Books / Vakrokti Jivita Kuntuka Chapter 1 and 2 Dasharth Dvivedi

1. Vakrokti Jivita Kuntuka Chapter 1 and 2 Dasharth Dvivedi

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Barcode

: 5990010098574

Title - Vakroktijivita

Author - Dashrath Dwivedi

Language - sanskrit

Pages - 255

Publication Year - 1977

Barcode EAN.UCC-13

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VAKROKTIIIVITA

OF

RAJANAKA KUNTAKA

Chapters I & II

Edited by

Dr. Dashrath Dwivedi

M A. Ph. D., Sahityacharya

DEPARTMENT OF SANSKRIT, UNIVERSITY OF GORAKHPUR

GORAKHPUR

VISHWAVIDYALAYA PRAKASHAN

CHOWK, VARANASI

Page 4

FIRST EDITION 1977

Price Rs. 12·50

Published by

VISHWAVIDYALAYA PRAKASHAN

CHOWK, VARANASI

Printed at

JNANAMANDAL LIMITED

KABIRCHAURA, VARANASI

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श्रीमद्राजानककुन्तक विरचित

वक्रोक्तिजीवितम्

प्रथम-द्वितीय उन्मेष

हिन्दी व्याख्या अनुवाद तथा समीक्षात्मक भूमिका सहित

व्याख्याकार तथा सम्पादक

डॉ० दशरथ द्विवेदी

एम० ए०, पी-एच० डी०, साहित्याचार्य

प्राध्यापक, संस्कृत-विभाग

गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर

विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी

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प्रथम संस्करण १९६७ ई०

मूल्य : बारह रुपये पचास पैसे

प्रकाशक : विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी

मुद्रक : ज्ञानमण्डल लिमिटेड, कवीरचौरा, वाराणसी-७५ ९७-३३

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भूमिका

आचार्य कुन्तक, उनका क़ितत्व

एकस्तावद् रचयितुमर्हे श्रुतिमतोपारस्तौ-

मन्यः कथमपि तदुभयसंपि ज्ञातुमेकोऽभियुक्तः ।

नत्वेकस्मिन्नत्रिशयवतां सज्जिपातो गुणानां-

मेकः सूते कनकसुपलस्तत्परीक्षा क्षमोऽन्यः ॥ रत्न श्री ज्ञान ॥

एक रचना करता है तो दूसरा उसका आनन्द लेने मे समर्य होता है, किन्तु उभयगुणविधिस्पष्ट कतिपय ऐेसे भी क़िती पाये जाते है जो सर्जना की उज्ज्वल प्रतिभा से मण्डित होने के साथ उसका आनन्द प्राप्त करने मे भी उतने ही पटु होते है । रचना के सदसदू का विवेचक, काव्यतत्वज्ञ, काव्यपरिक्षक, काव्यालोचक इन तीनों से परे कोई एक ही होता है । और प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र के इतिहास मे ऐसे ही अद्वितीय काव्यतत्वज्ञ हैं आचार्य कुन्तक, जिनकी एकमात्र उपलब्ध किन्तु खण्डित कृति ‘वक्रोक्तिजीवित’ से संस्कृत काव्यशास्त्र की अमरवेल मे एक और अपूर्व अभिनव वक्रोक्तिशाखा की डनाई की विविध भङ्गी छाया का प्रादुर्भाव हो गया है । डॉ० सुरेशकुमार दे की उक्ति के अनुसार मद्रास से उपलब्ध इस ग्रन्थ की पाण्डुलिपि मे वक्रोक्तिकार के कुलतलक तथा कुन्तक दोनो ही नाम उपलब्ध होते हैं । इसका समर्थन उन्मेषों की समाप्ति पर—

‘इति राजनककुन्तक ( कुन्तलक ) विरचिते वक्रोक्तिजीविते काव्यालङ्कारे प्रथमोन्मेष· ।

इति श्री कुन्तकविरचते वक्रोक्तिजीविते द्वितीय उन्मेषः ।’ लिखी गयी इन पक्तियों से हो जाता है । प्रकृत संस्करण मे मैने डॉ० दे की सम्पादित ‘वक्रोक्तिजीवित’ का ही उपयोग किया है, किन्तु पाठान्तरो को मैने एकत्रम छोड दिया है । अतएव उन्मेषो की समाप्ति पर भी यहाँ ‘कुन्तक’ ही मिलेगा । इस प्रकार यद्यपि वक्रोक्तिकार के उपर्युक्त दोनो नाम उपलब्ध होते हैं किन्तु जैसल्मेर से प्राप्त पाण्डुलिपि तथा अरुणाचलनाथ, भट्टगोपाल आदि के उद्धरणो और परवर्ती रसिक, विद्वाधर प्रभृति की कृतियों मे ग्रन्थकार का कुन्तक नाम ही पाया जाता है । अधुनातन विद्वान् इसी नाम का समर्थन भी करते है । रसिक ने अपने ‘अलङ्कारसर्वस्व’ के प्रारम्भ मे केवल ‘वक्रोक्तिजीवितकार’ मात कहकर कुन्तक अभिमत काव्य की आत्मा का उल्लेख किया है—

१. द्रष्टव्य, डॉ० एस० के० दे की वक्रोक्तिजीवित, भूमिका, पृ० १ तथा काणे, संस्कृत साहित्य का इतिहास, हिन्दी संस्करण, पृ० २८१-८३ ।

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वक्रोक्तिजीवितम्

'वक्रोक्तिजीवितकार: पुन:··· ···'वक्रोक्तिमेव प्राधान्यात् काव्यस्य जीवित-मुक्तवान् ।' अ० स० प्र० ९, सम्पा०, डॉ० रामचन्द्र द्विवेदी ।

कुन्तक के मत का प्रत्याख्यान करते हुए एकावलिकार् विद्याधर ने प्र० ५९ पर कहा है —

'एतेन यत्न कुन्तकेन भक्तावन्तर्भावितो ध्वनिस्तदपि प्रत्याख्यातम् ।'

स्वयं आचार्य कुन्तक ने अपने ग्रन्थ के प्रथम उल्लेष की नवीं कारिका में उचित तथा विवक्षित अर्थ के प्रतिपादक शब्द के उदाहरण मे, 'संरम्भ: करिकटमेघशकलोडेदेशो:' इत्यादि श्लोक को प्रस्तुत किया है । इसी श्लोक को 'विधेयाविमर्श' दो के उदाहरण मे प्रस्तुत करते हुए आचार्य महिमभट्ट ने अपने ग्रन्थ 'व्यक्तिविवेक' के द्वितीय विमर्श की २९ वीं कारिका के अन्तर्गत कुन्तक का इस प्रकार स्मरण किया है—

काव्यकृच्‍नकपाश्‍ममानिना कुन्तकेन निजकाव्यलक्षणणि ।

यस्य सर्वनिरवचयोदिता श्लोक एप स निदर्शितो मया ॥ व्यक्तिविवेक, २।२९

इसी प्रकार आचार्य महिम ने कुन्तक का नामोल्लेख न करते हुए, भी उनके काव्यलक्षण का खण्डन भी किया है ।³ अरुणाचलनाथ ने 'कुमार-सम्भव' की अपनी टीका में—'यदाहुः कुन्तक:-' कहते हुए 'वक्रोक्तिजीवित' की ( ११३५ ) कारिका को उद्धृत किया है ।⁴ मम्मट के 'काव्यप्रकाश' की टीका 'साहित्यचूडामणि' ( त्रिवेन्द्रम् सं०, १९२६, पृ० २ ) की भूमिका के श्लोकों में श्री भट्टगोपाल ने कुन्तक को अलङ्कार के आचार्यों की श्रेणी में तीसरे स्थान पर रखा है । क्रम इस प्रकार है— दण्डी, वामन, कुन्तक, भामह, उद्भट, रुद्रट, धनञ्जय, भोज, ध्वनिकार, लोचनकार तथा महिमभट्ट ।

पुनः कुन्तक की प्रसङ्गा मे भी कहते है—

'वकानुरञ्जनीमुचि चञ्चूभिरिव मुखे वहन् ।

कुन्तक: क्रोडति सुखं कीर्तिस्फुटटिपङ्‌जरेऽरे ॥'

त्रिपुरारि ने 'मालतीमाधव' की अपनी टीका में 'असार सरासरम्' ( व० जी०, इलोक ३९ ) इत्यादि श्लोक से कुन्तक का मत रखते हुए उनका नामस्मरण किया है—'अतो विधिविलसित सर्वंमफलम्' इति पटनरीयम् इति कुन्तकप्रभृतय: काव्य-तत्त्वज्ञा सद्ददया:' ।

किन्तु कुन्तक द्वारा निर्दिष्ट पाठान्तर इससे भिन्न ही है । 'इसी प्रकार परवर्ती काव्यालङ्‌कारिको ने कुन्तक या वक्रोक्तिजीवितकार नाम से 'वक्रोक्ति-जीवित' के लेखक का उल्लेख किया है । इससे यह सिद्ध होता है कि ग्रन्थकार का नाम कुन्तक ही है ।

वस्तुतः ग्रन्थकार का कशमीरीय नाम तो कुन्तक है, यह कश्मीर कवि या काव्यशास्त्रकारों की नामकरण-पद्धति से सिद्ध होता है । सम्भावना तो यह है कि कुन्तकरचित 'वक्रोक्तिजीवित' की प्रति जब दक्षिण पहुँची तो उसमें

१. दृष्टव्य, व्यक्तिविवेक, पृ० १४२, चौखम्बा संस्करण, १९६४ ।

२. उद्धृत, डॉ० दे की वक्रोक्तिजीवित की भूमिका, पृ० २ ।

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के रसास्वाद की अश्रामात्र भी समानता करने मे समर्थ नहों है । वस्तुत शास्त्र, श्रुति-कथु, कष्टसाध्य, दुरधिगम तो होता ही है, अध्ययन के समय ही उसकी कठिनता आदि के कारण महान् कष्ट होता है । शास्त्र कडवी औषध के समान है । काव्य से उसकी तुलना ही व्यर्थ है । आनन्ददायक काव्य अमृतकल्प होता है—

कटुकौषधवच्चास्त्रमविद्याध्याधिनाशनम् । आह्लाद्यमृतवत्काव्यं समविवेकगदापहम् ॥

इस प्रकार कुन्तक की दृष्टि से काव्य का प्रमुख प्रयोजन सच्चरित्रों के नियन्त्रण-पूर्वक पुरुषार्थ-चतुष्टय का कोमल उपदेश. नूतनौचित्य समन्वित लोकव्यवहार की शिक्षा तथा अलौकिक काव्यामृतरस का सहृदय-हृदय मे चमत्कार पैदा करना है । प्राचीन आचार्यों तथा परवर्ती काव्यालोचकों का काव्यप्रयोजन देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि, कुन्तक का यह विवेचन कोई नया नहों है । भामह ने धर्मादि, कलावैचक्षण्य तथा कीर्ति-प्राप्ति को काव्य का प्रयोजन माना था । कुन्तक के इस विवेचन मे कीर्ति का अभाव है । वस्तुतः भामह-मम्मट आदि के प्रयोजन कवि तथा सामाजिक दोनो की दृष्टि से कहे गये है जवकि कुन्तक ने यहाँ सहृदय-सामाजिक-लोक को दृष्टि मे रखकर ही काव्य की उपयोगिता बताई है । कान्ता-सम्मित उपदेश या सच्चःपरिनिर्वृति-रूप काव्यप्रयोजन भी कुन्तक के उपर्युक्त विवेचन मे समाविष्ट है । पाश्चिम मे काव्य को कला का एक अङ्ग माना जाता है । समृद्धतया पाश्चिम का काव्यप्रयोजन "कला कला के लिए, कला जीवन के लिए, जीवन से पलायन के लिए, सेवार्थ, आत्मानुभूति का साधन, आनन्दार्थ, विनोदार्थ तथा सृजन की आवश्यकतापूर्ति" के रूप मे माना जा सकता है । इस प्रयोजन की विवेचना न करके यही कहना उचित होगा कि भारतीय काव्यप्रयोजन के समक्ष ये समस्त प्रयोजन बहुत ही हीन है । कुन्तक के प्रयोजन मे इन समस्त को देखा जा सकता है । पर इनसे परे जो भारतीय काव्य तथा कुन्तक-विवेचना का भी उद्देश्य है 'रामादिवत् व्यवहार' तथा अन्ततः चरमलक्ष्य परिनिर्वृति, मोक्ष, वह पाश्चिम के काव्यप्रयोजन मे अप्राप्त्य है ।

अलङ्कार और अलङ्कार्य :-कुन्तक भी प्राचीन आचार्यों भामह आदि के समान शब्द-अर्थ के सम्प्रदाय का अनुयायी है । किन्तु उनके अनुसार अलङ्कृत ही शब्दार्थ काव्य कहे जाते है । अतएव काव्य सदैव अलङ्कृत होता ही है न कि काव्य का अलङ्कार के साथ योग होता है । शब्द और अर्थ ही अलङ्कार है । उनका अलङ्कार है वक्रोक्ति । इन दोनो का पृथक्-पृथक् विवेचन काव्य-व्युत्पत्ति के लिए ही किया जाता है । अन्यथा इनमे कोई तात्विक पार्थक्य नहों है ।

काव्य-लक्षण :-भामह, उद्भट तथा परवर्ती मम्मट आदि भी शब्दार्थ-साहित्य को ही काव्य मानते है । भामह से ही वक्रोक्ति को लेकर प्रस्थान का स्वरूप देने वाले कुन्तक भामह के ही काव्य-लक्षण को भी स्वीकार करते है । किन्तु यह विवेचन इतना सरस, मनोहारी, विवाद तथा सुस्पष्ट हो गया है कि प्रयास करने पर भी

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वक्रोक्तिजीवितम्

संस्कृत काव्यशास्त्र का कोई भी आचार्य वहाँ तक नहीं पहुँच पाया है। उनके अनुसार सहृदय-हृदयहारि, वक्रोक्तिव्यापारशोभित, बन्ध में व्यवस्थित सम्मिलित शब्द और अर्थ ही काव्यपदवी के भागी होते हैं।

शब्द-अर्थ :—वाचक शब्द तथा वाच्य अर्थ सम्मिलित ही दोनो काव्य कहे जाते हैं। इसलिए कविकौशलकल्पित अतिशय कमनीय शब्द को ही काव्य मानने वाले या रचना में वैचित्र्य का आधार करने वाले अर्थ को ही काव्य मानने वाले लोगों के मत का निरास हो जाता है। जैसे प्रतितिल में तैल होता है, वैसे ही शब्द-अर्थ दोनो में ही काव्यमयत्व को आह्लाद करने की शक्ति होती है। अर्थात् दोनो में सम्मूत काव्यकांतता पायी जाती है। काव्य में शब्द तथा अर्थ दोनो को वकत्व-विच्छित्ति से विभूषित होना चाहिए। रचना में वस्तु-भाव का विन्यास तो हो किन्तु शब्द में वाचकत्वविच्छित्ति का अभाव हो तो कुंतक ऐसे शब्द को काव्य के लिए उपयोगी नहीं मानते। अतएव—‘न शब्दस्यैव रमणीयताविच्छिष्टस्य केवलस्य काव्यत्वं, नार्थस्यैव १ ।' इसलिए—'शब्दार्थौं द्वौ सम्मिलितौ काव्यम् ।'

साहित्य :—शब्द और अर्थ काव्य हो सकते हैं। किन्तु हो सकता है कि, कहीं शब्द कुछ कम वैचित्र्यपूर्ण हो अर्थ अधिक या अर्थ में अधिक सौन्दर्य हो शब्द में कम। तो क्या ऐसे में भी काव्यपद व्यवहार हो सकता है? इसी के लिये तो कारिका में शब्दार्थौ का सहितौ विशेषण दिया गया है। सहितौ का अर्थ है साह्माव, साहित्य-पूर्वक अवस्थित शब्दार्थ ही काव्य हो सकते हैं। शब्द और अर्थ का साहित्यविरह तो होता नहीं, क्योंकि इनमें वाच्यवाचक सम्बन्ध होता ही है। फिर सहितौ की क्या आवश्यकता? वस्तुतः यथार्थ तो यही है, किन्तु साहित्य से यहाँ शब्दार्थ का विशिष्ट सादृश्य अभीष्ट है। उस साहित्य का अर्थ है वक्रोक्तिविच्छित्तिविशिष्ट गुण तथा अलङ्कार-विभूति का परस्पर सापेक्षत्व। एक-दूसरे से होड़। परस्पर सापेक्षता का अर्थ है शब्द का दूसरे शब्द से तथा अर्थ का अन्य अर्थ से। और ऐसा परस्पर सापेक्षत्व शब्दार्थ साहित्य ही काव्य में अभिप्रेत है। कुंतक ने वृत्तिभाग से शब्दार्थ साहित्य काव्य का सामान्य लक्षण प्रस्तुत करने के अनन्तर विशेष रचना होने का प्रयास भी किया है। उसी क्रम में उन्होंने साहित्य-कारिका-८-९ की व्याख्या प्रस्तुत की है। तदनुसार—यद्यपि वाचक को शब्द तथा वाच्य को अर्थ कहा जाता है, यह प्रसिद्ध है किन्तु काव्यमार्ग में, अलौकिक कविकर्म में इनका कोई अपूर्व ही तत्त्व है, परमार्थ है।

सहृदयों के रहते भी समुचित समस्त सामग्री समन्वित विवक्षित अर्थ का अभिधायक शब्द ही वास्तव में अपनी वाचकता की सिद्धि कर पाता है। कविगण जिस विवक्षित अर्थ को प्रस्तुत करना चाहते हैं, उस विशेष के अभिधायक शब्द का ही चुनाव करते हैं। वस्तुतः कविविवक्षित विशेष अर्थ की अभिधान की क्षमता रखना ही वाचकता है। जिससे रचनाकाल में प्रतिभा में किसी अपूर्व सौन्दर्य से समुल्लसित पदार्थ प्रस्तुत प्रकरण के उपयुक्त अकथनीय अपूर्व स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। और इस प्रकार प्रस्तुत कर दिये जाते हैं।

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कि सहृदय मन चमत्कृत हो उठता है। इसी प्रकार काव्य मे काव्य, ध्वोत्य या व्यंग्य सभी अर्थ, क्योकि कुन्तक ध्वोत्य, व्यंग्य अर्थ को भी वाच्य ही मानते है, ऐसे होने चाहिये जो काव्यज्ञ को आनन्द प्रदान करने वाले अपने स्वभाव से मनोहारी हो।

सहृदयहृदयाह्लादक अर्थ ही अर्थ है।

कुन्तक शब्दार्थ-साहित्य की मात्र इतनी ही व्याख्या से सन्तुष्ट नही है। पुनः १६वीं कारिका से उन्होने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि शब्दार्थ सदैव सहित ही प्रतीति पथ मे आते है, यह निस्सन्दिग्ध सिद्धान्त है।

किन्तु काव्य मे वाच्य-व्यंग्य के शाश्वत साहित्य का निर्वन्धन नही होता, अन्यथा बैलगाडी के हॉकने वाले गाड़ीवानो की उक्तियो को भी साहित्य कह देना पड़ेगा।

यही नही व्याकरण, मीमांसा, न्याय आदि शास्त्रो मे भी साहित्य पद प्रयुक्त होने लगेगा।

बात तो यह है कि इस असीम काव्यमार्ग मे अब तक तो साहित्य शब्द का प्रयोग होता अवश्य रहा है किन्तु कवि-कर्मकौशल की चरम सीमा पर अध्यारूढ इस साहित्य का 'परमार्थ यही है' ऐसा कोई भी विद्वान् समझ नही सका।

अतएव अब मै कुन्तक सरस्वती-हृदयारविन्द-मकरन्दद्रिन्दुसमूह से मुन्दर सत्कविवाणी मे वर्तमान आमोद से मनोहारी प्रकारामान इस 'साहित्य' का सहृदय भ्रमरो को साक्षात्कार कराने जा रहा हूँ।

शब्द और अर्थ दोनो की परस्पर सपर्यारूप रमणीय, न किसी का उत्कर्ष न निकर्षरूप अपूर्व ही साहित्य यहाँ विवक्षित है।

और यह परस्परस्पर्धित्व साहित्य सहृदयहृदयाह्लादकारी सौन्दर्यशोभाधित होता है।

इसलिए—'एतयोः शब्दार्थयोः यथास्वं यस्याः स्वसम्पत्त्सामग्रीसमुदायः सहृदयहृदयाह्लादकारी परस्परस्पर्धया परिस्फुरति सा काव्यदेव वाक्यविन्याससमत्वात् साहित्यव्यपदेशभाग् भवति ।' और इन शब्दार्थो की स्थिति परस्पर दो मित्रो की है

— “तमसर्वगुणैः सन्तौ सुहृदाविव सङ्कतौ । परस्परस्य शोभायै शब्दार्थौं भवतो यथाऽऽ॥”

कुन्तक के अनुसार काव्य की परिभापा तब तक पूर्ण नही मानी जा सकती जब तक यह शब्दार्थ का साहित्य वन्ध-रचना मे अवस्थित न हो।

अन्यथा एक पद मे भी काव्यत्व प्रसक्त हो जायगा।

वन्ध का अर्थ है वाक्य-व्यास, रचना और उस रचना मे लावण्य गुण अलङ्कार से सुशोभित सन्निवेश से विशिष्टतया अवस्थित किये गये ही शब्दार्थ-साहित्य को काव्य कहा जा सकता है।

यह वन्ध या वाक्य-रचना भी ऐसी-वैसी नही होनी चाहिए।

काव्यमर्मज्ञ को आनन्दित करने वाले वन्ध मे व्यवस्थित ही शब्दार्थ-साहित्य मे काव्यपद प्रसक्त हो सकता है।

अन्य विशेषता वन्ध की है कि वन्ध को शास्त्रप्रसिद्ध शब्दार्थनिबन्धन से अतिरिक्त घट् प्रकार की— वक्रोक्ता से विशिष्ट कविकर्म से श्लाघनीय होना चाहिए।

इस प्रकार कुन्तक की काव्य-परिभाषा बनती है—'काव्य-सममंल के हृदय को आह्लादित करने वाले शास्त्रोचित शब्दार्थनिबन्धन वकता-विशिष्ट कविकर्म से श्लाघ्य वाक्य मे लावण्यादि गुणालङ्कारसुशोभित सन्निवेशपूर्वक अवस्थित परस्परस्पर्धिता सहभाव प्राप्त शब्द-अर्थ ही काव्य कहे जाते हैं ।'

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वक्रोक्तिजीवितम्

वक्रोक्ति का स्वरूप —काव्य-लक्षण मे कुन्तक ने शब्दार्थ-साहित्य को वाक्य मे व्यवस्थित होना चाहिए, यह बताकर दूसरी बात भी लगा दी कि वाक्य को वक्रोक्तिव्यापार से श्लाघ्य होना चाहिए। वकता है क्या ? की व्याख्या १० वीं कारिका मे उन्होंने प्रस्तुत की है। शब्द और अर्थ दोनो ही अलङ्कार्य हैं, किन्तु इनका अलङ्कार वक्रोक्ति ही है । वक्रोक्ति कहते है विदग्धभङ्गीभणिति को—

उभावेतावलङ्कार्यो तयो: पुनरलङ्कृति: । वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यभङ्गीभणितिरुच्यते ॥१०॥

वक्रोक्ति की व्याख्या कुन्तक ने भिन्न-भिन्न स्थलों पर भिन्न-मिन्न पदो मे की है । कारिका मे कहा—(१) वैदग्ध्यभङ्गीभणिति ही वक्रोक्ति है । पुनः वत्ति मे कहते है— (२) प्रसिद्ध कथन से भिन्न विचित्र अभिधा ही वक्रोक्ति है । पुनः कारिकाश की व्याख्या मे कहते है—(३) वैदग्ध्य-विदग्धभाव यानी कविकर्मकौशल, उसकी भण्णी माने विच्छित्ति, तत्पुर्वक भणिति कथन, विचित्र ही अभिधावक्रोक्ति कही जाती है । (४) अन्यत्र कहते है —शब्दादि से प्रसिद्ध शब्दार्थ-निबन्धन से व्यतिरिक्त पट् प्रकार वकताविशिष्ट कविव्यापार ही वक्रोक्ति है। (५) प्रसिद्ध प्रस्थान व्यतिरेकी और (६) अतिकान्त प्रसिद्ध व्यवहारसररिणी शब्द का भी वकता के लिए कुन्तक ने प्रयोग किया है। उन्ही की शब्दावलियो मे—(१) शब्दादिप्रसिद्ध शब्दार्थोऽपिनिबन्धव्यतिरेकी, (२) प्रसिद्ध प्रस्थान व्यतिरेकी, (३) अतिक्रान्त प्रसिद्ध व्यवहारसररिण, (४) वैदग्ध्यभङ्गी- भणिति , (५) प्रसिद्धाभिधानव्यतिरेकिणी । विचित्रैवाभिधा, (६) विचित्रैवामिधा वक्रोक्तिरित्युच्यते ।। सभी का सार है—सामान्य कथन से विशिष्ट विचित्र ही अभिधा, वक्रोक्ति है। यह विचित्र अभिधा निष्पन्न होती है कविकर्म की निपुणता से और उस निपुणता से ही इसमे विच्छित्ति का आधार होता है। इसी को कुन्तक के दूसरे शब्दो मे पुनः कह सकते है—कवक्वैचिच्यकथन । इसी वकता मे ध्वनिकार का समस्त ध्वनिप्रपञ्च तथा प्राचीनो का गुणालङ्कार समाहित है। यह विचित्र अभिधाद्योत्य व्वाङ्गय सभी सौन्दर्य को अपने सामाङ्जय मे समेट लेती है । इसीलिये तो इसका नाम है विचित्र अभिधा । बावजूद इसके कुन्तक की दृष्टि मे है यह अलङ्कार ही । शब्दार्थ है अलङ्कार्य । अलङ्कार्य को अलङ्कृत करने के लिए उससे व्यतिरिक्त किसी अन्य साधन को होना चाहिए । और वह अलङ्कार या साधन है वक्रोक्ति । किन्तु यह अलङ्कार कही से लाकर जोडा नही जाता प्रत्युत वकत्ववैचिच्य- पूर्वक इनका अभिधान ही अलङ्कार है । इसीलिये कुन्तक कहते है कि काव्य का अलङ्कार से योग नही होता जैसा कि लोक मे कटक केयूर आदि का देखा जाता है। बल्कि काव्य अलङ्कृत होता ही है । कुन्तक के काव्यलक्षण से मिलते-जुलते कुछ पश्चात्य काव्यलक्षण देखे । कविकर्म को प्रधान मानते हुए कहा है—‘कविता उत्तमोत्तम शब्दो

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बैली ने कविता को महान् सत्य की अभिव्यक्ति बतलाया है। ज़े० डेनिस ने का मत है,

'करुण तथा असंख्य शब्दों के माध्यम प्रकृति का अनुकरण ही काव्य है।' ले० हण्ट

लिखता है, 'सत्य, सौन्दर्य तथा शक्ति के तीव्र भाषा की अभिव्यक्ति ही कविता है।' हेजलिट ने 'कविता को कल्पना की भाषा कहा है।' इन कतिपय परिभाषाओं की दृष्टि

पर विचार किया जाय तो स्पष्टतः यह सभी अभिव्यक्तिवादी प्रतित होते हैं। कुंतक से

इन विचारों को इतना ही साम्य हो सकता है कि कुंतक भी अभिष्यावादी है। शब्दार्थ-

साहित्य के विषय मे टी० एस० इलियट का यह कथन कुछ सीमा तक लागू हो सकता

है—'The music of poetry is not something which exists apart from

its meaning.' अधिक सहीप है ब्रैडले की यह उक्ति, 'In poetry the meaning

and the sounds are one', किन्तु ब्रैडले यह भी कहता है कि सौन्दर्य पूर्णतया अर्थ

में ही निहित रहता है। इसके विपरीत सैण्टवरी का कथन है, 'शब्द का अपना ही

सौन्दर्य है और यह अर्थ से' बिल्कुल स्वतन्त्र होता है।' इस प्रकार कुंतक का सिद्धान्त

पाश्चात्य समीक्षकों के सिद्धान्त के काफी समीप है। श्री कृष्ण चैतन्य ने इस दिशा मे

डी० थामस को कुन्तक के सर्वाधिक समीप माना है।

स्वभावोक्ति को अलंकृतता का निराकरण :—शब्दार्थ-शक्ति की विवेचना

में क्रमिक विवेचन छूट गया और आगे की कारिकाओं के सार भी आ गये।

पुनः प्रकृत क्रम पर आते है। भामह ने वक्रोक्ति को सर्वालंकार सामान्य माना था।

दण्डी ने उसके मूल मे न केवल श्लेष को मानकर उसके सम्मान को धक्का ही दिया

बल्कि स्वभावोक्ति, जिसे भामह स्वीकार करने को उद्यत नही दीखते, को उन्होंने वाड्‌मय-

विमाजन का एक आधार मानकर आचार्यकृति का समर्थन भी दे दिया। कुंतक

को यह कैसे सह्य हो सकता है ? स्वभावोक्ति बहुत ही रमणीय ही क्यों न हो किन्तु

वह अलंकृति नही बन सकती। पदार्थ का स्वभाव ही तो वर्ण्य होता है। वह

काव्यधारणकल्प है। यदि वही अलंकार हो जायगा तो अलंकार्य क्या शोष रहा ?

अतएव जो अलंकार मानते हैं वे ही कुकुमार मन । भोले-भोले। विवेकपूर्वक विचार

से डरने वाले। अभी इसके पूर्व तो आपने सालकार वाक्य को काव्य कहा था ?

तो वाक्य ही अलकार्य हुए, स्वभाव नही ? वस्तुतः वह विवेचन तो विभाग के लिए,

पृथक्करण के लिए था। स्वभाव से व्यतिरिक्त तो कुछ कहा ही नही जा सकता, क्योंकि

ऐसा होने पर वस्तु शशविषाण आदि के समान असत्कल्प हो जायगी। स्वभाव ही

तो वस्तु का शरीर है, यदि वही अलंकार हो जायगा तो वह अलंकृत किसे करेगा।

शरीर अपने ही शरीर पर नही आरूढ हो पाता। अतः

स्वभावोक्ति अलंकार नही हो सकती और यदि स्वभावोक्ति को अलंकार मान ही लेंगें

तो अन्य अलंकारों के विन्यास को स्थिति मे दो ही बाते हो सकेंगी। या तो उन

दोनों का भेद एकदम स्पष्ट रहेगा या अस्पष्ट। स्पष्ट होने की दशा में परस्पर

निरपेक्ष होने से काव्य मे सर्वत्र संसृष्टि अलकार का प्रश्न खड़ा हो जायगा और

अस्पष्ट होने पर सङ्कर। फिर तो अन्य उपमादि अलंकारों को अवकाशा ही न मिल

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२०

वक्रोक्तिजीवितम्

पायेगा। इस प्रकार उनका लक्षण करना भी व्यर्थ हो जायगा। यदि मान ले कि इन्हीं सृष्टि-शृङ्गर दो अलङ्कारो से ही काम चल जायगा? ता यह कथन ही व्यर्थ है। क्योंकि अन्य अलङ्कार स्वतन्त्रतया सभी को मान्य होते हैं। विवेचित भी है। तथ्य तो यह है कि समस्त पदार्थजात का स्वभाव ही सहृदयाह्लादकारी होने से काव्यशरीर माना जाता है। वही वर्णनीय होता है। वही शोभातिशायकारी किसी अपूर्व अलङ्कार से सुशोभित किया जाता है। 'आत' शब्दालोक्ति अलङ्कार नहीं हो सकती। यहाँ कुन्तक की इस मान्यता को स्वीकार करते हुए भी कुन्तक-विवेचित स्वभावोक्ति विषयक विवेचन को ध्यान में रखे तो स्वभावोक्ति की अलङ्कारता का यथार्थ स्फुट हो जायगा। इस प्रकार ११-१५ कारिकाओं में ग्रन्थकार ने स्वभावोक्ति की अलङ्कारता का निराकरण किया है।१६-१७ कारिकाएँ 'साहित्य' से ही सम्बन्ध रखती है।

(६)वकता के भेद :- १८ वीं कारिका मे कुन्तक ने बतायाहै कि प्रसिद्ध प्रस्थान-व्यतिरेकी काव्यक्रियारूप कविकर्म निष्पन्न वकता के प्रधानत छ भेद ही होते है। उनके भी अनेक अवान्तर भेद हो सकते हैं। पृथ. १९ वीं कारिका मे उन्होंने प्रथम तीन भेदो—(१) वर्णविन्यासवकता, (२) पदपूर्वार्धवकता तथा (३) पदपरार्धवकता का उल्लेख किया है। २० वीं कारिका मे उन्होने वकता के ४थे प्रकरणवाक्य-वकता का निर्देश किया है जिसमे समग्र अलङ्कारवर्ग समाहित हो जाते है। २१ वीं

कारिका से (४) प्रकरण (६) तथा प्रबन्धवकता का उल्लेख कर बताया है कि प्रकरण तथा प्रबन्धवकता सहज तथा आहार्य से उपार्जित रमणीयता से मनोहारी होती है। प्रकरण तथा प्रबन्धगत वकता वस्तु से सम्बद्ध है, जिनका पर्यवसान 'रामादिवदर्तित-तन्यम्' न रावणादिवर्त्त' तथा विनय-व्यवहार आदि की शिक्षा मे होता है।

प्रथम उन्मेष मे कुन्तक ने इन वक्ताओ का सक्षेप मे दिग्दर्शन मात्र कराया है, विस्तारपूर्वक विवेचन द्वितीय उन्मेष मे है। वर्णविन्यासवकता के विपय मे कुन्तक का स्वय कथन है—'एतदेव वर्णविन्यासवकत्वं चिरन्तनैश्वर्यनुप्रास इति प्रसिद्धम् ।' पदपूर्वार्धवकता के विवेचन मे उन्होने सुबन्त, तिङन्तरूप पद के पूर्वार्ध प्रातिपदिक तथा धातु की वकता का विवेचन प्रस्तुत किया है। इसके अवान्तर भेदो मे वृति-वकता, पर्यायवकता, उपचारवकता, विशेषणवकता, सङ्केतवकता, वृत्तिवैचित्र्यवकता, लिङ्गवकता, क्रियावैचित्र्यवकता का प्रथम उन्मेष मे कतिपय अवान्तर वकतापरुस्सर विवेचन किया गया है। पदपरार्धवकता प्रतयार्थित होती है। प्रत्यय भी सुप् तथा तिङ् से जुड़ते है। प्रथम उन्मेष मे इसके केवल तीन भेद—सङ्ख्या, कारक तथा पुरुषवैचित्र्यवकता का विवेचन है। कविप्रतिभा के आननल्य से अलङ्कारो का भी आननल्य सम्भव है। अतः वाक्यवकता मे समग्र उपमादि अलङ्कारवर्ग समाहित तो जाते है। प्रकरण तथा प्रबन्धवकता का निर्देश पूर्व की पक्तियो मे किया जा चुका है।

बन्ध :- पहले काव्यलक्षण मे 'बन्ध' पद का प्रयोग आ चुका है। 'बन्ध' की व्याख्या कुन्तक ने २२ वीं कारिका मे दी है। शब्द तथा अर्थ के लावण्य तथा

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सौभाग्यगुण का परिपोपक, काव्यक्रियारूप वाक्य का विशिष्ट विन्यास ही उक्त कहा जाता है। कह सकते है गुणालंकृत-वाक्यविन्यास ही वन्ध है।

तद्विदाह्लादकता :—काव्यलक्षण मे वन्ध के विशेषण के रूप मे ‘तद्विदाह्लादकारिण’ पद का प्रयोग किया गया है। अतएव कुन्तक ने २५ वीं कारिका मे इस पद की व्याख्या भी दे दी है। तदनुसार ‘तद्विदाह्लादकारिता’ का अर्थ है वाच्य, वाचक तथा वक्रोक्ति इन तीनों के स्वरूप से अतिरिक्त अर्थात् लोकोत्तर तथा सहृदय-हृदयसवेच अनिर्वचनीय रज्जकता से जायमान रमणीयता ।

मार्ग :—कवियो के प्रसान के हेतु, काव्य क्रिया के कारण को मार्ग कहते है। ये मार्ग तीन ही होते है। न अधिक, न कम । और वे हैं—(१) सुकुमार, (२) विचित्त्र तथा (३) उभयात्मक मध्यम मार्ग । २४ वीं कारिका मे मार्ग के त्रिधा विभाग को बताकर कुन्तक ने वामन-दण्डी आदि के रीतिविषयक विवेचनों की आलोचना भी की है। ध्यान देने की बात है कि संस्कृत काव्यशास्त्र मे रीति या मार्ग पर्याय शब्द है। वामन ने वैदर्भी, गौडी तथा पांचाली तीन रीतियों मानी हैं । और उनके नामो के विषय मे उन्होंने बतलाया है, तत्तद्देश मे प्रचलित होने के कारण उनकी ये समाख्यायें या नाम प्रचलित है । दण्डी ने वैदर्भी-गौडी दो ही रीतियों का उल्लेख किया है। कुन्तक दोनो ही मतो के विरोधी है। उनके अनुसार रीति या मार्गों को देश की सीमा मे आबद्ध नही किया जा सकता । काव्य का मेद कविस्वभावभेद पर अवलम्बित है । कविस्वभाव, प्रतिभा या शक्ति को देशविशेष की सींमा मे आवद्ध नही किया जा सकता । अतएव देशविशेष के आधार पर रीति-मार्गों का नामकरण ठीक नही । वामन वैदर्भी को समग्रगुणोपेता मानकर रीतियो की उत्तमोत्तममध्यम कल्पना भी करते हैं । कुन्तक यहाँ भी विरोधी है, क्योकि वैदर्भी-समान सौन्दर्य अन्य मे न मिलने से उन रीतियों का विवेचन भी व्यर्थ हो जायगा । इसी प्रकार केवल दो ही रीति मानने मे कठिनाई यह है कि, कविस्वभावभेद से तो रीति-मार्ग अनन्त हो सकते है, किन्तु अनन्त संख्या तो अपरिमित हो जायगी । अतः नियमन आवश्यक है । सहृदयतासमन्वित कवि उसी प्रकार के सुकुमार काव्य का निर्माण करने मे समर्थ होता है । इससे अतिरिक्त रमणीयताविशिष्ट विचित्र मार्ग होता है । तत्प्रयुक्त कवि उसी मे रचना करता है । रमणीय इन दोनो की छाया-तुप्राणित रमणीयताविशिष्ट उभयात्मक मध्यम मार्ग होता है। इन तीनो मे ही तद्विदाह्लादकारिता देखी जाती है, अतः ये तीन मार्ग स्वीकार्य हैं । मार्गो के ही सन्दर्भ मे कुन्तक ने—प्रतिभा—का भी विवेचन किया है । कुन्तक ने स्पष्टतः यहाँ काव्यहेतु के रूप मे प्रतिभा, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास को प्रस्तुत किया है । परन्तु कुन्तक ने यहाँ एक नयी और मनोवैज्ञानिक बात यह कही है कि प्रतिभा, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास ये तीनो ही कविस्वभाव पर अवलम्बित है । कविस्वभाव के अनुसार हो प्रतिभा तथा शक्ति का आविर्भाव होता है । और तदनुसार ही कवि का काव्यकर्म बनता है । इसीलिये

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सुकुमार मार्ग को वह प्रतिभा का साम्राज्य मानते हैं। किन्तु यह मार्ग प्रतिभा के परिपाक का फल है। प्रतिभा के प्रथम प्रकाश मे वनता है विचित्र मार्ग और आहार्य-व्युत्पत्ति-अ+यास से निर्मित होता है उभयात्मक मध्यममार्गानुसारी काव्य । मार्गों का स्वरूप तथा उनके गुणों का विवेचन भी बड़ा ही मनोहार है ।

सुकुमार मार्ग :—कादिदास प्रभृति महाकवि इसी मार्ग से अपनी यात्रा किये हैं । पषित वनमार्ग से जैसे भ्रमरपंक्ति आगे बढ़ती है, वैसे ही इस मार्ग के कवि मे भ्रमर समान सारसंग्रह का व्यसन पाया जाता है । इसमें जो कुछ भी अलंकारदि वैचित्र्य पाया जाता है वह सारा का सारा प्रतिभा-समुद्भूत होता है, महज होता है, आहार्य नही । रचना की सुकुमारता सहृदय-हृदय को अनुरंजित करने की रसनीयता मे सराबोर रहती है । दोषवर्जित, प्राप्तनाद्यन परिपाक से प्रौढ अनिर्वचनीय कविशक्तिरूप प्रतिभा से स्वय समुल्लसित तद्विदाह्लादकारी अम्लान नूतन शब्द तथा अर्थ से यह मार्ग मनोहार हो जाता है । अलंकार अयत्नज, स्वल्प तथा मनोहार होते है । पदार्थों के स्वभाव की ही यहाँ प्रधानता पायी जाती है, जिससे आहार्य या व्युत्पत्ति-जनित कौशल फीका पड़ जाता है । यहाँ रसादि के परमार्थ को जानने वाले सहृदय का मनः+वाद पाया जाता है । सहृदय-हृदय मन सद्वादकारी मनोहर वाक्यों का विन्यास ही इसका माहात्म्य है । कवि का वैदग्ध्य यहाँ इतना बड़ा-चढ़ा हुआ होता है कि यह कह पाना कि इसकी यही सीमा है बड़ा कठिन हो जाता है । मन मे ही उसकी सर्वोत्कृष्टता स्फुरित होती है । यहाँ कवि का कौशल विधाता की सर्गरचना के रमणीय ललितालंवण्यादि के समान अकथनीय, विवेचना से परे होता है । इस मार्ग का लक्षणोदाहरणपुरस्सर विवेचन ग्रन्थ मे ही दृष्टव्य है । कारिका २५-२९ तक इसका विवरण है । इस मार्ग के माधुर्य, प्रसाद, लावण्य तथा औचित्य चार गुणों का विवेचन कुन्तक ने ३०-३३ वीं कारिका मे प्रस्तुत किया है ।

विचित्र मार्ग :—तलवार की धार के समान यह मार्ग अति दु:संचारयोग्य है । कुछ विदग्ध कवि ही इस मार्ग से जा सके है । प्रतिभा के प्रथम प्रभाव का यह मार्ग है । यहाँ शब्द-अर्थ दोनों मे वक्रता प्रष्कुटित-सी प्रतीत होती जान पड़ती है । एक अलंकार के विनिवेश से सन्तोष न हो पाने के कारण इसमें कविगण उसके अलंकरणरूप दूसरे अलंकार का निवरणधन कर देते है । मणियाँ अपनी प्रभा से युवती के शरीर को ढँक देती है किन्तु सुन्दरी ललना के शरीर को अपनी जगमगाहट से ढँक देने वाले ये अलंकार उसकी शोभा ही होते है । अलंकार ही बनते है । वैसे ही अलंकार यहाँ इतना उद्द्रिक्त रहता है कि अलंकार्य को अपनी शोभा के साम्राज्य से दीतिमय करके प्रकाशित करता है । पुरानो भी वस्तु यहाँ भणितिवैचिग्रव्यवशात् लोकोत्तर उत्कृष्टता को पहुँचा दी जाती है । इस मार्ग का कवि अपनी प्रतिभा के प्रसाद से वस्तु के अन्यथा रूप को हृदयंगारी दूसरे रूप मे रूपान्तरित कर प्रस्तुत करने मे सक्षम होता है । यहाँ विवक्षित अनाख्येय वस्तु की प्रतीयमानता निबन्धित की जाती है, जिसमें

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वाच्य-वाचक शक्ति का अभाव रहता है। अर्थात् वाक्यवक्रता के प्रतीमान व्यापर का साम्राज्य यहाँ देखा जाता है। अलौकिक सहृदय-हृदयहारि कमनीय वैचित्र्य से उपचृद्धित पदाथों का स्वभावानुरूप रसनिर्मित् अभिप्राय इस मार्ग में निबन्धित होता है। अनिर्वचनीय अभिधा लोकोत्तर अतिशयोक्ति से भर्जमान अंतरवक्रोक्ति का वैचित्र्य ही इस मार्ग मे प्राण का काम करता है।३४-४३, दस कारिकाओ के लम्वे लक्षण मे निबद्ध कुन्तक का विचित्र मार्ग ससक्त काव्यशास्त्र मे न केवल लक्षण प्रत्युत् लक्षणान्तर्गत् सामग्र्री के आधार पर भी वेजोड है। इसके पूवोक्त चार गुणो का ४४-४८ कारिकाओ मे विवेचन किया गया है। मार्गानुसार गुणो के स्वरूप मे भी यहाँ यथेष्ट अन्तर देखने को मिलेगा।

मध्यम मार्ग :-यह मार्ग सुुकुमार तथा विचित्र दोनो के व्यवसायी कवि-गणो का मनोहरारी काव्यपथ है जिसमे पूर्वोक्त दोनो मार्गों की विस्मृतियोँ समान रूप मे, परस्परसपर्धितया प्रतिष्ठित होती है। वैचित्र्य तथा सुकुमार दोनो की शोभा यहाँ मिली-जुली होती है। इस प्रकार इसमे सहज तथा आहार्य उभयचाक्तिजन्य शोभा का विलास देखने को मिलता है। पूवोक्त चार माधुर्य आदि गुण भी इसमे मध्यमदष्टि अर्थात् उभयमार्गानुसारी गुणो की उभयात्मक छाया का आश्रय लेकर रचना मे कोई अनिर्वचनीय ही कान्ति का आविर्भाव ले आते है। अग्राम्य भूपा की कल्पना मे प्रवीन नागर लोगो के समान कमनीय कथा के व्यवसायी कुछ आरेचक्री वत्ति वाले लोग ही उभयन्त्र्छायाछुरित इस मध्यम मार्ग के प्रति अनुराग रखते है। इन तीनो मार्गो के अन्त मे कुन्तक ने मार्गग्रन्थितयगामी कवियो का नामसकीर्तन भी किया है—

१. कालिदास, सर्वसेन आदि महाकवियो के काव्य सहज तथा सौकुमार्य मार्ग की सुपमा से सवलित है।

२. विचित्र मार्ग के सौन्दर्य वाण के हर्षचरित मे प्रचुर मात्रा मे देखे जा सकते है। इसी प्रकार भवभूति, राजशेखर के ग्रन्थो तथा तथा अन्य मुक्तको मे भी यह मार्ग देखा जा सकता है।

३. सुकुमार-विचित्र उभयच्छायासवलित मध्यमाग्र के उदाहरण मातृगुप्त, मायुराज, मज्जीर प्रभृति कवियो की रचनाओ मे देखे जा सकते है।

औचित्य :-भरत मुनि से लेकर क्षेमेन्द्र और अनन्तर अद्यावधि काव्य मे औचित्य को प्रसुत स्थान दिया गया है। तीनो मार्गो के नियत गुणो का विवेचन तो मार्गों के लक्षण-परिसर मे ही कर दिया गया है। तीनो मार्गो के सामान्य गुण के रूप मे औचित्य को ही प्राण माना है। जिस अभिधानवैचित्र्य से पदार्थ का उत्सर्ष स्पष्टतया परिपुष्ट हो जाता है, उचित अभिधान प्राण वह औचित्य ही काव्य मे विच्छित्ति का, मार्गानुसारी शोभा का आधान करता है। और जहाँ प्रमता या वक्ता की अभिधेय वस्तु शोभातिशयशाली स्वभाव से आच्छादित हो उठता है, वह भी औचित्य है।५३-५४ वी कारिकाओ से मार्गग्रतय के सामान्प्य गुण औचित्यरूप

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वक्रोक्तिजीवितम्

प्रथम का विवेचन कर कुन्तक उनके दूसरे सामानय गुण सौभाग्य की ५५-५७ कारिकाओं मे चर्चा करते है ।

सौभाग्य :-कवि की प्रतिभाशक्ति जिसके लिये बडी सावधानी से काव्य-क्रिया मे व्यापृत होता है, उस वस्तु के अर्थात् काव्य के गुण का नाम है सौभाग्य । यह सौभाग्य-गुण केवल प्रतिभासाध्य ही नही है वल्कि उसके लिये व्युत्पत्ति-अभ्यास भी आवश्यक है । प्रतिभा-व्युत्पत्ति-अभ्यास समग्रौसामग्री से सुस्पाद्य, द्ववित-हृदय काव्यमर्मज्ञो मे अलौकिक, लोकोत्तर आनन्द का सर्जक काव्य का एक अद्वितीय प्राण, सौभाग्यगुण कहा जाता है। अलङ्कारादि से भ्राजिष्णु ये दोनो—औचित्य तथा सौभाग्य-गुण सुकुमार, विचित्र तथा मध्यम तीनों मार्गों मे होकर पद, वाक्य तथा प्रबन्धो मे व्यापक रूप से प्रतिष्ठित देखे जाते है ।

इस प्रकार वक्रोक्ति को ही काव्य का जीवन मानने वाले कुन्तक ने प्रथम उन्मेष मे काव्य-प्रयोजन, काव्यहेतु प्रतिभा आदि, काव्यस्वरूप, शब्दार्थस्वरूप तथा साहित्य, वक्रोक्तिस्वरूप, वक्रोक्तिभेद, मार्गत्रितय, उनके विशेष तथा सामानय गुणो का यथा-वसर सङ्केतोच् विस्तरपूर्वक विवेचन कर अन्तिम कारिका ५८ वी से उन्मेष की समाप्ति करते है। इन तीनों मार्गों मे तीनों मार्ग पर तो कोई ही कवि जा सके है । और जाने वालो मे अपूर्व प्रतिष्ठा भी पायी है । यह मार्ग सभी से सेवनिय नही है । अब आगे मैं कुन्तक द्वितीय उन्मेष मे मार्गत्रितयावलम्बी पदन्यास-परिपाटी का सौन्दर्य कहूँगा ।

द्वितीय उन्मेष : १. वर्णविन्यासवकता —द्वितीय उन्मेष मे कुन्तक ने वकता के छः भेदो मे प्रथम तीन भेदो का सविस्तार विवेचन किया है । वर्णविन्यास-वकता से इस उन्मेष का प्रारम्भ होता है । पूरे उन्मेष मे कुल ३५ कारिकाएँ है । सामानय प्रयोग की विधि से व्यतिरिक्त रमणीयतया वर्णों के विन्यास मे वर्णविन्यासवकता होती है। वर्ण शब्द वयवधान का पर्याय है । वर्णवकता के अनेक भेदो का विवेचन ग्रन्थ मे उपलव्ध है। एक, दो अथवा बहुत से व्यञ्जनो की आवृत्ति मे विनिबद्ध यह वकता प्रथमतः त्रिधा होती है । और यह आवृत्ति भी कभी तो व्यवधानपूर्वक होती है, कभी अव्यवधान से । कभी नियत स्थान तथा कभी अनियत स्थानयुक्त होती है । व्यवधान या अव्यवधान निवन्धन मे स्वरो के अव्यवधान आदि की विवक्षा नही होती । प्रथम कारिकोक्त त्रिधा आदृत्ति को अन्य त्रिमेद से उन्होने बताते हुए कहा है कि प्रस्तुत औचित्य के शोभावर्धक कादि से मकारपर्यन्त स्पष्ट अपने वर्गान्त स्पष्टो से संयुक्त होकर आवृत्त होते है या कही तकार लकार-नकार आदि द्विरुच्चरित होकर आवृत्त होते है और कही इनसे व्यतिरिक्त व्यञ्जन रेफान्ति से संयुक्त होकर ही आवृत्त होते है ।

तृतीय कारिका मे स्वरो के असादृश्य मे अव्यवधानादृत्ति से यमकाभास निर्देश किया गया है । पूर्वोक्त द्रुतो के परित्यागपूर्वक नूतन वर्णों की आवृत्ति समन्वित इस वर्ण-वकता मे अतिशय आसक्ति ग्राह्य नही है । अल्पलज आवृत्ति हेतु मनोहारी होती है । इस वकता का मार्गों के प्रोक्त प्रसाद आदि गुणों के अनुसार अक्षरों की कान्तिमती

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आवृत्ति ही सौन्दर्य है। उद्भट प्रभृति इसे ही उपनागरिका आदि वृत्ति वैचित्र्य कहते हैं। वर्णविन्यासवक्रता के अनियतस्थानशोभिनी इन आवृत्तियों में आचार्यों की समस्त अनुपासच्छटा विराजमान है। वर्णविन्यासवक्रता का ही अन्य प्रकार है यमक। जिसमे समान वर्णों की आवृत्ति होती है। इसका अर्थ है, एक, दो या अनेक श्रुतिवर्णों की व्यवधान या अव्यवधानपूर्व्वक आवृत्ति। इसमे पायी जाती है। एकरूप वर्णों की आवृत्ति होने पर उनके अर्थ यहाँ भिन्न होते हैं। अकठोर शब्द विरचित इसमे प्रसादगुण तथा औचित्य का परिपालन आवश्यक है। नियत पदादि के आदि, मध्य, अन्त में, जैसा कि अन्य आचार्य यमक भेद मानते हैं, इसकी आवृत्ति पायी जाती है। अनन्त भेद हो सकते हैं, किन्तु उनमे वैसा सौन्दर्य न होने के कारण कुन्तक ने उन सबका विस्तार नहीं किया है। इस प्रकार अनुप्रास-यमक-शब्दालङ्कारो को कुन्तक ने वर्णविन्यासवक्रता में समाहित कर लिया है। इसका सविस्तार विवेचन १—७ कारिकाओं में है।

( २ ) पदपूर्वार्धवकता :--८ वी से २५ वी कारिका तक कुन्तक ने इस वक्रता का उदाहरण—भेद-प्रदर्शन-पुरस्सर विवेचन किया। है। यहाँ प्रथम उन्मेष की अपेक्षा पाँच भेद अधिक प्रदर्शित किये गये हैं। प्रथम उन्मेष से केवल छ भेद प्रदर्शित हैं, यहाँ ग्यारह—

(१) रूदिवैचित्र्यवकता, (२) पर्यायवकता, (३) उपचारवकता, (४) विशेषणवकता, (५) संवृतिवकता, (६) क्रियादिवकता, (७) आगमवकता, (८) वृत्ति वकता, (९) भाव-वकता, (१०) लिङ्गवकता तथा (११) क्रियावैचित्र्यवकता।

१. रूदिवैचित्र्यवकता :--वर्ण्यमान पदार्थ के लोकोत्तर तिरस्कार के प्रतिपादनार्थ या उसके श्लाघ्य उत्कर्ष के प्रतिपादन की इच्छा से कविगण जहाँ वाच्य रूदि शब्द के द्वारा असंभवनीय अभिप्राय की प्रतीति कराते हैं या वर्ण्यमान किसी धर्म की अद्भुत महिमा प्रतीति का अभिप्राय प्रस्तुत करते हैं, वहाँ रूदिवैचित्र्यवकता होती है। कारिका ८-९ में यह विवेचन है। इसके उदाहरण में कुन्तक ने ध्वनिकार के अर्थान्तरसङ्क्रमित वाच्यध्वनि के उदाहरण ‘ताला जाआन्ति गुणा’ इत्यादि को प्रस्तुत कर ध्वनिकार मुखवैैचिव कहा है—‘ध्वनिकारेणैव व्यङ्ग्यै:-व्यङ्गकभावोद्ग सुतरां सङ्क्रतिम् ।’ इस वकता के दो भेद किये जाते हैं—( क ) जहाँ किसी के द्वारा स्वयं ही अपने में उत्कर्ष या निकर्ष का आधान करने के लिए कवि के द्वारा रूदिवाच्य अर्थ का उपनिबन्धन किया जाता है या ( ख ) जहाँ उसका कोई अन्य प्रतिपादक वक्ता होता है। यहाँ भी कुन्तक ध्वनिकारप्रदर्शित उदाहरणों को ही प्रस्तुत करते हैं। इस वकता में प्रतिपमान अर्थ का बाहुल्य होता है। अतएव अनेकों भेद हो सकते हैं—‘एपा च रूदिवैचित्र्यवकता प्रतिपमानधर्मबहुल्याद् बहुमकाखा भिद्यते ।’ स्पष्टतः इस वकता से लक्षणामूला ध्वनि को गतार्थ किया गया है।

२. पर्यायवकता :--पर्यायप्रधान शब्द को पर्याय कहते हैं। जहाँ किसी वस्तु के अनेक पर्याय होने पर भी कविरण अतिशय वैचित्र्य की सर्जना के लिए किसी

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वक्रोक्तिजीवितम्

विरोध पर्याय का ही उपादान करते है, वहाँ यह वक्रोक्ति पायी जाती है। इसके कई अवान्तर प्रकार उन्होंने दिखाये है—

( १ ) पर्यायवक्रता का प्रथम प्रकार वहाँ होता है जहाँ वाच्य का अत्यन्त समीपी, होने के कारण कोई पर्याय विवक्षित वस्तु का जैसा प्रतिपादन कर लेता है। वैसा कोई अन्य पर्याय नही कर पाता।

( २ ) जहाँ कोई विशिष्ट पर्याय सहजसौकुमार्य सुभग भी पदार्थ का अतिशय पोषक होने से सहृदय-हृदयहारिता को प्राप्त होता है।

( ३ ) जहाँ कोई विशिष्ट पर्याय अपने ही या अपने विशेषणमूल अन्य पद के द्वारा उल्लेषादि की रमणीय छाया के स्पर्श से अभिधेय वस्तु को विभूषित करने मे ममर्थ होता है। यही वकता शब्दशक्तिमूलानुरणनव्यापारनिष्पन्न के पद या वाक्यध्वनि का विषय होती है।

( ४ ) वर्ण्यमान वस्तु की प्रक्रान्तर से उत्पन्नासक्तया अवस्थिति रहने पर भी जो पर्याय अपनी कान्ति से सहृदय-हृदयाहारी बन जाता है।

( ५ ) जिस कथन मे वर्ण्यमान वस्तु के असम्भवनीय अर्थ की योग्यता के अभिप्राय को जो पर्याय उसी तरह बनाकर प्रस्तुत करता है।

( ६ ) जहाँ कोई विशिष्ट पर्याय रूपकादि अलङ्कारो से अन्य शोभा को धारण हृदयानुरक्षण करता है या जो उपेक्षा आदि अलङ्कारो मे अन्य ही शोभा का आधार कर देता है। इस प्रकार तीन कारिकाओ (१०-१२) तथा विस्तृत वृत्ति के माध्यम कुन्तक ने सविशेषार पर्यायवक्त्व का विवेचन किया है।

३. उपचारवक्रता:-(क) उपचार प्रधन होने से इसे उपचारवक्रता कहते है। पदार्थ के लोकोत्तर सौन्दर्य का प्रतिपादन करने के लिए जहाँ अतिशय भिन्न स्वभाववाले भी पदार्थों के धर्म का स्वल्प मात्र भी साम्य के आधार पर दूसरे पदार्थों पर आरोपित कर दिया जाता है, वहाँ इस वकता की सहृदयहृदयहारिता बन जाती है। प्रस्तुत और अप्रस्तुत यचापि एक-दूसरे से काफी दूर रहते है। यह दूरी देश-काल की न होकर उनके मूल स्वभाव की होती है। मूल स्वभाव से तात्पर्य है अमूर्त की अपेक्षा मूर्त, पदार्थ मूर्त या घनत्व की अपेक्षा द्रवत्व, अचेतनत्व की अपेक्षा चेतनत्व का अभिधान।

(ख) उपचारवक्रता का दूसरा रूप है वह, जिसमे उपचारसौन्दर्य के बल मे अवस्थित हो जाने के कारण रूपक आदि अलङ्कारो सरस उल्लेखवाले बन जाते है। यह दूसरी उपचारवक्रता रूपक आदि अलङ्कारो का प्राण है। १३-१४ कारिकाओ मे इस वकता के सौन्दर्य का विवेचन उपलब्ध है। यहाँ गौणी वृत्ति तथा रूपक आदि अलङ्कारो का आधार पाया जाता है।

४. विशेषणवक्रता :--विशेषणो की माहिमा से जहाँ क्रिया अथवा कारक-रूप वस्तु की रमणीयता फूट पड़ती है। तात्पर्य, पदार्थों के स्वभाव की सुकुमारता की समूूल्लासक्ता तथा अलङ्कारो की शोभातिशय का परिस्फोटकत्व ही इसका सौन्दर्य है।

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५. संवृतिवकता:-जहाँ पदार्थों के अभिधायो किन्हीं सर्वनाम आदि शब्दों के द्वारा उनका गोपन कर दिया जाता है। यह गोपन किया जाता है वैचित्र्य के अभिधान की इच्छा से। यह सवृतिप्रधान वकता अनेक रूपो मे प्रयुक्त होती है—

( १ ) साक्षात् शब्दों से प्रतिपादन नही अत्यन्त सुन्दर वस्तु भी जहाँ किसी सामानय तत्त्वाची सर्वनाम के द्वारा सवृत कर दी जाती है केवल इसलिये कि उस साक्षात् प्रतिपादक शब्द से अभिधान होने पर कही उसका उत्कर्ष सीमा न हो जाय।

( २ ) अपने स्वभाव के उत्कर्ष को चरम सीमा पर आधृत सतिशय वस्तु को कथन से परे है यह सिद्ध करने के लिए कविगण सर्वनाम से आच्छादित कर अन्य वाक्य से उसे प्रस्तुत करते है।

( ३ ) अतिशय सुकुमार वस्तु, कायांतिदय के अभिधान के बिना भी संवृति-मात्र की रमणीयता से चरम सीमा तक पहुँचा दी जाती है।

( ४ ) अनुभवगम्य भी वस्तु वाणी से कहने योग्य नही है। यह सिद्ध करने के लिए भी संवृति का सहारा लिया जाता है।

( ५ ) दूसरे के अनुभव योग्य वस्तु की वक्ता के कथन का आविपय सिद्ध करने के लिए संवृति कर दी जाती है।

( ६ ) स्वभाव या कवि की विवक्षा से किसी दोष से उपहत वस्तु महापातक के समान वर्णन योग्य नही है ऐसा बताने के लिए सर्वनाम आदि से उसका सवरण कर दिया जाता है।

इस संवृतिवकता के मूल मे भी व्यञ्जना विद्यमान है।

६. वृत्तिवकता:-व्याकरणप्रसिद्ध, समास, सन्ध्यादि तद्धित आदि वृत्तियों की अपने सजातीय वृत्ति की अपेक्षा जहाँ अधिक रमणीयता स्कुरित होती है, वहाँ यह वकता पायी जाती है।

७. भाववकता:-भाव का अर्थ है क्रिया। साध्यरूप मे प्रस्तुत करने से भाव के द्वारा जहाँ वस्तु का दुर्बलतया परिपोष होने के कारण, उसकी अवज्ञा कर सिद्धारूप मे प्रस्तुत कर प्रकटार्थ का परिपोष किया जाता है, वहाँ इस वकता की विच्छित्ति पायी जाती है।

८. लिङ्गवकता:-जहाँ भिन्न-भिन्न लिङ्गों की अनिर्वचनीय शोभा समुद्धित होती है वहाँ लिङ्गवैचित्र्यवकता का सौन्दर्य पाया जाता है। यह शोभा त्रिधा उदित होती है—

( १ ) भिन्न-भिन्न लिङ्गों के समान अधिकारणवर्त्ती होने से।

( २ ) ‘स्त्री नाम ही रमणीय है’ इस सिद्धान्त के कारण कविगण शोभानिर्माणार्थ अन्य लिङ्ग सम्भव होने पर भी स्त्रीलिङ्ग का ही प्रयोग कर देते है।

( ३ ) अन्य लिङ्गों के सम्भव होने पर भी विशिष्ट शोभाधानहेतु, अर्थ के औचित्यानुसार किसी विशेष लिङ्ग का ही प्रयोग कर दिया जाता है। २१-२३ कारिकाएँ

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वक्रोक्तिजीवितम्

दृश्यव्य हैं। अब तक पदपूर्वार्धवकता के जो विवेचन किये गये वे प्रातिपदिक आश्रित थे। अब आगे धातु पर आश्रित इसी वकता प्रकार के भेद का उल्लेख किया जायेगा।

९. क्रियावैचित्र्य वकता:-क्रियावकता का मूल है धातु का वैचित्रय। इसीलिये इसे क्रियावैचित्रय अभिधान दिया गया है। इसके पांच प्रकार कुन्तक ने बताये है—

( १ ) क्रिया का कर्ता की अत्यन्त अन्तरङ्ग अर्थात् सामीप्यतया निवन्धन।

( २ ) ऐसी क्रिया का निवन्धन जिसके कर्ता की अन्य कर्ताओं की अपेक्षा अधिक विचित्रता हो।

( ३ ) क्रिया के अपने विशेषण का विचित्र भाव।

( ४ ) उपचार अर्थात् साहश्य आदि सम्बन्ध के आधार पर अन्य धर्म के आरोप से जायमान वकता।

( ५ ) प्रस्तुत औचित्य के अनुसार अतिशय प्रतीति के लिये सर्वनाम आदि के माध्यम कमं आदि का संवर्र्ण कर क्रिया का प्रकाशन किया जाता है।

१०. क्रियादिवकता :-क्रियादी प्रत्यय पद के बीच मे आकर किसी अपूर्व वकता की सृष्टि कर देते है। यद्यपि यह वक्ता तथा आगें कही जाने वाली आगम-वकता, जिसे कुन्तक ने १७-१८ कारिकाओं मे निबद्ध किया है, कुन्तक के ही अनुसार प्रत्ययवकता के विषय है, तथापि प्रातिपदिक का विषय बन जाने, पदमध्य आने से तथा आचार्य विश्वेश्वर द्वारा इन्हें भी पदपूर्वार्धवकता के अन्तर्गत गिनने के कारण मैने भी इन्हें इसी वकता के अन्तर्गत विवेचित किया है।

११. आगमवकता :-गुम् आदि के आगमों के सौन्दर्य से रमणीय किसी अपूर्व वकता की सृष्टि होती है, जिससे रचना की शोभा मे वृद्धि आ जाती है।

३. पदपदार्थवकता :-पद-प्रातिपदिक या धातु के पर मे जुडने वाले प्रत्ययों से जायमान वैचित्रय को यहॉ यह अभिधान दिया गया है। इसके मूलत छः भेदों का क्रमिक विवरण कराया जा रहा है।

( १ ) कालवकता :-वर्ण्यमान वस्तु के औचित्य के अतिशय अन्तरङ्ग होने के कारण लडादि वाच्य काल प्रत्यय जहॉ रमणीयता को प्राप्त होते हैं।

( २ ) कारकवकता :-अनिर्वचनीय भङ्गीभणिति की रमणीयता का परिपोप करने के लिए आदि मुख्य कारकों के गौण भाव का संविधान करते हुए जहॉ कारक सामान्य का मुख्य कारक की अपेक्षा मुख्य भाव निवन्धित किया जाता है, इस प्रकार कारकों के विपर्यास मे कवि इस वैचित्रय का निर्माण करता है। दृश्यव्य है कारिकाएँ २७-२८।

( ३ ) सङ्ख्यावकता :—काव्य-सौन्दर्य की विवक्षा से विदग्ध कविगण जहॉ सङ्ख्या का विपर्यांस-एक या द्विवचन के प्रयोग मे अन्य वचनों का प्रयोग—कर देते हैं, वहॉ सङ्ख्यावकता मानी जाती है। वचन विपर्यय ही इसके सौन्दर्य का कारण है।

( ४ ) पुरुषवकता :-शोभासृष्टि के लिए जहॉ उत्तम-मध्यम-प्रथम आदि पुरुषों के स्थान पर विपर्ययपूर्वक उनका प्रयोग किया जाता है, वहॉ इस वकता का समुदय होता है।

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(५) उपम्रहवकता :- धातुओं के आधार पर निर्भरित उनके पद-परस्मै तथा आत्मनेपद मे से जहाँ किसी एक पद आत्मने या परस्मैपद का ही कविगण शोभार्थ विनिवन्धन करते है, वहाँ भी क्रियावैचिच्र्यवक्रोक्ति होती है।

(६) प्रत्ययवकता :- टिडादि प्रत्ययो से विहित अन्य प्रत्यय जहाँ किसी अपूर्व शोभा की सृष्टि करता है, वहाँ प्रत्ययवकता होती है। इस प्रकार पदवकता के पूर्वोक्त-परोक्त भेद से कुन्तक ने अनेक भेद बतलाये है। इनमे प्रायः ध्वनिवादी के सभी पद वाच्य व्यञ्जकताओ का विनिवेश हो गया है।

उपसर्गे-निपातवकता :- उपसर्ग तथा निपात भी पद कहे जाते है। अविकारी होने से इनमे पूर्वोक्त-परोक्त की सर्गति नही बनती। अतएव कुन्तक ने इन्हे ३३ वी कारिका से पृथक्‌तया विवेचित किया है। जहाँ उपसर्ग तथा निपात रसादि को द्योतित करते है। यह वकता वाक्य का एक मात्र जीवन है। उन्मेष की समाप्ति के पूर्व कुन्तक ने ३४ वी कारिका से बतलाया है कि पूर्वोक्त वकताएँ वाक्यों मे एक साथ निवद्धमान होने पर परस्पर की अनेक प्रकार की छटा को उत्पन्न करती है। इस प्रकार द्वितीय उन्मेष मे त्रिविध वकता की व्याख्या कर कुन्तक ने विदग्धो से तदनुसार ही काव्यरचना का आग्रह करते हुए उन्मेष की समाप्ति कर दी है। उक्तिसतया प्रथम दो उन्मेषो का सार प्रस्तुत किया गया। सोदाहरण विवेचन विस्तारभय से सम्भव न हो सका। ग्रन्थ के तृतीय उन्मेष मे वाक्यवकता का, जिसके अन्तर्गत समस्त अलंकार-वर्ग समाहित हो जाता है, विवेचन किया गया है। किन्तु यह विवेचन खण्डित तथा अपूर्ण-सा है। किन्तु है व्यवस्थापक। विषयसामग्री भी इसकी विपुल होने के साथ नूतन और मौलिक चिन्तन समलंकृत है, जिसपर बाद मे विचार किया जायगा। चतुर्थ उन्मेष मे प्रकरण तथा प्रवन्धवकता के अवान्तर भेदोपभेदो का विवेचन है। जिसमे वस्तु, उसके सविधाभाग, रस, नाटक, मुखसन्ध्यादि का विततस्त किन्तु खण्डित विवेचन है।

इस पूरे पर पुनः लिख जायेगा।

भूमिका को अतिविस्तार देने के लिए ही वक्रोक्तिजीवीत के मूलग्रन्थो मे ग्रन्थ का यहाँ दिग्दर्शन कराया गया है। कुन्तक के सिद्धान्त पर पृथक् ग्रन्थ लिखकर ही उनका उचित सम्मान तथा सिद्धान्तो की समुचित व्याख्या की जा सकती है। समय मिलने पर इस ओर प्रयास अपेक्षित है। वक्रोक्तिजीवीत के पूर्व के सभी संस्करणो का सहारा लिया गया है, उनके संपादको के प्रति मै विनम्र आभार प्रकट करता हूँ। त्रुटियो जो ग्रन्थ या अनुवाद मे रह गयी है मेरी तथा प्रूफ न देख पाने के कारण प्रेस-मत ही है, उनसे पूर्व के आचार्यो का कोई सम्बन्ध नही है। विविध विद्यालय प्रकाशन के व्यवस्थापक श्री पुरुषोत्तम दास मोदोजी को कोटिशः साधुवाद जिनके सतत प्रयासो से ग्रन्थ प्रकाश मे आया है। शुभम्भूयात्॥

वसन्त पक्षमी, १९६७ ईं

वाराणसी दिनेशी

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वक्रोक्तजीवितम्

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भूमिका

रचनाकार के नाम मे 'ल' वर्ण जुड़ गया और उसका नाम कुन्तलक लिखा जाने लगा । डॉ० दे की वक्रोक्तिजीवित की पुस्तिपका मे कुन्तलक नाम के पाठान्तर का यही कारण हो सकता है ।

रचना की उपलब्धि तथा प्रकाशन :--कुन्तक की एकमात्र उपलब्ध कृति है 'वक्रोक्तिजीवित' । ग्रन्थ जितना ही महत्वपूर्ण है, उसके पाण्डुलिपि की उपलब्धि तथा प्रकाशन की गाथा भी उतनी ही दिलचस्प । प्रकृत संस्करण के अतिरिक्त इस महनीय ग्रन्थ के चार संस्करण प्रकाश मे आ चुके है । किन्तु सभी संस्करणो का आधार है डॉ० दे की सम्पादित वक्रोक्तिजीवित ही। और इस छुतप्राय ग्रन्थ को प्रकाश मे लाने का समस्त श्रेय है डॉ० सुशीलकुमार दे को । डॉ० दे ने अपने संस्करण की भूमिका मे इस ग्रन्थ के पाण्डुलिपि की प्राप्ति तथा सम्पादन का विवरण प्रस्तुत किया है । उन्ही के कथन को यहाँ हिन्दी मे प्रस्तुत किया जा रहा है । ग्रन्थ के प्रथम दो संस्करणो का प्रकाशन तो डॉ० दे ने ही किया है । प्रथम संस्करण का सम्पादन उन्होने प्रो० जैकोबी के सहयोग से किया था । सर्वप्रथम १९२० ई० मे मद्रास की हस्तलिखित ग्रन्थो की राजकीय पुस्तकालय की सूची मे इस ग्रन्थ का नाम प्रकाश मे आया । उस समय श्री दे साहब 'इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी' लन्दन मे कार्य कर रहे थे । लाइब्रेरी के अध्यक्ष डॉ० एफ० डब्ल्यू० थामस ने श्री दे का ध्यान इस ग्रन्थ की ओर आकृष्ट किया । पाण्डुलिपि को इण्डिया ऑफिस के माध्यम से ऋण-रूप मे प्राप्त करने के लिए उन्होने आवेदन कर दिया, किन्तु मद्रास लाइब्रेरी का वैसा नियम न होने के कारण उन्हे पाण्डुलिपि प्राप्त न हो सकी । डॉ० थामस के महत्वपूर्ण प्रयासो से मद्रास लाइब्रेरी के अध्यक्ष ने १९२० मे पाण्डुलिपि की एक प्रमाणित प्रतिलिपि डॉ० दे को लन्दन प्रेपित कर दी। पाण्डुलिपि एकदम अशुद्ध थी, प्रत्येक पक्ति अशुद्धातः गायत्र थी । कुछ समय के लिए उन्होने इस कार्य को स्थगित कर दिया ।

यह जानकर कि डॉ० दे के पास इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ की प्रति उपलब्ध है । प्रो० जैकोबी ने श्री दे महोदय को बॉन ( जर्मनी ) निमन्त्रित किया । वहाँ जाकर श्री दे महोदय ने प्रो० जैकोबी के साथ इसका अध्ययन किया । प्रो० साहब के अतादृशयक अत्यन्त अनुराग से समुत्साहित श्री दे महोदय अपूर्ण भी सामग्री के सम्पादन की तैयारी मे लग गये और वह प्रथम दो उन्होने की शुद्ध तथा पठनीय मूलप्रति तैयार करने मे सफल हो गये । और जब ये दोनो विद्वान् तृतीय तथा चतुर्थ पर पहुँचे, तो इन लोगो ने पाण्डुलिपि की प्रति को अत्यन्त अशुद्ध पाया । अन्ततः एकदम निराश होकर इन लोगो ने कार्य को त्याग ही दिया ।

भारत लौटनें पर

१९२२ मे श्री दे महोदय ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के माध्यम से पुन मूलप्रति को प्राप्त करने का प्रयास किया, पर इस प्रक्रिया मे भी सफलता की आशा उन्हे कम ही लग रही थी और स्वयं की उनकी स्थिति ऐसी नही थी कि मद्रास जाकर पाण्डुलिपि का निरीक्षण कर सकते । कलकत्ता विश्वविद्यालय

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के तत्कालीन कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी से श्री दे महोदय ने अपनी कठिनाई बताई। श्री मुखर्जी साहब ने बड़ी कृपापूर्वक महामहोपाध्याय पं० अनन्तकृ̣ण शास्त्री को अपने हाथ से एक नवीन प्रति तैयार करने के लिए नियुक्त कर दिया । मद्रास लाइब्रेरी के पं० रामकृ̣ण कवि की सहायता से लुप्तप्राय पाण्डित्य अनन्तकृ̣ण द्वारा तैयार की गयी प्रति से दे महोदय को पहले तैयार की गयी प्रथम दो उन्मेषों की बहुत सारी अशुद्धियों को ही ठीक करने का मौका नहीं मिला प्रस्तुत प्रथम प्रति में विछिन्न पाँच पृष्ठों को भी जोड़ने का सौभाग्य प्राप्त हो गया । इस प्रकार इन दो प्रतिलिपियों के आधार पर १९२३ में प्रथम दो उन्मेषों का महनीय प्रकाशन हो गया । श्री दे महोदय का यह पहला प्रकाशन था ।

श्री कृ̣ण कवि ने अपने मद्रास लाइब्रेरी की प्रति के सम्बन्ध मे श्री दे साहब को २५ फरवरी १९२५ को एक पत्र लिखा । मूल का हिन्दी अनुवाद है—‘लन्दन में आपको जो प्रति भेजी गयी थी, वह हमारे पुस्तकालय की मूलप्रति की सत्य प्रतिलिपि थी और जिससे लाइब्रेरी की प्रतिलिपि तैयार की गयी थी वह उस प्रथम मूलप्रति की भी प्रति प्रतिलिपि थी । मै समझता हूँ जितनी भी प्रतियाँ इस मूलप्रति से तैयार की जायेंगी सभी मे वे अशुद्धियाँ रहेंगी ही । इस विषय मे मै यह भी कहना चाहता हूँ कि, पाण्डुलिपि के प्रतिभू इस ग्रन्थ का अपना संस्करण पाँच उन्मेषों मे छाप रहे है । ( जैसलमेर के ) इन अध्यापक महोदय ने ग्रन्थ को अनेक वार अपने शिष्यों को पढ़ाया है । उस समय पाण्डुलिपि अपनी छुद्रावस्था मे थी । पूरे ग्रन्थ को वह अपनी स्मरणशक्ति से पुनः यथाक्रम प्रस्तुत करने मे समर्थ है । उनका संस्करण बहुत शुद्ध प्रकाश मे डा जायगा, किन्तु यह समाचार किसी दूसरे संस्करण के महत्व को कम नही करता ।’ श्री कृण कवि ने यह भी लिखा था कि मद्रास की उत्तम पाण्डुलिपि जैसलमेर के एक अध्यापक महोदय की प्रति से तैयार की गयी थी । वह अध्यापक महोदय वही थे जिनका संकेत इस ऊपर के पत्र मे आया है । किन्तु उन अध्यापक महोदय का संस्करण अभी तक तो प्रकाश मे नही आ सका है । ओरियण्टल कॉन्फ़्रेंस १९२४ मे मद्रास मे हुआ था । श्री दे महोदय को वहाँ एक सप्ताह से ऊपर रहने का अवसर मिल गया । उन्होंने पुस्तकालय की उस प्रति का निरीक्षण किया, जिससे उनकी प्रतिलिपि तैयार की गयी थी । पं० रामकृण वहाँ नही थे । किन्तु लाइब्रेरी के पण्डितों ने उनके पत्रविषयक सुझाव की पुष्टि की और उन्होंने बताया कि मूलप्रति माल्लावार के तटवर्ती किसी स्थान से प्राप्त की गयी थी । मद्रास की प्रति ने पं० रामकृण के कथित प्रति पर कोई नया प्रकाश नही डाला । दुर्भाग्यवश यह पाण्डुलिपि भी अधूरी थी । चौथा उन्मेष इसमे कटा हुआ था । तीसरे मे भी काफी स्थान रिक्त थे, टूटे-फूटे थे । निश्चयतः नही जाना जा सका कि वास्तव मे ग्रन्थ मे कितने उन्मेष रहे । पण्डित रामकृण के कथनानुसार पाँच उन्मेष होने चाहिए थे । किन्तु ग्रन्थ के प्रति पाठ्य से प्रतीत होता है कि वक्रोक्ति के अन्तिम भेद—प्रबन्धवक्रोक्ति—के विवेचन

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के अनन्तर ग्रन्थ की परिसमाप्ति हो जानी चाहिए । चतुर्थ उन्मेष मे वक्रोक्ति के इस भेद का अधूरा रूप मिल पाता है । आशा नही की जा सकती कि उसकी पूर्ति के लिए लेखक ने पृथक् से एक पृथक् उन्मेष ही लिख डाला होगा । दूसरी कोई सामग्री भी वर्ण्य नही रह जाती जिसके लिए अतिरिक्त उन्मेष की आवश्यकता पडती । अतएव ग्रन्थ चार उन्मेषो मे ही रहा होगा ।

इसी बीच १९२३ मे जैन भण्डार जैसलमेर की पाण्डुलिपियो की सूची मे श्री सी० डी० दलाल द्वारा प्रकाशित ( गायकवाड सीरीज न० २१, पृ० ६२-६३ ) ग्रन्थ की एक दूसरी पाण्डुलिपि का पता चला । श्री दे की ओर से ढाका विश्वविद्यालय के, अधिकारियों द्वारा पाण्डुलिपि को उधार प्राप्त करने के सभी प्रयास विफल हो गये । जैन भण्डार पाण्डुलिपि को उधार देने मे बडा कठोर था । जैसलमेर दरबार तथा जैन भण्डार दोनो से किया गया प्रयास व्यर्थ हो गया । पश्चिमी राजपूताना के राज्यो के रेजीडेण्ट की बडी कृपा से, उनके प्रभाव से १९२६ मे ढाका विश्वविद्यालय के लिए एक प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त हो पायी । इस नवीन तथा शुद्ध पाण्डुलिपि की खोज ने प्रथम दो तथा तृतीय उन्मेष के कुछ अंश को अधिक सन्तोषजनक रीति से सम्पादित करना सम्भव कर दिया ।

दुर्भाग्यवश यह पाण्डुलिपि भी अधूरी सिद्ध हुई । इसमें प्रथम दो तथा तृतीय उन्मेष का करीब एकतिहाई भाग ही उपलब्ध था । इसलिये इसके दूसरे १९२८ के संस्करण मे उतना ही भाग शुद्ध रूप से प्रकाशित किया जा सका जितना दोनो पाण्डु-लिपियो मे उपलब्ध था । भ्रष्ट तथा टूटे-फूटे तृतीय और चतुर्थ उन्मेष के अवशिष्ट भाग को दे महोदय ने मद्रास की भ्रष्ट पाण्डुलिपि के सहारे जहाँ तक सम्भव हो सका है, वृत्ति तथा कारिका को अपनी बुद्धि के अनुसार जोड-जाडकर द्वितीय संस्करण मे परिशिष्ट के रूप मे जोड देने का स्तुत्य प्रयास किया है । इसी के १९६१ के तृतीय संस्करण मे उन्होंने कुछ मूल्यों से शुद्ध और उपयोगी सामग्री का योग कर दिया है ।

इस प्रकार इस ग्रन्थ को जिस भी स्थिति मे हो, प्रकाश मे लाने के लिए समग्र संस्कृत-जगत् डॉ० दे का सदा ऋणी रहेगा । क्योंकि इन तीनों संस्करण से साहब के है, अतः इन तीनो को ही मैने एक संस्करण की संज्ञा दी है ।

डॉ० दे के संस्करण के अनन्तर आचार्य विश्वेश्वर की व्याख्यानुवाद समेत डॉ० नगेन्द्र की भारी भूमिका समन्वित इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ का दूसरा संस्करण १९५९ मे हिन्दी अनुसन्धान परिषद्, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली की ओर से आत्माराम एण्ड सन्स, कश्मीरी गेट, दिल्ली-६ से प्रकाशित हुआ है । इस संस्करण मे आचार्य विश्वेश्वर ने न केवल सर्वप्रथम इसे हिन्दी अनुवाद से मण्डित किया प्रत्युत् अपनी विवेकाश्रित पद्घति से तृतीय-चतुर्थ उन्मेष को जोडने का प्रयास भी किया है । डॉ० नगेन्द्र की भूमिका पश्चिमी आलोक मे वक्रोक्ति को देखने का अच्छा माध्यम है ।

इसका तीसरा संस्करण श्री राधेश्याम मिश्र की 'प्रकाशा' हिन्दी व्याख्या समेत चौखम्बा

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वक्रोक्तिजीवितम्

संस्कृत सीरीज, वाराणसी से १९६७ मे प्रकाशित हुआ है। इस सस्करण मे एक लघु किन्तु उपयोगी हिन्दी भूमिका भी है। मिश्रजी ने आचार्य विश्वेश्वर की कतिपय भूलो की ओर भी दृष्टिपात किया है। कुलंक की इस अमररचना का चौथा सस्करण डा० के० कृष्णमूर्ति द्वारा प्रकाश मे लाया जा रहा है। 'अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन' के २८ वे अधिवेशन धारवाड के १०-१२ नवम्बर १९७६ के त्रिदिवसीय सम्मेलन मे भाग लेने का अवसर मिला। वहाँ डॉ० कृष्णमूर्ति के सम्पादन की जानकारी हुयी; ग्रन्थ कनाडक विश्वविद्यालय धारवाड के प्रकाशन-विभाग से प्रकाशित हो चुका था। केवल वार्डिज़ शेष था। इस ग्रन्थ के तृतीय-चतुर्थ उन्मेषो मे डा० साहब के सस्करण का उपयोग किया जायेगा। इस प्रकार वक्रोक्तिजीवित के अब तक कुल चार सस्करण प्रकाश मे आ चुके है। यह पाँचवाँ सस्करण विद्याविभाग प्रकाशन, वाराणसी के अनुगृह से विद्वानो के हाथो मे है।

कुन्तक का समय :-(१) मार्गो के विवेचन मे कुन्तक ने कुमार, विचित्र तथा मध्यम तीन मार्गो के उदाहरनो को कालिदास, सर्वसेन, वाण, भवभूति, रजशेखर, मातृगुप्त, मायुराज, मज्जीर आदि महाकवियो की रचनाओं से देखवने का निर्देश किया है

'मातृगुप्तमायुराजमज्जीरप्रभृतितीनां सौकुमार्यवैचित्र्यसवलितपरिस्फुरद्स्थानदीनि कान्यानि सम्भवन्ति। तत्र मध्यममार्गसवालिते स्वारस्य विचारणीयम्। एवं सहज-सौकुमार्यसुभगानि कालिदाससर्वसेनादीनां काव्यानि हृदयन्ते। तथैव च विचित्रवकत्वविजृम्भित हर्षचरिते प्राचुर्येण भट्टवाणस्य विभाव्यते, भवभूतिराजशेखरविरचितेषु वन्यसौन्दर्यसुभगेषु मुक्तकेषु परिहृत्यते।' व० जी०, कारिका ५२ की वृत्ति के अन्त मे स्पष्ट है कि कुन्तक इन कवियों के परवर्ती है। इनमे कुन्तक के सबसे अधिक समीप राजशेखर आते है। राजशेखर का समय नवी शती का अन्तिम भाग तथा दशम शती का प्रारम्भ माना जाता है। डा० दे० प्रभृति विद्वानों ने यही सिद्ध किया है। अतः कुन्तक को कम से कम दशम शतक के मध्य अवस्थित माना जा सकता है। उपर्युक्त कवियों की रचनाओं से कुन्तक ने अनेक उद्धरण प्रस्तुत ही किये हैं, साथ ही उनके द्वारा उल्लिखित रचनाओं तथा रचनाकारों मे उद्भट, कोलदास, किरातार्जुन नाट्य, कुमारसम्भव, श्रुत्यारोचना, छोलतराम, तापसराज, दण्डी, ध्वनिकार, नागानन्द, पाण्डवाभ्युदय, पूरपदूषितक, प्रतिमानिरुद्ध, वाल रामायण, भट्टवाण, भरत, भवभूति, भामह, मज्जीर, महाभारत, मातृगुप्त, मायापुष्पक, मालतीमाधव, मुद्राराक्षस, मेघदूत, रघुवंश, राजशेखर, रामचरित, रामानन्द, रामाभ्युदय, रामायण, रुद्रट, विक्रमोर्वशीयम्, वीरचरित, वेणीसहार, शाकुन्तल, चिडुपालवध, सर्वसेन, सेतुप्रबन्ध ( नाटक ), हयग्रीवध, हर्षचरित, उत्तररामचरित तथा उदात्तराघव आदि का नाम पाया जाता है।

१. द्र०, काणे, सा० का० इ० (हिन्दी स०) पृ०, २९३-४।

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भूमिका

ध्यान देने योग्य है कि इसमे रामचरित का भी उल्लेख है। यह रामचरित अभिनन्द की अमरकृति है। डॉ० रामजीत मिश्र ने अपने शोध-प्रबन्ध मे अभिनन्द तथा राजशेखर को परस्पर मित्र मानकर उनका समय वही स्वीकार किया है जो ऊपर की पंक्तियो मे लिखा जा चुका है।1 अतएव कुन्तक के समय की पूर्वसीमा राजशेखर से पूर्व नही रखी जा सकती। विस्तृत जानकारी के लिए डॉ० दे तथा श्री राघेश्याम मिश्र जी की भूमिका देखी जा सकती है। ( २ ) कुन्तक ने 'ध्वनिकार आनन्दवर्धन का नाम उल्लेख न करते हुए भी ध्वनिकार के मत की अनेक अवतारणा की है। आनन्दवर्धन की कारिका तथा रचना को भी उद्धृत किया है।2 राजशेखर ने आनन्दवर्धन का 'प्रतिभाव्युत्पत्तयो: प्रतिभाश्रेयरसौन्दानन्द:' कहते हुए उल्लेख किया है, पर आश्चर्य कि है कुन्तक ने उनका उल्लेख नाम्ना नही किया। आनन्द के प्रति कुन्तक का गौरवभाव ही इसमे कारण हो सकता है। यही कारण है ध्वनि का चक्रोक्ति मे अन्तर्भाव करने पर भी कुन्तक ने उसका खण्डन करने का कही प्रयास नही किया है। ध्वनि, ध्वनिकार तथा उनकी युक्तियों का उल्लेख करने के कारण कुन्तक आनन्दवर्धन तथा राजशेखर से परवर्ती है तो दूसरी ओर उनके मत की चर्चा करने वाले आचार्यो मे सर्वप्रथम महिमभट्ट को उदाहृत किया जा सकता है। परवर्ती महिमभट्ट, रुद्रटक, जयंत प्रभृति के द्वारा कुन्तक के मतो की पर्याप्त चर्चा की गयी है। किन्तु नाम तथा सिद्धान्त दोनो का उल्लेखकर सर्वप्रथम कुन्तक के विचारो का खण्डन करने वाले आचार्य महिमभट्ट ही है। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, महिम ने अपने 'व्यक्तिविवेक' के २१९ के अन्तर्गत-

'काव्यकक्षणकशाऽऽश्रिमममानिना कुन्तकेन निजकाव्यलक्षणि । यस्य सर्वान्तिरवच्योदिता श्लोक एव स निदर्शितो मया ॥'

कहकर कुन्तक का नामोल्लेख करते हुए उनके मत को दूषित सिद्ध किया है। व्यक्तिविवेक पृ० १४२ ( चौ० संस्करण ) नाम न लेकर भी कुन्तक के मत का उन्होने पुन खण्डन किया है। महिमभट्ट को ११ वी शती के अन्त मे निर्धारित किया जाता है।3 अतः कुन्तक को उनसे पूर्ववर्ती होना चाहिए। (३) महिमभट्ट ने लोचनकार अभिनवगुप्त के भी कतिपय अंशो को शब्दशः लेकर उसका खण्डन किया है।4 किन्तु लोचनकार ने कुन्तक का उल्लेख स्पष्ट शब्दो मे नही किया है। तथापि लि०वकता विवेचन के कतिपय अंशो का लोचन के 'तट्टी तारं ताम्यति' इत्यत्र तट-शब्दस्य पुंस्त्वनपुसकत्वे अनाहत्य स्त्रीत्वमेवाश्रितिं सहृदयैः -स्त्रिति नामापि मधुरसं,

१. द्र० डॉ० रामजीत मिश्र, 'अभिनन्दकृत रामचरित का आलोचनात्मक अध्ययन, शोधप्रबन्ध, गोरो० वि० वि० १९६८, पृ० १९-२० ।

२. आनन्दवर्धन के 'तदा जायन्ते गुणाः।' इत्यादि 'विपमबाणलीला' के इलोक तथा 'प्रधानेडनन्यत्र वाक्यार्थे' इत्यादि २.१५ की कारिका को कुन्तकने व० जी० मे उद्धृत किया है ।

३. द्र०, भूमिका, डॉ० दे, पृ० १४ तथा श्री काणे, स० का० इ०, पृ० २१४, मिश्र, पृ० १० ।

४. द्रष्टव्य, लोचन तथा व्यक्तिविवेक ।

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वक्रोक्तिजीवितम्

इतिकृतवा' इत्यादि विवेचन पर तथा नाम, आख्यात, उपसर्ग आदि के विवेचन मे अभिनव-भारती के, 'विभक्तय: सुङन्ततवचनानि तैः कारकचकतयो लिङाद्युपग्रहास्तुचो- पलक्ष्यन्ते' यथा 'पाण्डिमिन्न भर्गनं वपु:' इत्यादि कथनो पर अन्त मे 'अन्यैरपि सुवादि- वक्ता' उक्ति पर स्पष्टतः कुन्तक का प्रभाव मानकर कतिपय विद्वान् कुन्तक को अभिनव से भी पूर्व स्वीकार करते है ।१ वस्तुत इस पक्ष के तकों मे यथेष्ट दम है । और जयरथ की यह उक्ति 'वक्रोक्तिजीवितहृदयदर्पणकारार्वाचीन ध्वनिकारानन्तर- भाविनौ' कुन्तक को 'हृदयदर्पणकार' भट्टनायक का पूर्ववर्ती, या नही तो कम से कम समकालीन सिद्ध करने मे समर्थ तो है ही। अभिनवगुप्त ने भट्टनायक के सिद्धान्त का खण्डन किया ही है । डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय आदि ने अभिनवगुप्त को दशम शती के उत्तरार्ध मे रखने का प्रयास किया है ।२ इस प्रकार कुन्तक को राजशेखर तथा अभिनवगुप्त के बीच दशम शातक मे रखा जा सकता है ।३

वक्रोक्ति, ग्रन्थ का प्रतिपाद्य :-भामह से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तक वक्रोक्ति का स्थान संस्कृत काव्यशास्त्र मे अकुण्ठ रहा है । और आज भी उस पर निरन्तर तकँ-वितकँ चलते ही है, चल रहे हैं । वक्रोक्ति की ऐतिहासिकता के लिये हम सर्वप्रथम महाकवि वाणभट्ट को ले सकते है । उन्होने वक्रोक्ति को काव्य के व्यपिक तत्व के रूप मे प्रस्तुत किया है । काव्यशास्त्री मे सबसे पर वक्रोक्ति निपुण शब्द का प्रयोग किया है । प्रसङ्गानुसार वहाँ वक्रोक्ति का भेद़ीविच्छित्ति अर्थ ही लेना उपयुक्त होगा । कविराज ने सुबन्धु, वाण तथा अपने को वक्रोक्ति मार्ग का आचार्य बताय है— सुबन्धुवाणभट्टश्र कविराज इति त्रयः । वक्रोक्तिमार्गानुपुणा श्रुत्यर्थ विद्धते न वा ॥ (राघवपाण्डवीय, १-४९)

काव्याचार्यों मे सर्वप्रथम भामह ने ही वक्रोक्ति का विवेचन किया है । उन्होने वक्रोक्ति को वाणी का उत्तम भूषण माना है ।४ उनका अभिप्राय है कि वक शब्द तथा अर्थ के अभिधान मे ही अलङ्कार की अलङ्कारता सिद्ध होती है । वक्रोक्ति का ही दूसरा पर्याय उन्होने अतिशयोक्ति को माना है । लोकोत्तरिकान्त, अलौकिक कवि-

१. डॉ० लाॅ0 हरी०, डॉ० सुक्ला, डॉ० दे०, श्री मिश्र तथा डॉ० ब्रजमोहन चतुर्वेदी ने अपनी-अपनी कृतियो मे अभिनव को कुन्तक का समकालीन या परवर्ती सिद्ध करने का प्रयास किया है । इसके विपरीत डॉ० शकरन् तथा डॉ० राघवन् यह स्वीकार करने को तैयार नही है कि अभिनव पर कुन्तक का प्रभाव है । दृश्यव्य, डॉ० के० सी० पाण्डेय, अभिनवगुप्त, स्वय अभिनव के कथन, भूमिका मिश्र की, पृ० ११-१८ तथा वहाँ उद्धृत पाद-टिप्पणियो तथा काणे और दे हिस्ट्री तथा डॉ० ब्रजमोहन चतुर्वेदी का महिमभट्ट, पृ० ३५-६ ।

२. दृश्यव्य, डॉ० के० सी० पाण्डेय, अभिनवगुप्त, स्वय अभिनव के कथन, भूमिका मिश्र की, पृ० १८ तथा दे एव काणे का इतिहास ग्रन्थ ।

३. डॉ० दे की भूमिका, काणे का स० का० इ० तथा मिश्र और आचार्य विरवेचवर की भूमिका, चतुर्वेदीजी का महिमभट्ट दृश्यव्य ।

४. वक्रोभियेयशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलकृति: । काव्यालङ्कार १.३६-३१ ।।

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वाक् ही अतिशयोक्ति है। लोकोत्तरता का अर्थ यहाँ पण्डितराज जगन्नाथ के शब्दों मे लोकोत्तरान्त आहादरूप रमणीयता होता है—

‘रमणीयता च लोकोत्तराह्लादजनकज्ञानगोचरता’ ॥२० गौ॰, पृ०४॥

यह अतिशयोक्ति ही भामह की दृष्टि में वक्रोक्ति है। यही समग्र अलङ्कार वर्ग का प्राण है। सभी अलङ्कारों मे प्राणतया अवस्थित है। इसी से अर्थ का विभावन होता है। अतएव कवि को इसी की सिद्धि का प्रयास करना चाहिए। इसके अभाव मे कोई अलङ्कार-अलङ्कार हो ही नही सकता—

सैपैव वक्रोक्तिरनयाध्यों विभाव्यते ।

यत्तादृशां कवितां कार्यः; कोऽलङ्कारोऽनया विना । काव्य०, २।८५।

भामह का समर्थन करते हुए आनन्दवर्धन ने भी कहा है कि विपयौचित्यपूर्वक की गयी काव्य की अतिशययोगिता उत्कर्ष ले आती है—‘कथं हि काव्यस्य स्वविषयौचित्येन क्रियमाणा सती नोत्कर्ष मावहेत्’ (ध्व०; पृ० ४९८, ९९) और आगे इतना कहने के बाद ‘ध्वनिकार ने भामह की उक्त कारिका को आचार्य का नामोल्लेखपूर्वक प्रस्तुत किया है। ध्वनिकार की उक्त पंक्ति पर लोचनकार अभिनवगुप्त के भी विचार वही है—‘अतिशययोगिता कथं नोत्कर्षमावहेत्’—काव्ये लोकोत्तरे शोभोल्लसति ।...भामहोक्तातिशयोक्ति सर्वालङ्कारसामान्यरूपमवदात् ।... शब्दस्य च वक्ता अभिधेयस्य च वक्ता लोकोत्तीर्णेन रूपेणावस्थानम्’ (वही लोचन)। इस प्रकार लोचनकार की दृष्टि से भी काव्य मे अतिशययोग ही उत्कर्ष ले आता है। अतिशययोग से काव्य मे अलौकिक शोभा जुड़े जाती है। भामह ने अतिशयोक्ति को सर्वालङ्कार मामान्य तत्व कहा है। शब्द तथा अर्थ की वक्ता उनका लोकोत्तर रूप से काव्य मे विन्यास ही है। वस्तुतः लोचनकार की ‘विभाव्यते’ की व्याख्या से तो यह भी अर्थ निकलता है कि वक्रोक्ति-अतिशयोक्ति मे ही, अलङ्कार-वस्तु-रस तीनों समाहित है।

लोचन मे व्याख्या है—‘अर्थः... विचित्रतया भाव्यते । तथा प्रमोदचयानादिः विभावतां नीयते । विशेषेण च भाव्यते रसमीयते, इति ।’ (लो०, पृ० ५००)। अर्थ विचित्रतथा प्रतीत होता है, प्रमोद-उद्यान आदि विभावना को प्राप्त कराये जाते है, विशेष रूप से अर्थ भावित होता है, रसमय किया जाता है। यहाँ ‘वैचित्र्य’ पद अलङ्कार का, विभाव पद वस्तु का, रसमय तो रस का स्पष्ट बोधक है ही। हम कह सकते है भामह की वक्रोक्ति मे समपूर्ण ध्वनिवर्ग समाहित है। भले ही भामह ने इसे ध्वनिकार की चौली मे प्रस्तुत नही किया हो। और इसी आधार पर आचार्य कुन्तक द्वारा खड़ा किया वक्रोक्ति-सिद्धान्त का भव्य प्रसाद अभिनव समर्थित है, यह भी माना जा सकता है। भामह ने वक्रोक्ति की महत्ता काव्यालङ्कार १।३०, ३६ तथा ५।६६ मे भी प्रतिपादित की है।

वकता के अभाव मे उन्होंने हेतु, सूक्ष्म तथा लेश जैसे अलङ्कारो को अमान्य सिद्ध कर दिया। वक्रोक्ति-विहीन काव्य उनकी दृष्टि मे वातां मात्र ही होता है। ‘सूर्य अस्त हो रहा है’, ‘चन्द्र उदित हो रहा है’, ‘पक्षिणगण नीड़ की ओर जा रहे है’ इत्यादि स्वभाव

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‘उक्तियो मे कोई वैचिच्य नहीं' वक्रोक्ति नही है, अलङ्कारता इनमे नही आ सकती । ये कथन मात्र है; वाणी मात्र है । अतएव वक्रता के अभाव मे स्वभावोक्ति अलङ्कार नही हो सकता । इस प्रकार भामह की वक्रोक्ति जो अतिशयोक्ति अलङ्कार भी है, न केवल वह अलङ्कार है, प्रत्युत् अलङ्कार का सामान्य जीवातु विलक्षणता का अपर पर्याय है ! और क्योकि भामह की दृष्टि मे रस-वस्तु आदि सभी अलङ्कार है, अतः यह अतिशयोक्ति रस-वस्तु-अलङ्कार तीनो को समाहित करती है ।

आगे चलकर देखिये तो वक्रोक्ति की सीमा के कुछ सीमितन से कर दिया ।

भामहोक्तिप्रिथ स्वभावोक्तिं को दण्डी ने न केवल अलङ्कार की मान्यता प्रदान की प्रत्युत् उसे प्रधान अलङ्कार ‘आचार्यलङ्कृति' मान लिया । क्योकि वह जाति, द्रव्य, गुण, क्रिया-रूप नाना पदार्थों के रूपो को साक्षात् प्रकट करती है ।

नानावस्थं पदार्थानां रूपं साक्षाद्दृणवती । स्वभावोक्तिश्च वक्रोक्तिश्चाद्यालङ्कृतिरित्यथा ॥ ( काव्यादर्श, २१८ )

यही नही उनके अनुसार शास्त्रो मे इसी का साम्राज्य है, और काव्यो मे भी इसी की योजना अपेक्षित है—‘शास्त्रे स्वस्यैव साम्राज्यं काव्ये स्वंयेतदीप्सितम् ।’ इस प्रकार स्वभाव या जाती कथन से भिन्न इतर अलङ्कारो को दण्डी ने वक्रोक्ति के अन्तर्गत रखा है । उन्होने समस्त वाड्मय को ही स्वभावोक्ति तथा वक्रोक्ति दो भागो मे बाँट दिया है—

किन्तु इलेष प्रायः सर्वासु पुण्णाति प्रायो वक्रोक्तिम् ।

मिथं हि द्विधा स्वभावोक्तिः वक्रोक्तिरेव च वाड्मयम् ॥ (काव्यादर्श, २।२६२)

किन्तु इलेष प्रायः सभी अलङ्कारो मे शोभा की सम्पुष्टि भरता है । इस प्रकार दण्डी की दृष्टि मे वक्रोक्तिमूलक अलङ्कारों मे इलेष की प्रधानता रहती है । ‘हृदयंगमा’ टीका के अनुसार दण्डी के वक्रोक्ति से इलेषसकीर्ण उपमादि अलङ्कारों का बोध होता है—‘वक्रोक्तिशब्देन उपमादयः सक्रीणपर्यन्ता अलङ्कारान् उच्चयन्ते ।’ और अतिशयोक्ति के विवेचन मे उन्होने अतिशयोक्ति को ही अन्य अलङ्कारो का मूल भी स्वीकार किया है—

‘अलङ्कारान्तराणामप्येकमादु परायणम् । लोकसीमातिवर्तिनाम्’ (वही २।२१४) अतिशयोक्ति के इस लक्षण को स्वीकार कर दण्डी ने लगभग अतिशयोक्ति का वही स्वरूप स्वीकार किया है जो भामह को अभिमत था । अतएव कहना पडेगा कि दण्डी वक्रोक्ति का स्वरूप, जो भामह सम्मत था, मानते तो है पर उसके मूल मे इलेष को पोषक तत्व भी स्वीकार करते है और दूसरी ओर भामह अनभिप्सित स्वभाव कथन को वह काव्य मे उत्तम स्थान भी देते है । ध्यान देने योग्य है कि इलेष की अलङ्कारान्तर पोषकता के विषय मे उद्भट, इन्दुराज, मम्मट, रुय्यक आदि ने काफी विस्तार से विचार किया है । अत. प्राचीनो की दृष्टि मे इलेष की व्यापकता को काफी महत्व मिला है.

वामन ने ‘सादृस्यालङ्करण वक्रोक्ति:' कहकर अपने ग्रन्थ काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति मे वक्रोक्ति को एक अर्थालङ्कार-विशेष का स्थान प्रदान कर दिया । आपातत तो स्पष्ट

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ही है कि यहाँ वक्रोक्ति का वह अर्थ नहीं है जो सम्मट-दण्डी का अभीष्ट है । किन्तु सादृश्यात्मकलक्षणा वक्रोक्ति लक्षणामूल गूढ व्यङ्ग्य प्रधान ध्वनि का मूल अवश्य है । और विवेचन किया जाय तो सादृश्य और लक्षणा तथा वक्रोक्ति शब्दों की व्याख्या के आधार भामह-दण्डी की मान्यता को यहाँ भी खींच-तानकर रखा जा सकता है ।

वामन के वाद रुद्रट ने अपने ‘काव्यालङ्कार’ मे वक्रोक्ति को एक शब्दालङ्कार के रूप मे प्रतिष्ठित किया। निश्चय ही रुद्रट की वक्रोक्ति मे भामह-दण्डी की वक्रोक्ति का सामान्य धर्म विच्छित्ति तो है किन्तु वह एक अलङ्कार विशेष है जैसे कि भामह की वक्रोक्ति अलङ्कार ही नही, अलङ्कार वस्तु-रस सामान्य तत्व है । ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने जैसा कि पहले भी कहा गया है, वक्रोक्ति को सर्वालङ्कार सामान्य माना है—‘अति-रायोक्तिगर्भता सर्वालङ्कारेषु शक्यक्रिया1” कहकर उन्होंने भामह का समर्थन किया है । भामह के प्रसिद्ध लोचनकार का मत दिया जा चुका है । पुनश्च अभिनवगुप्त ने तो वक्रोक्ति को काव्य का जीवन भी स्वीकार किया है । उन्ही के शब्दों मे—

‘यतिरायोक्तिलक्षितैः सर्वा वक्रोक्तिरलङ्कारः1…‘अथ सा जीवितस्वनेत्थं विवक्षिता ।’ ( लोचन, पृ० ४९८-५०९ )।

अतिरायोक्ति ही वक्रोक्ति है । वह काव्य का जीवन है । यही नहीं, अभिनव ने तो दण्डी के समान समस्त वाङ्मय को दो भेदों मे विभाजित कर दिया है—

‘काव्येऽपि च लोचनार्थंव्यधर्मिंस्थानीयेन स्वभावोक्तिवक्रोक्तिप्रकारदयेनालौकिक-प्रसन्नमधुरोजस्विशब्दसमार्यमाणविभावादियोगादियोगादिमेव रसवर्त्मा ।’ ( लो०पृ० १९७ )।

अर्थात् काव्य मे भी स्वभावोक्ति तथा वक्रोक्ति के माध्यम से ही रसनीयता का सन्धान होता है ।

अग्नि-पुराण मे ‘वाकोवाक्य’ नाम का एक अलङ्कार है, जिसके दो भेद है— ऋजु तथा वक्रोक्ति । यह वक्रोक्ति भी श्लेष तथा काकु से पैदा होती है । इस प्रकार इसके दो भेद है ।’ स्पष्टतः यह वक्रोक्ति रुद्रट-सम्मट के समान है । भोजराज ने वक्रोक्ति, रसोक्ति तथा स्वभावोक्ति भेद से वाड्मय को तीन प्रकारो मे विभक्त किया है । और इनमे रसोक्ति ही प्रधान है ।’ इस प्रकार वाड्मय को विभक्त करने की दण्डी की पद्धति को उन्होने और आगे बढाने का प्रयास किया और रसादि को भी विभाजन

१. ध्व० पृ० ४८-९९ । ध्वनिकार ने भामह की उक्त कारिका के प्रसङ्ग मे स्पष्ट किया है कि अतिशय योग से काव्य मे शोभातिशय आ जाता है, क्योकि वही अलकार सामान्य तत्व है । ध्वनिखण्डन मनोरथ नामक कवि के श्लोक मे, ‘यत्रिम्न्राक्ति न वस्तु वक्रोक्तिरन्या च यत्र’ इत्यादि ध्वन्याोलोके श्लोक के ‘वक्रोक्तिरूनीयर्य’ की व्याख्या मे लोचनकार का कथन है, ‘वक्रोक्तिरूनीयर्य शब्देन सर्वालङ्काराभाववश उत्कः ।’ कुन्तक की सुस्पष्टाद्वैतता का भेद तो ध्वनिमेद पर ही आश्रित है ।

२. द्र०, अग्निपुराण।

३. वक्रोक्तिक्ष्व रसोक्तिक्ष्व स्वभावोक्तिक्ष्व वाड्मयम् । मतोऽस्माभिः तत्र रसोक्तिः प्रतिजानते ॥

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वक्रोक्तिजीवितम्

का एक आधार मान लिया । 'शृङ्गार-प्रकाश' मे 'सर्वालङ्कारजातयो वक्रोक्त्यभिधान-वाच्‍या भवन्ति-' समग्र अलङ्कारजाति वक्रोक्ति शब्दवाच्‍या होती है, कडकर उन्होंने आगे कहा — 'वक्‍त्रत्‍मेव काव्याना पराभूति भामहः'१ इससे स्पष्ट है कि भामह-रాజ भी वक्रोक्ति के विपय मे भामह की मान्यता का स्वीकार करते है, किन्तु आगे वही वह यह भी कहते है— 'त्रिविधः सखु अलङ्कारवर्गः वक्रोक्तिः,' स्वभावोक्ति, रसोत्किरिति । तत्रोपमाचित्रदारपाधान्ये वक्रोक्तिः, सौपि रसप्राधान्ये स्वभावोक्तिः, विभावानुभाव-व्यभिचारिसयोगाच्च रसनिष्पत्तौ रसोत्किरिति ।' स्पष्ट है कि भामह-राज का यह काव्य-विभाग, अलङ्कार, गुण तथा रस के आधार पर है । अतः उनकी दृष्टि मे भी भामह-दण्डी सम्मत वक्रोक्ति का स्थान अकुण्ठ बना रहा । इसके वावजूद उन्होंने 'वाकोवाक्य' नामक एक शब्दालङ्कार भी माना है । जिसके छः भेदो मे वक्रोक्ति-स्वभावोक्ति अलङ्कारो को अन्तर्भूत किया जा सकता है । किन्तु यहॉ इन्हें अलङ्कार विशेषोप मात्र ही कहा जा सकता है, काव्य-विभाजन का आधार नही । वाकोवाक्य के छः भेद क्रमशः— ऋजु-वक्‍ता, वैचित्र्योक्ति, रूढोक्ति, प्रहेलिकोक्ति तथा चित्रोक्ति है । इनमे ऋजु-वक्‍ता तथा वक्रोक्ति अलङ्कार है?

वक्रोक्ति की इतिहास-परम्परा मे वक्रोक्तिकार कुन्तक को अभी छोडा जा रहा है । उनके सिद्धान्त का प्रतिपादन आगे होगा । परवर्ती काव्याचार्यो पर एक सक्षिप्त दृष्टि डाल देना चाहिए । आचार्य मम्मट ने भी 'काव्य प्रौढ वक्रोक्तिः' इत्यादि भामह के कथन का सम्यक् आदर किया है तथा रुडट के समान उन्होंने भी वक्रोक्ति को एक शब्दालङ्कार मात्र माना है । परवर्ती विश्वनाथ, जयदेव प्रभृति अलङ्कार के आचार्य प्रायः मम्मट की रीति पर ही चलते है ।२ रुद्रक, अमृतानन्द योगी तथा शोभाकर आदि इसे अन्यालङ्कार मानते है ।३ रुद्रक ने 'अपने 'अलङ्कारसर्वस्व' की भूमिका मे कुन्तक के वक्रोक्ति-सिद्धान्त का सम्यक् प्रतिपादन किया है । पहले भी कहा जा चुका है कि महिमभट्ट तथा दर्पणकार ने वक्रोक्ति को काव्य की आत्मा मानने के सिद्धान्त का खण्डन किया है । इस प्रकार भामह-दण्डी द्वारा प्रतिपादित वक्रोक्ति के स्वरूप पर विचार करे तो साफ है कि संस्कृत अलङ्कारशास्त्र मे 'सैपा सर्वव वक्रोक्तिः' के अमर वोप का किसी ने प्रतिवाद नही किया । यह अवश्य कहा कि उसे शल्डार कहना, जैसा कि भामह आदि प्राचीन अलङ्कारशास्त्री कहते थे, किसी को मान्य न हुआ । वह वक्रोक्ति को काव्य के सामान्य शोभाधायक तत्व के रूप मे प्रतिष्ठित हो गयी न कि भाम्री वक्रोक्ति के

१. दृ०, सरस्वतीकण्ठाभरण, २।१६-१३२ ।

२. रुडट के वक्रोक्तिलक्षण, काव्यालङ्कार-२।१४ तथा २।१६ के इलेष-काकुवक्रोक्ति के आधार पर मम्मट ने अपना लक्षण किया— 'यदुक्तमन्यथा वाच्या मन्यथैन योच्यते । इलेषेण काक्वा वा शेया सा वक्रोक्तिस्तथा द्विधा ॥' काव्यप्रकाश, ९।७७ । दृ०, काव्यानुशासन ५१८, अलङ्कार-सर्वस्व, पृ० २९; साहित्य-दर्पण २१९३; चन्द्रालोक, ५।१६२; साहित्यदर्पण १०।११, अलङ्कारशेखर, पृ० २८८; प्रतापरुद्रयशोभूषण, पृ० ४७; काव्यानु०, पृ० ४९, वाग्भटालङ्कार ४।१४;

३. अल० सत्र ७७, तथा शोभाकर आदि के विवेचन ।

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सर्वालङ्कार सामान्य । यहाँ कुछ विद्वान् आपत्ति कर सकते है कि सर्वालङ्कार सामान्य को यहाँ काव्य का सामान्य धर्म कैसे कहा जा रहा है ? वस्तुतः भामह का अभिमत, वक्रोक्ति, लोचनकार तथा कुन्तक का समर्थन-विवेचन इसी की पुष्टि करता है । और अलङ्कार के रूप मे वक्रोक्ति का वही स्वरूप जो भामह को अभीष्ट था, बाद मे सुरक्षित न रह सका । अलङ्कार के रूप मे यह शब्द जो अर्थ का कलान्तर मे अलङ्कार मान बनकर रह गयी ।

वक्रोक्ति जीवित के प्रथम उन्मेष का प्रतिपाद्य :—वक्रोक्तिजीवित कारिका तथा वृत्ति मे लिखा गया है । दोनो का लेखक एक ही व्यक्ति है; वह है आचार्य कुन्तक । कारिका तथा वृत्ति को अलग-अलग अभिधान देने का कोई औचित्य दृष्टिगत नही होता । अतः विद्वानो के इस विवाद को विना स्पष्टी किये ही यह कहना अधिक संगत होगा कि, कारिका तथा वृत्ति पूरे को मिलाकर कुन्तक के ग्रन्थ का नाम है वक्रोक्तिजीवित । पूर्व की पक्तियो मे ग्रन्थ के पाँच उन्मेष मे होने की भी चर्चा हुई है । किन्तु उपलब्ध ग्रन्थ, टूटी-फूटी जिस भी अवस्था मे है, चार उन्मेषो मे विभक्त किया गया है । प्रथम उन्मेष के प्रारम्भ मे कुन्तक ने कारिकाभाग के मङ्गल श्लोक से वाग्देवता की वन्दना की है । विवेच्य विषय है, काव्यालङ्कार अतएव तत्त्वोपादेक ग्रन्थ के प्रारम्भ मे उसके अधिदेवता की स्तुति उचित ही है । वृत्तिभाग के मङ्गल मे कुन्तक ने शक्तिपरिस्पन्द मात्र उपकरण शिव की वन्दना की है । करुणामयी होने के कारण कुन्तक पर भी प्रत्यक्षादर्शन का प्रभाव स्वाभाविक था । अतः परमशिव की वन्दना करते हुए, कुन्तक ने काव्य तथा काव्यशास्त्र मे प्रचलित स्वभाव कथन तथा प्रौढ, या वक्रोवर्णन की आलोचना करते हुए तथा स्वतन्त्र ध्वनिसिद्धान्त का अनादर किये बिना काव्य के तत्त्वभूत वक्रोक्ति के उन्मीलन-प्रयास प्रारम्भ किया है ।

(१) ग्रन्थ का नाम तथा प्रयोजन :—ग्रन्थ के प्रथम उन्मेष मे कुल ५८ कारिकाएँ है । द्वितीय कारिका तथा वृत्तिभाग से ग्रन्थकार ने अपने ग्रन्थ के नाम, अभिधेय तथा प्रयोजन को बताया है । तदनुसार इस ग्रन्थ के पूर्व भी अनेक काव्य के अलङ्कार ग्रन्थ लिखे जा चुके है, किन्तु इस प्रकार के वैचित्र्य सम्पादन का प्रयास कहा और नही किया गया है । अतएव यह रचना सोद्देश्य तथा सार्थक भी है । रही ग्रन्थ के नाम की बात । प्राचीन काव्यशास्त्री अलङ्कार को प्रधान मानते रहे है । उनके ग्रन्थो के नाम भी अलङ्कारपरक ही है । वस्तुतः तो यह है कि अलङ्कार शब्द का लोक मे ध्वीर-शोभातिशायकारी होने के कारण प्रघानतया कटक-केयूर आदि मे ही प्रयोग ठीक है । काव्य मे भी उपमा आदि अलङ्कार काव्यशरीर की शोभा के हेतु होते हैं, अतः उपचaratः उपमा-रूपक आदि अलङ्कारो मे भी अलङ्कार पद का प्रयोग होता है । गुणादि भी अलङ्कार स मान ही हैं । काव्यशोभाधायक । अतएव तत्त्वदर्शी होने के कारण गुण भी अलङ्कार कहे जाते है । और गुण-अलङ्कार आदि के विवेचक ग्रन्थो मे भी उसी प्रकार अलङ्कार पद का व्यवहार किया जाता है । अतः प्राचीनों की दृष्टि को

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वक्रोक्तिजीवितम्

ध्यान में रचकर की गयी पूर्व विवेचना के आधार पर मेरे इस ग्रन्थ का नाम है, काव्यालङ्कार भले ही वक्रोक्ति की काव्यप्राणता होने के कारण ग्रन्थ को वक्रोक्तिजीवित कहा गया हो। अलङ्कार शब्द से बोध्य इस ग्रन्थ का अभीष्ट है उपमादि अलङ्कार। वक्ता अलङ्काररूप ही है। अतएव सामान्यतया ग्रन्थ का प्रतिपाद्य उपमादि को मानने मे कोई कठिनाई नही है।

१. इस वक्रोक्तिजीवित ग्रन्थ के निर्माण का प्रयोजन लोकोत्तर-चमत्कारकारी वैचित्र्य की सिद्धि करना है। ग्रन्थ के कारिका तथा वृत्तिभाग के भिन्न-भिन्न नामो की विवाद चर्चा तथा समाधान, श्री काणे तथा अन्य टीकाकारो के ग्रन्थो मे द्रष्टव्य है।

२. वक्रोक्तिजीवित नामक ग्रन्थ के निर्माण का लोकोत्तर-चमत्कारकारी वैचित्र्यसम्पादनरूप प्रयोजन बताने के अतिरिक्त कुन्तक ने काव्य के अन्य प्रयोजनों का भी निर्देश किया है। ग्रन्थ के अनुसार धर्म, अर्थ, काम, मोक्षरूप पुरुषार्थचतुष्टय का उपदेश ही सर्गवन्ध निमित्त काव्य का प्रयोजन है। यद्यपि पुरुषार्थचतुष्टय का उपदेश शास्त्रो से भी सम्भव है किन्तु शास्त्र दुरवगाह तथा कठोर रीति से नियमो का सम्पादन करते है। अत कलेशभीरु, कोमलमति, राजकुमार आदि अभिजात वर्गों को शास्त्रो की अपेक्षा ऐसे साधनो की आवश्यकता होती है, जिससे वे अनायास तथा सुखपूर्वक कोमलरीति से धर्मादि की शिक्षा प्राप्त कर सके। काव्य स्वभावत: सरस तथा संयोगग्राह्य होता है। सुकुमार परम्परा से अभिहित काव्य सुकुमार पद्दति से धर्मादि का उपदेश देता है। जिससे कोमलमति भी लोग मुखपूर्वक उपदेश ग्रहण मे सक्षम हो जाते है। शास्त्र से पलायमान राजपुत्रादि उचित उपदेश के अभाव मे समस्त जगती के नियामक होने पर भी समस्त समुचित व्यवहार का उच्छेद कर सकते है। अतएव ऐसे लोगो को समुचित मर्यादा-नालन आदि के उपदेश के लिए कविप्राण काव्यो मे व्यतीत सच्चारित्रों का निवन्धन करते है। अतएव शास्त्र की अपेक्षा काव्य की उत्कृष्टता तो है ही— ‘तदेव शास्त्रातिरिक्त-प्ररूणमस्त्येव प्रयोजनं काव्यबन्धस्य’, कहा भी है—

धर्मादि साधनोपाय: सुकुमार कोमलमति: । काव्यबन्धोडनुभिज्जातानां हृदयाह्लादकारक: ॥ ३ ॥

३. काव्य के तृतीय प्रयोजन मे कुन्तक ने व्यवहार-ज्ञान को प्रस्तुत किया है। सत्काव्य के द्वारा सामाजिक को सम्प्राट आदि के सच्चरित्रो के माध्यम से अलौकिक औचित्यानुसारि लोकव्यवहार के क्रियाकलापो का अधिगम कराया जाता है। अन्य- शास्त्रो की अपेक्षा लोकव्यवहारादि का ज्ञान यहाँ आसान तरीके से निप्पन्न हो जाता है। अतएव काव्य उपयोगी होता है।

४. काव्य का अन्तिम प्रयोजन है सहृदय-हृदय मे रसानन्द की सृष्टि द्वारा चमत्कार का आधान करना। काव्यामृत का यह आनन्द चतुर्वर्गफल के आस्वाद से भी बढ़कर चमत्कृति का विस्तार करता है। शास्त्रोपदिष्ट चतुर्वर्गफलास्वाद काव्यामृत

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श्रीमद्राजानककुन्तकविरचितं

वक्रोक्तिजीवितम्

प्रथमोन्मेष:


जगत: चित्रतयैव चिच्चित्रचित्रकर्मविधायिनम् ।

शिवं शक्तिपरिस्पन्दमात्रोपकरणं नुमः ॥ १ ॥

प्रकृत ग्रन्थ 'वक्रोक्तिजीवितम्' आचार्य कुन्तक की अमर कृति है । ध्वन्यालोकार आनन्दवर्धन आदि की भाँति आचार्य कुन्तक ने भी इसे कारिका और वृत्तिरूप मे लिखा है । ग्रन्थ की निवृत्तितया समापti के लिये संस्कृत के ग्रन्थकारो मे मङ्गलाचरण करने की परम्परा है । इस आचार का परिपालन करते हुए , ग्रन्थकार आचार्य कुन्तक रचना के वृत्तिभाग का मङ्गलाचरण करते हुए अपने अभिमत देव महाशिव की वन्दना करते है—

शक्ति के परिस्पन्द मात्र उपकरण ( उपादान कारण ) वाले, तीनो लोको के वैचि-

त्र्यरूप चित्रकर्म के निर्माता शिव को हम नमस्कार करते है ।

आचार्य कुन्तक कश्मीरी एव आचार्य अभिनवगुप्त के समसामयिक थे । उस समय कश्मीर मे दौवारगाम का पूरा जोर था । अभिनवगुप्त की भाँति कुन्तक भी परमशैव प्रवीत होते है । अतः उनके द्वारा शिव की वन्दना उचित ही है । उस शिव की वन्दना जो शौङ्गगम मे नित्य, कूटस्थ एवं सच्चिदानन्द स्वरूप माना गया है । यह परिदृश्यमान सम्पूर्ण जगत् जिसका इच्छाशक्ति का परिस्पन्द मात्र है । यद्यपि उसकी अनेक शक्तियो का उल्लेख है किन्तु प्रधान शक्तियाँ पॉच ही है—चिति, आनन्द, इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया । शिव और शक्ति मे अभेद सम्बन्ध है । शक्ति उस परमशिव का उपादान कारण है जिससे वह इस जगत्-चित्र का निर्माण करता है । आचार्य अभिनवगुप्त ने भी 'ध्वन्यालोक' के तृतीय उद्योत की टीका 'लोचन' के प्रारम्भ मे स्पष्टरूप से कहा है कि उस महाशिव को शक्ति के अतिरिक्त किसी और उपकरण की अपेक्षा नही होती—

क्रियपञ्चकनिवर्हायोगेडपि परमेश्वर: ।

नान्योपकरणापेक्षो यत: ता नौमि शाङ्करीम् ॥

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निरुपादानसभारमभित्तावेव तन्वते ।

जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलालालव्याय शूलिने ॥

यदुन्मीलनशक्त्यैव विश्वमूर्मीलति क्षणात् ।

स्वात्मायतनविश्रान्ता तां वन्दे प्रतिभा शिवाम् ॥

स्कुटीकृतार्थैवचित्र्यवहिःप्रसरदायिनीम् ।

तुयोर् शक्तिमहं वन्दे प्रत्यक्षार्थानदर्शिनीम् ॥

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यथातत्त्वं विवेच्यन्ते भावास्त्रैलोक्यवर्तिनः ।

यदि तन्नाद्भुतं नाम दैवरक्ता हि किङ्कुका: ॥ २ ॥

स्वमनोऽधिकयैवाथ तत्त्वं तेषां यथारुचि ।

स्थाप्यते प्रौढिमात्रं तत्परार्थो न तादृशः ॥ ३ ॥

इसके चिपरीत स्वभाव-वर्णन-सूर्य अस्त हो गया, चन्द्रमा शुशोभित हो रहा है, पक्षिगण निवास स्थानों को जा रहे हैं आदि कथन कोई काव्य है, ऐसा वह नहीं मानते—

'गतोऽस्तसमर्क: भातीनदुर्यांति वासाय पक्षिण: ।

इत्येवमादि कि काव्य वार्तामेना प्रचक्षते ॥'

किन्तु दण्डी ऐसे काव्य को साधु ही नहीं मानते प्रत्युत वे स्वभावोक्ति को तो वाड्मय का एक भेद भी मानते हैं—

इटेप: सर्वासु पुण्णाति प्रायो वक्रोक्तिरुचिरम् ।

भिन्ना दृशा स्वभावोक्तिः वक्रोक्तिश्चेति वाड्मयम् ॥ (काव्यादर्श)

काव्य-रचना के क्षेत्र मे महाकवि वाण ने जातिवादी कवियों को निरर्थक जीवन बताया है—

मत्ति रेवान इवामलस्या जातिभाजो रहेश्रहे ।

उत्पादका न बहवः कवयः शरभा इव ॥ ( हर्षचरित )

और स्वयं वक्रोक्तिकार कुन्तक स्वभाव को काव्य मे अलङ्कार्य मानते है । इसी-

लिए वह आगे की कारिका मे स्वभावोक्ति का सीधे खण्डन तो नहीं करते जैसा कि कतिपय व्याख्याकार मानते है किन्तु यदि वह वस्तु का यथावत् ही वर्णन हो तो

उसका वह प्रकारान्तर से समर्थन करते हुए कहते है—यथा तत्त्वमित्यादि ।

'त्रैलोक्य मे वर्तमान पदार्थों का उनके स्वरूप का बिना परित्याग किये यथार्थ वर्णन किया जाता है और यदि वह अद्भुत नहीं होता तो कोई बात नही क्योंकि वह

तो स्वभावत: सुन्दर होता ही है । दैवरक्त किङ्कुक को किसी अन्य वर्ण की क्या आवश्यकता? जो स्वयं रक्त है, सुन्दर है उसे वाह्य उपादान की कोई आवश्यकता नही

होती । अतः वस्तु का स्वभाव-वर्णन भी ग्राह्य है, उपादेय है । स्वभाव स्वयं ही अलङ्कार्य होता है । उसमे चमत्कृति या वैचित्र्य आवश्यक नहीँ ॥२॥ और आगे के

श्लोक से वह कहते है—

'कि यदि अपनी रुचि के अनुसार स्वतन्त्र रूप से उन पदार्थों के स्वरूप को

( कविगण ) अपनी बुद्धि-विलास मात्र से प्रस्तुत करते है, प्रतिबिम्बमण्डित करते है,

अतिशयोक्तिमय ढंग से प्रस्तुत करते है, तो वह वर्णन प्रौढिमात्र होगा क्योंकि

वस्तुत. वह वस्तु उस प्रकार की नही होती । वस्तु मे कविकल्पना का प्राचुर्य उसकी

यथार्थता को समाप्त कर देता है । अतः रचना का स्वाच्छन्द्य भी बहुत ग्राह्य नही

होता' ॥३॥

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इत्यसत्कविसन्दर्भे स्वतन्त्रेऽप्यधुनादरः ।

साहित्यार्थसुभासिन्धोः सारसुन्दरीय-यम् ॥ ४ ॥

येन द्वितयमध्येत तत्स्वनिर्मितिलक्षणम् ।

तद्धिदामृता मोदचमत्कारं विधास्यति ॥ ५ ॥

ग्रन्थारम्भेऽभिमतदेवतांनमस्कारकरणं समाचारः । तस्माद्देव तावदुपक्रमते—

कवीनां वक्रोक्तिमनुलास्यमाननर्तकं देवं

देवों वन्दे, देवतां स्तौमि । कामित्याह—कवीनद्रवक्रोक्तेर्नुलास्यमान्दिर-

नर्तकीम् । कवीनद्राः कविप्रवरास्तेऽपां वक्रोक्तेर्नुसुरचन्द्रः स एव लास्यमन्दिरं

नाट्यवेश्म, तत्र नर्तक्री लासिकाम् । किविशिष्टम्—सूक्तिपरिस्पन्दसुन्दरा-

भिनयोज्ज्वलाम् । सूक्तिपरिस्पन्दः सुभाषितविलसितानि तान्येव सुन्दराभिनया: सुकुमाराः सात्त्विकादयरसैरुज्ज्वलाम् आाजमानाम् । या किल

'इस प्रकार स्वतन्त्र भी अयथार्थ तर्क सन्दर्भ ( वस्तु ) रचना के प्रति भी आदर न रखते हुए मैं ( आचार्य कुन्तक ) साहित्यतत्व् रूप अमृत-सिन्धु के सार ( यथार्थ रूप ) का उद्घाटन कर रहा हूँ, निर्माण कर रहा हूँ ॥४॥

'जिससे ( काव्य ) तत्व और ( काव्य ) निर्मिति ये दोनो ही काव्यविदों के अद्भुत आनन्द एवं चमत्कार का निर्माण करेंगे ॥५॥ अर्थात् मेरी इस कृति से काव्य

तत्वो का यथारूप तो प्रस्तुत होगा ही, काव्य का ठीक-ठीक निर्माण करने में भी

सह्हायता उपलब्ध हो सकेगी ।'

इस प्रकार आचार्य कुन्तक ने अपने वृत्तिभाग का मङ्गलाचरण प्रस्तुत किया ।

अब आगे कारिका भाग के मङ्गल की अवतारणा करते हुए कहते हैं—ग्रन्थारम्भ

'ग्रन्थ के प्रारम्भ मे अपने अभिमत देवता को नमस्कार करना ( विद्वानों मे ) सम्यक् आचार है । इसलिए प्रथम उसी को प्रस्तुत करते है--

'महाकवियों के मुखचन्द्रद्रूप लास्यभवन मे नर्तन करनेवाली, सुभापित

विलासरूप सुन्दर अभिनय से प्रकाशमान वागदेवता को मैं ( आचार्य कुण्तक ) प्रणाम करता हूँ' ॥ ९ ॥

उक्त मङ्गलाचरण का वृत्तिभाग स्वयं लिखते हुए कुन्तक कहते हैं—देवोंम् आदि ।

देवी की वन्दना, देवता की स्तुति करता हूँ । किस देवता की ? उत्तर देते हैं । श्रेष्ठ

कवियों की मुखचन्द्ररूप नृत्यभवन की नर्तकी । कवीनद्र, प्रमुख कविवर्ग, उनके

वक्रोक्तेन्दु मुखचन्द्र वे ही लास्यमन्दिरं, नृत्यभवन है, वहों नर्तन करनेवाली । वह किस

विरोषण से युक्त है ? सूक्तिपरिस्पन्द से सुन्दर अभिनय से उज्ज्वल । सूक्तिपरिस्पन्द,

जो सुभापित विलास है, वे ही सुन्दर अभिनय हैं—सुकुमार सात्त्विक आदि भाव हैं,

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प्रथमोऽम्शेपः

सत्कवि वक्त्रे लास्यवेदसमनृत्येव नर्तकी साविलासाभिनयाविशिष्टा नृत्यन्ती विराजते, तां वन्दे नो स्फिति वाक्यार्थे । तदिदमत्र तात्पर्यम् । यत्किल प्रस्तुतं वस्तु किमपि काव्यालङ्कारकरणं तद्विधिदैवतभूतामेव विधरामणीयकहृदयहारिणीं वाग्भूयं सरस्वतीं स्तौमि ।

एवं नमस्कृत्येदानीं वक्तव्य वस्तु विषयभूतान्वभिधानाभियेयप्रयोजन-न्यासूत्रयति ।

वाचो विषय नै यलस्मुल्पादयितुमुच्यते । आदिवाक्येऽभिधानादि निमित्तेमो अनूच्चवत ॥ ६ ॥

इत्यनतरश्लोकः ।

लोकोतररचमत्कारकारिवच चित्रयसिद्धये । काव्यस्यायमलङ्कारः कोऽपि पूर्वो विधीयते ॥ २ ॥

उनसे उज्जवल अर्थात् शोभायमान दीप्यमान ( देवरता की वन्दना करता हूँ ) जो ( वागदेवता ) नृत्यशाला मे हाव-भावादि विलास सहित अभिनय-विशिष्ट नृत्य करती हुई नर्तकी के समान सत्कवियों के मुख मे ( सत्कवि कर्मे आदि-विशिष्ट अभिनय से स्फुरित होती हुई ) विशेष रूप से शोभायमान होती है, उस ( वागदेवी ) को नमस्कार करता हूँ । यह इसका वाक्यार्थ है । यहाँ यह तात्पर्य है कि, जो यह लोकोत्तर काव्यालङ्कारकरण रूप प्रस्तुत वस्तु है, उसकी अधिष्ठात्री देवी इस प्रकार की रमणीयता से हृदय को हरण करनेवाली वागरूप सरस्वती देवी की स्तुति करता हूँ ।

जयतक प्रतिपाद्य विपय के नाम-प्रयोजन आदि का विवेचन न कर दिया जाय उसमे किसी की प्रृत्ति सहज नही हो पाती । अतएव प्रारम्भ मे वागदेवता की स्तुति कर अनुवन्धचतुष्ट्य के प्रयोजन की आवश्यक्ता बताते हुए आगे की दूसरी कारिका मे अनुवन्धचतुष्ट्य का विवेचन किया गया है । उसी का उपक्रम किया जा रहा है ।

एवमोचते । 'इस प्रकार ( वागदेवता को ) नमस्कार कर इस समय आगे कहे जानेवाले वस्तु के विपयभूत नाम, विपय और प्रयोजन आदि को निश्चित करते है । 'भवन आदि निर्माण के प्रारम्भ मे विपय ( लम्बाई, चौडाई आदि ) को नियतता निर्धारण करने के लिए मानक सत्र की भाति ( किसी भी ) रचना के वाणी के विपय की नियतता को पैदा करने के लिए रचना के प्रारभिक वाक्य मे ही अभिधानादि ( अनुवन्धचतुष्ट्य ) कह दिये जाते है ।

यह अनतरश्लोक है ।

कुन्तक ने कारिका के अतिरिक्त अपने वृत्तिभाग मे बीच-बीच मे स्वरचित श्लोको का उपनिबन्धन किया है । जिन्हे उन्होने अन्तरश्लोक का नाम दिया है ।

लोकोत्तर चमत्कार को पैदा करनेवाले वाच्य के वाच्यार्थ की सिद्धि के लिये यह कोई अपूर्व ही काव्य का अलङ्कार ( ग्रन्थ ) किया जा रहा है ॥ २ ॥

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

अलङ्कारो विधीयते अलङ्करणं क्रियते। कस्य, काव्यस्य । कवे: कर्म काव्यम्, तस्य । न च सन्ति चिरन्तनास्तदलङ्कारास्तत्किमर्थमित्याह—पूर्व:, तद् यतिरिक्कार्थाभिधायी । तदपूर्वत्वं तदुक्तग्रन्थस् निकृष्टस् च द्वयोरपि संभवरतीत्याह—कोटि, अलौकिक: सातिशय: । सोऽपि किमर्थमित्याह—लोकोत्तरचमत्कारकारिवैचित्र्यसिद्धये असामान्याहादविधायिविचित्रभावसम्पत्तये । यथापि सन्ति शास्त्र: काव्यालङ्कारग्रन्थस्थापि न कुतश्चिदप्येवविधवैचित्र्यसिद्धि: ।

अलङ्कारशब्द: शरीरस्य शोभातिशयकारित्वान्मुख्यतया कटकादिपु वर्तते, तर्कारित्वसामान्यादुपचारादुपमादिपु, तद्-देव च तत्सदृशेषु गुणादिषु,

‘अलङ्कार का विधान किया जा रहा है अथांत अलङ्करण किया जा रहा है । किसका ( अलङ्करण )? काव्य का । कवि का कर्म ही काव्य है, उसका ( अलङ्करण किया जा रहा है ) । ( प्रश्न हो सकता है कि ), जब प्राचीन अलङ्कार ( ग्रन्थ ) है ही तो किसलिए ( इस नये ग्रन्थ की रचना की जा रही है )? उत्तर है—पूर्व:, उन ( प्राचीन ग्रन्थों ) से व्यतिरिक्त अर्थ वा विवेचन करनेवाले ( ग्रन्थ की रचना की जा रही है ) । ( कहा जा सकता है कि ), उन ( प्राचीन ग्रन्थ्यो से ) अपूर्वता तो उनसे उत्कृष्ट एवं उनसे निकृष्ट दोनो ही प्रकार की रचनाओं में हो सकती है ? इस पर कहते है—कोई ही, अलौकिक, अतिशय युक्त ( ग्रन्थ ) । वह ( अपूर्व अलङ्कार ग्रन्थ ) भी किसलिए ( लिखा जा रहा है )? उत्तर है—लोकोत्तर चमत्कार-कारी वैचित्र्य की सिद्धि के लिए, असामान्य ( विशेष प्रकार के ) आह्लाद के विधायक विचित्रभाव की निष्पत्ति के लिए ( अपूर्व अलङ्कार कृति लिखी जा रही है ) । ( तात्पर्य यह है कि ), यद्यपि सैकडो काव्यालङ्कार ग्रन्थ है किन्तु फिर भी कहीं भी इस प्रकार के वैचित्र्य की सिद्धि नही पायी जाती ।

शरीर की शोभा मे आधिक्य पैदा करने के कारण अलङ्कार शब्द प्रधानतया वलय आदि ( लौकिक ) आभूपणो मे प्रयुक्त होता है । ( और काव्य-शरीर की शोभा मे अतिशयत्व व्यापादन रूप समानता के कारण ( अलङ्कार शब्द ) उपमा आदि अलङ्कारो मे भी प्रयुक्त होता है । और उसी प्रकार तत्सदृश ( काव्य शोभाकरान् धर्मान् लझारान् प्रचक्षते—आदि दण्डी प्रसृतित प्राचीन आलङ्कारिको की दृष्टि से सभी काव्यशोभाकर धर्म अलङ्कार कहे जाते है, चाहे वे गुण हो, रीति हो या अलङ्कार आदि ) ( अलङ्कार के समान शोभाधायक तत्त्व होने के कारण ) गुण आदि ( रीति आदि ) मे भी अलङ्कार शब्द का प्रयोग होता है । योगक्षेम समान होने के कारण शब्द और अर्थ दोनो का ( किसी भी वस्तु मे ) ऐक्य रूप से ( अभेद सम्बन्ध से ) व्यवहार होता है । जैसे—गौ: यह शब्द है और उसका अर्थ गौ: यह भी है । अर्थात दोनो के लिए गो शब्द का प्रयोग होता है । ( ग्रन्थकार का यहाँ तात्पर्य है कि जिस वस्तु के लिए शब्द का व्यवहार होता है उसी शब्द का व्यवहार उसके अर्थ एवं

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तथैव च तदभिधायिनि ग्रन्थे । शब्दार्थयोरेकयोगक्षेमत्वादैक्येन व्यवहारः । यथा गौरिति शब्दः गौरित्यर्थे इति ।

तदयमर्थः । ग्रन्थस्यास्य अलङ्कार इत्यभिधानम्, उपमादि प्रमेय जातं-भिधेयम्, उत्कर्षवैचित्र्यसिद्धिः प्रयोजनमिति ॥ २ ॥

एवमालङ्कारस्य प्रयोजनमस्तीति स्थापितेऽपि तदलङ्कारस्य काव्यस्य प्रयोजनं विना सदैवपदार्थकमित्याह--

धर्मादिसाधनोपायः सुकुमारक्रमोदितः । काव्यबन्धोडभिजातानां हृदयाह्लादकारकः ॥ ३ ॥

हृदयाह्लादकारकश्वितानां-जनकः काव्यबन्धः, सर्गबन्धादिरभिवर्त्तित सम्बन्धः । कस्येत्याकाङ्क्षायासाम्-अभिजातानाम् । अभिजाताः खलु राजपुत्रादयो धर्माद्युपेयार्थिनो विजिगीषु:, कलेवरवच, सुकुमाराशयत्वा-

तत्त्वप्रतिपादक रचना आदि मे भी होता है । जैसे अलङ्कार शब्द प्रधानत: कटकादि मे व्यवहृत होता है, तत्तकारित्व सामान्य से गौणतया उपमान अलङ्कार एवं तत्समान गुणो मे भी व्यवहार होता है और अन्ततः उनके प्रतिपादक ग्रन्थो को भी अलङ्कार ही कहते है ।

'इस प्रकार पूरे का आशय यह है कि इस ग्रन्थ का अलङ्कार यह नाम है, उपमा आदि साध्य विषय इसके प्रतिपाद्य है और पूर्वोक्त प्रकार से वैचित्र्य-सिद्धि ही इसका प्रयोजन है' ॥ २ ॥

'इस प्रकार अलङ्कार का (लोकोत्तर चमत्कारकारी वैचित्र्य की सिद्धि) प्रयोजन है, यह स्थापित हो जाने पर भी, उसके अलङ्कार्य काव्य के प्रयोजन बिना रहने पर भी वह (अलङ्कार) व्यर्थ है । इसलिए (काव्य प्रयोजन ही) कहते है--

'सुकुमार परम्परा से कहा गया काव्यबन्ध धर्म आदि (अर्थ, काम एवं मोक्ष) की सिद्धि का साधन, तथा अभिजात लोगों के हृदयो में आनन्द की सृष्टि करता है' ॥ ३ ॥

कारिका की व्याख्या करते है—हृदयादि से । हृदयाह्लादकारक, तात्पर्य, चित्त मे आनन्द पैदा करनेवाला, काव्यबन्ध अर्थात् सर्गबन्ध आदि रूपो मे निबद्ध महाकाव्य होता है । काव्यबन्ध का यहाँ भवति क्रिया से सम्बन्ध है । (ध्यान देने की बात है कि महाकाव्य का लक्षण न करते हुए भी कुन्तक ने यहाँ महाकाव्य के लक्षण की ओर संकेत कर दिया है ।) किसका (हृदयाह्लादकारक होता है) ? इस आकाङ्क्षा मे कहते है—अभिजातों का । अभिजात राजपुत्र आदि लोग होते है जो धर्म आदि (अर्थ, काम, मोक्ष) प्राप्त करने के योग्य, विजिगीषु एवं कष्ट से डरने-

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

तेपाम् । तथा सत्यपि तदाह्लादकत्वे काव्यबन्धस्य क्रीडनकादिप्रसृत्या प्राप्त्योत्पादनं---धर्मादि साधनोपायः । धर्मादौ पेयभूतस्य चतुर्वर्गस्य साधने संपाद्यते तदुपदेशरूपत्वादुपायसत्यास्वादनिमित्तम् ।

तथापि तथाविधपुरुषार्थोपदेशपरैरपरैरपरिशास्त्रैः किंपरार्थमित्यभिधीयते---सुकुमारक्रमोदितः । सुकुमारः सुन्दरः सहृदयहृदयाहारी क्रमः परिपाटी-विन्यास-स्तेनोदितः । काव्यतस्तेन । अभिजातोऽभिजनोभिमानोद्भवत्वात् सति प्रवर्तकत्वेऽप्यध्यवसाये धर्मादिप्राप्त्युपायत्वात् प्रतिपाद्यते । शास्त्रेषु पुनः कठोरक्रमाभिहितत्वान् धर्मादुपदेशो दुर्वगाहः । तथाविधये विषये विद्यमानोऽप्यनेकचित्कर एव ।

मे तदाह्लादकत्व ( अभिजातो का चित्तानन्द जनकत्व ) होने पर भी ( यदि उसका और कोई प्रयोजन नहीं है तो जैसे खिलौने आदि भी आनन्दजनक होते है वैैसे ही ) काव्यबन्ध की क्रीडनक ( खिलौने ) आदि से समानता ही सिद्ध होती है । उसका प्रतिवाद करते है——( काव्यबन्ध ) धर्म आदि साधन का उपाय है । अर्थात् प्राप्त करने योग्य वस्तु धर्म आदि चतुर्वर्ग की सिद्धि मे, संपादन में, धर्मादि का उपदेश-रूप होने के कारण ( काव्यबन्ध उपाय है, उसकी ( धर्मादि की ) प्राप्ति का कारण है ।

( काव्यबन्ध धर्मादि साधनोपाय होता है ) तो भी उस प्रकार के पुरुषार्थ ( चतुर्थ्य रूप ) उपदेशपरक अन्य ( श्रुति, स्मृति आदि ) शास्त्रों से क्या अपराध हो गया है ( यदि उनके रहते भी पुरुपार्थ का उपदेश देने के लिए काव्यबन्ध को ही साधन बनाया जा रहा है ), इस पर कहते है——( क्योकि ) सुकुमार परम्परा से कहा गया ( काव्यबन्ध धर्म आदि साधनो का उपाय होता है ) । सुकुमार-सुन्दर-सहृदय के हृदय का हरण करनेवाला, क्रम——परिपाटी-विन्यास, रचना, उससे कहा गया ( प्रतिपादित ) ही ( काव्यबन्ध धर्मादि का साधक होता है ) । अभिजातो का आह्लादक होने के कारण ( धर्मादि साधनो के प्रति ) उनका ( अभिजातो का ) प्रवर्तक होने से काव्यबन्ध धर्मादि की प्राप्ति की उपायता ( साधनता ) को प्राप्त हो जाता है । किन्तु शास्त्रो मे ( धर्मादि-प्राप्ति के उपाय ) कठोर परम्परा से कहे गये होते है, अतएव उनसे ( सुकुमार मति अभिजात को ) धर्म आदि का उपदेश कठिनता से बोधगम्य हो पाता है । इसलिए उस प्रकार के विपय मे ( कठोर परम्परा से प्रतिपादित शास्त्र आदि मे ) धर्मादि साधन का उपदेश ) विद्वान रहने पर भी ( सुकुमारमति अभिजातो के लिए तो वह, कुछ भी न करनेवाला ( व्यर्थ ) ही होता है ।

प्रद्न हो सकता है कि धर्मादि का उपदेश केवल अभिजात्त राजकुमारो के लिए ही क्यो हो ? सामान्य जन उसके भागी क्यो नही हो सकते ? इसका उत्तर आगे देते है——राजपुत्रा: आदि से ।

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प्रथमोऽपे: ]

राजपुत्रा: खलु समासादितविभवा: समस्तजगतीयव्यवस्थाकारितां प्रति-पद्यमानाः इलाच्योपायोपदेशैरूनीतया स्वतन्त्राः सन्तः समुचितसकलङ्यवहारोचितं प्रवर्त्तचितुं प्रभवन्तीयेतदर्थमेतदृश्युत्पत्तये व्यतितसच्चरित्र-राजचरितं तद्विदर्शनाय निवेशयन्ति कवयः । तदेवं शास्त्रातिरिक्तं प्रशस्यमस्त्येव प्रयोजनं काव्यबन्धस्य ॥ ३ ॥

मुख्यं पुरुषार्थसिद्धिलक्षणं प्रयोजनमास्तां तावत्, अन्यदपि लोकयात्रा-प्रवर्त्तनिमित्तं श्रुत्यसूत्रादिस्वान्यादित्समावर्जनमननेन विना सम्यङ् न संभवती-त्याह—

व्यवहारपरिस्पन्दसौन्दर्ये व्यवहारेऽभि: । सत्काव्याधिगमादेव नूतनौचित्यमाप्यते ॥ ८ ॥

'राजपुत्रो को यथासमय विभव आदि यी उपलब्ध हो जाती है । ऐश्वर्य-प्राप्त वे लोग ( शासक होने के कारण ) समग्र पृथ्वी की व्यवस्था करनेवाले नियमादि के व्यवस्थापक होते है और यद्यपि वे प्रभुसत्त उपयो हारादि द्वारा दिये गये ( धर्मादि के उपदेश से युक्त ) हो तो स्वच्छन्द होकर सभी उपयुक्त आचारो का विनाश प्रारम्म कराने में समर्र होते है, इसीलिए इस प्रयोजन के लिए ( कि वे स्वच्छन्द होकर समस्त उचित आचारो के उन्मूलन मे प्रवर्तित न हो ), इस प्रकार की व्युत्पत्ति के लिए, उन ( राजपुत्रो ) को दृश्यन्त प्रस्तुत करने के लिए कविगण द्विते हुए सदाचारयुक्त (रामचन्द्र आदि ) राजाओ के चरित्र को ( काव्य मे ) निश्रन्थित करते है । ( इस प्रकार जहाँ शास्त्र रक्ष भाग में धर्मादि की व्युत्पत्ति कराते है, वही काव्य राजचरित आदि के माध्यम से सुकुमार शैली से धर्मादि की व्युत्पत्ति कराते है ) । इस प्रकार वाव्य-रचना का प्रयोजन शास्त्र की अपेक्षा अधिक उत्तम गुणवान् होता ही है ॥ ३॥

(पुरुपार्थ की सिद्धि तो काव्य का मुख्य प्रयोजन है किन्तु यकतक लोक-व्यव-हार आदि का विधिवत् परिचय न हो पुरुपार्थ-सिद्धि असंभव ही है । अतः प्रधान प्रयोजन का निरूपण कर अन्यकार अगिम कारिका मे गौण प्रयोजन का निरूपण करेंगे । तदर्थ उसकी अवतारणिका करते है—मुख्यमादि से । )

पुरुषार्थ ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) प्राप्तिलुप प्रधान प्रयोजन तो है ही, वह रहे-किन्तु अन्य भी प्रयोजन, लोक-व्यवहार की प्रवृत्ति के कारणस्वरूप, सेवक, मित्र, स्वामी आदि की परस्पर प्रीति आदि भी काव्य के बिना ठीक-ठीक नही हो पाते । अतः कहने है—

'व्यवहार करने में प्रमुख लोग सत्काव्य के अधिगम ( अवबोध ) से नूतन औचित्य समन्वित ( लोकादि ) व्यवहार प्रयोग सौन्दर्य की प्रासि करते है ॥ ८॥

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व्यवहारो लोकवृतं, तस्य परिस्पन्दो व्यापारः क्रियाक्रमलक्षणः तस्य सौन्दर्यं रमणीयकं तद्, व्यवहाराभिः—व्यवहारैभिः, सत्काव्याधिगमादेव कवनीयकत्वपरिज्ञानादेव तान्यस्माद्, आप्यते लभ्यते, इत्यर्थः । कीदृशं तत्सौन्दर्यम्—नूतननौचित्यम् नूतनमभिनवमलौकिकमौचित्यसुचितभावो यस्य । तदिदंयुक्तं भवति - महतां हि राजादीनाṁ व्यवहारो वर्ण्येमाने तद्भूता: सर्वे सुक्यामत्यप्रभृतय: समुचितप्रातिभि:करतृग्यव्यवहारानिपुणतया निवन्ध्यमान्ता: सकलङ्कव्यवहारिकवृत्तोपदेशतामापचयन्ते । ततः सर्वे: कवचित्क्रम-

नीयकाव्ये कृतश्रमः समासादितव्यवहारपरिस्पन्दसौन्दर्योतिशयः इलाघनीयफलभाग् भवतीति । योऽसौ चतुर्वर्गलक्षणः पुरुषार्थस्तदुपार्जनविपयव्युत्पत्तिकारणतया काव्यस्य पारंपर्येण प्रयोजनमित्यन्रात्, सोऽपि समयान्तरभावितया तदुपभोगस्य

व्यवहारः ( कहते है ) लोकाचार को, उसका परिस्पन्द् तत्पर्य क्रियाक्रमरूप व्यापार, उसका सौन्दर्य—रमणीयता । वह उसके व्यवहारी-व्यवहार ( प्रयोग ) करनेवाले लोगो से, सत्काव्य के अधिगम से ही—कवनीय काव्य के परिज्ञान से ही, न कि किसी अन्य ( शास्त्रादि ) से, आप्त होता है—प्राप्त होता है । यह अर्थ हुआ । वह ( व्यवहार परिस्पन्द का ) सौन्दर्य किस प्रकार का हे ? उत्तर है—नवीन औचित्य समन्विता नूतन-अभिनव अर्थात् अलौकिक लोकोत्तर, औचित्य-जिसका उचिंत भाव है ( वह सौन्दर्य ) । तो यह इस प्रकार कहा गया समझना चाहिए—उत्तम प्रकृति राजा आदि ( ऋषि-मुनिगण ) के व्यवहार के वर्णन किये जाने पर, उसके सहायभूत सभी प्रधान अमात्य आदि सभी अपने-अपने समुचित कर्तव्यच और व्यवहार के प्रति निपुण रूप मे निवन्धित किये जाते है । ( सदाचार निवन्धतये राजामात्यादि ) संसार के सभी लोकाचार-परम्पराओं के लिए आचार के उपदेशक भाव को प्राप्त हो जाते है । ( उनके आचरणो से लोग सदाचार की शिक्षा लेते है । ) इस प्रकार समस्त सामान्य

जन कहीं भी कमनीय काव्य मे परिश्रम कर व्यवहारे परिस्पन्द के अतिशय सौन्दर्य को प्राप्त कर लेता है । और इस प्रकार से वह भी महत्स्वरूपूर्ण काव्यफल का भागी हो जाता है । ( किलु हेत्वादि के माध्यम सरी इलाघनीय फल के भागी नही वन पाते अतः काव्य प्रयोजन शास्त्र की अपेक्षा अधिक महतनीय है ।)' ॥ ४ ॥

पुरुषार्थे-प्राप्ति-विपयक् व्युत्पत्ति का कारण होने से काव्य का जो यह चतुर्वर्ग ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) रूप परम्परा-प्राप्त प्रयोजन पहले कहा गया है, वह प्रयोजन भी काव्य का उपभोग ( अध्ययन ) करने के समय के बाद ही ( न कि सचा: ) प्राप्त होता है । ( इसलिए उससे सच्चा आनन्द तो भिलता नही और यदि कोई कहे कि धर्मादि की प्राप्ति ही आनन्द है तो वस्तुतः तो यह है ।फकि पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति तो साक्षात् होती नही।प्रत्युत् वह पारम्परिक ह्वाल्है, अतः सद्देशे सुख तो उससे मिलता नही, यही बात आगे की पंक्ति से कही

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तत्फलभूता हारादिकारितया तत्कालमेव पर्यवस्यति । अतस्तदतिरिक्तं किमपि सहृदयहृदयसंवादसुभगं तदात्मकरणीयं प्रयोजनान्तरमभिधातुमाह— चतुर्वर्गफलास्वादमप्यतिक्रम्य तद्विदाम् । काव्यामृतरसनान्तश्चमत्कारो वितन्यते ॥ ५ ॥

चमत्कारो वितन्यते चमत्कृताविवस्थायितहृदः पुनः पुनः क्रियते इत्यर्थः । केन—काव्यामृतरसनान्तः । काव्यमेवामृतं तस्य रसस्य—काव्यरसेन । क्वेत्य- भिदधाति-अन्तश्चेतसि । कस्य—तद्विदाम् । तं विदन्ति जानन्तीति तद्विदस्तज्ज्ञास्तेषाम् । कथम्—चतुर्वर्गफलास्वादमप्यतिक्रम्य । चतुर्वर्गस्य धर्मादेः फलं—तदुपभोगस्तस्यास्वादस्तदनुभवस्तमपि प्रतिहतिशयमतिक्रम्य विजित्य पस्पर्शप्रायं संपाद्य ।

आह्लादकारिता उसकी फलभूत होने के कारण फलप्राप्ति के समय ( कालान्तर ) में ही प्राप्त हो पाती है । ( तात्पर्य यह कि काव्य का उपयोग होने के अनन्तर ही पुरुषार्थ चतुष्टय का लाभ हो पाता है और तज्जन्य आनन्द चूँकि उसका फल है इसलिए वह आनन्द 'तत्काल मिलता है । जब पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है । पुरुषार्थजन्य आनन्द में समय का व्यवधान है काव्योपभोग-पुरुषार्थ-प्राप्ति-और तज्जन्य आनन्द । किन्तु काव्य तो ऐसा हो जो पठनकाल में ही आनन्द पैदा करे । अतः कहते है ) । इसलिए उस ( चतुर्वर्ग ) से भिन्न, सहृदयहृदयसंवाद से सुन्दर तत्काल ( अध्ययन समकाल में ही ) मनोहारी अनिर्वचनीय दूसरे प्रयोजन को कहने के लिए कहते है—

‘काव्यविदों के चित्त में काव्यरूपी अमृत-रस के द्वारा, चतुर्वर्ग ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) से जायमान आनन्द को भी अतिक्रान्त कर ( उससे भी अधिक ) चमत्कार फैलाया जाता है ।

‘चमत्कार का वितनयन किया जाता है—चमत्कृति फैलायी जाती है, अर्थात् वार-वार आनन्द पैदा किया जाता है, यह अर्थ हुआ । किसके द्वारा ( हृदय किया जाता है )?—काव्यामृत रस से । काव्य ही अमृत है, उसका रस—उसका आस्वाद-उसका अनुभव, उसके द्वारा ( हृद किया जाता है ) । ( वह चमत्कृति ) कहाँ ( पैदा की जाती है )?—अन्तर-चित्त मे । किसके ( वित्त मे )?—तद्विदो के । उस ( काव्य ) का विन्दन करते है—जानते है वे तद्विद—काव्यज्ञ कहे जाते हैं, उनके ( चित्त मे चमत्कृति पैदा की जाती है ) । किस प्रकार से ( पैदा की जाती है )?—चतुर्वर्ग के फलास्वाद को भी अतिक्रान्त कर । चतुर्वर्गी अर्थात् धर्म आदि ( अर्थ, काम, मोक्ष ) के, फल-उसका उपभोग, उसका आस्वाद-उस ( चतुर्वर्गी फल ) का अनुभव, प्रसिद्ध प्रौढ उस अनुभव को भी अति-क्रान्त कर-जीतकर, पस्पर्शप्राय ( प्रारम्भिक उपलब्धिमात्र ) बनाकर ( अन्तश्शमत्कार पैदा करता है ) ।

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तदयमभिप्रायः—योडसौ चतुर्वर्गफलास्वादः प्रकृष्टपुरुषार्थतया सर्वशास्त्रप्रयोजनत्वेन प्रसिद्धः सोऽस्य काव्यस्यास्ति वर्णन चमत्कारकलामात्रस्य न कामपि साम्यकलनां कविमहंतीति । दुःश्रवदुर्भेणदुरधिगमत्वादिदोषपुष्ट्रोऽध्ययनावसर एव दुःसहदुःखदायि शास्त्रसनन्दर्भस्तत्कालंकृति पतकमनीयचमत्कुते काव्यस्य न कथंचिदपि स्पर्धामधिरोहतित्येतदर्थतोऽभिहितं भवति । कटुकौषधवच्छास्त्रसविधाव्याधियाधिनाशनम् ।

आहार्यमृतवत्काव्यं सरिविवेकगदापह्म । ॥ ७ ॥ आयात्यां च तदात्ये च रसनिस्यानदुसुन्दरम् । येन सम्पद्यते काव्यं तदिदानीन्त विचार्यते ॥ ८ ॥

इस पूरे का यह अर्थ हुआ कि जो यह, प्रकृष्ट पुरुषार्थ के रूप में सभी शास्त्रों के प्रयोजन के रूप में प्रसिद्ध चतुर्वर्ग फल का आस्वाद है वह भी इस काव्यरूपी अमृत के आस्वाद से उत्पन्न चमत्कार के अशामात्र की भी किसी भी प्रकार की समता करने में समर्थ नही है । अर्थ से यह भी अभिहित होता है कि, दु:श्रव ( श्रुतिकटु ), दुर्भण-कहने मे कठिन, और दुरधिगमत्व-कठिनता से वोघगम्य-आदि दोषो से दूषित, और अध्ययन के समय ही असहनीय दु:ख प्रदान करनेवाला शास्त्रीय ग्रन्थ, अध्ययन के समय ही रमणीय लोकोत्तर चमत्कार पैदा करनेवाले काव्य की किसी भी तरह से स्पर्धा को प्राप्त नही होता ( उसकी समानता नही कर सकता ) ।

( शास्त्र एवं काव्य के आस्वाद की तुलना द्रकुकेपघ एवं अमृत से की जाती है । इसी तथ्य को आगे के प्रथम अन्तरश्लोक से व्यक्त करते है । )

'कड़वी दवा के समान शास्त्र अविद्या ( अज्ञान ) रूप व्याधि का नाश करता है जबकि काव्य आनन्दप्रद अमृत की भाँति अज्ञान-रोग का विनाशक होता है । ( अज्ञान-विनाश मे दोनो ही समर्थ है किन्तु जैसे औषधि रोग का नाश तो करती है किन्तु कड़वी होती है, कठिनाई से गले उतरती है, शास्त्र भी कटोर होने से कठिनाई से गले उतरता है । किन्तु सुन्दर काव्य सरस होने से आसानी से ग्राह्य होता है और सरलतापूर्वंक अज्ञान का विनाश करने मे सक्षम होता है । अतः शास्त्रापेक्षया काव्य अधिक महनीय है । ) यह श्लोक वामन के 'काव्यालङ्कार सुत्रवृत्ति' की सूत्र ११९१ की टीका मे श्री गोविन्दभूपाल ने भी उदाहृत किया है ।

'एव गुण-विधिष्ट वह-काव्य जिस तत्व से अध्ययनकाल एवं तदनन्तर आगामी समय मे भी रस-प्रवाह से सुन्दर सम्पन्न होता है अब इसके बाद उसका विचार किया जाता है ।' ॥ ८ ॥

ध्यान देने योग्य है कि आचार्य कुन्तक ने अवतक काव्य के प्रधानतः ३ प्रयोजनो का विवेचन किया—(१) चतुर्वर्ग की प्राप्ति, (२) व्यवहार-ज्ञान एवं (३) लोकोत्तर चमत्कार । इनमे कोई भी प्रयोजन नया अथवा कुन्तक पूर्ववर्तित नही है । प्रायः सभी पूर्ववर्ती काव्याचार्यों ने कर दिया था ।

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प्रथमोऽनुच्छेदः ]

इत्यन्तरश्लोकौ ।

अलङ्कृतिरलङ्कार्यमपोदृश्य विवेच्यते ।

तदुपायतया तद्वं सालङ्कारस्य काव्यताऽऽत्र ॥ ६॥

अलङ्कृतिरलङ्करणं , अलङ्क्रियते ययeti विग्रहः । साविवेच्यते विचार्यते ।

यच्चालङ्कार्यमलङ्करणीयं वाचकरूपं वाच्यवाच्यरूपं च तदपि विवेच्यते ।

अभिह्न ने चतुर्वर्ग-प्राहौ, कलाओं में दक्षता एवं कीर्ति और प्रीति को साधुकाव्य का प्रयोजन माना था—

धर्मार्थकाममोक्षेपु वैचक्षण्यं कलासु च ।

करोति कीर्तिं प्रीतिं च साधुकाव्यनिवन्धनम् ॥

काव्यालङ्कार १।२

वामन ने भी प्रीति कीर्ति को ही प्रधान कहा था—

काव्य सदृशदृष्टार्थ प्रीतिकीरितहेतुत्वात् । का० सु० वृ० १।१।५

और आचार्य मम्मट ने इन सबका संकलन किया और कहा—

काव्यं यशसेर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये ।

सत्यः परनिन्दितये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥ का० प्र० १।२

काव्य से (९) यशःप्राप्ति, (४) अर्थ-लाभ, (३) व्यवहार ज्ञान, (४) अमङ्गल-निवारण, (५) काव्य-पाठन श्रवणानन्तर ही रसास्वाद एवं (६) कान्तासम्मितोपदेश ।

इनमें से छहों में यशःप्राप्ति, अर्थलाभ एवं अमङ्गल-निवारणरूप प्रयोजनों को लोग कवि से और इतर तीन को सम्भ्रान्त काव्य के पाटक से जोड़ते हैं ।

इस दृष्टि से विचार किया जाय तो स्पष्टतः कुन्तक के प्रयोजनों में प्रायः सभी पाठक की दृष्टि से लिखे गये प्रतीत होते हैं ।

वस्तुतः काव्य कवि के लिए, कम साॅहृदय पाठक के लिए अधिक होता है ।

इसलिए उसका प्रयोजन भी पाठक को ही दृष्टि में रखकर होना चाहिए ।

इस दृष्टि से कुन्तक का ‘काव्यप्रयोजन’ आधुनिक मनोवैज्ञानिक एवं आधुनिक विचारों के समीप है ।

परवर्ती काव्य-शास्त्र में प्रायः मम्मट सम्मत काव्य प्रयोजनों को ही अधिक समादृत किया गया है क्योकि वह कवि-पाठक दोनों को लेकर चलता है ।)

‘उस ( काव्य ) का उपाय ( साधन ) होने के कारण पृथक्-पृथक् कर अलङ्कार और अलङ्कार्य का विवेचन किया जाता है ।

वस्तुतः अलङ्कार से युक्त ( अलङ्कार्य शब्द-अर्थ ) की ही काव्यता होती है ॥ ६ ॥

अलङ्कृति-अलङ्करण को कहते हैं । जिससे अलङ्कृत किया जाता है इस प्रकार से विग्रह कर ( अलङ्कृति-अलङ्कार शब्द निष्पन्न होता है ) ।

उसका विवेचन-विचार किया जाता है । और जो अलङ्कार्य ( अलङ्कृत करने योग्य ) अलङ्करणीय, वाचक-रूप और वाच्यरूप ( शब्द-अर्थ रूप ) है, उसका भी विवेचन किया जाता है ।

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तयोः सामान्यविशेषलक्षणद्वारेण स्वरूपतिरूपं च क्रियन्ते । कथं-अपोद्धृत्य । निष्कृष्य, पृथक् पृथगवस्थाप्य, यत्र समुदयरूपे तयोरन्तर्भावस्तद्विभज्य । केन हेतुना-तदुपायतया । तदिति कार्ये परआत्मतया ने । तस्योपायस्तदुपाय-स्तस्य भावस्तदुपायता तथा हेतुभूतया । तस्माद्विवेच्यो विवेकः कार्यव्युत्पत्त्युपायतातां प्रतिपद्यते । तद्यते च समुदायान्तःपातिनामसत्यभूतानामपि व्युत्पत्तिनिमित्तमपोद्भृत्य विवेचनम् । यथा पदान्तर्भूतयोः प्रकृतिप्रत्यययोर्व्युत्पत्तिनिमित्तमपोद्भृत्य विवेचनम् । यथा चैवमसत्यभूतोडप्यपोद्धारस्तदुपायतया क्रियन्ते । तत् किं पुनः सत्यमित्याह-तत्त्वं सालंकारस्य काव्यता । अग्निमत्र परमार्थे-सालंकारस्यालं रणसहितस्य सकलस्य निरस्तावयवस्य `सतः क्रियतां

उन दोनों ( अलङ्कार्य एवं अलङ्कार ) का सामान्य और विशेष लक्षणों के माध्यम स्वरूप निरूपण किया जा रहा है । कैसे ( स्वरूप निरूपण किया जा रहा है )?—अपोद्धृत्य- अलग कर । निकाल कर, पृथक्-पृथक् रूप में अवस्थापित कर ( स्वरूप निरूपण दिया जा रहा है ), जहाँ समुदायरूप ( काव्य ) में उन दोनों का अन्तर्भाव हो जाता है, उससे विभक्त कर ( उनका विवेचन किया जाता है ) ( अर्थात् अलङ्कार और अलङ्कार्य दोनों ही शब्दार्थ स्वरूप काव्य में अन्तर्भूत है । शब्दार्थ ही काव्य है और अलङ्कार भी शब्द और अर्थ में होते हैं । अतः दोनों का पृथक् विवेचन आवश्यक है, अन्यथा दोनों में श्लेष ( संशय ) सम्भव है । ) किस कारण से ( पृथक् कर विवेचन किया जाता है )? उत्तर है—उस ( काव्य ) का उपाय होने के कारण । यहाँ तत् शब्द से काव्य का परामर्श होता है । उस ( काव्य ) का उपाय ही तदुपाय कहा जाता है । उसका भाव हुआ तदुपायता हेतुभूत उस ( उपाय ) के द्वारा ( पृथक् कर अलङ्कार-अलङ्कार्य का विवेचन किया जाता है ) । इसलिए इस प्रकार का विवेचक काव्य की व्युत्पत्ति की उपायता को प्राप्त होता है । ( अर्थात् जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है । अलङ्कार और अलङ्कार्य का पृथक् विवेचन आवश्यक है । क्योंकि इससे काव्य की व्युत्पत्ति हो जाती है । अन्यथा शब्दार्थ रूप काव्य एवं उसके ही शब्द-अर्थ के अलङ्कार में कोई भेद नहीं हो पायेगा ।) क्योंकि, देखा जाता है । कि व्युत्पत्ति के लिए समुद्राय के अन्तर्गत आनेवाले असत्यभूत ( पदार्थों ) का भी पृथक् कर विवेचन किया जाता है । जैसे व्याकरण शास्त्र में पद-वे, ही अन्तर्गत आनेवाले ( असत्यभूत ) प्रकृति और प्रत्यय का और वाक्य के अन्तर्गत आनेवाले ( असत्यभूत ) पदों का ( पृथक् कर विवेचन किया जाता है ) । ( पद से प्रकृति-प्रत्यय का बोध होता है । इस प्रकार पद-वाक्य के अन्तर्गत प्रकृति-प्रत्यय एवं पदों का कोई अस्तित्व नहीं, महत्त्व नहीं, तथापि उनका अलग-अलग विवेचन किया जाता है । उसी प्रकार यद्यपि काव्य चूँकि शब्दार्थ रूप होता है अतः उसी के अन्तर्गत अलङ्कार-अलङ्कार्य दोनों आते हैं । काव्य की दृष्टि से वे दोनों ही असत्यभूत है । तथापि व्युत्पत्ति के लिए उनका पृथक् विवेचन आवश्यक होता है, कियतां

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कविकर्मेत्वम् । तेनालंकृतस्य काव्यत्वमिति स्थितिः, न पुनः काव्यस्यालंकृतयोग इति॥ ६ ॥

है । यहाँ पर कुन्तक ने व्याकरण प्रक्रिया का सहारा लिया है । व्याकरण सिद्धान्त मे प्रक्रिया दशा मे भले ही प्रकृति-प्रत्यय, वर्ण, पद, वाक्य, की अवस्थिति स्वीकार की जाती है किन्तु परमार्थतया वहाँ पदस्फोट अथवा वाक्यस्फोट का ही प्राधान्य होता है । इस प्रकार वहाँ पद-वाक्य की दृष्टि मे प्रकृति-प्रत्यय एवं पद क्रमशः असत्यभूत ही होते है । इस बात को भर्तृहरि के वाक्यपदीय मे इस प्रकार कहा गया है—

पदेन वर्णा विद्यन्ते वर्णेष्वचयववा न च । वाक्यार्थपदानामानन्त्यं प्रविवेको न कस्यचन ॥ स्फोटस्याभिन्नकालस्य ध्वनिकालानुपातिनः । ग्रहणोपाधिमेदेन वृत्तिमेद प्रचकक्षते ॥ वाक्यपदीय, १·७३,७५

( आगे सन्देह कर वृत्तिकार उत्तर देते है )—यदि इस प्रकार से असत्यभूत भी ( अलंकार-अलंकार्य का ) पृथक् कर, काव्य-व्युत्पत्ति का उपाय होने के कारण विवेचन किया जाता है? तो फिर सत्य क्या है ? उत्तर देते है—तत्त्व तो सालंकार ( शब्दार्थ ) की काव्यता है ।

यहाँ यह भाव है । सालंकार का—अलंकरण सहित सम्पूर्ण की—अवयव रहित समग्र काव्य-समुदाय की ही काव्यता अर्थात् कविकर्मत्व होता है । इसलिए अलंकृत ( शब्दार्थ ) की ही काव्यता होती है, यह स्थिति है । न कि काव्य का अलंकार के साथ योग होता है । ( ध्यान देने की बात है कि सशक्त काव्यशास्त्र मे अलंकार स्वरूप के विपय मे प्राधान्यतया दो धारणाएँ है । प्रथम तो यह कि अलंकार काव्य के स्वरूपाधायक धर्म है और द्वितीय यह कि अलंकार काव्य के शोभाधायक धर्म है ।

प्रायः प्राचीन काव्याचार्य प्रथम मत को मानते है । ध्वनिवादी द्वितीय मत को । ध्वनिवादी की दृष्टि मे आत्म-रस ही अलंकरणीय होता है । अलंकार अज्ञ द्वारा उसमें शोभा की सृष्टि करते है किन्तु ऐसा नही होता कि वे काव्य के नियत धर्म है । यदि निरलंकार शब्दार्थ की भी काव्यता पायी जाती है । सम्भवत: काव्य हृदय—तददोपौ शब्दार्थी सगुणावनलंकृती पुनः कवापि—इस तथ्य को व्यक्त करता है । किन्तु ‘सौन्दर्यमलंकृतिः, काव्यं ग्राह्यमलंकारात्’, इत्यादि वामन की उक्तियों कुन्तक के अधिक समीप है । जो यह मानते है कि काव्य अलंकृत होता ही है । अर्थात सालंकार शब्दार्थ को ही काव्य कहा जा सकता है । अलंकार उसके नित्यधर्म है, अनित्य नही । वे लोक की भाँति कहाँ से ले आकर काव्य मे जोड़े नही जाते प्रत्युत काव्य अलंकृत होता ही है । अन्यथा सामान्य उक्ति और काव्य की वर्णना मे भेद क्या रह जायेगा । इसलिए ‘सालंकारस्य काव्यता’ का तात्पर्य है कि अलंकार काव्य के नियतधर्म है, आाधार्य नही । वे शोभाधायक धर्म नही है । प्रत्युत काव्य के स्वरूपा-धायक हैं । ) ॥ ६ ॥

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सालङ्कारस्य काव्यतैति समसुग्रहतया किश्वत्काव्यस्वरूपमपि सूत्रितम्, निपुणं पुनर्निर्वितम्। किं लक्षणं वस्तु काव्यव्यपदेशभाग् भवतीत्याह—

शब्दार्थौ सहितौ वक्रविव्यापारशालिनि । बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणि ॥ ७ ॥

शब्दार्थौ काव्यं वाचको वाच्यरचेष्टि दौ सम्भालितौ काव्यम्। द्वावेकमिति विचित्रैवोक्ति:। तेन यत्केपांचिन्मतं कविकुलशेखरालितकल्पितकमननीयतातिशय: शब्द एव केवळं काव्यमिति, केपाश्रिते वाच्ये रचनावैचित्र्यचमत्कारकारि काव्यमिति, पक्षद्वये निरस्तं भवति। तस्माद्द्वयोरापि प्रतिपादितोऽत्रैषां तैलं तद्विदाह्लादकारित्वं वर्तते, न पुनरेकस्मिन्। यथा—

भण तरुणी रमणसन्निधरमानन्दसुन्दररत्नुसुन्दरेऽतिसुखि । यदि सलोलेल्लापिनि गच्छसि तर्हि कत्थद्याचरिते ॥ ९ ॥ अनणुरणन्मणिसेखलमविरतशिञ्जानमज्जुमझीरम् । परिसरणमरुणचरणे रणरणकमकारणं कुरते ॥ १० ॥

काव्य-स्वरूप—की भूमिका प्रस्तुत करते हुए कहते हैं—सालङ्कारस्यैति । 'सालङ्कार' की काव्यता होती हे इस प्रकार सम्मोहित-सा होते हुए ( अस्पष्टतया ) कुछ काव्य का स्वरूप निवद्ध किया ( अवश्य ) किन्तु सही ढंग से उसका स्वरूप-निर्धारण नहीं किया। अतः किस रूप की वस्तु काव्य नाम को प्राप्त होती है? इस पर कहते हैं—

'काव्यविद् में आह्लाद पैदा करनेवाले, तथा वक्रविव्यापार से सुशोभित रचना में व्यवस्थित सहित ( सम्मिलित ) शब्दार्थ काव्य ( कहे जाते हैं )' ॥ ७ ॥

'शब्द और अर्थ काव्य हैं। वाचक ( शब्द ) और वाच्य ( अर्थ ) दोनों भोति मिलकर ही काव्य कहे जाते हैं। दो ( शब्द-अर्थ मिलकर ) एक है, यह तो विचित्र ही वथन है। इसलिए जो कतिपय लोगों का मत है कि कवि की कुशलता से कल्पित अतिशय कमनीय केवल शब्द ही काव्य है, और जो किन्हीं और का मत कि, रचना की विचित्रता से चमत्कार पैदा करनेवाला अर्थ ही काव्य है। ये दोनों ही पक्ष ( शब्दार्थौ सहितौ काव्यम् ) से निरस्त हो जाते हैं। इसलिए दोनों में ही प्रत्येक तिल में तैल की भाँति काव्यविद् को आह्लाद पैदा करने की सामर्थ्य ( काव्यता ) होती है, न कि किसी एक ( पृथक्-पृथक् शब्द या अर्थ ) में। उदाहरणाथ—

अरी, आनन्द प्रवाहित करनेवाले चन्द्र सरिखे मुखवाली, सविलास संभापण करनेवाली, लाल पैरोवाली नवयौवने, यदि तुम अपने रति प्रेमी प्रिय के पास जाती हो तो तुम्ही वताओ क्योंकर तुम्हारा, अतिशय बजती मेखला ( रणरणाती हुई करधन ) एवं निरन्तर बजते मधुर पायलिया से युक्त मधुर मन्द गमन मुझमें अकारण उत्कण्ठा ( काम-अभिलाषा ) पैदा करता है।'

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प्रथमोऽनुच्छेदः ]

प्रतिभादारिद्र्यदैन्यादितिस्वल्पसुभाषितेन कविना वर्ण्यसावर्ण्यरसम्याताम्रमतोदितम् । न पुनर्वाच्यैर्वैचित्र्यकाण्डैः काचिदस्तीति ।

यत्किल नूतनतारुण्यतरङ्गित लावणालतटभङ्गान्ते: कान्ताया: कामयमानेन केनचिदेतदुच्यते । यदि त्वं तरुणी रमणमन्दिरं ब्रजसि तत्किं त्वदीयं रणरणकसकारणं मम करोतीत्यत्रिमाम्येयसुक्तिः । किन्तु, न आकारणम् । यतस्तस्यास्तदनादरेण गमनेन तदनुरक्तान्तःकरणस्य विरहविधुरिताश्रूणाकुलतता कारणं रणरणकस्य । यदि वा परतरङ्गस्य मथिता किमपरिद्रुतिमत्कारुणगतासमपङ्क्तौ, एतदप्यतिमात्रम्यतरम् । सम्वोधनानि च बहूनि मुनिप्रणीतस्तोत्रामन्त्रणकल्पानि न काचिदपि तद्विदाह्लादकारितां पुष्णन्तीति यत्किचिदेतत् ।

यहाँ उक्त वर्णन मे प्रतिभा के दारिद्र्य के कारण दीनतावश ( जैसे और कोई चारा ही न हो ) अत्यन्त स्वल्प सुभाषित से कवि ने वर्णों की सावर्ण्यता मात्र की रमणीयता का वर्णन किया है ( अनुप्रास मात्र का सहारा लिया है क्योकि - वर्णसाम्यमनुप्रासः ) । किन्तु यहाँ अर्थ-वैचित्र्य ( सौन्दर्य ) का कोई लेशमात्र भी नही है । ( वस्तुतः वक्ता-वोद्धा के ऊपर ही अर्थ-सौन्दर्य निर्भर है । उक्त रचना मे जहाँ वर्णसाम्य ध्वनि सङ्गीत है वही उसके एक-एक पदो मे अर्थ-सौन्दर्य भी है । )

उक्त वर्णन मे कोई वक्रता नही है इसी को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं—यदि ति 'जो अभिनव तरुणाई से तरङ्गित मनोहरता-आँखो की सुङ्गिधमा ( लावण्य सस्थान सुङ्गिधमा-लोचन ) एव कमनीय आभाभावली रमणी को चावनेवाले किसी ( नायकेतर व्यक्ति ) द्वारा यह कहा जा रहा है—हे रमणि, यदि तुम अपने रमण के घर जा रही हो तो क्यो तुम्हारा मन्दगमन आकारण ही मुझ मे ( तवाभिलाष विषयक ) उत्कण्ठा पैदा कर रहा है—इस प्रकार का यह कथन अत्यन्त ग्राम्य है । और तो और यह रणरणक आकारण भी तो नही है । क्योकि वह रमणी उस मनचले युवक का अनादर कर गमन करती है । जिससे उस युवती मे अनुरक्तहृदय उस युवक की ( नायिका की अप्रातिज्ञन्य विरह-विधुरता की आर्ताङ्गजानित ही रणरणक का कारण है । ( तत्वतः यह कि उत्कण्ठा का कारण तो रमणी द्वारा युवक का तिरस्कार करके जाना और उस युवक की अप्रातिज्ञन्य वियोगाकातरता ही है ) । अथवा ( तुम्हारे ) परिभ्रमण का मैने क्या अपराध किया है, यह कथन भी आकारणता का समर्थक ( समर्पक है ) और यदि है तो यह तो और भी अधिक ग्राम्य उक्ति है । कोई कह सकता है कि नायिका के लिए 'आनन्दस्यान्दी' त्यादि सम्वोधनो मे तो सौन्दर्य है? इसी का प्रतिवाद करते है—मुनियों से प्रणीत स्तोत्रो मे प्रयुक्त सम्वोधन सरीखे अनेक सम्वोधन तो किसी भी प्रकार की तद्विदो ( काव्यज्ञों ) की आह्लादकारिता की पुष्टि नही करते । इसलिए यह वर्णन तो जो भी है तुच्छमात्र है । ( वर्ण-साम्यता मे काव्यत्व नही हो सकता का प्रतिपादन किया ) । अब आगे कहते है ।

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[वक्रोक्तिजीवितम्

वस्तुमात्रं च शोभातिशयगून्यं न काव्यव्यपदेशमर्हति यथा—

प्रकाशस्वभाव्यं विदधति न भावास्तमसियत्तथा नैते ते सूर्यादि किल तथा तत्र न कथम् ।

गुणाध्यासाभ्यासवशेन हृददृक्षागुरुर्गुणोरविग्रयापरोडयं किमथ सदृशं तस्य महतः ॥१९॥

अत्र हि शुष्कतर्कवाक्यवासनाधिवासित चेतसा प्रतिबिम्बप्रतिभातमात्र-

मेव वस्तुव्यसनितयाकविना केवलसुपनिबन्धम् । न पुनर्वोचकवकृताविच्छेदितलेशैरपि लक्ष्यते । यस्मिस्तर्कवाक्यशोभेनैव श्लोकस्स्याद्देहलक्ष्यम् ।

तथा च तत्रव्यतिक्रता: पदार्था धर्मिणः प्रकाशस्वभावा न भवन्ति, इति साध्यम् । तमस्य तथाभूतत्वादिति हेतुः ।

दृष्टान्तस्तर्हि कथम् न दर्शितः ? तर्केन्यास्यैव चेतसि प्रतिबिम्बसमनन्तवान् ।

और अतिशय शोभा विरहित वस्तुमात्र वर्णन में भी काव्य नाम का भागी नहीं होता । जैसे—

'सासारिक भाव ( घट, पटादि पदार्थ ) स्वयं प्रकाश स्वरूप को नहीं प्राप्त होते,

क्योकि ये वे पदार्थ अंशकार मे उस प्रकार नही होते ( जैसे प्रकाश मे प्रकाशमान होते है ), यदि वे प्रकाश-स्वभाव होते तो फिर उस अन्याकार मे क्यो नही वैसे प्रकाश-

स्वभाव होते है । वस्तुतः ( प्रकाशादि ) गुणो के अध्यास ( मिथ्या प्रतीति ) की पुनः पुनः आभृति रूप व्यसन की हदद दीक्षा का महान गुणयुक्त सूर्य का ही यह सब व्यापार है, अथवा उस ( रवि-व्यापार ) के प्रकाशा के समान दूसरा और कौन

है? ॥१९॥ (अर्थात् सूर्यप्रकाशा ही सबको प्रकाशित करता है अन्य भावों मे स्वं प्रकाशा की सामर्थ्य नही है । )

इस वर्णन मे नीरस तर्कवाक्य ( अनुमान ) की वासना ( संस्कार ) से वासित चित्तवाले कवि से वस्तुव्यसनिता के कारण प्रतिबिम्ब से प्रतीतमात्र केवल वस्तु का ही निवन्धन किया गया है । किन्तु शब्दकविता की विशिष्टता का अंशमात्र भी इसमें

परिलक्षित नही होता । क्योकि तर्कवाक्य की दौत्यिया मात्र ही इस श्लोक का शारीर है—स्वरूप है । तो जैसे कि, अनन्धकार मे व्यतिरिक्त अन्यधर्मी पदार्थ ( क्योकि

अनन्धकार तो स्वयम् भी प्रकाशास्वभाव्य नही है ) प्रकाशास्वभाव नही होते, यह ( उस तर्के-वाक्य का ), साध्य है और 'क्योकि वे अन्धकार मे उस प्रकार के ( प्रकाश-

स्वभाव ) नही होते यह ( उस अनुमान-वाक्य मे ) हेतु है ।

प्रश्न — यदि उक्त श्लोक मे तर्क-वाक्य है और उक्त प्रकार से साध्य-हेतु दोनो है

तो 'क्यो नही दृष्टान्त इसमे दिखाया गया ?' ( क्योकि बिना दृष्टान्त के अनुमान दूषित होगा ) । उत्तर देते हैं कि, 'कवि के चित्त मे तर्क न्यस्य का ही प्रतिबिम्ब हो

रहा था ( इसीलिए उसने दृष्टान्त नही दिया ) ।'

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प्रथमोल्लासः ]

तद्वदौ हेतुभावौ हि दृष्टान्ते तद्वेदिनि ।

स्थाप्येते, विदुषां वाच्यो हेतुरेव हि केवलः॥१२॥ इति ।

विद्रधतीति-वि पूर्वो दृश्याति: करोत्यर्थो वर्त्तते । स च करोत्यर्थोडत्र न सुस्पष्टस्समन्वयः । प्रकाशस्वाभाऽऽन्यं न कुवेन्तीति । प्रकाशस्वाभाऽन्य शब्दोऽपि चिन्त्य एव । प्रकाशः स्वभावो यस्यासौ प्रकाशस्वभावः । तस्य भाव इति

और कहा भी गया है।

'दृष्टान्त मे तदभाव ( साध्य ) और तद्धेतु ( साध्य का साधक लिङ्ग् ) भाव उसके ( साध्य-साधन भावरूप अनुमान के ) अजानकार के लिए ही स्थापित किये जाते है । विद्वानों के लिए तो केवल हेतु को ही कहना चाहिये ( अन्य साध्य-साधन आदि तो वे जानते ही है )॥१२॥

(वस्तुतः अनुमान, न्यायदर्शन के अनुसार—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन—पञ्चावयवों द्वारा किया जाता है । उक्त तर्क-वाक्य मे साध्य-साधन भाव तो है किन्तु दृष्टान्त नही । कुन्तक ने कहा है कि दृष्टान्त आदि का प्रयोग तो अनुमान-प्रक्रिया से अनभिज्ञ के लिए होता है । अतः चूँकि कवि को इस प्रक्रिया का ज्ञान था इसलिए उसने दृष्टान्त आदि का सहारा नही लिया ।

किन्तु ध्यान देने की बात तो यह है, कि दृष्टान्त देने पर भी यहाँ पञ्चावयव की बात सिद्द्ध नही होती । बौद्ध एवं जैन-सिद्धान्तों मे कतिपय विद्वान् अनुमान के लिए हेतु एवं दृष्टान्त मात्र का प्रयोग करते है । अतः बहुत सम्भव है कि इस कथन मे यहाँ कुन्तक उन्ही से प्रभावित हो । इस पर विस्तृत विवेचन पं० विश्वेश्वर की टीका मे दृष्टव्य है । पुनः स्मर्तव्य है कि, इस कारिका को महिमभट्ट ने भी अपने व्यक्तिविवेक मे प्रस्तुत किया है ।

ध्वनि का अनुमान मे अन्तर्भाव करने के लिए उन्होंने त्रिरूप लिङ्गाख्यानरूप परार्थानुमान का सहारा लिया है । कोई कहे कि दृष्टान्त आदि काव्यो मे तो मिलते नही, फिर कैसे अनुमान सिद्ध होगा ? इसीलिए उत्तर मे उन्होने किया है । उन्होने कहा है कि काव्य-शास्त्र मे भेद है । इसलिए दोनो के अनुमान मे भी भेद पाया जाता है । काव्य मे चमत्कार पाया जाता है, शास्त्र मे नही ।

अतः काव्यानुमान तर्कानुमान से विलक्षण ही होता है । इसलिए यह आवश्यक नही कि, काव्यानुमान मे भी तर्कानुमान की भाँति व्याप्ति आदि का सहारा लिया जाय—

'नन्वत्र विद्धद्विदेर्देन व्याप्तिसाधनप्रमाणविपयस्य दृष्टान्तस्यप्रयोगः प्रयोग-

स्वोकः । न काव्ये कदाचिद् दृष्टान्तस्य प्रयोगो दृश्यते । तत्कथमत्रुमानसमर्थनम् ।

काव्यानुमानं तर्कानुमानविलक्षणं काव्यस्य चमत्कारसारत्वात् । ** 'काव्ये

न व्याप्त्यादिसुखेनाऽनुमानप्रदर्शनसमर्थनमिति । रुघ्यकृत्त क० वि० व्याख्या पृ० ६९ ।

'और यहाँ 'विद्रधति' मे वि उपसर्गपूर्वक 'धा' धातु ( करणार्थक ) 'कु' के अर्थ मे प्रयुक्त है । और वह 'कु' अर्थ भी यहाँ ( प्रकाशस्वभाव्यम् आदि मे ) सुस्पष्ट-

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भावप्रत्यये विहिते पूर्वपदस्य वृद्धिः प्राप्त्नोतिः । अथ स्वभावस्य भावः स्वाभाव्यमित्यत्रापि भावप्रत्ययान्ताद्वावप्रत्ययो न प्रचुरः प्रयोगार्हः। तथा प्रकाशश्वासौ स्वाभाव्यद्र्वेति विशेषणसमासोऽपि न समीचीनः।

तृतीयेऽ च पादेऽन्तासम्पकसमासमभूयस्त्ववैशरसं न तद्विदाह्लादकारितामावहति । 'रविग्यापार' इति रविशब्दस्य प्राधान्येनाभिमतस्य समासे गुणीभावो न विकल्पितः । पाटान्तरस्य 'रवे:' इति सम्भवात्।

तथा समासो नहीँ होता कि अथ यहाँ 'प्रकाशस्वभाव्य' को नहीँ करते । ( इस प्रकार उक्त मे 'धा' धातु का प्रयोग भी सही ढंग से नहीँ किया गया )। 'प्रकाश स्वभाव्य' शब्द भी यहाँ चिन्तनीय ही है। प्रकाश जिसका स्वभाव हुआ । उसका भाव हुआ प्रकाशस्वभाव्य । इस प्रकार प्रकाशस्वभाव शब्द से भाव प्रत्यय ( ष्यज् ) करने पर नियमितः ( जित होने के कारण ) पूर्वपद को भी वृद्धिः प्राप्त होती है ( और इस प्रकार 'प्रकाशस्वभाव्यम्' न होकर 'शब्दस्वरुप' 'प्राकाशस्वभाव्यम्' होना चाहिए था, अतः भावप्रत्यय करने पर वह शब्द ही अच्युत्द्र है )। और यदि स्वभाव का भाव स्वाभाव्य होता है, इस प्रकार से भावप्रत्ययान्त शब्द स्वभाव ( स्वभाव मे दो पद है स्व-भाव । भू धातु से भाव अर्थ मे घञ् प्रत्यय करके भाव शब्द बनता है। पुनः उसका स्व के साथ समास होने पर स्वभाव शब्द बना )। इस प्रकार स्वभाव शब्द स्वय मे भाव प्रत्ययान्त है ) से पुनः भाव प्रत्यय ( ष्यज् ) का करना प्रयोग के बहुत अधिक उपयुक्त नहीँ है । और यदि भावप्रत्ययान्त से भावप्रत्यय करके स्वाभाव्य बना भी ले तो, 'प्रकाशस्वचासौ स्वाभाव्यम्' ऐसा विशेषण समास करके भी ( प्रकाशस्वभाव्यम् शब्द बनाना ) उपयुक्त नहीँ है ।

और श्लोक के तृतीय पाद ( गुणवाच्यासाभ्यासव्यसनहृददक्षागुरु गुणः ) मे ( अर्थ के ) अतिशय असमर्पक ( सहजभाव से बोध न कराने वाले ) समासवाच्युल्य की कष्टता तद्विदों ( काव्यमर्मज्ञों ) की आह्लादकारिता को नहीँ पैदा करती ।

और चतुर्थ पाद मे आये 'रविग्यापार:' शब्द मे यद्यपि रवि शब्द की प्राधान्यता अभीष्ट है किन्तु समास मे ( 'रवे: व्यापारः रविग्यापार:' ) इस प्रकार के समास मे रविशब्द गौण हो जाता है; क्योकि नियम है कि समास मे पूर्वपद गौण होता है ) ( रवि ) शब्द के गौणभाव को विकलिप्त नहीँ किया जा सका ( अर्थात और इसी प्रकार से उसका गौणभाव दूर नहीँ किया जा सका )। यद्यपि 'रवे: व्यापार:' ऐसा प्रयोग रूपपाठान्तर करके इस दोष से बचना सम्भव था ( क्योकि 'रवे: व्यापाररॉडयम्' प्रयोग करने पर छन्दोमङ्ग नहीँ होता )। किन्तु कवि इस दोष से भी नहीँ बच सका । अतः उक्त रचना अनेक दोषदुष्ट होने के कारण*काऽव्यपदव्यपदेश्य नहीँ हो सकती ।

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ननु वस्तुमात्रस्याप्यलङ्कारशून्यतया कथं तद्विदाह्लादकारित्वमिति चेत् तन्न, यस्मादलङ्कारेणाप्रस्तुतप्रशंसालक्षणेनानुपदेशतया स्फुरितमेव कवि-चेतसि ।

प्रथमं च प्रतिभाप्रतिभासमानमघटितपाषाणशकलकल्पर्माणप्रस्र्‌मेव वस्तु विदग्धकविविरचिततटाकक्‍वाक्योपारुढं शानोल्लेठमणिमनोहरतया तद्विदाह्लादकारित्वमपधिरोहति i तथा चैकस्मिन्नेव वस्तुन्यवहितानवहित-मानिनीजनेविलोचनपातानुष्णवाष्पकलुषानभिग्रहून ।

मन्दमन्‍दसुधितः प्रययौ रवं भीत भीत इव शीतमयूखः ॥१३॥

क्रमादेकद्वित्रिप्रभृतिपरिपाटीः प्रकटयन् ।

कला: स्वैरं स्वैरं नवकमलकन्दाडकुरुरुचि ।

पुरन्ध्रीणां प्रेयोविरहदहनोद्दीपिततनशां कटाक्षेभ्यो विम्‍बाधरश्‍वृत इव चन्द्रोऽस्मयुदयते ॥१४॥

प्रश्न उठता है कि, यदि वस्तुमात्र मे आप आह्लादकारिता नहीं मानते तो अलङ्कारशून्य वस्तुमात्र की तद्विद आह्लादकारिता कैसे हो सकती है? उत्तर है कि यदि कोई ऐसा प्रश्न करे तो वह ठीक नहीं, क्योंकि इस प्रकार की रचना मे कवि के चित्त मे पहले से ही किसी अन्य को व्यपदेश कर अप्रस्तुत प्रचार स्वरूप ( कोई न कोई, अलङ्कार तो स्फुरित हुआ ही रहता है ) और वस्तु जब प्रथमतः कवि की प्रतिभा मे प्रतिबिम्बित होती है उस समय तो उसका स्वरूप बिना तराशे हुए अतएव पाषाण के टुकड़े सरीखे मणि के समान ही होता है ।

और तदनन्तर विदग्ध कवि से निबन्‍धित वक्‍वाक्य मे समारूढ होकर वही वस्तु ज्ञान से तराशे मणि के समान मनोहारो हो जाती है और इस प्रकार वह काव्यमणि सहृदय को आह्लाद प्रदान करने वाले काव्य पदवी को प्राप्त हो जाती है ।

दूसरी बात तो यह है कि एक ही विषयवस्तु मे सावधान और असावधान दो भिन्न कवियो से विरचित ये ( नीचे दिये जाने वाले श्लोकद्वय रूप ) दो वाक्य महान्‌ अन्‍तर को सूचित करते है—

प्रकृत श्लोक भारवि के ‘ किरातार्जुनीयम्‌ ’ के नववे सर्ग का ६६वॉ श्लोक है । विषय चन्द्रोदय का है—

‘ उदित हुआ चन्द्रमार गरम-गरम आँसुओ से धूमिल कोपवती नायिकाओं के दृष्टि प्रहारों को स्वीकार करता हुआ डरा-डरा सा धीरे-धीरे आकाश मे ऊपर चढा ’ ॥१३॥

चन्द्रोदय का ही एक दूसरा भी वर्णन है—कमल की कन्तलि के अभिनव अड्‌कुर के समान कान्तिवाली कलाओं को कमश: एक-दो-तीन की परम्परा से प्रकट करता हुआ, प्रियतम की विरहज्वाला से जलती आँखोवाली रमणियों ( उत्तम महिलाओ ) के कटाक्षों से डरता अतएव चुपचाप-सा चन्द्रमार उदित हो रहा है ॥१४॥

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२२

[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

एतयोरेवं सहृदयहृदयसंवेद्यमिति वैरेख विचरणीयम्। तस्मात् स्थित-मेतत्—न शब्दार्थयैव रमणीयताविशिष्टस्य केवस्य काव्यत्वम्, नाप्यर्थस्यैति ।

तदिदमुच्यते —

रूपकादिरलङ्कारस्थान्यैर्वहुधोदितः ।

न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनिताननम् ॥१५॥

रूपकादिरलङ्कार-वाच्योऽर्थोऽचक्षते परे ।

सुपान्तिडां च व्युत्पत्ति वाचां वाच्यल्यकृतिम् ।

तदेतदाहुः सौशब्द्यं नार्थव्युत्पत्तिरीक्षशी ।

शब्दाभिधेयालङ्कारभेदादिष्टं द्वयन्तु न ॥१६॥

इन उपर्युक्त दोनो ( अवहित कवि भारवि एवं अनवहित किसी और कवि की ) रचनाओं का अन्तर ( स्वय ) सहृदयहृदयसंवेद्य है। अतः उन्हीं से विचारणीय है ( कि दोनो मे अन्तर है या नहीँ ) । वस्तुतः दोनो ही रचनाओं मे छन्द एवं वर्णन शैली के कारण रमणीयता मे काफी अन्तर आ गया है। छन्द की मनोहरता, कोमल वर्णों की विन्यासवक्रता एवं सङ्गोप्राहिता तथा अर्थगाम्भीर्य होने से प्रथम रचना अधिक हृदयाह्लादिनी हो गयी है, जबकिं द्वितीय मे एक तो छन्द ही विपयानुरूप नही है, श्रुतिकटु शब्दो का विन्यास तथा अर्थ की अरमणीयता पाठक को रुचिकर ( नहीँ लगती ) । इसलिए ( उक्त उदाहरणो से सिध्द होने के कारण ) यह बात स्थित रही कि न केवल रमणीयता विशिष्ट शब्द की ही काव्यता होती है और न अर्थ की ही । इसीलिए आचार्य भामह ने अपने काव्यालङ्कार ( १।१५-१७ ) मे यह तथ्य कहा है—

'अन्य अनेक (मेरे पूर्ववर्ती) आचार्यों ने अनेक प्रकार से रूपक आदि अर्थालङ्कारों का विवेचन किया है। सुन्दर भी युवती-मुख बिना गहनो के सुशोभित नहीँ होता ( तद्वत् सुन्दर भी काव्यवस्तु अलङ्कारों के बिना सुशोभित नहीँ होती )

॥१५॥

किन्तु कुछ और आचार्यगण रूपक आदि अर्थालङ्कारो को ( काव्य की ) वाध्या भृशा बताते है और सुवन्त एव तिङन्त पदो की व्युत्पत्ति को ही वाणी का अलङ्कार कहना चाहते है ॥१६॥

तो यह ( सुवन्त एवं तिङन्त पदो का सन्निवेश मात्र ) तो सौशब्द्य ( शब्द सौन्दर्य ) हुआ; क्योकिं अर्थ की व्युत्पत्ति इस प्रकार की ( चमत्कारजनक ) नहीँ होती । इसलिए शब्दालङ्कार एवं अर्थालङ्कार भेद से दोनो ही मुझे ( भामह को ) अभीष्ट ( मान्य ) हैँ ॥१७॥

( ऊपर की भामह की उक्तियों से लगता है कि उनके पूर्वं अलङ्कारशास्त्र मे दो कवि वर्ग थे । एक_तो शब्दालङ्कारपरक, दूसरे अर्थालङ्कारपरक । परन्तु भामह को

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तेन शब्दार्थों द्वौ सम्मिलितौ काव्यमिति स्थितम् । एवमवस्थापिते द्वयोः काव्यत्वे काविदेकस्य मनाऽड्मात्रन्यूनीकृतयोरन्यतरस्य सत्यां काव्यव्यवहारः प्रवर्तेत्याह- सहिताविति । सहितौ सहितभावेन साहित्येनावस्थितौ । नतु च वाच्यवाचकसम्बन्धस्य विद्यमानत्वादित्यर्थः । कथम् ? वक्ताविचित्रगुणालङ्कारसम्पदां परस्परसापेक्षयोः । तेन—

किसी एक की वात नहीं सुहाई और उन्होंने दोनों ही भेदों को स्वीकार किया । कारिका मे सुप् और तिङ् पद क्रमशः सङ्ज्ञा एवं क्रियापदों के लिये प्रयुक्त है । किन्तु इनके अभिधान का तात्पर्य मात्र सङ्ज्ञा एवं क्रियापदो से न होकर शब्दमात्र से है । शब्दालङ्कारसमर्थक लोगो का कथन है कि काव्य मे प्रथमतः शब्द ही पाठक के समक्ष आते हैं , हृदय पर पहला प्रभाव उन्हीं का पड़ता है । अतः हृदय को आवर्जित करने के कारण वे ही है । स्वभावतः शब्दालङ्कार ही काव्य मे प्रधान हैं । अर्थ की प्रतीति बाद मे होती है । अतः उसके अलङ्कार गौण एवं वाध्य है । किन्तु भामह इन दोनो मतो को लेकर चलते है । और बाद के आचार्यों ने भी प्रायः यही बात मानी । सम्मत ने तो काव्य-प्रकाश मे समर्थन के लिये भामह को इन कारिकाओं को उद्धृत भी किया है ।

इसलिए ( क्योंकि प्राचीन आचार्य भी शब्द-अर्थ दोनो का सौन्दर्य स्वीकार करते है और स्वयं भामह—शब्दार्थों सहितौ काव्यम्—काव्य की परिभाषा मानते है ) शब्द और अर्थ दोनो सम्मिलित होकर काव्य होते है , यह स्थिर हुआ । इस प्रकार काव्यता दोनो ( शब्द अर्थ ) मे है , यह अवस्थापित हो जाने पर ( उनमे से ) किसी एक की कुछ थोड़ी-सी भी न्यूनता हो जाने पर भी काव्य व्यवहार ( न ) प्रवर्तित हो जाय , इसलिए सहितौ ( शब्दार्थों ) ऐसा कहा है । सहितौ , तात्पर्य सहितभाव से साहित्य से अवस्थित ( शब्द-अर्थ ) काव्य होते है । ( शब्दवाचक होता है और अर्थ—

प्रदान करे कि ) वाच्यवाचक सम्बन्ध के विद्यमान रहने से इन दोनो ( शब्द-अर्थ ) मे किसी भी प्रकार से साहित्य का अभाव तो पाया नही जाता ? ( फिर आपने 'सहितौ' विरोध क्यों दिया ? इसका उत्तर देते है ) । यह कथन सत्य है ( कि शब्द-अर्थ का वाच्यवाचक सम्बन्ध है । इसलिए उनमे सहभाव तो विद्यमान ही है किन्तु मेरे कथन का तात्पर्य कुछ और ही है , और वह यह है कि ) यहाँ पर 'सहितौ' पद से ( सामान्य साहित्य की अपेक्षा ) विशिष्ट प्रकार का ही साहित्य अभीष्ट है ( प्रश्न ) कैसा है ( वह विशिष्ट साहित्य ) ? उत्तर देते हैं—( वक्ष्यमाण ) वकता से कमनीय गुण और अलङ्कार विभूतियों का आपस मे स्पर्धा को प्राप्त हो जाना ( ही शब्दार्थो का विशिष्ट साहित्य यहाँ अभीप्त है ) ।

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

समसर्येगुणौ सन्तौ सुहृदाविव सज्जतौ ।

परस्परस्य शोभायै शब्दार्थौं भवतो यथा ॥१८॥

ततोडरुणपरिस्पन्दमनदीकृतवपुः ।

दध्रे कामपरिक्षामकामिनीगण्डपाण्डुताम् ॥१९॥

अत्रारुणपरिस्पन्दमनदीकृतवपुषः इति । कामपरिक्षणीया्ट्टे: कामिन्याः कपोलफलकयच न पाण्डुत्वसामर्थ्यनात् अश्लेषारुणपरिपोषः शोभातिशाय-वाक्ष्यमाण वर्णविन्यासवक्रोक्तलक्षणः शब्दालङ्कारोडन्यतिरिक्तं रसप्रणीयः । वर्णविन्यासविच्छित्तिविहिता लावण्यगुणसंपदस्त्येव । लीलया कुवलय कुवल अ व सीसे समुच्वहेण । सेसेप सेसपरिसाण पुरिसआरो समुच्वसिओ ॥२०॥

[ लीलया कुवलयं कुवलयमिव शीर्षे सुदृढहता ।

शोणेण शोपुरुषाणां पुरुषकारः समुपहसितः ॥२०॥] इति

इसलिए—

जहाँ समान सर्वगुणसम्पन्न परस्पर सज्जत दो मित्रों की भाँति ( माधुर्यादि ) सर्वगुणसम्पन्न शब्द और अर्थ दोनों एक-दूसरे की शोभा के लिए सज्जत ( सहित ) होते हैं ( वे ही विशिष्ट शब्द-अर्थ के साहित्य-काव्य कहे जाते हैं ) ॥१८॥

उक्त प्रकार के कथन का समर्थन करने के लिए उदाहरणस्वरूप निम्न श्लोक को कुन्तक ने प्रस्तुत किया है—

तदनन्दर ( सूर्य सार्थी ) अरुण के संचार ( सूर्योदय ) से क्षीणाभ शरीर चन्द्रमा ने काम से मलिन रमणी के कपोल की पाण्डुता की भाँति पीताभ वर्ण को धारण किया ॥१९॥

प्रकृत मे शब्दार्थ की वक्रवैचित्र्य को दिखाते हुए कहते है—अत्रादि । यहाँ पर अरुण के सङ्घार से क्षीणाभ चन्द्रमा की काम से परिक्षीण लगनेवाले कामिनी के कपोलफलक की पाण्डुता की समानता से साधर्म्य ( उपमा ) का समर्थन किया गया है। अतएव अर्थालङ्कार (उपमा) का परिपोष है, जो अत्यन्त शोभा को पैदा करता है। और आगे कहा जाने वाला वर्णविन्यासवक्रोक्तिरूप शब्दालङ्कार ( अनुप्रास ) भी यहाँ अत्यन्त रमणीय है। और वर्णों के विन्यास से जायमान शोभा से उत्पन्न लावण्य-गुण की सम्पत्ति ( वैभव ) तो यहाँ है ही ( इस प्रकार इसमें शब्द-अर्थ के अलङ्कार एवं गुणों का परस्पर इस प्रकार प्रयोग*है कि वे दोनों एक-दूसरे की शोभा की सृष्टि करते हैं। अनुप्रास से गुणों की सृष्टि हो रही है और गुणों से अनुप्रास की ओर करते हैं। अनुप्रास-गुण अर्थालङ्कार मे और भी शोभा को बढा रहे है । _शब्द-अर्थ के साहित्य का परस्पर स्पर्धाभिरोह यहाँ पूर्णतः निबद्ध है ) । शब्दार्थ-साहित्य का द्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करते है—‘नील कमल के समान पृथ्वीमण्डल को अनायास शिर से धारण करते हुए भगवान् शेष ने ( संसार के ) अवशिष्ट सभी पुरुषों ( प्राणियों ) के पराक्रम का अच्छा उपहास्र किया है ॥२०॥

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अत्राप्रस्तुतप्रशंसोपमालक्षणवाच्यालंकारवैचित्र्यविहिताहेलामात्रविरचित यमकानुप्रास हारिणी समर्पितवसुभगा कापि कान्त्यच्छाया सहृदयहृदयमाहा-दयति ।

द्विवचनेनात्र वाच्यवाचक जातिद्रव्यामिधीयते । व्यतिक्रतिद्रव्याभिधाने पुनरेकपदव्यवस्थितयोरपि कान्त्यत्वं स्यातदित्याह-बन्धे व्यवस्थितौ । बन्धो वाक्यविन्यासः तत्र जातिस्थितौ विशेषेण लावण्यादिगुणालंकारशोभिना समविरेशेन कृतावस्थानौ । सहितावित्यत्रापि यथायुक्ति सजातीयापेक्षया शृङ्गस्य शब्दान्तरेण वाच्यस्य वाच्यान्तरेण च साहित्यं परस्परस्पर्धित्वलक्षण-मेव विवक्षितम् । अन्यथा तद्विदाहादकारित्वहानि: प्रसज्येत ।

यहाँ इस वर्णन मे अप्रस्तुत प्रशंसा और उपमारूप अर्थालङ्कार के सौन्दर्य से अनायास निर्मित यमक एव अनुप्रास ( शब्दालङ्कार ) से मन को आकृष्ट करने वाली , अर्थ ) समप्रकता के कारण सुन्दर कुछ अपूर्व ही काव्यप्रभा सहृदय के हृदय को आह्लादित करती है । ( प्रकृत मे अप्रस्तुत शेष पुरुषो के पुरुषकार के उपहास से प्रस्तुत शेष की महत्ता का वर्णन होने से अप्रस्तुत प्रंशा अलङ्कार है । कुव-लय ( नील कमल ) के साथ कवलय ( पृथ्वीमण्डल की उपमा दी गयी है, अत: दोनो मे उपमा है । कवलय-कुवलय मे यमक है । शेष-शेष, पुरुष-पुरुप मे छेकानुप्रास एवं ल, क, श, ष आदि वर्णबिन्यास से वृत्यनुप्रास है । इस प्रकार यहाँ भी शब्द एव अर्थ की समान सभभाविता होने से काव्यत्व की प्रसक्ति है ) ।

अब पुन: कुन्तक कारिका के अवशिष्ट भाग की वृत्ति पर जाते है—द्विवचनेन आदे से । यहाँ ( शब्दाथौ सहितौ-' आदि कारिका मे आये शब्दाथौ के ) द्विवचन से वाच्य-वाचक ( अर्थ और शब्द ) के जातिगत द्वित्व का अभिधान किया गया है । ( जाति नित्य और अनेक समवेत होती है । अत: जातिगत द्वित्व से तात्पर्य है शब्द-अर्थ का नित्य साहित्य एव अनेक शब्दो और अर्थों का साहित्य न कि किसी एक शब्द-अर्थ का साहित्य ) । यदि ( शब्दाथौ से ) व्यक्तिद्रव्य का अभिधान ( अर्थात एक ही शब्द-अर्थ का साहित्य विवक्षित ) होता तब तो एक पद मे उपात्त ( एक ही शब्द-अर्थ ) की भी काव्यता हो जाती । ( अतएव इसके निवारणार्थ ही कारिका मे कहा गया है कि शब्द और अर्थ का साहित्य ) बन्ध मे व्यवस्थित हो । बन्ध-वाक्य-विन्यास—वहाँ ( वाक्यविन्यास मे ) व्यवस्थित-लावण्य आदि गुण एव अलङ्कार से सुशोभित विशेष प्रकार के समविरेश से व्यवस्थापित ( किये गये शब्दार्थ ही काव्य है । ) 'सहितौ' इस द्विवचन मे भी यथासंभव शब्द की स्वजातीय शब्द की अपेक्षा अन्य शब्द से एव अर्थ की स्वजातीय अर्थ की अपेक्षा अन्य अर्थ से परस्पर स्पर्धित्व-रूप ही साहित्य विवक्षित है । अन्यथा शब्द की स्वजातीय शब्द की अपेक्षा शब्दान्तर से एव अर्थ की स्वजातीय अर्थ की अपेक्षा अर्थान्तर से परस्पर स्पर्धित्व रूप साहित्य के अभाव मे तादृश ( काव्यत्व ) की आह्लादकारिता की हानि हो सकती है ।

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असारं संमारं परिसुषितरत्नं त्रिभुवनं निरालोकं लोकं मरणशरणं बान्धवजनम्‌। अदर्पं कन्दर्पं जननयननिर्माणमफलं जगज्जीर्णारणयं कथमसि विधातुं व्यवसित ॥२१॥

अत्र किल कवितावटोऽन्यः काव्यतत्त्वपारङ्गत: काव्ये कान्तां व्यपादयित-मध्यवसितो भवन्तमभिधीयते—यदुपगतसारः संसार हतरत्नसर्वस्वं त्रैलोक्यं, आलोकमनীয়वस्तुवर्जितो जीवलोकः, सकललोकलोचननिर्माणं निषफलप्रायम्‌, त्रिभुवनविजयित्वदपहीनः कन्दर्पः, जगज्जीर्णोण्येकल्पमनया विनाभवतीति किं त्वमेवंविधमकरणीयं कर्तुं व्यवसित इति ।

एतस्मिन् श्लोके महावाक्यकल्पे वाक्यान्तराण्यवान्तर वाक्यसदृशानि तस्याः सकललोकलोचनाभनীয়लावण्यसंपत्तिप्रतिपादनपरा अपि परस्परसपर्द्धिनोऽन्यत-रमणीयानुपनिबद्धानि कमपि काव्यच्छायातिशयं पुष्णन्ति ।

यह यदि शब्दार्थ साहित्य मे उत्तक प्रकार का परस्पर स्पर्धित्वरूप साहित्य न हुआ तो सहृदय पाठक को वहाँ आनन्द नही आयेगा और आनन्द न आया तो काव्यता भी वहाँ नही हो सकेगी ) ।

जैसे—( प्रकृत श्लोक महाकवि भवभूति के ‘मालती माधव’ ( ५।३० ) नामक प्रकरण का है । कामालिक मालती का वध करने के लिए तत्पर है । उसी पर माधव की उक्ति है कि इस अदृष्ट शोभासृष्टि मालती का वधकर तुम ) संसार को नि सार, त्रैलोक्य को रत्नविहीन; संसार को आलोकविहीन, ( मालती के ) बान्धवजनों को मरण मात्र शरणप्राप्त, काम को गर्वहीन, लोगों के नेत्र-निर्माण को व्यर्थ एवं संसार को जीर्ण जंगल बना देने के लिए क्यो तत्पर हो ॥२१॥

इस श्लोक के सौन्दर्य-सौन्दर्य की समीक्षा करने के पूर्व अर्थ करते हुए कहते हैं—अत्रेति । इस किसी प्रबन्ध मे किसी सुन्दरी ( मालती ) को मारने के लिए तत्पर होता हुआ कोई कामालिक ( किसी-साधुव के द्वारा कहा जा रहा है—कि उसके विना यह संसार सारविहीन, त्रैलोक्य अपहृत सर्वस्व, जीवलोक प्रकाशस्वरूप रमणीय वस्तु से विहीन, व्यर्थप्राय सम्पूर्ण जगत् के नेत्रों का निर्माण, काम त्रैलोक्य के लिए' रूप' रूप गर्व ये'हीन और संसार पुराने जंगल सढृशा हो जायेगा । इसलिए तुम इस प्रकार के अकरणीय कार्य को करने मे लगे हो ।

महावाक्य के समानं इस श्लोक मे उपनिबद्ध एक के बाद दूसरे सभी वाक्य अवान्तर वाक्य के समान है । जो उस ( मालती ) की सम्पूर्ण जगत् को लुभाने योग्य सौन्दर्य-संपत्ति के प्रतिपादन मे तत्पर है । परस्पर स्पर्धायुक्त कुछ अनिर्वचनीय ही काव्य की शोभातिशयिता को परिपुष्ट करते हैं । ( किन्तु इनमे एक ही वाक्य खटकता है ) ‘मरणशरणं बान्धवजनम्‌’ यह वाक्य ( अमङ्गल रूपदीप दुष्ट होने के कारण ) इन

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प्रथमोल्लासे:

वान्धवजनमिति न पुनरतेषां कालामात्रमपि स्पर्धितुमर्हतीति न तद्विद्रामाद्धादकारि । बहुषु च रमणीयेषु वाक्योपयोगिषु युगपत्प्रतिभासपदवीमवतरत्सु, वाक्यार्थ परिपूरणार्थं तत्प्रतिभं प्राप्तुमपरं प्रयत्नेन प्रतिभा प्रसाधते । तथा चासिमन्नेव प्रस्तुतवस्तु सन्निधौचारि वस्त्वन्तरमपि सुप्रापमेव—‘विधिमपि विपन्नाद्‌सुतविधिम्’ । इति ।

प्रथमोल्लासेऽभीष्टपदार्थप्रतीत्यानुपदार्थप्रतीत्यानन्तरासम्भवे सुधुमारितरौप्यवैसम्येन

कामपि काञ्चच्छायामुन्मीलयन्ति कवयः । यथा—रुद्राद्रेस्तुल्यं स्वकण्ठविपिनोच्छेदो हरेःवासन् कारावेश्मनि पुष्पकापहरणम्‌।॥२२॥

अन्य वाक्यो की आशामात्र भी स्पर्धा करने योग्य नही है । इसलिए ( अमङ्‌लवाचक होने के कारण ) तद्विद्रो ( काव्यरमंशों ) का आह्लादकारक नही है । ( वस्तुतः ) एक वाक्य के उपयोगी अनेक रमणीय वाक्यो के एक साथ प्रतिति पथ मे अवतरित होने पर ( वाक्यार्थ की पूर्ति न होती हो तो ) वाक्यार्थ की विधिवत्‌ पूर्ति के लिए अवान्तर वाक्यो के समान अन्य वाक्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास करने से प्रतिभा को प्रसाद प्राप्त होता है । ( अर्थात्‌ प्रतिभा निर्मल होकर तदनुरूप अन्य वाक्य प्रस्तुत करने मे सक्षम हो पाती है । ) यहाँ कवि की प्रतिभा एक अवान्तर वाक्य ‘मरणाहरणम्‌’ आदि मे चूक गयी । प्रयास किया गया होता तो शायद कवि से यह अनवधानता न हो पाती ) । इसी श्लोक मे प्रस्तुत वस्तु ( ‘स्मरणाहरणं वान्धवजनम्‌’ के अतिरिक्त अन्य अवान्तर वाक्यो ) के समान ( सुन्दर ) दूसरी वस्तु ( मरणाहरणं वान्धवजनं के स्थान पर अन्य वाक्य रचना ) आसानी से प्राप्त हो ही जाती है । वह है—विधिमपि विपन्नाद्‌सुतविधिम् ( ब्रह्मा को भी क्यो विपन्न सुन्दर सृष्टि करना चाहते हो ) ? यह वाक्य ( ‘मरणाहरणं वान्धवजनम्‌’ के स्थान पर रखा जा सकता है । और इस प्रकार उत्त दोष दूर हो जाता है । किन्तु प्रयास के अभाव मे कवि से असावधानी हो गयी । अतः शब्द की स्वजातीय शब्द से अन्य के साथ एवं अर्थ की स्वजातीय अर्थ की अपेक्षा अन्य अर्थ के साथ परस्पर स्पर्धायुक्त ही साहित्य “साहित्य” के द्विवचन से अभिप्रेत है ।

कविगण वाक्य-रचना मे प्रथम प्रतीत पदार्थ के प्रतिभटभूत अर्थात्‌ तत्स्पर्धी अन्य-पदार्थ के असम्भव प्रतीत होने पर उससे भी कोमल अपूर्व पदार्थ के समर्पण से कुछ अकथनीय ही काव्यच्छटा का उन्मीलन करते है । जैसे—रावण का महत्त्व प्रतिपादित किया गया है ) हिमालय को तुच्छ कर देना, ( अपने ही भगवान् शंकर की प्रसन्नता के लिए अपने कण्ठस्वरूप अरुण्य का उच्छेदन ( दस शिरों का कर्त्तन्‌ ), इन्द्र को कारागृह मे निवासित कराना एवं पुष्पक का अपहरण आदि कर लेना ( आदि जिसके इस प्रकार के विलास हैं ) ।॥२२॥

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इत्युपनिबद्धच पूर्वोपनिबद्धपदार्थानुरूपवस्त्वन्तरासंभवादपूर्वमेव "यस्येदृशा: केऽय:'" इति न्यस्तम्, येनात्रेडपि कामपि कमनीयतामन्वियन्त ।

यथा च —

तद्वक्त्रेन्दुविलोचनेऽनुदिवसो नित: प्रदोषस्थिता तद्रोष्ठौ च निशापि मन्थथकृतोत्साहैस्तदझैर्जौ:' ।

तां सप्रत्युपि मार्गदत्तनयनां दृष्टुं प्रवृत्तस्य मे बद्धोत्कण्ठोमिमदनत: किम .............. ॥रिश:॥

इति संप्रत्युपि तामेवविघां वीक्षितुं प्रवृत्तस्य मम मन: किमिति बद्धोत्कण्ठ-मिति परिसमाप्तेडपि तथाविधवस्तुविन्यासो विहित:—

...... अथवा प्रेमासमाप्तोत्सवम् ॥ इति ।

येन पूर्वेषां जीवितमिवार्पितम् ।

यचापि दृयार्पयेतयोसतत्प्राधान्येनैव वाक्योपनिबन्ध:; तथापि कविप्रतिभा प्रौढिरेव प्राधान्येनावतिष्ठते । शब्दस्यापि शब्दान्तरेण साहित्यविरहोदाहरणं यया —

इस प्रकार यहाँ रावण के श्लाधयक्तो का वर्णन करके प्रथम वर्णित पदार्थों के अनुरूप अन्य वस्तु का होना असम्भव होने के कारण पूर्व ही वस्तु—जिसकी इस प्रकार की विलास-कीड़ाएँ है—यह अवान्तर वस्तु कवि से विन्यस्त की गयी है । जिससे अन्य कथा भी किसी अनिर्वचनीय कमनीयता को प्राप्त करा दिये गये है । और जैसे—

( तापसवत्सराज नाटक के प्रथम अङ्क में वासवदत्ता के लिए उदयन की यह उक्ति है ) उस ( वासवदत्ता ) के मुखचन्द्र को देखते ही दिन व्यतीत कर दिया, तथा प्रदोष ( सन्ध्या ) काल भी उसके साथ वार्तालाप-संभाषण ( गोष्ठी ) से ही व्यतीत कर दिया, काम से पैदा किये गये उत्साह से उसके द्वारा अन्धों के अपण ( सुख ) से रात्रि भी विता दी । इस समय भी ( मेरे आगमन के ) पथ पर आँखें लगाये हुए उसी को देखने के लिए मेरा यह मन क्यो उत्कण्ठा से मुक्त हो रहा है? ॥२३॥

इस प्रकार इस रचना मे 'इस समय भी इस प्रकार की उसे देखने के लिए प्रवृत्त मेरा मन क्यो उत्कण्ठायुक्त हो रहा है' इस कथन के बाद वाक्य के समाप्त हो जाने पर भी अन्त मे उक्त कथन के समर्थन-हेतु इस प्रकार का वस्तुविन्यास कवि के द्वारा किया गया है—'अथवा प्रेम का आनन्द कभी समाप्त नही होता ।' जिससे पूर्व उक्तियों मे जीवन-सा डाल दिया गया है ।

यद्यपि इन दोनों ( (१) दृशादृशे: इत्यादि एवं (२) तद्वक्त्रेन्दु इत्यादि ) रचनाओं मे ही उनके ( शब्द अर्थ के परस्पर स्पर्धित्वरूप साहित्य के ) प्राधान्य से ही वाक्यो का विन्यास किया गया है, तथापि इनमे कवि की प्रतिभा की पारिपक्वता ही प्रधानतया वर्तमान है ( तात्पर्य यह कि शब्दार्थ साहित्य मे परस्पर स्पर्धित्ल कविप्रतिभा पर ही

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चारुता वपुरभूषयदासां तामनूननवयौवनयोगः ।

तं पुनर्मकरकेतनलक्ष्मीस्तां मदो दयितसज्जमभूषः ॥२४॥

दयितसंगमस्तामभूषयदिति वक्तव्ये । कीदृशो मदः, दयितसज्जमो भूषा यस्यैति । दयितसज्जमशब्दस्य प्राधान्येनाभिमतस्य समासवृत्तावन्तर्भूतत्वाद् गुणीभावो न तद्विदाह्लादकारी । दीपकालङ्कारस्य च काव्यशोभाकारित्वेनोपन-

अवलम्बित है । कवि प्रतिभा की न्यूनता ही काव्य में न्यूनता की सृष्टि करती है । असावधानी प्रतिभा क्षीणता का ही परिणाम है । ‘असार संसारम्’ आदि में कवि-प्रतिभा की अपौढ़ता ही दोष का कारण बन गयी । अतः काव्य-रचना में प्रतिभा प्रधान तत्व है, यह कुन्तक का मत सिद्ध होता है ।

श्रब तक कुन्तक ने शब्द और अर्थ का परस्पर स्पर्धितस्वरूप साहित्य दिखाकर काव्यत्व की अपनी परिभाषा को युक्तियुक्त सिद्ध किया, साथ ही ‘असार संसारम्’ आदि में अर्थ का अर्थान्तर से साहित्यविरह भी दिखलाया । अब आगे वह शब्द का शब्दान्तर से विरह सिद्ध करने के लिए कहते हैं—शब्दस्यापीति । शब्द का भी दूसरे शब्द से ( परस्पर स्पर्धितस्वरूप ) साहित्यविरह का उदाहरण जैसे माघ ( १०।३३ ) का यह श्लोक है । ( वृत्तान्त रघुवंश पर यादवों के विहार का है । यादव अज्झनाओं

के मदिरापान एवं उनके सौन्दर्य का विवेचन किया गया है )—

इन गोपाझनाओ ( यादव-पलियो ) के शरीर को सुन्दरता ने विभूषित किया । उस सुन्दरता को ( रमणियो के ) परिपूर्ण यौवन के संयोग ने, और उस यौवनसंगम को मकर केतु काम की शोभा ने और उस मदनश्री को प्रियतम-समागम अलङ्कार-वाले ( दयित-प्रिय का सङ्झम-समागम ही जिसकी भूषा अलङ्कार है ) ( मदिरा के ) मद ने विभूषित किया ॥२४॥

विवेचन करते हैं—प्रिय ( दयित ) के सङ्झम ने उस ( मदनश्री ) को विभूषित किया ( जहाँ ) ऐसा कहना चाहिए ( वहाँ कवि ने उस मदनश्री को मद ने अलङ्कृत किया यह कह दिया ) और वह मद क्या है? प्रिय’ का सङ्झम जिसकी भूषा है ( उस मदनश्री को मद ने विभूषित किया )! इस प्रकार इस उक्ति में दयित सङ्झम शब्दप्रधान तथा अभिमत है । किन्तु समासवृत्ति में अन्तर्लीन हो जाने के कारण उसका गुणीभाव ( उपसर्जन, गौणत्व ) हो गया है जो काव्यज्ञ जनों को आह्लादकारी नहीं है । ओर दूसरी बात यह है कि इस श्लोक में दीपक अलङ्कार काव्यशोभाकारी

के रूप में उपनिबद्ध है, किन्तु उसका निर्वाह ठीक से नही किया । उपमार के समय वह भङ्झप्राय हो गया है जिससे प्रकमभङ दोप भी बन गया है। इस दोष के कारण सरसहृदय व्यक्ति में वैरस्य उत्पन्न होना अनिवार्य ही है । इस दोष से बचने के लिए ‘दयित सज्जतिरेनम्’ यह पाठान्तर तो सुप्रसिद्ध ही है ( किन्तु कवि को स्फुरित नही हुआ । यह पाठान्तर स्वयं कुन्तक ने सुझाया है ।)

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वद्रस्य निर्वहणावसरे छुतितप्रायत्वात् प्रक्रमभङ्गविहितं सरससहृदयवैरस्यमात्रवायंम् ‘दयितसङ्झतिरेनम्’ ।

द्वयोरप्येतयोरुदाहरणयोः प्राधान्येन प्रत्येकमेकतरस्यसाहित्यविरहो व्याख्यात् । II परमार्थतः पुनरुभयोरप्येकतरस्य साहित्यविरहोऽन्यतरस्यापि

कुन्तक के इस विवेचन मे ‘दीपक’ अलङ्कार कथन की बात काव्यशास्त्रीय लक्षणों से प्रमाणित नही होती । प्रायः सभी आचार्यों ने दीपक को उपमा वर्ग का अलङ्कार माना है । अतः वर्णन का उपमा मे पर्यवसान होना चाहिए जो कि इस उक्ति मे नही है । दीपक मे क्रिया गुण रूप धर्म प्रस्तुत, अप्रस्तुत दोनो वाक्यो मे एक होता है—

सकृदुक्तिस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनोः । सैव क्रियासु बह्वीषु कारकस्यैतिदीपकम् ॥ का० प्र० १०।१०३

यहाँ दीपक न होकर एकावली अलङ्कार ही अधिक उपयुक्त है । एकावली का लक्षण है—

वस्तूपरस्त्य विशेषणतया स्थापनोपहितैकावली ।

अर्थात् प्रथम के अनुसार पर का विशेषण रूप मे स्थापन या अपोहन ( निवर्तन ) एकावली अनुकार है । इस प्रकार यहाँ प्रथम के प्रति उत्तर—उत्तर का विशेषणरूप मे विन्यास होने के कारण एकावली अलङ्कार ही अधिक समीचीन है । किन्तु इसका समाधान सम्भवतः कुन्तक के ही दीपक लक्षण से हो सकता है । कुन्तक का दीपक लक्षण है—

औचित्यावहमम्लानां तत्त्वदाहादकारणम् । अशक्तधर्ममार्याना दीप्यदस्तु दीपकम् ॥

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प्रथमोऽनमेषः ]

पर्यवस्यति । तथाचार्यः: समरथवाचकासद्भावे स्वात्मना सुप्तरन्नीति मृत्कल्प-

एवावतिष्ठते शब्दोऽपि वाक्योपयोगिवाच्यसंभवे वाच्यान्तरवाचक सन्

वाक्यस्य व्याधीनूत प्रतिभातीलमतिप्रसङ्गेन ।

प्रकृतं तु। क्रियाश्रे बन्धे-वक्रोक्तिवैचित्र्यापारशालिनी । वक्रो योऽसौ शास्त्रादि-

प्रसिद्धशब्दार्थोपनिबन्धव्यतिरेकी षट्प्रकारवक्रताविशिष्ट: कविव्यापारस्त-

एक: प्रकाशयन् सन्तं भूतोसि भूतसा क्वाचित् ।

केवलं पक्तिसस्त्यं वा द्विविध परिहस्यते ॥

व० जी० ३।१५-१७

अथांत् अर्थों के अशक्त धर्म रूप पदार्थ को प्रकाशित करनेवाला दीपक होता है। वह दो प्रकार का है—केवल और पक्ति । जहॉ बहुते का प्रकाश एक वहॉ केवल, अनेकौ के अनेक प्रकारक वहॉ पक्ति ( माला दीपक )। इस प्रकार उक्त मे केवल दीपक हो सकता है। पं० विश्वेश्वर ने कुन्तक के लक्षण से ही उक्त मे दीपक की बात कह दी है, किन्तु उन्होंने घटित नही किया । पर कुन्तक के उदाहरणो से लगता यही है कि अनेक लक्षण और उदाहरण भी औरों के ही दीपक के पोषक है। अतः वह समाधान जो आचार्य विश्वेश्वर मानते है वह उतना सासयुक्त नही लगता।

वस्तुतः यहाँ पंडितराज जगन्नाथ की उक्ति का सहारा लेना अधिक अच्छा होगा। पंडितराज का रसगङ्गाधर मे कथन है कि शृङ्गालमूलक रत्नावली आदि अलकारों मे दीपक की प्रायः अवस्थिति पायी जाती है। इस दृष्टि से ही यहाँ दीपक को माना जा सकता है। शायद कुन्तक भी इस दृष्टि से परिचित थे। इसी आधार पर उन्होने यहाँ रूपक का विवेचन किया है।)

इन दोनों ( श्लोक २९ तथा २४ ) उदाहरणो मे एक-एक मे ( क्रमशः अर्थ एवं शब्द के ) साहित्यविरह की व्याख्या की गयी है ( अर्थांत् 'असारं संसारं' मे अर्थविरह की एवं 'वस्तावपु:' आदि मे शब्दविरह की व्याख्या दिखाई गयी है )। वस्तुतःथ तो यह है कि इन दोनो ही उदाहरणो मे एक के भी ( चाहे अर्थ का हो या शब्द का ) साहित्यविरह होने पर उसका पर्यवसान दूसरे के भी साहित्यविरह मे ही जाता है ( अर्थांत् जहॉ अर्थविरह दिखाया है वहाँ शब्दविरह अपने आप हो जाता है क्योंकि अर्थ शब्दमिश्रित है—ऐर-जहॉ शब्दविरह है वहॉ अर्थ विरह भी हो ही जाता है उक्त रीति से।) और अर्थ ( वाक्योपयोगी ) समर्पक शब्द ( वाचक ) की.. अनु-

पस्थिति मे अपने आप सुनिश्चित होता हुआ भी मृत-सा होकर रह जाता है और वाक्यो-

पयोगीऽर्थे: के सम्भव न होने पर शब्द भी अन्य अर्थ (प्रकृतानुपयोगी ) का

वाचक होकर वास्य का व्याघातभूत-सा प्रतीत होता है। इस प्रकार अब शब्दार्थ-

समहिल्य के प्रसङ्ग का अधिक विस्तार प्रासङ्गिक नही होगा ।

पुनः उक्त काव्य-निपुणेक कार्यका की व्याख्या मे चलते हैं—प्रकृतं आदि से ।

'अब प्रसङ्ग तो यह है ( कि वह शब्दार्थ-साहित्य ) किस प्रकार के बन्ध मे ( व्यवस्थित

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३२

[ वक्रोक्तिजीवित

त्कियाक्रमस्तेन शालते ह्लाघते यस्तस्मिन् । एवमपि कष्टकल्पनोपनेयोऽपि प्रसिद्धव्यतिरेकितवमस्तीत्याह—तद्विदाह्लादकारिणि । तदिति काव्यपरामर्शः । तद्विदन्तीति तद्विदस्तज्ज्ञातृषेषामाह्लादमातन्वं करोति यस्तस्मिन् तद्विदाह्लाद-कारिणि ग्रन्थे व्यवस्थितौ । वकृतां वक्ताप्रकारस्तद्विदाह्लादकारित्वं च प्रत्येकं यथावसरमवोदाहरिष्यन्ते ॥५७॥

एवं काव्यस्य सामान्यलक्षणे विहिते विशेषलक्षणमुपक्रमते । तत्र शब्दार्थ-योस्तावत्स्वरूपं निरूपयति—

तथापि काव्यमार्गेऽस्मिन् परमार्थोड्यमेतयोः ॥५८॥

होकर काव्यपदव्यपदेश्य होता है ?)—वक़कविव्यापार से शोभायमान ( बन्ध मे व्यवस्थित शब्दार्थ का साहित्य काव्य है )। वक्—जो यह, शास्त्रादि मे प्रसिद्ध शब्द और अर्थ का उपनिबन्धन है उससे व्यतिरिक्त ( वक्ष्यमाण ) छः प्रकार की वकता से विशिष्ट कवि का व्यापार अर्थात् कविकर्म ( काव्य ) की परम्परा उससे जो शोभित होता है—प्रतिष्ठित होता है। उस बन्ध मे (व्यवस्थित शब्दार्थ काव्य है )। ( इस पर प्रश्न हो सकता है कि ) इस प्रकार लक्षण होने पर भी कष्ट कल्पना से पीडित रचनाओं मे भी शास्त्रादि प्रसिद्ध शब्दो या अर्थों से व्यतिरिक्तता तो हो ही जाती है। ( फिर काव्य का वैशिष्ट्य क्या हुआ ?) ( उत्तर देते है ) इसीलिए तो कहा है—तद्विदो को आह्लाद पैदा करने वाले ( बन्ध मे अवस्थित शब्दार्थ काव्य है )। ( यहाँ 'तद्वि-दाह्लादकारिणि' पद मे ) 'तत्' इस पद से काव्य का बोध होता है। ( तत् काव्य को ) उसको जो जानते है वे तद्विद् है अर्थात् उसके ( काव्य के ) जानकार, उनका आह्लाद—आनन्द जो करता है, ऐसे तद्विद् आह्लादकारी बन्ध मे व्यवस्थित ( शब्दार्थ साहित्य काव्य है )। वकता, वकता के भेदों तथा तद्विद् आह्लादकारिता प्रत्येक यथास्थान प्रस्तुत किये जायेंगे ॥५७॥

' ध्यातव्य यह है कि कुन्तक ने यहाँ भामहसम्प्रदायस्वरूप 'शब्दार्थों सहितौ काव्यम्' को ही स्वीकार किया है। भामह से कुन्तक का वैशिष्ट्य मात्र इतना ही है कि कुन्तक ने भामहोक्त लक्षण की विस्तृत व्याख्या कर दी है।

इस प्रकार काव्य का सामान्य लक्षण किया । इसके बाद विशेष लक्षण का उपक्रम करते हैं। उसमें भी ( विशिष्ट ) शब्द-अर्थ का स्वरूप निरूपण करते हैं (आगे की कारिका से)—

'यद्यपि यह प्रसिद्ध है कि अर्थ वाच्य एवं शब्द वाचक कहा जाता है । तथापि इस ( वक्ष्यमाण ) काव्यमार्ग में इन दोनों का वास्तविक अर्थ ( स्वरूप ) तो यह ( आगे नवों कारिका में वक्ष्यमाण ) है ॥५८॥

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प्रथमोऽनुच्छेदः ]

इति एवंविधं वस्तु प्रसिद्धं प्रतीतम्—यो वाचकः स शब्दः; यो वाच्यश्राभिधेय सोऽर्थ इति । ननु च द्योतकव्यज्जकावपि शब्दौ सम्भवतः, तदसंग्रहात्तन्न व्याप्तिः; यस्मादर्थप्रतीतिकारित्वसामान्यादुपचाराद्वाचकावेव । एवं द्योत्यद्यंगयोरर्थयोः प्रत्येयत्वसामान्यादुपचाराद्वाच्यत्वमेव । तम्माद्वाचकत्वं वाच्यत्वं शब्दार्थयोरेव सुप्रसिद्धं यदपि लक्षणं, तथाप्यस्मिन् अलौकिके काव्यमार्गे कविकर्मवर्त्मनि, अयमेत्योर्वक्ष्यमाण लक्षणः परमार्थः; किमप्यनृतं तत्त्वमिव्यर्थः । कीटशमित्याह—

शब्दो विवक्षितार्थंकवाचकौडन्येषु सत्स्वपि ।

अर्थः सहृदयाह्लादकारि स्वस्पन्दसुन्दर ॥ ८ ॥

सः शब्दः काव्ये यस्तत्रसूचित समस्त सामग्रीकः । कीटक_विवक्षितार्थैंकवाचक । विवक्षितोऽसौ वक्तुमिष्टोऽर्थस्तदेक वाचकः, तस्य एकः केवल वाचक ।

इस प्रकार की वस्तु प्रसिद्ध-प्रतीत है । जो वाचक होता है वह शब्द है, और जो वाच्य-अभिधेय ( अभिधा से बोध्य अर्थ होता है ) होता है वह अर्थ है । ( प्रश्न हो सकता है शब्द द्योतक तथा व्यज्जक भी होते है उनका अपने लक्षण मे ग्रहण नहीं किया ? उत्तर देते है प्रश्नपूर्वक ) द्योतक और व्यज्जक भी शब्द हो सकते है ? लक्षण मे उनका ग्रहण न करने से अव्यासि दोष नही होगा । क्योंकि द्योतक और व्यज्जक शब्दो मे भी अर्थप्रतीतिकारित्वसामान्यता पायी जाती है । अत उपचार ( गौणवृत्ति ) से वे भी वाचक ही होते है । इसी प्रकार द्योत्य और व्यङ्गक अर्थों मे भी अर्थप्रतीतिकारित्व सामान्यता पायी जाती है इसलिए उपचार से उनमे भी वाच्यता ही होती है । इसलिए यद्यपि लोक मे शब्द और अर्थ की क्रमशः वाचकता एवं वाच्यता यह लक्षण अच्छी तरह प्रसिद्ध है, फिर भी इस अलौकिक काव्य मार्गकविर्म वृत्ति मे इन दोनो का वक्ष्यमाण स्वरूप यह परमार्थ कुछ अनिर्वचनीय लोकोत्तर ही तत्व है । यह अर्थ हुआ ॥ ८ ॥

वह ( परमार्थ ) कैसा है ? कहते है—

‘अन्य शब्दो के रहते भी विवक्षित अर्थ का एकमात्र वाचक शब्द ही वाचक ( वास्तविक ) शब्द कहा जाता है । और सहृदयग्रहृदय को आह्लादित करने वाला तथा अपनी स्वाभाविकता से सुन्दर अर्थ ही ( वास्तविक अर्थ ) कहलाता है ॥ ९ ॥

काव्य मे वही शब्द ( प्रयोज्य है ) जो उस ( काव्य ) के लिए विधिवत् उपयुक्त समस्त सामग्रियो से युक्त हो । किस प्रकार का ( शब्द ऐसा होता है ? )—विवक्षित अर्थ का एकमात्र वाचक । अर्थात् विवक्षित जो यह कहने को अभीष्ट अर्थ होता है, उसका एक वाचक—उसका एक ही मात्र वाचक । कैसे ?—उसके वाचक अन्य बहुत ( शब्दों ) के उपस्थित रहने पर ( जो विवक्षित अर्थ का मात्र वाचक होता है, वही वास्तविक शब्द है ) । इसलिए सामान्य रूप से जो अर्थ ( कवि को ) कहना

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

एव वाचकः । कथमन्येषु सत्त्वापि । अपरेपु तद्वाचकेषु बहुष्वपि विद्यमानेधु । तथा च सामान्यात्मना वक्तुमभिप्रेतो योऽर्थस्तस्य विशेषाभिधायै शब्दः समीयगू वाचकता न प्रतिपघते । यथा—

कल्कोऽलवेल्लिततटपटपरुषप्रहारैरत्नान्यमूनि मकराकर मावमस्थाः ।

कि कौस्तुभेन भवता वीरहितां न नीमो याचप्रसारितकरः पुरुपोत्तमोऽपि ॥ २५ ॥

अत्र रत्नसामान्योक्तिप्रकर्षाभिधानिनुपक्रान्तम् । कौस्तुभेनेति रत्नविशेषाभिधायी शब्दस्तद्विशेषोक्तिप्रकर्षाभिधानमुपसंहरति । प्रक्रमोपसंहारवैषम्यं न शोभातिशयमावहति । न चैतद्रकृतं शक्यते—यः करिचद्विशेषो गुणग्रामगरिमा विद्यते स सर्वसामान्येऽपि संभवत्येवि । यस्मात्—

वाजिवारणलोऽडानां काष्ठपाषाणवाससाम् । नारी पुरुषतोयानमन्तरं महदन्तरम् ॥ २६ ॥

तस्मादेवंविधे विषये सामान्याभिधायैव शब्दः सहृदयहृदयहारीतां प्रतिपघते । तथा चास्मिन् प्रकृते पाठान्तरं सुलभमेव—

अमीष्ट है उस अर्थ का विशिष्टतया अभिधान करनेवाला शब्द समुचित वाचकता को नही प्राप्त होता । जैसे—हे मकराकर ( समुद्र ) ! लहरो से छुदकते पत्थरो के कठोर प्रहारो से इन ( अपने मे ही वर्त्मान ) रत्नो का तिरस्कार न करो । क्या तुम्हारे इनही रत्नो मे से कौस्तुभ ने पुरुपोत्तम भगवान विष्णु को भी आपसे माँगने के लिए फैलाये हाथो वाला नही बना दिया ? ( अर्थात् तुम्हारी एक कौस्तुभमणि ने पुरुषोत्तम को तुम्हारे सामने याचक बना दिया । अत ये रत्न तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है उनका तिरस्कार नही करना चाहिए । )

यहाँ रत्नसामान्य के उत्कर्ष वतानेवाले वृत्तान्त का वर्णन प्रारम्भ किया था । किन्तु ‘कौस्तुभेन’ यह शब्द जो कि रत्नविशेष ( कौस्तुभ मणि मात्र ) का वाचक है उस ( रत्न कौस्तुभ ) विशेष ( मात्र ) के उत्कर्ष का अभिधायक है ( इसलिए उपक्रान्त रत्नसामान्य का उत्कर्षाभिधान ) समाप्त हो जाता है । इस प्रकार यहाँ प्रारम्भ तथा उपसंहार मे विषमता होने से ‘( प्रक्रमभङ्ग’ रूप दोष हो जाता है—जैसा प्रारम्भ हो उपसंहार मे भी वर्णन तदनुरुप होना चाहिए, अन्यथा प्रक्रमभङ्ग रूप दोष होता है । इसलिये ऐसा वर्णन शोभातिशय को नही पैदा करता । और ( यदि कोई यह कहे कि ) विशेष ( कौस्तुभ ) मे जो कोई भी गुण वर्ग का गौरव है, वह सम्पूर्ण सामान्य रत्नो मे भी हो ही सकता है ? तो यह नही कहा जा सकता । क्योकि—

अश्व, हाथी, लौह, काष्ठ, पाषाण ( पत्थर—रत्नादि, मणियो ) वच्र, स्त्री, पुरुष और जल ( आदि मे अपने सवर्गीय से ही ) अन्तर, महान् अन्तर है । पदाथों मे ‘नक स्वर्गीय से ही महान् अन्तर देखा जाता है ) इसलिए इस प्रकार

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प्रथमोऽपे: ]

एकैन कि न विहितो भवत: स नाम, इति ।

यत्र विशेषात्मना वस्तुप्रतिपादयितुमभिमतं तत्र विशेषामिधायकमेवाभिधानं निवद्धान्ति कवय: । यथा—

द्रयंगतं सम्प्रति शोचनीयतां समागमप्रार्थनाया कपालिन: ।

कला च साकान्तिमतिकलावत स्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी ॥ २७ ॥

अत्र परमेश्वरवाचक शब्द सहृदयसंभवेडपि कपालिन इति भीत्सरसलम्बनविभाववाचक: शब्दो जुगुप्साप्रदत्वेन प्रहुष्ट्यमान: कामपि वाचकवकतां विधत्ते । ‘सम्प्रति' 'द्रयं' चेत्यतीव रमणीयम् । यत् किल पूर्वमेका सैव दुर्व्यसनदूषितत्वेन शोचनीया संजात, सम्प्रति पुनस्त्वया तस्यास्थाविध-

के ( विवक्षित सामान्य जैसे ) विषय मे सामान्य अर्थ का वाचक ही शब्द सहृदयहृदय को हरण करने की क्षमता रखता है । और जैसे कि इस प्रस्तुत श्लोक कल्लोलवेल्लित ) मे पाया जाता है—‘एकैन किं न विहितो भवत: स नाम' एक ( कौस्तुभ ) से ही क्या आपके समक्ष वह पुरुषोत्तम्‌भी याच्ञ्चा के लिए हस्तप्रसारित बना दिये गये ? ( इस प्रकार प्रकमोपसंहार वैषम्य दोष से सहज ही बचा जा सकता था ।

.जहाँ वस्तु का विशेषतया-प्रतिपादन- अभीप्रेत होता है वहाँ कविगण विशेष के ही अभिधायक शब्द ( अभिधान ) का निवन्धन करते हैं । जैसे—, महाकवि कालिदास प्रणीत ‘कुमारसम्भवम्‌' महाकाव्य के इस ( ५।७९ ) श्लोक मे है । यहाँ उस समय का वर्णन है जब भगवान् शिव ब्रह्मचारी के रूप मे पार्वती की परीक्षा के लिए तपोवन मे पधारे है । भिक्षुरूप वह जटिल भगवान् शिव की निन्दा करते हुए उनमे पार्वती के अनुराग को व्यर्थ बताते हुए कह रहे हैं—

कपालिन् ( मुण्डमाला धारण करने वाले भगवान् शंकर ) के सम्प्राप्ति की अभिलाषा से कलावान् ( चन्द्रमा ) की सुन्दर वह कला और इस लोक ( जगत् ) के आखो की जोन्हाई तुम ( पार्वती ) इस समय दोनो ही शोचनीय अवस्था को प्राप्त हो गयी है ॥ २७ ॥

यहाँ प्रकृत वर्णन मे परमेश्वर ( शिव ) के वाचक अनेक शब्दो के सम्भव होने पर भी भीत्स रस के आलम्बनभूत विभाव ( मुण्ड आदि ) का वाचक, ‘कपालिन्‌' यह शब्द घृणा के प्रतिष्ठापक के रूप मे प्रयोजित किया गया है, अलौकिक ( अकथनीय ) ही वाचकवकता को पैदा करता है । 'सम्प्रति', 'द्रयं' ये दोनो शब्द भी अत्यन्त रमणीय है । ( वह इस प्रकार ) जो पहले अद्वितीय ( कलावान् की कला ) थी वही के कारण शोचनीय हो गयी थी और फिर इस समय तुमने ( पार्वती ने ) भी उसी के उस प्रकार के ( कपाली को प्राप्त करने की अभिलाषा रूप दुर्व्यसनता ) कष्टसाध्य

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संसरम्भः करिकटमेघशकलोडरशन सिहस्य य सर्वस्यैव स जातिमात्रविहितो हेवाकलेशः किल ।

इत्याशाद्विरलक्ष्याम्‍भुदघटावन्धेडप्यसंरघवान्‍ योऽसौ कुत्स चमत्कृतरतिशयं यात्वम्भिका केसरी ॥ २८ ॥

अत्र करिणां ‘कीट’ त्यपदेशेन तिरस्कारः, तौयदानां च ‘शकल’ ‘शब्द-विधेयतां नोदैर्‌; ‘सर्वस्य’ इति ‘जातेःच’ यस्माद्‌वस्याचिन्तुच्छतरप्रायस्तयेह तु, जातेरच ‘मात्र’ शब्दो विशिष्टत्वेनावलप्‍ते; हेवाकस्य ‘लेश’ शब्दाभिधाने नात्प्रातिपत्तिरित्यते विवक्षितार्थैकवाचकत्वं द्योतयन्‍ति । ‘घटावन्‍ध’ शब्दश्र प्रस्तुतमहत्त्वप्रतिपादनपरत्वेनोपहितरतन्नवन्धनतां प्रतिपद्यते । विशेषोपामिधानाकाड्‌क्षण पुनः पदार्थस्वरूपस्य तत्प्रतिपादनविरोषणशून्यतया शोभाहानिरुतपद्यते । यथा—

यात्रानुबिल्लिखिताख्यमेव निखिलं निर्मानमेतद्‌विधे- रुत्कर्षप्रतियोगिकल्पनापमिन्यक्कारकोटिःपरा ।

हस्तिरूपी कीड़े एव मेघरूपी को उद्दे शय कर सिंह का जो आवेश है वह तो सभा ( सिंहा ) की जातिमात्र से आप्त समास्य का अभिमान है ( ऐसा सोचकर ) दिग्गजो एवं प्रलयकालीन मेघो के घटाघोप पर भी आविष्ट न होने वाला जो यह मो ( दुर्गा, का वाहनभूत सिंह है, वह चमत्कार की अतिशयिता हेतु कहलां जाये ॥२८॥

यहाँ ( उक्त श्लोक मे ) ‘कीट’ कथन से हाथियो का तिरस्कार सूचित होता है । और ‘शकल’—खण्ड शब्द के कहने से मेघो का अनादर किया गया है । ‘सर्वस्य’ ( सभी सिंहो के ) पद से जिस किसी अत्यन्त तुच्छ प्राय ( सिंह ) ( अर्थ व्यक्त होता है ) जो उसका तिरस्कार व्यक्त करता है और जाती के ‘मात्र’ शब्द से विशिष्ट करकै कहने से ( अम्बिका के सिंह का ) दर्प सूचित किया जाता है । ‘लेश’ शब्द से अभिधान किये जाने से ( हेवाक के ) स्वल्पता की प्रतीत होती है । इस प्रकार ये सभी शब्द विवक्षित अर्थ की एकवाचकता द्योतित करते है । और ‘घटावन्ध’ शब्द प्रस्तुत ( अम्बिका केसरी ) वस्तु के महत्त्व प्रतिपादक के रूप मे उपात्त है । और वह उस महत्त्व की प्रतिपादकता को प्राप्त होता है । किन्तु विशेषप रूप से प्रतिपादन के योग्य पदार्थस्वरूप की शोभा मे कमी पैदा हो जाती है । यदि उसके प्रतिपादन करने वाले विशोषणो से शून्य ( दाब्दो का प्रयोग किया गया हो ) । जैसे—

जिस ( चिन्तामणि ) के रहते प्रजापति की यह सम्पूर्ण सृष्टि रचना नामोल्लेख के भी योग्य नही रह जाती और जिसके उत्कर्ष के समान किसी और वस्तु की कल्पना, ( उसके ) तिरस्कार की अन्तिम सीमा है । जिसके ऐश्वर्य प्राणधारियो के मनोरथ की गति को लाँधकर ( दूर तक ) चले गये है । उसके आभासमात्र से मलिन होते हुए भी मणिस्वरूप ‘प्रतीत होनेवाले पत्थरो मे मणि ( विशोष चिन्तामणि ) की पत्यरता ( प्रस्तुतरुपता ) हि उचित है । ( सामान्य जनो के बीच विशिष्ट व्यक्तिको भी

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याता. प्राणभृतां मनोरथगतीह्लाद्ययत्संपदस्त्र्याभासमणीकृताइ़मसु मणेरसमत्वमेवोचितम् ॥ २९ ॥

अत्र ‘आभास’शब्दः स्वयमेव मात्रादिविशिष्टत्वमभिलष्यंल्लक्ष्यते । पाठान्तरम्—छायामात्रमणीकृताइ़मसु मणेसतस्याच सतैवोचितां इति । एतच्च वाचकवक्ताताप्रकारस्वरूपनि रुपणावसरे प्रतिपदं प्रकटीभाविष्यत इत्यल- मतिप्रसङ्गेन ।

अर्थेइच वाच्यलक्षण कीतर्ह: ? काव्ये यः सहृदयाह्हादकारिस्वस्पन्दसुन्दरः। सहृदयाः काव्यार्थविदस्तेइ़शाम ह्हादसमन्वदं करोति यस्तेन स्वस्पन्देनात्मीयेन स्वभावेन सुन्दरः सुकुमार । तदेतदुक्तं भवति यदपि पदार्थेस्य नानाविधर्मेखचितं संबवति तथापि तथाविधेन धर्मेण सम्बन्धः समाख्यते यः सहृदयह्हदयाह्ह्लादमधातुं क्षमते । तस्य च तदा ह्हादसामध्यें संभाङ्यतेयेन काचिदेव स्वभावमहतारसपरिपोपाझत्वं वा

यदि वैसा ही माना जाता है तो यह उसका तिरस्कार है क्योंकि उसके आभास सम्पर्क मात्र से भी और लोग रत्न वन जाते है ॥ २९ ॥ प्रकृत लोक को आचार्य मम्मट ने अर्थदोष के 'नियम' पर्यायत्वरूप दोष के उदाहरण मे अपने 'काव्यप्रकाश' मे प्रस्तुत किया है ।

यहाँ इस इलोक मे स्वयं 'आभास' शब्द ही मात्र आभि विशिष्टता को प्राप्त करने की अभिलाषा करता हुया प्रतीत होता है । ( अर्थात् आभास शब्द मे मात्र पद का प्रयोग अपेक्षित है न लगाने से दोष आ गया है ।) अत यहाँ यह पाठान्तर भी हो सकता है—'छायामात्रमणीकृताइ़मसु मणेसतस्यामतैवोचिता—छायामात्र से अमणि ( प्रस्तर ) को भी मणि कर देने वाली उसकी प्रस्तरता ही उचित है । यह सव वाचकवक्तता के स्वरूप-विवेचन के समय प्रतिपाद प्रकट होगा । इसलिये प्रसङ्ग को छोडकर अधिक विपयान्तर के विस्तार को छोडा जा रहा है । ( पुन अपने प्रकृत वाच्य-विवेचना पर आये है । )

हृदय का आह्हादक स्वस्पन्द से सुन्दर हो । सहृदय ( कहे जाते है ) काव्यार्थवेच्चा, उनका आह्हाद अर्थात् आनन्द करता है जो ( स्वस्पन्द ), उस स्वस्पन्द—अपने स्वभाव से सुन्दर—सुकुमार ( अर्थ ही काव्य मे ( वाच्यरूप से प्रसिद्ध है ) । तो यह कहा जा सकता है—यदपि पदार्थ नाना प्रकार से धर्मयुक्त हो सकते है । तथापि ( उस पदार्थ का ) उत प्रकार के धर्म से सम्बन्ध सम्यक् रूपसे वर्णित किया जाता है जो सहृदय-हृदय मे आह्हाद का आधान करने मे समर्थ होता है । और उसकी सहृदया-ह्हादकारी धर्म सम्बन्धित पदार्थ की ) आह्हाद श्क्ति सम्भावित होती है जिससे कोई अपूर्व ही स्वभाव का महत्व अथवा रस को परिपुष्ट करने की एज्ता ( सहायकता ) अभिव्यक्ति को प्राप्त करती है । जैसे—

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वक्तिमासादयति। यथा—

दंष्ट्राप्रष्टेषु सच शिरवरिषु न कृत स्कन्धकण्डूविनोदः

सिन्धुषु वञ्जावगाहः खुरकुङहरगलतुच्छतोयेषु नामः।

लब्धा। पातालपङ्के न लुठनरतयः पोत्रमात्रोपयुक्ते

येनोद्वारे धरित्र्या सजयति विभुताविच्छितेच्छो वराहः॥३०॥

अत्र च तथाविध पदार्थपरिग्रहसमर्थानुप्राणितत्वे माः स्वभाववैमुख्ये

विनस्तत्परिस्पन्ददानान्तरस्य संरोधसंप्रदाननेन स्वभावमहतां सुल्लासयन

सहृदयाह्लादकारितां प्रपन्नः। यथा च—

ताम्राभगच्छछुदितातुसारि

मुनेः कुशोद्माहरणाय यातः।

(प्रकृत श्लोक 'सदुक्तिकर्णामृतम्' एवं सुभाषित 'रत्नभाण्डागार' दोनो मे उपलब्ध है किन्तु कवि का पता नही है) भगवान वराह की स्तुति की गयी है—वराह रूपधारी जिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी के (हिरण्याक्ष से पाताल के छुपायी गयी पृथ्वी के) उद्धार के समय दैत्यों से नृण्णित अत्यपश्किरवरो पर क्षणमात्र भी कन्धो की खुजली का श्रम नही किया, अपने खुररूप कहरो से बहते स्वल्प जल समुद्रो मे (जिन्होने) अवगाहन नही प्राप्त किया। सुखाग्र भाग (यूूशुन-सुखाग्रे क्रोडहलयोः पोत्रम्-अमरकोष एवं 'पोत्र वक्त्रे सुखाग्रे च' निघण्टुरस्य हलस्य च' विश्वकोश के अनुसार पोत्र सूकर सुखाग्र भाग एवं हलाग्र के लिए प्रयुक्त होता है। अन्य टीकाकार पोत्र का अर्थ 'पोतना' लगाते है जो पूर्णत असंगत है) मात्र के लिए उपयुक्त पाताल के कीचड़ मे जिनहोने लोटने के आनन्द नही लिये, विमुत्पूर्ण तथापि अपूर्ण काम भगवान वराह की जय हो (सर्वोत्त्कृष्ट है)। विस्तुता के कारण अपूर्ण काम अर्थ मे कोई सौन्दर्य नही है। वस्तुतः सौन्दर्य तो इस विरोध मे है कि समर्थ होने पर भी भगवान ने वे आनन्द लिये नही; क्योकि उनके समक्ष उन सबका कोई महत्व नही था)।॥३०॥

यहॉ उस प्रकार की पदार्थ स्वभाव की महिमा निवद्ध है जो स्वभाव से उत्पन्न होने वाले उस पदार्थ (भगवान वराह के वर्णन) का स्वभाव से सम्पादित (अर्थ धर्मो, स्कन्ध, कण्डू, विनोद आदि) का निरोध सम्पादित होने से (पदार्थ) स्वभाव के महत्व को सम्यक् सुरोभित करता हुआ सहृदय हृदय की आह्लादकारिता को प्राप्त हो गया है। और जैसे—

(यह श्लोक महाकवि कालिदास प्रणीत रघुवंश १४.७० का है)। वर्णन उस समय का है जब सीता अरण्य मे निर्वासित कर दी गयी है। उसके रुदन को महर्षि वाल्मीकि सुनते है और उधर का अनुसरण कर उसके पास चल्ते है—

(यथ्रीय) कुञ्च और लकड़ी को लाने के लिए गये हुए वह महर्षि वाल्मीकि (सीता के) रुदन का अनुसरण करते हुए उसके समीप पहुँचे। (उसी समय)

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निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थ इलोकत्वमापद्यत यस्य शोक: ॥३१॥

अत्र कोडसौ मुनिवरोऽपि चरिति पर्यायपदमात्रे वक्तव्ये परमकारुणिकस्य निषादनिर्मिन्नशकुनिसंदर्शनमात्रसमुत्थितः शोक: इलोकत्वमभजत् यस्येति तस्य तदवस्थजनकराजपुत्री दर्शनविवशवृत्तेरेनाः करुणपरिस्पन्दः करुणरस परिपोषडतया सहृदयहृदयाह्लादकारी कवेरभिप्रेतः । यथा च—

भतृमित्रं प्रियमविधवे विद्धिमाममुवाहं त्वत्संदेशाद्दहृदयनिर्हितदारागं त्वन्मीपम् । यौव्रान्दानि त्वरयति पथि श्राम्यतां प्रोषितानां मन्त्रस्तिग्धैर्ध्वनिभिरबलावेणिमोक्षोत्सुकानि ॥३२॥

अत्र प्रथममात्रणपदार्थस्तदावासकारिपरिस्पन्दनतिबन्धनः । भतृमित्रें मां विद्धीत्युपादेयत्वमात्रनः प्रथयति । तच्च न सामान्न्यम्, प्रियमिति विशेषसाम्भ

निषाद से मारे गये क्रौञ्च पक्षी के दर्शन से उत्पन्न जिनका शोक ही (मा निषाद प्रतिष्ठा त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ( रामायण १-२-१५; इत्यादि रूप मे ) इलोकरूपता को प्राप्त हो गया ।।३१।।

यहाँ यह वर्णित मुनि कौन है? वाल्मीकि । इस प्रकार मुनि शब्द के पर्याय पद ( वाल्मीकि ) मात्र कथन के लिए ( कवि द्वारा प्रस्तुत ) परम कारुणिक जिनका निषाद के द्वारा मारे गये पक्षी ( क्रौञ्च ) के विलोकन मात्र से उत्पन्न हुआ शोक ही श्लोकता को प्राप्त हो गया, उस प्रकार की अवस्था वाली ( गर्भिणी होने पर भी पति से अरण्य मे निर्वासित ) जनकराज विदेह की पुत्री ( सीता ) के दर्शन से विकल वृत्ति उन महर्षि के अन्तःकरण का स्वभाव वर्णन करुण रस के परिपोष मे सहायक होने से सहृदय हृदय के आह्लाद को पैदा करता है, इसी रूप मे कवि को अभिप्रेत है । और जैसे—

( प्रकृत श्लोक महाकवि कालिदास के मेघदूत, पूर्वमेघ ( ५६ ) का है । यक्ष का सन्देश लेकर अलकापुरी पहुंचे मेघ विरहिणी यक्षिणी से कह रहा है ), ‘आ सौभाग्यवती, जलवहिक ( मेघ ) मुझको तुम अपने स्वामी का प्रिय मित्र समझो जो हृदय मे रखे गये उसके ( तुम्हारे प्रिय के ) सन्देश ( सुनाने के प्रयोजन ) से तुम्हारे समीप आया हुँ । और जो ( श्रान्त हो जाने के कारण ) राह मे थकान मिटाते हुए अपनी प्रियतमाओं की वेणी खोलने के लिए समुत्कण्ठित प्रवासी पथिक समूहो को ( अपने ) गम्भीर एवं मनोहारि ध्वनियों से वेग युक्त ( घर पहुंचने मे तेज गति ) कर देता है ।।३२।।

पहले तो यहाँ सम्बोधन पद ( अविधवे ) का अर्थ ही उस यक्षिणी को आकर्षण पैदा करने वाला स्वरूप निबन्धन है । ( अविधवे, पद मे यक्षप्रिया को सौभाग्यवती, सुहागिन कहा गया है क्योंकि यदि पति न होता तो वह ‘अविधवे’ के स्थान पर किसी

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प्रथमोऽमेषः ]

कथापात्रताम् । इति, समारोहास्योनमुखीकृत्य च तत्संदेशात्मकत्वसमीपमागमनमिति प्रकृतं प्रस्तौति । हृदयनिहितादिति स्वहृदयनिहितं सावधानतयैव चोतयते । नतु चान्यः कश्चिदेवंबिधव्यवहारविदग्धबुद्धिः कथम् न नियुक्त इत्याह—ममैवात्र किमपि कौशलं विजृम्भते । अम्भुवाहमित्यात्मनस्तकारिताभिधानं ध्वनत्यात । यः प्रोक्षितानां वृन्दानी त्वरयति, संजातत्वराणि करोति । ऋत-शानाम्—श्राम्यताम्, त्वरायामसमर्थोनामपि । वृन्दानीति बाहुल्यात्मककारिताभ्यासं कथयति । केन—मन्द्रस्निग्धैर्ध्वनिभिः, माधुर्यरमणीयैः शब्दैर्विदग्धऔर पद का प्रयोग करता । इस प्रकार यह व्यक्त होता है कि चिन्तित न हो, तुम्हारा प्रिय जीवित है, सुरक्षित है, तुम सुहागिन हो, समय पर सम्मिलन होगा ) । ‘मुझे ( मेघ को ) अपने पति का मित्र समझो, इस कथन से मेघ अपनी उपयोगिता को प्रकट्यापित कर रहा है । और वह ( उपादेयता ) भी साधारण नही है । ‘पियम्’ यह पद विश्वसनीय कथनों ( वार्ताओं ) की पात्रता को ( व्यक्त करता है । अर्थात् मैं तुम्हारे प्रिय का प्रिय मित्र हूँ । मेरी उपयोगिता है साथ ही इतना प्रिय हूँ कि मुझसे विश्वसनीय कोई भी बात कही जा सकती है । ) आद्वासन देकर तथा यक्षप्रिय को अपनी ओर उन्मुख करके ही ‘तुम्हारे समीप मेरा आगमन उसी के सन्देश से हुआ है, इस प्रकार सामाजिक बात प्रस्तुत करता है । ( मेघ यक्षिणी को ‘अविघ्नवै’ सम्बोधन से आद्वासन देकर सिद्ध करता है कि तुम सुहागिन हो, प्रियतम जीवित है । तुम्हां प्रिय का प्रिय मित्र हूँ । कोई भी विश्वसनीय बात मुझसे कही जा सकती है । इस प्रकार उसे अपनी ओर आकृष्ट कर ही प्रकृत को प्रस्तुत करता है । ) ‘हृदय निहितात्’ पद से हृदय में अवस्थित सावधानी व्यक्त होती है । ( अर्थात् उसके सन्देश को मैंने कही किसी और से कहा नही है । बड़ी सावधानी से मन में डिपाये बैठा हूँ । ( यदि कही तुम्हे ( यक्षप्रिया को ) यह सन्देह हो कि ) इस प्रकार के व्यवहार ( सन्देशावहनव्यापार ) मे विचक्षण बुद्धि किसी और को ( मेघ ने ) क्यो नही नियुक्त किया ? तो उत्तर देते है कि इस विषय ( सन्देशावहन ) मे मेरी ही कुछ अनिर्वचनीय दक्षता है विलक्षणता है । अम्भुवाहम्—जल वहन करने वाला ( मेघ ) इस पद से अपनी उस सन्देशावहन करने की सज्ञा का चोतन होता है । ( अम्भुवाह पद से अभीष्ट है सन्देशावहन करने की अपूर्व क्षमता जो जल को भी वहन कर सकता है, जिसका वहन आसान काम नही, वह सन्देशावहन क्यो नही कर सकता । वाहक भी मैं कैसा हूँ ? ) जो प्रवासियों के मण्‌डो को त्वरित करता, वेगयुक्त करता हूँ ( वल्लभाओं के पास शीघ्र पहुंच जाने के लिए प्रेरित करता हूँ ) । कैसे प्रवासियों को ( त्वरायुक्त करता हूँ ) ?—विश्राम करते त्वरा मे असमर्थों को भी । ‘वृन्दानी’ इस बहुवचन पद से ( पथिकों की कोई ) बहुलता ( व्यक्त होती है ) जिससे उसे करने ( प्रेषित वृन्दों को त्वरायुक्त बनाने ) का अभ्यास ( पुनः पुनः प्रयास ) को व्यक्त करता है । किसके द्वारा त्वरायुक्त किया जाता है ? मन्‌द्रस्निग्ध

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४२

[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

दूतप्ररोचना वचनप्रायैरित्यर्थः । कवः पथि मार्गों । यहच्छया यथार्थंचित् 'अह्मेतदाचरामिति किं पुनः प्रयत्नेन सुहृद्सेनिमित्तंसंबंध बुद्धिं न करोमीति ।

कीदृशानि वृन्दानि—अबळावेणिमोक्षोत्सुकानि । अबलाशब्देनात्र तत्प्रेयसीविरहवैधुयैःसहलं भण्यते, तद्रेणिमोक्षोत्सुकानीति तेषां तद्नुरक्तचित्तवृत्तित्वम् । तद्यमत्र वाक्यार्थः —विधिविहिताविरहवैधुयेयस्य परस्परानुरक्तचित्तवृत्तेर्यस्यैकचित्कामिजनस्य समाजमसौल्यसंपादन सौहार्दं सदैव गृहीतव्रतोस्मीति । अत्र यः पदार्थपरिस्पन्दः कविनोपनिबद्धः प्रबन्धस्य मेघदूत

विधो यथा— नपुनरेवं स एव जीवितमिति सुतरां सहृदयहृदयाह्लादकारी ।

ध्वनियो से माधुर्य एवं रमणीय शब्दों के द्वारा ( त्वरायुक्त करता हूँ ) तात्पर्य दूत के योग्य औरो को प्रेरित करने वाले प्रधासा आदि वचनों से मैं प्रवासियो को त्वरायुक्त करता हूँ ! कहो ( त्वरित करता हूँ ) ?—पथ मे, मार्ग मे । यथा कर्थंचित् स्वेच्छा से ही मैं यह सब कार्य करता हूँ । फिर प्रयासपूर्वक मित्र के प्रेम के लिए सम्यक् प्रेरितो किये गये कार्य को मनपूर्वक क्यों नही सम्पादित करूँ सकता ? ( मैं इतना परहित चिन्तक हूँ, विशेषकर प्रेम के विषय मे कि, रास्ते मे श्रम मिटाते हुए भी प्रोक्षितो को असह्याय विरहिणी युवतियो को सकाम करने के लिए उनकी गति मे शिथ्रता ला देता हूँ । और यह सब कार्य तो मैं स्वेच्छा से कर लेता हूँ । फिर तो जब मित्र का कार्य हो वह भी प्रेमविषयक उसको भी सिर पर उठा लिया होऊॅं तो फिर मन लगाकर न करूँ ऐसा कैसे हो सकता है ? तुमसे मित्र को मिलाना भी मेरा व्रत है, कार्य है ।

किस प्रकार के ( प्रोपित ) वृन्दों को ( मैं त्वरित करता हूँ )?—अबलाओं की वेणी खोलने के उत्सुक ( प्रोक्षित वृन्दो को) । अबला शब्द से यहाँ उन ( पथिकों ) की प्रियतमाओं मे प्रिय विरह को विकलतया असह्यता कही जा रही है । उनकी वेणी को खोलने के उत्सुक से उन पथिकों की उन ( विरहिणी अबलाभूत प्रियजनो ) मे अनुरक्त चित्तवृत्तिता ( कही जा रही है ) । तो इस पूरे का यह वाक्यार्थ है—दैवसम्पादित विरहव्यथायुक्त, तथा परस्पर अनुरक्त चित्तवृत्ति, जिस किसी भी कामीजन ( शृङ्गारी कामी नर या नारी जो भी हो ) के संयोग सुख के निष्पादनरूप प्रियकार्य मे मैं सदैव रतहोता हूँ ( सदैवपर रहता हूँ ) । कवि ने यहाँ पदार्थ का जो स्वभाव निवद्ध किया है रचना ( मेघदूत कृति ) की मेघदूतता ( मेघको दूत बनाकर मेजने मे ) मे वस्तुत. वही जीवन है, इस प्रकार यह वर्णन स्वयं ही सहृदय-हृदय को आकृष्ट करता है ( इसलिए अत्रं ऐसा हो जो पदार्थपरिपन्थ से सहृदयहृदयाह्लादन करने मे समर्थ हो ) न कि पुनः इस प्रकार का—

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प्रथमोऽनुच्छेदः ]

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सद्यः पुरीपरिसरेऽपि शिरीषमुद्गदी

सीता जवात्त्रिचतुराणि पादानिगत्वा

गन्तव्यमद्र्र कियदित्यसकृद् ब्रुवाणा

रामाऽश्रुणा कृतवती प्रथमावतारम् ॥ ३३ ॥

अत्रासकृत्प्रतिक्षणं कियद्व गन्तव्यमित्यभिधानलक्षणःपरिस्पन्दो न स्वभाव-

वमहेतुना भवितव्याद्, न च रसपरिपोषपात्रतां प्रतिपद्यते । तस्मात्स्थितोऽत्र सहजेन केनाप्यौचित्येन गन्तुमध्यवसिताया: सौकुमार्यावमेविशं वस्तु हृदये

परिस्फुरदपि वचनमारोहतीति सहृदयैः संभाव्यितुं न पार्यते। न च प्रति-

क्षणमभिधीयमानमपि राजवाचःप्रथमावतारस्य सम्यक् सङ्जतिं भजते, सकृदापि

( कविवर राजशेखर के बालरामायण ( ६।३४ ) का श्लोक है । वनवास-गमन

में सीता की सुकुमारजन्य शोकदशा और राम की कथा का चित्र है ) शिरीष पुष्प

सदृशा कोमल सीता नगर के समीप ही तीन-चार पग जल्दी से जाकर अब और कितना

चलना है, ऐसा ( राम से ) बार-बार पूछती हुई राम की आँसू का प्रथम आविर्भाव

किया । ( दुःख से राम को आँसू आ गये ) ॥ ३३ ॥

( राजशेखर ने इस श्लोक को कुमारदास के ' जानकीहरण' के इस श्लोक से

लिया है—

द्वित्राण्येव रथं त्यक्त्वा पदान्याधाय नि स्खलं ।

येयमन्यक्तियद् दूरमिति प्रप्र्च्छ मैथिली ॥ जा० ह० १०१५०

इस रचना में कुन्तकगवेषित दोषों का अभाव है । ) विवेचन करते है—अमेति ।

यहाँ इस ( सीता वनगमन ) वर्णन में असकृत् अर्थात् प्रतिक्षण ( सीता का यह

कहना कि ) आज अब कितना चलना है इस प्रकार का कथनरूप व्यापार न तो

स्वभाव की महत्ता को प्रकट करता है और न ( करुण ) रस के परिपोषण में अज्ञता

को ही प्राप्त कर रहा है । क्योंकि किसी स्वाभाविक औचित्य ( प्रतिप्रेम आदि ) के

कारण वन जाने के लिए आतुर सीता के द्वारा ऐसा वचन, भले ही वह उनके मन में

उस प्रकार के थकान आदि की बात उठ रही हो—केवल सुकुमारता के कारण कहा

जा सकता है । इस प्रकार की बात की सम्भावना सहृदयगण करने मे समर्थ नही है ।

और न तो यह वर्णन ही कि प्रतिक्षण कहे जाने पर भी रामचन्द्र के आँसुओं का

प्रथम वार प्रादुर्भाव होता है जो उचित सङ्गति को प्राप्त नही कर पाता । क्योंकि वह

आँसू तो एक वार के ही सुनने से आविर्भूत होनी चाहिए थी ( अन्यथा, राम की रामता

क्या रह गयी । वे इतने कठोर हो गये है जो बार-बार सुनने के पश्चात् ही पसीजते है)।

अतएव अत्यन्त सुन्दर भी यह रचना स्वल्पमात्र कवि की असावधानी से कवि कदर्थना

( निन्दनीयता ) प्रसक्ती करती है । इसलिए वहाँ 'अवचारम्' यह पाठ करना चाहिए ।

इसलिए इस प्रकार प्रतिपादित विशिष्टस्वरूप ही शब्द-अर्थ का लक्षण स्वीकार करना

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कर्णेनादेव तस्योपपत्तेः । एतच्चवात्यनंतरमणीयमपि मनाड्वात्रचोचावधानतत्त्वेन कवे: कदर्थितम् । तस्माद् ‘अवशाम्’ इत्यत्र पाठः कर्तव्यः । तदेवंविधं विशिष्टमेव शब्दार्थयोर्लक्षणमुपादेयम्। तेन नेवार्थोपार्थोदयो दूरोत्सारितत्वात्पृथडनवक्तव्यः: ॥ ९ ॥

एवं शब्दार्थयो: प्रसिद्धस्वरूपातिरिक्तमन्यदेव रूपान्तरमभिधाय, न नेतृविन्यासात्रभवे काव्यमुपयोगि किन्तु वाच्याश्रयविशिष्टमात्राह—उभावेतावलङ्कार्यौंतयो: पुनरलङ्कृति: ।वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यभङ्गीभणितिरुच्यते ॥ ९० ॥

‘उभौ द्वावप्येतौ शब्दार्थावलङ्कार्यावलङ्करणीया, केनापि शोभातिशयकारिरिणालङ्करणे योजनीयौ । किम् तत्त् तयोरलङ्करणमभिधीयते, ‘तयो: पुनरलङ्कृति:' । तयोद्विसंल्याविशिष्टयोरप्यलङ्कृति: पुनरेकैव, यथा द्वावप्यलंऋति:' ।

चाहिए । उसे नेपार्थ-अपार्थ दूर से ही समाप्‍त कर दिये जाते है, उन्हे अलग से नहीं कहना चाहिए । ( तात्पर्य यह है कि प्राचीनप्रतिपादित रीति से विशिष्ट रूप से शब्दार्थ साहित्य काव्य की उपादानवस्तु न करने से दोष की स्थिति ही नही हो पावेगी, और सटीक साहित्य नही होगी; अतएव विशिष्ट शब्द-अर्थ ही काव्य मे उपादेय है । इस प्रकार अब तक विवक्षित ‘शब्द’ ‘अर्थ’ साहित्य काव्य का प्रतिपादन कर तत्संबंधी अन्य तत्त्व की अवतारणा के लिए पुन: भूमिका प्रस्तुत करते है—एवमति । )

इस प्रकार शब्द और अर्थ के प्रसिद्धस्वरूप का विवेचन करने के अनन्तर उससे अतिरिक्त ही विशिष्ट शब्द-अर्थ रूप दूसरे स्तर का विवेचन किया किन्तु मात्र उतना ही काव्य के लिए उपयोगी नही होता । अपितु वह दूसरे विच्छित्ति से विशिष्ट ही उपयोगी होता है अत: उसी को कहते है—वे दोनो ( शब्द-अर्थ ) अलंकार्य है और वैदग्ध्यपूर्ण विच्छित्ति से अभिषेय-स्वरूप वक्रोक्ति ही उन दोनो का अलंकारण है ॥ ९० ॥

उभौ—शब्द और अर्थ ये दोनो ही, अलकार्य अलंकरणीय ( अतंकृत करने योग्य है ), शोभातिशयकारी किसी अपूर्व अत:कार से संयुक्त करने योग्य है । उन दोनो का वह कौन ( वस्तु ) अलंकरण कही जाती है । ( इसलिए प्रयुक्त किया है पद ) ‘तयो: पुनरलङ्कृति', उन दोनो की ( एक ) अतंकृति है । उन दोनो अर्थात् द्वित्वसंल्याविशिष्ट शब्द और अर्थ दोनो का अलंकार पुन: एक ही है जिसके द्वारा ये दोनो ही अतंकृत किये जाते है । वह कौन ( अलंकृति ) है ?—वक्रोक्ति ही है । वक्रोक्ति अर्थात् प्रसिद्ध कथन से व्यतिरिक्त विचित्र ही कथन ( वक्रोक्ति है । ) कैसी है ( वह वक्रोक्ति ) ?—वैदग्ध्यभङ्गी डिणिति रूपा । वैदग्ध्य से अर्थ है विदग्धभावकवि कर्म ।

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क्रियेतेऽ कासौ—वक्रोक्तिरेव। वक्रोक्तिः प्रसिद्धाभिधानव्यतिरेकिणी विचित्रैवाभिधा। कीदृशी—वैदगध्यभङ्गिभणितिः। वैदगध्यं विदग्धभावः कविकर्मकौशलं तस्य भङ्गी विच्छित्तिः, तयाभणितिः विचित्रैवाभिधा वक्रोक्तिरित्यचते। तदिदमत्र तात्पर्यम्—यत् शब्दार्थों पृथगवस्थितौ केनापि व्यतिरिक्तेनालङ्करणेन योज्यते, किन्तु वकता वैचित्र्ययोगितायाभिधानमेवानयोरलङ्कारः तस्यैव शोभातिशयकारित्वात्। एतच्च वकता व्याख्यानात् वक्तुर एवोदाहरणरिष्यते ॥ ९० ॥

ननु च किमिदं प्रसिद्धार्थविरुद्धं प्रतिज्ञायते यद्वक्रोक्तिरेवालङ्कारो नान्यः कचिचदिति, यत आङिचर—तनैरपि स्वभावोक्तिलक्षणमलङ्करणमन्नातं तच्चातिशयरमणीयमित्यस्मान्नस्तदेव निराकरतुं साह—

अलङ्कारकृतां येषां स्वभावोक्तिरलङ्कृतिः । अलङ्कार्यतया तेषां किमन्यदवतिष्ठते ॥९१॥

की निपुणता, उसकी भङ्गी विच्छित्ति ( शोभा ), उसके माध्यम से अभिधान, अर्थात् विचित्र ही कथन ( अभिधा से अभिधान ) वक्रोक्ति ऐसा कहा जाता है। तो यहाँ यह भाव हुआ—कि पृथक्—पृथक् अवस्थित शब्द और अर्थ किसी अपूर्व व्यतिरिक्त अलङ्करण से किये जाते है किन्तु वकता के वैचित्र्य से सम्भावित रूप में ही इनका अभिधान ही अलङ्कार कहा जाता है। ( क्योंकि ) वही शोभातिशयकारी होता है । ( क्योकि ) वही वैदगध्यपूर्वक सौन्दर्याभिधान ही वक्रोक्ति है और वही वक्रोक्ति शब्द—अर्थ अलङ्कार्य का अलङ्करण है श्रुतत्व्य है कि भामह ने लोकातिक्रान्तगोचर अतिशयोक्तिरूपा वक्रोक्तिं को सभी अलङ्कारों के मूल में अवस्थित माना था । दण्डी प्रायः सभी वक्रोक्तिं के मूल में र्लेप का पोषण बताते है तथा स्वभावोक्त—वक्रोक्ति दो प्रकार का वाङ्मय मानते है और भोजराज वक्रोक्ति को वाड्मय विभाजन का एक आधार—सैषा सर्वव वक्रोक्तिः—इति भामहः । र्लेप सर्वांसु पुणाति प्रयो वक्रोक्तिषु त्रियम् । भिन्ना द्विधा स्वभावोक्तिवक्रोक्तिरुच्यते वाड्मयम् ॥ इत्थे दण्डी और 'वक्रोक्तिश्च स्वभावोक्तिश्च'—इत्यादि वाड्मय—इति भोजराज। ॥ ९० ॥

कयो यह तो प्रसिद्ध वस्तु के विरुद्ध प्रतीत होता है कि वक्रोक्ति ही अलङ्कार है और कोई नहीं ? क्योंकि प्राचीन आचार्यों ने स्वभावोक्ति रूप दूसरे अलङ्कार का विवेचन किया है और वह अत्यन्त ही सुन्दर होता है । ( इस प्रकार का यदि कोई पूर्वपक्षी प्रस्तुत करना चाहे तो इस कथन को ) न सहते हुए, उसी का निराकरण करने के लिए ( कुन्तक अगली कारिका से ) यह कहते है—

अलङ्कार ग्रन्थो की रचना करनेवाले जिन आचार्यों को स्वभावोक्ति अलङ्कार है ( ऐसा प्रतीत होता है ) उनके लिए अलङ्कार्य के रूप में दूसरो और कौन ( सी वस्तु ) रह जाती है ॥९१॥

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येषामलङ्कारकृतामलङ्कारकाराणां स्वभावोक्तिरलङ्कृति: या स्वभावस्य पदार्थधर्मलक्षणस्य परिस्पन्दस्योक्तिरविधा सैवालङ्कृतिरलङ्करणमिति प्रतिभाति, ते सुकुमारमानसत्यान् विवेकक्लेशद्वेषिण:। यस्मात् स्वभावोक्तिरिति कोऽर्थ:? स्वभाव एवोच्यमान: स एव यदलङ्कारस्तत्किमन्यत्तदूच्यतिरिक्तं काव्यशरीरकल्पं वस्तु विचिते यत्तेषामलङ्कार्यतया विभूष्यत्वेनावतिष्ठते पृथग्वस्तितिमासादयति, न किचिदित्यर्थ:॥१९१॥

नहु पूर्वमवस्थापितम्—यद्वाक्यस्यैवाविभागस्य सालङ्कारस्य काव्यत्वमिति (१९६) तत्किमर्थ मेतदभिधीयते? सत्यम्, किन्तु तत्रास्त्यमूतोद्यपोद्धार-

(आचार्य भामह को स्वभावोक्ति की अलङ्कारता अभीष्ट नही थी। इसीलिए उन्होंने 'स्वभावोक्ति भी अलङ्कार है' ऐसा कुछ लोग मानते है ऐसा कह कर उसका विवेचन करते है—स्वभावोक्तिरलङ्कार इति केचित्प्रचक्षते-काव्यालङ्कार २।९३। इसके बिलकुल विपरीत आचार्य दण्डी ने स्वभावोक्ति के आधार पर वक्रोक्ति को ही दो भागो मे विभक्त कर दिया—मित्रं द्विधा स्वभावोक्तिः वक्रोक्तिश्चेति वाङ्मयम्। और यही नही। उन्होने स्वभावोक्ति को प्रथमा अलङ्कृति कहा और कहा शास्त्र और काव्य दोनो मे ही इसी का साम्राज्य है—शास्त्रेष्वसैव साम्राज्यं काव्येष्वप्येतदी-स्थितम्॥ काव्यादर्श, २१३। कुन्तक से लेकर बाद मे तो प्राय: सभी काव्याचार्य स्वभावोक्ति को अलङ्कार के रूप मे प्रतिष्ठित करते है किन्तु इस विपय मे कुन्तक भामह मत को ही अधिक उपयुक्त मान कर उसी का समर्थन करते हैं।)

जिन अलङ्कार (ग्रन्थ) रचने वालो अलङ्कारकारों के मत मे स्वभावोक्ति अलङ्कार है, स्वभाव-पदार्थ के धर्मस्वरूप सौन्दर्य की जो उक्ति-कथन है, वही अलङ्कृति-अलङ्कार है (ऐसा जिन आचार्यों को अभीष्ट है) प्रतीत होता है, वे सुकुमार चित्त होने के कारण (अलङ्कार्य अलङ्कार) निर्णय के क्लेश के द्वेषी है। (अर्थात् उनकी बुद्धि मे इतनी भी सामर्थ्य नही है कि सम्यक्‌ रूप से वे अलङ्कार्य-अलङ्कार का विवेक कर सके) । क्योकि स्वभावोक्ति इसका क्या अर्थ है? स्वभाव ही वर्ण्यमान होता है। यदि वही अलङ्कार कहा जायेगा तो उनसे व्यतिरिक्त काव्य के शरीरसदृश और कौन-सी वस्तु रह जाती है जो उनके अलङ्कार्य को अलङ्कार्य रूप से—विभूषित किये जाने की योग्यता से युक्त (उनसे) पृथक् सत्ता को प्राप्त करती है, अर्थात् कोई भी ऐसी वस्तु पृथक् नही रह जाती जो अलङ्कार्य हो सके। (अतः स्वभावोक्ति को अलङ्कार नही मानना चाहिए)॥१९२॥

(पूर्वपक्ष स्वभावोक्तिवादी)—पहले ही १९६ कारिका मे (स्वभावोक्ति को अलङ्कार्ये मानने वाले वक्रोक्तिकार अपने ही) जो यह स्थापित किया है कि (अल-ङ्कार्य अलङ्कार के) विभाग से रहित अलङ्कारयुक्त वाक्य की ही काव्यता होती है तो अब (सिद्धान्तपक्ष आपसे) यह क्यो कहा जा रहा है (कि स्वभावोक्ति को अलङ्कार मान लेने पर अलङ्कार्य कोई अवस्थित ही नही रह जायेगा)?

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बुद्धिविहितो विभागः कर्तुं शक्यते वर्णपदन्यायेन वाक्यपदन्यायेन चेत्युक्तमेव । एतदेव प्रकारान्तरेण विकल्पयितुमाह—

स्वभावव्यतिरेकेण वक्तुमेव न युज्यते । वस्तु तद्रहितं यस्माद्विरुपाख्यं प्रसज्यते ॥११२॥

स्वभावव्यतिरेकेण स्वरुपस्पन्दं विना निःस्वभावं वक्तुमभिधातुमेव न युज्यते, न शक्यते । वस्तुस्वाचलक्षणम् । कुतः; तद्रोहिते तेन स्वभावेन रहिते वर्जितं यस्माद्विरुपाख्यं प्रसज्यते । उपाख्याया निष्कान्तं निरुपाख्यम् ।

उपाख्या, शब्दः, तस्यागोचरभूतममिधाना योग्यमेव सम्पद्यते । यसमात् स्वभाव शब्दस्येष्टश् व्युत्पत्तिः, भवतोडस्मादमिधानप्रत्ययौ इति भावः, स्वस्यात्मनो भावः स्वभावः । तेन स एव यस्य कस्यचिदपदार्थस्य प्रख्योपाख्यवतारानिबन्धनम् । तेन वर्जितं असत्कल्पं वस्तु शशाविषाणप्रायं शब्दज्ञानागोचरतां प्रतिपद्यते ।

तो ठीक है ( कि अलङ्कार-अलङ्कार्य का विभाग जैसा कि ११६ मे प्रतिपादित है, नहीं होता ) किन्तु वहाँ पर ( अलङ्कार-अलङ्कार्य का ) असत्यभूत भी विभाग दोनों के पृथककरण की दृष्टि से किया गया है । और वर्णपदन्याय तथा वाक्यपदन्याय मे ( उनका अलङ्कार्य-अलङ्कार का ) विभाग किया जा सकता है, ऐसा तो पहले ११६ मे भी कह ही चुके हैं । प्रकारान्तरित करने के लिए इसी को प्रकारान्तर से कहते है—

स्वभाव से व्यतिरिक्त कोई भी वस्तु कही ही नही जा सकती क्योंकि उससे ( स्वभाव से ) रहित वस्तु वर्णन के योग्य ही नही होती ॥११२॥

स्वभाव से व्यतिरिक्त— ( पदार्थ के ) धर्म के बिना, स्वभावविहीन ( वस्तु ) कहने—अभिधान के योग्य नही होती ( कहन ) सम्भव ही नही है । वस्तु अर्थात् अभिधानयोग्य पदार्थस्वरूप । ( प्रश्न हो सकता है ) स्वभाव व्यतिरिक्त ( वस्तु ) क्यो ( नही कहा जा सकता )? ( उत्तर है ) उससे रहित-स्वभाव से रहित-वर्जित ( वर्जित ) निरुपाख्य प्रसक्त होती है । उपाख्या से ( का अर्थ है ) शब्द, उसकी ( शब्द की ) अगोचरभूत-अभिधान के अयोग्य ही ( स्वभावरहित वस्तु ) हो जाती है । क्योंकि स्वभाव शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की है—अभिधान ( वर्णन ) और बोध ( प्रत्यय ) जिससे दोनो होते है उसे भाव कहा जाता है, स्व का ( वस्तु का ) अपना भाव हुआ स्वभाव । इसलिए सभी पदार्थों के ज्ञान और वर्णन के अवतार निवन्धन मे वही ( स्वभावोक्ति ) ही रहती है । उससे विहीन, असत् समान, शशविषाणप्राय वस्तु शब्दज्ञान की गोचरता को नही प्राप्त होती । स्वभाव से युक्त ही वस्तु सर्वथा अभिधेय पदवी मे उतरती है ( कथनयोग्य होती है, अन्यथा स्वभाव-कथन को अलङ्कार मानने पर न कि अलङ्कार्य, स्वभाव कथन होने के कारण ही ) गाडीवालो के वाक्यों से भी सालङ्कारता प्राप्त होने लगेगी क्योंकि

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शाकटिकवाक्यानामपि साकड्ढारता प्राप्तोति, स्वभावोक्तियुक्तत्वेन ॥१२॥

शरीरं चेदलङ्कुरते णरम् । आत्मैव नात्मनः स्कन्धं कवचिदऽऽधिरोहति ॥१३॥

यस्य वस्याचिद्‌वर्ण्येमानस्य वस्तुनो वर्णनीयत्वेन स्वभाव एव वर्ण्य- शरीरम् । स एव वेदककरे, यदि विशिष्टां, तल्लक्षणपर तद्वाक्यविदग्धे, यदलङ्कुरते विभूषयति । स्वात्मानेवाऽऽलड्करोति चेत्, तदयुक्तम्, अनु- पपत्तेः । यदात्मैव नात्मनः स्कन्धं क्वचिदऽऽधिरोहति । शरीरमेव शरीरस्य न कुतचिदप्यसमधिरोहतीत्यर्थः । स्वात्मनि क्रियाविरोधात् ॥१३॥

अन्यच्चाऽऽुपगम्यापि भूमः— भूषणत्वे स्वभावस्य विहिते भूषणान्तरे । भेदावबोध प्रकटस्तथोरपकटोऽथवा ॥१४॥

वे भी कथन-स्वभाव से युक्त होते है ( किन्तु उन्हे तो कोई भी अलङ्कार मानने को तत्पर नही । अत स्वभावोक्ति को अलङ्कार नही मानना चाहिए ) ॥१२॥

इसी बात को दूसरे ढंग से कहते है— ( वर्ण्यमान पदार्थ का स्वभाव रूप ) शरीर ही यदि अलङ्कार है तो किस दूसरे ( अलङ्कार्य ) को वह अलङ्कृत करता है । ( अर्थान्तरन्यास से समर्थन करते है ) कहीं भी अपने ही अपने कन्चे पर आरूढ नही हुआ जाता ( अर्थात् स्वभाव अलङ्कार्य है, अलङ्कार नही । जैसे स्वय अपने कन्चे पर आरूढ नही हुआ जा सकता उसी प्रकार शरीर ( अलङ्कार्य ) ही शरीर को ( अपने स्वभाव को स्वभाव ही ) कैसे अलङ्कृत कर सकता है । अतः स्वभावोक्ति अलङ्कार्य है, अलङ्कार नही ) ॥१३॥

जिस किसी भी वर्ण्यमान वस्तु का स्वभाव ही वर्णन की योग्यता होने के कारण वर्ण्य विषय का आधार होता है । और यदि वही अलङ्कार-विभूषण हो गया तो कौन दूसरी वस्तु जो उससे व्यतिरिक्त है, अवशिष्ट रही जिसे वह अलङ्कृत, विभूषित करता है । ( यदि कोई कहे कि ) अपने ही वह अपने को अलङ्कृत करता है, तो यह अयुक्त है, ( क्योकि ) ऐसा सम्भव नही है । क्योकि कहीं भी ( कोई ) अपने ही अपने कन्चे पर आरूढ नही होता । शरीर ही शरीर के कन्चे पर कहीं आरूढ नही होता, यह अर्थ है । अपने मे ही क्रिया का विरोध होने के कारण ( शरीर-शरीर पर नही चढता, स्वभाव-स्वभाव को ही अलङ्कृत नही करता ) ॥१५॥

और दूसरी बात तो यह भी है ( कि स्वभावोक्ति को अलङ्कार ) मानकर भी हम कहेंगे— स्वभाव की अलङ्कारता मान लेने पर अन्य अलङ्कार ( उपमादि ) का संविधान करने पर उन दोनोँ ( स्वभाव एवं उपमादि ) का भेद ज्ञान प्रकट होगा या अप्रकट ॥१४॥

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स्पष्टे सर्वत्र संसृष्टिरस्पष्टे संकरस्ततः । अलङ्कारान्तराणां च विषयो नावशिष्यते ॥१५॥

भूषणत्वे स्वभावस्य अलङ्कारत्वे स्वपारिस्पन्दस्य यदा भूषणान्तरमलङ्कारान्तरं विरुध्यते तदा विहिते कृतेऽस्मिन् सति, द्वयी गति: संभाव्यते । का तौ ? तयो: स्वभावोक्त्यलङ्कारान्तरयो: भेदाद्वबोधो मिन्नत्व परिभास. प्रकट: सुस्पष्ट: कदाचिदप्रकटरुचापरिस्फुटो वेति । तदा स्पष्टे प्रकटे तस्मिन् सर्वत्र सर्वस्मिन् कविविषये संसृष्टिरेवैकल्कृत्रि: प्राप्त्नोति । अस्पष्टे तस्मिन्नप्रकटे सर्वत्रैकेक: सदृरोग्लेकार: प्राप्त्नोति । तत: को दोष: स्यादिग्याह—अलङ्कारान्तराणां च विषयो नावशिष्यते । अन्येषामलङ्काराणामुपमादीनां विषयो गोचरो न कद्रिचदप्यवशिष्यते । निवृप्त्यत्वमेवायातीत्यर्थ: । ततस्तेषां लक्षणकरणवैयर्थ्ये

जहाँ ( उनका-स्वभावोक्ति तथा इतर उपमादि का ) भेद एकदम स्पष्ट होगा उन सभी स्थलों पर संसृष्टि अलङ्कार होगा ( क्योंकि परस्पर अनपेक्ष रूप से अवस्थित अलङ्कारो की स्थिति मे संसृष्टि अलङ्कार होता है—मिथोऽपेक्षयैतेपा स्थितिः संसृष्टिरुच्यते—काव्यप्रकाश ) और भेदावबोध अस्पष्ट होने पर सङ्कर अलङ्कार होगा । ऐसी स्थिति में संसृष्टि और सङ्कर को छोड़कर ) अन्य अलङ्कार ( उपमादि ) का विषय ही नही अवशिष्ट रहेगा ॥१५॥

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४०

[वक्रोक्तिजीवितम्

प्रसङ्गः। यदि वा तावेव संसृष्टिसंकरौ तेषां विषयत्वेन कल्प्येते तदपि न किश्चित्, तैरेवालङकारैरस्तस्यानर्थस्याऽऽनन्ती कृतत्वात्। इत्यनेनैवाकाशचारवर्णनप्रतिमेनालमलीकविनन्धेन। प्रकृतमनुसरामः। सर्वथा यसकस्यचित्पदार्थजातस्य कविन्यापारविषयत्वेन वर्णनीयतापदवीमवतरतः स्वभाव एव सहृदयहृद्याह्लादकारिकत्वशरीरत्वेन वर्णनीयतां प्रतिपद्यते। स एव च यथायोगं शोभातिशयकारिणा येन केनचिदलङ्कारेण योज्यतऽयः। तदिदमुक्तं,

अर्थः सहृदयाह्लादकारिस्वस्पन्दसुन्दरः' (१९९) इति च। 'उभयवेतावलङ्कारौ' (१।१०) इति च।

एवं शब्दार्थयोः परमार्थमभिधाय 'शब्दार्थौ' इति (१।७) काव्यलक्षणवाक्ये पदमेकं व्याख्याताम्। इदानीं 'सहितौ' इति (१।७) व्याख्यातं साहित्यमेतयोः पर्यालोच्यते—

उपमा आदि अलङ्कार निर्विषय ही हो जायेंगे (जब संसृष्टि और सङ्कर दो ही अलङ्कारो की विषयता रहेगी तो स्वभावतः उपमादि अलङ्कारों का विषय कोई वस्तु रह ही नही सकती और ऐसी स्थिति मे)। तो फिर उनका लक्षण करना (जैसा कि भरत से लेकर किया जा रहा हो व्यर्थ हो जायेगा। (और यदि स्वभाव को अलङ्कार कहने वाले यह कहे कि) वे दोनो संसृष्टि और सङ्कर ही उन उपमा रूपक आदि के विषय रूप मे कल्पित कर लिये जायेंगे तो वह भी कोई बात नही हुई; क्योंकि उन्होंने कही भी यह नही माना है (कि उपमादि अलङ्कार संसृष्टि-सङ्कर के विषय हैं, प्रत्युत् वे सभी उपमादि को स्वतन्त्र अलङ्कार मानते हैं)। तो इस प्रकार इस आकाशचारवर्णन के समान इस प्रकार के व्यर्थ निवन्धन से विरत ही रहना चाहिए (अर्थात् स्वभावोक्ति को अलङ्कार मानने जैसी बात जो असम्भव है—के विषय में अधिक विस्तार व्यर्थ है। प्रस्तुत का अनुसरण करते हैं। कवि-व्यापार (कवि-कर्म) के विषय के रूप मे वर्णना की दौड़ मे उतरने वाले, सहृदयों के हृदय को आह्लाद प्रदान करने वाले जिस किसी भी पदार्थ मात्र का स्वभाव ही हर प्रकार से काव्य शरीर के रूप मे वर्णन की योग्यता को प्राप्त करता है। और वही शोभातिशयकारी जिस किसी अलङ्कार से यथासम्भव संयुक्त करने योग्य होता है। इसलिए ही पहले यह कहा है—'अर्थः सहृदयाह्लादकारिस्वस्पन्दसुन्दरः'। (१९९) तथा यह भी—

'उभावे तावलङ्कारौ' (१।१०)

इस प्रकार शब्द और अर्थ दोनो का वास्तविक स्वरूप बताकर, काव्यलक्षण—'शब्दार्थौ सहितौ' इत्यादि (१।७) के वाक्य मे 'शब्दार्थौ' इस एक पद की व्याख्या की। इस समय 'सहितौ' इस पद की व्याख्या करने के लिए इन दोनो (शब्द और अर्थ) के साहित्य की विस्तृत विवेचना (आगे की कारिका) (१।१६) से करते हैं—पूर्वपक्ष की अवतारणा विषयक श्लोक का अर्थ) शब्द और अर्थ तो सदैव सहित ही

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शब्दार्थों सहितावेव प्रतीतौ स्फुरत: सदा । सहिताविति तावेव किमपूर्वं विधीयते ॥११६॥

शब्दार्थोवभिधानाभिधेयौ सहितावियुक्तावेव सदा सर्वकालं प्रतीतौ स्फुरत: ज्ञाने प्रतिभासते । ततस्तावेव सहितावियुक्ताविति किमपूर्वं विधीयते न किंचिद्-भूतं निष्पाद्याते । सिद्घं साध्यत इत्यर्थ: । तदेव शब्दार्थयो: निसर्गेसिद्घं साहित्यम्। क: सचेताः पुनस्तदभिधानेऽन निष्प्रयोजनमात्मानमायासयति? सत्यमेतत्, किन्तु न वाच्यवाचकलक्षणशाङ्कावतससम्बन्धनिबन्धनं वस्तुत: साहित्यमुच्यते । यस्मादेतस्मिन् साहित्यशब्देनाभिधीयमाने कष्टकल्पनोपरचितानि गाड़कूटादि-वाक्यानि, असम्बद्धानि च शाकटिकादि वाक्यानि च सर्वाणि साहित्यशब्देनाभिधीयेरन् । तेन पदवाक्यप्रमाणव्यतिरिक्तं किमपि तत्त्वान्तरं साहित्यमिति विभागोऽपि न स्यात्॥

ननु च पदादिव्यतिरिक्तं यत्किमपि साहित्यं नाम तदपि सुप्रसिद्धमेव,

ज्ञान मे प्रतीत होते है । इस प्रकार वे सहित तो होते ही है फिर आप ( कुन्तक ) ( कारिका ११७ से ) किस अपूर्व की बात कर रहे है, निर्माण कर रहे हैं ॥१६॥

शब्द और अर्थ अभिधान और अभिधेय, सहित-अवियुक्त ( एक साथ ही ), सदा सभी समय में, प्रतीति मे स्फुरित होते है । इसलिए वे ही सहित-अवियुक्त होते है ( ऐसा कहकर ) कौन-सा अपूर्व विधान किया जा रहा है? किसी अपूर्व तथ्य का निष्पादन नही किया जा रहा है, अर्थात् सिद्घ बात को ही सिद्घ किया जा रहा है ।

तब इस प्रकार शब्द और अर्थ का साहित्य तो स्वभाव सिद्घ ही है । फिर तो कौन बुद्धिमान ( मात्र आपके कहने से ) उसके अभिधान से व्यर्थ अपने को पीड़ित करेगा।

( स्वयं पूर्वपक्ष का अवतार कर ग्रन्थकार उत्तर देते है ) यह कथन सत्य है ( शब्द और अर्थ सहित होते ही है ), किन्तु ( काव्य के परिसर मे ) 'शब्द और अर्थ का साहित्य वस्तुत' वाच्यवाचक रूप जो नित्यसम्बन्ध स्वरूप है ( शब्द और अर्थ के

विषय मे भी यदि ) साहित्य शब्द के कथन से ( नित्य: शब्दार्थसम्बन्ध: —यह शब्द-अर्थ का शाश्वत सम्बन्ध रूप साहित्य माना जायगा तो कष्ट कल्पना से विरचित गाड़कूटादि ( गाड़कूटादिभ्योदृण्णान्त्त् ( पा० १।२।२१ ) पाणिनि विरचित ऐसे सुत्न रूप ) वाक्यों एवं असम्बद्ध गाडीवानों आदि के वाक्यो, सभी को साहित्य शब्द से

अभिहित करना पड़ेगा । और इस प्रकार व्याकरण ( पद ), मीमांसा, ( वाक्य ) न्याय ( प्रमाण ) आदि शास्त्रों से व्यतिरिक्त 'साहित्य' दूसरा अलौकिक तत्त्व है

यह विभाग भी नही पायेगा । ( अतएव यहाँ काव्य के सम्बन्ध मे शब्द-अर्थ का साहित्य शाश्वत सम्बन्ध वाला अभिप्रेत नहीँ है ) ।

( पुन: पूर्वपक्षी ) पद, वाक्य, प्रमाण से व्यतिरिक्त जो कुछ भी 'साहित्य' नाम की वस्तु है, वह तो सुप्रसिद्ध ही है ( उसका विवेचन तो और भी काव्यशास्त्रियों ने

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पुनस्तदभिधानेऽपि कथं न पौनरुक्त्यप्रसङ्गः? अतएवेतदुच्यते, यदिदं साहित्यं नाम तदेतावतिनिःसीमानि समयाध्वनि साहित्यशब्दमात्रेणैव प्रसिद्धम् । न पुनरेतस्य कविकर्मकौशलकाष्ठाभिलषितरसणीयसादृश्यापि कश्चिदपि विप्रतिचदयमस्ति परमार्थ इति मनाङ्मात्रमपि विचारपदवीमनवर्तीनः । तदद्य-सरस्वतीहृदयाविन्दमकरन्दबिन्दुसन्दोहसुन्दराणां सत्कविवचसामन्तरामोदं मनोहरत्वेन परिस्फुरदेतत् सहृदयषड्वचनगोचरतांनीयते॥१६॥

साहित्यमनयो: शोभाशालितां प्रति काप्यसौ । ( अनन्यूनानतिरिक्तत्वमनोहारिण्यवस्थितः ॥१७॥

किया ही है ) तो फिर से आपके द्वारा उसके कथन से क्या ही पुनरुक्ति का प्रसङ्ग पैदा होगा ? ( उत्तर देते हैं )—इसलिए तो यह कहा जा रहा है । जो यह ( शब्द और अर्थ का ) साहित्य है न, वह इतने असीम समय के ( काव्य ) मार्ग मे ( अर्थात् पहले से लेकर अब मेरे कुन्तक तक ) 'साहित्य' शब्द मात्र से प्रसिद्ध रहा ( उसमें कोई नूतनता किसी ने नही बताई ) । किन्तु कवि-काव्य की निपुणता की चरम सीमा को प्राप्त रमणीय इस साहित्य पद का वास्तविक अर्थ आज तक किसी भी विद्वान् की विचार-पद्धति मे स्वल्प मात्र भी नही उतरा कि यह इसका ( साहित्य पद का ) वास्तविक रूप है । इसलिए आज सरस्वती देवरता के हृदयरूपी कमल के पराग ( रस ) विन्दु समूह जैसे सुन्दर, उत्तम कविगणों की वाणी के आन्तरिक आनन्द-स्वरूप, मनोहारो होने के कारण सर्वत्र प्रकाश इस साहित्य को ( मैं कुन्तक ) सहृदय भामरो के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ॥१६॥

शोभाशालिता के लिए इन दोनों ( शब्द और अर्थ ) की कमी या अधिकताविहीन मनोहारिणी कुछ अपूर्व ही अवस्थिति 'साहित्य' कही जाती है ॥१७॥

( शब्द और अर्थ का ) सहित भाव ही साहित्य है । इन दोनों शब्द और अर्थ की जो कोई भी अलौकिकी, चेतन की चमत्कारिता का कारणभूत अवस्थिति है, विचित्र ही विन्यास की विच्छित्ति-शोभा है ( वही साहित्य है ) । ( वह अवस्थिति ) कैसी है ?- न्यूनता या अधिकता के बिना मनोहारिणी अर्थात् ( दोनों की ) परस्पर की स्पर्धिता से रमणीय ( शब्दार्थ की अवस्थिति साहित्य कही जाती है ) । जिस ( अवस्थिति ) मे दोनों ( शब्द और अर्थ ) मे एक की भी न्यूनता-अपकर्षत्व अथवा अधिकता-उत्कर्षत्व विद्वमान नही रहता है । ( पूर्वपक्ष ) उस प्रकार का ( न्यूनत्व

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तथाविधं साम्यं द्वयोरुपहतयोरपि संभवतीत्याह—शोभाशालितां प्रति । शोभा सौन्दर्यमुच्यते । तयां शालते इहाघते य स शोभाशाली, तस्य भावः शोभाशालिता, तां प्रति सौन्दर्य—इहाधितां प्रतीत्थे । सैव च सहृदयाहृदकारिता । तस्यां स्फुरित्वेन यासाववस्थितिः परस्परसाम्यसुभगमवस्थानं सा साहित्यमुच्यते । तत्र वाचकस्य वाचकान्तरेण वाच्यस्य वाच्यान्तरेण साहित्यमभिधेतम्, वाक्ये काव्यलक्षणस्य परिसमाप्त्वादिति प्रतिपादितमेव ( ११७ )।

नतु च वाचकस्य वाच्यान्तरेण वाच्यस्य वाचकान्तरेण कथं न साहित्यमिति चेतत्र, क्रमभयुक्तक्रमे प्रयोजनाभावादसमन्वयाद्वाच । तस्मादेतयो शब्दार्थयोर्याथास्वं यस्यान्तः सममामग्रीसमुदायः सहृदयाहृदकारित्री परस्परस्पर्धया परिस्फुरति, सा काविदेव वाक्यविन्यासासमप्त साहित्यलयपदेष्टाभाग्भवति ।

तथा अपकर्षत्वविहीन ) दोनो ( शब्द और अर्थ ) का साम्य तो ( दोषादि से ) दुष्ट ( शब्द-अर्थ ) मे भी हो सकता है ? ( उत्तर देते है— ) इसलिये कहा है—शोभाशालित्ता के प्रति ( निवद्ध शब्दार्थ को ही साहित्य माना जायगा )। शोभा सौन्दर्य को कहते है । उससे जो शोभासामान्य या प्रख्यातनीय होता है, वह है शोभाशाली उसका भाव शोभाशालिता ( कही जाती है ) उसके प्रति अर्थात् सौन्दर्य की इलाधिता के लिए यह भाव हुआ, और वही सहृदयों के हृदय को आह्लादित करने का भाव है । उसमे ( परस्पर ) स्फूर्तिमापूर्वक जो यह ( शब्द अर्थ की ) अवस्थिति आपस मे परस्पर साम्ययुक्त सुन्दर अवस्थान है । वही साहित्य कहा जाता है । वहॉ एक वाचक का दूसरे वाचक से एवं एक वाच्य ( अर्थ ) का दूसरे अर्थ से साम्य अभिप्रेत है । क्योंकि शब्द और साहित्य रूप वाक्य लक्षण वाक्य मे ही परिसमाप्त होता है, उसका प्रतिपादन ( ११७ मे ) किया ही है ।

( पूर्वपक्ष— ) एक शब्द ( वाचक ) का न सारे अर्थ के साथ एवं एक अर्थ ( वाच्य ) का दूसरे शब्द से साहित्य क्यो नही अभिप्रेत है ? यदि ऐसा कोई कहे तो उत्तर है, नही ( ऐसा नही हो सकता )। क्योंकि क्रम का ( शब्द का शब्दान्तर से एवं अर्थ का अर्थान्तर से साहित्य रूप क्रम का ) परित्याग करके व्युत्क्रम ( शब्द का अर्थान्तर एवं अर्थ का शब्दान्तर से साहित्य-प्रतिपादनरूप क्रम के त्याग ) से ( साहित्य विवेचन मे ) न कोई प्रयोजन प्रस्तुत है और न ( इस व्युत्क्रम कथम का ) कोई उचित सम्बन्ध ही स्थापित हो पाता है । इसलिए, इन दोनो शब्द और अर्थ की वह कुछ अपूर्व ही वाक्यो के विन्यास की सम्पत्ति 'साहित्य' अभिधान की पात्र होती है, जिसमे यथासम्भव ( शब्द और अर्थ को ) अपना सम्पत्ति रूप सामग्र्री समुदाय सहृदयों के हृदय को आह्लादित प्रदान करने वाला परस्पर स्फूर्धा के कारण परिस्फुरित होता है । ( अन्तर श्लोकों मे इस के सार को प्रस्तुत करते है )—

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

मार्गानुगुणयसुभगो माधुर्योदिगुणोदयः ।

अलंकरणविन्यासो वकताश्रयानिवत ॥३४॥

वृत्त्यौचित्यमनोहारि रसानां परिपोषणम् ।

सपर्धया विचिते यत्र यथास्वसुभयोरपि ॥३५॥

सा काव्यवस्थितिस्तत्र विद्वद्‌नन्दनसुन्दरा ।

प्रतिपाद्यैकपक्षे सन्निधानमार्गः साहित्यमुच्यते ॥३६॥

एतेषां च पदवाक्यप्रमाणसाहित्यानां चतुणामपि प्रतिवाक्यमुपयोगः । तथा चैतत्पद‌मेवस्वरूपं गकारौकारविसर्जनीयात्मकेतस्य चार्थस्य प्रातिपदिक-कार्यपक्षक लक्षणस्यालख्यात्पदार्थष्टकलक्षणस्य वाक्यमिति पदसंसकारलक्ष-णस्य व्यापारम् । पदनां च परस्परान्वयलक्षणसं‌बन्धनिबन्धनमेतद्वाक्यार्थ-तात्पर्यमिति वाक्यविवारलक्षणस्योपयोगः । प्रमाणेन प्रत्यक्षादिनैतदुपपत्त्रमिति युक्तियुक्तत्वं नाम प्रमाणलक्षणस्य प्रयोजनम् । इदमेव परिस्पन्द‌माहात्म्यात‌्स-हृदयहृदयहारितां प्रतिपत्त्रमिति साहित्यस्योपयुज्यमानता । एतेषां यद‌पि

( आगे प्रतिपादित किये जाने वाले ) मार्गों की अनुरूपता से सुन्दर, माधुर्य आदि गुणों के समुदय से युक्त, वकता के अतिशय से समन्वित ( जहाँ ) अलङ्करण-पूर्वक ( शब्द और अर्थ की ) रचना की जाती है ॥३४॥

वृत्तियो ( कौशिकी आदि ) के औचित्य से मनोहारि ( शब्दार्थ साहित्य से जहाँ ) रस का परिपोषण किया जाता है और जहाँ यथाशक्ति दोनो ( शब्द और अर्थ ) की ही परस्पर स्पर्धा से अवस्थिति पायी जाती है ॥३५॥

काव्य तत्व के जानकर सहृदयो को आनन्द प्रदान रूप क्रिया से सुन्दर पद ( व्याकरण ) आदि ( वाक्य-मीमासा एवं प्रमाण-न्यायशास्त्र ) की उक्ति का सारभूत ( शब्द और अर्थ की ) कुछ अनिर्वचनीय ही वह प्रतिपाद्य अवस्थिति ‘साहित्य’ कही जाती है ॥३६॥

और इन व्याकरण, मीमासा, न्याय तथा साहित्यशास्त्रों चारों का प्रायः सभी वाक्यो मे उपयोग पाया जाता है । ( क्रमशः चारों का प्रयोग बहुलता से प्रतिपादन प्रकार व्यक्त करते हैं— ) १—तो जैसे—गकार, औकार और विसर्ग रूप ( गौः ) यह पद प्रातिपदिकार्य रूप पाँच ( १-प्रातिपदिक, लिङ्ग, परिमाण, वचन और कारक ) इन अर्थों का अथवा आख्यातार्थ रूप छः ( कर्त्ता, कर्म, काल, पुरुष, वचन एवं भाव ) इन अर्थों का इस प्रकार से वाचक होता है । २—और पदो के परस्पर अन्वयरूप सम्बन्ध का निबन्धन न करना ही वाक्यार्थ का तात्पर्य है, इस प्रकार यह वाक्य विचार रूप मीमांसा शास्त्र के शब्दार्थ निरूपण का प्रकार है । ३—प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के कारण ( इसका ) यह ( अर्थ ) ठीक है, इसलिए यह वाक्यार्थ युक्तियुक्त है, इस प्रकार प्रमाण-शास्त्र का ( शब्दार्थ ) व्यापार है । ४—( अमुक शब्द का ) यही ( अर्थ )

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प्रथमोऽनुच्छेद· ]

प्रत्येकं स्वविषये प्राधान्यान्येषां गुणीभावस्थापि सकलवाक्प्रसन्दजीवितायमानस्यास्य सहित्यलक्षणस्यैव कविव्यापारस्य वस्तुतः सर्वथातिशायित्वम् । यस्मादेतद्मुख्यतयापि यत्र वाक्यसन्दर्भोऽन्तरे स्वप्रसिद्धिमात्रेणैव संस्कारभारभूते तस्यैतद्विधासङ्कुन्यतामात्रेणैव रमणीयकविरहः पर्यवस्यति । तस्मादुपादेयताया: परिहानिरुल्पद्यते। तथा च स्वप्रसिद्धावैय्यप्रसङ्गः । शास्त्राभिरिक्तप्रयोजनत्वं शास्त्राभिधेयचतुर्वर्गोधिकफलत्वं चास्य पूर्वमेव प्रतिपादितम् ( १।३,५ )।

अपर्यालोचितेडप्यर्थे बन्धसौन्दर्यसम्पदा । गीतवद्गृहीयते हृदयं तद्विदां विद्धाति यत् ॥३७॥ वाच्यार्थबोधनिष्पत्तौ पदवाक्यार्थवेजितम् । यत्किमप्यर्पयत्यन्तः पानकास्वादवत्स्तताम् ॥३८॥

स्वभाव की महत्ता के कारण सङ्हृदय की हृदयहारीता को प्राप्त हो गया है, इस प्रकार साहित्य की ( शब्दार्थ के प्रति ) उपयोग्यमानता है । इन चारों ( व्याकरण, मीमांसा, न्याय एवं साहित्य ) मे प्रत्येक की अपने-अपने विषय मे प्रधनता तथा दूसरे के विषय मे गौणभाव है तथापि समस्त वाङ्मयापार के प्राण सङ्हृदयहृदयत् होनेवाले इस साहित्यरूप कविव्यापार ( काव्य ) की ही वस्तुतः सर्वत्र अतिशायिता रहती है । क्योंकि संस्कारभारभूत अन्य वाक्यसन्दर्भों ( व्याकरण आदि की रचनाओंओ ) मे जहॉ यह ( साहित्य ) गौण रूप से ही वर्तमान रहता है, अपने परिमल मात्र से ही ( सौन्दर्य सृष्टि कर देता है ) किन्तु उन सन्दर्भान्तरो मे इसके द्वारा प्राप्त अधिवासन की शून्यता मात्र से ही रमणीयता का अभाव हो जाया करता है । इस प्रकार उस कचन की उपयोगिता की परिह' नि उत्पन्न हो जाती है । और इस प्रकार उस वाक्यसन्दर्भ के स्वव्यापार की व्यर्थता का प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है । साहित्य का मीमासा आदि शास्त्रों से मिन्न प्रयोजनयुक्त होना तथा मीमासादि शास्त्रों से प्रतिपादित चतुर्वर्गो रूप फल से आधिक फलवाला होना पहले ही ( १।३,५ ) प्रतिपादित किया जा चुका है । ( इस प्रकार काव्य मात्र साहित्य ही नहीँ, अन्य शास्त्रो से उत्कृष्ट है, वल्कि उसका प्रयोजन और उद्देश्य भी उनसे वढ़कर है । इस वात को आगे के अन्तरालोको से और भी अधिक स्पष्ट करेगे ) ।

अर्थ की सम्यक् पर्यालोचना किये बिना ही झो ( वक् कवि-व्यापार ) रचना की सौन्दर्य-सम्पत्ति से ही सङ्हृदय काव्य-रमणशो के हृदय मे गीत की भाँति आनन्द की सृष्टि कर देता है ॥३७॥ वाच्यार्थ-प्रतीति के बाद जो सङ्हृदयों के हृदय मे पद ( अभिधेयार्थ ) एवं वाक्यार्थ ( तात्पर्यार्थ ) आदि से अतिरिक्त व्यङ्ग्यार्थरूप पानक रसास्वाद के समान कुछ अनिर्वचनीय आनन्द को समर्पित करता है ॥३८॥

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[वक्रोक्तिजीवितम्

शरीरं जीहितेनैव स्फुरितेनैव जीवितम् ।

विना निर्जीवतां येन वाक्यं याति विपश्चिताम्॥३९॥

यस्मात्किमपि सौभाग्यं तद्विद्रामेव गौवरम् ।

सरस्वती समश्नुते तदिदानीं विचार्यते ॥४०॥

इत्यन्तरङ्लोका:।

एवं सहिताविति व्याख्याय कविव्यापारवकृत्वं व्याचष्टे—

कविव्यापारवकृतव्प्रकारा: संभवन्ति षट् ।

प्रत्येकं बहवो भेदास्तेषां विच्छित्तिशोभिन: ॥१८॥

कवीनां वक्यापार: कविव्यापार: काव्यक्रियालक्षणस्तस्य वकत्वं वक्रभाव:

प्रसिद्धप्रस्थानव्यतिरेकैवैचित्र्यं तस्य प्रकारा: प्रभेदा: षट् संभवन्ति । मुख्यतया

तावन्त एव संभवन्तीत्यर्थे । तेषां प्रत्येकं प्रकारा: बहवो भेदविशेषा

कीटशा:-विच्छित्तिशोभिन: वैचित्र्यभङ्गीभाजिष्णव: । संभव्न्तीति सम्बन्ध: ।

तदेव दर्शयति—

वर्णविन्यासवकत्वं पदपूर्वार्धवकता ।

वकताया: परोड्युक्ति प्रकार: प्रत्यायाश्रय: ॥१९॥

प्राण के बिना शरीर एवं स्पन्दन के बिना जीवन जैसे व्यर्थ है, वैसे ही जिस ( वकतारूप व्यापार ) के बिना विद्वानों की उक्ति निष्प्राण हो जाती है ॥३९॥

जिससे कोई अनिर्वचनीय ही सौन्दर्य काव्यतत्वज्ञ लोगों को ही प्रत्यक्ष होता है,

और जिससे सरस्वती ( कविगण को ) वाणी प्राप्त हो जाती है, इस समय उस ( वक्र-व्यापार ) का विचार करते हैं ॥४०॥

इस प्रकार ये अन्तर श्लोक समाप्त हुए ।

इस प्रकार 'सहितौ' इसकी व्याख्या कर कवि-व्यापार की वकता का विवेचन करते हैं—

कवि-व्यापार ( रूप रचना-प्रक्रिया की ) की वकता के छः प्रकार होते हैं । और विच्छित्ति, विभूषित उनके अनेक भेद हो सकते हैं ॥१८॥

कवियो का व्यापार ही कविव्यापार कहा जाता है जो काव्यरचनारूप होता है। उसकी वकता-वक्रभाव अर्थात् ( लोकशास्त्रादि ) प्रसिद्ध प्रस्थान से व्यतिरिक्त

सौन्दर्य । उसके प्रकार- प्रभेद छः होते हैं । प्रधानतया उतने ही हो सकते हैं, यह

अर्थ है । उनमे ( छहो मे ) प्रत्येक के अनेक प्रकारभेद विशेष होते हैं । किस प्रकार

के भेदविशेष ? विच्छित्तिशोभि—वैचित्र्य की भाङ्गिमा से शोभायमान होते हैं । इस

क्रिया से सम्बन्ध है । उसी ( भेद ) को दिखलाते हैं ॥१८॥

( १ ) वर्णविन्यासवकता ( २ ) पदपूर्वार्धवकता एवं वकता का दूसरा

प्रकार तृतीय ( ३ ) है प्रत्यायाश्रितवकता । ( शेष अन्य भेद आगे प्रदर्शित किये

जायेंगे ) ॥१९॥

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वर्णोनां विन्यासो वर्णविन्यासः अक्षराणां विशिष्टन्यासतं तस्य वक्रत्वं वक्रोभावः प्रसिद्धप्रस्थानव्यतिरेकिणा वैचित्र्येणोपनिबद्धः संनिवेशविशेषविहिततत्तद्विद्यालङ्कारी शब्दशोभातिशयः । यथा—

प्रथममरुणच्छायस्तावन्तः कनकप्रभ-स्तदनु विरहोत्काम्यतन्नीकपोलतलग्नतिः । प्रसरति ततो ध्यातरोदयेऽस्मः आङ्गारामुखे सरस्वसिनेकन्द्रछलेदच्छविमुगलालङ्क्छत: ॥४१॥

अत्र वर्णविन्यासवक्रतामात्रविहितः शब्दशोभातिशयः सुतरां समुन्मीलितः । एतदेव वर्णविन्यासवक्रत्वं चिरन्तनेष्वनुप्रास इति प्रसिद्धम् । अत्र च प्रभेदस्त्वपनिरूपणं लक्षणावसरेऽपि करिष्यते ( २१९ )

पदपूर्वार्द्धवकता—पदस्य सुवन्तरस्य टिडन्तस्य वा यत्पूर्वार्द्धे प्रातिपदिकलक्षणं धातुलक्षणं वा तस्य वकता वक्रोभावो विन्यासवैचित्र्यम् । तत्र च वहवः प्रकाराः सम्भवन्ति । यत्र रूढिशब्दस्यैव प्रस्तावसमुचितत्वेन वाच्य-

१—( वर्णविन्यासवक्रता का निरूपण करते है )—अकारादि वर्णों का विचित्र प्रकार से निबन्धन वर्णविन्यास कहा जाता है । अर्थात् अक्षरों का विशेष न्यास, ( वर्णविन्यास हुआ ) उसकी वक्रता—वक्रोभाव, प्रसिद्ध प्रस्थान से व्यतिरिक्त विचित्रता पूर्ण उपनिबन्धन वर्णविन्यासवक्रता कही जाती हैं । तात्पर्य कि, वर्णों के सन्निवेश विशेष से विलिर्मित काव्यतत्त्वविद् को आनन्द प्रदान करनेवाला शब्दो का शोभातिशय ही वर्णविन्यास वकता है । जैसे—चन्द्रोदय का वर्णन है । उदय के समय प्रथमतः रक्तिम, उसके बाद सोने के समान ( पीली ) कान्तियुक्त, और उसके बाद विरह से विकल कुष तनु रमणी गण्डफलक जैसी ( पाण्डुर ) आभायुक्त और उसके बाद रात्रि के प्रारम्भ मे, प्रदोषकाल मे अन्धकार को चूर्ण करने मे समर्थ, सरस कमलिनी के मूल खण्ड सरीखे सौन्दर्य वाला रागाङ्क ( चन्द्रमाः ) आकाश मे ऊपर सरक रहा है ॥४१॥ (यह श्लोक, सुबाषितावली, काव्यप्रकाश, सरस्वतीकण्ठाभरण, सुवृत्तितिलक ( वामन ) के काव्यानुशासन की विवृति ) तथा अलङ्कारसर्वस्व मे भी उदाहृत हुया है । काव्यप्रकाश 'चन्द्रिका' मे इसे 'मालतीमाधव' नाटक का श्लोक बतलाया है ।

इस श्लोक मे वर्णविन्यासवक्रता मात्र से चिनिर्मित अतिशय सौन्दर्य को सुतरा उभारा गया है । यही वर्णविन्यासवक्रता प्राचीन आलङ्कारिक भामह आदि मे 'अनुप्रास' इस नाम से प्रसिद्ध है । इस विषय मे इसके समस्त भेदो का निरूपण आगो लक्षण के समय ( २१९ मे ) करेगे ।

१—पदपूर्वार्द्ध वकता—पद—टिडन्त अथवा सुवन्त पद का जो पूर्वार्द्ध, प्रातिपदिक या धातुरूप ( प्रकृति ) उसकी वकता, वक्रोभाव अर्थात् विन्यासवैचित्र्य ( ही पद-पूर्वार्द्धवकता है ) । उसमे भी अनेक भेद हो सकते है ।

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प्रसिद्धधर्मान्तराध्यारोपगर्भीभूतैर्निबन्धैः स पदपूर्वार्धवकतया: प्रथमः प्रकांरः । यथा—

रामोडस्मि सर्वं सहे ॥४२॥

द्वितीयः—यत्र संज्ञाशब्दस्य वाक्यप्रसिद्धस्य धर्मस्य लोकोत्तरातिशया-ध्यारोपं गर्भीकृत्योपनिबन्धः । यथा

रामोडसौ भुवनेषु विक्रमगुणैः प्राप्तः प्रसिद्धिं परामसमद्राग्यविपर्ययाद्यादि परं देवो न जानाति तम्‌।

( क ) जहाँ रुचि शब्द का ही प्रकरण के उपयुक्त वाच्यरूप से प्रसिद्ध धर्म के अतिरक्त धर्म के अध्यारोपपूर्वक्‌ निबन्धन किया जाता है, वहाँ पदपूर्वार्धवकता का प्रथम भेद होता है । जैसे—

राम लूँ सब कुछ सह लैगो ॥४२॥

यह पद 'महावीरचरितम्‌' नाटक के प्रकृत श्लोक का है—

स्निग्धशस्यामल कान्तिलसितवियतो वेल्लद्वलाकाघना वाताः शीकरणः पयोदसहृदयमानन्दकेकाः कला ।

कामं सन्तु हृदः कठोरहृदयो रामोडस्मि सर्व सहे वैदेही तु कथं भविष्यति' यहाँ हि दावोघोरो भवेत् ॥

'रामोडस्मि सर्वं सहे' इस पद मे 'मैं राम सब कुछ सह लैगो' कथन से 'राम' शब्द का जो वाच्यार्थ दशरथपुत्र राम है वह अभिप्रेत न होकर उसके अतिरिक्त 'दारुण-हृदय अत्यन्त 'सहनशील' धर्मयुक्त राम हूँ, अभीष्ट है । इस पद से अपूर्व सौन्दर्य का संविधान किया गया है । राम शब्द रुचि है और सुबन्त का पूर्वार्ध है । अतः यह पद पूर्वार्धवकता का उदाहरण हुआ । ध्वनिवादी आनन्द आदि इसे अर्थान्तरसंक्रमित वाच्यध्वनि का उदाहरण मानते हैं ।

( ख ) पदपूर्वार्ध वक्रता का दूसरा प्रकार—जहाँ संज्ञा शब्द के वाच्यतया प्रसिद्ध धर्म का अलंकारिक अतिशय रूप से अध्यारोप करके उससे गर्भित उपनिबन्धन किया जाता है वहाँ पदपूर्वार्धवकता का दूसरा प्रकार होता है—जैसे ( यह श्लोक काव्य-प्रकाश में सर्वनाम, प्रातिपदिक आदि की व्यञ्जकता के उदाहरण के रूप में उद्धृत है । 'राघवानन्द' नामक नाटक का यह श्लोक है मम्मट के टीकाकार यह मानते है । 'माणिक्य चन्द्र' के अनुसार कुम्भकर्ण यहाँ रावण से कह रहा है । चन्द्रिकाकार के अनुसार यहाँ विभीषण कह रहा है । सदुक्तिकर्णामृतम्‌ मे यह श्लोक विशाखदत्त के नाम से उल्लिखित है । सरस्वतीकण्ठाभरण मे भोजराज ने भी इसे उद्धृत किया है )—

'अपने पराक्रम ( खरदूषण आदि के वध रूप ) माहात्म्य से लोको मे अत्यन्त प्रसिद्धि प्राप्त यह राम है । किन्तु यदि देव महाराज रावण आप उन्हैं नहीं पहचानते तो यह हमारे ( राक्षसानिवासियों के ) दुर्भाग्य से ही है ।। वारण के समान यह वाय भी

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बन्दीवाैष यशांसि गायति मरुद्गस्यैकबाणाहार्ति-श्रेणीभूतविशालतालविवरोद्गीर्णैः स्वरैः समभि।।१४३।।

अत्र रामशब्दो लोकोत्तरशौर्योदिधर्मोतििशयाधिकारोपपरत्वेनोपात्तो वकृतां प्रथयति ।

पर्यायवक्तवं प्रकारान्तरं पदपूर्वोक्तवकताया:—यत्रानेकशब्दाभिधेयत्वे वस्तुनः किमपि पर्यायपदं प्रस्तुतानुरणनत्वेन प्रयुज्यते । यथा—

वामं कज्जलवद्विलोचनमुरोरोद्गद्रिसारितनं मध्यं क्षाममकाण्ड एव विपुलाभोगा नितम्बस्थली ।

सत्यः प्रदीप्तविस्मयैरिति गणैरालोक्यमानं मुहुः पायाद्रः प्रथमं वपुः स्मररिपोर्मिश्रीभावक्तान्तया ।।१४४।।

अत्र 'स्मररिपो:' इति पर्याय कामपि वक्ततामुन्मीलयति । यस्मात्कामरिपो: कान्तया मिश्रीभाव शरीरस्य न कर्थंचिदपि संभाव्यत इति गणानां

जिसकी कीर्ति का गान, जिसके एक ही बाण के प्रहार मे पक्तिबद्ध से विशाल ( सात ) ताड़ वृक्षो के छिद्रो से निकलते सात स्वरो द्वारा कर रहा है ( उस राम को आप हमारे भाग्यविपर्यय से ही नही जानते ) ।।१४३।।

इस रचना मे आया 'राम' शब्द, संज्ञास्वरूप राम शब्द, अलौकिक शौर्य आदि धर्मो मे उत्कर्ष के अध्यारोपपरक के रूप मे ग्रहण किया गया है ( वह राम जिसका विक्रम संसारप्रसिद्ध है । जिसने खर प्रभृति राक्षसो का विनाश किया है । एक ही बाण से पंक्तिबद्ध सात विशाल ताड़ वृक्षो को भेदकर सुग्रीव को मित्रता का आश्वासन दिया है और साथ ही वाली का विनाश कर दिया है । इत्यादि अतिशय शौर्ययुक्त है वह राम ) ।

( ग ) पदपूर्वोक्तवकता का अन्य प्रकार है पर्यायवकता । जहाँ किसी वस्तु का अभिधान अनेक शब्दो से सम्भव होने पर भी प्रकट के अनुकूल किसी अपूर्व पर्याय पद का कविगण निवन्धन करते है, वहाँ पर्यायवकता पायी जाती है । जैसे—

भगवती पार्वती से मिश्रित अर्धनारीश्वर भगवान शिव का वर्णन है—प्रितमा पार्वती के शरीर से प्रथमः संयुक्त होता हुआ, हु्रस्न प्रादुर्भूत विस्मययुक्त अपने गणो से बार-बार हृदयमान कामरिपु भगवान् अर्धनारीश्वर शिव का शरीर आप लोगो की रक्षा करे । जिस धारीर मे वामो नेत्र काजल युक्त हो गया है, ( वाम ) वक्षः प्रादुर्भूत हो रहे विशाल स्तन से युक्त हो गया है, अस्थान मे ही कटी प्रदेश का वाम भाग क्षीण हो गया है और वामनितम्ब भाग अत्यन्त विस्तृत हो गया है ।।१४४।।

यहाँ पर ( शिव के अनेक पर्याय होने पर भी प्रयुक्त ) 'स्मररिपो:' कामशत्रु यह पर्यायपद अपूर्ववकतां को उन्मीलित करता है । क्योकि जो स्वयं कामरिपु है उसके शरीर का अप्यी पत्नी के शरीर से मिश्रित होना किस भी प्रकार से सम्भव नही है ।

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

सचः प्रोद्गतविस्मयत्वसुपपत्त्रम्। सोऽपि पुनः पुनः परिशीलनेनाइचर्यैका- रीति 'प्रथम' पदस्य जीवितम्। एतच्च पर्यायवक्रत्वं वाच्यसंविधर्मान्तर- गर्भीकरणापि वक्ष्यते। यथा—

अर्जुनाज, सेनापते, राजवल्लभं, रक्षैनं भीमादुदुःशासनम् ॥४५॥

अत्र त्रियाणामपि पर्यायाणामसंभाव्यमानतत्परित्राणप्रातत्प्रलक्षणसकि- चित्करत्वं गर्भीकृत्योपहस्यते—रक्षैनामिति ।

पदपूर्वार्धवकताया उपचारवकत्वं नाम प्रकारान्तरं विद्यते— ययामूर्तेस्या वस्तुनो मूर्तद्रव्याभिधायिना शब्देनाभिधानमुपचारात्। यथा—निष्कारणं निकारकणिकापि मनस्विनां मानससायासयति। यथा— हस्तापचेयं यशः । 'कणिका'-शब्दो मूर्तेवस्तुस्टोकार्थामिधायী स्तोक्त्वसामा- न्योपचाराद्मूर्तस्यापि निकारस्य स्तोकोभिधानपरत्वेन प्रयुक्तस्तद्विद्विदाहकारि-

इसलिए उसे देखकर गणों को तुरन्त आश्चर्य पैदा हो गया। और वह आश्चर्य होना उपयुक्त ही है। और वह मिश्रित शरीर भी यदि बार-बार परिशीलित क्रिया जाता ( देखा जाता ) तो शायद उतना आश्चर्यकारक न होता। क्योंकि प्रथमतः: देखा जा रहा है अतएव आश्चर्य पैदा हुआ। इसलिए 'प्रथम' पद 'स्मररिपो:' पद का प्राणभूत-सा हो गया है।

और यह पर्यायवक्रता वाच्यार्थ से असम्मावित दूसरे धर्म की गर्भता में भी देखी जाती है। जैसे— ( भट्टनारायण विरचित वेणीसंहार नाटक के तृतीय अङ्क की वर्ण के उपहास मे प्रयुक्त भीमसेन की उक्ति है )—

'अर्जुन के नरेश ( दुर्योधन की ) सेना के अधिपति, राजा ( दुर्योधन ) के प्रियपात्र, भीम से इस दु:शासन की रक्षा करो' ॥४५॥

यहाँ कर्ण सम्बोधन का प्रयोग न करके उसके पर्याय रूप मे निवद्ध तीनो सम्बोधनों—अर्जुन, सेनापते, राजवल्लभ, से यह भावगर्भित है कि उसमे दु:शासन के रक्षा की योग्यता असम्भव है और इस प्रकार वह कुछ भी नही कर सकता।

और इसीलिए 'इसकी रक्षा करो' से का उपहास किया जा रहा है। ( घ ) पदपूर्वार्धवकता का अन्य प्रकार उपचारवकता भी होती है। जहाँ पर अमूर्तवस्तु का मूर्तद्रव्य का अभिधान करनेवाले शब्द से उपचारवक्ता ( लक्षणा द्वारा ) अभिधान किया जाता है वहाँ उपचारवकता होती है। जैसे—

'अकारण की गयी तिरक्रिया की कणिका भी अभिमानी जनों के चित्त को पीड़ित करती है ( यह उक्ति वाण के हर्षचरित की है )। अथवा जैसे— 'हाथ से चुनने योग्य कीर्त्ति ।'

यहाँ प्रथम उदाहरण मे 'कर्णिका' शब्द आया हुआ है जो निकार का विशेषण पद है। कणिका शब्द सामान्यतः मूर्त वस्तु के 'स्वल्प' अर्थ को अभिव्यक्त करता है। किन्तु निकार ( अपमान ) अमूर्त ( भावरूप ) है। स्वल्पतारूप सामान्य अर्थ

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त्वादृक्तां पुष्णाति। 'हस्तापचेयम्' इति मूर्तपुष्पादिवस्तुसंवन्धितत्सामान्योपचारादमूर्तेऽस्यापि यशसो हस्तापचेयमित्यभिधानं वकृतामावहति। द्रवरूपस्य वस्तुनो वाचकशब्दस्तरजितत्वादिरमे निवन्धनं किमपि सारदर्शनात्रसचलमध्यसंहतस्यापि वाचत्वेन प्रयुज्यमान कविप्रवाहे प्रसिद्धः। यथा ह्वासौक्तमरजिणि स्तनतटे इति ॥४६॥

कवचिदमूर्तेऽपि द्रवरुपार्थाभिधायी वाचकत्वेन प्रयुज्यते। यथा— एकों कामपि कालविग्रुषममिं शौर्योशिकण्डूय्यन्वग्र- न्यग्रा सुश्रावविस्मृतामरचमूडीम्वाहवा बाहव ॥४७॥

को बताने के लिए ही यहाँ पर साम्यवश उपचार ( लक्षणा द्वारा ) से, काणिका शब्द के स्वतः अर्थ के अभिधायाक होने के कारण, अमूर्त निकार के लिए भी स्तोक अर्थ ( निकार की स्वल्पता ) के अभिधायक रूप में प्रयुक्त किया गया है। तात्पर्य के लिए आहादकारी होने से यह ( उपचार ) वकता को पुष्ट करता है ।

इसी प्रकार 'हस्तापचेयम् यशः' में भी यशः को हाथ से एकत्रित करने योग्य उपचार से ही बताया गया है। मूर्त वस्तु पुष्प आदि को ही हाथों से बाँधा जा सकता है। अमूर्त यशः को नहीं। किन्तु चयनरूप सामान्य धर्म के कारण उपचारतया अमूर्त यशः को भी हस्तापचेय कहा गया है। इस प्रकार यहाँ भी उपचारवकता सौन्दर्यं को पैदा करती है। उपचारवकता को ही और अधिक से पुष्ट करते हुए कहा रहे हैं कि—

द्रव रूप वस्तु का वाचक शब्द, तरजितत्व आदि धर्मों के प्रतिपादन के लिए निवन्धित किया गया किसी साहर्यमात्र को लेकर कठोर ( संहत ) वस्तु के भी वाचक के रूप मे प्रयुक्त किया हुआ कवि-परम्परा मे प्रसिद्धतथा ( देखा जाता है )। ( द्रव अर्थ के अभिधायक शब्द ठोस अर्थ के भी अभिधायक होते है )। जैसे— द्वासे प्रादुर्भूत अतिशय कॉपते स्तन के प्रान्त ( कोर ) पर कम्पन होना द्रव पदार्थ का धर्म है। यहाँ ठोस स्तनो पर कम्पन रूप धर्म का प्रादुर्भाव द्रवपदार्थ के कम्पनसाम्य मात्र के आधार पर उपचार से किया गया है जिससे किसी अपूर्व सुन्दरता की सृष्टि होती है। इस प्रकार यहाँ भी उपचारवकता ही है। इस पद का पूर्ण इलोक इसी उन्मेष मे लावण्यरूप के उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत किया गया है। कवीन्द्रवचनसमुच्चय ( स० ४५० ) मे भी यह पाया जाता है।

कही अमूर्त अर्थ के वाचक शब्द का द्रवरूप अर्थ के अभिधायक के रूप में वाचकतया प्रयोग किया जाता है। जैसे—( इस श्लोक का उत्तरार्ध तृतीय उन्मेष में उपलब्ध है—

लोको याहारमाह साहसधनं तंक्षत्रियापुत्रकं स्वात्सत्येन सततादगेव नभवेदवातां विसवादिनी । साहस के धनी, उसतुच्छ क्षत्रिय पुत्र को जगत् जैसा कहता है वह भले ही सत्यतया वैसा ही हो और इस प्रकार की बाते भी भले ही झूठी न हो । किन्तु बहुत दिनों से

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विशेषणकत्वं नाम पदपूर्वोद्धृतवक्रताया: प्रकारो विद्यते—यत्र विशेषणमाहात्म्यादेव तद्विद्यादकारित्वलक्षणं वक्तृत्वमभिव्यज्यते । यथा—

दाहोद्मः प्रसृतिमपंचः प्रचयवान् वाष्पः प्रणालोचितः

इवासा: प्रेङ्खितदीपदीपलतिका: पाण्डुरमिन्न मग्नं वपुः ।

किंचान्यकथयामि रात्रिमखिलां तन्मार्गवातायने

हस्तच्छनिरुद्धचन्दनमहास्रस्तया: स्थितिवर्त्तते ॥४८॥

अत्र दाहो बाधः इवासा वपुरिति न किचिद्वैचित्र्यसुन्मीलितम् । प्रत्येकं विशेषणमाहात्म्यात्पुनः काचिदेव वक्त्रताप्रतीति:। यथा च—

नीडायोगान्नतवदनया सन्निधाने गुरूणां

वृद्धोत्कम्प्यस्तनकलशया मन्युमन्तर्नियाम्य ।

तिष्ठेत्युक्तं किमिव न तथा यत्ससुत्सूर्जय वाष्पं

मन्या सक्तस्तरचितहरणीहारिनेत्रत्रिभागः ॥४९॥

देवताओं की सेना के साथ हुए प्रलययुद्धों को भूली हुई मेरी ये भुजाएँ किसी एक भी अलभ्य समय की बूँद मात्र ( एक क्षण की कणिका ) भर के लिए पराक्रम की गर्मी से उत्पन्न खजली को मिटाने में व्यग्र ( संलग्न ) हो जाये ।

उपर्युक्त इन दोनो उदाहरणों मे क्रमशः ‘तरङ्गिणी’ और ‘विप्रुषम्’ दोनो ही पद सौन्दर्य को पैदा कर रहे हैं । ( द्वितीय मे विशेषण ( बूँद ) पद मृत्के द्रव पदार्थ का धर्म है किन्तु स्वस्तिमात्र के साम्य के कारण यहाँ समय के लिए भी उपचार से प्रयुक्त किया गया है जव कि काल स्वयं एक अमूर्त पदार्थ है ।

( व )—विशेषणवक्रता भी पदपूर्वोद्धृतवक्रता का एक प्रकार है—जहाँ विशेषण के महत्व से ही काव्यविदु को आह्लाद प्रदान करने वाला सौन्दर्य अभिव्यजित होता है । जैसे—( वियोगिनी नायिका के विषय मे दूती द्वारा नायक से कहा जा रहा है )—( उसकी ) वियोगाग्नि फैले हुए जल को भी सुखा देने वाली है । विध्रृद्व अश्रुजल बड़ी-बड़ी नालियों से बहने योग्य हो गया है । कॉपती हुई प्रज्ज्वलित दीपलता जैसी उसकी साँस चल रही है । और सम्पूर्ण शरीर ही पीतिमा मे डूब गया है । और आधिक क्या कहूँ, पूरी रात ही तुम्हारे राह की ओर के गवाक्ष मे अपने हाथ के छत्र से चन्द्रमा की धूप को रोके हुए वधू ( देखती रहती है ), यही उसकी अवस्था है ।

यहाँ पर दाह, वाष्प, इवास एवं वपु इन शब्दों ने किसी भी सौन्दर्य का उन्मीलन नहीं किया है । किन्तु एक-एक की विशेषणो के माहात्म्य से ( दाहः के प्रसृतिमपंचः, वाष्प: के प्रणालोचितः, इवासा: के प्रेङ्खितदीपदीपलतिका: एवं वपु: के पाण्डुरमिन्नमग्नं आदि विशेषण हैं ) कोई अपूर्व ही सौन्दर्य—प्रतीति हो रही है ।

अथवा जैसे—( किसी प्रेमी की अपने निकट के व्यक्तिं से उक्ति है ) गुरुजन ( सास-स्वसुर आदि ) के समीप रूज्जा लगाने के कारण नीचे सुल्त किये हुए तथा

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अत्र चकितहरिणीहारौति क्रियाविशेषणं नेत्रत्रिभागासज्जस्य गुरुसंनिधानविलोचनसाम्येन ।

अयनपरः पदपूर्वार्द्धवकताया: प्रकारो यदिदं संवृतिवकत्वं नाम—यत्र पदार्थेस्वरूपं प्रस्तुतानुगुण्येन केनापि निकर्षेणोत्कर्षेण वा युक्तं व्यक्ततया साक्षादाभिधातुमशक्यं संवृतिसामध्योयपायोगिनां शब्देनाभिधीयते । यथासोऽयं दम्भभृतव्रत: प्रियतमे कतुं किमप्युद्यत: ॥५९॥

निरन्तर कॉपते स्तनकलशा उसने क्रोध को अन्दर ही रोककर, आँसू गिराते हुए जो भयत्रस्त हरिणी के समान मनोहारी नेत्र के व्रयश ( कटाक्ष ) को मेरे मे विविधवत् गाड दिया क्या ( उसी से उसने ) यह नही कह दिया कि रुक्को ( विदेश मत जाओ ) ॥४९॥

यहाँ पर 'चकितहरिणीहारि' यह क्रिया-विशेषण, भयत्रस्त चकित मृगी के मनोहारी नेत्र की समानता के कारण, ईश्वर आदि गुरुजनों के समीप न किये जाने वाली प्रगल्भता के कारण सुन्दर नेत्र त्रिभाग ( कटाक्ष ) के आसक्ति की किसी अपूर्व ही कमनीयता की सृष्टि कर रहा है । इस प्रकार यहाँ विशेषणवक्रता की विशिष्ट चमत्कारकारिणी हो रही है ।

( छ ) पदपूर्वार्द्धवकता का यह दूसरा प्रकार है जिसे संवृतिवकता कहते हैं—जहाँ प्रकरण के अनुरुप किसी भी उपकरण अथवा उत्कर्ष से युक्त पदार्थ का स्वरूप, व्यक्त हो जाने के भय से, साक्षात् नही कहा जा सकता, संबरण ( गोपन ) करने की शक्ति के कारण उपयोगी किसी शब्द से कहा जाता है ( वहाँ 'संवृतिवकता' नामक पद-पूर्वार्द्धवकता पायी जाती है ) । जैसे—( यह श्लोक 'तापसवत्सराजचरित' नाटक से लिया गया है । इसी ग्रन्थ के चौथे उन्मेष मे पूरा श्लोक इस प्रकार है—

चक्षुर्यस्य तवाननदपगतं नाभूत् क्वचिद्विरितं येनैषा सततं त्वदेकश्रयनं वक्षःस्थली कल्पिता ।

येनोभासितया विनावत जगच्चकूनां क्षणाज्जायते सोऽयं दम्भभृतव्रतः प्रियतमे कतुं किमप्युद्यत: ॥५०॥

पत्नी वासवदत्ता की विप्रलब्धता से दुःखित, पद्मावती से परिणय को उद्यत राजा उदयन की स्वगत उक्ति है—जिस ( मेरे उदयन ) की आँखे तुम्हारे मुँह से दूर हटकर कहीं भी शान्त नही होतीं, जिसने अपने वक्षःस्थल को मात्र तुम्हारे लिए चैया के रूप में निरन्तर समझा, जिस ( मेरे ) के बिना प्रसन्न भी संसार क्षणभर मे ही तुम्हारे लिए शून्य-सा हो जाया करता था, “ हे वल्लभ मे वासवदत्ते, वही दम्मभामात्र के लिए ( एकपत्नी व्रत को धारण करनेवाला यह उदयन कुछ भी ( पद्मावती-परिणयरूप आकार-णीय ) करने को उद्यत है” ॥५०॥

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अत्र वत्सराजो वासवदत्ताविपत्तिविधुरहृदयस्तत्याप्रालोभनवशेन पद्मावर्तीं परिणेतुमीहमानस्तदेवाकरणीयामित्यवगच्छन् तस्य वस्तुनो महापातकस्येवाकीर्त्तनसंवरणसमर्थेन सर्वनामपदेन ।

यथा च— निद्रानिमीलितदशो मदस्न्त्रराया नाप्यर्थवान्ति न च यान्ति निरर्थकानि ।

अद्यापि मे वरतनोमेधुराणि तथा- स्थान्यक्षराणि हृदये ध्वनन्ति ॥५१॥

अत्र किमपीति तदाकर्णनविहितया श्रवणचमत्कृतिरतुभवैकगोचरत्वलक्षण-मत्वपदेरेयत्वं प्रतिपाद्यते । तान्नति स्वसंवेद्यत्वेन व्यपदेशाविषयत्वं प्रकाश्यते । तेषां च न च यान्ति निरर्थकान्त्यलौकिकचमत्कारकारितवादपार्थकत्वं निर्वार्यते । त्रिव्यप्येतेपु विशेषणवकृत्वं प्रतिपाद्यते ।

वत्सराज उदयन वासवदत्ता की ( अग्निदाह ) विपत्ति से व्यथित मनवाला, उसकी पुन प्राप्ति के प्रलोभन के कारण पद्मावती से परिणय करने की इच्छा रखता हुआ ( वासवदत्ता के प्रेम के कारण ) उसी को संबरणीय ऐसा मानता हुआ, महापाप के सदृश अकथनीय उस ( पद्मावती-परिणयरूप ) वस्तु की, संबरणयोग्य ‘किमपि’ इस सर्वनाम पद से अकथर्तनीयता को प्रकटापित कर रहा है । ( अर्थात् धृतप्रेमा उदयन पद्मावती के साथ परिणय को महापाप समझता है किन्तु उसे कहना नही चाहता । इस मन्तव्य को ‘किमपि’ पद से गोपित कर दिया गया है । इस प्रकार यहाँ संबरण चक्रता का साम्राज्य है ) ।

अथवा जैसे—( यह श्लोक विल्हण की ‘चौरपञ्चाशिका’ का है ) । धनिकृत दृश- रूपक के ‘अवलोक’ हेमचन्द्रकृत काव्यानुशासन एवं समुद्रबन्ध मे भी इसका उल्लेख है—नीद से झपकती ऑखों एवं मद से अलसायी उस वरवर्णिनी के वे मीठे अक्षर जो न तो सार्थक थे और न निरर्थक ही ( क्योंकि अचेतन अवस्था मे कहे गये थे ), अब भी मेरे चित्त में कुछ ध्वनित-सा कर रहे हैं ॥५१॥

'उस सुन्दरी रमणी के मधुर शब्दों के श्रवण से उत्पन्न हृद्गत आनन्द को अनुभव- मात्र से जाया जा सकता है ( कथन से नही ) । इस प्रकार यहाँ ‘किमपि’ पद उसकी ( अनिर्वचनीयता ) अनभिधानता को प्रतिपादित कर रहा है । ‘तान्नि’ पद से सूचित होता है कि वे मधुर शब्द उस प्रकार के अनुभावविशेष से ही स्मरण करने योग्य है, कहने योग्य नहीं । ‘अर्थवान् भी नही थे, कथन से अज्ञातब्बों की संवे्यता तथा अनभिधेयता प्रकटित होती है । और ‘जो निरर्थक भी नही थे’ इस कथन से उनकी अलौकिक चमत्कारकारिता का प्रतिपादन कर उनकी व्यथ्यता का निवारण किया गया है । इन तीनों ही पदों मे ( तान्नि, नाप्यर्थवन्ति तथा न च यानि निरर्थकानि में )

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इदमपरं पदपूर्वार्धवकताया: प्रकारान्तरं संभवति वृत्तिवैचित्र्यवकत्वं नाम—यत्र समासादितवृत्तीनां कासाचिद् विचित्राणामेव कतिभि: परिगृह: क्रियते । यथा—

मध्ये डडूरं पल्वव: ॥५२॥

यथा च—

पाण्डुनिम्नगतं वपु: ॥५३॥

यथा वा—

सुधाविसरणनिः्यन्दसमुल्लासविधायिनी । हिमधामनि खण्डेडपि न जनो नोन्मनायतते ॥५४॥

अपरं लिख्यवैचित्र्यं नाम पदपूर्वार्धवकताया: प्रकारान्तरं हरयते—यत्र मिन्नलिङ्गानामपि शब्दानां वैचित्र्याय सामानाधिकरण्योपनिबन्ध: । यथा—

विशेषणवकता प्रतीत हो रही है (क्योंकि ये तीनो पद अक्षराणि के विशेषण रूप मे उपात्त है, और ‘कतिभि’ पद मे सङ्ख्यावकता है ) ।

( ज ) वृत्तिवैचित्र्यवकता नाम का यह पदपूर्वार्धवकता का दूसरा प्रकार सम्भव है—जहाँ प्राप् वृत्तियो मे कविगण किन्ही विचित्र वृत्तियो को ही स्वीकार करते है ( वहाँ वृत्तिवैचित्र्यवकता नाम की पदपूर्वार्धवकता होती है ) जैसे—

अडकुरो के मध्य पल्वव ( किसलय विराजमान ) है ॥५२॥

( यहाँ तत्पुरुष समास सम्भव होने पर भी कवि ने अव्ययीभाव का सहारा लिया है जिससे चारुता मे वृत्ति आ गयी है ) । अथवा दूसरा उदाहरण—

शरीर पाण्डिमा मे डूबा हुआ है ॥५३॥

( यचपि ‘पाण्डुतायाम्’ प्रयोग भी यहाँ सम्भव था किन्तु तद्धिततद्धिति का सहारा लेकर कवि ने यहाँ वकता मे वृत्ति कर दी है ) ।

अथवा जैसे अन्य उदाहरण—अमृत प्रवाह के निर्झर से आनन्द पैदा करनेवाले अपूर्ण भी तुहिनदीधिति चन्द्रमा के ( उदित हो जाने पर ) व्यक्ति उन्मना हो जाता है ) ॥५४॥

ऐसा नहीँ ( अर्थात उन्मना हो ही जाता है ) ।

यहाँ पर वृत्तिवैचित्र्यवकता का सौन्दर्य है ।

( झ ) पदपूर्वार्धवकता का दूसरा प्रकार लिख्यवैचित्र्य भी देखा जाता है—जहाँ भिन्न लिङ्गवाले भी शब्दो का सौन्दर्य सृष्टि के लिए सामानाधिकरण्य से ही उपनिबन्धन किया जाता है ( वहाँ लिख्यवैचित्र्यपदपूर्वार्धवकता होती है ) । उदाहरणार्थ जैसे—

इस जड जगत् ( मूर्य लोक ) मे लम्बे कानो ( अधिक श्रवण शक्ति ) वाला एवं लम्बे सूँड ( हाथों ) वाला ( इस हाथी को छोड़ कर महान् व्यक्ति को छोड़कर इस दुनिया मे ) और कौन इस प्रकार का पात्र मेरी ध्वनि को सुनने योग्य ( मेरी याचना मे उपलब्ध है )—

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इत्यं जडे जगति कोऽनु वृहल्प्राण-

कर्णः करी नतु भवेद् ध्वनितस्य पात्रं।५५।

यथा च—

मैथिली तस्य दारा ॥ इति ॥५६॥

अन्यदपि लिख्यवैचित्र्यवकृतवम्—यत्रानेकलिङ्गसंभवेडपि सौकुमार्यांत्

कविभिः श्रीलिङ्गमेव प्रयुज्यते, ‘नामैव स्त्रीणां पशेलम्’ ( २१२२ ) इति कृत्वा ।

यथा—

एतां पदय पुरस्तटीम् इति ।५७।

पदपूर्ववृत्तेस्तु धातोः क्रियावैचित्र्यवकत्वप्रकारान्तरं विद्यते—

यत्र क्रियावैचित्र्यप्रतिपादनपरत्वेन वैदग्ध्यभङ्गीभणितिरमणीयान् प्रयो-

इत्यागन्तं झटिति योजयिनमुन्‍नममन्थ

मातङ्ग एव किमत परमुच्यतेसौ॥

इस प्रकार सोचकर आये हुए भ्रमर ( याचक अथवा व्रस लोभी ) को जिसने बड़ी

शीघ्रता से मथ डाला ( निराशकर भगा दिया ) वह मातङ्ग ( हाथी—अधम जाति

चाण्डाल ) ही होता है उसे इससे अधिक और क्या कहा जाये ॥ ५५ ॥

( यहां ‘वृहल्प्राणकर्णः’ करी पुलिङ्ग है किन्तु ‘पात्रं’ नपुसकलिङ्ग । कवि ने

दोनो भिन्न लिङ्गो का समानाधिकरण रूप मे प्रयोग किया है जो अतीव सौन्दर्यं को

पैदा करता है । प्रकृत श्लोक मे अप्रस्तुत ने प्रशंसा के माध्यम से महान् किन्तु मूर्ख जड

व्यक्ति का चित्रण किया गया है ।

अथवा लिख्यवैचित्र्य का दूसरा उदाहरण—

मैथिली ( सीता ) उनकी ( धर्म ) पत्नी हैं ॥ ५६ ॥

( यहां ‘मैथिली’ शब्द नीलिङ्ग एवं ‘दारा’ शब्द पुलिङ्ग है, दोनो का समान

अधिकरण के रूप मे प्रयोग किया गया है । )

लिङ्गवैचित्र्यवकता इतरे दङ्ग से भी होती है—अनेक लिङ्गों का उपनिबन्धन

सम्भव होने पर भी जहाँ ‘क्री’ नाम ही पुलिङ्ग होता है (२१२२) ऐसे समझ कर कवि-

गण श्रीलिङ्ग का ही प्रयोग करते है । जैसे—

सामने इस तटी—को देखो ॥ ५७ ॥

( ‘टट्, तटी, तटम्’ इस प्रकार टट् के तीनों लिङ्ग होते हैं, किसी का भी प्रयोग

किया जा सकता था । किन्तु रमणीयता लाने के लिएकवि ने यहां ‘तटीम्’ श्रीलिङ्ग का

प्रयोग किया है । यह श्लोक पूरा इस प्रकार है—

एता पदय पुरस्तटीमिह किल क्रीडति रागतोहरः:

कोदण्डेन किरीटीना सरभसं चूडान्तरे ताडितः ।

इत्याकर्ण कयाद्‍वृसुतं हिमनिधावद्रौ सुभाद्र‍स्वते

मन्दं मन्दमकारियन निजयोद‍धड्‌डयोरमणडलम् ॥ ५७ ॥

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गान् निर्बन्धान्ति कवयः । तत्र क्रियावैचित्र्यं बहुविधं विच्छित्तिवितततनयवहारं हरयते । यथा—

रइकेलिहिअणिअंसणकरिसलअरुअणअणजुअलस्स रुअरस्स तइअणअं पठविइपरिअुम्बिअं जअइ ।५८।।

रतिकेलिहतनिवसणकरकिसलयरुअदणयणयुगलस्स । रुद्रस्य तृतीययनं पार्वतीपरिअुम्बितं जयति ॥ (इतिच्छाया)॥

अत्र समानेपि हि स्त्रगनप्रयोगेने साध्ये तुल्ये च लोचनतये, देइय्याः परि- चुम्बनेन यस्य निरोधः संप्राप्यते तद्रुगवतसृटतीर्यं नयनं जयति सर्वोत्तर्षेण वर्त्तेत इति वाक्यार्थः । अत्र जयति क्रियापदस्य किमपि सहृदयहृदयसंवेद्यं वैचित्र्यं परिस्फुरदेव लक्ष्यते । यथा—

( दशरूपक की वृत्ति में 'शोभा' नामक सात्त्विक गुण के उदाहरण में यह उद्धत है ) ।

पहले प्रतिपादित कर चुके हैं कि पदपूर्वार्धवकता सुवन्त एवं तिङन्त रूप पद- पूर्वार्ध को लेकर होती है । अब तक सुवन्त के कुछ अवान्तर भेद बताये । आगे तिङन्त का प्रदर्शन करेंगे ।

( अ ) पदपूर्वार्धकता ( तिङन्त ) धातु की वकता दूसरा भी प्रकार क्रियावैचित्र्य वकता नाम का होता है—जहाँ कविगण क्रिया की रमणीयता का प्रतिपादन करने के लिए वैदग्ध्यमण्डनमणिति से रमणीय ही ( क्रिया ) के प्रयोगों को निबन्धन्वित करते हैं । वहाँ भी सुन्दर्य से विस्तृत प्रयोगावाला क्रियावैचित्र्य अनेक प्रकार का होता है । जैसे—

सुरत प्रसङ्ग मे ( भगवान् शंकर के द्वारा ) हटाये गये वधू के कारण निर्वसना ( नग्न ) अतएव ( देवी के ) कर किसलयो से बन्द कर दिये गये नेत्रोवाले ( भालस्थ तृतीया नेत्र तो खुला ही रह गया है । उससे देख लेंगे बाबाजी, अतः ) भगवान् रुद्र का पार्वती से पूर्णतया चुम्बित ( अतएव बन्द ) तीसरा नयन जयनशील सर्वोत्तम्‌वादी है ।।५८।।

यहाँ देवी पार्वती का साध्य शिवजी के तीनों नेत्रों को बन्द कर देना समान होने पर भी, देवी पार्वती के परिअुम्बन से जिसका निरोध सपादित हो रहा है, भगवान् का वह तीसरा नेत्र जयनशील है अथ्यात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, यह वाक्यार्थ है । यहाँ 'जयति' इस क्रियापद का सहृदय गो के हृदय से ही सर्वेध कोऽनिरवच-नीय ही वैचित्र्य सुरित होता हुआ ही परिलक्षित होता है । ( वस्तुतः भगवान् शंकर के दो नेत्रों को शमित करने मे भगवती की लज्जा ही प्रधान कारण है किन्तु तृतीय नेत्र का परिअुम्बन से सृगन महत्वपूर्ण है । एक तो उसी नेत्र से काम भस्मसात् हो गया दूसरे देवी की निर्वसनता भी देखी जा रही है । अतः देवी ने तृतीय नेत्र, जो काम की दाहिका है, अपने चुम्बन से इसे कुशाकर चादुरी से न केवल लज्जा का ही संवरण कर लिया प्रत्युत काम की पूर्णता को प्राप्त करने की अभिलाषा भी पूर्ण कर ली । सौन्दर्य इस भाव मे है । इसीलिए तृतीय नेत्र सर्वोत्तम्‌ है ) । इसीलिए

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स्वेच्छाकेसरिणः स्वच्छस्वच्छायायासितेन्वद्वः ।

त्रायन्तां वो मधुरिपोः प्रपन्नार्तिंच्छिदो नखाः ॥ ५९ ॥

अत्र नखानां सकल्लोकप्रसिद्धच्छेदनत्व्यापारल्यतिरेकि किमपि पूर्वमेव प्रपन्नार्तिंच्छेदनलक्षणं क्रियावैचित्र्यमुपनिबद्धम् । यथा—

स दहति दुरितं शम्भवो व शराग्निः ॥ ६० ॥

अत्र च पूर्ववदेव क्रियावैचित्र्यप्रतीतिः । यथा—

कर्ण्युप्पलदलमिलिअत्तोअणहिं हेलालोळणमणिअघणेओहि ।

लीलहि लीलावहि णिरुद्धओ सिद्विलिअचाओ अजई मअरद्धओ ॥ ६१ ॥

का दूसरा उदाहरण जैसै— ( ध्यानालोक मे मझलाचारण को श्लोक है )—( हिरण्यकशिपु का वध करने के लिये अपनी इच्छा से ही केसरि ( नृसिंह रूप धारण करनेवाले ), मधुरिपु ( भगवान् विष्णु के अपनी स्वच्छकान्ति से चन्द्रमा को भी तिरस्कृत कर देने वाले ) तथा ( शरण मे आये लोगो की पीड़ा को तोड़नेवाले नख आप ( श्रोता एवं पाठक जनों ) की रक्षा करे ॥ ५९ ॥

यहाँ पर नखलो का सकल्लोकप्रसिद्ध ( सामान्य ) जो छेदन कार्य है उससे भिन्न कुछ अपूर्व ही शरणप्राप्त लोगो की पीड़ा का विनाश ( छेदन ) रूप क्रियावैचित्र्य उपनिबन्धित किया गया है । ( इस प्रकार यहाँ क्रियावकता पायी जाती है । ) अथवा इसी का दूसरा उदाहरण जैसै—

भगवान् शरभ की वह वाणो की अग्नि आपके पाप को जला दे ॥ ६० ॥

यहाँ पर भी पूर्व की भाँति ( पूर्व उदाहरण ‘स्वेच्छाकेसरिण्’ आदि की भाँति ) क्रियावैचित्र्य की प्रतीति हो रही है ( सकल्लोकप्रसिद्ध अग्नि की दाहकता से भिन्न दुरितदहन रूप अपूर्व दाहकता सम्पादन के कारण क्रियावैचित्र्य की प्रतीति हो रही है । यह अमरुक शतक के द्वितीय श्लोक का अन्तिम पद है । पूरा श्लोक इस प्रकार है—

क्षितो हस्तावलग्नः प्रसभमभिहतोऽप्याददानोऽस्युकान्तं,

गृहाणं केशेष्वपास्यवरणनिपतितो नेक्षितः शम्भ्रमेण ।

आलिङ्गन् योडघूत्क्षिपुरपुनरतिभिः साश्रुनेत्रो पलाभिः:

कार्भवाद्दीपराधः सदहस्तु दुरितं शम्भवो वः शराग्निः ॥

अथवा ( क्रिया वैचित्र्य का ही दूसरा उदाहरण ) जैसे—कानो मे पहन गये नीलकमलदल के समान नेत्रोवाली, अनायास चपल नेत्रों से सुन्दर हाव भाव आदि विलासों से युक्त सुन्दरियों के विलास से रोका गया, अतएव ‘धनुष को ढीला कर देने वाला काम सबवृत्तक्ष है ॥ ६१ ॥

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प्रथमोन्नेषः ]

(कर्णोत्पलदलमिलितलोचनैर्हेलालोलनमानि तनयनाभिः ।

लीलावतीभिरिनिरुद्धः शिथिलीचृतचापः जयति मकरध्वजः ॥

( इतिेच्छया )

अत्र लोचनैर्लीलया लीलावतीभिरिनिरुद्धः स्वेच्यापारपराड्मुखीकृतः सन् शिथिलीचृतचापः कन्दर्पो जयति सर्वोत्कर्षेण वर्त्तत इति किमुच्यते, यतस्तत्स्थाविधविजयावाप्तौ सत्यां जयन्नीति वक्तव्यम् । तदनत्राभिप्रायः—

यत्तल्लोचनविलासानामेवं जैत्रताप्रौढभावं पर्यालोच्य चेतनत्वेन स स्वचापारोपणायासमुपसंहतवान् । यतस्तनेव त्रिभुवनविजयावाजितः परिसमाप्त्येते ममेति मन्यमानस्य तस्य सहायतव्यत्कर्षोऽतिशयैः जयतीति क्रियापदेन कर्त्तताया कारणत्वेन कवेरचतसि परिस्फुरितः । तेन किमपि क्रियावैचित्रयमत्र तद्विद्-हादकारि प्रतीयते । यथा च—

तान्यक्षराणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ॥ ६२ ॥

अत्र जल्पान्ति वदन्तीत्यादि न प्रयुक्तम्, यस्मान्तानि कयापि विच्छित्या किमप्यनाख्येयं सम्प्रयन्नीति कवेरभिप्रेतम् ।

यहाँ लीलावती सुन्दरियों के नेत्रों से अनायास निरुद्ध अपने बाण प्रहार रूप विसुख किया गया, धनुष को ढीला किये हुए कामदेव की जय हो—अर्थात् सबसे अधिक उत्कर्ष से युक्त । ( कामदेव सर्वोत्कर्ष युक्त है ) यह क्या कहाना, कहाना तो यह चाहिए कि उस प्रकार की विजय प्राप्त हो जाने पर ( अपनी लीला से काम रोक-कर शिथिल चाप कर देने रूप विजय प्राप्ति से ) वे सुन्दरियाँ ही विजयिनी हैं तो यहाँ अभिप्राय यह है—कि उन ( लीलावतियों ) के नेत्र विलासों की इस प्रकार की जयनशीलता की उत्कृष्टता की विवेचना कर नैतनता बुद्धिमत्त के कारण उस काम ने अपने धनुषारोहण प्रयास को रोक दिया, समाप्त कर दिया । क्योंकि उसी ( लीला-वतियों के लोचन विलास मात्र ) से मेरे द्वारा प्रारम्भ किये गये त्रैलोक्य की विजय प्राप्ति समाप्त ही जाती है, ऐसा मानते हुए उसकी ( काम की ) सहाय्यता के उत्कर्ष का ( लीलावतियों के नेत्र-विलास मे ) अतिशय 'जयति' इस क्रिया पद से कर्त्ता के कारण के रूप मे कवि के चित्त मे परिस्फुरित हुआ है । इसलिए यहाँ 'जयति' इस का कुछ अनिवर्चनीय ही वैचित्र्य तद्विदो को आह्लाद देने वाला है ।

अथवा जैसे—( क्रियावैचित्र्य मे ही प्रस्तुत ५१वे उदाहरण 'निद्रानिमीलितदृशो'

का यह अन्तिम पद है ) ( प्रियतम के उच्चारित वे निरर्थक 'अथवा' सार्थक ) शब्द हृदय मे कुछ अपूर्व ही ध्वनित कर रहे है ॥६२॥

यहाँ 'जल्पान्ति' अथवा 'वदन्ति' जैसे पद प्रयुक्त नही किये गये; क्योंकि वे अक्षर किसी अनिवर्चनीय विच्छेद्याचत से कुछ अकथनीय ही वस्तु समर्पित करते है यह कवि का अभिप्रेत है ( जो 'ध्वनन्ति' से ही सम्भव था, अन्य पदों से नही । अतः यहाँ 'ध्वनन्ति' क्रियापद की वक्ता हृदयहारिणी है ।

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वक्ताया: परोड्यसति प्रकारः प्रत्ययाश्रय: इति । वक्रोक्तिभावस्यान्योऽडपि प्रभेदो विद्यते । कीदृशः—प्रत्ययाश्रयः । प्रत्ययः सुप्तिङ च यस्याश्रयः स्थानं स तथोक्तः । तस्यापि बहवः प्रकाराः संभावन्ति—संख्यावैचित्र्यविहित, कारकवैचित्र्यविहित:, पुरुषवैचित्र्यविहितः । तत्, संख्यावैचित्र्यविहितः—यस्मिन् वचनवैचित्र्यं काव्यबन्धनशोभायै निबध्यते । यथा—मैथिली तस्य द्वारा: ॥ इति ॥६३॥

यथा च—फुल्लेन्दीवरकाननानि नयने पाणी सरोजाकराः ॥६४॥

अत्र द्विवचनबहुवचनयोः समाना-धीकरण्यमतीव चमत्कारकारि । कारकवैचित्र्यविहितः—यत्राचेतनस्यापि पदार्थस्य चेतनत्वाद्यारोपेण चेतनस्यैव क्रियासमावेशलक्षणं रसादिपरिपोषणार्थं कल्पत्वादिकारकं निबध्यते ।

अब आगे पुन वक्ता के प्रधान भेद पर आते है—वक्ता का एक और प्रकार है प्रत्ययाश्रय । ( १९वीं कारिका के उत्तरार्ध भाग—वक्ता यः परोऽड्यसति प्रकारः प्रत्ययाश्रय —की व्याख्या करते है ।) वक्रोक्ति का और भी प्रभेद है । (वह प्रभेद) कैसा है ?—प्रत्ययाश्रय । प्रत्यय अर्थात् सुप् और तिङ् जिसके आश्रय है, स्थान है, वह उस प्रकार से कहा गया है ( प्रत्ययाश्रय वैचित्र्य है ) । उसके भी अनेक प्रकार हो सकते है—संख्यावैचित्र्य से किया (प्रत्ययाश्रय वैचित्र्य) गया, कारकवैचित्र्य से किया गया एवं पुरुषवैचित्र्य से किया गया । उसमे भी संख्यावैचित्र्यविहित (प्रत्ययाश्रय वक्ता वहाँ होती है)—जहाँ काव्य-रचना की शोभा के लिए (कविगण) (एकवचन आदि रूप) वचनसौन्दर्य का निबन्धन करते है । जैसे—मैथिली (सीता) उन (राम) की पत्नी है ॥६३॥

(यहाँ 'मैथिली' पद एकवचन का है; किन्तु 'द्वारा' बहुवचन पद का प्रयोग किया गया है जो स्वयं मे नित्य बहुवचन होने से अत्यन्त रमणीयता का आधायक हो गया है ।)

अथवा इसी वक्ता का दूसरा उदाहरण जैसे—(उस नायिका के) नेत्र खिले हुए (नील) कमल वन है और दोनो हाथ (रक्त) कमलवन ॥६४॥

यहाँ 'नेत्रे' एवं 'पाणी' द्विवचन एवं क्रमशः 'फुल्लेन्दीवरकाननानि' एवं 'सरोजाकराः' बहुवचन का समाना-धीकरण्य (एकविभक्तिक) प्रयोग अत्यन्त चमत्कार का जनक है (अत संख्यावैचित्र्ययुक्त प्रत्ययाश्रितवकक्ता हुई)।

कारकवैचित्र्यविहित प्रत्ययवकता वहाँ होती है जहाँ रस आदि की परिपुष्टि के लिए अचेतन पदार्थ मे भी चेतनता का आरोप कर उसके द्वारा चेतन के ही क्रिया-समावेशा रूप कर्तृत्व आदि कारक का (अचेतन पदार्थ मे भी) निबन्धन किया जाता है । जैसे—

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स्तनद्वन्द्वं मर्दनं स्रपयति बला द्वाष्पनिवहोऽथादन्तः कुण्ठं लुठति सरस पद्मरमवः ।

शरज्ज्योत्स्नापाण्डुं पतति च कपोलः करतलं न जानेऽस्तस्याः क इव हि विकारव्यतिकरः ॥१५५॥

अत्र वाष्पनिवहादीनामचेतनानामपि चेतनत्वाध्यारोपेण कविना कर्तृत्व-मुपतिबदधम्—यत्स्या विकारस्याः सत्यास्तनोष्मणोः स्तनयोर्हान्, सा पुनः

स्वयं न किंचिद्याचरितुं समर्थेऽत्यमिप्रायः । अन्यच्च कपोलादीनां तद्वय-वानामेतदवस्थंं प्रत्यक्षतया स्मादादिगोचरतामपद्यते, तस्याः पुनयैः सावन्त्र्वि-कारव्यतिकररस्तं तदनुभवैकविषयत्वाद्रयं न जानेऽमः । यथा च—

चापाचार्योऽत्रिपुरविजयी कार्तिकेयो विजेयः शस्त्रव्यस्तः सदनमुदधिमूभ्रियं हन्तकारः ।

अस्त्येवैनत् किसु कृतवता रेणुकाकण्ठबाधां बद्धसस्पर्धस्तव परशुना लज्जते चन्द्रहासः ॥१५६॥

( किसी विरहिणी का वर्णन है ), अश्रुप्रवाह ज्वरन दोनों स्तनों को धीरे से नहला रहा है । रसयुक्त पद्मरमस्वर जबर्दस्ती गले के भीतर लुठित हो रहा है । शरत्स-मय की चाँद्रिका के समान पीला उसका कपोल हाथों मे गिरा पड़ा रहा है; किन्तु पता नहीं, उसका विकार-प्रकार किस तरह का है ॥१५५॥

यहाँ अचेतन भी वाष्पसमूहों (वाष्प, पद्मरमव एवं कपोल) का कवि ने चेतनता का उन पर आरोप कर कर्तृत्व निवेशित किया है । वह इस प्रकार है कि ( विरह-वेदना से ) विवशा उस युवती के रहने पर उन ( वाष्प, पद्ममस्वर एवं कपोल ) का इस प्रकार का (स्नान करना, कुण्ठित होना एवं गिर पड़ना) कार्य है और वह स्वयं कुछ भी करने मे समर्थ नहीं है—यह इसका अभिप्राय है । और दूसरा वैचित्र्य यह भी है कि उसके कपोल आदि अज्ञों की यह अवस्था है जो हम जैसे को प्रत्यक्षतः दृष्टिगित होती है । किन्तु उसकी जो वह मानसिक विकार की स्थिति है उसे हम नहीं जानते; क्योंकि वह तो एकमात्र अनुभव का विषय है । ( इस प्रकार यहाँ एक ओर तो कारककवक्ता है और दूसरी ओर क्रियावैचित्र्य भी ) । अथवा कारककवक्ता का ही दूसरा उदाहरण जैसे—चापाचार्यन् ।

राजशेखरकृत 'बालरामायण' नाटक का यह श्लोक है । रावण भगवान् परशुराम से कह रहा है—त्रिपुरविजयी ( भगवान् शिव ) आपके धनुर्विद्या के गुरु रहे है, कार्तिकेय भी आपके विजेय रह चुके हैं ( उन्हें भी आपने जीता है ) शस्त्र ( वाण ) से दूर फेंका गया समुद्र आपका घर है और यह पृथ्वी आपके द्वारा काश्यप को प्रदान कर दी गयी ( घोडशग्राम रूप धरणी अतिथि-भिक्षा बनी ) । यह सब तो ठीक ही है किन्तु ( अपनी माँ) रेणुका के ही गले को काटनेवाले आपके कुठार के साथ स्पर्धा करते हुए मेरी तलवार लज्जित हो जाती है ॥१५६॥

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अत्र चन्द्रहासो लज्जित इति पूर्ववत् कारकवैचित्र्यप्रतीति: । पुरुषवैचित्र्यविहितं वक्रत्वं वि' ते—यत्र प्रत्यक्तापरभावविपर्ययांसं प्रयुञ्जते कवय:, काव्यवैचित्र्यार्थीं युष्मदस्मदिभि: वा प्रयोक्तव्ये प्रतिपदिकमात्रं निवन्धनन्ति ।

यथा—

अस्मदाग्यविपर्ययेयादिपरं देवो न जानाति तम् ॥६७॥

अत्र त्वं न जानासि इति वक्तव्ये वैचित्र्याय देवो न जानातीयुक्तम् । एवं युष्मदादिविपर्योस: क्रियापदं विना प्रातिपदिकमात्रेऽपि हृदयये ।

यथा—

अयं जन: प्रष्टुमनास्तपोधने न चन्द्रहासं प्रतिवक्तुमर्हसि ॥६८॥

यहाँ 'चन्द्रहास लज्जित होता है' इस प्रकार के कथन मे पहले की भाँति ( अचेतन पर चेतनता का आरोप करने के कारण ) कारकवैचित्र्य की प्रतीति हो रही है ।

( उत्तम आदि ) पुरुष सौन्दर्य से सम्पादित वक्रता भी होती है—जहाँ कविगण प्रत्येक ( प्रथमादि पुरुषो ) के अपने स्वरूप का विपर्य्यासपूर्वक वर्णन करते है, तात्पर्य यह कि काव्य मे सौन्दर्य-सम्पादन के लिए युष्मत् ( मध्यम पुरुष ) या अस्मद् ( उत्तम पुरुष ) का प्रयोग करने के बजाय उनके स्थान पर प्रातिपदिकमात्र ( प्रथम पुरुष ) का निवन्धन करते है ।

जैसे—

( यह विभीषण की उक्ति जो रावण से कही गयी है, पूर्व भी आ चुकी है । ) हमारे ( लड़्‌झानिवासियो ) के भाग्यविपर्यय ( दुर्भाग्य से ) महाराज आप ( रावण ) भी उस ( त्रैलोक्यविश्रुतपराक्रम राम ) को नही जानते ॥६७॥

यहाँ 'तुम जानते हो' ऐसा कहने के स्थान पर विचित्रता के लिए 'देव आप नहि जानते'—इस पद का प्रयोग किया है । ( तात्पर्य यह कि युष्मद् के स्थान पर सौन्दर्य-सम्पादन के लिए 'देव' प्रातिपदिक का प्रयोग कवि ने किया है । )

इसी प्रकार 'युष्मद्' आदि का विपर्यय क्रियापद के बिना भी प्रातिपदि मात्र मे भी देखा जाता है । जैसे—कुमारसम्भव का इलोक है ।

वृद्ध वेपधारी शिव पार्वतीजी से पूछ रहे है )—तपस्वी, आपसे यह व्यक्ति कुछ पूछने की कामना रखता है, यदि रहस्य ( गोपनीय ) न हो तो ( मेरे प्रश्नो का ) प्रत्युत्तर देने की कृपा करे ॥६८॥

यहाँ पर मै पूछने की इच्छा रखता हूँ ऐसा कहने के स्थान पर तटस्थता ( औदासीन्य ) की प्रतीति कराने के लिए 'यह व्यक्ति' ऐसा कहा है ।

( इस प्रकार यहाँ क्रियापद 'प्रष्टुमना:' का विपर्यय किये बिना 'असद्' के स्थान पर मात्र प्रातिपदिक का प्रयोग 'अयं जन:' किया गया है जो पुरुषवकता को सूचित करता है ।

कुमारसम्भव के इस इलोक का उत्तरार्द्ध इस प्रकार है—

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सोऽयं दम्भभृततन्रत: इति ॥६९॥

अत्र सोऽहमिति वक्तव्ये पूर्ववद् ‘अयम्’ इति वैचित्र्यप्रतीति: । एते च मुख्यतया वकताप्रकारा: कतिचिन्मिदर्शनार्थं प्रदर्शिता: । शिष्टास्त्र सहस्रश: संभवन्तीति महाकविग्रवाहो सहदयै: स्वयमेवोत्रेक्षणीया ।

एवं वाक्यावयवानां पदाना प्रत्येकं वर्णावयवद्वारेण यथासंभवं वक्रो- भावं न्यायशास्त्रविदां पदसुदार्यमूतस्य वाक्यस्य वकता । न्याय्यीयते— वाक्यस्य वकभावोडन्यो भिद्यते य: सहस्रधा ।

यत्रालंकारवर्गोडसौ सर्वोऽन्यान्तर्भविष्यति ॥७०॥

वाक्यस्य वकभावोडन्य: । वाक्यस्य पदसमुदायमूतस्य । आख्य्यात सांय्याकारविशेषणं वाक्यमिति यस्स प्रतीतिसतस्य इलोकादवेवंकभावो भणितिवैचित्र्यम् अन्य: पूर्वोक्तवकताव्यतिरेकी समुदायवैचित्र्यानिबन्ध: कोऽपि संभवति । यथा—

‘अतोऽत्र किञ्चिद् भवती बहुकशा द्विजातिभावादुपपर्यचापलं ।’

अथवा जैसे ( पुरुषवकता का अन्य उदाहरण )—वह यह ( उदयन ) दम्भमात्र के लिये ( एक पत्नी ) व्रत धारण किये हुए कुछ भी ( अकरणीय ) करने के लिये उद्यत है ॥६९॥

यहाँ पर ‘वह मैं’ यह कहने के स्थान हर पहले की भाँति वह ‘यह’ इस पद का प्रयोग किया गया है ( अर्थात् अस्मद् के स्थान पर अन्य पुरुषसूचक प्रतिपादिक मात्र सर्वनाम पद ‘अयम्’ का प्रयोग किया गया है ), जिससे अधिक सौन्दर्य की प्रतीति हो रही है ।

इस प्रकार निदर्शन मात्र के लिये प्रभानतया कुछ वकता के प्रभेद् प्रदर्शित किये गये । इस प्रकार के अवशिष्ट हजारों वकताप्रकार हो सकते है । इसलिए महाकवियों के प्रवाह ( रचनाओं ) में सहृदयजनों को उनको स्वयं देखना चाहिए ।

इस प्रकार वाक्य के अवयवभूत पदों ( सुवन्त-तिङन्त ) के वर्णादि अवयव के माध्यम से ( वर्ण आदि ) प्रत्येक का यथासंभवं बहुमुख प्रतिपादित कर अब पदों से समुदायमूत वाक्य की वकता की व्याख्या की जा रही है—

वाक्य का वकभाव ( पदचकता से ) अन्य ही है जो हजारों प्रकार के भेद को प्राप्त होता है । जिसमे ( प्रस्तुत ) यह समस्त ( उपमादि ) अलङ्कारसमूह अन्तर्भूत हो जायगा ॥७०॥

वाक्य का वकभाव अन्य ही है । वाक्य का—पदसमुदायमूत वाक्य का । अव्यय, कारक, विशेषण के साथ आख्यात ( क्रिया ) से युक्त ( पद समूह ही ) वाक्य है ।

इस प्रकार जिस ( पद-समूह ) की प्रतीति होती है उस ( वाक्यरूप ) इलोक आदि का वकभाव अन्यांत् भङ्गिमाणतिवैचित्र्य अन्य अर्थात् पूर्वप्रतिपादित ( पद ) वकता से व्यतिरिक्त ( पद ), समुदाय ( वाक्य ) की विचित्रता का निबन्धन ( पूर्वं

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स च वक्रोभावस्ताविधो य सहस्रधा भिद्यते बहुप्रकारं भेदमासादयति । सहस्र शब्दोऽत्र संख्या-भूयस्त्वमात्रवाची, न नियतार्थवृत्ति:, यथा—सहसदल-मिति । यस्मात् कविप्रतिभानामानन्त्याश्रियतत्वं न संभवति । योडसौ वाक्यस्य वक्रोभावो बहुप्रकार;, न जातुमस्तं कीटशमित्याह—यत्रालङ्कारवर्गोऽसौ सर्वोऽप्यन्तर्भविष्यति । यत्र यस्मिन्नलङ्कारवर्गे कविप्रवाहप्रसिद्धप्रतीति-रूपमादिरलङ्करणकलाप: सर्वे: सकलोऽप्यन्तर्भविष्यति, अन्तर्भावं ब्रजिष्यति, पृथक्‌त्वेन नावस्थाप्यते । तत्प्रकारभेदत्वेनैव व्यपदेशमासादिष्यतित्यर्थे: ।

स चालङ्कारवर्ग: स्वलक्षणावसरे प्रतिपदमुदाह्रियते । एवं वाक्यवक्रतां व्याख्याय वाक्यसमूहरूपस्य प्रकरणस्य तत्समुदायात्मकस्य च प्रबन्धस्य वक्रता क्याख्यायते—

वक्रोभाव: प्रकरणे प्रबन्धे वास्ति यादृश । उच्यते सहजाहार्यसौकुमार्यमनोहर:॥२१॥

वक्रोभावो विन्यासवैचित्र्यं प्रबन्धैकदेशाभूते प्रकरणे यादृशोऽस्ति यादृङ्‌

विद्यते प्रबन्धे वा नाटकादौ सोऽप्युच्यते कथम् । कीटश:—सहजाहार्य-व्याख्या करते है—सचेति । और वह ( वाक्यवक्रत ) वक्रोभाव उस प्रकार का है, जो

हजारों प्रकार के भेद को प्राप्त करता है—अनेक प्रकार के भेद को प्राप्त करता है । सहस्र शब्द यहाँ संख्या की बहुतलता मात्र का वाचक है, न कि नियत ( सहस्र ) अर्थ का वाचक । जैसे सहसदल ( सहस्रदल कमल को कहते है ) उसमें हजार पंखु-डियों होती है इसलिए सहस्रदल उसे नही कहते, प्रत्युत इसलिए कि उसमें अनेक दल होते है । उसी प्रकार यहाँ भी सहस्र संख्या का नियामक नही, बहुतल्य का सूचक मात्र है ।) क्यो? क्योंकि कविप्रतिभा का अन्त नही होता, इसलिए वाक्यवक्रता की नियतता ( कि हजार भेद ही होते हैं इस प्रकार की निश्चयता ) सम्भव नही है । ( कोई प्रदान कर सकता है ) जो यह बहु प्रकार वाक्य का वक्रोभाव है, उसे हम नही जानते कि किस तरह का है? ( उत्तर देते है )—जहाँ यह समस्त ( उपमादि ) अलङ्कारसमूह अन्तर्भूत हो ।

यत्र जिस ( वाक्यवक्रता ) में, यह अलङ्कार वर्ग—कवि परम्परा में प्रसिद्ध प्रतीति वाळा, उपमा आदि अलङ्कार समूह, सर्व—सम्पूर्ण भी अन्तर्भूत हो जायगा—अन्तर्भाव को प्राप्त हो जायगा । ( वह अलङ्कार वर्ग ) अलग से अवस्थापित नही किया जायगा । अर्थात् उस ( वाक्यवक्रता ) के प्रकार भेद से ही अभिधान को प्राप्त करेगा, यह अर्थ हुआ । और वह अलङ्कारवर्ग उनके ( अपने ) लक्षण के समय प्रतिपाद उदाहृत किया जायगा ।

इस प्रकार वाक्यवक्रता की व्याख्या कर वाक्य के समुदायरूप प्रकरण और उसके समुदायरूप प्रबन्ध की वक्रता की व्याख्या की जा रही है—

प्रकरण अथवा प्रबन्ध में जिस प्रकार का वक्रोभाव पाया जाता है ( उसे भी ) कहा जा रहा है । ( वह ) सहज, आहार्य और सौकुमार्य ( भेद से ) मनोहारि होता है ॥२१॥

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७७६

[वक्रोक्तिजीवितम्

सौकुमार्येमनोहरः । सहजं स्वभावविकमाहार्यं व्युत्पत्त्युपार्जितं यत्सौकुमार्यं

रमणीयकं तेन मनोहरो हृदयहारि यः स तथोक्तः । तत्र प्रकरणे वक्रोभावो

यथा—रामायणे मारीचमायामयमाणिक्यमृगानुसारिणो रामस्य करुणाक्रन्द-

कर्णनकातरान्तःकरणया जनकराजपुत्र्या तम्राणपरित्राणाय स्वजीवितपरिक्षा-

निरपेक्षया लक्ष्मणो निर्भरत्ये प्रेषित । तदेतदुत्यान्तमनौचित्ययुक्तम्, यस्या-

द्गुरुवरस्नेहातिशयात्तथाविधव्यापारकरणेनासंभावनीयम् । तस्य च

सर्वोत्कृष्टचरितयुक्तत्वेन वर्ण्येमानस्य तेन कनीयसां प्राणपरित्राणसंभावन-

वक्रोक्ति-विन्यास की विचित्रता, प्रवन्ध के एक अगूढ प्रकरण मे जैसी है—

जिस प्रकार की पायी जाती है अथवा नाटक आदि प्रवन्ध मे ( जैसी पायी जाती है ),

वह भी कही जा रही है। वह किस प्रकार की है ?—'सहज, आहार्य एवं सौकुमार्य

से सुन्दर' । सहज-स्वाभाविक, आहार्य-व्युत्पत्ति से उपार्जित तथा जो सौकुमार्य-रमणीय,

उससे ( इन तीनों से ) मनोहर-हृदयहारि जो ( वक्रोभाव है ) वही ( प्रकरण-प्रबन्ध

का वक्रोभाव है ) जैसा कि कहा गया है। उनमे भी प्रकरण मे प्राप्त वक्रोभाव का

उदाहरण है। जैसे—रामायण मे मारीचरूप मायाविरचित स्वर्णमृग के पीछे भागने-

वाले रामचन्द्र की करुण चीखो को सुनने से भयचकित मनवाली जनकराजपुत्री सीता

ने अपने प्राणों की रक्षा से उदासीन होकर रामचन्द्रजी के प्राणों की रक्षा के लिए

बहुत-कुछ भला बुरा कह कह लक्ष्मण को भेज दिया। यह तो अतिशय अनौचित्यपूर्ण

है। क्योंकि सेवक ( लक्ष्मण ) के समीप रहते प्रधान ( राम का ) उस प्रकार का

कार्य करना ( स्वर्णमृग का पीछा करना, जनकी के रक्षा के लिए लक्ष्मण को छोड़ना

और पुनः करुणाक्रन्दन ) असम्भव-सा ही लगता है। साथ ही सर्वोत्कृष्ट चरित के रूप

में वर्ण्यमान उन ( राम ) की उनसे छोटे ( लक्ष्मण के द्वारा ) ( उनके ) प्राण की

रक्षा की संभावन, यह तो और भी अनुचित है। ऐसा विचार कर ही 'उदात्तराघव'

नामक नाटक मे कवि ने चातुर्यपूर्वक मारीचमृग को मारने के लिए गये हुए लक्ष्मण

की परिक्षा के लिए सीता ने भयवशा राम को प्रेषित किया ऐसा हृत्तान्त उपनिबन्धित

किया है। और यहाँ ( उदात्तराघव के उस वर्णन मे ) काव्यज्ञ रसिक की आह्लाद-

कारिता ही वक्रोक्ति है। और जैसे ( भारविविरचित ) किरातार्जुनीय महाकाव्य मे

किरात ( वेषधारी भगवान् शंकर द्वारा प्रेषित अनुचर रूप ) पुरुष की उक्तियों मे

अपने बाणों का अनुसंश्रण मात्र ही ( कवि ने ) वाच्य रूप मे प्रस्तुत किया है।

किन्तु तात्पर्यार्थ की सम्पक् विवेचना से ( स्पष्ट है ), कि वस्तुतः ( किरात की उक्तियों मे ),

अर्जुन के साथ वैर ( विग्रह-युद्ध आदि ) की बात ही वक्यार्थतया उपनिबद्ध की

गयी है। जैसे कि वही ( किरातार्जुनीय ) मे ही कही गयी है—

( किरात के प्रति अर्जुन की उक्ति है )—( प्रथमतः तो शान्तिमय उक्तियों से

तुमने ) साम का आचरण प्रयुक्त किया, ( तदनतर अपने स्वामी से मित्रता की बात

उठाकर ) प्रलोभन का प्रयोग किया, ( पुनः उसके शौर्य का वर्णन कर ) बॄद्वि मे

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त्येतदृत्यन्तमममौचीनमिति पर्योलोच्य उदात्ततराघवे कविना वैदग्ध्यवशेन मारीवच्मगमारणाय प्रयातस्य परित्राणार्थं लक्षणस्य सीतया कालरत्वेन रामः प्रेरितः इत्युपनिबद्धम्। अत्र च तद्विद्वाहादकारित्वमेव वक्रोक्तिम्। यथा च किराताजुनीयेऽपि किरातपुरुषोक्तिषु वाच्यत्वेन स्वमार्गणमार्गणमात्रमेवोप- क्रान्तम्। वस्तुतः पुनरजुनैन सह तात्पर्यार्थे पर्योलोचनया विम्रहो वाक्यार्थेता- सुपनीतः। तथा च तत्प्रोच्यते— प्रयुज्य सामाचरितं विलोमभं भयं विभेदाय धियः प्रदर्शितम्। तथाभियुक्तं च शिलीमुखार्थिना यथेतररुयाद्यमिवावभासते ॥

( अपने निश्चितय से अलग हो जाने के लिए ) विभेद पैदा करने के लिए भय का भी प्रदर्शन किया । इस प्रकार बाण को चाहने वाले तुमने ऐसी बातें कह डाली जो अनुचित होती हुई भी उचित-सी प्रतीत होती है ॥७॥

( वस्तुतः उक्त श्लोक मे जो उक्त ग्रन्थ के १४वें सर्ग का है—अर्जुन ने सम्पूर्ण १३वें सर्ग की बात वह डाली है। कथा तो सर्वविदित ही है कि अज्ञापाति के लिए राड़ररजी को प्रसन्न करने के लिए अर्जुन तपश्चर्या मे लीन थे । मूषकदनव उनके वध के लिए छूकररूप मे आता है । भगवान् शाङ्कर सगण किरात वेशधारण कर अर्जुन की रक्षा के लिए साथ हो पराकाष्ठा भी आ जाते हैं। अर्जुन तथा किरातोद्धर दोनों ही दानव पर बाण-प्रहार करते है । अर्जुन के बाणो से उसकी मृत्यु होती है । बाण, अर्जुन झूकर के शरीर से निकाल लेते है । बाणप्राप्ति के लिए शिव का गण किरात अर्जुन के पास आता है और साम, दाम, भय का प्रदर्शन करता है बाण लेने के लिए । यद्यपि इरादा परिक्षार्थ युद्ध का । इस प्रकार के साम आदि के कतिपय श्लोको को आचार्य विश्वेश्वर ने अपनी टीका मे 'किराताजुनीयेऽनु' से प्रस्तुत कर दिया है तथापि औचित्यवक्ता वे यहाँ भी दिये जा रहे है— शान्तता विनययोगे मानस भूरिधाम विमलं तपः शृतम्। प्राह तेनु सद्शी दिवाकसामन्ववायभवदा तमाकृति: ॥

॥ किरात, १३-१७ साम की बातकर आगे के श्लोक से लोभ प्रदर्शन करता है— मित्रमिष्टमुपकारि सध्राये मेदिनिपतिरयं तथा च ते । तं विरोधि भवता निराक्षि मा सज्जनैः कवसति: कृत्तहता ॥ १३-५१

सज्जनोऽसि विजहि चापलं सर्वदा क इवा सहिष्यते । वारिधीनिव युगान्तवायवः क्षोभयन्त्यनभ्रुता गुरुनादपि ॥ १३-६६

किरातनरेश ने आपका अपराध क्षमा कर दिया है बाण लौटा दे— तत्त्वतिक्षितमिद मया सुनैरियवोचत वचस्रचमुपाति: । बाणमत्रभवते निनयं दिशरात्रान्मुहि त्वमपि सर्वसम्पद् ॥ १३।६८

इस प्रकार की उक्तियो के बाद ही १४वें सर्ग मे अर्जुन के प्रश्नोत्तर है, जिनमें प्रकृत श्लोक सातवों है। इसमे अर्जुन ने किरात की समस्त उक्तियो का सार ही प्रकटुत

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प्रबन्धेवभावो यथा-कुत्रचिन्महाकविविरचिते रामकथोपनिबन्धे नाटकादौ पञ्चविधवकतासामग्रीसमुदायसुन्दरं सहृदयहृदयहारि महापुरुषवर्णनमुपक्रमे प्रतिभासते। परमार्थतस्तु विधिनिषेधात्मकधर्मो उपदेशः पर्यवस्यति, रामवद्रतिंतत्पयं न रावणवादिति। यथा च, तपस्वत्सराजे ऋषुमुखुमुखुमारचेतसः सरस्विनोदैकरसिकस्य नायकस्य चरितवर्णनमुपक्रान्तम्। वस्तुतस्तु ड्यसनार्णवे निमज्जन्त्रिजो राजा तथाविधनव्यवहारनिपुणैरमात्यैस्तैलेह रायै रुत्कारणीयमित्युपदिश्रम्। एतच्च स्वलक्षणव्याख्यानावसरे व्यक्ततामायास्यति। एवं कवितयापारवकताष्टकसुद्देशमात्रेण व्याख्यातम्। विस्तारेण तु स्वलक्षणावसरे व्याख्यास्यते।

प्रबन्ध मे प्रास्त वक्रमाव का उदाहरण जैसे--महाकवियो से विर्निमित रामकथा-मूलक नाटक आदि कही भी, पाँच प्रकार की वकता की सामग्री के समुदाय से सुन्दर वाक्य ( ५ ) प्रकरण, छठाँ तो प्रबन्ध का है ही जो इन पाँचो के सहयोग से निष्पन्न होता है ), सहृदय हृदयहारी महापुरुष का वर्णन ही प्रारम्भ मे प्रतीत होता है। वास्तव मे उसका अर्थ तो यह है कि 'राम के समान आचरण करना चाहिए--न कि रावण के समान। इस प्रकार विधि-निषेधरूप धर्म के उपदेश मे ही ( उस नाटकादि के महापुरुषचरित का ) पर्यवसान होता है। ( प्रबन्धवकता का सौन्दर्य यही है । )

जैसे कि 'तापस वत्सराज' नामक नाटक मे पुष्प के समान कोमलचित्त, आनन्दपूर्ण विनोद के एकमात्र रसिक नायक ( उदयन ) का चरित-वर्णन ही प्रारम्भ किया गया है। किन्तु वस्तुतया उसका परमार्थ तो यह है कि, विपत्तिसागर मे इवते हुए अपने राजा की उस प्रकार के नीति-प्रयोग मे निष्णात मन्त्रियो को उन-उन उपायो से उबारना चाहिए, यह उपदेश दिया है ( नायक के चरितवर्णन से ) और यह सब अपने लक्षण की व्याख्या के समय स्पष्टता को प्राप्त करेंगे।

इस प्रकार काव्य की वकता के छ: भेद उदुदेश मात्र से कहे गये। ( अर्थात् नाममात्र से उनका विवेचन किया गया ) किन्तु विस्तार से तो उनके अपने लक्षणो की व्याख्या के समय पर ही व्याख्या जायगी ॥२१॥

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क्रमप्राप्तत्वेन बन्धोडघुना व्याख्यायते—

वाच्यवाचकसौभाग्यलावण्यपरिपोषकः ।

व्यापारशाली वाक्यस्य विन्यासो बन्ध उच्यते ॥७२॥

विन्यासो विशिष्टं न्यसनं यः सन्निवेशः स एव व्यापारशाली बन्धोच्यते ।

तेन श्लाघते इलाघ्यते यः स तथोक्तः ।

कस्य—वाक्यस्य इलोकादौ । कीदृश —वाच्यवाचकसौभाग्यलावण्यपरिपोषकः।

वाच्यवाचकयोरद्वैतारोपे वाच्यस्याभिधेयस्य वाचकस्य च शब्दस्य वृद्ध्यमार्ण सौभाग्यलावण्यलक्षणं यद्गुणद्वय तस्य परिपोषकः पुष्पतातिशयकारी ।

सौभाग्यं प्रतिभासंभ्रमफलभूतं चेतनचमत्कारित्वलणं, लावण्यं सन्निवेश सौन्दर्यं,

तयोः परिपोषकः । यथा—

दत्वा वामकरं नितम्बफलके लीलावलम्बध्यया

प्रोतुङ्गस्तनमंसचुम्बिचिबुकं कृत्वा तथा मां प्रति ।

क्रम से उपपत्त होने के कारण अब बन्ध की व्याख्या की जा रही है—

शब्द और अर्थ के सौभाग्य एवं लावण्य को पोषित करने वाला ( कवि के काव्य-क्रिया रूप ) व्यापार से युक्त वाक्य की रचना को बन्ध कहा जाता है ॥७२॥

विन्यास—विशेष प्रकार का ( शब्द आदि का ) न्यसन अर्थात् जो सन्निवेश,

व्यापारशाली वही ‘बन्ध’ कहा जाता है । व्यापार यहाँ प्रस्तुत काव्यकरण रूप है ( अर्थात् काव्यरचना-रूप व्यापार से युक्त वाक्य का सन्निवेश ही ‘बन्ध’ है ) । उस ( व्यापार )

से जो शालित होता है——प्रशंसित होता है ( उस प्रकार का वाक्यविन्यास बन्ध कहा जाता है ) । किसका ( विन्यास ) ?—वाक्य अर्थात् श्लोक आदि का । कैसा

विन्यास ?—वाच्य और वाचक के सौभाग्य तथा लावण्य का परिपोषक । वाच्य और वाचक दोनो का ही—वाच्य अर्थात् अभिधालभ्य अर्थ एवं वाचक शब्द का, आगे कहा जाने वाला, सौभाग्य एवं लावण्य रूप जो दो गुण उसका परिपोषक—अत्यन्त पुष्टताविधायक ( वाक्य-विन्यास बन्ध कहा जाता है ) । सामाग्य प्रतिभा की

प्रौढता की फलभूत चेतनचमत्कारिता ( को कहा जाता है ) । ( वर्णादि ) के सन्निवेश-सौन्दर्य को लावण्य कहते है । ( लावण्यं सन्निवेशसुधग्धमा—लोचन । ) उन दोनो का

परिपोषक ( वाक्य का विन्यास बन्ध कहा जाता है ) । उदाहरण जैसे—

( रचना कवीनद्रवचनसुलभ्य से है ) सविलास कटि भाग को डुमाती हुइं उस

रमणी ने ( अपने ) बाये हाथ को नितम्बफलक पर रखकर, उतुङ्ग ( उन्नत ) स्तनों

को और भी अधिक ऊपर उठाकर, कनक्ने को छूते हुए ऐसे कपोल को करके, ईष्योँ

( कामेर्ष्या ) सहित, कामसक्ताप को बढानेवाली, छोर पर पिरोये गये नवीन इन्द्रनील-मणि से युक्त सुकुमाराल्मा की सौन्दर्य ( विभ्रम ) पैदा करनेवाली दो-तीन कटाक्ष

सौन्दर्य ( सुपमा ) को मेरे ऊपर वारित किया ॥७२॥

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प्रान्तोत्रतनवेन्ट्रनीलमणिमन्युक्तावलीविव्रधमा: सासूयं प्रहिता: स्मरज्वरमुचो द्वित्रा: कटाक्षच्छता: ॥ ६२ ॥ अत्र समग्रकविकौशलसम्पाद्यास्य चेतनचमत्कारेत्वलक्षणस्य सौभाग्यस्य कियन्मात्रवर्णविन्यास विच्छित्तिविहितस्य पदसंधानसम्पदुपार्जितस्य च लावण्यस्य पद: परिपोषो विद्यते । एवं च स्वरूपममिधाय तद्विदाह्लादकारित्वममिधित्से— वाच्यवाचकवक्रोक्तित्रितियातिशयोत्करम् । तद्विदाह्लादकारित्वं किमप्यामोदसुन्दरम् ॥ २३ ॥ तद्विदाह्लादकारित्वं काव्यविदानन्दविधायित्वम् । कीदृशम्—वाच्यवाचकवक्रोक्तित्रितियातिशयोत्करम् । वाच्यसमभिधेयं वाचकं शब्दो वक्रोक्ति- रलंकरणम्, एतस्य त्रितस्य योडतिशय कोडप्युत्कर्षस्तादुत्करमतिरिक्कम् ।

यहाँ पर कवि की समग्र कुशलता से सम्पाद्य चेतन चमत्कारिरूप सौभाग्य एवं कुछ सीमित वर्णों के विन्यास-सौन्दर्य से सम्पादित, पदरचना की सम्पत्ति ये उपजित लावण्य का अतिशय परिपोष विद्धमान है ॥ ७३ ॥

( वस्तुत: कविप्रतिभाप्रौढि से वर्ण्यमान विषय की हृदयहारिता है । यहाँ रमणी के कटाक्षप्रहार की बात कही गयी है । कटाक्ष फेंकते समय जो भी सुन्दर स्वरूप एक युवती का हो सकता है उसका पूर्ण चित्र उक्त श्लोक में उतार दिया गया है । रमणी अपनी कमर को बड़ी अदा से घुमाती है, बाये हाथ को नितम्ब पर ले जाकर कुछ ऐसी अदा से खड़ी है कि गाल कन्धे को छू गये है और ह्रदयनीलमणि के समान उसकी नीली तथा सहर्‌ष ताजी ऑंखें हैं जो शरारतवश तरल हो उठी हैं । सुन्दर ऑंखें प्रसन्नतारल होने के कारण नीลมयुक्त मुक्तावली का विभ्रम पैदा करती हैं । ऐसी नीली प्रसन्न सताकती ऑंखों से उसने जो बॉकपन से कटाक्ष फेंके तो बेचारे प्रेमी की हालत खराव हो गयी, होना ही चाहिए । यह है सौभाग्य इस रचना का और लावण्य इस प्रकार (वर्ण का) स्वरूप कहकर तद्विदाह्लादकारिता का विवेचन करते है—

अर्थ ( वाच्य ), शब्द (वाचक) एवं वक्रोक्ति इन तीनो के अतिशय से उत्कृष्ट (लोकोत्तर), आमोद से सुन्दर कतिपय अनिर्वचनीय हृा तत्त्व तद्विदाह्लादकारी (सहृदय हृदयानुरंजक—काव्यविद्‌ की आनन्दकारिता) होता है ॥ २३ ॥

तद्विदाह्लादकारिता का अर्थ है काव्य विदों की आनन्द विधायिता । किस प्रकार की?—वाच्य, वाचक एवं वक्रोक्ति के चितय के अतिशय से उत्तर । वाच्य-अभिधालभ्य अर्थ, वाचक शब्द, वक्रोक्ति अलङ्कार इन तीनो का जो अतिशय-अनिर्वच्य उत्कर्ष, उससे उत्तर—अतिरिक्त, (इन तीनो के त्रितय के) स्वरूप और अतिशय से भिन्न स्वरूप और अतिशय से युक्त यह् अनिर्वचनीय कुछ अन्य ही तत्त्व है । और अर्थात् (वाच्य-वाचक-वक्रोक्ति) इस त्रितय से भी लोकोत्तर है ।

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प्रथमोऽनुष्टेश• ]

स्वरूपेणातिशायेन च स्वरूपेणान्यत् किमपि तत्वान्तरमेतदतिशायेनैतस्मातितया-दरपि लोकोत्तरमित्यर्थ। अन्यच्च कीटशब्दं-किमप्यामोदसुन्दरम्। किमप्य-व्यपदेश्यं सहृदयहृदयसंवेद्यम् आमोद. सुगुमारवस्तु धर्मो रञ्जकत्वं नाम, तेन सुन्दरं रञ्जकत्वरमणीयम्। यथा—

हंसानां निनदेषु यैः कवलितैरासज्यते कूजतामन्यः कोऽपि कपायिकण्ठलुठनादाघररो विग्रहः।

ते संप्रत्य कठोरवारणवधूदन्ताङ्कुरसर्पर्धिनो

निर्यन्ता: कमलाकरेऽपि बिसिनी कन्दाधिमग्रन्थयः ॥७३॥

अत्र त्रितयेऽपि वाच्यवाचकवक्रोक्ति लक्षणे प्राघान्येन कथितदपि कवे:संरम्भो विभाव्यते। किन्तु प्रतिभावैचित्र्यवशेन किमपि तद्विदाहादकारित्व-

और किस प्रकार का है (वहत्विदाहादकारित्व)?—किसी अपूर्व आनन्द से सुन्दर। किमपि-अनभिधेय, (मात्र) सहृदय-हृदय से संबन्ध आमोद कहते है। सुगुमार वस्तु के धर्म को जिसको रञ्जकता की संज्ञा दी जाती है उससे सुन्दर अर्थात् रञ्जकता से रमणीय (भानिर्वंचनीय रञ्जकता से रमणीय भी वह सहृदयहृदयहारित्व होता है)। उदाहरण जैसे—(कमलिनी के नवांकुरो का वर्णन)।

हस्तवधू के कोमल दन्तांकुर सरीखी कमलिनी के मूलों की वे प्रथम गाँठे अब तालाबों मे उभर आधी हैं (कमलिनी की जड़ों से वे प्रथम अँखुएँ फूट गये हैं) जिनके भक्षण से कूजन करते हुए हंसों की ध्वनियों मे कसेले कण्ठों मे लुढ़ित होने के कारण घर्र-घर्र करता हुआ कोई और ही सौन्दर्य आ जाता है।

यहाँ वाच्य-वाचक वक्रोकित (शब्द-अर्थ-अलङ्कार) रूप त्रितय के रहते भी कवि की कोई विशेष कल्पनाप्रौढि नही प्रतीत होती है। किन्तु फिर भी प्रतिभा के वैचित्र्य के कारण अपूर्व ही काव्य-रमणीयता आह्लादकारिता प्रकट हो गयी है। (प्रकृत-रचना मे शब्द का सुन्दर विन्यास तो है ही अर्थ की रमणीयता भी हो ही जाती है।

अर्थ की रमणीयता अकुरो की हथिनि के कोमल अंकुर जैसे दंतो से उपमित होने के कारण साथ ही हंसों की ध्वनि मे परिवर्तन रूप सामर्थ्य का कारण है। और उपमा-अनुप्रास तो है ही। इस प्रकार त्रितय का साम्राज्य है, किन्तु कवि बहुत सावधान नहीं है, अन्यथा इस रचना मे शायद और भी प्रौढता आ सकती थी।

(कोई कह सकता है कि इन उदाहरणो मे अपने लक्षण को आपू पूर्णत घटित नही करते? इसी का उत्तर देते है कि) यद्यपि सभी उदाहरणो मे 'जो अब तक काव्यलक्षण के लिए दिये गये है) काव्य का लक्षण पूणर्त घटित हो सकता है तथापि जिसकी प्रधनता दिखाने के उद्देश्य से कहा गया है वही अरु प्रत्येक उदाहरणो मे प्रधनतया परिस्फुटित हुआ है। इसलिए सभी उदाहरणों मे सहृदयो को स्वयमेव काव्यत्व को समझ लेना चाहिए॥२३॥

इस प्रकार काव्य का सामान्य लक्षण कह कर उस (काव्य) के विशेष स्वरूप का विषय बताने के लिए रचना के तीन प्रकार के मार्गभेद का विवेचन करते हैं—

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सुनिबन्धनं यद्यपि सर्वेषामुदाहरणानामतिकलकाव्यलक्षणपरिसमाप्तिः संभवति तथापि यत्राधान्यानाभिधीयते स एवांशः प्रत्येकमुद्रिक्ततया तेषां परिस्फुरतीति सहर्यैः स्वयमेवोत्रेक्षणीयम् । एवं काव्यसामान्यलक्षणमभिधाय तद्रिशेषलक्षणविषयप्रदर्शनार्थं मार्गभेदनिबन्धनं क्रियविधेयमिति-

सम्प्रति तत्र ये मार्गाः कविप्रस्थानहेतवः । सुकुमारो विचित्रश्च मध्यमश्चाभ्यात्मकः ॥ २४ ॥

तत्र तासु काव्ये मार्गाः पन्थानस्रयः संभवन्ति । न द्वौ चत्वारः, स्वरादिसंस्क्यावतावतात्मकैव वस्तुतस्तज्जैरैवपलम्भात् । ते च कीर्तशा:-कविप्रस्थानहेतवः । कवींनां प्रस्थानं प्रवर्त्तनं तस्य हेतवः, काव्यकरुणस्य कारणभूता:-सुकुमारोविचित्रश्च मध्यमरुचेः । कीटशो मध्यम:-उभयात्मकः । उभयमनन्तरोक्कं मार्गद्रयमात्मा यस्येति विग्रहः । छायाद्रयोपजीवीलयुक्तं भवति । तेषां च स्वलक्षणावसरे स्वरूपमाख्यायते ।

अत्र (काव्यस्वरूप के प्रतिपादन के बाद) काव्य में कवियो के प्रवृत्ति के हेतुभूत जो सुकुमार, विचित्र एवं उभयात्मक मध्यम मार्ग हैं उनका विवेचन करते है ) ॥ २४ ॥

वहॉ-उसमें अर्थात् काव्य मे मार्ग—राहे तीन हो सकती हैं, न दो न चार । वस्तुतः काव्यतत्त्वज्ञो के द्वारा स्वर आदि की नियत संख्या के समान ( जैसे स्वर के सात भेद नियत है, न उससे कम न अधिक उसी प्रकार ) उतने (तीन ही काव्यमार्गों के ) ही की उपलब्धि होने के कारण ( तीन मार्गों का ही मैने विवेच्चन किया है न उससे अधिक चार, न कम दो ) । और वे कैसे है ?—कवियो के प्रस्थान प्रवर्त्तन, उसके कारण, काव्य करने के कारण; काव्य करने के कारणस्वरूप । किस नाम के हैं ( वे मार्ग )?—सुकुमार, विचित्र और मध्यम । मध्य का क्या स्वरूप है ?—उभयात्मक । उभय का अर्थ है—अव्यवधान से ( अभो-अभी ) कहा गया दो मार्ग ( सुकुमार और विचित्र ) जिसका स्वरूप है ( वह उभयात्मक है ), यह विग्रह हुआ । ( सुकुमार और विचित्र ) दोनो की छाया का उपजीवी होता है ( उभयात्मक मध्यम मार्ग ) यह कथित होता है ( उभयात्मक पद से ) । और उन ( तीनो ) का स्वरूप ( उनके ) अपने लक्षण के समय कहा जायगा ।

(यद्यपि काव्यमातृका वृत्तियॉ-वृत्या काव्यमातृका:-वृत्तियो से भिन्न मानी गयी है । किन्तु मम्मटोद्भट आदि ने उपनागरिका आदि जिन वृत्तियो का विवेचन किया है वे वृत्तियॉ रीतियो से भिन्न नही है । इस प्रकार संस्कृत काव्यशास्त्र मे रीति, वृत्ति, मार्ग आदि शब्द प्रायः समान अर्थ एवं तत्त्व का बोध कराते हैं । आचार्य वामन ने रीति को काव्य की आत्मा कहा है ।

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अत्र च बहुविधा विप्रतिपत्तयः संभवन्ति । यस्माच्चिरन्तनैरविदर्भोदेशाविशेषसमाश्रयणेन वैदर्भीप्रभृतयो रीतयस्तिष्ठः । समाम्नाताः । तासां चोत्तमाधममध्यमतत्त्ववैचित्र्येण त्रिविध्यम् । अन्यैरपि वैदर्भगौडौयलक्षणं मार्गोद्वृतयमालख्यताम् । एतच्चोभयसम्प्रत्युक्तियुक्तम् । यसमादेशभेदनिबन्धनत्वे रीतिभेदानां देशानामानन्त्यादसंख्यत्वं प्रसज्यते । न च विशिष्टरीतियुक्तत्वेन काव्यकरेणं मातुलेयभगिनीविवाहवद् देशधर्मेतया व्यवस्थाप्यतुं शक्यम् । देशधर्मो हि वृद्धव्यवहारपरम्परामात्रशरणः । शक्योऽनुमातुं मातापितृभिः ।

रीतिरात्मा काव्यस्य । काव् सू० ३०, १।२८। वह रीति तीन प्रकार की होती है—वैदर्भी, गौडी एव पाञ्चाली—

सा त्रेषा वैदर्भी गौडी या पाञ्चाली चेति । वही १।२।१९ पुनः उनका कहना है कि विदर्भ आदि देशो मे प्रचलित होने के कारण ही उक्त रीतियो के वैदर्भी इत्यादि नाम दिये गये है—

विदर्भादिपु देशत्वात् तत्समारख्या । वही, १।२।१९०, किन्तु आगे वृत्ति मे उन्होने यह स्पष्ट कर दिया है कि विदर्भ आदि देशो के कवि उन-उन रीतियो मे रचना करते हैं इसलिए वैदर्भी आदि नाम है, अन्यथा देशविशेष से काव्य का कोई सम्बन्ध नही है — ‘विदर्भ गौड पाञ्चालेषु तत्स्वरूपमवलोक्य तत्तस्मारख्या । न पुनर्देशः किश्चित्प्रक्रियते काव्यानाम् । ( वही वृत्ति ) और गोविन्द त्रिपुरहारिभूषण की टीका भी है—‘विदर्भादि पदैरुपचारादिदमारभादि देशस्थाः कवयो लक्षण्ते ।’ किन्तु कुन्तक भान्तिवश देशविशेष के आधार को लेकर आगे वामन की आलोचना करों । इसी प्रकार दण्डी रीति के दो ही भेद मानते है । वैदर्भी और गौडी । और उन्ही का विवेचन भी करते है । यद्यपि अनेक मार्ग है यह भी कहते है—

अस्त्यनेको गिरा मार्गः सूक्ष्मभेदः परस्परम् । तत्र वैदर्भगौडौय वण्येते प्रषुटान्तरौ ॥ काव्यादर्श, १।८०

इन्ही दो मतों की आगे कुन्तक अ० आलोचना करते है—अन्रेति से ) और यहाँ मार्गचित्रितय के सम्बन्ध मे अनेक प्रकार की आशाङ्काएँ हो सकती हैं । क्योंकि प्राचीनो ( वामन आदि आचार्यों ने, जैसे कि ऊपर कहा जा चुका है ) ने विदर्भ आदि देश को आश्रय मानकर वैदर्भी आदि ( गौडी-पाञ्चाली ) तीन रीतियों की व्याख्या की है और उनके उत्तम, अधम एवं मध्यम वैचित्र्य से वैचित्र्य की विवेचना की है ( वामन कहते है—तथा पूर्वो ग्राह्या गुणसाकल्यात्, न पुनरितरे स्तोक गुणल्वात् । वही, १,२,१४-१५ । उन तीनो रीतियो मे समग्र गुणसम्पन्न होने के कारण वैदर्भी ही उत्तम एव ग्राह्या है । इतर मे गौडी अधम एव उभयात्मक पाञ्चाली मध्यम गुण होती है । कुन्तक ने भी सुकुमार, विचित्न एव उभयात्मक मध्यम मार्ग वामन से ही प्राप्त किया है यद्यपि उत्तमाधम मध्यम के वे विरोधी भी है । इस प्रकार कुन्तक कहना चाहते है कि वामन उत्तम, अधम एवं मध्यम मानकर ही रीतियो का

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तथाविधकाव्यकरणं पुनः शक्त्यादिकारणकलापसकल्यमपेक्ष्यमाणं न शक्यते यथा—कथंविदतुग्राह्यम् । न च दाक्षिणात्यगीतविषयसुस्वरतादिध्वनिरामणी-यकवत्तस्य स्वभाविकत्वं वक्तुं पार्यते । तस्मिन् सति तथाविधकाव्यकरणं सर्वस्य स्यात् । किंच शक्तौ विद्यमानायामपि व्युत्पत्त्यादिराहार्यैकरणसम्प-त्प्रतिनियमदर्शविषयतया न व्यवतिष्ठते, नियमनिबन्धनाभावात् तत्रादर्शनाद् अन्यत्र च दर्शनेन । न च रीतिनासुतमाधममध्यमत्वभेदेन त्रैविध्यं व्यवस्थापयितुं

त्रैविध्य स्थापित करते है)। और अन्य (दण्डी आदि) ने वैदर्भ एवं गौडिय रूप दो मार्गों की विवेचना की है। यह दोनोँ ही विवेचन (देशसमाश्रित एव उत्तमाश्रित मध्यम आधार पर भेद-विवेचन वामन का तथा दण्डी का वैदर्भ-गौड दो मार्ग) युक्तियुक्त नही है। क्योंकि रीति के भेदो का देशाविशेष के भेदो के आधार पर निबन्धन किये जाने पर, देशो की अनन्तता होने के कारण रीति के भेदो मे भी अनन्तता-असङ्ख्यभेदता-प्रसक्त हो जायगी। पूर्वपक्षी (कह सकता है)—देशाविशेष के धर्म (प्रथा) से मेरी बहन के साथ होनेवाले विवाह की भाँति देशाविशेष के धर्म के आधार पर विशेष रीति से युक्त होने के कारण काव्यक्रिया (कै भेदो की) अवस्थापना की जा सकती है (अर्थात् किसी देशाविशेष मे जैसे मेरी बहन के साथ वहाँ की

प्रथा होने के कारण विवाह हो जाता है, वैसे ही यदि किसी देशाविशेष मे वह रीति पायी जाती है तो वहाँ की विशिष्ट परम्परा के कारण उसका स्वरूप भी काव्यजगत् मे उसके नाम से व्यवस्थित किया जा सकता है ? ) (कुन्तक उत्तर देते है )—नही (ऐसी व्यवस्था नही की जा सकती)। क्योंकि देशधर्म बृद्धोँ (श्रेष्ठजनोँ) की व्यवहार-परम्परा मात्र पर आधारित होता है, इसलिए सम्भव अनुष्ठानोँ का वहाँ अति-क्रमण नहीँ हो पाता (अर्थात् रूढ़ व्यवहार परम्पराश्रित होने के कारण मेरी बहन से विवाह तो हो सकता है। किन्तु उस प्रकार की काव्यक्रिया तो उस प्रकार से (मातृ-लेय भगिनी विवाह की भाँति देशधर्म के आधार पर) किसी भी प्रकार से नहीँ की जा सकती। क्योंकि काव्यक्रिया शक्ति आदि (काव्य के) कारणसमूहो की परिपूर्णता

की अपेक्षा रखती है (जबकि देशधर्म वृद्धोँ की व्यवहार-परम्परा मात्र की अपेक्षा रखता है)। पूर्वपक्षदाक्षिणात्यो के संगीतविपयक सुन्दर स्वर आदि रूप ध्वनि की रमणीयता के समान उस (प्रकार की वैदर्भी देशाश्रित रचना) को स्वाभाविक कहा जा सकता है ? उत्तर—ऐसा नही कहा जा सकता। क्योंकि (यदि यह मान लिया जाय कि वैदर्भी देश समाश्रित रचना मे उस प्रकार की स्वाभाविकता होती है इसलिए उस काव्य को उस रीति से युक्त मानते है तो ऐसा मानने पर तो वहॉ के) सभी लोगो मे उस प्रकार की काव्यरचना सम्भव हो जायगी (लेकिन ऐसा होता नहीँ)। (कोई कहे कि उस रीति के कवि मे शक्ति विद्यमान रहती है इसलिए वह ऐसी रचना कर लेता है तो ?—कहते है)—यदि यह भी मान लिया जाय कि (उस प्रकार की काव्य-क्रिया करनेवाले सभी मे) शक्ति विद्यमान है तो भी, (काव्य का

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प्रथमोन्नेष ]

न्यायः्यम् । यस्मात् सहृदयाह्लादकारिकाव्यलक्षणप्रस्तावे वैदर्भीसदृशसौन्दर्य्यसंभवान्मध्यमाधमयोरुपदेशवैचर्थ्यमायाति । परिहार्यत्वेनाभ्युपदेशो न युक्ततामालम्बते, तैरैवानभ्युपगतत्वात् । न चागतिगतिकिन्यायेन यथाशक्ति दरिद्रदानादिवत् कार्यं करणीयताम्हैति । तदेवं निर्वचनसमाख्यामात्रकरणकारणत्वे देशविशेषाश्रयणयस्य वयं न विवादामहे । मार्गोद्वितयवादिनामप्येतान्येव दृषणानि । तदलमनेँ निःसारत्वस्वपरिमलनव्यसनेन ।

कारण केवल शक्ति ही तो नहीं है, उसमें अभ्यासप्राप्त ) व्युत्पत्ति आदि रूप आहार्य ( काव्य की ) कारण-सामग्री प्रत्येक नियत देश के विप्रय के रूप में तो व्यवस्थित नहीं होती ( अर्थात् ऐसा तो कोई नियम नहीं है कि विदर्भ देश में आहार्य सामग्री इतनी मात्रा में पायी जायगी और गौड़ में इतना ही । और काव्यक्रिया में शक्ति के साथ-साथ अभ्यासादि आहार्य कारणों की भी आवश्यकता होती है । यदि मान लें कि वैदर्भी रचना में स्वाभाविक रूप से सुन्दरता पायी जाती है; क्योंकि तत्वः कवि में शक्ति विद्यमान रहती है तो कठिनाई यह है कि केवल शक्ति मात्र से तो काव्य बनता नहीं । व्युत्पत्ति भी उसके लिए आवश्यक तत्व है और विदर्भ आदि देशों के लिए व्युत्पत्ति की इयत्ता निश्चित नहीं है । ) क्योंकि इस प्रकार के किसी नियम की व्यवस्था का अभाव पाया जाता है ( कि इस देश में इतनी ही आहार्य सामग्री पायी जायगी )। उस ( विदर्भ देश ) में ( उस आहार्य सम्पत्ति का ) दर्शन नहीं पाया जाता ( यह भी नहीं कहा जा सकता, और न यहीं कहा जा सकता है कि विदर्भ देश से इतर ) अन्य देशों में ( आहार्य सम्पत्ति ) का दर्शन पाया जाता है ( इसलिए देश-भेद के आधार पर रीतियों की नाम-व्यवस्था युक्तियुक्त है ) ।

और रीतियों की त्रिविधता ( उनकी ) उत्तमता, अधमता एवं मध्यमता के आधार पर व्यवस्थित करना भी उपयुक्त नहीं है । क्योंकि ( उत्तमता आदि के आधार पर तो ) सहृदयों के हृदय को आनन्दित करनेवाले काव्यस्वरूप के प्रसद्ध मे मध्यम और अधम काव्य-रचनाओं का तो उपदेश ही व्यर्थ हो जायगा । इसलिए कि ( सामग्री गुणोपेता ) वैदर्भी के सममान उनमें सौन्दर्य मिलना असम्भव है । ( यदि कोई कहे कि उत्तमोत्तममध्यमों की व्यवस्था इसलिए की गयी है कि अन्तिम दो ) परिहीय है अतः उस प्रकार की रचना का उपदेश न्याय्य हो सकता है ? तो यह भी उचित नहीं है; क्योंकि उन्हीं ( वामन ने ही ऐसा स्वीकार नहीं किया है ( वस्तुतः यहाँ वामन तो पूर्ण स्पष्ट है । वह कहते हैं—तासां पूर्वा ग्राद्या, गुणसाकल्यात्, नेतरे स्तोकगुणत्वात्—अर्थात् उन तीनों रीतियों में समग्र गुणयुक्त होने के कारण कवि को वैदर्भी का ही आश्रय लेना चाहिए न कि कम गुणयुक्त गौड़ी और पांचाली । किन्तु वामन का यह भी अभिमत नहीं है कि अन्त की दो का परित्याग किया जाय । दूसरी बात ध्यान देने की है कि वामन स्पष्टतः कहो भी नहीं कहते कि रीतियों की यह त्रिधा व्यवस्था

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

कविस्वभावभेदानिबन्धनत्वेन काव्यप्रस्थानभेदः समुझसतान् गाहते । सुक्षु-मारस्वभावस्य कवेःस्थाविधैव सहजा शक्ति: समुद्रवति, शक्तिशक्तिमतोर्भेदात् । तयाच तथाविधसौकुमार्येरमणीयां व्युत्पत्तिमावन्धनाति । तांध्यां च सुक्षुमारवर्त्मनास्यास्तत्परः क्रियते । तथैव चैतस्माद् विचित्रः स्वभावो यस्मै कवेःस्तद्विदाह्लादकारिकाव्यलक्षणकरणप्रस्तावात् सौकुमार्येऽप्यतिरेकिणा वैचित्र्येण रमणीय एव, तस्य च काव्यद्विचित्रैव तद्गुणालम्बनाति । तथां च तथाविधवैदग्ध्यबन्धुरां व्युत्पत्तिमावन्धनाति ।

ही यह आलोचना करते प्रतीत होते है ) । और यदि कोई कहे यथाशक्ति दरिद्र के दान की भूरि अगतिकगति न्याय से ( जाने मे असमर्थ जो थोड़ा भी चल लेने की रीति से ) जिस कवि की कही कोई गति नही है अपनी सामर्थ्य के अनुसार वह ( अधम मध्यम मार्गों को लेकर ) काव्यक्रिया कर सकता है ( यह समझ कर ही आचार्य वामन ने वैसे भेद किये है तो ) यह भी उचित नही है क्योंकि उस प्रकार के ( अधम मध्यमं ) काव्यों की रचना ठीक नही ( जब कि उत्तम वर्तमान हो । इस प्रकार उत्तम, अधम एव मध्यमत्व को लेकर रीतियो का वैविध्य स्थापित नही किया जा सकता ) । जो उपमार्ह करते है—तो इस प्रकार देखविशेष के आश्रय को लेकर किये गये रीतियो के निर्वचन एव अभिधान मात्र की कारणता मे ही हमारा विवाद नही है । ( काव्य मे ) अपितु ( उनके उत्तमादि को लेकर निर्धारित स्वरूपभेद पर भी है ) । ( काव्य मे ) दो ही ( वैदर्भगौड ) मार्ग हो सकते है ऐसा कहनेवालों ( दण्डी आदि ) के लिए भी ( हमारे पक्ष से ) ये ही उक्त दोप है । तो ( पुनः उनका पिष्टपेषण व्यर्थ है ) । इस प्रकार नि.सार वस्तु को वार-वार भोजने का व्यसन व्यर्थ है ( पुनः पुनः आलोचना निरर्थक है, इसलिए इस विषय को छोड़ा जाता है ) ।

अब पुनः प्रकृत पर आते है—कवित्यादि से । कविस्वभाव के भेद के आधार पर निवन्धित काव्य के आधार पर ही काव्य-मागों का किया गया भेद सम्यक् उचित हो सकता है, ( न कि देशविशेष के आधार पर ) । सुक्षुमार स्वभाववाले कवि को उस प्रकार की ही ( सुक्षुमार रचनापरायणता ) सहज शक्ति प्राप्त हो जाती है ( क्योंकि ) सहज सुक्षुमार शक्ति एव सहज सुक्षुमार व्युत्पत्ति की सहायाता से ( कवि ) सुक्षुमार मार्ग के माध्यम से ही ( काव्यरचना के अभ्यास मे तत्पर किया जाता है । और उसी तरह जिस कवि का स्वभाव इस सुक्षुमार स्वभाव से ( भिन्न ) विचित्र ( प्रकार का ) होता है तद्विदू आह्लादकारी काव्यस्वरूप के निर्माण के प्रसंग मे वह सौकुमार्य से भिन्न वैचित्र्य से युक्त होने के कारण रमणीय ( विचित्र स्वभाव युक्त ही ) होता है । और उसे ( उसके ( विचित्र स्वभाव के ) अनुयपि कोई विप्रलिप्त हो शक्तिमान् होता

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प्रथमोल्लेषः ]

वासितमानसो विचित्रवस्तुनाभ्यासभाजं भवति । एवमेतदुभयकविनिबन्धनसंवलितस्वभाववस्यं क्वेसदृचतैव शबळशोभातिशयशालिनी शक्तिः समुन्नेति । तथा च तदुभयपरिस्पन्दसुन्दररघ्युत्पत्त्युपार्जनमाचरति । ततस्तच्छायाद्वितयपरिपोषपेशलाभ्यासपरवशः संपच्यते ।

तदेवमेते कवयः सकलकाव्यकरनकलापकाष्ठाधिरूढिरमणीयं किमपि काव्यमारभन्ते, सकुमारं विचित्रमुभयात्मकं च । त एव तत्त्ववर्त्मनि सिन्तभूता मार्गे इत्युच्यन्ते । यथा हि कविस्वभावभेदनिबन्धनत्वादान्तर्भेदभिन्नतयमन्तर्वायं, तथापि परिसंङ्ख्यातुमशक्यत्वात् सामान्येन त्रिविध्यमेवोपपाद्यते । तथा च

है । और उस ( विचित्र शक्ति एवं स्वभाव ) से वह उस प्रकार के ( विचित्रता से युक्त ) विदग्धता से कोमल व्युत्पत्ति ) को धारण करता है । और उन दोनों ( विचित्र शक्ति एवं व्युत्पत्ति ) के द्वारा वैचित्र्य की वासना से अधिवासित ( संस्कृत ) बुद्धि वह कवि विचित्र मार्ग से ( काव्यक्रिया का ) अभ्यास करने का भागी होता है । इसी प्रकार इन दोनों प्रकार ( सुकुमार एवं विचित्र ) के कवियों से भयसंबंधित ( दोनो के ) मिश्रित स्वभाववाले कवि को उसके ( सुकुमार एवं विचित्रस्वभाव के ) अनुरूप ही ( सुकुमारता एवं वैचित्र्य से ) मिश्रित अतिशय शोभाशालिनी ( उभयात्मिका ) शक्ति समुल्लते होती है । और वह उस ( उभयात्मिका ) शक्ति से उन दोनो ( सौकुमार्य एवं वैचिच्य ) शक्ति के स्वभाव से सुन्दर व्युत्पत्ति के उपार्जन का प्रयास करता है । और उसके बाद यह उन दोनो ( सौकुमार्य एवं वैचिच्य ) की कान्ति के परिपोष से रमणीय ( रचना ) के अभ्यास मे तत्पर कर दिया जाता है ।

पुनः तीनो मार्गों को और भी स्पष्ट करते है—तदेवमेते आदि से । इस प्रकार ये तीनो प्रकार के ही कवि काव्यरचना के समग्र असाधारण कारणो के द्वारा रमणीयता की चरम सीमा को प्राप्त किसी अपूर्व ही काव्य की रचना का सूत्रपात करते हैं जो सुकुमार, विचित्र और उभयात्मक होता है । वे ही ( तीनो प्रकार के सुकुमार, विचित्र एवं उभयात्मक काव्य ) उन कवियों की ( काव्य-रचना मे ) प्रवृत्ति के करण होने के कारण मार्ग ऐसे कहे जाते हैं । ( पूर्व पक्ष से कहा जा सकता है कि संसार मे कविस्वभाव के अनन्त भेद हो सकते हैं फिर कविस्वभाव के आधार पर ही काव्य-मार्ग का त्रिषा विभाग तो उपयुक्त नही लगता ? इसी का उत्तर देते हैं ) । कविस्वभाव के भेद से निश्चित होने के कारण यद्यपि मार्ग के ( कविस्वभाव की अनन्ता संभव होने के कारण अनन्त भेद होने अनिवार्य हैं, किन्तु ( स्वभाव एवं तदाश्रित मार्ग की ) परिगणना करना अशक्य होने के कारण सामान्तया मार्ग की विविधता ही ठीक है । और इस प्रकार ( मार्ग की विविधता ही ठीक है, निश्चित हो जाने के बाद ) रमणीय काव्य को स्वीकार करने के प्रसङ्ग मे तो प्रथम वर्ग है—सुकुमार स्वभाव ( काव्य ) । क्योकि उसे व्यतिरिक्त अन्य काव्य असुन्दर होने के कारण उपादेय नही होता । और उस सुकुमार काव्य से व्यतिरिक्त, भिन्न रमणीयता-

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रमणीयकाव्यपरिग्रहप्रस्तावे स्वभावसुकुमारस्तावदेकोराशेः, तद्वयतिरिक्तस्यारमणीयस्यानुपालयितव्यात्। तद्वतिरेकी रमणीयकविशिष्टो विचित्र इत्युच्यते । तदेतयोर्द्वयोरपि रमणीयत्वादेतद्वीयच्छायाद्रितयोपजीविनोडन्यस्य रमणीयत्वमेव न्यायोपन्नं पर्यवस्यति । तस्मादेशां प्रत्येकमस्वलितस्वपरिस्पन्दमहिम्ना तद्विदाह्लादकारित्वपरिसमाप्रेरण कस्यचिन्न्यूनता ।

ननु च शक्त्योरन्तरतम्यात् स्वभाविकत्वं वक्तुं युज्यते, व्युत्पत्त्यभ्यासयोरपि पुनराहार्ययोः कथमेतद् घटते ? नैषः दोषः, यस्मादास्तां तावत् काव्यकरुणम्, विषयान्तरेऽपि सर्वस्य कस्यचिदनादिवासनाभ्यासाधिवासितचेतसः स्वभावानुसारिणावेव व्युत्पत्त्यभ्यासौ प्रवर्त्तते । तौ च स्वभावाभिज्ञयज्ञानेनैव साफल्यं भजतः । स्वभावस्य तयोरेव परस्परमुपकार्योपकारकभावेनावस्थासाफल्यं भजत इति ।

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नातः स्वभावस्तावदारभते, तौ च तत्परिपोषमातनुतः । तथा चाचेतनानामपि भावः स्वभावसंवादिभिर्वान्तरन्निधानमहात्म्यादभिव्यक्तिमासादयति, यथा चन्द्रकान्तमणयश्चन्द्रचुमसः करपरामर्शेवशेन स्पन्दमानसहजरसप्रसराः संपद्यन्ते ।

तदेवं मार्गानुद्रिय तानेव क्रमेण लक्ष्यति—अम्लानप्रतिभोदिते नवनवशब्दार्थबन्धः स्फुरत्यत्नाविहितस्वल्पमनोहारित्ववैशिष्ट्यणः ॥ २५ ॥

भावस्वभावप्रधाने न्यककृत्ताहार्यकौशलः । रसादिपरमार्थेशमनः संवादसुन्दर ॥ २६ ॥

अविभावितसंस्थानरामणीयकरक्खकः । विधिवैदग्ध्यनिष्पन्ननिर्माणातिशयोपमः ॥ २७ ॥

यत्किचनापि वैचित्र्यं तत्सर्वं प्रतिभोद्भवम् । सौकुमार्यपरिस्पन्दस्यैव यत्र विराजते ॥ २८ ॥

अभिव्यक्ति को प्राप्त करते है । जैसे चन्द्रकान्तमणियों चन्द्रमा की किरणों के सम्पर्क मात्र से चूते हुए स्वाभाविक जलप्रवाहवाही हो जाती है । (अतः कविस्वभाव को लेकर मार्ग-भेद का निरूपण उचित है, कोई दोष नही है । और यद्यपि व्युत्पत्ति एवं अभ्यास आहार्य होने के कारण सामान्यतः स्वाभाविक नही है फिर भी स्वभाव के अनुसार ही व्युत्पत्ति-अभ्यास सभी को पैदा होते है । अचेतन विषयों में भी जैसे चन्द्रकान्तमणि को ही लिया जाय—यह बात देखी जाती है । चन्द्रकिरणों का स्पर्श मात्र पाकर वह रिसने लगती है । क्योंकि उसका स्वभाव यही है । कवि को भी व्युत्पत्ति एवं अभ्यास उसके स्वभावानुसार ही पैदा होते है और तदनुरूप वह काव्यरचना मे प्रवृत्त भी होता है । अतः प्रकारान्तर से ये व्युत्पत्ति-अभ्यास भी स्वाभाविक ही कहे जा सकते है । )

इस प्रकार मार्गों का उल्लेख कर अब उन्ही क्रम से लक्षण करते है । (उनमें भी क्रमप्राप्त सुकुमार मार्ग का ही प्रथमतः लक्षण किया जा रहा है )—कवि की अम्लान प्रतिभा से उन्मद्र, नवीन शब्द और अर्थ से समृद्ध, अयत्न सम्पादित किन्तु स्वल्प एवं मनोहारि अलङ्कारों से युक्त ॥ २५ ॥

भावो के स्वभाव की प्रधानता से आहार्य कौशल को कुछ हीन करनेवाला तथा रस ( भावादि ) रूप परमार्थ के जानकर ( सहृदयो ) के मन का सवादी होने के कारण सुन्दर ॥ २६ ॥

अव्यक्त अनालोचित वर्णना की रमणीयता से आनन्द पैदा करनेवाला तथा विधाता की कुशलता से सम्पन्न सृष्टि के अतिशय ( लावण्यादि ) के समान ॥ २७ ॥

सौकुमार्य स्वभावैः प्रवाहित होनेवाला जहाँ जो भी वैचित्र्य है वह सम्पूर्ण ( अम्लान-कवि ) प्रतिभाजन्य होकर ही सुशोभित होता है ॥ २८ ॥

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सुकुमाराभिधः सोडयं येन सत्कवयो गताः । मार्गेणोत्त्कुलकुसुमकानननेनव घटपदाः ॥२९॥

सुकुमाराभिधः सोडयम्, सोडयं पूर्वोक्तलक्षणः सुकुमारशब्दाभिधानः । येन मार्गेण सत्कवयः कालिदासप्रभृतयो गताः प्रयाताः, तदाश्रयेण काव्यान्ति कृतवन्तः । कथम्—उत्कुलकुसुमकानननेव घटपदाः । उत्कुल्लानि विकसितानि कुसुमानि पुष्पाणि यस्मिन् कानने वने तेन घटपदा इव भ्रमरा यथा । विकसितकुसुमकाननसाम्येन तस्य कुसुमसौकुमार्यसदृशमाभिजात्यं द्योत्यते । तेषां च भ्रमरসादृश्येन कुसुममकरन्दकल्पसरसङ्ग्रहण्यसनिता । स च कीटशः—यत्र यस्मिन् किंचनापि कियनमात्रमपि वैचित्र्यं विचित्रभावो वक्रोक्तियुक्ततया तत्तसर्वमलङ्कारादिप्रतिभोद्भवं कविशक्तिसमुल्लसतिमेव, न पुनराहार्यं यथाकथंचित्प्रयत्नेन निष्पाद्यम् । कीटशम्—सौकुमार्येपरिस्पन्द-

स्यन्दि । सौकुमार्यमाभिजात्यं तस्य परिस्पन्दद्रुतिदाहकाद्रितवलक्षणं रा-

( इस प्रकार का ) सुकुमार नाम का यह वह मार्ग है, जिस मार्ग से प्रयुक्त पुष्पवन ( मार्ग से जानेवाले ) भ्रमरों की भाँति सत्कवियों ने अपनी यात्रा की है ॥ २९ ॥

( उपर्युक्त कारिकाओं की व्याख्या करते समय कविकुलगुरु ने अन्तिम से प्रारम्भ की है )—

सुकुमार अभिधान ( नाम ) वाला वह यह—पूर्व कथित लक्षणवाला ( २५-२९ तक कहा गया ) सुकुमार शब्द से कहा जानेवाला ( मार्ग है ) । जिस मार्ग से सत्कवि-वर्ग कालिदास आदि गये हैं, प्रयाण किये हैं। उस ( सुकुमार मार्ग ) का आश्रय लेकर काव्यों की रचना की है । कैसे ( गये हैं )?—विकसित हुए फूलवनो से युक्त ( मार्गों से ) भ्रमरावलियों की भाँति । उत्कुल्ल—विकसित, कुसुम—फूल, जिस कानन-वन मे हो, उस ( मार्ग ) से भ्रमरों की भाँति-भ्रमर जैसे । खिले हुए पुष्प वन के साम्य से उस ( सुकुमार मार्ग ) की फूल की सुकुमारता के समान रमणीयता ( आभिजात्यता ) प्रकट होती है । और उन ( सत्कवियों ) का भ्रमर से साम्य होने से फूलों के पराग सदृश ( मधुरता के ) सार-संग्रह की ( उनको ) वासन। प्रकट होती है । और वह किस प्रकार का है ?—जहाँ जिस ( मार्ग की रचना ) मे, कुछ भी कितनी मात्रा मे भी, वैचित्र्य-विचित्रभाव अर्थात वक्रोक्ति से युक्तता है, वह सम्पूर्ण अलङ्कारादिरूप वैचित्र्य कवि की प्रतिभा से ही उत्पन्न होता है । अर्थात् कवि की शक्ति से ही समुल्लसित होता है न कि आहार्य, जिस किसी तरह से आयास-पूर्वक ( निष्पाद्य ) होता है । किस तरह का है ( वह कवितिमभोद्भूत वैचित्र्य )?—सुकुमारता-अभिजातता, उसका परिस्पन्द-काव्यमर्मज्ञ की आह्लादकारिता रूप सुन्दरता, उससे प्रवाहित होता है—जो रसमय हो जाता है उस प्रकार का वह ( वैचित्र्य होता है ) । जहाँ रंजित होता है—अतिशय शोभा को पुष्ट करता है, यह वाक्यसम्बन्ध

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णीयरं तेन स्यन्दते रसमयं संपद्यते यत्तथोक्तं । यत्र विराजते शोभातिशयं पुष्णातीति संबंधः । यथा—

प्रवृत्ततापो दिवसोडतिमात्र- मतर्थमेव क्षणदा च तन्वी । उभौ विरोधोक्तियाया विभिन्नौ जायापती सानशयाविवास्ताम् ॥७४॥

अत्र श्लेषच्छायान्चुरितं कविशक्तिमात्रसुल्लसितमलंकरनमनाहार्यं कामपि कमनीयतां पुष्णाति । तथा च ‘प्रवृत्ततापः’ ‘तन्वी’ इति वाचकौ सुन्दरस्वभावमात्रसमर्पणपरत्वेन वर्तमानावर्थान्तरप्रतীত्यानुरोधपरत्वेन प्रवृत्ति-न संमन्येते, कविव्यक्तकौशलमुल्लसितससत्य पुनः प्रकारान्तरस्य प्रतीतावातु-गुण्यमात्रेण तद्विदाह्लादकारितां प्रतिपद्यते । किं तत्त्वकारान्तरं नाम ?—विरोध-विमिन्न्रयः शब्दयोरथान्तरप्रतीतिकारिणोरुपनिबन्धः । तथा चोपमेययोः

महाकवि कालिदास के रघुवंश ( १६।४९ ) का श्लोक है । ग्रीष्म ऋतु का वर्णन किया गया है — ( ग्रीष्म काल में ) तापयुक्त दिन अत्यन्त भारी हो गया एवं रात्रि अतिशय क्षीण हो गयी । ( वृद्धि एवं क्षीणता रूप ) विरोधी कार्य से विपरीत दोनो, ( प्रणय-कलह आदि रूप ) विरोधी कार्य से अलग-अलग हुए ) परस्परयुक्त ( पति-पत्नी-ताप से प्रवृद्धताप दिन एवं क्षीण क्षणदा ) पति पत्नी के समान हो गये थे ॥७४॥

यहाँ पर कवि की शक्तिमात्र से समुल्लसित श्लेष की छाया से युक्त, अनाहार्य ( अय लज्ज उपमा ) अलङ्कार किसी अपूर्व कमनीयता को परिपुष्ट कर रहा है । जैसे कि ‘प्रवृत्त ताप’’ एवं ‘तन्वी’ ये दोनो ही वाचक शब्द ( दिन और रात के ) सुन्दर स्वभाव मात्र के समर्पणपरक के रूप मे वर्तमान है ( किन्तु यद्यपि पति-पत्नी के प्रवृत्तताप एवं क्षीणतारूप अर्थान्तर की प्रतीति यद्यापि करा सकते है तथापि ) दूसरे अर्थ की प्रतीति अनुरोधपरक के रूप मे प्रवृत्ति को सम्यक् नहीं सहन कर पाते ( क्योंकि प्रकरणतया ग्रीष्म का वर्णन होते से अभिधेयार्थ हो जाने पर अभिधा वही नियत्न्रित हो जाती है ) फिर भी कवि के स्पष्ट कौशल से समुल्लसित दूसरे प्रकार के अर्थ की प्रतीति मे अनुचूल होने मात्र से ( दोनो—प्रवृत्ततापः एवं तन्वी-पद ) तद्विद् आह्लादकारिता को प्रास हो जाते है । वह दूसरा प्रकार है क्या ? दूसरा प्रकार है प्रतीति कराने वाले विरोध और विभिन्न शब्दों का निवन्धन । जैसे कि उपमेयो ( दिन

एवं रात ) का सहानवस्थान रूप विरोध है ( दोनो एक साथ नही रह सकते ) और स्वभाव भेदरूप विभिन्नता है और उपमानो ( पति-पत्नी ) मे ईर्ष्या ( प्रणय कोप रूप ) कलहस्वरूप विरोध है एवं क्रोध के कारण अलग-अलग अवस्था रूप विभिन्नता है । यहाँ ‘अतिमात्र’ एवं ‘अत्यर्थ’ दोनो ही विशेषण दोनो ही पक्षो ( दिन-रात एवं पति-पत्नी ) मे अतिशयता सहित ( अनुशय का ) प्रतीतिकारो होने से अत्यन्त रमणीय है । ( वस्तुतः वृत्ति से ‘सातिशयता’ के स्थान पर ‘सानुरयता’ पाठ अधिक समीचीन

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सधानवस्थानलक्षणो विरोधः; स्वभावभेदलक्षणं च विभिन्नत्वम् । उपमानयोः पुनरीष्याकलहलक्षणो विरोधः, कोपात् पृथगवस्थानलक्षणं विभिन्नत्वम् । 'अतिमात्रम्' 'अत्यर्थ' चेति विशेषणद्वितयं पक्षद्वयेडपि सातिशयतात्प्रतीतिकारित्वेनातितरां रमणीयम् । इल्लेषच्छायोःक्लेश संपाद्याप्ययत्नघटिततत्वेनात्र मनोहारिणी ।

परचात् कौतुकम्—अल्लानुप्रासोभयत्र। छेकानुप्रासवैचित्र्यमात्रशोभनम् । अल्लानो यासो-वदोपहतता प्रास्तावनाद्यतनसंस्कारपरिपाकप्रौढा प्रतिभा काचिदेव कविशक्तिः, तत् उद्दिन्तौ नूतनाड्कुरनायेन स्वयमेव समुल्लसति, न पुनः कदर्थनाकुष्टे नवौ प्रत्यग्रौ तद्विदाह्लादकारित्वसामर्थ्ययुक्तौ शब्दार्थावमिधानामिधेयो ताम्यां वन्धुरो हृदयाह्लादौ । अन्यच्च कीदृशम्—अयत्नविहितस्वल्पमनोहारिविभूषणम् । अयत्नेनाक्लेशेन विहितं कृतं यत् स्वल्पं मनाझात्रं मनोहारि हृदयाह्लादकं विभूषणमलंकरणां यत्र स तथोक्तः । 'स्वल्प'—शब्दोडत्रप्रकरणाद्यपेक्षः, न वाक्यमात्रपरः । उदाहरणं यथा—

जान पड़ता है क्योंकि 'अतिमात्र' एवं 'अत्यर्थ' दोनो ही विशेषण उनके परचात्ताप दुःख को अत्यधिक बढ़ाते हुए चित्रित किये गये हैं । परचात्ताप के कारण ही तो वह दिवस ताप में प्रकट्त है और क्षणदा बेचारी क्षीण होती जा रही है । ( पति मे ताप बढ़ गया है तन्वी बेचारी क्षीण हुई जा रही है । ) इलेष का सौन्दर्य, यहाँ कुछ उठते हुए क्लेश ( कठिनता ) से संपाद्य होने पर भी क्योंकि अयत्न निर्मित है, मनोहारि बन गया है ।

और जो ( सुकुमार मार्ग है वह ) कैसा है—अल्लान प्रतिभा से उद्भूत नूतन शब्द एवं अर्थ से वन्धुर । अम्लाना—दोषो से अनुपहत, पूर्वजन्म एवं इहजन्म के संस्कारो की परिपक्वता से प्रौढ यह प्रतिभा जो कुछ अपूर्व ही कोई कवित्वक्ति है, उससे उद्दिन्तनूतनाड्कुर न्यास से ( जैसे नया अड्कुर स्वय ही फूट पड़ता है उसी प्रकार ) स्वय ही समुत्पन्न, न कि आयास से लाये गये, नवीन एकदम ताजे ( अभिनव ) अर्थात् सहृदय काव्यश्र की आह्लादकारित्वरूप शक्ति से युक्त, शब्द और अर्थ, अभिधान और अमिधेय, उन दोनो से वन्धुर हृदयावर्जक ( होता है सुकुमार मार्ग ) । और फिर कैसा है ?—अयत्न निष्पाद्य स्वल्पमनोहार्गे अलङ्कार युक्त । अयत्न बिना प्रयास के कष्ट के, विहित—निर्मित, जो स्वल्प—मामूली मात्र, मनोहारि हृदय को आह्लादित करने वाला, विभूषण—अलङ्कार ( वह ) जिसमें हो वह तथोक्त ( सुकुमार मार्ग है ) । स्वल्प शब्द यहाँ प्रकरण आदि की अपेक्षा से प्रयुक्त किया गया है न कि वाक्यमात्र परक है ( अर्थात् पूरे प्रकरण-प्रबन्ध मे स्वल्प अलङ्कारो का विधान ही एकादश मे नहीं ) । उदाहरणा जैसे—

'यह रचना भी कालिदास की है । कुमारसम्भव ( ३।२९ ) में भगवान् शङ्कर को जीतने के लिए काम द्वारा आविष्कृत वसन्त का वर्णन किया गया है— ( पूर्णतया )

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बालेनदुवक्राण्यविकाशाभवाद् वसुः पलाशान्यतिलोहितानि । सद्यो वसन्तेन समागतानां नरवक्षतानीव वनस्थलीनाम् ॥७५॥

'अत्र 'बालेनदुवक्राणि' 'अतिलोहितानि' 'सद्यो वसन्तेन समागतानाम्' 'अत्र पदानी सौकुमार्यांत् स्वभाववर्णेनामात्रपरत्वेनोपात्तान्यपि 'नरखक्षतानिवि' इत्यलङ्करणस्य मनोहारिणः कलेनां विना स्वभावोक्तिद्यन्त्वेन योजनां भजमा-नानि चमत्कारितामापद्यन्ते ।

यत्रचान्यच्च कीदृशं—भावस्वभावप्राधान्यान्यकृताहार्यौ—कौशालः । भावाः पदार्थोत्तेषां स्वभावस्तत्त्वं, तस्य प्राधान्यान् मुख्यभावस्तेन न्यक्कृतं तिरस्कृतमाहार्यं व्युत्पत्तिविहितिं कौशलं यत्र स तथोक्तः । तदयसम्भिप्राय—पदार्थपरार्थं महिहिमैव कविशक्तिसमुन्मीलितः, तथाविधो यत्र विजृम्भते । येन विविधमपि व्युत्पत्तिविलसितं काव्यान्तर्गतं तिरस्कारास्पदं संपद्यते । अत्रोदाहरणं रघुवंशं मुगयावर्णनपरं प्रकरणम्, यथा—

विकसित न होने के कारण बालचन्द्र ( द्वितीया के चाँद ) के समान टेढ़े तथा अत्यन्त लोल वर्ण पलाश ( ढाक ) के फूल वसन्त ( ऋतु नायक ) से, तत्काल समागम किये हुए वनस्थलीयो ( रूप नायिकाओं ) के नखक्षतों की भाँति दमक उठे ।।७५।।

यहाँ पर 'बालेनदुवक्राणि' 'अतिलोहितानि' एवं 'सद्यो वसन्तेन समागतानाम्' ये सभी पद सौकुमार्य के कारण मात्र स्वभाव के वर्णन के लिए प्रस्तुत किये गये है, फिर भी 'नरखक्षतानीव नखक्षतों' के समान—इस प्रकार के ( उपमारूप ) मनोहारी अलंकार की आयास के बिना ही स्वभावत प्रकट होने कारण योजना को प्राप्तकर सौन्दर्यभाव को धारण कर रहे है ।

और जो यह सुकुमार मार्ग वह किस प्रकार का है ?—भावों के स्वाभाविक वर्णन की प्रघानता से आहार्य कौशल को तिरस्कृत करनेवाला । भाव-पदार्थ, उनका स्वभाव-तत्त्व ( वास्तविकता ), उसका प्राधानय— मुख्य भाव, उससे न्यक्कृत, आहार्य व्युत्पत्ति विनिर्मित, कौशल-निपुणता जहाँ पायी जाती है वह तथोक्त ( भाव-स्वभाव प्राधान न्याकृताहार्य कौशल मार्ग ) । तो इसका अभिप्राय हुआ—कि कवि की शक्ति से समुन्मीलित पदार्थ के वास्तविक स्वरूप का प्रभाव ही जहाँ उस प्रकार से विजृम्भित होता है जिससे काव्य मे निवद्ध कवि की व्युत्पत्ति विराजित विभिन्न प्रकार के भी ( निवन्धन ) तिरस्कार की प्रतिष्ठा को प्राप्त हो जाते है । इसका उदाहरण ( कालिदास के ) रघुवंश ( ९५ ) मे आखेट-वर्णन से सम्भद्ध प्रकरण है; जैसे—

मृगया के समय उन राजा दशरथ के सामने मृगों का समूह प्रकट जिसमें ( दूष पीने के लिए मों के ) स्तनों के प्रणयी मृगदावको से हरिणियों के समन मे रुकावट पैदा की जा रही थी । जिनके मुखो के बीच कुत्रा विराज रहे थे, और जिसके आगे—आगे गर्वयुक्त कृष्णसार मृगा चल रहा था ॥ ७६ ॥

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तस्य स्तनप्रणयिभिरसुहृदरणशावै- वयहिन्यमानहरिणीगमनं पुरस्तात् । आविर्विभूव कुशाग्रभुसुखं मृगाणां yूथं तदग्रसरगविंत कृष्णसारम् ॥ ७६ ॥ यथा च कुमारसम्भवे ( ३।३५ ) इन्द्राद्रौति भावं क्रियया विभक्तः ॥ ७७ ॥ इतः परं प्राणिधर्मेर्वर्णनम्, यथा श्रृङ्गारश्च स्पर्शानिमीलिताक्षीं मृगीमकण्डूयत कृष्णसारः ॥ ७८ ॥ अन्यच्च कीदृशः—रसादिपरमार्थशमनः संवादसुन्दरः । रसा: शृंगारादयः तदादिम्रहणेन रत्यादयोडपि गृहयन्ते । तेषां परमार्थे: परमरहस्यं तत्त्वानन्तीति तत्त्वास्तद्विदस्तेपां मनः संवादो हृदयसंवेदनं स्वानुभवगोचरतया प्रतिभासः; तेन सुन्दरः: सुकुमारः सहृदयहृदयाह्लादकारी वाक्यस्योपनिबन्ध इत्यर्थः । अत्नोदाहरणानि रचौ रावणं निहत्य पुष्पकेरणमाच्छतो रामस्य सीताया-

यहाँ पर मृग-दृग् का स्वाभाविक वर्णन ही अतिशय मनोहारी एवं हृदयावर्जक है। आहा्र्य व्युत्पत्ति विनिर्मित न होकर यहाँ कवि की प्रतिभा का ही विसाल है । और जैसे कुमारसम्भव ( ३।३५ ) के इस श्लोक मे है। श्लोक पूरा इस प्रकार है— तं देशमारोपितपुष्पचापे रतिद्रवितीये भदनेने प्रपन्ने । काष्ठागत स्नेह रसानुविदं हृद्रानिमावं क्रियया विभक्तः ॥ ३।३५ वसन्तागमन के समय पुष्प धनुष चढ़ाये हुए रतिसनाथ काम से युक्त उस प्रदेश मे ( जहॉ भगवान् शिव तपस्यारत थे ) प्राणियो के जोडो ने चरम सीमा को प्राप्त शृगार- रस से परिपूर्ण अपने भावो को क्रियाओ द्वारा विशेष प्रकार से व्यक्त किया ॥ ७७ ॥ और इसी के बाद ( वसन्त विहल ) प्राणियो के क्रियाधर्म का (श्लोक ४२ तक) वर्णन है। उदाहरण जैसे आगे का ३६वॉ श्लोक, जो पूर्णतया इस प्रकार है— मधुविद्रेपी: कुसुमैकपात्रे पपौ प्रिया स्वामनुवर्तिमानः । श्रृङ्गेण च स्पर्शानिमीलिताक्षीं मृगीमकण्डूयत कृष्णसारः ॥४३।३६

अपनी प्रियतमा का अनुवर्त्तन करता हुआ भ्रमर कुसुमरूप एक ही पात्र मे ( प्रिया के साथ ) मधुपान करने लगा और (स्पर्शो सुम्व से ) निमीलित नेत्र हरिणी को कृष्णसार मृग ने अपनी सीगो से खुजलाना प्रारम्भ कर दिया ॥ ७८ ॥ ( यहाँ भी वसन्तागमन मे प्राणियो की जो स्वाभाविक दशा हो जाती है—उसी का कविप्रतिभा से निबन्धन अत्यन्त मनोहारी बन गया है, आहा्र्यता का कोई नाम नहीं है ) । और फिर वह सुकुमार मार्ग कैसा है?— रस (भाव आदि) के परम रहस्य को जानने वालो के मनःसंवाद से सुन्दर । उस-शब्द आदि न च ( रस ) । उस

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स्तद्विरहविधुरहृदयेन मयासिन्नसिन् समुद्देशे किमप्येवंविधं वैचित्र्यमनुभूतमिति वर्ण्यत: सर्वाण्येव वाव्यानि । यथा—

पूर्वानुभूतं स्मरता च रात्रौ कम्पोत्तरं भीरु तवोपगूढम् । गुहाविसारीण्यतिवाहितानि मया कथंचिद्‌ घनगर्जितानि ॥

अत्र रसिद्धृयकरणस्यायमभिप्रायो यद्‌ विभावादिरूपेण रसाङ्गभूता: शकुनिरुततुरसलिलकुसुमसम्प्रस्तृतय: पदार्था: सातिशयस्वभाववर्णनप्राधान्येनैव रसाङ्गतां प्रतिपद्यन्ते । तदूयातिरिक्ता: सुरगन्धर्वप्रप्रस्तृतय: सोत्कर्षचेतनायोगिन: शृङ्गारादिरससन्निमरतया वर्ण्यमाना: सरसहृदयाह्लादकारितामायान्तीत कविभिरम्युपगतम् । तथा विधमेव लक्ष्ये हृदयते ।

( रस पद ) मे आदि ग्रहण से रति आदि ( भाव, रसाभास, भावाभास, सन्धि-शान्ता आदि ) भी ग्रहण हो जाते है । उनका परमार्थ-परमरहस्य, उसको जो जानते है ( वे है) तज्ज्ञ ( रसादि के परमार्थं को जानकर ), उनके मन: सवाद—हृदय की अनुभूति अर्थात् अपने स्वभाव से साक्षात्कृत होने के कारण ( रसादि ) की प्रतीति, उससे सुन्दर सुकुमार अर्थात सहृदयो के हृदय को आह्लादित करनेवाक्यो की रचना, यह अर्थ हुआ । इसके उदाहरण—रघुवंश मे रावण को मार कर पुष्पक से लौटते हुए राम के वे सभी कथन हैं जिसमें सीता से बताते हुए उन्होंने कहा है कि उन ( सीता ) के वियोग से व्यथित हृदय मैने इन-इन प्रदेशो मे कुछ इस प्रकार के अकथनीय कष्टो का अनुभव किया है । जैसे—रघुवंश १३।२८ का है । लङ्का से लौटते राम सीता से कहा जा रहा है—भीरु स्वभाववाली सीते ! ( इस स्थल पर मैने ) ( वर्षा ऋतु की ) गतियो मे ( वादलो की गर्जगडाहट से भयत्रस्त ) कम्पन के बाद तुम्हारे द्वारा किये गये आलिङ्गन जन्म पूर्वानुभूत ( सुख ) का स्मरण करते हुए ( पर्वत की ) गुफाओ मे फैलने वाली वादलों की गर्जनाओ को ( तुम्हारे बिना वर्षात के समय मे ) मैने किसी-किसी प्रकार से सहन करते हुए झेला था ॥ ७९ ॥

यहॉं ( सुकुमार मार्ग के इस लक्षण मे ) दो विभाग ( भावो की स्वभावगत से आहार्य कौशल को तिरस्कृत करने वाला एवं रसादि के परम रहस्य के ज्ञाता के मन सव्वादी होने से सुन्दर रूप ) करने का अभिप्राय यह है कि, रसादि के अङ्गभूत ( सहकारी ) पक्षियो के कलरव, वृक्ष, जल, पुष्प एव समय ( ऋतु आदि ) पदार्थ ( काव्य मे ) विमान आदि के रूप मे निवद्ध ḍहिये जाते है । औौखे वैचित्र्य या सौन्दर्ययुक्त स्वभाव के वर्णन की प्रधानता से ही रस की अङ्गता को प्राप्त होते है ( ध्वानिकार ने भी यह बात कही है ) । और उनसे मित्र उत्कर्षयुक्त चेतना समन्वित सुर-गन्धर्व आदि शृङ्गार आदि रसों से अतिशय बोझिल रूप मे वर्णित होकर रसिक हृदयसहृदयो आह्लादिकारिता को प्राप्त करते है, ऐसा कवियो ने स्वीकार किया है । उसी

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अन्यच्च कीटशः—अविभावितसंस्थानरामणीयकरक्खकः। अभिभावित-

मनालोचितं संस्थां संस्थिथियेतत्र तेन रामणीयकेन रमणीयत्वेन रक्खकः सहृदयहृदादरक्। तेनायमार्थः—यदि तथाविधं कविकौशलमय संभवति तद् व्यपदेशदुमियत्तया न कथंचिदपि पायंते, केवलं सर्वोतिशायितया चेतसि परिस्कुरति। यदच कीटश—विधिवैदग्धनिष्पत्तिनिर्माणातिशयोपमः। विधि-

विंधाता तस्य वैदग्ध्यं कौशलं तेन निष्पन्नः परिसमाप्तो योडसौ निर्माणातिशयः सुन्दरः; सगोलेलेखा रमणीयरमणीयलावण्याविंयादिः स उपमा निदर्शने यस्स तथोक्तः। तेन विधातुरिव कवे: कौशलं यत्र विवेकतुमशक्यम्। यथा—

विनि: श्वसदृक्तरपरंपेण। कारागृहे निर्जितवासवेन दशाननेनोषितमा प्रसादत्॥८०॥

प्रकार का निबन्ध भी कवियो के काव्यो में देखा जाता है। ( इस प्रकार प्रथम विभाग भाव स्वभाव प्राधान्यनकृतताहार्य कौशलः—का प्रयोजन है तिर्यंच आदि का स्वाभाव-

विक वर्णन एवं—रसादि परमार्थज्ञ मनः संवादिशुन्दरः—का प्रयोजन है उत्कृष्ट चेतना का सरस निबन्धन।)

और कैसा है ( वह सुकुमार मार्ग )?—अविभावित संस्थानों की रमणीयता से सुन्दर। अविभावित—अनालोचित है, सस्थान—सस्थिति, जहॉ उस रामणीयक से—

रमणीयता से, रक्खक—सहृदयों के हृदय को आकृष्ट करनेवाला। इससे यह अर्थ होता है—यहॉ उस प्रकार का कवि कौशल हो सकता कि यदि उसे कहा जाय कि, ‘वह इतना ही है, ऐसा ( कहना ) किसी प्रकार से सम्भव नही, मात्र सर्वोतिशायी रूप से वह चित्त मे ही परिस्कुरित होता है। और जो कैसा है ?—विधाता की विदग्धता से निष्पन्न रचना के अतिशय सदृश। विधि-विधाता से सृष्टा, उसका वैदग्ध्य—कौशल उसके द्वारा निष्पन्न—सम्यक् पूर्ण किया गया जो यह (जागतिक) निर्माण का अतिशय—

सुन्दर सृष्टि की रचना अर्थात् रमणीय रमणी के लावण्य आदि, वह उपमा—निदर्शन उदाहरण है जिसको वह उसे प्रकार का ( विधि वैदग्ध्य ) निष्पन्ने निर्माणातिशयोपम मार्ग सुकुमार कहा जाता है। इससे ( यह अर्थ हुआ कि ), विधाता के कौशल की भॉति जिस रचना मे कवि कौशल का विवेचन अशक्य हो ( वह सुकुमार मार्ग की रचना है )। जैसे—यह रचना भी रघुवंश ( ६।४० ) की है। इन्दुमती स्वयंवर मे सुनन्दा नाम की सखी प्रतिप नामक राजा के परिचय मे उसके पूर्वज कार्तवीर्य का

महर्षि प्रस्तुत करती कह रही है—जिस ( कार्तवीयर्जुन ) के कारागृह मे (उसकी) प्रसन्नता पर्यन्त ( जब तक प्रसन्न होकर उसने स्वयं नही छोड़ f या ), धनुष की डोर के बन्धन से असमर्थ भुजाओं वाले, मुखो की पॉटी ( दसों मुखों ) से लम्बी—लम्बी

आहे लेनवाले, इन्द्र को भी जीतने वाले रावण ने निवास किया था (उसी कार्तवीयर्जुन

तृपति का वशधर है यह राजा प्रतिप ) )॥८०॥

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अत्र व्यपदेशप्रकारान्तरनिरपेक्षः कविशक्तिपरिणामः परं परिपाकमधिरुढः ।

एतस्मिन् कुलके—प्रथमे श्लोके प्राधान्येन शब्दार्थालङ्करणयोः सौन्दर्यं प्रतिपादितम् । द्वितीये वर्णनीयस्य वस्तुनः सौकुमार्यम् । तृतीये प्रकारान्तरनिरपेक्षस्य संनिवेशस्य सौकुमार्यम् । चतुर्थे वैचित्र्यमपि सौकुमार्याविसंवादि विलीयत इत्युक्तम् । पञ्चमो विप्रविषयिसौकुमार्यप्रतिपादनपरः ॥२५-२९॥

एवं सौकुमार्याभिधानस्य मार्गस्य लक्षणं विधाय तस्यैव गुणान् लक्ष्यति—असमस्तमनोहारीपदविन्यासजीवितम् । माधुर्यं सौकुमार्यस्य मार्गस्य प्रथमो गुणः ॥३०॥

असमस्तानि समासवर्जितानि मनोहारिॆणि हृदयाह्लादकानि श्रुतिरम्यत्वेनार्थरमणीयत्वेन च यानि पदानी सुविदन्तानीति तेषां विन्यासः संनिवेशवैचित्र्यं

है ॥३०॥

असमस्त-समास वर्जित, मनोहारी-सहृदयों के हृदय को आह्लादित करने वाले अर्थात् श्रवण मे रमणीय अथवा अर्थ मे रमणीय होने के कारण सुविदन्त या तिड्नतरूप

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

जीवितं सर्वस्वं यस्मात्तत्थोक्तं माधुर्य नाम सुकुमारलक्षणस्य मार्गस्य प्रथमः प्रधानभूतो गुणः । असमस्तशब्दोक्त प्राचुर्यार्थे; न समासाभावनिपमार्थे ।

क्रोडारसेन रहसि स्थितपुंसोऽसिन्दोर्लेखां विकृष्य विनिबध्य च मूर्धिन गौर्याः । किं शोमिताहमनयेतिशशाङ्कमौले: पृष्ठस्य पातु परिचुम्बनमुत्सरं वः ॥८९॥

अत्र पदानांसमसतत्वं शब्दार्थरमणीयता विन्यासवैचित्र्यं च त्रितयमपि चकास्ति । तदेवं माधुर्यमभिधाय प्रसादमभिधन्ते—अक्लेशव्यजिताकूतं झगित्यर्थेसंपणम् । रसवक्रोक्तिविषयं यत्प्रसाद: स कथ्यते ॥३९॥

झगिति प्रथममतरमेवार्थेसंपणं वस्तुप्रतिपादनम् । कीटशम—अक्लेश-व्यजिताकूतम् अकदर्थनाप्रकटिताभिप्रायम् । किविषयम्—रसवक्रोक्तिविषयम् ।

जो पद ( हृदयाह्लादक होते हैं ), उनका विन्यास-सन्निवेश वैचित्र्य ही जीवन सर्वस्व है जिसका तथोक्त, माधुर्य नाम वाचा ( गुण ) सुकुमार रूप मार्ग का प्रथम-प्रधानभूत गुण है । असमस्त पद यहाँ प्राचुर्य अर्थ को द्योतित करता है ( अर्थात् समासों की अधिकता को निषिद्ध करता है ) न कि समासों के सर्वथा अभाव के नियम के लिए ग्रहण किया गया है ।

( माधुर्य गुण का ) उदाहरण जैसे—एकान्त मे प्रणय कीडा के आनन्द से ( शशाङ्क के सिर पर वर्तमान ) चन्द्रकला को खींचकर ( स्वर्य ) अपने सिर पर लगाकर 'क्या मैं इससे सुन्दर लग रही हूँ' इस प्रकार गौरी पार्वती से मुस्कानपूर्वक पूछे गये चन्द्रशेखर भगवान् का ( पार्वती को दिया गया ) परिछुम्बन रूप उत्तर आपभी रक्षा करे ॥८९॥

यहाँ पदों की असमासता रूप ( स्वल्प समासता ), शब्द और अर्थ की रमणीयता एवं पदों का विन्यास वैचित्र्य तीनों ही शोभायमान हो रहा है । ( अर्थः माधुर्य गुण है ) ॥३०॥

तो इस प्रकार माधुर्य का लक्षण कहकर प्रसाद को कहते हैं—रस एवं वक्रोक्ति विषयक अभिप्राय को अनायास ही व्यक्त करने वाले अर्थ को श्रीप्रकाशित करने वाला जो गुण है वह प्रसाद कहा जाता है ॥३९॥

झगिति ( सुनने या पढ़ने पर ) सर्वप्रथम, अर्थ का संप्रेषण-वस्तु का प्रतिपादन ( करने वाला ) । किस प्रकार के अर्थ का ?—अक्लेश से ही अभिप्राय को व्यक्त करने वाला—बिना आयास के ही अभिप्राय को प्रकटित करने वाला । किस विषयक अभिप्राय को ?—रस और वक्रोक्ति विषयक । रस—शृङ्गार आदि ( भाव, भावाभास-प्रभृति ), वक्रोक्ति—सकल अलङ्कार सामान्य भूत तत्व ही विषय-गोचर हैं जिसका

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रसाः श्रृङ्गारादयः, वक्रोक्तिः सकलालङ्कारसामान्यं विषयो गोचरো यस्य तत्तथोक्तम् । स एवं प्रसादाख्ये गुणेऽपि कध्यते भण्यते । अत्र पदानामसामस्तत्त्वं प्रसिद्धाभिधानत्वम् अल्पवहितसंबन्धत्वं समाससदृशावेदपि गमकसमासयुक्तता च परमार्थः । 'आकृत'-शब्दस्तार्पर्यविविच्छतौ च वर्तते । उदाहरणं यथा—

हिमगिरिपयाद्दिशदाधराणा-मोपान्तुरोभूतमुखच्छवीनाम् । स्वेदोद्गमः किपुरुषाङ्गनानां चक्रे पदं पत्रविशेषकेषु ॥८२॥

अत्रासमस्तत्वादिसामग्री विद्यते । यदपि विविधपत्रविशेषकवैचित्र्यविहितं किंपि वदनसौन्दर्यं मुक्ताकणाकारस्वेदलवोर्द्रंहितं तदपि सुव्यक्तमेव । यथा वा—

अनेन सार्धं विहराम्बुराशे-स्तीरेषु ताडीवनमर्मरेषु । द्वीपान्तरानीतलवङ्गपुष्पै-रूपकृत्स्वेदलवा महाद्रिः ॥८३॥

उस तथोक्त अभिप्राय को ( श्रीधर समर्पित करने वाला ) । वही प्रसाद नाम का गुण कहा जाता है—भणित होता है । यहाँ पर पदो की असमासता ( स्वल्प समासता ), प्रसिद्ध की अभिधानता ( अर्थ आदि के साथ व्यवधानरहित समबन्ध स्थापना तथा समास होने पर भी ( अर्थादिका ) सङ्ज्ञातया बोध करने वाले समासो से युक्त होना इस गुण का परम तत्व है । ( कारिका मे उपात्त ) 'आकृत' शब्द तात्पर्य की शोभा के अर्थ मे रूहीत है । उदाहरण जैसे—

कुमारसंभव ( ३।२३ ) का ही श्लोक है । वसन्तागमन का वर्णन है—शीतकाल के चले जाने ( एवं वसन्त के आगमन के कारण ) प्रदीप्त अधरों वाली, सर्वतः पीत ( गौर ) हुए मुख की शोभा युक्त किन्तु नारियो के पत्ताकार तिलक रुचनाओं ( आभूषणों ) मे पसीने के आविर्भाव ने अपना स्थान जमा लिया ॥८२॥

यहाँ पर असमसता आदि रूप ( प्रसाद गुण की सभी ) सामग्री प्रस्तुत है । और जो अनेक प्रकार की पत्र रचनाओं के सौन्दर्य से विनिर्मित तथा मुक्तागण जैसे पसीनों की बूदो से परिद्वहित मुख का कुछ अपूर्व सौन्दर्य है, वह भी अत्यन्त स्पष्ट ही है ।

अथवा जैसे ( द्वितीय ) उदाहरण । रघुवंश का ही ( ६।५३ ) श्लोक है । स्वयम्वर मे सुनन्दा कलिङ्गाधिपति हैमाङ्गद का इन्दुमती से परिचय दे रही है—

ताडवनोः कीर्मर्मन् ध्वनि से गुज्ञायमान समुद्र के तटो पर अन्य द्वीपी से लाये गये लवङ्ग के फूलो की सुगन्धयुक्त वासु से स्वेदकणो को विलग करती हुई इस ( हेमाङ्गद के साथ ) विहार करो ॥८३॥

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अलङ्कारव्यक्तिर्येथा—

बालेन्‍दुवक्राणि इति ॥ ८४ ॥

एवं प्रसादमिधाय लावण्यं लक्ष्यते—

वर्णविन्यासविच्छिन्निपदसंधानसंपदा ।

स्वल्पया बन्धसौन्दर्यं लावण्यमभिधीयते ॥ ३२ ॥

‘बन्ध’ इति वाच्यविन्यासस्‍तस्य ‘सौन्दर्य’ रमणीयता, लावण्यमभिधीयते

लावण्यमित्युच्यते । कीटश्रय—वर्णनात्मकश्रयाणां, विन्यासो विचित्रं न्यसन्‍नं,

तस्य विच्छिन्‍निः शोभा वैदग्ध्यभङ्गी, तथा लक्षितं, पददानां सुमिद्धतानां, संधानं

संयोजनं, तस्य सम्पत्त्, सापि शोभैव, तथा लक्षितम । कीटद्रया—उभयरूप-

यापि स्वल्पया मनाङ्मात्रया नातिनिर्बन्धननिर्मितया । तद्पमात्रार्थे—शब्दार्थ-

सौकुमार्यसुभग. सन्निवेशमहिमा लावण्याख्यो गुण: कथ्यते । यथा—

वक्रोक्ति रूप अलङ्कार की स्पष्टता जैसे—

बालेन्‍दुकवकाण्यविकास भावाद्‍बकुः पलाशान्‍मति लोहितानि ।

सद्यो वसन्तेन समागताना नखक्षतानीव वनस्‍थलीनाम् ॥ कु०सं० ३।२९

यह श्लोक कुमार भार्गव के उदाहरण में भी आया है । इस श्लोक मे प्रसाद गुण

की समस्त सामग्री के साथ उपमा अलकार अनायास ही स्पष्ट हो जाता है । अतः

प्रसाद गुण है ।

इस प्रकार प्रसाद का अभिधान कर अब लावण्य गुण का लक्षण करते हैं—

स्वल्पमात्र वर्ण विन्यास की शोभा के द्वारा विहित पदसर्जना की स्वल्पचमत्कृति से

निष्पन्‍न रचना की सुन्दरता को लावण्य गुण कहा जाता है ॥ ३२ ॥

बन्ध—वाक्य विन्यास, उसका सौन्दर्य—( उसकी ) रमणीयता लावण्य गुण कही

जाती है—लावण्य ऐसा माना जाता है । कैसे ( बन्ध का सौन्दर्य ) ?—वर्णों—अक्षरो

का, विन्यास विभिन्न प्रकार से अवस्थापन, उसकी विच्छित्ति—शोभा, अर्थात् वैदग्ध्य

भङ्गिमा, उससे लक्षित, पदो का—सुप्त तिड् रूप पदो का, संधान—संयोजन, उसकी

सम्पत्ति—वह भी शोभा ही है, उससे लक्षित होता है ( बन्ध सौन्दर्य जहाँ लावण्य गुण

कहा जाता है ) । किस प्रकार की सम्पत्ति से ( लक्षित बन्ध सौन्दर्य ) ?—दोनो ही

प्रकार ( वर्ण सघटना और पद सघटना ) की, स्वल्प—एकदम यून अर्थात ( वर्ण

एवं पद संघटना के ) अतिशय आयास के बिना विनिर्मित ( शोभा से लक्षित वाक्य

रचना को लावण्य कहते है ) । तो यहाँ इसका यह अर्थ हुआ—शब्द और अर्थ की

सुकुमारता से सुन्दर ( वर्णों-पदो के ) विन्यास की सुन्दरता लावण्य नामक गुण कही

जाती है । उदाहरण जैसे—

श्लोक रघुवंश ( १६।१० ) का है । अयोध्या मे कुश के आगमन पर कुशद्रती

के साथ उसके विहार की भूमिका मे बसना की समाति पर आये ग्रीष्म ऋतु मे वनिता-

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स्नानाद्रेःसुक्तेष्वनुधूपवासं विन्यस्तससायनन्तनमल्लिकैषु ।

कामो वसन्तात्ययमन्दवीर्यः । केशेपु लेभे वलमझ्झनानाम् ॥ ८५ ॥

अत्र सन्निवेशसौन्दर्यमाहिम्ना सङ्घदयसंवेद्यो न व्यपदेश्यं पायते ।

यथा वा—

चकार वाणैररुणाझनानां गण्डस्थलीः प्रोषितपत्रलेखाः ॥ ८६ ॥

अत्रापि वर्णविन्यासविच्छित्तिः पदसंधानसम्पच्च सन्निवेशसौन्दर्यनिबन्धन-

स्फुटावभासैषु ॥ ३२ ॥

एवं लावण्यममिधाय आधिजात्यममिधत्ते—

श्रुतिपेशलताशालिनि सुप्रशोमिव चेतसा ।

स्वभावमसृणच्छायामाभिजात्यामभिजात्यं प्रचकक्षते ॥ ३३ ॥

एवम्विधं वस्तु आभिजात्यं प्रचकक्षते आभिजात्याभिधानं गुणं वर्ण्यन्ति ।

श्रुतिः श्रवणन्द्रियं तत्र पेशलता रामणीयकं तेन शालते इलाघते यत्तथोक्तम् ।

अपने सहायक मित्र वसन्त के चले जाने से ( श्रीसम्प के आगमन पर ) अतिशय दुर्बल काम् स्नान करने के कारण गीले और खोले गये तथा ( सूख जाने पर ) धूप-

वास से सुगन्धित किये जाने के बाद सायकाल में गन्ध्ये गये मल्लिका के फूलों से युक्त सुन्दर अझावली रमणीयताको केचकरोलो में (पुनः ) वल प्राप्त किया ॥ ८५ ॥

यहाँ पर (वर्णों एवं पदो के सुन्दर ) सन्निवेश की शोभा का माहात्म्य सहृदयों से सम्वन्ध ही है, शब्दों से नही कहा जा सकता ।

इसी का दूसरा उदाहरण जैसे नीचे के श्लोक मे है । यह भी रघुवंश का ही श्लोक है ( ६।७२ ) । इनदुमती स्वयंवर के समय ‘कुत्स्य’ राजा का वर्णन करते सुनन्दा इन्-

मती को उसका महत्व बता रही है । पूरा श्लोक इस प्रकार है—

महेन्द्रमास्तथाय महोकरूप यः संयति प्राप्य पिनाकिलील ।

चकार वाणै रसुराझनानां गण्डस्थलीः प्रोषितपत्रलेखा ॥ ६।७२

चृपभ रूपधारी इन्द्र पर आरुढ होकर भगवान् राघ्घीर की लीला को प्राप्त कर जिस राजा कुत्स्य ने युद्ध मे वाणो से असुरो की सुन्दरियो के कपोलमण्डल को पन्ररचना से शून्य कर दिया (वही यह नरेश है ) ॥ ८६ ॥

यहाँ भी वर्ण विन्यास की विच्छित्ति एवं पदसंधान की शोभा संघटना के सौन्दर्यं निर्वन्धित होने के कारण स्पष्टतः प्रतीय ही हो रही है ।

इस प्रकार लावण्य गुण का विवेचन कर अब (सुकुमार मार्ग के ) ही आभि-

जात्य गुण का उल्लेख करते हैं—

सुनने मे रमणीयता से युक्त, चित्त से सुख स्र्पर्श-सा ( प्रतीत होने वाला ) एवं स्वभावत· मनोहर सौन्दर्यशाली ( गुण ) आभिजात्य कहा जाता है ॥ ३३ ॥

इस प्रकार की वस्तु आभिजात्य कही जाती है—आभिजात्य नामक गुण कही

जाती है । श्रुति—श्रवणेन्द्रिय (कर्ण ), उसमें जो प्रतीत पेशालता—रमणीयता, उससे

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सुस्पर्शोमिव चेतसा मनसा सुस्पर्शोमिव । सुखेन स्पृश्यत इवेत्यतिशयोक्तिरियम् । यस्मादुभयमपि स्पर्शोयोग्यत्वे सति सौकुमार्याद् किमपि चेतसि स्पर्शसुखमरपयतीव । यतः स्वभावमसृणच्छायम् आहार्येरलक्षणकान्ति यत्तदू आभिजात्यं कथ्यन्तीत्यर्थः । यथा—

ज्योतिरलेकावलयिगालितं यस्य बहुं भवानी । पुत्रप्रीत्या कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति ॥ ८७ ॥

अत्र श्रुतिपेशलतादि स्वभावमसृणच्छायतवं किमपि सहृदयसंवेग्यं परिस्फुरति । नतु च लावण्यमाभिजात्यं च लोकोत्तरतरुणीरूपलक्षणवस्तुधर्मेतया यत् प्रसिद्धं तत् कथमस्य भवितुमर्हतीति चेतनन् । यस्मादनेन न्यायेन पूर्वप्रसिद्धियोरपि माधुर्यप्रसादयोः काव्यधर्मेत्वं विघटते । माधुर्ये हि गुडादिमधुरद्रव्यधर्मेतया प्रसिद्धं तथाविधाह्लादकारित्वं

जो शाल्ति होता है—प्रशंसित होता है, तथोक्त ( उस प्रकार का श्रुति पेशलताचाली ) । चित्त से सुस्पर्शों को भोत्ति—मनसे सुखकर स्पर्शों-सा लगनेवाला । सुख से स्पृष्ट सा किया जाता है, इस प्रकार कथन ( असमबन्धे सम्बन्धारोपा ) अतिशयोक्ति रूप है । क्योंकि स्पर्शों की योग्यता विद্যমान रहने पर दोनों ही सुकुमारता के कारण चित्त मे किसी अपूर्व सुस्पर्शी को समर्पित-सा करते है । इसलिये कि स्वभावतः मसृण कान्ति एवं व्युत्पत्तिजन्य कोमलकान्तिरहित जो रचना होती है वह आभिजात्य कही जाती है । जैसे यह श्लोक मेदूत से लिया गया है । पूरा श्लोक इस प्रकार है—

ज्योतिरलेकावलयिगालितं यस्य बहुं भवानी । पुत्रप्रीत्या कुवलयदल प्रापि कर्णे करोति । धौतपादां हरशशिरुचा पावकेस्तं मयूरे पच्वाददृश्रहण गुहाभिरगिजितनेत्रैयेथाः ॥ पूर्वमेघ, ४८ ।

मण्डलाकार चमकती रेखाओं से गिरे युक्त गिरे हुए ( कार्तिकेय के ) जिस मयूर के पिच्छे को भवानी पावती पुत्र-प्रेम के कारण कुवलय कानों मे लगाती है । ( स्वामि कार्तिकेय के अभिषेक के ) बाद भगवान् शिव के शिरस्थ चन्द्र की प्रभा से शुद्ध कनकियों वाले कार्तिकेय भगवान् के उस मयूर को तुम पर्वत की टकराहट से गम्भीर अपनी गर्जनाओं से नचाना ॥ ८७ ॥

यहाँ श्रुति पेशलता आदि स्वभावतः मसृण सौन्दर्यत्वं कुछ अपूर्व ही सहृदयसंवेग्य होकर परिस्फुरित हो रहा है । प्रश्न हो सकता है कि लावण्य और आभिजात्य जो अलौकिक युवतियों के सौन्दर्य रूप वस्तु धर्म के रूप से प्रसिद्ध हैं वे काव्य के गुण कैसे हो सकते है ? ( उत्तर है कि ऐसा कहना ) ठीक नही है । क्योंकि इस रीति से प्राचीन आचार्यों द्वारा मान्य अथवा पूर्व प्रतिपादित माधुर्य और प्रसाद गुणों की भी काव्यधर्मता विघटित हो जायगी ।

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सामान्योपचारात् काव्ये व्यपदिश्यते । तथैव व प्रसादः स्वच्छसलिलस्फाटिकादि धर्मतया प्रसिद्धः स्फुटवभासितवसासामान्योपचाराज्जगति प्रतिपेशालतां प्रतिपद्यते । तद्धदेव व काव्ये कविशक्तिकौशलोल्लिखितकान्तिकमननीयं बन्धसौन्दर्यं चेतनचमत्कारकारित्वसामान्योपचाराल्लावण्यशब्दद्यतिरेकेण शब्दान्तराभिधेयतां नोत्सहते । तथैव च काव्ये स्वभावसमुच्‍चायतया माभिजात्य शब्देनाभिधीयते । नतु च कैश्चित्प्रतीयमानं वस्तु ललनालावण्यसाम्याल्लावण्यमित्युपपादितमिति—

प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत्तत्‍त्रसिद्धावयवातिरिक्तमभाति लावण्यमिवाज्ञानाम् ॥८८॥

तत्कथम् बन्धसौन्दर्यमात्रं लावण्यमित्यभिधीयते ? नैष दोषः, यस्मादनেন दृष्टान्तेन वाच्यवाचकतक्षणप्रसिद्धावयवण्यतिरिक्तत्वेनास्तित्वमात्रं साध्यते प्रतीयमानस्य, न पुनः सकल्लोकलोचनसंवेद्यस्य ललनालावण्यस्य । सहृदयलोक मे माधुरता गुडादि मधुर द्रव्यो के धर्म के रूप मे प्रसिद्ध है । उसी ( गुड आदि ) के समान आह्लादकारी होने से, (आह्लादकारित्व रूप) सामान्य धर्म के कारण उपचार ( लक्षण ), से माधुर्य आदि तत्त्व भी ) काव्य मे माधुर्य आदि के गुण के रूप व्यप्ति होते है । और उसी प्रकार प्रसाद भी स्वच्छ जल एवं ( स्वच्छ निर्मल ) स्फटिक मणि आदि के धर्म के रूप से प्रसिद्ध है (किन्तु) उपचार से प्रसाद गुण भी ) तुरन्त ( अर्थ ) प्रतीति की रमणीयता को प्राप्त हो जाता है । और उसी प्रकार काव्य मे कवि के वैदग्‍ध्य से निष्पादित कान्ति से सुन्दर ( लावण्यादि ) रचना के सौन्दर्य सहृदय-हृदय मे चमत्कार सम्पादन रूप साधारण धर्म के कारण उपचार से लावण्य शब्द से व्यतिरिक्त अन्य शब्दो की अभिधेयता को प्राप्त नही हो पाते । और उसी प्रकार काव्य मे स्वभावतः माधुर्य कान्ति रूप तत्त्व अभिलाष्या शब्द से कहा जाता है ।

( प्रश्न होता है कि ), किन्ही (आनन्द-वर्धन ) ने प्रतीयमान वस्तु को रमणी के लावण्य साम्य से लावण्य ऐसा कहा है— अज्ञनाओ मे उनके प्रसिद्ध अवयवो से व्यतिरिक्त प्रतीयमान सौन्दर्य लावण्य की भाँति महाकवियो की वाणी मे विलसित होने वाला प्रतीयमान अर्थ प्रसिद्ध वाच्यार्थ से व्यतिरिक्त अन्य ही वस्तु है ॥८८॥

तो फिर बन्ध के सौन्दर्यमात्र को लावण्य कैसे कहा जा सकता है ? उत्तर देते है—यह कोई दोष नही हुआ । क्योकि इस ( ध्वनि का रोक्तं प्रतीयमान अर्थ के समर्थन मे ललनालावण्य का उनके अवयवों से व्यतिरिक्त बताने रूप ) दृष्टान्त से वाच्यवाचक रूप प्रसिद्ध अवयवो से व्यतिरिक्त होने के कारण प्रतीयमान अर्थ का

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हृदयानामेव संवेगं सत् प्रतीममानं समीकर्तुं पार्यते । तस्य बन्धसौन्दर्यमेवाव-त्युत्पत्तिपदपदार्थोनामपि श्रवणमात्रेणैव हृदयहारित्वस्पर्धया वचपदिश्यते । प्रतीममानं पुनः काव्यपरमार्थज्ञानामेवानुभवगोचरतां प्रतिपद्यते । यथा कामिनी-नीनां किमपि सौभाग्यं तदुपभोगोचितानां नायकानामेव संवेगतामर्हति, लावण्यं पुनस्तासामेव सत्कविगिरामिव सौन्दर्यं सकललोकगोचरतामायाती-त्युक्तमेवेत्यलमतिप्रसङ्गेन।

एवं सुकुमारस्य लक्षणमभिधाय । विचित्रं लक्षणयति—प्रतिभाप्रथमोदेेदसमये यत्र वकता । शब्दाभिधेयोरनतः स्फुरतीव विभाव्यते ॥१३४॥ अलङ्कारस्य कवयो यत्रालङ्करणानन्तरम् । असंस्तुत्था निवन्धनन्ति हारादेमेर्मणिबन्धवत् ॥१३५॥ रत्नानि रचितच्छटोल्सेकभासुरैर्भूषणैरयथा । कान्ताशरीरमच्छाद्य भूषायै परिकल्पते ॥१३६॥

अस्तित्वमात्र सिद्ध किया जा रहा है, न कि सभी लोगो से संवेग्य लावण्यलावण्य का सहृदय-हृदय लोगो मात्र से संवेग्य प्रतीममान को उससे समीकृत किया जा सकता है । उस काव्य का बन्ध सौन्दर्य ही, जिन्हे पद और पदार्थ की व्युत्पत्ति नहीं है उन सामान्य लोगो को भी श्रवणमात्र से ही हृदयहारी होने के कारण ( लावण्य लावण्य की ) स्पर्धा से ( लावण्य ) कहा जाता है ( लावण्य लावण्य सहृदय एवं अव्युत्पन्न सामान्य जनों को भी आकृष्ट करता है तदतत् काव्य का सामान्य सौन्दर्य लावण्य भी दोनो को श्रवणमात्र से ही आकृष्ट कर लेता है ) । किन्तु प्रतीममान ( अर्थ तो ) काव्य के परमार्थ को जाननेवालों की ही अनुभव गोचरता को प्राप्त करता है । जैसे कामिनी वृद्धो का अनिवार्चनीय सौन्दर्य उनके उपयोग के योग्य नायको की ही अनुभवराग्म्यता के योग्य होता है, किन्तु उन्ही का लावण्य सौन्दर्य उत्तम कवियों की वाणी की भाँति समस्त लोगो को ही प्रतीत का पात्र बनता है । वह तो कविता है । माझ को छोड़कर कहना व्यर्थ है । अत अब इस विषय को छोड़ते है ॥१३३॥

इस प्रकार सुकुमार मार्ग का लक्षण ( एवं उसके गुणो का ) प्रतिपादन कर विचित्र मार्ग का लक्षण करते हैं—जहाँ कवि की प्रतिभा के प्रथम आविर्भाव के समय शब्द और अर्थ के बीच वक्ता परिस्फुरित होती हुई सी प्रतीत होती है ॥१३४॥

जहाँ एक ही अलङ्कार से सन्तोष न होने के कारण कविगण हार आदि आभूषणो में जटित विभिन्न मणियो की भाँति दूसरे अलङ्कारो का गुम्फन करते है ॥१३५॥

( हारादि आभूषणो में विन्यस्त विभिन्न ) मणियो से छिटकती किरणप्रभा के बाहुल्य से दीप्यमान अलङ्कारो से ढँककर जैसे युवती के शरीर को भूषण भूषित किया

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यत्र तद्रदलङ्कारैर्ध्वजमानैर्निजजातमनः ।

स्वशोभातिशयान्तःस्थमलङ्कारं प्रकाशयति ॥३७॥

यदप्यनूतनोल्लेख्यं वस्तु यत्र तदप्यलम् ।

उक्तिवैचित्र्यमात्रेण काव्यां कामपिनीयते ॥३८॥

यत्रान्यथाभावात् सर्वमन्यथैव यथार्थतां ।

भाव्यते प्रतिभोल्लेखमहत्त्वेन महाकवेः ॥३९॥

जाता है । उसी प्रकार जहाँ अपने-आप प्रकाशमान ( उपमादि ) अलङ्कारो से स्वाभाविक शोभातिशय मे अवस्थित अलङ्कार्य प्रकाशित किया जाता है ॥ ३६-३७ ॥

( ध्वनिकार आचार्य आनन्दवर्धन ने भी अलङ्कारो के विषय मे उनकी स्वाभाविकता का समर्थन किया है—

रसाक्षिसतया यस्स्य बन्धः शस्स्य क्रियो भवेत् ।

अपृथग्मयत्न निरवर्त्यः सोऽलङ्कारो ध्वनौ मत ॥

ध्वन्यासमूते शुद्धारे समीक्ष्य विनिवेदिते ।

रुपकादिरलङ्कारवर्गः एति यथार्थताम् ॥

विवक्षातपरत्वेन नाङ्गित्वेन कदाचन ।

काले न च ग्रहणत्यागौ नातिनिर्वहणेऽपि चित् ।

निर्व्यूढावपि चाङ्गत्वे यत्तेन प्रत्यवेक्षणम् ॥ ध्व० २।१६-१९ ।

अर्थात् अलङ्कार्य की अपेक्षा से ही अलङ्कारो का विनिवेश अच्छा होता है । उनका आह्लादक रूप काव्य के सौष्ठव को विचित्र कर देता है । अतः कुन्तक ने भी उक्त काव्यो मे अलङ्कारो की अलङ्कार्यपरता एवं स्वाभाविकता का समर्थन किया है ।)

जिस वस्तु का वर्णन नही है ( प्राचीन आचार्यों ने भी जिसका प्रतिपादन कर दिया है ) वह वस्तु भी जहाँ कवि के प्रतिपादन के सौन्दर्यमात्र से किसी अपूर्वे अवस्था को ले जायी जाती है । ( अपूर्वतया वर्णित की जाती है ) ॥३८॥

(यहाँ भी कुन्तक ध्वनिकार से ही तत्व ग्रहण करते है । ध्वनिकार आनन्द ने भी कहा है—

यद्यापि तदापि रसैः यत्र लोके कश्चिदर्थः-

स्फुरितभिदमिलीय बुद्धिरभ्युपजिहीते ।

अनुगतमपि पूर्ववचछायया वस्तु ताहक्

सुकविवरचनावन्धान्निबन्धता नोपयाति ॥ ध्व०, ४।१६ ।

जहाँ कोई वस्तु अन्य प्रकार की होती हुई भी महाकवि की प्रतिभा के उन्मेष के माहात्म्य से अपनी रीच के अनुसार पूर्णतया अन्य रूप मे ( नवीनतया ) ही प्रस्तुत होती है ॥३९॥

( यहाँ भी ध्वनिकार की उक्ति दृष्टव्य है—

अक्षरादिरचनायोज्यते यत्र वस्तु रचना पुरातनि !

नूतने स्कुरति काव्यवस्तूनि व्यक्तमेव खलु सा न दुष्यति ॥४।१५ )

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प्रतीयमानता यत्र वाक्यार्थेन निबध्यते । वाच्यवाचककद्रुतिभ्यां व्यतिरिक्तस्य कस्यचित् ॥४०॥

स्वभावः सरसाकृतो भावानां यत्र बध्यते । केनापि कमनीयेन वैचित्र्येणोपबृंहितः ॥४१॥

विचित्रो यत्र वक्रोक्तिवैचित्र्यं जीव्यितायते । परिस्फुरति यस्यान्तः सा काव्यतिशयाभिधा ॥४२॥

सैडतिदुःसंचरैर्येन विदग्धकवयो गताः । खड्गधारापथेनैव सुभटानां मनोरथा: ॥४३॥

स विचित्राभिधान् पन्थं कीटको-अतिदुःसंचरं, यत्रातिदुःखेन संचरते । किं बहुना, येन विदग्धकवयः केचिदेव व्युत्पन्नाः केवलं गताः प्रयाता:, तदाश्रयेण काव्यानी चक्रुरित्यर्थः ।

कथम्—खड्गधारापथेनैव सुभटानां मनोरथाः । निस्रिंशधारामार्गेण यथा सुभटानां महावीराणां मनोरथाः ।

शब्द और अर्थ के व्यापार से व्यतिरिक्त जहाँ किसी अनिर्वचनीय वाक्यार्थ को प्रतीयमानता ही निवद्ध की जाती है ॥४०॥ ( ध्यान देने की बात है कि वाक्यार्थ की प्रतीयमानता से यह नही समझना चाहिए कि कुन्तक स्वनि-सिद्धान्त को स्वीकार करते है । उनके तात्पर्य अर्थ की सुप्रसिद्धव्याख्यानी से नही प्रत्युत् उसकी व्यङ्ज्यतया प्रतीति मे है ) ।

किसी अपूर्व कमनीयता से युक्त वैचित्र्य से अतिशयित जहाँ भावों का रसवाही अभिप्राय समन्वित स्वभाव निवन्धित किया जाता है ॥४२॥

जहाँ वक्रोक्ति का वैचित्र्य ही प्राण के समान प्रतीत होता है और जिसमे कोई अपूर्व ही यह अतिशय अभिधा परिस्फुरित होती है । तलवार की धार के पथ से चलने वाले महान शूर-वीरो के मनोरथ की भाँति जिस कठिन मार्ग से विदग्ध कवियों ने अपनी यात्रा की है । अतिशय कठिनाई से गमनीय वह मार्ग विचित्र मार्ग कहा जाता है ।

वह विकार अत्यन्तम् कारिका से प्राणम् करते है—मेति से । वह विचित्र नाम का मार्ग कैसा है ?—अतिशय कठिनाई से गमन योग्य, जहाँ अत्यन्त कष्ट से चला जाता है । अधिक कहने से क्या ( लाभ ), जिस मार्ग से विदग्ध कविगण अर्थात् कविपय व्युत्पन्न कवि ही केवल गये है—गमन किये है, उस ( विचित्रमार्ग ) के आश्रय से काव्यो का निर्माण किया है, यह अर्थ है । कैसे ( गये है )—तलवार की धारपथ से सुभटो मनोरथ की भाँति । तलवार की धार के मार्ग से जैसे सुभटो—महावीरों के मनोरथ-संकल्प विशेष ( जाते है ) । तो यहाँ यह अभिप्राय है—औचित्य के अनुसार रुचि का तिरस्कार किये बिना तलवार की धार के मार्ग पर चलने मे प्रवर्तमान मनोरथो की स्वल्पमात्र भी मलिनता ( हानि ) सम्भव नही है । साक्षात् युद्ध की भीड़-भाड़ मे आचरण करने पर तो फिर कदाचित् कुछ मलानता भी सम्भावित हो

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प्रथमोऽमेशः ]

सकलपविशेषाः । तदयमत्राभिप्रायः यदसिध्दारमार्गेगमने मनोरथानामौ- चित्यादुमारण यथारुचि प्रवर्तिमानानां मनाइ्सात्रमपि म्लानता न संभाव्यते ।

साक्षात्समारसद्र्समाचरणे पुनः कदाचित् किमपि म्लानत्वमपि संभाव्येत । तदनेन मार्गेस्य दुर्गेमत्वं तत्प्रस्थितानां च विहरणप्रौढिः प्रतिपाद्यते । कीटकरू स

मार्गः-यत्र यस्मिन् शब्दाभिधेयोरमिधानाभिधीयमानयोर्न्तः स्वरुपानु- प्रवेशिनी वक्रता भणितविच्छित्तिः सुरततीव प्रसन्नद्मानव विभाव्यते

लक्ष्यते। कदा--प्रतिभाप्रथमोदे्दससमये । प्रतिभाया: कविशक्तेरमौल्लेख- खावसरे । तदयमत्र परमार्थः—यत् कविप्रयत्न-निरपेक्ष्योरेव शब्दार्थयोः

स्वाभाविकः कोडपि वक्त्राप्रकारः परिस्फुरन परिदृश्यते । यथा— कोडयं भाति प्रकारस्तव पवन पदां लोकपादाहतीनां

तेनस्वित्रात्रसे णे नभसि नयसि यत्पांखुपूर्ण प्रतित्राम्। यस्मिश्रुत्याप्यमाने जनतयजनपथोद्रवस्तावदास्तां

केनोपायेन सह्यो वपुषि कलुषतादोष एष त्वयैव ॥८९॥

सकती है । इसलिए इस उदाहरण से ( विचित्र ) मार्ग की दुर्गमता और उस पर चलने वालों--रामत करने वालों--की श्रमन परिपक्वता प्रतिपादित होती है । और कैसा है वह मार्ग ?--जहाँ जिस मार्ग में, शब्द और अर्थ--अभिधान एवं अभिधीय- मान के मध्य--स्वरुप में अनुप्रवेश करने वाली, वक्रोक्ति--कथन की शोभा, स्फुरित

होती हुई सी--प्रवाहित होती हुई सी विभावित होती है--लक्षित होती है । कब ?— प्रतिभा के प्रथम उद्भेद के समय । प्रतिभा--कविशक्ति के प्रथम उल्ले ख के अवसर

पर । इसलिए यहाँ वास्त व रूप यह हुआ--कि, कवि से प्रयत्न से निरपेक्ष ( आहा र्य व्युत्पत्ति की अपेक्षा बिना स्वाभाविक कविशक्ति समुत्सल्सित ) ही शब्द और अर्थ का

स्वाभाविक अपूर्व ही कोई वक्रता प्रकार जहाँ सर्वत्रः प्रवाहित होता हुआ परिदृष्टि होता है ( वह है विचित्र मार्ग ) । जैसे--सुभाषितावली का श्लोक है । वायु को

लेकर अप्रस्तुत प्र ांसा ( अन्योक्ति मय ) कथन है--हे पवन, तुम्हारा यह कौन-सा तरिका है कि जो लोगो के पाद-ग्रहो के साथ भासितगाथ को तेजस्वित्रसर्ग ( सूर्य आदि

ग्राहो ) से सेवन्त्रीय आकाश मे प्रतिष्ठा प्रदान करते है ( दुष्टो को भी सद्गति देने वाले ! तुम्हारी यह कौन सी ईषा है कि उपेक्षा के पात्र व्यक्ति को भी सिर पर चढ़ा

देते हैं ) । जिसके ऊपर उठाये जाने से लोगो के नेत्रपथ मे होने वाले उपद्रव तो रहे ( जिस वयक्ति को ऊपर उठाया जाना लोग देख नही पाते उनकी ऑंखो को भी कष्ट

होता है फिर भी यदि उसकी बात छोड भी दी जाय तो ), ( जिसको उठाने से लगा हुआ ) तुम्हारे शरीर मे जो यह कलुषतरूप दोप है, तुम्हारे ही द्वारा वह कैसे सहा

जाता है । ( ऐसे व्यक्ति को ऊपर उठाने से तुम्हारे ऊपर लगा हुआ जो कलड्क है उसे तुम सहन कैसे कर लेते हो ! ) ॥८९॥

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अमाप्रस्तुतप्रशंसात्नक्षणोऽलङ्कारः प्राधान्येन वाक्यार्थे:। प्रतीयमानपदार्थोत्तरत्वेन प्रयुक्तत्वात्तत्र विचित्रकविशक्तिसमुल्लिखितवक्रोपनिबन्धमाहात्म्यात् प्रतीयमानमण्यभिधेयतामिव प्रापितम्। प्रक्रम एव प्रतिभासामानत्वाच्चार्थान्तरप्रतीतिकारित्वेडपि पदनां इलेष्यपदेशः शक्यते कर्तुम्, वाच्यस्य च सम्प्रधानभावेनावस्थानात्। अर्थान्तरप्रतीतिकारित्वं च प्रतीमानार्थस्फुटत्वावभासनार्थमुपनिबध्यमानमतिवचमत्कारकारितां प्रतिपद्यते।

तमेव विचित्रं प्रकरणान्तरेण लक्ष्यतेऽलङ्कारस्येत्यादि। यत्र यस्मिन्नमार्गे कवयो निबन्धनित विचरयन्ति, अलङ्कारस्य विभूषणस्यालं-करणान्तरं विभूषणान्तरम् असन्तुष्ट: सन्तः। कथम्-हारादिमणिबन्धवत्। मुक्ताकलापप्रभृतेयर्थ पदकादिमणिबन्ध रत्नविशेष-विन्यासं वैकटिका:।

यहाँ अप्रस्तुत प्रशंसा रूप अलङ्कार प्रधानत। वाक्यार्थ है। ( अप्रस्तुत वर्णन से प्रस्तुत अर्थ की व्यञ्जना मे अप्रस्तुत प्रशंसा अलङ्कार होता है। यहाँ प्रस्तुत अर्थ है किसी परोपकारी व्यक्ति द्वारा सर्वथा उपेक्षित व्यक्ति का उद्धार कर उसे 'उच्च प्रतिष्ठा प्रदान करना जिसे अप्रस्तुत पवन के वर्णन से व्यञ्जित किया गया है। इस प्रकार यहाँ अप्रस्तुत पवन वृत्ति के वर्णन से ) प्रतीमान अन्य पदार्थ ( परोपकारी व्यक्ति के आचरण ) के रूप मे ( वाक्यार्थ पवन-वर्णन के ) प्रयुक्त होने के कारण विचित्र ( मार्ग मण्डित ) कवि की स्वाभाविक शक्ति से निबन्धत वक्रो शब्द और अर्थ के प्रभाव से प्रतीमान भी ( परोपकारी वर्णन रूप वृत्त ) वाच्यार्थता को प्राप्स-स कर दिया गया है। ( प्रत्तन हो सकता है कि यहाँ अप्रस्तुत प्रशंसा से नहीं, इलेष के माध्यम से द्वितीय अर्थ की प्रतीति हो रही है तो उत्तर है ) यहाँ प्रयुक्त पदो मे दूसरे अर्थ ( उपकारी व्यक्ति ) की प्रतीति कारित रहने पर भी क्योंकि प्रारम्भ मे ही 'पदृते' ही ) ( द्वितीय अर्थ की ) प्रतीति हो जाती है इसलिए इस रचना के पदो मे 'इलेष' का व्यपदेश नही किया जा सकता। क्योंकि इलेष मे दोनो ही अर्थ वाच्य एवं सम्प्रधान होते है किन्तु यहाँ तो प्रतीमान अर्थ ) वाच्यार्थ के सम्प्रधान रूप मे अवस्थित नही है ( प्रत्युत प्रतीमान अर्थ मे चमत्कार अधिक है और इस प्रकार यहाँ पदो की ) अर्थान्तर प्रतीतिकारिता प्रतीमान अर्थ की स्पष्टत: प्रतीति कराने के लिए उपनिबन्धित की गयी है जिससे वह अत्यन्त ही चमत्कारिता को पहुँच गयी है।

उसी विचित्र मार्ग को प्रकरणान्तर से लक्षित करते हैं—अलङ्कारस्य इत्यादि कथन से। जहॉ-जिस मार्ग मे कविगण निवन्धन करते हैं—विचार करते है, अलङ्कार का—विभूषण का ( उपकारी ) दूसरे अलङ्कार—दूसरे विभूषण का ( एक ही अलङ्कार से ) सन्तुष्ट न हो पाने के कारण। कैसे ?—हारादि मे मणियो आदि के विन्यास से, सन्तुष्ट न हो पाने के कारण। कैसे ?-जैसे जौहरी लोग मुक्ताहार आदि लौकिक अलङ्कारो मे पदक आदि मणिबन्ध—रत्न विशेष का विन्यास करते है। जैसे—( यहाँ इलोक वाक्यपदीय की पङ्

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हे हेलाजितबोधिसत्व वचसां किं विस्तरैस्तोयधे नास्ति त्वत्सदृशः परः परहिताधाने गृहीतव्रतः।

तृष्यत्यान्यजनोऽपकारघटनावैमुख्यलब्धायशो-भारोद्धरहने करोषि कृपया साधायकं यन्मरः॥९०॥

अत्रात्यन्तगर्हणीीयचरितं पदार्थान्तरं प्रतীয়मानतया चेतसि निधाय तथाविधविलसितः सखिलनिधिरवोच्यतयोपक्रान्तः। तदेतावदेवालंकृतेःप्रस्तुतप्रशंसाया: स्वरूपम्। गर्हणीीयप्रतীয়मानपदार्थान्तरपर्यवसानमपि वाक्यं [व] स्तुन्युपक्रमरमणीयतयोपनिबध्यमानं तद्रिद्वाह्लादकारितामायाति। तदेवदू

राज की टीका मे २१९ कारिका की व्याख्या मे प्रस्तुत है। वाद मे व काव्यप्रकाश, अलङ्कार सर्वस्व एव काव्यानुशासन मे भी प्रयुक्त किया गया है)--

बोधिसत्व भगवान् बुद्ध को भी अनायास जीत लेने वाले हे जल्निधि समुद्र, ( तुम्हारी प्रशासापरक ) वाणी के विस्तार से क्याऽ (लाभ ?)। परोपकार का व्रत धारण करने वाला तुम्हारे समान (इस जगत् मे ) कोई भी दूसरा व्यक्ति नही है। जो तुम कृपापूर्वक, प्यासे पथिकजनो की (जल प्रदान रूप) उपकार किया से विषु-खता के कारण प्राप्त अपकीर्ति के भार को सम्यक् वहन करने मे मस्स्थल की सहायाता करते है हे ॥९०॥

( यहाँ पर काव्य-प्रकाशकार मम्मट एव अलङ्कार सर्वस्वकृत् रूपक् दोनो मानते है । व्याजस्तुति का लक्षण सर्वस्वकार ने किया है—स्तुति निन्दाभ्या निन्दास्तुत्यो-र्गम्यत्वे व्याजस्तुतिः। कुन्तक के अनुसार यहाँ व्याजस्तुति तो है किन्तु वह अप्रस्तुतप्रशंसा को अलङ्कृत कर रहा है। प्रस्तुत समुद्र-वर्णन से प्रस्तुत ऐसे धनवान् का वृत्त व्यञ्जित-हो रहा है जो भूले-व्यासो की सहायाता नही करता । तो मस्स्थल सुभावतः जल शून्य है, निर्धन के पास वैसे भी धन कहाँ ? किन्तु जो अपार जल ( धन ) राशि से परिपूर्ण हो वही दीन दुखियो की सहायाता न करे तो इससे बढ़कर उसका अपका क्या हो सकता है? इस प्रकार अप्रस्तुत समुद्र-वर्णन से प्रस्तुत धनवान् की प्रतीममानता होने के कारण अप्रस्तुत प्रशंसा है। इसी का आगे की पक्तियो मे विवेचन है ।)

यहाँ पर अत्यन्त निन्दनीय चरित अन्य पदार्थ ( धनवान् ) प्रतीममान अर्थ है। इस प्रतीममान अर्थ को ही चित्त मे रख कर कवि ने उस प्रकार के व्यापार ( प्यासे पथिक को जल प्रदान न करने रूप अयशा भारोद्धर-रूप कार्य से युक्त ) वाले समुद्र को वाच्यार्थ के रूप मे प्रस्तु- किया है। यहाँ पर प्रस्तुत प्रशंसा अलङ्कार का इतना ही स्वरूप है। और वस्तुत वर्णन के प्रारम्भ मे रमणी रूप मे उपनिबध्यमान यह वाक्य ( रचना ) निन्दनीय प्रतीममान दूसरे पदार्थ ( धनवान् की निन्दा ) मे पर्यवसित होता हुवा भी सहृदय-हृदय की आह्लादकारिता को प्राप्त होता है। तो यह ( वाच्यार्थ समुद्र की स्तुति से प्रतीममान धनाल्य की निन्दा की प्रतीति होने के कारण )

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व्याजस्तुतिप्रतिरूपकप्रायमलङ्करणान्तरमप्रस्तुतप्रशंसास्पाया भूषणत्वेनोपात्तम् । न चात्र संकरालङ्कारकविवह्हरो भवितुमर्हति, पृथग्गति परिस्फुटत्वेनावभासनात्। न चापि संसृष्टिसंभवः समप्रधानभावेनावस्थितेः । न च द्वयोरपि वाच्यालङ्कारत्वम्, विभिन्नविषयत्वात् । यथा वा—

नामान्यनंतरोरसि निमीलितमभूतत्ववदुन्मीलितं स्थानेऽवतलः स्ववस्तुनि विशेषेऽपि गृहीतं कर इति । लोकैरचायमर्थश्रदर्शनकृता रगवैशसादुदृधृतो युक्तं काष्ठिक लूनवान् यदैव तामाम्रालिमाकालिकीम् ॥९१॥

व्याजस्तुति रूप दूसरा अलङ्कार अप्रस्तुत प्रशंसा अलङ्कार के अलङ्करण के रूप मे ग्रहण किया गया है ( एक ही वाक्य मे दो अलङ्कारो की अवस्थिति से त्रिविध—एकाश्रया-नुप्रवेश, अज्ञाझि एवं सन्देह रूप सङ्कर तथा संसृष्टि हो सकती है? इस सन्देह को दूर करते है । यहाँ सङ्कर अलङ्कार का व्यवहार नही हो सकता, क्योकि—दोनो ही अलङ्कार यहाँ अलग-अलग एवं अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रतिाभासित हो रहे है (इसलिए न उनमे अज्ञाझि भाव है, न सन्देह और न एकाश्रयानुप्रवेशत्व ) । परस्पर अनपेक्षित रूप मे अवस्थित समप्रधान भावो वाले अलङ्कारो की दशा मे संसृष्टिहोती है, यहाँ वह भी नही है क्योकि दोनो का विषय मिन्न-मिन्न है, इस लिए यहाँ_दोनो ही अलङ्कारो की वाच्यता भी नही है (अप्रस्तुत प्रशंसा व्यग्य है और वाच्य है व्याजस्तुति, इस प्रकार दोनो का विषय भी मिन्न है । उक्त रीति से यहाँ कवि ने अप्रस्तुत प्रशंसा मातृ से सन्तुष्ट न होकर उसकी शोभाहेतु हार्दि मे न्यस्त मानिक्य आदि की भौति व्याज-स्तुति-रूप अन्य अलङ्कार का विनिवेश कर सहृदयहृदयहारिता प्रस्फुट की हैं अतः यहाँ विचित्र मार्ग है ) ।

अथवा जैसेः— रचना भल्लाटशातक की है । यह उदाहरण भी व्याजस्तुति से परिपोषित अप्रस्तुतप्रशंसा का समर्थक है ।)—काष्ठकर्मिक असमय मे ही फलने वाली उस आम्राली को जो तुमने छिन्न कर दिया है वह नडित्री की कन्या ( सन्ध्या ) को अपना हाथ ( सद्गारा ) दिया, यह दूसरा उपकार हुआ । और ( आम्राली जैसी ) पूर्व अदृष्ट वस्तु के दर्शन से होने वाले नेत्र कष्ट से इस संसार का उद्धार कर दिया ( यह तीसरा उपकार हुआ ) ॥९१॥

यहाँ भी आम्राली के उच्च्छेदरूप कार्य की स्तुति रूप वाच्यार्थ से उस प्रकार की असमय मे पक कर फल देनेवाली मधुर वस्तु के विनाश रूप कार्य की निन्दा रूप प्रतियमान अर्थ मे पर्यवसान होने के कारण व्याजस्तुति अलङ्कार है, नो वाच्य है ।

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प्रथमोत्तमेष ]

अत्रायमेव न्यायोऽनुसन्धेयः । यथा वा—

किं तारुण्य तरोरियम् रसमरोदित्त्वा न वा वल्लरी लीला प्रोच्छलितस्य किं लहरिका लावण्यवारांनिधे: । उद्गाढोत्कलिकावतां स्वसमयोपन्यासविध्वंसभञ्जण: किं साक्षादुपदेशयष्टिरथवा देवस्य शृङ्गारिण: ॥९२॥

अत्र रूपक लक्षणं योज्यं वाक्यालङ्कार: तस्य सन्देहान्तरातिशयोत्पादनायोपनिबद्धा चेतनचमत्कारितामावहति । शिष्टं पूर्वोदाहरणद्वयोक्कमनुसृतंलङ्गयम् ।

यह वाच्यालङ्कार व्याज्यमान अप्रस्तुत प्रशंसा का पोषक है । यहाँ अप्रस्तुत का प्रशंसा काव्यिक के आम्राली उच्छेद रूप वाच्य से किसी नृशंस व्यक्ति की प्रतिति हो रही है । जो असमय मे भी लोगो को उदारतया सहायत करता था, जिसकी कीर्ति से औरो का लुकाव हो गया था जिसने कितनो के भाग्य पलट दिये थे और जिसे अपूर्व अदृष्ट होने के कारण देख लोग सन्तुष्ट होते थे उसका नृशंस तूने उच्छेद कर जगत् का महान् उपकार कर दिया । वस्तुत: तो यहाँ 'आकालिकी' पद से इसका सम्बन्ध किसी असमय तारुण्य प्राप्त युवती के वृत्तान्त से प्रतीत होता है ।

नृशंस, निष्ठुर काश्मीर तुमने जो असमय प्राप्त तारुण्य उसको नखादि से क्षत किया अच्छा नही किया, जिसके सौन्दर्य से अन्यो का सौन्दर्य छिप-सा गया था । आदि-आदि । इस तरह वहाँ अप्रस्तुत प्रशंसा व्यक्त हो रही है ।

अथवा जैसे - ( इलोक सुभाषितावली का है । आचार्य रुय्यक ने इसे 'अलङ्कार सर्वस्व' मे शुद्ध सन्देह अलङ्कार के उदाहरण के रूप मे उपन्यासत किया है । किसी रमणी के प्रति प्रेमी की उक्ति है )—यह युवती क्या यौवनवृक्ष की रसाधिक्य से खिली हुई कोई नयी लतिका है? अथवा विलास ( अनायास ही ) के कारण तट से छलके हुए लावण्यसमुद्र का कोई प्रवाह है क्या ? या अतिशय गहरी प्रेम की उत्कण्ठायुक्त प्रेमी जनों के लिए अपने आचार को प्रस्तुत करने मे विश्वास्त शृङ्गार रस के देव काम की साक्षात् उपदेश यष्टिका है ॥९२॥

( यहाँ वाच्य सन्देहालङ्कार से रूपक की प्रतीयमानता स्पष्ट हो रही है । जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है रुय्यक ने इसमें शुद्ध सन्देह अलङ्कार माना है, यहाँ उक्त रचना मे ( नायिका पर वल्लरी, लहरिका एवं उपदेशयष्टि रूप उपमानो का आरोप होने के कारण ) रूपकस्वरूप जो यह वाक्य का अलङ्कार है उसके सौन्दर्यान्तर के अतिशय की वृत्ति के लिए यह सन्देह अलङ्कार वाच्यरूप मे उपनिबद्ध किया गया है, जो सहृदय-हृदय मे चमत्कार का आधान करता है । शेषर सङ्कर- संसृष्टिका निराकरण रूपकार्य, पूर्व के दो उदाहरणो के विषय मे कही गयी बात के अनुसार समझ लेना चाहिए ।

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भूयिष्ठेष्वपि कवित्वं गणनात्यर्थं किमुत्तार्ष्यते तस्योदारमुजोर्म्णोऽन वसिता नाचारसंपत्तया ॥९३॥

अत्राजेमेहोत्सवव्यतिकरतेन तथाविधं रूपणं विहितं यात्रालंकार्यमु “आर्यः स्वशौर्येण युष्मान् सर्वानन्व मारयति” इत्यलंकार शोभातिशयान्तर्गीतत्वेन भ्राजते । तथा च कदाचित्समान्योडपि क्वापि देवस्यपि देशे नामविभक्तो युष्माकमवशिष्यते । तस्मात् समरमहोत्सवसंविभागालंमत्तया प्रातिकं यत् संग्रहमं त्यजति । गणनया वयं भूयिष्ठा इत्यशक्येनातुप्रणतानां यदिमन्यध्वे तदपयुक्तम् । यस्यादसंख्यसंविभागा शक्यता कदाचिदसंपत्या कार्पण्येन वा संभाध्यते । तदेतदहुभयमपि नात्यतीत्युक्तम्—“तस्योदार मुजोर्म्णोडनवसिता नाचारसंपत्तया” इति । यथा च—

कतमः प्रविजृम्भित विरहः शून्यतां नीतो देशः ॥९४॥ इति ।

तुम्हारा कोई महत्व नहीं है ) । इसलिए कयों बहुत उतावले हो रहे हो । उनके उदार भुजाओं की गर्मी की आचार सम्पत्तियों ( प्रयोग विधाएँ ) समास नहीं हुई हैं ( तुम्हारा विनाश करने के लिए उनकी सुजाओं मे पर्याप्त गर्मी वर्त्तमान है ) ।

यहाँ पर युद्ध का महोत्सव से सम्बन्ध प्रतिपादित होने के कारण ( युद्ध पर महोत्सव का आरोप कर ) उस प्रकार का अपूर्व् रूपण किया गया है कि जिसमे अलङ्करणीय वाक्य ‘पूज्य राम अपने पराक्रम से तुम सबको मार डालेंगे’ यह भाव ( रूपक ) अलङ्कार की रमणीयतातिशय के अन्तर्गत होने के कारण शोभायुक्त हो गया है, दीप्यमान है । ( और वह अलङ्कार्य रूप वाक्य ऐेसे हो सकता है ) तुममे से कोईँ सामान्य भी व्यक्ति कहीं किसी दूर प्रदेश में भी असविभक्त ( विभाग पाये बिना, अकान्तं ) नही बचेगा । इसलिए समर रूप महोत्सव मे प्राप्त होने वाले अपने भाग की लालसा के कारण ( क्योंकि आप सबकी बल लालसा पूर्ण हो जायगी अतः ) तुममे से प्रत्येक घबराहट को छोड़ दो । यदि यह मानते हो कि संख्या मे हम बहुत हैं इसलिए ( प्रत्येक भाग प्रदान रूप कार्य का ) अनुष्ठान होना असंभव है, तो यह सोचना भी ठीक नही है । कयोंकि असंख्य लोगो को भाग देने की अचाक्यता कदा-चित् संपत्ति के अभाव से अथवा कृपणता से ही संभव हो सकती है । किन्तु यह दोनों ही श्रीरामचन्द्रजी मे नही है । इसीलिए कहा है—“उदार बाहु की ऊमा से युक्त

अथवा जैसे अन्य उदाहरण— ( नीचे के दोनोँ उदाहरण ‘हर्षचरित’ से लिये गये हैं । दोनोँ मे ही सावित्र्री दधीची के विषय मे उनके सेवक विकुक्षि से पूछ रही है )— ‘अत्यन्त् प्रबुद्ध विरह कौँ व्यथा से युक्त किस देश को ( अपने आगमन से ) शून्य कर दिया है ॥९४॥

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[वक्रोक्तिजीवितम्

यथा च—

कानि च पुण्यभाज्जि भजन्यमिल्यामक्षराणि ॥१९५॥ इति ।

अत्र ‘कस्मादागताःस्थ’, ‘किंवास्य नाम’ इत्यलङ्कार्येमप्रस्तुतप्रशंसा लक्षण-लड्घारच्छायाच्छुरित त्वेनैतदীয় शोभान्तर्गतत्वे ना सहृदय-हृदयाह्लादकारितां प्राप्तितम् । एतच्च व्याजस्तुतिप्रयोक्तृप्रशस्तीनां भोक्त्रैषा विभाव्यते । ननु रूपकादीनां स्वलक्षणावसर एव स्वरूपं निर्णय्यते तत्किम्र्रयोक्तृषामिहोदाहर-णस्य ? सत्यमेतत्, किन्त्वे तदेव विचित्रस्य वैचित्र्यं नाम यदलौकिककेच्छाया-तिशय योगित्वेन भूषणोपनिबन्धः कामपि वाक्यवक्रतामुप्मीलयति ।

विचित्रमेव रूपान्तरेण लक्ष्ययति—यदपि त्यादि । यदपि वस्तु वाच्यम्-नूतनोल्लेखमनिबन्धनेनोल्लेखवितं तदपि यत्न यस्मिन्नलं कामपि काष्ठां नीयते लोकोत्तरातिशयकोटि मधिरोप्यते ।

कथम्—उक्तिवैचित्र्यमात्रेण, भणिति वैदग्ध्येनैवेत्यर्थः ।

यथा—

अथवा जैसे—‘कौन से पुण्यशाली अक्षर आपकी अभिधेयता ( नाम ) का सेवन करते है ?’ ॥१९५॥

यहाँ ( उपर्युक्त दोनो उदाहरणो मे क्रमशः ) ‘कहोँ आये है’ और ‘इस ( युवा ) का नाम क्या है ?’ इस प्रकार का अलङ्कार्य, अप्रस्तुत प्रशंसा रूप अलङ्कार (अप्रस्तुत-देश की विरह-व्यथा रूप वर्णन एवं अक्षरो का नाम सेवन रूप वर्णन से प्रस्तुत, ‘किस देश से आये है’, ‘नाम क्या है ?’ की प्रतीति होने के कारण दोनो मे अप्रस्तुत प्रशंसा अलङ्कार है ) के सौन्दर्य से व्याप्त होने के कारण, इस अलङ्कार की शोभा के अन्तर्गत होने से सहृदय की हृदयाह्लादिता को प्राप्त करा दिया गया है । और यह वैचित्र्य (अलङ्कार की अपनी छाया के अन्तर्गत प्राजमान वस्तु रूप स्वभाव या अलङ्कार कार्य का अवस्थान) व्याजस्तुति, पर्योक्त आदि अलङ्कारो मे विशेषकर प्रतीत होता है ।

(प्रश्न हो सकता है कि) स्पक आदि अलङ्कारो का स्वरूप निर्णय उनके लक्षण करने के समय आगे किया ही जाने वाला है जो फिर इनके यहाँ उदाहरण प्रस्तुत करने के क्या उदेश्य है ? (उत्तर है)—सत्य है ( कि इनके स्वरूप विवेचन के समय इनका लक्षणोदाहरण दिया जायगा ), किन्तु विचित्र मार्ग की तो यही विचित्रता है कि अलौकिक शोभा के अतिशय का सम्पादक होने के कारण ( विचित्र मार्ग मे ) ( रूपक आदि ) भूषण का उपनिबन्ध किसी अपूर्वे ही वाक्यवक्रता को जन्म देता ( तदर्थ ही यहाँ रूपक आदि अलङ्कारो के उदाहरण प्रस्तुत किये गये है ) ।

विचित्र ( मार्ग ) को ही दूसरे रूप मे लक्षित करते है—यदपीयादि से । जो भी वस्तु अर्थात् वाच्य, नवीन कथन न होने पर भी—अभिनव रूप मे वर्णित न हो, वह भी जहाँ जिस ( मार्ग ), मे अलम्—किसी अनिर्वचनीय सीमार्को पहुॅंचायी जाती है अर्थात् अलौकिक अतिशय की पराकाष्ठा पर विराजित होती है ( वहॉ भी विचित्र मार्ग पाया जाता है ) कैसे ?—कथन की सुन्दरता मात्र से । अर्थात् भणिति की

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अण्णं लडहत्तणाणं अण्णंछि अ काइवत्तणच्छाया ।

सामा सामण्ण प आवइणो रेहइ्चि अण होइ ।९६।

( अन्यललट भत्सन्थैव कापि वतर्तनच्छाया ।

इयामा सामान्यप्रजापते रेखैव न भवति ॥ इति च्छाया )

यथा वा—

उहे षो डयं सरसकवितली श्रेणी षोस्फातिशयारी

कुञ्जोत्तर्षाडुरित हरिणी विभ्रमो नर्मदाया: ।

किण्वैतस्मिन्सुरतसुहृदस्तन्वि ते वान्ति वाताः

येऽसामग्रे सरित कलितकाकण्डकोपो मनोभूः ।९७॥

भणितिवै चिच्यमात्रमेवात्र काव्यार्थः; न तु नूतनोल्लेखशालि वाच्य-

विजृम्भितम्। एतच्च भणिते वैचिच्र्यं सहस्रप्रकारं संभवतीति स्वयमेवोत्रेक्षणीयम् ।

पुनर्विच्चित्रमेव प्रकारान्तरेण लक्ष्ययति—यत्रान्यथेत्यादि। यत्र यस्मिन्न्-

न्यथा भवदन्येन प्रकारेण सत्त् सर्वमेव पदार्थजातम् अन्यथैव प्रकारान्तरेणैव

विनिर्म्रतता से हि ( ऐसा हो पाता है ) । जैसे—यह गाथा प्राकृति रचना 'गाहासत्तमई'

की है। सम्भवतः, र्थ्यक ने इसे अतियोक्कि अलङ्कार के उदाहरण मे प्रस्तुत किया है।

किसी युवती का वर्णन है—

'खु कु मारता कुछ और ही', शरीर की कान्ति कुछ अपूर्व ही है (इस प्रकार) वह

स्यामा (पौड्रशी युवती) साधारण प्रजापति का सृष्टि ही नही है ।९६।

अथवा जैसे—(काव्य प्रकाशकार ने 'काव्यप्रकाश' के तृतीय उल्लास में वाच्य

व्यञ्जकता के उदा.हरण के रूप में इस श्लोक को प्रस्तुत किया है ? सम्भोग चाहने वाले

कामुक की नायिका के प्रति उक्ति है—कुसुमाञ्छः स्निग्ध कदली वनो की शोभा से

अतिशय मनोरम एवं स्त्रिग्धो की पुष्पादि समृद्धि से न रहने पर भी विलासिनी वनिताओं

मे हाव-भाव आदि विभ्रम पेदा करने वाला यह नर्मदा का उन्नत प्रदेश है। और

यहाँ रति के सुलभुने: प्रवर्त्तक ने हृदयाँ वहती है जिनके स्याये मनोभाव काम अनुर

भी कोपयुक्त होकर विचरण करने लगता है ॥९७॥

उक्त दोनो उदाहरणो मे वर्णन की विच्चितत्रता (सौन्दर्यं) मात्र ही वाक्यार्थ है

( काव्यार्थ है ) न कि नवीन वर्णन से सुन्दर अर्थ का विजृम्भण । और यह भणिति

वैचिच्र्य हजारी प्रकार का हो सकता है। इसलिये विद्वानो को उसे स्वयं जान लेना

चाहिए (कहाँ तक उनका उल्लेख किया जाय ।)

विच्चित्र मार्गों को ही पुन अन्य प्रकार से लक्षित करते हैं—यच्चान्यथेत्यादि से ।

जहाँ—जिस ( मार्ग ) मे, अन्य प्रकार का होता है हुआ—अन्य प्रकार से विदग्धमान

सभी पदार्थ समूह, यथा रुचि । (कवि के ) अपने प्रतिभास के अनुसार उत्पन्न होता

है । किसके द्वारा ?—महाकवि की प्रतिभा के उल्लेख के महत्व से—कवि की अनु-

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भाव्यते। कथञ्च—यथारुचि। स्वप्रतिभातुरुपेणोत्पद्यते। के न—प्रतिभोलेक्षण-

महत्त्वेन महाकवेः, प्रतिभासौन्दर्यप्रातिशयत्वेन कवेः। यत्किल वर्ण्येमानस्य

वस्तुनः प्रस्तुतसमुचितं किमपि सहृदयहृदयहारि रूपान्तरं निर्मिमीते कविः।

यथा—

तापः स्वात्मनि संश्रितद्युमत्ताशेषोदध्यगैर्वर्जनं

सकलं दुःशमया तृषा तव मरो कोड्सावनर्थो न यः।

एकोऽप्यस्तु महानयं जलधिव्यामिश्रयौदार्ज्जेनः

संहन्ति न यत्क्षोपकृतये धाराधराः प्राह्रुता: ॥९८॥

यथा वा—किञ्चित् यदि नो कञ्चित्कालं किलामुनिधिं विधेः

कृतिपु सकला स्वेको लोके प्रकाशकतां गतः।

कथामितरथा धात्रा तमांसि निशाकरं

स्फुरदिदमियान्ताराचकं प्रकाशयति स्मुटम् ॥९९॥

अत्र जगद्गर्हितस्यापि मरोः कवि प्रतिभोलीलावितेन लोकोत्तरोदार्य धुरा-

धिरोपणेन ताक्क स्वरूपान्तरमुन्मीलितं यत्प्रतीयमानत्वेनोदाहर चरितस्य

कस्यापि सत्स्वप्नु चित परिस्पन्दसुन्दरेषु पदार्थे सहृदये तदेव व्यक्तदेशपात्र-

भूति के उन्मेप के अतिशयत्व से। भाव यह कि, वर्ण्यमान वस्तु का प्रकरणानुरूप कुछ

अपूर्व ही सहृदयहृदयहारि दूसरा रूप कविजन निर्मित करते है। जैसे—( श्लोक

सुभाषितावली का है)। अप्रस्तुत प्रशंसा अलङ्कार के माध्यम से मरुस्थल का वर्णन करते

हुए स्वाभिमानी निर्झर को प्रस्तुत किया गया है।—अपने ही अन्दर सन्ताप, आश्रित

वृक्ष लताओ का सूखना, पथिक-जनो द्वारा परित्याग, कष्ट से शान्त की जाने वाली

प्यास से तुम्हारी मित्रता ( इस प्रकार ) हे मरु ! वह कौन-सा अनर्थ है जो तुम्हे नही

है ( सभी अनर्थ विद्वमान है ) किन्तु तुम्हारा एक ही महान अर्थ ( गुण ) है कि

जल के लेशमात्र की स्वामिता के अहंकार से गर्जने वाले प्राक्त मेघ तुम्हारे उपकार के

तत्पर नही होते ॥९८॥

अथवा जैसे दूसरा उदाहरण—वह्यता को समस्त रचनाओं में आदित्तीय एवं जगत्

मे प्रकाशता (प्रसिद्धि) को प्राप्त ( सूर्य ) यदि कुछ समय के लिए समुद्र मे प्रवेश

न करे तो तेज वो धारण करने वाला ( वह सूर्य ) अन्धकार, चन्द्रमाऔर दीप्यमान

इतने नक्षत्र-मण्डल को अन्यथा कैसे सस्पष्टया प्रकाशित कर पाये ॥९९॥

( यहाँ भी अप्रस्तुत सूर्यास्त से लोकोत्तर व्यक्ति का जगत की सेवा-हेतु विश्राम

करना व्यक्त हो रहा है, अतः अप्रस्तुत प्रशंसा है।

यहाँ ( प्रथम श्लोको मे ) संसार मे निन्दित भी मरुस्थल का कवि की प्रतिभा

से उल्लिखित, अलौकिक औदार्य की चरम सीमा पर अधिरोपण द्वारा कवि ने उस

प्रकार दूसरा स्वरूप उन्मीलित किया है जो प्रतीयमान होने के' कारण ( उत्त द्लोक

मे अप्सृत प्रशंसा अलङ्कार है। अप्रस्तुत वाच्य मुरू से प्रस्तुत किसी सत्पुरुष की

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तामहैतीति तापयेम्। अवयवार्थस्तु-‘दुःशमयेतिं ‘तृड्’-विशेषणेन प्रतीयमानस्य त्रैलोक्यराज्येनाप्यपरितोषः पर्यवस्यति। अध्वगौर्वर्जनमिल्यौदार्येऽपि तस्य समुचितं संविमागसंभवादर्थिमिळीभूज्ज्जमानैरपि स्वयमेवाभिसरणं प्रतीयते। संश्रित द्रुमलताशोष इति तदाश्रितानां तथाविधेऽपि संकटे तदेकनिष्ठताप्रतिपत्तिः। तस्य च पूर्वोक्तस्वपरिकर परितोषाक्षमतया तापः स्वात्मनि न भोग लवलेलनेति प्रतिपत्त्यते। उत्तरार्धेन-तादृशे दुर्विलसितेऽपि परोपकार विषयत्वेनैवाघासपदत्वमुन्रॉलीतम्।

अपरत्रापि विधिविधिता समुचितसमयसंभवं सलिलनिधिमजनं निजोद्रयनकृतानिखिलस्वपरपक्षः प्रजापतिप्रणीतसकलपदार्थप्रकाशन व्रताम्युपगमनिरवद्यनाय विस्वान् स्वयमेव समाचरतित्यान्यथा कदाचिदपि शशाङ्क

प्रतीति होने से यहाँ यह अलङ्कार योजना बनाती है कि जो व्यक्ति अपने सन्ताप को मन मे छिपाये रहता है, आश्रित नर-नारियों को सब कुछ निछावर कर स्वयं निस्व हो गया है, दूर तक हाँकने वालो से जिसकी निर्भती नही। कभी भी शान्त न होने वाली प्रेम अथवा ज्ञान की विपासा से युक्त सभी कुछ तो उसके लिये कष्ट का विपय (मुख का कारण) है, किन्तु सबसे बडा कष्ट तो उसे यह होता है कि ज्ञान के लेशमात्र से फूले हुये कुछ मूल छोटे-बडे प्रदत्तों मे भी उसे कमी नही आते) उदारचित्त किसी भी व्यक्ति के लिये, समुचित स्वभाव से सुन्दर अनेक पदार्थों के रहते भी, वह मरु ही अभिमान पात्रता के योग्य है। यह इसका तात्पर्य है।

इसका अवयवभूत प्रतीयमान अर्थ तो इस प्रकार है—‘दु शम इस तृष्णा के विशेषण से प्रतीयमान (व्यक्ति) को त्रैलोक्य की राज्य प्राप्ति से भी परितोष नही है, इसमें पर्यवसित होता है। ‘पथिक जनो से परित्याग’ इस कथन से उदारता विद्वमान रहने पर भी उसका विधिवत् विभाग न हो पाने के कारण रुणित होते हुये भी याचको का उसके पास स्वयं आगमन प्रतीत होता है। ‘आश्रित वृक्ष एवं लताओं के शोष’ से उसके आश्रित लोगो का उस प्रकार की विपत्ति मे भी एकमात्र उसी मे निष्ठाभाव की प्रतीति होती है। उसके अपने हृदय मे होने वाला सन्तापपूर्वक अपने आश्रितादिजन-समूहों को परितुष्ट करने मे असमर्थ होने के कारण है न कि भोग के लेशमात्रा के लौत्य के कारण (यह ताप स्वात्मनि) आदि से प्रतिपत्र होता है। और उत्तरार्ध

‘एकोऽर्थस्तु’ इत्यादि से वैसी दुरवस्था मे भी उसकी परोपकारिता व्यक्त होने के कारण वही प्रदर्शा का पात्र है, यह परिस्कृत किया गया है।

अन्यत्र (दूसरे उदाहरण मे) भी विधाता से किये गये समुचित समय पर होने वाले जलनिधि मे (सूर्य के) डुबने की बात को (कुछ अन्य प्रकार से ही व्यक्त किया गया है कि) विधात से निर्मित जगत् के समग्र पदार्थों को प्रकाशित करने रूप अझीकृत व्रत पालन कै निर्वाह के लिये सूर्य अपने उदय से समस्त स्वपक्ष एवं परपक्ष को तिरस्कृत कर अपने ही (समुद्र मज्नन कार्य का) आचरण करता है, अन्यथा

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तमस्तारादीनामभिव्यक्तिर्मनागापि न संभावतीति केवना नूतनत्वेन यदुल्लिखितं तदतीवप्रतीममानमहृव्यक्तिपरत्वेन चमत्कारकारिताभापद्यते ।

विचित्रमेव प्रकरणान्तरेपोन्तीलयति-प्रतीममानतetyādi । यत्र यस्मिन् प्रतीममानता गम्यमानता काव्यार्थस्य मुख्यतया विवक्षितस्य वस्तुनः कस्मैचिदन्वयेयस्य निवन्ध्यते ते । कया युक्त्या—वाच्य या चकृवृत्तिभ्यां शब्दार्थशक्तिभ्यां, व्यतिरिक्तस्य तदतीरिक्त वृत्तेरन्वयस्य व्यंग्यभूतस्याभिव्यक्तिः क्रियते ।

‘वृत्ति-‘शब्दोत्र शब्दार्थयोस्तत्प्रकाशन सामर्थ्येऽसिद्धत्ते । एष च ‘प्रतीममान-‘व्यवहारो वाक्यवक्रता व्याख्यानावसरे सुत्रां समुन्मीलयते । अनन्तरोक्तमुदाहरणद्रयमत्र योजनीयम्। यथा वा—

वक्रोन्दोर्न हरन्ति वाष्पपयसां धारामरोहां श्रियम् निश्वासा न कदर्थयन्ति मधुरां बिम्बाधरस्य धुतिम् ।

चन्द्रमा, अन्थकार एवं तारागणो आदि को स्वल्पमात्र की कभी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती, इस प्रकार कवि ने जो नवीनतया बात कही है, वह अत्यन्त प्रतीमान महत्वपूर्ण व्यक्तिपरक होने के कारण सौन्दर्योत्पादकत्व को प्राप्त हो गया है ।

( सर्वान्तविशायी महिमामण्डित व्यक्ति यदि स्वयं मार्ग से हटकर औरों को अवसर प्रदान न करे तो अन्य लोगो की अभिवृद्धि सम्भव ही नहीं ।

इस प्रकार ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति की महत्ता यहाँ सूर्य के वृत्त से व्यक्त होती है ) ।

विचित्र ( मार्ग को ही ) अन्य प्रकार से प्रकाशित करते है—‘प्रतीममानता’ इत्यादि ( ४०वीं कारिका ) से । जहाँ जिस ( मार्ग ) मे, काव्यार्थ का—प्राधान्यतया प्रतिपाद्य किसी ( वाच्य रूप मे ) अनाख्येय पदार्थ की प्रतीममानता-गम्यमानता निबन्धित की जाती है ( उसे भी विचित्र मार्ग कहते है ) ।

किस युक्ति से ( प्रतिपादन किया जाता है ) ?—वाच्य और वाचक वृत्तियों से—शब्द और अर्थ की शक्तियो से, व्यतिरिक्त—उन ( शब्दार्थ की अभिधा शक्ति ) से अतिरिक्त अन्य वृत्ति ( व्यञ्जना ) के द्वारा व्यंग्यभूत अर्थ की जाती है ।

यहाँ इस कारिका मे आया ‘वृत्ति’ शब्द और अर्थ की ( व्यञ्जना के द्वारा ) उनके प्रकाशन की सामर्थ्य को व्यक्त करता है ।

और यह प्रतीमान ( अर्थ ) का व्यवहार वाक्यवक्रता के व्याख्यान के समय विधिवत् प्रकाशित किया जायगा ।

इस कारिका मे प्रोक्त मार्ग लक्षण के उदाहरण ) मे इसके पूर्व कहे गये दोनो उदाहरणो—‘ताप- स्वातन्न्य’ आदि ‘एवं ‘विशातियदि’ आदि—को योजित करना चाहिए ।

अथवा जैसे ( तीसरा भी उदाहारण )—‘कवीनद्र वचनामृतम्’ एवं ‘सदुक्तिकर्णामृतम्’ मे यह श्लोक आया है ।

नायिका की इसी नायक से उसकी विरहावस्था का वर्णन कर रही है )—

‘उस तन्वङ्गी के चन्द्रमुख की रमणीय शोभा को ( तुम्हारे वियोग मे निरन्तर ) बहती ऑसुओं की धाराएँ बिलीन नही कर पाती और उच्च्छवास मरुत् उसके बिम्बाफल जैसे होठो की हृदय कान्ति को मलिन नही कर पाते ।

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तस्यास्तवद्विरहे विपक्वलवलीलावण्य संवादिनि

च्छाया कापि कपोऌयो रतुदिनं तनुध्याः परं पुष्यति ॥१००॥

अत्र त्वद्विरह वैचुर्यसंवरण कदर्थनमनुभवन्त्यास्तस्यास्तथाविधे महाति

गुरुसङ्ढे वर्त्मानायाः—किं बहुना—वाष्प निर्ह्वासमोक्षावसरौडपि न

संभवन्ति । केवलं परिगत लवलीलावण्यसंवादसुभगा कापि कपोऌयोः

कान्तिरक्षणसंवरेणा प्रतिदिन 'पर' परिपोषमासादयति इति वाच्यवृत्ति-

रित्त्वान्निदूतीयक्तितात्पर्ये प्रतीयते । उक्त प्रकार कान्तिमत्वकथनं च कान्ति-

कौतुकोक्तलिक कारणतां प्रतिपद्यते ।

विचित्रमेव स्वरूपान्तरेण प्रतिपादयति—स्वभाव इत्यादि । यत्र यस्मिन्

भावानां स्वभावः स्वपरिस्पन्दः सरसाकूतो रसनिभ्रेराभिप्रायः पदाथौन निव-

ध्यते निवेद्यते । कीदृशः—'केनापि कमनीयेन वैचित्र्येणोपपद्वृंहितः:' लोको-

तरेण हृदयहारीण वैदग्ध्येनोत्तेजितः । 'भाव' शब्देनात्र सर्वपदार्थोऽभिधीयते,

न रत्यादिरेव ।

उसके कपोलो पर निरन्तर पकी हुई लवलली लता ( की पीली ) कान्ति के समान कोई

अपूर्व ही कान्ति परिपुष्ट होती जा रही है ॥१००॥

यहाँ पर-तुम्हारे विरह की विधुरता को गोपन करने की व्यथा का अनुभव करती

हुई, उस प्रकार के अनिर्वाच्य महान् विशाल सङ्ढट मे वर्तमान उस वेचारी को—

अधिक क्या कहे—आसू गिराने एवं निःश्वास छोड़ने का अवसर भी नहीं मिल पाता ।

केवल परिपक्व लवलली लता के लावण्य के समान सुन्दर कपोलो की कोई अपूर्व ही

कान्ति, जिसे छिपा सकना संभव नही है ( आँसू गिराती नही, निःश्वास छोड़ती नही

कि कही कोई यह जान न ले कि वह तुम्हारे प्रेम से पगी हुई है अतः रुदन और

आहो को छिपाती फिरती है किन्तु कपोलों की कान्ति तो छिपायी नही जा सकती जो

निरन्तर पीली पड़ती जा रही है )—निरन्तर अतिशय परिपोष को प्राप्त हो रही है ।

इस प्रकार वाच्यार्थ से व्यतिरिक्त प्रतीयमान वृत्ति रूप दूती के कथन का तात्पर्य प्रतीत

हो रहा है । और ( दूती के द्वारा नायिका के कपोलो की ) उस प्रकार की ( पीत )

कान्तिमत्ता का प्रतिपादन ( नायिका से मिलने की ) प्रियतम की उत्कण्ठा के आवि-

भाव की कारणता को प्राप्त होता है ।

विचित्र ( मार्ग ) को ही दूसरे स्वरूप से प्रतिपादित करते हैं—स्वभाव इत्यादि

से । जहाँ जिस ( मार्ग ) मे भावों का स्वभाव अपना परिस्पन्द, सरसाकूत-रसनिभ्रेर

से युक्त अभिप्राय पदाथौन का निवद्ध किया जाता है । कैसा ( स्वभाव ) ?—किसी

अपूर्व कमनीय वैचित्र्य से उपचृंहित-लोकोत्तर सहृदयहृदयहारी वैदग्ध्य से उत्कर्षयुक्त

किया गया । भाव शब्द से यहाँ सभी पदार्थों का अभिधान किया गया है, न कि

केवल रति आदि भावौ का ही ( अभिधान किया गया है ) । उदाहरण जैसे—( किसी

रमणी के स्तनोपरि भ्रूवो का वर्णन है ,—अभिनव ( थोड़े-थोड़े ) काम से युक्त

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१२०

उदाहरणम्—

कीडासु 'बाल कुसुमायुधसंगताया यत्तत्स्मितं न खलु तत् स्मितमात्रमेव ।

आलोकयते स्मितपाटलान्तरितां मृगाक्षी—

स्तस्या परिस्फुरदिवापरमेव किचित् ॥१९०॥

अत्र न खलु तत्स्मितमात्र मेवति प्रथमार्थेऽडमिलाभसुभगं सरसाभिप्रायत्वमुक्तम् ।

अपरार्थे तु—हसितां शुकतिरोहितमन्यदेव विम्बपि परिस्फुरेदालोकयत इति कमनीय वैचित्र्यविच्छित्ति: ।

इदानीं विचित्रमेवोपसंहरति--विचित्रो यत्रेत्यादि ।

एवं विधो विचित्रो मार्गो, यत्र यासिन् वक्रोक्तिवैचि(चि)त्र्यम् अलङ्कार विचित्रभावो जीवितायते जीवितवदाचरति ।

वैचित्र्यादेव विचित्रे 'विचित्र:' शब्द: प्रवर्तते ।

तस्मात्तदेव तस्य जीवितम्, किंत्वदैचिच्यं नामेत्याह—परिस्फुरति यस्यान्त: स्वरूपानुप्रवेशेन सा काव्यलौकिकातिशयोकि:

( जिसमें अभी काम का आविर्भाव हो रहा है, तरुणाई ओ हो रही है ) उसे मृग—

नयनी का ( रति आदि ) क्रोडाओ मे जो वहाँ स्थित था वह स्थित मात्र ही नहीं था

प्रत्युत स्थित रूप वस्तु से ढँका हुआ कोई अपर ही पदार्थ परिस्फुरित होता हुआ प्रतीत

हो रहा था ॥१९०॥

यहाँ वह केवल स्थितमात्र नहीं था इस पूर्वार्ध के वर्णन से ( उस मृगाक्षी के

संभोग आदि ) अभिलाष से रमणीय सरस अभिप्राय को कहा गया है ।

और उत्तरार्ध भाग से हसित रूपी अंशुक से ढँका हुआ कोई अकथनीय अन्य ही ( रति आदि रूप

भाव ) अभिलाष परिस्फुरित होता हुआ दिखाई पड़ता था, इस प्रकार कमनीय

कान्ति का निर्माण किया है ।

अब विचित्र ( मार्ग का ) ही (४३वीं कारिका से ) उपसंहार करते है—

विचित्रो यत्रेत्यादि से ।

इस प्रकार का ( ३४वीं कारिका से लेकर ४१वीं तक प्रति—

पादित विधि से युक्त ) वैचित्र्य मार्ग होता है ।

यत्र जिस मार्ग मे वक्रोक्ति का वैचित्र्य-अलङ्कार का विचित्रभाव, जीवितामित होता है—प्राण के समान आचरण

करता है ( अलङ्कारादि विषयक ) विचित्र भाव के कारण विचित्र मार्ग मे 'विचित्र'

शब्द का प्रवर्त्तन होता है ।

इसलिए वही ( विचित्र भाव-अलङ्कार का वैचित्र्य ) उस

( विचित्र मार्ग ) का प्राण है ।

वह वैचित्र्य है क्या ?—कहते हैं, जिसके अन्तर्गत

वह कोई अपूर्व ही अतिशय अभिषा परिस्फुरित होती है— जिसके अन्तर्गत स्वरूप के

अनुप्रवेश द्वारा वह कोई अपूर्व ही अलौकिक अतिशयोक्ति परिस्फुरित होती है—

शोभायमान होती है । जैसे—बालरामायण ( ७।६५ ) का श्लोक है—

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यत्सेनारजसामुद्भ्रति चयेद्राम्यां दवीयोडन्तरान् पणिभ्यां युगपद्विलोचनपुटाननाश्राक्ष्मो रक्षितुम्। एकैकं दलमुत्क्रम्य गम्यनं वासाम्बुजं कोशतां धाता संवररणा कुलरिचरमभूत् स्वाध्यायवद्वानन ॥१०२॥

एवं वैचित्र्यं संभवन्तु मान प्रथुक्तया: प्रतीममानत्वसुत्रेक्षया: । तच्च वदेतां वैचित्र्यं छायालवै तस्माच्च गुणागुणम् स्वध्यवष्ट—वैदग्ध्यस्पन्दि माधुर्यं पदामात्र बध्यते । याति यत्कत्कथैतिल्यं वन्धबन्धुरताझिताम् ॥४४॥

अत्रास्मिन् माधुर्यं वैदग्ध्यस्पन्दि वैचित्र्य समर्पकं पदातां बध्यते वाक्यैक देशानां निवेशयते । यत्कत्कथौथिल्यमुज्ज्वित कोमलभावं भवद्रूनन्धबन्धुरताझतां याति सन्निवेश सौन्द्योपरकरणतां गच्छति । यथा—

( प्रयोग के समय ) जिसकी सेना से ( समुत्थित ) धूलिसमूह के ऊपर की ओर उठने पर, स्वाध्याय मे लगे हुए मुखो वाले ब्रह्माजी अत्यन्त दूर अन्तर पर अवस्थित अपने आठों नेत्रपुटो की एक साथ दोनो हाथों से रक्षा करते मे असमर्थ होकर अपने निवासास्पद कमल को, उसकी एक एक पंखडियों को ऊपर की ओर उठाकर कलिका का रूप प्रदान करते हुए बहुत देर तक उसे वन्द करने मे व्यस्त रहे ॥१०२॥

( अपने ऑंखो की रक्षा मे असमर्थ विधाता मानो अपने आवासभूत कमलो को बन्द करने मे व्यस्त हो गये इस प्रकार यहाँ ) संभावना के अनुमान से प्रवृत्त होने वाली प्रतीमान उपेक्षा का ( इवादिक पदाभावे गूढोपेक्षां प्रचक्षते— चन्द्रलोक ) इस प्रकार का सौन्दर्य निवन्ध है । और वह उपेक्षा वैचित्र्य अतिशय उत्कर्ष प्राप्त रमणीय अतिशयोक्ति के स्वभाव का प्रवाहक प्रतीत हो रहा है । ( तो इस प्रकार ३४—४३ कारिका तक वैचित्र्य मार्ग का स्वरूप प्रतिपादित किया गया ) ।

इस प्रकार वैचित्र्य मार्ग की व्याख्या करके उसी के गुणों की विवेचना करते है— इस ( विचित्र मार्ग ) मे पदो का वैदगध्य प्रवाहित करने वाला माधुर्य निबन्धित किया जाता है जो शिथिलता का प्रतिपादन कर रचना की बन्युरता की अज्ञता को प्राप्त करता है ॥४४॥

यहाँ इस ( विचित्र मार्ग ) मे, वैदगध्यस्यन्दी विचित्रता का समर्पक ( माधुर्य गुण ) पदों का निवेश किया जाता है—अर्थात् वाक्य के एकाश का ( वैदगध्य प्रवर्तक माधुर्य ) निविष्ट किया जाता है । जो त्यक्तशौथिल्य—कोमल भाव को छोड़ते हुए वन्ध की बन्युरता की अज्ञता को प्राप्त हो जाता है—सन्निवेश की सुनदरता के उप- करण भाव को प्राप्त कर लेता है । जैसे—

'कि तारुण्यतरोर' इत्यादि उदाहरणार्थ ९२ मे प्रस्तुत श्लोक के पूर्वार्द्ध मे माधुर्य का निवेश है । जो इस प्रकार है—

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‘किं तारुण्य तरोः’ इत्यत्र पूर्वार्द्धे ॥१०३॥

एवं माधुर्येऽभिधाय प्रसादेऽभिधत्ते—

असमास्त पदन्यासः प्रसिद्धः कविवर्त्मनि ।

किश्चित्क्षोदः स्फुटान् प्रायः प्रसादोड्यत्र दृश्यते ॥४५॥

असमस्तानां समासरहितानां पदनां न्यासो निबन्धः कविवर्त्मनि विपश्चिन्मार्गे यत्र प्रसिद्धः प्रख्यात । सोऽन्यस्मिन् विचित्रार्ह्ये प्रसादभिधानो गुणः किंचित् क्रियन्त्रामात्र ओजः स्फुटान्, उत्तानतया व्यवस्थितः प्रायो दृश्यते प्राचुर्येणलक्ष्यते । वन्धसौन्दर्ये निबन्धनत्वात् तथाविधस्यौजस समासवती वृत्तिः ‘ओजः’ शब्देन चिरन्तनैरुच्यते । तदयमत्र परामर्शः—पूर्वस्मिन् प्रसाद-

लक्षणे सति ओजः स्फुरामात्रमिह विधीयते । यथा—

अपाङ्गततारकाः स्तिमितपक्ष्मपालीभृतः

स्फुरत्सुबग कान्त्यः स्मित समुज्ज्वलितोत्क्षता ।

कि तारुण्यतरोरियं रसभरेऽद्रिन्ना नवा वल्लरी

लीलाप्रोच्‌छलितस्य कि लहरिका लावण्यवारानिधे ॥१०३॥

यहॉं प्रत्येक पदो मे प्रायः माधुर्य व्यञ्जक सौन्दर्य पाया जाता है ॥४५॥

इस प्रकार माधुर्य का अभिधान कर प्रसाद गुण का विवेचन करते है—

समासरहित पदविन्यास से युक्त, कुछ-कुछ ओज गुण का स्पर्श करता हुआ कविपरम्परा मे प्रसिद्ध प्रायः प्रसाद गुण भी यहाँ ( विचित्र मार्ग मे ) देखा जाता है ॥४५॥

असमस्त—समासरहित पदों का न्यास—निबन्धन, कवियो के मार्गे—विद्वानों की रचना विधि मे जो प्रसिद्ध—प्रख्यात है । वह ( प्रसाद गुण ) भी विचित्र नामक ( मार्ग मे ) प्रसाद नाम का गुण, कुछ-कुछ मात्रा तक, ओज का स्पर्श करता हुआ—प्रौढ़ रूप मे व्यवस्थित हुआ प्रायः देखा जाता है—औचितया लक्ष्यित होता है । रचना के सौन्दर्यं निबन्धन का कारण होने के कारण उस प्रकार के ओज की समास-

युक्त वृत्ति को प्राचीन आचार्यों ने 'ओज' शब्द से कहा है । तो यहाँ इसका वस्तु अर्थ तो यह है कि—इसके पूर्व सुकुमार मार्ग के प्रसाद गुण के विदग्ध मान रहने पर यहाँ ओज का स्पर्श मात्र भी निवन्धित किया जाता है ( तात्पर्य यह है कि सुकुमार मार्ग का ओज का स्पर्श मात्र भी निवन्धित किया जाता है ( तात्पर्य यह है कि सुकुमार मार्ग का

जो प्रसाद गुण है । जैसा कि ३१वीं कारिका मे व्यक्त है--अक्लेदा व्याजिज्ञाताकूतं

झगित्यर्थ सम्प्रणमू । रसवक्रोक्ति विषयं यत्प्रसाद । सकध्यते । इस प्रसाद गुण का जो लक्षण है, विचित्र मार्ग मे भी यह रहता है । अन्तर केवल यह है कि विचित्र मे यह

ओज गुण का भी स्पर्श करता है, ओज से युक्त भी होता है ) । जैसे—( युवति-नारियो के दृष्टि सौन्दर्य का वर्णन है—) प्रियतम पर प्रेरित मदयुक्त सुन्दरी रमणियों

की ऑखे ( कटाक्ष ) जयनशील है ( सर्वांतिशायी है )। जिन्होंने ऑखों की पुतलियों को

नेत्रों के कोर भाग मे पहुँच जाती है, निःचचल पलकों को धो धारण करती हुईँ छिटकती

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विलासभरमन्थरास्तररलकलितैकभुवो जयन्ति रमणेन्दिप्ता: समद् सुन्दरी हृष्टय: ॥१०४॥

प्रसादमेव प्रकारान्तरेण प्रकटयति— गमकान्ति निबध्यन्ते वाक्ये वाक्यान्तराण्यपि । पदानीवात्र कोऽप्येष प्रसादस्यापर: क्रम: ॥४६॥

अत्रास्मिन् विचित्रे यद्वाक्यं पदसमुदायस्ताम्मिन् गमकानि समर्पकाण्य- न्यनि वाक्यान्तराणि निबध्यन्ते निवेशयन्ते । कथम् पदानीव पदवत् , परस्पर- न्वितानित्यर्थ: । एष कोऽप्यपूर्व: प्रसादस्याप्यपर: क्रम: बन्धच्छायापकार: । यथा—

नामाङ्गन्यतर: इति ॥१०५॥

प्रसादमभिधाय लावण्यं लक्ष्यति—

मुस्कान के आविर्भाव से जो चमक उठती है तथा विलासो के अतिशय भार से जो अलसायी रहती है और जिन आँखो की एक भौह चञ्चल कर दी जाती है ॥१०४॥

( ओजगुण सम्पर्क पदसंघटना-वर्ण विन्यास की विच्छित्ति के साथ श्रृङ्गार रस समन्वित होने के कारण यहाँ प्रसाद गुण है ) ।

प्रसाद गुण को ही दूसरे ढंग से कहते हैं—

यहाँ ( विचित्र मार्ग के इस प्रकारान्तर प्रसाद गुण मे ) वाक्य मे पदों की भॉति व्यञ्जक दूसरे वाक्य मे निवद्ध किये जाते है । यह प्रसाद का अनिर्वाच्य कोई दूसरा ही प्रकार है ॥४६॥

यहाँ—इस विचित्र मार्ग मे जो वाक्य होता है—पद समुदाय होता है, उसमें गमक—( व्यञ्जना ) सम्पर्क अन्य दूसरे वाक्य निवद्ध किये जाते है—निवेशित किये जाते हैं । कैसे ?—पदो की भॉति-पद की भॉति एक-दूसरे से आपस मे अन्वित । यह कोई अपूर्व ही प्रसाद गुण का दूसरा क्रम है । जैसे—

नामाङ्गन्यतर: ॥१०५॥ ( यह ९१वीं संख्या के उदाहरण का एक अंश मात्र है । पूर्ण श्लोक इस प्रकार है—

नामाङ्गनयनामीलितममूषिताविदुनिमीलित- प्रस्थाने स्वलतः स्वरत्स्ननि विधेरन्मद्गरहीत` कर: । लोकश्रायमहष्ट दर्शानकहतादरूढरवैशसा हुडृदृतो मुक्तं काञ्चिक लनवान् यदसि ताम्रालिमाकालिकीम् ॥१०५॥

यहाँ आकालिक आपातलिकदम के काष्टिक द्वारा काटे जाने रूप वाक्य मे 'अन्यतर के निमीलितादि' वाक्य पदो की भॉति गमक एव परस्पर अन्वित है । अतः प्रसाद गुण है ) ।

प्रसाद का व्याख्यान कर लावण्य गुण का लक्षण करते हैं—

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अत्नाप्लुतविसर्गान्तैः पदैः प्रोतेैः परस्परम् । हस्वैः संयोजपूर्वैश्च लावण्यमतिरिच्यते ॥४७॥

अत्नासियन्रेवैः विवैः पदैलावण्यमतिरिच्यते परिपोषं प्राप्नोति । कुटिलैः—परस्परमन्योन्यं प्रोतेैः संश्लेषं नीतैः । अन्यच्च कीटदौः—अलुप्त विसर्गान्तैः, अलुताविसर्गैः श्रुयमाण विसर्जनीयाः अन्ताः येषां तानि यथोक्तानि तैः । हस्वैश्च लघुभिः । संयोजेभ्यः पूर्वैः । अतिरिच्यते इति सम्बन्धः । तदिदमत्र तात्पर्य्यम्—पूर्वोक्तलक्षणं लावण्यं विधमान मनेनातिरिक्ततां नीयते । यथा—

श्वासोल्कम्पतरङ्गिणिस्तनतटे धौताज्जनश्यामलाः कीर्यन्ते कणशः कुराङ्गि किममी वास्यास्वसन्तो विन्दवः । किञ्चाकुटिलकण्ठरोधकुटिलाः कर्णोमृतस्यान्दिनो हुंकाराः कलपञ्चमप्रणयिनस्त्रुवन्ति निर्यान्ति च ॥१०६॥

यहॉं अलुप्त विसर्ग से युक्त अन्त ( पदो वाले ), परस्पर संबद्ध एवं संयोज के पूर्व हस्व पदो से युक्त लावण्य गुण का अतिरेक ( परिपोष ) पाया जाता है ॥४७॥

यहॉं—इस ( विचित्र मार्ग ), मे, इस प्रकार पदो से लावण्य को अतिरेक—परितोष प्राप्त होता है । किस प्रकार के ( पदो से )?—परस्पर—आपस मे, प्रोतेैः—संश्लेष को प्राप्त कराये गये । और कैसे ( पदो से )?—अलुप्त विसर्गान्त पदो से—विसर्ग लुप्त नही है, जिनके अन्त मे विसर्जनीय श्रुयमाण है वे तथोक्त उन पदो से । और हस्व—लघु ( पदो से ), जो संयोज पदो से पहले ( आये हो ) । ( ऐसे पदो मे लावण्य गुण ), अतिरेक वो प्रास होता है । ( इस क्रिया ) से सम्बन्ध है । तो यहॉं यह तात्पर्य्य है—पूर्व कथित लक्षणवाला लावण्य गुण उपस्थित होने पर ( अर्थात् सुकुमार मार्ग का जो ३२वीं कारिका मे कहा गया है लावण्य गुण है वह इससे मिल्कर अतिरिक्तता को प्राप्त कराया जाता है ) इसके संयोज से अतिरेकता वो प्राप्त कराया जाता है । जैसे—

( आरती रोती हुई किसी रमणी का वर्णन है—अपि तन्वङ्गि ! ( ऑसू लगाये गये ) अञ्जन को धुल देने के कारण काली काली ये ऑसू की बूंदे श्वासजन्य उत्कम्पन से तरङ्गायमान स्तनों के छोरो पर कण-कण करके क्यो विखेरे जा रहे है ? और क्यो कुछ-कुछ दबी जुबान के अवरोध से टूटे-फूटे, कानो मे अमृत प्रवाहित करने वाले, मधुर पञ्चम राग के प्रणयी ( समान ) हुँम्-हुँम् के शब्द टूट-टूट कर रह जाते है ( रह-रह कर ) बाहर निकल पडते है ॥१०६॥

( यहॉं पर धौताज्जनश्यामलाः, कणशः, विन्दवः, कुटिलाः, हुकाराः पद अलुप्त विसर्गान्त हैं । इसी प्रकार संयुक्ताक्षरों के पूर्व प्रायः सर्व हस्व की विधान है । यहॉं विचित्र मार्ग का लावण्य गुण विराजमान है । )

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यथा वा—

एतन्मन्थ विपक्व तिन्दुकफलरयामोदरा पाण्डुर-

प्रान्तं हन्त पुलिन्द सुन्दर कर स्पर्शेक्षमं लक्ष्यते ।

तस्पल्शीपति पुत्रि कुजरकुलं कुम्भाभयभ्र्यर्थना—

दीनं त्वामुनाथते कुचयुगं पत्राङ्गुकर्मो पिधा: ॥१०७॥

यथा वा—

'हंसाना निनदेषु' इति ॥१०८॥

एवं लावण्यमसिधायाभिजात्यमभिधीयते—

यच्चातिकोमलच्छायं नातिकाठिन्यसुद्रहत् ।

आभिजात्यं मनोहारी तदत्र प्रौढिनिर्मितम् ॥४८॥

अथवा जैसे इसी का दूसरा उदाहरण—( यह श्लोक 'काव्यप्रकाश' मे दोष प्रकार मे च्युतिसंस्कृत ( व्याकरण लक्षण दोष ) के उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत किया गया है । अन्तिम पद 'अनुनाथते' मे व्याकरण नियमो के अनुसार आधीर्थ होने के कारण 'अनुनाथति' होना चाहिए । पल्लीपति ( ग्रामप्रधान ) की कन्या के कुचयुगल का दर्शन चाहने वाले किसी विदग्धे को यह—अरी, छोटे गोरे प्रवान श्यामवरपत्नी की लाडिली, हर्प का विप्रिय है कि हलके पके तिन्दुक फल के समान श्याम मध्य भाग एवं मामूली पिले छोरो वाले ये तुम्हारे कुचद्रय ( किसी ) श्यबर के सुन्दर हाथो के स्पर्शो के उपयुक्त लग रहे है ( मर्दन योग्य हैं ) । ( क्योंकि तुम्हारे कुम्भ-

युगल से आक्रुष्ट एवं संदेहापित होकर कि किस कुम्भ पर प्रहार करे श्यवर हाथियो के गण्डस्थलो पर प्रहार नही करेगा अतएव ) अपने गण्डस्थल ( कुम्भद्रय जो कि तुम्हारे कुचकुम्भ के ही समान है ) के अभय प्राप्ति की प्रार्थना से कातर हाथियो का समूह तुमसे यह याचना करता है कि इन अपने कुचयुगलों को पत्ताङ्कुशों से मत छिपाओ ( ढँको ) अर्थात् मद्दर्शनार्थ अनावृत ही रहने दो ॥१०७॥

( यहाँ पदो का परस्पर सङ्लेप एवं सयोगपूर्वक हस्व का विधान तो है ही, वर्णन का सौन्दर्य भी परम आह्लादकारी है ।)

अथवा इसी का तीसरा उदाहरण है—'हंसाना निनदेषु' इत्यादि उदाहरण मे जो सख्या ७३ मे है । पूरा श्लोक वही द्रष्टव्य है ॥४७॥

इस प्रकार लावण्य को कहकर अब आभिजात्य का विवेचन करते हैं—

इस ( विचित्र मार्ग मे ) जो न अत्यन्त कोमल छाया और न अत्यन्त कठिनता के सौन्दर्य को धारण करता हुआ ( निर्माण है ) मनोहारी एवं ( कवि ) प्रौढि से विनिर्मित वह आभिजात्य ( गुण ) कहा जाता है ॥४८॥

यहाँ इस ( विचित्र मार्ग मे ) वह आभिजात्य ( गुण कहा जाता है ), जो न अत्यन्त कोमलच्छाया—अत्यंत मसृण कान्ति, एवं न अतिशय कठिनता को वहन

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काठिन्यसुद्रवह्नाति कठोरतां धारयत् प्रौढिनिर्मितं सकलकविकौशलसंपादितं सन्मनोहारि हृदयार्पकं भवतीत्यर्थे। यथा—

अधिकरतरलतल्पं कल्पितस्वापलीला-परिमलननिमीलितपाणिपीडमा गणडपाली। सुतनु कथय कस्य नज्जयत्यज्जसैव स्मरनरपति केली यौवराज्याभिपेकम् ॥१०९॥

एवं सुकुमारविहितानामेव गुणानां विचित्रे करिचिद्वतिशयः संपाद्यते इति वक्तव्यम्।

आभिजात्यादिप्रभृतयः पूर्वमार्गोदितागुणाः। अत्रातिशयमयान्ति जनिताहार्यसंपदः ॥१९०॥

इत्यन्तरश्लोकः

एवं विचित्रसमविधाय मध्यमसुपचक्रमते—वैचित्र्यं सौकुमार्यं च यत्र संकीर्णतांगते। भ्राजते सहजाहार्य शोभातिशयशालिनी ॥४९॥

करता हुआ——अत्यन्त कठोरता को धारणा करता हुआ ही, प्रौढि से निर्मित——कवि की समस्त चातुरी से संपादित होकर मनोहारि सहृदय-हृदय का अनुरञ्जक होता है—यह अर्थ हुआ। जैसेः—( यह श्लोक ‘काव्यप्रकाश’ में भी आया है? चिन्तापरायणा नायिका के प्रति सखी के वचन हैं—) शोभनाद्रौ? बताओ तो सही कि करतलरूप द्युत्त्या पर की गति रायन की लीला के परिसमापन मे (अरणिमा आ जाने के कारण) तिरोहित हुई पाण्डिमा से युक्त यह तुम्हारी कपोलस्थली अकस्मात् किस भाग्यशालिनी के कामदेव रूपी राजा की क्रोड़ाओं के यौवराज्य पद पर (तुम्हारे द्वारा किये) अभिषेक को अभिव्यक्त कर रही है? ॥१०९॥

( प्रकृत श्लोक मे न तो अत्यन्त कठिन न अतिशय मृदण पदो का ही प्रयोग किया गया है। कवि कल्पना का लालित्य है। अतएव आभिजात्य है)।

इस प्रकार सुकुमार मार्ग मे विहित गुणो का ही विचित्र मार्ग मे कोई अपूर्व सौन्दर्यं संपादित कर दिया जाता है अर्थात् उनमे कुछ और ही सौन्दर्यं ला दिया जाता है यह समझना चाहिये। (इसी को आगे के अन्तर श्लोक से कह रहे है)—

आभिजात्य आदि (माधुर्य, प्रौढि एवं लावण्य) पूर्व मार्ग (सुकुमार मार्ग) मे ही कहे गये गुण यहाँ (इस) विचित्र मार्ग मे (कवि की) आहार्य (न कि स्वाभाविक) काव्यसंपत्ति से युक्त और भी अतिशय को प्राप्त हो जाते है ॥१९०॥

इस प्रकार यह अन्तरश्लोक रचा।

इस प्रकार विचित्र मार्ग एवं उसके गुणो का अभिधान कर अब मध्यम मार्ग के लक्षण का प्रयास करते है—

सहज ऐश्‍चाहार्य शोभा के उत्कर्ष से सुशोभित जहाँ परस्पर सदृशीणता को प्राप्त सुकुमार एवं विचित्रभाव प्रकारामान होते है ॥४९॥

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माधुर्यादिगुणग्रामो वृत्तिमाश्रित्यमध्यमाम् । यत्र कान्ति पुष्णाति बन्धच्छायातिरिक्तताम् ॥५०॥

मार्गोंडसौ मध्यमो नाम नानारुचिमनोहरः । स्पर्धया यत्र वर्त्तिन्ते मार्गद्वितय सम्पदः ॥५१॥

अत्रारोचकिनः केचिच्छायावैचित्र्यरक्षकेः । विदग्धैः नेपथ्यविधौ भुजज्ञा इव सादराः ॥५२॥

मार्गोंडसौ मध्यमो नाम मध्यमाभिधानोऽसौ पन्थाः । कीदृशः—नानाविधा रुचयः प्रतिभासा येषां ते तथोक्तास्तेषां सुकुमारवैचित्र मध्यमव्यसनिनां सर्वेषामेव मनोहरो हृदयहारि । यास्मिन् स्पर्धया मार्गद्वितय सम्पदः सुकुमार विचित्र शोभा: साम्येन वर्त्तन्ते व्यवस्थितत्नेऽति न्यूनातिरिक्तत्वेन । यत्र वैचित्र्यं विचित्रत्वं सौकुमार्यं सुकुमारत्वं सदृशीकरणतां गते, तस्मिन् मिश्रतां प्राप्ते सती भ्राजेते, शोभेते । कीदृशे—सहजाहार्यशोभातिशयशालिनी, शक्तिक्लयुत्पत्ति-संभवो यः शोभातिशयः कान्तियुक्तःशस्तेन शालते रलायते ये ते तथोक्ते ।

जहाँ माधुर्य आदि ( लावण्य प्रसाद एव आभिजात्य ) गुण वर्ग मध्यम वृत्ति का अवलम्बन कर रचना के सौन्दर्य की किसी अपूर्व विशेषता को परिपुष्ट करते हैं ॥५०॥

वभिन्न रचिवाले ( सदृदयो ) के मन को हरण करने वाला मध्यम नाम का वह मार्ग है जहाँ दोनो मार्गों ( सुकुमार एव विचित्र मार्गों ) को विभिन्नतायों परस्पर स्पर्धापूर्वक वतर्मान रहती है ॥५१॥

कान्ति सौन्दर्य से रचक सम्पय आभूषण की विधि मे आदरयुक्त नागर जनो की भ्राति शोभा की विचित्रता से सदृदय—हृदय रक्षक एवं विदग्धजन की अलङ्करण पद्धति वाले इस मध्यम मार्ग मे कुछ आरोचकी वृत्ति के लोग ही आदरयुक्त होते है ॥५२॥

यह मार्ग मध्यम नाम का है—यह ( काव्य ) पथ मध्यम अभिधान वाला है । कैसा है ?—नाना प्रकार की रुचियों—प्रतिभास जिनके पास है वे है तथोक्त ( नाना रुचि ), उनका अर्थात् सुकुमार विचित्र मार्गो एवं मध्यम मार्ग के वासनो इन सभी का ही जो मनोहर—हृदयहारि होता है ( वह है मध्यम मार्ग ) जिसमे परस्पर स्पर्धापूर्वक दोनो ( सुकुमार एवं विचित्र ) मार्गों की सम्पत्तियों—सुकुमार और विचित्र मार्गों की शोभाएँ समान भाव से होती है—व्यवस्थित होती है—कम अथवा अधिक भाव से नही । जहाँ वैचित्र्य—विचित्रता, सौकुमार्य—सुकुमारता । दोनो ही ) सदृशीकरण को प्राप्त-कर उस ( मध्यम ) मार्ग मे मिश्रत्व भाव को प्राप्तकर ही दीप्यमान होते है—शोभाय-मान होते है । किस प्रकार के ( वे दोनो ) ?—सहज एव आहार्य शोभा के अतिशय से शालित—शक्ति एव व्युत्पत्ति से उत्पन्न होने वाला जो शोभा का अतिशय कान्ति का उत्कर्ष, उस जो शालित होते है वे—प्रकाशित होते है वे दोनो तथोक्त रम्यते सहजाहार्य शोभातिशयशालिनी ) उस प्रकार के मार्गी को मध्यम मार्गे कहते है ।

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

माधुर्याद्यति । यत्र माधुर्यादि गुणग्रामो माधुर्यप्रभृतिगुणसमूहो मध्यमा-मुभयच्छायाच्छुरितां वृत्ति स्मस्पन्दगतिमाश्रित्य कामप्यपूर्वा बन्धच्छायाति-रिक्ततां सन्निवेशकान्त्यधिकतां पुष्णाति पुष्ट्यतीत्यर्थः ।

तत्र गुणानामुदाहरणानि । तत्र माधुर्यस्य यथा—

वेलानिभ्रैर्मृदुभिराकुलितालकान्ता गीयान्ते वसुधा चरितानि परान्तकान्तः ।

लीलानताः समवलम्ब्य लतास्तरुणां हिन्तालमालिशु तटेषु महानवेप्स्य ॥१११॥

प्रसादस्य यथात—

तदृक्चक्षेनुविचोकनेन, इत्यादि ।।११२।।

( मध्यम मार्ग को ही और अधिक विशिष्ट करने के लिए कहते है )—माधुर्य-त्यादि । जहॉ—जिस मार्ग मे माधुर्यादि गुणो का समूह माधुर्य प्रभृति (प्रसाद, लावण्य और आमिजात्य ) गुणो का समुदाय मध्यमावृत्ति ( सुकुमार एव वैचित्र्य रूप ) दोनो की कान्ति से मिश्रित वृत्ति अर्थात अपने व्यापार को प्राप्त कर किसी अपूर्व ही रचना की शोभा को आभनित करता—विन्यास विशिष्टि की विशिष्टता को पुष्ट करता है—परिपोष प्रदान करता है ( वह मार्ग मध्यम मार्ग कहा जाता है )। क्योंकि मध्यम मार्ग सुकुमार एव वैचित्र्य की विचित्र से सवलित होता है इसलिए मध्यम के गुण भी उक्त दोनो मार्गों के गुणो के मिश्रण से उक्त होगे । अतः उनका लक्षण न करके केवल उदाहरण दिये जा रहे है ।

उस ( मध्यम मार्गे ) मे गुणो के उदाहरण दिये जाते हैं । उनमे भी माधुर्य का उदाहरण जैसे—श्लोक पादताडितक भाण का है जो श्यामिलक कवि की कृति मानी जाती है—) हिन्ताल वृक्षो से शोभायमान महासागर के तट पर, सरिलास छुकी हुई वृक्ष की लताओ का सम्यक अवलम्बन लेकर किनारे की मञ्जु हवाओ से विखरे अलकोंवाली जलनिधि के दूसरे किनारे की कामनियो जिसका चरितो का वर्णन किया करती है ।।१११।।

( यहाँ पर सुकुमार मार्ग के माधुर्य गुण का अधिक समासों का अभाव एव विचित्र मार्ग के माधुर्य का—चौथिल्य विहीन विन्यास मार्ग का माधुर्य गुण दमक उठा है । ) प्रसाद गुण का उदाहरण जैसे—उदाहरण संख्या २३ मे उदाहृत श्लोक —तदृक्चक्षेन्दु विलोकनेन, इत्यादि ।।११२।।) पूरा श्लोक पुन दिया जा रहा है —

तदृग्चक्षेन्दु विलोकने दिवसोनितः प्रदोषस्थिता

तद्गोष्ठयैव निशापि मन्यथाकृतोत्साहैस्तदग्निर्पणे: ।

तो स्मरत्यपि मार्गदर्शनयना दृशं प्रदक्षिण्य मे •

बद्धाकर्णामिदं मनः किमथवा प्रेमा समासोक्तवम् ।।११२।।

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प्रथमोऽनुष्टुः ।

लावण्यस्य यथा—

सड़कान्ताझुलिपर्वसूचितकरस्वापाकपोलस्थलीनेत्रे निर्मर्मरुक्तबाष्पकलुषे निःस्वासतान्तोडघरः । बद्धोद्भेदविसंघल्लालकलता निर्वेदशून्यं मनः कष्टं दुन्‍नेयवेदिभिः कुसचिवैवृत्सा हढं खेयते ॥ ११३ ॥

आभिजात्यस्य यथा—

आलम्ब्य लम्बा: सरसामवल्लीः पिबन्ति यस्य स्तनभरणाम्राः । शोतश्च्युतं शीकरकणिताक्ष्यो मन्दाकिनीनिःश्रितमरवमुख्यः ॥ ११४ ॥

एवं मध्यमं व्याख्याय तमेवोपसंहरति—अत्रैति । अत्रैतस्मिन् केचित् कतिपये सादरास्तदाश्रयेण कार्यं कुर्वन्ति । यस्मात् अरेचकिनः कमनीयवस्तुव्यसनिनः कीटशे चासिनि—छायावैचित्र्यरक्षके कान्तिविचित्रभावाहादके ।

(शृङ्गार रस, दीपक अलङ्कार, ओजःप्रश्र्क पद, समास-रचना एवं पदों की व्यञ्जकता होने से यहाँ प्रसाद गुण का सौन्दर्य समुल्लसित है ।) मध्यम मार्ग के ही लावण्य गुण का उदाहरण जैसे—श्लोक 'तापसवत्सराज' ( ३।७६ ) से लिया गया है—

गणडस्थली प्रतिबिम्बित ( चित्रित ) ञ्जलुलिओ के पोरो से हाथ पर रखकर सोने की सूचना देती है । नेत्र अतिशय बहाये गये ऑसुओ से मलिन हो गये है और अधरोष्ठ निःस्वास वायु से सूख गये हैं । कोमल कचकलाप बन्धन ( जूडे ) के खुल जाने के कारण असत्-व्यस्त हो गये है और मन निर्वेद के कारण शून्य हो गया है ( खाली-खाली है ) कष्ट है कि दुर्नीति के जानकार ( इन ) कुमार्तियों से प्यारी वत्सा ( वसवदत्ता ) बहुत ही सतायी जा रही है ॥ ११३ ॥

( शब्द और अर्थ की रमणीयता, पदों की सुन्दर रचना, सर्विसर्गान्त पद एवं संयोजपूर्वक ह्रस्व पदों के विधान से यहाँ लावण्य गुण की शोभा बन रही है ।)

आभिजात्य गुण का उदाहरण जैसे—

स्तनो के भार से झुकी हुई हरी-हरी विशाल लताओं के अग्रभाग का सहारा लेकर किन्तु-रमणियों निर्मीलित नेत्र जिस ( पर्वत हिमालय ) के प्रवाह से गिरते हुए गढ़ा के जलप्रतापों का पान करती है ॥ ११४ ॥

( श्रुतिसुखद, कोमलकान्तपदावली, माधुर्य एवं कुछ-कुछ कठिन वर्णों से युक्त होने के कारण यहाँ आभिजात्य गुण सुतरां दर्शनीय है ।)

इस प्रकार से मध्यम मार्ग का गुणोदाहरणपूर्वक विवेचन कर उसी का उपसंहार करते हैं—अत्रैति से । यहाँ—इस ( मध्यम मार्ग ) मे कुछ-कतिपय ही ( कविगण ) सादर होते है—उस मार्ग के आश्रय से काव्य-रचना करते है । क्योंकि अरेचकी—कमनीय वस्तु के (वे कवि) व्यसनी होते हैं । किस प्रकार के इस मार्ग मे ?—सौन्दर्यं की

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वक्रोक्तिजीवितम्

कथम्—विदगधत्नेपथ्यविधौ विधौ भुजझा इव, अग्नाम्यवकल्पकल्पने नागरा यथा । सोऽपि छायावैचित्र्यरक्षक एव ।

अत्र गुणोदारणानि परिमितत्वात्स्वदर्शितानि, प्रतिपदं पुनरछायावैचित्र्यं सहदयैः स्वयमेवानुसर्तव्यम् । अनुसरणदिक्संप्रदर्शनं पुनः क्रियते । यथा—मातृ-गुप्तमायुराजमझीरप्रभृतितीनां सौकुमार्यवैचित्र्यसंवलितपारिस्पन्दनद्योतिनी काव्यायनि समभवन्नि । तत्र मध्यममार्गोचितंवलितं प्रकृतं विचित्रपणीयम् । एव सहजसौकुमार्यसुभगानि कालिदाससर्वसेनादीनां काव्यनि हरयन्ते । तत्र सुकुमारमार्गस्वरूपं चर्चनीयम् । तथैव च विचित्रवकत्वविजृम्भितं हर्षचरिते प्राचुर्येण भट्टबाणस्य विभाव्यते, भवभूतिराजशेखरविरचितेषु बन्धसौन्दर्य-सुभगेषु मुक्तकेषु परिदृश्यते । तस्मात् सहदयैः स्ववक्त्र सर्वेषमनुसर्तव्यम् । एवं मार्गत्रितयलक्षणं डिण्डिमात्रमेव प्रदर्शितम् । न पुनः साकल्येन सत्कविकौशल-प्रकाराणां केनचिदपि स्वरूपमभिधातुं पार्यते । मार्गेषु गुणानां समुदायधर्मता । यथा न केवलं शब्दादिधर्ममत्त्व तथा तल्लक्षणव्याख्यानावसर एव प्रतिपादित-तम् ॥४९-५२॥

वैचित्र्यता से रुढ़क—कान्ति का जो विचित्र भाव उससे आह्लाद प्रदान करने वाला कैसे ?—विदग्ध नेपथ्य की किया मे भुजङ्गो की भॉति—अग्राम्य वेश-रचना मे नागर जनों की तरह । ( क्योकि ) वह ( नागरजनों की वेश-रचना ) भी शोभा की विचित्रता से आह्लाद प्रदान करने वाली होती ही है ।

यहाँ गुणों के उदाहरण सक्षिसतया ही प्रदर्शित किये गये है, किन्तु प्रतिपद कान्ति की विचित्रता सहदय जनों को स्वयं समझ लेनी चाहिए । ( उसे अन्यत्र ) अनुसरण करने की विधि का प्रदर्शन हम कर देते है । जैसे—मातृगुप्त, मायुराज तथा मङ्जीर आदि कवियों के सौकुमार्य एव वैचित्र्य मार्ग से मिश्रित स्वभावसमर्पक काव्य हो सकते है । वहाँ पर मध्यम मार्गयुक्त स्वरूप का विचार करना चाहिए । इसी प्रकार स्वाभाविक सौकुमार्य मार्ग से सुन्दर कालिदास सर्वसेन आदि कवियों के काव्य देखे जाते हैं । वहाँ पर सुकुमार मार्ग के स्वरूप की चर्चा की जाननी चाहिए और उसी प्रकार बाणभट्ट के हर्षचरित मे विचित्र ( मार्ग ) की कान्ति का विजृम्भण बहुलता से देखा जाता है ( साथ ही ) भवभूति एव राजशेखर आदि से रचित रचना के सौन्दर्य से मनोहारि मुक्तकों मे भी विचित्र की कान्ति का विजृम्भण पाया जाता है । इसलिये सहदय जनों को सभी ( कवियों की ) रचनाओं मे समग्र मार्गों के गुण आदि के उदाहरणों का अनुसरण करना चाहिए । इस प्रकार ( मैने ) तीनों मार्गों के लक्षण संक्षेप मात्र ही दिखाये है, ( न कि पूर्णरूप से दिखाये है ) । क्योकि श्रेष्ठ कवियों के रचना-कौशल के प्रकारों का स्वरूप पूर्णतया किसी के भी द्वारा कहा जाना सम्भव नही है । गुणों की मार्गों मे समुदायधर्मता है ( अर्थात मार्गों मे गुणों की अवस्थिति सामानयरूप मे पदसमुदाय मे ही होती है, न कि पथक्-पृथक रूप से शब्दों मे ) । ( गुणों की )

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एवं प्रत्येकं प्रतिनियतगुणग्रामरमणीयं मार्गान्वितयं व्यारुच्याय साधारणगुणस्वरूपव्याख्यानार्थमाह—

आज्ञसेन स्वभावस्थ्य महत्त्वं येन पोष्यते । प्रकारेण तदौचित्यमुचिताख्यानजीवितम् ॥ ५३ ॥

तदौचित्यं नाम गुणः । कीदृक्—आज्ञसेन सुस्पश्रेण स्वभावस्य पदार्थस्य महत्त्वमुत्कर्षो येन पोष्यते परिपोषं प्राप्त्यते । प्रकारेणोति प्रस्तुततत्त्वाभिधावैचित्र्यमत्र ‘प्रकार’-शब्देनोच्यते । कीदृशम्—उचिताख्यानमुदाराभिधानं जीवितं परमार्थो यस्मिन् तत्थोक्तम् । अतदालु गुणयेनैव विभूषणविन्यासो विच्छित्तिमावहतति । यथा—

करतलकलिताक्षमाल्यो: समुचितसाध्वससनाथस्तयो: । कृतरुचिरजटानिवेशयोरपर इवेह्वरयो: समागम: ॥ ११५ ॥

यथा वा—

उपगिरिपुरहूतस्पृशे सेनानिवेश-स्टटमपरिमितोदध्रुस्रुतद्वदवलानावसन्तु ।

केवल शब्द आदि की धर्मता जैसे नहो है उसे तो उन गुणो के लक्षण की व्याख्या के अवसर पर हो प्रतिपादित कर दिया गया था ॥ ५९-५२ ॥

प्रत्येक मे नियत गुणसमूहो से रमणीय एक-एक करके तीनो मार्गों की व्याख्या कर अब ( उनके ) साधारण गुण के स्वरूप का व्याख्यान करने के लिए कहते हैं—

( वर्णन की ) स्पष्ट रीति से जहाँ स्वभाव का महत्त्व परिपुष्ट किया जाता है, उचित वर्णनस्वरूप प्राणयुक्त वह औचित्य गुण कहा जाता है ॥ ५३ ॥

वह औचित्यनाम का गुण है । कैसा ?—आज्ञास—सुस्पष्टरूप से, स्वभाव—पदार्थ का महत्त्व—उत्कर्ष जिसके द्वारा पुष्ट होता है—परिपोष को प्राप्‍त होता है । प्रकार पद से यहाँ अर्थ है—प्रस्तुत होने के कारण अभिधा का चमत्कार्य ही यहाँ ‘प्रकार’ शब्द से कहा गया है । कैसा है ( औचित्य गुण ) ?—उचित आकल्यान—उदार वर्णन—जीवित—परमार्थ है जिसका तथोक्त । इसकी अनुवृत्ति से हो अलङ्कारो का विन्यास शोभा की सृष्टि करता है । ( ध्यान देने की बात है कि, औचित्य का विचार आचार्य भरत से लेकर क्षेमेन्द्र की प्रस्थान-स्थापना तक और उसके बाद भी काव्यशास्त्र मे निरंतर होता रहा है । कुन्तक का विवेचन क्षेमेन्द्र के लिए लाभकारी ही रहा है ) ।

औचित्य गुण का उदाहरण प्रस्तुत करते है । जैसे—( श्लोक तापस वत्सराज ( ३।८४ ) का ही है ) हायो मे अक्षमाला लिये हुए, उत्पन्न साध्वस ( हडबडी ) से सनद्ध हाथों वाले, सुन्दर जटाओं की संरचना किये हुए उन दोनो का समागम ) हुआ ॥ ११५ ॥

अथवा जैसे—( फरसपर विरुद्ध दो सेनाओं की मोर्चेबन्दी का वर्णन है ) पर्वत के समीप यह इन्द्र की सेनाओ का वासस्थान है । यहाँ से पर्वत के दूसरे किनारे पर

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धुवमिह करिणस्ते दुर्धराः सधनिकर्षे सुरगजमदलेखा सौरभं न क्षमन्ते ॥ ११६ ॥

यथा च—हे नागराज बहुधास्य नितम्बभारं भोगेन गाढमभिवेष्ट्य मन्त्राद्रेः । सोढाविषह्याविववहनयोगलीला पर्यड्बन्धनविधेस्तव कोटिभारः ॥ ११७ ॥

अत्र पूर्वोदाहरणयोःभूषण गुणननेव तद्गुण परिवेषः, इतरेतरञ्च स्वभावौ- दार्याभिधानेन ॥ ५३ ॥

औचित्यमेव छायान्तरे स्वरूपमुन्मीलयति— यत्र वक्तुः प्रमातुः वाच्यं शोभातिशायिना । आच्छाद्यते स्वभावेन तद्भ्यौचित्यमुच्यते ॥ ५४ ॥

यत्र यस्मिन् वक्तुरभिधातुः प्रमातुः श्रोतुर्वा स्वभावेन स्वपरिस्पन्देन वाच्यमभिधेयं वस्तु शोभातिशायिना रमणीयक मनोहरेण आच्छाद्यते सञ्ज्रियते तुम्हारी सेनाएँ निवास करे । ( क्योंकि ) निश्चय ही तुम्हारे भयङ्कर हाथी ( अपने प्रतिपक्षभूत ) देवताओं के हाथियों की मददगार के सौरभं को सहन नहीं कर सकेंगे ॥ ११६ ॥

अथवा तीसरा उदाहरण जैसे— हे सर्पराज वासुकि ! इस मन्दराचल के नितम्ब ( मध्य ) प्रदेश को अपने शरीर से कसकर अनेक बार आवेष्टित कर लो । विष-वहन करने वाले भगवान् शिव की योगलीला में असहनीय पर्यड्बन्धन (आसनबन्ध्) की प्रक्रिया को सहन करने वाले तुम्हारे लिये यह कौन-सा महान् भार है ? ॥ ११७ ॥

यहॉँ ऊपर के दोनों पूर्व उदाहरणों में अलङ्कार के गुण से ही औचित्य के गुण की परिपुष्टि हो रही है । प्रथम में उपेक्षा अलङ्कार है जिसके उपयुक्त ही ‘कारतलकलित- ताश्माल्योः’ आदि उचित पदों का विनिवेश किया गया है और द्वितीय उदाहरण में भी उपेक्षा, व्यतिरेक, अतिशयोक्ति आदि अलङ्कारों का समुचित विनिवेश होने से ही औचित्य गुण की परिपुष्टि हो रही है । और अन्यत्र तीसरे उदाहरण में ( श्लेषणाग आदि के ) स्वभाव की उदारता के वर्णन से औचित्य का धरिपोष हो रहा है ॥ ५३ ॥

औचित्यगुण का ही स्वरूप दूसरे सौन्दर्य को लेकर प्रस्तुत करते हैं— जहॉँ वक्ता या प्रमाता के शोभा के अतिशय से प्रदीप्त स्वभाव से वाच्य ही ढँक लिया जाता है वह भी औचित्य गुण ही कहा जाता है ॥ ५४ ॥

जहॉँ—जिस ( गुण ) में वक्ता कहने वाले या प्रमाता-श्रोता के शोभातिशाययुक्त रमणीयता से मनोहर स्वभाव-अपने परिस्पन्द के द्वारा वाच्य-अभिधेय वस्तु आच्छादित कर ली जाती है—ढँक दी जाती है वह भी औचित्य ही कहा जाता है ।

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प्रथमोऽनेष ]

शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्नाभासि तीर्थप्रतिपादिततर्दिः ।

आरण्यकोपात्तफलप्रसूति: स्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः ॥ ११८ ॥

अत्र इलाघ्यतया तथाविधमहाराजपरिस्पन्दे वर्ण्येमाने मुनिना स्वानुभावसिद्धव्यवहारानुसारेणालयोजनमौचित्यपरिपोषमावहति । अत्र चक్తుः

स्वभावेन च वाच्यपरिस्पन्: संवृतप्रायो लक्ष्यते ।

प्रमातुर्यथा—

निपीयमानस्तबकाश्लीलिसुखेर्ष्यशङ्कयष्टिचलवालपल्भवा ।

विडम्ब्यनती दहशे वधूजनैरमनददश्रौष्ठकरावधूतनम् ॥ ११९ ॥

अत्र वधूजनैनिजानुभवासनानुसारेण तथाविधशोभाभिरामतानुभूति-रौचित्यपरिपोषमावहति । यथा वा--

वापीतडे कुड्‌डा पिअसहि हाउं गएहिं दीसंति ।

न धरंती करण भमंती पत्ति वलिउँ पुण प देन्ति ॥

जैसे (ऋग्वेद) का ( ५।१५ ) श्लोक है । विध्वजित् नामक यज्ञ मे सम्पूर्ण दानकर शरीरमात्र से अवस्थित रघु से गुरुवरदक्षिणार्थी कौत्स का कथन है )—

राजन् ( रघु ) ! सत्पात्रो को अपनी समस्त सम्पत्ति दानकर शरीरमात्र से शेष

आप वनवासियो से फल-फूल ले लिये जाने के बाद डण्ठलमात्र से अवशिष्ट नीवार

की भाँति मुशोभित हो रहे है ॥ ११८ ॥

यहाँ प्रशंसनीय होने के कारण उस प्रकार के महाराज रघु के स्वभाव का वर्णन

किये जाने पर मुनि कौत्स के द्वारा उनके अपने अनुभव मे सिद्ध व्यवहार के अनुसार

( उपमा ) अलङ्‌कार की योजना औचित्य गुण का परिपोष करती है ( उपमानो का

प्रयोग लोग अपने अनुभव से ही करते है । कौत्स वनवासी मुनि है । नित्य-प्रति उनके

व्यवहार मे नीवार आता है । उससे फल-फूल तोड़ते रहते है । उसके अवशिष्ट नीवार के

डण्ठल का उन्हे पूरा बोध है । इसलिए समस्त दान कर शरीरमात्र से अवशिष्ट व्यक्ति के

लिए एक वनवासी के द्वारा यह उपमा उचित ही है, औचित्य गुण का परिपोष करती

है ) । यहाँ पर वाक्य ( कौत्स ) के स्वभाव से वाच्य अभिधेय रघु का स्वभाव समाविष्ट

प्राय दीख पड़ता है । प्रमाता ( के स्वभाव से वाक्य का सवरणरूप ) औचित्य जैसे—

भ्रमर-समूहों से छककर पीली जाती हुई पुष्प-गुच्छों वाली तथा हिलते हुए अभिनव

ऋकसलयो से युक्त अशोक लता को कामिनीचुबुन्द ने कसकर काटे गये होठो वाली

अतएव हस्तकम्पन्नयुक्त ( रमण्णो ) अनुकरण करती हुई सी देखा ॥ ११९ ॥

यहाँ पर वधूजनों ने अपने अनुभव के संस्कार के अनुसार ही उस प्रकार की

रमणोयता की अनुभूति ( अशोक लता में भी की है ) । ( इस प्रकार यह ) औचित्य

का परिपोप करती है । अथवा जैसे—

सुग्धा की उक्ति है—‘यारी सखि ! स्नान करने गये लोगों के द्वारा बावड़ी के

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१३४

[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

वापीतटे कुरङ्गः प्रियसखि स्नातुं गतेऽपि त्वयि ।

न धैर्यान्त करेण भणन्ति नेति वलितुं पुनर्न ददनिति ॥ १२० ॥ इतिेच्छया ।।

अत्र कस्याश्चिद्विप्रभातृताया: सातिशयमौघ्यपरिस्पन्दसुन्दरेण स्वभावेन व च्यमाच्छादितमौचित्यपरिपोपमावहति ।

एवमौचित्यसमविधाय सौभाग्यमभिधत्ते—

इत्युपादेयर्योऽस्मिन्न्यदर्थं प्रतिभा कवे: ।

सम्यक् सरभते तस्य गुणः सौभाग्यमुच्यते ॥५५॥

इत्येवंविधेऽस्मिन्नुपादेयर्यो शब्दाद्युपेयसमूहे यदर्थं यन्निमित्तं कवे: सम्वन्धिनी प्रतिभा शक्तिः सम्यक् सावधानतया सरभते व्यवस्यति तस्य वस्तुनः प्रस्तुतत्वात् काव्याभिधानस्य यो गुणः स सौभाग्यमित्युच्यते ॥ ५५ ॥

तच्च न प्रतिभा संरम्भमात्रसाध्यम्, किन्तु तद्विहितसमस्तसामग्री—

सम्पाद्यमित्याह—

सर्वसम्पत्परिस्पन्दसम्पायं सरसात्मनाम् ।

अलौकिकचमत्कारकारिकाव्यैक जीवितम् ॥ ५६ ॥

किनारे ( ऐसे ) मृग देखे जाते है जो न तो हाथ से पकड़े जाते है, न बोलते हैं और न ही घूमकर ( उधर ) आते देते हैं ॥ १२० ॥

यहाँ पर प्रमतृ भूत ( सुनने वाली ) किसी युवती के अतिशय सुग्धता के धर्म से सुन्दर स्वभाव के द्वारा वाच्य को आच्छादित कर दिया गया है ( मुग्धा नायिका होने के कारण ) औचित्य का परिपोष हो रहा है । ( वस्तुतः यहाँ वक्ता के कथन से भी औचित्य का परिपोष है ) ।

वस्तुतः उक्त रचना मे व्यंग्यार्थ प्रधान है । कुन्तक का अभिप्राय इसी मे है ॥५४॥

इस प्रकार औचित्य का अभिधान कर ( अन्य सामान्य गुण ) सौभाग्य व विवेचन करते है—

इस प्रकार इस उपादेय वर्ग मे जिस वस्तु के लिए कवि की प्रतिभा समग्रगुप्त से प्रयुक्त होती है उसका गुण सौभाग्य कहा जाता है ॥ ५५ ॥

इस प्रकार इस प्रकार के इस उपादेय वर्ग मे— शब्द आदि उपादेय समृह मे जिसके लिए—जिसके निमित्त कवि की—कवि-सम्बन्धिनी प्रतिभा—शक्ति समग्रगुप्त से साधधानभाव से सम्पयुक्त होती है—व्यापार मे प्रयुक्त होती है—उस वस्तु का— ( प्रकरणतया ) प्रस्तुत होने के कारण काव्य नाम वाले ( उस पदार्थ का ) जो गुण होता है, वह सौभाग्य कहा जाता है—भणित होता है ।

और वह ( सौभाग्य ) मात्र प्रतिभा के व्यवसाय से ही साध्य नही होता किन्तु उस ( काव्य ) के लिए बताये गये ( प्रतिभा-व्युत्पत्ति आदि ) समस्त सामग्री से ही सम्पादनीय होता है । इसी को कहते है—

( काव्योपयोगी ) समग्र सामग्री के परिस्पन्द से सम्पादनयोग्य तथा रसयुक्त चित्त

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प्रथमोऽनुच्छेदः ]

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सर्वेषाम्प्रतिपरिस्पन्दसम्पाद्यं सर्वेष्योपादेयराशोऽयो सम्पत्तिरनवच्यताकाशा तस्या: परिस्पन्द: स्फुरितत्वं तेन सम्पाद्य निप्पादनीयम्। अन्यच्च कीटशम्-

सरसात्मनामात्रैचेतसामलौकिकचमत्कारकारि लोकोत्तराह्लादविधायी। किं बहुना, तच्च काव्यैकजीवितं काव्यस्य पर: परमार्थ इत्यर्थ:। यथा-

दोर्मूलावधिसूत्रितस्तनमुर: स्फीतहृटतटाक्षे दशौ किंचित्ताण्डवपणिडते स्मितसुभासिक्तोक्तिषु भ्रूलते। चेत: कन्दलितं स्मरव्यतिकरैलावण्यमडैर्वृतं तन्वझ्न्यस्तम्भान्तिमिन्नि सुप्ततिशयैरऩ््यै: कौतुकेलापि:॥१२१॥

तन्व्या: प्रथमतरुणयेदवर्तीर्ण:, आकारस्य चेतसदृशेग्रयायारच वैचित्र्यमत्र वर्णितम्। तत्र सूत्रितस्तनमुरो लावण्यमडैर्दृतमित्याकारस्य, स्मरव्यतिकरै: कन्दलितमिति चेतस:, स्फीतहृटतटाक्षे दशाविति किंचित्ताण्डवपणिडते स्मितसुभासिक्तोक्तिषु भ्रूलते इति चेष्ट्रायारच। सूत्रित-सिक्त-ताण्डव-

( सङ्केत ) जनों को अलौकिक चमत्कार प्रदान करने वाला काव्य का प्रधान-प्राणभूत ( सौभाग्य गुण होता है )॥ ५६ ॥

समस्त सम्पत्ति के परिस्पन्द से सम्पाद्य—( काव्य के लिए ) उपादेय समस्त राशि ( शक्ति-व्युत्पत्ति आदि ) की जो सम्पत्ति—अनवच्यता ( रमणीयता ) की चरम सीमा, उसका परिस्पन्द स्फुरितत्व, उससे सम्पाद्य—निष्पादनयोग्य होता है ( सौभाग्य गुण )। और वह कैसा होता है ?—सरस आत्मा वाले—आद्र चित्त वाले लोगों को अलौकिक चमत्कारकारी—लोकोत्तर आह्लाद प्रदान करने वाला। अधिक से क्या, और वह काव्य का एकमात्र जीवन—काव्य का सर्वोत्तम् परमार्थ है, यह अर्थ है। जैसे—( हेमचन्द्र ने अपने काव्यानुशासन मे इसे उद्दृत किया है। सुन्दर रमणी का वर्णन है—)

कृशाङ्गी ( इस प्रकार युवती के शरीर मे ) तरुणिमा के धीरे-धीरे पदार्पण करने पर अपूर्व कोई और ही ( सौन्दर्य ) रचना दिखाई पडती है। वक्षस्थल भुजाओं के मूल तक स्तनों से बँधा हुआ है। नेत्र प्रेमपूर्ण कटाक्ष से युक्त हो गये हैं। मुस्कराहट के अमृत से मीली उसकी उक्तियों मे भौहें कुछ अपूर्व ताप्डव ( वकिमता ) मे विदग्ध हो गयी है। काम की विशेष अवस्थाओं से चित्त अंकुरित ( पुलकित ) हो गया है और शृङ्गों ने अपूर्व लावण्य वर्णन कर लिया है॥ १२१ ॥

यहाँ युवावस्था के प्रथम अवतार होने पर कृशाङ्गी नायिका के आकार, चित्त एवं चेष्टा का वैचित्र्य वर्णित हुआ है। उसमें भी ‘वक्षस्थल स्तनों से बँधा हुआ है’, ‘शृङ्गों ने-लावण्य का वर्णन कर लिया है’, इस प्रकार से आकार का - ‘काम की विशेष अवस्थाओं से मन’ कन्दलित हो गया हैं। इस प्रकार से चित्त की एवं ‘प्रेमपूर्ण कटाक्ष से युक्त दोनों नेत्र’, ‘मुस्कान की अमृत-सिहरी से आर्द्र कथनों मे किसी अपूर्व ताप्डव की विदग्ध भौहे है’ इस प्रकार से चेष्टा का ( वैचित्र्य वर्णित है )। सूत्रित सिक्त-ताण्डव-पणिडत एवं कन्दलित पदो की उपचरितवकता ( भी यहाँ ) यहाँ दिखायी पडती है। ‘स्फीतहृत्’

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

पणिडत-कनदलितानामुपचारवकत्वं लक्यते, स्तिद्यादित्येतस्य कालविशेषावेदकः प्रत्ययवकभावः; अन्यैव काचिदवणनयीयेति संवृतिवकताविच्छति:, अड्‌डैर्वैतमिति कारकवकत्वम् । विचित्रमागौंविषयो लावण्यगुणातिरेकः । तदेवमेतस्मिन् प्रतिभा सरसभजनितसकलसामग्री समुन्मीलितं सरसहदयाह्लादकारि किमपि सौभाग्यं समुद्भासते ॥ ५६ ॥

अनन्तरोक्तस्य गुणद्वयस्य विषयं प्रदर्शयति — एतद्विषयपि मार्गोंप गणद्वितयमुज्ज्वलम् । एतद् गुणद्वितीयसौचित्यसौभाग्याभिधानम् उज्ज्वलमतीव भ्राजिष्णुपद-वाक्यप्रबन्धानां व्याणामपि व्याप्तिकत्वेन वर्तते ॥ ५७ ॥

इस पद की, कालविशेष ( वर्तमान ) को बताने वाली ( शत्रु ) प्रत्यय गत वकता है । अनौपय- ( पद जिसका अर्थ ) कोर्इ अवर्णनीय — मैं इस प्रकार संवृतिवकता की शोभा है । अड्‌डो से वर्ण किया गया है, इस प्रकार ( तृतीया विभक्ति से होने के कारण ) कारकवकता है । ( इस प्रकार पूरे श्लोक मे ) विचित्र मार्ग के विपय से उत्पन्न, समग्र-सामग्री ( व्युत्पत्ति-वकत्वादि ) से सयुक्त उन्मीलित रसयुक्त हृदय-सहृदयों को आह्लाद प्रदान करने वाला अनिर्वचनीय सौभाग्य गुण समुद्भासित हो रहा है ॥ ५६ ॥

अभ्री-अभ्री कहे गये दोनो गुण (औचित्य एवं सौभाग्य ) का विषय प्रदर्शित करते है—

पद, वाक्य एवं प्रबन्धों के तीन ही मार्गों ( सुकुमार, विचित्र एवं मध्यम ) मे अत्यन्त दीप्यमान ये दोनो ( औचित्य-सौभाग्य ) गुण व्यापकरूप से वर्तमान रहते है ॥ ५७ ॥

यह गुण द्वितीय —औचित्य एवं सौभाग्य नाम वाला, उज्जवल—अत्यन्त दीप्यमान, पद, वाक्य एवं प्रबन्धों तीनों मे ही व्यापकरूप से वर्तमान रहते है । अर्थात् ( काव्य के ) श्रमस्त अवयवों मे व्याप्तिपूर्वक उपस्थित रहते है । कहाँ ?—इस पर कहते है—सुकुमार, विचित्र एवं मध्यम नामक तीनों ही मार्गों मे ( रहते है ) । ( अब पद, वाक्य एवं प्रबन्ध की कमश: औचित्ययुकता तथा सौभाग्यभागिता को बताने के लिए आगे कहते है ) । उसमे भी तो पहले पद का जो औचित्य है वह अनेक भेदों से भिन्न ( अनेक प्रकार का ) वकभाव है । स्पष्टरूप से स्वभाव का परिपोष ही वकता का परम लक्ष्य है । उचित वर्णन या कथन ही ( वकता का ) प्राण है, इसलिए

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पुरं निषादाधिपतेष्टदेतद्यासिन्मन्या मौलिमणि विहाय । जटासु बद्धस्वरुत्सुमनत्: कैकेयी कामा: फलितास्तवेतै ॥१२२॥

अत्र रघुपतेरनर्घेमहापुरुषसम्पदुपेतचेन वण्येमानस्य 'कैकेयी कामा: फलितास्तवं' इत्येवंविधतुच्छतरपदार्थसंश्रयं तदभिधानं चात्यन्तमनौचित्यमावहति ।

प्रबन्धस्यापि क्वचिद्विप्रकरणैकदेशेऽप्यौचित्यविरहादेकदेशदाहदूपितदग्ध-पटप्रायता प्रसज्यते । यथा—रघुवंशे एव दिलीपसिंहसंबादावसरेऽर्थैकघनत्वोपनागच्छद्धाद् गुरो: कुत्रापि प्रतिषादविमोषेऽपि शक्योऽस्य मन्युंरेतापि जेतुं गा: कोदिश: स्फर्शीतया घटोक्ष्णो: ॥१२३॥

इति सिंहस्याभिधातुमुचितमेव, राजोपहासपरत्वेनाभिधीयमानत्वात् । राज्ञ: पुनरस्य निजयश: परिरक्षणपरत्वेन तृणवल्लघुधुरुतया प्राणा: प्रतिभासन्ते ।

वाक्य के भी एक देश में औचित्य का अभाव होने से काव्यमर्मन् की आह्लादकारिता की हानि होती है । जैसे—रघुवंश ( १३।५९ ) का इलोक है । ( लङ्का से लौटते राम के द्वारा सीता को उन-उन अभ्रभूत प्रदेशों का दर्शन-स्मरण कराया जा रहा है । निषादराज के स्थान के विपय में वता रहे है—)

यह वही निषादराज गुह का नगर है जहाँ मेरे द्वारा शिरोभूषण का परित्याग कर जटाओं को बाँध लेने पर सुमन्त्र ने, 'कैकेयी, तुम्हारे मनोरथ सफल हो गये' ( ऐसा कहते हुए ) रुदन किया था ॥ १२२ ॥

अप्रतिम महापुरुष की महिमा से युक्त होने के कारण यहाँ रघुपति श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा वर्णन किया जाता हुआ, 'कैकेयी, तुम्हारे मनोरथ सफल हो गये' इस प्रकार का अतिशय तुच्छ वस्तु का सम्यक् स्मरण और उसका कथन अतिशय अनौचित्य की सृष्टि करता है ।

प्रकरण के किसी एक अंश मे भी औचित्य का अभाव होने से—एक भाग मे अग्नि के द्वारा जल जाने से दूषित दग्ध वस्र के दूषण के समान—प्रबन्ध मे भी दूषणता प्रसक्त हो जाती है । जैसे रघुवंश मे ही (२।४९) सिंह और दिलीप के संवाद के समय पर । ( सिंह की उक्ति है राजा दिलीप से—(राजन् ?) एक ही गाय के निकट ( विनष्ट हो जाने रूप ) अपराध से कुछ अग्नि-सीखे गुरु वशिष्ठ से यदि आप डरते है ( तो उन्हे तुष्ट करने के लिए ) घड़ों के समान स्तनों वाले करोडो गाये देकर प्राण गँवाते हैं आप )॥ १२३ ॥

उक्त प्रकार से सिंह के द्वारा कहा जाना तो उचित ही है क्योकि ( यह बात उसके द्वारा ) राजा से उपहास के रूप मे कही जा रही है । किन्तु इन राजा दिलीप को तो

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कथञ्च शक्योऽनुनयोऽमहर्षेरवि श्रावणानुच्चान्तपयस्विनीनाम् इमां तनूजां सुरभेरवेहि रुद्रौजसा तु प्रहृत त्वयाडस्याम् ॥१२४॥

इत्यन्यासां गवां तत्त्वतस्तुप्रदानयोग्यता यदि कदाचित्सम्भवति ततस्तस्य मुनेःमेम चोभयोरप्येतज्ज्ञवितपरिरक्षण नैरपेक्ष्यसुपन्नमिति तात्पर्यपर्यवसान-दृश्यान्तमनौचित्ययुक्तेऽयमुक्तिः। यथा च कुमारसम्भवे त्रैलोक्याक्रान्तिप्रवणपराक्रमस्य तारकाख्यस्य रिपोर्जिंगोषावसरे सुरपतिर्मेनमथेनाभिधीयते—

कामे कपत्त्नीर् व्रतदुःखशीलां लोलं मनश्चारुतया प्रविष्ट्राम् । नितान्तनीमिच्छासि मुक्तलज्जां कण्ठे स्वयं ग्राहनिषक्तबाहुम् ॥१२५॥

इत्यविनियानुगुणानितरं त्रिविष्टपाधिपत्यप्रतिष्ठितस्यापि तथाविधाभिप्राया-

अपने यश की रक्षा मे तत्पर होने के कारण और सब प्राणी तो तृण के समान तुच्छ-वृत्ति लगते है। इसी पूर्वपक्ष कथन के उत्तर के रूप मे उन राजा की यह उक्ति—

( इस नन्दिनी के बदले ) अन्य गायो को दे देकर भी महर्षि ( वसिष्ठ ) का ( क्रोध शान्तिरूप ) अनुनय किया जाना कैसे सम्भव हो सकता है! इसे तुम सुरभी ( कामघेनु ) की पुची समझो। तुमने भी तो इस भगवान् रुद्र के प्रभाव से ही ( अपने ) अधिकार मे कर लिया है। ( यह मामूली गाय नहीँ है और न मामूली लोग इस पर अधिकार ही कर सकते है ) ॥ १२४ ॥

इस प्रकार राजा दिलीप के इस कथन से कि यदि कहीँ दूमरी गायो मे उस ( नन्दिनी ) के समान वस्तुरूप अर्थ प्रदान की योग्यता सम्भव हो पाती ( अर्थात् नन्दिनी के समान कोई और गाये विनिमययोग्य होती ) तो मुनि ( वसिष्ठ ) तथा मेरी दोनो की ही इसके जीवन की परीक्षा के प्रति उदासीनता उपयुक्त होती ( किन्तु चूँकि संसार मे नन्दिनी के समान कोई और गाय नही है जिसे देकर मै गुरु वसिष्ठ को तुष्ट कर सकूँ । यदि ऐसा होता तो न ता मै इसके जीवन-रक्षा की उतनी आवश्यक्ता समझता और न मेरे गुरु ही इसके प्रति इतने आग्रहयुक्त होते और कर्तव्य-पालन की बात भी मै त्याग देता )। इस प्रकार के तात्पर्य मे पर्यवसान होने के कारण यह ( दिलीप का कथन ) अत्यन्त अनौचित्ययुक्त है ( अत एकदेश मे अनौचित्य होने से दःखपातवत् दोषवहै )।

और जैसे कुमारसम्भव के इस श्लोक ( ३.१७ ) मे तीनों लोकों मे आक्रमण करने मे प्रवण पराक्रम वाले तारकासुर नाम शत्रु के विजित करने की अभिलाषा के समय देवेन्द्र इन्द्र से कामदेव का यह कहा जाना है—

एकमात्र पतिपरायणा तथा पातिव्रत धर्म का निरन्तर प्रतिपालन करते रहने के कारण कठिन स्वभाववाली किन्तु सुन्दर होने के कारण ( आप के ) तरल मन मे समायी हुई किस सुन्दर नितम्बो वाली को—जो त्यक्त-लज्जा होकर अपने आप ( आपके ) गले ह्राथ डाले हुयी हो जाय—ऐसी चाहते हो? ॥ १२५ ॥

इस प्रकार यहॉं त्रैलोक्य के भी अधीश्वर-पद पर वर्तमान इन्द्र के लिए उस

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जुवर्त्तनपरत्वेनाभिधीयमानमनौचित्यमावाहति । एतच्चैतस्यैव कवेः सहजसौकुमार्यमुद्रि तसूक्तिपरिस्पन्दसौन्दर्यस्य पर्योलोच्यते, न पुनरन्येषामाहार्यमात्रकाव्यकरणकौशलोल्लाधिनाम् । सौभाग्यमपि पदवाक्यप्रकरणप्रबन्धानां प्रत्येकमनेकाकारकमनीयाकारणकलापकलितरामणीयकानां किमपि सहृदयहृदयसंवेद्यं काव्यैकजीवितमलौकिकचमत्कारकारि संवलितानेकरसास्वादसुन्दरं सकलावयवव्यापकत्वेन काव्यस्य गुणान्तरं परिस्फुरतीन्यालयमति प्रसृजतेन ॥ ५७ ॥

इदानींतेनोदपसुन्दर्यान्यदवक्तव्यंयतिमार्गाणां त्रितयं तदेतदसकृत् प्राप्तव्यपर्युत्सुकैः। ऋणं कैरपि यत्र कामपि श्रुतं प्राप्य प्रसिद्धिं गताः। सर्वे स्वैरविहारहरिकवयो यास्यन्ति येनाधुना तस्मिन्कोडपि स साधु सुनिर्भरपदन्यसाक्रमः कथ्यते ॥ ५८ ॥

प्रकार ( किसी पतिव्रता स्त्री के पातिव्रत का विनाश कर उसकी ग्रहणशीलता ) के अभिप्राय के अनुपालन के रूप मे ( काम के द्वारा ) कहा हुआ वाक्य, अविनय के आचरण से परिपूर्ण है, इस प्रकार बड़ा ही अनौचित्य पैदा करता है । और यह ( अनौचित्यरूप यह दोष ) इसी कवि ( कालिदास ) की स्वाभाविक ( प्रतिभासम्भूत ) सौकुमार्य ( मार्ग ) निरूद्ध ( सकुचि ) सृक्तियों के परिस्पन्द के सौन्दर्य की ही पर्यालोचना की जा रही है, न कि फिर अन्य ( कवियों की सृक्तियों के सौन्दर्य की आलोचना ) जो कि आहार्यमात्र ( वयसत्तिमात्र ) से काव्य-रचना की कुशलता की प्रशंसा प्राप्त करने वाले होते है, ( उनकी पर्यालोचना करने पर तो अनुपद अनौचित्य मिल जायेगा, जबकि कविकुलगुरु की यह अवस्था है जो कुमार मार्ग के धनी और प्रतिभाजन्य रचना के कवि हैं, तो औरों की बात ही क्या ? ) ।

एक-एक के अनेक ( विभिन्न ) स्वरूप की कमनीय कारण सामग्री से रमणीयता को धारण करने वाले पद, वाक्य, प्रकरण एवं प्रबन्ध का समस्त अवयवों मे व्याप्त होने के कारण काव्य का जो दूसरा सामान्य गुण सौभाग्य है वह भी परिस्फुरित होता है । वह कुछ अनिर्वचनीय अलौकिक, सहृदयहृदयसंवेद्य, काव्य का एकमात्र प्राण, अलौकिक चमत्कार का आभयक तथा अनेक रसों के आस्वाद सयुक्त होने कारण सुन्दर होता है । इस प्रकार इस विषय के अधिक विस्तार से जानने की आवश्यकता नहीं प्रतীত होती ।

अब इस समय इस ( औचित्य आदि ) विषय का उपसहार कर अन्य विषय ( आगे के द्वितीय उन्मेष मे कहे जाने वाले विषय ) की अवतारणा करते है—अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति के लिए हर तरह से उत्सुक किन्ही महाकवियों के ही द्वारा यह मार्गान्तरय बार-बार अनुगमित हुआ है । जिस मार्ग पर चलकर अलौकिक प्रतिष्ठा को प्राप्त कर वे ख्याति को प्राप्त हुए है उस मार्गत्रय मे जिससे ( भविष्य मे

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मार्गोणां सुकुमारादीनामेतत् त्रितयं कैरपि महाकविभिरेव न सामान्न्यैः, प्राप्तव्यपर्यन्तुकैः प्राप्योत्कण्ठितैरेसकृत् बहुवारमभ्यासेन श्लेषणं परिगतमतम् । यत्र यस्मिन् मार्गत्रये कामपि भुवं प्राप्य प्रसिद्धिं गतः, लोकोत्तरां भूमिमासाद्य प्रतीतिं प्राप्ताः । इदार्निं सर्वे स्वैरविहारहारिणः स्वेच्छाविहरणरमणीयाः कवयस्तस्मिन् मार्गत्रितये येन यास्यन्ति गमिष्यन्ति स कोडपि अलौकिकः सुन्दरपदन्यासक्रमः साधुशोभनं कृत्वा कथ्यते । सुभग-सुप्र-निटक्-समर्पणपरिपाटी विन्यासो वर्ण्यते । मार्ग-स्वैरविहार-पदप्रसृततयाः शब्दाः श्लेषच्छायाविशिष्टत्वेन व्याख्येयाः ॥ ५८ ॥

॥ इति श्रीराजनककुन्तकविरचिते वक्रोक्तिजीविते काव्यालङ्कारे प्रथमोऽनुमेषः ॥

भी ) स्वतन्त्रतापूर्वक विन्चार से रमणीय सभी कविरण काव्य-यात्रा करेंगे, उस किसी अलौकिक सुन्दर पदक्रम को अब आगे शोभन ढंग से कहा जा रहा है ॥ ५८ ॥

मार्गों का सुकुमार (आदि विचित्र-मध्यम) का यह त्रितय किन्हीं—महाकवियों से ही, न कि सामान्य कवियों से, प्राप्तव्य के पर्यन्तुक—प्राप्त्य प्रयोजन के उत्कण्ठितों से अनेक बार अभ्यासपूर्वक परिगत हुआ है । जहाँ—जिस मार्गत्रयी में ( वे ) किसी अपूर्व भूमि को प्राप्त कर प्रसिद्धि को पहुँच गये । अर्थात् लोकोत्तर भूमि ( आधार—प्रतिष्ठा ) को प्राप्त कर ख्याति को प्राप्त हुए । इस समय, सभी स्वतन्त्रतापूर्वक विन्चार करने से रमणीय कविगण उस मार्गत्रितय मे जिसके माध्यम से जायेंगे, वह कोई अलौकिक ही सुन्दर पदो के विन्यास का क्रम साधु-सुन्दर बनाकर कहा जा रहा है अर्थात् सुन्दर सुप्-तिङ्-समर्पित करने वाली पद्प्रतिपूर्वक विन्यास का विवेचन किया जा रहा है । मार्ग-स्वैरविहार तथा पद आदि शब्दो की इस श्लोक मे श्लेष अलङ्कार की कान्ति के वैशिष्ट्य से ही व्याख्या की जानी चाहिए ।

श्री राजानक कुन्तक द्वारा विरचित काव्य के अलङ्कार वक्रोक्तिजीवित ग्रन्थ में प्रथम उन्मेष परिसमाप्त हुआ ।

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द्वितीयोन्नेष:

सर्वत्रैव सामान्यलक्षणे विहिते विशेषलक्षणं विधातव्यमिति काव्यस्य “शब्दार्थौ सहितौ” इत्यादि ( १७ ) सामान्यलक्षणं विधाय तदवयवभूतयो: शब्दार्थयो: साहित्यस्य प्रथमोन्नेष एव विशेषलक्षणं विहितम् । इदानों प्रथमो- द्वितीयस्तस्य वर्णविन्यासवक्रतवस्य विशेषलक्षणमुपक्रमते—

एको द्वौ बहवो वर्णा बध्यमाना पुन: पुन: । स्वल्पान्तराधिकाः सोक्ता वर्णविन्यासवक्रता ॥ १ ॥

वर्णशब्दोऽत्र व्यञ्जनपर्याय:, तथा प्रसिद्धत्वात् । तेन सा वर्णविन्यास- वकता व्यञ्जनविन्यासविच्छित्ति: त्रिधा त्रिभि: प्रकारैरुक्ता वरींता । के पुनस्ते त्रय: प्रकारा इत्युच्यते—एक: केवल एव, कदाचिद् द्वौ बहवो वा वर्णा: पुन: पुनर्बेध्यमाना योज्यमाना: । कीदृशा:—स्वल्पान्तरा: । स्वल्पं स्तोक-

प्रथम उन्मेष मे वकता के छः प्रकारों का उल्लेख करते हुए उनके सामान्य लक्षण एव उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं । इस द्वितीय उन्मेष मे उन छः प्रकार के वकत्व का विशेष लक्षण करना है। उसी की भूमिका अवतरित करते हुए आचार्य कुन्तक कहते हैं—सर्वत्र ( सभी ग्रन्थ आदि मे किसी वस्तु का ) सामान्य लक्षण किये जाने के बाद ( उसका ) विशेष लक्षण करना चाहिए। इसलिए (प्रथमोन्नेष की कारिका १७ ) 'शब्दार्थीं सहितौ' इत्यादि से काव्य का सामान्य लक्षण करके उसके अवयव- भूत शब्द और अर्थ के साहिल्य ( सहभाव ) का लक्षण प्रथम उन्मेष मे ही कर दिया गया है। इस समय ( इस द्वितीय उन्मेष के प्रारम्भ मे प्रथम उन्मेष की १९वीं कारिका द्वारा ) उदिष्ट ( षड्विध वकत्व प्रकारो मे से प्रथम प्रकार ) वर्ण-विन्यास- वकता का विशेष-लक्षण प्रस्तुत कर रहे हैं—

( जहाँ पर ) थोड़े-थोड़े अन्तर से एक-दो अथवा अनेक वर्ण पुन:-पुन: निवद्ध किये जाते हैं, तीन प्रकार की वह (वकता) 'वर्ण-विन्यास-वकता' कही गयी है ॥ १ ॥

यहॉ ( इस कारिका मे ) वर्ण शब्द, व्यञ्जन का पर्याय रूप है । क्योंकि ऐसा ही प्रसिद्ध है (काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों मे) । इसलिए वर्णविन्यासवक्रता—वर्णों के विशेष विन्यास का सौन्दर्य त्रिधा—तीन प्रकारों से कहा गया है । वे तीनों प्रकार फिर हैं कौन ? इस पर कहा जा रहा है—एक-इत्यादि । केवल एक ही, और कभी दो अथवा बहुत से वर्ण बार-बार निवद्ध किये जाते हुए—संयुक्त किये जाते हुए ( होते है ) । किस प्रकार के ?—स्वल्प अन्तरयुक्त । स्वल्प—बिलकुल कम, अन्तर—व्यवधान है जिनमें

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[वक्रोक्तिजीवितम्

मन्त्रं व्यवधानं येषां ते तथोक्ताः । त एव त्रयः प्रकारा इत्युच्यन्ते । अत्र वीप्साया पुनः पुनरित्ययोगव्यवच्छेदपरत्वेन नियमः, तान्ययोगव्यवच्छेद-परत्वेन । तस्मात् पुनः पुनर् बध्यमाना एव, न तु पुनः पुनरेव बध्यमानाइति ।

तत्रैकव्यतिरिक्तनिबद्धोदाहरणं यथा—

धमिल्लो विनिवेशिताल्पकुसुमः सौन्दर्यधुर्यः स्मितं विन्न्यासो वचसां विदग्धमधुरः कण्ठे कलः पञ्चमः । लीलामन्तरतारकै च नयनै यातं विलासालसं कौतुकेन हरिणीइव शः स्मरशरापातावदातः क्रमः ॥ १ ॥

वे उस प्रकार के ( निवन्धित किये गये ) वर्ण ( वर्णविन्यासवक्रता के समर्थक होते हैं और ) वे ही तीन प्रकार ऐसे कहे जाते है । यहाँ पर अभ्यासरूप प्रयुक्त पुन -पुन इस ( त्रिलक्ति ) का अयोगव्यवच्छेदपरक के रूप मे नियम ( विषयान ) किया गया है न कि अन्ययोगव्यवच्छेदपरक के रूप मे । इसलिए ( यहाँ पुनः-पुनः बध्यमाना से तात्पर्य है ) बार-बार निवन्धित किये जाते हुए ही वर्ण ( वर्णविन्यासवक्रता के सूचक हो सकते है ), न कि बार-बार ही निबध्यमान वर्ण । यहाँ ध्यान देने की बात है कि कुन्तक ने कारिका मे ‘एव’ का उपादान नही किया है किन्तु वृत्ति मे उन्होने ‘एव’ पद प्रस्तुत कर दिया है । ‘एव’ पद किसी वस्तु का अन्य से व्यवच्छेदक होता है । उसके त्रिविध रूप कहे गये है—

‘अयोगमन्ययोगाख्यान्त्यान्त्ययोगमेव च ।

व्यवच्छिन्नत्ति धर्मस्य एककाराक्रिथा मतः ॥’

( १ ) अयोगव्यवच्छेदपरक, ( २ ) अन्ययोगव्यवच्छेदपरक एवं ( ३ ) अत्यन्ता-योगव्यवच्छेदपरक ‘एवकार’ का प्रयोग होता है । यहाँ वृत्तिकार ने ‘पुनः पुनर् ध्य-माना.’ मे प्रयुक्त वीप्सा के लिए प्रथम दो का उल्लेख किया है और कहा है कि ‘पुनः पुन’ इस द्विरुक्ति मे अयोगव्यवच्छेदपरक नियम है न कि अन्ययोगव्यवच्छेदपरक । विशेषणसहितस्लेवकारो अयोगव्यवच्छेदक —विशेषणसहित प्रयुक्त ‘एव’ अयोग-व्यवच्छेदक होता है । उदाहरणार्थ ‘देवदत्तः पीय एव’ को ले सकते है । विशेषण ‘पीय’ सज्ञत ‘एव’ इस अर्थ को व्यक्त करता है कि देवदत्त मे पीयत्व का अयोगव्यवच्छेद-

( सम्बन्धाभाव नही ) है । ‘देवदत्त मोटा ही है ! इसका नियमन हो जाता है अर्थात देवदत्त के साथ पीयता का योग अवश्य है । इसी प्रकार वीप्सा मे प्रयुक्त उक्त कारिका मे ‘पुन. पुन. बध्यमाना ( एव )’ मे एव पद अयोगव्यवच्छेदपरक अर्थ का विधान करता है और अर्थ होता है कि बार-बार निवद्धयमान ही वर्ण वर्णविन्यासवक्रता के उपपादक होते है । इसी प्रकार जब विशेष्य के साथ ‘एव’ का प्रयोग होता है तो वह अन्ययोगव्यवन्ल्छेद का नियामक होता है । जैसे उक्त उदाहरण मे ही कहा जाय ‘देवदत्तः एव पीय.’ देवदत्त ही मोटा है । यहाँ ‘एव’ पद विशेष्य स्त्वदत्त के साथ आया है जो यह व्यक्त करता है कि देवदत्त ही मोटा है और कोई नही । इस प्रकार यहाँ

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द्वितीयोऽमेषः ]

एकस्य द्वयोर्बहूनां चोदाहरणं यथा—

भगनैलावलरीकास्तरालितकदलीस्तम्भताम्बूलजम्भू- जम्बीरास्तालतालतीसरलतरलता लासिका यस्य जहः । वेल्लत्कलोलहेला बिसकलनजडा: कूलकच्छेऽपि सिन्धो: सेनासीमन्तिनीनामनवरतरताभ्यासतांन्ति समीरा: ॥ ३ ॥

एव पद देवदत्त के पीनत्व को अन्य से अलग करता है । यहाँ एव अन्ययोगव्यवच्छेद-परक नियम मे प्रयुक्त हुआ है किंतु 'पुनः पुनः' इस वाक्यांश मे पद का प्रयोग अन्ययोग- व्यवच्छेदपरक मे नही है कि उसका अर्थ किया जाय 'पुनरपि' बार-बार ही निवद्धदयमान वर्णो, वर्णविन्यासवक्रता के उपपादक होते है ।

उन ( त्रिधा वर्णविन्यासवक्रता ) मे ( स्वल्पान्तर से पुनः-पुनः निबद्ध ) एक व्यक्जन के द्वारा प्रस्तुत ( वर्णविन्यासवक्रता ) का उदाहरण जैसे—( मदनाविष्ट है, सौन्दर्यघुरीण मुस्कान है, पाण्डित्य पूर्ण एवं मधुर वचनो का विन्यास किया जाता है, कण्ठ मे मधुर पद्मम स्वर है, ऑखे विलास से मन्थर ताराओ वाली हो गयी है ( निश्श्वल है ) और विलास से उल्स्याया गमन है । इस प्रकार काम के बाणो के प्रहार से निर्मल उस मृगनयनी का ( सभो ) व्यापार कुछ अनिर्वचनीय ही हो गया है ॥ ९ ॥

यहाँ प्रथम पदमे व्यवधानेपुर्वक क्रमशः म्, स्, घ्, य् वर्णों का, द्वितीय पाद मे म्, सु, घ्, क् वर्णों का, तृतीय मे ल्, ष्, त्, न्, य्, स् वर्णों का एवं चतुर्थ पाद मे र्, ष्, त् वर्णों का पुन-पुन निबन्धन होने से यह वर्णविन्यास- वक्रता का उदाहरण है । ध्यातव्य है कि वर्णविन्यासवक्रता ही मतान्तर मे अनुप्रास अलङ्कार कही जाती है ।

एक, दो एव अनेक वर्णों की पुन-पुन आवृत्ति का उदाहरण जैसे— इलायची ( एला ) की लतिकाओ को मर्दित करने वाली, केलों के समूह, पान, जामुन एव नीमुओ के झुन्ड को केपाने वाली, ताड़-ताड़ी एव आम्रलताओं की तरलता की लास्यविधायिका, कॉपती लहरो के सौन्दर्यविलास के विशेष सस्पर्श से शीतल हवाएँ समुद्र ( नदियों ) के तटीय कछारो मे जिस ( राजा ) की सेनाओं की सुन्दरियो के निरन्तर पुनः-पुन क्रियमान सम्भोगजन्य क्लान्ति का अपहरण किया करती थी ॥ २ ॥

इष उदाहरण मे वर्णविन्यासवक्रता के तीनो उदाहरण प्रस्तुत किये गये है । लकारादि एक वर्ण की अनेक बार आवृत्ति एवं ताल्ताली जैसे दो वर्णों की पुन- पुन आवृत्ति और इसी प्रकार स्तम्भ-ताम्बूल जैसे अनेक वर्णों की पुनः-पुन आवृत्ति हो रही है । अतः यहाँ सभी के उदाहरण प्राप्य है । ध्यान देने की बात है कि, यह त्रिविध वर्णविन्यासवक्रता अन्य काव्यशास्त्री विश्वनाथ आदि की दृष्टि से छेकानुप्रास एवं वृत्यानुप्रास आदि से ही गतार्थ हो जाती है । अर्थात् मतान्तर का अनुप्रास ही यहाँ उत्त वक्रता का पोषक है ।

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एतामेव वक्रोक्तिं विच्छित्यान्तरेण विविनक्ति—

वर्गान्तयोगिनः स्पष्टो द्रुकारस्तलादयः ।

शिष्टास्तथ्र रादिसयुक्ताः प्रस्तुतौचित्यशोभिनः ॥ २ ॥

इयमपरा वर्णविन्यासवकता त्रिधा त्रिभिः प्रकारैरुक्तेति ‘च’ शब्देनाभिसम्बन्धः । के पुनरस्यास्त्रस्यः प्रकारा इत्याह—वर्गान्तयोगिनः स्पष्टोः । स्पष्टः

कादयो मकारपर्यन्तवर्गोऽस्तदन्तैः डकारादिभिर्योऽगः तथोक्तः, पनः पुनर्बध्यमानः—प्रथमः प्रकारः । तद्-उ-नादयः तकार-डकार-नकार-

प्रभृतयो द्रुकार्चारिताः द्रुगुणाः सन्तः, पुनः पुनर्बध्यमानाः—द्वितीयः । तद्-य-तिरिक्ता: शिष्टास्तरच व्यज्जनसंज्ञा ये वर्णास्ते रेफप्रश्रितिभिः संयुक्ताः, पुनः

इसी ( वर्णविन्यास की ) वकता को अन्य विच्छित्ति के द्वारा विवेचित करते है—वर्गान्तेत्यादि से ।

वर्ण्यमान वस्तु के औचित्य से सुन्दर तथा ( स्वस्पान्तर से पुनः-पुनः निवन्ध्यमान )

( १ ) अपने वर्ग के अन्तिम वर्ण से युक्त स्पष्ट ( कादयो मावसाना: स्पष्टोः—के अनुसार स्पष्ट क से लेकर म तक के पाँचों वर्गों के सभी वर्ण स्पष्ट कहे जाते है ) ( २ )

द्रुक्ष्त, त, ल तथा न आदि वर्णों से संयुक्त रूप ( मे जहाँ स्वस्पान्तर से पुनः-पुनः निवन्धित किये जायें वहाँ वर्णविन्यासवकता का दूसरा सौन्दर्यप्रकार होता है ) ॥ २ ॥

यह दूसरी वर्णविन्यासवकता त्रिधा—तीन प्रकार से कही गयी है, यह सम्बन्ध ( कारिका मे प्रयुक्त ) ‘च’ शब्द से ज्ञात होता है । फिर वे तीन प्रकार है कौन ? इस पर कहते है—वर्ग के अन्त ( वाले वर्ण से ) संयुक्त स्पष्ट वर्ण । स्पष्ट है ‘क’ से

प्रारम्भ कर ‘म’ तक के वर्गे ( कवर्ग-पवर्ग, पाँचों वर्ग ) डकार, डकार आदि उन ( वर्गों ) के अन्त के वर्णों से योंग-सयोग जिन वर्णों का हो तयोग ( वर्गान्तयोगी स्पष्टो ), पुनः-पुनः निवन्धित किये जाते है जहाँ वह भी ( वर्णविन्यासवकता का विच्छित्यान्तर का ) प्रथम प्रकार है । त-ल-न आदि-तकार, लकार, नकार आदि वर्ण

द्रुक्ष्त—दो बार उच्चारित-द्रुगुण होकर ( जहाँ ) बार-बार निवन्ध्यमान हो वह दूसरा प्रकार है । और उन ( वर्गान्तयोगी स्पष्टो एवं द्रुक्ष्त-त-ल-न आदि ) से व्यतिरिक्त—अवशिष्ट व्यज्जनसंज्ञ जो वर्ण है वे रेफ ( रकार ) आदि से संयुक्त होकर बार-बार

( जहाँ ) निवन्धित किये जा रहे हों ( वहाँ ) तीसरा प्रकार होता है । थोड़े अन्तर—परिमित्त व्यवहार से ही निवन्धित हो, इसका सम्बन्ध सभी ( उत्त तीनो प्रकारों ) से

है । और वे कैसे हो ?—प्रस्तुत औचित्य से सुन्दर । प्रस्तुत—वर्ण्यमान वस्तु, उसका न कि केवल वर्णों की सर्वस्नता की आसक्ति मात्र से उपनिबद्ध ( तथा इस प्रकार )

प्रस्तुत वस्तु के औचित्य को मलिन करने वाले ( वर्णों का उपस्करण-निबन्धन अभीष्ट है ) । प्रस्तुत वस्तु के उचित भाव की शोभा के सर्जक होने के कारण कहीं-कहीं कठोर रसों

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द्वितीयोन्मेषः ]

१४५

पुनर्बन्ध्यमाना:—ऋतीयः । स्वल्पान्तरा: परिमितत्ववहिता इति सर्वेषाम्-

भिसम्बन्धः । ते च कीटशा:—प्रस्तुतौचित्यशोभिनः । प्रस्तुतं वण्येमानं वस्तु

तस्य यदौचित्यमुचितभावस्तेन शोभन्ते ये ते तथोक्ता । न पुनर्वणीसावर्ण्ये-

व्यसनितामात्रेणोपनिबद्धा:, प्रस्तुतौचित्यम्लानकारिणः । प्रस्तुतौचित्य-

शोभितवात् कुतश्चित्परुषप्रस्तावेतादृशाननेवाभ्यनुजानाति । तत्र प्रथम-

प्रकारोदाहरणं यथा—

उन्निद्र-कोक-नद-रेणु-पिशङ्गिताझा गुञ्जन्ति मञ्जु मधुपाः कमलाकरेषु । एतच्चकार्तिक च रवेर्नवबनुजजीव- पुष्पच्छदाम्बुदयाचलचुम्बिविन्दुम् ॥ ३ ॥

यथा च—

कदलीस्तम्भताम्बूलजम्बूजम्भीराः इति ॥ ४ ॥

यथा वा—

सरस्वतीहृदयारविन्दमकरन्दविन्दु सुन्दोहसुन्दरराणाम , इति ॥ ५ ॥

( वीर, वीभत्स, रौद्र एव भयानक ) के प्रसङ्ग मे उसी प्रकार के ( परुष ) वर्णों को ( रचनाकार ) समझता है ( और उन्हीं का प्रयोग करता है, किन्तु कोमल रस शृङ्गार आदि मे वह परुष वर्णों का प्रयोग नहीं करता, क्योंकि उनसे प्रस्तुत के औचित्य की शोभा नही हो पाती ) ।

उनमे से प्रथम ( स्वर्गीय अन्यवर्ण से संयुक्त स्पर्शवर्णों की पुनःपुनः आवृत्ति-

रूप भेद का उदाहरण जैसे—

विकसित रक्त कमलों की पराग से पीले अञ्जलि वाले भ्रमरगुन्जित कमलवनों मे मनोहारी गुञ्जन कर रहे है और यह सूर्य का उदयगिरिस्पर्धी तथा अभिनव बन्युजजीव ( दुपहरिया ) पुष्प की आभा सदृश कान्ति वाला मण्डल प्रकाशित हो रहा है ॥ ३ ॥

( यहाँ उन्निद्र, पिशङ्गिताझा, मञ्जु, गुञ्जन्ति, चुम्बि, विम्बम मे गकारादि स्पर्शो

एवं वर्गान्त वर्णों का संयुक्त रूप मे प्रयोग है । अत यह वर्णविन्यासवक्रता के प्रथम भेद का उदाहरण है ) ।

इसका दूसरा उदाहरण जैसे इसी उन्मेष की उदाहरण स० २, के अंश—

'कदलीस्तम्भताम्बूलजम्बूजम्भीराः:' आदि मे है ।

अथवा जैसे उसे कोमल रस की १६ वीं

कारिका का वृत्तिभाग—

'सरस्वतीहृदयारविन्दमकरन्दविन्दु सुन्दोहसुन्दरराणाम'—मे है ।

द्वितीय प्रकार के वर्णविन्यासवक्रता का उदाहरण जैसे—प्रथम उन्मेप के उदा-

हरण स० ४१—'प्रथमप्रणच्‍छादय्'—आदि के द्वितीय एवं चतुर्थ पाद मे—'दृश्ना-

स्तनलादर्श.—के अनुसार यहाँ, त, ल, न, च, छ की द्विसक्ति पायी जाती है ।

९०

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१४६

द्वितीय प्रकारोदाहरणं—

प्रथममरुणच्छायः ॥ ६ ॥

इत्यस्य द्वितीयचतुथौपादौ ।

तृतीयप्रकारोदाहरणस्यैव तृतीयपादः । यथा वा—

सौन्दर्येधुर्ये स्मितम् ॥ ७ ॥

यथा च ‘कह्लार’—शब्दसाहचर्येण ‘ह्लाद’—शब्दप्रयोगः । परुषरसप्रस्तावे तथाविधसंयोगोदाहरणं यथा—

उत्ताभ्यतांलवृत्त प्रतिपति तरुणावंशवौ तापतन्री-

मद्रिद्रोणीकुट्टिरे कुरहरिणि हरिणारातयो यापयन्ति ॥ ८ ॥

एतामेव वैचित्र्यान्तरेण व्याचष्टे—

क्वचिदध्ववधानेडपि मनोहारिनिबन्धना ।

सा स्वराणामसारूप्यात् परां पुष्णाति वक्रताम् ॥ ९ ॥

क्वचिदनुप्रासप्रायवाक्यैकदेशे कस्यचित्‌चिदद्वयवधानेडपि व्यवधाना-

इसी वर्णविन्यासवक्रता का ( रसादि संयुक्त स्पष्टीकरण का पुनः-पुनः निवन्धन रूप ) तृतीय प्रकार का उदाहरण जैसे—इसी श्लोक का तीसरा पाद ( जहाँ 'प्र, आदि का निवन्धन है । यह पूरा श्लोक इस प्रकार है—

प्रथममरुणच्छायस्तनावत्तत् कनकप्रभः

तदनु विरहोत्तापभय्तन्वीकोप्ततलव्युति ।

प्रसरति ततो ध्वान्तक्षोदलक्ष्मः क्षणदामुखे

सरसविसिनीकन्दच्छेदेच्छविर्मुगललाञ्छनः ॥

अथवा जैसे ( इसी उन्मेष के प्रथम उदाहरण के प्रथम पद के अंश—

सौन्दर्येधुर्ये स्मितम् ॥ ७ ॥

मे र का य से दो बार संयog वर्णित है ) ।

और जैसे 'कह्लार' शब्द के सामीप्य मे निवद्ध 'ह्लाद' शब्द के प्रयोग ( मे 'हू' एवं 'ल' के संयog रूप वर्णविन्यासवकता के तृतीय भेद का उदाहरण पाया जाता है ) ।

कठोर ( वीर, रौद्र, भयानक आदि ) रस के प्रकरण मे उसी प्रकार के ( तदनु-

कूल पुरुष वर्णों के ) संयog का उदाहरण जैसे—

सूर्य के अत्यन्त तपने पर अतिशय नटक्ती तनुओ वाले मृग-शालु सिंह ( सूर्य की ) किरणों से उत्पन्न ताप की तन्द्रा को गुहाओं वाली छोटी कुट्टियो जैसी पर्वत की घाटियों मे बिताया करते हैं ॥ ८ ॥

यहाँ पुरुष रस भयानक के अनुकूल, त, प, र, द, ह आदि वर्णों का संयog एवं आवर्तन प्रस्तुत किया गया है । अतः यह भी वर्णविन्यासवक्रता के तृतीय प्रकार का उदाहरण है ।

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भावेऽप्येकस्य द्वयोः समुदयोरेच बहूनां वा पुनःपुनर्वेध्यमानानामेषां मनोहारिनिबन्धना हृदयावर्जकविन्यासा भवन्ति । काचिदेवं संपद्यत इत्यर्थे । यमकङ्यवहारोक्त न प्रवर्त्तते, तस्य नियतस्थानतया व्यवस्थानात् । स्वरैरव्यवधानमत्र न विवक्षितम्, तस्यातुपपत्तेः । तत्कैस्यालव्यवधानोदाहरणं यथा—

वां कज्जलवद्दिलोचनतुरोरोहद्रिसारिस्थानम् ॥ ९ ॥ द्वयोर्यथा— ताम्बूलनीद्धसुगन्धकसृकतरुतलसस्तरे साजुगाभिः पायं पायं कलाच्चितकदलदलं तारिकेलिफलाम्भः । सेव्यन्तां व्योमयात्राश्रमजलजलितः सैन्यसीमन्निर्निभ- दात्ल्यूहव्यूहकेलिकलितकुहकुहरावकान्ता वनाान्ता ॥ ११९० ॥

इसी वर्णविन्यासवक्रता को अन्य वैचित्र्य के माध्यम से प्रस्तुत करते है— कहीं-कहीं वर्णों के व्यवधान न होने पर भी ( पुनः-पुनः निवध्यमान वर्णों की ) मनोहारी वर्णन तथा ( कहीं कहीं ) स्वरों का असादृश्यतथा ( पुनः-पुनः निवन्धन ) होने से वकता की परम पुष्टि होती है ॥३२॥

कहीं अनिश्चितप्राय किसी वाक्य के एक अंश में अव्यवधान-व्यवधान न रहने पर भी पुनः-पुनः निवध्यमान, एक अर्थवा समाहित दो या अनेक वर्णों के मनोहारी निवन्धन-हृदय को आवर्जित करने वाले विन्यास होते है । अर्थात् कोई ही वकता इस प्रकार से संपन्न होती है—यह भाव है । ( व्यञ्जनों की आहृति में यमक अलङ्कार भी होता है, अतः कोई कह सकता है कि यहाँ पर भी यमक अलङ्कार ही होना चाहिए ? इसी का उत्तर देते है । ) यहाँ यमक का व्यवहार प्रवृत्त नही होगा, क्योंकि उसकी आहृति ( किसी वाक्य के आदि, मध्य अथवा अन्त रूप ) नियत स्थान मे ही स्थित होती है ( किन्तु यहाँ इस प्रकार की कोई भी बात नही है ) । स्वरों से होने वाला अव्यवधान यहाँ विवक्षित नही है, क्योंकि वह अनुपयुक्त होगा ( अतः मात्र व्यञ्जनों के व्यवधान की ही यहाँ विवक्षा है ) । उनमे भी व्यवधानरहित एक वर्ण की आहृति का उदाहरण जैसे—( उदाहरण ९१४८ का प्रथम चरण वाला भाग ) अर्धनारीश्वर भगवान् शङ्कर का अद्भुत शरीर ‘कज्जलयुक्त वाम नेत्र वाला एवं बढ़ते हुए विस्तृत स्तन से युक्त है’ ॥ ९ ॥

यहाँ पर ‘कज्जल’ पद मे व्यवधानरहित एक वर्ण ‘ज’ की आहृति हुई है । वर्णों की पुनः-पुनः आहृति का उदाहरण जैसे—( श्लोक बालरामायण ( १।६३ ) का है । रावण सीतास्वयम्बर मे मिथिलापुरी मे आया है । अपनी सेनाओं के अधीश्वरों को आदेश दे रहा है— पान की लताछे से वेष्टित मनोहारी सुपारी के वृक्षों के नीचे आसनो ( पर बैठी हुई ), मोड़कर केले के पत्तो मे नारियल के फल के रस को बार-बार पान करती हुई,

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यथा वा—

अथ पिबत चकोरा: ऋतस्नुह्नाम्य कण्ठान् ऋमुकबलनचतुचतुचवचवश्रान्त्रिकाम्प: । विरहविधुरितानां जीवितत्राणहेतोर्भेति हरिणलक्ष्मा येन तेजो दरिद्र: ॥ ११ ॥

बहूनां यथा—

सरलतरलतया लासिका ॥ इति ॥ १२ ॥

अपि शब्दालङ्कारादृष्टव्यवधानडप !

द्वयोर्यथा—

स्वस्था: सन्तु वसन्त ते रतिपतेःप्रेसरा वासरा: ॥ १३ ॥

साथ-साथ अनुगमन करती हुई सैन्य-सुन्दरियों आ काशागमन से उत्पन्न पसीनों को सुखा देने वाले तथा महोख अथवा पडुकी चून्दों की क्रीडा मे होने वाले ललित कुछ-कुछ ध्वनि से रमणीय वनप्रदेशों का सेवन करे ॥ १० ॥

( यहाँ पायं पाय, कदलदलं आदि मे अव्यवधानपूर्वक दो-दो वर्णों की आवृत्ति है । अतः वर्णविन्यासवकता का उदाहरण है । कुछ टीकाकार यहाँ व्यवधानयुक्त का उदाहरण मानते हैं । वह भ्रान्तिवश प्रमाद ही है । ‘दातू’ पद का अर्थ कोयल, चातक अथवा कोई कोई भी उपयुक्त नही है; वस्तुतः महोख पक्षी जो कुछ भूरा होता है और कुछ-कुछ की ध्वनि करता है वही उपयुक्त है, जो कि अमरकोप आदि से भी ठीक बैठ जाता है । पेडकी पक्षी भी श्वेत-भूरा और कुछ-कुछ की ध्वनि करता है । ) अथवा इसी का दूसरा उदाहरण जैसे—वही बालरमायण ( ५।७३ ) से है । उन्मत्त रवण सीता के प्रेम-विरह मे विहलल चन्द्रिका को न सह सकने के कारण कह रहा है—“सुपारी वनों मे घूमने के कारण चमकती चोचवाले हे चकोरे ! वियोग-पीडित लोगों की प्राणरक्षा हेतु अपने कण्ठो को ऊपर उठाकर समस्त जोन्हाई रूप जल को पी जाओ जिससे यह मृगाङ्क चन्द्रमा प्रभावहीन हो जाय ( और अस्मद्‌दृश विरहीजनों को पीडित न करे ) ॥ ११ ॥

( अव्यवधान मे ) अनेक वर्णों की ( पुनः-पुनः आवृत्ति का ) उदाहरण जैसे—सरलतरलतया लासिका ( आदि १२ के उदाहरण भाग मे ल, त वर्णों की ( पुनः पुनः आवृत्ति हुई है ) ॥१२॥

कारिका मे उपात्त ‘अपि’ शब्द से ( सूचित होता है कि ) कहाँ-कहीं व्यवधान रहने पर भी ( एक, दो अथवा अनेक वर्णों की पुन्-पुन् आवृत्ति मे वर्णविन्यास-चकता संभव है ) ।

व्यवधान मे दो वर्णों की आवृत्ति का उदाहरण जैसे—

'हे वसन्त रति के स्वामी कामदेव के अग्रेसर तुम्हारे दिवस प्रसन्न हो ॥ १३ ॥ यहाँ ‘अग्रेसरा वासरा' मे वा वर्णविहित व्यवधान से ‘रा:’ पद की पुनः आवृत्ति हुई है ।

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द्वितोयन्मेपः ]

१४९

बहूनां व्यवधानेऽपि यथा—

चकितचकितकमेचकविचिते वर्षात्यये ॥ १४ ॥

सा स्वराणामसारूप्यात् सेयमनन्तरोक्ता स्वरानामकारादीनामसारूप्याद्‌दशादृश्यात् क्वचिद्वर्णसादृश्याद्‌वर्ततेमानसमुदायैकदेशे परामन्यों वक्रतां कामपि पुष्णाति पुष्टयतीत्यर्थः ।

यथा— रजीव जीवितेश्वर ॥ १५ ॥

यथा वा— धूसर सरिति इति ॥ १६ ॥

यथा च—

स्वस्था सन्तु वसन्त । इति ॥ १७ ॥

यथा वा— ताल्ताली । इति ॥ १८ ॥

सोडयमुभयप्रकारोऽपि वर्णविन्यासवक्रताविशिष्टवाक्यविन्यासो यमकभास सन्निवेशविशेषो मुक्ताकलापमध्यप्रोतमणिमयकपदकबन्धवनधनुर्हुरः सुतरां महद्‌यहृद्‌यहारीतां प्रतिपचते । तदिदं मुक्तकम्—

वर्णों के व्यवधान मे अनेक वर्णों की आवृत्ति जैसे—वर्णो के समाप्त हो जाने पर ( जव ) उत्कण्ठित चातकों से आकर्षा श्यामवर्ण कर दिया गया ।

( यहाँ चू क त आदि अनेक वर्णों का व्यवधान मे पुनः-पुन आवृत्ति का उदाहरण है ।

वह स्वरो के असारूप्य—वह यह अभी-कभी कही गयी स्वरो—अकार आदि के असारूप्य—असादृश्य से कही—किसी भी आवर्तमान ( व्यञ्जन ) समूह के एकाश मे दूसरी—अपूर्व किसी अन्य प्रकार की वक्रता को पोषित करती है—पुष्ट करती है यह भववर्थ है ॥ १४ ॥

जैसे—राजीव जीवितेश्वर 'इत्यादि' मे 'जीव-जीवि' वर्णसमुदाय की आवृत्ति हुई है । इसमें 'व' के स्वरो मे असमानता है । एक मे 'अ' स्वर है दूसरे मे 'इ' ॥ १५ ॥

अथवा जैसे—'धूसर सरिति' मे 'सर-सri' वर्णसमुदाय की आवृत्ति मे भी पूर्ववत् स्वर भेद है ॥ १६ ॥

अथवा जैसे इसी उन्मेष के उदाहरण सं० ३ के अंशा 'स्वस्था' सन्तु वसन्त मे 'सन्तु-सन्त' की आवृत्ति मे 'त' के स्वरो मे असारूप्य है ॥ १७ ॥

अथवा जैसे इसी उन्मेष के उदाहरण सं० २ के द्वितीय पाद के अंशा 'ताल्ताली' मे स्वरभेद है ॥ १८ ॥

दोनो ही प्रकार ( व्यवधान अथवा अव्यवधान रूप वर्णों की आवृत्ति मे निवन्धित ) की वह यह वर्णविन्यासवक्रता से मुक्त विशिष्ट वाक्य का विन्यास, यमकाभास, सन्निवेश विशेष है ( जो ) मोती की लरी के बीच पिरोये गये मणिनिर्मित पुलकरचना के समान कोमल पदो की संरचना से रमणीय अत्यन्त ही सहृदय-हृदय की हारिता को प्राप्त हो जाता है । तो इसे को ( १।१५ मे ) कहा भी गया है—

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'नाप्यपेशलभूषिता' न चाप्यपेशलैररुकुमारैररलंकृता । यथा— शीणेग्रामाणि । इति ॥ २१ ॥

तदेवं कीटशी ताहिं कर्लयेय्याह—पूर्ववृत्तपरित्यागनूतनानावर्त्तोज्ज्वला । पूर्वमावृत्तनां पुनः पुनर्विरचितानां परित्यागेन प्रहाणेन नूतनानामभिनवानां वर्णानामावर्त्तनेन पुनः पुनः परिम्रहेण च । तदेवसुभाष्यां प्रकाराभ्यामुज्ज्वला भ्राजिष्णु । यथा— एतां पदय पुरस्तटीमिह किल क्रीडाकिरातो हरः कारण्डवन् किरीटिनो सरभसं चूडान्तरे ताडितः । इत्याकरण्य कथाॅसुतं हिमनिधावद्रौ सुभद्रापते- मेन्द्रं मन्त्रमकारि यत् निजयोधैर्दण्डयोरमण्डलम् ॥ २२ ॥

यथा वा— हंसानां निनदेषु । इति ॥ २३ ॥

यथा च— एतन्मन्दविपक्व इत्यादौ ॥ २४ ॥

'शीणेग्रामाधिपाणीन् व्रणिभिरपघनैनैर्धरराव्यक्तक्वोपान् दीर्घाघातानतौधेै पुनरपि घटयत्येक उल्कायन य । घर्मोढोत्सङ्ग यो निस्तदिगुणाधनाध्वाननिर्धूतचक्रे- दर्त्तार्था: सिद्धसड् घैविदघतु घृणय: श्रीमहोविषयतम् ॥ पूरे श्लोक मे अपेक्षाल वर्णों की अनेकधा आत्तृक्ति की गयी है ॥ २१ ॥

तो फिर ऐसे मे किस प्रकार की वर्णविन्यासवक्रता करनी चाहिए ? इस पर कहते है—पूर्वी आावृत्त वर्णों का परित्याग एवं नूतन आःवर्तन से उज्जवल ( करनी चाहिए )। पहले आावृत्त किये गये—बार-बार विरचित ( वर्णों ) के परित्याग—प्रहाण से नूतन—अभिनव वर्णों के आवर्त्तन—पुनः-पुनः परिम्रहण से, इस प्रकार दोनों ही प्रकारो से उज्जवल प्रकाशमान ( वर्णविन्यासवक्रता का निबन्धन करना चाःहिए )। जैसे— यहाँ कीरटी अर्जुन ने भतुप्रे कृत्रिम किरात भगवान् शिव के मस्तक पर वेगपूर्वक प्रहार किया था । इस प्रकार हिमालय पर सुभद्रापति अर्जुन की इस अद्भुत कथा को सुनकर जिन ( भगवान् शिव ) ने धीरे-धीरे अपनी सुध ओ के मण्डल को बनाया ॥ २२ ॥

यहाँ पकारादि वर्णों की आावृत्ति कर क्रमधा: उनका परित्याग करते हुए ककार आदि नवीन वर्णों का उपादान किया गया है । अथवा जैसे—'हंसानां निनदेषु' इत्यादि उदाहरण ( १।७३ ) मे भी नकार, ककार आदि वर्णों का उपादान एवं परित्यागपूर्वक विन्यास किया गया है ॥ २३ ॥

और जैसे—'एतन्मन्द विपक्व' इत्यादि उदाहरण ( १।१०७ ) मे भी 'म' आदि का उपादान—परित्याग किया गया है ॥ २४ ॥

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यथा वा—

णमह दसाणणसरहसकरतडिअबलन्तसेल्मअविहलं वेभंथोरथणहरहरकअकंठगहं गोरि ॥ २५ ॥ नमत दशाननसरभसकरतुलितचलच्छैलभयविहलाम् । वेपमानस्थूलस्तनभरहररकृतकण्ठगहां गौरीम् ॥ इति च्छाया ॥ २५ ॥ एवमेतां वर्णविन्यासवक्रतां व्याख्याय तामेवोपसंहरति— वर्णच्छायानुसारेण गुणमार्गानुवर्तिनी । वृत्तिर्वैचिच्ययुक्त्ति सैव प्रोक्ता चिरन्तना: ॥ ५ ॥ वर्णानामक्षराणां या छाया कान्ति: श्रृङ्गयतादिगुणसम्पत्, तथा हेतुभूतया यदनुसारेणतुसार: प्राप्यस्वरूपालुप्रवेशस्तेन । गुणानां माधुर्यादीन मार्गानुस्च सुपुमारप्रभृतितानुवर्त्तते या सा तथोक्ता । तत्र गुणानामान्तरतम्यात् प्रथमोपन्यास्तम्, गुणद्वारेणैव मार्गानुसरणोपपत्ते: । तदयमर्थार्थ:—यदप्येषा वर्णविन्यासवक्रता वक्ख्यानच्छायानुसारेण, तथापि प्रतिनियतगुणविशिष्टानां

अथवा जैसे—

दशावदान रावण के द्वारा अकस्मात् हस्त पर उठाये गये हिलते हिमालय के कारण भय से व्याकुल तथा काँपती हुई स्तनों के भार से भगवान् राक्षसराज के गले में लिपटी पार्वती को नमत्कार करे ॥ २५ ॥

यहाँ भी नकार आदि कर ग्रहण—परित्यागपूर्वक विल्यास होने से पूर्वोक्त वकता का सादृश्य है । कवित्क की उक्त कारिका को कुछ हद तक आनन्दवर्धन की उक्ति, अलङ्कार की सार्थकता विषयक प्रतिपादिका, निम्न से समीकृत किया जा सकता है—

विवक्षा तत्परत्वेन नादित्वेन कदाचन । काले च ग्रहणत्यागौ नातिनिर्वन्धणौषिता ॥ निर्युङ्गदावपि चाङ्गत्वे यत्तेन प्रत्यवेक्षणम् । ख्व० २१८-९९ ॥

इस प्रकार इस ( उपयुक्त ) वर्णविन्यासवक्रता की व्याख्या कर ( अब ) उसी का उपसंहार करते है—

वर्णों की कान्ति के माध्यम गुणों तथा मार्गों का अनुवर्तन करने वाली वह वर्ण-विन्यासवक्रता ही प्राचीनो (आचार्य उद्भट आदि ) से वृत्तियों के सौन्दर्य से समन्वित कही गयी है ॥ ५ ॥

( ध्यान देने की बात है कि आनन्दवर्धन ने कहा है कि प्राचीनो को ध्वनितत्त्व स्फुरित नही था; इसीलिए उन्होंने 'रीतिरात्मा काव्यस्य' जैसे मत चलाये थे—

'अरस्कटसरितं काव्यतत्त्वमेतद्र्योदितम् । अशक्नुवद्भिर्योङ्कर्तु रीतय:' सम्प्रवर्तिता: ॥' ध्वन्यालोक ॥

वामन की वैदर्भी, गौडी एवं पांचाली रीतियों को आचार्य मम्मट एवं ध्वनिकार ने भी इत्यनुप्रःस के त्रिविध भेद उपनागरिक, परुषा एवं कोमला मे अन्तर्भूत कर लिया है—

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द्वितीयोऽनुवेषः ]

मार्गाणामनुवर्तने द्वारेण यथास्वरूपानुप्रवेशं विधायति तथा विधातव्येऽपि ते । तत् एव च तस्यास्तत्रिबन्धना प्रवृत्तताः प्रकाराः समुल्लसन्ति । चिरन्तनैः पुनः सैव स्वातन्त्र्येण वृत्तिवैचित्र्ययुक्तैः प्रोक्ता । वृत्तीनामुपनागरिकादीनां यदू वैचित्र्यं विचित्रभावः स्वानुप्राससंघ्याभेदभिन्नत्वं तेन युक्ता समन्वियन्तेति । चिरन्तनैः पूर्वसूरिभिरभिहिता । तदिदमत्र तात्पर्यम्—यदस्याः सकलगुणस्वरूपानुसरणसमन्वयेन सुकुमारादिमार्गानुवर्तनायत्तवृत्तेः पारतन्त्र्यमप-रिगणितप्रकारत्वं चैतदुभयमप्यवश्यम्भावि, तस्मादपारतन्त्र्यं परिमितप्रकारत्वं चेति नातिचित्रमुपरम् ।

केपाचिदेता वैदर्भीप्रधाना रीतयो मताः ॥ कारिका प्र० ८१८ ॥

ये तीनों रीतियाँ—दुर्जनियाँ, कुमतिः माधुर्ये, ओज एवं प्रसादगुणो के व्यक्‍क व्यञ्जक वर्णों के दिन्न्याम में ही होती है । और उन्हीं में कुन्तक ने अपने त्रिविध मार्गों का प्रतिपादन भी किया है । अतः इस कारिका से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वृत्ति, मार्ग एवं गुण कुन्तक की दृष्टि में लगभग एक ही तत्त्व के दृष्टिभेदपरक विवेचनमात्र है ।

वर्ण—अक्षरों की जो छाया-कान्ति, ( जो ) श्रव्यत्व आदि गुण-सम्पत्तियुक्त होती है, हेतुभूत उस कान्ति के द्वार जो अनुसरण—अनुगमन, अर्थात् प्रासाद्य अभीष्ट वन्तु के स्वरूप में प्रवेश उसके द्वारा, गुणों-माधुर्य आदि तथा सुकुमार आदि मार्गों का जो अनुरवर्त्तन करती है तथोक्त—गुणमार्गानुवर्तिनी ( वर्णविन्यासवक्रता ) । ( गुणों को ही प्रथम उपादान क्यों किया ? ) वेहि—गुणमार्गानुवर्तिनी पद में—गुणे में अनन्तरमतता होने के कारण ( उनको ) प्रथम उपन्यास किया गया, क्योकि गुणों के द्वारा ही मार्गों का अनुसरण उपयुक्त होता है ( अतः मार्ग का वाद में और गुण का प्रथमोपादान किया गया है । तो यहाँ यह अर्थ है—यद्यपि यह वर्णविन्यासवक्रता व्यञ्जनों की कान्ति के अनुसरण से ही निष्पन्न होती है तथापि नियतगुणविशिष्ट प्रत्येक व्यक्‍क व्यञ्जनों की कान्ति के अनुसरण से ही निष्पन्न होती है तथापि नियतगुणविशिष्ट प्रत्येक व्यक्‍क व्यञ्जन के मार्गों के अनुरवर्त्तन के द्वारा जिस प्रकार से ( वस्तु के ) स्वरूप में अनुप्रवेश कर लेती है वैसी ( वर्णविन्यासवक्रता ) करनी चाहिए । और उसी से उस ( वर्णविन्यासवक्रता ) के मार्ग को लेकर निबन्धित किये गये अनेको प्रकार समुल्लसित होते है । और वही चिरन्तन ( प्राचीन ) आचार्यों के द्वारा स्वेच्छापूर्वक वृत्तिवैचित्रयुक्त कहे गयी है । उपनागरिका आदि वृत्तियों का जो वैचित्र्य—विचित्र भाव अर्थात् स्वरूपगत संख्याभेद की विशिष्टता, उससे युक्त-समन्वित होती है ऐसा प्राचीन—पहले के विद्वानों उद्भट आदि के द्वारा कहा गया है । तो यहाँ यह तात्पर्य है—( माधुर्य आदि ) समस्त गुणों के जो स्वरूप है, उनके अनुरवर्त्तन के समन्वय द्वारा सुकुमार आदि मार्गों के अनुरवर्त्तन के अधीन स्वरूपवती इस ( वर्णविन्यासवक्रता ) की परतन्त्रता तथा तथा असंख्य प्रकटता यह दोनो ही होना अवश्यम्भावी है । इसलिए अपरतन्त्रता तथा सीमित प्रकारता ( दोनो ही इसके विषय में कथन ) बहुत ठीक नही है ( अर्थात वर्णविन्यासवक्रता गुणो एवं मार्गों पर अवलम्बित है, तदर्थीन है और गुण तथा मार्गों के अनन्त भेद संभव है । अतः उसके भी अनन्त भेद हो सकते है ) ।

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

नतु च प्रथममेको द्वावित्यादिना प्रकारेण परिमितान् प्रकारान् स्वतन्त्रत्वं च स्वयमेव व्याख्यातुं किमेतदुक्तमिति चेत्‍रैप दोषः, यस्माल्लक्षणकारैस्य कस्यचिदपदार्थस्य समुदायपरायत्तत्त्वे परवयुत्पत्तौ प्रथममपोद्वारबुद्ध्या स्वतन्त्रतया स्वरूपमुल्लिख्यते। ततः समुदायान्तर्भावो भविष्यतीत्यलमति-प्रसङ्गेन।

येयं वर्णविन्यासवक्रता नाम वाचकलाङ्कृतिः स्थाननियमाभावात् सकलवाक्यस्यैव विषयत्वेन समासंगता, सैव प्रकरणान्तरविशिष्टा नियतस्थानतयोपनिबध्यमाना किमपि वैचित्र्यान्तरमबन्धनातीयाह—

समानवर्णमन्यार्थं प्रसादि श्रुतिपेशलम् । औचित्ययुक्तमादि नियतस्थानशोभि यत् ॥ ६ ॥

यमकं नाम कोऽङ्गस्याः प्रकारः परिदृश्यते।

स तु शोभान्तराभावादिह नाति प्रतन्यते ॥ ७ ॥

( प्रश्न हो सकता है कि ) पहले तो ‘एको द्वौ बहवो’ आदि के द्वारा स्वयं ही आप एक, दो इत्यादि प्रकार से नियत भेदो तथा उसके स्वतन्त्रता की व्याख्या कर यह ( उसकी स्वतन्त्रता तथा अपरिमित प्रकारता ) क्या कह दिया ? यदि ऐसा कहा जाय तो ठीक है । मेरा यह कथन दुष्ट नही है, क्योकि लक्षणकार दूसरो को व्युत्पत्ति कराने के लिए समुदाय पराधीन जिस किसी भी पदार्थ का ( समुदाय से उसे ) पृथक् करने के विचार से पहले तो स्वतन्त्र रूप से ( उसका ) स्वरूप प्रतिपादित करते है । और उसके बाद तो समुदाय मे उसका अन्तर्भाव हो ही जायगा । ( इसलिए पूर्व-प्रतिपादित वर्णवक्रता के भेद का परिगणन गुणमार्गीयत्व उसके स्वतन्त्र स्वरूप का विवेचन करने के लिए है । न कि नियत भेद प्रतिपादन के लिए । ) अत अधिक विस्तार ठीक नही ॥ ५ ॥

जो यह वर्णविन्यासवक्रता नामक शब्दो की अलङ्कृति स्थान नियम के बिना ही ( श्लोक रूप ) समस्त वाक्य के विषय के रूप मे प्रतिपादित की गयी वही अन्य प्रकार से विशिष्ट ( यमकयुक्त ) होकर नियत स्थान के रूप मे उपनिबन्धित की जाती हुई किसी और ही सौन्दर्य का संयोजन करती है। इसलिए अब आगे की कारिका से यमकस्वरूप वर्णविन्यासवक्रता को ही—समान-इत्यादि से कहते है—

समान वर्णों वाले तथा ( प्रकृत से भिन्न ) अन्य अर्थवाले, प्रसादगुणयुक्त, सुनने मे रमणीय, औचित्ययुक्त, आदि ( मध्य तथा अन्त ) आदि नियत स्थान से विभूषित जो यमक नाम का इस ( वर्णविन्यासवक्रता ) का कोई और भेद देखा जाता है ( पूर्वप्रतिपादित सौन्दर्य के अतिरिक्त ) अन्य शोभा से सहित होने के कारण वह अधिक विस्तार से यहाँ प्रतिपादित नही किया जा रहा है ॥ ६-७ ॥

'इस ( वर्णविन्यासवक्रता ) का कोई ही प्रकार देखा जाता है।' इसका—पूर्वोक्त ( वर्णविन्यासवक्रता ) का कोई अपूर्व ही प्रभेद प्रतीत होता है। यह कौन ( भेद )

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द्वितीयोन्मेषः ]

'कोडप्यस्या: प्रकार: परिदृश्यते'। अस्या: पूर्वोक्ताया:, कोडप्यपूर्वे: प्रभेदो विभाध्यते। कोडप्यविच्छेद—यमकं नाम। यमकमिति यस्य प्रसिद्धि:। तच्च कीटशम्—समानवर्णम्। समाना: स्वरूपा: सहशश्रुतया वर्णा यस्मिन् तत् तथोक्तम्। एवमेकस्य द्वयोरहूनां सहशश्रुतीनां व्यवहितमध्यवहितं वा यदुपनिबन्धनं तदेव यमकमित्युच्यते। तदेवमेकरूपे संश्यानद्रये सत्यापि अन्यार्थ—भिन्नाभिधेयम्। अन्यच्च कीटशम्—प्रसादि प्रसादगुणयुक्तं झण्गति वाक्यार्थेसंपर्कम्, अकदर्थनावृधयमिति यावत्। श्रुतिपेशलमित्ये- तदेव विशेष्यते—श्रुति: श्रवणन्द्रिय तत्र पेशलं रसिकं, अकदर्थनाद्वैचि- त्रम्। कीटशम्—औचित्ययुक्तम्। औचित्यं वस्तुन: स्वभावोक्तिप्रस्तेन है ? इस पर कहते है—यमक नाम (वाला वह भेद) है। यमक ऐसी जिसकी प्रसिद्धि है। और वह किस प्रकार का है ?—समान वर्ण (विन्यास) वाला। समान स्वरूपयुक्त—समान सुनाई पडने वाले वर्ण जिसमें होते हैं तथोक्त वह (समान वर्ण-युक्त हुआ)। तो इस प्रकार समान सुनायी पडने वाले एक, दो अथवा अनेक वर्णों का व्यवधान या अव्यवधानपूर्वक जो उपनिबन्धन होता है, वही यमक, ऐसा कहा जाता है। तो इस प्रकार एक रूप के (शब्दों की) दो अवस्थिति (आद्रत्ति) होने पर भी अन्य अर्थ—(उनका) अर्थ भिन्न होने पर (यमक) होता है। (कुन्तक का यह विवेचन दर्पणकार विद्यानाथ के यमक के लक्षण की ओर बरबस ही देखने को बाध्य कर देता है)। और वह (प्रकार-यमक) कैसा होता है ?—प्रसाद—प्रसाद-गुण से युक्त, शीघ्र ही वाक्य के अर्थ का सम्पर्क, आयास के बिना ही समझने योग्य होता है यह भाव हुआ। वह श्रुतिपेशल होता है—इस प्रकार इसे और भी विशेषपित करते है। श्रुति—श्रवणेन्द्रिय अर्थात् कान उनके लिए पेचाल—रुचिकर अर्थात् कोमल शब्दों से निष्पन्न। और वह किस प्रकार का होता है ?—औचित्य-युक्त। औचित्य (कहते है) वस्तु के स्वभाव के उत्कर्ष को, उससे युक्त, समन्वित होता है। अर्थात् जहाँ पर यमक के उपनिवन्धन की व्यसनिता होने पर भी औचित्य परिम्लान नही होता। उसी (यमक) को ही अन्य विशेषण से विशेषित करते है—जो आद्य आदि नियत स्थानो पर सुशोभित होता है। आदि इत्यादि (मध्य तथा अन्त में जिनका उपनिवन्धन होता है) वे तथोक्त (आद्यादि) हुए अर्थात् प्रथम, मध्य एवं अन्त, वे ही नियत स्थान है, विशेषोप प्रकार के विन्यास कहे जाते है, उनसे जो शोभायमान होता है, दीप्यमान होता है तथोक्त—आद्यादि नियत स्थानशोभी हुआ। यहाँ 'आदि' आदि पद' समन्वयबोधक है। उन्हे पद आदि के विशेषण रूप में प्रयुक्त समझना चाहिए (इस प्रकार अर्थ हुआ कि पद, वाक्य आदि के आदि, मध्य, अन्त मे यमक पदो का समवेश होना च:हिए।) किन्तु (वर्णविन्यासवक्रता का यमक नामक) वह प्रकार (सातवी कारिका मे) कथित लक्षण विभूतिसम्पन्न होता हुआ भी यहाँ अधिक विस्तृत नही दिया जा रहा—इस ग्रन्थ मे अधिक विस्तार से

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युक्तं समन्वितम् । यत्र यमकोपनिबन्धनव्यसनित्वेनाऽप्यौचित्यमपरिम्लानमित्यर्थे । तदेव विशेषणान्तरेण विशिनष्टि—आद्याविनियतस्थानशोभि यत् । आदिरादिर्येषां ते तथोक्ताः प्रथममध्यान्तास्तान्तीयेव नियतानि स्थानानि विशिष्ट्राः सन्निवेशशास्त्रैः शोभते भ्राजते यत्तथोक्तम् । अत्यादरयः सम्बन्धिशब्दाः पदादिभिरविशेषणीयाः । स तु प्रकारः प्रोक्तलक्षणसंपदुपेतोडपि भवन् इह नातिप्रतन्यते ग्रन्थेडस्मिन्नातिविस्तरंयते । कुतः—शोभान्तरभावात् । स्थाननियमव्यतिरिक्तस्य न्यायस्य शोभान्तरस्य छायान्तरस्यासंभवादित्यर्थः । अस्य चवर्णविन्यासवैचित्र्यव्यातिरेकेणान्यत्किचिदपि जीवितान्तरं न परिलक्ष्यते ।

तेनानन्तरोक्तालङ्कृतिप्रकारात्तैव युक्ता । उदाहरणान्यत्र शिशुपालवधये चतुर्थे सर्गे समर्पकाणि कानिचिदेव यमकानि, रघुवंशे वा वसन्तवर्णने ॥ ७ ॥

एवं पदावयवानां वर्णानां विन्यासवक्रभावे विचारिते वर्णसमुदायात्मकस्य पदस्य च वक्रोभावविचारः प्राप्तावसरः । ततः पदपूर्वार्द्रस्य तावद्वकताप्रकाराः कियन्तः सम्भवन्तीति प्रक्रमते—

प्रतिपादित नहीं किया जा रहा है । क्यों ?—अन्य शोभा के अभाव होने से । स्थाननियम से व्यतिरिक्त ( ध्यान देने की बात है कि स्थाननियम में कतिपय आचार्य छायानुप्रास मानते है ) अन्य शोभ—अन्य विच्छित्ति सम्भव न होने के कारण ( उसका विस्तार यहाँ नहीं किया जा रहा है ) । और इस यमक में वर्णविन्यास की वक्रता के अतिरिक्त और कोई दूसरा प्राणस्वरूप तत्त्व परिदृष्ट ही नहीं होता । इसलिए अभी-अभी इसके पूर्व कथित (वर्णविन्यासवक्रता रूप) अलङ्कार की प्रक्राति ही ( इस यमक की ) ठीक है । एतद्रिपयक उदाहरण शिशुपालवध के चतुर्थ सर्ग में ( अर्थ ) सम्पेक कुछ इने-गिने ही यमक है, अथवा रघुवंश ( के नवे सर्ग ) में वसन्तवर्णन के अवसर पर कुछ यमक निबन्थित है ॥६-७॥ शिशुपाल वध में ऐसे उदाहरणों की सङ्ख्या ९, १२, १५, १८, २१, २४, २७ हो सकती है तथा रघुवंश के अनेकों स्लोक लिये जा सकते हैं ।

इस प्रकार पद के अशोभूत वर्णों के विन्यास की वक्रता का विचार कर लिये जाने के बाद वर्णों के समुदायस्वरूप पदवक्रता का विचार क्रम से उपस्थित होता है । उसमें पद के पूर्वार्द्ध की वक्रता के कितने प्रकार हो सकते हैं ? इसको प्रस्तुत करते हैं—

( यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि प्रथम उन्मेष की १९वीं कारिका में पदपूर्वार्द्धवकता के निम्त प्रकार प्रस्तुत किये गये हैं— ( १ ) रूढ़िवैचित्र्य, ( २ ) पर्याय, ( ३ ) उपचार, ( ४ ) विशेषण, ( ५ ) संवृत्ति, ( ६ ) वृत्तिवैचित्र्य, ( ७ ) लिङ्ग, ( ८ ) क्रिया । आगे की कारिका में प्रथम प्रकार रूढ़िवैचित्र्यवकता का स्वरूप प्रस्तुत करते हैं—)

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यत्र रूढेरसम्भाव्यधर्माध्यारोपगर्भता ।

सद्र्मोऽतिशयारोपगर्भतवं वा प्रतियते ॥

लोकोत्तरतिरस्कारछीलाङ्योत्कर्षाभिधित्सया ।

वाच्यस्य सोच्च्यते कापि रूढिवैचित्र्यवकता ॥ ८-९ ॥

यत्र रूढेरसम्भाव्यधर्माध्यारोपगर्भता प्रतीयते । शब्दस्य नियतद्रुत्तिता नाम धर्मों रूढिरुच्यते, रोहणं रूढिरिति कृतवा । सा च द्विप्रकारा सम्भवति—नियतसामान्यवृत्तिता नियतविशेषवृत्तिता । तेन रूढिशब्देनात्र रूढिम्रधानः शब्दोऽभिधीयते, धर्मेऽभिधानोपचारदर्शनात् । यत्र योस्मिन् विषये रूढि-

शब्दस्य असम्भाव्य सम्भावयितुमशक्यो यो धर्मः कश्चित्परिस्फुरद्र्स्तस्य-ध्यारोप: समर्पणं गर्भोऽभिप्रायो यस्य स तथोक्तस्तस्य भावस्तत्ता सा प्रतीयते

जहाँ अर्थ के लोकोत्तर तिरस्कार या प्रधानस्य उत्कर्ष का अभिधान करने की इच्छा से रूढि के द्वारा असम्भवनीय धर्मसमर्पक अथवा विद्यमान धर्म के अतिशय समपंक अभिप्राय की प्रतीति होती है, वह कहीं अपूर्व ही सौन्दर्यविधायक रूढिवैचित्र्यवकता कही जाती है ॥ ८-९ ॥

जहाँ रूढि के द्वारा असम्भवनीय धर्म के अध्यारोप की गर्भता प्रतीत होती है ( वहाँ रूढिवैचित्र्यवकता है ) । शब्द की नियतदृत्तिता रूप धर्म रूढि कहा जाता है, रोहण ( प्रादुर्भाव करने वाला, उत्पन्न करने वाला ) करने वाला, करने वाला ऐसा अर्थ करने के कारण । वह दो प्रकार की हो सकती है—नियतसामान्यवृत्तिता तथा नियतविशेष-

वृत्तिता ( शब्द की वृत्ति है अर्थ का बोध करना । अत नियतवृत्तिता का भाव यहाँ नियत रूप से अर्थ की बोधकता से है और इस प्रकार नियतसामान्यवृत्तिता का अर्थ है निश्चित सामान्य अर्थ का बोध करने का धर्म एवं नियतविशेषवृत्तिता का भाव है निश्चित विशेष अर्थ का बोधकत्व ) । ( रूढि शब्द यद्यपि नियतसामान्यदृत्ति रूप धर्मों का अवबोधन कराता है, तथापि ) उपचार से धर्म एवं धर्मों का अभेद देखे जाने के कारण यहाँ पर रूढि पद से रूढि प्रधान शब्द का अभिधान किया गया है । जहाँ, जिस विषय में, रूढि शब्द का असम्भाव्य ( बोध ) संभव न

कराया जा सकने वाला जो धर्म—कोई अपूर्व स्वभाव, उसका अध्यारोप—समर्पण, ( बोध कराने वाला ) गर्भ—अभिप्राय जिसका वह तथोक्त—यत्र रूढेरसम्भाव्यधर्म-ध्यारोप गर्भ—हुआ, उसका भाव हुआ असम्भाव्यधर्माध्यारोपगर्भता, वह प्रतीत होती है—प्रतीपन्न होती है ( वहाँ रूढिवैचित्र्यवकता होती है ) । यहाँ यत्र का सम्बन्ध है ( आगे के पद से भी ) । अथवा जहाँ वर्तमान धर्म के अतिशय के आरोप की

गर्भता प्रतीत होती है ( वहाँ भी रूढिवकता होती है ) । विद्यमान जो यह धर्म उसे कहते हैं सद्र्म—पदार्थ का विद्यमान स्वभाव, उसमें जिस किसी भी अपूर्व अतिशय-आश्चर्यस्वरूप महत्व का आरोप—( अर्थ ) समर्पण गर्भ—अभिप्राय होता है जिसका उसे कहते है तथोक्त—सद्र्मोऽतिशयारोपगर्भ, उसका भाव हुआ—सद्र्मोऽतिशयारोप-

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

प्रतिपद्यते। यत्रेति सम्बन्धः। सद्दर्मौतिशयारोपगर्भीतं वा। संरस्रासौ धर्मेश्र सद्दर्मः विध्यमानः पदार्थस्य परिस्पन्दस्स्तस्मिन्न यत्कस्यचिदपूर्वंस्यातिशय-स्त्यादूश्रुतरुपस्या महिम्ना आरोपः समर्पणं गर्भोंडभिपायो यस्य स तथोक्तस्य भावस्तत्त्वम्। तच्च वा यस्मिन्न प्रतिपाते। केन हेतुना—लोकोत्तरतिरस्कार-श्राध्योत्कर्षाभिधित्सया। लोकोत्तरः सर्वोतिशायी यस्तिरस्कारः खलीकरणं श्राध्यश्र स्पृहणीयो य उत्कर्षः सातिशयत्वं तयोरभिधित्सा अभिधातुमिच्छा-वकूक्तमता तयोः कस्य वाच्यस्य रूढिशब्दस्य वाच्यो योडभिधेयोऽर्थस्तस्य। सोऽच्यते कथमिति काव्यलौकिकीरूढिवैचित्र्यवक्रता। रूढिशब्दस्यैवंविधेन वैचित्र्येण विचित्रभावेन वक्तावक्रमावः। तदिदमत्र तात्पर्यम्—यत्सामान्य-

मात्रास्पर्शिनां शब्दानामनुमानवश्रितविशेषपालीडनं यदापि स्वभावादेव न किन्चिदपि सम्भवति, तथाप्यनया युक्त्या कविवक्षितनियतविशेषणिर्ष्टतां नीरमानः कामपि चमत्कारितां प्रतिपद्यन्ते। यथाः—

गर्भंता। और अथवा वह जिस ( रचना-कथन ) मे प्रतीत होता है ( उसे भी रूढि-वैचित्र्यवक्रता कहते हैं )। ( असम्भाव्यधर्माध्यारोपगर्भंता अथवा सद्दर्मोतिशयारोप-गर्भंता ) किस प्रयोजन से होती है ?—( उत्तर है ) लोकस्तर तिरस्कार अथवा लोकोत्तर श्राध्य उत्कर्ष का अभिधान करने की इच्छा मे। लोकोत्तर सझसे बढकर जो तिरस्कार-तुच्छीकरण और ( लोकोत्तर जो ) श्राध्य—अभिलपित उत्कर्ष सातिशयता, उन दोनो को अभिधान की इच्छा—कहने अभिलाषा, कथन की कामना उसके लिए। किसके ( कथन की कामना से )?—अर्थ की, रूढिशब्द का वाच्य जो अभिधेय अर्थ उसकी। वह कही जाती है कोई अलौकिक रूढिवैचित्र्यवक्रता। रूढिशब्द की इस प्रकार की वैचित्र्य-विचित्रभाव से वकता—वक्रमाव होता है। तो यहाँ यह तात्पर्य हुआ—कि यदापि सामान्य मात्र का स्पर्श करने वाले शब्दो का अनुमान की ही भाँति नियत विशेष ( अर्थ ) का स्पर्श ( ग्रहण ) स्वभाव से ही कुछ भी नही हो सकता तथापि इस युक्ति

( सामान्य मात्र का बोधक होने के कारण अनुमान से सामान्य मात्र का ही बोध हो सकता है विशेष का नहीँ, उसी प्रकार सामान्य मात्र का स्पर्श करने वाले शब्दों से अभिधेय अर्थ की ही प्रतीति हो सकती है अन्य विशेष वयंग्य आदि का नही । जैसा कि आचार्य विश्वेश्वर ने माना है। और यहाँ योगदर्शन की पद्धति का सहारा लिया है, उचित प्रतीत होता है। विस्तार उनकी टीका मे उपलब्ध है।

उदाहरण जैसे—( गाथा आनन्दवर्धनकृत 'विषम-बाणालीला' की है जो ध्वन्या-लोक' तथा मम्मट के 'काव्यप्रकाश' एवं रुय्यक के 'अलङ्कारसर्वस्व' मे भी उदाहृत है )—

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ताला जाअंती गुणा जाला दे सहिअएहि घेस्संती । रइकिरणानुगगहिआइ होन्ति कमलाइ कमलाइ ॥ तदा जयन्ते गुणा यदा ते सहदऱयैर्गृह्यन्ते । रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ॥२६॥

( इतिच्छाया । ) प्रतीयते इति क्रियापदवैचित्र्यस्यायमभिप्रायो यदेवंविधे विपये शब्दानां वाचकत्वेन न त्यापारः, अपि तु वस्तुनः पदार्थतात्पर्यविषयतया युक्त- युक्तमप्येतदिह नातिप्रतन्यते । यस्माद् ध्वनिकारेण व्यङ्ग्यव्यञ्जकभावोद्र सुत्रां समर्थितस्तत् कि पौनरुक्त्येन । एवं रूढिवैचित्र्यवकता सुल्यतया ह्रिप्रकारा सम्भवति—यत्र रूढिवाच्योऽर्थः स्वयमेव आत्मन्युक्तर्षे निकर्षं वा समारोपयितुकामः कविनोपनिबध्यते, तस्या- न्यो वा कश्चिद्वक्तेति । यथा—

गुण तभी ( गुण ) बनते है जब वे सहदऱयों द्वारा ग्रहण कर लिये जाते है । सूर्ये की किरणों से अनुग्रह्हीत ही कमल ( वास्तव मे ) कमल होते है ॥ २६ ॥

( ध्वनिकार ने लक्षणामूला ध्वनि के दो भेद बताये है—अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य एवं अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य । यह उदाहरण अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि का है । यहाँ द्वितीय 'कमल' पद अभिधेय कमल का वाचक न होकर लक्म्मी या शोभा का पात्र सहृदयों वैचित्र्यो से युक्त होता है का बोधक है । कुन्तक ऐसे उदाहरणो को रूढिवैचित्र्य- वकता के अन्तर्गत मानते है ) । ( उपर्युक्त कारिका < मे प्रयुक्त ) 'प्रतीयते' इस क्रियापद के वैचित्र्य का अभिप्राय यह है कि इस प्रकार के विषय ( जहाँ रूढि की असंभाव्य धर्माध्यारोपगर्भिता अथवा सदृशमातिशयारोपगर्भिता हो ) मे ( प्रकृत जैसे उदाहरणो मे ) शब्दो का व्यापार केवल वाचकता मात्र से ही नही होता, अपितु ( शब्द के अभिधेयार्थ से अतिरिक्त ) अन्य वस्तु की प्रतीतिकारिता ( कविविवक्षित व्यङ्ग्य आदि अर्थ की बोधकता ) मात्र से ही ( शब्द का व्यापार ) युक्तियुक्त होता है । यहीं युक्तियुक्त है तथापि यहाँ उसका अधिक विस्तार नही किया जा रहा है । क्योंकि यहाँ ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने व्यङ्ग्य- व्यञ्जकभाव का भल्लीभाँति समर्थन किया है ( जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, ध्वनि- कार ने यहाँ अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य ध्वनि माना है । कमल व्यङ्गक है और उससे उसकी अतिशय श्रीसम्पन्नता आदि अर्थ व्यङ्गित होते है ) । क्योंकि ध्वनिकार ने कहीं

  • दिया है, अत फिर से उसे कहना क्री क्या आवश्यकता ।

इस प्रकार रूढिवैचित्र्यवकता प्राधान्यया दो प्रकार की हो सकती है—( १ ) जहाँ कवि स्वयं ही अपने ( वर्ण्य विषय ) मे उत्कर्ष अथवा निकर्ष के समारोप करने की कामना से रूदिरशब्द से वाच्य अर्थ का उपनिबन्धन करता है, ( २ ) अथवा जहाँ उस

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[ वक्रोक्तिजीवितम्

स्विग्धश्यामालकान्तिलिप्रवियतो वेल्लदूवलाकाघना

वाताः शीकरणः पयोदसुहृदामानन्दकेकाः कलाः ।

कारं सन्तु हृढ़ं कठोरहृदयो रामोऽस्मि सर्वं सहे

वैदेही तु कथम् भविष्यति हहाहा देवि धीराभव ॥२७॥

अत्र ‘राम’शब्देन ‘हृढ़ं कठोरहृदय’ ‘सर्वं सहे’ इति यदुभाभ्यां प्रतिपाद्यितुं न पार्यते, तदेवंविधविविधोदीपनविभावसहनसामर्थ्येकारणं दुःसह-

जनकसुताविरहव्यथाविसंष्टलेऽपि समये निपतितप्राणपरिरक्षणावैचक्षण्य-

लक्षणं संज्ञापदनिबन्धनं किमप्यसम्भाव्यमसाधारणं क्रौञ्चं प्रतীয়ते । वैदेही-

त्नेन जलधरसयुसुन्दरपदार्थसन्दर्शनेन सहितवत्सम्पंकं सजलसौकुमार्यसुलभं

( उत्कर्ष या निकर्ष ) का वक्ता कोई और होता है । उदाहरण जैसे — ( इस श्लोक को भी ध्वनिकार ने अन्यन्तररसंक्रमितवाच्य के उदाहरण में प्रस्तुत किया है । वाद में तो काव्यप्रकाशकार मम्मट आदि ने भी इसका प्रयोग किया है ) — स्विग्ध एवं श्याम

कान्ति से आकाश को लिलि कर देने वाले तथा उड़ती वलाकाओं से युक्त मेघ, सृक्‌स्म-

जलकणोद्गारी हवाएँ, मेघों के मित्रभूत ( शोभनहृदय ) मयूरों की आह्लादपूर्ण

मधुर ध्वनियों यहाँ सब यथेच्छ रहे ( इनसे मेरा कुछ विगड़ता नहीं क्योंकिं ) अतिशय

कठोरहृदय में ‘राम हूँ’ ‘सर्वं कुछे’ सहे लेंगे । किन्तु हाय, हाय ( ऐसे उद्दिपक समय

में ) जानकी कैसे होगी ? आह, देवि, ( पूज्यपादे सीते जहाँ कहीं भी हो ) धैर्य

रखो ॥ २७ ॥

यहाँ ‘हृढ़ं कठोरहृदयः’ ‘सर्वं सहे’ इन दोनो ही पदो से जिस अर्थ का प्रतिपादन

करना संभव नहीं है, ‘राम’ शब्द के द्वारा वह, इस प्रकार के विविध उद्दीपन

विभाव सम्पत्ति को सहन करने की शक्ति का कारणभूत, जनकपुत्री सीता की अत्यन्त

असहननीय योगव्यथा से विपरीत समय में भी निर्लज्ज प्राणों की हर प्रकार से रक्षा

की निपुणतारूप, ‘राम’ इस संज्ञा ( व्यक्ति, न कि दशरथकुलोत्पन्न कौशल्यादि के

स्नेहपात्र जानकीवत्लभ राम ) पद का बोधक, कुछ अनिर्वचनीय, असंभवनीय तथा

असंभाव्य क्रूरता व्यक्त हो रही है । और ‘वैदेही’ इस शब्द से ( सीता की ) मेघ-

कालीन ( उद्दिपक ) सुन्दर पदार्थों के दर्शन की असह्यता प्रस्तुत करने वाली, सहृज

सुकुमारताभम्य अनिर्वचणीय कातरता समर्पित हो रही है । और वही जानकी पद के

प्रथम ( अभिधेय ) अर्थ से विशिष्ट ( कातरत्व आदि ) अर्थ का बोध कराने वाले

‘तु’ पद का प्राण है ।

( इस श्लोक की चारुता के लिए ‘ध्वन्योक’ एवं ‘रोचन’ की निम्न पंक्तियों

अधिक उपादेय हैं—

‘इत्यत्र रामशब्द ( अर्थान्तरे सङ्क्रमित ) । अनेन हि । व्यङ्ग्यवधर्मान्तरपरिणत.

सच्छी प्रत्याय्यते, न संज्ञिमात्रं’ । ध्व० ।

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किमपि कावर्तवं तस्या: समभ्येते । तदेव च पूर्वस्मादिशेषाभिधायिनः ‘चु’ शब्दस्य जीवितम् ।

विद्यमानधर्मोक्तिशयवाच्याधारोपगमेत्यं यथा—

तत: प्रहस्याह पुनः पुरन्दरं व्यपेतभीरून्मिपुरन्दरात्सजः । गृह्णाण शस्त्रं यदि सर्ग एष ते न खल्वनिर्जित्य रघुं ऋृती भवान् ॥ २८ ॥

'रघु'शब्देनात्र सर्वत्राप्रतीहिततस्वभावास्यापि सुरपतेऽस्थाविध्यव्यवसायव्याघातसामधेयेनिबन्धनबन्धः कोडपि स्वपौरुषातिशय: प्रतीयते । 'प्रहस्य' त्यनेनैत-अर्थसहित लोचन की पंक्तियों—'अत्र श्लोके रामशब्द इति सज्जति: । स्लिग्धया जलसम्भ्रमशसरया र्यामलया द्विविधविनतोचितासितवर्णनया कान्या चाकचक्येन लिस-माच्छुरितं वियतमभो यै: । वेल्लन्त्यो विजृम्भमानास्तथा चलन्त्य: परमागवशात्प्रहर्षवशाच्च वलाका: सितपक्षविदोषा येषु तत एवंविधा मेघा: । एवं नभस्तावद् दुरालोकं वतन्ते । दिशोपि दुःसहा: । यतः सृक्ष्मजलकणोद्गारिणो वाताः इति मन्तमन्दुत्वेनपामनियत-दिगागमनं च बहुवचनन सूचितम् । तहिं गुहासु क्वचिद्विचित्रासतामिल्याह— पयदानां ये सुहृदस्तेषु च सत्सु ये शोमनाहदया मयूरास्तेषामामनन्देन हृपेण कला पदुपजसंवादिन्यो मधुरा: केका: शब्दविशेषा: तास्र सर्वं पयोधृतान्तं दुस्सहं स्मारयन्ति; स्वयञ्च दुस्सहा इति भाव: । एवमुद्दीपनविभावोद्बोधिततद्विप्रलम्भ: परस्पराधीनत्ववर्तते विभावाना साधारणतामभिमत्यमान: इत एव प्रभृति प्रियतमा हृदये निधायैव स्वात्मवृत्तान्तं तावदाह—कामं सन्तु इति । हृदयमिति सातिद्रायम् । कठोरहृदय इति, रागशब्दार्थ-ध्वनिविशेषावकारादानाय कठोरहृदयम् । अन्यथा रामपदं दशरथकुलोद्रवत्वकौमल्या-स्नेहप्रकतत्वबाल्यचरितजानकोलभादिधर्मोत्तरपरिणतमर्थे कथम् न ध्वनोदिति । अस्मृति । स एवाहं भावमत्यर्थ: । ‘अनोनोति । रामशब्दनेनपुज्युमानार्थेनैति भाव: । व्यज्जय धर्मान्तर प्रयोजनरूप राज्यनिर्वासनाच्यसंख्येयम् । तच्चासंख्यत्वादमिध्यावापारेणा-धाक्य समर्पणम् । क्रमेणाप्येमनप्येकधविषयमभावाभावान्न, चित्रचर्वणापदमिति न चारुत्वातिशप्रकृत् । प्रतीममानं तु तदसंख्यमनुद्धतिविरोधेनैव किं कि रूपं न सहत इति चित्रमानकरसापूगपुङ्गमोदकस्थानीयर्विचित्रचर्वणापदं भवति ।••• 'रामशब्दो धर्मान्तरपरिणतमर्थे लक्शयति । व्यज्जयानुसाधारण्यानुबन्धवाच्यानी धमोंत्तराणि ।'

विद्यमान धर्म के अतिशय को व्यक्त करने वाले अध्यारोपगर्मता का उदाहरण जैसे— ( रघुवंश ३।५९ का श्लोक है । रघु-इन्द्र-संवाद के समय रघु की इन्द्र से उक्ति है— ) इसके बाद पृथ्वी के ( पुरन्दर ) इन्द्र ( अधीश्वर दिलीप ) के पुत्र ( रघु ) ने भयरहित होकर इन्द्र से पुनः हॅसकर कहा कि यदि आपका यही निश्चय है कि ( इस जगत् में मेरे इन्द्र के अतिरिक्त दूसरा और कोई शतक्रतु नहीं हो सकता, इसी-लिए तुम्हारे पिता के अश्व का मैंने अपहरण किया है, और तुम अपने घुर्ण्जो के—

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[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

देवोपपृंहितम् । अन्यो वक्ता यत्र तत्रोदाहरणं यथा—

आज्ञा शक्रशिखामणिप्रणयिनी शास्त्राणि चक्षुर्नेवं

भक्तिभूूतपतौ पिनाकिनि पदं लब्ध्वेति दिल्‌ल्यापुरी ।

सम्प्रतीदृंहणान्वये च तदहो नेदंवरो लभ्यते

स्त्याच्चद्वेष न रावणः कव तु पुनः सर्वत्र सर्वे गुणाः ॥ २९ ॥

'रावण'शब्देनात्र सकल्लोकप्रसिद्धशासननदुविळासव्यतिरिक्तमभिजन-

विवेकसदाचारप्रभावसम्भोगसुखसमृद्धिलक्षणाया:

समस्तवरगुणसामग्री-सम्पदस्तिरस्कारकारणं किमप्यनुपादेयतानिमित्तभूतमौपहत्यं प्रतीयते ।

सगर पुत्रो के मार्ग का अनुसरण न करो ( वही ३।४९-५० ) तो शास्त्र ग्रहण करो,

रघु को विना जीते आप कृतार्थ नही हो सकते ॥ २८ ॥

यहाँ पर रघु शब्द से सर्वत्र अवाधित प्रभाववाले देवेन्द्र इन्द्र के उस प्रकार के

( अतिशयापहारणरूप , ) प्रयास को विनष्ट कर देने की सामर्थ्य को प्रस्तुत करने वाला

कुछ अनिर्वचनीय ही रघु का अपना पराक्रमातिशय ( रघु की अजेयता आदि )

प्रतीत हो रही है । 'प्रहस्त्य' हॅॅसकर ( उपहास-सा करके ) इस पद से यही यहाँ परिपुष्ट

किया गया है ।

ऊपर के दोनों उदाहरण 'स्निग्धश्र्यामल' तथा 'ततः प्रहस्याह' इत्यादि मे कवि-

निबद्ध वक्ता के द्वारा अपने मे उत्कर्ष लाने के लिए रूढि की 'असंभाव्य धर्माध्यारोप-

गर्भता' प्रस्तुत की गयी है ।

( रूढि की असंभाव्य धर्माध्यारोपगर्भता मे ) अन्य वक्ता के माध्यम से जहाँ

उत्कर्ष-अपकर्ष का आधार किया जाता है उसका उदाहरण जैसे—( बालरामायण

का श्लोक ५।३६ है । शतानन्द जनक से रावण का उत्कर्ष बताते हुए कह रहे है—)

( जिसकी ) आज्ञा इन्द्र के चूड़ामणि की प्रणयवती है ( इन्द्र शिर से धारण करता

है, स्वीकार करता है ), शास्त्र अभिनव नेत्र है ( शास्त्रदृष्टि है ), भूतपति पिनाकी

भगवान् शंकर मे जिसकी भक्ति है, दिव्य लङ्का नगरी ( निवास ) स्थान है, और

ब्रह्मा के वंश मे जन्म हुआ है, तो अरे भाई ऐसा वर कहाँ मिलता है ? यदि यह

रावण न होता ( तो सब कुछ ठीक ही था ), किन्तु समस्त गुण सम्पन्न होते ही कहाँ

है ॥ २९ ॥

यहाँ 'रावण' शब्द से सकल जगत् प्रसिद्ध रावण के दुर्विलास को छोड़कर

( उसके ) कुल, विवेक, सदाचार, प्रभाव इत्यादि सम्भोगसुख की समृद्धिरूप वर के

योग्य समस्त गुण-समूह विभव के तिरस्कारहेतुक ( उसकी ) अयोग्यता का कारणभूत

कुछ अनिर्वच्य ही दोष प्रतीत हो रहा है ।

यहाँ भी धनिवादी के अनुसार 'रावण' शब्द अर्थान्तर मे संक्रमित हुआ है ।

'रावण' शब्द उसके लङ्काधिपति दशासुख होने का ही अर्थ नही व्यक्त कर रहा है

प्रत्युत समस्त जगति को रुलाने वाले, पीड़ित कर देने वाले उसके दुष्ट स्वभाव को

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द्वितीयोन्मेपः ]

१६३

अत्रैव विधमानगुणातिशयाऽऽचारोपगर्भत्वं यथा—

‘रामोड्सौ सुवनेपु विक्रमगुणैः प्राप्तः प्रसिद्धिं पराम् ॥ ३० ॥

अत्र ‘राम’शब्देन सकलत्रिभुवनातिशायी रावणानुचरविषयास्पदं शौर्यो-

तिशयः प्रतীয়ते ।

एषा रुढिवैचित्र्यवकता प्रतीममानधर्मेवाहुल्याद् बहुप्रकारा भिच्चते ।

तच्च स्वयमेवोत्रेक्षणीयम् । यथा—

गुर्वर्थर्मर्थी श्रुतपारङ्गरवा रघोः सकाशादनवाप्य कामम् ।

गते वेदनान्तरालमप्ययं मे नाऽपि मृत्पराविदं वा वेतारि ॥ ३१ ॥

‘रघु’शब्देनात्र त्रिसवनातिशायिन्यौदार्यांतिरेकः प्रतिप्रतीते । एतस्यां वक्ता-

यासयमेव परमार्थो यत् सामान्यमात्रनिष्ठतामपाकृत्य कविविवक्षितविशेष-

व्यक्त कर रहा है । जिससे वस में होने वाली समस्त योग्यता के रहते वह वर की

पात्रता की तिरस्कारता को प्राप्त हो जाता है । यहां वक्ता रावण स्वयं न होकर दूसरा

है । इसलिए यहां रुढिवैचित्र्यवकता का दूसरा प्रकार है ।

यही (अर्थात् इसी प्रकारण मे अन्य वक्तृ प्रयुक्त कविनिबद्ध पदार्थ मे ) विधमान

गुण के अतिशय की अध्यारोपगर्भता का उदाहरण जैसे—( यह श्लोक प्रथम उन्मेप मे भी आया है । पूरा श्लोक वही द्रश्य है ।)— यह ‘राम’चन्द्र है, ( जिन्होने )

अपने पराक्रम के गुणों से लोकती मे अतिशय (चरम) प्रविष्टि पायी है ॥ ३२ ॥

यहां ‘राम’ शब्द से समस्त त्रैलोक्य से बढकर रावण के सेवक ( माल्यवान् ) मे

उद्भूत विस्मयमूलक ( राम क ) अतिशय पराक्रम प्रतीय हो रहा है ।

प्रतीयमान धर्मों के अनन्त होने के कारण यह रुढिवैचित्र्यवकता अनेक प्रकारो

से भेदयुक्त होती है । और उसे स्वयं ही ( प्रकरणादि के अनुसार ) समझ लेना

चाहिए । उदाहरणार्थ जैसे—( रघुवंश ( ५।२४ ) के इस श्लोक मे है । वर्णन उस

समय का है जब शुरुदक्षिणार्थ कौत्स विदद्वजित् यजकर्त्ता रखु के पास जाते हैं और

उनके द्वारा सपयों मे प्रस्तुत मुण्मयपात्रों को देखकर कौत्स निराशा होकर अन्य

प्रदाता के पास जाने की बात सोचते है । इस पर महाराज रघु की उक्ति है— )

शास्त्र-पारङ्गत, गुरु ( की दक्षिणा चुकाने ) के लिए याचक (ऋषि कौत्स )

रघु के पास अपने अभीष्ट ( की सिद्धि ) की पाकर किसी दूसरे दोनो के पास

चला गया ( मेरे रघु के लिए ) यह अपवाद का नया आविर्भाव नही होना चाहिए

( अत आप जाइये नही ) ॥ ३१ ॥

‘रघु’ शब्द से यहां ( महाराज रघु की ) त्रैलोक्य को भी अतिक्रान्त कर देने वाले

उदारता का बाहुल्य प्रतीय हो रहा है । इस ( रुढिवैचित्र्य ) वकता मे यही तो

रहस्य है कि (इसमे सामान्य अर्थ के अभिधायक भी शब्द ) सामान्य मात्र अर्थ-

गर्भता का परित्याग कर् कवि के वक्तुमभिप्रेत विशेषोप ( अर्थ ) के प्रतिपादन की

शक्तिरूप अतिशय शोभा समुद्धासित करता है । (यदि कोई कहे कि रुढिपरक )

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प्रतिपादनसामर्थ्यलक्षणः शोभातिशयः समुल्लास्यते । संज्ञाशब्दानां नियतार्थ-निष्ठत्वात् सामान्यविशेषभावो न करिचत् सम्भवतीति न वक्तव्यम् । यस्यात्तेषामप्यवस्थासहस्रसाधारणवृत्तेरवच्यस्य नियतदशाविशेषवृत्तिनिष्ठता सत्कविविवक्षितात सम्भवत्येव, स्वरश्रुतिन्यायेन लङाश्रुकन्या चेतति ॥ ९ ॥

एवं रूढिवक्त्रां विवेच्य क्रमप्राप्तमसमन्वयां 'पर्यायवकतां' विविनक्ति—अभिधेयान्तरतमस्स्यातिशयपोषकः । वाच्यवैचित्र्यनन्तरस्फूर्तौद्भटदण्डीमतीहिवत् ॥ १० ॥

स्वयं विशेषेणापि स्वच्छायोत्कर्षपेशलः । असम्भाव्यार्थप्रतीतत्वगर्भी यत्राभिधीयते ॥ ११ ॥

अलङ्कारोपसंस्कार मनोहारी निवन्धनः । पर्यायस्तेन वैचित्र्यं परां पर्यायवक्तताम् ॥ १२ ॥

संज्ञा मात्र के ( बोधक रघु आदि शब्द दिलीप-पुत्र आदि ) नियत ( व्यक्ति विशेष ) अर्थ-परक होने के कारण उनमें सामान्य-विशेषभाव नाम की कोई वस्तु नहीं होनी चाहिए, ( सामान्य अर्थबोधक रघु-राम आदि शब्द विशेष अर्थ की प्रतीति नहीं करा सकते ) तो ऐसा नही कहना चाहिए, क्योंकि 'स्वरश्रुतिन्याय' तथा 'लङनाशुकन्याय' से उन ( संज्ञाबोधक रामादि शब्दों ) में भी असम्भ्य अवस्थाबोधक साधारण अर्थनिष्ठतायुक्त वाच्य की सत्कवि की विवक्षा के अनुसार नियत दशाविशेष की अर्थनिष्ठता ( अर्थबोधक सामर्थ्य ) हो ही सकती है ॥ ९ ॥

इस प्रकार से पदपूर्वार्धवकता के एक भेद रूढिवकता का विवेचन कर क्रम-प्राप्त समन्वयित 'पर्यायवकता' का व्याख्यान करते है—अभिधेय का अत्यन्त समीपवर्ती अन्तरङ्ग, उसके अतिशय का पोषक, स्वयं अथवा अपने विशेषण के द्वारा या ( अभिधेयार्थ से व्यक्तरित् ) अन्य रमणीय शोभा का स्फुरण करने के कारण उस ( अभिधेयार्थ ) को अलंकृत करने मे समर्थ, अपने ही कान्ति के उत्कर्ष से पेशल, और जो ( पर्याय ) असम्भावित अर्थ की योग्यता शक्ति ) से गम्भित कहा जाता है, तथा अलंकार से अलंकृत या अलंकृतारो का उपस्कार करने के कारण मनोहारी विन्यासयुक्त जो पर्याय है उससे होने वाली वकता जहाँ होती है वह कोई और ही पर्यायवकता होती है ॥ १०—१२ ॥

पूर्वोक्त ( १०—१२ कारिका प्रोक्त ) विशेषणो से विशिष्ट काव्य के विषय मे जो पर्याय पद का प्रयोग होता है, उसके कारण जो वैचित्र्य—विचित्रभाव अर्थात् विशेष प्रकार की शोभासृष्टि होती है, वह अतिशय—प्रकृष्ट कोई ही पर्यायवकता ऐसी कही जाती है । पर्यायप्रधान शब्द पर्याय कहा जाता है । उसकी पर्यायप्रधानता यही है कि, वह कभी तो विवक्षित विषय मे ( उसके ) वाचक के रूप मे प्रवर्तित होता है और कभी ( उसके वाचक ) अन्य शब्द ( पर्याय ) का प्रयोग किया जाता है । इसलिए पूर्वोक्त प्रकार से पर्याय के अनेक प्रकार कहे गये है । तो इसके कितने

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द्वितीयोऽमेषः ]

१६५

पूर्वोक्तविशेषणविशिष्टकाव्यविषये पर्यायस्तेन हेतुना यत् वैचित्र्यं विचित्रभावो विच्छित्तिविशेषः सा परा प्रकृष्टा काचिदेव पर्यायवक्रतैव च्युतेः । पर्यायप्रधानः शब्दः पर्योऽडभिधीयते । तस्य चैतदेव पर्योग्रप्रधानत्वं यत् स कदाचिद्वक्ष्यते वस्तुनि वाचकतया प्रबर्तते, कदाचिद्वाचकान्तरमिति । तेन पूर्वोक्तनीत्या वहुप्रकारः पर्योऽडभिहितः । तत्त्रियान्तोडस्य प्रकाराः सन्तीत्या ह-अभिधेयान्तरतम । अभिधेयं वाच्यं वस्तु तस्यन्तरतम् प्रत्यासनततम् । यस्मात् पर्यायशब्दत्वे सति यत्रान्तरङ्गत्वात् यत्र विवक्षितं वस्तु ध्यानाकर्ष कविक्रिदिति । यथा —

नामियोक्तुमनृतं तवमिष्यसे कस्तपस्विविशिखेपु चादरः । सन्ति भूभृतः हि नः शराः परे ये पराक्रमवसुंनो वज्रिणः ॥ ३२ ॥

अत्र महेन्द्रवावकेष्वस्खलयेऽपि सत्स्वपि पर्यायशब्देपु ‘वज्रिणः’ इति प्रयुक्तः पर्यायवक्रतां पुष्णाति । यस्मात् सततसन्निहितवज्रस्यापि सुरपते ‘पराक्रम—

प्रकार है ? यह कहते है—अभिधेयान्तरतमः से—वाच्यवस्तु ( कही—कही पर्याय ) उसका अन्तरतम, अत्यन्त नजदीकी होता है । क्योंकि ( उसके ) पर्याय अन्य शब्दों के होने पर भी ( क्योकि विवक्षित वस्तु का ) यही नजदीकी, समीपवर्ती होता है, इसलिए विवक्षित वस्तु को वह जितना अच्छा व्यकत करता है उतना कोई और ( शब्द ) नही । उदाहरण जैसे—( श्लोक किरात १२१५८ का है । शकरधारीरधारी मूक दानव पर तपस्यारत अर्जुन और उनकी परीक्षा—हेतु गये वनचररूपधारी भगवान् पिनाकी रौद्र एक साथ वाण—प्रहार करते है । किरात शिव का अनुचर किरात अर्जुन के पास जाकर अपने स्वामी का पक्ष लेते हुए कह रहा है कि—‘हम तुम्हे असत्य से अभियुक्त नही कर रहे है, तपस्वी के बाणों मे कौन—सी आस्था ( हो सकती है ) । हमारे स्वामी के पास अन्य तमाम बाण है जो इन्द्र के शौर्य—विभव ( से भी बढकर ) है ॥ ३२ ॥

इन्द्र अर्थ के वाचक अनेक शब्दो के रहने पर भी यहाँ प्रयुक्त ‘वज्री’ शब्द पर्यायवक्रता का परिपोष कर रहा है । क्योकि सदैव वज्रयुक्त देवेन्द्र इन्द्र के भी जो ‘पराक्रमवसु’ विक्रम धन है, इस प्रकार ( किरातार्जिप के ) वाणो की लोकोत्तरता की प्रतीति हो रही है । ‘तपस्वी’ शब्द भी यहाँ अति ही रमणीय है । क्योकि वीरों के वाणों के प्रति आदर तो कदचित ठीक भी हो सकता है किन्तु कुछ भी न कर सकने वाले व्यर्थ तपस्वियों के वाणो के प्रति क्या आदर ( हो सकता है ) ?

अथवा जैसे—( शिव—काम का परस्पर संभाषण है )—( शिव कहते है )—तुम कौन हो ? ( काम— ) मुझे जान ही जाओगे । ( शिव )—काम, मुझे जानते हो ( मेरा स्मरण है ) ? ( काम— ) सौभाग्य से ( जानता हूँ आप कौन है ) । ( शिव— ) क्यो आये हो ? ( काम— ) तुम्हे उन्मादयुक्त करने । ( शिव— ) कैसे ( उन्मत्त

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वसून' विक्रमधनान्तीति सायकानां लोकोत्तरस्वप्रतीति: । 'तपमि'शब्दोऽप्य-

तितरां रमणीय:। यस्मात्सुभटसायकानामादरो बहुमान: कदाचिदुपपद्यते,

तथा वा —

कस्त्वं झास्यसि मां स्मर स्मरसि मां द्रष्ट्र्या किमभ्यागत-

स्वामुन्यादयितु कथं नतु बलात्तु किन्ते बलं पश्यय तत्।

पश्ययामित्यभिधाय पावकसुचा यो लोचने नैव तं

कान्ताकण्ठनिपत्कवाहुमदहत् तस्मै नम: शूलिने ॥ ३३ ॥

अत्र परमेश्वरे: पर्यायसहस्रेष्वपि सम्भवत्सु 'शूलिन:' इति यत्प्रयुक्तं

तत्रायमभिप्रायो यत् तस्सै भगवते नमस्कारव्यतिरेकेण किनन्यदभिधीयते ।

यत्तथाविधोत्सेकपरित्यकविनयवृत्ते: स्मरसय कुपितेनापि तदभिमतावलोक-

व्यतिरेकेण तेन सततसत्रिहितशूलेनापि कोपसमुचितमायुधग्रहणं नाचaritam ।

करोगे )? ( काम— ) बलपूर्वक । ( शिव— ) तुम्हारा बल क्या है? ( काम— )

तो उसे देखो । ( शिव— ) देखता हूँ, ऐसा कहकर जिन्होने अग्निप्रपिं ( तृतीय

भालस्थलस्थ विप्रम ) नेत्र से ही अपनी प्रियतमा के गले मे बॉह डाले उस काम के

भस्म कर डाला, उन शूलधारी भगवान् शिव को नमस्कार है ॥ ३३ ॥

परमेश्वर भगवान् शिव के सहस्रो पर्याय सम्भव होने पर भी 'शूलिन:' यह पद जो

प्रयुक्त किया गया है तो उसका यह अभिप्राय है कि उन भगवान् को नमस्कार के

बिना और क्या कहा जा सकता है कि उस प्रकार से अवलेप के कारण विनम्र व्यवहार

का परित्याग कर

रहने पर भी उन भगवान् शिव ने उस ( काम ) के अभिमत दृष्टिपात के अतिरिक्त क्रोध

के योग्य शस्त्र ( त्रिशूल ) को ग्रहण करने का प्रयास नही किया । ( इस

प्रकार ) दृष्टिपात मात्र से क्रोध का कार्य ( शस्त्र से सम्पन्न होने वाला काम-विनाश-

रूप कृत्य ) कर देने के कारण भगवान् शिव का प्रभाव अत्यधिक परिपुष्ट हुआ है ।

इसलिए उन भगवान् शिव को नमस्कार है यह कथन युक्तियुक्तता को प्राप्त हो

जाता है ।

पदपूर्वार्द्धवक्रता का कारणभूत यह दूसरा पर्याय ( वक्तृ ) प्रकार है—जो उस

( अभिधेयार्थ ) के अतिशय का पोषक होता है । उस अभिधेय अर्थ का अतिशय,

उत्कर्ष जो परिपुष्ट करता है वह हुआ तथोक्त 'तस्यातिशयपोषक' । क्योंकि सहज

सौकुमार्य-गुणसम्पन्न सुन्दर भी पदार्थ उस पर्याय से परिपुष्ट अतिशय वाला होकर

अत्यन्त सहृदय हृदयहारिता को प्राप्त हो जाता है । जैसे—( राजधोसरकृत बाल-

रामायण १०/४१ के इस श्लोक मे है, जहॉ भगवान् श्रीरमचन्द्र जी पुष्पक से

अयोध्याँ लौत्तते समय मार्ग मे भगवती जानकी को चन्द्राङ्कित दिखाते कह रहे है— )

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लोचनपातमात्रेणैव कापकार्यकरणादभगवतः प्रभावातिशयः परिपोपितः । अत एव तस्मै नमोडस्त्वति युक्तियुक्ततां प्रतिपद्यते ।

अयमपरः पदपूर्वार्द्धवकृताहेतुः पर्यायो यस्यस्यातिशयपोपकः । तस्याभिधेयस्यार्थस्यातिशयमुत्कर्षं पुष्णाति यः स तथोक्तः । यस्मात् सहृजसौकुमार्यसुभगोडपि पदार्थस्तेन परिपोपितातिशयः सुतरां सहृदयहृदयहारितां प्रतिपद्यते । यथा—

सम्बन्धी रघुवंशसुजां मनसिजव्यापारदीक्षागुरुगौराङ्गीवदनोपमापरिचितस्तारावधूललभः । सद्योमार्जितदाक्षिण्यात्यतरुणीदन्तावदातद्युति-रचनः सुन्दरि हृदयतामयमितरुचणडीशचूडामणिः ॥ ३४ ॥

अत्र पर्याया: सहजसौन्दर्यसम्पदुपेतस्यापि चन्द्रमसः सहृदयहृदयाहादकारणं कमप्यतिशयमुत्पादयन्नतः पदपूर्वार्द्धवकृतां पुष्णन्ति । तथा रमण रावणं निहत्य पुष्पकेण गच्छता सीतया: सविभ्रमं स्वैरकथास्वेदद्भिधीयते 'यच्चन्द्रः

अथि शोभने सीते, इधर इस रकुवंशी राजाओं के सम्बन्धी, कामक्रिया के दीक्षागुरु, गौर अङ्ग सुन्दरियो के मुख की उपमा के लिए विख्यात, तारा ( नक्षत्र ) वधुओं के प्रियतम, तत्काल शुद्ध किये गये दक्षिणी युवतियों के दाँतो की भाँति स्वच्छ कान्ति तथा भवानीपति शंकर के शिरोभूषण चन्द्रमा को देखो ॥ ३४ ॥

स्वाभाविक सौन्दर्य-श्री से सयुक्त भी चन्द्रम के ( प्रयुक्त ) पर्याय यहाँ सहृदय हृदय के आह्लादहेतुक किसी अनिर्वचनीय उत्कर्ष की सृष्टि करते हुए पदपूर्वार्द्धवकृता को परिपुष्ट कर रहे है । जैसे कि, रावण को मार कर पुष्पक से ( अयोध्या ) जाते हुए राम सीता से स्वातन्त्र वार्ताओं मे यह कह रहे है 'कि हे सुन्दरि ! चन्द्रमा को देखो !' रमणीयता से मन हरण करने वाले सम्पूर्ण जगत् के नेत्रानन्दक चन्द्रमा की ओर ध्यान दो । क्योंकि उस प्रकार के लोगों के लिए ही उस प्रकार का ( चन्द्रमा ) विधिवत् विचार का विषय हो सकता है । 'रघुवंशी राजाओं का सम्बन्धी है' इस कथन से 'यह हमारा नय वधू नही है, इसलिए दर्शक से इसे सम्मानित करों । इस प्रकार प्रकारान्तर से भी चन्द्र-विषयक अत्यादर प्रतीत हो रहा है । और अवशिष्ट अन्य ( पर्याय ) भी उस चन्द्रमा के उत्कर्ष आधान की अपनी तत्परता ही प्रख्यापित करते है और उसी कारण से प्रस्तुत अर्थ ( चन्द्रम ) के प्रति प्रत्येक पर्यायो के द्वारा पृथक्-पृथक् रूप से उत्कर्ष प्रकट किये जाने से बहुत से पर्यायों का प्रयोग होने पर भी पुनरुक्तभाव नही प्रतीत होता । यही तीसरे पद मे विशेषणवकृता विद्यमान है, पर्यायवकृता नही ।

पदपूर्वार्द्धवकृता को प्रस्तुत करने वाले पर्यायवकृता का यह अन्य प्रकार है— जो उस ( अभिधेय ) को अलंकृत कर सकने मे समर्थ हो । जो उस अभिधेयरूप वस्तु को विभूषित करने मे समर्य होता है, यह अर्थ हुआ । किसके द्वारा ? —रमणीय

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१६८

[वक्रोक्तिजीवितम्]

सुन्दरि हृदयताम्' इति। रमणीयकमनोहारिणि सकल्लोलकलोचनोत्सवश्रान्तद्रमा-

विचार्येतामिति । यस्मातथाविधानमेव तादृशः सङुचितो विचारगोचरः ।

सम्बन्धी रघुभूभुजामित्यनेन चास्माकं नापूर्वो वनगुरयमित्यव्लोकनेन

सम्प्रान्ततामिति प्रकारान्तरेणापि तद्विशयो बहुमानः प्रतीयते । शिष्टश्रुत-

तिशयाधानप्रवणत्वमेवात्मनः प्रथयन्ति । तत् एव च प्रस्तुतमर्थ प्रति प्रत्येकं

पृथकत्वेनोक्तर्षप्रकटनोत् पर्यायाणां बहूनामष्यपौनरुक्त्यम् । तृतीयेऽपादे

विशेषणवक्रता विचते, नै पर्यायवक्रत्वम् ।

अयस्मपरः पर्यायप्रकारः पदपूर्वोक्तवक्रता निवन्धनः—यस्तदलङ्कृतुममीश्वरः ।

तदभिधेयलक्षणं वस्तु विभूषयितुं यः प्रभवतीत्यर्थः । कसमात्—रसयच्छाया-

न्तरस्पष्टौ । रस्मिन् रमणीयं यच्छायान्तरं विच्छित्यान्तरं श्लिष्टत्वादि, तस्य

स्पष्टौ । शोभान्तरप्रतीतेरित्यर्थः । कथम्—स्वयं विशेषणेपि । स्वयमात्म-

नैव, स्वविशेषणसूतैः पदनान्तरेण वा । तत्र स्वयं यथा—

इत्थं झटिति को नु वृहत्प्रमाण-

कर्णः करी नतु भवेद्विध्वनितस्य पत्रम् ।

शोभान्तर के स्पष्ट से । रस्मिन्, रमणीय जो अन्य छाया दूसरि विच्छित्ति श्लिष्टत्व आदि उसके स्पष्ट से, 'उभयात्' ( अभिधेयार्थ से व्यतिरिक्त अन्य शोभा की ) प्रतीति से, यह अर्थ हुआ । कैसे ?—स्वयं तथा विशेषण से भी । स्वयं अपने ही अथवा अपने विशेषणमूत अन्य पदो के द्वारा । उनमे भी स्वयं ( पर्याय ) जैसे ( अभिधेय को विशिष्ट करता है का उदाहरण )—

इस जड़लोक मे विशाल कर्ण एवं झुण्डा-दण्ड ( प्रसस्त कर्ण एवं हाथो वाला, सुनने और देने मे समर्थ ) और कौन मेरे झझार ( निवेदन का ) पात्र हो सकता है ( ऐसा समझकर ) आये हुए भ्रमर को ( याचक को ) जिसने मसल डाला । वह मातङ् ( हाथी, चाण्डाल ) तो है ही, इससे अधिक उसे और क्या कहा जाय ॥ ३५ ॥

यहाँ 'मातङ्' शब्द प्रस्तुत हस्ति मात्र मे प्रवर्तित होता है । अवशिष्ट ( लक्षणा ) वृत्ति से अप्रस्तुत चाण्डालरूप वस्तु की प्रतीति 'पैदा' करता हुआ रूपक अलङ्कार की छाया के सस्पर्शो से 'गौवांभीक.' इस प्रक्रिया से सादृश्यमूलक उपचार संभव होने के कारण प्रस्तुत वस्तु हस्ती के भावो का ( अप्रस्तुत चाण्डाल पर ) अध्यारोप कराता हुआ ( मातङ् शब्द ही ) पर्यायवकता को परिपुष्ट कर रहा है । क्योकि इस प्रकार के विषय मे प्रस्तुत का अप्रस्तुत के साथ सम्बन्ध निवन्धन रूपक अलङ्कार के द्वारा और कदाचित् उपमा द्वारा प्रस्तुत किया जाता है । जैसे 'वही यह है' तथा 'यह उसके समान है' ( इस प्रकार से रूपक एवं उपमामूलक से निवन्धन किया जाता जाता है ) ।

और शब्दशक्तिमूलसंलक्ष्यकमव्यड्गय पदध्वनि का यही ( ध्वनिवाद मे ) विषय होता है । अथवा इस प्रकार के अनेक प्रयोग होने पर शब्दशक्तिमूलसंलक्ष्यकमव्यड्गय वाक्य-

ध्वनि के विषय होते है ।

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इत्यागतं झटिति योऽलिनिसुतस्माथ मातङ्ग एव किमत: परमुच्यते ऽसौ ॥ ३५ ॥

अत्र 'मातङ्ग'-शब्द: प्रस्तुतो वारणमात्रे प्रवर्तते । शिष्ट्रया वृत्त्या चाण्डाल-लक्षणस्याप्रस्तुतस्य वस्तुन: प्रतीतिमुपादधाति रूपकालङ्कारेच्छायासंस्पर्शाद् गौर्बोहीक: इत्यनेन न्यायेन साहद्रयनिबन्धनस्योपचारस्य सम्भवात् । प्रस्तुतस्य वस्तुनस्तत्त्वमध्यारोप्यन् पर्यवकृतां पुष्णाति । यस्मादेवं विषये प्रस्तुत-स्थाप्रस्तुतन सम्बन्धोपनिबन्धा रूपकालङ्काराद् दारण कदाचिदुपमासुखेन वा । यथा स एवायं, स इवार्यमिति वा । एप एव च शब्दशक्तिमूलातुरणनरूप-व्यङ्गस्य पदध्वनेर्विषय: बहुपु चैवंविधेपु सत्सु वाक्यध्वनेर्वो ।

यथा— कुसुमसमयुगपुसंहरत्फुल्लमल्लिकाधवलाट्टहासो श्रीष्माभिधानो महाकाल: ॥ ३६ ॥

यथा वा— वृत्तेऽस्मिन् महाप्रलये धरणीधारणायाधुना त्वं शेप इति ॥ ३७ ॥

अत्र युगादय: शब्दा: प्रस्तुताभिधानपरत्वेन प्रयुज्यमानाः सन्तोड्य-प्रस्तुतवस्तुप्रतीतिकारितया कामपि काव्यच्छायां समुन्मीलयन्त: प्रतीपमातालङ्कार्यपदेशभाजनं भवन्ति ।

और जैसे ( हर्षचिरित के द्वितीय उच्च्छ्वास में निवद्ध श्रीमदृत्तु के इस वर्णन मे )— पुष्प-समय ( वसन्तऋतु ) के युग ( काल- दो महीने ) की परिसमाप्ति ( उप-संहार ) करता हुआ, धवल प्रसाद जैसी खिली हुई शुभ्र मल्लिका ( जूही ) के ( हास ) विकास से युक्त ग्रीष्म नाम का 'महाकाल' जम्हाई लेने लगा ( प्रारम्भ हो गया ) ॥ ३६ ॥

अथवा जैसे ( वही हर्षचरित से ही लिया गया उदाहरण )—इस महाप्रलय ( आनन्द के सर्वत विनाशरूप पिता प्रभाकर वर्द्धन आदि के विनाश ) के हो जाने पर पृथ्वी को धारण करने के लिए अब तुम्हीं ( हर्ष ) ही शेष ( बचे ) हो ॥ ३७ ॥

( महाप्रलय के हो जाने पर पृथ्वी को भारण करने के लिए शेष भगवान् ही रह जाते है । ऊपर के दोनो ही उदाहरण शब्दशक्त्युत्थ वाक्यध्वनो के उदाहरण है जिन्हें यहाँ कुन्तक पर्यायवकता के अन्तर्गत प्रस्तुत किये है ।)

यहाँ पर युग आदि शब्द प्रस्तुत अर्थ ( ग्रीष्म समय आदि ) के वाचकरूप मे प्रयुक्त किये जाते हुए भी अपृक्त वस्तु ( महाशिव आदि ) की प्रतीति कराने वाले होने के कारण किसी अपूर्व काव्यसौन्दर्य को समुन्मीलित करते हुए प्रतीपमालङ्कार ध्वनि के अभिधान के पात्र होते है ।

विरोधण के माध्यम जैसे—उत्तम महिलावृन्द ने अतिशय मनोहारी, लावण्योपेत, शुभ्र तथा विशाल नेत्र, सुन्दर एवं हाव-भावादि पूर्ण ( इस ) नायक को देखकर आज यह जाना कि भगवान् रुद्रर ने ( जिस ) काम को जलाकर राख कर दिया था

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विशेषणेन यथा—

सुस्निग्धसुगन्धधवलोरुदशं विदग्धमालोक्य यन्मधुरमधुविलाससिधम्‌।

भस्मीचकार मदनं न तु काश्मीरतन्नूनमीश इति वेति पुरनिंशिलोकः ॥ ३८ ॥

अत्र काश्मिरिति विशेषणपदं वर्ण्यमानपदार्थापेक्षया मनसथस्य नीरसतां प्रतीपादधद्‌ रम्यच्छायान्तरसताश्रयविशेषच्छायान्तरापेक्षाश्रयदर्शनेपेक्षच्छायान्तरापेक्षविन्यासपरमस्मिन्नवस्तुन्युपप्रस्तुते मदनाभिधानपदार्थलक्षणे प्रतीतिमुपपादयन्‌ रूपकालङ्कारच्छायासंरपशान्तः कामपि पर्यायवक्रतामुपमीयति । अयमपरः पर्यायप्रकारः पदपूर्वार्द्धवकतया कारणम्‌—यः स्वच्छायोत्कर्षपेशलः कान्त्योः सुकुमारता तदुत्कर्षेण तदतिशयेन यः पेशलो हृदयहारी। तदिदमत्र तात्पर्यम्‌ यद्यपि वर्ण्यमानस्य वस्तुनः प्रकारान्तरो ल्लासकत्वेन ठववस्थितिस्तथापि परिस्पन्दसौन्दर्यसम्पदेव सहृदयहृदयहारितों प्रतिपादयते। यथा—

इत्थमुत्कयति ताण्डवलीलापणिडतार्बुधहरीगुरुपादैः ।

उल्थितं विषमकाण्डकुटुम्बनभस्याङ्गुभिः स्मरति विरहो माम्‌ ॥ ३९ ॥

वह निश्चित ही काष्ठ ही था ( अन्यथा ऐसे सौन्दर्योपर कामरूप व्यक्ति की उपलब्धि कैसे हो सकती थी ) ॥ ३८ ॥

यहाँ पर प्रस्तुत ( कामदेव का ) 'काष्ठ' यह विशेषण पद वर्ण्यमान ( व्यक्तिरूप ) पदार्थों की अपेक्षा काम की नीरसता को प्रतिपादित करता हुआ रमणीय दूसरी कान्ति का सङ्केत कर रहे दृश्य अलङ्कार की कान्ति से युक्त मनोज्ञ विन्यासयुक्त, अप्रस्तुत इस मदन नामक वृक्षरूप वस्तु मे प्रतिति पैदा करता हुआ रूपक नामक अलङ्कार की शोभा के सङ्केत से किसी अपूर्व पर्यायवकता को उन्मीलित कर रहा है ।

पदपूर्वार्द्धवकता का हेतुभूत यह दूसरा पर्याय ( का चौथा भेद ) प्रकार है—जो अपनी शोभा के उत्कर्ष से ही रमणीय होता है । स्वकीय, अपनी छाया—जो कान्ति, सुकुमारता, उसके उत्कर्ष आधिक्य के द्वार जो ( पर्याय ) पेशल हृदयहारी होता है ।

तो यहाँ यह तात्पर्य है—यद्यपि वर्ण्यमान ( प्रस्तुत ) वस्तु की अवस्थिति अन्य प्रकार ( अभिधेय से व्यतिरिक्त अर्थ ) को प्रकाशित करने वाली होती है, फिर भी ( वस्तु की ) स्वभावगत सौन्दर्यसम्पत्ति ही सहृदयो की हृदयहारिता को प्राप्त हो पाती है ।

जैसे—ताण्डवलीलापणिडता समुद्रलहरी की आचार्य विषमशर ( कामदेव ) के कुङ्कुम्बी ( चन्द्रमा ) की किरणो से इस प्रकार ( परेशान होकर ध्यानादि से ) उठे हुए मुझे कामिनी ( प्रियतमा ) का वियोग उत्कण्ठित कर रहा है ॥ ३९ ॥

यहाँ पर कवि ने इन्दु ( चन्द्रमा ) के पर्याय 'विषमकाण्डकुटुम्ब' शब्द का उपनिबन्धन किया है । ( इस पर्याय विषमकाण्ड—विपञ्चावाण—कामदेव—के कुङ्कुम्बी सहायक अभीष्ट चन्द्रमा का प्रयोग यहाँ इसलिए किया गया है ) क्योकि ( विरहो—

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द्वितीयोऽमेपः ]

अत्रैन्दुपर्योयो ‘विषमकाण्डकुटुम्ब’शब्दः: कविनोपनिबद्धः । यस्मान्मृगाङ्कोदयद्रेषिणा विरहविगुरहृदयेन केनचिदेतदुच्यते। यदयमप्रसिद्धोडप्यपरिम्लानसमन्वयतया प्रसिद्धतमतामुपनीतस्तेन प्रथममतरोल्लिखितत्वेन च चेतनचमत्कारितामवगाहते। एष च स्वच्छायोक्तिकरपेक्षशः । सहजसौकुमार्यसुभगत्वेन नूतनोल्लेखविलक्षणत्वेन च कविमिः पर्यायान्तरपरिहारपूर्वकसुपवर्ण्यते । यथा कृष्णकुटिलकेरीति वक्तृव्ये यमुनाकल्लोलवाक्रालकेति । यथा वा गौराङ्गीवदनोपमापरिच्छेद इत्यत्र वनितावाचिकरसहेलुसदृशलेहुंभावोद्दीपगौराङ्गीत्यभिधानमत्रैव रमणीयम्।

अयमपरः पर्यायप्रकारः पदपूर्वार्धवकताभिधायी—असंभाव्यार्थपात्रत्वगर्भं यरुचाभिधीयते। वर्ण्यमानस्यासंभाव्यः सम्भावयितुमशक्यो योडर्थः कत्रिचित्पात्रिस्पन्दतस्तत्र पात्रत्वं भजनत्वं गर्भोडभिप्रायो यत्राभिधाने तत्थाविधं कृत्वा यरुचाभिधीयते भण्यते ।

दीपक होने के कारण ) चन्द्रदय से विद्वेष रखने वाले ( प्रियतमा के ) वियोग से व्यथित किसी के द्वारा यह बात कही जा रही है । जो ( चन्द्रमा के पर्याय के रूप मे ) अप्रसिद्ध भी यह (‘विषमकाण्डकुटुम्ब’ पर्याय ) , नूतनता-अपरिम्लानता से सम्भावित होने के कारण अत्यन्त प्रसिद्धिभाव को प्राप्त करा दिया गया है, इसलिए ( चन्द्रमा के पर्यायरूप मे ) सर्वप्रथम उल्लिखित होने के कारण सहृदय प्राणियों का चमत्कारिता का अवगाहन करता है । और अपनी ही कान्ति के अतिशय से रमणीय यह पर्याय, स्वाभाविक सुकुमारता से सुन्दर होने के कारण तथा (और प्रचलित पर्यायों की अपेक्षा) नवीन कथन होने से अपूर्व होने के कारण कवियों द्वारा अन्य पर्यायों का परित्याग करते हुए ( काव्यादि मे ) उपवर्णित किया जाता है । ( अन्य उदाहरण देकर इसे और भी स्पष्ट करने का प्रयास करते है ) जैसे—काले एवं ‘कुञ्चित केशो वाली’ ( कृष्ण-कुटिल-केशी ) ऐसा कथनीय होने पर ‘यमुना की लहरियों की भाँति वक्र अलकों वाली’ ( यमुनाकल्लोलवाक्रालका ) ऐसा कह देते है । अथवा (२।३४ के उद्धृत श्लोक मे आये पद ) ‘गौराङ्गी वदनोपमा परिचित:’ इस प्रयोग मे ( श्रीवाचक ) वनिता आदि सहृदयो बोधक शब्दों के रहते भी ‘गौराङ्गी’ यह कथन ( अत्यन्त अप्राम्य होने के कारण ) अतिशय रमणीय है ।

पदपूर्वार्धवकता का अभिषायक यह अन्य ( पाँचवाँ ) पर्याय ( वकता ) का भेद हैं—जो ( पर्याय ) असंभाव्य अर्थ की पात्रता से गर्भित कहा जाता है—‘असंभाव्यार्थपात्रत्वगर्भं यरुचाभिधीयते’ । वर्ण्यमान विषय का अमंभाव्य—अशक्य सम्भावित जो अर्थ, कोई (अनिर्वाच्य) स्वभाव, उसकी पात्रता-भाजनता (योग्यता, अर्हता आदि) का गर्भ—अभिप्राय जिस कथन मे (निहित होता है) वह ( पर्याय ) उस प्रकार से (ही असंभाव्यार्थ-पात्रत्वगर्भित ) करके ही जो वाच्य होता है, कहा जाता है (उसे असंभाव्यार्थपात्रत्वगर्भ कहते है । उदाहरण जैसे ( रघुवंश २।३४ का यह श्लोक )—गुरु की

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यथा—

अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रामितो वृथा स्यात् । न पादपोन्मूलनशक्तिरंहः शिलोच्चये मूर्छ्छति मारुतस्य ॥ ४० ॥

अत्र महीपालेऽति राज्ञः सकलपृथ्वीपरिरक्षणक्ष्मपौरुषस्यापि तथाविधप्रयत्नपारिपाटीतत्परुरूपसज्जविमात्रपरित्राणासामर्थ्यस्वप्नेऽप्यसम्भावनाभिर्यत्तत्पात्रत्वगर्भेसामन्त्रणमुपनिबद्धम् । यथा वा—

भूतानुकम्पा तव चेदयं गौ-रेका भवेत्स्वस्तिमती त्वदन्ते । जीवन् पुनः शरवधुपैःलवेश्यः प्रजा: प्रजानाथ पितेव पासि ॥ ४१ ॥

अत्र यदि प्राणिकरुणाकारणं निजप्राणपरित्यागमाचररतदप्ययुक्तम् । यद्यस्वदन्ते स्वस्तिमती भवेदियमेकैव गौरिति त्रियमप्यनादरास्पदम् ।

प्रहार के लिए तूणीर से वाण निकालना चाहते हैं, वे वहाँ अवरुद्ध हो जाते है । इस पर सिंह राजा से कहता है ——महीपाल; आपके पराक्रम व्यर्थ है ! मेरे ऊपर ( आपके द्वारा ) प्रयुक्त भी अस्त्र व्यर्थ ही होगा । वायु का ( बड़े-बड़े ) वृक्षो को उखाड़ फेकने की सामर्थ्य का वेग पाषाणसमूहो ( पर्वतो ) को मूर्छित नही कर पाता ( इसी प्रकार बड़े-बड़े लोगो को उखाड़ फेकने वाले आपके वाणो का प्रभाव पर कुछ भी नही हो सकता ) । ॥ ४० ॥

सम्पूर्ण पृथ्वी की परिरक्षायोग्य पराक्रमवाले भी राजा दिलीप के लिए ( सिंह से कहा गया ) 'महीपाल' यह सम्बोधन, यहाँ उस प्रकार के प्रयास से भी परिरक्षणीय गुरु की गायत्रूप एक प्राणिमात्र के परिरक्षण की ( उनकी ) असमर्थता, जिसकी स्वप्न मे भी कल्पना नही की जा सकती, उसकी पात्रता के अभिप्राय से ( कवि ने ) उपनिबन्धित किया है । ( सम्पूर्ण पृथ्वी का रक्षक भी एक जीव की रक्षा करने मे असमर्थ है इस प्रकार राजा के महीपालत्व की हॅसी उडायी गयी है । )

अथवा ( वहाँ आगे २।४८ का उदाहरण ) जैसे—( सिंह, राजा को प्राणोत्सर्ग के लिए भी तैयार देखकर, पुनः कहता है—) ( अपने प्राण-परित्याग से भी आप इसकी रक्षा करना चाहते है ) यदि यह आपकी प्राणियो के प्रति करुणा के कारण है तो आपकी मृत्यु के बाद तो केवल यह एक गाय ही कल्याणयुक्त हो पायेगी । और हे प्रजाओं के स्वामी राजन्‌! जीवित रहते हुए आप तो प्रजाओं को निरन्तर पिता के समान उपद्रवो से वचाते रहेंगे ॥ ४१ ॥

( सिंह द्व‌ रा ) यहाँ यह कहा जा रहा है कि यदि जीवो‌ के प्रति होने वाली करुणा के कारण अपने प्राण-परित्याग का आचरण का रहे है तो वह भी अयुक्त

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द्वितीयोल्लेषः ]

जीवन् पुनः शाश्वत्सदैवोपप्लवेभ्योऽनथेभ्यः प्रजा: सकलभूतधात्रीवत्‌लय-

वर्तिनी प्रजानाथ पासि रक्षोभि: । पितेवेल्यानादरातिशय: प्रथते । तदेव यद्यापि

सुस्पष्टतसमन्वयोडयं वाक्यार्थस्थापि तात्पर्यान्तरमत्र प्रतीयेते । यस्मात्सवैंस्य

कस्यचिच्चिज्जानाथत्वे सति सदैव तत्परिरक्षणस्या करणमसम्भाव्यम् । तत्पात्रत्व-

गर्भमेव तदभिहितम् । यस्मात्त्र्यक्षग्राणिमात्रभक्ष्यमाणगुरुहोमेधेऽनुप्राणपरि-

रक्षणापेक्षानिरपेक्षस्य सतो जीवतस्त्ववानेन न्यायेन कदाचिदपि प्रजापरिरक्षणं

मनागपि न सम्भाव्यत इति प्रमाणोपपन्नम् । तदिदंसूक्तम—

प्रमाणवत्त्वादायात: प्रवाह: केन वार्थते ॥ ४२ ॥ इति । अत्राभिधान-

प्रतीतिगोचरोकृतानां पदार्थानां परस्परप्रतियोगित्वमुदाहरणप्रत्युदाहरण-

न्यायेनानुसन्धेयम् ।

ही है क्योंकि १—आपके विनष्ट हो जाने के अनन्तर, २—कल्याणमती यह एक ही,

३—और वह भी गाय होगी, यह तीनों ही बातें आदर के योग्य नहीं है । और जीवित

रहते हुए शाश्वत्—सदैव, उपद्रवो—उपद्रवों से (अनथों से) सम्पूर्ण प्राणियों को भरण

करने वाली पृथ्वी-मण्डल मे रहने वाली सकल प्रजाओं की, हे प्रजाओं के अधीश्वर,

रक्षा करते रहोगे । ‘पिता की भाँति’ ( पिता जैसे अपने बच्चो की निरन्तर उपद्रवों से

रक्षा करता है । पुत्र-पालन से विमुख होकर एक जीव की रक्षार्थ प्राणोत्सर्गीं ) यह पद

अनादर के आधिक्य को ही बढ़ाता है । तो इस प्रकार से यह वाक्यार्थ यद्यपि सुस्पष्ट

समन्वययुक्त हो जाता है, तथापि यहाँ दूसरा भी तात्पर्य प्रतीत होता है । क्योंकि, सब

किसी के प्रजानाथ होने पर निरन्तर उस ( प्रजा ) की परिरक्षा न करना असम्भव

है ( जो भी प्रजानाथ होगा निरन्तर प्रजा की रक्षा करेगा ही । यदि आप सच्चे में

प्रजानाथ है तो कर्तव्य है आपका कि इस गाय की रक्षा करे ) । उक्ती पात्रता ( प्रजा-

रक्षण की असम्भवता आपमें है ) के अभिप्राय से ही ( यहाँ राजा को ) वह ( प्रजा-

नाथ ) कहा गया है । क्योंकि ऑलो के सामने ही एक जीव ( सिंह ) मात्र के द्वारा

खायी जाती हुई, गुरु की, ( वह भी ) होम की गाय के प्राणों की परिरक्षा की अपेक्षा

( जो आपसे कही जाती है ) से उदासीन, वर्तमान आपके जीवित रहते, इस प्रकार

से आपसे कभी भी प्रजा की स्वल्पमात्र भी परिरक्षा की सम्भावना नहीं की जा सकती

यह तो ( प्रत्यक्ष ) प्रमाण से ही युक्तियुक्त हो जाती है । यह कहा भी तो है—

प्रमाणयुक्त होने के कारण प्राप्त प्रवाह कैसे रोका जा सकता है? ॥ ४२ ॥ ( एक

गाय की रक्षा के असामर्थ्य से ही प्रजा की अरक्षा सिद्ध ही हो जाती है ) ।

यहाँ ( पर्यायवकता के इस भेद के विषय मे ) उक्ति से प्रतीति गोचर किये गये

पदार्थों की परस्पर प्रतियोगिता को उदाहरण प्रत्युदाहरण विधि से अन्वेषणीय है ।

पर्याय को यह अन्य प्रकार ( छटाँ भेद ) पदपूर्वार्द्ध की सृष्टि करता है—

‘अलङ्कारोपसंस्करण॰ से जो सुन्दर रचनावाला होता है । यहाँ ‘अलङ्कारोपसंसकार’

शब्द मे तृतीया तत्पुरुष एवं षष्ठी तत्पुरुष समास करना चाहिए । उससे दो अर्थ

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अयमपरः पर्यायप्रकारः पदपूर्वाद्धेवक्तां विधत्ते।—‘अलङ्कारोपसंस्कारमनोहारि निवन्धनः’1 अत्र ‘अलङ्कारोपसंस्कार-’शब्दे तृतीया-

समासः षष्ठीसमासश्च करणीयः। तेनार्थद्रयमभिहितं भवति। अलङ्कारेण रूपकादिनोपसंस्कारः शोभान्तराधानं यत्तेन मनोहारि हृदयरक्षकं निवन्धन-

सुपनिवन्धो यस्य स तथोक्तः। अलङ्कारस्योत्प्रेक्षादिरूपसंस्कार शोभान्त-

राधानं चेति विग्रहः। तत्र तृतीया समासपक्षोदाहरणं यथा—

यो लीलाताललोऽस्ति रहासि निःसपत्नियच्च केलिपत्रीपः।

कोपक्रीडासु योडस्रं दशनकृतुरुजो योधरसैकसकः।

आकल्पे दर्पणं यः श्रमशयनविधौ यक्षः गण्डोपधानं

देव्या स व्यापदं वो हरतु हरजटाकन्दलीपुष्पमिन्दुः ॥ ४३ ॥

अत्र तालवृन्तादिकार्यसामान्यादभेदोपचारनिबन्धनो रूपकालङ्कार-

विन्यासः सर्वेषामेव पर्यायाणां शोभातिशयकारित्वेनोपनिबद्धः। षष्ठी-

समासपक्षोदाहरणं यथा—

देवी वतनुमुखपङ्कूजेन शशिनः शोभा तिरस्कारिणा

पर्याज्ञाति विनिर्जितातनि सहसा गच्छन्ति विच्छायताम् ॥ ४४ ॥

कथित होते है। अलङ्कार-रूपक आदि ( अलङ्कारो ) से उपसंस्कार—अन्य शोभा की

जो सृष्टि होती है, उसे मनोहारि—हृदयरक्षक, निवन्धन—उपनिवन्ध होता है जिसका

वह तथोक्त—अलङ्कारोपसंस्कार मनोहारि निवन्धन—पर्यायवकत्व कहा जाता है। ( षष्ठी

के अनुसार ) अलङ्कार का उपेक्षा आदि का उपसंस्कार—अन्य शोभा की सृष्टि

जिससे होती है, उससे मनोहारि निवन्धनयुक्त पर्यायवकता होती है। उसमें भी तृतीया

( तत्पुरुष ) समास के पक्ष का उदाहरण जैसे—( चन्द्रमा ) देवी पार्वती की क्रीडा

का वालच्यजन है, एकान्त में होने वाली प्रणयक्रीडा का जो निर्विघ्न दीपक है, प्रणय

में होने वाली मानकेलियो में जो अस्त्र है, ( प्रणयलीला में भगवान् राधार्जी, के )

दोनों से पैदा की गयी पीडयुक्त अधर का जो अपूर्व सेक है; सौन्दर्य-रचना ( प्रसाधन ) में जो दर्पण का काम देता है, तथा ( लीलाओं से थककर सोने की क्रिया में

जो कपोलतल का उपवर्ह ( तकिया ) है, भगवान् राधार्जी की जटाकन्दली का फूल

वह चन्द्रमो आप लोगों की विपदाओं को दूर करे ॥ ४३ ॥

यहाँ तालवृन्त आदि कार्यसामान्य से अभेदोपचार लक्षण रूपक अलङ्कार का

विन्यास हुआ है, जो ( तालवृन्त आदि ), सभी पर्यायों के शोभातिशयकारी के रूप में

उपनिबद्ध किया गया है। ( यहाँ रूपक अलङ्कारों से शोभासृष्टि हो रही है अतः

कारिका के ‘अलङ्कारोपसंस्कार’ आदि पद में तृतीया-समासघटित अर्थ का यह

उदाहरण हुआ ) ।

उक्त पद में ही षष्ठी समास के पक्ष का उदाहरण जैसे—( रत्नावली नाटिका में

उदयन के द्वारा वासवदत्ता के प्रति कही गयी इस उक्ति में )—‘देवी, देखो चन्द्रमो

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अत्न स्वरससम्प्रवृत्तसायंसमयसमुचितासरोहुहां विच्छायातप्रतिपत्तिनोयकेन नागरकतया वल्लभोपलालनतप्रवृत्तेन तत्रिदर्शनोपक्रमरमणीयत्वमुखेन निर्जितानीवेति प्रतीममानोप्रेक्षालङ्कारकारित्वेन प्रतिपाद्यते । एतदेव च युक्तियुक्तम् । यस्मात्सवैसय कस्यचिदपकर्षस्य शृङ्गारशोभातिरस्कारितां प्रतिपद्यते । त्वन्मुखपद्मजेन पुनः शशिनः शोभातिरस्कारणा न्यायतो निर्जितानि सन्ति, विच्छायातां गच्छन्तीवेति प्रतीममानस्योप्रेक्षालक्षणस्यालङ्कारस्य शोभातिशय समुल्लास्यते ॥ १२ ॥

एवं पर्यायवक्रोक्ति विचारीयं क्रमसमुचिताविसंवादिरोमुपचारवक्रोक्ति विचारयति— यत्र दूरे डनतरेण्वस्यात्मसामान्यमुपचर्यते । लेशेनापि भवत्काव्यविदग्धतुमुद्रिकृतस्थितिताम् ॥ १३ ॥

यन्मूला सरसोल्लेखा रूपकादिरलङ्कृति: । उपचारप्रधानासौ वक्रोक्ति: काचिदुच्यते ॥ १४ ॥

की शोभा का तिरस्कार करने वाले तुम्हारे मुखकमल से एकदम जीत लिये गये कमल एकएक शोभाशून्य हो गये है ॥ ४४ ॥

यहाँ अपने आप होने वाली सायंकाल के उपयुक्त कमलों की म्लानता की प्रतीति को, प्रियतमा को रिझाने मे तत्पर हुए नायक के द्वारा विदग्ध विधि से उन कमलों की सम्प्राप्ति से होने वाली तात्कालिक विस्मयोत्पत्ति के द्वारा ( मुखकमल से ये कमल ) 'निर्जित से हो गये है' इस प्रकार प्रतीममान उपेक्षा अलङ्कार के उत्पादक के रूप मे प्रतिपादित किया जा रहा है । और यही युक्तियुक्त भी है। क्योंकि सब किसी कमल की चन्द्रमा के द्वारा ( सायंकाल मे कमलों के वन्द हो जाने के कारण उनके ) शोभा की तिरस्कारिता तो प्रतिपन्न होती ही है । किन्तु चन्द्रमा की शोभा को भी तिरस्कृत कर देने वाले तुम्हारे मुखकमल से अन्य कमल उचित ही जीत लिये गये है पराजित कर दिये गये है ( अत एव ) 'मानो म्लानता को प्राप्त से हो रहे है' इस प्रकार यहाँ ( प्रकरणानुकूल ) उत्पेक्षारूप अलङ्कार का शोभातिशय समुल्लसित हो रहा है । ( ध्यान देने योग्य है कि कुन्तक ने अब तक पर्यायवकता के अन्तर्गत लक्षणामूल एवं अभिधामूल ध्वनियों के कतिपय उदाहरण प्रस्तुत किये है । अतः ध्वनिवादियों की दृष्टि में समस्तवेश पर्यायवकता में ही की जा सकती है ) ।

इस प्रकार पर्यायवकता ( के छः भेदो ) का विचार कर क्रम समुचित अवसर प्राप्त उपचारवकता का विचार करते है— किसी अपूर्व अतिशायित व्यापार को कहने के लिए अत्यन्त व्यवधानपूर्ण प्रस्तुत वस्तु मे जहाँ दूसरी वस्तु से लेशमात्र भी सामान्य धर्म उपचरित ( समारोपित ) किया जाता है ( यहाँ उपचारवकता होती है ) ॥ १३ ॥

रूपक आदि अलङ्कार यन्मूलक होने से रसयुक्त बन जाते है, उपचारप्रधान वह कोई अपूर्व ही ( उपचार ) वकता कही जाती है ॥ १४ ॥

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असौ काचिदपूर्वो वक्तोच्चयते वक्रोभियोधीयते । कीदृशी—उपचारप्रधाना । उपचारणसुपचारः स एव प्रधानं यस्याः सा तथोक्ता । किं स्वरूपा च—यत्र यस्यामन्यस्मात् पदार्थान्तरात् प्रस्तुतत्वाद् वर्ण्यमाने वस्तुनि सामान्यूपचार्यते साधारणो धर्मः कदिचिद् वस्तुमभिप्रेतः समारोप्यते । कस्यिन् वर्ण्यमाने वस्तुनि—दूरान्तरे । दूरमनल्पमनन्तरं व्यवधानं यस्य तत्तथोक्तं तस्मिन् । नतु च व्यवधानसमूर्तत्वाद् वर्ण्यस्यमानस्य वस्तुनो देशविहितं तावत् सम्भवति । कालविहितमपि नास्त्येव, तस्य क्रियाविषयत्वात् । क्रियास्वरूपं कारकस्वरूपं चेत्युभयात्मकं यद्यपि वर्ण्यमाने वस्तु, तथापि देशकालकृत्‌यवधानेनात्र न भवितव्यम् । यस्यात् पदार्थोनामुचुमानवत् सामान्मात्रमेव शब्दैर् विषयीकृतं पायंते, न विशेषः । तत्कथम् दूरान्तरत्वमुपपद्यते ? सत्यमेतत्, किन्तु ‘दूरान्तर’शब्दो मुख्यतया देशकालविषये विग्रकर्षे प्रत्यासत्तिविरहे वर्त्तमानोऽप्युपचारात् स्वभावविग्रकर्षे वर्त्तते । सोऽयं स्वभावविग्रकर्षो विरुद्धधर्माध्यास-

वह कोई अपूर्व ‘वकता कही जाती है’—वक्रोक्ति बताई जाती है । कैसी वकता ?—जो उपचारप्रधाना होती है । उपचार को ही उपचार करते है । ( उपचार का विवेचन विद्वानों ने इस प्रकार किया है—अत्यन्तं विशाकलित्योः साधस्यातिशयमहिम्ना भेदप्रतीतिस्थापनमुपचारः ।) ‘अत्यन्तं पृथक् दोने पदार्थों मे अतिशय साधस्य के कारण भेदप्रतीति का न होना उपचार कहा जाता है ।) —विश्वनाथ । वही जिसमें प्रधान हो वह हुई तथोक्त—उपचारप्रधाना (वकता)। और क्या स्वरूप है उसका ?—जहाँ, जिसमे ( प्रकृत से ) इतर दूसरे पदार्थ के द्वारा प्रस्तुत होने के कारण वर्ण्यमान वस्तु मे सामान्म उपचारित होता है, कथन के (लिये अभीष्ट (किसी साधारण धर्म का ( उसमे ) समारोप किया जाता है । किस वर्ण्यमान वस्तु मे ( समारोप किया जाता है ?—दूर अन्तर वाली मे । दूर—अतिदूर, अन्तर—व्यवधान हो जिसमे उस तथोक्त दूरान्तर वस्तु मे । (पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते हुए कह रहे है कि— ) वर्ण्यमान वस्तु क्योंक अमूर्त होती है इसलिये ( आपने वर्ण्यमान वस्तु मे जो अतिशय व्यवधान की बात कही है ) व्यवधान देशविहित तो हो नही सकता ( इसलिये कि देशविहित व्यवधान केवल मूर्त वस्तु को ही हो सकता है । और उसमे कालकृत व्यवधान भी नही हो सकता क्योकि कालकृत व्यवधान क्रिया का विषय होता है । और यदि यह कहा जाय कि, यद्यपि काव्य-रचना के समय वर्ण्यमान वस्तु क्रियास्वरूप एवं कारकस्वरूप, उभयात्मक होती है ( अतः काल—देशकृत व्यवधान तो हो ही सकता है ? इसका उत्तर है कि ) तथापि यहाँ देश-कालकृत व्यवधान नही हो सकता क्योंकि अनुमान प्रमाण की माँति शब्दो से पदार्थों के सामान्मात्र का ही ग्रहण किया जा सकता है, न कि विशेष का । तो फिर कारिकोक्त—‘दूरान्तरता’—वस्तु का व्यवधान कैसे उपयुक्त हो सकता है ? ( उत्तर देते है )—यह सत्य है ( आपका कथन कि, वर्ण्यमान वस्तु मे व्यवधान सभव नही है ) किन्तु, ‘दूरान्तर’ शब्द ( का प्रयोग यहाँ )

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द्वितीयोऽनुच्छेदः ]

१७७

लक्षणः पदार्थोनाम । यथा मूर्तिमत्त्वसमूर्तत्वापेक्षया, द्रवत्वं च घनत्वापेक्षया, चेतनत्वमचेतनत्वापेक्षयति । कीटका तत्सामान्यम्-लेखेनापि भवन्त । मनाङ्मात्रेणापि सत् । किमर्थम्—कानिचिदपूर्वामुद्रिकतावृत्तितां वक्तुं सातिशयपरिस्पन्दतामभिधातुम । यथा—

स्निग्धयालकान्तिलिप्तवियत: ॥ ४८ ॥

अत्र यथा बुद्धिपूर्वकारिणः केचिच्चेतनवर्णाच्छायातिशयोत्पादनेच्छया केनचिद्रव्येणामीलितनेत्रतारका मूर्तिमन्तरुपचारात् किल्विदेव लेपनंयं मूर्तिमदद्रवस्त्रप्रायं लिम्पन्ति, तद्रदेव तत्त्कारित्वसामान्यं मनाङ्मात्रेणापि विध्यमानं कामघुद्रिकतावृत्तितामभिधातुमुपचारात् स्निग्धयालक्यामलकान्त्या लिमं वियद् यौसिर्युपनिबद्धम । 'स्निग्ध'शब्दोऽयुपचारवक्रो एव । यथा मूर्तं वस्तु दर्शनेस्पर्शनसवेय स्नेहगुणयोगान् स्निग्धमित्युच्यते, तथैव कान्तिरमूर्त्ताप्युपचारात् स्निग्धयेत्युता ।

सामान्यतया देशकालविषयक दूरी, सामीप्याभाव अर्थ मे वर्तमान रहते हुए भी उपचार से ( वस्तु के ) स्वभाव के व्यवधान ( द्रवत्व ) में भी लागू होता है । ओर वहीं यह स्वभाव विप्रकर्ष पदार्थों के विरुद्ध धर्मों का अध्यासरूप होता है । जैसे मूर्तिमत्ता अमूर्त्त की अपेक्षा, द्रवत्व घनत्व की अपेक्षा तथा चेतनता अचेतनता की अपेक्षा ( द्रान्तरत्न स्वभाव वाली ही है ) । द्रान्तरत्न पद की व्याख्या कर आगे उपचरित सामान्य मे सामान्य पद का विवेचन करते है )--वह सामान्य कैसा है ?—लेपमात्र से भी उपस्थित होता हुवा । स्वल्पमात्र से भी विध्यमान । किसलिए ( सामान्य उपचारित होता है )? किसी अपूर्व उद्रिकतावृत्तिता को कहने के लिए, अतिशययुक्त परिस्पन्दता स्वभाव, धर्म का वर्णन करने के लिए । उदाहरण जैसे—( २१२७ पर उद्धृत श्लोक का अंश )—

स्निग्ध और श्याम अपनी कान्ति से आकाश को विलिप्त कर देने वाले ( मेघ )

…....॥ ४९ ॥

बुद्धिपूर्वक कार्य करने वाले कुछ लोग जैसे चेतन की मॉत्ति वर्णों से की जाने वाली अतिशय कान्ति के निष्पादन की अभिलाषा से कुछ ही लेपनयोग्य किसी मूर्तिमान् वस्तु को विध्यमान लेपनशक्ति मूर्त्त किसी नील ( पात ) आदि रंगने के द्रव्य-विशेष से वही-साँ रँग देते है, उसी प्रकार किसी अपूर्व सातिशयिता का अभिधान करने के लिए स्वल्पमात्र भी ( मेघ मे ) विध्यमान उस लेपनत्वकारितारूप सामान्य धर्म के कारण उपचार से आकाश, दिव ( मेघ की ) श्यामल कान्ति से लिप्त गया है, यह उपनिबद्ध किया है । 'स्निग्ध' शब्द भी यहाँ उपचारवक्रता से ही संवलित है । जैसे ( कोई ) मूर्त्त वस्तु दर्शन एवं स्पर्शन के अनुभययोग्य स्नेहलुप गुण से युक्त होने के कारण 'स्निग्ध है' ऐसा कही जाती है उसी प्रकार अमूर्त्त भी कान्ति-उपचार से 'स्निग्ध' ऐसा कही गयी है । अथवा जैसे—

१२

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यथा वा—

गच्छन्तीनां रमणवसतिं योषितां तत्र नक्तं रुद्वालोके नरपतिपथे सूचिभेद्यैर्यैस्तमोभिः । सौदामिन्या कनकनिकषास्निग्धया दर्शयोर्यैस्तोयोत्सर्गेऽनिलतनुसुखरो मासं भूरिक्ल्वास्ताः ॥ ४६ ॥

अत्रामूर्त्तोनारापि तमसामतिभाहुल्याद् घनतन्मूर्त्तससुचितं सूचिभेद्यत्वमुपचरितम् । यथा वा—

मा आभ्रं यत् पतगेहं वारिद्रुतिरजज्ञानाद् अपवाद । निरहङ्कारमिअङ्का हरन्ति नीलाओ विगेसाओ ॥ ४७ ॥ गगनं च मत्तमेरुः धाराल्लहितारुजुनानि च वनानि । निरहडारमगाढा हरन्ति नीला अपि निशा ॥इतिच्छाया॥

( श्लोक पूर्व मेघ का ३७ वाँ है । विरहपीड़ित यक्ष ने अपनी प्रियतमा के पास सन्देश ले जाने वाले मेघ से राह मे पड़ने वाली उज्जयिनी के विषय मे कहा है )—मेघ, उस उज्जयिनी मे तुम रात्री मे सूचिमेध ( गहन ) अन्धकार के द्वारा अवरुद्ध प्रकाश राजमार्ग से होकर प्रियतम के निवास स्थान को जाती हुई सुन्दरियों को स्वर्ण-कसौटी के समान स्विग्ध विद्युत्र्द्रेखा से ( उन्हे ) भूमि ( राह ) दिखाओ ( किन्तु ) जलद्वान एवं गरजन से सुखर ( तुम ) न होना, कि वे भयविकल हो जाये ॥ ४६ ॥

यहाँ अमूर्त्त भी तमोद्रव्द्र के अतिशय आधिक्य के कारण, घनत्व के कारण मूर्त्त वस्तु के समतुकूल ( उस घनान्धकार पर ) सूचिभेद्यता का उपचारपूर्वक प्रयोग किया गया है । अथवा जैसे दूसरा उदाहरण—( गाथा गौडवहो ४०६ की है । ध्वनि-कार ने इसे अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य ध्वनि के उदाहरण मे प्रस्तुत किया है । वाद में व्यक्तिविवेककार महिमभट्ट तथा जयद्रथ आदि ने भी इसका उपयोग किया है । वर्षा-काल के वर्णन है—) मत्त मेघ आकाश तथा धारावृष्टि से सम्प्ति अर्जुन वृक्ष एवं सहकार कानन और अहङ्कारविहीन चन्द्रमाः वाली नील निशायें भी मन को हरण कर लेती हैं ॥ ४७ ॥

यहॉँ चेतन प्राणियों का धर्मसामान्य 'मत्तत्व' एवं 'निरहडारत्व' उपचरित हुए हैं । ( मत्त और निरहड्कार कोई चेतन प्राणी ही हो सकता है, मेघ और चाँद नही । किन्तु उन पर मत्तता एवं निरहड्कारता का आरोप ( उपचार ) किया गया है । वर्षा में इधर-उधर भटकने वाले मेघ वैसे ही लगते है जैसे भटकता मत्त व्यक्ति । निधि खो जाने पर ग्लानि-गर्व व्यक्ति की भोति वर्षा मे चन्द्र की अहड्कारता भी समाप्त हो जाती है, वह प्रकाश-हीन हो जाता है । इस प्रकार यहॉँ मेघ और चाँद दोनो मे चेतन धर्म की समानता पायी जाती जाती है । ) तो यह उपचारवकता का प्रकार सत्काव प्रवाह मे पड़कर हजारों प्रकार का हो सकता है, इसलिए सह्दयों को स्वयं ही समझ लेनी चाहिए । इसलिए इस उपचारवकता मे ( कुछ भी ) अन्तर समीप होने पर ( पूर्वप्रतिपादित विधि से कमी होने पर ) वक्रोक्ति का व्यवहार नही हो पाता । जैसे 'गौरीशिखर.' मे । ( उक्त गाथा का सौन्दर्य अभिनवगुप्त के शब्दो मे—

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अत्र मत्तत्वं निरहंकारत्वं च चेतनधर्मेसामान्यमुपचारितम् । सोऽयमुपचारवकताप्रकारः सत्कविप्रवाहे सहस्रमशः सम्भवतीति सहृदयैः स्वयमेव त्रेक्षणीया: । अत्र एवं च प्रत्यासत्तान्तरे डस्मिन्नुपचारे न वकतांव्यवहारः; यथा गौर्वाहीक इति ।

इदानीमुपचारवकताया: स्वरूपम्—यन्मूला सरसोल्लेखा रूपकादिरलङ्कृति: । या मूलं यस्या: सा तथोक्ता । रूपकमादिर्यस्या: सा तथोक्ता । का सा ?—अलङ्कृतिरलङ्कार्यनिबन्धनार्था । कीदृशी ?—सरसोल्लेखा । सरस: सास्वादः सचमत्कृतिरुल्लेखः समुन्मेषो यस्या: सा तथोक्ता । सामान्याधि करणयोत्र हेतुहेतुमद्भावः । यथा—अतिगुरवो राजभाया न भङ्ख्या इति ॥ ४८ ॥

यन्मूला सती रूपकादिरलङ्कृति: सरसोल्लेखा । तेन रूपकादेरलङ्करणकलापस्य सकलस्यैवोपचारवकता जीवितमित्यर्थः ।

'गगनं मत्तमेघमपि न केवलं ताराढितम्। धरारुहलताजुन निबक्षारण्यपि वनानि न केवल मलयमारुतान्दोलितसहकाराणि । निरहङ्कारमुगाढा नीला अपि निशां न केवल सितकरकरधवलिता । हरन्ति उत्सुकयनतीर्थ्यर्थः । मत्तद्रवेन सर्वथैवेहासम्भवत्स्वाथेन व्यापितमशेषव्योमक्षीरावलम्बनसर्वधेनु साधुयास्मेधोल्लक्षितया तस्माज्जसकादरनिर्वर्तनीयतादिर्धर्मसहत्वं ध्वन्यते । निरहङ्कारशब्देनापि चन्द्र लक्ष्यतया तत्पारतन्त्र्यविच्छिद्यायतत्वोज- गमियारूपजिगीषात्यागप्रभृति:-लोचन ।)

उपचारवकता का यह ( दूसरा ) स्वरूप है । यन्मूलक होने से रूपक आदि अलङ्कार सरस वर्णनायुक्त हो जाते है । जो ( उपचारवकता ) जिस ( रूपक आदि अलङ्कृति ) का मूल होती है वह हुयी तथोक्त यन्मूला । रूपक है आदि मे जिसके वह हुयी तथोक्त रूपकादि ( अलङ्कृति ) । वह ( यन्मूला रूपकादि ) क्या है ? अलङ्कृति- अलङ्कार, रूपकप्रभृति अलङ्कारो की काञ्चि है ( वह ), यह अर्थ हुवा । वह कैसी है ?-- सरल उल्लेखवाली । सरस—आस्वादयुक्त, चमत्कारपूर्वक् उल्लेख विशिष्ट उन्मेष, प्रकाशा जिसका वह होती है तथोक्त सरसोल्लेख रूपक आदि अलङ्कृति । सामान्य अधि- करण ( उपचारवक्तारूप ) वाले दोनो ही पदो ( सरसोल्लेखा एवम् रूपकादिरलङ्कृति ) मे हेतु-हेतुमद्भाव सम्बन्ध है । उदाहरण जैसे— अत्यन्त भारी अन्न नहीं खाने चाहिए ॥ ४८ ॥ ( यहाँ हेतुहेतुमद्भाव है । )

यन्मूलक होकर ही रूपक आदि अलङ्कार सरस उल्लेखवाले हो जाते है । इसलिए उपचारवकता समग्र ही रूपक आदि अलङ्कार-चन्द्र का प्राण है, यह अर्थ हुवा । ( अभी-अभी ) पूर्वंप्रतिपादित उपचारवकता के प्रकार से ( सम्प्रति प्रतिपाद्य- मान ) इसका क्या भेद है ? पहले वाली मे स्वभाव की अत्यन्त दूरी होने के कारण सामान्यतया स्वल्पमात्र ही साम्य का समाश्रयण कर सातिशयता का प्रतिपादन करने के लिए उस ( वस्तु ) के धर्ममात्र का अध्यारोप प्रवर्तित हो पाता है किन्तु इसमे कम

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ननु च पूर्वेस्मादुपचारवकतापकारादेतस्य को भेदः ? पूर्वेस्मिन्‌ स्वभावविप्रकर्षोत्‌ सामान्यान्‌ मनाड्‌मात्रमेव साम्यं समाश्रित्य सातिशयत्वं प्रतीपादयितुं तद्रर्मात्राधारोपः प्रवर्त्तते, एतस्मिन्‌ पुनरदूरेविप्रकृष्टसादृश्यतत्त्वमेवाध्यारोप्यते । यथा—

सत्स्वेव कालश्रवणोत्पलेपु सेनावनालोकिषपल्ववेपु । गाम्भीर्यपातालफणीश्वरेषु खड्‌गोषु को वा भवतां सुरारिः ॥ ४९ ॥

अत्र कालश्रवणोत्पलादिसादृश्यजनितप्रत्यासत्तिविहितमभेदोपचारनिबन्धनं तत्त्वमध्यारोपितम्‌।

'आदिग्रहणात्प्रस्तुतप्रशंसापकारस्य कस्यचिदन्यापदेशलक्षणस्योपचारवकतैव जीचितत्वेन लक्ष्यते ।

तथा च किमपि पदार्थान्तरं प्राधान्येन प्रतीममानतया चेतसि निधाय तद्राविधलक्षणसाम्यसमन्वयेन समाश्रित्य पदार्थान्तरमभि धीयमानतां प्रापयन्तः प्रायशः कवयो हृदयन्ते । यथा—

अनर्घः कोडप्यनस्तव हरिणहेवाक महिमा स्फुरत्येकस्यैव त्रिभुवनचमत्कारजनकः ॥

दूरे या भेद से युक्त सादृश्य से समुत्पन्न प्रत्यासत्ति के समुचित होने से अभेदोपचारनिबन्धन तत्‌ ( उस वस्तु ) का ही अध्यारोप कर दिया जाता है । जैसे—

काल ( मृत्यु ) के कर्‌पांपल, सैन्य वनपंक्ति के पल्‍वव तथा गाम्भीर्य ( गम्भीरता — अगाधता ) के पाताल सर्प खड्‌गों के रहते वह देवशत्रु आपके लिए क्या है ? अर्थात्‌ कुछ भी नहीं ॥ ४९ ॥

यहॉं पर ( खड्‌गों से ) कालश्रवणोत्पल आदि के सादृश्य से उत्पन्न सामीप्यविनिर्मित अभेदोपचारनिबन्धन ( खड्‌गोंपर ) कालकर्णोत्पलादि तत्‌व का ही अध्यारोप किया गया है ।

कारिका मे प्रयुक्त 'आदि' पद के ग्रहण से ( रूपक के अतिरिक्त ) किम्बी और को उपदेश कर कहे जाने के रूप अप्रस्तुत प्रशंसा प्रकरण की भी उपचारवकता ही प्राणरूप है, यह प्रतोत होता है ।

जैसे कि कविजन प्रायः किसी अन्य पदार्थ को प्राधान्येन मन मे प्रतीममान के रूप मे रखकर उसी प्रकार के स्वरूपसाम्य से युक्त वस्तु का समाश्रय कर किसी दूसरे पदार्थ को वर्ण्यमान विषय का पात्र बनाते हुए प्रायः देखे जाते है । जैसे—

( चन्द्रमा को सम्वोधित कर कहा जा रहा है ) — हे हरिण ! अकेले तुम्हारे अन्तर में त्रैलोक्य मे भी चमत्कार पैदा करने वाला प्रभाव-महात्म्य कुछ अमूल्य ही है, क्योंकि तुम्हारे लिए विधार की वनभूमि आकाश मे चन्द्रमा की मूर्ति है और अमृत की निरन्तर झरी प्रवाहित करने वाली ( उसकी ) किरण-समूहे ( तुम्हारे लिए ) घास का ग्रास हैं ॥ ५० ॥

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यदिन्दोर्मूर्तिस्थिते दिवि विहरणारणयवसुधा सुधासारस्यान्ती किरणानिकरः शश्पकवलः ॥ ५० ॥

अत्र लोकोत्तरतवलक्षणसुभग्यातुरयायि सामानयं समाश्रित्य प्राधान्येन विवक्षितस्य वस्तुनः, प्रतीमानवृत्तेरभेदोपचारनिबन्धनं तत्वमध्यारोपितम् । तथा चैतयोरैप्यलङ्कारयोसतुल्ये डङ्युपचारवक्रताजीवितत्वे वाच्यत्वमेकत्र प्रतीमानात्वमपरस्मिन् स्वरूपभेदस्य निवन्धनम् । एतच्चोभयोरपि स्वलक्षणव्याश्यानावसरे तुग्रहील्यते ॥ १४ ॥ एवं उपचारवक्रतां विविच्य समनन्तरप्राप्ताव्याकाशां विशेषणवक्रतां विविनक्ति—

विशेषणस्य माहात्म्यान् क्रियाया: कारकस्य वा । यत्रोल्लसति लावण्यं सा विशेषणवक्रता ॥ १५ ॥ सा विशेषणवक्रता विशेषणवक्रतव्वविच्छित्तिरभिधीयते । क्रियादृशि—यत्र यस्मां लावण्यमुल्लसति रमणीयकमुद्रिश्यते । कस्य—क्रियाया: कारकस्य वा । क्रियालक्षणस्य वस्तुनः कारकलक्षणस्य वा । कस्मात्—विशेषणस्य माहात्म्यात् ।

यहाँ अलौकिकत्व रूप ( प्रस्तुत सत्पुरुपादि वृत्त तथा अप्रस्तुत चन्द्रह्रिणादिरूप वृत्त ) उभयानुगामी सामान्य का समाश्रय कर प्रधानतया विवक्षित वस्तु की प्रतीमान वृत्ति का अभेदोपचाररूप तत्व ( हरिणत्व ) का ही अध्यारोप किया गया है ।

इस प्रकार इन ( रूपक एवं अप्रस्तुतप्रशंसा ) दोनो ही अलङ्कारो में उपचारवक्रता की प्राणता समान होने पर भी एकत्र ( रूपक मे ) वाच्यता और अन्यत्र ( अप्रस्तुतप्रशंसा मे ) प्रतीमानता ही उनके स्वरूपभेद का कारण है । और यह इन दोनो ही अलङ्कारो के अपने-अपने लक्षण के विवेचन के समय सम्यक् प्रस्फुटित किया जायगा ॥ १४ ॥

इस प्रकार उपचारवक्रता का विवेचन कर उसके ठीक बाद अवसर प्राप्त विशेषणवक्रता का व्याख्यान करते है—

जहाँ विशेषण के माहात्म्य से क्रिया अथवा कारक की रमणीयता समुद्भासित होती है, उसे विशेषणवक्रता कहा जाता है ॥ १५ ॥

वह विशेषणवक्रता—विशेषणवक्रता की शोभा कहाँ जाती है । कैसे ( है वह ) ?—जहाँ—जिसमे लावण्य उल्लसित होता है—रमणीयता समुद्भूत हो जाती है । किसकी ( रमणीयता समुद्भूत होती है ) ?—क्रिया अथवा कारक की । क्रियारूप वस्तु अथवा कारकरूप वस्तु की ( शोभा समुद्भूत होती है ) । किससे ( समुद्भूत होती है ) ?—विशेषण के माहात्म्य से । इन दोनो ( क्रिया—कारक ) मे प्रत्येक का जो विशेषणभेदक तत्व, उसके माहात्म्य से दूसरे पदार्थ मे अतिशयित भाव हो जाने के कारण । वह सातिशयत्व है क्या ? ( वह सातिशयत्व ) भावो के स्वभाव की सुकुमारता की समुल्लासकता और अलङ्कारो की कान्ति के अतिशय की परिपोपकता है । उदाहरण

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[ वक्रोक्तिजीवितम्

एतयो प्रत्येकं विशेषणं भेदकं (तस्य माहात्म्यात्) पदार्थान्तरस्य सातिशयत्‍वात् । किं तातिशयत्वम्—भावस्वभावसौकुमार्येसुल्लासकत्वमलङ्कारच्छायातिशयपरिपकत्वाद्‍न । यथा—

श्रमजलुसेकजनितनयनव्‍हिलिखितनखपददाहमूर्छिता वल्लभरमणसलुलितललितालकवलयचयार्थिन्‍हुता । स्मररसतविविधविधिहितसुरतक्रक्रमपरिमन्थ्रपालसा जयति निशात्‍ये युवतितनक्‍ तनुमद्‌ध्‍दमविध्रपाटला ॥ ५१ ॥

यथा—करान्तरालीकपोलभिस्‍तिर्यग्‍वाष्पोच्छलत्कूणितपतत्रलेखा । श्रोत्रान्तरे पिण्डितचित्तवृत्तिः श्रुणोति गीतध्वनिमत्र तन्वी ॥ ५२ ॥

यथा वा—शुचिशीतलचन्द्रिकाप्लुताङ्गाङ्गिरनिश्‍वद्‌धमनोहरा दिशः । प्रश्‍वासस्य मनोभवस्य वा हृदि कस्याप्यथ हेतुतां ययुः ॥ ५३ ॥

क्रियाविशेषणवक्‍त्वं यथा—

जैसे—( प्रभातकाल में निद्रा से उठी परिपुष्टा नायिका का वर्णन है—) ( रति के समय नायक के द्वारा किये गये ) अभिनव ताजे नखक्षतों पर गिर रहे पसीने की जलन से मूर्छित-सी, ( सम्भोग मे ) प्रियतम के द्वारा आवेगपूर्वक ( खींचे जाने से अवमर्दित ) विक्खरे सुन्दर कच-कलाप से अध्‍डेकी, कामजनित आनन्द से किये गये अनेक प्रकार के सम्भोग की परम्परा मे प्राप्त परिमर्दन की लाज से अल्‍साथी तथा कुछ-कुछ अवशिष्ट सुरा के मद के कारण सफेद गुलाब वर्णों वाली युवतिजनो की आँखे निशावसान मे सर्वसुन्दर लगती है ॥ ५१ ॥

यहाँ विविध विशेषणो के माध्यम सम्भुक्त युवती के प्रभातकालीन नेत्रो की सुन्दरता की स्वाभाविकता को रमणीयकता प्रस्तुत किया गया है ।

अथवा दूसरा उदाहरण जैसे—

दोनों हाथो के बीच अपने दोनो कपोलो को पूरी तौर से रखे हुए, छलकते ऑसुओ से ( गालो पर चिनित धुल जाने के कारण ) सिमटती पच्‍चरचनाओं वाली, कोनों मे मनोव्यथित हो समेटे कुशाछों यहाँ गीत की ध्वनि को सुन रही है ॥ ५२ ॥

यहाँ भी विशेषणो की सुन्दरता से वर्ण्यमान तन्वङ्गी का स्वभाव-सुन्दरता प्रकाशित की गयी है । इसके बाद शीतल-शुभ्र जोनहाई से परिपूर्ण, बहुत देर से शान्त और मनोहारी दिशाएँ किसी के भी हृदय मे प्रशान्ति ( विराग ) अथवा अनुराग की कारणता को प्राप्त हो गयी ॥ ५३ ॥

यहाँ भी विशेषणो के माहात्म्य से दिशाओ के सौन्दर्य को प्रकाशित किया गया है । उपर्युक्त तीनों उदाहरणो मे क्रमशः युवतितनक्‍, तन्वी एवं दिशारूप कारकों की विशेषणों के माहात्म्य से स्वाभाविक सुन्दरता प्रकाशित की गयी है । अतः ये सभी कारक विशेषणवक्रता के उदाहरण है । क्रियाविशेषणवक्रता का उदाहरण जैसे—

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सस्मारवर्णनपतित्वनिमीलिताक्ष: स्वेच्छाविहारवनवासमहोत्सवानामू॥ ५४ ॥

अत्र सर्वत्रैव स्वभावसौन्दर्यसमुल्लासकत्वं विशेषणानाम्। अलङ्कारच्छायाति ( शय ) परिपोषकत्वं विशेषणस्य यथा—

शाशिनः शोभातिश्काररिणा ॥ ५५ ॥

एतदेव विशेषणवक्तृं नाम प्रस्तुतौचित्यानुसारि सकलसत्काव्यजोवीतत्त्वेन लक्ष्यते, यस्मादनेनैव रसः परां परिपोषपदवींवतार्यते। यथा—

करान्तरालीन इति॥ ५६ ॥

स्वमहिम्ना विधीयन्ते यत्र लोकोत्तरोच्रियः ।

रसस्वभावालङ्कारास्तद्विधेयं विशेषणम् ॥ ५७ ॥

इत्यन्तरालोकः॥ ९५ ॥

एवं विशेषणवक्तां विचार्य क्रमसमर्पितावसरां संरुतिवक्तां विचारयति—

यत्र संग्रियन्ते वस्तु वैचित्र्यस्य विवक्षया।

सर्वेनामादिमिः कैदिचन् सोक्ता संरुतिवक्तता ॥ ९६ ॥

एकदम बन्द नेत्रों से गजेन्द्र ने ( पकड़ लिये जाने पर ) अपनी इच्छानुसार विचरण ( आदि ) वनवास के महोत्सवो का स्मरण किया ॥ ५४ ॥

यहाँ नेत्रानिमीलनरूप विशेषण से सस्मरणक्रिया का स्वाभाविक चित्र ही प्रस्तुत कर दिया गया है।

इन उपयुक्त सभी उदाहरणों मे विशेषणों मे स्वाभाविक सौन्दर्य की प्रकाशकता प्रस्तुत है।

विशेषण के माहात्म्य से ही अलङ्कार की शोभातिशय की परिपोषकता का उदाहरण हरण जैसे—( २।५४ के उदाहरण मे प्रस्तुत ) चन्द्रमा की शोभा को तिरस्कृत करने वाले ( तुम्हारे मुखकमल के द्वारा विनिर्जित कमल देखो मलिनता को प्राप्त हो रहे हैं ) ॥ ५५ ॥ ( यहाँ प्रतिमान उपेक्षा अलङ्कार का शोभातिशय परिपुष्ट हो रहा है । )

यहाँ विशेषणवक्ता प्रस्तुत वस्तु के औचित्य का अनुसरण करती है, समस्त उत्तम काव्यों की प्राणरूप से प्रतिष्ठित होती है; क्योंकि इसी के द्वारा रस अत्यन्त परिपोष की अवस्था को प्राप्त कराया जाता है । जैसे—( २।५२ के उदाहरण ) करान्तरालीन इत्यादि मे ( विप्रलम्भ शृङ्गार का परिपोष हो रहा है ) ॥ ५६ ॥

( कवियों द्वारा काव्य मे ) ऐसे ही विशेषण का संविभान करना चाहिए जिसके अपने माहात्म्य से रस, स्वभाव ( वस्तु ) और अलङ्कार लोकातिशायी शोभायुक्त कर दिये जाते है ॥ ५७ ॥ यह अनन्तरालोक है ।

इस प्रकार विशेषणवक्ता का विचार कर क्रमप्राप्त अवसर ( पदपूर्वार्धवक्ता के ही प्रकार ) संरुतिवक्तता का विचार करते है—

वैचित्र्य के कष्ण की इच्छा से जहाँ वस्तु को कहीं सर्वनाम आदि से छिपाया जाता है, वहाँ उसे संरुतिवक्तता कहते है ॥ ९६ ॥

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सोक्ता संरुतिवकता—या किलैवंविधा सा संरुतिवकतेत्युक्ता कथिता । संरुत्या वकता संरुतिप्रधाना वेति समासः। यत्र यस्यां वस्तु पदार्थलक्षणं संत्रियते समाच्छाद्यते । केन हेतुना—वैचित्र्यस्य विवक्षया विचित्रभावस्यामिधानेच्छया । या या पदार्थों विचित्रभावं समासादयतित्यर्थः। केन संत्रियते—सर्वनामादिभिः कैश्चित्‌ । सर्वस्य नाम सर्वनाम तदादि॰येषां ते तथोक्तास्ते: कैश्चिदपूर्वैर्वाचकैरित्यर्थः ।

अत्र च बहवः प्रकाराः सम्भवन्ति । यत्र किमपि सातिशयं वस्तु वाक्यं शाक्यमपि साक्षादमिधानादियतितयापरिच्छिन्नतया परिमितप्रायं मा प्रतीभासतामिति सामान्यव्यवचिना सर्वनाम्नाच्छाद्य तत्कार्यामिधायितया तदतिशयाभिधानपरेण वाक्यान्तरेण प्रतीति गोचरतांनीयते । यथा—

तत्पितर्यर्थ परिम्रहलिप्सौ स ठ्यधत्त करणीयमणीयः । पुष्पं चापशिखरस्थकपोले मनस्थः किमपि येन निदृध्यौ ॥ ५८ ॥

अत्र सदाचारप्रवणतया गुरुभक्तिभावितान्तःकरणो लोकोत्तरौदार्यगुणयोगाद्विविधविषयोपभोगवितृष्णमना निजेन्द्रियनिग्रहमसम्भावनीयमपि

वह संरुतिवकता कही गयी है । जो इस प्रकार की है, वह सवृतिवकता ऐसा कही गयी है । सवृति से वकता ( संरुत्या वकता ) अथवा सवृतिप्रधान ( वकता ) इस प्रकार का यह समास होता है । यहाँ—किसको, तत्त्व—वाचक ( वस्तु ) संवृता किया जाता है, समझकर आच्छादन कर लिया जाता है ( उसे संरुतिवकता कहते है ) । किस हेतु से ( वस्तुरूप का संबरण किया जाता है ) ?—वैचित्र्य के कथन की इच्छा से, विचित्रभाव के अभिधान की इच्छा से । जिससे पदार्थ विचित्रभाव को प्राप्त कर लेता है—( अर्थ हुआ यह ) । किसके द्वारा वस्तु संवृत की जाती है?—किन्हीं सर्वनाम आदि के द्वारा । सबका जो नाम वह सर्वनाम कहा जाता है । वह सर्वनाम ही जिनके आदि में हो वे हुए तथोक्त ( सर्वनामादि ) उनके द्वारा अर्थात् किन्हीं अपूर्व ( अर्थों के ) वाचक ( शब्दों ) के द्वारा ( वस्तुसंवृत किया जाता है ) ।

इसमें अनेक प्रकार हो सकते हैं । ( प्रथम प्रकार इस तरह का है )—जहाँ कोई भी अतिशयुक्त वस्तु का ( साक्षात् ) कहा जाना सम्भव होने पर भी ( यह समझकर कि ) साक्षात् कथन से ( इसका भाव ) इतने परिमाममात्र से युक्त होने के कारण सीमितप्राय न प्रतीत होने लगें, इसलिए ( अभिषेय वस्तु को ) सर्वनामवाची किसी सर्वनाम से आच्छादन कर उस कार्य ( अर्थ ) के वाचक, उसके अतिशय के कथनपरक अन्य वाक्य से प्रतीतिविषयता को प्राप्त कराया जाता है। उदाहरण जैसे—

उन ( भीष्म ) के पिता ( शान्तनु ) के ( सत्यवती से ) पाणिग्रहण के अभिलाषी होने पर अत्यन्त छोटी वयवाले उन्होंने करने योग्य ( आजन्म ब्रह्मचर्यं—व्रत—पालन की प्रतिज्ञारूप ) कार्य किया जिससे पुष्प—धनुप की छोर पर गाल रुळे कामदेव किसी ( अनिर्वचनीय अवस्था मे ) डूबो दिये गये ॥ ५८ ॥

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शान्तनवो विहितवात्याभिधातुं शक्यमपि सामान्याभिधायिना सर्वनाम्ना-च्छायोत्तराधेनं कार्योत्तराभिधायिना वाक्यान्तरेण प्रतीतिगोचरतामनीयमानं कामपि चमत्कारितामावहतति । अयमपरः प्रकारो यत्र स्वपरिस्पन्दकाष्ठाधिरुढः सातिशययं वस्तु वचसाम-गोचर इति प्रथयितुं सर्वनाम्ना समाच्छाद्य तत्कार्याभिधायिना तदतिशय-वाचितां वाक्यान्तरेण समुन्मील्यते । यथा—

याते द्वारवती तदा मधुरिपौ तदूदत्तसम्पदानां कालिन्दीज़लकेलिचञ्जुललतामालमध्य सोत्कण्ठया । तदूगीतं गुरुवाष्परद्गदगत्तारस्वरं राधया येनान्तर्जलचारिमिर्जलचरेरप्युक्तमुत्कृजितम् ॥ ५९ ॥

अत्र सर्वनाम्ना सङ्कृतं वस्तु तत्कार्याभिधायिना वाक्यान्तरेण समुन्मील्य सहृदयहृदयहारितां प्राप्तितम् । यथा वा—

यहाँ सदाचार-परायण होने के कारण गुरुजन ( पिता ) की भक्ति से भावित चित्त, अलौकिक औदार्य-गुण से युक्त होने के कारण विभिन्न विषयों के उपभोग से पराड्मुख मन, शान्तनु के पुत्र ( भीष्म ) ने सम्भावना न होने पर भी अपनी इन्द्रियों का निग्रह कर लिया ऐसा कहना सभव होने पर भी, सामान्य के अभिधायक सर्वनाम से आच्छादित कर ( प्रतिपद-रूप ) दूसरे कार्य को अभिव्यक्त करने वाले उत्तार्द्ध के दूसरे वाक्य के द्वारा प्रतीति-पदवी को प्राप्त कराया जाता हुआ किसी अपूर्व चमत्कारिता को प्रस्तुत कर रहा है ।

( सङ्केतवक्ता का ) यह अन्य प्रकार है, जहाँ अपने स्वभाव को सीमा पर अधिरुढ होने के कारण अतिशययुक्त वस्तु वागगोचर है, ऐसा प्रख्यापित करने के लिए किसी सर्वनाम के द्वारा उसे समाच्छादित कर उस कार्य को अभिहित करने वाले, उसके अतिशयवाची किसी अन्य वाक्य के द्वारा समुन्मीलित किया जा है । उदाहरण जैसे—(कृण के वियोग में विधुरा राधा का चित्रण है—) उस समय मधुसूदन भगवान् कृण के द्वारा चले जाने पर, उनके द्वारा प्रदान की गयी सल्कियावाली, यमुना के जल मे क्रीडा ( मल्लक ) वचञ्जुल ( वेतस ) लता का अवलम्बन कर उत्कण्ठायुक्त राधा ने अतिशय आँसुओ से गद्गद्गदुण्ठ उच्च स्वर वह ( करुण ) गान किया कि जिससे जल के बीच विचरण करने जलचर जीवों से भी उन्हें होकर ( विरहपूण ) चौंकार किया जाने लगा ॥ ५९ ॥

यहाँ पर ( तदूगीत के तत् इस ) सर्वनाम से आच्छादित ( राधा का विरहगीत-रूप ) वस्तु, उस कार्य को कहने वाले ( राधा के अपूर्व विरहव्यथा को व्यक्त करने वाले ) दूसरे वाक्य ( श्लोक के अन्तिम पाद जलचारियों के करुण-कूजनरूप ) के द्वारा विविधत् प्रकाङ्क्षित कर सहृदयों के हृदय की हारिता को प्राप्त करा दी गयी है । अथवा जैसे--

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तहं रुण्णं कण्हु विसाहीए रोहगिरगिराए ।

जहं कस्सवि जम्ससऐवि कोइउ मा वल्लहो होड ।। ६० ।।

तथा रुदितं कृष्ण विशाखया रोहगद्गिरा ।

यथा कस्यापि जन्मशतेडपि कोडपि मा वल्लभो भवतु ।।

इति इच्छाया ।

अत्र पूर्वोक्ते संवृतं वस्तु रोदनलक्षणं तदतिशयाभिधायिना वाक्यान्तरेगण कामपि तद्विद्राह्लादकारितां नीतम् ।

इदं सपरमात्रं प्रकारान्तरं यत्र सातिशयसुकुमारं वस्तु कार्योतिशयाभिधानं

विना संवृतिमात्ररमणीयतया कामपि काष्ठामधिरोप्यते । यथा—

दर्पणे च परिमोगदर्शिनी प्रृथुतः प्रणयिनो निषेदुषः ।

वीक्ष्य बिम्बमनुबिम्बमात्मनः कान्ति कान्त न चकार लज्जया ।। ६१ ।।

अयमपरः प्रकारो यत्र स्वानुभवसंवेदन्तीया वस्तु वचसा वक्तुमविषय

इति ख्यापयितुं संरियते । यथा—

तान्यक्षराणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ।

इब्लि पूर्वेमेव व्याख्यातम् ।

हे कृष्ण ( तुम्हारे वियोग में ) अवरुद्ध गद्गद वाणी से विशाखा ने वैसा (करुण)

क्रन्दन किया कि ( यह कहती पड़ता है कि ) सैकड़ो जन्मो में भी कोइउ भी किसी

का भी प्रियतम न होवे ( न कोइ किसी का वल्लभ होगा, न वियोग में ऐसे कष्ट

होगे ।। ६० ।।

यहाँ पर पूर्वार्द्ध मे रोदनरूप समावृत वस्तु उसके अतिशयवाची अन्य वाक्य ( कि

कोइउ भी किसी का सैकड़ो जन्मो मे भी प्रेमी न बने ) के द्वारा किसी अनिवंचनीय

काव्यमरमज्ञो को आनन्द प्रदान करने की अवस्था को प्राप करा दी गयी है ।

यहाँ (सदृक्तिवक्रता मे ) यह और दूसरा प्रकार है जहाँ अत्यन्त सुकुमार वस्तु

(उसके) कार्य के अतिशय का वर्णन किये बिना सवरणमात्र की रमणीयता के कारण

अनिवंचनीय सीमा तक पहुँंचा दी जाती है । जैसे—( कुमारसम्भव ८।१९ के इस

श्लोक मे, जहाँ पार्वती की शृङ्गारिक चेष्टाओ का वर्णन है—)

दर्पण मे ( प्रिय भगवान् शिव के द्वारा सुरत मे कोपोल आदि पर हुए ) परिमोग

को (नखक्षत, दन्तक्षत आदि चिन्हो को ) देखती हुई पार्वती ने पीछे बैठे हुए प्रणयी

( शिव ) की छाया को अपनी छाया के पीछे देखकर लज्जा के कारण क्या-क्या

नहीं किया ।। ६१ ।।

यहाँ पर कानि-कानि सवर्णनाम से पार्वती की लज्जाजनित चेष्टाओ का संवरण

किया गया है किन्तु इन्ही पदों से सुन्दर वनिता की तात्कालिक छवि सम्मुख उपस्थित

हो जाती है ।

( सदृक्तिवकता का ) यह और भी प्रकार है, जहाँ अपने अनुभव से जानने योग्य

वस्तु, वाणी से कहने का विषय नहीं है ऐसा व्यक्त करने के लिउ, समाच्छादित कर

ली जाती है । जैसे—( १।५१, पर उदाहृत श्लोकाश )—'तान्यक्षराणि हृदये किमपि

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इदमपि प्रकारान्तरं संभवति यत्र परानुभवसवेद्यस्य वस्तुनो वक्तुरगोचरतां प्रतिपादयितुं सन्न्रुति: क्रियते । यथा—

मन्य्रथ: किमपि येन निदध्यौ ॥ ६३ ॥

अत्र त्रिसुवनप्रथितप्रतापमहिमा तथाविधशक्तिन्याघातविष्णणचंताः काम किमपि स्वानुभवसमुचितमविन्त्यादिति ।

इदमपरं प्रकारान्तरमत्र विद्यते—यत्र स्वभावेन कविविवक्षया वा केनचिद्वैपेहत्येन युक्तं वस्तु महापातकादिवच कोतनीयता नाहंताति संपाद्यतुं संप्रियते । यथा—

दुर्वचं तदथ मास्मभून्मृगस्त्वण्यसौ यदकरिष्यदौजसा । नैनमाशु यदि वाहिनीपतिः प्रत्यपत्स्यत शितेन पत्रिणा ॥ ६४ ॥

ध्वनान्ति मे । जहाँ तानि पद से ‘सम्मोगकाल मे प्रियतमा के उन अकथनीय वाग्गोचर असकूट अक्षरो, की सान्त्वनयता प्रस्तुत की गयी है । पद क्री व्याख्या पहले ही की जा चुकी है ॥ ६२ ॥

( सन्न्रुति-वकता का ) यह भी एक और भेद हो सकता है, जहाँ अन्य के द्वारा अनुभव सवेदनीय वस्तु क्री वक्ता के द्वारा की जाने वाली प्रतिपादना क्री अगोचरता को प्रतिपादित करने के लिए ( सन्न्रुति-नाम से ) उस वस्तु का सवरण किया जाता है । उदाहरण जैसे सन्न्रुति-वकता के ही प्रथम उदाहरण के अन्तिम पद में—‘जिससे कामदेव किसी अनिवंचनीय अवस्था मे हुबा दिया गया ॥ ६३ ॥

( यहाँ भीष्म की अपूर्व प्रतिज्ञा से त्रिभुवन-विदित प्रताप शोचनोय अवस्था को प्रास काम क्री अवस्था का वर्णन किसी वक्ता से सभव नही है, प्रतिपादित करने के लिए ही ‘यत्र’ सर्वनाम का प्रयोग किया गया है । ) यहाँ चैलोेक्य-विख्यात अपने पराक्रम क्री महिमावाला ( भीष्म के द्वारा क्री गयी प्रतिज्ञा से ) उस प्रकार से अपनी शक्ति के विनाश से विष्णण मन काम ने अपने अनुभव योग्य किसी अकथनीय बात को सोची ( जिसे कोई और सोच न सकता और न ही कह सकता है ) ।

इस ( सन्न्रुति-वकता ) मे और अन्य भेद भी है—जहाँ स्वभाव अथवा कवि-विवक्षा के कारण कोई वस्तु किसी दोष से युक्त महापातक को भोति कथन के योग्य नही है, ऐसा प्रतिपादित करने के लिए छिपा ही जाती है । जैसे—( किरात के १३३।१४ के इस श्लोक मे । झूकर-वेपधारी दानव पर किरात-वेप शिव एव अर्जुन के बाण-प्रहार के बाद किरात-नरेश के गण से हो रहे अर्जुन-सवाद मे किरात का कथन है )—

यदि ( मेरे ) सेनापति ने तोक्षण बाण से इसे दीप्त न मारा होता तो यह पशु ( झूकर ) अपने भयंकर पराक्रम से तुम्हारे प्रति जो करता, वह दु:ख से ही कथनीय है और वह ( तुम्हारे लिए ) न हो ॥ ६४ ॥

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मुचितभावस्तस्य विच्छित्तिमुपशोभां विकासयन्त समुल्लासयन्त । केन स्वमहिम्ना निजोत्कर्षेण । यथा— वेल्लद्बलाकाघना: ॥ ६७ ॥

यथा वा— सिन्धौ हताक्षे हशौ । इति ॥ ६८ ॥

अत्र वर्तमानकालाभिधायि: शतप्रत्यय: कामप्यतीतानागतविप्रप्रभविरहितां तात्कालिकपरिस्पन्दसुन्दरीं प्रस्तुतौचित्यविच्छित्तिं समुल्लासयन् सहृदयहृदयहारिणीं प्रतिपयवकतामावहतति ॥ ९८ ॥

इदानोमेतस्या: प्रकरणन्तरं पर्यालोचयति— आगमादिपरिस्पन्दसुन्दर: शब्दवकताम् । पर: कामपि पुष्णाति वनन्धच्छायाविधायिनीम् ॥ ९८ ॥

परो द्वितीय: प्रत्ययप्रकार: कामप्यपूर्वा शब्दवकतामावध्नाति वाचकवकभावं विधत्ते । कीटचू आगमादिपरिस्पन्दसुन्दर: । आगमो मुदादिरादियेस्य स तथोक्त:, तस्यागमादे: परिस्पन्द: स्वविलसितं तेन सुन्दर: सुकुमार: । कीटवर्शी शब्दवकताम्—वनन्धच्क्षायाविधायिनीम सत्रिवेशान्तकारिणीमित्यर्थ: ।

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१९०

[वक्रोक्तिजीवितम्

यथा—

जाने सख्यास्तव मयि मनः सम्प्रत्यस्नेहमस्मा-दिष्टंभूतां प्रथमविरहे तामहं तर्कयामि ।

वाचालं मां न खलु सुभगमन्यभावः करोति प्रत्यक्षं ते निखिलमचिराद् भ्रातरुक्तं मया यत् ॥ ६९ ॥

यथा वा—दाहौष्मभः प्रसृततिम्पचः ॥ ७० ॥ इति ॥

वार्यं पायं कलाचीहृतकदलदलम् ॥ ७१ ॥

अत्र सुभगमन्यभावप्रस्तुतिशब्देनैव सुमादिपरिस्पन्दसुन्दरा: सत्रिवेश-च्छायाविधायिनीं वाचकवकतां प्रत्यय: पुष्णन्ति ॥ १८॥

उदाहरण जैसे—(मेघदूत का यह ९०वाँ श्लोक है । पत्नी की वियोगावस्था का सुन्दर वर्णन करने के बाद यक्ष मेघ के प्रति उसमें अत्यधिक आश्वा पैदा करने के लिए कह रहा है )—मैं जानता हूँ, तुम्हारी सखी ( मेरी पत्नी ) का मन मेरे प्रति स्नेह से परिपूर्ण है, इसीलिए ( इस ) प्रथम-प्रथम वियोग में मैं उसे इस प्रकार की ( जैसी की मैंने इसके पूर्व मेरे वियोग में होने वाली उसकी विरहदशा का वर्णन किया है ) सोचता हूँ । अपने को सुन्दर मानने का भाव ( सुभगमन्यभाव ) मुझे बहुभाषी नहीं बना रहा है ( मैं अपने को बहुत सुन्दर समझता हूँ, इसीलिए यह समझता हूँ कि मेरे वियोग मे उसकी ये-ये अवस्थाएँ होगी । बात ऐसी नही है । कोई व्यर्थ प्रलाप मैने नही किया है, अधिक कहने से क्या ) भाई, मैने जो भी कहा है, सीधा ही वह सम्पूर्ण तुम्हारी आँखों के सामने होगा ॥ ६९ ॥

अथवा जैसे—( पूर्वोदाहृत ११८ के अंश )—

दाहौष्मभः प्रसृततिम्पचः ॥ ७० ॥ इत्यादि मे ।

अथवा जैसे—( २१९ में उदाहृत )—

पायं पायं कलाचीहृतकदलदलम् ॥ ७१ ॥ मे ।

यहाँ ( इन तीनों उदाहरणों मे ) सुभगमनन्यभाव आदि ( प्रस्तुतिम्पचः, पाय-पायम् ) शब्दों मे मुम् आदि के परिस्पन्द से सुन्दर प्रत्यय ( सुभगमात्मान मन्यते इस अर्थ मे ) सुभग उपपद मन् धातु से ख़्वा प्रत्यय एवं मुम् का आगम होकर ‘सुभगमन्य शब्द बनता है । ‘सुभगमन्यभाव’ पद से इलोक मे सौन्दर्य का उत्कर्ष बढ़ गया है । इसी प्रकार ‘प्रस्तुतिम्पच ’ इस अर्थ मे प्रस्तुत उपपद पच् धातु से ख़्वा, मुम् होकर ‘प्रस्तुतिम्पच’ शब्द की निष्पत्ति होती है । यहाँ भी इस पद के प्रयोग से वियोगिनी की दहकती विरहाग्नि का बाहुल्य घोतित होता है । ‘पायं पायम्’ मे भी पीत-पीत के अर्थ मे ‘पा’ धातु से णमुल् एवं लुक् का आगम करके ‘पायम्पायम्’ शब्द निष्पन्न होना है, जिससे प्रकृत मे चारुता की वृद्धि हो गयी है । इस प्रकार तीनों ही उदाहरणों मे आगम हुआ है ) रचना की शोभा करने वाली वाचक ( शब्द ) वकता को पोषित कर रहे है ॥ १८ ॥

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एवं प्रसङ्गसमुचितां पदमध्यवर्तिप्रतयवकतांं विवार्ये समनन्तरसम्भा-

विनिर्वृत्तिवकतां विचारयति—

अङ्ययीभावमुख्यानां वृत्तीनां रमणीयता ।

यत्रोल्लसति सा वृत्तिवैचित्र्यवकता ॥ १९ ॥

सा वृत्तिवैचित्र्यवकता ध्वेया बोद्धृभिः । वृत्तीनां वैचित्र्यं विचित्रभावः

सजातीयापेक्षया सौकुमार्योत्कर्षेण वकृतां वकभावविच्छित्तिः । कीदृशी—

रमणीयता यत्रोल्लसति । रमणीयक यस्यामुद्रीयते । कस्य वृत्तिनाम् । कासां—

अङ्ययीभावमुख्यानाम् । अङ्ययीभावः समासः मुख्यः प्रधानभूतो यासां तास्त-

थोक्तासां समासतद्वितसुब्व्युत्पत्तीनां वैच्याकरणप्रसिद्धानाम् । तद्यम-

त्रार्थे—यत्र स्वपरिस्पन्दसौन्दर्यमेतासां समुचितभित्तिभागोपनिबन्धाद्भि-

व्यक्किमासादयति ।

यथा—

अभिव्यक्कि: तावद्वहिरलभमानः कथमपि सुरत्रान्त स्वात्मन्यधिकतरसमुच्छ्रितभयः ।

मनोज्ञासुदृश्यतां परपरिमलस्पन्दसुभगा-

महो धत्ते शोभामधिमधु लतानां नवरसः ॥ ७२ ॥

इस प्रकार प्रसङ्गानुकूल पदों मे रहने वाली प्रत्ययवकता का विचार कर उसके तुरन्त बाद होने वाली वृत्तिवकता का विचार करते है—

जहाँ अव्ययीभाव प्रधान वृत्तियों की रमणीयता समुद्धासित होती है, उसे वृत्ति-

वैचित्र्यवकता जाननी चाहिए ॥ १६ ॥

उसे वृत्तिवैचित्र्यवकता जानना चाहिए, समझना चाहिए । वृत्तियों का वैचित्र्य,

विचित्रभाव, सजातीय ( शब्दों की ) अपेक्षा सुकुमारता का उत्कर्ष पं उससे होने वाली

वकता, वकभाव की सुन्दरता ( वृत्तिवैचित्र्यवकता कही जाती है ) । कैसे ( है वह )? जहाँ रमणीयता उल्लसित होती है । किसकी

( रमणीयता )—वृत्तियो की । किन ( वृत्तियो ) की ?—अव्ययीभाव प्रधान

( वृत्तियो ) की । अव्ययीभाव समास मुख्य, प्रधानभूत है जिनमे उन समास, तद्धित,

सुप्, धातु-वृत्तियो का, जो वैयाकरणो मे प्रसिद्ध है । तो यहाँ यह अर्थ हुआ—जहाँ इन

वृत्तियों का अपना सहज-सौन्दर्य समुचित भित्तिभाग ( वस्तु आदि ) मे उपनिबन्धित

होने के कारण अभिव्यक्कि प्राप्त करता है ( वहाँ वृत्तिवैचित्र्यवकता समुल्लसति

होती है ) ।

उदाहरण जैसे—ओ हो, मधुमास को प्राप्त कर लताओ का नया रस किसी भी

प्रकार से बाहर न निकल पाने के कारण अपने अन्दर ही स्कुरित होता हुआ अतिशय

समुत्पन्न मूर्छा के भार से युक्त, बाहर निकल पडने वाली मनोरम एवं अत्यधिक परिमल

के निर्गमं से सुरेल्य अपूर्व शोभा को धारण कर लेता है ॥ ७२ ॥

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१९२

[ वक्रोक्तिजीवितम्

अत्र ‘अधिमधु’शब्दे विभक्त्यर्थविहितः समास समयाभिधानेऽपि विषयसममीप्रीतितिसृप्तादयन ‘नवरस’शब्दस्य श्लेषेन छायाच्छुरणवैचित्र्यसुनिबन्धयति। एतद्वृत्तिविरहिते विन्यासान्तरे वस्तुप्रतीतौ सत्यामपि न तादृक्तद्विदाहकारित्वम्। उद्भ्रुतपरिमलस्पन्दसुभगशब्दानुपचारवकृतृं परिस्फुरद्विभाव्यते। यथा च—

आस्वर्लोकादुरगनगरं नूतनालोकलक्ष्मी- मातन्यदृक्: किमिव सिततां चैष्टतैरते न नीतम्। अप्येतासां दयितविहिता विद्वदष्टुन्दरीणां यैरानोता नखपदमयी मण्डना पाण्डिमाननम् ॥ ७३ ॥

अत्र पाण्डुत्व-पाण्डुता-पाण्डुभावशब्दद्रेश्यः पाण्डिमशब्दस्य किमपि वृत्ति- वैचित्र्यवकत्वं विद्यते। यथा च—

कान्तत्वीयाति सिहलीसुकरुचां चूर्णीभिषेकोल्स- ल्भावण्यासृतवहिनिःश्वासमाचान्तिभिरिचन्द्रमाः।

यहाँ पर ‘अधिमधु’ शब्द मे (‘अव्ययं विभक्तौ समी’ आदि सूत्र से, ‘मधौ इति

अधिमधु’ इस प्रकार के विग्रह करने पर, ) विभक्ति अर्थ मे किया गया ( अव्ययीभाव ) समास ( वस्तुतः रूप ) समय का वाचक होने पर भी विषय मे सम्भवी ( मधौ इति ) की प्रतीति उत्पन्न करता हुआ ‘नवरस’ शब्द की श्लेष की शोभा से मण्डित विचित्रता को उन्मीलित करता है। इस वृत्ति ( अव्ययीभाव समास ) के बिना दूसरे ढंग मे रचना करने पर वस्तु की प्रतीति होने पर भी उस प्रकार की तादृक्त्विदाहकारिता नहीँ हो पाती। ( वृत्तिवकता के अतिरिक्त इसी उदाहरण मे प्रयुक्त ) उद्भ्रुत, परिमल, स्पन्द तथा सुभग शब्दो की उपचारवकता भी प्रकाशित होती प्रतीत हो रहा है।

अथवा जैसे—( सुभाषितावली की स० २९५८ पर उद्भ्रुत इस श्लोक मे, जहाँ किसी विशिष्ट व्यक्ति का वैशिष्ट्य प्रतिपादित किया जा रहा है—) ( श्रीमन ), स्वर्गलोक से लेकर नागलोक ( पाताल ) तक अभिनव कान्ति की शोभा का चतुर्दिक् विस्तार करने वाले तुम्हारे कायों ( कीर्तिप्रतापन ) से कौन-सी वस्तु शुष्कता को प्राप्त नहीँ कर दी गयी ( और यही नहीँ ) इन शत्रुवनिताओ की अपने प्रियतम से विरचित नखपद-रूप अलङ्करण भी जिन ( सुचरितो ) से पाण्डुता को प्राप्त करा दिये गये है ॥ ७३ ॥

यहाँ पाण्डुत्व, पाण्डुता तथा पाण्डुभाव शब्दो की अपेक्षा पाण्डिमा शब्द की कोई अपूर्व ही ( तादृक्त्वरूप ) वृत्तिवैचित्र्यवकता वर्‌णमान है।

और जैसे—( चन्द्र-सौन्दर्य के इस वर्णन मे )—चूर्णलेपपूर्वक किये गये स्नान से छलकते कान्त-सुधा को वहन करने वाले झरनों से सुमधुर सिहल-सुन्दरियों के मुख-सौन्दर्य के आचमन से चन्द्रमाः ( इस प्रकार के ) कान्तभाव को प्राप्त कर रहा है।

जिससे ( यह चन्द्रमाः ) देवेन्द्रपर्यन्त जगती को जीत लेने वाले मनोजन्मा भगवान् कामदेव के पानगोष्ठियों के महोत्सव-प्रसङ्गो मे एकच्छत्र ( राजा ) सा आचरण करता है ॥ ७४ ॥

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येनापानमहोत्सवव्यतिकरेप्वेकातपत्रायते

देवस्य त्रिदशाधिपावरधिगजगिजिष्णोर्मेनोजन्मनः ॥ ७४ ॥

अत्र सुब्धातुत्र्ते: समासग्रतेपि किंपि वक्रतावैचित्र्यं परिस्फुरति ।

एवं वृत्तिवक्रतां विचार्य पदपूर्वार्द्धभाविनीसुचितावसरां भाववक्रतां

विचारयति—

साध्यतामप्यनाटल्य सिद्धत्वेनाभिधीयते ।

यत्र भावो भवत्येषा भाववैचित्र्यवक्रता ॥ २० ॥

एषा वर्णितस्वरूपा भाववैचित्र्यवक्रता भवत्येवं ।

भावो धात्वर्थरूपस्तस्य वैचित्र्यं विचित्रभावः प्रकारान्तराभिधानवग्यतिरेकि रामणीयकं तेन वक्रता

वक्तृवैचित्र्यस्थितेः । कीदृशी? यत्र यस्मिन् भावः सिद्धत्वेन परिणिष्पत्त्वेनाभिधीयते भण्यते ।

किं कृतवा—साध्यतामप्यनाटल्य निष्पाद्यमानतां प्रसिद्धसाध्यवधीर्ये ।

तदिदमत्र तात्पर्यम्—साध्यत्वेनापरिनिष्पत्तेः: प्रस्तुतस्यार्थेस्य

दुर्बलः परिपोषः, तस्मात् सिद्धत्वेनाभिधानं परिणिष्पत्तत्वात्पर्यैषु प्रकृतार्थ-

परिपोषमावहति । यथा—

यहाँ ( कान्तलीयति मे प्रथमतः तो कान्तत्व में तद्वित्त वृत्ति है, पुनः उस सुवन्त

पद को आचार्यार्थ में कृत् से धातु बनाकर कान्तलीयति मे तथा इसी प्रकार एकात-

पत्त्र शब्द से ( एकातपत्रायते मे भी आचार्यार्थ कृत् प्रत्यय करके धातु बना कर )

सुब्धातुत्र्ते एवं ( अन्य पदो में तत्पुरुषसमासादि रूप ) समासस्वृत्ति का किञि अपूर्वं

ही वक्रत्व-सौन्दर्य प्रकाशित हो रहा है ।

इस प्रकार वृत्तिवक्रता का विचारकर पद के पूर्वार्द्ध मे होने वाली, उचित

अवसरप्राप्त भाववक्रता का विचार करते है—

जहाँ ( क्रिया की ) साध्यता का भी तिरस्कार कर भाव ( क्रिया या व्यापार )

सिद्ध के रूप मे कहा जाता है, वहाँ यह भाववैचित्र्यवक्रता होती है ॥ २० ॥

यह ( कारिका द्वारा ) वर्णितस्वरूप वाली भाववैचित्र्यवक्रता होती है । भाव

( कहते है ) धातु के अर्थ ( क्रिया या व्यापार ) रूप को, उसका वैचित्र्य, विचित्रभाव,

प्रकारान्तर से कहे जाने के कारण प्रकृष्ट रमणीयता, उससे होने वाली वक्रता अर्थात्

वक्रत्व की शोभा ( वृत्तिवैचित्र्यवक्रता कही जाती है ) । कैसी?—जहाँ, जिस

( वाक्ता ) मे भाव सिद्धरूप से, परिणिष्ठितरूप से अभिहित किया जाता है, कहा

जाता है । क्या करके?—( उसकी ) साध्यता को भी तिरस्कृत कर, प्रसिद्ध भी

निष्पाद्यमानता की अवधीरणा करके ( सिद्धरूप से कहा जाता है ) । यहाँ इसका

तात्पर्य यह हुआ—( भाव का ) साध्यरूप से वर्णन करने पर पूर्णतया निष्पन्न न हो

पाने के कारण प्रस्तुत वस्तु का परिपोष दुर्बल पड़ जाता है, इसलिए सिद्धरूप से

कथन पूर्णतः निष्पन्न होने के कारण पर्यांसरूप मे ( भाव ) प्रकट अर्थ का परिपोप

करता है । जैसे—( विरहिणी का वर्णन है )—( निरन्तर ) उच्छ्वास की पीड़ा से

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इवासायासमलीमसाधरुरचेदोःकन्दल्लीतानवातं केयूषायितमझदैः परिणतं पाण्डिम्नि गण्डत्विषा । अस्या: किं च विलोचनोत्तपलयुगेन्तमश्रुश्रुता तारं तारगपाझ्योररुणितं येनोल्प्रतापः स्मरः ॥ ७५ ॥

अत्र भावस्य सिद्धत्वेनाभिधानमतीव चमत्कारकारि ॥ २० ॥

एवं भाववकृक्तां विचार्य प्रातिपदिकान्तर्वर्तिनां लिङ्गवकृक्तां विचारयति— सिन्नयोरिङ्योरस्यां सामान्याधिकरण्यतः । कापि शोभाभ्युदेते येषा लिङ्गवैचित्र्यवकृक्ता ॥ २१ ॥

एषा कथितस्वरूपां लिङ्गवैचित्र्यवकृक्ता स्यादिविचित्रप्रभववकृक्ता विच्छित्ति । भवतीति सम्बन्धः, क्रियान्तराभावात् । कीटशी यस्यां यत्र विभिन्नयोरविभक्तस्वरूपयोरिङ्योः सामान्याधिकरण्यतस्तुल्याश्रयत्वादेकद्रव्य-

वृत्तित्वात् काप्यपूर्वा शोभाभ्युदेति कान्तिरुल्लसति । यथा— मलिन अधर-कान्ति इस योगिनी के कठोर मुजवल्ली की कुरता के कारण मुजबन्ध का आचरण किये हुए ( मुजबन्ध जैसे लगने लगे है ), कपोल की कान्ति पीतिमा मे परिणत हो गयी है । ( अधिक क्या ) अतिशय आँसू बहाने वाले दोनों नयनकमल प्राप्त भाग मे वैँसे अत्यधिक अरुणित हो गये है कि जिसने काम ( और भी ) उत्कट प्रताप वाला हो गया है ॥ ७५ ॥

यहाँ पर भाव का सिद्ध के रूप मे अभिधान अत्यन्त चमत्कारकारी हो गया है ॥ २० ॥

इस प्रकार भाववकता का विचारकर प्रातिपदिक के अन्तर्गत होने वाली लिङ्ग-वकता का विचार करते है—

जहाँ भिन्न-भिन्न लिङ्झों के ( रहते भी प्रयोग मे ) उनकी समान अधिकारणता के कारण कोई अपूर्व शोभा उदित हो जाती है ( वह ) यह लिङ्गवैचित्र्यवकता कही जाती है ॥ २१ ॥

यह ( कारिका द्वारा) कथित स्वरूपवाली लिङ्गवैचित्र्यवकता, ख्री आदि ( लिङ्झों ) के विचित्रप्रभाव की वकता, विच्छित्ति होती है । भवति ( होती है ) इस क्रिया का 'लिङ्गवैचित्र्यवकृक्ता' से सम्बन्ध है, क्योंकि दूसरी क्रिया का अभाव है । कैसी है ( वह वकता ) ?—जिसमे, जहाँ भिन्न-भिन्न, पृथक् स्वरूपवाले दो लिङ्झो के समानाधि-

करण्य, समान आश्रयता के कारण, एक द्रव्याश्रयी होने से कोई अपूर्व ही शोभा अभ्युदित होती है, कान्ति उल्लसित होती है ( वहाँ लिङ्गवैचित्र्यवकृक्ता ) होती है । उदाहरण जैसे—( राजशेखर के बाल-रामायण नाटक १३०, मे रावण का कथन है—) जिस ( शिवधनु ) के आरोपण-काव्य से ही बहुते के द्वारा वीरता का व्रत परित्यक्त कर दिया गया है । इन भुजाओं से मुझे उभी शिव-धनुष को बाणयुक्त

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यस्यारोपणकर्मणापि बहवो वीरभ्रतं त्याजितः कार्यं पुढि:खतबाणमीदृवरधनुरस्तदूदोभिरेभिरिमेया । स्त्रीरत्नं तदगर्भेसम्भवमितो लभ्यं च लीलायितया तेनैषा मम फुल्लपङ्कजवनं जाता दशां विंशतिम् ॥ ७६ ॥

यथा वा— नम्रेस्वता लासितकल्पवल्लीलोलग्रीवाबालव्यजननैर नृत्ये । उरस्स्थले डकोयेत दक्षिणेन सर्वास्पदं सौरभमझरागः ॥ ७७ ॥

यथा च— आयोज्य मालामृतुभिः प्रयत्नसम्पादितामंसतटेडस्य चक्रे । करारविन्दं मकरन्दबिन्दुस्र्यान्तश्रिया विश्रमकरणीपूः: ॥ ७८ ॥

इयमपरा लिङ्गवैचित्र्यवकता— सति लिङ्गान्तरे यत्र स्त्रीलिङ्गं च प्रयुज्यते । शोभानिष्पत्तये यस्माद्रामैव स्त्र्रीति पेशलम् ॥ ७९ ॥ यत्र यस्मिन् लिङ्गान्तरे सत्यन्यस्मिन् सम्भवत्यपि लिङ्गो स्त्रीलिङ्गं प्रयुज्यते निवध्यते । अनेकलिङ्गत्वेऽपि पदार्थस्य स्त्रीलिङ्गविषयः प्रयोगः क्रियते ।

किमर्थम्—शोभानिष्पत्तये । कस्मात् कारणात्—यस्माद्रामैव स्त्रीति पेशलम् ।

करना है और इस कार्य से गर्भ से अनुत्तपन्न ( अयोनिजा ) सीतारूप उस खीरत्न को प्राप्त करना है, तभी तो मेरे नेत्रों की सुन्दर यह बीसी खिले कमलवन के समान हो गयी है ॥ ७६ ॥

अथवा जैसे— ( रचना बालरामायण, ७।६६ की है )— दक्षिण पवन के द्वारा उसके वक्ष:स्थल पर नचायी गयी कल्पलता के अभिनव पल्लवरूप बालव्यजन से सर्वनिधान सौरभयुक्त ( विलेपनरूप ) अझराग दिखेर दिया गया ॥ ७७ ॥

अथवा जैसे— ऋतुओं ने प्रयत्नपूर्वक बनायी गयी माला को इसके स्कन्ध-प्रान्त मे डालकर टपकते मकरन्द बिन्दुयुक्त कर-कमल को शोभापूर्वक सुन्दर करणपुर बना दिया ॥ ७८ ॥

( उपर्युक्त तीनो ही उदाहरणो मे क्रमश: प्रथम मे 'फुल्लपङ्क्जवनम्' तथा 'दशां विंशतिम्:' मे यद्यपि नपुंसकलिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग है, किन्तु एकाश्रय मे होने से 'जाता' ख्रीलिङ्ग का प्रयोग 'लिङ्गवैचित्र्य' के सौन्दर्य को प्रकट करता है । द्वितीय मे सर्वास्पदं सौरभम्' तथा 'अझराग:' मे क्रमश: नपुंसक एवं पुल्लिङ्ग होने पर भी सामानाधिकरण्य से प्रयोग है । इसी प्रकार अन्तिम मे भी 'करारविन्दम्' और 'विश्रमकरणीपू:' मे भी पूर्ववत् सौन्दर्य है । )

यह दूसरी लिङ्गवैचित्र्यवकता है—जहाँ अन्य लिङ्गो के सम्भव होने पर भी 'स्त्री नाम ही सुन्दर होता है' ऐसा मानकर सौन्दर्य-सम्पादन के लिए स्त्रीलिङ्ग का ही प्रयोग किया जाता है ( वहाँ भी लिङ्गवैचित्र्यवकता पायी जाती है । )

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स्त्रीत्यभिधानमेव हृदयहारी । विच्छित्त्यन्तरेरण रसादियोजनयोग्यत्वात् ।

उदाहरणं यथा— यथेयं श्रीमोष्मघ्यतकरवती पाण्डुरभिदा

सुखोद्गिरणम्यानिलतरङ्गवल्लीकिसलया ।

तट्टी तारं ताम्यतिशशियशशा: कोडपि जलधर-

स्ततया मन्ये भावी भुवनवलया क्रान्तिसुभगा ॥ ५९ ॥

अत्र त्रिलिङ्गे सत्यापि 'टट्'शब्दस्य सौकुमार्यायोत् स्त्रीलिङ्गमेव प्रयुक्तम् ।

तेन विच्छित्त्यन्तरेरण भावी नायकङ्गवहार: कदिचिदासूत्रित इत्यतीव रमणीय-

यत्वाद्वक्रतामावहति ॥ २२ ॥

इदमपरेतस्य: प्रकारान्तरं लक्ष्यते—

विशिष्टं योत्स्यते लिङ्गमन्यस्मिन् सम्भवत्यपि ।

यत्र विच्छित्तये सान्या वाच्यौचित्याहुसारत: ॥ २३ ॥

सा चोक्तसरूपान्यापरा विदते । यत्र यस्या विशिष्टं ( लिङ्गं ) योत्स्यते लिङ्गचतयाणामेकतमं किमपि कविविवक्षया निबध्यते— कथं—अन्यस्मिन्

जहों, जिसमें दूसरे लिङ्ग के रहते, दूसरे लिङ्ग के सम्भव होने पर भी स्त्रीलिङ्ग ( ही ) प्रयुक्त किया गया है, निबन्धित किया जाता है । पदार्थों की अनेकलिङ्गता

रहने पर भी स्त्रीलिङ्ग विषय का ही प्रयोग किया जाता है । किसलिए ?—शोभा की

निष्पत्ति के लिए । किस कारण से ?—क्योंकि 'स्त्री' यह नाम ही पेठाल' होता है ।

स्त्री यह कथन ही हृदयहारी होता है । शोभान्तर की सृष्टि करने से स्त्रीलिङ्ग या अभि-

धान रसादि की समायोजन के योग होने के कारण ( स्त्री यह अभिधान ही हृदयहारी

होता है ) । उदाहरण जैसे—

जिस प्रकार से यह ग्रीष्म की उष्णमा से युक्त, पीत वर्ण के भेद को प्राप्त मुख

( प्रवेशादार ) से निकलती हुई उष्ण वायु से लहराती लताकिसलयो से युक्त (मुख से

प्रकट म्लान तथा लहराती तनुतला करादि किसलयवती) तलहटी (नायिका) अत्यधिक

सन्तप्त हो रही है, उससे तो ऐसा लगता है कि, चन्द्रमा की कीर्ति ( ज्योत्स्ना ) को

भी अतिक्रान्त ( आच्छादित ) कर देने वाला तथा समस्त लोक-मण्डल को व्याप्त

करै लेने के कारण मनोहारी कोई मेघ ( नायक ) उपस्‍थित है ही वोलो है ॥ ५९ ॥

तटट शब्द की त्रिलिङ्गता (तटः, टटी, टटम् इस प्रकार पुलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग एवं

नपुंसकलिङ्ग ) होने पर भी यहाँ सुकुमारता के कारण स्त्रीलिङ्ग का ही प्रयोग किया

गया है । उससे ( टटः; टटम् से उत्पन्न होने वाले सौन्दर्य से व्यतिरिक्त ) अन्य ही

शोभासृष्टि के द्वारा भावी किसी अपूर्व नायक के व्यवहार को निवन्धित किया गया है,

इस प्रकार (यह 'टट्' रूप स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग ) अत्यन्त रमणीय होने के कारण सौन्दर्यं की सृष्टि कर रहा है ॥ ३ ॥

इदम् (लिङ्गचकता ) का यह तीसरा अन्य प्रकार है—जहाँ अन्य लिङ्ग के सम्भव

होने पर भी अर्थ के औचित्य का अनुसरण करते हुए शोभा-निष्पत्ति के लिए किसी

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सम्भवत्यपि, लिङ्गान्तरे वियमानेऽपि । किमर्थम्—विच्छित्त्यै, शोभायै । कस्मात् कारणात्—वाच्यौचित्यानुसारतः । वाच्यस्य वर्ण्यमानस्य वस्तुनो यदौचित्यमुचितभावस्तस्यानुसरणमनुसारस्तस्मात् । पदार्थो-चित्यमनुसृत्येत्यर्थः ।

यथा—

त्वं रक्षसा भारं हेतोर्नीतास्तं मार्गमिमां लतां मे । अदर्शयन् वक्तुमशक्तुवन्त्यः शाखाभिरावर्जितपल्वलवामिः ॥ ८० � अग्र सीतया सह रामः पुष्पकेनावतरंस्तस्याः स्वयमेव तद्विरहवैधुर्यमादे-यति—यत् त्वं रावणेन तथाविधतवरावरतनुत्रचेतसा मार्गे यस्मिन्नपनīta तत्तदुपमर्देवशात्तथाविधसंस्‍थानयुक्तत्वं लतानामुखत्वं मम तन्मार्ग-तुमानस्य निमित्ततामपन्नामिति वस्तुवic्छित्त्यन्तरण रामेण योज्यते ।

यथा—हे भीरु स्वभावविक सौकुमार्यैकातरान्तःकरणे, रावणेन तथाविध-कूरकर्मकारिणा यस्मिन्मार्गे त्वमपनीता तमेताः साक्षात्कारपरिरत रसमान-विरोष लिङ्ग का ही प्रयोग किया जाता है, वह अन्य प्रकार की ही ( लिङ्गवैचित्र्य-वकता ) है । ॥ ८३ ॥

और वह प्रकृत कारिका से कथित स्वरूप, अन्य (पूर्वोक्त दो प्रकारो से भिन्न) और ही लिङ्गवकता होती है । जहाँ, जिस लिङ्गवकता मे विशेष प्रकार के ही लिङ्ग की योजना की जाती है, कवि के कथन की इच्छा से तीनों लिङ्गो मे किसी एक का ही निवन्धन किया जाता है । कैसे ?—अन्य लिङ्ग के सम्भव होने पर भी, अन्य लिङ्ग के विद्यमान रहने पर भी ( किसी विशिष्ट का ही प्रयोग करते है ) । किसलिए ?—शोभा के लिए । किस कारण से ?—वाच्य वस्तु का जो औचित्य, उचित भाव उसका अनुसरण ही अनुसार ( कहा जाता है ) अर्थात् पदार्थ का जो औचित्य उसका अनुसरण करके ही ( विशिष्ट प्रकार के लिङ्ग का प्रयोग किया जाता है । ) उदाहरण जैसे—( रघुवंश १३।१४ के इस इलोक मे है । ) लङ्का से लौटते हुए भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सीताजी से राह मे पड़ने वाले स्थानो का परिचय करा रहे है । कहते हैं— )

अथि भीरु ! सीते ! राक्षस रावण के द्वारा तुम जिस मार्ग ले जायी गयी थी उस मार्ग को बोलने मे असमर्थ इन लताओं ने छुके हुए पल्ववशाखाओं से दयापूर्वक मुझे दिखलाया था ॥ ८० ॥

सीता के साथ पुष्पक विमान से सप्रयाण करते हुए श्रीरामचन्द्रजी यहाँ स्वयम् ही उनके विरह की विकलता को निवेदित कर रहे है—कि तुम, उस प्रकार की शीतलता से पराधीन चित्त रावण के द्वारा, जिस मार्ग मे से होकर ले जायी गयी थी, उस मार्ग मे किये सङ्घर्षपण के कारण, उस प्रकार के अवस्थानों से युक्त होना, लताओं का उस ओर को उन्मुख होना मेरी लिए तुम्हारे अपहत मार्ग के अनुमान की निमित्तता

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मूर्त्तयो लताः किल मामदर्शयन्निति । तन्मार्गप्रदर्शनं परमार्थतस्तासां निश्चितनया न सम्भाव्यमिति प्रतीममानृत्यतिरह्न्रेक्कार कवेरभिप्रेतः । यथा—तव भीरुत्वं रावणस्य क्रौर्यं ममापि त्वत्परित्राणप्रयत्नपरतां पर्यालोच्य स्त्रीस्वभाववादाद्वैहृदयत्वेन समुचिततस्वविषयपक्षपातमाहात्म्यादेता: कृपयैव मम मार्गप्रदर्शनमकुर्वन्त्रिति । कृत् करणभूतेन—शाखाभिरावर्जितपल्लवाभिः यस्माद्वागिन्द्रियवर्जिततत्त्वाद्वकृतुमशक्नुवन्त्र्यः । यत् किएल ये केचिदजल्पन्तो मार्गप्रदर्शनं प्रकुर्वान्ति ते तदनुसुखीभूतहस्तपल्लवैवाभिरित्येतदतीव युक्ति-युक्तम् तथा चात्रैव वाक्यान्तरमपि विद्यते—

मृगयश्र दर्भाड्कुरनिःसृत्यपेक्षास्तावागतिंषु समबोधयन्नाम् । व्यापारयन्त्यो दिशा दक्षिणस्याः सुप्तपक्ष्मराजीभिविलोचनानि ॥ ८१ ॥ हरिणयश्व मां समबोधयन् । कीटशब्दम्—तवागतिझं, लताप्रदर्शितमार्ग-

मजानन्तम् । ततस्ताः सम्यगगवबोधयन्निति, यतस्तास्तदपेक्षया किश्चित्प्रबुद्धा को प्राप्त हुआ । इस प्रकार की वस्तु वाच्य को श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा शोभान्तर से संयुक्त की जा रही है । जैसे कि—हे भीरू; स्वाभाविक सुकुमारता के कारण भयत्रस्त-हृदय सीते; उस प्रकार के (अकल्पनीय) क्रूर कर्म करने वाले रावण के द्वारा जिस मार्ग में से होकर तुम ले जायी गयी थीं उस मार्ग को प्रत्यक्ष परिह्रयमान-स्वरूप इन लताओं ने ( मानो ) मुझे दिखलाया था । उनके द्वारा मार्ग का प्रदर्शन वस्तुतः उनके अचेतन होने के कारण (मानो) सम्भव नहीं था, इस प्रकार प्रतीममान वृत्ति उत्प्रेक्षा अलङ्कार ही यहाँ कवि का अभिप्रेत है । जैसे—तुम्हारी ( सीता की ) भीरुता, रावण की क्रूरता और मेरी तुम्हारे परित्राण के प्रयास की तात्परता को भी विचारकर इन लताओं ने अपने स्त्री-स्वभाव के कारण द्ववितहृदय होने से अपने विषय ( स्त्रीपक्ष ) के प्रति समुचित पक्षपात के प्रभाव से हृदयपूर्वक ही मेरे मार्ग का प्रदर्शन किया था । हेतु-भूत किससे? ( मार्ग प्रदर्शन किया ? )—शुके पल्लवयुक्त शाखाओं से । क्योंकि वे वाक् इन्द्रिय से युक्त नहीं है (वाक्चातुर्यहीन है ), इसलिए कहने मे असमर्थ होते हुए ( शाखाओं से मार्ग-प्रदर्शन किया । क्योंकि जो कोई भी बिना बोले मार्ग-प्रदर्शन करते हैं, वे उस मार्ग की ओर उन्मुख हुए हस्तपल्लव शाखाओं से ही ( मार्ग-प्रदर्शन करते हैं । इस प्रकार यह समायोजना अत्यन्त युक्तियुक्त है । और यहीं उसी प्रकार एक दूसरा भी वाक्य ( रघुवंश १३।२५ ) प्रस्तुत है—पुनः श्रीरामचन्द्रजी का कथन है कि )—अपने घास के एँकुरो की बिलकुल अपेक्षा किये बिना ही ऊपर उठी हुई पलकोंयुक्त सुन्दर नेत्रो को दक्षिण दिशा मे लगाती हुई मृगियों ने तुम्हारे जाने के मार्ग से अनभिज्ञ मुझे ( मार्ग ) बताया ॥ ८१ ॥

और हरिणियों ने मुझे (तुम्हारा मार्ग) बताया । किस प्रकार के मुझको—तुम्हारे जाने के मार्ग को न जानने वाले, लताओं द्वारा प्रदर्शित किये जाने पर भी मार्ग को न जानने वाले मुझको । तदनन्तर ( लताओं के द्वारा किये प्रदर्शन के बाद )

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इति।तत्रच कीटश्रयः—तथाविधवैशससन्दर्शनवशाद् दुःखितत्वेन परित्यक्कतणग्रासाः। किं कुर्वाणाः—तस्यां दिशि नयनानि समर्प्यन्ट्यः। कीटश्रानि-ऊर्ध्वीकृतपक्ष्मपुटाक्तीक्ष्णि। तदेवं तथाविधस्थानकयुक्तत्वेन दक्षिणां दिशमन्रिश्रेणी नीतेति सङ्ज्ञयां निवेद्यन्ट्यः। अत्र वृक्षसुगादिषु लिङ्गान्तरेपु सम्भवत्स्वपि श्रृङ्गमेव पदार्थौचित्यानुसारेण चेतनचमत्कारकारितया कवेरभिप्रेतम्। तस्मात् कामपि वक्रतामवहति॥२३॥

एवं प्रातिपदिकलक्षणस्य सुवन्तसम्भविनः पदपूर्वार्धस्य यथासम्भवं वक्रोभावं विचार्येदानीमुभयोरपि सुप्तिडन्तयोर्धातुत्वरूपः पूर्वभागो यः सम्भवति तस्य वक्रतां विचारयति। तस्य च क्रियावैचित्र्यनिबन्धनत्वमेव वक्रत्वं विद्यते। तस्मात् क्रियावैचित्र्यस्यैव कीटशः कियन्तरश्च प्रकाराः सम्भवन्तीति तत्स्वरूपनिरूपणार्थमाह—

कर्तृ रत्यान्तरङ्गत्वं कत्रेर्नतरविचित्रता। स्वविभोपणवैचित्र्यमुपचारमगोज्झता॥२४॥

उन हरिणियों ने मुझे निश्चय बतलाया ( यह भाव है)। सयोकि उन लत्ताओं की अपेक्षा कुछ अधिक प्रबुद्ध थी ( इसीलिए लत्ताओं के प्रदर्शन के बाद भी मैं तुम्हारे गमन-मार्ग से अनभिज्ञ रहा और बाद में इन्होंने सम्यक् बता दिया)। और वे हरिणियाँ कैसी थी?—उस प्रकार के ( अकथनीय सीतापहरणरूप) दु:ख के अवलोकन से सजात दुःख के कारण घास के कवलों को एकदम छोड़े हुए। क्या करती हुई?—उसी ( दक्षिण ) दिशा में नेत्रों को समर्पित करती हुई। कैसे नेत्र को?—ऊपर किये हुए पक्ष्मपक्तियों वाले ( नेत्रों को)। तो इस प्रकार वैसे ( ऊर्ध्वीकृत पक्ष्मपक्ति नेत्रो-रूप ) अवस्थानों से युक्त होने के कारण संकेतपूर्वक यह निवेदित करती हुई कि अन्तरिक्ष-मार्ग से दक्षिण दिशा को ( सीता ) ले जाई गयी है। यहाँ ( ऊपर के दोनों ही उदाहरणों में लत्ता, मृगी की अपेक्षा) वृक्ष, मृग आदि ( पुलिङ्ग रूप ) अन्य लिङ्गों के संभव होने पर भी पदार्थ के औचित्य के अनुसार चेतन सहृदयों के चमत्कार का जनक होने के कारण कवि को स्त्रीलिङ्ग का ही प्रयोग यहाँ अभीष्ट है। इसलिए वह ( स्त्रीलिङ्ग प्रयोग ) किसी अपूर्व ही वक्रता की सृष्टि कर रहा है॥२३॥

इस प्रकार सुवन्त मे होने वाले प्रातिपदिकरूप पदपूर्वार्धे ( वक्त्रता ) के वक्रोभाव का यथासंभव विचार कर अब आगे सुवन्त और तिडन्त दोनो ही धातुरूप जो पूर्व-भाग हो सकता है, उसकी वक्रता का विचार करते हैं। और क्रियावैचित्र्य का निबन्धन ही उस ( धातु ) की वक्रता है। इसलिए क्रियावैचित्र्य के ही किस प्रकार के निबन्धन हो उस ( धातु ) की वक्रता है। इसलिए क्रियावैचित्र्य के ही किस प्रकार के निबन्धन हो सकते हैं, इसके लिए उसके स्वरूप का निरूपण करने के लिए कहते हैं—

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कर्मोदिसंस्कृति: पदत्र प्रस्तुतौचित्यचारव: ।

क्रियावैचित्र्यवकत्वप्रकारास्तु इमे स्मृताः ॥ २५ ॥

क्रियावैचित्र्यवकत्वप्रकारा धात्वर्थाविचित्रभाववकताप्रभेदास्तु इमे स्मृता

वण्यैमानस्वरूपा: कीर्तिता: । कियन्त:—पदत्र पदवसन्ध्याविशिष्टा: । कीटशा:-प्रस्तुतौचित्यवारव: । प्रस्तुतं वण्यैमानं वस्तु तस्य यदौचित्यमुचितभावस्तेन

चारवो रमणीयाः । तत्र प्रथमस्तावत् प्रकारो यः—कर्तृरत्यान्तरङ्गत्वं नाम ।

कर्तुः स्वतन्त्रतया मुख्यभूतस्य कारकस्य क्रियां प्रतिनिवेशयितृतयेदन्तरङ्गत्वम्

अत्यन्तमान्तरतम्यम् । यथा—

चूडारत्ननिषण्णडमरुवहहस्तगदाभारोन्नमत्कन्धरो,

धत्तामुदीरिततामसौ भगवत्: शेषस्य मूर्ध्ना परम् ।

स्वैरं संसृपतिषड्गवयवर्नति यस्मिन्नलौठुन्याक्रमं,

शून्ये नूनमियान्ति नाम भुवनान्युद्दामकम्पोत्तरम् ॥ ८२ ॥

अत्रोदाहुरता धारणलक्षणक्रिया कर्तुः फणीश्वरमस्तकस्य प्रस्तुतौचित्य-

माहात्म्यादन्तर्बावं यथा भजते तथा नान्या काचिदिति क्रियावैचित्र्यवकता-

मावहति । यथा वा—

किं शोभितमहनीयते पिनाकपाणेः

पुष्पस्य पातु परिलुञ्चनसुत्तरं वः ॥ ८३ ॥

( १ ) कर्ता की अतिशय अन्तरङ्गता, ( २ ) अन्य कर्ताओं से होने वाली विचित्रता,

( ३ ) अपने विशेषण से होने वाला वैचित्र्य, ( ४ ) उपचार से जायमान रमणीयता

तथा ( ५ ) कर्म आदि कारको का संवरर्ण, प्रस्तुत वस्तु के औचित्य से सुन्दर ये पाँच

क्रियावैचित्र्यवकता के प्रकार कहे गये हैं ॥ २४-२५ ॥

क्रियावैचित्र्यवकता के प्रकार, धात्वर्थ के विचित्रभाव की वकता के प्रभेद ये कहे

गये हैं ( उपयुक्त दो कारिकाओं से ) कथित लक्षण वाले बताये गये हैं । कितने हैं ?-

पाँच, पाँचकी संख्या से विशिष्टोषित है । कैसे है ?—प्रस्तुत औचित्य से सुन्दर । प्रस्तुत वर्ण्यमान वस्तु, उसका जो औचित्य उचित भाव, उससे सुन्दर, रमणीय होते

है । उनमें भी पहला प्रकार जो है ( वह है ), कर्ता की अतिशय अन्तरङ्गता । कर्ता

के ( स्वतन्त्र कर्ता । पा० १-४-५४ के अनुसार ) स्वतन्त्र होने के कारण ( कर्तारूप )

प्रधानभूत कारक की, क्रिया को निष्पन्न करने वाले ( कारक ) की जो अतिशय

अन्तरङ्गता, अन्तरतरमता ( अत्यन्त सामीप्य, वह क्रियावैचित्र्यवकता का प्रथम प्रकार

है । उदाहरण जैसे—

चूडारत्न पर अवस्थित, दुःख से वहन किये जाते हुए संसार के भार से उन्नमित

( छुकती ) हुई कन्धरा से युक्त भगवान् शेष का शिर ( फणभाग ) अत्यन्त हृदया को

धारण करे, जिसके स्वल्पमात्र भी अवनति का संस्पर्श कर लेने पर आकाराश में ये इतने

सारे लोक प्रणवड कम्पनपूर्वक धीरे-धीरे व्यु्क्कम से उल्टित हो उठते है ॥ ८२ ॥

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द्वितीयोन्मेष ]

२०१

अत्र चुम्बनव्यतिरेकेण भगवता तथाविधलोकोत्तरं गौरीशोभातिशयाभिधानं न केनचित् क्रियान्तरेण कर्तुं पायेत इति क्रियावैचिच्र्यानिबन्धनं वक्रोभावमा- वहति । यथा च—

हृददस्स तइअणअणं पच्चइ परिअुम्बिअं जइअ ॥ ८३ ॥ ( हृदस्य तृतीयनयनं पार्वती परिअुम्बितं जयति ) ॥ इति इच्छाया ।

यथा वा—

सिठिलिअचाहो जइअ मअरद्धओ ॥ ८५ ॥ ( शिथिलितचापो जयति मकरध्वजः ) इति इच्छाया ॥ एतयोर्वैचिच्र्यं पूर्वमेव व्याख्यातम् ।

अयमपरः क्रियावैचिच्र्यवकताया: प्रकारः—कर्त्रन्तरविचित्रता । अन्यः कर्ता कर्त्रन्तरं तस्माद्विचित्रता वैचिच्र्यम् । प्रस्तुतत्वाद् सजातीयत्वाच्च कतुरेव ।

यहॉ प्रस्तुत वस्तु ( शेषनाग के माहात्म्य ) के औचित्य के माहात्म्य से प्रयुक्त सर्पराज शेषनाग के मस्तकरूप कर्ता की धारणरूप क्रिया 'उद्घूर्णता' जिस प्रकार अन्यतमता की प्राप्ति हो रही है उसे प्रकार से अन्य कोई भी क्रिया अन्तरङ्गता की प्राप्ति नहीं कर सकती, इस प्रकार यहॉ 'उद्घूर्णता' पद क्रियावैचिच्र्य की सुन्दरता की सृष्टि कर रहा है । अथवा जैसे—( कुमारसम्भव ३।१३ का यह श्लोक १८१ के उदाहरण मे आ चुका है । भगवान् शिव के मस्तक की चन्द्रदलेहा को खींचकर अपने सिर पर बॉध कर गौरी प्रिय शिवजी से पूछ रही है कि )—क्या मैं इससे अलंकृत ( सुशोभित ) लगती हूँ, इस प्रकार भगवती पार्वती से पूछे गये ( भगवान् शड्कर का ) उत्तर- रूप परिअुम्बन आप सबकी रक्षा करे ॥ ८३ ॥

भगवती पार्वती के उस प्रकार के अलौकिक शोभातिशय का बखान भगवान् शड्कर के द्वारा चुम्बन से व्यतिरिक्त किसी अन्य क्रिया के द्वारा किया जाना सम्भव नहीं था, इस प्रकार क्रियावैचिच्र्य निबन्धनरूप ( परिअुम्बन क्रिया उत्तरदाता शिवरूप कर्ता की अत्यन्त अन्तरतमता के कारण ) वक्रोभाव को प्रस्तुत कर रही है ।

अथवा जैसे—( उदाहरण स० १।५८ पर यह भी आ चुका है )— पार्वती से चुम्बित भगवान् शड्कर का तीसरा नेत्र सर्वोत्त्कृष्ट है ॥ ८४ ॥

अथवा जैसे—( १।६१ पर उदाहृत श्लोकांश में ) धनुष को ढीला किये हुए काम सर्वजययी ( सर्वोत्त्कृष्ट ) है ॥ ८५ ॥

इन दोनों का ही वैचिच्र्य पहले ही ( १।५८, १।६१ ) कहा जा चुका है ।

२—'कर्त्रन्तरविचित्रता—यह क्रियावैचिच्र्यवकता का दूसरा ही प्रकार है । दूसरा जो कर्ता वह है कर्त्रन्तर उससे होने वाली विचित्रता को कर्त्रन्तरविचित्रता कहते है । प्रस्तुत ( वर्ण्यमान ) और सजातीय होने के कारण ( वह कर्त्रन्तरवैचिच्र्य )

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२०२

[ वक्रोक्तिजीवितम्

एतदेव च वचित्र्यं यत् क्रियांमेव कर्त्रन्तरापेक्षया विचित्रस्वरूपं सम्पादयति। यथा—

नैकत्र शक्तिविरति: क्वचिदस्ति सर्वे, भावाः स्वभावपरिनिष्ठिततारतम्याः ।

आकल्पमौर्वीर्दहनेन निपीयमानमम्भोधिमेकचुलुकेन पयावगस्त्यः ॥ ८६ ॥

अत्रैकचुलुकेनाम्भोधिपानं सतताध्यवसायाभ्यासकाश्रयधिरुढिप्रौढत्वाद्वाडवाग्नेः किमपि क्रियावैचित्र्यमुद्रहत् कामपि वक्रतामुन्मीलयति। यथा वा—

प्रकृत्यांतिच्छिदो नखाः ॥ ८७ ॥

यथा वा—

सद्‌हतु दुरितं शान्भवो व शराग्निः ॥ ८८ ॥

एतयोर्‌वैचित्र्यं पूर्वंमेव प्रदर्शितम्।

अयमपः क्रियावैचित्र्यवकृताया: प्रभेदः—स्वविशेषणवैचित्र्यम् ।

सुख्यतया प्रस्तुतत्वात् क्रियाया: स्वस्यात्मनो यद्‌ विशेषणं भेदकं तेन वैचित्र्यं विचित्रभावः । यथा—

कर्ता का ही होता है । यहाँ उसकी विचित्रता है कि वह ( कर्ता ही ) दूसरे कर्ता की अपेक्षा ( अधिक उत्कर्षयुक्त ) विचित्र स्वरूप वाली क्रिया का ही सम्पादन करता है उदाहरण जैसे— ( यह श्लोक सुभाषितावली में स० ९९२ पर उद्धृत है ) —शक्ति की समाति कहीं एक जगह ही नही होती । ( संसार मे ) सभी पदार्थ ( अपने ) स्वभाव के अनुसार तारतम्य से युक्त होते है । कल्प के प्रारम्भ से ही वाडवाग्रि से पान किये जाते हुए समुद्र को अगस्त्य ने एक चुलु से ही पी डाला ॥ ८६ ॥

यहाँ निरंतर परिश्रम एवं अभ्यास की चरम सीमा को प्राप्त होने से प्रौढ होने के कारण वाडवाग्रि के ( समुद्रपान की अपेक्षा भगवान् अगस्त्य के द्वारा ) एक ही चुलु से समुद्र-पान ( रूप किया ) किसी अपूर्व क्रियावैचित्र्य को धारण करती हुई अनिर्वचनीय वकता को प्रकटित करती है । अथवा जैसे— ( ११५९ पर उद्धृत श्लोकाङ्क मे ) —कारणपान लोगो की पीडा को काटने वाले ( भगवान् विष्णु के ) नाखून ( सर्वोत्कृष्ट हैं ) ॥ ८७ ॥

अथवा जैसे— ( ११६० पर उद्धृत ) भगवान् राघ्घुर के वाण की वह अद्धि तुम्हारे पापों का दहन करे ॥ ८८ ॥

इन दोनो का भी वैचित्र्य पहले ही ( ११५९, ११६० पर ) प्रदर्शित किया जा चुका है ।

३—क्रियावैचित्र्यवकता का यह अन्य ( तीसरा ) प्रभेद है—अपने विशेषण से होने वाली विचित्रता । प्रधानतया प्रस्तुत होने के कारण क्रिया का स्वकीय अपना जो

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इत्युद्गते शशिनि पेशलकान्तिदूतीसलापसंवलितलोचनमानसाभिः ।

अग्राहि मण्डनविधिर्विपरीतभूषाविन्यासहासितसखीजनमज्जनाभिः ॥ ८९ ॥

अत्र मण्डनविधिग्रहणलक्षणाया: क्रियाया विपरीतभूषाविन्यासमहासितसखीजनमिति विशेषणेन किमपि सौकुमार्यमुन्नीलितम् । यस्मात्‌ तथाविधादरो-

परचितं प्रसाधनं यस्मिन्‌ ठयज्जकत्वेनोपात्तं मुख्यतया वर्ण्यमानवृत्ततेर्वैलभानु-

रागस्य मोदध्वनेन सुवतां समुल्लेज्जत् । यथा वा—

मध्यासक्तदृचकितहरिणा हारि नेत्रत्रिभागः ॥ ९० ॥

अस्य वैचित्र्यं पूर्वमेवोदाहृततम् । एतच्च क्रियाविशेषणं द्वयोरपि क्रियाकारक-

योर्‌वक्तृत्वमुल्लासयति । यस्माद्‌ विचित्रक्रियाकारित्वमेव कारकवैचित्र्यम् ।

इदम्‌परं क्रियावैचित्र्यवक्रताया: प्रकारान्तरम्‌—उपचारमनोज्ञता ।

उपचार: साधरस्यादिसमन्वयं समाश्रित्य धर्मान्तराध्यारोपस्तेन मनोज्ञता

विशेषण ( इतर से ) भेदकतत्व, उसे होने वाला वैचित्र्य, विचित्रभाव । उदाहरण

जैसे—( यह श्लोक काव्यभीमासा के अध्याय १३ अर्थाहरण प्रकरण मे युक्तिम के

उदाहरण मे प्र० १६७ पर, दशरूपकावलोक २।३८ तथा रसार्णव सुधाकर १।२७२ पर

भी उद्धृत है—) इस प्रकार चन्दमा के उदित हो जाने पर रमणीय कान्तिमण्डित

दूतीजनो से वार्तालाप मे चञ्चल नयन एवं मनवाली वनिताओ ने विपरीत आभूषणो

के विन्यास से सखी-जनो को हँसाने वाली अलङ्करण विधि को धारण किया ॥ ८९ ॥

यहॉं मण्डनविधि ग्रहणरूप क्रिया का 'विपरीत अलङ्कार-विन्यास से सखी-जनो

को हँसाने वाली' इस विशेषण के द्वारा ( मण्डनविधि ग्रहण क्रिया की ) अपूर्व

सुकुमारता उन्मीलित की गयी है । क्योंकि उस प्रकार आदर से विरचित अलङ्करण

जिस ( वल्लभानुराग ) की व्यञ्जकता के रूप मे प्रस्तुत किया गया है, प्रधानतया

वर्ण्यमान वस्तु प्रियतम के प्रति होने वाले अनुराग को भी इससे विधिवत् समुत्तेजित

किया गया है । अथवा जैसे—( उदाहरण १।४९ मे उद्धृत श्लोकार्थ मे )—( उसने )

भयत्रस्त मृगी के मनोहारी नेत्र के समान सुन्दर नेत्र के व्यश भाग ( कटाक्ष ) को मेरे

पर ल्गा दिया ॥ ९० ॥

इसका सौन्दर्य पहले ही कह दिया गया है । यह क्रियाविशेषण ( का वैचित्र्य )

क्रिया और कारक दोनो के ही वक्रत्व को समुल्लासित करता है । क्योंकि विचित्र

क्रिया का सम्पादन ही कारक का वैचित्र्य है ।

४-क्रियावैचित्र्यवक्रता का यह अन्य ही प्रकार है—उपचारमनोज्ञता । सादृश्य

आदि के सम्यक् सम्बन्ध का समाश्रय कर अन्य ( वस्तु के ) धर्म का अध्यारोप,

उससे होने वाली मनोज्ञता, वक्रता का उपचार मनोज्ञता कहते है । ( यहाँ कुन्तक

का उपचार, अन्य साहित्यिको के उपचार के समान ही है—'उपचारो हि नामात्यन्तं

विश्रकल्ति: शब्दो· साहश्यादिस्थयमहिम्ना भेदप्रतीतिस्थगनमात्रम् । सा० द०

प्र० ४३ ) । उदाहरण जैसे—( यह श्लोक मधुरिका कार्णमृतम्, हैमचन्द्र-काव्यानुशासन

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वक्तवम्। यथा—

तरणतीवाञ्जानि स्वलदमललावण्यजलधौ;

प्रथिम्नः प्रागल्भ्यं स्तनजघनमुनुद्रयति च ।

हशोलीलारम्भः स्कुटतमपवदन्ते सरलतामहो सारज्ञाद्यास्तरुणिमनि गाढः परिचयः ॥ ९१ ॥

अत्र स्वलदमललावण्यजलधौ समुल्लसद्विमलसौन्दर्यसम्भारसिन्धौ परिस्फुरत्यपि स्पन्दतया जलधमानत्वेन लक्ष्यमाणत्वात् पारप्रकाशमासाद्यितं व्यवस्यन्तीवेति चेतनपदार्थसम्भाविसादृश्योपचारात्रुण्यतरुण्यींगात्राणां तरणमुखेक्षितम्। उक्तेक्ष्यायार्चोपचार एव भूयसा जीविततत्त्वेन परिस्फुरतीन्युत्प्रेक्षावसर एव विचारयिष्यते ।

प्रथिम्नः प्रागल्भ्यं स्तनजघनमुनुद्रयति च ( इति )—अत्र स्तनजघनकट्री प्रथिम्नः प्रागल्भ्यं महत्त्वस्य प्रौढिमुनुद्रयत्युन्मीलयति । यथा कत्रिच्च्चेतनः किमपि रक्षणीयं वस्तु मुद्रयित्वा कमपि समयमवस्थाप्य समुचितोपयोगावसरे स्वयमुनुद्रयत्युद्घाटयति, तदेवं तात्कारितवसाम्यात्

वामभट ( दण्डी ) के काव्यानुशासन अलङ्कार-तिलक आदि में भी आया है ।

( अहो, इस मुग्धनयनी के ) अञ्ज झरते हुए निर्मल लावण्य के समुद्र में तैर से रहे है, स्तन और जघन भाग पृथुलता ( मासलता ) की प्रगल्भता ( अधिकता ) को प्रकाशित कर रहे है। नेत्रों के ( कटाक्ष आदि ) लीला के प्रारम्भ स्पष्टतया सरलता की निन्दा से कर रहे है । अरे इस मुग्धनयनी का तो ( अब ) तरुणाई से गहरा सम्बन्ध हो गया है ॥ ९१ ॥

यहाँ पर, झरते निर्मल लावण्य-समुद्र मे, शोभायमान विमल सौन्दर्य-सामग्री के समुद्र में, प्रकाशमान भी स्पन्दन होने के कारण सतरण करते हुए से प्रतीत हो रहे ( अञ्ज ) दूसरे किनारे की प्राप्ति को पाने के लिए प्रयास-सा कर रहे है, इस प्रकार चेतन पदार्थ में सम्भव होने वाले ( सतरण, पर पार प्राप्ति प्रयास आदि ) साहचर्य के उपचार से तरुणाई के कारण लहराते तरुणी के अञ्जो के सतरण की उपेक्षा ( संभावना ) की गयी है। और उपचार ही उक्तप्रेक्षा के सबसे भारी प्राण के रूप मे परिस्फुरित होता है । इसका विचार उत्प्रेक्षा-विवेचन के अवसर पर ही करेंगे ।

स्तन और जघन भाग पृथुलता की प्रगल्भता को प्रकाशित ( समुद्र्यादित ) कर रहे है इस प्रकार यहाँ स्तन और जघनरूप कर्ता पृथुता की प्रगल्भता महानता की घुरीर्यता को उनमुद्रित कर रहे है, उन्मीलित कर रहे है । ( वैसे ही ) जैसे कोई चेतन व्यक्ति रक्षण योग किसी सुन्दर वस्तु को मुद्रित कर किसी समय पर रखकर, उपयोग के समुचित अवसर आने पर स्वयं उनमुद्रित करता है, खोलता है । तो इसी प्रकार ( चेतन की ) उद्घाटनकारिता के साम्य से स्तन और जघन के उन्मुद्रण का उपचारः प्रयोग किया गया है । तो इस पर यह कहा जायगा कि—जो ही ( स्तन और जघन

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स्तनजघनस्योन्नतद्रुपचारितम्। तदिदंमुक्तं भवति—यत् यदेव शृङ्गारदशायां शक्त्यात्मना निर्मीलितस्वरूपमनवस्थितमासीत्, तस्यप्रथिम्नः प्रागल्भ्यस्य प्रथममततारुण्यावातारावसरसमुचितं प्रथनप्रसरं समर्पयति।

दशोर्लीलारम्भः स्फुटमपवदन्ते सरलताम् ( इति )—अत्र शृङ्गारप्रतिष्ठितां सरलतां प्रकटमेवापसार्य दशोर्वीळासोल्लासाः कमपि नवयौवनसमुचितं विग्रहममधिरोपयन्ति। यथा केचिच्चेतनाः कुतश्चिद्विषये कमपि व्यवहारं समासादितप्रसरमपसार्य किमपि स्वाभिप्रायाभिमतं परिस्पन्दान्तरं प्रतिष्ठापयन्तीति तत्कारित्वसादृश्याल्लाघवतीळोचनविलासोल्लासानां सरलत्वापवदनमुपचारितम्। तदेवंविधेनोपचारेणैतास्तिस्रोडपि क्रियाः कामपि वक्रतामधिरोपिता। वाक्येडस्मिन्नपरेपि वक्ताप्रकाराः प्रतिपदं सम्भवन्तीयव-सरान्तरे विचार्येन्ते।

इदमपरं क्रियावैचित्र्यवकratayāḥ प्रकारान्तरम्—कर्मोदिसंवृति। कर्म-ग्रभृतीनां कारकाणां संवृति। संवरेणं, प्रस्तुतौचित्यानुसारेण सातिशयं प्रतीये समाच्छाद्याभिधा। सा च क्रियावैचित्र्यकारित्वात् प्रकारत्वेनाभिधीयते।

की पृथुता ) शृङ्गार अवस्था मे स्त्रीरूप से निर्मीलितस्वरूप अतएव अनवस्थित थी, उसी पृथुता की प्रगल्भता को ( स्तन और जघन ) तरुणाई के सर्वप्रथम समागमन समय के उपयुक्त विस्तार के अवकाश को समर्पित करते है ।

नेत्रो के ( कटाक्ष आदि ) लीला के प्रारम्भ स्पष्टतया सरलता की निन्दा से कर रहे हैं—इस प्रकार यहाँ नेत्रो के विलास के विकास शृङ्गार अवस्था मे प्रतिष्ठित सरलता को स्पष्टतः दूर हटाकर नई जवानी के सम्यक् उपयुक्त अपूर्व शोभा को आरोपित कर रहे हैं। जैसे कोई चेतन प्राणी किसी विषय मे प्रसारप्राप्त किसी व्यवहार को दूर कर अपने अभिप्राय से सम्मत किसी अपूर्व अन्य व्यवहार को प्रतिष्ठापित करते हैं, उस अन्य व्यवहारकारिता के सादृश्य से सुन्दरियो के नेत्रविलास के विकास की सरलता के अपवाद ( निन्दा ) को यहाँ उपचार से प्रयोग किया गया है। इसलिए इस प्रकार के उपचार से ये तीनो ही क्रियाएँ ( तरन्ति, उन्मुद्रयन्ति एवं अपवदन्ते ) अपूर्व वकratā को पहुँचा दी गयी हैं। इस वाक्य मे प्रतिपद अन्य भी वकratā के प्रकार हो सकते हैं। इसका विचार दूसरे अवसर पर करेंगे।

५—क्रियावैचित्र्यवकratā का यह दूसरा ( ५वाँ ) अन्य ही प्रकार है—कर्मोदि संवृति। कर्म आदि कारकों की संवृति, संवरेण, गोपन अर्थात् प्रस्तुत वस्तु के औचित्य के अनुसार अतिशय समन्वित प्रतीति के लिए ( कर्म आदि ) का समाच्छादन कर अभिधान ( कर्मोदि संवृति कहा जाता है )। ( फिर तो उसे कारकवकratā कहाँ चाहिए ? उत्तर देते हैं ) और क्रिया की शोभाजनक होने से वह ( कर्मोदि संवृति ) क्रियावैचित्र्यवकratā के प्रकार के रूप में कही जाती है।

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कारणे कार्योपचाराद् यथा—

नेत्रान्तरे मधुरसर्पितीव किचित्

कान्तान्तिके कथयतीव किमप्यपूर्वम् ।

अन्तः समुल्लिखति किचिद्दिव्याताद्या

रागालसे मनसि रम्यपदार्थलक्ष्मीः ॥ ९२ ॥

अत्र तदुभवैकरोचरत्वादनभ्येयत्वेन किमपि सातिशयं प्रतिपदं कर्म-

सम्पादयन्त्यः क्रियाः स्वात्मनि किमपि वक्तुमभिसूच्यभियान्ते । उपचारमनोज्ञता-

ताप्यत्र विद्यते । यसमादर्पणकथनोल्लेखनान्युपचारानिबन्धनान्येव चेतनपदार्थ-

धर्मेत्त्वात् । यथा च—

नुतारम्भद्धरितरभसस्थितां तावन्मुहूर्तं

यावन्मौलौ इलथमचलतां भूषणं ते नयामि ।

इत्याल्यायि प्रणयसधुरं कान्तया योज्यमाने

चूडाचन्द्रे जयति सुखिनः कोऽपि शर्वस्य गर्वः ॥ ९३ ॥

कारण मे कार्य का उपचार होने से ( कर्मान्दि सदृश्वति क्रियावैचित्र्यवकृतता का )

उदाहरण जैसें—

अनुराग से छलकते मनवाली युवती का चित्रण है—

विशाल नेत्रों वाली ( इस युवती ) के मन के अनुराग से अलस हो जाने पर रमणीय पदार्थ शोभा ऑंखो मे कुछ मीठा-सा भर देती है, कानो के समीप कुछ अश्राव्य अनिवाच्य-सा कह देती है और हृदय मे कुछ उद्देक-सा देती है ॥ ९२ ॥

यहॉ उस ( युवती ) के ही अनुभ्रमात्र का गोचर होने के कारण किन्ही अनिर्वाच्य उत्कर्षयुक्त कर्मों का प्रतिपादन करती हुई क्रियाएँ अपने मे अपूर्व वक्भाव की उन्मीलना कर रही है । ( अपूर्वति, कथयति तथा समुल्लिखति क्रियाओं के कर्म को किचिद्, अपूर्व आदि शब्दों से समाच्छादित कर दिया गया है । अतएव यहाँ कर्मादिस्वरूप क्रियावैचित्र्यवकृतता की शोभा विचारणीय है । इन क्रियाओं का वैचित्र्य आपने मे ही अपूर्व है, कहने योग्य नही है । ) उपचारमनोज्ञता भी यहाँ विदयमान है क्योकि चेतन पदार्थ का धर्म होने के कारण अर्पण, कथन और उल्लेखन क्रियाएँ ( साक्षात् ) उपचार निबन्धन ही है ।

अथवा जैसे इसी का दूसरा उदाहरण—जल्दबाजी से विरत होकर तब तक थोड़ी देर के लिए नृत्त के प्रारम्भ से रुक जाइये, जब तक मैं ( तुम्हारे ) शिर पर के ढीले आभूषण ( चन्द्रमा ) को ( कसकर ) अचलता प्रदान कर देती हूँ । इस प्रकार प्रेम से भरे मीठे वचन कहकर प्रियतमा ( पार्वती ) के द्वारा चूडा पर चन्द्रकला के लगाये जाने पर प्रसन्न भगवान् शङ्कर अपूर्व अभिमान सर्वातिशायी हैं ॥ ९३ ॥

यहाँ 'कोऽपि' इस सर्वनाम पद से मात्र उन ( भगवान् शङ्कर ) के ही अनुभव-गम्य होने के कारण अनभिधानीय होने से उत्कर्षपूर्ण भगवान् शङ्कर का गर्व है, इस

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अत्र ‘कोऽपि’ इत्यनेन सर्वनामपदेन तदनुभवैकगोचरत्वाद्‌विपदेर्यत्‌स्वेन सातिशयः शवेस्य गवि इति कर्तृसंवृतिः । जयति सर्वोत्तर्षण वतंत इति क्रियावैचित्र्यनिबन्धनम् ।

इत्यं पदपূर्वार्धे वकभावो व्यवस्थितः । डिडिमात्रमेवमेतस्य शिष्टं लक्ष्ये निरूप्यते ॥ ९४ ॥ इति सङ्ग्रहश्लोकः ॥ २५ ॥

तद्वेव सुप्रसिद्धान्तयोरेवोक्तौ अपि पदपूर्‌वार्धस्य प्रातिपदिकस्य धातोश्च यथायुक्ति वक्तां विचार्येदानीं तयोरेव यथास्वमपरार्धस्य प्रत्ययलक्षणस्य वक्तां विचार्यते । तत्र क्रियावैचित्र्यवकताया: सममनन्तरसम्मभाविनः क्रमसमन्वितत्वात् कालस्य वक्तत्वं पर्यालोच्यते, क्रियापरिच्छेदकत्वात्तस्य । औचित्यानन्तरतस्येन समयो रमणीयताम् । याति यत्र भवत्येषा कालवैचित्र्यवकता ॥ २६ ॥

एषा प्रकान्तस्वरूपा भवत्यसौ कालवैचित्र्यवकता । कालो वैचित्र्य- करणादिप्रसिद्धो वर्तमानादिलिङ्गप्रभृतिप्रत्ययबाच्यो य पदार्थानामुदय-

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२०८

[ वक्रोक्तिजीवितम् ]

तिरोधानविधायी तस्य वैचित्र्यं विचित्रभावस्थाविधत्वेनोपनिबन्धस्तेन वक्रोक्तिवैचित्र्यविच्छित्तिः । कीदृशी—यत्र यस्यां समये कालाक्ष्यो रमणीयतां याति रामणीयकं गच्छति । केन हेतुना—औचित्यान्तरतम्येन । प्रस्तुतत्वात्प्रस्ताविधिकुतस्य वक्तुनो यदौचित्यमुचितभावस्थास्तान्तरतस्येनान्तरङ्गत्वेन । तदतिशयोत्पादकत्वेनैत्थर्थः । यथा—

समविषमणिविवेसेसा समेतदो मन्दमन्दसञ्चारा ।

अत्रेति । होहिंति पहा मणरहाणं पि दुल्लङ्घा ॥ ९५ ॥

समविषमनिर्‌विशेषा: समन्ततो मन्दमन्दसञ्चारा: ।

अचिराद्भविष्यन्ति पन्थानो मनोरथानामपि दुल्लङ्घ्याः ॥

इतिच्छाया ॥

अत्र वल्लभाविरहवैदग्‌ध्यकातरान्तःकरणेन भावितः समयस्य सम्भावना-जुगुप्सामाहात्म्यमुखप्रेक्ष्य उद्दीपनविभावत्वविभवविळसितं तत्परिम्पन्न-सौन्दर्‌यसन्दर्शिनासहिष्णुना किमपि भयविसंशयुलस्वमभूय शब्दाकुलत्‌वेन केनचिदेतदभिधीयते—यदचिराद्भविष्यन्ति पन्थानो मनोरस्थानामप्यलङ्घ-घनीयाः इति भविष्यत्कालाभिधायी प्रत्ययः काम्यपरार्थवक्रोक्तां विकासयति ।

सृष्टि करता है। किस कारण से ?—औचित्य के अन्तरतमभाव से । प्रस्तुत होने के कारण, प्रकरण के रूप मे अधिकृत वस्तु जो औचित्य, उचित भाव, उसके अन्तर-तमभाव से, अन्तरङ्गता से । अर्थात् उस ( प्रस्तुत वस्तु ) के अतिशय का उत्पादक होने के कारण ।

उदाहरण जैसे—‘ऊँचे नीचे के मेढ से रहित चारो ओर मन्द-मन्द चलने लायक ये मार्ग अभिलाषाओं के लिए भी शीघ्र ही दुल्लङ्घ्य हो जायेंगे ॥ ९५ ॥

यहाँ प्रियतम के विरह की विधुरता से व्यथित मनवाले तथा भावी ( वर्णात् के ) समय की संभावना के अनुमान के महत्व की कल्पना कर, उद्दीपन विभाव के ऐश्वर्य-विलास तथा उसके स्वभाव-सौन्दर्य के समवलोकन को न सह सकने वाले, किसी अनिर्वाच्य भयजनित विषमता का अनुभव कर शब्द्‌जाल से व्याप्त किसी के द्वारा यह कहा जा रहा है—‘के मार्ग शीघ्र ही मनोरथों के भी अलङ्घनीय हो जायेंगे । इस प्रकार भविष्यकाल का अभिधान करने वाला ( लट् का ) प्रत्यय ( स्य ) किसी अपूर्व पदोत्तरार्धवक्रोक्ति को प्रकाशित कर रहा है । ( ध्यान देने की बात है कि गाथा-सप्तशती की इस ६७५वीं गाथा को ध्वनिकार ने भी कालव्‍यक्‍त का के उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत किया है । और वह कहते हैं—‘अत्र ह्याचिराद्‌भविष्यन्तीत्यसिन् पदे प्रत्ययः कालविशेषाभिधायी रसपरिपोषहेतुः

प्रकाशाते । अत्र हि गाथार्थः प्रवासविप्रलम्भशृङ्गारविभावतया विभाव्यमाने रसवान् ।

… ‘अत्र प्रत्ययो व्यञ्जक: l¹ ध्व० पृ० ३९० ) । अथवा जैसे—(.मधुमास के प्रारम्भ मे ही ) जब कि जगत् के ये समस्त अमिनव पदार्थ तरल मनवालों को कुछ अपूर्व

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यथा वा—

यावत्किचिद्दृग्पूर्वमद्रंमनसामावेदयन्तो नवा: सौभाग्यातिशयस्य कामपि दशां गन्तुं व्यवस्यन्त्यमी । भावास्तावदनन्वयस्य विधुर: कोऽप्युदयमो जृम्भते, पर्योमे मधुविप्रमे तु किमयं कर्तेति कम्पामहे ॥ ९६ ॥

अत्र व्यवस्यन्ति जृम्भते कर्ता कम्पामहे चेति प्रत्यया: प्रत्येकं प्रतिनियतकालाभिधायिन: कामपि पदपरार्थवक्रतां प्रथ्यापयन्ति । तथा च—प्रथमतरावर्तीणमधुसमयसौकुमार्येसुलभ्लसितसुन्दरपदार्थसार्थसमुन्मेपसमुद्दीपितसहजविभवविलसिततत्वेन मकरकेतुमनङ्गमात्रमाधवसानाध्यसमुल्लसितातुल्यशक्ते: सरसहृदयविधुरताविधायी कोऽपि संरम्भ: समुज्जृम्भते । तस्मादनेनानुमानेन परं परिपोषमधिरोहति कुसुमाकरविभवविभ्रमे मानिनीमानदलनदुल्लेलितसमुदितसहजसौकुमार्येसम्पत्सङ्घनितसमुचितजिगीषावसर: किमसौ विधास्यतीति विकलपयन्तस्तत्कुसुमशररणिकरनिपातकातरान्त:-करण: किमपि कम्पामहे चकितचेतस: सम्पद्यामहे इति प्रियतमाविरहविधुरचेतस: सरसहृदयस्य कस्यचिदेतदभिधानम् ॥ २६ ॥

निवेदन करते हुए सौभाग्य के अतिशय की अनिर्वचनीय दशा को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं ( उद्योग कर रहे हैं ) । तब तक काम का व्यथित कर देने वाला कोई अनिर्वचनीय अपूर्व उद्योग फैलने लगा है फिर तो वसन्तविलास परिपूर्ण हो जाने पर यह क्या कर डालेगा यह सोचकर हम कॉप उठते हैं ॥ ९६ ॥ यहाँ 'व्यवस्यन्ति', 'जृम्भते', 'कर्तां' तथा 'कम्पामहे' मे प्रत्येक ( कालवाची लडादि ) प्रत्यय नियतकाल के वाचक होकर अपूर्व पदपरार्थवक्रता को प्रथित करते हैं । जैसे कि—सद्य: अवर्तीर्ण मधुमास की सुकुमारता से सुबोधित सुन्दर पदार्थ-चुन्दों के समुन्मेप से विधिवत् उद्दीप्त किये गये स्वाभाविक सम्पत्ति-विलास से युक्त होने के कारण, वसन्त ऋतु की स्वल्प मात्रा साहाय्यता से अतुल्यशक्ति समन्वित काम का सरसहृदय वाले में व्यथा पैदा करने वाला कोई अपूर्व उद्योग फैलने लगा है; ( क्योंकि प्रथमतर अवर्तीर्ण मधुमास में काम का यह कृत्य है ) इसलिए इस अनुमान से कि, वसन्त के ऐश्वर्य-विलास के चरम परिपोष को प्राप्त होने पर मानिनी युवतिचुन्द के मान को चूर्णित कर देने से प्रगल्भ, स्वाभाविक सुकुमार भाव प्राप्त विभव से उत्पन्न विजयेच्छा का समुचित अवसर प्राप्त कर यह काम क्या कर डालेगा ऐसा सोचते हुए उस कामदेव के पुष्पमय बाणों के प्रहार से भयचकित हृदय हम कुछ कॉप उठते हैं, नचभितचित्त हो जाते है । इस प्रकार प्रियतमा के वियोग से व्यथित चित्त किसी सरसहृदय की यह उक्ति है ।

इस प्रकार पदपपरार्थवक्रता के भेद कालवक्रता का विचार कर कमसमुचित प्राप्त अवसर कारकवक्रता का विचार करते हैं—

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२१०

एवं कालकवकृतां विचार्ये क्रमसमुचितावुसरां कारकवकृतां विचारयति—

यत्र कारकसामान्यं प्राधान्येन निबध्यते ।

तत्त्वाध्यारोपणान्मुख्यगुणभावाभिधानात् । ॥ २७ ॥

परिपोषयितुं काञ्चिद्भङ्गींभणितिरम्यताम् ।

कारकाणां विपर्योस: सोक्ता कारकवकृता ॥ २८ ॥

सोक्ता कारकवकृता सा कारकवकृताविच्छित्तिरभिहिता । कीदृशी—

यस्यां कारकाणां विपर्योस: साधनानां विपरिवर्तनम्, गौणमुख्ययोरितरेतरत्वापत्ति: ।

कथम्—यत् कारकसामान्यं मुख्यापेक्षया करणादि तत् प्राधान्येन मुख्यभावेन प्रयुज्यते ।

कया युक्त्या तत्त्वाध्यारोपणात् ।

तदिति, मुख्यपरामर्शे;, तस्य भावस्तत्त्वं तद्‌ध्यारोपणात् मुख्यभावसमर्पणात् ।

तदेवं मुख्यस्य का व्यवस्था—मुख्यगुणभावाभिधानात: मुख्यस्य यो गुणभाव-

स्तदभिधानादमुख्यत्वेनोपनिबन्धादित्यर्थ: ।

किमर्थम्—परिपोषयितुं काञ्चिद्भङ्गींभणितिरम्यताम् ।

काञ्चिदपूर्वां विच्छित्तियुक्तिरमणीयतासुल्लासच्यितुम् ।

तदेवमचेतनस्यापि चेतनसम्भविस्वातन्यसमर्पणादमुख्यस्य करणादे:

कर्तृत्वाध्यारोपणाच्चात्र कारकविपर्योसरचमत्कारकारी सम्पद्यते ।

जहाँ किसी अपूर्व वकृतवविच्छित्ति की रमणीयता को परिपुष्ट करने के लिए तत्त्व (मुख्यत्व) का अध्यारोप करने से कारक सामान्य (गौण कारक) प्रधानरूप से तथा (गौणत्व का आरोपकर) प्रधान कारक गुणभाव के अभिधानपूर्वक निवन्धित किया जाता है, (इस प्रकार ) कारको का विपर्ययरूप वह कारकवकता कही गयी है ॥ २७-२८ ॥

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द्वितीयोऽमेष ]

यथा—

याच्चां दैन्यपरिमहणयिनां नेक्ष्वाकव शिक्षिता: सेवासंवलित: कदा रघुकुले मौलौ निवद्धोज्ज्वलि: । सर्वं तद्विहितं तथाऽप्युधिना नैवोपरोध: कृत: पाणि: सम्प्रति मे हताद् किमपरं स्पष्टु धुनुद्रोवति ॥ ९७ ॥

अत्र पाणिना धनुर्हीतगुणमिष्यतेति वक्तव्ये पाणो: करणगणत्वात् करणवाक्यम्— ध्यारोप: कामपि कारकवकतां प्रतिपद्यते । यथा वा— स्तनद्रन्द्रम्, इत्यादौ ॥ ९८ ॥

यथा वा—

निष्पर्याणनिवेशपेशलरसैरन्योन्यनिर्भर्त्सनभि- हंस्ताभ्रैगुणैगपत्निपत्य दशभिर्वामैर्दृशं कारुकम् । सत्यानां पुनरप्रथीयसि विधावसिमन् गुणारोपणे मत्सेवाविधुषामहं प्रथमिकां काप्यमिमे वर्तते ॥ ९९ ॥ अत्र पूर्ववदेव कर्तृत्ववाधारोपनिबन्धनं कारकवक्त्वम् ।

उदाहरण जैसे—

( समुद्र पर सेतुबन्धन के पूर्व समुद्र पर कुपित राम की उक्ति है । यह श्लोक 'महानाटक' ४।७८ तथा 'सरस्वतीकण्ठाभरण' में भी आया है )— दीनता को स्वीकार करने प्रणयिनी याचनावृत्ति को इक्ष्वाकुवंशीय राजाओं ने ( कभी नहीं ) सीखी तथा रघुवंश में कब ( किसी ने ) सेवा में बँधी हुई अज्जलि सर पर बॉँधी । ( किन्तु मैं राम ने ) वह सब कुछ किया फिर भी समुद्र ने कृपा नहीं की, अब और क्या जवरन मेरा हाथ धनुष को छूते के लिए बढ रहा है ॥ ९७ ॥

यहाँ 'हाथ से धनुप ग्रहण करना चाहता हूँ' ऐसा कहने की अपेक्षा साधनभूत हाथ पर कर्तृत्व का अध्यारोप कर दिया गया है ( जो ) अपूर्व कारकवकता को प्रतिपन्न कर रहा है । अथवा जैसे—( १।६५ पर उद्धृत ) 'स्तनद्रन्द्रम्' इत्यादि रचना मे ( अचेतन बाह्यसमूहकरण मे कर्तृत्वभाव का अध्यारोप किया गया है ) ॥ ९८ ॥

अथवा जैसे राजशेखरकृत बालरामायण ( १।९० ) मे रावण की इस उक्ति मे— अक्रम ( एक साथ ) धनुष पर विन्यस्त होने के कारण रमणीय आनन्द-निमग्न ( मैं ही पकडूँ इस प्रकार ) परस्पर ( एक दूसरे की ) निर्भर्त्सना करने वाले दसो बाये होओं से एक साथ पहुॅचकर ( भाव ) धनुष पकड लिया गया है । और फिर धनुष के आरोपपरूप इस छोटे से कार्य मे ( पहुॅचने के लिए ) मेरा अभिमत कार्य समझने वाले दाहिने दसो होओं की 'प्रथम मैं पहुॅचूँ, प्रथम मैं पहुॅचूँ' इस प्रकार की कुछ आनिवचनौग्या ( अहंकारयुक्त वाणी ) आकाश मे हो रही है ॥ ९९ ॥

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यथा वा—

वद्रस्पर्धी । इति ॥ १०० ॥ २८ ॥

एवं कारकवकता विचार्य क्रमसमन्वितां संख्या वावकृतां विचारयति, तत्परिच्छेदकत्वात् संख्या या:—

कुर्वन्ति काव्यवैचित्र्यविवक्षापरतां त्रित्ता: ।

यत्र संख्या विपर्ययोसं तां संख्या वावकृतां विदु: ॥ २९ ॥

यत्र यस्यां कवय: काव्यवैचित्र्यविवक्षापरतां त्रित्ता: स्वकर्मविवित्रभाव-

विधित्सा परवशा: संख्या विपर्ययोसं वचनविपरिवर्तनं कुर्वन्ति विदग्धते तां

संख्या वावकृतां विदु: तद्रवचनवकत्वं जानन्ति तद्विद्र । तद्यमग्रार्थ:—यदेक-

वचने द्विवचने प्रयुक्त क्ये वैचित्र्यार्थं वचनानन्तरं यत्र प्रयुज्यते, मिन्नवचनयो

यत्र सामान्याधिकरण्यं विधीयते । यथा—

कपोले पत्राली करतल निरोधेन मुदिता

निपीतो निःश्वास सै रयम स्मृतहृदयोधरर स: ।

यहाँ भी पहले की ही भाँति ( करणमूत वाम-दक्ष हायो पर धनुग्रंहण और आरोपण हेतु अहं स्फुरति कालूप कार्य के ) कर्तृत्व का अध्यारोप पूर्वक निवन्धन कारक-

वकता की सृष्टि कर रहा है ।

अथवा जैसे ( १ । ६६ मे आये श्लोक मे परशुराम के प्रति रावण की इस उक्ति मे कि ) —

( तुम्हारे पृष्ठ से ) हृड बोधे ( मेरी यह खड्ग लज्जित हो रही ) ॥ १०० ॥

यहाँ भी तलवार पर स्पर्धा बोधने रूप कार्य के कर्तृत्व का अध्यारोप किया गया है ॥ २८ ॥

इस प्रकार कारकवकता का विचार कर कमसमन्वित संख्या वकता का विचार करते है क्योंकि संख्या ( वचन ) कारक का परिच्छेदक होती है—

काव्य मे वैचित्र्य प्रतिपादन के पराधीन कवि गણ जहाँ संख्या ( वचन ) का

विपर्यय कर देते हैं, उसे संख्या वकता कहते हैं ॥ २९ ॥

जहाँ जिस उक्ति मे कवि गણ काव्य सौन्दर्य के प्रतिपादन की इच्छा से नियोजित

होकर अपने कवि कर्म ( काव्य ) के विचित्र भाव के कथन की इच्छा के पराधीन

होकर संख्या का विपर्यास, वचन का विपरिवर्तन कर देते है, उसे संख्या वकता कहते

है, जानते हैं । काव्यविद् उसे वचनवकता ऐसा जानते है । इस प्रकार यहाँ पर अर्थ हुआ—कि एक वचन अथवा द्विवचन के प्रयोग करने के स्थान पर विचित्रता के लिये

जहाँ अन्य वचन प्रयोग किये जाते है, अथवा मिन्न वचनो का जहाँ सामानाधिकरण्य

कर दिया जाता है ( वहाँ ( वचन ) संख्या वकता होती है ) ।

उदाहरण जैसे—( अमरुशतक ८५, सुभाषितावली १६२७, कावीन्द द्वचन ३७७,

सदुक्तिकर्णामृतम् २१४५, तथा ध्वन्यालोक प्र० २३२ एवं स्मरस्वतीकण्ठाभरण मे

उदाहृत इस श्लोक मे जहाँ नायक रूठी प्रियतमा को मनाते हुए कह रहा है )—

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सुदुः कण्ठे लग्नस्तरलयति वाष्पः स्तनतटीं प्रियो मन्युर्जातस्तव निरनुरोधे न तु वयम् ॥ १०१ ॥

अत्र 'न त्वहम्' इति वक्तव्ये, 'न तु वयम्' इत्यनन्तरझलत्वप्रतिपादनार्थं ताटस्थ्यप्रतीतये बहुवचनं प्रयुक्तम् । यथा वा—

वयं तत्वान्वेषणधुकरहतास्त्वं खलु कृतี ॥ १०२ ॥

अत्रापि पूर्ववदेव ताटस्थ्यप्रतीतिः । यथा वा—

फुल्लेन्दीवरकाननान्ति नयने पानी सरोजाकराः ॥ १०३ ॥

अत्र द्विवचनबहुवचनयोः सामानाधिकरण्यलक्षणः संख्याविपर्ययोस: सहृदयहृदयहारितामावहति । यथा वा—

शास्त्राणि चक्षुर्नेवम् ॥ १०४ ॥ इति ॥

अत्र पूर्ववदेवैकवचनबहुवचनयोः सामानाधिकरण्यं वैचित्र्यविधायि ॥२९॥

एवं संख्याविपर्ये विचार्ये तद्विषयत्वात् पुरुषाणां क्रमसमर्पितावसरां पुरुषवकतां विचारयति—

( निरन्तर रोते रहने के कारण ) गालो पर बनायी गयी पत्तावली तुझे होथो की रसाड़ से मसक डाला है । अमृत के समान अच्छा लगने वाला यह तुम्हारा अधररस निर्झरसी क्रीड़ा एकदम पी लिया गया है । बार-बार गले में लगने यह आँसू स्तन के छोर को कम्पित कर दे रहा है । अयि ! अनुरोध न मानने वाली तुम्हारा तो क्रोध हो गया है, न कि हम ॥ १०१ ॥

यहाँ 'न कि मैं' ऐसा कहने के बजाय 'न कि हम' यह बहुवचन, अपने अन्तरङ्ग न होने का प्रतिपादन करने के लिए तथा उदासीनता की प्रतीति कराने के लिए प्रयुक्त किया गया है । अथवा जैसे—( अभिज्ञान-शाकुन्तल १।२४ के अन्तिम पाद मे )—राजा दुष्यन्त का कथन है—मधुकर ! हम तो यथास्थिति ( शकुन्तला क्षत्रिया है या नहीं, विवाह योग्य है अथवा नही ) की खोज मे ही मारे गये और तुम कृतार्थ हो गये हो ॥ १०२ ॥

यहाँ भी पहले.की ही तरह 'अहम्' के स्थान पर 'वयम्' का प्रयोग करने से तटस्थता की प्रतीति हो रही है ।

अथवा जैसे—( १।६४ पर उदाहृत श्लोकांश मे )—

ऑखे खिले हुए नीले-कमलों के वन तथा होथ कमलों के निधान है ॥ १०३ ॥

यहाँ ( नयने—काननानि तथा पानी—सरोजाकराः, इस प्रकार से ) द्विवचन और बहुवचनो का सामानाधिकरण्यरूप सख्यापरिवर्तन सहृदय-हृदय को अच्छा लगने वाला हो गया है ।

अथवा जैसे—( २।२९ मे प्रयुक्त वाल्मीरामायण १।३६ के श्लोकांश मे )—

शास्त्र ही ( रावण के ) अभिनव नेत्र है ॥ १०४ ॥

यहाँ भी पहले.की ही तरह ( चक्षुः—शास्त्राणि के ) एकवचन और बहुवचन का सामानाधिकरण्य विचित्रता की सृष्टि करने वाला है ॥ २९ ॥

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प्रत्यक्तापरभावइच विपर्योसेन योज्यते ।

॥ यत्र विच्छित्तये सैषा ज्ञेया पुरुषवकता ॥ ३० ॥

यत्र यसां प्रत्यक्ता निजात्मभावः परभावइच अन्यत्वमुभयमप्येतेद्वि-

पर्योसेन योज्यते विपर्यवर्तनेन निवध्यते । किमर्थम्—विच्छित्तये वैचित्र्याय ।

सैषा वर्णितस्वरूपा ज्ञेया ज्ञातव्या पुरुषवकता पुरुषवकत्वविच्छित्तिः । तदय-

मत्रार्थः—यदन्वसिन्नुतुत्समे मध्यमे वा पुरुपे प्रयोकव्ये वैचित्र्यायान्यः

कदाचिद्रथमः। तस्माच्च पुरुषकयोगन्यतरपदसादृश्ये; प्रातिपदिक-

मात्रस्य च विपर्यासः पर्यवस्यति । यथा—

कौशाम्बीं परिभूय नः कृपणकौशाम्बरेप्सि: स्वीकृतां

जानाम्येव तथा प्रमादपरतां पद्यर्नैद्रेपिणः ।

स्त्रीणां च प्रियविप्रयोगविधुरं चेतः सदैवात्र मे

वक్తుं नोत्सहते मनः परमतो जानातु देवी स्वयं ॥ १०५ ॥

'अत्र 'जानातु देवी स्वयं' इति युष्मदि़ मध्यमपुरुपे प्रयोकव्ये प्राति-

पदिकमात्रप्रयोगेण वक्तुदर्शकत्यालुप्रानतां मन्यमानस्यौदासीन्यप्रतीतिः ।

इस प्रकार सख्यावकता का विचारकर पुरुषो के सख्या कम विपय होने के

कारण क्रम प्रति अवसर पुरुषवकता का विचार करते है—

विच्छित्ति के लिए जहाँ आत्मभाव और परभाव का विपर्ययपूर्वक निवेश

किया जाता है, ऐसी वह पुरुषवकता जाननी चाहिए ॥ ३० ॥

जहाँ जिस उक्ति मे 'प्रत्यक्ता' अपना आत्मभाव तथा परभाव, अन्यत्व ये दोनो

ही विपर्यासपूर्वक संयुक्त किये जाते है परिवर्तनपूर्वक निबद्ध किये जाते है

( वहाँ पुरुषवकता होती है ) । किसलिए?—विच्छित्त के लिए, वैचित्रय के लिए ।

वह इस प्रकार की वर्णितस्वरूप पुरुषवकता, पुरुषवकता की विच्छित्ति जाननी

चाहिए । तो इसका यहाँ यह अर्थ होता है—जहाँ अन्य, उत्तम अथवा मध्यमपुरुप

के प्रयोग करने की स्थिति मे वैचित्रय के लिए—अन्य अर्थात् कभी-कभी प्रथमपुरुप

का प्रयोग कर दिया जाता है । और उस पुरुप ( विपर्ययास ) के समान ही योगज-

युक्त होने के कारण अस्मदादि ( उत्तमादि पुरुप ) और प्रातिपदिक मात्र का भी

विपर्यय पर्यवसित होता है। उदाहरण जैसे—( इलोक तापसवत्सराज १।१६७ का है )—

मन्त्री योगन्धरायण का कथन है—तुच्छ आपने दानुगो से अधीन की गयी कौशाम्बी

को जीतकर नय से द्वेप रखने वाली महाराज की वैसी प्रमादपरता ( असावधानी )

को तो मैं जानता ही हूँ स्त्रियो का हृदय अपने प्रियतम के वियोग से सदैव व्यथित

रहता है तथा मेरा मन इस विषय मे कुछ भी कहनां नहीं चाहता, इसके आगे देवी

( आप ) स्वयं समझे ॥ १०५ ॥

यहाँ मध्यमपुरुष के युष्मद् शब्द ( त्वम् ) के प्रयोग करने के स्थान पर 'देवी

स्वयं जानने, इस प्रकार से 'देवी' इस प्रातिपदिकमात्र के प्रयोग से उस अपने कथन

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तस्याहच प्रसुत्वात् स्वातन्त्र्येण हिताहितविचारपूर्वकं स्वयमेव कर्तव्यार्थप्रतिपत्तिः कवेः वाक्यवक्रभावमावहति । यस्मादेतदेवस्य वाक्यस्य जीवितत्वेन परिस्फुरति ।

एवं पुरुषवक्रतां विचार्ये पुरुषाश्रित्यवादात्मनेपदपरस्मैपदयोरचितावसरां वक्रतां विचारयति । धातूनां लक्षणानुसारेण नियतपदाश्रयः प्रयोगः पूर्वाचार्यैः-

णाम 'उपग्रह'शब्दाभिधेयतया प्रसिद्धः । तस्मादतदभिधानैनैव ब्यवहरति—पद्योरुभयोरेकमौचित्याद् विनियुज्यते ।

शोभायै यत्र जल्पन्ति तामुपग्रहवक्रताम् ॥ ३१ ॥

तामुक्तस्वरूपामुपग्रहवक्रतामुपग्रहवक्रत्वविच्छित्ति जल्पन्ति कवयः कथयन्ति । कीदृशी-यत्र यस्मिन् पद्योरुभयोरपि धात्वदेकमात्मनेपदं परस्मैपदं वा विनियुज्यते विनिबध्यते नियामेन । कस्मात्कारणात्—औचित्यात् । वर्ण्येमानस्य वस्तुनो यदौचित्यमुचितभावस्तस्मात्, तं समाश्रित्येत्यर्थः । किमर्थम्—शोभायै विच्छित्तये ।

की (देवी के द्वारा) परिपालन किये जाने की अशङ्क्यता मानने वाले वक्ता (मन्त्री योगन्धरायण) की (आप मानें या न मानें इस प्रकार की) उदासीनता की प्रतीति हो रही है । और उस देवी के समर्थ होने के कारण स्वतन्त्रतापूर्वक हित और अनहित के विचारपूर्वक स्वयं ही करणीय अर्थ का निर्धारण करना चाहिए इस प्रकार की अपूर्व वाक्य की वक्रता को (देवी पद का प्रयोग) प्रस्तुत कर रहा है । क्योंकि यही इस वाक्य के प्राण के रूप में समुत्कलसित हो रहा है ।

इस प्रकार से पुरुषवक्रता का विचार कर आत्मनेपद और परस्मैपद के पुरुष के आश्रित होने से उचित अवसर प्राप्त उनकी वक्रता का विचार करते है । धातुओं का लक्षण के अनुसार निश्चित पद (परस्मैपद, आत्मनेपद या उभयपद) के आश्रित होने वाला प्रयोग प्राचीन आचार्यों में 'उपग्रह' शब्द के नाम से प्रसिद्ध है । इसलिए, उस नाम से ही यहाँ भी उन्हे (परस्मैपद-आत्मनेपद को) व्यवहत कर रहे है—

(कविगण) जहाँ (काव्य की) शोभा के लिए दोनों (परस्मैपद आत्मनेपद) पदों में से औचित्यवश किसी एक का विनिबन्धन करते हैं, उसे उपग्रहवक्रता कहते है ॥ ३१ ॥

उस (कारिका से) कथित स्वरूपवाली उपग्रहवक्रता, उपग्रहवक्रत्वविच्छित्ति को कहते है, कविगण बताते है । कैसे है?-जहाँ, जिसमे दोनों पदो में से एक आत्मनेपद अथवा परस्मैपद का नियमितपूर्वक विनियोग, विशेष विनिबन्धन करते है । किस कारण से ?—औचित्य के कारण से । वर्ण्यम‿न वस्तु का जो औचित्य, उचित भाव उसके कारण अर्थात् वर्ण्यमान वस्तु के औचित्य का समाश्रय करके विनिबन्धन करते है । किसलिए ?—शोभाहेतु, विच्छित्ति-निर्माण के लिए ।

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तस्या परेष्वपि म्रगेषु शरानुसूक्ष्मः कर्णान्तमेत्य विविधे निविडोऽपि सुष्टु: ।

त्रासातिमात्रचटुलैः स्मरयत्सुनेत्रैः प्रौढप्रियानयनविव्रहमचेष्टितानि ॥ १०६ ॥

अत्र राज्यः सुललितविलासवतीलोचनविलासेषु स्मरणगोचरमवतरतस्यु

तत्परायत्तचित्तवृत्तेस्तेरोऽधिकप्रयत्नपरिस्पन्दविनिवर्त्तनान्मुस्त्रिविंभिदे भियते स्म ।

स्वयमेवोति कमकर्तृनिबन्धनसन्नतनेपथ्यमतिक चमत्कारकारिणीं कामपि वाक्य-

वकतामावहति ॥ ३१ ॥

एवमुपग्रहवकतां विचार्य तदनुसम्भावितां प्रत्ययान्तर वकतां विचारयति—

विहितः प्रत्ययादनुः प्रत्यय कमनीयताम् ।

यत्र कामपि पुष्णाति सान्या प्रत्ययवकता ॥ ३२ ॥

सान्या प्रत्ययवकता सा समासन्नतरूपादनुयापरा काचित् प्रत्ययवकत्व-

विच्छित्ति । अस्तीति सम्बन्धः । यत्र यस्मात् प्रत्ययः कामप्यपूर्वां कमनीयतां

रम्यतां पुष्णाति पुष्टयति । कीटशः—प्रत्ययात् तिङादेर्विहितः पदत्वेन

विनिर्मितोऽन्वयः कश्चिदति ।

( रघुवंश ९।५८ मे महाराज दशरथ के द्वारा मृगया किये जा रहे वृत्तान्त का वर्णन है )—भय से अत्यन्त चञ्चल नेत्रों से प्रियतमा के नेत्रों की उत्तम विभ्रम चेष्टाओं का

स्मरण दिलाने वाले दूसरे मृगों पर भी बाण-प्रहार की इच्छा रखने वाले उन महाराज दशरथ की गहरी भी मूठ ( पकड़ ) ढीली पड़ गयी ॥ १०६ ॥

यहाँ ( भयवश अतएव और भी चञ्चल मृगनेत्रों के दर्शन से ) वल्लभा के सुन्दर नेत्र विभ्रमो के स्मृतिगोचर होने पर उस ( प्रियतमा दृष्टि ) के पराधीन मनोद्रुत्ति

राजा दशरथ के द्वारा ( शर-प्रहाररूप ) प्रयत्नभाव से विरत हो जाने से सुडष्ठी विलग्न हो गयी, ढीली पड़ गयी । स्वयं ही न ( मूठ ढीली पड़ गयी ) इस प्रकार कर्मकर्तृनिबन्धन

आत्मनेपद अतिशय सौन्दर्य पैदा करने वाली अपूर्व वाक्यवकता को ला रहा है ॥ ३१ ॥

इस प्रकार उपग्रहवकता का विचारकर उसके परचात् हो सकने वाली दूसरे

प्रत्ययों की वकता का विचार करते है—

जहाँ एक प्रत्यय से किया गया अन्य प्रत्यय अपूर्व वकता को पुष्ट करता है, वह

अन्य प्रकार की प्रत्ययवकता होती है ॥ ३२ ॥

वह अन्य ही प्रत्ययवकता है । वह अर्थात् इसके पूर्व कथित स्वरूप ( परस्मैपद

तथा आत्मनेपद प्रत्ययरूप ) से भिन्न अन्य दूसरी ही कोई प्रत्ययवकता की विच्छित्ति

है । अस्ति-होती है इस क्रिया का सम्बन्ध है । जहाँ जिसमें प्रत्यय किसी अपूर्व ही

वकता कमनीयता का पोषण करता है, पुष्ट करता है । कैसा प्रत्यय ?—तिङादि

प्रत्यय से किया गया अर्थात् पद के रूप मे बनाया गया कों और प्रत्यय ( जहाँ कम-

नीयता का पोषण करता है वहाँ दूसरे प्रकार की प्रत्ययवकता होती है ) ।

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यथा—

लीनं वस्तुनि येन सूक्ष्मसुभगं तत्वं गिरा कृष्यते निर्यातं प्रभवेन् मनोहरमिदंबवैचैव यो वाक्पतिः । वन्दे द्वावपि तावहं कविवरौ वन्दे तरां तु पुन- र्यो विज्ञातपरिश्रमोड्यमनयोर्भारावतारक्षम: ॥ १०७ ॥

'वनदेतराम्' इत्यत्र कापि प्रत্যয়वक्रता कवेच्छेतसि परिस्फुरति । तत् एव 'पुनः'—शब्द: पूर्वस्माद् विश्रान्त्याभिधीयत्वात् प्रयुक्तः ॥ ३२ ॥

एवं नामाख्यातस्वरूपयो: पद्ययो: प्रत्येकं प्रकृत्याद् अवयवव विभा गद्वारेण यथासम्भवं वक्रत्वं विचार्येदानीं सुपरसंगतिपातथोरयुक्तप्रत्ययाद् वादसम्भव द्विभक्ति- कत्वाद् निरस्तावयवत्वे सत्यपि भक्तयो: साकल्येन वक्रतां विचारयति—

रसादिचोतनं यस्यानुपसर्गनिपातयो: । वाक्यैकजीवितत्वेन सा परा पदवक्रता ॥ ३३ ॥

सापरा पदवक्रता—समर्पितस्वरूपापारा पूर्वोक्तलयतिरिक्ता पदवक्रत्व- उदाहरण जैसे—वस्तु मे अन्तर्निहित सूक्ष्म तथा सुन्दर तत्व को जो अपनी वाणी से बाहर स्वீच निकालता है अथवा जो इस बहिर्जगत् को वाणी से ही मनोरम बनाने मे समर्थ है वह कविपुज्यो को मैं प्रणाम करता हूँ और उसको इन दोनो से भी अधिक प्रणाम करता हूँ जो इन दोनो के परिश्रम का जानकार ( और इस प्रकार इनके ) भार को उतारने मे समर्थ होता है ॥ १०७ ॥

( प्रथम तो यहाँ 'विहित प्रत्यय लङादि' का मिप् रूप 'वन्दे' प्रयुक्त है किन्तु इस प्रत्यय से अन्य प्रत्यय 'वनदेतराम्' मे तर्प्रत्यय किया गया है, इस प्रकार यहाँ ) 'वनदेतराम्' इस प्रयोग मे कवि के चित्त मे कोई अपूर्व प्रत्ययवक्रता समुल्लसित हो रही थी ( जिसके वशीभूत होकर उसने इसका प्रयोग किया है ) इसीलिए तो पहले की अपेक्षा विशेष के प्रतिपादक के रूप मे 'पुनः' शब्द का प्रयोग किया गया है ॥ ३२ ॥

इस प्रकार नाम ( प्रतिपादिकरूप सुबन्त ) और आख्यात ( धातु या क्रियारूप तिङन्त ) स्वरूप दोनो प्रकार के पदो की प्रकृति आदि ( प्रत्यय ) के अवयव के विभागपूर्वक यथासम्भव प्रत्येक वक्रता का विचार कर इस समय ( पदजातो मे अवशिष्ट दो ) उपसर्ग और निपात की अव्युत्पन्न होने के कारण तथा उनमे विभक्ति सम्भव न होने के कारण उनके अवयवरहित होने पर अविभक्त उन दोनो की सम्पूर्ण रूप से होने वाली वक्रता का विचार करते है—

जहाँ उपसर्ग और निपात के द्वारा वाक्य के एकमात्र प्राणस्वरूप ( श्रृङ्गार आदि ) रस आदि ( भावादि ) का द्योतन होता है । वह ( पूर्वंप्रतिपादित पदवक्रता से भिन्न ) अन्य प्रकार की पदवक्रता होती है ॥ ३३ ॥

वह अन्य पदवक्रता है । वह अपर अर्थात् वर्णितस्वरूप से मिन्न इतर, पूर्वोक्त से व्यतिरिक्त, पदवक्रता की शोभा होती है ।'अस्ति' इस क्रिया का ( सापरा पदवक्रता

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विच्छित्तिः।अस्तीति सम्बन्धः।कीदृशी—यस्यां वक्त्रायामुपसर्गेनिपातयोः वैयाकरणप्रसिद्धाभिधानयो रसाद्योतनं शृङ्गारप्रभृतिप्रकाशनम्।कथम्— वाक्यैक्यजीवितत्वेन।वाक्यस्योल्लोकादेरेकजीवितं वाक्यैकजीवितं तस्य भावस्तत्त्वं तेन।तदिदमुक्तं भवति—यद्वाक्यस्यैकस्फुरितभानेन परिष्कुरति यो रसादिस्तत्प्रकाशननेतर्थः।यथा—

वैदेही तु कथम्भविष्यति ह हा हा देहि धीराऽऽ भव॥१०८॥

अत्र रसोत्पत्तिरस्तत्कालज्वलितोद्दीपनविभावासम्भत्समुल्लासितः सन्निकृष्टजनितजानकीविपत्तिसम्भावनस्तत्प्रतिप्राणकरणगोल्साहकारणतां प्रतीपद्यमानस्तदेकाङ्गतया विस्तृतविप्रकर्षः अत्ययप्र- रसपरिस्पन्दसुन्दरो निपातपरम्पराप्रतिपद्यमानत्वैक्यैकजीवितत्वेन प्रतिभासमानः कामपि वाक्यवक्रतां समुन्मीलयति।तु-शब्दस्य च वक्त्रभावः दृग्वमेव वयाख्यात्।

से)सम्बन्ध है।कैसी(है वह पदवक्रता)?—जिस वक्त्रता में वैयाकरण-ग्रन्था में प्रसिद्ध नाम उपसर्ग और निपातों के द्वारा रसादि का द्योतन, शृङ्गार आदि रसादि का प्रकाशन होता है।कैसे?क्योकि(रसादि हो)वाक्य का एकमात्र जीवन है।वाक्य, श्लोक आदि का एकजीवित है जो वह हुआ वाक्यैकजीवित, उसका जो भाव वह हुआ वाक्यैकजीवितत्व, वाक्य के एकमात्र जीवनरूप(रसादि के)होने से।तो यहाँ यह कहा जा सकता है—वाक्य के एकमात्र जीवित रूप से प्रकाशित होता है जो रसादि उसके प्रकाशन से(जो उपसर्ग-निपात का प्रयोग किया जाता है, वह और ही पदवक्रता है)यह अर्थ हुआ।

उदाहरण जैसे—(२।२७ पर उदाहृत श्लोकांश मे)—

(राम मै तो सब कुछ सह लैऊँगा)किन्तु हाय,(इस उमड़ते-घुमड़ते बादलों वाले वर्पाकाल में)विदेहपुत्री सीता कैसे होगी?हा देहि ! धीरज रखो॥१०८॥

यहाँ उस(सिन्धु-श्यामलकान्तिलतित विपदादि युक्त)वर्षाकाल में प्रदीप्त उद्दोमान विभावो की शोभा से सर्वविधि प्रकाशित, निश्ितरूप से सीता की मृत्युरूप विपत्ति की सभावनायुक्त श्री रघुनाथ रामचन्द्र जी की अकुलाहट, उन मीता की रक्षा करने के लिए उत्साह की कारणता को प्राप्त होता हुआ, सीता की एकाङ्गता से चिच्चित साक्षात्कारस्वरूप, तदाकारित होने के कारण वियोग को बुला देने वलाः, अभिनव(विप्रलम्भ शृङ्गार)रस के परिस्फुरण से सुन्दर(ह,ह आदि निपात-समूह से प्रस्तुत रघुनन्दजी का)व्यापार(विप्रयोग विप्रलम्भानुभूति)वाक्य के एकमात्र प्राण के रूप मे प्रतीत होता हुआ अपूर्व वाक्यवक्रता को विभासित कर रहा है।और 'तु'शब्द का वक्त्रभाव पहले(२।२७)ही व्याख्यात हो चुका है।

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द्वितीयोऽमेष: ]

अयमेकपदे तयावियोग: प्रियया चोपनत: सुदु: सहो वा । नव वारि धरोदरादहोभिरेभिरेवितलव्यं च निरातपत्रवरस्यैः॥ १०९ ॥

अत्र द्रयो: परस्परं सुदुःसहत्वोद्दीपनसामर्थ्यसमेतयोः प्रियाविरह-वर्षोकालयोस्तुल्यकालत्वप्रतिपादनपरं 'च'-शब्दद्वितयं समसमयसमुद्रद्दीपयति । 'सु'-'दु' शब्दाभ्यां च प्रियाविरहस्याश्रयप्रतीकारता प्रतिपाद्यते । यथा च—

सुहरज्जलिसंवृताधरोष्ठं प्रतिपेधाक्षरविकलवाभिरामम्। मुखखण्डसविवर्ति पक्ष्मलाक्षा: कथयिष्युन्रमितं न चुम्बितं तु ॥ ११० ॥

अत्र नायकस्य प्रथयमाभिलाषविवशाश्रुतेसुभगस्मृतिसमुल्लिखिततत्काल-समुचिततद्रद्रनेन्दुसौन्दर्यस्य पूर्वपरिचुम्बनस्वलितसमुद्दीपितपरचात्ताप-वशावेशयोत्तानपर: 'तु'- शब्द: कामपि वाक्यवक्रतामुत्तेजयति । एतदुतरत्रत प्रत्ययवक्रत्वमेवविहितप्रत्ययान्तरत्वृत्तभावान्तर्भूतत्वात् पृथकत्वेन नोक्तमिति स्वयमेवोत्रेक्षणीयम्।

अथवा जैसे—( विक्रमोर्वशीय ४१३ इस श्लोक में । यह श्लोक ध्वन्यालोक में भी निपातों की व्यञ्जकता में उदाहृत किया गया है)—उदश्री के वियोग से पीडित पुरुरवा कहता है कि, उस प्रियतमा उर्वशी से मेरा अत्यन्त असह्य वियोग तथा अमिनव जलधर मेघो के उदय से आतपराहित रमणीय होने वाले दिन एक साथ ही मेरे समक्ष आ पड़े॥ १०९ ॥

यहाँ परस्पर अत्यन्त दु:सहत्व तथा उद्दीपन की शक्ति से युक्त प्रियावियोग तथा वर्षाकाल दोनों की समकालता को प्रतिपादित करने में समर्थ ( निपातरूप में प्रयुक्त ) दोनो 'च' शब्द एक साथ प्रकाशित अभि को प्रज्ज्वलित करने में सक्षम दक्षिण मल्लय-मासुत तथा बालव्यजन की समानता का समर्थन करते हुए अपूर्व वाक्यवक्रता को समुद्दीप्त करते हैं। और 'सु' तथा 'दु' निपातरूप दोनो ही शब्दो से प्रिया-वियोग की असम्भाव्य प्रतीकारता प्रतीत होती है। अथवा जैसे—( अभिज्ञान शाकुन्तल ३८५ का श्लोक जिसमें राजा दुष्यन्त द्वारा एकान्त में भी प्रियतमा शकुन्तला के होठो का पान न कर सकने का परचात्ताप वर्णित है । यह भी श्लोक ध्वन्यालोक में ( पृ० ३८६ ) निपातों की व्यञ्जकता के उदाहरण के रूप मे आया है)—

बार-बार ऑगुलियों से ढँके गये अधरोष्ठयुक्त तथा निपेधके ( न-न ) अक्षरों से घबराये अतएव सुन्दर उस पक्ष्मलाक्षी शाकुन्तला के स्कन्ध तक परावर्तित मुख को मैने किसी-किसी प्रकार से ऊपर उठा तो लिया किन्तु चुम्बन नही कर पाया ( बीच मे गौतमी आ पडी ) ॥११०॥

यहाँ प्राप्ति की प्रथम अभिलाषा से विवश व्यापार नायक दुष्यन्त के ( एकान्त सड्नम मे मुख को ऊपर उठाने आदि के ) अनुभव के स्मरण से चित्रित उस समय के उपयुक्त शाकुन्तला के मुखचन्द्र की सुन्दरता का पहले ही परिछुम्बन ( न ले पाने ) मे होने वाली भूल से समुद्दीपित परचात्ताप के कारण समुत्पन्न आवेश को द्योतित

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यथा—

येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापत्स्यते ते वहेग्णेव स्कुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णोः ॥ १९१ ॥

अत्र ‘आतितराम्’ इत्यतीव चमत्कारकारि । एवमन्येपामपि सजातीयलक्षणद्वारेण लक्षणनिष्पत्तिः स्वयमनुसर्तव्या । तदेवमियमनेकाकारा वकृत्वविच्छित्तिरचतुविचित्रापदाविषया वाक्यैकदेशजीवितत्वेनापि परिस्कुरन्ती सकलवाक्यवैचित्र्यनिबन्धनतामुपयाति ।

वकृताया: प्रकाराणामेकपि कविकर्मणि तद्विदाह्लादकारित्व हेतुतां प्रतिपद्यते ॥ १९२ ॥

करने वाला ‘तु’ शब्द अपूर्व वाक्यवकता को उद्भासित कर रहा है । ( ऊपर के दोनो श्लोको मे होने वाली व्यञ्जना को लोचनकार ने इस प्रकार व्यक्त किया है—दोनों ‘च’ शब्दाचैवमाहतु:; काकतालीयन्यायेन गणडस्योपरि स्कोट इतिवच्चादृयोगदृश् चर्पासमयस्च समुपनतौ एतदलं प्राणहरणाय । … ‘तु’ शब्द: पश्चात्तापसूचकसनं तावन्मात्रपरिचुम्बनलाभेनापि कृतकृत्यता स्यादिति ध्वनति । लोचन पृ० ३८६ ) ।

इन ( उपसर्ग ) के अन्त मे लगाने वाले प्रत्ययो की वकता इस प्रकार की ( पूर्वपादित रूप ) अन्य प्रत्ययो की वकता मे अन्तर्भूत हो जाती है, इसलिए उन्हे पृथक् रूप से नही कहा है । इसे स्वयं ही समझ लेना चाहिए । उदाहरणार्थ जैसे—मेघदूत के १५वें श्लोक का उत्तरार्द्ध है—

रत्नच्छायाव्यतिकर इव प्रेङ्खयमेतपुष्पस्त्रुटल्मीकग्रात्समभवति धनुः खण्डमाखण्डलस्य ॥

मेघ के रामगिरि से आगे जाने की बात है । विभिन्न मणियों की कान्ति के मिश्रण की भाँति दर्शनीय इन्द्रधनुष का टुकडा बाँबीपयो से स्फिकल रहा है । ) जिससे तुम्हारा र्गामगिरीर छिटकते प्रकारा मयूरपंख से गोपवेषधारी भगवान् कृष्ण के श्याम-

धारी की भॉति अत्यन्त शोभा को प्राप्त कर लेगा ॥ १९१ ॥

यहॉ ‘आतितराम’ पद अत्यन्त चमत्कारकारि है । ( ऐसे उपसर्ग आदि के बाद आने वाले ‘तरप्’ आदि प्रत्ययो को पूर्वप्रतिपादित प्रत्ययवकता मे अन्तर्भूत कर लेना चाहिए । ) इसी प्रकार समान जातीय लक्षणों के द्वारा अन्य वकताओ के भी लक्षणों का निर्माण स्वयं समझ कर कर लेना चाहिए । इस प्रकार यह अनेक स्वरूपो वाली वकता की विच्छित्ति ( नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातरूप ) चार प्रकार के

पदो की विपयक होती हुई वाक्य के एकाशामात्र के भी जीवन के रूप मे प्रकाशित होती हुई सम्पूर्ण वाक्य की विचित्रता के निवन्धन की हेतुता को प्राप्त होती है ।

वकता के अनेक भेदों मे से एक भी प्रकार कविकर्म ( काव्य ) के तद्विद ( सहृदय ) की आह्लादकारिता की कारणता को प्राप्त कर श्रेता है ॥ १९२ ॥

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यद्येवमेकस्यापि वक्त्रापकारस्य यदेवंविधो महिमा तदते बहवः सम्पत्तिता: सन्तः किं सम्पादयन्तीतियाह—

परस्परस्य शोभायै बहवः पतिता: क्वचिद्‌ । प्रकारा जनयन्त्येतां चित्रच्छायामनोहराम्‌ ॥ ३४ ॥

क्वचिदेकस्मिन् पदमात्रे वाक्ये वा वक्त्रापकारा वक्त्रप्रभेदा बहवः प्रभूताः कविप्रतिभामाहात्म्यससमुल्लसिताः । किमर्थम्‌—परस्परस‍ शोभायै,

अन्योन्यस्य विच्छित्तये । यथामेव चित्रच्छायामनोहरामनेकाकारकान्ति रमणीयां वाक्यतां जनयन्त्युत्पादयन्ति ।

तर्न्तीव इति ॥ ११३ ॥

अत्र क्रियापदानां त्रयाणामपि प्रत्येकं त्रिप्रकारं वैचित्र्यं परिस्फुरति—क्रियावैचित्र्यं कारकवैचित्र्यं कालवैचित्र्यं च । प्रथिम-स्तानजघन-तरुणिम्नां त्रयाणामपि वृत्तिवैचित्र्यम्‌ । लावण्यजलधि-प्रागल्भ्य-सरलता-परिचय शब्दान-सुपचार-वैचित्र्यम्‌ । तदेवमेते बहवो वक्त्रापकारा एकस्मिन् पदे वाक्ये वा सम्पत्तितादृचित्रच्छायामनोहरामेवतामेव चेतनचमत्कारकारिणीं वाक्यवकतामकलिनि ॥ ३४ ॥

यदि इस प्रकार से एक भी वक्ता के प्रकार का यदि इस प्रकार का माहात्म्य है तो ये अनेक प्रकार उपस्थित होकर क्या करते है, इस पर कहते है—

एक-दूसरे की शोभा के लिए कही कही उपस्‍थित ( वक्ता के ) अनेक प्रकार इस वक्तता को अनेक प्रकार की कान्ति से मनोहर बना देते है ॥ ३४ ॥

कहीं एक ही पदमात्र अथवा वाक्यमात्र मे वक्ता के प्रकार, वक्ता के प्रभेद, बहुत से अनेक कवि-प्रतिभा के माहात्म्य से समुल्लसित होते है । किसलिए ? —एक-दूसरे की शोभा के लिए । अन्योन्य की विच्छित्ति के लिए । इसी विभिन्न कान्ति से मनोहर, अनेक स्वरुपो की कान्ति से रमणीय वक्तता को जन्म देते हैं, उत्पन्न करते है ।

उदाहरण जैसे—(२।९१ में उद्धृत श्लोक—

‘तरन्तीवाऽज्ञानि‘ इत्यादि मे ॥ ११३ ॥

यहाँ तीनो ही ( तरन्ति, उन्तुदयन्ति, अपवदन्ते ) क्रियापदों मे प्रत्येक की तीन प्रकार की वक्ता समुल्लसित हो रही है—क्रियावैचित्र्य, कारकवैचित्र्य और कालवैचित्र्य !

प्रथिमा, स्तनजघन और तरुणिमा तीनो पदो मे ( तादृत्त-समासादिरूप ) वृत्तिवैचित्र्य है । लावण्यजलधि, प्रागल्भ्य, सरलता तथा परिचय शब्दो की उपचारवक्तता है !

इसीलिए इस प्रकार से ये अनेक वक्तता के भेद एक पद अथवा वाक्य मे उपस्थित होकर विभिन्न शोभा से मनोहर; इसी चेतन ( सहृदय ) को चमत्कृत करने वाली वाक्यवकता को निष्पन्न करते हैं ॥ ३४ ॥

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एवं नामाख्यातोपसर्गेनिपातलक्षणस्य चतुर्विधस्यापि पदस्य वकताप्रकारान् विचार्येदानीं प्रकरणमुपसंहरत्यानयदवतारयति—

वागवल्ल्या: पदपल्ववासपदतया या वक्रोद्भासिनी विच्छित्तिः सरसत्वसम्पदुचिता काप्युज्ज्वला जृम्भते ।

तामालोच्य विदग्धषट्पदगणेर्व्यप्रसूताश्रयि: स्पारामोदमनोहरं मधु नयोत्कण्ठाकुलं पीयताम् ॥ ३५ ॥

वागेव वल्ली वाणी लत्ता तस्याः काव्यलौकिकविच्छित्तिजृम्भते शोभा समुल्लसति । कथम्—पदपल्ववासपदतया पदान्येव पल्ववाति सुविदन्त्र-

न्येव पत्राणि तदास्पदतया तदाश्रयत्वेन । कीदृशी विच्छित्तिः—सरसत्वसम्पदु-

चिता, रसवत्त्वातिशयोपपन्ना । किं विशिष्टा च—वकतया वकभावेनोद्भासते भ्राजते या सा तथोक्ता । कीदृशी—उज्ज्वला, छायातिशयेन रमणीया । तामेव-

विधामालोच्य विचार्य विदग्धषट्पदगणेर्विबुधषट्पदचरणचकैरमृदुपपोयतां मकरन्द-

आस्वाद्यताम् । कीदृशम्—वाक्यप्रसूनाश्रयम् । वाक्यान्येव पदसुदाय-

रूपाणि प्रसूनानि पुष्पाण्याश्रयःस्थानं यसद् यत्तथोक्तम् । अन्यच्च कीदृशम्—

स्पारामोदमनोहरम् । स्पारः—स्फीतो योडसावामोदस्तद्रर्मेविशेषपस्तेन मनोहरं

इस प्रकार नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपातरूप चारों प्रकार के पदों के वकता के भेदों का विचार कर इस समय इस प्रकरण का उपसंहार कर अन्य अवतारणा करते है—वाणीरूप लता के पदरूप किसलय के आश्रय मे रहने वाली, वकता से समुद्भासित सरसत्व श्री विभूषित जो कोई अपूर्व उज्ज्वल शोभा प्रकटित होती है, उसकी आलोचना कर ( उसे निभाल्नित कर ) पण्डिततरूप भ्रमर न्दो द्वारा वाक्य-

रूप पुण्पो मे रहने वाले अतिशय आमोद से मनोहर मधु को नयी उत्कण्ठा से व्यग्र होकर पीये ॥ ३५ ॥

वाक् ही वल्ली है, वाणी लत्ता है, उसकी कोई अलौकिक शोभा प्रकाशित होती है, समुल्लसित होती है । कैसे ?—पदपल्वव मे रहने वाली । पद ही हुए पल्वव अर्थात् सुवन्त, तिङन्तरूप पद ही पत्ते है उसके आस्पद होने के कारण, उसके आश्रय मे रहने वाली । कैसी विच्छित्ति ?—सरसत्व सम्पत्ति से युक्त, अतिशय रसवत्ता से भरपूर । और किस वियोग से युक्त है ?—वकता से वकभाव से जो उद्भासित होती है, शोभित होती है वह तथोक्त वक्रोद्भासिनी विच्छित्ति । कैसी ?—उज्ज्वल, शोभातिशय से रमणीय ।

उस इस प्रकार की विच्छित्ति को आलोचित कर, विचार कर, विदग्ध भ्रमर-समूहों द्वारा, पण्डिततरूप भ्रमर न्दो द्वारा मधु पीया जाये, मकरन्द का आस्वाद लिया जाये । कैसे मधु ?—वाक्यरूप पुष्पो मे रहने वाले । पदसमुदायरूप वाक्य ही प्रसून, पुष्प ही आश्रय-

स्थान है जिसके उस तथोक्त वाक्यप्रसूनाश्रय मधु को । और कैसे ?—स्पार आमोद से मनोहर । स्पार, स्फीत (अतिशय) जो यह आमोद उसका धर्मविशेष (सौगन्ध्य) उससे मनोहर हृदयहारी मधु को । कैसे पाने किया जाये ?—नयी उत्कण्ठा से आकुल होकर

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हृदयहारी। कथमस्वादयिताम्—नवोत्कण्ठाकुलम् नूतनोक्तिलकान्वयग्रहम्। मधुकरसमूहाः खलु वल्ल्याः प्रथमोल्लसितपल्लवोल्लेखमालोच्य प्रतीतचेतसः समनन्तरोदितसुकुमारकुसुममकरन्दपानमहोत्सवमतुभवन्ति। तदृदृदयया: पदास्पदां कामपि वक्त्रां विच्छित्तिमालोच्य नवोत्कलिकाकलितचेतसो वाक्याश्रयि किमपि वक्ताजीवितसर्वस्वं विचारयित्वा तात्पर्यार्थः। अत्रैकत्व सरसत्वं स्वसमयसम्भविरसालङ्कृत्यम्, अन्यत्र शृङ्गारादिव्यञ्जकत्वम्। वक्तृकत्र बालिन्दुसुन्दररसस्थानीयुक्तत्वम्, इतरेतरव्यतिरेकादिवैचित्र्यम्। विच्छित्तितिरेकत्र सुविभक्तपदत्वम् अन्यत्र कविकौशलकमनीयता। उज्ज्वलत्वमेकत्र पर्णच्छायामुक्तत्वम् अपरत्र सङ्कीटेशसौन्दर्येसमुदयः। आमोदः पुष्पेपु सौरभम्, वाक्येपु तद्विदाह्लादकारिता। मधुकुसुमेपु मकरन्दः, वाक्येषु सकलकाव्यकारणसम्पत्तसमुदय इति।

इतिश्रीमत्त्कविरचिते वक्रोक्तिजीविते द्वितीय उन्मेषः ॥

अभिनव उत्प्रेक्षा से व्यग्रम ( अपीर ) होकर। भ्रमरगण लता की प्रथमतः निकली पल्लवरेखा को देखकर विद्वस्तमना होकर पल्लव के बाद निकले कोमल पुरुप के पराग के पाने को आनन्द उठाते है। उसी प्रकार सहृदयगण पदों मे रहने वाली अलौकिक वकता की शोभा को देखकर अभिनव उत्कण्ठा से व्याप्त मन वाक्याश्रित अलौकिक अपूर्व वक्तारूप प्राणधन का विचार करते हैं, यह तात्पर्य हुआ।

यहॉ इस श्लोक मे एकत्र ( लतापक्ष मे ) सरसत्व का अर्थ है अपने समय पर होने वाली रस की अधिकता। अन्यत्र वाक्‌ ( काव्यपक्ष ) मे सरसत्व का अर्थ है शृङ्गार आदि की व्यञ्जकता। वकता से तात्पर्य प्रथम पक्ष मे द्वितीय के चन्द्रमां के समान सुन्दर अवयवो से युक्त होना है, अपरत्र काव्यपक्ष मे कथन आदि की विचित्रता है। विच्छित्ति एकत्र तो पत्तो का अच्छी तरह से अलग-अलग होना है, दूसरी ओर कवि के कौशल की मनोहरता है। उज्ज्वलता से तात्पर्य एकत्र पत्तो को शोभा से युक्त होना है, अपरत्र पदावदि के सौन्दर्य का समुल्लास है। आमोद का अर्थ फूलो मे सौरभ और वाक्यो मे है तद्विद्‌ की आह्लादकारिता। मधु का अर्थ फूलो मे मकरन्द से है तथा वाक्यो ( काव्य ) मे समस्त काव्य के कारण-सम्पत्ति का विधिवत् आविर्भाव है।

श्रीमान् कुन्तकविरचित वक्रोक्तिजीवित मे ( हिन्दी अनुवाद का ) द्वितीय उन्मेष समाप्त हुआ।