1. Upanishad Mandakini Devadatt Sastri Hindi
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उपनिषद्-मुण्डाकिनी
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देवदत्त शास्त्री
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किताब महल [होलसेल डिविजन] प्राइवेट लिमिटेड
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रजिस्टर्ड आफिस : ४६ - ए जीरो रोड, इलाहाबाद
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कलकत्ता * बम्बई * दिल्ली * जयपुर * हैदराबाद * पटना
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प्रथम आवृत्ति
१९९३ शकान्द
मूल्य
पाँच रुपया मात्र
प्रकाशक :
किताब महल
५६ ए-जीरो रोड
इलाहाबाद
मुद्रक
हरप्रसाद वाजपेयी
श्री कृष्ण प्रिटिंग प्रेस
२७, हिवेट रोड,
इलाहाबाद
ग्रावररण मुद्रक
ईगल ग्राफसेट प्रिन्टर्स
१५, थानंहिल रोड,
इलाहाबाद
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दो शब्द
ग्राठ वर्ष पूर्व मैंने उपनिषद् साहित्य का ग्रनुशीलन लिखा था, जिसे किताब महल ने 'उपनिषद्-चिन्तन' के नाम से प्रकाशित किया था । ग्रनुशीलन के साथ ही प्रमुख ग्रौर प्रामाणिक माने जाने वाले ग्यारह उपनिषदों का हिन्दी ग्रनुवाद भी उसी समय प्रस्तुत किया गया था, किन्तु उस ग्रनुवाद के अपने का ग्रवसर ग्रब ग्राया है ।
उपनिषद् साहित्य के संबंध में मुझे कुछ विशेष नहीं कहना है । यह साहित्य ग्रध्ययन, ग्रनुशीलन की वस्तु है, ग्रपनी मौलिक विशेषता के कारण यह विश्व साहित्य में इसका सर्वोपरि स्थान है । यह साहित्य जितना बौद्धिक चिन्तनसम्पन्न एवं गम्भीर है, उतना ही विचार-भिन्न-ताम्रों से भी सम्पृक्त है । दिव्य भावों ग्रौर विचारों से सम्पन्न इस ग्राध्यात्मिक दिव्य साहित्य में ग्रासुरी भावों ग्रौर विचारों का भी समावेश है । ऐसे भावों ग्रौर विचारों को छान्दयोग्य उपनिषद् ने 'ग्रसुर उपनिषद्' ही संज्ञा दी है ।
उपनिषद् साहित्य जीवन-साहित्य है । जीवन को पवित्र श्रौर विचारों को उन्नत बनाने तथा मनोबल एवं ग्रात्मबल बढ़ाने का यह सहज साधन है इसमें ग्राध्यात्म के साथ जीवनोपयोगी प्रक्रियाएं एवं सृष्टि तत्व तथा ज्ञान-विज्ञान का सुन्दर विश्रेषण है । ग्राशा है यह हिन्दी ग्रनुवाद सर्व साधारण के लिए उपनिषद्-रमं समभने में सहायक सिद्ध होगा ।
--देवदत्त शास्त्री
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उपनिषद्-क्रम
१. ईशावास्य उपनिषद् १
२. केनोपनिषद् २४
३. कठोपनिषद् ४७
४. प्रश्नोपनिषद् ६३
५. मुण्डकोपनिषद् ७६
६. माण्डूक्योपनिषद् ९३
७. ऐतरेयोपनिषद् १०७
८. तैत्तिरीयोपनिषद् १२०
९. श्वेताश्वतरोपनिषद् १४३
१०. छान्दोग्योपनिषद् १६५
११. बृहदारण्यकोपनिषद् २५८
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ईशावास्य-उपनिषद्
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शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन-संहिता में चालीस अध्याय हैं । ग्रन्थिम चालीसवें 'ईशावास्यम्' आदि मंत्रों द्वारा बहुत ही उत्कृष्ट ब्रह्म निरूपण किया गया है । यही ग्रन्थिम अध्याय 'ईशावास्योपनिषद्' कहलाता है। 'ईशावास्यम्' से प्रारम्भ होने के कारण इसका यह नाम पड़ा । इसमें ब्रह्म का निरुपण इतनी मार्मिकता से किया गया है, कि इस उपनिषद् को ग्रन्य 'उपनिषदों में प्रथम स्थान दिया गया है।
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शान्ति पाठ
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ॐ । वह पूर्ण है, यह पूर्ण है । पूर्ण से पूर्ण निष्पन्न होता है । पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लें तो भी पूर्ण ही शेष रहता है।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । (तीनों प्रकार के ताप शान्त हों)
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हरिः ॐ । संसार में जो कुछ और जितना जीवन है, वह सब ईश्वर से भरा हुआ है। ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें ईश्वर का निवास नहीं है । समस्त चर-अचर जगत् में केवल ईश्वर की ही सत्ता समायी हुई है । सब का स्वामी एक परमात्मा ही है—ऐसा समभ कर तुम्हें अपना सब-कुछ उसी परमात्मा को समर्पण करना चाहिए , और जो कुछ मिले उसे भगवान् का दिया हुआ प्रसाद
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२ : ईशावास्य-उपनिषद्
समझकर 'ब्रह्म' करना चाहिए । अर्थात् हर समय अपने हृदय में यह भावना रखनी चाहिए कि मेरा अपना कुछ नहीं है, जो कुछ भी है वह सब भगवान् का है । किसी के भी धन के प्रति इच्छा मत रखो ।
ऐसी भावना रखने वाला व्यक्ति किसी भी भोग्य वस्तु पर आसक्त नहीं होगा । किसी चीज को अपनी नहीं मानेगा—सभी चीजें उसकी ही रहेंगी, सब कुछ उसे मिलता रहेगा । जितना उसे मिलेगा उसी से वह अपने को सन्तुष्ट और सम्पन्न समझेगा । पराये धन, वैभव को देखकर ईर्ष्या नहीं करेगा और न किसी के धन को लेने की कभी इच्छा ही करेगा ।
जो आदमी आत्मसुख और निष्कामपन की जिदंगी بسر करने की कामना रखता है, वही दूसरों के धन की इच्छा क़िया करता है । इसीलिए तुम्हें चाहिए कि संसार में रहते हुए कर्म करते-करते ही सौ वर्ष तक जीने की कामना रखो । निष्क्रिय बनकर बिना कर्म किये जीवन की इच्छा रखना जीवन के साथ विश्वासघात करना है । तात्पर्य यह कि भगवान् ने हमें जैसा जीवन दिया है— निरन्तर कर्म करते हुए जीना चाहिए । तुम्हारे जैसे शरीरधारी के लिए यही मार्ग है । इसके अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है । यह निश्चय समझ लो कि व्यक्ति से कर्म नहीं लिपटता बल्कि कर्म-फल प्राप्त करने की वासना लिपटती है । कर्म-फल की इच्छा करने पर जीवन भारस्वरूप बन जाता है; समस्त पापों की जड़ भी यही है । अज्ञानी लोग फल वासना को ग्रहण किया करते हैं ।
जो लोग भगवान् को भूलकर भोग-विलास में फँसे रहते हैं, कर्तव्य और कर्म को छोड़कर आलस्य की जिंदगी बिताते हैं; वे इसी जीवन में घोर नरक में वास करते हैं । तात्पर्य यह कि आत्म-
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ईशावास्य-उपनिषद् : ३
ज्ञान से शत्रुता रखने वाले व्यक्ति आत्मघाती होते हैं। मरने के बाद ये घोर अज्ञानकार से चिर्री हुई आसुरी योनि में जन्म लिया करते हैं।
तुम्हें यह सम्भना चाहिए कि ईश्वर की शक्ति और सत्ता असीम है। उसके बारे में कोई तर्क नहीं किया जा सकता है। तुम्हारे तर्कों से वह सीमित हो जाएगा। यही एक आत्म तत्व है जो अचल और अविन्चल होकर भी मन से भी अधिक वेगवान है। देवता उसे पकड़ नहीं सकते बल्कि देवों को ही उसने पकड़ रखा है। वह खड़ा रहकर दूसरे दौड़ने वालों को पछाड़ देता है। प्रकृति माता की गोद में खेलने वाला प्राण उसी की सत्ता से संचालित होता है।
वह हलचल करता है, वह हलचल नहीं करता। वह दूर है, वह पास है। वह इन सब के भीतर है, वह इन सब के बाहर है। तात्पर्य यह कि चर और अचर रूप से परमात्मा की व्याप्ति सर्वत्र है। दूर और पास का मतलब काल और अवकाश है। ये दोनों असीम माने जाते हैं, लेकिन फिर भी ये दोनों परमात्मा की व्याप्ति—व्यापकता के भीतर समाये हुए हैं।
जिस प्रकार अपनी सन्तान की रग-रग पर माता का स्नेह समाया रहता है, उसी प्रकार जो व्यक्ति आत्मा ही में सब जीव और सभी जीवों में आत्मा का निवास समभता है, वह फिर किसी से ऊँच-नीच नहीं है। अर्थात वह व्यक्ति किसी के प्रति घृणा—द्वेष के भाव नहीं रखता। क्योंकि जब तुम्हारे हृदय में यह भावना दृढ़ हो जाएगी कि भीतर-बाहर, पास-दूर, चर-अचर रूप से सर्वत्र भगवान ही भगवान भरे हुए हैं, तब तुम्हारे मन में अपने—पराये भेद का अवकाश ही नहीं रह जाएगा।
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४ : ईशावास्य-उपनिषद्
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जिसकी दृष्टि सभी जीवों में एक ही आत्मा का दर्शन करेगी,
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जो निरन्तर एकत्व की भावना रखेगा—ऐसे विज्ञानी पुरुष को
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मोह कहाँ, शोक कहाँ ?
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आत्म तत्व को समभने वाला ऐसा व्यक्ति उस आत्म तत्व
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को जिसका कोई रूप नहीं है, इसलिए इन्द्रियों से उत्पन्न होने
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वाले दोषों और गुणों से सर्वथा शुद्ध, पापरहित—चारों
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और से घेर कर बैठ गया। वह कवि (क्रान्तदर्शी ) व्यापक,
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मननशील और स्वतन्त्र हो गया। उसने अनन्त काल तक टिकने
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वाले सभी स्थों को भली भाँति समर्पण कर चुका।
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निवृत्त और प्रवृत्त ये दोनों 'अविद्या और विद्या के अंग हैं।
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ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। श्रथात् विद्यारहित अविद्या और
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अविद्यारहित विद्या अनर्थकारी बन जाती है, इसलिए आत्म-
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तत्व को जानने वाला व्यक्ति इन दोनों को एक साथ अपनाता है।
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केवल एक का सहारा लेना अनर्थकार में इूबना है। जो व्यक्ति
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अविद्या में डूब गए वे घोर अन्धकार में इूब गए और जो विद्या
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में डूब गए वे उनसे भी अधिक घोर अन्धकार में डूब गए।
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इसलिए तुम्हारे लिए तो उभय दोषरहित और उभय गुणसम्पन्न
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आत्मनिष्ठा ही अभीष्ट होनी चाहिए।
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आत्म तत्व को विद्या से मिल्ल ही कहा गया है, और अविद्या
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से भी मिल्ल कहा गया है। जिन धीर पुरुषों से हमने ऐसा सुना
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है, उन्होंने ही उसका दर्शन कराया है। तात्पर्य यह कि आत्म तत्व
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विद्या और अविद्या दोनों से परे है। क्योंकि जानने और न
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जानने इन दोनों से आत्मज्ञान निराला है।
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विद्या और अविद्या इन दोनों के सहारे जो आत्म तत्व को
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जानते हैं, वे उस आत्मतत्व के द्वारा अविद्या से मृत्यु को पार कर
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विद्या से अमृत को प्राप्त करते हैं। तात्पर्य यह कि आत्मज्ञान की
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श्रोत्र मुकाव होने से मनुष्य श्रवविद्या के सहारे ज्ञानाल्प विषयों से बुद्धि को हटाकर सहज ही मृत्यु-सागर को पार कर जाता है और फिर विज्ञा के सहारे वह आत्मचिन्तन कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। इसलिए आत्मज्ञान ही सर्वोच्च है।
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विकास और निरोध इन दोनों के साथ जो आत्म तत्व को समभते हैं, वे उसी आत्म तत्व के सहारे निरोध से मृत्यु को पार करके विकास से अमृत को प्राप्त करते हैं। तात्पर्य यह कि नये दोषों को न लिपटने देना तथा पुराने दोषों को निकाल कर बाहर कर देना ही मृत्यु को पार करने की कुंजी है तथा विकास से व्याप्त विश्व-प्रेम का अभ्यास करने से अमृत (मोक्ष) प्राप्त होता है।
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वित्तमोह के सुनहले ठक्कन से सत्य का मुँह ढका हुया है। हे परमात्मा मुफ्त सत्य-धर्म के उपासक को दर्शन कराने के लिए उसे तू खोल दे। सारांश यह कि हे ईश्वर मुझे सत्य रूप आत्मा का दर्शन करा, प्रार्थना करने के लिए सत्य स्वरूप ईश्वर और आचरण करने के लिए सत्य रूप धर्म का मैं साक्षात्कार करूँ।
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हे परमात्मा, इस संसार का पोषक तू ही है और इसका एक मात्र निरीक्षक भी तू ही है। तू नियंत्रक भी करता है और प्रवर्तन भी करता है। तू सभी को अपनी सन्तान समभ कर सब का पालन करता है। पोषण करने वाली अपनी रश्मियों के समूह को खोलकर और उन्हें एकत्र करके मुझे दिखा। तेरा तेजोमय, कल्याणकारी रूप मैं देख रहा हूँ। जो परात्पर पुरुष कहलाता है, वह मैं हूँ।
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हे वायुरूप ईश्वर, तुम अन्तर्यामी हो मेरे प्राणों को चलाने वाले हो, मैं चाहता हूँ, कि मेरे प्राण उस चैतन्यमय अमृत तत्व में लीन हो जायँ। मेरे भौतिक शरीर की राख बन जाये। हे दृढ़-संकल्पमय जीव, भगवान का स्मरण कर, उसका किया हुया
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६ : ईशावास्य-उपनिषद्
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स्मरथ्य कर, हे मेरे जीव, स्मरथ्य कर, अपने संकल्पों को छोड़कर उसका क्या हुद्या स्मरथ्य कर ।
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तात्पर्थ्य यह कि मरने के बाद मृत शरीर को जलाकर राख कर दिया जाए, जिससे जीवात्मा को उससे मोह न रह जाए और मरने के बाद प्राप्त आदि सूक्ष्म वस्तु देवताओं में समा जायँ । ईश्वर के चिन्तन से मन के सारे संकल्प नष्ट हो जाएँ और जीवात्मा परमात्मा से मिल जाए ।
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हे परमप्रकाशक, प्रकाशमान् परमात्मा, तू ही श्रग्नि रूप से हमारे शरीर में वास कर चेतना प्रदान करता है, इसलिए हे प्रभो, जब तक हममें चेतना है हमें पशासत् पथ पर न रख । हमें टेढ़े-मेढ़े रास्ते से न ले जा । विरव में गूँथे हुए सभी तत्त्वों को तू जानता है, इसलिए हमें सरल मार्ग से परम श्रानन्द की श्रोर ले चल । टेढ़े रास्ते पर जाने से लगने वाले पास से तू हमें दूर हटा दे, प्रभो हमारी बारंबार यही विनम्र प्रार्थना है ।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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केनोपनिषद्
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सामवेद की तलवकार शाखा में ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् हैं। तलवकार ब्राह्मण के नवें अध्याय को ‘तलवकारोपनिषद्’ कहा जाता है। ‘ब्राह्मणोपनिषद्’ और ‘केनोपनिषद्’ भी इसके दो नाम और हैं। इस उपनिषद का प्रारम्भ ‘केन’ शब्द से होने के कारण इसे ‘केनोपनिषद्’ कहा जाने लगा। इनमें चार खण्ड हैं। प्रथम दो खण्डों में ब्रह्म का निरूपण है। शेष तीसरे और चौथे खण्डों में ब्रह्म का महत्व है।
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शान्ति पाठ
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हे ईश्वर मेरे समस्त अंग, वाणी, नेत्र, कान आदि सभी इन्द्रियाँ, सभी प्राण शारीरिक और मानसिक शक्ति तथा ओज-सब पुष्ट और वृद्धि को प्राप्त हों। उपनिषदों में बताए गए सर्वरूप ब्रह्म के स्वरूप को मैं कभी भी अस्वीकार न करूँ और वह ब्रह्म भी मेरा परित्याग न करे। उनके साथ मेरा अटूट संबंध बना रहे। उपनिषदों में बताए गए जितने धर्म हैं, वे सब उस परमात्मा में लगे हुए मुख में प्रकाशित होते रहें मुख में निरन्तर बने रहें। हे ओंकार रूप परमात्मा तीनों प्रकार के तापों की शान्ति हो। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
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: केनोपनिषद्
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खण्ड ९
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शिष्य गुरु से पूछता है—किसकी सत्ता की स्फूर्ति पाकर और किससे संचालित होकर यह मन्तःकरषा विषयों की ओर झुकता है—उन तक पहुँचता है । किससे नियुक्त होकर सर्वश्रेष्ठ प्राण चलता है । किसके द्वारा यह वागी क्रियाशील बनती है, लोग बोलते हैं । और वह कौन-सा प्रसिद्ध देव है, जो आँखों और कानों को अपने-अपने विषयों के अनुभव में प्रवृत्त करता है ।
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गुरु कहते हैं—मन, प्राण आदि सभी इन्द्रियों का—समस्त संसार का जो परम कारण है जिससे ये सब उत्पन्न हुए हैं, जिसकी शक्ति पाकर ये सब अपनी-अपनी काम करते हैं । जो इन सब का ज्ञाता है वही परब्रह्म परमात्मा ही इन सब का प्रेरक और संचालक है । उसे जानकर ज्ञानी लोग जीवनमुक्त होकर अमर-पद प्राप्त करते हैं ।
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ध्यानपूर्वक सुनो, उस परब्रह्म तक न तो नेत्र आदि ज्ञान इन्द्रियाँ पहुँच सकती हैं और न वागी आदि कर्मेन्द्रियाँ और न मन ही, इसलिए मन और इन्द्रियों द्वारा कोई कैसे बता सकता है, कि ‘ब्रह्म ऐसा है’ । ब्रह्मज्ञान की ऐसी उपदेश-पद्धति न तो हमने किसी से सुनकर समझी है और न हम स्वयं अपनी बुद्धि से ही समझ पाते हैं । हमने तो जिन महापुरुषों से इस गूढ़ तत्त्व को सुना है, जिनसे इस तत्त्व ज्ञान का उपदेश प्राप्त किया है, उन्होंने तो यही बताया है, कि परमात्मा जड़ और चेतन दोनों से भिन्न है । ब्रह्म जाने हुए, जानकारी में न आने वाले पदार्थों से भिन्न है और मन, इन्द्रियों द्वारा न जाने गए या जानकारी में न आने वाले से भी ऊपर है । ऐसी स्थिति में उस ब्रह्म तत्त्व को वाणी के द्वारा व्यक्त करना बिल्कुल असम्भव है ।
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केनोपनिषद् : ६
वागी के द्वारा जो झुठ॑ ब्रह्म के सम्बन्ध में कहा जाता है और तदनुसार जो उपासना की जाती है वह ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप नहीं है। क्योंकि ब्रह्मतत्त्व वागी से बिल्कुल परे है। उसके बारे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है, कि जिसकी शक्ति के किसी एक अंश से वागी को बोलने की शक्ति मिली है जो वागी का ज्ञाता, प्रेरक, प्रवर्तक है वही ब्रह्म है।
जिसे कोई ग्रन्थ:करा के द्वारा नहीं समप्क सकता। बल्कि जिससे मन मनुष्य का जाना हुया्रा हो जाता है, उसी को ज्ञानी लोग ब्रह्म कहते हैं। मन और बुद्धि के द्वारा जाने-जाने वाले जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं—वह ब्रह्म नहीं है।
जिसे कोई इन आँखों ने नहीं देख पाता, बल्कि जिससे नेत्रों से ही अपने विषयों को देखने की शक्ति मिलती है, उसे ही तुम ब्रह्म समप्को। नेत्रों द्वारा दिखाई पड़ने वाले जिस दृश्य वर्ग की लोग उपासना करते हैं वह ब्रह्म नहीं है।
जिसे कानों द्वारा कोई सुन नहीं सक्ता, बल्कि जिससे कानों को ही श्रवण-शक्ति मिली है। उसे ही तू ब्रह्म समप्क॑। श्रोत्र इन्द्रियों के द्वारा जानने में श्राने वाले जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं—वह ब्रह्म नहीं है।
जो प्राण के द्वारा चेष्टायुक्त न होकर स्वयं प्राण को चेष्टा प्रदान करता है, उसे ही तू ब्रह्म समप्को प्राणों की शक्ति से चेष्टायुक्त दिखाई पड़ने वाले जिन तत्त्वों की लोग उपासना करते हैं—वह ब्रह्म नहीं है।
खण्ड २
शिष्य को सावधान करते हुए गुरु बता रहे हैं, कि हमारे द्वारा संकेत से बताये गये श्रेष्ठ ब्रह्मतत्त्व को सुनकर यदि तू यह
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९० : केनोपनिषद्
समक्ता है, कि मैं उस ब्रह्म को सम्यक् गया हूँ, तो यह निश्चित है, कि तूने ब्रह्म के सम्बन्ध में बहुत कम समभा है; क्योंकि पर-ब्रह्म का जो ब्रांशिक रूप तू है और उसका जो ब्रांशिक रूप देवताओंों में है, वह सब मिल कर भी थोड़ा ही है। इसलिए मैं तेरे जानने हुए ब्रह्म-तत्व को मैं विचारणीय मानता हूँ।
इस पर अपने विचार प्रकट करते हुए शिष्य कहता है—भगवन्, मैंने ब्रह्म को भली-भाँति समक लिया है, यह मैं नहीं मानता हूँ और न यही मानता हूँ कि मैं ब्रह्म को जानता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ, फिर भी मेरा यह जानना वैसा नहीं है जैसा किसी ज्ञाता का किसी जानने योग्य वस्तु के जानने का होता है। मेरा यह जानना उससे सर्वथा विभिन्न है, इसलिए मेरा यह कहना कि मैं उसे नहीं जानता—ऐसा नहीं और जानता हूँ। ऐसा भी नहीं; तथापि मैं जानता हूँ। मेरे इस कथन के रहस्य को हम शिष्यों में से वही समक सकता है, जो वस्तुतः ब्रह्म को जानता है।
गुरु-शिष्य के इस प्रश्नोत्तर का निष्कर्ष श्रुति के वचनों द्वारा इस प्रकार बताया गया है—जो यह मानते हैं, कि ब्रह्म जाना नहीं जा सकता, उसे वह जानते हैं। जो यह मानते हैं, कि ब्रह्म को मैं जानता हूँ—वह नहीं जानता क्योंकि जिन्हें जानने का अभिमान हो गया है, उन्हें यह ब्रह्म तत्व बिना जाना हुआ—सा है। और जिन्हें जानकार बनने का अभिमान नहीं है वस्तुतः वही ब्रह्म तत्व को जानते हैं। तात्पर्य यह कि भगवान् का साक्षात्कार उन्हीं को होता है, जिन्हें जानने का अभिमान नहीं होता।
उपर बताए गये संकेत द्वारा उत्पन्न ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है, क्योंकि इससे श्रमूल स्वरुप परमात्मा को मनुष्य प्राप्त करता है, मननशील परमात्मा से परमात्मा को जानने की शक्ति प्राप्त है।
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कैनोपनिषद् : ११
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करता है और इस ज्ञान से अमृत रूप परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त करता है।
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यदि इसी मनुष्य शरीर में ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लिया जाए तो बहुत ही अच्छी बात है। कदाचित् इस शरीर के रहते हुए ब्रह्म-ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ तो महान् विनाश सम्भवना चाहिए।
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यही सोचकर बुद्धिमान् श्राद्धमी हर प्राणी को ब्रह्म समभकर इस लोक से जाने के बाद अमर पद प्राप्त करते हैं।
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खण्ड ३
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भगवान् ने देवासुर संग्राम में देवताओं को शक्ति प्रदान की, जिससे उन्होंने असुरों पर विजय पायी। यह विजय भगवान् ने देवताओं को जिमित बनाकर स्वयं प्राप्त की थी।
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परन्तु देवता इसे न समझ पाए उन्होंने भगवान् की शक्ति और महिमा को अपनी समभ लिया। उन्हें इस बात का अभिमान हो गया कि हम बड़े शक्तिशाली हैं अपनी शक्ति से ही हमने असुरों को हरा दिया है।
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देवताओं के इस मिथ्याभिमान को भगवान् ताड़ गए, उन्होंने सोचा कि अगर ऐसा ही अभिमान इन देवताओं में बना रहा तो इनका दिव्यत्व नष्ट हो जाएगा और ये पतित हो जायेंगे।
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इसलिए उनकी भलाई के लिए ही भगवान उनके सामने दिव्य यज्ञ का रूप धर कर प्रकट हुए। उस यज्ञ के अद्भुत रूप को देखकर देवता चकरा गए, उन्हें समभ में ही नहीं आता था कि यह दिव्ये यज्ञ क्या है। वे उसे पहचान न सके।
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वे सब भयभीत हो गए और उसका परिचय जानने के लिए व्यग्र हो उठे। उन्होंने सोचा कि अग्निदेव परम तेजस्वी हैं, वेदार्थ के तत्वज्ञ हैं, सभी उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता हैं—सर्वज्ञ हैं, इसीलिए उनका नाम 'जातवेदा' है—इसलिए उन्हें ही इसका पता लगाने
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१२ : केनोपनिषद्
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के लिए भेजना चाहिए। यह तय कर सब ने ऋग्निदेव से प्रार्थना की कि ज्ञाप जाकर पता लगाइए कि यह यज्ञ कौन है ?
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ऋग्निदेव को भी अपनी बुद्धि-शक्ति का पूरा अभिमान था, उन्होंने तपाक से कहा कि ऋभी पता लगाता हूँ।
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दौड़ते हुए ऋग्निदेव यज्ञ के पास पहुँचे। अपने समीप ऋग्नि को खड़ा देखकर यज्ञ बोला—तुम कौन हो ? यह सुनकर ऋग्नि मन ही मन सोचने लगे—कि मेरे ऋग्रित तेज से तो सभी परिचित हैं, यह कौन है, जो मुझे पहचानता भी नहीं। उन्होंने तुनुक कर कहा—मैं सर्वत्र विख्यात ऋग्नि देव हूँ, मेरा ही गौरव-शाली नाम 'जातवेदा' है।
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तब यज्ञ रूपी परमात्मा ऋज्ञान बनकर बोले—ऋच्छा आप ऋग्निदेव हैं और सब को जानने से ही आप का नाम 'जातवेदा' पड़ा है, बड़ी ऋच्छी बात है, कृपया यह तो बताइए कि आप में कौन-सी शक्ति है? आप क्या कर सकते हैं?
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बड़े गर्व से ऋग्नि ने कहा—मैं क्या कर सकता हूँ—पर आप जानना चाहते हैं, ऋरे मैं चाहूँ तो सम्पूर्ण दृश्य जगत् को एक क्षण में राख का ढेर बना दूँ।
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यह सुनकर यज्ञ भगवान ने ऋक्ति के सामने एक सूखा तिनका डालकर कहा—आप तो सब कुठ भस्म करने की ऋामत शक्ति रखते हैं, थोड़ी-सी शक्ति इस छोटे से तिनके को जलाने में तो लगा दें। ऋग्नि ने इसे अपना ऋपमान समझा और कोपकर के मट उस तिनके के पास पहुँचकर उसे जलाने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी किन्तु उसमें ऋाँच भी नहीं लगी। ब्रह्म ने अपनी दाहक शक्ति ऋग्नि से खींच लिया था, इसलिए तिनका कैसे जलता, लेकिन घमंडी ऋग्नि को यह बात मालूम न हो सको। घमंड से चूर होकर उसने अपनी सारी शक्ति का प्रयोग किए बार उस
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तिनके को जलाने में लगायी किन्तु वह ज्यों का त्यों रहा। तब वह लज्जित होकर देवताओं के पास लौटकर बोला—भाई, मैं नहीं जान सका कि यह दिव्य यत्न कौन है ?
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तब देवताओं ने वायु देवता से कहा कि वायु देव, आप जाकर पता लगाइए कि यह कौन है। वायु भी कम घमण्डी नहीं थे, उन्होंने कहा कि अच्छी तरह पता लगाकर आऊँगा।
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यह कहकर वह तुरन्त उड़कर यत्न भगवान् के पास पहुँच गए। अपने समीप वायु को खड़ा देखकर यत्न ने पूछा—आप कौन हैं भगवान् ! वायु ने भी बड़े गर्व से कहा—मैं वायु हूँ। मेरा ही गौरवशाली, रहस्यपूर्ण नाम 'मातरिश्वा' है।
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तब यत्न रुप भगवान् ने ज्ञानजान बनकर वायु से भी पूछा—महाराज, आप तो वायु देवता हैं, और अन्तरिक्ष में बिना किसी आधार के विचरण करने वाले हैं, इसलिए आप का नाम मातरिश्वा है। भला यह तो बताइए कि आप में क्या शक्ति है—आप क्या कर सकते हैं। वायु ने भी अग्नि की तरह बड़े गर्व से कहा—आप मुझे क्या समभते हैं, मैं चाहूँ तो सारे भूमण्डल को उड़ाकर अधर में लटका दूँ।
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वायु की ऐसी गर्वोक्ति सुन सर्वशक्तिमान्, यत्न रुप परमात्मा ने वही सूखा तिनका उनके सामने भी रखकर बोले, ठीक है देव, थोड़ी सी शक्ति लगाकर इसे तिनके को उड़ाने का कष्ट करें। वायु देवता ने इसे अपना अपमान समभा। वे क्रुपित होकर तिनके के पास जाकर लगे उसे उड़ाने। सर्वशक्तिमान परमात्मा ने उसी समय उनके अन्दर से अपनी शक्ति खींच ली, वे उछलते-कूदते ही रह गए किन्तु तिनका को हिला भी न सके। हारकर चुपचाप देवताओं के पास जाकर बोले, मैं तो अच्छी तरह नहीं समभ सका कि यह यत्न कौन है।
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अग्नि और वायु को असफल लौटते हुए देखकर देवताओं ने स्वयं देवराज इन्द्र को भेजने का निश्चय कर उनसे निवेदन किया कि—देवराज, आपही समर्थ हैं, आपके अतिरिक्त और दूसरा कोई भी इस यज्ञ का पता नहीं लगा सकता यत्नः कृपापूर्वक जाने का कष्ट करें । ‘अच्छा’ कहकर देवराज इन्द्र यज्ञ के पास पहुँचे । ज्योंही वह वहाँ पहुँचते हैं, कि उनके देखते-देखते यज्ञ रूप भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गए । समस्त देवताओं से अधिक अभिनान इन्द्र में था ‘इसलिए भगवान् ने उन्हें बात करने का भी अवसर नहीं दिया ।
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यज्ञ के अन्तर्धान हो जाने पर इन्द्र वहीं खड़े रहे लौटे नहीं । इतने में उन्होंने देखा कि वहाँ पर यक्ष थे, वहीं पर भगवती उमा देवी प्रकट हो गयी हैं । उन्हें देखकर इन्द्र उनके पास चले गये । बड़ी विनम्रता से इन्द्र बोले—भगवती, आप देवाधिदेव महादेव की स्वरूपा शक्ति हैं । यत्नः आपको सब कुछ पता है, कृपा करके मुझे बताइए कि यह दिव्य यज्ञ जो अभी अन्तर्धान हो गया—कौन है । किसलिए यहाँ आया था ।
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खण्ड ४
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इस प्रकार देवराज इन्द्र के पूछने पर भगवती उमा ने कहा— जिस दिव्य यज्ञ को तुम देख रहे थे वह सान्नात भगवान् थे । असुरों पर तुमने जो विजय प्राप्त की है, वह उन्हीं की शक्ति से । तुम लोग तो केवल निमित्त मात्र थे । लेकिन अज्ञानता के कारण तुम लोगों ने इसे अपनी विजय मान ली। तुम्हारे इस मिथ्या-भिमान को दूर करने के लिए, तुम्हारा कल्याण करने के लिए ही भगवान् यज्ञ का रूप धरकर प्रकट हुए थे । अग्नि और वायु का गर्व चूर कर तुम्हें ज्ञान देने के लिए उन्होंने मुझे प्रेरित किया।
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है। इसलिए तुम अपनी स्वाधीन शक्ति और सत्ता का अभिमान अपने अज्ञान से निकाल दो। यह निश्चय समझो कि तुम्हारी जो शक्ति और महिमा है वह भगवान् की बदौलत है। भगवती के समक्षते पर देरताओों को ज्ञान हुआ कि उनके सामने यक्ष का रूप धारसा कर साक्षात् ब्रह्म प्रकट हुए थे ।
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इसलिए अग्नि, वायु और इन्द्र ये तीनों देरताओों में श्रेष्ठ समभे जाते हैं, क्योंकि इन्हीं तीनों ने ब्रह्म का संस्पर्श प्राप्त किया था । परब्रह्म का दर्शन, परिचय और उनके साथ बातचीत करने का सर्वप्रथम सौभाग्य इन्हीं तीन देवताओों को मिला था और इन्होंने ही सबने पहले इस सत्य को समभो कि हम लोगों ने जिसका दर्शन किया, जिनसे वार्तालाप किया और जिनकी शक्ति पाकर असुरों पर विजय पायी वह साक्षात परब्रह्म, परमात्मा ही थे ।
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अग्नि और वायु ने ब्रह्म के दर्शन किये, उनसे बातचीत भी की लेकिन उन्हें ब्रह्म के स्वरूप का ज्ञान न हो सका । भगवती उमा द्वारा देवराज इन्द्र को ही सब से पहले ब्रह्म-तत्व का ज्ञान मिला, इसलिए सभी देवताओों में इन्द्र श्रेष्ठ समभे जाने लगे ।
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जब किसी के हृदय में ब्रह्म-प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा जाग उठती है, तब भगवान् उसकी अभिलाषा को तीव्रतम बनाने के लिए अपने स्वरूप की झाँकी के दर्शन बिजली की चमक अथवा आँखों की भपकी के समान दिखाकर छिप जाते हैं । इस आधिदैविक उदाहरणे द्वारा बड़े रहस्यमय ढंग से ब्रह्म-तत्व का संकेत किया गया है । शब्दों का अर्थ तो हर कोई अपने ढंग से लगा सकता है, लेकिन इसका अनुभव ज्ञानी संत ही कर सकते हैं ।
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इसी विषय को आध्यात्मिक उदाहरणे से समभाते हुए बताया गया है, कि जब हमारा मन ब्रह्म के समीप जाता है तब वहाँ-सा प्रतीत
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होता है, तथा उस ब्रह्म को हर समय प्रीतिपूर्वक स्मरण करता है। उसी समय वह मन अत्यन्त श्याकुल बन जाता है। उसमें ब्रह्म को प्राप्त करने की उत्कट इच्छा उत्पन्न हो जाती है।
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वह परमानन्द परमात्मा सभी को अत्यन्त प्यारा है। हर प्राणी किसी न किसी रूप से उसे चाहते हैं, उसको प्यार करते हैं। इसी लिए वे मुख के रूप में खोजते हुए दुःख रूप विषयों में भटकते रह जाते हैं उसे पा नहीं सकते। इसलिए साधक को चाहिए कि हर प्राणी में, हर वस्तु में भगवान की सत्ता सम्भवकर सब को प्यार करे, सभी में ईश्वर का साक्षात्कार करे। ऐसा करने से संसार के सभी प्राणी उसे अपना आत्मीय समभने लगेंगे, उसको हृदय से प्यार करेंगे।
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इसके बाद शिष्य ने प्रार्थना करते हुए कहा—गुरुदेव, उपनिषद् (ब्रह्म विद्या) का उपदेश कीजिए। गुरुने कहा—वत्स, हमने तुम्हें ब्रह्म विद्या का उपदेश दे दिया है। तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर में हमने जो उत्तर दिये हैं वे सब ब्रह्म विद्या के ही उपदेश थे—यह निश्चय सम्भो।
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उस ब्रह्म विद्या के तप, दम, कर्म ये तीन आधार हैं। चारों वेद उसके अंग हैं। सत्य स्वरूप परमात्मा उसका अधिष्ठान है। इसलिए ब्रह्म प्राप्ति की इच्छा रखकर जो वेदों के अनुसार तत्व चिन्तन करता हुआ, तपस्या, इन्द्रिय निग्रह और निष्काम भाव से साधन करता है, वही ब्रह्म विद्या के सार—परब्रह्म को प्राप्त कर सकता है।
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उपयुक्त ढंग से बतायी गयी ब्रह्म विद्या को जो कोई जान लेता है—तदनुसार साधन में प्रवृत्त हो जाता है, वह समस्त पाप समूहों को नष्ट करके स्वर्ग से भी श्रेष्ठ ज्ञानन्त, अविनाशी परमधाम में प्रतिष्ठित हो जाता है—सदा के लिए स्थित हो जाता है।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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कृष्ण यजुर्वेद को कठ शाखा के ग्रन्थगत 'कठोपनिषद्' है । इसमें दो अध्याय और उन अध्यायों में ६ वल्लियाँ हैं । इसमें बालक नचिकेता और यमराज के संवाद के रूप में परमात्मतत्व के रहस्य का विवेचन बहुत हो विशाद और मार्मिक है ।
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शान्ति पाठ
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ॐ । परमात्मा हम दोनों आचार्य और शिष्य की रक्षा एक साथ करें । हम दोनों का पालन करें । एक ही साथ हम दोनों ज्ञान सम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें । जो कुछ हम दोनों पढ़ें वह तेजस्वी हो और किसी से भी द्वेषभाव न रखें ।
३
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
३
(तीनों प्रकार के ताप शान्त हों)
३
अध्याय १ वल्ली १
३
परम्परागत यह कथा प्रसिद्ध है, कि वाजश्रवा के पुत्र वाज श्रवस ने सांसारिक फलों की कामना रख कर विश्वजित यज्ञ में अपना सब धन दान दे डाला था। उसके एक पुत्र था, जिसका
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नाम नचिकेता था। जिस समय यज्ञ कराने वाले क्षत्रियों, पुरोहितों श्रौर ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने के लिए गौएँ लायी जा रही थीं उसी समय बालक नचिकेता में श्रद्धा के भावों का उदय हुग्रा वह सोचने लगा—
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'जिनमें जल पीने, घास चरने की शक्ति क्षीण हो गयी है, दूध देना बन्द कर चुकी हैं, बुढ़ाई के कारण जो बच्चे भी नहीं पैदा कर सकती हैं, ऐसी बूढ़ी गौत्र्यों को दक्षिरा में देनेवाला यजमान निश्चय ही ब्रह्मानन्दरहित लोक में निवास करता है ।'
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यह सोचकर बालक नचिकेता अपने 'पिता वाजश्रवा : बोल—पिता जी, श्राप मुझे किसको देंगे? दो बार, तीन बार यह वाक्य दुहराने पर पिता को कोध श्रा गया श्रौर वह बोले—'मैं तुम मृत्य को दूँगा ।' यह सुनकर नन्हा-सा बालक नचिकेता सोचने लगा कि 'मैं श्रनेक पुत्रों श्रौर शिष्यों में प्रमुख रूप से सद्चरएा कर रहा हूँ। मध्यम कोटि के बहुतरे शिष्य श्रथवा पुत्रों में मध्यम वृत्ति : रहता हूँ । श्रधम व्यवहार मुझमें छू तक नहीं गया है, फिर मेरे पिता जी ने मुझे यमराज को दे दिया है। ऐसा कौन-सा प्रयोजन है, जो मुझे यम को देकर पिताजी सिद्ध करना चाहते हैं। संभवतः किसी स्वार्थ या प्रयोजन की कामना न रखकर क्रोधवश पिताजी ने ऐसा कहा है, लेकिन फिर भी पिता का वचन मिथ्या न हो—
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यह सोचकर नचिकेता ने श्रपने पिता से—जो श्रपनी नासमझी पर पश्चात्ताप कर रहे थे—कहा ।
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पिताजी, पश्चात्ताप न करें, श्रापके पूर्वज जैसा व्यवहार कर रहे हैं, उस पर विचार करें, उन्हीं के पग-चिन्हों पर चलने व को देखिए, इस समय जो श्रेष्ठ सज्जन लोग शिष्ट ग्राचारएों के रहे हैं। हैं, उन्हें भी देखिए, उन पर विचार कीजिए। प्राचीन काल के तथा वर्तमान काल के जितने महानुभाव रहे हैं या हैं, उनमें :
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किसी ने भी श्रपनी बात को श्रपने कथन को मिथ्या नहीं किया है। यह काम तो दुर्जनों का है जो यह नहीं सम्भते कि श्रपने श्राचरए को मिथ्या बनाकर कोई श्रज्जर-श्रमर नहीं हो सकता। क्योंकि मनुष्य तो खेती की तरह पकता है—जीर्ण होकर मरता है श्रौर मर कर खेती की तरह फिर पैदा होता है। इसलिए श्रसार संसार में थोड़ी-सी जिन्दगी के लिए श्रसत्य श्राचरए करना कोई लाभदायक काय नहीं .है।—श्राप खेन्द्र न करें। यमराज के पास मुझे भेजकर सत्य की रक्षा करें।
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इस प्रकार नचिकेता के सम्भाने पर उसके पिता ने उसे यमराज के यहाँ भेज दिया। यमराज कहीं बाहर गये हुए थे, इसलिए यमपुरी पहुँच कर नचिकेता जब तक यम नहीं लौटे तीन रात तक वहाँ बिना कुछ खाये-पिये टिका रहा। यमराज के लौटने पर उसके परिवार श्रौर मंत्री-परिषद् के सदस्यों ने यमराज से कहा—
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हे वैवस्वत, ब्राह्मण श्रतिथि के रूप में स्वयं श्रग्नि देवता ही घर में प्रविष्ट होता है। उस श्रग्नि की ज्वाला को शान्त करने के लिए ही सद्गृहस्थ लोग श्रासन, जल श्रादि उसे दिया करते हैं। इसलिए इस ब्राह्मण श्रतिथि की श्रावभगत के लिए जल ले श्राइए। इसे भोजन कराइए। क्योंकि जिस गृहस्थ के घर में ब्राह्मण-श्रतिथि बिना भोजन किए निवास करता है, उस मन्दमति गृहस्थ पुरुष की ज्ञात श्रौर अज्ञात वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छाएँ, उनके द्वारा प्राप्त होने वाले फल, सत्यप्रिय वाणी श्रौर उससे होने वाले फल, यज्ञ, दान श्रादि से प्राप्त होने वाले फल श्रौर बगीचा लगवाने, तालाब, कुएँ खुदवाने से होने वाले फल तथा पुत्र श्रौर पशु श्रादि सभी को वह नष्ट कर देता है।
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इस प्रकार सम्भाये जाने पर यमराज तुरन्त नचिकेता के पास जाकर उसका यथोचित स्वागत किया श्रौर बोला—ब्राह्मण श्रतिथि!
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तुमें नमस्कार करता हूँ। मेरा कल्याण हो। तुम पूज्य ऋतिथि होकर भी तीन रात्री तक बिना भोजन किये ही मेरे घर में पड़े रहे,
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ऋतः एक-एक रात के लिए एक-एक करके मुझसे तीन वर माँग लो।
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नचिकेता ने कहा—यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मैं प्रथम वर यही माँँगता हूँ कि—
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मेरे यहाँ चले जाने पर मेरे पिता—जिनका यह संकल्प शान्त हो गया है, कि ‘न जाने मेरा पुत्र यमराज के यहाँ जाकर क्या करेगा—प्रसन्न और क्रोधरहित हो जायँ। हे यमराज, आपके भेजने पर जब मैं पुनः मृत्यु लोक में जाकर अपने घर पहुँचूँ तो मेरे पिता मुझे पहचान लें, उन्हें यह ज्ञान हो जाय कि मेरा वह पुत्र नचिकेता लौट कर आ गया है।
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यमराज ने कहा ठीक है, तुम्हारे पिता श्र्रौण-पुत्र उद्दालक की बुद्धि और स्मरण-शक्ति जैसे पहले तुम्हारे प्रति स्नेहयुक्त रही है उसी प्रकार अब भी जब तुम मुझसे प्रेरित होकर उनके पास जाओगे—रहेगी। तुम्हें मृत्यु के मुख से लौटा हुया समभकर वे शेष रात्रियों में सुखपूर्वक सोएँगे। उनका सारा क्रोध भूल जाएगा।
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नचिकेता बोला—मृत्यु देव, स्वर्ग लोक में तो कुछ भी भय नहीं है। रोग, शोक की नाम भी नहीं है। और न वहाँ ग्राप का ही कुछ वश चलता है। स्वर्ग में रहने वाले लोग जरा और मृत्यु से भयभीत नहीं हैं इसीलिए वे अजर और अमर कहलाते हैं। भूख, प्यास के बन्धनों से मुक्त वहाँ के निवासी आनन्दमय जीवन विताते हैं।
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ऐसी स्थिति में हे मृत्यु देवता, मुझे स्वर्ग प्राप्त करने के साधन-भूत श्रभनि को बताइए क्योंकि ग्राप उसे श्रच्छी तरह जानते हैं
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और मैं भी श्रद्धालु हूँ। वह कौन-सी अग्नि है, जिसे चयन करने वाले लोग अभ्रमता प्राप्त करते हैं—इसी अग्नि-विज्ञान को मैं दूसरे वर द्वारा माँगता हूँ।
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यमराज बोले—मैंने वर देने की प्रतिज्ञा की है, इसलिए हे नचिकेता, स्वर्गे प्राप्त कराने वाली अग्नि को मैं तुम्हें बताता हूँ। एकाग्रचित्त होकर समभ लो; क्योंकि उसे भली भाँति समझने वाला विशेषज्ञ मैं ही हूँ। मैं कहता हूँ भली भाँति समभो। जो स्वर्ग लोक को प्राप्त कराने वाला है और विराट रूप से संसार का आधार वना हुया है उस अग्नि को तू बुद्धिमान पुरुषों की बुद्धि-स्थित समभ।
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इस प्रकार यमराज ने स्वर्ग प्राप्त कराने वाली अग्नि को तथा उसके चयन करने में जैसी और जितनी ईंटें होती हैं तथा जिस विधि से उसका चयन किया जाता है—यदि सभी बातें नचिकेता को समभा दीं और नचिकेता ने भी यमराज से जो कुछ सुना और समभा था—ज्यों का त्यों वहाँ उसे सुना दिया। इससे सन्तुष्ट होकर मृत्यु फिर बोला—
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प्रिय नचिकेता ! तुम्हारी बुद्धि और धारणा-शक्ति से मैं प्रसन्न हूँ इसलिए तीन वरों के अलावा एक और अपनी ओर से यह दे रहा हूँ कि यह अग्नि तेरे ही नाम से प्रसिद्ध होगी और तू यह शब्द करने वाली विचित्र वरों की रत्नमाला को धारण कर।
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कर्म की प्रशंसा करते हुए यमराज फिर बोले—जिसने तीन बार नाचिकेत अग्नि का चयन किया है, उसे त्रिनाचिकेत कहते हैं। माता, पिता और आचार्य—इन तीनों से सम्बन्ध प्राप्त कर त्रिनाचिकेत जन्म और मृत्यु को पार कर जाता है तथा ब्रह्मा से उत्पन्न हुए, ज्ञानवान और स्तुति करने योग्य देव को जान कर
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ग्रात्मभाव से देखकर ग्रपनी बुद्धि से प्रत्यक्ष होने वाली अत्यन्त शान्ति को प्राप्त कर लेता है ।
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नाचिकेत ग्रग्नि के चयन में कितनी और कौन सी ईष्टें होनी चाहिए, किस प्रकार चयन करना चाहिए । इन तीनों बातों को सम्यक कर जो त्रिनाचिकेत विद्वान ग्रग्नि का चयन करता है, उसका साधन करता है वह धर्म, ज्ञान और राग-द्वेष ग्रादि मृत्यु के बन्धनों का मूल से पूर्व हो त्याग करके शोक, मोह ग्रादि मानसिक क्लेशों से मुक्त होकर विराट में मिल जाता है ।
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हे नचिकेता, दूसरे वर से जो तुमने माँगा उसे मैंने स्वर्ग के साधनरूप ग्रग्नि को बतलाकर तुम्हें दे दिया । लोग ग्रब इसे तेरे ही नाम से नाचिकेत ग्रग्नि कहा करेंगे । श्रच्छा तीसरा वर भी माँग लो ।
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नचिकेता बोला—मृत्युदेव, मर जाने के बाद मनुष्य के विषय में अनेक धारणाएँ श्रौर शंकाएँ बतायी जाती हैं । कोई तो कहता है, कि मर जाने के बाद शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि के ग्रलावा ग्रात्मा का सम्बन्ध सूक्ष्म शरीर से रहता है । किसी का कहना है कि ग्रात्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है । ऐसी स्थिति में न तो कोई ग्रनुमान ही किया जा सकता है, न तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाण ही है ।
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इसलिए ग्रापसे शिष्ट होकर मैं इसे भली भाँति समभना चाहता हूँ । यही मैं ग्रन्तिम तीसरा वर माँगता हूँ ।
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नचिकेता की ऐसी बात सुनकर यमराज ने—इस बात की परीक्षा लेने के लिए यह बालक मोक्ष के साधन ग्रात्म-ज्ञान का ग्रधिकारी है या नहीं—कहा—
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यह ग्रात्मतत्त्व का विषय है । बहुत पहले देवताओं को भी ऐसा ही संशय हुग्रा था । साधारण मनुष्यों के लिए यह तत्त्व सुनने
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पर भी श्रच्छी तरह जानने योग्य नहीं है। क्योंकि श्रात्मा नाम का धर्म बहुत ही सूक्ष्म है। श्रत: हे नचिकेता, कोई दूसरा वर माँगो। यह ठीक है, कि हमने तुम्हें वरदान दिया है, लेकिन जैसे कोई धनी किसी कर्जदार को दबाता है उसी प्रकार तुम मुझ पर दबाव मत डालो। इस वर को तुम मेरे लिए छोड़ दो।
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लेकिन हृदयान्तस्थयी नचिकेता उस से मस न हुया और बोला—हे मृत्यु, इस विषय में देवताओं को अवश्य सन्देह हुया होगा और आपका कहना भी ठीक है, कि इसे साधारण मनुष्य सरतला से नहीं समझ सकते। इसलिए इस विषय की और मेरा और भी श्रधिक श्राकर्षण बढ़ रहा है। मुझे यह विश्वास है, कि इस धर्म का वक्ता श्रापके समान और कोई दूसरा हो नहीं सकता और न इसके समान कोई दूसरा वर ही हो सकता है। क्योंकि और सभी वर तो श्रनित्य फलों को देने वाले होते हैं।
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नाचिकेता की यह बात सुनकर यमराज उसे प्रलोभन देते हुए बोले—सुनो नचिकेता, इस वर के बदले में तुम मुझसे सौ वर्ष तक जीते वाले पुत्र-पौत्र माँग लो; बहुत से पशु, हाथी और घोड़े माँग लो; विशाल भूमण्डल का राज्य माँग लो तथा स्वयं जितने वर्ष तक जीना चाहते हो उतने वर्ष का दीर्घ जीवन माँग लो। लेकिन इस वर को छोड़ दो।
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यही नहीं इस वर के तुल्य जो भी वर तुम उचित समझो माँग लो। चिर काल तक रहने वाला धन और चिरस्थायी जीविका माँग लो। श्रधिक क्या कहूँ नचिकेता, इस विशाल भूखण्ड में तू राजा बनकर उत्तरोत्तर समृद्धि को प्राप्त हो। मैं तुम्हें समस्त दैवी और मानुषी कामनाओं को इच्छानुसार भोग करने की शक्ति देता हूँ।
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मृत्युलोक में जो भी दुर्लभ भोग हैं उन सब को तू खुलेधिल से माँग ले, मैं देने के लिए तैयार हूँ। यहाँ रथ और बाजोंसहित
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अनेक ऐसी सुन्दरी स्त्रियाँ हैं जिन्हें मनुष्य कभी प्राप्त नहीं कर सकते। मैं इन्हें तुम्हें दे दूँ तो इनसे अपनी सेवा करा, लेकिन हे नचिकेता मृत्यु सम्बन्धी प्रश्न मुझसे मत पूछ।
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इस प्रकार के प्रलोभन दिए जाने पर भी नचिकेता ने श्रद्धागाध सरोवर की भाँति निश्चल होकर कहा—
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मृत्यु देव, आपने जिन भोगों और ऐश्वर्यों को बताया है वे तो चतुष्किक हैं, उनके अस्तित्व का क्या ठिकाना, आज हैं कल नहीं रहेंगे। आपकी ये अप्सरायें मनुष्य की सम्पूर्ण इन्द्रियों के तेज को जीत लेती हैं। जीवन का भी क्या ठिकाना। दीर्घ जीवन लेकर मैं क्या करलूँगा जब कि ब्रह्मा की ही आयु की एक सीमा हुआ करती है। इसलिए आप रथ, बाजेगाजे, घोड़े, हाथी आदि समस्त ऐश्वर्य और भोगों को अपने ही पास रखैं, मुझे इनकी जरूरत नहीं है।
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किसी भी मनुष्य को धन और ऐश्वर्य से तृप्त कहीं नहीं देखा गया है। मनुष्य लोक में धन की प्राप्ति आज तक किसी को तृप्त नहीं कर सकी। आपके दर्शन हो जाने से जब कभी मुझे धन की लालसा होगी तो उसे भी प्राप्त कर लूँगा। मुझे यह भी विश्वास है कि जब तक आप यमराज के पद पर रहेंगे तब तक हम जीवित रहों। क्योंकि आप के सम्पर्क में आकर आपकी दर्शन कर कोई भी मनुष्य दरिद्र और अल्पायु कैसे हो सकता है ? इसलिए आत्म-विज्ञान संबंधी वर ही मुझे चाहिए और कुल भी नहीं।
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क्योंकि अजर और अमर कहे जाने वाले देवताओं के लोक में पहुँच कर मनुष्य लोक का ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो शारीरिक सुखों और भोगों को त्यप्समंगुर समभवता हुआ बहुत दिनों तक जीवित बने रहने में सुख मानेंगा। इसलिए मुझे आप मिथ्या भोगों के प्रलोभन में न फँसा कर मेरा अभीष्ट वर प्रदान करें।
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हे मृत्यु देव, मरे हुए जीव के सम्बन्ध में लोग ‘है या नहीं’ का जो सन्देह रखते हैं तथा महान् परलोक के विषय में निश्चित विज्ञान हैं वह मुझे बताने की कृपा करें। आत्म तत्व सम्बन्धी यह वर जो श्रुति गृढ़ है इसके श्रातिरिक्त और कोई वर नचिकेता को नहीं चाहिए।
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इस प्रकार नचिकेता की योग्यता और जिज्ञासा की परीक्षा लेने के बाद यमराज ने कहा-श्रेय (विद्या) और प्रेय (अविद्या) और है। इन दोनों के प्रयोजन भिन्न हैं, फिर भी इन्हीं के द्वारा सब लोग श्रपुने कर्तव्यों से बँधते हैं। इन दोनों में जो श्रेय को ग्रहण करता है उसका कल्याण होता है और जो प्रेय का वरन् करता है वह पुरुषार्थ से च्युत हो जाता है। श्रेय और प्रेय दोनों आपस में एक दूसरे से मिले हुए-से मनुष्य को प्राप्त हुया करते हैं। जो पुरुष बुद्धिमान होता है, वह भली भाँति विचार करके उन दोनों को अलग अलग कर लेता है। विवेकी लोग प्रेय के सामने श्रेय को अंगीकार करते हैं। इसके विपरीत जो अल्पमति होते हैं, जिनमें विवेक शक्ति का अभाव रहता है वे भौतिक सुखों को देने वाले प्रेय को ही स्वीकार करते हैं।
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हे नचिकेता, धन, सन्तान, वाहन, श्रप्सरा आदि प्रिय भोग पदार्थों को सामनेहात सम्भाकर तुझे उन्हें त्याग दिया है। वारम्बार प्रलोभन दिये जाने पर भी तू उन भोगों में श्रासक्त नहीं हुया जिन पर श्रविवेकी श्रादमी श्राँख मूँद कर डूब जाया करते हैं।
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विद्या और श्रविद्या में दोनों प्रकाश और श्रन्धकार के समान परस्पर विरुद्ध स्वभाव वाली और विपरीत फल देने वाली हैं। तुम्हें श्रनेक भोगों ने श्राकृष्ट नहीं किया है, इसलिए मैं तुम्हे विद्या
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(ज्ञान) का अधिकारी और इच्छुक ,समर्थता हूँ। लेकिन जो संसारी जीव ज्ञानी होते हैं वे श्रविद्या के भीतर रहकर अपने ज्ञान को बहुत बड़ा विद्वान् ,बुद्धिमान् और पंडित समभते हैं।
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ऐसे मूर्ख उसी प्रकार से पथभ्रष्ट हुया करते हैं, जैसे एक अन्य पुरुष श्रगुवा बनकर अन्य ग्रन्थों को ले जाकर गढ़े में गिरा देता है।
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धन के मोह से ग्रन्थे बने हुए श्रविवेकी और प्रमादी को परलोक का साधन नहीं सूकता। 'संसार ही सब कुछ है परलोक कोई चीज नहीं है!'—ऐसा समभने वाले लोग वारम्बार मृत्यु के वशीभूत हुआ करते हैं। लेकिन तुम्हारी तरह विवेकी और श्रेय के इच्छुक विरले ही हुआ करते हैं।
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ग्रात्म तत्व का ज्ञान बहुतere व्यक्तियों को तो सुनने को भी नहीं मिलता। ऐसे भी श्रनेक श्रभागे हैं, कि ऐसा ज्ञान सुनकर भी उनके गले से नीचे नहीं उतरता है। इसी तरह ग्रात्मतत्व का उपदेश देने वाला वक्ता भी हजारों में कोई एक ही हुया करता है और ऐसे ज्ञान को सुनकर ग्रहणए करने वाला भी श्रनेक में से कोई एक ही होता है। क्योंकि जिसे ग्रात्मतत्त्वदर्शी ग्राचार्य ने उपदेश दिया है ऐसा ग्रात्मतत्त्वज्ञ भी विरला ही है।
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जिस श्रात्मज्ञान के सम्बन्ध में तुम्हारी जिज्ञासा है, इसे साधा-रसा बुद्धि मनुष्य का बार-बार समभाने पर भी नहीं समक सका । क्योंकि तर्क बुद्धि वाले व्यक्तियों द्वारा वस्ति (है), नास्ति (नहीं है), कर्ता (बनाने वाला) श्रकर्ता (कुछ भी न करने वाला) शुद्ध (माया, मोह, ईर्ष्या, द्वेष श्रादि से रहित), श्रशुद्ध (दोषों, विकारों से भरपूर) श्रादि श्रनेक प्रकार से चिन्तन किया जाता है। लेकिन श्रेष्ठ दर्शी श्राचार्ये द्वारा उपदेश किए गए इस ग्रात्मा में 'है या
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नहीं है'—इस प्रकार के तकों की कोई गति हो नहीं रहती; क्योंकि श्रात्मा सम्पूर्ण विकल्पों, कुतकों की गति से रहित है।
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इसलिए हे नचिकेता, तुममें शास्त्रज्ञ और तत्वज्ञ श्राचार्य द्वारा बतायी गयी जो यह बुद्धि पैदा हुई है, वह कोरे तार्किक के तकंपूर्ण उपदेशों से प्राप्त नहीं हो सकती । प्रियवर, तू नि:सन्देह सत्यसन्ध है । तेरे ही समान पूछने वाला हमें फिर मिले ।
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जिस धन को पाने और खजाने के लिए प्रार्थना की जाती है, वह कर्म फल रूप निधि अनित्य है, सदा रहने वाली नहीं है—ऐसा मेरा श्रदृढ़विश्वास है । क्योंकि अनित्य (नाशवान) साधनों के द्वारा नित्य (ग्रविनाशी) परमात्मा रूप निधि नहीं प्राप्त की जा सकती है । मैंने स्वयं नचिकेता श्रग्नि का चयन किया था । उन्होंने अनित्य पदाथों से ही मैंने यमराज पद का श्रधिकार बनाकर स्वर्ग जैसे नित्य स्थान को प्राप्त किया है ।
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हे नचिकेता, तूने बुद्धिमान होकर सांसारिक भोगों की श्रावधि, जगत् की प्रतिष्ठा, यज्ञफल की ग्रननतता, श्रभय की मर्यादा, हर प्रकार की सिद्धियों और ऋद्धियों की विस्तीर्ण गति तथा प्रतिष्ठा को देखकर भी उसे बड़े धीरज के साथ छोड़ दिया है । बुद्धिमान और विवेकी लोग कठिनाई से दिखायी पड़ने वाले, गूढ़ स्थान में प्रविष्ट हुए, बुद्धि में स्थित, गहन-स्थान में स्थित परात्पर देव को श्रध्यात्म द्वारा जानकर हर्ष-शोक को त्याग दिया करते हैं ।
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सुनो नचिकेता, समस्त वेद जिसके पद का वर्णन करते हैं, जिसकी प्राप्ति के लिए सभी प्रकार के तप साधक बने हुए हैं, जिसकी इच्छा से मोक्ष चाहने वाले ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं, उस पद को मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ—यही वह 'ॐ' पद है ।
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२ः ऋषिप्रणीतदू
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यह 'ओं' ञ्रदर ही ञ्रपर ब्रह्म है, यही पर ब्रह्म है। इसे जानकर जो जिसकी इच्छा करता है वही उसका हो जाता है। इसलिए यह श्रेष्ठ ञ्रालम्बन है, यही पर ञ्रालम्बन है। इस साधन को जानकर साधक परब्रह्म में लीन होकर ब्रह्म के समान ही पूजनीय बन जाता है।
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यह ञ्रात्मा न मरती है, न पैदा होती है। जो वस्तु पैदा होती है ञ्रौर मरती है, उसी में समस्त विकार हुत्रा करते हैं, इसलिए ञ्रात्मा निर्विकार है। कभी लुप्त न होने वाले चैतन्य रूप स्वभाव के कारण यह ञ्रात्मा मेधावी है। यह ञ्रजन्मा है, नित्य है, इसका कभी नाश नहीं होता है, इसलिए यह प्राचीन होकर भी नूतन है। शरीर में रहकर भी ञ्रात्मा ञ्राकाश के समान निर्लिप्त है।
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ऐसी ञ्रात्मा को न जानकर जो केवल शरीर को ही ञ्रात्मा समभते हैं तथा जो दूसरे किसी के प्रति यह विचार रखता है कि मैं इसे जान से मार डालूँगा ञ्रथवा मारा जाने वाला यह समभता है, कि मैं मार डाला गया—वस्तुतः यह लोग ञ्रात्मा के स्वरूप को नहीं समभते । क्योंकि ञ्रात्मा तो निर्विकार है, वह न मर सकती है, ञ्रौर न उसे मारा जा सकता है ।
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मृत्यु चाहने वाले लोग समभते हैं कि यह ञ्रात्मा ञ्रङ्गुष्ठ से भी ञ्रगुत्तर ञ्रथात् सूक्ष्म है, तथा महान से भी महत्तर है। यह जीव की हृदय रुपी गुफा में बैठी हुई है। कामना रहित पुरुष अपनी इन्द्रियों की प्रसाद से ञ्रात्मा के महत्व को पहचानकर शोकरहित हो जाता है।
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यह ञ्रात्मा ञ्रचल होकर भी दूरातम है, शयन करता हुत्रा भी सभी ओर गतिशील है। हर्ष से युक्त ञ्रौर हर्ष से रहित ऐसी ञ्रात्मा को मेरे सिवा ञ्रौर कौन जान सकता है। जो मनुष्य ञ्रादि
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शरीरों में शरीररहित, नाशवानों में श्रविनाशी, महान् और सर्वव्यापी श्रात्मा को जान लेता है, वह बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता ।
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यह श्रात्म ज्ञान वेद शास्त्रों के श्रध्ययन से नहीं प्राप्त होता, न ग्रन्थों के भाव, श्रर्थ ग्रहण करने की धारणा शक्ति से ही जाना जाता है और न केवल बहुश्रुत होने से ही मिल सकता है । साधक जिस श्रात्मा के लिए प्रार्थना करता है उस श्रात्मा से ही यह प्राप्त किया जा सकता है श्रर्थात निष्काम पुरुष को श्रात्मा के द्वारा ही श्रात्मा की प्राप्ति होती है ।
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इसके श्रलावा दूसरी बात यह है, कि जो पाप कर्मों से निवृत्त नहीं हुग्रा है, जिसकी इन्द्रियाँ चंचल हैं, जिसका चित्त प्रशान्त है वह भी श्रात्मा को केवल श्रात्म ज्ञान द्वारा नहीं प्राप्त कर सकता है ।
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समस्त धर्मों को धारण करने वाले और सभी के रक्षक होने पर भी ब्राह्मण और क्षत्रिय ये दोनों वर्ग जिस श्रात्मा के भोजक हैं तथा सब का हरण करने वाला होने पर भी मृत्यु जिसके भोजन में शाक के समान है ऐसी श्रात्मा को कौन ज्ञ पुरुष जान सकता है ?
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शुभ कर्मों द्वारा प्राप्त मानव-शरीर में परम ब्रह्म का निवास स्थान हृदय है । उसमें बुद्धि रूपी गुफा में छिपे हुए श्रेय और प्रेय सत्य का पान करते हैं । ये दोनों धूप-छाँह की भाँति श्रापस में भिन्न हैं—ऐसा ब्रह्म ज्ञानी लोग कहते हैं । यही बात तीन वार नाचिकेत श्रग्नि का चयन करने वाले और पंचाग्नि से सम्पन्न गृहस्थ भी कहा करते हैं ।
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यज्ञ करने वालों के लिए नाचिकेत श्रभ्न शोक-सागर के पार पहुँचाने वाला पुल है। संसार सागर से पार होने की इच्छा रखने वालों के लिए वही श्रभय-पद है। इसलिए उस श्रविनाशी परब्रह्म परमात्मा को जानने और प्राप्त करने में भी हम समर्थ हों।
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हे नचिकेता, तुम जीवात्मा को तो रथ पर बैठने वाला स्वामी समभो और शरीर को रथ जानो। इस शरीर-रथ को चलाने वाला सारथी बुद्धि है तथा मन घोड़ों की रास है। ज्ञानी लोग इन्द्रियों को इस रथ के घोड़े मानते हैं, तथा सभी विषयों को घोड़ों के विचरने का स्थान समभते हैं। शरीर, इन्द्रिय और मन इन सबके साथ रह कर जीवात्मा भोग किया करता है।
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जो व्यक्ति श्रविवेकी और चंचल मन होता है, उसकी इन्द्रियाँ श्रसावधान सारथी के बिगड़ैल घोड़ों की भाँति कभी वश में नहीं रहा करती हैं। लेकिन जो 'विवेकी, स्थिर चित्त होता है, उसकी इन्द्रियाँ सावधान सारथी के सँधे हुए घोड़ों की भाँति सदैव वश में रहा करती हैं।
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जो व्यक्ति श्रविवेकी, श्रसंयत चित्त और श्रपवित्र होता है, वह उस परमपद को नहीं प्राप्त कर सकता और बार-बार संसार में जन्मता और मरता रहता है। लेकिन विवेकी, संयतचित्त और पवित्र व्यक्ति उस परम पद को प्राप्त कर लेता है जहाँ से लौटकर फिर जन्म नहीं लेता।
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जो श्रादमी बुद्धिरूप विवेकशील सारथी से सम्पन्न होकर मन रूपी लगाम को वश में रखता है, वह संसार यात्रा को समाप्त कर परब्रह्म परमात्मा के परम पद को प्राप्त हो जाता है।
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वात यह है, कि इन्द्रियों से रूप, रस, गन्ध, स्पर्श आदि विषय बडे बलवान् होते हैं, और इन विषयों से अधिक बलवान् मन होता है, मन से भी बलवान बुद्धि हुती है और इन सभी से महाबलवान आत्मा है। जीवात्मा से भी परम बलवान भगवान् की माया है, भगवान् की अन्यक्त माया से भी श्रेष्ठ स्वयं परमात्मा है। वस, परमात्मा से बढकर कुछ नहीं है। वही सब की चरम सीमा और परम अवधि है।
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वही परमात्मा आत्मा बनकर सभी जीवों में निवास करता है। माया के परदे में छिपा होने के कारण वह दिखायी नहीं पडता है। केवल सूक्ष्म तत्वों को समभाने वाले तत्वज्ञानी लोग अपनी सूक्ष्म बुद्धि से उसे देख पाते हैं।
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इसलिए बुद्धिमान साधक को चाहिए यह पहने वाणी आदि इन्द्रियों को मन द्वारा वशीभूत करे। उस मन को ज्ञान स्वरूप बुद्धि में लय करें, ज्ञान स्वरूप बुद्धि को महान आत्मा में विलीन करे और उस आत्मा को सच्चित आनन्द-स्वरूप परमात्मा में विलीन कर दे।
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हे संसार के मनुष्यों; उठो, जागो, श्रेष्ठ महापुरुषों के पास जाकर उस परमात्मा को जान लो क्योंाक त्रिकालदर्शी ज्ञानी लोग तत्व ज्ञान के मार्ग को छुरे की धार के समान तेज एवं दुस्सर समभते हैं।
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जो रूप, रस, गन्ध, स्पर्श आदि विषयों से रहित है, नित्य, अविनाशी, आदि-अन्तहीन, असीम, आत्मा से भी श्रेष्ठ और सर्वथा सत्यतत्व है, उस परमात्मा को जान कर मनुष्य मृत्यु के मुख मे सवेदा के लिए छूट जाता है।
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नचिकेता को यमराज द्वारा दिए गए इस ज्ञान उपदेश को जो पढता है, सुनता है और मनन करता है, वह ब्रहलोक में
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जाकर प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । जो मनुष्य शरीर और मन से पवित्र होकर इस संवाद को ब्राह्मणों की सभा में सुनाता है; अथवा श्राद्धकल में भोजन करने वालों को सुनाता है वह श्रान्त, श्रवि-नाशी फल प्राप्त करता है ।
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अध्याय २ वल्ली १
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स्वयम्भू परमात्मा ने सभी इन्द्रियों को बहिर्मुखी ही बनाया है, इसलिए लोग बाहर की ओर ही देखते हैं, अपने ग्रन्थर स्थित ग्रात्मा को नहीं देख पाते । ऐसे बहुत कम लोग हैं जो अमरपद पाने की इच्छा रखकर नेत्र ग्रादि इन्द्रियों को बाहरी विषयों से हटा करके ग्रन्तरात्मा को देख पाते हैं ।
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लेकिन जो मूर्ख बाहरी भोगों में ही रमे रहते हैं, वे सब जगह व्याप्त मृत्यु के जाल में फँस जाते हैं; इसके विपरीत बुद्धिमान मनुष्य विवेक द्वारा नित्य ग्रमर पद को जानकर सांसारिक द्रव्यक भोग सुखों में ग्रासक्त नहीं होते हैं ।
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हे नचिकेता, जिसके श्रनुभव से लोग शब्द, रूप, स्पर्श, गन्ध और स्त्री-प्रसंग ग्रादि विषयों का ग्रनुभव करते हैं ग्रौर जिसके ग्रनुभव से यह भी जानते हैं कि यहाँ क्योँ शेष रह जाता है; वही परमात्मा है, जिसके विषय में तुमने मुझसे पूछा था ।
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जागते हुए और सोते हुए दोनों श्रवस्थाओं में मनुष्य जिससे देखता है, उस सर्वश्रेष्ठ, सर्वव्यापी, सभी में निवास करने वाले ग्रात्मा को जान लेने पर बुद्धिमान व्यक्ति शोक नहीं किया करते ।
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जो मनुष्य कर्मों के फल देने वाले, सबको जीवन देने वाले, तीनों काल में शासन करने वाले इस परमात्मा को ग्रपने समीप समभक्ता
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है, तब वह कभी किसी की निन्दा नहीं करता—यही वह परमात्मा है, जिसके विषय में तुमने मुझसे पूछा था ।
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जो जल से पहिले हिरण्यगर्भ रूप में उत्पन्न हुया था, सब से पहिले तप से उत्पन्न हुया था, जीवधारियों की हृदय-गुफा में प्रवेश कर जो सभी जीवात्माओं के साथ निवास करता है, उस परमात्मा को जो बुद्धिमान पुरुष देखता है—वही ठीक देखता है । नचिकेता, वही वह ब्रह्म है, जिसके विषय में तुमने प्रश्न किया था ।
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प्राणों और प्राणियों के सहित जो देवमयी ज्योति से उत्पन्न हुई है तथा जो हृदय रूपी गुफा में प्रवेश करके वहीं निवास करती है, उसे जो पुरुष देख लेता है, वही यथार्थ में देखता है । यही वह ब्रह्म है, जिसके बारे में तुमने प्रश्न किया था ।
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जैसे गर्भिणी स्त्री के द्वारा शुद्ध अन्न-जल आदि आहार और नियमित संयम करने से स्वस्थ और परिपुष्ट बालक गर्भ में छिपा रहता है और यथासमय श्रद्धा, प्रीति एवं प्रसव-वेदना रूप मन्त्रों के द्वारा उत्पन्न होता है, उसी प्रकार ऋग्वर और उत्तर अरणि (यज्ञ में मथकर आग निकालने वाली अरणि लकड़ी के ऊपर और नीचे का भाग) के अन्तर अग्नि देवता छिपे रहते हैं जो एकाग्रता श्रद्धा द्वारा की गयी स्तुति से अरणि-मन्थन द्वारा प्रकट हुये करते हैं । इसके बाद हवन-सामग्री द्वारा इन्हें सन्तुष्ट करते हैं । यही अग्निदेव सर्वज्ञ परमेश्वर के रूप हैं । नचिकेता, जिन्हें तुम पूछ रहे तो वह यही ब्रह्म है ।
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जहाँ से सूर्य उदय होकर जहाँ विलीन होते हैं, सभी देवता उसी में समर्पित हैं । उस परमात्मा को कोई भी नहीं लांघ सकता—यह वही ब्रह्म है जिसके विषय में तुमने मुझसे पूछा था ।
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जो परमात्मा यहाँ है वही वहाँ (परलोक में) भी है, जो वहाँ है वही यहाँ (इस लोक में) है। जो मनुष्य परमात्मा को ध्यानेक की भाँति समभता है, वह बारंबार जन्मता और मरता है।
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यह परमात्मतत्त्व शुद्ध मन से प्राप्त किये जाने योग्य है, इस संसार में एक परमात्मा के सिवाय और कुछ नहीं है। इसलिए जो पुरुष इस संसार में परमात्मा को ध्यानेक भाँति से समभता है, वह बार-बार पैदा होता है और मरता है।
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परमपुरुष परमात्मा शरीर के मध्य भाग हृदयाकाश में अंगुष्ठ मात्र परिमाए से स्थित है। जो तीनों काल का शासन करने वाला है, उसे जान लेने पर मनुष्य किसी की निन्दा नहीं करता। यह वही परमात्मा है, जिसे तुमने पूछा था।
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अंगुष्ठमात्र परिमाए वाला परमपुरुष परमात्मा सूर्यरहित ज्योति के समान है। भूत, भविष्य और वर्तमान पर शासन करने वाला वही परमात्मा अज है और वही कल है। यह वही नित्य सनातन ब्रह्म है, जिसे तुमने पूछा था।
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जैसे ऊँचाई पर बरसा हुत्रा पानी पहाड़ के विभिन्न स्थानों में चारों ओर फैल जाता है, उसी प्रकार विभिन्न धर्मों से युक्त देवता, राक्षस और मनुष्य आदि को पस्सात्मां से अलग देखकर उनकी उपासना करने वाला मनुष्य उन्हीं के पीछे दौड़ता है।
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लेकिन वही वर्षा का निर्मल जल यदि निर्मल जल में ही बरसता है तो वह उसी रूपा निर्मल जल ही होता है। न तो उसमें कोई विकार पैदा होता है और न वह बिखरता है। इसी प्रकार हे गोतमवंशीय नचिकेता, जो इस बात को अच्छी तरह जान गया है कि जो कुछ भी है वह सब परमात्मा ही है—उस संसार के सभी भोगों से अनासक्त मुनि की आत्मा ब्रह्म को प्राप्त होती है।
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मनुष्य के शरीररूपी नगर में दो-दो आँख, दो कान, नाक के दो छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और मूत्रेन्द्रिय ये साढ़े चार द्वार हैं। यह सतल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, श्रुति-प्रतिपाद्य परमात्मा की नगरी है। सर्वेन्द्रिपूर्ण और सर्वत्र समभाव रहते हुए भी भगवान् अपनी इस राजधानी ( मनुष्य देह ) में राजा की भाँति निवास करते हैं—ऐसा समक कर जो मनुष्य अपने शरीर-नगर के स्वामी परमात्मा का ध्यान आदि साधन करता है, वह कभी भी शोकग्रस्त नहीं होता। शोकरहित होने से सांसारिक बन्धनों से छूट कर वह मुक्त हो जाता है।
जो परम पवित्र परम धाम में रहने वाला स्वयं प्रकाश परमात्मा है वही ऋग्वेदादि में विचरने वाला वसु, नामक देवता है। वही ऋतु-ऋतु रूप में गृहस्थों के घरों में पहुँचते हैं। वही यज्ञ-वेदी की ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमें आहुति देने वाले होते हैं। वही परमात्मा मनुष्य रूप में स्थित हैं, वही मनुष्यों से श्रेष्ठ पितर देवता आदि रूप में स्थित हैं। वही आकाश और सत्य में प्रतिष्ठित हैं, वही जल में मछली, शंख, सूती आदि रूपों में प्रकट होते हैं। वही पृथ्वी में वृक्ष, लता, गुल्म, औषधि के रूप में प्रकट होते हैं। वही सत्कर्म और उसके फल के रूप में तथा पर्वतों में नद-नदी के रूप में प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियों से सभी की श्रेष्ठ महान् और परम सत्य तत्व हैं।
शरीर के इन्द्र प्राण, अपान आदि वायु तत्व की जो क्रियाएँ हुआ करती हैं, उन क्रियाओं को संचालित करने वाली उनमें क्रिया-शीलता पैदा करने वाली परमात्मा की शक्ति है। परमात्मा ही शरीर के इन्द्र रह कर प्राण-वायु को ऊपर चढ़ाते हैं और अपान वायु को नीचे गिराते हैं। उस सर्वश्रेष्ठ उपासना करने योग्य परमात्मा की सभी देवता उपासना करते हैं।
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जीवात्मा का स्वभाव है एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को ग्रहण करना। जब वह एक शरीर को छोड़कर निकल जाता है, तब उसके साथ इन्द्रियाँ और प्राण भी चले जाते हैं, उस समय देखने में उस मृत शरीर में कुछ भी नहीं शेष रह जाता, लेकिन सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म उस समय भी उसमें व्याप्त रहता है। यही वह ब्रह्म है जिसके सम्बन्ध में तुमने पूछा था।
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हे नचिकेता, निश्चय ही एक दिन मरने वाले मनुष्य आदि जितने प्राणी हैं, वे न तो प्राण की शक्ति से जीवित रहते हैं और न ग्रहण की शक्ति से ही। इन्हें जीवित रखने वाला केवल जीवात्मा है। प्राण और अपान वायु ये दोनों जीवात्मा के आश्रित रहते हैं। बिना जीवात्मा के ये एक क्षण भी शरीर में नहीं रह सकते। जीवात्मा के चले जाने पर ये भी इन्द्रियों के साथ शरीर से चले जाते हैं। हे गोतम वंश में उत्पन्न नचिकेता ! अब मैं तुम्हें बताऊँगा कि आदमी के मर जाने के बाद जीवात्मा का क्या होता है, वह कहाँ जाता है, किस प्रकार रहता है, और यह भी बताऊँगा कि उस सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मा का क्या स्वरूप है।
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सुनो नचिकेता, अपने-अपने शुभ कर्मों के अनुसार, शास्त्र-ज्ञान, गुरु-ज्ञान, सत्संग, शिल्या, कारोबार आदि साधनों के द्वारा मनुष्य देख कर, सुन कर, पढ़ कर जो अनुभव करता है, उसी के अनुसार उसके भाव बनते हैं, उसके ध्यान में वासना बनती है। जैसे जिसकी वासना दृढ़ होती है, उसी के अनुसार कोई प्राणी मरने के बाद वीर्य के साथ माता की योनि में प्रवेश कर दूसरा शरीर धारण करते हैं। इनमें जिनके पाप और पुण्य समान होते हैं वे मनुष्य के, जिनके पुण्य कम और पाप अधिक होते हैं वे स्थावर भाव अर्थात् जड़, वृक्ष आदि योनि को प्राप्त होते हैं।
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जो जीवात्माओं के कर्म के अनुसार उन्हें नाना प्रकार के भोगों को देने वाला तथा उनकी यथायोग्य व्यवस्था करने वाला प्रलय-काल में सब को ज्ञान होते ही जागते पर भी अपनी माया से नित्य जाग्रत रहता है। जो स्वयं ज्ञानमय है, उसका ज्ञान सदैव समान रहता है। वही यह ब्रह्म है, वही विशुद्ध परमतत्व है। उसी को शुद्ध तत्व और परमानन्द कहा जाता है। समस्त लोक उसी के आश्रय में रहते हैं। उसका कोई अतिक्रम नहीं कर सकता। उसके नियमों को कोई बदल नहीं सकता—उल्लंघन नहीं कर सकता। समस्त चराचर उसके शासन में है। कोई भी उसकी व्यापक महिमा को नहीं समभ सकता। यही है वह ब्रह्म—जिसके सम्बन्ध में तुमने पूछा था।
जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही निराकार अग्नि है उसमें कोई भेद नहीं है, लेकिन जब वह साकाररूप से प्रज्वलित होती है तब उन आधारभूत वस्तुओं का जैसा रूप होता है, वैसा ही आकार उस निराकार अग्नि का भी दिखाई देने लगता है। इसी प्रकार समस्त प्राणियों में एक ही परमात्मा निराकार रूप से निवास करता है। वह सब में समभाव से व्याप्त है। उसमें कोई भेद नहीं है। लेकिन फिर भी वह परमात्मा भिन्न-भिन्न प्राणियों में उन-उन प्राणियों के अनुरूप अनेक रूपों में प्रकाशित होता है।
जिस प्रकार एक ही वायु अलक्ष्य रूप से समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, लेकिन प्रकट में भिन्न-भिन्न वस्तुओं के संयोग से उन-उन वस्तुओं के अनुरूप गति और शक्ति वाला दिखाई देता है। उसी प्रकार सभी प्राणियों में रहनेवाला एक अन्तर्यामी परमात्मा भिन्न-भिन्न प्राणियों के संबंध से भिन्न-भिन्न रूप और शक्ति वाला दिखाई पड़ता है। इतना ही नहीं वह परमात्मा उन सब के बाहर भी अनन्त, असीम एवं विलक्षण रूप से स्थित है।
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जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड का प्रकाशक नेत्र सूर्य है। उसका प्रकाश प्राप्तिमात्र की आँखों का सहारा है। उसके प्रकाश की सहायता से लोग अनेक प्रकार के अच्छे-बुरे काम करते हैं, लेकिन सूर्य उनके नेत्र द्वारा किये जाने वाले दुष्कर्मों से तनिक भी लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सबके मन्तर निवास करने वाले भगवान् एक हैं, उन्हीं की शक्ति से प्राप्ति शक्तिशाली होता है। मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा नाना प्रकार के शुभ-अशुभ कर्म करता है। तदनुरूप फल भोगता है। परन्तु वे पाप-पुण्य परमात्मा पर लिप्त नहीं होते। क्योंकि वह सब में रहते हुए सर्वथा व्यासंग हैं।
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जो परमात्मा अन्तरात्मा बना हुआ सबके मन्तर निवास करता है, जो श्रद्धेय है, समस्त चराचर को अपने वश में रखता है। वही सर्वशक्तिमान् अपने एक ही रूप को अपनी माया से बहुत प्रकार का बना लेता है। जो ज्ञानी पुरुष ऐसे परमात्मा को सदैव अपने हृदय के मन्तर स्थित देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत परमानन्द मिलता है—दूसरों को नहीं।
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जो समस्त नित्य चेतन जीवात्माओं के भी नित्य चेतन आत्मा हैं, जो एक होकर भी अनन्त जीवों के भोगों को कर्मानुसार निर्माण करते हैं, ऐसे सर्वशक्तिमान् भगवान् को जो ज्ञानी अपने हृदय के मन्तर ही देखते हैं, उन्हें ही परम शान्ति मिलती है। दूसरों को नहीं।
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ज्ञानी लोग उस परमानन्द और परम शान्ति को ही परब्रह्म मानते हैं। जिसे मन और वाणी से नहीं बताया जा सकता है, उस परमानन्द स्वरूप परमात्मा को मैं प्रत्यक्ष रूप से कैसे जानूँ, क्या वह प्रत्यक्ष प्रकट होता है अथवा उसकी अनुभूति होती है, उसका ज्ञान किस प्रकार होता है?
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उस स्वयं ज्योतिर्मय, सर्वोपरि ज्ञाननद्मय परब्रह्म के समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता। सूर्य का आंशिक तेज उसके असीम तेज के सामने उसी प्रकार बिलीन हो जाता है जैसे सूर्य के प्रकाश में जुगनू की चमक। चन्द्रमा, नक्षत्र और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते तब फिर अग्नि की बात ही क्या?
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उस परमब्रह्म के प्रकाशित होने पर ही सूर्य, चन्द्र आदि प्रकाशित होते हैं। उसी के प्रकाश से यह सम्पूर्ण जगत प्रकाशित हो रहा है।
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जिसकी जड़ बना हुआ परमात्मा ऊपर ( सर्वश्रेष्ठ ) है और जिसकी मुख्य डाल ब्रह्मा तथा छोटी-मोटी डालें देव, पितर, मनुष्य, पशु आदि कर्म से नीचे हैं। ऐसा यह अश्वत्थ रूप पीपल का वृत्त सनातन काल से है। कभी प्रत्यक्ष रूप से और कभी अप्रत्यक्ष रूप से अपने कारण स्वरूप ब्रह्म में नित्य निवास करता है, इसीलिए सनातन है। इसका जो मूल कारण है, जिससे यह उत्पन्न होता है, जिससे सुरक्षित है और जिसमें विलीन होता है वही दिव्य तत्व है, वही ब्रह्म है, उसी को अमृत कहते हैं, तथा सब लोग उसी के आश्रित रहते हैं। उसका कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता। नचिकेता, वह यही तत्व है, जिसके बारे में तुमने पूछा था।
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जो कुछ भी देखा, सुना और कहा जाता है और जो कुछ जगत है, वह परब्रह्म से ही आदिभूत हुआ है। उस प्राण स्वरूप परमात्मा में ही चेष्टा करता है, इस उठे हुए वज्र के समान महान् भयंकर परमात्मा को जो जानते हैं वे जन्म और मृत्यु से छूटकर अमर हो जाते हैं।
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इसो के भय से ंग्रभ्नि तपता है, इसी के भय से इन्द्र, वायु ंऔर पाँचवें मृत्यु देवता अपने-अपने कायों में प्रवृत्त होते हैं।
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यदि मृत्यु से पहले हो साधक, परमात्मा का साक्षात् कर सके तब तो ठीक हैं, ंअन्यथा ंअनेक युगों ंऔर कलपों तक ंअनेक लोकों ंऔर योनियों में जन्म लेने के लिए उसे विवश होना पड़ता है।
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जैसे स्वच्छ दर्पंण में सामने ंआयी हुई वस्तु दिखाई पड़ती है, उसी प्रकार शुद्ध ंअन्तःकरण में परमात्मा के दर्शन हुूश्य करते हैं। जैसे स्वप्न से वस्तु धुँधली दिखाई पड़ती है, उसी प्रकार पितृलोक में परमात्मा के ंअस्पष्ट दर्शन होते हैं। जैसे जल में परछाईं दिखाई पड़ती है, उसी प्रकार गन्धर्व लोक में परमात्मा के दर्शन होते हैं। किन्तु ब्रह्मलोक में तो छाया ंऔर धूप की तरह जीवात्मा ंऔर परमात्मा के रूप पृथक्-पृथक् दिखाई देता है।
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शब्द, स्पर्श ंआदि विषयों के ंअनुभव-स्वरूप ंअलग-्अलग कार्य करने के लिए भिन्न-भिन्न रूप में पैदा हुई इन्द्रियों की जो ंअलग-्अलग सत्ता है ंऔर जो उनका उदय हो जाना तथा लय हो जाना-रूप स्वभाव है, उसे जान कर धीर पुरुष शोच नहीं करता।
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इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि उत्तम हैं, बुद्धि से ऊँचा उनका स्वामी जीवात्मा है ंऔर जीवात्मा से ंअव्यक्त शक्ति उत्तम है। ंअव्यक्त से वह व्यापक, निराकार परमपुरुष श्रेष्ठ है, जिसे जान कर जीवात्मा मुक्त हो जाता है ंऔर ंचैतन्य स्वरूप, ंज्ञानन्द-मय ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
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इस परमात्मा का वास्तविक रूप साधारण मनुष्य अपनी इन ंआँखों से नहीं देख सक्ता। जो भगवान् श्रद्धा-सम्पन्न मन से उसका चिन्तन करता है, विशुद्ध हृदय से उनके दिव्य-स्वरूप का
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ध्यान करता है; वही विशुद्धात्मा बुद्धिरूप नेत्रों से परमात्मा के दिव्य रूप को देख सकता है। इस परमात्मा को जानने वाला अमृत (अमर) बन जाता है।
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जब मन के सहित पाँचों इन्द्रियाँ अच्छी तरह निश्चल हो जाती हैं, और बुद्धि भी निश्चेष्ट बन जाती है; उस स्थिति को योगी लोग परमगति कहते हैं। इन्द्रिय, मन और बुद्धि की स्थिरता का ही नाम योग है—ऐसा योगी लोग मानते हैं, क्योंकि उस समय साधक प्रमादरहित हो जाता है। परन्तु यह योग उदय और अस्त होने वाला है इसलिए परमात्मा की प्राप्ति के लिए साधक को निरन्तर योगयुक्त रहना चाहिए।
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वह परमात्मा मन, वाणी और नेत्रों द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता, क्योंकि वह इन्द्रियों की पहुँच से बाहर है। लेकिन वह अवश्य, जो कोई उस ब्रह्म को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा रखते हैं उन्हें वह अवश्य मिलता है। इस बात पर जिसका विश्वास ही नहीं है, उसे वह कैसे मिलता है?
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इसलिए साधक को चाहिए कि पहले वह परमात्मा की सत्ता पर विश्वास करे, फिर इसी विश्वास से उन्हें स्वीकार करे और उसके पश्चात् तत्व नित्तन द्वारा निरन्तर उसका ध्यान करके उन्हें प्राप्त करे। जब साधक इस निश्चित विश्वास से 'भगवान्' को स्वीकार कर लेता है—कि वह अवश्य हैं—तब परमात्मा का तत्वरूप अपने-आप उसके सामने प्रत्यक्ष हो जाता है।
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मनुष्य का हृदय लौकिक पारलौकिक अनन्त कामनाओं से सदैव भरा रहता है। यही कारण है, कि वह परमात्मा की प्राप्ति का उपाय सोच ही नहीं पाता। कामनाओं की अभिलाषा के सामने परमात्मा को प्राप्त करने की इच्छा भी उसमें उत्पन्न ही नहीं होती। इस प्रकार की ये सब कामनाएँ जब साधक के हृदय से
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नष्ट हो जाती हैं, तबो वह श्रेष्ठधर्मा मनुष्य भ्रमर हो जाता है और इसी मनुष्य-शरीर ही में वह परमात्मा का साक्षात्कार कर लेता है।
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जब मनुष्य के हृदय की ग्रहंता और ममता की गांठें बिल्कुल कट जाती हैं, उसके सब प्रकार के संशय नष्ट हो जाते हैं और परमात्मा की सत्ता पर उसे दृढ़ विश्वास हो जाता है, तब वह इसी मानव-देह से ही ईश्वर का साक्षात्कार करके भ्रमर हो जाता है। वस नचिकेता, वेदान्त का इतना ही निचोड़ है।
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अन्तर्यामी, परब्रह्म परमात्मा हृदय के अंगुरुष्ठ मात्र रूप से सदा सब के हृदय में निवास करते हैं। लेकिन फिर भी श्रद्धालु उन्हें देख नहीं पाता। जो प्रमाद छोड़ कर उनकी प्राप्ति के लिये निरन्तर साधन किया करते हैं, उन्हें चाहिए कि वे शरीरस्थ परमात्मा को उसी तरह बिलचखा और पृथक् समभें जैसे साधारण लोग सींक को मुंज से पृथक् समझते हैं। इसी प्रकार वह शरीर और आत्मा के भीतर रहने वाला परमात्मा उन दोनों से सर्वथा विलचखा है। वही विशुद्ध चैतन्य है, वही विशुद्ध अमृत है।
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इस प्रकार यमराज के द्वारा दिये गए उपदेश को तथा उनके द्वारा बतायी गयी समस्त विद्याओं और योग की विधियों को प्राप्त कर नचिकेता जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त, विकार रहित एवं विशुद्ध होकर ब्रह्म को प्राप्त हो गया।
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दूसरा जो कोई भी इस आध्यात्मिक विद्या को इसी प्रकार जान लेता है वह भी निर्विकार, विशुद्ध होकर ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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(तीनों प्रकार के ताप शान्त हों)
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अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा के अन्तर्गत ‘प्रश्नोपनिषद्’ है। इसमें महर्षि पिप्पलाद ने ६ ऋषियों के ६ प्रश्नों के उत्तर क्रमशः दिये हैं जो ब्रह्म विवेचन से संबंधित हैं। प्रश्नों के कारण ही इसे ‘प्रश्नोपनिषद्’ कहा जाता है।
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शान्ति पाठ
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हे देवगण, भगवान का ष्याराधन करते हुए हम लोग दोनों कानों से कल्याणमय वचन सुनें। नेत्रों से कल्याण ही देखें। हमारे शरीर के ष्यंग-ष्यंग सुदृढ़ हों। हमें ऐसी ष्यायु मिले जो परमात्मा के काम आ सके। उनके ष्यानुकूल रहने से हमारी सारी इन्द्रियाँ सन्मार्ग में लगी रह सकती हैं। यशस्वी इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, विट्र विनाशक गरुड़, और बुद्धि के स्वामी बृहस्पति ये सभी देवता भगवान का दिव्य विभूतियाँ हैं। ये सभी हमारे कल्याण का पोषण करें।
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उँ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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(तीनों प्रकार के तापों की शान्ति हो।)
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प्रथम प्रश्न
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परम्परागत यह प्रसिद्ध है, कि भरद्वाज के पुत्र सुकेशा, शिविकुमार सत्यकाम, गर्ग गोत्र में उत्पन्न सौर्यायणी; कोसल
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निवासी स्याश्वलांघन, विदर्भ निवासी भार्गव, और कतय के प्रपौत्र कबन्धी—ये तीन वेदपरायण, ब्रह्मनिष्ठ ऋषि परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा रख बाहर निकले। ब्रह्म की खोज करते हुए ये सत्वर यहाँ समभकर कि पिप्पलाद ऋषि ब्रह्म के विषय में सब कुछ बता देंगे—ऋजुज्ञासु के वेश में हाथ में समिधा लिये हुए उनके पास पहुँचे।
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ब्रह्म की जिज्ञासा लेकर उन्हें अपने पास आए हुए देखकर पिप्पलाद ऋषि ने कहा—तुम लोग तपस्वी हो, तुमने ब्रह्मचर्य व्रत रखकर वेद-वेदांगों का अध्ययन किया है, फिर भी मेरे आश्रम में एक वर्ष तक रहकर तपश्चर्या करो। इसके बाद जो इच्छा हो प्रश्न करना। यदि तुम्हारे पूछे हुए विषयों का ज्ञान मुझे होगा, तो निश्चय ही मैं उन्हें भली भाँति तुम्हें समझाऊँगा।
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ऋषि के आदेशानुसार उन लोगों ने एक वर्ष तक ब्रह्मचर्यपूर्वक उसी आश्रम में तपस्या की। इसके बाद सब मिलकर ऋषि के पास गए। उनमें से कबन्धी ने श्रद्धा और विनयपूर्वक पिप्पलाद मुनि से पूछा—भगवन्, जिससे समस्त चराचर जीव विविध रूपों में पैदा होते हैं, जो उन जीवों का परम कारण है—वह कौन है?
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पिप्पलाद बोले, प्रिय कबन्धी, वेदों में यह बात प्रसिद्ध है, कि समस्त जीवों के स्वामी परमात्मा को सृष्टि के आरम्भ में जब प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा हुई तो उन्होंने संकल्प रूप तप किया। उस तपस्या से उन्होंने रयि और प्राण का जोड़ा पैदा किया। उन्हें उत्पन्न करने का उद्देश्य यह था कि दोनों मिलकर मेरी विविध प्रकार की प्रजाओं को उत्पन्न करेंगे।
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यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत् रयि और प्राण इन दोनों तत्वों के समन्वय से बना है। प्रत्येक दिखायी देने वाला यह सूर्य ही प्राण है और यह चन्द्रमा ही रयि है। पृथ्वी, जल, तेज यह सब
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आकार वाले और आकाररहित—ये सब ऋषि हैं। इसलिए देखी और जानी जाने वाली सभी वस्तुएँ ऋषि हैं।
रात के बाद जब सूर्य उदय होकर पूर्व दिशा में अपना प्रकाश फैलाता है, उस समय वहाँ के प्राणियों की जीवननी शक्ति को सूर्य की किरणों के साथ सम्बन्ध होकर उसमें नवीन चेतना आ जाती है। इस प्रकार जिस दिशा में जहाँ-जहाँ सूर्य अपना प्रकाश फैलाता है, वहाँ के प्राणियों को वह स्फूर्ति देता है। इसीलिए सूर्य ही समस्त प्राणियों का प्राण है।
प्राणियों के अंतर स्थित वैश्वानर नाम की जो उदराग्नि अग्नि पचाया करती है वह सूर्य का ही अंश है। इसलिए सूर्य ही है। तथा जो प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान—इन पाँच रुपों में विभक्त प्राण है, वह भी इस सूर्य का ही अंश है, अतः सूर्य ही है।
किरण-जाल से घिरा हुताश्र प्रकाशमान और प्रतापी यह सूर्य संसार के समस्त रुपों का केन्द्र है। सभी रंग, रुप और आकृतियाँ इसी से प्रकाशित होती हैं। यह सविता ही सव का उत्पत्ति-स्थान है। यही सव को जीवन-ज्योति का मूल-स्रोत है। समस्त जगत् का प्राण बना हुआा सूर्य एक ही है। यह सहस्र किरणों वाला सूर्य हमारे मणकों प्रकार के त्यचहार, सिद्ध करता हुत्या उदय होता है। समूूर्ण सृष्टि का जीवनदाता प्राण ही सूर्य रुप में उदय होता है।
बारह महीनों का यह संसार रुप काल ही मानों सृष्टि के स्वामी परमेश्वर का स्वरुप है। उत्तरायण और दक्षिणायन इसके दो अयन हैं। दक्षिणायन में छह मास तक सूर्य जो दक्षिण की ओर घूमता है वे इसके दक्षिण अंश हैं और उत्तरायण के छह महीने उसके उत्तर अंश हैं। उनमें उत्तर अंश तो प्राण
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है श्रोऔर दक्षिएा शृंग रयि है । जो लोग यज्ञ, दान, स्वाध्याय श्रादि सत्कर्म सकाम भाव से करते हैं वे चन्द्रमा के लोक का प्राप्त होते हैं। वे : हो वार-वार श्राकर इस संसार में जन्म लिया करते हैं। इसलिए सन्तान की कामना वाले ऋषिोषगण दक्षिएा मार्ग को प्राप्त होते हैं । निःसन्देह यही रयि हैं । जो पितृयान नाम का मार्ग है ।
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जो श्रद्धा श्रोऔर श्रध्यात्म विद्या के द्वारा ब्रह्मचर्य व्रतपूर्वक तपस्या करते हुए सूर्य रूप ब्रह्म की खोज करते हैं, वे उत्तरायण मार्ग से सूर्य लोक को जीत लेते हैं। यह सूर्य ही प्राणों का केन्द्र है। यह श्रमर श्रोऔर भयरहित है। यह परमगति है, इससे पुनः लौटकर नहीं श्राते ! इसलिए वह बार-बार जन्म लेने से रुकता है। इसी बात को स्पष्ट करने वाला यहाँ श्रागे का श्लोक है—
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जो लोग इस सूर्य को पाँच चरखों वाला सब का पिता, बारह श्राकृतियों वाला, जल का उत्पादक श्रोऔर स्वर्ग लोक से भी ऊपर के लोक में स्थित बतलाते हैं । तथा वे दूसरे शनेक लोग विशुद्ध सात पहियों वाले श्रोऔर छह श्वारों वाले रथ में बैठा हुआ्य एवं भय्री-भ्राँति जानने वाला—ऐसा बतलाते हैं ।
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महोना हो प्रजापति है, उसका कृष्ण पक्ष रयि श्रोऔर शुक्ल पञ्ञ पाह है । इसलिए कल्याएा की कामना वाले ऋषि शुक्ल पञ्ञ में यज्ञ, दान श्रादि कर्म करते हैं, श्रोऔर दूसरे सकाम भाव से यज्ञ श्रादि करने वाले कृष्ण पक्ष में किया करते हैं ।
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दिन श्रोऔर रात का जोड़ा ही प्रजापति है, उसका दिन ही प्राएा है। रात ही रयि है। जो दिन में स्त्री प्रसंग करते हैं, वे लोग निःसन्देह अपने प्राएों को जीरा करते हैं। तथा जो मनुष्य रात में स्त्री-सहवास करते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है ।
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वह्नि ही प्रजापति है, क्योंकि इसी से वह वीर्य उत्पन्न होता है, जिससे सम्पूर्ण चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं।
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जो कोई उस प्रजापति व्रत का अनुष्ठान करते हैं, वे जोड़े को उत्पन्न करते हैं। जिनमें तप और ब्रह्मचर्य हैं तथा जिनमें सत्य प्रतिष्ठित है। उन्हें यह ब्रह्मलोक मिलता है।
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जो झूठ, कपट, माया और कुटिलता से रहित हैं, उन्हें यह विशुद्ध, विकाररहित ब्रह्मलोक मिलता है।
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द्वितीय प्रश्न
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इसके बाद विदर्भ निवासी भार्गव ऋषि ने पिप्पलाद ऋषि से प्रश्न किया—भगवन्, प्रजा को कितने देवता धारण करते हैं, उनमें से कौन-कौन इसे प्रकाशित करते हैं। उन सब में श्रेष्ठ कौन है?
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महर्षि पिप्पलाद बोले—वैसे तो सब का आधार स्वरूप आकाश देवता ही है, परन्तु उसमें उत्पन्न वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के चारों महाभूत भी शरीर को धारण करते हैं। इन्हीं से स्थूल शरीर की रचना हुई है। वाणी आदि पाँच कर्म इन्द्रियाँ, नेत्र, कान आदि ज्ञान इन्द्रियाँ एवं मन आदि अन्तःकरण ये चौदह देवता इस शरीर के प्रकाशक हैं। ये देवता देह को धारण और प्रकाशित करते हैं। इसीलिए प्रकाशक देवता कहे जाते हैं।
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ये सब देह के प्रकाशक बनने से गर्व में चूर होकर आपस में कहने लगे कि हमने इसे शरीर को आश्रय देकर धारण किया है।
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तब उन सब में श्रेष्ठ प्राण बोला—तुम लोग मोह में न पड़ो, मैंने ही अपने इस स्वरूप को पाँच विभागों में विभक्त कर इस शरीर को आश्रय देकर धारण किया है। यह सुनकर भी उन्हें विश्वास न हुआ।
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तब प्राण ऋभिमानपूर्वक मानो उस शरीर से बाहर निकलने लगा। उसी के साथ अन्य सब भी बाहर निकलने लगे और उसके लौटने पर सब इधर-उधर भी लौट कर उसी शरीर में ठहर गए। तब जैसे मधुमक्खियों का राजा छत्ते से उड़ने लगता है और उसी के साथ बैठी हुई अन्य मक्खियाँ भी उड़ चलती हैं। उसके बैठ जाने पर सब की सब बैठ जाती हैं। यही दशा इन सब यज्ञ श्रादि देवताओं की है। ऋत: वागी, नेत्र, कान, और मन श्रादि सब प्रसन्न हो प्राण का स्तुति करने लगे। यह प्राण ही ऋग्नि रूप से तपा करता है। यही सूर्य है। यही मेघ, इन्द्र और वायु है। यही देवता पृथ्वी और जीवों का समुदाय है। सत् और असत् तथा उसे भी श्रेष्ठ जो अमृत रूप परमात्मा है। वह भी यही प्राण है।
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जैसे रथ के पहिये की नाभी में लगे हुए और नाभी के ही श्राश्रित रहते हैं। उसी प्रकार ऋग्वेद की सारी ऋचाएँ, यजुर्वेद के सब मंत्र, समूचा सामवेद तथा उनके द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञ श्रादि शुभकायँ करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय श्रादि ये सब प्राण के आधार पर ही श्राश्रित हैं।
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हे प्राण तू प्राणियों का ईश्वर है; तू ही गर्भ में विचरने वाला और माता-पिता के अनुरूप सत्कान के रूप में जन्म लेने वाला है। ये सब जीव तुझे ही भेंट समर्पित करते हैं। तू ही प्राण श्रादि सब प्राणों के सहित सब के शरीर में स्थित हो रहा है।
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हे प्राण तू देवताओं के लिए उत्तम श्रग्नि है। पितरों के लिए उत्तम स्वधा है। ऋथर्वाङ्गिरस श्रादि ऋषियों द्वारा अनुभव किया गया सत्य तू ही है।
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हे प्राण, तू तेज से सम्पन्न इन्द्र, रुद्र और रक्षा करने वाला है, तूही ज्ञान्तरिक्ष में भ्रमण करता है। तूही समस्त तारागणों का स्वामी सूर्य है।
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हे प्राण, तू सब प्रकार के तेज से सम्पन्न तीनों लोकों का स्वामी इन्द्र है। तू ही प्रलयकाल में सबका संहार करने वाला रुद्र है तूही सब की भली-भाँति रक्षा करने वाला है। तू ही पृथ्वी और श्राकाश के बीच भ्रमण करने वाला वायु है। और तू ही श्रग्नि, सूर्य, चन्द्र तथा तारागण श्रादि ज्योतियों का स्वामी है।
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हे प्राण, जब तू श्रच्छी तरह पानी बरसाता है, उस समय तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा यह श्राशा करती हुई कि जीवन निर्वाह के लिए यथेष्ट श्रन्न उत्पन्न होगा—ग्रानन्द में मग्न हो जाती है।
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हे प्राण तू संस्कार रहित होकर भी सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। हम लोग तेरे लिए भोजन को देने वाले हैं श्रौर तू उसे खाने वाला है। समस्त जगत् का श्रेष्ठ स्वामी तू ही है। हे श्राकाश में घूमने वाले वायुदेव, तू हमारा पिता है।
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हे प्राण, जो तेरा स्वरूप, वाणी, कान नेत्र, श्रादि सभी इन्द्रियों और मन; ग्रन्तःकरण श्रादि सभी में व्याप्त है, उसे तू करुणामय बना ले—यही हमारी प्रार्थना है।
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प्रत्यक्ष जगत् श्रौर स्वर्ग में जो कुछ भी स्थित है, वह सब प्राण के श्राधीन है। हे प्राण तू हमारी रक्षा माता-पिता की भाँति कर। हमें श्रद्धा, ऐश्वर्य श्रौर बुद्धि प्रदान कर।
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इसके बाद कोसल निवासी श्राश्वलायन ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा—भगवन, यह प्राण किससे उत्पन्न होता है, इस शरीर में इसे
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प्राण है। अपने को किस प्रकार विभाजित कर स्थित होता है ? किस प्रकार शरीर से बाहर निकलता है, किस प्रकार बाहरी संसार को धारण करता है ? किस प्रकार मन और इन्द्रचापि शरीर के भीतर रहने वाले जगत् को धारय करता है ? यही मेरा प्रश्न है।
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महर्षि पिप्पलाद बोले—ऋषि ! आश्वलायन, तुम बहुत ही कठिन प्रश्न पूछ रहे हो। लेकिन तुम वेदों के विशेषज्ञ हो, इसलिए मैं तुम्हें इन प्रश्नों का उत्तर समभाने की रहा हूँ।
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यह प्राण परमात्मा से उत्पन्न होता है, जैसे छाया पुरुष के अधीन रहती है, उसी प्रकार यह प्राण परमात्मा के अधीन रहता है। यह इस शरीर में मन द्वारा किए गए संकल्प से प्राण है।
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जिस प्रकार चक्रवर्ती सम्राट् भिन्न-भिन्न गाँवों, नगरों, मंडलों और प्रदेशों का प्रबंध योग्य अधिकारियों को नियुक्त करके करता है, उसी प्रकार यह सर्वश्रेष्ठ प्राण भी अपने अंग रूप अपान, व्यान प्राणादि को शरीर के भिन्न भिन्न स्थानों में कार्य करने के लिए नियुक्त कर देता है।
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यह प्राण, गुदा और उपस्थ स्थान में अपान को नियुक्त रखता है, स्वयं मुख और नासिका द्वारा विचरता हुआ प्राण आँखों और कानों में स्थित रहता है। शरीर के मध्य भाग में समान वायु को नियुक्त करता है। यह समान वायु ही प्राणादि में हवन किए हुए अन्न को समस्त शरीर में यथायोग्य समभाव से पहुँचाता है, उससे दो आँखें, दो कान, दो नाक के छिद्र और एक जीभ—ये सातद्वार उत्पन्न होते हैं। उस रस से परिपुष्ट होकर ही ये अपनाअपना कार्य करने में समर्थ होते हैं।
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यह जीवात्मा हृदय प्रदेश में निवास करता है, उसमें एक सा नाड़ियों का समुदाय है। उनमें प्रत्येक नाड़ी में सौ-सौ शाखाएँ
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हैं। प्रत्येक नाड़ी की शाखा की बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखाएँ होती हैं। इन्हीं में व्यान वायु विचरता रहता है।
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उपर्युक्त ७२ करोड़ नाड़ियों के अतिरिक्त एक श्रौर नाड़ी सुषुम्ना है, जो हृदय से निकलकर ऊपर मस्तक में गयी है। उसके द्वारा उदानवायु शरीर में ऊपर की श्रोर विचरता करता है। अन्य वान्, पुरुषात्मा मनुष्यों को यह' उदान वायु अन्य सब प्राण और इन्द्रियों सहित इस शरीर से निकालकर स्वर्गलोक ले जाता है। पापात्माओं को कुत्सित, सुचिर स्वादि की योनियों में अथवा रौरव-नरक में ले जाता है। जिनके पाप-पुण्य का हिसाब बराबर रहता है, उन्हें फिर मनुष्य योनि में ले जाता है।
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इतना निश्चित रूप से समस्त लोग कि सूर्य ही सबका वाहक प्राण है। यहीं नेत्र सम्बन्धी प्राण पर अनुगत करता हुया उदित होता है। पृथ्वी में अपानवायु की शक्ति का प्रतिनिधि देता मनुष्य के प्राणन वायु को स्थित किए रहता है। पृथ्वी और स्वर्ग के बीच जो श्राकाश है, वह समान है और वायु ही व्यान है।
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अग्नि और सूर्य की जो गर्मी है वही उदान का बाह्य स्वरूप है। वह शरीर के बाहरी अंगों को ठंडा नहीं होने देता और शरीर के भीतर की गर्मी को स्थित रखता है। जिसके शरीर से उदानवायु निकल जाता है, उसका शरीर ठंडा पड़ जाता है। शरीर की गर्मी शान्त होते ही उसमें रहने वाला जीवात्मा मन्त्र में चिह्नित हुए इन्द्रियों को साथ लेकर उदान वायु के साथ-साथ दूसरे शरीर में चला जाता है।
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मरते समय जीवात्मा का जैसा संकल्प होता है, उसका मन अन्तिम समय में जिस भाव का चिन्तन करता है, उस संकल्प के हित मन, इन्द्रियों को साथ लिए हुए यह मुख्य प्राण में स्थित
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हो जाता है। वह मुख्य प्राण उदान वायु से मिलकर मन और इन्द्रियों के सहित जीवात्मा को उस शान्तिम संकल्प के अनुसार यथा-योग्य भिन्न-भिन्न लोक अथवा योनि में ले जाता है ?
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जो 'विद्वान् प्राण' के इस रहस्य को सम्यक् लेता है और सम्यक् कर हर प्रकार से उसे सुरचित रखता हैं, उसकी उपेक्षा नहीं करता उसकी वंश-परम्परा कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि उसका वीर्य श्रमोष हो जाता है। वह अमर हो जाता है। इस विषय पर निम्नलिखित श्लोक है—
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जो मुख्य प्राण को उत्पत्ति के रहस्य को जानता है, उसके निवास स्थान और उसकी व्यापकता को जानता है तथा बाहर कहाँ रहता है, भीतर कहाँ रहता है। इस रहस्य को श्रद्धा-त्मिक, आधिभौतिक पाँचों भेदों के रहस्य को भली-भाँति सम्यक् लेता है वह अमृत स्वरूप परमानन्द ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
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पाँचवाँ प्रश्न
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इसके बाद गार्ग्य ऋषि ने महर्षि पिप्पलाद से पूछा कि—भगवन्, जिस समय आदमी गाढ़ी नींद में सोया रहता है, उस समय शरीर में रहने वाली इन्द्रियों में से कौन इन्द्रियाँ सोती हैं। कौन-कौन जागती रहती हैं। स्वप्न वस्था में स्वप्न की घटनाओं को कौन-कौन देखता है। निद्रा अवस्था में सुख का अनुभव किसको होता है और सभी इन्द्रियाँ किसके आश्रित हैं।
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इस प्रकार गार्ग्य मुनि द्वारा जीवात्मा और परमात्मा का तत्व पूछने पर महर्षि पिप्पलाद बोले—हे गार्ग्य, जिस प्रकार सूर्यास्त के समय सूर्य की सभी किरणें एक होकर उसी तेज: पुंज में समा जाती हैं,
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से श्रेष्ठ इन्द्रिय मन में समा जाती है। उस समय जीवात्मा न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न चलता है, न मलमूत्र का त्याग करता है और न मैथुन का सुख भोग करता है।'
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उस समय मनुष्य के शरीररूप नगर में केवल पाँच प्राण रूप अग्नियाँ ही जागृत रहती हैं। निद्रा को यज्ञ का रूप देते हुए प्राण को ऋग्मि रूप बतलाकर पिप्पलाद ऋषि कहते हैं कि—प्राण गाहेपत्य अग्नि है, व्यान अग्नि पचाने वाली दक्षिणाग्नि है। गाहेपत्य अग्नि से उठाकर जो ले जाई जाती है, वह आहवनीय अग्नि है। उठाकर ले जाए जाने के कारण ही प्राण रूप है।
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उच्चैःश्वास और निःश्वास मानो ये दोनों आहुति हैं। जो इन दोनों को सब ओर पहुँचाता है वह 'समान' कहलाता है वही हवन करने वाला 'होता' कहलाता है। यह मन ही यजमान है। यज्ञ का अभीष्ट फल ही उदान है। यह उदान ही इस मनरूप यजमान को प्रतिदिन निद्रा के समय में ब्रह्मलोक भेजता है अर्थात् हृदयरूपी गुफा में ले जाता है।
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स्वप्नावस्था में जीवात्मा अपनी विभूति का अनुभव करता है, जो बार-बार देखा हुया है, उसी को बार-बार देखता है। बार-बार सुनी हुई बातों को बार-बार सुनता है। अनेक देशों और दिशाओं में प्राप्त किए हुए विषयों को बार-बार अनुभव में लाता है। देखे हुए और न देखे हुए, सुने हुए और न सुने हुए अनुभव किए हुए और अनुभव न किए हुए, विद्यमान और अविद्यमान को भी देखता है, सारी घटनाओं को सोचता और अनुभव करता है। स्वयं सब कुछ बनकर देखता है।
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यह मन जब उदान वायु में अभिभूत हो जाता है, उस समय
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जीवात्मा स्वप्नों को नहीं देखता, उस समय मनुष्य के शरीर में जीवात्मा की इस सुपुप्ति के सुख को अनुभव होता है ।
गार्ग्य, पाँचवीं बात जो 'तुमने कही है, उसे भी सभी मो—हे प्रिय, जिस प्रकार बहुत-से पक्षी वृक्ष पर श्राकर श्याराम से वसेरा लेते हैं, ठीक उसी प्रकार पृथ्वी श्रादि तत्वों से लेकर ब्रह्मा तक सबके सब परमात्मा में सुखपूर्वक श्राश्रय पाते हैं ।
पृथिवी श्रौर उसकी सूक्ष्म गन्ध, जल श्रौर उसका रस, तेज श्रौर उसका तनुय का रूप, वायु श्रौर उसका स्पर्श, श्राकाश श्रौर उसका शब्द, नेत्र श्रौर उससे दिखायी देने वाली वस्तुएँ, कान श्रौर उससे सुनायी पड़ने वाली वस्तुएँ, नाक श्रौर उससे सूँघी जाने वाली वस्तुएँ, जीभ श्रौर उसके स्वाद, त्वचा श्रौर उससे स्पर्श होने वाली वस्तुएँ, वाणी श्रौर उससे बोले जाने वाले शब्द, दोनों हाथ श्रौर उनके द्वारा की जाने वाली वस्तुएँ, उपस्थ ( मूतनेन्द्रिय ) श्रौर उसका विषय, गुदा श्रौर उससे परित्याग की जाने वाली वस्तु, दोनों पैर श्रौर उनके गन्तव्य स्थान, मन श्रौर उससे मनन।की जाने वाली वस्तु बुद्धि श्रौर उससे जानी जाने वाली वस्तु श्रहंकार श्रौर उसका विषय, चित्त श्रौर उसके चिन्तन में थ्याने वालीो वस्तु, प्रभाव श्रौर उसका विषय, श्रौर प्रारब्ध श्रौर प्रारब्ध द्वारा धारणा की जाने वाली वस्तु ये सभी परमात्मा के श्राश्रित हैं ।
यह जो कुछ देखने वाला, स्पर्श करने वाला, सुनने वाला, सूँघने वाला, स्वाद लेने वाला, मनन करने वाला, जानने वाला तथा कर्म करने वाला, विज्ञान-स्वरूप जीवात्मा है, वह भी श्रविनाशीपरमात्मा में भली-भाँति स्थित है ।
यह निश्चय पूर्वक कह रहा हूँ, कि जो कोई भी मनुष्य उन छाया रहित, शरीर रहित, रंग-रूप रहित, विशुद्ध, श्रविनाशी परमात्मा को जान लेता है, वह परम ब्रह्म परमात्मा को ही प्राप्त
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हो जाता है। हे सोम्य, जो कोई भी ऐसा है, वह सर्वज्ञ और सर्व रूप बन जाता है। इस विषय में निम्नांकित श्लोक है—
सब के परमकारण परमात्मा ही समस्त प्राणियों, सभी जीवों सभी इन्द्रियों और आत्मा के आश्रय हैं। हे सोम्य, उस अक्षर, अविनाशी परमात्मा को जो जान लेता है, वह सर्वज्ञ, स्वरूप परमात्मा में लीन हो जाता है। इस प्रश्न का उत्तर समाप्त हुत्रा।
पाँचवाँ प्रश्न
इसके बाद सत्यकाम ने ॐकार के विषय में प्रश्न करते हुए जिज्ञासा प्रकट की कि—जो मनुष्य जिन्दगी भर ॐकार की उपासना करता है, उसे क्या फल मिलता है, उसे कौन-कौन से लोकों की प्राप्ति होती है।
महर्षि पिप्पलाद बोले—प्रिय सत्यकाम, ॐ का लक्ष्य परब्रह्म है, और वह इससे भिन्न नहीं है। इसलिये वही परब्रह्म है और वही उस परब्रह्म से प्रकट हुत्रा उसका विराट् स्वरूप—अपर ब्रह्म भी है। इसलिये बुद्धिमान मनुष्य केवल एक प्रभाव का चिन्तन करता हुत्रा परब्रह्म अथवा अपर ब्रह्म में से किसी एक का श्रद्धानुसार अनुसरण करता है।
ऐसा उपासक यदि एक मात्रा से युक्त ॐ का भली-भाँति ध्यान करे तो वह उस उपासना से ही प्रेरित हुत्रा शीघ्र ही इस संसार में उत्पन्न होता है। उसे ऋग्वेद की ऋचाएँ मनुष्य शरीर प्राप्त करा देती हैं। वह तप, ब्रह्मकर्म और श्रद्धा से युक्त होकर महिमा का अनुभव करता है।
परन्तु यदि वह दो मात्राओं से युक्त ॐ का ध्यान करता है तो मन से उत्पन्न चन्द्रलोक को प्राप्त होता है। वह यजुर्वेद के
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मंत्रों द्वारा अन्तरिक्ष में स्थित चन्द्रलोक को ऊपर की ओर ले जाया जाता है। इसके बाद चन्द्रलोक के ऐश्वर्य का अनुभव कर वह पुनः पृथ्वी लोक में लौट आता है। परन्तु जो तीन मात्राओं वाले ॐ अक्षर के द्वारा परब्रह्म का ध्यान करता है। वह तेजोमय सूर्य लोक में जाता है। वह पापों से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे साँप केचुली छोड़ देता है। इसके बाद सामवेद की श्रुतियों द्वारा वह ऊपर ब्रह्मलोक पहुँचाया जाता है। वहाँ वह जीव समुदाय से श्रेष्ठ परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार कर लेता है। इस विषय में निम्नांकित दो श्लोक हैं—
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ॐ की तीन मात्राएँ अ, उ, म एक दूसरों से संयुक्त रहकर प्रयुक्त की गयी हों अथवा अलग-अलग एक ध्येय के चिन्तन में इनका प्रयोग किया गया हो। दोनों ही प्रकार से वे मृत्यु युक्त हैं। बाहर, भीतर और बीच की क्रियाओं में भली-भाँति इन मात्राओं का प्रयोग किए जाने पर उस ब्रह्म को जानने वाला ज्ञानी विचलित नहीं होता।
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एक मात्रा के ॐ की उपासना करने वाला उपासक ऋचाओं द्वारा मृत्यु लोक में पहुँचाया जाता है। दो मात्राओं से युक्त ॐ की उपासना करने वाला उपासक यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा चन्द्र लोक तक पहुँचाया जाता है। तीन मात्राओं से युक्त ॐ की उपासना करने वाला उपासक सामवेद की श्रुतियों द्वारा उस ब्रह्म लोक में पहुँचाया जाता है, जिसे केवल ज्ञानी लोग जानते हैं। विवेकी साधक केवल ॐ की उपासना से ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। वह ब्रह्म परम शान्त, जन्म, जरा और मृत्यु से रहित सर्वश्रेष्ठ है।
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छठा प्रश्न
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इसके बाद शान्त में ऋषि सुकेशा ने विपुलाद ऋषि से पूछा—भगवन्, कोसल देश के राजकुमार हिरण्यनाभ ने मेरे पास आकर यह प्रश्न पूछा कि—क्या तुम सोलह कलाओं वाले
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पुरुष को जानते हो। मैंने उस राजकुमार से ईमानदारी से कह दिया कि मैं नहीं जानता। यदि मैं उस सोलह कलापूर्ण पुरुष को जानता तो उसे श्रावय्य बतलाता। क्योंकि इतना तो मैं सब भली भाँति जानता हूँ कि जो झूठ बोलता है वह समूल नष्ट हो जाता है। इसलिए मैं झूठ बोलने का सामर्थ्य नहीं रखता। मेरी यह बात सुनकर वह राजकुमार रथ पर बैठ कर चुपचाप चला गया। उसी को मैं ग्राप से पूछ रहा हूँ, कि सोलह कलाओं से पूर्ण पुरुष कौन है ? और कहाँ रहता है।
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महर्षि पिप्पलाद ने कहा—हे सौम्य, सोलह कलाओं से पूर्ण यह पुरुष यहीं इस शरीर के ग्रन्दर ही रहता है।
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महासर्ग के प्रारम्भ में संसार के रचयिता परमात्मा ने ब्रह्माण्ड की रचना का विचार किया। उसने सोचा कि ऐसा कौन-सा तत्व डाला जाय जिसके न रहने पर मैं स्वयं भी उसमें रह न सकूँ।
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यह सोचकर उसने सबसे पहले प्राण की रचना की, प्राण के बाद श्रद्धा को उत्पन्न किया। उसके बाद क्रम से ग्राकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी इन पाँच तत्वों को उत्पन्न किया। फिर मन और इन्द्रियों की उत्पत्ति हुई। तदनन्तर ग्रन्न, से वीर्य, तथा विविध प्रकार के मन्त्र, कर्म और विभिन्न लोकों की रचना हुई और उन लोकों में नाम की रचना हुई।
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जिस प्रकार नदियाँ समुद्र को लक्ष्य बनाकर समुद्र की ओर बहती हुई उसमें मिल जाती हैं और मिलने के बाद उनका नाम रूप मिट कर समुद्र ही कहलाने लग जाता है, उसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त परमात्मा की सोलह कलाएँ जिनका आधार भी परमपुरुष है प्रलयकाल में उसे पाकर उसी में लीन हो जाती
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३५ : प्रश्नोपनिषद्
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हैं। तब वही कलाएँ केवल 'पुरुष' इस एक ही नाम से पुकारो जाने लगती है। वही यह कला रहित परमात्मा है, जिसके विषय में अगला श्लोक है—
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रथ के पहिये की नाभी के आधार पर जैसे तारे स्थित रहते हैं, उसी प्रकार परमात्मा में सभी कलाएँ स्थित रहती हैं। उस जानने योग्य सबके आधारभूत परमात्मा का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए जिससे हे शिष्यो, तुम्हें मृत्यु का दुःख न प्राप्त हो।
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महर्षि पिप्पलाद ने उनसे कहा कि पर ब्रह्म को मैं इतना ही जानता हूँ। इससे बढ़कर श्रेष्ठ कोई तत्व नहीं है। नहीं है।
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तब उन छहों ऋषियों ने मिलकर महर्षि पिप्पलाद को और कहा कि—आप हमारे पिता हैं, आपने हमें अविद्या से मुक्त कर दिया है। हे परम ऋषि, आपको नमस्कार है।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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( तीनों प्रकार के ताप शान्त हों )
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मुण्डकोपनिषद्
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अथर्ववेद को शौनक शाखा की उपनिषद् ‘मुण्डक’ है । इसमें ३ मुण्डक हैं और प्रत्येक मुण्डक में दो खण्ड है । इसमें ब्रह्म निरूपण और सृष्टिवाद ही मुख्य विषय है ।
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शान्ति पाठ
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हे देवगण, हम अपने कानो से कल्याणमय वचन सुनें । हमारा जीवन यज्ञ-परायण हो । हमारी आँखें सदैव शुभ दर्शन करती रहें । हमारा शरीर हमारे शरीर का एक-एक अंग सुपुष्ट हो । हमारी आयु भोग-विलास और प्रमाद में न बीते । यशस्वी इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, वितन विनाशक गरुड़ और बुद्धि के स्वामी बृहस्पति आदि भगवान की ये दिव्य विभूतियाँ देवता सदा हमारे कल्याण का पोषण करें । तीन प्रकार के ताप हमें पीड़ित न कर सकें ।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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प्रथम मुण्डक
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प्रथम खण्ड
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सर्व शक्तिमान परब्रह्म परमात्मा से सर्वप्रथम चतुर्मुख ब्रह्म उत्पन्न हुए । उनसे देवता, महर्षि और मरीचि आदि प्रजापति .
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पैदा हुए। साथ ही ब्रह्मा ने सभी लोकों की रचना कर उन सबकी रक्षा के लिए विधान और नियम बनाए। उनके सबसे बड़े पुत्र महर्षि अथर्वा थे। उन्हें ही ब्रह्मा ने सर्वप्रथम ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया। जिससे परब्रह्म और अपरब्रह्म दोनों का ज्ञान हो उसे ब्रह्मविद्या कहते हैं। यही सम्पूर्ण विद्याओं का श्राश्रय है।
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ब्रह्मा से प्राप्त ब्रह्मविद्या को अथर्वा ने अंगी ऋषि को बतलायी। अंगी ने भरद्वाज गोत्र में उत्पन्न सत्यवहु नाम के ऋषि को बतायी। भरद्वाज ने पर और अपरब्रह्म का ज्ञान कराने वाली ब्रह्मविद्या का उपदेश अंगिरा ऋषि को दिया।
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शौनक काल में एक बहुत बड़े विश्वविद्यालय के मुख्य आध्यात्मिक शौनक नाम के ऋषि थे। पुराणों में लिखा है, कि उनके ऋषि शिष्यल में तीन हजार ऋषि रहते थे। वे शौनक ऋषि ब्रह्म विद्या जानने के लिए, ब्रह्मचारी के वेष में हाथ में समिधा लिए हुए अंगिरा ऋषि के पास पहुँचे। विनय पूर्वक उनसे बोले— भगवान् जिसे जान लेने के बाद देखने, सुनने और मनन करने में आने वाली सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है। वह परम तत्व क्या है? वह कैसे जाना जाता है? कृपया बताइए?
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महर्षि अंगिरा बोले—प्रिय शौनक, ब्रह्मज्ञानी महर्षियों का कहना है, कि मनुष्य के लिए जानने योग्य परा और अपर ये दो विद्याें हैं।
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उन दोनों में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष ये शास्त्र अपरा विद्या के अन्तर्गत हैं। और जिससे अक्षर, अविनाशी, परब्रह्म परमात्मा का ज्ञान होता है वह पराविद्या है।
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जो न जाना जा सकता है और न जिसको ब्रह्मा किया जा सकता है। जिसका न कोई गोत्र है, न रंग है, न रूप है, न आँख, कान आदि इन्द्रियाँ ही उसमें हैं। ऐसा वह नित्य, अविनाशी, सर्वव्यापक, सूक्ष्म परमात्मा है। उसे समस्त प्राणियों के परम कारण को ज्ञानी लोग सदा देखते हैं।
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जैसे मकड़ी जाले को बनाती है और उसे निगल भी जाती है तथा जिस प्रकार पृथिवी में अनेक प्रकार की औषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे जीवीत मनुष्य से रोएँ और बाल पैदा होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी परब्रह्म से यह सारा संसार पैदा होता है।
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विज्ञानमय तप से परब्रह्म वृद्धिको प्राप्त होता है। उससे ऋतु, ऋत्न से कमशः प्राप्त, मन, सत्य, समस्तलोक, कर्म तथा कर्मों से अवश्यभावी सुख-दुःख रूप फल उत्पन्न होता है।
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जो सर्वज्ञ है, सर्वविद् है, जिसका ज्ञानमय तप है, उसी परमेश्वर से वह ब्रह्म रूप विराट् जगत् तथा नाम, रूप और ऋत्न आदि उत्पन्न होते हैं।
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दूसरा खण्ड
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यह निर्द्वन्द्व सत्य है, कि बुद्धिमान ऋषियों ने जिन कर्मों को वेद मंत्रों में देखा था वे तीन वेदों में अनेक प्रकार से व्याप्त हैं। हे सत्य को चाहने वाले मनुष्यों, तुम लोग उनका नियम पूर्वक अनुष्ठान करो। इस मनुष्य शरीर में तुम्हारे लिए यही शुभ कर्म की फल प्राप्ति का मार्ग है।
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जिस समय हवि को देवताओं तक पहुँचाने वाली प्रदीप्त अग्नि की लपटें लहलहाने लगती हैं, उस समय अग्नि में आहुति नहीं डालनी चाहिए। अग्नि को अच्छी तरह प्रज्वलित करके ही होम करना चाहिए।
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६२ : मुण्डकोपनिषद्
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प्रतिदिन हवन करने वाला मनुष्य यदि ग्रामवास और पूर्वीमह के दिन किए जाने वाले यज्ञों ( दर्श, पौर्णमास्य ) से रहित है। या चातुमास्य (चार महीने में पूरा होने वाला) यज्ञ अथवा शारद ऋौर वसन्त ऋतुओं में होने वाले इष्ट रूप यामयज्ञ यज्ञ नहीं करता तथा उसकी ऋतिथि शाला में ऋतिथियों का उचित सत्कार नहीं किया जाता, भोजन के समय वतिवैश्वदेव कर्म नहीं किया जाता तो उस अग्निहोत्र करने वाले मनुष्य को वह अंगहीन सातों लोकों से रहित बना देता है।
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काली, कराली (जिसमें आग लग जाने का डर रहता है) मनो. जवा (जो मन के समान चंचल) सुलोहिता (सुन्दर लाली लिए हुए) सुधूम्रवर्णा (सुन्दर धुएँ को लिए हुए ) स्फुलिगनी ( चिनगारियों वाली ) विशरुची ( सब ओर से प्रकाशित ) ये सात प्रकार की आग की लपटें मानो यज्ञ कुंड की अग्नि की हविर्भहण करने वाली लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं।
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उपयुक्त सात प्रकार की लपटों से युक्त प्रज्वलित अग्नि में जो कोई नित्य प्रति हवन करता है उसे मरते समय ये लपटें सूर्य की किरणें बनकर स्वर्गे पहुँचा देती है।
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वे प्रज्वलित आहुतियाँ सूर्य की किरणों के रूप में बदलकर मरते हुए उस अग्निहोत्री साधक से कहती हैं, कि आग्र्यो, आग्र्यो यह तुम्हारे शुभ कर्मों का फलस्वरूप स्वर्ग लोक है। ऐसी प्रिय वाणी से उसका सत्कार करती हुई किरण उसे सूर्य की किरणों के मार्ग से ले जाकर स्वर्ग में पहुँचा देती हैं।
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जिनमें उपासना रहित समान कर्मों का वर्णन है, ऐसी ये यज्ञरूप अठारह नौकाएँ हैं। जो हद या स्थिर नहीं हैं। इनके द्वारा संसार-सागर पार करना तो दूर रहा इस लोक में वर्तमान दुःख-
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रूप छोटी-सी नदी पार कर स्वर्ग तक पहुँचना असंभव है। इस रहस्य को न समझ कर जो ज्ञानी इन सकाम कर्मों को ही कल्याण-माग समभ कर इनकी साधना करते हैं, उन्हें निःसंदेह बारंबार वृद्धावस्था और मृत्यु के दु:ख भोगने पड़ते हैं।
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जैसे अन्य आदमी को मार्ग दिखाने वाला अन्य गड्ढे में गिरा देता है, वैसे ही अपने आप बुद्धिमान, विवेकी और पंडित समभने वाले मूर्ख लोग अविद्या के भीतर स्थित होकर वार वार चोटें सहते हुए भटकते ही फिरते हैं।
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अविद्या में डूबे हुए ऐसे ज्ञानी मनुष्य समभते हैं कि हमने अपने कर्तव्य का पालन कर लिया है। सांसारिक भोगों में उनकी अत्यन्त आसक्ति होने से वे केवल भौतिक उन्नति ही सोचा करते हैं, उन्हें इसका पता ही नहीं और न यह सोचते हैं कि परमानन्द के पार कोई परमात्मा भी है और मनुष्य उसे प्राप्त करता है। इसलिए सदैव दु:खी रहते हैं। पुण्यकमों के फल क्षीण हो जाने पर पुनः स्वर्ग से मृत्यु लोक में आ जाते हैं।
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इष्ट ( यज्ञ, दान आदि ) और पूर्त ( कुआं खुदाना, बगीचा लगाना ) कमों को ही श्रेष्ठ समभने वाले महामूर्ख लोग वास्त-विक श्रेय को नहीं पहचान पाते। वे पुण्यकमों के क्षीण हो जाने पर स्वर्ग से इस मृत्यु लोक में अथवा निकृष्ट योनि में प्रवेश करते हैं।
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लेकिन जो तपोवनों में रहकर शान्ति पूर्वक तप करते हैं, केवल मिद्धा के लिए ही पर्यटन करते हैं। संयम, श्रद्धा और तप का सेवन करते हैं वे विद्वान रजोगुण रहित सूर्य के मार्ग से वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ पर जन्म-मृत्यु से रहित परमपुरुष, अविनाशी ब्रह्म रहता है।
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उपर्युक्त बताए गए सकाम कामों के फलस्वरूप इस लोक और परलोक के सभी सुखों को भली-भाँति समभकर, उनकी तृष्णा भंगुरता और दुःखपरता को जानकर सब प्रकार के भोगों से मुख मोड़ना चाहिए। यह निश्चय समस्त लोको को लिये जाने वाले सकाम कर्मों से स्वतः सिद्ध नित्य परमेश्वर नहीं मिल सकता। उसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए हाथ में समिधा लेकर वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास ही विनम्रता पूर्वक जाना चाहिए।
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उस वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ गुरु को भी चाहिए कि शान्त, सुस्स्थिर और विरक्त शरणागत शिष्य को ब्रह्मविद्या का तत्व भली-भाँति समभाकर ऐसा उपदेशा दें, जिससे वह अविनाशी ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर सके।
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द्वितीय मुण्डक प्रथम खण्ड
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महर्षि अंगिरा कहते हैं—हे प्रिय शौनक, मैंने तुम्हें पहले परब्रह्म का स्वरूप बतलाते हुए जो रहस्य बतलाया था, वह सर्वथा सत्य है। जैसे प्रज्वलित अग्नि से उसी के समान रूप वाली हजारों चिनगारियाँ विविध प्रकार से प्रकट होती हैं उसी प्रकार अविनाशी ब्रह्म से अनेक प्रकार के भाव उत्पन्न होते हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं।
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वह दिव्य पुरुष परमात्मा नि:सन्देह निराकार है और समस्त जगतारूप के भीतर और बाहर व्याप्त है। वह जन्म-मरण के विकारों से रहित सर्वथा विशुद्ध है, क्योंकि न उसके प्राण हैं, न इन्द्रियाँ हैं और न मन ही। इसलिए अविनाशी जीवात्मा से श्रेष्ठ है।
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इसी परमात्मा से प्राण उत्पन्न होता है। तथा मन समस्त इन्द्रियों आकाश, वायु, तेज और सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करने वाली पृथ्वी ये सब उत्पन्न होते हैं।
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समस्त दृश्यमान जगत् परमात्मा का विराट् रूप है। उसका मस्तक खुलोक है, सूर्य और चन्द्रमा दो नेत्र हैं। समस्त दिशाएँ कान हैं। अनेक ऋतुओं और ऋषियों के रूप में फैलते हुए चारों वेद उस विराट् रूप की वाणी हैं। वायु प्राण है। सम्पूर्ण चराचर जगत् हृदय है। पृथ्वी मानों पैर है। यह परमात्मा समस्त प्राणियों के परमेश्वर हैं।
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सर्वप्रथम परतत्त्व से उसकी अचिन्त्य शक्ति का एक अंश प्रकट होता है। जिसका ईंधन सूर्य है। अभि से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ। चन्द्रमा से मेघ उत्पन्न हुए। मेघों के बरसने से पृथ्वी पर अनेक औषधियाँ उत्पन्न हुई हैं। उन औषधियों को खाने से उत्पन्न वीर्य को जन्तु पुरुष अपनी सजातीय स्त्री में सिञ्चन करता है, तब उनसे प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं।
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उस परमात्मा से ही ऋग्वेद की ऋचाएँ सामवेद की भूतियाँ, यजुर्वेद के मंत्र तथा दीक्षा, यज्ञ कतु और दक्षिणाएँ तथा संग्रत्सर रूप, यजमान सबलोक उत्पन्न हुए हैं। जहाँ चन्द्रमा प्रकाश फैलाता है, वहीं सूर्य प्रकाश करता है।
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उसी परमात्मा से अनेक देवता उत्पन्न हुए हैं। तथा साध्यगण, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण, अपान, वायु, धान, जौ आदि अन्न, तप, श्रद्धा, सत्य और ब्रह्मचर्य एतद् यज्ञ आदि अनुष्ठान की विधि भी उसी से उत्पन्न है।
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उसी परमात्मा से प्राप्त उत्पन्न हुए हैं, ञग्नि की काली कराली ज्वालाएँ सात लपटें, विषय रूपी सात समिधाएँ, सात प्रकार के हवन, सात लोक, इन्द्रियों के सात द्वार भी उसी से उत्पन्न हैं, जिनमें प्राण विचरते हैं। हृदय रूप गुफा में शयन करने वाले ये सात-सात के समुदाय सभी प्राणियों में स्थापित किए हुए हैं।
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इसी से समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं, इसी से अनेक रूपों वाली नदियाँ निकलकर बहती हैं। इसी से समस्त औषधियाँ और रत्न उत्पन्न हुए हैं, जिनसे परिपुष्ट हुए शरीरों में यह सबका ञंतरात्मा ब्रह्म सब प्राणियों की आत्मा के साथ उनके हृदय में स्थित है।
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तप, कर्म और परम ञमृत रूप ब्रह्म यह विश्व सब कुछ परमात्मा है। हे सोम्य, इस गुफा रूप हृदय में स्थित ञनतर्यामी ब्रह्म को जो जानता है, वह इस मनुष्य शरीर ही में ञज्ञान से उत्पन्न ग्रन्थि को खोल डालता है।
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द्वितीय खण्ड
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सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी परमात्मा परम प्रकाशवान् है। समस्त प्राणियों के ञत्यान्त समीप उन्हीं के हृदय रूप गुफा में छिपे रहने के कारण वह 'गुहाशय' नाम से प्रसिद्ध है। जितने भी हिलने डुलने वाले, साँस लेने वाले, आँख खोलने और मूदने वाले प्राणी हैं, उन सबका समुदाय परमात्मा में स्थित है। सबके आश्रय ये परमात्मा ही हैं। तुम इन्हें जानो। ये सत् और ञसत्, कार्य और कारण, प्रकट सब कुछ हैं। सबके द्वारा वरेण्य करने योग्य और ञत्यन्त श्रेष्ठ हैं और सभी प्राणियों की बुद्धि द्वारा ञज्ञेय हैं।
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जो परमात्मा प्रकाश स्वरूप है, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, जिसमें समस्त लोक और उन लोकों के निवासी समस्त प्राणी स्थित हैं, वही परम शुद्ध ब्रह्म हैं। वही सब को जीवन देने वाला प्राण है, वही सम्पूर्ण जगत् के हृदय और अन्तःकरण में प्रकट है। वही यह परम आत्मविनाशी स्मृत तत्व है। प्रिय शौनक, उपनिषद् में वर्णित प्रभाव स्वरूप महान् शस्त्र धनुष को लेकर उस पर उपासना से तेज किया गया वाण चढ़ाकर फिर भाव-प्रधान चित्त द्वारा उस वाण को खींचकर, हे सोम्य, उस उस शुद्ध-ब्रह्म को लक्ष्य मानकर उसका वेधन करना चाहिए।
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यहाँ पर ॐ ही धनुष है, आत्मा वाण है, परमात्मा उसका लक्ष्य है, यह प्रमाद रहित मनुष्य द्वारा वेधे जाने योग्य है। ॐत्कार से उसे वेधकर वाण की तरह उस लक्ष्य में तन्मय हो जाना चाहिए।
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जिस परमात्मा में स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष उनके बीच का आकाश तथा समस्त प्राणों के सहित मन गुँथा हुआ है, उसी एक सब के आत्मा रूप परमात्मा को जानो। दूसरी बातों को सर्वथा छोड़ दो। यही स्मृत का सेतु है।
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रथ की नाभी में जुड़े हुए आरों के समान जिसमें समस्त देह-व्यापिनी नाड़ियाँ स्थित हैं। उसी हृदय में वह अनेक प्रकार से उत्पन्न होने वाला परमात्मा मध्यभाग में रहता है। इस सर्वात्मा परमात्मा का ध्यान ॐ इस नाम से करो। श्रज्ञान अन्धकार से परे भवसागर के अन्तिम तट रूप परमात्मा की प्राप्ति के लिए तुम लोगों का कल्याण हो।
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उस परमात्म-तत्व को जान लेने से जीवात्मा के हृदय की गांठ खुल जाती है सम्पूर्ण संकट कट जाते हैं, और समस्त शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं।
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वह निर्मल, श्रवयण रहित ब्रह्म प्रकाशामय परमधाम में रहता है। वह सर्वथा विशुद्ध है। समस्त ज्योतियों की ज्योति है। उसे आत्मज्ञानियों ही समभते हैं।
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वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्र और तारागण ही और न बिजलियाँ कौंधती हैं। फिर इस श्रग्नि के लिए तो कहना ही क्या है। क्योंकि उसके प्रकाशित होने पर ही सब प्रकाशित होते हैं। उसी के प्रकाश से यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है।
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यह श्रमृत स्वरूप ब्रह्म ही सामने है, यही पीछे है, यही दायें और बायें है। यह नीचे और ऊपर है। यह जो सम्पूर्ण संसार है वह सब सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म का ही रूप है।
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तृतीय मुण्डक
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प्रथम खण्ड
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मनुष्य का यह शरीर मानो एक वृत्त है। ईश्वर और जीव—ये सदा साथ रहने वाले दो मित्र पच्छी हैं। ये दोनों इस शरीर रूप वृत्त में साथ-साथ हृदय रूप घोंसले में निवास करते हैं। इनमें से एक पच्छी जीवात्मा प्रारब्ध के श्रनुसार प्राप्त सुख दुखों को श्रनुराग, दृश्य भाव से भोगता है, और दूसरा पच्छी परमात्मा उनके फलों से कोई सम्बन्ध न रखकर केवल देखता रहता है।
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इस शरीर रूप वृत्त पर रहने वाली पच्छी जीवात्मा शरीर के मोहजाल में फँसा रहता है। श्रसमर्थता और दीनता का श्रनुभव करता है। मोहित होकर शोक करता है, जब कभी भगवात्न् की कृपा से भक्तों द्वारा सेविच परमात्मा और उनकी चमत्कारी महिमा को जो जगत् में विभिन्न रूप से प्रकट हो रही है—प्रत्यक्ष कर लेता है तब वह उसी समय शोकरहित हो जाता है।
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मुण्डकोपनिषद् : ६५
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जब वह जीवात्मा सबके शासक ब्रह्म के भी उत्पाद का सम्पूर्ण जगत् के रचयिता, दिव्य प्रकाश स्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार लेता है, उस समय पुण्य और पाप दोनों को भली-भाँति दूर कर निर्मल हृदया वह ज्ञानी सर्वोत्तम समता को प्राप्त कर लेता है।
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यह परमात्मा ही प्राप्य है जो सभी जीवों के द्वारा प्रकाशित हो रहा है। इसे जानने वाले ज्ञानी आभिमानी और वकवादी नहीं हृदया करते बल्कि वे क्रियावान् सब की आत्मा बने हुए भगवान् में कोड़ा करते रहते हैं। और सबका आत्मा अन्तर्यामी परमात्मा में ही रमण करता है। वे ज्ञानी ब्रह्मवेत्ताओं में भी श्रेष्ठ हैं।
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शरीर के अन्दर हृदय में स्थित प्रकाश स्वरूप, परम विशुद्ध परमात्मा निश्चय ही सत्य भाष्या, तप और ब्रह्मचर्यपूर्वक यथार्थ ज्ञान से ही प्राप्त होता है। उसे योगयुक्त, निर्विकार साधक ही देख पाते हैं।
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सत्य की ही विजय होती है, झूठ की नहीं। क्योंकि वह देवयान नाम का मार्ग सत्य से ही परिपूर्ण है, जिससे पूर्ण तृप्त ऋषि लोग वहाँ गमन करते हैं। जहाँ सत्य-स्वरूप परमात्मा का उद्भट धाम है।
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परब्रह्म महान्, दिव्य और अचिन्त्य स्वरूप है। वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म अत्यन्त सूक्ष्म रूप में प्रकाशित होता है। वह दूर से भी दूर है, परन्तु इस शरीर में रहकर वह निकट भी है। वह देखने वालों के भीतर उनकी हृदय रूपी गुफा में स्थित है।
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वह न नेत्रों से, न वाणी से और न अन्य दूसरी इन्द्रियों से ग्रहण किया जा सकता है। तप से अथवा कर्मों से भी वह नहीं ग्रहण किया जा सकता है। उस अवयव रहित परमात्मा को तो
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विशुद्ध ञन्तःकरणवाला साधक अपने विशुद्ध ञन्तःकरण से ध्यान करता हुत्रा ही ज्ञान की निर्मैलता से देख पाता हु।
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जिसमें पाँच प्रकार के प्राण समाये हुए हैं, उस शरीर में यह सूक्ष्म आत्मा मन से जाना जा सकता है। प्राणों का यह सम्पूर्ण चित्र प्राणों से व्याप्त है। जिस ञन्तःकरण के विशुद्ध होने पर यह आत्मा सब प्रकार से वैभव को प्राप्त होता है।
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इस प्रकार का विशुद्ध ञन्तःकरणवाला मनुष्य जिस-जिस लोक को मन से चिन्तन करता है, तथा जिन भोगों की कामना करता है, उन उन लोकों को जीत लेता है और उन इच्छित भोगों को भी प्राप्त कर लेता है, इसलिए विशेष की कामना करने वाला मनुष्य शरीर से भिन्न आत्मा को समझने वाले ज्ञानी का सत्कार करे।
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द्वितीय खण्ड
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वह कामना रहित मनुष्य इस परम विशुद्ध ब्रह्मवान का ज्ञान लेता है, जिसमें सम्पूर्ण जगत् स्थित हुत्रा प्रतीत होता है। जो कोई भी निष्काम भाव रखने वाले साधक परम पुरुष की उपासना करते हैं, वे बुद्धिमान रजोगुणीमय जगत् को लाँघ जाते हैं।
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भोगों को महत्व देने वाला जो मनुष्य उनकी इच्छा करता है, वह उन इच्छाओं के कारन उन-उन लोकों में उत्पन्न होता है, जहाँ वे श्रासानी से मिलते हैं। परन्तु पूणकाम, विशुद्ध चित्र वाले पुरुष की सम्पूर्ण कामनाएँ यहीं विलीन हो जाया करती हैं।
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यह आत्मा न तो प्रवचन से, न बुद्धि से, न बहुत सुनने से मिलता है। यह जिसको स्वीकार कर लेता है उसी के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। क्योंकि यह आत्मा उसके लिए अपने यथार्थ स्वरूप को प्रकट कर देता है।
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यह श्रात्मा वलहीन मनुष्य को भी नहीं मिलता है तथा प्रमाद से, लड़खड़ा रहे तप से भी नहीं प्राप्त किया जा सकता है। जो बुद्धिमान साधक इन उपायों द्वारा प्रयत्न करता है, उसकी श्रात्मा ब्रह्मधाम में पहुँच जाती है।
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नानासक्त श्रौर शुद्रान्तःकरण निष्ठिगण इस परमात्मा का साक्षात्कार कर ज्ञान से तृप्त एवं परम शान्त हो जाते हैं। श्रपने श्रापको परमात्मा में मिला देने वाले ये ज्ञानी परमात्मा को चारों ओर से प्राप्त कर सर्वरूप परमात्मा में लीन हो जाते हैं।
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जिन्होंने उपनिषद् शास्त्र के विज्ञान द्वारा उसके श्रर्थभूत परमात्मा को श्रच्छी तरह जान लिया है, कर्मफल, श्रासक्ति श्रौर त्याग रूप भोग से जिनका ग्रन्थःकरण शुद्ध हो गया है वे योगी मरने पर उस परमधाम में जाते हैं जहाँ जाकर लोग जीवन-मरण से छूट जाते हैं।
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पन्द्रह कलाएँ श्रौर सम्पूर्ण इन्द्रियाँ श्रपने श्रपने श्रधिष्ठात्त देवता में जाकर स्थित हो जाते हैं। फिर समस्त कर्म श्रौर विज्ञान से पूर्ाी जीवात्मा सबके साथ परमात्मा से मिलकर एक ही बन जाते है।
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जैसे बहती हुई नदियाँ श्रपने नाम-रूपको त्याग कर समुद्र में समा जाती हैं, वैसे ही विवेकी लोग नाम-रूपका मोह त्याग कर उत्तम से भी उत्तम परम दिव्य स्वरूप परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं।
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जो कोई भी परब्रह्म परमात्मा को जान लेता है, वह ब्रह्म ही बन जाता है। उसके कुल में जो ब्रह्म को न जानने वाला नहीं होता, वह भी शोक से पार हो जाता है। पापों के समुदाय से पार हो जाता है। हृदय की गांठें छूट जातीं हैं श्रौर वह श्रमर हो जाता है।
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७२ : मुण्डकोपनिषद्
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ऐसे ब्रह्म के विषय में यह बात ऋचाओं द्वारा कही गयी है—
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जो निष्काम भाव से कर्म करते हैं, वेदज्ञ, तथा ब्रह्म के उपासक हैं। श्रद्धा रखते हुए स्वयं एकर्षि नाम वाले अग्नि में हवन करते हैं। तथा जिन्होंने विधिवत् सर्वश्रेष्ठ व्रत का पालन किया है, उन्हें यह ब्रह्मविद्या बतलानी चाहिए।
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इसी सत्य तत्व को अंगिरा ऋषि ने कहा था कि—जिसने मद्यपान व्रत का पालन करके ब्रह्मतेज नहीं पाया है, वह इतो भ्रष्टस्त तो भ्रष्टः हो जाता है। ऐसे परमर्षि जिनसे इसका अध्ययन नहीं हो सकता है। उनपर ऋषियों को नमस्कार है—
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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( तीनों प्रकार के ताप शान्त हों )
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माण्डूक्योपनिषद्
६
माण्डूक्य उपनिषद् को लोग अथर्ववेदोय मानते हैं । अथर्ववेद के श्रारण्यक तो मिलते नहीं, एकमात्र उपलब्ध गोपथ ब्राह्मण में इस उपनिषद् का पता नहीं है । संभव है, इसका संबंध ऋग्वेद की माण्डकेय शाखा से हो । कुछ भी हो परंपरागत लोग इसे अथर्ववेदोय ही मानते आ रहे हैं । इसमें सब मिलाकर १२ मंत्र हैं, जिनमें प्रोंकार, ब्रह्म ज्यादि के रहस्यों का निरूपण किया गया है ।
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शान्ति पाठ
६
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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(तीनों प्रकार के ताप शान्त हों)
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ॐ यह शतार अविनाशी परमात्मा है । यह सम्पूर्ण जगत् उसकी निकटतम महिमा का लक्ष्य कराने वाला है । भूत, भविष्य और वर्तमान—यह सबका सब जगत् ॐ ही है । तथा उपयुक्त तीनों कालों से परे भी जो कुछ है वह सब ॐ ही है ।
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जो कुछ है वह ब्रह्ममय है । यह भी ब्रह्म है । वह भी ब्रह्म है । यह सर्वात्मा ब्रह्म चार चरणों वाला है ।
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जागृत अवस्था का यह स्थूल जगत् जिसका शरीर है। जिसका ज्ञान इस वाह्य जगत् में फैला हुया है। भूः, भुवः, स्वः आदि सात लोक जिसके सात अंग हैं। पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ, पाँच कर्म इन्द्रियाँ, पाँच प्राण और चार अन्तः करण ये उन्तीस विषय जिसके उन्तीस मुख हैं। जो स्थूल जगत् को भोगने वाला, उसका अनुभव करने वाला है, वह विश्व को धारण करने वाला वैश्वानर परमात्मा—पहला चरण है।
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स्वप्न की भाँति यह जगत् जिसका स्थान है। जिसका ज्ञान सूक्ष्म जगत् में व्याप्त है। पूर्वोक्त सात अंगों और उन्तीस मुखों वाला, सूक्ष्म जगत् को भोगने वाला, प्रकाश का स्वामी सूक्ष्मात्मा हिरण्यगर्भ इस पूर्ण परब्रह्म का दूसरा चरण है।
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जिस अवस्था में सोया हुया आदमी किसी भी भोग की कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता—वह सुषुप्ति अवस्था है। यही सुषुप्ति ही जिसका शरीर है, जो एकरूप हो रहा है। जो एक मात्र ज्ञानन्द स्वरूप है। प्रकाश ही जिसका मुख है। जो एकमात्र ज्ञानन्द का भोक्ता है, वह प्राज्ञ ब्रह्म का तीसरा चरण है।
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यही सर्वेश्वर है, यही सर्वज्ञ है, यही अन्तर्यामी है, यही संसार का उत्पादक है। और समस्त सृष्टि का रचयिता, पोषक और सहायक भी यही है।
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जिसका ज्ञान न बाहर की ओर है, न भीतर की ओर है, और न दोनों ही ओर है। जो न ज्ञान स्वरूप है, जो न जानने वाला है और न नहीं जानने वाला है। जो न दिखायी पड़ता है और न व्यवहार में लाया जा सकता है, न इसका किया जा सकता है तथा जिसका चिन्तन नहीं किया जा सकता, वर्णन नहीं किया जा सकता
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और न जिसका कोई लङ्गन ही है। जिसमें सभी प्रपंचों का विलय है। परमात्मा की सत्ता की प्रतीति ही जिसका स्वरूप है—ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्व पूर्ण ब्रह्म का चौथा चरण है।
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वह चारचरणों वाला परमात्मा यहाँ अक्षर के प्रकाश में अपने नाम से अभिन्न होने के कारणा तीन मात्राओं वाला ॐ है। अ, उ और म ये तीन मात्राएँ ही उसके तीन चरण हैं और ये तीन चरण ही ॐ की तीन मात्राएँ हैं। जैसे ॐ अपनी मात्राओं से अलग नहीं है, उसी प्रकार परमात्मा अपने चरणों से अलग नहीं है।
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परमात्मा के नाम रूप ॐ की पहली मात्रा 'अ' किसी भी अर्थ को बताने वाले जितने भी शब्द हैं, उन सब में व्याप्त है। ऐसा कोई भी शब्द नहीं है जो आकार से रहित हो, समस्त वर्गों में 'अ' ही पहला अक्षर है। यह आदि अक्षर होने के कारणा जागृत की भाँति स्थूल जगत् रूप शरीर वाला वैश्वानर नामक पहला चरण है। जो आदिसी ॐ के इस स्वरूप को जान लेता है, वह निश्चय ही सभी भोगों को प्राप्त कर लेता है। और सबका आदि (प्रधान) बन जाता है।
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ॐ की दूसरी मात्रा 'उ' अथ से उत्कृष्ट होने के कारणा अध्यात्म दोनों भाव रखने के कारणा अपने की भाँति सूक्ष्म जगत् रूप शरीर वाला तेजस् नामक दूसरा पाद है। जो इसे जान लेता है, वह अवश्य ही ज्ञान की परम्परा को उत्तम बनाता है। और समाधि भाव वाला हो जाता है। उसके कुल में वेद रूप ब्रह्म को न जानने वाला अज्ञानी कभी पैदा ही नहीं होता।
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ॐ की तीसरी मात्रा 'म' है। यह अन्तिम मात्रा है। 'अ' और 'उ' से पीछे उच्चारित होता है। इसलिए आगे की दोनों
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मात्राओं का माप इसमें न्रा जाता है। तात्पर्य यह कि 'म' अकेले हो 'अ' और 'उ' को जानने वाला है। तथा इन दोनों मात्राओं का ध्यान में विलोन करने वाला भी है। जैसे कारण जगत् से ही स्थूल और सूक्ष्म जगत् की उत्पत्ति होती है और उसी में उनका लय भी होता है। इसी प्रकार 'म' की और कारण जगत् के अधिष्ठाता प्राज्ञ नामक तीसरे चरण की समता होने के कारण 'म' पूर्ण ब्रह्म का तीसरा चरण है। जो व्यक्ति 'म' और प्राज्ञ रूप परमात्मा की एकता को जान लेता है, वह सर्वत्र एक परब्रह्म परमात्मा को ही देखने वाला बन जाता है।
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इसी प्रकार निराकार प्रणव (ॐ) जो मात्रा रहित है, व्यवहार में नहीं ज्ञात' प्रपंच से परे है, वह स्वाद्वितीय कल्याणमय व्रह्म का चौथा चरण है। वह आत्मा अवश्य ही आत्मा के द्वारा पूर्ण रूप से परात्पर परब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है,
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ॐ शान्तः शान्तिः शान्तिः
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( तीनों प्रकार के ताप शान्त हों )
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ऐतरेयोपनिषद्
७
ऐतरेय ब्राह्मण में ७० अध्याय हैं। अन्तिम भाग ऐतरेयारण्यक कहलाता है। ऐतरेयारण्यक पाँच भागों में विभक्त हैं। प्रत्येक भाग आरण्यक कहा जाता है। द्वितीय आरण्यक के ४ और ६ अध्यायों को 'ऐतरेय उपनिषद्' कहा जाता है। इसमें सृष्टिवाद, जीववाद और ब्रह्मवाद के ऋमशः विषय हैं।
७
प्रथम अध्याय
७
प्रथम खण्ड
७
शान्ति पाठ
७
हे सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा, मेरी वाणी मन में स्थित हो जाए। मेरा मन वाणी में स्थित हो जाए। हे प्रकाशमय ब्रह्म, मेरे लिए तू प्रकट होजा, हे मेरे मन और वाणी, तुम दोनों मेरे लिए वेद विषयक ज्ञान को लाने वाले बनो, मेरा सुना हुआ ज्ञान सुभे न छोड़े, स्वाध्याय करता हुआ मैं दिन और रात को एक कर दूँ। मैं श्रेष्ठ शब्दों को ही बोलूंगा। मैं सत्यवचन ही बोला करूंगा। वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे। वह ब्रह्म मेरे आचार्य की रक्षा करे। रक्षा करे मेरी और रक्षा करे मेरे आचार्य की।
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४५ : ऐतरेयोपनिषद्
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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(भगवान् शान्ति स्वरूप हैं, शान्ति स्वरूप हैं, शान्ति स्वरूप हैं) सृष्टि होने से पहले यह संसार एकमात्र परमात्मा ही था। उसके अतिरिक्त और दूसरा कोई भी चेष्टा करने वाला नहीं था। 'मैं लोकों की रचना करूँ'—यह संकल्प उस ब्रह्म ने अवश्य ही किया था।
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उसने भूलोक तथा उसके ऊपर के लोकों की, अन्तरिक्ष तथा मृत्युलोक और पाताल आदि सभी लोकों की रचना की। स्वर्ग-लोक तथा उससे ऊपर के लोक तथा उनका आधारभूत भूलोक—स्वर्गलोक ये सब 'भू:' के नाम से कहे गए हैं। अन्तरिक्ष लोक 'मरीचि' है। यह पृथिवी मृत्युलोक कही गयी है। और पृथिवी से नीचे के लोक पाताल आदि सब जल (आपः) कहे गए हैं।
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उपर्युक्त लोकों की रचना करने के बाद, परमात्मा ने फिर विचार किया कि सभी लोकों की रचना तो हो गयी अब इनकी रक्षा करने के लिए लोकपालों की भी रचना करनी चाहिए। यह सोचकर उसने जल आदि सूक्ष्म तत्वों से हिरण्यमय पुरुष को निकालकर उसको सभी अंगों से परिपूर्ण बनाकर मूर्तिमान बनाया।
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इसके बाद परमात्मा ने संकल्प रूप तप किया। तप के फल-स्वरूप उस हिरण्यगर्भ पुरुष के शरीर में अंडे की तरह फूटकर मुख छिद्र उत्पन्न हुआ। सुख से वाणी पैदा हुई। वाणी से उसका अधिष्ठात देवता अग्नि पैदा हुआ। फिर नाक के दोनों छिद्र बने, उनसे प्राण-वायु प्रकट हुआ। प्राणों से वायु देवता उत्पन्न हुए। फिर दोनों आँखों के छेद पैदा हुए। उनसे नेत्र इन्द्रिय और नेत्र इन्द्रिय से उसका देवता सूर्य उत्पन्न हुआ। इसके बाद कानों
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के दोनों छेद निकले। उनसे श्रोत्र इन्द्रिय और श्रोत्र इन्द्रिय से उसके देवता दिशाएँ उत्पन्न हुईं। इसके बाद त्वचा (चाम) पैदा हुई। त्वचा से रोम पैदा हुए। रोमों से औषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं, फिर हृदय प्रकट हुआ। हृदय से मन और मन से उसका अधिष्ठाता देवता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ। इसके बाद नामि प्रकट हुई। नामि से अपान वायु और अपान वायु से गुदा इन्द्रिय का अधिष्ठाता देव मृत्यु उत्पन्न हुआ। इसके बाद लिंग उत्पन्न हुआ। लिंग से वीर्य और वीर्य से जल उत्पन्न हुआ।
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तृतीय खण्ड
78
परमात्मा द्वारा रचे गए उपर्युक्त सभी इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता इस संसार रूप महासागर में आ पड़े। तब परमात्मा ने उन सभी देवताओंों को भूख-प्यास के संयुक्त कर दिया। भूख-प्यास से वे अग्नि आदि देवता अपने रचयिता परमात्मा से बोले-
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प्रभो, हमारे लिए एक ऐसे स्थान की व्यवस्था कर दीजिए जहाँ रहकर हम लोग अपना अपना आहार ग्रहण कर सकें।
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देवताओं की यह प्रार्थना सुनकर परमात्मा ने उनके रहने के लिए गाय का एक शरीर बनाकर उन्हें दिखाया। उसे देखकर उन्होंने कहा—भगवन्, यहाँ हम सब के लिए पर्याप्त न होगी। अतः कोई दूसरी रचना करें। तब परमात्मा ने उन्हें घोड़ा बनाकर दिखाया। उसे भी उन देवताओंों ने अग्र्योम बताया।
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तब भगवान् ने उनके लिए मनुष्य का शरीर बनाकर उन्हें दिखाया। उसे देखते ही सभी देवता बड़े प्रसन्न हुए। और बोले-हमारे लिए यह बहुत ही सुन्दर और उपयुक्त स्थान है। इसमें हम
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५० : ऐतरेयोपनिषद्
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सुख पूर्वक रहते हुए श्रपनी सब श्रावश्यकताएँ पूरी कर सकेंगे।
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तब परमात्मा ने कहा, ठीक है, तुम लोग श्रपने-श्रपने योग्य स्थान ढूँढकर इसमें प्रवेश कर जाओ।
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भगवान् की श्राज्ञा पाते ही श्रग्नि ने वाक् इन्द्रिय का रूप धरकर उस मुख्य शरीर में प्रवेश किया। उन्होंने जीभ को श्राश्रय बना लिया। यहीं वसू देवता भी रसन-इन्द्रिय बनकर प्रविष्ट हो गए। श्रश्विनीकुमार प्राणा इन्द्रिय का रूप धरकर नासिका में समा गए। सूर्य नेत्र इन्द्रिय बनकर श्राँखों में समा गए। दिक्देवता श्रोत्रेन्द्रिय बनकर दोनों कानों में समा गए। श्रौषधि श्रौर वनस्पतियों के देवता रोम बनकर त्वचा में समा गए, तथा चन्द्रमा मन का रूप धरकर हृदय में प्रविष्ट हो गया। मृत्यु देवता श्रपान का रूप धरकर नाभी में समा गए। जल के श्रधिष्ठाट देवता वीर्य बनकर लिंग में प्रविष्ट हो गए।
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तब भूख श्रौर प्यास ने भगवान् से निवेदन किया—प्रभो, इन देवताओंों की भाँति हमें भी कोई निश्चित स्थान रहने के लिए दे दीजिए। परमात्मा बोले—तुम दोनों के लिए कोई श्रलद्हा स्थान नहीं है। इन देवताओंों के स्थानों में मैं तुम्हें साभीदार बनाये देता हूँ। इनके श्राहार में तुम्हारा हिस्सा रहेगा।
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तृतीय खण्ड
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इतनी सृष्टि उत्पन्न करने के बाद परमात्मा ने पुनः विचार किया कि ये सब लोक श्रौर लोकपाल तो बना दिए गए लेकिन इनके निर्वाह के लिए भोग-पदार्थों की भी व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि इनके साथ पैदा होते ही भूख श्रौर प्यास की रचनाओं की गयी हैं। यह सोचकर भगवान् ने श्रन्न की सृष्टि करने का निश्चय किया।
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उन्होंने पांचों सूक्ष्म तत्वों को तपाया—अपने संकल्पद्वारा उनमें हिरण्य पैदा की। परमात्मा द्वारा संचालित पांचों महाभूतों से उनका एक जो स्थूल रूप पैदा हुग्रा—वही देवताओं के लिये अन्न—भोगने की वस्तु वनी।
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उत्पन्न हुए उस अन्न ने यह सोचकर कि ये सब मुझे ही खाने वाले हैं—मेरा तो विनाश ही कर डालेंगे—छुटकारा पाने के लिए भागना शुरू किया। तब मनुष्य के रूप में उत्पन्न जीवात्मा ने उसे वागों द्वारा पकड़ना चाहा। लेकिन वागों उसे पकड़ न सकीं। (यदि वागों उसे पकड़ लेती तो ब्राज मनुष्य केवल अन्न का नाम लेकर तृप्त हो जाता। खाने की जरूरत ही नहीं पड़ती)।
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तब उस श्रादमी ने अन्न को ग्रहण इन्द्रिय के द्वारा पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह नहीं पकड़ा जा सका (नहीं तो ब्राज भी केवल सूंघ लेने मात्र से श्रादमी की भूख मिट जाती)।
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तब उसने उसे श्राँखों से पकड़ना चाहा, लेकिन श्राँखें उस अन्न को न पकड़ सकीं। (यदि ऐसा हो जाता तो केवल भोज पदार्थों के देखने के ही दृष्टि हो जायया करती)।
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तब उस पुरुष ने कानोें द्वारा उसे पकड़ने की चेष्टा की, किन्तु कान उसे न पकड़ सके (श्रन्यथा केवल सुन लेने से ही श्रादमी की भूख मिट जाया करती)।
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तब उस श्रादमी ने चमड़ी (खाल) से पकड़ना चाहा लेकिन वह पकड़ा नहीं गया। (नहीं तो केवल अन्न को छू लेने मात्र से ही भूख मिट जाया करती है)।
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६
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५२ : ऐतरेयोपनिषद्
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तब उसने उसे मन से पकड़ना चाहा, परन्तु मनकी न पकड़ सका । ( ग्रन्नथाः ग्रन्न का चिन्तन करने मात्र से ही सन्तोष हो जाता करता ) ।
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तब उस पुरुष ने उसे लिंगेन्द्रिय द्वारा पकड़ने की चेष्टा की किन्तु वह न पकड़ा जा सका । ( ग्रन्यथाः ग्रन्न के त्याग से ही भूख मिट जाया करती )
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तब उस पुरुष ने ग्रपानवायु द्वारा मुख से शरीर में उसे प्रविष्ट कराने की चेष्टा की, तब वह ग्रन्न को ग्रपने शरीर में ले जा सका । यहाँ ग्रपानवायु ही शरीर के भीतर श्वास प्रश्वास के रूप में जाता है । यही ग्रन्न को भीतर ले जाने वाला है । जो वायु ग्रन्न से जीवन की रक्षा करने वाले के रूप में प्रसिद्ध हैं । यह वही ग्रपान वायु है ।
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तब परमात्मा ने सोचा कि जो कुछ हुत्या ठीक है, लेकिन यह मनुष्य शरीर मेरे बिना कैसे रहेगा । यदि इस जीवात्मा के साथ मेरा निकट सहयोग न रहा तो यह कैसे यहाँ रह सकेगा । लेकिन एक बात यह भी है कि यह ग्रादमी ने मेरे सहयोग के बिना ही बोलना, सुनना, सूँघना, चलना-फिरना, श्वास लेना, भोजन करना, चिन्तन-मनन करना सीख लेना, तो फिर मेरा और मेरी सत्ता का उपयोग तो क्या रह जायगा । इसीलिए मुझे इस मनुष्य शरीर के पैर या मस्तिष्क इन दो मार्गों में से किसी एक मार्ग से इसके शरीर में प्रवेश करना चाहिए ।
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यह सोचकर उसने इस मनुष्य शरीर की सीमा को चीर कर उस मनुष्य शरीर में प्रवेश किया । वह यह द्वार विदीर्णः किया हुत्या द्वार नाम से प्रसिद्ध है । यही द्वार ब्रह्मरन्ध्र कहा जाता है । ग्रानन्द स्वरूप परमात्मा को प्राप्त कराने वाला यही है । परमात्मा
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की उपलब्धि के तीन स्थान हैं। तीन स्वप्न हैं। पहला तो हृदय-रूपी गुहा उनकी उपलब्धि का स्थान है।
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दूसरा विशुद्ध आकाश रूप परमधाम है—जिसे गोलोक, ब्रह्मलोक आदि नामों से पुकारा जाता है। तीसरा यह संसार है जिस की जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण रूप अवस्थाएँ हैं, वे ही इसके तीन स्वप्न हैं।
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मनुष्य रूप में उत्पन्न हुए उस पुरुष ने भौतिक जगत् की रचना को बड़े आश्चर्य से देखा और मन ही मन कहा—इस विचित्र संसार की रचना करने वाला यहाँ दूसरा कौन है—ऐसा विचार करते ही उसने साक्षात्कार परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन किया। उस समय वह मन ही मन प्रसन्न होकर कहने लगा—बड़े सौभाग्य की बात है, कि मैंने परब्रह्म परमात्मा को देख लिया है।
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उस मनुष्य शरीर में उत्पन्न हुए पुरुष ने परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किया, इसीलिए परमात्मा का नाम 'इन्द्रो:' ( इसको मैंने देख लिया है ) पड़ गया। यद्यपि प्रत्यक्ष दर्शन कर लेने पर परमात्मा का नाम 'इन्दन्र:' है, लेकिन लोग उन्हें परोक्ष भाव से 'इन्द्र' कहकर पुकारते हैं। क्योंकि देवता लोग मानों परोक्ष भाव से ही कही गयी बात को पसंद करने वाले होते हैं। 'परोक्षप्रिय: हि देव:' ।
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द्वितीय अध्याय
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यह सांसारी जीव पहले-पहल पुरुष शरीर ही में वीर्य रूप से प्रकट होता है। यह वीर्य शरीर के सम्पूर्ण अंगों से निकलकर उत्पन्न हुआ तेज ( सार ) है। पिता अपने आधार भूत उस वीर्य रूप तेज को पहले तो अपने शरीर ही में धारण-पोषण करता है।
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७४ : ऐतरेयोपनिषद्
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ब्रह्मचर्य के द्वारा बढ़ाता और पोषता करता है । फिर उसे जब वह स्त्री के गर्भ में स्थापित करता है तब गर्भ रूप से उत्पन्न करता है । माता के शरीर में प्रवेश करना ही इसका पहला जन्म है ।
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स्त्री के गर्भ में थाया हुग्रा वह वीर्य उस स्त्री के श्रात्म भाव को प्राप्त हो जाता है । श्रर्थात् उस स्त्री के जैसे श्रौर श्रंग होते हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी उसके शरीर का श्रंग बन जाता है । यही कारण है, कि वह गर्भ उदर में रहता हुग्रा भी गर्भिरणी को भार स्वरूप नहीं प्रतीत होता । वह स्त्री श्रपने शरीर में थाए हुए श्रपने पति के श्रात्मा रूप गर्भ को श्रपने श्रंगों की भाँति ही भोजन के रस से पुष्ट करती है ।
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उस गर्भ का पालन-पोषण करने वाली वह स्त्री घर के लोगों द्वारा पालन और पोषरण करने योग्य होती है । उस गर्भ को वह स्त्री प्रसव काल तक तो श्रपने शरीर में धारएा करती है । फिर जन्म लेते हो पिता जातकर्म श्रादि संस्कारों से उस कुमार को उन्नतिशील बनाता है । श्रनेक प्रकार की शिक्षाओं से उसे सब प्रकार से उन्नतिशील बनाता है । मानों वह इन मनुष्यों को बढ़ाने के रूप में श्रपनी ही उन्नति करता है । क्योंकि इसी प्रकार ये सब लोग विस्तार को प्राप्त हुए हैं। वह इसका दूसरा जन्म है ।
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पुत्र रूप में उत्पन्न यह पिताही का श्रात्मा, पिता के शुभ कर्मों के लिए उसका प्रतिनिधि बना दिया जाता है । इसके बाद इस पुत्र का यह पिता रूप दूसरा श्रात्मा श्रपना कर्त्तव्य पालन करते हुए, श्रायु पूरी होने पर यहाँ से मरकर चला जाता है । यहाँ से जाकर यहीं पुनः यहीं उत्पन्न होता है । यह इसका तीसरा जन्म है ।
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यही बात ऋषियों ने भी कही है । गर्भ से बाहर श्राने से पहले ऋषि वामदेव को यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिए उन्होंने
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ऐतरेयोपनिषद् : ४३
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माता के उदर में ही कहा था कि—ग्रहो, कितने ज्ञानन्द और रहस्य की बात है, कि गर्म में रहते-रहते मैंने इन ग्रान्तःकरा और इन्द्रियरुप देवताओं के होने एक जन्मों का रहस्य समझ लिया। इसको जानने से पहिले मुझे सैकड़ों लोहे के समान दुर्मेध और कठोर लोहे के समान शरीर रूप पिजरों ने अवरुद्ध कर रखा था। उनमें मेरी ऐसी द्दढ आस्था हो गयी थी कि उन्हें छोड़ना मुश्किल था। श्रब मैं वाज चिड़िया की भांति ज्ञान रुप वल के वेग से उन सब को तोड़कर उनसे श्रतलग हो गया हूँ।
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इस प्रकार जन्म-जन्मान्तर के तत्व को समझने वाले ऋषि वामदेव इस शरीर के नाश होने पर संसार के ऊपर उठ गए और ऊर्ध्वगति द्वारा उस परमधाम को पहुँचे, जहाँ समस्त कामनाओं को प्राप्त कर तृप्त हो गए। तृप्त हो गए।
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तृतीय अध्याय
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हम लोग जिसकी उपासना करते हैं, वह आत्मा कौन है। अथवा जिससे मनुष्य देखता है, सुनता है, सूँचता है, स्पष्ट बोलता है तथा स्वाद युक्त और स्वाद रहित वस्तु के भेद को समभता है वह आत्मा कौन है?
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जो यह हृदय है, यही मन भी है। सम्यक् ज्ञान शक्ति, प्राज्ञा इन की शक्ति, विभिन्न रूप से जानने की शक्ति, तत्काल जानने की शक्ति, धारणा करने की शक्ति, देखने की शक्ति, धैर्य, बुद्धि, मननशक्ति, वेग, स्मरण-शक्ति, संकल्प शक्ति, मनोरथशक्ति, प्राण-शक्ति, कामना शक्ति, स्त्री-संसर्ग-शक्ति श्रादि की अभिलाषा इस प्रकार ये सबके सब स्वच्छ ज्ञान स्वरुप परमात्मा की ही सत्ता के बोधक हैं।
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४६ : ऐतरेयोपनिषद्
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परमात्मा ही ब्रह्मा हैं, यही इन्द्र हैं, यही प्रजापति हैं, जितने देवता हैं, तथा यह पृथ्वी, वायु, श्राकाश, जल और तेज ये पांच तत्व, तथा छोटे-छोटे श्रापस में मिले हुए बीज रूप प्राणी, श्रौर उनसे भिन्न उसने भी श्रंडज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, तथा घोड़े, गौवें, हाथी, मनुष्य सबके सब मिलकर जो कुछ यह जगत् है, जो कोई पाँखों वाला श्रौर चलने-फिरनेवाला तथा स्थावर प्राणिसमुदाय है, वह सब प्रज्ञान स्वरूप परमात्मा ही में स्थित है। यह ब्रह्मांड प्रज्ञान रूप परमात्मा से ही ज्ञानशक्ति सम्पन्न है।
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परमात्मा ही इस स्थिति का श्राधार है। यह प्रज्ञान ही ब्रह्म है।
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यह परमात्मा इस लोक से ऊपर उठकर उस स्वर्गलोक में ( परमधाम में ) सम्पूर्ण इन्द्रिय भोगों से युक्त होकर भ्रमर हो गया। श्र्रमर हो गया।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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(तीनों प्रकार के ताप शान्त हों)
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यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के ग्रन्थ-
2
गत तैत्तिरीय आरण्यक का अंश है। तैत्तिरीय आरण्यक में
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दस अध्याय हैं। उनमें से सातवें, आठवें और नवें अध्याय को
2
तैत्तिरीय उपनिषद् कहा जाता है।
2
इसमें शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्द वल्ली और भृगु वल्ली—
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ये तीन वल्लियाँ हैं। जिन्हें ब्राह्मण कहा जा सकता है और हर
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वल्ली में कई अनुब्राह्मण हैं, जिन्हें प्रकरण कह सकते हैं।
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शिक्षावल्ली में मनुष्य को अपने जीवन-निर्माण के
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लिए ऐसी शिक्षाएँ दी गयी हैं, जिनसे वह लोक और परलोक
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के सर्वोत्तम फल प्राप्त कर ब्रह्मविद्या को ग्रहण करने में
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समर्थ हो जाता है।
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ब्रह्मानन्द वल्ली में यह बताया गया है, कि साधक
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परमात्मा को प्राप्त किए हुए सिद्ध पुरुष इन्द्रियों द्वारा बाह्य
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विषयों का सेवन करते हुए भी स्वयं सदा परमात्मा में स्थित
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रहते हैं। इस वल्ली में परब्रह्म के स्वरूप तथा उसकी शान की
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महिमा बतायी गयी है।
2
भृगु वल्ली में उन उपदेशों का वर्णन है, जिन्हें वरुण
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ने अपने पुत्र भृगु ऋषि को ब्रह्मविद्या का उपदेश देकर
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दिया था।
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९९ : तैत्तिरीयोपनिषद्
शान्ति पाठ
इसका श्रेष्ठे श्रागे प्रथम श्रनुवाक में दिया जा रहा है।*
शिक्षा वल्ली
प्रथम अनुवाक
दिन श्रौर प्राण के श्रधिष्ठाता देवता हमारा कल्याण करें ।
ष्रयर्मा तथा रात श्रौर श्रपान के श्रधिष्ठाता देवता बल्रप भी हमारे लिए कल्याण प्रद हों। बल श्रौर भुजाओं के देवता इन्द्र तथा वागी श्रौर बुद्धि के श्रधिष्ठाता वृहस्पति दोनों हमारे लिए शान्ति प्रदान करने वाले हों।
त्रिविक्रम रूप से विष्णु जो पैरों के श्रधिष्ठाता देवता हैं, हमारी कल्याण करें। इन सभी देवताओं के श्रात्म स्वरूप परब्रह्म को नमस्कार है। हे वायुदेव, तुम्हें नमस्कार है। तुम प्राण रूप से प्रत्यक्ष देवता हो, तुम्हीं ब्रह्म हो।
इसलिए मैं तुम्हें ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम ष्रतत के श्रधिष्ठाता हो इसलिए तुम्हें ऋतत नाम से पुकारूँगा । तुम सत्य के प्रतिष्ठाता हो, इसलिए तुम्हें सत्यनाम से पुकारूँगा । ऐसा सर्वशक्तिमान् परमात्मा मेरी रक्षा करे। मेरे श्राचार्ये की रक्षा करे। रक्षा करे मेरी श्रौर मेरे श्राचार्ये की।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
भगवान् शान्ति स्वरूप हैं, शान्ति स्वरूप है, शान्ति स्वरूप हैं।
द्वितीय अनुवाक
अब हम शिक्षा का वर्णन करेंगे। वर्णे, स्वर, मात्रा, प्रयत्न, वयों के उच्चारणा की विधि श्रौर संधि। इस प्रकार वेद के उच्चारष्प की शिक्षा का श्रध्याय कहा गया है।
*शान्ति पाठ श्रौर प्रथम श्रनुवाकू की ऋचाएँँ में एक ही हैं।
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वैत्तिरीयोपनिषद् : ५६
तृतीय अनुवाक
श्राचार्य और शिष्य हम दोनों का यश एक साथ वढ़े । एक साथ ही हम दोनों का ब्रह्म तेज भी वढ़े । ऐसी शुभ इच्छा प्रकट करने के बाद हम यहाँ से लोकों के विषय में, ज्योतियों के विषय में, पांच स्थानों में संहिता के रहस्य का वर्णन करेंगे । इन सबको महा संहिता कहा जाता है। इनमें से सब से पहली लोक-विषयक संहिता है । पृथ्वी पूर्व वर्ष है, स्वर्गे लोक परवर्ष है । श्राकाश संधि रूप है । वायु दोनों का संयोजक है । इस प्रकार यह लोक-विषयक संहिता की उपासना-विधि पूरी हुई ।
अब ज्योति विषयक संहिता का वर्णन करते हैं । श्रग्नि पूर्व वर्ष है । श्रादित्य परवर्ष है । जल इन दोनों की संधि है और श्रीर विजली इनको जोड़ने का हेतु है । इस प्रकार ज्योति विषयक संहिता बनी ।
अब विद्या विषयक संहिता को हम प्रारंभ करते हैं । गुरु पहले वर्ष हैं, शिष्य परवर्ष है । विद्या इन दोनों की संधि है, गुरु द्वारा दिया गया उपदेश ही संधि का हेतु है । इस प्रकार विद्या-विषयक संहिता कही गयी ।
अब प्रजा विषयक संहिता कहते हैं—माता पूर्व वर्ष है, पिता परवर्ष है । सन्तान दोनों की संधि है और सन्तान पैदा करने के लिए किया जानावाला कार्य संधि का कारण है । इस प्रकार यह प्रजा विषयक संहिता कही गयी ।
अब आत्म विषयक संहिता का वर्णन करते हैं । नीचे का जबड़ा पूर्व वर्ष है, ऊपर का जबड़ा परवर्ष है । वाणी दोनों के बीचु की संधि है । जिस वाणी रूप संधि को उत्पत्ति का कारण है । इस प्रकार अध्यात्म विषयक संहिता कही गयी ।
इस प्रकार ये पाँच महासंहिताएँ कही गयी हैं । जो मनुष्य उपर्युक्त महासहिताओं को जान लेता है, वह सन्तान से, पशु
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- : वैत्तरीयोपनिषद्
१, ब्रह्मतेज से, अन्न आदि भोग पदार्थों से, स्वर्ग लोक से सम्पन्न होता है ।
चतुर्थ अनुवाक
जो वेदों में सर्वश्रेष्ठ है । सर्वरूप है और अमृत स्वरूप वेदों प्रधान रूप से प्रकट हुआ था वह ओंकार स्वरूप परमात्मा मुझे रसयुक्त बुद्धि से सम्पन्न करे । हे देव मैं आपकी कृपा से मृतमय परमात्मा से अपने हृदय में धारणा करने वाला बनूँ । मेरा शरीर नीरोग और पुष्टीला बना रहे । मेरी जिह्वा तेशाय मधुर आखिरनी बने । मैं दोनों कानों से आधिक सुनता हूँ । हे अग्नि, तू लौकिक बुद्धि से ढकी हुई परमात्मा की चित्ति है मेरे सुनते हुए उपदेश की रक्षा कर ।
हे अग्नि के अधिष्ठाता अग्निदेव, जो मुझे आवश्यकता के पर तुरन्त विविध प्रकार के वस्त्र, गौएँ, भोजन सामग्राी, आदि प्रस्तुत करती रहे । उन्हें बढाती रहे तथा उन्हें नया रूप न कर दे । ऐसी श्री को तू भेड़-बकरी आदि रोयें वाले एवं पशुत्रों सहित ला दे । 'स्वाहा' । (इसी मंत्र का उच्चारया करके स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में आहुति देनी चाहिए ।
ब्रह्मचारी लोग मेरे पास आयें, स्वाहा (आहुति देनी चाहिए) हवन पट हों स्वाहा (इस उद्देश्य से आहुति देनी चाहिए) ब्रह्मलोग प्रामाणिक ज्ञान को ग्रहण करने वाले हों स्वाहा । ब्रह्मलोग मन को वश में रखने वाले हों स्वाहा ।
योगों में मैं यशस्वी बनूँ । स्वाहा (इस उद्देश्य से यह आहुति हवन धनवानों की अपेक्षा आधिक धनवान हो जाऊँ स्वाहा । हे भगवान् आप ही में मैं समा जाऊँ स्वाहा ।
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हजारों शाखा वाले ग्राप में ध्यान द्वारा निमग्न होकर अपने को विशुद्ध कर लूं स्वाहा।
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जिस प्रकार नदियों का जल ढाल पाकर समुद्र में मिल जाता है। जिस प्रकार महीनों, दिनों को ग्रन्त करने वाले संवत्सर रूप काल में चले जाते हैं। हे विधाता, इसी प्रकार मेरे पास चारों ग्रोर ब्रह्मचारी लोग ग्राएँं स्वाहा। तू सब का निवास स्थान है। मेरे लिए अपने को प्रकट कर। मुझे प्राप्त होजा।
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पाँचवा अनुवाक
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भूः सुवः और स्वः ये तीन व्याहतियाँ प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त जो चौथी व्याहृति 'महः' है, इसकी उपासना का रहस्य सबसे पहले महाचमस के पुत्र ने जाना था। इन चारों व्याहतियों में 'महः' व्याहृति ही ब्रह्म है। यही अन्य तीन व्याहतियों की ग्रात्मा है। क्योंकि ब्रह्म सर्वरूप हैं, सबकी ग्रात्मा है। अन्य सभी देवता उसके ग्रंग हैं। भूः यह व्याहृति ही यह पृथ्वी लोक है। भुवः व्याहृति ग्रन्तरिक्ष लोक है। स्वः व्याहृति स्वर्गे लोक है। महः यह ग्रादित्य—सूर्य है। ग्रादित्य से ही समस्त लोक महिमामय बने हुए हैं।
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भूः यह व्याहृति ग्रग्नि है। सुवः यह वायु है। स्वः यह ग्रादित्य है। महः यह चन्द्रमा है। चन्द्रमा से ही समस्त ज्योतियाँ महिमामयी होती हैं। भूः यह व्याहृति ऋग्वेद है। सुवः सामवेद है। महः यह ब्रह्म है। ऋग्वेद से ही समस्त वेद महिमावान् होते हैं।
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भूः यदि व्याहृति ही प्राण है। सुवः यह ग्रपान है। स्वः यह व्यान है। महः यह ब्रह्म है। ब्रह्म से ही समस्त प्राण महिमावान् होते हैं। इस प्रकार संसार भर में व्याप्त प्राणा मानो तीनों
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७२ : तैत्तिरीयोपनिषद्
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व्याहृतियाँ हैं। भोर महः-रूप चौथी व्याहृति ऋतम् है। जिस प्रकार व्याहृतियों में ‘महः’ सबसे प्रधान है, उसी प्रकार प्राणों का पोषक ऋतम् प्रधान है। ऋत: प्राणों के अन्तर्यामी परमात्मा की उपासना ऋतम् के रूप में करनी चाहिए।
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छठा अनुवाक्
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पहले बतलाया हुया जो यह हृदय के भीतर अंगूठे के समान आकाश है। उसमें विशुद्ध, प्रकाश स्वरूप, अन्तर्यामी, परमात्मा का वास है। वहीं उसका साक्षात्कार हो जाता है।
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दोनों तालुओं के बीच में जो यह स्तम्भ के समान लटक रहा है, उसके भी भीतर जहाँ यह केशों का मूलस्थान ब्रह्मरन्ध्र स्थित है, वहाँ शिर के दोनों कपालों को छेदकर निकली हुई जो सुषुम्ना नाड़ी है, वही परमात्मा की प्राप्ति का द्वार है। मरते समय साधक भू: इस व्याहृति के अर्थ रूप अग्नि में स्थित होता है। भुव: इस व्याहृति के अर्थ रूप वायु में स्थित होता है। स्व: इस व्याहृति के अर्थ रूप सूर्य में स्थित होता है। तत्पश्चात् मह: इस व्याहृति के अर्थ रूप ब्रह्म में स्थित होता है।
७२
ऐसे साधक पर प्रकृति का अधिकार नहीं रहता, बल्कि वह स्वयं प्रकृति पर शासन करता हुया ‘स्वराट्’ बन जाता है। वह वाणी का, नेत्रों का, कानों का और विज्ञान का स्वामी बन जाता है। पहले बताए हुए साधन के द्वारा ही यह फल प्राप्त होता है।
७२
वह ब्रह्म आकाश की तरह शरीर वाला, सत्ता रूप, इन्द्रियों आदि समस्त प्राणों को विश्राम देने वाला, मनको आनन्द देने वाला, शान्ति से सम्पन्न अविनाशी है—ऐसा सम्भव कर हे प्रियवर प्राचीन योग्य, तू उसी की उपासना कर।
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१३
सातवाँ अनुवाक
१३
पृथ्वी लोक, अन्तरिक्ष लोक, पूर्व, पश्चिम आदि दिशाएँ श्राग्नेय, नैऋृत श्रादि श्राग्नान्तर दिशाएँ—ये सभी लोकों की श्राधिभौतिक पंचति है । श्रग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा श्रौर नक्षत्र ये पांच ज्योति समुद्राय की पंचति है । जल, श्रौषधियाँ, वनस्पतियाँ, श्राकाश, श्रात्मा तथा इनका संघात स्वरूप श्रन्नमय स्थूल रूप ये पांचों स्थूल पदार्थों की पंचति है । इस प्रकार यह वर्णान श्राधि भौतिक दृष्टि से किया गया है । श्रन्न श्राध्यात्मिक दृष्टि से सुतो—प्राण, कान, चक्षु, उदान, श्रौर समान—ये पांचों प्राणों की पंचति है । नेत्र, कान, मन वाकी श्रौर त्वचा—ये पांचों करणों की पंचति है । चर्म, मांस, नाड़ी, हड्डी श्रौर मज्जरा ये पांच शरीरगत घातुएँ की पंचति है । इस प्रकार भली भाँति कल्पना करके ऋषिप ने कहा—यह सब निश्चय ही पंचति—समूह है । साधक इस श्राध्यात्मिक पंचति—समूह से ही वाक्य पंचति—समूह को श्रौर वाक्य से श्राध्यात्मिक पंचति समूह को पुष्ट करता है ।
१३
ऋाठवाँ अनुवाक
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ॐ यह ब्रह्म है । ॐ ही यह प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला जगत है । ॐ यह श्रद्धा ही निःसंदेह श्रतुमोदक है । यह वात प्रसिद्ध है । इसके सिवा हे श्राचार्य, मुझे सुनाइए ?
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ऐसा कहने पर श्राचार्य ॐ कहते हुए शिष्य को उपदेश देते हैं—सामगायक विद्वान सामवेद गाते हैं। ॐ ॐ कहते हुए वेदमंत्रों को पढ़ते हैं। ॐ कहते हुए श्रध्यगु यज्ञ में प्रति गुरू मंत्र का उच्चारण करता है । श्रौर ब्रह्मा श्रतुमति देता है । ॐ कहकर श्रग्निहोत्र करने का श्रादेश देता है । श्रध्ययन करने से पहले
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५४
५४ : वैत्तिरीयोपनिषद्
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ओंकार ॐ का उच्चारण करता है। इसके बाद कहता है, मैं वेद को प्राप्त करूं फिर वह वेद को निश्चय प्राप्त करता है।
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नवाँ अनुवाक
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सदाचार का पालन और शास्त्रों का पढ़ना, पढ़ाना यथाशक्ति निश्चित रूप से करना चाहिए। सत्य भाषा और वेदों का पढ़ना पढ़ाना भी साथ-साथ करना चाहिए। इन्द्रियों का दमन और शास्त्रों का पढ़ना-पढ़ाना भी साथ-साथ करना चाहिए। तपस्या के साथ वेदों का स्वाध्याय करना चाहिए। मन को वश में करने के उद्यम के साथ वेदाध्ययन भी करना चाहिए। यज्ञ करने के साथ ही वेदाध्ययन भी करना चाहिए। श्राग्निहोत्र और वेदों का स्वाध्ययन करना चाहिए। अतिथियों की सेवा और स्वाध्याय करना चाहिए। आपसी लोक व्यवहार के साथ ही स्वाध्याय भी करना चाहिए। गर्भाधान आदि संस्कार रूप कर्मों के साथ वेदाध्ययन भी करना चाहिए। शास्त्रीय विधान के अनुसार अपनी स्त्री से सहवास भी करना चाहिए और स्वाध्याय भी करना चाहिए। अपने परिवार को बढ़ाने के कर्म के साथ ही वेदाध्ययन भी करना चाहिए। सत्य ही इन सबमें श्रेष्ठ है—इस प्रकार रघोतर के पुत्र सत्यवचा ऋषि कहते हैं। तपही सर्वश्रेष्ठ है— यह पुनःपुनः ऋषियों का कहना है। और सुदीर्घल के पुत्र नाक मुनि का कहना है, कि वेदों का पढ़ना-पढ़ाना ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि यही तप है, यही तप है।
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दसवाँ अनुवाक
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प्रवाह रूप में ऋणादि काल से चले आते हुए इस जन्म-मृत्यु रूप संसार वृत्त को मैं विनष्ट करना चाहता हूँ। मेरा यश पवित्र की चोटी की भाँति उदित है। ऋण पैदा करने वाली शक्ति से सम्पन्न
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६५
सूर्य में जैसे उत्तम ञ्रमृत है; उसी प्रकार मैं भी ञ्रत्यान्त पवित्र ञ्रसृत स्वरूप हूँ। तथा प्रकाशयुक्त धन का भंडार हूँ। परमा-नन्दमय ञ्रमृत से ञ्रभिविचित तथा श्रेष्ठ बुद्धि वाला हूँ। इस प्रकार त्रिशङ्कु नृपाथि को ञ्रनुभव किया हुञ्रा यह वैदिक प्रवचन है।
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ग्यारहवाँ ञ्रनुवाक
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वेद का भली भाँति ञ्रध्ययन कराकर ञ्राचार्यञ्र अपने ब्रह्मचारी विद्यार्थी को—'गृहस्थ बनकर जैसे जीवन व्यतीत करना चाहिए—यह शिक्षा देते हैं—तुम सदैव सत्य बोलो। धर्म का ञ्राचरण करो। स्वाध्याय से कभी न चूको। ञ्राचार्य के लिए दचिगा के रूप में इच्िछत धन लाकर दो फिर उनकी ञ्राज्ञा से गृहस्थ ञ्राश्रम में प्रवेश कर सन्तान परम्परा को चलाते रहो। उसव। विनाश न होने देना। तुम्हें सत्य से कभी न डिगना चाहिए। शुभ कर्मों से कभी नहीं चूकना चाहिए। उन्नति के साधनों से कभी नहीं चूकना चाहिए। उन्नति के साधनों से कभी नहीं चूकना चाहिए। वेदों के पढ़ने ञ्रौर पढ़ाने में कभी भी प्रमाद नहीं करना चाहिए। देव कार्य ञ्रौर पितॄ कार्य से कभी न चूकना चाहिए।
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तुम माता में देव बुद्धि रखने वाले बनो। पिता को देव रूप समकने वाले होञ्रो। ञ्राचार्य को देवतुल्य समकने वाले हो उठो। ञ्रतिथि को देवता के समान समकने वाले होञ्रो। जो जो निर्दोष-कर्म हैं, उन्हें का तुम्हें सेवन करना चाहिए। हम ञ्राचार्यों के जो ञ्रच्छे गुरा हैं, निर्दोंष कार्य हैं, उन्हीं का सेवन तुम्हें करना ञ्राहिए। दोषयुक्त कर्मों का ञ्राचरण कभी नहीं करना चाहिए। जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ गुरुजन, या ञ्राज्ञा ञ्राज्ञायाँ, उन्हें ञ्रासन देकर बैठाना तथा ञ्रन्य प्रकार का ञ्राराम तुम्हें देना चाहिए।
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३६
३६ : तैत्तिरीयोपनिषद्
३६
श्रद्धा पूर्वक दान देना चाहिए। बिना श्रद्धा के दान न देना चाहिए। श्रार्थिक स्थिति के अनुसार दान देना चाहिए। लज्जा पूर्वक देना चाहिए। भयभीत होकर देना चाहिए और जो कुछ भी दिया जाय उसे विवेक पूर्वक देना चाहिए।
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यह सब करते हुए भी यदि तुम्हें किसी अवसर पर कर्तव्य निश्चित करने में दुविधा पैदा हो जाए, अपनी बुद्धि से किसी निर्णय पर पहुँचना मुश्किल हो जाए—तुम किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाओ, तो ऐसी स्थिति में जहाँ पर जो कोई विवेकशील, हो उचित सलाह देने वाले हों, सदाचारी और सज्जन हों। सब के साथ प्रेम व्यवहार रखने वाले हों, तथा एक मात्र धर्मे पालन की ही इच्छा रखने वाले विद्वान् ब्राह्मण हों—वे जिस प्रकार का आचरण करें उसी प्रकार का आचरण तुम्हें भी करना चाहिए। उन्हीं के सत्संग्रार्षों और उन्हीं के श्रादर्शो को अपनाकर उन्हीं का अनुकरण तुम्हें करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जो मनुष्य किसी दोष के कारण कलंकित हो गया हो उसके साथ किस समय कैसा व्यवहार करना चाहिए इस विषय में भी यदि तुम्हें कभी असमंजस पैदा हो, तुम अपनी बुद्धि से निर्णय करने में असमर्थ हो जाओ तो वहाँ भी विचारशील, परामर्श देने में कुशल, सत्कर्म और सदाचार में संलग्न, धन, धान्य, स्त्री आदि की कामना से रहित निःस्वार्थी, निर्लोभी ब्राह्मण हों—उन्हीं के आचरणों का अनुसरण तुम्हें करना चाहिए। उनका व्यवहार ही तुम्हारे लिए प्रमाण है।
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बारहवाँ अनुवाक
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दिन और प्राप्त के अधिष्ठाता देवता मित्र हमारे लिए कल्याण प्रद हों। रात्रि और श्रपान के अधिष्ठाता वरुण भी कल्याण दायक हों। नेत्र और सूर्यमण्डल के अधिष्ठाता देवता
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वयमा हमारे लिए कल्याग्रमय हों । इन्द्र तथा बृहस्पति देवता हमारा कल्याग्र करें । त्रिविक्रम रूप से विशाल पगों वाले विष्णु हमारे लिए कल्याग्रमय हों । ऋग्वेद को नमस्कार है । वासुदेव को नमस्कार करता हूँ । प्राण रूप से प्रत्यक्ष होने वाले वायुदेवता, तुम्हें नमस्कार है । तुम्हीं ब्रह्म हो । इसलिए मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है । ऋत के श्रधिष्ठाता हो इसलिए मैंने तुम्हें ऋत कहकर पुकारा है । तुम सत्य के श्रधिष्ठाता हो इसलिए मैं तुम्हें सत्य नाम से पुकारता हूँ । जिस सर्वशक्तिमान् परमात्मा ने मेरी रक्षा की है, उसने व्याचार्य की रक्षा की है । रक्षा की है मेरी । रक्षा की है मेरे व्याचार्य की ।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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( तीनों प्रकार के ताप शान्त हों )
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ब्रह्मानन्द वल्ली
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शान्ति पाठ
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संसार में जो कुछ भी जड़ चेतन पदार्थ हैं । वह ईश्वर से व्याप्त हैं । सभी मनुष्यों में ईश्वर का वास समझकर हिल-मिल कर साथ रहना चाहिए । एक दूसरे की सहायता करने परस्पर मिलजुल कर पदार्थों का भोग करें । एक साथ पराक्रम करें । स्वापस में किसी की न तो निन्दा करें और न किसी से ईर्ष्या और शत्रुता ही रखें ।
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प्रथम अनुवाक
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ब्रह्मज्ञानी परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, उसी भाव को प्रकट करने वाली यह श्रुति कही गयी है ।
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६५
६५ : तैत्तिरीयोपनिषद्
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परब्रह्म परमात्मा सत्यस्वरूप है। ज्ञानस्वरूप है तथा ज्ञेयनन्त है। जो मनुष्य परम विशुद्ध आकाश में रहते हुए भी प्राणियों के हृदय कमल में लिपे हुए उस ब्रह्म को जानता है। वह उस विज्ञान स्वरूप ब्रह्म के साथ समस्त भोगों का भोक्ता करते हैं।
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यह निश्चय है कि सर्वप्रथम इस परमात्मा से सर्वत्र फैला हुआ यह आकाश उत्पन्न हुया है। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न, अन्न से यह मनुष्य शरीर उत्पन्न हुया। यह मनुष्य शरीर निश्चय ही अन्न और रसमय है। इसका यह प्रत्यक्ष दिखायी पड़ने वाला शरीर पत्ती की कल्पना में सिर है। दाहिनी भुजा ही दाहेबा पंख है। यह बायीं भुजा बायाँ पंख है। शरीर का मध्यभाग पदी के शरीर का धड़ है। ये दोनों पैर पूँछ और प्रतिष्ठा हैं। इसी से संबंधित यह श्लोके कहा जाने वाला यह श्लोक—मंत्र है।
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दूसरा अनुवाक
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पृथ्वी पर रहने वाले जितने प्राणी हैं, वे सब अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न से ही जीवित रहते हैं और अन्न में ही अन्न से ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं। अन्न ही सब जीवों में श्रेष्ठ है। इसलिए यह सर्वोषधि रूप कहलाता है। जो साधक अन्न को ब्रह्म समझ कर उसकी उपासना करता है। वह नि:संदेह समस्त अन्न समुच्चय को प्राप्त कर लेता है। क्योंकि अन्न ही सब जीवों में श्रेष्ठ है। इसलिए यह सर्वोषधि कहा जाता है। अन्न से ही सब प्राणी पैदा होते, जीवन धारण करते और अन्न में विलीन होते हैं। अन्न को प्राणी खाते हैं तथा अन्न स्वयम भी प्राणी को खा जाता है। इसीलिए तो इसका नाम 'अन्न' पड़ा है।
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तैत्तिरीयोपनिषद्: ६५
अन्न के रस से बने हुए स्थूल शरीर से भिन्न उसी के भीतर रहने वाला एक प्राणमय पुरुष है। उसी से यह अन्न-रसमय वाला पुरुष पूरी तरह से घिरा हुआ रहता है। वह प्राणमय आत्मा निश्चित ही पुरुष के आकार चाहो है। उस आत्मा की पुरुष के समान आकृति में व्याप्त होने से ही यह पुरुष के आकार का है। उस प्राणमय आत्मा का प्राण ही मानों शिर है। व्यान दाहिना पंख है, अपान बायाँ पंख है। आकाश शरीर का मध्यभाग है, पृथिवी पृष्ठ एवं आधार है। उस प्राण की महिमा के विषय में भी यह आगे बताया जाने वाला श्लोक है।
तीसरा अनुवाक
जितने भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि शरीरधारी जीव हैं, वे सब प्राण के सहारे ही जी रहे हैं। बिना प्राण के किसी का भी जीवन नहीं रह सकता, क्योंकि प्राण ही प्राणियों का जीवन है। प्राण ही सब प्राणियों की आयु है। इसलिए यह 'सर्वायु' कहलाता है। जो साधक उसे सर्वायु समझकर इसकी उपासना करता है। यह पूर्ण आयु को प्राप्त कर लेता है। जो परमात्मा अन्न के रस से बने हुए स्थूल शरीरधारी पुरुष का अन्तरात्मा है वही उस प्राणमय पुरुष का भी अन्तर्यामी आत्मा है।
पूर्वोक्त प्राणमय पुरुष से भिन्न उससे भी सूक्ष्म होने के कारण उसके भीतर रहने वाला दूसरा पुरुष है। उसका नाम है मनोमय । वही इस प्राणमय शरीर में सर्वत्र व्याप्त रहता है। वह यह मनोमय शरीर भी पुरुष के ही आकार होता है। पञ्ची के रूप में उसकी इस प्रकार कल्पना की गयी है—उस मनोमय पुरुष का सिर यजुर्वेद है। ऋग्वेद दाहना पंख, सामवेद बायाँ पंख है। विधि वाक्य ( आदेश ) शरीर का मध्यभाग है। तथा अथर्वा श्रौर
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१०० : तैत्तिरीयोपनिषद्
अंगिरा इन दो ऋषियों द्वारा देखे हुए अथर्ववेद के मंत्र ही पूछे और व्याधार हैं।
जहाँ से मन के सहित वाणी आदि इन्द्रियाँ उसे न पाकर लौट आती हैं, उस ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला पुरुष कभी भयभीत नहीं होता। इस प्रकार यह श्लोक है पूर्वोक्त आनन्द-रस-मय शरीर का जो आनन्द-आत्मा बतलाया गया है वही इस मनोमय शरीर का भी अन्तरात्मा अन्तर्यामी आत्मा है।
चौथा अनुवाक्
पहले बताये गए मनोमय शरीर से भी सूक्ष्म होने के कारण उसके भीतर रहने वाला आत्मा है वह दूसरा है। यह है विज्ञान-मय पुरुष उसी से यह मनोमय शरीर पूर्णतया व्याप्त है। यह विज्ञान-मय आत्मा निःसंदेह पुरुष शरीर के आकार का है। उस मनोमय पुरुष में व्याप्त होने से ही वह पुरुषाकार कहा जाता है। उस विज्ञान-मय के अंगों की पृथ्वी के रूप में इस प्रकार कल्पना की गयी है—बुद्धि की निश्चित विश्वास रूप वृत्ति—श्रद्धा उसका शिर है। सदाचार उसका दाहना पंख है। सत्य भाषा उसका वायों पंख है। ध्यान द्वारा परमात्मा के साथ संयुक्त रहना ही विज्ञानमय शरीर को मध्यमाग है। और महः नाम से शरीर परमात्मा पूछे है।
पाँचवाँ अनुवाक्
विज्ञान ही यज्ञों का विस्तार करता है, कर्मों का भी विस्तार करता है। सभी इन्द्रियरुप देवता सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म के रूप में विज्ञान की ही सेवा करते हैं। यदि कोई विज्ञान को ब्रह्मरूप से जानतों है। और यदि उसे प्रमाद नहीं करता; निरन्तर उसी प्रकार चिन्तन करता रहता है तो शरीराभिमान से उत्पन्न आपसमुदाय
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तैत्तिरीयोपनिषद् : २०९
को शरीर ही में लोड़कर समस्त भोगों का ग्रनुभव करता है । उस विज्ञानमय का यह परमात्मा ही शरीर के ग्रान्तर रहने वाला ग्रात्मा है ।
निःसन्देह पहले बताएं गए विज्ञानमय जीवात्मा से भिन्न इसके भी भीतर रहने वाला ग्रात्मा ग्रानन्दमय परमात्मा है, उससे यह विज्ञानमय पूर्णरूप से व्याप्त है । वह यह ग्रानन्दमय परमात्मा भी पुरुष के ग्राकार के समान है । उस विज्ञानमय के पुरुषाकार के ग्रन्तर्गत रहने से यह ग्रानन्दमय परमात्मा पुरुषाकार कहा जाता है । उस ग्रानन्दमय परमात्मा का प्रिय ही सिर है । मोद मनोरंजन ) दाहिना पंख है, प्रमोद वायां पंख है । ग्रानन्द ही शरीर का मध्यभाग है । ब्रह्म पृष्ठ है । उसकी महिमा के विषय एक यह भी श्लोक है—
यदि कोई यह समझता है, कि ब्रह्म नष्ट नहीं है, तो यह नष्ट ही हो जाता है । यदि कोई—'ब्रह्म है'—ऐसा जानता है, तो ज्ञानी जन उसे सत्पुरुष समभते हैं । इस प्रकार यह श्लोक है ।
उस ग्रानन्दमय का भी यही शरीर, शरीर के ग्रान्तर रहने वाला ग्रात्मा है, जो पहले वाले विज्ञानमय का है ।
ग्रन्थ ग्रनुप्रश्न का प्रारंभ करते हुए पहला प्रश्न यह उपस्थित किया जा रहा है कि—यदि ब्रह्म है तो उसको न जानने वाला कोई ब्रादमी मरने के बाद परलोक जाता है या नहीं । तथा दूसरा प्रश्न यह है कि ब्रह्म को जानने वाला कोई ब्रादमी मरने के बाद परलोक प्राप्त करता है या नहीं ।
सृष्टि के प्रारंभ में परमात्मा ने विचार किया कि मैं विभिन्न रूपों में उत्पन्न होकर एक से ग्रनेक हो जाऊँ ।यह विचार करने के
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१२ : तैत्तिरीयोपनिषद्
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३ उसने कर्म के ऋतुसार जीवों की सृष्टि करने के लिए संकल्प किया। संकल्प करने के बाद इस समस्त दृश्यमान् चेतन-श्रचेतन जगत् की उसने रचना की। तदनन्तर स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो गया। प्रविष्ट होने के बाद वह मूर्त्त और श्रमूर्त्त हो गया। बताने वाले ग्रहण करने वाले और न ग्रहण करने वाले, श्राश्रम देने वाले और न देने वाले, चेतन और श्रचेतन पदार्थ, सत्य और भूठ श्रादि सभी रूपों में ही सत्यरूप परमात्मा ही हो गया। जो कुछ भी यह दिखायी देता है, वह सत्य ही है—ऐसा ज्ञानी कहते हैं। इस विषय में एक यह भी श्लोक है—
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सातवाँ अनुवाक्
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प्रकट होने से पहले जड़ और चेतनमय यह जगत् श्रप्रकट ही में था। उसी से ही ज्ञानेक भाँति का यह प्रत्यक्ष जगत् 'हुष्ट्रा' है। उसने अपने को खुद इस रूप में प्रकट किया है; प्रकार वह 'सुकृत' कहा जाता है। इस प्रकार यह श्लोक है—
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नेश्चय ही वही सुकृत है, वही रस है, क्योंकि यह जीवात्मा स को प्राप्तकर श्रानन्दमय हो जाता है। यदि यह श्रानन्द प्रकार की भाँति व्यापक परमात्मा न होता तो कौन जीवित कता। कौन प्राणों को संचालित करता। निःसंदेह यह योंकि परमात्मा को प्राप्त करने की श्रभिलाषा रखने वाला व कभी देखने, सुनने और बोलने में न श्राने वाले श्रौर के श्राश्रित न रहने वाले शरीर रहित परमात्मा में निश्चित त्प करता है। वह सदा के लिए भय और शोक से रहित ता है।
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योंकि यह जीवात्मा उस परब्रह्म परमात्मा थोड़ा भी ग्रन्तर इतना है, वह उसी का स्मरण किया करता है। परमात्मा को
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थोड़ी देर के लिए भूल जाता है तब तक के लिए भय है। वह भय केवल मूर्ख को ही नहीं होता बल्कि श्रानुभवी शास्त्रज्ञ विद्वान को भी होता हैं। इसी विषय में यह सीधे लिखा श्लोक पढ़ा जारहा है—
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आठवाँ अनुवाक
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परमात्मा के भय से हवा नियम पूर्वक चला करती है। इसी के भय से सूर्य उदय हुग्रा करता है। इसी के भय से श्रग्नि, इन्द्र और यम श्रपना-श्रपना काम कर रहे हैं।
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अ्रब श्रानन्द संबंधी विचार शरु होते हैं। कोई श्रादमी जवान हो, वह भी ऐसा-वैसा मामूली जवान नहीं। सदाचारी, शीलवान और कुलीन हो। उसे सम्पूर्ण वेदों की शिक्षा मिली हो तथा वह ब्रह्मचारियों को संयम सदाचार की शिक्षा देने में कुशल हो वह सर्वथा नीरोग, काम करने सुहृद् और समर्थ हो तथा सभी प्रकार के फल से सम्पन्न हो। फिर धन-वैभव से भरी हुई सम्पूर्ण पृथिवी यदि उसके हाथ में श्रा जाय तो यह मनुष्य का बड़ा से बड़ा सुख है। यह मानव लोक का सबसे महान श्रानन्द है।
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मनुष्य योनि में उत्तम कार्य करके जो लोग गन्धर्व लोक को प्राप्त हुए हैं उन्हें वहाँ मनुष्य लोक के श्रानन्द से सौ गुना श्रानन्द है। वह सतुष्य गन्धर्व लोगों का एक श्रानन्द होता है। जिसका श्रन्त करने भोगों की कामनात्रों से दूषित नहीं हुग्रा है ऐसे वेदों के ज्ञाता भी वही स्वाभाविक श्रानन्द मान जाते हैं।
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जिस मनुष्य-गन्धर्व के श्रानन्द का वर्णन अभी किया गया है उसी तरह के सौ श्रानन्दों को एकत्र करने पर जो श्रानन्द का ढेर होता है, उतना सृष्टि काल के प्रारंभ में देवता जाति उत्पन्न देव
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१०४ : तैत्तिरीयोपनिषद्
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गन्धर्व का एक ज्ञानन्द है। जो मनुष्य ऐस भौतिक कामनाओं में ग्रासक्त नहीं होता तथा जो वेद के उपदेशों को हृदयंगम कर चुका है। ऐसे विद्वान् को यह ज्ञानन्द सहज ही मिल जाता है।
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देव गन्धवों के जिस ज्ञानन्द का वर्णन उपर किया गया है, वैसे सौ ज्ञानन्द इकट्ठा करके जो एक राशि बनती है, उतना चिरस्थायी, पितृ लोक में रहने वाले दिक् पितरों का एक ज्ञानन्द होता है। जो लोग संसार के भोगविलासों से रहित होकर श्रुतियों के चिन्तन ही में रहते हैं, उन्हें वह ज्ञानन्द सहज ही मिला जाता है।
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पितृलोक में जो चिरस्थायी पितर हैं, उनके सौ ज्ञानन्द मिला कर जो एक राशि बनती है, वह 'आाजानज' नाम के देवताओं का ज्ञानन्द होता है। जो लोग 'आाजानज' स्थान तक के भोग विलासों की इच्छा नहीं रखते हैं, उस वेदवित् पुरुष के लिए यह ज्ञानन्द सहज प्राप्त है।
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जो 'आाजानज' नाम के देवाताओं की ज्ञानन्द की सौरगुनी संख्या है, वह उन कर्म देवों का एक मात्र ज्ञानन्द है। जो वेद में बताए गए कमों से देवभाव को प्राप्त हुए हैं। और उस लोक तक के भोगों की कामना जो नहीं करता उसे वह ज्ञानन्द तो स्वतः प्राप्त है।
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कर्म देवों के जो एक सौ ज्ञानन्द हैं, वह देवताओं का एक ज्ञानन्द है, और जो देव लोक तक के भोगों की कामना से रहित है, उस वेदज्ञ को वह स्वतः प्राप्त है।
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जो देवताओं का एक सौ ज्ञानन्द है, वह इन्द्र का एक ज्ञानन्द है। और इन्द्र लोक तक के भोगों की कामना से जो रहित है उस वेदज्ञ पुरुष का वह ज्ञानन्द स्वतः प्राप्त है।
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तैत्तिरीयोपनिषद् : १०४
इन्द्र के सौ आनन्द मिलकर बृहस्पति के एक आनन्द के बरावर हैं और जो वेदज्ञ बृहस्पति के भोगों तक की कामना से रहित है, उसे वह आनन्द स्वतः प्राप्त है ।
बृहस्पति के सौ आनन्द मिलाने से प्रजापतिका एक आनन्द होता है । और जो वेदज्ञ प्रजा पति के भोगों में अनासक्त है उसे वह आनन्द स्वतः प्राप्त है ।
प्रजापति के सौ आनन्द मिलकर ब्रह्मा का एक आनन्द होता है । और जो ब्रह्मलोक तक के भोगों की कामना नहीं रखता उसे वह आनन्द स्वतः मिल जाता है ।
जो परमात्मा मनुष्यों में है वही सूर्य में भी है । वे सबके अन्तर्यामी एक ही हैं । जो इसे जान लेता है वह मरने के बाद पूर्वोक्त आनन्दमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माओं प्राप्त होता है । इसके विषय में श्वागे का श्लोक पढ़ा जा रहा है—
नवाँ अनुवाक
मन के सहित सभी इन्द्रियाँ जिस ब्रह्मानन्द को जानने के लिए वहाँ तक पहुँचने में व्यसमर्थ हैं, उस ब्रह्मानन्द को जान लेने वाला विद्वान् कभी किसी से भयभीत नहीं होता ।
उपयुक्त ढंग से परमात्मा को जान लेने वाला विद्वान् कभी इस प्रकार शोक नहीं करता कि हाय, मैंने अच्छे कर्म नहीं किए हैं । मैंने क्यों पाप कर्म किए हैं । उसके मन में उत्तम कर्मों के फल-स्वरूप मिलने वाले स्वर्ग और पाप कर्मों से मिलने वाले नरक की चिन्ता नहीं रहती ।
लोभ और भय से उत्पन्न सन्ताप उसे लेश तक चिन्ता नहीं रहती ।
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१०६ : तैत्तिरीयोपनिषद्
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नहीं सकते । वह ज्ञानी श्रासक्तिपूर्वक किए हुए पुण्य और पाप दोनों प्रकार के कर्मों के जन्म-मरण का कारण समभ्क कर उनके प्रति ईर्ष्या, राग द्वेष से रहित हो जाता है। और परमात्म-चिन्तन में लीन रहकर श्रात्मरक्षा करता है ।
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भृगु वल्ली
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प्रथम अनुवाक
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वरुण के पुत्र भृगुनाम के ऋषि के मन में एक बार परमात्मा को जानने और उसे प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा हुई । तब वे अपने पिता के पास गए । उनके पिता वरुण वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे । इसलिए भृगु को किसी दूसरे श्राचार्य के पास जाने की जरूरत न पड़ी । उन्होंने अपने पिता के पास जाकर कहा—भगवन्, मैं ब्रह्म को जानना चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे ब्रह्मतत्त्व समभाइए । वरुण ने कहा—पुत्र ! श्रन्न, प्राण, नेत्र, कान, मन और वाणी ये सभी ब्रह्म प्राप्ति के द्वार हैं । इन सभी में ब्रह्म की सत्ता गूंथी रहती है । ये दिखायी देने वाले जितने प्राणी हैं वे सब जिससे उत्पन्न होते हैं, जिसके बल पर उनका पालन होता है और महाप्रलय के समय जिसमें ये विलीन होते हैं उसी को जानने और पाने की इच्छा कर । वही ब्रह्म है ।
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इस प्रकार पिता का उपदेश प्राप्तकर भृगु ऋषि ब्रह्मचारी, संयम आदि के द्वारा तप करने लगे । पिता की श्राज्ञा पर दृढ़ रहे । त्याग पूर्वक शम, दम का पालन करते रहे यही उनका तप था । इस प्रकार का तप करके उन्होंने क्या प्राप्त किया—यह बात अगले अनुवाक में बतायी गयी है ।
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दूसरा अनुवाक
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पिता के उपदेश के अनुसार भृगु ने यह निश्चय किया कि श्रन्न ही ब्रह्म है, क्यों कि समस्त प्राणी श्रन्न से ही जन्म लेकर वीर्य से ही
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उत्पन्न होते हैं। ध्यान से ही वे जीते हैं और ध्यान में यहाँ से प्रस्थान करते हुए ध्यान में ही प्रविष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार का निश्चय कर वह पुनः अपने पिता वरुण के पास पहुँचकर बोले—भगवन्, मुझे ब्रह्म का वोध कराइए। तब वरुण ऋषि ने कहा कि पुत्र, ब्रह्म को तत्त्व से जानने की इच्छा करो। तप ही ब्रह्म है। इस प्रकार पिता की आज्ञा से वह तप करने लगे। तप करके—
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तीसरा अनुवाक
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प्राण ही ब्रह्म हैं—ऐसा उन्हें बोध हुआ था। क्योंकि प्राण से ही सभी प्राणी पैदा होते हैं। पैदा हो कर प्राण से ही जीवित रहते हैं। और मरते समय प्राण में ही सब प्रकार से समा जाते हैं। इस प्रकार का बोध प्राप्त कर भृगु ऋषि ने फिर अपने पिता वरुण ऋषि के पास जाकर उन्हें अपना बोध सुनाया और कहा—भगवन्, मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए। वरुण ऋषि ने कहा—ब्रह्म को तप से तत्त्वतः जानने की इच्छा करो। ब्रह्म प्रापि का साधन तप ही है। इस प्रकार आज्ञा पाकर वह फिर तप करने लगे और तप करके—
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चौथा अनुवाक
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उन्होंने यह बोध प्राप्त किया कि मन ही ब्रह्म है। क्योंकि मन से ही सभी प्राणी पैदा होते है, मन से उत्पन्न होकर मन से ही जीते हैं और मरते समय मन ही में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार उस ब्रह्म को जानकार उन्होंने पुनः अपने पिता के पास जाकर अपना निश्चय सुनाया। लेकिन अपनी बात का कोई उत्तर न पाकर—भृगु बोले—भगवन् मुझे उपदेश दीजिए। ऐसा प्रार्थना करने पर वरुण ऋषि ने कहा—ब्रह्म को तप से तत्त्वतः जानने की इच्छा करो। तप ही ब्रह्म है। तदन भृगु फिर तपस्या करने लगे और तप करके—
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पाँचवाँ अनुवाक्
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उन्होंने सम्भवतः कि विज्ञान ही ब्रह्म है। क्योंकि विज्ञान से ही समस्त प्राणो उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर विज्ञान से जीते हैं और मरने पर विज्ञान ही में समा जाते हैं। इस प्रकार ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर वह उसी प्रकार फिर अपने पिता के पास गए। अपनी बात का कोई उत्तर न पाकर बोले—भगवन्, मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए, इस प्रकार कहने पर वरुण ऋषि बोले—ब्रह्म का ज्ञान तप से तत्त्वतः प्राप्त करने की इच्छा करो। पिता की यह आज्ञा मान कर वह फिर तप करने लगे और तप करके—
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छठा अनुवाक्
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उन्होंने यह समभा की श्रानन्द ही ब्रह्म है। क्योंकि श्रानन्द से ही समस्त प्राणी पैदा होते हैं, इसी से जीवित रहते हैं और अन्त में इसी में समा जाते हैं। इस प्रकार ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद ऋगु की जानी हुई और वरुण द्वारा उपदेश की हुई विद्या विशुद्ध श्राकाश रूप परब्रह्म परमात्मा में पूराँ स्थित है। जो कोई इस श्रानन्द ब्रह्म को जान लेता है, वह परब्रह्म में स्थित हो जाता है इतना ही नहीं वह इस लोकमें बहुत श्रान्त वाला और श्रान्त को भली-भाँति पचाने की शक्ति वाला हो जाता है। तथा संतान से, पशुओं से, ब्रह्म तेज से सम्पन्न होकर वह महान् बन जाता है और उत्तम कीर्तिंशाली हो जाता है।
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सातवाँ अनुवाक्
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श्रान्त की निन्दा न करनी चाहिए, क्योंकि वह ब्रत है, प्राण है वही श्रान्त है। शरीर है और श्रान्त का भोक्ता है। शरीर और प्राण के आधार पर स्थित हैं। शरीर के आधार पर प्राण स्थित हो रहे हैं। यह श्रान्त ही में श्रान्त स्थित हो रहा है। जो मनुष्य—श्रान्त ही
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में अन्न स्थित है—इस रहस्य को जान लेता है, वह उसी में प्रतिष्ठित हो जाता है। अन्नवाला अन्न को खाने वाला हो जाता है। सन्तान, पशु और ब्रह्मतेज से सम्पन्न होकर वह महान् बन जाता है। कीर्ति से भी सम्पन्न हो जाता है।
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अन्न का अपमान न करना चाहिए क्योंकि यह एक व्रत है। जल ही अन्न है और तेज रस स्वरूप अन्न का भोक्ता है। जल में तेज रहता है, तेज में जल रहता है। वही यह अन्न में अन्न प्रतिष्ठित रहता है। जो मनुष्य इस रहस्य को जान जाता है, वह उस रहस्य में प्रतिष्ठित हो जाता है। अन्नवाला और अन्न को खानेवाला हो जाता है। सन्तान, पशु और ब्रह्मतेज से महान् बन जाता है। तथा कीर्ति से समृद्ध हो कर महान् बन जाता है।
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नवम अनुवाक
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अन्न को वढ़ाना चाहिए। क्यों कि यह एक व्रत है। पृथिवी रूप अन्न का आधार होने से आकाश अन्न को खाने वाला है। पृथिवी में आकाश स्थित है। आकाश में पृथिवी स्थित है। वही यह अन्न में अन्न स्थित है। जो मनुष्य इस रहस्य को जान लेता है, वही अन्न- वाला और अन्न का खानेवाला बन जाता है। वह सन्तान, पशु और ब्रह्मतेज से महान् बन जाता है। वह महान् कीर्तिशाली बन जाता है।
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दसवाँ अनुवाक
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अपने घर में ठहरने के लिए आए हुए किसी अतिथि को प्रति कूल उत्तर न देना चाहिए। यह एक व्रत है अतिथि सत्कार के लिए
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११० : तैत्तिरीयोपनिषद्*
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हर उपाय से अन्न को जुटाना चाहिए। क्योंकि गृहस्थ अपने घर आए हुए अतिथि से कहता है कि—‘भोजन तैयार है।’ यदि गृहस्थ, अतिथि को श्रद्धा, प्रेम और सत्कार से तैयार किया हुआ भोजन देता है, वह निश्चय ही देने वाले को श्रद्धा और सत्कार के साथ ही अन्न प्राप्त होता है। यदि वह अतिथि को मध्यम श्रेणी की श्रद्धा और प्रेम से तैयार किया हुआ भोजन देता है तो निःसंदेह दाता को मध्यम श्रेणी का अन्न प्राप्त होता है। और यदि तो कोई अपने अतिथि को निकृष्ट श्रद्धा-सत्कार से तैयार किया गया भोजन देता है तो देने वाले को निकृष्ट अन्न मिलता है। जो इस रहस्य को जान लेता है, वह अतिथि के साथ उत्तम वर्ताव करता है।
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वह परमात्मा वाणी में रत्न शक्ति के रूप में निवास करता है† प्राण और अपान में प्राणि और रत्न रूप से, हाथों में कर्म करने की शक्ति रूप से, पैरों में चलने की शक्ति रूप से, गुदा में मल त्याग की शक्ति रूप से रहता है। इस प्रकार ये आध्यात्मिक उपासनाएँ हैं। अब दैवी उपासनाओं का वर्णन किया जाता है—
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वह परमात्मा वृष्टि में ऋतु-शक्ति रूप से है। बिजली में बल (शक्ति) रूप से है। पशुओं में यश रूप से है। ग्रहों और नक्षत्रों में ज्योति रूप से है। मूत्राशय में सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति वीर्य रूप है। अमृत और आनन्द देने की शक्ति रूप से स्थित है और आकाश में सब का आधार बनकर स्थित है।
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उपासना करने योग्य वह परमात्मा सबका आधार है। जो साधक उसकी इस प्रकार उपासना करता है वह प्रतिष्ठित बन जाता है। वह भगवान् सबसे महान् है। यह सम्भव कर जो उपासना करता है, वह महान् बन जाता है। वह भगवान् मन है—यह समम्न कर जो उपासना करता है वहं मनन शील बन जाता
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है। वह ईश्वर नमस्कार योग्य है—यह समझ कर जो उपासना करता है उसके समस्त भोग पदार्थ विनीत बन जाते हैं। जो कोई उसकी उपासना ब्रह्म सम्यक् कर करता है वह ब्रह्ममय वन जाता है। जो कोई उसे सबको मारने वाला नियत किया हत्या-अधिकारो सम्यक् कर उसकी उपासना करता है, उस उपासक के सभी शत्रुओं का नाश हो जाता है। उसके अनिष्ट चाहने वाले सभी ऋप्रिय जन नष्ट हो जाते हैं।
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वह परमानन्द स्वरूप परमात्मा इस मनुष्य में और सूर्य में एक ही है। जो इस तत्व को जान लेता है वह मरने के बाद परमानन्द में मिल जाता है। जिस आनन्दमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय आत्मा का वर्णन पहले किया जा चुका है वह स्थूल और सूक्ष्म भेद से विविध रूपों में स्थित हैं। सभी के रूप परमात्मा हैं। ऐसे परमात्मा को पाकर मनुष्य सभी भोग पदार्थों से युक्त होकर इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति से सम्पन्न हो जाता है। साथ ही वह इन लोकों में विचरता हुआ गान करता है।
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परमात्मा का साक्षात्कार कर लेने वाले व्यक्ति के अन्तःकरण से निकले पावन उद्गार ये हैं—बड़े आश्चर्य की बात है, कि ये इन सम्पूर्ण भोग पदार्थों को भोगने वाला जीवात्मा और भोग पदार्थों तथा जीव का संयोग कराने वाला परमात्मा मैं एक हूँ। मैं ही इस दृश्यमान जगत का कर्ता और सब से पहले उत्पन्न होने वाला ब्रह्म हूँ। परमात्मा अमृत रूप ब्रह्म और मुख में कोई फर्क नहीं—दोनों एक हैं। कोई व्यक्ति किसी वस्तु को जब किसी को प्रदान करता है—वह मानों मुझे ही देकर मेरी रक्षा करता है। इसके विपरीत जो ग्रहण करने ही लिए सभी भोगों को भोगता है, उस खाने वाले को मैं अन्न रूप होकर निगल जाता हूँ। मैं समस्त
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१२ : तैत्तिरीयोपनिषद्
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ब्रह्मांड का तिरस्कार करने वाला हूँ । मेरी महत्ता के सामने यह
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व कुछ तुच्छ है । मेरे प्रकाश की एक किरण सूर्य के समान है ।
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कोई परमात्मा के इस तत्व को जान लेता है, वह भी इसी
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याति को प्राप्त कर लेता है ।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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(तीनों प्रकार के ताप शान्त हों)
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श्वेताश्वतरोपनिषद्
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यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद के अन्तर्गत है। इसके द्वारा श्वेताश्वतर ऋषि ने चौथे आश्रम ( संन्यास ) में प्रवेश करने वालों को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था। इसमें कुल छह अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में परमात्मा के साक्षात्कार का साधन प्रवण (ॐ) बताया गया है। दूसरे अध्याय में ध्यान-भ्यास की विधि, उसके योग्य स्थान, प्रवृत्ति और फल का वर्णन किया गया है। तीसरे अध्याय में ध्यान के साध्य परमात्मतत्व का सगुण, निर्गुण, विराट् तथा शुद्ध रूप का क्रमशः वर्णन किया गया है। चौथे अध्याय में तत्व बोध की प्राप्ति के लिए तथा माया से छुटकारा पाने के लिए भगवान से प्रार्थना को गयी है। पांचवें अध्याय में क्षर, अक्षर तथा इन दोनों के प्रेरक परमात्मा के विविध रुपों का उल्लेख किया गया है। छठे अध्याय में परमात्मा के स्वरूप और ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए उसी के ज्ञान से सांसारिक दुःखों से छुटकारा पाने का निर्देश किया गया है।
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१९४ : श्वेताश्वतरोपनिषद्
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इस उपनिषद् में परमार्थतत्त्व का ही निरूपण है । संसार क्या है, इसका कारण क्या है । हम कहाँ से उत्पन्न हुए हैं । किनके द्वारा। हम जीवन धारण करते हैं। हमारी आधार कौन है ? और किसकी प्रेरणा से हम सुख-दुःख भोगते हैं, श्रादि ऐसा ही जिनासाओं का हल इस उपनिपद् में है ।
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शान्ति पाठ
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वहू परमात्मा हम श्राचार्य और शिष्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करे । हम दोनों का साथ-साथ पालन करे । हम साथ ही साथ विद्या संवंधी पराकम प्राप्त करें । हम दोनों ने जो कुछ पढ़ा है, वह तेजस्वी हो । हम द्वेष न करें ।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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( तीनों प्रकार के ताप शान्त हों )
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हरिः ॐ का उच्चारए करते हुए ब्रह्मवादी कहते हैं— हे वेदज्ञ महर्षिगणए, वेदों में लिखा है, कि इस समस्त जगत् के कारण ब्रह्म हैं। वह ब्रह्म कौन है । हम लोग कहाँ से पैदा हुए हैं । हमारी स्थित किस पर श्राधारित है । हमारा परमाश्रय कौन है? हम लोगों की व्यवस्था करने वाला कौन है ! जिसकी व्यवस्था के श्रन्तगत हम सुख-दुःख का श्रनुभव भोग रहे हैं ।
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काल, स्वभाव, निश्चित फल देने वाला कर्म, श्राकस्मिक घटना, पाँचों तत्त्व या जीवात्मा जगत् का मूल कारण है । इस पर विचार करना चाहिए । क्योंकि ये चेतन श्रात्मा के प्रति न हैं । इनमें स्वतंत्र कार्य करने की शमता नहीं है । ये सब सुख-दुःखों के हेतु होने के कारण प्रारब्ध के श्राधीन हैं ।
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ध्यानयोग में स्थित होकर उन्होंने अपने गुणों से ढकी हुई उस परमात्मदेव की व्यचिन्त्यशक्ति का साक्षात्कार किया जो व्यचेष्टा ही काल से लेकर व्यात्मा तक वताए हुए कारणों पर शासन करता है ।
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परमात्मा की व्यचिन्त्यशक्ति का साक्षात्कार करने वाले महर्षियों का कहना है, कि हमने एक ऐसे चक्र को देखा है, जो एक नेमि (गोली लकड़ी जिसमें धुरी पहिया फँसे रहते हैं ।) तीन घेरों वाले, सोलह सिरों वाले, पचास अरों (पहियों की पुतियों में लगी हुई तकड़ियाँ) से ६ ऋष्टकों से युक्त है । और अनेक रूपों वाले एक ही पाश से युक्त मार्ग के तीन भेदों वाला दो निमित्त और मोह रूपी नाभिवाला है ।
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तात्पर्य यह कि संसार चक्र का मूल आधार एक परमात्मा है । वह संसार चक्र प्रकृति रूपी नेमि से घिरा हुया है । सत्, रज और तम ये तीन उसके घेरे हैं । आठ सूक्ष्मतत्व और आठ स्थूल रूप उसके सिरे हैं । घन्ट:करण की प्रवृत्तियों के पच्चास भेद संसार चक्र के अरे हैं । उसमें आठ-अठारह चीजों के ६ समूह हैं । पाँच महाभूतों के कार्य, दस इन्द्रियां, पाँच प्राण और पाँच विषय ये बीस अरों की जगह हैं । जीवों को इस चक्र में बाँधकर रखनेवाली मायासक्ति ही फाँसी (पाश) है ।
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देवयान, पितृयान और तीसरा इस लोक के दूसरी योनि में जाना ये तीन उस चक्र के मार्ग हैं । पुण्य और पाप ये दोनों चक्र के साथ-साथ घुमाने में निमित्त हैं । संसार चक्र का केन्द्र ब्रज्ञान है ।
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'वे ब्रह्म वेत्ता ऋषि अब संसार के नदी रूप का वर्णन करते हैं—वे कहते हैं, कि हम एक ऐसी नदी को देख रहे हैं, जिसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच प्राण सोते हैं । पंच महाभूत इस नदी के पाँच
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११६ : श्वेताश्वतरोपनिषद्
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उद्गीतम स्थान हैं। यह संसार रूप नदी बहुत ही टेढ़ी-मेढ़ी श्रोतेज़ प्रवाह की है। इस भवसरिता की लहरें प्राप्त हैं। यह मन संसार रूप नदी का मूल है। शब्द, स्पर्श श्रादि पाँच विषय संसार-सरिता की पाँच भँवरें हैं। इन्हीं में फँसकर जीव जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ जाता है। पाँच प्रकार के दु:ख (गर्भ, जन्म, रोग, बुढ़ाई, मृत्यु) इस नदी के प्रवाह के वेग हैं। श्रविद्या, श्रास्मिता (ग्रहंकार) राग, द्वेष श्रौर श्रभिनिवेश (मृत्युभय) ये पाँच प्रकार के क्लेश संसार-सरिता के पाँच विभाग हैं। श्रौर ग्रन्थ:करण की पचास वृत्तियाँ ही इस नदी के पचास भेद हैं।
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इस संसार चक्र के संचालक परमात्मा द्वारा यह जीव अपने कर्मों के ग्रनुसार गुमाया जाता है। जब तक इस चक्र के संचालक को जान कर उसकी कृपा नहीं प्राप्त कर ली जाती तब तक इस चक्र से छुटकारा नहीं मिलता। जब जीव ग्रपने को ग्रौर संसार चक्र के संचालक को श्रच्छी तरह अलग-अलग समभ लेता है, तब वह परमात्मा का कृपा पात्र बन जाता है। ग्रमृतत्व को प्राप्त हो जाता है।
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जिस परमात्मा की महिमा वेदों ने गायी है, वह सब का सर्वोत्तम स्थान है। समस्त विश्व उसी में स्थित है। वही प्रेरक, श्रविनाशी ग्रौर श्रद्वैत-रूप परमदेव है। ध्यान योग में स्थित होकर जिन ब्रह्म ज्ञानियों ने ऐसे परमात्मा का साक्षात्कार किया है वे सर्वात्मा परमात्मा को ग्रपने हृदय में स्थित समभकर उसी की शरण में जाकर उसी में लीन हो गए।
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विनाश शील, जड़वर्ग एवं ग्रविनाशी जीवात्मा इन दोनों के संयुक्त रूप प्रकट ग्रौर ग्रप्रकट रूप में स्थित इस विश्व को धारण श्रौर इसका पोषण परमात्मा ही करता है। तथा जीवात्मा; सांसारिक विषयों का भोक्ता बनकर प्रकृति के ग्रधीन हो इसमें फँस जाता
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है । लेकिन परमदेव परमात्मा को जानकर वह सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है ।
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सर्वज्ञ और ज्ञानी, सर्वशक्तिमान और समर्थ ये दो श्रज्ञान्मा श्रात्मा हैं। तथा जीवात्मा के भोगने के लिए उपयुक्त उपभोग सामग्री से युक्त आदि प्रकृति एक तीसरी शक्ति है। इन तीनों से श्रलावा ईश्वर शक्ति सबसे विलक्षण है। क्योंकि वह परमात्मा श्रनन्त, सर्वस्वरुप, कर्त्तोपन के श्रभिमान से रहित है। जब मनुष्य ईश्वर, जीव, प्रकृति इन तीनों को ब्रह्म रूप में प्राप्त कर लेता है, तब वह सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
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प्रकृति तो परिवर्तनशील होने के कारण विनाशशील है। इसके भोगने वाला अ्रविनाशी चैतन्य तत्त्व है। इन प्रकृति और चेतन-जीव समुदाय दोनों तत्त्वों पर एक परमात्मा ही शासन करता है। वही प्राप्त करने और जानने योग्य है ! उसे तत्त्व से जानना चाहिए। ऐसा निश्चयकर परमात्मा का ध्यान करने से उसी में निमग्न और तन्मय हो जाने से शन्त में उसी को प्राप्त करता है। इस प्रकार सम्पूर्ण बन्धनों से छूट जाना पड़ता है।
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इस प्रकार चिन्तन और ध्यान करने से जब परमात्मज्ञान हो जाता है, तब मनुष्य के सभी बन्धन छूट जाते हैं। क्योंकि क्लेशों का नाश हो जाने से जन्म-मृत्यु से छुटकारा मिल जाता है। ऋतः वह देह भेद नाश होने पर स्वर्ग लोक तक के समस्त ऐश्वर्य त्याग करके केवल सर्वथा विशुद्ध पूर्ण काम हो जाता है।
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परब्रह्म परमात्मा अपने ही भीतर-हृदय में घ्यान्तर्यामी रूप से स्थित है ! इसे जानने के लिए सदैव चेष्टा करनी चाहिए। क्योंकि इससे बढ़कर जानने योग्य तत्त्व दूसरा कुछ भी नहीं है। जीवात्मा, जड़वर्ग और उनके प्रेरक परमात्मा इन तीनों को जान-
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११८ : श्वेताश्वतरोपनिषद्
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कर मनुष्य सब कुछ जान लेता है । इस प्रकार तीनों वेदों में बताया गया यह ब्रह्म ही है ।
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जिस प्रकार अपने प्रकट होने के स्थान—काष्ठ आदि में स्थित अग्नि का रूप दिखायी, नहीं देता लेकिन उसकी सत्ता का नाश नहीं होता, क्योंकि प्रयत्न करने, पर अग्नि अपने उत्पत्ति स्थान ईंधन आदि से प्रकट हो जाती है उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा इसी शरीर में रहते हैं और ओंकार की साधना करने पर प्रत्यक्ष हो जाते हैं ।
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अग्नि को प्रकट करने के लिए जैसे दो अरણી लकड़ियों को नीचे ऊपर करके मथा जाता है, उसी प्रकार अपने शरीर में परमात्मा को प्राप्त करने के लिए शरीर को नीचे की अरણી वनाना चाहिए और ओंकार को ऊपर की अररણી । इसके बाद ध्यान द्वारा निरंतर मथते रहने पर साधक छिपी हुई अग्नि की तरह हृदय में छिपे हुए भगवान् को देख लेता है ।
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जैसे तिल में तेल, दही में घी; स्रोतों में जल और अररણી लकड़ी में अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार यह परमात्मा अपने हृदय के अंदर छिपा हुआ है । जो साधक इसे सत्य और संयम रूप तप से देखता है—चिंतन करता है उसके द्वारा वह उसे प्राप्त कर लेता है ।
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दूध में समाये हुए घी की भाँति सर्वत्र परिपूर्ण आत्मा विद्या एवं तप से प्राप्त होने वाले जिस परमात्मा को साधक प्राप्त करता है, वही उपनिषदों में बताया गया ब्रह्म है ।
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दूसरा अध्याय
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सबको उत्पन्न करने वाला परमात्मा पहले हमारे मन और बुद्धि की वृत्तियों को तत्त्व की प्राप्ति के लिए अपने अपने दिव्य
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श्वेताश्वतरोपनिषद् : ११६
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स्वरूप में लगाए । और फिर अग्नि आदि इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवताओं की जो विषयों को प्रकट करने की शक्ति है उसे दृष्टि में रखते हुए बाहरी विषयों से लौटाकर हमारी इन्द्रियों में अच्छी तरह स्थापित कर दें ।
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हम लोग सब को उत्पन्न करने वाले परमात्मा के आराधना रूप यज्ञ में लगे हुए मन के द्वारा स्वर्गीय सुखों की प्राप्ति के लिए पूरी शक्ति से प्रयत्न करें ।
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सबके उत्पादक भगवान् मन और इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवताओं को जो स्वर्ग आदि लोकों में और आकाश में गमन करने वाले तथा महान् प्रकाश फैलाने वाले हैं, हमारे मन और बुद्धि से संयुक्त करके हमें प्रकाश देने के लिए प्रेरणा प्रदान करें ।
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जिसमें ब्राह्मण आदि मन को लगाते हैं । बुद्धि की सभी वृत्तियों को लगाये रहते हैं । जिसने समस्त अग्निहोत्र आदि का विधान किया है, जो समस्त जगत के विचारों को जानने वाला है और केवल एक ही है उस सर्वश्रेष्ठ, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ एवं सबके उत्पादक परमात्मा की हमें स्तुति करनी चाहिए ।
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हे मन और बुद्धि में तुम दोनों के स्वामी, सबके आदि परब्रह्म से वारम्बार नमस्कार के द्वारा लग्न होता हूँ । मेरी यह स्तुति श्रेष्ठ विद्वान् की भाँति सर्वत्र फैल जाए । जिससे अविनाशी परमात्मा के समस्त पुत्र जो दिव्य लोकों में निवास करते हैं सुनें ?
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जिस स्थिति में अग्नि प्रकट करने के लिए अरणियों द्वारा मथे जाने की भाँति अग्नि रूप परमात्मा को प्राप्त करने के लिए ॐ के ध्यान और चिन्तन से मन्थन किया जाता है । जहाँ प्राणवायु का भली-
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भ्रान्ति निरोध किया जाता है। जहाँ ज्ञानानन्द रूप सोमरस अध्यिक्ता से पैदा होता है। उसी स्थिति में मन सर्वथा विशुद्ध हो जाता है।
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सम्पूर्ण जगत् के उत्पादक परमात्मा द्वारा प्राप्त हुई प्रेरणा से सब के आदि कारण उसी परमात्मा की ष्याराधना करनी चाहिए। तू उस परमात्मा में ही श्राश्रय प्राप्त कर। इसमें तेरे पूर्व संचित कर्म विनष्ट नहीं डालेंगे।
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बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि सिर, गला और छाती इन तीनों को एक साथ सीधा करके समस्त इन्द्रियों को मन के द्वारा हृदय में रोक कर ॐ रूप नौका द्वारा समस्त भयावह सोतों के प्रवाहों को पार कर जाए।
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इस प्रकार के भोग साधन में व्याहार-विहार का संयम रखकर विधिवत् प्राणायाम करके, प्राण के सूक्ष्म हो जाने पर नाक के छेद से उसे बाहर निकाल दे। उसके बाद जैसे सारथी दुष्ट घोड़ों से युक्त रथ को सावधानी से चलने वाले मार्ग पर ले जाता है उसी प्रकार मन को भी सावधानी से वश में रखना चाहिए।
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इस प्रकार मन को वशीकृत करने के लिए कंकड़, श्राग, बालू से रहित सब प्रकार से शुद्ध, शब्द, जल, वायु के दृष्टि से उपयुक्त नेत्रों को कष्ट न देने वाले वायु-शून्य स्थानों में ष्याभ्यास करना चाहिए।
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इस प्रकार का योग साधन करते समय पहले कुहरा, धुञ्राँ, सूर्य, वायु, और श्रग्नि के सदृश, तथा जुगुनू, बिजली, स्फटिक मणि और चन्द्रमा के समान बहुत-से दृश्य योगी के समान प्रकट होते हैं। ये सब योग की सफलता के सूचक होते हैं।
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पृथिवी जल, श्रग्नि, वायु और ष्याकाशा इन पांच तत्वों का उत्थान योगाभ्यास करने से हो जाता है। और इन पांचों तत्वों
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श्वेताश्वतरोपनिषद् : १२१
से सम्बन्ध रखने वाली भोग सम्बन्धी पाँचों प्रकार की सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं। उस समय योगाग्निमय शरीर को प्राप्त करने वाले उस साधक को न तो रोग होता है, न बुढ़ापा आता है और न उसकी मृत्यु होती है।
इसके अतिरिक्त शरीर में हल्कापन आ जाता है, किसी प्रकार का रोग नहीं होता, विपयों से मन विरक्त हो जाता है। शरीर का रंग निखर जाता है। स्वर मधुर हो जाता है। शरीर से एक प्रकार की सुगन्धि निकलने लग जाती है। मल-मूत्र कम मात्रा में पैदा होता है, इन्हें भोग की पहली सिद्धि कहते हैं।
जैसे चमकता हुआ रत्न मिट्टी से लिपटा रहने पर मलिन रहता है। किन्तु वही रत्न जब मिट्टी जाने पर चमकने लगता है, उसी प्रकार जीवात्मा का असली रूप अत्यन्त स्वच्छ होने पर भी अनेक जन्मों के मलिन कर्मों से ढका रहता है। लेकिन ध्यान योग द्वारा मनुष्य जब इसे स्वच्छ कर लेता है, तब वह निर्मल बन जाता है और अकेला ही मोक्ष पद को प्राप्त कर शोक, क्लेश रहित हो जाता है।
फिर जब वह साधक इसी स्थिति में दीपक के तुल्य प्रकाशमान आत्मतत्त्व के द्वारा ब्रह्मतत्त्व को भली-भाँति देख लेता है, उस समय वह उस ब्रह्मात्मा, निश्चल, समस्त तत्त्वों से विशुद्ध परमात्मा को जान कर सभी बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार का वह ब्रह्म सभी दिशाओं, अवान्तर दिशाओं में व्याप्त है। सबसे पहले वही हिरण्य गर्भ रूप में प्रकट हुआ था। वही समस्त ब्रह्माण्ड रूप गर्भ में अन्तर्यामी रूप से स्थित है। वही इस जगत् के रूप में प्रकट है। वही भविष्य में भी प्रकट होगा।
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होगा । शन्तन्योमो रूप से वह सभी जीवों के हृदय में बैठा हुय्या है । उसके चारों और मुख हैं ।
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जो परमात्मा श्रग्नि में है, वही जल में है। जो समस्त लोकों में है वही श्रौपधियों और जो वनस्पतियों में है उस परमात्मा को हम नमस्कार करते हैं । नमस्कार करते हैं ।
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तीसरा अध्याय
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जो एक—श्रद्वितीय परमात्मा जगत् रूप जालकी रचना करके अपनी स्वरूप भूत शक्तियों द्वारा उसपर शासन करता है तथा उन विविध शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, जो श्रकेला ही सृष्टि और उसके विस्तार करने में समर्थ है, उसे ब्रह्म को जो बुद्धिमान जान लेते हैं, वे श्रमर हो जाते हैं ।
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जो श्रपनी स्वरूपभूत शक्तियों द्वारा इन सभी लोकों पर एक ही शासन करता है, वह रुद्र है । इसलिए ज्ञानी पुरुषों ने जगत् के कारण का निश्चय करते समय दूसरे का श्राश्रय नहीं लिया । वह परमात्मा समस्त जीवों के भीतर स्थित हो रहा है । सम्पूर्ण लोकों की रचना करके उनकी रक्षा करने वाला परमात्मा प्रलयकाल में इन सबको समेट लेता है ।
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एक होते हुए भी उस परमात्मा की श्राँखें सभी स्थान हैं । सब जगह हाथ और सब जगह पैर हैं । श्राकाश और पृथिवी की रचना करते वाला वह एक मात्र परमात्मा मनुष्य श्रादि को दो-दो बाहों से युक्त करता है । तथा पच्चो, कीट, पतंग श्रादि को पँखों से युक्त करता है ।
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जो रुद्र, इन्द्र श्रादि देवताओं का स्रष्टयिता, पालक, पोषक है तथा समस्त विश्व का श्रधीश्वर और महान ज्ञानी है । जिसने
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पहले हिरण्यगर्भ में को उत्पन्न किया था, वह परमेश्वर हम सबको शुभ बुद्धि से संयुक्त करे।
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हे रुद्रदेव, आपकी जो भयानकता से रहित पुरुष से प्रकाशित होने वाली कल्याणकारी सौम्य मूर्ति है, हे गिरिशन्त, (पर्वत पर रहते हुए सभी लोकों को सुख पहुँचाने वाले) परमेश्वर, उस परम सौम्य मूर्ति से ही हमारी ओर कृपा करके देखें।
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हे गिरिशन्त, जिस वाण को फेकने के लिए तू हाथ में धारण किए हुए है, हे गिरित्र, जगत को नष्ट न कर।
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जो जीव समुदाय रूप जगत से और हिरण्यगर्भ ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ है, समस्त प्राणियों में उनके शरीर के अनुरूप होकर छिपा हुआ है। समस्त जगत को सब ओर से घेरे हुए है, सर्वत्र व्याप्त और महान है, उस एक मात्र परमात्मा को जान कर ज्ञानी लोग सद्ा के लिए श्रमर हो जाते हैं।
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मैं महान से भी महान उस परमात्मा को जानता हूँ, जो अविद्या रूप अज्ञान से सर्वथा परे है। सूर्य की भांति स्वयं प्रकाशमान है। उसे जान कर ही लोग मृत्यु को लाँघ जाते हैं। परमपद की प्राप्ति के लिए इसके सिवा और कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
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जिससे बढ़कर श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है, जिससे बढ़कर न तो कोई सूक्ष्म है, और न महान है। जो अकेला ही वृक्ष की भांति निश्चल भाव से आकाश में स्थित है। उसी परमात्मा से यह समस्त जगत व्याप्त है।
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पूर्वोक्त हिरण्यगर्भ से जो सब प्रकार से श्रेष्ठ और महान है, वह निराकार और निर्दोष है। जो इस परमात्मा को जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं, अन्यथा नरक में पड़ते हैं।
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श्रमर हो जाते हैं, परन्तु इस रहस्य को न जानने वाले दूसरे लोग वार वार दु:ख को ही प्राप्त होते हैं।
वह भगवान् सच ग्रोर शिर ग्रोर सर्व ग्रोर मुख वाला है। समस्त प्राणियों के हृदय में निवास करता है। सर्व व्यापी हौ। इसलिए वह कल्याण रूप परमात्मा सभी जगह पहुँचा हुच्चा है।
निश्चय ही यह महान् प्रभु, सब पर शासन करने वाला, ग्रविनाशी, प्रकाशस्वरूप, परमात्मा ग्रपने ग्राप्ति रुप निर्मल लाभ की ग्रोर च्रन्त: करण को प्रेरित करने वाला है।
ग्रंगूठे के परिमाण वाला ग्रन्तर्यामी परमात्मा सदैव मनुष्यों के हृदयों में निवास करता है, मन का स्वामी है, तथा निर्मल हृदय ग्रोर शुद्ध मन से ध्यान करने पर प्रकट होता है। इसे जान जाता है, वह ग्रमर हो जाता है।
हजारों शिर वाला, हजारों ग्राँख वाला, ग्रोर हजारों पैर वाला वह परमात्मा समस्त जगत् को सब ग्रोर से घेर कर नाभि से दस ग्रंगुल ऊपर हृदय में स्थित है।
जो हो चुका है, जो होने वाला है ग्रौर जो खाद्य पदार्थों से इस समय बढ़ रहा है। वह समस्त जगत् पुरुष परमात्मा ही है। वही ग्रमृत स्वरूप मोक्ष का स्वामी है।
वह परमात्मा सब जगह हाथ-पैर वाला, सब जगह ग्राँख व, शिर ग्रोर मुख वाला तथा सब जगह कानों वाला है; वही ब्रह्माण्ड में सब ग्रोर से घेर कर स्थित है।
जो परमात्मा इन्द्रिय रहित होकर भी समस्त इन्द्रियों के विषयों का ज्ञाता है। तथा सब का स्वामी ग्रौर शासक है ग्रौर सबसे बड़ा ग्राश्रय है। उसी की शरण में जाना चाहिए।
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सम्पूर्ण स्थावर और जंगम जगत् को वशीभूत रखने वाला वह प्रकाशमय परमात्मा, नवद्वार वाले शरीर रूप नगर में अन्तर्यामी रूप से स्थित देखी ही है। वही बाहरी जगत् में भी लीला कर रहा है।
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हाथ और पैरों से रहित वह परमात्मा सभी वस्तुओं को ग्रहण करने वाला है, बड़े वेग से सर्वत्र गमन करता है, आखों के बिना ही सब कुछ देख लेता है। कानों के बिना सब कुछ सुन लेता है। सभी वस्तुओं का वेत्ता है लेकिन उसे जानने वाला कोई नहीं है। ज्ञानी लोग उसे महान् श्रादि पुरुष कहते हैं।
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सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, महान् से भी महत्तर वह परमात्मा जीव की हृदय रूप गुफा में छिपा है। सवकी रचना करने वाले परमात्मा की कृपा से जो मनुष्य उस संकल्प रहित परमात्मा को तथा उसकी महिमा को देख लेता है, वह सभी दुःखों से मुक्त होकर परमात्मा को ही प्राप्त कर लेता है।
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वेद के रहस्य को ज्ञाता ज्ञानी लोग जिसे ऋजुता तथा नित्य बतलाते हैं। उस सर्व व्यापक, सर्वोत्तम, निर्विकार शुद्ध शाश्वत पुराण पुरुष परमात्मा को मैं जानता हूं।
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जो परमात्मा निर्विकार निराकार होकर भी सृष्टि के आदि में किसी अन्यज्ञ प्रयोजनवशा विविध शक्तियों से युक्त अनेक रंग, रूप धारण करता है। तथा ग्रनत में यह सम्पूर्ण जगत् जिसमें विलीन हो जाता है, वह परमदेव हम लोगों को शुभ बुद्धि से संयुक्त करे।
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वही अग्नि है, वही सूर्ये, वायु, चन्द्रमा तथा अन्यान्य प्रकाश-माननच्त्र श्रादि एवं जल, प्रजापति और ब्रह्मा हैं। योगी उसी ब्रह्म की विभूतियाँ हैं, इन सब के अन्तर्यामी वे ही हैं। ऋत: ये सब उन्हीं के स्वरूप हैं।
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हे भगवान, श्राप स्त्री, पुरुष, कुमार, कुमारी, आदि सब के रूप में प्रकट हैं श्रापही वृक्ष होकर लकड़ी के सहारे चलते थे । श्रापही विगड़ रूप में प्रकट होकर सब शोर मुख किए हुए थे ।
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श्रापही नील रंग के भौंरा हैं तथा हरे रंग और लाल श्राँखों वाले तोता हैं । श्रापही बिजली से युक्त मेघ है, वसन्त श्रादि सभी ऋतुएँ एवं सातों समुद्र श्रापही के रूप हैं । क्योंकि श्रापही से सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुए हैं । श्रापही श्रनादि प्रकृति के स्वामी तथा सर्व व्यापक हैं ।
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श्रापने ही समान तीनों गुणों से युक्त श्रनेक जीव समुदायों को रचने वाली तथा लाल, सफेद और काले रंग की एक श्रज्ञा ( प्रकृति ) को निश्चय ही एक श्रज्ञ ( जीव ) श्रासक्त हुया भोगता है । दूसरा श्रज्ञ ( ज्ञानी ) इस भोगी हुई श्रज्ञा ( प्रकृति ) को त्यागता है ।
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यह मनुष्य-शरीर एक पीपल के वृक्ष की तरह है । ईश्वर और ये दोनों सदा साथ रहने वाले मानों दो पत्ती मित्र हैं । ये दोनों उस शरीर रूप वृक्ष के हृदय रूप कोटर में एक साथ निवास करते है । सुख, दु:ख रूप कर्मफल मानो इस पीपल के दो फल हैं । इन फलों को जीवात्मा रूप एक पत्ती तो बड़े स्वाद से खाता है, दूसरा ईश्वर रूप पत्ती खाता नहीं सिर्फ देखता रहता है ।
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उपर्युक्त शरीर रूप वृक्ष के एक ही हृदय रूप घोंसले में पर-मात्मा के साथ रहने वाला यह जीवात्मा जब तक श्रपने साथी ईश्वर की श्रोर नहीं देखता, इस शरीर में श्रासक्त होकर मोह में निमग्न रहता है, तब तक श्रसमर्थता और दीनता से मोहित हुया विविध प्रकार के दुखों को भोगता है । जब कभी इस पर भगवान की कृपा हो जाती है तब यह श्रपने से भिन्न
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अपने मित्र परमात्मा को पहचान लेता है। साधकों, ज्ञानीजनों द्वारा निरंतर सेवित परमात्मा को तथा उसकी महिमा को जो संसार में विभिन्न रूपों से प्रकट हो रही हैं, जब यह देख लेता है, उस समय तत्काल शोक रहित हो जाता है।
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जिस परमात्मा में समस्त देवताओं का निवास है, उसे श्रात्म-नाशो परमधाम में सम्पूर्ण वेद स्थित हैं, जो मनुष्य उसको नहीं जानता वह वेदों के द्वारा क्या कर सकेगा। लेकिन जो उस परमात्मतत्व को जान लेते हैं, वे तो उस परमधाम में सदैव वास करते हैं।
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ज्योतिष्टोम आदि विशेष यज्ञ, तथा विविध प्रकार के यज्ञ, उनके नियम तथा श्रौत भी जो ऋक्, भूत, भविष्य वर्तमान पदार्थ हैं, जिनका वयोंन वेदों में पाया जाता है—इन सबको प्रकृति के श्रधिष्ठाता परमात्मा ही अपने पाँच तत्वों से रचते हैं। तथा दूसरा जीवात्मा माया के द्वारा वँधा हुग्रा है।
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भगवान् की शक्ति रूप प्रकृति माया है श्रौर मायापति महेश्वर को सम्भना चाहिए। उसी के श्रंगभूत कार्य-कारण समुदाय से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है।
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परब्रह्म परमात्मा ही हर योनि का श्रधिष्ठाता है। जिसमें यह समस्त जगत् प्रलयकाल में विलीन हो जाता है, श्रौर सृष्टि-काल में विविध रूपों में प्रकट हो जाता है, उस सर्वनियन्ता, वरदायक, स्तुति करने योग्य परमदेव को तत्व से जानकर मनुष्य निरन्तर बनी रहने वाली परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है।
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सब को अपने श्रधीन रखने वाले जो रुद्र रूप भगवान् समस्त देवताओं को उत्पन्न करते हैं श्रौर बढ़ाते हैं तथा जो सबके स्वामी श्रौर सर्वज्ञ हैं, जिन्होंने सृष्टि श्रादि में उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भ को
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देखा था, वे परमदेव परब्रह्म हम लोगों को श्रच्छी बुद्धि से संयुक्त करें।
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जो समस्त देवों के अधिपति है, जिसमें समस्त लोक सन प्रकार से श्राश्रित हैं, जो इस दो पैर वाले और चार पैर वाले समस्त जीव समुदाय का शासन करता है। उस ज्ञानद स्वरूप परमदेव परमात्मा को हम श्रद्धा भक्ति द्वारा हवि स्वरूप मेंट समर्पें कर उसकी पूजा करें।
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जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म हैं, सबके हृदय रूप गुहा स्थान के भीतर छिपा हुया है। जो ग्राखिल विश्व का रचयिता है। ग्रास्वयं विश्व रूप होकर ग्रनेक रूप धारण किए हुए है। जो निराकार रूप से सम्पूर्ण जगत् को सब घोर से घेरे हुए है। उस सर्वोपरि महेश्वर को जानकर मनुष्य सदा रहनेवाली, ग्रनन्त, ग्रविनाशी और ग्रतिशय शान्ति को प्राप्त करता है।
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वही परमात्मा समय पर सभी ब्रह्मांडों की रक्षा करता है। वही सम्पूर्ण जगत् का ग्रधिपति और सम्पूर्ण प्राणियों में छिपा हुया है। जिसमें ऋषि और देवतागए भी ध्यान के द्वारा संलग्र रहते हैं। उस परमात्मा को इस प्रकार जानकर मनुष्य मृत्यु के बन्धनों को काट डालता है।
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जो मक्कल में रहने वाली चिकनाई की भाँति सब का सार एवं ग्रत्यान्त सूक्ष्म है, उस कल्याण स्वरूप परमदेव परमात्मा को समस्त प्राणियों में छिपा हुया तथा समस्त जगत् को सब घोर से घेर कर उसे व्याप्त किए हुए जानकर मनुष्य सभी बन्धनों से सदा के लिए छूट जाता है।
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सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, जगत् के उत्पादक परमात्मा सदैव सभी मनुष्यों के हृदय में भली-भाँति स्थित है। तथा हृदय, बुद्धि
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और शुद्ध मन से ध्यान करने से वह प्रकट हो जाता है। जो साधक उस रहस्य को जान लेता है, वह अमर वन जाता है।
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जब ज्ञानमय ध्यानाकार का सर्वथा अभाव हो जाता है, उस समय अनुभूति में शान्ति न दिन है, न रात है। न सत् है और न असत् है। केवल विशुद्ध रूप कल्याणमय शिव ही है। वह सर्वथा अविनाशी है, यह सूर्य देवता द्वारा पूजा जाता है। उसी से यह पुरानी प्रज्ञा फैलती है।
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यह परमात्मा न ऊपर, नीचे, दायें-बायें और न बीच ही में पकड़ा जा सकता है। जिसका नाम ही 'महद्यश' है। उसकी कोई उपमा नहीं है।
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इस परब्रह्म परमात्मा का स्वरूप दृष्टि के सामने नहीं टिकता, इसे कोई भी इन्द्रियों आँखों से नहीं देख सक्ता। जो साधक हृदय में स्थित इस परमात्मा को हृदय और मन के द्वारा जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं।
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हे रुद्र, ( सब के संहारक ) आप अजन्मा हैं—यह समझकर जन्म और मृत्यु के भय से डरा हुआ मैं आपकी शरण लेता हूँ। मैं भी जन्म और मृत्यु से छुटकारा पाने की इच्छा रखकर आपकी शरण में आया हूँ। ऋत: आपका जो दाहना ( कल्याणमय ) मुख ( स्वरूप ) है, उसके द्वारा आप मुझे जीवन-मरण के महान् भय से सदा के लिए मुक्त कर दें।
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हे सब के संहारक भगवान रुद्र, हम लोग विविध प्रकार की भेंट लेकर सदैव रक्षा के लिए आपको बुलाया करते हैं, क्योंकि आप ही हमारी रक्षा करने में समर्थ हैं। ऋत: हमारी प्रार्थना है,
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कि ग्राप हम पर क्रुद्ध न हों और हमारे पुत्रों, पौत्रों को, हमारी व्रायु को तथा गौत्रों, गोड़ों ग्रादि पशुश्रों को कभी किसी प्रकार की श्रति न पहुँचाएँ। और जो हमारे समाज के पुरुष हैं उनका भी नाश न करें।
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पाँचवाँ ग्रध्याय
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जो परमात्मा ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ है, अपनी माया में ही लिप्त है । ग्रसीम और ग्रविनाशी है। जिसके ग्राधार पर ग्रविद्या और विद्या दोनों टिकी हुई हैं। वही पूर्ण ब्रह्म है। यहाँ पर विनाशशील जड़ वर्ग को ग्रविद्या और ग्रविनाशी जीव समुदाय को ही विद्या कहा गया है। तथा जो विद्या और ग्रविद्या पर शासन करता है—वह इन दोनों से सर्वथा भिन्न है, विलक्षण है।
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इस संसार में देव, पितर, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंग ग्रादि जितनी भी योनियाँ हैं, तथा प्रत्येक योनि के जितने भी रूप और उनके कारण हैं उन सब पर जो ग्रकेला ही ग्राधिपत्य रखता है । सबससे पहले उत्पन्न होकर जो कपिल ऋषि (हिरण्यगर्भ) को सब प्रकार के ज्ञानों से परिपुष्ट बनाता है। जिसने उस कपिल (ब्रह्म) को सबसे पहले उत्पन्न होते हुए देखा था वही वह परमात्मा है।
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वह परमात्मा इस संसार चक्र में सृष्टि के समय बुद्धि, ग्राकाश ग्रादि अपनी प्रकृतियों के एक-एक जाल को ग्रनेक भागों में बाँट कर प्रलय काल में उनका संहार करता है। वही परमात्मा पुनः सृष्टि काल में पहले की भाँति समस्त लोकपालों की रचना करके स्वयं सब पर ग्राधिपत्य करता है।
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जैसे सूर्य सभी दिशाग्रों को ऊपर नीचे इधर-उधर सब ओर से प्रकाशित करता हुश्रा देदीप्यमान होता है। उसी प्रकार सभी के ग्रंशयों से सम्पन्न, उपासना करने योग्य वह परमात्मा ग्रकेला
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ही समस्त कारण रूप श्रपनी मिन्न्-मिन्न शक्तियों पर श्राधिपत्य करता है ।
जो समस्त विश्व का परमकारण है श्रौर समस्त तत्वों की शक्ति रूप स्वभाव को श्रपने संकल्प रूप तप से पकड़ता है । तथा समस्त पकाये जाने वाले पदार्थों को विविध रूपों में परिवर्तित करता है, जो श्रकेले ही तीनों गुणों का सम्बन्ध जीवों के साथ जोड़ता है श्रौर इस विश्व का शासन करता है - वह परमात्मा है ।
वही परमात्मा वेदों की रहस्यविद्या-उपनिषद् में छिपा हुग्रा है । वेद भी उसी के नि:श्वास बनकर उसी से प्रकट हुए हैं । ऐसे उस परमात्मा को ब्रह्म जानता था । इसीलिए वह उसी में तन्मय होकर श्रव्युत रूप हो गया ।
जो जीव माया में फँसा हुग्रा है वही जन्म श्रौर मरएा रूप चक्र में घूमता है । जो तीनों गुणों से रोहित हुग्रा है, वह नहीं घूमता । तीनों गुणों से बँधा हुग्रा जीव श्रनेक प्रकार के कर्म-फल रूप भोगों की प्राप्ति के लिए श्रनेक प्रकार के कर्म करता है श्रौर श्रपने किए हुए कर्मों का फल भोगने के लिए श्रनेक योनियों में जन्म लेकर विभिन्न रूपों में प्रकट होता है । वह जहाँ भी जिस योनि में पैदा होता है, वहाँ तीनों गुणों से बँधा रहता है । मरने पर वह देवयान, पितृयान श्रौर पैदा होना तथा मरना इन तीन रास्तों से जाता है । जब तक वह मोक्ष नहीं प्राप्त करता तब तक संसार चक्र में घूमता रहता है ।
मनुष्य के हृदय को श्रंगूठे की नाप के बराबर मानकर उसे श्रंगुठ मात्र कहा गया है । वहीं पर जीवात्मा का निवास स्थान है । वह सूर्य की भाँति प्रकाशमय तथा संकल्प श्रौर ग्रहंकार से युक्त है । बुद्धि के गुणों के कारएा तथा श्रपने गुणों के कारएा सूजे
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की नोक की तरह सूक्ष्म आकार वाला है—ऐसा परमात्मा से भिन्न जीवात्मा भी नि:संदेह ज्ञानीजनों द्वारा देखा गया है।
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वह जीवात्मा कितना सूक्ष्म है यह बताने के लिए ऋषिपि कहता है—कि मान लीजिए एक बाल की नोक के हम सौ टुकड़े कर लें, फिर उसमें से एक टुकड़े के पुन: सौ टुकड़े कर लें, अर्थात् बाल की नोक के दस हजार भाग करने पर उसमें से एक भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है उसके समान जीवात्मा का स्वरूप समझना चाहिए। और वह अनन्त भाव होने में समर्थ है।
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वह जीवात्मा न तो स्त्री है, न पुरुष है, और नपुंसक ही है। वह जिस शरीर को ग्रहण करता है उससे संयुक्त होकर वह वैसा ही वन जाता है। अर्थात् जीवात्मा सभी भेदों से रहित और उपाधियों से शून्य है।
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संकल्प, स्पर्श, दृष्टि, मोह, भोजन, जलपान और वृष्टि इन सदसे प्राप्तियों के सजीव शरीर की वृद्धि और उत्पत्ति होती है। यह जीवात्मा भिन्न-भिन्न लोगों में कर्मानुसार मिलने वाले भिन्न-भिन्न शरीर को क्रम से वार-वार प्राप्त होता रहता है।
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यह जीवात्मा अपने कर्मों के गुणों से तथा शरीर के गुणों से युक्त होने के कारण, अहंता, ममता, आदि अपने गुणों के वशी-भूत होकर अनेक स्थूल और सूक्ष्म रुपों को स्वीकार करता है। उनके संयोग का कारण दूसरा भी देखा गया है।
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दुस्तर संसार के बीच व्याप्त, आदि-अन्त से रहित, समस्त विश्व के रचयिता अनेक रूप धारण कर समस्त संसार को घेरे हुए अद्वितीय परमात्मा को जान कर मनुष्य समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
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वह परमात्मा शरीर रहित है तथा संसार का उत्पादक और संहारक है। सोलह कलाओं को भी वही पैदा करता है। ऐसे होने पर भी वह परमानन्द परमात्मा श्रद्धा और भक्ति से ग्रहण किया जा सकता है। जो मनुष्य ऐसे परमात्मा को जान लेता है वह शरीर से सम्बन्ध तोड़कर मुक्त हो जाता है।
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कितने ही विद्वान लोग स्वभाव को जगत् का कारण बताते हैं। कुछ लोग काल को जगत् का कारण बताते हैं। लेकिन ऐसे सब लोग वस्तुतः मोह ग्रस्त हैं—वे वास्तविक कारण नहीं जानते। सच्च पूछा जाय तो समूचे जगत् में केवल परमात्मा की ही महिमा का विस्तार है। जिसके द्वारा यह संसार चक्र घुमाया जा रहा है।
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जिस परमात्मा से यह समस्त संसार घिरा हुआ है। ज्ञान-स्वरूप परमात्मा काल का भी महाकाल है। सर्वगुण सम्पन्न और सर्वज्ञ है, उसी से शासित यह संसार रूप कर्म विभिन्न प्रकार से चल रहा है और पृथिवी, जल, आकाश आदि पाँचों तत्त्व भी उसी के शासन के अधीन हैं—ऐसा भाव रखकर भगवान् का चिन्तन करना चाहिए।
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परमात्मा ने अपनी मूल शक्ति प्रकृति से स्थूल महाभूतों आदि की रचना करके उसका निर्माण किया। फिर जड़ तत्व के साथ चेतन तत्व का सम्बन्ध जोड़कर अनेक रूपों में दिखाई देने वाले संसार की रचना की।
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जो आदमी तीनों गुणों से युक्त कर्मों का आरम्भ करके उनको तथा समस्त भावों को परमात्मा को समर्पित कर देता है तो उसके उन कर्मों का प्रभाव हो जाने पर उस आदमी के पूर्व जन्म के संचित कर्म-समुदाय का भी नाश हो जाता है। इस प्रकार कर्मों के
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नाश हो जाने पर वह साधक परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। क्योंकि वह जीवात्मा वास्तव में चेतन है।
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वह श्रादि कारण परमात्मा, तीनों कालों से सर्वथा अतीत एवं काल रहित होने पर भी प्रकृति के साथ जीव का संयोग कराने में कारणों का भी कारण देखा गया है। अपने अन्तःकरण में स्थित उस विश्व रूप एवं जगत् में प्रकट, स्तुति करने योग्य पुराणपुरुष परमात्मा की उपासना कर उसे प्राप्त करना चाहिए।
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जिसकी अचिन्त्य शक्ति के प्रभाव से यह संसार प्रवाह रूप से निरन्तर चलता रहता है, वह परमात्मा इस संसार वृक्ष, काल और प्रकृति से सर्वथा परे है और मित्र है। फिर भी वह परमात्मा धर्म को बढ़ाता है, पापों का नाश करता है और समस्त ऐश्वर्यों का अधिपति और जगत् का आधार है। यह समस्त संसार उसी पर टिका हुआ है। वह परमात्मा अन्तर्यामी रूप से हमारे हृदय में भी रहता है। इस प्रकार उसे जान कर योगी परमगति को प्राप्त कर लेता है।
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उस अधीश्वरों के भी अधीश्वर, देवताओं के परम देवता, स्वामियों के महान् स्वामी तथा समस्त ब्रह्मांड के स्वामी, स्तुति करने योग्य प्रकृति स्वरूप परमात्मा को हम लोग सब से परे जानते हैं।
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न तो उसके शरीर रूप कार्य है और अन्तःकरण तथा इन्द्रिय रूप करण ही है। न तो कोई उससे बड़ा है और न कोई उसके समान है। ऐसे परमात्मा की ज्ञान, जल, और क्रिया रूप स्वाभाविक दृष्टि शक्ति नाना प्रकार से सुनी जाती है।
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संसार में उस परमात्मा का कोई स्वामी नहीं है और न उस पर किसी का शासन है। उसका कोई विशेष चिह्न नहीं, वह सब का
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कारण तथा सभी कारणों ऽतिष्ठाताओं का ऽधिपति है। कोई भी न तो उसका उत्पादक है और न स्वामी है।
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जैसे मकड़ी ऽपने ही जाल के ढक जाती है, उसी प्रकार पर-मात्मा ने ऽपने को ऽपनी स्वरूप भूत शक्ति से उत्पन्न ऽनन्त कार्यों द्वारा स्वभाव से ही ढिपा रखा है। ऐसा परमात्मा हम लोगों को ऽपने परब्रह्म रूप में ऽऽश्रय दे।
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एक परमात्मा समस्त प्राणियों के हृदय रूप गुहा में छिपा हुया है। वही सर्वव्यापी ऽऔर ऽन्तर्यामी है। वही सभी कर्मों का ऽतिष्ठाता, कर्मानुसार फल देने वाला ऽऔर समस्त प्राणियों का निवास स्थान है। वही सब के शुभाशुभ कर्मों को देखने वाला साक्षी है। सभी को चेतना प्रदान करने वाला है ऽऔर सर्वथा शुद्ध-बुद्ध निर्लेप है।
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जो विशुद्ध चेतन स्वरूप परमात्मा ऽकेला ही ऽनेक निष्क्रिय-जीवों का शासक है। जो एक ही प्रकृति रूप बीज ऽनेक रूपों में बदल देता है। उस हृदय में स्थित परमात्मा को जो धीर पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं—उन्हीं को परमानन्द की प्राप्ति होती है, दूसरों को नहीं।
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जो एक ही चेतन परमात्मा ऽनेक चेतन ऽऽत्माओं के कर्म फलों के भोगों का विधान करता है, उस ज्ञान योग ऽऔर कर्म योग से प्राप्त करने योग्य सब के कारण स्वरूप परमदेव परमात्मा को जानकर मनुष्य सब वन्धनों से मुक्त हो जाता है।
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न तो सूर्य का प्रकाश फैल सकता है, ऽऔर न चन्द्रमा, तारा गया ही प्रकाशित हो सकते हैं तथा बिजलियाँ भी वहाँ तक नहीं पहुँच पाती तब भला फिर यह लौकिक ऽग्नि कैसे प्रकाशित हो सकता है। क्योंकि उसके प्रकाशित होने पर उसी के प्रकाश से
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वतलाए हुए सूर्य आदि सब उसके पीछे प्रकाशित होते हैं। उसके प्रकाश से यह समूचा जगत् प्रकाशित होता है।
उसे ब्रह्मांड के मध्य में एक प्रकाश स्वरूप परमात्मा हो पूरे हैं। वही जल में स्थित ब्रग्नि है। उसे जानकर ही मनुष्य मृत्यु रूप संसार समुद्र से सर्वथा पार हो जाता है। दिव्य परम-धाम के लिए और कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है।
वह ज्ञान स्वरूप परब्रह्म जगत् का उत्पादक, सर्वज्ञ अपने को प्रकट करने का कारण है। उसे प्रकट करने को और कोई दूसरा कारण नहीं। वह काल का भी महाकाल है। क्योंकि कालातीत है। दिव्य गुणों से सम्पन्न, सर्वत्र, प्रकृति और जीवात्मा का स्वामी; सबका गुप्तों का शासक तथा जन्म-मृत्यु रूप संसार में बाँधनेवाला, बाँधकर रखने और फिर मुक्त करने वाला है।
वह परमात्मा स्वरूप में स्थित, अमृत स्वरूप एकरस है। सभी लोकपालों का स्वामी है। समस्त ब्रह्मांड की रक्षा वही सर्वज्ञ, परमात्मा ही करता है। वही संसार का नियंत्रण और संचालन करता है। संसार पर शासन करने के लिए दूसरा कोई उपयुक्त कारण है ही नहीं।
जो परमात्मा निश्चय ही सबसे पहले अपने नाभि-कमल से ब्रक्षा को उत्पन्न करता है। और उत्पन्न करके उसे समस्त वेदों का ज्ञान प्रदान करता है। जो अपने स्वरूप का ज्ञान कराने के लिए साधकों के हृदय में वैसी ही बुद्धि प्रकट करता है। ऐसे परमदेव की शरण मैं मोक्ष की इच्छा रखकर ग्रहण करता हूँ।
कलाथ्यों से रहित, क्रिया रहित, सर्वथा शान्त, निर्दोष, निर्मल, अमृत के परमसेतु रूप तथा जले हुए ईंधन से युक्त अग्नि की शान्ति मैं उस परमात्मा का चिन्तन करता हूँ।
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जब मनुष्यगण श्राकाश को चमड़े की तरह लपेट सकेंगे
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तब भी बिना परमात्मा का ज्ञान हुए दु:ख समुदाय का श्रन्त नहीं
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हो सकेगा ।
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यह बात प्रसिद्ध है कि श्वेताश्वतर ऋषिप्र ने तप के प्रभाव से;
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परमात्मा की ऋहेतुकी ऋृपा से उसे जान लिया था । फिर उन्होंने
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ऋषि समुदाय से सेवित परम पवित्र इस ब्रह्म-तत्व का श्राश्रम के
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श्रभिमान से परे श्रधिकरियों को उत्तम ऋषि से उपदेश किया था ।
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यह परम रहस्य ज्ञान पूर्वकल्प में भी वेदों के श्रन्तिम भाग
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उपनिषद् भली-भाँति वर्णित हुआ था । जिस मनुष्य का श्रन्त:-
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करण श्रशान्त रहता हो उसे इस रहस्य का उपदेश नहीं देना
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चाहिए । तथा जो श्रपना पुत्र श्रथवा शिष्य न हो उसे भी यह
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उपदेश न देना चाहिए।
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जिस मनुष्य को परमात्मा में श्रगाध निष्ठा है; तथा परमात्मा
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की भाँति गुरु में भी वह श्रगाध निष्ठा रखता है, उस मनस्वी
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पुरुष के हृदय में ही ये वताए हुए रहस्यमय श्रर्थ प्रकाशित होते
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हैं । उसी महात्मा के हृदय में प्रकाशित होते हैं ।
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ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:
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( तीनों प्रकार के ताप शान्त हों )
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छान्दोग्योपनिषद्
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यह उपनिषद् सामवेद का एक ब्राह्मण छान्दोग्य है। जिसमें दस प्रपाठक हैं। उनमें से प्रथम दो को छोड़कर शेष आठ प्रपाठक छान्दोग्य उपनिषद् कहलाते हैं। इसका मुख्य-विषय उपासना है। ॐकार को इसमें उद्गीथ ( श्रेष्ठगान ) कहा गया है। उपनिषद्करने प्रणव और उद्गीथ को ॐकार का पर्यायी माना है। इसमें अनेक उपयोगी श्राध्यायिकाएँ भी है। पहली श्राध्यायिकाके प्रसंग में एक ‘छासुरोपनिषद्’ का भी उल्लेख किया गया है।
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पहला प्रपाठक
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पहला खण्ड
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शान्ति पाठ
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हे ईश्वर, मेरे सभी अंग, सभी इन्द्रियाँ, सभी प्राण, सभी शक्तियाँ और सभी ओज पुष्टि एवं वृद्धि को प्राप्त हों। उपनिषदों में वर्णित सर्वरूप ब्रह्म को मैं कभी ग्रहण न करूँ और वह ब्रह्म भी मेरा कभी निराकरण न करे। मुझे सदा अपनाये रखे। ब्रह्म का और मेरा सम्बन्ध सदा अटूट बना रहे। उपनिषदों में
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छान्दोग्योपनिषद् : १३६
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वर्णित समस्त धर्म मुझ में सदैव प्रकाशित होते रहें। मुझ में निरन्तर बने रहें।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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( त्रिविध ताप शान्त हों )
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उच्चस्वर से गाये जाने वाले अविनाशी ओंकार की उपासन करनी चाहिए। क्योंकि ओंकार ही उद्गीथ ( श्रेष्ठ गान ) है। उसकी उपासना का व्याख्यान आगे किया जा रहा है।
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समस्त तत्वों का सारभूत रस पृथिवी है। पृथिवी का सार जल है। जल का सार अन्न और औषधियाँ हैं। औषधियों का सार पुरुष है। पुरुष का सार वाणी है। वाणी का सार ऋचाएँ हैं। ऋचाओं का सार सामगान है और सामगान का सार ओंकार—उद्गीथ—श्रेष्ठ गान है।
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ब्रह्म का वाच्य ओंकार ब्रह्म रसों में क्रम से आठवाँ रस, सम्पूर्ण रसों में परम श्रेष्ठ, सर्वोच्च स्थान है।
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कौन-कौन ऋचा, कौन-कौन साम, कौन-कौन श्रेष्ठ गान है यह विचारणीय है। वाणी ही ऋचा है, प्राण ही साम है, यह रक्षक ईश्वर ही उद्गीथ—ओंकार है। वह यह जोड़ा है। जो वाणी और प्राण है और यही ऋचा और साम है।
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निश्चय ही यह ओंकार अनुमार सूचक है। मनुष्य जो कुछ अनुमति देता वह ओं ही कहता है। अनुमति देना ही परम ऐश्वर्य है। यह कामनाओं को पूरा करने वाला और बढ़ाने वाला है। इस प्रकार इस अविनाशी ओंकार को मानते हुए विद्वान् लोग इसकी उपासना करते हैं।
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१४० : छान्दोग्योपनिषद्
इस ओंकार के साथ तीन विद्याएँ हैं। ओं ही को उच्चार्य सुनाता है, ओं ही की स्तुति करता है और उद्गाता ओं ही का गान करता है। ये सब किसी-न-किसी रूप में इसकी अभिव्यक्ति ओं की उपासना के लिए होती हैं। इसी की महिमा से और इसी की कृपा से।
इस प्रकार से जो ओं को जानता है और जो नहीं जानता है, वे दोनों इस ओंकार की सहायता से काम करते हैं। लेकिन विद्या और अविद्या भिन्न-भिन्न हैं। विद्या से, श्रद्धा से, और उपनिषद् की शिक्षा से मनुष्य जो काम करता है वह बहुत ही फलदायक होता है। जो कुछ कहा गया है वह निश्चय ही इसी ओंकार का व्याख्यान है।
ऐसा सुना जाता है, कि प्रजापति की दोनों सन्तानें देवता और असुर जिस समय प्रसिद्ध देवासुर संग्राम के लिए प्रवृत्त हुए, उस समय देवताओं ने असुरों को जीतने की इच्छा से उच्चस्वर से ओंकार का गान गाया।
उन देवताओं ने नासिका में स्थित प्राण को अधिष्ठित कर ओं की उपासना उस समय शुरू कर दी, तब असुरों ने उस प्राण को पापों से बंध दिया। जिससे जीव सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों सूँघता है। क्योंकि पाप से यह प्राण बंधा हुआ है।
तब देवता वाणी के द्वारा ओं की उपासना करने लगे। उसे वाणी को भी असुरों ने पाप से बंध दिया। इसलिए उस वाणी से मनुष्य सच और झूठ दोनों बोलता है। क्योंकि पाप से यह वाणी बंधी हुई है।
तब देवता कान से ओं की उपासना करने लगे। आँखों को भी असुरों ने पाप से बंध दिया। इसलिए मनुष्य आँखों से देखने योग्य और न देखने योग्य वस्तुओं को देखता है, क्योंकि आँखें पाप से बंधी हुई हैं।
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छान्दोग्योपनिषद् : १४१
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तब देवता कान से ॐ को उपासना करने लगे । असुरों ने कानों को भी पाप से बंध दिया । इसलिए मनुष्य सुनने योग्य और न सुनने योग्य बातें कानों से सुनता है । क्योंकि कान पाप से बंधे हुए हैं ।
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तब देवता मन से ॐ की उपासना करने लगे । असुरों ने मन को भी पाप से बंध दिया । इसलिए मनुष्य संकल्प करने योग्य और न करने योग्य दोनों का संकल्प करता है । क्योंकि यह मन पाप से बंधा रहता है ।
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तब देवताओं ने ज्योंही श्रेष्ठ प्राण के द्वारा ॐ की उपासना शुरू की त्योंही असुर-सैन्य उसे पाकर इस प्रकार नष्ट हो गया जैसे कठोर पत्थर को पाकर मिट्टी का ढेला चूर-चूर हो जाता है ।
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जैसे कठोर चट्टान से टकरा कर मिट्टी का ढेला चूर-चूर हो जाता है, वैसे ही वह मनुष्य चूर-चूर हो जाता है, इस प्रकार जानने वाले के सम्बन्ध में पाप करना चाहता है और जो ॐ स्वर से ॐ का गान करने वाले को सताता है उसके लिए वह उद्गीर्थविद् कठोर पत्थर बन जाता है ।
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यह मुख्य प्राण पापरहित है, इससे मनुष्य सुगन्ध और दुर्गन्ध को नहीं जानता । इसके द्वारा वह जो खाता-पीता है उसे इन्द्रियों की रक्षा होती है । इसी प्राण को मरते समय तक न पात्र चल देता है । अन्त समय तक मुंह खुला रहता है । मुख में रहने वाले प्राण को वापस बुलाना चाहता है ।
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कहा जाता है, कि उस प्राण की उपासना अंगिरा ऋषि किया करते थे । अंगों का जो रस है उसी को अंगिरस कहा जाता है । प्रसिद्ध है कि उसी प्राण को लब्ध करके वह स्पति नाम के एक
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१४२ : छान्दोग्योपनिषद्
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ऋषि उस उद्गीथ (ॐ) की उपासना किया करते थे। निश्चय ही वाणी को वृहत् रहते हैं; उसका यह पति है। इसी को प्राण रूप वृहस्पति मानते हैं।
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सुना जाता है, कि उसी प्राण को लक्ष्य करके व्यासस्य नाम के कोई ऋषि उस उद्गीथ (ॐ) की उपासना किया करते थे। प्राण रूप व्यासस्य उसी को कहा जाता है जो मुख से (व्यास्यात) ज्ञान देता हैं (श्रयते)।
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यह भी कहावत प्रसिद्ध है, कि उसी प्राण को आधार मानकर किसी दाल्भ्य नामक ऋषि के पुत्र बक ऋषि ने उद्गीथ (ॐ) को जाना था। वे नैमिषारण्य क्षेत्र में होने वाले प्रसिद्ध यज्ञ के उद्गाता हुए। वह उनके लिए कामनाओं के लिए गान करते थे—यज्ञ द्वारा उनकी इच्छाओं को पूरी किया करते थे।
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जो इस अविनाशी ॐ की उपासना करता है, वह निश्चय ही सभी कामनाओं का पूरक (ग्रागाता) बन जाता है। शरीर की उपमा से यह अध्यात्म उपासना का वर्णन है।
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तीसरा खण्ड
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अब देवताओं की उपमा से उद्गीथ (ॐ) की उपासना पर विचार करते हैं—जो वह सूत्र रूप रहा है, उसकी दृष्टि से उसे उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए। उदय होता हुत्या यह सूर्य ऐसा जान पड़ता है। मनो समस्त जनता के लिए उद्गीथ का गानकर रहा है। उदय होता हुया वह अन्यकार के भय दूर कर देता है। जो उपासना ऐसा समक लेता है—निश्चय ही वह अन्यकार के भय का विनाशक होता है।
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यह प्राण और यह सूर्य समान ही हैं। यह प्राण और यह सूर्य दोनों अष्टम हैं। इस प्राण को स्वर कहते हैं श्रादित्य सूर्य
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को भी स्वर प्रत्यास्वर कहते हैं। इसलिए इस प्राण और सूर्य की दृष्टि से उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए।
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अथ वायु को ही उद्गीथ मान उसी दृष्टि से उद्गीथ (ॐ) की उपासना का विधान बताया जाता है—जो वायु को बाहर निकालता है, वह प्राण है, जो वायु को भीतर ले जाता है वह अपान है। जो प्राण और अपान की सन्धि है वह व्यान है। जो व्यान है वह वागी है। इसलिए श्वास को निकाले, खींचे बिना वह वागी को बोलता है।
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जो वागी है, वह ऋक् है, इसलिए श्वास खींचे और निकाले बिना वह ऋच्चा को बोलता है। जो ऋक् है, वह साम है, इसलिए श्वास निकाले या खींचे बिना वह साम का गान करता है। जो साम है वह उद्गीथ (ॐ) है। इसलिए श्वास, खींचे या निकाले बिना वह उद्गीथ का गान करता है।
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रगड़ कर आग निकालना, संग्राम में दौड़ना, कठोर धनुष को खींचना आदि जो पराक्रम साध्य कर्म हैं, उन्हें यह ध्यान बिना श्वास निकाले और खींचे ही कर लेता है। इसलिए व्यान को लक्ष्य में रखकर उद्गीथ (ॐ) की उपासना करनी चाहिए।
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इसके बाद यह विचार किया जाए। उद्गीथ के उद्+गी+थ इन तीनों अक्षरों पर विचार किया जाए। उद्गीथ के इन तीनों अक्षरों में से 'उत्' प्राण है, क्योंकि प्राण से वह ऊपर उठता है। 'गी' वाक् है। क्योंकि वागी को 'गिरा' कहा जाता है। 'थ' श्वास है। क्योंकि यह सब कुछ निश्चय ही श्वास में स्थित है।
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'उद्' द्यौ है। 'गी' आकाश है। 'थ' पृथिवी है। सूर्य ही उद् है। वायु 'गी' है। 'थम्' अग्नि है। सामवेद 'उद्' है, यजुर्वेद 'गी:' है और ऋग्वेद 'थम्' है। 'उद्' गी 'थ' उद्गीथ इन अक्षरों को
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१४४ : छान्दोग्योपनिषद्
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जानता हुद्रा जो इसकी उपासना करता है, उसके लिए वागी स्वयं दूध दुह देती है। जो वागी का दूध है और वह अन्न उसका भोक्ता है।
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अथ इसके बाद उपासक की कामनाओं की पूर्ति और वृद्धि पर विचार किया जाता है। यह भी कहा जाता है कि उपसरपों की उपासना करे। उपसरप का शब्दार्थ 'दौड़कर समीप जाना है।' यहाँ पर उपासना के सम्बन्ध में विचारणीय विषयों को उपसरप कहते हैं। जिस सामवेद के मंत्र से स्तुति करनी हो उस साम की उपासना करनी चाहिए। जिस ऋचा में वह साम हो उस ऋचा पर विचार करना चाहिए। जो उस ऋचा का ऋषि हो उसका तथा मंत्रस्थ विषय के देवता और उसके विषय का चिन्तन करना चाहिए।
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जिस छन्द के द्वारा स्तुति करनी हो उस छन्द का चिन्तन करे, सामवेद के जिस स्तुति समूह से स्तुति करनी हो उस स्तोम का चिन्तन करे।
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जिस दिशा को लक्ष्य में रखकर स्तुति करनी हो उस दिशा का चिन्तन करे। ध्यान में आसक्त रहित होकर अपनी कामना पर विचार करते हुए आत्मा के समीप यानी आत्मस्थित होकर स्तुति करे। जो जिस कामना के लिए स्तुति करेगा, उसकी वह कामना शीघ्र पूरी होगी।
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चौथा खण्ड
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ॐ इस अविनाशी उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए। ॐ ही निश्चय गायन करता है। उसी का व्याख्यान है।
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छान्दोग्योपनिषद् : १४५
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मृत्यु से भयभीत होकर देवतागण निश्चय ही तीनों विधाओं में प्रविष्ट हुए। उन्होंने छन्दों से अपने को ढाँक लिया। क्योंकि इन छन्दों से देवों ने अपने को ढाँका था इसलिए यही छन्दों का छन्दस्व है।
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छन्दों से ढँके हुए उन देवों को मृत्यु ने ऋक्, साम और यजु मंत्रों में देखा। जब उन देवों न यह जान लिया तो वे ऋक्, साम और यजु मंत्रों से ऊपर होकर स्वर ही में प्रविष्ट हुए।
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जब मनुष्य निश्चित रूप ऋचा को प्राप्त होता है—ओंकार का ही श्रद्धा से उच्चारण करता है। इसी प्रकार साम एवं यजु मंत्रों के प्रारंभ में ओंम् का उच्चारण करता है। निश्चय ही यही ओंम् स्वर है। जो यह अविनाशी, अमृत और अभय है। उसमें प्रविष्ट होकर देवगण अमृत और अभय हो गए।
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जो विद्वान इस प्रकार ऋक्, अविनाशी ओंम् को जानता है, उसकी स्तुति करता है; वह इस ऋक्, अमृत, अभय स्वर ओंकार में प्रविष्ट होता है। जैसे देवगण अमर हुए वैसे ही मनुष्य भी उसमें प्रविष्ट होकर अमर हो सकता है।
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पाँचवाँ खण्ड
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यह जो प्रसिद्ध उद्गीथ है, वही ओंकार है। जो ओंकार है वही उद्गीथ है। निश्चय ही यह सूर्य उद्गीथ है—यह ओंकार है। क्योंकि यह ओंकार ही उच्चारण करता हुमा जाता है।
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ऐसा कहा जाता है, कि कौशीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा था कि इसको मैंने वेद तरह गाया था। इसलिए तू मेरे एक पुत्र है, तू सूर्य की किरणों को वार-चार अपने चारों ओर ले, नि:संदेह
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१४६ : छान्दोग्योपनिषद्
तेरे एक पुत्र पैदा होंगे। यह अधिदैवत—दैवतापरक वाक्य समाप्त हुया।
ऋषि शरीर सम्बन्धी उपमा से बतलाया जाता है—मुख में रहने वाला यह जो श्रेष्ठ प्राण है, उसको लदय करके उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए। क्योंकि यह प्राण ओंकार का उच्चाररू करता हुया चलता है।
कौषीत कि ऋषि अपने पुत्र से बोले इसी को मैंने अच्छी तरह गाया था। इसलिए मेरा तू एक पुत्र है। तू प्राण के समान सबके आश्रय ओंकार को अच्छी तरह गाना। निःसन्देह तेरे एक पुत्र होंगे।
जो यह जानता है, कि जो उद्गीथ है वह प्राण है और जो प्राण है वह उद्गीथ है, वह होता के आसन से ही निश्चय दुष्ट-गान को ठीक कर देता है।
छठा खण्ड
यह पृथिवी ही ऋग है, अग्नि साम है। वह यह सामवेद इस ऋग्वेद में लीन है। इसलिए ऋग्वेद में अन्तर्निहित साम वेद गाया जाता है। यह पृथिवी सा = अग्नि = ऋम् = साम है। पृथिवी और अग्नि दोनों मिलकर साम कहे जाते हैं।
अन्तरिक्ष ऋग्वेद है, वायु सामवेद है। वह सामवेद इस ऋग्वेद में अन्तर्निहित है। इसलिए ऋग्वेद में अन्तर्लीन सामवेद गाया जाता है। अन्तरिक्ष ही सा = वायु—श्रम + साम है। वायु और अन्तरिक्ष मिलकर साम हैं।
द्यौ ऋग्वेद है। आदित्य साम। वह इस ऋग्वेद में अन्तर्निहित साम है। इसलिए ऋग्वेद में अन्तर्लीन साम गाया जाता है। द्यौ
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ही सा ऋग् और आदित्य ही ॠम है । दोनों मिलकर साम कहे जाते हैं ।
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नक्षत्र ही ऋग्वेद है चन्द्रमा सामवेद है । वह सामवेद ऋग्वेद में अन्तर्लीन है, इसलिये ऋग्वेद में अन्र्तललीन साम गाया जाता है । नक्षत्र ही 'स' चन्द्र 'अम' है । इसलिये दोनों मिलकर साम हैं ।
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इससे बाद आदित्य की जो शुक्ल प्रभा है, वही ऋग्वेद है । और जो अत्यन्त कृष्ण है वह सामवेद है । वह सामवेद ऋग्वेद में अन्र्तललीन है । इसलिये ऋग्वेद में अन्र्तललीन गाया जाता है । आदित्य की शुक्ल प्रभा ही 'सा' और अत्यन्त कृष्ण 'अम' हैं । इसलिये दोनों मिलकर साम हुए ।
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अब आदित्य की जो यह शुक्ल ज्योति है वही 'सा' है और जो अत्यन्य कृष्ण है वह 'अम' हैं । और आदित्य के मध्य में जो हिरण्यमय पुरुष दिखाई देता है, ज्योति जिसकी दाढ़ी है । उत्ता्ति जिससे बाल हैं । नाखूनों तक सभी कुल जिसका ज्योर्तिमय है ।
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जैसे काल कमल और श्वेत कमल होता है । ऐसे ही उसके नेत्र हैं । उसका 'उत्' यह नाम समस्त पापान्यथकार को दूर कर उदय होता है । जो यह जानता है, वह निश्चय ही समस्त पापान्धकार दूर कर उदय होता है ।
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उसके गाने वाले ऋक् और साम हैं । इसलिये वह उद्गीथ है । (श्रेष्ठ गान) इसी लिए वह उद्गाता (श्रेष्ठ गानेवाला) है । वह यह ॐ जो उस आदित्य लोक से श्रेष्ठ लोक है । उनका देवता विषयक तथा विद्वानों की कामनाओं का स्वामी है । देवता निष्यक उपमा सम्पन्न हुआ ।
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सातवाँ खण्ड
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अब वही विषय शरीर की दृष्टि से समभाया जाता है। वाक् इन्द्रिय ही ऋक् है, प्राण-साम है। वही यह प्राण रूप साम वाक् रूप ऋक् में भलोभाँति स्थित है। इसलिए ऋक् में प्रतिष्ठित साम का गान किया जाता है। वाक् ही 'सा' है और प्राण— 'ग्राम' है। दोनों मिल कर साम हैं। इसी प्रकार नेत्र ही ऋक् है, और उसके भीतर का काली पुतली साम है। वही वह प्राँख की पुतली रूप साम नेत्र रूप ऋक् में भलोभाँति स्थित है। इसलिए ऋक् में प्रतिष्ठित साम का गान किया जाता है। नेत्र ही 'सा' है और पुतली 'ग्राम' है। वे दोनों ही मिलकर साम हैं। श्रोत्र ही ऋक् है, मन साम है। वही वह मन रूप साम श्रोत्र रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है। इसलिए ऋक् में प्रतिष्ठित साम का गान किया जाता है। श्रोत्र ही 'सा' है और मन 'ग्राम' है। दोनों मिलकर साम हैं। तथा यह जो नेत्रों की सफेद चमक है—वही ऋक् है। जो नीली—अ्रत्यन्त श्याम रंग की आभा है, वही साम है। वही श्याम आभा रूप साम श्वेत रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है। इसी—लिए ऋक् मेंप्रतिष्ठित साम का गान किया जाता है। तथा यह जो नेत्र की श्वेत आभा है, वही 'सा' है और जो नीली तथा अ्रत्यन्त श्याम आभा है वही 'ग्राम' है। इन दोनों का मिला जुला रूप ही 'साम' है। पुनः यह जो नेत्र के भीतर पुरुष भलक पड़ता है, वही ऋक् है, वही साम है, वही यजुर्वेद है, वही उक्थ—स्तोत्र समूह है और वही ब्रह्म है। इस पुरुष का वही रूप है, जो पीछे आदित्य-मण्डल में स्थित पुरुष का रूप बताया जा चुका है। जो इसके गुणा गान हैं, वही उसके गुणा गान हैं। जो उसका नाम है, वही इसका भी नाम है। पृथिवी से नीचे जो भी लोक हैं उनका शासन यही पुरुष करता है। मनुष्यों के भोग भी इसी के अ्रधींच हैं इस—लिए वीणा के स्वरों में जाने वाले लोग इसी परमात्मा का गुणा
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गान करते हैं। इसी से वे लोग धन और इच्छित फल प्राप्त करते हैं। इस रूप में इस रहस्य का ज्ञाता जो उपासक साम गान करता है, वह नेत्र तथा आदित्य मण्डल स्थित परमगुरु ष का गुरण गान करता है। वह उसे परमात्मा से ही अपनी श्रेष्ठ प्रार्थना करता है। सूर्य लोक से ऊपर जितने भी लोक हैं, उन सब को तथा समस्त श्रेष्ठ फलों को वह ईश्वर के द्वारा प्राप्त कर लेता है। साथ ही सूर्य लोक अथवा मनुष्य लोक से नीचे जितने लोक हैं उनको तथा मनुष्यों द्वारा भोगे जाने वाले समस्त भोगों को भी वह इस परमात्मा के द्वारा प्राप्त कर लेता है। इसलिए निश्चय पूर्वक इस रहस्य का मर्मज्ञ उद्गाता यजमान से यह कहे कि—‘मैं तेरे लिए कौन-सी मनोवांछित वस्तु की प्राप्ति के लिए सामगान करूँ।’ क्योंकि जो इस प्रकार से इस रहस्य को जान लेता है वह समस्त भोग सुखों को गान द्वारा आवाहन करने में समर्थ होता है।
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आठवाँ खण्ड
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यह बात प्रसिद्ध है, कि ऋषि शालावान् के पुत्र शिलक, चिकित्यान के पुत्र दाल्भ्य और जीवल के पुत्र प्रवाहण ये तीन ऋषि उद्गीथ का तत्व जानने में बड़े कुशल थे। एक दिन बैठे हुए तीनों आपस में बातें कर रहे थे कि इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम लोग उद्गीथ (श्रेष्ठगान) विद्या में बड़े निपुरण हैं तो फिर क्यों न आपस हो में इस विद्या के सम्बन्ध में भली भाँति विचार-विनिमय कर लिया जाए। तीनों को राय एक हो जाने पर वे सब उद्गीथ पर विचार करने के लिए मुख से बैठ गए। इसके बाद उनमें से प्रसिद्ध राजर्षि जीवल के पुत्र प्रवाहण ऋषि बोले—पहले आप दोनों पूज्य महानुभाव उद्गीथ विद्या पर वार्ता प्रारंभ करें। आप जैसे विद्वान् ब्राह्मणों के उपदेश-वचन में सुनूँगा—यह कह करके वह चुप हो गए।
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१५० : छान्दोग्योपनिषद्
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कहा जाता है, कि तब शालावान् के पुत्र शिलक ऋषि चिकितायन के पुत्र दालभ्य से बोले—कहिए तो मैं ही पूर्वपक्ष लेकर आप से प्रश्न करूँ। दाल्भ्य ने कहा—हाँ ठीक हैं पूछो?
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शिलक—साम का आश्रय कौन है?
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दाल्भ्य—स्वर ही साम का आश्रय है।
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शिलक—स्वर का आश्रय कौन है?
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दाल्भ्य—प्राण ही स्वर का आश्रय है?
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शिलक—प्राण का आश्रय कौन है?
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दाल्भ्य—अन्न ही प्राण का आश्रय है।
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शिलक—अन्न ही का आश्रय कौन है?
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दाल्भ्य—जल ही अन्न का आश्रय है।
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शिलक—जल का आश्रय कौन है?
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दाल्भ्य—स्वर्ग लोक ही जल का आश्रय है।
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शिलक—उस लोक का आश्रय कौन है?
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दाल्भ्य—स्वर्ग लोक से आगे नहीं जाना चाहिए, उससे आगे की बात नहीं पूछनी चाहिए। हम स्वर्ग लोक ही में साम की पूँजीतया स्थित मानते हैं। इसीलिए साम को स्वर्ग लोक मानकर उसकी स्तुति की जाती है।
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शिलक—दाल्भ्य, तुमने साम का जो स्वरूप बताया है वह बहुत ही दिखलता है—प्रतिष्ठा रहित है। स्वर्ग का कोई न कोई आश्रय अवश्य होना चाहिए। यदि कोई साम तत्व का वेत्ता विद्वान् तुम्हारे इस अधूरे उत्तर पर भुनभुनाकर यह कह दे कि तुम्हारा शिर गिर जाएगा तो निश्चित हो तुम्हारा शिर गिर पड़ेगा।
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दाल्भ्य—तो फिर श्रीमान् जी आपही साम का तत्व बतला दीजिए?
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शिलक—हाँ मैं साम का तत्व समझ सकता हूँ।
दाल्भ्य—तो फिर बताइए स्वर्गलोक का आधार कौन है ?
शिलक—मनुष्य लोक ही उसका आधार है।
दाल्भ्य—मनुष्य लोक का आधार कौन है ?
शिलक—जो सब की प्रतिष्ठा है, उस लोक से आगे प्रश्न नहीं करना चाहिए। मनुष्य लोक ही में हम सब की प्रतिष्ठा मानते हुए साम की स्थिति मानते हैं। क्योंकि साम रूप से पृथिवी ही की स्तुति की जाती है।
तब जीवल के पुत्र प्रवाहण ने शिलक से कहा—
शालावन् के पुत्र शिलक, तुम्हारा समझा हुआ साम तत्व भी निःसन्देह श्रथूरा है। श्रत्: यदि कोई साम तत्व जानने वाला तुम्हारे इस श्रथूरे उत्तर पर भूलकर तुम्हारे शिर को गिर जाने का शाप दे है दे तो निश्चित ही तुम्हारा शिर गिर जाएगा।
शिलक—तो क्या इसका रहस्य आपसे मालूम हो सकेगा !
प्रवाहण—ऋ्रवश्य मैं बता सकता हूँ।
नवाँ खण्ड
शिलक—ने प्रवाहण से पूछा—इस मनुष्य लोक का आधार कौन हैं ?
प्रवाहण—आकाश ऽर्थात् सर्वत्र व्यापक रहने वाले परमात्मा ही इसके आधार हैं। इसमें सन्देह नहीं कि ये समस्त जीव आकाश से ही उत्पन्न होते हैं। क्योंकि आकाश ही इन सबसे महान् है—इन सब का परम आश्रय है। वह आकाश स्वरूप परमात्मा ही सबसे बड़ा उद्गीथ है। वह अनन्त है। जो उपासक
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१५२ : छान्दोग्योपनिषद्
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इस प्रकार सम्यक् कर उद्गीथ की उपासना करता है, उसका जीवन ऊँचा से ऊँचा हो जाता है और वह निश्चित ही बड़े-बड़े लोगों को जीत लेता है—प्राप्त कर लेता है। एक बार शुनक के पुत्र श्वति धन्वा नाम के ऋषि ने उद्दालकायिल्य नाम के ऋषि को इसी उद्गीथ—रहस्य का उपदेश देते हुए उनसे कहा था—तेरी वंश परम्परा में लोग जब तक इस उद्गीथ को जानते रहेंगे तब तक इस लोक में उनका जीवन साधारण मनुष्यों से श्रेष्ठयुत्तम—श्रेष्ठ रहेगा। मरने के बाद उन्हें परमपद मिलेगा निश्चित है।
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दसवाँ खण्ड
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कुरुप्रदेश में महावतों (हाथीवानों) का एक गाँव था, वहाँ पर चक्र मुनि के पुत्र उषस्तिमुनि अपनी पत्नी—जो अभी तक पूर्णतः युवती भी नहीं पायी थी—के साथ बड़ी गरीबी से दिन बिता रहे थे। दुर्भाग्य से ऐसे ही समय में अकाल के गिरने से समस्त कुरुप्रदेश की खेती चौपट हो गयी। बड़ा भारी अकाल पड़ गया। मोक्ष मांग कर गुजर करने वाले मुनि उषस्ति ने भूख के मारे एक दिन एक महावत को अत्यन्त निकृष्ट उड़द खाते हुए देखकर उससे उड़द की याचना की। महावत ने कहा जितने उड़द इस वरतन में रखे हुए मैं खा रहा हूँ—बस इतने ही मेरे घर भर में हैं, इनसे अधिक कुछ भी नहीं है। मुनि ने कहा—इन्हीं में से मुझे कुछ दे दीजिए? अपने खाने से बचे हुए सारे उड़दों को महावत ने मुनि उषस्ति की झोली में उड़ेल दिया। ऋषि उन्हें खाना लगे। महावत ने कहा खाकर जल भी पीलीजिए। ऋषि ने कहा—नहीं मैं तुम्हारा जूठा जल नहीं पी सकता।
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छान्दोग्योपनिषद् : १५३
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महावत बोला—तो क्या ये उड़द जूठे नहीं थे ?
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ऋषि ने कहा—ऋ्रवश्य जूठे थे, लेकिन इन उड़दों को न खाने
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पर मैं जीवित न रहता—नीने का जल तो
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मुझे सर्वत्र मिल सकता है ।
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उपस्ति ऋषि ने खाने से बचे हुए उड़द घर लाकर अपनी
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पत्नी को दे दिया । पत्नी को पहले से ही कुछ खाने को भीख
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मिल गयी थी, इसलिए उसने उन उड़दों को रख दिया । सवेरे
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सो कर जागने के बाद उपस्ति ने कहा—हाय, यदि थोड़ा—सा भी
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शन्न खाने को मिल जाता तो मैं कुछ धन कमा लाता । ऋभुक्
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राजा यज्ञ करने वाला है वह मुझे ऋत्विज पद पर वरगा कर
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लेगा ।
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ऋषि पत्नी ने कहा—स्वामिन, कल आपने जो उड़द मुझे
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दिए थे, वह रखे हैं, ले लोजिए ? उन्हें खाकर उपस्ति राजा के यज्ञ
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में गए ।
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वहाँ पहुँच कर वह उस स्थान पर बैठ गए जहाँ उद्गाता लोग
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स्तुति गान करने के लिए बैठे हुए थे । उन्होंने स्तुति करने वाले
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प्रस्तोता से कहा—
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प्रस्तोता, जिस देवता की स्तुति करने तुम जा रहे हो उसे यदि
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जाने बिना तुम स्तुति करोगे तो सम्भव लो तुम्हारा शिर धड़ से
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झलग हो जाएगा । फिर उद्गाता से बोले—उद्गाता जिस देवता
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का तुम उद्गीथ करने जा रहे है । उसे बिना जाने यदि उद्गान
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करोगे तो सम्भव लो तुम्हारा शिर गिर जाएगा । इसके बाद उन्होंने
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प्रतिहर्त्ताओं से कहा--प्रतिहर्त्ता, यदि तुम बिना जाने सम्भके प्रतिहार
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करोगे तो तुम्हारा शिर झलग हो जाएगा ।
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यह सुनकर सभी ऋत्विक् अपना अपना काम छोड़कर चुप-
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चाप बैठ गए ।
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३५४ : छान्दोग्योपनिषद्
षष्ठारहवाँ खण्ड
तब उस यजमान राजा ने उषस्ति से पूछा—भगवन्, मैं श्राप का पूर्व परिचय जानना चाहता हूँ। उषस्ति ने कहा—मैं चाक्रायण हूँ।
राजा बोला—मैंने इन समस्त ऋत्विक कर्म के लिए श्रापकी तलाश की। श्रापके न मिलने पर मैंने अन्य ऋत्विकों का वररण किया। किन्तु श्रव मेरे इस यज्ञ के ऋत्विक कर्म के लिए श्रापही रहें। ऋषि ने तथेति (बहुत श्रच्छा) कहकर श्रपनी स्वीकृति दे दी।
इसके बाद उषस्ति ने कहा—मेरे श्रादेश से पहले वररण किए गए ऋत्विक लोग ही स्तुति प्रारंभ करें। लेकिन एक बात है जितना धन उन ऋत्विकों को दिया जाए—उतना ही मुझे भी दें। राजा ने—ऐसा ही होगा—कहकर श्रपनी स्वीकृति दे दी।
इसके बाद प्रस्तोता ऋषि उषस्ति के पास श्रा कर बोला—भगवन्, श्रापने मुझसे कहा था कि जिस देवता की तुम स्तुति करने जा रहे हो उसको जाने बिना यदि प्रस्ताव करोगे तो तुम्हारा शिर गिर जाएगा। तो कृपया यह वतलाइए कि वह कौन देवता है।
उषस्ति ने कहा—वह देवता प्राण है। ये जितने प्राणी हैं सब प्राण से ही उत्पन्न होते हैं प्रौर श्रन्त में जाकर प्राण ही में विलीन हो जाते हैं। यही देवता प्रस्ताव में विद्यमान है। यदि इसे जाने बिना तुम स्तुति प्रारंभ कर देते तो मेरे श्रादेश देने पर भी तुम्हारा शिर गिर जाता —अवश्य गिर जाता।
तदनन्तर उद्गाता ने श्रा कर उषस्ति से कहा—भगवन्, श्रापने मुझसे कहा था कि हे उद्गाता, जो देवता उद्गीथ में विद्यमान
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है, उसे जाने बिना यदि तुम उद्गीथ करोगे तो तुम्हारा शिर गिर जाएगा । इसलिए कृपया बताइए कि वह देवता कौन है ?
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ऋषि उपस्ति ने कहा--वह देवता सूयं है । निश्चय ही ये सब प्राणि श्राकाश में स्थित सूर्य का गान करते हैं । वही यह सूर्य उद्गीथ से सम्बन्ध रखने वाला देवता है । उसे बिना जाने हुए यदि तुम उद्गान करते तो मेरे कथनानुसार तुम्हारा शिर धड़ से अलग होकर गिर जाता । अवश्य गिर जाता ।
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इसके बाद प्रतिहर्त्ता ने आकर उपस्ति से कहा--भगवन्, आपने मुझसे कहा था--कि प्रतिहर्त्ता, जो प्रतिहार से सम्बन्ध रखने वाला देवता है, उसे बिना जाने यदि तुम प्रतिहार क्रिया करोगे तो तुम्हारा शिर गिर जाएगा । इसलिए मैं जानना चाहता हूँ, कि वह देवता कौन है ।
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उपस्ति ने उत्तर दिया कि वह देवता वाक् है, सभी प्राणि वाक् ही को खाकर जीवन धारणा किया करते हैं । वही यह देवता प्रतिहार में है । उसको यदि न जानते हुए तुम मेरे कहे देने से प्रतिहार करते तो तुम्हारा सिर धड़ से गिर पड़ता ।
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वरहवाँ खण्ड
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अब यहाँ से शोच ( कुत्ते के समान वृत्तिवाली इन्द्रियों का ) उद्गीथ का वर्णन किया जाता है । वाक्, श्रौद्राग्य्य, ग्लानि रहित सब के मित्र जानवास्मा ने स्वाध्याय करने का प्रयत्न किया । उसके लिए श्वेत शुद्ध प्राणे ( श्वेतः, श्वा , नकट हुच्रा । अन्य इन्द्रियां उसके समीप आाकर वानो--भगवन् ( आये ) हमारे लिए अन्न का गान करें । हम भूखी हैं ।
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तब उन इन्द्रियों से वह प्राणे बोल--यहाँ ही प्रातःकाल मेरे
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निकट श्राश्रो । वहाँ वक्ता, श्रविनाशी, दु:खरहित (मैत्रेय) और सब का मित्र जीवात्मा देखने लगा ।
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जैसे इस यज्ञ में बहिष्पवमान स्तोत्र के द्वारा स्तुति करते हुए ऋत्विक् सम्मिलित होकर क्रमश: चलते हैं, वैसे ही निश्चय ही प्राण श्रादि वे इन्द्रियाँ मिलकर चलें । वे इन्द्रियाँ वहीं स्थित होकर साम गान करने लगीं ।
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हे सबके रक्षक ॐ हम भोजन करें, पान करें । हे भगवान् ॐ, आप दिव्य गुण युक्त, स्वीकार करने योग्य प्रजापति और सविता हैं । हे अन्न पते, हमें अन्न दीजिए । ॐ ।
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तेरहवाँ खण्ड
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यही पृथिवी लोक हो उकार है ।' वायु हाउकार है । चन्द्रमा अथकार है । श्रात्मा इहकार है और श्रग्नि ईकार है ।
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ग्रादि ऊकार है । श्रावाहन एक है । विश्वदेव ग्रौहोइकार है प्रजापति हिङ्कार है । प्राण स्वर ग्रन्न और वाक् विराट् हैं ।
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संभार, हुङ्कार, स्तोत्र सबके सबके मबंध मुखते वाले ने, वह तेरहवाँ हुङ्कार नामा स्तोत्र है । वागी इस स्तोम यज्ञ के लिए स्वयं दूध दुहती है । जो वागी का तूष्ण है, जो सामवेद संबंधी इस उपनिषद् को जानता है । वह ग्रन्नवान और ग्रन्नाद होता ।
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' गाते समय गान को पूरा करने के लिए सामवेद के मंत्रों में बीच-बीच में हाउ, हाइ श्रादि शब्द को बढा दिए जाते हैं । उन्हें स्तोभ या स्तोमाक्षर कहते हैं ।
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दूसरा प्रपाठक
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पहला खण्ड
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(ॐ) समस्त साम की उपासना निश्चय ही सुख देने वाली है। जो साधु होता है, उसको साम कहते हैं। जो ॠसाधु होता वह ॠसाम कहलाता है। इस विषय में और भी कहते हैं—जब कोई इस (राजा) के समीप सामव्दारा गया है—ऐसा कहा जाय तो तो उसका तात्पर्यं साधुभाव से जाना ही होता है। और जब यह कहा जाय कि वह इसके समीप सामव्दारा गया है। तो लोग यही समझते हैं कि वह इसके समीप ॠसाधुभाव से गया है।
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इसके ॠसन्नंतर ऐसा भी कहते हैं, कि हमारा साम (कल्याण) हुआ। और ऐसा भी कहते हैं कि हमारा ॠसाम हुआ। ॠथार्थ में उसे इस प्रकार जानने वाला जो साम-साधु है। ऐसी उपासना करता है। उसके पास सभी शुभधर्म शीघ्र ही आ जाते हैं और उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं।
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दूसरा खण्ड
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लोको में पाँच प्रकार के साम की उपासना करनी चाहिए। पृथवीी हिंकार, अग्नि प्रस्ताव, ॠन्तरिद्ध उद्गीथ, आदित्य प्रतिहार, द्यौ लोक और निधन है—इस प्रकार ऊपर के लोकों में साम दृष्टि रखनी चाहिए।
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अब अधोगत (नीचे उतरते हुए) लोकों के सम्बन्ध में साम की उपासना बतायी जा रही है। द्यौ हिंकार, आदित्य प्रस्ताव, ॠन्तरिद्ध उद्गीथ, अग्नि प्रतिहार और पृथिवी निधन है। जो आदमी इसे इस प्रकार जानकर पाँच प्रकार से साम की उपासना करता
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है। उसके लिए ऊँधे श्रोर श्रध्योमुख लोक भोग्य रूप से उपस्थित होते हैं।
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तीसरा खण्ड
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वर्षा में पाँच प्रकार से साम की उपासना करनी चाहिए। वरसात लाने वालीपुरवा हवा हिंकार है। मेघ उत्पन्न होता है यह प्रस्ताव है। वरसता है यह उद्गीथ है। चमकना श्रौर गरजना प्रतिहार हैं। वर्षा का बन्द होना निधन है। जो इस सैम को इस प्रकार जानता हुग्रा वृष्टि में पाँच प्रकार के साम की उपासना करता है। निश्चय उसके लिए मेघ स्वयं वरसते हैं श्रौर वह दूसरों के लिए वरसता है।
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चौथा खण्ड
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समस्त जलों में पाँच प्रकार के साम की उपासना करनी चाहिए। घटायें बनकर इधर-उधर घिरते हुए बादल—हिंकार हैं। जो वरसता है वह प्रस्ताव। जो जल पूर्व की श्रोर बहता है वह उद्गीथ है। जो पश्चिम की श्रोर बहता हैं वह प्रतिहार हैं। श्रौर समुद्र निधन है जो इस प्रकार जानता हुग्रा ऐसे पाँच प्रकार के साम की उपासना करता है, निःसन्देह वह जलों में नहीं मरता। सर्वत्र जलवान् होता है।
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पाँचवाँ खण्ड
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ऋतुश्रों में पाँच प्रकार की सामोपासना करनी चाहिए। वसंत हिंकार, ग्रीष्म प्रस्ताव, वर्षा उद्गीथ, शरद् प्रतिहार श्रौर हे मंत निधन है। जो ऐसा जानता हुग्रा ऋतुश्रों में इस साम की पाँच प्रकार की उपासना करता है, निश्चय उसके लिए ऋतुएँ श्रनुकूल वन जाती हैं।
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छठा खण्ड
पशुओं में पांच प्रकार से साम की उपासना करनी चाहिए। वत्सा हिकार, मेढ प्रस्ताव, गौवें उद्गीथ, घोड़े प्रतिहार और पुरुष निधन है।
जो इस प्रकार जानता हुया पशुओं में पांच प्रकार से साम की उपासना करता है, उसके पशु होते हैं और वह पशुवाला होता है।
सातवाँ खण्ड
प्राणों में पाँच प्रकार के उत्तरोत्तर उत्कृष्ट साम की उपासना करनी चाहिए। प्राण-हिंकार, वाणी प्रस्ताव, नेत्र उद्गीथ, कान प्रतिहार और मन निधन है। ये निश्चयमेव उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं।
जो इस प्रकार जानता हुया प्राणों में इस पांच प्रकार के साम की उपासना करता है। निश्चय ही उसका जीवन सर्वोत्तम होता है। वह प्रसिद्ध सर्वोत्तम लोगों को प्राप्त करता है। पांच प्रकार की सामोपासना का वयस्क समाप्त हुया।
आठवाँ खण्ड
अब साम प्रकार की सामोपासना का व्याख्यान किया जाता है। वाणी में सात प्रकार की सामोपासना करनी चाहिए। वाणी संंधी जो हुँ अत्तर है वह हिंकार है। जो प्र अत्तर है, वह प्रस्ताव है और श्र अत्तर श्रादिनायक साम है।
जो यह पद है, वह उद्गीथ, जो प्रतिशब्द है, वह प्रति हार जो उप यह पद है, वह उपद्रव है, जो भ यह पद है, वह निधन है।
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दूध जो वाणी का दुग्ध है, वाणी उसे स्वयं दुहती है। वह अन्नवान और अन्न का भोक्ता होता है--जो इस प्रकार जानता है--ऐसे सात प्रकार की साम उपासना करता है।
नवां खण्ड
सूर्य दृष्टि से सात प्रकार की साम उपासना निश्चय ही करनी चाहिए। सूर्य सदैव समतामय है, इसलिए वह साम (सदृश) है। सूर्य हो में सभी प्राणो आश्रित रहते हैं। ऐसा समझ कर सूर्योदय से पहले उसका जो रूप है वह हिंकार है। सूर्य के उदय होने से पूर्व उसके रूप उषा पर सभी पशु आश्रय लेते हैं। इसलिए वे पशु उसे समय हवि: करते हैं क्योंकि वे पशु इस साम-गान के भागीदार हैं।
उषा काल के बाद सूर्य का जो प्रथम उदय होता है वह प्रस्ताव है। इस रूप पर मनुष्यों का आश्रय रहता है। इसलिए वे मनुष्य स्तुति और प्रशंसा की इच्छा रखते हैं। क्योंकि वे इस सामगान रूप प्रस्ताव के हिस्सेदार होते हैं।
इसके बाद सूर्य के निकलने और उसकी किरणों फैलने का जो समय (संगव) होता है वह आदि है। पशु इस समय पर निर्भय रहते हैं। इसलिए वे आकाश में निराधार अपने कोटि का कर उड़ा करते हैं। क्योंकि इस साम गान की विधि में उनका भाग रहता है।
इसके बाद सूर्य का जो मध्याह्न काल होता है वह उद्गीथ है। विद्वान लोग उस मुहूर्त के आश्रित रहते हैं। इसलिए वे प्रजापति द्वारा बनाए गए सभी पदार्थों में श्रेष्ठ हैं। क्योंकि इस साम गान के उद्गीथ में हिस्सेदार हैं।
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मध्याह्न के बाद और अपराह्न से पहले का समय प्रतिहार है । इस मुहूर्त पर गर्भे निरभ्र रहता करते हैं । इसलिए वे गर्भे प्रतिहार होकर नहीं गिरते हैं । क्योंकि इस साम के प्रतिहार में वे हिस्सेदार हैं ।
अपराह्न के बाद और सूर्यास्त से पहले का समय उपद्रव है । सूर्य के इस मुहूर्त पर ध्यान, पशु आश्रित रहते हैं । इसलिए वे पुरुषों को देखकर जंगल में अथवा अपने विल में घुस जाते हैं । क्योंकि वे इस साम के उपद्रव के हिस्सेदार हैं ।
दसवाँ खण्ड
आत्मा के समान मृत्यु को पार करने वाले सात प्रकार के साम की उपासना करें । हिकार के हि + का + र ये तीन अक्षर और प्र + स्ता + व प्रस्ताव के ये तीन अक्षर दोनों मिल कर सम—बराबर कुत्सा करते हैं ।
आदि में आ + दि दो अक्षर और प्रतिहार में प्र + ति + हा + र चार अक्षर हैं । इस प्रतिहार से एक अक्षर लेकर इस आदि पद में जोड़ने के अक्षरों की समानता हो जाती है ।
उद्गीथ के उ + द् + गी + थ तीन अक्षरों और उपद्रव के उ + प + द्र + व चार अक्षरों में तीन-तीन अक्षरों की समानता होती है—एक अक्षर बच रहता है । तीन अक्षरों से वे भी सम हैं ।
निः + ध + न तीन अक्षरों वाला निधन अन्य तीन अक्षरों वाले पदों के बरावर होता है । निश्चय वे ये २२ अक्षर हैं ।
इक्कीस अक्षरों से आदित्य को प्राप्त होता है । निश्चय यहाँ से वह आदित्य इक्कीसवाँ है । बाईसवें अक्षर से आदित्य से ज्योति को प्राप्त होता है । वह आनन्दमय है । दुःख से रहित है ।
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जो इस साम को ऐसा जानता हुया परस्पर सामगान के अंगों की दृष्टि से बराबर मृत्यु को पार करने वाले सात प्रकार के साम को प्रयोग में लाता है तो इस लोक में वह आदित्य को प्राप्त होता है। और आदित्य को प्राप्त कर लेने के बाद वह ज्योति को प्राप्त करता है।
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ग्यारहवाँ खण्ड
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मन्त, हिंकार, वागी, प्रस्ताव, पशु, उद्गीथ, श्रोत्र, प्रतिहार और प्रार्चे निधन हैं। यह नाम का सामगान ( गायन ) है और प्राणों में पिरोया हुया है।
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इसलिए प्राणों में पिरोये हुए इस सामगान को जो इस प्रकार जानता है, वह प्राणी होता है; पूर्ण आयु प्राप्त करता है। उसका जीवन उज्ज्वल होता है, संतान, पशुओं से महान बनता है। कीर्ति से महान होता है, उदार हृदय वाला होता है। यही व्रत है।
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बारहवाँ खंड
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अररियों को जो मथता है, वह हिंकार, उससे जो धुआँ निकलता है वह प्रस्ताव, जो प्रज्वलित होता है वह उद्गीथ, जो अंगारे निकलते हैं वह प्रतिहार, जो बुझता है वह निधन। यह यज्ञाग्नि में पिरोया हुया रथन्तर नाम का साम है।
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यज्ञाग्नि में श्रोत-श्रोत इस रथन्तर को जो इस प्रकार जानता है, वह ब्रह्मवर्चसी और अन्न भोक्ता होता है। उज्ज्वल जीवनवाला पशुओं और संतान से महान होता है। महान कीर्तिशाली होता है। यज्ञादि के समय यज्ञाग्नि के सम्मुख न तो थूकना चाहिए और न धूंकना चाहिए। यही व्रत है।
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तेरहवाँ खण्ड
स्त्री-पुरुष युग्म में एक दूसरे को संकेत द्वारा बुलाना—यह संकेत है, हाव-भाव दिखलाना प्रतिज्ञा है। स्त्री के साथ पुरुष का सोना उद्दगीथ है। एक दूसरे की ओर मुंह करके सोना प्रतिहार है। इस प्रकार जो समय बीतता है वह निधन है। ऋतिशय भोग में लिम रहना जो निधन है वही यह मिश्रुन में पिरोया हुआ वामदेव्य साम है।
जो पुरुष इस प्रकार मिश्रुन में श्रोत-प्रोत वामदेव्य साम को जानता है, वह स्त्री-पुरुष के मैथुन का ज्ञाता होता है। उसका जोड़ा कभी नहीं फूटता। उसका कभी वियोग नहीं होता, मैथुन से उसके सन्तान उत्पन्न होती है। वह पूर्ण आयु का भोग करता है। उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। प्रजा और पशुओं के कारण महान होता है, तथा कीर्ति के कारण महान होता है। किसी स्त्री पर-स्त्री का कभी अपहरण न करना चाहिए। कभी भी व्यभिचार न करे—यही व्रत है।
चौदहवाँ खण्ड
उदय होता हुश्रा सूर्य हिङ्कार है, उदित सूर्य प्रस्ताव है। मध्याह्न उद्दगीथ है। अपराह्न प्रतिहार है, अस्त हुश्रा सूर्य निधन है, यह सूर्य में स्थित है, जो इस प्रकार इस वृहत्साम को सूर्य में स्थित वृहत्साम जानता है, वह हिङ्कार और प्रस्ताव का भोक्ता होता है। वह पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओं के कारण महान होता है। कीर्ति के कारण महान होता है तपते हुए सूर्य की निन्दा न करे—यह व्रत है।
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पन्द्रहवाँ खण्ड
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वादलों का पूर्व जो आकाश में जटता है—वह हिङ्कार है, उसका बादल बन जाना प्रस्ताव है। पानी का बरसना उद्गीथ और चमकना, गरजना प्रतिहार तथा वृष्टि का बन्द हो जाना निधन है। यह वैरूप साम मेघ में ओत-प्रोत है। जो पुरुष इस प्रकार इस वैरूप साम को जानता है वह सन्तान, पशु और ब्रह्म तेज से सम्पन्न हो जाता है। पूरे आयु को प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। कीर्ति से महान होता है। बरसते हुए मेघ की निन्दा न करनी चाहिए। यह व्रत है।
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सोलहवाँ खण्ड
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वसन्त हिङ्कार, ग्रीष्म प्रस्ताव, वर्षा उद्गीथ, शरद प्रतिहार, हेमन्त निधन है। इस प्रकार यह वैराज नाम का साम ऋतुओं से ओत-प्रोत है।
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ऋतुओं में ओत-प्रोत इस वैराज साम को जो जानता है, वह सन्तान; पशु और ब्रह्मतेज से शोभित होता है। ऋतुओं की निन्दा न करे—यह व्रत है।
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सत्रहवाँ खण्ड
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पृथिवी, हिङ्कार, अनन्तरिक्ष प्रस्ताव, द्यौ उद्गीथ, दिशाएँ प्रतिहार, और समुद्र निधन है। समस्त लोकों में ओत प्रोत ये शकरी साम हैं।
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लोक में ओत-पोत इस शकरी नाम के साम को जो इस प्रकार जानता है, वह लोकवाला होता है, पूरे आयु प्राप्त करता है, उज्ज्वल जीवन रखता है। सन्तान और पशु से महान होता है। कीर्ति से महान होता है, लोकों की निन्दा न करे—यह व्रत है।
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अठारहवाँ खण्ड
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बकरी हिंकार, मेढ़ प्रस्ताव, गायें उद्गीथ, घोड़े प्रतिहार, श्रौत पुरुष निधन हैं। पशुओं में श्रोत-प्रोत यह रेवती नाम का सामगान है।
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पशुओं में श्रोत-श्रोत इस रेवती सामगान को जो इस प्रकार जानता है, वह पशुओं वाला होता है। पूर्ण आयु भोगता है। स्वच्छ जीवन व्यतीत करता है। प्रजा और पशुओं से महान होता है। कीर्ति से महान होता है। पशुओं की निन्दा न करे—यह व्रत है।
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उन्नीसवाँ खंड
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लोम हिंकार है। लवचा प्रस्ताव है। मांस उद्गीथ है। वसति प्रतिहार है। चर्वी निधन है। श्रंगों में श्रोत-प्रोत यह यज्ञायज्ञिय नाम का सामगान है।
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समस्त श्रंगों में श्रोत-श्रोत इस यज्ञायज्ञिय साम को जो इस प्रकार जानता है, वह उत्तम श्रंगों वाला होता है। उसका कोई श्रंग टेड़ा-मेढ़ा नहीं होता। पूर्ण आयु प्राप्त करता है, निष्कलंक जीवन व्यतीत करता है। सन्तान और पशुओं से महान होता है। उत्तम कीर्ति से महान होता है। वर्ष में कभी मांस न खाए—यह व्रत है। निश्चय ही कभी मांस न खाये।
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बीसवाँ खण्ड
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अग्निर्हिंकार है, वायु प्रस्ताव है। आदित्य उद्गीथ है। नक्षत्र प्रतिहार है। चन्द्रमा निधन है। देवताओं में श्रोत-प्रोत यह राजन् नाम का सामगान है।
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देवताओं में श्रोतप्रोत राजन नाम के इस सामगान को जो इस प्रकार जानता है। वह इन्हीं देवताओं के समान ऐश्वर्य और सायुज्य प्राप्त करता है। पूरें आयु प्राप्त करता है। उज्जवल जीवन व्यतीत करता है। प्रजा तथा पशुओं से महानता प्राप्त करता है। उत्तमकीर्ति से महान् बनता है। ब्राह्मणों—विद्वानों की निन्दा न करे—यही व्रत है।
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इक्कीसवाँ खण्ड
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ऋक्, साम और यजु ये तीन विद्याएँ हिंकार हैं। तीनों लोक प्रस्ताव हैं। अग्नि, वायु, आदित्य ये उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पञ्ची और किराएँ प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितृगण निधन हैं। यह सामोपासना सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में श्रोतप्रोत है।
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इसलिए जो कोई इस सामोपासना को जानता है—वह सब कुछ होता है। इस विषय में यह मंत्र भी कहा गया है—हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन इन पाँचों प्रकारों में जो तीन विद्याएँ कही गयी हैं उनसे महान् और उत्कृष्ट और कोई सामगान नहीं है। जो उस साम को जानता है, उसके लिए समस्त दिशाएँ बलि पदार्थ देती हैं। 'मैं सब कुछ हूँ'—ऐसी भावना रखना व्रत है—यही व्रत है।
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बाईसवाँ खण्ड
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पशुओं के लिए हितकर और ऋग्मि संबंधी उद्गीथ जो विशेष स्वर युक्तसामगान है—उसे मैं पसन्द करता हूँ। प्रजापति का सामगान अनिरुक्त—श्रुति उत्तम है। सुबोध है। वायु का सामगान श्लक्ष्ण—सुकोमल है। सोम का सामगान निरुक्त—कोमल है। बृहस्पति का सामगान क्रौंचपक्षी
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की ध्वनि की तरह है। वस्त्र का सामगान फूटे हुये वर्तन की ध्वनि की तरह है। इनमें केवल वस्त्र का सामगान छोड़कर शेष सभी का उपयोग करना चाहिए।
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मैं देवताओं-ऋषि वेदवेत्ताओं के लिए अमरता का गान करूँ। पितरों-रक्षकों के लिए स्वधा का गान करूँ। मनुष्यों के लिए स्वाशा का, पशुओं के लिए चारा और जल का, यजमान के लिए विशेष सुख के लिए और अपने लिए ब्रह्म का गान करूँ।
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इन सभी उपर्युक्त गानों का मन से ध्यान करते हुए आलस्य रहित होकर भगवान की स्तुति करे।
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सम्पूर्ण स्वर इन्द्र की आत्मा हैं। समस्त ऊष्मावर्ण (श, ष, स, ह) प्रजापति की आत्मा हैं। सभी स्पर्श वर्ण (कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग) मृत्यु की आत्मा हैं। वर्णों के इस उच्चारण क्रम को जो उद्गाता जानता है उसको यदि कोई स्वरों (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ) में अशुद्ध उच्चारण करने वाला कहे तो वह उससे कहे कि 'मैं इन्द्र की शरण में आया हूँ—वही तुम्हें उत्तर देगा।'
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और यदि कोई ऊष्मावर्णों के उच्चारण में अशुद्धि निकाले तो वह उससे कहे कि मैं प्रजापति के शरणागत था—वही तुमको उत्तर देंगे। यदि कोई स्पर्श वर्णों के उच्चारण में दोष का आभियोग दे तो उससे कहे कि मैं मृत्यु की शरण में था वही तुमको दण्ड देंगे।
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सभी स्वर घोष (उच्च स्वर) और बलयुक्त उच्चारण किए जाने चाहिए। ऋत् उनका उच्चारण करते समय 'मैं इनमें बल का आधान करूँ'—ऐसा चिन्तन करना चाहिए। समस्त ऊष्मा वर्ण न प्रसे हुए न फैंके हुए स्पष्ट उच्चरित होने चाहिए। इस प्रकार का उच्चारण करने वाला प्रजापति को आत्मसमर्पण करता है।
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सभी स्पर्श वर्ण धीरे धीरे, वापस में न मिलाकर उच्चारण करने चाहिए। इस प्रकार उच्चारण करने वाला मृत्यु से अपने को वचा लेता है।
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तेईसवाँ खंड
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धर्म के तीन स्कन्ध (भाग) हैं। यज्ञ, स्वाध्याय और दान मिल कर पहला स्कन्ध है। तप दूसरा स्कन्ध है। आचार्य कुल में रहता हुया ब्रह्मचारी अपने को जो तपस्वी बनाता है, वह तीसरा स्कन्ध है। ये सभी पुरालोक वाले होते हैं। परन्तु इनमें से ब्रह्म-निष्ठ मुक्ति पाता है।
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प्रजापति ने लोकों को प्रकाशित करने के लिए ध्यानरूप तप किया। उनके प्रकाशित होने पर तीन विद्याएँ (चार वेद) प्रादुर्भूत हुईं। उनको ऋषियों के हृदय में प्रकाशित किया। उनके प्रकाशित होने पर भूः भुवः और स्वः ये तीन व्याहृत प्रकट हुए।
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उन तीन व्याहृतों को प्रजापति ने तपाया, उनके तपने से ॐ प्रकाशित हुया जैसे शंकुओं (नसों) द्वारा सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त हैं। उसी प्रकार ॐ से सम्पूर्ण वाणी व्याप्त है—ओंकार ही सब कुछ है।
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चौबीसवाँ खंड
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ब्रह्मवादियों का कहना है, कि प्रातःसवन वसुओं का है, मध्याह्न सवन रुद्रों का है। और तीसरा सवन आदित्यों, विश्वेदेवों का है। तो फिर यजमान का लोक कहाँ है ? यदि वह इस लोक को न जाने तो कैसे यज्ञ करेगा ? उसे जानने वाला ही यज्ञ करेगा।
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प्रातरुत्सुक आरंभ करने से पहले गाहर्पत्य अग्नि के पीछे-उत्तरामिमुख बैठकर वह यजमान वसुओं का सामगान करता है—
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ऽन, तुम्हारा इस लोक का द्वार खोल दो, जिससे हम राज्य प्राप्ति ! तुम्हारा दर्शन करें। इसके बाद यजमान इस मन्त्र द्वारा करता है—पृथ्वी में रहने वाले इस लोक के वासी ऋग्मिन्देव, मभु यजमान को तुम लोक की प्राप्ति कराओ। श्वय ही यजमान का लोक है। मैं इसे प्राप्त करने वाला हूँ। लोक में वायु समाप्त होने के बाद में पुप्यलोक को प्राप्त हो स्वाहा—पृथ्वा कहकर वह हवन करता है। और परिषद् ता) को नष्ट करो—ऐसा कहकर उत्थान करता है; वसुगण ततः सवन प्रदान करते हैं।
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पाध्यान्दिन सवन के प्रारम्भ में पहले ऋग्नीध्रीय ऋभिन के यजमान उत्तर की ओर मुँह करके रुद्रों के साम का गान है—
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लोक-द्वार खोले दें, हम लोग आपको साम्राज्य के लिए देखें।
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इसके बाद यजमान इस मंत्र द्वारा हवन करता है—ऋनत: रिषु में व्याप्त वायुदेव को नमस्कार है। मुजे ( यजमान ) तुम रित् लोक को प्राप्त कराओ। यही यजमान का लोक है और ते प्राप्त करने वाला हूँ। "मैं वायु समाप्त होने पर ऋन्तरिक्ष को प्राप्त करूँ।" ऐसा कहकर यजमान हवन करता है और ; द्वार की अंगेला को दूर करो? ऐसा कहकर उत्थान करता है। वसुगण लिए रुद्रगण माध्यान्दिन सवन देते हैं।
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तृतीय सवन के प्रारम्भ से पहले वह यजमान आहवनीय ऋभिन् छले उत्तराभिमुख बैठकर आदित्य और विश्वेदेव के साम का करता है।
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"लोक द्वार को खोल दो जिससे हम स्वाराज्य प्राप्ति के लिए रा दर्शन कर सकें।" यह आदित्य सम्बन्धी साम है। लोक—
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द्वार खोल दो जिससे हम आपको साम्राज्य के लिए देखें—‘यह विश्वेदेव सम्वन्धी साम है’।
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इसके बाद यजमान इस मन्त्र द्वारा हवन करता है—‘आदित्यों को समस्त देवों को, भुलोकवासियों को और अन्य लोक निवासियों को नमस्कार ।’ मुभे यजमान को तुम पुरुपलोक की प्राप्ति कराओ । यह निश्चय ही यजमान का लोक है और इसे प्राप्त करने वाला मैं हूँ। यहाँ यजमान—‘आयु समाप्त होने पर मैं इस लोक को प्राप्त कहलँगा’—ऐसा कहकर स्वाहा सहित हवन करता है । और ‘लोक द्वार की रागेंला दूर करो’—कहकर उठ जाता है । उस यजमान को आदित्य और विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता है, और जो इस प्रकार जानता है, वह निश्चय यज्ञ के यथार्थ स्वरूप को जानता है ।
१७०
तीसरा प्रपाठक
१७०
पहला खण्ड
१७०
निश्चय ही यह आदित्य देवताओं का मधु है । झुलोक इसका तिरछा बाँस है । अन्र्तनिहित छत्ता है और किरणें उसमें रहनेवाले अंडे-बच्चे हैं।
१७०
पूर्वादिश की जो किरणें हैं, वही इस अन्र्तनिहित रूप छत्ते के छिद्र हैं। ऋचाएँ ही मधुमक्खियाँ हैं । ऋग्वेद ही पुष्प है । वे सोम आदि अमृतरस पूर्ण हैं । निश्चय ही उन ऋचा रूप मधुमक्खियों ने इस ऋग्वेद को तपाया है । उस तपे हुए ऋग्वेद से यश, तेज, वीर्य, इन्द्रिय और श्रोज आदि रूप, रस उत्पन्न हुए । वह यश आदि रस बाहर भरने लगा और उसने सब ओर आदित्य का आश्रय लिया । निश्चय वह यह है जो आदित्य का लाल रूप है ।
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१७१
दूसरा खण्ड
१७१
इसकी जो दक्खिण दिशा की किरणें हैं, वे ही इसकी दक्खिण की मधुनाड़ियाँ हैं। यजुर्वेद की श्रुतियाँ ही मधुक्खियाँ हैं। यजुर्वेद ही पुष्प है। तथा साम श्रादि रूप ऋमृत ही रस है। उन सब श्रुति रूप मधुमक्खियों ने यजुर्वेद को तपाया उसके तपने से यश, तेज, इन्द्रिय, बल और भोग पदार्थ रूप रस प्रकट हुया।
१७१
वह भरने लगा और उसने आदित्य का सब ओर से आश्रय महण किया। निश्चय वह यह है जो आदित्य का शुक्ल रूप है।
१७१
तीसरा खण्ड
१७१
और जो इस आदित्य की जो किरणें पश्चिम की ओर हैं, वे ही इसकी पश्चिम ओर की मधुनाड़ियाँ हैं। साम ही शहद की मक्खियाँ हैं। साम वेद ही पुष्प है और वह ऋमृत रस पूर्या है।
१७१
निश्चय उन इन सामों ने इस सामवेद रूप पुष्प को तपाया, उसके तपने से यश, तेज, इन्द्रिय बल और भोग्य पदार्थ रूप रस प्रकट हुया।
१७१
वह भरने लगा और उसने सब ओर से आश्रय लिया। निश्चय वह यह आदित्य का कृष्ण रूप है।
१७१
चौथा खण्ड
१७१
और ये जो इस आदित्य की उत्तर की ओर किरणें हैं, वे ही इसकी उत्तर की ओर किरणें हैं, वे ही इसकी उत्तर की ओर की मधुनाड़ियाँ हैं। इतिहास पुराणा फूल हैं और वे ऋमृत रस पूर्या हैं।
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१७२
निश्चय ही उस श्रथर्वाङिरस ने इस इतिहास-पुराण रूप फूल को तपाया, उसके तपने से यश, तेज, इन्द्रिय, वल और भोज्य पदार्थ रूप रस उत्पन्न हुचा ।
१७२
वह भरने लगा और उसने आदित्य का सब ओर से आश्रय लिया, निश्चय वह यह है जो आदित्य का अत्यन्त कृष्ण रूप है ।
१७२
और जो इस आदित्य की ऊपर की और की किरणें हैं, वे ही ऊपर की मधुनाडियाँ हैं । गूढ शित्याएँ ही मधुमक्खियाँ हैं । वेद ही पुष्प हैं और वे अमृत रस पूरें हैं ।
१७२
निश्चय ही उन गूढ शित्याओं ने वेद को तपाया, उसके तपने से यश, तेज, इन्द्रिय, वल और भोज्य पदार्थरूप रस उत्पन्न हुचा है ।
१७२
वह भरने लगा और उसने सब ओर से आदित्य का सहारा लिया, निश्चय ही वह आदित्य के बीच का कम्पन है ।
१७२
निश्चय ही वे यश, तेज आदिरस हैं, क्योंकि वेद रस हैं, उसके ये रस हैं । निश्चय वे इन अमृतों के अमृत हैं, क्योंकि वेद अमृत हैं और उनके ये अमृत हैं ।
१७२
छठा खंड
१७२
इन अमृतों में जो पहला अमृत है. उससे वसुगण अग्नि मुख से जीते हैं । निश्चय न तो वे देवता खाते हैं, न पीते हैं । इसी अमृत को देखकर वे तृप्त होते हैं ।
१७२
वे वसुगण इसी रूप में सब ओर से प्रवेश करते हैं । इसी रूप से उदय होते हैं । जो कोई इस अमृत को जानता है, वह वसुग्णों में ही एक होकर अग्नि मुख ही से-इसी अमृत को देखकर तृप्त होता है ।
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१७३
और वह इसी रूप में सब ओर से प्रवेश करता है। इसी रूप से उदय होता है। जितने समय तक सूर्य पूर्व दिशा से उदित होता है और पश्चिम दिशा में अस्त होता है, उतनी ही देर तक वह वसुओं के आधिपत्य और स्वाराज्य को प्राप्त होता है।
१७३
सातवाँ खंड
१७३
अब जो दूसरा अमृत है, उसको पाकर रुद्रगण इन्द्र मुख से जीते हैं, निश्चय ही वे देवता न खाते हैं न पीते हैं। उसी अमृत को देखकर तृप्त होते हैं।
१७३
वे रुद्र इसी अमृत में सब ओर से प्रविष्ट होते हैं। और इसी रूप से उदय होते हैं। इसलिए जो कोई इस अमृत को जानता है, वह रुद्रों में से कोई एक होकर इन्द्र मुख से इसी अमृत को देखकर तृप्त होता है। वह इसी रूप में सब ओर से प्रविष्ट होता है। और इसी रूप से उदय होता है।
१७३
जितने काल तक सूर्य पूर्व से उदय होकर पश्चिम में अस्त होता है। उससे दूने समय में वह दक्षिण से उदित होता है और उत्तर में अस्त होता है। इतने समय तक वह रुद्रों के ही आधिपत्य एवं स्वाराज्य को प्राप्त होता है।
१७३
आठवाँ खंड
१७३
तृतीय अमृत है उससे आदित्य गण वरुण रूप प्रधान होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं। वे इसी रूप में सब ओर से प्रवेश करते हैं और इसी रूप में सर्वत्र उदित होते हैं।
१७३
वह जो इस अमृत को जानता है वह आदित्यों में ही एक होकर वरुण की प्रधानता से इसी रूप में सब ओर से प्रविष्ट होता है और इसी रूप से उदय होता है।
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१७४
१७४ : छान्दोग्योपनिषद्
१७४
वह सूर्य जितने समय में दक्षिण से उदित होता है और उत्तर में अस्त होता है। उससे दूने समय में पश्चिम से उदित होता है और पूर्व में अस्त होता है। इतने समय वह आदित्यों के ही आधिपत्य और स्वाराज्य को प्राप्त होता है।
१७४
नवाँ खण्ड
१७४
इसके बाद जो चौथा अमृत है, मरुद्गण सोम की प्रधानता से उसके आश्रित जीवित रहते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं। वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। वे इसी रूप में सब ओर से प्रवेश करते और इसी रूप से उदय होते हैं।
१७४
वह जो इस अमृत को जानता है, वह मरुतों ही में एक होकर सोम की प्रधानता इसी अमृत को देखकर तृप्त होता है, और इसी रूप से उदय होता है।
१७४
जितने काल में सूर्य पश्चिम से उदय और पूर्व में अस्त होता है, उससे दुगने समय तक उत्तर से उदय और दक्षिण में अस्त रहता है। उतने समय तक वह मरुतों के बीच आधिपत्य और स्वाराज्य प्राप्त करता है।
१७४
दसवाँ खण्ड
१७४
और जो पाँचवाँ अमृत है, साध्यगण ब्रह्मा की प्रधानता से उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं। वे इस अमृत को देखकर ही तृप्त होते हैं। वे साध्यगण इसी रूप में सब ओर से प्रविष्ट होते हैं और इसी रूप में प्रविष्ट होते हैं।
१७४
वह जो कोई इस अमृत को जानता है, साध्यों ही में एक होकर ब्रह्ममुख से इस अमृत को देखकर तृप्त होता है। वह
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१७३
ज्ञान्दोम्योपनिषद् : १७३
१७३
इसी रूप में सब ओर प्रवृष्ट होता है और इसी रूप से उदय होता है।
१७३
वह सूर्य जितने समय में उत्तर से उदित होता है और दक्षिण में अस्त होता है, उससे दूने समय तक ऊपर की ओर उदित होता है और नीचे की ओर अस्त होता है। इतने समय तक वह साध्यों ही के आधिवलय और स्वाराज्य को प्राप्त होता है।
१७३
ग्यारहवाँ खंड
१७३
तपश्चात् वह उसमें ऊपर न उदित होता है और न अस्त होता है। बल्कि अकेला ही मध्य में स्थित रहता है। उसके विषय में श्लोक है—
१७३
'वहाँ निश्चय ही ऐसा नहीं होता। वहाँ सूर्य का न कभी उदय होता है और न अस्त । हे देवगण! इस सत्य के द्वारा मैं ब्रह्म से विरुद्ध न होऊँ, अथोत् सत्य से वंचित न होऊँ ।'
१७३
जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद् को जानता है, उसके लिए न तो सूर्य का उदय होता है और न अस्त होता है। उसके लिए सर्वदा दिन ही रहता है। वह यह मधु ज्ञान ब्रह्मा ने प्रजापति से कहा था। प्रजापति ने मनु को सुनाया और मनु ने प्रजा को बतलाया। तथा यह ब्रह्मविज्ञान अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा-नन्दन उदालक को उसके पिता ने सुनाया था। अतः पिता इस ब्रह्मविज्ञान का उपदेश अपने ज्येष्ठ पुत्र अथवा सुयोग्य शिष्य को दे।
१७३
यदि कोई समुद्रों से घिरी हुई धन-धान्य से पूर्ण पृथिवी भी आचार्य को दे दे तो भी इस ब्रह्मविद्या का उपदेश अन्य किसी को नहीं करना चाहिए। क्योंकि उस पृथिवी दान से यही ब्रह्मविद्या का दान अधिक है। यही दान उस दान से अधिकतर है।
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१५६
बारहवाँ खण्ड
१५६
निश्चय ही जितने ये सब प्राणि श्राप्राणी हैं—गायत्री है। वाणी ही गायत्री है, क्योंकि वाणी ही इस जीव-समुद्राय को गाती है और उसकी रक्षा करती है।
१५६
निश्चय जो वह गायत्री है, वह यही है जो यह पृथिवी है। क्योंकि इस पृथिवी पर सभी पदार्थ प्रतिष्ठित हैं। इसका कोई श्रतिक्रमण नहीं कर सकता।
१५६
जो वह पृथिवी है वह यही है जो कि इस पुरुष में यह शरीर है। क्योंकि इसी में ये प्राण स्थित हैं। और इसी को ये कभी नहीं छोड़ते। जो भी इस पुरुष में शरीर है, वह यही है जो कि इस श्रन्तः पुरुष में हृदय है, क्योंकि इसी में ये प्राण स्थित हैं। और इसी का श्रतिक्रमण नहीं करते। वह यह गायत्री चार चरओं वाली और छह प्रकार की है। वह यह विषय ऋचा द्वारा कहा गया है।
१५६
इस ईश्वर की जितनी बड़ी महिमा है, उससे यह बहुत बड़ा है। समस्त ब्रह्माण्ड उसका एक श्रंश है। इसके तीन श्रमरपाद उसकी दिव्य महिमा में स्थित है।
१५६
निश्चय जो भी वह ब्रह्म है, वह यही है, जो कि यह पुरुष से बाहर श्राकाश है, और जो भी यह पुरुष से बाहर श्राकाश है, वह यही है जो यह पुरुष के भीतर श्राकाश है। तथा जो भी यह पुरुष के भीतर श्राकाश है वह यही है जो हृदय के श्रन्तर्गत श्राकाश है। वह यह हृदयाकाश पूर्ण और कहीं भी प्रवृत्त न होने वाला है। जो पुरुष ऐसा जानता है, वह पूर्ण और कहीं प्रवृत्त न होने वाली सम्पत्ति प्राप्त करता है।
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ज्ञानोऽग्न्युपनिषद् : १३७
१३७
तेरहवाँ खण्ड
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निश्चय उस इस हृदय के पांच देव सम्रन्धी सुरषि (छिद्र द्वार) हैं। वह प्राप्त है, वह चक्षु है। वह श्रादित्य है। वही यह तेज और ऋतम् त्र्याधों को मार्गने वाला है—इस दृष्टि से उसको प्रयोग में लाना चाहिए। जो इस प्रकार इनकी उपासना करता है, वह तेजस्वी और ऋन्न का भोक्ता होता है। इसका जो दक्षिण द्वार (छिद्र) है, वह ध्यात है। वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है। वही यह श्री एवं यश है। इस प्रकार इसकी उपासना करनी चाहिए। जो इस प्रकार इसे जानता है, वह श्रामन् और यशस्वी होता है। इसका जो पशिचम द्वार है, वह प्राण हैं, वह वाक् है, वह श्रप्न है और वही यह ऋन्न तेज एवं ऋन्न का भोक्ता है। जो इसे ऐसा जान कर इसकी उपासना करता है, वह ब्रह्म तेजस्वी एवं ऋन्न का भोक्ता होता है। इसका जो उत्तरी द्वार है, वह समान है। वह मन है। वह मेध है, वही कान्ति और देह की सौन्दर्य (वृष्टि) है। इस प्रकार इसे जान कर जो इसकी उपासना करता है, वह कीर्तिमान् और कान्तिमान् होता है। इसका जो ऊपरी द्वार है वह उदान है। वह श्राकाश है, वही यह ब्रोज और तेज हैं। इस प्रकार इसे जान कर जो इसकी उपासना करता है वह ब्रोजस्वी और तेजस्वी होता है।
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वे ये पांच ब्रह्म पुरुष हृदय (स्वर्ग) के द्वारपाल हैं। जो कोई स्वर्ग (हृदय) लोक के इन पांच ब्रह्म पुरुषों—द्वारपालों को जानता है, वह स्वर्ग लोक को प्राप्त होता है। उसके कुल में शूरवीर उत्पन्न होता है। अब इस भूलोक से ऊपर जो परम ज्योति विश्व के पृष्ठ पर—सब लोकों से ऊपर श्रद्वितीय बनकर प्रकाशित हो रही है, वह
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१३
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१९५
१९५ : छान्दोग्योपनिषद्
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निश्चय ही यही है, जो पुरुष के भीतर ज्योति है। उस इस हृदयपुरुष के दर्शन का यही उपाय है।
१९५
जब मनुष्य इस शरीर में स्पर्श के द्वारा ऋष्यता का अनुभव करता है—उसकी यह श्रुति है—आवाज है। जब दोनों कानों को मूँद कर रथ की ध्वनि की तरह, बैल की आवाज की तरह, जलती हुई आग की आवाज की तरह सुनता है। वह यह ज्योति देखी गयी और सुनी गयी है—इस प्रकार इसकी उपासना करनी चाहिए। जो साधक इस प्रकार उपासना करता है, वह दर्शनीय और विख्यात होता है।
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चौदहवाँ खण्ड
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यह सारा विश्व निश्चय ही ब्रह्म है। उसी ईश्वर से सब कुछ उत्पन्न होता है। उसी में प्राण धारण करता है और अन्त में उसी में लीन होता है। ऐसा जान कर शान्तभाव से उसकी उपासना करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य वासनामय है—जैसी वह इच्छा करता है, वैसा ही बन जाता है। इस लोक में मनुष्य की जैसी वासना होती है, वैसी ही यहाँ से मर कर दूसरी योनि में होती है। इसलिए मनुष्य को उत्तम इच्छाएँ और उत्तम कर्म करने चाहिए।
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मनोमय प्राण जिसका शरीर है। प्रकाश रूप, सत्यसंकल्प, आकाश शरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस वह इस समस्त विश्व को सब ओर से घेरे हुए है वह वाणी रहित और आदर पाने की चिन्ता से मुक्त है।
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मेरे हृदय में स्थित यह मेरा आत्मा धान से, यव से, सरसों से श्यामाक से चावल से भी सूक्ष्म हैं। वह पृथिवी से भी बड़ा, अन्तरिक्ष से भी विशाल औ से भी महान और सभी लोकों से भी बड़ा है।
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छान्दोग्योपनिषद् : १५८
वह समस्त कमों को करने वाला, समस्त शुभ इच्छाओं वाला, समस्त गन्ध युक्त, सर्व रस पूर्र्ण सम्पूर्ण विश्व के श्रृङ्ग-अङ्गु में व्याप्त है। वाणी रहित मन की इच्छा से शान्त यह आत्मा मेरे हृदय में हैं। यह ब्रह्म है। मरने के बाद मैं इसी को प्राप्त होने वाला हूँ। जिसका ऐसा निश्र्चय है और जिसे इस विषय में कोई सन्देह भी नहीं है—उसे इसी ब्रह्मभाव की प्राप्ति होती है—ऐसा शाण्डिल्य ऋषि ने कहा है।
पञ्चदशः खण्ड
एक कोश है, जिसका उदर ऋन्तरिक्ष और चराचर पृथवी है। वह कभी जीर्ण नहीं होता है। दिशाएँ इसके कोने हैं। आकाश ऊपर का चित्र है। वह यह कोश वसुधान है। उसी में यह सारा विश्व स्थित है। उस कोश की पूर्व दिशा 'जुहू' नाम वाली है। उसकी पश्चिम दिशा का नाम 'राज्ञी' है। उत्तर दिशा का नाम 'सुभूता' हे। उन 'दिशाओं का वायु वत्स है। वह जो इस प्रकार इस वायु को दिशाओं के वत्स रूप से जानता है, पुत्र के निमित्त रोदन नहीं करता। वह मैं इस वायु को दिशाओं के वत्स के रूप से जानता हूँ। शपथ: मैं पुत्र के कारण न रोऊँ।
मैं ऋमुक, ऋमुक के सहित प्राण की शरण हूँ। ऋमुक, ऋमुक के सहित भूः की शरण हूँ। ऋमुक ऋमुक के सहित भुवः की शरण हूँ। ऋमुक, ऋमुक के सहित स्वः की शरण हूँ।
'मैं प्राण की शरण हूँ'—ऐसा जो मैंने कहा था, वह यह जो कुल सम्पूर्ण जीव समुदाय है, प्राण ही है। उसी की मैं शरण हूँ। 'मैं भूः की शरण हूँ'—ऐसा जो मैंने कहा था इसका तात्पर्य—मैं पृथवी की शरण हूँ, ऋन्तरिक्ष की शरण हूँ और मैं चुलोक की शरण हूँ।
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१५० : छान्दोग्योपनिषद्
हौं—‘मैं भुवः की शरण हूँ’ इस कथन का तात्पर्ये यह है कि मैं अग्नि की शरण हूँ, वायु की शरण हूँ और आदित्य की शरण हूँ। ‘मैं स्वः की शरण हूँ’ मेरे इस कथन का तात्पर्य है—मैं ऋग्वेद की शरण हूँ, यजुर्वेद की शरण हूँ और सामवेद की शरण हूँ। यही मैंने कहा है।
सोलहवाँ खण्ड
पुरुष ही यज्ञ है। उसकी आयु के जो २४ वर्ष हैं, वे प्रातः- सवन हैं। गायत्री चौबीस अक्षरों वाली है। प्रातः सवन गायत्री- छन्द से संवद्ध है। इस पुरुषयज्ञ के उस प्रातःसवन से वसु संबंधित हैं। प्राण ही वसु हैं। क्योंकि ये ही सब प्राणिसमूह को बसाते हैं।
इस चौबीस वर्ष के ब्रह्मचर्य की आयु में यदि उस ब्रह्मचारी के ब्रह्मचर्यें में कोई बाधा उपस्थित करे तो वह उसे कहे—हे प्राण प्रिय बन्धुओ, यह मेरा ब्रह्मचर्य रूपी प्रातःसवन है। आप लोग मेरे माध्यन्दिनसवन अथार्त ४४ वर्ष के ब्रह्मचर्य को विस्तृत करें और ऐसा ‘प्रयत्न करें कि आप प्राण प्रिय बन्धुओं के बीच में मैं यज्ञ हूँ, लुप्त न हो जाऊँ। इस विनय से वह ब्रह्मचारी उदित होता है रोगों (विनाशों) से मुक्त होता है।
इसके बाद ४४ वर्ष की आयु तक का माध्यन्दिन सवन (द्वितीय ब्रह्मचर्य) होता है। ४४ अक्षरों का त्रिष्टुप् छन्द होता है। इसलिए त्रिष्टुप् माध्यन्दिन सवन है। उस पुरुष यज्ञ के माध्यन्दिन सवन से रुद्र संबंधित है। प्राण ही रुद्र हैं। क्योंकि ये ही सब प्राणिसमूह को रुलाते हैं।
इस आयु की द्वितीय ब्रह्मचर्यावस्था 'में यदि ब्रह्मचारी के ब्रह्मचर्यें पर कोई बाधा डाले तो वह उससे कहे—हे प्राण प्रिय
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छान्दोग्यउपनिषद् : १-८
१४९
वन्युथों और स्त्रों, यह मेरे जीवन का माध्यन्दिन सवन हैं। आपलोग मेरे लिए ८४ वर्ष की आयु तक के तृतीय सवन को विस्तृत करें। और ऐसा यत्न करें कि आप जैसे प्राण प्रिय बन्युथों और स्त्रों के बीच जो मैं यज्ञ हूँ लुप्त न हो जाऊँ। इसमें वह व्रतचारी उदित होता है और रोग (चिन्ता) रहित होता है।
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इसके बाद जीवन के जो अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय सवन हैं। जगती छन्द अड़तासील अक्षरों वाला है। तथा तृतीय सवन जगती छन्द से संवंधित हैं। इस सवन से संवंधित श्राद्धिल्यग्नि हैं। क्योंकि ये ही इस सम्प्रदाय को प्रहण करते हैं। इस श्रवस्था में यदि पुरुष की साधना में कोई वाधा उपस्तिथ हो तो उसे कहनाचाहिए—हे प्राणे रूप श्रादित्यगण, मेरे इस तृतीय सवन को श्रायु के साथ मिला दो। यज्ञ रूप में प्राणे रूप श्रादित्यों के बीच लुप्त न हो जाऊँ। ऐसा कहने से वह उदित होता है और रोग से मुक्त होता है।
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इस प्रसिद्ध विद्या को ऐतरेय महिदास ने कहा था—हे रोग, तू मुझे क्यों कष्ट दे रहा है, क्योंकि मैं इस रोग से मर नहीं सकता। इतराका पुत्र वह एतरेय महिदास एकसौ सोलह वर्ष तक जीवित रहा था—ऐसा प्रसिद्ध है। इसलिए जो इस प्रकार इस सवन विद्या को जानता है वह नीरोग और चिन्ता मुक्त होकर एक सौ सोलह वर्ष की श्रायु तक जीवित रह सकता है।
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सत्रहवाँ खण्ड
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वह पुरुष जो भोजन करने की इच्छा करता है, पानी पीने की इच्छा करता है किन्तु उनमें श्रासक्त नहीं होता वही इस ब्रह्मचारी की दीक्षा है।
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१५२ : शान्तोग्युपनिषद्
१५२
और जो खाता है, पीता है, आसक्त होता है वह समानता को प्राप्त होता है। और जो हँसता है, खाता है, मैथुन करता है वह स्तोत्र और शास्त्र की समानता प्राप्त करता है।
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तप, दान, सौम्यता, अहिंसा, सत्य भाषरण आदि ये ही इसकी दवियाँ हैं। इसलिए कहते हैं, कि 'प्रसूता होगी' अथवा 'प्रसूता हुई' वह इसका पुनर्जन्म है। तथा मरने ही अवभृथ स्नान हैं।
१५२
घोरांगिरस ऋषि ने देवकीपुत्र कृष्ण को यह यज्ञ दर्शन सुनाकर जिससे वह अन्य विद्याओं में तृष्णा रहित हो गया था, कहा—'उसे शयन्त काल में इन तीन मंत्रों का जप करना चाहिए—
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१—तू अचित्त (अचिन्त्य) है।
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२—तू अच्युत (अविनाशी) है।
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३—तू अति सूक्ष्म प्राप्य है।'
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इसके विषय में दो ऋचाएँ हैं—१—'आदित्यतलस्य रेतसः और २ 'उदयंतमसपरि ।' इसमें पहली ऋचा इस प्रकार है—
१५२
'आदित्यतलस्य रेतसो ज्योति: पश्यन्ति वासरम् । परो यदि व्यते दिवि ।'
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इसका अर्थ है—जगत के नित्य कारण ब्रह्म के व्यापित प्रकाश को सब प्रकार से देखते हैं। यह उत्कृष्ट प्रकाश ब्रह्मरंड में सर्वत्र प्रकाशित है। दूसरा मंत्र इस प्रकार है—
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'उदयं तमसस्परि ज्योति: पश्यन्त उत्तर ऊँ स्व: पश्यन्त उत्तरम् देवे देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति । ज्योतिरुत्तममिति ।'
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इसका अर्थ है—
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ज्ञानरूप ध्यान के द्वारा से ऋतेँत उत्कृष्ट ज्योति को देखते हुए तथा ऋतभीय उत्कृष्ट तेज को देखते हुए हम सम्पूर्ण देश में प्रकाशमान सर्वोत्तम ज्योति: स्वरूप सूर्यं को प्राप्त हुए।
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छान्दोग्यउपनिषद् : १५३
अठारहवाँ खण्ड
मन ब्रह्म है—यह सम्पक् कर उपासना करनी चाहिए। यही अध्यात्म दृष्टि है। तथा आकाश ब्रह्म है—यह आधिदैविक दृष्टि है। इस प्रकार आध्यात्मिक, आधिदैविक दोनों दृष्टियों का उपदेश दिया गया है।
वह यह मनःसंज्ञक ब्रह्म चारपादों वाला है। वाक् वाद ही, प्राण पाद है, चक्षु पाद है और श्रोत्र पाद है। यह अध्यात्म हैं। वाग् ही ब्रह्म का चत्थापाद है, वह अग्निरूप ज्योति से दीप्त होता है और तपता है। जो ऐसा जानता है, वह यश, कीर्ति और ब्रह्मतेज से प्रकाशित होता है।
प्राण हो मनोमय ब्रह्म का चौथापाद है। वह वायुरूप ज्योति से प्रकाशित होता है। और तपता है। जो इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेज से प्रकाशित होता है, तपता है।
चक्षु ही मनःसंज्ञक ब्रह्म का चौथापाद है। यह आदित्यरूप ज्योति से प्रकाशित होता है, तपता है। जो इस प्रकार जानता है, वह, यश, कीर्ति और ब्रह्मतेज से प्रकाशित होता है। तपता है।
श्रोत्र ही मनःसंज्ञक ब्रह्म का चौथा पाद है। वह दिशारूप ज्योति से प्रकाशित होता है और तपता है। जो इस प्रकार जानता है, वह यश, कीर्ति और ब्रह्मतेज से प्रकाशित होता है और तपता है।
उत्तीसवाँ खण्ड
आदित्य ब्रह्म है—यही उपदेश है। अब इसी की न्यासख्या की जाती है पहले यह असत् ही था फिर वह सत् हुआ। वह अंकुरित
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१८४
१८४ : छान्दोग्योपनिषद्
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होकर फिर एक अंडे के रूप में बदल गया। वह सन्धिकाल तक उसी हालत में पड़ा रहा। इसके बाद वह फूटा और उसके दो खंड हो गए। एक खंड तो चाँदी-सा और दूसरा सोने के रूप-सा हो गया। जो खंड रजत रूप था वही पृथिवी है और जो सुवर्ण था वह श्लोक है।
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उस अंडे का जो उपरी आवरण था वही ये पर्वत हैं, जो सूत्रम् आवरण था वही मेघों के सहित कुहरा है। नाड़ी रूप जो बहता पानी था उसी से नदियाँ बनीं। जो विस्तृत गहरा जल था, वह समुद्र बना।
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उस अंडे का जो दूसरा आधा हिस्सा प्रकट हुआ था वह सूर्य है। उस सूर्य के प्रकट होने पर ऊंचे हर्षध्वनि (उल्लूल ध्वनि) होने लगे। उस सूर्योदय से समस्त प्राण और सब कामनाएँ उत्पन्न हुईं। उस सूर्य के उदय और अस्त के घोष हुआ करते हैं। और सभी प्राण एवं समी कामनाओं की पूर्ति हुआ करती है।
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जो कोई सूर्य की इस महानता को जानता हुआ इसकी उपासना करता है, उसे शुभ शब्द सुनाती पड़ते हैं। और वे शब्द उसे सुख पहुँचाते हैं।
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चौथा यपाठक
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पहला खंड
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राजा जनश्रुति के वंश में उत्पन्न जानश्रुति नाम का एक प्रसिद्ध राजा था। उसके पिता पितामह और प्रपितामह तीनों जीवित थे, इसलिए वह पौत्रायण जानश्रुति, के नाम से प्रसिद्ध था। वह श्रद्धापूर्वक देने वाला महादानी था। भोजन दान देने के लिए उसके यहाँ बहुत से भोजन-शालाएँ थीं। अपना ही अन्न खिलाने
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ज्ञान्दोग्योपनिषद् : १९३
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के लिए उसने लोगों के रहने के लिए सर्वत्र निवासस्थान ( धर्मशालाएँ ) बनवा दिए थे ।
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उसी समय एक दिन रात में उड़ते हुए कुछ हंस राजमहल के ऊपर आए । एक हंस ने दूसरे हंस से, कहा —"भो भल्लाच्छ, भरे भल्लाच्छ, देख तो सही, दान देने के कारण राजा पौत्रायण ज्ञानश्रुति का तेज झुलोक के समान फैलता हुया है। तू उसे मर्ष मत करना नहीं तो भस्म कर डालेगा ।
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आगे आगे चलने वाले दूसरे हंस ने कहा—"भरे, तू किस महत्वशील राजा के प्रति ऐसे सम्मानित वचन कह रहा है ! क्या तू इसे गाड़ी वाले रैक्व ( सतुग्वारैक्व ) के समान समभता है ?
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इस पर पीछे वाले हंस ने कहा —"भो भरे, गाड़ी वाला यह रैक्व कैसा है ? वह बोला —"मैंने ऐसे सुना है, कि जिस प्रकार जुएँ में कृंत नामक पासे जाते हैं, उसी प्रकार प्रजा जो कुछ भी सत्कर्म करती है, वह सब उस रैक्व को प्राप्त हो जाता है। जो कोई जो कुछ भी जानता है, वह उसे जानता है ।
१९३
इस बातचीत को जानश्रुति पौत्रायण ने सुन लिया । दूसरे दिन प्रातःकाल उसने अपने सारथी से कहा, भारे भाई, तू गाड़ी वाले रैक्व के समान मेरी प्रांसा क्यों करता है ? सारथी ने पूछा वह गाड़ी वाला रैक्व कैसा है ! राजा ने कहा—"जिस प्रकार कृंत नामक पासे के द्वारा जीतने वाले जुएँाड़ी के अधीन उससे छोटी श्रेष्टी के सभी पासे हो जाते हैं उसी प्रकार रैक्व को प्रजा के द्वारा किए गए सभी सत्कर्म प्राप्त हो जाते हैं । तथा जो कोई कुछ भी जानता है, उसे वह रैक्व जान लेता है । वह ऐसा है—ऐसा मुझे बताया गया है ।
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१५६ : छान्दोग्योपनिषद्
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वह सारथी उस रैक्व को ढूंढने लगा, उसे न पाकर जब वह वापस आया तब उससे राजा ने कहा—अरे, जहाँ ब्रह्मा की खोज की जाती है, वहाँ उसके पास जा । सारथी ने जाकर देखा कि गाड़ी के नीचे एक ब्राह्मण बैठा हुग्रा खाज खुजलता रहा है । वह रैक्व के पास बैठ कर उससे बोला—कि भगवान्, क्या श्रापही गाड़ी वाले रैक्व हैं ? रैक्व ने कहा—हाँ भाई मैं ही हूँ । ऐसा कहने पर उस सारथी ने समझ लिया कि :वही रैक्व है और वह लौट
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दूसरा खण्ड
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तब वह जानश्रुति पौत्रायण ६ सौ गायें, एक बहुमूल्य हार और रथचत्रियों से जुता हुग्रा एक रथ लेकर उसके पास गया और बोला—भगवन्, ये ६ सौ गाएँ, एक बहुमूल्य हार और रथचत्रियों से जुता हुग्रा यह रथ मैं श्राप के लिए लाया हूँ । श्राप इसे स्वीकार कर मुझे उस देवता का उपदेश दें, जिसकी उपासना श्राप करते हैं ।
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उस रैक्व ने कहा—अरे शूद्र गौत्रों के सहित यह हार युक्त रथ तेरे ही पास रहे । तब वह राजा एक हजार गौएँ, एक हार रथचत्रियों से जुता हुग्रा रथ और श्रपनी सुन्दरी कन्या को लेकर फिर उसके पास श्राया और बोला—रैक्व, ये हजार गौएँ, यह हार, जिसमें श्राप रहते हैं—स्वीकार कर मुझे उपदेश दीजिए ?
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तब उस कन्या के मुख को ऊपर उठाते हुये रैक्व बोला—हे शूद्र, यह कन्या जो तुम लाये हो, क्या इसी के मुख से मुझे बोलवाना चाहते हो । इस प्रकार जहाँ वह रैक्व रहता था, वहाँ रैक्व पर श्राप ये नाम का गाँव महावृष देश में प्रसिद्ध है । तब रैक्व ने राजा ने कहा—
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तीसरा खण्ड
वायु ही संवर्ग (अपने भीतर पचाने वाला) है। जब श्राग्नि चुभती है, तो वायु में लीन होती है। जब सूर्य श्रस्त होता है तो वायु में ही लीन हो जाता है। जब चन्द्रमा श्रस्त होता है तब वायु में ही लीन हो जाता है। जब जल सूखता है तो वायु में ही लीन होता हैं। निश्चय ही इन सबको वायु ही अपने ग्रनन्दर लेस लेता है। यह दैविदैवत (देवताओं के सम्बन्धी) बात समाप्त हुई।
श्रव शरीर के संवर्ग में कहते हैं—प्राण ही संवर्ग है। वह (पुरुष) जब सोता है, प्राण ही में वाणी लीन हो जाती है। इसी प्रकार चक्षु प्राण में, श्रोत्र प्राण में, मन प्राण में लीन होते हैं। निश्चय ही प्राण इन सब को अपने भीतर ले लेता हैं। देवताओं में वायु और इन्द्रियों में प्राण—ये ही दो संवर्ग हैं।
कहा जाता है, कि कपिगोत्र वाले शौनक और कत्सेन के पुत्र श्रभिप्रतारी से—जब इन दोनों को भोजन परोसा जा रहा था —ब्रह्मचारी ने भिक्षा माँगी। उम को उन्होंने भिक्षा नहीं दी।
उन दोनों से ब्रह्मचारी ने कहा---भुवन की रक्षा करने वाला एक सुखमय परमात्मा है। वह श्रग्नि, सूर्य, चन्द्र, जल तथा वाणी, चक्षु, श्रोत्र और मन इन चार बड़ों को खाया करता है। हे अभिप्रतारी, हे ज्ञानिनि मनुष्य उस सर्व व्यापक परमात्मा को नहीं देख्ते हैं। निश्चय जिसके लिये यह श्रन्न है, उसके लिये यह श्रन्न नहीं दिया।
कपि गोत्र में उत्पन्न शौनक उस ब्रह्मचारी की बात मन में बार वार सोचते हुये श्राए और बोले---वह देवों का श्रात्मा, प्रजाओं को उत्पन्न करने वाला, हिरण्य दंष्ट्र (सुनहरे दाँतों वाला) वभस्र
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९५ : छान्दोग्योपनिषद्
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(सब का भर्तक) चित्तस्वरूप है। इस की महती विभूति का वर्णन किया जाता है।
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जो स्वयं न खाया जाने वाला अन्न है, उसे खा जाता है। निश्चय है, ब्रह्मचारी इस ईश्वर की अचली तरह उपासना करते हैं। हे रसोइयों, इस ब्रह्मचारी को मिद्धा दो।
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रसोइयों ने उस ब्रह्मचारी को मिद्धा दे दी। निश्चय वे पाँच अग्नि आदि ग्रन्थ पाँच वाक् आदि मिलकर दस होते हैं। वे ऋत—जुएँ के पाँसे हैं। इसलिए सब दिशाओं में अन्न ही दॄष्ट है। वह यह विराट् अन्न को ही खाता है। उसके द्वारा यह सब देखा हुया होता है। इस उपासक का यह सब देखा हुया होता है। जो ऐसा जानता है---जो ऐसा जानता है।
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चौथा खण्ड
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ऐसा कहा जाता है, कि जबाला के पुत्र सत्य काम ने माता जबाला से पूछा—कि माँ, मैं ब्रह्मचर्थ व्रत धारआ करना चाहता हूँ। बताश्रो मेरा गोत्र क्या है?
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अपने पुत्र से जबालता बोली—प्रिय पुत्र, मैं यह नहीं जानती कि तेरा कौन—सा गोत्र है। क्योंकि युवावस्था में अन्नेक पुरुषों की सेवा करती हुयी मैंने तुझे पैदा किया है। इसलिए मैं यह नहीं बता सकती कि तू किस गोत्र का है। परन्तु मेरा नाम जबाला है और तू सत्य काम हैं। इसलिए तू सत्य काम जावाल यही वत्ता देना।
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वह सत्य काम प्रसिद्ध गोतम गोत्र में उत्पन्न हारिद्रिमान के पुत्र हारिद्र मत के समीप जाकर बोला—भगवन्, मैं ब्रह्मचर्य व्रत धारआ करूँगा। आपकी सेवा में आया हूँ।
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उस सत्य काम से ऋषि बोले—सोम्य ! तेरा गोत्र क्या है ? वह बोला—भगवन् ! यह तो मैं नहीं जानता कि मेरा गोत्र क्या है ? माता से मैंने पूछा था। उसने कहा कि वहुत से पुरुषों की सेवा करती हुई इस सेविका ने जवानी में तुम्हें प्राप्त किया है ! इसलिए मैं यह नहीं बता सकती कि तेरा गोत्र क्या है ? परन्तु मेरा नाम जबाला है और तेरा सत्य काम है। इसलिए भगवन् ! आप मुझे सत्य काम जाबाल सम्भें।
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ऋषि बोले—ऐसी बात हो तो ब्राह्मण कभी भी नहीं प्रकट कर सकता है ! सोम्य ! तू समिधा ले आ ! मैं तुझे उपनीत करूँगा । तू सत्य से पृथक् नहीं हुआ है। यह कहकर ऋषि ने सत्य काम का उपनयन संस्कार करके गोशाला से चार सौ दुबली-पतली कमजोर गाएँ निकाल कर कहा—सोम्य ! इनके पीछे जाओ ? उन गौओं को हाँकते हुए सत्य काम ने कहा—कि हजार गाएँ बित्ता हुए मैं न लौटूँगा ! ऐसा कहा जाता है, कि वह अनेक वर्ष वन में रहा और वे गाएँ हजार हो गयीं !
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पाँचवाँ खण्ड
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इसके श्रनन्तर सांङ्ग ने उससे कहा—सत्य काम ! वह बोला भगवन् ! क्या ज्ञाज्ञा है ? वह बोला—सोम्य ! हमारी संख्या एक हजार हो गयी है। अब तू हमें श्राचार्य कुल में पहुँचा दे ! मैं तुम्हें ब्रह्म का एक पाद बताऊँगा ? सत्य काम ने कहा—भगवन् ! मुझे आवश्यक उपदेश दें। सांङ्ग बोला—पूर्व दिक् कला, पश्चिम दिक् कला, उत्तर दिक् कला और दक्षिण दिक् कला है। सोम्य ! यह ब्रह्म का 'प्रकाशवान्' नामक चार कलाओं वाला एक पाद है। जो साधक इसे इस प्रकार जानकर 'प्रकाशवान्' गुण से युक्त ब्रह्म की चतुष्कल पाद की उपासना करता है। वह इस लोक में प्रकाशवान् होता है। और प्रकाशवान् लोकों को प्राप्त करता है।
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९६० : छान्दोग्योपनिषद्
छठा खण्ड
अब अग्नि तुम्हे ब्रह्म के दूसरे पाद का उपदेश करेगा—यह कहकर वृषभ मौन हो गया। दूसरे दिन उसने गौश्रों को श्राचार्य-कुल की ओर हाँक दिया। सायंकाल जहाँ सब ठहरीं वहीं पर अग्नि को प्रज्वलित कर अग्नि के पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर वह बैठ गया। अग्नि ने प्रकट होकर कहा—सत्य काम! उसने कहा—भगवन्! अग्नि ने कहा—सोम्य, मैं तुम्हे ब्रह्म का एक पाद बतलाऊँ। सत्य काम ने कहा—भगवन्! अवश्य उपदेश दें।
तब अग्नि ने कहा—पृथिवी कला है, अग्निरत्न कला है, चुलोक कला है और समुद्र कला है। सोम्य, यह ब्रह्म का 'चतुष्कल-पाद' 'ज्ञान्तवान्' नाम वाला है। जो इस प्रकार जान करता है 'ज्ञान्तवान्' गुण से युक्त ब्रह्म के इस चतुष्कल पाद की उपासना करता है। वह इस लोक में 'ज्ञान्तवान्' होता है। 'ज्ञान्तवान्' लोकों को प्राप्त होता है।
सातवाँ खण्ड
अब हंस तुम्हे तीसरा पाद बतलायेगा—यह कहकर अग्नि अन्तर्धान हो गया। दूसरे दिन वह गौश्रों को लेकर श्राचार्य कुल की ओर चल दिया। सायंकाल जहाँ सब गौएँ रुकीं, वहीं सत्य काम ने अग्नि को प्रज्वलित कर उसके पश्चिम की ओर पूर्व मुख कर के वह बैठ गया। तब हंस ने उसके समीप उतर कहा—सत्य काम! उसने उत्तर दिया—भगवन्!
हंस ने कहा—सोम्य, मैं तुम्हे हंस का पाद बतलाऊँ? सत्य काम बोला—भगवन्, अवश्य उपदेश दें। हंस बोला—अग्नि कला है। सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है और विद्युत कला है।
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छान्दोग्योपनिषद् : १६१
सोम्य, यह ब्रह्म का चतुष्कल पाद ‘ज्योतिष्मान्’ नाम वाला है। जो कोई इसे जान कर ‘ज्योतिष्मान्’ गुण से युक्त ब्रह्म के इस चतुष्कलपाद की उपासना करता है, वह ज्योतिष्मान् होता है। और ज्योतिष्मान् लोक को प्राप्त करता है।
आठवाँ खण्ड
‘मद्गु तुम्हे चौथे पाद का उपदेश करेगा।’ यह कहकर हंस चला गया। दूसरे दिन उसने गौवों को गुरुकुल की ओर हाँक दिया। सायंकाल जहाँ पर गौएँ रुकतीं वहीं, वह अग्नि जलाकर उस अग्नि के पश्चिम की ओर पूर्वाभिमुख होकर वह बैठ गया। समित्पाणि छोड़ते ही मद्गु ने उसके पास जाकर कहा—हे सत्यकाम! उसने उत्तर दिया—भगवन्! मद्गु बोला—सोम्य, मैं तुम्हे ब्रह्म का पाद वतलाऊँ। सत्यकाम बोल—भगवन्, मुझे अवश्य बताइए?
वह बोला—प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है। और मन कला है। हे सोम्य, यह ब्रह्म का ‘आयतनवान्’ नामवाला चतुष्कल पाद है। इस प्रकार इसे जो जानता है, और ब्रह्म के इस चतुष्कल्पाद ‘आयतनवान्’ की उपासना करता है, वह ‘आयतनवान्’ होता है और मरने पर आयतनवान् लोकों को प्राप्त करता है।
नवाँ खण्ड
सत्यकाम आचार्य कुल में पहुँचा। आचार्य ने उसे सत्यकाम कहकर पुकारा। ‘हों भगवन्’ कहकर सत्यकाम ने उत्तर दिया।
आचार्य ने पूछा—हे सोम्य, निश्चय तू ब्रह्मविद् के समान सुशोभित हो रहा है। किसने तुम्हे शिक्षा दी है। सत्यकाम ने कहा—
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-मनुष्य से ऋतिरिक्त प्राप्तियों ने मुझे शिक्षा दी है, किन्तु भगवन्, श्रापही मुझे भलीभाँति दीक्षित करें ।
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क्या?कि श्रापही जैसे श्राचार्यों से मैंने सुना है, कि श्राचार्य ही से सोंखी हुई विद्या उत्तम मार्ग की श्रोर ले जाती है। यह सुन कर श्राचार्य ने उसे इसी विद्या का उपदेश दिया । इसमें कुछ नहीं छूटा, इसमें कुछ नहीं छूटा हुग्रा है ।
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दसवाँ खण्ड
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प्रसिद्ध है, कि कमलक के पुत्र ने निश्चय ही जाबाल सत्य काम के समीप ब्रह्मचर्य व्रत के लिए निवास किया। श्रौर यह भी कहा जाता है, कि उसने बारह वर्ष तक यज्ञ के लिए श्राग्नि का सेवन किया । उस सत्य काम ने श्रनन्य ब्रह्मचारियों का समावर्तन करते हुये उस उपकोसल का समावर्तन नहीं किया ।
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श्राचार्यपत्नी ने अपने पति से कहा कि-यह ब्रह्मचारी तपस्वी है, इसने यज्ञ के लिये श्राग्नि का भी सेवन किया है। ऐसी स्थिति में श्राग्नियाँ श्राप को न त्यागें (ग्राप दोषी न ठहरें) इस लिये इसे जो उपदेश देना हो दे दीजिए । लेकिन उस ब्रह्मचारी को उपदेश दिए बिना ही श्राचार्य कहीं बाहर चले गए।
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उस ब्रह्मचारी ने भोजनादि के कारणों को छोड़ दिया । तब श्राचार्य पत्नी ने कहा—ब्रह्मचारी, भोजन करो, श्रन्न-शान क्यों किए हो ? उस ब्रह्मचारी ने कहा—इन पुरुषों में श्रनेक मार्गों वाली ये श्रनेक इच्छाएँ हैं । इन व्याधियों से मैं परिपूर्ण हूँ ।
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इसके बाद ऐसा सुना जाता है, कि श्राग्नि शक्तियों का उदय हुग्रा । उस समय श्राग्नियाँ वह कह रही थीं, ब्रह्मचारी तपस्वी है, श्रौर
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छान्दोग्योपनिषद् : १३
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इसने बड़ी सावधानी से हमारी सेवा को है। इसलिए इसे उपदेश देना उचित है। ऐसा कहा जाता है, कि वे ऋग्नियाँ उस ब्रह्मचारी से बोलीं—
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प्राण ब्रह्म है; कं ब्रह्म है, ख आकाश (ख) ब्रह्म है। उस ब्रह्मचारी उपकोसल ने जवाब दिया दिया कि मैं जानता हूँ, कि प्राण-ब्रह्म हैं, किन्तु यह नहीं जानता कि कं और खं भी ब्रह्म है। वे ऋग्नियाँ—जो कं हैं, वही खं हैं। जो खं हैं, वही कं हैं। कहा जाता 'है: कि उस उपकोसल के लिए वे ऋग्नियाँ प्राण और उस आकाश के लिए बोलीं।
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ग्यारहवाँ खण्ड
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गाहंपत्य ऋग्नि ने उसे उपदेश दिया, कि पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य ये मेरा पोषण करते हैं। सूर्य में जो यह पुरुष दिखाई पड़ता है, वह मैं हूँ। वह मैं हूँ।
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जो कोई इसे जानता हृदय इस गाहंपत्य ऋग्नि को प्रयोग में लाता है, वह पाप कर्मी को नाश करता है, लोकवान होता है, पूर्ण आयु प्राप्त करता है, उज्जवल जीवन धारण करता है। उसके पुत्र, पौत्र आदि का ह्रास नहीं होता, दोनों लोकों में ऋग्नि उसकी रक्षा करता है—जो गाहंपत्य ऋग्नि को ऐसा जानता हृदय प्रयोग में लाता है।
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बारहवाँ खण्ड
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यह प्रसिद्ध है, कि उसके बाद उस ब्रह्मचारी को दक्षिणाग्नि ने उपदेश दिया कि जल, दिशाएँ और नक्षत्र मेरे पोषक हैं। चन्द्रमा
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१६४ : शान्दोग्योपनिषद्
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में जो यह पुरुष ( प्रकाश ) दिखाई पड़ता है—वह मैं हूँ। वही मैं हूँ।
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ऐसा जानकर जो इस ॠग्नि को प्रयोग में लाता है, सभी पापों का नाश होता है। पूर्ण आयु प्राप्त करता है और उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है।
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हम सब ॠग्नि उसकी रक्षा करते हैं। उसके पुत्र, पौत्र आदि की वृद्धि करते हैं। वह इसकी दोनों लोकों में रक्षा करता है—जो इस ॠग्नि को जानता है।
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तेरहवाँ खण्ड
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कहा जाता है, कि इसके बाद उस ब्रह्मचारी को आहवनीय ॠग्नि ने उपदेश दिया—कि प्राण, आकाश, चाँद और विद्युत मेरे पोषक हैं। इस विद्धत में जो पुरुष (आग्नेय शक्ति) दिखाई पड़ता है—वह मैं हूँ। वही मैं हूँ।
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इसलिए जो कोई ऐसा जानकर सेवन करता है, उसके पापों का नाश होता है। वह लोकवान होता है, पूर्ण आयु प्राप्त करता है और उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। ऐसे ॠग्निहोत्री के पुत्र, पौत्र आदि की वृद्धि होती है। वह इसकी दोनों लोकों में रक्षा करता है—जो इस आहवनीय ॠग्नि को इस प्रकार जानकर प्रयोग में लाता है।
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चौदहवाँ खण्ड
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कहा जाता है, कि वे ॠग्नियाँ उस उपकोसल से बोलीं—है सोम्य, तेरे लिए यह हमारी विद्या और आत्मविद्या है। परन्तु आचार्य तुम्हे ब्रह्म विद्या का उपदेश देंगे। इतने में आचार्य आ गए और वे उसे उपकोसल ! उपकोसल !! कहकर पुकारने लगे।
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'हे भगवान्'—यह कहकर उपकोसल ने जवाब दिया । श्राचार्य ने कहा, सोम्य, तेरा मुखमण्डल ब्रह्मतेज से प्रदीप्त है । किसने तुम्हे उपदेश दिया है ? उपकोसल ने यह कहकर कि "भगवन्, मुझे कौन शिक्षा देगा ?'—मानों ऋषियों द्वारा प्राप्त शिक्षा को छिपा रहा था । फिर कुछ सोचकर उसने कहा निश्चय ही अन्य सामान्य मनुष्यों से भिन्न जो ऋषिगण हैं, उन्होंने ही मुझे शिक्षा दी है । यह सुनकर श्राचार्य ने पूछा—सोम्य, ऋषियों ने तुम्हे क्या शिक्षा दी है ।
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ऋषियों द्वारा प्राप्त शिक्षा को उपकोसल ने बता दिया तो श्राचार्य ने कहा सोम्य, उन्होंने तुम्हे लोकों की शिक्षा दी है; अब मैं तुम्हे ब्रह्म का उपदेश दूंगा । जैसे कमल के पत्तों पर पानी नहीं ठहरता उसी तरह ब्रह्मज्ञानी को पाप कर्म नहीं सस्पर्श करते । उपकोसल ने कहा—भगवन् मुझे उस ब्रह्म का उपदेश दें । ऐसा कहा जाता है, कि श्राचार्य ने उसे उपदेश दिया ।
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श्राचार्य ने कहा कि—जो यह पुरुष श्रांख में दिखाई पड़ता है, वही यह श्रात्मा है । यह श्रमृत है, यह श्रभय है, यह महान् है । यद्यपि इस श्रांख में घी या पानी डालते हैं, तो वह श्रांखों के किनारों ही को जाता है ।
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इस श्रात्मा को 'संयमधाम, कहा जाता है, क्योंकि समस्त सौन्दर्य इसी को प्राप्त होते हैं । जो ऐसा जानता है । उसे समस्त सौन्दर्य प्राप्त हो जाते हैं ।
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यही श्रात्मा 'वामनी' है । क्योंकि यह समस्त सौन्दर्य को पहुँचाता है । जो ऐसा जानता है, वह समस्त सौन्दर्य को पहुँचाने वाला होता है ।
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१६६ : छान्दोग्यउपनिषद्
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यही आत्मा 'भामनी' है । क्योंकि सभी लोकों में चमकता है । जो ऐसा जानता है, वह समस्त लोकों में प्रकाशित होता है । श्रव ऐसे ब्रह्मवेत्ता की गति बतलाते हैं—इस ब्रह्मवेत्ता की श्रन्वेष्टि-क्रिया करें पान करें—वह अर्चि-अभिमानी देवता को प्राप्त होता है । फिर अर्चि-अभिमानी देवता से दिवसाभिमानी देवता को, दिवसाभिमानी देवता से शुक्ल पचाभिमानी देवता को और शुक्लपचाभिमानी देवता से उत्तरायण के ६ मासों को प्राप्त होता है । मासों से संवत्सर को संवत्सर से आदित्य को, आदित्य से चन्द्रमाः को और चन्द्रमा से विद्युत् को प्राप्त होता है । वह वैद्युति दशा को प्राप्त हुया मनुष्य साधारएा मनुष्यों से भिन्न अधिक उन्नत होता है ।
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वह ब्रामानव पुरुष इन ब्रह्मवादियों को ब्रह्म की प्राप्ति कराता है । वह देवपथ-देवयान है । यह ब्रह्मपथ ब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग है । इस मार्ग से जाननेवाले इस मानवी संसार को नहीं पाते ।
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सत्रहवाँ खण्ड
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प्रजापति ने लोकों को लक्ष्य बनाकर ध्यान रूप तप से उन्हें तपाया, तपस्या से तप उन लोकों से उसने रस निकाले । पृथिवी से अग्नि, ऋतारद्रि से वायु, और भुवलोक से आदित्य को निकाला । फिर उसने इन्हीं तीन देवताओं को लक्ष्य बनाकर तप किया । उन तप किए जाते हुए देवताओं से उसने रस निकाले । अग्नि से ऋक्, वायु से यजु और आदित्य से साममत्रए किए । इसके बाद उसने इस त्रयी विद्या को लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्या से उसने रस निकाले । ऋक्श्रुतियों से मूः, यजुः श्रुतियाँ से भुवः तथा सामश्रुतियों से स्वः इन रसों को अहरण किया ।
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१.५.७
उस यज्ञ में यदि ऋचाओं से ऋति पहुँचे तो 'गाई्हपत्ये भूः स्वाहा' बोलकर आहुति दे। ऋचा से हुई ऋति को उन ऋचाओं के रस और ऋचाओं की शक्ति से दूर कर देता है।
१.५.७
और यदि यजुः से यज्ञ का ऋत हुआ हो तो दर्विहोमिन स्वाहा बोलकर आहुति देनी चाहिए। यजुः से हुई ऋति को उस यजुःही के रस से, और यजुःही के बल से दूर करता है।
१.५.७
और यदि सामसे यज्ञ-ऋत हुत्या हो तो श्राहवनीय ऽग्नि में स्वाहा बोलकर आहुति देनी चाहिए। सामसे हुई सामऋति को साम ही रस और साम ही के बल से दूर करता है।
१.५.७
जैसे पारे से सोने को, सोने से चाँदी को चाँदी को त्रपुको. त्रपु से सीसे को सीसे से, लोहे को और लोहे से काष्ठ को काथवा चमडे से काष्ठ को जोडा जाता है। उसी प्रकार इन लोकदेवताओ और त्रयी विद्या की शक्ति से यज्ञ के ऋत का घाटा पूरा किया जाता है। जिस यज्ञ में ऐसा विशेषज्ञ ब्रह्मा होता है, वह यज्ञ निश्चय ही मानों वेदो द्वारा संस्कृत होता है। जहाँ इस प्रकार जानने वाला ब्रह्मा होता है, वह यज्ञ उद्दकप्रवण होता है। इस प्रकार जानने वाले ब्रह्मा के उद्द श्य से ही यह गाथा प्रसिद्ध है कि 'जहाँ-जहाँ कर्मे व्यापृत होता है, वही वह पहुँच जाता है।
१.५.७
एक मानव ब्रह्माही ऋत्विक है, जिस प्रकार युद्ध मे घोडा योद्धाओ की रक्षा करता है, उसी प्रकार ऐसा विशेषज्ञ ब्रह्मा यजमान और अन्य सभी ऋत्विको की सब और रक्षा करता है व्रतः ऐसे ही विशेषज्ञ को यज्ञ का ब्रह्मा बनाना चाहिए। ऐसा न जानने वाले को नहीं। ऐसा न जानने वाले को नहीं।
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१६५ : छान्दोग्योपनिषद्
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पाँचवाँ प्रपाठक
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पहला खंड
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निश्चय ही जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठ को जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है । ब्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ।
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जो निश्चय रूप से वसिष्ठ को जानता है वह अपने परिवार में वसिष्ठ होता है—ऐसा प्रसिद्ध है । वागी ही वसिष्ठ है । जो प्रतिष्ठा को जानता है, वह इस और उस लोक में प्रतिष्ठित होता है । नेत्र ही प्रतिष्ठा है । जो संपद् को जानता है, उसके लिए देव और मनुष्य संपद् कामनाएँ अवश्य पूरी होती हैं । श्रोत्र ही संपद् है ।
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जो आयतन को जानता है, अवश्य वह अपने परिवार का आश्रयदाता होता है । मन ही आयतन है । ऐसा कहा जाता है, कि प्राण और इन्द्रियों में आपस में भगड़ा हुया प्राण ने कहा कि मैं श्रेष्ठ हूँ और इन्द्रियों ने कहा कि हम श्रेष्ठ हैं । भगड़ा निपटाने के लिए इन्द्रियाँ और प्राण मिलकर प्रजापति के पास गए और बोले कि हम में कौन श्रेष्ठ है ? प्रजापति ने इन्द्रियों से कहा कि तुममें से जिस एक के भी निकल जाने से शरीर निकम्मा देख पड़े उसे ही श्रेष्ठ समझो ?
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ऐसा प्रसिद्ध है, कि पहले वागी ही शरीर से निकल गयी और साल भर बाद लौटकर बोली कि मेरे बिना तुम लोग कैसे जी रहे हो ? शेष इन्द्रियों ने उत्तर दिया जैसे गूँगा न बोलते हुए भी प्राण से श्वास लेता है, आँख से देखता है, कान से सुनता है, मन से विचारता है, उसी प्रकार हम सब भी जीते रहे । यह सुनकर वागी अपनी श्रेष्ठता समक शरीर में प्रविष्ट हो गयी ।
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छान्दोग्योपनिषद् : १६४
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तब श्राँखें बाहर निकल गयीं । एक वर्ष तक बाहर रहकर जब वे लौटीं तो बोलीं कि हमारे बिना तुम कैसे जीवन धारए में समर्थ रही हो ? शेष इन्द्रियों ने उत्तर दिया कि श्रन्धा बिना देखे प्राण से श्वास लेता है, वागी से बोलता है, कान से सुनता है, मन से सोचता है, इसी प्रकार हम भी जीवित रही । यह सुनकर श्राँखें चुपचाप शरीर में प्रविष्ट हो गयीं ।
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इसके बाद कान बाहर चले गए, वे वर्ष भर बाहर रहकर जब लौटे तो बोले कि हमारे बिना तुम कैसे जीवन धारए करने में समर्थ रही हो । इन्द्रियों ने कहा—जैसे बहरा श्रादमी प्राणों से सांस लेता है, वागी बोलता है, श्राँख से देखता है, मन से सोचता है, इसी तरह हम भी जीवित रही हैं । यह सुनकर कान शरीर में प्रविष्ट हो गए ।
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तब मन बाहर निकल गया । एक वर्ष बाहर रहने के बाद लौटकर वह बोला, मेरे बिना तुम कैसे जीवित रही । इन्द्रियाँ बोलीं, जैसे श्रज्ञानो सोचे बिना प्राण से सॉस लेता है, वागी से बोलता है, श्राँख से देखता है, कान से सुनता है, इसी प्रकार हम भी जीवित रही । यह सुनकर मन शरीर में प्रविष्ट हो गया ।
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इसके बाद प्राण ने शरीर से बाहर निकलने की इच्छा की । उसने अन्य इन्द्रियों को इस प्रकार उखाड़ दिया जैसे बलवान् घोड़ा वाँधने के खूँटे को एक झटके से उखाड़ देता है । उस प्राण को चारों ओर से घेर कर इन्द्रियाँ बोलीं—भगवन्, तुम हमारे स्वामी हो, हम में तुम्ही श्रेष्ठ हो श्रब मत निकलो ?
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इसके बाद उस प्राण से वागी बोली, कि यदि मैं वसिष्ठा हूँ तो तुम वसिष्ठ हो । श्राँखों ने कहा—यदि हम प्रतिष्ठा हैं तो तुम प्रतिष्ठ हो । कानों ने कहा यदि संपदा हैं तो तुम सपद हो । मनने कहा—यदि मैं श्राश्रय हूँ तो तुम श्राश्रय-स्थान हो ।
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२०० : छान्दोग्योपनिषद्
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निश्चय है कि वाणी को वाणी, ग्राँख को ग्राँख, कान, मन को मन नहीं कहा जाता बल्कि इन सब को प्राण ही कहा जाता है। निश्चय ही ये सब प्राण ही हैं।
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दूसरा खण्ड
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वह प्राण बोला मेरा क्या ग्रन होगा ? इन्द्रियों ने कहा-कुत्ते से लेकर पत्ती तक जो कुछ यह है वही तुम्हारा ग्रन है। निश्चय यह 'ग्रन' (ग्राण) का ग्रन है। 'ग्रन' ही प्राण का प्रत्यक्ष नाम है। इस प्रकार प्राण को जानने वाले के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है, जो ग्रनत्र—ग्रन से भिन्न हो।
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वह प्राण बोला, मेरा क्या वस्त्र होगा ? इन्द्रियों ने उत्तर दिया कि जल। निश्चय ही ग्रन खाने की इच्छा रखने वाले भोजन से पूर्व और परचात् जल से ग्रन से, ग्राचमन करके ढाँक लेते हैं। इस प्रकार यह प्राण वस्त्र धारण करता है, नाम नहीं रहता।
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कहा जाता है, कि सत्यकाम जाबालने व्याघ्रपाद के पुत्र गोश्रु त को यह प्राण विजय—गाथा सुनकर बतलाया कि यदि यह गाथा सूखे हुए वृत्त को भी सुनायी जाए तो उसमें भी हरी हरी डालियाँ और पत्ते पनप उठे।
200
अब यदि कोई महत्व प्राप्त करने की इच्छा करे तो वह सभी श्रौषधियों के चूर्ण को दही और शहद के साथ पात्र में मथकर 'ज्येष्ठायस्वाहा श्रेष्ठाय स्वाहा', कहकर श्रग्नि में ग्राहुति देकर श्रुव से लगे हुए घृत को उस पात्र में डाले।
200
'वसिष्ठाय स्वाहा' बोलकर श्रग्नि में घृत की ग्राहुति देकर श्रुव से टपकते हुए घृत को उस मथने वाले पात्र में डाले इसी
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२०१
प्रकार 'प्रतिष्ठयै स्वाहा', 'सम्पदे स्वाहा', 'आायतनाय स्वाहा' अलग-अलग बोलकर आहुति दे।
२०१
इसके बाद दोनों हाथों की अंजलि में मथने वाला पात्र रखकर जप करे 'श्रम: नाम असि' (तुम्हारा श्रम नाम है), 'श्रमाहिते सर्वमदम्' (वह सब तेरी श्रम शक्ति है), 'सति॒ह उ॒पेष्ठ: श्रेष्ठो राजाधिपति:' (वह तुम्हीं ज्येष्ठ और श्रेष्ठ राजा और अधिपति हो) 'समा ज्येष्ठयाँ श्रेष्ठयाँ राज्या॑धि॒प॒त्य॒ँ गमय' (वह आप मुझे भी ज्येष्ठता, श्रेष्ठता, राज्य और आधिपत्य प्रदान करें)। 'अहर्ह-सवैमस॒त्नी॒ीत॒ि' (मैं भी यह सब हो जाऊँ)।
२०१
इसके बाद इस ऋचा से अच्छी तरह एक पाद से आचमन करे। 'तत्स॑वि॒तुर्वृ॒णीमहे' कह कर पहला आचमन करे। 'व॒य॒ँ दे॒व॒स्य भोज॒नम्' कह कर दूसरा आचमन करे। 'श्रे॒ प॒ᳶ्ठ सर्व॒धा॒तम॒म्' बोलकर तीसरा आचमन करे। 'तु॒रं॒भ॒ग॒स्य॒ थी॒महि' बोलकर शेष जल पी ले।
२०१
इसके बाद काँसे के पात्र या चमस को छोड़कर श्रमण के पीछे मृगचर्म अथवा भूमि पर मौन होकर काम क्रोध आदि से संबंधित कोई साहस न करता हुआ बैठ जाय और यदि स्वप्न में स्त्री दिखाई पड़े तो कार्य को सफल सम्भत्ना चाहिए।
२०१
उपर्युक्त विषय से सम्बद्धित एक श्लोक है—यदि इ॔च्छित कर्म में स्वप्न में स्त्री दिखायी पड़े तो ऐसे स्वप्न से कार्य की सफलता सम्भनी चाहिए।
२०१
तीसरा खण्ड
२०१
ऐसा सुना जाता है, कि आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु पंचालों की सभा में आया। राजा जै॔बलि प्रवाहण ने उससे कहा—कुमार।
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२०२
२०२ : छान्दोग्योपनिषद्
क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें शिक्षा दी है? कुमार ने उत्तर दिया—
हाँ भगवान् !
यहाँ से मरकर ये जीव ऊपर जिस स्थान में जाते हैं। उसे तुम जानते हो ?
नहीं राजन्, मैं नहीं जानता।
जैसे वे फिर लौटते हैं, क्या तुम जानते हो ?
नहीं राजन्, यह भी नहीं जानता।
देवयान और पितृयान के मार्ग जहाँ से अलग होते हैं क्या तुम जानते हो ?
नहीं राजन् मैं नहीं जानता।
इस लोक से बरावर लोग जाते हैं किन्तु यह क्यों नहीं मरता, क्या तुम जानते हो ?
नहीं राजन् !
जिस प्रकार पाँचवीं आहुति में जल जीव वाचक होते हैं—क्या तुम जानते हो ?
नहीं भगवान् !
राजा ने कहा —तब यह क्यों कहा था, कि मैं शिष्यित हूँ क्यों कि जो इसे नहीं जानता है, वह अपने को कैसे शिष्यित कह सकता है।
परास्त होकर श्वेतकेतु अपने पिता के पास चला आया। और पिता से बोला—बिना शिक्षित किए हुए आपने मुझे कैसे कह दिया कि शिक्षा पूरी हो गयी। उस सत्यकाम जाबालि ने मुझ से पाँच प्रश्न किए। किन्तु मैं एक का भी उत्तर न दे सका।
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203
पिता ने कहा—वहाँ से श्राने पर तुमने राजा के जिन प्रश्नों को मुझसे बताया है, उन प्रश्नों में से एक भी उत्तर मैं स्वयं नहीं जानता हूँ। यदि उनका उत्तर मुझे ज्ञात होता तो मैं तुम्हें अवश्य बतलाता।
203
वे प्रसिद्ध गौतम ऋषि राजा के पास श्राए। राजा ने उनका सत्कार किया। प्रातःकाल ऋषि राजा की सभा में श्राए। राजा ने गौतम से कहा—भगवन् गौतम, मनुष्य सम्बन्धी धन का वर मुझसे माँगिए?
203
गौतम बोले—राजन्, मनुष्य सम्बन्धी धन श्रापका ही रहे। मेरे कुमार से जिन प्रश्नों को श्रापने पूछा था, उन्हीं को मुझसे कहें।
203
गौतम की यह बात सुनकर राजा दुःखी हुश्रा। उसे बहुत दिनों तक श्रपने यहाँ रहने की श्राज्ञा दी। पश्चात् बोला—
203
श्रापने मेरे द्वारा किए गए जिन प्रश्नों का उत्तर मुझसे ही पूछा है, श्रापसे पहले यह विद्या ब्राह्मणों के पास नहीं गयी थी। इसीलिए समस्त लोकों में क्षत्रियों का ही श्राधिकार रहा। इस प्रकार राजा ने गौतम से कहा।
203
द्वितीय खण्ड
203
हे गौतम, यह स्वलोक ही श्रग्नि है। उसकी समिधा सूर्य है। उस श्रग्नि का धुआँ सूर्य की किरणें हैं, उसकी ज्वाला दिन है, श्रंगार चन्द्रमा है श्रौर चिनगारियाँ नक्षत्र हैं। देवगण इस श्रग्नि में श्रद्धा-रूप जल का हवन करते हैं। उस श्राहुति से राजा सोम ( जलीय भाप ) पैदा होता है।
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204
पाँचवाँ खण्ड
204
है गौतम, मेघ ही श्रग्नि है, वायु समिधा, बादल धु्रवाँ है, बिजली ज्वाला है। वज्र श्रंगारे और गर्जन ही चिनगारियाँ हैं। इस श्रग्नि में देवगण राजा सोम (भाप) की श्राहुति देते हैं। उसी श्राहुति से वर्षा होती है।
204
छठा खण्ड
204
है गौतम, पृथ्वी ही श्रग्नि है, संवत्सर ही उसकी समिधा है। श्राकाश धु्रवाँ है। रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ श्रंगारे हैं और श्रवान्तर दिशाएँ चिनगारियाँ हैं। इस श्रग्नि में देवतागण वर्षा की श्राहुति देते हैं। उस श्राहुति से अन्न पैदा होता है।
204
सातवाँ खण्ड
204
है गौतम, पुरुष ही श्रग्नि, उसकी वागी समिधा, उसके प्राण धु्रवाँ, जिह्वा ज्वाला, श्राँख श्रंगार और कान चिनगारियाँ हैं। इस श्रग्नि में देवगण श्रन्न की श्राहुति देते हैं; उस श्राहुति से वीर्य पैदा होता है।
204
आठवाँ खण्ड
204
है गौतम, स्त्री ही श्रग्नि है, उसका गुह्य स्थान ही समिधा है, उसका जो प्रयोग है वही धु्रवाँ है। योनि ही ज्वाला है। उसके अन्दर जो प्रवेश करता है वही श्रंगार है। और उससे जो श्रानन्द मिलता है वही चिनगारियाँ हैं।
204
इस श्रग्नि में देवगण वीर्य की श्राहुति देते हैं, उसी श्राहुति से गर्भेधान होता है।
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201
छान्दोग्योपनिषद् : २०१
201
नवाँ खण्ड
201
इस प्रकार पाँचवीं श्राहुति में जल पुरुषवाची होता है । वह गर्भ में मिलती है से लिपटा हुआ दसवें या नवें महीने तक माता के उदर में रहता है और वाद उत्पन्न होता है । वह उत्पन्न बालक श्रापन्न श्रायु भर जीता है । मर जाने पर उसे कर्म के अनुसार श्राग्नेय निर्धारित योनि में ले जाती हैं। जहाँ से वह यहाँ श्राया था और जहाँ जाकर उत्पन्न होता है ।
201
दसवाँ खण्ड
201
जो इस प्रकार पंचाग्नि को जानते हैं, तथा ऽरण्य ( वन ) में श्रद्धा और तप का सेवन करते हैं वे ऽर्चिर्दशा से दिन की दशा को प्राप्त होते हैं। ऽर्चिर्दशा से दिन की दशा को, दिन की दशा से शुक्ल पक्ष की दशा को, शुक्ल पक्ष की दशा से उत्तरायण होते हुए सूर्य जिन ६ महीनों को प्राप्त होता है—उसे प्राप्त करते हैं ।
201
मासिकी दशा से संवत्सर समान दशा को । संवत्सरी दशा से ऽादित्य समान दशा को, ऽादित्य समान दशा से चन्द्र समान दशा को, चान्द्रमसी दशा से विद्युतीय दशा को प्राप्त होते हैं। वहाँ पहुँचकर वह पुरुष ऽलौकिक बन जाता है । वही ज्योति उन्हें ब्रह्म को प्राप्त कराती है । यहाँ देवयान का मार्ग है ।
201
और जो गाँवों में लोग वैदिक यज्ञ करने तथा कुआँ, धर्मशाला, बाग-बगीचा ऽादि बनाने का दान करते हैं, वे धूम्र वाली दशा को प्राप्त होते हैं । उस धूम दशा से रात्रिदशा को, रात्रि दशा से कृष्ण पक्ष की दशा को, कृष्ण पक्ष की दशा से जिन ६ मासों में सूर्य दक्षिण दिश्ए को जाता है, वे उन्हें को प्राप्त करते हैं । संवत्सरी दशा को नहीं प्राप्त होते हैं ।
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२०६
दधिक्राव्यान छमाही दशा से पैंटक दशा को, पैंटक दशा से चान्द्रमसी दशा को प्राप्त होते हैं। वह सोम राजा है, वह देवताओं का श्रन्न होता है, उसे देवता खा लेते हैं। कर्मेन्द्रयन होने तक वे उसी दशा में रहकर उसके बाद उसी मार्ग से फिर लौटते हैं जिससे गए हैं। श्राकाश श्राकाश से, वायु वायु होकर धूम्राँ बनता है। धूम्राँ बना हुया वायुसमूह श्रभ्र बनता है। श्रभ्र से मेघ बनता हैं और वह पानी बरसता है। ये जीव यहाँ (संसार में) धान, जौ, श्रौषधि, वनस्पति, तिल और उड़द होकर पैदा होते हैं। यह निश्चय है, कि यहाँ से जीव का निकलना कठिन है। जो जो निश्चय श्रन्न को खाता है, वह वह स्त्रियों में वीर्य का सिंचन करता है। वह उसी का रूप बन जाता है।
२०६
जो इस लोक में उत्तम कार्य करते हैं, वे शोभन ही ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य जैसी उत्तम योनि को प्राप्त करते हैं और जो बुरे कार्य करते हैं, ये कुत्ता, सुअर और चांडाल जैसी निकृष्ट योनि को प्राप्त करते हैं।
२०६
और जो इन मार्गों में से किसी से नहीं जाते हैं, वे तुच्छ शीघ्र मरने वाले जीव होते हैं। पैदा होना और मरना नामक तीसरा है। इससे यह लोक नहीं मरता। इसलिए इसे निंदित समझना चाहिए। इस विषय में निम्नांकित श्लोक है—
२०६
कहा जाता है, कि जो इन पाँच श्रग्नियों को इस प्रकार जानता है, वह उन पापियों के साथ व्यवहार रखता हुया भी पाप से लिप्त नहीं होता वह शुद्ध, पवित्र पुण्यलोक वाला होता है। जो ऐसा जानता है।
२०६
ग्यारहवाँ खण्ड
२०६
उपमन्यु के पुत्र प्राचीनशाल, पुलुष के पुत्र सत्ययज्ञ, भाल्लवी के
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२०७
पुत्र इन्द्रद्युम्न् शंकराच्च के पुत्र जन्, ऋाश्वतराश्वि के पुत्र बुडिल ये प्रसिद्ध वैदिक विद्वान्, कुलपति थे। एक दिन श्रापस में मिलकर सोचने लगे कि श्रात्मा क्या है और ब्रह्म क्या है?
२०७
उन्होंने निश्चय किया कि इस समय ऋंगु वंश में उत्पन्न उद्दालक मुनि इस वैश्वानर श्रात्मा को जानते हैं। इसलिए उचित है, कि उनके पास चलें—यह तयकर वे उनके पास पहुँचे।
२०७
उन्हें देखकर उद्दालक मुनि पशोपेश में पड़ गए कि ये पाँचों महान् वेदविद् होने के साथ ही कुलपति हैं, पता नहीं क्या पूछेंगे और कदाचिन् मैं उत्तर न दे सकूँ। इसलिए किसी दूसरे को इन्हें बतलाॅूं।
२०७
यह निश्चयकर उद्दालक ने उनसे कहा—भगवन्। इस समय केकय देश के राजा अश्वपति वैश्वानर श्रात्मा के विशेषज्ञ हैं। श्रच्छा हो कि हम सब उन्हीं के पास चलें। यह तयकर सब चल दिए।
२०७
राजा अश्वपति ने उन विद्वानों की पृथक् पृथक् पूजा की। प्रात:काल दूसरे दिन उसने उनसे कहा—मेरे राज्य में न चोर हैं, न कृपण हैं, न शरावी न अग्निहोत्र न करने वाले हैं, न मूर्ख हैं, न व्यभिचारी पुरुष फिर व्यभिचारिणी स्त्रियाँ कहाँ। भगवान् मैं यह करने वाला हूँ। जितना श्रन्य श्रेष्ठियों को धन दूँगा, उतना श्राप लोगों को भी दूँगा। मान्यवर विद्वानों, श्राप मेरे घर में निवास करें।
२०७
वे विद्वान् बोले—जिस प्रयोजन के लिए किसी,के पास जाएँ उसी को उससे कहे। इस वैश्वानर श्रात्मा का श्रध्ययन इस समय श्रापने ही किया है। उसी को उपदेश हमें दें।
२०७
अश्वपति बोले, कल प्रात:काल उत्तर दूँगा। वे विद्वान् दूसरे दिन हाथों में समिधाएँ लिए, हुए राजा के पास खुद गए।
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२०५
विद्वानों को उपनীত किए बिना ही राजा अश्वपति ने उनसे कहा-
२०५
बारहवाँ खण्ड
२०५
है उपमन्यु वंश में उत्पन्न ऋषि, आप आत्मा की उपासना करते हैं ? हाँ राजन्, मैं चुलोक की उपासना करता हूँ—ऐसा उसने उत्तर दिया ।
२०५
राजा बोले, जिस आत्मा की तुम उपासना करते हो, निश्चय ही वह तेज युक्त वैश्वानर आत्मा है इसीलिए तुम्हारे कुल में सुत, प्रसुत और ऋषुत दिखायी पड़ रहे है ।
२०५
अन्न खाता है, प्रिय देखता है, जो इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह भी अन्न खाता है । प्रिय देखता है । उसके कुल में ब्रह्मतेज होता है । परन्तु आत्मा का वह शिर मात्र है । यदि आप मेरे पास न आते तो आपका शिर गिर जाता—ऐसा अश्वपति ने कहा ।
२०५
चौदहवाँ खण्ड
२०५
अश्वपति ने इन्द्रद्युम्न से पूछा—हे वैयाघ्रपद्य ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? उसने उत्तर दिया भगवान, मैं केवल वायु ही की उपासना करता हूँ।
२०५
राजा बोला—विश्व विविध प्रकार के गमन-स्वभाव वाला वैश्वानर आत्मा है जिस आत्मा की तुम उपासना करते हो । इसी लिए अनेक प्रकार की भोग-सामग्रियाँ तुम्हें प्राप्त हैं और अनेक रथों की पंक्तियाँ तुम्हारे पीछे चलती हैं ।
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२५६
अन्न खाता है, प्रिय देखता है, जो कोई इस वैश्वानर की उपासना करता है—वह भी अन्न खाता है, प्रिय देखता है। उसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है। परन्तु यह वायु वैश्वानर आत्मा का प्राणमात्र है। यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण निकल जाता।
२५६
इसके बाद राजा ने जन से कहा—‘क शाकंराज्य ! तुम किस आत्मा की उपासना करते हो ?’ उसने कहा—‘राजन् ! मैं आकाश ही की उपासना करता हूँ।’
२५६
राजा बोला—‘जिसकी तुम उपासना करते हो, निश्चय ही यह आकाश बहुत बड़ा वैश्वानर आत्मा है, इसलिए तुम विपुल धन और सन्तान से सम्पन्न हो !
२५६
अन्न खाता है, प्रिय देखता है। जो कोई इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, अन्न खाता है, प्रिय देखता है। उसके कुल में ब्रह्मवर्चस् होता है। परन्तु यह वैश्वानर आत्मा का मध्य शरीर मात्र है। तुम्हारा मध्य शरीर नष्ट हो जाता यदि तुम मेरे पास न आते।
२५६
पन्थाहवाँ खण्ड
२५६
इसके बाद राजा बुडिल से बोला—‘हे वैयामप्रपच्य ! तुम किस आत्मा की उपासना करते हो ?’ उसने उत्तर दिया—‘भगवन् ! मैं जल ही की उपासना करता हूँ।’ राजा ने कहा—‘यह जल वैश्वानर आत्मा का ही धन है, जिसकी तुम उपासना कर रहे हो ? इसी—लिए तुम धनवान और पुष्ट हो।’
२५६
सोलहवाँ खण्ड
२५६
१४
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११०
११० : ज्ञानयोगउपनिषद्
अन्न खाता है, प्रिय देखता है। जो कोई इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह भी अन्न खाता है, और प्रिय देखता है। उसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है। परन्तु यह जल वैश्वानर आत्मा का मूत्राशय मात्र है। यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मूत्राशय फट जाता।
सत्राहवाँ खण्ड
इसके बाद राजा ने उद्दालक से पूछा—‘कि तुम किस आत्मा की उपासना करते हो। उद्दालक ने कहा—राजन्, मैं पृथिवी ही की उपासना करता हूँ। यह सुनकर प्रसिद्ध राजा ने कहा—जिस आत्मा की तुम उपासना करते हो यह तो वैश्वानर आत्मा की प्रतिष्ठामात्र है। इसीलिए तुम सन्तान और पशुओं से प्रतिष्ठित हो।
अन्न खाता है, प्रिय देखता है। जो कोई इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है वह अन्न खाता है, प्रिय देखता है। उसके कुल में ब्रह्मवर्चस् उत्पन्न होता है। परन्तु यह पृथिवी वैश्वानर आत्मा का पैरमात्र है। यदि तुम मेरे पास न आते तुम्हारे पैर सूख जाते।
अठारहवाँ खण्ड
उन सबसे राजा अश्वपति ने कहा—कि यह निश्चय है, कि तुम सब लोग वैश्वानर आत्मा के एक-एक अंग को जानते हुए अन्न खाते हो। किन्तु जो इस वैश्वानर आत्मा को विराट और सबका निर्माता सम्पूर्ण कर उपासना करता है, वह समस्त लोकों समस्त प्राणियों और सम्पूर्ण आत्माओं में अन्न खाता है—आत्मानन्द भोगता है।
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191
ज्ञानेश्वरोपनिषद् : १९१
191
उस ऋतु प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा का मूर्त्त तेज युक्त शुलोक ही है। अनेक रूप वाला सूर्य उसका चक्षु है। अनेक मार्गों वाला वायु प्राण है। जल ही मूत्राशय है। पृथिवी ही पाँव है। यज्ञ वेदो ही वेद है। कुशा ही बलि है। दक्षिणामूर्ति मन और श्राद्ध-
191
नीय श्रामनि मुख है।
191
उन्नीसवाँ खण्ड
191
इसलिए जो श्रन्न पहले वैश्वानर आत्मा के उपासक के पास आये उसे प्राणाय स्वाहा कह कर होम करे। उस श्राहुति से प्राण तृप्त होता है प्राण के तृप्त होने पर श्राँखें तृप्त होती हैं। श्राँखों के तृप्त होने पर श्रादित्य तृप्त होता है। श्रादित्य के तृप्त होने पर शुलोक तृप्त होता है। शुलोक के तृप्त होने पर जो कुछ शुलोक और श्रादित्य के श्रधीन रहता है—वह सब तृप्त होता है। इन सब की तृप्ति के उपासक सन्तान, पशु, श्रन्न, तेज, ब्रह्मवर्चस् से तृप्त होता है।
191
बीसवाँ खण्ड
191
इसके बाद जिस दूसरी श्राहुति का होम किया जाए 'व्यानाय स्वाहा,' कहकर। उससे व्यान तृप्त होता है। व्यान के तृप्त होने पर कान तृप्त होते हैं। कानों के तृप्त होने पर चन्द्रमा तृप्त होता है। चन्द्रमा के तृप्त होने पर दसों दिशाएँ तृप्त होती हैं। दिशाओं के तृप्त होने पर जो कुछ दिशाओं और चन्द्रमा के श्रधीन है वे सभी तृप्त होते हैं। उनके तृप्त होने उपासक पशु, श्रन्न, तेज और ब्रह्म-
191
वर्चस् से तृप्त होता है।
191
इक्कीसवाँ खण्ड
191
इसके बाद 'अपानाय' कह कर तीसरी श्राहुति को छोड़े। इससे अपान तृप्त होता हैं। अपान के तृप्त होने पर वाणी तृप्त
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212
२१२ : छान्दोग्योपनिषद्
होती है। वाणी के तृप्त होने पर श्रग्नि तृप्त होती है। श्रग्नि के तृप्त होने पर पृथिवी तृप्त होती है। पृथिवी के तृप्त होने पर पृथिवी और श्रग्नि के श्राधिकार में जो कुछ रहता है—वह सब तृप्त होता है। उनके तृप्त होने के बाद उपासक सन्तान, श्रन्न, तेज और ब्रह्मवर्चस् से तृप्त होता है।
बाईसवाँ खण्ड
इसके बाद 'समानाय स्वाहा' कह कर चौथी श्राहुति छोड़ी जाए। इससे समान तृप्त होता है। समान तृप्त होने पर मन तृप्त होता है। मन के तृप्त होने पर मेघ तृप्त होता है। पर्जन्य के तृप्त होने पर विद्युत तृप्त होती है, विद्युत के तृप्त होने पर जो कुछ विद्युत और मेघ के श्राधिकार में होता है, वह सब तृप्त होता है। इनके तृप्त होने के बाद उपासक सम्मान, पशु, श्रन्न और ब्रह्मवर्चस् से तृप्त होता है।
तेईसवाँ खण्ड
इसके बाद 'उदानाय स्वाहा' कह कर पाँचवीं श्राहुति दे। इससे उदान तृप्त होता है। उदान के तृप्त होने पर त्वचा तृप्त होती है। त्वचा के तृप्त होने पर वायु तृप्त होती है, वायु के तृप्त होने पर जो कुछ वायु और श्राकाश के श्राधिकार में होता है, वह तृप्त होता है, उसके तृप्त होने पर उपासक सन्तान पशु, श्रन्न तेज और ब्रह्मवर्चस् से तृप्त होता है।
चौबीसवाँ खंड
जो कोई इसे न जानता हुया हवन करता है, वह मानो श्रंगारों को हटा कर राख में हवन करता है। और जो इसे ऐसा जानता हुया हवन करता है, उसका समस्त लोकों, सम्पूर्ण प्राणियों और सब श्रात्माओं में हवन किया हुया होता है।
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जैसे मूँज की रुई श्राग में डालने से जल जाती है, वैसे ही उस उपासक के सब पाप नष्ट हो जाते हैं। जो इस पद्धति को जानकर हवन करता है। इस प्रकार का विशेषज्ञ चार्वादाल को उच्छिष्ट हैउस का यह दान वैश्वानर श्रात्मा ही में हवन होता है। इस विषय में एक श्लोक है—
213
जैसे भूखे हुए वच्चे माता को चारों श्रोर से घेरे रहते हैं, वैसे ही समस्त प्राणी श्रग्निहोत्र का सेवा करते हैं।
213
छठा प्रपाठक
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पहला खण्ड
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ऐसा कहा जाता है कि श्वेतकेतु के पिता श्रारुणि ने उसमें कहा—हे श्वेतकेतु, ब्रह्मचर्य वास करो। हे सौम्य, यह निश्चित है, कि हमारे कुल में वेद न पढ़कर कोई श्रधम ब्राह्मण नहीं होता। वह श्वेतकेतु १२ वर्ष की श्रायु में श्राचार्य कुल में प्रविष्ट होकर २४ वर्ष की श्रायु तक समस्त वेदों को पढ़ कर अपने को बड़ा श्रभिमानी श्रोर विद्वान सममकर श्रकड़ता हुया लौटा। उसके पिता ने उससे पूछा—हे सौम्य, जो तुम अपने को बड़ा श्रभिमानी, विद्वान सममक कर श्रकड़ रहे हो क्या इसका श्रादेश तुमने अपने श्राचार्य से पूछा था। जिससे न सुना हुया सुना जाता है, न जाना हुया जाना जाता है? श्वेतकेतु ने कहा—भगवन्, वह श्रादेश क्या है?
213
हे सौम्य, जैसे मिट्टी के ढेले को जान लेने से मिट्टी के सभी पदार्थों का बोध होता है। मिट्टी से बने हुए घड़े श्रादि वाची के विस्तार श्रौर नाम मात्र हैं। केवल मिट्टी ही सत्य है। जैसे सोने के एक टुकड़े को जान लेने से उससे बने हुए सभी श्राभूषयों का बोध होता है। स्वर्ण-निर्मित तरह-तरह के श्रलंकार वाची के विस्तार श्रौर नाम मात्र हैं। केवल सोना ही सत्य है। लोहे की
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२१४ : ज्ञान्दोम्युपनिषद्
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बनी हुई नाखून काटने वाली नहन्त्री को देखकर लोहे से बने हुए सभी पदार्थों का बोध हो जाता है। वे सब वस्तुएँ वाणी के विस्तार और नाममात्र हैं। केवल काला लोहा ही सत्य है—हे सौम्य, यही वह वादरशी है।
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यह सुन कर श्वेतकेतु ने कहा—भगवन्, मेरे वे पूज्य आचार्य निश्चित यह नहीं जानते थे। अन्यथा मुझे अवश्य बतलाते अब आपही कृपा कर मुझे बतलावें ?—“ऐसा ही हो सौम्य, कहूँ कर पिता ने उत्तर दिया।
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दूसरा खण्ड
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पिता ने कहा—हे पुत्र, कैसे क्या हो सक्ता है? किस प्रकार असत् से सत् हो सक्ता है? हे सौम्य, पहले एक अद्वितीय सत् ही था। उसने इच्छा की कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ। बहुत प्रजा वाला हो जाऊँ। उस सत् ने तेज (अग्नि) उत्पन्न किया। तेज ने भी इच्छा की कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, बहुत प्रजा वाला हो जाऊँ। उसने जल उत्पन्न किया इसलिए मनुष्य जहाँ कहीं संतप्त होता है, उसे पसीना आ जाता है—उस तेज से ही जल उत्पन्न होना है।
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उस जल ने सोचा कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ। और संसार की रचना करूँ। उसने पृथिवी की रचना की। इसलिए जहाँ कहीं वर्षा होती है, वहीं बहुत अन्न उत्पन्न होता है। जल से ही वह अन्न तथा अन्य भोग्य पदार्थ उत्पन्न होते हैं।
२१४
तीसरा खण्ड
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इन सब प्राणियों के तीन ही बीज होते हैं अण्ड से उत्पन्न होने वाले, जीवित जल्नुश्यों से उत्पन्न होने वाले और पृथ्वी को
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२२५
फोड़कर पैदा होने वाले वृक्ष आदि। वह यह देवता जिसने तेज, जल और अन्न को पैदा किया था, सोचने लगा कि अच्छी हो कि मैं अग्नि, जल और पृथिवी इन देवताओंों और इस जीवतात्मा के साथ प्रवृष्ट होकर नाम और रूप को अलग-अलग करूँ।
२२५
उन तेज, जल और पृथिवी से एक-एक को तीन-तीन गुणा करूँ। तदः यह सत् देवता उन तीनों देवताओंों में जीवाल्मा के साथ प्रवृष्ट होकर नाम और रूप भेद से भिन्न-भिन्न बन गया।
२२५
फिर उन तीनों में से एक-एक को तोन-तीन गुणा किया। हे सौम्य, ये प्रसिद्ध तीनों देवता एक-एक जैसे तीन-तीन गुणा होता है—वह मुफ्त से जान लो।
२२५
चौथा खंड
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अग्नि में जो लाल रंग है वह तेज का रूप है और काला रंग पृथिवी का रूप है। इस प्रकार अग्नि का अग्नित्व चला गया। अग्नि का जो स्थूल रूप है, वह वाणी का विस्तार है, और नाम मात्र है। तीन रूप ही सत्य हैं।
२२५
आदित्य का जो लाल रंग है वह तेज का रूप है। उसका सफेद रंग जल का और काला रंग पृथिवी का रूप है। इस प्रकार आदित्यत्व चला गया। आदित्य का जो अब स्थूल रूप है—वह वाणी का विस्तार और नाम मात्र है। तीन रूप ही सत्य हैं।
२२५
चन्द्रमा में जो लाल रंग है वह तेज का रूप है। उसका सफेद रंग जल का और काला रंग पृथिवी का रूप है। इस प्रकार चन्द्रमा का चन्द्रत्व चला गया। उसका जो स्थूल रूप है—वह वाणी का विस्तार है और नाम मात्र है। तीन रूप ही सत्य हैं।
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विजली का जो लाल रंग है, वह तेज का रूप है। उसका सफेद रंग जल का और काला रंग पृथ्वी का रूप है। इस प्रकार अब बिजली का विद्युत् चला गया। बिजली का जो अब स्थूल रूप है वह वाणी का विस्तार है और नाम मात्र है। तीन रूप ही सत्य हैं।
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ऐसा कहा जाता है, कि पहले इसी विद्या को जाननेवाले कुलपति वेदज्ञ कहा करते थे कि अब हम को कोई न सुनी हुई, न सम्भी हुई और न जानी हुई वस्तु को बतला सकेगा। क्योंकि उन्होंने सब विज्ञान को जान लिया था।
२१६
उन्होंने यह जान लिया था। कि जो कुछ भी लाल रंग का है वह तेज का रूप है। जो सफेद है वह जल का रूप है और जो काला है वह पृथिवी का रूप है। जो कुछ उन्होंने नहीं जाना था—उसे उन्होंने उन्हीं देवताओं का समास (मेल) सम्भफ लिया था। हे सोम्य, जैसे ये तीनों देवता जीवात्मा से मिलकर प्रत्येक तीन-तीन प्रकार का होता है—उस विज्ञान को तुम मुझसे समभो।
२१६
पाँचवाँ खण्ड
२१६
खाया हुआ अन्न तीन भागों में विभक्त हो जाता है। उसका सबसे स्थूल भाग मल वत् जाता है, जो मध्य भाग है वह मांस और जो अति सूक्ष्म भाग होता है वह मन होता है।
२१६
जल पीने के बाद तीन भागों में विभक्त हो जाता है। उसका स्थूल भाग मूत्र होता है। मध्य भाग रक्त और अति सूक्ष्म भाग प्राण होता है। पचाये हुए भोजन का अंश (तेज) तीन भागों में बँट जाता है। उसका स्थूल भाग ग्रस्थि होता है, मध्य भाग मज्जा होता है और अति सूक्ष्म भाग वाणी होता है।
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छान्दोग्यउपनिषद् : 213
213
हे सौम्य, मन अन्न से बना हुग्रा है । जलमय प्राण और तेजोमयी वाणी होती है। यह सुन कर श्वेतकेतु ने कहा—भगवन्, मुझे समभाइए ?
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पिता ने उत्तर दिया—सौम्य, ऐसा ही हो ।
213
छठा खण्ड
213
हे सौम्य, मथे गए दही का जो सूक्ष्म भाग ऊपर उठ श्राता है— वह मंठवन कहलाता है । इसी प्रकार खाये हुये अन्न का जो सूक्ष्म भाग ऊपर उठता हैं वही मन है । पिये हुए जल का जो सूक्ष्म भाग है वह प्राण है । पचाये हुए भोजनांश का जो सूक्ष्म भाग ऊपर उठता है, वह वाणी है । हे सौम्य, मन अन्नमय, प्राण जलमय और वाणी तेजो मयी है । पुत्र ने कहा—पिता जी, और समभाइए ?
213
पिता ने कहा—बहुत श्रच्छा बेटा !
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सातवाँ खण्ड
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हे सौम्य, पुरुष सोलह कला कला है । १५ दिन तक भोजन न करो, इच्छानुसार जल पियो, जल पीते रहने से प्राणों की रक्षा होती है क्योंकि प्राण जलमय हैं ।
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कहा जाता है, कि श्वेतकेतु ने बहुत दिन तक भोजन नहीं किया, इसके बाद वह पिता के समीप गया और पूछा—पिता जी, क्या कहूँ । पिता ने कहा—सौम्य, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को सुनाग्रो ? पुत्र ने कहा—पिता जी, मुझे तो कुछ भी याद न रह गया ।
213
पिता ने कहा—हे सौम्य, जैसे जलते हुए श्रग्निपुँज में से शेष एक मामूली तिनगी ( चिनगारी ) ज्वगुनू की तरह कुछ भी जलाने में असमर्थ होती है। उसी प्रकार तेरी सोलह कलाग्रों में
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२१८ : छान्दोग्योपनिषद्
२१८
से एक कला शेष रह गयी है । इसीलिए तुम्हें वेदों का स्मरण नहीं हो रहा है । भोजन करो ?
२१८
भोजन करने के बाद तुम मेरी बात समभोगे ? उसने भोजन किया और फिर वह पिता के पास गया । उससे जो कुछ पिता ने पूछा वह सब समभ गया । तब पिता ने फिर कहा—
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सोम्य, जैसे जलती हुई श्राग में बचे हुए जुगनू के समान एक छोटी सी चिनगारी से इकट्ठे किए गए तिनकों को जला लिया जाता है, और जलते हुए श्रंगारे से तो बहुत बड़ी चीज जलायी जा सकती है ।
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हे सोम्य, इस तरह सोलह कलाओं में से तेरी एक ही कला शेष रह गयी थी । वह अन्न से बढ़कर चमक उठी है । उसो चर्म-
२१८
कती हुई कला से तू वेदों को समभ रहा है । हे सोम्य, निश्चय ही मन श्रन्नमय है, प्राण जलमय है और वागी तेजोमयी है । श्रपने पिता के वचनों को तब पुत्र ने समभा । तब वह समभा ।
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आठवाँ खण्ड
२१८
कहा जाता है, कि श्ररुण के पुत्र उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा—सोम्य, मुझे स्वप्न की ग्रन्तिम ग्रवस्था 'सुषुप्ति' समभो ! जब इस पुरुष ( जीव ) का 'स्वपिति' नाम होता है,
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तब वह जीव ग्रात्म सम्पन्न ( ग्रान्तर्मुखी चेतना सम्पन्न ) होता है । इसलिये इस जीव को स्वपिति ( सोता है ) —ऐसा कहा जाता है । क्योंकि यह जीव ग्रपने में लीन होता है ।
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जैसे सूत से बँधा हुग्रा पत्ती चारों ग्रोर गिर कर ग्रन्न का सहारा न मिलने से बन्धन का ही ग्राश्रय लेता है । ऐसे ही यह मन जीव के चारों ग्रोर घूमकर ग्रनन्यत ग्राश्रय न पाकर ब्रह्म का
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ही श्राश्रय लेता है। क्योंकि हे सोम्य, मन ( जीवात्मा ) प्राण ( ब्रह्म ) के बन्धन से बँधा हुग्रा हाता है।
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हे सोम्य, भूख-प्यास के तत्व को मुझसे सीखो। जब इस पुरुष ( जीव ) का 'श्राशिशिषति' नाम होता है, उससे दबाये हुये को गाय ले जाने वाले, घोड़ा ले जाने वाले श्रौर मनुष्यों के नेता को भ्राँति जल ही ले जाता है। इस प्रकार उस जल को 'श्रशनाय' कहते हैं। हे सोम्य, उत्पन्न हुए इस श्रंकुर ( शरीर ) को जानो यह शरीर बिना कारण के नहीं होता।
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पृथिवी से भिन्न उसका कारण क्या होगा? इसी तरह हे सोम्य, निश्चय ही पृथिवी रूप श्रंकुर ( कार्य ) से जल रूप कारण सम्भवो। जल रूप श्रंकुर ( कार्य ) से तेज रूप कारण सम्भो। तेज रूप श्रंकुर ( कार्य ) से सत् ( ब्रह्म ) रूप कारण को जानो। हे सौम्य, सभी प्रजाएँ सत्कारण श्रौर सत् श्राश्रय वाली हैं। श्रौर सत् ही में प्रतिष्ठित हैं।
216
जब यह पुरुष पोनना चाहता है, तब 'पिपासति' नाम वाला होता है। उस पी हुई वसु की तेज इस प्रकार ले जाता है जैसे गायों को ले जाने वाले, वोड़ों को ले जाने वाले श्रौर मनुष्यों को ले जाने वाले ले जाते हैं। उसी प्रकार जल को ले जाने वाले तेज को उदन्य—उदक नायक कहते हैं। इस प्रकार इस उत्पन्न श्रंकुर ( शरीर रूप कार्य ) को समभो यह निर्भूल न होगा।
216
जल से भिन्न इस शरीर का मूल कारण वहाँ होगा। हे सौम्य जल रूप श्रंकुर ( कार्य ) को तेज रूप श्रंकुर ( कार्य ) के सत् रूप कारण समभो? ये सभी प्रजाएँ सत् रूप कारण 'वाली हैं। सत् श्राश्रय वाली सत् प्रतिष्ठा वाली हैं। जैसे तेज, जल, पृथिवी ये तीनों देवता जीव को प्राप्त करके एक-एक तिगुने-तिगुने हो
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२२० : छान्दोग्योपनिषद्
जाते हैं। इसका जो कुछ होता है। वह पहले बताया जा चुका है। हे सोम्य, मरने वाले पुरुष की वाणी मन में लीन हो जाती है। मन प्राण में और तेज परम देवता सत् में लीन हो जाते हैं। जो वह सूक्षमता है वही सत् है।
हे श्वेतकेतु, यह सब ब्रह्ममय परमात्मामय है, वह सत्य है, वह आत्मामय है। उसी आत्मा का तू ( तत्वमसि ) है।
तब श्वेतकेतु ने कहा—भगवन्, और भी मुझे समझाइए? पिता ने कहा बहुत श्रच्छा पुत्र, सम्भो?
नवाँ खण्ड
हे सोम्य, जैसे मधुमक्खियाँ अनेक रस वाले वृक्षों के रसों को एकत्र करके रस बनाती हैं, लेकिन रस के छत्ते में एकत्र वे अनेक रस यह नहीं जानते हैं, कि अमुक वृत्त का मैं रस हूँ। इसी प्रकार ये सभी मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त करके भी यह नहीं समप् पाते कि ब्रह्म में हम वर्तेंमान हैं।
इस संसार में चीता, सिंह, भेड़िया, सुघ्रर कीट, पतंग, मच्छर आदि जो जो जीव होते हैं, वही पुनः पुनः पैदा हुयेा करते हैं। यह जो सूक्ष्म जगत है यह सब आत्ममय है। यह आत्मा सत्य है और हे श्वेतकेतु, तू आत्मा का है।
यह सुनकर श्वेतकेतु ने अपने पिता से कहा—हे भगवन्, और भी शिक्षा दें। पिता ने कहा—तथास्तु।
दसवाँ खण्ड
हे सोम्य, पूर्व दिशा में जाने वाली नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं और पश्चिम दिशा को जाने वाली नदियाँ पश्चिम की ओर
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२२
छान्दोग्योपनिषद् : २२
२२
बहती हैं। ये नदियाँ समुद्र से समुद्र ही को जाती हैं। वे समुद्र ही हो जाती हैं। जैसे उस समुद्र से मिल कर वे नदियाँ जानती हैं कि मैं नदो हूँ, उसी प्रकार हे सोम्य, ये सव प्रज्ञाएँ सन से आकर यह नहीं जानतीं कि हम सन् मे श्रायी हैं। वे यहाँ चीता, सिंह, भेड़िया, मुखर, कीट, पतंग, मच्छर जो जो होते हैं, वैसे फिर होते हैं।
२२
यह जो सूक्ष्म जगन् है सव आत्मामय है। यह मन् है। यह आत्मा है। श्वेतकेतु उसी का है। हे भगवन्, मुझे और नमम्काइए। श्वेतकेतु के ऐसा कहने पर पिता ने कहा—तथास्तु।
२२
ग्यारहवाँ खण्ड
२२
हे सोम्य, इस महान वृत्त की जड़ में यदि आघात किया जाए तो यह जीवित रहेगा—किन्तु इससे रस बहने लगेगा। यदि इसके दूसरे मध्य भाग में प्रहार किया जाए तो भी जीवित रहेगा किन्तु रस बहने लगेगा। यदि इसकी चोटी पर प्रहार किया जाए तब भी यह जीवित रहेगा किन्तु रस बहने लगेगा। इस प्रकार यह वृत्त जीवात्मा से व्याप्त होकर जड़ से पानी लेता हुआ तृण्णा सदैव प्रसन्न खड़ा रहता है।
२२
इस वृत्त की एक शाखा को जब जीव छोड़ देता है, तब वह सूख जाती है। दूसरी शाखा को जब छोड़ देता है, तब वह भी सूख जाती है। तीसरी शाखा को जब वह छोड़ देता है, तब वह भी सूख जाती है। समस्त जड़ को यदि छोड़ देता है, तो सारा वृत्त सूख जाता है। हे सोम्य, ऐसी ही दशा इस शरीर की समस्त?
२२
निश्चय यह शरीर जीव के न रहने पर मर जाता है। किन्तु जीवात्मा नहीं मरता। यह जो सूक्ष्म जगन् है, सव आत्मामय है,
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२२२ : छान्दोग्योपनिषद्
श्वेतकेतु, तू उसी का है । श्वेतकेतु ने कहा—भगवन् और भी मुझे उपदेश दें । पिता ने कहा—तथास्तु ।
बारहवाँ खण्ड
इस वट वृक्ष का फल लाओ ? पिता ने श्वेतकेतु से कहा । भगवान् वह फल यह है —पुत्र ने कहा ।
इस फल को फोड़ डालो ?
भगवन्, फोड़ डाला मैंने इस फल को ।
इसमें क्या देखते हो सोम्य !
श्रति सूक्ष्म दाने देख रहा हूँ भगवान् !
इसमें से एक दाने को फोड़ दो सोम्य !
दाने को फोड़ दिया—भगवन् !
इसमें क्या देखते हो सोम्य !
कुछ नहीं भगवान्!
हे सोम्य, इस सूक्ष्म दाने में जो तुम कुछ नहीं देखते हो, इसी से बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष उत्पन्न हुआ करता है । हे सोम्य, इस बात का विश्वास करो ?
यह जो सूक्ष्म जगत् है, आत्मामय है । हे सोम्य तू उसी का है । यह सुनकर श्वेतकेतु ने कहा -भगवन्, मुझे और समभाइए ?
पिता ने कहा तथास्तु !
तेरहवाँ खण्ड
इस नमक को जल में डालकर प्रातः काल मेरे पास आना । श्वेतकेतु ने वैसा ही किया । पिता ने पुत्र से कहा—पुत्र, रात में जो
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नमक पानी में डाला था, उसे ले श्राथ्यो। श्वेतकेतु पानी में नमक ढूँढ़ता रहा किन्तु कहीं न मिला।
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हे पुत्र, इस नमक मिले हुए जल के ऊपरी भाग का श्राचमन करके बताओ कैसा है?
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नमक ही है——भगवन्!
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अब मध्य के जल का श्राचमन करके बताओ कैसा है?
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नमक ही है भगवान्!
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श्रच्छा नमक मिले हुए इस जल का स्वाद लेकर मेरे पास श्राओ? श्वेतकेतु ने वैसा ही किया और पिता से बोला वह नमक जल में मौजूद है। हें सौम्य, वह नमक इसी जल में है, लेकिन तुम नहीं देखते हो कि वह यहाँ है। इसलिए यह जो सूक्ष्म जगत् है, सब श्रात्ममय है, तू भी उसी का है। यह सुनकर श्वेतकेतु ने कहा भगवान् मुझे और समभाइये। पिता ने कहा——तथास्तु।
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चौँदहवाँ खण्ड
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हे सौम्य, जैसे किसी पुरुष की श्राँखें बाँधकर उसे गान्धार देश से लाकर किसी जंगल में छोड़ दिया जाय और वह उस वन में पूर्वे, उत्तर, दच्त्रिया, परिचम की और घूमता हुध्रा चिल्ला उठे कि श्राँखें बन्द करके मैं यहाँ लाया गया हूँ और उसी हालत में छोड़ दिया गया हूँ।
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तब उस पुरुष की श्राँखों की पट्टी खोलकर कहे, कि इस दिशा में गान्धार नगर है चले जाओ। यदि वह विद्वान् श्रौर समभदार है तो एक गाँव से दूसरे गाँव को पूछता हुध्रा गान्धार नगर को पहुँच जाय। वैसे ही यहाँ श्राचार्ये से शिक्षा प्राप्त पुरूष जानता है;
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२२४ : ज्ञान्दोग्योपनिषद्
कि उसे उस समय तक की देर है, जब तक इस शरीर के बन्धन से छुटकारा नहीं पाता। इसके बाद वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेगा।
यह जो सूक्ष्म जगत् है, आत्मामय है। हे श्वेतकेतु, तू उसी आत्मा का है। यह सुनकर उसने कहा—भगवन्, मुझे और उपदेश दीजिए? पिता ने कहा—तथास्तु।
पन्द्रहवाँ खण्ड
हे सोम्य, जब से रोगी मनुष्य के आसपास उसके परिवार के लोग घेरकर बैठ जाते हैं और उससे पूछने लगते हैं मुक्को जानता है, मुझे पहचानता है। उसकी जब तक वागी मन में, मन प्राण में, प्राण तेज में और तेज आत्मा में लीन नहीं होता तब तक वह जानता है।
इसके बाद जब इसकी वागी मन में, मन प्राण में, प्राण तेज में और तेज आत्मा में लीन हो जाता है तब वह नहीं पहचानता।
यह जो सूक्ष्म जगत है—सब कुछ आत्मामय है। यह सत्य है, यह आत्मा है। श्वेतकेतु, तू इसी आत्मा का है—यह सुनकर श्वेतकेतु ने कहा—भगवन्, और भी मुझे उपदेश दीजिए। पिता ने कहा—तथास्तु।
सोलहवाँ खण्ड
हे सौम्य, किसी छाद्मी को हाथ पकड़ कर लाया जाता है, और कहा जाता है, कि इसने कोई चीज उठाली है—चोरी की है। इसके लिए लोहार से तपाथो। यदि वह सचमुच चोर होता है, तो
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अपनी श्रात्मा को भूठा बनाता है। वह भूठा भूठ से अपनी श्रात्मा को छिपा कर गर्म लोहे को पकड़ लेता है। वह जल जाता है। इसके बाद वह चोर मार दिया जाता था।
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ग्रौर यदि वह पकड़ा हुश्रा श्रादमी चोर नहीं होता तो उसी ईमानदारी से वह अपनी श्रात्मा को ईमानदार बनाता है। सत्य से संबंधित होकर सत्य से अपनी श्रात्मा को ढाँक कर वह गर्म लोहे को पकड़ लेता है। वह नहीं जलता श्रौर छोड़ दिया जाता है।
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जैसे वह सच्चा पुरुष वहाँ जलता नहीं, ऐसी श्रात्मा से पूर्या यह जगत् सत्य है, यह श्रात्मा है। हे श्वेतकेतु, तू उसी का है। तब श्वेतकेतु ने पिता के दिए गए उपदेशों को जान लिया।
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सातवाँ प्रपाठक
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पहला खण्ड
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कहा जाता है, कि नारद सनत्कुमार के पास जाकर बोले—भगवन्, मुझे शिच्चा दीजिए—यह कहकर उनके पास बैठ गए। सनत्कुमार ने कहा, जो कुछ तुम्हारा श्रद्ध्ययन हो उसे पहले प्रकट कर मेरे पास बैठो। तब तुम्हें उससे श्रागे को शिच्चा दूँगा।
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नारद बोले—भगवन्, मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, श्रथर्ववेद को जानता हूँ। इतिहास, पुराणों ग्रौर वेदों के मुख्य विषय को जानता हूँ। श्रुश्रूषा विज्ञान (नसिंग) राशि (गणित) उत्पाद विज्ञान (दैवे) विधि (ग्रर्थ शास्त्र) तर्क शास्त्र (वाको वाक्य) नीतिशास्त्र,
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२२६ : छान्दोग्योपनिषद्
निरुक्त, ब्रह्मविद्या, ज्योतिष, प्राणविद्या, धनुर्विद्या, सर्पविद्या, नृत्य, गीत, वाद्य शास्त्र—इन्हें जानता हूँ।
हे भगवान् मैं शास्त्रविद् हूँ आत्मविद् नहीं। आत्मही जैसे पुरुषों मैंने सुना है, कि आत्मविद् व्यक्ति शोक को पार कर जाते हैं। हे भगवान्, मैं बहुत दुःखी हूँ। ब्रत: आप मुझे शोक से पार कर दें। सनत्कुमार ने कहा—इसमें सन्देह नहीं जो कुछ तुमने अध्ययन किया है वह नाम ही हैं।
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ये निश्चित ही नाम हैं। पाँचवाँ इतिहास पुराण वेद वेदों के मुख्य विषय हैं। शुश्रूषा विज्ञान, गाथित, उत्पातविज्ञान, अर्थशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, ब्रह्मविद्या, भाषाप्रशास्त्र, धनुर्विद्या, ज्योतिष, सर्पदेवजन विद्या, वृक्ष गीत वाद्य शास्त्र ये सब नाम ही हैं। हे नारद तुम उन्हें जानो?
ब्रतएव जो नाम को ही सबसे महान् समपन्न कर इसकी उपासना करवाता है, तो नाम की जहाँ तक गति होती है वहीं तक उस उपासक की भी गति रहती है—जो नाम को बड़ा समपन्नता है।
नारद ने पूछा भगवान्, नाम से भी कोई महान् होता है? सनत्कुमार ने कहा हाँ होता है।
नारद ने कहा—तो फिर भगवान् मुझे उसे बतलाइए।
दूसरा खण्ड
सनत्कुमार ने कहा—नाम से बड़ी वाणी है। वाणी ही ऋग्वेद को बतलाती है। यजुर्वेद सामवेद, अथर्ववेद तथा पाँचवें इतिहास, पुराण वेदों के मुख्य विषय, शुश्रूषा विज्ञान, गाथित, उत्पातविद्या, अर्थशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त,
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ऋग्विद्या, प्राणिशास्त्र, धनुर्विद्या, ज्योतिष, सर्पदेवजन विद्या, नृत्य, गीत, वाच्य शास्त्र, वाक्षी ही है। धुलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य, पशु, पछी, तृण, वनस्पति, हिंसक जन्तु, कीट—पतंग, चींटी आदि इत्त्र जन्तु, धर्म, अधर्म, सत्य, झूठ, अच्छी-बुरा, प्रिय-अप्रिय—निरचय यदि वाक्षी न होती वो न धर्म और न अधर्म जाना जाता। न सत्य न झूठ, न अच्छी, न बुरा, न प्रिय न अप्रिय जाना जाता। इसलिए वाक्षी की उपासना करो।
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इस प्रकार वाक्षी को बड़ा समक्ख कर जो इसकी उपासना करता है, तो जहाँ तक वाक्षी की गति है वहाँ तक उसकी गति रहती है। जो वाक्षी की जान कर उसकी उपासना करता है।
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नारद ने पूछा—भगवन, वाक्षी से भी बड़ा कुछ है।
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सनत्कुमार ने कहा—हाँ वाक्षी से भी बड़ा है।
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नारद—तब भगवान उसका मुफे उपदेश दें।
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तोसरा खण्ड
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मन ही वाक्षी से बड़ कर है। जैसे मुठ्ठी दो थांबलो, दो बेरो अथवा दो बहेड़ों का ग्रहण करती है, उसी प्रकार मन, वाक्षी और नाम दोनों का ग्रहणव करती है। इसलिए जब कोई मन से यह मनन करता है कि मन्त्रों को पढ़ूँ—तो पढ़ता है, कमों को करूँ—तो करता है। पुत्रों और पशुओं की इच्छा करूँ तो इच्छा करता है। इसलोक और परलोक की इच्छा करूँ तो इच्छा करता है। मन ही आत्मा है, मन ही लोक है, मन ही बड़ा है, इसलिए मन की उपासना करो।
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२२९ : छान्दोग्योपनिषद्
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इस प्रकार जो मन को बड़ा जान कर उसकी उपासना करता है, तो मन की जहाँ तक गति होती है—वहीं तक उसकी भी गति होती है। जो मन को बड़ा जान कर उपासना करता है।
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नारद—भगवन्, मन से भी बड़ा कुछ और है?
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सनत्कुमार—हाँ मन से भी बड़ा है।
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नारद—भगवन्, मुक्त उपदेश दें।
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चौथा खण्ड
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मन से बड़ा संकल्प है। जब मनुष्य संकल्प करता है, तभी वह मंथन करता है और फिर वाणी को प्रेरित करता है। तभी उस वाणी को नाम की ओर प्रेरित करता है। नाम में मन्त्र एक होते हैं। और मन्त्रों में कर्म। निश्चय ये मन, वाणी और नाम संकल्प रूप हैं और संकल्प में स्थित रहते हैं। भूलोक और पृथिवी संकल्पमय हैं। वायु और आकाश संकल्पमय हैं। जल और तेज संकल्पमय हैं। इन्हीं के संकल्प से वर्षा संकल्पमयी होती है। अन्न के संकल्प से प्राप्त संकल्पमय होते हैं, अन्ना के संकल्प से मन्त्र संकल्पित होते हैं। मन्त्रों के संकल्प से कर्म संकल्पमय होते हैं, कर्मों के संकल्प से लोक संकल्पमय होते हैं और लोकों के संकल्पमय होने से सभी संकल्पमय होते हैं। ऐसा यह संकल्प है। संकल्प की उपासना करो ?
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जो संकल्प को महान समझ कर इसकी उपासना करता है, वह दृढ़, प्रतिष्ठित, जुझ्लेश रहित होकर चांंकल्पमय लोकों को प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति संकल्प की गति के अनुसार ही अपनी गति रखते हैं। जो संकल्प को महान समझ कर इसकी उपासना करता है।
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छान्दोग्योपनिषद् : २२९
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नारद--संकल्प से भी बड़ा कुछ और है भगवन् !
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सनत्कुमार--हाँ संकल्प से भी बड़ा होता है ।
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नारद--भगवन्, मुझे उसका उपदेश दें ।
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पाँचवाँ खण्ड
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संकल्प से महान् चित्त हैं । क्योंकि संकल्प करने से पूर्व चिन्तन किया जाता है । तबही मनन किया जाता है । तबही वाणी प्रेरित होती है और वह वाणी नाम से प्रेरित होती है । नाम में मन्त्र एक होते हैं और मन्त्रों में कर्म ।
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निश्चयतः ये संकल्प यदि चित्त के आश्रय चित्त स्वरूप और चित्त ही में प्रतिष्ठित है । इसलिए कोई बड़ा विद्वान् स्वस्थिर चित्त होता है तो उसे नहीं के बराबर समझा जाता है । क्योंकि यह समझा जाता है, कि यदि यह पुरुष विद्वान् होता तो स्वस्थिर चित्त कदापि न होता । और यदि कोई अल्पज्ञ होकर भी चित्तवान् होता है, तो उसकी सभी लोग सेवा करते हैं । चित्त ही इनका आश्रय है, चित्त ही आत्मा है और चित्त ही प्रतिष्ठा है । इसलिए चित्त की उपासना करो ।
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इस प्रकार जानता हुआ जो चित्त की उपासना करता है, वह हृद्, प्रतिष्ठित, क्लेश रहित, और संकल्पमय लोगों को प्राप्त करता है । चित्त की जहाँ तक पहुँच है, उसकी भी वहाँ तक पहुँच हो जाती है । जो चित्त को बड़ा जान कर काम में लाता है ।
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नारद--भगवन्, चित्त से भी बड़ा कुछ है ?
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सनत्कुमार--हाँ चित्त से भी बड़ा है ।
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नारद--भगवन् तो फिर मुझे उसका उपदेश दें ।
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२३० : छान्दोग्योपनिषद्
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छठा खण्ड
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ध्यान हो चित्त से बड़ा है। पृथ्वी मानो ध्यान कर रही है, अन्तरिक्ष मानो ध्यानस्थ है। घुलोक मानो ध्यान मग्न है। जल मानो ध्यान संलग्न है। पर्वत मानो ध्यान निमग्न हैं। इसलिए मनुष्यों में जो यहाँ महत्व प्राप्त किया करते हैं, मानो वे ध्यान की प्राप्ति की एक कला हैं। और ध्यान रहित चुद्र पुरुष होते हैं, वे उपद्रवी चोर, पिशुन और उपवादी (खुशामदी) होते हैं। जो प्रभावान् सम्पन्न होते हैं मानो वे ध्यान के एक अंश के प्रताप से ही हैं। इसलिए नारद ध्यान से काम लो।
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इस प्रकार जो ध्यान को बड़ा समक् कर ध्यान की उपासना करता है, वह ध्यान की पहुँच की बराबर अपनी पहुँच बना लेता है। जो ध्यान की उपासना करता है।
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नारद—भगवन् ध्यान से भी बड़ा कुछ है?
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सनत्कुमार—हाँ ध्यान से भी बड़ा श्रवश्य है।
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नारद—भगवन्, मुझे उपदेश दें।
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सातवाँ खण्ड
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विज्ञान ही ध्यान से बड़ा है। विज्ञान से ही ऋग्वेद जाना जाता है। यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवाँ इतिहास पुराण, वेदों के मुख्य शुश्रूषा विज्ञान, गणित, उत्पात विज्ञान, श्रथे शास्त्र, तर्क शास्त्र, नीति शास्त्र, निरुक्त, ब्रह्मविद्या, प्राणि शास्त्र, ज्योतिष, सर्प विद्या, नृत्त गान विद्या, श्रुलोक, पृथिवी, वायु, श्राकाश, जल, तेज, देव-मनुष्य पशु-पक्षी, तृण-वनस्पति, हिंसक जन्तु, कीट-पतंग, चींटी, धर्म-अधर्म, सत्य-झूठ, श्रच्छा-बुरा, प्रिय-अप्रिय, अन्न, रस, लोक और परलोक को विज्ञान से ही जाना जाता है। इसलिए विज्ञान की ही उपासना करो।
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जो विज्ञान की उपासना करता है, वह विज्ञान वेत्ता होकर विज्ञान वाले लोकों को प्राप्त करता है। जहाँ तक विज्ञान को पहुँच है वहाँ तक विज्ञान के उपासक की भी पहुँच हो जाती है। जो विज्ञान को बड़ा जान कर उसकी उपासना करता है।
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नारद—भगवन्, विज्ञान से भी कुछ बड़ा है। सनत्कुमार—हां इससे भी बड़ा है। नारद—भगवन्, उसका उपदेश दें।
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आठवाँ खण्ड
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विज्ञान से बड़ा बल है। प्रसिद्ध है, कि सौ बलहीन विज्ञान वेताओं को एक बलवान् काँपा देता है। जो बलवान् होता है उसमें कार्य करने की क्षमता भी होती है। कार्य करने में समर्थ होने पर सेवा करने वाला होता है। सेवा करता हुया वह विद्वानों का श्रद्धेवासी बन जाता है। उसके निकट वैठता हुया वह देखने वाला, सुनने वाला, मनन करने वाला, जानने वाला, काम करने में समर्थ और विशेषज्ञ बन जाता है। बल से पृथिवी ठहरती है। बल से अन्तरिक्ष, बल से द्युलोक, बल से पर्वत, बल से देव, मनुष्य, बल से पशु, पत्ती, क्षुद्र वनस्पति, हिंसक जन्तु, कीट-पतंग क्षुद्र जीव स्थित हैं। थहलोक बल से ही ठहरा हुया है। इसलिये बल की उपासना करो।
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जो कोई बल को महान् समझ कर उसकी उपासना करता है उसकी पहुँच बल की पहुँच तक हो जाती है। जो बल को बड़ा जाने कर काम में लाता है।
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नारद—भगवन्, बल से भी कुछ बड़ा है। सनत्कुमार—हां बल से भी कुछ बढ़कर है। नारद—भगवन्, उसका मुझे उपदेश दें।
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२३२ : छान्दोग्योपनिषद्
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नावाँ खण्ड
232
अन्न ही बल से बढ़कर है। इसलिए यदि मनुष्य दस रात भोजन न करे और चौथे दिन भी यदि वह जीवित रहे जाए तो उसकी देखने, सुनने, मनन करने, समझने, विशेष ज्ञान प्राप्त करने की शक्ति जोए हो जाती है। अन्न प्राप्त हो जाए तो वह दृष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा, कर्ता और विज्ञाता हो जाता है। 'इसलिए अन्न की उपासना करनी चाहिए।
232
जो अन्न को बड़ा समझ कर उसका उपयोग करता है वह अन्न और पान वाले लोगों को प्राप्त करता है। जहाँ तक की पहुंच है वहाँ तक उसकी भी पहुंच हो जाती है। जो अन्न का इस प्रकार उपयोग करता है।
232
नारद—भगवन्, अन्न से भी बढ़कर कुछ है ?
232
सनत्कुमार—हां है।
232
नारद—भगवन्, मुझे उपदेश दें।
232
दसवाँ खण्ड
232
अन्न से बढ़कर जल है। इसलिए जब अच्छी वर्षा नहीं होती है, तो प्राण दुःखो होते हैं। अन्न कम पैदा होता है और अच्छी वृष्टि होने पर प्राण पुलकित होते हैं। खूब अन्न पैदा होता है। जितने मूर्तिमान पदार्थ हैं सब जलमय हैं। पृथिवी, अन्तरिक्ष, सुलोक, देव, मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट पतंग आदि जल ही की सब मूर्तियाँ हैं। इसलिए जल की उपासना करो।
232
जो जल को बड़ा मानकर इसकी उपासना करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है। और तृप्त होता है—जो जल को महान समझता है।
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२३८
नारद—भगवन्, जल से बढ़कर कुछ है ।
२३८
सनत्कुमार—हाँ है ।
२३८
नारद—भगवन्, मुझे उपदेश दें ।
२३८
जल से बढ़कर तेज है । यही तेज वायु के साथ आकाश को तपाता है । तब लोग कहा करते हैं—बहुत गर्मी पड़ रही है । जबर पानी बरसेगा । तेज ही उसे दिखाकर फिर पानी वरसाता है । वही ऊपर जाने वाली और तिरछी गति वाली बिजली को प्रकट करता है । तब लोग कहते हैं कि बिजली चमक रही है, बादल गरज रहे हैं । तेज ही उस दृश्य को दिखाकर जल उत्पन्न करता है । इसलिये तेज की उपासना करो ।
२३८
जो तेज को महान् समझ कर इसकी उपासना करता है, वह तेजस्वी बनकर प्रकाशमय लोकों को प्राप्त करता है । जहाँ तक तेज की पहुँच होती है, वहाँ तक उसकी भी पहुँच हो जाती है । जो तेज को महान् समझता है ।
२३८
नारद—भगवन्, तेज से भी बढ़कर कुछ है ।
२३८
सनत्कुमार—हाँ है ?
२३८
नारद—भगवन्, मुझे उपदेश दें ।
२३८
तेज से बढ़कर आकाश है । आकाश ही में सूर्य, चन्द्र, बिजली और नक्षत्र हैं । आकाश के द्वारा किसी को पुकारा जाता है और आकाश के द्वारा ही सुना जाता है । आकाश में क्रिड़ा करता है
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२३४
२३४ : छान्दोग्योपनिषद्
२३४
और श्राकाश में रमता नहीं। श्राकाश में उत्पन्न होता और श्राकाश को प्रकट करता। इसलिए श्राकाश की उपासना करो ?।
२३४
जो कोई श्राकाश को बड़ा समझ कर इसकी उपासना करना है, वह श्राकाश की भाँति बनकर श्रन्थकार, पीड़ा रहित, विस्तीर्ण लोगों को प्राप्त करता है। जहाँ तक श्राकाश की पहुँच होती है। वहाँ तक उसको भो पहुँच हो जाती है। श्राकाशा को 'जो महान् समभता है।
२३४
नारद—भगवन्, श्राकाश से भी कुछ बढ़कर है।
२३४
सनत्कुमार—हाँ है।
२३४
नारद—मुझे उपदेश दें।
२३४
तेरहवाँ खण्ड
२३४
श्राकाश से बढ़कर स्मृति है। क्योंकि यदि स्मृति न रह जाए तो लोग न तो कुछ सुन सकेंगे, न विचार कर सकेंगे, न 'जान सकेंगे। स्मरण होते ही वे जान सकेंगे। स्मृति ही से मनुष्य पुत्रों को जानता है। पशुओं को पहचानता है। इसलिए स्मृति की उपासना करो ?
२३४
जो कोई स्मृति की उपासना करता है, तो वह जहाँ तक स्मृति की पहुँच होती है, वहाँ तक श्रपनी पहुँच कर लेता है। 'जो स्मृति को बड़ी समझ कर उपासना करता है।
२३४
नारद—भगवन्, स्मृति से भी बढ़कर कुछ है ?
२३४
सनत्कुमार—हाँ है।
२३४
नारद—भगवन्, मुझे उपदेश दें।
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234
चौदहवाँ खण्ड
234
आाशा ही सृष्टि से बढ़कर है। आशा से उत्साहित मनुष्य स्मरता शील होकर मन्त्रों को पढ़ता है। कमों को करता है। पुत्रों और पशुश्रों की इच्छा करता है। इसलोक और परलोक को समना रखता है। इसलिए आशा को काम में लाओगे ?
234
जो आशा को बड़ो समझ कर इसका उपयोग करता है, उसकी सभी कामनाएँ बढ़ती हैं। उसकी प्रार्थनाएँ पूरी होती हैं। और जहाँ तक आशा की पहुँच होती है, वहाँ तक उसकी भी पहुँच हो जाती है।
234
नारद--भगवन्, आशा से भी बढ़कर कुछ है ?
234
सनत्कुमार--हाँ है।
234
नारद--भगवन्, उसका उपदेश मुझें दें।
234
पन्द्रहवाँ खण्ड
234
आशा से बढ़कर प्राण है। जैसे पहिये की धुरी में चारे डुंडे हुए रहते हैं। इसी प्रकार प्राण में सब पिरोये रहते हैं। प्राण प्राण के से व्यवहार करता है। प्राण प्राण्णी को जीवन देता है। और प्राण के लिए देता है। प्राण ही पिता है, प्राता है, भाता है, बहिन है, आचार्य है और ब्राह्मण है।
234
यदि कोई पुरुष पिता, माता, भाई, बहिन, आचार्य या ब्राह्मण को कुछ अनुनचित शब्द कहता है, तो 'तुम धिक्कार हो'—ऐसा ही कहते हैं। निश्चय तूने पिता, माता, भाई, बहिन, आचार्य और ब्राह्मण का घातक है।
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२३६
२३६ : छान्दोग्यउपनिषद्
२३६
यदि मरे हुए पिता, माता, भाई, बहिन आदि को शूल से इकट्ठा कर जला दिया जाता है, तो उस जलाने वाले को पिता, माता, बहिन आदि को मारने वाला कोई नहीं कहता।
२३६
निश्चित ही पिता, माता, भाई, बहिन आदि प्राण ही होता है। निश्चय ही प्राण की उपासना करने वाला इस प्रकार देखता (मानता और जानता हुत्रा श्रतिवादी)--सबसे परे वस्तु को प्रकट करने का जिसका स्वभाव हो--कहा जाता है। उसको यदि कहा जाय कि तू श्रतिवादी है, तो वह अपने को श्रतिवादी स्वीकार करे--छिपाए नहीं।
२३६
सोलहवाँ खण्ड
२३६
जो सत्य को सबसे बढ़कर कहता है--निश्चय ही वहु श्रतिवादी है। इसलिए हे भगवान्, मैं श्रतिवादी बनूँ।
२३६
सनत्कुमार--तब तो सत्य को ही जानने की इच्छा रखनी चाहिए।
२३६
नारद--हे भगवान्, मैं सत्य की ही जिज्ञासा रखता हूँ।
२३६
सत्रहवाँ खण्ड
२३६
जब कोई बात भली-भाँति जानी जाती है, तब सत्य ही बोलता है। न जानता हुत्रा सत्य नहीं बोलता। जानता हुत्रा ही सत्य बोलता है।
२३६
सनत्कुमार--विज्ञान की ही जिज्ञासा रखनी चाहिए।
२३६
नारद--भगवन्, मैं विज्ञान नहीं की जिज्ञासा रखता हूँ।
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अठारहवाँ खण्ड
जब मनुष्य मनन करता है, तभी जानता है। जो मनन नहीं करता है, वह नहीं जानता है मनन करने पर ही जानता है।
सनत्कुमार—इसलिए मनन की ही जिज्ञासा है।
नारद—भगवन्, मैं मनन की ही जिज्ञासा रखता हूँ।
उन्नीसवाँ खण्ड
जब श्रद्धा की उत्पत्ति है, तभी मनन होता है। श्रद्धा न रहने पर मनन नहीं हो सकता। इसलिए श्रद्धा ही जिज्ञासा करने योग्य है।
नारद—भगवन्, मैं श्रद्धा को जिज्ञासा करता हूँ।
बीसवाँ खण्ड
जब कोई निष्ठा करता है, तभी वह श्रद्धा करता है। निष्ठा न करने पर श्रद्धा नहीं हो सकती। निष्ठा करने पर ही श्रद्धा हो सकती है।
सनत्कुमार—इसलिए निष्ठा ही जिज्ञासा के योग्य है।
नारद—हे भगवान्, मैं निष्ठा की जिज्ञासा करता हूँ।
इक्कीसवाँ खण्ड
जब मनुष्य कृति करता है, तभी निष्ठा करता है, कुछ न करने पर निष्ठा भी नहीं करता। करने पर ही निष्ठा करता है।
सनत्कुमार—इसलिए कृति की ही जिज्ञासा करनी चाहिए।
नारद—भगवन्, मैं कृति की ही जिज्ञासा करता हूँ।
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२३९
बाईसवाँ खण्ड
२३९
निश्चय ही, जब मनुष्य सुख पाता है, तब कर्म करता है। बिना सुख प्राप्त किए कोई नहीं करता। सुख प्राप्त करने पर ही कोई करता है।
२३९
सनत्कुमार—सुख की ही तुम्हें जिज्ञासा करनी चाहिए।
२३९
नारद—भगवन्, मैं सुख की जिज्ञासा करता हूँ।
२३९
तेईसवाँ खण्ड
२३९
वस्तुतः जो भूमा है, वही सुख है। अन्य वस्तु में सुख नहीं है। भूमा ही सुख है। इसलिए भूमा की ही जिज्ञासा करनी चाहिए।
२३९
नारद—भगवन्, मैं भूमा की ही जिज्ञासा करता हूँ।
२३९
चौबीसवाँ खण्ड
२३९
जब मनुष्य न कुछ और देखता है, न कुछ और सुनता है, न कुछ और जानता है वह भूमा है। और जब कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है; कुछ और जानता है, वह अल्प है। जो अल्प है वह मरने योग्य है।
२३९
नारद—भगवन्, वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है।
२३९
सनत्कुमार—न तो वह अपनी महिमा में और न किसी की महिमा में प्रतिष्ठित है।
२३९
इस संसार में गाय, घोड़े, हाथी, सोना, दास, भार्याँ, क्षेत्र और घर को महिमा कहते हैं। लेकिन मैं इसे महिमा नहीं कहता। क्योंकि इसमें अन्य अन्य में प्रतिष्ठित है।
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236
छान्दोग्योपनिषद् : २३६
236
पच्चीसवाँ खण्ड
236
वही 'भूमा नीचे है, वही ऊपर है, वही पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में है। वही यह सब है। वही उस भूमा का स्वाहंकार आदेश है। मैं नीचे, ऊपर, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में हूँ। मैं ही सब कुछ हूँ।
236
अब यहाँ उस भूमा का आत्मा आदेश बताया जाता है— आत्मा ही, पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण सब कुछ है। जो बुद्धिमान इसे इस प्रकार देखकर, सुनकर, जानकर, मनन कर आत्मा में लीन होता है वह आत्मा की स्वाधिपति होता है। उसकी सब लोकों में गति होती है। और जो इस शिक्षा के विरुद्ध जानतें हैं, वे नाशवान लोक को प्राप्त होते हैं। वे सभी लोकों में स्वेच्छा- गमन करते हैं।
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छब्बीसवाँ खण्ड
236
निरचय है, जो इस प्रकार देखता है, सुनता है, जानता है और मनन करता है उसे आत्मा ही से सब कुछ प्राप्त होता है। आशय, श्रविभाव, तिरोभाव, ज्ञान, बल, विज्ञान, ध्यान, चित्त, संकल्प मन, वाणी नाम मंत्र, कर्म—ये सब प्राप्त होते हैं।
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निम्नांकित यह श्लोक*इस विषय में प्रमाण है—साच्ची मूत्यु को नहीं देखता है और न रोग और दुःखों को देखता है। प्रज्ञान है; कि वह ब्रह्म का साच्ची सब को देखता है। वह सब प्रकार से सब को प्राप्त कर लेता है।
236
वह प्रारम्भ में एक ही था फिर तीन, पाँच, सात और नव प्रकार का होता है। फिर वह तेरह प्रकार का होता है, फिर और
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२४० : छान्दोग्योपनिषद्
सौ दस प्रकार का फिर एक हजार प्रकार का और फिर बीस हजार प्रकार का हो जाता है।
आहार के शुद्ध होने पर अन्तःकरण शुद्ध होता है। अन्तःकरण के शुद्ध होने पर भूमा की दृढ़ स्मृति होती है। और स्मृति में दृढ़ता होने पर हृदय की गांठें खुल जाती हैं। भगवान् सनत्कुमार ने नारद को दिखा दिया कि उनके राग-द्वेष रूप दोष घुल गए, ग्रन्थि-कार का आखिरी किनारा दिखा दिया। उस सनत्कुमार को लोग स्कन्द कहते हैं। स्कन्द कहते हैं।
छान्दोग्योपनिषद्
अष्टम प्रपाठक
पहला खण्ड
इस ब्रह्मपुर ( शरीर ) में जो सूक्ष्म कमल गृह है तथा इसमें जो सूक्ष्म अन्तर आकाशा है—उसमें जो खोजने योग्य है, वही जिज्ञासा करने योग्य भी है।
यदि कोई आचार्य से पूछे कि इस शरीर में जो कमल गृह है उसके मध्यवर्ती जो सूक्ष्म आकाश है, उसमें खोजने योग्य क्या है? तो आचार्य का उत्तर देना चाहिए कि—जितना यह बाहर दिखायी पड़ने वाला आकाश है, उतना ही यह हृदय के अन्दर का आकाशा है। बाहरी आकाश के चुलोक और पृथ्वीलोक दोनों अग्नि और वायु, सूर्य और चन्द्रमा विद्युत और नक्षत्र एवं इस आत्मा का इस लोक में जो कुछ है और जो कुछ नहीं है वह सब हृदय के इस आकाश में विद्यमान है।
यदि कोई आचार्य से फिर प्रश्न करे कि इस शरीर में यदि सब कुछ समाया हुच्रा है, समस्त प्राणी और समस्त कामनाएँ भी हैं तो फिर जब इस शरीर की वृद्धावस्था होती है तो शरीर अवश्य नष्ट हो जाता है तब फिर शेष क्या रह जाता है?
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४७
इस पर उस श्राचायँ को यह उत्तर देना चाहिए—‘कि इस शरीर के वृद्ध हो जाने पर आत्मा नहीं वृद्ध होता है । इस शरीर के वध से आत्मा नहीं मरता । यह ब्रह्मपुर ( शरीर ) अविनाशी है—सत्य है । इसमें सभी कामनाएँ समायी हुई हैं । यह आत्मा पापरहित, बुढ़ापे से पृथक्, मृत्यु से श्रलग, शोक से खाली, ग्रहने-दानने की इच्छा से शून्य, सत्य काम और सत्य संकल्पमय है । जैसे प्रजाएँ राजा के ऋतुकूल चलती हैं, जिस प्रदेश, जिस जनपद् ( राज्य ) जिस राज्य के भाग्य की कामना करने वाली होती हैं, उसी का वे उपभोग करती हैं ।
४७
जैसे यहाँ कर्म से प्राम लोक चीज़े हो जाते हैं, वैसे परलोक में पुण्य कमों से उपार्जित भोग चीज़ें हो जाते हैं । जो लोग आत्मा की खोज किए बिना और इन सत्य कामनाओं को जाने बिना चले जाते हैं, उनका सब लोकों में स्वेच्छा गमन नहीं होता और जो यहाँ से आत्मा तथा इन सत्य कामनाओं की खोज करते जाते हैं, उनका सभी लोकों में स्वच्छन्द गमन होता है ।
४७
दूसरा खण्ड
४७
यदि वह पितृलोक की कामना रखता है, तो उसके संकल्प ही से उसके पिता उसके समीप उपस्थित होते हैं । उस पितृलोक से वह महत्त्व प्राप्त करता है । यदि वह मातृ लोक का इच्छुक होता है, तो उसके संकल्प ही से माताएँ उसके ममाने उपस्थित हो जाती हैं । उन माताओं मे वह वह महत्त्व को प्राप्त करता है । तथा यदि वह भ्रातृलोक की इच्छा रखता है, तो उसके संकल्प मात्र में भ्राता उपस्थित हो जाते हैं, उन भाइयों से सम्पन्न होकर वह वह महत्त्व को प्राप्त करता है ।
४७
१६
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242
यदि़ स्वर्ग लोक की इच्छा रखता है, तो उसके संकल्प मात्र से बहिनें उपस्थित होती हैं, और वह उनसे सम्पन्न होकर महत्व को प्राप्त करता है। यदि वह सखा लोक की इच्छा रखता है, तो उसके संकल्प मात्र से सखागण उपस्थित होते हैं। और वह उनसे सम्पन्न होकर महत्व को प्राप्त करता है।
242
यदि़ वह गन्धमाल्य लोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से ही गन्ध और माल्य उपस्थित होती हैं। उनसे सम्पन्न होकर वह अपनी महिमा का अनुभव करता है। यदि वह षत्र्न पान लोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से षत्र्न पान उपस्थित हो जाते हैं। उनसे सम्पन्न होकर वह महत्व को प्राप्त करता है।
242
यदि वह गीत-वादित्र लोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से ही गाने और बाजे उपस्थित हो जाते हैं। उनसे सम्पन्न होकर वह महत्व को प्राप्त करता है। यदि वह स्त्री लोक की कामना करता है, तो उसके संकल्प मात्र से स्त्रियाँ उपस्थित हो जाती हैं। उनसे वह महत्व को प्राप्त करता है। वह जिस जिस प्रदेश की कामना करता है। वे उसके संकल्प मात्र से ही पूरे हो जाते हैं। उनसे सम्पन्न होकर वह महिमा का अनुभव करता है।
242
तीसरा खण्ड
242
वे ये कामनाएँ सत्य होने पर भी झूठ से ढकी हुई हैं। हर्दय में वर्तमान सत्य कामनाओं का झूठ ढकना है। इससे संबंधित जो मर कर यहाँ से चला जाता है उसको यहाँ देखने के लिए नहीं पाता।
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परोक्ष में स्थित जीवित या मरे हुए सम्बन्धियों को मनुष्य चाहे जगतमें स्वेच्छानुसार अपनी आँखों से नहीं देख सक्ता।
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247
परन्तु हृदय में स्थित ब्रह्म की निकटता प्राप्त कर लेने पर उसकी अव्यक्त शक्तियाँ व्यक्त हो जाती हैं। शक्तियों के व्यक्त होने पर अनृत (असत्य) का परदा हट जाता है। यद्यपि ये सब कामनाएँ सत्य हैं।लेकिन फिर भी अनृत से ढकी हुई हैं। जैसे खेत के अन्दर की हालत न समभने वाला किसान ऊपर ही ऊपर हलचलाता हुया जमोन के नीचे गड़े हुए सोने के खजाने को नहीं जान पाता, वैसे ही ये सब प्रज्ञाएँ दिन प्रति दिन ब्रह्म के उदेश्य से जाती हुई भी ब्रह्म लोक को नहीं पाती हैं। क्योंकि अनृत से ढकी हुई हैं।
247
निश्चय यह आत्मा हृदय में है। उस हृदय शब्द का 'हार्द-ध्ययम्' यही निरुक्त--निर्मचन है। यह हृदय कहलाता है—ऐसा जानने वाला विद्वान् निश्चय स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है।
247
गुरू ने शिष्य को बताया कि यह जो निर्मल आत्मा शरीर को छोड़कर परम ज्योति को प्राप्त कर अपने असली रूप परमात्मा को चारों ओर से प्राप्त करता है—यही जिसको आत्मा ने प्राप्त किया है परमात्मा है। यही अमृत है, यही अभय है, यह ब्रह्म है, बस इस ब्रह्म का नाम सत्य है।
247
निश्चय वे ये तीन अक्षर हैं? स, ति, यम् इन तीन अक्षरों से सत्य बनता है। यह जो 'सत्' है वह अमृत है, और जो 'ति' है वह मृत्यु है तथा' जो 'यम्' अक्षर है वह स और ति दोनों का नियम करता है। इसलिए यम कहलाता है। ऐसा जानने वाला निश्चय प्रतिदिन स्वर्ग को प्राप्त होता हैं।
247
तृतीया खण्ड
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आत्मा और परमात्मा दोनों समस्त लोकों की रक्षा के लिये पुल रूप होकर उन्हें धारण करते हैं। उस ईश्वर रूप सेतु को
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२४४
२४४ : छान्दोग्योपनिषद्
२४४
रात, बुढ़ापा, मृत्यु, शोक तथा श्रच्छे बुरे कर्म नहीं लांघ सकते हैं। इस ब्रह्म प्राप्त जीव से समस्त पाप निवृत्त हो जाते हैं। क्योंकि ब्रह्मलोक पापरहित है। इसीलिए इस सेतु को पारकर ब्रह्मा देखने वाले हो जाते हैं, धायिल भाव रोहित हो जाते हैं। रोगी नीरोग बन जाता है। इसीलिए इस सेतु को पारकर रात भी दिन ही हो जाता है—क्योंकि यह ब्रह्मलोक सदैव प्रकाशमय है।
२४४
इसलिए जो इस ब्रह्मलोक को ब्रह्मचर्य से प्राप्त करते हैं, उन्हीं का यह ब्रह्मलोक है। वे समस्त लोकों में स्वेच्छा गमन करते हैं।
२४४
पाँचवाँ खण्ड
२४४
जो यज्ञ कहा जाता है, वहो ब्रह्मचर्य है! क्योंकि ब्रह्मचर्य ही से ब्रह्मज्ञ ब्रह्मलोक की प्राप्ति करता है। जिसे 'इष्ट' कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य है। क्योंकि ब्रह्मचर्य ही से इष्ट परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। सत्यायन नाम का यज्ञ भी ब्रह्मचर्य है। क्योंकि ब्रह्मचर्य ही से सर्वदा विचमान अविनाशी जीवात्मा की रक्षा पाता है। जिसे मौन कहा जाता है—वह भी ब्रह्मचर्य है, क्योंकि ब्रह्मचर्य ही से परमात्मा को जानकर मनन करता है।
२४४
जो श्रनाशकायन यज्ञ है—वह ब्रह्मचर्य ही है। क्योंकि ब्रह्मप्राप्ति के लिए 'आर' और 'स्य' दो समुद्र हैं। यहाँ से तीनों लोकों में 'परमन्दीय' सरोवर हैं। वहाँ अमृत टपकता हुश्रा एक पीपल का वृक्ष है। वहाँ एक प्रजेय ब्रह्म की पुरी है और प्रभु निर्मित एक हिरण्यमय है।
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जो लोग ब्रह्मलोक की प्राप्ति के लिए 'आर' और 'स्य' नाम के इन दोनों समुद्रों को ब्रह्मचर्य से पार करते हैं—वही ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं। और समस्त लोकों में उनकी स्वच्छन्दगति होती है।
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छठाँ खण्ड
हृदय की नाड़ियाँ मूरे रंग वाले सूक्ष्म रज से पूरित हैं। सफेद, ले, पीले और लाल रंग वाले सूक्ष्म रज से पूरित हैं। निश्चित यह ये भूरे, सफेद, नीले, पीले और लाल रंग का है।
जैसे समस्तान्तर में स्थित दो गाँवों को स्पर्श करता हुआ उनके बीच से एक लम्बी चौड़ी सड़क जाती हैं, उसी प्रकार सूर्य की किरणें शरीर सूर्य मंडल दोनों लोगों को जाती हैं। वे किरणें उस यी से निकलती हैं और इन नाड़ियों में प्रविष्ट होती हैं। वे ऋषयें इन नाड़ियों से निकलती हैं और सूर्य में प्रविष्ट होती हैं।
जब सोता हुआ आत्मा अपने आप में लीन होकर सुपुप्ति अवस्था को प्राप्त होता है, कुछ स्वप्न भी नहीं देखता है—आनन्द का अनुभव करता है। तब उसका जीवात्मा हृदय की इन्हीं नाड़ियों में प्रविष्ट रहता है। उसे कोई पाप स्पर्श नहीं करता क्योंकि वह तेज से युक्त होता है।
और जब वह व्यक्ति मृत्यु निकट आ जाने से दुर्बलता को प्राप्त होता है, तब उसके चारों ओर बैठकर उसके परिवार वाले रहते हैं—लुम्क को पहचानते हो? जब तक जीव शरीर से बाहर नहीं होता तब वह जानता रहता है। जब वह शरीर से बाहर निकल जाता हैं। तब इन्हीं रशियों के द्वारा जो सूर्य से लेकर शरीर तक फैली रहती हैं, ऊपर चढ़ता है। वह इन्हीं का उपकारख करता हुआ हृदय ऊपर ही को चढ़ता है। जितने समय तक में वह आदित्य में पहुँच कर सौरी दशा को प्राप्त होता है। निश्चित वह सौरी दशा ही ब्रह्म लोक का मुख्य द्वार है। वह द्वार ज्ञानियों के लिए खुला रहता है और अज्ञानियों के लिए बन्द रहता है।
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२४६
२४६ : छान्दोग्य उपनिषद्
२४६
इस सम्बन्ध में यह श्लोक प्रमाण है—
२४६
हृदय में १०१ नाड़ियाँ हैं, उनमें से एक मूर्धा की ओर निकली हुई है। उसी नाड़ी से जीव ऊपर की ओर जाकर अमृत तत्व को प्राप्त करता है। अन्य नाड़ियों के द्वारा यदि निकलवा है, तो भिन्न गति को प्राप्त होता है।
२४६
सातवाँ खण्ड
२४६
कहा जाता है, कि प्रजापति ने एक बार कहा—कि जो परमात्मा पाप, जरा, मृत्यु, शोक, भूख, प्यास से रहित और सत्य संकल्पमय है, वह खोजने योग्य और जानने योग्य है। जो उसे खोजकर जान लेता है, वह सम्पूर्ण लोकों और समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है। प्रजापति के इन वचनों को सुनकर देवों और असुरों ने कहा—कि अच्छा है आत्मा की खोज करें। जिस आत्मा को खोजकर मनुष्य सब लोकों और सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। यह निश्चित कर देवों में इन्द्र और असुरों में से विरोचन प्रजापति के पास गए। वे दोनों आपस में कुछ भी न बोलते हुए हाथ में समिधा लिए हुए प्रजापति के समीप बैठ गए।
२४६
वे दोनों बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक प्रजापति के पास रहे। प्रजापति ने उन दोनों से कहा—कि यहाँ रहते हुए तुम क्या चाहते हो? वे दोनों बोले—जो आत्मा पाप, जरा, मृत्यु, शोक, भूख, प्यास से रहित हैं और सत्य काम, सत्य संकल्पमय है, वह खोजने योग्य और जानने योग्य है। जो उसे खोजकर जान लेता है वह समस्त लोकों और कामनाओं को पा लेता है। ऐसा आपका कहना है—जिसे विद्वान लोग दुहराया करते हैं। उसको समझने, जानने के लिए हम यहाँ उपस्थित हुए हैं।
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24J
छान्दोग्योपनिषद् : २४J
उन दोनों से प्रजापति ने कहा—जो यह पुरूष श्राँख में दिखायी देता है, वही श्रात्मा है। यह श्रमृत है, श्रभय है, इन्द्र और विरोचन बोले—भगवन् जो जल में दिखायी पड़ता है श्रौर दर्पण में दिखायी पड़ता है उनमें कौन श्रात्मा है ? प्रजापति ने कहा—जो इन सब में दिखायी पड़ता है वही श्रात्मा है।
उपाठवाँ खण्ड
जल भरे हुए मिट्टी के पात्र में देखो यदि देखने के बाद श्रपने को न समभ सकें तब सुभे कहो। प्रजापति की बात मान कर इन्द्र श्रौर विरोचन मिट्टी के पात्र में जल भर कर उसमें देखने लगे तो प्रजापति ने कहाँ—क्या देखते हो ? दोनों बोले—भगवन्, हम दोनों शिर से लेकर पैर तक श्रपने शरीर को देख रहे हैं।
प्रजापति ने कहा—तुम दोनों वस्त्रालंकृत होकर जल भरे हुए शकोरे में श्रपने को देखो ? ऐसा सुनकर उन दोनों ने वस्त्रालंकृत होकर जल भरे शकोरे में श्रपने को देखा तब प्रजापति बोले—क्या देख रहे हो ?
उन दोनों ने कहा—भगवन्, हम दोनों ने यही देखा कि हम दोनों सुन्दर, स्वच्छ हैं। प्रजापति ने कहा—यही श्रात्मा है। यह श्रमृत, श्रभय श्रौर महान् है। दोनों शान्त हृदय होकर चले गए।
उन दोनों को जाते हुए देखकर प्रजापति बोले—ये दोनों श्रात्मा को न पहचानते हुए, न जानकर ही जा रहे हैं। इनमें से जो देव या श्रसुर इस उपनिषद् ( यह ही श्रात्मा है ) के मानने वाले होंगे वे पराजित होंगे। वह विरोचन शान्त हृदय होकर श्रसुरों के पास पहुँचा श्रौर उन से बोला कि इसलोक में शरीर ही श्रात्मा है। शरीर
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२४ : छान्दोग्योपनिषद्
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ही पूजा और सेवा के योग्य हैं। जो इस शरीर की पूजा सेवा करता है, वह इसलोक और परलोक को प्राप्त करता है।
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इसलिए आज भी दान न देने वाले, श्रद्धा न रखने वाले और यज्ञान करने वालों को खेद के साथ असुर जाति का कहा जाता है। क्योंकि यह उपनिषद् असुरों की है।
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मरे हुए शरीर के शव को गन्ध-माल्य से तथा वस्त्रालंकार से सुसज्जित करते हैं। उनकी यह धारणा है, कि वे परलोक को जीत लेंगे।
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नवाँ खण्ड
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इसके विपरीत इन्द्र देवताओं के पास न जाकर आशंकित मन से सोचने लगा कि जिस प्रकार शरीर की सजावट से छाया पुरुष सुन्दर लगता है।
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इसी प्रकार इस शरीर के अन्धे, काने, कुबड़े, लूले, लंगड़े तथा छिन्न भिन्न होने से छाया पुरुष भी विकलांग होगा। इस शरीर के नष्ट हो जाने पर यह छाया पुरुष भी नष्ट हो जाता है।
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ऋतपव मैं इस उपनिषद् को कल्याणकारी नहीं समझता।
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यह निश्चय कर इन्द्र हाथ में समिधा लेकर पुनः प्रजापति के पास गया प्रजापति ने कहा, प्रिय तुम तो विरोचन के साथ शान्त हृदय होकर चले गए थे, फिर क्यों वापस आ गए।
24
इन्द्र बोला-भगवन्, मैंने सोचा है, कि जिस प्रकार इस शरीर के वस्त्रालंकार से सजे होने पर छाया पुरुष भी सुन्दर और स्वच्छ जान पड़ता है, उसी प्रकार इसके अन्धे, काने, कुबड़े, लूले, लंगड़े और विकलांग होने पर यह छाया पुरुष भी विकलांग हो सकता है।
24
इसके नष्ट होने पर छाया पुरुष भी नष्ट हो सकता है। इसलिए मैं इस उपनिषद् को आसुरभावों वाला समझकर इसे कल्याणप्रद नहीं समझ सका हूँ।
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248
प्रजापति बोले—इन्द्र, जो तुम मोच रहे हो यही ठीक है। ऋतएव इसीलिए आत्मा की दृश्यया तुम्हारे लिए फिर करूँगा। तुम ३२ वर्ष तक फिर यहाँ निवास करो ! इन्द्र ३२ वर्ष तक प्रजापति के यहाँ रहा।
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दसवाँ खण्ड
248
प्रजापति ने कहा—जो यह स्वप्नावस्था में अपनी अपनी महिमा का अनुभव करता है—यही आत्मा है। यह अमृत है, यह अभय है और महान है। यह सुनकर इन्द्र शान्त हृदय होकर चला गया। लेकिन वह देवताओं के पास न जाकर पुनः सोचने लगा कि यद्यपि स्वप्नावस्था में शरीर अन्यथा होता है तो भी वह स्वप्नात्मा अन्यथा नहीं होता। यदि शरीर स्वप्न में काना होता है तो आत्मा काना नहीं होता। शरीर के दोष से निश्चय वह स्वप्नात्मा दृष्टित नहीं होता।
248
इस शरीर के बन्ध से उसका बन्ध नहीं होता, उसके काना होने पर वह काना नहीं होता। परन्तु इस स्वप्नावस्था का मानो कोई मार रहा है, कोई भगा रहा है। मानो यह अमित्र वेत्ता हो रहा है और मानो रो रहा है। मैं इसमें कल्याण नहीं देखता हूँ।
248
वह हाथ में समिधा लेकर फिर प्रजापति के पास आया। प्रजापति ने कहा—प्रिय, तुम तो शान्त हृदय होकर चले गए थे अब किसलिए वापस आए हो। इन्द्र बोला—भगवन्, यद्यपि यह शरीर अन्यथा होता है, परन्तु वह स्वप्नात्मा अन्यथा नहीं होता। यदि शरीर काना होता है तो वह आत्मा काना नहीं होता। यह आत्मा इस शरीर के दोष से कदापि दृष्टित नहीं होता।
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इस शरीर के बन्ध से बन्ध नहीं होता। इसके काना होने से काना नहीं होता। परन्तु इस स्वप्नात्मा को मानो कोई मार रहा
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२५० : छान्दोग्योपनिषद्
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है, भग्न रहो है मानो यह स्वप्नियवत्ता हो रहा है। श्रोत्र रो रहा है। मैं इसे कल्याणमय नहीं समकता। प्रजापति बोले—इन्द्र, तुम ठीक कहे रहे हो, इसे आत्मा का व्याख्यान मैं फिर कहूँगा। ३२ वर्ष तक तुम हो, यहाँ निवास करो? इन्द्र ने प्रजापति के यहाँ ३२ वर्ष तक निवास किया।
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ग्यारहवाँ खण्ड
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तब प्रजापति बोले—जब यह सोचा हुआ प्रसन्न चित्त होकर स्वप्न करता हुआ स्वप्न नहीं देखता है—यही आत्मा है। यह अमृत है, अभय है और महान है। यह सुनकर इन्द्र शान्त हृदय से चला गया। लेकिन देवों के पास पहुँचने से पहले उसे यह शंका हुई कि यह सोचा हुआ आत्मा निश्चय रूप से अपने को यह नहीं जानता कि मैं कौन हूँ, और न इन भूतों को ही जानता है। मनो विनाश को प्राप्त हो जाता है। मैं इस शिक्षा को कल्याणमय प्रद नहीं समकता।
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यह सोचकर वह हाथ में समिधा लिए हुए प्रजापति के पास पहुँचा। प्रजापति ने कहा—इन्द्र, तुम तो शान्त हृदय से गए थे। फिर क्यों लौट आये? इन्द्र ने कहा—भगवन्, वह सोचा हुआ आत्मा ठीक ढंग से अपने को नहीं जानता कि मैं कौन हूँ। और न उन भूतों को ही जानता है। मनो विनाश को प्राप्त हो गया है। मैं इसे कल्याणमय प्रद नहीं समकता।
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प्रजापति ने कहा—इन्द्र, तुम ठीक कहते हो। सुपुप्तात्मा ऐसा ही है। मैं तुम्हें पुनः आत्मा का व्याख्यान बताऊँगा। इस आत्मा से मित्र का व्याख्यान नहीं करूँगा। बस सिर्फ पाँच वर्ष तक तुम और यहाँ रहो? वह इन्द्र पाँच वर्ष तक और वहाँ रहा। इस
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छान्दोग्यउपनिषद् : २५७
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प्रकार कुल मिलाकर १०१ वर्ष हो गए । इसीलिए यह कहा जाता है कि इन्द्र निश्चित रूप से १०१ वर्ष तक प्रजापति के पास रहे ।
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तीारहवाँ खण्ड
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प्रजापति ने इन्द्र से कहा—इन्द्र, यह शरीर निःसंदेह नश्वर है । मृत्यु से मसा हुया है । यह शरीर-अमय, शरीर-रहित जीवात्मा का वास स्थान है । निश्चय शरीर के साथ जीवात्मा सुख और दुःख से गृहीत है । शरीर में लिप्त हुए सुख और दुःख कभी नष्ट नहीं होते । शरीर से रहित होने पर सुख दुःख कभी स्पर्श नहीं होते ।
257
वायु शरीर रहित हैं । बादल, बिजली और गर्जन ये शरीर रहित हैं । जैसे ये बादल श्राकाश से उठकर पर ज्योति (अपनी सत्ता) को प्राप्त कर अपने रूप से प्रकट होते हैं, उसी प्रकार यह जीवात्मा निर्मल होकर इस शरीर से छूट कर पर ज्योति को प्राप्त कर अपने रूप से प्रकट होता है । वह उत्तम पुरुष है । वहाँ वह जीव हँसता हुया, प्रसन्न होता हुया स्त्रियों, परिचितों, बन्यु- बान्धवों के साथ यानों में विहार करता है । वहाँ वह अपने पूर्व शरीर का स्मरण नहीं करता । हे इन्द्र, जैसे रथ में घोड़ा जुता रहता है उसी प्रकार यह जीव प्राण के साथ शरीर में जुता रहता है ।
257
जहाँ यह नेत्र श्राकाशा ( श्राँख का छिद्र ) में जुड़ा रहता है । वहाँ श्राँख में रहने वाला पुरुष जीवात्मा यहीं है । उसके देखने के लिए नेत्र हैं । और जो 'इसे सूँघूँ' ऐसे जानता है, वह आत्मा है । गन्ध ग्रहण करने के लिए घ्राणइन्द्रिय है । और जो 'यह बोलूँ' वह आत्मा है । बोलने के लिए वाकइन्द्रिय है । और जो ऐसा जानता है । कि 'मैं इसे सुनूँ' वह आत्मा है ।
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१५२
१५२ : छान्दोग्योपनिषद्
१५२
सुनने के लिए कान हैं। तथा जो ऐसा जानता है कि "मैं इसे मनन करूँ" वह आत्मा है। इस जीवात्मा का दिव्यनेत्र मन है। इसीसे यह कामनाओं को देखता हुद्रा आनन्द भोग करता है। ब्रह्मलोक में जो मुक्त जीव हैं, वे इस परमात्मा की उपासना करते हैं। इसलिए उन्हें सब लोक और सब कामनाएँ प्राप्त होती हैं। वह सब लोकों और सब कामनाओं को प्राप्त करता है। जो इस परमात्मा को खोज करके जान लेता है—ऐसा प्रजापति ने कहा!
१५२
तृतीयहवाँ खण्ड
१५२
श्याम ( काला ) से शबल ( चितकबरा ) को प्राप्त करता हूँ। शबल से श्याम को प्राप्त होता हूँ। घोड़ों की तरह बालों को माड़-कर अथवा चन्द्रमा की तरह राहु के मुख से, पाप से छूटकर और शरीर को छोड़कर—कृतकृत्य होकर नित्य ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ। नित्य ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ।
१५२
नवदहवाँ खण्ड
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निश्चय ही आकाश नामक ब्रह्म ही जगत् के बाह्य दृश्याँ का प्रकाशक है। वे नाम और रूप जिसके अन्र्त हैं—वह ब्रह्म है। वह अमृत है, वही परमात्मा है। मैं प्रजापति के आकाशमय गृह—ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ। मैं यशस्वी होऊँ। ब्राह्मणाँ, क्षत्रियों और वैश्याँ के यश को प्राप्त होऊँ। श्वेतरक्तिमय, दाँत रहित जननेन्द्रिय के श्वेत विन्दु ( पिछ्छल कोष ) को प्राप्त करूँ। अथर्थात मैं ऐसी योनि को प्राप्त करूँ जिससे आवागमन से छूटकरा मिल जाए।
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पञ्चदहवाँ खण्ड
१५२
इस उपनिषद् को ब्रह्मा ने प्रजापतियों से कहा, प्रजापति ने
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मनु से कहा और मनु ने समस्त प्रजाओं में कहा। जो आचार्य कुल में ब्रह्मचर्य पूर्वक पढ़कर उनकी शुश्रूषा करता हुआ मनीषी कुल में संस्कार करके कुटुम्ब के पवित्र स्थान में स्वाध्याय करता हुआ, शारिक वनता हुआ, आत्मा में समस्त इन्द्रियों को स्थापित करके तीर्थों से अतिरिक्त भी तीर्थों में अहिंसा का भाव रखता हुआ आयुपर्यंत ऐसा व्यवहार करता हुआ वह ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लेता है। वह फिर वापस नहीं आता। फिर वापस नहीं आना।
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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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( तीनों प्रकार के ताप शान्त हों )
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११
बृहदारण्यक उपनिषद्
११
यह उपनिषद् शतपथ ब्राह्मण का ग्रन्थिम भाग है । सभी उपनिषदों से यह उपनिषद् बड़ी है । आरण्यक (जंगल) में लिखे जाने के कारण इसका नाम 'बृहदारण्यक' पड़ा । पूरी उपनिषद् में छह अध्याय हैं । अन्त के दो अध्याय 'खिल' ( परिशिष्ट ) कहे जाते हैं । चार अध्याय तक ही मूल उपनिषद् मानी जाती है । इनमें ब्रह्म विद्या के गूढ़ तत्वों का समावेश है । ब्रह्म विद्या के अतिरिक्त कुछ भिन्न विषयों का भी वर्णन है ।
११
शतपथ ब्राह्मण की माझ्यन्दिनी और काण्व दो शाखाएँ चलित हैं । दोनों शाखाओं की उपनिषदें भी हैं, जिनमें कहीं नहीं कुछ भेद है । माध्यन्दिनी शाखा का शतपथ और उसी शाखा की उपनिषद् का हो पहले ग्राधिक प्रचार था । जगद्गुरुशंकराचार्य ने पहले माध्यन्दिनी शाखा की उपनिषद् का भाष्य किया था, बाद में उन्होंने काण्व शाखा की उपनिषद् जब भाष्य किया तबसे उनके उपनिषद्-भाष्यों में काण्व-शाखा उपनिषद् ही सम्मिलित कर ली गयी । माध्यन्दिनी
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वृहदारण्यकोपनिषद् : २४५
शाखा मूल यजुर्वेद से पूर्वां संगति रसती है, उसमें कोई मिला-
वट या प्रशाखे नहीं है । इसीलिए मैंने माध्यन्दिनी शाखा
का इस उपनिषद् को ही स्वीकार किया है ।
पहला अध्याय
शान्ति पाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
पहला ब्राह्मण
पहली कंडिका
यज्ञ सम्बन्धी अश्व ( विराट् जगत् ) का शिर उषा है, सूर्य आँख
है । प्राण वायु है । खुला हुआ मुँह वैश्वानर अग्नि है । और
उसकी जानने योग्य वक्षःस्थल ( छाती ) संवत्सर है । ग्रीवा
पीठ है, अन्र्तरित्त पेट है । पृथिवी चरखा तल है, दिशाएँ छाती और
कन्धे हैं । स्वान्तर दिशाएँ ( ईशान आदि ) दोनों ओर की पसलियाँ
हैं । ऋतुपाएँ अंग हैं । मास और पत्त ऋंगों के बीच के जोड़े हैं ।
दिन और रात दोनों पैर हैं । नक्षत्र हडियाँ हैं और बादल
मांस हैं ।
अथपचा भोजन बालू, नदियाँ गुदा—नाडियाँँ है, पहाड़
कलेजा और फेफड़े हैं । औषधियाँ रोम हैं । नाभि से ऊपर का
शरीर उदय होता हुश्रा सूर्य है । नाभि से नीचे का शरीर उतरता
हुश्रा सूर्य है । बिजली का चमकना उसकी जमुहाई है । बादल का
गरजना उसकी अंगड़ाई है । मेघ का बरसना उसका मूत्रना है और
उसकी वाणी ही जगत् का घोष है ।
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२५६
दूसरी कण्डिका
२५६
निश्चय पहले ऋश्व ( विराट्रूप जगत्) की महिमा के रूप में दिन प्रकट हुआ था उसका कारण पूर्व समुद्र ( दिशा ) में उदय होने वाला सूर्य है । इसके बाद रात प्रकट हुई । उसका कारण पश्चिम समुद्र ( दिशा ) में अस्त होने वाला सूर्य है । ये दोनों महिमाएँ ऋश्व ( विराट्रूप जगत्) के दोनों ओर हुईं । यह जगत् हय ( त्याग ) होकर देवों को वाजी ( भोग की शक्ति ) होकर गन्धवों को ऋयौ ( हिंसा ) होकर ऋसुरों को और ऋश्व ( भोजन ) होकर मनुष्यों को लिए जारहा है । इस जगत् का वन्शु ( रक्षक ) समुद्र ( ईश्वर ) ही है और वही कारण भी है ।
२५६
दूसरा माहात्म्य
२५६
पहली कंडिका
२५६
सृष्टि से उत्पन्न होने से पहले यहाँ कुछ भी नहीं था । भूख रूप मृत्यु ( ईश्वर ) से ब्रह्मांड का पूर्व ढका हुआ था । क्योंकि भूख मृत्यु रूप परमात्मा ने अपने मन में यह संकल्प किया कि मैं प्रयत्नवाद् हों जाऊँ । ऐसा संकल्प कर उसने गर्त शून्य प्रकृति में गति का संचार किया । उस गति-संचार से जल पैदा हुआ । तो उसने यह समभ लिया कि निश्चय मेरे द्वारा किए गए गति-संचार से ही यह जल प्रकट हुआ है । यही ईश्वर का ईश्वरत्व है । जो इस प्रकार ईश्वर के ईश्वरत्व को जानता है, उसके लिए सुख होता है ।
२५६
दूसरी कंडिका
२५६
निश्चय जल ईश्वर का विराट्रूप ही है । उसके भाग से पृथ्वी पैदा हुई । उसपर ईश्वर ने श्रम किया । उसके श्रम और तप से अग्नि रूप तेज उत्पन्न हुआ ।
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वृहदारण्यकउपनिषद् : २५७
257
तीसरी कण्डिका
257
उस ईश्वर ने अपनी विराट् रूप को तीन श्रादित्य, वायु और श्रग्नि इन भागों में विभक्त किया। उसका शिर पूर्व दिशा है। ईशान और श्रारतेय को उसके दो हाथ हैं। पश्चिम दिशा उसकी पृठ है। वायव्य और नैऋत्यकोण उसकी दोनों जंघाएँ हैं। उत्तर और दक्षिण दिशाएँ उसके दोनों पार्श्व हैं। श्राकाश उसकी पीठ है। श्रन्तरिच्चलोक पेट है और पृथिवी छाती है। यह विराट् ब्रह्माण्ड में प्रतिष्ठित है। इसे जानने वाला जहाँ कहीं जाता है, वहीं प्रतिष्ठित होता है।
257
चौथी कण्डिका
257
ईश्वर ने अपनी दूसरी श्रात्मा प्रकट करने की इच्छा की तो उसने परमात्मा ने मन के साथ वाणी को जोड़ दिया। उस मिथुनभाव से जो वाचा निकली वह संवत्सर हुयी। इससे पहले संवत्सर नहीं था। इतने समय तक उसे परमात्मा ने अपने ही श्रन्दर धारष कर रखा था। जितना संवत्सर (सन्धिकाल) होता है, उतने समय के पीछे उस समय को उत्पन्न किया, फिर उसे विस्तीर्ण किया। इसके बाद संसार को प्रकाशित किया। वही वाणी हुयी।
257
पाँचवीं कण्डिका
257
उस ईश्वर ने देखा कि यदि इस वाणी को मार डालूँगा तो निरचय ही कुछ थोड़ा-सा श्रन्न पैदा कर सकूँगा। इसलिए उसने उस वाणी के द्वारा अपनी गति रूप पुरुषार्थ से सब को उत्पन्न किया। जो कुछ ये ऋचाएँ, यजु, साम छन्द, यज्ञ, प्रजा और पशु
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१७
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२५९
२५९ : बृहदारण्यकउपनिषद्
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हैं, इन सब में जिस जिसको उसने उत्पन्न किया, उन सब को खाने के लिए अपने शरीर धारण किया । निश्चय वह सर्वभक्षक है । इसी से उसका नाम आदिति है । सर्वभक्ष्या ही ईश्वर का आदितित्व है । जो कोई ईश्वर के इस आदितित्व को जानता है, वह इन सब वस्तुओं का भोक्ता होता है और सभी भोग्य पदार्थ उसके लिए भोग्य बन जाते हैं ।
२५९
छठी कण्डिका
२५९
उस ईश्वर ने यज्ञ से फिर यज्ञ करने की कामना करके श्रम और तप किया । उसके श्रम और तप करने पर यश और वीर्य की उत्पत्ति हुई । निश्चय प्राण ही यश और बल हैं । उस प्राप्त के उत्पन्न होने से और बढ़ने पर शरीर का बढ़ना प्रारम्भ हुआ । उसका मन शरीर ही में था ।
२५९
सातवों कण्डिका (क)
२५९
उस ईश्वर ने यह कामना की कि मेरा यह विराट शरीर जानने योग्य हो जाए, इसलिए इस ब्रह्मांड के साथ प्रयत्नवान हो जाऊँ । उसके प्रयत्न करने पर ब्रह्मांड 'पूर्णता' को प्राप्त हुआ और वह जानने योग्य भी हो गया । जानने योग्य ब्रह्मांड का यही अश्व-मेधत्व—जानना है । जो कोई इस अश्व (ब्रह्मांड) को इस प्रकार जानता है, निश्चय वही जानने योग्य जगत को जानता है । उस ब्रह्मांड को वह अवरोध ( रुकावट ) रहित समभता है । वह उस जगत को कल्पान्त (प्रलयकाल) में अपने लिए संहार कर देता है । विराट शरीर के इन्द्रिय रूप देवताओं के लिए ईश्वर ने यज्ञ-पशुओं (इन्द्रियों के विषयों) को समर्पित किया । इसलिए सब देवताओं के हितकर शुद्ध प्रजापति के उत्पन्न किए हुए यज्ञ (इन्द्रिय-विषय) को देवता लोग ग्रहण करते हैं ।
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२५६
वृहदारण्यकउपनिषद् : २५६
२५६
सातवाँ कण्डिका (ख)
२५६
यह अश्वमेध ( जानने योग्य जगन् ) है। जो यह प्रकाशित हो रहा है वह उस विराट् जगन् के संवत्सर की आत्मा (शरीर) है। यह श्रीमन् ( ईश्वर ) पूज्य है। उसे ईश्वर का विराट् शरीर यह समस्त ब्रह्माण्ड है। ब्रक् (ईश्वर) और अश्व मेध (विराट् जगन्) ये दोनों जानने योग्य हैं। वह मृत्यु (ईश्वर) ही एक उपास्यदेव है। इस रहस्य को जानने वाला विद्वान् मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। ऐसे उपासक का मृत्यु ही शरीर होता है। और वह इन सूर्ये आदिक देवताओं के मध्य प्रमुख स्थान प्राप्त करता है।
२५६
तीसरा ब्राह्मण्
२५६
पहली कण्डिका
२५६
प्रजापति की दो सन्तानें थीं—देव और असुर। उनमें देव थोड़े और असुर अधिक थे। वे आपस में लोकों के सम्बन्ध में स्पर्धा करने लगे। देवता बोले—कि अच्छा हो, कि यज्ञ में उद्गीथ के द्वारा असुरों पर आक्रमण किया जाए।
२५६
दूसरी कण्डिका
२५६
ऐसा प्रसिद्ध है, कि वे देवगण (इन्द्रिय समूह) वागी से बोले कि हमारे लिए तू उद्गीथ ( श्रेष्ठ गान ) का उद्गाता ( गायक ) बन कर गायन कर। 'तथेति' कहकर वागी ने उनकी बात स्वीकार कर ली और वह उनके लिए उद्गीथ का गान करने लगी। वागी के अन्दर जो भोग है, उसे उसने देवों (इन्द्रियों) के लिए गान किया और जो कल्याण बोलती है—उस उसने अपने लिए रखा। इतने में उन असुरों ने जान लिया कि ये देवता लोग निश्चय ही
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२६०
२६० : बृहदारण्यकउपनिषद्
२६०
इस उद्गाता के द्वारा हम पर श्राक्रमण करेंगे, इसलिए उन श्रसुरों ने उस वाणी पर श्राक्रमण कर उसे पाप से बींध दिया।
२६०
इसलिए यह वाणी जो कुछ श्रनुचित बोलती है--वही वह पाप है।
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तीसरी कण्डिका
२६०
कहा जाता है, कि इसके बाद प्राण इन्द्रिय से प्राण बोले कि तू हमारे लिए उद्गीथ का गायन कर। प्राण इन्द्रिय ने स्वीकार कर उद्गीथ का गायन किया। उसके श्रन्दर जो भोग है, उसे तो उसने देवों (अन्य इन्द्रियों) के लिए गाया श्रौर जो वह कल्याण सँँघती है उसे उसने श्रपने लिए रखा। उन श्रसुरों ने जान लिया, कि निश्चय इस उद्गाता के द्वारा हम पर देव लोग श्राक्रमण करेंगे, इसलिए उन्होंने प्राण पर श्राक्रमण कर पाप से उसे बींध दिया। इसलिए प्राण इन्द्रिय जो श्रनुचित सँँघती है वह वही पाप है।
२६०
चौथी कण्डिका
२६०
इसके बाद देवताओंों (इन्द्रियों)* ने श्राँख से कहा कि तू हमारे लिए उद्गीथ का गान कर। श्राँख ने स्वीकार कर लिया श्रौर उद्गीथ का गान किया तो श्राँख में जो भोग है उसे देवों के लिए गाया श्रौर जो कल्याण देखती है, उसे उसने श्रपने लिए रख लिया। उन श्रसुरों ने जान लिया कि निश्चय इस उद्गाता के श्राक्रमण द्वारा देव लोग हम पर करेंगे। श्रत: उन्होंने श्राँख पर श्राक्रमण करके उसे पाप से बींध दिया। इसलिए श्राँखें जो श्रनुचित देखा करती हैं, वही पाप हैं।
२६०
पाँचवीं कण्डिका
२६०
इसके श्रनन्तर उन्होंने श्रोत्र से कहा कि तू हमारे लिए उद्-
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गीथ गायन कर। तथास्तु कह कर श्रोत्र ने उनके लिए उद्गीथ का गायन किया। श्रोत्र में जो भोग है उसे उसने, देवों (इन्द्रियों) के लिए गाया और जो कल्याण शब्द सुनना था उसे अपने लिए रख लिया। उन असुरों ने जान लिया कि ये श्रोत्र उद्गीथात् कर हमें पर आक्रमण करेंगे इसलिए उन्होंने श्रोत्र पर आक्रमण कर उसे पाप से बींध दिया। इसलिए कान अपशब्द सुनता है—वही वह पाप है।
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छठी कण्डिका
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इसके बाद उन देवों (इन्द्रियों) ने मन से कहा तू हमारे लिए उद्गीथ का गान कर। तथास्तु कह कर मन ने उद्गीथ का गान गाया। मन में जो भोग है, उसे उसने देवों के लिए गाया और जो कल्याण संकल्प थे, उसे उसने अपने लिए रख लिया। उन असुरों ने जान लिया कि ये लोग इस मन द्वारा हम पर आक्रमण करेंगे और उसे पाप से बींध दिया, इसलिए मन जो अनुनित संकल्प करता है वही वह पाप है।
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इस प्रकार ये देवता (इन्द्रियाँ) पाप से छुए गए तथा बींधे गए हैं।
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सातवीं कण्डिका
२६१
इन्द्रियों के हार जाने के बाद देवगण मुख में रहने वाले प्राण से बोले—कि तू हमारे लिए उद्गीथ का गायन कर। स्वच्छा कह कर प्राण उनके लिए उद्गीथ का गान करने लगा। उन असुरों ने जान लिया कि ये देवता इस प्राण के द्वारा निश्चय हम पर आक्रमण करेंगे। उन्होंने उस प्राण पर आक्रमण कर उसे पाप से बींधन चाहा। :परन्तु जैसे मिट्टी का ढेला पत्थर पर गिर कर चूर-चूर हो
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२६२ : बृहदारण्यकउपनिषद्
जाता है, उसी प्रकार वे असुर उस प्राण से टकरा कर ध्वस्त हो गए।
इस प्रकार जब असुर टकरा कर नष्ट हो गए। तब देवगण विजयी हुए। जो इस प्रकार देवासुर-संग्राम को ज्ञातत है वह अपने आप से विजयी होता है। उसके शत्रु स्वतः परास्त हो जाते हैं।
अष्टमों कण्डिका
वे देवगण आपस में बोले—जिसने हमारी रक्षा की है, वह कहाँ है ? उनमें से एक ने कहा—वह यह मुख के भीतर ही है। इसीसे प्राण ‘अ्रयास्य’ ( मुख में रहने वाला ) कहा जाने लगा और अंगों का रस होने के कारण वह ‘आंगिरस रस’ भी कहा जाता है।
नवमों कण्डिका
निश्चय वह यह प्राण देवता दूर नाम वाला है। इसीलिए इससे मृत्यु दूर रहती है—ऐसा जो जानता है।
दसवीं कण्डिका
वह यह प्राण देवता इन इन्द्रियों के पाप रूप मृत्यु को मार कर जहाँ इन दिशाओं का अन्त है, वहीं लँ गया। वहीं इन इन्द्रियों के पापों को रख दिया इसीलिए उस पुरुष के पास जो दिशा के अन्त में रहता है—पापी न हो जाए और उस दिशा के अन्त में भी न जाए। कहीं ऐसा न हो कि पाप रूपी मृत्यु को प्राप्त हो जाऊँ।
ग्यारहवीं कण्डिका
निश्चय उस प्राण ने इन्द्रियों की पाप रूपी मृत्यु को मार कर मृत्यु के पार पहुँचा दिया।
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वृहदारण्यकोपनिषद् : २६३
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बारहवीं कण्डिका
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प्राण ने वाणी को मृत्यु के पार पहुँचाया। मृत्यु से पार होकर वह वाणी अग्नि हो गयी। इसलिए अग्नि पाप से निकल कर सत्य से परे जमकर रहा है।
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तेरहवीं कण्डिका
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इसके बाद वह प्राण प्राणेन्द्रिय को मृत्यु के पार ले गया। वह जब मृत्यु के बन्धन से मुक्त हुया तब वायु हो गया। वह वायु मृत्यु से परे पाप से मुक्त होकर वह रहा है।
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चौदहवीं कण्डिका
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फिर प्राण, चक्षु को ले गया। मृत्यु के बन्धन से छूटकर चक्षु आदित्य हो गया। वह आदित्य मृत्यु रूप पाप से मुक्त होकर प्रकाशित हो रहा है।
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पन्द्रहवीं कण्डिका
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इसके पश्चात् वह श्रोत्र को ले गया। मृत्यु के बन्धन से छूटकर श्रोत्र दिशा हो गए। वे दिशाएँ मृत्यु रूप पाप से मुक्त हो गयीं।
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सोलहवीं कण्डिका
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इसके बाद वह प्राण मन को ले गया। मृत्यु के बन्धन से छूट कर वह मन चन्द्रमा हो गया। वह मन चन्द्रमा पाप से निकल कर प्रकाशित हो रहा है। जो इस प्रकार जानता है उस तत्वज्ञानी को निश्चय ही यह प्राण देवता मृत्यु से पार कर देता है।
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२६४ : वृहदारण्यकोपनिषद्
सत्रहवीं कण्डिका
इसके बाद उस प्राण ने अपने खाने योग्य अन्न का गायन किया। क्योंकि जो कुछ खाया जाता है, वह प्राण के द्वारा ही यहाँ प्राण प्रतिष्ठित रहता है।
अठारहवीं कण्डिका
वे इन्द्रियाँ बोलीं—यह जो कुछ अन्न है, वह इतना ही है। हे प्राण, तूने इसे अपने लिए ही गाया है। अपने भोग के बाद इस अन्न में हमें भी हिस्सा दो। यह सुनकर प्राण बोला—तुम सभी सब ओर से मुझ में प्रवेश करो। 'तथास्तु' कहकर सभी इन्द्रियाँ प्राण में समाविष्ट हो गयीं। इसलिए इस प्राण के द्वारा जो खाया जाता है, उससे सभी इन्द्रियाँ तृप्त होती हैं। इस प्रकार इसमें सभी अवयव समाविष्ट रहते हैं। और वह प्राणविद् अपने सभी अंगों का पोषक, अगुवा, भोक्ता और स्वामी होता है। जो इस प्रकार इस रहस्य को जानता है। आश्चर्य है कि अपने अंगों में से जो कोई इस प्रकार के रहस्यवेत्ता के प्रति अवरोध उत्पन्न करना चाहता है—निश्चय ही ग्रह पोषक करने योग्य भार्या आदि के लिए पोषक नहीं बन पाता। जो कोई इस प्राणविद् के अनुकूल आचरण करता है। वह अपने कुल तथा पोषक करने योग्य व्यक्तियों के पोषण करने में पूर्ण समर्थ होता है।
उन्नीसवीं कण्डिका
मुख में रहने वाला प्राण आदिरस है। क्योंकि वह अंगों का रस है। निश्चय प्राण अंगों का रस है, क्योंकि प्राण अंगों का रस है। इसलिए जिस किसी अंग से प्राण निकल जाता है, वही वह सूख जाता है। निश्चय है, कि यह प्राण अंगों का रस आदिरस है।
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वृहदारण्यकउपनिषद् : २६५
बीसवीं कण्डिका
यही प्राण बृहस्पति है। निश्चित ही वागी बृहती है, उस बृहती का पति होने के कारण यह प्राण बृहस्पति कहलाता है।
इक्कीसवीं कण्डिका
यही प्राण ब्रह्मणस्पति है। वागी का नाम ब्रह्म है, उसका पति यह प्राण है, इसलिए यह ब्रह्मणस्पति भी कहा जाता है।
बाईसवीं कण्डिका
यही प्राण साम है। वागी ही ‘सा’ है और प्राण ‘अम’ है। ‘सा’ और ‘अम’ मिल कर साम होता है—यह ही साम का समत्व है। अथवा जिस लिए यह प्राण मुनगे (प्लुषि) के समान, मच्छर (मशक) के शरीर के समान, हाथी के शरीर के समान, तीनों लोकों के समान, इन सब के समान है—इसीलिए यह साम है। जो कोई इसे जानता है, वह साम के सायुज्य—समानता और सालोकता को प्राप्त करता है।
तेईसवीं कण्डिका
यह प्राण ही उद्गीथ है। यही उत् है। क्योंकि प्राण ही से सब कुछ थमा (उत्तब्ध) हुतश्रा है। वागी ही गीत (गीथा) है। उत् (प्राण) और गीथा (वागी) दोनों मिलकर उद्गीत हो जाता है।
चौबीसवीं कण्डिका
इस विषय में यह एक आख्यायिका है, कि चैकितानि के पुत्र ब्रह्मदत्त ने सोमरस को पीते हुए कहा था—कि मुख में रहने वाले प्राण और अंगों के रस इस प्राण का ज्ञाता मैंने यदि प्राण से भिन्न
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२६६ : वृहदारण्यकउपनिषद्
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'अन्य इन्द्रियों से उद्गीथ का गान किया हो तो राजा सोम (सोम रस) मेरे मूर्धा को गिरा दे। क्योंकि उसने वाणी और प्राण से गायन किया था।
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पचीसवीं कण्डिका
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कहा जाता है, कि इस साम के धन को जो जानता है, निश्चित वह धनवान् होता है। उसके कण्ठ की मधुरता ही उसका धन है। इसलिए ऋत्विज् का कार्य करने वाले स्वर की मधुरता की इच्छा करें। उस मधुर स्वर वाले ऋत्विज् का कार्य करें। यज्ञ में मधुर स्वर वाले ऋत्विज् को लोग देखना ही चाहते हैं। जिसके पास धन होता है उसे लोग देखने की इच्छा करते ही हैं। जो कोई सामने इस धन को जानता है, निश्चय उसके पास धन होता है।
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छब्बीसवीं कण्डिका
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निश्चय है कि जो कोई इस साम (प्राण) के सोने को जान लेता है, उसके पास सोना होता है। उसका सोना-स्वर ही है। जो इस प्रकार साम के सुवर्ण को जानता है, उसके पास निश्चय सोना होता है।
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सत्ताईसवीं कण्डिका
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कहा जाता है, कि जो कोई इस साम (प्राण) के आश्रय को जानता है, वह प्रतिष्ठित होता है। निश्चय ही उसकी वाणी ही आश्रय है। क्योंकि यह प्राण वाणी ही में आश्रित रहता है। निश्चय है, कि यह गाया जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि यह वाणी में प्रतिष्ठित है।
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वृहदारण्यकउपनिषद् : २६
अट्टाइसवीं कण्डिका
ग्रन्थ यहाँ से पवमान सूक्तों की जप विधि बतायी जाती है । यह निश्चित है कि प्रस्तोता नाम का ऋत्विज यज्ञ में सामगान का आरंभ करता है । जिस समय वह प्रस्तोता विधि का आरंभ करे उस समय इन्हें जपना चाहिए—
(१) असतो मा सद्गमय—असत् से मुझे सत् की ओर ले चलो ?
(२) तमसो मा ज्योतिर्गमय—अन्धकार से मुझे ज्योति की ओर ले चलो ?
(३) मृत्योर्माऽमृतं गमय—मृत्यु से मुझे अमृत की ओर ले चलो ?
जब वह कहता है, कि 'असतो मा सद्गमय'—इसमें मृत्यु ही असत है और अमृत सत है । तात्पर्य यह कि मृत्यु से मुझे अमृत की ओर ले चलो । अर्थात् अमर कर दो । और उसके तमसो मा ज्योतिर्गमय इस कथन में मृत्यु ही अन्धकार है और ज्योति ही अमृत है । अर्थात् अन्धकार से मुझे अमृत की ओर ले चलो ?
मुझे अमर बना दो । तथा मृत्योर्माऽमृतं गमय उसके इस कथन का तात्पर्य है कि मृत्यु से मुझे अमृत की ओर ले चलो । इसमें कुछ छिपा हुआ नहीं है और जो श्रान्त स्तोत्र हैं, उनमें उद्गाता अपने लिए खाने योग्य अन्नों का गायन करे । अर्थात् उन मन्त्रों के कारण वह जो कामना करे । उसके लिए वर मांगे । इस प्रकार जानता हुआ उद्गाता अपने लिए खाने योग्य अन्नों का गायन करे । यजमान के लिए जो इच्छा रखता है उसका गायन करता है । यह विद्या लोगों को जीतने वाली है । जो कोई इस साम को जानता है, उस तत्व ज्ञानी से सब लोगों के मुखरने की आशा हो सकती है ।
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२६५ : बृहदारण्यकउपनिषद्
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चौथा ब्राह्मण
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पहली कण्डिका
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प्रारंभ में पुरुष के समान यह आत्मा ही था। उसने चारों ओर देख कर अपने से अलग किसी को नहीं देखा। 'मैं हूँ'—ऐसा उसने सर्वं प्रथम कहा। इसलिए उसका नाम 'अहं' हुया इसलिए अब भी पुकारे जाने पर 'अहं' (मैं यहाँ हूँ) ऐसा पहले कह कर तब अन्य नाम कहता है जो उसका होता है। उसने सभी पापों को पहेले से जला रखा है। इसीलिए वह पुरुष प्रकार जानता है वह उसे जला देता है—जो इससे पहेले भ्रष्ट होना चाहता है।
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दूसरी कण्डिका
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वह पुरुष के समान जीव डरने लगा, इसलिए अकेले डरता है। यह डरा हुया जीवात्मा विचार करने लगा कि जब मुझसे भिन्न कोई दूसरा नहीं है। फिर किससे मैं डर रहा हूँ—ऐसा सोचतेँ ही उसका डर मिट गया। वह किससे डरता है, निश्चय ही उसे भय होता है।
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तीसरी कण्डिका
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निश्चय वह जीवात्मा प्रसन्न नहीं हुया। इसीलिए उसने वह जीव इतना ही था जितना स्त्री और पुरुष मिला कर होते हैं। पुरुष के समान जीव ने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त किया। तब पति और पत्नी दो हुए। इसीलिए आत्मा का यह शरीर अर्ध वृंगल (आधे दाने) के समान है। ऐसा याज्ञवल्क्य
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२६५
ने कहा। इसी इस पुरुष के श्रागे का श्राकाश स्त्री के साथ सन्निलित हुया तब भी मनुष्य पैदा हुये।
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चौथी कण्डिका
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कहा जाता है, कि वह स्त्री विचार करने लगी कि श्रपने ही में सुझे उत्पन्न कर यह पुरुष मेरे साथ कैसे संभोग करता है। 'अच्छा हो कि मैं क्लिप जाऊँ'—यह सोचकर वह गाय हो गयी और वह पुरुष भी बैल हो गया। उसी गाय के साथ वह बैल संभोग करने लगा। उससे गाय और बैल पैदा हुये। इसके बाद वह स्त्री घोड़ी वन गयी और वह पुरुष घोड़ा हो गया। फिर वह गदही बन गयी वह पुरुष गदहा बन गया। और उसके साथ संभोग करने लगा। उससे एक खुर वाली पशु जाति उत्पन्न हुयी। इसके बाद वह बकरी हो गयी तो दूसरा बकरा, वह भेड़ी बनी तो दूसरा भेड़़ गया। उसके साथ वह संभोग करने लगा उससे बकरी और भेड़ की जाति उत्पन्न हुयी। उसी प्रकार चींटी पर्यन्त जीवों की जितनी जोडियाँ हैं—सभी का निर्माण हुया।
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पाँचवों कण्डिका
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पुरुष के समान उस जीवात्मा ने समझा कि निश्चय ही मैं सृष्टि हूँ। क्यों कि मैंने ही सबकी रचना की है। ऐसा समझने पर नह सृष्टि हो गया। जो इस प्रकार जानता है वह इस सृष्टि में प्रसिद्धि को प्राप्त करता है।
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छठी कण्डिका
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इसके बाद उसने मनन किया। उसने मुख रूप योनि (स्थान) और हाथों के लिए श्रग्नि पैदा की। इसीलिए मुख और हाथ की हथेलियाँ रोम-रहित हैं। क्योंकि श्रग्नि की जगह भीतर से रोम-
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२७० : वृहदारण्यकउपनिषद्
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रहित हुत्रा करती हैं। जो लोग यह कहा करते हैं कि ‘इसका यज्ञ करो इसका यज्ञ करो—एक एक देव का यज्ञ करो, वे यही जानते हैं कि इसी एक देव (ईश्वर) की सब सृष्टि है। निश्चय यही सब देवों का देव है।
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इसके श्रलावा जो कुछ रससहित गीला पदार्थ है, उसको उसने वीर्य (बीज) से पैदा किया—वह सोम है। निश्चय यह सब जगत इतना ही है, जितना अन्न और उसका भोक्ता है। सोम ही अन्न और अन्न का भोक्ता है। यही ब्रह्म की महान सृष्टि है।
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जो श्रेय था उससे देवताओं की रचना की—अर्थात मर्य होकर अमृतों की रचना की। इसी से यह सृष्टि महान है। जो इस प्रकार जानता है वह प्रजापति की इस महान सृष्टि में प्रसिद्ध होता है।
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सातवीं कण्डिका
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कहा जाता है कि प्रारम्भ में सभी पदार्थ बिना नाम के थे। उसके बाद नाम और रूप ही से पदार्थ प्रकट हुये। जिस नाम और रूप से जो पदार्थ प्रारम्भ में प्रकट हुये वही व्याज भी उसी नाम और रूप से प्रकट होता है। यह जीवात्मा इस शरीर में नखों के अग्रभाग तक प्रविष्ट है। यह जीव शरीर में उसी प्रकार प्रच्छन्न रहता है, जैसे सुरधाम (छुरेहरपी या किसवत) में छूरा, अग्नि कुण्ड में आग। इसीलिए इसे कोई देख नहीं पाता क्योंकि मनुष्य श्रपूर्ण है। वह श्वास लेता हुया प्राण नाम वाला होता है। बोलने से ‘वाक’, देखने से ‘चक्षु’, सुनने से ‘श्रोत्र’, और मनन करने से ‘मन’ नामवाला होता है। इस जीव के सभी कर्म नामके ही हैं। इसलिए जो एक-एक को आत्मसमभ कर उसकी सेवा करता है वह नासमभ है। क्योंकि जीव एक-एक
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से तो श्रपूर्णों है। इसलिए 'श्रात्मा' ऐसा जानकर उसकी उपासना करनी चाहिए। क्योंकि इसमें सभी एकत्र होते हैं। यह जीव खोज करने योग्य है। श्रात्मा का वास सभी में है। इससे श्रात्म-विज्ञान होता है। जैसे पैरों की निशानी देखकर व्यक्ति श्राभीष्ट व्यक्ति को पा लेता है। जो इस प्रकार जानता है वह कीर्ति और यश को प्राप्त करता है।
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आठवीं कण्डिका
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ग्रनतरतम में स्थित यह श्रात्मा पुत्र से प्रिय, धन से प्रिय ग्रन्थ सभी से ग्राधिक प्रिय है। जो व्यक्ति ग्रनतरात्मा में मित्र किसी ग्रन्थ को प्रीति करता हो उससे ग्रात्मज्ञानी यह कहे कि तू अपने प्रिय को खोजेगा और यदि श्रात्मा ही को सर्वाधिक प्रिय समझेगा तो उसी प्रकार तू भी समर्थ हो जाएगा।' जो कोई श्रात्मा ही को परम प्रिय समझकर उसकी उपासना करता है, वह ग्रमर हो जाता है।
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नवीं कण्डिका
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कुछ लोग ऐसा मानते हैं, कि ब्रह्मविद्या से सब कुछ प्राप्त कर लेंगे। लेकिन क्या किसी ने उस ब्रह्म को जान लिया है, जिससे सब कुछ उसे प्राप्त हो गया है।
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दसवीं कण्डिका
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नि:सन्देह श्रारंभ में केवल एक ब्रह्म ही था। उसने अपने ही को जाना कि मैं ब्रह्म हूँ। उसी से सबका विस्तार हुग्रा। देवों में जो जाग उठे वही ब्रह्म हो गए। ऋषियों और मनुष्यों में जो जाग उठे वे ब्रह्म हो गए। इस प्रसिद्ध विज्ञान को जानते हुए ऋषि वामदेव ने कहा—कि मैं मनु हुग्रा, मैं सूर्य हुग्रा इस विज्ञान
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२७२ : वृहदारण्यकोपनिषद्
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को जो ब्राज्ञ भी जानता है और यह सम्भता है कि मैं ब्रह्म हूँ, वह ब्रह्म हो जाता है। उसका ऋहित देवता भी नहीं कर सकते हैं। निश्चय वह देवताओं का आत्मा हो जाता है। वह दूसरा है और मैं दूसरा हूँ ऐसा जानकर जो अन्य देवों की उपासना करता है, वह मनुष्यों का भरत-पोषण करते हैं। उसी प्रकार अनेक ज्ञानी पुरुष देवताओं का पोषण करते हैं। जैसे किसी व्यक्ति का एक पशु ले लिया जाय तो उसे अच्छा नहीं लगता और फिर यदि अनेक ले लिये जाएँ तो कहना ही क्या है। इसी प्रकार इन देवताओं को यह रुचिकर नहीं प्रतीत होता कि कोई मनुष्य ईश्वर को जान ले।
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ग्यारहवीं कण्डिका
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आरम्भ में एक ही ब्रह्म (ब्राह्मण वर्ग) था। अकेला होने से की। अथर्वा देवताओं में इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, मेध, यम, मृत्यु से श्रेष्ठ कोई नहीं है। इसीलिए राजसूय-यज्ञ में ब्राह्मण कर क्षत्रिय की उपासना करता है। वह ब्राह्मण क्षत्रिय होने में अपने कारण है। इसीलिए यद्यपि राजा उत्कृष्टता को प्राप्त करता है; तथापि राजसूय यज्ञ के अन्त में अपने उत्पत्ति के कारण ब्राह्मण ही के समीप नीचे बैठता है। जो कोई इस ब्राह्मण का निरादर करता है वह अपने ही कारण (उत्पत्ति स्थान) की हिंसा करता है। वह उसी प्रकार घोर पापी होता है। जैसे कोई अपने श्रेष्ठ को मार कर पापी बनता है।
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बृहदारण्यकउपनिषद् : २७३
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बारहवीं कण्डिका
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वह ब्रह्म (ब्राह्मण वर्णो) क्षत्रिय वर्णो को उत्पन्न करने के बाद भी जब वृद्धि न प्राप्त कर सका, तो उसने वैश्य जाति की रचना की। वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव और मरुत् इत्यादि जो ये देवगण है—गणेश: कहे जाते हैं—उन्हें उत्पन्न किया।
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तेरहवीं कण्डिका
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किन्तु फिर भी वह ब्रह्म (ब्राह्मण वर्ण) वृद्धि को न प्राप्त हुआ तब उसने शूद्र वर्ण की रचना की। पूषा शूद्र वर्णो है यह पृथिवी पुष्टा है, क्योंकि जितना कुछ भी है सब पोषने यही करती है।
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चौदहवीं कण्डिका
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फिर भी जब वह ब्रह्म वृद्धि न कर सका तो उसने श्रेष्ठ धर्म की रचना की। यह धर्म क्षत्रिय पर भी शासन और नियन्त्रण करता है। अत: धर्म से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। जैसे राजा की सहायता प्राप्त कर प्रबल शत्रु को भी जीवन का सामर्थ्य हो जाता है, उसी प्रकार धर्म के द्वारा निर्बल पुरुष भी बलवान् को जीतने की इच्छा रखता है। यह जो धर्म है, निश्चय ही सत्य है। इसलिए सत्य बोलने वाले के सम्बन्ध में कहा जाता है—यह धर्म बोल रहा है। तथा धर्म की बात बोलने वाले को कहा जाता है कि यह सत्य बोल रहा है। क्योंकि ये दोनों यही धर्म ही हैं।
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पन्द्रहवीं कण्डिका
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ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों को पैदा करने वाला देवों में ब्रह्म रूप से ब्रह्मा हुआ। तथा मनुष्यों में ब्राह्मण हुआ। क्षत्रिय से क्षत्रिय हुआ। वैश्य से वैश्य और शूद्र से शूद्र हुआ।
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२७४ : बृहदारण्यकउपनिषद्
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हुञ्या। इसलिये ऋमि ही में कर्म करके देवताओंों के बीच कर्मफल की इच्छा करते हैं। क्योंकि ऋमि ऋऔर ब्राह्मण इन्हीं दो रूपों से ही ब्रह्म व्यक्त हुञ्या है। जो कोई बिना आत्म दर्शन के ही इसलोक से चला जाता है, उसका वह ऋनजानना हुञ्या आत्म लोक वैसे ही पालन नहीं करता जैसे बिना श्रध्ययन किया हुञ्या वेद ऋथवा बिना ऋनुष्ठान किया हुञ्या कोई काम। इस प्रकार आत्म दर्शन-रहित व्यक्ति इसलोक में कोई पुण्य कार्य भी करता है तो भी ऋन्त में उसका वह कर्म क्षीण हो जाता है। ऋतः आत्म लोक की उपासना करनी चाहिए। जो पुरुष आत्म लोक की उपासना करता है, उसके कर्म क्षीण नहीं होते। इस आत्मा से मनुष्य जो भी इच्छा करता है उसकी सभी इच्छाऐं पूरी होती हैं।
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सोलहवीं कण्डिका
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यह आत्मा समस्त जीवों का ऋाश्रय है। वह जो हवन ऋौर यज्ञ करता है, उससे देवताओंों का भोग्य होता है। जो स्वाध्याय करता है, उससे ऋषियों का, जो पितरों के लिए पिण्डदान करता है, सन्तान की इच्छा करता है; उससे पितरों का, जो मनुष्यों को वास स्थान ऋौर भोजन देता है; उससे मनुष्यों का। ऋौर जो पशुत्रों को घास ऋौर जल देता है, उससे पशुत्रों का भोग्य होता है। इसके घर में कुत्ते, बिल्ली ऋादि श्वापद, पच्ची ऋौर चीटियाँ तक जितने जीव, जन्तु हैं सभी के ऋाश्रित होकर जीवन धारिप करते हैं। उससे यह उनका भोग्य होता है। जिस प्रकार लोग अपने शरीर के ऋविनाश की इच्छा रखते हैं, वैसे ही इस प्रकार जानने वाले का ऋविनाश समस्त प्राप्री चाहते हैं। निश्रय यह विषय जाना गया ऋौर इस पर विचार किया गया है।
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सत्रहवीं कण्डिका
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प्रारम्भ में केवल यही आत्मा ही ऋकेला था। उसने इच्छा की कि मेरे लिए पत्नी हों जाय तो सन्तान उत्पन्न करूँ। इसके
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वाद मेरे पास धन हो जाए तो उसके द्वारा पुरुषार्थ के कार्य करूँ। बस ऐसी इतनी ही कामनाएँ मनुष्यों में भी हु᳁य्रा करती थीं। चाहता हु᳁य्रा और न चाहता हु᳁य्रा भी इससे अधिक नहीं पा सकता। अब भी अकेला आदमी ऐसी ही कामना करता है, कि मेरे स्त्री हो, फिर मे सन्तान उत्पन्न करूँ। तथा मेरे धन हो तो मैं उससे कर्म करूँ। वह जब तक इन में से एक को भी नहीं प्राप्त करता तब तक अपने को ग्रपूर्ण समभता है। उसकी पूर्यता इस प्रकार होती है—मन ही इसका ग्रात्मा है। वाणी स्त्री है। प्राण सन्तान है और नेत्र मानुष धन है। क्योंकि वह नेत्र से ही गाय आदि मानुष धन को देखता है। श्रोत्र दैवधन है। क्योंकि श्रोत्र से ही वह दैव-धन को सुनता है। ग्रात्मा—शरीर—ही इसका कर्म है, क्योंकि ग्रात्मा ही से यह कर्म करता है। यह यज्ञ पाँच से बना हुग्रा पुरुष है। यह सब ही पाँच से बना हुग्रा है। जो कुछ इस संसार में हैं—जो ऐसा जानता है, वह इसे को पा लेता है।