1. Upanishat Sara Shivprasad Sita Rai (Hindi)
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उपनिषत्सार
मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तरीय, ऐतरेय, श्वेता- श्वतर, ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, कौषीतकि ब्राह्मण और मैत्री अर्थ सहित अपने पुत्र पौत्र मित्र बान्धव योग्य अधिकारियों के लिये राजा शिवप्रसाद सितारैहिन्द ने छपवाया तीसरी बार
लखनऊ सुपरिएटेएडेएट बाबू मनोहरलाल भागव के प्रबन्ध मंशी नवलकिशोर (सी, आई, ई) के छापेखान में छापीगई अक्टूवर सन् १६०८ ई० ॥ इस किताब का हक महफूज है वहक इस दापेखाने के
जुन ं वर्क ३
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उपनिपरसार
पथवदेहीय सुण्डक
तदपाषि पादं नित्वं विभु सर्वगत सुसच्म तढ व्ययं यहतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥
जो वह अदद्य (देखने के योग्य नहीं) है अमाह हैं अगोन अर्थात् चनादि है अवर्णहै न उसके आंस्र हैं न कान न उसके हाथहै ल पांत्र नित्य है विसु है स्व्वगत है सूच्म है अव्यय है धीरोंकी दृष्टि में वही भूतयोनि है॥
सहस्त्रशः प्रसवन्ते सरपाः। तथाक्षराहिवियाः सान्यमावा: प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति॥ लो यह सत्यहै जैसे प्रज्यलित पामक से एकहीरूप की सहलों चिनगारियाँ निकछती हैं वैसेही हे सौस्य। अक्षर से विविध साव (जीव-) निकलते हैं और फिर उसी में जाते हैं ॥। दिव्योह्यमर्त:पुरुष: सवाह्याम्यन्तवाह्यजः।
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२ उपनिपत्सार।
अप्राणोह्यमना: शुभ्रोह्यक्षरात् परतः परः॥ दिव्य है अमूर्त है पुरुपहै वही चाहरहै वही भीतर है अज है प्र्प्रप्राण है अमन है शुभ्र ह्वै पर श्र्रक्षरसेभी परेहै॥ यदर्चविष्म दयदपुभ्योडणुयस्मिन् लोकानिहिता लोकिनश्च तदेतदक्षरं ब्रह्मस प्राणस्तदुवाङ्म- नःतदेतत्सत्यं तदमृतं तद्दोद्दव्यं सौम्य विद्ि॥ जो परचिष्मान्है जो त्र्प्रखुसे भी अणु है जिसमें लोक और लोकों के रहनेवाले निहित हैं सो यह अक्षर ब्रह्म है वही प्राण है वही वाकू है वही मन है सो सत्य है सो अमृत है हे सौम्य! उसी को वोद्धव्य जान ।। न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारक नेमा वि- द्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनु- भाति सव्चै तस्य भासा स्व्वमिदं विभाति।। वहाँ (ब्रह्म में) सर्य प्रकाश नहीं करता न चांद औप्रर तारे न ये बिजली अग्निकी तो क्या वात है उसी के (ब्रह्मके) प्रकाशमान होनेसे सव प्रकाशमान होते हैं उसीका प्रकाश सचको प्रकाशमान करता है।। ब्रह्लैवेदममृतं पुरस्ताद्व्रह्म पइचाद्व्रह्म द- क्षिपतश्चोत्तरेण। अधश्चोरई्उच प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।।
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उपनिषत्सार। AY
यह अमृत ब्रह्म आगे है ब्रह्म पीछे है ब्रह्म दहने और धाएँ है नींचे और ऊपर है यह वरिष्ठ (श्रेष्ट) ब्रह्मही फैला हुआ विश्व (जगत) है।। बृहच्च तदिव्यमचिन्त्यरूपं सूचमाच्च तत्सू- क्ष्मतरं विभाति। दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पशयतिस्विहैव निहितं गुहायाम्॥ यह (ब्रह्म) बड़ा है दिव्य है अचिन्त्यरूप है सूक्ष्म से सक्ष्म तर है प्रकाशमान है दूर से दूर है और यहां निकट भी है देखनेवालों के लिये इसी गुहामें स्थितहै।। न चक्षुषा ग्ृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तप साकर्म्मणा वा। ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्वस्तत स्तुतं पश्यते निष्कलंध्यायमानः। वह चक्षु से महणा नहीं होता न वाक से न अन्य इंद्रियों से न तप से न कर्म्म से ज्ञानके प्रसाद से शुद्ध है तपंतःकरण जिसका वही उस निष्कल (निरवयव) को ध्यान के द्वारा देखता है।। यथा नदः स्यन्दमाना: समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान् नामरुपादिमु क्त: परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।। जैसे बहती हुई नदियां समुद्र में जाके नास रूप छोड़
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४ उपनिमत्लार। के श्रस्त होजाती हैं वेसेही विद्ान् नाम रूप छोड़ के परात्पर दिव्य पुरुप को प्रसत होता है।।
अथर्ववेदीय सापडक्य सर्व्वछं ह्ेतत्रह्मायमात्मा॥ सब यह ब्रह्म यह आत्मा है।। नान्तः प्रज्ञ न महिः प्रह नोभयतः प्रज्ञं न अज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रजं। शरहष्टमव्यवहार्थ्य
यसारं प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विजञेय:॥ न अन्तः प्रज्ञ है न वहिः प्रज्ञ है। न दोनों प्रज्ञ है न प्रज्ञानघनहै न प्रज्ञ है न अप्रज्ष है। तदृष्ट है अव्यवहार्य्य है अग्राह्यहै अलक्षणहै अचिन्त्य है अव्यपदेश्य (कहने को अशक्य) है एकात्म्य प्रत्यय (ज्ञान-प्रतीति) सार है (अर्थात् इस निश्चय से मिलताहै कि तीनों तरपरवस्थां में वही एक आत्मा है) उलमें सारे प्रंफच उपशम को प्रास् होते हैं शांत है कल्याणरूप है अद्वैत है उसी को चतुर्थ मानते हैं वही आत्मा है वही विज्ञेय है।
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: 2 उपनिषत्सार।
यजुर्वर्वेदीय तैत्तिरीय एतत्दो भवतिआकाशशरीरंब्रह्म। सत्यात्म प्राणाशामं मन श्र्प्रानन्दं। शान्तिसमृद्दममतम्।। " 'वह तब ब्रह्म होजाताहै त्रकाश है शरीर जिसका सत्यात्म है प्राणोंमें है आकीड़ा जिसकी सनको आनन्द करे जो शान्ति है समृद्ध जिसकी अ्मृत है।। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गु- हायां परमे व्योमन् सोऽनुते सर्व्वान कामानू सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥ सत्य ज्ञान पप्रनन्त ब्रह्म को परम पाकांश में गुहा के भीतर रहता हुआ जाने सो सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ सारे काम भोगता है।! असन्नेव भवति असद्ब्रह्मेति वेद चेतूः। अ. स्ति ब्रह्मेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुरिति॥ जो ब्रह्म को अ्र्रंसत् जाने आपही अंसत होजाता है। जो ब्रह्म को सत् जाने उस को सत् जानते हैं। सोऽकामयत। बहुस्यां प्रजायेयेति। सतपो उतप्यत सतपस्तप्त्वा। इद छं स्व्वमसृजत यदिदंकिञ्च । तत्सृष्दा तदेवानुपाविशत्। तदनुप्रविश्य। सव्चत्यंच्चाभवतू्। निरुक्कचानि-
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६ उपनिषत्सार।
रुक्तच। निलयनञचानिलयनञ्च। विज्ञान- ञ्चाविज्ञानञच। सत्यञ्चानृतञ्च सत्यमभ- वत्। यदिदं किञ्च तत्सत्यमित्याचक्षते॥ उस ने (ब्रह्म ने) कामना की। बहुत होजाऊं पैदा हूं। वह तंप तपा। उसने तप तप के यह सब रचा। जो कुछ कि यह है सब रचके उसने उसमें प्रवेश किया उस में प्रवेश करके मूर्त्तिमान् हुआ और त्र्रमूर्त्तिमान् भी। निरुक्त (वोला जा सके) भी और श्रनिरुक्त भी आश्रय भी अनाश्रय भी। विज्ञान भी अविज्ञान भी। सत्य भी असत्य भी सत्य हुआ। जो कुछ यह है वह सत्य यही कहा जाता है।। यतो वाचो निवर्त्तनते। अप्राप्य मनसासह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न विभेति कुतइचने- ति। तछंहवावनतपति। किमहछंसाधुनाकरवं। किमहं पापमकरवमिति। सय एवं विद्वानेते पात्मान स्पृपुते। उभेह्येवैष एते आत्मान थं स्पूणते। य एवं वेद ॥। ब्रह्मका जिससे मन सहित वाचा बिना पाये लौटते हैं आनन्द जानने वाला किसी से भी भय नहीं खाता उसे यह ताप नहीं होता कि किस लिये मैंने पुण्य नहीं किया किस लिये मैंने पाप किया जो ऐसा जानता है
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उपनिपत्सार।
वह दोनों को आत्मा जानता है क्योंकि जो ऐसा जानता है वह दोनों को आत्मा जानता है।। यतो वा इमानि भतानि जायन्ते। येन जा तानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तदि जिज्ञासस्व। तद्ब्रह्मेति। जिससे ये सव उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न हो के जिससे जीते हैं लय होते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं उसी के जानने की इच्छाकर वही ब्रह्म है।।
ऋग्वेदीय ऐतरेय यदेतहृदयं मनश्चैतत् सज्ञानमज्ञानं वि ज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्म्मतिर्म्मनीषाजतिः स्मृतिः सङ्कल्प: क्रतुरसुःकामोवशइति । सव्वा ण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति॥एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सव्धें देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि प्रथिवी वायुराकाश आपो ज्योतीषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजा नीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्धिज्जानि चाश्वागावः पुरुषा हस्तिनो यत् किञचेदं प्राणिजङ्गमं च पतन्नि च
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उपनिपत्सार। य् स्थावरं। सव्वे तत् प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रति ष्वितंप्रज्ञानेत्रोलोक: प्रज्ञाप्रतिष्ठा प्रज्ञानंब्रह्म॥ हृदय मन सज्ज्ञान (चेतन भाव) अज्ञान विज्ञान प्रंज्ञान मेधा दृष्टि धृति (धैर्य) सति मनीपा (पवल ुद्धि) जति (गति) स्मृति सङ्कल्प क्रतु ( कामना) असु (ग्रण) काम वश ये सब प्रज्ञान ही के नाम हैं। यही ब्रह्म है यही इन्द्रहै यही प्रजापतिहै यही सच देवता है यही पृथ्वी वायु आकाश जल तेज पञ्चमहाभत है यही है वे जो छोटे छोटे मिले हुए हैं। इन के उन के बीज अएडज जारुज स्वेदज उद्िज घोड़ा गाय पुरुष हाथी जितने प्राणधारी हैं क्या चलनेवाले क्या उड़ने- वाले क्या स्थावर। सव प्रज्ञाही से हुए हैं (अर्थात् प्रज्ञा है नेत्र अर्थात्ं निर्वाह करने वाला जिसका) प्रज्ञान में प्रतिष्ठित हैं प्रज्ञान ही से संसार हुआ प्रज्ञानही प्रतिष्टा है प्रज्ञान ही ब्रह्महै।।
कृष्णयजुर्व्वेंदीय इवेताश्वतर न तन्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं। नेमा वि द्ुतो भांन्ति कुतोयमग्निः। तमेव भांतमतुभा ति सच्चै। तस्य भासा सर्व्वमिदं विभाति॥: वहां (ब्रह्म में) सूर्य प्रकाश नहीं करता न चांद और
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उपनिषत्सार। तारे न ये बिजली अग्नि की तो क्या बात है उसी के (ब्रह्म के) प्रकाशमान होने से सब पकाशमान होते हैं उसी का प्रकाश सबको प्रकाशमान करताहै।।
वाजसनेयसंहिता। (ईशावास्य) तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्ददन्तिके। तद न्तरस्य सर्च्वस्य तदुसर्च्वस्यास्य बाह्यतः॥ वह चलता है वह नहीं चंलताहै वह दूर है और समीप भी। वह इस सबके भीतरहै वह इस सबके बाहर है।। यस्तु सर्व्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्व्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ य स्मिन् सर्व्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥ संब भूतों को केवल आत्मा में देखता है। और आत्माको सब भूतों में वह किसी से घिन नहीं करता॥ जब-मनुष्य जानता है कि सारे भूत आत्माही हैं (और) एकत्व देखता है तो फिर मोह और शोक कौन हैं (अर्थात् नहीं रहते)॥ २
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उपनिपत्सार।
सामवेदीय तलवकार श्रोतस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्ाचोह वाचं (केन)
स प्राणस्य प्राणश्चक्षुषशचक्षुः। (ब्रहम वह है जो) कान का कानहै मनका सन है वाचा का वाचा है प्राण का प्राण है आंख की आंखहै।। न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्यो न विजानीमो यर्थेतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो त्र्विदितादधि। इति शुश्रुम पव्चेषां येनस्तद्चाचचक्षिरे॥ न वहां (ब्रह्म में) आँख जाती है न वाकू जाती है न सन हम (इसलिये उसको) नहीं जानते न (यह) जानते हैं कि किसतरह उसे वतलावें जो कुछ कि जाना हुआहै उससे वह अन्यहै वह उससे भी जो कुछ कि नहीं जाना हुआ है परे है ऐसाही पहलों से जिन्हों ने उसे हसको समझाया सुना है॥ यद्ाचानास्युदितं येन वागस्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदसुपासते। यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनोमतम। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ यव्धक्षुषा न पश्यति येन चक्षृंषि पश्यति। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास
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उपनिषत्सार। ११ ते।।यच्छोत्रेण न शणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदसुपालते ॥ य त्प्राऐन न प्राशिति येन प्राणः प्रणीयते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदसुपासते।। जो वाकू से प्रकट नहीं होता और जिससे वाक प्रकट होतीहै उसी को तू बह जान न यह जो उपासना किया जाता है। जो मनसे मनन नहींकरता और जिससे कहते हैं कि मन मनन किया जाता है उसीको तू ब्रह्म जान न यह जो उपासना किया जाता है। जो आंखों से नहीं देखता और जिससे आंखों को देखते हैं उसीको तू ब्रह्म जान न यंह जो उपालना किया जाता है। जो कानों से नहीं सुनता और जिससे यह कान सुना जाताहै उसीको तू ब्रह्म जान न यह जो उपासना किया जाता है। जो प्रण से पराणा नहीं लेता और जिससे प्राण प्राण लेता है उसीको तू ब्रह्म जान न यह जो उपासना कियाजाता है॥
यजुर्वेदीय कठ।। न जायते घियते वा विपश्चिन्नायं कुतरचन्न बभूव कशचित्। अजो नित्य: शाइवतोऽयम्पुरा णो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
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१२ उपनिपत्सार। जाननेवाला न.जन्मता है न मरता है न वह किसी से हुआ न उससे कोई हुआ। वह अजहै नित्यहै शाश्वत है पुराण है शरीर के मारेजाने से भारा नहीं जाता।। हन्ताचेन्मन्यते हन्तुछंहतश्चेन्मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायथंहन्ति न हन्यते॥ जो मारनेवाला शोचे कि मैं मारताहूं जो मरनेवाला शोचे कि मैं मरताहूं तो दोनों नहीं जानते न वह मारता है न वह मारा जाता है।।
मगन्धवच्च यत्। अनाचनन्तम्महतः परन्ध्रुवंनि
जिसने अशब्द अस्पर्श अरूप अव्यय अरस नित्य अगन्ध अनादि अनन्त ध्ुव बुद्धिसे भी परे (ब्रह्म) को जाना सो मृत्यु के मुख से छूटता है।। हृथंसःशुचिषद्दसुरन्तरिक्षस दोता वेदिषदति थिर्दुरोणसत्। नृषद्रसदतसदयोम सदब्जागो जा ऋतजा अद्रिजा ऋतम्बृहत्॥ इंस (सूर्य) होके आकाश में रहता है वसु (वायु) होके अन्तरिक्ष में रहता है होता होके पृथ्वी में रहताहै सोम होके घड़े में रहताहै। वह मनुष्य में रहताहै वह
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उपनिषतसार। १३ देवता में रहताहै वह सत्य में रहताहै वह आकाशमें रह- ता है वह पानी में जन्मता है (जलजन्तु) वह पृथ्वीमें जन्मता है (अन्न) वहयज्ञ में जन्मता है वह पंहाड़पर जन्मता है (नदी) वह सत्य है वह बड़ा है.।। अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रति रूपो बभूव। एकस्तथा स्व्वभतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।। जैसे एक अग्नि संसार में आके रूप रूप प्रति रूप रूप की होजाती है वैसेही एक आत्मा सब प्राशियों के भीतर (और) वाहर भी रूप रूप प्रति रूप रूप का होरहा है।। वायुर्थथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रति रूपो बभूव। एकस्तथा सर्व्वभतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥ जैसे एक वायु संसार में आके रूप रूप प्रति रूप रूप की होजाती है वैसेही एक आत्मा सब प्राणियों के भी- तर और बाहर भी रूप रूप प्रति रूप रूप का होरहाहै।। एको वशीसर्वभतान्तरात्मा एक रूपम्बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतन्नेतरेषाम्॥
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उपनिषत्सार। सब प्राणियों के भीतर वही एक आत्मा है वश करने वाला जो एक रूप को बहुत करता है। जो धीर उसे अपने में स्थित देखते हैं वही सदा सुखी हैं दूसरे नहीं।।
तथर्व्वेदीय प्रश्न ॥ एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोदा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुष:।स परेक्षरे आत्मनि सम्प्रतिष्ठते।। यही विज्ञानात्मा पुरुष देखनेवाला है छूनेवाला है सुननेवाला है संघनेवाला है रस लेनेवाला है ननन करनेवाला है जाननेवाला है करनेवाला है। वह पर अक्षर आत्मा में.सम्प्रतिष्ठित है। विज्ञानात्मा सह देवैइच सवैः प्राण भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र। तदपरं वेदयते यस्तु सौम्य स सर्व्वज्ञः सर्व्वमेवाविशेति॥ हे सौस्य! जो कोई अक्षर (ब्रह्म) को जो विज्ञाना- तमा है और जिसमें सब देवता (इन्द्रिय) प्राए और भूत (पञ्चभूत) प्रतिष्ठित हैं जानता है वह स्व्वज्ञ है वह सब में प्रवेश करता है । सयथेमानद्यः स्यन्दमाना: समुद्रायणःसमुद्रं
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उपनिषत्सार। १५ प्राप्यास्तं गच्छन्ति मिद्येते तासा नामरूपे स मुद्र इत्येवं प्रोच्यते। एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकंला: पुरुषायणा: पुरुषं प्राप्यास्तंगच्छ न्ति भिद्येते तासां नामरूपे पुरुष इंत्येवं प्रोच्य ते सएषोडकलोऽमतो भवति॥ जैसे ये समुद्र को बहती हुई नदियां समुद्र में पहुँच कर अस्त होजाती हैं उनका नाम और रूप नाश होजा- ता है केवल समुद्र पुकारा जाता है ऐसेही पुरुष (ब्रह्म) को जाती हुई इंस परिद्रष्ट (देखनेवाले) की सोलहों कला (प्राण १ श्रद्धा २ आकाश ३.वायु ४ अग्नि ५ जल ६ पृथिवी ७ इन्द्रिय क मन ६तन्न १०वीर्य ११ तप १२ मन्त्र १३ कर्म्म १४ लोक १५ नाम १६) पुरुष में पहुँच कर अस्त होजाती हैं उनका नाम और रूप अस्त होजाता है केवल पुरुष (ब्रह्म) पुकारा जाता है वह अकल है वह अमृत है।। छान्दोग्य सवे खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्तउपा सीत ॥ : सब यह निश्चय व्रह्म है क्योंकि उससे पैदा हुआ उसमें लय होताहै और उसीसे स्थितहै शांत होके ऐसी उपासना करे॥
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१६ उपनिषत्सार।
प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति तेहोचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति॥ प्राण ब्रह्म है क ब्रह्म है ख ब्रंह्म है उसने कहा प्राण ब्रह्म यह तो मैंने समझा पर क और ख नहीं समझा उन्हों (अग्नियों) ने कहा जो क सोई ख है और जो ख सोई क है।। अस्य सौम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राएस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां स य एषोषिमैतदात्म्यमिदथंसर्वे त त्सत्यछं स आत्मा तत्त्वमसि इवेतकेतो इति॥ जब मनुष्य मरता है उसकी वाकू मनमें लयहोती है मन प्राण में प्राण तेज में तेज परदेवता में वह यही अणिमा है सो आत्म्य यह सब वह सत्य वह आत्माहै वह तू है हे श्वेतकेतु !॥ यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्य द्विजानाति स भूमा अथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्य च्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भमा तद मृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यछं स भगवः कस्मिन्प्र तिष्ठित इति स्वे महिस्त्नि यदि वा न महिम्रीति॥
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उपनिषत्सार। १७
वह जिसमें कोई नहीं देखसकता ज़िसको कोई नहीं सुन सकता और जिस को कोई नहीं जान सकता वह भूमाहै वह जिस में दूसरा देख सकताहै जिसको दूस- रा सुन सकता है और जिस को दूसरा जान सकताहै वह अल्प है निश्चय भमा अमृत हैं जो अल्प है वह मत्य है भूमा कहां रहताहै हे भगवन्! (नारद ने. पूछां) वह अपनी महिमामें रहताहै वा यदि पूछो वह महिमा कहां है सनत्कुमार ने (कहा) वह अपनी महिमा में नहीं रहता है।। आात्मैवाधस्तादात्मोपरिष्ठादात्मा पंश्रादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिपत आत्मोत्तरत प्र्रात्मैवेद छंसर्वमिति॥ निश्चय आत्मा नीचे से आत्मां ऊपर से आत्मा पीछे से आत्मा आगे से आत्मा दक्षिण से आत्मा उत्तर से आत्माही यह सव हैi।- स ब्रूयांन्नींस्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमू। वंह कहता है कि इसकी जरा से वह जीर्ण नहीं होता इंसके वधकरनेसे वह वध नहीं होता यंह ब्रह्मपुर सत्यहै। i: मनोमय: परफशरीरो भारुप: सत्यतंङ्कल्प mY'
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१८ उपनिषत्सार। आकांशात्मा सर्वकर्म्मा सर्वकामः सर्वगन्धः स- र्वरस: सर्वमिंदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः।। मनोमय है प्राण है शरीर उस का भारूप है सत्य- संकल्प है आकाशात्मा है स्व्वकर्म्मा है स्व्वकाम है सर्व गन्ध है सर्वरसहै इस सबको ढके है न किसी से कहता है न किसी का आदर करता है। एषम आपात्माऽन्तर्हदयेऽणीयान् ब्रीहेर्वा यवा द्वा सर्षपादा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वा एषम आत्मान्तर्हदये ज्यायान् प्थिव्या ज्याया-
यह आत्मा क्या मेरे हृदय के भीतर है ब्रीहिसे भी छोटाहै वा यव से भी वा सरसों से भी वा कंगनी से भी वा उसके तण्डुल से भी यह आत्मा मेरे हृदय के भीतर है पृथिवी से भी बड़ा है अन्तरिक्ष से भी बड़ाहै दिवसे भी बड़ाहै इन सब लोकों से भी बड़ाहै।। सर्वकर्म्मा सर्वकाम: सर्वगन्धः सर्वरसःसर्व मिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एषम आत्मान्तर्हृद्य एतद्रह्मैतमितः प्ेत्याभिसम्भवितास्मीति। वह सर्वकम्मा हैं सर्वकाम है संर्वगन्ध हैं सर्वरसहै जो इस सबको ढकेहै न वह बोलता है न आंदर कर ता है यह मेरेहृदय में आत्मा है यह ब्रह्महै मरके मैं उसे पाऊंगा॥
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उपनिषत्सार। १६ सदेवसौम्येदमग्रआसीदेक मेवाडद्ितीयम्। तच्बैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्विती यं तस्मादसतःसज्जायेत ॥१॥कुतस्तु खलसौ म्यैव ॐ स्यादिति होवाच कथमसतःसज्जाये तेति॥ सत्वेव सौम्येदमग्र आसीतू एकमेवादि तीयम॥२ ॥ हे सौम्य!यह आगे सत्ही था एक ही अद्वितीय॥ उसी को कोई कहते हैं यह आगे असत्ही था एकही अद्वितीय उसी असत् से सत् निकला॥ १॥उस ने कहा पर हे सौम्य! निश्चय ऐसा वयोंकर होसकता है कि असत् से सत् निकले यह आगे सत्ही था एक ही अ़द्वितीय ॥। २ ।। आकाशो वैं नाम नामरूपयोनिर्वहिता ते यदन्तरातद्रह्मतद्मृत अ स ऋात्मा॥ निश्चय आकाश नाम है नाम रूप से परे सो ब्रह्म वह अमृत है वह आत्मा है।।
वृहदारण्यक ब्रह्मं वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेत्॥ यह पहले ब्रह्मथा वह आत्माही को जानता भया।।
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२० उपनिषत्सार।
अहं ब्रह्मास्मीति॥ "मैं ब्रह्म हूं॥ तस्मात्तत्सर्व्वमभवत्। उस (जानने.) से वह (ब्रह्म) सव हुआII, न दष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न अ्षतेःश्रोतारथंशृणुयाः नमतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञातेविज्ञातारं वि जानीयाः॥ न दृष्टि के द्रष्ट को देखता है न श्रुति के श्रोता को सुनता है. न, मति के सन्ता को ननन कंरताहै न विज्ञान के ज्ञाता को जानता है।" यः प्रथिव्यां तिष्ठन्थिव्या अन्तरोयंष्थि वी न वेद यस्थ पथिवीशरीरंयः प्रथिवीमन्तरो यमयत्येषत आत्मान्तर्याम्यमृतः ।योऽप्सु ति छन्नद्योऽन्तरोयमापो नं विदुर्यस्यापःशरीरं योड पोन्तरो यमयत्येषत आत्मान्तर्य्याम्यमतः। यो ग्नौतिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमग्निनवेद यस्याग्निःश रैरंयोऽग्निमन्तरो यमयत्यैष त आत्मान्तर्याम्य मृतः। योऽतरिक्षे तिष्ठन्नन्तरिक्षादन्तरोयमन्त रिचं न चेद यस्यान्तरिक्षथं शरीरं योन्तरिक्षम
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उपनिषत्सार। २१ न्तगेयमयत्येष त आ्र्प्रात्मान्तर्थ्याम्यमृतः। योवा यौतिष्टन्वांयोरन्तरो यंवायुर्नवेद यस्य वायुःशरी रं योवायुमन्तरो यमयत्येषत आत्मान्तर्य्याम्यम तः।योदिवितिष्ठन्दिवोऽन्तरो यंदयौनवेदयस्यद्यौंः शरीरं यो दिवमन्तरोयमयत्येष तआत्मान्तिर्य्या म्यमृतः य आररादित्ये तिश्वन्नादित्यादन्तरोयमा दित्यो नवेदयस्यादित्य:शरीरं य आ्रदित्यमन्त रोयमयत्येष त आ्र्प्रात्मान्तर्य्याम्यमृतः। यो दिक्षु
रीरंयोदिशोऽन्तरोयमयत्येष त. आत्मान्तर्याम्य मृतः । यश्चन्द्रतारंके तिष्ठथंश्चन्द्रतारकादन्त रोयंचन्द्रतारकं न वेद यस्य चन्द्रतरिंकछंशरी रंयइचन्द्रतारकमन्तरो यमयत्येष त आरत्मन्ति र्याम्यमतः।य आकाशे तिष्ठन्नाकाशादन्तरोय माकाशो न वेदयस्याकाश: शरीरं य आकाशम न्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।यस्त मसि तिष्ठछंस्तमसोडन्तरो यं तमो न वेद यस्यत मः शरीरं यस्तमोऽन्तरोयमयत्येष त आत्मान्त र्याम्यमृतः। यस्तेजसितिष्ठथंस्तेजसोऽन्तरोयंते जो न वेद यस्य तेज: शरीरं यस्तेजोऽनतरोयमय
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:२२ उपनिषत्सार। त्येषत आत्मान्तर्याम्यमृतः। इत्यधिदैवतमथा धिमृतम्॥ यःसवर्वेषुभते षुतिश्वन्सर्वेभ्योभतेभ्योंड नतरोयथंसर्व्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य स्व्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्व्वाणि भृतान्यन्तरोयमय त्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः। इत्यधिभतमथा
वेदयस्यप्राणः शरीरं यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त.आत्मान्तर्याम्यमृतः।यो वाचि तिष्ठन्वाचोड नतरो यं वार्ड न.वेद यस्य वाक शरीरं यो व।चम नतरी यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः।यश्च क्षषि तिष्ठथंश्चक्षुषोऽतरोयं चक्षुर्न वेद यस्य चक्षः शरीरं यश्चक्षरन्तरो यमयत्येष त आंत्मा न्तर्याम्यमतः। यःश्रोत्रे तिष्ठच्छोत्रादन्तरो यछं श्रोत्रं न. वेद. यस्य श्रोत्रछंशरीरं यः श्रोत्रमन्तरो यमयत्येषत आरप्रात्मान्तर्याम्यमृतः। यो मनसि तिष्ठन्मनसोऽन्तरो यं मनो:नवेद, यस्य मनःश रीरं यो मनोऽन्तरो यमयत्येष त. आत्मन्तर्या म्यमृत:। यस्त्वचितिष्ठथंस्त्व चोऽतरो यंत्वङ्न वेद यस्य त्वक शरीरं. यस्त्व चमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्यास्यमतः 1 यो विज्ञाने तिष्ठन्वि
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उपनिषत्सार। २३
ज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्यं विज्ञान छं शरीरं यो विज्ञानमन्तरोयमयत्येष त त्र्प्रात्मान्त र्याम्यमृतः। यो रेतसि तिष्ठनेतसोऽन्तरो य छं रेतो न वेद यस्य रेतः शरीरं यो रेतोऽन्तरोयम
श्रोताडमतोमन्ताSविज्ञातो विज्ञाता नान्योडतो डस्ति. द्रंष्टा नान्योतोस्ति श्रोता, नान्योऽतोस्ति मन्ता नान्योऽतोस्ति विज्ञातैष त आत्मान्तर्या म्यमतोऽतोऽन्यदार्न ततो होददालक आरुषि रुपरराम ।।
जो पृथिवी में रहकर पृथिती से अन्तर जिसको पृ- थिव्री नहीं जानती जिसका पृथिवी शरीर जो पृथिवी को भीतर होकेयम (प्रेरसा) करता है सो आात्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो जल में रहकर जलसे अन्तर जिसको जल नहीं जानता जिस का जल शरीर जो जल को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो अग्नि में रहकर अग्नि से अप्र- न्तर जिसको अग्नि नहीं जानती जिसका अग्नि शर्रार जो अग्नि को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो अन्तरिक्ष में रहकर अन्तरिक्ष से अन्तर जिस को अन्तरिक्ष नहीं जानता
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२४ उपनिपत्सार।
जिसका अरन्तरिक्ष शरीर जो अन्तरिक्ष को भीतर होके चम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो वायु में रहकर वायु से अन्तर जिस को वायु नहीं जानता जिस का वायु शरीर जो बागु को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अ- मृतहै। जो दिव में रहकर दिव से अन्तर जिसको दिव नहीं जानता जिस का दिव शरीर जो दिव को भीतर होके यम (प्रेरणा) करताहै सो आत्मा अन्तर्यामी अ- मृत है। जो आ्रादित्य में रहकर आदित्य से त्र्प्रन्तर जिस को आदित्य नहीं जानता जिस का आप्रादित्य शरीर जो आदित्य को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो दिशाओं में रहकर दिशाओंसे अन्तर जिस को दिशा नहीं जानतीं जिस का दिशा शरीर जो दिशाओं को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आात्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो चन्द्र तारों में रहकर चन्द्र तारों से अन्तर जिस को चन्द्र तारे नहीं जानते जिस का चन्द्र तारे शरीर जो चन्द्र तारों को भीतर होके चम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो आकाश में रहकर आकाश से अं्तर जिसको आकाश नहीं जान- ता जिसका आकाश शरीर जो आकाश को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो तम में रहकर तम से अनंतर जिस को तम नहीं
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उपनिषत्सार.। २५.
जानता जिसका तम शरीर जो तकको भीतरहोके यम (प्रेरसा). करती है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो तेज में रहकर तेज से अन्तर जिसको तेज नहीं जानता जिसका तेज शरीर जो तेज को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आात्मा अन्तर्यामी अवृत है। इति अधिदैवतमथाधिभूतं। जो सम्पूर्ण भूतों में रहकर सम्पूर्ण भूतोंसे अन्तर जिलको सम्पर्ण सूतनहीं जानते जिसका सम्पूर्ण भूत शरीर जो सम्पूर्ण भूतोंको भीतर होके यम (प्रेरणा) करताहै सो आत्मा अन्तर्थामी अमृत है। इत्यधिभूतमथाध्यात्मंजोप्राण में रहकरप्राख से अन्तर जिसको प्राण नहीं जानता जिसका प्राण श- रीर जो प्राण को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो वाणी में रहकर वासी से अन्तर जिसको वाणी नहीं जानती जिसका वाणी शरीर जो वाणी को भीतर होके यम (प्रेरसा) करता है सो आत्मी अन्तर्यामी अरमृत है। जो नेत्र में रहकर नेत्र से अन्तर जिस को नेत्र नहीं जानता जिस का नेत्र शरीर जो नेत्र को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो कान में रहकंर कान से अन्तर जिलको कान नहीं जानता जिस का कान शरीर जो कान को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता हैं सो तरत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो मन में रहकर मन से अन्तर जिसको मन नहीं जानता जिसका
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२६ उपनिपत्सार।
मन शरीर जो मनको भीतर होके यम (प्रेरणा) क- रता है सो आत्मा अन्तर्थ्यामी अ्रपरमृत है। जो त्वचा में रहकर त्वचा से अन्तर जिसको तचा नहीं जानती जि- सका त्वचा शरीर जो तचा को भीतर होके यम (प्रे- रणा) करता है सो आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो विज्ञान में रहकर विज्ञानसे अन्तर जिसको विज्ञान नहीं जानता जिसका विज्ञान शरीर जो विज्ञान को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा आन्तर्यामी अमृत है। जो रेतस में रहकर रेतस से अन्तर जिसको रेतस नहीं जानता जिस का रेतस श़रीर जो रेतस को भीतर होके यम (प्रेरणा) करता है सो आत्मा अन्त- र्यामी अमृत है। अदप्ट्है द्रष्टाहै तरप्रश्रुत है श्रोता है अमत है मन्ता है तरप्रविज्ञात है विज्ञाता है इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं इससे अन्य कोई श्रोता नहीं इससे अन्य कोई मन्ता नहीं इससे अन्य कोई विज्ञाता नहीं सो यही आत्मा अन्तर्यामी अमृत है इसके सिवाच नाशी है।। कस्मिन्रुखल्वाकाश ओतइच प्रोतइचेति।स होवाचैतहवै तदक्रं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्य स्थूलमनएवहस्वमदीर्घमलोहि तमस्नेहमच्छाय
59 मश्रोत्रमवागमनो Sतेजस्कमप्राषममुखममात्रः मनन्तरमबाह्यं नतदश्नाति किञ्चन न तदश्ना
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उपनिषत्सार। २७ तिकश्चनएतस्य वा त्प्रक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर््या चंद्रमसौविधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्ष- रस्य प्रशासने गार्गि द्यावाप्थिव्यौ विधृतें ति- ष्ठतः। एतस्य वा त्र्प्रक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहर्त्ता अहोरात्राण्यईमासा मासा ऋ- तवंः संवत्सराइति विधृतास्तिष्ठत्येतस्य वा अ. क्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्य- न्दन्ते श्वेतेभ्यःपर्वतेभ्यःप्रतीच्योऽन्यायां याञच दिशमन्वेति। एतस्य वा त्रप्रक्षरस्य प्रशासने गार्गिदृदतो मनुष्याःप्रशछं सन्ति यजमानं देवा दर्वी पितरोऽन्वायत्ताः। यो वा एतदक्षरं गार््य विदित्वाऽस्मिल्लोके जहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्ष सहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्रवति यो
कृपणोऽथयएतदक्षरं गार्गि विदित्वाडस्माल्वोकां त्प्रैतिस ब्राह्मणः। तद्ाएतदक्तरं गार्ग्यऽष्टंद्रष्ट श्रतथंश्रोत्रऽमतं मन्त्रSविज्ञातं विज्ञात नान्यद तोऽस्ति द्रष्ट नान्यदतोऽस्ति श्रोतनान्यदतोऽ स्ति मन्त नान्यदतोऽस्ति विज्ञात्रेतस्मिन्नुखल्व- क्षरे गार्ग्याकाश तपोतश्च प्रोतश्चेति।
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२८ उपनिपत्सार। आकाश किस में ओत और प्रोत है (अर्थात् किस ताने, वाने से बिनाहै)। याज्ञवल्यय बोले हे गार्गि !त्रा- ह्वाण (ब्रह्मज्ञानी) लोग उसको तक्षर कहते हैं वह न स्थलहै न अशु है न हस्व है न दीर्घ हे न लोहितहे न उसमें तेल है न छाया है न तम है न वायु है न आ- काश है असंग है शरस है अगन्ध है अचक्ष है अश्रोत्रहै अवाकू है अमन है अतेज़स्क है अप्राण है असुख है न कोई इन्द्रियहै न भीतर है न चाहरहै न वह कुछ खाता है न उले कोई खाता है। इस त्रक्षर के प्रशासन से हे गार्गि! सर्य और चन्द्रमा घरेहुए स्थित हैं इस त्र्प्रक्षर के प्रशासन से हे गार्गि! स्वर्ग और पृथिवी धरी हुई स्थित है इस अक्षर के प्रशासन से हे गार्गि! निमेप सु. हुर्त दिन रात्रि पक्ष सास वातु वर्ष ये सब धरे हुए स्थित हैं इस त्रक्षर के प्रशासंन से हे गार्गि! पूर्व में प- शचिस में और भी दिशाओं में शवेतपर्वतों से नदियां बहती हैं इस त्ररक्षर के प्रशासन से हे गार्गि! देने वाले मनुष्य प्रशंसा पाते है यजमान के देवता दर्वी (होम) के पितर इसी के प्रशासन से वशवर्ती हैं। इस श्र्प्रक्षर के बिना जाने हे गार्गि! जो इस संक्ार में होम क- रता है यज्ञ करता है बहुत सहस्रों वर्ष तप करता है उसका (फल) नाश युक्तही होता है इस तक्षर के बिना जाने हे गार्गि! जो इस संसार से जाताहै सो कृपण है इस अक्षर को जानके हे गार्गि! जो इस संसारसे जा-
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उपनिषत्सार। २६ ताहै सो बराह्मत है। यह अत्तर हे गार्गि! अदुष्टहै द्रष्टाहै अश्जुतहै ओ्रोता है अमतहै मन्ताहै अविज्ञात है विज्ञाता है इसके सिवाय कोई द्रक्टा नहीं इसके सिवाय कोई शरोता नहीं इसके सिवाय कोई मन्ता नहीं इसके सि- वाय कोई विज्ञाता नहीं इसी अक्षर में हे गार्गि! आकाश ओरत और प्रोत है। (तान् हतैःइलोके पप्रच्छ) यथा वक्षी वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा। तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिकावहिः ॥ त्वच एवास्य रुधिर प्रस्यन्दित्वच उत्पटः। तस्मात्तदातृण त्प्रैति रसो वच्ादिवाहतात्॥ मा छंसान्यस्यश कराशि किनाट छंस्नावततस्थिरं। अस्थीन्यंतर तोदारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता॥ य द्टनोळ कणो रोहतिमूलान्नवतरःपुनः। मर्त्यःस्विंमृत्युना टक्णः कस्मांमूलात्प्ररोहति ॥रेतस इति मावो चत जीवतस्तत्प्रजायते। धानारुह इव वै छक्षी जजजंसा प्रेत्य सम्भवः ॥ यत्समूलमावहेयुर्व नं नःपुनराभवेत्। मर्त्यः स्विन्मत्युना उक््ए: क स्मान्मलात्प्ररोहति॥ जात एवं न. जायते को न्वेनं जनयेत्पुनः । विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रति र्दातु: परायणं। तिष्ठमानस्य तद्विद,इति।।/
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उपनिपत्सार।
(याज्ञवल्क्य ने पूछा) जैसा वनस्पति वृक्ष सव वैसाही पुरुष इसके लोम उसके पत्ते चाहर का चमड़ा वैसीही उसकी भी छाल त्वचाही से पुरुष का रुधिर बहता है छालही से वृक्ष का (रंस) गोंद मारे हुये पुरुष से रुधिर टपकता है कटेहुये वृक्ष से रस पुरुपके मांसहै वृक्षके टुकड़े वृक्षके स्थिर काष्ठमें लगी हुई जैस छाल वैलेही पुरुष के स्नाव पुरुष के हड्डी वृक्ष के का्ट पुरुष और वृक्षकी मज्जाही से उपमा की गयी जो वृक्ष कटा वह जड़ से फिर नवीन उत्पन्न होताहै मृत्यु का काटा मरा पुरुष किस जड़ से उत्पन्न होता है रेतम से ऐसा मत कहो वह तो जीते पुरुष के होता है वृक्ष बीज से और साक्षात् (कलम) से भी उत्पन्न होता है जड़ स- मेत वृक्ष को खोद डालने से फिर उत्पन्न नहीं होताहै मृत्यु का काटा मरा पुरुष किस जड़ से उत्पन्न होताहै जना हुआ नहीं जनाजाता फिर कौन इसे जने धन देने वाले और तिष्ठमान ( ब्रह्मवेत्ता) का परायण विज्ञान आनंद ब्रह्म तिस को जान। अत्र पिता Sपिता भवति माताडमातालोका अलोका देवा अदेवा वेदा अवेदाः। अन्रस्ते नोडस्तेनो भवति भ्रूणहा डभ्रणहा चाएडालोड चाएडाल: पोल्कसो डपौल्कस: श्रमणोऽश्रम ण स्यापसोऽतापसोनन्वागतं पुएयेनानन्वागतंपा
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उपनिषत्सार। ३१ पेनतीर्णेहि तदासर्वाच्छोकानूहृदयस्य भवति॥ यहां (सुंषुत्ति अवस्था में) पिता अपिता होता है माता अमाता लोक अलोक देवता अदेवता वेद अवेद. स्तेन अस्तेन भ्रूणहा अभ्रूरहा चाण्डाल अचाण्डाल पॉल्कस अपोल्कस श्रमण अश्रमण तापस अतापस होता है पुण्य और पापसे लिप नहीं होता उसअवस्था में हृदय के शोकों से छूट जाता है।। यद्वेतन्न पश्यति पश्यन्ह्येतन्न पशयति!नहि द्रष्टर्टष्टेविपरिलोपो विद्यते Sविनाशित्वात् नतु तद्वितीयमस्ति ततो Sन्वद्विभक्क यत्पश्येत्। य द्वेतन् जिघ्रति जिघ्रन्वैतन्न जिघ्रति नहि घ्रातुर्घ्रा तेविपरिलोपो विद्यते डविनाशित्वान्नतु तदविती यमस्ति ततो उन्यद्विंभक्कं यग्जिघ्रेत। यद्वैतन्न रसयते रसयन्वै तन्न रसयते नहि रसयितु रस यतेर्विपरिलोपो विद्यते डविनाशित्वान्नतु तदिं तीयमस्ति ततो उन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ।यद्वैतन्न वदति वदन्वै तन्न वंदति नहि वक्तुर्व क्तेर्विपरि लोपोविद्यते डविनाशित्वान्नतु तद्वितीयमरितिं ततो Sन्यद्विभक्तं यद्देत्। यद्दैतन्न शृणोतिशृ एवन्वै तन्न शृणोति नहि श्रोतुःश्रुतेर्विपरिलोपो विद्यते डविनाशित्वान्नतु तद्वितीयमस्ति ततो
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३२ उपनिषत्सार। इन्यद्विभक्तं यच्छणयात्। यद्वैतन्न मनुते मन्वा नो वै तन्न मतुते नहि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो वि दयते डविनाशित्यान्नतु तद्वितीयमस्ति सतो त्र न्यद्विभक्तं यन्मन्वीत। यद्वैतन्न स्पशति स्ट शन्वै तन्न स्पशतिनहिस्प्रष्टु: स्परष्टेविंपरिलोपो विद्यते डविनाशित्वान्नंतु तद्वितीयमस्ति ततो S=यिभक्ं यत्स्टशेत्। यद्वैतन् विजानाति वि जानन्वैतन्न विजानाति नहि विज्ञातुविज्ञातेचिप रिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्नतु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्कं यदिजानीयात् ॥ यत्र वाडन्य दिवास्यात्तत्रान्यो न्यत्पइयेदन्यो डन्यज्जि्रे दन्यो ऽन्यद्रसयेदन्यो Sन्यद्वदेदन्यो डन्यच्छृणु यादन्योऽन्यन्मन्वीतान्यो इन्यत्स्पशेदन्यो ऽन्य द्विज़ानीयात्॥ सलिलएकोद्रष्टा उद्दैतोभवत्येष ब्रह्मलोक: सघाडिति हैनमनुशशासयाज्ञवल्क्य एषास्य परमागतिरेषास्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमोलोक एषो डस्य परमआनन्द एतस्यैवा नन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रासुपजीवन्ति ॥ (सुपुति अवस्था में) जो द्वैत (दूसरे) को नहीं दे- खाता द्रष्टा की दृष्टिका लोप नहीं होता क्योंंकि न्र्प्रवि-
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उपनिषत्सार। ३३
नांशी है वह द्वितीय नहीं है उससे दूसरा पृथक् भूत नहीं है जिसको देखे। जो दूसरे को नहीं सूंघता घाता के घ्रांग का लोप नहीं होता क्योंकि अविनाशी है वह द्वितीय नहीं है उससे दूसरी पृथकं भूत नहीं है जिसको सूंघे। जो दूसरे को स्वाद नहीं लेता स्वादलेनेवाले के स्वाद का लोप नहीं होता क्योंकि अविनाशी है वह द्वितीय नहीं है उससे दूसरा पृथकू भत नहीं है जिसको स्वादले। जो दूसरे को नहीं कहता कहनेवाले के कहने का लोप नहीं होता क्योंकि अविनाशी है वह द्वितीय नहीं है उससे दूसरा पृंथंक भूत नहीं है जिसको कहें। जो दूसरे को नहीं सुनता श्रोता के अवा का लोप नहींहोता क्योंकि अविनाशी है वह द्वितीय नहीं है उससे दूसरा पृथक भूत नहीं है जिसको सुने। जो दू- सरे को नहीं मनन करता मन्ता के मनन का लोप नहीं होता क्योंकि अविनाशी है वह द्वितीय नहीं है. उससे दूसरा पृथक भूत नहीं है जिसको मननकरे। जो दूसरे को नहीं स्पश करता स्पर्श करनेवाले के स्पर्श का लोप नहीं होता क्योंकि तविनाशी है वह द्वितीय नहीं है उससे दूसरा पृथक भूत नहीं है जिसको स्पर्श करे। जो दूसरे को नहीं जानता ज्ञाताके ज्ञानका लोप नहीं होता क्योंकि अविनाशी है वह द्वितीय नहीं है उस से दूसरा पृथक भूत नहीं है जिसको जाने। जहां अन्य इव (सा) होय वहां अन्य अन्य को देख अन्य अन्य
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३४ उपनिषत्सार।
को सूंघे अन्य अन्य को स्वाद ले अन्य अन्य को कहे अन्यः अन्य: को सुने; अन्य अन्य को मननकरे अन्य अन्य को स्पर्श करे अन्य अन्य को जाने। सलिल (जैसा) एक दरष्टा अद्वैत होता है याज्ञवल्क्य ने कहा हे सघ्रांड् !1 यही ब्रह्मलोक है यही इसकी परमगति है यही इसकी परम सम्पत है यही इसका परम लोक है यही इसका परम आनन्द है इसी आनन्दका कला- मांत्र अन्य भृत उपजीवन करते है॥ स यत्रष चाक्षुषः पुरुष: पराङ्पर्य्यावर्तते तथारूपज्ञा भवति। एकी भवति न पशयतीत्या हुरे की भवति न जिंघ्रतीत्याहुरेकी भवति न रस यतइत्याहुरेकी भवति नं वदतीत्याहुरेकी भवति नःप्रणोतीत्याहुरेकी भवति न मनुत इत्याहुरेकी भवति न स्पशतीत्याहुरेकीभवति न विजानाती त्याहुस्तस्य है तस्य हृदयस्यायं प्रद्योतते तेन प्धोततेनैष आत्मा निष्कामति। 1वह चाक्षष पुरुष जब पराङ् (वाहर को) पर्य्याव- तैन करता हैं तब रुपज़ होता है जब एकहोता है नहीं देखता है जब एक होता है नहीं स्वाद लेता है जंबएक होता है नहीं कहता है जब एक होता है नहीं सुनता है जन एक होता है नहीं मनन करता है जब एक. होत।
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उपनिषत्सार। ३५ है नहीं स्पर्श करता है जब एक होता है नहीं जानता है ऐसा कहते हैं उसके हृदय का अग्र उस एकी भाव से प्रद्योतन करता है उस प्रद्योंतन से यह आत्मा निः कल जाता है। स बा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो-मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः प्रथिवीमय आपो मयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोडतेंजोमयः काममयोडकाममयः क्रोधमयोSकोधमयो धर्म्म मथोडघर्म्ममयः सर्व्वमयस्तद्यदेतदिदम्म योड़दो मय इति, यथाकारी थाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुएयः पुण्येन कर्म्मणा भंवति पापः पापेन। वह या यह आर्तमा ब्रह्म विज्ञानमय मनोमय, प्राणमय चक्षमय श्रोत्रमय पृथिवीमय जलमय वायुमय आकाश मय तेजमय अतेजमय काममय अकाममय कोधमय अक्रोघमय-धर्म्ममय अधर्म्ममय सर्व्मय प्रत्यक्षमय अप्रत्यक्षमय जो जिसके करने का और आचरण का शील है उस में वैसाही हो जाता है पुण्य करने से पु- पयात्मा पाप करने से पापी होता है पुण्य कम्म से पुष्यं पाप से पाप होता है। यदासर्वे प्रमुच्यनतेकामायेऽस्य हृदिश्षिता।
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३६ उपनिषत्सार। अथ मर्त्योऽमतो भवत्यत्र ब्रह्मसमशनुत इति॥ जव इसके हृदय से सव काम (इच्छा) छुट जाते हैं यह मनुष्य यहांही अमृत होकर ब्रह्मको पाजाता है॥ तद्यथाहि निर्ल्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैव मेवेद छं शरीर छं शेते. अथायमशरीरो डमृत: प्राणो ब्रह्मैव तेज एव ॥। जैसे सांप की केचली जुदा होके वांवी में मरी पड़ी सोती है वैसेही यह शरीर सोता है यह अशरीर अमृत प्राण ब्रह्मही है तेजही है॥ तपरथह याज्ञवल्क्यस्य द्वेभारय्यें वभवतुमैत्रे यी च कात्यायनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बंभूव स्त्री प्रज्ञैव तहि कात्यायन्यथह याज्ञवल्क्यो जन्यद्ळत्तमुपाकरिष्यन्। मैत्रेयीति होवाच याज्ञ वल्क्यःप्रव्नजिष्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि हन्ततेऽनयाकात्यायन्यान्तं करवाणीति। साहो वाच मैत्रेयी यनुम इयं भगो: सर्वा एथिवी वित्ते
वाच याज्ञवल्क्यों यथवापकरणवर्ता जीवितं त थैव ते जीवित थं स्यादमृतत्वस्य तुनाशास्ति वित्तेनेति। सा होवाथ मैत्रेयीयेनाहं नामतास्यां
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उपनिषत्सार। ३७ किमहं तेन कुय्यी यदेव भगवान्वेत्थ तदेव मे िब्रूहीति। स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वैख लुनो भवती सती प्रियमटधद्दन्ततर्हि भवत्येत इयाख्यास्यामितेव्यांचक्षाएस्य तुमे निदिध्यास स्वेति। सहोवाच न वा घप्ररे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिःप्रियो भवति न वा अरे जायायै.कामाय जाया प्रिया भवत्या त्मनस्तु कामाय जाया प्रियां भवति न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियम्भवत्यात्मनस्तु कामाय वि तं प्रियं भवति न वा अरे पशूनां कामाय प- शवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रियाभवन्ति न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कार्माय ब्रह्म प्रियं भवति न वा अरे क्षत्रस्य कामीयक्षत्रं प्रियं भवत्यात्म नस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति न वा अरे लो कानां कामाय लोका:प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु का माय लोका: प्रिया भवन्ति न वा अरे:देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय
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.३८ उपनिषत्सार। देवाः प्रिया भवन्ति न वा अरे वेदानां कामाय वेदाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाःप्रिया भवन्ति न वा अरे भतानां कामाय भतानि प्रि याणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति न वा अरे सर्वस्य कामाय सव्ध प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवतिआरात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो:मन्तव्यो निदिध्यासि तव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते. विज्ञात इद थं. सर्वविदितं। ब्रंह्मतंपरादाघोऽन्यन्नात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादादोऽन्यत्रात्मनः च्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यन्रात्मनो लोकान्वेद देवा स्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद वेदास्तं प रादुर्योऽन्यन्नात्मनो वेदान्वेद भूतानि त परादु योडन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वै तं परादादयोड न्यन्रात्मनः सव्व वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवाइमे वेदा इमानि सर्व्वाणि भूतानीदथं सव्चै.यद्यमात्मा। स यथी दुन्दुभेर्हन्यमानस्य नबाह्याञ्छव्दाञ्क्नुयादूंग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः। स यथाशंखस्य ध्मायमानस्य:न बाह्याच्छन्दाञ्ळ
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उपनिषत्सांर। ३६ कनुयाद्ग्रहणाय शंखस्य तु ग्रहणेन शंखध्म स्य वा शब्दो गहीतः।सयथा वीणयै वांदमा
यैतु ग्रहषेन चीणावादस्य वा शब्दोगृहीतः। संयथाद्रेधागनेरभ्याहितस्य पृथगधमा, विनिश्च रत्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसित मेतददग्वेदों यजुर्वेद: :सामवेदोडथवीगिरस इ तिहासः पुराएं विद्या उपनिषद: इलोका: सूत्रा पयनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टथं हुतमाशि तं पीयितमय च लोक: परश्च लोक: सर्व्वाणि च सूतान्यस्यैवैतानि, स्व्वाणि निइवसितानि।। सयथासरच्चा सामपा छं.समु्द्रएकीयनमेवछंसर्वे षाथंस्पर्शानां त्वगेकायनमेवा छंसर्वेषा छं.रसा नौ जिह्लैकायनमेवथ्रंसर्वेषा गन्धारना नासिके का यनमेवछ सर्वेषा छं रूपाणां चक्षरेकायनमेव थं
षा.छं.संकल्पानां मन एकायनमेव,छंसव्वासां विद्याना छं हृदयमकायनमेव छं सव्चेषां कर्म्म शोखं.हस्तावेकायनमेव छं स्व्वेषा मतन्दानामु पस्थ एकायनमव छं स्व्चेषां विसर्गाणां पायु
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8.0: उपनिषत्सारः।
सव्वेषां वेदाना छं वागेकायन। सयथा सैंधव घनो: Sनन्तरोडबाह्य: कृत्स्नोरसघन एवैवं वा अरे ड्यंमात्मा S नन्तरो डबाह्यः कृत्स्नःप्रज्ञानः घन एवैतभ्यो भतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुवि नश्यति न. प्रेत्य, सव्ज्ञाऽस्तीत्यरे ब्रवीमीति हो वाच याजवल्क्यः। सा होवाच मैन्नेय्यत्रेवमा भगवान्मोहान्तमापीपिपत्न वा अहमिमं विजा नामीति स होवांच न वा अरे 5हं मोहं ब्रवीम्य विनाशी वा अरेऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्म्मा । यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इंतरं जिघ्रति तदितर इतर छं रसयते तदितर इतरंमभिवदति तदितर इंतर छं श्ृणो ति तंदितर इतरं मनुते तदितर इतरथंस्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्रत्वस्य सर्व्वमात्मै वींभूत्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन छं शृणयात्तत्केन कें मन्वीत तत्केनक छं स्पशेत्तत्केन. कं.चिजानी यादेनेद थं स्च विजानाति.त. केन विजानीया त्सएष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि ग्रह्यतेऽशी य्यों नहि शीर्य्यते 5संगो नहि सज्यते सितो न
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उपनिषत्सार। ४१
व्यथते. न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानी यादित्युक्का नुशासनासि मैत्रेय्येतावदरेखल्वस तत्वंमितिहोक्तवा याज्ञवल्कयो विजहार।। याज्ञवल्क्यके दो स्त्री थीं मैत्रेयी और कात्यायनी मै- त्रेयी ब्ह्मवादिनी थी कात्यायनी स्त्रियों कीसी बुद्धि 'रखती थी याज्ञवल्क्य (गृहस्थाश्रम से) दूसरे त्र््राश्म (परिव्राजक) में चलनेको हुए बोले हे मैत्रयी! मैं इस जगह से परिव्रजन करूंगा तू चाहे तो तेरा कात्यायनी से विभाग करदूं वह मैत्रेयी बोली हे स्वामी! यह पृथ्वी धनसे पूर्ण होगी, तो मैं क्या अमृता हो जाऊंगी याज्ञ- चल्क्य वोले कि नहीं जैसा धनियों का जीवन होता है वैसाही तेरा भी होगा धनसे अमृतत्व की आशा नहीं "है। मैत्रेयी बोली जिससे मैं अमृता न हूंगी उसे मैं क्या करूंगी स्वामी जो आप जानते हैं सोही मुझको कहिये वह याज्ञवल्क्य जोले निश्चय कर हमको प्रिया होती हुई तू अच प्रीति को बढ़ाती है तेरेलिये कहता हूं मेरे कहने में मनलगा। वह बोले अरी पतिके कामके लिये पति प्रिय नहीं होता अपने कामके लिये पति प्रिय होता है तरी स्ी के कामके लिये स्ी प्रिय नहीं होती अपने फाम के लिये स्त्री प्रिय होती है अरी पुत्रों के क़ाम के लिये पुत्र प्रिय नहीं होते अपने काम के लिये पुत्र छिय होते हैं अरी धन के काम के लिये धन प्रिय
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४२ उपनिपत्सार।
नहीं होता अपने कामके लिये धन प्निय होता है अरी पशुओं के कामके लिये पछाप्िय नहीं होते अपने काम के लिये प्रिय होते हैं तरी ब्रह्म के काम के लिये ब्रह्य प्रिय नहीं होता अपने काम के लिये प्रिय होताहैतरी क्षत्र के काम के लिये क्षत्र प्रिय नहीं होता अपने काम tho ric As के लिये ग्रिय होता है अरी लोकों के काम के लिये लोक प्रिय नहीं होते अपने काम के लिये प्रिय होते हैं अरी देवताओं के काम के लिये देवता प्रिय नहीं होते अपने काम के लिये परिय होतेहैं अरी वेदों के कांम के लिये वेद प्रिय नहीं होते अपने काम के लिये प्रिय होते हैं अरी (पञ्चमहा) भूतों के काम के लिये (प- ञ्चमहा) भूत प्रिय नहीं होते अपने काम के लिये प्रिय होते हैं अरी सब के काम के लिये सब प्रिय नहीं होते अपने काम के लिये प्रिय होते हैं अरी आत्मा द्र- षव्य श्रोतव्य मन्तव्य निदिध्यासितव्य है अरी मैत्रेयी निश्चय करके आत्मा के देखने सुनने सानने और अच्छी तरह जानने से यह सब जाना जाता है। ब्रह्म- जाति उसको तिरसकार कर देती है जो आत्मा से दू सरे में ब्रह्म जानता है क्षत्र जाति उसको तिरस्कार कर देती है जो तरात्मा से दूसरे में क्षत्र जानता है लोक उसको तिरस्कार कर देते हैं जो आत्मा से दूसरे में लोक जानता है देवता उसको तिरस्कार कर देते हैं जो आत्मा से दूसरे में देवता जानता है वेद उसक
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उपनिषत्सार।
तिरस्कार करदेते हैं जो आत्मा से दूसरे में वेद जा- नता है (पश्चमहा) भूत उसको तिरस्कार कर देते हैं जो आत्मा से दूसरे में (पश्चमहा) भत जानता है सब उस्को तिरस्कार कर देते हैं जो आत्मा से दूसरे में सब जानता है यह ब्रह्म यह क्षत्र थे लौक ये देव्ता ये वेद ये सब (पश्चमहा) भूत यह सब यही आत्मा है। वह जैसे बजायी जाती दुदुभी के बाहरके शब्दकों घ्रंहण न कर सकिये पर दुंडुभी के हणा करने से ब- जायी जाती दुंदुसी का शब्द गृहीत होजाता है। वह जैसे बज़ाये जाते शंख के बाहर के शब्द को अ्रहण ने कर सकियें पर शंख के ग्रहण करने से बजाये जात शंख का शब्द गृहीत हो जाताहै। वह जैसे बजायी जाती बीन के बाहर के शब्द को ग्रहण न कर लकिये पर बी- न के अहरा करने से बजायी जाती बीन का शब्द मृहीत हो जाता है। वह जैसे गीली लकड़ी के संयोग से अग्नि में से धुआं निकलता है वैसेही अरी इस बड़े भत का निश्वसित हैं यह ऋगवेद यजुर्वेद सामवेद अ- थर्वण वेद इतिहास पुराण विद्या उपनिषद् श्लोक सभ्र प्प्रतुव्याख्या व्याख्या इष्ट (यज्ञ) हुत (होम) खाया हुवा पीया हुवा यह लोक परलोक सब भत इसी का यह सब निश्वसित है। वह जैसे सब जलों का समुद्र एकायन (अयन-ठिकाना) है. सब स्वशों का तवचा एकायन है सन रसों का जिह्वा एकायन है सब गन्धों का
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उपनिषत्सार।
नासिका एकायन है सव रूपों का चंक्षु एकायनहै सक शब्दों का कान एकायन है सब संकल्पों का मन एका- यन है सब विद्याओं का हृदय एकायन है सव कामों का हाथ एकायन है सव आनन्दों का उपस्थ एकायन है सब विसंगों का पायु एकायन हैं सब पथों का पैर एकायन है सब वेदों का वाकू एकायन है। वह जैस सैन्धव घन भीतर और बाहर संपूर्ण रस का समूह है अरी ऐसेही यह आत्मा भीतर और बाहर प्रज्ञान घनही है इन भतों से उठ कर उन्हीं के पीछे होकर नाश को प्राप्त होता है नाश होने पर संज्ञा नहीं रहती अरी मैं कहता हूं यह याज्ञवल्क्य ने कहा। वह मैन्नेयी बोली हे भगवन्! यहां आापने सुभको मोह के मध्य में गिरा दिया मेरी समझ में यह नहीं आता वह बोले अरी मैं मोहकी वात नहीं कहताहूं अरी यह आत्मा अरविनाशी है और अनुच्छितिधर्म्मा है (जिसका कभी उच्छेदनहीं) जहां द्वैत सा होता है वहां एक दूसरे को देखता है वहां एक दूलरे को सूंघता है वहाँ एक दूसरे का रस लेता है वहां एक दूसरे का अभिवादन करता है वहां एक दूसरे की सुनता है वहां एक दूसरे का मनन करता है वहां एक दूसरे को छूताहै वहां एक दूसरे को ज़ानताहै जहां इस का सम्पूर्ण आिमाही होगया तब किस से किसको देखेगा तब किससे किसको सूंघेगा तव किससे किसका रस लेगा तब किससे किसका अभिवादन करेगा तवं
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किससे किसको सुनेगा तब किससे. किसका मनन क- रेगा तब किससे किसे छूएगा तब किससे किसे जा- नेगा जिससे यह सम्पूर्ण जाना जाता है उसको किससे जानिये वह आत्मा यह नहीं यह नहीं अगृहयहै ग्रहण नहीं होता अशीर्य है शीर्य नहीं होता (नहीं टूटंता) अरसंग है साथ नहीं किया जाता असित (अबद्ध) है दुःखी नहीं होता नष्ट नहीं होता अरी विज्ञाता को किससे जा- निये यह तुझे सब शिक्षा देदी अरी मैत्रेयी इतनाही अमृतत्व है यह कहके याज्ञवल्क्य परिव्रासता को धा- रण करते भये ॥, कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषत्॥ ऋतुरस्म्यार्तवोऽस्म्याकाशाद्योने: सम्भूतो भायैरेतः संवत्सरस्य तेजो भतस्य भृतस्यात्मा भतस्य मततस्य त्वमात्मासि यस्त्वमसि सोडहम स्मि तमाहकोऽहमस्मीति सत्यमिति ब्रयात् कि तद्यत्सत्यमिति यदन्यद्देवेभ्यश्च प्रणभ्यश्च तत्सदथ यद्देवाइच प्राणाश्च तत्त्यं. तदेतया वा चाभिव्याह्नियते सत्यमित्येतावदिदं सर्वमिदंसर्व मसीत्येवैनं तदाह।। मैं ऋतुं हूं मैं वह हूं जो मतु में है मैं आकाशयोनि. से हुवा हूं स्वयं प्रकाश ब्रह्म संवत्सर का वीर्य चतु-
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४६ उपनिषत्सार।
विध प्राियों का तेज पाणी और अंगाणियों का और पंच भतों का आत्मा तू आत्मा है जो तू है सोही मैं हूँ उससे कहता है मैं कौन हूं तू सत्य है ऐसा कहे वह. सत्य क्या है इन्द्रियों से और प्राणों से जो अन्यत् सो सत् है इन्द्रियां और प्राण त्य अर्थात् वह है इस वाणी : से सत्य कहा जाताहै जो कुछ कि यह सघ है यह सव तू है ऐसा वह उसको कहता है।। मैंत्री उपनिषत्।।
इलेष्माशदूषिका विएसूत्रपित्तकफ मंघानेदुर्गन्धे निःसारेऽस्मिळ्छरीरे किकामोपभोगै: । हे भगवन्! इस अस्थि चर्म स्नायु मजा मांस शक्र शोणित श्लेष्मा अश्रदूपिका (आंखत्र का मैल) चिट मूत्र पित्त कफ के संघात दुर्गन्धि निःसार शरीर में मुझे भोगों की क्या चाह हो।। अथ यत्र द्वैतीभूतं विज्ञानं तत्रहि शृणोति पश्यति जिध्रतिरसयति चैव स्पर्शयति सर्वमा त्मा जानीतेति यत्राद्वैतीभतं विज्ञानं कार्यकारण कर्मनिर्मुक्त निर्वचनमनौपम्यं निरुपाख्यं किं तदवाच्यं।
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उपनिपत्सार। ४७
जहां विज्ञान द्वैती होता है वहां वह सुनता है दे- खता है संघता है रस लेता है छता भी है आत्मा सव जानता है जहाँ विज्ञान अद्वैती होता है वहाँ कार्य का- रण कर्म से निर्मुक्त है निर्वचन है अनौपम्य है निरुपा- र्य है वह क्या है अवाच्य हैं।। बहनेश्च यहत् खलु विस्फुलिंगा: सर्यान्मयू खाइच तथैव तस्य। प्राणादयो वैपुनरेवतस्मा दभ्युच्चरन्तीह यथाक्रमेष्॥ अग्नि की जैते चिनगारियां और सर्य की जैसे कि- रूणों वैसेही प्राखादि यथाकम फेरफेर उससे निकलते हैं। ब्रह्मणो वावैतत्तेज: परस्यामृतस्याशरीरस्य यच्छरीरस्यौष्ण्यमस्यैतत घृतम्। शरीर का औष्एय अनृत अशरीर परव्रह्म का तेज है यह उसका घी है।। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिइच न विचेष्टते तामाहु: परमांगतिं॥ जब पांचों ज्ञानेन्द्रिय मन के साथ रहें और बुद्धि चेष्टा न करे उसीको परम गतति-कहते हैं। यथा निरिन्धनो वहूनिःस्वयोनाउपशाम्यते। तथा वत्तिक्षयाचितं स्वयोना उपशाम्यते॥ स्व
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उपनिपत्सार। योना उपशान्तस्य मनसः सत्यकामतः । इन्द्रि यार्थ'विमढस्यानता: कर्मवशानुगाः॥ चित्तमेव हि संसारं तत्मयतेनशोधयेत्। यच्चितंस्तन्मयो भवति गुह्यमेत्तत् सनातनं ।I चित्तस्य हि प्रसा : देन हन्ति कर्म शुभाशुभं। प्रसन्नात्मात्मनिस्थि त्वा सुखमव्ययमशनुते॥ समासक्वं यथा चित्तं जन्तोर्विषय गोचरे। यद्येवं ब्रह्मणि स्यात्तत् को न मुच्येत बन्धनात्॥ मनो हि. द्विविधंप्रोक्तं शुद्धञचाशुद्दमेव च। त्र्प्रशुद्धं काम सम्पर्कांत् शुद्धं काम विवर्जितं । लयविक्षपरहितं मनःकृ त्वासुनिइ्चलं। यदायात्यमनीभावंतदातत्परमं पदं। तावन्मंनो निरोद्व्यं हृदियावत् च्यंगतं। एतज्ज्ञानं च मोक्ञ्च शेषान्ये ग्रंथविस्तराः । समाधिनिर्ध्धौतमलस्यचेतसो निवेशितस्यात्मनि यत् सुखं भवेत्। नशक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्त:करणेन गृह्यते। अर्प्रपामापोऽग्नि रग्नो वा व्योम्निव्योमनलक्षयेत्। एवमन्तर्गतं यस्यमनः स परिमुच्यते॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।बन्घाय विषयासंगि मो न्ो निर्दिषयं स्मृतम् ॥
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उपनिषत्सार। जैसे निरिन्धन वहूनि अपनी योनि में उपशम को प्राप्त होती है। नैसे ही वृत्ति के क्षय से चित्त अपनी योनि में उपशम पाता है।। इन्द्रियार्थ से मूढ़ हुये मन •की कर्म चश अनुगासी भूठी प्रवृत्तियां सत्य काम से अपनी योनि में उपशम पाने पर नहीं रहतीं। चित्त ही संसार है यत्न करके उसे शोधे। जो चिन्तन करता है उसी में तन्मय हो जाताहै यही सनातन बुह्य है।। चित्तही के प्रसाद से झुभाशुभ कर्मो को नाश करता है प्रसन्नात्मा आत्मा में स्थिर हो के अव्यय सुख को प्राप्त होता है।। जन्तुवों का चित्त जैसा विषयों के अ हस में समासक्त होता है। यदि ऐसा ब्रह्ममें होवे कौन बंधन से न छूटे। मन दो प्रकार का कहाहै शुद्ध और • अशुद्ध। अश्ुद्ध कामसम्पर्क से और शुद्ध काम विवर्जि- त ।। लय और तित्षेप से रहित मनको निश्चल करके। जव अमनीभाव होताहै तव उस परमपढ़को प्राप्तहोता है।। जबतक हृदय में क्षय न होजाय तव तक मन का निरोध करना चाहिये। यही ज्ञानहै यही सोक्षहै शेष केवल ग्रंथ विस्तार है। चित्तको जिसका मल समाधि से धो गया है और आत्मा में निवेशित होगया है जो सुख होता है वासी उसका वर्णन नहीं कर सकती उसको। वह आपही अन्तःकरण से ग्रहस कियाजाता है।। जैसे पानी में पानी अग्नि में अग्नि आकाश में झ्काश न देख सकिये। ऐसे ही जिस का मन अन्त-