Books / Tripura Upanishad

1. Tripura Upanishad

Text

Verse १

तिस्त्रः पुरस्त्रिपथा विश्वचर्षणा अत्राकथा अक्षराः संनिविष्टाः ।अधिष्ठायैना अजरा पुराणी महत्तरा महिमा देवतानाम्॥

tistraḥ purastripathā viśvacarṣaṇā atrākathā akṣarāḥ saṃniviṣṭāḥ ।adhiṣṭhāyainā ajarā purāṇī mahattarā mahimā devatānām॥

तीन पुर, तीन पथ एवं इस (श्री चक्र) में सन्निविष्ट अकथादि अक्षर-इन सभी से अधिष्ठित यह (शक्ति) सबको समान दृष्टि से देखने वाली जो अजर, प्राचीन चैतन्य शक्ति है, वह अपनी महिमा से अत्यधिक श्रेष्ठ है ॥[यहाँ तीन पुर का तात्पर्य स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर से है। तीन पथ का तात्पर्य-ज्ञान, कर्म, उपासनाज्ञान, विज्ञान एवं सम्यक ज्ञान से है। अकवादि अक्षर से तात्पर्य 'अ' से लेकर 'क्ष' तक अक्षर समूह में है।] 1. Three cities are there, and pathways three for all. (On the dais of Fortune) are letters a, ka, tha and others. In them there dwells, never-aging, ancient, The exceeding grandeur of the gods.


Verse २

नवयोनीर्नवचक्राणि दधिरे नवैव योगा नव योगिन्यश्च ।नवानां चक्रा अधिनाथा स्योना नव भद्रा नव मुद्रा महीनाम्॥

navayonīrnavacakrāṇi dadhire navaiva yogā nava yoginyaśca ।navānāṃ cakrā adhināthā syonā nava bhadrā nava mudrā mahīnām॥

(वह चैतन्य शक्ति) नव योनि, नवचक्र, नवयोग, नवयोगिनी, नवचक्रों की आधार शक्तियों, सुखकारी नवभद्राओं तथा महिमाशालिनी नव मुद्राओं के रूप में प्रकाशित हो रही है ॥ [ इस मन्त्र के विशिष्ट शब्दों का परिचय इस प्रकार है-नवयोनि - श्री चक्र यत्र में बनाई जाने वाली नौ योनियाँ ( महात्रिपुर सुन्दरी आदि महाशक्तियाँ)। नवचक्र - सर्वानदमय सर्वसिद्धिप्रद, सर्वरक्षाकर, सर्वरोगहर, स्वार्थसाधक, सर्वसौभाग्यदायक, सर्वसंक्षोभण, सर्वाशापरिपूरक एवं त्रैलोक्य मोहन। नवचक्रो की आधार शक्तियाँ - महात्रिपुरसुन्दरी, त्रिपुराम्बा, त्रिपुरसिद्ध, त्रिपुरमालिनी, त्रिपुरा श्री, त्रिपुरवासिनी, त्रिपुरसुन्दरी, त्रिपुरेशी एवं त्रिपुरा। नवयोग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि और सहज योग। नवयोगिनियाँ -नवचक्रों में निवास करने वाली नौ शक्तियाँ। नवभद्रा - योनि, बीज, खेचरी, महांकुश, महोन्मादिनी, सर्ववशंकरी, सर्वाकर्षिणी , सर्वविद्राविणी एवं सर्वसंक्षोभिणी मुद्राएँ। नवभद्रा-कामेश्वरी आदि नवशक्तियाँ ही नवे भद्राएँ हैं।] Subject to Her whose sources are nine Shine forth the centres nine and Yogas nine, Nine deities and regents of the planets nine, Gentle healing deities nine and gestures nine.


Verse ३

एका स आसीत्प्रथमा सा नवासीदा सोनविंशादा सोनत्रिंशात्।चत्वारिंशादथ तिस्त्रः समिधा उशतीरिव मातरो माऽऽविशन्तु ॥

ekā sa āsītprathamā sā navāsīdā sonaviṃśādā sonatriṃśāt।catvāriṃśādatha tistraḥ samidhā uśatīriva mātaro mā''viśantu ॥

नभद्रा आदिरूप में, उन्नीस तत्व समूह रूप में, चालीस शक्तियों के रूप में तथा तीन समिधा के रूप में अपनी सन्तानों के लिए कल्याण कामना करने वाली माता के समान (ब्रह्मपद प्राप्ति की कामना वाले) मुझमें प्रवेश करें अर्थात् मेरे अन्त:करण में प्रविष्ट हों ॥[१९ तत्त्=५ ज्ञानेन्द्रियाँ + ५ कर्मेन्द्रियाँ +५ प्राण+ ४ अन्त:करण। २१ तत्व = १९ तत्तव+ ५ विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध,) + ५ उपप्राण। ४० शक्तियाँ-१४ अन्तः-बाह्य इन्द्रियाँ एवं इन्द्रियों के अधिपति + ३ कर्म (तूल, मूलअविद्याजन्य)+४ गुण (विश्क्षेप, आवरण, मुदिता, करुणा ) + विश्व, विश्वादि, तुर्य, प्राज्ञ आदि भेद से युक्त तीन समिधा=क्रिया, ज्ञान, इच्छात्मक तथा ज्ञान, विज्ञान तथा सम्यक ज्ञान।] The One she was, the Foremost; She was the nine, the nineteen and the twenty-nine; The forty, she; may the radiant energies three, As fond mother's love, encircle me.


Verse ४

ऊर्ध्वज्वलज्ज्वलनं ज्योतिरग्रे तमो वै तिरश्चीनमजरं तद्रजोऽभूत्।आनन्दनं मोदनं ज्योतिरिन्दोरेता उ वै मण्डला मण्डयन्ति ॥

ūrdhvajvalajjvalanaṃ jyotiragre tamo vai tiraścīnamajaraṃ tadrajo'bhūt।ānandanaṃ modanaṃ jyotirindoretā u vai maṇḍalā maṇḍayanti ॥

ऊर्ध्व (ऊपर) की ओर प्रज्वलित होने वाली और प्रकाशित होने वाली ज्योति सर्वप्रथम अनुभव में आती है। इसके विपरीत तमोगुण तिरश्चीन (तिरछी गति वाला) और अजर है, उससे रजोगुण उत्पन्न हुआ। यह ज्योति आनन्द और प्रसन्नता देने वाली है तथा इन्दु के (चन्द्रवत् शीतल) गुणों से विभूषित करती है ॥ In the beginning was upblazing Light; Gloom and Motion stretched athwart the Ageless; The Moonlight gladness and delights; these spheres Adorn indeed (the knowers of Brahman).


Verse ५

यास्तिस्त्रो रेखाः सदनानि भूस्त्रीस्त्रिविष्टपास्त्रिगुणास्त्रिप्रकाराः। एतत्त्रयं पूरकं पूरकाणां मन्त्री प्रथते मदनो मदन्या ॥

yāstistro rekhāḥ sadanāni bhūstrīstriviṣṭapāstriguṇāstriprakārāḥ। etattrayaṃ pūrakaṃ pūrakāṇāṃ mantrī prathate madano madanyā ॥

जो तीन रेखाएँ हैं, चार सदन हैं, तीन भू (स्थल) हैं, तीन विष्टप, तीन गुण और तीन-तीन प्रकार (भेद) हैं। ये सभी त्रिक पूर्णता प्रदान करने के साधन स्वरूप हैं। मन्त्र में ( श्री चक्र में) कामना (पूर्ण करने वाली) शक्ति से मदन (कामना के अधिष्ठाता देवता) जय शील हो ॥[तीन रेखा= क्रिया, ज्ञान और इच्छाशक्ति, चार सदन = जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय अथवा नेत्र, कण्ठ, हृदय और सहस्त्रार चक्र; तीन भूः + भूः, भुवः एवं स्वः; तीन विष्टप एवं तीन गुण= तप, रज एवं सतोगुण, तीन-तीन प्रकार-तम-सत तम, रज+म, तम+तम; रज-सत-रज, रज+रज, तम+रज; सत-सत+सत, सत+ रज, सत तम्।] 5. Of the three lines, abodes, three worlds and three spheres With triple constituents (She is the prop). This group of three among the sheaths is prime. In diagram drawn with mystic words The God of Love with Fortune's Goddess dwells.


Verse ६

मदन्तिका मानिनी मंगला च सुभगा च सा सुन्दरी सिद्धिमत्ता। लज्जा पतिस्तुष्टिष्टिा च पुष्टा लक्ष्मीरुमा ललिता लालपन्ती ॥

madantikā māninī maṃgalā ca subhagā ca sā sundarī siddhimattā। lajjā patistuṣṭiṣṭiā ca puṣṭā lakṣmīrumā lalitā lālapantī ॥

(उनके परिवार के आवरण देवता की संख्या पन्द्रह है, जो क्रमशः) मदन्तिका, मानिनी, मंगला, सुभगा, सुन्दरी, सिद्धिमत्ता, लज्जा, मति, तुष्टि, इष्टा, पुष्टा, लक्ष्मी, उमा, ललिता एवं लालपन्ती हैं ।। 6. The Exhilarating and the Proud, The Auspicious, the Lucky and the Lovely, The Perfected, the shy, the Witty One, The Gratified, the chosen and the Full, The Wealthy, the Forbidden, the Graceful, The Eloquent - (These on Consciousness do wait).


Verse ७

इमां विज्ञाय सुधया मदन्ती परिसृता तर्पयन्तः स्वपीठम्।नाकस्य पृष्ठे महतो वसन्ति परं धाम त्रैपुरं चाविशन्ति ।।

imāṃ vijñāya sudhayā madantī parisṛtā tarpayantaḥ svapīṭham।nākasya pṛṣṭhe mahato vasanti paraṃ dhāma traipuraṃ cāviśanti ।।

(साधक) नको जानकर (इनके) अमृत गुणों से प्रसन्नता का अनुभव करते हुए, स्वपीठ (श्री चक्रपीठ) को (दुध आदि से) तृप्त करते हुए महान् स्वर्गलोक में निवास करते हैं और चैपुर परमधाम में पहुँच कर (अपने को) कृतकृत्य अनुभव करते हैं ॥ 7. Attended thus the Power of Consciousness Is drunk with the drought of Immortality; Knowing Her and worshiping Her throne (Her devotees) on heaven's great vault do dwell And enter the supreme Triple City.


Verse ८

कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गहा सकला मायया च पुरूच्येषा विश्वमातऽऽदिविद्या ॥

kāmo yoniḥ kāmakalā vajrapāṇirguhā hasā mātariśvābhramindraḥ । punargahā sakalā māyayā ca purūcyeṣā viśvamāta''dividyā ॥

(आदिमूल विद्या का स्वरूप इस प्रकार है- यह) काम, योनि, काम कला, वज्रपाणि, गुहा, हसा, मातरिश्वा, अभ्र, इन्द्र, पुनः गुहा, सकला और माया आदि से यह विशिष्टरूपा यह विद्या (प्रवर्धान हुई) है ॥[यहां आदि विद्या के संकेताक्षर प्रयुक्त हुए हैं। जो इस प्रकार हैं- काम = क, योनि = ए, कामकला = ई, वज्रापाणि =ल, गुहा=ह्रीं, हसा=ह, स, मातरिश्वा = क, अभ्र=ह, इन्द्र = ल, सकला = स, क, ल, माया ह्रीं । ये सभी वर्ग प्रणवात्मिका आदि विद्या के प्रतीक हैं।] 8. Desire, the womb, the Digit of Desire, The Wielder of the Thunderbolt, the Cave, Ha sa, the Wind, the Cloud, the King of Heaven, Yet again the Cave, sa ka la and maya - Such is the primeval Wisdom, embracing all, Mother of the vast universe.


Verse ९

षष्ठं सप्तममथ वह्निसारथिमस्या मृलत्रिकमादेशयन्तः। कथ्यं कविं कल्पर्क काममीशं तुष्टुवांसो अमृतत्वं भजन्ते ॥

ṣaṣṭhaṃ saptamamatha vahnisārathimasyā mṛlatrikamādeśayantaḥ। kathyaṃ kaviṃ kalparka kāmamīśaṃ tuṣṭuvāṃso amṛtatvaṃ bhajante ॥

(आदि विद्या के) छठे वर्ण (ह-शिवबीज), सातवें वर्ण (स-शक्तिबीज) और वह्रि सारथि (क-कामेश -बीज) इसके मूलत्रिक (ह, स, क) का जप करते हुए कथ्य रूप, कवि (क्रान्तदर्शी भूत, भविष्यत् और वर्तमान को जानने वाला-त्रिकालज्ञ) सदृश कामेश्वर की स्तुति करते हुए अमृतत्व को प्राप्त करते हैं॥ 9. Uttering in secret Her three basic letters - The sixth, the seventh and the eighth - Lauding the Lord, the theme of the Upanishads, The Seer, the Fashioner, the Free to Will, (Seekers) achieve the state of Immortality.


Verse १०

पुरं हन्त्रीमुखं विश्वमातू रवे रेखा स्वरमध्यं तदेषा। बृहत्तिथिर्दश पञ्चा च नित्या सषोडशिकं पुरमध्यं बिभर्ति ॥

puraṃ hantrīmukhaṃ viśvamātū rave rekhā svaramadhyaṃ tadeṣā। bṛhattithirdaśa pañcā ca nityā saṣoḍaśikaṃ puramadhyaṃ bibharti ॥

(वह देवी) पुर, हन्त्रीमुख (ह-स-क), विश्वमातारूप, रवि-रेखा (आदित्य मंडल रूप), स्वर मध्य ('ई' 'ओ' रूप) आदि रूपों में विद्यमान बृहत्तिथि (निमेष से लेकर कल्पान्त तक) तथा पंचदशादि (पन्द्रह तिथियाँ, वार नक्षत्रादि) नित्य (देवता भाव को प्राप्त) सषोडशिक (सोलहवीं तिथि पूर्णिमा सहित) पुर मध्य (स्व अविद्या पर आधारित) रूपों को धारण करती है ॥ 10. The Mother of the Universe sustains Her abode - the Destroyer's Face, the Circle of the Sun, The core of sounds, the span of time, The Eternal, half the lunar month; With sixteen (She sustains the core of their abode).


Verse ११

यद्वा मण्डलाद्वा स्तनबिम्बमेकं मुखं चाधस्त्रीणि गुहासदनानि।कामीकलां कामरूपां चिकित्वा नरो जायते कामरूपश्च कामः ।।

yadvā maṇḍalādvā stanabimbamekaṃ mukhaṃ cādhastrīṇi guhāsadanāni।kāmīkalāṃ kāmarūpāṃ cikitvā naro jāyate kāmarūpaśca kāmaḥ ।।

(रवि, चन्द्र आदि के) मण्डल से आविर्भूत सर्वांग सुन्दरी जिसका एक स्तनबिम्ब एवं मुख नीचे की ओर है, के देहत्रय (स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर) रूपी गुहा में अवस्थित परमेश्वर की कला-'कामकला' का ध्यान करके योगी अपनी समस्त कामनाओं को पूर्ण करके स्वेच्छानुसार काममय' हो जाता है, (पर काम्यफल) जन्म आदि का कारण होता है, इसलिए (उच्च वर्ण वाले मुमुक्षु को) सकाम उपासना नहीं करनी चाहिए ॥ Or, worshiping the digit of desire in its manifold forms, Enthroned in the three cavernous homes and in symbols Of the rounded breasts and face set in the spheres, The man of desires gains that which he wants.


Verse १२

परिसृतं झषमाजं पलं च भक्तानि योनी: सुपरिष्कृताश्च। निवेदयन्देवतायै महत्त्यै स्वात्मीकृते सुकृते सिद्धिमेति ॥

parisṛtaṃ jhaṣamājaṃ palaṃ ca bhaktāni yonī: supariṣkṛtāśca। nivedayandevatāyai mahattyai svātmīkṛte sukṛte siddhimeti ॥

(इसी प्रकार हीन वर्ण वाले) विधिवत् तैयार किये गये अपने भोज्य पदार्थ (मांस-मदिरा आदि) को (आत्मीय भोग बुद्धि का परित्याग करके) सर्वप्रथम महादेवी को समर्पित करके प्रसाद रूप में ग्रहण कर पुण्य कर्मों के द्वारा (श्रेष्ठ कर्मो की) सिद्धि प्राप्त करते हैं ॥ 12. Dressed fish, goat's flesh, Cooked rice, pleasure of sex, Who offers to the Goddess great, Merit and success for himself achieves.


Verse १३

सृण्येव सितया विश्वचर्षणिः पाशेनैव प्रतिबध्नात्यभीकान्। इषुभिः पञ्चभिर्धनुषा च विध्यत्यादिशक्तिररुणा विश्वजन्या ।।

sṛṇyeva sitayā viśvacarṣaṇiḥ pāśenaiva pratibadhnātyabhīkān। iṣubhiḥ pañcabhirdhanuṣā ca vidhyatyādiśaktiraruṇā viśvajanyā ।।

(जो मनुष्य इस) काम्य मार्ग में निरत रहते हैं, उन कामजनों को सरस्वती, लक्ष्मी, आदिशक्ति गौरी-ब्रह्म (विद्या) रूप धारण करके भलीप्रकार बाँधकर संसार के महावर्त (भँवर) में डाल देती हैं तथा पंच बाण (पंचेन्द्रियों) और धनुष से विद्ध कर देती हैं (उनका उद्धार कभी नहीं करती) ॥ 3. With (Sarasvati) fair and (Lakshmi), World's Mother, (Gauri), roseate, primeval Power, withdrawer of the world, Binds with noose creatures who grasp, and tread Attachment's path; and swiftly smites with bow and arrows five.


Verse १४

भगः शक्तिर्भगवान्काम व इंश उभा दाताराविह् सौभगानाम्। समप्रधानौ समसत्त्वौ समोजौ तयोः शक्तिरजरा विश्वयोनिः ।।

bhagaḥ śaktirbhagavānkāma va iṃśa ubhā dātārāvih saubhagānām। samapradhānau samasattvau samojau tayoḥ śaktirajarā viśvayoniḥ ।।

छ; ऐश्वर्यों ( समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश,श्री, ज्ञान और वैराग्य) से सम्पन्न चित् शक्ति, भगवान् काम और ईश (कामेश्वर )-दोनों (चित् शक्ति सामान्यात्मा की दृष्टि से) सम प्रधान, समान सत्त्व से युक्त, समान ओज से युक्त(दयार्द्र होकर, निष्काम) उपासक को ब्रह्मपद प्रदान कर देते हैं। उन दोनों (“शिव-शक्ति' या 'काम- ईश') के मध्य (तीनों शरीरों से विलक्षण) अजरा (जरारहित) यह विश्वमाता (' श्री शक्ति') स्थित रहती है।। 14-15. The Power of Consciousness and desire's Lord, Lord of auspicious powers, coequals both, Of equal prowess, in energy equal, Grant gifts to the fortunate here. Of the two, the un-ageing Power, the world's womb, With offering of knowledge pleased, Removes the aspirant's twofold sheath. With mind averted from illusion's sphere He becomes Creator, Protector, Withdrawer of the world; Nay, one with Cosmic Being.


Verse १५

परिसृता हविषा भावितेन प्रसंकोचे गलिते वैमनस्कः ।शर्वः सर्वस्य जगतो विधाता धर्ता हर्ता विश्वरूपत्वमेति ॥

parisṛtā haviṣā bhāvitena prasaṃkoce galite vaimanaskaḥ ।śarvaḥ sarvasya jagato vidhātā dhartā hartā viśvarūpatvameti ॥

(उपासक की निष्काम) भावना से भावित (ज्ञान, विज्ञान और सम्यक् ज्ञान रूपी) हवि द्वारा भली प्रकार संतृप्त हुई (आवरण और विक्षेप को), गलाकर नष्ट कर देती है। इस प्रकार उपासक संसार से) अमनस्क होकर सम्पूर्ण जगत् के विधाता, पालक एवं संहारक (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) बनकर विश्वरूपता को प्राप्त कर लेता है।। 14-15. The Power of Consciousness and desire's Lord, Lord of auspicious powers, coequals both, Of equal prowess, in energy equal, Grant gifts to the fortunate here. Of the two, the un-ageing Power, the world's womb, With offering of knowledge pleased, Removes the aspirant's twofold sheath. With mind averted from illusion's sphere He becomes Creator, Protector, Withdrawer of the world; Nay, one with Cosmic Being.


Verse १६

इयं महोपनिषत्रैपुर्या यामक्षरं परमो गीर्भिरीट्टे।एषर्ग्यजुः परमेतच्च सामायमथर्वेयमन्या चविद्या।।

iyaṃ mahopaniṣatraipuryā yāmakṣaraṃ paramo gīrbhirīṭṭe।eṣargyajuḥ parametacca sāmāyamatharveyamanyā cavidyā।।

यह ऋग,यजु, साम, अथर्व तथा अन्य विद्याएँ (पुराण,न्याय,मीमांसा आदि १४ विद्याएँ),जिसकी अक्षय (ज्ञानस्वरूप)परम( सर्वोत्कृष्ट )वाणीरूप स्तोत्रों से स्तुतियाँ करती हैं। यही त्रिपुरा नाम की महोपनिषद् है ॥ 16. This is Tripura's great Upanishad, Imperishable, which, in glorious words The Rig, Yajus, Saman and Atharvan And other forms of knowledge laud.


Verse १७

ॐ' ह्रीं ॐ ह्रीमित्युपनिषत् ॥

oṃ' hrīṃ oṃ hrīmityupaniṣat ॥

‘ॐ ह्रीं ' - यही चित् और शक्ति तत्त्व है। यही चैतन्य शक्ति तत्व है॥ Om, Hrim, Om, Hrim - thus ends the secret doctrine.