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1. Tattva Bodha Shankaracharya Hindi Translation Madan Mohan Pathak Ed. Madhav Prasad Vyasa

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श्री:

तत्त्वबोध:

श्रीमच्छङ्करावतारश्री १०८ युतेश्रीपडरा- चार्य भगवत्पाद विरचित:।

कृतभाषानुवादसहितः ।

काशीस्थ काशीनाथ सं० पाठशालाप्रधानाध्यापकेन व्या आ. 'विधारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन संशोधितः ।

भार्गवपुस्तकालयाध्यक्षेगा स्वकीये 'भार्गवभूषण' यन्त्रालये मुद्रयित्वा प्रकाशित: । अस्य सर्वे ऽधिकारा: प्रकाशकाधीनाः । वि० संवत् १६६२

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( ४ )

सरल करने का उद्योग किया गया है। आशा है जिज्ञासु लोग इस ग्रन्थ से वेदान्त के गूढ़तत्वर को सहज में समझ सकेंगे। यदि जिज्ञासु जन इससे लाभ उठावेंगे तो मैं अपना परिश्रम सफल समझूंगा, और ग्रन्थ भी उनकी सेवा में भेजू गा। मैंने बड़ी सावधानो से इस ग्रन्थ का अनुवाद किया है। इतने पर भी यदि कहीं अशुद्धियां रह गई हों तो दया कर उसे पाठक महोदय सुधार लेवें।

आपका हितकर- पं० मदनमोहन पाठक, गायघाट बंगाली बाड़ा, श्रो काशी क्षेत्र।

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  • श्रीग सेशाय नमः *

अथ तत्त्वबोधः प्रारभ्यते।

हम आस्तिक लोग जब किसो कार्य को आरम्भ करते हैं तब मङ्गलाचरण अवश्य करते हैं। इस विषय में हमारा विश्वास है कि मङ्गलाचरण से दो बात होती हैं ! पहिली बात विध्न का नाश और दूसरी उस कार्य की समाप्ति जिसके प्रारम्भ में हमने मङ्गलाचरण किया था। हमारो सिद्धान्त है कि प्रत्येक कार्य की सिद्धि में जैसे उसकी सामग्री की आवश्यकता है वैसे ही विध्नों का न होना भी आवश्यक है। जैसे उन २ सामग्रियों से वे २ कार्य सिद्ध होते हैं वैसेही विघ्नों के न होने से भी कार्य सिद्ध होते हैं त् जैसे ग्रन्थ समाप्ति में कारय सामग्रो बुद्धि कल्पना और सदसद्विवेक आदि हैं वैसे ही एक िघ्न का न होना भी है। इसलिये ग्रन्थ के आरम्भ में मङ्गल करना आवश्यक जान पड़ता है। परिपाटी के पालन से हमें एक लाभ और होता है जिसे हम लोग परम्परा कहते हैं। यदि हम लोग मङ्गला- चरण करते हैं तो हमें यह विश्वास होता है कि यदि कदाचि।

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६ तत्ववोध:।

हमारे शिष्यगणा भी ग्रन्थ बनावेंगे तो वे भी मङ्गलाचरया करेंगे। यही कारण हुआ कि हम मङ्गलाचरण को ग्रन्थ का एक अङ्ग मान कर उसे ग्रन्थ के आदि में मिला देते हैं और उससे एक उत्तम परिपाटी का निर्वाह करते हैं। अब हमें यह भी विचारना आवश्यक है कि हम किस देवता का मङ्गलाचरण करें ? इस विचार का निर्राय ग्रन्थ के विषय पर ही निश्चित है। अतः जिन ग्रन्थों में जो विषय हो उसी के अनुसार मङ्गलाचरणा भी होना उचित है। इसी अनादि सिद्ध परिपाटी का पालन करने की इच्छा से भगवान् शङ्करा- चार्यजी (तत्त्वबोध) के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण कहते हैं।

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भाषाटीकासहितः। ७

ग्रथ मङ्गलाचरणप। वासुदेवेन्द्र योगीन्द्रं नत्वा ज्ञानप्रदंगुरुम।

अर्थ-मोक्ष साधन ज्ञान के देने वाले योगियों में श्रेष्ठ बासुदेवेन्द्र योगिराज गुरु को प्रखाम करके, मोक्षपद की चाहना करने वाजे मनुष्यों के हित के लिये तत्वबोध का कथन करता हूँ।। १ !। साधनचतुष्टयसम्पन्नाधिका- रिणां मोक्षसाधनभूतं तत्त्व- विवेकप्रकारं वत्याम: ॥२॥ अर्थ-मोचपद की प्रप्ति के चार प्रकार के उपायों को सायने वाले अधिकारी जनों के लिये जो मोच में साधन हैं उन तत्वों के विचार को कहता हूँ। जगत का उपादान कारख सत् चित् आनं्द रूप परमेश्वर है। वही माया के आवेश से जीव अवस्था को प्राप्त होता है और पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश में अपना रूप देखता है। तच्व के बोध से वह पञ्चमहाभूत से अपने को अलग समफता है। इससे तत्त्वबोध का प्रकार कहना अति आवश्यक है।। २।।

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तरवबोधः।

साधनचतुष्टय किम ? नित्या-नित्यवस्तुविवेक:, इहामुत्रा- र्थफलभोगविरागः, शमदमादिषट्- कसम्पत्तिः मुमुत्तुत्वं चेति।३।। अर्थ-मोक्ष के चारो साधन कौन कौन हैं ? नित्य पदार्थ और अनित्य पदार्थ का भिन्न भिन्न ज्ञान, इस लोक के और परलोक के पदार्थ और उनसे होने वाले फलों में वैराग्य, शम, दम, आदि छओ पदार्थों का सम्पादन और मोचपद की इच्छा, ये ही चारो साधन हैं॥ ३।। नित्यानित्यवस्तुविवेक: क: ? नित्यवस्त्वेकं ब्रह्म, तद्दयति- रिक्तं सर्वमनिताम, अ्रयमेव नित्यानित्यवस्तुविवेक: ॥४ ॥ अर्थ-नित्य पदार्थ और अनित्य पदार्थ का विवेक किसको कहते हैं ? नित्य पदार्थ केवल ब्रह्म है। उसको छोड़कर और जितने पदार्थ हैं सब अनित्य अर्थात् मिथ्या वा असत् हैं इसी ज्ञान को नित्यानित्य-वस्तु-विवेक कहते हैं।। ४ ।

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भाषाटीकासहितः ।

विराग: कः ? इह स्वर्गभोगेषु इच्छाराहित्यम् ॥ ५॥ अर्थ-विराग किसे कहते हैं ? इस लोक के और स्वर्ग आदि परलोक के सुख आदि भोग की इच्छा का त्याग करना। अथात् इस लोक और परलोक के सुख-भोग को बासना को हंटा देना। इसे विराग कहते हैं ॥। ५ ॥ शमादिसाधनसम्पत्तिः का ? शमोदमउपरतिस्तितिक्षाश्रदास- माधानं चेति॥६। अर्थ-शम आदि साधनों की संपत्ति का क्या अर्थ है १ शम,दम, उपरम, तितिता, श्रद्धा और समाधान, इन छमों साधनों का होना शम आदि साधन संपत्ति कहाती है। शम-शान्ति, दम-इन्द्रियों का रोकना, उपरम-कर्तव्य का अनुष्ठान, वितिक्षा-सीवादि का सहना, श्रद्धा-गुरुआदि के वाक्य में विश्वास, समाधान-चित्त की एकाग्रता, ये ही छः साधन हैं॥ ६ ॥ शमः कः ? मनोनिग्रहः । दमः कः ? चक्षरादिवाह्यन्द्रिय-

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१० तस्वबोधः ।

निग्रहः। उपरमः क: ? स्व- र्गानुष्ठानमेव। तितिना का ? शीतोष्णसुखदुःखादिसहिष्णुत्व- म्। श्रद्धा कीदृशो ? गुरु- वेदान्तवाक्यादिषु विश्वास: श्रद्धा । समाधान किम् ? चित्त कायरता॥७॥ अर्थ-शम किसे कहते हैं ? मन रोकने को शम कहते हैं। दम का क्या अथ है ? नेत्र, कर्स, जिह्वा, घापा और त्वचा आदि बाहरी इन्द्रियों के रोकने को दम कहते हैं। उपरम किसे कहते हैं ? अपने निज धर्म का ही अनुष्ठान करना। अर्थात् शब्द आ विषयों से इन्द्रियों को रोककर और सब लौकिक विचारों से हटा कर केत्रल आत्मविचार में तत्पर रहना, इसे उपरम कहते हैं। तितिक्षा किसे कडते हैं? शीत, उष्य, सुख, दुःख, मान, अपमान आदि को धैर्य से सह लेना, इसे तितिक्षा कहते हैं। श्रद्धा कौन सी वस्तु का नाम है ? गुरु के वाक्यों को और वेदान्त के वाक्यों को विश्वा: पूर्वक यथार्थ समझना श्रद्धा कहाती है। समाधान

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भाषाटीकासहितः । ११

का क्या अथ है? चित्त की एकाग्रता को अरथ.त् गुरु और अधिकारी को बताना समाधान कहाता है। इन्हेही शम आदि छः साधन कहते हैं।। ७।। मुमुत्तुत्वं किम ? मोनो मे भूयादितीच्छ्ा ॥८ ॥ अर्थ-मुम्रत्तत्व का क्या अर्थ है? मेरा मोक्ष होवे ऐसी इच्छा का होना। अर्थात् मुझे किसी प्रकार के सांसारिक दुःखों से संयोग न हो, इस इच्छा वाले को सुमुन्तु कहते हैं।।८।। एतत्साधनचतुष्टयम् । तत- स्तत्वविवेकस्याधिकारिगो भ- वन्ति। तत्वविवेक: कः ? आ्रात्मा मिथ्येति॥६॥ सत्यस्तदन्यत्सव

अरथ-ये चारों मोक्ष के साधन हैं। इनकी सांधना के अनन्तर तत्त्वविषेक के अधिकारी होते हैं। अरथान् इन चारों की साधना से वह तत्त्वज्ञान होता है जो महाभूतों से आत्मा को भिन्न सिद्ध कर देता है। तत्वविवेक किसे कहते हैं? आत्मा सत्य है, और उसके सिवाय और. जितने जगत् के पदार्थ हैं वे सब मिथ्या हैं, इसी को तत्वविवेक कहते हैं॥६।।

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१२ तत्वबोधः ।

आरत्मा कः ? स्थूलसूत्त्मका- पञ्चको- शातीतः सन्नवस्थात्रयसा- क्षी सच्चिदानन्दस्वरूप: सन् यस्तिष्ठति स आत्मा॥ १०॥ अर्थ-आत्मा किसे कहते हैं ? स्थू लशरीर सूद्षमरारीर और कारणशरीर से अन्य, अन्मय आदि पाँचो कोशों से दूर और जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिरूप तीन अतस्थाओं का साक्षी होकर जो सत् चित् और आनन्दस्वरूप हो रहता है उसे आत्मा कहते हैं। अर्थात् आत्मा वह है जो स्थूल, सूचम और कारखशरीर से अलग है, जो अन्नमय प्राशम आदि पाँचों कोशों से दूर है, जो जाग्रत्, स्वप्त और सुषुप्ति का साक्षी है और जो सत् चित् आनन्द रूप है ।। १० ।। स्थूलशरीरं किम ? पञ्चीकृत- पञ्चमहाभूतैः कृतं सत्कर्म- जन्यसुखदुःखादिभोगायतन शरीरम, अस्ति, जायते, वर्धते,

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भाषाटांकासाहतः । १३

विपरिगामते, अपत्तीयते, वि- नश्यतीति षड्विकारवदेत- त्स्थूलशरीरम्॥११॥ अर्थ-स्थूल शरीर किसे कहते है ? पञ्चीकृत पृथिवी, जल, तेज, वायु, और आकाश आदि पाँचों महाभृतों से किया गया, कर्मो के द्वारा उत्पन्न सुख और दुःख आदि के भोगने का प्रधान आश्रय नाश होने वाला, और स्थिति, उत्पत्ति, वृद्धि, घटना, बढ़ना, ढोला पड़ना और नाश रूप छहों विकार वाला स्थूल शरीर कहलाता है। तात्पर्य यह है कि पृथिवी आदि पाँचों महाभूतों के पञ्चाकरण से स्थूल शरीर उत्पन्न होता है। महाभूतों के पञचीकरण का यह प्रकार है कि प्रथम आकाश को दो भागों में बाँटकर मक भाग को अलग रख देना। फिर दूसरे भाग को चार भाग में बाँटकर अलग रखे हुए आधे भाग को इसी प्रकार बाँटे गये वायु के भागों में मिला देना। इसी भाँति वायु का विभाग करके उसे तेज/भाग में मिला देना। तेज भाग को बाँट कर जल भाग में मिला देना। जल को बाँटकर पृथिवी में मिला देना। इन्हीं भागों के मिलाव को पञ्चीकरणकहते हैं। इसी पञ्ची करस नवस्था का नाम स्थूल शरीर है, जब फिर पृथिवी झादि भूतों के भागों को अलग अलग करके अपने ₹

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१४ तत्वबोधः ।

कारख महाभतों में लोन कर देते हैं तब स्थूलसरोर का नाश हो जाता है। इस स्थूल शरीर के सहायक उपादानकारण शुभ अशुभ कर्म हैं। शुभ अशुभ कर्मो से सुख दुःख का भोग उत्पन्न होता है। स्थूख शरीर इनका भोग करता है। इस स्थूल शरीर की छः अवस्था होती है। प्रथम अवस्था अस्ति है। अस्ति शब्द का अर्थ है सता, अरथात् उत्पन्न होना। द्वितोय अवस्था जनन, अर्थात् उत्पन्न होना है। तृतीय अवस्था वर्धन अर्थात् कदाचित् बढ़ना और कदाचित् घटना। चतुर्थ अवस्था विपरिणाम अर्थात् क्रम से बढ़ना। पञ्चम अवस्था अपक्षय अर्थात् वृद्ध आदि होने पर शरोर का शिथिल होना। और छठवीं अवस्था नाश अर्थात् शरीर का पात होना। इसी को लोग स्थूल शरीर कहते हैं। ११॥

सूत्मशरोरं किम ? अपञ्चीक्ृ ..- तपञ्चमहाभूतैः कृत तत्कर्मज- न्यसुखदुःखादि-भोगसाधन

कर्मेन्द्रियाणि पञ्च प्राणादयः पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च

मनश्चैकं बुड्धिश्चैका एवं स-

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भाषाटीकास हितः। १५

प्तदशकलाभि: सह यत्तिष्ठति तत्सूक्त्मशरीरम् ॥१२॥

अर्थ-सूच्मशरीर किसे कहते हैं ? अपञचीकृत पृथिवी आदि पाँचों महाभूतों से बना, कर्मोंसे उत्पन्नसुख दुःख आदि के भोगने का साधन, पाँच ज्ञान इन्द्रियों के, पाँच कर्म इन्द्रियों के, पाँच प्राणों के, एक मन के और एक बुद्धि के, इस भाँति सत्रह कलाओंके साथ जो रहता है वह सूच्षमशरीर कहाता है। अरथात् सूद्मशरीर में पञ्चमह्दाभूतों के पचीस भाग नहीं होते। कर्म उसका सहायक है। वह सुख दुःख का भोगनेवाला है। उस में नेत्र, कर्स, श्रव, नासिका और स्पर्श इन्द्रियां रहती हैं। वाक, हस्त, पाद, गुदा और उपस्थ भी रहते हैं। प्राय, व्यान, समान, उदान और अपान आदि प्राण भी रहते हैं। मन भी रहता है। और बुद्धि भी होती है। इन्हीं सत्रहों कला वाले शरीर को सूद्तमशरीर कहते हैं ।। १२ ॥।

श्रोत्रं त्वक चत्तुः रसना घागा- मिति पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि। श्रोवस्य दिग्देवता। त्वचो

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१६ तत्वचोषः।

वायुः। चक्ुषः सूर्यः। रसनाया वरुणः । घागस्याश्विनौ, इति ज्ञानेन्द्रियदेवताः । श्रोतरस्य विषयः शब्दग्रहगाम। त्वचो विषयः स्पर्शग्रहगाम। चक्षुषो विषयो रूपग्रहगाम । रसना- या विषयो रसग्रहगाम। घागास्य विषयो गन्धग्रहगामिति ॥१३॥ अर्थ-श्रोत्र-कान, त्वकूस्पर्श की इन्द्रिय, चन्तु-नेत्र, रसना-जिह्वा, और भया-नासिका, ये पाचों ज्ञान इन्द्रिय हैं। श्रोत्र इन्द्रिय की देवता दिशा है। त्वक इन्द्रिय की देवता वायु है। चक्षु इन्द्रिय की देवता सूर्य है। रसना इन्द्रिय की देवता वरुसा है। घ्राण इन्द्रिय का देवता अश्विनीकुमार हैं। श्रोत्र इन्द्रिय से शब्द का ज्ञान होता शै । त्वक इन्द्रिय से स्पर्श का ज्ञान होता है। चक्ष इन्द्रिय से शक्ल आदि का ज्ञान होता है। रसना इन्द्रिय से मधुर आदि रस का ज्ञान होता है। घ्रास इन्द्रिय से सुगन्धि और गद्ुन्धि का ज्ञान होता है।। १३।।

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२ भाषाटीकासहितः । १७ वाकपाणिपादपायूपस्थानीति पञ्च कर्मेन्द्रियागि। वाचो देवता व क्नि। हस्त्योरिन्द्रः। पादयो- र्विष्णुः। पायोर्मृत्युः। उपस्थस्य प्र जापतिरिति कर्मेन्द्रियदेवताः। वाचो विषयो भाषगाम। पारयो- र्विषयो वस्तुग्रह्गाम। पादयो- र्विषयो गमनम्। पायोर्विषयो मलत्यागः। उपस्थस्य विषया आ्रनन्द इति॥१४॥ अर्थ-वाक(वाखी)पासि (हस्त)पाद (चरख पायु(गुदा)और उपस्थ(लिद्ग) ये पाचों कर्म इन्द्रिय हैं। वाक इन्द्रिय की देवता अग्नि है। हस्त इन्द्रिय की देवता इन्द्र है। पाद इद्रिय की देवता मृत्यु है। लिङ्ग इन्द्रिय को देवता प्रजापति है। वाक् इन्द्रिय से बोलते हैं। हस्त से वस्तुओं को ग्रहण करते हैं। पैर से गमन करते हैं। गुदा से मतत्याग करते हैं। लिङ्ग से विषयानन्द करते हैं।। १४ ।।

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१८ तत्त्वबाधः ।

कारगाशरीरं किम? त्निर्वाच्या- नाद्याविद्यारूपं शरीरहयकारण- मात्रं सत्स्वरूपाज्ञान निर्विकल्प- करूपं यदस्ति तत्कारपाशरीरमू॥१५॥ अर्थ-कारण शरीर किसे कहते हैं ? अनिर्वाच्य और अनादि शरविद्या रूप जो स्थूल और सूक्ष्म शरीर का केवल कारख है, जो सत्सवरूप अ्रज्ञान है और जिस में किसी विशेषता का ज्ञान नहीं होता उसे कारण शरीर कहते हैं, तात्पर्य यह है कि कारय शरीर कौन है? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जा सकता है कि मायाकार शरीर है काया अनिर्व च- नीय है, अर्थात् उसका रपष्टर अरथ नहीं हो सकता,नतो उसे रु त् कह सकते हैं, क्यों कि ब्र्ज्ञान होने पर उसका नाश हो जाता है, और न उसे मिथ्या कह सकते हैं, क्योंकि फिर उससे जगत् की उत्पत्ति भी नहीं हो सकती। इससे उसे शनिर्वचनीय स्वीकार करते हैं। माया अनादि भी है और उसकी उत्पत्ति भी नहीं होती। यही माया सूद्षम शरीर और स्थूल रीर का कारख है। इसे सतस्वरूप अज्ञान कहते हैं।। इसमें किसी प्रकार के विशेष का सम्बन्ध नहीं होता। अतएव यही कारण शरीर है॥। १५ ।।

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भाषाटोकारसाहतः।

अवस्थात्रयं किम ? जाग्रत्स्वप्न- सुषुप्त्यवस्थाः ॥ १६ ॥ अर्थ-तीन प्रकार की अवस्थाए कौन २ है? प्रथम जाग्रत् अवस्था है। द्वितीय स्वप्न अव्स्था है। और तृ तीय सुरुप्ति अवस्था है॥ १६ ॥। जाग्रदवस्था का ? श्रोत्रादिज्ञाने- न्द्रियैः शब्दादिविष्रयेश्च ज्ञायते इति यत्सा जाग्रदवस्था स्थूल- शरीराभिमानी आ्रत्मा विश्व इत्युच्यते॥ १७ ॥ अर्थ-जाग्रत् अवस्था किसे कहते हैं ? श्रोत्र, त्वक,नेत्र, रसना और घ्ाम इन्द्रियों से जब शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गन्ध का ज्ञान होता है, उसे जाग्रत् अवस्था कहते हैं। "स्थूल शरीर मेरा है,, यह अभिमान करने वाला आत्मा विश्व कहलाता है। यद्यपि स्थूल शरीराभिमानी आत्मा अपनी अवस्था से भिन्न ही है, क्योंकि वह नित्य है और उसकी अवस्था तथा स्थूल शरीर मिथ्या है तो भी स्थूल शरीर का अभिमान करने से आत्मा का नाम विश्व पड़ जाता है। १७॥

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२० तत्वबोधः । स्वप्नावस्था का ? इति चेत् ? जाग्रदवस्थायां यद्टृष्टं यच्छू तं तज्जनितवासनया निद्रासमये यः प्रपञ्चः प्रतीयते सा स्वप्ना- वस्था। सूत्मशरीराभिमानी आ्त्मा तैजस इत्युच्यते ॥१८॥ अर्थ-स्वप्न अवस्था किसे कहते हैं ? जागते हुए जो कुछ दिखाता है वा जो कुछ जाना जाता है उस से आत्मा में एक प्रकार की वासना उत्पन्न हो जाती है। निद्रा लग जाने पर इसी वासना के प्रभाव से जो संसार देख पड़ता है वही स्वप्न अवस्था है, उसी को कोई सूचम शरीर के अभिमान करनेवाने प्रकाशमान भोक्ता और साक्षी श्रत्मा को तैजस कहते हैं।।१८॥ अतः सुषुप्त्यवस्था का ? तररह किमपि न जानामि, सुखेन म- या निद्रानुभूयत इति सुषुप्त्य- वस्था। कारणशरीराभिमानी त्रत्मा प्राज्ञ इत्युच्यते ॥ १६॥

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भाषाटीकासाहतः । २१

अर्थ-सुषुप्ति अवस्था किसे कहते हैं? मैं कुछ नहीं जानता,, "मैंने बड़े सुख से निद्रा की" गह ज्ञान जिस अवस्था में होता है वह अवस्था सुप्ति कहाती है। तात्पर्य यह हेकि सुपप्ति अवस्था में निद्रा सुख के सिवाय और किसी पदार्थ का ज्ञान नहीं रहता। तब भी आत्मा का प्रकाश बना रहता है। इससे सुपृप्ति के बाद कहता है कि "मैंसुख से सोया मुझे और कुद नहीं जान पड़ता था। 'यह कहना ही इस बात की साक्षी है कि उसे उस समय भी सूचम ज्ञान था, परन्तु निद्राके वेगसे वह स्पष्टर किसी वस्तु का ज्ञान नहीं कर सकता था। सुपुप्ति के बाद फिर पूर्व ज्ञान लौट आता है। इससे जिस समय विशेष ज्ञान न हो केवल ज्ञान ही हो उस समय को सुषुप्ति कहत हैं। इस अवस्था को कारण शरीर और आनन्दमपकोश भो कहत हैं। कारण शरीर के अभिमानी आत्मा को प्राज्ञ अर्थात् इन्द्रियों की सहायता के विनाही स्वप्न कथासे वासना रूप विषयों का भोगने वाला आत्मा कहते हैं॥ १६॥। पञ्चकोशाः के?। प्रन्नमयः, प्रागामयः, मनोमयः, विज्ञानमयः, आ्रनन्दमयश्चेति॥२०॥ अर्थ-पाँचों कोश कौन२ हैं? अन्नमय कोश, प्रासामय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, और आनन्दमय कोश

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२२ तत्वबोधः ।

ये पाँचों कोश हैं। शब्द का अर्थ है आच्छादन करना, और ये पाचों आत्मा के आच्छादन करने वाले हैं इस से कोश कहाते हैं॥ २०॥ अन्नमयः क ?। अ्न्नरसेनैव भृत्वा त्र्रन्नरसनेव वृद्धिं प्राप्या- न्नरूपष्टथिव्यां यद्िलीयते तदन्न- मयः कोशः स्थूलशरारम ॥२१॥ अर्थ-अनमयकोश किसे कहते हैं ? अभ के रस से ही जो उत्पन्न होता है, अन्न के रस में ही जो बढ़ता है, और अन्न रूप पृथ्वी में जो लीन हो जाता है उसे अन्नमय कोश अर्थात् स्थूलशरीर कहते हैं॥ २१ ॥ प्रागामयः कोश कः ? प्राणादि पञ्चवायवो वागादीन्द्रियपञ्चक प्रागामयः कोशः ॥ २२ ॥ अर्थ-प्रासमय कोश किसे कहते हैं ? प्राण, अपान, ध्यान, समान और उदानरूप पाँ वों प्राखवायु समूह को और वाक, पाशि, पाद पायु और उपस्थ रूप पाँचों कर्मेन्द्रियों को प्रासमय कोश कहते हैं। प्रासमय कोशका दूसरानाम क्रिया-

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भावाटोकासहितः । २३ शक्ति भी है क्यों कि प्रारामय कोश के सहारे ही शरीर की सब क्रिया होती है॥। २२।। मनोमयः कोशः कः ? मनश्च ज्ञानेन्द्रिपपञ्चक मिलित्वा भ- वति स मनोमयः कोशः ॥।२३। अर्थ-मनोमय कोश किसे कहते हैं। मन और श्रोत्र, त्वक, जिह्वा और घ्रासरूप पाँचों ज्ञान इन्द्रियों के मिलनेम कोश होता है, उसे मनोमय कोश कहते हैं। इसे इच्छा शक्ति भी कहत हैं। मनोमयकोश की सहायता से ही आत्मा में इच्छा उत्पन्न होती है। तात्पर्य यह है कि मन का स्वरूप ही संकल्प विकल्पे वाला है। और संकम्प विकल्प इच्छा रूप है। इस लिये आत्मा में इच्छा का होना मनोमय कोश की सहायता से होता है॥। २३ विज्ञानमयः कोशः क?। बुद्धि- र्ञानेन्द्रियपञ्चक मिलित्वा यो भवति स विज्ञानमयः कोशः॥२४॥ अरथ-विज्ञानमय कोश किसे कहते हैं ? बुद्धि और सब त्वक, चक्षु,जिह्वा और घासरूप पाँचोंज्ञानेन्द्रियों के मि- लने से जो प्रकाश उत्पन्न होता है, उसे विज्ञानमय कोश कहते हैं। इसका दूसरा नाम ज्ञानशक्ति भी है क्योंकि बुद्धि और पाँचो ज्ञान इन्द्रियों की ही सहायता से आत्मा को सब पदार्थों का ज्ञान होता है।। २४ ।।

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२४ तत्वबोधः । आनन्दमयः कः ? एवमेव कार- गशरीरभूताविद्यास्थमलिनसत्वं प्रियादिव्ृत्तिसहितं सदानन्दमयः कोशः। एतत्कोशपञ्चकम् । मदीयं शरीरं, मदीयाः प्राणाः, मदीयं मनश्च, मदीया बुदधिर्म- दीयं ज्ञानमिति स्वेनैव ज्ञायते। तद्यथा मदीयत्वेन ज्ञातं कटक- कुराडलग्रहादिक स्वस्माद्भिन्न, तथा पञ्चकोशादिक मदीयत्वेन ज्ञातमात्मा न भवति ॥२५ ॥ अर्थ-आनन्दमय कोश किसे कहते हैं ? इसी माँत कारण शरीर रूप अविद्या में रहने वाला, रज और तम गुण के संयोग से मलिन और प्रिय तथा मोद आदि वृत्तियों वाला जो कोश है उसे आनन्दमयकोश कहते हैं। इस कोश का आरनन्द- मयकोश नाम इसी कारण से हुआ है कि यह प्रिय और इष्ट पदार्थ की प्राप्ति से सुदित और सुखित होता है। जब

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भाषाटीकासहितः। २५

मोद और सुख होता है तो आनन्द की मात्रा अधिक मालूम पड़ती है। बस यही कारण है कि इसे आनन्दमय कोश अरथात अधिक आनन्दवाली अवस्था कहते हैं। पहिले कहे हुए पाँचों कोश पञ्चकोश कहे जाते हैं। आत्मा स्वयं 'मेरा शरीर, मेरे प्राण' मेरा मन, मेरी बुद्धि, और मेरा ज्ञान, यह जानता है। यही ज्ञान आत्मा को शरीर आदि से भिन्न करता है जैसे 'मेरा गृह्, 'मेरा कङ्कण' और 'मेरा कुर डल' यह ज्ञान गृह आदि को ज्ञाता से िन्न सिद्ध करता है, न कि वे स्वयं ज्ञाता बन जाते हैं, ऐसे ही 'मेरा शरीर' इत्यादि ज्ञान भी अपने को ज्ञाता से भिन्न सिद्ध करते हैं यह सिद्धि मम शब्द के प्रभाव से होता है। कोई भो कदापि ऐक्य होने पर मेरा शब्द नहीं कहता, जहाँ आप अलग रह कर केवल अपना सम्बन्ध जनाना रहता है, वही 'मेरा शब्द, बोला जाता है। मेरी पुस्तक, मेरी लेखनी, इत्यादि शब्दों का यही अर्थ है कि लेखनी मुझसे भिन्न है, परन्तु मेरा इसके साथ स्वामिपना का सम्बन्ध है। तस्मात् 'मम शब्द' के उच्चारण करने वाले के सम्बन्धी समझे जाते हैं, वैसे ही मेरे पाँचों कोश, इस प्रकार से ज्ञाता के सम्बन्धवाले पञच कोश, आत्मा उनसे भिन्न है। उनका साची है और पञचकोश माया के खिलवाड़ हैं। यह वार्त्ता सिद्ध हो गई ॥ २५॥ आरत्मा तहिं क ? सच्चिदानन्द- स्वरूप: ॥ २६॥

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२६ तत्वबोधः । अरर्थ-तब आत्मा किसे कहते हैं। जो सत्रूप चित्रूप और आनन्दरूप है उसे आत्मा कहते हैं।। २६॥। सतू किम ? कालत्रयेऽपि तिष्ठ तीति सत्। चित् किम ? ज्ञान- स्वरूपः । त्र्रानन्दः कः ? सुख- रूप:। एवं सच्चिदानन्दरूप- मात्मान विजानीयात् ॥२७॥ अर्थ-सत् किसे कहते हैं? भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमानकाल में जो विगड़ता नहीं किन्तु सदा एक रस रहता है,उसे सत् कहते हैं। चित्शब्द का क्या अथ है? जो ज्ञानस्वरूप है उसे चित् कहते हैं। चित शब्द का अथ है प्रकाश और प्रकाश ज्ञान में रहता है। इससे ज्ञान स्वरूप से जो सब का अनुभव करने वाला है, वही चित् शब्द का अर्थ है। आनन्दशब्द का क्या अर्थ है। जो सदा सुखरूप है वह आनन्द का अर्थ है। भर्थात् जो कभी भी दुःख से छुआ नहीं जाता वही कूटस्थ परब्रह्म नित्यानन्दरूप है, और उसे ही दूसरे शब्द में सुखरूप कहते हैं। इस भाँति आत्मा को सत्रूप, चित्रूप, और आनन्दरूप जाने। तात्पर्य

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भा पाटीकासहितः । २७

यह है कि आत्मा को नित्य ज्ञानस्वरूप और कूटस्थ समभ कर जगत् को मिथ्या समझे ॥२७॥ अ्रथ चतु विंशतितत्वोत्पत्तिप्र- कारं वत््यामः ॥२८॥ अर्थ अब (मैं) माया से उत्पन्न होनेवाले चौबीस तत्त्वों की उत्पत्ति के उपाय को कहता हूँ॥ २=॥ ब्रह्माश्रया सत्त्वरजस्तमोगणा- त्मिका माया त्रस्ति। तत आकाशःसम्भूतः। त्रकाशादा- युः। वायोस्तेजः। तेजस आपः। अद्भ्य: पृथिवी॥२६॥ अरथ-सत्वगुय, रजोगए और तमोगुखवाली और पर- ब्रह्म के आधार पर रहने वाली माया है अर्थात् जब सच्व रज और तम रूप गुणों में किसी प्रकार की न्यूनता वा अ- धिकता नहीं जान पड़ती किन्तु केवल समानता मालूम पड़ती है, उसी अवस्था का नाम माया है,। सांख्य मत- वाले इसे ही मूल प्रकृति, प्रधान और स्वभाव आदि शब्दों से स्मरख करते हैं। इसी माया के सहायक ब्रह्म के प्रभाव से आकाश उत्पन्न होता है। आकाश से वायु उत्पन्न होता

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तत्ववोध: ।

है। वायु से तेज उत्पन्न होता है। तेज से जल उत्पन्न होता है। जल से पृथिवी उत्पन्न होती है। तात्पर्य यह है कि माया एक प्रकार की शक्ति है। जिसके सम्बन्ध भ्रम से पर- ब्रह्म में एक प्रकार की कर्तृता जान पड़ती है। वह कर्त ता सम्बन्ध भ्रम से जान पड़ती है, इस से प्रथम आ्रकाश उत्पन्न होता है। आकाश एक पोला पदार्थ है इस से उसमें वायु उत्पन्न हो जाता है। वायु और आकाश की परस्पर रगड़ से अग्नि रूप तेज उत्पन्न होता है। अग्नि की उष्मा से वाष्परूप जल उत्पन्न होता है। जल के परस्वर की रगड़ से पृथिवी उत्पन्न होती है॥ २६।। एतेषां पञ्चतत्त्वानां मध्ये त्र्प्रा- काशस्य सात्विकांशाच्छोत्रेन्द्रि- यं सम्भूतम। वायो साख्विकांशा त्वगिन्द्रियं सम्भूतम्। अरग्नेः सा- च्विकांशाचतुरिन्द्रियं सम्भुतम्।

सम्भूतम्। प्रथिव्याः सत्विकां शात् प्रागोन्द्रियं सम्भूतम। एते-

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भाषाटीकासहितः । २६

षां पञ्चतत्वानां समष्टिसात्वि- र्कांशान्मनोबुद्ध यहंकारचित्तान्तः- करणानि सम्भूतानि ॥३० ॥ अर्थ-इन पाँचों तत्चों में से आकाश के स्त्त्वगुख भाग से श्रवण (कान) इन्द्रिय उत्पन्न हुई है। वायु के सत्त्चगु से त्वक (स्पर्श) इन्द्रिय उत्पन्न हुई है। अप्रग्ति के सच्चग ए के भाग से चतु (नेत्र) इन्द्रिय उत्पन्न हुई है। जल के सत्यगुसा भाग से रसना (जिह्वा) इन्द्रिय उस्पन्न हुई है। इन आकाश आदि पाँचों तच्ों के मिले हुए सत्व के गुख के भाग से मन बुद्धि अहङ्कार और चित्तरूप चार अन्तःकरण उत्पत्न हुए हैं॥ ३०॥ संकल्पविकल्पात्मकं मनः नि- श्चयात्मिकाबुद्धि । त्रहंकर्ता तहंकारः । चिन्तनकतृ चित्त- म्।मनसे देवता चन्द्रमाः। बुद्धर्ब्रहमा। ब्रहंकारस्य र्द्रः। चित्तस्य वासुदेवः॥ ३१ ॥

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३० तत्त्वचाध: ।

अथ-चार प्रकार के अन्तःकरण में मन उसे कहते हैं, जिससे यह काम करू ऐसा सन्देह उत्पन्न होता है। 'यह कार्य अवश्य कर्तव्य है, यह ज्ञान जिससे होता है, उसे बुद्धि कहते है। 'यह कार्य किया, यह अहङ्कार रूप ज्ञान जिससे होता है उसे अहङ्कार कहते हैं। सम्पूर्ण पदार्थो की जिससे चिन्ता व विचार होता है उसे चिच कहते हैं। यद्यपि अन्तःकरण एकही है, तो भी संङ्कन्प, निश्चय, अहङ्कार और चिन्तनरूप कार्य के भिन्न होने,से चार प्रकार का कहा जाता है। मन की देवता चन्द्रमा है। बुद्धि की देवता ब्रह्मा है, अहङ्कार की देवता रुद्र (महादेव) हैं चित की देवता चासुदेव (विष्णु) हैं॥ ३१॥ एत्तेषां पञ्चत्त्वानां मध्ये त्ररा- काशस्य राजसांशाहागिन्द्रियं सम्भूतम्। वायोराजसाशात्प्रागो न्द्रियं सम्भूतम। वहने' राजसां- शात्पादेन्द्रियं सभ्भूतम। जल- स्य राजसांशादुपस्थेन्द्रियं सम्भू- तम। प्टथिव्या राजसांशाद्गदे-

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भापाटीकासहित: । ३१

न्द्रियं सम्भूतम् । एतेषां सम- प्िराजसांशात्पञ्च प्राणा: स- म्भूता: ॥३२॥ अथ-इन पाँचों तरवों के मध्य में से आकाश के रजो गुशभाग से वाकू (वाणी) इन्द्रिय उत्पन्न हुई है। वायु के रजोगुण भाग से पाखि (हाथ) इन्द्रिय उत्पन्न हुई है: अग्नि के रजोगुख के भाग से पाद (पैर) इन्द्रिय उत्पन्न हुई है। जल के रजोगुख के भाग से उपस्थ (पुरुप) इन्द्रि य उत्पन्न हुई है। पृथ्वी के रजोगुण के भाग से गुदा इन्द्रिय उ.पन्न हुई है। इन आाकाश आदि पाँचो भृतों के मिले हुए रजोगुश के भाग से प्राय, अ्णान, व्यान, समान और उदान नाम के पाँच प्राय उत्पेन्न हुए हैं।। ३२।। एतेषां पञ्चतर्वानां तामसांशात्प- ञ्चीकृत पञ्चभूतानि भवन्ति॥३३॥ अर्थ-आकाश आदि पाचों महाभूतों के तमोग ए के भाग से पञ्चीकरण किये गये पाँच तत्व उत्पन्न होते हैं। इस भाँति चौबीस तत्वों की उत्पत्ति होती है। इनमें आकाश आदि पाँचों महाभूतों के सत्वग सके भागसे पाँच ज्ञान इन्द्रिय और चार अन्तः्करण उत्पेन्न होते हैं। सब के योग से नव

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३२ तत्वशेध:। तच्व होते हैं। इसी प्रकार आकाश आदि पाँचों के रजोग एके भाग से पाँव कर्म इन्द्रिय और पाँच आख उत्पेन्न होते हैं। जोड़ने से दस तत्व हुए। उसी भाँति पाँचों भूतों के तमोगु य के भाग से पाँच पेञ्चीकृत तत्व उत्पेन्न हुए। अब सब की संख्या को जोड़ने से चौतीस संख्या हो जाती है।। ३३ ।। पञ्चीकरगां कथमिति चेतू ?। एतेषां पञ्चमहाभूतानां ताम- सांशस्वरूपं एकमेकं भृत द्विधा विभज्य, एकैकमर्ध एथक तूष्णीं व्यवस्थाप्य, अपरमपरमर्ध चतुर्धा विभज्य स्वार्धमध्येष्वर्धेषु स्वभा- गचतुष्टयं संयोजनीयम्। तदा प- ञ्चीकरगं भवति। एतेम्यः पञ्ची- कृतपञ चमहाभूतेभ्यः स्थूलशरीर भवति। एवं पिएडब्रह्माएाडयो- रैक्यं सम्भूतम्॥३४ ॥

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३ भाषाटीकासहितः। ३३

अर्थ-पञ्चीकरण किस प्रकार होता है ? इसका उत्तर यह है कि इन पाँचों महाभूतों के तमोगुण रूप एक २ भूत भाग को दो २ भाग में बाँट देना। इन वाँटे हुए दोनों भागों में से एक ₹ भाग का चुप चाप अलग कर देना बाकी के एक भाग को चार भागों में बाँट देना। अब अलग रखे हुए अपने आधे भाग को इन भागों में मिला देना। यही पञ्ची- करणा होता है। यदि कहोगे कि इस प्रकार के मिलान से तो सब महाभूतों में सबका भाग आगया। अब 'यह पृथ्वी है' 'यह आकार है' यह भेद कैसे सिद्ध होवेगा ? तो इसका यह समाधान है कि, अवश्य एक २ में औरों का भाग आ जाता है तब भी जिसमें जिसका भाग अधिक होता है उस- का वही नाम होता है। जिसमें पृथ्वी का भाग अधिक रहेगा और औरों का कम होगा वह पृथिवी। इस प्रकार औरों में भी जानो। जैसे 'पहलवानों का ग्राम' यह कहने से सुनने वाला समझता है 'इस ग्राम में पहलवान् अधिक हैं, और दूसरे जाति के लोग कम हैं। जैसे ही महाभूतों के विवय में समकना उचित है। इन पञ्चोकृत पाँच भृतों से स्थूल शरीर उत्पन्न होता है। इस प्रकार पिएड (स्थूल शरोर) और ब्रह्माएड की एकता सिद्ध होती है। ब्रह्माएड भी स्थूल शरीर के समान पञ्चीकृत पाँच महाभृतों से उत्पन्न होता है॥ ३४ ॥

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३४ तत्वबोधः ।

स्थूलशरीराभिमानी जीवनात्म- कं ब्रह्मप्रतिविम्बं भवति, स एव जीवः, प्रकृत्या स्वस्मात् ईश्वरं भिन्नत्वेन जानाति। त्र्रवि- द्योपाधिः सन्नात्मा जीव इत्यु- चयते॥३५ ॥ अर्थ-स्थूल शरीर का अभिमान करने वाला अर्थात् उसे अपना समझने वाला ब्रह्म का प्रतिबिम्ब जीव कहलाता है। वह अपने स्वभाव के अनुसार ईश्वर को अपने रूप से भिन्न समझता है, अविद्या के संयोग से आर्मा जीव कहा जाता है। तात्पर्य यह है कि जीव वस्तुतः ब्रम्म ही है, परन्तु वह जब स्थूल शरीर में अभिमान करता है तब दर्पणा के प्रतिबिम्ब के समान वह जीव समझा जाता है। प्रतिबिम्ब होने के कारण मजान है जैसे थाली में भरे हुए जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब (परछाही) देखकर लोग उसे तब तक आकाश में रहने वाले सूर्य से अलग समझते हैं जब तक थाली हटा नहीं ली जाती। परन्तु थाली के हटाते ही प्रतिबिम्न का दर्शन नहीं होता केवल सूर्य रह जाता है, वैसे ही स्थूलशरीर के अभिमान के नाश हो जाने पर जीव नाम नहीं रहता तब

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भाषाटीकासहितः । ३५ इसका कारण अज्ञान ही है। इसी से जीवाभिमाना आरत्मा ईश्वर को दूसरा समझता है। और अज्ञान से हुवे कार्य को अपना कार्य समझ कर उनके शुभ और अशुभ कर्मों को भो- गता है। तात्पर्य यह के अविद्या से घिरा हुआ आत्मा हो जीव है वह और नहीं है। जब अविद्या का नाश हो जाता है अर्थात् जब ज्ञान उत्पन्न हो जाता है, तब वही अपने को ब्रह्म २ कहने लगता है। जैसे कोई पुरुष अपने गले में पड़े हार को अज्ञान से खोया हुआ समझ कर उसे ढूढ़वा फिरता है, परन्तु जब उसका हाथ अपने गले पर फिर जाता है तब वह चुपचाप अपनी राह लग जाता है, किसी से कुछ नहीं कहता, वैसे ही जीव भी ज्ञान होने पर अपने स्वरूप को देखने लग जाता है इसी स्वरूप दर्शन को ब्रह्मप्राप्ति कहते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि माया और अविद्या ही स्थूल शरीर के अभिमान में, आत्मा के जीव रूप प्रतिबिम्ब होने में और ब्रह्म को जोव नाम धरने में कारस है। माया और अरविद्या का भेद इतना ही है कि सत्वगुण की अधिकता में माया नाम है, रज वा तमोगु को अधिकता में अविद्या नाम है।। ३५॥ मायोपाधि: सन्नीश्वर इत्युच्य- ते, एवमुपाधिभेदाज्जोवेश्वरभे-

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३६ तत्ववोध: ।

ददृष्टिर्यावत्पर्यन्तं तिष्ठति ताव- त्पर्यन्तं जन्ममरणादिरूपसं- सारो न निवर्तते। तस्मात् का- रणान्न जीवेश्वरयोः भेदबुद्धि: स्वीकार्या ॥ ३६। अथ-माया में जो ब्रह्म का प्रतिबिम्ध है, उसे ईश्वर कहते हैं। इसे ही वैयासिक लोग जगत् का कर्त्ता अरथात् निमित्तकारण कहते हैं। इस प्रकार अविद्या और माया रूप धर्म के भेद से जब तक अविद्या में ब्रह्म के प्रतिबिम्ब को जीव, और माया में ब्रह्म के प्रतिबिम्ब को ईश्वर कहा करते हैं, तब तक संसार से छुटकारा नहों होता। संसार अर्थ है बार बार जन्म लेना और मरना। और वह तब तक बराबर बना रहता है, जब तक भेदबुद्धि नहीं छूटती। इस लिये जीव और ईश्वर को भिन्न नहीं समझना, किन्तु उन दोनों के भेद को मिथ्या समक कर एकता बुद्धि करनी ॥। ३६ ।।

ननु साहङकारस्य किञ्चिज्ज्ञस्य जीवस्य निरहङकारस्य सर्वजञेश्व-

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भापाटीकासहितः । ३७ रस्य तत्त्मसीति महावाक्या- त्कथमभेदबुद्धिः स्यादुभयोर्विरु दधर्माकान्तत्वात् ?॥ ३७॥

अर्थ-यहाँ यह शङ्का दोती है कि जीव का स्वरूप अररह झ्ारी और अल्पज्ञ है, और ईश्वर का स्वरूप निरहङ्कारी और सर्वज्ञ है। इन दोनों को एकता' तत्वमसि' 'तु वही है' इस महावाक्य से कैसे होवेगो। क्यों कि यह दोनों भिन्न भिनन धर्म वाले हैं। जो २ भिन्न धर्मवाले होते हैं उनकी एकता कभी नहीं होती! जैसे अग्नि और जल इनकी एकता नहीं होती । ३७॥।

इति चेन्न। स्थूलसूत्मशरीरा- भिमानीत्वं पदवाच्यार्थः, उपा- धिदशािनिर्मुक्तसमाधिदशास- म्पन्नं शुद्धं चैतन्यं त्वपद- लक्ष्यार्थः ॥ ३८।

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३८ तत्ववोध: ।

अर्थ-इस शङ्का का यह समाधान है कि स्थूल और सूक्षम शरीर का जो अभिमानी है वह तवं शब्द का वाच्य अर्थ है, और माया तथा अविद्या धर्म से रहित और समाधि अवस्था वाला शुद्ध चैतन्य त्वं शब्द का लक्ष्य अर्थ है। अरव विचारना चाहिये कि त्वं शब्द का ही दोनों अर्थ हुआ। एक वाच्य अर्थ और दूसरा लक्ष्य अर्थ,वाच्य और लक्ष्य दो नहीं होते। जैसे घट शब्द का वाच्य अर्थ घड़ा है और लक्ष्य अर्थ मृत्तिका है। और जो मृत्तिका है वही घड़ा है। ऐसेही तत् शब्द का भी वाच्य अर्थ माया और अविद्या वाला जीव है और लक्ष्य अर्थ शुद्ध ब्रह्म है। श्रब हमें 'तत्त्वमसि' इस वाक्य की ओर देखना चाहिये कि इसका क्याअर्थ है ? इसके विचार से हमें यह जान पड़ता है कि 'जो सर्वज् ईश्वर है वही तू है'। इस अर्थ के देखने से हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि जीव ब्रह्म की एकता जानने के समय दोनों में कोई धर्म का ज्ञान बाकी नहीं रहता इससे कोई शङ्का नहीं बच - जाती ॥ ३८॥

एवं सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट ईश्वर- स्तत्पदवाच्यार्थः उपाधिशन्यं

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भाषाटीकासहितः। ३६

शुद्धचैतन्यं तत्पदलत्यार्थ: एवं च जीवेश्वरयोश्चैतन्यरूपे- गाभेदे वाधकाभावः ॥ ३६॥

अरथ-इस भाँति सर्वज आदि धर्मवाला ईश्वर तत् शब्द का वाच्य अर्थ है, और सर्वज्ञत्व आदि धर्म के विना जो शुद्ध चैतन्य है वह तत् शब्द का लक्ष्य अर्थ है। इस प्रकार धर्म वाले ईश्वर की एकता में कोई दोप नहीं आता। क्योंकि धर्म को अलग कर देने में दोनों ओर चैतन्य मात्र रहता है और स्वभाव से एक ही है।। ३६ ।।

एवं च वेदान्तवाक्येंः सद्गुरूप- देशेन च सर्वेष्वपि भूतेषु येषां ब्रह्मबुद्धिरुत्पन्ना ते जीवन्मुक्ता इत्यर्थः॥४० ॥

अर्थ-इस प्रकाश 'तु वही है' 'मैं ब्रह्म हूँ' इत्यादि वेदान्त के महावाक्यों से और सद्गुरु के उपदेश से जिनको सब

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४० तत्वबोधः ।

प्राशियों में ब्रह्मज्ञान हो गया है वही जीवन्मुक्त हैं। आरशय यह है कि जीवन्मुक्त वही महापुरुष है, जिसे ब्राह्मणा, गौ. हाथी, कुत्ता और श्वपाक में अपनाही स्वरप दिखाता है। इस समय न तो उसे स्पर्शास्पर्श का विचार होता है, न वह ब्राह्मश को पवित्र और कुत्ते को अपवित्र समझता है, उसे किसी वस्तु के लाभ से न हर्ष होता है न किसी के नष्ट होने से दुःख होता है, और न वह अपने और पराये में कुछ अन्तर समभता है। वह इस समय जनक के समान कह देता है कि 'यदि सब मिथिला पुरी ही भस्म हो जावे तो भी मेरा कुछ भी भस्म नहीं होगा, तात्पर्य यह कि वह सब द्वन्द्वों से छूट जाता है॥ ४० ॥ ननु जीवन्मुक्त: क: ?। यथाऽहं पुरुषोऽहं ब्राह्मणोऽहं शूट्रोऽहम- स्मीति दृढनिश्चयस्तथा नाहं ब्राह्मगो न शूद्रो न पुरुषः कि- न्त्वसङ्ग:, सच्चिदानन्दरूप:, प्र- काशरूप: सर्वान्तर्यामी, चिदाका-

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भाषाटी कासहितः। ४१

शरूपोऽस्मीति दृढनिश्चयरूपा- परोक्षज्ञानवाञ्जोवन्मुक्त: ।४१।

अर्थ-जीवन्मुक्त किसे कहत हैं? जैसे-मैं देह हूँ, मैं पुरुष हूं, मैं ब्राह्मण हूँ, और मैं शूद्र हूँ, यह दृढ़ निश्चय है इसी भाँति 'न मैं ब्राह्मस हूँ, न शद्र हूँ, और न पुरुष हूँ, किन्तु मैं किसी से सङ्ग न रखने वाला, सत् और आनन्द स्वरूप वाला, प्रकाश स्वरूप वाला, सब जीवों का अन्तर्थामी और चित्त प्रकाश स्वरूप हूँ यह दृढ़ ज्ञान का प्रत्यक्ष जिसे होता है वही जीवन्मुक्त है।। ४१ ।।

ब्रह्मैवाहमस्मि इत्यपरोक्ज्ञानेन निखिल कर्मबन्धविनिर्मुक्त:स्यात् ४२

अर्थ-'मैं ब्रह्म ही हूँ' इस प्रत्यक्ष ज्ञान के होजाने से सब प्रकार के कर्मों के बन्धनों से छूट जाता है ४२॥

कर्माणि कति विधानि सन्ति ?

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४२ तत्वबोधः । इति चेत्। आगामिसन्चितप्रा- रब्धभेदेन त्रिविधानि सन्ति॥४३॥

अर्थ-कर्म कै प्रकार के हैं ?। इसका उत्तर यह है कि कर्म तीन प्रकार के हैं। प्रथम आगामि कर्म, द्वितीय सञ्चित कर्म, और तृतीय प्रारब्ध कम हैं॥४३।। ज्ञानोत्पत्यनन्तरंज्ञानिदेहकृतं पु- गयपापरूपं कम यदस्ति तदागा- मीत्यभिधोयते॥ ४४॥ अर्थ-ज्ञान हो जाने के बाद ज्ञानी के शरीर से किया गया जो पुरय और पाप कर्म है वह आगामि कर्म कहा जाता है ।। ४४ ।। सच्चितं कम किम? त्र्नन्तको- टिजन्मनां बीजभूतं सद्यत्कर्म- जातं पूर्वारजित तिष्ठति तत्सन्चि- तं ज्ञेयम् ॥ ४५ ॥

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भाषाटाकासहितः। ४३

अर्थ-सञ्चित कर्म किसे कहते हैं ? अनेक करोड़ जन्मों का जो-बीज अर्थात् म ख्य कारसा हैं, और जो अनेक जन्मों से बटोरा गया है उसे सञ्चित कम कहते हैं॥। ४५।।

प्रारब्धं कर्म किमिति ? चेत्। इदं शरीरमुत्पाद्य इह लोके एव सुखदुःखादिप्रदं यत्कर्म तत्प्रार- ब्धं भोगेन नष्टं भवति। प्रारब्ध- कर्मगां भोगादेव क्षय इति ॥४६॥

अथ-प्रार्ध कर्म किसे कहते हैं ? जो कर्म इस शरीर को उत्पन्न करता है, और इस लोक में अनेक प्रकार के सुख और दुः्ख देता है उसे प्रारब्ध कर्म कहते हैं। प्रारब्ध कर्म का भोग करने से ही नाश होता है क्यों कि कहा है कि 'प्रारब्ध कर्मों का भोग करनेसे ही च्षय होता है। वस्तुतः ज्ञान होने पर उसका भी नाश हो जाता है।। ४६ ।। सञ्चितं कर्म ब्रह्मैवाहमस्मीति निश्चयात्मकज्ञानेन नश्यति,

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४४ तत्त्वबोध: । आमिकर्मापि तेन नश्यति। वि्वागामिकर्मणां नलिनदल- गजलवत् ज्ञानिनां सम्बन्धो नस्त ॥४७॥

इं) मैं ब्रह्म ही हूँ, इस दृढ़ ज्ञान से सञ्चित कर्म नष्ट हो जात आगामि कर्म का ज्ञानी के साथ उसी प्रकार सम्बन्धन्हीं होता जैसे कमल के पत्त से जल का सम्बन्ध नहीं रहा॥ ४७ ।

किच ये ज्ञानिनं स्तुवन्ति,भज- नि, अर्चयन्ति तान्प्रति ज्ञानि- कृमागामिपुरायं गच्छति। येज्ञानिन निन्दन्ति, द्विषन्ति, दुशधप्रदान कुर्वन्ति तान्प्रति ज्ञा- निक़तं सर्वमागामिक्रियमाणां

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भाषाटीकासहितः। ४५

यदावाच्यं कर्म पापात्मकं तद् गच्छूति ॥४८॥ अथ-और भी जो लोग ज्ञानी की स्तुति करते है, सेवा करते हैं और पूजा करत हैं, ज्ञानी का किया हुआ आगामी पुरय उन्हें मिलता है। जो लोग ज्ञानी की निन्दा करते हैं, उनसे वैर करते हैं, और उन्हें दुःख देते हैं, ज्ञानी का किया हुआ सब आगामी पाप उन्हें मिलता है॥४८॥ तथा चात्मवित्संसारं तीर्त्वा ब्रह्मानन्दमिहैव प्राप्नोति। तर- ति शोकमात्मविदिति श्रुतेः ॥४६॥ अथे-इस प्रकार आत्मज्ञानी संसारसागर से पर होकर इसी जन्म में ब्रह्मानन्द को पाता है। क्योंकि ब्रह्मज्ञानी शोक- . ส . म्र. समुद्र को पार कर जाता है यह श्रति में लिखा है।। ४६।। 'तनु' त्यजतु वा काश्यां श्वप- चस्य ग्रहे्थवा। ज्ञानसम्प्राप्ति- समये मुक्तोऽसौ विगताशयः॥' इति स्मृतेश्च ॥। ५० ॥

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४६ त्वबोध: ।

अथ-चाहे काशी में शरीर पात होवे, अथवा चाएडाल के घर में शरीर पात हावे, ज्ञान की प्राप्ति हाते ही अन्तः- करण के मलों से शुद्ध होकर ज्ञोनी मुक्त होता है॥। ५० ।

इति तत्त्वबोधप्रकरणं समाप्तम ।

सब प्रकार की पुस्तकों के मिलने का पता- भार्गवपुस्तकालय, गायघाट, बनारस सिटी।

बाबू केलासनाथ भार्गव द्वारा, मार्गवभूष प्रेस, बनारस में मुद्रित।

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। श्रा: ॥ श्रो राजस्थान-संस्कृत-कालेज-ग्रन्थमाला का १४ वाँ पुप्प छप गया! हाथों हाथ बिक रहा है !! शाघ लीजिय !!! छ टिकाओं से सुशोभित लघुशब्देन्दुशेखरः संस्कर्ता-पं० श्रीगुरुप्रसादशास्त्री, व्याकरणाचार्य, न्यायाचार्य, दर्शनाचार्य [ प्रिन्सिपल-श्रीराजस्थान-संस्कृत-कालेज, काशी] (१) परिष्कारपूर्णा 'अरभिनव चन्द्रिका', (१) नागेश- भट्ट के प्रधान शिष्य 'वैद्यनाथ पाय गुयडे' कृत-विशाल-विस्तृत- अद्भुत टीका-'(िदस्थिमाला', (३) ज्योत्स्ना, (४) सदाशिवभट्टी, (५) विषमी, तथा (६) वरवणिनी नामक उत्तमोत्तम छै टीका टिप्पणियों से सुसज्जित शब्देन्दुशेखरका यह 'राज संस्करण' बहुत ही मनोहर और उपादेय हुआ है। इतनी टीकाओं से अलडकृत शेखर का आज तक कोई संस्करण नहीं था। छपाई और कागज अत्युत्तम कोटि के हैं। कपड़े की बहुत श्रेष्ठ सुनहरी जिल्द है। महीनोंसे जिसके लिए छात्र वृन्द एवं विद्वद्वृन्द उत्सुक थे-वह श्रेप्ठ ग्रन्थ रत्न-शब्देन्दुशेखर-शीघरता से बिकरहा है, आजही इसे मँगाइए, अन्यथा कदाचित्, दूसरे संस्करण की प्रतीक्षा करनी पड़े। मूल्य .... .... ८) कमीशन काट कर .. .... ६l।) निवेदक-भार्गवपुस्तकालय, गायघाट, काशी।

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संसार में सबसे सस्ती श्री 'राजस्थान-संस्कृत-कालेज-ग्रन्थमाला' की परीक्षोपयोगी पुस्तकें। १-तर्कसंग्रह [दीपिका-न्यायबोधिनो सहित ] श्रो गुरुप्रसाद शास्त्री कृत 'राजलक्ष्मी-परिमल' नामक विशाल-विस्तृत सरल टीका त्रर 'आमोद'नामक टिप्पणी सहित, म'्यम परीक्षो योगो कमीशन काटकर ।=)।। २-अभिज्ञान-शाकुन्तल,[परोक्षोपयोगीस शोधित-संस्करण]श्रीगुर प्रसाद शास्त्रीकृत अत्यन्त विस्तृतटीक "अभिन्व-राजलक्ष्मी"सहित, इसके द्वारा बिना गुरु के शकुन्तला पढ़ सकते हैं ३७५प.[कमीशनकाटकर] I=) ने-मूलरामायण (परीक्षोपयोगी) नागेशभट्ट की बनाई प्राचीन टीका 'तिलक' और श्रीगुरुपसादशास्त्रो कृत 'अभिनव राजलक्ष्मी' टोका और भाषा टीका सहित, ऐसी 'मूलरामायण'कहीं नहीं छनो है मून्य =)।। ४-रघुबंश (२से ५ सर्ग तक) १. पदचछेद, २. विभक्ति, ३. अन्वय, ४. विग्रह, ५. अर्थ, ६.भावार्थ, ७.वाच्यपरिवर्तन, द.कोश, ६अलङ्गार १०. टिप्पणी ११. प्रश्नपत्र, १२, भाषा टोका आदि से सुसज्जित श्रीगुरुप्साद शास्त्री कृत विशाल टीका-'अभिनव-राजलक्ष्मी'सहित, (संशोधित संस्करण) ३३२ प्रत्ट .... (कमीशन काट कर ) 11) ५-छन्दोमन्दाकिनी(श्रुतबोध) प्रथम परीक्षोपयोगी अति सरलऔर संच्षिप्त छन्दः संग्रह-देखकर आप बहुत प्रसन्न होंगे, (संशोधित-संस्करण) मू०*) ६-पञ्चतन्त्र 'अपरीक्षित कारक' श्रीगुरुप्रसादशास्त्री 'राजलक्ष्मी टोका सहित शुद्ध संस्करण, मूल्य=)।1 'अभिनव राजलक्षमी' टोका सहित अमरकोश [गुटका] 'अभिनव राजलक्ष्मी' नामक अररत्यन्त सरल टीका सहित अमरकोश का यह गुटका संस्करण अत्यन्त उपादेय हुआ है। छपाई तो इतनी उत्तम है कि देखते ही बनती है। ऐसा उत्तम संस्करण अरपरभीतक नहीं निकला था। मूल्य [कमीशनकाट कर ]. :- )u पता-भार्गव पुस्तकालय, गायघाट, काशी।