धर्म है, तपरु तिससे विप- रीत जो त्रनिलयन सो परमूर्तकाही धर्म है'.। [निलयन कहिये गृह इप्ररु पप्रट्टालिकादिक मूर्ततिमान् स्थानविशेष, शरु अ्रप्रनिलयन कहिये अवयवरूप, देश विशेषसे रहितपना, सो अनिरुक्रतादिक पप्रमूर्त्तके धर्मवत् ब्रह्मकोही क्यों न होवेंगे, तहां कहते हैं ] त्यत् शरु अ्ररनिरुंक ऋपररु अ्र्प्रनिलयन, यह अ्रमूर्त रूपताके हुये भी व्या- कृतको विषय करनेवालेही हैं, क्योंकि सृष्टिके उत्तरकाल विषे तिनके होनेका अ्रवसहै ताते। याते त्यत् जे प्राणादिक अनिरुक्त हैं सोई त्रनिलयनहैं, याते यह त्र्प्रसूर्त्तके विशेषण व्याकृत 'कार्य' कोही विषय करनेवाले हैं। अरु विज्ञान (चैतन्य) अरु चेतन से रहित अरचेतनरूप अविज्ञान, अरु पाषागादिरूप सत्य ।'यहां सत्य: जो कहा सो अधिकारसे व्यवहारको विषय करनेवाला है परन्तु परमार्थसे सत्य नहीं। परमार्थसे सत्यरूप तो एक ब्रह्मही है, अरु व्यवहार को विषय करनेवाला जो सत्य है, सो सापे- क्षिक है। याते मृग जलादिक असत्यकी अपेक्षा से व्यावहारिक जलादिक सत्य कहते हैं, अरु तिस सत्यसे विपरीत सो भूठ (असत्य) यह सर्व सो परमार्थ से सत्यरूप जो ब्रह्म सो होता हुआ॥प्र०॥ सो ब्रह्म क्यारूपहै।उ॥सोब्रह्म।"सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म"। संत्यज्ञान अनन्तव्रह्म हैं,। अर्थात् सोब्रह्म 'सत्य' चैतन्य, अनन्तरूप है। ऐसे प्रसंगमें प्राप्तहुआ होनेसे, सत्यादिरूप है। इपररु जिस करके सत् अरु त्यत् आदिक सूत्त अरु वमूर्त्तरूप धर्मो का समूह जो कुछ यह विलक्षणं विकारका समूह है, सो एकहीं सत् शब्दका वाच्यब्रह्म होताहुआ, तिससे भिन्न नाम रूपमय

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१२८ तैत्तिरीयोपनिषद्। विकार कहिये कार्य तिसके त्भाव से। याते तिस।'सर्व के कारणरूप'। ब्रह्मको ब्रह्मवेत्ता सत्य ऐसा कहते हैं। [ पदोंका अर्थ करके प्रसंगविषे प्राप्त प्रश्न के निषेधहुये।"सोऽकामयत, इति" सो कामना करता हुआ,। इत्यादिरूप प्रकरणके तात्पर्यको देखावे हैं ] ।ब्रह्मवेत्ता तो ब्रह्मको सत्य कहते हैं, परन्तु' त्रह्म है वा नहीं, ऐसा प्रसंगविषें प्रासहुआ प्रश्न है, तिसके उत्तर विषे यह कहा कि। "बहुस्यामि" में बहुत होवों,। ऐसे कामना करता हुआ। अरु सो कामना के अनुसार सत् ऋरु त्यत् आदि लक्षण वाले त्रराकाशादि कार्यरूप सृजके तिसके ताई पीछे प्रवेश करके, देखताहुआ, सुनताहुआ, मनन करताहुआर, जानताहुआ, बहुत रूप होताहुआ। ताते सो यह आकाशादि कार्योंका कारण परम व्योमविषे त्रनुगत हृदयरूपा गुहाविषे स्थित, अरु तिस गुहाके शहंकर्त्ता भोका इत्यादि वृत्तिरूप प्रकाशविशेषों से प्रतीयमान ब्रह्मको "है" इसप्रकार जानना ऐसे कथन कियाहै। अरु तिस इस ब्राह्मणा भाग करके उक्क, अर्थविषे यह श्लोक कहिये मन्त्र ।'प्रमाण'। होताहै। अरथात् जैसे पूर्व के पांच तप्रनुवाकों विषे भी त्न्नमयादिक पप्रात्माके प्रकाशक मन्त्रहैं, तैसे कार्यद्वारा अत्यन्त सर्वान्तर त्रप्रात्मा के सद्भाव के प्रकाशक भी मन्त्र होतेहैं॥३०॥ इति षष्टोऽनुवाकः ॥ ६ ॥ तरथ अप्तमोनुवाक: ७। असद्वा इदमग्र आर्प्रांसीत। ततो वै सदजायत। तदात्मनछस्वयमकुरुत। तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति। यद्वैतत्सुकृतम्। रसो वै सः। रसछ ह्येवायं लब्ध्वा- Sऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात्क प्रारयात्। यदेष तर्प्रांकाश त्र्प्रानन्दो न स्यात् एषं ह्येवानन्दयति। यदा

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द्वितीयाध्याम ब्रह्मानन्दवच्जी.। १२६ तिष्ठां विन्दते। अथ सोडभयं गतो भवति। यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य। तदप्येष श्लोको भवति॥ ३१॥ इति सप्तमोडनुवाकः ॥

थंस्व्रयमकुरुत, तस्मान्तत्सुकृतमुच्यत इति"। ययह पगे असत्ही होताहुआ, तिससेही सत्उत्पन्न होताहुआ, सो आपही आपको ही करताहुआ, ताते सो सुकृत कहिये है, अर्थात् यह जगत्आगे असत्ही होताहुआ। यहां असत् शब्दकरके प्रकटनामरूप प्रपंच से विपरीतरूपवाला तर्रविकारी ब्रह्म कहतेहैं। पुनः सो अत्यन्तही असत् है ऐसानहीं जिसकरके छसत्सेसत् 'विद्यमान'जन्मसेरहित ऐसानामरूप विशेषवाला व्याकृत( कार्य)रूप जगत्उत्पत्तिसे पूर्व नहीं हुआहै, किन्तु असत् ब्रह्मका वाच्य ब्रह्महोता हुआतिस शसत् ब्रह्म से निश्चयकरके नामरूपके विभागवाला प्रपंचरूप से सत् उत्पन्नहुआ॥ तिससे विभागवाला कार्य क्या पिता से पुत्रवत् उत्पन्न हुआहै, तहां नहीं, इसप्रकार कहते हैं, सो पसत, ब्ह्मका वाच्य ब्रह्म आपही आपकोही करताहुआ। इस करके ऐसे है, ताते सो ब्रह्मही सुकृत,।' तर्थात् आपही कर्त्ता'। कहते हैं। लोक विषे ब्रह्म सर्वका कारण होने से आपही कर्ता प्रसिद्ध है। जाते निश्चय करके सर्वरूपसे सर्वको आपही करताहुआर, ताते सो आपही कर्त्ता ऐसा कहते हैं। वा पुएयरुपसे भी सोई ब्रह्मरूप कारस सुकृत कहते हैं। अरु लोकविषे सर्वथा भी फलका सम्ब- न्धादिक कारण सुकृत शब्दका वाच्य प्रसिद्ध है। अरु जब पुएय है वा अन्य है, सो प्रसिद्ध चेतनवत् नित्य क़ारण के होते संभवे है, ताते सुकृत की प्रसिद्धि से सो ब्रह्म सुक्कतरूप है। अरु इस अग्रिम कहने की रसरूपता की प्रसिद्धि रूप हेतु से भी यह ब्रह्म सुकृतरूप है।। प्र०॥ ब्रह्मको सुक्कृतपनेकी प्रसिद्धि काहे से है,

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१३० तैत्तिरीयोपनिषद्। उ०॥ तहां कहते हैं। "यद्वैतत् सुकृतम्, रसो वै स:, रस थंह्येवायं लब्ध्वाSSनन्दीभवति"। यदा यह सुकृत, निश्चय करके सो रसरूप है, रसकोही पायके शप्रानन्दित होते हैं, अर्थात् यद्ा यह सुकृत निश्चयकरके सो रसरूप है। लोक विषे तृप्तिका हेतु परानन्दकारी मधुर आरप्राम्मादिक रूपरस प्रसिद्धहै यह पुरुष रसको ही पायके आन्दित कहिये सुखी होताहै। लोकविषे असत् वस्तुको प्रनन्द का हेतुपना देखा नहीं। तरु जिसकरके बाह्य आनन्द के साधन से रहितहुये भी इच्छा अरु एषणा से रहित विद्दान् ब्राह्मण बाह्य रसके लाभादिकों से रहित रसरूप आ्ररानन्द वाले देखते हैं, तिनका ब्रह्मही रसहै। एतदर्थ तिन विद्वानों को आानन्दका कारण रसवत् ब्रह्मही रसहै। अरु प्राणादिक क्रिया के देखने रूप हेतु से भी ब्रह्महै, इसप्रकार जानाजाताहै। अरु यह पिएड (देह)भी जीवते के प्राससे प्राणन (जीवन) क्रिया को करता है, परुन्नपानसेअर्प्रपाननक्रिया को करताहै, ऐसेवायुसम्बन्धी शरु इन्द्रियसम्बन्धी जो चेश्टाहै, सो मिश्रित हुये कार्य अरु कारण रूप।'संघात'।करकेनिर्वाह कियाहुआ्र देखतेहैंत्र्प्ररु सो एकप्रयोजन का साधनहोने करके पर स्पर के अधी नतचेतनरूप कार्य कारका संघात चेतन करके युक्त संभवे है, क्योंकि [गृह ञरु ञप्रटारी त्र्प्रा- दिकों विषे स्वतन्त्र, अप्ररु गृहादिकों से आर्प्ररंभ करने को अप्रयोग्य स्वामी विना मिलावने के पदर्शन से। अर्थात् गृहादिक जिनकी संज्ञाहै सो ईट पाषाण चूना सृत्तिका काछ्ठादि संघात से निमिस्त होते हैं, परन्तु उन ईट पाषासदि जड़ों के संघात से पृथकू तरु चेतन कोई एक उनके स्वामी करकेही उन ईट पाषासादिकोंका पकन होय गहादिकों के नामरूप से निर्माण होना लोकषिषे देखाहै, उन ईंट पाषासादिकों से भिन्न उनके स्वामी चैतन्य विना उन जड़ ईट पाषासादि संघातका एक होना देखा नहीं'। कार्य कारण के संघात विषे भी विलक्षण अरु शरीरवाला शरु अवयवादिकों से शरु बुद्धि आरदिकों से रहित।उन जड़ संघात

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १३१ का एकत करनेवाला कोई एक'। स्व्रामी जानिये है, अरु वह चे- तनपने करके।' सर्वत्र'। भेदके त्रभाव से ब्रह्मही है, इसप्रकार तिसके सद्भावकी सिद्धिहै। यह तरर्थ है ] अन्य ठिकाने स्वामीसे रहित तिनका पप्रदर्शनहै ताते। सो कहते हैं।"को ह्येवान्यात्कःप्रा- एयात्, यदेष आकाश आप्रानन्दो न स्यात् एष ह्येवानन्दयति, यदा ह्यवैष एतस्मिन्नटश्येSनात्म्येSनिरुक्ेSनिलयनेSभयं प्रतिष्ठा वि- नदते"। जजब यह आकाशविषेन्नानन्द न होवे, कौनही अपान रूप चेष्टाको करेगा, कौन प्रासानरूप चेष्टाको करेगा, जिसकरके यहही आनन्द करावे है, जब याते यह इस अदृश्य अनात्म्य श्र. निरुक्त अनिलयन अभय स्थितिको पावता है तब सो अभयको प्राप्त होताहै, अर््थात् जब यह आकाशसंज्ञक परमव्योभगत. हृदयरूपा गुहाविषे स्थित आ्रानन्द न होय तब लोकबिषे कौनही अपरपानरूप चेष्टाको करेगा, अरु कौंन प्रासनरूप चेष्टाको करेगा, किन्तु कोई भी न करेगा, ताते सो ब्रह्म है, ऐसा जानाजाता है।। जिसके अर्थ कार्य कारणादिकों की प्राणन आदिक चेष्टा होवे है, तिसका कियाही आरानन्द लोकोंको होता है।। प्र० ॥ यह काहे से जानतेहौ,।।उ०। जिसकरके यहही परमात्मा लोकोंको। 'उनके। पुएयोंके अनुसार आानन्द करावे है, अरु सोई आानन्दरूप आतमा प्राणियों को अररविद्या से परिच्छिन्न भासता है, एतदर्थ अविद्वान् को भयका अरु विद्वान्को अभयका हेतु होने से, सो ब्रह्महै, इस प्रकार जानिये है। ननु, सत् अवस्थावाले वस्तुके आश्रयसे अ -भय होताहै, ऋरु अरसत् वस्तु के आराश्रयसे भयकी निवृत्ति संभवे नहीं; इसकरके ब्रह्म को अभय का हेतुपना कैसे है, तहां कहते हैं, जब जिसकरके यह साधक इस ऋदृश्य [दृश्य नाम देखनेयोग्य विकारका है, क्योंकि विकार (कार्य) दर्शनके अर्थहै ताते,। शरु ब्रह्म जिसकरके दृश्य नहीं, इसकरके अदृश्य कहिये अविकारहै। यह अर्थ है ]; अविकारी अरु अविषयरूपहै, अरु जिसकर के अ- दृश्यहै तिसही करके अनात्म्य कहिये अशरीरहै, अरु जिसकरके

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१३२ तैत्तिरीयोपनिषद्.। अनात्म्य।अशरीरी।' है तिसही करके त्र्प्रनिरुक्त कहिये अ्र्रवाच्य है [जो विशेषहै सोई कहनेका विषय है, तपरु सो विशेष विकार रूपहै। तरु ब्रह्म जिसकरके सर्व विकारों ( कार्यों) का हेतु (कारण) है ताते त्ररविकारीरू पहै, एतदर्थ अनिरुक् कहिये त्र- वाच्य है। ] तरु जिसकरके अ्र्प्रनिरुक्रहै तिसही करके त्र्प्रनिलयन कहिये आाधाररहित अनाधार है ऐसा कहते हैं तरु पूर्व कार्य के धर्मसे विलक्षण ब्ह्म विषेअ्रभय स्थितिकहिये त्र्ात्मभाव कोपावता है, तब सो तिस न्रह्म विषे भयके हेतु श्रविद्याकृत नानाभावके दर्शनसे अरप्रभयको प्रप्त होताहै। ऋरुजिसकरके यह साधक जब स्वरूप विषे प्राप्त होताहै त अन्यको देखता नहीं, अन्यको सुनता नहीं, अन्य को जानता नहीं अरु जिसकरके अन्य से अन्यको भय होता है, त्रप्रात्मा अपपने आरापसेही नहीं, एतदर्थ आ्रत्मा से जो अभय कहा सो युक्र है ताते आत्माही आ्रात्मा के अभयका कारण है। ऋरु भय हेतुके होते ब्रह्मवेत्ता न्राह्मण सर्व तपरोरसे निर्भय देखिये है, अरु सयसे रक्षक न्रह्मके अविद्यमान हुये सो अभय पयुक्तहै, ताते तिन ब्राह्मसको तभयके दर्शन से तिस पभयका कारण न्रह्महै इसप्रकार जानते हैं। प्र०॥यह साधक कब परभयको प्राप्त होताहै।। उ०।।जव यह साधक अरन्यको नहीं देखता है, अरु आत्माबिषे मेदको करता नहीं, तब अभयको प्राप्त होता है। यह अ्रभिपाय है।" तथ सोऽभयंगतो भवति, यदा हो- वैष एतस्मित्रुदरमन्तरं कुरुते, अथ तस्य भयं भवति, तत्ेव भयं विदुषो सन्वानस्य, तदप्येष श्लोको भवति"। 'तब सो त्र्भ- यको प्राप्त होताहै, जब जिस करके यह इसविषे अल्पभी अन्तर को करताहै तब तिसको भय होता है, जाननेवाले न मानने वाले को सोई तो भय होता है, तिसबिषे भी यह श्लोक होता है, अर्थात् तब सो तिस ब्रह्मबिषे भयके हेतु त्र्रविद्याकृत नाना भावके न देखने से अ्भय को प्राप्त होता है, ऋरु जब अरवि- दयावस्था बिषे जिसकरके यह शरविद्यावान् अविद्या करके आरो

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १३३ पित वस्तुको तिमिर दोषकरके आरोपित द्वितीय चन्द्रमावत् आात्मा विषे देखता है, अरु इस ब्रह्मबिषे अल्प भी त्रन्तर कहिये भेददर्शन को करता है, अर्थात् अन्तःकरण बिषे रंचक- मात्र भी भेदको देखता है, तब तिस भेद दृष्टिरूप हेतु करके तिस भेददर्शी आप्रात्माको भय होताहै। एतदर्थ आत्माही आात्मा को भयका कारण होताहै, अर्थांत् ईश्वर मुझसे अन्यहै रु मैं तिससे अन्य संसारी हौं, इसप्रकार जाननेवाले तपरु तरप्रल्प भी भेदके करनेवाले पुरुषों को भय होताहै। इसप्रकार जानके भी एकता करके न माननेवाले भेददर्शी को भेददृष्टिका विषयककिया सोई ब्रह्मतोभय का हेतुहोताहै।[।"दासोस्मि"।"दासोऽहं तस्य देवस्य ममाराध्यःपरमेश्वर इति" मैं दासहौं, वा मैं तिसदेवका दासहौं अरु मेरा आराध्य परमेश्वर है,। इसप्रकार के भेदको, जाननेवालेको कैसे प्रप्रज्ञानी कहते हौ, यहां यह अर्थहै, जैसे चन्द्रमा के भेदको देखतांहुआभी पुरुष अयथार्थदर्शी होनेसे अज्ञानी कहते हैं तैसे] जिसकरके जो यह एक पभिन्न आत्मतत्व्रको देखतानहीं, तिसही करके यह विद्वान् भी अविद्दानहै। तव तिस भेददर्शी को भयकी संभावना किसप्रकार होती है। तहां कहते हैं, यहांयहञ्र्र्थ है कि, संहारका कर्त्ता परमेश्वर हमको संहार करेगा, वा नरक विषे डालेगा, इसप्रकार देखनेवाले पुरुषको भय होताहै।[ तप्ररु नाश करनेयोग्य मानेहुये वस्तुके विनाशके हेतुके देखने से, तिस को भयहोवे है। ब्रह्मही उच्छेदका हेतु काहेसे है। सहां कहे हैं:। यहां यह अर्थ है कि, उच्छेद कहिये नाश तिसके हेतुके भी उच्छेद के हुये अनवस्थाके प्रसंगसे तिसकी नित्यता कहनेको योग्य है, सो उच्छेद का हेतु ब्रह्मसे अन्य संभवे नहीं ] तपरु त्ररन्यों के नाश का हेतु जो ब्रह्महै, सो नाश करने को अयोग्य है, एतदर्थ।तिस भेददर्शी के चित्त घिषे तिस नाशके कारण'। अरु नाश करनेको ऋयोग्य ब्रह्मके अविद्यमानहुये तिस नाशके हेतु भेदके दर्शनका कार्यरूप भय युकहै। तरु सर्व जगत्को भयवाला देखते हैं, ताते

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१३४ तैत्तिरीयोपनिषद्। जगत् के भयके देखनेसे जानिये है कि जिससे जगत् भयको पा- वताहै, ऐसा भयका कारण विनाशका हेतु अविनाशीरूप सो ब्रह्म निश्चय करके है। तिस इस तप्र्थविषे भी यह अग्रिम कहनेका श्लोक कहिये मन्त्र प्रमाण होवे है॥।३१॥ इतिससमोऽनुवाकः।।७॥ तरथाष्टमोऽनुवाक: ८॥ भीषाऽस्माद्वातः पवते। भीषोदेति सय्यः भीषा- स्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम इति। सैषा- Ssनन्दस्य मीमाथंसा भवति। युवा स्यात्साधु युवा- डध्यायिक:। आ्प्राशिष्ठो हढिष्ठो बलिष्ठः। तस्येयं प्थिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात। स एकोमानुष आ्र्प्रानन्दः । ते ये शतं मानुषा आानन्दाः। स एको मनुष्यगन्धर्वाणा- मानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ते ये शतं म- नुष्यगन्धर्वाणणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामान- न्दुः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य॥ ते थे शतं देवगन्ध- र्वाणामानन्दाः। स एकः पितृणां चिरलोकलोकांना- मानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ते ये शतं पि- तृसां चिरलोकलोकानामानन्दाः। स एक अंजानजा नों देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः । सं एक: कर्म्मदेवा- नामानन्दः। ये कर्म्मणा देवानपि यन्ति। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ते ये शतं कर्म्मदेवानामानन्दाः ।स एको देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य॥ते ये शतं देवानामानन्दाः ।स एक इन्द्रस्यानन्दः॥श्रो- त्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः।

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दभसी। १३५ स एको बृहस्पतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य॥ ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः।स एकः प्रजापतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ते ये शतं प्रजापतेरान- नदाः। स एको ब्रह्मर आरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाका- महतस्य ॥ स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये। सं एकः । स य एवांवित्। उप्रस्माल्लोकात्प्रेत्य एतमन्नमय- मात्मानमुपसंक्रामति। एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रा- मति। एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति। एतं विज्ञान- मयमात्मानमुपसंक्रामति। एतमानन्दमयमात्मानमुपसं- क्रामति।तदप्येषश्लोको भवति॥।३२।इत्यष्टमोऽनुवाकः॥

ग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चम इति"। 'इससे भयकरके वायुच- लताहै, भयकरके सूर्य उदयहोताहै, इससे भयकरके त्ररग्नि, इन्द्र, अपररु पांचवां सृत्युधावता है, अरथांत्जिसकरके वायु आ्रप्रादिक न्राप ईश्वरहुये भयके योग्यहोयके बहुत श्रमवाले गमनादिक कार्य्यों विषे नियमितहुये प्रवृत्त होतेहैं, सो भयका कारण आनन्दरूपब्रह्म है। तिस इसतनन्दरूप ब्रह्मको यहयुक्नहै कि जिस नियामक के होते नियम करके तिनका प्रवर्तन होवे है। अरु राजा से किं- करवत् वे वायुआप्रादिक इस व्रह्म से भयकरके प्रवर्त होते हैं, एतदर्थ।' उनको'। भयका कारण तिनका नियामक ब्रह्महै।छरुं सो भयका कारण ब्रह्म आनन्दरूप है[ सो भयका कारण ब्रह्म ।'यदेष त्रराकाशत्ररानन्दो नस्यात्" जो यह आ्रकाशविषेआ्र्ानन्द न होय तो,। इस श्रुतिबिषे त्र्परानन्द कहा। अरु यहां प्र्ानन्द जो है सो लोकबिषे जन्य प्रसिद्धहै, ताते विचार का त्र्प्रारंभ करते हैं]।"सैषाSSनन्दस्य मीमाछ सा भवति, युवास्यात्साधु युवा- डध्यायिकः। आपरशिष्ठो दढिष्ठो वलिष्ठः, तस्थेयं पृथिवी सर्वावित्त- स्थ पूर्णा स्यात् स एको मानुष त्र्प्रानन्दः"। :आ्र््रानन्द का सोयह

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१३६ तैन्तिरीयोपनिषद्। विचार होताहै 'श्रेष्ठ युवा' तधीत चारो वेद, और से पाया, दढ़ अपररु बलिष्ठ, तिसकी यह सर्व पृथिवी वित्तकरके पूर्ण होती है, सो एक मनुष्यों का त्र्प्रानन्द होताहै; अर्थात् तिस इस न्रह्म के आानन्दका सो यह विचारहै। प्र०॥ त्रानन्दका क्या विचार करने को योग्यहै, तहां कहते हैं।उ०॥ ब्रह्मका त्रानन्द क्या लौ- किक आनन्दवत् विषय त्ररु विषयीके सम्बन्धसे जन्यहै, अथवा स्त्राभाविक है, इसप्रकारका यह त्र्प्रानन्द का विचारहै। [ जव ब्रह्मानन्दका विचार प्रसंगविषे प्राप्तहुत्प्राहै, तव यहां श्रुतिविषे सार्वभौमके आ्प्रानन्दादिकों के कहनेका त्ररारंभ किस अर्थहै,इस शंकापर कहते हैं, यहां यह अर्थ है कि जो लौकिक त्रानन्द है सो कहीं भी तवधि को पायाहै ।' कि यह इतनाहै'। क्योंकि सातिशयहै, परमाशुवत्। इसप्रकार व्रह्मानन्द के विचार ञनु- मानार्थ लौकिक तरपानन्दोंके कथनका आ्रप्रारंभहै] यहां जो लौकिक आानन्दहै सो वाह्य तरु भीतरके साधनोंकी सम्पत्तिरूप निमित्त वाला उत्कृष्टहै, सो यह ब्रह्मानन्दके निश्चयार्थ कहते हैं। तरुजिस करके इसप्रसिद्ध त्रप्रानंदसे विषयरहित ब्रह्म अरुशरप्रात्माकी एकता के दर्शी पुरुषों की वुद्धिका विषय ब्रह्मानन्द जानने को शक्य है, एतदर्थ यह लौकिक आनन्द कहते हैं। तरब अ्रन्यप्रकारसे ब्रह्मा- नन्दके ज्ञानको कहते हैं ] लौकिक आ्र्परानन्द भी व्रह्मानन्दका लेश है। तररु अर्प्रविद्यासे तिरस्कारको पायाहुआ्र्प्रा ्रप्रज्ञात सो ब्रह्मानन्द, रविद्या के उत्कर्षहुये ब्रह्मादि प्राणियों करके कर्मके वशसे वुद्धिके पनुसार विषयादि साधन के सम्बन्ध के अधीन होवे हैं, तपररु सो लोकविषे विपरीत भासमान होने से अस्थिर लौकिक होता है अपरु सोई त्रह्मानन्द, त्रप्रविद्या काम रु कर्म्म इसकी न्यूनता करके मनुष्य गंधर्वादिकोंकी उत्तरोत्तरभूमिविषे निष्काम विद्वान् श्रोत्रियको प्रत्यक्षहुआरर शत १०० गुणा अधिक अधिक उत्कर्ष से जहांलगि हिरएयगर्भरूप ब्रह्मका आनन्द है तहां पर्य्यन्त भासताहै। अरु अविद्याकृत विषय विषयी के विद्याद्वारा निषेध

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १३७ किये हुथे स्त्राभाविक परिपूर्ण एक अद्वैत आानन्द होता है। इस अर्थको प्रकट करनेकी इच्छा करते हुंये कहतेहैं। श्रेष्ट युवा तंधीत चारोवेद, माता पितादिक अरन्यसे शिक्षा पांयाहुआर अत्यन्त हढ़ प्ररु वलिष्ठ, ऐसे त्रन्तरके साधनकरके सम्पन्न जो पुरुषहै तिसकी यह भोगके साधन धनकरके शपरु कर्मके साधन दढ़ अर्थकरके पूर्ण सर्वपृथिवी होतीहै, त्रप्र्थात् सम्पूर्ण पृथिवीका पति चक्रवर्ती राजा होताहै। तिसका जो आानन्द है सो एक मनुष्योंका उत्कष्ट आरानंद है।"तेये शतं मानुषा आानन्दः,सएकोमनुष्यगन्घर्वाणामानन्दः, श्रोत्रियस्यचाकामहतस्य"।१ वे जे शत मनुष्योंके आरानन्दहैं, सो एक मनुष्य गन्धर्वका आ्ानन्दहै, सो श्रोत्रिय मनुष्यके विषयभोग अपररु कामनाके निवृत्तहुये होती है? अर्थात् वह जो एक चक्रवर्ती राजाका त्र्ानन्द है तैस सौ चक्रवर्ती के आपानन्दहैं सो मिलके एक मनुष्य गन्धवोंका आ्र्प्रानन्दहै। अपर्थात् सनुष्योंके आ्र्प्रानन्दसे सौगुखा अप्रधिक मनुष्य गन्धर्वोका आ्ररानन्द होता है मनुष्य होके जो कर्म उपासनाके वलसे गन्धर्वपनेको प्राप्तहुये हैं, तिनको सनुष्य गंघर्व कहते हैं। तरु सो जिस करके अ्न्तर्धानादिक होनेकी शक्रिकरके सम्पन्न हैं, अरु सूक्ष्म कार्य कारखवाले। त्रतिवाहक शरीरवालें। हैं, ताते उनको शीतोष्पादिक द्वन्दूकृत पीड़ाकी अल्पताहै, ञरु दन्द्के निवारंख करने की सामर्थ्यरूप साधनकी सम्पत्ति है। एतदर्थ मंतुष्यके भोगोंकी कामनासे रहित मनुष्य गन्घर्वकोचित्त की प्रसन्नताहोती है। तिस प्रसन्नताविशेषसे सुखविशेष की प्रकट- ता होवे है। इसप्रकार पूर्व पूर्व भूमिकासे उत्तरोत्तर भूमिकाविषे प्रसन्नताके विशेषसे शतगुण त्रांनन्द का उत्कर्ष संभवे है।[ प्रथम ।"तकामहत"। निष्काम,। इस विशेषण से अगहण का तात्पर्य्य कहते हैं। यहां यह अर्थ है कि जब प्रथम पर्यायबिषेही निष्काम ग्रहण करिये, तब तिसहीको सार्वभौम कहिये चक्रवर्ती राजाके तुल्य आ्ानन्द होवेगा तब मानुष आानन्दकी इच्छासे रहित पुरुष मानृष आानन्दका भागी है, इस प्रकार-व्याघात दोष होवेगा।

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१३८ तैत्तिरीयोपनिषद्। एतदर्थ मनुष्य गन्धर्वके आानन्दसे तुल्य तिसके आप्रानन्दको देखा- वने को प्रथम पर्याय विषे।"तप्रकामहतस्य"। इस विशेषण का ऋभ्रहण है] प्रथ तो।"झकामहत"। कामना से रहित, ।इस विशेषसका अररग्रहण है, क्योंकि मनुष्यों के विषय भोगकी काम नासे अहतहुये श्ोत्रिय, विद्ान्, को मनुष्यके आानन्दसे शतगुण आानन्दका उत्कर्ष मनुष्य गन्धर्वके तुल्य कहनेको योग्य है, इस

धीतवेद'। इन पदोंकरके श्रोत्रियपना अरु निष्पापपना ग्रहस करिये है। अरु जिसकरके सो दोनों विशेषस सर्वठिकाने समान हैं रु कामनासे रहितघना तो विषयकी ऋरप्रधिकता इरपररु न्यूनता से सुखकी न्यू नता अधिकताके अर्थ विशेष होता है। एतदर्थ ति- सके विशेषसे शतगुखा सुखके अरधिकताकी प्रतीति से कामनासे रहितपने को परमानन्दके प्राप्ति की साधनताके विधानार्थ प्रथम पय्याय बिषे कामनासे रहितपनेका अग्रहण है इस प्रकार कथन किया जो मनुष्य गंधर्वका आ्ररानन्द सो श्रोत्रिय मनुष्यके विषय- भोगकी अरुकामना से रहित, ज्ञानी, को होवे है।"तेयेशतं मनुष्य-

महतस्य"। वह जोशतमनुष्यगन्धवोंका प्रानन्दहैसोएकदेवगंधर्वं का आनन्दहै, सो श्रोत्रिय अरु कामनासे रहित पुरुषोंको होता है। अर्थात् जो सौ१०० सनुष्य गंघर्वका आ््प्रानन्दहै सो एक देवगंघर्ष का आ्र्प्रानन्दहै, सो आ्रानन्द श्रोत्रिय तरुनिष्काम पुरुष कि जिसकी मनुष्य गंधवोंके आ्रानन्द की कामना उठ गई है तिसको होताहै। रु कर्पकी तरप्रादिबिषे जो जातिसेही गंधर्व होते हैं, तिनको देवगंघर्व कहतेहैं।"तेयेशतंदेवगंघर्वाणामानन्दाः, सएकःपितृणांचिरलोक- लोकानामानन्द:, श्रोत्रियस्यचाकामहतस्य "। टवे जो शतदेव गन्धवोंके आ्र्प्रानन्द हैं सो एकचिरलोकवासी पितरोंका त्रानन्दहै, सो श्रोत्रिय अरु कामना से रहितको होता है., अर्ात्. जो एक देवगन्घर्व के आनन्दहैं तिससे सौगुणा अधिक एक चिरलोकके

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १३६ निवासी पितरोंका आानन्दहै, सो श्रोत्रिय अरु कामनासे रहित को होताहै।। अरु।"तेयेशतं पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दाः, स एक आराजान जारनोदेवा नामानन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य" 6 वह जो शत चिरलोकनिवासी पितरों का आ्प्रानन्द है, सो एक झ्ाजानज देवोंका आपानन्द है, सो श्रोत्रिय ञरु प्ाकास को होता है; अर्थात जो एक चिरलोक के निवासी पितृके आ्रानन्द हैं तिनसे सौगुणा अधिक एक आजानज देवता के आनन्द हैं सो पानन्द श्रोत्रियपुरुषको कि जिसकी चिरलोकके निवासी पितरो के आानन्दकी कामना प्प्रभाव हुई है तिसको, होता है। त्रराजा- नज जो देवलोक तिसविपे स्मृति उक्र कमोंके करनेसे।' तिनके फल भोगार्थ देवभावसे उत्पन्न हुये जे मनुष्य'। तिनको आजानज देव कहते हैं।। त्र्प्र रु "तेयेशतमाजानजानां देवानामानन्दाः,सएकः कर्मदेवानामानन्दः, येकर्मया देवानामपियन्ति श्रोत्रियस्यचाका- महतस्य"। : वे जो शत त्रप्राजानज देवोंके आप्रानन्द हैं, सो एककर्म देवों का आनन्द है, जो केवल वेदोक़ ऋग्निहोत्रादि कर्म करके देवभावको पावते हैं, सो श्रोत्रिय अपरु कामनासे रहितको होता है; अर्थात् जो एक त्राजानज देवके त्रप्रानन्दहैं तिसके शतगुणे अधिक कर्मदेवों का आ्ानन्द है त्रपरु जो वेदोक् ऋ्ररग्निहोत्रादि कर्म विद्याके ज्ञान सहित करते हैं सो पुरुष देवभावको पावते हैं, अर्थात् यहां शरीर त्यागके देवलोकमें देवभावसे उपजते हैं, तिन देवताओ्रंका त्र्ानन्द आराजानज देवके आनन्दसे शतगुका अधिक है सो आ्रानन्द श्रोत्रिय तरु कामनासे रहित पुरुष पावता है।। शरु।"तेयेशतंकर्मदेवानामानन्दाः, सषकोदेवानामानन्दःश्रोत्रि- यस्य चाकामहतस्य"।वे जे शत कर्मदेवनके आदन्दहैं सो एक देवोंका आानन्दहै, सो भरोत्रिय अरु कामनासे रहित पुरुषको होता है; अर्थात् जो एक कर्मजा देवके आनन्द हैं तिनसे शत.१०० गुणाअ्र्परधिक देवताका त्र्प्रानन्दहै,अरु त्रप्रष्टवसु ८,एकादशरुद्र ११, इादश आादित्य १२, चन्द्रमा प्रजापति २, यह सर्व मिलके

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तैतिरीयोपनिपट्। तॅतीस २३ देवता हैं शरु जे यज्ञविषे हविके भोका।अरु सृष्टि के उत्पत्ति कालविषे प्रथम न्रह्माके सङ्गल्पमात्र सेही उपजे अ्र. योनिसम्भव हैं'। ताते ये सुख्य देवता हैं, तिनका जो प्ानन्द है सो श्रोत्रिय अरु निष्काम पुरुषको होता है।। शपररु।"तेयेशतं दे- वानामानन्दा:सएक इन्द्रस्यानन्दः, श्रोत्रियस्य चाकासहतस्य"। 1वे जे शत देवों के आनन्द हैं; सो एक इन्द्रका त्र्प्रानन्द है, सो भोत्रिय अरु कामनाले रहित पुरुषको होताहै; अर्थात् जो एक देवताओरप्रोंका प्र्प्रानन्द है तिससे सौगुणा त्रप्रधिक देवतात्र्परों के ऋरप्रधि- पति इन्द्रका आपनन्दहै, सो श्रोत्रिय।'विद्वान्' शरु सर्वकामनासे रहित पुरुषको होता है।। छरु।"तेयेशतमिन्द्रस्यानन्दाः,स एको बृहस्पतरानन्दः, श्रोत्रियस्यचाकासहतस्य"। ६ वे जे शत इन्द्रके प्रानन्दहैं, सो एक बृहस्पतिका त्र्प्रानन्दहै, सो श्रोन्निय अरु नि- ष्काम को होताहै; अर्थात् जो एक इन्द्रको आ्रानन्द है तिनसे सौगुखा अधिक इन्द्रके आचार्य वृहस्पतिका आ्रनन्द है। 'क्योंकि जो सर्व देवताओ्प्रों का त्र्प्रधिपति त्रैलोक्य का राजा इन्द्र है सो अपपने गुरु बृहस्पति का सेवन आराधन करतसन्ते उनकी पाज्ञामें वर्चता है अरु ईश्वरके तुल्य जानता है, एतदर्थ इन्द्र के आानन्द से सौगुणा अधिक बृहस्पति का त्रानन्दहैं। सो श्रो त्रियतरररु कामनारहितको होता है।। अरु।"ते ये शतं बृहस्पतेरा- नन्दाः सएक:प्रजापतेरान्द:, श्रोत्रियस्थचाकासहतस्य"। ६वेजे शतवृहस्पतिके त्र्प्रानन्दहैं, सो एक प्रजापतिका श्र्परानन्द है, सो श्रो. त्रिय अरु कामनासे रहितको होताहै; तर्थात् इन्द्रके आानन्दसे शतगुखा अधिक्र वृहस्पतिका त्र्प्रानन्दहै तिससे सौगुणा त्र्प्रधिक . त्रैजोक्यमय शरीरवाले विराडभिमानी प्रजापतिका तरप्ानन्दहै, सो श्रोत्रिय शरु कामनासे रहितहुयेको होताहै। अरु। "तेयेशतंप्रजा- पतेरानन्दः स एको व्रह्मण तरानन्द:, श्रोत्रियस्यचाकामहतस्य"। हवेजे शत प्रजापति के आरनन्द हैं, सो एक ब्रह्माका प्र्रानन्द है, सो श्रोत्रिय शरु कामनासे रहितको होता है अर्थात् जोएकविराद

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द्वितीयाध्याय न्रह्मानन्दवल्ली। १४१ शरीरवाले प्रजापति का आ्र्प्रानन्द है, तिस आानन्द से शतगुख अधिक ग्रह्मानामकरके हिरएयगर्भका त्रानन्दहै। तर्थात् समष्टि व्यष्टिस्वरूप, तपररु जन्ममरणरूप त्र्प्रग्निविषे व्यापी, अपररु जहां पर्यन्त तर्प्रानन्दके भेद एकताको पावते हैं, अरु जहां उनका नि- मिस् धर्म छरु तिनको विपय करनेवाला ज्ञान अरु कामना से रहितपना, ये सर्व त्रप्रतिशय कहिये सर्व से अरधिक है, सो यह हिरएयगर्स ब्रह्माहै जिसका यह आनन्दहै सो श्रोत्रिय (चेदशास्त्र को जानके धर्माचरसको करनेवाला) इरु कामनासे रहित पुरुष पावताहै।अर्थात् जो विद्वान् धार्मिक निप्पापरूप है तपररु तिस की विषय सुखकामना उठगई है ऐसा निष्काम पुरुष चक्रवर्त्ती राजा के आानन्दको भोगता है, अपर्थात् जिसको जिस वस्तुकी कामना है तिसको तिसकी प्राप्तिके तप्रर्थ श्रम होनेसे तरु प्रात्ति के प्रयत् में क्रचिद्विन्न होनेसे अरु प्राप्तिके अ्र्प्रनन्तर तिसकी ऋ्रप्रंरु शरीर की तस्थिति निमित्तक वियोग होनेकी चिन्तासे सुख नहीं, अरु जिसकी विषय सुख कामना उठगई है सो तन्निमि- तक प्रयल्नादिकोंसे रहितहुआ आनन्दको भोगताहै। इसप्रकार जिस धार्मिकविद्वान् निष्पाप पुरुषकी चक्रवर्त्तीके आ्रप्रानन्दसे हि- रयगर्भ के आानन्दपर्यन्त जिस जिस विषयक आरनन्द भोगकी कामना उठगई है सो निष्कामपुरुष यहांही सुखपूर्वक उस श्र्प्रा- नन्द को प्राप्त होता है। अतएव जिस निष्पाप धर्मात्मा श्रोत्रिय पुरुषकी जितनी जितनी कामना अधिकाधिक निवृत्तहुई है सो तिसके अनुसार अधिकाधिक आनन्दको पावताहै। ऋरु जि- सकी हिरएयगर्भ के भी पद पर्यन्त की कामना उठगई है तिन की प्रशंसा वेद करता है अरु सोई ब्रह्मानन्द प्राप्तिका अधिकारी

पारम्। स्तोममहदुरुगायम्प्रतिष्ठान् दष्टाधृत्याधीरो नचिकेतोऽत्य- साक्षीः"। इस श्रंति से मृत्यु भगवान्ने हिरएयगर्भ के पदसे भी निष्कामहुये परमाविकारी की प्रशंसा कियाहै ताते जिसकी हि-

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१४२ तैच्तिरीयोपनिषद्। रएयगर्भ के आानन्द भोगकी कामना भी पप्रभाव हुई है सो न- ह्मानन्दका उत्तमाधिकारी है'।। पर्थात् श्रोत्रिय कहिये वेदशास्त्र की आज्ञानुसार धर्ममार्गमें वर्ततनवाला अरु निप्पाप शरु कामना से रहित, ऐसे पुरुष कर के सो ब्रह्म देव का प्र्पानन्द लर्व श्ोरसे प्रत्यक्ष त्रनुभव कियाजाताहै। एतदर्थ यह भोत्रियतादि तीन, ञ्रानन्दके साधन हैं, इसप्रकार जानाजाता है। कारु तिनमें सी श्रोत्रियपनाघ्रु निष्पापपना यह दोनों साधन नियमित हैं, अरु निष्कामता तो अधिकाधिक होती है, ताते सर्व साधनों में तिसकी उत्कृष्टता जानीजाती है।[तिसके अरपर्थ विचारका तरारम्भ किया है, तिस निरतिशय साधनकी सिद्धि विपे वाक्यके तात्पर्यके लखावने को कहते हैं। यहां तिस हिरययगर्भरूप ब्रह्माका जो तरानन्द है श्ररु जो तिसके उपासक को प्रत्यक्ष है सो आप्रानन्द जिसकी मात्रा कहिये लेश (किसका) है सो यह परमानन्द स्वाभाविकहै, इ- सप्रकार सम्बन्ध है ] तिस ब्रह्मा को निष्कामपने की अधिकता करके प्रतीयमान जो श्रोत्रियको प्रत्यक्ष त्रह्मा का त्र्प्रानन्द है जो जिस परमानन्दका एक अंशमात्र है।।।'अथा देश है जैसे एक समस्त भूमंडल पर अनेक देश हैं तिनमें कोई एक दौशके ऋधि पतिका देश भूमंडलका कोई एक देश है, तैसे हिरसणमाख्य ब्रह्मा का जो आानन्द है सो परमानन्द का कोई एक त्रपरंश है।॥ क्योंकि।"एतस्यैवानन्दस्यान्यानि सृतानि मात्रासुपजीवन्तीति"। इसहीआनन्दके एकदेशके ताई अ्न्य। 'ब्रह्मादि'। भूत उपजीविका करते हैं,। इस अ्रन्य श्रुतिके वाक्यसे। अरु समुद्रजल के एक विन्दुवत् जिसका एकदेशरूप सो यह चक्रवर्त्ती आादिकोंका शरा- नन्द नानामात्रारूप विभागको पावता हुआप्र जहां।'अर्थात् जिस निष्काम त्रह्मवेत्ता के प्रत्यक्ष अनुभन हुये व्रह्मानन्दथिषे'। एकता को पावता है, सो यह परमानन्द स्वाभाविक है॥।अर्थात् पर- मानन्द जो है सो अथाह अपार समुद्र जलवत् है, तरु हिरएय- गर्भका आानन्द महानदजलवत्है,परु प्रजापतिका प्रानन्द नदी

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १४३ जलवत् है, रु वृहस्पतिका प्र्प्रानन्द महाहदवत् है अरु इन्द्रका प्रानन्द लघुहदजलवत् है, तरु देवताओं का त्र््रानन्द सरोवर के जलवत् है, अरु कर्म्मज देवोंका आ्र्परानन्द कुएडके जलवत् है, अरु पप्राजानजदेवका त्र्प्रानन्द वापीके जलवत् है, अरु पितरोंका जप्ा. नन्द दीर्घकूप के जलवत्है, शरु देवगंधवोंका आ्रानन्द लघुकूपके जलवत् है, तपरु मनुष्य गंधवों का त्रानन्द एक गृहस्थ के घरके जलवत् है, शरु चक्रवर्तीका आ्ानन्द पानपात्र (गिलासादिक) के जलवत्है। इसप्रकार महानदके जलसे लेके पानपात्रके जल पर्यन्त अंशाअरंशी भावकी तारतम्यतासे एक महासागर के जल का अंश व्याप रहा है, अरु उसीही के आश्रय सर्व अपने नाम रूपादि सहित अपने व्यापारको सिद्धकर रहे हैं। तैसेही एक परमानन्दका अरंश से हिरएयगर्भ के आ्रानन्द से लेके चक्रवर्ती के प्रानन्द पर्यन्त फैल रहाहै अरु उसहीके आाश्रय सर्व आानन्दित हुये अपनी २ उपजीविका को करते हैं। अथवा जैसे एक सैंधव लवसकी त्रपराकर है तिसके लवसका कोई एक अंश वो लवस है जो आाकर से बाहर पर्वत के समान एकत्र करके रक्खा है, तिस लवसका कोई एक अंश वो लवण है जो सहस्रावधि उष्ट शकटों में भरके महाविज लिये जाते हैं, तरु तिस लवस का कोई एक अंश वो लवण है, जो दीर्घ नगरों में वैश्यों ने अपने स्थानों में भर रकखा है, अरु तिस लवणा का कोई एक अंश वो लवसहै जो लघु वैश्यलोग अपनी दूकानपर विक्रय करते हैं, शरु तिस लवसका कोई एक अंश वो जवए है जो गृहस्थ ने अपने गृहके दीर्घपात्रमें भरा है, तिस लवणका कोई एक अंश वो ज. व है जो गृहस्थ के यहां नित्य खर्च के अर्थ लघुपात्रमें कियाहै, तिस लवसका कोई एक अंश वो लवण है जो दाल शाकमें प- ड़ताहै, लिस लवणका कोई एक अंश वो लवसाहै जो एक मनुष्य के भोजनमें आवता है। इसप्रकार उस आकरके लवसका कोई एक अंश आाकर के बाहर पर्वताकार लवससे लेके एक मनुष्य

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१४४ तैत्तिरीयोपनिषद्। के सोजन पर्यन्त के लवसापर्यन्त व्याप होरहाहै अरु उसही के आश्रय सर्व अपनी उपजीविका को करते हैं॥ हे सौम्य! तैसेही आानन्दघन परमानन्दका कोई एक अंश हिरणयगर्भका प्रानन्द है तिसका शतवांभाग प्रजापति (विराट) का आ्नन्दहै, तिस प्रजापति के आरनन्दकाशतवांभाग वृहस्पतिका त्रानन्दहै, तिस बृहस्पतिके न्र्प्रानन्दका शतवांभाग इन्द्रका त्रपरानन्दहै, तिसइन्द्रके आानन्दका शतवांभाग वसुआ्रादि देव ताओ्रप्रोंका आ्र्प्रानन्दहै, तिसका शतवांभाग कर्म्सज देवोंका है, तिन कर्म्मज देवों के आ्रानन्दका शतवांभाग आाजानजदेवोंकाहै, तिसश्राजानज देवके आ्रानन्दका शतवांभाग पितरोंका आ्र्प्रानन्द है, तिस पितरों के त्र्परानन्दका श- तवांभाग देवगन्धर्वोका श्रानन्दहै, तिस देवगन्धवोंके त्रानन्दका शतवांभाग मनुष्य गंधर्वोका आ्ानन्दहै, तिसमनुष्य गंघर्वके त््रा- नन्दका शतवांभाग चक्रवर्ती राजाका त्र्प्रानन्द है। हे सौम्य! उक्र प्रकारपरमानन्दका कोरईएक अरप्रंश हिर सायगरभकेश्र्प्रानन्द सेचक्रवर्ती केआनन्दपर्यन्तश्मंशात्रंशीभावसे फैलरहाहै अपररुउसही त्रानन्दके ताश्रय हिरएयगर्भसे पिपीलिका पर्यन्त सर्वभूत अपनी उपजीवि काको करते जीवते हैं। हे सोन्य!जिसधर्मात्मा परमपवित्र श्रोत्रिय पुरुषने वेदशास्त्र करके हिरएयगर्भकेपदसे लेकेतृरापर्यन्त सर्वकार्य- मात्र जगत्को सव्यकूप्रकार नाशवान् अरनित्य बन्धनका कारण जाना है अरु तिस ज्ञानकरके सर्वकी कामना अपने चित्त से तप्रशेष त्याग कियाहै, सो पुरुष यहांही अपने आ्प्रापविषे उस पर- मानन्दको साक्षात् अनुभव करता है। अरु जिस धार्मिक पवित्र शास्त्रज्ञ श्रोत्रिय पुरुष ने साधारण मनुष्यों के विषय भोगकी कामनाका त्यागकिया है सो चक्रवर्ती के आानन्दको भोगता है, अरु जब चक्वती के आनन्द की कामनाका त्याग करताहै, तब तिससे शतगुशा अधिक मनुष्य गन्धर्व का आ्रनन्द यहां इसही शरीरमें भोगता है, अरु जब मनुष्य गन्धर्व के आनन्द भोगकी कामनाको त्यागता है तब तिससे शतगुणा अधिक देवगन्धर्वके

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १४५ आनन्द को यहां इसही शरीरविषे भोगता है, अरु जब तिसकी कामनाको त्यागताहै. तब पितरों के आनन्दको भोगताहै। इस प्रकार पूर्व पूर्व के परप्रानन्द भोगकी कामना के त्याग से उत्तरो- त्तरके त्र्प्रानन्द को भोगता है, तपररु जव हिरएयगर्भके भी त्राननंद भोगकी कामनाको अशेष त्यागताहै, तव साक्षात् परमानन्दको यहांही अपनेश्र्प्राप विष्दे यथार्थ अनुभव करता है।'ताते अभिप्नाय यह है कि ज्योंहीं ज्यों कामना का त्याग तरु पवृत्ति से निवृत्ति होती है, त्योहीं त्यों तानन्दकी आधिक्यताहै, ताते मुमुक्षुको कामनाका पररशेष त्यागही परमानन्दकी प्रात्तिका मुख्य सर्वोक्कष साधन हैं।।तरु।'परमानन्दको" अपरद्वतरूप होनेसे. यहां प्रप्रानन्द अरु त्रानन्दी का विभाग नहीं॥ सो यह विचारका फल अब सं मास्त करते हैं॥।।"स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये, स एंक: १्र सो जो यह पुरुषः विषे है, अरु जो यह सूर्यचिषे है, सो एक है, अर्थात् "स यश्चायंपुरुषे" सो यह पुरुषविषे, ।ऐसा जो कहा सो'। यहां परंमव्योमगत गुहा विषे स्थित हुआ्र आकाश से आदि लेके अन्नमय पर्यन्त कार्य को सृजिके तिसही के. अर्थ।'वा ति सही विषे'। पीछे प्रव्ेशको पावता है।। वा करता है। ऐसा जो पर- मात्मा,यह। वा-यह श०्द. करके लक्षित जो यह परमातमा।।स यः"। सोजो,। इंसप्रकार कंहाहै, सो एक है। अरुजो यह सूर्यविषे ह्कै अर्थात् जो ओोत्रिय कहिये ब्रह्मनिष्ठ को प्रत्यक्ष कथन किया पर- मानन्द है, किजिसके एक देंशके ताई ब्रह्मा आद्रिक भत सुख के. योग्य हुये उपजीर्विका को करते हैं, यह "यश्चासावादित्य' सोजो यह सूर्यविषे है, इंसप्रकार कहाहै, सो एकहै।.इसप्रकारे जिस [विचारसे "निरतिशयानन्द ब्रह्मास्मीति"निरतिशय आानन्दरूप ब्रह्ममैं हूँ,। इसप्रकार निर्ध्धार किया, तिसकी निष्काम पुरुषके प्रत्यक्षके कथन से अभेदकी सिद्धि है। त्ररुजिसकरके परका शर्प्रनन्द पर को प्रत्यक्षहोवेनहीं।अर्थात् एंकक्राश्मानन्ददूसरे को भासे नहीं'। इसकर के निरतिशय त्रानन्दरूप ज्रह्मही तूहैं ! जी-

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३४६ तैत्तिरीयोपनिषद्। वकातत्व "ब्रह्मविदापनोतिपरम्" ब्रह्मवेता परमब्रह्मको पावता है, इसप्रकार कहने को प्र्प्रारम्भकिया, तप्ररु विचार सेसिद्ध हुआ्र्प्रा, सो तब समाप करिये है ] विचार करके सिद्ध वस्तुको भिन्न दे- शगत घटाकाश ऋरु महदाकाश की एकतावत् उपसंहार करिये है I सूर्य, ग्रहणाके अ्र्प्रधिदैवक उपाधिरूप अ्र्थ के कहने के भनि- चछतपने के देखावने को प्रश्नको प्रकट करते हैं।] यहां यह अर्थ है कि।"य एष एतस्मिन्म एडले पुरुषोयश्चायं दक्षिऐऽक्षन् पुरुषः" जो यह इस मएडल विषे पुरुष है तरु जो यह दक्षिण नेत्रविषे पुरुष है,। इत्यादिरूप न्य श्रुतिविषे सूर्यमएडल विषे स्थित पुरुषकी दक्षिनेत्र विषे स्थित पुरुष से एकता के कथन हुये दक्षिण नेत्रका कथन युक्र है [ ननु, तिसके निर्देशहुये "स यश्चायं पुरुषे " सो जो यह पुरुष बिषे है,। ऐसे अविशेष करके अपरध्यात्म रूपका कथनयुक़ नहीं, परन्तु "यश्चायं दक्षिणेक्षन् पुरुषः" जो यह दक्षिण नेत्रविषे पुरुष है,। ऐसा कथन युक्र है, क्योंकि अन्यश्रुतिबिषे प्रसिद्धहै ताते,। सो ]त्रध्यात्म तरु ऋधिदेवतरूप जो लिंगात्मा है सो उपासना के कहने की इच्छाके हुये तैसे होता है। अरु यहाँ सो उपासना कहने को इच्छित नहीं, इसप्रकार कहते हैं। यहां यह अर्थ है कि जो उत्कृष्ट उपाधि बिषे प्रतिबिम्ब को पाया है सोई शिर ञपररुहस्त त्र्प्रादिक।'अ्प्रवयव'। वाले पुरुषरूप निकृष्ट उपाधि बिषे प्रतिबिम्ब को पावता है, इसप्रकार परमा- नन्दकी अपरपेक्षा से समताहै। अरु विशिष्ट वैतन्योंकी स्वभाव से एकता कहने को इच्छित है, इसप्रकार जो जानता है सो निर- तिशय आानन्द को पावता है [ बनेनहीं, परमात्मा के अधिकार से। ज़िसकरके "अधिकृतोदश्येऽनात्म्ये" "भीषास्माद्वातः पवते" "सैषा नन्दस्यमीमांसेति" इस ऋदृश्य अरु अ्रपनात्मा बिषे। इससे भयकरके वायु चलता है। सो यह आ्ानन्द का वि- चार है,। इन श्रुतिवाक्यों करके यहां परमात्माही अधिकार को पाया है। शरु अकस्मात् प्रसंगविषे अप्नाप्त पदार्थ कहने को युक्

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द्वितीयाध्याय त्रह्मानन्दवल्ञी। १४७ नहीं, अरु यहां परमात्माका विज्ञान कहनेको इच्छितहै, ताते "स एक:"सो एक है,। इसवाक्य करके,परमात्माही कहाहे॥ ननु, यहां प्ानन्दका विचार प्रसंगविपे प्राप्त हुआ है, तिसकांभी फल समास करने को योग्य है, तहां कहते हैं, अभिन्न स्व्राभाविक जो आ्रानन्द है सो परमात्मा ही है, विषय विषयी भावसे।' जनित आ्ानन्द' नहीं, इस प्रकार सो विचारका फल समाप्त कियाहै। अरु "स यश्चायं पुरुषे"सो जो यह पुरुष विषेहै,।अरु"यश्चासावादित्ये,स एक:"जो यह सूर्यविपे है सो पकहै,। इसप्रकार भिन्नअ्रधिकरण चिषे स्थित वस्तुके भेदके निषेधसे जो यह कथन कियां है सो निश्चय करके तिसके अनुसार ही है।।'ननु ऐसे हुये भी सूर्यरूप विशेषण (उपाधि) का ग्रहण व्यर्थ है, सो व्यर्थ वनेनहीं, क्योंकि सूर्य के गहणको उत्कर्ष अरु अपकर्ष के निषेधरूप अर्थवान्- पनाहे ताते'।अरु जब मूर्त अरु र्मृत्तरूप द्वेतका जो सूर्यके अन्त- 4. गत उत्कर्ष है, सो जव पुरुपगत भेदके निषेधसे परमानन्द की अपेक्षा करके समहोवे है, तब तिस गतिको प्राप्तहुये पुरुष को कोई भी उत्कर्ष वा अपकर्ष नहीं है, पतदर्थ "अभयं प्रतिष्ठा विन्दते"अभय प्रतिष्ठा को पावता है,। यह पूर्तोक् अर्थ घटित होता है।। इसप्रकार [उक्र अर्थके अनुवादपूर्वक उत्तरभंथ को प्रकट करते हैं। इस वल्ली के षष्ठ अनुवाक बिषे ब्ह्म है वा नहीं है, इसप्रकारका कथन कियारहा जो प्रश्न सो, 'एक, कार्य, रसलाभ, प्राशन, अभय, स्थिति'अरु भय दर्शनरूप युक्ियों से, सो आकाशादिकों का कारण ब्रह्म ही है, इस प्रकार करके ।'उक्र प्रश्नगत संशयको'। दूर किया। अरु अन्यदोनों 'विद्ान्' अरु, अविद्वान, को ब्रह्मकी प्राप्ति अरु उप्राप्ति होती है, तिसको विषय करनेवाले प्रश्नहै। तहां "विद्वान् समशनु तेसमश्नुत इति" विद्वान् मरसको प्राप्त होके इस ब्रह्मरूप लोक को प्राप्त होता है वा नहीं प्रास्तहोता,। इसप्रकारका अन्तका प्रश्नहै तिसका समा. धान करनेको कहते हैं। अरु मध्यका जो प्रश्न है सो अन्तके

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१४६ तैत्तिरीयोपनिषद्। प्रश्नके दूरकरने के साथही दूर होवेगा, एतदर्थ तिसके दूरकरने को प्रयत्न करते नहीं।"सय एवं वित, शस्माँल्लोकत्प्रिेत्य एतमन्न-

एतं. अनोमयमात्मानसुपसंक्रामति, एतं विज्ञानमयमात्मान- सुपसंक्रामति, एतमानन्दमयमार्तमानसुपसंक्रामति "८जो ऐसे जानताहै सो इंसलोकसे निरक्षेपहोके इस अन्नमय त्रांत्मा को उह्लंघन करता है, इस प्राशामय आरत्माको उल्लंघन करताहै, इस मनोमय आरत्माको उल्लंघन करताहै, इस विज्ञानमय त्र्प्रात्मा को उह्लंघन करताहै, इस त्रनंदमय त्रात्माको उल्लंघन करताहै, र्थात् जो कोई एक उक्क प्रकार का उत्कर्ष अपरु अपकर्ष से रहित अरु सत्य, ज्ञान, अनन्तरूप त्रह्म में हूं, इसप्रकार जानता है सो दष्ट अरु, अदृष्ट्ट विषय का समुदायरूप जो यह।'संसाराख्य'। लोकहै तिसलोक से निरपेक्षहोके कथनकिये इनतन्नमय।'कोश- रूप'। आत्माको उल्लंघन करके।अनात्मा जानके वा अ्रप्रन्नमय रूप आत्माही जानके'। अर्थात् विषयके समूहको पिंडरूप त्र- झंमयले भिन्न देखता नहीं, किन्तु सर्व को स्थूलभूत त्ररन्नमर्य- रूप आरत्माही देखता है। तातें भीतर इस सर्व अ्न्नमयरूंप त्र्प्रां- त्माविषे।'घटमें पवनवत्'। स्थित. अरभिन्न प्रसामय।'कोशरूप'। पात्माको उह्लंघन करता है। पीछे इंस मनोमय।'कोशरूप'। पात्माको उल्लंघन करता है। पुनः इस।'मनोमय के त्रन्तर जो' विज्ञानमय।'कोशरूप'। आत्मा है।'तिसको'। उल्लंघन करता है तिसके पश्चात् जो।'विज्ञानमयके अन्तर आनन्दमय कोश है तिस'। इंस आानन्दमयरूप आ्रत्माकों उल्लंघन करता है। तिसके पश्चात् अदृश्य, अनात्म्य, अ्रनिर्क्क, अनिलय, ब्रह्म बिषे शरंभयस्थितिको पावताहै। यहां यह विचारकरनेयोग्यहै, कि यह इसप्रकारका जाननेवाला कौनहै, वा सो कैसे उल्लंघन करता है, ऋरु सो उल्लंघन कर्त्ता क्या परमात्मासे भिन्न किया है, अथवा सौंई है, शरु तिससे [अंशयुक्र अरु प्रयोजनसहित वस्तु विचार

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द्वितीयाध्याय ज्रह्मानन्दवल्ली। १४६ के योग्य होती है, तरु यहाँ किसपक्ष विषे कौन दोष है वा कौन लाभ है, यह कहते हैं ] क्याहै, जो ऐसा कहोगे सो परमात्मासे भिन्न है, तव "तत् सृष्टा तदेवानुप्राविशत्""अन्योऽसावन्योऽह- मस्मीति, न.स वेद" "एकर्मेवाद्वितीयम्" "तत्वमसि"तिसको सृजकें तिसही के अर्थ पीछे प्रवेश करताहुआं। यह तन्यहै मैं अन्य हाँ इसप्रकार जो जानता है, सो सम्यक् प्रकार जानता नहीं। एकही ऋर्रद्वितीय है। सो तूहै।- इत्यादि बंहुतसी भ्रुतियों से वि- रोध तरावता है।। त्रपंरु जो कहोगे कि यह सोई है, तव, "पर्प्रानन्द- मयमात्मानमुपसंक्रामति" आनन्दमयरूप आ्र्रात्मा को उल्लंघन करताहै, एकही को कर्म (विषय) भाव अरु कर्त्ता (विषयी) भाव इनका श्र्प्रेसंभवहोवेगा। पर्थात् एकही को कर्म अरु कर्त्तापना वा विषय विषयीपनेका अरप्रसंभवहै।'यद्यपि दोनोंप्रकारसे प्राततहुआ्र जोदोप सो निवारण करने कोतप्रशक्य है; ताते विचारकांकरनाव्यर्थ है, तथापिउनदोनों में से एक पक्षविषे दोषकी तप्रप्राप्ति है, वाती- सरे पपरदृष्ट पक्षविषे दोषकी त्रपाप्ति है, अरु सोई शाखतार्थ है, ताते विचारका करना व्यर्थ नहीं, किंतु तिस शास्त्रार्थ के निर्द्धारणार्थ होने से यह विचार प्रयोजनवालाही है। इसप्रकार जब वादीने कंहा तब सिद्धान्ती कहे है, प्राप्तहुआ जो दोष सोनिवारण करने को अशक्य है। अपरु दोनों मेंसे किसी एकके पक्षके वा तीसरे अदृष्ट पक्षके निश्चय किये हुये चिनतन व्यर्थहोवेगा यह तेरा कथन सत्य है, परन्तु सो वतक िश्चय किया नहीं याते तिसके निश्चयरूंप अर्थवाला होने से यह चिन्तन अर्थवालाही है तरु सफल है।। यद्यपि शास्त्रके निश्चयरूप अर्थवाला होने से यह चिन्तन अर्थ वांलाही है, अरु तू चिन्तन करता है यह कथन सत्य है, परन्तु तिसको क्यों निराय करतानहीं, तरुनिर्णय करने को योग्यनहीं, इसप्रकारका वेदका वचन नहीं है। तव बहुत प्रतिपक्षों के होनेसे अंरु र्वेदार्थ के परायण होने से एकताका निर्याय तू वादी कैसे करंता-नहीं, अरु जिसकरके बहुत नानाभावके वादी वेदते वाह

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तेरे प्रतिपक्षी हैं, याते मेरी त्रशका को निर्राय करतानहीं, इस प्रकार में जानताहौं[ यहही विचारके आरम्भ करनेवाले मुझको कल्याणहै, नो तू मुझको, तुम एकत्व वादीहौ, इसप्रकार कहता है। अरु अप्राप्य वस्तुका वादी होनेसे एकताके वादीको भी एक वस्तु सम्मत होनेसे अरु प्प्रनेक वस्तु के वादी बहुत मेरे प्रतिपक्षी हैं। इस अर्थ से भी मेरा कल्याणहै, क्योंकि अनेकताको अन्यो- न्या श्रयादिक दोषकरके दूषितपना है ताते, अरु पूर्वपक्षके निषेध से सिद्धान्तके संभव से यह अर्थ होताहै ] तहाँ सिद्धान्ती कहे है, यहही मेरा कल्याणहै कि जो मुझ एकके सम्बन्धीको प्र्प्रनेक का सम्बन्धी शपरु बहुत प्रतिपक्षवाला कहताहै, इसकरके मैं सर्वको जय करोंगाअरु चिन्तन (विचार) को त्ररंभ करों ह, सोई [विचारके आरप्रारम्भको प्रतिपादन करके अररब.सिद्धान्तके कहनेका प्रारंभकरेहैं, यहाँ यह अर्थ है कि, इसप्रकार जाननेवाला पुरुष उपाधिकृत भेदसे भिन्न हुआ्र्राी परमात्माही होताहै] सो होता है, क्योंकि तिसके भावका कहना इच्छितहै ताते। ऋरु "ब्रह्मविदा- प्रोतिपरम्" ब्रह्मवेत्ता परब्रह्म को पावताहै,। इस श्रंतिवाक्य करके तिसके विज्ञान से यहाँ परमात्मभांव कहने को इच्छितहै। अरु

घनकर्त्तापरमात्माही है।ननु, तिस। 'ब्रह्मवेत्ता' को भी तिस परव्रह्म के भावप्रात्तिश्रघटितहै। सोकहनाबनेनहीं, क्योंकि तिस।'विद्या' को तविद्याकृत अनात्मा के निषेधरूप अर्थवान्पनाहै ताते। अरु ब्रह्मविद्याकरकेजोस्वस्वरूपकी प्राप्ति उपदेश करते हैं, सो आप्रात्मापने करके आरोपित अनात्मरूपअ्रविद्याकृतअ्रन्नमयादि विशेषश्रात्मा के निषेधार्थहै। अर्थात् 'अन्नमयत्र्रात्मा' यहजावाक्यहै तिसमें जो नन्नमयपद विशेषहै।'सो उसको तांत्मत्वके निषेध बोधार्थ है'।॥ [अंविद्याकरके आारोपित अरपरब्रह्मभावकी निवृत्तिही ब्रह्मकी प्रात्ति ।'ऐसा'। कहने को इच्छितहै। तहां फलवाक्यका ऐसे अर्थ करके युक्रपना कैसे जानिये है, शरु तप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति होवे नहीं।

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १५१ इसप्रकार वादी।'शंका'। कहे है] जो ऐसा कहे कि इसप्रकार के अर्थ करके युक्पना कैसे जानते हौ, तहां श्रवस करो,[यहांऔर प्रकार से भी वादी तप्रसंभव को शंका करता है। यहां यह अर्थहै कि गमनकर्त्ता को स्वरूपसेही ग्रामरूपता का अप्रभाव होनेसे भी जैसे मार्गके ज्ञानका उपदेश सार्थक है, तैसे जीवको भी स्वरूप से भ्रमरूपता के अभाव होनेसे भी विद्याका उपदेश सार्थक है, क्योंकि तभ्यासद्वारा।'विद्या'। ब्रह्मकी प्राप्तिका हेतु है ताते] विद्या- मात्रके उपदेश से इसप्रकारके अपर्थकरके युक्कता जानिये है, अरु अविद्याकी निवृत्तिरूप विद्या का कार्य देखा है, सो आत्मा की प्राप्ति विषे विद्यामानरूप साधन यहां उपदेश किया है। अपररु जो कहे कि मार्गके विज्ञानके उपदेशवत् तिसके आात्मभाव बिषे विद्यामात्र रूप साधनका उपदेशहेतुहै, क्योंकिअन्यदेशकी प्राप्ति विषे मार्गके विज्ञानके उपदेशके देखने से, अरु जिसकरके ग्राम ही गंमन कर्त्ता (चलने वाला)नहीं है, इसकर के सो मार्गके ज्ञान का उपदेश सफल है, तैसे जीव स्वरूप से ब्रह्म नहीं है, तथापि चिद्या का उपदेश आभास द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिकांहेतु होनेसेसफल है, सो कथन बने नहीं, क्योंकि दष्टान्त अरु सिद्धान्त की विष- मताहै ताते। अरु जिसकरके जैसे तहां ग्रामको विषय करने वाला विज्ञान नहीं उप्रदेश करते हैं, किन्तु तिस ग्रामकी प्राप्ति के मार्गको विषय करनेवाला विज्ञान उपदेश करते हैं,। तैसे यहां ब्रह्मके विज्ञान करके। 'ब्रह्मसे'।भिन्नअन्य साधनको विषय करनेवाला विज्ञान नहीं उपदेश करते, एतदर्थ उपदेश की विषमतासे मार्गविज्ञानके उपदेशका दष्टान्त विषमहै। अरु जो ऐसा कहे कि, उक्र कर्म्मादिक साधंनकी पेक्षावाला न्रंह्माका वि- ज्ञानरूप साधन परब्रह्मकी प्राप्तिबिषे उपदेश करतेहैं, सो कहना बने नहीं, क्योंकि "नित्यत्वान्मोक्षस्येति" मोक्षको नित्यता है ताते,। इत्यादि वाक्यों करके पूर्व निषेध कियाहै ताते। अरु "तत् सष्टातदेवानुप्राविशत्" तिसको सृजके तिसके तर्थ पुनः पीछेसे

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१५२ तैत्तिरीयोपनिषद्। प्रवेश करताहुआ,। यह श्रुति कार्यकी तिंस।ब्रह्म। रूपताको दे खावेहै। अरु अरभयस्थिति के संभवसे, अरु जिसकरके जब विद्वान् इवस्वरूपसे अन्यको देखतानहीं, इसही करके अ्प्रभय स्थितिको पावता है, इसप्रकार होय क्योंकि भयके हेतु अन्यका रप्रभावहै ताते। तपररु जब विद्वान् सेअन्यभयका हेतु ईश्वर नहीं है, तब भिन्न ईश्वर के ज्ञानकी कौनगति।अर्थात् कौन व्यवस्था है, यह पप्राशंका करके कहते हैं। यहां यह पर्थहै कि. कल्पित भेद सहित रूपसे ई श्वरंको अरप्रविद्यासे रचिततारूप मिथ्यापने के हुये विद्यासे तिसबिषे मिथ्यापनेका ज्ञान संभवे है।ईश्वरो मम प्रशास्तेति" मेरा नियासक ईश्वर है,। यह ज्ञान जिसकरके मिथ्याहै, इसही करकें तिस ईश्वरकी अरु मेरी वास्तवकरके एकरूपताही हैं। इंसप्रकार विद्वान्की दष्टिसे उपाधिविशिष्ट चैतन्यरूप ईश्वरका मिथ्यापना है ] अ्रन्य ईश्वरको अ््विद्याकरके रचितता के हुये वि- द्यासे तिसके अवस्तुहोने रूप भावके दर्शनका संभवहै।जैसे दू- सरे चन्द्रमाका जो असत्यपना। 'वा सत्यपना' है सो तिमिर दोष से रहित पुरुषकरके अहसाकिया जाता नहीं तैसे॥ [अपब वादी दंष्टान्तकी विषमताकी शंका करताहै। यहां यह अर्थ है कि जैसे चन्द्रमाकीएकताके द्शनसे दूसराचन्द्रमाजानते नहीं, ऐसा यहां नहीं है किंतु य हा ब्रह्मवे ताकर के भिन्नईश्वर जानिये है, क्योंकि भो जनादिककी प्रवृत्तिके अ्र्परसंभव करके जीवन्मुक्कको भी नियमित प्रपंचकी प्रवृत्तिका अरंगीकार है ताते, अरु प्रपंच के नियमको ईश्वरके त्र्प्राधीन होने से अंगीकार है] अरु जो कहै इसप्रकार नहीं ग्रहस करते हैं, [यद्यपि जायत्बिषें विद्वान्को भिन्न न्प्राभा- सका दर्शन होवेहै, तथापि वो भयका कारण नहींहैं। अरु.मा- यावी पुरुष स्वरंचित व्याघसपादिकों के आभास दर्शन से भय को पावतानहीं। अरु अविद्वान् को भी भिन्न वस्तुका दर्शन सदा है नहीं, इसप्रकार कहते हैं ]सो बने नहीं क्योंकि सुषुतिवाले अरु समाधिवाले पुरुषको तिस ईश्वरका त््रहंयाहै ताते [सषुतिबिषे

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १५३ भिन्नवस्तुके अरप्रग्रहसके सद्भावका साधक नहीं है, इसप्रकार पूर्व- वादी कहता है। यहां यह अथ है कि जैसे वाणका चनानेवाला घाण विषे त्रप्रासक मनवाला होता है, सो तिस आासक्िसे तिस चाए से भिन्न विद्यमान वस्तुको भी देखता नहीं, तैसे सुषुप्ति विषे भी सुखमें आसक़ होने करके विद्यमानहुये भी द्वितीय वस्तु को 4 देखता नहीं परन्तु तिसके अभावसे नहीं] तरु जो कहे कि सुधुति वाले पुरुपचिपे जो अरन्यका अभ्रहसाहै सो अप्रन्यकार्य विषे श्रासक हुयेपुरुपवत्है,।।[अन्यवस्तुषिषे आ्र्रासक्रपुरुषको तिससे।'कि जिस में त्र्प्रासक्है'। भिन्न वस्तुके तप्रदर्शन हुये भी तिसका अरदर्शनही है। अरु सुपुस्तिविषे भी "न किश्चिदज्ञासिषमिति" मैं कुछ भी न जानता हुआ, इस प्रतीतिसे सुखको भी आत्माके तादात्म्यसे छपरु उ्रज्ञानकी भिन्नता के पप्रकथनसे, वास्तविक द्वितीयवस्तुके त्र्प्रभाव सेही द्वितीय वस्तुका त्रप्रग्रहण है। ऐसा कहते हैं ] सो बने नहीं क्योंकि सुपुप्तिविषे सर्वका अग्रहण है. ताते[ जब सुषुप्िधिषे ञप्र- प्रतीतिसे द्वैतका असन्नाव है, तव जाग्रत् अरु स्वन्में प्रतीतिके होनेसे द्वैतका सज्जाव क्यों न होवेगा। इसप्रकार वादी कहताहै] ्ररु जो कहे कि जाग्रत् तरु स्वप्न विषे अन्यके ग्रहएसे तिसका सज्ावही है।[अ्रप्रनात्मादिकों विषे श्र्प्रात्मभावादिकों की वुद्धि अरपरविद्याहैं, तिसके होतेही द्वैतकी प्रतीति से प्रतीतिमात्र द्वैत के सन्भावकी साधक नहीं है, तरपन्यथा शुक्किगत रूप्यादिकोंके भी सद्भावके प्रसंगसे ] सो कहना बने नहीं क्योंकि तिसको अप्रविद्या करके रचितपनाहै ताते, जाग्रत् तरु स्वमविषे जो शरन्यका ग्रहण होता है सो अविद्याकृतही है क्योंकि विद्याके पभावहुये तिनका परभाव है ताते। [यहां पूर्ववादी कहे है। इसका यह न्र्प्र्थ है कि सुपुत्तिविषे द्वैतका अग्रहण भी लयरूप अपविद्याका किया है परन्तु भेदके अपरभावका किया नहीं। एतदर्थ सुषतति विषे सर्वात्मा ब्रह्मभूत हुआ्र जीव अरपनेस भिन्न वस्तुको तिसके प्रभावसेही देखतानहीं, इसप्रकार जो तुमने कहा सो असत्य है] अरु जो कहे कि सबुधति

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१५४ तैत्तिरीयोपनिषद्। विषे जो अग्रहाहै सोभी तविद्याका कियाहे, [विद्यमानहुये भी द्वैतका अपविद्याके वशसे अग्रहणा होताहै, इस तेरे वचनका क्या अर्थ है सो कहो त्रग्रहण क्या ग्रहण का प्रागभाव होताहै, अथवा अप्रकाशका तर्प्रारोप है, किंवा अग्रहण के आररकारसे तरप्रविकार को प्राप्तहुये स्वरूपकी स्थितिहै, तिनमें जो प्रथमपक्ष कहै तो सो बने नहीं, क्योंकि प्रागुभावका अनादिपना अ्रंगीकार है ताते, अरु जो कदापि द्वितीय पक्षक है तो सोभी वनेनहीं, क्योंकि अन्य।'सांख्य'। वादी करके द्वितीय।'सुषुत्तिगत चैतन्य'। वस्तुके स्व्प्रकाश- तारूप स्वभावके श्ररंगीकारसे तपररु अप्रप्रकाशके आप्ररोप के अ्र्प्रनंगी. कारसे, अरु प्रकाशके आारोपहुये सर्वकी स्वप्रकाश ब्रह्मरूपता के अंगीकार करनेकी योग्यतासे हमारे इष्टकी सिद्धि के प्रसंगसे। छरु जो तृतीयपक्ष कहे तो सो भी बने नहीं, इसप्रकार अप्रघ क- हते हैं। यहां यह अर्थ है कि अविकारको प्राप्तहुये स्वरूपकी जो स्थिति है सो अविद्याका कार्य नहीं है क्योंकि उत्पत्ति अपरु विना- शकरके रहित है ताते] सो वने नहीं क्योंकि तिसको स्वाभाविक- पनाहै ताते।[ इस उक्र अर्थकोही स्पष्ट करतेहैं, यहां स्वतन्त्रता की सिद्धिके अ्रप्रभिप्नायसे सन्मात्र वस्तु इष्ट कहते हैं, परन्तु वैशे- षिकके अरभिप्रायसे ऐसे जानना। ऋरु यहां जो अरचिक्रिया कही है सो विक्रियाके तपरभाव करके लक्षणासे जानने योग्य स्वरूपहै, क्योंकि तिसको निरपेक्ष सिद्धिवालापनाहै ताते, तपरु ग्रहण आ्रा- दिक विक्रिया जो है सो स्व्राभाविक नहीं है, क्योंकि तिसको स्फ. टिकके रक्तवर्णावत् पर की अपेक्षावाली होनेसे। अरु तब तो निरपेक्ष सिद्ध होनेसे त्ररविक्रियपना कहा, तिसको स्पष्ट करते हैं] झरु जिस करके इष्ट कहिये 'सत्वस्तु' का स्वरूप अविक्रिया है क्योंकि तन्यकी अ्रप्रपेक्षासे रहितहै ताते। अरु जो विक्रिया है सो तिसका स्वरूप नहीं क्योंकि विक्रिया अन्यकी अपेक्षावाला है ताते। अरु जिसकरके कारककी अपपेक्षावाली वस्तु परमार्थ से सत्वस्तुका स्वरूप नहीं, अरु जो विशेषहै सो कारककी अपेक्षा

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द्वितीयाध्याय न्रह्मानन्दवल्ली। १५५ चालाहै, अरुविशेषही विक्रिया है, अरु जायत् स्वपका जो ग्रहयाहै सो विशेषहै।अरुजो जिसका अन्यकी अपेक्षा से राहित स्वरूप है सो तिसका यथार्थ स्वरूपहै, शरु जो अन्यकी अपेक्षावाला है सो यथार्थ स्वरूपनहीं क्योंकिअन्यके त्र्प्रभाव हुये तिसका तपरभा वहै ताते। एतदर्थ स्वाभाविक होनेसे सुषुप्तिविषे अग्रहणा है सो जा- अत् अरु स्वप्नत्रत् विशेष नहीं। [इसप्रकार सिद्धान्ती अपने मतबिषे चैतन्यकी सत्तासे भिन्नभयके हेतु ईश्वरके अभावसे वि- द्वान् को अभयता संभवे है, इसप्रकार प्रतिपादनकरके, अब द्वैत- वादिनके पक्ष विषे तिस अभयके असंभवको कहे है। यहां यह भावहै कि अन्यवस्तुके स्वरूपके स्थितहुये वा नष्ट्हुये सत्वस्तुका ध्वंस होवे नहीं क्योंकि व्याघातते, अरु तिसकी अनवस्था से ] झरु पुनः जिनके मतमें ईश्वर आत्मासे अन्य (भिन्न) है अरु कार्य अन्य है तिनको भयकी निवृत्ति होवे नहीं, क्योंकि भय जो है सो अन्य वस्तुके निमित्तवाला है ताते, अरु अ्रन्य वस्तु के स्वरूपसे स्थितहुये वा नष्टहुये सत्स्तुके स्वरूपका नाश होवे नहीं क्योंकि व्याघात अरु अनवस्था दोषहोता है ताते। [तब भयकी उत्पत्तिके हुये असत्ही अभयकी प्राप्ति होवेगी, यह आप्राशंका करके कहते हैं ] शरु असत् वस्तु के आपत्माका लाभ होता नहीं॥ जो [भिन्न ई- श्वरको सद्भावमात्रसे भयकी हेतुता नहीं है, किन्तु धर्मादिक की अपेक्षावालेको भयकी हेतुताहै, एतदर्थ तिन धर्मादिकके त्ररभाव से अभय होवेगा, यह आशंकाकरके, सिद्धान्ती यह सांख्यवादी करके कहनेको योग्य नहीं, क्योंकि सत्रूप अधर्मादिकके भी अ्रप्र त्यन्त असन्भावके भंगीकारसे। अरु नैयायिक आ्दिकों के सत बिपे भी सत् हेतुविषे कार्यके शत्यन्त अभावके निश्चय न होने से तिन्हों करके भी यह कहनेको योग्य नहीं, ऐसा कहते हैं] कहे अपेक्षा सहित अन्य वस्तुको भयका हेतुपना है, सो बने नहीं, क्योंकि तिसको भी तुल्यता है ताते। अरु जो अधर्मादिकों का पनुयायी रूप नित्य वा अनित्य निमित्तको अपेक्षा करके अ्रन्य

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१५६ वस्तु भयका कारण होती है, तिसप्रकारके तिसको भी स्वरूपकी हानिके त्ररभावसे भयकी त्र्प्रनिवृत्ति होती है वा प्र्प्रात्माकी हानि होवे है। रु सत् [ किंवा असत्रूप अप्रधर्मादिक जव अरप्रसत्- भाव को प्राप्तहोवे हैं, तव आरात्मविपे भी कौन विश्वास है, ताते स्वभाव की विपरीततारूप जो त्रपरसत् वस्तुको त्रप्रसन्भाव की प्राप्ति है, सो किसी के भी मत बिषे, घटे नहीं ] अरु असत् को परस्परकी प्रात्तिके हुये सर्वन्र अनास्थाही होवेगी। ऋपरु एक- ताक़े पक्षविषे सत्रूपनिमित्तवाले संसार को अविद्या करके क- लिपित होने से दोष नहीं हैं, एतदर्थ तिमिरदोषवाले पुरुप करके देखेहुये द्वितीयचन्द्रको स्वरूपका लाभ वा नाश नहीं है। [प्र- विद्यासे कल्पित जो भय सो विद्या से निवृत्त होवे है, इसप्रकार कहनेवाले तुझ सिद्धान्ती के मतविषे विद्या इरु अविद्या को ात्माका धर्मपना वाञ्छित हैं। ताते धर्मकी उत्पत्ति ्रपरु वि- नाशके हुये आत्मा को विकारीपना अरु अनित्यपना प्राप्त हो- वेगा, इसप्रकार आराशंका करते हैं ] जो कहै, विद्या अरु अविद्या को तिस आत्माका धर्मपना है, सो बने नहीं, क्योंकि। विद्या इप्रविद्या'। प्रत्यक्ष है ताते, तरु ग्रन्तःकरण विपे स्थित जो विवेक रु अंविवेक, सो रूपादिकोंवत् प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं। तररत प्र- त्यक्ष विद्यमान रूपको द्रष्टाका धर्मपना नहीं है, अरु जोअ्र्प्- विद्या है सो अपने अ्नुभव से में ढूंढंहूं मुझको ज्ञान त्ररविचा- रित है, इसप्रकार निरूपण करते हैं, तैसही विद्यारूप विवेक अप्रनुभव करते हैं, अरु आात्मा की विद्या को जान के अन्योंके अर्थ उपदेश करते हैं, तरु तैसे अन्यःअधिकारी निश्चय करे हैं, ताते नामरूप पक्षवाले की ही विद्या अरु अविद्या घरु नामरूप है, अरु नामरूपबिषे निर्वाह करीहुई यह विद्या अरुं तविद्या पात्मा केधर्म नहीं, क्योंकि "यदन्तरात्तंद्ब्रह्मेति" जो मध्यमें है सो ब्रह्म है, इस अ्ररन्य श्रति सें। तरप्ररु [ चेतनमान्र के अ्र््धीन घप्रनादि त्रनिर्वचनीय जो अ्ररविद्या है, सो अन्तःकरणरूप से परि-

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द्वितीयाध्याय त्रह्मानन्दवल्नी। १५७ सामको पावती है। अरु सो अन्तःकरण तामस तपरु सा्विक SEEESE पप्रवस्था के भेदसे भ्रान्ति ज्ञान शप्ररु सम्यक ज्ञान के आाकार से परिशाम को पावता है। तिस त्रन्तःकरण विषे प्रतिबिम्व को पाया चैतन्य अपनी उपाधिके धर्म्म से ही आ्रान्त दिवस त्रप्ररुं रात्रिवत् कल्पितहै, परमार्थ से विद्यमान नहीं। जो पूर्व कहा था कि अप्रभेदके हुये, एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति,, इस परानन्दमय त्र्परात्माको उल्लंघन करके जाता है, इसप्रकार एकही परमात्मा को कर्मभाव अरु कर्त्ताभावका छसंभवहै, सोबने नहीं, क्योंकि उल्लंधन करने को विज्ञानमान्नरूपता है ताते। तपररु जलोका (जोंकनामक जलजन्तुविशेप) आ्रादिकोंवत् उल्लंघन करना यहां उपदेश करते नहीं किन्तु विज्ञानमात्ररूप यहां उ- हंघन करनेकी श्रुतिका अर्थ है।। ननु, उपसंकामतीति,, उल्लंघन करके जाता है। इस प्रकार मुख्यही उल्लंघन करना श्रवस करते हैं, इसप्रकार जो कहे तो सो भी बने नहीं, क्योंकि अन्न- मयविपे तिस उल्लंघन करनेका पपदर्शन है ताते। 5प्ररु त्रपन्नमय को उन्लंघन करनेवाले का जलौकावत् इस वाह्यसे उल्लंघन करके जाना व अन्य पक्षी के प्रवेश के प्रकारवत् जाना देखते नहीं॥ [ उक्र न्यायसे न्रह्म्वेत्ता ताते।ब्रह्मसे। अपरभिन्न है, इस प्रकार कहा। तहां त्रन्यवादी के कंथन को प्रकट करके निषेध करते हैं। यहां यह अर्थ है कि आनन्दमय कोशरूप परमात्मा नहीं, अरु तहां तिसका प्रवेशरूप उल्लंघन नहीं है, किन्तु तवि- पय ब्रह्मरूपताके ज्ञानसे भ्रांतिसे त्र्प्रात्मापने करके ग्रहणकियेश्न्रा: नन्दमय का वाघही यहां उल्लंघन कहनेको इच्छित है] तरु जो कहे वाह्य निकसे मनोमयका वा विज्ञानमय का फेर लौट के तरात्मासे उद्लंघन करना होवे है, [यद्यपि अन्नमय कोश विषे मुख्य संक्रमए।अर्थात् अन्यको संघि. के स्वरूपविषे गमन'। सभवे नहीं, तथापि वाह्यके विषयोविषे प्रवृत्त जो मन.और बुद्धि तिन विषे वाह्यके विषयोंसे लौटके स्वरूपविषे स्थितिरूप संक-

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तैत्तिरी योपनिषद्। मण (गमन) देखा है। तैसे दुःखी जो पुरुषहै, तिसका आानन्द- मयके स्वरूपविषे स्थितिरूप संक्रमणा होवेगा, इसप्रकार, वादी कहता है] सो बने नहीं क्योंकि स्वस्वरूप बिषें विक्रिया का वि- रोध है ताते, अन्य जो है सो त्न्नमय को उल्लंघन करके जाता है, इसप्रकार आरम्भ करके मनोमय वा विज्ञानमय आत्मा को ही उल्लंघन करिके जाता है, यह विरोध होषेगा। तैसे आनन्द- मय का आत्मासे उल्लंघन नहीं संभवें है [ तिसकी स्वरूप विषे स्थिति अस्थिर है ताते, शरु आ्ररंभ किये तर्थका विरोधहै ताते, सो सुख्य संक्रमण नहीं है, इसप्रकार सिद्धान्ती कहे है] ताते देशान्तरकी प्रात्तिका उल्लंघन करना नहीं है, अरु अन्नमयादिकों मेंसे एकका कियाभी उल्लंघन करना नहीं है परिशेषसे त्रन्नमयसे आ्रादिलेके त्र्प्रानन्दमय पर्यन्त जो आरप्रारोपित श्रात्मा हैं, तिनसेभिन्न जो परमात्मा है, तिसका किया, अरु ज्ञानमात्र उह्ंघन करके जाना संभवे है। अपरु, संक्रमणको ज्ञानमान्न रूपता के होनेसे क्या सिद्ध होताहै,इस आशंकापर कहते हैं। यहां यहमभाव है कि मुख्यार्थ के असम्भव होनेसे गौएं तर्थका ग्रहण भराही है, याते अधिष्ठानके स्वभावके तिरस्कार करके युक्र अध्यस्त वस्तु का वाध करना ही संक्रम सिद्ध होने है] तिसकी ज्ञानमात्रताके हुये आानन्दमय पर्यन्त पंचकोशों में स्थित अपरु सर्वान्तर अरु त्रा- काश से आदिलेके अन्नमय पर्यन्त कार्य को सृजके तिसके अर्थ पीछे प्रवेश हुये त्र्प्रांत्मा को हृदयरूप गुहाके सम्बन्धसे अ्न्नमया- दिक अनात्माविषे आरत्माका जो विभ्रम है सो आत्माके विवेक ज्ञानकी उत्पत्ति से विनाशको पावता है। तिस 'इस अविद्या रचित' विश्रमके नाशहुये उल्लंघन करके गमनकरमा, यह कथन उपचारसे कियाहै, अन्यथा सर्वगत आत्मा का उंसंघन करके गमन संभवे नहीं, अरु पप्रन्थ वस्तुके त्रपरभावसे सो मुख्य गमन करनाही खोजने को योग्य है। अरु आात्मा का ही ग़मन करना नहीं है, अरु जलौका नामक जो जलजन्तु विशेष है सो तराप-

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली।. १५६ कोही उ्ंघन करके जाता नहीं। ताते [संक्रमणके कथनमात्र- पनेको व्याख्यान करके प्रकरणके महान् तात्पर्य की समाप्ति के मिसकरके कहते हैं "सत्यंज्ञानमनन्तंब्रह्म" सत्य, ज्ञान, अनन्त, ब्रह्म है,। इस उक्र प्रकार के लक्षणवाले आरत्मा के ज्ञानार्थही 'बहुरूपहोना,सृष्टि, प्रवेश, रस,भय,अभय,अरुउल्लंघनादिक जो हैं' सो व्यवहार आादिकों का विषय कल्पित ब्रह्मबिषे संभवे है, परन्तु परमार्थ से निर्विकल्प ब्रह्मविषे कोई भी विकल्प संभवे नहीं [उपनिषदोंबिषे जहांजहां प्रकरणकी आदि ऋप्ररु् अर्प्रन्तविषे उक्र निर्विकल्प ब्रंह्मका कथन होनेसे उपक्रम अपररु उपसंहारकी एक- रूपताहै। याते मध्यमें कहे जे बहुरूप होने आदिक अर्थ तिनबिषे प्रकरणका तात्पर्य नहीं है, किन्तु सपादि अ्रन्त में कथन किये नि- 'र्विकल्प वस्तुविषे ही तात्पर्य है। यह तरर्थ है। ] तिस इस निवि- कल्प आत्मा को, ऐसे क्रमसे उल्लंघन करके।' अर्थात् जानके'। किसीसे भी भयको पावता नहीं, अरु अभय स्थिति को पावता है। "तदप्येष श्लोको भवति"। तिसविषे भी यह श्लोक होता है; अर्थात् तिस इस अर्थविषे भी सर्वही इस आनन्दवल्ञी के र्थरूप प्रकरसके संक्षेप से प्रकाशनार्थ यह अगिम मन्त्र प्रमाण' होता है॥ ३२ ॥ इत्यष्टमोऽनुवाकः ॥ मै॥ अथ नवमोऽनुवाक: है।। यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न विभेति कुतश्चनेति। तथह वाव न तपति॥ किमहथंसाधु नाकरवम्। किमहं पापमकरवमि- ति। सय एवं विद्वानेते आत्मानछस्पुते। उभे ह्येवैष एते आात्मानथस्प्णुते। य एवं वेद इत्युपनिषद्॥३३॥ हे सौम्य !।"यतो वाचो निवर्नन्ते अंप्ाप्य मनसा सह"। जिससे वाणियां अप्रासतहोके मन करके सहित निवर्त होवे हैं, अर्थात् जिस निर्विकल्प उक्र लक्षावाले प्द्ैत आर्रानन्दरूप

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१६० तैत्तिरीयोपनिषद्। आरप्रात्मासे द्रव्यादिक सविकल्प वस्तुको विषय करनेवाले, शरपरत वस्तु की. समानता से निर्विकल्प तद्वैत ब्रह्मविषे भी वक्का पुरुप करके प्रकाशनार्थ योजना कियेहुये वचनरूपा वासियां अपपाप्त होके ।'अर्थात् प्रकाश किये विनाही'। निवर्त होती है।अर्थात् त्रपने सामर्थ्य से हीन (रहित) होती है। तरु यहां मन नाम ज्ञानका है, सो ज्ञान जहां इन्द्रिय रगोचरादिकं तपर्थ विषे वचन प्रवर्त होते हैं, तहां तिनके पीछेही प्रकाश करने के तर्थ प्रवर्त होवे है, अररु जहां ज्ञानहै तहां वाणीकी प्रवृत्ति होती है। ताते वचन अपररुं वृत्तिरूपावासी तपरु मनकी सर्वत्र साथही प्रवृत्ति होती है। ताते ब्रह्मके प्रकाशनार्थ सर्वप्रकारसे योजना करनेवाले वक्रापुरुष कर. के योजना करीहुंई भी वाखियां जिस ज्ञान ऋपरु शब्दके तर्प्रविषय इपररु अदृश्यादिक विशेषणवाले त्र्प्रात्मासे, सर्वको प्रकाशकरनेविपे समर्थ मन नामक विज्ञान करके सहितही निवर्त होवे हैं। तिस श्रोत्रिय निष्पाप परु:निष्काम अरु लोकादि सर्व एषसासे रहित पुरुषके आत्मभूत अपररु विषय विषयी के सम्बन्ध से रहित, अरु इवाभाविक नित्य विभाग वर्रित सर्वोकृष्ट।"पानन्दं ब्रह्मणो विद्वान्, न विभे त कुतश्चनेति"। 'ब्ह्मके आ्र्प्रानन्दको उक्कप्रकारसे जाननेवाला किसीसे भी भयको पावता नहींअर्थात, श्रोत्रिय, अपाप, कामनासे रहित, विद्वान् ब्रह्मनिष्ठ पुरुषके आप्रात्मस्वरूपन्रह्म के आानन्दको उक्रप्रकारके जाननेवाला विद्वान् किसीसेभी भयको पावता नहीं, क्योंकि भयके निमित्त।भेददृष्टि'। का। 'उसविषे। पप्रभाव है ताते। तरपरु जिसकरके विद्वान् को 'कि जिससे भयको पावता हैं, ऐसा ब्रह्मसे पृथक् अन्य वस्तु कोई भी है नहीं, इसही करके उसको भयका निमित्त नहीं। अरु भयके निमित्तके तप्रभाव से भय भी नहीं'। अरु ऋविद्या करके "यदोदरमन्तरंकुरुते, तथ तस्य भयं भवतीति" जब अल्प भी अन्तरको करताहै, तवति- सको भयहोताहै,। इसप्रकार पूर्व कहाहै, अरु विद्वान्को त्ररविद्या के कार्य ऋरु तिमिर दष्टिवाले पुरुषकरके देखेहुंये द्वितीयचन्द्रवत्

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवल्ली। १६१ भयके निमित्त अन्यवस्तुके नाशहुये वो किसी से भी भयकोपा- बता नहीं, यंह कथन घटित है। अरु मनो मयबिषे उ़दाहर एकिया जो मंत्र सो मनके ब्रह्मज्ञान का साधन होनेसे, तिस मन विषे ब्रह्मभावको आप्रारोप करके तिसकी स्तुतिके अप्पर्थ है "न विभेति कदाचनेति' किसी कालविषे भी भयको पावता नहीं,। इसप्र- कार भयसात्रका निषेध किया। यहां अद्वैतविषे "न बिभेति कु- तश्चनेति"किसीसे भी भयको पावता नहीं;। इसप्रकार भयके निमित्तकाही निषेध करते हैं, एतदर्थ पुनरुकि दोष नहीं॥ ननु शुभकर्म्मोका न करना इपरु पापक्रिय।'करने'। रूप भयका नि- मित्त है।'तव कैसे कहतेहौ कि विद्वानको भयके निमित्तकां त्र्प्र- भावहै'। इसप्रकार, नहीं है.। तब किसन्रकार है, तहां कहते हैं "तथंह वांव न.तपति, किमहय साधु नाकरवम, किमहं पाप- मकरवमिति"।: इसको किस कारणसे मैं शुंभकरमोंको न करता हुआ, किसकारणसे मैं पाप कम्मोको करताहुआ, ऐसे निश्चय करके तपावते नहीं; अर्थात् इस कथन किये ऐसे जाननेवालेको किस कारणसे, मैं शुभकर्मोंको न करता-हुआर, इसप्रकार पश्चात् मरसक़े समीप, कालविषे जो संताप होता है, तैसे किसकारणसे मैं पापकर्मको करता हुआ, इसप्रकार, नरकपातादि, दुःखके भय से ताप होताहै,सो शुभकर्मका न करना, अरु पांपकरिया यह दोनों जैसे अविद्दान को तंपावते हैं, ऐसे निश्चयकरके तपावते ( उद्ेग करते) नहीं।। प्र० ॥ विद्वानको वे कैसे तपावते नहीं। तहां कहते हैं,!"सय एवं विद्वानेते ्ात्मा नथस्पणुते, उभेह्येवैष एते आ्रात्मा- नथ स्पृणाते, य एवं वेद इत्युपनिषत्"।:जो ऐसे जाननेवाला है सो इन दोनोंको आात्मा देखताहै, जाते इन दोनोंको यह ं्र्प्रात्मा- रूपसे देखताही है, जो ऐसे जानताहै सो अद्दत ब्रह्म को जानता है, ऐसी यह उपनिषद् है, अर्थात् जो उक्क प्रकार जाननेवाला है, सो तापके हेतु इनदोनों शुभत्शुभ कम्मोको अपरर्रना श्र्प्रात्मा जानके तप्राच्छादन कहिये तिरस्कार करता है वा परमात्मभाव

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१६२ तैततिरीयोपनिषद्। से देखता है। जाते इसप्रकार इन दोनों पुएाय पापोंको यह वि- द्वान [ शुभाशुंभ जो कर्म हैं, सो अधिष्ठान से मिन्ष किये नहीं हैं, छरु नहीं भासते हैं, यांते सत् अरु. प्राशमात्र श्रात्मतत्व्रही तिन दोनों का स्वरूप है, शरु तिससे भिंन्न धर्थ अरु अनर्थ के हेतुपने रूप जो तिनका विशेष रूप है सो वस्तु नहीं है, क्योंकि तिनको सत् अररु प्रकाशसे अन्य होने करके अ्रलत्पनाहै ताते, अरु ऋरप्रकाशवान् होनेसे, इस अभिप्राय से कहते हैं] अ्र्प्रंपने विशेष स्वरूप से शून्य करके परात्मस्वरूप से [आ्रात्माही अ्रपरविद्यासे शु भाशुभ कर्मरूपसे प्राप्त होताहुआ, इसप्रकार कहा। अपरु पवतो यह शुभाशुभ कर्म अर्थ वरु व्प्रनर्थके हेतु होते हुये "ते आात्मैवेति" सों आात्माही है,। इस ज्ञानसे स्वस्व्ररूप को शुभाशुभ कर्मरूप करने करके विद्वान् तिनको देखताही है। अरु लौकिक दृष्टिसे सम्पादन किये पुरायपापरूप देखिकैं विद्वान्को पुएय पापवान् देखते हैं, परन्तु सो उनसे भयको पावता नहीं, ऐसा कहते हैं] देखताही है, एतदर्थ इसको पुएय पाप तपावते नहीं। ऐसा कौन है जो ऐसे जानताहै सो उक्रप्रकारके पद्धैत आानन्दरूप ब्रह्मको जानता है। ऋरु तिसके आरप्रात्मभाव के देखे हुये पुराय पाप नि- षफल तापवाले हुये जन्म के आरंभक होते नहीं। ऐसी यह उपनिषद् जैसे हैं तैसे कथन किया, अर्थात् इस वली विषे ब्रह्मं- विद्यारूप उपनिषद् (सर्व विद्याओंसे परमरहस्य ,गोप्य,) जो है सो प्रकट देखाई। इसबिषे परमश्रेय स्थित है॥ ३३॥

गों व्यानोऽपान आकाश: एथिवी पुच्छथंष्टिछंशतिः प्राणं. यजुर्ऋक सामादेशोऽथर्वाङिरस:पुच्छ। डाविथ शंतिर्यत् श्र्धत्तथं सत्यं योगों महोऽष्ादश विज्ञानं प्रियं मोद: प्रमोदश्पानन्दो ब्हम पुच्छं। द्ाविथशंतिर-

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द्वितीयाध्याय ब्रह्मानन्दवलली। १६३ मनुष्यगन्धर्वाणां। देवगन्धर्वाणां। पितृणां। चिरलोक- लोकानामाजानज़ानां। कर्मदेवानां। ये कर्म्मणा। देवा- नामिन्द्रस्य बृहस्पतेः प्रजापतेर्बरह्मयः। स यश्च संक्रा- मत्येकपञ्चाशद्यतः कुतश्च। नैतमेकादश। नव॥ स- हनाववतु माविद्विषावहै अ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ब्रंह्मविद्य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥३४।। इति द्वितीयोऽध्याय ब्रंह्मांनन्दवल्ली।। हरि: अंतत्सत् "ब्रह्म यह इत्यादिलेके, जो इसप्रकारजानताहै सो ब्रह्मवेत्ता है, ऐसी उपनिषद् हैं"यहां पर्यन्त इस चौंतीसवें ३४ मन्त्र का अर्थ है।। ३४॥ अरु इसका विशेषार्थ श्रीभाष्यकार शंकराचार्य जीने भी किया नहीं अतएव यहां भी विशेष व्याख्यान नहीं।। इति नवमोऽनुचाक:॥६॥

  • याध्यायभाषाभाष्यसम्पूर्णम् हरिः तत्सत् अथ भृगवल्ली प्रारंभ्यते॥ हरिः ३। सह नववतु। सह नौ भुनक्ु। सह वीर्थ्य करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु। माविद्विषा- वहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ भृगुर्वै वारुरः। वरुणां पितरमुपससार तर्प्रधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवांच। अन्नं प्राणं चक्षः श्रोत्रं मनोवाचमिति। तथ होवाच। यतो वा इमानि भूता- नि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यमिसं- विशन्तीति तद्विजिज्ञासस्व। तब्रह्मेति ॥सं तपोऽतप्य- ता स तपस्तप्त्वा ॥ ३५॥ इति प्रथमोडतुवाक:॥।

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१६४ तैत्तिरीयोपनिषद्। अपरथ तैत्तिरीयोपनिषद्गतभृगुवल्लीनामक तृतीयाध्यायभाषाभाष्यं प्रारभ्यते

:- हे साम्य! अब भृगुवल्लीके विचारको श्रवण करो कि जिसमर- कार वरुणनाम ऋषिका भृगुनाम पुत्र अपने पिता के उपदेश से अन्नंमयादि पंचकोशों के विचारसे पंचकोशातीत परमानंदृ- रूप ब्रह्मको अपना आांप आात्मरूपसे सांक्षात् यथार्थ अनुभव करके शान्त सुखी निर्भय हुश्राहै।। जो[ उक् अर्थके तपनुवादपूर्वक तृतीयावल्ली के सम्बन्ध को कहते हैं]सत्य,ज्ञान, अरनन्तरूपन्रह्म तरप्राकाशादिकोंसे लेके अन्न- मय पर्यन्त कार्य को सृजके तिसही विषे पुनः प्रवेशकों पायाहै, सो जिरुकरके विशेषवत् प्रतीति होवेहै, तिसकरके सर्व कार्यसे विलक्षण अदश्यादिक धर्मवाला आानन्दरूपही है। तिसही को "तदेवाहमिति" सोई मैं हूं,। इसप्कार जानना, क्योंकि तिस के प्रवेशको तिसे ज्ञानरूप अपर्थवानपना है ताते। तप्ररु तिस ऐसे जाननेवाले ब्रह्मवेत्ताके शुभ अरुगुभकर्म जन्मान्तरके आ्र्प्रारंभक होतेनहीं, इसप्रकारका अर्थ उक्र आनन्दवली विषे कहनेको इ- च्छत है। तिसबिषे ब्रह्मविद्या समात किया। तिसके पीछे भृगु- 'वल्ली विषे ब्रह्मविद्या का साधनरूप तप (वाक्यार्थ के ज्ञान का साधन पदों के अर्थका विचार) कहनेको योग्यहै। ऋरु ञन्नम. यादिकों को विषय करनेवाले उपासन कहे हैं। एतदर्थ प्रथमवत् शान्तिपाठपूर्वक यह।'भृगुवल्ली'त्रारंभ करते हैं॥।"सह ना- ववतु सह नौ भुनकु सह वीर्य्यं करवावहै। तेजस्विनावधीत- मस्तु भा. विद्विषावहै, ॐ शान्तिः ३"।'सो हमको रक्षाकरो, सो हमको भोगावो, सो सामर्थ्य को करो, हमारा अध्ययन किया तेजस्वी होहु, हम शिष्य अरु आचार्य परस्पर द्वेष न करें, ॐ ।'सत्यही कहताहौं'।। शान्ति होउ ३.,।'इस शान्ति पाठका ञ्र्प्र्थ पूर्व सविस्तर कहाहै'। यहां विद्याकी प्रशंसाके अर्थ अरपने प्रिय

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। पुत्रको पिताने कथनकरी यह तराख्यायिकाहै।"भृगुर्वैवारुसिः, वरुएं पितरमुपससार, पप्रवीहि भगवो ब्रह्मेति, तस्मा एतत्प्रोवाच, अंन्नं प्राएं चक्षुः श्रोत्रं मनोत्राचमिति"। भृगु प्रसिद्ध वरुण- ऋपिका पुत्र सो वरुए नाम अपने पिताके समीप जाय।'कहता हुआ कि'। हे भगवन् ब्रह्मको कहो, तिसके अर्थ यह करता हुआ अन्न, प्राए, चक्षु, श्रोत्र, मन,अरु वाणी, कहता हुआअरथातं भृगु इसनामवाला प्रसिद्ध वरुणनाम ऋषिका पुत्र था सोब्ह्म के जाननेकी देढ़ जिज्ञासाधारके वरुणनाम अपनेपिताकेसमीप जाय:यह वचन कहता हुआ कि हे भगवन्। आप.मेरेप्रति ब्रह्म को वर्णन करो, इसप्रकार जब भृगुने अपने पितासे ब्रह्म की जिज्ञासा अप्ररु विनय पूर्वक कहा, तत्र सो वरुसनाम पिता विधिवत् अपने समीप प्रापतहुये तिस भृगुनाम पुत्रकेताई यह वचन कहताहुआ ।'किहे पुत्र!'। तिसको त्र्प्रन्नकहिये शरीर तरप्ररु तिसकेभीतर प्राणत्त्परु इन अन्तरके ज्ञानके साधन चक्षु, श्रोत्र, मन, इंप्ररु वाणी, इन ब्रह्मके [ यहां यह भावहै कि, जिसकरकेः शरीराद्रिकोंकी चेष्टाके अन्यथा।अर्थात् चैतन्य विना। पसंअवकरके तिनका साक्षीरूप चैतन्यको विवेचनकरते हैं, एतदर्थ यह शरीरादिक ब्रह्मके लक्ष- कहोनेसे तिसके ज्ञानविषे। अर्थात् विवेकार्थः द्वारवंतू द्वारहै। - तिनको।'अपनेपुत्र'। भृगुकेअपर्थ।'वरुणपिता कहताहुआ। केवल अर्थ का ज्ञान।अर्थात त्वं.पदकार्थ'। वाक्यार्थ के ज्ञानका सा- धन नहीं, किन्तु तत्पदार्थका ज्ञानभी है, इस अभिप्रायसे तत्पदके अर्थरूप ब्रह्म के लक्षणको कहताहुआ] ज्ञानविषे द्वारोंको कहता हुआ। अरु इन द्वारभूत तन्नादिको कहके पुनः तिस। अपनेपुत्र जिज्ञासुको'। न्रह्मका लक्षण कहताहुआ॥ प्र०॥क्या तिस ब्रह्म का लक्षपहै।उ०॥ तहां कहते हैं,।यतोवाइमानिभतानिजायन्ते] येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तदिजिज्ञास- स्व्र। तद्व्रह्मेति ॥ सतपोऽतप्यत। सतपस्तप्त्वा' जिससे प्र सिद्ध यह भूत उपजे हैं, अरु जिसकरंके उपजेहुये जीवते हैं, अरु

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३६६ 1 : तैत्तिरीयोपनिषद्। जिस ब्रह्मके.अर्थ जाते हैं, अरु तादात्यकोही पावते हैं, तिसको सो ब्रह्महै, ऐसे विशेषकरके जाननेकी इच्छाकर, सो तपकोही त- पताहुआ, सो तपको तंपके, अपर्थात जिससे प्रसिद्ध यह ब्रह्मादि- कसोंलेके, स्तंबपर्यन्त भतउपजते हैं, अरु जिसकरके उपजेहुये जीवते हैं.।'अर्थात् प्राणके धारणरूप, जीवनको करते हैं १:अरु विनाशकालबिषे जिस ब्रह्मकेताई जाते हैं तरु तादातम्यकोही पावतेहैं, अर्थात् उत्पत्ति स्थिति तरु लय, इन तीनोंकालों विषे भूतों का देह जिसके स्वरूपभावको त्यागता नहीं, सो ब्रह्मका लक्षण हैं।I तिसको तू ,सो ब्रह्म है, इसप्रकार विशेषकरके जाननेकी इच्छांकर, अर्थात् जो उक्लक्षणवाला ब्रह्म है तिसको तू तन्नादिक द्वारा प्रासहो। तहां।"प्राशस्य प्राणाः उत- चक्षुषश्चक्षरुत श्रोत्रस्य ोत्रमन्नस्यान्नंमनसों मनो ये. विदुस्ते निचिक्युर्ब्रहम पुरायमग्रयमिति"। प्राणका प्रायाहै, चक्षुका चक्षु है, श्रोत्रका श्रोत्रहै, त्र्प्रन्नका अपन्नहै, मनका मनहै, जो तिसको ज़ा- नताहै सो पुराण (प्राचीन) अरु अग्रबिषे स्थित ब्रह्मको पावता है,। यह अन्य.क्षुतिभी ब्रह्मके जाननेविषे द्वारोंको देखावे है। सो भृगु इन ब्रह्मज्ञानके द्वारों को अरु ब्रह्मके लक्षणको पितासे श्र- वण करके ब्रह्मज्ञानका साधन होने करके तपकोही [ यहां यह अर्थ है कि, पदार्थोंके लक्षणकेही कथनसे अखंडन रूप वाक्यार्थ के अ्रप्रतिपादनसे शरररु पदार्थ, के भेद ज्ञानसे पुरुषार्थ का त्र्प्रसंभव है तातेअरु।"उदरमन्तरं कुरुंते अथ .भयं भवति"। जो अल्पभी अन्तर (भेंद) को करता है तिसको भयं होता है। इत्यादि श्रुति वाक्यों से भेद ज्ञान निन्दितहै ताते। एतदर्थ वाक्यार्थ के ज्ञान पर्यन्त तारत्पर्य सेलक्ष्यपदार्थों के, विवरणंको वारंवार आाचरता हुआ] तपता हुआ।। ननु, भृगुको।'तप करनेका'।.उपदेश नहीं किये ही।भृगुको' तपके साधन भावका, निश्चय किस करके होताहुआ, तहां कहते हैं,।उ०।। त्रवशेषं सहित ब्रह्म के कथनसे भृगु को नहीं उपदेश किये तपके साधन भावका निश्चय हुशप्र

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १६७ । अर्थात् भृतुको वरुणने :जिसकरके भूत उपजते हैं, अरु उपजे हुये जिसकरके जीवते हैं, पपररु अन्तविष जिसमें लय होते हैं तिसको तू जहाजान, इसप्रकार ब्रह्मको तटस्थ लक्षण से उप्रदेश कियां, तव भगको स्वरूपलक्षणस व्रह्मको जानना अ्रवशेष रहा तिसके जानने के अर्थ भृगु एकान्त विचाररूप तपरूपे साधनका निश्चय करता हुआ, तपररुपिताने कहा कि जिस करके भूत उत्पन्न होतेहैं, जिसकरके जीवते हैं अरु जिसविषे प्रवेश को पा- वते हैं, सो ब्रह्महै, तव इन तर्टस्थ लक्षणों के श्रत्र से भृगुको यह तरपवश्य विचारणीय हुआ्र, कि किससे यह स्व्व भूत उपजते हैं, अरु उपजेहुये किस करके जीवते हैं, तरु.अन्तबिषे: किसमें प्रवेश पावते हैं, ऐसा विचार न्रह्मके निश्चय जानने के अर्थ विचारमय तपरूप साधनका निश्चयकर आागे उक्रलक्षणों से प्रथम अन्नमयार्दिकों का विचाररूप तपकर पंश्चात् सत्यज्ञान अनन्तादि स्वरूप लक्षण से, सर्व के आप्राधार परमानन्दरूप ब्रह्म को अपने आत्मभाव से पावताहुआ'।।। रु जिसकरके ब्रह्मके निश्चय विषे त्रन्नादिरूप द्वारको, रु।"यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते"। जिससे प्रसिद्ध यह भत उपजते हैं,। ऐसेलक्षणको कहताहुआ सो तवशेष रहे साधन सहितही हैं, क्योंकि सांक्षात् बह्मके उपदेशसे। अन्यथा जिज्ञासु पुत्र के अर्थ .. यह ब्रह्म ऐसे रूपवालाहै, इसरीति से त्रह्म उपदेश करने को योग़्य है, तररु तव तवशेष सहित क्या कहतेहुये, अरुं याते जानाजाताहै कि पिता व्रह्म ज्ञानार्थ निश्चय करके अन्य साधन की भी अपेक्षा करे हैं। तरुउन दोनोंका विशेष निश्चय तो तपको सर्वका अत्यन्त साधक होने से होता है।' कि सब सांधनों में मुख्य विचार मय तपही है' तरु जिसकरके सर्व नियमित, साध्यों को विषय करने वाले साधनों का उक्र तपही अत्यन्त सांधक अरु साधन है, इस प्रकार लोकबिषे प्रसिद्ध है। तांते भृगु पिताने नहीं उपदेश किये भी तपको ब्रह्मज्ञान का साधन होने से ज़ानताहुआ!अरु सो

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तप बाह्य अरु: अन्तर के कारणों का एकाग्रपना है। क्योंकि सो ब्रह्मज्ञान तिस। इन्द्रिय अरु चित्तकी एकाय्रतारूप द्वारवाला हैं ताते। अरु"मनसश्चेन्द्रियाणाञवैकाग्यंपरमंतपः, तज्ज्यायः। सर्वधर्मभ्यः सधर्मः पर उच्यतेति"' मन, परु इन्द्रियों का जो एकाग्रपनाहै सो परमतपहै, सो जाते सर्घ धर्म्मों से वड़ाहै याते तिसको परमधर्म कहते हैं'। इस स्वृति के प्रमाणसे। अरु सो [सो. तप्रको तपिके, अरप्र्थ यह पिताने कहा जो लक्षणा सो कहां परिपूर्णा हुआहै, इसप्रकारएकाग्रचित्तसे विचारके।"अन्नंव्रह्मेति"। अन्न ज्रह्महै,। ऐसा जानताहुआ। यहा यहं अर्थ है कि सर्व करके भोगिये है, ऐसा जो सर्वकी प्राप्तिका साधारण स्थूलदेहका कारण विराट्नामवाला स्थूल पंचसूतोंका समूह, यहां अन्नशब्द करके कहते हैं.। तिसकों स्थूल भौतिक पदार्थोका कारण होने से! जिससे यह भतउपजते हैं, इस ब्रह्म के लक्षणाको तंहां योज़ना करने को शक्यहोने से सो।'अन्न, ज्रह्महै इसप्रकार जानता हुशर्प्रा ].तपको तपके अरन्त ब्रह्म है इसप्रंकार जानताहुआ्रा, इसप्रकार प्रथमके पप्रनुवाकसे सम्बन्धहै॥ पर्थात्, प्रथम अ्नुवा कके अंंत में कहाहै कि।"तपस्तप्त्वा" तपको तपिके, अपरु इस अ्रनुवाकके तपरादिः में कहा है कि।अननंब्रह्मेतिव्य जानात्"। अ्न को ब्रह्म जानताहुत््र्रा, ताले पूर्वानुवाकके अन्त अपररु इसके आ्रादिके सम्वन्ध से यह अर्थ हुआके, तपको तपके अन्नको ब्रह्म जानताहुंआा ॥ ३५॥. :इति द्वितीयोऽनुवाक:॥7 अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाध्येव खल्विमानि भतानि जायनते। अ्रन्मेन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रय- नत्यमिसविशन्तीति। तहिज्ञाय पुनरेव वरुणं पितर- मुपससार। घीहि भगवा ब्रह्मति। तथ होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपा ब्रह्मति।स तपोडत- प्यत। स तपस्तप्त्वा २।३६॥ इति द्विती योडनुवाक:।।

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तृतीयाध्याय भृंगुवल्ली। १६६ हे सौम्य!"अन्नं ब्रह्मेतिव्यजानात्"। अंन्न ब्रह्महै,ऐसे जानता हुआ, जिसकरके सो अन्न ब्रह्म के उक्र लक्षणों करके युकहै, याते तिसकोब्ह्महै, ऐसे जानताहुआ।। प्र०॥कैसे सो।'अ्न्न'ब्रह्मके लक्षणॉंकरकेयुक्तहै,तहां कहते हैं।"अरन्नाद्व्वयेवखत्विमानि भूतानि जायन्ते, प्र्रन्नेन जातानिजीवन्ति,अन्नंप्रयन्त्यभिसंविशन्तीति?। जिसकर के तन्नसेही प्रसिद्ध यह सर्वभृत उपजते हैं, अ् से उपजे हुये जीवते हैं, अन्नके ताई सम्मुखजाते हैं, प्रवेश को पावते हैं- अर्थात्अन्नसेउपजेहुयेभूत अननसेही जीवते हैं, अरु परिणाम अन्नमेंही लयहो ते हैं, ताते अनन का ब्ह्मपना युकहै। सो ऐस तपको तपके लक्षण अरु युक्िसे तद्िज्ञाय वरुणं पितरमुपससार, तप्रधीहि भगवो ब्रह्मेति। तिसकी जानिके पुनः वरुण पिता के पास जाताहुप, अरुकहा, हेभगवन्! ब्ह्मको कहिये, अर्थात् पन्नरूप ब्रह्म को जानके पुनः संशयको प्रासहुआा भृगु तरपनवरुण नामक पिताके समीप जाय कहता हुआ कि हे, भगवन्! ब्रह्म को कथन करिये॥प्र•॥यहां संशयका कारण कौन है,॥उ०॥। अन्न की उत्पत्ति को देखने से उसको संशयहुआ।'कि.पिताकर के कहे ब्रह्म के लक्षण त्रपरन्नंबिषे पायेजाते हैं परन्तु ब्ह्मअजहै त्रौ तन्न उत्पत्ति वाला है ताते यह अन्नब्रह्म कैसे होगा।।"तय होवाच तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्वर, तपों ब्रह्मति, सतपोउतप्यत, सतपस्तप्त्ा"।तिस 'भृगुको पिता' कहताहुआ. तपब्हम है, ऐसे तपकरके तू विशेष ब्रह्म के जानने की इच्छाकर, पश्चात् सो भृगु पुनः तप को तपताहुन्प्रा, सो तंपको तपिके१ ॥ २। ३६ ॥ इति द्वितीयोऽनुवाक:॥ २॥ पणो ब्र्मेति व्यजानात्। प्राणाझेव खल्विमानि भूतानिजायन्ते। प्रारोन जातानि जीवन्ति। प्रायां प्र. यन्त्यभिसंविशन्तीति। तदिज्ञाय पुनरेव वरुरां पितरमु पससार।ऋधीहि भगवो ब्रह्मति। तथहोवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत।

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तैत्तिरीयोपनिषद्।' स.तपस्तप्ता ॥ ३ ।३७॥ इति तृतीयोऽनुवाकः ॥ हे सौम्य!।"प्राणोब्रह्मेति, व्यजानात्, प्राणाद्येव खल्विमानि भृतानि जायन्ते, पाशेन जातानि जीवन्ति, प्रागं प्रयन्त्यभि- संविशन्ताति" प्राएब्रह्म है, ऐसा जानताहुआ। प्राण से ही प्रसिद्ध यह सर्व भृतमात्र उपजते है, प्राएसे ही उपजेहुये जीवते हैं; अरु प्रासके अर्थ सम्मुख जाते हैं तरु प्रवेश को पावते हैं; अंर्थात प्रागासे ही सर्वभूत उपजते हैं अरु उपजेहये तिसहीसे जीवते हैं, अरु अन्त बिषे तिन प्रागही में प्रवेश को पावते हैं ।"'तद्विज्ञायपुनरेव वरुणं पितरमुपससार अ्रंधीहि भगवोत्रह्मेति। तिसको जानके पुनः ही वरुण पिताके समीप जाताहुय है भगवन् ! ब्रह्मको कहो, अर्थात् उक्रप्रकार तिस प्राणरूप ब्रह्म को विचारके पुनः वो भृगु अपने वरुणनाम पिताके समीप जाय कहताहुआ हे भगवन् ! ब्रह्मकों कहिये, इसप्रकार ब्रह्म विषयक प्रश्न करताहुत, तब।"तधहोवाचं! तपसा ब्रह्मविजिज्ञासस्व, तपोब्रह्मेति, सं तपोऽतप्यंत। स तपस्तप्त्वा 'सो पिता कहेता हुआ तपसे विशेष करके ब्रह्मको जानने की इच्छाकर, तप ब्रह्मे है सो तपको तपताहुआ, तपको तपिके॥ अर्थात्।प्रागको ब्रहम के लक्षणों कर के विचार नेसे भृगुको यह संशयंहुआ कि यह पराए उत्पत्तिमान अपररु आ्र्प्रवागमनवाला अरु जड़ है अरु बह्म त्रज अचल चैतन्य है, ऐसा विचार पितासमीप जा कहा हे भगवन्। ब्रह्म कहो तब पिताने कहा तप सर्व साधनों में बड़ा है ताते तू तप करके ब्रह्मको विशेषकरके जानने की जिज्ञासाकर, तब वो भृगु पुनः तपको तपताहुआ, तपको तपिकै।। आगे चतुर्थ अनुवाक से पूर्ववत् सम्बन्ध है॥३।३७।। इति तृतीयोऽनुवाक: ॥३॥ मनो ब्रह्मेति व्यजानात् 1मनसो ह्ेव खल्विमानि भृतानि जायन्तें। मनसा जातानि जीवनति। मनः प्रयः न्त्यभिसंविशनतीति। तैडिज्ञाय पुनरेव वरुएं: पितरमुप-

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १७१ ससार। अरधीहि भगवो ब्रह्मेति। तथ होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा॥ ४।३८ ॥ इति चतुर्थोडनुवाकः॥ हे सौम्य !।"मंनोत्रह्मेतिव्यजानात्, मनसोहयेव खल्विमानि भतानि जायन्ते, मनसा जातानि जीवन्ति, मनः प्रयन्त्यभिसं- विशन्तीति"मन ब्रह्म है, ऐसे जानताहुआ, मनसेही प्रसिद्ध यह भूत उपजते हैं, मनकरके उपजेहुये जीवते हैं, मनके तर्थ सम्मुखं जाते हैं तरु प्रवेशको पावते हैं, अर्ात् यह मनहीज्रह्म है ऐसेजानता हुंआ, मनसेही सर्वभूत उपजे हैं अरु सो उपजे हुये मनकरकेही जीवते हैं अरु परन्तविषे मनके सम्मुख हुये मनविषे प्रवेश करतेहैं ।"तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरसुपससार, अधीहि भगवो न्र- ह्रेति, तथ्होवाच, तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व, तपो ब्रह्मेति, 'स तपोऽतप्यत, स तपस्तप्त्वा"। तिसको जानके पुनः भी वरुण पिताके पास जाता हुर्प्र, हे भगवन्! ब्रह्म कहो, पिताने कंहा तपं वड़ाहै, तपकरके ब्रह्म के विशेष जानने की इच्छा करो, सो तप को तपताहुआ, तपको तपिके, अर्थात् तिस मनरूप ब्रह्म को जानके।'पूर्ववत् तिसविषे संशयको पायके'पुनः वो भृगु अपने वरुसापिता के समीप जायके ।'अपना संशय कह'। कहता हुआ कि हे भगवन् 1 ब्रह्मको कंहिये, इसप्रकार जब भृगुने ब्रह्म पूछा तव वरुण कहताहुआ, तप। 'सर्वसाधनों में ' बड़ा है, ताते तू तपको तपिके ब्रह्मको विशेष जानने की इच्छाकर, तब वो भृगु पुनः तप को तपता हुआ, तपको तपिके। इसका सम्बन्ध आगेहै॥४॥३८॥इति चतुर्थोडनुवाकः-॥४,॥ विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्। विज्ञानाद्येव खल्वि- मानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय पुनरेव व- रुां पितरमुपससारं। अंधीहि भगवो ब्रह्मेति। तथ

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१७२ तैत्तिरीयोपनिषद्'। होवाच। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा॥ ५।३६॥ इति पञ्च- मोडनुवाक:॥ हे सौम्य!।"विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्, विज्ञानाद्येव खल्वि- मानि भूतानि जायन्ते, विज्ञानेन जातानि जीवन्ति, विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंिशंतीति"। 'विज्ञान ब्रह्म है ऐसा जानताहुत्र्रां,र विज्ञानसेही।'यंह सर्व प्रसिद्धभूत उपजे हैं'। विज्ञानसेही उपजे जीवते हैं, विज्ञानके सम्मुख जाते हैं, प्रवेश करते हैं, अर्थात् विज्ञानही ब्रह्म है इसप्रकार जानता हुआ्रा, क्योंकि विज्ञानसेही प्रसिद्ध यह सर्व भूत उत्पन्न होते हैं, तररु उत्पन्न हुये सर्व विज्ञान सेही जीवते हैं, तरु त्न्त विज्ञानके सम्मुख जाते प्रवेश करते हैं "तदिज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरसुपससार, तधीहि भगवो ब्रह्मेति तधहोवाच तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व, तपो ब्रह्मेति, स तपोऽ्त- प्यत, स तपस्तप्त्ा"। तिसको जानके पुनः ही वरुण पिताके पास जाताहुआर, हे भगवन्! ब्रह्मको कहो, पिता कहताहुआ्र, तप को तपिके ब्रह्मकी विशेष जिज्ञासा करौ, सो तपको तपता हुआ्प्रा सो तपको तपिके, अरथात् सो भृगु विज्ञानको ज्रह्म जानके, त्रपररु पूर्वप्रकार तिसमें संशयवांन् होके पुनःअपने वरुसनामक पिताके समीपजाय कहताहुआर कि हे भगवन्! ब्रह्म कहो, इसप्रकार जब भृगुने प्रश्न किया तब सो वरुसापिता कहता हुआ कि हे पुत्र! ऐसे ही तपकरके ब्रह्मको विशेष करके जाननेकी इच्छा करो, क्योंकि सर्व साधनों में तप ब्रह्म (बड़ा) है, तब पुनः वो भृगु एकान्तमें जाय तपको तपताहुआ्रा, तपको तपिके॥ इसका अग्रिम अंनु- वाकसे सम्बन्ध है॥ ५। ३६ ॥ इति पञ्चमोऽनुवाकः॥५॥ उ््रानन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आ्राननदाध्येव ख- ल्विमानि भूतानि जायन्ते आनन्देन जातानि जीवन्ति। श्रानन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति:। सैषा भार्गवी वारुणी

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १७३ विद्या।-परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता। सय एवं वेद। प्रति- तिष्ठति। तर्प्रन्नवानन्नादो भवति। महान् भवंति। प्रजया पशुभिर्व्रह्मवर्च्सन। महान् कीत्या।॥ ६।४० । इति षष्ठोऽनुवाक: ॥

संविशन्ति"। 'आनन्द व्रह्म है ऐसे जानताहुत्ररा,त्र्रानन्इसे प्रसिद्ध यह भूत उपजते हैं, अररु आानन्दसेउप जे हुये जीव ते हैं, अरु आरानन्द के तपर्थ सम्मुख हुये जाते हैं अरु प्रवेश को पातते हैं, अर्थात् यह आरनन्द ही ब्रह्महै क्योंकि ।'न्रह्मासे पिपीलिकापर्यन्त सर्व'। भूत उपजते हैं, अरुउप जे हुयेसर्व प्रानन्दसे ही जीवते हैं; अरु तन्त में त्रानन्द के सम्मुख जाते तिसहीविपे प्रवेशको पावते हैं,। इसप्रकार जानता हुआ। यहाँ जो वारंवार तपका उपदेश है, सो तपकी त्र्प्रतिशय साधनता के निश्चयार्थ है। यावत् पर्यन्त ब्रह्म का निरतिशय लक्षण नहीं होताहै, अरु यांवत् जिज्ञासा निवर्त नहीं होती है, तावत् तुझको तंपही साधनहै, तिस, तप करकेही ब्रंह्मके जानने की इच्छाकर। यह पिताके।' वारंवार तप करनेकी आज्ञा.का, ञभिप्रायहै। [यहाँ यहत्रर्थ है कि क्रति स्मृतिभिषे विराद की उत्पत्तिके देखने से तहां ब्रह्मके।अजत्वादिसर्व '1 लक्षण घटते नहीं, यह जानके। 'अन्नन्रह्मके जानने,के पश्चात्'। पुनः।'वोभृगु'। तपको तपताहुआ।। अर्थात् यहां तप शब्दका अर्थ विचारहै अरु यहीं त्रतिशय साधनहै अरु सो भी चक्षरादि इन्द्रियां बाह्य करणं अरु मन आदिक अन्तःकरण इनकी सम्यक् प्रकार एकां- अतापूर्धक जो विचार है सो तप शब्द करके ग्रह्य है।॥ तिस विराद् रूप तन्नके कारण क्रियां शक्किका आश्रय होने करके प्राण शबदके लक्ष्य पप्ररु, संकल्प अरु निश्चयकी सामर्थ्य, से युक् होने करके मन अरु विज्ञान शब्दके लक्ष्य हिरएयगर्भ को ब्रह्म है,

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१७४ तैत्तिरीयोपनिषद्। इसंप्रकारजानताहुआ। तदनन्तरतिसहिरएयगर्भकोभी।'।"हि- रणयगर्भोजायमांनः"। इत्यादि वेदप्रमाशसे' कार्यरूप होने क- रंके तहाँ भी ब्रह्म का।'समस्त' लक्षण होता नहीं, यह विचारके तिंस हिरएयगर्भ के कारकों स्वतन्त्रपना होने से निश्चय करके प्रार्थना किया होने से त्र्रानन्दशब्दके वाच्य मायाविशिष्ट चतन्य- रूप, तन्तर्यामी को बह्म है, ऐसा जानके उपाधि विशिष्ट को अन्य त्र्प्रविशिष्टकी स्वरूपताके संभवसे कारणभाव करके उपल- क्षित शुद्ध आानन्द को ब्रह्म है, इसप्रकार जानता हुआ्रप्र ] इस प्रकार भृगुऋषि जो है, सो तप करके शुद्ध चित्तवालाहुनप्र प्रा- खादिकों विषे सम्पूरपने करके ब्रह्म के लक्षणको देखता हुआ्र्प्रा। पंपररु कुछ काल उपरान्त तिस विषे प्रवेश करके, तपत्यन्त आ्रन्तर आ्प्रानन्दरूप ब्रह्म को तपकरके अर्थात् तपरूप साधन करके ही जानताहुआ। ताते ब्रह्मके जिज्ञासु पुरुषकरके वाह्य अरु भीतर के करंणों की।अर्थात् इन्द्रिय अरु मन त्र्प्राष्िकोंकी'। एकाग्रता- रूप परम तपरूप।'सर्वोत्तम'। साधन अ्रनुष्ठान करने को योग्यहै, · यंह इससमस्तप्रकरणंका अर्थ।'अभिप्राय'।है। तरव पिता पुत्र की आपाख्यायिकाकों त्यागिके श्रुति अपने वचनों करके आप्राख्या- यिकासे कथन किये अर्थको कहे है।"सैषाभार्गशीवारुणी विद्या, परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता, सय एवं वेद, प्रतितिष्ठति, त्रन्नवान- न्नादो भवति, महान् भवति, प्रजया पशुंभिर्न्रहमवर्च्चसन। महान् कीर्त्या"। सो यह, भार्गवी वारुणी विद्या, परम व्योम विषे, स्थितहुंई है; जो ऐसे जानताहै, सो स्थित होताहै, तन्नवान् होता है, अन्राद होताहै प्रजाकरके पशुकरके ब्रह्मवर्चसकरके महान् होताहै, कीर्त्तिकरके महान् होताहै, अर्थात् सो यह भृगुऋषि ने ज्ञातकरी ताते भार्गवी, इरु वरुणऋािने कथनकरी ताते वारुणी विद्या, सो अन्नमयरूप आ्रत्मासे प्रवृत्त हुई परमव्योम हृदया- काशगत। 'बुद्धिरूंपा'। गुहा बिषे परमानन्दरूप ्र्प्रद्वैतविषे स्थित कहिये समाप्त हुईहै। जो अन्य जिज्ञासु भी उक्कप्रकार तपरूप

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १७५ साधन करके ही इसही क्रमसे तिन अन्नमयादिक आरात्माविषे प्रवेशहोयके आ्र्रानन्दरूप त्रह्म को जानताहै, सो इसप्रकार विद्याकी स्थितिसे आ्र्प्रानन्दरूप परव्रह्म विषेस्थित होताहै, अर्थात् ब्रह्मही होताहै।। इसप्रकार तिसको अटष्ट फलकी प्राप्ति कहके, अरबदृष फल कहते हैं॥। [ यहां मूल श्रुतिविषे अ्रन्नकी वाहुल्यतारूप वि- शेषण सुनानहीं, तब तिसको कैसे रखतेहीं, यह आाशंका करके कहते हैं, यहां यह अर्थ है कि, यहां मूल श्रति बिषे सामान्यमात्र त्रन्नके कहे हुये श्वान सूकरादिकोंको भी शरीरकी स्थित्यथ प्रांप हुये भन्नकरके।"तपन्नवान् भवति"। अन्रवाला होताहै,। इस वि- द्वान्के विशेपणसे विद्याका फल नहीं कहा ऐसा होवेगा, एतदर्थ तिसके घलसे यहां तन्नकी बाहुल्यतारूप विशेषण धराहै] बहुत से अन्नवाला होताहै,। जिसकरके सामान्य रीतिसे तो सर्वजीव रपन्नवान् है, इसकरके सो विद्यासे।"विद्वान्का। विशेषण न होवेगा। एतदर्थ विद्वान् को ही बहुत से अन्नवाला कहा। ऋरु ऐसे तन्नकों जो भोगता है, ऐसा जो प्रदीप जठराग्निवाला ऋन्न का भोका तिसको तर्प्रन्नाद कहते हैं, सो होवे है।अपर्थात् इंस भार्गवी वारुणी विद्याका सम्यक जाननेवाला बहुत अन् (भाग्य सामग्री)अपरु भोगनेकी विशेष शककिकर के युक्त होताहै'। अरु पुत्रा- दिरूप प्रजा तपररु गो श्वाद्रि पशुंकर के, अरु शम दम ज्ञानादि निमित्तवाले ब्रह्मतेजरूप ब्रह्मवर्चस करके महानु। 'सर्व से त्र्प्र- घिक'। होवे है। ऋरु शुभाचरण करनस प्रख्यातिरूप कीतिकरक महान् होता है, अर्थात् तिनको साक्षात् अनुभव करताहै ॥६॥४॥ इति षष्टोऽनुवाकः॥ ६॥ ऋन्नं न निन्धात्। तद्व्रतम् प्राणा वाडनम्। शरी- रमन्नादम्। प्राए शररिं प्रतिष्ठितम्। शरीरेपायः प्रति ष्वितः तदेतदनमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति न्नवानन्नादो भवति।

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१७६ . तैत्तिरीयोपनिषद्। महान् भवति। प्रजया पशुभिर्व्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्त्या ।।७।४१।। इति संत्मोड़नुवाक:।। हें साम्य! [ दैवगति से प्रांतहुये निकृष्ट त्र्प्रन्न की भी निन्दा करनी नहीं, क्योंकि।"पद्योच्छिष्टमुतावरमित्युकत्वात्" आ्रज का पाक किया।'सघ'।-वा कल का पाककिया।'बासी अन्न भक्षए करना,। इसप्रकार-शास्त्रान्तर विपे कहा है ताते। अर्थात् जो कदापि प्रारब्धवशात् सद पाकहुआ्र त्रन्न न प्राप्तहोय तो प्रांसहुये बासी प्प्रन्नकों सक्षण करना परन्तु अंन्नकी निन्दा न करनी, परु यावत् सदसिंद्धकिया तन्नप्रासहोचे तावत्वासी अ्रन्न न खावे क्योंकि गीतास्मृति में एक प्रहरमात्र के भी वासी अ्रन्न को तामसअप्रन्नं वा भोजन कहा है'। यहां ब्रह्मवेत्तां को-जो उक्र नियमका कथन हैं. सो, सो साधक के अनुष्ठानार्थ।अरु निन्दाकें त्यागबिषे'। है] किवा जिससे द्वारभत ऋंन्ञकरके ब्रह्मका विज्ञान होता है ताते गुरुवत्।"तत्नं न निन्धात्, तद्वतम्"! 'न्नको निदाका विषय करना नहीं; सोवत है,।अर्थात् जैसे गुरु ब्रह्म की प्राप्तिका द्वार है तैसे अंन्न, भी विचारद्वारा ब्रह्मप्ासिका-द्वार है, ताते किसीप्रकार के.भी. त्रन्नकी निंदा करनी नहीं,'। इसप्रकार को ब्रह्मवेत्ताओ्र्रं. का वत कहिये नियम उपदेश। प्रतिज्ञा है। यहां वतक़ा जो उपदेश है सो अन्नकी स्तुत्यर्थ है वा।अ्रन्न की महिमा प्रकाशनार्थ है। अररु ऋरन्नको ब्रह्मज्ञानका उपायरूप होने से स्तुति की योग्यताहै।॥[ऐसे वाक्यार्थ के ज्ञानविषे लक्ष्यपदार्थ के अनुसंधानरूप मुख्य साधनको अपरु तिसके फलको समाप् करके, तरब विचारविषे असमंर्थ मन्द अधिकारी को तन्न अरु ऋपन्नाद ।-भोग्य अरु भोका' रूपसे प्रासादिकोंकी उपासनारूप गौण साधन को विधान करते हैं। यहां यह कथन किया होताहै कि उपासना भी फलकी इच्छासे अ्रनुष्ठान की हुई मन्द अधिकारी को बुद्धिद्वारा ब्रह्मज्ञानके अपर्थ उपकार करेंहै, पप्ररु.मुख्य।'उंत्तम'।

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १७७ अधिकारीको तो प्रपश्चके अपवादार्थ उपकार करेगी]। "प्रासो वाऽन्नम्, शरीरमन्नादम्, पराणे शरीरं प्रतिष्ठितिम्, शरीरेप्राणःप्रति- छ्वितः"।वा प्राण त्रन्नहै, शरीर अपन्नाद है, प्राणविषेशरीरस्थित है, शरीरविषे प्राणास्थितहै, अर्थात् वा प्राण अन्नहै, क्योंकि प्राणंका शरीर विपे त्रन्तरभाव है ताते, अर्थात् जो जिसके श्रन्तरहोताहै सो तिसका अन्न होताहै। ऋरु शरीरविषे प्राण स्थित होताहैं ताते प्राए त्रपन्नहैं तररु शरीर पर्प्रन्नाद (त्रन्नका भोक्ा) है। तैसेशरीरभी परपन्नं है, परु प्राणत्रन्नाद है क्योंकिशरीरकी स्थितिप्रासरूपनिमित्त वालीहे ताते;तरुजि सकर केपा राविषे शरीरस्थि तहै, अरु शरीरविषे प्रास स्थितहै, इसकरके यह दोनों शरीर अरु प्राण परस्पर त्न्न अरु अन्नादरूपहैं, शंरु जिसहेतुकर के परस्परविषे स्थितहैं तिसही करके तन्नहैं, अरु जिसकर के परस्परंकी स्थितिरूपहै तिसहीक- रके पन्नाद।भोका। है। एतदर्थ प्राण शरु शरीर ये दोनों प्रन्न

प्रतिष्टितं वेद प्रतितिष्टति अ्रन्नवानन्नादो भवति, महान् भवति, प्रजयापशुभिर्न्रहवर्चसेन, महान्कीर्त्यां"। सो यह अन्न त्रन्नविषे स्यितहै, जोयह श्रन्नविषेस्थित श्न्न को जानताहै सोतपरन्नञ्म्ारु् उ्र्प्रन्न्ा- दरूपसेही स्थितहोताहै, किंवा अ्न्नवान् शरु तन्नाद होताहै, चरु प्रजाकरके अरुपशुकरके त्रह्मवर्चस करके महान् होता है तरु कीर्तिकरके महान् होता है, अर्थात् सो यह त्न्न अन्नविषे स्थित है, अरु जो इसत्रन्नवषे स्थित अन्नको सम्यकप्रकार जानता है सो ञन्न अरु अन्नाद।अर्थात् भोग्यअरु.ओोका'। रूपसेही स्थित होताहै, अथवा अन्नवान्।'अर्थात् प्रन्नादि सर्वभोग्य सामग्री स- स्पन्न, अरु पन्नाद,। अरर्थात् भोगने के सामर्थ्य सम्पन्न सर्वभोगों का. भोका होताहै। अरु पुत्र पौन्नादि प्रजाकरके, अरु गो गजे ंंपरश्वादि पशुश्नोंकरके, शम दम समाधि आपरदि सांधननिमित्तक ब्ह्मते जकरके सर्वसे अधिक होता है। अरु पुत्र पशु ब्रंह्मवचेंस धर्म्मदनिादि निमित्तक ख्यातिरूप कीर्ति करके लोकिषे

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१७= तैत्तिरीयोपनिषद्। प्रख्यात होता है ॥७।४१ ।। इति,सप्तमोऽनुवाकः॥७॥ ऋपरथाष्टमोऽनुवाक:८.। अन्नं न परिचक्षीत। तद्दतम्। आपो वाऽन्म्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योति- व्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्न प्रतिष्ठितम्। स य ए- 4 तदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् वेद।प्रतितिष्ठति। त्रन्नवानन्नादो भवति। महान् भवति। प्रजया पशभिर्व्रह्मवर्चसेन। महान् कीर्तया ॥।८।४२। इत्यष्टमोऽनुवाकः ॥ हे सौम्य!।"अन्नं न परिचक्षीत, तद््तम्, तपोवाऽन्नम्, ज्यो- तिरन्नादः, तप्सु ज्योतिःप्रतिष्ठितम्, ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः, तदेतदन्नमन्नेप्रतिष्ठितम्"। अन्नको परित्यांग करे नहीं सो व्रतहै, वा जल तन्न है, ज्योति: त्र््रन्नाद है, जलविषे ज्योति: स्थित है ज्योतिःविषे जलस्थितहै, सो यह अननविषेस्थित अन्न है,,अर्थात् अन्नको परित्याग करे नहीं। अर्थात्जो कदापि अ्न्न निकृष्टभी होय तथापि उसका निरादर वा निन्दारूप त्याग करे नहीं, यह अन्नरूप ब्रह्मके ज्ञाता विद्वानोंका उद्देश (शिक्षा) रूप व्रत कहते हैं। यहां उक्र वतका जो उपदेशहै सो तन्नकी स्तुतिके अर्थ है। इपरु अन्न ऐसे शुभाशुभकी कल्पनासे तपपरित्यागकिया स्तुतिका विषय किया अरु महान् कियाहुआ होताहै। वा जल, इप्रन्नहै,रु ज्योति: कहिये तेज अन्नाद है।'अर्थात जल, भोग्यहैअरु तेज भोकाहै, यह लोकविषे प्रख्यात है'। जलविषे ज्योतिः स्थित है, ज्योति: विषेजल स्थित है। सो यह तपरन्नविषे स्थित अ्रन्नहै।।"स.य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद, प्रतितिष्ठि, अन्नवानन्नादो भवति, महान् भवति, प्रजया पशुशिब्रह्मवर्चसेन, महान् कीर्त्या"। जो इस अन्नबिषे स्थित अप्रन्न को जानता है, सो अन्न अरु अन्नादके रूपसे स्थित होताहै, अथवा अन्न ।'भोग्य'। वान् अरु व्न्नाद !'भोका' होता है। अरु/ 'पुन्नादि'।, प्रजाकरके, तरु।'गवाद्ि' पशु

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १७६ करके झरु ब्रह्मवर्ससकर के महान्।'सर्वविंषे प्रख्यातहोवेहै,अरुदा- नादि सद्धर्माचरणके निमित्तसे लोकविषे सर्वसे अ्रप्रधिक कीर्ति ।'यश ' वाला होवे है॥। =।४२॥ इति त्रष्टमोऽनुवाकः॥८॥ अपन्नं बहु कुर्वीत। तद्ूतम्। प्थिवी वाडन्नम् । प्राकाशोऽन्नादः। पथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः। श्र्र्रा- काशे प्टथिवी प्रतिष्ठिता। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्ं। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् वेद। प्रतितिष्ठति। अर्- न्नवानन्नादो भवति। महान् भवति। प्रजया पशुभिं- व्रह्मवर्चसेन। महान्की्र्या।।६।४३।।इति नवमोऽनुवाकः। हे सौम्य!।"अन्नं वहु कुर्बीत, तद्ूतम्, पृथिवी वाडन्रम्,पप्रा- काशोऽन्नाद:, पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः, प्राकाशे पृथिवी प्र- तिष्ठिता, तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितिम्"। :अ्न्रको बहुत करना, सो -व्रतहै, वा पृथिवी तरपन्नहै, त्र्राकाश परप्न्नादहै, प्ृथिवी विषे श्राकाश स्थितहै, त्रांकाश विषे पृथिवी स्थितहै, सो यह त्रन्न त्रन्नविषे स्थितहै।, अर्थात् त्रन्नको बहुत करना, सो व्रत कहिये उपदेश करतेहैं। अर्थात् जल तरपररु तेजके अन्न इरु प्रन्नाद गुशावानूपनेकरके उपासककात्र्प्रन्नकाबहुतकरनाव्तहै। वा पृथिवीत्रप्रन्नहै अरुप्पप्राकाश पन्नादहै। पृथिवी विषेश्नकाशस्थित है। आकाशबिषे पृथिवीस्थित है। सो यह अप्रन्न त्र्प्रन्नविषे स्थितहै।"सयएतदन्नमन्नेप्रतिष्ठितंवेद, प्रतितिप्ठति, त्ररन्नवानन्नादो भवति, महान् भवति, प्रजयापशुभि- ब्रह्मव र्चसेन, नहान् कीर्त्या"। 'जो इस त्रन्नविषे स्थित त्रन्रन को जानता है, सो तन्न अप्ररु अ्र्प्रन्नादरूपसे।'भोग्य भोक्राके रूपसे'। स्थित होता है वा अन्नवान्।'भोग्य सामग्री करके सम्पन्न'। तरु अन्नाद।'भोगनेकी शक्कि सम्पन्न'। होताहै। अरु प्रजाकरके, पशु करके, ब्रह्मवर्चस करके महान्।'सर्वसे त्रप्रधिक'। होवेहै, शररु शु- भगुोंके निमिन्तसे यशकरके लोकविषे महान्।'त्ति प्रख्यात्'। होवे है, ॥।६।४३॥ इति नवमोऽनुवाकः ॥ ६ ॥

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१८.० तैत्तिरीयोपनिषद्। • न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद्रतम्। तस्मा- द्यया कया च विधया वह्नन्नं प्राप्यात्। नराध्यस्मा

डस्मा ऋंन्नथ राध्यते। एतदा अरन्ततोऽस्मा अ्रन्नथ राध्यते ॥४४ ॥ ': हे सौल्य!।"नकञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत, तद्रतम्, तक्मा- घया कया च विधया वहननं प्राप्तुयात्, अराध्यस्सा अ्न्नमित्याच- क्षते" निवासार्थ, किसीको भी निवारणं करना नहीं, सोन्नत है, ताते येनकेन प्रकारसे बहुत अ्न्नको प्रातहोना, इसके अ्पर्थ नन्न सिद्ध है ऐसा कहते हैं; अर्थात् तैसे पृथिवी विषे त्राकाशके उपासक का निवास करने विषे किसी को भी निवारण, करना नहीं, सोव्रत।'प्रतिज्ञा' है। अर्थात् त्राकाश द्वारा ग्रह्मका उपा- सक निवासार्थ अपने स्थानपर छाये पपभ्यागतको निवास करने में निवारण (निषेध) करते नहीं क्योंकि अपने स्थानपर आाये पप्रभ्यागतको निवास देना ऐसा उनका प्रतिज्ञारूप व्रतहै ताते, परु अ इस सांपतका में बहुधा ऐसा देखने में या है कि जो किसी धनवान् गृहस्थके स्थानपर रात्रिकों वा सायंकाल को मार्गचलनेसे श्रमितहुआ कोई साधुन्रभ्यागत आायके अपने एकरात्रिमात्र निवासार्थ स्थानकी याचनाकरताहै, अरु उस, गृह- स्थके यहां आरामादि स्थानभी हैं तथापि उसः आये अभ्यागत को अपने स्थानके विषयसें राजकीयपुरुषों का वा चोरादिफों का अय देखाय, अपने स्थानपर निवासकरने का उस अरभ्यागतको निषेधकरते हैं, अरु जो कदापि/उस अभ्यागतके प्रारब्ध भोगसे उस समय दैवप्रेरित वर्षावातादिक भी दुःखदायी होय, तथापि निर्दयी अविवेकी अधर्मी महाकृपण वो गृहस्थ उस निवासार्थी को अपने स्थानपर निवासमात्रभी देते नहीं तब अन्नदेने का

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ी। १६१ तो प्रसंगही कयाहै'।॥ तरु तप्रभ्यागतादिकों को निवास के दि येहुये भोजनका देनाभी अवश्य योग्यहीहै, ताते येनकेनप्रकार से ।अपर्थात् जैसे वनै तैसे त्रन्न को प्राप्त। संग्रह'। करना। अरुं ञ्र- न्नवाले विद्वान्। अप्र्थात् जिसके पास त्र्प्रन्नादिक धनभीहै, अरु ञप्रभ्यागत तरप्रतिथिको अप्रन्ननिवासादि देने के पुएयको अपररुन देने के पापको सम्यक् प्रकार जानता है।। अन्नके अर्थी अरभ्यागत.के.शर्थ ।'अर्थात् जिससे किसीभी प्रकार, का सम्बन्ध वा परिचय न होथ शरु वो अपने स्थानपर निवासार्थी वा अन्नार्थी वा उभयार्थी होके आायाहोय तिसकों अभ्यागत कहते हैं'। इसकेलिये अन्नसिद्धहै ऐसाउदार वचन कहते हैं, अन्न नहीं है ऐसा।'कपरा अरु हज्ञातः पनेका'।वचन, बोलते नहीं (अन्न का निवारएकरते, नहीं) तिससे बंहुत तन्नका संग्रह करना, इसप्रकार पूर्वले पदसे सम्बन्धहै। प्रवर्श्मन्नदानकामाहात्म्य कहतेहैं।"एतद्रमुखतो नराध्म्सु- खतोऽस्माअन्नं राध्यतें, एतद्वै मध्यतोऽननuराद्टम्,मध्यतोड़स्मा परन्नथराध्यते"। इसप्रसिद्धसिद्धान्नको मुखसेदेताहै, इंसकेञ्प्रथं पन्न सिद्ध होताहै, अरु, इस प्रसिद्ध सिद्ध अन्न को मध्यसे देता है, इसके अर्थ मध्यसे अ्न्न सिद्ध होताहै; अर्थात् जिसकाल में छररु जिसभावसे अन्न दान करताहै, तिसही काल में अरु.तिसही भाव से वोभी अन्न पावताहै।।प्र०। कैसे पावता है।।उ०।। इस ।लोकविषे'। प्रसिद्ध।तंदुल (चावल.) दाल, मधुकरी (रोटी) तप्रादिक'।सिद्धहुये। 'पाककिये।अन्नकोमुखसे॥। अर्थात् मुखकहि- ये मुख्य, शरीरकी किशोरादि सविवेक प्रथमावस्थाकरके वा मुख्य जे श्रंद्धा तिस श्रद्धावृत्तिकरके, अरथात् बृहदारएयकी अ्षति प्रसाख से मनुष्यों के परम कल्यांगार्थ एक दानदेनीरूप धर्म्महीः मुख्य है, छरु।"त्राशाप्रतीक्षे सङ्गतथं. सनृताञ्चेष्टापूर्तेपुत्रपशुथंशच सर्वान, एवृंड्के पुरुषस्याल्पमघसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्म- सो गहे" इत्यादि प्रमासे जिस अल्पज्ञ अविद्दान् पुरुषके गृह आाया अभ्यागत अतिथि विश्राम अन्नादिकों से सत्कार पावता

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तैत्तिरीयोपनिषद्। नहीं तिसके धर्म कर्म पुत्र पशु आदिक सर्व नष्ट होते हैं, ताते अपरभ्यागतको श्रद्धा सत्कारपूर्वक सिद्धान्न देना योग्यहै ऐसा वि- चारके, पूजनादिसंत्कारपूर्वक जोअ्प्प्रन्रन्रार्थीत्र्भ्यागतकोत्र्प्रन्नदेताहै, इसप्रकार जो अभ्यागतादिकों को सत्कारपूर्वक अन्नादिकों का देनाहै सो मुख्य वृत्ति से देना है। अरु जो कहा कि प्रथमा- वस्था बिषे देना सो, मुख्य देनाहै, तिसका आशय यह है कि शरीर की. प्रथमवय बालकिशोरादि तप्रवस्था विषे जो त्रप्रतिथि पभ्यागतों की सेवारूप धर्मबिषे अरु दानादि सद्धर्मविषे श्रद्धा- पूर्वक रुचिका होना है सो पूर्बले उत्तमोत्तस संस्कारोंसे है, त्रपररतु उस प्रथमवयविषे जो सद्धर्म में श्रद्धाका होनाहै सो पूर्व जन्मकें धर्मात्मापने का बोधक पप्रसाधारण लक्षण है, तप्ररु प्रथमवयविषे उत्पन्न हुई सद्धर्म विषयक श्रद्धा सो उसपुरुषके धर्मात्मा होनेमें मुख्य हेतुहैं, जैसे नचिकेताको प्रथमवयविपेही पिताके हितरूप धर्म्म में श्रद्धा उत्पन्न हुई अरु सोई उसके परमंधार्मिक होनेके प्रकाशार्थ मुख्यहेतु हुई, ताते प्रथम वयचिषे अरु श्रद्धा संत्कारा- दिवृत्तिपूर्वक जो दानादि होते हैं सो , मुख्य, ऐसा कहते हैं'।॥ देताहै। प्र० ॥ तिस दाताको क्या फल होताहै'।।उ०॥ मुखसे ।अर्थात् उक्रप्रकार'। प्रथमवयविषे वा सुख्य (श्रद्धादि) वृत्ति से।तरप्रभ्यागतादिकों को त्ररन्नादि दानदेता है'। ऐसे अ्न्नदाता के अर्थ अन्न सिद्ध होताहै, अर्थात् जैसा। जिसशवस्थामेंतरु जिस वृत्तिसेः। दियाहै तैसाही।' तिस वय शरु तिस वृत्तिसे उस को भी:इसलोक व्रा परलोक में'। प्राप्त होता है।।।अर्थात् जो i

पुरुष अपनी प्रंथमवयविषेःश्रद्धा सत्कारपूर्वक अन्नादि देते हैं, तिनके उस कर्म्म की उसही वयमें लोकविषे प्रख्याति होने से उसकी भी उसही वयविषे श्रद्धा सत्कारादि मुख्य वृत्तिसे ही अन्नादिक प्राप्त होता है। अपरुं तिसकर के ही लोकबिषे प्रसिद्ध है कि जो जैसा करता है सो तैसा पांवता है, अरु इस उंक्विचा- रार्थ को आागे भी लगाय लेना'।। इसप्रकारही, इस प्रसिद्ध

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। सिद्धान्नको मध्यसे। अर्थात् मध्यवयसे वा मध्यम वृत्तिसे'। अभ्यागतों के अर्थ देताहै। तैसेही इस अन्नदाताके अर्थ.मध्यसे ।अर्थात् मध्यव्रयविषे वा मध्यमव्ृत्तिसे'। श्रन्न सिद्धहोता है। ।'अर्थात् जो पुरुष मध्यम भावसे देता है तिसकोभी मध्यमंभाव सेही प्राप्तहोताहै'।।तरु तैसही। "एतद्वा अन्ततोऽन्नथ राद्मू, अन्ततोऽस्मात्न्नथराध्यते"। इसप्रसिद्धसिद्धान्नको तरन्तसे देता है, इसके त्रपर्थ त्रपरन्तसे त्र्प्रन्नसिद्ध होताहै, अरथात् तैसेही इसप्र- सिद्ध सिद्ध्प्प्रन्नको त्रप्रन्तसे। अप्रर्थात् अ्रप्रन्तके वयविषे वा त्र्प्रधम वृत्तिसे। त्रभ्यागतके तर्थ देताहै। तैसे ही इस अन्नदाताके अर्थ अन्तसे। त्र्प्रन्तकीवयविपेतातररघमवृत्तिसे'त्र्न्नसिद्ध होताहै।।४४।। य एवं वेद। क्षेम इति वाचि। योगक्षेम इति प्राण- पानयोः। कम्मेति हस्तयोः। गतिरिति पादयो। वि मुक्किरिति पायौ। इति मानुषीः समाज्ञाः॥ अथ दैवीः॥ तृप्तिरिति उष्टै। वलमिति विद्युति॥४५।। हे सौम्य!।"य एवं वेद, क्षेम इति वाचि, योगक्षम इति प्रा- सापानयोः" [जो इसप्रकार जानता है, क्षेम है ऐसे वाणीबिषे, योग श्र क्षेम हैं इसप्रकार प्राए अरु अपान बिषे अर्थात् जो ऐसे उक्रप्रकारके अन्नके माहात्म्यको जानताहै, सो उक्र प्रकारके अन्नदानके फलको प्राप्त होता है।। तररव ब्रह्मकी उपासना का प्रकार कहते हैं। ग्रहणा किये वा प्रासहुये वस्तुका जो रक्षणा ति सको क्षेम कहते हैं, सो क्षेम ऐसे वाणी बिषे, अर्थात् ब्रह्म वासी विषे क्षेमरूपसे स्थित है, इसप्रकार उपासना करने को योग्य है।।'अपर्थात्त्र््राचार्यसग्रहणाकियावाप्पासहुई विद्यारूपवस्तु सो यद्यपि संस्काररूप से अन्त:कररबिषे स्थित है. अर स्मृति होना भी अन्त:करएका धर्म है, परन्तु इस प्रसंगविषे आ्चारयसे प्राप्तहुई विद्या जिह्नाग्होने सों वाणीविषेही स्थित माननीहै, अरु तिसकी जो सर्वकाल यथार्थ स्मृतिका रहनाहै सोई उसकी क्षेम-

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१८४ तैत्तिरीयोपनिषद्। रूप रक्षाहै तपररु रक्षणा करता चैतन्यहोता है तपरु चैतन्य आात्मा- ही।"यो वाचि तिष्टन्वाचोऽन्तरोयम्"। इस श्रुतिघ्रमाससे, वासी. विषे स्थितहै, ताते वासीबिपे ज्रह्म क्षेमरूपसे उपासना करने को योग्यहै'।।। तरु त्रप्रग्रहण वस्तुका ग्रहण किंवा अप्राप्त वस्तु की प्रात्तिको योग, शपरु प्राप्तवस्तु की रक्षा क्षेम, सो योगे क्षेमरूप है, सो प्रास अपानविषे है, यद्यपि वो योग क्षेम चलवान् हुये प्राए तप्रपानबिषेही होते हैं।'क्योंकि सर्वका जीवनरूप योग क्षेम प्राण तप्रपानकेही त्राश्रय होते हैं तातें।। तथापि वे योग क्षेम प्राए छप्रपानरूप निमित्तवाले ही नहीं हैं, किन्तु ब्रह्मरूप निमित्तवालेही हैं।।6 क्योंकि प्रास त्रपानका योग क्षेम भी किसी चैतन्य ब्रह्म के ही आश्रय है। तथा च।"न प्रागेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन इतरेण तु जीवन्ति"। यह त्रन्य श्रुतिका प्रमाण भी है। तपररु।"यः प्राणे तिष्ठन्प्रादन्तरोयम्"। इस श्रुतिने प्राएके अ्न्तर अ्र्प्रन्त- र्यामीरूपसे चैतन्य ब्रह्मकोही कहा है'। अतएव ग्रह्म योग क्षेम- रूपसे प्राएं अपरु उप्रपानविषे स्थितहै, ऐसे जानके उपासना क- रनेकों योग्यहै। इसप्रंकार पिछले अरन्य।' ज्ञानेन्द्रिंयरूप '। वस्तु विषे भी तिस तिस।'दर्शन श्रवणादि सामर्थ्य'। स्वरूपसे त्रल्लही उपासना के योगहै।"कर्म्मेति हस्तयो, गतिरिति पादयोः,वि- सुक्िरिति पायौ।। इतिमानुषी: समाज्ञा:"। ६ कर्म्स है ऐसे हस्त विषे, गतिरूपहै ऐसे पादों विषे, विमुक्किरूप है ऐसे पायु (गुद) विषे,।'ब्रह्म उंपासना करने के योग्यहै'। ऐसी मानुषी समाज्ञाहै, अर्थात् कर्म है इसप्रकार हस्तविषे, अर्थात् कर्मोको त्रह्म करके निर्वाह करनेकी योग्यता होनेसे दोनों हाथोविषे कर्मरूपसे ब्रह्म स्थितहै।।' अर्थात् हाथोंविषे जो क्रियाशक्ि है सो सर्वशक्रिमान् चैतन्य ब्रह्मकीही है क्योंकि हस्तादिक कर्मेन्द्रिय जड़हैं ताते उन जड़ोविषे कर्तृत्वादि कोई भी शक्ति उनकी नहीं इपरु जहां शक्कि होती है तहां उस शक्रिका आश्रय शक्तिमान् भी अवश्य होताहै, ताते कर्मरूपसे हाथोंबिषे ब्रह्म स्थितहै'।। इसप्रकार उपासना

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १६५ करनेको योग्यहै। तरु गति कहिये गमनरूप हैं इसप्रकार पादों विष, ब्रह्मउपासना करनेको, योग्यहै। विमुक्ति।'मलका त्याग वा मृत्यु '। रूपसे है, इसप्रकार पायु (गुदेन्द्रिय) बिषे, ब्रह्म उपासना करनेकें योग्य है।।अर्थात् जैस हाथोबिषे कर्मरूपस ब्रह्मके त्र- स्तित्व में कल्पितविशेषार्थ है तैसेही पाद अरु पायु इन्द्रिरयोविषेभी अर्थकी योजना करके तिनके तिनके कर्मरूपसे ब्रह्म को जानना।।। यंह मनुष्योंविषे होनेवाली ऐसी अध्यात्मिकरूप मानुषी समाज्ञा कहिये उपासना है।"अथ दैवीः" अव दैवी, अर्थात् अब देवों बिषे होनेवाली ऐसी देवी, समाज्ञा कहते हैं।i"तृप्तिरितिघृष्टौ, वलमिति, विद्युति। तृतिरूपहै ऐसे वृष्टिबिष, बलरुपहै ऐसे विद्युंतबिषे, अर्थात् तृपिरूपहै इसप्रकार वृष्टिविषे, क्योंकि वृष्टि को अन्नादिकद्वारा तृप्तिका हे तुपनाहै ताते ब्रह्मही तृंत्तिरूपसे वृक्टि विषे स्थितहै, इसप्रकार जानक उपासना करने को योग्यहै।। तथा च।"यदा त्वमभिवर्षस्यथमा: प्राण तप्रजाः, आानन्दरूप स्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति"। यह अन्य श्रुतिके अर्थकीभी योजना होती है।। अरु इसप्रकार अन्यों बिष तिस तिस रूपसे ब्रह्मही उपासना करेने को योग्यहै॥ ।अर्थात् जिस जिस देवता विषे जो जो दैवी शक्रि है सो सो उस सवशक्रिमान् परमात्मा कीही है, अरु उसही ने आाकाशादि भूत सजक तिसंविष आापही प्रवेंश कर के अपनी पृथक २ विशेष शक्िको आपही अनुभव करता है, जैस सूर्य अपनी किरणोंस जल उत्पन्न करता है,तिस विषे प्रंतिबिम्बरूंपसे प्रवेशभी आरप्रपही करता है, अरु तिस प्रंतिबिम्ब द्वारा जलबिषे आइ.जो अपनी प्रकाशरूपा विशेषशकति तिसको अनुभव भी आरपही करताहै तैसे,। ताते सवविषे सर्वेशक्किमान् एंकबह्मही उपासना करने के योग्यहै'।। तैसे बल ऐसे।'चलरूप से बिजली बिष हैं॥ ४५॥ यश इति पशुष। ज्योतिरिति नक्षत्रेषु। प्रजातिर-

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तैप्तिरीयोपनिषद्। मृतमानन्द इत्युपस्थे। सर्वमित्याकाशे। तत्प्रतिष्ठेत्यु- -पासीत। प्रतिष्ठावान् भवति। तन्मह इत्युपासीत महान् भवति। तन्मन इत्युपासीत। मानवान् भवति॥४६॥ हे सौम्य!।"' यश इति पशुषु, ज्योतिरिति नक्षत्रेषु, प्रजातिर- ृतमानन्द इत्युपस्थे, सर्वमित्याकाशे, तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत, प्रतिष्ठावान् भवति"।यश ऐसे पशुविषे, ज्योति ऐसे नक्षत्रोविषे, अ्मृत अपपरत् आ्रानन्द उपस्थविषे, स्व आाकाशविषे है ऐसे, सो सर्वकी प्रतिश्ठाहै ऐसे उपासनाकरना, प्रतिष्ठावान् होताहै: अर्थात् यश इसप्रकार यशरूप से पशुर्भोविषे, ऋरु ज्योति इसप्रकार नक्षत्रोंविषे ज्योतिरूपसे। 'अर्थात्।"यश्चन्द्रतारकेतिठठन्"।'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति"।।"यश्चन्द्रमसियश्चाग्नी तत्तेजो विद्धि मामकम्"। इत्यादि श्षुति स्मृतियों के प्रमाणसे। शरु प्रजापति शरु पुत्रसे पितृकशकी निघृत्तिद्वारा अमरभावकी प्राप्तिरूप, भ मृत औौभानन्द कहिये सुख, ऐसे उपस्थइन्द्रियविषे, अर्थात्,प्र- नापतित्व, असृत, सुख यह सर्व उपस्थइन्द्रियरूप निमित्तवाले हैं, ताते ब्रह्मही इनरूपसे उपस्थविषे स्थितहै, इसप्रकार।जान के'। उपासना करने को योग्य है। अरु जिसकरके सर्व आाकाश विषे स्थितहै, इसकरकेही, जो सर्व आकाशविषे है सो ब्रह्मही है, इसंप्रकार।'जानके'। उपासना करनी योग्यहै। अरु जिसक रके सो आाकाश व्रह्मही है, इसही से वो सर्वकी प्रतिष्ठा (भा- धार) है इसप्रकार।' जानके'। उपासना करना। तिस प्रतिष्ठा- रूप गुणकी उपासना से प्रतिष्ठावान् होते हैं।।'अर्थात् भा काश केवलअ्रवकाश रूपहै ताते यावत् समस्त जगत् आाकाशबिषे भासते हैं सोआका शविषे नहीं, किन्तु। "य आकशे तिष्ठन्"।"आा- काशशरीरम् न्रह्म "। इत्यादि श्रुतियोंके प्रमाशसे जैसे शरीरी के आश्रय शरीर अरु तदाश्रित अवयवादि सर्व होता है, आकाश स- मेत सर्व ब्रह्म से उपजाहै। अरु तिस करके आकर्षितहुआतिसही

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। विषे स्थितहै, ताते जो भाकाशचिषे है सो सर्व त्रकाशसहित ब्रह्म ही है अरु सो सर्व ब्रह्म के आकर्षण से स्थित है ताते सो सर्व की प्रतिष्ठाका ही ये आधार है।"सर्वाधारो"। इति श्रुतेः ॥'वा' ।सौम्येमाः स्व्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः"। इत्यादि श्रुंति। जैसे पृथिवीसे उत्पन्न हुये घटसरावादिक पृथिवी रूपहैं, अरु. प्ृथिवी के आश्रयहैं ताते पृथिवी उनकी प्रतिष्ठाहै, तैसेही ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ सर्व ब्रह्मरूपही है अरु सर्व ब्रह्मकेही आश्रयहै ताते ब्रह्म सर्वका आाधारभूतहोने से सर्वका आ्रप्राधाररूप प्रतिष्ठा है, इसप्रकार प्रतिष्ठारूप गुविशिष्ट त्रझ्मको उपासताहै सो प्रति- ध्वान् होताहै। इसप्रकार पूर्व कहि उपासना बिषे भी जो जि. सके आधीन फलहै सो ब्रह्मही है, ताते तिसकी उपासनासे तिस वालाही होताहै।।'।"ये यथा माम्प्रपद्यन्ते तास्तथैव भजाम्य- हम्"।'। इसप्रकार जानना क्योंकि।"तं यथा यथोपासते तदेव भवतीति"। तिसको जैसे जैसे उपासते हैं सोई (फल) होताहै। यहअन्यश्रुतिकाभी प्रमाणहै।।"तन्महइत्युपासीत, महान्भवति,। तन्मन इत्युपासीत मानवान् भवति"।६सो महत् है ऐसे उपा- सना करना, महान् होताहै, सो मन ऐसे उपासना करना, मा- नवान् होताहै; अर्थात् सो।ब्रह्म'। महत्, पनेरूप, गुरावान्, है इसप्रकार जानके उसकी उपासना करने से महान् होताहै, अरु सो।'ब्रह्म'। मनरूप है ऐसा जानके उसकी उपासना करते हैं सो मानवान् कहिये मननविषे समर्थ होताहै॥ ४६ ॥ तन्नमइत्युपासीत। नम्यन्तेडस्मै कामाः। तद्ब्रह्मेत्युपा- सीत।व्रंह्मवान् भवति। तद्ब्रह्मणःपरिमर इत्युपासीत। पय्येरा म्रियन्ते द्विषन्तः। सपतनाः। परि येडप्रिया आ्रा- तृव्या:सयश्चायं पुरुषे।यश्चासावादित्ये।स एक:।।४७।। हे सौम्य!।"तन्नम इत्युपासीत, नम्यन्तेSसमै कामाः, तद्ब्रह्मे- स्युपासीत, ब्रह्मवान् भवति तद्बह्मणःपरिमर -इस्युपासीत,।"Cसो

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तैत्तिरीयोपनिषद् । नमहैः ऐसे उपासना करना, इसके अर्थ काम नमते हैं, सो ब्रह्मं है ऐसे उपासना करना, ब्रह्मवान् होवे है, सो ब्रह्मका परिमर है ऐसे उपासनाकरना,अर्थात् सो नम 'कहिये नमनरूप गुणवाला है' इसप्रकार।' जानके'। उपासनाकरना, तिसकरके इस उपासक के अर्थ भोगने योग्य विषयरूप कामनमते।'प्रासहोते रहते' हैं। रु सो ब्रह्म ।' तर्थात् सर्व से वड़ा अत्यन्तघन परिपूर्ण'। है ऐसा ।जानके'। उपासना करते हैं'।सोउपासक ब्रह्मवांन्।'तिसव्रह्मके गुरावाला, होता है'।'अर्थात् ब्रह्म के गुणोंवाला तवहोनेगा,जवत्रह्मरूप होवेगा, अतएव ब्रह्मका उपासक ब्रह्म रूप हुआ तिसगुणवानूहोत, है.'।। अरु सो ब्रह्मका परिमर, कहिये वायु, है इसप्रकार। जानके उपासनाकरना। ञर्थात् जिसविषे, विजली, वर्षा, चन्द्रमा, सूर्य, ञरुं अग्नि, यह पांच देवता मरते हैं, ऐसा जो वायु सो।"अतो वायुं: परिमर"। याते वायु परिमरहै,। इस अन्य श्रुतिनिषे प्रसि- द्है। ताते वायुको ब्रह्मका परिमरकहते हैं, सो यहही वायु जि- सकरके प्रप्राकाश से अनन्य है इसी से आरकाश ब्रह्म का परिमरहै। तिस वायुरूप त्रप्राकाशको ब्रह्मका परिमर है, इसप्कारं। जानके' उपासना करना॥ इसप्रकार ज़ाननेवाले उपासकके प्रति स्पर्द्धा करनेवाले द्वेष करते हुये भी जिससे शत्रु होते हैं, इसहीसे तिनको द्वेषकरनेवाले शत्रुहैं, इसप्रकारका विशेषणदेतेहैं।"पर्य्येम्रियन्ते द्विषन्तः"। द्वेषकरनेवाले सर्वत्ररोरसे मरते हैं? अर्थात् सो इसके प्रति द्वेषकरनेवाले शत्रुसर्वत्रोरसे मरतेहैं कहिये प्राणोंकोत्यागते हैं। किंवा।"सपलाः परियेSप्रिया भ्रातृव्याः"। 'जो अप्रियम्राता के पुत्रहैं, वे सर्व ओोरसे मरते हैं, अर्थात् जो इस। 'उपासक'के पप्रियम्राताके पुत्रहैं सो अद्वेषकरनेवाले हुयेभी सर्व ओोरसे मरते हैं। इसप्रकार [ऐसे मन्दाधिकारीके विषय उंपासनाके समूहको इंप्रध्यारोप पपरवस्थासे.उपदेशकरके, अरबं अपवाददृष्टिके अ्रभिप्रा- :यसे कहते हैं ]।"प्राणोवाऽन्रम्, शरीरमन्नादम"'। वा. प्राष् अन्नहै अरु शरीर त्न्नाद है,। इससे आरंभ करके आ्राकाशपर्यन्त कार्यों

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १८६ काही अन्न अरु अन्नादपना कहा।। प्र० ॥ यह कहां तिसकरके क्या सिद्ध हुआ।। उ०॥ तिसकर के यह सिद्धहुआ कि भोज्य अरु भोक्ता का किया जो संसार है सो कार्यको विषयकरनेवालाही है ।'अर्थात यह सर्व भोग्य भोकारूप संसार है सो आप कार्यरूप होनेसे कार्यपनेकोही लखावनेवाला है। आ्रात्माविषे तो नहीं है; परन्तु आत्माबिपे।' तिसका। भन्तिसे तारोप करते हैं। ननु, [भोकापने आर्प्रबिरूप जो संसारहै, सो कार्यकों विषयकरनेवाला है, ऐसा वर्णन किया है, तहां जीवको, उपाधिरंहित (स्वरूपसे) सं. सारीपना देखाहै तिसकोभी कार्यरूप होनेसे। इस वैष्यवोंके मत को प्रकटकरके दूषणदेते हैं] आरत्माभी परमात्माका कार्यहै, ताते इसको संसारयुकहै, सो कथन वनेनहीं क्योंकि असंसारीकेही प्रवेशकी क्षुतिहै ताते। अरुं।" तत्सृष्टा तदेवानुप्राविशत्"।ति- सको सृजके तिसहीके अर्थ पुनः प्रवेश करताहुआ,। इसप्रकार श्रुतिविषे आ्रराकाशादिकों के कारणं अससारी परमात्माकाही का: योविषेप्रवेशकहाहै। अरु'।सोई सुनतेहैं ताते कार्योविषे प्रवे० शको पाया जो जीव रूप आत्मा है सो परमात्मारूपही असंसारी है। अरु।"संष्टानुप्राविशदिति"। सजके पुनः प्रवेशकरताहुत्ां,। इसप्रकार सृष्टि अरुं प्रवेशके समान कतापनके सभवसे, जब सृष्टि शरु प्रवेश।'उभय'। रूप क्रियाका एककत्ता है, ताते, सजि के प्रवेशकरताहुआ्र, ऐसाकहना युकहै। उरु जो कहे, प्रवेशकरने वालेको तो अ्रन्नभावकी प्रापतिहोती है, सो कथन बने नहीं, क्योंकि प्रवेशको अन्यअर्थपनेकर के पूर्व षष्टमन्त्रविषे निषेधकियाहै ताते,। शरु जोकहे कि [छांदोग्यकी श्रुतिके अनुसारसेविकार (कार्य.) के आकार वाले स्वरूपसे परमात्माक प्रवेशकी आशंका करके तहां वाक्यशेषके विरोधको कहेहैं]।।"त्रनन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य" इस जीवरूपसे प्रवेशकरताहुआः। इस विशेषश्षतिसे अन्यधर्मसे प्रवेश हुआ्ा है, सोभी बनेनहीं, क्योंकि।",तत्वरमसि" सो तूहै,। इसप्रकार पुनः तिस परमांत्मभावकाही कथनहै ताते,। अरु जो

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१६० तैत्तिरीयोपनिषद्। [भ्रान्तिसे देहादिभावको प्राप्तहुये ब्रह्मसे व्यतिरिक्त जीवको ही रागके निषेधार्थ परस्त्रीबिषे माताकी वुद्धिवत् संसारीपनेके निषे- धार्थ त्रह्मदृष्टि छान्दोग्यश्जुतिविषे उपदेशकियाहै, एतदर्थ "तत्व- मसि"सो तूहै,। इस उपदेशसे अन्य तर्थवाला होनेसे, जीव को पारमार्थिक असंसारी ब्रह्मपना नहींहै। यह आशंका करके तिसकों दूषए देतेहैं। यहां यह अर्थहै कि पवाधित तत्पदसे मुख्य सामानाधिकररायके विरोधसे ब्रह्मरूपजीवविषेश्रब्रह्मभावके स- म्पादनंकरनेरूप अरर्थवानपना कल्पनाकरनेको परप्रशक्य है ] कहे कि अन्नभावको प्रात्तहुये परमात्माकीही तिस अन्यभावके नि- षेधार्थ।"तत्व्रमति"। सो तू है,। ऐसे श्षतिविषे सम्पत्ति कही है सो बनेनहीं क्योंकि।"तत्सत्यं, स व्रात्मा, तत्वमसि"1 सो सत्य है, सो आत्माहै, सो तू है,। इसप्रकार जीव अरु परमात्मा के सामा- नाधिकरएय (एकार्थरूपता) है ताते,। अरु जो [संसारीभावके ग्राहक प्रत्यक्ष प्रमाणकें विरोधसे जीव विषे अवाधितपना असिद्ध है, इसप्रकार पूर्ववादी कहे है। यहां सिद्धान्ती सर्व प्रमाणों का अनुग्ाहक तर्क अङ्गीकांरकरे हैं अरु आत्मा के सं- सारीरूप धर्मवानूपने को तर्क करके आसिद्धता होने से, अरु तिस संसारीपने के प्रत्यक्ष प्रमाणको भ्रान्तरूप होनेसे तिस प्रत्यक्ष प्रमाण को शास्त्र जन्य ज्ञानका बांधकपना सम्भवे नहीं, इस प्र- 1 कार कहते हैं सुखादिकों को प्रतीयमान होनेसे रूपांदिकवत उपलब्धा (ज्ञाता) का धर्मपना सम्भवे नहीं, यह अर्थ है। ] कहे जीव का संसारीपना देखा है, सो कहना बने नहीं, क्योंकि उपलब्धा (प्रत्यक्षप्रमाण) को अंप्रतीयमानपना है ताते, ति- सका देखना सम्भवे नहीं क्योंकि धर्मों के शरु धर्मी के भेदसे झंग्निके धर्म उष्णाता शरु प्रकाशता को अग्नि करके जलावनेकी योग्यता शरु प्रकाश करने की योग्यता के असम्भववत्, अरु नेत्र के धर्म को नेत्रकी विषयता के असंभववत् आत्माके धर्म को पात्माकेविषय होनेके असंभव से धर्मविशिष्ट आत्माकी प्रतीति

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तृतीयाध्याय भृगवल्लीं। १६१ संभवे नहीं। अरु जो [प्रत्यक्ष प्रमाण के विरोधके अभावहुये भी।अर्थात् जीव ब्रह्मकी एकताविषे पत्यक्षप्रमाण विरोधी है तिस विरोधके अभाव हुयेमी। अनुमान प्रमाण का विरोध तो होवेगा, इसप्रकार पूर्ववादी कहता है] कहे कि आत्माको भ- यादिक के देखने से दुःखीपने आदिक धर्मोका अनुमान होताहै अंथात आात्मा विषे भयादि लिंगों के देखने से आत्मा बिषे दुःखादि धर्मोंका होना सिद्ध होता है।। सो भयादिक जोहै सो आश्रय सहित है, कार्य होने से, घटवत्, ।अरु अन्य आश्रय के असभवसे आात्माही तिसका आश्रय अनुमान से जानिये है। [इसप्रकार कहना योग्य नहीं, क्योंकि जो जानने योग्य वस्तु है सो उपलब्धा कहिये जाननेवाला तिसका धर्म नहीं है, रूपादि- कोंवत्,। इनव्याप्त्यन्तरके (अन्यव्यापिके) विरोधसे अध्यास से भी कार्यके दर्शनके असंभवसे। यह अर्थ है।] बने नहीं, क्योंकि भय आदिकोंको अरु दुःखोंको प्रतीयमान होने से सो उपलब्धा (जाननेवाला) का धर्म्म नहीं है। अरु जो [जीवकी ब्रह्मरूपता के प्तिपादन करनेवाले शास्त्र को तर्कशास्त्र के विरोधसे. ब्रपमाण पना है, यह शकाकरके दूषण देते हैं] कहे ऐसे माने हुये कपिलं मुनिकृत सांख्यअ्ररु - करणादमुनिकृत वैशेषिक आदि तर्कशास्त्रोंका विरोध होवेगा, सो बनेनहीं, क्योंकि तिन कपिलादिकोंको मूल के अभावहुये अरु वेदके विरोध हुये, भ्रांतिके संभवसे, अरु ात्मा का असंसारीपना श्रुति अरु-युकिकरके सिद्धहै। अरु जीव [ किवा तार्किककर के भी जीवकासुखी पनाईरवर के आधीन निरूपएकरने कोयोग्यहै, सो निरूपएकर ने कोयोग्य नहीं, क्योंकिअपने आ्ात्मरूप ईश्वरविषे सुखदुःखकी हेतुताका त्र्परसंभवहै ताते। इस अभिप्रायसे कहते हैं] ईश्वरकीएकतासे ईश्वरके आधीन जीवके सुखीपनेका निरूपणकरनेको शक्यनहीं। ननु, जीव अरु ईश्वरकी एकता कैसे है, तहां कहते हैं।"स.यश्चायंपुरुषे, यश्चासावादित्ये, स एकः"। सो जो यह पुरुषबिषे है, अरु, जो यहसर्य्यषिषेहै, सोएकहै,॥४७॥

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१६२ तैत्तिरीयोपनिषद्। सय एर्ववित् । वप्रस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमा- त्मानमुपसंक्रम्य। एतं प्रायामयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रम्य। एतं विज्ञानमयमा त्मानमुपसंकम्य। एतमानन्दमयमात्मानमुपसंकम्य इमांलोकान कामान्नी कामरुप्यनुसचरन एतत्सा मगायन्नास्ते। हा.३. घु.हा ३ वृहा:३ वृ॥४=1: हे सौम्य![अव इस तृतीयावल्लीकी समाप्ति पर्यन्त जो।'अ वशेष'। गन्थहै तिसके तात्पर्यको उक अर्थके कथनसे कहते हैं] i"सत्य ज्ञानमनन्तत्रह्म"। सत्य ज्ञान अनन्त ब्रह्म है, इस २४ चौवीसवीं ऋंचा का अर्थ तिसकी विवसरुप आनन्दवल्लाकरके विस्तार से व्याख्यानकिया। अरु। "सोऽश्नुते सर्वान् कामानूसह ब्रह्मणा विपश्चितेति"सो विपश्चित(सर्वज्ञ) ब्रह्मस्व्ररूपसे सवे कामों (भोगों) को भोंगताहै,। इस तिसके फल वचनके अर्थ का कौन वे सर्वकामहैं, वा सो किसको विषय करनेवाले हैं, वां तिनको कैस सो नहारूप हुआ एक कालमें भोगता है,, इस रीतिका विस्तार कहानहीं, सो कहनेको योग्यहै, याते यह अब आारंभ करते हैं। तहां पूर्वोक विद्याकी साधनरूप पिता अरु पुत्र की आख्यायिका विषे ब्रह्मविद्या का तपरूप साधन कहा। अरुं प्राससे आदिले त्रकाशपर्यन्त जो कार्य है तिसका अ्न अरु परन्नादपने करके उययोगकहा,। चरु ब्रह्मको विषय करनेवालें उपासन कहे। अरु नियमित अनेकसाधनों करके साध्य त्राका- शादि कार्यके भेदको विषयकरने वाले जो सर्व कामहैं सो दे- खाये। अरु एकता बिषे काम अरु कामीपने का झंसंभव है, क्योंकि सर्वभेदके समूहको आत्मरूपती है ताते। तहां उक्र प्रकार जाननेवाला विद्वान एककाल विषे ब्रह्मस्वरूपता करके सर्वकामोंको. कैसे भोगताहै, तहां कहतेहैं,[विद्वान् जो है सो अ- विद्याके लेशमात्रके वंश होनेकरके द्वैत के भ्रमको अनुभवकरता

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तृतीयाध्याय भृगुंवल्ली। १६३ हुआ. सर्वस्य आत्माहमिति,, सर्वका आात्मा मैं हैं;। इस प्रकार मानताहुआ, अणिमादि ऐश्वर्यवाले योगियोंका जो कामान्नपना ।अर्थात् कामना के अर्प्रनुसार अरप्रन्नवानूपना, अरु कामरूपपना।'अ्र्र-, र्थात् कामनाके अनुसार रूपका धारनेपना, है तिसको।अपने एकात्मपनेके यथार्थ तपनुभवसे'। मेराही है, ऐसे देखता 'हुश्ररा एककालविषेही सर्व विषयानन्द को भोगताहै, ऐसा कहाहै, सोई कहते हैं] सर्वात्मता के संभव से सो एककालबिषे ब्रह्मरूपसे सर्व कामों (भोगों) को भोगंताहै। प्र० ॥ तिसकी सर्वात्मताका संभव कैसे है, तहां कहते हैं।।"सय एवंवित, अस्माल्लोका्प्रेत्य, एतम-

सनोमयमात्मानसुपसंक्रम्य, एतंविज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रम्य, एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रंम्य,"। 'जो ऐसे जाननेवाला है. सो इस लोकसे निरपेक्ष होके, इस अन्नमय रूप आात्मा को उल्लङ्कन करके, इस प्रासमयरूप आत्मा को उल्लंघन करके, इस, मेनोमयरूप आत्माको उल्लकन करके, इस विज्ञानमयरूप आत्माको उल्लङ्नकरके, इस आ्र्प्रानन्दमयरूप आ्रप्रात्माको उल्लङ्न करके, अर्थात् जो उक्रप्रकार।'आत्मा को'। जाननेवाला है सो इस दृष्ट अरु तटष्ट।'इसलोक परलोक'। रूप इस लोकसे।अर्था- त् समस्त नामरूपात्मक कार्यरूप जगत् से'। निरपेक्षहोके।अर्था- त् लोकादि एषणासे रहितहोके'। पुरुष अरु सर्यविष स्थित आ्रा- त्माकी।'अभेद'। एकताके विज्ञान से उत्कर्ष अरु अपकर्ष को दूरकर' के, पुनः इस अन्नमयरूप आत्माको उल्लङ्वनकरके।।'अरथात् इस स्थूलदेहरूप अन्नमयकोशको पश्चभूतों के तमोगुसका कार्य के- वल अन्नरूप होने से इसको कार्यरूप विकारीजान इसमें से आरात्म- बुद्धि त्यागके'।। पुनःप्राएमयरूप आ्रत्माको उल्लक्षन करके।।'अ्र- र्थात्ं अन्नमयकोशके भीतर शररु अ्न्नमयसे सूक्ष्म होनेसे त्रन्नमय का आात्मा जो प्रासामय कोश तिसको भी भूतोंका कार्य विकारी मान तिस विषयक प्त्मबुद्धि त्यागके'।। पुनः मनोमयरूप आ्रपात्मा

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१६४ तैत्तिरीयोपनिषद्। को उल्लइन करके।।अर्थात् उक्प्रकार के प्रासामय कोश के भीतर अपरु प्राणामयसे सूक्ष्म होने से प्राणमयका आात्मा जो मनो- मय कोश तिसकोभी भूतों के रजोगुशका कार्य विकारी चंचल आात्माके लक्षण से विपरीत लक्षणवाला जान तिस विषयक झरां- त्मबुद्धि त्यागके। पुनः विज्ञानमयरूय आरत्मा को उंहंघन कर के।।अर्ात् मनोमय कोशके अन्तर अरु मनोमय से सूक्ष्म ऋरु मनोमयकी नियन्ता मनीषा नामवाली बुद्धिरूप विज्ञानमय कोश तिसको भी भूतोंके संत्गुएका कार्य शुभाशुभकी कर्त्ता वि- कारीजान, तिस विषयक आत्मबुद्धि त्यागके'। पुनः आनन्दम- यरूप प्र्रात्मा को उल्लंघन करके।।'तररथात् विज्ञानमय कोशके अ- न्तर तरु विज्ञानमय से सूक्ष्म होने से विज्ञानमय कोशका आ्रात्मा, ररु अरप्रविद्याका कार्य धन पुत्रादिकों के संयोगरूप निमिन्तसे अपने प्रियआ्दिक अवयवों सहित क्चित् भासनेवाला अनात्मा जड़, तिसविषयक ं्रंप्रात्मबुद्धि त्यागकेः। इसप्रकारत्प्प्रविद्या कल्पितञ्रन्न- मयसेलेके झानन्दमयपर्यन्त जो प्रपरात्मा कहेहैं, तिनको क्रमसे उ- ल्लङ्गनकरके।'हे सौम्य !- यह जो अन्नमयादिकोशोंका उल्लङ्न क- रना कहाहै सो किसी तीर्थके जानेवाला यात्री जैसे मार्गके ग्रामों को उन्लंघन करके उस तीर्थको प्राप्त होताहै'। तैसे इन अन्नमयादि- कोशरूष ग्रामोंको उल्लङ्नकर के सुमुक्षुरूप यात्री अपने परमानन्द-

कर परमपुरुषार्थ (मोक्ष) रूप फलकों प्रांत् होताहै। परन्तु, उस यात्रीका बाह्यगमनहै तैसे सुमुक्षुरूप यात्रीका देशान्तरके गमन- वत् बाह्यगमन नहीं किन्तु अन्तरसुख गमन है, अब इसपर अ- न्यटष्टान्त श्रवण करों। हे सौम्य! जैसे किसी चक्रवर्त्ती, राजाके राजगृह की अनेककक्षा (डयोढ़ी.) होती हैं अरु जो पुरुष उस राजाके दर्शनार्थ उस रांजगृह में जाताहै सो प्रथम कक्षासे लेके परन्तकी कक्षापर्यन्त सर्वको देखता अरु द्वारपालों से मिलताजाता है तब राजाके साक्षात् दर्शन पावताहै,अरु जो. कदापि वो राज-

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १६५ दर्शनाभिलाषी पुरुष उन कक्षाओं को देखे विना छरु उन द्वार- पालों से मिले विना उस राजाके दर्शनार्थ जाय तो वो द्वारपाल उसको मागही में अपने निकट अवरोधकरके उसको राजाके स- ममुख प्राप्त होने देतेनहीं। हे साम्य! तैसेही।"निहितं गुहायां प- सर्व्वजनानां हृदधि सन्निविष्टः"।।"पुरमेकादशद्वारमजस्य वक्रचे- तस:"।।" नवद्ारे पुरे देही"। इत्यादि त्र्प्रनेक श्रुतियों स्मृतियों के प्रमापासे इस शरीररूप पुर बिपे हृदयरूप गुहा किंवा बुद्धि- रूपा गुहाहैं सो साक्षी तात्मारूप चक्रवर्ती राजाका राजगह है तिसविषे वो महाराज विराजमान है। अरु तिस राजगृहके प्राप्त होने को कमसे अन्नमयसे आानन्दमयकोश पर्यन्त पांच कक्षा हैं जरु तत्तदविशिष्ट जो चिदाभास है सोई उन कक्षात्रंके अभिमानी द्वारपालहैं अपररु।"ते वा एते पश्च ब्रह्म पुरुषा: स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः" इस छांदोग्यकी श्रतिसे भी उक्कपंचकोशोंको द्वारपना, अरु तदाभिमानी चिदाभासोंको द्वारपालत्वपना, सिद्ध होताहै,। हे सौम्य! उक्रप्रकारके राजमन्दिरविषेस्थित जो साक्षीरूप आात्मा "सर्वेषां राजा"। सर्वइन्द्रादिकोंका राजा महाराजतिसके साक्षात् दर्शनाभिलाप्री जिज्ञासु सुमुक्षु, सो जब क्रमसे अन्नमयादि कोश- रूप द्वारमार्ग से इस शरीररूप पुरान्तर उक्र राजगृहको चलता है अरु उक्र द्वारपालीं से विचारद्वारा मिलता है पुनः क्रमसाध्य एक एक कक्षाको उल्लंघन करता उक्र द्वारपालों से उक्क प्रकार मिलता आगेको अ्रन्तरमुख चलता अपने स्व्रस्वरूपकी ओरपर आर्रा- वताहै तव उक्र राजा महाराजको उक्र राजमन्दिरके भीतर के- वल आरप्रानन्दरूप सिंहासन पर। 'अहं ब्रह्माSस्मि"1 भावसे साक्षात् यथार्थ अनुभव रूप दर्शनकर पप्रभेदतासे परमानन्द सुखको प्राप्त होताहै। अतएव हे सौम्य!उस राजाके दर्शनार्थ तुमको जोजाना है सो उक्र कोशों को उल्लंघन करते अन्तरको जाना है, क्योंकि "कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचंक्षुरमृतत्वमिच्छन," इस

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१६६ तैत्तिरीयोपनिषद्। श्रुतिप्रमाणसे उक्रप्रकार अ्रन्तरमुख चलनेसेही आंत्माका दर्शन होवे है'।। तपरु,सत्य, ज्ञान (चैतन्य), अ्प्रनन्त, अदश्यादि धर्म वाले स्वाभाविक श्र्प्रानन्दस्वरूप अ्र्प्रजन्मात्र्प्रमृत श्र्प्रभय अ्र्प्रविनाशी पद्वैत, ब्रह्मरूप फलको प्राप्तहोके।"इमाँलोकान् कामान्नी कामरू- प्यनुसञ्चरन्। एतत्सामगायन्नास्ते। हाश्यु हा३ वु हायु"। का- मान्नी, कामरूपीहुआ, इन लोकों के अर्थ विघरता हुआ हावु, हातु हात्रु इस सामका गायन करताहुआ स्थित होताहै, अर्थात् ।' उंक्प्कारका विद्वान् ब्रह्मविद्याके विषय'। शद्ैत ब्रह्मरूप.फल को प्रासतहोके,कामान्नी।अर्थात् कामनाके अनुसार अंन्न को पावने वाला'।। अरु कामरूपी।अर्थात् कामना के अप्रनुसार रूपको धारने वाला'। होयके इन पृथिव्यादि लोकोंके अर्थ विचरताहुआ़।।अ र्थात्।"लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथभिक्षाचर्य चरन्ति"। इस वृह- दारएय की श्रुतिप्रमाण लोकैषणा कि जिस विषे पुत्रैषण अरु वितैषणा का त्रप्रन्तरभाव है,तिसको त्यागके भिक्षान्न भोजनकरता हुआ विचरताहुआ,अर्थात् सर्वात्मरूप से इनलोकोंको आत्मपने करके अपनुभव करता हुआ'।।, हावु, हावु, हावु, इस साम को गायन करताहुआ स्थित होता है। प्र०। काहे को इस साम को गायन करताहुआ स्थितहोताहै,।उ०।। 'सर्वत्र सर्वविषे'। समरूप होनेसे ब्रह्मही साम है।'अर्थात् "समो नागे समो मशके" "विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मशो गविहस्तिनि। शुनि चैव शवपाकेच परिडता: समदार्शनः"इत्यादि श्रुति स्मृतियों के प्रमाणसे अ्रप्र- व्याकृतसे लेके तृण पर्यन्त सर्वमें समरूपसे एक अरद्रैत चैतन्य पांत्माही सुशोभितहै। ताते साम नामवाले आ्र्प्रात्माको ही गायन करताहै'।। तिस सर्वसे अनन्य ब्रह्मरूप सामको सर्व लोकों के हितार्थ, आात्मज्ञान के फल अतिशय कृताथपेने को गायन करता हुआ।।'अर्थात् एक अद्धैत चैतन्य त्मा की सर्वत्र समता को लखावता हुआ'।। स्थित होता है। अरु यहां तीनबार हातु हावु हावु,ऐसे कहाहै, सो त्हो!इसआश्चर्यरूप अर्थबिषे वर्तमान हुआ

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १६७ अत्यन्त विस्मय (आश्चर्य) के जनावनके अपर्थ है॥ "आ्प्राश्चय्यों- वक्राकुशलो इस्य लब्धाऽ5श्चर्य्योज्ञाता कुशलानुशिष्टः" 'प्राश्च- र्यवत्पश्यति कश्चिदेन "इत्यादि श्रुति स्मृतियोंके प्रमाणसे ४८॥ ऋ्रह्मन्नमहमन्नमहमन्नम्। ऋहमन्नादो ३ तरहमन्ना- दो ३ ्रहमन्नादः। अहथंश्लोककृदहथंश्लोककृदह- थंश्लोककृत्। ऋर्प्रहमस्मि प्रथमजो ऋता ३ स्य। पूर्व देवेभ्योऽम्तस्य ना ३ भायि। यो मा ददाति स इदेव मा ३ वाः। परहमन्नमन्नमदन्तमा ३ झि।अहं विश्वं भुवनमभ्यभवां ३। सुवर्रज्योतिः । य एवं वेद। इत्यु- पनिषद् राध्यते विद्युति। मानवान् भवत्येको हा. ३ वु. य एवं वेदैकञ् ॥। ४६ ॥ हे सौम्य!।।प्र०॥ यहविस्मय कौनहै,।उ०। अद्ैत आ्र्प्रात्मारूप हमन्नादो ३ अ्हमन्नादः। अहथ श्लोककृदहथ श्लोकक्ृदहथ श्लोकक्त्"। मैं त्रप्रन्न हौं, मैं तरन्न हौं, मैं श्रन्न हौं। मैं तन्नादहों, मैं अन्नादहों, मैं अन्नाद हौं। मैंश्लोककाकत्ताहों,मैं श्लोककाकर्त्ता हौं, मैं श्लोकका कर्त्ता हौं,, अर्थात् श्लोक जो अन्न ऋरु तन्नादका सं- घात तिसका कर्त्ता चैतन्य मैंहीं हौं। तथवा तन्नादरूप जो अन्य तिसके अर्थ हुये पपनेकरूप जे अ्र्प्रन्नकेही संघात तिनका परार्थ रूप हेतु करके करत्ता मैंहीं हौं। और यहां तीनबार जो कथन है, सो विस्मयपने के प्रख्यात करने के अर्थ है। किंवा।"अहमस्मि प्रथम- जो ऋता ३ स्य, पूर्व देवेभ्योऽमृतस्य ना ३ भायि, यो मा ददाति स इदेव मा ३ वा अहमन्नमन्नमदन्तमा ३ झि,अहं विश्वं भुवन- मभ्यभर्वा ३, सुवर्शज्योतिः"। ६मैं ऋतरूप इसके पूर्व उत्पन्न हुआर हौं, देवताओं से पूर्व अमृतका नाभिहूं, जो मुफको देताहै सो मुझको रक्षण करताहै, अन्नके भक्षण करनेवाले को मैं त्न्नही

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१६८ं :तैत्तिरीयोपनिषद्। भक्षण करता हैं, मैं भुवनको भक्षण करता हौं, प्रकाशवान् मेरा ज्योतिहै, अर्थात् सें ऋत कहिये मूर्त, अमूर्तरूप इस ज. गत्के प्रथम उत्पन्नहुंआ्र्प्रा हिरएयगर्भ हूं अरु, व्यष्टिरूप देवतात्र्रों से पूर्व विराटरूपही हौं, अरु मैं अररभृतका नाभि (मध्य) हौं तर्प्र- र्थात प्राणियों का अरमृतभाव मेरे विषे स्थितहे। त्ररु जो कोई एक सुभ अन्नरूप को किसी परन्नार्थीके अरथ देता है।अर्थात् मुझ अन्नको किसी जिज्ञासुके प्रति अन्न रूपसे उपदेशकर ताहै'। सोऐसे ऋप्रविनाशी रूप हुयेभी सेरी रक्षा करंता है।।तर्थात् अ्ररमृतवत् सर्व का जीवन जो अन्नरूप ब्रह्म तिसको जो पुरुष किसी क्षुधित अन्नार्थी के अर्थ देताहै सोई उस अन्नरूप ्रह्म जो सर्वका जीवन हुंरा आाप अविनाशी है तिसकी रक्षा करताहै क्योंकि अन्नार्थी के अर्थ जो अ्रन्नका देनाहै सोई उस ्न्नकी साफल्यता: रूप रक्षा है, तथवा उस अन्नार्थी को ब्रह्मसे अभिन्न हुये उसकी जो अन्नदान से रक्षा करनी है सोई उस अविनाशीरूप ब्रह्मकी रक्षाहै त्रथवा ब्रह्मको जो अधिकारी जिज्ञासुप्रति अन्नरूपसे उपदेश करना है सोई उस अविनाशीरूप ्रह्मकी रक्षा करनी है क्योंकि अधिकारीके प्रति जो उपदेश होताहै सो अपने निरादर- पनेरूप भयको पावता नहीं।।ऋरु जो कोई अन्य (अविद्वान्)सुभ पन्न को अप्पर्थियों के पर्प्रथ समय के प्रांतत हुये न दे के अ्र्प्रन्न को भक्षणक- रताहै।।'अर्थात् जो त्र्रविद्वान् पुरुष अरपने भोजन के समय ्राय प्राप्तहुये जे अन्नार्थी अप्रतिथि प्रप्रभ्यागत तिनको अ्र्ंन्न न दे के र्प्रा- पही अन्नको भक्षण करताहै'।। तिस अन्नको भक्षण करनेवालें पुरुषको मैं अ्रन्नही उलटा भक्षण करता हैं।।अंर्थात् गृहस्थ के यहां जो भोजनार्थ छान्नपाक होता है तिस सिद्ध हुये. अन्नमें से प्रथम गार्हपत्याग्नि (रसोई के व पार्कशालाके स्थानका अग्नि) विषे बलि वैश्वदेव कर्म्मकी आाहुति, अरु प्रात्तहुये अतिथि तप 'भ्यागत के जठरका वैश्वानरनाम त्र्रग्नि 'जोकि वैश्वानरविद्या के ज्ञाता विद्वान् के भोजन के निमित्त से सर्वात्मरूप से भोका

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। १६ह हुआ समस्त जगतकी तृप्ति करनेवालाहै, तिसमें मिक्षान्नरूप आहुति देने से अवशेष रहा जो सिद्धान् सो "यज्ञशिष्टामृतभु- जो वा यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो" इत्यादिप्रमाणसे श्रपमृत रूप होता है, तरु तिस यंज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवांला विद्वान् ब्रह्म- लोकको प्राप्त होता है। वी सर्वपापों से छूटता है अरु जो वि- द्वान् से अन्य अविद्वान् ग्रहस्थ अपने गृह में सिद्धहुआ जो. अन्न, तिस सिद्धान्न में.से बलि वैश्वदेव की परप्राहुति अरु अतिथि अभ्या- गतको, भिक्षा दिये विना जो आपही अन्न को भक्षण करता है तंब वो अन्न।"भुञ्जते ते त्वघं पापा, ये पचन्त्यात्मकारणत्ः। इत्यांदि प्रमाणसे पापरूप हुआ्र, भक्षक का विनाशकर्ता विषके तुल्य होताहै, एतदर्थ विद्वान् कहताहै कि जो पुरुष समयपर प्राप्त पप्रन्नार्थी अ्र्प्रतिथिरूप जो मैं, कि जो।" त्र्प्रतिथिदेवो भव"1इ- त्यादि श्रुतियोंने देवता के तुल्य पूज्यनीय लक्ष कराया है, तिसको अन्न न देके आपही उस तन्न को भक्षण करताहै तिस भक्षणकर्ता पुरुषको मैं अन्नही।'उसके उदरमें अ्र्प्रजीर्णादि दोष विकार प्रक- टकर उस पुरुषको भक्षण करताहौं'।। यहां वादी कहता है कि, जवऐसही है। 'कि जैसे तुम कहतेहौ'। तब मैं सर्वात्मभावकी प्रा- सिरुप भोक्षसे भयको पावताहौं, मुझको संसारही होवो। ज़ि- सकरके सुकहुआभी में अन्नरुप हुआ अन्नकाही मक्ष्य होनोंगा, ताते मैं मोक्षसे भय पावताहौं, तहां सिद्धान्ती कहताहै, कि हे वा- दिन! तू भय संतकर क्योंकि सर्वकामों के भक्षणको व्यवहार का विषय होने से, यह अविद्वान् अन्न अरु अंन्नादादिरूप पविद्या के किये व्यवहार के विषयको भक्षण करता है, अरु विद्यासे ब्रह्म- भावको प्राप्तहुआ जो विद्ान्है तिसको।'आत्मासे'।द्वितीय अरप्रन्य वस्तु है नहीं कि जिसकरके भयको प्रांसहोवे, एतदर्थ मोक्षसेभय करने के योग्य नहीं है। प्र० ॥ जब ऐसही है, तब यह विद्वान् मैं अन्नहौं-३, मैं त्रन्नादहौं-३,, इसप्रकार यह क्या कहता है,।। उ०॥ जो यह त्रन्न रु अन्नादिक स्वरूप कार्यरूप व्यवहार

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२०० तैत्तिरीयोपनिषद्। है सो व्यवहार कार्यरूपही है, परमार्थवस्तु नहीं, सो व्यवहार ऐसाहुआभी ब्रह्मरूप निमित्तसे है ब्रह्म विना असत्है।।'अर्थात् अध्यस्तकार्यकी जो व्यावहारिक सत्ताहै सो वास्तव में असत् है तथापि जो उसकी सत्यता प्रतीतिमात्र भालती है सो व्रह्मरूप सत्य. अरप्रधिष्ठानके आर्प्राश्रय हुई भासती है त्रप्ररु सत्यरूप अ्र्प्रधिष्ठान: विना बन्ध्यासुतवत् त्रप्रसत् है'। इसप्रकार.होनेकरके विद्वान् के सर्वात्मभावकी स्तुतिके अप्र्थ"मैं अ्र्प्रन्न हौं, मैं त्र्प्रन्नहौं, मैं अ्र्पन्न हों" "मैं त्रपन्नादहौं, मैं त्र्प्रन्रादहौं, मैं त्र्प्रन्नादहं" इत्यादिरूप यह ब्रह्म- विद्याका कार्य्य कहते हैं।। अर्थात् विद्वान्का सर्वात्मभाव कैसे है इसका भी किञ्चित् वुद्नुसार विचार कर्त्तव्य है 'एक.अद्रैत' इंस शब्दका अर्थ सजातीय विजातीय स्वागततप्रादि सर्व भेद से रहित निर्विकल्पवस्तुको लखावे है इपरु, सर्व, इस शव्दका जो ंप्रथहै सो एक अद्वैतशब्दके अपर्थ से विपरीतहुआ नानात्वका वा संघातका वा समुदायका वा भेदोंका बोधकहै, ताते एक इसशब्द के अर्थ में सर्व इस शब्दके अर्थका प्रवेश होवेनहीं, ताते, सर्वात्म, इसशब्दमें जो आत्मशब्द के साथ सर्वशब्द का कथनहै सो कथ- नमात्रही है, जैसे एक मृत्तिकामें उससे अभिन्न हुये घट सरावादि हैं, तैसे भी एक अद्वैत निराकार परिपूर्ण आ्ररत्माविषे सर्वशब्दका विषय नहीं तरु रज्जुमें सर्पवत्भी त्रद्ैत निराकार आात्मा में सर्व शब्दका अरथ नहीं क्योंकि शदृश्य में दश्यकी अरु निराकार में साकारकी ्रान्ति होवे नहीं, अरु जिन शास्त्रकारों ने एक अद्दैत निराकार त्रप्रात्मा में मृत्तिका में घटादि तरपरु रज्जु में सर्पादिवत् सर्व शब्दका विषय नानात्व माना तिन्होंने माया को स्व्रीकारक- रके. मानाहै ताते उनका कथन मायामात्र है अरु, या,मा, सा माया अर्थात् जो वास्तव में होवे नहीं केवल कहनेमात्रही होवे सो माया अरु ऐसी कथनमात्रही जो.माया सो शुद्ध एक अद्वैत आात्माविषे कल्प कके प्र्प्रभावसेहै नहीं, अरु अ्प्रमायी(मायारहित) शुद्ध आात्माके अनुभवमें मायामात्रभी नानात्व नहीं, ताते केवल

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त्र्प्रविद्या करंके कल्पित नानात्व है परन्तुअ्रविद्या जवअपने.आश्रय शुद्ध त्रद्वैत त्र्प्रात्मा में परिशाम होती है.तब अ्रविद्यारूप कल्पक के पभावहुये कल्पनामात्रभी नानात्व नहीं 'जैसे रंज्जु के ज्ञान में जब रज्जुका पप्रज्ञान अपने परिणामभाव को पावता है, तव अपने कल्पकके अ्र्प्रभावसे कल्पित सर्पभी अ्रभाव होताहै' तैसे। अर्थात् तमकी ऋरु उप्ज्ञानकी वस्तुको यथार्थ न लखीवने बिषे एकताहै अरु प्रकाश अरु ज्ञानकी वंस्तुको यथार्थ लखावने विवे एकताहै क्योंकि बाह्यके तमको पायके तिसके आ्रश्रय अन्तरका पज्ञानरूप तम रज्जुरूप वस्तुको सर्पादिरूपसे अन्यथा कर देखा- वेहै, छरु जब वाह्यका दीपकादिकों के निमिन्तका प्रकाश होता है तब तिसके आश्रय अन्तरंका ज्ञानरूप प्रकाश रज्जुरूप वस्तुको ज्योंकीत्यों लखावेहै, अरु जब बाह्यका प्काश अरु अन्तर का ज्ञान एकत्र होते हैं तब बाह्यका तम वाह्यके प्रकाश में अरु ं. न्तरका प्परज्ञान अन्तर के ज्ञान में परिणामको पावते हैं तब उस निर्विकार शुद्ध रज्जुविषेकल्पककेअररभाबहुये पुनः भ्रान्तिमात्रमी सर्पर हे नहीं, छरु जैसे सर्पका कल्पक शज्ञान ज्ञानरूप परिणामकों पावताहै तव वो कल्पित, सर्प अपने रज्जुरूप अधिष्ठानमें परिणास को पावता है। सो अपने कारण कल्पकप्प्रज्ञानके त्र्प्रभाव हुये पुनःवो भ्रान्तिमात्रसर्भीउत्पन्नहोवेनहीं, अरु उसशुद्धर ज्जुको तोकालनय मेंभीसर्पका गंधमात्रभीनहींवो अपने एक अद्ैत स्वरूप के यथार्थ तप्रनुभवमें दूसरे सर्पको जानती भी नहीं जो सर्प क्या अरु कैसा होताहै तैसेही एक तद्दैत आत्मा को सर्वन्र परिपूर्णातासे घन शिलावत् यथार्थअनुभव करताहै तिसविद्वान् के अनुभवमें.सिवाय एक अपने आंप त्रद्ैत परिपूर्सा अखएंड आत्माविषे सर्व शब्दके विषयका गन्ध भी नहीं, ताते उसके सर्वात्मअ्रनुभव में यहं भाव नहीं कि कुछ सर्व शब्द का विषय है अरु तिसका मैं आत्मा होनेसे सरवोत्मा होँ, किन्तु उसके अनुभव में ऐसा है कि मेरे एक अद्दैत परिपूर्ण स्वरूप में वज्ञान के अभावसे सर्व शब्द

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२०२ तैत्तिरीयोपनिषद्। का विषय कल्पनामात्र भी नहीं ताते वास्तव करके मैं सर्व का झप्रात्मा वा सर्वरूप परपात्मा नहीं सरव विकल्प कल्पनासे रहित अ्वाच्य निर्विकल्प हो अरु जो अज्ञानकरके सायाके शश्रय मुभ विषे नानात्वकी कल्पना करते हैं तिस कल्पनाका आश्रय शं. विष्ठान होने से उनके अरनुभवका नानात्व 'जो वास्तव करके मेरे बिषे गंधमात्रभी नहीं, सोभी मैंही हौं ताते मेरेविषे सर्वशब्द के विषयके त्र्प्रभावसे जो हौं सो मैंही हौं तरु अविद्या करके कल्पित अरु मेरे वास्तवस्वरूप में अप्रत्यन्त तरपरभावरूप अ्र्प्रवि- द्ानूकरके भासमान प्रप्रन्न अरु पन्नाद सो भी मैंही हौं। इसप्रकार सम्यक् प्रप्रातमानुभवी विद्वान् अपने वास्तवस्वरूप में सर्वशब्दके विषय को न देखता अपरपनेसर्वांत्मापनेको अपरनुभवकरताहै।'एतदर्थ उक् प्रकार के ब्रह्मभत विद्वान्को तरप्रविद्याके नाश हुये शविद्यारूप निमित्तकां कियाभयादिकदोषों का विद्ान् के विषे गंधमात्र भी नहीं। इस अरभिप्रायसे त्रह्मसूत विद्वान् पुनःकहताहै कि न्रह्मादिक भंतों करके भोगने योग्य वा जिसविषें भूत होवे हैं ऐसा जो सुवन है तिस।'चतुर्दशादि '1. सर्व सुवनों को मैं परमेश्वररुपसे संहार [ ईश्वररूपंता के ज्ञानसे मैं द्वैतका बाध करताहौं, तातें सुभको भयका कारण नहीं। ।पर्थात् "द्वितीयाहै भयं भवति" इत्यादि प्रमाससे भयका हेतु प्ज्ञानजन्य द्वैतभावहै, तिसका विद्वान् ने एक अद्दैत सर्वात्मज्ञानकरके निःशेष बाध कियाहै ताते उस वि- द्वान्को भयका हेतु रंचकमात्र भी नहीं, यह अर्थ है ] करताहों अरु सर्य्यवत् एकही कालविषे प्रकाशवान् मेरा ज्योति है। अरु "य एवंवेद, इत्युपनिषट् राध्यते विद्युति, मानवान् भवत्येको हा ३ वु।।।"य एवंवेदैकञ्च"। 'यह उपनिषद् है जो ऐसे जानता है, सिद्ध होताहै मानवान् होताहै, एक हावु जो ऐसे जानताहै अरु एक है, अर्थात् यह द्वितीय अरु तृतीयवल्ली करके कथन किया उपनिषद कहिये परंमात्मविषयक ज्ञान' है। तिस इस उक़ प्रकार की उपनिषद् को "शान्तोदान्तउपरतस्तितिक्षः

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। २०३ समाहितो भत्वा"। शान्त (बाह्येन्द्रियकी उपरामता)दान्त(मन का दमन वा तृष्णादि दोषोंकी निवृत्ति) उपरति (पुत्रादि ए षसाकी निवृत्ति) तितिक्षा (शीतोष्ादि द्वंद्वकी सहिष्णुता) समाहित चित्त (चित्तकी एकाग्रता) इसप्रकार साधन सम्पन्न होयके। 'भृगुवत् महान् तप (एकाग्र चित्तसे सम्यक् विचार) को आाश्रय करके जो उक़ प्रकार।ब्रह्म आत्मा की अभेदताकों सम्यक प्रकार'। जानता है, तिसको अग्रिम कथित फल होता है। सिद्ध होताहे।अर्थात् उस साधन सम्पन्न विचारशील विद्वान् पुरुषको अपपने आप्रपिषे सर्व्वात्मभाव अ्रप्रनुभव सिद्ध हो- ताहै'! मानवान् होताहै।' अर्थात् उस ब्रह्मभूत पुरुषको लोक घिषे विवेकी पुरुष ब्रह्मपनेका मानदेते हैं। एकहावु। 'एकही विस्मय (आश्चर्य)है'। जोपुरुषत्पनादिकालकेत्र्प्रविद्याकर केत्रल्पज्ञजीवभाव को पाया सताजन्मजरामरणादिकोंके केशोंको अनिवार्यतासे पा- वताघरु अपने किये शुभाशुभ कमोंके आश्रय स्वर्गनरकादिकोंमें सुखदुःख भोगता वारंवार देवतासे तृरा पर्यन्त शरीरोंको धारता तापत्रयरूप अ्रग्निकर के जलता हाय हायकरता रोवता सुख प्रात्तिकी कामनासे दीन हुआ वृक्ष पाषाणदिकोंको पूजता कामनाकी प- सिद्धि शरु अप्रनिवृत्तिसे सर्वं और्रोर भ्रमता सर्वकरके तिरस्कारपाया अपनेको पापी अपपराधी अर्प्रतिर्दान नारकी ईश्वरादिकोंका किंकर मानतारहा। सो पुरुष ब्रह्मविद्याके प्रताप से अपने स्वरूप को यथार्थ साक्षात् त््रनुभवकरईश्वरादिकोंकाभी ईश्वर ब्रह्मभूतहुआ्प्रा ब्रह्मा विष्सु शिवादिकोंकरके पूज्य सर्वात्मभावसे स्थित त्र्प्रभय त्र्प्र- होताहै, यही ब्रह्मविद्याकी अलौकिक विलक्षण त्रश्चर्यरूपाशक्रि हैं'।। इसप्रकार जानताहै।अरु ऐक है।।। अर्थात् अरपने आ्र््राप यथार्थ आत्मानुभव में सर्व शब्द के विषयको देखता सापेक्षिक एकसंख्या से, रहित सर्व संख्यातीत एक अद्ैत अर्थात् द्वैतसंख्याकी सापे- क्षिक जो एक संख्याहै तिस एक संख्यातीत सम पद्दैत है'।४६।

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२०४ तैत्तिरीयोपनिषद्। भृगुस्तस्मै यतो विशन्ति। तदिजिज्ञासस्व तत्रयोद- शान्ं प्राणं मनो विज्ञानमितिविज्ञाय। तन्तपसा द्ादश द्वादशानन्द इति। सैषा दशाननं न निन्दात्। प्राणः श- रीरंसनं न परिचक्षीतापो ज्योतिरन्नं बहुकुर्चीत। पथि. व्यामाकाश एकदशकादश। न कञ्चनैकषष्टिरेकाल् विछशतिरेकान्नविछशतिः। सहनाववतु सहनौ भुनकु सहवीर्य्य करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तुमाविद्वि षावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः भृगुरित्युपनिषत् शत्नोमिन्नः। प्रावीद्दक्कारम॥।५०॥ॐ शान्तिः।। इतिदशमोनुवाक:१॥ इति भृगुवल्लीनामक ततीयोऽध्यायः समातः।

हे सौम्य!।"सह नाववतु, सहनौ सुनकु, सह वीर्य करवाव- है। तेजस्वििनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै"। ६सो (परमात्मा ) हसारी (गुरु शिष्य़की आरांसुरी सम्पदासे)? रक्षा करो, शरु तो (परमात्मा) हम (गुरु शिष्यको अपरपना ञ्रभेदानन्द) भोगावो, घरुं सो (परमात्मा हमारे विषे निदिध्यासन समाधिका) सा- सर्थ्य करो, छरु (हे परमात्मन्!) हमारा अ़ध्ययन किया (उप- निषद् पध्यात्मशास्त्र ब्रह्मविद्या सो) पविद्यारूपा अपराविद्या प्रवृत्तिशास्त्र, तिसकी विस्मृति पूर्वक।।'अर्थात् "ञन्यावाचो विसुच्यथ" यह श्रुति ब्रह्मविद्या वेदान्तशास्त्र से इतर भावण करने का निषेध (त्याग) कहती है ताते, शरुन्रह्मविद्या के विचार- वान्को अप्रपराविद्या प्रवृत्तिशास्त्रकी स्मृति विक्षेपकारी है तातें॥ तेज़रवी हो, अरु हम शिष्य अरु पचार्य (किसीप्रकारके भी नि- मित्तको पायके) परस्पर में द्वेषको न प्राप्त होवें,।ॐ (यह) सत्य है।अर्थात् पर मानन्द की प्रात्ति बिषे।"एतदालम्बनंश्रेष्टम्"यह

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तृतीयाध्याय भृगुवल्ली। २०५ प्रणवोपासनाही सत्य (मुख्य) है यह मैं सत्य कहताहौं।" ॐ शान्ति: शान्तिःशान्तिः"शान्तिहोवो, शान्तिहोवो, शान्तिहोवो। यह जो उपनिषद्विद्या के अध्ययन वा पाठकरनेके परादि ग्रन्त में शान्तिपाठ करना कहाहै तहां. पूर्व के शान्तिपाठ से विद्याके समस्त अध्ययन होने पर्यन्त आाध्यात्मिकांदि केशकी निवृत्ति के अर्थ परमात्मा से प्रार्थना है, अरु पपरन्तके शान्तिपाठसे अ्रध्ययन कींहुई विद्या की उक्र वि्नों से विस्मृतकी निवृत्ति के अपर्थ परमात्मा से प्रार्थनाहै। तरु जहां कहीं विम् विक्षेप होताहै तहां आ्र्प्रांध्यात्मि- कादि क्रेशोंके निमिससे ही होताहै,एतदर्थ मुख्यकरके उक विन्नों की निवृत्तिके अर्थही आरदिश्ररन्तमें परमात्माकी प्रार्थनारूप शांति पाठहै।। हे सौम्य! इस मन्त्रके आ्र्प्रारंभमें "भृगुस्तस्मै" भृगु तिस के अपर्थ, यहां से लेके "एकान्नविंशति" एक उन्नीस १६, यहां पयन्त जो इस तृती याध्यायके मन्त्रकी स्मरखार्थ शृंखलाहै, तिस को निरुपयोगी जानके भाष्यकार श्रीशङ्गराचार्यजीने अर्थ किया नहीं, चरु तिसही अरभिप्रायसे त्र्रानंन्द गिरिने, वा अन्य भीषा- टीकाकारोंने भी तिसका अर्थ किया नहीं। एतदर्थ ज्येष्ठ श्रेष्ठों की परम्परासे मुझ अल्पज्ञने भी उक्क मंत्रों के अर्थ की कल्पना किया नहीं॥ १०।५० ॥ इति दशमोऽनुवाकः॥ १० ॥

तृतीयोध्यायः समासः॥। इति श्रीस्वामीब्रह्मानन्द सरस्वती का त्रप्रतिशरपल्पज्ञ शिष्य यमुनाशङ्करनामक नागरन्नाह्मश कल्पित यह तैत्तिरीय उपनिषद् का भाषाभाष्य समास हुआ।। ॐ हरिः।ॐ तत्सद्रह्मार्परम्॥

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उपानिषदों का सेट

[अरनुवादक-रायबहादुर बा० जालिमसिंहजी रिटायर्ड .पोस्टमास्टर जनरल, रियासत ग्वालियर ]

जिसे पाकर कुछ भी पाने को नहीं रहता, जिसे जानकर कुछ भी जानने को नहीं रह जाता, जिसे माप्त करने के लिये बड़े-चड़े चक्रवर्ती सम्राटों ने वसुंधरा के साम्राज्य को तृणवत् त्याग दिया अपनिपद् उस परम पुनीत ब्रह्म-विद्या के मुख्य स्रोत हैं। यों तो उपनिपदों की संख्या ११५ से भी अधिक है; पर उनमें से १० मुख्य हैं। इन दसों की टीका, मुंदर टाइपः और पुस्ट काग्ज़ में, बड़ी सुंदरता-पूर्वक, छपी तैयार है। टीका का क्रप यह है-पहले मूल, फिर पदच्छेद, फिर दो कालमों में संस्कृत-अन्वय औ्ौर पत्येक शब्द के आगे हिंदी-अर्थ, और सबके नीचे सरल हिंदी में भावार्थ। इतनी सरल शैली से उपनिषदों की टीका कहीं नहीं छपी। पृष्र भौर म्य इस पकार है-

नाम पृष्ठ-संख्या मूल्य नाम पृष्ठ-संखया मूल्य. ईंश ३६ मांडूक्य: २० केन ४४ ऐतरेय ५४ कठ १६० तैत्तिरीय १३४ पश्न ६४ छांदोग्य ६६८ मुडक । । वृहदारएयक :७५०

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