Books / Taittiriya Upanisad with Hindi Tika and Translation Jalim Singh

1. Taittiriya Upanisad with Hindi Tika and Translation Jalim Singh

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कृष्णयजुर्वेदोय

तैत्तिरीयोपनिपद् सटीक

अनुवादक-

रायबहादुर बाबू जालिमसिंह


तृतीयबार

लखनऊ

केसरीदास सेठ द्वारा

नवलकिशोर-प्रेस में मुद्रित शोर प्रकाशित

सन् १६२५ ई०

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भूमिका

वेदव्यासजी के शिष्य वैशंपायनऋषि के पास याज्ञवल्क्य आदि विद्वान् ब्रह्मचर्य-व्रत को भारसा किये हुये यजुर्वेद का अध्ययन करते रहे, उस वैशंपायनऋषि को किसी एक निमित्त करके ब्रह्म-हत्या प्राप्त हुई, उस हत्या के निवारणार्थ वैशंपायनऋषि ने याज्ञवल्क्य से इतर अपने शिष्यों से नियमाचरण अर्थात् प्रायश्चित्त कर्म करने की आज्ञा दी, तब याज्ञवल्क्य ने कहा कि हे भगवन् ! यह व्रत अतिकठिन है, इन दुर्बल बालक विद्यार्थियों से अशक्य है, मैं परिपक्व और शरीर करके दृढ़ हूँ, मैं अकेला ही इस कठिन व्रत को करके आपकी ब्रह्म-हत्या निवारण करने में समर्थ हूँ और इस कठिन व्रत के करने की आज्ञा मुझे ही दीजिये, इस प्रकार जब याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु वैशंपायन से विनय किया, तब वह ऋषि ब्रह्म-हत्या के वश होने के कारण क्रोधित हो, ऐसा कहता भया कि हे याज्ञवल्क्य ! तू बड़ा गर्विष्ठ है, अपने को श्रेष्ठ मानता है, और इन बेचारे ब्राह्मण के बालक विद्यार्थियों का अपमान करता है, अब तू मुझसे पढ़ी हुई विद्या को शीघ्र त्याग दे, नहीं तो तत्कालो मैं मरघ-संबंधी शाप दूँगा।

जब इस प्रकार वैशंपायनऋषि ने कहा, तब शाप के भय से भयभीत हो, याज्ञवल्क्य गज-क्रिया केबल से वमन करके अधीत की हुई विद्या को त्यागता भया, तब उस त्यागी हुई विद्या को अन्य कई एक ब्राह्मण के बालक विद्यार्थियों ने तीतर का रूप धारण करके अपने गुरु की आज्ञा से ग्रहण कर लिया, तभी से उस विद्या का नाम तैत्तिरीय विद्या पड़ा, उस तैत्तिरीय विद्या अथवा शाखा का यह उपनिषद् भी तैत्तिरीय-उपनिषद् करके विख्यात है, इस उपनिषद् में गुरु-शिष्य का संवाद है।

ॐतत्सत् ॐतत्सत् ॐतत्सत् ॥

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श्रीगणेशाय नमः

कृष्णयजुर्वेददीय ।

तैत्तिरीयोपनिषद् सटीक ।

स्मथ शिक्षाध्यायरूपा प्रथमा वल्ली प्रारभ्यतें ।

मूलम् ।

हरिःॐ ॥ शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा ।

शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः ॥ नमो

ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि त्वामेव

प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ॠतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि

तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु अवतु माम् अवतु वक्तारम्

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥

इति प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

शम्, नः, मित्रः, शम्, वरुणः, शम्, नः, भवतु, अर्यमा, शम्, नः, इन्द्रः, बृहस्पतिः, शम्, नः, विष्णुः, उरुक्रमः, नमः, ते, वायो, त्वम्, एव, प्रत्यक्षम्, ब्रह्म, असि, त्वाम्, एव, प्रत्यक्षम्, ब्रह्म, वदिष्यामि, ॠतम्, वदिष्यामि, सत्यम्, वदिष्यामि, तत्, माम्, अवतु, तत्, वक्तारम्, अवतु, अवतु, माम्, अवतु, वक्तारम्, ॐ, शांन्तिः, शांन्तिः, शांन्तिः ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

शान्तिः । पदार्थे-सहित

मित्रः=प्राण ग्रौर दिन ग्रभिमानी देवता

नः=हमको

शम्= सुखकारी

भवतु=होवें

वरुणः=ग्रपान ग्रौर रात्रि-ग्रभिमानी देवता

नः=हमको

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

ग्रर्यमा=नत्र ग्रौर सूर्य ग्राभिमानी देवता

नः=हमको

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

इन्द्रः=बल ग्राभिमानी देवता

नः=हमको

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

बृहस्पतिः=वाणी ग्रौर बुद्धि ग्रभिमानी देवता

नः=हमको

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

उरुक्रमः= { बढानेवाला है तीन पाद का जो राजा बकिंके यज्ञ बिये (ऐसा

विष्णुः=चरयों का ग्राभिमानी देवता

नः=हमको

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

ब्रह्मयः=ग्रयापक है जो ऐसे उस ब्रह्म के लिये

नमः=नमस्कार है

वायोः=हे वायु देवता

ते=तेरे ग्रर्थे ग्रर्थांत तुमको

नमः=नमस्कार है

त्वम् पद्=तूही

प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष

ब्रह्म=ब्रह्म

ग्रासि=है

त्वाम्=तुमको

एघ=ही

प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष

ब्रह्म=ब्रह्म

वदिष्यामि=मैं कहूँगा

त्वाम्=तुमको

पद्=ही

ऋतम्=निश्चयात्मक बुद्धि

वदिष्यामि=मैं कहूँगा

त्वाम्=तुमको

पद्=ही

सत्यम्=सद्रूप

वदिष्यामि=मैं कहूँगा

तत्=वह वायुरूप ब्रह्म

माम्=मुफ्त विद्यार्थी को

ग्रवतु=रक्षा करे ग्रर्थांत विद्या से युक्त करे

तत्=वह वायुरूप ब्रह्म

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वकारमू=आचार्यं श्रथात् गुरु की श्रावतु= { रक्षा करे श्रथात् वक्तृत्व-सामर्थ्य से युक्त करे माम्=शिष्यको श्रावतु=रक्षित करे वकारमू=आचार्यं को

श्रावतु=रक्षित करे द्विवचन आदरार्थे है

ओं शान्तिः=आध्यात्मिक विघ्नों से शान्ति हो शान्तिः=आधिभौतिक विघ्नों से शान्ति हो शान्तिः=आधिदैविक विघ्नों से शान्ति हो ॥

भावार्थ ।

मित्र इति । प्राणवृत्ति का अभिमानी मित्रसंज्ञक देवता हम लोगों को सुखकारी हो, श्रापानवृत्ति का अभिमानी वरुणसंज्ञक देवता हम लोगों को सुखकारी हो, चक्षु का अभिमानी अश्य्यसंज्ञक देवता हम लोगों को सुख का कारक हो, भुजा का अभिमानी इन्द्रसंज्ञक देवता हमको सुखकारक हो, बुद्धि का अभिमानी बृहस्पति नामक देवता हम लोगों को सुखकारक हो, और चरनों का अभिमानी विष्णु देवता, जिसने राजा बलि के यज्ञ में अपने तीन पादों से तीनों लोकों को आच्छादन किया है, हमको सुखकारी हो, हे सूत्रात्मा वायु ! तेरेको मैं नमस्कार करता हूँ, तूही प्राणरूप से सब शरीरों में स्थित है, तेरे इस रूप को भी नमस्कार है, तूही प्रत्यक्ष ब्रह्म है, तुभक्तको मैं ब्रह्म कहूँगा, और शास्त्र के निश्चित अर्थ के ग्रहण के लिये मैं तेरे ही को निश्चयात्मक बुद्धि कहूँगा, तूही साररूप ब्रह्म है, समष्टिरूप सूत्रात्मा वायु है, हे व्यष्टिरूप प्राणात्मक वायु ! तू मुभ् विद्याथियों की रक्षा करे, और विद्या ग्रहण करने की सामर्थ्य को दे, ब्रह्मरूप वायु मेरे गुरु वक्ता को वक्तृत्व शक्ति दे, मुभको और मेरे आचार्य को रक्षा करे, और जो आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तीन प्रकार के विघ्न हैं, उनसे हम दोनों की शान्ति होवे ॥ १ ॥

इति प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद्

मूलम्

ॐ शिक्षां व्याख्यास्यामः वर्णः स्वरो मात्रा बलम्

साम सन्तानः इत्युक्तः शिक्षाध्यायः शिक्षां पद्म ॥ २ ॥

इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

शिक्षाम्, व्याख्यास्यामः, वर्णः, स्वरः, मात्रा, बलम्, साम, सन्तानः,

इति, उक्तः, शिक्षाध्यायः ॥

मन्वयः ।

पदार्थ-सहित

सूक्ष्म भावार्थे ।

मन्वयः ।

वर्णः=अक्षर श्रथोत् ग्र-कारादि वर्गा

स्वरः={उदात्त, अनुदात्त

श्रौैर स्वरित श्रथोत्

ऊँचा, नीचा तथा

मध्यम स्वर से उ-चारण करना

मात्रा={हस्वादि श्रथोत् हस्व,

दीर्घे श्रौैर ऋतु

बलम्={प्रयत्न श्रथोत् शब्दों

के उच्चारणा में जो

यत्न करना पड़ता

है, वह

भावार्थ ।

साम={श्वरयण में मध्य-मता

सन्तानः=संहिता श्रथोत् शब्‍दों

की सन्धि

इति=यह

शिक्षाध्याय:=शिक्षाध्याय

उक्तः=कहा गया है

शिक्षाम्={इस शिक्षा को

प्रथोत् वेदो‍श्वर्या

में वर्ण, स्वर श्रादि

विवेक को

व्याख्या}हम ग्रश्रष्टी प्रकार

कहेंगे ॥

शिष्यते ऽनयेति शिद्धा । शिष्य के प्रति जिस करके शिद्ता की

जाते, उसका नाम शिद्धा है, श्रथवा शिष्य के प्रति वर्णादिकों के

उच्चारणा करने के उपदेश करने का नाम शिद्ता है, उसी शिद्ता को

हम व्याख्यान करेंगे, ॥ वर्णः ॥ अकार श्रादि वर्ण हैं, तथा उदात्त,

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श्रनुदात्त और स्वरित ये स्वर हैं, इन्हीं स्वरों करके संपूर्ण वर्णों का उच्चारण होता है, जिस स्वर करके वर्ण का धीरे से उच्चारण किया जाता है, उसका नाम उदात्त है; जिस स्वर करके कुछ जोर से वर्ण का उच्चारण किया जाता है, उसका नाम श्रनुदात्त है; और जिस स्वर करके बहुत जोर से वर्ण का उच्चारण किया जाता है, उसका नाम स्वरित है; और जिनके मिलाने से बिना ककारादिक वर्णों का उच्चारण न होसके, उसका नाम मात्रा है; सो अकार इकार उकारादिक हैं, इनके साथ जब ककार खकारादिक वर्ण मिलते हैं, तभी उनका उच्चारण होता है; बिना उनके मिलने से ककारादिक वर्णों का उच्चारण नहीं होता है; जो अकार, इकार, उकारादि मात्रा हैं, सो ह्रस्व, दीर्घ और प्लुतरूप से उच्चारण किये जाते हैं, याने हरएक मात्रा इस प्रकार तीन-तीन भेदोंवाली होती है, और बल नाम प्रयत्नविशेष का है, एक तो वर्णों का स्थान होता है, दूसरा प्रयत्न होता है, जिस स्थान से जो वर्ण निकलता है, वह वर्ण का स्थान कहा जाता है, कोई वर्ण तो कंठ-स्थान से निकलता है, कोई ताल्वादि स्थानों से । अकार, ककार और विसर्ग इनका उच्चारण कंठ से होता है, इसीलिये इनका कंठस्थान कहा जाता है, और ईकार, चकार, यकार और शकार इनका उच्चारण तालु से होता है, इसलिये इनका तालुस्थान कहा जाता है; और स्पष्ट, ईषत्स्पृष्ट, ईषद्विवृत, विवृत और संबृत; ये प्रयत्न कहलाते हैं, जिस वर्णों के उच्चारण करने में जिन अवयवों का बल लगता है अर्थात् जिन अवयवों के प्रयत्न से जो वर्ण उच्चारण किये जाते हैं, वे प्रयत्न उन्हीं वर्णों के कहलाते हैं, सो दिखाते हैं; जिस वर्ण के उच्चारण करने में जिह्वा के अग्रभाग में और कंठादिक शारीर के अवयवों में पूर्णरूप से परस्पर स्पर्श होता है, वह स्पष्ट-प्रयत्न कहा जाता है, सो ककार से लेकर मकार पर्यन्त

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तैत्तिरीयोपनिषद्

जितने वर्ण हैं इनका स्पष्ट प्रयत्न है, इसी प्रकार और वर्णों का भी जान लेना, विस्तार के भय से यहां नहीं लिखते हैं, और वर्णों का मध्यम स्वर से उच्चारण करने का नाम साम है, ऋऋथात् ऋऋतिशीघ्रता ऋऋर अतिविलम्बता को त्याग करके जितना उसके उच्चारण करने के काल का नियम है, उतने काल में जो उसका उच्चारण करना है, उस्का नाम साम है, ऋऋर वर्णों का ऋऋध्यवधानता करके जो उच्चारण करना है, उसका नाम सन्तान है; ऋऋर वर्णों की शित्ता होते जिस ऋऋध्याय में, उस ऋऋध्याय का नाम शित्त्याध्याय है ॥ २ ॥

इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥

मूलम् ।

सह नौ यशः सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथातः संहितायाः उपनिषदं व्याख्यास्यामः ॥ पञ्चस्वधिकरणेषु ऋऋधिलोकमध्यज्योतिषमध्यविद्यमध्यप्रजमध्यात्मं ता॓ महासंहिता इत्याचक्षते । ऋऋथाधिलोकं पृथिवी पूर्वरूपं यौत्तररूपम् ऋऋआकाशः सन्धिः ( ३ ) वायुः सन्धानम् इत्याधिलोकम् ऋऋथाधिज्योतिषं ऋऋग्निः पूर्वरूपम् ऋऋआदित्य उत्तररूपम् ऋऋआपः सन्धिः वैचुतः सन्धानम् इत्यधिज्ज्योतिषम् ऋऋथाधिविद्यं ऋऋआचार्यः पूर्वरूपम् ( ४ ) ऋऋन्तेवास्युत्तररूपं विद्यासन्धिः प्रवचनं सन्धानम् इत्याधिविद्यम् ऋऋथाधिप्रजं माता पूर्वरूपं पितोत्तररूपं प्रजा सन्धिः प्रजननं सन्धानम् इत्याधिप्रजं ( ५ ) ऋऋथाध्यात्मम् ऋऋधराहतुः पूर्वरूपम् उत्तराहनुरुतररूपं वाक्सन्धिः जिह्वा सन्धानम् इत्यध्यात्मम् इतीमा महासंहिता य एवं वेत्ता महासंहिता

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

व्याख्यातारो वेद संधी यते प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनाध्येन स्वर्गेण लोकेन सन्धिराचार्ये: पूर्वरूपमित्याधि-

प्रजं लोकेन ॥ ६ ॥

इति तृतीयोऽनुवाक: ॥ ३ ॥

पदच्छेद: ।

सह, नौ, यशः, सह, नौ, ब्रह्मवर्चसम्, ऋथ, ऋत:, संहिताया:, उप-

निषदम्, व्याख्यातास्याम:, पद्यसु श्रधिकारेषु, श्रधिलोक्षम्, श्रधिज्यो-

तिषम्, ऋथ, श्राधिविधाम्, श्राधिप्रजम्, श्रध्यात्मम्, ता:, महासंहिता:, इति,

श्राचत्ते, ऋथ, श्रधिलोकम्, पृथिवी, पूर्वरूपम्, चो:, उत्तररूपम्,

आकाश:, सन्धि:, वायु:, सन्धानम्, इति, श्रधिलोकम्, ऋथे, श्रधि-

ज्योतिषम्, ऋग्नि:, पूर्वरूपम्, श्रादित्य:, उत्तररूपम्, आप: सन्धि:,

वैश्वानर:, सन्धानम्, इति, श्रधिज्योतिषम्, ऋथ, श्रधिविद्यम्, श्राचार्ये:,

पूर्वरूपम्, अन्तेवासि:, उत्तररूपम्, विधासन्धि:, प्रवचनम्, सन्धानम्,

इति, श्राधिविधाम्, ऋथ, श्राधिप्रजम्, माता, पूर्वरूपम्, पिता, उत्तर-

रूपम्, प्रजा, सन्धि:, प्रजननम्, सन्धानम्, इति, श्राधिप्रजम्, ऋथ,

श्रध्यात्मम्, ऋध्वर:, हनु:, पूर्वरूपम्, उत्तम:, हनु:, उत्तररूपम्, वाक्स-

न्धि:, जिह्वा, सन्धानम्, इति, श्रध्यात्मम्, इति, इमा:, महासंहिता:,

य:, एवम्, एता:, महासंहिता:, व्याख्यातार:, वेद, सन्धीयते, प्रजया,

पशुभि:, ब्रह्मवर्चसेन, ऋन्नाधेन, स्वर्गेण, लोकेन, सन्धि:, श्राचार्ये:,

पूर्वरूपम्, इति, श्राधिप्रजम् लोकेन ॥

पदार्थ-सहित |

सूक्ष्म भावार्थे ।

नामों-हीनों गुरू-शिष्य को

सह=साथ ही

यश:=यश

पदार्थ-सहित

सूक्ष्म भावार्थे ।

अस्तु-होवे

नौ=हम दोनों को

सह=साथही

ब्रह्मवर्चेसम्=ब्रह्म-तेज

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

भवतु=होवे श्रथातः=अब संहिताया:=वेद की उपनिषदम्=उपासना को पञ्चसु=पाँच श्राधिकरेषु=ज्ञानाश्रयों में व्याख्या } =हम व्याख्यान करेंगे स्यामः } श्रधिलोकम्=लोक-संबंधी उपासना श्रधिज्यो } =ज्योति-संबंधी उपासना तिषम् } श्रधिविद्यम्=विद्या-संबंधी उपासना श्रधिप्रजम्=प्रजा-संबंधी उपासना श्रध्यात्मम्=आत्म संबंधी उपासना ताः=इन पाँच ज्ञान-संबंधी उपासनाओं को महासंहिता:=महासंहिता इति=करके श्राचार्ये=श्राचार्य लोग आचक्षते=कहते हैं श्रथ=अब श्रधिलोकम्=लोक आश्रय उपा- सना को कथयामः=इम कहते हैं पृथिवी=पृथिवी पूर्वरूपम्=पूर्वरूप है द्यौः=स्वर्ग . उत्तररूपम्=उत्तर रूप है श्राकाशः=आकाश सन्धिः=सन्धि है वायुः=वायु

सन्धानमू=दोनों का मिलानेवाला है इति=इस प्रकार श्रधिलोकम्=श्रधिलोक उपासना है श्रथ=अब श्रधिज्यो } =ज्योतिष-विषयक तिषम् } कथयाम:=उपासना को कहते हैं श्राग्निः=अग्नि . पूर्वरूपम्=पूर्वरूप है श्रादित्यः=सूर्ये उत्तररूपम्=उत्तररूप है श्रापः=जल सन्धिः=सन्धि है वैद्युतः=बिजुली सन्धानमू=दोनों को मिलानेवाली है इति=इस प्रकार श्रधिज्यो } =ज्योति उपासना है तिषम् } श्रथ=अब श्रधिविद्यम्=विद्याश्रय उपासना को कथयामः=कहते हैं श्राचार्यः=श्राचार्य पूर्वरूपम्=पूर्वरूप है श्रन्तेवासी=शिष्य उत्तररूपम्=उत्तररूप है विद्या=विद्या सन्धिः=सन्धि है प्रवचनम्=वेद-शाखा का कथन सन्धानमू=मिलानेवाला है

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

इति=इस प्रकार

श्राधिविधिमू=विद्योपासना है

श्रथ=श्रव

श्राधिप्रजमू=प्रजा-विषयक उपासना को

कथयाम:=कहते हैं

माता=माता

पूर्वरूपमू=पूर्वरूप है

पिता=पिता

उत्तररूपमू=उत्तररूप है

प्रजा=सन्तति

सन्धिः=सन्धि है

प्रजननमू={ ऋतुकाल में स्वभावत:

को गर्भ-दान देना

सन्धानमू=सन्धान है

श्रर्थात् मिलाने वाला है

इति=इस प्रकार

श्राधिप्रजमू=प्रजाश्रय उपासना है

श्रथाऽऽत्मममू=श्रवण ग्रहण-संबंधी उपासना को

कथयाम:=कहते हैं

अधरा हनुः=नीचे का श्रोधर

पूर्वरूपमू=पूर्वरूप है

उत्तरा हनुः=ऊपर का श्रोधर

उत्तररूपमू=उत्तररूप है

वागूसन्धि:=वागी सन्धि है

जिह्वा=जिह्वा

सन्धानमू=मिलानेवाली है

इति=इस प्रकार

श्राध्यात्मममू=श्र. श्राश्रय उपासनादै

इति=ऐसी

इमा:=ये पाँच उपसना

महासंहिताः=महासंहिता करके कही

गरीं हैं

य:=जो

पचममू=इस प्रकार

पताः=इन

व्याख्याताः=कही हुईं

महासंधिता:=महासंहिताताओं को

वेद=उपासना करता है

स:=वह

प्रजया=सन्तति करके

पशुभिः=पशुओं करके

ब्रह्मवर्चसेन-=ब्रह्मतेज करके

श्रन्नाद्येन=श्रन्न धनादि करके

स्वर्गैः=स्वर्ग

लोकेन=लोक करके

सन्धीयते=युक् होता है

भावार्थ ।

शिक्षामिति । पूर्वोक्त शान्तिपाठ के करने से जो विघ्नों की शान्ति होती है, उसकी प्रार्थना कीगई है; श्रनु विद्या श्रैर उसके फल की उत्कर्ष्रता के लिये शिष्य प्रार्थना करता है, हमारी श्रैर गुरु श्राचार्य्य की उपासना करके जगत् में कीर्ति हो, श्रौर हम दोनों के मुख की वाक् त ब्रह्म

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

तेज करकै हो ॥ ऋथेति ॥ जो वर्षावेद की उपासना पाँच प्रकार की है, उश्को ऋथ हम कहते हैं ॥ पृथिवी ऋादिक लोकों को ध्येय-रूप करके देखना, जिससे चित्त की एकाग्रता होती है, वह ऋधिलोक-संबंधी ( १ ) उपासना है ॥ चित्त की एकाग्रता के लिये जो ऋग्नि, सूर्य, चन्द्रमा षादि की ज्योतियों का ध्यान करना है, वह ज्योति-संबंधी ( २ ) उपासना है ॥ विद्या की प्राप्ति के लिये जो ऋाचार्य का ध्यान करना है, वह विद्या-संबंधी ( ३ ) उपासना है ॥ माता-पिता का जो चिन्तन करना, ध्यान करना है, वह प्रजा-संबंधी ( ४ ) उपासना है ॥ ऋात्मा शब्द देह का भी वाचक है, देह के ऋवयवों के विषय में जो ध्यान करना है, वह ऋध्यात्म-संबंधी ( ५ ) उपासना है ॥ यह उपासना पाँच विषयोंवाली महासंहिता ऋर्थात् महोपनिषद् कही जाती है ॥ संहिता के विषय जो लोक हैं, वह बड़े-बड़े हैं इसी वास्ते संहिता को भी वेद के वेत्ता महासंहिता कहते हैं, और ऋधिलोकादि पाँच संहिता के पाँच ऋवयव हैं, सबसे पहले ऋधिलोक है, इसलिये प्रथम ऋधिलोक की उपासना को कहते हैं ॥

उपासना में चार भाग रख्खे हैं ( १ ) पूर्व ( २ ) उत्तर ( ३ ) सन्धि ( ४ ) सन्धान, इनका ध्यान एक दूसरे के बाद करना चाहिये । संहिता का पूर्वरूप ऋर्थात् पूर्वभाग पृथिवी है, याने पहले पृथिवी में दृष्टि करे और कोई लोक पृथिवी शब्द करके पृथिवी ऋभिमानी देवताओं का प्रहुआ करते हैं, उनके मत में पृथिवी ऋभिमानी देवता में दृष्टि करनी कही है, क्योंकि जड़ की उपासना को वे नहीं मानते हैं, और संहिता के उत्तर-भाग में याने बाद को स्वर्गलोक का ध्यान करे, और संहिता के पूर्वोत्तर भागों की जो संधि याने मध्य देश है उसमें ऋन्तरिक्ष लोक की दृष्टि करे, संहिता के पूर्वोत्तर भागों का चिन्तन किया जावे जिस करके, उसका नाम

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सन्धान है; वही पूर्व और उत्तरभागों को मिलाता है, स्वर्ग और पृथिवी का मिलानेवाला वायु है, इसका ध्यान सबके पीछे करना चाहिये, इस प्रकार संहिता की श्रधिलोक विषयक उपासना कही है, अब श्रधिज्योति विषयक उपासना को कहते हैं-महासंहिता का पूर्वभाग श्रग्नि है, याने पहले श्रग्नि का ध्यान करे, और फिर श्रादित्यं श्रर्थात् सूर्य का जो उत्तरभाग है ध्यान करे, और फिर दोनों भागों की सन्धिरूप जो जल है, उस जल का ध्यान करे, उन दोनों को मिलानेवाली विद्युत सन्धान है, उसका ध्यान करे, यह श्रधिज्योति विषयक उपासना है। अब विद्या-विषयक उपासना को कहते हैं ॥ आचार्य पूर्वरूप है, श्रर्थात् प्रथम श्राचार्य का ध्यान करे, और शिष्य सहितता का उत्तररूप है, इसलिये महासंहिता के उत्तरभाग में शिष्य दृष्टि करे, और विद्या का प्रतिपादक जो ग्रंथ है वह संधि है, दोनों भागों की संधि में विद्या का ध्यान करे।। और-ग्रन्थ का जो श्रध्ययन है वह सन्धान स्वरूप है, उसमें भी शिष्य ध्यान करे यह विद्या-विषयक उपासना है ॥ ३ ॥ इति तृतीयोऽनुवाकः ॥ ३ ॥

मूलम् ।

यज्ञेन कल्पस्सम्भो विश्वरूपः हुत्द्रोग्योऽधयोमृततस्त्स-म्भूय स मेन्द्र्रो मेधया स्पृणोतु श्रमृतस्य देवधारणो भूयासम् शरीरं मे विचर्षणाम् जिह्वा मे मधुमत्तमा कर्षाभ्ष्याम् भूरिबिश्वुम् ब्रह्मणा: कोशोऽसि मेधयापि-हितः शुनं मे गोपाय श्रावहन्ती वितन्वाना ( ७ ) कुर्वाणाचिर मातमनः वासांसि मम गावश्च श्रन्नपाने च सुवेदा तत्तो मे श्रियमावह लोहम्शा पशुभिः सह स्वाहा श्रामायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा दमायन्तु ब्रह्म-

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शारिरा: स्वाहा शमायन्तु ब्रह्मचारिरा: स्वाहा ( ट ) यशो जनेऽसाने स्वाहा श्रेयान् वस्यसोऽसानी स्वाहा तन्त्वा भग प्रविशानि स्वाहा स मा भग प्रविश स्वाहा तस्मस्तु सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा यथाSSप: प्रवतायन्ति यथा मासा अहर्जरम् एवं मां ब्रह्मचारिषो धन्तरायन्तु सर्वत: स्वाहा प्रतिेशोऽसि प्रमाभाहि प्रमथ पद्यस्व ॥ ९ ॥

इति चतुर्थोंऽनुवाक: ॥ ४ ॥

पदच्छेद: ।

य:, छुन्दसाम्, ऋषभ:, विश्वरूप:, छुन्दोऽभ्य:, स्वाधि, ऋमृतात्, सम्बभूव, सं:, मा, इन्द्र:, मेधया, स्पृणोतु, ऋमृतस्य, देव, धारणा:, भूयासम्, शरीरम्, मे, विचर्षणाम्, जिह्वा, मे, मधुमत्तमा, करणाभ्याम्, भूरिविश्ववम्, ब्रह्मणा:, कोश:, ऋसि, मे, मेधया, ऋपिहित:, श्रुतम्, मे, गोपाय, ग्रावहन्ती, वितन्वाना, कुर्वाणा, ऋचिरम्, ऋआत्मन:, वासांसि, मम, गाव:, च, ऋन्नपाने, च, सर्वदा, तत्:, मे, श्रियं, ऋआवह, लोमशाम्, पशुभि:, सह, स्वाहा, ग्रामायन्तु, ब्रह्मचारिरा:, स्वाहा, प्रमायन्तु, ब्रह्मचारिरा:, स्वाहा, दमयन्तु, ब्रह्मचारिरा:, स्वाहा, शमायन्तु, ब्रह्मचारिरा:, स्वाहा, यश:, जने, ऋसानी, स्वाहा, श्रेयान्, वस्यस:, ऋसानी, स्वाहा, तम्, त्वा, भग, प्रविशानि, स्वाहा, स:, मा, भग, प्रविश, स्वाहा, तस्मिन्, तु, सहस्रशाखे, नि, भग, ऋहम्, त्वयि, मृजे, स्वाहा, यथा, आप:, प्रवतायन्ति, यथा, मासा:, ऋहर्जरम्, एवम्, माम्, ब्रह्मचारिष:, ऋधात:, ऋआयन्तु, सर्वत:, स्वाहा, प्रतिेश:, ऋसि, प्रमाभाहि, प्रमथ, पद्यस्व ॥ ४ ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

ध्यायः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

यः = जो प्रयाव छन्दसाम् = वेदों विषे ऋषभः = श्रेष्ठ च = और विश्वरूपः = सर्वव्यापी-रूप प्रास्ति = है च = और यः = जो ग्राभिश्रमृतात् = श्रमित रूप हुद्रोभ्यः = वेदों से सम्भूव = उत्पन्न हुग्रा है सः = वह प्रयाव इन्द्रः = सर्वकामना का स्वामी ईश्वर मा = मुझको मेधया = प्रज्ञा करके स्पृणोतु = बत्तलानू करे देव = हे देव !

ग्रमृतस्य = ब्रह्म-ज्ञान का धारयाः = धारणा करनेवाला भूयासम् = होऊँ मैं मे = मेरा शरीरम् = देह विचर्षणाम् = ब्रह्मज्ञानधारणायोग्य भूयात् = होवे मे = मेरी जिह्वा = जिह्वा मधुमत्तमा = प्रास्त्रुत मधुर भाषण करनेवाली

ध्यायः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

भूयात् = होवे श्रद्धम् = मे कऱ्याभ्याम् = दोनों कयौं करके भूयः = बहुत विश्ववम् = सुननेवाला भूयासम् = होऊँ त्वम् = तू मेधया = लौकिक बुद्धि करके ग्रापिहितः = ढका हुग्रा ग्रक्षयः = परब्रह्म का कोशः = कोश ग्रास्ति = है मे = मेरे शृतम् = सुने हुये ग्रास्म-ज्ञान को गोपाय = तू रक्षा कर यः = जो श्रीः = श्री ग्रचिरंकुवोष्य = जल्दी करती हुई ग्रर्थान्त शीघ्र

मम = मेरे ग्रात्मनः = शरीर के लिये वासांसि = वस्रों को + च = और गावः = गौवों को + च = और ग्रश्वानेः = खाने पान को च = और

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१६

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

लोमशाम् = { वाक्‌चञ्चाला धन प्रर्थात् प्राज, व्रधि (बकरी, भेड़ी) इत्यादिकोंको पशुभिः = अश्व गौादि पशुओं सहित सह = सहित आवहन्ती = सब ओर से आती हुई + च = और चितन्वाना = विस्तार करती हुई याने बढ़ती हुई भवति = होती है तत् = सो हे इन्द्र = ग्रहो प्रयाव ! ततः = बुद्धि-ध्यानदि के परचान्त त्वम् = तू मे = मेरे प्रर्थ पवम् = ऐसी श्रियं = यागादि समर्ध लक्ष्मी को श्रावह = प्राप्त कर श्रत = इस लिये ते = तेरे प्रर्थ स्वाहा = यह हविद्राँ है + च = और ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोक मा = मेरे पास श्र्रायन्तु = श्रावें श्रत = इस विये ते = तेरे प्रर्थ

स्वाहा = यह हविदाँ है ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारी मा = न वियन्त = चले जावें श्रतः = इसलिये ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविदाँ है ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारी विद्यां = विद्या को प्रामयन्तु = प्राप होवें श्रत = इसलिये ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविदाँ है ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारी दमयन्तु = { दमनको प्राप होवें, ग्रर्थात् इन्द्रियों का निग्रह करें श्रत = इसलिये ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविदाँ है ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारी शामयन्तु = शान्ति को प्राप होंवें श्रत = इसलिये ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविदाँ है + च = और

महं = मैं जन = लोक विष यशः = यशस्वी भ्रसानि = होऊँ श्रत = इसलिये

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ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविर्दान है वस्यसः = और धनावान् से भी श्रेयान् = श्रेष्ठ श्रसानि = मैं होऊँ श्रत: = इसलिये ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविर्दान है भग = हे प्रभव-रूप भगवन् ! तम् = उस त्वाम् = तुफ विशेषे प्रविशानि = मैं प्रवेश करूँ श्रत: = इसलिये ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविर्दान है भग = हे प्रभकाररूप भगवन् ! सः = सो त्वम् = तू मा = मुफ बिपे प्रविश = प्रवेश कर श्रत: = इसलिये ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविर्दान है भग = ब्रह्मो भगवन् ! सहस्रशाखे = बहु शाखावाले तस्मिन् = उस त्वसि = तेरे विशेषे श्रहम् = मैं पापकृत्याम् = अपने पापकर्म को निमृजे = शोधन करूँ

श्रत: = इसकिये ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविर्दान है धात: = हे सर्वे विधाता ! हे जगत् कर्त्ता ! यथा = जैसे श्राप: = जल प्रवत्ता = ढालवाले देश करके यन्ति = बहते हैं च = और यथा = जैसे मासा: = चैत्रादि मास श्रहर्जरम् = संवत्सर को श्रर्थात वर्ष को यन्ति = प्राप्त होते हैं पचम् = इसी प्रकार ब्रह्मचारिया: = ब्रह्मचारी लोक माम् = मुफ प्रति याने मेरे पास सर्वतः = सब ओर से श्रायन्तु = श्रावें श्रत: = इसलिये ते = तेरे श्रथे स्वाहा = यह हविर्दान है यत: = चूँकि त्वम् = तू प्रतिवेश: = { उपासकों के पाप { श्रौर दुःख के पूरे करने का स्थान है तस्मात = इस लिये त्वम् = तू

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१ =

तैत्तिरीयो उपनिषद् ।

'मा = मुख् उपासक के प्रति | माम् = मुभे प्रपद्य = स्वामभाव को प्राप्त च = श्रौर कर ॥

प्रभाधि = प्रकाश हो भावार्थ ।

यशोऽनन्द सामिति । जो पुरुष बुद्धिहीन है, उसकी सुना हुया ग्रंथ का अर्थ विस्मरएा होजाता है इसलिये उसकी बुद्धि में ब्रह्म-विद्या का उदय होना असम्भव है, उसको शुद्ध बुद्धि की प्राप्ति के लिये प्रएाव की उपासना करनी कही है, सो दिखाते हैं ॥ यः ॥ ॐ जो वेदों में श्रेष्ठ है और अमृतरूप है, सो मुख् उपासक की बुद्धि को स्पर्श करे, अ्रर्थात् मेरी बुद्धि में विद्या के प्रवेश करने की सामर्थ्य को देवे, ताकि मैं ब्रह्म-ज्ञान का धारएा करनेवाला होऊँ और मेरी देह ब्रह्म-ज्ञान के धारएा करने-योग्य होवे और मेरी जिह्वा मधुर भाषा करनेवाली हो,

हे प्रएावदेव ! तू विश्वरूप है, अर्थात् सम्पूर्ण जगत् तेरा ही रूप है, और तू वागियों का ग्रन्तर्भाव होने से सम्पूर्ण वागी-रूप भी है, तू इन्द्र है अर्थात् परमेश्वर है, हे दीसिमन्, प्रएाव ! मोक्ष का साधनभूत जो ज्ञान है, उसका मैं धारएा करनेवाला होजाऊँ और मेरा जो शरीर है सो रोगों से रहित हो और मेरी जिह्वा अतिशय करके मधुर भाषा करनेवाली हो और मेरे कानों में वेद के श्रवएा करने की सामर्थ्य हो, हे प्रएाव ! ब्रह्म परमात्मा का तू कोष है अर्थात् परमात्मा की उपलब्धि का तू स्थान है और अलौकिक प्रज्ञा करके तू ग्राह्लादित है, इसलिये सामान्य बुद्धिवाले तुभको नहीं जान सकते हैं, विशेष बुद्धिवाले ही पुरुष तुभको जान सकते हैं, मेरे श्रवएा किये हुये

ग्रात्म-ज्ञान की तुम रक्षा करो ॥ श्रावहन्तीति ॥ बुद्धि की प्राप्ति की कामनावाला जो पुरुष है, उसके श्री की प्राप्ति के लिये होम-मन्त्रों को अब लिखते हैं ॥ श्रावहन्तीति ॥ हे प्रएाव ! हे परमेश्वर ! जो श्री

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तैत्तिरीयोपानिषद् ।

१६

मुफ्त उपासक के लिये वत्स, बकरी, गौवें और अन्न पानादिक को शीघ्र प्राप्त करती है और प्राप्त द्रव्यों को विस्तार करती है, उसी को मेरे प्रति तुम प्राप्त करो, हे प्रभाव ! बुद्धि की प्राप्ति के पश्चात् तू मेरे अर्थ योगादि के लिये लक्ष्मी प्राप्त कर इसी लिये यह हविदान है और ब्रह्मचारी लोग शान्तचित्त होते हुये मेरे पास आवें और चले न जावें इसलिये यह हविदान तेरे प्रति है, और लोक में यश को प्राप्त होऊँ और धनवान् होऊँ या उससे भी श्रति श्रेष्ठ होऊँ इसलिये यह हविदान तेरे अर्थ है; हे प्रभावरूप, परमात्मन् ! मैं तेरे में और तू मेरे में प्रवेश करे, और तेरे स्पर्श से मेरे सत्र पाप नाश हो जावें, इसलिये यह हविदान तेरे वास्ते है ॥ यथेति ॥ जैसे जलकृपया नदियाँ नीचे के देश में गमन करती हैं और जैसे चैत्रादिक मास दिनों के सहित संवत्सर के अन्तर्भूत होजाते हैं, वैसे, हे सम्पूर्ण जगत् के कर्त्ता ! मुफ्त आचार्य को ब्रह्मचारी शिष्य चारो दिशाओं से प्राप्त हों अर्थात् मेरे गृह में प्रवेश करें इसलिये तेरे अर्थ यह हविदान है, हे प्रभावदेव !. तू उपासकों के पाप और दुःख दूर करने का स्थान है इसलिये मेरी प्रार्थना है कि तू मुफ्त उपासक के प्रति प्रकाशमान हो और मुफ्त आत्मभात्र को प्राप्त कर ॥ ७-६ ॥

इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

मूलम् ।

भूःशुवः स्वरिति वा एतास्विस्रो व्याहृतयः तासा-मु ह स्मेतां चतुर्थीं महाचमस्यः प्रवेदयते मह इति तद्विदुः स आत्मात्मज्ञान्यन्या देवताः भूरिति वा अयं लोकः

भुव इत्यन्तरिक्षम् स्व इत्यसौ लोकः मह इत्यादित्येन बाव सर्वे लोका महीयन्ते भूरिति वा अग्निः भुव इति वायु-रित्यन्तरिक्षम् स्व इत्यसौ लोकः मह इति वायु-स्वरित्या-यन्ते भूरिति वा ऋग्वेदो भुव इति यजु-रिति सामवेदः स्व इति अथर्ववेदः मह इति ब्रह्म स्वरित्यादित्येन बाव सर्वे वेदा महीयन्ते भूरिति प्राणो भुव इत्यापानः स्व इति व्यानः मह इत्यन्नमन्ने ह स्मैतां चतुर्थीं प्राणाः स्वरित्यादित्येन बाव सर्वे प्राणा महीयन्ते यत्तदेताभ्यां व्याहृतिभ्यां परं तद्विद्वांसो मह इति चतुर्थीमुपासते ॥ १० ॥

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२०

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

दित्यः मह इति चन्द्रमाः चन्द्रमसा वाच सर्वाणि ज्योतींषि महीयन्ते भूरिति वा ऋचः ऋगिति सामानि स्वरिति यजूंषि ॥ ११ ॥

मह इति ब्रह्म ब्रह्मणा वाच सर्वे वेदा महीयन्ते भूरिति वै प्राणः भुव इत्यपानः स्वरिति व्यानः मह इत्यन्नम् ऋन्नेन वाच सर्वे प्राणाः महीयन्ते ता वा एत- र्चतस्रश्चतुर्द्री चतस्रो व्याहृतयः ता यो वेद स वेद ब्रह्म सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ऋसौ लोको यजूंथ्सि वेद द्रे च ॥ १२ ॥

ईत्थं पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।

भूः, भुवः, स्वः, इति, वै, एता:, तिस्रः, व्याहृतयः, तासाम्, उ, ह, स्म, एताम्, चतुर्थीम्, महाचमस्यः, प्रवेदयते, महः, इति, तत्, ब्रह्म, सः, आत्मा, ऋज्ञानि, ऋन्या:, देवताः, भूः, इति, वै, ऋयम्, लोकः, भुवः, इति, ऋन्तरिक्षम्, स्वः, इति, ऋसौ, लोकः, महः, इति, ऋआदित्यः, ऋआदित्येन, वाच, सर्वे, लोकाः, महीयन्ते, भूः, इति, वै, ऋग्निः, भुवः, इति, वायु:, स्वः, इति, ऋआदित्यः, महः, इति, चन्द्रमाः, चन्द्रमसा, वाच, सर्वाणि, ज्योतींषि, महीयन्ते, भूः, इति, वै, ऋचः, भुवः, इति, सामानि, स्वः, इति, यजूंषि, महः, इति, ब्रह्म, ब्रह्मणा, वाच, सर्वे, वेदाः, महीयन्ते, भूः, इति, वै, प्राणः, भुवः, इति, ऋपानः, स्वः, इति, व्यानः, महः, इति, ऋन्नम्, ऋन्नेन, वाच, सर्वे, प्राणाः, महीयन्ते, ताः, वै, एता:, चतस्रः, चतुर्द्री चतस्रो व्याहृतयः, तासाम्, वै, एता:, चतस्रः, चतुर्धी चतस्रो व्याहृतयः, ता:, यः, वेद, सः, वेद, ब्रह्म, सर्वे, ऋस्मै, देवाः, बलिम्, ऋआवहन्ति, ऋसौ, लोकः, यजूंथ्सि, वेद, द्रे, च ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

अन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

भूः = भूः भुवः = भुवः स्वः = स्वः इति = इस प्रकार पताः = ये तिस्रः = तीन व्याहृतयः = व्याहृति वै = प्रसिद्ध हैं तासाम् = उन तीनों की इयम् = यह चतुर्थी = चौथी व्याहृतिः = व्याहृति महः इति = महः करके प्रसिद्ध है पताम् = इस चतुर्थी = चौथी महः = महः इति = व्याहृति को महाचमस्यः = महाचमस्य नामक ऋषि

उहरसम् = अनेक प्रकार प्रवेदयते = जानता भया तत् = वह व्याहृति ब्रह्म = ब्रह्म-रूप है सः = वह महः रूप ब्रह्म आत्मा = देवता आदि का शारीर-भूत है अन्याः = प्राण देवताः = देवता आदि तस्य = उस महर्ब्रह्म के

अन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

श्रद्धानः = श्रवण-भूत हैं श्रयम् = यह मनुष्य लोकः = लोक भूः = भूः इति = करके वै = प्रसिद्ध है भुवः = भुवः इति = करके वै = प्रसिद्ध है अन्र्तिक्षम् = अन्र्तरिक्ष लोक वै = प्रसिद्ध है स्वः = स्वः इति = करके असौ = स्वर्ग लोकः = लोक वै = प्रसिद्ध है महः = महः इति = करके आदित्यः = सूर्य लोक वै = प्रसिद्ध है

आदित्येन = सूर्य से वाव = ही सर्वे = सब लोकाः = भूरादि लोक महीयान्ते = बृद्धि को प्राप्त होते हैं प्राणाः = प्राणादि देवता भूः = भूः इति = करके वै = प्रसिद्ध है

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

वायु:=वायु देवता

भुव:=भुव:

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

आदित्य:=सूर्यदेवता

मही=मह:

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

चन्द्रमाः=चन्द्रमा देवता

स्व:=स्वः

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

भाव=निश्चय करके

सर्वांषि=ये सब

ज्योतींषि=ज्योतिष्कोंक

चन्द्रमाः=च=द्रमाः करके

महीयान्ते=वृद्धि को प्राप्त होते हैं

ऋच:=ऋग्वेद

भू:=भूः

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

सामानि=सामवेद

भुव:=भुवः

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

यजूंषि=यजुर्वेद

स्व:=स्वः

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

ब्रह्म=प्रणव

मह:=महः

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

इति=करके प्रसिद्ध हैं

ब्रह्मणा=प्रणवान से

वाच:=ही

सर्वे=सब

वेदा:=वेद

महीयान्ते=वृद्धि को प्राप्त होते हैं

प्राण:=प्राणवायु

भू:=भूः

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

अपान:=अपानवायु

भुव:=भुवः

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

व्यान:=व्यान-वायु

स्व:=स्वः

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

अन्नम्=अन्न

मह:=महः

इति=करके

वै=प्रसिद्ध है

अन्नेन=अन्न से

वाव=ही

सर्वे=सब

प्राणाः=प्राणभूत जीव

महीयान्ते=वृद्धि को प्राप्त होते हैं

ते=वे

पताः=वे

चतस्रः=चार

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

यः ह्याहतयः = व्याहृतियँँ चतस्रः = प्रत्येक चार-चार हो चतुर्धाः = चार प्रकार की भवन्ति = होती हैं यः = जो ताः = पूर्वोक्त व्याहतियों को वेद = जानता है

सः = सो ब्रह्म = ब्रह्म को वेद = जानता है यस्मै = इस ब्रह्मवेत्ता के प्रथं देवा: = श्रृंगभूत देवता बलिम् = भागधर्मं यानी द्विराज को आवहन्ति: = सब तरफ से लाते हैं ॥

भावार्थ ।

भूःवः स्वारिति । भूर्भुवः स्वः, इस प्रकार ये तीन व्याहतियाँ हैं उन तीन व्याहतियों से पृथक् एक महाव्याहति है, महाचार्य मस्य ग्राचार्य इसको भली प्रकार जानते थे, वह ब्रह्मरूप है, वही देवलोक और वेदादि का शरीर है, और जितने देवता और लोक श्रथवा प्राण हैं, वे सब इस महाव्याहति के ही श्रंग हैं, इसी को दिखाते हैं, भूः करके प्रत्यक्ष का विषय पृथ्वीलोक है श्रर्थात् यह जो प्रत्यक्ष का विषय पृथ्वीलोक है उसी का नाम भूः है, और भुवः करके ग्रन्तरिक्षलोक है, और स्वः करके स्वर्गलोक है, सूर्य करके ही पृथ्वीलोक, ग्रन्तरिक्षलोक, और स्वर्गलोक प्रकाशित होते हैं, इसी वास्ते इस महः व्याहति को श्रादित्यरूप कहते हैं, भूः व्याहति श्रग्नि रूप है, इसमें श्रग्निदेवता की दृष्टि को करे, भुवः व्याहति वायुरूप है, इसमें वायुदेवता की दृष्टि को करे, और स्वः व्याहति सूर्यरूप है, इसमें सूर्यदेवता की दृष्टि को करे, और महः व्याहति चन्द्रमारूप है, इसमें चन्द्रदेवता की दृष्टि को करे, यह सम्पूर्ण ज्योतिलोंक चन्द्रमा करके वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥ भूरिति ॥ ऋषि उन्हीं व्याहतियों में वेददृष्टि को विधान करते हैं ॥ ऋग्वेद में भूः दृष्टि करे, साम में भुवः दृष्टि करे, यजुर्वेद में स्वः दृष्टि करे और ब्रह्म में महः दृष्टि करे,

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

अर्थात् ओंकारे दृष्टि करे, तात्पर्य यह है कि भूः को ऋग्वेद करके जाने, भुवः को सामवेद करके जाने, स्वः को यजुर्वेद करके जाने, और महः को ब्रह्मरूप या ओंकाररूप करके जाने, उन्हीं व्याहतियों में अब प्राणादि दृष्टियों के विधान को करते हैं ॥ भूरीरिति ॥ भूः व्याहति प्राणारूप है, अर्थात् भूः में उपासक प्राण-दृष्टि को करे, भुवः में अपान-दृष्टि को करे, स्वः में व्यान-दृष्टि को करे, और महः में अन्न-दृष्टि को करे, क्योंकि अन्न के भोजन करने से ही सम्पूर्ण प्राण अपानादि तृप्ति को प्राप्त होते हैं, बिना अन्न के प्राण अपानादिक सूख जाते हैं ॥ ता इति ॥ भूः भुवः, स्वः, महः ये जो चार व्याहतियाँ हैं, इनमें से एक एक व्याहृति प्रकार को होने से षोडश ( सोलह ) भेद इनके बन जाते हैं, इन्हीं सोलहों का नाम षोडश कला भी है, इन्हीं के सम्बन्ध से पुरुष जीवात्मा भी षोडश कलात्मा कहा जाता है, वह जो व्याहतियों की उपासना को करता है, और उनकी उपासना को जानता है, वह ब्रह्म को ही जानता है, और ब्रह्म को ही प्राप्त होता है, उस उपासक के प्रति सम्पूर्ण देवता बलि को प्राप्त करते हैं ॥ १०-१२ ॥

इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

मूलम् ।

स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः अमृतो हिरण्मयः । अन्रतरेषु तालुके य एष स्तन इवावलम्बते सेन्द्रयोनिः यत्रासौ केशान्तो विर्व-तस्ते व्यपोह्य शीर्षकपाले भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति भुव इति वायौ ॥ १३ ॥

स्वरित्यादित्ये मह इति ब्रह्मणि श्रामोति स्वाराज्यम् प्राणमोति मनस्पतिम् वाक्पतिरश्चक्षुष्पतिः श्रोत्रपतिः

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विज्ञानपति: एतत्तदो भवति श्राकाशशरीरं ब्रह्म सत्याम्प्राणारामं मन श्रानन्दं शान्तिसमृद्धममृतम् इति प्राचीनयोग्योपास्व वा यावमृतमेकं च ॥ १४ ॥

इति षष्ठोऽनुवाक: ॥ ६ ॥

पदच्छेद: ।

स:, य:, एष:, श्रन्तर्हृदये, श्राकाश:, तस्मिन्, श्रयम्, पुरुष:, मनोमय:, श्रमृत:, हिरण्मय:, श्रन्तरेा, तालुके, य:, एष:, स्तन:, इव, श्रवलम्बते, स:, इन्द्रियोनि:, श्रत्र, श्रसौ, केशान्त:, विवर्तते, व्यपोह्य, शीर्षकपाले, भू:, इति, श्रग्नौ, प्रतितिष्ठति, भव:, इति, वायौ, स्व:, इति, श्रादित्ये, मह:, इति, ब्रह्माणि, श्रामोति, स्वाराज्यम्, श्रामोति, मनसस्पतिम्, वाक्पतिम्, चक्षुष्पतिम्, श्रोत्रपति:, विज्ञानपति:, एतत्तद:, भवति, श्राकाशशरीरम्, ब्रह्म, सत्याम्प्राणारामम्, मन:, श्रानन्दम्, शान्तिसमृद्धम्, श्रमृतम्, इति, प्राचीनयोग्य, उपास्व, वायौ, श्रमृतम्, एकम्, च ॥

श्रन्वय: । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

श्रन्तर्हृदये={ हृदय के मध्य बिषे जो उद्ध्वं नाल श्रधोमुख कमलाकारमांसपिण्ड प्रसिद्धहै, उसके भीतर जो श्राकाश है }

तस्मिन्=तिस बिषे

य:=जो

एष:=यह

पुरुष:=पुरुष है

स:=सो

मनोमय:={विज्ञान-रूप मन करके प्राप्त होने योग्य है

श्रयम्=यह

श्रमृत:=मरत्न-रहित

हिरण्मय:=ज्योति:स्वरूप

प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित है

तत्प्राप्तिय:=उसकी प्राप्ति के लिये

या=जो

हृद्यात्‌=हृदयं से

श्रन्वय: । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

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२६

तैत्तिरीयोपनिषद्

प्रधृत्ता=श्रारंभ हुईं सुषुम्ना=सुषुम्ना योगशास्त्र में प्रसिद्ध नाडी=नाडी मस्ति=है च=और तालुके=दोनों तालुओं के प्रान्तरेषा=बीच में यः=जो पृष्ठः=यह स्तनः=स्तन यानी घन इव=सा प्रघनमवते=लटकता है तस्य=उसके प्रान्तरेषा=मध्य विशेषे गत्वा=निकल कर यत्र=जहाँ प्रसौ=प्रसिद्ध केशान्तः=केशमूल वत्तते=वर्तमान है अर्थात् जो ब्रह्म-रन्ध्र है तत्र=वहाँ पर शीर्षेकपातेः=शीर्षकपालों को व्यपोह्या=विदारकर विनिर्गताः=निकली है सा=सो नाडी इन्द्रियोनिः=ब्रह्म-प्राप्ति का मार्ग है पंचविधान=इस मंडल का ज्ञाता भुः=भूः व्याहृति इति=करके

अग्नौ=अग्नि विशेषे प्रतितिष्ठति= { स्थित होता है अर्थान् श्रग्निवत तेजस्वी और ध्यापक होता है } भुवः=भुवः व्याहृति इति=करके वायौ=वायु विशेषे प्रतितिष्ठति=स्थित होता है स्वः=स्वः व्याहृति इति=करके श्रादित्ये=सूर्य विशेषे प्रतितिष्ठति=स्थित होता है महः=महः व्याहृति इति=करके ब्रह्मणि=ब्रह्म विशेषे प्रतितिष्ठति=स्थित होता है च=और अन्र्ते=अन्न्त में स्वाराज्यम्=स्वाराज्य को प्रामोति=प्राप्त होता है तदन्तः=उसके पीछे सु:=वह मनस्पतिमू=सर्वे मनोमय भाव को प्रामोति=प्राप्त होता है च=और वाक्पतिः=सर्व वाणी का पति भवति=होता है चतुष्पितिः=संपका दृष्टा भवति=होता है

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तैत्तिरीयोपनिषद्‌ ।

श्रोत्रपति:=सर्वका श्रोता भवति=होता है

विज्ञानपति:=सर्वका जाननेवाला भवति=होता है

एतत्‌तद्‌:=सर्व रूप भवति=होता है

च=और

वै=निश्चय से

श्रेम

आकाश- शरीरम्‌ = { आकाशवत्‌ सूक्ष्म शरीर है जिसका

सत्यात्म=सत्य रूप है आत्मा जिसका

प्राणारामम्‌=प्राणों को सुख- स्थान है जो

मनग्रानन्दम्‌=मन का आनन्द वदानेवाला है जो

शान्तिसमृद्धम्‌=शान्ति करके पुष्ट है जो

अमृतम्‌=अमरत्व-धर्म- रहित है जो

इति ब्रह्म=ऐसा ब्रह्म है

प्राचीनयोग्य= { ब्रहो प्राचीन योग्य नामक

शिष्य

तत्‌=उसको

त्वम्‌=तू

उपास्स्व=उपासना कर ॥

भावार्थ ।

पाँचवें ऋनुवाक में अंगों की उपासना कही गई है, अब इस छठे ऋनुवाक में अंगी ब्रह्म है, उसकी उपासना को कहते हैं, ब्रह्म का स्वरूप कैसा है, सो कहते हैं—

स य इति । इस स्थूल-शरीर के अन्‍तर अंगुष्ठ- प्रमाणवाला हृदय है, उसके भीतर जो आकाश है, वह भी उपाधि के परिच्छेद करके अंगुष्ठ प्रमाणवाला कहा जाता है, उस आकाश के अन्‍तर जो आत्मा है, वह भी उपाधि के परिच्छेद से अंगुष्ठ प्रमाणवाला ही कहा जाता है, जैसे घट और उपाधि करके आकाश भी घटाकाश कहा जाता है, जैसे आकाश व्यापक है, वैसे आत्मा भी व्यापक है, वह जो हृदय के अन्‍तर आकाश है, उस आकाश के भीतर यह पुरुष-रूप आत्मा स्थित है, भूः आदि लोक जिस करके पूर्ण हों, उसका नाम पुरुष है; यद्यपि वह सर्वत्र स्थित है तथापि उसकी उपलब्धि का स्थान हृदय ही है, क्योंकि मन के निरोध करने से ही आत्मा का साक्षात्कार

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होताँ है, वह आत्मा मनोमय है, अर्थात् ज्ञान-स्वरूप है, क्योंकि मनन करने का नाम मन है, और मनन नाम ज्ञान का है, और मय शब्द का अर्थ स्वरूप है, तब मनोमय का अर्थ ज्ञान-स्वरूप हुग्रा, वही आत्मा है, वही मरण-धर्म्म से रहित है, वह प्रकाश-स्वरूप है, इतना कह करके उपास्य जो ब्रह्म है, उसके स्वरूप को दिखलाया है, अब उपासक को ब्रह्मलोक की प्राप्ति के लिये मार्ग-विशेष को कहते हैं, और तालु के बीच में स्तन के तुल्य एक मांस का टुकड़ा लटकता है, उसके समीप सुषुम्ना-नाड़ी ऊर्ध्व को गई है, उसी सुषुम्ना नाड़ी का नाम इन्द्र-योनि है, अर्थात् वही ब्रह्म-लोक की प्राप्ति का मार्ग है, उसी नाड़ी द्वारा ऊपर ब्रह्म-लोक को गमन करता हुग्रा उपासक मोक्ष को प्राप्त होता है, क्योंकि वह नाड़ी शीर्ष कपाल को भेदन करके ब्रह्म-लोक में गई है, उसी नाड़ी द्वारा वह उपासक ब्रह्म-लोक को गमन कर जाता है ॥

ब्रह्म-लोक की प्राप्ति को कह करके अब उपासक की फल की प्राप्ति को कहते हैं—

भरिति। "भूः" यह जो व्याहृति-रूप ग्राग्नि है, वही इस लोक का ग्राधिष्ठाता है, उसमें व्यष्टिरूपिणी ग्रग्नि व्याप्त होती है, और "भुवः" यह जो दूसरी व्याहृति-रूप वायु है उसमें व्यष्टिवायु ग्रन्तरिक्षलोक को व्याप्त करके स्थित है, और " स्वः " यह जो तीसरी व्याहृति है, सो ग्रादित्य-रूप है; उसने तीनों लोकों को ग्रपने तेज करके ढक रखा है, और "महः" यह जो चौथी व्याहृति है, वह ब्रह्मरूप है; इसमें तीनों व्याहृतियाँ स्थित हैं, और इसका उपासक स्वराजभाव को प्राप्त होता है सम्पूर्ण प्राणियों के मनों का भी ग्राधिपति अर्थात् स्वामी होजाता है, सम्पूर्ण प्राणियों की वाणियों का भी ग्राधिपति होजाता है, सम्पूर्ण चक्षु इन्द्रियों का भी ग्राधिपति होजाता है, सम्पूर्ण

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

२६

प्राणियों के श्रोत्र इन्द्रियों का और सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों का भी ऋषिपति अर्थात् प्रेरक होजाता है, उपासक को समष्टि-रूप विराट्-भाव की प्राप्ति होने के बाद ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है, और फिर वह ब्रह्मस्वरूप होजाता है ॥

प्र०-कैसा वह ब्रह्म है ?

उ०-आकाश की तरह मूर्ति से रहित है, सद्रूप है अर्थात् वाध्य से रहित है, वागादिक इन्द्रियों की उत्पत्ति का स्थान है, मन को भी उसी में आनन्द मिलता है, क्योंकि वह मन के आनन्द का स्थान है, वह शान्त-स्वरूप है, मरण-धर्म से रहित है, ऐसा जो ब्रह्म है हे शिष्य ! उसकी तुम उपासना करो ॥ १३-१४ ॥

इति षष्ठोडनुवाकः ॥ ६ ॥

मूलम् ।

पृथिव्यन्तरिचं चौर्दिशोडवान्तरदिशः अग्निर्वायुदित्यश्र्चन्द्रमानक्त्राणि आप ओषधयो वनस्पतयः आकाश आत्मा इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् प्राणोडपानो व्यान उदानः समानः चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् चर्म मांससस्थि स्नावास्निथ मज्जा एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् पादेकं वा इदं सर्वं पादेकेनैव पादृकृथ्स्पृणोतीति सर्वमेकश्न ॥ १५ ॥

इति सप्तमोडनुवाकः ॥ ७ ॥

पदच्छेदः ।

पृथिवी, अन्तरिचम्, चतुः, दिशः, अवान्तरदिशः, अग्निः, वायुः, आदित्यः, चन्द्रमाः, नक्षत्राणि, आपः, ओषधयः, वनस्पतयः, आकाशः, आत्मा, इति, अधिभूतम्, अथ, अध्यात्मम्, प्राणः, अपानः, व्यानः, उदानः, समानः, चक्षुः, श्रोत्रम्, मनः, वाक्, त्वक्, चर्म्म, मांससस्थि, स्नावास्निथ, मज्जा, एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् पादेकं वा इदं सर्वं पादेकेनैव पादृकृथ्स्पृणोतीति सर्वमेकश्न ॥

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ऋ०

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

मांसम्, स्नावा, अस्थि, मजा, एतत्, स्वाधिविधाय, ऋषि:, स्ववोचत्, पाड्कम्, वै, इदम्, सर्वम्, पाड्केन, एव, पाड्कम्, स्पृणोति, इति, सर्वम्, एकम्, च ॥

ग्रन्थय: । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

पृथिवी=पृथ्वीलोक

ग्रन्तरिक्षम्=ग्रन्टारिक्ष लोक

घौ:=स्वर्गलोक

दिश:=दिशा

ग्रवाऽन्तरदिश:=विदिशा यानी चार कोने

  • पततत्लोक- पञ्ककम् = ये पाँच लोकपञ्चक हैं

ग्रग्रि:=ग्रग्रिन

वायु:=वायु

ग्रादित्य:=सूर्ये

चन्द्रमाः=चन्द्रमा

नक्षत्राणि=नक्षत्र

  • ग्रेतद्देव- पञ्ककम् = ये पाँच देवपञ्चक हैं

ग्राप:=जल

ग्रोषधय:=ग्रोषधी

वनस्पतय:=वनस्पति

ग्राकाश:=ग्राकाश

च=ग्रौर

ग्रात्मा=विराद्रूप

  • पतत् भूत- पञ्ककम् = ये पाँच भूतपञ्चकहैं

इति=इस प्रकार

तीनों पञ्चक

ग्रन्थय: । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

ग्राधिभूतम्=ग्राधिभूत हैं

ग्रथ=ग्रौर

प्राण:=प्राण

ग्रपान:=ग्रपान

व्यान:=व्यान

उदान:=उदान

समान:=समान

  • पततवायुपञ्चकम् = ये पाँच वायुपञ्चकहैं

चक्षु:=नेत्र

श्रोत्रम्=कर्ण

मन:=मन

वाकू=वागी

त्वक्:=त्वचा

  • पतत् इ- इन्द्रियपञ्चकम् = ये पाँच इन्द्रिय-पञ्चक हैं

च=ग्रौर

चर्म=चर्म

मांसम्=मांस

स्नावा=नाड़ी

ग्रस्थि=हाड़

मजा=मजा

  • पतत् भातु- पञ्चकम् = ये पाँच भातुपञ्चककहैं

इति=इस प्रकार ये

तीनों पञ्चक

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

ग्राघ्यातमम्=ग्राध्यात्म हैं

पतत्= { उस पूर्वोक्त ग्र-

चिभूत ग्रौर ग्राघ्यात्म को

ग्राधियेघाय=कल्पना करके

इदम्=यह

सर्वेम=सब बाह्याभ्यन्तर

वै=विचार करके

पाङ्कम्=पाँच ग्रथोंत पंचा-

तमक हैं

पाङ्कम्=ग्राधिभूत बाज्ञ

पाङ्केन=ग्राघ्यात्मिक

पंचात्मक करके

पचम्=ही

सर्वेम=सबको

पचकम्=एकाकारता से

स्पृशोति=ग्रनुभव करता है

पचम्=ऐसा

ग्रर्षि:=वेद ने

ग्रावोचत्=कहा हे ॥

पचमम्=इस प्रकार

विद्वान्=बुद्धिमान पुरुष

भावार्थ ।

पूर्व ग्रतीन्द्रिय मनोमयत्वादि गुण-विशिष्ट ब्रह्म की उपासना को कहा है, ग्रब इस सप्तम ग्रनुवाक में मन्द ग्रधिकारियों के प्रति स्थूल पृथ्व्री ग्रादिकों की पंचात्मक स्वरूप करके उपासना को कहते हैं—

पृथिवीति । पृथ्वी-लोक, ग्रन्तरिक्ष-लोक, स्वर्ग-लोक, प्राची, ग्रवाची, उदचीची, प्रतीची चारों दिशा, ग्रौर ज्योतिष्कोश, नैर्ऋत्यकोश, वायव्यकोश, ईशानकोषष चारों ग्रवान्तर दिशा मिलकर ये पाँच लोकपंचक हैं ।

ग्रग्नि, वायु, सूर्ये, चन्द्रमा, नक्षत्र ये पाँच देवपंचक हैं ।

त्रीहि यवादि ग्रोषधी, जल, वृक्षादि वनस्पति, ग्राकाश, ग्रौर विराट् ग्रात्मा, ये पाँच भूतपंचक हैं ।

इस प्रकार ये तीनों पंचक ग्राधिभूत हैं, ग्रब्र ग्राध्यात्मिक को

प्राण्ञा इति । प्राणा, ग्र्यान, ग्रपान, उदान, समान ये पाँच वायु-

पंचक हैं ।

हृदय में प्राण्ञा का स्थान है, ग्रपान का गुदा स्थान है, समान का

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३२

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

नामिस्थान है, उदान का कंठ स्थान है, और प्राण समग्र शरीर में रहता है, और चक्षु, श्रोत्र, मन, वाक् और त्वक् ये पाँच इन्द्रियोंपंचक हैं और चर्म, मांस, नाड़ियाँ, हाड़, मज्जा ये पाँच धातुपंचक हैं, इस प्रकार ये तीनों पंचक अध्यात्म हैं, इसलिये अधिभूत और अध्यात्म को लेकर यह सम्पूर्णी जगत् पंचात्मक कहा जाता है, और पृथ्वी आदि लोक तथा अग्नि आदिक देवता भी पंचात्मक कहाते हैं, इस प्रकार पंचात्मकाविशिष्ट ब्रह्म की उपासना करने से उपासक् विराट् अभिमानी प्रजापति को प्राप्त होता है ॥ १५ ॥

इति सममोऽनुवाकः ॥ ७ ॥

मूलम् ।

उ॒मिति ब्रह्म उ॒मितीदं॑ सर्वम् उ॒मित्येतदनु॑ कृतिहे॒स्म व॒ऽअ॒प्यों आव॒येत्याश्राव॒यन्ति उ॒मिति॑ सामानि गाय॒न्ति उ॒म् शो॒मिति॑ शस्त्राशि शं॒सन्ति उ॒मित्यध्वर्यु॒ः प्रतिग॒रं प्रतिगृ॒णाति उ॒मिति॑ ब्रह्मा प्र॒सौति उ॒मित्यग्निहो॒त्रमनु॑जानाति अ॒मिति॑ ब्राह्म॒णः प्रव॒क्ष्यन्नाह॑ ब्रह्मोप॒नुवानि॒ति ब्र॒ह्मैवोप॑नोति उ॒म् इति॑ दश ।॥ १६ ॥

इत्यष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

उ॒म्, इति, ब्रह्म, उ॒म्, इति, इदम्, सर्व॑म्, उ॒म्, इति, एतत्, अनु॑कृति:, ह, स॒म्, वै, अ॒पि, उ॒म्, श्रावय॒, इति, आश्राव॒यन्ति, उ॒मिति॑, सामानि, गाय॒न्ति, उ॒म्, शो॒म्, इति, शस्त्राशि, शंस॒न्ति, उ॒मिति॑, अध्वर्यु॒ः, प्रति॒ग॒रम्, प्रति॑, गृ॒णाति, उ॒म्, इति, ब्रह्मा, प्र॒सौति, उ॒म्, इति, अ॒ग्निहो॒त्रम्, अनु॑जानाति, अ॒मिति॑, ब्राह्म॒णः:, प्रव॒क्ष्यन्, आह॑, ब्रह्म, उप॒नुवानि॒, इति, ब्र॒ह्म, एव॑, उप॑नोति, उ॒म्, इति॑, दश ।

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तैत्तिरीयो॑पनिषद्‌ ।

३३

श्रान्त्वयः । पदार्था-सहित सूक्ष्म भावार्थे । यत् इदं सर्वम्‌ ॐ इति हति व्यासम्‌ ॠत इह, ॐ, चै अ॒म्‌ इति हति पतत् अनुरुति प्रापि अ॒म्‌ चै ॐ श्रावय इति । तदा श्राश्रावयन्ति च ॐ

श्रान्त्वयः । पदार्था-सहित सूक्ष्म भावार्थे । इति सामवेदं गायन्ति च ॐ शोम्‌ इति शस्नित च ॐ अध्वर्यु प्रातिग्र॒णाति च ॐ अ॒म्‌ इति ब्रह्मा प्रासौति च ॐ श्राग्निहोत्रं श्रनुजानाति च ॐ यदा

श्राश्रावयन्ति च ॐ

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२४

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

प्रवक्ष्यन्=वेद पढ़ने की इच्छा|वाला|तद्=तथ|सः=वह ब्रह्मया|ब्रह्मा:=ब्रह्मया|इति=ऐसा विचार करके|कि|ब्रह्म=वेद को|उपास्म्रवाति=मैं प्राप्त होजाऊं|पूर्वम्=आरम्भ बिपे|ॐ इति=ॐ शब्द को|श्राहु:=उ चारण करता है

उपप्रोति=प्राप्त होता है|तत्:=इसलिये|ॐ=ॐ शब्द|इति=करके|ब्रह्म=शब्द-ब्रह्म को|उपासीत=उपासना करे ॥

भावार्थ ।

पूर्वं पष्ट अनुबाक में किंचित् सूक्ष्मदर्शी मध्यमाधिकारी के प्रति मन शादिक उपाधिक ब्रह्म की उपासना कही है, शौनर सप्तम अनुबाक में स्थूलदर्शी मन्ददश्राधिकारी के लिये पृथ्वी श्रादि उपाधिक ब्रह्म की उपासना को कहा है, 'ब्रह्म उत्तमाधिकारी के लिये ओंकार में ब्रह्म-दृष्टि का विधान करते हैं-

उमिति । ' ॐ ' यह जो शबदर है सो परब्रह्म का वाचक है, शौर परब्रह्म इसका वाच्य है, वाच्य-वाचक का श्रभेद होता है, इसलिये ओंकार ब्रह्म-रूप ही है, ऐसा चिन्तन उपासक को करना चाहिये, शौर यह जो नानाप्रकार की प्रतीतियों का विषय चराचरात्मक सम्पूर्णा जगत् है, सो सब ओंकाररूप ही है, शौर जितना शब्द करके ज्ञात होने योग्य है, वह सब ओंकार करके ही ज्ञाप्त है, क्योंकि वाच्य जो है सो वाचक के ही श्राधीन होता है, इसलिये सम्पूर्णा जगत् ओंकाररूप ही है, शब्द दो प्रकार का होता है, एक ध्वन्यात्मक, दूसरा वर्णात्मक । यावत् लोक-लोकान्तर में वस्तु है, वह इन शब्दों फरके ज्ञाप्त है, शौर शब्द ही ओंकार है, इसलिये सब वस्तु

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

ॐकाररूप है, और बिना ॐकार के कुछ भी सिद्ध नहीं होता है,

अव ॐकार की स्तुति को करते हैं, यह वार्ता लोक में प्रसिद्ध है, जैसे

किसी ने कहा-मैं इस काम को करता हूँ, तब दूसरा आगे से ॐ

ऐसे कहता है, अर्थात् ऐसा कहा ॐ अक्षर को उच्चारण करके

वैदिक-कर्म का प्रारम्भ किया जाता है, और ॐ कह करके वैदिक-

कर्म की समाप्ति की जाती है, जब देवताओं के प्रति वेद का मन्त्र

पढ़ा जाता है, तो ॐ कह करके पढ़ा जाता है, और जो सुनता है,

वह भी ॐ कह करके सुनता है, और यज्ञ में सामवेद के गायन करने

वाले ॐकार को ही उच्चारण करके सामवेद की ऋचा का गायन करते

हैं, और ॐ यह शब्द उच्चारण करके ऋग्वेद की ऋचाओं को यज्ञ में पढ़ते

करते हैं, अर्थात् यज्ञ के कर्म का कर्ता जोकि ऋत्विजु है, सो शंसावों

इस गीति मंत्र को यज्ञ में पढ़ता है, और ॐ इस अक्षर का उच्चारण

करके ब्रह्मा जोकि ऋत्विग् है स्तुति करता है, ॐ इसका उच्चारण

करके ही अग्निहोत्र करने की आज्ञा होता को देता है, ॐ शब्द को

उच्चारण करके यजुर्वेदी यजुर्वेद के मंत्रों को पढ़ता है और जब ब्राह्मण

ॐ उच्चारण करके ही पाठ के आदि में कहता है कि मैं ब्रह्म को

प्राप्त होजाऊँ और फिर पाठ करता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता

है, इसलिये ॐ शब्द करके ब्रह्म की उपासना करे ॥ १६ ॥

इत्यष्ठमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

मूलम् ।

ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने

च तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च दमश्च स्वाध्यायप्रवचने

च शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने

च अग्निहोत्रं स्वाध्यायप्रवचने च अतिथयज्ञः स्वा--

ध्यायप्रवचने च मानुषं स्वाध्यायप्रवचने च प्रजा च

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३६

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

स्वाध्यायप्रवचने च प्रजनञ्च स्वाध्यायप्रवचने च प्रजा-

तिश्च स्वाध्यायप्रवचने च सत्यमिति सत्यवच्चा राथी-

तरः तप इति तपो नित्यः पौरशिष्टिः स्वाध्यायप्रवचने

एवेत्य नाको मौद्गल्यः तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥ १७ ॥

इति नवमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

ऋतम्, च, स्वाध्यायप्रवचने, च, सत्यम्, च, स्वाध्यायप्रवचने, च,

तपः, च, स्वाध्यायप्रवचने, च, दमः, च, स्वाध्यायप्रवचने, च, शमः,

च, स्वाध्यायप्रवचने, च, अग्नयः, च, स्वाध्यायप्रवचने, च, अग्निहोत्रम्,

च, स्वाध्यायप्रवचने, च, श्रातिथ्यम्, च, स्वाध्यायप्रवचने, च, मानुषम्,

च, स्वाध्यायप्रवचने, च, प्रजा, च, स्वाध्यायप्रवचने, च, प्रजनः, च,

स्वाध्यायप्रवचने, च, प्रजातिः, च, स्वाध्यायप्रवचने, च, सत्यम्, इति,

सत्यवचाः, राथीतरः, तपः, इति, तपः, नित्यः, पौरशिष्टिः, स्वाध्याय-

प्रवचने, एव, इति, नाकः, मौद्गल्यः, तत्, हि, तपः, तत्, हि, तपः ॥

ग्रन्थः ।

पदार्थ-सहित

सूक्ष्म भावार्थे ।

ग्रन्थः ।

पदार्थ-सहित

सूक्ष्म भावार्थे ।

ऋतम्=वेद के सूक्ष्म अर्थ

का विचार करना

च=श्रौर

स्वाध्याय-प्रवचने

च=श्रौर

सत्यम्=सत्य बोलना

च=श्रौर

स्वाध्याय-प्रवचने

च=श्रौर

तप:=तप करना

च=श्रौर

स्वाध्याय-प्रवचने

च=श्रौर

दम:=बाह्य इन्द्रियों का रोकना

च=श्रौर

स्वाध्याय-प्रवचने

च=श्रौर

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

च=श्रौत शमः=मन का रोकना च=श्रौर स्वाध्यायप्रवचने=वेद का पढ़ना श्रौर पढ़ाना च=श्रौर श्रयनय:=श्रद्धा धारण करना च=श्रौर स्वाध्यायप्रवचने=वेद का पढ़ना श्रौर पढ़ाना च=श्रौर अग्निहोत्रम्=श्रौत अग्निहोत्र करना च=श्रौर स्वाध्यायप्रवचने=वेद का पढ़ना श्रौर पढ़ ना च=श्रौर प्रातिथय:=अतिथियों का पूजन करना च=श्रौर स्वाध्यायप्रवचने=वेद का पढ़ना श्रौर पढ़ाना च=श्रौर मानुषम्=लौकिक व्यवहार श्रार्थात विवाह श्रादि कर्म करना च=श्रौर स्वाध्यायप्रवचने=वेद का पढ़ना श्रौर पढ़ाना च=श्रौर प्रजा=सन्तति का उत्पन्न करना

च=श्रौर प्रवचन:={ स्वाध्यायी बिषे गर्भ दान ऋतु काल में देना च=श्रौर स्वाध्यायप्रवचने=वेद का पढ़ना श्रौर पढ़ाना च=श्रौर प्रजांत:={ विवाह पुत्र पौत्र कीउत्पात्ति के लिये करना च=श्रौर स्वाध्यायप्रवचन=वेद का पढ़ना श्रौर पढ़ाना + पतिनिधि विदितकर्माण={ ये सब उपर लिखे हुये वेद विहित कर्म अवश्यकर्तव्यताग्रनिः=अवश्य करने योग्य हैं च=श्रौर राथीतर:=राथीतर गोत्र में उत्पन्न हुवा सत्यवचने=सत्यवचा नामक ऋषि सत्यम्=सत्य को धीति=धी मनुते=श्रेष्ठ मानता है पौत्रशिष्टः=पुरुशिष्ट गोत्र में उत्पन्न हुवा ॥

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३ =

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

भावार्थ ।

श्रवण उपासक के नियमों को विधान करते हैं-वेद के सूत्रमर्थ का जो निश्रय करना है, उसका नाम ऋत है; और अध्ययन किया हुया जो वेद है, उसका जो प्रतिदिन पाठ करना है, इसीक। नाम स्वाध्याय हैं; और वेद के श्रर्थ का जो व्याख्यान करना है, उसका नाम प्रवचन है; और जिस वार्ता को वेद और शास्त्र करवे और युक्तियों करके निश्रय करना है, वह यथार्थ कहा जाता है; सत्य-भाषण और कृच्छ्रचान्द्रायणादि व्रत तप कहे जाते हैं ।

चक्षुरादिक इन्द्रियों को बाह्य-विषयों से हटाने का नाम दम है; और मन को निश्चिति विषय में चित्तन करने से हटाने का नाम शम है, और गार्हपत्यादि श्रग्नियों का स्थापन करना श्रर्थात् प्रातःकाल और सायंकाल श्रग्निहोत्र कर्म करना नित्य कर्त्तव्य है, और घर में श्राये हुये श्रातिथियों की पूजा करना और विवाहादिकों में वधू श्रादिकों का पूजन करना कर्त्तव्य है, इसी का नाम मानुष्य कर्त्तव्य है, और पुत्र की उत्पत्ति के लिये गर्भाधानादि संस्कार का नाम प्रजा कर्त्तव्य है, और पुत्रोत्पत्ति के लिये ऋतु-काल में स्वभायों के पास जाने का नाम प्रजन कर्त्तव्य है, और अपने वर्णाश्रम के अनुसार पुत्र की उत्पत्ति का नाम प्रजाति है, ये सब कर्मे कर्त्तव्य हैं, तात्पर्यें सबका यह है कि वेद पढ़े और पढ़ावे, वेद के सूत्रमर्थ को विचार करे, तप करे, बाह्य इन्द्रियों को रोके, मन को रोके, हवन करे, श्रग्नि धारण करे, श्रग्न्यागातों की पूजा करे, विवाह करे, सन्तति उत्पन्न करे, श्रपनी भार्या से ऋतुकाल विषे भोग करे ।

राथींतर श्राचार्ये ऐसा मानता है कि सत्यभाषणे सदा करना चाहिये, और सत्यभाषणे ही उत्तम कर्मे है, पौौरशिष्ट्र श्राचार्ये नित्य तप करता था, इसलिये वह कहता है कि तप ही उत्तम कर्म है, और मौद्रलय श्राचार्ये

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

३५

ऐसा मानता है कि वेद का सदा पढ़ना और पढ़ाना ही उत्तम कर्म है, इसलिये ऊपर के लिखे हुये कर्म अवश्य नित्य करते हैं ॥ १७ ॥

इति नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥

मूलम् ।

अ्रहं वृक्षस्य रेरिवा कीर्तिंः पृष्ठं गिरेरिवाऽऽऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीीव स्वमृतमस्मि द्रविणं सुवर्चसम् । सुमेधा ऽ्रमृतोऽक्षितः इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ा्रहं षट्‌॥१८॥

इति दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥

पदच्छेदः ।

अ्रहं, वृक्षस्य, रेरिवा, कीर्तिः, पृष्ठम्, गिरेः, इव, ऊर्ध्वपवित्रः, वाजिनी, इव, स्वमृतम्, अस्मि, द्रविणम्, सुवर्चसम्, सुमेधा:, ा्रमृतोऽक्षितः, इति, त्रिशङ्कोः, वेदानुवचनम् ॥

ग्रन्वयः । पदार्थे-सहित ग्रन्वयः ।

सूक्ष्म भावार्थे ।

अ्रहदम्‌=मैं वृक्षस्य=संसार-रूपी वृक्ष का रेरिवा=प्रेरक ग्रन्थों में

अ्रासिम=हूँ च=और मे=मेरा कीर्तिः=यश गिरेः=पर्वत के पृष्ठम्‌=शिखर इव=समास

ऊर्ध्वपवित्रः=निर्मेल-ब्रह्म ज्ञान-स्वरूप

वाजिनी=सूर्य बिचे

स्वमृतम्=शुद्ध ा्रमृत है तद्वत्=वैसे ही अ्रहदम्‌=मैं ऊर्ध्वपवित्रः=निर्मेल-ब्रह्म ज्ञान-स्वरूप

अ्रासिम=हूँ च=और सुवर्चसम्‌=प्रकाशमान द्रविणम्‌=ब्रह्म-रूप द्रव्य मय=मुक्त करके प्राप्तम्‌=पाया गया है च=और अ्रहदम्‌=मैं

ग्रन्वयः । पदार्थे-सहित ग्रन्वयः ।

सूक्ष्म भावार्थे ।

अ्रासिम=हूँ अ्रहदम्‌=मैं

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८०

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

सुमेधा:=⎧ कार्य-कारणात्मक जगत् का ग्रादि- मध्यांत जाननेवाला

ग्रास्मि=हूँ श्रतपच=इसी कार्य ग्रहम्=मैं ग्रमृतेऽक्षित:=ग्रमृत से सिंचित किया हुग्रा ग्रास्मि=हूँ

इति=इस प्रकार त्रिशङ्को:=त्रिशङ्कु मुनि का वेदानुवचनम्=ग्रात्मानुभव के पश्चात् यह वाक्य

है (जैसे वाम- देव ऋषि का ग्रनुभव-वाक्य गर्भ में ही उ- त्पन्न हुग्रा था)।।

भावार्थ ।

ग्राहमिति । जिसका तत्वज्ञान करके छेदन किया जाय उसका नाम वृक्ष है, मो संसार-रूप वृक्ष का तत्व-ज्ञान करके छेदन हो सकता है, इसलिये ज्ञान-वैराग्य-रूपी शस्त्र करके संसार-रूप वृक्ष का छेदन करनेवाला हूँ, और जब मैं संसार-रूप वृत्त का छेदन कर देऊंगा तब मेरी कीर्ति पर्वत के शिखर के ऐस ग्रत्यंत उँची होगी, और जैसे सूर्य बिषे शुद्ध ग्रमृत है वैसे मैं निर्मल ज्ञान-स्वरूप ब्रह्म-रूप हूँ, क्योंकि प्रकाशमान ब्रह्म-रूप द्रव्य मुख करके पाया गया है, मैं कार्य-कारणात्मक जगत् को भली प्रकार जानता हूँ, मैं ग्रमृत-रूप तत्व-ज्ञान को प्राप्त हुग्रा हूँ, धारणा शक्तिवाला मैं ही हूँ, ऐसा ग्रनु-भव त्रिशङ्कु मुनि का है॥ ९॥ *

इति दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥

मूलम्।

वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति सत्यं वद । धर्म्ममेश्व र. स्वाध्यायान्मा प्रमदः ग्राचार्याय प्रियं धन- माहत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः सत्यान्न प्रमादि- तव्यम् ।

  • शब्दार्थ इस प्रकार स्पष्ट है कि भावार्थ की ग्रावश्यकता नहीं, इसी विचार से भावार्थ सूक्ष्म लिखा गया है ।

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तत्तिरोयोमानिषद् ।

८१

त॒थ्यम् धर्म्मान्न प्रमदित॒थ्यम् कुशलात्न प्रमदित॒थ्यम् भूत्यै न प्रमदित॒थ्यम् स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रम- दित॒थ्यम् देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदित॒थ्यम् ॥ १९ ॥

मातु॑देवो भव पितु॑देवो भव आचार्यदेवो भव अ॒तिथिदेवो भव यान्यनवद्यानि कर्म्माणि तानि से॑वित॒व्यानी नो इतराणि यान्यस्माक॑ङ्क सु॒चरि- तानि तानि त्वयोपास्यानी नो इतराणि ॥ २० ॥

ये के चास्मच्छ्रेया॑ ऽथ सो ब्राह्म॒णा: तेषां त्वयाऽसनेन प्र॒श्व- सित॒व्यम् श्रद्ध॒या देयम् ऋ॒श्रद्ध॒या॒डदेयम् श्रि॒या देयम् हि॒या देयम् संविदा देयम् श्रि॒यै यादे॑ ते कर्म्मवि॑चिकित्स॒ा वा वृत्तवि॑चिकित्स॒ा वा स्या॑त् ॥२१॥

ये त॒त्र ब्राह्म॒णा: स॒म्म॒र्शिन: यु॒क्ता प्रायुक्ता॑ नि॒ल॒क्ष्षा धर्म्मेकामा: स्यु: यथा ते त॒त्र वर्ते॑र॒न॒ तथा त॒त्र वर्ते॑था: य॒था॒ त॒था॒भ्या॒च॒र्य॒ातेषु ये त॒त्र ब्राह्म॒णा: स॒म्म॒र्शिन: यु॒क्ता नि॒ल॒क्ष्षा धर्म्मेकामा: स्यु: यथा ते तेषु वर्ते॑र॒न॒ तथा तेषु वर्ते॑था:

एष॑ आ॒देश: एष उप॑देश: एषा वेदो- प॒निष॒द॒ ए॒तद॒नु॑शा॒स॒न॒म॒ ए॒व॒मु॑पा॒सि॑त॒व्य॒म॒ ए॒व॒ञ्चै॑त- दुपा॑स्य॒म् स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदित॒व्यम् ता॑नि त्वयोपास्यानी विचिकित्स॒ा वा स्या॑त॒ेषु वर्ते॑र॒न॒ ॥ २२ ॥

इ॒त्येकादशोऽनुवा॑क: ॥ ११ ॥

पद॑च्छेद: ।

वेद॒म्, अ॒नूच्य॑, आ॒चार्य्ये:, अ॒न॑ते॒वा॑सि॒न॑म्, अ॒नु॑शा॒स्ति॑, स॒त्य॑म्, व॒द्, धर्म्म॑म्, च॒र्, स्वाध्यायान्त्, मा प्रमद:, आचार्य्यो:, प्रिय॑म्, धन॑म्, आह्रि॑त्य, प्र॒जात॑न्तु॒म्, मा व्यवच्छे॑त्सी:, स॒त्य॑त्, न, प्रमदित- व्य॑म्, धर्म्मा॑त्, न, प्रमदित॒व्य॑म्, कुशलात्, न, प्रमदित॒व्य॑म्, भूत्यै,

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न, प्रमदितव्यम्, स्वाध्यायप्रवचनाभ्याम्, न, प्रमदितव्यम्, देवपितृकार्याभ्याम्, न, प्रमदितव्यम्, मातृदेवः; भव, पितृदेवः; भव, आचार्यदेवः; भव, अतिथिदेवः; भव, यानि, अनवद्यानि, कर्म्माणि, तानि, सेवन्यानि, नो, इतराणि, यानि, अस्माकम्, सुचरितानि, तानि, त्वया, उपास्यानि, नो, इतराणि, ये, के, च, अस्मच्छ्रेयांसः, ब्राह्मणाः, तेषाम्, त्वया, आसनेन, प्रश्वसितव्यम्, श्रद्धया, देयम्, अश्रद्धया, अदेयम्, श्रिया, देयम्, हिया, देयम्, भिया, देयम्, संविदा, देयम्, अथ, यदि, ते, कर्म्मविचिकित्सा, वा, वृत्तविचिकित्सा, वा, स्यात्, ये, तत्र, ब्राह्मणाः, सर्मर्शिनः; युक्ताः; श्रायुक्ताः; भ्रलून्नाः; धर्म्मकामाः; स्युः; यथा, ते, तत्र, वर्त्तेरन्, तथा, तेषु, वर्त्तेथाः; श्रभ्याल्यातेपु, ये, तत्र, ब्राह्मणाः, सम्मर्शिनः; युक्ताः; श्रायुक्ताः; श्रलून्नाः; धर्म्मकामाः; स्युः; यथा, ते, तेषु, वर्त्तेरन्, तथा, तेषु, वर्त्तेथाः; एषः, आदेशः; एषः; उपदेशः; एषा, वेदोपनिषत्, एतत्, श्रनुशासनम्, एवम्, उपासितव्यम्, एवम्, उ, च, एतत्, उपास्यम्, स्वाध्यायप्रवचनाभ्याम्, न, प्रमदितव्यम्, तानि, त्वया, उपास्यानि, त्रि. चिकित्सा, वा, स्यात्, तेषु, वर्त्तेरन्

ज्ञान्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ । आचार्यः=गुरु शिष्यं=शिष्य को वेदम्=वेद ज्ञान्वय=पढ़ाकर अनुशासित=कर्म से ददाति हे शिष्य=हे सौम्य त्वम्=तू संयमु=सत्य ज्ञान्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ । वर्=वोल धर्म्मम्=धर्म चर्=कर स्वाध्यायात्=वेद-पाठ से मा प्रमदः=प्रसाद याने भूष मत् कर आचार्याय=गुरु के लिये धनम्=धन को प्रथान्त गुरु-दक्षिणा को

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प्रजातन्तुम्‌=संतान-रूपी तंतु को

मा न बच्छेदसीः={ उच्छेद मत कर

अर्थात् वंश-रूपी

तन्तु को मत तोड़, अर्थात्‌ग्रह-

स्थात्‌ सन्तान कर

सस्थ्यात्‌=सथ से

प्रमदितव्यम्‌=प्रमाद करना योग्य

न=नहीं है

धर्मेस्तु=धर्म से

प्रमदितव्यम्‌=प्रमाद करना योग्य

न=नहीं है

कुशलात्‌=देह-रक्षार्थ कर्म से

प्रमदितव्यम्‌=प्रमाद करना योग्य

न=नहीं है

भूत्यै=संपत्ति के लिये

प्रमदितव्यम्‌=प्रमाद करना योग्य

न=नहीं है

स्वाध्यायाम्‌-प्रवचनाभ्याम्‌} = वेद के पठन और

पाठन से

प्रमदितव्यम्‌=प्रमाद करना योग्य

न=नहीं है

देवपितृकार्या-भ्याम्‌} = यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण

आदि कर्म से

प्रमदितव्यम्‌=प्रमाद करना योग्य

न=नहीं है

हे शिष्य=हे सौम्य

त्वाम्‌=तू

मातृदेवः=माता को देवता

तुष्य माननेवाला

भव=हो

पितृदेवः=पित्ता को देवता-

तुष्य माननेवाला

भव=हो

आचार्यदेवः={ ग्राचार्य को दे-

वता के तुल्य पू-

जन करनेवाला

भघ=हो

प्रतिथिदेवः={ ब्रह्मागातों को

देवता-तुल्य पू-

जन करनेवाला

प्रव=हे

यानि=जो

मनसचचाहीन=प्रनिन्दित

कर्माणि=कर्म हैं

तानि=वे

त्वया=तुम्ह करके

सेवितव्यानि=सेवन करने-योग्यहैं

इतराणि=निन्दित कमं

न=सेवन करने योग्य

नहीं हैं

च=और

यानि=जो कमं

अस्माकम्‌=हमारे

शुचिर्तात्‌नि=श्रद्धी तरह से

सेवन दिये हुये हैं

तानि=वे कमे

त्वया=तुम्ह करके

उपास्यतिः=उपासना करने

योग्य हैं

इतराणि=हमारे त्याग किये

हुये कमं

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४४

तैत्तिरीयोपनिषद्

त्वया=तुम्हें करके नो=नहीं सेवन करने- योग्य हैं ये=जो के=कोई ब्राह्मणा:=ब्राह्मण प्रसिद्ध्येयांस:=प्राचार्यादि कर्में करके हमसे विशेष हैं तेषाम्=उनका श्रासनেন=श्रासनदानादि सत्कार से त्वया=तुम्हें करके प्रश्वसितव्यम्=श्रासन करना योग्य है

श्रद्धया=श्रद्धा करके देयम्=दान करना चाहिये अश्रद्धया=श्रद्धा करके अदेयम्=दान नहीं देना चाहिये श्रिया=नुसर श्रथांत यथाशक्ति देयम्=देना चाहिये हिया=लज्जा करके देयम्=दान योग्य है भिया=डर करके देयम्=देना योग्य है संविता=मित्रादि कार्य करके देयम्=दान योग्य है

इग्रथ=जब यदि=कभी ते=तुमको कर्मादीन् श्रद्धा=स्मृति कर्मे विषे संदेह था=श्रथवा वृत्तिविषे श्राचार लक्षणया श्रुत विषे संदेह स्वयात्=होवे तदा=तब तत्र=उस समय में ये=जो न=जैसे ब्राह्मणा:=ब्राह्मण समर्पिन्त=विचारवान् युक्ता:=लौकिक कर्म-युक्त श्रायुक्ता:=शास्त्रोक्त कर्म-युक्त अलक्षणा:=श्रकुरबुद्धिवाले धर्मकामा:=धर्मंविषे कामना रखने वाले सन्तु=हों ते=वे यथा=जैसे वत्तैन=बर्ताव करें तत्र=उस संशय विषे त्वम्=तू श्रापि=भी तथ्या=वसी ही वत्तेथा:=बर्ताव का श्रथ=श्रौर तत्=उन

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तैत्तिरीयोपनिषद्‌ ।

प्रभ्याश्यातेषु=श्रति प्रसिद्ध ब्राह्मणों

विषे

श्रे=जो

ब्राह्मणा:=ब्राक्षरा

सम्मार्शिन=विचारवान्

युक्ता=श्रौतिक-कर्म्म-युक्त

श्रायुक्ता=वैदिक-कर्म्मयुक्त

श्रलुक्षा=श्रकुरबुद्धि वाले

धर्मेकामा:=धर्म विषे कामना

रखनेवाले

स्यु:=होवें

ते=वे

यथा=जैसे

तेषु=उन शंशयों बिषे

वर्तेरन्=बर्तें

तथा=वैसा ही

त्वम्=तू

श्रप=मो

तेषु=उन शंशयों बिषे

वर्तेथा=वर्त्तौ कर

पष:=मही

श्रादेश:=श्रुति है

प्रषा=यह्ही

उपदेश:=पुत्र, शिष्य श्रादिकों

को उपदेश है

प्रषा=यह्ही

वेदो'पनिषत्‌=वेद का सूक्ष्म श्रौर

गोप्य श्रथे है

एतत्‌=यह्ही

श्रनुशासनम्‌=ईश्वर-वचन है

एवम्‌=इस प्रकार

उपासितव्यम्‌=उपासना करने

योग्य है

च=श्रौर

उ=मिश्रय करके

एवम्‌=इस प्रकार

उपास्यम्‌=उपासना करनेयोग्यहै॥

भाव्यार्थ ।

वेदमिति । श्राचार्य शिष्य को प्रथम उपनयन कराकर, वेद का श्रध्ययन कराते हैं, परचात्‌ वेद के श्रर्थ को शिष्य के प्रति इस प्रकार प्रहषा करते हैं-

हे शिष्य ! सदैव तुम सत्य-भाषणा करो, कदापि मिथ्याभाषणा न करो, श्रौर प्रतिदिन वेद-सहित धर्म का ही तुम श्राचारषा करो, श्रौर वेद के श्रध्ययन से तुम प्रमाद कदापि न करो; श्रौर विद्या की प्राप्ति के लिये श्राचार्ये के प्रति धन को ला करके दो, श्रौर विद्या की समाप्ति के श्रनंतर श्राचार्य की श्राज्ञा को लेकर विवाह करके मंन्नान्

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उत्पन्न करो, और यदि विवाह करने से पुत्र उत्पन्न न हो, तो पुत्रेष्टियज्ञ करके पुत्र की उत्पत्ति के लिये यत्न करो ।

प्र०—मुक्ति के साधनों के प्रकारण में प्रजा की उत्पत्ति का निरूपण करना क्या संगत है ?

उ०—असंगत नहीं है, क्योंकि पितृ-ऋण भी मोक्ष का प्रतिबंधक है, उससे छूटना भी मुक्ति का एक साधन ही है । सो प्रजा के उत्पन्न करने से ही पुरुष पितृ-ऋण से छूटता है, और आचार्य फिर शिष्य के प्रति कहते हैं, हे शिष्य ! सत्य-भाषण से कभी भी तुम प्रमाद न करना, धर्म के आचरण से कभी भी तुम प्रमाद न करना, सर्वदा काल धर्म का ही तुम अनुष्ठान करना, कुशलता से शरीर की रक्षा के करने वाले जो कर्म हैं, उनसे भी कभी तुम प्रमाद न करना, और विभूति अर्थात् ऐश्वर्य के प्राप्त करने वाले जो कर्म हैं, उनसे भी तुम प्रमाद न करना, और वेद के पढ़ने पढ़ाने से भी तुम कभी प्रमाद न करना, और देव-कार्य जोकि यज्ञादिक हैं और पितृ-कार्य जोकि श्राद्धादिक हैं, इनसे भी तुम प्रमाद न करना ॥ १६ ॥

मातदेव इति । माता को देवता जानना, और देवता की तरह माता का पूजन तुम करना, पिता को देवता जान करके पूजा करना, आचार्य को देवता जानकर पूजन करना, अतिथि को देवता जान करके पूजन करना ।

दो प्रकार के कर्म हैं, एक निंदित कर्म हैं, दूसरे अनिंदित कर्म हैं, दोनों में से जो कर्म लोक-प्रसिद्ध शिष्टाचार-रूप अनिंदित हैं, उन्हींका आचरण तुम करना, निंदित कर्मों का आचरण कभी तुम न करना, जो कर्म आचार्यों के सुचरित हैं, अर्थात् श्रुति-स्मृति से अविरुद्ध हैं, उन्हींका आचरण तुम करना, इतर कर्मों का आचरण मत करना ॥ २० ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

ये के चैति । जो लोक में प्रसिद्ध ब्राह्मण हैं, और जो हमारे से श्रेष्ठ हैं, उन ब्राह्मणों की तुम शासनादि प्रदान करके सेवा करना, और वे ब्राह्मण जो तुमको उपदेश करें उनके उपदेश को भली-भकार तुम ग्रहण करना, और श्रद्धा करके अर्थात् आस्तिक बुद्धि करके उनके प्रति अन्नादिकों को देना, अश्रद्धा करके न देना, क्योंकि श्रद्धा से रहित जो दान है, उसका किंचित् भी फल नहीं होता है, इसलिये श्रद्धा से युक्त हो करके ही देना और आस्तिक बुद्धि करके जो दान दिया जाता है, वह श्रिया दान कहा जाता है, और लजा करके दान देना और शास्त्र के भय करके देना और विवेक करके अर्थात् विधि-कारक को विचार करके दान देना ॥ २१ ॥

अथेति । आचार्य शिष्य के प्रति कहते हैं, जब तुम्हारे को श्रौत-कर्म में अथवा स्मार्त-कर्म में संशय उत्पन्न हो, जैसे कि-उदिते जुहोति, अनुदिते जुहोति । ये दो श्रुति-वाक्य हैं, एक तो कहता है कि सूर्य के उदय होने पर अग्निहोत्र-कर्म करना चाहिये, दूसरा कहता है कि सूर्य के उदय से पहिले ही अग्निहोत्र-कर्म करना चाहिये । अब यहाँ पर संदेह होता है कि कौन से वाक्य के अनुसार करना चाहिये, और स्मार्त-कर्म संध्या में कहीं तो संध्या के देवता की मूर्ति पुरुष-रूप करके कही है, और कहीं स्त्री-रूप करके कही है, यहाँ पर भी संदेह होता है कि किस रूप का ध्यान करना चाहिये । एक कर्मविचिकित्सा कही जाती है, दूसरी वृत्तविचिकित्सा कही जाती है ।

वृत्त नाम कुल की परंपरा करके जो कर्म चला आता है, जैसे कहीं आज्ञा है कि मातुल-कन्या के साथ विवाह करना चाहिये, और मांस भक्षण करना चाहिये, और कहीं लिखा है नहीं करना चाहिये, हे शिष्य ! जब तुम्हारे मन में इस तरह के संशय उत्पन्न हों, तब तुम वैसे ही कर्म में प्रवृत्त हो, जैसे प्रसिद्ध वेद के वेत्ता ब्राह्मण, नित्य

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

विचारवान्, समदर्शी, क्रोधादिकों से रहित, शांत स्वभाववाले, धर्म की कामना से संयुक्त, नित्य-नैमित्तिक कर्मों में प्रवृत्त होते हैं ॥ ग्रह ग्रौर उपदेश को श्राचार्य करते हैं, हे शिष्य ! यदि पातक की शंका करके दूषित पुरुपों में तुमको संशय हो कि इनके साथ व्यवहार करना चाहिये या नहीं ? तब उस देश में जो ब्राह्मण हों, वे.जिस प्रकार उनके साथ व्यवहार करते हों, वैसे ही तुम भी करो, वे ब्राह्मण कैसे हों कि विचारवान् हों, और नित्य-नैमित्तिक कमों में प्रवृत्त हों, और स्वतन्त्र हों, और क्रोध आदिकों से रहित हों, और धर्म की कामना से युक्त हों ॥ ५ ॥

एष इतिः ॥ हे शिष्य ! जैसे राजा अपने सभ्यों को आज्ञा करता है, और वैसे ही वैदिक कर्मों के करनेवालों को वेद भी आज्ञा करता है, और सत्य भाषण करने का ही वेद का मुख्य उपदेश है, यह वेद में विधिमंत्र है, पूर्वोक्त वेद-वाक्य सब ईश्वर की आज्ञाएँ हैं, यह सब उपासना और ध्यानुष्ठान करने के योग्य है ॥ २२ ॥

इत्येकादशोऽनुवाकः ॥ ९९ ॥

मूलम् ।

शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्यमा शन्न इन्द्र्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् ऋतमवदिषम् सत्यमवदिषम् । तन्मावीत् तद्रुक्कारमावीत् आवीन्माम् आवीद्वकारम् सत्यमवदिषं पश्रु च ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ २३ ॥

इति शिक्षाध्यायः प्रथमावधी ॥ पदच्छेदः ।

शम्, नः, मित्रः, शम्, वरुणः, शम्, नः, भवतु, अर्यमा शन्न इन्द्र्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् ऋतमवदिषम् सत्यमवदिषम् । तन्मावीत् तद्रुक्कारमावीत् आवीन्माम् आवीद्वकारम् सत्यमवदिषं पश्रु च ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

४६

नः, इन्द्रः, बृहस्पतिः, शम्, नः, विष्णुः, उरुक्रमः, नमः, ब्रह्मणे, नमः, ते, वायो, त्वम्, एव, प्रत्यक्षम्, ब्रह्म, असि, त्वाम्, एव, प्रत्यक्षम्, ब्रह्म, ऋतादिषम्, ऋतम्, ऋतादिषम्, सत्यम्, ऋतादिषम्, तत्, माम्, ऋतावीत्, तत्, वकारम्, ऋतावीत्, माम्, ऋतावीत्, वकारम्, ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः ॥

शान्त्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

मित्रः=प्रातः श्रौर दिन श्राभिमानी देवता

नः=हमको

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

वरुणः=ग्रापान श्रौर रात्रि श्राभिमानी देवता

नः=हम को

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

श्रर्यमा=नेत्र श्रौर सूर्य श्राभिमानी देवता

नः=हमको

शम्=सुखककारी

भवतु=होवें

इन्द्रः=बल-ग्राभिमानी देवता

नः=हमको

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

बृहस्पतिः=वाचा श्रौर बुद्धि श्राभिमानी देवता

नः=हमको

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

शान्त्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

भवतु=होवें

उरुक्रमः= { बढ़ानवाला है तीन पद का जो राजा्वालि के ( विष्णु बिष एसो

विष्णुः=चरणों का श्राभि-

मानी देवता

नः=हम को

शम्=सुखकारी

भवतु=होवें

ब्रह्मणे=उयापक है जो ऐसे ब्रह्म के लिये

नमः=नमस्कार है

वायो=हे वायुदेवता

ते=तेरे श्रर्थे

नमः=नमस्कार है

त्वम्=तू

प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष

ब्रह्म=ब्रह्म

असि=है

त्वाम्=तुमको

एव=ही

प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष

ब्रह्म=ब्रह्म

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४०

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

अवांदिषम्=मैंने कहा है

त्वाम्=तुमको

पव=ही

श्रुतम्=निश्चयात्मक बुद्धि

अवांदिषम्=मैंने कहा है

त्वाम्=तुमको

पव=ही

सत्यम्=सत्य

अवांदिषम्=मैंने कहा है

तत्=उस वायु-रूप ब्रह्म ने

माम्=मुझे

आवीत्={ अध्याात्मिक

तत्=उस वायु-रूप ब्रह्म ने

वक्कारम्=आचार्यं

आवीत्=उसने रक्षित किया है

आशीः=उसने रक्षित किया है

माम्=मुफ्कको

आशीः=उसने रक्षित किया है

वक्कारम्=आचार्यं को

आशीः=उसने रक्षित किया है

आंशान्तिः={ आध्यात्मिक

शान्तिः={ आधिभौतिक

शान्तिः={ आधिदैविक

भावार्थ ।

ॐ शान्नो मित्रः शं वरुणः । इस शान्ति-पाठ का अर्थ पहिले कर ग्राये हैं. वही अर्थ यहाँ पर भी जान लेना चाहिये, दुबारा लिखने की जरूरत नहीं है, शब्दार्थ ऊपर दिया है वह इसी प्रकार स्पष्ट है ॥ इति शित्तावल्ली समाप्ता ॥ १ ॥

मूलम् ।

हरीः ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्ये करवावहै तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद्।

पदच्छेदः ।

सह, नौ, श्रावतु, सह, नौ, भुनक्तु, सह, वीर्यम्, करवावहै, तेजस्विनौ, श्रधीतम्, अस्तु, मा, विद्विषावहै, ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः ॥

मन्त्रव्य: । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

  • सः=वह ईश्वर नौ=हम दोनों को श्रथांत् गुरु और शिष्य्र को सह=साथ + एव=ही श्रावतु=रक्षा करे नौ=हम दोनों को सह=साथ + एव=ही भुनक्तु=भोग प्राप्त करे + श्रावाम्=हम दोनों सह=साथ + एव=ही वीर्यम्=विद्या-ज्ञान श्रौर विद्या-ग्रहण-सामर्थ्य को करवावहै=प्राप्त होवें नौ=हम दोनों का श्रधीतम्=पढ़ा हुध्रा तेजस्वि=श्रर्थ ज्ञान योग्य श्रथांत् सफल अस्तु=होवे + श्रावीम्=हम दोनों मा विद्विषावहै=पठन-पाठन में प्रमाद-रूप विद्वेष को न प्राप्त होवें ॐ शान्तिः=श्राध्यात्मिक शान्तिः=श्राधिभौतिक शान्तिः=श्राधिदैविक, श्रे त्रिविध ताप हमारे शान्त होवें ॥

भावार्थ ।

अब वक्ष्यमाणा परा-विद्या की प्राप्ति के लिये श्रैर विघ्नों की शान्ति के लिये प्रथम शान्ति-मन्त्र के श्रर्थ को कहते हैं—

परमेश्वर हम दोनों श्रथांत् श्राचार्य श्रैर शिष्य के हृदय में ब्रह्म-विद्या के स्वरूप को प्रकाश करके रखा करे परमेश्वर हम दोनों को विद्या के फल को प्राप्त करे, वह परमेश्वर हम दोनों की ब्रह्म-विद्या-कृत सामर्थ्य को बढ़ावे, हम दोनों श्रतिशय करके तेजस्वी

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

होंवें, हम दोनों में प्रमाद करके परस्पर द्वेष कभी न होवें, हम दोनों की आध्या́त्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक विघ्नों से शान्ति होवे ॥ ॐ शान्ति:, शान्ति:, शान्ति: ॥

मूलम् ।

ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम् तदेषाडभ्युक्ता सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् सो́डश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेतितस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: सम्भूत:, आकाशाद्वायु:, वायोरग्नि:, अग्नेराप:, अद्भ्य: पृथिवी, पृथिव्या ओषधय:, ओषधीभ्यो́न्नम्, अन्नाद्रेत:, रेतस: पुरुष:, स वा एष पुरुषो́न्नरसमय: तस्येदमेव शिर:, अयं दक्षिणा: पाद:, अयमुत्तर: पाद: अयमात्मा इदं पuc्छं प्रतिष्ठा तदप्येष श्लोको भवति ॥

इति प्रथमोऽनुवाक: ॥ १ ॥

पदच्छेद: ।

ब्रह्मविद्, आप्नोति, परम्, तद्, एषा, अभ्युक्ता, सत्यम्, ज्ञानम्, अनन्तम्, ब्रह्म, य:, वेद, निहितम्, गुहायाम्, परमे, व्योमन्, स:, अश्नुते, सर्वान्, कामान्, सह, ब्रह्मणा, विपश्चिता, इति, तस्मात्, वै, एतस्मात्, आत्मन्, आकाश:, सम्भूत:, आकाशात्, वायु:, वायो:, अग्नि:, अग्ने:, आप:, अद्भ्य:, पृथिवी, पृथिव्या:, ओषधय:, ओषधीभ्य:, अन्नम्, अन्नात्, रेत:, रेतस:, पुरुष:, स:, वै, एष:, पुरुष:, अन्नरसमय:, तस्य, इदम्, एव, शिर:, अयम्, दक्षिणा:, पाद:, अयम्, उत्तर:, पाद:, अयम्, आत्मा, इदम्, पुच्छम्, प्रतिष्ठा, तत्, अपि, एष:, श्लोक:, भवति ॥

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ग्रन्थयः १ | पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

ब्रह्मावित्=ब्रह्म-वेत्ता परम्=निर्तिशय ब्रह्म को प्राप्नोति=प्राप्त होता है ब्रह्म-श्रेष्ठ स्वयं ब्रह्म-रूप होजाता है

तत्=तत्र=उस ब्रह्म के ज्ञान बिषे

पषा=यह ऋचा श्रभ्युक्ता=वेद ने कही है कि सत्यम्=विकार-शून्य ज्ञानम्=ज्ञान-स्वरूप अनन्तम्=त्रिविध परिच्छेद-शून्य श्रर्थात् काल, दिक्, श्रौर देश के श्रवाधि से शून्य

इति=ऐसा ब्रह्म=ब्रह्म है परमे=उत्कृष्ट

व्योमन्=हृदयाकाश में गुहायाम्=बुद्धि-रूप गुहा बिपे + यत्=जो निहितम्=साक्षि-रूप से स्थित है + तत्=उस ब्रह्म को यः=जो वेद=जानता है सः=वह विपाश्चिता=सर्वज्ञ

ग्रन्थयः १ | पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

ब्रह्माण=ब्रह्म-स्वरूप एक्काल् बिपे सहैव={ ही श्रर्थात् तर्काल ही सर्वान्=संपूर्ण कामन्=कामनाओं को श्रश्नुने={ प्राप्त होता है श्रर्थात् सर्वास्मा होजाता है

तस्मात्=उस पतस्मात्=उस पूर्वोक्त श्रात्मन्:=श्रात्मा से श्राकाशः=श्राकाश, शब्द-गुणवाला चै=प्रसिद्ध सम्भूतः=उत्पन्न हुग्रा है

श्राकाशात्=श्राकाश से वायु:=वायु, शब्द-स्पर्श-गुणवाला सम्भूतः=उत्पन्न हुग्रा है

वायोः=वायु से श्राग्नि:=श्राग्नि, शब्द-स्पर्श-रूप गुण्य-वाला सम्भूतः=उत्पन्न हुग्रा है

ग्रग्ने:=ग्रग्नि से श्रापः=जल, शब्द-स्पर्श-रूप-रस गुण्य वाले सम्भूतः=उत्पन्न हुग्रा है

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

सम्भूता:=उत्पन्न हुए हैं अन्नेभ्य:=अन्नों से पृथिवी= pृथिवी, शब्द- स्पर्श-रूप-रस- गंध-गुणवाली सम्भूता=उत्पत्ति हुई है पृथिव्या:=पृथिवी से ओषधय:=ओषधियाँ सम्भूता:=उत्पन्न हुए हैं ओषधीभ्य:=ओषधियों से अन्नम्=अन्न सम्भूतम्=उत्पत्ति हुआ है अन्नात्=अन्न से पुरुष:=पुरुष सम्भूत:=उत्पत्ति होता है पृषः=यह है वै=निश्चय है कि सः पुरुष:=वह पुरुष अन्नरसमय:=अन्न-रस से आस्तित=स्थित है अर्थात उत्पत्ति हुआ है तस्य=उस पुरुष का

इदम्=यह शिर:=शिर है अयम्=यह दक्षिणः=दहिना पक्ष:=भुजा है अयम्=यह उत्तर:=वाम पक्ष:=भुजा है अयम् आत्मा= यह कंठ से क- टिपर्यंत अंर्गी- मध्यभाग आत्मा है इदम्=यह कंधे से नीचे पादतल पर्यंत पुच्छम्=पूँछ है हत्=वह पूँछ प्रतिष्ठा=उर्ध्व देह का आधार है तत्=तत्=ऐसे अन्नमय कोश विवे श्रापे=ही पृषः=यह आगेआल श्लोकः=मंत्र भवति=प्रसिद्ध है ॥

भावार्थ ।

अथिति । पूर्व वक्ष्यी में उपासना का निरूपण किया है, किंतु केवल उपासना से जन्म-मरण-रूप संसार का नाश नहीं होता है, किंतु संपूर्ण श्रनर्थों का बीज-भूत अविद्या है, उसके नाश होने से ही संसार-रूप बीज का नाश होता है, इसलिये अविद्या का नाशक श्रात्मज्ञान है, उसी को श्रुति उपदेश करती है ‘ब्रह्मविदाप्रोति’ इति

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जो वस्तु सबसे बड़ी हो, अर्थात् जगत् जिसके अन्तर्भूत हो, उसी का नाम ब्रह्म है, उसी व्यापक ब्रह्म को जो कोई अपना आत्मा करके जानता है, उसी का नाम ब्रह्मवित् है, वह ब्रह्मवित् ही देह-त्याग के अनन्तर ब्रह्म को प्राप्त होता है, अर्थात् ब्रह्म में लय होकर ब्रह्म-रूप हो जाता है, इसी अर्थ को और भी श्रुति कहती हैं 'ब्रह्माविद् ब्रह्मैव भवति' जो ब्रह्म को जानता है, वही ब्रह्म-रूप होता है, इसी बात को मंत्र ने भी कहा है 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' वह ब्रह्म सद्रूप है, ज्ञान-स्वरूप है, अनन्त-रूप है, श्रुति ने ब्रह्म के स्वरूप का यह लक्षणा कहा है, जो वस्तु स्वरूप-भूत हो, और इतर पदार्थों से भेद करके लक्षित भी हो, उसको का नाम स्वरूपलक्षणा है, सो सत्यादि ब्रह्म के स्वरूप हैं, और इतर जड़ पदार्थों से भेदक भी हैं, इसवास्ते यह ब्रह्म का स्वरूपलक्षणा है ॥ और ब्रह्म के लक्षणा में 'सत्य' पद देने से मिथ्या की व्यावृत्ति होती है, अर्थात् मिथ्या पदार्थों से वह भिन्न है, और 'ज्ञान' पद से जड़ की व्यावृत्ति होती है, अर्थात् वह ब्रह्म जड़ पदार्थों से भिन्न चेतन है, 'अनन्त' पद से परिच्छिन्न पदार्थों से व्यावृत्ति होती है, अर्थात् देश, काल, वस्तु परि-च्छेदवाले जितने पदार्थ हैं, उन सबसे वह भिन्न है, अर्थात् वह सत्य-स्वरूप है, ज्ञान-स्वरूप है, और अनन्त-स्वरूप है, ऐसे ब्रह्म को, 'यो वेद निहितं गुहायाम्' जो विद्वान् पुरुष बुद्धि-रूप गुहा में स्थित देखता है, और जानता है, अर्थात् 'अहं ब्रह्मास्मि' करके साक्षात्कार कर लेता है, सो विद्वान् ब्रह्म के साथ अभेद को प्राप्त होकर, संपूर्ण भोगों को एक ही काल में भोगता है, अर्थात् ब्रह्मानंद को प्राप्त होता है ।

तस्माद्रेति । ब्राह्मण-वाक्य करके और ब्रह्म मंत्र-वाक्य करके, जो ब्रह्म कथन किया गया है, उसी ब्रह्म से शब्द, तन्मात्रा, आकाश

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प्रथम उत्पन्न हुत्या, फिर उसी व्याकाश से स्पर्शतन्मात्रा वायु उत्पन्न हुयी, उसी वायु से रूपतन्मात्रा ऋग्नि उत्पन्न हुयी, उस ऋग्नि से फिर रसतन्मात्रा जल उत्पन्न हुया, उस जल से गंधतन्मात्रा पृथिवी उत्पन्न हुयी, उस पृथिवी से व्रीहियवादि औषधियाँ उत्पन्न हुयीं, उन औषधियों से भातरूपि अन्न उत्पन्न हुया, फिर अन्न से वीर्य उत्पन्न हुया, उस वीर्य से हाथ-पाँववाला स्थूल शरीर उत्पन्न हुया, इसलिये यह स्थूल देह अन्न के रस का ही विकार है, उस अन्न रसमय पुरुष का यह प्रसिद्ध शिर है, यह प्रसिद्ध दक्षिण भुजा है, यह प्रसिद्ध सव्य उत्तर भुजा है, और दोनों भुजाओं के बीच में जो मध्यम भाग है, सो संपूर्ण अंगों का आत्मा है, याने स्थापना त्याप है, और जो यह प्रसिद्ध नाभि का अधोभाग है सो पुच्छ है, याने पुच्छ की तरह अन्नमय शरीर का आधार है, सो उस बाह्य अन्नमय कोश की उपासना विषे यह अगला मन्त्र प्रमाया है ॥

इति प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥

मूलम् ।

अन्नाद्दै प्रजा: प्रजायन्ते, या: काश्च पृथिवीं शिताः; अथो अन्नेनैव जीवन्ति, अथैनदपि यन्त्यन्ततः; अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठं, तस्मात्सर्वौषधमुच्यते, सर्वे वैते ऽन्नामभवन्ति ये ऽन्नं ब्रह्मोपासते ज्येष्ठं तस्मात्सर्वौषधमुच्यते अन्नाद्भूतानि जायन्ते जातान्यन्नेन वर्धन्ते अद्यते ऽत्ति च भूतानि तस्मादन्नं तदुच्यते इति तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात् अन्न्योऽतरात्मा प्राणमयः तेनैष पूर्णः स वा एष पुरुषविध एव तस्य पुरुषविधताम् अन्न्वयँ पुरुषविधः तस्य प्राण एव

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

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शिरः ऋयानो दधिघ्नः पन्थः ऋपान उत्तरः पन्थः ऋआकाश ऋआत्मा पृथिवी पुञ्छं प्रतिष्ठा तदप्येष श्लोको भवति ॥२॥ इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

ऋयान्त्, वै, प्रजा:, प्रजायन्ते, या:, का:, च, पृथिवीम्, श्रिता:, ऋथो:, ऋन्नेन, एव, जीवन्ति, ऋथ, एनत्, ऋपि, यन्ति, ऋन्ततः, ऋन्नम्, हि, भूतानाम्, ज्येष्ठम्, तस्मात्, सर्वौषधम्, उच्यते, सर्वम्, वा, एते, ऋन्नम्, ऋभुवन्ति, ये, ऋन्नम्, ब्रह्म, उपासते, ऋन्नम्, हि, भूतानाम्, ज्येष्ठम्, तस्मात्, सर्वौषधम्, उच्यते ऋन्नात्, भूतानि, जायन्ते, जातानि, श्रयन्ते, वर्धन्ते, श्रिचते, श्रोति, वच, भूतानि, तस्मात्, ऋन्नम्, तत्, उच्यते, इति, तस्मात्, वै, एतस्मात्, ऋन्नरसमयात्, ऋन्यान्:, ऋन्नतरात्मा, प्राश्नमयः, तेन, एष:, पूर्वः:, स:, वै, एष:, पुरुषविध:, एव, तस्य, पुरुषविधताम्, ऋनु, ऋयम्, पुरुषविध:, तस्य, प्राप्तः, एव, शिरः, ऋयानः, दधिघ्नः, पन्थः, ऋपानः, उत्तरः, पन्थः, ऋआकाशः, ऋआत्मा, पृथिवी, पुञ्छम्, प्रतिष्ठा, तत्, ऋपि, एषः, श्लोकः, भवति ॥

शब्दार्थः । पदार्थ- सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

च=श्रौर य:=जो का:=कौन् प्रजा:=प्रजा पृथिवीम्=पृथिवी के + ता:=ते सब श्रिता:=आश्रित हैं

ऋन्नात्=रस-परिप्यामो ऋन्न से वै=ही प्रजायते=उत्पन्न होती हैं

ऋथो:=उत्पत्ति के परचात ऋन्नेन=ऋन्न से एव=ही जीवन्ति=जीती हैं श्रौर बढती हैं ऋथ=जीवन-वर्धन के परचात

ऋन्तत:=श्रत-संत्य जीवन-त्याग के समय एनत्=इस ऋन्नम्=ऋन्न को ऋपि=में यन्ति=जाते हैं

पदच्छेदः । पदार्थ- सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

च=श्रौर ऋथो:=उत्पत्ति के परचात ऋन्नेन=ऋन्न से एव=ही

जीवन्ति=जीती हैं श्रौर बढती हैं ऋथ=जीवन-वर्धन के परचात

ऋन्तत:=श्रत-संत्य जीवन-त्याग के समय पनतत्=इस ऋन्न ही ऋपि=में

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यन्ति=आतीन होती हैं भूतानि=समस्त भूत आन्नात्=अन्न से जायन्ते=उत्पन्न होते हैं जातनि=उत्पन्न हुए च=और वर्धन्ते=वृद्धि को प्राप्त होते हैं + यत:=जिस कारण तद्=वह अन्न भूतै:=भूतों द्वारा अध्यतते=खाया जाता है च=और वह भूतानि=भूतों को + प्रियम्=अप्रिय अभित:=खाता है तस्मात्=उसी कारण अन्नम्=अन्न उच्चयते=कहा जाता है वै:=स्मरण रहे कि तस्मात्=उस पतस्मात्=पूर्वोक्त

तस्मात्=इस कारण अन्नम्=अन्न हि=निश्चय करके भूतानाम्=प्राणियों का ज्येष्ठम्=प्रथम तत्व है च=और सर्वौषधम्={ सब के लिये भूधा-निवारणार्थ औषध उच्चयते=कहा जाता है ये=जे अन्नम्=अन्न को अत्ति=करके उपासते=उपासना करते हैं ते=वे सर्वम्=सब अन्नम्=अन्न चा=निश्चय करके प्राप्नुवन्ति=प्राप्त होते हैं यस्मात्=जिस कारण अन्नम्=अन्न हि=ही भूतानाम्=प्राणियों का ज्येष्ठम्=प्रथम तत्व है तस्मात्=उसी कारण सर्वौषधम्={ प्रथोत भूधा शान्त्त करनेवाला उच्चयते=कहा जाजा है

अन्नरसमयात्={ अन्न-रस द्वारा बने हुए देह से प्रथोत अन्नमय कोश से आनन्दरातमा=प्रसन्नतासे भरा हुआ शरीर प्राणमय:=प्राणमय कोश + अभित:=है

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तेन=उस प्राणमय कोश द्वारा पषः=यह अन्नमय कोश पूर्षः={ पृरित है याने भराहुचा है जैसे हवा से थैली भरी होती है वैः=पुनः समरण्य रहे कि सः=वह पषः=यह प्राणमय कोश + ग्रपि=भी पुरुषविधः=पुरुषाकार एव=ही + ग्रस्ति=है तस्य=उस पूर्वोक्त अन्नमय कोश पुरुषविधताम्=पुरुषाकार के ग्रनु=समान ग्रयम्=यह प्राणमय कोश ग्रपि=भी पुरुषविधः=पुरुषाकार है तस्य=उस प्राणमय शरीर का प्राणा:=प्राणा एव=ही शिरः=शिर है ध्यानः=ध्यानवायु

दक्षिणतः=दहिना पक्षः=भुजा है प्रपानः=ग्रपानवायु उदक्=वाम पक्षः=भुजा है ग्राकाशः={ ग्रभ्यंतर ग्राकाश ग्रथांत् समान वायु ग्रात्मा=शरीर है याने धड़ है पृथिवी=ग्रपानवांयु के रहने का स्थान + तस्य=उसका पृच्छमूः=पूँछ है याने नीचे का धड़ है + तत्=वह पृच्छमूस्थानरूप पृथिवी प्रतिष्ठा={ उस प्राणमय शरीर का ग्राधार स्थान है उस प्राणमय कोश की उपासना विधे . तत्=तत्={ ग्रपि=ही पषः=यह ग्रलोकः=मंत्र प्रनाया भवति={ है (जिसका ध्यान श्रागे किया जावेगा )।

भावार्थे ।

ग्रन्नाद्वा इति । सृष्टि बीजभावापन्न विराडात्मा से प्रसिद्ध स्थावर-जंगम-रूप प्रजा उत्पन्न होती हैं, ग्रौर जितनी पृथिवी पर प्रजा हैं, वे

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

सब ॠन्न से ही उत्पन्न होती हैं, और ॠन्न को ही भद्रता करके जीती हैं, इसलिये सब प्रजा ॠन्न के तरफ दौड़ती हैं, और फिर पृथिवी-रूप ॠन्न में ही सब लय को प्राप्त होजाती हैं, समष्टिरूप ॠन्न सम्पूर्ण प्रजा की उत्पत्ति का कारण होने से प्रथम उत्पन्न हुया है, और सबसे प्रथम होने के कारण जुदा सब रोगों का नाशक है, इसी वास्ते वह औपध करके कहा जाता है, जो उपासक ॠन्न को ही ब्रह्म-रूप करके उपासना करते हैं, अर्थात् ॠन्न में ही ब्रह्म-बुद्धि को करते हैं, वे निश्चय करके ॠन्न को प्राप्त होते हैं, और ॠन्न से सम्पूर्ण प्राणि उत्पन्न होते हैं, और ॠन्न करके ही उत्पन्न होकर जीते हैं और बढ़ते हैं, इसी वास्ते ॠन्न को ही जीवन का कारण कहते हैं, यह ॠन्नमय कोश के उपासना का मंत्र है । जो ॠन्नमय कोश ब्रह्म की उपासना करते हैं वे ॠन्न से सदा पूरर्ण रहते हैं । पूर्ववाले मंत्र करके ॠन्नमय कोश का निरुपण करके ॠन्न प्राणमय कोश को दिखलाते हैं ।

तस्मादिति । ब्रह्मखभाग करके और मंत्रभाग करके कथन किया जो ॠन्नमय कोश है, उसके ॠनन्तर और उससे भिन्न प्राणमय कोश है, जैसे धौकनी विषे वायु व्याप्त है, उसी प्रकार प्राणमय कोश करके यह स्थूल देह व्याप्त है, सो जो स्थूल देह में वर्तमान प्राणमय कोश है, सो शिर आदि अवयवों करके पुरुपाकार है, उस ॠन्नमय कोश पुरुषाकार के ॠनन्तर यह प्राणमय कोश भी है पुरुषाकार है, ॠन्नमय कोश की तरह यह प्राणमय कोश स्वतंत्र पुरुषाकार नहीं है, बल्कि ॠन्नमय कोश के पुरुषाकर्ता को आश्रय करके उसी के आकार ऐसा इसका आकार है, इसी प्रकार पूर्व-पूर्व कोश की पुरुषाकर्ता के ॠनन्तर उत्तर-उत्तर कोश की पुरुषाकारता आती जाती है, और उस प्राणमय कोश का मुख और नासिका में संचार करनेवाली जो कि प्राणवायु है वही शिर है, और सम्पूर्णा नाड़ियों में संचारणा करनेवाली जो व्यानवायु

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है, वही दहिना पद है, और नीचे को संचार करनेवाली जो अपान वायु है वह उत्तर पद है, और सम्पूर्ण शरीर में विचरनेवाली जो समान वायु है वह शरीर है, याने धड़ है, और उदान वायु पृँछ याने शरीर का आधार स्थान है, प्राणमय कोश की उपासना बिपे यह आगेवाला मंत्र प्रमाण है ॥ २ ॥

इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥

मूलम् ।

प्राणं देवा श्रनुप्राणन्ति, मनुष्या: पशवश्च ये प्राणो हि भूतानामायु: तस्मात्सर्वायुषमुच्यते सर्वमेवत श्रायु-र्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते प्राणो हि भूतानामायुस्सर्वम-स्तस्मायुषमुच्यत इति तस्यैष एव शरीर श्रात्मा य: पूर्वस्य तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयाद् श्रन्योंऽन्तरात्मा मनोमय: तेनैष पूर्ण: स वा एष पुरुषविध एव तस्य पुरुषविधताम् श्रनु श्रयम् पुरुषविध: तस्य यजु: शिर:, ऋग्द्विषा: पदे:, सामोचार: पदे:, श्रादेश श्रात्मा श्रथर्वाङ्गिरस: पुच्छं प्रतिष्ठा तदप्येष श्लोको भवति ॥ ३॥

इति तृतीयोऽनुवाक: ॥ ३ ॥

पदच्छेद: ।

प्राणम्, देवा:, श्रनु, प्राणन्ति, मनुष्या:, पशव:, च, ये, प्राण:, हि, भूतानाम्, श्रायु:, तस्मात्, सर्वायुषम्, उच्यते, सर्वम्, एव, ते, श्रायु:, यन्ति, ये, प्राणम्, ब्रह्म, उपासते, प्राण:, हि, भूतानाम्, श्रायु:, सर्वम्, अस्तस्मायुषमुच्यत इति, तस्य, एष:, एव, शरीर:, श्रात्मा, य:, पूर्वस्य, तस्मात्, वै, एतस्मात्, प्राणमयात्, श्रन्य:, श्रन्तरात्मा मनोमय:, तेन, एष:, पूर्ण:, स:, वै, एष:, पुरुषविध:, एव, तस्य, पुरुषविधताम्, श्रनु, श्रयम्, पुरुषविध:, तस्य, यजु:, एव, शिर:, ऋग्द्विषा:, पदे:, सामोचार:, पदे:, श्रादेश श्रात्मा श्रथर्वाङ्गिरस:, पुच्छं, प्रतिष्ठा, तदप्येष श्लोको भवति ॥ ३॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

ऋक्, दान्तिआ:; पच्:, साम, उत्तर:; पद्:, श्रादेश:; श्रात्मा, श्रथर्वऋिरस:; पुष्टऋम्, प्रतिष्ठा, तत्, ऋपि, एष:, रसोऽक:, भवाति ॥

ग्रन्थय: । पदार्थ-सहित ग्रन्थय: ।

सूक्ष्म भावार्थे । सूक्ष्म भावार्थे ।

ये=जो

देवा:=इन्द्रियाभिमानी देवता हैं

च=और

ये=जो

मनुष्या:=मनुष्य

पशव:=पशु श्रादि प्राणि हैं

  • ते=वे सब

प्राणम्=प्राण के

ग्रनु=पश्चात्

प्राणन्ति=चेष्टावान् होते हैं

हि=क्योंकि

प्राणा:=प्राण

भूतानाम्=सब भूतों का

आयु:=जीवन है

तस्मात्=इसलिए

सर्वायुषम्=सबका जीवन

उच्यते=कहा जाता है

ये=जो कोऊ

प्राणम्=प्राण को

ब्रह्म=ब्रह्म

इति=करके

उपासते=उपासन करते हैं

तत्=वह

सर्वम्=पूर्ण याने सौ वर्ष तक

आयु:=आयु को

पच=प्राप्य

यन्ति={ प्राप होते हैं श्रथांत्

हि=जिस कारण

प्राण:=प्राण

भूतानाम्=सब प्राणियों का

आयु:=आयु है

तस्मात्=उस कारण

सर्वायुषम्=सबका जीवन

उद्यते=कहा जाता है

  • च=और

पूर्वस्य=प्राणमय कोश का

य:=जो

आत्मा=चिदात्मा

शरीर:=शरीर विषे स्थित

पष:=वह

पव=ही

तस्य=इस प्राणमय कोश का

ऋपि=भी

आत्मा=चिदात्मा

  • श्रासित=है

इति={ यह प्राणमय कोश की

वै=पुनः समरष्य रहे कि

तस्मात्=तस्मात्

प्ततस्मात्=इस

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तैत्तिरीयोपनिषद्।

प्राणमयालू=प्राणमय कोष के | पुरुषविध:=पुरुषाकार है

अ्रान्तर:=श्रास्यन्तर + च=श्रौर

अ्रान्य:=पृथक् अ्रात्मा=शारीर

मनोमय:=मनोमय कोष के प्रसिद्ध + अ्रासित=है

तेन=इस मनोमय कोश करवेके

पृष:=यह प्राणामय कोश पूर्वी:=पूरित है अ्रर्थात् व्याप्त है

वै=समझा रहे कि स:=सो

पृष:=यह मनोमय कोश अ्रापि=भी

पुरुषविध:=पुरुषाकार पव=ही

अ्रासित=है

तसय=उस प्राणामय कोश के

पुरुषविधताम्=पुरुषप्रकार के

अ्रनु=समन

अ्रायमू=यह मनोमय कोश + अ्रपि=भी

तसु=इस मनोमय शरीरका यजु:=यजुर्वेद पव=निश्चय करके

शिर:=शिर है ऋक्=ऋग्वेद

दक्षिणे=दाहिने

पक्ष:=भुजा है साम=सामवेद

उत्तर:=वाम

पक्ष:=भुजा है

आदेश:=श्रादेश-ग्रन्थ अ्रर्थात्

ब्राह्मय=-भाग

अ्रात्मा=मध्य शरीर है

अ्रथर्वाङ्गिरस:=अ्रथर्ववेद

पुच्छमु=पुँछ है + ततु=सोई

प्रतिष्ठा=उस मनोमय कोश का अ्राधिष्ठान + अ्रासित=है

ततु=इस मनोमय कोश की उपासना विषे

अ्रपि=भो

पृष:=यह श्लोक:=मन्त्र प्रमा्या

भवति=है ॥

भावार्थ ।

प्राणामिति । पाँच वृत्ति-रूप जो मुख्य प्राण है, उसको अ्राश्रयण करके ही देवता, मनुष्य, पशु, पत्ती अ्रादि सब चेष्टा को करते हैं, और प्राणों की क्रिया करके ही सम्पूर्ण क्रियावाले होते हैं, इसी कारण

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

प्राण प्राणियों का जीवन है, जवतक इस शरीर में प्राण निवास करता है तबतक सभी जीते हैं, जो अधिकारी प्राणमय कोश आत्मा की ब्रह्म-रूप करके उपासना करता है, वह उपासक पूर्ण शतवर्ष की आयु पर्यंत जीता है, जो पुरुप जिस इच्छा करके ब्रह्म की उपासना को करता है, वह पुरुप उसी इच्छा को प्राप्त होता है, जो पुरुष दीर्घ आयु की इच्छा करके ब्रह्म की उपासना को करता है, वह दीर्घ आयु को प्राप्त होता है, और जो चैतन्य आत्मा अन्नमय कोशवाले शरीर में है, वही प्राणमय कोश त्रिपे भी स्थित है । और ब्राह्मण-भाग करके भिन्न और उसके भीतर मनोमय कोश है, उससे मनोमय कोश करके यह प्राणमय कोश पूर्ण है, और इसीलिये जो चेतन प्राणमय कोश का आत्मा है वही मनोमय कोश का भी आत्मा है, और वह मनोमय कोश भी पुरुषाकार है, अर्थात् वह भी शिर आदिस्वयवोंवाला है, इसवास्ते वह भी पुरुषाकारवाला कहा जाता है, उस पुरुपाकार को दिखलाते हैं, इस मनोमय कोश का यजुर्वेद शिर है, ऋग्वेद दक्षिणा पद है, सामवेद उत्तर पद है, और ब्राह्मण-भाग जो है वह उस मनोमय कोश का मध्य भाग है, और अथर्ववेद मनोमय कोश की पूँछ है, अर्थात् अधिष्ठान है, ऐसा जानकर चिंतन करे, इसी अर्थ को मन्त्र भी कहता है ॥ ३ ॥

इति तृतीयोऽनुवाकः ॥ ३ ॥

मूलम् ।

यतो वाचो निवर्त्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । श्रानन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनैति तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात् । श्रन्योऽन्तर श्रात्मा विज्ञानमयः तेनैष पूर्णः स वा एष पुरुषविध एव तस्य पुरुषविधताम् । श्रन्वयं पुरुषविधः तस्य श्रद्धैव

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

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शिरः ऋतं दृढिष्ठाः पन्थाः सत्यमुत् तरः पच्छः योग आत्मा महः पुच्छं प्रतिष्ठा तदप्येष श्लोको भवति ॥ ४ ॥

इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

यतः, वाचः, निवर्त्तन्ते, अप्राप्य, मनसा, सह, ज्ञानन्दम्, ब्रह्मणा:, विद्वान्, न, बिभेति, कदाचन, इति, तस्य, एषः, एव, शरीरः, आत्मा, यः, पूर्वस्य, तस्मात्, वै, एतस्मात्, मनोमयात्, अन्यः, अन्यतरः, आत्मा, विज्ञानमयः, तेन, एषः, पूरि:, सः, वै, एषः, पुरुषविधः, एव, तस्य, श्रद्धा, एव, शिरः, ऋतम्, दढिष्ठाः, पन्थः, सत्यम्, उत्तरः, पदः, योगः, आत्मा, महः, पुच्छम्, प्रतिष्ठा, तत्, अपि, एव:, श्लोकः, भवति ॥

ग्रन्वयः ।

पदार्थ-सहित ग्रन्वयः ।

सूक्ष्म भावार्थे ।

वाच:=वाणी-रूप वेद

मनसा सह=मन द्वारा

यतः=जिस ब्रह्म को

अप्राप्य=न प्राप्त होकर

ग्रप्राप्य={ के श्रार्थात् घट-

दिवत् न साक्षा-

त्कार करके

लौट श्राते हैं ग्र-

थांत् प्रत्यक्ष नहीं

कर सकते हैं

निवर्त्तन्ते=लौटते हैं

तस्य=उस

ब्रह्मणा:=ब्रह्म के

ज्ञानन्दम्=ज्ञानंद को

+यः={ जो मनोमय कोष

का उपासक

विद्वान्=वेद जानता है

स:=वह उपासक

कदाचन=जन्म मरण श्रादि से कभीं

न=नहीं

बिभेति={ डरता है याने श्रावाग-

मन से रहित होकर

तस्मिन् ब्रह्म होजाताहै

तस्य=उस

पूर्वस्य=पूर्वोक्त प्रायामय

कोश का

य:=जो

शरीर:=शरीर बिषे स्थित

ग्रात्मा=चिदात्मा है

एष:=वह

+ग्रन्य:=इसमनोमय कोशका

+ग्रन्यतर:=भी

+ग्रात्मा=ग्रात्मा है

एतस्मात्=इस

मनोमयात्=मनोमय से

विज्ञानमय:=विज्ञानमय

तेन=उससे

एष:=यह

पूरि:=पूरित है

एष:=यह

पुरुषविध:=पुरुष के समान

एव=ही

तस्य=उसका

श्रद्धा=श्रद्धा ही

शिर:=मस्तक है

ऋतम्=ऋत

दृढिष्ठाः=दृढ

पन्थ:=मार्ग है

सत्यम्=सत्य

उत्तरः=ऊपर का

पद:=पद है

योग:=योग

ग्रात्मा=ग्रात्मा है

महः=महः

पुच्छम्=पुच्छ है

प्रतिष्ठा=प्रतिष्ठा है

तत्=वह

ग्रपि=भी

एव:=ही

श्लोक:=श्लोक

भवति=होता है

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

इति= { यह मनोमय

वै=स्मरन्तु रहे कि

तस्मात्=उस

एतस्मात्=इस

मनोमयात्=मनोमय कोश के

अनन्तर:=अग्रभ्यन्तर

च=श्रेष्ठ

अन्य:=पृथक्

आत्मा=शारीर

विज्ञानमय=विज्ञानमय कोश

  • ग्राह्य:=है

तेन=इस विज्ञानमय कोश से

पृष्ठ:=वह पूर्वोक्त मनोमय कोश

पूर्व:=व्याप्त है

वै=पुनः स्मरणा रहे कि

स:=वह

पृष्ठ=यह विज्ञानमय कोश

पुरुपविध:=पुरुषाकार

एव=ही

आस्ति=है

तस्य=उस मनोमय कोशके

पुरुषाविधताम्=पुरुषप्रकार के

श्रदु=समान

आयमू=यह विज्ञानमय कोश

पुरुपविध:=पुरुषाकार है

तस्य=उस विज्ञानमय

शरीर का

श्रद्धा=यागादि उपासना विषे श्रद्धा।

एव=निश्चय करके

शिर:=शिर है

ऋतम्=मानसिक निश्चय सत्य

दक्षिणा:=दाहिना

पक्ष:=भुजा है

सत्यम्=कायिक चाचिक सत्य

उत्तर:=वाम

पक्ष:=भुजा है

योग:=मन का समाधान

आत्मा=मध्य शरीर है

मह:=महत्तव

पुच्छम्=पूँछ है

तत्=वह पूँछ ग्रर्थात

प्रतिष्ठा=विज्ञानमय शरीर का ग्राधार है

तत्=तत्=उस विज्ञानमय शरीर

की उपासना विषे

अपि=भी

पृष्ठ:=यह

श्लोक:=मंत्र प्रमाण

भवति=दे ॥

भावार्थ ।

यत इनि । जिस ब्रह्म श्रात्मा को सम्पूर्ण वेद वारणी इयत्ता करके

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नहीं कहसकती है उसको मन में ञ्यारोप्य करने से मनोमय कोष हुच्रा है, उस मनोमय कोष की उपासना के फल को कहते हैं। मनोमय कोष का जो उपासक ब्रह्म के ञ्ञानंद को प्राप्त होता है वह जन्म मरन ञादि दु:खों से छूट जाता है, क्योंकि दु:ख का हेतु जो ञविद्या है वह मनोमय कोष की उपासना करके ब्रह्म के साच्ञात्कार होने पर नाश होजाति है, ञौर पूर्वोक्त प्राणामय कोष का जो ञात्मा है वही मनोमय कोष का भी ञात्मा है, ञ्ञानंद की प्राप्ति के लिये प्राणामय कोष से ञातमतव दष्टि को उठा करके मनोमय कोष में ञातमतव दष्टि को करे, उस ब्राह्मण प्रतिपाद्य वेदभाग करके ञौर मन्त्र-प्रतिपाद्य वेदभाग करके जो मनोमय कोष है उसके श्राभंतर ञौर उससे पुथक् ञौर उसके ही समान विज्ञानमय कोष है, विज्ञान नाम निश्चयात्मक ञन्त:करण की वृत्ति का है, उस विज्ञानमय कोष करके यह मनोमय कोष व्याप्त है, वह विज्ञानमय भी पुरुषाकार है, उस विज्ञानमय पुरुषकार के पाँच ञंगयकों को कहते हैं, विज्ञानमय कोष की ञास्तिक बुद्धि-रुपी जो श्रद्धा है वही शिर है, ञौर शाख के ञनुसार जो कर्तव्य है वही उसका दक्षिणपच्त है, ञौर सत्यभावना उसका उत्तर पद है, ञौर चित्त की वृत्ति का निरोध-रुप जो योग है सो उसका मध्य भाग है, ञौर हिरण्यगर्भ की समष्टि-रुप बुद्धि ञर्थात् महत्तत्व उसका ञाधार है, इसी ञर्थ को मन्त्र भी प्रकाश करता है॥ ४॥

विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुते ऽपि च विज्ञानं देवा: सर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते विज्ञानं ब्रह्म चेद् वेद तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति शरीरेऽपप्मनो हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते इति तस्यैष एव शरीर ञात्मा य: पूर्वस्य तस्माद्वा

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः तेनैष पूर्णः स वा एष पुरुषविध एव तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः तस्य प्रियमेव शिरः मोदो दक्षिणः पक्षः प्रमोद उत्तरः पक्षः आनन्द आत्मा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा तदप्येष श्लोको भवति ॥ ५ ॥

  • इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।

विज्ञानम्, यज्ञम्, तनुते, कर्माणि, तनुते, श्रपि, च, विज्ञानम्, देवा:, सर्वे:, ब्रह्म, ज्येष्ठम्, उपासते, विज्ञानम्, ब्रह्म, चेत्, वेद, तस्मात्, चेत्, न, प्रमाद्यति, शरीरेऽपि, हित्वा, सर्वान्, कामान्, समश्नुते, इति, तस्य, एष:, एव, शरीरः, आत्मा, यः, पूर्वस्य, तस्मात्, वै, एतस्मात्, विज्ञानमयात्, आनन्द्य:, आनन्तरः, आत्मा, आनन्दमयः, तेन, एषः, पूर्णः:, सः, वै, एषः, पुरुषविधः, एव, तस्य, पुरुषविधताम्, अन्वयम्, पुरुषविधः, तस्य, प्रियम्, एव, शिरः, मोदः, दक्षिणः, पद्मः, प्रमोदः, उत्तरः, पक्षः, आनन्दः, आत्मा, ब्रह्म, पुच्छम्, प्रतिष्ठा, तत्, श्रपि, एषः, श्लोकः, भवति ॥

अन्वयः ।

पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

विज्ञानम्=निश्रय-पूर्वक ज्ञान

यज्ञम्=यज्ञ को

तनुते=विस्तार करता है

कर्माणि=सप्तकर्मों को

तनुते=विस्तार करता है

श्रपि=श्रवण

च=चौर

विज्ञानम्=विज्ञान को

देवा:=सर्वे=सब

ब्रह्म=ब्रह्म को

ज्येष्ठम्=प्रथम उत्पन्न हुए

उपासते=उपासना करते हैं

तत्=उसको

चेत्=जब

वेद=जानता है

तस्मात्=जिस कारण

चेत्=यदि

न=नहीं

प्रमाद्यति=प्रमाद करता है

शरीरेऽपि=शरीर में भी

हित्वा=छोड़कर

सर्वान्=सब

कामान्=कामनाओं को

समश्नुते=प्राप्त करता है

यत्:=जिस कारण

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

ब्रह्म+ऋतिं+यो वेद चेत् तस्मात् ब्रह्म न प्रमाद्यति + सः शारीरे पाप्मन् हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते तस्य=उस पूर्वस्य मनोमय कोश का यः=जो आत्मा=चिदात्मा शारीर=शरीर में स्थित है पष=वह एव=ही + शास्त्र=हम विज्ञानमय कोश का + आपि=भी + आस्ति=आश्रय है वै=पुनः समरण रहे कि तस्मात्=उस विज्ञानमयात्=विज्ञानमय कोश के ग्रान्तर=ग्रन्थांतर च=दूसरा अन्य=पृथक् आत्मा=शरीर ग्रानन्दमय=ग्रानन्दमय कोश करके प्रसिद्ध + आस्ति=है तेन=इस ग्रानन्दमय कोश करके पष=वह विज्ञानमय कोश पूर्यों=पूरीत है ग्रर्थांत व्याप्त है वै=समरण रहे कि स:=वही पष=यह ग्रानन्दमय कोश पुरुषविध:=पुरुषाकार एव=ही + आस्ति=है तस्य=उस पूर्वोक्त विज्ञानमय कोश के पुरुषविधताम्=पुरुषाकार के श्रजु=समान ग्रयमु=यह ग्रानन्दमय कोश + आपि=भी पुरुषविध:=पुरुषाकार है तस्य=इस ग्रानन्दमय पुरुप का

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

प्रियं=पुत्र धन श्रादि इष्ट वस्तु केदार्शीनसेउत्पन्नहुथ्रा प्रेम एतद्=ही शिरः=शिर है मोदः=प्रिय पदार्थ के लाभ से उत्पन्न हुथ्रा हर्षे दक्षिणा=दहिना पक्षः=भुजा है प्रोमोद्=पूर्वोक्त प्रत्यंत हर्ष उत्तर=वाम पक्ष=भुजा है प्रानन्दः=जो मह प्रकार से श्रानंद है सः=वही

श्रातमा=मध्य शरीर है ब्रह्म=बह्म पचछमू=पाँच है ततू=वह बह्म-रूप पृथूळ प्रतिष्ठा=श्रानन्दमय शरीर का श्राधार स्थान है ततू=ततू=इस श्रानंदमय कोश की उपासना विपे श्रपि=भी पुषः=यह श्लोकः=मन्त्र प्रामाण्य भवति=है ॥

भावार्थ ।

विज्ञानमिति । विज्ञान श्रर्थात् निश्चयात्मकर जो बुद्धि है, सो वैदिक कर्म या ज्ञान को श्रद्धा-पूर्वक विस्तार करती है, श्रौर स्मार्त कर्मों को भी विस्तार करती है, श्रौर सम्पूर्ण जितने इन्द्रिय-रूप देवता हैं, वे सब विज्ञानमय श्रात्मा को बह्म-रूप करके उपासना करते हैं ॥ श्रौर इसी कारण जो पुरुष विज्ञानमय श्रात्मा को बह्म-रूप करके जानता है, श्रौर विज्ञानमय से अतिरिक्त जितने श्राननमयादि कोश हैं, उनमें जो ब्रह्म-बुद्धि को नहीं करता है वह जीवित दशा में ही पापों को नाश्र करके सम्पूर्ण दिव्य भोगों को भोगता है ॥ श्रौर जो पूर्वोक्त मनोमय कोश का श्रात्मा है वही इस विज्ञानमय कोश का भी श्रात्मा है, मनोमय कोश से उपासक श्रात्मत्व-दृष्टि को उठाकर विज्ञानमय कोश में श्रात्म-दृष्टि को करे ।

श्रथ श्रानन्दमय कोश को कहते हैं - ब्राह्मराभाग करके श्रौर मन्त्रभाग

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करके प्रतिपाद्य जो विज्ञानमय कोश है उसके भीतर और उससे मिले ज्ञानानन्दमय कोश है, जिस काल में पुरुष शुभकर्मों के फल को अनुभव करता है उसी काल में अन्तःकरणा की वृत्ति अन्तर्मुख होजाती है, और तब उसमें आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है, और प्रतिबिम्ब करके युक्त हुई वह वृत्ति ज्ञानान्दमय कही जाती है, और उसमें आधिक ज्ञानंद प्राप्त होने से उसका नाम ज्ञानान्दमय कोश है। जब कर्म का फल समाप्त होजाता है, तब वह वृत्ति लीन होजाती है, और वही ज्ञानान्दमय आत्मा भोक्ता-रूप भी होता है, उसी ज्ञानान्दमय कोश करके यह विज्ञानमय कोश व्याप्त है, और यह ज्ञानान्दमय कोश भी पुरुषाकार है, उसी ज्ञानान्दमय कोश के पाँच आवयवों को दिखलाते हैं।

प्रिय और इष्ट वस्तु के दर्शन से जन्य जो सुख है वह उस ज्ञान-न्दमय आत्मा का शिर है, और इष्ट पदार्थ के लाभ-जन्य जो सुख है वह उस ज्ञानान्दमय कोश का दक्शिणा पख्श है, और इष्ट पदार्थ के भोग से जन्य जो सुख है वह उस ज्ञानान्दमय का उत्तर पख्श है, और प्रिय प्रमोदादि इन्द्रियवों में सामान्य-रूप करके अनुगत जो सुख है वह ज्ञानान्दमय का मध्य भाग है, और जिस ब्रह्म के बोध के लिये ज्ञानमयादिक पाँच कोशों था निरुपण किया है, वह ब्रह्म ज्ञानान्दमय कोश का पुछ्छ-रूप करके व्याधार है, यही ध्यान करने के योग्य है, और जो कुछ अज्ञान करके कल्पित द्वैत प्रपंच है उस सबकी अवयधि ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्म में ही सब कल्पित है इसी अर्थ को मन्त्र ने भी कहा है॥५॥

इति पञ्चमोऽनुवाकः॥५॥

मूलम्‌।

असन्नेव स भवति असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । असति त्वमिति चेत्त्वेद सन्तमेनं ततो विदुरिति तस्मैष एव शारीर

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

आत्मा यः पूर्वस्य य्रथातोऽनुप्रश्ना: उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छति ( ३ ) ग्रहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समरनुता ( ३ ) उ सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा इदम् सर्वमसृजत यदिदं किञ्च तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् तदनुप्रविश्य सच त्यचाभवत् निरुक्तश्वानिरुक्तश्व निलयनश्वानिलयनश्व विज्ञानश्वाविज्ञानश्व सत्यश्वानृतश्व सत्यमभवत् यदिदं किञ्च तत्सत्यमित्याचक्षते तदप्येष श्लोको भवति ॥ ६ ॥

इति पदेष्टानुवाकः ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।

अ्रसन्, एव, भवति, अ्रसत्, ब्रह्म, इति, वेद, चेत्, अ्रस्ति, ब्रह्म, इति, चेत्, वेद, सत्तम्, एनम्, तत्:, विदुः, इति, तस्य, एषः, एव, शरीरः;, आत्मा, यः;, पूर्वस्य, अ्रथ, ऋत:, ऋत्नु, प्रश्राः, उत, अ्रविद्वान्, अमुम्, लोकम्, प्रेत्य, कश्चन, गच्छति, अ्रहो, विद्वान्, अमुम्, लोकं प्रेत्य कश्चित्समरनुता, उ, सोः, श्रोकामयत, बहु, स्याम्, प्रजायेय, इति, सः, तपः, अ्रतप्यत, सः, तपः, तप्त्वा, इदम्, सर्वम्, असृजत, यत्, इदम्, किञ्च, तत्, सृष्ट्वा, तत्, एव, अनुप्राविशत्, तत्, अनुप्रविश्य सत्, च, त्यत्, च, अ्रभवत् निरुक्तश्वानिरुक्तं च निलयनश्वानिलयनं च विज्ञानं चाविज्ञानं च सत्यश्वानृतं च सत्यमभवत् यत् इदम् किञ्च तत् सत्यम् इति अ्राचक्षते तत् अपि एष श्लोकः; भवति ॥

ग्रन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे । ग्रन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

चेतू=यदि ब्रह्मः=ब्रह्म

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

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असत्=नहीं है

इति=ऐसा

वेद=जानता है जो, तो

  • स:=वह ब्रह्म का नहीं जाननेवाला

पशु=प्राप ही

असन्=नास्तिक अर्थात् सत्ता-शून्य होता है

चेत्=यदि

व्रतम्=ब्रह्म

आसित=है

इति=ऐसा

वेद=जानता है जो,

तत:=तो

पुनमू=उसको अत्यंत ब्रह्म-सत्ता माननेवाले को

सन्तमू=सत्-सदित अर्थात् सत्ता

इति=करके

विदु:=जानते हैं संसारी लोक

तस्य=उस पूर्वोक्त

पूर्वस्य=विज्ञानमय कोश का

य:=जो

आत्मा=चिदात्मा

शरीर:=शरीर में स्थित है

पशु:=वह

पशु=ही

  • आत्मा=चिदात्मा

  • अस्य=उस ज्ञानमय कोश

का

  • अपि=भी

आसित=है

अथ=प्रब

अनु=इसके पश्चात्

प्रश्नः=प्रश्न

भवन्ति=उत्पन्न होते हैं कि

असत्:=ब्रह्म है अथवा ब्रह्म

नहीं है

उत=यदि ब्रह्म है

  • तद्=तौ ( क्या )

कश्चन=कोई

अविद्वान्=अज्ञ पुरुष

अपि=भी

प्रेत्य=देह-त्याग करके

अभुमू=उस

लोकमू=ब्रह्म भाव को

गच्छति इ=प्राप्त होता है ( यह विचार करना योग्य है )

अभो:=यदि पहले कहे हुये के विपरीत

ब्रह्म नहीं है

  • तदा=तौ ( क्या )

कश्चन=कोई

विद्वान्=विद्वान् पुरुष

उ=भी

प्रेत्य=देह-त्याग करके

अभुमू=उस

लोकमू=ब्रह्म भाव को

समश्नुते= { नहीं प्राप्त होता है } (यह भी विचार करना योग्य है)

इस प्रकार शिष्यों की शंका पर

सिद्धान्ती " सत् + अनं ज्ञानमननतं

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

ब्रह्म" इस पूर्वोक्त मध्यवाक्य को प्रधान रखकर आत्मा की सत्यता के निमित्त आगे ग्रंथ का आरंभ करते हैं

स:=वह आत्मा जिससे आकाश आदि पञ्च-महाभूत उत्पन्न हुये हैं

ईति=इस प्रकार

अकामयत=कामना करता भया कि अहम्=मैं

अप्रजाये-नाम सप्र-जायेयम् -नाम सप कर करके बहु=बहुत स्याम्=होऊँ

स:=वह आत्मा तप:=सृष्टि की उत्पत्ति की इच्छा बिपे

अतपयत=विचार करता भया

स:=वह आत्मा पवम्=इस प्रकार तप:=विचार

तप्त्वा=करके इदम्=इस सर्वम्=सब नामरूपात्मक जगत् को

असृजत=सृज करके तत्=उसमें

स्वयम्=आप पवम्=ही

प्राविशत्=चेतन्य कल से प्रवेश करता भया

तत्=उस जगत् बिपे प्रविश्य=प्रवेश करके

अन्नु=फिर सत्=मूर्त्त-डृश्य अर्थात् पृथिवी च=और त्यत्=अमूर्त्त डृश्यांत वायु-आकाश-रूप

च=भी + स्वयमेव=आपही

अभवत्=होता भया

निरुकम्=निरुक्त याने नीच्य जार्ति च=और

अनिरुकम्=ऊँच जाती च=भी

  • स्वयमेव=आपही

अभवत्=होता भया

निलयनम्=आश्रय च=और

अनिलयनम्=अनाश्रय च=भी

  • स्वयमेव=आपही + अभवत्=होता भया

असृजत=सृजता भया

यत्=जो किंच=कुछ इदम्=यह दृश्यमान जगत् है तत्=उसको

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विज्ञानम्=चेतन

च=और

ग्राविज्ञानम्=ग्रचेतन

च=भी

  • स्वयमेव=ग्रापही

  • ग्रभवत्=होता भया

सत्यम्=सत्य

च=ग्रौर

ग्रनृतम्=ग्रसत्य

च=भी

  • स्वयमेव=ग्रापही

  • ग्रभवत्=होता भया

यत्सत्य्यात्=जिसकी सत्यता से

यत्=जो

किञ्च=कुछ

इदम्=यह कार्य-रूप जगत् है

तत्=त्सो भी

सत्यम्=सत्य

ग्रभवत्=होता भया

तत्=उस सत्य ग्रानन्दरूप ब्रह्म को

सत्यम्=परमार्थ से सत्य

हति=करके

ग्राचक्षते=कहते हैं ( ब्रह्मवेत्ता लोक )

तत्=तत्=उस परमार्थ सत्य की

ग्रपि=भी

पष:=यह

श्लोक:=मन्त्रप्रमाण

भवति=है ॥

भावार्थ ।

ग्रसन्नेवेति । सम्पूर्ण व्यवहारों से रहित ग्रौर सम्पूर्ण इन्द्रियों का ग्रविषय जो ब्रह्म है वह ग्रसत् है, ग्रर्थात् वह है नहीं, इस प्रकार जो पुरुष जानता है वह पुरुष पुरुषार्थ से रहित ग्रसत् के तुल्य नास्तिक श्रद्धा-हीन होता है, ग्रौर इसी कारणा वह ग्रसाधु समभा जाता है, ग्रौर जो पुरुष सम्पूर्ण द्वैत जगत् का ग्रधिष्ठान ग्रौर कर्त्ता ग्रौर लय का ग्राधार ब्रह्म को जानता है, उसको ब्रह्मवेत्ता लोग ब्रह्म-स्वरूप ग्रौर परमार्थ से सद्रूप करके मानते हैं, इसलिये ब्रह्म है ऐसा जानना चाहिये, क्योंकि जो विज्ञानमय कोश का ग्रात्मा है, वहां ग्रानन्दमयकोश की भी ग्रात्मा है, ग्रौर उसी विज्ञानमय कोश के ग्रभ्यन्तर ग्रानन्दमय कोश स्थित है, पूर्व श्रुति-विधि करके ग्रात्म-तत्त्व को दिखाया है,

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

यहाँ पर मनन-विधि करके आत्म-तत्व के दिखाने के लिये प्रथम प्रश्नों को लिखते हैं ।

आत्मविद् । ज्ञानी मरकर प्रकाशस्वरूप ब्रह्म को प्राप्त होता है, वा नहीं होता है, और विद्वान् पूर्वोक्त ब्रह्म को प्राप्त होता है, या आत्मविद्वान् की तरह नहीं प्राप्त होता है, और ब्रह्म सम होने से किसी का भी पतनपाती नहीं है, तब आत्मविद्वान् उस ब्रह्म को प्राप्त होता है, वा नहीं होता है और विद्वान् उसको प्राप्त होता है, वा नहीं होता है, इन प्रश्नों के उत्तर में आगे ग्रन्थ का आरम्भ करते हैं ।

सोऽकामयतेति । परमात्मा सर्ग के आदिकाल में ऐसा इच्छा करता भया कि 'बहुस्यां प्रजायेय'। मैं एक से अनेक होऊँ, और प्रजा-रूप करके मैं उत्पन्न होऊँ ।

प्रश्न—पूर्व सिद्ध जो ब्रह्म है उसकी स्वरूप से उत्पत्ति नहीं बनती है ?

उत्तर—जैसे जल में सूर्यादिकों के प्रतिबिम्ब का प्रवेश होता है, वैसे अन्तःकरणादिकों में ब्रह्म के प्रतिबिम्ब का प्रादुर्भाव होता है, यही उत्पत्ति अंगीकार की है, स्वरूप से उसकी उत्पत्ति नहीं मानी है ।

जब इस प्रकार वह ईश्वर जगत् के रचने का विचार करता भया और पश्चात् फिर वह सम्पूर्ण जगत् को रचता भया, तब रचे हुए जगत् की चेष्टा के लिये आपही उसमें प्रवेश करता भया, अर्थात् सम्पूर्ण जीवों के अन्तःकरणा में अपना प्रतिबिम्ब डालता भया, यही उसका प्रवेश है, क्योंकि जड़ में वास्तव से व्यापक का प्रवेश बनता नहीं है ।

तदनुप्रविश्येति । उस कार्य-रूप जगत् में वह परमात्मा प्रवेश करके आपही स्थूल सूक्ष्म-रूप भी होता भया, पृथिवी, जल और तेज ये तीन स्थूल भूत चतुरादि इन्द्रियों का विषय मूर्तिमान् हैं, और वायु आकाश यह दो भूत अमूर्तिमान् हैं, सो वह परमात्मा ही मूर्त और

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

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श्रामूर्त्त-रूप होता भया, श्रौर जो कुछ नाम-रूप करके निरूपण करने को शक्य है, श्रर्थात् जितना कुछ भूत भौतिक कार्य है उसका नाम निरुक्त है: श्रौर जो कुछ नाम-रूप करके निरूपण करने को अशक्य है उसका नाम अनिरुक्त है, सो निरुक्त श्रनिरुक्त-रूप भी वह श्रापही होता भया, जो किसी श्राधार के श्राश्रित होकर स्थित होवे उसका नाम ‘निलयनं’ है जैसे कि मंदिर श्रादिक हैं, श्रौर जो किसी श्राधार के श्राश्रित होकर स्थित न होवे उसका नाम ‘अनिलयनं’ है, जैसे श्राकाशादिक. श्रौर चेतनादिक मनुष्यों का नाम विज्ञान है, श्रौर जड़ पाषाणादिकों का नाम श्रविज्ञान है, श्रौर व्यवहार का विषय जो नदियों मे जलादिक हैं वह सत्य कहे जाते हैं, श्रौर प्रतिभासिक जैसे कि शुक्ति रजतादिक हैं वह श्रसत्य कहे जाते हैं, ये सब उसी परमात्मा से ही उत्पन्न हेते भये, इसलिये जो कुछ वस्तुमात्र है उसको ब्रह्मवेत्ता लोग ब्रह्म-रूप करके ही कथन करते हैं, इसी श्रर्थको मन्त्र भी कहता है ॥ ६ ॥

इति षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥

मूलमं ।

श्रसद्वा इदमग्र श्रासीत्ततो वै सदजायत । तदात्मानं स्वयमकुरुत तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽऽनन्दी भवति को ह्येवान्यात्कः प्राण्यादतस्माद्यदेष श्राकाश श्रानन्दो न स्यात् एष ह्येवानन्दयति यद्वा ह्येवैतस्मिन्नन्दरमन्तरं डनात्म्येडनिरुक्तेडनिलयनेडभयं प्रतिष्ठां विन्दते ऽथ सोऽभयं गतो भवति यद्वा ह्येवैतस्मिँदरमन्तरं कुरुते ऽथ तस्य भयं भवति तद्वमेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य तद्रप्येष श्लोको भवति ॥ ७ ॥

इति सप्तमोऽनुवाकः ॥ ७ ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

पदच्छेदः ।

व्यसत्, वै, इदम्, अग्रे, व्यासीत्, ततः, वै, सत्, अजायत, तत्, व्यात्मानम्, स्वयं, अकुरुत, तस्मात्, तत्, सुकृतम्, उच्यते, इति, यत्, वा, एतत्, सुकृतम्, रसः, वै, सः, रसम्, हि, एव, आत्मम्, लब्ध्वा, आनन्दीभवति, कः, हि, एव, अन्यात्, कः, प्राण्यात्, तस्मात्, यत्, एषः, आत्माकाशः, आनन्दः, न, स्यात्, एषः, हि, एव, आनन्दयाति, यदा, हि, एव, एषः, एतस्मिन्, अदृश्ये, अनात्म्ये, अनिरुके, अनिलयने, अभयम्, प्रतिष्ठाम्, विन्दते, अथ, सः, अभयम्, गतः, भवति, यदा, हि, एव, एषः, एतस्मिन्, उत, अ्रम्, अनतरम्, कुरुत, एथ, तस्य, भयम्, भवति, तत्, त्वम्, एव, मवम्, विदुःः, अमानस्य, तत्, आपि, एषः, श्लोकः, भर्वाति ॥

मन्थयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

अग्रे=उत्पत्ति से पूर्व इदम्=यह जगत् व्यसत्=व्याप्त था व्यर्थात् ब्रह्मरूप वै=ही व्यासीत्=था ततः=उस श्रात्मक् ब्रह्म से सत्=नाम-रूपात्मक यह जगत् वै=निश्चय करके अजायत=उत्पन्न होता भया स्वयम्=स्वयम्भू याने अपनी कामना से श्रात्मानम्=अपने को श्रकुरुत=जगत्-रूप करत भया तस्मात्=इसलिये तत्=वह ब्रह्म सुकृतम्=सुदृढ़ उच्यते=कहा जाता है, क्योंकि यत्=चूँकि वा=निश्चय करके एतत्=यह ब्रह्म सुकृतम्=कारणात्मक सत्यरूप है वै=इसलिये सः=वह रसः=रसस्वरूप हि=ही रसम्=आनन्द को एव=ही आत्मम्=अपनेमें लब्ध्वा=प्राप्त होकर श्रानन्दीभवति=प्रानन्दयुक्त होता है कः=कौन हि=ही अन्यात्=दूसरेके बलसे कः=कौन प्राण्यात्=प्राण धारण कर सकता है ? तस्मात्=इसलिये यत्=जब एषः=यह श्रात्माकाशः=आकाशरूप श्रानन्दः=आनन्द न स्यात्=नहीं होता है एषः=तब हि=ही एव=ही श्रानन्दयाति=प्रानन्दित नहीं होता है यदा=जब हि=ही एव=ही एषः=यह एतस्मिन्=इस अदृश्ये=दृष्टिगोचर श्रनात्म्ये=जड़में श्रनिरुके=निराकारमें श्रनिलयने=आधारभूतमें श्रभयम्=निर्भयरूप प्रातिष्ठाम्=स्थितिको विन्दते=प्राप्त होता है श्रथ=तब सः=वह श्रभयम्=निर्भय गतः=होकर भवति=होता है यदा=जब हि=ही एव=ही एषः=यह एतस्मिन्=इसमें उत=और श्ररम्=विषयमें श्रन्तरम्=भेद कुरुत=करता है एथ=तब तस्य=उसके लिये भयम्=भय भवति=होता है तत्=उसको त्वम्=तुम एव=ही मवम्=मृत्यु विदुः=जानते हैं श्रमानस्य=अमानित्वका तत्=वह श्रापि=भी एषः=यह श्लोकः=श्लोक भर्वाति=होता है ॥

मन्थयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

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रसं=सार-रूप है हि=क्योंकि ग्रायं=यह जीवात्मा रसं=रस-रूप ब्रह्मा को लभन्त्र=पा करके पवं=नि:संदेह ग्रानन्दीभवति= पूर्यानन्द होता है यस्मिन्=य दे=ग्रागर श्राकाशे= { हृद्याकाश बुद्धि-रूपा गुहा बिप्रे स्थित } पषं=यह ग्रानन्दं=परमानन्द-स्वरूप परमात्मा न स्यात्=न हो + तदा=तो + लोके=लोक विषे हि=निश्रय करके क: पचं=कौन ग्रन्यादि= { उपानादि क्रिया के करने में समर्ध होवे + च=ग्रौर क:=कौन प्रारयादि= { प्राण्यादि क्रिया के करने में समर्थ होवे श्रथांत् विना श्रात्मशक्ति के उपान ग्रौर प्रार्यादि किसी अपने कार्य के करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं तस्मात्=इसलिये

हि=निश्रय करक पषं=यह परमात्मा पवं=ही + लोके=लोक को ग्रानन्दयति= { ग्रानंदित करता है ग्रथांत विषय-सुख को प्राप्त करता है हि=क्योंकि ग्रदश्ये=इन्द्रियोंका ग्रागोचर ग्रनात्म्ये=शरीर-शून्य ग्रनिधते=विशेष-शून्य + च=ग्रौर ग्रनिलयने=ग्राधार-शून्य एेतत् जो ब्रह्म है पतस्मिन्=उस विषे यद् पषं=जब यह उपासक ग्रभयम्=भयरहित ग्रथांत अद्वैत व शून्य प्रतिष्ठाम्=स्थिति को विन्दते=प्राप्त होता है ग्रथ=तब स:=वह उपासक ग्रभयम्=ग्रभयपद को गत:=प्राप्त भवति=होता है हि=खात रहे कि यद्=जब पषं=यह विद्वान् पतस्मिन्=उस ब्रह्म विषे ग्ररम्=कुछ

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

ग्रापि=भी ग्रन्तरमू=मेद कुहते=रखता है ग्रथ्=तब तस्य=उसको भयमू=भय पच=भी भवति=होता है

पच=भी तत्=वह ब्रह्म- भयमू=भय का हेतु त्वमू=तू होता है तत्=तत्=ब्रह्म के उस भय के हेतु विपे ग्रापि=भी पच:=यह श्लोक:=मन्त्र प्रमाण भवति=है ।

ग्र्रम=ज्ञानस्य=श्रद्धैत न माननेवाले विदुष:=विद्वान् को

भावार्थ ।

ग्रसद्वैत । यह जो प्रत्यक्ष को विषय जगत् है, सो उत्पत्ति से पूर्व ग्रसत् ग्रर्थात् नाम रूप करकै प्रकट नहीं होता भया, क्योंकि कथ- मसत: सज्जायेत' । ग्रसत् से ग्रर्थात् शून्य से कैसे व्यावहारिक सत-रूप जगत् की उत्पत्ति हो सकती है, इस श्रुति-वाक्य ने शून्य से जगत् की उत्पत्ति का निषेध किया है, इसलिये ग्रव्यक्त ब्रह्म से नाम-रूप संयुक्त जगत् उत्पन्न होता भया, ग्रर्थात् ग्रव्यक्त शब्द का वाच्य जो कि ब्रह्म है, सो ग्रपने को ही जगत्-रूप करकै दिखाता भया, ग्रौर जिस कारण ब्रह्म ग्रापही जगदाकार होता भया, उसी कारण ब्रह्म को श्रुति जगत् का कर्ता कथन करती है, ग्रौर इसीलिये ब्रह्म ही रस है, ग्रर्थात् सम्पूर्ण जगत् का सारभूत है, ग्रौर जीवभूत सत्य प्रधान ग्रन्त:करण में ग्रभिव्यक्त जो ब्रह्मानन्द है उसको प्राप्त होकर सुखी होते हैं, निरुपाधिक ब्रह्मानन्द करे विद्वान् लोग सुखी होते हैं, ग्रौर सोपाधिक ब्रह्मानन्द करके इतर मूर्ख लोग सुखी होते हैं । सम्पूर्ण जीवों को ग्रानन्द का कारक होने से ग्रानन्द-रूप ब्रह्मही है, यदि सबका सार्धीभूत हार्दोकाश में ग्रर्थात् बुद्धिरूपी गुहा विषे स्थित ग्रा- नन्दरूप ग्रात्मा न होतॆ तो जीवन का हेतु प्राणादिकों के व्यापार को

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

= ९

कौन करे, ईैसे सिद्ध होता है कि प्राणादिकों का व्यापार भी चेतन के श्राधीन है, श्रौर वही चेतन श्रानन्द-रूप श्रात्मा सम्पूर्ण लोकों को सुख प्राप्त करता है, श्रौर साधक जिस विद्या‌डवस्था में इस ब्रह्म में श्रभयपद को प्राप्त होता है, उसी श्रवस्था में ब्रह्मानन्द को भी प्राप्त होजाता है, क्योंकि उसकी इच्छा श्रविद्या-कृत नानात्व दर्शन की श्रभाव होजाती है ।

प्रश्न—कैसे ब्रह्म में वह साधक श्रभय प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है ?

उत्तर—जो दृश्य प्रपञ्च से वर्जित है, शरीर से रहित है, इयत्ता करके जो नहीं कहा जाता है, श्रौर जो किसी के श्राश्रित भी नहीं है वही ब्रह्म है, हे पिप्पलाद ! विद्वान् के लिये एकत्व दर्शन ही श्रभय का कारण है, श्रौर श्रविद्वान् के लिये नानात्व दर्शन भय का कारण है, विद्वान् के श्रभय के कारण को कहकर श्रब श्रविद्वान् के भय के कारण को कहते हैं । जिस श्रविद्या दशा में यह श्रज्ञान‌दर्शी उस ब्रह्म में थोड़ा‌सा भी भेद करता है, याने वह ईश्वर मेरे से पृथक् है, श्रौर मैं उससे पृथक् हूँ इस प्रकार की भेद-भावना को करता है, उस भेददर्शी को भय होता है, भेद-बुद्धि करने से केवल श्रविद्वान् को ही भय नहीं होता है, परंतु विद्वान् को भी भय होता है, श्रौर उपास्य-उपासक भाव में भी भय ही होता है, क्योंकि एक में उपास्य-उपासक भाव बनता ही नहीं है, द्वैत में ही उपास्य-उपासक भाव बनता है, इसी श्रर्थ को श्रागे‌वाला मन्त्र भी कहता है ॥ ७ ॥

इति सप्तमोऽनुवाकः ॥ ७ ॥

मूलम् ।

भीषाऽस्माद्वातः पवते, भीषोदेति सूर्यः, भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च, मृत्युर्धावति पञ्चम इति, सैषाऽऽनन्दस्य मीमांसा स भवति, युवा स्यात्साधु युवाऽऽध्यायिकः, श्राशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः, तस्मैयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

पूर्णा स्यात्, स एको मानुष आनन्दः, ते ये शतं मानुषा आनन्दाः; स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः; स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः; स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः; स एक अजानजानां देवानामानन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, ते ये शतमजानजानजानां देवानामानन्दाः; स एकः कर्मदेवानामानन्दः, ये कर्मणा देवानपि यान्ति, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, ते ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः; स एको देवानामानन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, ते ये शतं देवानामानन्दाः; स एक इन्द्रस्य आनन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, ते ये शतामिन्द्रस्य आनन्दाः; स एको बृहस्पतेरानन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः; स एकः प्रजापतेरानन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः; स एको ब्रह्मा आनन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य, स यश्वाङ्गं पुरुपे यश्वासावादित्ये, स एकः, स य एवंवित्, यस्माल्लोकात्प्रेत्य एतमन्नमयमात्मानुपसंस्करामति, एतं प्राणमयमात्मानुपसंस्करामति, एतं मनोमयमात्मानुपसंस्करामति, एतं विज्ञानमयमात्मानुपसंस्करमति, एतमिन्द्रमयमात्मानुपसंस्करमति, तद्‌द्योष रक्षोको भवति ॥ ७ ॥

इत्यष्ठमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

पदपञ्चेदः ।

भीपा, ग्रस्मात्, वातः, पचते, भीपा, उदेति, सूर्यः, भीपा, ग्रस्मात्, ग्रग्निः, च, इन्द्रः, च, मृत्यु:, धावति, पञ्चधा:, इति, सा, एपा, ग्रानन्दस्य, मीमांसा, भवति, यथा, स्यात्, साधुयुवाध्यायिकः, ग्राशिष्ठः, दृढिष्ठः, बलिष्ठः, तस्य, इयम्, पृथिवी, सर्वा, वित्तस्य, पूर्रा, स्यात्, सः, एकः, मानुषः, ग्रानन्दः, ते, ये, शतम्, मानुषाः, ग्रानन्दा:, सः, एकः, मनुष्यगन्धर्वाराम्, ग्रानन्दः, श्रोत्रियस्य, च, ग्रकामहतस्य, ते, ये, शतम्, मनुष्यगन्धर्वाराम्, ग्रानन्दाः, सः, एकः, देवगन्धर्वाराम्, ग्रानन्दः, श्रोत्रियस्य, च, ग्रकामहतस्य, ते, ये, शतम्, देवगन्धर्वाराम्, ग्रानन्दा:, सः, एकः, पितृणाम्, चिरलोकलोकानाम्, ग्रानन्दः, श्रोत्रियस्य, च, ग्रकामहतस्य, ते, ये, शतम्, पितृणाम्, चिरलोकलोकानाम्, ग्रानन्दा:, सः, एकः, ग्राजानजानाम्, देवानाम्, ग्रानन्दः, श्रोत्रियस्य, च, ग्रकामहतस्य, ते, ये, शतम्, ग्राजानजानाम्, देवानाम्, ग्रानन्दा:, सः, एकः, कर्म्मदेवानाम्, ग्रानन्दः, ये, कर्म्मणा, देवान्, ग्रापि, यन्ति, श्रोत्रियस्य, च, ग्रकामहतस्य, ते, ये, शतम्, कर्म्मदेवानाम्, ग्रानन्दा:, सः, एकः, इन्द्रस्य, ग्रानन्दः, श्रोत्रियस्य, च, ग्रकामहतस्य, ते, ये, शतम्, इन्द्रस्य, ग्रानन्दा:, सः, एकः, बृहस्पते:, ग्रानन्दः, श्रोत्रियस्य, च, ग्रकामहतस्य, ते, ये, शतम्, बृहस्पते:, ग्रानन्दा:, सः, एकः, प्रजापते:, ग्रानन्दः, श्रोत्रियस्य, च, ग्रकामहतस्य, ते, ये, शतम्, प्रजापते:, ग्रानन्दा:, सः, एकः, ब्रह्मणः, ग्रानन्दः, श्रोत्रियस्य, च, ग्रकामहतस्य, सः, यः, च, ग्रयम्, पुरुषे, यः, च, ग्रासौ, ग्रादित्ये, सः, एकः, सः, यः, एवंवित्, ग्रस्मात्, लोकात्, प्रेत्य, एतम्, ग्रन्नमयम्, ग्रात्मानम्, उपसंक्रमति, एतम्, प्राणमयम्, ग्रात्मानम्, उपसंक्रमति, एतम्, मनोमयम्, ग्रात्मानम्, उपसंक्रमति, एतम्, विज्ञानमयम्, ग्रात्मानम्, उपसंक्रमति,

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

श्रानन्दमयम्, श्रात्मानम्, उपसंक्रामति, तत्, श्रपि, एपः, श्लोकः, भवति ॥

ग्रन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

ग्रस्मात्=ग्रस्य =उस ब्रह्म के भीषा=भिया=भय से वायु:=वायु पचते=चलता है ग्रस्मात्=उसके भीषा=भय से सूर्ये=सूर्य उदेति=उदय होता है च=श्रौर ग्रस्मात्=उसके भीषा=भय से श्राग्निः=ग्रग्निदेव धावति=दहनकर्म में बिपे प्रवृत्त होता है च=श्रौर ग्रस्मात्=उसके भीषा=भय से इन्द्रः=इन्द्र धावति=पालनकर्म में बिपे प्रवृत्त होता है इति=इसी प्रकार ग्रस्मात्=उसके भीषा=भय से पञ्चमः=पाँचवाँ मृत्युः=मृत्यु

ग्रन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

धावति=मारयाकर्म बिपे प्रवृत्त होता है सा=वह पपा=यद् मीमांसा=विचार श्रानन्दस्य=श्रानन्द का + श्रग्रे=ग्रागे भवति=है + यः=जो + ग्रास्मिन् लोके=इस मनुष्य लोक बिपे साधुयुबा=प्रच्छा जवान स्यात्=होवे + च=श्रौर युवाध्या- यिकः = यौवन ग्रवस्था बिपे ही + च=श्रौर ग्राशिष्ठः= ग्राज्ञा करके युकृ हो याने साहब ग्रखस्यार हो + च=श्रौर दृढिष्ठः= ग्रप्रयतं हृद् ग्रर्थान्त् शूर-वीर हो + च=श्रौर बलिष्ठः=श्रति बलवान् हो वित्तस्य=वित्त करके पूर्ष्णः=पूर्ष याने भरपूर हो + च=श्रौर

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तैत्तिरीयोpanishad ।

इयम्=यह सर्षो=संपूर्ण पृथिवी=पृथिवी तस्य=उसके श्रार्च्चान स्यात्=हो +नसय चक्र- वर्तें राज्ञः =ऐसे चक्रवर्ती राजा यः=जो ज्ञाननन्दः=ज्ञानन्द है स:=सो मानुषः=मनुष्यसम्बन्धी एकः=एक अंश ज्ञानन्दः=ज्ञानन्द है च=श्रोर ऐेसे ते=वे ये=जो शातमू=शौ-गुणा मानुषगन्धर्वा- याम् = { मनुष्यगन्धवौं उनके एकः=एक अंश ज्ञानन्दः=ज्ञानन्द है + च=श्रौर स पघानन्दः=वही ज्ञानन्र शाकामहतस्य=निष्काम श्रोत्रियस्य=विद्वान् का च=भी + श्रासित=है

च=श्रौर ऐेसे ते=वे ये=जो शातमू=सौ-गुणा देवगन्धर्वोयामू=देव-योनि गन्धवौं के ज्ञानन्दाः=ज्ञानन्द हैं स:=सो चिरलोक- लोकानामू = { चिरकाल स्थायी हैं लोक जिनके ऐसे पितृणामू=पितरों का एकः=एक अंश ज्ञानन्दः=ज्ञानन्द है

च=और श्रकामहतस्य=निष्काम श्रोत्रियस्य=विद्वान् का च=भी स ज्ञानन्दः=वही ज्ञानन्द है

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तैत्तिरीयोपनिषद्

श्रकामहतस्य=निष्काम श्रोत्रियस्य=विद्वान् का च=भी तद्रदाऽऽनन्दः=उसके समान आनन्द है चिरलोक- लोकानाम् = चिरकाल स्थायी हैं लोक जिनके ऐसे पितृणाम् =पितरों के ते=वे ये=जो शतम् =सौ-गुणा आनन्दा:=आनन्द हैं सः=सो अज्ञानजानाम् = { स्मातं कर्म द्वारा जो देव-योनि को प्राप्त हुए हैं ऐसे देवताओं का एकः=एक अंश आनन्द्=आनन्द है + स एव=वही आनन्द निष्काम श्रोत्रियस्य=विद्वान् का च=भी आस्ते=है अज्ञानजानाम् = { स्मातं कर्म द्वारा जो देव-योनि को प्राप्त हुए हैं ऐसे देवताओं के ते=व ये=जो शतम् =सौ-गुणा आनन्दा:=आनन्द हैं सः=सो देवानाम् =वसु आदि देवताओं का एकः=एक अंश आनन्द्=आनन्द है + स एव=वही आनन्द

सः=सो एकः=एक ग्रंश आनन्द्=आनन्द हे तेषाम् =उन कर्मदेवानाम् =कर्म देवों का कर्मैः=अग्निहोत्र आदि श्रौत-कर्म करके देवान् =देवभाग को आपे यंते=पाप्त होते हैं + च=श्रौत तेषां ये=उनको जो आनन्दा:=आनन्द हैं स एव=वही आनन्द निष्काम श्रोत्रियस्य=विद्वान् का च=भी आस्ते=है

कर्मदेवानाम् =कर्म देवों के ते=व ऐसे ये=जो शतम् =सौ-गुणा आनन्दा:=आनन्द हैं सः=सो देवानाम् =वसु आदि देवताओं का एकः=एक अंश आनन्द्=आनन्द है + स एव=वही आनन्द निष्काम श्रोत्रियस्य=विद्वान् का च=भी आस्ते=है

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तैत्तिरीयोपनिपद् ।

च=भी + ग्रसित=है देयानाम्=वसु आदि देवताओं के ते=वे ये=जो शतम्=सौ गुणा ग्रानन््द्रः=ग्रानन्द् हैं स=सो इन्द्रस्य=इन्द्र का एक:=एक अंश ग्रानन्द्:=ग्रानन्द है + स एव=वही ग्रानन्द् ग्रकामहतस्य=निष्काम श्रोत्रियस्य=विद्वान् का च=भी + ग्रसित=है

इन्द्रस्य के ते=वे ये=जो शतम्=सौ-गुणा ग्रानन्द्:=ग्रानन्द है स=सो बृहस्पते:=बृहस्पति देव-गुरु का एक:=एक अंश ग्रानन्द्:=ग्रानन्द है + स एव=वही ग्रानन्द् ग्रकामहतस्य=निष्काम श्रोत्रियस्य=विद्वान् का च=भी + ग्रसित=है

प्रजापते:=ब्रह्मा के ते=वे ये=जो शतम्=सौ-गुणा ग्रानन््द्रः=ग्रानन्द् हैं स=वही प्रजापते:=ब्रह्मा का एक:=एक अंश ग्रानन्द्:=ग्रानन्द है + स एव=वही ग्रानन्द् ग्रकामहतस्य=निष्काम श्रोत्रियस्य=विद्वान् का च=भी + ग्रसित=है

२०

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तैत्तिरीयोपनिषद्

च=और य:=जो स:=वह अस्यम्=यह आनन्द पुरुषे=पुरुष बिपे है च=और य:=जो आदित्ये=सूर्य बिपे असौ=यह आनन्द है स:=सो एकः=एक अंश आनन्दः=आनन्द है य:=जो पञ्चचित्=इस प्रकार जानने-वाला है स:=वह अस्मात्=इस लोकात्=लोक से प्रेत्य=मरकर पतम्=पूर्वोक्त आनन्दमयम्=आनन्दमय आत्मानम्=शरीर को उपसंक्रामति=उल्लङ्घन करता है

पतत्‌म्=पूर्वोक्त प्राणमयम्=प्राणमय आत्मानम्=शरीर को उपसंक्रामति=उल्लङ्घन करता है पतत्‌म्=पूर्वोक्त मनोमयम्=मनोमय आत्मानम्=शरीर को उपसंक्रामति=उल्लङ्घन करता है पतत्‌म्=पूर्वोक्त विज्ञानमयम्=विज्ञानमय आत्मानम्=शरीर को उपसंक्रामति=उल्लङ्घन करता है पतत्‌म्=पूर्वोक्त आनन्दमयम्=आनन्दमय आत्मानम्=शरीर को उपसंक्रामति=उल्लङ्घन करता है तत्त्वम्=तत्‌=इस बिपे असि=भी वष्‌ट=यह श्लोकः=मन्त्र प्रमाण भवति=है

भावार्थे। भीषेति। उसी ब्रह्म के भय करके वायु रात-दिन निरन्तर गमन करता रहता है, उसी ब्रह्म के भय से सूर्य नित्य ही उदय ग्रस्त भाव को प्राप्त होता रहता है, उसी ब्रह्म के भय से ग्रग्नि प्रज्वलित होती रहती है, उसी ब्रह्म के भय से इन्द्र वर्षा ग्रादि कार्यों को करता रहता है. ग्रौर उसी ब्रह्म के भय से पञ्चम मृत्य प्रति दिन पातञ्जियों के

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

= ५

कर्मों के अनुसार उनके नाश करने को दौड़ता ही रहता है, तात्पर्य यह है कि वायु, सूर्य, अग्नि, इन्द्र और यम ये पाँचों जिसके भय से रात-दिन अपने-अपने कार्य करने के लिये दौड़ते फिरते हैं उसीको तुम हे पुरुषोत्तम ! ब्रह्म जानो, जब कि वायु आदिकों के भय का हेतु ब्रह्म है, तब इतर तुच्छ जीवों का कहना ही क्या है ? वस्तुमात्र के विचार से और ब्रह्म की प्राप्ति से जो आनन्द है वह सब आनन्दों की आवधि है, याने उसके आगे और आनन्द नहीं है और उसके स्थापित करने के लिये मानुषानन्द से आरम्भ करते हैं । जो पुरुष यौवन अवस्थावाला हो, सुंदर-रूप और सुंदर-स्वभाववाला भी हो, और सब प्रकार की विद्या से संपन्न हो, ऐश्वर्यवाला हो, माता-पिता और आचार्य करके सुशिक्षित भी हो, शूर-वीर हो, वित्त करके पूर्ण हो, और संपूर्ण पृथिवी उसका आधीन हो; ऐसे चक्रवर्ती राजा को जितना आनन्द प्राप्त होता है वह मनुष्यसंबंधी एक अंश आनन्द है, और मनुष्यानन्द का सौ-गुना एक गन्धर्वानन्द है, अर्थात् जो कर्म और उपासना द्वारा गन्धर्व-योनि को प्राप्त हुआ है उसको मानुषानन्द से सौ-गुना आधिक आनन्द प्राप्त होता है, और जितना आनन्द उसको है उतना ही शुद्धचित्त निष्काम विद्वान् को मिलता है, और गन्धर्वानन्द से सौगुना आधिक आनन्द देव-योनि जन गन्धवों को होता है, याने उन गन्धवोंको जो कल्प के आदि में ही देव-योनि में उत्पन्न हुए हैं, और उतना ही आनन्द शुद्धचित्त निष्काम विद्वान् को होता है, जिन तना देव गन्धवों को अपनी पदवी में आनन्द होता है उससे सौ-गुणा आधिक आनन्द अग्निष्वात्तादि पितरों को होता है, याने उनको जो पितर चिरकाल पर्यन्त पितृलोक में सुख को अनुभव करते हैं उतना ही आनन्द शुद्धचित्त निष्काम विद्वान् को भी होता है, और जो आनन्द चिरकालस्थायी पितगें को होता है उससे भी सौ-गुना आधिक

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५० तैत्तिरीयोपनिषद् ।

आनन्द् अज्ञानज देवतों को अर्थात् उन देवतों को जो स्मार्त कर्मों के अनुष्ठान करके देव-योनि को प्राप्त हुए हैं, और जिन आानन्द् उनको है उतना ही आानन्द् शुद्धचित्त निष्काम विद्वान् को होता है, और जितना आानन्द देवतों को होता है उससे भी सौ-गुना आधिक आानन्द कर्मदेवतों को होता है, अर्थात् उन देवतों को जो श्रौतकर्मों को करके देवता हुए हैं, और जितना आानन्द उनको है उतना ही आानन्द निष्काम शुद्धचित्त विद्वान् को होता है, और जो आानन्द कर्म-जन देवतों को होता है उससे भी सौ-गुना आधिक आानन्द देवतों को होता है, अर्थात उनको जो देव-योनि में ही प्रथम से उत्पन्न हुए हैं, और उतना ही आानन्द निष्काम विद्वान् को होता है, और जितना आानन्द देवतों को होता है उससे सौं-गुना आधिक आानन्द इन्द्र को जो देवतों का अध्यक्ष है होता है, और उतना ही आानन्द निष्काम शुद्धचित्त विद्वान् को भी होता है, और जितना आानन्द इन्द्र को होता है उससे भी सौ-गुना आधिक आानन्द बृहस्पति को होता है जो सम्पूर्ण देवतों के गुरु हैं, और उतना ही आानन्द निष्काम शुद्धचित्त विद्वान् को होता है, और जितना आानन्द बृहस्पति को होता है उसका सौ-गुना आधिक आानन्द प्रजापति को होता है ( प्रजापति नाम विराट् का है जो सबसे प्रथम उत्पन्न हुया है ।) और उतना ही आानन्द निष्काम विद्वान् को होता है, और जितना आानन्द एक प्रजापति को होता है उससे भी सौ-गुना आधिक आानन्द ब्रह्मा को होता है, और जितना आानन्द ब्रह्मा को होता है, उतना ही निष्काम विद्वान् को होता है, और ब्रह्मा का आानन्द भी उस ब्रह्मानन्द या आत्मानन्द का एक लेशमात्र है, और उसी आानन्द की एक मात्रा को लेकर सम्पूर्ण जगत् आानन्दित हो रहा है, वह ब्रह्मानन्द एक समुद्र है, उसकी एक बूँद-मात्र से सम्पूर्ण संसार आानन्द को प्राप्त होरहा है,

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

२१

इसी कारण वह ब्रह्मानन्द निरतिशयानन्द है, निरावधिक आनन्द है ।

प्रश्न—जब ब्रह्मानन्द की एक मात्रा को लेकर सम्पूर्ण जगत् के लोक ध्यानन्दित होते हैं, तब तो सम्पूर्ण विषयानन्द भी ब्रह्मानन्द का एक अंशमात्र ही हुआ, और अंशाशी का भेद नहीं होता है, जैसे हाथ पाँव सब शरीर के अंश हैं; और शरीर अंशी है, वैसे ब्रह्मानन्द भी अंशी है, और विषयानन्द उसका अंश है, विषयानन्द व ब्रह्मानन्द दोनों एक ही हुए तब शाखकारों ने विषयानन्द की निन्दा क्यों की और महात्मा लोग भी विषयानन्द की निन्दा को क्यों करते हैं । विषयानन्द की निन्दा करनेसे तो ब्रह्मानन्दकी भी निन्दा होती है, क्योंकि दोनों का अभेद है ?

उत्तर—ब्रह्मानन्द निरुपाधिक आनन्द है, और विषयानन्द सापेक्षिक आनन्द है । उपाधि के सम्बन्ध से विषयानन्द दुःख का हेतु हो जाता है; जैसे शुद्ध गंगा का जल बरसात में मल-मूत्रादिकों के सम्बन्ध से रोग का जनक हो जाता है, क्योंकि मलिन उपाधि के साथ उसका सम्बन्ध होता है, इसी तरह ब्रह्मानन्द का जो लेशमात्र आनन्द है सो भी विषयों के साथ सम्बन्ध होने से दुःख का जनक हो जाता है, वस्तुतः में वह ब्रह्मानन्द से भिन्न नहीं भी है, तथापि विषय-रूप उपाधि के भेद से उसका भेद ब्रह्मानन्द से हो जाता है, और उपाधि को दुःख-रूप होने से वह भी दुःख-रूप हो जाता है । दूसरे विषयानन्द स्वल्प है और क्षणिक है, क्योंकि उसकी उपाधि स्वल्प व क्षणिक है, और इसी कारण जन्म-मरण का हेतु भी है, यदि विषयानन्द करे ही यह जीव तोष को प्राप्त होजाय, तो फिर महान् नित्यानन्द की प्राप्ति इसको कदापि न हो, और जन्म-मरण- रूपी दुःख की निवृत्ति भी इसको कदापि नहीं हो सकती । नित्यानन्द की प्राप्ति के लिये और जन्म-मरण की निवृत्ति के लिये शाखकारों और महात्माओं ने विषयानन्द की निन्दा की है ।

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३२

तैत्तिरीयोपनिषद्।

सयक्षोति । श्राकाराश से लेकर श्रन्नादिक कार्यों को उत्पन्न करकें श्रानन्द-स्वरूप परमात्मा श्रपने श्रापको उनमें प्रवेश करता भया, श्रौर इसी लिये प्रत्येक रूप करके हर प्राणिमात्र के शरीर में रहता है, श्रौर उसीको निष्काम विद्वान् श्रनुभव करता है, वही लौकिक श्रानन्द की श्रवधि है, वही श्रानन्द-रूप श्रात्मा एक है, श्रैरभेद से रहित भी है, परंतु उपाधियों के भेद करके भेदवाला कहा जाता है, जो श्रानन्द-रूप परमात्मा निष्काम विद्वान् के शरीर में रहता है, वही श्रादि-हयमंडलस्थ पुरुष में भी रहता है, वे दोनों एक ही हैं, जो कोई श्राधिकारी इस प्रकार श्रात्मा के श्रभेद को जानता है, श्रर्थात् उस ब्रह्मात्मा को श्रपना श्रात्मा करके जानता है, वही इस लोक से मरे करके फिर इस श्रन्नमयकोशा को श्रर्थात् स्थूल देह को नहीं प्राप्त होता है, श्रौर प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश श्रौर श्रानन्दमयकोश से भी उत्क्रमणा कर जाता है, श्रर्थात् श्रात्मज्ञान के उदय होते ही श्रज्ञान की निवृत्ति होजाती है, श्रौर श्रज्ञान की निवृत्ति होते ही श्रज्ञान का कार्य जो कि पाँच कोश हैं उनकी भी निवृत्ति होजाती है, इसी श्रर्थ को श्रागे वाला मंत्र भी कहता है ॥ ८ ॥

इति श्रष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

मूलम्।

सतो वाचो निवर्तंते ऽप्राप्य मनसा सह श्रानन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चनेति एतद् ह वा न तपति किंहं साधु नाकरवम् किंहं पापमकरवामिति स य एवं विद्वान् आत्मानं स्पृणुते। उभे श्रेवाैष प्रते स्यात्मानं स्पृणुते य एवं वेद इत्युपामित् ॥ ९ ॥

इति नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥

इति ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्ता।

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तैत्तिरीयोपानिषद् ।

पदच्छेदः ।

यतः, वाचः, निर्तन्ते, श्रप्राप्य, मनसा, सह, श्रानन्दम्, ब्रह्मणः, विद्वान्, न, बिभेति, कुतश्चन, इति, एतम्, ह, वाव, न, तपति, किम्, श्रहं, साधु, न, श्रकरवम्, किम्, श्रहं, पापम्, श्रकरवम्, इति, सः, यः, एवम्, विद्वान्, एते, श्रात्मानम्, स्पृशुते, उभे, हि, एव, एषः, एते, श्रात्मानम्, स्पृशुते, यः, एवम्, वेद, इति, उपनिषत् ॥

ग्रन्वयः ।

पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

वाचः=वाचीरूप वेद

मनसा सह=मन द्वारा + यम्=जिसको

ग्रप्राप्य=प्राप्त न होकर

यतः=जिससे

निर्वर्तन्ते=लौड़ जाते हैं श्रथात् प्रत्यक्ष निरुपया नहीं कर सकते हैं

तम्म्=उस

ब्रह्मणः=ब्रह्म के

ग्रानन्दम्=ग्रानन्द को

विद्वान्=जाननेवाला

कुतश्चन=जन्म-मरण भय ग्रादि से कंबो

न=नहीं

बिभेति=डरता है

इति=पूर्वोंक श्रहे वातों सत्य

है

किम्=हा ग्रफसोस है कि

ग्रहम्=मैं

साधु=सत्कर्म को

न=नहीं

ग्रकरवम्=करता भया

सः=श्रौर

किम्=हा ग्रफसोस है कि

ग्रहम्=मैं

पापम्=पापकर्म को

ग्रकरवम्=करता भया

इति=इस प्रकार के

एवम्=ऐसे

तापः=प्रश्रास्ताप को

यः=जो

विद्वान्=जाननेवाला है

सः=वह

पते=पुण्य पाप दोनों कम्मों को

ग्रात्मानम्=परमात्म-रूप

स्पृशुते=देखता है

हि=क्योंकि

एषः=यह विद्वान्

एते=इन

उभे=दोनों को जाने पुथग्र्

पाप कम्मों को

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श्रात्मानम्=श्रात्म-रूप

पश्य=ही

स्पृशते=देखता है

यः=जो

एवम्=उक्त प्रकार श्रद्धेय

प्रद्वैत ब्रह्म को

वेद=जानता है

स स्वयं

जरामृत्यु-

रहितोग्रैव

भवति

  • एवं प्रकारं

व्याख्यायाम्

उपनिषत्=ब्रह्मविद्या

इति=करके

उक्ता=कहा गया है ॥

भावार्थः ।

यतो वाचे इति । जो वस्तु शब्द-शक्ति का विषय होता है, वही शब्द-शक्ति के ज्ञान का भी विषय होता है, सो ब्रह्म ऐसा नहीं है, इसलिये श्रद्धयानन्द स्वप्रकाश स्वरूप ब्रह्म से मन के सहित वाणी लौट श्राती है, श्रर्थात् कथन नहीं कर सकती है, उस ब्रह्मानन्द को जो विद्वान् प्राप्त होता है, श्रर्थात् साक्षात्कार कर लेता है, वह जन्म-मरण-रूपी भय से कूट जाता है, क्योंकि भय का कारण जो कि श्रज्ञान या वह उसके नष्ट होगया है । और श्रज्ञान के नष्ट होते ही पाप और पुण्य-कर्म पूर्व किये थे सब निवृत्त हो जाते हैं, और वह पश्चात्ताप नहीं करता है कि हा मैंने शुभकर्म नहीं किया, हा मैंने पापकर्म क्यों किया, क्योंकि वह पुण्य और पाप को श्रात्म-रूप करफे ही देखता है, और इस लिये पुण्य-पाप विद्वान् के जन्म के हेतु नहीं होते हैं ॥ ५॥

इति नवमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

इति ब्रह्मानन्दवल्ली समाप्ता ।

—:o:—

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तैत्तिरीयोपनिषद्

अथ भृगुवल्ल्ली प्रारम्भ्यते ।

मूलम् ।

हरिः ऊँ ॥ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै तेजस्वनावधीतमस्तु मा विद्दिषावहै ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

पदच्छेदः ।

सह, नौ, अवतु, सह, नौ, भुनक्तु, सह, वीर्यम्, करवावहै, तेजस्विनौ, श्रधीतमम्, अस्तु, मा, विद्दिषावहै, ऊँ, शान्तिः;, शान्तिः;, शान्तिः: ॥

भन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

सः=वह ईश्वर नौ=हम दोनों को श्रथान्त गुरु श्रोत्र शिष्य को सह=साथ + अवतु=ही रक्षतु=रक्षा करे नौ=हम दोनों को सह=साथ + अव=ही भुनक्तु=अन्नादि से पुष्ट करे भुनकु=योग प्राप्त करे + श्रावाम्=हम दोनों सह=साथ पव=ही वीर्यम्=विद्या-दान शौर विद्या-ग्रहण सामर्थ्य को करवावहै=प्राप्त होवें नौ=हम दोनों का श्रधीतमम्=पढ़ा हुया तेजस्विन=श्रथे-ज्ञान योग्य हो श्रर्थात सफल अस्तु=होवै + श्राधाम्=हम दोनों मा विद्दिषि-=पठन-पाठन में प्र- माव-रूप द्वेष को न प्राप्त होवे ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः =हमारे तापत्रयों की =शान्ति होवे ॥

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२६

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

मूलम् ।

भृगुर्वै वारुणिः वरुणं पितरमुपससार श्रद्धीहि भगवो ब्रब्रेति तस्मा एतत्प्रोवाच ऋतं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति तद्होवाच यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रब्रेति स तपोडतप्यत स तपस्तप्त्वा ॥ ? ॥

इति प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

भृगुः, वै, वारुणिः, वरुणं, पितरम्, उपससार, श्रद्धीहि, भगवः, ब्रब्र, इति, तस्मै, एतत्, प्रोवाच, ऋतम्, प्राणम्, चक्षुः, श्रोत्रम्, मनः, वाचम्, इति, तम्, ह, उवाच, यतः, वा, इमानि, भूतानि, जायन्ते, येन, जातानि, जीवन्ति, यत्, प्रयन्ति, अभिसंविशन्ति, इति, तद्, विजिज्ञासस्व, तद्, ब्रब्र, इति, सः, तपः, अतप्यत, सः, तपः, तप्त्वा ॥

भृगुः=प्रसिद्ध है कि वारुणिः=वरुण का पुत्र भृगु=भृगु नाम से विख्यात ऋषि था

ब्रब्र+जिज्ञासु+स्वम्=ब्रह्म-जिज्ञासु होकर स्वप्राण=प्राण को

पितरम्=पिता वरुणम्=वरुण के उपससार=समीप गया + च=और श्रद्धीहि=ऐसा

भगवः=हे भगवान् ब्रब्र=ब्रह्म को इति=ऐसा तस्मै=उस भृगु नामक पुत्र से एतत्=यह उपदेश प्रोवाच=कहा

ऋतम्=ऐसा + उवाच=कहता भया कि प्राणम्=प्राण चक्षुः=नेत्र श्रोत्रम्=कान मनः=मन वाचम्=वाणी

इति=ऐसा तम्=उस भृगु को ह=ही भगवः=भगवान्=हे मगवन् ब्रब्र=ब्रह्म को

ब्रह्म=ब्रह्म को श्रद्धीहि=श्रद्धापूर्वक + सः=वह वरुणः तस्मै=उस भृगु नामक पुत्र से

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

५७

पततत्=यह प्रोवाच=कहता भया कि श्रन्नम्=श्रन्न को श्रधांत् श्रन्न-भय वीर को प्राश्नम्=प्राय को चक्षुः=नेत्र को श्रोत्रम्=कर्णी को मनः=मन को वाचम्=वारणी को इति=एष प्राण की प्राति का द्वार जान तू + पुनः=फिर तम् ह=उससे उवाच=कहता भया कि वै=निश्रय करके यत्=जिससे प्रमानि=प्रकादि तृण पर्यन्त भूतानि=सर्वभूत जायन्ते=उत्पन्न होते हैं + च=श्रौर जातानि=उत्पन्न हुए जीवन्ति= { प्राय को धारय करते हैं श्रौर वद्धते हैं

च=श्रौर विनाशकाले:=विनाश-काल विषे यत्=जिस प्रति प्रयत्नित=प्रवेश करते हैं + च=श्रौर { तदारम्भाव को प्राप्त होते हैं भ-शानैक-रूप होजात हैं

प्रभिसंबिश्यनित= { तदारम्भाव को प्राप्त होते हैं भ-शानैक-रूप होजात हैं

यत्=ऐसा जो श्रन्न है तत्=उस ग्रह्म=ब्रह्म को + त्वम्=तू हे सौम्य विजिज्ञासस्व=विरोष करके जानने की इच्छा कर + इति श्रुति=ऐसा सुनकर तत्=वह श्रृगु तपः=मन श्रौर इन्द्रियों की समाधानता को मृतध्यत=एकाग्र करके विचा-रता भया

तपः=विचार को ततधा=भकीमाँति विचार करके ॥

नोट-इसका संशंध श्रागे वाले श्रनुवाक के साथ है ।

भावार्थ ।

ग्रात्मवित् ज्ञानी को शुभ ग्रशुभ किये हुए कर्म जन्मान्तर के हेतु नहीं होते हैं, यह वार्ता पिछली श्रानन्दवल्ली में कह श्राये हैं; श्रौर ग्रन्न-विद्या की समाप्ति मी उसी पूर्ववाली वल्ली में कही गई है, ब्रह्म-

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‘३‘

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

विद्या के साधन जो कि तप और उपासना आदि हैं, उनके निरूपण करने के लिये अब इस वल्ली का आरम्भ करते हैं, सो प्रथम प्रिय पुत्र के प्रति ब्रह्म-विद्या का उपदेश करे, दूसरे के प्रति न करे, क्योंकि ब्रह्म-विद्या एकसर करके जो प्रियतम हैं उन्हीं के प्रति उपदेश की गई है, और इस ग्रन्थ में ब्रह्म-विद्या की स्तुति के लिये पिता-पुत्र के संवाद को लिखते हैं ।

भृगुरिति । भृगु-नाम करके प्रसिद्ध जो कि वरुण का पुत्र वारुणी है, वह ब्रह्मजिज्ञासु होकर वरुण अपने पिता के समीप जाकर कहता भया कि हे भगवन् ! सत्यादिरूप ब्रह्म को मेरे प्रति उपदेश करो,

पुत्र की वार्ता को सुनकर पिता ने कहा कि हे पुत्र ! अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और वाग् को ब्रह्म जान, अन्न करके स्थूल शरीर का, प्राण करके पाँचों प्राणों का, चक्षु व श्रोत्र करके पाँचों ज्ञानेन्द्रियों का, मन करके अन्तःकरण का, और वागिन्द्रिय करके पाँचों कर्मेन्द्रियों का ग्रहण है, ये सब ब्रह्म की उपलब्धि के द्वार हैं, इस प्रकार वरुण ने ‘त्वं’-पद का अर्थ कहा, अब तत्पद का अर्थ कहते हैं ।

जिस करके ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिस करके जीते हैं, अर्थात् प्राणों को धारण करते हैं, और बढते हैं, और फिर मर करके जिस कारण में प्रवेश करते हैं, और जो जगत् के जन्मादिकों का कारण है उसीको तू ब्रह्म करके जान, इस प्रकार वरुण ने अपने पुत्र भृगु के प्रति ब्रह्म का उपदेश किया, उस उपदेश के समभने में भृगु समर्थ न होकर विचारता भया, और जानता भया कि

॥ १ ॥

इति प्रथमा ऽनुवाकः ॥ १ ॥

मूलम् ।

अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्येव ह्यजायन्त । अन्नाद्येवा ऽभिवर्धन्ति । अन्नाद्येव ऽभि-

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

१.२

तानि जायन्ते शन्नेन जातानि जीवन्ति शन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति तं होवाच तपसा ब्रह्म विंजिज्ञासस्व तपो ब्रह्मेति स तपोऽतप्यत स तपस्तप्वा ॥ २ ॥

इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

शन्नम्, इति, विजानात्, शन्नात्, हि, एव, खलु, इमानि, भूतानि जायन्ते, शन्नेन, जातानि, जीवन्ति, शन्नं प्रयन्ति, श्रभिसंविशन्ति, इति, तत्, विज्ञाय, पुनः, एव, वरुणं, पितरम्, उपससार, अधीहि, भगवः, ब्रह्म, इति, तम्, ह, उवाच, तपसा, ब्रह्म, विजिज्ञासस्व, तपः, ब्रह्म, इति, सः, तपः, श्रतप्यत, सः, तपः, तप्वा ॥

शान्त्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

इति=ऐसा

विजानात्=जानता था कि

शन्नम्=शान्ति देने वाला

ब्रह्म=ब्रह्म है

हि=क्योंकि

खलु=निश्चय करके

इमानि=यहाँ से तृणपर्यन्त

भूतानि=सर्वभूत

जायन्ते=उत्पन्न होते हैं

शन्नेन=शान्ति के साथ

जातानि=उत्पन्न हुए

जीवन्ति=जीते हैं और बढ़ते हैं

च=और

शन्नं=शान्ति को

प्रयन्ति=प्रवेश करते हैं

  • विनाशकाले=विनाशकाल में

श्रभिसंविशन्ति= { तादात्म्यभाव को प्राप्त होते हैं } श्रप्रथमतः लीन होते हैं

शान्त्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

शन्नेन=शान्त्र करके

एव=ही

जीवन्ति=जीते हैं और बढ़ते हैं

च=और

  • च=और

श्रभिसंविशन्ति= { तादात्म्यभाव को प्राप्त होते हैं } श्रप्रथमतः लीन होते हैं

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९००

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

इति={इसकिये पिता के बताये हुए ये तीन वाक्यनयुक् ऐसे} तस्मै=उस पुत्र को ब्रह्म=ब्रह्म विज्ञाय=जानकर स:=वह भृगु पुन:=फिर पितरम्=पिता वरुणम्=वरुण के उपससार=समीप आयत् भया च=और इति=इस प्रकार उवाच=कहता भया कि भगव:=}दे भगवान् ब्रह्म=ब्रह्म को + मह्याम्=मेरे प्रति आधीहि=}कोई वेदाध्यापय} + तद्=तब स:=वह वृह्य नोट- इसका संबंध अगले मनुवाक से है ।

तम् ह=उस भृगु के प्रति प्रोवाच=कहता भया कि सौम्य=हे सौम्य (इन्द्रियाँ की वाक्-वृत्ति को अन्तर्मुख करना और मन को एकाग्र करना तप:=}इन्द्रिय और मन के समाधान-रूप तप करकं ब्रह्म=ब्रह्म को विजिज्ञासस्व=भलीभाँति जानने की इच्छा कर + इति श्रुत्वा=ऐसा सुनकर स:=वह भृगु तप:=तप को ऋतपयत=विचार करता भया स:=वह भृगु तप:=तप को तप्त्वा=विचार करके ।।

भावार्थ ।

अन्नं ब्रह्मेति । अन्न ही ब्रह्म है, क्योंकि अन्न से तृणपर्यंत सब अन्न से ही उत्पन्न होते हैं, और अन्न से ही जीते हैं, और फिर अन्न में ही लय को प्राप्त होते हैं, अन्न से यहाँ मतलब समष्टि शरीर अभिमानी विराट से है, क्योंकि विराट आत्मा से ही ये सभू चर-अचर प्राणी उत्पन्न होते हैं, फिर उसी करके ही प्राणों को धारण करते हैं,

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फिर मर करके उसमें ही लय को प्राप्त होते हैं, पर थोड़े काल में भृगु को विचार-रूपी तप करके अन्न में उत्पत्तिद्दिक दोष देख पड़े, और ख्याल किया कि जो उत्पत्तिवाला और नाशवाला होता है, वहं अनित्य होता है, सो अन्न उत्पत्तिवाला और नाशवाला है, यह कैसे ब्रक्ष हो सक्का है, इन्हीं दोषों के निवर्रणार्थ भृगु अपने पिता वरुण के पास फिर जाता भया । अपने पिता वरुण से कहा कि हे भगवन् ! आप ब्रह्म को मेरे प्रति फिर कथन करो, वरुण ने अपने पुत्र भृगु से कहा कि तप करके अर्थात् विचार करके ब्रह्म को तू जान, विचार ही ब्रह्म-ज्ञान का हेतु है, वह भृगु फिर तप को करता भया ॥ २ ॥

इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥

प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते प्राणेन जातानि जीवन्ति प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार श्रद्धो हि भगवो ब्रह्मेति तं होवाच तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रह्मेति स तपोऽतप्यत स तपस्तप्यमानः ॥ ३ ॥

इति तृतीयोऽनुवाकः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः । प्राणः, ब्रह्म, इति, व्यजानात्, प्राणात्, हि, एव, खलु, इमे, भूतानि, जायन्ते, प्राणेन, जातानि, जीवन्ति, प्राणं, प्रयन्ति, अभिसंविशन्ति, इति, तद्, विज्ञाय, पुनः, एव, वरुणं, पितरम्, उपससार, श्रद्धा, हि, भगवः, ब्रह्म, इति, तम्, ह, उवाच, तपसा, ब्रह्म, विजिज्ञासस्व, तपः, ब्रह्म, इति, सः, तपः, अतप्यत, सः, तपः, तप्यमानः, सः, तपः, तप्या ॥

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१०२

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

शान्त्यय: । पदार्थ-सहित सूक्ष्मभावार्थे ।

इति=ऐसा व्यजानात्=जानता भया कि प्राण:=प्राण ही ब्रह्म=ब्रह्म है हि=क्योंकि खलु=निश्चय करके प्राणात्=प्राण से हि पव=ही इमानि=ये भूतानि=सर्वभूत जयन्ते=उत्पन्न होते हैं च=और जातानि=उत्पन्न हुए प्राणेन=प्राण करके हि पव=ही जीवन्ति=जीते हैं चन=और च=श्रौर वच्मि=विपुल आकार वाले विषे प्राणमू=प्राण प्राण प्रति प्रयन्ति=प्रवेश करते हैं च=और प्राभिस्- विशान्ति =तद्रूप हो जाते हैं इति= ऐसा तीन लक्ष्य-युक्त पिता करके बताये हुए तत्=उस प्राण-रूप ब्रह्म को स:=वह ऋषिु विज्ञाय=जान करके

शान्त्यय: । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

पुनरेव=फिर संशय-युक्त हो पितरम्=पिता वरुणम्=वरुण के उपससार=समीप जाता भया च=और उवाच=कहता भया कि भगव:=हे भगवन्! ब्रह्म=ब्रह्म को मह्यम्=मेरे प्रार्थीहि=कहिये प्राध्यापय =तदा=तब स:=वह वरुण तम् ह=उस ऋषिु के प्रति उवाच=कहता भया कि तप:=विचार इति=ही ब्रह्म=ब्रह्म-प्राप्ति का द्वार है त्वम्=तू तपसा=सूक्ष्म विचार करके एव=और ब्रह्म=ब्रह्म को विजिज्ञा- सम् =भली प्रकार जानने की इच्छा कर पद्यं श्रुत्वा=ऐसा सुन करके स:=वह ऋषिु तप:=विचार को

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तैत्तिरीयोपनिषद्।

१०३

सृत्यत्=विचार करता भया | तप:=विचार को स:=वह तप्त्वां=विचार करके ॥ नोट—इसका संबंध श्रगले श्रनुवाक से है ।

भावार्थे ।

प्राणा इति । प्राणा ही ब्रह्म है, यहाँ प्राणा से मतलब हिरण्यगर्भे से है, क्योंकि प्राणा जो हिरण्यगर्भ है उसीसे निश्चय करके ये संपूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं, श्रौर उत्पन्न होकर उसी प्राणा करके जीते हैं, श्रौर फिर मर करके प्राणा में ही लयभाव को प्राप्त होते हैं, पर जब विचार किया, तब मालूम हुग्रा कि प्राणा नामक हिरण्यगर्भ भी उत्पत्ति नाशवाला है, वह कैसे ब्रह्म हो सक्ता है, ऐसा विचार करके फिर श्रपने पिता वरुणा के पास गया, श्रौर कहा, हे भगवन् ! मेरे प्रति ब्रह्म का उपदेश करो । उंस वरुणा ने श्रपने पुत्र को फिर कहा, हे पुत्र ! तप करके श्रथात् विचार करके ब्रह्म को जान, क्योंकि विचार से बिना ब्रह्म नहीं जाना जाता है । भृगु फिर विचार करके जानता भया ॥ ३ ॥

इति तृतीयोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

मूलम् ।

मनो ब्रह्मेति व्यजानात् मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते मनसा जातानि जीवन्ति मनः प्रत्य- न्यभिसंविशन्तीति तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणा पितरमुपस- सार प्रधीहि भगवो ब्रह्मेति तं होवाच तपसा ब्रह्म विंिजिज्ञासस्व तपो ब्रह्मेति त तपोऽतप्यत स तप- स्त्वा ॥ ४ ॥

इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

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१०४

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

पदच्छेदः ।

मनः, ब्रह्म, इति, व्यजानात्, मनसः, हि, एव, खलु, इमानि, भूतानि, जायन्ते, मनसा, जातानि, जीवन्ति, मनः, प्रयन्ति, अभिसंविशान्ति, इति, तत्, विज्ञानं, पुनः, एव, वरुंषं, पितरम्, उपससार, ऋधीहि, भगवः, ब्रह्म, इति, तम्, ह, उवाच, तपसा, ब्रह्म, विजिज्ञासस्व, तपः, ब्रह्म, इति, सः, तपः, ऋतप्यत, सः, तपः, तप्त्वा ॥

अन्वयः । पदार्थ-सहित | अन्वयः । पदार्थ-सहित

सूक्ष्म भावार्थे ।

सूक्ष्म भावार्थे ।

इति=ऐसा

व्यजानात्=जानता भया कि

तत्त्व=उस मनोमय ब्रह्म को

मनः=मन ही

  • सः=वह भृगु

ब्रह्म=ब्रह्म होता है

विज्ञान=जान करके

हि=क्योंकि

पुनरेव=फिर भी संशय-युक्त हो

खलु=निरचय करके

  • स्वम्=अपने

मनसः=मन से

पितरम्=पिता

एव=ही

वरुणम्=वरुण के

इमानि=सर्वभूत

उपाससार=समीप जाता भया

जायन्ते=उत्पन्न होते हैं

  • च=और

उवाच=कहता भया कि

जातानि=उत्पन्न हुए

भगवः=हे भगवान् !

मनसा=मन करके

ब्रह्म=ब्रह्म को

जीवन्ति=जीते हैं और बढते हैं

  • मद्याम्=मेरे अर्थ

  • च=और

ऋधीहि=कहिये

प्रयन्ते=विनाशकाल में

  • वेद-=वेद

मनः=मन प्रति

  • सः=वह ऋष्या

प्रयन्ति=प्रवेश करते हैं

तम् ह=उस भृगु के प्रति

  • च=और

अभिसं-विशान्ति=तन्मय होजाते हैं ।

इति=ऐसा ।

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उवाच=कहता भया कि + हे सौम्य=हे सौम्य ! तप:=विचार इति=ही ब्रह्म=ब्रह्म की प्राप्ति का द्वार है + त्वम्=तू तपसा=विचार करके एव=प्रवश्य ब्रह्म=ब्रह्म को नोत-इसका संबंध अगले ग्रनुवाक से है ।

विजिज्ञाससव=भले प्रकार जानने की इच्छा कर + इति श्रुत्वा=ऐसा सुनकर स:=वह भृगु तप:=विचार को श्रोतप्यत=विचार करता भया स:=वह भृगु तप:=विचार को तप्त्वा=विचार करके ॥

भावार्थ ।

मन इति । मन ही ब्रह्म है, मन से यहाँ मतलेब समाधि ग्रन्तः-करण-रूपी हिरण्यगर्भ में है, उसीको ब्रह्म-रूप करके भृगु जानता भया, क्योंकि समाधि-रूपी मन के संकल्प से ही संपूर्ण मनुष्यादि प्राणी उत्पन्न होते हैं, फिर उसी करके ही जीते हैं, और फिर मर करके उसी में ही लयभाव को प्राप्त होते हैं, थोड़े काल पीछे विचार से मालूम हुग्रा कि मन भी उत्पत्ति-नाशवाला और परिच्छिन्न है तब ऐसा मन ब्रह्म कैसे हो सक्ता है, ब्रह्म तो नित्य है, ऐसा विचार करके अपने पिता वरुण के पास फिर भृगु जाता भया और अपने पिता वरुण से कहा, हे भगवन् ! मेरे प्रति ब्रह्म का उपदेश करें, उस भृगु के प्रति पिता कहता भया, हे पुत्र ! तप करके अर्थात् विचार करके ब्रह्म को जान, विचार करके ही ब्रह्म जाना जाता है, विचार ही ब्रह्म के जाननं में कारण है, वह भृगु फिर विचार करता भया, और विचार करके भृगु ने ब्रह्म को जाना ॥ ४ ॥

इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

मूलम् ।

विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि

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१०६

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

भूतानि जायन्ते विज्ञानेन जातानि जीवन्ति विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितर-मुपससार ऋधीहि भगवो ब्रह्मेति तं होवाच तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रह्मेति स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा ॥ ५ ॥

इति पश्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।

विज्ञानम्, ब्रह्म, इति, विजानात्, विज्ञाने, हि, एव, खलु, इमे, भूतानि, जायन्ते, विज्ञानेन, जातानि, जीवन्ति, विज्ञानं, प्रयन्ति, अभिसंविशन्ति, इति, तद्, विषय, पुनः, एव, वरुणं, पितरम्, उपससार, ऋधीहि, भगवः, ब्रह्म, इति, तम्, ह, उवाच, तपसा, ब्रह्म, विजिज्ञासस्व, तपः, ब्रह्म, इति, सः, तपः, ऋतप्यत, सः, तपः, तप्त्वा ॥

शब्दार्थः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

इति=ऐसा

विजानात्=जानता था कि

विज्ञानम्=विज्ञान ही

ब्रह्म=ब्रह्म है

हि=क्योंकि

खलु=निश्चय करके

विज्ञानेन=विज्ञान से

  • च=और

इमे=ये

भूतानि=सभी भूत

जायन्ते=उत्पन्न होते हैं

  • च=और

जातानि=उत्पन्न हुए

जातानि जीवन्ति=जीते हैं

विज्ञानम्=विज्ञान प्रति

प्रयन्ति=प्रवेश करते हैं

  • च=और

अभिसंविशन्ति=तन्मय होजाते हैं

ऐसे तीन वाक्यण करके मुनि पिता के उपदेश किए हुए

शब्दार्थः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे ।

विज्ञानेन=विज्ञान करके

  • एव=ही

जीवन्ति=जीते हैं और

बढते हैं

  • एव=और

विज्ञानम्=विज्ञान प्रति

प्रयन्ति=प्रवेश करते हैं

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

१०७

तत्‌=उस विज्ञान-रूप ब्रह्म को स:=वह भृगु विद्नाय=जान करके पुनरेष=फिर भी संशय-युक्त हो + स आत्मन्‌=अपने पितरम्‌=पिता वरुणाम्‌=वरुण के उपससार=समीप जाता भया + च=श्रौर उवाच=कहता भया कि भगवान्‌=हे भगवान्‌ ! ब्रह्म=ब्रह्म को मह्याम्‌=मेरे श्रथीः श्रधीय=कहिये श्राध्यापय + तदा=तब स:=वह वरुण नमः ह=जिस अथु प्रति नोऽत्‌-इसका संबंध श्रगले श्रनुवाक से है ।

इति=ऐसा उवाच=कहता भया कि हे सौम्य=हे सौम्य ! तपः=तप रति=ही ब्रह्म=ब्रह्म की प्राप्ति का द्वार हे + त्वम्‌=तू तपसा=विचार करके एव=ही ब्रह्म=ब्रह्म को विजिज्ञासस्व=भली प्रकार जानने की इच्छा कर + पचं श्रुत्वा=ऐसा सुनकर स:=वह भृगु तपः=विचार को ब्रत‌्‌यत=विचार करता भया स:=वह भृगु तपः=विचार को तत्त्वा=विचार करे ॥

भाष्यार्थ ।

विज्ञानमिति । विज्ञान ही ब्रह्म है, यहाँ विज्ञान से मतलब हिरण्यगर्भ की समष्टि श्राधिदैविक बुद्धि है, जिसका महत्तत्त्व भी कहते हैं, क्योंकि विज्ञान से ही संपूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं, विज्ञान करके जीते हैं, फिर मर करके विज्ञान में ही लयभाव को प्राप्त होते हैं, फिर भृगु को विचार से पूरा कि विज्ञान भी तो उत्पत्ति-नाशवाला है, और परिच्छिन्न है, ब्रह्म तो नित्य है, विज्ञान ब्रह्म कैसे हो सक्ता है, इस संशय को प्राप्त होकर भृगु फिर अपने पिता के पास गया, श्रैर पिता

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१० =

तैत्तिरीयोपांनिषद् ।

से कहने लगा, हे भगवन् ! हमको ब्रह्म का उपदेश करो, उस भृगु के प्रति पिता ने कहा, तप ही ब्रह्म है, तप करके अर्थात् विचार करके तू ब्रह्म को जान, वह फिर विचार करता भया और विचार करके ही ब्रह्म को जानता भया ॥ ४ ॥

इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ४ ॥

मूलम् ।

आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् आनन्दाद्धयेव खल्वि- मानि भूतानि जायन्ते आनन्देन जातानि जीवन्ति आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति सैषा भार्गवी वारु- णी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता स य एष वेद प्रतिति- ष्ठति श्रद्धावाननादो भवति महान् भवति प्रजया पशु- भिर्ब्रह्मवर्चसेन महान् कीर्त्या ॥ ६ ॥

इति षष्ठोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।

आनन्दः, ब्रह्म, इति, व्यजानात्, आनन्दात्, हि, एव, खलु, इमे, भूतानि, जायन्ते, आनन्देन, जातानि, जीवन्ति, आनन्दम्, प्रयन्ति, अभिसंविशन्ति, इति, सा, एषा, भार्गवी, वारुणी, विद्या, परमे, व्योमन्, प्रतिष्ठिता, सः, यः, एषः, वेद, प्रतिति- ष्ठति, श्रद्धावान्, आनन्दः, भवति, महान्, भवति, प्रजया, पशुभिः, ब्रह्मवर्चसेन, महान्, कीर्त्या ॥

ग्रन्वयः ।

पदार्थ-सहित

सूक्ष्म भावार्थे ।

ग्रन्वयः ।

पदार्थ-सहित

सूक्ष्म भावार्थे ।

इति=ऐसी व्यजानात्=जानता भया कि आनन्दः=आनन्द ही ब्रह्म=ब्रह्म है

हि=निश्चय करके आनन्दात्=आनन्द से एव=ही खलु=निश्चय करके आनन्दात्=आनन्द से एव=ही

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

१०५

इमामनि = थे भूतानि = सर्वभूत जायन्ते = उत्पन्न होते हैं

  • च = और जातानि = उत्पन्न हुए श्रानन्देन = श्रानन्द करके
  • एव = ही जीवanti = जीते हैं और बढ़ते हैं
  • च = और
  • श्रान्ते = विनाशकाल विषे श्रानन्दम् = श्रानन्द प्रति प्रयन्ति = प्रवेश करते हैं च = और {

श्राभिसंवि- शान्ति } = तन्मय होजाते हृति = { इस प्रकार वारंवार विचार करके सर्वो- त्तर श्रानन्द को वह भृगु ब्रह्म ही जानता भया सा = वही एषा = यह विद्या = ब्रह्म-विद्या भार्गवी = भृगु करके विदित

  • च = और वारुणी = वरुण करके कथित परमे = उत्तम {

व्योमन् = { हृदयाकाश बुद्धि-रूप व्योमि } = गुहा विषे प्रतिष्ठिता = स्थित है यः = जो

एवम् = इस प्रकार ब्रह्म-विद्या को वेद = जानता है सः = वह प्रतितिष्ठति = { श्रानन्द-रूप परब्रह्म बिपे स्थित होता है अर्थात् स्वयं ब्रह्म हो जाता है

  • च = और इदं च फलं = इह्यमान फल भी तस्य एवं प्र- कारेषा = बिपे इस प्रकार स्व-शरीर = शरीर में प्राप्त होतै) हैं कि सः = वह
  • श्राश्वान् = विशेष श्रान्तवाला
  • च = और श्रान्नादः = श्रन्न के भक्षण करने को सामर्थ्यवान् भवति = होता है
  • च = और

प्रजया = सन्तान करके पशुभिः = गवारादि पशुओं करके ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्म-तेज करके महान् = ऐश्वर्यवान् भवति = होता है

  • च = और कीर्त्या = कीर्ति करके
  • श्रपि = भी महान् = श्रीमान् भवति = होता है ॥

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११०

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

भावार्थ ।

आनन्दो ब्रह्मेति । आनन्द-रूप ही ब्रह्म है, ऐसा भृगु जानता भया, यहाँ आनन्द से मतलब ब्रह्मानन्द से है, क्योंकि उसी आनन्द-रूप ब्रह्म से ही संपूर्ण भूत उत्पन्न होते हैं, उसी करके जीते हैं, फिर मर करके उसी आनन्द-रूप ब्रह्म में लयभाव को प्राप्त होते हैं, इसलिये आनन्द-रूप ही ब्रह्म है, इसलिये विचार करके ही भृगु ने ब्रह्म को जाना है, ब्रह्म के जानने का मुख्य साधन विचार ही है, सो यह वरुण करके कही हुई और भृगु करके पूछी हुई ब्रह्म-विद्या है, वही हृदाकाश में स्थित है, अब पूर्वोक्त ब्रह्म-विद्या के फल को कहते हैं ।

जो अधिकारी पूर्वोक्त रीति से इस ब्रह्म-विद्या को जानता है, वह पर-ब्रह्म में ही स्थित होता है, अर्थात् ब्रह्म-रूप ही हो जाता है, जीवनमुक्त विद्वान् में देह-पात के पूर्व अविद्या लेश-मात्र रह जाती है, इसलिये वह ब्रह्म-रूप ही है, ऐसा जो विद्वान् है, उसके पास बहुत अन्न होता है, और उसकी जठराग्नि बड़ी तेज होती है, अर्थात् वह नीरोग होता है, और पुत्रादिकों करके और पशुओं करके वृद्धि को प्राप्त होता है, और ब्रह्मतेज करके महान् कीर्ति को प्राप्त करता है ॥ ६ ॥

इति षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥

मूलम् ।

अन्नं न निन्द्यात् तद्व्रतम् प्राणो वा अन्नं शरीरमन्नादम् शरीरेऽन्नं प्रतिष्ठितम् शरीरे प्रतिष्ठितः प्राणः प्रतिष्ठितः स य एतदन्नमनेन प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति तदेतदन्नमस्मे प्रतिष्ठितं स य एतदन्नमस्मे प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति अन्नवानन्नादो भवति महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन महान्कीर्त्या ॥ ७ ॥

इति सप्तमोऽनुवाकः ॥ ७ ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद्

१११

पदच्छेदः ।

शान्तमू, न, निन्द्यात्, तत्, व्रतम्, प्राशा:, चै, शान्तमू, शरीरमू, शान्तादमू, प्राशो, शरीरमू, प्रतिष्ठितमू, शरीरेऽ, प्राशा:, प्रतिष्ठितः, तत्, एतत्, शान्तमू, शाने, प्रतिष्ठितमू, सः, यः, एतत्, शान्तमू, शाने, प्रतिष्ठितमू, वेद, प्रतितिष्ठति, शान्तवान्, शान्तादः, भवति, महान्, भवति, प्रजया, पशुभिः, ब्रह्मवर्चसेन, महान्, कीर्त्या ॥

शान्त्वयः । पदार्थ-सहित सध्म भावार्थ ।

  • एवं पद्को-श्रविचारेण इस प्रकार पद्यकोश के विचार द्वारा

  • ब्रह्मविद्रः=ब्रह्मवेत्ता का

नत्=यह

व्रतम्=नियम है कि

शान्तमू=शान्ति की

  • कदापि=कभी

न=नहीं

निन्द्यात्=निन्दा करे

शान्तमू=शान्ति का

वा=ही

प्राशा:=प्राशा है

  • च=और

  • शरीरमू=प्राण-युक्त शरीर

शान्तादमू=शान्ति का भक्षण करनेवाला है

  • च=और

यत्=क्योंकि

शरीरमू=शरीर

प्राशो=प्राशा विषे

शान्त्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

प्रतिष्ठितमू=स्थित है

च=और

प्राशा:=प्राशा

शरीरे=शरीर विषे

प्रतिष्ठित:=स्थित है

तत्=इसलिये

एतत्=यह

शान्तमू=शान्त

शाने=शान्त विषे

प्रतिष्ठितमू=स्थित है

यः=जो उपासक

एतत्=इस

शान्तमू=शान्त को

शाने=शान्त विषे

प्रतिष्ठितमू=स्थित

वेद=जानता है

सः=वह

प्रतितिष्ठति={ ब्रह्म विषे स्थित होता है ब्रथान्त स्वयं ब्रह्म हो जाता है

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११२

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

  • दृष्टं च फलं तस्य श्राविमन् शरीरं पवं पकारेग भवाति + स:=वह श्रभवान्=विशेष श्रभवाला भवति=होता है + च=और श्रन्नाद्:=श्रन्न के भक्षण करने में सामर्थ्यवाला भवति=होता है

  • च=और स:=वह प्रजया=सन्तति करके पशुभिः=गावाश्वादि पशुओं करके ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्म-तेज करके महान्=ऐश्वर्यवान् भवति=होता है + च=और कीर्त्यो:=कीर्ति करके श्रपि=भी महान्=श्रीमांन् भवति=होता है ॥

भावार्थ ।

ग्रब ग्रन्न की स्तुति के लिये कर्तव्य को कहते हैं । ग्रन्नान् ग्रन्न की निन्दा कदापि न करे, यतच्छा करके ग्रर्थात् प्रारब्ध-योग से जैसा कैसा ग्रन्न मिल जाय उसको ग्रादर-पूर्वक भत्नरा करे, ग्रब ग्रन्न की उपासना को कहते हैं, पाँच वृत्तियोंवाला प्राण-रूप जो वाय् है सो ग्रन्न है, क्योंकि ग्रन्न से ही प्राण की स्थिति है, ग्रौर शरीर जो है सो ग्रन्नाद है, ग्रर्थात् ग्रन्न का भत्नरा करने वाला है, क्योंकि शरीर बिना प्राण के स्थित नहीं रह सकता है, इसलिये प्राणों में ग्रन्न बुद्धि को करे, ग्रौर शरीर में ग्रन्नाद बुद्धि को करे, ग्रौर चूंकि शरीर में प्राणा प्रतिष्ठित हैं इसलिये दोनों परस्पर ग्रन्न ग्रन्नाद-रूप हैं, जो पुरुष इस प्रकार दोनों को ग्रर्थात् प्राणा ग्रौर शरीर को ग्रन्न ग्रन्नाद-रूप करके जानता है, वह उपासक शरीर ग्रौर प्राण-रूप करके स्थितं होता है, ग्रर्थात् वह चिरकाल तक जीननेवाला होता है, उसके पास बहुत सा ग्रन्न होता है, ग्रौर वह बहुत से ग्रन्न का भत्नरा करनेवाला होता है ग्रौर बहुत से उसके पुत्र-पौत्र भी होते हैं,

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

११३

फिर उसके घर में बहुत गाय, घोड़े श्रादि पशु भी होते हैं, ब्रह्म तेजवाला श्रौर महान् कीर्तिवाला भी होता है ॥ ७ ॥

इति सप्तमोऽनुवाकः ॥ ७ ॥

मूलम् ।

अन्नं न परिचक्षीत तद्व्रतम् । आपो वा अन्नम् । ज्योति-रन्नादम् अप्सु ज्योति: प्रतिष्ठितम् । ज्योतिष्याप: प्रति-ष्ठिता: तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् वेद प्रतितिष्ठति अन्नवानन्नादो भवति महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन महान् कीर्त्या ॥ ८ ॥

इत्यष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

अन्नम्, न, परिचक्षीत, तत्, व्रतम्, आपः, वा, अन्नम्, वा, अन्नम्, ज्योति:, अन्नादम्, अप्सु, ज्योति:, प्रतिष्ठितम्, ज्योतिषि, आप:, प्रतिष्ठिता:, तत्, एतत्, अन्नम्, अन्ने, प्रतिष्ठितम्, सः, यः, एतत्, अन्नम्, अन्ने, प्रतिष्ठितम्, वेद, प्रतितिष्ठति, अन्नवान्, अन्नाद:, भवति, महान्, भवति, प्रजया, पशुभिः, ब्रह्मवर्चसेन, महान्, कीर्त्या ॥

अन्नवयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्मभावार्थ ।

अन्नवयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

  • पञ्चं पञ्चकोश- विचारेष = इस प्रकार पञ्च-कोशों के विचार द्वारा + ब्रह्माविद्=ब्रह्मवित्ता का

तत्=यह व्रतम्=नियम है कि अन्नम्=अन्न को न=नहीं + कदापि=कभी न=नहीं

परिचक्षीत=त्याग करे व=क्योंकि ग्राप:=जल वा=ही अन्नम्=अन्न है + च=और

ज्योति:=ज्योति अन्नादम्=अन्न का भक्ष्य करनेवाला है

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११८

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

  • यत्=चूँकि उ्योतिः=ज्योति ञ्राप्सु=जलों बिपे प्रतिष्ठितम्=स्थित है च=और ञ्रापः=जल ज्योतिषि=ज्योति बिपे प्रतिष्ठिता:=स्थित है तत्=उसलिए पततत्=यह ञ्रन्नम्=अन्न ञ्रन्ने=अन्न बिपे प्रतिष्ठितम्=स्थित है य=जो पततत्=इस ञ्रन्नम्=अन्न को ञ्रन्ने=अन्न बिपे प्रतिष्ठितम्=स्थित वेद्=जानता है सः=वह प्रतितिष्ठति= { ब्रह्म बिपे स्थित होता है ञ्रर्थात् स्वयँ ब्रह्म हो जाता है

  • च=और हृद्यं च फलं { हृदयमान फल भी उसको ईसी शरीर बिपे हूस प्रकार होता है कि तस्य पवं श्रन्नादः=श्रन्न के भक्षक करने में सा- मध्यैवाला भवति=होता है + स=वह ञ्रन्नवान्=विशेष ञ्रन्नवान् भवति=होता है च=और + च=और प्रजया=संतति करकै पशुभिः=गवारादि पशुश्रों करकै ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्मतेज करकै महान्=ऐश्वर्यवान् भवति=होता है + च=और कीर्त्या=कीर्ति करकै महान् भवति=श्रीमान् होता है ॥

भावार्थ ।

ञ्रन्नमिति । ञ्रन्न के उपासक को चाहिये कि स्वल्प और मोटे ञ्रन्न को भी त्याग न करे, जो ञ्रन्न भोजन के पात्र में प्राप्त होजाय, उसको स्वीकार करे और प्रसन्नता-पूर्वक उसको भज्ना करे ऐसा उपासक इस प्रकार विचार करे कि जल ञ्रन्न है, और जो जठाराग्नि है सो ञ्रन्नाद है, ञ्रर्थात् ञ्रन्न का भद्गा करनेवाला है, जल में ञ्रागनि

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

११५

स्थित है, और अग्नि में जल स्थित है, इसलिये तेज और जल परस्पर अन्न अन्नादरूप हैं, जो पुरुष जल और तेज को अन्न अन्नादरूप करके जानता है वह चिरकालपर्यंत स्थित होता है, उसके पास बहुत अन्न होता है; और वह बहुत अन्न को भोग करनेवाला भी होता है, और उसके पास बहुत से पशु होते हैं, और ब्रह्म तेजवाला और महान् कीर्तिवाला भी होता है ॥ ८ ॥

इत्यष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥

मूलम् ।

अन्नं बहु कुर्वीत तद् व्रतम् पृथिवी वाडनम् आकाशोऽन्नादः पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् वेद प्रतितिष्ठति अन्नवानन्नादो भवति महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन महान् कीर्त्या ॥ ८ ॥

इति नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥

पदच्छेदः ।

अन्नम्, बहु, कुर्वीत, तद्, व्रतम्, पृथिवी, वाङ्नम्, आकाशः, अन्नादः, पृथिव्याम्, आकाशः, प्रतिष्ठितः, आकाशे, पृथिवी, प्रतिष्ठिता, तत्, एतत्, अन्नम्, अन्ने, प्रतिष्ठितम्, सः, यः, एतत्, अन्नम्, अन्ने, प्रतिष्ठितम्, वेद, प्रतितिष्ठति, अन्नवान्, अन्नादः, भवति, महान्, भवति, प्रजया, पशुभिः, ब्रह्मवर्चसेन, महान्, कीर्त्या ॥

पदार्थ-सहित | अन्वयः । पदार्थ-सहित | अन्वयः ।

सूक्ष्म भावार्थे ।

सूक्ष्म भावार्थे ।

  • पञ्चकोशविचारेण = { कोषों के विचार द्वारा

तत्=यह व्रतम्=नियम है कि अन्नम्=अन्न को ही

  • ब्रह्माविद्:=ब्रह्मवेश का

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११६

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

बहु=श्रेष्ठ

कुर्वीत=समर्पण करे

पृथिवी=पृथिवी

वा=ही

अन्नम्=अन्न है

आकाश:=आकाश

अन्नाद:=अन्न का भक्षक है

  • यत्=चूंकि

पृथिव्याम्=पृथिवी में

आकाश:=आकाश

प्रतिष्ठित:=स्थित है

  • च=और

आकाशे=आकाश में

पृथिवी=पृथिवी

प्रतिष्ठिता=स्थित है

तत्=इसलिए

पतत्=यह

अन्नम्=अन्न

अन्ने=अन्न में

प्रतिष्ठितम्=स्थित है

य:=जो

'पतत्=इस

अन्नम्=अन्न को

अन्ने=अन्न में

प्रतिष्ठितम्=स्थित

वेद=जानता है

स:=वह

प्रतितिष्ठति={ ब्रह्म विपे स्थित होता है अर्थात् स्वयं ब्रह्म हो जाता है

वहं च फलं { दृश्यमान फल भी उसको इस प्रकार इस शरीर में होता है कि

तस्मै एव अन्न- तस्मिन् शरीर विपे

अन्नवान्=विशेष अन्नवाला

  • भवति=होता है

च=और

अन्नाद:= { अन्न के भक्षण करने विपे साधनवाला

भवति=होता है

  • च=और

प्रजया=संतति करके

पशुभि:=पशुओं करके

प्रज्ञया=प्रज्ञाति में करके

महान्=श्रीमान्

भवति=होता है

  • च=और

कीर्त्या=कीर्ति करके

  • आपि=भी

महान्=ऐश्वर्यवान्

  • भवति=होता है ॥

भावार्थः ।

अन्नभृति । बहुन से अन्न को संपादन करे यह उस उपासक के लिये नियम विधान किया गया है, पृथिवी अन्न है, आकाश अन्नाद है,

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तैत्तिरीयोपनिषद्।

११७

ग्राकाश ग्रन्न है, पृथिवी ग्रन्नाद है, याने परस्पर दोनों ग्रन्न ग्रन्नाद हैं, जैसे घट के ग्रंदर ग्राकाश स्थित है, वैसे पृथिवी में भी ग्राकाश स्थित है, ग्रौर ग्राकाश में पृथिवी स्थित है, इस रीति से पृथिवी ग्रौर ग्राकाश दोनों एक दूसरे में स्थित हैं, ग्रथ इस उपासना के फल को कहते हैं । जो पुरुष पृथिवी ग्रौर ग्राकाश को ग्रन्न ग्रन्नाद-रूप करके जानत! हे वह एक को दूसरे में स्थित जानता है, ग्रर्थात् इस प्रकार दोनों में ग्रन्न ग्रन्नाद दृष्टि को करता है, ऐसा विचार करनेवाला पुरुप चिरकाल तक जीता है, उसके बहुत से पुत्र, पौत्र ग्रौर पशु ग्रादिक होते हैं, ग्रौर ब्रह्म-तेज करके ग्रौर कीर्ति करके भी युक्त होता है ॥ ह ॥

इति नवमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

मूलम् ।

न कष्णन् वसतौ प्रत्याचच्तीत तद्व्रतम् तस्मा ग्रया कया च विधया बहन्नं प्राप्तुयात् ग्राराधयस्मा ग्रन्नमित्याचचते एतद्ै मुखतोऽन्नथ् राद्धम् मुखतोऽस्मा ग्रन्नथ् राध्यते एतद्ै मध्यतोऽन्नथ् राद्धम् मध्यतोऽस्मा ग्रन्नथ् राध्यते एतद्ै ग्रन्नतः ग्रन्नथ् राद्धम् ग्रन्नतः ग्रन्नथ् राध्यते ॥ ७ ॥

पदच्छेदः ।

न, कष्णन्, वसतौ, प्रत्याचक्षीत, तत्, व्रतम्, तस्मात्, यया, कया, च, विधया, बहुग्रन्नम्, प्राप्तुयात्, ग्राराधि, ग्रस्मै, ग्रन्नम्, इति, ग्राचचते, एतत्, वै, मुखतः, ग्रन्नथ्, राद्धम्, मुखतः, ग्रस्मै, ग्रन्नथ्, राध्यते, एतत्, वै, मध्यतः, ग्रन्नथ्, राद्धम्, मध्यतः, ग्रस्मै, ग्रन्नथ्, राध्यते, एतत्, वै, ग्रन्नतः, ग्रन्नथ्, राद्धम्, ग्रन्नतः, ग्रस्मै, ग्रन्नथ्, राध्यते ॥

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११ =

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

श्रन्वय: । पदार्थ सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

पञ्चकोशो- पासकस्थ तत् व्रतम् वसतो स्त्रगुद्रे श्रागतम् कञ्चन न प्रत्याचक्षीत चै तस्मात् यया कया च विधया वह्न्र्नम् प्रापुयात् च श्रनमै श्रद्धम् श्राराधि इति श्राचन्ते यद्रि पतत् श्रन्वम्

श्रन्वय: । पदार्थ सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

मुखत: = प्रथम वय में सत्कार पूर्वक राष्ट्रं = दिया गया है तत् = तो ग्रस्मै = उस दाता के लिये मुखत: = प्रथम वय बिपे ही सत्कार पूर्वक पत् = निश्चय करके श्रन्वम् = श्रन्व राध्यते = मिलता है वै = श्रग्रर पतत् = यह श्रन्वम् = श्रन्व

मध्यत: = मध्य वय बिपे सत्कार पूर्वक श्रातिथि को राष्ट्रं = दिया गया है तत् = तो ग्रस्मै = उस श्रन्व दाता के लिये मध्यत: = मध्य वय बिपे सत्कार पूर्वक श्रन्वम् = श्रन्व राध्यते = मिलता है वै = श्रग्रर पतत् = यह

अन्तत: = ग्रन्त वय बिपे सत्कार पूर्वक श्रातिथि को श्रन्वम् = श्रन्व राध्यते = मिलता है वै = श्रग्रर पतत् = यह श्रन्वम् = श्रन्व

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

१ १ ६

राष्ट्रं=दिया गया है + तदा=तो ग्रस्मै=उस ग्रन्न-दाता के लिये

ग्रन्तत:=ग्रन्त वय विषे सरकार-पूर्वक ग्रन्नम्=ग्रन्न साध्यते=मिलता है ॥

भावार्थ ।

न कञ्चनेति । पृथिवी ग्रौर ग्राकाश की, जो पुरूष ग्रन्न ग्रन्नाद गुणा करके उपासना करता है, उसके नियम के विधान कहते हैं । यदि कोई मनुष्य उसके घर में निवास करने के लिये प्राप्त होजाय, तब उसका त्याग कदापि न करे ग्रर्थात् उसको हटावे नहीं, उसके प्रति ग्रन्न श्रवश्य देवे, इसलिये येन-केन प्रकार करके वह ग्रन्न का संग्रह करे ग्रौर ग्रातिथियों को खिलावे । जो ग्रातिथि की पूजा करके ग्रातिथि के प्रति ग्रन्न को खिलाता है उस ग्रन्नदाता को जितना वह ग्रन्न देता है उससे हज़ारगुना बलिक लाखोंगुना ग्राधिक ग्रन्न जन्मान्तर में प्राप्त होता है, ग्रौर जिस ग्रवस्था में देता है उसी उसी ग्रवस्था में उसको मिलता है, याने जो प्रथम ग्रवस्था में ग्रन्न का दान करता है उसको जन्मान्तर के प्रथम ग्रवस्था में ही ग्रन्न मिलता है, जो मध्यम ग्रवस्था में दान करता है उसको मध्यम ग्रवस्था में ग्रन्न मिलता है, जो वृद्धावस्था में दान करता है उसको वृद्धावस्था में ही ग्रन्न मिलता है ॥ १ ॥

मूलम् ।

य एवं वेद हैम इति वाचि योगक्षेम इति प्राणापा-नयोः कर्मेति हस्तयोः गतिरीति पादयोः विमुक्तिरिति पायो इति मानुषीः समाख्या: ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

यः, एवं, वेद, हैम, इति, वाचि, योगक्षेम, इति, प्राणापानयोः, कर्म, इति, हस्तयोः, गति:, इति, पादयोः, विमुक्ति:, इति, पायो:, इति, मानुषीः, समाख्या: ॥

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१२०

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

कर्म, इति, हस्तयोः; गतिः, इति, पादयोः; विमुक्तिः, इति, पायौ, इति, मानुषीः, समाखा: ॥

ग्रन्थयः । पदार्थ-सहित ग्रन्थयः ।

यः=जो

पचमू=इस प्रकार ग्रन- दान श्रौर उसके फल को

वे ह=जानता है

सः=वह

  • यथोक्तफलमाप्नोति}यथोक्र फल को प्राप्त होता है

इदानों ब्रह्म-पास नप्रकार=श्रब ब्रह्म की उपासना का विधान कहा जाता है

उच्यते{विधान कहा जाता है

क्षेम=कल्याण-रूप ब्रह्म

वाचि=वाणी बिपे स्थित है

इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है

योगक्षेम=प्राप्त वस्तु की प्राप्ति ( योग ) श्रौर प्राप्त वस्तु की रक्षा ( क्षेम ) ये दोनों ब्रह्म-रूप

प्राणापानयो:=प्राण श्रौर श्रपान बिपे स्थित हैं

कर्म=कर्म-रूप ब्रह्म

हस्तयो:=दोनों हाथों बिपे स्थित है

इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है

गतिः=गमन-रूप ब्रह्म

पादयो:=चरणों बिपे स्थित है

इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है

विमुक्तिः=मल-मूत्र विसर्जन-रूप ब्रह्म

पायौ=गुदा बिपे स्थित है

इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है

इति=इस प्रकार

पता:=ये उक्त पाँच उपासनाएँ

मानुषी: }मानुष्य-लोक-

समाखा:=उपासना हैं ॥

भावार्थ ।

य इति । जो पुरुष पूर्वोक्त प्रकार करके ग्रनन के माहात्म्य को श्रौर उसके दान के फल को जानता है उसीको पूर्वोक्त फल की प्राप्ति भी होती है ।

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

१२१

अथ ब्रह्म की उपासना के प्रकार को कहते हैं—ब्रह्म शरीरों में योग-क्षेम करके स्थित हैं, याने जो वस्तु प्राप्त की जाती है वह ब्रह्म ही करके की जाती है, और प्राप्त वस्तु की जो रक्षा की जाती है वह ब्रह्म ही करके की जाती है, प्राप्त वस्तु का रक्षा करने का नाम क्षेम है, और अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है, योग-रूप करके वह ब्रह्म प्राप्त में स्थित है, और क्षेम-रूप करके अपान में स्थित है, इस प्रकार योग-क्षेम-रूप करके ब्रह्म की उपासना करनी चाहिये । ब्रह्म कर्म-रूप करके हाथों में स्थित हैं, गति-रूप करके पावों में स्थित है, गुदा में विसर्ग-रूप करके स्थित है, इस प्रकार ब्रह्म की उपासना करनी चाहिये, यह शारीरिक उपासना है ॥ २ ॥

अथ दैवीं तृषिरिति वृष्टौ बलमिति विद्युति यश इति पशुषु ज्योतिरिति नक्षत्रेषु प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे ॥ ३ ॥

मूलम् ।

अथ, दैवीं:, तृषि:, इति, वृष्टौ, बलम्, इति, विद्युति, यशः, इति, पशुषु, ज्योतिः, इति, नक्षत्रेषु, प्रजातिः:, अमृतम्, आनन्दः:, इति, उपस्थे ॥

पदच्छेदः ।

अथ, दैवी:, तृसि:, इति, वृष्टौ, बलम्, इति, विद्युति, यशः:, इति, पशुषु, ज्योतिः, इति, नक्षत्रेषु, प्रजातीः:, अमृतम्, आनन्दः:, इति, उपस्थे ॥

अन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

अथ=अब दैवी:=देवलोक-संबंधिनी + समाख्या:=उपासनाएँ + उच्यन्ते=कहीं जाती हैं तृषिः=प्रक्रोपत्ति द्वारा तृष्णा-रूप ब्रह्म वृष्टौ=वृष्टि विषे स्थित है

इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है बलम्=बल-रूप ब्रह्म विद्युति=विद्युत् विषे स्थित है इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है यशः=यश विषे स्थित है

पशुषु=पशुओं में ज्योतिः=ज्योति नक्षत्रेषु=नक्षत्रों में प्रजातीः=प्रजा उत्पन्न करने वाला अमृतम्=अमृत आनन्दः=आनन्द उपस्थे=उपस्थ में इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है

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१२२

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

यशः=दुग्ध श्रोर श्रारोहयादि प्रजाति:=पुत्रोत्पत्ति-रूप ब्रह्म

यश-रूप ब्रह्म श्रार पुत्रोत्पत्ति द्वारा

पशुपु=गावादि पशुगणं विषे स्थित है

ऋतृतमू=ऋषि-त्रय की निमिति-रूप श्रमृत- तुल्य ब्रह्म श्रार

इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है

ज्योति:=तेजो-रूप ब्रह्म श्रानन्द:=श्री-गमन विषे प्राप्त

नक्षत्रेषु=सूर्य, चन्द्र श्रादिकों विषे स्थित है

इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है

उपस्थे=उपस्थ इन्द्रिय विषे स्थित है

इति=ऐसी उपासना करनी योग्य है ॥

भावार्थ ।

ग्रथ दैवीरिति । ग्रथ देवता-संबंधी ग्रर्थात् ग्राभिदैविक उपासना का कथन करते हैं ।

तृसिरिति । तृसि नाम वृष्टि का है, क्योंकि वृष्टि ही ग्रन्नादि द्वारा तृसि का हेतु है, सो ब्रह्म ही तृसि-रूप करके वृष्टि में स्थित है, ऐसी उपासना करनी चाहिये ।

तड़ित् जो विजली सब शरीरों विषे स्थित है, ग्रोर जीवों को चेष्टा करने में सामर्थ्य करती है, उसमें वल-रूप करके ब्रह्म स्थित है, ऐसी उपासना करनी चाहिये, ग्रोर यश-रूप करके पशुगणों में भी वह ब्रह्म स्थित है, याने दुग्ध, दधि, घृत, सवारि ग्रादि जो फल मिलता है वह सब ब्रह्म से ही मिलता है, ग्रोर प्रकाश-रूप करके नक्षत्रों में ब्रह्म स्थित है ।

ग्रोर पुत्र का जन्म पितरों को उनके ऋण-त्रय से छुड़ाता है, यही ऋण-त्रय से छूटना ही ग्रमृत-रूप ब्रह्म है, ग्रोर श्री-संसर्ग-जन्य जो सुख है सो पुत्र-रूप करके, श्रानन्द-रूप करके ग्रोर ऋषि-त्रय मोचन-रूप करके ब्रह्म ही उपस्थ-इन्द्रिय में ग्रर्थात् लिङ्ग-इन्द्रिय में स्थित है, ऐसी उपासना करनी चाहिये ॥ ३ ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

१२३

मूलम् ।

सर्वेमित्याकाशे तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत प्रतिष्ठावान् भवति तन्मह इत्युपासीत महान् भवति तन्मन इत्युपासीत मानवान् भवति ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

सर्वम्, इति, आकाशे, तत्, प्रतिष्ठा, इति, उपासीत, प्रतिष्ठावान्, भवति, तत्, महः, इति, उपासीत, महान्, भवति, तत्, मनः, इति, उपासीत, मानवान्, भवति ॥

ग्रन्वयः । पदार्थ-सहित | ग्रन्वयः । पदार्थ-सहित

सूक्ष्म भावार्थ । यदि=ग्रगर

इति=एैसी

उपासीत=उपासना करे

  • तत:=तो

महान्=स्वयं श्रेष्ठ

भवति=होता है

तत्=वह ब्रह्म

मनः=मन-रूप है

  • यदि=ग्रगर

इति=एैसी

उपासीत=उपासना करे

  • ततः=तो

मानवान्= { मनन याने ईश्वर के श्राराधन में समर्थ }

भवति=होता है ॥

सूक्ष्म भावार्थ ।

सर्वम्=सर्वात्मक-रूप ब्रह्म

आकाशे=ग्राकाश विपे स्थित है

इति=एैसी उपासना करनी योग्य है

तत्=वह ब्रह्म

प्रतिष्ठा=सबका श्रभिष्ठन है

  • यदि=ग्रगर

इति=एैसी

उपासीत=उपासन करे

  • तत:=तो

प्रतिष्ठावान्=स्वयं सर्व्विज्ञान-रूप

ब्रह्म

भवति=होता है

तत्=वह ब्रह्म

मह:=महत्व=सबसे श्रेष्ठ है

भावार्थ ।

सर्वेमिति । ग्राकाश में सर्वे-रूप करके ब्रह्म रिथत है, ग्रर्थात् ब्रह्म से ग्रभिन्न ग्राकाश ही संपूर्ण जगत् का ग्राश्रय है, एैसी उपासना

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१२४

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

करनी चाहिये, जो पुरुष इस प्रकार की उपासना करता है, वह स्वयं सर्वाविष्ठान-रूप ब्रह्म होता है, वह ब्रह्म श्रति श्रेष्ठ है अगर ऐसी इस्की उपासना करे, तो वह स्वयं श्रति श्रेष्ठ होता है, वह ब्रह्म मनन गुनावाला है इस प्रकार की जो उपासना करे, तो ईश्वर के मनन करने में भी सामर्थ्यवाला होता है ॥ ४ ॥

सूलम् ।

तन्नम इत्युपासीत नम्यन्तेडस्मै कामाः तद्ब्रह्मेत्युपासीत ब्रह्मवान् भवति तद्ब्रह्मा: परिमर इत्युपासीत पर्येंषं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः परि येडप्रियाः ब्रातृव्याः ॥ ५ ॥

तत्, नमः, इति, उपासीत, नम्यन्ते, ऽस्मै, कामाः, तत्, ब्रह्म, इति, उपासीत, ब्रह्मवान्, भवति, तत्, ब्रह्मा:, परिमर:, इति, उपासीत, पर्येंषं, म्रियन्ते, द्विषन्तः, सपत्नाः, परि, ये, ऽप्रियाः, भ्रातृव्याः ॥

शान्वयः ।

पदच्छेदः ।

पदार्थ-सहित | शान्वयः । पदार्थ-सहित

सूक्ष्म भावार्थ । सूक्ष्म भावार्थ ।

तत्=वह सर्व-भूत-स्थित ब्रह्म तत्=वह ब्रह्म

`मः=नमस्कार करने-ये गय ब्रह्म=व्यापक-रूप है

है + यदि=अगर

यदि=अगर इति=ऐसी

इति=ऐसा उपासीत=उपासना करे

उपासीत=उपासना करे + तत्=तो

तत्=तो ब्रह्मवान्=स्वयं व्यापक-रूप

ब्रह्मवान्=स्वयं व्यापक-रूप भवति=होता है

भवति=होता है तत्=वह वायु-रूप

तत्=वह वायु-रूप ब्रह्मा:=ब्रह्म का

ब्रह्मा:=ब्रह्म का

अस्मै=उस उपासक के लिये परिमर:=ब्रह्म का

कामाः=विषय-भोग इति=ऐसी

नम्यन्ते=स्वतः उपस्थित होते है उपासीत=उपासना करे

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तैत्तिरीयो–पनिपद्‌ ।

परिमरः=⎧⎩⎨⎪⎪⎪⎪⎪⎪⎪⎪परिमर है याने जिस में पाँच देवता विद्‌युत्‌, पृथिवी, चन्द्रमा, श्रादित्य और श्रग्नि लीन होते हैं सा वायु ब्रह्म का परिमर है

  • यदि=अ्रगर इति=ऐसी उपासीत=उपासना करे तत्‌=तो तनम्‌=उससे विद्धिपन्तः=द्वेष करने हुए

सपत्नाः=शत्रु इति=श्रापही ग्राप

परिध्रियन्ते=मर्‌या को प्राप्त होते हैं + च=और श्राद्धिप-न्तः⎫⎭⎬⎪⎪=द्वेष न करनेवाले भी ये=जो श्रप्रियाः=श्रप्रिय भातृव्या:=भातृ–पुत्रादि हैं

ते च परिध्रियन्ते=वे भी ⎧⎩⎨⎪⎪⎪⎪⎪⎪⎪⎪श्रापही मर्‌या को प्राप्त होते हैं ॥

भावार्थ ।

तत्‌नम्‌ इति । वह ब्रह्म नमस्कार करने–योग्य है, श्रगर ऐसी उपासना को करे, तो उस उपासक के श्रागे सव विषय स्वतः उपस्थित हो जाते हैं, वह ब्रह्म विराट्‌रूप व्यापक है, इस प्रकार की उपासना करे, तो वह स्वयम्‌ व्यापक हो जाता है, वह ब्रह्म वायु गयाच्चाला है, जो इस प्रकार की उपासना करे, उसके द्वेष करनेवाले श्रौर द्वेष करनेवाले सव शत्रु मर जाते हैं ॥ ५ ॥

सूक्तम्‌ ।

स यच्चायं पुरपे यच्चासावादित्ये स एकः स य एवं वित् श्रस्माल्लोकात्प्रेत्य एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रम्य एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रम्य एतं मनोमयमात्मान–मुपसंक्रम्य एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रम्य एतम–नन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य इमाँल्लोकान् कामान्नीकाम–रूप्यनुसंचरन् एतत्साम गायन्नास्ते ॥ ६ ॥

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१३६

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

पदच्छेदः ।

सः, यः, च, श्रायम्, पुरुषे, यः, च, श्रसौ, आदित्ये, सः, एकः, सः, यः, एवम्, वित्, श्रस्मात्, लोकात्, प्रेत्य, एतम्, श्रन्न-मयम्, श्रात्मानम्, उपसंक्रम्य, एतम्, प्राणमयम्, श्रात्मानम्, उपसंक्रम्य, एतम्, मनोमयम्, श्रात्मानम्, उपसंक्रम्य, एतम्, विज्ञान-मयम्, श्रात्मानम् उपसंक्रम्य, एतम्, श्रानन्दमयम्, श्रात्मानम्, उपसंक्रम्य, इमान्, लोकान्, कामान् श्रकामरूपी, श्रनुसञ्चरनू, एतत्, साम, गायन्, श्रास्ते ॥

ग्रन्वयः ।

पदार्थ-सहित | ग्रन्वयः । सूक्ष्म भावार्थ ।

यः=जो सः=वह परमात्मा है + स पद्=वहीं श्रायम्=यह पुरुष है च=और यः=जो श्रसौ=यह श्रादित्ये=सूर्य में है सः=वह देवों एकः=एक ही है यः=जो विद्धान् एवं=इस प्रकार वित्=जानता है श्रस्मात् लोकात्=इस लोक से प्रेत्य=मर कर श्रथांत् दृष्टि हटाकर एतम् श्रन्नमयम् श्रात्मानम्}=इस ग्रन्नमय कोष को उपसंक्रम्य=उपलँघन करके एतस् प्राणमयम् श्रात्मानम्}=इस प्राणमय कोष को उपसंक्रम्य=उपलँघन करके एतम् मनोमयम् श्रात्मानम्}=इस मनोमय कोष को उपसंक्रम्य=उपलँघन करके एतम् विज्ञानमयम् श्रात्मानम्}=इस विज्ञानमय कोष को उपसंक्रम्य=उपलँघन करके एतम् श्रानन्द-मयम् श्रात्मानम्}=इस ग्रानन्दमय कोष को उपसंक्रम्य=उपलँघन करके इमान् लोकान्=उन्हीं लोकों में कामान्=सब कामनाओं को श्रकामरूपी=कामनारहित होकर श्रनुसञ्चरनू=विचरता हुआ एतत् साम=यह साम गायन्=गाता हुआ श्रास्ते=रहता है ।

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निकामरूपो=स्वेच्छाचारो होकर

ग्रनुसंचरन=दिचरता हुया

पतत्=इस

साम गाय॔=साम वेद का गा-

यन निम्न प्रकार

करता हुया

श्रासते

स्थितर हाता हे ॥

भावार्थ ।

स यथायमिति । जो यह आत्मा प्रत्येक शारीरों में वर्तमान है और जो आत्मा आदित्य-मण्डल में वर्तमान है, वे दोनों एक ही हैं, जो पुरुष इस प्रकार जीवात्मा और परमात्मा के अभेद को जानता है, सो विद्वान् इस लोक श्रैर परलोक के विपय भोगों से उपराम होकर इस ग्रन्नमय शरीर को, और इस ग्रन्नमय के ग्रन्तर प्राणामय शरीर को, ग्रार प्राणामय के ग्रन्तर मनोमय शरीर का, ग्रार मनोमय के ग्रन्तर विज्ञानमय शरीर को, ग्रार विज्ञानमय शरीर के ग्रन्तर ग्रानन्द-मय शरीर को वाध करके अपनी इच्छा से विचरता हुया इन भूरादि लोकों में सामवेद के गीत को इस प्रकार गाता हुया फिरा करता है ॥ ६ ॥

मूलम् ।

हारे वु हारे वु हारे वु हारे वु ब्रह्मन्नादो᳚र ब्रह्मन्नादो᳚र ब्रह्मन्नादो᳚र ब्रह्मन्नादः ब्रह᳚थ्, श्लोककृ-दह᳚थ्, श्लोककृदह᳚मस्मि प्रथमजो ऋताऽ

स्य पूर्व᳚ देवेभ्योऽमुनस्य नाऽऋ भाऽपि यो मा ददाति

स इ᳚देव मा᳚ऽ वा: ब्रह्मन्न᳚मह᳚मन्न᳚मद᳚न᳚तमाऽ᳚ऋ द्वि᳚ ब्रहं᳚

वि᳚रवं᳚ भु᳚वन᳚म᳚भ᳚व᳚भ᳚वां᳚ऋ सुव᳚र्ण᳚ज्यो᳚ति᳚ः य एवं वेद᳚

इ᳚त्यु᳚प᳚निष᳚द᳚ ॥ ० ॥

इति दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥

इति तृतीया भृगुव᳚ल्ली समा᳚प्ता ॥ ३ ॥

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१२८

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

पदच्छेदः ।

हारे वु, हारे वु, हारे वु, ग्राहम्, ग्रन्नम्, ग्राहम्, ग्रन्नम्, ग्राहम्, ग्रन्नम्, ग्राहम्, ग्रन्नादः, ग्राहम्, ग्रन्नादः, ग्राहम्, ग्रन्नादः, ग्राहम्, श्लोककृत्, ग्राहम्, श्लोककृत्, ग्राहम्, श्लोककृत्, ग्राहम्, प्रास्मि, प्रथमजः, ऋतास्य, स्य, पूर्वम्, देवेभ्यः, अमृतस्य, नारेभायि, यः, मा, ददाति, सः, इत्, एव, मा इ, वा:, ग्राहम्, ग्रन्नम्, ग्रन्नतमम्, आ रेभि, ग्राहम्, विश्वम्, भुवनम्, अभ्यवभवाँ३, सुवर्गांज्योति:, यः, एवम्, वेद, इति, उपनिषद् ॥

ग्रन्थयः ।

पदार्थ-सहित ग्रन्थयः ।

सूक्ष्म भावार्थ ।

पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थ ।

हारेवु=ग्रहो ! =बड़े श्राश्रये है हारेवु=ग्रहो ! =बड़े श्राश्रये है हारेवु=ग्रहो ! =बड़े श्राश्रये है

ग्राहमनन्नम्=मैं ग्रन्न हूँ ग्राहमनन्नम्=मैं ग्रन्न हूँ ग्राहमनन्नम्=मैं ग्रन्न हूँ ग्राहमन्नादः =मैं ग्रन्न का भोक्का हूँ ग्राहमन्नादः =मैं ग्रन्न का भोक्का हूँ ग्राहमन्नादः =मैं ग्रन्न का भोक्का हूँ

ग्राहं श्लोककृत्=मैं कार्य-कारण-रूप हूँ ग्राहं श्लोककृत्=मैं कार्य-कारण-रूप हूँ ग्राहं श्लोककृत्=मैं कार्य-कारण-रूप हूँ

ग्रादम्=मैं कृतास्य=मूर्त्त-ग्रामृत श्रर्थान कार्य-कारण के प्रथमजः=पूर्व उत्पन्न हुग्रा

  • च=और ग्रास्मि=हँ

स्य=जो पूर्वम्=पहिले देवेभ्यः =इन्द्रियाँ भिमानी देवताग्रों से

  • च=और अमृतस्य=ग्रमृत का नारेभायि= { नाभि ( मध्य-स्थान ), ग्रर्थात निधान

ग्रास्मि=मैं ही हूँ

  • च=और यः=जो मा=मम्=मुख ग्रन्न-रूप को ग्रन्नार्थिने=ग्रन्नार्थी के लिये ददाति=देता है सः=वह इत्=इति=ऐसे दान-धर्म से एव=ग्रवरषय

मा इ=वा: ग्राहम् ग्रन्नम्=मैं ग्रन्न हूँ ग्रन्नतमम्=ग्रा रेभि=मुफ्त ग्रन्न-रूप को ग्राहम् विश्वम्=मैं विश्व हूँ भुवनम्=भुवन हूँ ग्रभ्यवभवाँ३= { सुथा सुवर्गांज्योति:=सुवर्गा ज्योति: यः=जो एवम्=ऐसे वेद=जानता है इति=ऐसे उपनिषद्=उपनिषद् है

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तैत्तिरीयोपनिषद्।

मा=माम्=मुझको

अभिभवाँ३=अभिभवामि=तिरस्कार करता

अवत:=अवति:=रक्षा करता हे

च=श्रौर

य:=जो

अन्नम्=अन्न को

अन्नार्थ-नेदद्रवा} =अन्नार्थी के लिये न देखर

अन्नमदन्तम्=अन्न भक्षण करते हुए को

अहम्=मैं

आददे=आददे=भक्षण कर जाता हूँ + च=श्रौर

अहम्=मैं ही

सुवर्णोज्यो-ति:=सूर्य की तरह प्रकाशमान होकर

विश्वम्=ब्रह्मा से तृणपर्यन्त

भुवनम्=लोक को

पवम्=इस प्रकार वेद्=जानता है

च=श्रौर

य:=जो

पवम्=इस प्रकार .

विन्=जानता है

स पच=वहीं

इति उपनिषद्:=इस प्रकार वेद के रहस्य को जानता है श्रथात् ब्रह्मज्ञानी होता है ।।

भावार्थ ।

हा इति । ऋग्व सामवेद के गायन के प्रकार को कहते हैं ।

"हा३ वु" श्रौर "हा३ वु" ये दोनों शब्द विस्मयार्थ के वाचक हैं, ब्रह्म का उपासक मस्त होकर कहता फिरता है, श्रद्धेतात्मा माया-मल से रहित मैं हूँ, मैं ही ऋन्न भोग्यरूप भी हूँ, श्रौर मैं ही ऋन्नाद भोक्तारूप भी हूँ, यही बड़ा श्राश्रर्य है, मैं ही देहादि अनेक इन्द्रियों के सञ्चात का कर्ता हूँ, श्रौर मैं ही श्रचेतन-रूप शरीर इन्द्रियादिकों का संघात हूँ, यह ही महान् श्रारचर्य है, मृत-श्रमूर्त-रूप सम्पूर्ण जगत् का प्रथम उत्पन्न हिरएयगर्भ-रूप कर्ता भी मैं ही हूँ, श्रौर हिरएयगर्भ की उत्पत्ति के श्रनन्तर इन्द्रादिक देवतात्रों से पूर्व उत्पन्न जो विराट्-पुरुष है सो भी मैं ही हूँ, श्रर्थात् कार्य-कारण-रूप मैं ही हूँ, श्रौर मुमुक्षुग्रों को प्राप्तव्य जो कि श्रमृतत्व है वह भी मेरा ही

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१३०

तैत्तिरीयोपनिषद् ।

स्वरूप है, जो पुरुष मुझ ज्ञान-रूप को ज्ञानार्थियों के प्रति देता है सो ज्ञान-दाता मेरी रक्षा ज्ञान करके करता है, और वृद्धि को प्राप्त होता है, और जो पुरुष ज्ञानार्थियों के प्रति ज्ञान को न देकर आप ज्ञान को भन्नया करता है, उसको मैं भन्नया कर जाता हूँ, तात्पर्य यह है कि उपासक कहता है मैं ही ज्ञान हूँ, मैं ही ज्ञान का भन्नया करने वाला भी हूँ, मैं ही संपूर्ण विश्व का प्रकट करनेवाला हूँ, मैं ही संपूर्ण विश्व को प्रलय-काल में उपसंहार करके अपने में लय करबेता हूँ, फिर सृष्टि-समय मैं ही संपूर्ण जगत् को उत्पन्न करके उसको प्रकाश करता हूँ, यह सब आाश्रर्य-रूपि कौतुक मेरा ही है, इन दो वाक्यों करके निरूपण किया परमात्मा का ज्ञान जो कोई और पुरुष भी पूर्वोक्त प्रकार से जानता है उसको भी यही फल मिल जाता है, याने पाँचों कोश-संबंधी शरीरों को उल्लंघन करके ब्रह्म-रूप हो जाता है ॥ ७ ॥

इति दशमोऽनुवाकः ॥ १० ॥

इति तृतीया भृगुवल्ली समाप्ता ॥ ३ ॥

मूलम् ।

सह नाववतु सह नौ भुनकु सह वीर्यं करवावहै ।

तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

पदच्छेदः ।

सह, नाववतु, सह, नौ, भुनक्तु, सह, वीर्यम्, करवावहै, तेजस्वि, नावधीतमस्तु, मा, विद्विषावहै, ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः ॥

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तैत्तिरीयोपनिषद् ।

१३१

श्रन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे । सः=वह ईश्वर नौ={ गुरु और शिष्य को श्रथांत=साथ सद्=ही श्रावतु=रक्षा करे नौ=हम दोनों को सह पव=साथ ही भुनक्तु=भोग प्राप्त करे + श्रावाम्=हम दोनों सह=साथ + पव=ही

श्रन्वयः । पदार्थ-सहित सूक्ष्म भावार्थे । वीर्यम्={ विद्या-दान श्रौर विद्या-प्रह्या स-मथ्ये को करवावहै=प्राप्त होवें नौ=हम दोनों का श्रधीतम्=पढ़ा हुग्रा तेजस्व=ग्रर्थ-ज्ञान योग्य ग्रर्थांत् सफल ग्रस्तु=होवे + श्रापाम्=हम दोनों मा विद्धिपावहै={ पठन-पाठन में प्रमादरूप द्वेष को न प्राप्त होवें ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

इति तैत्तिरीयोपनिषत्सर्टीका सम्पूर्णा ।

शुभमस्तु ।

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ग्रनुवादक की ग्रनूदित ग्रन्यान्य पुस्तकें ।

नाम पुस्तक मूल्य नाम पुस्तक मूल्य

ईशावास्योपनिषद् .... =) विष्णु-सहस्रनाम .... १)

केनोपनिषद् .... =)॥ सांख्यकारिकातत्त्वबोधिनी १=)

कठोपनिषद् .... १) सांख्य तत्व-सुबोधिनी .... १)

प्रशनोपनिषद् .... १) उपन्यास श्रादि ।

मुंडकोपनिषद् .... १) मनोरंजन .... .... १=)

मांडूक्योपनिषद् .... =) चित्त-विलास १-२ भाग ॥)॥

ऐतरेयोपनिषद् .... १)॥ राम-प्रताप .... .... ॥)

छांदोग्योपनिषद् .... ३) ब्रह्म-दर्पण .... .... ॥)॥

बृहदारण्यकपनिषद् ३) राम-दर्पण .... .... १)

भगवद्गीता .... .... ३) पथिक-दर्शन .... .... १=)

अष्टावक्र-गीता .... .... १॥) याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद १)

राम-गीता .... .... १)

वेदान्त-संवेशी ग्रन्यान्य पुस्तकों के लिये -) का रि० भेजकर बड़ा सूचीपत्र मुफ्त मँगवा लीजिप ।

मिलने का पता—

मैनेजर, नवलकिशोर-प्रेस ( बुकडिपो ), हज़रतगंज, लखनऊ.