1. Vakrokti Jivita Kuntuka Hindi Commentary Radheshyam Misra Chowkambha
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Barcode : 99999990303673 Title - Vakroktijivita Series-180 Author - Kuntaka, Rajanaka Language - sanskrit Pages - 531 Publication Year - 1998 Barcode EAN.UCC-13
9 999999 030367
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।। श्रीः ।। काशी संस्कृत ग्रन्थमाला १८०
श्री मद्राजानककुन्तकविरचितं वक्रोक्तिजीवितम् सटिप्पण 'प्रकाश' हिन्दीव्याख्योपेतम् LIBRARY
Acoouon I .H5 Numte्ख्ाकार LOY श्री गधेश्योमेे G( Vi CC
चौखवम्भा संस्कृत संस्थान भारतीय सास्कृतिक साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक पो. वा०नं. ११३९ के ३७'११६, गोपाल मन्दिर लेन (गांनघर समीप मैदागिर) वाराणसी - २२१ ००१ ( भारत)
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प्रकाशक • चौखम्भा सस्कृत सस्थान, वाराणसी मुद्रक : चारू प्रिंटर्स, वाराणसी संस्करण : चतुर्भ, वि० सं० २०५५ मूल्य : प्रथम उन्मेष रु० ४००० द्वितीय उन्मेष रु० २५०० १-२ उन्मेष ह० ५००० रु० २०००० सम्पूर्ण
Cचौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणसी इस ग्रन्थ का परिष्कृत तथा परिवर्धित मूल पाठ एव टोका, परिशिष्ट आदि के सर्वाधिकार प्रकाशक के अधोन है। फोन ३३३४४५, ३३५९३०
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THE KASHI SANSKRIT SERIES 180
VAKROKTIJĪVITA
ÒF RAVANAKA KUNTAKA
GOVT Edited with The 'Prakasa' Hindt Commentary
By ŚRĪ RĀDHEŚYĀMA MIŚRA, M A,
CHAUKHAMBHA SANSKRIT SANSTHAN Publishers ghd Distrtbutors of Oriental Cultural Literature Post Box No. 1139 K 37/116, Gopal Mandir Lane (Golghar Neat Maidarin) VARANASI - 221001
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जिनके
श्री चरणों में वेठकर
साहित्य शाख्त का अ्ययन किया
उन्हीं परम थ्रव्ेय गुरुवर, साहित्यापार्य, साहित्यरस
डॉ० लालरमायदुपाल सिंद्द जी,
एम० ए०, डी० फिल०,
क
कर कमलों
में
सादर सविनय
समपित
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भूमिका कुन्तक का काल
आावार्य कुन्तक का एकमात्र प्रन्य 'बबोकिजविन' उपलब्ध होता है जो कि भपूर्ण एवं सण्डित है। अतः प्रन्यकार ने म्रन्य को समाप्ति पर रचनाकाल इम्यादि का निर्देश किया था या नहीं, यह पता नही चल पाता। प्रम्य के भारंभ में सन्यकार का अपने विषय में कोई निर्देश नहीं है। अन कुन्तक के बात- निर्धारण में बनकी पूर्व सोमा का निधय उनके प्रन्थ में उद्त कवियों अथवा आाचायों के नामों एवं बनके ध्रन्थो से उदृत वदाहूरणों के आधार पर तथा उत्तर सोमा का निर्धारण उनके परवर्ती भ्न्थों में उनके विशय में किए गए तब्लेखों मे करना होगा। कुन्तक के काल की पूर्वसीमा (1) आावार्य वृ तक ने अपने अन्य में 'खन्यालोक" की अपोलिखित बारिय तदृत की है- 'ननु रंधितन् प्रतीयमान वहु ललनालवग्यसाम्याच्चावण्यमिम्युपपादित्- मिनि- प्रतोयमानं पुनरम्यदेव वह्वरित वाणोपु महाकवीनाम्। पक अ्मिशवयवातिरिकं विभाति लाबभ्यमिवाहनायु।।" साप ही रमवरलद्वार के सम्हन के प्रसन में उन्होंने एक मन्य कारिका- प्रधानेद्दत् वाक्यारये समापन्त रमाद्य'। रामं तरिममलद्कारी रवादिरिति में मतिः ।* उस्स कर उसकी पमि में उदत 'सिसी दस्तावन्न" एयदि तपा "िदवास्येन न ने प्रपास्यति" आदि वदादरणों को उदशत कर इनका शज्डन हिदा है। इसके भतितिन उन्होंने अन्य बई म्यमों पर व्वन्यातोक के पतिभाग मे उदाहरजादि पस्तुत किए है। उदाहरणार्य 'करियावैचिकदवडता' के एक
४ उर्युन बह, दृ० १११०ज १० र० १० १२०।
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( =)
उदाहरण रूप में उन्होंने ध्वन्यालोक पृत्षि के महलद्लोक-'स्वेच्छाकेसरिण"" इत्यादि को उद्धृत किया है। इससे स्पष है कि कुन्तरु धवन्यालेक के बारिकाश एवं पुत्यंश दोनों से पूर्णत परिचित थे। अत' इममें संशय नही रह जाता कि वे आान-दषर्दन के परवर्ती थे। (२) वंसे तो उद्धरण उनहोंने राजशेखर विरचित 'विद्शालमज्ञिका' आदि से भी दिए हैं किन्तु नामोल्लेखपूर्वक 'प्रवरणातर्गतस्मृतप्रकरणरूप' प्रकरणवकता का उदाहरण देते हुए 'बालरामायण' से उद्धरण प्रस्तुत किया है- यथा मालरामायणे चतुर्षेड्डे लह्केस्वरानुकारी नट" महस्तानुकारिया नदे नानुथ्र्यमान :- कर्पूर इव दग्घोडपि शततिमान यो जने जने। सम: भारवीनाय तरमे घुसुमपनवने॥' इतना ही नहीं, राजशेखर का एक विनिन्नमार्गानुयायी कवि के रूप में नाम्ना निर्देश भो किया है- 'तयेद च विचित्नवकत्वविजम्भितं हर्पचरिते प्रानुर्येक महषाणत्य विभाग्यते। भवभूतिरा जशेखरविर वितेषु वनधसौन्दर्यसुभगेघु मुक्तवेयु परिदश्यते।२ इस विषय में कोई संशय नहीं किया जा सकता कि दोनों आचार्यों में राजशेखर हो परवर्ती थे। वे रपष्ट रूप से आनद का नागना निर्देश करते हैं- प्रतिभाव्युत्परयो प्रतीभा श्रेयसीत्यानदः। सा हि कवेरव्युत्मतिकृतं दोषमशेषमाच्छाद्यति। तदाह- अध्युत्पततिकृती दोप शषत्या समियते वविः। - यहत्वश किकृतह्तस्य सगित्येवावभासते ।।* अत' निश्चित रुप से कुन्तक के काल की पूर्वसीमा राजशेवर के काल के बाद निर्धारित होती है। राजसेखर का काल राजशेखर अपने तीन रुपो-'विद्शालभजिवा', 'कर्पूरमधरी' तथा 'बालभारत' में थपने को महेन्द्रपाल का गुरु बताया है- -(क) 'रघुकुलतिलको महेन्द्रपाल" सकलकलानिलय: स यश्य शिष्यः। (ख) 'रहुउलचूडामणियो महिन्दवाल्स्स को अ गुरु।"1 १ ध्वन्या० पृ० ४, सद्वृत व० जौ० पृ० ७८। २. व० जी० पृ० ११५" ३. फा० मी० पृ० ५५७६। ४. विदशालमज्िका श६। ८ कर्पुरमेजरी १५।
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(a )
(ग) 'देवो यक्ष्य मदेन्द्रपालनृपति" शिष्यो रघुमामणोः ।" इगके फतिरिक राजशेसर ने अपने को बालरामायप में 'निर्भयगुर, तथा क्ुरमक्तरी में 'दालफई वृइरार्ओो गिन्मरराभस्स तह उदज्याभो" कदकर नपने शे निर्मनराज' का गुरु बनाया है। पिशेल महोदय ने निर्भयराज और महेन्द्र- पाल को एक सिद्ध किया है। इम महेन्द्रपाळ का पुत्र या महोपाल जो आरया्वर्न का सफाट था। उसका उल्लेस राजरेसर ने मालभारत में इस प्रकार किया है- 'तेन (महोपालदेवेन .) च रपुवंशमुनामगिनाऽडयवर्नमहाराजपिराजेन श्रीनिरभयनरन्द्रनन्दनेवाराधिता सभामद:'इत्यादि।" फलंट महोदय ने एन महीवाळ को 'आलीशिलालेख' के राजा महीवाल से भभिस भिद्ध किया है। इग सिलालेस का काल विक्रम संवत् १७४ अर्पाद ९1७ रगयो है। माय ही पिशेन तथा फलोट मदोदय ने यह भी निर्देश किया है कि राजशंगर के एक रपक 'बारमारत' को रचना 'महोदय' नामक स्थान में हुई थी जिये हन्होने वान्चगन्ज सथवा कलोज से अभित्ष सिद्ध किया है। वही पर राजा मदेन्टरपाल एवं उनके पुत्र महोपाल ने राज्य किया या। 'सियाहोनो' शिवालेख के सनुमार महेन्द्रपाल का वाल १०३-९०७ ईसवो तथा महीपाल का फाल 1१३ रसवी है। भत राजशेसर का काल, यदि यह भी र्योकार कर लिया आाय कि र• ई मे अब कि महेन्द्रपाल इभोज के सम्ताट् वे तम समय उनकी वरणा * वर्ष भी रही होगी, तो सरलता मे ८६• ई० के बाद स्थीकार कर सुहते हैं। मनः राजशेसर का समय निश्चित रप मे ८६• तवा १३०ई• के मध्य निर्यारित किया जा सकता है। और इम प्रकार कुन्तक के काल की पूर्व- सोमा ११ या र ई० के बाद दो निश्चित होती है। चुन्तक के काल की उत्तरसीमा उन्तक का नाम्मा निर्देश महिममह के 'यसिविनेक', विद्याघर की 'एहापनो', नरेन्द्रयमसूरि के 'इलरारमहोदभि' तथा सोमेश्वर की 'काम्य प्रहारादापर में किया गया है।
- बारुमारठ १११। 1. यू एर्मशी ११९1 ४. पासमारम. ६०२। 4 तेमा हि डॉ. को ने सने प्रन्य H S P. में दः २२६ दद उसो पह हर पाहरिण्यणी सं. t मे निदेश किदा है कि-"सोमेश्टर (folio 7 a) tgररोt शाF :- एतन तब बपो मर्सा: कनि भर्णान हश।
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( ko )
(क) 'रम्यवाञ्यमकपाइममानिना दुन्तकेन निजशादलमनि। वत्प सघनिरकय्यसोदिता स्लोक एव स निर्दिशतो मया।" ( ) 'एतेन यप कुन्तकेन भ कावन्स्मा वितो व्निस्तदि प्रत्याख्यातम्'। (ग)'माधुयें सुक्ुमारामिधमोजो विचिनाभियं तदुमयमिश्रन्वसम्भव मध्यम नाम मार्ग केडपि दुधा पृस्ु (न्त) कादयोवदसुत्तापन्त। मदाहु :- सन्ति तत कयो मार्गा: कविप्रस्यानहे-वः। सुकुमारो विचिन्नरच मध्यमर्तोमयात्मकः।य निश्चय हो इन अरंधकारों में प्राचोनतम महिममह है जिसकी स्वोकार करने में विद्वानों को कोई आपति नहीं है। और इसे मा स्वीनार करने में विट्वानों में दो मत नहीं हैं कि कुन्तक महिममट्ट के पूर्ववर्ती थे। कृन्तक तथा अभिनवगुप दुन्तक और अभिनवगुन में फौन पूर्ववतों या भोर कौन परवर्नी, इप विषय में विद्वानों में बडा मतभेद है जब कि वुन्तक के कालनिर्धारज का इसमे पनिष्ट सम्बन्ध है। अत' इम समस्या को सुलताना परमावश्यक है। ॉ सुकर्जी तथा डॉ लाहिरो ने कुन्तक को अभिनव का पूर्ववर्ती स्वोकार किया है और यह माना है कि अभिता कुन्तरु के 'पकोकिजिवित' मे भलोभाँति परिचित थे और अच्छी तरह जानते हुए उन्होंने भरत के लक्षण की कुन्तक की बकोकि के साप समानता सिद्ध था।ै
१. म्यकतिविवेक २२९। २. एकावड़ो पृ० ५१। ३ मल० महो०, पृ० २०१-१०३। . ४. टॉ सादिरो का कमन ह- The terms expressions used by Abhinava are nadou- bledly those of Kuntaka and this makes it highly probable that the Vakroktyivita appeared earher than the Abhinava- bharati and Abhinava quite consciously identified ( Bharata's ) Laksana with Kuotaka's Vakrokti 'Concept of Riti and Guns'-P. 19. डॉ. मुबजों का निमन्न हमें प्राप्त नहों हो सका। यठ उनके तरहों के विषय में कुछ निक्षित नहीं कहा जा सकता। डॉ. काणे का कपन- ,'Dr. Mooker in B C. Law Vol, I at p. 183 says the same thing what Dr. Lahttt said." H. S. P .- 235. [ Contd.]
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रॉ. लाइरी और क० सुम्बर्जी का यह अभिमत पूर्णत सस्य है। वस्तुत: 5न्तक के पहोकि मिदान्त का सरलता से प्रत्यास्यान करना मसम्भव या भतः भभिनय ने उगध अन्तर्भाष मरत के लक्षणों में कर देने का प्रयाम किया। समिनय के रकयविवेचन के मतिरिय जन्य मी कुछध ऐगो बातें दें को अर्भिनव को युन्त का परिवर्ती सिद्ध करती है, यदाँ उन्हीं पर विचार किया ज रदा हे- (1) आचार्य आनन्दवर्दन ने म्वन्यालोकपृति में प्रतीयमान र्पक के उदादरण रूप में 'प्रासतथोरेव बस्मान्" आादि क्नोक उद्भृत किया है। 1सुन्तक ने उमे ही 'रसोष्मानस्यतिरेक' के टदाहरण रूप में प्रस्तुत किया ह किन्तु वन्होंने भानन्द के मन को भी कडी शद्ञा क साथ इने शब्दों में व्यक् किया है- 'मह्वाध्यारोपणात् प्रतीयमानतया स्पकमेव पर्कसूरिभिराम्मातम्।2 रखे श्लोक कों ध्यार्या करते हुए अभिनन ने कहा है- समव नाय व्यतिरेको मानि सथापपि स पूर्ववामुदेवस्वसूपाद नायतनाद्। वमा कभिन्य का मह वृधन युन्तक वे अमिमत की औोर इद्वित, नहीं करता ? (२) ममान पापहो में मे हिसी एक कदी बास्तावंशिषय का प्रति- पादन करते हुए भमिनय ने करा ने - तदो सारं साम्बति। इत्यन तटरावाम्य पुम्स्वनपुंमकररे सनाहन्य स्रीन्वमेवा- धिर्तं महदम-'सीति नामापि मपुरम्' इति हत्वा। ममिनव का यह वयन निशि्षित रूप मे पुन्करु ने 'नामव कौति पेशलम" कारिर्याश औौरें तगको रति रा मटवादमान है। वुन्तक के निममेमिभ्दवकता का निरपण करते हए पछा रे- मति सिशन्तरे मत सनितउब पपुग्पने। शोमानिष्पनपे यर्माभ्वमेव सीति पेशनमु।। इसके उदहरण रूप में उन्होंने 'तरी तानं नाम्मति' ादि श्लोक टद्पृत कर
सम्मषनः शो० मुख्जों ने बर बनाया का कि भ्ोषन में युछ समी पर इन्क "को गन का निर्रेत किया गया है, जैमा कि डॉ० बाने के इम कबम से हभ है- 'Dr. Mookerji is not at all right lo thinking that the Locana alludes to Kuntaks ( D C. Law Vol I P 183 ) This is no evidence worth the name to prove thw or events make the inference very probable" -H. S P. (P. 188-189 )
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'अन्न प्रिलित्वतवे सन्यदि, तट' शन्दस्य, मौकुमार्यात स्रीलितमेव प्रयुक्त।"9 (३) इतना ही नहीं, चुन्तव की वकताओं को ओर अभिनवभारती में उन्होंने स्पष्ट निर्देश भी किया है। अमिनवमारती में नाम, आस्यात, उपसर्ग आदि की विचिन्नता का प्रतिपादन करते हुए विभकिषेिग्य को व्याख्या चरते हुए उन्होंने वहू। हे- "विभदाय: सुप्तिष्वचनानि ते वारकशकयो लिडायुपप्हार चोपलदयन्ते। यथा 'पाण्डिम्नि मग्न वपुः इति वपुष्येद मजनकर्सुबर्व तदायना पाण्टिम्नर्चा धारता गदस्यानीयर्ता दयोतयलतीव रजयर्ति न तु पाण्ुस्वभाव वपुरिति। एवं वारकान्तरेयु वाच्यम्। मचनंयथा 'पाण्डवा यस्य दासा" सर्वेच पृथकु नेत्मर्भ तथा मैचित्रयेण लवं हि रामस्य दारा ।' एत देवोपजीव्यानन्दवर्दनाचार्येणोक 'सुप्तिद्वचनेत्यादि "' अन्येरपि सुवादिबकता। यहाँ 'अन्ये' के द्वारा रपट्ट ही कुन्तक को और निर्देश किया गया है। 'मैथिलो तस्य-दारा' और 'पाण्डिम्नि मग्नें यपु' आदि उदाहरणो को पुन्तक ने भी सख्या तथा वृतिवकता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है। ऐमा न स्वोकार करने या कोई समुचित कारण भी नहीं है। क्योंकि परवर्ती प्रन्थों एवं अन्यकारों के उल्लेख से सुवादि वबताओं का विवेचन करने वाला चुन्तक के अलावा कोई दूसरा आचार्य उल्लिखित नहीं है। वळोकिवादी के रूप में भाचार्य कुन्तक हो प्रसिद्ध है। महिमभट्ट ने इन्हों की वकताओं और आनन्द को ध्वनियों को एररूप कहा है। साहित्य भोमासाकार ने- ध्वनिवर्णपदार्थेपु वाक्ये प्रकरणे तथा। प्रबन्धेड्याहुराचार्या: वेचिद् वक्र वमाहिमतम्॥2 वहकर चड्विध बकताओं का प्रतिपादन करने वाली वुन्तक की हो कारिवायं को उद्धृत किया है, किसी अन्य आचार्य को नहीं, जब कि 'ध्वनिवक्रता' शा विवेचन वुन्तक ने नहीं किया। यदि ध्वनिवकता की उद्भावना स्वयं साहित्य- मीमासाकार को न होती तो कंम से कम उसके समर्थन में तो विसी अन्य आषार्ये वा वद्ाहरण देते। अतः निश्चित ही यहाँ सन्देह के लिये कोई स्यान नहों है. विन्तु जिसे सन्देह करने की आदत ही पड़ आय उमरा कया उपाय! क्योति मन्दंह तो किसी भी विशय में आसानी से रिया आ सक्ता है। सुन्तक को अभिनव का पूर्ववर्तो न स्वोकार करनेवाले विद्वान हैं-डॉ. शंवरन"
र. व नो. स१र तथा वृद्धि। १ै. सा-मौ०, पृ० १५५। २. अमि० मा०, पृ० ०२७-२२९। ४. द्रहन्य Some Aspects-pp. ?
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डॉ. ढे' डॉ राघवन तथा भारतरत्न म. म. डॉ० कागे महोदय'। ३+ शंकशन का तर्क है कि 'अ्रभिनवगुप्त ने ो 'अ्न्येशवि सुवादिवकता' में 'मन्ये?' रहा है, वह वुन्तक के सिए दी कहा गया है ऐमा हम इम लिए नहीं स्वोकार बर महने क्योंकि वकोनिजीवित मे हमें 'मुवादिवकता' शब्दों मे रोई कारिका नहीं प्राप्त होतो।"
निश्चिन हो डॉ. सादब का यह कयन बहुत विचार के अनन्तर कहा गया प्रतोन नहीं होना कयोकि जैमा थगले विवेचन मे स्रष होगा अभिनव ने 'मुवादि- वकता' के द्वारा किमी कारिका के वारम्म को ओर निर्देश नहीं किया बल्कि विवय ही चोर किया है। अमिनय उस सयन पर नाटयशाछ्र की-'नामारयातनियर- तोपमर्ग-'(ना. शा० १४।४) आदि भारिका में आये हुए विभकि पद को म्याख्या कर रहे हैं। स्पटट रूप में तनका विवेचन यहाँ सानन्द मे प्रभावित है। हमोलिए उन्होंने-'विमनय' गुप्तिरष बनानि' इम प्रकार व्याम्या प्रस्तुन को है। कदः इनके ददाहरणों को प्रम्मुन करने के सनन्तर उन्होंने वहा-
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चकता कहा है। अत श. साहब की यह धारणा कि 'बकोकिजोषित' को सुबादिवकना मे आरम्भ होने वालो कोर्ड कारिका होनी चाहिये पूर्णतया भ्रान्ति- मूलक है। अत इस आधार पर यह स्वीकार कर लेना कि अभिनव ने पन्तक को घात का उल्लेख न कर किमो अन्य के अभिमत को प्रस्तुत किया है- ममोचीन नही है।
(x) इनके अतिरित्त राव्यक ने 'अलद्कारसवस्व' में ध्वनि के विषय में विभिन्न आचार्यों के अभिमतों का टल्लेख करते हुए पहले चकोकिनीवितकार और भट्टनायक के मतो का उत्लेखरुर वनिकार का मत बताया है और उसके वाद व्यक्तिविवेककार का मत प्रतिपादित किया है।' इम विषय में कालानुकरम का निर्देश करते हुए जयरय ने वहा है-द्दनिवारान्तरभावो व्यत्तिविवेककर इति तन्मतमिह पश्चान्निर्दिष्म। यद्यपि वषोकिजीवितहृदय दर्पणवारावपि ध्नि- वारान्तरभाविनावेव, त्याि तो चिरन्तनमतानुयायिनावेवेति तन्मन पूर्वमेवो- हिषम्।'२ सुय्यक और जयरय द्वारा यहाँ वक्रोकिजीवितकार का हृदयदपणकार के पूर्व उल्लेख भी इस मात का समर्थक है कि या तो कुन्तर भट्टनायक के भी पूर्ववर्ती े अथवा ठनके समसामयिवं थे। और इससे भी कुन्तक क अररभिनव मे पूर्ववर्तिता ही सिद्ध होती है।
आचार्य अभिनव तथा कुन्तक का कालनिर्धारण
जैसा कि अभिनव के अपने तीन भ्रन्थों में दिए गए काल के आधार पर डॉ. वान्तिचन्द्र पाण्डेय ने अपने शोधप्रबन्ध 'अरभिनगुप्त' में उनका नाहित यिक कृतित्वकाल ११०-९१ ईसबी से १०१४-१४ ईसवी तक निधारित पर बनका जन्मकाल १४० और १६० ई० के बीच निर्धारित किया है, स्ष्ट रूप में रसके २५ या ३० वर्ष पूर्व भी कुन्तक का जन्मकाल मान लिया जाय तो उनक जन्म समय लगभग ९२४ ईसवी के आासपास स्वोकार किया जा सकता है। साथ ही इस काल का पौर्वापर्य राजशेखर के काल से भी पूर्ण सामतस्य रसता है। जैसा कि रचनाकम महामहोपाध्याय स. मिराशी ने निर्धारित हिया है उसके अनुसार 'बालरामायण' का रचनाकाल ११० ई. के श्राम-पाम हो पडेगा। क्योंकि सबसे पहली रचना मिराशीजी ने 'बालरामायण' मे ही स्योकर किया है। तदनन्तर बालमारत, कर्पूरमञ्जरो, विद्शालमक्जिक पौर वाव्यमीमागा १. दरष्व्य अ:० स० पृ० ९-१६। २. विमर्शिनी नृ० २१५।
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का रचनानाल स्वीकार किया है। जैसा कि पीछे उल्लेकष किया जा चुकर है सियाडोनी शिलालय ने अनुसार निश्चिन रूप से 'महीपाल' गद्दी पर बैठ गया होगा और इस त.हबालभारत' का रचनाकाल ११५ ई० के आसपास मान लेने में कोई आपत्ति नही होनी चाहिए। इसके बाद यदि दो-दो वर्ष के व्यवधान से भी एक-एक ्रन्थ का रचनाफाल निर्धारित किया जाय तो काव्यमीमासा का रचनाकाल १२० ई० के आस-पास होगा। और इस टग से यदि कुन्तक का तित्वकाल उनकी २५ वर्ष की अवस्था के बाद ९५० के बाद से भी माना जाय तो ४०-५० वर्षो में नालरामायणदि का अत्यधिक प्रसिद्ध हो जाना अमम्मव नहीं। अत कुन्तक का कतित्व काल दशम शताब्दी के उतरार्द का प्रारम्भ मानना ही उचित है। जो कि अभिनव कृतित्वफाल से भी सामञ्जस्य रसता है। २ या ३0 वर्षो में 'बकोफिनीचिन' का सहृदय-समाज में प्रसिद्ध हो जाना अ्सम्भव नहीं। ग्रन्थ का प्रतिपाध वर्तेमान समय में जो वकोपिजीवित तपलब्ध है उनमें चार उन्मेष हैं। इन चार उन्मेपों में भी चतुर्थ उन्मेष असमाप्त है जैसा कि भाण्डलिपि के विषय में डो० डे ने निर्देश किया है- "There is no Colophon to this chapter but the senbe marks-असमाप्तोऽय ग्रन्य:"- v J p 246 परन्तु अ्रन्थ के निवेच्य विषय पर ध्यान देने से यह अ्नुमान सहज दो लगाया जा सकता है कि अन्थ या तो समाप ही है अथवा दो तीन कारिकायें और भी अवशिष्ट हैं, इससे अधिक नहीं। डॉ० डे ने जो प० रामकृष्ण कवि द्वारा संकेतित अध्यापक जी के पास पाँच उन्मेषों के वकोकितजीवित की चर्चा (व• जी० भूमिका पृ० ६) की है वह सत्य से कोसों दूर जान पड़ती है। अत प्राप्त प्रन्थ के आधार पर जो क्रम से विवेचन प्रस्तुन किया जा सकता है उसे हम प्रस्तुत करेंगे। वर्तमान वकोकिजीवित के तीन भाग मिलते हैं -- १ कारिकाभाग, २. वृत्ति- भाग, रे उदाहरणभाग। सम्भवतः कुन्तक ने पहले कारिकाए लिख कर उनकी व्याख्या, उन पर वृत्ति और उदाहरण प्रश्तुंत किए हैं।
t. I would place the works of Rajasekhara chronologically as follows-1. The Balaramayana, 2. The Balabharata, 3 The Kāvyamatjari, 4. The viddhasalabhannka and 5 The Kāvyamimamgā. -Studies in Indology, vol I p
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कुन्तक प्रत्यभिज्ञा-दर्शन के अनुयायी थे प्रन्थ के आरम्भ में पृत्तिभाग का प्रारम्भ कुन्तक शिव की बंदना करते हुए करते हैं -- उनके शिष, शत्ति परित्पन्दमात्रोपकरण वाले हैं -- जगत्व्रितयवेचिभ्यवित्य कर्मविधायिनम्। शिव शत्तपरिस्पन्दमात्रोपकरय नम. । प्रत्यमिश्ञादर्शन में शिव को दी एकमात्र परम तत्व स्वीकार किया गया है। इस सम्पूर्ण जगतप्रबच की रचना करने के लिए केवल उनकी शक्ति का परस्पन्द ही पर्यात्त है। उन्हें किसी अन्य उपकरण की आवश्यकता नहीं पडती। शक्ति और शकििमान शिव में पूर्ण अभेद है। इसी बात को कुन्तक मार्गो का विवेचन करते समय स्ययं कहते हैं -- 'शक्तिशक्तिमतोरमेदाद' (पृ० ११)। साप ही उनके अन्य में माये हुए अनेक प्रयोगों से यह बात स्पष्ट होती है कि वे प्रत्यमिश्ञादर्शन के अनुगायी थे। इसका और विवेचन हम आगे करेंगे। इसके अनन्तर कुन्तक प्रथम कारिक में बापूपा सरस्वती की वन्दना प्रस्तुत करते हैं। ग्रन्थ का अभिधान, अभिघेय और प्रयोजन अभिधान -- सरस्वतो का वन्दना के अनन्तर पन्यकार द्वितीय कारिका -- लोकोसरचमरकार कारिवैनििभ्यसिद्धये। काम्यस्यायमलक्वार: कोऽप्यपूर्वी विधीयते।। के द्वारा अभिधानादि का प्रतिपादन करते हैं। इस कारिका एव इसके नतिभाम ने महामहोपाप्याय डा कारो आादि को इस निष्कर्ष पर पहुँचाया है कि कुन्तक ने भारिकाभाग का नाम वाग्या लक्वार और वृक्षिमाग का नाम वकोकिनोवित रखा या। "It appears that aas meant tho Karikas alone to be called काभ्यालदार as the Karika of the first न्मेव states 'लोकोतर' (इत्यादि) The वुत्ि on this says ननु च सन्ति विरन्तनास्तदलट्टा- रास्तत्किमयेमित्याह-शरपूर्व. सद्ष्यतिरिकार्याभिधायी। ... . कोषपि अलौविक:
यद्यपि सन्ति शतशाः काम्यालव्वारास्तयापि न कतरिचद्म्येवंदियववित्यसिद्धि। It my be noticed that the works of भामह, उद्ट and ससट wer called enaragns Though the aiftwrs thus appear to havo been meant to be calted astrent, the whole work has been referred to by later writers as afalfta The yfa is
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quite clear on thrs pount-तदयमर्थः। अ्रन्यस्यास्य अलद्वार इत्यभि- धानम, उपमावि प्रनेयजातमभिधेयम्, उत्तरुपरवेचित्यमिद्धि प्रयोजनमिति।" H. S P. ( p. 225-26 ) वस्तुन डा० माहव का यह मत समीचीन नहीं प्रतीत होता । क्योंकि- १ यदि कुन्तक ने अपने कारिकाम्न्य का नाम 'काव्यालङ्कार' रखा होता तो सम्भवत' कारिका इस प्रकार लिखते-'काव्यालद्कार इत्येष होऽप्यपूर्वो विधोपने' जैसे कि अपने यरो का 'काव्यालशर' नाम रखनेवाले आचार्यो ने लिखा है-भामह लिखते हैं- का व्यालद्वार इ्व्ेष यथाबुद्धि विवारयते (११), तथा रदट लिस्र ते हैं- 'कावयालद्वारोऽय प्रन्थ' कियते यथायुक्ति' (१२)। रहौ बात उद्भट की तो उन्होंने कहीं अपने ग्रथ के नाम का निर्देश ही नहीं किया, और फिर उनके प्रन्थ का नाम 'बाव्यालंकार' नहीं बलकि 'काव्यालड्वारसंपर' या। जैमा कि प्रतोहारेन्दुराज कहते हैं-
विद्द प्रयान्मुकुल कादधिगम्य विविच्यते। प्रतिहारेन्दुराजेन काव्यालङ्कारसप्र:्न: ॥
अन्यथा डा० माहज को अपने उक्त कथन में वामन का भी नामभ्रहण करना चाहिए या क्योंकि उनके भी प्रन्य का नाम तो 'काव्यालक्वारसूअवृति' है। २ यदि कुन्तक को प्रन्थ का नाम 'काव्यालद्वार' ही अभिप्रेत होना तो वे वृति में-अलद्गारो विधोयते अलद्दरपां कियते। कम्य-काव्यस्य, के कर्म काव्य मश्य' न कहते। बह्कि यह कदते कि 'काव्यालद्वार' इति प्रन्थ: कियते।' ३ साथ ही जिस कथन के आधार पर डा माहव उम प्रन्थ का नाम काव्यालद्वार कहते हैं वह हवयम्-मरन्यश्यास्य अलक्वार इत्यभिधानम्" ने दोकर ग्रन्थस्यास्य काव्यालद्वार इत्यनिधानम्' होता।
४ फिर वुन्नक के इम कयन -- 'मनु च सन्ति चिरन्तनासदलेद्वारा"' की सप्नति भोनहो बेडेगी। क्यैोकि इसका मतलब यह होगा कि कुन्तक ने केवल भामह तथा स्द्ट के प्रन्य के अतिरिक किसी अन्य ग्रं (जैसे दण्डी का काव्या- दर्श, आानन्द का ध्वन्यालोक आदि) के विवेच्य को ओर ध्यान ही नहीं दिया। उन्होंने अपने को केवल 'काव्यालद्वारा तक ही सीमित रखा। और ऐमा अर्य करना. सर्वपा अनुरयुर्क्त होगा क्योंकि कुन्तक ने स्थल स्थल पर दण्डी तथा मानन्द दोनों की आशोचना की है।
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x. यदि 'वाव्यालद्वार' और 'वकोकिजीवित' अग-भलग सङ्त्रामें कमराः कारिका और वृति भाग को होती तो निश्वम हो प्रत्येक उन्मेप की कारिकायों की समाप्ति पर भी-"इति श्रीराजानककुन्तनविरचिते 'कान्यालगगारे' प्रथम उन्नेप, द्वितीय उन्मेष", आादि उपलब्ध होता। परन्तु ऐमा कही भी उपलन्ध नहीं होता। यदि डा. साहष यहाँ यह सन्देह प्रकट फरना चाटे कि प्रथम उन्मेष को समाप्ति पर- 'इति धीराजानकनुन्तकविरचिते वरोकिजीविने कान्यालद्वारे प्रथम उन्मेष प्ाम होता है। यहाँ 'नबोकितजीवित' से तात्पर्य पर्तिभाग से है और 'काव्या- लहार' से आशय कारिका अ्रन्य से है तो यह ठीक नहीं। वर्यें कि-दितीय उन्मेष को समाप्ति पर वेवल- 'इति थीमत्कुन्नकविरचिते वकोफिजीचिते द्वितीय उन्मेक' तथा वृतीय इन्मेष की समाप्ि पर- 'इति कुन्तकविरचिने चकोकिजीविने तृतोयोन्मेष समाप्र' हो उपलब्ध होता है वताँ 'काव्यालद्वार' की को चर्चा ही नहीं है। ६ साथ हुो यदि वुन्नक के कारिका प्रन्थ का नाम 'काब्शलद्वार' होता तो तन्हें बाद के सभी आचार्य केवन 'वकोफिजोविनिकार' के रूप में ही षयों याद करते, कम से कम इनको कारिकाओं को उद्धृत करते समय 'काव्यालक्टार' के नाम से अथवा 'कुन्त रविरचिते काव्यालंकरे' इत्यादि के द्वारा स्नरग करते। अत यह मन्तव्य कि इनके पारिका मन्थ का नाम 'काम्पालद्वार' और पृतिम्रन्थ का नाम 'दकोतिजोवित' या सर्वथा अममीचीन है। घब रही बात यह कि वुन्नक की इस कारिका और उसके पृतिभाग का फिर अर्थ कया है यह अत्यन्त सुस्पष्ट है। अलद्वार से तात्पर्य है मलद्वारों का प्रतिपादन करने वाला अन्य या अलद्वार भन्थ । इस प्रकार कारिका का अर्य हो जायगा कि चुन्तक बाग्य के अलद्वारप्रन्य वा निर्माण कर रहे है। क्योंकि कुन्तर स्वयं मडे सपष्ट दद्व से इम बात को उसी वृत्िभाग में कहते हैं- 'अलद्वार ·शब्दः शर्गीरस्य शोभातिशयकारित्वान्मुख्यतया कटकादिषु धर्तले, तहमारित्वसामान्यादुयच रारटुपमादिपु, तद्रदेव च तत्सदशेपु गुणादिपु तथैव च तदभिधायिनि मन्धे।' यहाँ यदि पुन्तक को 'अलद्वार' का अर्थ-'मलद्वार- प्रतिपादक अन्य' न अभिप्रेत होता तो इतनी लम्बी चोड़ी अनद्वार शब्द की व्यार्या की बोई आवश्यकता नहीं थो। बर्योकि गुण इस्यादि को सो दण्डी, वामन आदि सभो पूर्वाचार्य अतद्वार शब्द द्वारा व्यवद्त कर हो चुके थे समे
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दुहराने की को आ्वश्यकता ही नहीं थो, यदि इन्हे अलद्वार शब्द का 'अलङ्का- राभिधायक प्रंथ' अर्य श्रभीष्ट न होता। साथ ही यदि हम अलद्वार का अय 'अलद्वारप्रन्थ' मान लेते हैं तो कुन्तक का यह कथन 'ननु च सन्ति चिरन्तनास्तदलद्वारा' पूर्णतया सव्नत हो जाता है, इसमे इनके विवेचन की अनभिप्ेत सीमितता समाम हो जाती है। क्योंकि इमका अर्थ हो जायगा कवि 'यदि प्राचीन बहुत से अलक्कारमन्य हैं तो आपके इम नवन अलद्दारत्रन्य की क्या आवश्यकता?' और फिर यह भी कथन कि यद्यपि सन्ति शनश काव्यालद्वार,स्तथापि न कुतश्चिप्येवविधवचित्र्यसिद्धिः' ा र्य भी मङ्गत हो जायगा। साथ ही 'राव्यस्यायमलद्वार' कोऽप्यपुर्वो विधीयते' से हमें अभिधान और अभिषेय दोनों का बोव हो जायगा 'अर्थात इस प्रकार अलद्वारों का प्रतिपादन करने वाले ग्रन्यों का नाम उपचार से 'अनंकार' होता है और उनके अभिधेय उपमादि अररद्वार रूप प्रमेय होते हैं। अन्यथा प्रयोजन और अभिधान के अतिरिक्त अमिषेय को बोई चर्चा ही इस कारिका से सामने नहीं आ पायेगी। औरर सैब 'ग्रन्यस्यास्याउद्वार इत्यभिधानन्' का अर् होगा कि इम (प्रकार के) अलद्वार के प्रतिपादक ग्रन्थ को उपचार में अनद्धार सज्ज्ञा दी जायगो। न कि यह अर्थ 'कि हमारे इस अ्रन्थविरोष का नाम 'अलङ्कार' है'। क्योंकि ऐसा अर्थ कर लेने पर तो फिर 'काव्यालद्कार' नाम मानना भी अनुचित हो होगा। और कार कही गई 'अलद्वार' शब्द की व्याख्या निश्यक सिद्ध होगी। अ्रत. धुन्तरु के अन्य का नाम 'वकोकजीविन' है (कारिका तथा वृत्ति दोनों भागों का) यही स्वोकात करना समीचोन है। अभिघेय-इमका अभिधेय तो उपनादि प्रमय समूह हे हो जैमा कि वे स्वयं बहते हैं-'उपमादिप्रमे परजातमभिधेयम्'। कुन्तक का 'उपमादिप्मेयजातमभिधेयम्' यह कदन भी इसी बात का समर्थन करता है कि कुन्तक यहाँ सामान्य रूप से अमद्वारप्रन्यों के प्रयोजन को बता रहे हैं, केवल अपने 'वकरोकिजीवितमात्र' के नहीं अन्यथा अपने अन्य का प्रतिपाद्य चक्रोि आदि कुछ कहते। क्योंकि उपमा आदि तो मबके सब अलद्कार उनको एक्मात्र 'वाक्यवकना' में ही अन्तर्भूत हैं- 'वाक्यश्य वक्रमावोऽन्यो भिगते य" सहसधा। यत्रालद्कार वर्गोडती सर्वोऽप्यन्तर्भविष्यति ॥' (१।२० ) साथ हो जब वे वेवल वकोकि को ही अलद्वार मानते हैं- तयो पुनरलष्ूकृति वक्रोकिरेव। ( 1१०) प्रयोजन -- प्रन्थ का प्रयोजन बताते समय भी कुन्तरने एक नवीनता प्रदर्शित को है। इनके पूर्व के सभी आचायों ने तथा बाद के समी आचार्यों ने केवल
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कक्य के हो प्रयोजन बनाये हैं और, उन्हीं को उसका अम् होने के कारण इमका भो प्रयोजन मान लिया है-जैसा कि साहित्यदर्पणकार स्पष्ट शन्दों में कहते हैं- 'म्य अन्यश्य काव्याहतया काव्यफलैरेव फल्वश्वमिति काव्यरुलान्याह- इल्यादि। परन्तु कुन्तक ने अलद्वारपन्य का अलग प्रयोजन और अलहार्य काव्य का प्रयोजन अलग मे बनाया है- अलद्वार प्रन्य का प्रयोगन है-'असामान्य शहाद को वत्पन्न करने वाले वैचित्य की सिद्धि'। अर्थात कुन्तक ने अपने अन्य का निर्माण उत्तरप वेचित्र्य को सिद्धि कराने के लिए किया है। अन्य ग्राचोन आचार्यों के मन्थों में कहीं भी ऐसे वैचित्र्य की मिद्धि नहीं हुई।- 'यदपि सन्ति शतशः काव्यालद्वारा
व्र्यसिद्धि द्रयोजनम्। (पृ० ७-८) इस प्रकार अलद्वार प्रन्य का प्रयोजन बताने के बाद वे उमके अलद्वार्यभूत काव्य का प्रयोतन बताते हैं क्योंकि बिना अलद्कार्य के प्रयोजन के अलद्वार सप्नयोजन होते हुए भी धेकार होता है। काव्य के प्रयोजन को उन्होंने कमशः प्रथम उन्मेष की तीमरी, चौपी और पाँचवों कारिका में प्रतिपादित किया है- १. काव्य का पहला प्रयोजन तो यह होता है कि वह धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष रुप पुरुवार्थचतुश्य की मिद्धि का उपाय होता है। शास्तादिक से इसका वैशिश्टय यह होता है कि शासतादि कठोर क्रम से अ्रमिहित होने के कारण मुकुमारमनि, एवं क्लेशमोहू राजक्मारादिकों के लिए शह्यादकारक नही होते जब कि काव्य सुकुमार कम से अभिहित होने के कारण हृदयाहादकारक होता हुआ पुरुपायचतुष्ट्य की सिद्धि का उपाय होत है। जैसा कि कुन्तक अन्तरश्लोक द्वारा प्रमागे कहते हैं :-
श्राहाद्यामृतवत्का व्यमविर्वेवगटापट्म्।। २. काव्य का दूसरा प्रयोजन है उमका ममुचित व्यवहार का बोध कराने में सहायक होना। प्रम्येकु मनुष्य को सतकाष्यों में वर्णित गजा. अमात्य, मृत्यादि के ग्यवहारों से उनके लिए अनुवरणोय उचित म्यनहार का ज्ञान होता है। ३. काव्य का सर्वातिशायी, यहाँ तक कि पृर्पार्थ्चतुध्य के प्यास्वाद का भी अतिवमण कर जाने वाला, तोसरा प्रयोजन है उसके आस्वाद से (जो अमृत- रसास्वाद के समान होता है) सहृदयों को सतकाल आानन्द की अनुभूति कराना। चुन्तक का कहना है-'गोडमौ चतुर्वर्गफलारवाद: प्रहृष्टपुरुपार्थतया मर्वशास्र
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प्रयोजनत्वेन अमिद्ध मोड्यस्य साव्यामृत वर्वेणवम का रकनामनस्य न काममपे साम्यकलना कर्नुमहतीति।" [पृ० १५)
कान्यलक्षण इम प्रकार काव्य का प्रयोजन बताने के बाद कुन्तक काव्यलक्षण प्रस्तुन करते हैं। उनका कथन है कि अलंकृत शब्द और अ्य ही क्ाव्य होते है। यदि हम काव्य में अलद्कार्य और अनद्वार का विवेचन अलग अलग करते हैं तो यह केवल अरीव्ार बुद्धि के द्वारा। वस्तुत अउद्वार और अनदार्य की अलग-अलग सत्ता ही चाव्य में नहीं है- 'तश्व मालह्वारसय काव्यता तेनालंकृतस्य काष्यत्वमिति स्यिति। न पुन काव्यरयालद्वार योग इहि।' इसके अतिरिक काव्यलक्षण वे प्रथम उन्मेप की सानवी कारिका में इम प्रकार प्रस्तुत करते है- शबदारयों सहितो वम कविव्यापारशालिनि। बन्धे व्यवश्यितौ कार्व्यं नदिदाह्वादकारिणि॥ अर्थात महदयों को आहादित करने वाले, एव चकतविव्यापार से सुशोमित होने ा ने वकयविन्यास में साहित्ययुक्त शब्द और अर्थ कान्य होते है। वाुन कन्तक का सम्पूर्ण अन्य इसी वौव्यकक्षण को व्याख्या को प्रस्तुत करता है। इम काव्यवक्षण में आपाने वाले तत्व जिनका उन्होंने व्याख्यान किया है-वे हैं- १ शन्द और अर्थ २ सातिस्य ३ वकरविव्यापार * बन्ध और तद्विदाहादकारिव १ (क)वुन्तक के अनुसार शब्द और अर्थ दोनों मिल कर काव्य होते रे, केवल रमणीयताविशिष्ट शब्द अ्रथवा केवल चाहनावि राष्ट अर्थे कराव्य नहीं होता। उनका कहना है- 'तस्माद स्यितमेतत-न शब्दस्येव रमणायताविशिष्टम्त केवलस्य कान्य- त्वम् नाप्यर्थस्येति'। तथा कुन्तक अपने इस मत को सनर्थन टेने हैं-भामह की प्रथम परिच्छेद की 'रूपकादिरलट्टारस्तस्यान्यैर्बहुधोदिन।शन्दाभि- पैयालक्वारमेदादिष्टं द्वयन्तु न ॥'इन्यादि १३ वी, १४ वी और १५ वी कारिका को उद्भृत करके। {व० जी. पृ० २३-२४)
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(स) माय ही काव्य में शब्द और अर्थ का स्वरूप लोक में प्रसिद्ध वाच्य- षाचक रूप मे विशमान शब्द और अर्थ में स्वरप से सर्वया भिन्न होता है- शन्द-वाव्य में वही शब्द होता है जो कि विवक्षित अर्थ के बहुत से वाचकों के विदमान रहने पर भी उस अर्थ का एक्मात्र वाबक होता है। तात्पर्य यह है कि निवक्षित अर्थ को ममपेत करने में जिस प्रकार वह समर्थ हो वैसा समर्य अन्य कोई दूसरा वाचक न हो। शन्दो विवक्षिताथैकवाचकोऽन्येपु सत्वदि। अर्थ-तथा काध्य में वही धर्थथ अपर्यथ होता है जो कि अपने ग्वभाव की रमणोयता से सदृदयों को आहादित करने में समर्थ होता है :- 'सर्थ सहदयाहादवारिस्व स्पन्दरन्दर' (१९) साहित्य शब्द और अर्थ के साहित्य को जैसी व्याख्या आचार्य सुन्तक ने प्रस्तुत की दे. बेमस सादिट्र का स्वरूप न तो किमी भी पूर्वाचार्य ने ही बताया या और न ही बाद में होने वाले अन्य आचार्यों ने, जिन्होंने साहित्य वा विवेचन किया। वे सुनतक ने इम माहित्यस्वरूप को उपेक्षित कर सकने में ही समर्य हुए। कुन्तक शब्द और सर्य के चाव्यवाचक सम्बन्ध रूप साहित्य को साहित्य नहीं मानते क्योंकि ऐमा साहित्य काव्य के अतिरिक भी सर्वत्र विदमान रहता ही है। इसीलिए वे बहते हैं :- विशिष्टमेवेह साहित्यमभिप्रेदम्।(पृ० १५) और वद साहित्य है कैसा ? "जहों पर चमता से विचिन्न गुणों एवं अलंकारी की सम्पत्ति मे परस्पर स्पर्श (होड) एगो रहती है।' और यह परमुपर स्पर्धा शब्द की दूमरे शन्द के साय तथा अर्थ पी दूसरे अर्थ के साथ ही अनिव्रेत है क्योंकि काव्यलक्षण की समाप्ति वाक्य में होता है, मेवल एक ही शब्द और अर्थ में नहीं। इसोलिए कुन्तक ने कह़ा है- *हिववनेनाघ् वाच्यवाचकजातिद्वित्वमभिघीयते 1 व्यतति दवित्वा भिधाने पुनरोकपद- म्यषस्पितयोरपि काव्यश्व स्यात'-(पृ० २७) साहित्य या लक्षण कुन्तक के अनुसार इस प्रकार है- साहित्यमन यो: शोभाशालितां प्रति काप्यसौ ।
अर्थात् शब्द और अर्य की उस स्पिति को दम साहित्य कहेंगे जो सौन्दर्य- शालिता के प्रति अर्थात् सहदयों को आक्वादित करने के विषय में दोनों को
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( २ ) अपने मजानोयों के साथ परस्पर हवर्गा के कारण रमणीय होती है। मौन्दर्य- श्लाघिदा के प्रति होड़ वाक्य में प्रयुर शब्द की शव्दान्तर के साथ और अरये की अर्यान्तर के साय होतो है। स्पष है कि जब सौन्दर्यरलाधिता के प्रति शब्द अपने भजातीयों मे और अर्य अपने सजानियों से होड़ करेगा तो निश्वय हो दोनॉ मम्मिलिन होकर रनगोय काव्य को सूष्टि करेंग। शब्द का अर्थान्तर के साय माहिन्य अथवा श्रय का शब्दान्तर के साय साहित्य मानना उचित नहीं क्योंकि ऐस मानने पर कोई नमन्वय हो सकना कठिन हो जायगा। हपर्षा का निर्य मजातीयो में ही किया जा सकता है भिन जातोयों में नहीं। इसी लिए कुन्तक कहने हैं-'ननु वाचकत्य वाच्यान्तरेण वाच्यक्ष वाचकान्तरेण कर्यं न साहिन्यमिति चेत्. तस, कमव्युरकमे प्ररोजनाभावादएमन्वयाच्य।
केवल वक्रोक्ति ही अलङ्कार कुं्तक का कहना है कि यदयपि अलंकृत शब्द औौर अर्य मिल कर काथ्य होते है किन्तु जब हम अपोद्वार बुद्धि से अलद्ार्य औौर अलद्वार का विभाग कर लेते हैं नो उम दशा में-शब्द और अरय अलद्कार्य होते हैं तथा उनका (उन दोनों का) अलद्वार केवल एक बकोकि ही होती है। 'तयो द्वित्वसक्- स्याविशिष्टयोर्यलंकृति- पुनरैकैत्र, यमा द्वावप्यदडकियेते' (पृ० ४८)।
वक्रोकि का 'स्वरूप वक्रोकि कहते किमे है? 'शाज अथवा लोकप्रमिद्ध उत्तिति से अतिशायिनी विचित्र ही उत्ति को बकोकि कहते है-वकोकिः प्रसिद्धाभिधानव्यतिरेकिणी विचिन्नैवाभिधा।' यह वकोक्ति वसी होती है ?- वैदरभ्यभग्गीभणितिस्वरूप होनी है अर्यात् काव्यकुशलता की विच्छित्ति द्वारा किए गये कथन को बकोकि कहने हैं। और यह कयन शौभातिशयकारी होने के कारण एकमात्र अलक्वार है-"शब्दायों प्ृथगवस्धितौ कैनापि व्यततिरिकेनालक्वुरणेन योज्येते किन्तु वकतावे चित्र्य योगितयाभिवानमेनानयोरलद्वार तस्येव शोभातिशयकारित्वाद।'
स्वभारोक्ति की अलङ्धारता का प्रत्याख्यान (१११-१५) इस प्रकार दुन्तक इम सिद्धान्त की स्थापेत करके कि 'वकोकि हो एक मात्र अलद्वार है' वे स्वभावौक्ि की अलद्गारता का प्रत्यात्यान करते हैं। उनके तर्क उम प्रवार है-
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१ स्वमायोकि का अरपं हुआ पहा जाने वाला समाव सर्याद पदार्थ पा धर्म औौर यदी पाउ्यशरीर होता है अत काम्यशरीर रोने के कारण यद अलकार्य होगा, अलद्वार केमे हो सकता है। यदि फोई यह वहे कि नहीं काव्य- शरीर स्वभाष से भिन्न होता है, तो वह सम्भव नहीं वषैकि स्वनान शब्द की व्युन्पत्ति है-'भवतोऽस्माद् 'अनिधानप्रत्ययौ इति मावः स्तय झातमनो भाव' सभाव ।' अर्थाव जिम के द्वारा (हिसी का) कथन और ज्ञान हो उमे भाव पहुते हैं, अपने भाव को स्वभाव बहते हैं। निस्वनाव वक्तु शब्द का विषय बन हो नहीं सकती। अर्पत् किमी भो पदार्य का सवभाव हो उसे शब्द का विषय बनाता है। इसलिए सभो वाकय जो मार्पक होगे निशित ही स्वभाव- युकत होंगे। अतः सर्वन्र सवभावोकि हो रहती है और मददि इमी शरीरभूता स्वमावोकि को सलद्गार मान लिया जाय तो एक गाडीवान की कही गई बात भी अलद्वार युकत होने लेगी जो किसी भो आलद्वारिक को पमीष नहीं। २. यदि शरीरभूत स्वभावोक्ति वो हो अनद्गार मान लिया जाय तो फिर अलद्वार्य पया होगा। अगर यह कहे कि बइ अपने को हो अलरकरत करती है तो यह एक मेरमुमकिन बात है क्योंकि शरीर ही अपने बन्धे पर स्वयं नहीं चद पाता, अपने में ही करियाविरोध होने के कारण। ३. कुन्तक या तीमरा तर्क है कि यदि आप स्वमावोकि को अलद्दार मान लेते हैं तो वह सर्मन्न हो वियमान रहेगा। ऐमी अवस्या में यदि वहाँ कोई अन्य अलद्ार हपट रप से आाता है तो वहाँ संसृष्टि होगी और यदि अशरष्ट रूप से आता है तो मंकर होगा। इस प्रकार नर्वत् संसृष्टि और संकर के अलावा अन्य अलद्ार नहीं हो पायेंगे। और इस प्रवार अन्य अलद्वारों का *
चेत हो समाप्त हो जायगा। अन सनानोकि को अलद्वार मानना उचित नहीं, यह अलक्वार्य ही है,। ४ इस प्रकार काव्य लक्षण के, शब्द अरप और उनके साहित्य का व्याख्यान करने के अनन्तर कुन्तक वक्रकावव्यापार को प्रस्ुत करने है। छविष्यापार की वकता के उन्होंने सुग्य रूप से छः भेद प्रस्तुत किए हैं और बताया है कि इन छ भेदों के बहुत से अवान्तर भेद है। वे छ प्रहार है- १. वर्गनिन्यासवकता ८. वाश्ययकता २ पद रवर्द्धिवकता ५. प्रवरणवक्ता र. प्रत्ययाधययकता ह. प्रबन्धवकना माचार्य पुन्तक ने इन छहो प्रकार की वकताओं का सामान्य ढम् से विश्लेपण प्रथम उन्मेष में किया है। तदनन्तर उनका विशेष विश्लेषण द्वितीय,
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( २५ ) तृतीय और चनुर्थ उन्मेषों में किया है। द्वितीय उन्मेप में उन्होंने वर्णवविन्यास- वकता, पददूर्वादवेवकता तथा प्रत्ययाश्रयवकता का, तृतीय उन्मेष में वसतुमकता और वाक्यवकता का तथा अन्तिम चतुर्थ उन्मेष में प्रकरणवक्रता और प्रबन्ध- बकता का विशेष विश्लेषण प्रसतुत किया है। प्रबन्धषकना का विवेचन पूर्ण नहीं हो पाता है कि प्रन्थ परिसमाप्त हो जाता है। इसीलिए यह अनुमान है कि प्रन्व लगभग परिपूर्ण ही है क्योंकि प्रबन्धवकना का ही विश्लेषण आखिरी है। लगभग उसके ६ प्रमेदों की व्याख्या कुन्तक प्रस्तुन करते हैं। पाण्डुलिपि में प्राप्त होनेवाली पन्तिम कारिक-
नूतनोपाय निष्पघन यवन्मोपदेशिनाम्। महा कावेप्रदन्धाना सर्वेघामस्ति वकता ॥।
से यह आराय स्पष प्रतीत होता है कि प्रबन्धकता के सभी प्रकारों का विवेचन वे समाप्त कर चुके हैं। अस्त. हम सत्तेप से इन वकता के छहो प्रकार का सम्पूर्ण अन्य के भाधार पर विचेचन प्रस्नुत करते हैं। १. व्णेविन्यासवकता जहों पर वर्णों अर्यात् अक्षरों को उनके सामान्य प्रयोग करने के दज् से भिन्न गमरगीय टत् द्वारा विन्यस्न किया जाता है जिसके कारण उनका वह विन्यास सहदयों को आह्कादित करने में समर्थ हो जाता है, वहाँ वर्णविभ्यास चकता होती है। इस वर्णविन्यासवकता के कारण शब्द का सौन्दर्य उत्कर्षयुक हो जाता है। यह एक, दो अथना बहुत से ग्यंजनों की बार-बार आृत्ति से आनीहै। यह आयृनि कभी व्यवधान से कभी श्रव्यवधान से होती है। कभी अनियन स्यान वाली होकर तथा कभी नियन स्यान वाली होफर (यमक रप में) सौन्दर्य प्रदान करता है। कुन्तक ने इस वकता को इस ढम से प्रस्तुन किया है कि इसमें अन्य आचार्यों के सभी अनुप्रासप्रकार और अमकपकार अन्तर्भृन हो जाते हैं। इस चकता का प्राण औचित्य है। वर्ण्यमान के औचित्य से च्युन होने पर यह वकता नहीं मानी जायगी। इसीलिए उन्होंने व्यमनिता पूर्दक निबद् किए जाने वाले ववन्याम का निषेध किया है- 'नातिनिबन्ध विदिता नाप्यपेशलभूषिता।
यही यमक वर्गविन्यामवकता को प्रस्तुत कर सकेगा जो प्रपादगुण सम्पन्न हो, धुतिपेशल हो और शोवित्ययुक्त हो। ३ वं० भु०
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इसी वर्णविन्यासवकता के अन्तर्गत कुन्तक ने प्राचोन भाच या द्वारा स्वीहृत अनुगस तथा यमक अलंवर का एवं भहोदूट द्वारा स्वोकृत पदपा, उपनागरिका और भाम्या पृतियों का प्रहण पेर लिया है। उन्हीं के कयन हैं -- (क) 'एतदेव वर्णविन्यासवक्वं चिरन्तनेवनुप्रास इति प्रसिद्धम्। पृ० ६३ (ख) 'वर्णच्छायानुसारेण गुणमागासुवर्तिनी। पृचिवेचित्रययुक्तति सैव प्रोका चिरन्तनः ।' (२x) (ग) 'यमक नाम कोडप्यस्या' प्रकार परिदृश्यते ।(२६) २. पदपूर्वाद्धवक्रता कुन्तक का पर से अभिप्राय है सुबन्त एवं तिउन्त पदों से, जैसा कि पाणनि ने कहा है-'सुप्तिडर्न्त पदम् " इमप्रक्ार स्पष्ट है कि पद में दो भाग होते है-एक भाग तो सुप और तिब् रूप परार्द है और दूमरा प्रकृति रूप पर्वांर्द्ध। उसी प्रकृति को कम में प्रातिपदिक और धातु रुहते हैं। प्रात्पिदिक स्बम्त होने पर पद बनत दै और धातु तिइन्त होने पर। अन जो प्रातिपदिक प्यवा धातु के वैचित्य के चारग आने वाली रमणीयता है उसे हम पद पूर्वादवकता के नाम मे अभिहित करेंन। कुन्तक ने इसके प्नेक प्रभेद प्स्तुत किए हैं। वे इस प्रकार हैं- (फ) रुटिचित्यवक्रता-जह़ों पर हुठि शब्द के द्वारा असम्भाव्य धर्म को प्रस्तुत करने के अभिप्राय का भाव प्रतीत होता है वहाँ, अथवा नहाँ पदार्थ में रहने वाले हो किसी धर्म की अद्भत महिमा को प्रस्तुत करने का भाव प्रतोन होता ह वहाँ रठिवेचित्रयवकता होती है। इस प्रकार के भाव की प्रतीति कवि वर्ण्यमान पदार्थ के या तो लोशेत्तर तिरसार का प्रदिपादन करने की इच्छा से या उसके स्तृहणीय जत्कर्ष को प्रस्तुन करने वो इच्छा से कराता है। इसके उदाहरण रूप में कुन्तर्क ने आनन्दवर्धन द्वारा 'अर्दान्तरसद्कमितणच्यध्वनि' के उदाहरण रूप में ध्वन्यालोक पृ० १७० पर उद्धृत - ताला जाअन्ति गुणा जाला दे सहिश्रएदि घेप्पनत। रइकिरणाणुग्गहिआाइ शोन्ति कमलाइ बमलाइ।। को उद्भृत किया है। इसके उन्होंने वचा की ष्टि से मुख्य रूप से दो भेद किए हैं। पहला भेंद वहाँ होता है जहोँ कि स्वयं वत्ता हो अपने उत्कर्ष अथवा तिरहकार को प्रति- यादित करते हुए कवि द्वारा उपनिबद्ध किया जाता है। तथा दूसरा भेद वहाँ होता है उहाँ किसी दूमरे का को कदि किसों के उत्कर्ष भपमा तिरहहार का
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प्रतिपादन करने के लिए उपनिबद्ध करता है। उदाहरग मूल प्रन्थ में देखें। इस वकता के विषय में कुन्तक का कहना है कि- 'एग च रूदिवेचत्र्यवकता पतोयमानधर्मबाहुल्याद् बहुप्रवारा मिझ़े।
(स्व) पर्योयवक्रश-जहों पर कवि अ्रनेक शब्दों द्वारा पदार्थ के प्रति- पादिन किये जा सकने योग्य होने पर भी वर्ण्यमाव पदार्थ के अन्यधिक सौन्दर्य को प्रस्तुत करने के लिए किसी विशोष ही पर्याय का प्रथोग करता है-वहाँ पर्यायवकता होमी है। पर्यायवक्रता को अघोलिसित पर्याय प्रम्तुत करने में समर्थ होते हैं- (१) वहू पर्याय जो वाच्य पुदार्थ का बहुत ही अन्तरत हो अर्थात् जिम प्रकार से विवक्षित वस्तु को प्रश्तुत करने में वह पर्याय समर्य हो बैसा कोई अन्ध पर्याय न हो। तभी वह वकता को प्रस्तुत करेगा। (र) वह पर्याद जो वण्यमान पदार्य के अतिशय को भलीमाति लोकोतर टङ् से पुट्ट कर महदयों को आहदिन करने में ममर्थ हो। वह पर्यायवकना को समर्पित करेगा। (३) व: पर्याय जो या तो स्वमं दी अयवा अपने विशेषणभूत दूमरे पद के द्वारा श्लिट्टना आादि की मनोदर छाना से वर्ण्यमान वस्तु के सन्दर्य को परिपुष्ट करने में समर्ष हो वह पर्यायवकता को प्रस्तुत करेगा। इम तोमरे प्रकार को पर्यामचकता को चुन्तक ने 'शब्दशक्तिम्लानुरणनरूपव्यडूग्यपदभ्वनि' अथवा वाक्यष्चनि' वा विषय स्वोकार किया दे- 'एष एव च शब्दरनिमूलानुरगनरपव्यळग्यस्य पदध्वनेवैजय। बहुपु चैविधेषु सत्तु वाक्यष्वनेर्वा ।' (पृ० २०९) (४) चह पर्याय जो कि वण्यमान पदार्थ के उत्कर्ष को प्रस्तुत तो करे साथ ही अपनी निजो मुकुमारता से सहृदर्यों को आनन्दित करने में समर्थ हो, वह् चीये प्रकार को पर्यायवकना की प्रस्तुत करेगा। (x) पाँचनें प्रकार की पर्यायवक्रता को वह पर्याय प्रस्तुत करता है जिसमें वभ्यमान पदार्थ के किसी असम्भाव्य अभिप्राय की पात्रता निहित होतो है। (६) छठे प्रकार की पर्यायवकता को प्रस्तुत करने में वह पर्याय समर्य होता दे जो कि रूपकादि के द्वारा दूसरे सौन्दर्य को धारण करके सहृदयों को आनन्दित करता है अयवा जो उत्येक्षा आदि के दूमरे सौन्दर्य को प्रस्तुन करता हुआ सहद याहादकारी होता है।
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(ग) उपचारवकता-जहों पर कवियों द्वारा अदन्त भिस्ष सवनाव वाले पदार्थों के धर्म का एक दूसरे पर अन्यन्त अल्प साम्य के आाधार पर उसके कोकोत्तर सौन्दर्य को प्रतुत करने के लिये आरोप किया जाता है यहाँ उपपारवकता होती है। जैसे भमूर्त पदार्य को मूर्त पदार्थ के वाचट शब्द द्वारा कथन, टोस पदार्थ का द्रव पदार्थ के पाचक शब्द द्वारा कथन, ध्चेतन पदार्थ का चेतन पदार्थ के प्रतिपादक शब्द द्वारा कथन उपवारवकना के प्रयम प्रकार को प्रस्तुत करता है। इस वकता प्रकार के अनन्त प्रकार सम्भन होते हैं- 'सोडयमुपचारवकताप्रकार' सतकविप्रवाहे सहसशः सम्भवतीति नहदर्य ह्वय- मेवो:प्रेक्षणीय '-(पृ २२)। स्वनावविप्रकर्ष के प्रत्यासन होने पर ववता नहीं होगो-'अत एव च प्रत्यासधान्तरेस्मिन्नुपचारे न पकताव्यवहार यथा गोर्वाह्ीक इनि (पृ. १२१ ) • दूसरे प्रकार को उपचारकता वह होती है जिसके मूल में विश्मान रहने पर रपकादि मलद्वार सरस उस्लेख वाले हो बडते हैं। कहने का आराय यह कि यह दूरे प्रकार की उपचारबता रुपकादि अलदारों शी प्राणभूता
पृ० २११1 तथा 'आदि-'महगाद प्रस्तुत प्रशंसाप्रकारम्य कहपचिदन्याप रेशलक्षणस्यो- पचा सवकनैव जोवितत्वेन लक्ष्पते (प· २२३) इन दोनों प्रकार की वक्ताओं का भेद फुन्तक ने इम दज् में प्रस्तुत किया है- 'पूर्वस्मित् स्वमावविप्रकर्पाव सामान्येन मनाइ्मात्रमेव स.म्यं समाधित्य सातिशयत्ष प्रतिपादयितुं तदर्ममात्राध्यारोपः प्रवर्तते, एतस्मिन वुवरदूर- विप्रकृष्टसा टृश्यसमुद्ध वप्रत्या मनिससुचितत्वादभेदोषच। रनिबन्धनं तश्वमेवाभ्या- रोध्यते ।' (पृ० २१२ ) (प) विशेषणयकवा -जहाँ पर करिया रूप अथवा कारक रव पदार्थ का सौन्दर्य उसके विशेषणों के माहारम्य से समुष्लस्षित होता है वहाँ विरोषण- वकना होतो है। किया अथवा कारक रूप पदार्थ के सौन्दर्य से अनिवाय पदार्थ रदभाव की सुकुमारता की प्रकाशकता एं अलद्वार के सौन्दर्यातिशय को परिपुष्टि से है। इस के विषय में कुन्तर का कइना है कि- 'एतदेव विशेष्णवळत्वं नाम प्रसुर्तावियातुमारि सकल-त्काम्यजीवित- •स्वेन लइपते, यह्मादनेनैद रस परा परिपोषपद्वीमवतार्यते-पृ० २२६
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इसी से विशेषण का स्वरूप निर्धारण करते हुए वे कहते हैं- स्वम हिम्ना विधीयन्ते देन लोकोत्तरशिय। रसस्वभावालद्वारास्तद विधेयं विशेषणम् ॥ (पृ० २२७) () संवृतिवकता-जहों पर पदार्थ का स्वरूप किमी वैचित्र्य का प्रतिपादन करने के लिए उसके अरपूर्व वाचकभूत सर्वनाम आादि के द्वारा छिपा दिया जाता है, वहाँ सततिवकता होती है। यह सवरग अधोलिखित अवस्याभों में प्रयुक दोकर संत्रतिवकता की सृष्टि करता है- (१) जहों पर साम्षात् शब्दों द्वारा कही जा सकने योग्य भी उत्कर्षयुक्त ससतु का मामान्यवाची सर्वनाम के द्वारा यह सोचकर मंवरण कर दिया जाता है कि कहों साक्ष द प्रतिपादन के कारण इस वस्तु का उत्कर्ष इमता से परिचिछन्न होकर परिमिनप्राय न हो जाय वहाँ संतृतिनकता होती है। (२) जहों पर अपने स्वभावोक्कर्य की चरम सीमा को पहुँची हुई वस्तु को वाणी का अविषम भिद्ध करने के लिए उमे सर्वनमादि के द्वारा आन्छादित कर के प्रस्तुत किया जाता है-चहा दूसरे प्रकार की संवतिवकता होती है। (३) जहाँ किमी अत्यन्त सुकुमार वस्तु को बिना उसके कार्यातिशय को कहे हो वेवल मंवरणमत्र से सौन्दर्य की पगकाष्ठा को पहुचा दिया जाता है वहाँ तोसरे प्रकार की संवृतिवकता होती है। (४) जहाँ किसी स्वानुभवमवेप वस्तु को वाणी का अविषय मिद्ध करने के लिय ही सर्वनामाद के द्वारा संवरण कर दिया जाना है, वहाँ चौथे प्रकार की मंतृतिवकता होती है। (५) पाँच्वें प्रकार की संतुतिवकता वहाँ होती है जहाँ परानुभवैसगम्य वसु को बचा को वाणो का अविषय सिद्ध करने के लिए ही मर्वनामादि द्वारा संवरण कर दिया जाता है। (६) छडी संचृतिवकता वहाँ होती है जहाँ पर स्वभावत अथवा कवि की विवक्षा मे किमी दोष से बुकत वस्तु का सर्वेन्ामादि के द्वारा संवरण उसकी महापातक के समान अभ्यनीयता का प्रतिपादित करने के लिए किया जाता है। (च) पदमध्यान्तर्भृत प्रत्ययबकना-जहाँ पर पद के मष्य में आने बाजे कृदादि प्रत्यय अपने उत्कर्र के द्वारा चर्भ्यमान पदार्थ के श्रचित्य की रमगोगता को अभिव्यक्त करते हैं वहाँ पदमध्यान्तर्भूत प्रत्यमवकता होती है। अथवा जहाँ पर मुमादि आगमों के विलास से रमणीय कोई प्रत्यय बन्घ- सौन्दर्य को परिपुष्ट करता है वहाँ दूसरी प्रत्ययबकता होती है। (छ) वृत्तिवेचित्र्य वक्रता-जहां पर पेगाकरणों के यहाँ प्रमिद्ध अण्यपी-
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भाव आदि समास, तद्धित, एवं सुन्यातु वृत्तियों की अपने सजातियों की अपेक्षा विशिष्ट रमशोगता समुल्ल सेत होती है, वहाँ वृत्तिवेचित्र्यवकता होनी है। (ज) भाववैचिष्यवक्रता-भाव की बकता से आशाय धावर्य अर्पात् किया की वक्रता से है जदाँ कविजन यह समझ कर कि यदि भाव को साध्यसप में कहा जायगा तो प्रस्तुत पदार्थ को भलीभाँति पुष्टि नहीं होगो उसको साता की पपज्ञा करके उसे सिद्ध रूप से प्रस्युत करते हैं वहाँ भाववेचित्यवक्रता होतो है। (म) लिङ्गचचित्रयवकता-जहाँ पर वुंलित सोलित और नपुंसक लिम्न के विशिष्ट प्रयोगों के कारण काव्य में रमणोयता भाती है वहाँ लिङ्ग वैचित्र्य वकरता होती है। (१) जहां पर कवि द्वारा विभिन्न स्वरूप वाले लिनॉं के सामानाधिकरण्य रूप में प्रस्तुत किए जाने पर किसी अवूर्ष सोन्दर्य की खृषि हो जाती है वहाँ प्रथम प्रकार की लिपवकता होती है। (२) जहों पर अन्य सिद्रों के सम्भव होने पर भी कवि लोग पान्यसन्दर्य को प्रस्तुत करने के लिए यह सोचकर कि 'सो, यह नाम हो मनोदर है' ेवल सीलित का हो प्रयोग करते हैं, यहाँ दूसरे प्रकार को लिद्ववकता होती है। ऐसा करने से उन्टें ऋमारादि रसों की परिषुष्टि कराना बहुत ही आनान हो जाता है क्योंकि स्रीलित के प्रयोग के कारण दूसरी विरििति से नानर- नायिका आदि के व्यवहार को प्रतीति होने से रसादिं को परिपुष्टि अधिक रमणीय दंग से हो जाती है। (३) तीसरे प्रकार को लिद्वेचित्रयवकता वहाँ होती है, तदा कविजन वर्ष्यमान पदार्थ के औचित्य के अनुरूप, तोनों तिनों के सम्भव होने पर भौ किसी दिशिष्ट लिक को उपनिबद्ध करके सौन्दर्यातिशय को प्रस्तुत करते हैं। ३. क्ियाव चिन्न्यवकता- अरभी सक कुन्तक द्वारा प्रतिपादित पदपूर्षार्द्गत प्रतिपादक की वकताभो का विवेचन प्रस्तुत किया गया। अब धातु को रकता का विवेचन करना है। चूंकि धातु की वकता का मुल किया को विचित्रता है अत- वुन्तक ने इसका नाम कियायेवित्रयधकता रखा और यदी प्रतिपादित किया कि कियाने वेत के कितने प्रकार हो सकते हैं- "तस्य न (अर्थाद् धातुल्पस्य पूर्वभागस्य न) वियावैिपनिबन्पनमेष मकथ विधते। तस्मात् कि यावेचिष्यस्येय फौटशा: कियन्तय प्रकार सम्भवनतीति तत्वरु वनिरूपणा पमाद्।" (पृ० २४४)
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कियावेचित्र्य के कुग्तरु ने पाँच प्रकार बताये हैं। वे पाँचो प्रकार वक्रता तभी प्रस्तुत करेंगे जब कि वे वर्ण्यमान पदार्थ के शचित्य से रमणीय होगे- प्रस्तुतोचित्य वारब :- २११1 (१) प्रिया का पहला वैबित्य है उसका 'कर्ता का अत्यधिक अन्तरभ होना'- कर्सुरत्यन्तरप्त्वम्-(२२४)। आशय यह कि कवि वाव्य में कर्ता के उम कियाविशेष को प्रस्तुत करके जिम सौन्दर्य की सृष्टि करता है ठसे कोई दूसरी किया नहीं कर सकती। इसीलि। वहाँ क्रियावचिव्यवकता होती है । जैमे- कोडारसेन रहसि स्मितपूर्वमिन्दो लेंखा विकृष्य विनियध्य च मूप्नि गोगा। कि शोमिताउ मनयेति गशादमोले पृष्टस्य पातु परिवुम्बनमुत्तरं व ।। में भृगवान शाह्र द्वारा उत्तर रूप में चुम्बन से भिन्न किसी अन्य किया द्वारा पार्वती के उस लोकोततर सौन्दर्य का प्रतिपादन नहीं किया जा सकता था। इसलिए युम्बनस्प करिया उत्तररुप कर्ता की अत्मधिक अन्तरतत है। मत यह किश्वेचित्यवकरता हुई। (र) क्रियाचैचित्य का दूसरा प्रकार है-कर्ता को अपने सजातीय दूमरे कर्ता की अपेक्षा विचित्रता। कर्ना की विचित्रता यही होती है कि वह अपने अन्य सजातीय कर्ताओं की अपेक्षा विचित्र स्वरूप वाली किया को ही सम्पादित करता है। जैमे-'त्रायन्ता वो मधुरिपो प्रपभातिच्छिदो नखा।' में जो कर्ताभूत नख़ के द्वारा अपने सजातीयों की अरेक्षा विचिन्न 'प्रपतातिच्छेदनरूप' किया प्रस्तुत की गई है, वह कर्ता की विचित्रता को प्रतिपादित करते हुए कियाघेचित्य वक्रता को प्रसतुत करता है। (३ ) क्रियावैचित्र्य का तीसरा मवार है-अपने विशेषण के द्वारा आने वाली विचित्रता। आशय यह है जहाँ क्रियाविशेषण के द्वारा ही क्रिया का सौन्दर्य सहदगहदयहारी हो जाता है वहाँ क्रियावेचित्यवकता होती है। (४) क्रियाचेचिभ्र्य का चतुर्थ प्रकार है-इसकी उपचार अर्यात् सादश्य आदि सम्बन्ध का आश्रय प्रहण कर किये गए दूसरे धर्म के आरोप के कारण आने वाली रमणोयता। जैसे-'तरन्तीवाजानि र्वलद्मललावण्यजलघौ' में भभों की लावण्यमागर में तैरने रुप किया को उत्प्रेक्षा को गई है, वह उपचार के कारण ही लोकोतर रमजीयता को प्राप्त कर गई है। (५) क्रियावचित्य का पाचवां परकार है-उसके द्वारा कर्म इत्यादि कारकों का संवरण। वहॉँ पर वर्म्येमान पदार्थ के भनित्य के अनुरुप उसके
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( * ) लोकोतर उत्कर्ष की प्रतोति कराने के लिये कर्म आदि को सर्वनामादि के द्वारा खिपा कर किया का प्रतिपादन किया जाता है, वह किया के वेचिध्यवकना को प्रस्तुत करने के कारण क्रियावेचिभ्यवकता को प्रसृत करता है। जैसे- 'नेश्रान्तरे मधुरमर्पयलीव किसित में किसी लोनेतर वर्म को सम्पादित करती हुई किया को, उपनिषद्ध किया गया है, कर्म का 'किगित्' द्वारा संवरण किया गया है। इम प्रकार द्वितीय उन्मेप की २x वी कारिका तक कुन्तक पदरावकना का विवेचन कर उसकी समाप्ति इन शब्दों में करते हैं :- इन्यथ पदपूर्वार्द्धवक्रभावो व्यवस्यित । दिष् मात्रमेवमेतस्य शिष लक्ष्ये निरूग्यते ।। पदपरार्ष अथवा प्रत्ययवकता (क) कालवैचित्र्यवक्रता-प्रत्यगवर्रता का विवेचन प्रारम्भ करते हुए कुन्तक सर्वश्रयम कालयेचित्यवकता को प्रस्नुत करते हैं। जहाँ पर व्ण्यमान पदार्थ के शचित्य का अत्यन्त अन्तरत् होने के कारण अर्थात् उसके उत्कर्ष को उत्पल्न बरने वाला वैयाकरणों में प्रसिद्ध लट् आदि प्त्ययों द्वारा वाच्य वर्तमान आदि काल रमणीयता को प्राप्त करता है, वहाँ कालवैचिष्यवक्रता होती है। (स्र) कारकवकता-जहों पर भद्ञीभणिति की किसी अूर्व रमणीयता को परिपुष्ट करने के लिए कवि कारकों के परिवर्तन को प्रस्तुत करते है, वहाँ कारकवकता होती है। कहने का आशय यह कि जहाँ कविजन प्रधान कारक को गेज बना कर और गोण कारक को उस पर प्रधानता का आरोप करके प्रधान रुप से उपनिबद्ध करते हैं वहाँ कारकवकता होती है। इम प्रकार से करणभूत गोण पर्प्चेतन आदि पदार्थ मुख्य चेतन में सम्भव होने वाली कर्नृता के आरोप से कर्तारूप में उपनिबद्ध छोकर चमतकार जनक हो जाते हैं। जैसे- 'स्तनदवन्द्वं मन्दं सनपयति बलाद् वाप्पनिवद्' में बाष्य निवह्' अ्रचेतन, गोग, एवं करणभूत है किन्तु कवि ने यहाँ उस पर चेतन में सम्भव होनेवालो कर्तृता का भारोप कर उसे कर्तार्स में उपनिषद्ध कर अपूर्ष कारकवेचित्य को प्रस्तुत किया है। (ग) सक्यावक्रता-जहाँ इविजन काव्यवेिभ्य का प्रतिपादन करने की इच्छा से वचन विपरिणाम को प्रस्तुत करते हैं यहाँ सदर यावकता होती है। माशम यह कि जहाँ एकवचन या द्विवचन का प्रयोग करने के बजाय बहुवचन का प्रयोग कर देते हैं अथपा दो भिथ् पमों का सामाना-
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धधिकरण्ण प्रस्तुत कर देते हैं वहाँ संख्यावक्रता होती है। जैसे-'प्रियो मन्युर्जात- स्तव निरनुरोधे न तु वयम्' में ताटस्थ्य का ग्रतिपादन करने के लिये एकवचन 'अहम्' का प्रयोग न करके बहुवचन 'वयम् का प्रयोग किया गया है। अथवा 'फुल्लेन्दीवरकाननानि नयने' में नयन मे पयुक्त द्विवचन का काननानि में प्रयुक्त बहुवचन के साथ सामानाधिकरण्य सहृदयहदयाहादकारी है। (घ) पुरुषवकता-जहों कविजन काव्यसीनदर्य को प्रहतुस करने की इच्छा से उत्तम अथवा मध्यमपुरुष के स्यान पर कभी प्रथमपुरुप का प्रयोग कर देते हैं, थथवा अस्मद् या युप्मद आदि का प्रयोग ने कर केवल प्रातिपदिकमात्र का प्रयोग करते हैं यहाँ पुरुषवकता होती है। जैसे 'जानातु देवी स्वयम्' में वक्ा ने अपनी उदासीनता का प्रतिपादन करने के लिए 'युम्मद' मध्यमपुरुष का प्रयोग न कर प्रादिपदिकमात्र का प्रयोग किया है जो सहदयावर्जंक होने के कारण पुरुषवकता को प्रस्तुत करता है। (ङ) उपप्रह्वक्रता-धातुओं के लक्षण के अनुसार निक्चितमद (आत्मने- पद अथवा परहमैपद) के आश्रय वाले प्रयोग की उपभह करते हैं- "धातना लक्षणानुसारेण नियतपदाशयः प्रयोग: पूर्वाचार्याणाम् 'उपप्रह'- शब्दामिधेयतया प्रसिद्धा ।"-(पृ २६३) अतः जहाँ कविजन व्ण्यमान पदार्य के औचित्य के अतुरूप सौन्दर्य का सूद्टि के लिये आत्मनेपद अ्रथदा परहमपद में से किसी एक पद का ही प्रयोग करते हैं वहाँ उपप्रहबकता होती है (छ) प्रत्ययविहित प्रत्ययवकता-जहाँ पर तिजादि प्रत्ययों से बनाया गया अन्य प्रत्यय किसी अपूर् रमणीयता को प्रस्तुत करता है यह अभी तक बतायो गयी चकताओं से भिन्न एक प्रत्यविहित प्रत्ययकता को प्रस्तुत करता है जसे- "मन्दे छाषपि तावहं कविवरी वन्देतरा तें पुत"" में 'ब्देतराम्' पद में तिड्प्रत्यय से विदित प्रत्ययवक्रता को प्रस्तुत करता है। उपसर्गनिपातजनित पदवक्रता भभी तक कुन्तक ने ययासम्भव नाम एवं आख्यात पदों में से प्रत्येक के प्रकृति एव प्रत्यम से सम्भव होने वाली चकताओं का विवेचन प्रस्तुत किया। किन्तु इनके अतिरिक्त उपसगों और निपातों के अ्व्युत्पन्न होने के कारण उनका अवयवों के अभाव में कोई विभाग सम्मव नहीं था। अत. उन्हें न वे पदपूर्वारस- वकता के अन्तर्गत ही विवेचित कर सकते ये और न पदपरा्धेवकता के अन्तर्गत
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(३४ ) ही। अतः इन दोनों का अल्-भलग विपेचन कर अब सम्पूर्ण पद की वक्रता के- रप में उपसरगों एवं निपातों की वकता को प्रस्तुत करते हैं। जहाँ उपसर्ग तथा निषात सम्पूर्ण वाक्य के एकमात्र भराण रूप में गार आदि रसों की प्रकाशित करते हैं, यहाँ उपसर्ग एवं निपातजनित पद्षकतायें हुआ करती है। वद्यपि इन उपसर्गादिक से लगे हुए अन्य प्रत्यय भो पदवक्रता को प्रस्तुत करते हैं-जैसे- "येन श्यामं वपुरतितरो वान्तिमापतस्यते ते" में अ्रप्ति के बाद भाया हुमा 'तराम्' प्रत्यय, किन्तु इसका पूर्वोक्त प्रत्ययवकता के अन्तर्गत ही अन्तर्भाव हो जाने से अलग विवेचन कुन्तक ने नहीं किया। इस तरह चार प्रकार के पदों की विषयभत वकताओं का उनके भैद-्प्रभेद सहित विवेचन करके भ्रन्त में उसके विषय में इस प्रकार कहते हैं :- 'तदेवमियमनेकाकारा वकत्वविच्छित्तियतुविधपद विपया वाकयकदेशजोवितत्वे- नापि परिस्फुरन्ती सकलयाक्यवैदिन्यनिबन्धनतसुपयाति। वकतायाः प्रकाराणामेकोऽपि कचिकमग: । तद्विदादवादकारित्वहेतुतां प्रतिपयवे ॥(पृ० १६९) जहाँ पर इन चकता प्रकारों में से कई एक वकताप्रकार एक स्थल पर ही परस्पन एक दूसरे के सौन्दर्य को प्रस्तुत करने के लिए कवियों द्वारा उपनिबद्ध किए जाते हैं यहाँ ये नानाबिध कान्ति से रमणीय वक्रता को प्रस्तुत करते हैं। वस्तुवक्रता अथवा पदार्थवक्रता द्वितीय उन्मेप में पद्वकता का भेद-प्रभेद सहित विवेचन कर चुकने के बाद कन्तक ने वत्तीय उन्मेष के प्रारम्भ में वस्तुवक्रता का विवेचन प्रस्तुत किया है। (१) जहां पर विवक्षित अर्थ को प्रतिपादन करने में पूर्णतया समर्थ, एवं अनेक प्रकार की वक्रताओं से विशिष्ट शब्द के द्वारा ही अत्यन्त रमणोय स्वा- भाविक धर्म से युक रूप में वस्तु का वर्णन किया जाता है, यहां वस्तुवकता होती है। ऐसी वस्तवकता को प्रस्तुत करते समय कविजन बहुत से उपमादि अलद्वारों का उपयोग नहीं करते क्योंकि मैसा करने सें वस्तु को सदज सुकुमारता के म्लान हो जाने का भय रहता है। जदा कवियों को विभाव आदि के औचित्य से ममारादि रकों की प्रतीति करानी होती है वह़ां वे इसी वस्तुवकता का सहाया लेते हैं। भलक्षारादि का उपयोग बहुत कम करते है। वहाँ कही भी अलहावारों का उपयोग करते हैं वह केवल उस वस्त की स्वामाविक सुकुमारता को ही मर भी अधिक समुन्मीनित करने के लिए ही न कि किसी भलदार मैनिम्य को प्रसुत करने के लिए।
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(२) कवि की शक्ति एवं व्युस्पत्ति के परिपाक से प्रौद्ध कुशलता से मुशोगित होने वाली वस्तु की सृष्टि दूसरो प्रकार की वसतुनकना को प्रस्तुत करती है जिसका विषय कोई अभूनपूर्व एव अलौकिरु वस्तु का उन्कर्ष होता है। प्राशय यह कि कविजन किसा सताहोन पदार्थ की सृष्ि तो करते नहीं, बल्कि अपनी सहज एवं आहार्य कुशलता मे केवल सत्तारूप से ही स्फुरित होने वाले पदार्थों के किसी ऐसे उत्कर्ष को प्रस्तुत कर देते हैं जिससे कि वह सहदयहृदयावर्जक हो उढता है। इस प्रकार सहज आहार्य भेद से वर्णनीय वस्तु की दो प्रकार को बकतामें होती हैं। वस्तु की सद्दज वकता उसके स्वाभाविक सौन्दग, एवं रणदि को परिपुष्ट करतो है जब कि आहार्यवस्तुवकता अद्कारचेचिय को प्रस्तुत करती है।
वर्णनीयवस्तु का विपयविभाग कुन्तक ने वस्तुबकता का विवेचन करने के बाद तृतीय उन्मेष को पाँचवी कारिका से दसवी कारिका तक, छ कारिकाओं में, वर्णनीय वस्तु के विषय- विभाग एवं उसके स्वरूप को प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार वर्गनोय पदार्थों का, अभिनवर्परिपोष के कारण रमगीय स्वभाव के अनुरुप होने के कारण मनोहारी स्वर्प दो प्रकार का होता है :- १ चेतनों अर्थात् ग्राणियों का स्वरूप और २ अचेतनों अर्ात जड़ों का स्वरूप। इनमें चेतन पदार्यों का स्वरूप प्रधा- •नता एवं गोणना के आधार पर फिर दो प्रकार का होजाता है .- १. सुर अ्रसुर, सिद्ध, विद्याघर आदि प्रधान चेतनों का स्वरूप तथा (२) सिंदादि अप्रधान चेतनों का स्वरूप। (१) इनमें से प्रधानभूत चेतनों अरर्थात् सुरादिकों का वह्ी स्वरूप कचियों के वर्णन का विषय बनता है जो कि रति आदि स्थायोभावों को मलीमाति परिपृष्ट करने के कारण रमणीय होता है। (२) तथा गोणभूत चेतनों अर्थात् पशु, पक्षि एवं मृगादिकों का वही स्वरूप कवियों का वर्णनीय होता है जो कि अपनी जाति के अनुरूप स्वाभावानुसार व्यापार से युक्त होने के कारण सहृदयहृदयाहादक होता है। (३) साथ दो गौणभूत चेतनों एवं अचेतनरूप वृक्षादिकों का शहारादि रसों को उदीप्त करने की सामर्थ्य द्वारा रमणोय स्वरूप सी ज्यादातर कवियों की वर्मना कर विषय होता है। (४) इसके अतिरिक चेतन और अचेतत समी पदार्थों का लोकव्यवद्ार
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के योग्य, तथा धर्मादि पुरुपार्चतुष्टय की सिद्धि कराने वाले अपने व्यापार से रमगीस स्वह्प कवियों के वर्णन का बनता है।
वाक्यवक्रता एवम् अलङ्गार सुकुमार, विचित्र एव मध्यम मार्गों में विद्यमान वक्र शब्दो, अर्यो, गुणों एवं अलद्धारों के सौन्दर्य से भिल, रवि की लोगेतर कशलतारूप, किसी अनिर्वचनीय ढंग की शक्ति के ही प्राणवाली वाकम की बकता होती है। जिस प्रकार किस्ी रमणीय नित्र में उसके फलक, रेखा-विन्यास, रग और कान्ति से भिन्न हो चित्रकांर की कुशलता प्राणस्प में मलक्ती रहती है उसी प्रकार वाक्य में मार्ग आदि, उनके शब्द, अर्थ, गुण एष अलकार आदि से बित्युल मिल् कवि की कुशलता रूप वाक्यवकता, जो कि सहृदयहृदयसंवेय एवं समस्त प्रस्तुत पदार्थों की प्राणभूत होती है, दिखाई पड़ती है। यद्यपि पदार्यों के स्वामादिक सौकुमार्य को रमणोय दग से प्रस्तुत करने में, अथवा प्नारादि रसों की मनोहारी ढेंग से अवाध निष्पति कराने में भी वाक्य वक्ता रूप कवि कोशल ही प्राणभूत होता है फिर भी रमणीय ढंग से अलकार को प्रस्तुत करने में कवि कौशल का ही विशेष अनुभ्रह् होता है, भतः ययावि अलंदार पृथग भाव मे स्थित होते हैं फिर भी तनका कविकोशलाधीन स्थित वाली वाश्यवकता में ही अन्तर्भाव युकिसंगत है-इसीलिए वुम्तक ने प्रथम सम्मेष की २० यों कारिका में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया या- वाक्यस्य नकभावोडयो भिद्यते य सहसत्रधा।
अलङ्कार-विवेचन आचार्य कन्तक ने पूर्वाचारयों द्वारा स्वोकृत अलंकारों में से केवल बीस सलेंकार नाम्ना स्वीकार किए हैं। उनमें प्राय सभी अलंकारों को उन्होंने अपने दज से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। तथा जिन अलंसरों के प्राचीन आालंकारिकों द्वारा दिय गये लक्षण उन्हें युत्तियुक्त नहीं प्रनीत हुए उनका अपने तर्को द्वारा सण्टन कर उन्होंने नया लक्षण प्रस्तुत किया है। वे रवीकृत १० अलंकार हैं-
- रूपक २ अगस्तुतप्रशंसा ३. पर्यायोक *. व्याजस्तुति ५ दलपेक्षा 6. अतिशयोकि ७ उपमा ८ श्लेष ९ व्यतिरेक 1. ह्षानत 19 अर्पान्तर- न्यास १२. शक्षेप १२. विभावना २४. ससन्देह 1%. अपहति १६० संसृष्टि
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और १७, संकर, तथा : अन्य मलंकार जिनके पूर्वाचार्यों द्वारा किए गए लक्षणो का सण्डन कर अपने ढज से नये लक्षण दिये-वे है-१८ रसचन् १९ दीपक और २० सहोकि। इन अलकारों के अतिरिक उन्होंने पूर्चाचार्यों द्वारा स्नीकृत निम्न १९ अलकारों की अलंबारता का खण्डन किया है .- १- प्रेयस् २ ऊजस्विन् 3 उदात्त ४ समाहित ५ प्रतिवस्तूपमा ६ उपोमपमा तुल्ययोगिता ८ अनन्नय ९ निदर्शना १० परिवृति ११ विरोध ११. समासोकि १३ यथामड्रूय १४ श्राश्ती १५ विशेषोकि 1६ हेतु १७ सूकम 1८. लेश और १९ उपमारूपक। परन्तु बडे ही अमौमाग्य का विषय है कि इन अलकारों का विवेचन-स्थल पाण्डुलिपि में अत्यन्त अ्रद और मण्डित या। जिसकी बजइ् से डा० डे महोदय उसे समीचीन ढंग से प्रकाशित करने में असमर्य रहे। फिर भी उनसे द्वारा दिए गये मूल और Resume के आधार पर इन अलंकारों के जी दिषय में निष्कर्प निकाले का सकते हैं इन्हें हम संदेप से प्रस्तुत करते है। हम यहाँ पर पूर्वाचार्यों द्वारा स्वीकृत इन्हीं असंकारों का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत करेंगे जिनका कि कुन्तक ने खण्डन किया है-
१. रसवदलङ्कार प्राचोम आचार्यों द्वारा स्वोकृत रसवदलंकार को कुन्तक ने अंकार्य कहा और उसकी अलंकारता का खग्न दो आबारों पर किया है :- १. वर्थ्यमान के स्वरूप से भिन्न किसी अम्य वस्तु का बोध होने से-तथा (२) शब्द मौर अर्थ को सक्ति न होंने से :- 1. प्रथम आधार के विषय में वुन्तक प्राचीन आचार्यो भामह, दण्डिन तथा तद्भट के लक्षणो को प्रस्तुत कर उनमें दिखाते हैं कि इनके लक्षणों से अलंकार और अतकार्य का विभाग किया हो नहीं जा सकता क्योंकि जो अलंकार्य है उसं को ये लोग अलकार रहते हैं। इन तीनों आचायो की परिभाषाओं में सुख्यत- र को ही रसवदलं कार कहा गया है। रस तो अलकार्य है, उसे अनंकार माना ह नहीं जा सक्ता। क्योंकि ऐसा मानने पर अपने में ही कियाविरोध होगा, सा ही यदि रस को हम अलंकार मान भी लें तो अलंकार्य किसे मानें १ ऐसी को व्यवस्था इन आ्पराचार्यो के लक्षणों में नहीं है। उनके लक्षणो की इस ढस की पव्यवस्य का बडे ही सूक्षम तकों द्वारा कुन्तक ने प्रतिपादन किया है, उसे विस्तार के भय सें यहाँ प्रस्तुत करना ठोर नही, उसे मूल अन्य में देखे। भामह, उद्भट, दण्डी आादि के अतिरिक कुछ आचार्यों ने सम्भवतः यह सिद्धान्त प्रस्तुत किया या कि पेतन पहार्यों के वर्णन प्रसद्ध में रसवद्लट्वार
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और भचेतन पदार्थों के प्रसत्न में उपमादि अलंकार मानना चाहिए। धुन्तक ने इस पक्ष को उठाकर उसका विशेष सण्डन स्वयं नहीं किया क्योंकि इसका खण्डन आानन्दवर्धन कर चुके थे। अत इन्होंने उसवा वेवल निर्देश मात्र कर दिया है। इसके अनग्तर कुन्तक आनन्दवर्धन के भी रसवदलवार के लक्षण :- प्रधानेऽ्यत्र माक्याये यत्राद तु रसादय. । वा्ये तह्मिसरंवारो रसादिरित मे मतिः॥ से भी सदमत नदी है। वे आनन्दवर्धन द्वारा तद्षृत 'स्षिप्ती दुस्तावलान' और "कि हास्येन न मे श्र्यास्यसि' उदाहूरणों वा खण्डन करते हैं। उनके लक्षण का सण्न करने में भी कुन्तक के दो तर्क सामने आते हैं- . १ रम अलंकाये है। यह असकार नहीं ही सकता। १ जब आप 'तह्मिच लवारो रसादिरिति म मतिः' कहते है तो पिर आपनो रसालकार घहना चाहिए 'रसवदलवार' नहीं क्योंकि 'मद' प्रस्त का बोई आशय नही प्रतिमादित किया गया। (२) रसवदलकार के खण्डन का दूसरा आधार या शब्द और अर्य को असन्नति । वन्तक का कहना है कि 'रसवदलंकार' में आ्राप दो प्रवार समास बर सकते हैं-(क) पष्ठीसमास-जिसमें रक विदमान है वह हुआ रसवद और उसका अलंकार रसवदलंकार। इस पक्ष को स्वीकार करने में आपति यद है कि रस से भिक्ष कौन सा पदार्य जिसमें रस विद्यमान है और उसका यह अलंकार है। यदि उत्तर यह दें कि काव्य में रस विदमान है, तो काश्य का अल्कार केवल 'रसवद्' हो नदी हे मल्कि अन्य सभी अलंसर है। अत इसकी अन्य सलंवारों से कोई विशिष्टता रह ही नहीं जायगी। (ख) विशेषण समास-अगर हम कहॅ कि जो रसमान् और अलंकार है वह रसवदलंकार है तो यदा उस विशेष्यभूत अलकार के भ्तिरिक् और कोई पदार्थ है ही नहीं जो अलंकार बन सके। अत शब्द और अर्थ को सगति भी न होने से 'रसवदलज्वार' नहीं हो सकता। वु्तकाभिमत रसवदलद्वुार का लक्षण-इस प्रकार सभी प्राचीन आचार्यों के रसवदलद्वार के स्वरप का खण्डन कर वन्तक अपना रक्षण इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं- जो उपमा रूपकादि अलद्वार काव्य में शंगारादि रसों के समान सरसता का सम्पादन करते हुए सहृदयों को आहादित करने में समर्थ होते हैं वे रस के तुल्य होने के कारण रसवदलद्टार कहे जाते हैं। जैसे दोई क्षनिय म्राह्मणों के तुल्य बाचार करने पर 'म्राह्मणवत्कत्रिय' कहा जाता है।
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और इस प्रकार से वह रमवदलद्वार समस्त अलंकारों का प्राणभूत होकर काव्यैकसवस्वता को प्राप्त करता है। २. प्रेयस् अलङ्कार प्रेमस् अलंकार का खण्डन करते हुए कुन्तक ने दण्डी के लक्षण को प्रहतुत किया है। भामह ने तो लक्षण दिया दो नहीं केवल उदाहरण दिया है। इसके विषय में भो कुन्तक इसी तर्क को प्रस्तुत करते हैं कि यहा जो अलकार्य है उसी को अलंकार माना गया है। अत' वर्ग्यमान के स्वरूप से भिन्न किमी अन्य वस्तु का बोध न करा सकने के कारण यह अलकार नहीं हो सकता। और यदि अलंकार्य को ही अलंकार मानने का दुरामह करें तो अपने में ही क्रियाविरोध दूर नही किया जा सकता। विन्तु यदि कोई दण्टो और भामह के-'अय या मम गोविन्द' इत्यादि उदाहरणों के अ्तिरिक्त 'इन्दोलमं तिपुरजयिन"' आदि जैमे उदाहरणों को उदघृत करके यह कहे कि यहा प्रियनर आरयान होने के कारण प्रेयत् प्रसंकार और निन्दामुलेन स्तुति होने के कारण 'न्याजस्तुति' अलंकार का संकर है। तो ठीक नहीं क्योंकि यहाँ प्रियतर कपन ही तो अरतकार्य है, क्योंकि यदि उसे भी अलंकार मान लिया जाय तो अलंकार्य र्प में कुछ शेष हो नहीं बचता। अतः ऐसे स्थलों पर भी प्रथम् अलकार्य हो रहेगा अलंकार नही 1 ३. ऊर्जस्वि अलङ्गार इसे भी कुन्तक ने अलंकार्य की कोटि में ही रखा है। भामइ ने तो कोई लक्षण दिया नही केवल उदादरण दिया है। कुन्तक दण्टिन् के 'अपदर्ताह- मस्मीति' भादि उदाहरण को प्रस्तुत कर किस दंग से आलोचना की यद कह सकना कठिन है। उद्धद के लक्षण- 'अनोचित्यप्रपृ ताना कामकोधादिकारणात्। भावाना रसानाऊच बन् ऊजस्वि कथ्यते ।।' की आलोचना में उन्होंने यह निर्देश किया कि यदि भाव अनौचित्य प्रवृत्त होगा तो वहाँ रसभत हो जायगा जैसा भामन्द ने कहा है-'अनोचित्याहते नान्यद् रसमशस्य कारणम्'। इसके बाद वे कहते हैं-'न रसवदादमिहितदूषणपान्रताम- तिकामति, तदेतदुषमत्र योजनोयम्।'पृ-१७१) ४. उदात अलङ्कार उदात को भा कुन्तरु अलंकार्ये ही मानते हैं। वे सदट के दोनों प्रकार के उदात्त की झालोचना करते हैं। बहूट का लक्षण है --
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उदात्तमृद्धिमद्वस्तु नरितञ्व हात्मनाम्। वपलक्षणता प्राप्तं नेतिपुत्तत्वमागतम् ।। पइले प्रकार के विषय में कुन्तक कहते हैं जिस् ऋद्विमद्स्तु तुम अलंकार कहते हो वही तो प्ण्येशरीर होने के कारण अटंकार्य है। अत. यहॉ स्वात्मनि क्रियाविरोध दोप उपस्थित है और यदि तुम यह कहो कि ऋद्विमद्वस्तु जिममें हो वह उदातासंकार है तो काव्य ही अलंद्वार होने लगेगा। जब कि काय्य हो नहीं बल्फि काव्य के अलद्वार होते हैं ऐसी प्रसिद्धि है। अतः यहाँ 'शब्दार्थासकति' रूप दोष विद्यमान है। अतः इस प्रथम प्रकार की अलसर्यता ही उचित है।
दूसरे भेद के विपय में वन्तक कहते हैं कि कया उपलक्षणमात्र पृति वाले महानुभावों के व्यवहार का प्रस्तुत वाक्यार्थ में कोई अन्वय है, या नहीं है। भगर अन्वय है तो वह उसके अंग रूप में आ जायगा, अलक्ार नहीं बन जायगा जैसे शरीर के हाथ आदि आ हैं, अलहार नहीं। और यदि उसका प्रस्तुत वाक्यार्थ में कोई अन्वय ही नहीं है तो सता का ही श्रभाव होने पर अलद्धारता की चर्चा तो बहुत दूर की बात है। अतः दोनों प्रवार का उदात अलंकार्य हो है, अलद्दार नहीं।
५. समाहित अलङ्ार समाहित की भी अलकार्यता ही वुन्तक को मान्य है-'एव समाहिसस्याम्य- लंकार्यत्वमेव न्याय्यम्' न पुनरलंकारभाव ।' समादित के बन्होंने दो प्रकार बताकर दोनों का खण्डन किया है। पहले प्रवार के रूप में उन्नोंने बहुट के लक्षण को प्रस्तुत कर उसका खण्डन किया है। खण्डन किम ढंग से किया यह कहना कड़िन है। फिर दूसरे प्रकार के उदाहरण रूप में दण्डी के लक्षेण का खण्डन प्रस्तुत किया है- 'यदवि कश्चित् प्रकारान्तरेण समाहितास्यमलहरणमाख्यातं तस्यापि तथेय भूपणत्व न विद्यते।'
६. दीपक अलङ्कार कन्तक ने भामह के दीपकालंकार के लक्षण का खण्डन किया है। उनका कहना है कि प्राचोन आाचार्यों में आादिदीपक, मध्यदीपक और अन्तदीपक के इस प्रकार के कियापद के ही आदि, मध्यम और अ्रम्त में विदमान रहने से कियापद को ही' दीपकालंकार कढ़ा है। इसी बात का कन्तक कई तर्यों द्वारा खण्डन करते है। उसे मूल भ्रन्य से देखें। उन्हें केवछ कियापद ही दोपक होता है यही स्वीकार
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करने में विरोध है जैसा कि ने अपने दीपकालंद्वार के विवेचन के वाद 'मदो जनयति प्रोतिम्' आदि भामह के उदाहरण को पस्तुत करने के बाद स्वयं कहते ई-'कियापदमेकमेव दीपकमिति तेयां तात्पर्यम, अस्माक पुन, वर्तृपदादि निबन्धनानि दीपकानि बहूनि सम्भवन्तीति।' दीपक के लक्षण में वे टङ्भट को बल्कि अभियुक्ततर कहते हैं-'प्रस्तुता- प्रस्तुतविध्यगामर्थ्यसम्प्रात्तिप्रतीयमानवत्तिसाम्यमेव नान्यतू किश्चित इत्यभि- युकतरे प्रतिपादितमेव-'आदिमण्र्यान्तरविषया प्राधान्येतरयोगिनः। अ्न्तर्गतो- पमा धर्मा यत्र तहीरकं विदुः ।' और ठद्भट के साथ वे सहमति व्यक्त करते हैं कि यदि प्रस्तुत और अप्रस्तुत में प्रतीयमानपृति साम्य नहीं होगा तो दीपक होगा ही नहीं। और उनकी 'अन्तर्गतोपमा धर्म' की विशेषता को समर्थन देते हैं। उनका दीपक का लक्षग है- "शचिलयावहमम्लाने तदिदाहादकारणमू। अशक्त चर्ममर्याना दौपयद् वस्तुदीपकम्।।" पाण्डुलिपि के अस्पष और खण्डित होने के कारण यह कह सकना कठिन है किस प्रकार उन्होंने उसफी म्याख्या और विभाजनादि किया। ७. उपमा में अन्तर्भूत होने वाले अलद्धार (क) प्रतियस्तूपभा-कन्तक प्रतिवस्तूपमा का अन्तर्भाव प्रतीयमानोपमा में करते हैं-"समानवस्तुन्यासोपनिबन्ध्न प्रतिचस्तूपमापि न पृथग् वक्व्यता- महति पुर्वोदाइरणेनेव समानयोगन्ेमल्वात्" तथा-"तदेव प्रतिचस्तूपमायाः प्रतीयमानोपमायामन्तर्भावोपपरयो सत्याम्।" (पृ० ३७६) (ख) उपमेयोपमा-उपमेयोपमा भी उपमा से भिन्न नहीं। वह सामान्य है। क्योंकि उसके लक्षण की उपमा के लक्षण से अन्ययास्थित नहीं। अन्तर केवल इतना ही तो है कि उसमें उपमान उपमेय और उपमेय उपमान हो जाता है। (ग) तुन्ययोगिता-नस्ययोगिता भी स्पष्ट रूप से उपमा ही होती है- 'सा भवत्युपमिति: सफुटम्।' क्योंकि उसमें दो पदार्थों के बीच साम्यातिरेक विद्यमान रदता है जिनसे से प्रत्येक मुख्यरूप से वर्णनीय पदार्थ होता है। वे भाभह के लक्षण के अनुसार भी उनके सुल्ययोगिता के 'शेषो हिमगिरि' आादि उदाहरण को उपमा में भन्तर्पृत कर कहते हैं-'उका (भामइ) लकणे ताव- दुपमान्तभाषस्तुल्ययोगिताया:। (घ) अनन्यय-अनन्वय के विषय में भी कुम्तक का यही कहना है कि ४ व० भु०
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उसका भी भलग सै -लक्षण करने को कोई आवस्यकता नहीं क्योकि उसनें एक उपमान हो तो काल्पनिक रहता है। इसके विषय में पे कहते हैं- "उदेवम भिधा वचित्र्यप्रकाराणामेवंविध वैद्स्प्यम्, न पुनर्लक्षयभेदानाम् ।" (रु) निदर्शना-निदर्शना भी उपमा में ही अन्तर्मूत है-'निदर्शनम-
(च) परिघृत्ति-परिवति को भी वे ढपमा से सलग नहीं स्वीशर करना चाहते-"परिषृतिरप्पनेन न्यायेन पृपष् नास्तीति निरुम्यते।" उन्या रहूना 'हे यहां पर दो पदार्यो का विनिवर्तेन होता है और दोनों ही मुर्य रूत से अभिधीयमान होते हैं। इसलिए बोई किसी का असंकार नही हो सकता। हो, जब इनवा रूपान्तरनिरोध होता है तो सान्य के सद्भाव में अवस्य हूो उपना अलंकार हो जाती है।-"स्पान्तर निरोधेतु पुन साम्यसद्भावे भवत्युपमितिरेपा चालड्कृति समुचिता।"(पृ० ३८२)
८. विरोध और ९. समासोक्ति । इस इथल की पाण्डुलिपि अत्यम्त प्रष्ट होने के करण डॉ. डे दोई विशेष निर्देश नहीं कर सके। उनके निर्देशानुसार-विरोध श्लेप से अभिन्न होने के कारण उसो में अन्तर्भूत है इसको अलग से अलंकारता कुन्तक की स्वीकार
समासोकि के विषय में उनका पहना है कि वह भी अन्य अलंहर के रप में शोभाशूज्य होने के कारण शलेप से स्रभिन हे- 'अलहारान्तरत्वेन शोभा- शन्यतया ।' १०. सहोक्ति अलङ्कार
कुन्तक भामह के महोक अलंबार के मक्षण औोर वदाहरण को प्रस्तुत कर उसका खण्डन करते हैं और कहते हैं कि मामह की यह सहोकि तो उपमा में ही अन्तर्भूत है क्योंकि वह चाइत्व साम्यसमन्वय के ही कारण है-भामइ के उदाहरण के विषय में ठनका फहना है-'अत्र परस्परसाम्मसमन्वयो मनोह्ारि-
कुन्तकाभिमत सहोकि लक्षण जड़ों पर प्रधान रूप से विवक्षित अर्य को प्रदीति बराने के लिए कई वरश्मायों का एक साथ हो कथन किया जाता है, यहाँ सहोकि अलंकार होता
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है। कहने का आशय यह है कि जिस बात को दूसरे वाक्य द्वारा कहना चाहिए उसे भी प्रस्तुत अर्य की सिद्धि कराने के लिए रमणीयता के साथ उसी वाक्य द्वारा कह दिया जाता है। इसके उदाहरण रूप में वे अन्य वदाहरणों के साथ-साथ विक्रमोवशीय से- "सर्वक्षितिभूतानाय रष्टा सर्वानसुन्दरी। रामा रम्ये वनोहे शे मया विरहिता त्वया।' को प्रस्तुत कर व्यास्या करते हैं- "सात्र वाक्यायद्यमुप- निबद्धम्।" इसके बाद कन्तक ने स्वयं हो प्रश्न ठठाकर इसकी श्लेष से मिनता सिद्ध किया है।
११. यथासङ्र्य
नयासंख्य में किसी भी प्रकार के उत्तिवेचित्र्य का सभाव होने से उसकी अनंकारता कुन्तक को मान्य नहीं-मणितिवैचित्र्यविरदान काचिदत्र कान्ति- बिधते'। १२. आशी: श्राशी को वे अलंकार्य मानते हैं अलद्दार नहीं-क्योंकि उसमें आ्राशंसनीय अर्थ ही मुख्य रूप से वर्णनीय होने के कारण अलद्धार्य होता, जैसे कि प्रेयोडलंकार में प्रियतराख्यान वर्णनीय दोने कारण के अलद्धार्य होता है। अतः जो दोष प्रेयस को अलंकारता मानने से आाते हैं वे हो दोष आशी को भी अलद्वार मानने में आते हैं।
•१३. विर्शर्पाक्ि
कन्तक विशेषोक्ति को भी अंंकार्य ही मानते हैं। इस विषय में चे भामह के- स एकस्त्रोणि जयति जगन्ति कुसुमायुध:। हरतापि तनुं यस्य शम्भुना न हतं बलमू।। उदाहरण को उद्पृत कर आलेचना करते हैं कि इसमें समस्त लोकों में प्रसिद्ध विजय के उत्कर्षवाला कामदेव का रवमात्र दो तो वर्णित है अत यद भलंकार्य है।
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१४. हेतु, १५. सूक्ष्म तथा १६. लेश अलद्कार हेतु सूक्ष्म मोर लेश की अनद्धारता का सण्ठन करते हुए वे भामह की- देवुष सूद्षमो लेशोडय नालद्वारतया मतः । समुदायाभिधानस्य घक्रोक्त्यनमिधानतः ।। इस उकति को समर्थन देते हैं और कहते हैं यहाँ किसी वैचित्य को प्रातुत न करने के कारण अलद्दारता सम्भव नह। साथ ही दण्डी के उदाइरणों को प्रस्तुत कर पहते हैं कि यहाँ तो केवल वस्तु स्वभाव ही रमणीय है। अत बह अलद्वार्य है, अलद्वार नहीं।
१७. उपमारूपक कुन्तक उपमारूपक की भी अलड्ारता का खण्डन करते हैं। परन्तु किस ढंग से, यह कहना वठिन है। डा० डे ने केवल इतना हो अंश सुदित किया है कि-केविदुपमा रूपकाणामलंकरणत्वं मन्यन्ते, तद्युक्षम्, अनुपपद्यमानतवात्।"
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प्रकरणवक्रता
इस प्रकार तृतीय उन्मेष तक कुन्तर्क प्रथम उन्मेष में परिंगणित, वर्णचिन्यास पदपूर्वाई, पदपराईऔर वाक्य को वकता का विवेचन प्रस्तुत कर अवशिष्ट प्रकरण और प्रबन्ध की वकता का चतुर्थ उन्मेघ में विवेचन करते हैं। भनेक वाक्यों का समूह ओर सम्पूर्ण प्रबन्ध का एक अंश प्रकरण कहलाता है। जहाँ कवि इन प्रकरणों को अपनी सहज और आहार्य सुबुभारता से रमणीय बना देता है वहाँ प्रकरणवक्रता होती है। इसके अनेक प्रमेद कन्तक ने प्रस्तुत किए हैं- १. जहा पर कवि पुरातनी कथा में अपनी शबाघ स्वतन्त्रता का आश्रमण करके इस प्रकार मे अपने अमीष्ट अर्थ को प्रस्तुत करता है कि न तो मूल का वच्छेद होने पाता है और न इस नयी कल्पना के उत्थान के विषय में कोई आशका हो की जा सकती है, वहाँ कुन्तक के अनुसार पहली प्रकरणवकता होती है। जैसे 'रघुवंश' में कालिदास द्वारा उपनिबद्ध किया गया रघु और कीत्स का प्रकरण। २ दूसरे प्रकार की प्रकरणचक्रता वह होती है जहाँ पर कवि इतिवृत में प्रयुक्त क्या में भी अपनी प्रतिभा के बल पर किसी नवीन प्रकरण को उद्धाचित कर उसे काव्य का जोवितभूत बना देता है। यह कवि की नवीन उद्धावना दो प्रकार की होती है। एक तो वह जहाँ कवि इतिवृत में अविघ्यमान की हो उद्भावना करता है-जैसे अभिज्ञान-शाकुन्तल में दुर्वाशा के शाप की उद्भावना। और कहीं पर इविवृत में विद्यमान भी प्रकरण को अनोचित्ययुक्त होने के कारण नये ढंग से प्रस्तुत करता है। जैमे 'उदात्तराघय' में मारीचवष का प्रकरण जहाँ मृग को मारने के लिए गए हुए लत्मण की रक्षा द्वेतु राम का नमन दिखाया गया है। ३ तीसरी प्रकरणवक्रता वहाँ होती है जहाँ कावे कान्य के मुख्य फल का सिदि कराने में समर्थ प्रकरणों के उपकार्योपकारक भाव को अपनी अलोकिक प्रतिभा से प्रस्तुत करता है। जैसे उत्तररामचरित के प्रथम अ्रष्ट के चित्रदर्शन प्रकरण में जो सीता की भावी सन्तानों के लिए राम द्वारा जम्भकाससिद्ि प्रदान की गई, प्रधान कया की पळचम अद्ध में जम्भकासव्यापार द्वारा तपरकारक सिद्ध होती है। ४. जहाँ कवि एक ही पदार्यस्वरूप को प्रत्येक प्रकरण में अपूर्व रसों एवं चलद्वारों की योजता से रमणोय बना कर बार-बार प्रसतुत करता है जो सहदम- ह्ादकारिता में किसी प्रकार वाघक नहीं हो तो वहाँ चौपी प्रकरणवकता होती
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है। जैसे 'तापस वत्सराज' में द्वितीय, चतुर्ष, पञ्बम और यहठ भट्टों में नये- दस से कवि ने करुणरस को समुदीप्त कराया है। ५. जहाँ कवि किसी काव्य के सौन्दर्य को प्रस्तुत करने के लिए उसके कथावेचित्रय की सृष्टि करने वाले जलकोडा आदि प्रकरणों को प्रस्तुत करता है वहाँ पाचवीं प्रकरणवकता होत है। जैसे रघुवंश २१ वें सर्ग में कुश की जल- बोडा । ६. छठी प्रकरणवपता यहाँ होती हैं जहाँ कृबि किसी प्रकरणविश्ेष के कम्प के द्वारा भभी रस की निम्पत्ति हख ढज् से कराता है कि वैसी निष्पतति कराने में उसके पहले के और वाद के पकरण असमर्य सिद्ध होते हैं। जैसे कि 'विकमोवशीय' का 'उन्मताइ' जहाँ अभ्ी स विप्लम्भन्रक्कार है। ७. जहाँ कवि प्रधान वस्तु की मिद्धि करने के लिए उसी प्रकार की एक नये प्रकरण के वैचिन्य को प्रस्तुत करता है वहाँ सातवीं प्रकरणवक्रता होता है। जैसे 'मुदराक्षस' के छठे भट्ट में राशम और पुरुष की बार्ता का प्रररण। ८ जहाँ वविजन किसी नाटक के मध्य में एक दूसरे नाटक को सामाजिकों को आहादित करने के लिए प्रस्तुत करते है, वहां आठवीं प्रकरणवकता होती है। जैसे बालरामायण का चतुर्य बद्ध या उत्तरचरित का सातवां भ्द। १ नवे प्रवार की प्रतरणवकता वुन्तक ने उन सभी प्रबन्धों में रवोदार किया है जिनके प्रत्येक प्रकरण सैधि-संविधान भादि की दृष्टि मे एक सुछूस में बँधे रहते हैं और उनके पौर्यारर्य में किसी प्रकार की असंगाने नहीं होती। उदाहरणार्थ उन्होंने पुषपदवितकपकरण' को उद्भृत किया है।
प्रबन्धवक्रता
कन्तक ने प्रबन्धववता के भी अनेक भेद प्रतिपादित किए हैं। प्रबन्ध से वात्पर्य सम्पूर्ण नाटक, महाछ्ाम्यादिकों से है। 1. जिस इतिहास के आधार पर कवि अपने प्रबन्ध को कयावस्तु को प्रस्तुत करता है, उसी इतिदवास में जिस रस सम्पत्ति का निर्वास किया गया है उससो उपेक्षा करके जह्ोँ कवि सहदयाहाद की सृष्टि करने के लिए नदोन रछ को प्रस्तुत करता है, बड् प्रबन्ध की पहली चक्रता होती है। जैसे बशभारत पर आंधारित वेणीसंद्ार और रामायण पर आाधारित उत्तराभनरित सो कुन्तक के अनुसार रामायण और महाभारत दोनों का सही रम शन्त है- "रामायण- महाभारतयोश्य शान्तात्ित्वं पूर्वसरिभिरेव निरूपितम्"' । जब कि वेकोसंहार का अम्नोरस बोर, और उत्तरचरित का करनविप्रलम्भ है।
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२ दूसरी प्रबन्दकता वहाँ होती है जहा कि कवि इतिपृत की सम्पूर्ण कथा को प्रारम्भ ले करता है किन्तु उसकी समाप्ति उसके एक भाग से ही कर देता है क्योंकि वद भागे की कथा को प्रस्तुत कर मेौरसता नहीं काना चाहता। जैसे किरातार्जुनीय की कथा। पहले कवि ने ध्मराज के अभ्युदय तक को कया को प्रारम्भ कर उसकी समाप्ति अज्ञन के किरातराज के साथ युद्ध के बाद ही कर दिया। ३ तीसरे प्रकार की प्रबन्धववता यहाँ होती है जहोँ कि बवि प्रधान कयावस्तु के आधिकारिक फल की सिद्धि के उपाय को तिरोहित कर देने वाले किसी कार्यान्तर को प्रस्तुत कर कथा की विचिन्नन कर देता है किन्तु उसी कार्यन्तर द्वारा, हो प्रधान कार्य की सिद्धि करा देता है। जैसे शिशुपालवध महाकाव्य में। ४. चोयी प्रबन्धवकता कुन्तक के अनुसार नहाँ होती है जहाँ कि कवि एक फलप्राप्ति की सिद्धि में लमे हुए नायक को उसी के समान मन्य फलों की भी पाप्ति करा देता है। जैसे नागानन्द नाटक के नायक जीमूतवाहन को अनेकों फलों की प्राप्ति होती है। ४ माचयें प्रार की प्रबन्धवकता कवि कथावस्तु में वैदग्य दिखाकर नहीं, बल्कि केवल प्रबन्ध के उस नामकरण से ही प्रस्ुत कर देता है जो नाम- करण प्बन्ध की प्रधान कथायोजना का चिद्भूत होता है। जैसे अभिज्ञान- शाकुन्तल, मुद्ाराक्षस आदि । ६ कन्तक के अनुसार, जहा अनेक कविजन एक हो कथा का निचोह करते हुए श्रनेक प्रबन्धों की रचना तो करते हैं किन्तु उन प्रबन्धों में कही विस्तृत वस्तु वो संक्षिस करते हुए और संकषित्त वस्तु को विस्तृत करते हुये नये-नये शन्दो, अर्थों एवं अलंकारों से उन्हें एक दूसरे से सर्वया मिन्न बना देते हैं, यह दन कवियों के सभी प्रबन्धों की बकता ही होती है। जैसे एक ही रामायण की कथा पर आधारित रामान्युदय, उदाप्तराघव, वीरचरित, बालरामायण, कृत्यारावण आदि अनैक प्रबन्धों को परस्पर निर्भिन्नता का वैचित्र्य तन-उन प्रबन्धों को वक्ता को तसमुत करता है। ७इसके अनन्तर कन्तक महाकवियों के ठन सभी प्रबन्धों में यकता स्वीहर करते हैं जो कि नये नये उपायों से सिद्ध होने वाले नोतिमार्ग का जपदेश करते है। जैसे-मुद्राराक्षस और वापसवत्सराज चरित आदि में नीति का रपदेश किया गया है। इस प्रकार कुन्तक प्रथम उभ्मेष में परिगणित छदो कबिष्यापार को बकतामों फा विवेचन चतुर्ष उन्मेष की समाप्ति तक समास करते हैं,
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बन्ध इस प्रकार वाव्यलक्षण 'शब्दायों सहितो-'आादि में आय हुए शब्द, अरष, साहित्य और कदिव्यापार का विनेचन अब सक इमने संक्षिम रूप से प्रस्तुत किया। अम बचते है दो पद और वे ह बन्ध और तदिदाहादवारित्व। वुन्तक के अनुसार शब्द औौर अर्थ के लावण्य और सौभाग्य गुण को परिपुद करनेवाला, एष वककविम्यापार से सुशोभित होने वाला वाक्य का विशिष्ट सलिवेश वन्य कहलाता है। सावण्य से अभिप्राय सनिवेश को चारता से है और सोभाग्य से आराय सहृदयाहादकारिता है। तद्विदाहादकारित्व
कन्नक के अनुसार तविदाहवादकारित्व सहदयहृदयसंवेध होता है। उसे पाणी द्वारा ग्यक नहीं किया जा सकता। उसके विषय में कुन्तक यहो कहते हैं- कि वह शब्द, अर्थ, और पदोकि इन तोनों के उत्कर्ष से भिल उत्कर्ष वाला होता है, साथ हो इन तोनों से भिल्त स्वरूपवाला होता है। तथा सहृदयहृदन- संवेद किसी अनिर्वंचनीय सोकुमार्य से रमणीय होता है। कुन्तक का मार्ग-गुणविवेक कन्तक का मार्गपुणविवेचन पूर्णत मौलिक है। उन्होंने मार्गो को काव्य- रचना का कारणभूत हवीकार किया है। वे मार्ग तीन हैं -- () सुबुमार (१) विचित्न और (३) मध्यम या उभयात्मक। देशविभाग के आधार पर रीतियों का खण्डन
मार्गों का विवेयन करते हुऐ कुन्तक ने कई विप्रतिपत्तियां प्रस्तुत की है। उन्होंने सबसे पदले गौड़, वेदर्भ, आादि देशों पर रखे सये गौढी, वैदर्भी आादि रीतियों तथा गौड़ या वैदर्भ मार्गो का खण्टन किया है। इसका कहना है कि- (1) यदि इम भेद के चाधार पर विभिन्न रीतियों का नामकरण करेंगे तब तो जितने देश हैं उतनी ही रेतियाँ स्वीकार करनी पडेगी। अतः भानन्त्य कोष प्रस्तुत हो जायगा। (२) दूसरी बात काव्यरचना किसी देशविदेश का धर्म नहीं होती, जेसे कि ममेरी बडिन के साथ विवाह देशादि का धर्म होता है। क्योंकि देश धर्म तो केवल पूद्ों की परम्परा पर भाधारित होते हैं। परन्तु काव्यरचना तो शकि, वयुत्पतति र सभ्यास पर आधारित होती है। शकति आदि को देशविशेष या
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OVT धम नहीं माना जा सहती है असयायएक देश के सभी कवियों की रचना एक जैही हो होनी चाहिए कपरन्तु ऐसा होजा नहीं।अत देशविशेष के आधार पर रोतियों का विभाजन समीचीन नही जैसा कि पदण्डी आदि आचार्यों ने किया ईै।
रीतियों को उत्तम, मध्यम और अधम मानना उचित नहीं
कुछ आचार्यों ने बेदर्भी को उत्तम, पाञ्चालो को मध्यम और गोडीया को अधम रीति के रूप में स्वीकार किया था। उसका भी खण्डन कुन्तक ने किया है। उनका कहना है कि इस प्रकार का त्रैविध्य स्थापित करना ठीक नहीं। अन्यया वेदर्भो के अलावा अन्य रोतियों का जो उपदेश किया गया है वह व्यर्थ मिद्ध होगा। भला कौन ऐसा मनुष्य होगा जो कि उत्तम चीज को छोड़कर मध्यम और अधम का भ्रहण करेगा। यदि कोई सही रूप में रचना काव्य है तो वद उत्तम ही होगी। क्योंकि काव्य कोई दरिद् का दान तो है नहीं कि यथा- शक्ति उसको प्रस्तुत किया जाय। काव्य तो वही होगा जो कि सहदयाहादकारी हो और ऊपर बताये गए हाव्यसक्षण से समन्वित दो।
कवि स्वभाव के आधार पर मार्ग-विभाजन
अत कुन्तक ने मार्गविभाजन का आधार कविस्वभाव को स्वीकार किया। जिम कवि का जैसा स्वभाव होता है वैसी ही उसकी शक्ति होनी है और उसी शक्ति के अनुरूष उसकी व्युत्पत्ति औौर अभ्यास भी होते हैं। इस प्रकार सुकुमार स्वभाव की सुकुमार शक्ति होती है, क्योंकि शक्ति और शक्तिमान् में अभेद होता है। उस सुकुमार शक्ति के द्वारा वह कवि सौकुमार्य से रमणीय व्युत्पत्ति अर्जिंत करता है और उसी सुकुमार शकि और व्युत्पत्ति के आधार पर वह सुक्मार मार्ग के अभ्यास में लगता है और सुकुमार कान्य की रचना करता है। इसी प्रकार विचिन्न स्वभाव वाला कवि विचित्र काव्य को प्रस्तुत करता है और मध्यम स्वभाववाला कवि मध्यम काव्य को प्रस्तुत करता है। यद्यपि कविस्वभाव के आधार पर इन मार्गो का आनन्स्य अनियार्य है किन्तु उनकी गणना न हूँ। सकने के कारण सामान्य ढम्ञ से उनके तीन भेद स्वाकार किये गए हैं। इन तोनों में कोई भी उत्तम, मध्यम, माँ अधम ढंग से विभाजित नहीं है। सभ रमणीय है। क्योंकि सदृदयों को आह्ादित करने की सामर्थ्य की किसी में वरा भी कमो नहीं होती है।
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सुकुमार मार्ग
कुन्तक ने सुषुमार मार्ग की अधोलिखित विशेषतायें प्रस्तुत की है :- (१) यह कबि की दोपरहित मार्ग उसकी अपूुर्व शक्ति द्वारा समुक्जमित होने धाले, एवं सहृदयों को शाहमादित करने में समर्य शब्दों एव अरयों के कारण रमणीय होता है। (२) बिना किसी प्रयत्न के विरचित किए गए योरड से ही हृदयाहादक अलकारों से समन्वित होता है। (३) इसमें कवि-शक्ति से समुकसित होने वाला पदार्पों का रमणीय स्वभाव ह। सौन्दर्य को 'प्रस्तुत करता है, उस स्वभाव-सौन्दर्य के भागे भन्य काष्यों में विद्यमान व्युत्पतिजन्य कौशल फीका पड़ जाता है। (४) साथ ही मजरादि रसों के परम रहस्य को जानने वाले सहृदयों के मनःसंवाद के योग्य रमणीय वाक्यविन्यास से युकत होता है (५) इसमें चविकौशल का, किसी भी इयता की परिधि में वर्गन नहीं किया जा सकता। उसका मौन्दर विधाता के कौशल से निर्मित सृष्टि के उत्कर्ष के तुल्य हीता है। (६) साथ ही इसमें जितना वुछ भी अलकार वैचित्य होता है यह सब ववि की प्रतिभा से निर्मिंत होता है। उसके आाहार्य बौशल का उसमें सर्वया अमाव होता है और वद सोकुमार्य की रमणीयता को प्रस्तुत करने वाला होता है। इस मार्ग में निपुण कनियों के रूप में कुन्तक ने कालिदास व मवसेन आदि वा नाम म्रहण किया है। विचित्र मार्ग
कन्तक के अनुसार विचिन्न मार्ग की निम्नलिखित विशेपतायें हैं :- (क) कनि की प्रतिभा के प्रथम उल्लेख के अवसर पर भी बिना उसके प्रयतन की अपेक्षा रखने वाले शब्दों और भरथों के अन्दर कोई वकताप्रकार परिस्फुरित होता रहता है। (२) इसर मार्ग में कविजन केवल एक ही अलंकार से सन्तुष्ट नहीं होते इसीलिये उस अलंकार के अलसरस्प में वे अन्य अलंकार को उपनिषद्ध करते हैं। (३) यहाँ मलंसर की महिमा ही इतनी प्रकृष्ट होती है कि सलंकार्य उसके स्वरूप से आच्छादित-सा होकर प्रकाशित होता है।
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(४) इसमें जिस पदार्थ का यद्यपि नवीन वर्णन नहीं भी किया जाता उसको भी केवल उचति-वचित्र्य से लोकोत्तर अतिशय को प्राप्त करा दिया जाता है। (५) साय ही कवि अगनी प्रतिभा के बल पर अपनी रुचि के अनुसार पदार्थों के स्वरूप को उम दज से प्रसुत कर देता है जिस रूप में उनकी व्यवस्था ही नहों होती । (६) उसमें शब्द और अरय की शक्ति से मिन्न पृत्ति वाले काव्यार्थ को • समिव्यक्ति कराई जाती है। () उसमे सरस अभिप्राय से युक्त पदार्यों का स्वरूप किमी लोकोत्तर नैचित्य मे उन्नेजिन करके प्रस्तुत किया जाता है। (c) वक्ोफि का वह वैचित्र्य जिसके शन्दर कोई अतिशायोक्ति परिषफुरित होतो रइती है. इस मार्ग का प्राण् होता है। इस मार्ग में निपुण कवियों के रूप में वुन्तक ने बाणभट्ट, भवभूति व राजशेखर को स्मरण किया है। मध्यम मार्ग मध्यम मार्ग में सुकुभार और विचित्र दोनों मार्गों में ल्लिखित विशेषतायें संयुन्त रूप में विद्यमान रहती हैं। उनमें कवि की शषि एव व्युत्ष्पत्ति से सम्भव होने वाला सौन्दर्य पराकाशा को पहुँचा हुआ होता है। और सुकुमार तथा विवित्र मार्ग के माधुर्यादि गुण इस मार्ग में मध्यमरतति का आश्रयण करके किसी चपूर्ब सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। 'इस मार्ग में निपुन् कबियों के रूप में कुन्तक ने मातृगुत्त, मायुराज व मञ्जीर भादि का नाम प्रहण किया है। मागा के गुण वुन्तर ने इन प्रत्येक मार्गों के चार-चार नियत गुग बताये जाते हैं-वे हैं- १. प्रसाद् २. माधुर्य ३ लावग्य और ४. अभिनात्य। इनका स्वरूप इस प्रकार है .- 9.प्रसाद गुण-( १) मुट्ठ मार मार्ग का प्रसाद गुण सरलता से अभिप्राय को व्यफत कर देने वाल, सबसे पइले विवक्षित अर्थ का प्रतिपादन करने वाला हाता है। सभी ऋहारादि रप तथा समी अलकार उसके विशय होते हैं। उसमें ससमस्त पदों का प्रयोग किया जाता है अथवा समास के रहने पर गमक समास का प्रदोग होता है। प्रमिद्व शब्दों का प्रयोग होता है और उनका परस्पर सम्बन्य बिना किसी व्यवधान के हो जाता हे।
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(२) विचिन्न मार्ग में यही प्रसाद गुण वुछ प्तिशम को प्राध्त कर लेता है। इसमें सघया असमस्त पदों का न्यास नहीं होता, वह बुछकुछ ओजस था स्पर्श करता रहता है। शेप सुकुमार मार्ग के प्रसाद के लक्षण इसमें विद्यमान रहते हैं। तथा इस मार्ग में प्रसाद गुण वह्ाँ भी माना जाता है जहाँ एक ही वाक्य में उस वाभयार्थ को प्रस्तुत करने के लिए अनेक दूसरे वाक्य पदों की तरह उपनिबद्ध होते हैं। २. माधुयगुण-( १) सुसुमार मार्ग में माधुर्यगुण या प्राण असमक्त एव श्रुतिरमणीयता तथा अर्थरमणीयता के कारण हृदय को आनन्दित करने वाला पदों का विशेष सविवेष होता है। (२) विचिन्न मार्ग में भाधुरय पदों के वैचिभ्य का समपक होता है। उसमें शिमिलता वा पर्परभाव सलियेश-सौन्दर्य का कारण बनना है। 2. लावण्यगुण-(1) सुकुमार मार्ग का लावण्य गुण मर्णों के उस वैचिन्यपूर्ण न्यास से आता है जो बिना किसी व्यवसन के निर्मित की गई पदों की गोजना-रूप सम्पत्ि को प्रस्तुत करता है। • (१) चित्रम र्ग में यही लावण्य वृछ प्तिरेक को प्राप कर लेता है। इसमे पदों के अन्त मे आने वाले विसगों को भरमार होती है। संयु क्तषणों का अधिक प्रयोग रहता है। पद परापर एक दूसरे से सश्लिष्ट होते हैं। ४. आभिजात्यगुण-( १) सुकुमार मार्ग में शभिजात्य गुण उसे कद्दते हैं, जो शुतिरमणीयता से मुशोनित होता है, हृदय का मानों स्पर्श-सा करता रहता है और सहज रमगीय कान्ति से सम्पल्न होता है। (२) विबित्न मार्ग में न तो यह महुत कोमल ही कान्ति से युक्क होता है और न बहुत पठिन को हो धारण करता है। साथ ही कविकोशल से ही निर्मित होने के कारण रमणीय होता है। इस प्रकार सुकुमार मार्ग के माधुर्य आदि गुण विचित्र मार्ग में वुछ भाशायं सम्पत्ति को प्रस्तुत करने के कारण अ््पतिशय को प्राप्त कर लेते हैं- आभिजात्म प्रमृतय पूर्वमार्गोहिता गुणा:। अनातिशयमायान्ति जनिताहार्थसम्पदः॥१।११• मभ्यम मार्ग में ये सारे के मारे गुण एक मध्यमधृत्ति का आाध्रयण प्रददण कर सौन्दर्य को प्रश्तुत करते हैं। इस प्रकार कन्तक चार चार नियत गुणों से रमणोय मार्गशितय की व्याख्या करके दो साधारण गुणों को प्रस्तुत करते हैं। वे हैं-(१) सौभाग्य और (२) सोचित्य। ये दोनों गुण प्रत्येक मार्ग में पदों से लेकर प्रबन्ध तक व्यापक रूप में विद्यमान रहते हैं।
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१. सौभाग्य गुण काव्य के उपादेय तत्त्वों अर्थात् शन्द आादि के समूद् में जिस तश्व को प्राप्त करने के लिए कवि की रकि बढ़ी हो साबधानी के साथ व्यापार करती है, उसे सौभाव्यगुण कहते हैं। यह कवल कविप्रतिभा के व्यापार द्वारा ही साध्य नहीं होता। बल्कि काव्य की समात उपादेय सामरी द्वारा मम्मादनीय होता है। साथ ही सहृदयों के अन्दर अलोकिक चमन्कार को सृष्टि करने वाला होता है और काव्य का एकमान प्राण होता है।
₹ ओचित्य गुण
जिसके कारण पदार्थों का उत्कर्ष र्पष्ट ढज्ग से परिपृष्र होता है यही उचिद कथन के प्राणवाला उत्तिप्रकार औचित्य गुण कहलाता है। इमी श्रचित्य के अनुरूप होने पर ही अलंकार-विन्यास सौन्दर्य लाने में समर्य होता है। अथवा जहों पर वर्ण्ये पदार्थ वक्ता अ्थवा थोदा के सौन्दर्यातिशायी स्वमाच के द्वारा आच्छादित कर दिया जाता है वहाँ भी औचित्य गुण होता है। यदि इस शचित्य का पद, वाक्य या प्रबन्ध में कहीं भी अभाव होता है तो उससे सहदयों को आनन्द-प्रतीति में बाभा पढ़ जाती है।
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कुन्तक और कइमीर-शैवाद्वैत प्रत्यभिज्ञादर्शन के अनुसार एकमात्र परम तत्व 'परम सिव' है जो श्रद्वत, निर्विकार एव सच्चिदानन्दस्वरूप है। शिव का स्वरूप शिवट्ष्टि में इस प्रकार व्यक्त कियाग या है -- "वारमैस सर्वभावेयु स्कुरतिवृतचिद्धभु"। अनिरर्तेच्छाप्रसरः प्रसरदतिकम: शिव।" उन शिव वो शक्तियाँ भनन्त है-"शाकयथासङ्गपेयाः"-शिवदृष्टि। किन्तु मुख्यर्म से उन्हें पाँच रानियों पर निर्भर वहा गया है-'पथशतिपु निर्भेर"- शि० हृ•। परमार्थतः ने राकियां शिष से भिक्ष नहीं, क्योंकि 'शक्ति शक्तिमतोर मेद" न्याय से शक्ति औौर राक्तिमान में भभेद होता है, जैसे भग्नि- और उसका दाहयत्व एक दूसरे से अभित्न है, भ्ग्ति शचिमान है और दाईकन्व उसकी शकि। यहो बात 'शिवराष्टि' में इस प्रकार कही गई है :- "न शिव' शक्तिरदितो न शक्तिरष्यतिरेकिणी। शिव समस्तया भावानिच्छया कतंमीहते। शतिशलिमतोभेंद: शंवे जातु न वर्ण्यते।।" उन शिव को पाँच शकियाँ है-वित्, मानन्द, इच्छा, ज्ञान और किया, जिनका स्वरूप निम्न प्रकार हु .- (१) चित् शक्ति-प्रकाशरूपता ही चित शक्ति है, क्योंकि परमशिव प्रकाशरूप है, अत प्रकाशरूपता उसको शक्ति हुई, जैसा 'तन्त्रतार' में कह़ा गया है-'प्रवाशस्पता चिच्छकिरिति।' (२ ) आनन्दशक्ति- स्वातन्त्र्य ही भानन्द शक्ति है क्मोनि आानन्द को उपरब्धि स्व्त्रता में ही सं्भय है, पस्तन्त्रता में नही। 'तन्त्रसार' मे कहा
(३) इन्छाशक्ति-'इस प्रकार से मैं इस प्रवार का हो जाऊ ऐसा शिव का चमरकार ही सच्छाशकि है-'तच्चमलार इच्छाशकि। चमतवारसु इत्थ- म्वुभ्पालक्षण शर्ति' 1- तन्त्रसार। (४) ज्ञानशक्ति-थोड़ा सा बेघ (ज्ञान) को ओर उन्मुख होना अर्पाद आमरारूपता ही ज्ञान रात्ति है। वस्तुतः तो परम शिव ज्ञानस्वरूप हो है। 'ामर्शात्मकता ज्ञानशकि । ईषतया वेद्योन्मुखता सामर्श इति'-तन्त्रसार। (x ) क्रियाशकि-एक का अनेक में समस्त आाकारों में मोग हो जाना
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अर्थात विश्वरप में भा जाना हो क्रियाशक्ति है-'सर्वाकारयोगितवं करियाशफि- रिति'-तन्त्रमार। इन्हीं उपर्युक्त पाँच राफियोंके द्वारा परमशिव इस अगतप्रपख को परिहफुरित करता है। अर्यात् जब उसे यह इच्छा होती है कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ तो उसकी शक्ति में स्पन्दन किया होती है। 'स्पन्द' शब्द 'हपदि किअ्िच्चलने' धातु से निप्पल्न होना है जिसका अरय हिलना, फड़कना अर्यात स्फुरण होता है। इस प्रकार शक्ति में कुछ परिहकुरण होता है जो कि कुछ कुछ चलने के कारण स्पन्द वहा जाता है। यही शक्ति का स्पन्द ही वस्तुत जगत् है। जगतू की सत्ता रणन्दरूप ही है और यह स्पन्द शक्ति का स्वरूप ही है। शक्ति का परमशि से अभेद सिद्ध कर हो चुके हैं। अतः यह सिद्ध हुआ कि यह जगद् परमशिव से पृथक नहीं। अत वह अद्वत है-जैसा 'प्रन्यभिन्ञाहृदय' में कहा गया है- "पराशक्तिस्पा चितिरेव भगवती- शकि: शिवमहारकामिसा तत्तदनन्त- जगदात्मना स्फुरति।" अब नश्न यह उठता है कि परमशित तो एक पर इम जगत्वैचित्र्य में अनेकता है तो एक ही अनेक हो, यह कैसे -सम्भव है१ इस प्रश्न का उत्तर प्रत्यमिज्ञादर्शन के अनुसार यह है कि 'वस्तुत' यह सब एक ही हैं किन्तु उसमें भनेकता का आभाम होता है ठोक उसी प्रकार जसे कि बढे हुए मयूर के पंखों का रंगवचित्य जो अ्रनेक प्रतीत होता है, वस्तुत वह ठेसके अण्डे के भौतर के एकरूप ही तरलपदार्थ में निहिति रहता है। उसमें मयूर के बड़े होने पर हमें अनेकता का आभास होने लगता है। इसी को 'मयूराण्डरसन्याय' कहते हैं। इसी 'सरन्द' की व्याख्या करते हुए 'स्पन्दप्रतीपिका' में उत्पलाचार्य कहते है -- "स्पदि किधिच्चलने इति श्पन्दनाव स्पन्दः 1 सन्दनक्ष निस्तवहसत्यान्य तावद परमामन युगपषिवकल्पा या सर्वत्रौन्मुख्यूतिता।" अर्थात् सपन्दन क्या है? निस्तरज अर्थाव शान्त, अचसल, निर्विकार परमात्मा परमशिव हो एक साथ जो सर्वत अर्थात् विशवस्प समस्त आकारों में शन्मुख्यपृत्तिता अर्थात उसकी ओर उनमुख हो जाना-वह्ी स्पन्द है। आराय यह कि प्द्दस शिव का अनेकता में आमास ही स्पन्द है। इस स्पन्द के उपचार से 'सामान्य' और 'विशेष' दो रूप माने जाते हैं। 'सामान्यस्पन्द' का रूप है- "परमकारणभूनसष्य सत्यस्य आत्मस्वस्पम्य 'अयमहमस्मि' अरत" सर्वे प्रभवति, अन्नेव च प्रलोयते इति प्रत्यवमर्शात्मको निगो धर्म: सामान्यसपन्द:।" (२४ स्पन्दकारिका विवृति) अर्यात इस जगत् के परमकारणभृत सत्य अपने स्वरूप का-यह मैं हू इसी से सब परभूत होता है, इसी में सब प्रलीन हो जाता है-
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इस प्रकार का जो परामर्श रुप आान्तरिक ज्ञान है-एवता का ज्ञान है-वह 'सामान्यस्पन्द्' है यह उपादेय है। इससे हमें परमशिव की सता दा ज्ञान होता है। यह सदूप है। यही परमेश्वर की मुख्य शकि है। 'विशेषसपन्द' का स्वर्प है-'विशेषस्पन्दाः अनात्मभूतेपु, देहादिपु, आत्मा- भिमानमुद्भावयन्त:, पर स्पर भिन्नमामीय प्रमातृविषया सुसितोहहं दुसितोडइमित्या- दयो मुणमया: प्रत्यवप्वाहा: संसारहेतव."-वही। अरथात 'विशेषरपन्द' अना -- त्मभूत देदादि में अपने अभिमान की उदूभावना करते हुए एक दूमरे से भिस्न मायाजन्य प्रमाताओों के विषयभूत, मैं सुखी हूँ, मैं दुखो है, इत्यारदि सशव, रजस् एवं तमोरूप गुणों से युकु ज्ञान के प्रवाह रूप संसार के कारण हैं। परिणामत: ये हेय हैं। अत. यह सपष्ट हुआ कि यह मामिक जगत 'स्पन्द' के विशेषरुप में उपचरित है। यदपि परमार्यत 'ह्मन्द' वा कोई सामान्य या विशेय रुप नहीं है। इस प्रकार संक्षेप में स्पन्द की निम्न विशेषतायें सिद्ध हुई- (१) 'स्पन्द' शकति वा स्वभाव श्त्मीय भाव है। (२) 'सन्द' शक्ति का धर्म है। (३) 'हन्द' शक्ति का व्यापार दै। (४) 'सन्द' शक्ति का विलसित है। () 'स्न्द' शक्ति का स्वरूप अपना हो रूप है। (६) 'स्पन्द' शक्ति से अभिष है। (७) यह दश्यमान (अनुभूयमान) जगत रप नचिध्य शकिति का स्पन्द हो है। (८) 'सपन्द' राक्ति दा स्फुवितत्व है। हमारे 'साहित्यदर्शन' में 'अर्थ' परमशिवरप में तथा 'बाणी' शिवारूप में अर्थांद् शचिरुप में प्रतिष्टित है-'अर्य. शम्मु: शिवा बाणी'। पस्तुत- वाणो अर्थ से भभिन है क्योवि वाणी तो अर्थरुप हो दै। वाणो की प्रतिष्टा 'परावाक' के रूप में की गई है। उसका स्वरप तन्त्नालोक में इस प्रकार कहा गया है .- 'विति' प्रत्यवमर्शात्मा परा वाकू क्वरसोदिता' अर्मात् परावाक (उत्कष्ा चाणी) चित शक्ति है। पैसी चित् 2 प्रत्यवमर्शातमा अर्यात् चैतन्यावरुप हो है क्योंकि प्रत्यवमर्श चैतन्य का हो होता है। और केमी चिंत्? स्वरसोदिता अरात स्वारस्य, अपनी दी इच्छा (स्वातन्त्र्य) से स्पुरित। आशय यह है कि उसमें स्पन्दन स्फुरण, सपने आप हो होता है। उसका कोई वारण नहीं। यह वाकू उत्कृष्ट अर्य के ही परामशरूप होने के कारण उससे अमिन है। इसी की व्याख्या तन्त्रालोक में श्री अ्रभिनवगुप्तपादाचार्य ने इस प्रकार किया है-
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"इह खलु परपरामर्शसारबोघात्मिकाया परस्यां वार्चि सर्वभारनिर्भरत्वात् सव शासतर परवोधात्मकतर्यवोज्जम्मणं सत-इति।" इस परावाकू के तीन अन्य रूप भी हैं जो वस्तृतः इसके स्पन्द रप हो है। वे हैं- १. पश्यन्ती, २ मध्यमा, और ३. वैखरी। १. पश्यन्ती-दशा से भी वाच्य और वाचक का विभाग नहीं हुआ होता। अत' वाच्य से अमिन होने के कारण उसमें अर्थ रूप आन्तरिक ज्ञान का परामर्श होता रहता है किन्तु वह परामर्श अहन्ता से आच्छादित हो स्फुरित होता है। इसे 'तन्त्रालोक' में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है- "पशयन्तीदशाया वाच्यवाचकविभागस्वमावत्वेनासाधारणतयाऽ प्रत्यव- मर्शात्मकमन्तररेति। अतएव हि तन्न प्रत्यवमशकेन प्रमान्ना परामृश्यमानो वाच्योऽर्योऽहन्ताच्छादित एव स्फुरति।" २ .- मध्यमा-दशा में यह चाकू भिन्ष-भिन्न वाच्य और वाचक के रूप में उल्लसषित होती है। लेकिन भीतर हो, बाहर नहीं। इसमें यह भिन्नरूपता इसलिए आा जाती है क्योंकि इसमें नेय और वेदक अर्थाव् प्रमेय और प्रमाता के प्रपश् का दय हो जाता है । इसे अरभिनवगुस ने इस प्रकार व्यक्त किया है -- "तदनु तदेव मध्यमाभूमिकायामन्तरेव वैद्यवेदकप्रपचनोदयाव, वाव्य५चक्र-
. वैखरी-दशा में यह याच्य और वाचक का भेद अत्यधिक स्पष्ट होकर बात्य रूप में हमारे सामने उपस्थित होता है। जैसा तन्न्नालोक में कहा गया है- 'यद् बहिवैखरोदशाया स्कुटतामियादिति।' वस्नुतः हमारे नित्य प्रयोग में आनेचाली भाषा चाकू का वैखरी रूप ही है। इम प्रकार यह स्पष्ट हुआ कि जिस प्रकार जगद्वेचित्य केवल चित् शक्ति का परिस्पन्दमात्र है उसी प्रकार यह वाच्यवावकवेचित्र्य भी विद्पा परावाक् का परिस्पन्द ही है। स्पन्द और विवर्तवाद
जिस प्रकार प्रत्यमिस्नादर्शन में परमशिव की अपद्वैतता सिद्ध करने के लिए जगत् को मान्द इप माना गया है, उसी प्रकार वेदान्तदशेन में म्रम्म की अरद्वतता के पिद्ु करने के लिए जगत को विवर्तरूप में स्वीकार किया गया है। ५ ष० भृ०
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पारमार्मिक रृष्टि में जगत् को म्न्न से पृथकु सत्ता न वेशन्त हो सवोकार करता है और न परमशिव से धृथक् जगद को सत्ता प्रत्यभिड्ादर्शन ही। लेकिन प्रत्यमि्ादर्शन के अनुसार स्पन्द सत है जब कि वेदान्त का विवर्त भसत। वेदान्त के अनुसार अम्म सत् है और उसका विवर्तसप जगत मिथ्दा- 'बरझ्म सत्यं जगन्मिय्या।' पर प्रत्यमिझाटर्शन के अनुसार परमशिव भी सद, शक्ति भी सत और उसका स्पन्दरूप जगत् भी सत है। जैसा कि 'प्रल्यमिक्ना- हृदय में वहा गया है-"पराशकिस्पा पितिरेव भगवती शति शिवभहवारका- भिस्वा ततदनन्तभगदात्मना स्कुरति"। यहो दोनों का भेद है। स्पन्द और. परिणामचाद जिस प्रकार प्रत्यभिव्ञादर्शन में जगत् शक्ति का स्पन्द है उसी प्रवार साङप के अनुसार जगत् प्रकृति का परिणाम है। प्रकृति हो इस जगत् का कारण है। वह त्रिगुणात्मक है कयोंकि साङृप सत्कार्यवाद को स्वाार करता है। भतः क्योंकि जगत् त्रिगुणात्मक प्रतीत होता है सतः इसको वारणभूत प्रकृति भी निगुप्ात्मक दे। जिस प्रकार शक्ति का स्पं्दरूप जगत् शक्ति से पृथक नहों उसी प्रकार प्रकृति का परिणाम रूप जगत् प्रकृति से पृथकु नहीं, क्योकि बारण हो तो परिणामरप में परिवर्तित हो जाता है। शक्ति भी सत् है, इसका स्पन्द भी सत् है, उसो प्रकार प्रकृति मी सत् है उसका परिणाम भो सत् है। परन्तु सांख्य को प्रकृति जद़ है। वह परिवर्तनशील है, और उममे यह परिवर्तन उससे भिस्न निरपेक्ष, चेतन एवं नित्य पुरुष के दर्शन से प्रारम्भ होता है। परिणामत- इसमें द्वैत की सत्ता स्वीकृत है, जब कि प्रत्यमिज्ञाइर्शन में शक्ति जड नहीं। उसमें परिवर्तन भी नहीं होता। परिवर्तन का हमे वेवल माभास होता है। तथा शकि परमशिव से मिन्ष नहीं। अतः इसमें प्रद्वैत को सत्ता स्वीकृत है। इसके अतिरिक सांस्य रूष की अनेकता स्वीकार करता है जब कि प्रत्यमिज्ादर्शन परमशिव को एकता।
स्पन्द और नैयापिक उत्पत्ति सिद्धान्त जिस प्रकार वेदान्त जगत् को म्रम्म का विवर्तेहुप, सोरूय प्रकृति का परिग्मरूप एवं प्रश्यमिह्ादर्गन शक्रि का रपन्दस्य रवीार करता है उसी
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प्रकार नैयायिक जगत् को परमाणुओं से उत्पन्न मानता है क्योंकि परमाणुओं के परस्पर मिलने से दयणुरु उत्पन्न होता है और दयपुक्तु से सृष्टि की उत्पत्ति होती है। पर साहख्य और अ्रत्यभिज्ञादर्शन दोनों में कारण में कार्य सत् रूपे में विद्यमान रहता है क्योंकि साख्य तो सत्कारयवाद ही स्वीकार करता है और प्रयभिश्ञादर्शन में तो स्पन्द-शक्ति का स्वरप ही हैं, परन्तु न्याय अस्त से सब की उत्पत्ति मानता है जन कि प्रत्यभिज्ञादर्शन में स्पन्द भी सत, राषि भी सत् और परमशिव भी सत् है। स्पन्द और बौद्ध-असत्कार्यवाद बौद्ध दर्शन भी ठोक उसी प्रकार शून्य की सत्ता रवीकार करता है जैसे प्रन्यभिज्ञादर्णन 'ून्यप्रमाता' की। शून्यप्रमीता का लक्षण 'ईश्वरप्रत्यमिद्ञा- कारिका' में इसर प्रकार दिया गया है- "शन्ये युद्धयाधभावात्मन्यइन्ताकर्तृतापदे। अस्फटा रूपतंस्कारमात्रिणि ज्ञेयशून्यता।।" जगत् रुप कार्य का कारण प्रत्यभिज्ञादर्शन भी स्वीकार करता है, र्पन्द का करण परमशिव है। बौद्ध भी सभी कार्यों का कारण शून्य को स्वोकार करता दै। बोद्ध भी शून्य को धमावर््य मानता है, प्रत्यभिज्ञाद्शन भी शून्य को अभावरूप मानता है, पर इनका अरभाव बोद्धों के अभाव से सर्वेया भिन्न है। से पभाव को समहत भार्वो के लग्रस्धान के रूप में सवीकार करते है, जैसा स्पन्द- कारिका में कहा गया है। "अशून्य: शून्य इत्युक्त: शून्यश्चाभाव उच्यते। अभाव: स तु विझ्ेयो यत्र भावा क्षयं गता ।।" साय हो बौद्धदर्शन सभी को 'सर्वे क्षणिक क्षणिकम्' कह कर क्षणिक मानता है जब कि प्रत्यमिज्ञादर्शन परमशित की सत्ता क्षणिक न स्वीकार कर नित्य मानता है। साथ हो बौद्दर्शन 'सर्वमनात्ममनात्मम्' कह कर आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार करता हे जब कि प्रत्यभिकादर्शन परमशिव को आत्मरूप ही मानता दै-जैखा शिवदृष्टि में कहा गया है- "भातमैव्र सर्वभावेसु हफुरलिषृतचहिसुः। भनिरुद्धेच्छाप्रसर: प्रसरदतिक्रय शिवः।।"
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आचार्य कुन्तक द्वारा दी हुई 'वंक्रोक्तिजीवित' की कारिकाओं की वृत्ति में स्पन्द के विभिन्न पर्याय
आचार्य कुन्तक काश्मीरी पे। काश्मीर के शैव दर्शन का उन पर प्रभूत प्रभाव है। 'स्पन्द' शब्द जैसा कि विवेचन कर चुके हैं 'शैवदर्शन' का ही है। इस शब्द का प्रयोग आचार्य कुन्तर ने अपने प्रन्थ 'बकोतिजीचित' में शरनेक स्थलों पर किया है। उनके पत्षिभाग के प्रथम 'मंगलशलोक' के विषय में निर्देश करते हुए हमने कुन्तक की शेय।द्वैत की सत्ता स्वीकृति का संकेत किया या। हमारे इस अभिमत की पुष्टि स्वय बन्तक द्वारा दिये गये स्पन्द के विभिन्न पर्यायों की दारशनिक अर्थ के साथ सज्गति दिखाने पर हो जायगी।
(क) स्पन्द का स्वभाव के पर्याय-रूप में प्रयोग (1) काव्यमार्ग में अर्थ किस रूप का होना चाहिए यह बताते हुए (का० ११९)-'अर्थ: रहृद याहादकारिस्वस्पन्दसुन्दरः' की व्यास्या करते हैं- अर्थश्च वाच्यलक्षणः कोदश काम्ये यः सहृदया: काव्यार्थविदस्तेषामाहाद- मानन्दं करोति यसतेन स्वस्पन्देन आतमीपेन स्वभावेन सुन्दरः सुनुमार इति । (२) स्वभावोकि अलद्वार के खण्डन के प्रसद्ग में ( १।११) 'स्वभाव- व्यतिरेवेण वक्तमेव न युज्यते' में आये 'स्वभावव्यतिरेकेण' का पर्याय देते हैं- स्वपरिस्पन्दं विना निस्वभायं वकममियातुमेव न युज्यते न शक्यते इति। • (३) आजे इसी प्रमण् में आयी हुई (११४) 'भूष गत्वे स्वमावस्म विहिते भूषणान्तरे में भाये हुए 'स्वभावस्य को व्याख्या करते हैं-भूषणत्वे स्वभावस्य अलद्धारत्वे स्वपरिस्पन्दस्य इति। (४) इसके अनन्तर विचित्रमार्ग का लक्षण करते हुए (१४१) 'स्वभाव सरसाकतो भावाना यत्र बध्यते में आये स्वभाव का पर्याय देते है-"यत्र यस्मिन् भावाना स्वभाव: स्वपरिस्पन्द सरंसाकूती रक्ष निर्भराभिप्राय इत्यादि।" ('x) तदनंतर शोचित्य गुण का स्वरूप बताते हुए (१।४४) 'आच्छायते स्वभावेन सद्प्योचित्यमुच्यते।' में आये हुए स्वभाव की व्याख्या करते हैं- 'यन्न यश्मिन् वरुरमिधातुः प्रमातुरना धोतुर्वा स्वभावेन रवपरिस्पन्देन वाध्य. मभिधेयमित्यादि। . (६) आागे चल कर उत्परेक्षा अलद्वार के एक भेद का निरूपण करते हुए पृ .. ) 'प्रतिभासातया षोद: स्वस्पन्दमदिमोचितम' में आाये स्वस्पन्द्मदिमो
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चितम का मध्यान करते है-"तस्य पदार्थस्य या स्वस्पन्दमहिमा स्व-
इस प्रकार इतने निदर्शनों से यह बात स्पष है कि इन स्यलों पर कुन्तक ने स्वमाद के पर्यायरूप में स्पन्द का और स्वभाव का स्पन्द के पर्यायरूप में प्रयोग किया है। (स) स्पन्द का धर्म के पर्याय-रूप में प्रयोग (१) रूढिवे चित्यवकता के लक्षण प्रसद्ध में (२८)।
सद्धर्मातिशयारोपमर्भतव या प्रतीयते।' में प्रयुक्त 'धर्म' शब्दों का पर्याय देते हैं-(१) यत्र यस्मिन् विषये रूढ़ि- शब्दकष्य असम्भाव्य सम्भावयितुमशक्यो यो घमः कश्चित् परिस्पन्दः तस्या- ध्यारोप-इत्यादि। तमा (२) 'संघासी ध्मव सद्धर्म: विद्यमान: पदार्थस्य परिस्पन्द:। (२) अगे 'भतिशयोकि' अलद्गार का लक्षण देते हुए (श२९।) यत्यामतिशयः कोऽपि विच्छिन्या प्रतिपायते। वर्णनीयस्य धर्माणां तद्िदाकाददायिनाम्॥ में आये 'वर्णनीयस्य धर्माणाम्' का पर्याय देते हैं-'प्रस्तावाधिकृतस्य पस्तुन: स्वभावानुमम्बन्धिनाम परिस्पन्दानाम्।" (३) तथा उपमालद्वार का निरपण करते हुए (श१८) 'विवक्षिद्- परिस्पन्दमनोद्ारित्वसिद्धये में आाये परिस्पन्द की न्यास्या करते हैं-'पिवक्षितो वफ्तुममिप्रेतो योऽसी परिस्पन्द: कश्विदेव धर्मपिशेष:।' (४) तया जैसा इम पहले दिक्ा आाये हैं कि स्पन्द के पर्यायरूप में उन्होंने स्वभाव का अनेकश प्रयोग किया है। एकत्र वर्णनीय वस्तु का विषयविभाग करते हुए (२) *भावानामपरिम्लानस्वभावौचित्यसुन्दरम्।' में आये का स्वभाव का अर्प करते हैं-अपरिम्लानः प्रत्यभमरिपोधपेशलो य स्वभाव"पारमार्थिको धर्म- स्तस्येत्यादि।' इन निदर्शनों से हपष्ट है कि इन मिभिन्न स्यलों पर कुन्तक ने धर्म के वर्ाय र्प में स्पन्द तथा सु्पन्द के पर्याय रूप में धर्म का प्रयोग किया है। (ग) परिस्पन्द का व्यापार के पर्याय-रूप में प्रयोग (1) काम्य का प्रयोगन बताते हुए ( १४)।
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सत्काव्याधिगमादेव नृतनोचित्य माध्यते॥ में प्रयुक्त परित्पन्द की व्यास्या करते हैं-'व्यवदारो लोकश्सम् तस्प परिहंपन्दो व्यापारः क्रियाकमलक्षणस्तस्य सौन्दर्यमित्यादि। (९) तया शाब्द और प्रतीयमान दो प्रकार के व्यतिरेकालक्वार के निरपण के अनन्तर तीसरे प्रकार के व्यतिरेक का निम्पण करते हुए (श३६)। 'लोरुप्रसिद्धसामान्यपरिस्पन्दाद् विशेषत'।' व्यतिरेको मदेषस्य स परस्तदि्षवक्षया।। में आये परिस्पन्द् का वयख्यान करते हैं-'लोकपसिद्धो लगन्प्रतीत' सामान्य भूत सर्वसाधारणो य: परिस्न्द्र: व्यापार तस्मादिति। इन सद्धरणों से स्पष्ट है कि यहों पर उन्होंने परिस्पन्द का व्यापार के पर्यान रूप में प्रयोग किया है। (घ) स्पन्द का विलसित के पर्याय-रूप में प्रयोग (१) प्रन्थ के धारम्भ में हो अभिमत देवता के प्रति नमस्कारात्मक (११) 'वन्दे
में आाये सूकितिपतिस्पन्द की व्याख्या करते है-'सूत्तिपरिस्पन्दाः सुभाषित- विलममितानि'। (२) तदनन्तर प्रतययवकता के दूमरे भेद का निरूपण करते हुए (२१८) 'भागमादि परिष्पन्दपुन्दर: शब्दवकताम्'। पर: कामप पुष्णाति बन्धच्छायाविषामिनीम् ।।' में आाये परिस्पन्द का म्या्यान करते हैं-'भागामी सुमादिरादिर्यस्य सं तयोक- स्तस्यागम: परिस्पन्द: स्वविलसितं, तेन सुन्दर सकुमार:। एस प्रकार हम देखते हैं कि इन रपलों पर कुन्तक ने परिस्पं्द क्ता प्रयोग विलसित के पर्याय रूप में किया है। (ङ) परिस्पन्द के पर्योय रूप में स्वरूप शब्द का प्रर्योग वर्णनीयवस्तु का विषयविभाग करते हुए (३४) -* 'चेतनानो जडानाघ स्वरूर्प द्विविधं स्वृतम्' में आाये 'सवर्पम्' का पर्याय देते हैं -- "मावानो वर्ण्य- मानदूतीर्ना स्वरूप परिस्पन्दः।" यहाँ निषय दो स्वरूप स्पन्द के पर्याय रूप में प्रयुक हुआ है। (च) परिस्पन्द का स्फुरितत्व अर्थ में प्रयोग . सौमान्य गुण का विवेचन करते हुए कि वह गुण किस प्रकार का सम्पादित करना चाहिए कुन्तक (१५६)
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"सर्वसम्पत्परिस्पन्दसम्पादयं सरसात्मनाम्। अलौकिकचमत्कारकारि काव्येकजीवितम्।।" में आये परिस्पन्द का व्याख्यान करते हैं-सर्वस्योपादेयराशेयां सम्पत्तिरनवद्य ताकाछा तस्या परित्पन्द स्फुरितर्त्वं तेन सम्पाद निष्पादनीयम्।' य हाँ स्पष्ट हो परिस्पन्द का प्रयोग स्फुरितत्व के पर्गाय रूप में हुड्र है।
स्पन्द के दार्शनिक अर्थ के साथ कुन्तक द्वारा दिए हुए अर्थों की सङ्गति
'स्पन्द' के कुन्तक द्वारा किए गए विभिन्न शन्दों के पर्याय रूप में प्रयोगों का विचार करते हुए इमने देखा कि उन्होंने 'स्पन्द' या 'परिस्पन्द' का प्रयोग मुख्यत- (१) समाव, (२) धर्म ( ३) उयापार, (४) विलसित, (५) स्वरूप तथा (६) सफुरितत्व के पर्याय रूप में किया है। उनके ये सभी प्रयोग 'स्पन्द' के दाशनिक अर्थों से पूर्णत समत हैं। क्योंकि -- (१) स्पन्द वस्तुत रत्ति का स्वभान ही है। जैसे हृदय का स्पन्द हृदय का स्वभाव ही होता है, अन्यथा स्पन्द की समाप्ति पर भी हृदय की जोवित सता होनी चाहिए, पर ऐसा होता नहीं। अतः सिद्ध हुआ कि हृदय का स्पन्द उसका स्वभाव ही है। इसी प्रकार शल्ति का रपन्द भी उसका स्वमाव ही है। अत कुन्तक का स्पन्द का स्वभाव के पर्याय रूप में प्रयोग भसन्तत नहीं। (२) इसी प्रकार स्पन्द का धर्म के पर्याय रूप में भी प्रयोग असम्नत नहीं क्योंकि स्पन्द धर्मरूप हो है। जैसा कि इमने पहले सिद्ध किया है और जैसा कि 'स्पन्दकारिका' को प्रथम निकाय की प्रथम कारिका को ही व्यख्या में श्रीराम कण्ठावार्थ लिखते हैं -- "हपन्दशब्द्धायं स्वस्वभावपरामशमात्रस्य नित्यस्य शून्यतान्यति रेचनकारणभूतस्य तावन्मान्नर्सरम्भात्मनः शक्त्यपराभिधानस्य पार- मेश्वरस्य धमस्य किमिच्चलनात् स्पन्द इति"। इससे रपष्ट है कि स्पन्द संज्ञा किशिच्चलन रूप धर्म के कारण हो दो गई है। अतः कुन्तक का यह भी प्रयोग दारशनिक अर्थ से सर्वथा सज्गत है। (३) स्पन्द का व्यापार के पर्याय रूप में भी प्रयोग असंगत नहीं, क्योंकि स्पन्द व्यापार ही है। जब स्पन्दन दोता हे तो वह स्पन्दन रूप किया व्यापार ही तो होती हे क्योंकि व्यापार कियाकमलक्षण हो तो होता है, और जैसा अभी हमने ऊपर दिखाया है कि -- "पारमेशरस्य धर्मस्य किभिर्चलनाव स्पन्द।" स्पष्ट है कि किमिच्चलन म्यापार से मिन्न नहीं।
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(४) जैसा हमने पइले सिद्ध किया था कि यह जगद वस्तुत' शक्ति का ही विलसित है, साथ हो जगत् स्पन्दरूप ही है। भतः विलसित और स्पन्द पर्याय हुए। इस लिए सपन्द का कुन्तक द्वारा विलसित के पर्याय रूप में प्रयोग भी सङ़त ही है। (x) रपन्द का स्वरप अर्य में भी प्रयोग असह्त नहीं क्योंकि शफ्ति का स्पन्द शक्ति का स्वर्प ही होता है। उससे भिन नहीं। जैसे चिड़िया के डैनो में स्पन्दन हुआ और चिड़िया के पंखे कुछ फूल आए तो चिड़िया अपना रूप बदल कर हाथी तो नहीं हो जाती। अतः सिद्ध हुआा कि स्पन्द स्वरूप हो होता है। ('i) स्न्द स्फुरित्व रूप तो होता ही है क्योंकि स्फुरितत्व के कारण हो तो यह स्पन्द कहा जाता है। जैसा व्युत्पत्ति से हो ज्ञात है क्योंकि स्पन्द की निष्पत्ति 'सपदि किमिच्चलने' धातु से होती है -- 'स्पन्दनात् स्पन्द-।' अतः यह सिद्ध हुआ कि कुन्तक द्वारा प्रयुक्त स्पन्द के सभी पर्याय स्पन्द के दार्शनिक अर्थ से सरमया सम्त है। तनका 'वकोफिजोवित' जैसे साहित्यप्रंय को व्याख्या में इस प्रकार प्रयोग उनकी शेवाद्वित को बहुत भड़ी पहुँच का परिचायक है, इसमें कोई संशय नहीं रह आाता।
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मस्तुत संस्करण का महत्त्व
प्रस्तुत प्रन्थ 'बकोकिजीवित' को सर्वप्रथम डा सुशीलककमार दे ने सन् १९२२ में सम्पादित किया जिसमें उन्होंने केवल दो उम्मेषों को सम्पादित किया था। तदनन्तर इसका द्वितीय संह्करण तन्हांने १९२८ में प्रकाशित किया। उसमें उन्होंने पहले के प्रकाशित प्रन्थ से आगे तृतीय उन्मेष के कुछ अश को सम्पादित किया। साय ही इसके आगे के शेष भाम का जिसे कि वे पाण्डुलिपि के अत्यन्त भ्रष्ट होने के कारण पूर्णतः सम्पादित करने में असमर्य थे, केवल संक्षिप्त विवेचन दी प्रस्तुत किया। इसका तृनीय संत्करण पुनः सन् १९६१ में प्रकाशित हुआ। इसमें द्वितीय संस्करण को अर्पपेक्षा कोई परिवर्धन नहीं हो सका। दो उन्मेष और तृतोय का कुछ अंग सम्पादित या, उपके आगे के शेष भाग का संक्षित्त विवेचन प्रस्तुत किया गया है। डा० डे द्वारा सम्पादित 'बक्तेकि जोवित' के इन तोन संसकरगॉ के अतिरिक डा० ममेन्द्र ने आचार्य विशवेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि की हिन्दी व्याख्या एवं अपनो भूमिका से संवलित 'हिन्दी वक्रोकिजोवित' नामक अन्थ 'हिन्दी अनु- सन्घान परिषद् अ्रन्यमाला' की ओर से सन् १९४५ में सम्मादित किया। क्योंकि हमने 'संस्कृत काव्य शास्त्र में वक्ोकि-सम्प्रदाय का उद्दभव ओर विकास' नामक विषय पर शोषकार्य करना प्रारम्भ किया, फलत हमें साहित्य शास्तर के अन्य अन्यों के साथ हो साथ 'वकरोफिनेविन' के विशेष अध्ययन करने का अवमर प्राप हुया। इस प्रन्य का अध्ययन करते समय हमने डा० डे. के सृतीय संस्करण एवं डा० नगेन्द्र के प्रथम संहकरण दोनों का सहारा लिया। जहां तक टा० डे• के संस्करण की बात रही उससे तो हमें पर्याप्त सहायता प्राप्त हुई। क्योंकि जितना अंश मम्पादित या उससे अतिरिकत भाग का कम से कम संझषिप्त विवेचन उपलब्ध था। वहाँ उन्होंने मूळ पाण्डलिपि के स्थान पर अपनी ओोर से पाठ परिवर्तित किया था वहाँ पाण्डुकिपि के पाउ को पादटिप्पणी में ययातय रूप में उद्धृत कर दिया था। इसमे पाठों के विषय में अपनो ठळझनें सुकझाने में पढ़ी सहायता प्राप्त हुई। परन्तु डा नगेन्द्र एवं भाचार्य विश्वेश्वर जी ने जिस चकोकिशीवित को प्रकाशित किया उसका कया आामार था। इसका उन्होंने कोई निर्देश नहीं किया। जेसा कि महामहोपाध्याय डा पाण्ड्रतवामन काणे ने उसके विशय में लिखा है :-
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"An excellent edition of the four Unmesas of the Vakrolti- jivita, with a modern Hindi commentary by Acarya Viswe- svara and exhaustive Introduction in Hindrhas been published recently by Dr. Nagendra of the Delht Umiversity. Thereare, however many misprints and it is not clear on which mws or editions the text is based." ( H. S. P fn I. P. 215-6) महामद्ोपा ्याय जी का यह कयन पूर्णत सत्य है। इमें तो अ्रन्य के कतिपय अंशों को देखवर यही समय में आाता है कि आाचार्य जो के संस्करण का आधार दा० डेका संस्करण हो है। अस्तु, आचार्य जी के संस्करण का सूच्म दृष्टि से अवलोकन करते समय पाठ- भेदों तया व्यास्या में अनेक विसंगतियां देखकर चित्त बहुत भिन्न हो गया। अपने परमशद्वेय गुर्वर डा. लालरमायदुपाल सिंह जो, एम० ए०, एल एन० बी. डो० फिल, साहित्याचाय, साहित्यरत्न, प्रबत्त संस्कृतविभाग, प्रयाग विश्व- विद्यालय से अपने चित कौ उलझन निवेदित की तो उन्होंने आदेश दिया- "तुम स्वयं इस प्रन्थ का रूपान्तर हिन्दी में कर डालो। इमसे श्रंय भी तुम्हारो समझ में मा जायगा और उसे जब प्रकाशित करवा दोगे तो घह हिन्दी के सद्दारे संस्कृत के विषय को समझने वाले लोगों को वकोकिजीवित के सही विषय - का ज्ञान प्राप्त कराने में पर्याप्त सहायक सिद्ध होगा।" गुरु जी के आदेशानुसार इमने इसका हिन्दी रपान्तर किया। हमारे रूमान्तर का माधार पूर्ण रूप से डा० हे कृा संस्करण है। हमने जहोँ कही भी उसमें परिवर्तन किया है वह बा० डे द्वारा वद्धृत पादटिप्पणियों के सरधार पर ही। इसके लिए हम डा साहय के हृदय से आमारी हैं। यदपि ड. साहय का संस्करण बहुत हो विद्वत्तापूर्ण ढंग से सम्पादित किया गया है, फिर मो यत्र तत् बुछ पाण्डुलिपि के अंश अ. साइव के ध्मान में संगत न लगे होंगे जिनके स्थान पर उन्होंने सपनी धोर से पाठ दे दिया है। उनमें से वो अंश हमें यहाँ सकत प्रतीत हुए उनका इमने पाठ मूल पाण्दुलिपि के आधार पर परिवतित कर दिया है। मैसे हमारी योजना इस म्रन्थ के पूर्णस्प में प्रकाशित करने की है। यदि भगवत्कृपा रही तो हमें भाशा है कि हम इस कार्य को करने में सफल होंगे। प्रस्तुत प्रन्थ का रूपान्तर हमने डा डे द्वारा दिये गये मूल एवं एवं उनके तृतीय तभा सगुर्य सम्मेष की Resume में किए गए निर्देशों के आपगर पर किया है। भूमिका में हमने आाचार्ये इन्तक के काल के विवय में तथा उनके सैषादेत के
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सम्बन्ध के विषय में मौलिक चिन्तन प्रस्तुत किया है। इमने यह सिद्ध कर दिया है कि कुन्तक अभिनव से पूर्ववर्ती थे। इस पुस्तक के रूपान्तर करने में हमें हमारे पूज्य गुरुवर डा० सिंह जो से बहुत सहायता मिली है। इसके लिये उनके प्रति आभार प्रकट करना शब्दों द्वारा सम्भव नहीं। यह जो कुछ हमने किया सब उन्हीं की कृपा का प्रसाद है। हमारा रपान्तर पूर्णतः निरवदय है, यह कहना तो बिल्कुल असत्य को सामने लाना होगा क्योंकि यह हंमारा पहला प्रयास है और वह भी 'बकोकि जीवित' जैसे शात्त्रोय अ्रंथ का रूपान्तर करने का। इमारी समम में सभी स्थल पूर्ण रूप से सहो दंग से आ हो गए हैं यह कह सकना कठिन है। किर भी जहों तक हूम इसे समझ सके हैं विद्वानों के समक् प्रस्ुत कर रहे हैं। आाशा है कि विद्ज्जन अशुद्धियों के लिए क्षमा करेंगे। यदि इससे संस्कृत साहित्य का अध्ययन करने बालों को दुछ भी लाभ हो सकेगा तो हम अपना प्रयास सफल समझेंगे और यदि अवसर मिला तो दूसरे ससकरण में इसमें हम यथासम्भव संशोधन और इमकी विस्तृत व्यार्या प्रस्तुत करेंगे।
स्थान ४०२ मालवीय नगर विनीत
इलाहाबाद राधेश्याम मिश्र
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विषयानुकमणिका
प्रथम उत्मेप सुकुमार मार्ग के खुपे १३
सृत्िगत मझष्लाचरण 1. माधुय गुग कुम्तक और कश्मीर मौपागम २. प्रसाइ गुण भग्य की उपादेयता ३. हायण्य गुण कारिकागत मकछाघरण ५ ४. भाभिजाव्य गुण 116 ग्रन्थ के समिधान, अभिधेय और प्रतीपमान वस्तु और सावण्य प्रयोजन का भेद १२०
काव्य के प्रयोजन 1० विचिन्न मार्ग का स्वरूप काउपतापनिरूपण विचिनन माग के गुण कारय का सामान्य लक्षण १. माधु्य गुण 1४२
काव्य का विशेष लष्षण ३३ २. प्रसाद गुण का प्रथम प्रकार १४३ काव्य में शब्द और अर्थ का सवरुप ३४ प्रसाइ गुण का द्ितीय प्रकार 1४४ चक्रोकि दी पुकमात्र अलद्वार ३. लानपय गुण 1७५
स्वमायोकि की अलक्कारता का 2. झामिजाध्य गुण खण्ड न ४९ मध्यम मार्ग का स्वरुष 1४९ शब्द और अर्थ का साहित्य मध्यम मार्ग के गुणो का उदाहरण 1५1 कविष्यापार वकता के छः प्रकार ६२ मार्गानुसतारि कवियों एवं कार्व्यों का वर्णषिन्यासवकता दिक्प्रदशन पदपूर्वादवक्रता के प्रकार तीनों मार्गो के साधारण गुण प्रत्ययात्रितवक्रता के प्रकार ८० 1. लोपिश्य तुण का प्रयम बावथवफ्रता ८६ प्रकार 14$
प्रकरण वककसा ८२ सौप्वितय गुण का द्वितीय प्रकार १५८ मगन्धवक्रता २ सीभाग्य गुण 1६०
काम्पबन्ध का स्वरूप १३ साधारण गुणो का विषय सदिदाहादकारिरया का निरूपण १४- काछिदास के काव्यों में अमोचित्यं का:4 के न्रिविध मार्ग का मदुर्शन १६३ वैदर्ी अधि नीतियों की देशविशेष उपमंडार समानयता का मिराकरण रीतियों के सारसम्य (उत्तम.मध्यम- द्वितीय उन्मेष
और अघम माव) का निराकरण १८- वर्णों की संक्या के आमार पर कविस्वभावमेद से मार्ग भेद का वर्णविन्यासवकता का न्ेविष्य 101 निरूपण वर्शों के स्वरप के आधार पर वर्ण- सुकमार मार्ग का स्वरूप बिन्यासवळता का नैविष्य १0%
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७० )
वर्ग विन्यासवकता का पमकाभास तृतीय इन्मेप रूप दैचिम्य मसतुवकता का प्रथम भेद पर्नविम्पासबकता की विशेषताय १८५ स्वमाचोलि की अषकारता का वर्णविन्यासवकता तथा भृषियों पुम सण्डन की परुरूपता 1८८ वस्तुवमता का द्वितीय भेद यमक-वर्तषन्यास वकता का ही एक प्कार पद्पूर्षोदंवकता वर्णनीय वस्तु का पेतम औीर जड
(क) रुदिव चिभ्यवकता रूप में द्विबिष विभाजन १९१ १९३ (ख) पर्यामवक्तो सेतनों का प्रभान और गौग रूप २०० पर्यापदक्रता और शष्डपिमूला में ड्िविध विभाजन
नुरणनरूपष्यक पदाचनि या प्रधान और गौट वेतनों का काम्म
पास्मच्नि २०९ नें वर्णनीय स्वरूप २१८
(ग) उपचारवकता ११३ गौण पेतमों एवं जरों का काम्य में
(घ) विशेषण वकता २२४ दर्णनीय स्वरूप
(र) सद्कतिवळता २२० कार्प में वर्णमीय पदायों के सबस्सो
(घ) पदमध्यान्तभूंत प्रश्यप का उपसंदार
वकता का प्रथम पकार रेर दूर्वाचार्यों द्ारा अमिमत रसवद
उसी का द्वितीय प्रकार २३४ हटार की बहडारता का
(छ) घूतिवेषिभ्यवकना २३५ निशकरण
(प) भाषसचिभ्पवक्ता २१८ ध्वनिकारडाा शमिमत रसबद्
(स) हिद्ूवे विग्यवकता का ही अषडटारता का निराकरण ११८ प्रेपस को जलशरता का निराकरण रेश प्रथम परहार १३९ उसीका दितीय प्रकार कर्जस्त और उदास ही अलदारता का निशाकरण ३२ उसीका तुतीय प्रकार २५२ (अ) र्ियावेचिग्पपक्रता दिविम समाहित की अलकारता का निशकरण (५ भेद) २४५ कुंतकाभिमत रसवद्सक्ार पदपराधवकता २५४ (क) कालवे चिम्ववकता पूर्वाचायों द्वारा अमिमत सोएक की २५४ भलक्कारता का निशाकरण (ख) कारकपकता कुम्त कामिमत दोपकालहार ३४२
(ग) सडूकपावकना २६. केवल और पंरिसंस्यदोपड (घ) पुरणवकना माकारीपक (र) सपयह बाना २६३ दीरित दीपक ३४८
(त) अपयचिहित मापय दीपक में अभिसत किया और वस्तु २r९ २६५ रुपक बछकूर . १५० उपसर्गनिपालजनित पदचकता २६६ समसाषापुठिषचक रूपक विविध वकताओं के सहयोग एकदैशविवर्ति रूपक से खनित चिष्णद्धामाषिदिम्य २१९ मतीयमान रूपक उपसंदार सप्रस्तुतमसंसा रसद्ूार
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( श)
मके पाच प्रकार ३५७, ३५८ संसृष्टि के उदाहरण पर्यायोकत अलद्ार ३५९ सद्कर के उदाहरण ४०५
प्याज्सुति के उद्ावरण ३६१ अम्य अलद्टारों की अळक्कारता का
तपेजा मकहार ३६१ निराकरण ४०६
नाप्ेचा का सन्य प्रभेद ३६५ यधामहय की अलक्गारता का
अतिशयोकि अरुद्वार निरकरण
उपमा सलझार ३६९ आशी: की सलझाता का सण्टन ४०७ प्रतिवातूपमा का उपमा में क्षन्त- विशेषोंकि की अल द्वारता का संन ४०८ ३७६ हेतु, सूचम और लेश की मकझारता उपमेयोपमा का उपमा में अ्रन्त- का निराकरण ४०८
र्भाव ३७७ उपमारूपक की अषक्ारता का तुर्ययोगिता का तपमा में क्षन्त- निराकरण ४०५
र्मा ३७७। उपसंहार अनन्वय का उपमा में अन्तर्माव ३७१. निदर्शना का उपमा में अन्तर्माब ३८७ चतुर्थ सन्मेप
परिवृत्ति का उपमा में अन्तर्माव ३६२ प्रकरणचक्रता का प्रथम प्रकार रलेपालङ्वार के उदाहरण ३८५ द्वितीय प्रकार ४1० स्यतिोेक अलङ्वार ३८७ तृतीय मकार व्यतिरेक का द्वितीय प्रकार ३९० ससुर्थ प्रकार विरोध का रवेप में अन्तर्माध ३१! पद्म पकार १२८
समासोकि की अलसारता का पछ प्रकार ४३०
निराकरण ३११ सतम पकार ४३२ पूर्वाचार्यों द्वारा स्वौकृत सडोकि का अष्टम प्रकार 1T उपमा में अम्तर्भाव ३९२ 11 नवम प्रकार कुन्तकामिमत सहोकि सलक्कार ३९३ पनत्वषकता का प्रयम प्रकार रशन्त महहूार ३९७ द्वितीय प्रकार अर्थान्तरन्यास भलद्वार वृतीय प्रकार आधेप अलहार ३१९ सतुर्थ प्रकार इस4
विनापना अकदार DDR 11 पश्म प्रकार सन्देह भलद्वार वष्ट प्रकार अपहु ति मलद्वार सस म प्रकार EDR
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श्रीमद्राजानककुन्तकविरचितं वक्रोक्तिजीवितम् हिन्दीव्याख्योपेतम्
नथमोन्मेष जग स्वितयवै चित्रयचित्रकर्मविधायिनम्। शिवं शक्तिपरिस्पन्दमात्रोपकरणं सुमः ॥१॥। आचार्य कुन्तक अपने ग्रत्थ 'वकोकिजीवित' की कारिकाओं की मृत्ति लिखते समय, ग्रन्थकारो की परिपाटी का अनुसरण करते हुए, ग्रन्थ के आा रम्भ मे इस ग्रन्थ की निविघ्न परिसमाति के लिए आदि मे अपने अभिमत् देव परमशिव की वन्दना करते हैं- शक्ति के परिसपन्दमात्र उपकरण (सामप्री) वाले, तोनो लाको के वैचिम्य रूप चित्रक्मे का विधान करने वाले शिव (परमशिव) को हम नमस्कार करते हैं। ? ॥ टिप्पणी :- उक श्लोक द्वारा ग्रन्यकार ने परम शिव की वन्दना की है। आचार्मे कुन्तक कश्मीरी मे । कश्मीर शैवागम (प्रत्पभिज्ञादर्शन) के अनुयादी मे। उक्त पद्य मे उन्होंने शिव, शक्ति, परिस्पन्द एव जगत शब्द का उपादान किया है, जिनका सम्बन्ध शैवागम से है, तथा इस प्रन्थ मे 'स्पन्द' अथवा 'परित्पन्द' का तो अनेकश प्रयोग किया है। अत" इस पद्य का अर्थ समझने के पूर्व यह जानमा अत्यावश्यक है कि शैवागुम मे इन शब्दो का वधा अर्थ है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन के अनुसार एकमात्र परमतत्व 'दरम शिव' (शिव) है जो अनृंत, निर्विकार एव सच्चिदा नन्द स्वरूप है। इस अनुभूवमान जगदवचित्रय को वह अपनी शकियों द्वारा उद्धावित करता है। उसकी शक्तिया यद्मपि असख्य हैं फिर भी मुख्य रूप से वह पाँच शक्तयो (चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और किया) पर निभेर रहता है। शक्ति औौर शक्तिमान् मे बभेद होता 4
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२ वकोक्तिजीवितम्
है. जसे अग्नि वपनी शक्ति दाहकत्व से अभिन्न है। अत शिव का घक्ति से अभेद सिद्ध हुआ। परम शिव इन्ही पाँच बक्तियो के द्वारा जगतपक्ष को स्फुरित करता है। अर्थात् जयी जब यह इच्छा होती है कि 'मैं एक से अनेक हो जाऊ तो उसकी शक्ति मे त्पन्दन किया होती है। इस प्रकार शक्ति मे कुछ-कुछ परिस्करण होता है जो किस्विच्चलन के कारण 'स्पन्द' वहा जाता है। यही शक्ति का 'स्पन्द' ही वस्तुत जगत् है। यह 'स्पन्द' शकति से अभिन्न होता है बयोकि वह उसका स्वभाय, स्वरूप, एव धर्म ही तो होता है। जैसा कि 'प्रत्यभिश्ञाहृदय' मे कहा गया है-'दराशतिरूप चितिरेव भगवती शक्ति शिवभट्टारकामित्रा ततदन्नजवदात्नना स्फुरतीति।' इस प्रकार शक्ति, शिव मे अभिम्न है एव स्पन्द (जगत्) शक्ति से अभिन्न, अत शिव से जगत् अभिन्न हुआ। अत एव शंवागम वेवन परमशिव की ही (अद्ंत) सत्ता स्वीवार करता है। इस जगद्वचिम्म बा उसमे ठीक उसी प्रकार आभास होता है जैसे कि मसूर के अण्डे के भोतर रहुनेवाले एकरूप तरल पदार्घ मे मयूर के बढ़े हो जाने पर उसके रंगवचिन्न्न का आभात होने लगता है। परमारपत वह रङ्ग्वचिध्य उस एकरूप तरत पदार्थ का ही स्वरूप होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया कि इस जगततयरूप चित्वकर्म के 1
विधायक शिव ही है एव इस चिन्रकर्म के लिसे उनकी शक्ति का परित्पन्द मान ही उपकरण है। उन्हें अन्य उनकरण को आवश्यकता नही । इसी लिये दूसिकार ने उन्हे 'शक्तिपरिस्पन्दमायोपकरण' कहा है। इस 'हपन्द' को हम निम्नप्रकार से भी प्रकट कर सकते हैं .- (क) 'स्पन्द' शक्ति का स्वभाव (मात्मीय भाव) ही है। (घ) 'स्पन्द' शक्ति का धर्म है। (ग) 'र्पन्द' शक्ति का व्यापार हैं। (थ) 'स्पन्द' शक्ति का वितसित है। (ड) 'सपन्द' शक्ति का स्वरूप (अपना ही रूप) है। (च) 'रपन्द' शक्ति से अभिन्न है। (ए) 'स्पन्द' नक्ति का स्फरितत्व है। (ज) यह दृश्यमान (अनुभूयमान) जगदूप * बंचिन्न शक्ति का 'स्पन्द' ही है। हमारे साहित्य दर्शन मे अर्थ को शिवरूप मे एव वाणी को उनवी शक्तिरूप मे स्वोकार किया गया है-'अर्थ शम्भू शिवा वानी'-इति। +
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प्रथमान्मेष. ३
इस वाक के ४ ह (या स्वन्द) है-परा, पश्यन्ती, मध्यमा एव वँखरी। उनमे 'परा वाक' शित की चित् शक्ति के रूप मे स्वीकार किया गया है-'चिनि प्रत्यवनशतिमा परा वाक् स्वरसदिता'-नन्वालोक : यह परा वाक् स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी इच्छा से स्फुरित होती है। अन्य तीन पश्यन्त्ी, मध्यमा और वैखरी इनके स्पन्दरूप में ही है। वस्तुत हमारे प्रयोग मे वाक् का वँखरी रूप ही आता है। जैमा कि हमने बताया है परा वाघ्रूप शक्ति का स्पन्द होने के कारण वह वेखरी रूप उमसे अभिन्न हुआ। कविकमे रप काव्य हमारे सामने जपने वैखरीस्प मे ही आता है। अत कवि उसमे जितना भी वैचित्रय सम्वादन करना है वह 'परावाक' के स्पन्द रूप मे ही होता है। इसीलिमे आचार्य कुन्तक ने काव्वलक्षणग्रन्थ 'बकोक्तिजीवित' में काव्य-विषयक विचार करते समय 'स्पन्द' या परिस्पन्द शब्द का मनेकश प्रयोग किया है और जैमा कि हुम ऊपर सिद्ध कर चुके हैं स्पन्द का प्रयोग प्राय उपर्युक्त स्वभाव, धर्म व्यापार, विलसित स्वरूप एवं स्फुरितत्व आदि के पर्याय रूप मे ही हुआ है। यथातत्वं विवेच्यन्ते भावास्त्रैलोक्यवर्तिनः। यदि तन्नानुतं नाम दैवरक्ता हि किझुकाः ॥२॥
इसके अनन्तर कुन्तक अपने प्रमत्न की उपादेयता को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि-
त्रिलोकी मे स्थित पदार्यों का यदि सथातथ्य रूप मे विवेचन किया जाता है तो उसमे अद्भतता नहीं होगी क्योकि किशुक तो स्वभावत लाल हुआ ही करता है (अत यदि कवि यह वर्णन करे कि किशुक लाल होता है तो उसे हम अद्भुत न होने के कारण साहित्य या काव्य नही कहेंगे) ।। २ ।। स्वमनीपिकचैवाथ तत्त्वं तेपां यथारुचि। स्थाप्यते भौदिमात्रं तत्परमार्थो न ताहश ॥३॥
साथ ही यदि (कवि जन) स्वतन्त्र रूप से ( यथारुचि) उन पदार्थों के तत्व का निरूपण केवल अपनी बुद्धि से ही करते हैं ( वास्तविकता का पूर्ण परित्याग कर देते हैं) तो वह वेवल प्रौदि हो होगी कयोकि (उन पदार्थों का) तत्व उस प्रकार का नहीं होता है। (भाव यह कि यदि कोई कवि बश्द का वर्णन करते हुए कहे कि उसके चार सोगे, बाठ पर होते हैं तो वह भी साहित्य या काव्य मही होगा भयोंकि वह वास्तविकता से सबथा परे है) ॥३॥
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इत्यसत्तर्कसन्दर्मे स्वतन्त्रेऽप्यकृतादुरः।
येन द्वित यमप्येत सत्व्र निमितिलक्षणम्।
अत इस प्रकान के असत् तके के सन्दर्भ वाले स्वतन्त्र मे श्रद्धा न रखने हए मैं साहित्य के'अर्प रूप अमृत के सागर के सार (या परमार्थ) बा उन्मीलन करने जा रहा हूँ, जिससे कि तत्व और निमित रूप यह द्वितीय साहित्य म्मज्ञो के अद्भुत आनन्द व चमत्कार को उत्पन्न करेगा ।। ४-॥ टिप्पणी-कुन्तक ने यहाँ पर काव्यविषयक दो मतो का प्रतिपादन - किया है। प्रथम मत के अनुसार काव्य मे भी (शास्त्रादि की भाति) केवल वस्तु के सथातय्य स्वरूप का वर्णन करना चाहिए। तथा दूसरा मत इस बात को प्रतिपादित करता है कि- अपारे काव्यसासारे कविरेक प्रजापति । यपास्म रोचते विश्व तथेद परिवर्तते।।' अर्थान् कवि पूर्ण स्वतन्त्र है वह जंसा ही ाहे वैसा वर्णन कावये मे करे। परन्तु माचार्य कुन्तक इव दोनो मतो से ही पूणत्रया सन्तुष्ट नही है। कयोकि वेनतो कवि को इतनी स्वतन्त्नता ही देना चाहते हैं कि वह बिसकुल वास्तविकता से बोसो दूर पदार्थ का मनमाना वर्णन करे और न वे पदार्यों के मथातथ्य रूप मे सीधे सादे भोडे वर्मन को ही काव्य या साहित्य मानने को तैयार है। अत ये दोनो ही मती का समन्वय चाहते है। तभी समाहित्य का वास्तविक अर्थ समझा जा सकेमा। इसीलिए काव्य की परिभाषा भी उन्होने- 'शब्दार्थों सहितौ' इत्यादिदी है। ये दोनो ही मत उन्हें अमान्य हैं। इस स्थल की व्याख्या करते हुए आचार्य विश्वेश्वर जो ने स्वभावोक्ति वादी के पूर्व पक्ष को प्रस्तुत बराकर उसका खण्डन करवाते हुए वकोकि पक्ष की स्थापना करने का प्रयास करते हुए जो श्लोकों का युछ ऊटपटाय अथ प्रस्तुत करने वा प्रयास किया है, इसे वे ही समझ सकते हैं। कयो कि कुं्तक की वतोकि तो इनमे प्स्तुत दोनों मतो से भिन्न है। अन्यया उन्हें साहित्यार्यसुधा सागर के सारोन्मीतन की वया आवश्यकता। साथ ही 'इत्यस सवसन्दर्म स्वतत्त्रेऽ्प्यवृव्वादर' कहने की कया आवश्यकता थी, मदि वकोकिवादी कवि को पूर्ण स्वच्छन्द ही बना देता है। वक्रोकि का यह मतलब फदापि नही है कि कवि जो कुछ भी मनमाना तत्वहोन व्णन करे
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वह वकोकि होगी। अत उसे काव्य कहेंगे। इसी लिए आचार्य कुन्तक ने हवभावोक्ति की अलद्धारता का खण्डन करते हुए उसकी अलङ्वायंता प्रस्नुन की है। समाचारः तस्मात्तदेव नावदुपक्रमते-
देवीं सूक्तिपरिस्पन्दसुन्दराभिनयोज्ज्वलाम् ॥ १॥
ग्रन्थ के प्रारम्म मे इषटदेव के प्रति नमस्कार करना (ग्रन्थकारो का समाचार) है इती लिए तो उमी ( अभिमत देवतान्नमरकार) को प्रारम्भ करते हैं- (मैं) कविप्रवगे के मुखचन्द्ररूपी नृत्यभवन मे नृत्य करने वाली, सुभाषित के विलासरपी सुन्दर अभिनयो के कारण उज्जल सुशोभित देवी (वागदेवता) की स्तुनि करता हूँ॥ १॥ टिप्पणो :- जैसा कि पहले बनाया जा चुका है कि कुन्तक शैव से इलीलिए उनके ग्रन्थ में यमतत्र सवंत् शवदर्शन की छाप झलकती है, इस कारिका में भी मचार्य ने ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया है जिससे कि दूमरा शिव-शक्तिपरक अर्थ भी मूचित होता है। (वक्तरे इन्दुयस्य सः शिव" इत्यय) अर्थान् वबेन्दु भगवान् शिव के लास्यमन्दिर (अर्थात् जगत्) को नर्तकी, एव अपने परित्पन्दो के सुन्दर अभिनय से उज्ज्वल (शृङ्गारिणी- 'उज्जवनस्तुविकासिति शृङ्गारे विशदे' इति 'हेम ') देवी शक्ति की वन्दना करता हूँ। जंसा कि पहले बताया गया है कि यह जगत शक्ति का स्पन्द्र या परिस्पन्द है। अत यह परिस्पन्द शक्तिरूपा नतंकी का अभिनम हुआ। जगन् की सृष्टि तो शक्ति करती है अत उसे नतकी कहा गया है क्योकि शिव तो निविकार है। देवी वन्दे, देवत स्तौमि । कामित्याह-कथीन्द्रवक्त्रेन्दुलास्य- मन्दिरनतकीम् । कवीन्द्रा: कविप्रवरास्तेपां वक्त्रेन्दुर्मुखचन्द्र स एव लास्यमन्दिरं नाट्यवेश्म, तत्र नतेकीं लासिकाम्। किविशिष्टाम्; सूक्तिप रिस्पन्दसुन्दरामिनयोज्ज्वलाम्। सूकिपरिस्पन्दा: सुभाितमिल- सितानि तान्येव सुन्दरा अभिनया: सुकुमारा सात्विकादयस्तरज्ज्वलां भ्राजमानाम्। या किल सत्कविषकत्रे लास्यवेश्मनीव नर्तकी सविला-
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६ वनोकिजीवितम्
साभिनयविशिष्ठा नृत्यन्ती विराजते तां वन्दे नौमीति वाक्यार्थेः। तदिदमत्र तात्पर्यम्-यत्किल प्रस्तुतं वस्तु किमपि काव्यालंकारकरणं वाप्रूपां सरस्बतीं स्तौमीति।
देवी की वन्दना अर्थान् देवी की स्वुति करता हूँ। किन (देबता) की महाकवियो के मुखशशषिहपी नत्यगाला मे न्तन करनेवाली (देवत्ा) को। क्वौद्द्र अर्थान् शेष कविगण उन्के यततन्दु वर्यान् मुपचन्द्र वे हो है लास्यमन्दिर अर्थात् नृत्यशाला उसमे ननत्री अर्थान् नाचनेवाली। उस नत की को क्या विशेषताय है --
सूक्ि के सस्फुरणो के मुद्दर अभिनय के कारण जगमगाती हुई मुक्तिप रिस्पन्द अर्थात् सुभाषितो के विनसिन, वे ही है सुन्दर अभिनय अर्थान् सुकुमार सार्विकादिधाय, उनने उज्जवल अर्थान् सुशोभित। देवी जो कि नृत्यशाला मे हाव-भाव के साथ अभिनय पूर्ण अर्थात् तृत्य करली हुई नतकी के सद्भ महाकवियो के मुख मे विशेष प्रकार से जोभित होती हैं (विराजने) उन देवी को नमस्का करता हू। यह इसका वावतार्य हुआ तो यहाँ पर तात्पर्य यह निकला कि जो भी कुछ (यहाँ पर) प्रस्तुन विषय (किमपि) है। (वह) दाव्यालङ्गार की रचना है उमको अविषाषी देवता एव इस प्रकार को (अपूर्व) रमणोचना वे कारण मनोहर भगवती भारती की स्तुति करता हूँ।
एवं नमस्कृत्येदानी
इस प्रकार वन्दना करके अब आगे विवेचित बो जाने वाली वस्तु से सम्बन्धित सभा,- निषम और प्रयोजन कों उपायस्त करने का उपकम करते हैं-(कयोकि-)
टिप्पणी :- जिस प्रकार किसी कूप, नडाग तपा भवन आदि के निर्माण के पूर्व उसके सोमा-विस्तार निर्धारित करने के लिए कि-यह इस रप में निर्मित होगा-सर्वप्रथम मानसूत (फोते) के द्वारा उसकी लम्बाई-चौडाई बादि निश्रित कर दी जाती है उसी प्रकार अपने प्रतिवाद विषय को सूचित करने के लिए प्रन्वकार प्रार्म्भ मे ही उसके अनुवन्ध-चतुष्टय प्रस्तुत कर देते हैं। यह प्रन्यकार का अभिभाय है।
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प्रथमोन्मेप
वाचो विषयनयत्यमुत्पादयितुमुच्यते। आदिवाकयेऽभिघानादि निर्मितेर्मानसूत्रवस्।।६॥ इत्यन्तरश्लोक: म्रह अन्तर श्लोक है। वाणी को विषय की सीमा मे नियन्त्रित करने के लिए भवन-निर्माण मे सूत्रमान (फीते की पंमाइश) की तरह आरम्भिक याक्य में ही अभिधान आदि (अनुबन्धचतुष्टय) कह दिये जाते है॥ ६ ॥। टिप्पणो- इससे ग्रन्यकार यह भी सूचित करना चाहता है कि उसकी सरस्व्रती का वभव बहुत ही विशाल है। केवल प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से उमको वह सीमित करके पाठको के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है। लोकोत्तरच मत्कार कारि वैचित्र्यसिद्ध ये काव्यस्यायमलङ्कारः कोऽप्यपूर्वो विधीयते ॥ २॥ अलोकिक चमत्कार को उत्पन्न करनेवाले वैचित्रम को सम्पक्न करने के लिए किमी अपूर्व, काव्यविषयक अलद्वार ग्रन्थ का निर्माण किया जा रहा है।।२।। अलंकारो विधीयते अलंकरणं क्रियते। कस्य-काव्यस्य। कवे: कर्म काव्यं तस्त । ननु च सन्ति चिरन्तनास्तदलंकारास्तत्किमर्थ- मित्याह-अपूर्व:, तद्वयतिरिक्तार्थाभिघायी। तदपूर्वत्वं तदुत्कृष्टस्य तन्निकृष्टस्य च द्वयोरपि संभवतीत्याह-कोऽपि, अलौकिक: साविशमः।
मान्याह्वादविधायिविचिन्रभावसम्पत्तये। यद्यपि सन्ति शवशाः काव्यालकारास्तथापि न कुतश्चिद्येवंविधवैचित्रयसिद्धि:। अलद्धार का निर्माण किया जा रहा है अर्थान् शोभाधान किया जा रहा है। किसका? काव्य का। काव्य कवि का व्यापार है उस कविव्यापार का (अलसूरण किया जा रहा है)। यदि ऐसी शङ्ता की जाय कि, काक् के बहुत से प्ाचीन अलद्वार ग्रन्थ हैं अत (इस नये ब्रन्ध का निर्माण) कितलिए है। अत ब्रन्यकार कहता है अपूर्द (प्रन्थ) अर्थात् उन ( प्राचीन ग्रन्थो) से भिन्न अर्थात् मौलिक वस्तु को प्रस्तुत करनेवाले प्रत्थ का निर्मान कर रहे हैं। यह भी कहा जा सकता है-अनद्ार प्रन्य की नवीनता तो उ (प्राचीन ग्रन्थो) मे अच्छे बुरे दोनो प्रकार के ब्रन्मों मे आा सकती है इस विष्य मे कहते हैं-किसी और ही लोकोत्तर वैशिष्टध से युक्त-अतिशय से युक्त (प्रन्थ)। (प्रश्न-ठैक है कि आपं अपूर्व अनसार वन्व का
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दनोक्िजी विवम्
निर्माण कर रहे हैं) पर वह भी किस लिये ? इमसिये बताते हैं कि- लोकोत्तर (वर्थाव्-सस्यामान्य युक्त) नमत्कार को उत्पन्न करने दाले वैचित्र्य की सिद्धि करने के लिए वर्थात् असामान्य आह्वाद को उत्पन्न करने वाली विचित्रता की सिद्धि के लिए (अपूव अलद्कार प्रन्प की रचना कर रहे हैं)। यद्यपि बनेको काव्य के अलस्वार ग्रन्व (चिरन्तन आनद्कारियों द्वारा निमित) विदयमान है फिर भी किसी भी ग्रन्थ में इस प्रकार की विचिनता नहीं आ पाई है। टिप्पणी :- महामहोपाध्याय डॉ० पाप्डुरङ्ग वामन का मयन है- "It appears that Kuntaka meant the Larikas alone to be called काव्यानदार as the karika of the first unmesa states लोकोत्तर-इत्यादि। The vritti on this sayS नतु च सन्ति चिरन्तनास्तदलद्वारास्तत् किमर्थमित्याह-अपूर्वं तद्व्वि- रिक्तार्थाभिघामी। .. कोउपि अलोकिक: सातिशय । लोको"मिलने। असामान्याह्लादविद्या यिविचित्रमावसम्पतये । यद्यपि सन्ति पतम
noticed that the works of मामह, उद्भट and स्टट were called काव्यालद्वार s. Though the karikas thus appear to have been meant to be called काव्यातदूार the whole work has been refered to by later writers as asifmunfad I The vritti is quite clear on this point- तदयमर्म प्रत्थस्यास्यालसार इत्यभिधयानम्। उपमादिप्रमेयजातमभि- घेमम्। उत्तकूपवचित्र्यसिद्धि: प्रयोजन मिति। History of Sanskrit Poetics ( P. 225-26 ) अलकरशान्द: शरोरस्य शोभातिशयकारित्वान्मुख्यतया कटकादिपु सर्वते, वत्कारित्वसामान्यादुपचारादुपमादिपु, सद्वदेष व तत्सदरेपु गुणादिपु, वयव घ तद्भिधायिनि प्रन्थे शब्दार्थयोरेकयोगक्ेमत्वा दैक्येन न्यवहार:, यथा गौरिति शब्द: गौरित्यर्थ इति। वद्यमर्थ :- अन्थस्यास्यालक्वार इत्पभिधानम्ं, एकरूपवैचित्र्यसिद्धि: मयोजर्नमति ॥२॥। शरीर की शोभा में उसृष्टता से आाने के कारण प्रधानत 'बतद्गार' शब्द का प्रयोग कढ़े आदि (गहनो) के लिए किया जाता है। शोभातिवय
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की उत्पादकता के माधर्म्य के नारण लक्षण मे उपमास्पक आदि काव्य के अनद्गारो के अर्थ) मे भी अनककारशब्द का प्रयोग होता है। और उसी प्रकार उसके सदश होने के नाने गुग (मा्ग) आदि के अर्थ मे भी (अलद्धार शब्द का प्रयोग होता है) और उसी प्रकार उनका प्रतिपादन करने वाने ब्रन्थ के विषय मे इम शब् का प्रयोग किया जाता है। शब्द और अर्थ दोनों का समान रप मे योगक्षेम करने के कारण दोनो के स्थान पर एक व्यवहार होता है। जैसे गाय यह शब्द है और गाय यह अर्थ है। तो आशय यह है कि यह नन्थ। अर्थान इम प्रकार अलद्धारों के प्रति- पादन करने वाले ग्रन्थों का। जातावेकवचनम्) अलद्वार कहा जायगा। उपमा-रूपक आदि 'पमेय ममुदाय (इस प्रकार के अतद्वार,प्रन्थो का) अभिवेय अर्थात् प्रनिवादय विषय है। तथा कपर कही गईं (अलौकिक विचित्रता) को सिद्धि इसका प्रयोजन है। टिप्वणी :- उपर्युक्त पक्तियों मैं कुन्तक द्वारा प्रमुक्त 'बन्यम्यास्थ अलद्वार इत्यभिधानम्' शब्दावली विद्वानों के भ्रम का मल है। इमी आधार पर इस ग्रन्थ का नाम 'काव्वालद्ार' सिद्ध करने का प्रयास किया है जो समीचीन नही प्रतीत होना। कयोकि यहाँ पर कुन्तक सभी अलङ्गार ग्रन्थो वा प्रयोजनादि बता रहे हैं अन वे कहते हैं कि काव्य के अलङ्गारो (असमादि) के प्रतिपादन करने वाले ग्रन्थो का अलङ्कार (ग्रन्थ) नाम होता है। इस बात को उन्होने इसके पहने अलद्वार शब्द का अर्थ बताते हुए 'तथव छ तदभिघायिति प्रन्थे' कह कर अत्यधिक स्पष्ट कर दिया है। माय ही जैमा आचार्यों के बीच मे प्रसिद्धि है कि 'बकोकि काव्यजीवितम्' इति कुन्तक। इस कथन की पुष्टि इस ग्रन्थ का नाम 'काव्यानद्वार' मान लेने से नही होती है। जब कि 'चक्रोकिजोवितम्' इस सकजा से 'तदधिकृत्य कृते ग्रन्ये' से (वक्ोक्तिरेव जीवितम् मस्य तन्) यह अ्थ स्पप्ट प्रतीत होता है। माथ हो जैसा कि प्रथम उन्मेव की समाप्ति पर प्रयुक्त 'इति श्रीराजानक- कुन्तकदिरचिते वक्रोकिजीविने काव्यालक्वारे प्रयम उन्मेप' का 'वकोकि- जीवित' नामक काव्य के अलद्वार द्रन्य मे ऐसा ही अर्थ सङ्भत प्रतीत होना है। यदि यह कहा जाय कि बकोकति है जीवित जिसका ऐसे 'काव्यालद्वार' नामक प्रन्थ मे' यह अर्थ उपयुक्त होगा तो ठोक नही, क्योकि अन्यन् उत्मेषो को समाप्नि पर केवल 'इति श्रीराजानककुन्तकविरचिते बकोक्तिजीविते द्वितीय तृतोय-उन्मेप-' प्राप्त होता है। वहा 'काव्यालद्वारे' का प्रयोग नही मिलता है। अत. यहां पर 'म्रन्वस्यास्म अलद्धार इत्यभिधानम्' मे 'जाता- चेकचनम्' ही मानना अधिक सङत प्रतीन होता है।
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१० वक्ोकिगीवितम्
एवमलंकारस्यास्य प्रयोजनमस्तीति स्थापितेऽपि तदलंकार्यस्य काव्यस्य प्रयोजन बिना यदषि सदपार्थकमित्याद- धर्मादिसाधनोपायः सुकुमारक्रमोदितः । काव्यवन्धोऽभिजातानां हृदयाह्हादकारक. ।। ३ ।। इग तरह अलद्ारग्रन्थ का प्रयोजन। लोकोत्तरचमरकारकारिरवचिन्व की सिदि) है ऐमा सिद्ध हो जाने पर भी अलद्वार के द्वारा सुशोभित रिए जाने वाले वाध्य के प्रयोसन के विना वह प्रमोजनमूल का भी बेकार ही है। इस आशय से ग्रन्यकार कहते है कि- सुकुमार ऋम (अर्थान् सहृदयहृदयहारी परिपाटी) से कहा गया काव्य बन्ध 'अर्थार महाकाव्यादि) ध्मादद (अर्थान धर्म, अर्थ, काम एव मोक्ष रूप बबुर्वंगं) के सम्पादन का उदाय (तथा) अभिजातो (कुलीन-मुकुमार- मनि राजपुमादिको) के हृदय मे आहाद (आनन्द) को उत्पन्न करने बाना होता है।। ३ : हृदयाहादकारकश्चित्तानन्दजनकः काव्यबन्धः सर्गबन्यादिर्भय- तीति सम्बन्धः । कस्येत्याकाडक्षायामाह-अभिजातानाम्। अभिजाताः खलु राजपुत्रादयो धर्माद्यपेयार्थिनो विजिगीपव: क्लेशभीरवथ् सुकुमाराशयत्वात्तेयाम् तथा सत्यपि तदाहादकत्वे काव्ययन्घस्य फीडनकादिप्रख्यता प्राप्नोतीव्याह-धर्मादिसाधनोपायः। धर्माटे- रुपेयभूतस्य चतुर्वर्गस्य साधने सपादने तदुप्देशरूपत्वादुपायस्तत्मापि- निमित्तम्। हदयाह्वादकारक अथ चित्त मे आनन्द को उत्पन्न करने वाला काव्यबन्ध अर्थान स्गव्धादि (महाकाध्यादि) होता है यह (अर्थात् 'काव्यबन्ध' दा 'भवति' इस करिया से) सम्बन्ध है। किसका (चित्तानन्दजनक होता है) इस आकाक्षा मे कहा, अभिजाती का। (हृदयाह्वादकारक होता है)। अभिजात राजपुवादि उपामो द्वारा प्राष्म धर्मादि (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप पुर्यार्थ-चतुष्टय) के प्रार्थी विजय की इच्छावाले एव कलेश से डरने वाले होते है (वयोकि उनका स्वभाव सुबुमार होता है।) काव्यवन्ध के उस प्रकार उन (राजतुनादिको) का आह्गादक होने पर भी (उसे) खिलौना आदि का सादृश्य प्राप्त होता है' (अर्थान यदि काव्यबन्ध केवल राजपुता दिको का आह्वादक ही होता है, उसका और कोई प्रयोजन नही, तो वह तो खिलोने के ही सद्य हुआ वयो कि आह्नादकत्व तो उसमे भी होता है)
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प्रथमोन्मेप. ११
अन (खिलोने के साथ काव्यादि की समानना को दूर करने के लिय) कहा धर्मादि के सम्पादन का उपाय (काव्यबन्ध होता है) । (अर्थात् काव्यबन्ध) घर्मादि अर्थान उपामो के द्वारा प्राप्त होने वाते ( धर्म, अर्थ, काम एव मोक्ष रूप) चतुर्वर्ग के साधन अर्थान् सम्पादन में उस ( धर्मादि) की प्राप्ि का निमित होता है। तथापि तथाविधपुरुपार्थोंपदेशपरैरपरैरपि शाखत्रें: किमपराद्मित्यभि धीयते-सुकुमारकमोदितः । सुकुमार सुन्दर. सहदयहदयहारी क्रम' परिपाटीविन्यासस्तेनोदित: कथित सन्। अभिजातानामाहाद कत्वे सति प्रवर्तकत्वात्काव्यबन्धो धर्मादिप्राप्त्युपायतां पतिषद्यती। शास्त्रेपु पुन कठोरक्रमाभिहितत्वाद् धर्माद्युपदेशो दुरबगाह । तथाबिधे विपये
फिर भी उस प्रकार (उपायो द्वारा प्राप्तज्) पुरुदार्थ का उपदेश करने वाले दूसरे भी शास्त्रो द्वारा क्या अपराध किया गया है ( जो आप काव्य- वन्ध को ही धर्मादिसाधनोपाय बताते ह दूसरो को नहीं) अत कहते हैं, मुक्ुमार प्रम से कहा मया ( नान्मबन्ध धर्मादि के सम्पादन का उपाय होता है। सुकुमार अर्थान् सुन्दर सहृदयो के हुदयो का हरण करने वाला क्रम अर्था् परिपाटी विन्यास (विशेष प्रकार की रचनाशली) उसके द्वारा उदित अर्थात् कहा गया (काव्यबन्ध धर्मादि का साधन है)। अभिजात राजपुनादिको का आह्नादकत्व होने से काव्यबन्ध धर्मादि (पुरुपार्थ-चदुषटय) को प्राप्ति की उपायता को प्राप्त होता है (अर्थात् धर्मादि को प्राप्ति का उपाय बन जाता है।) फिर शास्त्रो मे (उनके) कठोर क्रम से कहे जाने के कारण (सुदुार मति एव क्लेभभीर राजपुशादिको के लिए) धर्मादि का उपदेश बड़ी ही कठिनता से प्राप्त होने बाला होता है। अत (शास्त्रादिक) उस प्रकार (घर्मादि को सिद्धि के विषय मे विद्यमान होने पर भ्री वेकार ही है राजपुत्रा: सलु समासादितविभवाः समस्तजगतीव्यवस्थाकारिता प्रतिपद्यमाना: श्लाष्योपायोपदेशशून्यतया स्वतन्त्रा. सन्तः समुचित सकलव्यवदारोच्छेदं प्रवर्तयितुं प्रभवन्तीत्येतदर्थमेतद्व्युत्पत्तये व्यतीव. • सघरितराजचरितं तमिदर्शनाय निषष्नन्ति कवयः। तदेवं शांसातिरिकं मगुभमस्त्येव प्रयोजनं कात्यमन्घस्य ॥३॥ राजपुत्र सरेग ऐशम को प्राप्त कर समस्त पृथ्वी की व्यवस्था करते हुए शंष (राजविषयक एव सोकव्यवहारसभ्बन्धी) उपामो के उपदेश
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१२ वकोकिजीवितम
से हीन होने के कारण (मास्त्रन्ञान के अभाव मे कारण) स्वच्छन्द होगर ममुचित समस्त व्यवहारो का विनाश करने के लिए समर्य होते हैं, अत (समस्त उचित व्यवहारो के विनाश को रोकने के लिए एव इस प्रकार राजपुत्रो की कार्यों में औचित्ययुक्त प्रवृत्ति एव निवृत्ति कराने के लिए) जनकी (शास्त्रविषयक) व्युत्पति के लिए कवि लोम असीत के श्रेष्चरित्र बाले राजाओ के चरित्र का उनके निदर्शन के लिए (काव्यरप मे) वर्णन बरते हैं। अत इस प्रकार से काव्यबन्ध का शास्त्र से अतिरिक्त प्रकृष गुण- वाला प्रयोजन तो निश्चित ही है ॥ ३ ॥ मुख्य पुरुपार्थसिद्धिलक्षण प्रयोजनमास्तां तावत्, अन्यदपि लोकयात्रापरवर्तननिमित्तं भृत्यसुदृत्स्वाम्यादिसमावर्जनमनेन विना सम्पड् न सम्भवतीत्याह- व्यवहारपरिस्पन्दसौन्दर्य व्यवहारिमि:। सत्काव्याधिगमादेव नूतनौचित्यमाप्यते ॥४॥ उपर्युक्त कारिका मे ग्रन्यकार ने काव्यबन्ध का प्रयोजन चतुर्वग की प्राप्ति को ही बताया है लेकिन उसके अन्य भी लोक-व्यव हारविषयक प्रयोजनो को बताने के लिए कहते हैं-) महलें पुरुषार्थ की सिद्धि (अर्थान् धर्म औदि वी प्राप्ति) रूप मुख्य प्रयोजन को रहने दै, अन्य भी लोकयात्रा की प्रधुत्ि के कारणभूत सेवन, मित्र एव स्वामी आदि का भलीभाति ऑक्पण इसके (वाव्यत्ञान के) बिना नही सम्भव है, अत कहा है- लोक व्यवहार मे (नित्म) प्रवृत्त होने वाले लोग नवोन औचित्य से युक्त लोकाचार के व्यापार के सौन्दर्म को थेंछ काव्यो के परिज्ात हे ही प्राप्त करने हैं ॥ ४ ।। व्यवहारो लोकवृत्त तस्य परिस्पन्दो व्यांपारः क्रियाकमलक्षण स्तस्य सौन्दर्य रमणीयक तद्व्यवह्ारिभिर्व्यषहर्तृभिः सत्काव्याधि- गमादेव कमनीयकाव्यपरिज्ञानीदेव नान्यस्मादू आप्यते लभ्यन इत्यर्यः। कीटशं तत्सौन्दर्यम्-नूतनीचित्यम् नूतनमभिनवमलौकिकमौचित्य सुचितभाधो यस्य। तदिदमुक्त भवति-महवां हि राजादीना व्यवहारे वण्यमाने तदङ्मूता सर्वे मुख्यामात्यप्रमृतयः समुचितप्रातिस्विक कर्तव्यव्ययहारनिपुणतया निषध्यमाना: सकलव्यवहरिृत्तोपदेशतामा-
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प्रथमोन्मेव १२
पद्यन्ते। ततः सर्वः कचिरकमनीयकाव्ये कृतश्रम समासादिन व्यवहारपरिस्पन्द्सौन्दर्यातिशय श्लाघनीयफलभाग भवनीति। व्यवहार अर्थात लोकचार उसका परिस्पेन्द अर्थान कार्य परम्परा रूप व्यापार, उसवा सोन्दर्य अर्थान् रमणीयता वह (लोकाचार के व्यापार का मोन्दर्य) व्यवहारी अर्थात् (नित्यप्रति) लोकव्यवहार मे प्रवृत्त होने वाले (पुरुषो के) द्वारा, सत्काव्य के अधिगम से अर्थात् कमनीय काव्य के परिज्ञान से ही, अन्य किसी (साधन) से नहीं आप अर्थात् प्राप्त होता है, ऐमा अर्य हुआ। वह सौन्दम किस प्रकार का है नूतन औचित्ययुक्त। नूतन अर्थात् अभिनव लौकिक औचित्य अर्थान् उचितभाव है जिसका ( ऐमा सोन्दय। इस प्रकार यह बताया गया कि, बडे-बड़े राजाओ के व्यवहार के (काव्य मे) वर्णन किए जाने पर उन (राजादिको) के अङ्गभूत सभी प्रधान समात्य (मत्री) आदि सम्यक औचित्यपूर्ण अपने-अपने कर्तव्यो एव व्यवहारो मे निपुणता के साथ (काव्य मे) वणित होकर समस्न व्यवहार में प्रदृत्त होने वाले पुरुषों के आचार के उपदेश करने वाले हो जाते हैं। अर्पान् लोकिक पुरुषो को किस ढग से व्यवहार करना चाहिए मह शिक्षा उन्हें काव्य के व्णित राजा एवम् उनके अमात्य आदि के व्यवहारो से मिलती है। तदनन्तर सभी कोई कमनीय काव्य मे परिश्रम करके लोकव्मवहार की कार्यपरम्परा रूप व्यापार के सौन्दर्यातिशय को प्राप्त कर श्ेष्ठ फन का भागी होता है। योऽसौ चतुर्वर्गलक्षणः पुरुषार्थस्तदुपार्जनविषयव्युत्पत्तिकारणतया काव्यस्य पारंपर्येण प्रयोजनमित्याम्नातः, सोऽपि समयान्तरभातितया तदुपभोगस्य तत्फलभूताहादकारित्वेन तत्कालमेव पर्यवस्यति। अतस्तदतिरिक्सं किमपि सहृदयहृदयसंबादसुभगं तदात्वरमणीय प्रयोजनान्तरमभिघातुमाह- काव्य के उम (चतुर्बगं) को प्रातति के विषय मे व्युत्पत्ति का साधन होने के बाग्ण जो यह (तृतीय कारिका मे धर्म, अ्य काम एव मोक्ष ) चतुवंग रूप पुरषारय-परम्परा से (कान्य का) प्रयोजन स्वीकार किया गया है वह मी उसके उपभोग के समयान्तर (अर्थान् काव्य के अध्ययन काल मे ुरन्न हो नहीं अनितु कुछ समय वाद) मे होने वाला होने के कारण उस (उपभोग) के फमस्वरूप आह्वाद का उन्पादक होने से उस ( समयान्नर रून) काल में ही पर्यवसित होता है. (अर्थात् काव्य के अध्ययन के फ्लभूत चतुवगें का उपभोग अध्यमन काल में न होकर कालान्तर मे होता है अन
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उमका फलभूत आहाद भी कालान्तर मे ही होता है इसलिए उम म्राह्माद का जनक होने का अध्ययनकालिक कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। इसनिए केवल भविष्य की कल्पना पर नाध्य का अध्ययन किया जाय वह उचित नही क्योकि भविष्य तो बन्धकारमय होता है अत उससे भिन्न सहुदयो के हृद्रय को जनुस्पना मे रमणोय तत्काल (अध्ययन कालन) में ही मनोहर किमी जन्म प्रयोजन को बताने के लिए बेहा है-
चतुर्वर्गफलास्वादमप्यतिक्रम्य तद्विदांम्। काव्यामृतरसेनान्तवमत्कारो वितन्यते ॥५॥ (प्रसित घ्म, अ्थ काम एव मोक्ष रूप) चतुर्वग के फन के आस्वाद (अनुभव) कत्र भी अतिप्रमण करक, काव्यरूपी अनृत का रम, उम (काव्यामृतरस्षास्वाद) को जानने वालो के हृदय मे चमत्कार का विस्तार करता है। अर्थात् काव्य के अध्ययन से उत्पन्न रसास्वाद मे प्रमिद्ध धर्मादि चवुर्वगे के फा का आनन्द भी निम्नकोटि का होता है।॥ ५॥ चमरकारो वितन्यते चमत्कावर्विस्तार्यते, ह्वाटःपुनः पुनः क्रियत इत्यर्थः । केन-काव्यामृतरसेन । काव्यमेवामृतं तस्य रसस्तदा-
तद्विदाम् । त विदन्ति जानन्तीति तद्विदस्तज्ज्ञास्तेपाम्! कथम्- चतुवेगफलास्वाद मप्यतिकम्य। चतुवर्गस्य धर्मादेः फलं तदुपभोग-, स्तस्यास्वादस्तदनुभवस्तमवि प्रसिद्धातिरायमतिक्रम्य विजित्य पस्पश- प्रायं संपाद। 'चमरकारी वितन्यते' अर्थात् चमत्कृति (रसास्वाद रप अलोकिक आनन्द) विस्तार किया जाता है, वारचार, आनन्दानुभूति कराई जाती है, यह अय हुआ। किसके द्वारा, वाध्यामृतरस के द्वारा। काव्य ही है अमृन (जो), उसका रस उसका आम्वाद अर्थात् उसका अनुभव उसके द्वारा। वहाँ (चमन्वार का विस्तार होता है) यह कह सकते हैं, अन्न अर्थात् हृदय मे, रिसके (हृदय मे), तद्विदो के। उम (काव्यरस) को जानते हैं जो वे हुए तनिद्, उसको जानने वाले, उनके (हृदम मे नमतार का विस्नार करता है) कैसे ( चमत्कार को पैदा बारना है) चतुर्वग के फलास्वाद का भो अतिक्मण करके। चनुर्वर्ग अर्धात् धर्मादि (धर्म, अथं, काम एव मोक्ष रूप पुरषारष) का फल अर्थात् उसका उपभोग, उसका आस्वाद अर्थात्
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प्रथमोन्मेप १५
उसका अनुभव, प्रसिद्ध उत्कर्ष वाले उम (चतुबग का फलास्वाद) अतिक्रमण करके उसको भी जोतकर अन उसे निगर मा बना करके (नमत्कार को उत्पन्न करता है)।
तदयमभिप्राय :- योऽसी चतुर्वगफलास्वादः प्रकृष्टपुरुपार्थतया सवशास्त्रप्रयोजनत्वेन प्रसिद्ध: सोऽप्यस्य काव्यामृतचर्वणचमत्कार कलामात्रस्य न कामपि साम्यकलना कर्तुमर्हतीति। दुनश्न्न-दुर्भण दुरधिगमत्वादिदोपटुष्टोऽध्ययनावसर एव दुःसहदु खदायी शास्त्र- सन्द्र्भस्तरकालकल्पितकमनीयचमत्कृतेः काव्यस्य न कथचिद्पि
तो इसका मतलब यह हुआ कि जो यह धर्मादि-चतुर्वर्ग के उपभोग का अनुभव प्रकृष्ट पुर्पार्थ के रूप मे समस्त शास्त्रो के प्रयोजन रूप से प्रसिद्ध है, वह भी इस काव्यरूप अमृत के आस्वाद के आनन्द की क्लामान की किसी भी प्रकार की -समता करने के योग्य नहीं है। दु शवत्व (कर्णकट्ु), दुर्भपत्द (उच्चारण मे कठिनाई पंदा करने वाले), दुरधिगमत्व (बडी मुरिकि्लि से समझ मे आने वाले) आदि दोपों से दूषित होने के करप अध्ययन काल मे अत्यन्त ही असहया हुख को देने वाला शाम्त्र सन्दर्भ (शास्त्रो के वर्णन) तत्काल (अध्ययन करते समय) ही कमनोय (रसषास्वादजन्य अलोकिक आनन्वरूप ) चमत्कृति की सृष्टि करने वाले काव्य की किसी भी प्रकार स्पर्धा (समता) करने मे समर्य नही यह बात भी अर्धतः (स्पष्ट कर दी जाती है) अभिहित होती है। (जैसा कि कहा भी गया है कि)-
कटुकौषघवच्छास्त्रमविद्याव्याधिनाशनम्।
शास्त्र कडवी दवा की तरह अज्ञान रूप मानसिक रोग (व्याधि) का विनाश करने वाला होता है, ( जब कि) काव्य (चित्त को) आनन्द देने वाले अमृत के सदग अज्ञान (अविवेक ) रूप रोग का विनाश करने वाला होना है।। ७।। आयात्यां घ तदात्वे च रसनिस्थन्दसुन्दरम्। येन संपद्ते काव्य वदिदार्नी विचार्यते॥८॥ इत्यन्तरश्लोकौ ।। ५ ।
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वशेकिजीवितम
(ऐसा उपर्युक्त गुणविशिष्ट) माव्य जिसके द्वारा उस (अध्यमन) पान मे एव बाद मे रस के प्रवाह मे सुन्दर सम्पन्न होता है वह ( तत्व) अब (इस पन्थ मे) चताया जाता है।।८। से दो अन्तर श्लोक है।। ५॥ अलंकृतिरलंकार्यमपोद्ष्टत्य विवेच्यते। तदुपायतया तत्वं सालंकारस्य काव्यता ॥ ६ । उस (काव्य) मा उपाय होने के षारण अलकार्य (वाब्य और वाबक) का अलग अलग बर्के विवेचन किया जाता है। वस्तुत अनकार से बुक (अलकाम शब्द एवं अर्थ) की ही काव्यता होती है ॥ (अर्थात् यदि असं" बार और असकार्य को अलग कर दिया जाय तो काव्य की सत्ता ही समाप्त हो जायगी मयोकि अलकार शब्द एवं अर्थ ही काव्य होते हैं पर उनका जो अलग-भलग विवेचन किया जाता है वह उनके स्पष्ट ज्ञान के लिए है एव घेही परापरा भी प्रचनित होने के कारण है।। ६।। अलंकृविरलंकरणम् अलंकियते ययेति बिगूस। सा विवेच्यते विचार्यते। यच्चालकार्यमफलंकरणीयं वाचकरूपं वाच्यरूपं च तद्पि विवैच्यते। तथोः सामान्यविशेपलक्षणद्वारेण स्वरूपनिरूपणं कियते। कधम्-अपोद्त्य। निष्कृष्य पृथक् पृथगवस्थाप्य, यत्र समुदायरूपे तयोर्तर्भावस्तस्माद्विभज्य । केन हेतुना-तदुपायतया। तदिति काव्यं परामृश्यते। तरयोपायस्तदुपायस्तस्य भावस्तदुपायता तया हेतुभूतया। तस्मादेवविधो विवेक: काव्यन्युत्पत्युपायतां प्रति- पद्यते। दृश्यते व समुदायान्तःपातिनामसत्यभूतानामपि व्युत्पत्ति निमित्तमपोतृत्य विवेचनम्। यथा-पदान्तर्भूतयोः प्रकृति- प्रत्यययोर्धाक्यान्तर्भूताना पदानां चेति। यद्येवमसत्यभूतोऽप्यपोद्वार- स्तदुपायतया करियते तत् कि पुन. सत्यमित्याह-्तत्त्वं सालकारस्य काव्यता। अयमन्न परमार्थ :- मालंकारस्थालकरणसदितस्य सफलस्य निरस्ताशयवस्य सतः समुदायस्य काव्यता फविकर्मत्वम्। तेनालंकृतस्य काव्यत्वमिति स्थिति:, न पुनः काव्यस्यालंकारयोग इति ॥ ६।। अलकृति अर्पात् अलद्दार। अलवृत किया जाता है जिसके दाय (यह अलकृति होती है ऐसा विव्रह् करके अलकृति शब्द का अर्य अलद्वार होता है)। उसका विवेधन अर्थात् विचार किया जाता है और जो अलसाय अर्थात् (अलद्ूारो द्वारा) अलसूरणीय अर्थात् वाचक रूप एव
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प्रथमोन्मष १७
वाच्य-रूप (अर्थात् शब्द एव अर्थ रूप) होता है उसका भी विचार किया जाता है। उन ('अलद्वार एव अलसाय) का सामान्य एव विशेष लक्षणो के द्वारा स्वरूप-विवेचन किया जाता है कसे-अधोद्घृत्य अर्थात् निकालकर, अलग-अलग स्थापित कर अर्थात् जहां (काव्य मे) समुदाव रूप मे उने दोनों का अन्तर्भाव होता है उससे अलग करके (उनका विवेचन किया जाता है)। किस लिए उसका उपाय होसे से। उससे काव्य का परामर्श होता है (अर्थात् काव्य की व्युत्पत्ति का कारण होने से), उसका उपाय हुआ तदुपाय, उसका भाव हुआ तदुपायता, उसके द्वारा कारण रूप होने से ( विवेचन किया जाता है) इसलिए इस 'प्रकार का विवेचन काव्य की व्युत्पति का उपाय बन जाता है और देखा भी जाता है कि समुदाय के अन्तगत स्थित असत्यभूत (पदायो) का भी व्युत्पति के लिए अलग-अलग विवेचन (शास्त्रो में किया जाता है)। जैसे पद के अन्त्गत स्थित प्रकृति और प्रत्यम का विवेचन (व्याकरणशास्त्र मे) तथा वाक्य के अन्तर्गत स्थित पदो का विवेचन (मीमासा शास्त्र मे) पामा जाता है"
(प्रश्न) यदि इस प्रकार से असत्यभूत भी अपोद्धार (अर्थात् अलभ्वार एवम् अलद्धार्य का अलग-अलग विवेचन) उस (काव्य की व्युत्पत्ति) का उपाय होने से किया जाता है तो फिर सत्य क्या है? उसे कहते हैं-'वस्तुत. अलद्धार युक्त की ही काव्यता होती है।
इसका निष्कृष्ट अय यह हुआ कि सालद्वार अपात् अलस्करण से युक्त समस्त (समुदाय की) अवयवहीन होने पर ही काव्यता अर्थात् कवि का कमत्व होता है। अत मलकृत (शब्द और अथ) ही काव्य 'होता है यह• सिद्ध हुआ न कि काव्य का अलद्वार से योग होता है (अर्थात् अलद्वार से हीन होने पर काव्य क सत्ता ही असम्भव है कयोकि अलद्वार को काव्य से अलग किया ही नहीं जा सकता, अत यह क्यन कि काव्य का अलकार के साथ योग होता है नितान्त अनुचित होगा, कयोकि यह कथन काव्य औौर अलकार को भिन्न-भिन्न सिद्ध करता है।) ॥ ६ । सालंकारस्य काव्यतेति संमुग्धतया किचित् काव्यस्वरूपमा- सूतितम् निपुणं पुनर्न निश्चितम्। किलक्षणम् वस्तु काव्यव्यपदेशभाग् भवतीत्याह- शब्दार्थौ सहिती वक्रकविव्यापारसालिनि। बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाहादकारिणि ॥ ७॥ २ ६० जी० to
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वरोतिभीचितम्
बलंकार से मुक्त को काम्पता होती है ऐसा साम्युगय रूप से कुछ काम का स्वरूप बताया तो गया है किन्तु बच्छी तरह से उसका स्वरप नहीं निश्चित किया। अत किस प्रकार की वस्तु काम्प संज्ञा के नोग्य होती है इसका निरूपण करते हैं- वक्र (अर्थात् ास्तादि मे प्रसिद्ध शब्द और अर्थ के उपनिबन्धन से भिन्न) कविव्यापार से शोभित होने वाले एवम् उस (काव्यतत्त्व) को सभभने वालो के आनन्ददायक वन् अर्वात् वाबयविन्यास मे विशेषरूप से अवस्थित तथा सहित भाव से युक्त शब्द और अर्थ (दोनो मिलकर ही) काव्य होते हैं।।७।। शब्दार्थों काव्यं वाचको वाच्यश्रेति क्वी संमिलिती फाव्यम्। द्वावेकमिति विचित्रेवोकि: । तेन यत्केपांचिन्मव कविकौशलकल्पित- कमनीयतातिशयः शब्द एव केवलं काव्यमिति केर्षांचिद् वाच्यमेव रचनावैचित्र्यचमत्कारकारि फाव्यमिति, पक्षद्वयमपि निरस्तं भवति। तस्माद् द्वयोरपि प्रतितिलमिव तैलं तहिदाहादकारित्वं यतेते, न पुनरेकस्मिन्। यथा- शब्द और अर्य काव्य होते हैं अर्थात् वाचक और वाब्य दोनो भली भाति मिलकर काव्य होते हैं। दो (मिलकर) एक होते हैं यह तो बडा विचित्र कपन है। इसलिए जो किसी का मत है कि कवि को चातुरी से निर्मित कमनीवातिशय से मुक्त शब्द ही केवल काव्य होता है यह (मत), तथा किसी या यह मत कि रचता को विचिन्रता से आनन्द को उत्पन्न करने वाला अर्य हो काव्य होना है ये दोनो पक खण्डित हो जाते है। (वयोकि दोनो अलग-अलग नही अवितु ए कसाथ मिलकर हो काव्य होते है।) अत (शब्द और अर्थ) दोनों मे ही प्रत्येक तिल मे स्थत सैल की मोति उम (काव्यतत्त्व) को जानने वालो को आह्लादित करने को क्षमता रहेती है न कि एक मे। जैसे-
यदि सक्षीज्ञोक्षापिनि गच्छसि तत कित्वदीयं मे ॥ ६ ॥ अनणुरणन्मणिमेखल म विश्न शिज्ञान मञ्जुमझ्जोरम्। परिसरणमरुणचरणे- रणरणकमकारण कुरुते ॥। १० ॥। (किसी परक्त्री को अपने प्रेमी के घर जाती हुई देखरुर कोई पुरष कहता है कि) हे यनन्दजनक सुन्दर चन्द्रमा के रदुश मुखवाली ! सुन्दर
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प्रथमोन्मेष. १६
विलासो के साथ बोलने वाली। लोहित चरणो वाली सरुणी ! तुम्हों बताओ कि अपने प्रेमी के घर तुम जब जाती हो तो तुम्हारा उन्द स्वर से शब्द करती हुई मणिमेखला वाला एवं निरन्तर बजते हुए मधुर नूपुरो वाला गमन निप्प्रयोजन हो मेरे हृदय को क्यो व्याकुल कर देता है? ॥ ८-१० ॥
प्रतिभादारिद्रवदन्यादतिस्वल्पसुभाषितेन कविना वर्णसावण्ये- रम्यतामात्रमन्नोदितम्, न पुनर्वाच्यवैचित्र्यकणिका काचिदस्वीति।
इन श्लोकों मे प्रतिभादारिद्रय की दौनता से अत्यल्प सुन्दर भाषण करने वासे कवि ने केवल वर्णों के सावर्ष्य की सुन्दरता को दिखाया है, न कि उसमे किसी भी प्रकार के अर्य के वचित्र्य का लेश भी है।
यत्किल नूतनतारुण्यरङ्गितलावण्यपटहकान्तेः कान्तायाः काम- यमानेनं केन चिदेवदुच्यते-यदि त्वं तरुणि रमणमन्दिरं व्रजसति तत्कि त्वदीयं परिसरणं रणरणकमकारणं मम करोतीत्यतिमाम्येयमुक्ि। रकिंच न अकारणम्, यतस्वस्यास्तदनादरेण गभनेन तदतुरक्तान्त :- करणस्य विरहविघुरवाशङ्काकातरता कारणं रणरणकस्य । यदि वा परिसरणस्य मया किमपराद्वमित्यकारणतासमर्मकम्, एतद्प्यति भाम्यतरम्। संबोधनानि घ बहूनि मुनिप्रणीतस्तोत्रा मन्त्रण कल्पानि' न कांचिदपि तद्विदामाहादकारितां पुष्णन्तीति यत्किंचिदेतत्।
जो कि नयी तारुम्यावस्या से तराङ्गित लावण्य के कारण सुन्दर काति- वाली कान्ता की कामना करने वाला कोई (उस कान्ता से) कहता है, है तरुणि ! यदि तुम अपने पति-गृह जाती हो, तो तुम्हारा गमन मेरे हृदय को अकारण ही ब्याकुल कर देता, यह कथन अत्यधिक व्राम्य है। और भी केवल आकारण हो नहीं। क्योकि उस कान्ता के उस (कामुक) के प्रति अनादरपूर्ण गमन से उम (कान्ता) मे अनुरक्त अन्त करण वाले (उस- कामुक) की (उस कान्ता के) विरह की विधुरता की शङ्का मे जन्य कातरता हदन की व्याकुलता का कारण है। अथवा (तुम्हारे) गमन का मैने क्या अपराय किया है (जो मुझे कष दे रहा है) मदि यह अकारणता को सिद्ध करने वाला हो तो यह और भी अधिक ग्राम्य है। तथा बहुत से सम्वोधन भुनियो द्वारा विरचित स्तोजो के सम्बोघनो के सदृश किसी भी प्रकार की उस (काव्यतत्व) को जानने वालों की वह्हादकारिता का पोषण नहीं.करते, इसलिए यह व्यर्य है।
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२० वकोकिजी वितम्
वस्तुमात्रं घ शोभाति शयशून्यं न काव्यव्यपदेशमद्दति। यथा- प्रकाशस्वाभाव्यं विद्धति न भावास्तमसि यत् तथा नैते ते स्युर्यदि किल तथा तत्र न कथम्।
रविव्यापारोऽयं किमथ सदश तस्य महसः ॥११॥ शोभातिशय से हीन वस्तुमात्र भी काव्यसंज्ञाके योग्य नही हती। पैसे- अन्धकार मे वस्तुयें जिस प्रकाशपकृतिकता को नहीं प्रस्तुत कर पाती ये उस तरह की वे हो ही न पायें यदि वहा पर वैसी चीज किसी तरह न हो। (तम के) गुणो के निदेश के अम्यास वे नष्ट कर देने की कठोर दीक्षा देने मे समर्य आघार्य रूब गुणवाला यह सूर्य का व्यापार है तो भता उस ज्योति के तुल्य और क्या हो सकता है॥ ११ ॥ अन्र हि शुष्कत कंवाक्यवासनाघिवासितचेतसा प्रतिभाप्रतिभात- मात्रमेव वस्तु व्यस्तनितया कविना फेवलमुपनिमत्म्। न पुनर्षाचक- वक्रताधिच्व्वित्तिलवोऽपि लक्ष्यते । यरुमान्तर्कवाक्यशाय्यैय शरीरमस्य श्लोफस्थ। तथा घ-तमोळ्यतिरिका: पदार्थो धर्मिणः, प्रकाशस्वभाषा न सवन्तीति साध्यम् तमस्यतथाभूतत्वादिति हेतु: । दष्टान्तस्त्ईि क्थं न दर्शितः तर्न्यायस्येव चेतसि प्रतिभासमानत्वात्। तथोच्यते- इस पद्य मे सूखे तर्क वावय की (अनुमान वाकम) वासना से अधि- वासित चित्त वाले कवि ने व्यसन के कारण प्रतिभा से प्रतीतमात्र हो वस्तु को मघवद्ध कर दिया है। न कि इसमे पब्दवनता की शोभा का लेश भी लक्षित होता है/ जिससे केवल तर्कवाकय (अनुमानवादय) की शय्या ही इस क्लोक का शरीर है। बयोकि अन्धकार से अतिरित्त पदार्थरूप धर्मी स्वम प्रकाश नही होते हैं, यह साध्य (प्रतिशावाक्य) है। सव्वकार मे उस् प्रकार (प्रकाशस्वमाव) न होने से यह हेतु (वाक्य) है। (मत. यह काव्य न होकर केवल अनुमानवावय ही है) इस पर पू्वपक्षी प्रश्न करता है कि यह वाक्य आपके अनुसार काव्यन होकर यदि अनुमानवाक्य ही है सब दुशन्त क्यो नही दिखाया गया' (वयोकि अनुमानवाष्य मे दुषटान्त दिखाना चाहिए पा तो इसका उत्तर कुन्तरु यह देते हैं कि दृष्टाग्त यहाँ इसीलिए नहीं दिखाया गया क्योंकि उस साकिक कवि के) हृदप में (काव्य रचना करते समय) तकम्याय ही प्रतिभासित हुआ था। बक्षा कहा भी गया है-
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प्रथमोन्मेष. २१
तकजरेतुभावौ हि दृष्टान्ते तदवेदिनः । स्थाररेते विदुषां वाच्यो ह्ेतुरेव हि केवलः ॥ १२ ॥ दृष्टान्त मे अस (अनुमेय वस्तु) की सत्ता तथा उसके हेतु की स्थापना केबल उस (हेतु-हेतुमद्दान) से अपरिचित (जन) के लिए की जाती है। किन्तु विद्वानो के लिए तो केवल हेतु हो कहा जाता है। (उसी से वे सत्ता का अनुमान कर लेते हैं)॥ १२॥ विदधतीति विपूर्वो दधातिः करोत्य्थे वतते। स च करोत्यर्थोऽन्र न सुस्प्टसमन्वय, प्रकाशस्वाभाव्य न कुर्वन्तीति। प्रकाशस्वाभाव्य- शळ्दोडपि चिन्त्य एव 1 प्रकाश: स्वभावो यस्यासौ प्रकाशस्वभावः तस्य भाव इति भावप्रत्यये विहिते पूवपदस्य वृद्धि: प्राप्नोति। अथ स्वभावस्य भाव: स्वमाव्यमित्यत्रापि भावप्रत्ययान्ताल्वावप्त्ययो न प्रचुरप्रयोगाह। तथा च प्रकाशश्चासौ स्वामाव्यं चेति विशेषप्- समासोऽपि न समीचीन। 'विदशति' यहां पर कि (अपक्षग) पूर्वक ददाति (घा धातु) करोति (इक्न करणे) के अरथं मे प्रयुक्त हुआ है। 'प्रकाशस्वाभाव्य (स्वमप्रकाशता) नही करते हैं' इस प्रकार यहाँ वह करोति (कु धातु) का अथ भी सुष्पर् ढग से अन्वित नही होता है। स्वम प्रकाशता नहीं करते हैं, इसमे 'प्रकाश स्वाभाव्य' शब्द भी चिन्त्य ही है। प्रकाश है स्वभाव जिसका ऐसा हुआ'प्रकास- स्वभाव। उसका भाव इस अर्य मे भाव प्रत्यय किये जाने पर पूर्व पद की वृदि प्राप्त होती है ( जिससे प्राकाशस्दरामाव्य यह रूप शुद्ध होगा प्रकाशस्वाभाव्म नहीं। और यदि स्वभाव का भाव स्वाभाव्य हुआ तो भी यहाँ भाव प्रत्य- यान्त (स्वभाव शब्द) से (पुन) भाव प्रत्यय अत्यधिक प्रयोग के योग्य नही है। और फिर 'प्रकाशरचासौ स्वाभाव्यस्तर' यह विशेषण समास भी ठीक नहीं। सृतीये, घ पाढेऽत्यन्तास्षमर्पकसमासभुयस्त्ववैशसं न तद्विशा- हादकारितामावहति। रषिव्यापार इति रवि-शब्दस्य प्राधान्येना- भिमतस्य समासे गुणीभाषो न विकल्पितः, पाठान्वरस्य 'रवे:' इति संभवाल्। तथा (उक्त श्लोक के) तृतीय चरण (गुणाव्यासाम्यासम्यसनद्- दोक्षागुछगुणः) मे अश्यन्त ही मसमपक (अरथ को सरलता से प्रतीति कराने मे माधक) समासब्इलरप कष्ट काम्पतस्वममश्रो की आनम्दकारित को
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२२ बकोकिनी विठम्
नही धारण करता है। एवं (चतुम चरण मे प्रयुक्त) 'रविव्यापर' इन शब्द मे रवि शब्द के प्रधानरूप से अभिमत होने पर मी समास मे उसका गोप- भाव नहीं बचामा गया है। जब कि पाठान्तर 'रवे भी सम्भव हो सकता दा। (अर्थात् उस स्थान पर रवि का व्यापार शन्द के साथ समास कर देने पर रवेः व्यापार, इति 'रविव्यापार' यहाँ व्यापार शन्द प्रधान हो जाता है औौर रवि शब्द गौण, जम कि प्राधान्म रवि का ही अभिनरेत है। मठ कुन्तक आलोचना करते हैं कि यहाँ समास करने के लिये कवि वाध्य नहीं है कि कयो 'रवे व्यापारोऽ्यम्' ऐसा पाठ कर देने से भी किमी नवार छन्दो- भङ्ग आदि की बाधया नही होती और रवि शब्द प्रधानरूप रे उपस्थित हो जाता है। अत उक्त दोषो के कारण शोभातिशम से शून्य यह श्सोक काब्य नहों है। यह कुन्तक का मत है।)
चेततन यस्मादलंकारेणाप्स्तुत प्रशंसा ल्क्षणे ना ्य पदेशतया स्कुरित मेव कविचेतसि। प्रथमंच प्रतिभापरतिभासमानमपटितपापाणशकलदल्प- मणिप्रसयमेव वस्तु विदग्यकवि-विरचतवफ्रवाक्योपारुढ शाशोल्लीढ मणिमनाइरठया त द्विदाहादकारिकाव्यत्वमधिरोह्दति। चकस्मिशेष वस्तुन्यवहितानवहितकत्रिद्वितयविरचितं वाक्यद्वयमिद तथा
महदुन्तरमावेद्यति- प्रश्न-यदि आप शोभातिशय से सून्य वस्तुमान को काव्य सज्जा देने के लिए तैयार नहीं है तो (अप्रस्तुतप्रशसा आदि के सथली पर) अलद्वार से शून्य होने पर भी वस्तुमान्र मे काव्यमर्मज्ञो का आह्लादकारित्व क्यों होता है7- सक्षर-ऐसा कहना ठीक नही। वयोकि (वाक्यरचना के) अन्य नक्ष्म से पुक्त होने के कारण कवि के हृदय मे अप्रस्तुतप्रशंसारप मलद्वर स्फुरिति हो होता (अर्णत् अप्रस्तुतप्रशसता आदि अलङ्कारो के स्थलो ने कर्वि जिस वस्तु का वर्णन वाक्य में प्रस्तुत बरता है, उस वस्तु का वर्मन करना ही उसका अभोष्ट या लक्ष्य नहीं होता, बल्कि नवि उस वर्णन के माध्यम से प्रतीयमान रूप किसी अन्य के चरित का वर्णन प्रस्तुत करता है। और इसी प्रतीयमान ढङ्ग से ही अभिमत वस्तु को प्रस्तुत करने में • क्वि का चायुयँ होता है जिससे सहुदयो को बानन्द प्राप्त होता है। यदि कवि उस प्रतीयमान वस्तु को हो वाध्यरूप से प्रस्तुत करे तो वह चमदार हीन सो बामगी। अत सिद्ध हुआ कि ऐसे स्थलो पर कवि का लद्य प्रथीय-
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प्रथमोन्मेष २२
यान वरस्तु का वर्णन होता है। अत दहाँ अप्नसतुतप्रशसारूप अलद्वार कवि के हृदय मे पहले से ही स्फुरित होने लगता है)। तथा सर्वप्रथम बिना तरासे हुए पापाणखण्ड के समान प्रतीत होने वाली मणि के समान ही ( कचि) प्रतिभा मे प्रतीत होने वाली वरतु चतुर ववि द्वारा विरचित चमत्कारपूर्ण (वक) वावय (श्लोक) मे निबद्ध होकर निब्य (वसौटी) पर चढ़े हुए मग्रि के सदृश मनोहर दङ्भ से काव्यमर्मेनो को मानन्द प्रदान करने वाली काव्यरूपता को प्राप्त करती है। और यही वारण है एक ही वस्तु को लेकर रचे गये सावधान एव असावधान दो प्रकार के कवियो के दो (भिन्न) वाक्य (इ्लोक) इस प्रकार के महान् अन्तर को सिद्ध करता है-
यहाँ पर मानिनियो के मानभङ्ग कर देने के कारण उनके क्रोध से हरे हुए चन्द्रमा के उदयरूप दरत का वर्णन ही दो कवियो ने दो ढङ्ग से प्रस्तृत विया है। पहला प्लोक महावि भारचि के विराताजनीय ने उदृत किया गया है कि- मानिनीजन विलोचनपातानुष्णबाष्पवलुषान भिगृहन्। मन्ुमन्दमुदितः प्रययौ सं भीतभीत इव शीतमयूख:।। १३।।
(पू्व दिशा मे) चदित हुआ चन्द्रभा गरम-गरम आसुओ से कन्ुषित हुए कामिनियो के कटाक्षपातो को सहन करता हुआ, मानो अत्यधिक भयभीव खा होकर घोरे-धीरे वाकाश मे पहुँच गया ॥२३॥ क्रमावेकद्वित्रि-प्रगतिपरिपाटी: प्रकटयन् कला: स्वैर स्वैरं नवकमलकन्दाङ्कुररुच:। पुरन्भीणां कटाचव्यो पिभ्यन्निभृत इब चन्द्रोऽभ्युदयते ।। १४।। (तथा इसी चन्द्रोदय का वर्णन किसी कवि ने इस प्रकार से किया है)- (पूर्व दिशा मे) कमल की जड़ो के नये बड़कुरो की कान्ति वाली (अपनी) कलाओ को धोरे-धोरे कमश एक, दो, तीन आदि की आनुपूर्ची को साथ प्रकट करता हुआ, प्रियतम के विरहानल से हीस नेनोवाली कुट्म्बिनियो के व टाक्षो से ढरता हुआ, (अतएव) मानो अत्यन्त विनीत हुआ सा चन्द्रमा उदित हो रहा है॥। १४॥ एतयोर्तर दवरेव विचारणीयम् । तस्मात् स्थितमेतन्-नरव्दुरयैव रमणीयताविशिषटस्य केवलस्य काध्यत्यम, नाप्यर्थस्येति। वदिदमुक्कम्-
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२४ वक्रों किजीवितम्
(यहा यद्यपि दोनो कव्रियों ने कटाक्षो से भमभोत हुए-से चन्द्रमा का वणन प्रस्तुन रिया है लेकिन पहले पद्य मे मान करनेवानी मानिनियो के मानभङ्ग से उत्पन्न क्रोध सें मुक्त कटाक्षो का वगन अदूर ही चमस्कारकारी है। जब कि दूसरे में कुटिम्ब्रिनी के प्रियविरहजन्य कोध से युक्त कटाक्षो के वणन मे उतना चमककार नही है। इस प्रकार) इन दोनो (पद्यो) का अन्तर सहुद्पहृदयसवेद्य होने के कारण उन्ही (सहरयो) द्वारा हो विचार करने योग्य है। ( हमे कुछ नहीं कहना है।) इस प्रकोर यह निश्रित हुआ वि न सो रमणीयना विशिष्ट वेवन शब्द का ही काव्यन्व होता और न केवल अरथ का ही (अपितु शब्द और अर्थे दोनों मिलकर ही काव्य होन है)। इमीलिए आचार्य भामाह ने अरने भ्रन्थ काव्यालद्ुार मे कामप के अलङ्गारो का विवेचन करते हुए ( १, १३-१५) मे) यह कहा है- रूपका दिरलकारस्तथान्यवद्ुघोदित. । न कान्तमपि निर्भूषं विभाति घनिताननम् । १४ ॥। मन्द सनेक (भामह के पूर्ववर्नो मलसारिको) ने (काव्य के) रूपक आदि अमद्ार (मर्यावद्धार) बताए है(कयोकि बिना मनटूारो के कान्य उमी प्रकार अशोभन होता है जसे) रमणीय होते हुए भी रमणी का मुख बिना अलद्वूारो के शोभित नहीं होता है॥। १५॥ रूपकादि मलंकारं शाहामाघमते परे। सुपां तिकां व व्युत्पत्ति वारषा वाळ्छन्त्यलंक्तिम्।। १६।। (इसके विपरीत दूसरे (आनद्वारिक) रूपकादि (सर्पाकारो) को माहा अलकूार बताते है मोर वाणी का अलद्वार मुबन्त (सब्जा पदो) तपा विडन्त (करियापदों) को व्युत्पति को स्वीकार करते हैं।। १६। वद्ेतदाडू सौशन्धं नार्थग्युत्पतिरीहशी।
नो इस प्रमर उन्होने ससौशव्य को बताया। अर्थ की च्युत्पतति इम प्रकार की नहीं होती। शब्द और अर्थ के अलद्वारभेद से हमे तो दोनो इष्ट है॥१७। तेन शन्दाथों द्वो संमिलितौ काव्यमिति स्थितम् पतमवस्यािते छयो: काव्यत्वे काचिदेकस्प मनाक्मात्रन्यूनतायां सत्यां काव्यव्यवदार
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प्रथमोन्मेप २५
अत् शब्द और अर्थ दोनो अच्डी नरह से मिलकर (ही) काव्प होते हैं, यह निश्चित हुआ। इस प्रकार (शब्द और अर्थ) दोनों में काव्यत्व होना है ऐसा निश्चित हो जाने पर कहो ( उन दोनो में से) एक की थोडी सी न्यूनता होने पर काव्य-व्यवहार प्रवर्तित होने लगे जो कि अनुचित एव अनभिप्रेत है) इसलिए ( कारिका मे) कहा-'सहिताविति'। सहितो अर्थात् सहित के भाव साहित्य से अवम्भित (शब्द और अर्थ काव्य होते है)। नतु च वाच्यवाचकसंबन्धस्य विद्यमानत्वादेतयोन कर्थचिदपि साहित्यविरह: सत्यमेतत् । किन्तु विशिष्टमेवेह साहित्यमभिप्रेत्तम्। कीदशम् ?- चक्रताविचित्रगुणालकारसपदा तेन- (इस पर यदि कोई प्रश्न करे नि) वाच्यवाचक सम्बन्ध के विद्यमान होने से इन दोनो (शब्द और अर्थ) मे साहित्य की अविद्यमानता किमी प्रकार सम्भव ही नहीं है (अर्थात् इन दोनों मे सदव सहभाव तो विद्यमान ही रहता है अत 'सहिती' इस विशेषण के प्रयोग की कोई आवश्यकता नही। तो इसका उत्तर देते हैं कि) ठीक है (शब्द और अर्थ मे सहभाव (साहित्य) सदब विद्यमान रहता है) किन्तु यहाँ पर (वह प्रसिद्ध साहित्य नहीं) अवितु (उससे) विशिष्ट ही साहित्म वाञ्छनीय है। (वह विशिष्ट स्ााित्य) किस प्रकार का है? (जहा आगे कही जाने वाली छ प्रकार की) वक्ताओं से विचिन्र गुणो एव अलद्धारो की सम्पत्ति की परस्पर स्पर्धा की पराकाष्ठा होती है वसा साहित्य अभिप्रेत है।) अत - समसर्वगुणौ सन्ती सुदृदाविव सकतौ। परस्परस्य शोभाये शब्दार्थो भवतो यथा ॥। ॥ (मुझे वह साहित्य अभिप्रेत है जहां) समान समस्त भुणो से सम्पन्न दो मित्रो की भाति (माधुर्यादि) समस्त गुशो से समानरूप से युक्त शन्द और अर्थ एक दूसरे को शोभा के लिये सगत हो (आपस मे अच्छी तरह से मिल) जाते हैं। (जैसे) ॥। १६ ॥ शशी। दभे कामपंरिक्षामकामिनीगण्डपाण्डुताम् ॥१६॥ सद्नन्तर (सबेरे सूर्य के सारथि) अरुण के सव्वरण (अर्यात् सूर्योदय) के कारण मन्दप्रभा वाले चन्द्रमा ने काम से परिक्षीण हुई वानिनी के गण्डस्पलों की जैसी पाम्पुता (पीलेपन) को धारण कियां ।।६ै।
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२६ वक्नोक्िजी वितम्
शोभातिशयमायहति। वत्यमाणवर्णविन्यासवकवालक्षणः शब्दा लंकारोऽप्यतितरां रमणीयः। वर्णविन्यासविच्छित्तिविहिता 'लावम्य गुणमपद्स्त्येध। यहाँ पर भदण के सश्वरण से मन्द कर दी गई प्रभा वाले चन्द्रमा की और काम के कारण परिक्षीण हो गये व्यापार वाजे कामिनी के गण्डस्थल की पाण्डता की समानता का समर्थन करने से ( उपमा रूप) अर्थातदुर का परिपोपण अत्यधिक शोभा को धारण करता है। (साथ ही) आगे वही जाने वाली वर्णविन्यासवकतारूप (जिमे अन्य आलद्गारिकों के आधार पर अनुप्राश अलद्वार कहा जा सकता है) शब्दालद्वार भी अत्यन्त ही रभणीय बन पड़ा है। और वर्णविन्यास की शोभा से उत्पन्न सावण्य गुण की सम्पत्ति तो है ही। (अत यहाँ पर गुण शब्दालद्वार एव अर्थालद्दार सभी का परम्पर स्पर्धा से प्रयोग शब्दार्यं-साहित्य का सूचक है जिससे यह पद्य एक सुन्दर वाब्प का उदाहरण बन गया है।) यथा च- लीलाइ कुयलअं कुवलअं व सीसे समुन्बरतथ। सेसेण सेसपुरिसाणं पुरसआरो समुप्पसिओो ॥ २० ॥ [ लोलया कुवलम कुयलमिव शीर्षे समुदह्त्ा। शेवेग शेवपुरपाणा पुरुपकार ममुषहमित ] और जैसे (दूसरा साहित्य (काव्य) का उदाहरण/- कुवलय (नील कमल) के सदुश वुवलम (पृथ्वी-मण्डल) को शिर पर बिना किसी थम के ही धारण करने वाले शेयनाग ने शेष पुरुचो के पौरुष की अच्छी हुंसी उडाई है॥ २०॥ अन्नाप्रस्तुत प्रशसोपमालक्षणवाच्यालंकारवैचितरयमिहिता हेलामात विरचितयमकानुप्रामहारिणी समर्पकत्वसुभगा कावि काव्यच्छाया सहदयहृद्यमाहवादयति। यहाँ पर अप्रस्तुतप्रशसा एव उपमारूप अर्थालद्वारों के वैचित्र्य से उत्पन्न, एव बिना परिशम के ही विरवित यमक एव अनुपास (रूप शन्दा- लद्ारों) से वित्ताकर्यक तथा कीझ हो अथ स्पष्ट हो जाने (समकत्व) के कारण सुन्दर कोई (अनिर्वचनीय) फाव्य की शोभा सहृदयो के हृदपो को
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प्रथमोन्मेष. २७
आनन्दित करती है (इस प्रकार इस पद्य मे भी परस्पर शब्द और यर्थ के साहित्य का स्वह्प स्पष्ट किया गया है।)
द्विवचनेनात वाच्यवाच कजाति द्वित्वमभिधीयते। व्यक्तिद्वित्वा भिधाने पुनरेक्पदव्यवस्थितयोरपि काव्यप्वं स्यादित्याह-बन्घे व्यवस्थितौ। बन्धो वाक्यतिन्यास: तत्र व्यवस्थितो विशेषेण लावण्यादिगुणालकार- शोमिना सनिवेशेस कृतावस्थानी। सहितावित्यत्रापि यथायुक्ति स्व- जातीयापेक्षया शब्दस्य शब्दान्तरेण वाच्यस्य वाच्यान्तरेण च माहित्यं परस्परस्पर्धित्वलक्षणमेव विर्वाक्षतम्। अन्यथा तद्विदाहादकारित्वहानि: प्रसज्येत । यहाँ (शब्दार्थों सहितौ"'॥ कारिका मे 'शब्दार्थो आदि पदो मे) हिवचन के प्रयोग से अर्थ और शब्द के जातिगत द्वित्व का अभिधान किया गया है (व्यक्तिगत द्वित्व का नहीं अर्थात् एक हो शब्द और अर्थ का ही नही अपितु वाक्य मे प्रयुक्त अनेक शब्दो और अर्थो का सहभाव होना चाहिए कयोकि) व्यक्ति के द्वित्व का अभिधान करने पर एक पद मे भी व्यवस्थित शब्द और अर्थ का काव्यत्व होने लनेगा। इसीलिए कहा है-'दन्ध मे व्यवस्थित (शब्द और अर्घं। बन्ध अर्थात् वाकय की विशेष प्रकार की रचना, उसमे व्यवस्थित। विशेष अर्थात् सावण्यादि सुणो एव अलंद्वारो से शोभित होनेवाली रचना के द्वारा स्थित । 'सहिती इस पद मे भी उक्त युक्ति के अनुसार स्वजातीय (शब्द) की अपेक्षा अर्थ शब्द का दूसरे शब्द से तथा (स्वजातीय अर्थ की अपेक्षा) अर्थ के साथ परस्पर स्पर्धा से युक्त स्वरूप वाला ही साहित्य (सहभाव) बताना अभीष्ट है। नही तो (उक्त प्रकार के शब्द के शब्दान्तर एव अर्थ के अर्थन्तर के साथ परस्पर स्पर्धा से युक्त साहिन्य के अभाव मे उस काव्य द्वारा) काव्यममंज्ञो की आह्लादकारिता को हानि होने लगेगी। यथा- असार संसार परिमुपितरत्न त्रिभुवनं निरालोक लोकं मरणशरण बान्धवजनम्। अनपं कन्दर्प जननयननिर्मोणमफल जगब्जीर्णारण्य कथमसि विधातु व्यवसित. ॥। २१॥ जैसे-(महाकवि भवभूति विरचित 'मातनीमाधव' नामक प्करण मे कापालिक को मालती का वध करने के लिए उंद्यत देख माधव उस वापालिक से कहता है कि इस मालती के वध से तुम इस) ससार को सारदीन, तीनों
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पनोकिजीवितम
लोडो को अपहृत रल्ोवाला, नोर को प्रकाशहीन, बान्यवजनो को करष की सरणवाता, कामदेव को (तोनो लोको के जीवने के) दर्द से होन, लोगो के मेशे के निर्माण को निष्फल तथा इस जगत को जोम प्ररम्य बना देने के लिए बयो उद्यत हो गये हो ॥। २१ ॥। अत्र किल वुतचित्प्रबन्धे कक्कापालिक: कामपि कान्तां व्यापादयितुमध्यवसितो भवन्नेवमभिधीयते-यद्पगतसार: ससारन हतरत्नमर्वस्वं वैलोक्यम्, आलोककमनीयवस्तुवर्जितो जीवलोक, सकललोकलोचननिर्माणं निम्फलपायम्, व्रिभुवनरितयित्वद्पहोन: फन्दर्प, जगजीर्णारण्यकल्पमनयाविना भवतीति कि स्वनेवंविधम- करणीय वतु व्यवसित इति। इस पद्य मे किसी प्रबन्ध (भवभूति-विरचित 'मालतोमाधव' नामक प्रकरण) मे किसी रमणो को हत्या करने के लिए उद्यत किसी कापालिक से ऐसा कहा जा रहा है-कि इस (मालती) के बिना ( उसकी हत्ा कर देने पर) ससार सार से होन, वलोकम समस्त रत्राशि से रहित, जोकनोक देखने में कमनीय वस्तुओ से होन, समस्त लोगो के नेनो का निर्माय ध्वमे सा, फामदेव तोनो लोको को जोतने वाले धमण्ड से होन, और जगन जीमें जंगल को भाति हो जायगा। अतः तुम क्यो इस प्रकार के (बनर्यकारी) न करने गोम् कार्य को) करने के लिए जद्यत हो गये हो। इति। एतस्मिन् श्लोके महावाक्यकल्पे वाक्यान्तराण्यशान्तरवाक्य सदशानि तस्याः सकललोकलोभनीयलावण्यसंपत्मतिपादनपरानि
पुष्णन्ति। मरणरारणं पान्यवजनमिति पुनरेतेयां न कलामात्रमपि स्पर्धितुमर्दत्तीति न तद्विदाहादकारि। महुपु च रमणीयेष्वेक वाक्योप- योगिधु युगपत् प्रतिभासपद्षीमवतरत्सु वाक्यार्थपरिपूरणार्थ तत्मतिमं पाप्तुमपर प्रयटनेन प्रतिभा प्रसाधते। तथा न्ास्मिन्नेव भस्तुतवस्तुस- अछ्य चारिवस्त्वन्तरमपि सुमापमेव- "बिधिमपि विपन्नाद्भुत विधिम्" इति। महाव/क्यतुल्य इस श्लोक के एक दूसरे (सभी) वावम अन्य वाबनो के समान उस (मालती) की समस्त लोको द्वारा लोमनोज सोन्डर्व की सम्पत्ि के प्रतिपादन मे सलर हुरेकर, परापर स्पर्षा करने थाले, वयन्त ही रमणोम छम से (कवि हारा) उपनिबद होकेर काम्य के िसी
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प्रथमोन्मेप २६
(नर्निवंचनीय) शोभातिशय का पोषण करते हैं। किन्तु 'मरणशरण बान्घवजनम्' (दनुजन मर जायेंगे यह वाक्य उन (अन्य) वाक्यो की क्लामात्र से भी (किसी भी प्रकार) स्पर्धा करने मे समर्य नही है, अत काव्यतत्त्वविदो के किये झाह्लादजनक नहीं है। एक वाक्य के लिये उपयोगी बहुत से सुन्दर वाक्यो के एक साथ (कवि के) मस्तिष्व मे अवतरित होने पर (सस) वाक्यार्थ को सुचारुरूप से पूर्ण करने के लिए उन (भवान्नर वाक्मो) के सद्श दूसरा (वाक्य) प्राप्त करने के प्रयत्न से (कवि की) प्रतिभा प्रपन्न हो जाती है। और जैसे कि इसी (असार ससार .. श्लोक) मे (अवान्तर वाक्मो द्वारा) प्रस्तुत की गई वस्तु के सदृश दूसरी वस्तु भी बही सरलता से ही प्राप्त हो सकती है (अर्ात् 'मरणशरण बान्धवजनम्' के स्थान पर) 'विधिमपि विपन्नाद्भुत विधि' (ब्रह्मा को भी विनष्ट हो गए अद्भुत विधान वाला) का प्रयोग कर देने से (अवान्तर वाक्यो के सदृश यह वाक्य भी चमत्कारकारी हो जायमा। इससे स्पष्ट है कि कवि ने इस वाक्म के प्रयोग मे अनवधानता दिखाई है।) प्रथभ प्रतिभातपदार्थप्रतिनिधिपदार्थान्तरासंभवे सुकुमारवरापूर्व- समर्पणन कामपि काव्यच्छायामुन्मीलयन्ति कवयः । यथा- (प्रतिभासम्पन्न) कविजन (कोई भी रचता करते समय) सर्वप्रथम मस्तिष्क मे आए हुए पदार्थ के प्रनिनिधिरूप अन्य पदार्थ {जो कि प्रथम प्रतिभात पदार्थ के साथ स्पर्धा कर मके और उसी की भाँति चमरकारजनक हो, उस) के असम्भव होने पर अत्यन्त ही सुकुमार ( पदार्थ) के अपूर्व (नये ढम से) समर्पण के द्वारा किसी ( अनिवचनीय) काव्य की शोभा का उन्मीलन करते हैं। जैसे- रुद्राद्रेस्तुलनं स्वकण्ठविपिनोच्छेदो हुरेवासल कारावेश्मनि पुषपकापहरणम् ॥ २२॥ (बाल रामायण १ ५१ मे कवि राजशेखर रावण के परा्रम का वर्णन करने हुए कि) कैलाश पर्वत को उठा लेना, अपने कण्ठरूपी अरण्य का व्तन करना (अर्थात भगवान शकर की सेवा मे अपने शिरो का काट- काट कर चढाना), इन्द्र का कारागार मे निवास कराना, पुप्पक (विमान) का अपहरण कर लेना-॥। २२ ।।
"यस्येहशाः केलयः" इति न्यस्तम्, येनंत्येऽपि कामपि कमनीयताम- नीयन्त । यथा च-
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३० वकोक्िजीवितम्
दरा प्रकार (राषण के पराक्रम का सुन्दर-सुन्दर वोक्यों द्वारा) उपनिबद्ध करके, पहले उपनिबद्ध किए गये पदार्थों के अनुरूप दूमरी वसतु के असम्भव होने से) अपूर्व (ढंग से ही) 'यस्पेद्था' केलमः' (इस प्रकार की जिसकी कोडायें हुआ करती वीं-अर्पात् इतने पराक्रम का कार्य जिसके लिये केवल ेल या जिसे वह अनायास हो कर डाले था तो उसके परातमपूर्ण कसे होगे) इस प्रकार (अन्निम वाक्य) उपनिद्ध किया है जिस (के प्रयोष) से अन्य (पूर्योपनिबद्ध वाक्य) भी किसी (अपूर्वं, अनिवंचनोव) रमणीयता को प्राप्त हो गए हैं। और जैसे-
तह्वक्ेन्दुविलोकनेन दिवसो नीतः प्रदोपस्तया तद्गोष्ठयैव निशाषि मन्मन्यकृतोत्साहैस्सददापेणैः । तां सप्रत्यपि मार्गदत्तनयना द्रषटं पवृतस्य मे पद्धोत्कण्ठमिदं मनः किम् ॥। २३ ॥। (तापसवत्सराजचरितम् मे) उस के मुखचन्द्र को देखने मे दिन (व्यतीत हो गया) तथा उसके साथ गोह़ी करने मे ही सन्या (बीत यई) एवं कामदेव द्वारा उत्पन्न उत्साह से मुक्त उसके अंगों के अपन से रात भी बीत गई। फिर भी (मेरी प्रतीक्षा मे) रास्ते में आख लगाने हुए उसे देखने के लिए मेरा मन (न जाने) क्यों उत्कष्ठायुक्त हो रहा है-।। २३ ।। इति संप्रत्यपि तामेषंविर्घां वीक्षितुं प्रवृत्तस्य मम मनः किमिति बवनोत्कण्ठमिति परिसमासेऽपि वथाविघवस्तुविन्यासो विहित :- "अथवा प्रेमासमापोतसवम्" इति, येन पूर्वेपां जीवितमिवार्पितम्। 'इस प्रकार अब भी इस प्रकार की (रास्ते में मेरी प्रतीक्षा मे मांख लगाए हुए) उसको देखने के लिए प्रवृत्त मेरा मन (न जाने) शयो उत्कष्ठित है, इस प्रकार (वाक्य) वे समाप्त हो जाने पर भी -(कवि ने) -'अथवा प्रमासमाप्तोत्सवम्' (अर्थान प्रेम का उत्सव कभी भी समाप्त नहीं होता, उसमे सदेव उत्कफ्ठा बनी ही रहती है) इस प्रकार ऐसा (अपूर्व) वस्तु (वाक्य) विन्यास कर दिया है जिससे पूर्वनिबद्ध वाक्यो मे जान-सी डाल दी गई है। यद्यपि द्वयोर्येतयोस्तक्षाधान्येनैय वाक्योपनिबन्यः तथापि कविप्रतिभाप्रौढिरेय आ्रधार्न्येनावतिष्ठते। शब्दस्यापि शव्दान्तरेश साहित्य विरहो दाहरणं यया-
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प्रथमोन्मेष:
यद्यपि इन दोनो (श्लोको) मे भी वाक्यविन्यास उस (परस्परस्पित्व- रूप साहित्य के हो प्रधान्म से किया गया है फिर भी प्रधानरूप से कवि की प्रतिभा की पोढता ही विधमान होती है। टिप्पणी :- मानार्य कुन्तन ने अपने उक्त कथन द्वारा काव-रचना मे कविप्रतिभा को प्रवाग बचाया है। अर्थात् यदि कवि प्रतिभासम्पन्न है तो उसकी रचना मे किसी भी प्रकार सब्दार्थ-साहित्य की परत्पर-सपधित्वरूपता में कोई वाघा नहीं उपस्थित हो सकती जैसा कि 'हद्रादवेस्तुलनम्-'॥।२२॥ एव 'तदक्बेन्दुविलोकनेन-॥।२३॥ उदाहरणो से स्पष्ट है। और यदि कवि प्रतिभासम्पन्न नही (अथवा प्रतिभासम्पन्न होते हुए भी अनवधान- वान है) तो, रचना मे 'असार ससार-॥। २१॥ को भाँति दोष आ जाना स्वाभाविक ही है। (सभी तक पूर्व उदाहृत-'असार ससारम्-'पद्य मे अर्थ साहित्य विरह का उदाहरण देकर) अव शब्द के भी अन्य शब्द के साथ माहित्य (परस्परत्पवित्वरूप) के विरह (अभाव) का उदाहरण (प्रस्तुत करते हैं) जैसे-(शिशुपालवष १०।३२ मे)- चारता धपुरभूषयदासां तामनूननषयोवनयोग:। तं पुनर्म करफेतनलद्मीस्तां मदो दयितसङ्गमभूष: ॥२४॥ इन (रमणियो) के शरीर को सुन्दरता ने, उस ( सुन्दरता) को पूर्ष (रूप से विकसित) नवयीवन के सयोग ने, तथा उस ( नवयोवन) को मदनश्री ने, तथा उस (मदनश्री) को प्रियतम के सम्मिलनरूप भूषण से युक्त मद ने भूषित किया॥ २४ ॥ दयितसङ्गमस्तामभूषयदिति बक्तव्ये कीटशो मद:, दयितसङ्गमो भूपा यस्येति। दयितसङ्गमशब्दस्य प्राधान्येनाभिमतस्य समासवृत्ता- वन्तर्भूतत्वाद् गुणीभावो न तद्विदाहादकारी । दीपकालंकारस्य घ काव्यशोभाकारित्वेनोपनिबद्धस्य निर्वहणावसरे बुटितप्रायत्वात् प्रक्रमभङ्गविहितं सरसहृद्यवरस्यमनिवार्यम्। 'दयितसङ्गतिरेनम्' इति पाठान्तर सुलसमेव। प्रिय के सङ्गम से उस (मदनथी) को भूषित किया ऐसा कहने के स्थान पर (कवि ने कहा कि मद ने उसे भूषित किया तो) केसे मद ने प्रिय का सङ्गम ही है भूषणं जिसका ऐसे ( मद ने भूषित किया)। (यहां) प्रघानरूप से अभीष्ट 'दमितसङ्गम' शब्द के समासवृत्ि में
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३२ बनोकिजीवितम
अन्नर्भूत हो जाने के कारण (उसका) गुणभाव काव्यतत्त्वममंज्ञो के लिये आनन्ददायद नहीं है। साथ ही करव्य के शोभाजनक के रूप मे उपनिदद दीपक अलद्धार के निर्वहणकाल मे भङ्ग-सा हो जाने से प्रतभभङ्ग् (दोष) जन्य सहृदयों के हृदय का वरस्य आवसयक हो गया है। (जब कि 'दवित- सङ्गमभूप' के स्थान पर उक्त दोष को दूर करने के लिए) 'दवितसङ्गति रेनम्' (अर्थात् मदनश्री को मद ने औोर उस मद वो प्रिय के सङ्गम ने भूषित किया) यह पाठ सरलता से ही प्राप्य है। जिससे प्रकमभङ्ग दोष भी समास हो जायगा, साथ ही 'दवितस्म' का गुणीभाव भी दूर हो जामगा।)
द्वयोरप्येतयोख्दाहरणयो: माधान्येन प्रत्येकमेकतरस्य साहित्य विरहो व्याख्यातः । परमार्थतः पुनरुभयोरप्येकतरस्य साहित्य- विरहोऽन्यतरस्यापि पर्यवस्यति। तथा चार्थ: समर्थवाचकासद्गाबे स्वात्मना स्कुरभ्पि मृतकल्प एवावतिष्वते। शब्दोऽपि वाक्योपयोगि वाच्यासभवे वाच्यान्तरवाचकः सन् वाक्यस्य व्याधिभूतः प्रवि- भतीत्यलमतिप्रसङ्गेन !
इन दोनो (श्लोकसस्या २१ एव २४) उदाहरणो मे प्रत्येक मे एक प्राधान्य द्वारा (अर्थान् 'अमार मसार'-मे अर्थ के प्राधान्य के कारण अर्य के तथा 'चाहना वपुरभूपयत्'-मे शब्द के प्राधान्य के कारण शब्द के) साहित्य के अभाव की व्याट्या की गई है। बास्तविक्ता तो यह है कि उन दोनों मे एव के भी साहित्य का विरह होने पर दूसरे का भी (साहित्य-विरह अपने आप) हो जाना है। और इसी लिए अयं (वाक्य के उपयोगी अर्थ के दे सबने में) समर्थ शब्द के अभाव मे स्वभावत स्फुरित होता हुआ भी मृतप्राय सा ही रहता है। और शब्द भी वाकय के लिए उपयोगी अर्थ के अभाव मे वन्य (चमर्कारहीन) अर्थ का वाचक होकर वाक्य के लिए व्याघिस्वरूप प्रवीत होता है (अत यह सिद्ध हुआ कि शब्द और अर्थ मे किसी एक का भी साहित्य विरह दूसरे के साहित्य-विरह मे पमवसित हो जाता है) इस प्रकार धव अतिप्रसङ्ग की आवश्यकता नही। प्रकृतं तु । कीटशे बन्घे-वक्रकवित्यापारशालिनि। वक्रो योऽसौ शास्त्रादिपसिद्धशब्दार्थोपनिबन्धव्यतविरेकी पट्प्रकारवकता विशिष्टः कवित्यापारस्तत्कियाक्रमस्तेन शालते श्लापते यस्तस्मिन्
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प्रथमोन्मेष ३३
हादकारिणि 1 तदिति काव्यपरामर्शः तद्विदन्वीति तद्विदस्वव्क्षा स्तेषामाहादमानन्दं करोति यस्तस्मिन् तद्विदाहादकारिणि बन्घे व्यवस्थिनौ। वकतां वक्ताप्रकारास्तद्विदाहादकारित्यं च प्रत्येकं यथावसरमे वोदाह रिष्यन्ते।
अवतरप्राप्त (बाव) तो (यह है कि) किस प्रकार के बन्ध में (न्वर्वस्थत, सहभाव से युक्त शब्द और अर्म काव्य होते हैं?) वककवि- व्यापार से शोभित होने वाले। वभ अर्थान् जो यह शस्नादि मे प्रसिद्ध शब्द और अर्थ के उपनिबन्धन से व्यतिरिक्त, (वश्यमाण) छ प्रकार की वकताओ से विशिष्ट कवि का व्यापार सर्थात उसकी कियाओ का (काव्य-रचना का) नम है, उसमे जो शोममित अर्थात् प्रशसित होता है, उस (बन्घ) मे (व्यदम्थित शब्द और नर्ष काव्य होने है।) तो इस प्रकार (लक्षण करने कर) मी कटिन वर्पन से उपहृत (वन्द) मे भी (शास्त्रादि मे) प्रसिद्ध (शब्दादोपनिबन्ध) से व्यतिरिकता आ जायगी (अर्थाव कठिन कल्पना से बुक्त भी बन्ध मे व्यवस्थित शब्द और अर्थ काव्य होने लगेंगे) बतः (ऐसे बन्धाव्य न हो इसके निवारणायं ) कहा है कि तदिदो के लिए माह्लादजनक (बन्ध मे व्यवस्थित। ततु शब्द से काव्य का परामश होता है। अर्थान् उस (काव्य) को जानते हैं जो वे हुए तदिद् ( अषात (काव्यक्ष) उनका जो आह्वाद अर्थान् आनन्द करता है वह हुआ तविदा- हादकारी(अर्थान काव्यजो के आह्वाद का जनक) उस बन्ध मे व्यवस्थित (शब्द और अर्थ काव्य होते है) । वक्रता, वतता के प्रकारो सथा काव्यतों की आललादकारिता, प्रत्येक को यथावसर ही उदाहत किया जायगा 1
एवं काव्यस्य सामान्यलक्षणे विहिते विशेषलक्षणमुपकमते। तत्र शब्दार्थ योस्तावत्स्वरूपं निरूपयति- वाच्योडर्थों वाचका शब्द: प्रसिद्धमिति यद्यपि। तथापि काव्यमार्गेऽस्मिन् परमार्थोऽयमेतयोः ॥८॥
इस प्रकार काव्य का समान्य लक्षण कर देने के अननर विशेष सक्षण प्रारम्भ करते हैं। उसमे तब तक शब्द और अर्ष के स्वरूप का निरूपण करते हैं- मद्यपि वाब्य अर्थ (होता है तथा) वाचक शब्द (होता है) यह
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प्रसिद्ध है, फिर भी इस काय्य मार्ग मे इन दोनो का पतमायं (काव्य मार्ग मे प्रयुक्त होने वामा वास्तविक एव अपूर्व अर्थ) यह (आगे हवी कारिवा मे कहा जाने वाला) है।। ८ :।
इवि एवंयिधं वस्तुं प्रसिद्ध प्रतीतम्-यो षाचक स शब्द यो वाच्यश्चाभिषेय: सोडर्ये इति। ननु व धोलकव्यक्षकावपि शब्दौ सम्भवतः, तद्समहानाव्याप्तिः यस्मादर्थप्रतीतिकारित्वसामान्या दुपचारात्तावपि वाचकावेव। एवं त्योत्यव्यक्गययोरथयो: प्रत्येयत्व- सामान्यादुपचाराद्वाच्यत्वमेव । तस्मादू वाचकत्वं वाच्यत्वं प शब्दार्थयोलोंके सुप्सिद्धं वद्यपि लक्षणम्, तथाप्यस्मिन् अलीकिके काव्यमार्गे कविकर्मवर्तर्मनि अयमेतयोर्वत्यमाणलक्षणः परमार्थः किमष्यपूर्ष तत्त्वमित्यर्थः। कीटशमिन्याद-
इति अर्थात इस प्रकार की वस्तु प्रसिद्ध अर्थान् (लोक मे) प्रसिद्ध है कि-जो वाचक (है) वह शन्द (होता है) और जो वाच्य अर्थात अभिघेन (है) वह अर्थ (होता है) । (यदि कोई शंका करे कि) ख्ोतक और व्यकक भी तो शब्द सम्भव है (जब कि मपने केवल वाचक शब्द ही ग्रहण किया ह अतः लक्षण मे अव्याप्ति दोष होगा तो उस शट्ूा का समाधान करते हैं कि) उस (धोतक और व्यञ्ञक) के ग्रहण न करने से अग्याप्त (दाष) नहीं हू, वयोंकि अर्प की प्रतीतिकारिता रूप सामान्य के कारण उपचार (लक्षणा अथवा गोणीवृत्ति) से वे दोनों (दोतक और बमबक शब्द) भी वाचक ही हुए। इस प्रकार द्ोत्य और व्यंग्य अथों में भी जञेपल (प्रस्येयत्व) सामान्य के कारण उपचार से वाच्यत्व ही ( हो जायगा) इसलिए यद्यपि सोक मे शब्द और अर्थ का वाचक रूप एव वाच्य रूप लक्षण अच्छी तरह प्रसिद्ध है, फिर भी इस अलोकिक' काव्यमार्ग अर्थान कविकर्म के पथ मे यह इन दोनों का (ध्वी कारिका मे) कहा जाने वाला, परमाय कोई (अनिर्वचनीय) अपूर्व तत्व है। यह षभिप्राय हुआ। तो यह (अपूर्व सत्त्व) किस प्रकार का है यह बताते है- शब्दो विवक्षितारथकवाचकोऽन्येपु सत्स्वपि।
(काव्यमार्गं मे विवक्षित अर्य के वाचक) अन्य (बहूत से पर्यायवाषी शब्दो) के रहने पर भी, कहने के लिए अभिप्रेत अर्य का (केवल) एक ही
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प्रथमोन्मेष:
वाचक (शब्द) शब्द होता है। (तथा) सहदमों को बाह्लादित करने वाला अपने स्वभाव से सुन्दर (अर्थ ही) अर्थ होता है।। ६ ।। स शब्द: काव्ये यस्तत्समुचितसमस्तसामपीकः। कीटक- विषक्षितार्थेकवाचक: । विवक्षितो योऽसौ वक्तुमिष्ठोऽर्थस्तदेकवाचक- स्तस्यैक: केवल एव वाचक: । कथम्-अन्येषु सत्स्वपि । अपरेपु सैदाचकेधु बहुष्तपि विद्यमानेषु। तथा च-
काव्य मे शब्द वही (होता है) जो उस (काव्य) के लिए समुचित समस्त सामप्ियो से युक्त होता है। कैसा (शब्द)? विवक्षित अर्थ का एक हो वाचक। विवक्षित् अर्थात जो यह कहने के लिए अभिप्रत अर्थ है उसका एक वाचक अर्थात् केवल वह ही वाचक उस अर्थ की प्रकाशित करने में समर्थ होता है) कसे अन्यो के रहने पर भी। अर्थात् उस अर्थ के वाचक दूसरे बहुत मे (शब्दों) के रहने पर भी (जरो विवक्षित अर्भे का केवल एकमान प्रकाशक होता है वह शब्द ही काव्य मे शब्द कहलाने का अधिकारी होता है।) इसी प्रकार-
सामान्यात्मना वक्तुममिप्रेतो योऽर्यस्तस्य विशेषाभिधायी शब्द: सम्यग वाचकर्तां न प्रतिपद्यते । यथा- जो अर्थ सामान्यरूप से कहने के लिए अभिप्रेत है, उसकी सम्यक् वाचकता को विशेषरूप से अभिष्वान करने वाला शब्द नही प्राप्त होता है- (अर्थात् जहौ हमे सामान्यरूप का अर्थ विवक्षित है वहां हम ऐसे ही शब्द का प्रयोग करें जो सामान्यरूप का अर्य दे सके। अन्यथा उसके स्थान पर यदि हम विशेषरूप का अर्थ देने वाते शब्द का प्रमोग करेगे तो वह शब्द उस अभिप्रेत अर्थ का वाचक न होगा) जैसे-
रत्नान्यमूनि मकराकर भाऽवसस्था । कि कौस्तुभेन भवतो विहितो न नाम याच्चाप्रसारितकरः पुरुपोत्तमोडपि ॥। २५॥ हे सागर (मकरालय)। (अपनी) उत्ताल सरङ्गो द्वारा चचत किए गए पापाणो के कठोर आघातो से इन रत्नो को अपमानित मत करो। क्या (इन्हीं रलों में से एक दत्) कोस्तुम ने पुष्पश्रेष्ठ (भगवान् विष्णु) को
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भी याचना के लिए (दुम्हारे नामने) द पंसाने के लिए प्रेरित नहीं, किया ॥ २४॥
मत्र रत्नसामान्योत्कर्षामिधानगुपकान्तम्। कौस्तुभेनेति रत्नविद्ये- भामिघायी शब्दस्व्द्विरोपोत्कर्ाभिधानमुपसहरतीति प्रकमोपसंहार वैषम्यं न शोमातिशयमावहति। न चैतद्ववतुं शक्यते-यः वश्वि- द्विरोपे गुणभ्रामगरिमा विद्यते स सर्वसानान्येऽ्पि सम्भवत्येपेति। पस्मात्- यहा (कवि ने) रत्न सामान्य के उत्कर्ष का कथन आ्रारम्भ कियया या (हिन्तु) 'कोम्सुभेन' यह रत्नविशेष का कथन करने वासा दब्द उस (रल) विशेष के उत्सर्गं के कथन में उपसहार करता है। इस प्रकार प्रारम्म और उपसहार का वैषम्य शोभाधिक्य को नहीं धारण करता है। (अर्थात् कवि ने पहने रलसामान्य के उत्संर्ग का कपन ता प्रारेम्भ किया बिन्तु 'कोस्तुभेन' कहकर उपसहार एक रत्नविशेष 'कोस्तुभ' के उत्कयं मे कर दिया। जिसने यहाँ 'प्रक्रमभङ्ग' दोप या गया जो कि शोभातिशय का पोषक नहीं है। (और यह भी नही कहा जा सकता कि-जो कोई भुण) समूह की गरिमा विशेष मे रहती है वह सर्वसामान्य मे भी सम्भव होती ही है। क्योंकक तन्नारमाबिका १४० मे कहा गया है कि- वाजिवारणलोद्दानां काष्टपापाणवाससाम्। नारीपुरुषतोयानामन्तरं महृदन्तरम् ॥। २६ ॥। वभ्व, गज, लोहा (रत्नादि), लकही, पुत्थर, वस्त्, स्त्री, पुरष और
है।। २६ ।। जल का (अपने सजातियो से ही) अन्तर, बहुत बडा अन्तर होवा
तस्मादेवविधे विषये सामान्याभिषाय्येव शब्द: सहृदयहृदयहारितां प्रतिपद्यते। तथा चास्मिन् प्रकृते पाठान्तरं सुलभमेव-"एकेन कि न विहिता भववः स नाम" इवि। इस लिए इस प्रकार (जहाँ सामान्यरप का कयन अभिप्रेत है, उस) के विषय मे सामान्य का अभिधान करनेवाता शब्द ही सहृदयो की हृदमहारिता को प्राप्त होता है। (विदयेपरुप का कथन करनेदाना शब्द नही।) और फिर इस प्रकृत ('कब्जोलवल्लित' इत्यादि पद्य) मे 'एवेन कि न विहितो भवत स नाम' (अर्थात् वया एक (कौस्तुभ) मणि ने आपको वह यह
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नही प्रदान किया) यह पाठान्तर सरलता से हो प्राम हो सकता है। जो कि वाकय का उपसहार भी सामान्य ही अर्थ में करता हुआ सहृदयहृदप- हारिता को प्राप्त करेगा ।) यत्र विशेषात्मना वस्तु प्रतिपादयितुमभिमतं तत्र विशेषाभिधा- यकमेवाभिधानं निवण्नन्ति कवयः । यथा- जहां वस्तु का विशेषरूद से ही प्रतिपादन करना (कवियो को) अभिप्रेत होता है वहाँ कविजन विशेष का अभिधान करनेवाले ही शब्द का प्रयोग करते हैं। जैसे-महाकवि कालिदास ने कुमारसम्भव (५७१) मे पार्वती से भिक्षुरूधारी शङ्गर द्वारा कहलवाया है कि द्वयं गत सपति शोचनोयतां ममागमपार्थनया कपालिनः। कला च सा कान्तिमती कलावतस्त्वमस्य लोर्कस्य च नेत्रकौमुदी॥२॥ (एक तो) वह कलावान् (चन्द्रमा) की कान्तिमती कला ओर (दूसरी) इस लोक के नेत्रो की कौमुदी तुम, दोनो इस समय (उस), कपाली (शहर) के समागम की प्रार्थना से शोचनीयता को प्राप्त हो गई हो।।२७॥
अत्र परमेशवरवाचकशनसह्ससंभवेडपि कपालिन इति बीभत्स- रसालम्बनविभायवाचक शब्दो जुगुप्सास्पदत्वेन प्रयुज्यमान: कामपि चाचकवकता विद्धाति। 'संप्रति' 'द्वय' चेत्यतीय रमणोयम्-यन् किज् पूर्वमेका सैतर दुरन्यंप्नदूषितत्व्रेन शोचनोपा संजाता, संपरति पुनस्तया तस्यास्तथाविघदुरष्यवसावसाहायकमित्रार्घमित्युप हस्यते । 'प्रार्थना' श=दोऽ्प्यतितरं रमणोय:, यसमात् काकतालोययोगेन तम्समागम: कदावित्र वाच्यतानह। प्रार्थना पुनरत्रात्यन्वं कोलोन- कर ककारिणी। इस पद्य मे शङर के वाचक (िनाकी आ्वि) सहसो शब्दो के सम्भव होने पर भी 'कपाकिन' (कपाली की) यह बीमत्सरस के आलम्बन विभाव का चाबक शब्द घृगा के पान के रून मे प्रयुक्त होरर किसी (अनि बंचनीप) शब्द की वक्ता को धारम करता है। (भाव यह है कि यह। भिक्षुवेधधारी शक्र पावती के मन में शित् के प्रति घुगा पेदा कराना चाहवे है अत यदि यहाँ 'कवाली' के स्थान पर वे 'पिनाकी' आदि कहने वो यह पुणाभाव आना ही कठिन था। अन.कराली कहकर जिथ के बीमरवर का विषम किशा है। जो उन्हें मुगासर सिद् करता है1 पहो प्रधसी पय
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की बतता है।) 'सम्पति' (इस समय ) औरर 'द्वय' (दोनो) ये पद मी अत्यन्त रमणीय है-कयोंकि पहले तो एक वहो ( चन्द्रकला ही कपाली के समागमसप) दुर्व्यंसन से दूवित होने के कारण शोचतीय हो गई थी ओर फिर अब तुमने भी उस (चन्द्रवला) के उस प्रकार के दुशधवमाय (दुखदायी उत्साह) मे सहायता सा करना प्रारम्भ कर दिया है इस प्रकार (भिन्ष्वेपवारी शिव द्वारा पावती का) उपहास किया जा रहा है। 'प्राथँना' शब्द भी अत्यधिक रमणीय है, मयोकि अकस्मात् (काकतालीय योग से) हो गया उस कपाली का समागम शायद वाच्यता (निन्दा) का वहन न दरता किन्तु यहाँ (उस कपाली के समागम की) प्रार्थना अत्यन्न ही बुलीन (बुस) मे उत्पन्न होनेवाली (तुम्हारे लिए) कलद्द कारिणी है।
'सा प' 'त्वं च' इवि, द्वयोरप्यनुभूयमानपरस्परस्पर्घिलावण्याति रायप्रतिपाद्नपरत्वेनोपात्तम् । 'कलावत्तः' 'कान्तिमती' इति च मत्वर्थायम्रतययेन द्ववोरपि प्रशंसा प्रतीमत इत्येतेयां प्रत्येकं कशितप्यर्थः शन्दान्तराभिघेयवां नोतसह ते। कविविर्वाक्षत विशेषाभिधानक्षमत्वमेव पाचकत्वलक्षणम्। यस्मात्पतिभारयां तत्कालोल्लिसितेन केनचित्परि स्पन्देन परिस्फुरन्तः पदार्था प्रकृतप्रस्तावसमुचितेन केनचिदुत्कपण वा समाच्छादितस्वमावाः सन्तो विवक्षाविधे यत्वेनाभिघेयतापदबी मषतरन्तस्तथा विध विशेष-प्रतिपादन-समर्थेनाभियानेना मिधीयमानाक्रे वनथमत्कारितामापधन्ते। यथा-
'सा च' (वह) और 'स्वच्न' (तुम) मे दोनों पद (धन्द्रकता और पायंत्री) दोनों के अनुभूयमान परस्पर स्पर्धा करनेवाले लावण्य के अतिगाय का प्रतिपादन करने के लिए ब्रहण किए गए है। 'कलावत'' और 'शान्ति- मती इन पदों में मत्वर्वीय प्रत्यय के द्वारा दोनो (चन्द्रमा एव उसकी इमा) की प्रशसा प्रवीत होती है। इस प्रकार (इग क्लोक मे प्रयुक्त) इन सभी पदों का प्रत्येक कोई भी अ्थ दूसरे शब्द द्वारा सभिधेयता को वहन नहीं कर सकसा बर्चात् यदि कवि द्वारा प्रयुक्त इस ग्लोर के प्त्मैक पदों के स्पान पर उसका पर्मामवाची दूसरा शब्द रखा जाद को तह दिय क्षित धर्थ को देने में मसमर्ष अतु पमत्कारहीन हो जानगा।) (मड) रषि के द्वारा कहने के लिए अभिप्रेत विशेष (म्पं) का जमिव्ान करने की समता का होना ही बाचकतव का लक्षण है। मिमने ( कव को) प्रविया में रस (काम्मरचता के) समय उम्मिवित हुए किसी स्वभावविरेष के
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प्रथमोन्मेष.
द्वारा पुरिस्फुरित होते हुए पदार्थ, अचवा अवसर प्राप्त प्रकरण के योग्य किसी उत्वर्यंविशैन से समाच्छन्न स्वभाव वाले होकर (पदार्थ कवि के) कथन के लिए सगिनित (वस्तु) की विदयता के कारण अभिधेयता को प्रासत कर, उस प्रकार के विशेष (अर्थ) के प्रतिपादन में समर्थ शब्द द्वारा अभिद्यीयमान होकर (सहृदपो के) हृदयो को चमत्कृत करने लगते है। जैसे- संरम्भ' करिकोटमेघशकलोद्देशेन सिंहस्य य: सर्वस्येव स जातिमात्रबिहितो हेवाकलेश किल। इत्याशाद्विर दृक्षयाम्लुद्घटाबन्धेऽप्यसरब्घवान् योऽसी कुत्र चमत्कृतेरनिशयं यात्यन्यिकाकेसरी॥। २८॥। करिकीटरूपी मेघखण्ड को लक्ष्य करके जो सिंह का अभिनिवेश है यह तो सभी (सिहो) का केवल जातिजन्य साधारण स्वभाव है अत जो यह भगवती दुर्गा का (वाहनभूत) सिंह साधारण दिग्गजरूपी प्रलयमेधो की घटारचना के प्रति भी अभिनिवेशहीन है ( तो फिर भला) और वह कहाँ ALAA चमत्कार के उत्कर्ष को प्राप्त कर सकेगा ॥ २८ ॥ अत्र करिणां 'कीट'-व्यपदेशेन तिरस्कार, तोयदानो च 'शफल' शब्दाभिधानेनानादर:, 'सर्वस्थ' इति यस्य कस्यचित्तच्छतरप्रायस्ये- त्यमहेला, जातेश् 'मात्र'-शब्द विशिष्टत्वेनावलेप:, हेवाफ्स्य 'सेश'-
यन्ति। 'घटायन्य - शन्दस्य प्रस्सुतमहत्त्वप्रतिपादनपरत्वेनोपासस्त- निषन्धनता प्रतिपधते। विशेषाभिघानाकाकक्षिणः पुनः पदार्थ- स्वरूपस्य तत्मतिपादन परविशेपणशून्यतया यपा-
यहां (उक्त पद्य मे) हाथियो का 'कोट' सा के द्वारा तिरस्कार (किया गया है), और बादलो का 'शकल' शब्द के द्वारा अभिधान कर अनादर (किया गया है)। 'सर्वस्व' इस (पद्र के प्रयोग द्वारा) जिस किसी अत्यधिक तुच्छ) हाथी का भी ऐया स्वभाव होता है।) इस प्रकान कहकर अवहेलना (की गई है), और जाति का 'मात्र' शब्द को विशेषण बनाकर (अम्बिकाकेसरी के) घमण्ड (सवलेप) की (सूचना दी गई है) तपा हेवाक का लेश शब्द के द्वारा अभिधान कर अल्पता की प्तीति (कराई गई है) इस प्रकार ये (समी शम्द) विगसित अर्प की केवल
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४o वकोक्तिजीवितम्
एक हो वाचवता को छोतित करते हैं। तपा 'घटाबन्ध' शन्द प्रस्तुत (अम्बिकारेसर) के महत्त्व का प्रतिपादन करने के लिए गुहीत होकर उस (महत्त्वप्रतीति ) की कारणता को प्राप्त करता है। फिर विशेष अमिधान के इन्छुरु पदार्षों के स्वरूप की, उस (विशेष अभिध्वान) का प्रतिपादन करने वासे विशेषण के अभाव मे, शोभा की हानि होती है। जैसे-
तघ्रानुल्लिसितास्यमेव निखिलं निर्माणमेतद्विधे- रुत्कर्षप्रतियोगिकल्पनमपि न्यक्कारकोटिन परा। याता: प्राणमृता मनोस्थगतीसलव्षथ यर संपद- स्तस्यामासमणोकृताश्मसु भणेएरमत्वमेवोचितम् ।। २६।
जिस (पिन्तामणि) के होने पर ब्रझ्मा को सारी सृष्ि नामोल्लेव करने मोग्म नही रह जाती, [ एव जिसके) उत्कर्ष के ( सदुश उत्कर्षवाले किसी अन्य पदार्परषप) प्रतियोगी की कल्पना करना भी (उसके) अपमान की पराकाह्ा है, तथा जिसकी सम्पतति प्राणधारियों के मनोरयो की गति को भी पार कर गई है (मर्थान् जिसकी सम्पति, मनोत्य के लिए भी अ्रगोवर' है) उस (चिन्तामणि) के आमास से (मणि न होते हुए मो) मणिरूप हो जाने वाले पस्थर के टुरूशे के बीष पत्थर का टुकडा ही बना रहना उचित है। अर्थात् यदि अन्य साधारण मणियों मे ही चिन्तामणि की भो गनना की जाती है तो बच्छा होगा कि उसे पत्पर हो कहा जाँप, मणि नहीं, क्योंकि उससे उसका अपमान होता है॥। २ह।।
अत् 'आामास'रा: स्वयमेय मात्रादिविशिष्टत्व ममिलपॅल्लदयते। पाठान्वरम्-'छाया मात्रमणीकृताशमसु इदि। एतच्च याचकवक्रताप्रकारस्वरूपनिरूपणावसरे प्रतिपद प्रकटी-
"यहीं आभास शब्द स्वम ही मात्र आदि विशेषणों के द्वारा (आभास- मात्र) इस प्रकार की विशिष्टना की इच्छा करता हुआ दिखाई पहता है। बठः इसके स्थान पर दूसरा पाठ-छायामात्र मणोकतामममु मणेस्तस्पाश्मत- वोषिता-अर्पात् छायामात्र से पत्पर को मणि बना देनेवाले उस चिन्तामणि का पस्पर होना ही उर्चित है. (अत्यधिक चमाकारपूर्ण होगा)। यह सब रम्दयकता के प्रकाशों के स्वस्प का निरूपण करते समय पदन्पद पर
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प्रथमोन्मेष ४१
(स्वय) प्रकट हो जायगा। अत अब अतिप्रसग (उसके महाँ विवेचन) की वावश्यकता नही ( यघावसर उसका विवेचन किया जायगा।)
अर्थध्च वाच्यलक्षणः कीहशः-काव्ये यः सहृदयाह्ृादकारिस्वम्पन्द- सुन्दरः ! महदया' काव्यार्थविदस्तेपामाह्नादमानन्द करोति यस्नेन स्वस्पन्देनात्मीयेन स्वभावेन सुन्दर सुकुमारः। तदेतदुक्त भवति- यद्यपि पदार्थस्य नानाविधधर्मसचितत्व संभवति तर्थापि तथाविघेन धर्मेण संबन्ध: समारयायने यः सहदयहदयाहादमायातु क्षमते। तस्य च तदाहादसामर्थ्य सभाव्यने चेन काचिदेव स्वभावमददता रस परिपोपाङ्गत्व वा व्यक्तिमासादुर्यति। यथा-
(अभी नक काव्य मे शब्द किस स्वरूप का होना चाहिए, उसका निरूपण कर अब अर्थ के स्वरूप का विवेचन प्रस्तुत करते है/ और वाच्य- रूप अर्थ किस प्रकार का (काव्यमार्ग में इए है)-काव्य मे जो सहकयो के आह्वादजनक अपने स्वभाव से सून्दर (होता है)। सहृद्य अर्थान काव्य वे अर्थ को जाननेवाले उनके आह्वाद अर्थान् आनन्द को (उत्पन्न) करता है जो उस अपने स्पन्द अर्थान् आत्मीय स्वभाव से सुन्दर अर्थान् सुकुमार (अर्थ काव्य मे अभिप्रेत है) इस प्रकार यह कहा गया है कि-मद्पि पदार्थ का नाना प्रकार के धर्मों से गुक्त होना सम्भव है फिर भी ( काव्य मे पदार्थ के) उस प्रकार के (विशेष) धर्म के साथ सम्बन्ध का भली प्रकार बणॅन किया जाता है जो सहदमो के हृदयो में आनन्द उत्पप्न क रने मे समर्य होता है। और इस प्रकार के वर्णन द्वारा उस (पदार्घ) का वह (सहदयो के) आह्लाद का साम्थ्य सम्भव हो जाता है जिससे कोई (अपू्वं, अनि्वचनीय) ही (पदार्थ के) स्वभाव की महत्ता अथवा (उसकी) रस के परिपोष मे अङ्भता व्यक्त हो जाती है। जैसे- वंट्टापिष्टेयु सद: शिखरिपु न कृत स्कन्ध कण्डूविनोद:
लब्घा पावालपस्ट न लुठनरतय पोत्रमात्रोपसुक्ते येनोद्धारे धरित्याः स जयति निभुतावित्नितेच्छो बराहः॥३।।
(विष्णु भगवान् के वाराहाबतार बाल का वणन करते हुए कवि कहता है कि) जिस (वराहुरूपघारी, बिप्मु) ने पृथ्वो का निस दिरण्याक्ष पाताल मे उठा ले गया था) उद्धार करते समय (अपने ) दाढ (की चोंटो) से
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पिस गए पवतो पर (अपने) कन्धो को सुनलाने का झानन्द नहीं (पाप) किया, (तथा अपने) खुरो के कुहरो से विगलित होते हुए तुष्छ जल बाबे समुद्रो मे (जिसने) स्नान नहीं किया, (एव) पोतने माम के लिए उपमुक्त पाताल के कीचड मे (जिसने) लोटने का आनन्द नही श्राप्त रिया, (ऐसे) वह (अपनी) विभता के कारण बाघित इच्छा वाले बराह (रूपधारी विप्णु) सर्वोक्कृष्ट है।। ३ । अन घ तथाविध: पदार्थपरिस्पन्दमहिमा निबद्धोदय स्वभाव संभविनस्तत्परिस्पन्दान्तरस्य संरोधसंपादनेन स्वभावमहत्तां समुलास यन् महदयाहाटकारितां प्रपन्नः । यथा च- इम श्नोक मे (कवि ने) उस प्रवार की पदार्थ (वरहरूपधारी विष्ण) के व्यापार की महिमा का वर्णेन प्रस्तुत किया है जो स्वभाव से ही उत्पन्न होने वाले उम (पदार्थ) के अन्य व्यापारो के निरोध के सम्पादन के द्वारा (उस पदार्थ के) स्वभाव की मतसा को स्कुरित करता हुआ सहृदयो को आनन्दित करता है। और जैसे (महावषि कालिदास ने रपुवश १४1३० मे राम के द्वारा निर्वासित गमेवती सोता के रुदन का अनुसरण करते हुए वाल्मीकि मुनि के उसके पास जाने का वर्णन करते हुए कहते हैं कि-) नामभ्यागच्छ द्रुदितानुसारी मुनिः कुशेष्माहरणाय यातः। निपाद विद्वाण्डजदर्शनोत्थः श्लोकत्वमापयत यस्थ शोक:॥३१॥ कुश और समिधा लाने के लिए गए हुए ( वे) मुनि (सीता के) रदन का अनुसरण करते हुए उसके पास पहुँचे जिनका निषाद के द्वारा विद्ध किए पक्षी (कांच) के दशन से उद्भूत शोक (मा निवाद प्रतिष्ठा खवमगरम' शाश्वतो समा। यत्कोखमियनादेकमवधो काममोहितम्॥ वा र वालकाण्ड २११५ इस प्रकार के आदि) फ्लोक के रूप मे परिणित हो गया था ॥ ३१ ॥ अत्र कोऽसी मुनिर्यात्मीकिरिति पर्यायपद मात्रे एकव्ये परमकारुणि कस्य निपादनिर्मित्रशकुनि संदर्शन मात्र समुत्थिषः शोक: श्लोकत्वमभजत यस्येति तस्य तदवस्थजनकराजपुत्रीदर्शन वियशवृत्ते रन्तःकरणपरिस्पन्दः फरणरसपरिपोषाद्गतया सह्ृदयहद्याहादकारी कवेरभिप्रेत: । यथा च- इस श्लोक मे यहू कौन मुनि (ये केवल मह बसाने के लिए) वाल्मीकि इसी पर्यायवाथी पदमान के कहने के स्थान पर (कवि ने जो दूसरे का से'
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उसे प्रस्तुत किया है उसका कारण है कि) परम कारिक जिन (मुनि वाल्मीकि) का निवाद के द्वारा मारे गये पक्षी (क्रौच) के देखने मात्र से उत्पन्न हुआ शोक (मा निषाद-इन्यादि) श्लोक के रूप मे परिणित हो गया था, उन्ही ( परम कारुणिक मुनि) के उस (गभवनी पति द्वारा निर्वासिन एव दन मे परित्यक्त) अवम्या वाली विदेहराज की पुत्री (सीता) के दर्शन से विवश चृत्तिवाले अन्त करण का व्यापार करुण रस के परिपोषण मे अङ्गरूप से (उपस्थित होकर) सहुदयो के हृदयो को आह्ादित करेगा (यहू) कवि (कालिदास) को अभीष्ट था (इसीलिए मभ्राकवि ने केवल 'वाल्मीकि' न कहकर उक्त विशेषणो द्वारा उनका परिच्य कराया था जिसमे वरुण रस भलीभाँति पुष्ट हो सके)। और (तीसरा उदाहरण) जैसे-
मर्तुर्मित्रं प्रियभविधवे विद्धि मामम्युवाहं तत्संदेशाद्धृद्यनिहितादागनं त्वत्समीपम्। यो मृन्दानि त्वरयति पथ्ि श्राम्यतां प्रोषितानां
(महाकवि कालिदास मेघदूत (पू० मे०५६) मे उस समय का वर्णन प्रस्तुत करते हैं जब शापग्रदत अपनी प्रियसमा से बहुत दूर रहने वाले यक्ष का उकी प्राणप्रिया यक्षिणी के पास सन्देश लेकर मेघ पहुँचता है तो मेध ही कहता है कि-) अविधवे (हे सुहागिन)' मुझ जल को बहुन बरने वाले (मेघ) को अपने पति का मिन समझे (जो) हृदय मे निहित उसके सन्देश (को तुमसे कहने के निमित) से तुम्हारे पास आया है। (और) जो मार्ग मे (चलते चुलने यक जाने के कारण) विश्राम करते हुए परदेशियो के (अपनी प्रियतमा) अबलाओ की चोटियो को खोलने के लिए उत्सुक समूहो को (अपनी) गम्भीर एव स्निग्ध स्वनियों के द्वारा तवरायुक्त (जल्दी जाने के लिए बाध्य) कर देता है॥ ३२ ॥
अत्र भतुमित्र मां विद्वीत्युपादेयत्वमात्मनः प्रथयति । तच्च न सामान्यम्, प्रियमिति विशम्भकथापात्रताम् । इति तामाघास्योन्मुखीकृत्य प तत्सदेशात्वत्समीपमागमनमति प्रकृत प्रस्तीति। हृदयनिहितादिति स्वहदयानिहिंत सावधानत्य धोत्यते । ननु चान्यः कशिदेवषिघ-
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YY वक्रीतिजी वितम् व्यपहारविदग्धबुद्धि कथं न नियुक्त इत्याह-ममैवान्र किमषि कौशलं विजम्मते। अम्युवाहमित्या मनस्तत्कारिताभिधानं घोवयति। यः प्रोपितानां वृम्दानि त्वस्यति, संजातत्वराणि करोति। कोदशानान्- श्राम्यतां त्वरायामसमर्यानामपि। वृन्दानोति बाहुल्यात्तत्कारिताभ्यासं कथयति। केन-मन्द्रस्निग्पै्ध्वनिभि म घुर्यरमणोयैः शन्हैविदग्ध दूतमरोचनावचनप्रायेरित्यर्थः।कव-पथि मार्गे। यटक्छया यथास्थचिदृह्मेतवाचरामीति कि पुनः प्रयत्नेन सुदृल्प्ेमनिमितं संर्पवुद्धि न करोमीति।
इस इलोक में पहले सम्बोधन पद (अविधने) का अर्थ हो जस (भक्षिणो) को आश्वासन देने वाले धर्म का करण है। (अर्थान्, तुम्हारा पति जीवित है, तुम सुहागिन हो, इम प्रकार यक्षिणो को अपने सुहागिन होने से उवासन मिलता है।। (नेघ: मुझे ( अपने) पति का मित्र समझो इस वयन) से अपनी उपारधता को पुष्ट करता है। और वह (मित्र भी) साधारण (मिन) नही, (अपितु) प्रिय (मित्र है) इस (कथन) से अपनी विधग्भ कथा विश्वासपूर्ण वार्तो की पात्रता को (रपष्ट करता है): इस प्रकार (अविधवे पद के द्वारा) जसे आश्ासन देकर तथापति का प्रिय मिन मुझे जाने इस वपन द्वारा अपनी ओर उसे) उन्मुख बरके (तब) 'उसके सन्देश से तुम्हारे पास मेरा आगमन हुआ है' इस प्रकरणमास (प्रकृत) दात को प्रस्तुत करता है। 'हुदय में निहित (मदेश) मे' इस पद के द्वारा अपने हृदय मे स्ित सायकनता को दोतित करता है (अर्थात् दुम्हारे सन्देश को मैंने बड़ी सादधानो से अरने हुदम मे रखा है उसे किसी से बताया नहीं) यदि मक्षपत्नी यह शक्ता कहे कि), यक्ष ने इस प्रकार (दरत) के भ्यवहार मे चतुर किसी वन्य व्यक्ति को कयो नहीं नियुक्त किया (तुझ मेव को हो कशे भेजा तो इस सद्टा का समाधान करने के लिए) अत बहा कि मेरा ही इस विषम मे बोई (अपूर्व) फौशल दिखाई पडता है और (अन्युवाहन्) 'जल को वहन बरने वाले' (मुझरो) इम वपन के द्वारा अपने उस (सन्देशाहरणरूप) कार्य को करने को सता का योनन करता है अर्थान मेरी सता हो 'अम्बुबाह (उस मो बहन करने बाला) है तो भला मुझसे अक्छा बहन काय। चाहे शम्देशवहन ही ममो न हो) और कौन बर सरुता है। जो पर्देशियो के सपूहो को खवरायुक्त कर देता है अर्षात् जल्दी जाने के लिए (विष्श) कर देव है। किस प्रकार के (परदेशियों के समूहो को संजातत्वरा कर
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देता है? विधाम करते हुए अर्थान शीघ्रता करने मे असमर्य भी (प्रोषित समूह को त्वरायुक कर देता है।) 'वृन्दानि' इस पद से बाहुल्य सूचना द्वागा उस कार्य को करने के आभ्यास को द्योतित करता है। किस प्रकार से-मन्द्र एव सनिव्द ध्वनियों के द्वारा अर्थात् चतुर दूत के प्ररोचना बचनो के सद्श माधुपंयुक्त रमणय शब्दो के द्वारा (पथिकों को त्वरायुक्त कर देता है) यह अभिप्राम हुआ। कहां (ऐसा करता है) पथि अर्थान् मार्ग मे। (अर्थात जब में) अपनी इच्छा से ही जसे-तैसे इम प्रकार का वाचरण करता है तो फिर (भला अपने) मिन के प्रेम के लिए प्रयत्न- पूर्वक समाहितचित्त क्यो न बनूं यह (अथं द्योतित होता है)। कीटशानि वृन्दानि-अवलावेणिमोक्षोत्सुकानि। अबला-शब्देनान्र तत्प्रेयसौविरइवघुर्यासहत्वं भण्यते, तद्वेणिमोक्षोत्सुकानीति तेपा तदनु- रकचित्तवृत्तित्यम् । तदयमत्र वाक्यार्थ-विधिविदितविरहवैधुर्यस्य परस्परानुरक्तचित्तवृत्तर्यस्यं कस्यचित्काभिजनस्य सभागमसौकष्य- संपादनसौहार्दे सदैव गृहीतव्रतोऽस्मीति। अन्र यः पदार्थपरि- स्पन्द: कविनोपनिबद्धः प्रबन्धस्य मेघदूतत्वे परमार्थतः स एव जीवितमिति सुतरां सहृदयहृदयाहृादकारी। न पुनरेवविधो यथा-
किस प्रकार के समूहों को (मजात त्वरा कर देता हूँ, जो) अवलाओ की वेणियों को खोलने के लिए उत्मुक (रहते है) (अर्थात् विरहिणियो के पति जब परदेश मे रहते हैं तो वे शृद्गार नहीं करती हैं अत उनकी चोटियाँ बंधी रहती हैं, किन्तु जब पति परदेश से वापस बाते हैं तो वे पुन शृद्गार करने के लिए अपनी घोटियों को खोलती है इसलिए परदेशियो के समूहो के उनकी चोटो खोलने के लिए उत्सुक बताया नया है)। 'अबला' शब्द के द्वारा यहाँ उन (परदेशियो) की प्रियतमाओ की (प्रियतम के) विरह को विधुस्ता को सह सकने मे असमर्थता बताते हैं। 'उनकी चोटियो को खोलने के लिए उत्सुक' इस पद के द्वारा उन (परदेशियो) की उन (अपनी प्रियतमाओ) मे अनुरक्त चितवृतिता को (दोतित करते हैं)। तो इमकन वाक्मार्थ यह है कि-दैवजनित विरह की विघुरता से युक्त, परस्पर अनुरक्त चितवृत्ति वाले जिस किसी कामी जन के समागम मे उत्पन्न सुख के सम्पादनरूप सोहाई (मैं) सर्वव गृहीतव्रत है। (अर्थार् विरद्ी- जनो का समागम कराने का मैंने व्रत ही से लिया है। (इस प्रकार) यहां (इस पसोक में) कवि ने जिस पदार्थ' (मेघ) के स्वभाव का वर्णन प्रस्तुत
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किया है वही ( मेपदूत नामक) प्रबन्ध के मेधदूतत्व मे वस्तुत प्राणभूत हो गया है अत अत्यधिक सहदयो के दृदगो को आनन्दित करने वाला है (अत अथं उसी प्रकार का होना चाहिए जो सहृदयो को आह्लादित करने वाले अपने स्वभाव से ही सुन्दर ह) न कि फिर इस प्रकार का- जैसे (राजशेखर विरवित बानरामायण के इस हारैंडपद्य मे है)-
मधः पुरोपरिमरेऽपि शिरीपमृद्वी सीता जवानतिचतुराणि पदानि गत्बा। गन्नव्यमद्य कियदित्यसकृद् माणा रमाशुण: कृतवती प्रथमावतारम्॥ ६३॥ जहाँ कवि सोता के राम के साथ वन के लिए प्रस्थान करने पर उनको, सुकुमारता वर्णन करते हुए कहता है कि-) शिरीष (पुष्प) के सदृश कोमन सीता में ( अषयोषया) नगरी के समीप मे हो तत्काल वेग से सीन चार पम घलकर (यान्त हो गई) 'आज (अभो) कितनो दूर जाता है ऐसा बार- चार कहती हुई रामचन्द्र के आसुओ को पहली बार अवतरित किया अर्थात् उनके वारबार पूछने पर वि अब कितना दूर जाता है, रामचन्द्र जी को भयों मे आँसू या गए) । ३३॥ अन्नासत्प्रतिक्षणं कियद्द गन्तव्यमित्यमिघानलक्षणः परिस्पन्दो न स्वभाव्मद्त्तामुन्मीलयति, न च रसपरिपोषाद्वता प्रतिपद्यते। यस्माव्सीताया: सहजेन फेना्योचित्येन गन्तुम्यवसिताया सौकुमार्यादेवविध वस्तु हृदये परिस्पुरदपि पचनमारोहतीति सहृद्ये: संभावयितु न पायते । न घ प्रतिक्षणमंभिषीयमानमपि राषयाम- प्रथमायतारस्य सम्यक सङ्ति भजते, सकृदाकर्णनादेव वस्यापपत्ते। एतच्चात्यन्तरमणीयमपि मनाङ्मान्रचलितावधानलेन कवे: कदथि तम्। तसमाद् 'अवशम्' इत्यत्र पाठः कर्तज्यः। सदेवंविधं विशिष्टमेव शब्दार्थयोर्लकषणमुपादेयम्। तेन नेयार्यापार्यादयो दूरोतसारतत्वा त्पृथक् न वक्तया: । यह (इरस श्लोक मे) अहकृत् अर्थान् क्षण-क्षण पर, आज फितनी दूर जाना है इस प्रकार फा कथनरूम व्यापार न तो (पीता के) रवभाव की महस्ता को कन्मीलित कदता है और न (प्रकृत करण) रस के परिपोषण का हो अङ्ग मनता है। कयोकि किसी सह्ज औचिष्य के कारण (अपने पति । रामचन्द्र के साथ) जाने के लिए उद्यक् हुई सीता के हृदय मे सौकुमार्य के
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कारण इस प्रकार की बात ( कि तीन-चार पग चलकर ही श्रान्ति का अनुभव ) स्फुरित होते हुए भी ( उनके द्वारा) कही जा सकती है ऐसा सहृदय अनुमान भी नही कर सबते। (अर्थात् सीना जैसी एक दृढ विचार वाली नादी जिसे कि वन की अनेको कठिनाइयो की बात-बताकर पति ने वन जाने ने रोकने का प्रयास किया फिर भी वह पति से यह कह कर कि "मैं सभी कठिनाइयो को मह लूँगी पर आप अपने साथ अवश्य लेते चनिए" बन जाने के लिए तैयार हुई और वही दो-चार कदम चल कर हो ऐमा कहने ल्गे, यह बाद सम्मव नही।) और न तो 'क्षण-क्षण कहे जाने पर भी रामबन्द् के पहले आांमुओ का ही प्रवाहित होना' यही वात भली प्रवार सङ्गति रखती है क्योकि (सीना के उस कथन के) एकबार ही सुन लेने मे उस (अश्रुधारा) की उपपत्ति हो जाने से। अन अत्यन्त रमणीय होते हुए भी यह (श्लोक) कवि की थोडी-सी ही असावधानी से निन्द (कद्षित) हो गया है। अत इस श्लोक मे 'असकृत्' के स्थान पर अवज्ञम्' यह पाठ कर देना चाहिए। (अर्थात् 'गन्तव्यमद्य कियदित्यवभ् दुवाणा' अर्थात् 'विवश होकर भाज अभी कितनी दूर जाना है' ऐसा कहती हुई राम के अथ्ओो को प्रवाहित किया। ऐसा पाठ कर देने से इसमें सहृदयहृदयहारिता म जायगी। अत (काव्य मे) शब्द और अर्घ का इस (उक्त) प्रकार का विशिष्ट ही लक्षण उपादेय हैं। इसलिए 'नेयार्यक' 'अपार्थक इत्यादि (काव्यदोष) दूर से उत्सारित हो जाने के कारण (हटा दिये जाने के कारण) अलग न कहे जाने चाहिए। (अर्थान जैसे शब्द और अर्थ हमने काव्य मे स्वीकार ·किए हैं उनमे ये दोष ही हो नही सक्ते क्योकि इन दोषो के रहने पर वे काव्यगत शब्द और अर्थ कहलाने के अधिवारी ही नहीं होंगे। पर्व शच्दार्थयो: प्रसिद्धस्वरूपातिसक्तमन्यदेव रूपान्तरमभिधाय न वावन्मात्रमेव काव्योपयोगि, किन्तु वैचित्र्यान्तरविशिष्टमित्याह- उभावेतावलंकार्यो तयो: पुनरलंकृतिः। वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यभङ्गीभणितिरुच्यते ॥ १० ॥ इस प्रकार शब्द और अर्थ के (लोक) प्रसिद्ध स्वरूप से भिन्न ही दूसरे रूप को बताकर, केवल उतना हो काव्य के लिए उपयोगी नही है, अपितु अन्य वैचिष्म से विशिष्ट (शन्द और अर्थ का स्वरूप काव्य के लिए उपयोगी है) यह बताने के लिए कहते हैं-
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YC वश्रोतिजीदितम्
सै दोनी। शन्द और अर्थ अनदाय है, और नातुमपूर्ण भङ्गिमा से किया गया कथनस्वरूप वकोक्ति ही दोनों का (एकमात्र) असङ्कार कहा जाता है।। १० ॥ इभी दावप्येतौ शब्दाथीवलंकार्योवलंकरणीया केनापि शोभाति शयकारिणालंकरणेन वोजनीयों। कि तत्तयोरलक्षरणमित्यभिधीयने- तयो: पुनरलंकृतिः । तथोद्वित्वसख्याविशिष्टयोश्य्यलंकृतिः पनरेकेक यया द्वावप्यलंकियेते। कासौ-बक्ोफिरेव। चक्रोकिः प्रासिद्धाभि धानव्यतिरेकिणी विचित्रैवाभिधा । कोहशी-वैदग््यभग्वीमणितिः । वैद्ग्ध्यं विद््यभावः कबिकर्मकौशलं वस् भद्गी विच्छित्ति तया भणिति: विचित्रैवाभिधा बकोकतिरित्युच्यते। तदिदमत्र तात्पर्थेम्-यत्ू शब्दार्थी पृथगवस्थिती केनापि व्यतिरिक्तेनार्लंकरणेन योब्चेते, किन्तु
कारित्वात्। एतच्च वकताव्या ख्यानावसर एवोदाहरिय्य ते। जभी अर्थात् ये दोनो ही शब्द और अर्थ अलदरये अर्यान बलदूरणीय होते है, किसी मोभातिवाम की उत्पम्ष करने वाले अलद्दूार के द्वारा युक्त करने योभ्य होने हैं। (फिर/ उन दोनों का अलद्वार क्या है यह कहते है-और उन दोनों का (एक) अलद्कार होता है। तथो अर्थान् द्वित्व संक्ष्या से विशिष्ट, शब्द और अर्थ दो) होने पर भी अलद्वार केवल एव ही होना है, जिसके द्वारा दोनो हो अलंबृत किए जाते हैं। यह कौनसा (अलकार) है चषोकि ही। वह अलकार है) 1 वकोकि अर्धान प्रसिंद्ध कथन ने भिन्न (व्यतिरिक्त) विचिन्न प्रकार का कथन ही (बनोक्ति है)। कभो बकोकि (रब्द और अये दोनों का अलद्वार है) वदन्धपू्ण भङ्गिमा द्वारा बग्न। हो बनोति है/ वैश्ध्य अर्थान् विदग्ध (चतुर) का भाव (चातुर्य अर्थान्) कवि के कमें (काव्य) की वुशलता, उसकी भङ्गो अर्थात् नोना (विक्छिति) उसके द्वारा कथन अर्थात विचिन प्रकार की उक्ति हो 'वमोकि कही जाती है। तो इसका तात्पर्य यह है-कि शब्द और सयं जलग स्थित होकर किसी (अपने से) िस अलद्वार से युक्त किए जाते हैं, परन्तु वफ्ता के वैविध्य से मुक्तरूप से कदन ही इन दोनो (भन्त और अर्थ) का अवद्ार होता है, उसी के सौभाधिवय के छनक होने के वारण अर्थान् वभस्ापूर्ण कथन ही इन शब्द और बर्य दोनो मे गोभाध्रिक्म को उत्पन्न करता है, अत वही इनका एकमात्र मलद्वार हुआ) का पात का उदाहरण वकता की व्याध्या करते समय ही दिया जायगा।.
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प्रथमोन्मेप'
ननु च किमिदं प्रसिद्धार्थविरुद्ध प्रतिज्ञायते यद्वक्कोकिरेयालंकारो नान्य' कश्चिदिति, यतश्वरन्तनैरपर स्वभावोकिलक्षणमलकरण- माम्नातं तथ्वातोव रमणीयमिकसतपनस्तदेव निराकर्तुमाह- (प्रश्न) आप प्रसंद मेय के विरुद्ध इस प्रकार की प्रतिज्ञा कयो कर 'रहे हैं कि केवल ककि-ही (एकमात् अलकौर होता है, दूसरा कोई नही, क्योकि प्रापान आलपीरकी ने दूसरी स्वभावोक्तिकप मलकार स्वीकार किया है और वह । स्वभावोकि अलङ्गार) होती भो अत्थन्त Number
ही रमणीय है?॥ अद- आप अ्यय प्रतिज्ञां न कज्े ह इस कथन को न सहन करते हुए उसी स्वमक्षोक्ति के अलड्ारसऊ्कयुने) का निराकरण करते हुए कहते हैं-
अलंकारकृतां येर्षो स्वभावोक्तिरलंकांत: । अलंकार्यतया तेषां किमन्यदवतिष्ठते ॥ ११ ॥ जिन (दण्डी आदि) अलद्वार (प्रन्थ) की रचना करने वालो के लिए स्वभावोक्ति (स्वभाव का कथन भी) अलकार है उनके लिए (फिर) अलकार्यरूप से कौन सी दूसरी वस्तु शेष रह जाती है। क्योकि स्वभाव का कथन ही तो अलकार्य होता है। ॥ ११ ॥
येषा मलं कार कृता मलंकार काराणां स्वभावोकिरलकृतिः या स्वभावस्य पदार्थधर्मलक्षणस्य परिस्पन्दस्य एकतिरमिधा सैवा- लंकृतिरलंकरणमिति प्रतिभाति, ते सुकुमारमानसत्वाद विवेकक्लेश- द्वेषिणः । यस्मात् स्वभावोकिरिति कोडर्थः १ स्वभाव एवोच्यमान: स इत यद्यलंकारकततिकमन्यत्तद् क्यतिरिकतक काव्यशरीरकल्पं वस्तु- विद्यते यत्तेषामनंकार्यतया विभूष्यत्वेनावतिष्ठते पृयगवस्थितिमासा- दयति, न किचिदित्यर्थ। जिन अलकारकृतो अर्थात् अलकार (ग्रन्थ) की रचना करने वालो के लिए स्वभावोक्ति अलकार है, अर्थात् जो स्वभाव की अर्थात् मदार्थ के ध्मरूप स्वभाव की उक्ति अर्थात् कथन है वही (जिनको) अलकृति अर्थान दलकार प्रतीत होता है ने सुकुमार बुद्धि होने के कारण विवेक के कष्ट से द्वेष करने वाले हैं (सात्पयं यह कि वे निवुंद्धि हैं उनमे विवेक करने की शक्ति का अभाव है)। जवयोकि स्वभावोक्ति का कमा अर्थ होता है? कहा जाने वाला स्वभाव ही तो (स्वभावोक्ति होती है) और यदि वही अलकार ४ व० जी०
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है तो उससे भिन्न काव्यकरीर के तुन्य औौर कौन सी वस्तु विद्यमान है जो उत् सुकुमाखुद्धि, स्वभावोकति को अलसार मानने वाले आलकारिको) के लिए मलकार रूप से अर्थात् भूषित किये जाने योग्य विद्यमान अर्थात (स्वभावीकि से) भिन्न स्पिति को प्रोस करती है, अर्थान कोई भी ऐसी म् वस्तु नही [ बचती जो अलकार्य बन सके)
4 काव्यत्वमिति ( १६) तत्किमर्थमेत दमिधीयते ? सत्यम् , किन्तु तत्नासत्यभूतोऽप्यपोद्धारबुद्धिविदितो विभाग: कहा शक्यते वर्णपद- न्यायेन वाक्यपदन्यायेन चेत्युक्मेव। एतदेव प्रकारान्तरेन विकल्पयितुमाह- (इस पर स्वामावोक्ति अलकारवादी प्रश्न करता है कि) पहले आापने ही (॥६ कारिका मे यह सिद्धान्त) स्थापित -किया है कि (अलंकार और उतकार्य के विभाग से द्वीनू अलकारयुक्त दावय ही काव्य होता है, तो अब आप ऐसा कयो नहीं कह रहे हैं कि (जब स्वभावोकि अलकार है तो अनकार्य क्या होगा? वयोकि अलकार और अलकार्य मे तो कोई भेद ही नहीं होता। इम बास का उत्तर देते हैं कि) ठोक है । कि अलंकार और अलकार्य का विभाग नही होता) किन्तु वहा असत्यभूत भी अलकार्य और अलकार का विभाग वर्णपदत्याय अथवा वाकयपदन्याय से मपोदार बुद्धि द्वारा किया जा सेकता है जसा कि (मैंने १६ कारिका को सृति मे) कहा ही है। इसी बात को दूसरे ढग से स्थापित कारने के लिए कहते हैं-
स्वभावव्यतिरेकेण वक्तुमेत्र न युज्यते। वस्तु तद्रहितं यस्माननिरुपार्यं प्रसज्यते ॥ १२ ।
स्वभाव के बिना कोई वस्तु कही ही नहीं जा सकती, वयोकि उस (स्वभाव) से रहित वस्तु अभिधान के योग्य ही नहीं होती (निरुपाध्य हो जाती है।। १२ ।। स्वमावव्यतिरेकेण स्वपरिस्पन्द बिना निस्वभावं वक्तुमभि- धातुमेव न युक्यते न शक्यते। वस्तु वाच्यलक्षणम्। कुतः-तद्रहित तेन स्वभावेन रहितं वर्जित यस्मातिरुपाल्यं प्रसक्यते। उपास्याया निष्कान्त निरुपामयम्। उपाल्या शब्द:, तस्यागोचरभूतमभिधाना
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प्रयमोन्मेप' ५१
योग्यमेव सम्पदते। यस्मान् स्वभावशव्दस्येद्दशी वयुत्पत्ति :- भवतो- उस्मादभिधानप्रत्ययाविति भावः, स्वस्यात्मनो भावः स्वभाषः। तेन वर्जितमसत्कल्प वस्तु शशविषाणप्रायं शब्दज्ञानागोचरतां प्रतिपद्यते। स्वभावयुक्तमेव शाकटिवाक्या- नामपि मालङ्ठारता प्राम्ोति, स्वभावोत्तियुफ्कवेन! एतदेव युक्त्यम्नरेण विकल्पयति-
स्वभाव के बिना जर्थान कपने अपने धर्म (परिस्पन्द) के बिना निस्वभात (वस्तु) कहने अर्थान् अभिधान करने के योग्य नहीं होती अर्यान् (वही हो) नही जा सकती। वस्तु (जो) वाच्य (कही जाने वाली) ्यहै। कयो नही ( कही जा सकती)? क्योकि उससे रहित अर्थात् उस स्वभाव से रहित अर्थात् वर्जिन (वस्तु) निरुपारूय हो जाती है। उपारया मे (जो) निष्कान्त (है वह हुआ) निष्पास्य। (अर्थात्) उपास्या (का अर्थ है) शब्द, उसके द्वारा अगोचर हो जाती है अर्यात् अभिधान करने योग्य हो नहीं रह जाती। क्योकि स्वभाव शब्द की व्युत्पनि इम प्रकार है- इससे अभिधान (कघन) और प्रत्यय (ज्ञान) होते हैं अत यह भाष हुआ, और स्व का अर्थात् अपना भाव स्वभाव हुआ। तात्पय वह कि जिसके द्वारा अपने (स्वरूप) का कथन और ज्ञान होता है वह स्वभाव होता है1.) अत वह (म्वभाव) हो जिस किसी पदार्थ की प्रख्या अर्थाव ज्ञान और उपास्या अर्थान् कथनरूपता मे लाने का कारण होता है, उस (स्वभाव) से रहिन वस्तु खरगोश की सीगो के सद्ग (,जिनकी सत्ता ही) नही होती) असत्कल्प होकर शब्द और ज्ञान से अगोचर हो जाती है। (अर्थात् स्वभाव- होन वस्तु का न तो ज्ञान हो हो सकता है और न उसे शब्दों द्वारा हो कहा जा सकता है। और) क्योकि स्वभाव से पुक्त ही (वस्तु) सब प्रकार से कथन के योष्य होती है। (या कही जाती है) अतः (आप स्वभावोकति अलकारवादी के मतानुसार) गाड़ी हाँकने वाले (शाकटिक) के वाक्य भी अलकारयुक्त होने लगेंगे ( क्योकि वे भी) स्वभाव के कथन (स्वभावोक्ति अलकार) से युक्त होते हो हैं और इस प्रकार वे भी काव्य रहताने के अधिकारी हो जायेंगे कयोकि सालकार थाक्य ही काव्य होता है, और किसी भी वस्तु का कथन विना स्वभावकमन के किया ही नहीं जा सकता, अत शाकटिक के वाक्य भी स्वभायोकि (जिसे आाप मसकार मानते है उस) से युक्त होकर सालकार वाक्य हो जायमे (झोर
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बनोक्िपीवितम्
काव्य कहलाने लगेये जो कि आपको भी इष्ट नहीं है। इसी बात को दूसरे डम से स्थापित करते हैं-
शरीरं चेदलक्कार: किमलङ्गरुतेऽपरम्। आत्मेव नात्मनः स्कत्धं क्चिदप्यघिरोहति ॥ १३ ॥। (किसी वस्तु का वर्म्यमान स्वभावरप) शरीर ही यदि मलवार है (सो वह वपने से भिन्न) किम दूसरे ( अलकार्म को अलकृत करता है। (बर्यात् स्वमाव का कथन ही तो शरीर होता है और यदि वही बलंकार हो गया तो दूसरे किसे वह अनकृत करेगा बमोकि) कही भी शरोर ही शरीर के कन्धो पर नही चटता है ( अर्थात् शरीर का स्वय अपने कन्धे पर चढ सबना सबंधा दुतंभ है) ॥१ ३॥ यस्य कस्यचिद्वव्येमानस्य वस्तुनो वर्णनीयत्वेन स्वभाव एव वर्ण्ये- शरीरम्। स एव चेदलक्वारो यदि विभूषण 'तन्किमपर तव्वयतिरिक् विद्यते यदलङ्गखते विभूषयान। स्वात्मानमेवालक्करोतीति चेत्तदयुक्तम् अनुपपत्ते । यस्मादात्मेव नात्मनः स्कन्ध कचिदप्यधिरोदति, शरीरमेव शरीरस्य न कुत्रचिद्प्यसमधिरोइतीत्यर्थ., स्वात्मनि क्रियाविरोधात्। अन्यवाभ्युपगम्यापि झूम'- जिस किसी भी व्म्यमान वहतु का स्वभाव ही वर्णन के योग्य होने के कारण वर्ष्य शरीर होता है। और यदि वह (स्वभाव) ही अलंकार अर्थान विभूषण है तो उससे मिल्न दूसरा बया (शेष) रहता है जिसे (वह) अलरृत् सर्थात् विभूषित करता है। (और यदि यह बही कि स्वभावोकि) अपने आप को ही अलषृत करता है-तो यह ठीक नही-(इस बात के) युक्तिसङ्भत नहो होने से। कयोकि अपने आप ही अपने कधे पर नही चढ़ा जाता बर्षात शरीर हो शरीर के कधे पर कभी नहीं बढ़ता अपने आप मे क्ियाविरोध होने के कारण। और फिर 'तुष्यतु दुजन' ग्याय से आपकी बात को कि 'स्वभावोकिति अलद्वार होता है') स्वीकार कर (हम आपसे) पुछते हैं कि- भूपणत्वे स्वभावस्य विहिते भूषणान्तरे। भेदावनोघः प्कटस्तयोरप्रक्टोऽथवा॥। १४॥ स्वभाव (स्वमायोक्ति) को अलकार मान सेने पर (काव्य मे) दूसरे
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प्रथमोग्मेष: ५३
(उपमा-रूपकादि) तलद्वारो की रचता करने पर उन स्वभावोकि तथा अन्य अलद्वार) के भो का भेद-ज्ञान स्पष्ट रहेमा अथवा अस्पष्ट रहेगा ॥१४।
स्पष्टे सर्वत्र संसृष्टिरस्पष्टे सङ्करस्ततः । अलङ्कारान्तराणां च दिपयो नावशिष्यते ॥ १५॥
(यदि दोनों का भेद) स्पष्ट रहेगा तो सवध (दोनो के तिततण्डूलवत् स्थिन रहने से) समृष्टि (अलद्वार होगा) और (यदि दोनो का "मेद) अस्पष्ट रहेगा तो (नीरक्षीरयन् स्यत रहने से सर्वत्र सन्देह, एकाश्रयानु- प्रवेश अथवा अङ्गाष्िंभाव रूप तीन प्रफार का) सङ्कर (अलकार रहेगा। इस प्रकार सर्वत्र बस्ष केवल इन्ही सदृष्टि और सकर दो बलकारो को हो स्थिति रहेगी, अत ) अन्य (शुद्ध ) अलकारी का विषय ही नहीं अवशिष्ट रहेगा। (कयोंकि उनकी स्वभावोक्ति अलकार के साथ संकर अथवा समृष्टि अदश्य हो जायगी ॥ १५॥ - भूषणत्वे स्वभापस्यालकारत्वे स्वपरिस्पन्दस्य यदा भूषणान्तर- मलंकारान्तरं विधीयते तदा विहिते कृते, तस्मिन् सति, द्वयी गति: संभवति । कासी-तयोः स्वभावोक्त्यलकारान्तरयोः भेदावबोघो मिन्नत्वप्रतिभासः प्रकटः सुर्पष्टः कदाचिद्भकटश्चापरिस्फुटो वेति। तवा स्पष्टे प्रकटे तस्मिन् सर्बत्र सर्वस्मिन कविवाक्ये संसृष्टिरे- वकालंकृतिः प्राप्नोति। अरुपष्टे तस्मिन्र प्रकटे सर्वत्रैवक्क: सेकरोऽलंकार: प्राप्नोति। तस. को दोष: स्यादित्याह-अलंकारान्तराणा च विषयो नावशिष्यते। अन्येषामलंकाराणामुथमादीनां विपयो गोधरो न कश्चिदप्यवशिष्यते, निविषियत्वमेवायातीत्यर्थः । ततस्तेषा लक्षण- करणवैयर्थ्यप्रसङ्ग: । यदि वा तावेव ससृष्टिसंकरी तेयां विषयत्वेन कल्पयेते तदपि न किचित्, तै रेवालंकारकारस्सस्यार्थस्यानक्गीकृतत्वात्। इत्यनेनाकाशचर्वणप्रतिमेनालमलीकनिषन्धनेन। प्रकृतमनुसरामः । सर्वथा यस्य कस्यचित् पदार्थजातस्य कविव्यापारविषयत्वेन घर्णना- पद्वीमवतरतः स्वभाव एव सहदयाहादकारी काव्यशरीरत्वेन वर्णनीयतां प्रतिपद्यते। स एव च यथायोगं शोभातिशयकारिणा येन केनचिदलंकारेण योजयितव्य: । तदिदमुक्तम्-'अर्थः सहदयाह्ाद कारिस्वस्पन्दसुन्दर' (१।६) इति । 'उभवेतालंकार्यो' (१।१०) इति प।
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चकोकिजी वितम्
स्वभाव के भूषण होने पर अर्थार अपने ही स्वरूप के (अथवा धर्म के) बलकार हो आने पर जव भषणान्तर अर्थात् दूसरे अलकार का विधान किमा जायगा तब (वैसा) विहित अर्थान किए जाने पर, उस (दूसरे बलकार) के होने पर दो ही प्रकार की स्यति सम्मय है। कौन सी वह (दो प्रकार की स्पिति है) तन दोनो अर्थवन स्वमावोकति और दूसरे अलकार का भदावबोध अर्थात् मिन्नता की प्रतीति बभी प्रकट अर्थान सुस्पष्ट और कमी अमकट अ्थान अम्पष्ट होगी। तब स्पष्ट अर्पात् उस (स्वभावोक्ति एव दूसरे अलकार के भेद) के (अलग २) प्रकट होने पर' सवन सभी कवियों (द्वारा विरचित) वाक्यो मे (अर्थात् काव्य मे) संसृष्टि (रूप) एक ही अलकार प्राप्त होगा है (और) उस ( भेद) के सस्पष्ट अर्थात् साफस्साफ आाहिर न होने पर म्वंत (काम्य मे) सकर (सन्देह्, अङ्गाद्रिभाव अथवा एकाशयानुश्वेश रूप) एक ही अलकार प्राप्त होने लगेगा। (यदि स्वभावोकिवादी वहे कि ठीक है ये ही दो असकार हो) तो कया दोष होगा' अत बताते है( कि दोष यह होगा) कि अन्य अलकारों का विषय ही समाप्त हो जायेगा। अन्य अलकार अर्थात् उपमा आदि का विषयअर्पात् प्राप्ति का स्थल ही कही भी नहीं बचेगा धर्थाव् (उपमादि) निविषयता को प्राप्त हो जायेंगे। और इस प्रकार फिर उनका लक्षण करना ही निम्प्रयोजन (व्ययं) होने लगेगा। अथवा यदि वे दोनो संसृष्टि और सकर (अलकार) हो उन ( उपमादि) के विषय रुप से कल्फित कर लिए जाँय, तो भी कोई प्रयोगन सिद्ध न होगा, बयोकि उन्हीं (स्वमाबोकि अलहारवादी) आलद्वूारिको द्वारा वह अर्थ अहवीकार किया गया है। अत् इस आकाषचर्वण के महुण व्य्य चर्चा को हूम समाप्त करते हैं। अवसरप्राप्त (प्रकृत) बात का अनुसरण करें। (इस प्रकार निश्िवित हुआ कि) कवि के व्यपार का विषय बनकर वर्णित होते हुए विस किसी भी पदार्थ का सहुदमो के हृदयो को आनन्दित करनेवासा स्वभाव ही सब प्रकार से काव्य के गरीर रूप मे वर्णन का विषम बनता है। (बोर) वह़ी (काव्य शरीर रूप स्वभाव ही) ययोचित ढग से जिस किसी भी शोभाधिक्य को उत्पन्न करनेवाले अलद्वार से युक्त किया जाना याहिए।
उपा 'उभावेतावमक्कायों (११०) इन दो पिछली का रिकामो मे प्रतिपादित किया है।
एवं शम्यार्थयो: परमार्थममिघाय 'शव्ार्थों' इति (() काव्य
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प्रथमोन्मेष-
लक्षणवाकये पदमेक व्याल्यातम् । इदानीं'सहितौ' इति (१) व्याख्यातुं साहित्यमेतयो: पर्यालोच्यते-
इस प्रकार शब्द और अर्थ के (काव्य मे अभिप्रेव) परमार्थ को बता- कर (शब्दार्थों सहिती""इत्यादि (१७) काव्य का लक्षण करनेवाले वाक्य में (प्रयुक्त) 'शब्दार्थी' इस एक पद का व्याध्यान किया गया। अब (उसी काव्यलक्षण वाक्य मे प्रयुक्त) 'सहितौ' (११७) इम पद की व्यास्या करने के लिए इन दोनो (शब्द और अर्थ) के साहित्य का परामर्श किया जाता है-
शब्दर्थो सहितावेव प्रतीतो स्फुरतः सदा। सहितावित्ि तावेव क्रिमपूर्व विधीयते ॥ १६॥
(अब साहित्य की व्यास्या करते समय पूर्वपक्षी प्रश्न करता है कि) शब्द और अर्थ (तो) सवंदा अवियुक्त होकर ही (सहिती) ज्ञान के विषय बनते हैं ( अतः आप अपने काव्यलक्षण मे) वे दोनो (शब्द और अय) ही अवियुक्त (होकर फाव्म) होते हैं, इस प्रकार किस अपूर्व बात का विधान कर रहे हैं। (अत" आपका प्रयास निरयंक है) ॥१६॥
शब्दारथोतभिघानाभिधेयौ सदिताववियक्तावेव सदा सर्वकाल प्रतीतौ स्फुरतः झाने प्रतिभासेते। ततस्तावेव सहिताववियुंक्काविति किमपूर्व विघीयते न किश्चदपूर्व निष्पाधते, सिद्धूं साभ्यत इत्यर्यः। तदेवं शब्दार्थयोर्निसर्गसिद्धं साहित्यम्। क: सचेता: पुनस्तदभिघानेन निष्परयोजनमात्मानमायासयति १ सत्यमेतत्, किन्तु न वाच्यवाचक- लक्षणशास्पतसबन्धनिबन्धनं वस्तुतः साहित्यमित्युच्यते। चस्मा- दैंतस्मिन् साहित्यशब्देनामिधीयमाने कष्टकल्पनोपरचितानि गाङकुटादि- वाक्यान्यसंबद्धानि शाकटिकादिवाक्यानि च सर्वाणि साित्य- शब्देनाभिधीयेरन्। तेन पदवाक्यप्रमाणव्यतिरिकं किमपि तत्त्वा- न्वरं साहित्यमिति विभागोऽपि न स्यात्।
शन्ध और अर्थ अर्थान् अभिधान (वाचक) और भिव्वेम (वाच्य) सदा अर्पान सभी समय सहित अर्थात अवियुक्त होकर ही ( साथ-साय) प्रतीति में स्फुरित होते हैं अर्थान् बुद्धि में प्रठिभाषित होते हैं! सो फिर उन्ही दोनों (शब्द और वर्ष) को (अपने काम्य-मग में ) सहित अर्थान
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वकोक्तिजीवितम्
अदियुक्त (प्रतिपादित कर) इस प्रकार किस अपूर्व (बात) का विघान कर रहे हैं अर्थात किसी नई बात का प्रतिपादन नहीं कर रहे हैं, (अनितु) सिद्ध की ही साधना (पिष्टपेषण) कर रहे हैं। तो इस प्रकार घब्द और खर्य का साहित्य (अवियक्तता तो) स्वभावत हो सिद्ध है। अत. कोन सहृदय पुन (पूर्वप्रतिपादित) उस (साहित्य) का कपनकर अपने को निरयक हो कष्ट देना चाहेगा। (अत आपका प्रयास व्यर्य है) इसी बात का उत्तर देते है-यह बात सत्य है (कि शब्द और अर्प मवियुत्त होते है) किन्तु ( शब्द और अर्य के) वाच्यवाचक रूप नित्य सम्बन्ध का कारण (ही) वस्तुत 'साहित्य' नहीं कहा जाता। बमोकि इस ( वाच्च वापक के निस्म सम्बन्ध के कारण) के हो 'साहित्य' शब्द द्वारा वयन किये जाने पर कठिन कल्पना द्वारा विरचित गाङकुटादि वाक्य तथा ।एक दूसरे से) लस्षम्बद्ध गाडी आदि हाकने वाते (मूखों) के वाकय सभी साहित्य शब्द द्वारा कहे जाने लगेंगे। और इस पकार पद (शास्त्र व्यारुरत) वाक्य (शास्त मौमासा) एवं प्रमाण (शास्तर न्याय) से मिस कोई दूसरा तल्व साहित्य (शास्त्र) होता है इस प्रकार का विभाजन भी सम्भव नही होगा। (वयोकि तब सो सभी साहित्य ही हो बायेगे)।
ननु थ पदादिव्यतिरिकं यत्किमपि साहित्यं नान तदपि सुम- सिव्धमेव, पुनस्तद्मिघानेऽपि क्यं न पौनसुक्त्यपसङ्ग: १ अतएवं- बदुच्यते-दिदं साहित्यं नाम तदेतावति निःसीर्मान समवषनि साहित्यशन्दमात्रेणैव प्रसिद्धम्। न पुनरतस्य कविकर्मकौशचकाट्ा- विरूटिरमणीयस्याद्यापि' कश्िदधि विपश्विद्यमस्य परमार्य इति मनायमात्रमपि विचारपद्वीमवतीर्ण:। तद्य सरस्वतीहृदयारनिन्द-
स्फुरदेवत् सहदयपट्चरणगोचरतां नीयते। (इस पर पूर्वपक्षी फिर प्रश्न करता है कि) ददादि (इर्धा व्वाय- रवादि शास्त्री) से मिक्ष जो कुछ भी साहित्य (कहा जाता) ह वह मी भनीमाति प्रसिद्ध है। अत फिर से उसीका कथन करने पर भी पुनरकि बपो नहीं होगी (अर्थात् उसका कथन विष्टपेषण ही होगा?' कमोनिए (इछ बात का उत्तर) यह आगे कहते है जो यद साहि है( जिमरा हम विवेचन करने जा रहे हैं), अभी तक (हुमारे दिवैन- हे पू्व) अनन्त काल से दती माती हुई पद्धति में केवस 'साहिस्' कम नाम) से ही प्रहिद्ध था (अर्थात् हमसे पूर्व के सभी बाचाय इसे देवव 'माटित्य' 'साहित्व'
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प्रथमोन्मेप ५७
कहा ही करते थे लेकिन काव्य की कुशलता की पराकाषा को पहुँचने से मनोहर इस (साहित्य) का यह वास्तविक स्वरूप है इस प्रकार जरा सा भी विवेचन किसी भी विद्वान् ने आज भी (अभी तक) नहीं किया है। इसलिए अब (मैं आचार्य कुन्तक) सरस्वती (देवी) के हृदयरूपी कमल के पुष्परस (मकरन्द) के कणो के समूह के समान सुन्दर श्रेष्ठ कवियो की वाणी का यह आन्तरिक रज्जकता से मनोहर रूप मे परिस्फुरित होता हुआ (साहित्य तत्त्व) सहृदपरपी भ्रमरो के दृष्टिपथ मे लाया जा रहा है। (अर्णात् उस साहित्य का विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है)
साहित्यमनयो: शोभाशालितां प्रति काप्यसौं। अन्यूनानतिरिक्तत्वमनोहारिण्यवस्थितिः ॥१७॥
सोन्दर्य द्वारा प्रशसा को प्रान्त करने के लिए, इन दोनो (शब्द और अर्थ) की अपकर्ष और उत्कर्ष से रहित (समान रूप से विद्यमान, परस्पर स्पर्धा के कारण) रमणीय मह कोई (अलोकिक ही) अवस्थिति 'साहित्य' (कही जाती) है॥ १३ ।। सहितयोर्भाव साहित्यम। अन्यो शब्दार्थयोर्या काप्यलीकिकी चेतनचमत्कारकारिताया कारणम् अवस्थितिविचित्रैव विन्यास- भङ्गी। कीदशी-अन्यूनानतिरिक्तत्वमनोहारिणी, परस्परस्पधित्व- रमणीया। यस्यां द्वयोरेकतरस्यापि न्यूनावं निकरषो न विद्यते नाष्य- निरिक्तत्त्रमुत्कर्षो वारतीत्यर्थ.।
सहित (शब्द और अर्थ) का भाव साहित्य होता है। इन दोनो शब्द और अर्थ की सहृदयो को आनन्दित करने की कारणस्वरूपा जो कोई अलोकिक अवस्यिति अर्थान् विचिन्न प्रकार की ही विन्वास-भङ्गिमा है। नंसी (विन्यासभङ्ग्िमा)? (जो) न्यूनता और आधिकय के अभाव के वारण चित्तावर्षक अर्थान परस्पर (आपस मे) विद्यमान प्रतिस्पर्धा के कारण सुन्दर है। जिसमे (शब्द और अर्ब) दो मे से एक की भी न्यूनता अर्थात होनता नहीं है और न अनिरिकना अर्थान् आधिक्य (उत्कर्पं हो हे (इस प्रकार की स्यिति ही 'माहित्य' होती है)। ननु न तथाविधं साम्य द्वयोरुपहृतयोरपि सम्भवतात्याह्- शोभाशालितां प्रति। शोभा सौन्दर्यमुच्यते। तथा शालते श्लाघते य. स शोभाशाली, तस्य भावः शोभाशालिता, ता प्रति सौन्दर्यश्लाघितां
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५८ वकोक्िजीवितम्
प्रतोत्यथः। सैव च सदृद्याह्ादकारिता । तस्यां स्पर्षित्वेन यासावब- स्थिति: परस्परसान्यसुभगमवस्थान सा साहित्यमुच्यते। तत्र घाच- कस्य वाचकान्तरेण वाच्यस्य वाच्यान्तरेण साहित्यमभिप्रेतम्, वाक्ये काव्यलक्षणस्य परिसमासत्वादिति प्रतिमादितमेव (१७)।
(इस पर पूवपक्षी प्रश्न करता है कि श्रीमान् जी) उस प्रकार का (नयूनता और आधिनय से रहित) साग्य तो दोनो निरृष्ट (गब्द और अर्थ) मे भी तो सम्भव हो सकता है (अत क्या आप उसे भी साहित्य स्वीकार करने को तैयार है तो इस बात का उत्तर देने के लिए) इस प्रकार कहते है कि (नही शरीमान् जी मुझे ऐसा साहित्य नही अभिप्रेत है अपितु जो) शोभाशानिता के लिए हो। शोभा सौन्दर्य को कहा जाता है। उस (सुन्दरता) से जो शोभित अर्था् प्वसनीय होता है वह गोभाशाली (कहा जाता) है, उसका भाव जोभाशालिता हुआ उसके प्रति अर्थान सौन्दय-द्वारा प्रससा-प्राप्ति के लिए यह अथ हुआ। और इसी को सहदपो के हुदयों को आनन्दित करने की योग्यता कहा जाता है। उस (शोभाशालिता) के प्रति. (परस्पर) स्वर्धायुक्त जो यह अवस्थिति अर्थात् परस्पर (सूनाधिक्य से रहित साम्य के कारण रमणीय (शब्द तथा अर्थ दानो की (स्थिति है वह 'माहित्य' कही जाती है। उसमे शब्द का अन्य शब्दो के साथ, अर्थ का अन्य अर्यों के साथ (परस्पर स्वायिस्वरूप) साहित्य अभीष्ट है, काव्यलक्षण के वाक्य मे परिसमास होने से, ऐसा पहले ही १७७ मे प्रतिपादित किया जा चुका है। (अर्थान् अनेक शब्दो एवं अनेक अर्थों का समुदायरूप बामय हो काव्य होता है अत- वाक्य मे स्पित सभी शब्दो एव सभी बर्मों का परस्पर एक दूसरे शब्द एव अर्थ से स्पर्धा रूप साहित्य ही अभीष्ट है एक ही शब्द अयवा एक ही अर्थ का नही)
ननु घ घाघकस्य वाध्यान्तरेण वाच्यस्य वाचकान्तरेण क्थ न साहित्यमिति वेत्तस, क्रमव्यु:क्रमे प्रयोजनाभाषादरामन्वयाच्य । सस्मादेवयो: शन्दार्थयोर्थवास्य यस्यां स्वसम्पत्सामप्ीसमुदायः स हदयाहादफारी परस्परस्पर्धया परिस्फुरति, सा काषिदेव विन्यास- सम्पत् साहित्यव्यपदेशभाग् भवति। (इस पर पूयपक्षी प्रश्न करता है कि महोदम आप शम्द का हो शब्द के ही साप तथा वर्थ का सर्थ के हो साप साहित्य कयो स्वीकार करते हैं) शन्द का
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दूसरे अर्य के साथ तथा अर्थ का दूसरे शब्द के साथ साहित्य बयो नही स्वीकार करते? तो इसका उत्तर देते हैं कि-यह बात ठीक नही ( क्योकि जंसा हमने शब्द का शब्द के साथ तथा अर्थ का अर्थ के साथ साहित्य का) क्म (बताया है उस) के (इस प्रकार के शब्द का अर्थ के साथ और अर्थ का शब्द के साथ साहित्य हो ऐसे) परिवर्तन मे किसी भी प्रयोजन का अभाव होने से तथा (इस विपरीत क्रम के कथन की) सम्यक् सङ्गति न होने से (ऐसा क्रम-परिवर्तन ठीक नही)। अत इन शब्द और अर्थ दोनो का यथानुरूप सह्दयो के हृदयों को आह्लादित करने वाला अपनी शोभा की सामप्री-समूह जिसमे परस्पर (न्यूनाधिक्य से रहित) स्पर्धा द्वारा परिस्फुरित होता है वह कोई अलोकिक ही वाक्य-विन्यास की सम्पत्ति साहित्य कहलाने की भागी होती है।
मार्गानुगुण्यसुभगो माधुर्यादिगुणोदयः। अलङ्करणविन्यासो वक्रतातिशयान्वितः॥। ३४।।
(जहाँ सुकुमारादि काव्य के) मागों के अनुरूप होने के कारण रमणीय, माधुमं (प्रसाद) आदि (काव्य मार्य) के सुणो से अन्वित, (व्ण्यमान ६ प्रकार की) वत्रताओ के अविशय से सयुक्त, अलक्धारो का विशेष उग से (चमत्कारपूर्ण) रचना (की जाती है).॥। ३४ ।।
वृत्त्योचित्यमनोहारि रसानां परिपोषणम्। स्पर्धया विद्यते यत्र यथास्वमुभयोरपि॥ ३४॥
(मोर) जहा (शब्द और अर्थं) दोनों की ययोचित (न्यूनाविक्य से रहित) स्पर्धा के कारण (केशिकी, भारती आदि) वृत्तियो के औचित्य से रमणीय (चित्ाकर्षक, शृद्धारादि) रसो का सम्पक पोषण, विद्यमान रहता है॥ ३५॥
सा काप्यवस्थितिस्त व्विदानन्दस्पन्दसुन्दरा। पदादिवाकपरिस्पन्द्सार: साहित्यमुच्यते ॥। ६६ ।।
(ऐसी,) काव्यतत्वर (सहृदमो) को आनन्दित करनेवाले (अपने) स्वभाव से रमणीय वह कोई (अलोकिक शब्द और अर्थ की परस्पर साम्प 'से सुन्दर) स्थिति, पद (वाक्य, प्रमाण) आदि वाणी के िलासो का सारभूत (तस्व) 'साहित्य' कहसाता है।। ३६ ॥
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६० नशरोक्तिमीपिसम्
एतेषां घ पद्वाक्यप्रमाणसाहित्यानां चतुर्णामवि प्रतिवाक्य- सुपयोगः। तथा चैतत्पद्मेवंस्वरूपं गकारौकार विसर्जनीयात्मकमेवस्य
मिति पदसंस्कारलक्षणस्य व्यापारः। पदानां व परस्परान्वय- लक्षण सबन्धनिबन्धनमेतद्वाक्यार्थतात्पर्यमिति वाक्यविचारलक्षण स्यो. पयोगः। प्रमाणेन प्रत्यक्षादिनेतदुपपन्नमिति युत्तियुक्तत्वं नाम प्रमाण लक्षणस्य प्रयोजनम्। इदमेव परिस्पन्द्माहात्म्यात्सहृदग:दयहारितां प्रतिपश्नमिति सादित्यस्योपयुज्यमानता। एतेपाँ यद्यपि प्रत्येक स्वविषये प्राधान्यमन्येषां गुणीभावस्तथापि मकलवाकूपरिस्पन्द जीवितायमानस्यास्य साहित्यलक्षणस्येव कविव्यापारस्य वस्तुतः सर्वत्रातिशयित्वम्। यस्मादेतवमुख्यतयापि यत्र वाक्यसन्दर्भान्तरे स्वपरिमलमात्रेणैव सस्कारमारमते तत्यैतदधियासशून्यता मात्रेणेव रामणीयकविरह' पर्यवस्याति। तस्मादुपादेयताया' परिदाणिरत्पदते। तथा घ स्वप्रमृत्तिवैयर्थ्यमसद्ग: । शामातिरित्तप्रयोजनत्व शास्त्रा भिधेय चतुर्वगाधिकफलत्वं चास्य पूर्वमेव प्रतिपादितम (१३५)।
और इन पद (शास्त्र व्यीकरण), वाक्य (शास्तर मीमास्ा), प्रमाण (शास्त्र न्याय) एव साहित्य (शास्त्र) चारो का प्रत्येक वाक्य मे उपयोग होता है। उदाहरणार्थ नकार ओकार और विसर्ग से युक्त (गी.) इस स्वरूप का यह पद प्रातिपदिकार्थपच्चर (१. प्रातिपदिकार्य २ लिंग ३. परिमाण ४. सचन और ५ कारक रूप (अचवा) आज्यानपदाथपडक (१ कत्ता २ कर्मे काल ४. पुरुष ५ वचन और ६ भाव) रुप इस खर्ष का वानक है यह पदसरकार का लक्षण करनेवाले ( व्यापरण शास्त्र) म व्यापार है। और 'पदो ने परस्पर अन्वय रूप सम्बन्ध का कारणभूत वाक्यार्थ का यह तात्पय है' यह वाक्य-विषार का निरूपण करनेवासे (मीमासा श्रास्त) का उपयोग होता है। तथा प्रत्यक्ष (अनुमान) आदि प्रमाणों के द्वारा (इम पद अपवा वावय का) या (अभ) समीचोन है इस प्रकार पुक्ियुक्तता (सङ्भति का प्रतिपादन करना) प्रमाणो का विवेचन करनेवाले (न्याय शास्त्र) का प्रयोजन है। और यही (वाकय इवि के) ध्यापार (परिस्पन्द) के माहात्म्य से सहृदयो के हृदपो को मनोहर प्रतीत होता है यही साहित्य (शास्त्र) का उपमोग है। पद्यपि इन (व्वाकरण, मीमासा, प्याम एवं साहित्य) सभी (मास्त्रो) मे प्रस्येक (शास्त्र) की अपने-अपने विपय मे प्रधानता तथा (उस विषम मे) अ्य
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प्रथमोन्मेप
(नास्त्रो) की गौगता है फिर भी समस्त वाग्वितास का प्राणभूत यह साहित्य न्वरूप रुवि का व्यापार ही वस्तुत सवंत्र सर्वातिनायी (सबमे अधिक महतवपूर्ण होना है। क्योकि यह जहाँ अन्य (व्याकरणादि के) वाक्य-सन्दर्भों मे गौण रूप से स्थित रहुकर भी अपनी गन्घमात्र (परिमल मान) से ही सस्कार प्रारम्भ कर देता है उस (वाक्य मन्दर्भ) मे इसकी केवल थोडी सी सम्कार में कमी आने से ही सुन्दरता का अभाव हो जाता है जिससे उस वावय सन्दर्भ की उपादेयता की बहुत हाति होती है और इस प्रकार उस वाक्य की प्रवृत्ति के व्यर्थ हो जाने का प्रसङ्ग आ जाता है (अर्थान् वह वानम-रचना शोभाहीन होकर बेकार हो जाती है। इससे सिद्ध हुआ कि व्यारुरण-मीमासा आदि अन्य शस्त्रों की अपेक्षा साहित्य शास्त्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।) तथा इस ( साहित्य शास्त्र) का (अन्म) शास्त्रो से भिन्न प्रयोजनों से मुक्त होना, एव (धर्मादि का प्रतिपादन करनेवाले) शास्त्रों के द्वारा सम्पावरित होने वाले ( धर्मादि) चतुवगं से अधिक फलों से युक्त होना, पहने ही (१ब,५) प्रतिपादित किया जा चुका है। अपर्यालोचितेऽप्यर्थ बन्धसौन्दर्यसम्पदा। गीतवद्धृदयाह्लादं तद्विदा विद्धाति यन् ॥ ३७॥ अर्थ का पर्मालोचन किये बिना भी (अर्थान बिना अर्थ को समझे हुए ही) वाक्य का विन्यास की सोन्दर्य रूप सम्पत्ति के द्वारा जो गीत के सदृथ (स्षदिद्) सहृदयो के हुदयो को आह्लादित कर देता है ॥ ३७॥
यत्किमप्यर्पयत्यन्त पानकास्वादवतसताम्।।३८ ।। (तथा) अथं ज्ञान के सम्पन्न हो जाने पर पद (के अर्थ अर्थान संकेतित अर्थ) वर्था वाकयार्थ (तात्पर्यारय) से अतिरिक (व्यग्यरप रसादि के द्वारा गुड-मरिचादि से निष्पन्न) पानक (रस) के आस्वाद की तरह जो सहूदयो के हृदयो को किसी ( अनि्वंचनीय रसास्वाद के आनन्द) को प्रदान करता है॥। ३८ ॥। शरीर जीवितेनेव स्कुरितेनेव जीवितम्। विना निर्जीवता येन वाक्य याति विपश्चिताम् ॥ २६॥ (तथा) जैसे प्राण के बिना शरीर तथा स्पन्द के बिना प्राण (निष्प्ाण हो जाते हैं उसी प्रकार) जिस ( तर्व) के बिना विदानो के वाक्क निष्पाण (सह्दयाह्लादकारिता से हौन) हो जाते हैं। २६ ॥।
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दहोकिजीवितम्
यस्मात्किमपि सौभाग्यं तद्विदामेव गोचरम्। सरस्वती समभ्येति तदिवनी विचार्यते॥ ४०॥ इत्यन्ताश्लोका'। (एव) जिस (तत्त्व ) से केवल काव्यतत्व को जानने वाले (सहदयो) द्वारा ज्ञातव्य किसी (अपूर्व अलौकिक) रमणीयता को सरस्वती (कविवाणी) प्राप्त हो जाती है, उस (कवि-व्यापार की वक्रता) का विवेचन अब हम प्रस्तुत करते है ॥। ४० ॥ ये अन्तर श्लोक हैं। एवं सहिताविति व्याख्याय कविव्यापारवक्रत्वं व्याचष्टे- कविव्यापारवक्रत्वप्रकारा: सम्भवन्ति पट्। प्रत्येकं बहवो भेदास्तेपां विच्छिचिशोभिन: ।।१८।। इस प्रकार (काव्य-लक्षण वाक्य 'शब्दार्थों सहितो-' (११७) मे आये हुये 'सहितौ' इस पद की व्याख्या करके प्रन्थकार कुन्तक अब) कवियो के व्यापार की वकता का व्यास्यान करने जा रहे हैं- (काव्य-रचना रूप) कवियो के व्यापार के (मुष्य रूप से छ भेद सम्भव होते हैं। उन (छ प्रकारो) मे से प्रत्येक (प्रकार) के (रचना के) वैचिश्व की भङ्गिमा से मुशोभित होने वाले बहुत से भेद (हो सकते) हैं ।। १५ ।।
कषोनां व्यापारः कविव्यापार: काव्यक्रियालक्षणस्तस्य वरत्व वक्रभावः प्रसिद्धप्रस्थानव्यतिरेकि वैचित्यं तस्य प्रकाराःप्रभेदा: पटू सम्भषन्ति। मुख्यतया तावन्त एवं सम्भवन्तयर्थ।तेपा प्रत्येक प्रकारा: बहवो भेदषिशेषा। फीटश :- विच्छित्तिशोभिनः वैचिकय भद्गीभ्राजिष्णवः । सम्भवन्तीति सम्बन्ध: । तदेव दर्शयति- कवियों का (काव्यकरणस्वरूप) व्यापार कविव्यापार (कहलाता) है। उसकी वकता अर्थान् (लोक अथवा-शास्तादि मे) प्रसिद्ध स्थान से भिन्न वंचित्र्य से मुक्त वकमाव उभके छ प्रकार अर्थात् प्रभेद सम्भव होते हूं अर्थान् रूप से उतने (छ भेद) ही सम्भव होते हैं। उनमे से हर एष (भेद) के बहुत प्रकार अर्थात् भेद विशेष (सम्भव होते हैं) रैसे (भेद विशेष सम्भद) होते है विष्छिति से शोभित होने वाले अर्थत् विषित्रता से
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प्रथमोन्मेष.
युक्त (चमटकार पुर्ग) भङ्गिमा से कान्तिमान (भेद विशेष) सम्भव होते हैं (इस करिया का दाक्य के साथ सम्बन्ध है)। उसी (कवि-व्यापार को वफता के प्रकारो का दिखाते हैं-
वर्णविन्यासवक्रात्वं पदपूर्वार्धवक्रता। चक्रतायाः परोऽप्यस्ति प्रकार: प्रत्ययाश्रयः ॥ १९॥
(कविव्यापार वकता ने) (१) वर्णंविन्यास वक्रता (२) पदपूर्वाद्ध वकता तथा वकता का अन्य भी प्रकार (३) प्रत्ययाश्रित वकता है ॥१६॥ वर्णाना विन्यासो वर्णविन्यास अक्षराणा विशिष्टन्यमन तस्य चकत्व वक्रमावः प्रसिद्धप्रस्थानव्यतिरेकिणा वैचित्रयेणोपनिबद्ध सनि- वेशविशेषविहितस्तद्विदाहादकारी शब्दशोभातिशय'। यथा-
वर्णों का विन्मास वर्णविन्यास होता है (अर्थार्) अक्षरो की विशेष ढग से रचना (अक्षरो का विशेष कम से रखना ही वर्ण-विन्यास है। उसकी वक्ता अर्थान (लोक एव शास्त्रादि के प्रसिद्ध) प्रस्थान से भिन्न बैचिञ्य के द्वारा उपनिबद्ध वक्रभाव अर्थान् (वर्गों की) रचना विशेष के द्वारा उत्पन्न काव्यतन्वज्ञो का आनन्ददायक शब्द की शोभा का अतिशम (ही चर्ण-विन्यास वक्ता) होती है। जैसे निम्न श्लोक-
प्रथममरुणचछ्ायस्तावत्तव: कनकप्रभ-
प्रसरति ततो ध्वान्तक्षोदक्षमः क्षणदामुखे
रात्रि के प्रारम्भ मे पहले तो अरुण कान्ति वाला, फिर स्वरण (की आभा) के सदश आभावाला, उसके बाद (प्रियतम के) वियोग से ब्योकुल कृशाङ्गी के गण्डस्थल (की काति) के सदश कान्ति वाला फिर तदनन्तर सरस कमलिनी के अड्कुरो के खण्ड (की कान्ति के सदृश कान्तिवाला (अत्यन्त घवल होकर) अन्धकार का विनाश करने मे समर्य चन्द्रमा उदित हो रहा है।। ४!।।
अन्र वर्णविन्यासवऋ्रतामान्नविहितः शब्दशोभातिशयः सुतरा समुन्मीलितः । एतदेव वर्णविन्यासवकत्वं चिरन्तनेष्वनुप्रास इति प्रसिव्रम्। अत्र प प्रभेदस्वरूपनिरूपणं लक्षणाघसरे करिष्यते (२१)।
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६४ नहोकिजीवितम्
यहाँ इस पद्य मे केवल वर्गों के विशेष रग की रचना से उत्पन्न शन्द का शोभातिशय बढे ही सुन्दर दग से ( कवि ने) उन्मीतित किया है। यही वर्णविन्यास वघता पाचीन आलद्वारिको (के परन्यो) मे 'अनुप्रास' नाम से प्रसिद्ध रही है। इसके भेद विशेषो के स्वरूप का निरूपण लक्षण कन्ते ममय (२१ म) किया जायदा।
पदपूर्वार्धवक्रता-पदस्य सुबन्तस्य तिर््तस्य वा यत्पूर्वाधं प्रातिपदिकलक्षण वातुलक्षण वा तस्य चक्रता वक्भावो विन्यास- वैचिन्थम्। तत्रं च बह्व' प्रकारा सभवन्ति। (अब कविव्यापार वक्ता के दूसरे भेद का वर्णन करते हैं)- पदपूर्यारद्ध वतना-सुबन्त अयवा तिडन्त पद का जो प्रातिपदिक रूप अथवा धातु रूप है उसकी वकना, वकभाव अर्थान् विशेष ढग की रचना का वैचिश्न्स (पदपूर्वाव्ध चक्रता हेती है) । उसके बहुन से भेद सम्भव होते हैं। यत्र रूढिशव्दस्यैर प्रस्तावसमुचित्त्वेन वाच्यप्रसिद्धधर्मान्त- राध्यारोपगर्भतवेन निबन्ध स पदपूर्वार्धवकतायाः प्रथमः प्रकार । यथा- रामोडस्मि सर्वे सहे ॥४२॥ द्वितीय :- यत्र संज्ञाशव्दस्य वाच्यप्रसिद्धधर्मस्य लोकोत्तरातिशया- ध्यारोपं गर्भीकृत्योपनिबन्ध:। यथा- जहां पर रूढि शब्द का ही, प्रकरण के अनुकूल वाच्य रूप से प्रसिद्ध (ध्रमं) से अतिरिकत धर्म के अध्याशोप के आधार पर निबन्धन किया जाय वह पदपूर्वाद्धं बनता का पहला भेद होता है जैसे (महानाटक के निम्न पद्य स्निग्धावामलकान्तिलिसवियतो वेल्लद्वलाका धना घाता शोकरिण पयोदसुहृदामानन्दकेवा. कला। काम सन्तु दृढ कठोरहृदयो रामोडसि्म स्व सहे वंदेही तु कथ भविष्यति हहा हा देवि धीरा भव ॥ में प्रयुक्त) 'रामोऽसिम सर्व सहे अर्थात् 'में राम हू सब कुछ सहन कर लूँगा' (इस वाक्य मे प्रयुक्त राम शब्द मे पदपूर्वाद्धं बतता है। क्योकि यहा पर प्रयुक्त राम शब्द अपने वाच्य रूप से प्रसिद्ध धर्म अर्थात् दशरयपुत्रत्व रुप से मिन्न अत्यधिक दुखसहनशीलता रूप घर्म को आधार लेकर कवि द्वारा प्रयुक्त किया गया है। अतः यहां जो कवि-विरचित वाकय मे एक अपूर्य
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प्रथमोन्मेष: ६X
चमरकार आ गया है, वह इसी रुदिशब्द राम के प्रयोग से ही, जो कि सुबन्त पद का पूर्वाद्ध है। अत यह पदपूर्वाद्ववकता का पहला भेद हुआ।) (अब पदपूर्वा्द्वकरता का) दूमरा (भेद बनाते हैं) जहाँ पर संज्ञा श्रब्द का उसके) वाच्य रप से प्रसिद्ध धर्म के अलोकिक मतिशय का आधार ग्रहण कर कवि द्वारा प्रयोग किया जाता है ( वहाँ पदपूर्वाद्- वक्ता का दूसरा भेद होता है), जैसे-
रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुण प्रात्त प्रसिद्धि परा- मस्मद्ाग्यविपर्ययायदि परं देवो न जानाति सम्। बन्दीवैष यशांसि गायति मरुधस्यैकमाणाहति- श्ेणीभूतदिशालसालविवरोद्गीणै: स्वरै. सप्तमि ॥४३॥ (यह पद्य काच्प्रकाश आदि मे उद्घुत हुआ है। उसके टीकाकार माणिक्यचन्द्र 'राधवाइन्' नामक वप्राप्य नाटक का पद बताकर इसे कुम्भदर्ण की उक्ि बताते हैं, जब कि 'चन्द्रिकाकार' इसे रावण के प्रति कही गई विभीषण की उक्ति बताते है। वस्तुत यह उकति विभीषण की सी लगती है। नाटक के अप्राप्य होने से निश्चित कुछ नहीं कहा जा सकता। अत इसे हम विभीषण की ही चक्ति के रूप मे स्वीकार करेंगे। तो विभीषण रावण से कहता है कि) यह (छरदूषण एव बालि आदि का वध करनेवाला तथा मारीच एव सुबाहु को परास्त करनेवाला) राम (अपने) शूरता के गुणो द्वारा सभी लोको मे अत्यधिक प्रसिद्ध हो गया है। लेकिन यदि हम सभी के दुर्भाग्य से उस ( प्रसिद्ध राम) को स्वामी नहीं जानते ( तो कया कहा जाय), जिसके कि यश का गान, यह वायु (भो) बन्दी के समान, एक (ही) बाण के प्रहार से (एक) पकति मे स्थित बडे-बडे ( सात) ताड (के वुक्षो ) के विवरो से निकले हुए सातो स्वरो द्वारा, कर रहा है॥४ ॥
षक्रतां प्रथयति।
यहाँ (इस ब्लोक मे प्रयुफ) 'राम' शन्द (जो कि एक सत्ा शब्द है वहु राम के वाच्य रूप मे प्रसिद्ध शौर्षादि धर्म को ही अलोकिकता का प्रतिपादन करनेवाले ) अलोकिक शोर्याषि धर्म के वतिरय के अध्यारोप को आाधार सेकर मुहीक हुआ बकता (बपूर्व चमतकार) की सिद्धि करता है। 1 8० जी.
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६६ धकोरिजीवितम्
टिप्पणी-पदपूर्वार्सवकता के इन दोनो ही मदो के उदाहरणो मे आचर्य कुन्तक ने 'राम' शब्द मे ही बकता दिखाई है, पर उन दोनों मे मौलिक भेद यही है कि पहुते भेंद मे रुदिशब्द के वाच्य रूप से प्रसिद्ध धर्म से भिन्न धर्म के अतिशय के अध्यारोप को आधार मानकर रूडि शब्द का प्रयोग किया जाता है जब कि दूसरे भेद मे सँज्ञा शब्द के वाच्य रूप से प्रसिद्ध धर्म के ही अलौकिक अतिशय के अध्यारोप को आधार मान कर सज्ञा शब्द का प्रयोग किया जाता है।
पर्यायवकत्व प्रकाशन्तर पदपूर्वारधवफ्रताया :- यत्रानेकशब्दा भिघेयत्वे वस्तुनः किमपि पर्यायपद प्रस्तुतानुगुणत्वेन मयुज्यने। यथा-
आचार्य कुन्तक पदपूर्वावकता के पूर्वोक्त दो भेदो की व्याख्ता कर तीसरे भेद 'पर्यामवक्रता' को प्रस्तुन करते हैं कि) पदपूर्वाद्धवकता का अन्य (तृतीय) भेद 'पर्यायवकरता' है। जहां पर (किसी) वस्तु की (जन्य बहुत से शब्दों द्वारा अभिधेपता (सम्भव) होने पर (भी) किसी (अपूर्व रमणोयता युक्त दूसरे ही) पर्यायवाची शब्द का प्रकरण के अनुकल प्रयोग किया जाता है (यहां पर्याप-वक्ता होती है) जैसे :-
वामं कज्जलघद्विलोचनमुरो रोहद्विसारिस्त नं मध्यं क्षाममकाण्ड एत् विपुलामोगा नितम्बस्थली। मध:प्रेद्गतविस्मरयिति गणैशालोक्यमानं मुह्ुः पायाद्व प्रथमं वपुः स्मररिपोमिश्रीभवत्कान्तया।।४४।।
- (इस पद मे पारवती तथा शवर के प्रथम सयोग का वर्णन प्रस्तुत किया गया है कि पायती के साप पङकूर का शरीर जिस समय एकन्दूसरे से सयुक्त हम) फाजल से युक्त वामनेन्रवाला, एव विकसित होते हुए विशाल स्तन से युक्त वक्ष स्थल वाला, और अनायास ही क्षीण हो गये मश्यभाग से युक्त, सथा बडे विस्तारवाली नितम्बस्थली से युक्त, तत्काल उत्पप्त विस्मय वाले शसूर के गरणों के द्वारा पहले-पहल वारवार देखा जाता हुष, काना (पावसी) के (शरीर के) साद मिशित होता हुआ, कामदेव के आयु (भगवान् शदर) का शरीर माप लोगो की रक्षा करे ॥४४।।
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प्रथमोन्मेष: ६७
अ्त्र 'स्मररिपो" इति पर्यायः कामपि वक्रतामुन्मीलयसि। यस्मात्कामशत्रो कान्तया मिश्रीभावः शरीरस्य न कर्थचिद्पि संभाव्यत इति गणानां सद्य प्रोद्गतविस्मयत्वमुपपन्रम्। सोऽपि पुनः पुनः परिशीलनेनाश्नर्यकारीति 'प्रथम'-पदस्य जीवितम्।
यही (भगवान् शद्र के शिव, महेश्वर, महादेव इत्यादि मनेक पर्यायवाची शब्दो के द्वारा शङूर रूप अर्थ का कथन सम्भव होने पर भी चतुर कवि द्वारा प्रयुक्त) 'स्मररिपो' अर्थात् 'कामदेव के 'शत्रु का' यह (शङ्कर का वाचक) पर्यायशब्द किसी (अनिर्वचनीय) वक्रता को उत्मी लित करता है क्योकि कामदेव के शत्रु के शरीर का रमणी के (शरीर) के साथ सबुक्त होना कदापि सम्भव नहीं है, इसीलिए (शिव के) गगों का तुरन्त हो (ऐसे असम्भव सयोग को देखकर) उत्पन्न विस्मय से युक्त होना उपयुक्त है और वह (शिव-पावती का असम्भव संयोग) भी बार-बार परिशोलन करने पर आश्चर्यजनक ने होता अत (सद्य विस्मय युक्त हो जाना श्लोक मे उपात) 'प्रथम' इस पद का जीवितभूत हो गया है।
एतचच पर्यायवक्त्वं वाच्यासंभविधर्मान्तरगर्भीकारेणापि हशयते। यथा-
(इस प्रकार 'पर्थायवऋता' का एक भेद बताकर, अब उसके दूसरे अवान्तर भेंद का प्रतिपादन करते हैं कि) और यह 'पर्यामवकरता' वाच्य के द्वारा सम्भव न हो सकनेवाले दूसरे धर्म के आधार को लेकर प्रयुक्त पर्यायों मे भी देखी जाती है जैसे-
अङ्गराज सेनापते राजवल्लम रक्षैनं मोमाद दुशासनम् इति ॥। ४४॥ भटटनारायण विरवित 'बेणीसंहार' नामक नाटक में भीम कर्णे का उपहास करता हुआ कहता है कि हे अङ्गदेश के नूरेश ! सेना के स्वामी 1 राजा (दुर्योघन) के प्रेमपान्न ! इस दु शासन की भीम से रखा करो ॥। ४५॥
अत्र त्रयाणामपि पर्यायाणामसंभाव्यमानतत्परिश्राणपात्रत्वलक्षण- मकिश्त्करत्वं गर्भी कृत्योपइस्यते-रक्षेनमिति। यहाँ (भीम के इस कथन में बाज्यरूप कर्म के हारा सम्बोधन न कर) जिन तींन पर्माय रूप विशेषणों का प्रयोम किया पमा है उनके द्वारा
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६८ दक्रोत्िजी वितम
असम्भाव्यमान उस (दुशासन) की रक्षा की पात्रता रूप मकिसिरकरता को गतित कर 'इसकी रक्षा करो दम प्रकार उपहास किया जाता है।
पदपुर्वार्थवकतरया सपचारवकत्वे नाम प्रकारन्तरं बियने- यत्रामूर्तस्य वस्तुनो मूर्तद्वव्यामिधामिना शव्देनामिधानमुपचारात। पया-
पदपूर्वादंवकता का उपचारयकता नामक (चतुर्थ) अवान्तर भेद भी है। जहां पर अमूतं वस्तु का मूर्त द्व्य के भिधान करने वासे शब्द के द्वारा उपवार (अर्थात् सादृश्य) के बलपर कन किया जाता है ( वहा उपचार-वकना होती है।) जैसे-
निष्कारणं निकारकणिकापि मनस्विनां मानसमायासयति। यथा-
इस्तापचेय यश: ।
'वकारण ही मानहानि की कणिका भी (अर्थान् अत्यल्प मानहानि भी) मनस्वी पुरुषों के हदम को पोकित कर देती है। और जैसे-
'हाथ के द्वारा एकत्रित घारने भोग्य यश' i 'कणिका -शब्दो मृर्तषस्तुस्तोका्याभिघायी स्वोकत्वसामान्योप- धारादमूर्तस्यापि निकारस्य स्तोकाभिधानपरतवेन प्रयुक्कतस्तद्विदाहाद कारित्वाद्वकता पुष्णाति। 'हस्तापचेयम्' इति मूर्तपुष्पादिषस्तु-
मिधान यकत्यमावदृति। (इन दोनो उदाहृरणों मे पहले उदाहरण मे प्रयुत्त) 'कणिका' शब्द मूतवस्तु की अल्पता के अर्च का अभिद्ान करने वाला (होते हुए भी) स्वत्पता रूप सामान्य के कारण उपचार से (साडृश्यमूला लक्णा द्वारा) घमूते भी मानहानि की अल्यता के कपन रूप से प्रयुक्त होकर काव्यतर्वगो को बाह्ादित करने के कारण वकना ( विचिन्ता) का पोषण करता है। (इस प्रकार अमूत वस्तु की मल्पता का अभिधान 'रृणिका' थम के द्वारा उपचार से होता है, अत यह। 'उपपारवकता' मानी जायगी)।
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प्रथमोन्मेप: ६६
(तथा दूसरे उदाहरण मे प्रयुक्क) 'हृस्तापचेयम्' (अर्थात् हाथ के द्वारा एकत्रित करने योग्य) इस पद से मूतं पुष्प आदि वस्तुओ मे प्राप्त होने वाले सहतत्व अर्थात् एकत्रित करने की योग्यतारूप) सामान्य के बलपर उपचार से मूत भी यश का हाथ से एकत्रित करने का अभिधान, चक्ता (अर्थान् उपचारवनित्य) को धारण करता है। दवरूपस्य वस्तुनो वाचकशन्दस्तर्वितत्वादिधर्मनिबन्धन किमपि साहश्यमात्रमयलम्ब्य सहतस्यापि वाचकत्वेन प्रयुज्यमानः कविप्रवाहे प्रसिद्ध। यथा-
श्वासोत्कम्पतरञ्जिणि स्तनतटे इति ॥४६॥ तर्राङगत्व आदि धर्म का प्रतिपादन करने के कारण द्म्य रूप वस्तु का बाचक शब्द किसी सादुश्यमान का आश्रय ग्रहण कर ठोस (मूतं वस्तु ) के भी वाचक शब्द के रूप मे प्रयोग किया जाता हुआ कवि समुदाय मे प्रसिद्ध है (अर्थान कविजन प्राय किसी सादृश्यमात्र को लेकर तरल पदार्थ के वाचर्क शब्द का ठोस मूत पदार्थ के वाचक शब्द के रूप मे प्रयोग करते हैं)। जसे- 'श्ास से उत्पन्न कम्पन के द्वारा तर्राङ्गत होते हुए स्तनप्रदेश पर ॥४६ ॥ (यहाँ पर वदि ने स्तनप्रदेश को श्वासजन्य कम्प के द्वारा तरङ्गत बताया है। वस्तुत तरंङ्गस होना द्रव्य पदार्थ का धर्म है जबकि स्तनप्रदेश द्रव पदार्थ न होकर ठोस मूर्त पदार्थ है। अत केवल कम्पनमात साम्य के आधार पर कवि ने स्तनप्रदेग को तरद्गित बताकर एक अपूर्व चमस्कार की सृष्टि की है जिससे काव्यममंज्ञो को एक अलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। अत यहाँ पर उपचारवकता मानी जायगी। यह सम्पूर्ण पद्य वकोक्तिजीवित के प्रथम उन्मेष के १०६ उदाहरण मे उद्घृत्त है जिसका कि एक अशमान महां पर गृहीत हुआ है।) कचिदमूर्तस्यापि द्रवरूपार्थाभिधायी वाच कत्वेन प्रयुज्यते।
यथा- एकां कामपि कालविध्रषममी शौर्योष्मकण्टून्यय- व्यप्रा: स्युश्चिरविस्मृतामरचमूडिम्बादवा बाह्यः।।४७।। एनयोस्तरद्विणोति विप्रुषमिति च वकतामावहतः ।
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वञ्ेतिखी वित म्
कही पर अब रूप अर्ष का कथा करनेवाले शब्द का अमूत (पदार्थ) के भी वाधक (शब्द) के रूप मे प्रयोग किया जाता है, जैसे- (यह पद्य अपने समय रप मे तृतीय उन्मेष के २२वे उदाहरण में सद्धुत हुआ है, इसका पूर्वार्द इस प्रकार है- लोको याद्शमाह साहसधन त क्षत्रियापुत्रक स्यात्सत्पेन स सादुगेव न भवेद वार्ता विसवादिनी। अर्थात् साहस रूप घन वाले इस कत्रिया के बच्चे को लोक जिस प्रकार का (पराक्रमी) कहते है वह भले ही बैसा क्यो न हो लोगो की बातें झूठी न हो, (फिर भौ ) । विरकाल से देवताओ की सेना के बोरो के साथ के युद्ध को भूली हुई मेरी ये भुजाये समय की किसी एक मी बूंद के लिए (अर्थान् सण भर के लिए ही) पराक्रम की गर्मी से उत्पन्न खुजलाहट को मिटाने के लिए व्याकुल हो जायं (तो मैं उस्ष दुष्ट का काम तमाम कर दूँ) ॥ ४७॥ (यहां पर जो द्वव पदार्थ के चाचक विप्रुष शब्द का प्रयोग कवि ने केवल वल्पता का समय लेकर अमूत पदार्थ काल के वाचक के रूप मे किया है उससे इस वाक्य मे अपूर्व चमत्कार आ गया है। अत यह भी 'उपचारवकता' का उदाहरण हुआ।) (इस प्रकार उदाहरण सख्या ४६ तथा ४७) इन दोनों मे (कम मे) तर्राङ्त्णो तथा विप्रुप् शब्द (उपचार) बकता का वहन करते है ( जसा कि हूम ऊपर व्याख्या कर चुक है)। विशेवणदऋत्यं नाम पदपूर्वारधेभक्ञताया प्रकारो विधने-यत्र विशेषणमाहात्म्यादेव तद्विदाकवकारित्वलक्षणं वक्रतवमभित्यज्यते । यथा-
'पनपूर्वाद्वंवऋता' का (एश्म) भेद 'विशेयवनता' है जिस वाक्य मे विशेषण के माहारग से हो काव्यज्ो को आह्लादित करनेवाली वकता (अर्पत् वैचित्य) अभिष्नक्त होती है। (वहाँ 'विशेषणवशता' होती है) जैसे दाहोडग्म, पसृतिपच: प्रचयवान् भाठ्प: प्रणालोनित आासा: प्रेङ्यदीपदीपलतिका: पाण्डिम्नि मग्नं पपु:। विश्वान्यतकयपामि रात्रिमसिलां त्थम्मार्गवातायने
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प्रथमोन्मेष. ७१
अन्न दाहो बाप्पः श्वासा वपुरिति न किञ्चिद्वैचित्रयभुन्मीलितम्। प्रत्येक विशेषण माहाल्यात्पुन. काचिदेव वक्रताप्रतीतिः । यथा च-
वरीडायो ॥F तबदनया सन्निधाने गुरूणां बद्वोत्कमस्तन कलशया मन्युमन्तनियम्य तिष्ठेत्युक्ततं कमिव न तथा यत्समुत्सृज्य चाषपं
(दिरह की) कम्मा जल के पझ देने वाली है, (जिससे कि) वाध्प अत्यधिक इकटा होकर पलवादी LIBRA निकालने योग्य हो गया है, (लम्बी) साँसेजलने हुए दीये की लपरे कोहिला देनेवाली है, सारा शरोर पीतिमा मे कर गया है, अ प नर्य।कहे, सवर की सारी रात वह तुम्हारे रास्ते के सरोबे AF GOVT को औटेसे चादनी को रोककर काट रही है ।। ४८ ॥।
अत्र. चकितहरिणीहमासि कियविसेठ नत्रत्रिभागासङ्गस्य गुरुमन्निधान विहिताप्रगल्भत्वर मे्पार्यस्थ GF कामदि कमनीव तामावहति
इस पद् मे प्रमुक्त दाह, चाप्प, श्रास तथा बपु शब्दों के द्वारा किसी भी प्रकार की विचित्रता उन्मीलित नहीं हुई, अपितु प्रत्येक शब्द के साथ प्रयुत्त विशेषणो के माहात्म्य के द्वारा (अर्थान 'दाह' के साथ 'प्रसृतिम्पच' 'बाप्प' के साथ 'प्रणालोचित', 'श्वासा' के साथ 'प्रेद्धितदी प्रदीपलतिका' तथा 'दपु' के साथ प्रयुक्त 'पाण्डिम्नि सम्नम्' विशेषणो के माहार्म्य से) किसी अनिवचनीय वक्रता (अर्थान् सहृदयम् हृदयाह्वादकारिता) का आभास होता है।
और जैसे (इसी का दूसरा उदाहरण कोई प्रवासी यूवक अपने किसी मित्र से कह रहा है कि जब में परदेश जाने लगा तो) गुरुजनो के समीप मे (स्थित होने के कारण) लज्जा से मुख को झुकाये हुए तथा कम्पित होते हुए स्तनरूप क लशो वाली, उम (मेरो प्रियतमा) ने (मेरे परदेश जाने के कारण उत्पन्न विरह के) शोक को हृदय मे ही दबाकर तथा आँसू बहाते हुए चकितहरिणी के नेत्रो के सदश मनोहर नेत्री वे कटाक्ष को मेरी ओर फेंका (उसके द्वारा) क्या ( उसने सुझे) रको (मत जाओ) ऐसा नही कहा, (अर्थात् अवमय कहा है)।
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७२ वनोकिजीपितम्
(इस श्लोक मे 'चकितहरिणोहारि' यह किया विशेषण गुरुबनो के समीप स्थित मेरी प्रियतमा द्वारा किने गये अत्यन्त मोलेपन के कारण रमवीप कटाक्ष के प्रहार की किसी अपूर्व रमणीयता को धारण करता है, चक्ति हरिणी के नेत्रो के सद्श मनोहर नेत्रो के साम् के द्वारा। इस प्रकार यह 'विशेषणवकता' का दूसरा उदाहरण प्रस्तुत किया गथा। अब आगे 'पदपूर्वा- वक्रता' के छठे भेद 'सबृतिवकता' को प्रस्तुत करते हैं)-
अयमपर: पदपूर्वाधवकताया प्रकारो यदिद मंवृतिवकातव नाम- यत्र पदार्थस्वरूपं प्रस्तावानुगुपनेन केनापि निकर्षेणोत्कर्पेण वा युक्त व्यकतया साक्षादभियातुमेशक्य सपृतिसामथ्योंपयोगिना शब्देना- मिधीयते। यथा;
यह पदपूर्वावं वकता का अन्य रठा भेद है, जिसे "सवृतिवकता' रहते हैं। वहो पर प्रकरण के अनुकूल किसी नता अपवा आधिकन से युक्त एव व्यक् रूप से साक्षात् कहने के लिए अनुपयुक्त पदार्थ के स्वरूप को सवरग कर मेने की सामय्यं के काउ्ण उपयोगो शब्द के द्वारा कहा जाता है ( वहा 'संबृतिवकता' होती है)। जसे- सोऽयं दम्मधृतन्नत. प्रियतमे क्तुं किमप्युद्यतः ॥।५०।। (प्रस्तुत पद्म 'तापसवत्सराजचरित' नामक नाटक से उद्घुत किया गया है। यह मम्पूर्ण श्लोक आये चतुर्य उन्मेप के १4 वे उदाहरण मे उद्घृत है। इसके प्रथम तीन घरण इस प्रकार है- पतुयंस्य तवाननादपगत नाभृत भ्विसिर्वुतं येनेषा सतत सदंदकशयन वसःस्वली बल्पिता। मेनोदासितया बिना वत जगच्छूम्यं सषणाग्जायते बर्यान् इस उव में राजा उदयन के पद्यावती के साथ विवाह करते समन उत्पन्न शोक का वर्णन किया गया है नि-जिसके नेत्रो को तुम्हारे मुख पर से हटने पर बन्मन कही सुख नहीं मिता, जिसने अपनी वस्षस्पली को केबल तुम्हारे हो शबन के लिए कतपित रिया तथा जिसकी उपस्थिति वे बिना तुम्हारे लिए सारा संसार जीणं वन के समान हो जाता या।
हे घियतमे। वही यह दम्भ से ( एकंपलील्व) व्रत को धारण करने वाना (तुम्हारा प्रियसम उदयन) बाज कुछ (निवृष् कार्य अर्थान् पपावती को पस्नी रूप मे स्वीकार) करने के लिए उद्त हो गया है।। ४०॥।
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प्रथमोन्मेष ७३
पद्मावती परिणेतुमीहमानस्तदेवाकरणीयमित्यवगच्छन् तस्य वस्तुनो महापातकस्येवाकोतनीयतां ख्यापयति किमपीत्यनेन सवरणसमर्थेन सर्वनामपदेन। यथा च
यहाँ वासवदत्ता ( के आग मे जलकर भस्म हो जाने) की विपत्ति (को सुनने) से दुखी चित्तवाले वत्सनरेश उदयन उस (वासवदत्ता) की प्रामि के प्रलोभन मे पडकर पद्मावती के परिणय की इच्छा रखते हुए उसी (पद्मावती-परिणम) को अकरणीय समझते हुए, उस वस्तु (पद्मावती- विवाह) की बडे भारी पाप के समान निन्दनीयता का, सवरण कर लेने में समर्थ सर्वनाम पद 'किमपि' के द्वारा विज्ञापन करते हैं। (अर्थात् मैं पद्मावती के साथ परिणय रूप एक महापातक के सदश निन्दनीय कर्म को करने के लिए उद्यत हो गया हूँ, इस बात को यदि इसी ढंग से कहते तो वह ग्राम्य एव अनुचित होती अत इस बात को छिपा सकने मे समर्थ 'किमपि' पद का प्रमोग किया गया, जिसके द्वारा मे सभी बातें साफ व्यक्चित हो जाती है। इस प्रकार कवि का कोशल यहाँ अकवनीय (निकृष्ट) वान को छिपाते हुए उसे सभ्य ढग से सहदयो के सममुख प्रस्तुत कर देने मे निहित है। इसलिए यहाँ 'संबृतिवकता' है)। और जैसे (दवूसरा उदाहरण)- निद्रानिमीलितदृशो मदमन्थराया नाप्यर्थवन्ति न च यानि निरर्थकानि। अद्यापि मे बरतनोर्मघुराणि तस्या- स्तान्यक्षाणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ॥ ५१॥
नीद के कारण आँखो को बन्द किए हुए एवम् मद के कारण अलसायी हुई ( सुस्त पडी हुई) उस सुन्दर शरीर वाली (मेरी प्रियतमा) के बे मधुर लक्षर आज भी हृदय मे कुछ (मनिवचनीय आनन्द को) व्वनित करते हैं जो न तो अर्थ मे ही युक्त थे और न निरर्थक हो थे। ५१ ॥ अत्र किमपीति तदाकर्णन विहितायाश्चित्तथमत्कृते रनुभबैकगोचरत्व लक्षणमत्यपदेश्यत्वं प्रतिपाद्ते। तानीति तथाविधानुभवविशिष्टतया स्मर्यमाणानि। नाप्यर्थवन्तीति स्वसवेद्यतवेन व्यपदेशाविषयत्वं प्रकाशयने। तेपा च न व यानि निरयकानीत्यलौकिकचमरकार कारित्वादपार्थकत्वं निवायते । त्रिष्वप्येतेपु विशेषणवक्रत्व प्रतीयते।
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७Y वकोकिजीवितम्
यहाँ पर 'किमपि' इस पद के द्वारा उन (मधुर अकरी) के सुनने से उत्पन्न हृदय के चमत्कार की केवल अनुभव के द्वारा प्राप्त किए जानेवाली अनिवंचनीयता को प्रतिपादित किया गया है। 'तानि' इस पद के द्वारा उस प्रकार के चमरकार-पूर्ण अनुभव के कारण विशिष्ट रूप से स्मरण किए जाते हुए अक्षरो की अनिर्वचनीयता ज्ञात होती है। 'नाम्यर्थबन्ति' (अर्थात् जो अर्थयुक्त नही थे) इस पद के द्वारा अपने आप जानी जा सकने वाली शब्दो द्वारा प्रकट करने की असमर्थता का प्रकाशन किया गया है। और उन (अक्षरो) का 'न व योनि निरर्थकानि' (अर्थात् जो निरर्थक भी नही थे) इस (विशेषण के प्रयोग) से अलोकिक आनन्द को प्रदान करने के कारण उन अक्षरो की अर्यहीनता का निषेध किया गमा है। (इम प्रकार 'अक्षराणि' के) इन तीनो ('तानि' 'नाध्यथवन्ति' 'न च यानि निरथंकानि') विशेषणो मे (उन्ही के प्रयोग द्वारा वाक्य मे चमत्कार आने से) 'विशेषण- वकता' की प्रतीति होती है।
इद मपर पदपूर्वाघवकनायाः प्रकारान्तरं सम्भवति वृत्िवैचित्य वकत्व नाम-यत्र समामादितवृत्तीनां कासाख्विद् विचिन्राणामेव कविभि, परिम्रहः क्रियते । यथा- मध्येडदुरं पल्लवाः।। ४२ ।। (अब 'पदपूर्वांवत्रता' के सातवें भेद का विवेचन करते हैं) यह 'वृत्तिवंवित्यदक्ता' नामक अन्य (सातर्वा) भेद सम्मव होता है। जहाँ पर प्रापत (अनेक-समाम-तद्धित सुबादि) वृत्तियों के मध्य से कविजन (अपूर्व चमत्कार को उत्पन्न करने वाली) मुछ ही विचित्न वृत्तियों का प्रयोग करते हैं । वहाँ 'वृत्षिवंबिभ्यवत्रता' होती है)। जैसे-
(यहाँ 'अकुराणा मध्ये इति मध्येऽ्ड्कुर' इस प्रकार अध्ययीभाव समास की वृत्ति वे प्रपोण से कवि ने एव अपूर्व चमरकार की सृष्टि की है जबकि यहाँ वह 'अकुरमध्ये' इत्यादि के प्रयोग से तत्पुरप समासवृत्ति का भी प्रयोग कर सकता था, किन्तु उसमे चमकार न आता। अत यहाँ चमरकार का वाषण 'वृत्िवं चित्ववतता' ही है।)
यथा प- पाण्डिम्नि मग्नं बपुः ॥।४३।
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प्रथमोन्मेप
और जैसे (दूसरा उदाहरण )- पाण्डुता मे शरीर डूवा हुआ है।। ५ू३ ॥ (यहाँ पर कवि प्रद्यपि 'पाण्डिम्नि' के स्थान पर 'पाण्ट्ुतायाम्' इत्यादि अन्म शब्दो का प्रयोग कर सकता था किन्तु उसने 'इमनिच्' प्रत्ययान्त पाण्ड शब्द के प्रयोग से तदित वृत्ति का प्रयोग कर एक अलोकिक चमत्कार को उत्प्न कर दिया है। मत यह 'वृत्तिवचित्रयवत्रता' का दूसरा उदा- हरण है।) यथा वा- सुधाविसर निष्यनदस मुन्ला सविधायिनि। हिमधामनि खण्डेपि न जनो नोन्मनायते॥ ७४॥ अपनी सुधाधारा के प्रवाह से आह्लादित करने वाले खण्ड (अपूर्व) चन्द्र के भी (उदित) होने पर ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो उत्कण्ठित हो जाता हो॥ ५४ ॥ अपर लिंङ्गचैचित्र्यं नाम पदपूर्तोरधंवक्रताया: प्रकाशन्तरं दश्तते- यत्र मिन्नलिङ्गानामपि शब्दायां वैचितयाय सामानाधिकरण्योपनिबन्ध । यथा- (अब पदपूर्वाद्ववकता के ाठरवे भंद का विवेचन प्रस्तुत बरते हैं-) 'पदपूर्वादंवकता' का अन्य (अष्टम) 'निङ्गवबिध्य' नामक अवान्तर भेद दिखाई पड़ता है। जहाँ मिन्न-भिन्न लिङ्ग वाले शब्दो का चमस्कार की मृष्टि के लिए सामानाधिकरण्य से उपनिबन्धन किया जाता है (वहाँ 'लिद्ध वै िध्मवकता' होती है।) जैसे- इत्थ जडे जगति को नु बृहत्प्रमाण कर्ण. करी ननु भवेद ध्वनितस्य पात्रम् ॥५४। (यह गरनोक इसी ग्रन्ध के द्वितीय उन्मेष के उदाहरण-सस्या ६५ पर सम्पूर्ण रूप मे उद्धून हुआ है। इसका पदार्ड निम्न प्रकार है- इत्यागत झटिति मोो्लिनमुन्ममाय मातङ्ज एव किमत परमुच्यतेन्सी ॥ अर्थार) इस प्रकार के जड ससार मे वृहत्पमाण कानो वाले एव सूंडवाले (अपवा हाम वाले, हामी से बढ़कर) दूसरा कौन (मेरी) ध्वनि को सुनने मे समर्य हो सकता है ।। ५ ५।।
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७६ वक्रोकिजीवितम्
(ऐसा सोचकर पास आये हुए भौरे को जिसने पीडित कर दिया वह मातङ्ग (चाण्डाल अथवा हाथी) ही है, इससे अधिक उसे और क्या कहा जा सकता है। इस प्रकार इस पद्य में वद्यपि 'बृहत्प्रमाणकर्णः करी' के साथ, (जो कि पुल्तिङ्ड है) सामानाधिकरण्य पुल्लिक्ग शब्द के साथ ही होना सम्भद था, किन्तु कुशत कवि ने पुंस्लिद् शन्द का प्रयोग न कर सामाना- धिकरण्प से नपुमकलिन्द 'व्वनितस्प पात्रम्' शब्द का प्रयोग कर सहुदमो के लिए एक विशेष प्रकार के चमत्कार की सृष्टि की है। अत यहां 'निङ्ग- वेचिव्य वक्ता' स्वीकार की जायगो। )
यधा च- मैथिलो तस्य दाराः । इति ॥ ५६॥ और जैसे (इसी का दूसरा उदाहुरण)- मिथिलेशकुमारी जानकी उसकी भार्षा है॥। २६ । (यहाँ 'मैथिली' शब्द के साथ सामानाधिकरम्प स्वीतिङ्ग शब्दो का ही सम्भव या, किन्तु कवि ने अपने कौशल से पुंत्लिङ्ज दारा शब्द का सामा- नाधिकरण्य से प्रयोग किया है, जो किसी अलोकिक चमस्कार का विघायक है अत यह भी 'सिङ्ग वैचित्र्य वक्रता' का ही उदाहरण हुआ) । अन्यदफि लिङ्गवैचिष्यवकत्वम्-पत्रानेकलिङ्गसम्भवेऽपि सौकुमार्यात् कविभि: स्त्रोलिद्गमेव प्रयुज्यते, 'नामैय सीति पेशलम्' (सश) इति फृत्वा। यथा-
'लिङ्गवचित्र्यवत्रना' का दूमरा भेद भी सम्भव हो सकता है। 'जहाँ (किसी शब्द मे) विभिन्न लिङ्गो की सम्भावना रहने पर भी (कुशल) कवि लोग सुकुमारता के कारण स्त्रीलिङ्ग को ही 'हत्री इस प्रकार का कपन ही हृदमहारि होता है' (२।२२) ऐसा स्वीकार कर, प्रपुक्त करते हैं ( वहा भी लिङ्गवचिभ्यवत्ता होती है) । जैसे-
एतां पश्य पुरस्तटीम् इति॥५७ ॥ सामने स्यित इस किनारे को देखो।। ५७॥ (यहाँ यद्यपि किनारे के वाचक सद शब्द का (तट, वटी, तटम्) पूंस्सिस्त, स्व्रीतिङ्ग एव नपूसक सिङ्ग सोनो लिस्गों में प्रयोग किया जा सकता पा, परन्तु कवि ने केवल सुकुमारता को घोतित करने के लिए यहां स्त्रीलिस
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प्रथमोन्नप
'तटी' शब्द का ही प्रयोग किया है। बत यहां सिङ्धवचित्य वत्रता ही सहृदयहृदया ह्वादकारिणी है।) (इस प्रकार भी तक 'पशपूवद्धिवक्ता' के अन्तर्गत 'प्रातिपदिक' की वकता के मुख्य रूप से आठ अवान्तर भेदो का प्रतिपादन कर अब 'धातु' की वक्ता के अवान्तर भेदो का प्रतिवादन किया जा रहा है जैसा पहले ही दलाया गया है कि सुबन्त पदो का पूर्वार्द्ध 'प्रात्तिपदिक' तथा तिडन्त पदो का पूर्वार्द्ध 'धातु' कहा जाता है तो ) पदपूर्तार्धस्य धातोः क्रियार्थवैचितयवऋत्व नाम वरत्वप्रकारान्तर विद्यने-यत्र कियावैचित्रय प्रतिपादनपरत्वेन वैदग्ध्यभङ्गीर्भणतिरमणीयान् प्रयोगान् नियष्नन्ति कवयः । तत्र क्रियावैचितयं बहुविध विच्छित्ति- विततव्यवहार दृश्यते। यथा-
(तिडन्त) पदों के पूर्वार्द्ध धातु की 'प्रियावचिञ्चवक्रता' नामक (पद्पूर्वार्द) वकता का अन्य (नवम) भेद् (भी) है। जहां क्रिया को विनित्नता (चमतकारजनकता) का प्रतिपादन करने के लिए ( कुशल) दविगण चातुयपूण (कविकोशल की) विच्छित्ति द्वारा कथन ( अर्थान वकोकि) से रमणीय (करिया पदों के) प्रयोगो की रचना करते हैं ( वहा 'क्रियावचित्यवक्रता' होती है।) जैसे-
रइके लिहि्अणिअंसणकर किसल अरुद्धणअणजुअलस्म । रुद्दस्स तइ्अणअण पब्वइपरिचम्बिअं जअद॥ ४६ ॥। [रतिकेलिहत्तनिवसनफर किस लयरुद्धनयनयुगल्स्य। रुद्रस्य वृतीयनयनं पार्वतीपरिचुम्बिंतं जर्यत।।] रतिकीडा करते समय वस्वहीन (नृग्न) हो जाने के कारण (पावती के) कर-किसलयों द्वारा बन्द किए गये दोनो नेनो वाले भगवान् शकर का, पावती के द्वारा घूमा गया तीसरा (माल का) नेत्र (जिसे पावती ने अपने चुम्बन से बन्द कर दिया है वह) 'सर्वोत्कृष्ट रूप मे विद्यमान है।। ५८ ॥। अत्र समानेऽपि हि स्थगनभयोजने साध्ये तुल्ये च लोचनत्वे, देव्या परिचुम्बनेन यस्य निरोध सम्पादते नद्ट्रगवतस्तृतीयं नयन जगति मर्वोत्कर्पेण वर्तत इति वाक्यार्थ। अत्र जयतीति क्रियापद्दस्य किमपि सहृद्यहृदयसंवेर्ध षैचिषयं परिस्फुरदेव लच्यते। यथा -
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वकोक्तिजीवितम्
इस पद्य मे साध्मभूत (नेत्रो के) स्वगन (धन्द करने के प्रयोजन के शिव के तीनो नेवो मे) समान होने पर, तथा (उन तीनो नेत्रो मे) नेनत्व के समान होने पर भी जिस (तृतीय नेत्र) का निरोध देवी (पावंती) के परिचुम्बन द्वारा सम्पत्र किया गया है ( ऐसा) वह भगवान् (शदूर) का तृतीय नेत्र 'जयति' अर्थान् सबसे उत्कृष्ट (नेत्र के) रूप मे विद्यमान है, यह इस शलोक का तात्पर्यार्य है। यहां पर 'जमति' इस क्रियापद का (वेवल) सहृजयहृद्यो द्वारा अनुभव किया जाने वाला कोई (जनिवचनीय) वैचित्रय परिस्फुरित होता दिखाई पडता है। (इस प्रकार यह 'त्रियावविभ्यवकता' का प्रथम उदाहरण प्रस्तुत किया गया)।
और जैंने (दूसरा उदाहरण)- स्वेच्छाकेसरिणः स्वच्छस्वच्छायामासितेन्दवः। त्रह्यन्तां वो मधुरिपो: प्रपत्रार्तिच्छिदो नखाः ॥४ ॥ अपनी ही इच्छा से सिंह बने हुए ( अर्थान् हिरण्यकशियु राक्षस का वध करने के लिए नसिंह रूप मे अवतरित हुए) मघु के शत्रु (भगवान् विप्णु के), अपनी विभल कान्ति के द्वारा चन्द्रमा को भी कष्ट देने वाले (अर्थान् चन्द्रमा जिसे कि अपनी कान्ति का गर्व है उसे सससे भी अघिक कान्तियुक्त होने के कारण कप्ट देने वाले) एव्म् ( अर्थान् शरण मे आये हुए लोगो) की विपतति का विनाश ररने वाले नाखून आप लोगों की रक्षा करे॥ ५६॥ अत्र नखानां सकललोकप्रसिद्धच्छेदनव्यापारव्यतरेकि किमप्य पूव मेव प्रपन्नातिच्छेद नलक्षणं क्रिया वैचिभ्वयमुपनिबद्धम्। यया प- स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराग्निः ॥ ६० ॥ यहा (इस पद्य मे नृमिंह-रूपधारी भगवान् विष्णु के) नासूनो के समस्त लोको मे प्रसिंद्ध छेदन व्यापार से मिन्न किसी अपूवं ही शरण मे आए हुए लोगो को विपात के छेदन रूप क्रिया-वेचित्य को कवि ने उपनिबद्ध किया है (अर्थात् लोक मे काछ आदि को ेटन रूप किया हो पायी जाती है, किन्तु यहाँ पर कवि ने अपूर्व विपतति को छेदन रूप करिया का वर्णन किया है जो कि अतिराम चमाकारत्पूर्ण होने के कारण 'तियया वैचिश्यवत्रता' को धारण करती है)। और जैसे (इसी का सीसरा उदाहरण)- भगवान् पटूर की वह (विशिर) शराग्नि आापके पाप को जसा हे।।६।।।
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प्रथमोन्मेप:
अत्र द पूर्ववदेव क्रियावचितर्यप्रतीतिः । यथा च- कण्णुप्पलटल मिलिअलोअणेहिं लोलइ लीलावईहि जिरुद्धओ सिढिलिअचाओ जअइ मअरद्वओ।६१॥ [कर्णोत्पलदलमिलितलोचनैहेंलालो लन मनित नयनाभिः]" लोलया लोलावतीभिनिरुद्ध: शिथिली कृन चापो, जयक मेंकरभ्वज़ ॥]
यहां पर भी पूर्व की भाति हो नियाववित्य की प्रतीति होती है अर्थान लोक मे केवल काछ आदि मूर्त वस्तुओ का ही अग्नि के सव सजलाया जाना। प्रसिद्ध है लेविन इस श्लोक-खण्ड मे उससे भिन्न पाप रूप कमूतं वस्तु की दहन रूप अपूर्व क्रिया का प्रतिपादन किये जीने के कारण यहाँ 'क्रिया- वचिञ्य-वक्रता' है। और जैसे (इसी का दूसरो उदाहरण/- मीडा (करने) के कारण चश्लता को प्राप्त नयनोवाली विलासिनियो के द्वारा विलास के साथ कानो मे लगे हुए कमलो के पत्तो से सयुक्त होते हुए नेत्रो द्वारा रोक दिया गया (अत).अपने धनुष को शिथिल कर देनेवाला कामदेव सर्वातिशायी है॥६१॥।
अन्र लोचनैरलीलिया लीलावतीभिर्निरुद्ध स्वव्यापारपराङ्मुखीकृत: सन् शिथिलीकृतचापः कन्दर्पो जयति सर्वोत्कर्षण वर्तत इति किमुच्यते, यतस्तास्तथाविघविजयावासी सत्यां जयन्तीति वक्तव्यम्। यहाँ कोडा करती हुई कामिनियो के द्वारा विलास के साथ नेत्रो द्वारा निरुद्ध किया गया अर्थात् अपने शर-सन्धान रूप व्यापार से पराङ्मुख किय्ा रया अपने धनुष को शिथिल कर देनेवाला कामदेव 'जयति' अर्धान् सर्वो- त्कृष्ट रूप से विद्यमान है। यहक्या कहा जाता है अर्थान यह कहना अनुचित है, क्योकि कामदेव को अपने व्यापार से पराङ्मुख कर देने के कारण उस प्रकार कामदेव के कपर विजय को प्राप्त करने पर वे रमणियां ही सर्वोत्कृष्ट रूप से बिद्यमान है यह कहना चाहिए न कि कामदेव। तद्यमत्राभिप्रायः-यत्तल्लोचनविलासानामेवविध जैत्रताप्रौढभाव पर्यालोच्य चेतनत्वेन स स्वचापारोपणायासमुपसंहृतवान्। यतस्तेनैव त्रिमुषनविजयावाति: परिसमाप्यते। ममेति मन्यमानस्य तस्य सहायत्वोत्कर्षातिशयो जयतीति क्रियापद्देन कर्तृताया. कारणत्वेन कवेश्चेनसि परिस्फुरित:। तेन किमपि क्रियावँचित्र्यमत्र तद्विदाहाद-कारि प्रवीयते । यथा च-
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वक्ोक्तिजोबितम्
हो यहाँ पर (इसका) अभिप्राय यह है कि-उन (कामिनियो के नेत-विलासो के इस प्रकार विजमी होने मे पोट-भार का विवेचन कर चेतन होने वे कारण उस (कामदेव) ने अपने धनुष घटाने के प्रयास को रोव दिया, वयोकि उसी ( कामिनियों के नेव-विलासो की विजयशीतता) से ही तीनो लोको को विजम की प्राम्ि मुझे हो जाती है ऐता समझते हुए उस (कामदेव) का सहायता के उत्कर्ष का अतिशय 'जर्यात' इम तियापद के द्वारा फतृंता के कारण रूप मे कवि के हृदय में परिस्फुरित हुआ। अन यहाँ पर सहृदयों को आनन्दित करने वाला कोई क्रियावैचित्र्य दृष्टिपथ मे ाता है। और जैसे (अन्य उदाहरण )-
तान्यक्षराणि हृदये किमपि ६इनन्ति ।। ६२॥
(यह पद्य अपने पूर्ण रूप मे इसी अ्मेष के ५१ वे उदाहरण मे उद्घृत हो चुका है। अत उसे वही देखेँ।-मद के कारण अलसाई हुई मेरो मुन्दरी प्रियतमा के अनुभवकगम्ब) दे अक्षर (जो कि न सारथक हो थे और न निरयंक हो ये) हृदय मे कुछ (अनिर्वचनीय ही अस्पष्ट सी) ध्वनि उत्पस्न करते है ॥ ६२।
अत्र जल्पन्ति घदन्तीत्यादि न प्रयुक्तम्, यस्मात्तानि कयापि विच्न्वत्या किमष्यनारपेयं समर्पयन्तीति कवेरभिप्रेतम्। यहाँ पर (कवि ने) 'जल्पन्ति' (कहते है' त्षमा 'वदन्ति' (बोलते है) ईत्यादि शब्दो का प्रयोग नही किया पयोकि में (अक्षर) किसी (अपूवं हो) वचिम्य के साथ अनिवचतीय (अनुभकवगम्य बानन्द) को प्रदान करते हैं। किसी (अर्थात् यदि 'जल्पनि आदि के द्वारा कहा जाता है तो उसके स्पष्ट ढग से उच्चरित होने के कारण मेवल अनुभवकगम्पता समाप्त हो जाती, और इस प्रकार उन अक्षरों के कथन को वाणी द्वारा व्यक किया जा सकता था। पर उससे वाकय मे ऐसा चमरकार न आ पाता। इसीलिए कवि ने यह। 'द्वनन्ति' शब्द का प्रयोग किया है अर्थात् वे कुछ स्पष्ट बोतते नही अपितु अस्पष्ट सी अनिवंचनीय अनुमवकगम्य ध्वनि करते हैं, जिसके द्वारा वाक्य मे एक अपुर्व चमत्कार आ गया है, अव यह नियावचिश्व वकता का उदाहरण हुआ)।
वकतायाः परोऽप्यस्ति प्रकारः प्रत्ययाभय इति। वक्रमाष- स्यान्योऽपि प्रभेदो विद्यते। कोरश :- प्रत्ययाभयः। प्रत्ययः सुप्िक
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प्रथमोन्मेष
च यस्याअयः स्थानं स तयोकतः। तस्यापि बहवः प्रकारा: सम्भवन्ति- सख्यावैचितयविहितः कारकवैचितर्याहित, पुरुषवैचित्र्यषिहितश् । तत्र, संख्यावैचित्रयविहित :- यस्मिन् वचनवैचित्यं काव्यबन्धशोभायै निषध्यते। यथा- मैथिली तस्य दाराः ॥ इति ॥ ६३ ॥ (इस प्रकार 'पूर्वाद्धवक्रता' एव उसके अवास्तर भेदो का सक्षिप्त विवेचन कर अब तीसरी 'प्रत्यमाध्ितवक्रता' एव उसके अवान्तर भेदो का प्रतिपादन कर रहे हैं-) (कविव्यापार) वकता का प्रत्यय के आश्रित रहने वाला अन्य (तोसरा) भी भेद है ( जिसे 'प्रत्ययाभितवक्रता' कहते हैं)। वकमाव का दूसरा भी भेद विद्यमान है। कैस्षा (भेद) प्रत्यय के आश्रम वाला। प्रत्यय अर्थात् सुप और तिड है जिसका आश्रय अर्थान् स्थान वह हुआ उस प्रकार कहा गया (प्रत्ययाश्रय भेद]। उसके भी सक्गभा के वैचित्रय से उत्पन्न अनेक (अवास्तर) भेद सम्भव है। उनमे ससधावैचित्र्य से उत्पन्न ('प्रत्ययात्रमवक्रता' का अवान्तर भेद वहा होता है)-जहां (कविजन) काव्यवन्ध की शोभा के लिये वचनो ( एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन) की विचित्रता का प्रयोग करते हैं। जैसे- सोता उसकी पत्नी है॥। ६३। (यहाँ 'मेमिली' शब्द एकवचन में ओर 'दारा-' शब्द बहुवचन मे प्रयुक्त है क्योकि दारा शब्द नित्य बहुवचनान्त है, परन्तु कवि ने 'मैथिली' की विशेषता बताने के लिए 'दारा' शब्द का ही प्रयोग ममानाधिकरण्य रूप मे कर वाक्य मे एक अपूर्व चमत्कार ला दिया है। अत यहाँ एकवचन के साथ बहुवचन का प्रयोग होने से सह् पावचित्रयकृत बकता है)। यथा च- फुल्लेन्दी वरकाननानि नयने पाणी सरोजाकराः।।६४।। और जैसे (इसी वचनवचिन्मबिहित 'प्रत्ययवकता' का दूसरा उदाहरण)- (उस सुन्दरी की) दोनों आखें विकसित कमलो के जगत हैं तथा दोनों हाथ कमनों को खाने हैं॥। ६४ ॥ अत्र विवचनबहुवधनयो: समानाधिकरण्यमतीष चमत्कारकारि। यहां (कुमल कवि द्वारा प्रयुक्त 'नमने' तथा 'पाणी' पदों के) द्विवचन तथा (उन दोनों के उपमान रूप 'फुल्लेन्दीवरकाननानि' एवं 'सरोशकरा:' पदों के) बहुवचन का समानाधिकरम्य (अर्थान् समान ६ व० जी.
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८२ पकोक्तिनीवितम्
विभक्ति मे प्रयोग, सहृदयो के लिमे) अत्यधिक आनन्दवायक है। (अतः यहाँ सख्पा (वन) की विचिन्नता से उत्पन्न 'प्रत्यमाश्ितवत्रता' हुई।) का रकवे चित्यविदित :- यत्राचेतनस्यापि पदार्थस्य चेतनत्वा्यारोपेण चेतनस्यैव क्रियासमावेशलक्षण रसादिपरिपोपणार्य कत्वादिकारकं निषम्यते। यथा- (बय 'प्रत्ययाधययक्रता' के दूसरे भेद का निरूपण करते हैं) कारक की विचितता से उत्पन्न ('प्रत्ययाधयवक्रता' वह। होती है)-जह। पेतनता का अध्यारोप करके चेतन पदार्थ के ही समान बनेतन पदार्य की भो कियामो के समावेशरूप कतृंता आदि कारक का, रस को परिपुष्ट करने के लिये (कवि दवारा) निबन्धन किया जाता है। बर्षात् जह। मचेसन पदार्थ मे भी चेतन की ही भाति विभिन्न कियाओ को करने की समता दिखाता हुआ कवि उसे कर्ता आदि के रूप मे कर्ता आदि कारको के प्रयोग द्वारा म्यक्त करता है, वह। कारकर्वचित्र्य-विहित 'प्रत्यमवक्कता' होती है) बंसे-
स्तनदरन्द्वं मन्दं स्नपयति मलाद्वाष्पनिवद्दो इठादन्त:कण्ठ लुठति सरसः पश्रमरः। शरण्योत्स्नापाण्डु: पतति प कपोल: करतले न जानीमस्तस्या: क इष दि विकारव्यतिकरः ॥६४॥ (विरहुष्यपा से विवश उस रमणी के) अनन्युग्म को बलपूर्वक आसुओ का समूह धीरे-धीरे स्नान करा रहा है एजम सरस पषम-स्वर हठपूर्वक उसके गले के भीतर सोट रहा है तथा पारत्मानीन चन्दिका के सदुश पाणडु वर्ण कपोस उसके करतल पर भरा जा रहा है (यह तो उसके बाह अवयवो की भवस्पा है जिसे कि हम देख रहे हैं, किन्तु) नहीं जानते कि उसके (आन्तरिक) विकारों की अवस्था फँसी है? ।। ६४ ॥
करत्वमुपनिबद्धम्-यत्तस्या विवशाया: सत्यास्तेपामेवंविधो व्यवहार:, सा पुनः स्वयं न किश्रिदप्याचरितुं समर्थेत्यभिभ्रायः'। अन्यच्च १. यहाँ पर डt०हे ने 'यदि तस्या' ऐसा पाठान्तर बताया है, एव आाचार्य विश्वेश्वर ने इस वाक्य मे आये, 'सा पुनः स्वय न किश्िदम्या- धरित पाठ में से 'न को हद़ा दिया है। इस प्रकार यदि 'न' से रहित, और प्रदि में 'मत' के स्थान पर 'यदि' के पाठ को ह्वीकार किया जाय सो -
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प्रथमोन्मेष:
कपोललतादीनां तदवयवानामेतदवस्थत्वं प्रत्यक्षत्रयास्मदादिगोचरनामा- पद्यते, तस्या: पुनर्योऽसावन्तविकारव्यतिकरस्तं तदनुभषकविषयत्वाद्वयं न जानीम: । यथा च- यहाँ पर अश्समूह आदि अचेतन (पदा्थों) की भी कतृ ता को, उन पर चेतनता का आरोप करके, कवि ने उपनिबद्ध किया है ( अर्थात् 'स्नान करा ते है' क्रिया के कर्ता के रूप मे 'अधुसमूह' का, 'लौटते हैं' किया के कर्ता के रूप मे 'पञ्चमरव' का, तथा 'गिरते हैं' करिया के कर्ता के रूप मे 'कपोल' का प्रयोग किया है, जो कि अचेतन पदार्थ हैं, जिनके कारण वाक्य मे एक अपूवं चमत्कार आ गया है) कि-उसके विरह-व्यया से विवश होने पर कपोल आदि उन अवेतन पदार्थों का इस प्रकार का व्यवहार है, वह स्वम कुछ भी करने से सम्थ नही है ( अर्थान् वह कुछ भी कर सकने मे पूर्णतया विवण है) और दूसरी बात यह है कि उसके अङ्गभूत कपोलादि की ऐसी अवस्पा तो प्रत्यक्षरूप से हमको दिखाई पडती है, लेकिन उसकी जो यह केवल उसी के द्वारा अनुभव की जा सकनेवाली आान्तरिक विकार को अवस्पा है उसको हम नहीं जानते। और जैसे ( इसी का दूसरा उदाहरण)-राजशेखरविरचित 'बालरामायणम्' नामक नाटक के द्वितीय अङ्क मे परशुराम के प्रति रावण का यह कथन है कि-
चापाचार्यखितिपुरविजयी कार्तिकेयो विजेय: शस्त्रव्यस्तः सदनमुदधिर्भूरिय हन्तकारः। अस्त्येवेतत् किमु कृतवता रेशुका कण्ठमार्घा बद्धस्पर्शस्तष परुना लब्जते चन्द्रहासः॥ ६६ ।। (हे परसुराम जी ! यह बात सही है कि) त्रिपुर पर विजय प्राप्त करने वाले (भगवान् शट्दर आपके) धनुष (अर्थान् धनुविद्या) के गुरु है, तचा स्वा मिकारतिकेय पर आपने विजय पामी है, एवम् आपके शस्त (पहले) से व्यस्त किया गया समुद्र आपका निवास-स्थान है और यह पृथ्वी हन्तकार है। यह भी सही है। किन्तु फिर मी (अपनी माता) रेशुका की गर्दन को
वाक्य का अपं इस प्रकार होगा-"यदि (विरह व्यपा से) विवश होने पर उस (रमणी) के उन कपोलादि अचेनन अवयवो) का इस प्रकार का व्यवद्वार है तो यह स्वय कुछ भी (अमगल व्गापार) करने मे समर्य होती है है यह अभिप्राय हुआ। (सर्थात् विरह्-ध्यणा से अधिक पीडित होकर यह अपनी जान भी दे सकती है)।
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CY धनोकिजी वितम्
पीटित करनेवाले (खर्षात उसे काट डालनेवाले) तुम्हारे फरसे के साथ स्पर्षा करनेवाला यह चन्द्रहास ( मेरा छड़ग ) लज्जित हो रहा है। ६ै ।। अत्र चन्द्रइासो लख्वत इति पूर्वधन् कारकवचित्रयप्रतीतिः। पुरुषधैचित्यविहितं वकत्वं विद्यते-यत्र प्रत्यकापरभावविपर्यासं प्रयुख्खते क्ययः काव्यवैचित्यार्थ युष्गदस्मदि वा पयोक्व्ये प्रातिपदिकमावं निषम्नन्ति । पथा- यहाँ पर पहले को ही भाति 'पन्द्रहासो सज्जते' इस वाक्-रचना द्वारा (वचेशन पदार्म चन्द्रहास मे चेतनता का बारोप कर उसे, लज्जित होता है 'लम्बते' इस किया के कर्ता के रूप मे प्रयोग कर कवि ने) कारक को विषिनता को प्रतिपादित किया है। (इस प्रकार कारक वंषित्यजन्य 'प्रत्ययवकता' की स्वास्याकर, पुरषवचित्र्वविहित वक्रता का प्रतिपादन करने जा रहे हैं- पुरुषष चिश्चजन्य वकरता (वहाँ) होती है-जह।ं क विजन। प्रथमादि पुरुष को) छपने भाव के दिपरयास को परित्क करके प्रस्तुत करते हैं, अर्थात् काव्म मे वचित्र्य (की सृष्टि करने) के लिए ( मध्यम पुरुष) युष्मद् मपवा (उत्तम पुरुष) अस्मद् ( शब्द) को प्रमुक्त करने के बजाय (प्रथम पुरुष) केवल प्रतिपादिक (शन्द को) प्रयुक्त करते हैं। जँसे - सस्मद्वाग्यनिपर्ययाधदि पर देवो न जानाति तम् ॥। ६७ ॥। (विभीषण के कपन कि) किन्तु यदि हम सभी के दुर्भाग्य के कारण स्वामी (आप रावण) उम् समस्त सोकों में प्रसिद्ध शौमवाले राम) को नहीं जानते (तो क्या कहा बाय) ॥ ६७ ।। अत्र तवं न जानासीति वकये घेचित्र्याय देवो न जानातीत्युक्म्। यहाँ पर 'तुम नहीं जानते हो' (त्वं न जानासि, इस प्रकार मध्यम पुषष का प्रयोग न कर, उस) के स्थान पर 'स्वामी नहीं जानते' (देयो नजानाति, ऐसे प्रदम दुर्व) का प्रयोग कर (कवि ने पाष्य में बपूय रमणीमता की सृष्टि की है इस उदाहरण में प्रात्रिपदिक 'देव" का प्रयोग 'न् जानाति' इस करियापद के साथ हुषा है, किन्तु कहीं २ बिना कियापद के प्रयोग के नेवस प्रतिपदिक का हो प्रमोग कविजन करते हैं ऐसा दिखाते है)। एवं युष्मदादिबिपर्यासः करियापद बिना आतिपदिकमात्रेऽपि हर्यते। यवा-
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प्रथमोन्मेष:
इसी तरह युध्मदादि का विपर्यास (अर्थात् मध्यम और उत्तम पुरुष के स्थान पर प्रथम पुरुष का प्रयोग) करिया पद (के प्रयोग) के बिना केवल प्रातिपदिक (के प्रयार मे भी देखा जाता है। जसे- अय जन: प्रष्दुमनास्तपोधने न चेद्रहस्थ प्रतितक्तुमह्सि ॥ ६=॥ (कुमार-सम्भव के पश्चम सर्ग में तपस्या करती हुई पावती से वट्वेष- धारी शकर उनकी तपस्या का कारण पूंछते हुए कहते हैं कि-) हे तप मान्र धनवाली (पार्वती) यह (तटस्थ) जन ( आपसे कुछ ) पूंछने के लिये उत्मुक है यदि (कोई) रहस्य न हो तो (आप उसे निस्सद्वोष) बता सकती है॥ ६८ ॥ अनाहं प्रष्टुकाम इति वक्तये ताटस्ध्यप्रतीत्यर्थमय जन इत्युक्म् यथा वा- यहाँ पर (वहुवेषधारी शंकर ने) "मैं पूंछने के लिए उत्ुक हू।( 'बह प्रष्टमना' ऐसे उत्तम पुरुष का प्रयोग करने) के बजाय तटस्थता को चोषित करने के लिए 'यह जन' (पूंछने के लिए उत्सुक है" इस प्रकार 'अम जन.' इस प्रातिपदिक मात्र) का प्रयोग किया है। (इस प्रकार इस वाक्य में क्रियापद से रहित केवल प्रातिपदिक के प्रयोग द्वारा वैचित्रय-सम्पादन हो गया है) अथवा जसे (दूसरा उदाहरण)- सोऽय दम्भधृतत्रत इति ॥ ६६।। (पच्ावती के साथ विवाह करने के लिए उद्यत वह्सराज उदयन द्वारा आग में भह्म हो गई वासवदत्ता को सम्बोघित कर कहे गये कि)-वही यह दम्भ के कारण (एकपतीत्व) व्रत को घारण करने वाला (मैं पचमावती परिणय करने को उद्यत हो गया हूँ। ॥ ६६ ॥ अन्र सोऽहमिति बक्तये पूर्ववद् 'अयम्' इति वैचित्र्यप्रतीतिः। इस वास्य मे 'वह मैं' ('सोऽह्म्' इस प्रकार उत्तम पुरुष) को न कहू कर 'वह यह' (सोऽय, इस प्रथम पुरुष) को (दपनी कृतघ्नता आदि को खोतित करने के लिए) प्रयुक्त कर { एक अपूर्व धमस्कार को उत्पन्न करने वाले ) वंचित्र्य की प्रतीति (कराई) है। एते च मुख्यतया वक्ताप्रकाराः कतिचिम्निदर्शनार्थं प्रदर्शिताः। शिष्टाक्ष सहस्रशः सम्भवन्तीति महाकविप्रवाहे सहदयैः स्वयमेदोत्म्रेक्ष जोपा: ।
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वकोक्तिजीवितम्
इस प्रकार उदाहूरण प्रस्तुत करने के लिए में ( कविव्यावार) वक्ता के कुछ भेद प्रदर्शित किए गये। शेष तो इसके हजारो भेद सम्भव हो सकते है, इन्हें सहृदय लोग स्वयं महाकवियो के प्रवाह ( अर्थान् काव्यो) मे देवें। एय वाक्यावयवानां पदानां प्रत्येकं वर्णाद्यवयवद्वारेण यथा- सम्भवं वक्रभार्व व्याज्यायेदानी पदसमुदायभूतस्य वाक्यस्य वक्रता व्याख्यायते- इस प्रकार वाकय के लवयद रूप (सुबन्त तथा तिटन्त) पदो मे से प्रत्येक को (उनके) दर्णादि अवययो के माध्यम से, यथासम्भव वकता की व्याख्या कर अब पद के समुदाय रूप वाक्य को वकता की व्यादया करते हैं :- याक्पस्य वक्रभावोऽन्यो भिद्यते यः सहस्रधा।
(पद के समुदायभूत) वाक्म की वतता (पूर्वोक्त पदादि वकता से भिन्न) दूसरी (ही) है, जो हजारो प्रकार के भेदो से युक्तक है। तथा जिसमे (कवि प्रसिद्ध उपमा आदि) मलद्वूारो का समटाय सद (का सब) अन्तर्भूत हो जाता है॥। २० ॥ वाक्यस्य वक्रमायोऽन्य:। वाक्यस्य पदसमुदायभूतस्य। आख्यातं साव्ययकारकषिशेषणं धाक्यमिति यस्य प्रतीतिस्तस्य श्लोकादेर्वक्रमावो महीभणितिवैचितयम् अन्यः पूर्वोकवकताव्यतिरेकी समुदायषचित्रय- निबन्धनः कोऽपि सम्भवति। यथा- वाक्य का वकमाव अन्य (ही) है। वाकय का अथार् पदो के समूह रूप (दास्य) का। 'अव्यय कारक तथा विशेषणो से युक्त आस्मात (किया पद) वाकप होता है इस प्रकार जिसकी प्रतीति होती है, उस सोकाद /वाकयों का वकसाय सर्थात अङमिजितिवा धिभ्य बन्य सथात (१६ वों कारिका मे प्रतिपादित वर्णवित्यास वकता आदि) पूर्वोक्त (पद की) वकताओ से अतिरिक्त समुदाम (मूत वाक्य) की विचितता का सम्पादन करनेवासा कोई (दूसरा भेद) सम्भव होता है। जैसे- उपस्थितां पूर्षमपास्य लद्मी बन मया सार्घमसि प्रपन्नः। त्वामामयं प्राप्य तया तु कोपात्सोढास्मि न त्वद्रबने वसन्ती॥ ७० ।i ('रघुवश' महाकाव्य मे भगवान् श्री राम के द्वारा परित्यक्त सोता, वन्हें जन्धत मे छोड़ कर सोटते हुए लक्ष्मण द्वारा राम के प्रतति सम्देश भंजती है कि)-
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प्रथमोन्मेथ' בף
पहले ( वन-गमन-काल में) आपने राज्याभिषेक के समय उपस्थित हुई (राज्य) लक्ष्मी को त्याग कर मेरे साथ वन के लिये प्रस्थान किया था। (अर्थान् उसको उस समय आपने माश्रय न देकर मुझे अपनाया था लेकिन इस समय पुन आपके राज्य-सिंहासन ग्रहण कर लेने से) आपको आश्रम (रूप में) प्राप्त कर (पूर्वकाल मे मेरे ही कारण अपना परित्याग होने से उत्पन्न) क्रोध के कारण, आपके ( राज) भवन मे निवास करती हुई मुझे वह सहन न कर सकी (अत' मुझे आपसे परित्यक्त करा दिया) ॥ ७० ॥ पतत्सातया तथाविधकरुणाफान्तान्त करणया वक्षरभं प्रति सन्दिश्यते -- यदुपस्थितां सेवासमापत्रा लक्ष्मीमपास्य प्नियं परित्यज्य पूर्व यस्तवं मया साघ वनं प्रपन्नो विपिन प्रयातस्तस्य तब स्वप्नेऽप्येतअ सम्भाव्यते। तया पुनस्तस्मादेव कोपात् स्रीस्वभावसमुचितसपत्नीविद्विषात्त्वद्गृडे वसम्ती न सोढास्मि। तदिदमुक्त भवति-यत्तस्मिन् विधुरदशावि- संब्ठुन्नेऽपि समये तथाविधप्रसादास्पदतामध्यारोप्य यदिदानी साम्राव्ये
विदितव्यवदारपरम्परेण भवता स्वयमेव विचार्यतामिति। महु उस प्रकार (गर्भावस्था मे वन मे परित्यक्त होने के कारण उत्पन्न) करुणा से आक्ान्त अन्त करणवाली सीता अपने प्रियतम (राम) के पास सन्देश भेजती है कि-पहले (वनवास काल मे) जो आपने उपस्थित अर्थात् सेवा करने के लिये समोप आई हुई (राज्य) लक्ष्मी अर्थात् (राज्य) श्री का परित्मान कर मेरे साथ वन को प्राप्त हुए अर्थात् जगल चले गये तो ऐसे (मेरे लिथे राज्यश्री का परित्याग करने वाले) आाप के लिये यह (मेरा परित्याग करना) कदापि सम्मव नही है। अपितु उसी ( प्राचीन मेरे का रण अपने परित्याग से उत्पन्न) करोध के कारण, नारी स्वभाव के अनुरूप सवतिया डाह के कारण वही (जक्ष्मी) आापके घर मे मेरे निवास को सहन न कर सकी। (अत मुझे घर से निकलवा दिया)। इस कयन का अभिप्राय यह हुआ कि- जो आपने उस (वन गमन से उत्पन्न) कष्टावस्था से विदम समय मे भी (मुझे) उस प्रकार (अपने साथ रखने की) कृपा का पात्र बना कर, बज साम्राज्य प्राप्त कर लेने पर (दुखावस्या को समासि हो जाने पर) बिना किसी कारण के परित्याग रूप तिरहकार का पात वना दिया है, यह (आपने) उचित (किया है) अथवा अनुचित (किया) है, इसका विचार व्पवहारप्रणाली को (भलोभाति) जानने वाले आप स्वम करें। ( अर्थति आपने सवया अनुचित किया है। इस प्रकार इस उदाहरण मे सारे वाबय के अर्ष को समझने पर एक अपूर्व चमत्कार की उत्तलब्धि होती है अस यहाँ 'वाक्ययक्ता' हुई।)
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स च वक्मावस्तयाविधो य महस्रवा मिधरते बहुप्रकार भेद- मासाद्यति। सहस-शम्टोडत मंस्याभूयस्त्वमात्रवाची, न नियतार्थवृत्ति:,
नम्भवति । योज्मौ वाक्यस्य वक्माशे बहुप्रकार, न जानीमस्तं कोटरा-
सकल। ऽप्पन्नर्भेविष्यात अन्तर्भात्र व्निर्ष्यात, परथक्त्वेन नावस्थापयते। ननप्रकारभेढत्वेनैव व्यपदेशमासार्वयव्यतीनयर्थ.। न चालद्वारवर्गः स्वलभ्णावसरे प्रतिपदमुदाहरिप्यते। और वह वत्रता उस प्रकार की है कि जो सहसधा भिन्रन होती है अर्थोन बहुत से भेदो से युक्त होती है। यहाँ प्रयुक्त सहस्र (हजार) शन्द नेवल मस्या को अदिर्तामान का वाचक है न कि (हजार रूप) निश्ित अर्घ का-जंने 'सहसदल' यह पद कमल बर्य का बाबक है, जिसमे हजार हो दल होने हो ऐसी बात नही है अपितु/सहस शब्द द्वारा सुख्या को लधिकता का बोध कराया गया है कि कमल मे बहुत से दन होते है।) क्योंकि इुवि को प्रतिमा के अनन्त होने के कारण बसकी निभधितता हकि जस दनने हो भेद होगे, ऐमा कहना) सम्भव नटी है। (यदि कोई सन्देह करे कि) यह वाक्य को बहुत मेदो वाली वचा होती है इँसी? यही हृग नही जानत अस (उसके स्वरूप बताने के लिदे) कहते है-वहा वह मारा असदार-समुदान अन्तर्मून हो जायगा। जहाँ बर्यान जिस ( वाक्पवमना) में यहु बनदवार-समुदाय अर्थान कविप्रवाह मे प्रसिद्ध अस्तित्व वासे उपमा आदि अलद्वारो का समूह सब अर्थार् सारा का सादा मन्तर्भूत होगा मर्थान् अन्तर्भाव को माम करेगा अनग से { उसवी) स्पिति न रहेगी। उसी (वाक्य-वचना) के भेट-प्रभेट रूप से संज्ञा को प्राप्त करेगा यह अभिष्राय हुआ। और वह अनसूार-समुदाय अपने-अपने नक्षण के समय प्तिपद उदाहृत किया जायगा।
एघ वाक्यवकर्ता व्यारवाय वाक्यममृहरुपम्य प्रकाणस्य तत्सतु दाथत्मकस्य प प्रबन्धम्य वक्ता व्यार्थायने-
इम प्रणार 'वाक्यवतरता' की व्याख्या पर यापव के समुदारसृत 'प्रकरण', तथा उस ( प्रकरण) वे समूह रूप 'प्रदाघ कों' वक्ता को स्लास्पा घरने जा रहे हैं-
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प्रथमोन्मेप
वक्रभाव: प्रकरणे प्रबन्धे वास्ति यादशः । उच्यते सहजाहार्यसौकुमार्यमनोहरः ॥ २१ ॥ प्रबन्ध अथवा प्रकरण मे, स्वाभाविक (महज) तथा व्युत्पत्ति के द्वारा उत्पन्न की गयी (आहायं) सुकुमारता से चित्ताकर्षक जिस प्रकार की वकता (विद्यमान रहती) है, (उसे अब) कहा जाता है॥। २१॥ वक्रमावो विन्यासवैचितय प्रबन्धकनेशभूते प्रकरण यादशोऽम्ति याहग विद्यने प्रबन्धे वा नाटकादी सोऽत्युच्यते कथ्यते। कीटश :- सहजाहार्यमोकुमायमनोहर: सहजं स्वाभाविकमाहार्यं व्युत्पत्त्युपर्जितं यत्सौकुमार्य रामणीयकं तेन मनोहरो हृदयहारी यः स तथोक्त। व्रभाव अर्थात विन्यास को विचियता, प्रबन्ध के एकदेशभूत प्रकरण मे जिस प्रकार की है अथवा प्रबन्ध अर्थान् नाटक आदि मे जिस ढङ्ग की (विचित्रता) है उसे कहते हैं। कसा है (वह वक्रभाव) सहज तथा ाहार्य सौकुमार्य से मनौहर। सहज अर्थात् स्वाभाविक, आहार्य अर्थान् वयुत्पत्ति द्वारा उत्पन्न किया गया, जो सौकुमार्य अर्थान् रमणौयता उससे मनोहर हृदय को आकर्षित करने वाला है जो वह हआ तथोक्त (अर्थात् सहज एव आाहार्य सौकुमार्य से मनोहर)। तत्र प्रकरणे वक्रमावो सथा-रामायणे मारीचमायामयमाणिक्य- मृगानुसारिणो रामस्य करुणाकन्दकर्णनकान्तरान्त,करणया जनक- राजपुतया तत्श्रणपरित्राणाय स्वजीवितपरिरक्षानिरपेक्षया लक्षमणो निर्मत्सर्य प्रेपितः । उन प्रकरण मे वक्रता (का उदाहरण देते हैं) जैसे-वाल्मीकि रामायण मे मारीव रूप मायानिर्मित माणिक्य (सोने) के मृग का पीछा करने वाले रामचन्द्र के करुण-आतेनाद को सुनने से अधीर हो गये हृदय वाली जनकराज पुश्री सीता ने, उन (रामचन्द्र) के प्राण की रक्षा करने के लिए, अपने प्राणो को रक्षा की चिन्ता न कर, लक्षमण की भत्संना कर (लक्षमण को) भेजा था। तद्ेतवत्यन्तमनचित्ययुक्तम्, यस्मादनुचरसंन्निधाने प्रधानस्य नथाविधव्यापारकरणमसम्भावनीयम्। तस्य च सर्वातिशयचरित- युक्तवेन व्ण्यमानस्य तेन कनीयसा प्राणपरिताणसम्भावनेत्येतदत्यन्त- मममीचीनमिति पर्यालोच्य उदात्तराघवे कविना वैदग्धयवशेन मारीच मृगमारणाय प्रयातस्य परित्राणार्थ लक्ष्मणस्य सीतया कातरत्वेन राम. प्रेरितः इत्युपनिमद्धम। अत्र च तद्विदाह्लाटवारित्वमेव वक्रत्वम्। यथा च-
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६०' वकोकिजीवितम्
यह बात अत्यन्त ही अनुचित है क्योकि (लक्ष्मण रूप) अनुचर के समीप रहने पर प्रधान ("राम) के उस प्रकार (माणिकयभृग का पीछा करने) वा व्यापार करने की सम्भावना ही नही की जा सकती। (अत. रामायण मे किया गया यह वर्णन अनुचित प्रचीत होता है।) साथ ही (रामायण मे) सर्वातिशायी चरित् से युक्त रूप मे वर्णित किए जाते हुए उन (राम) के प्राणो को रक्षा को सम्भावना उनसे छोटे (भाई लक्ष्मण) के द्वारा की जाम यह और भी अधिक अनुचित है। इस प्रकार (इस प्रकरण के अनोचिरव) का भली भाति विचार कर 'उदात्त राघव' (नामक नाटक) मे (कुशल) कवि ने लडे ही कौशल के साथ, 'मारीच (रूप मायामयमाणिकय) भृग के भारने के किए गये हुए लक्ष्मण की प्राणरक्षा के लिये (उनके करुण-कन्दन को शुनकर) सीता ने अधीरता से राम को भेजा था" ऐसे (प्रकरण की) रचना किया है। और इस बुद्ध के रामायण से परिवर्तित प्रकरण मे सहृदय-हृदया- हादकारिता हो ( प्रकरण की) वत्ता है। जैसे कि- किरातार्जुनीये किरातपुरुपोकिकिपु वाच्यत्वेन. स्वमार्गणमार्गणमात्र- मेवोपक्रान्तम् 1 वस्तुनः पुनरर्जुनेन सद्द तात्पर्यार्थलोचनया बिम्रहो वाक्यार्थलामुपनीत: 1 (भारवि विरचित) 'किरातार्जुनीयम' 'महाकाव्य) मे (भगवान शसूर द्वारा प्रेषित) किरात पुरु्ष की उक्तियों में वा्य बद्ध से केवल अपने वाण के अन्वेषण को हो (कवि ने) उपनिबद्ध किया है। किन्तु (उन दोनो किरातपुरुष तथा अर्जुन की वार्ता के) तात्पर्यारय का सम्यक विचार करने से वास्तव मे (गटर का) ध्जुन के साथ युद्ध हो वायमायं रूप में उपन्यस्त किया गया है। टिप्पणी-किरातार्जुनीय एक प्रबन्ध काव्य है जिसके मोतर बनेक प्रकरण सम्भव है। यहां जिस प्रकरण को कवि ने प्रस्तुत किया है वह १३ वे तथा १४ वें सग की कथा से सम्बद्ध है। जब बर्जन को सपस्या मे प्रसन्न होकर इन्द्र उसे भगवान् पटूर की सपस्या करने का उपदेश देते हैं तो अर्जुन बिना किसी विपाद के भगवान् शङ्र को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगता है। उसके घोर तप को देख वर एक दिन सभी देवगण शदूर के पास जाते हैं और अर्जुन की घोर तपस्मा का वर्णन कर उसका प्रमोजन पूछते हैं। सभी शझ्ूर देवताओं को यह बताते हुए कि वह मुझे प्रसन करने के लिए तपस्या फर रहा है वहां से देवो के साथ, अर्जुन का वथ करने के लिये आते हुए मूक दानव (वराह) से उसकी रक्षा करने के लिए चल
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प्रथमोन्मेप. ह१
देते हैँ। तथा स्थल पर पहुँच एक साथ ही अर्जुन तथा शङ्र दोनो के बाणो के लगने से वह शूकर मर जाता है। अर्जुन एक ओर से अपना बाण लेने पहुँचते हैं दूसरी ओर से शडूर का भेजा हुआ किरात सैनिक शङ्कर के वाण को खोजता हुआ वही पहुँचता है। पहले वह बड़ी शान्तिपूर्वक भाषण करता हुआ अर्जुन से बाण वापस देने को कहता है। फिर शङ्र के साथ सुग्रीव एवं राम की भाँति मैत्री करने का प्रलोभन देता है। और जब इस पर भी अर्जुन बाण देने को तैयार नही होते तो शङ्कर के अपूर्व पराक्रम का वर्णन कर अर्जुन की भय का प्रदर्शन करता है। और इसी प्रकार बात बउते २ अर्जुन की चुनोती स्वीकार कर शङ्कर सहित वे युद्ध करने के लिए उपस्यित हो जाते हैं। इस प्रकार यही कवि को अभिप्रेत रहा है शङ्कर और अर्जुन का युंद्ध जिससे की आगे शदर भगवान् प्रसन्न हो अर्जुन को दिव्यास्त प्रदान करते है। उस युद्ध का वर्णन प्रस्तुत करने के लिए ही कवि ने इस प्रकरण का निबन्धन किया है। अत. यद्यपि इसमे वर्णन तो बाण की खोज का ही किया गया है लेकिन यदि उसके अभिप्राय (तात्पर्यार्थ) का विचार किया जाम तो साफ स्पष्ट है कि वह केवल युद्ध की हो भूमिका है। अतः यह प्रकरण की वकता हुई। तथा च तत्रवोच्यते- प्रयुज्य सामाचरितं विलोमनं भयं विभेदाय धिय: प्रदर्शितम्। तथाभियुक्तं च शिलीमुखार्यिना यथेतरन्न्याव्यमिवावभासते।। ७१ ।। जसा कि वही ( १४ वे सर्ग के ७ वें मलोक मे अर्जुन के द्वारा) वहा गया है- "(तुमने पहले शान्तिपूर्ण बाते कर) साम का प्रयोग कर (फिर अपने सेनापति के साथ मिनता का लोभ देकर) प्रलोभन सम्पादित किया। • (तदनन्तर) बुद्धि को विचलित करने के लिए (अपने स्वामी के अतुल परातम का वर्णन कर) भयका प्रदर्शन किया। एवं (केवल) बाण प्रास्त करने के इच्छुकु तुमने उस प्रकार (का वाणी का प्रयोग किया है जो अन्यायपूर्ण होते हुए भी न्याययुक्त सी प्रतीत होती है। (अथवा जो वाणी न्याय्य से इतर अन्यामपूर्ण सी प्रतीत होती है।।। ७१ ॥। व्यास्या की गयी है। विस्तार के साथ उनका विवेचन अपनाअपना लक्षण करते समय किया जायगा। प्रबन्धे वरुमावा यथा-कुत्रचिन्महाकविविरचिते रामकथोप निबन्धे नाटकादौ पक्वविधवकतासाममरीसमुदायसुन्दर सहृदय- हृदयहारि महापुरुषवर्णनमुपकमे प्रतिभासते परमार्थतस्तु विधि- निपेधात्मकघमोपदेशः पर्यवस्यति, रामवद्वर्तिव्व्य न रावणवदिति।
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६२ वृकोकिजीवितम्
यथा च, तापसवत्सराजे कुसुमसुकुमारपेतसः सरसविनोदैकरसिफस्य नायकस्य चरितघर्णनसुपकरान्तम्। वस्तुस्तु व्यसनार्णवे निमज्ज- त्निजो राजा तथाविघनयव्यवहारनिपुणैर मात्यैस्तैस्तैरुपायवत्तारणीय इत्युपदिष्टम्। एतच्च स्वलक्षणन्यास्यानावसरे व्यक्ततामायास्यति। (इस प्रकार 'प्रकरण-वकता' का विवेचनकर अव 'प्रबन्धवकता' को विवेचित करते हैं)-प्रबन्ध मे वश्ता का उदाहरण जैसे- किसी महाकवि-विरचित रामकथा का वर्णन करनेवाले नाटक आदि मे (पूर्व-विवेचित वर्ण्य-विन्यास-बक्ता, पदपूर्वार्त्त-वभ्रता, प्त्यमाश्रम- वकता, वाक्य-वक्रता एव प्रकरण-वक्ता रूप) पाँच प्रकार की वक्ताओ से युक्त सामप्री के समुदाय से सुन्दर सहृदयो के हृदयो को आाकषित करने वाला महापुरष के चरित्र का वर्णन आरम्भ मे प्रतीत होता है। बिन्तु वस्तुत उसका पयवसान 'राम की तरह व्यवहार करता चाहिए' (मे विधिरूप) 'रावण की तरह नही' (मे निपेधरूप) इस प्रकार विधि तथा निषेधरूप धर्मे के उपदेश मे उस प्रबन्ध का पर्यवसान होता है। और जैसे (उदाहरणस्वरूप) 'तापसवत्सराज' (नामक नाटक) मे रभपूर्ण विनोद के एकमात्र रसिक तथा पुष्प के सदुभ सुकोमल हृदयवाले नायक (वत्सराज उदयन) के चरित्र का वर्णन प्रारम्भ किया गया है, लेकिन वास्तव मे विपत्ति के साधर मे दूबते हुए अपने राजा का उस प्रकार के नीति एव व्यवहार मे दक्ष भन्नियो द्वारा उन-उन तथा यर्णित उपायो द्वारा उद्ार करना चाहिए, यह उपदेश दिया गया है। यह बात अपने लक्षण को व्पाष्या करते समय मध्िक स्पष्ट हो जायगी। टिप्पणी-इस प्रकार अब तक राजानक कुन्तक ने कविव्यापार की वत्रता का विवेचन करते हुए ६ प्रकार की वकताओ (१) वण्य विन्यास- बतता (२) 'पदपूर्वाद-वतता' एव उसके अन्तर्गत 'रदिष चिन्म-वनना आदि आाठ अवान्तर भेदो का तथा ( ३) पत्यमाश्य-वणता तथा उसके अन्त्गत सख्या, कारक एव पुरुषवँचित्र्य-कृत व्वक्रता रूप तीन अवाम्तर मेदो का (४) वाश्यवतता (५) प्रकरणचनता तथा (६) प्रबन्धवकतर का सकषिप्त विवेचन किया।) एवं कविव्यापारषफ्रत पट्कमुद्देशमात्रेण व्याख्यातम् । विस्तरेण सु स्वलक्षणावसरे व्यासयास्यते। इस प्रकार कषि-ध्वापार की ६ वत्रताओ की नाम सकीतन मात्र से व्यास्या की गयी है। विस्तार के साथ उनका विवेचन अपता-अपना सक्षण करते समय किया जायगा।
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प्रभमोन्मेप
क्रमप्राप्तत्वेन बन्धोऽघुना व्या्यास्यते- वाव्यवाचकसौभाग्यलावण्यपरिपोपका। व्यापारशाली वाक्यस्य विन्यासो बन्ध उच्यते ॥ २२ ॥ (इस प्रकार 'शब्दार्थों सहितो" "' (१।७) इत्यादि काव्य-्लक्षण मे प्रयुक्त 'शब्दार्यों' 'सहितौ' एवं 'वक्कविव्यापार' पदो की व्याख्या कर चुरुने के बाद) क्रम प्राप्त होने से अब 'बन्ध' पद का व्याख्यान किया जा रहा हे- अर्थ और शब्द के (आमे कहे जाने वाले) सौभाग्य एव लावभ्य (गुणो) को परिपुष्ट करनेवाली ( कवि) व्यापार से शोभित होनेयाली वाक्य (श्लोकादि) की विशिष्ट सघटना को 'बन्ध' कहते हैं ।। २२,। विन्यासो विशिष्टं न्यसन य: समिवेशः स एप व्यापारशाली बन्य उचयते । व्यापारोऽन्न प्रस्तुतकाव्यक्रियालक्षणः । तेन शालते रलाघते य स तयोक। कस्य-वाक्यस्य श्लोकादे,। फीटश :- वाच्यवाच कसौ माग्यला वण्यपरिपोषक: वाध्यवाचकयोद्वयोरपि वाच्यस्याभिघेयस्य वाचकस्य घ शब्दस्य वत्त्यमाणं सौभाग्य- लावण्यलक्षणं यद गुणद्वयं तस्य परिपोपक: पुष्टतातिरायकारी सौमाग्य प्रतिभासंरम्मफलभूतं चेतनचमत्कारित्वलक्षणम्, लावण्यं सभिवेश- सौन्दर्यम्, तयो: परिपोषक 1 यथा- विन्यास अर्थात विशिष्ट उग से वर्णों एवं पदो का न्यास रूप जो संघटना है वही काव्य-कम रूप व्यापार से शोभित होनेवाला 'बन्ध' कहा जतिा है। व्यापार का मतसब यहाँ पर काव्य-करिया रूप है। उसके द्वारा जो 'शासते' अर्थान् प्रशसित होता है वह हुआ व्यापारशाली। किसका (वित्यास) वाक्य अर्थान् शलोकादि का विन्यास। किस ढग का (बिन्यास)-वाक्य और वाचक के सोमान्य तथा लावण्य का परिपुष्ट करने वाला। वाच्य और वाचक दोनों का भी वाच्य अर्थात् अर्थ, वाचक अर्ाद शब्द का आगे कहा जानेयाना सौभाग्य और लागम्य रूप जो गुण- दय उसका परिपोषक अर्थाव पोषण के अतिशाय को उत्पन्न करने वाला। सौभाग्म अर्थात् (कवि) प्रतिभा के सरम्भ का परिणामस्वरूप सहृदय हृदय को जानन्दित करने की मोम्मता, साव्य मर्थात् सघटना की सुन्दरता उन दोनों को परिपुष्ट करनेवाला (वाक्य-विन्यास) 'बन्ध' कहा जाता है) जैसे-
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वक्ोकिजीवितम्
दस्वा वामकर नितम्बफलके लीलावलन्मध्यया प्रोसुद्गस्तनमसचुम्धिचिबुकं कृत्वा तथा मां प्रति प्रान्त प्रोतनवेन्द्रनीलमणिमन्मुक्ताव लीविभ्रमाः सासूयं प्रहिता: स्मरज्वरमुचो हवित्रा: कटाशच्छटाः॥ज२॥ वितास के साथ कमर को सुकाये हुए, उस (मेरी प्रेमसी) ने अपने बामहस्त को नितम्बस्पलपर रखकर स्तन को खूब उभाडकर, और ठोडी को कन्चें का स्पर्श कराकर मेरे प्रति असूया के साथ मदनज्वर को छोडने घाले किनारो पर सगी हुई नयीनमी इन्द्नीतमणियो से युक्त, मोतियो की माला के विलास से युक्त दोन्तीन कटाक्ष फेंके ।। ७२ । अत्र समप्रकविकौशलसम्पाद्यस्य 'चेतनचमत्कारित्वलक्षणस्य सौभाग्यस्य कियन्मात्रवर्णविन्यासविच्छित्तिविहितिस्व पदसन्धानसम्प- दुफार्जितस्य घ लावण्यस्य परः परिपोषो विद्यते। यहों पर सहृदयह्दम को आनन्द देनेवाले, समग्र कवि की कुशलता से सम्पादित किये जानेवाले सौभाग्य गुण को, और केवल कुछ ही वर्गों को विशेष रचना के वैधिन््य से उत्पन्न, पदो के सयोग की सम्पत्ति से उपाजित होने वाले लावभ्य (गुण) को अत्यधिक परिपुष्ट किया गया है। एवं च स्वरूपममिधाय तद्विदाहादकारित्वमभिघसे-
तद्विदाह्लादकारित्वं किमप्यामोदसुन्दरम् ॥। २३॥। इस प्रकार (बन्ध) के स्वरूप को बताकर अब उसकी काव्य ममशो के लिए आनन्द प्रदान करने की योग्यता को बताते हैं- अर्थ, शन्द एव पकोकि इन सीनो के उत्करषं से भिन्न (अलोकिक उत्कर्पयुक्त) एव, किसी (अनुभवकम्य) 'आभोद (रंजकता) से रमणीय कोई अलोकिकतत्व ही काव्यम्मश्ों को आह्वादित करने की मोग्यता है।। २३ ।। तद्विदाहादफारित्यं काव्यविदानन्दविदायित्वम्। कीटशम्- वाच्यावाचकवक्रोकित्रितयातिशयोत्तरम्। वाच्यमभिधेयं याचक शब्दो धक्रोकिरलङ्करणम्, पतस्य त्रितयस्य योऽतिशयः कोऽप्युत्कर्ष स्तस्मादुत्तरमतिरिक्कम्। स्वरूपेण्विशयेन च स्वरूपेणान्यत् किमपि
फीटशम्-किमध्यामोदसुन्दरम् । किमप्यव्यपदेशयं सहृद्यहृद्य•
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प्रथमोन्मेष:
सन्देशम् आमोद: सुकुमारवस्तुधर्मों रक्षकर्त्व नाम, तेन सुन्दर वक्जाकत्वरमणीयम्। यया- तद्विदाह्हादकारिता अर्थाक् काव्य को समझने वालो को आनन्दित करने को योग्यता। कसी है-तद्विदाह्वादकारिता-वाच्य, दाचक और वक्कोकि तीनो के अतिशय से भिन्न। वाच्य अर्थात् अभिघेय अर्थ, वाचक अर्थात् शब्द, वफोकि अर्थात् बलकार-इन तीनों का जो अविशय अर्थात् कोई {अलौकिक) उत्कर्ष उससे उत्तर अर्थान् भिन्न, स्वरूप और अतिशय (दोनों से भिन्न) स्वरूप से भिन्न अर्थान् वह कोई दूसरा तत्व है ( ऐसी प्रतीति होती है) और अतिशय से भिन्न अर्थान् इन ( वाच्य, वाचक और वकोकि) दोनों से भी लोकोत्तर है। और कसा है वह तद्विदाह्हाद कारित्व-किसी (अलौकिक या अनिवंचनीय (आमोद मे सुन्दर। कोई अनिवचनीय सहृदयहृदय के अनुभव द्वारा अनुभव किया जा सकनेवाला आमोद अर्थान् रजकता नामक सुकुमार वस्तु का धर्म, उससे सुन्दर रजकता से रमणीय। जैसे- हंसानां निनदेधु ये: कयलितरासज्यते कूजता मन्यः कोऽपि कषायकण्ठलुठनादाघर्घरो विभ्रमः। ते निर्यात: कमलाकरेपु बिसिनो कन्दाभ्रिमप्रन्थयः॥७३॥ (कोई कवि मृणालत्न्तु की आरम्भ की ग्रन्थियों का वर्णन करता है कि- जिनका भक्षण कर लेने से शब्द करते हुए हँसी के कूजन भे मधुर कण्ठ के समोग से घर-घर स्वनियुक्त कोई विलक्षण ही विलास उत्पन्न हो जाता है, हथिनी के कोमल (तुरन्त निकले हुए) दन्ताइकुरो से होड लगानेवाली वे मृणालतन्तु को अग्रिम (नयी-नयी) ग्रन्थियां इस समय सरोवरों मे आविर्भूध हो गयी है।।७३ ।। अन्न त्रितयेऽपि वाच्यवाचकवकरोकिलक्षणे प्राधान्येन न. कश्िदृपि कने: संरम्भो विभाव्यते। किंतु प्रतिभावैचिष्यवशेन
यह! पर वाच्य, वाधक और बकोकि तौनो के सम्भव होने पर भौ (उन्हें उपस्थित करने में) कवि का प्रधान रूप से कोई संरम्भ नहीं दिखाई देता, अपितु प्रतिभा के वैचिश्य के बणीभूत होकर कवि ने किसी अलोकिक काम्य-ममश्ञो की आहलादकारिता का उन्मीलन किया है।
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६६ वकोकिजीवितम्
यद्यपि सर्वेषामुदाहरणानामविकल काव्यलक्षुणपरिसमाप्षिः सम्भवति तथापि यत्पाघान्येनाभिधीयते स एवोंशः प्रत्येकमुद्रिक्कतया तेपाँ परिस्फुरतीति सहृद्य: स्वयमेवोतपेक्षणोयम्। वद्यपि सभी उदाहरणो मे (जिन्हे कि मैंने अभी तक उद्घुत किया है) काव्य के समस्त लक्षणो की प्राप्ति सम्भव हो सकती है, फिर भी जिसका प्राधान्यरप से व्णन किया जाता है (अर्थात् लक्षण के जिस अश को वह उदाहरण होता है) वही अश प्रधान रूप से उनमे परिस्फुरित होता है ऐसा सहदमो को स्वय समझ लेना चाहिए। एवं काव्यसामान्यलक्षणमभिघाय तद्विशेपलक्षणविषय प्रदर्शनार्थ मार्गभेदनिबन्धनं त्रैविष्यमाभधने- इस प्रकार काव्य के सामान्य सक्षण को बताकर उसके विशेष लक्षण का विषय बताने के लिए मार्ग-भेद के कारण होने वाले ने विष्य का कयन करते हैं- सम्पति तन्न ये मार्गा: कविप्रस्थानहेतवः । सुकुमारो विचित्रश् मध्यमश्चोभयात्मकः ॥ २४॥ उस (काव्य) मे कवि को प्रवृत्ति के कारणभूत जो सुकुमार, विचित्र और उभयात्मक मध्यम मार्ग सम्भव हैं, उन्हे बताते हैं॥ २४ ॥ तत्र तस्मिन् फाव्ये मार्गा: पन्थानल्नयः सम्भवति। न द्वौन चत्वारः,
कविप्रस्थानह्रेतवः । कबीनां प्रस्थानं प्रवर्त्तनं वस्य हेतवः, काव्यकरणस्य कारणभूताः । किमभिधाना :- सुकुमारो विचित्रश्च मध्यमश्चेति। फ्रीटशो मध्यम :- उमयात्मकः। उभयमनन्तरोक्क मार्गदवयमात्मा यस्येति विभह:1 छायाद्वयोपजीवीत्युक्तं भवति । तेर्षां च स्वलक्षणावसरे स्वरूप माययास्यते । वहा अर्थात् उस काव्य मे तीन मार्ग अर्थात् रास्ते सम्भव हैं। नृ दो, न चारा स्वर आदि की सख्या के समान उतने (अर्थात् तीन) के ही वास्तव मे काव्यममज्ञो द्वारा अनुभव किये जाने से। और ये है कैसे- कवि प्रस्यान के हेतु। कवियों का प्रस्थान अर्थात् (काम्य करने की) प्रपृति उसके हेतु, अर्थाद् काव्य करने के कारणमूत। उनके कया नाम हैं- सुकुमार मार्ग, विषिन्नमार्ग और मध्यममाग। मध्यममाग कसा है-
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प्रथमोन्मेप:
उभयात्मक है। उभम अर्थात् अभी-मभी कहा गया ( सुकुमार और विचित्र रूप) मार्गदय है आत्मा अर्थात् स्वरूप जिसका (वह सभवात्मक हुआ) इस प्रकार का विप्रह होगा। (मध्यम माग) दोनों ( सुकुमार और विचित्र) मार्गों की छाया पर आश्रित होता है यह तात्पयं हुआ। उने (तीनो मागों) का स्वरूप अपने-अपने लक्षण के समय बताया जायगा। अन्न व बहुविघा विप्रतिपत्तयः सभवन्ति । यस्माचिरन्तनै- विंदर्भादिदेश विशेषसमात्रयणेन वैदर्भीप्रभृनयो समाम्नाताः । तासां चोत्तमाघममध्यमत्ववैचित्रयेण त्रैविष्यम्। शन्यैश्व वैदमंगौडीयलक्षणं सार्गद्वितयमारूयातम्। एतचोभयमप्य- युक्तियुक्त्म् । यस्माद्वेशभेदनिबन्धनत्वे रीतिभेशनां देशानामान- न्त्यादसंख्यत्वं प्रसज्यते। न च विशिष्ठरीतियुक्तत्वेन काव्यकरणं मातुलेयभगिनीवियादचद् देशधर्मतया व्यवस्थापयितुं शक्यम्। देश धर्मो हि-यृद्धव्यवहारपरंपरामात्रशरण शक्यानुप्वानतां नातिवतते। तथाविघकाव्यकरण पुनः शक्त्यादिकारणकलापसाकल्यमपेक्यमाण न शक्यते तथाकयचिदनुप्नातुम्। न घ दाक्षिणात्यगीत विषयसुस्वरतादि- ध्वनिरामणीय कवत्तस्य स्वाभाविकत्वं वक्तु पार्यते। तस्मिन् सवि तथाविधकाव्यकरणं सर्वस्य स्यात्। किंच शक्की विदयमानायामपि व्युपत्त्यादिराहार्यकारणसम्पत्प्रतिनियतदेशविषयतया न व्यवतिप्ठते, नियमनिबन्धनामावात् तत्रादर्शनाद् अन्यन्र व दर्शनास्। इस (मार्ग-तनितम) के विषय मे अनेक प्रकार की विप्रतिपत्तियाँ सम्भव हैं। क्योकि प्राचीन (वामन, राजशेखर आदि) आचार्यों ने (विदम आदि देशविशेषों (मे प्रात्ति) के आधार प वैदर्भी आदि (वैद्मी, गोडीया और पाञ्चाली) तीन रीतियों को स्वीकार किया है। और उन (मैंदर्भी आदि तीनों रीतियों) के उत्तम, अधम और मध्यम रुप-्वचित्म (का प्रतिपादन करने) के कारण (उत्तम, अधम और मध्यम ) तीन प्रकार स्वीकार किये हैं। तथा दूसरे ( दण्डी आदि) आचार्यों ने वैदर्भ और गोटीय रूप दो मार्गों को स्थापना किया है। ये दोनों ही (बांमन, राजसेखर और दप्डी के मत) युक्तियुक्त नहीं है। क्योकि रीतिभेदों का आधार (वामन, राजसेखर के अनुसार) वेशभेद को स्वीकार कर लेने पर देशों के घनन्त होने से (रोतिया भी) अस्य हो जायेगी। और विघिष्ट रीति से युक्क रूप मे काव्य-रचना की स्थापना मामा की लडकी के साथ विवाह की माति (मातुनेयमगिनी-दिवाह्वन्) देशघर्म के आधार पर नहीं की जा सकवी
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चकोकिजी वितम्
है। क्योकि देशधम वृद्धो की व्यवहार-परम्परा को ही साध्यण करने के कारण अपने बनुछान की सम्भावना का अतिकमण नही करता है ( वर्याद् यृव्धों की परम्परा पर सधारित होने के कारण उसकी स्थति वहाँ पर असम्भव नहीं है। लेकिन बकिति आदि कारण-समुदाय के साकल्व की अपेक्षा रखनेवाली उस प्रकार की काव्य-रचना तो किसी भी प्रकार देश-विदेष के आधारपर स्थापित नहीं की जा सकती। और न, दाक्षिणात्य गीत-विषयक सुस्वरता इत्यादि कवनि के सोन्दर्य के सद्भ उसकी स्वाभाविकता ही कही जा सकती है, क्योकि उस प्रकार की स्वाभाविकता स्वीकार कर लेने पर उसी प्रकार की काव्य-रचना सभी के लिए सम्भव हो जायगी। और फिर (यदि शक्ति को सभी के अन्दर समानरूप से मान तिया भी जाय सो फिर) शक्ति के विद्यमान रहने पर भी, व्पुत्पत्ति इत्यादि आहाय (अर्थान् प्रयत्न दार सम्पन्न होने वाली कारण-सम्पति हर एक देश के विषय रूप मे निश्रित नहीं है (क) किसी नियम के आधार के भाव के कारण (ख) उस (देश-विदेश) के सभी कवियों में दिखाई न पडने से (ग) अत्यत् (दूसरे द्रेश के कवियो मे मी) दियाई पडने मे। ( अर्थात् यदि देश के सभौ व्यक्तियों मे शक्ति को स्वीकार भो कर लिया जाय सो व्युत्पतति इत्वादि आहा्य कारण-सम्पत्ति भी वही निश्ित रूप से पायी जाम यह सवभा असम्भव है अत देशनेद के आधार पर रतियों का भेद करना ठीक नहौं है)।
न घ रीतिनामुन्तमाघममध्यमत्वभेदेन त्रैविभ्य व्यवस्थापयितु न्याय्यम् । यस्मात् सहृदयाहृादकारि काव्यलक्षणपरस्तावे वैदर्भीसदश-
नाप्युपदेशो न युकनामालग्वते, तैरेवानभ्युपगतत्यान् न चागतिक गविन्यायेन यथाराकि दरिद्रदानादयत् काव्यं करणीयतामहति।
विषदामहे। मार्गद्वियवादिनामप्येतान्येव दूपणानि। तदलमनेन
और न तो रीतियों का उत्तम, मध्यम औौर अघम रूप भेदो के द्वारा उनका विविध विभाजन उचित है कयोकि सहदयो के हृदयो को आनन्दित करनेवासे काष्य के लक्षण के प्रसग मे वदर्भी के सदूण सुन्दरता सम्भव न हो सकने से अन्य (दो भेद) मध्यम और व्घम का उपदेश व्यर्ष हो आायगा (्क्योंकि वैदर्भी के समान आाह्लादजनक न होने के कारण गौडी
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प्रथमोन्मेष:
तथा पाचाली के प्रति महृदय आकृष्ट ही न होंगे, अत उनका उपदेश व्यर्ष सिद्ध होगा और यदि कोई यह कहना चाहे कि वामन आादि ने इन दो रीतियों-पाचाली और गोडी का) उपदेश परिहमर्यरूप (अर्थात् त्याज्यरषूप) में किया है (कि कवियो को इन दो रीतियो को नहीं ग्रहण करना चाहिए सो यहु कथन भी) युक्तिसगत नही हो सकता, उन्हीं (वामन आदि) को ऐसा स्वीकार न होने से और न तो अगतिकगतिन्याय से (अर्थात् जो चलने मे सवया असमर्य है वह जो कुछ भी चोडा-बहुत चल से यही पर्याप्त होता है) मयाशक्ति दरिद्र के दान की तरह (मध्यम अथवा अघ्म) काव्य करने के मोग्य होता है। (अर्धान् काव्य-रचना उत्तम ही की जानी चाहिए षत" रीतियो का उत्तम-मध्यम और अधम रूप से किया गया विभाजन ठीक नहीं है)। इस प्रकार देश-विशेष के आश्रय का केवल रोतियो के निर्वेचन अथवा सज्ञा रखने का कारण होने मे ही हमारा मतभेद नहीं है, अपितु उनके स्वरूप के विषय में भी मतभेद है, जिसके कि आधार पर उन्हें उत्तम, मध्यम मोर अघम कोटि में विभक्तक किया जाता है। दो भागों का भी विवेचन करने वासे (दण्डी आदि के मतों में भी) ये ही दोष होंगे। अत" इस प्रकार की सारहीन वस्तु की आलीचना करने से कोई लाभ नही है।
कविस्वभावभेद निबन्धनत्वेन काव्यप्रस्थानभेद: समख्सतां गाहते। सुकुमारस्वभावस्य कवेस्तथाविधेव सहजा शक्ति: समुद्रवति, शक्ति शकिमतोरमेदात। तया च तथाविघसौकुमार्यरमणीयां व्युत्पच्तिमा बध्नाति। ताभ्यां च सुकुमारवर्त्मनाभ्यासतत्पर: कियते। तर्थव चैस- स्मादु विचित्र: स्वभावो यस्य कवेस्तद्विदाहादकारिकाव्यलक्षणकरण प्रस्तावात सौकुमार्यव्यतिरेकिणा वैचित्रयेण रमणीय एव, तस्य प काचिद्विचित्रैव तदमुरूपा शक्ति: समुझसति। तया व तथाविषवैद्ग्ष्य- बन्धुरां व्युत्पत्तिमाबध्नाति। ताभ्यां च वैचित्यवासनाधिवासित- मानसो विचित्रवर्त्मनाभ्यासमाग सवति। एवमेतदुमयकविनिबन्धन- संवलितस्वभावस्य कवेस्वदुचितैव शबलशोभातिशयशालिनी शक्ति: समुदेति । तया व तदुभयपरिस्पन्दसुन्दरवयुत्पत्त्युपार्जनमाचरवि। ततस्तच्छ्रायाद्वितयपरिपोषपेशलाभ्यासपरवरः सपधते। (इस प्रकार वाभन एव दण्डी इत्यादि के द्वारा देशभेद के आधार पर रोतियो के विभावन का खण्डन कर अब अपने मत की स्थापना करते हैं)- कविस्वभाव के भेद को कारण स्वोकार कर किया गया काव्य-मार्म का भेड समीचीन हो, सकता है। सुकुमार रवमाव पाले कवि की सहजतकि पी
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वकोसिजीनितिम
इसी प्रकार (सुकुमार हो) होती है। शकि और शक्तिमान् मे अभेद होने से। और (वह सुकुमार स्वभाव वाला कवि सपनी सहज सुकुमार) उस (शक्तिि) के द्वारा उस प्रकार के सोकुमार्य से मनोहर व्युत्पत्ति को धारंण करता है। और उस शक्ति तथा व्युत्पत्ति के द्वारा सुकुमार भार्ग से अन्यास में तत्पर होकर (काम्य-रचना) करता है। उसी प्रकार इम सुकरमार स्वभाव वाले कवि से जिस कवि का, सहदयों को आह्लादित करने वाले काव्य लक्षण करने के प्रसग से सौकुमायं से भिन्न वैचित्रय के कारण रमणीय ही विचिन स्वभाव होता है। उस कवि की उसके स्वभाव के अनुरूप कोई विचित्र ही शक्ति परिस्फुरित होती है। तथा उस विचिन शक्ति के द्वारा कवि उस प्रकार के वैदग्व्य से मनोहर व्युत्पत्ति को धारण करता है। एव उस विचित्र शक्ति और विचिन व्युपत्ति के द्वारा वैचित्र्य की वासना से अधिवासित चित्तवाला कवि विचिन्न मार्ग के आश्यण से अभ्यास करने का अधिकारी होता है। इस प्रकार इन दोनो कवियो के कारणभत (मुकुमार और विचित्र) से युक्त स्वभाव वाले कवि को उसके अनुरूप हो विचिन्र शोभा के अतिराय से सुभोभित होने वाली शक्ति उल्लक्षित होती है। उस शक्ति के द्वारा वह उभम-कवि दोनो सुकुमार और वितित के स्वभाव से सुन्दर व्युत्पति का उपा्जंन करता है। उसके अनन्तर उन सुकुमार औौर विचिन मिश्रित शक्ति तथा व्युह्पत्ति दोनों की छाया के परिपोषण से कोमल अभ्यास मे कवि तत्पर हो जाता है। तदेवमेते कवयः सकलकाव्यकरणकलापकाष्ाधिरूढिरमणीय किमपि काव्यमारभन्ते, सुकुमारं विचिन्रमुभयात्मकं प । त एव वत्प्रवर्तननि मित्तभूता मार्गा इत्युच्यंम्ो। सो इस प्रकार ये (सुकुमार, विविन् एवं उभयात्मक स्वभाववाले, तीनो प्रकार के) कविजन काव्य को समस्त कारण-समुदाय की पराकाष्ठा से मनोहारी किसी सुकुमाह, विचित्र या उभवाामक काव्य की रचना करते हैं। वे ही (सुकुमार, विचिन्न एव उभयात्मक काव्प ही) उन (कवियो) की (काव्य-रचना में) प्रदृति के कारण होने से 'मार्ग' कहे जाते हैं। यद्यपि कविस्यभाव भेदनिबन्धनत्वादनन्वभेदर्भिन्नत्वमनिवार्य तयापि परिसंख्यातुमशक्यत्वात् सामान्येन वैविध्यमेघोपपद्यते। तथा व रमणीयकाव्यपरिग्ह्प्रस्तावे स्वभायसुकुमारस्तावदेको राशि:, तद्व थतिरिकस्यार मणोय स्यानुपादेयत्वात्। तद्वयतिरेकी रामणीयक- विशिष्टो विचिन्न इत्युच्यते। तदेवयोद्वयोरपि रमणीयत्वादेवदीयच्छाया- द्वितयोपजीविनोऽस्य रमणीयत्वमेव न्यायोपपन्नं पर्यवस्यति। सस्मादेषां
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प्रथमोन्मेप:
प्रत्येकमस्खलित स्वपरिस्पन्दमहिम्ना त द्विदाहादकारित्वपरिसमाप्तेर्न कस्यचिन्न्यूनता। यद्यपि कदि-स्वभाव के भेद के (मार्गभेद का) आधार होने के कारण (कवियो के अनन्त स्वभाव होने से मा्गों मे भी) नसख्य प्रकारों से भिन्नता (आ जाना) अनिवार्य है, फिर भी उनकी सख्या निर्धारित कर सकना असम्भव होने से, सामान्य रूप से तीन भेदो से युक्त होना हो युक्तियुक्त (प्रतीत होता) है। और इस प्रकार मनोहर काव्य को स्वीकृत करने के सन्दर्म मे-(१) स्वभाव से सुकुमार (काव्यकी) एक राशि है, उससे भिन्न सौन्दर्य हीन (काव्य) के उपादेय न होने से। (२) उस (सुकुमार स्वभाव काव्य) से भिन्न सौन्दर्यमुक्त (दूसरा प्रकार) विचिन्न कहा जाता है। (३) इन (सुकुमार एव विचित्र ) दोनो के ही रमणीय होने से इन दोनों की छाया पर आधारित इस ( उभयात्मक-मध्यम भेद) का सौन्दर्यमुक्त होना (स्वतः ही) तकसव्जत हो जाता है। (इस प्रकार ये सुकुमार विचित्र और मध्यम नीनो ही स्वभावत रमणीय होते हैं)। अतः इन तीनो मे हर एक की अपने पूर्ण परिस्पन्द की महत्ता के कारण सहृदयों को आह्लाद प्रदान करने में परिसमाति होने से किसी की भी न्वूनता नहीं है। (सभी समान महत्त्व वे हैं और रमणीम होते हैं)।
टिप्पणी-आाचार्य कुन्तक ने अब तक देशभेद के आधार पर रीति- भेद की स्थापना का खण्डन कर कवि-स्वभाव के आधार पर मार्गभेद की स्थापना की। उन्होंने मह-बताया कि कवि-स्वभाव के अनुसार उसी ढग की सहज शक्ति कवि मे उल्लसित होती है तथा उस शक्ति के द्वारा वह कवि उसी प्रकार को व्युत्पत्ति प्राप्त करता है पथा शक्ति और व्युत्पत्ति के बल पर अभ्यास् करता हुआ वह काव्य रचना करता है। इस प्रकार हम यह देखते हैं कि शक्ति तो कवि मे सहज रूप से विद्यमान रहती ई, किन्तु व्युत्पत्ति और अभ्यास्ष आहारय-रूप से प्राप्त होते हैं जब कि काव्य-रचना मे केवल शक्ति ही नहीं कारण होती अि तु व्युत्पत्ति और अम्यास भी कारण होते हैं। अत पूर्वपक्षी आहाय-रूप व्युतपत्ति और अभ्यास की स्वाभाविकता मे सदेह करता हुआ प्रश्न करता है - ननु च शक्त्योगन्तरतम्यात स्वाभाविकत्व धक्तुं युज्यते, व्युत्पत्त्य- भ्यासयोः पुनराहारययो: कथमेतद् घटते ? नैव दोष, यस्मादास्तां वावत् काव्यकरणाम् , विपयान्तरेऽपि सर्वस्य कस्यचिवनादिवासना- भ्यासाधिवासित चेतसः स्वमावानुसारिणावेष व्युत्पत्त्याभ्यासी प्रवर्तेते।
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वनोकिप्रीवितम
तौ घ स्वाभावामिव्यश्वनेनैव साफल्यं भजतः। स्वभावस्य तयोश्ष परस्पर सुपकार्योपकारकमावेनाव स्थानात स्वभावस्तावारभते, तौ , च तत्परिपोषगातनुन: । तथा चाचेतनानामपि भावः स्वभावसवादि- भावान्तरसन्निधानमाहांत्म्याद भिव्याक्कमासादर्यत, यथा चन्द्रकान्त मणयचचन्द्रमस' करपरामर्शयरेन स्पन्द्मानसहजरसम्रसराः सम्पधन्ते । (सुकुमार बर विबित्र दोनो) शक्तियो की स्वाभाविकता का कथन तो (उनके) आन्तरिक होने के कारण ठीक है, लेकिन आहारयंरूप (बाह प्रयत्नो से प्राप्त होने वाले) व्युत्पति और बभ्यास की स्वाभाविकता कसे सम्भव हो सकती है। (वत स्वभाव-भेद के आधार पर मार्गमेद भी करना ठीक न होगा। इसका उत्तर देते हैं)-यह (कोई) दोष नही है क्योंकि काव्य-रचना की बात तब तक छोड दीजिए। दूसरे विषयो मे भी सभी किसी के अनादि वासना के अम्यास से अधिदासित अन्त करण वाले सभी किसी के व्युस्पत्ति और अभ्यास स्वभाव के अनुसार ही प्रवुत्त होने हैं, (अर्थात् जिसका जैसा स्वभाव होता है उसी प्रकार उसके व्युत्पति और अभ्यास होते हैं। (व्युत्पति और अभ्यास) दोनो स्वभाव की अभिव्यक्ति कराने से ही सफत होते है। स्वभाव तथा उन दोनों के परस्पर उपकाम और उपकारक रूप से अवस्पित होने के कारण स्वभाव पहले प्रारम्भ करता है और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास दोनो उसका परिपोषण करते है इमीलिए पढ पदार्थों का भी स्वमाय (अपनी) प्रता ने साम्य रखनेवाली दूसरी सस्ता के सम्पर्क के माहात्म्य से अभिम्दफ होता है। जैसे-चन्द्रकान्तर्माणया पनद्रमा की किरणों के साथ सम्पर्क होने:के कारण प्रवाहित होने वाले स्वाभाविक जल के प्रवाह से युक्त हो जाते हैं।
वदेषं मार्गोनुदिश्य तानेष क्रमेण लक्षर्यात- तो इस प्रबार (२४ वी कारिका से सुकुमार, विचित्र तथा मध्यम) मागों का केवल नाम बताकर उनका ही नमानुसार सक्षण करते हैं। (उनमे सबसे पहले क्मप्राप्त शुकुमार मार्ग को प्रारम्भ में लक्षित करते है)-
(रव की) दोषहीन प्रतिमा से (स्वत) स्पुरिति हुए नवीन (सहृदपासादयनक) शम्द सथा अर्ष से रमणीय (हुत्यावजक), एव विना
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प्रथमोन्मेप १०३
किसी प्रयत्न के (स्वाशधिक रूप से) उत्पादित, हृदय को आनन्द देने वाले थोडे से अनकार से पृक-॥२५॥ भावस्व लायप्राधान्यन्यवकृताहार्यकौशलः । रसादिपरमार्थज्ञमन:संवादसुन्दर: ।। २६॥ तथा पदार्थों के स्वभाव की प्रधानता से, व्युत्पत्तिजन्य निपुणता का तिरहकार करने वाला, (श्रृगार आदि) रसो (एवम् रति) आदि (स्यायी- भावो) के परमरहस्प को जानने वाले ( सहृदयो) के हृदयो के द्वारा अनुभद आने वाले ज्ञान से सुन्दर-॥ २६।।
1 विधिवैदग्ध्यनिष्पन्न निर्माणातिशयोपमः ॥२७॥ एवं अविभावित स्थितिवाले ( अर्थान जिसकी सत्ता का केवल अनुभव किया जा सकता है, शब्दो द्वारा नहीं व्यक्त किया जा सकता उस) सौन्दर्य से (सहृदयो को) आनन्दित करने वाला तथा विधाता के कोशल से निष्पन्न सृष्टि-रचना के (अर्थान् रमणी, नावण्य आदि रूप) सौन्दर्य के साथ सादुशय रखने वाला-॥ २७ ॥ यत् किनापि वैचित्र्यं तत्सर्व प्रतिभोद्गवम् । सौकुमार्यपरिस्पन्दस्यन्दि यंत्र विराजते ॥२८॥ तथा जहाँ सुकुमा रताजन्य (सहृदयहृदयाह्लादकारित्व रूप) रमणीपता के द्वारा (रसमय) प्रवाहित होने वाला जो कुछ भी वचित्र्य (वर्ात् वकोक्ति का योग) गोभातिशय का पोषण करता है, वह सब प्रतिभा से ही उल्लसित होता है (आहायं रूप व्युत्पत्ति मादि के द्वारा नहीं) ॥ २८ ॥ सुकुमाराभिध: सोऽयं येन सत्ककयो गता। मार्गेणोत्फुल्लकुसुमकाननेनेव पट्पदाः ।२९॥ ऐसा वह सुकुमार नाम का मार्ग है, जिस मार्ग से ( कालिदास आदि) सत्कवि,, विकसित हुए फूलो के बन से (गुजरने वाले) प्रमरो के समान मुजरे अर्थान् काव्य-रचना मे प्रवृत्त हुए हैं॥ २६॥ सुकुमाराभिय: सोऽयम्, मोरऽयं पूर्वोक्लक्षण सुकुमारशब्दाभि घान:। येन मार्गेण सत्कवय कालिदासपभृत्यो गता प्रयाता:, वदान्येण वाव्यानि कृतवन्तः । कथम्-उ.फुल्लफुसुमकाननेनेथ
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षट्पदा: उत्कु्तानि विकसितानि कुसुमानि पुष्पाणि यस्मिन् कानने वने तेन पट्पदा इष भ्मरा यथा। बिकसितकुसुमकाननसाम्येन तस्य फुसुम सौकुमार्यसदशमाभिजात्य द्योत्यते । तेषां व भ्रमरसादश्येन कुसुममकरन्दकल्पसारसंमह्व्यसनिता। स घ फीटशः-यत्र यस्मिन् किचनापि कियम्मात्रमपि वैचि्य विचिन्रभावो घक्रोतियुक्तत्वम्
यथाकर्थचित्प्रयत्नेन निष्पाद्यम्। फीटशम् -मौकुमार्यपरिस्पन्दस्यन्दि। सौकुमायेमामिजात्य परिस्पन्दस्तद्विदालादकारित्वलक्षणं रामणीयक तेन स्यन्दते रसमयं संपधते यत्तथोक्कम्। यत्र विराजते तस्य
शोभातिशयं पुष्णाताति सम्बन्धः। यथा-
सुकुमार नाम का वह यह अर्थात् पूर्व कपित लक्षण वाला एव सुकुमार शब्द के द्वारा कहा जाने वाला (यह मार्ग है) जिस मार्म से कालिदास आदि शेछ कवि गये है अर्थात् उस मार्गे का आश्रम ग्रहण कर काव्यो का निर्माण किये हैं। किस उद्त से-खिले हुए फूलो से युक्त जङ्गल से भोरो की तरह। उत्फुस्स अर्थात् छिते हुए कुसुम अर्थात् फूल है जिस कानन अर्पात् पङ्ञल मे, उस (जङ्त) से घट्पदो के समान मर्थात् भोरे की सरह (तात्पय यह है कि जैसे खिले हुए फूसो से युक्त नङ्ग से भोरे बड़े ही आनन्द के साम सरलता पूर्वक घ्रमण करते हैं, रम प्रकार श्ेषठ कवि सुकुमार मार्ग का आध्रयण कर काव्य-रचना करते हैं चविेकित फूलो से युक्त वन के साथ सादृष्य के द्वारा उस् (सुकुमार मा्ग) की पुष्पो की सुकुकारता के समान रमणीयता चोतित होती है, तथा उन (श्रेष् कवियो) को भेँवरो के साथ समानता के द्वारा पुष्पों के मकरन्द (पुष्प-रसष) के सदुग (सरस) तत्व के सग्रह का ध्यसन (प्रतिपादित किया गया है) । और वह (मुकुमार- मार्ग) है कैसा ? जहां अर्थात् जिस (मार्ग) मे कुछ भी अर्थात् बितना भी वैनिष्य विचिनता अर्थार् वकोकि का संयोग (होता) है। यह सब अलद्धार इस्पादि (वैचित्य) प्रतिमाजय सर्थात् केवल कदि को गक्ति से ही समुल्लसित होता है, जमे वैसे भी प्रयत्न द्वारा सम्पादित किया गया बाहायं (अर्थात् बनावटी) नही होता (वह कवि की स्वाभाविक दत्ति से ही निष्पन होता है वह वंचित्म पुन होसा) कस्षा है? सौकुमार्य के परिश्द से प्रवाहित होने वाला। सोकुमारय अर्थात् साभिजास्म (रमजोपता) उसका परित्पं्द अर्थान् सहरदमो को आह्लादित करने वाला सोन्द्य उससे वो प्रवाहित होता है वर्थाद रसमम हो जाता है वैसा ( वैचिन्य) हआ
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तथोकत (सुकुमारता के सौन्दर्य से रसमय सम्पन्न होने वाला वँचित्य), जहां विराजमान होता है अर्थात् सौन्दर्यातिशय का पोषण करता है ( वह सुकुमार नाम का मार्ग होता है) इस प्रकार का वाक्य का सम्बन्ध है। जैसे- प्रवृत्ततापो दिवसोऽतिमान्रमत्यर्थमेव क्षणदा च तन्वी। उभौ विरोधक्रियया विभिन्नी जायापती सानुशयाविवास्ताम्।।४।। अत्यधिक गर्मी से मुक्त दिन एव अत्यन्त ही वृश (क्षीण) हुई रात्रि दोनो विरोध क्रिया (अर्थात् दिन तापयुक्त होने के कारण कष्ट प्रदान करता है जद कि रात्रि (क्षणदा) शीतलतायुक्त होने से आनन्द प्रदान करती है। अत दोनों की करियाये विपरीत हुई) के कारण अलग हो गए पश्चातापयुक्त पति-पत्नी के समान स्यित है॥। ७४ ।।
अन्र मनाहार्य का मपि कमनीयतां पुष्णाति। तथा च 'प्रवृत्ततापः' 'तन्वी' इति वाचकौ सुन्दरस्वभावमात्रसमर्पणपरत्वेन वर्तमानावर्थान्तरप्रती त्यनुरोधपरत्वेन प्रवृत्ति न समन्येते, कविव्यक्कीशलसमुन्जसितस्य पुन. प्रकारान्तरस्य प्रतीतावानुगुण्यमात्रेण तद्विदाह्षादकारितां प्रति- पद्मेते। कि तत्प्रकारान्तरं नाम ?- विरोधविभिन्नयो. शब्दयोरर्था न्तरप्रतीतिकारिणोरूपनिबन्धः । तथा चोपमेययो: सहानवस्थानलक्षणो विरोध, स्वभावभेदलक्षणं च विनिन्नत्वम्। उपमानयो. पुनरीर्ष्याकलह- लक्षणो विरोध, कोपात् प्रथगवस्थानलक्षणं विभिन्नत्वम्। 'अतिमात्रम्' 'अत्यर्थ' चेति विशेषणद्वितर्यं पक्षद्वयेऽपि सातिशायताप्रतीतिकारित्वे नातितरां रमणीयम्। श्लेपच्छायोल्क्लेश संपाद्याप्ययत्नघटित लेनात्र मनोहारिणी । यहां पर केनल कवि की (सहज) प्रतिभा से निष्पल्न, स्वाभाबिक एव इ्लेष (अलङ्गार) की शोभा से सयक्त (उपमा नामक) अलङ्कार किसी अपूर्ष रमणीयता को पुष्ट करता है। तथा 'प्रवृत्तताप' (सतापयुक्त) एव 'तन्वी' (क्षीण, दुर्बल) ये दोनो शब्द केवल (दिन एव राव् के) सुन्दर स्वभाव को हो बताने के लिए स्थित होकर, (पति-पत्नी के विरहजन्य ताप एव कृशता रूप) मन्य अर्थ को प्रतीति कराने मे प्रवृत नही होते [ अर्थान् प्रकरणवश इन दोनो शब्दो का ग्रीक्ष्मकालिक दिन तथा रात की ही ताप- मक्तता एव क्षीणता अर्थो में भी अभिधा द्वारा नियन्त्रण हो जाता है, पति- पह्नो के विरहजन्य ताप और कृशता का अभिया द्वारा प्रतिपादन नही ककिमा जा सकता) फिर भी कवि द्वारा व्यक्त किए गये कौशल से निष्पन्न
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दूसरे प्रकार की प्रतीति मे अनुरूपता मात्र से (ये दोनो 'प्रवृत्ताप' एव 'तन्वी' शब्द) सहृदयहृदया ह्वादकारी हो जाते हैं। वह दूसरा प्रकार है कौन सा (जिसकी प्रतीति के जनुरूप होने से ये दोनों शब्द सहृदयी को आनन्द प्रदान करते हैं ।-(वह है) अन्य अर्म की प्रतीति कदाने बाते 'विरोध' एव 'विभिन्न' शन्दो का प्रयोग । और इस प्रकार जपमेयो (दिन तमा रात्रि) का सहानवस्थान रूप (अर्थार् साथ-साथ न रह सकने का) विरोध है, तथा स्वभाव का भेद रप सर्थात् दोनों के स्वभाव विस्द्व है) विभिननता है। साप ही उपमानो (पति-पत्नी) का (भी) ईर्ष्ब, कलहु रूप विरोध एव कौप के कारण अलन- अल्षग निवास रूप विभिन्नता है। इसी प्रकार 'अतिमाश्रम्' तथा 'अत्यर्पंम्' ये दोनो विशेषण दोनो ही (दिन एवं राध्रि तथा पति एव पत्नी रूप) पक्षो मे अतिरम युक्तता का बोध कराने के कारण बहुत ही मनोहर है। (न्रत,) यहाँ पर करुछ क्लेश के द्वारा सम्पादित होने पर भी श्तेष की छाया, अनायास घटित हो जाने के कारण, रमणोय हो गई है। यम्र कीदश -अमजानप्रतिभोद्विन्नवशब्दार्थबन्धुरः । अम्लाना यासतावदोपोपहता पराकनाछतनसस्कार परिपाकप्रौठा प्रतिभा काचिदेव कविशक्ति:, तत उद्गिन्नो नूतनाड्कुश्न्यायेन स्वयमेव समुल्लसितो, न पुनः कदर्थनाकृष्टौ नवी प्रत्यमौ तदविदाहादकारत्वसामर्थ्ययुक्ती शब्दरार्थावभिधानाभिषेयां ताभ्यां बन्धुरो हदयहारी। अन्यच्च कोटश :- अयत्नबिहि तस्वल्पमनोहारिविभूषणः। अयानेनाक्लेशेन विहितं कृतं यत् स्वल्प मनाङूमात्रं मनोहारि हृदयाहादकं विभूषण- मलंकरण यत्र स तथोक । 'स्वन्प'शन्दोऽत्र प्रफरणाधयपेक्ष., न वाक्यमात्रपर उदाहरणं यथा- ( इस प्रकार सुकुभार मार्ग को एक विशेषता का प्रतिपादन कर दूसरी विशेषता बताते है-) और जो ( सुकुमार मार्ग) कैसा है बम्लान प्रतिभा से निध्पन्न शब्द एव अर्थ मे कारण हृदयावर्जक। अम्तान अर्थान् दोषो से उपहृत न हुई जो यह पूर्वजन्म एव वर्तमान जग्म के सस्वारो के परिपक्व हो जाने से प्रवृद्ध हुई प्रतिभा पर्पान् बोई (अनिवचनीम अपूर्व ही) कवि को शर्ति, उस (शक्ति) से उद्धिम अर्थार् नये अँखुए के समान स्वय हो कूट पढे (समुस्तसित हुए), न कि (खीचातानो से) कस्टपूर्वक (कठिनता से) वकृष्ट किए गए नवीन अर्था: (मनोहर ल्पना से उद्धावित) अपूर्द सहृदपो को आनन्दित करने मे समर्य (जो) शन्द और
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अर्थ अर्थात अभिद्यान एवम् अभिघेय, उन दोनों से बन्धुर अर्थात् मनोहर। और किस प्रकार का-बिना (किसी) प्रयत्न से निष्पन्न थोडे ही मनोहर अलद्धारो से मुक्त अयत्न अर्थात् बिना किसी क्लेश के ( स्वाभाविक रूप से ही) विहित अर्थात् (निष्पन्न) किया गया जो स्वल्प अर्थात् योहा सा ही मनोहारि अर्थात् हृदय को आह्हादित करनेवाला विभूषण अर्धान् बलद्कार है जहाँ वह (हुआ) तयोक (सुकुमार मार्ग)। यहाँ स्वस्प शब्द का प्रयोग प्रकरणादि की अपेक्षा रखने वाला है केवल वाकयपरक ही नही। (अर्थात् प्रत्येक श्लोक मे कुछ अलद्गारो का प्रयोग हो ऐसी कोई अपेक्षा नही है अपितु सम्पूर्ण प्रकरण में अयत्न निष्पादित सहृदयहुदयहारी स्वल्प अलद्वारो को अपेक्षा होती है।) (इसका) उदाहरण जैसे-
वालेन्दुवक्राण्यविकाशभावाद् बभुः पलाशान्यतिलोहितानि। मद्यो वसन्तेन समागताना नस्रक्षतानीव वनस्थलीनाम्॥७४॥ (पूर्ण) विकाश न (प्राप्त) होने के कारण बालेन्दु (द्वितीया के चन्द्रमा) के सदुश टेढे, अत्यधिक लोहित पलाश (ढाक के फूल), वसन्त (ऋतुरूप नायक) के साथ तत्काल समागम किए हुए वनस्थलियो (अर्थात् तदूप नाषिकाओ) के नखक्षतो को भाति शोभायमान हुए॥ ७५ ॥। अत्र 'बालेन्दुवक्राणि' 'अतिलोहितानि' 'सदो वमन्तेन समा गतानाम' इति पदानि सौकुमार्यान स्वभाववर्णनामात्रपरत्वेनो- पात्तान्यपि 'नखभतानीव' इत्यलकरणस्य मनोहारिण वलेशं बिना स्त्रभावोद्रिन्नत्वेन योजनां भजभानानि चमत्कारितामापद्यन्ते।
यहाँ पर 'बालेन्दुवनाणि' (बाल चन्द्रमा के समान टेढे) 'अति- लोहितानि' (अत्यधिक रक्तवर्ण के) एवं 'सद्य वसन्तेन समागतानाम्' (तर्काल वसन्त के साथ समागय करने वाली) ये पद सुकुमार होने के कारण केवल स्वमाव का वर्णन करने के लिये प्रयुक्त होकर भी बिना किसी प्रयत्न के स्वाभाविक रूप से 'नसक्षतानीव' अर्थान् नखक्षतो के समान इम (पद मे प्रयुक्तक उपमारूप) मनोहर अलङ्गार की योजना को धारण करते हुए चमत्कारपूर्ण हो गये हैं। (अर्थात् यद्यपि 'बातेन्दुवत्राणि' इत्यादि पद पलाप्रापुष्व की स्वाभाविवता का हो प्रतिगादन करते है फिर भी जो नखक्षत से उसकी उपमा दी गई है उसके साथ पूर्णरपेण योजना रखते हुए, अर्थात् नखक्षत भी टेढा एव खून आ जाने के कारण साल होता है, साथ ही ऐसी सम्भावना नामक नायिका के समागम काल मे ही होती
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है। अत नापकननामिका रूप मे वसन्त एव वनस्थती के पूर्ण सामज्जत्य को स्थापित करते हुए ये सभी पद एक अपूर्व चमत्कार की सृष्टि करते हैं।) यश्ान्यच्च कीदश :- भावस्वभावप्राधान्यन्यक्कृताहार्यकौशलः। भावा: पदार्थास्तेपां स्वभावस्तत्व तस्य प्राघान्य मुख्यभावस्तेन न्यक्कृत तिरस्कृतमाहार्य व्युत्पतिविहित कौशल नैपुण्य यत्र स तथोक: । तदयमभिपायः-पदार्थपरमार्थ महिमैव कविशक्तिसमुन्नीलित:, तथाविधो यत्र विज्ञम्भते। येन विविघमवि व्युत्पत्तिविलसितं काव्यान्तरगत तिरस्कारस्पद सपछते। अन्ोदाहरणं रघुवशे मृगयावर्णनपरं प्रकरणम्, यथा- (इस प्रकार सुकुमार मार्ग की दूमरी विशेषता बता कर अब उसकी तीसरी विशेषता का प्रतिपादन करते है-) और जो (सुकुमार मा्ग है वह) अन्य किस प्रकार का है-पदार्थों के स्वभाव की प्रधानता से आहाय कुरालता को तिरस्कृत करने वाला। भाव अर्थान पदार्य उनका स्वभाव अर्पान् स्वरूप (परमार्थ तत्व), उसका प्राधान्य अर्थात् मुख्यरूपता, उसके द्वारा न्यवकृत अर्थात् तिरस्कृत किया गया है आहायं अर्थान व्यृत्पतिजन्य कोशल अर्थान् निपुणता को जिसमे, वह (सुकुमार मार्ग होता है) तो इस का अभिप्राय यह है कि यहा कवि की (सहज) प्रतिभा से (स्वाभाविक दङ्ग से) निबद्ध को गई पदार्थ के स्वभाव में महिमा ही उस प्रकार से प्रस्फुटित होती है जिससे अन्य काव्यगत ( कवि की) व्युत्पति का, अ्रनेको प्रकार का विलास भी उपेक्षणीय हो आता है। ग्रहा उदाहरण (रूप मे) रघुवश (महाकार्म) मे (वणित) मृगमावर्णन का प्रकरण लिया जा सकता) है। जैसे-
आविर्षभूष कुशगर्भमुख मृगाणां यूर्थ तदभसरगवितकृषणसारम्।७६। उस (राजा) के सामने से, आगे चलतेवाले ग्वित कृष्णसार (मृगविशेष) से यत्त, एव स्तनो के प्रणयी (अर्थात् माँ का दूध पीने वाले) मृगछोनो से बारबार बाधित होते हुए हरिियो के गमन से पुक्त, तथा कुशों के मध्यभाग से युक्त मुख वाले मृगो का समूह, गुजरा॥७६/॥ (यहां पर मुगो के स्वभाव का ही इतना चमरकारपूर्ण वर्णन कषि ने प्रस्तुत किया है जिसके आगे अन्य व्युत्पति-विहित कोशनो का कोई महत्द नही। उससे कही अधिक परमार्य स्वभाव का वर्णन ही सहदयहृदया- हवादकारी है।)
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प्रथमोन्येप: २०६
यथा च कुमारसम्मवे (३३५) द्वन्दानि' भावं क्रियया विकन्र॥ ७७ ॥ और जैसे (दूसरा उदाहर) कुमारसम्भव मे (३३५) से उद्घुत किया जा सकता है जहाँ कवि वमन्तऋतु के आगमन का वर्णन करते हुए कहता है कि-वसन्त ऋतु के आगमन काल में जगली पशुपक्षियो के-) दन्दो ने ( अपने) भावों को किया द्वारा व्यक्त किया॥ ७७ ॥ इवः परं प्राणिधर्मवर्णनम्, यथा मद्रेण च स्पर्शनिमीलिताक्षी मृगीमनण्टूयत कृष्णसारःIl = II इसी के सनन्तर प्राणियो के धर्म का वर्गन (स्वभाव की प्रधानता से तुत्पतिजन्य कौशल का तिरस्कार कर देने वाला है) जैसे- कृष्णसार (मृगविशेष) ने (सीगो के) स्पर्श (जन्व मानन्द) से वन्द किए हुए आखो वाली मृगी को सीग से खुजलाया॥। ७८ ॥ (यहाँ भी मृग एव सृगी के स्वभाव का वर्णन हो इतना सहृदयो के लिये चमत्कारजनक है कि अन्य व्युत्पतिविहित कविकौशल उसके आगे हेय सिद्ध होते हैं। ) अन्यचच कीटश-रसादिपरम र्थज्मन:सवादसुन्दर: । रसा शृद्धारादयः। तदादिमह्णेन रत्यादयोऽपि गृग्यन्ते। तेषां परमार्थ: परमरहस्यं तज्जानन्तोति तब्जञास्तद्विदस्तेयां मनःसंवादो हृदयसवेदनं स्वानुभवगोचरतया प्रतिमास:, तेन सुन्दर. सुकुमार सहृद्य- हृदयाह्वादकारी वाक्यस्योपनिबन्ध इत्यर्थः। अन्नोदाहरणानि रघौ रावण निहत्य पुष्पकेणागच्छतो रामस्य सीतायास्तद्विरहविधुरहृदयेन मयास्मिस्मिन् समुद्देशे किमप्येवंविधं वैशसमनुभूतमिति वर्णयतः सर्वाण्येव वाक्यानि। यथा- और किस प्रकार का है (वह सुकुमार मार्ग)-रसादि के परमार्य को जानने वालों के मन सवाद से सुन्दर। रस अर्थान् मङ्गारादि। उस (रस) के साप आदि के ग्रहण के द्वारा रवि आदि (स्थायी भावो) का भी ग्रहण हो जाता है। उन (रसादि) का (जो) परमाषं अर्यात् परम रहस्प (है), उसे जानते है जो वे हुये रसादि के परमायं को जानने वाले उनका मनसंवाद अर्थात् हार्दिक ज्ञान वर्थात् स्वानुभवगम्य प्रतीति, उससे सुन्दर अर्थात् सहृदयों के हुदमो को आनन्दित करने वाले सुकुमार वाक्य का निबन्धन (जहां होता है यह सुकुमार मार्ग होता है) इस विषय के
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उदाहरण रूप मे रघुवश (महाकाव्य) मे रावण का वघ कर पुष्पक विमान से आते हुए, एव सीता से, उन ( सीता) के विरह के कारण व्या कुल हृदयवाले हमने इस स्थान पर इस प्रकार किसी कष्ट का अनुभव किया था, ऐसर (अमुक अमुक सथलो के विषय मे) वर्णन करते हुए राम के सभी वाक्य (उद्धृत किये जा सकते हैं)। जैसे- पूर्वानुभूत स्मरता रातरौ कम्पोत्तर भीर तबोपगूढम्। गुहाघिसारीण्यतिषाहहतानि मया कर्थचिद् धनगजिंतानि ॥ ७ ।। हे भय शीले ( सीते! इस स्थान पर) रात्रि मे ( पहले बादलो के मरजने से डरी हुई) मपते हुए तुम्हारे आनिङ्गन का स्मरण करते हुए मैंने किसी प्रकार से (बडे पष्ट के साथ), गुफाओ के भोतर फेल जाने वाली बादलो की गडमडाहट को सहन किया था।। ७६ ।।
अत्र राशिद्वय करणस्या यमभिप्रायो यद् विभावादिरूपेण रसाङ्गभूता: शकुनिरुततरु सलिलकृसु मसमयप्रभृतय. पदार्था, सातिशयस्वभाववर्णन- प्राधान्येनैव रसाङ्गतां प्रतिपद्यन्ते। तद्वयतिरिकः सुरगन्धर्वप्रभृतयः सोत्कर्पचेतनायोगिन शृद्गारादिरसनिर्भरतया वर्ण्यमाना: सरसहृदया- हवादकारितामायातीति कविमिरभयुपगतम्। तथाविधमेव लक्ष्ये दश्यते। यहो पर जो (पहला पछु पक्षियो के स्वभाव के प्राधान्य का वर्णनरूप, एवं दूसरा घेतन पदाथों का रस-परिपूर्ण ढेग से वर्णनरूप) दो विभाग किए गए है उसका यही अभिप्राय है कि रस के अल्जभूत मक्षियो की स्वर्नि, पेड, जल, कुसुमो के समय आदि पदार्थ, अतिशय सम्पन्न अपने स्वभाव- वर्णन के मुख्यरूप से ही युक्त होकर विभावादि रूप से (वणित किए जाने पर) रसो के अङ्ग बनते हैं। (जबकि) उनसे भिन्न उत्कृष्ट चेतना से युक्त सुर, गन्धर्व आदि शृद्भारादि रसो की परिपूर्णता के साथ ही व्णित = किए जाने पर सहुदयो के हृदयों को आनन्द प्रदान करते हैं, ऐसा (भेद) • कवियो ने रवीकार किया है और उसी प्रकार का वर्णन भी लक्ष्य प्रत्थो के (अर्थान् ( काव्यादधको) में प्राम्त भी होता है। (इमीलिये पशु-पक्षिपो के वर्गन के लिए-'भावस्वभावप्राधान्यव्याकताहारमंकोशन :- विशेषण का प्रयोग कर, तथा सुरगन्धर्वादिको के वर्णन के लिये-'रसादिपर मार्थजमन :- सवादसुन्दर 'विशेषण देकर दो भेद कर दिए हैं।-) अन्यरष फीटश :- अविभावितसंस्थानरामणीयकरख्वकः । अषि- भाविसमनालोपितं संस्थानं संस्थितियत्र तेन रभणीयकेन रमणीयत्वेन
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रक्षक सहृदयाहृादकः । तेनायमर्थ .- यदि तथायि कविकोशलमत्र संभवति तद् व्यपदेष्टुमियत्तया न कथचिदपि पार्यते, केवल सर्वातिशायितया चेतसि परिस्फुरति। यत्ञ कीदशः-विधि- वैदग्व्यनिष्पन्न निर्माणातिशयोपमः विधिर्विधाता तस्य वैदग्ध्य कीशल तेन निष्पन्न: परिसमाप्तो योऽसौ निर्माणातिशयः सुन्दरः सर्गोन्लेखो रमणीयरमणीलावण्यादि: स उपमा निदर्शन यस्य स तथोत्त तेन विधातुरिव कबेः कौशलं यत्र विवेक्तुमशक्यम्। यधा- और कंसा है (सुकुमार मार्ग)-अविभावित सस्थान की रमणीयता से आनन्ददायक। अविभावित अर्थात् अनालोचित है सस्यिति अर्थात् अवस्थान जिसमे (अर्था जिसकी सत्ता को शब्दो द्वारा नहीं व्यक्त किया जा सकता अवितु जो केवल अनुभवगम्य होती है) उस रामणीयक अर्थान् रमणोयता के द्वारा रक्षक अर्थात् सहृदयो को आनन्दित करने बाला। इस प्रकार इसका अर्थ यह हुआ कि-यदि उस प्रकार का कविकोशल यहां (काव्य मे) सम्भव होता है तो वह 'इतना ही है' इस प्रकार किसी भी तरह कहा नही जा सकता, वह केवल सबसे अतिशयमुक्त रूप मे हृदय मे स्फुरित होता है (अर्थात् उसे शब्दो द्वारा कहा नही जा सकता, उसका केवल अनुभव किया जा सकता है।) और जो (सुकुमार मार्ग) कैसा है कि-विधि के वंद्य से निष्पस निर्माण के अतिशय के समान। विधि अर्थात् ब्रह्मा (विघाता), उनका (जो) वैदव्व्य अर्थात् कौशल (चातुर्य), उसके द्वारा निष्पन्न अर्थात् अच्छी प्रकार समाप्त हुआ जो यह निर्माण का अतिशय अर्थात् सुन्दर सृष्टि की रचना, रमणी के रमणीय लावण्यादि वह है उपमा अर्थात् निदर्शन (सदुश स्वरूप वाला) जिसका वह हुआ। उस प्रकार कहा 'गया (अविभावित संस्थान युक्त रमणीयता से मह्लादकारी)। इस प्रकार विधाता के (कौशल) की माति कवि के कोशल का विवेचन जहा नही किया जा सकता। ऐसा सुकुमार मार्ग होता है। जैसे-
कारागृह्दे निर्जितवासवेन दशाननेनोषितमा प्रसादात्॥50 ॥ (यह रघुवश महाकाव्य के छठवें सर्ग का ४० वा श्लोक हैं। इन्दुमती के स्वयवर मे प्रतीप नामक राजा का परिचय देती हुई सुनन्दा उसके पूवंज कातवीर्य को बोरता का परिषय देती हुई कहती है) कि-जिस (कातवीय अर्जुन) के कारागार में उसके प्रसादपर्यन्त (अर्थात् स्वय कृपा कर जन
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विजन स्पल मे कान-केलि के आनन्द से युक्त पावती के द्वारा, मुस्तुराहट के साथ (शिव्तलाट पर स्थित) चन्द्कला को छीच कर (अपने) सिर पर स्थापित कर 'क्वा मैं दष (चन्द्रनेखा) से शोभायमान हो रही रही हूँं ऐसा प्रश्न किये गए चन्द्रमौति (मगवान् शडूर) का पावती का किया गया) परिचम्बन रूप उत्तर आप सबकी रक्षा करे॥। ॥ षत्र पदानामसमस्तत्वं शाब्दार्थरमणीयता विन्यासवैविव्य च न्ितयमपि चकास्ति। यहां पर पदो का (१) (प्रचुर) समासो से वज्ित होना, [भर्गान यहाँ जो 'रशासु्मोले अथवा 'शीडारसेन' मे समासो का प्रयोग हुआ है दे कोई कठिन बथवा दोघं समास नहीं है जिनसे कि अर्म-प्रतीति मे दुछ भो बाधा पड़े, अपितु वे एक अपूर्व चमत्कार की ही सृष्टि करते हैं) (२) (कर्णपट्टका बदि दोपों से रहित मनोहर ) शब्दो तवा (सघ्य' रसष को परिपुष्ट करनेवाले रमणीम) सर्बों का सोन्दर्य, एवं (३) (वाक्न) रिन्वास की विषिभता, ये तीनो हो (माशूयं गुण के लिये अपेक्षित वस्तुव) जहां सजमाम है। वदेषं माघुर्यममिधाय प्रसाद्ममिघत्ते- अक्लेश्वव्यक्जिताकूतं झगित्यर्थसमर्पणम्। रसवक्रोक्तिविषयं यत्प्रसाद: स कथ्यते ।। ३१ ।। "सो इस प्रकार 'माडुय' (नामक सुकुमार मार्ग के प्रथम एवं प्रघान गुण) का कथन कर 'प्रसाद' (नामक दूसरे गुण का) अभिधान करते हैं- (शुङ्गारादि) रस एवं (सर्वालस्तारसामान्य) बकोक्िवियमक अभिम्राय को बनायास हो प्रकट कर देने वाला, एवं घर्य की तुरन्त प्रतोति कराने वाता जो (गुण) है वह 'प्रसाद' (तुण होता है) ऐसा कहा जाता है।। ३ ॥ गिति प्रथमतरमेवार्यसमर्पणं वस्तुप्रतिपादनम्। कीटशम्-
रसवफ्रोकिविषयम्। रसा: [2द्रारादयः, चकोकि: सकललक्वारसामान्यं विषयो गोचरो यस्य वत्तयोकम्। स एव प्रसादास्यो गुणो कथ्यते मण्यते। अत्र पदानामसमस्तत्वं प्रसिद्धामियानत्वम् वव्यपदिवसम्बन्धत्व समाससद्भावेऽपि गमकसमासयुक्कता प परमार्य:। 'आाकृत' शब्दस्ता स्पर्यविच्छिची प्व पवते। चहाहरणं ममा-
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झणिति अर्थात् सवप्रथम (सुनने के बाद तुरन्त) अर्थ-समर्पण अर्थात् वस्तु का प्रतिपादन (करने वाता) । किस प्रकार (के अर्थ का प्रतिपोदन) विना कनेश के अभिप्राय को व्यक्त करने वाले अर्थात् अनायास ही अभिप्राय को प्रकट कर देने वाले (अर्थ का सम्पण) । किस विषय (से सम्बन्धित) रस एव वकोकि विषयक। रस अर्थात् शृङ्गारादि वकोकति अर्थात् नमस्त अलद्धारो में सामान्यभूत (वाग्विच्छिति) है विषय अर्थात गोचर जिमका वह हुआ तथोक्त (रसवकोकिविषयक अभिप्राय) उसे ही बिना वष्ट के व्यक्त करने वाला) वह ही 'प्रसाद' नामक (सुकुमार मार्ग का दूसरा) गुण कहा जाता है। यहां (इस 'प्रसाद' नामक गुण का) परम रहस्य है-पदो का (१) समास से वजिन होना, (२) प्रसिद्ध (ही अर्थ) का अभिवान करना (३) (अर्य के साय) साक्षान् (अव्यवहिद, सम्बन्ध होना, एव (४) समास के विद्यमान होने पर भी (सरलतापूवंक अर्थ की) प्रतीति कराने वाले समास से युक्त होना। (इस कारिका में जो) 'आकूत' शब्द (का उपादान किया गया है वह) तात्पयें की विच्छिति (रमणीयना के अर्थ) मे किया गया है। (अर्थान् रमणीय तात्पर्य वाली वस्तु को अनायास व्यक्त करने बाला प्रसाद नामक गुण होता है।) उदाहरण जैसे- हि मव्य पाया दविशदाधरा णामापाण्डु रीभू तमुखच्छवीनाम्। स्वेदोद्गम किंपुरुषाङ्गनानां चक्रे पद पत्रविशेषकेषु॥। म२॥ शीत के व्यतोत हो जाने से स्वच्छ अधरो वालो एव गौर वर्ण की मुख- काम्सि से यस् किसरो को सुन्द्रियों के (मस्तक पर स्थित) पलाश के तिलको (पत्रविशेषको) मे पसीने के आविर्भाव ने अपना स्थान बना लिया (अर्थान् गर्मी के कारण मायो पर पसीना आने लगा) ॥ ८२॥ अन्रासमस्तत्वादिसाममी विद्यते। यद्षि तिविधपत्रविशेषक बैचित्रयविहितं किमपि वदनसौन्दर्य मुक्तकणाकारस्वेदलवोपसृंदियं तदपि सुश्यक्तमेव। यथा वा- यहाँ पर (प्रचुर) समास का अभाव आदि (प्रसाद गुण की) सम्ूमं सामप्री विद्यमान है। और जो भी विविध पत्र के विशेषको के वैचिन् से उत्पन्न कोई (अनिहँमनीय) भुख की सुन्दरता मुक्ताकणों के आकार वाले स्वेदकणो से परिकप्त की गई है, (अर्थान जिसमे वात्परय (बभिभ्राय) की विष्छिति है) वह भी सुस्पष्ट ही है। (मतः यदा प्रसाद गुण स्वीकार करिया गमा है)। अयवा जैसे (दूसरा उदाहरण)-
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तक उसने कारागार से मुक्त नही कर दिया तबतक) धनुष की डोरो से बंधी होने के कारण स्पन्दरहित भुजाओ वाले, ( अत्यधिक कष्ट के कारण) नि शवास लेते हुए (दसो) मुखो की परम्परा वाले एव इन्द्र को पराजित करने वाले रावण ने निवास किया था। (ऐसे कार्तवीय का यह वशज है) ॥। ८० ॥ कत्र कविशक्तिपरिणाम: परं परिपाकमधिरूढः। व्य पदेशप्रकारान्तरनिरपेक्षः
यहाँ (इस श्लोक मे) दूसरे प्रकार के कथन की अपेक्षा न रखने वाला कषि की (सहज) प्रतिभा का परिणाम अत्यन्त ही परिपोष को प्राप्त हो गया है। अर्थान् कवि ने रावण के लिए जिन विशेषणो का प्रयोग किया है उन्हे अब किसी अन्य शब्द द्वारा व्यत्त किये जाने की अपेक्षा नही। तात्पयं यह कि 'निर्जितदासवेन' अर्थात् जिसने इन्द्र को पराजित किया था उसो को कार्तवीय ने 'विनि शसदृवनपरम्परेण' अर्थात् निःश्ास लेती हुई दशो भुखो की परम्परा वाला बना दिया है कहां देवराज इन्द्र को जोतने वाला रावण कहाँ, उसकी यह दगा कि वह एक दो मुखो से नहीं बल्कि सभी मुखो से हॉफे वह भी किसी भारी कष्ट द्वारा पीषित किये जाने पर नही बल्कि एक मामूली धनुप की होरी से बधे जाने के कारण बीसो भुजाओ के स्पन्द से रहित 'ज्याबन्धनिष्पन्दभजेन'। इस प्रकार यहाँ रावण के लिए प्रयुक सभी विशेषण किसी एक अपूर्व चमरकार के जनक हैं उन्हें किसी अन्य व्यपदेश की आवश्यकता नहीं)। एतस्मिन् फुलके-प्रथमश्लोफे प्राधान्येन शब्दालंकरणयोः सौन्दर्य प्रतिपादितम्। द्वितीये वर्णनीयस्य वस्तुनः सौकुमार्यम। तृतोये प्कारान्तरनिरपेक्षस्य संनिवेशस्य सौकृमार्यम् । चतुये वैचित्र्यमपि सौकुमार्याविसंवादि विधेयमित्युक्त्म्। पक्मो विषय- विषविसोकुमार्वभतिपादनपर। इस (२५ से २६ कारिका वाले) कुलक मे, प्रथम श्लोक (२६ वी कारिका) मे मुख्यरूप से शब्द तथा अतदारों के सोन्दर्य को प्रतिपादित किया गया है। दूसरे (श्लोक २६ वी कारिका) में व्च्य वस्तु की सुकुमा- रता (का परतिपादन किया गया है)। तीसरे ( श्लोक २७ वी कारिका) मे प्रकारन्तर की अपेक्षा न रखने वाली सघटना की सुकुमारक्षा (प्रतिपादित की गई है) धौये (श्लोक २८ वीं कारिका) में सुकुमारता के अनुरूप ही मेंचिम्प की सृष्टि करना चाहिए ऐसा कहा गया है। एव पाचडो ( इलोक
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२६वीं कारिका सुकुमार मार्ग के) विषय और विषयी की सुकुमारता का प्रतिपादन करता है। एवं सुकुमारामिधानस्य मार्गस्य लक्षणं विघाय तस्यैष गुणान् लक्षयति-
असमस्तमनोहारिपद्विन्यासजीवितम्। भाघुयं सुक्कमारस्य मार्गस्य प्रथमो गुणः।। ३० ।। इस प्रकार 'सुकुमार' नामक मार्ग का लक्षण बढा कर उसी (सुकुमार मार्ग) के गुणो को लक्षित करते हैं- समास (की प्रचुरता से) हीन हृदयहारी पदो के विन्यासरूप प्राण दाला 'माघुर्ष' (नामक गुण) सुकुमार माग का पहला गुण है। ३०। असमस्तानि समासवर्जितानि मनोदारीणि हदयाह्वाइकानि श्रुतिरभ्यतवेनार्थरमणीयत्वेन च यानि पदानि सुप्िकन्तानि तेषां विन्यास: सश्निवेशवैचितयं जीवितं सर्वस्वं यस्य तत्तयोंकं माघुयं नाम सुकुमारलक्षणस्य मार्गस्य प्रथमः प्रधानभूतो गुणः । असमस्तशव्दोप्त प्राचुर्योर्थ:, न समासाभावनियमार्येः। उदाहरणं यथा- असमस्त अर्यान् समास से हीन मनोहारी अर्थाद् सुनने मे मनोहर एवं अथं से भी मनोहर होने के कारण (सहृदय) हृदयों को आह्लादित करने वाले, जो पद अर्थात् सुबन्त एव तिडन्त पद, उनका (जो) विन्यास अर्थात् सघटना का वैचित्म (वही है) जीवित अर्थात स्वस्व जिसका यह हुआ तयोक्त (असमस्त एव मनोहारि पदों के विन्यासरूप जीविष वाला) माधुयं नामक, सुकुमार रूप मार्ग का प्रथम अर्थात् प्रधानभूत गुण। असमस्त पद यहां प्राचुर्य मर्य का बोघक है ( अर्थात् समास के प्रपुर प्रयोग का निषेध करने वाला है) न कि समास के (पूर्ण) अभाव का नियम करने के अर्थ मे (कि समास बित्कुल हो ही नहीं। तात्यं यह कि समस्त पदों का प्रयोग किया जा सकता पर प्रचुरता से नहीं वयोंकि प्रचुरता से किया गया समास सुकुमारता में वाधक होगा।) इसका उदाहरण जैसे- फीहारसेन रहसि स्मितपूर्षमिन्दो- लेखं विकृष्य विनिबन्ध्य घ मूर्ष्नि, गौर्या। *कि शोमिताइमनयेति राशाङ्कमौतेः पृष्टस्य पातु परिबुम्बनमुत्तरं क।। =।।। ८ व० जी.
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११४ निर्जन स्पल मे कान-केलि के आनन्द से युकत पावती के द्वारा, भुस्कुराहट के साथ (शिवललाट पर स्थित) चन्दकला को घीच कर (अपने) सिर पर स्थापित कर 'क्या में इस (चन्द्रलेखा) से शोभायमान हो रही रही है' ऐसा प्रश्न किये गए चन्द्रमोलि (भगवान् शद्दूर) का (पावती का किया गया) परिचुम्बन रूप उत्तर आप सबकी रक्षा करे । ८१॥ अत्र पदानामसमस्तत्वं शब्दार्थरमणीयता विन्यासवेवित््य च त्रितयमपि पकास्ति। यहां पर पदों का (१) (प्रचुर) समासो से वर्जित होना, (अर्थान यहाँ जो 'शशासूमोते-' अथवा 'क्ोडारसेन' मे समासो का प्रयोग हुआ है वे कोई कठिन अथवा दोघ समास नहीं है जिनसे कि अर्प-प्रतीति मे कुछ भो बाधा पड़े, वदितु वे एक अपूर्व चमत्कार की ही सृष्टि करते हैं) (२) (कर्णपट्ुका आादि दोषो से रहिन मनोहर ) शब्दो तथा (सद्य रस को परिपुष्ट करनेवाले रमणीय) अथों का सौन्दर्य, एव ( ३) (वाबय) विन्यास की विभिभता, ये तीनो ही (माधुपं गुण के लिये अपेक्षित वस्तुवे) जहां विवमाम है। सदेषं भाघुर्यममिघाय प्रसादममिपत्ते- अक्लेश्व्यञ्ञिचाकृतं. झगित्यर्थसमर्पणम्। रसवक्रोक्तिविषयं यत्प्रसाद: स कथ्यते । ३१ ॥ सो इस प्रकार 'माचुय' (नामक सुकुमार मार्ग के प्रथम एवं प्रधान गुग) का कचन कर 'प्रसाद' (नामक दूसरे गुण का) अभिध्वान करते हैं- (शृक्गारादि) रस एव (सर्वालवारसामान्य) वकोकिकिविष्यक अभिप्राम को अनायास ही प्रकट कर देने वाला, एवं अर्थ को तुरन्त प्रतीति कराने वाला जो (गुण) है वह 'प्रसाद' (गुण होता है) ऐसा कहा जाता है । ३ १ r गिदि प्रथमतरमेवार्थसमर्पणं वस्तुप्रविपादनम्। कीटशम्- अवलेराव्य्विताकूवम् अकदर्थनाप्रकटितामिप्रायम्। किविपयम्- रसवफ्रोकिविषयम्। रसा:।मवारदय:, वफोकि सकललक्ठारसामान्यं विषयो गोधरो यस्य तचवोकप्। स पत्र प्रसादालयो गुणो कथ्यते भण्यते। मत् पदानामसमस्वत्वं प्रसिद्धामिधानत्वम् वव्यवदिवसम्बन्धत्व समाससन्गावेडपि गमरसमासयुक्कता च परमार्थ:। 'आाकूत' शब्दस्वा स्पर्यविच्छिषो प पर्वसे। उदादरणं मता-
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झगिति अर्थात् सवपरयम (सुनने के बाद तुरन्त) अर्थ-समर्पण अर्थात वस्तु का प्रतिपादन (करने वाला)। किस प्रकार (के अर्थे का प्रतिपादन) बिना कनेश के अभिप्राय को व्यक्त करने वाले अर्थात् अनायास हो अभिप्राय को प्रकट कर देने वाले (अर्थ का समर्पण)। किस विषय (से सम्बन्धित) रस एव वकोकि विषयक। रस अर्थान् शृङ्धारादि धकोक्ति अर्थात् समस्त अलद्वारो मे सामान्यभूत (वाग्निक्तिति) है विषय अर्थात् गोचर जिसका वह हुआ तथोक (रसवक्रोकिविपयक अभिप्राय) उसे ही बिना कष्ट के व्यक्त करने वाला) वह ही 'प्रसाद' नामक (सुकुमार मार्ग का दूसरा) गुण कहा जाता है। यहां (इस 'प्रसाद' नामक गुण का) परम रहस्य है-पदो वा (१) समास से वजिन होना, (२) प्रसिद्ध (ही अर्थ) का अभिधान करना (३) (अर्थ के साथ) साक्षात् (अव्यवहित, सम्बन्ध होना, एव (४) समास के विद्यमान होने पर भी (सरलतापूर्वक अर्थ की) प्रतीति कराने वाले समास् से मुक्त होना। (इस कारिका मे जो) 'आकृत' शब्द (का उपादान किया गया है वह) तात्पय की विष्छित्ि (रमणीयता के अर्थ) मे किया गया है। (अर्थात् रमनीय तात्पर्य वाली वस्तु को अनावास ्यक्त करने वाला प्रसाद नामक गुण होता है।) उदाहरण जैसे- हिमव्यपाया द्विशदाधरा णामापरण्डु रीभू तमुखच्छरीनाम्। स्वेदोद्गम' किपुरुपाद्गनानां चक्रे पदं पत्रविशेषकेषु॥ ६र॥। गीत के व्यतीत हो जाने से स्वच्छ मधरो वाली एव गोर वर्म की मुख- कान्सि से मुक्त किसरो को सुन्दरियो के (मस्तक पर स्थित) पलाश के तिलको ( पम्रविशेषको) मे पसीने के आविभव ने अपना स्पान बना लिया (सर्थान् गर्मी के कारण मापो पर पसीना आने लमा) ॥। ८२।। अन्रासमस्तत्वादिसामशी विद्यते। यदपि विविधपत्रविशेषक- बैचित्रयविहितं किमषि बदनसौन्दर्य मुकाकणाकारस्वेदलवोपसृदिवं तदपि सुव्यक्तमेव। यथा वा- यहाँ पर (प्रचुर) समास का अभाव आदि (प्रसाद गुण की) सम्पूर्भ सामप्री विद्यमान है। और जो भी विविध पत्र के विशेषको के वैचिभ्य से उत्त्पसन कोई (मनिकनीय) मुख की सुन्दरता मुक्ताकणो के आकार वाले स्वेदकणो से परिकम्पत की गई है, (अर्थान् जिसवमे तात्पयं ( बभिशाम) की विष्छिति है) वह भी सुसष्ट ही है। (अतः यहां प्रसाद गुण स्वीकार किया गया है)। अथवा जैसे (दूसरा उदाहरम)-
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अनेन साध बिहराम्युराशेस्नीरेवु वाडीवन नर्मरेपु।
(इन्दुमसी स्वयबर के प्रसम मे कलिद्ध-नरेश ह्वेमासद का परिचम देते हए सुनन्दा इन्दुमती से कहती है कि आप) ताडी के जङगलो के मर्मर शब्दो से युक्त सागर के किनारो पर दूसरे द्वीपो से लवङ्ग पुप्पो की लाने वाली हवा के द्वारा पसीने की बूंदो को सुखाते हुए इस ( कलिन्द नरेश हेमाङ्गद) के साथ बिहार करेंम द३॥
पालेन्दुवकाणि, इति ॥ .= ४॥। (यहा पर भी प्रचुर समासो का अभाव इत्यादि प्रसाद मुण की समस्त सामग्री विषमान है। सा ही 'अपाकृतस्वेदलवा' के द्वारा जो सुरजमय "वेद के कारण उत्पन्न हुए स्वेदकणो का सवत किया गया है वह भो सुरपष्ट है। इस प्रकार रसविषयक अभिन्राय स्पक्त करने के दो उदाहरण देकर) अलंकार व्यक्तिि का उदाहरण देते हैं) जैसे- बाल चन्द्रमा के समान टेढ़े इत्यादि पूर्वोंक्त उदाहूरण सच्या ७५ पर उदाहृत पद्य है।। ८४ ॥ (इसका अर्य वही देखें)। (इस पद्म मे हमास के अभाव के साथ-साप अर्थ की स्पष्टता आदि प्रसाद गुण की समप्र सरमप्री की विदमानता के साथ-साथ 'नखसतानीद' से प्रयक् उपमालवार बडे ही रमणीय ढग से व्यक्त हुआ है)। एव प्रसादम भिघाय-लावण्यीलक्षयति~ वर्णचिन्यासविच्छित्तिपद्सधानसंपदा 1 स्वल्पया बन्घसौन्दर्य लावण्यमभिधीयते ॥ ३२ ॥ इस प्रकार (सुकुमार मार्ग के 'द्वितीयगुण) प्रसाद का कवन कर (सृतीयगुण) सावण्य को लक्षित करते हैं- मक्षरो की विधिन सघटना की शोभा से (लक्षित) पदों की योजना की अत्यत्प स्पत्ति से (उत्पन्न शोभा द्वारा निष्पश्न) वाबय-रचना का सोन्दय 'सावण्य' नामरु गुण कहा जाता है ॥। ३२ । बन्घो वाक्यविन्यासस्तस्य सौन्दर्य रामणाक लावण्यमममि- धीयते लाषण्यमित्युच्यते। फीटशम्-वर्णानाभवराणां विन्यासो विचिन्न न्यसनं तस्य विच्छित्ति :- शोभा वैदग्ध्यभभ्री तया सक्षितं पदानां सुपिकन्ताना सन्धानं संयोजन तस्य सम्पत्, सापि शोभैष,
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तथा लक्षितम्। कीटश्या-उभयरूपयापि स्वल्पया मनाङू्मात्रया नातिनिबन्धनिर्मिनय। तद्यमन्नार्थः शब्दार्थसौकुमार्यसुभगः सन्निवेशमहिमा लावण्याखयो गुण, कथ्यते। यथा- बन्ध अर्थात् वावय की विशेष सघटना, उसका सौंदर्य अर्थात् रमणीयता लावण्म कही जाती है अर्थान "लावण्म नामक गुण" के द्वारा उसका कथन किया जाता है। कसा (बन्ध सोन्दर्य)-वर्गों अर्थात् अक्षरो का विन्यास अर्थात् विचित्र सघटना उसकी विच्छिति अर्थात् शोभा विदन्धतापूर्ण भङ्गिमा इसके द्वारा लक्षित-सुबन्त तथा तिडन पदो का सन्धान अर्थात् सम्यक योजना उसकी सम्पति अर्थात् शोभा उसे लक्षित अर्थात् सयुक्त (बन्धमोदय)। फकैसी (सम्पनि) के द्वारा-उभयरूप सम्पत्ति के द्वारा (बर्थात् (१) वर्णों के विचिन्नन्यास से जन्य धोभा (२) तथा उससे युक्त पदयोजना की शोभा इन दोनो से जो) स्वल्प अर्थात् अत्यन्त थोडी एव बिना अधिक प्रयास के निमित की हुई (अर्धान् स्वाभाबिक रूप से उत्पन्न शोभा के द्वारा)। इसका यहाँ यह अथ हुआ कि-शब्द और अर्थ की सुकुमारता से रमणोम सघटना की शोभा लावण्य नामक गुण कही जाती है। जैसे-
कामो वसन्सात्ययमन्दवीर्य: केशेषु लेभे पलमङ्गनानम् ॥८X॥ नहाने के कारण गीले हो जाने से खुले एव धूप से सुगन्धित किये जाने के अनन्तर सामकाल गंथे गये बेला के पुष्पो से युक्त सुन्दरियों के केशकलाप मे, वसन्तऋतु रूप अपने मुहृद् का विनाश हो जाने से (अर्थात् वसन्त की समासति पर) मन्द हो गये पराक्रम वाले कामदेव ने शक्ति प्राप्त किया॥८४॥ अत्र सभिवेशसौन्दर्यमहिमा सहृदयसवेदो न व्यपदेष्ट पार्यते। यथा वा- चकार बाणैरसुराङ्गनानां गण्डस्थली: प्रोधितपत्रलेखाः ।। ८६ ॥ यहाँ पर सघटना के सौन्दर्य की शौभा का कथन नहीं किया जा सकता क्योंकि वहु केवल सहृदय-हृदय के द्वारा अनुभवगम्य है। (अर्थात् इस श्लोक मे जो वर्णविभ्यास की वि्छित्ति है अर्थात् सुकुमार वर्णो का मनोहारी विन्यास है उसकी शोभा एवम् पदो को जो मनोहारी योजना है, उसकी शोभा दोनों का केवल अनुभव किया जा सकता है शब्दो द्वारा नही व्यक्त किया जा सकता । अथवा जैसे (इसी का दूसरा उदाहरण)- (रघुवंश महाकाव्य के इन्दुमती स्वयवर के प्रकरण मे इन्दुमती से राजा ककुत्स्य का परिचम देती हुई कहती है कि ये वे हो राजा ककुत्स्म हैं
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वकोक्तिजीवितम्
बिम्होंने संग्राम मे) बाणो के द्वारा (राक्षसो का वघकर) राक्षसो की पलियों की रुपोसस्थली को (उनके विध्रवा हो जाने के कारण सदा के लिए) पत्र-रचना (रूप प्रसाधन) से निर्मुक्तक कर दिया था ॥६६॥ अत्रापि वर्णविन्यासविच्छित्तिः पदसन्धानसम्पच सन्निवेशसौन्दर्य-
यहां पर वाक्य-सघटना के सौन्दर्य को कारणभूत वर्णों के विचिन सन्निवेश से वन्य शोभा तमा पदो की सम्पक् योजना की शोभा स्पष्ट रूप से शमकती है।
श्रुविपेश्यलतांश्ालि सुस्पर्शमिय चेतसा। स्वभावमसृणच्छायमामिजात्यं प्रचक्षते ॥ २३॥ इर प्रकार सुकुमार मार्ग के माधुर्य, प्रसाद तथा लावन्य तीन गुणो का प्रतिपादन कर ल्षब चोषे गुण आभिजातय का कपन करते है- खुनने में रमणीयता से सम्पन्न एकम् हृदय के साथ सुन्दर स्पर्ग के समान स्वभावत सिनग्ध कौति से युक्त वस्तु आभिजात्म नामक तुणही जाती है।। ३३॥। एवंिधं वस्तु आभिजात्य प्रथक्षते आभिज्ञात्यामियानं गुणं वर्ण- यम्ति। क्षुति. अवणेन्द्रियं तन्न पेशलता राभणीयकं तेन शालसे रसायते यत्तयोकम। सुस्पर्शमिष चेतसा मनंसा सुस्पशमिय। सुखेन स्टृश्यत इवेत्यतिशषफिरियम्। यस्मादुभयमपि स्पर्शयोग्यत्वे सति सौकुमार्यात् किर्ाव चेतसि स्पर्शसुसमर्पयतीष। यतः स्वमायमसूणध्नायम् अहार्यप्रदणपान्ति यत्तद् आभिजात्य कथयन्तीत्यर्थ: 1यपा- इस प्रफार की वस्तु आभिजात्य कही जाती है अर्थान् उसे षाभिज्ञात्य नामक गुण कहते हैं। अृति पर्थात् थवपेन्द्रिम कर्णे यहाँ जो पेघलता बर्षान् सौन्दर्य होषा है ।उससे भो शासित सुनोभित होता है वह हुआ तथोक्त धुधि की रमणीमता से सुशोभित होनेवाला। चित्त के साथ सुस्परम की भाति वर्थाद् मन के साथ सुवदामी र्पर्म की तरह। सुखनूबंक रपर्श किया जाता है जिसका उसके समान-यरहा अतिरायोकति है। क्योकि दोनो ही स्पर्ष को मोभ्यता के विधमान रहने पर सुक्ुमारता के कारण किसी अपूर्य रप शंसुख को हुरम मे उत्पन्न करते हैं। क्योंकि जो स्वभाव से मसुण छामा वासा
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अर्थात् स्वाभाविक (न कि व्युत्पत्तिजन्य) स्निग्धकान्ति से युक्त होता है, उसे आभिजात्य नामक गुण कहा जाता है जैसे- न्योतिलेखावलयि गलितं यस्य बहँ भवानी। पुत्रप्रीत्या कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति ॥८७ ॥ (मेघदूत काव्य मे देवगिरि पर स्थित स्वामिकातिकेय के वाहनभूत मयूर को नाचने के लिए प्रेरित करने के लिए कहते हुए यक्ष मेघ से उस मदूर की विशेषता बताते हुए कहता है कि)- जिस (स्वामिकार्सिकेय के वाहन मयूर) के कान्तिमय रेखा के बलमवाले गिरे हुए पख को भवानी (पार्वती स्वामिकातिकेय की माता अपने-) पुत्र के प्रेम के कारण कमलदल से युक्त कान में (धारण) करती है। अर्थात् र्णाभरण के रूप में उस पंख का प्रयोग भवानी करती है॥ ८७। अत्र श्रुतिपेशलतादि स्वभावमसृणच्छ्ायत्वं किमपि सहृद्पर्सवेधं परिस्फुरति। यहां पर शुतिरमणीयतादि तथा स्वभावतः स्निम्ध कान्तियुक्तता कोई अपूर्वं एवम् अनिवँचनीय सहुदर्यो का अनुभवगम्य तत्व परिस्कुरि होता है। ननु च लावण्यमाभिजात्यं प लोफोत्तरतरुणीरूपलम्णयस्तुधर्मतया यत् प्रसिद्धं तत् कथं काव्यस्य भवितुमईतीति चेत्तम 1 यस्मादनेन न्यायेन पूर्वप्रसिद्धयोरपि माघुर्यप्रसादयो: काव्यवर्मत्वं विघटते। माधुर्य हि गुडादिमघुरद्रव्यघमेतया प्रसिद्धं तथाविधाहादकारित्वसामान्योप- चारात् काव्ये व्यपदिश्यते। तर्थेव व प्रसाद: स्वच्छसलिलस्फटिकादि- धर्मतया प्रसिद्धः स्फुटावभासित्वसामान्योपपारात् ऋगितिप्रतीि- पेशलतां प्रतिपचते। तद्देव व काव्ये कविशचिकौशलोलिसितकान्ति- कमनीयं बन्धसोन्दर्य चेतनचमत्कार कारित्वसामान्योपघाराज्जाषण्यशब्द व्यतिरेकेण शब्दान्तराभिघेयतां नोत्सहते। वर्यव प फाव्ये स्वभायम- सृणच्छायत्वमाभिजात्य शब्देनामिघीयते। पूर्वपक्षी प्रशन करता है कि) लावण्य और आभिवात्य जो अलोकिक तरुणी के सौन्दर्यरूप वस्तु के धमरूप से प्रसिद्ध है वह काव्य का मुण रूप कैसे हो सकता है? इस बात का उत्तर देते हुए कहते हैं कि यह प्रश्न ठीक नही क्योंकि इस न्याय का आधयय करने से पूर्वप्रसिदध माधु्य एवं प्रसाद गुण भी काव्य के धर्म न हो सकेंगे क्योंकि ुड़ आदि मोठें पदार्यों के
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१२० चकोकिंजीबितिम्
घर्म के रूप मे प्रसिद्ध [माधुयं गुग भी उसी प्रकार (गुदध इत्यादि मघुर दव्यों की भाति) वाह्नादजनकता रूप सादृश्य के कारण उपचार से (लक्षणमः) काव्य मे (माधुय गुण के रूप मे) कहा जाता है। उसी प्रकार स्वच्छ जल अथवा स्फटिक मणि आदि (द्रव्यो के) धर्म रूप से प्रसिद्ध प्रसाद गुण भी स्पष्ट रूप से (अर्थ को) प्रकट कर देने रूप साद्श्य के आधार पर उपचार से (काव्य के प्रसाद गुण के रूप मे प्रसिद्ध होकर) सघ्य अर्थ-प्रतीति की रमणोयता को प्राप्त होता है। तथा उसी प्रकार कवि की सहज प्रतिभा के फोशल से निष्पध को गमी कान्ति से रमणोय वाकय- बिन्यास का सौन्दर्य सहदमो को बानन्द प्रदान करने रूप सामान्य के बाधार पर उपघार से लावम्य शब्द से मिन्न किसी अन्य शब्द के द्वारा अभिघेयता को नहीं सहन कर पाता (मर्थात् उसे केवल लावण्य शब्द के द्वारा ही व्यक्त किया जा सकता है) तथा उसी प्रकार काव्य मे स्वाभादिक रुप से स्निग्ध रान्तियुक्तता आभिजात्य शब्द के द्वारा कही जाती है (जैसे- रमणी आदि के अलौकिक सहज स्नि्ध कान्ति को आभिजातय कहते हैं इन दोनों मे भो चपचार का हेतु सहृदयहृदपाल्ादकारित्व रूप सामान्य ही है।)
स्पादितप्रतीति- प्रतीयमानं पुनशन्यदेव वस्त्वस्ति बाणीपु महाकषीनाम्।
(पूवंपजी यह प्रश्न करता है कि) कुछ (वानन्दपदन आदि आचार्यों) ने सुन्दरियों के स्ाषण्म केर्साम्य के कारण प्रतीयमान (स्यम्म) वस्तु को सावभ्य ऐसा कहा है- वाच्य को उपमा आादि प्रकारो से प्रसिद्ध बताकर प्रतीयमान रूप अर्प के दूमरे भेद का प्रतिपादन करते हैं- कि महाकवियों की वाणी के प्रवोयमान नामक वस्तु दूसरी ह। (वाच्य से भिन्न वस्तु) है, जो शङ्गताओ में उनके प्रसिद्ध अवपशो से मिन्न साबप के समान विशेषरूप से सुशोभित होती है॥। दम । वत्कथ पन्घसौन्दर्यमात्रं लाव ण्यमित्यभिघीयते ? नैप टोप, यस्माद-
मात्रं साध्यते प्रतीयमानस्य, न पुनः सकललोकलोचनसपेदस्प लगाना लायण्यस्य 1 सहद्यदद्पानामेव सवेधं सत् प्रतीयमानं समीकठु- पायते।
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प्रथमोन्मेप: १२१
आपने केवल बन्ध-सौन्दर्य को की लावण् कैमे कहा? (इस प्रशन का उत्तर देते हुए कहते हैं कि) यह कोई दोप नही है कयोकि इस दुष्टान्त के द्वारा (आनन्दवर्द्धन) वाव्य-वाचक रूप से प्रसिद्ध अवयदो से भिन्न प्रतोयमान (वस्तु) की सत्तामात्र का प्रतिपादन करते हैं न कि समस्त लोक के नेत्रो द्वारा जाने जा सकने योग्य ललना के लावण्य के साथ केवल सहदयो के हृदयो द्वारा अनुभव किये जा सकने वाले प्रतीयमान अर्थ को समान किया जा सकता है। (अर्थान् ललना का लावर्ण्य सभी लोग जान सकते हैं जब कि प्रतीयमान अर्थ का अनुभव केवल सहृदय ही कर सकते हैं तो भला वे दोनों समान कैसे हो सकते हैं? अत आनन्दवर्द्न ने केवल प्रसिद्ध उपमा आदि वाच्य रूप अवयबो से भिन्न प्रतीयमान वस्तु की सत्तामात्र का निदश किया है)। (लेकिन मैंने जो काव्य के लावण्य गुण की ललना के लावण्य के साथ समता स्थापित की है उसका यही कारण है कि) तस्य बन्घसौनदर्यमेवाव्युत्पन्नपदपदार्थानामपि श्रवणमात्रेणैव हृदयहारित्वस्पर्धया व्यपदविश्यते। प्रतीयमानं पुन काव्यपरमार्थ- जानामेवानुभवगोधरतां प्रतिपदते। यथा कामिनीना किमपि सौमाग्यं तदुपभोगोचित्ताना नायकानामेष सवेद्यतामईति, लावण्यं पुनस्तासामेव सत्कविगिरामित सौन्दय सफललो कगोचरतामायाती- स्युक्नेवेत्यल मतिप्रसङ्गेन। उस (काव्य) का बन्ध सौन्दर्य ही पद और पदार्थ को न जानने वाते (सहृदयमिस्न) सोगों के भो सुनने मात्र से मनोहर होने के कारण (तलना लावभ्य, जो कि समस्तनोक लोचनगोचर होता है उसकी) स्पर्धा से कथन किया जा सकता है। (अर्थान् जैसे ललना का लावण्य सभी पाणियो को मानन्द प्रदान करता है चाहे वे सहृदय हो अथवा असहृदय हो उसी प्रकार काव्य का बन्ध सोन्दय भी सभी के हुदयो को केवल श्रवण मान से आनन्दित कर देना है, चाहे वे पद एवं पदार्थ को समझने वाले सहुदय हो अयवा पद-पदार्थ ज्ञान से होन असहृदय)। जब कि प्रतीयमान अर्थं केवल काव्य के परामर्श करो जानने वाले। (सहृदवो के ही अनुभव का विषय बनता है जैसे कामिनियो का कोई अनिवर्चनीय सौभाग्य (सौन्दर्य)- उनका उपभोग करने योग्य नायको का ही अनुभवगम्म होता है जब कि उन्हीं का सातण्प श्रेष्ठ कवियो की वाणी के सोन्दर्य की भाति समस्त लोक के ज्ञान का विषय बनता है यह कहा हो जा चुका है अत इस अतिप्रसग की आवश्मकता नहीं।
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१२२ वकोतिजीवितम्
एवं सुकुमारस्य लक्षणमभिचाय विचित्र लक्षपति- प्रतिभाप्रथमोद्वेदसमये यत्र वक्रता। शव्दाभिधेयययोरन्तः स्फुरतीन विभाव्यते।। ३४।। इस प्रकार सुकुमार-मार्ग का लक्षण करने के उपरान्त विचिन-मार्ग का लक्षण करते हैं- जहां कवि की शक्ति की प्रथम हो उल्तेख के समय शब्द और अर्य के अन्दर (उत्तिवचिश्य रूप) वकता सफुरित होती हुई सी प्रकाशित होती है। :४ ।। अलंकारस्य कवयो यत्रालंकरणान्तरम्। असंतुष्टा निवघ्नन्ति हारादेमणिवन्घवत्॥।३५॥ (तथा) वहां कुपि लोग एक ही अलकार के प्रयीप से असन्तुष्ट होकर हार इत्यादि के मणि-विन्यास के नमान एक अनकार के लिए दूसरे बलकार को रचना करते है॥। ३५ ॥
कान्ताशरीरमाच्छाद्य भृपायैं परिकल्प्यते॥ ३६ ॥ यत्र स्वशोभाविशमान्त:स्थमंलंकार्य प्रकाश्यते॥३७॥। (एबम्) जिम प्रकार से रत्नों को किरनी को शोभा के उल्लास से देदीव्यमान आभूषणो के द्वारा रमणी के शरीर को ठंककर अलंकृत करते हैं उसी प्रकार उज्ज्वल उपमा आदि अलकार वहाँ अपने स्वरूप के द्वारा अपने शोभातिशय के अन्तगत विद्यमान अलकार्य ( स्वभाव) को प्रकाशित बरते है।। ३६-३७ ॥
यदप्यनूतनोल्लेखं चम्तु यत्र तदप्यलम्। उक्तिवेचित्र्यमावेण काष्टां कामपि नीयते ।। ३८ ।। (तथा) जहां जो (वाष्य रूप) वस्तु अभिनव ढंग से उत्तिखित नहीं होती ( व्ान् कवि किसी प्राचीन वस्तु का ही वणन करता है) वह भी उक्ति-वचिश्वमात्र से पर्गाप्त किसी अपूव सौन्दर्य की कोटि पर पहुँचा दो जाती है।। ३८ ।।
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प्रथमोन्मेप १२३
यत्रान्यथाभचत् सर्वमन्य्थव यथारुचि। भाव्यते प्रतिभोल्लेखमहत्वेन महाकेः ॥ ३९ ॥ (तथा) जहाँ अन्य ढग से विद्यमान सम्पूर्ण वस्तु महाकवि की प्रतिभा के उन्मेष के अतिशय के कारण अपनी प्रतिभा के अनुरूप अन्य ढग से ही व्गित होवर शोभायुक्त हो जाती है॥ ३६ ॥ प्रतीयमानता यत्र वाक्यार्थस्य निबध्यते। वाच्यवाचकवृत्तिभ्यां व्यतिरिक्तर यकस्यचित् ॥४० ॥। (एवं)'जहाँ शब्द और अर्थ की शक्तियों से भिश्न (व्यङ्ग्य रूप) किसी अनिवंचनीय वाक्यार्थ की प्रतीममानता (सर्थान् गम्यमानया) निबस को जाती है ( नर्थात्-जहाँ पर वाकमार्थ शब्द तथा अर्थ की शक्ति अभिद्टा के द्वारा न कहा जाकर व्यडग्य रूप मे (व्यजना शक्ति वे द्वारा) निबद्ध किया जाता है) ॥ ४०॥ स्वभाव: सरसाकूतो भावानां यत्र बध्यते। केनापि कमनीयेन वैचित्र्येणोपबृंहितः ॥४१॥ (सथा) जहाँ किसी (अलौकिक) हृदयहारी वैचित्र्य से वृद्धि को प्राप्त कराया गया, पदार्थों का सरस अभिप्राययुक्त स्वभाव वणित होता है॥४१। विचित्रो यत्र वक्रोक्तिवचित्रयं जीवितायतें। परिस्फुरति यस्यान्तः सा काप्यतिशयाभिया ॥४२॥ सोडतिदुःसश्चरो येन विदग्धकवयो गताः । खङ्गघारापथेनेव सुमटानां मनोरथाः॥४३॥ (तथा) जहां वकोक्ति की विचिन्रता प्राण के समान आचरण करती है जिसके भीतर कोई (अलौकिक) अतिशय की उक्ति उल्लसित होती है, वह अत्यन्त कठिनता से चलने योग्य विचित्र (नामक मा्ग) है, जिससे (जिसका आश्रयण कर) चतुर कवि लोग बढे-बढ़े वीरो के तलवार की धवारा के मार्ग से चलने वाले मनोरथो को भाति गुजरे हैं ( अर्थात् काव्य-रचना किए है) ॥। ४२-४३।। स विचित्रामिधानः पन्थाः,कीटक्-अतिदुःसक्र, यत्रातिदुखेन सख्रते। कि बहुना, येन विद्ग्धकवय- केिदेव व्युत्पभा केवलं गताः प्रयाता तदाययेणकाव्यानि चक्कुरित्यर्थः। कथम्-खन्ग-
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१२४ बयोकतिजीवितम्
धारापधेनेव सुभटानां मनोरथा:। निव्निशघारामार्गेण यथा सुभटानां महावीराणां मनोरया: सफल्पविशेया'। तद्षयमत्राभिप्रायः-यदसि धारामार्गगमने मनोरथानामोचित्यानुसारेण यथारूचि प्रवर्तमानार्ना मनाङ्ूमाप्रमपि म्लानता न सम्भाव्यते। माक्षात्समरसमर्दसमाचरणे पुनः कदाचित् किमपिम्लानत्वमपि सम्भाव्येत। तदनेन मार्गस्य दुर्गमत्वं तत्पस्थिताना च विहरयप्रीदि 'परतिपादयते। वह विचिन्न नामका माग कसा है-अतिदु सच्वर अर्थान् जहां बढे कृप्ट के साथ गमन किया जाता है। अधिक कहने से क्या लाभ, जिस (माग) से विदाध कविजन अर्थात्।केवल कुछ ही व्युत्पन् (कवि) लोग गये हैं इसका भाव यह है कि उस ( विचिन-मार्ग) का आश्रयण कर काव्य- रचना किए है। किस -प्रकार से-पडगवारा के मार्ग से सुभटो के मनोरय के समान। सलवार की धारा के मार्ग से जैसे सुभटो अर्थान् बढे-बढे वीरो के मनोरय अर्थान सवत्पविशेष (प्रमाणकरते हैं)। नो यहां इसका अभिप्राय यह है कि अपनी रुचि के अनुकुल औित्य के अनुमार खडग की धारा के मार्ग से चलने मे प्रवृत हुए मनोरयो की पोडी भी म्लानता सम्भद नहीं है, चाहे साज्षान् :संग्राम की भोड में माचरण करने पर गायद कभी वुर्धम्लानता भी सम्भव हो जाय (लैकिन तलवार की ध्ारा के मार्ग पर चलने पर म्लानता बदावि सम्भव नहीं है)। तो इस प्रकार मार्ग की दुर्गमता तथा उस (माग) से प्रस्थान करने वालो की विचरण की परिपतवता का (प्रोदि का) प्रतिपादन किया गया है। फीटफ म मार्ग :- यत्र यस्मिन् शब्दाभिधेययोरभिधानामिधीय मानयोगन्त स्वरूपानुपवेशिनी वक्रता भणितिविच्छित्ति: स्कुरतीष पहपन्दमानेव विभाव्यते। लक्ष्यते। कदा-प्रतिभाप्रथमोद्भेदसमये। प्रतिभाया: फविशकेश्घरमोल्लेखावसरे। तद्यमत्र *परमार्थ :- यत् य विप्रयत्न निरपेक्षयोरेव शव्दार्थेयो: स्वाभाविक: कोपि षक्रता प्रकार परिस्फुरन् परिदृश्यते। यथा- षहु विचिन्र माग है कस्षा-जहा अर्थान जिस मार्ग मे शब्द एवम् अभिधय अर्थात् वाबक और वाच्य (अर्थ) के भीतर अर्थान् स्वरूप में प्रवेश किये हुए वचना अर्थान् कपन को विष्छित्ति स्फुरित होतो हुई-सी अर्धान् प्रवाहित होती हुई सी विभावित अर्थान् लक्षित होती है। कद- प्रतिभा के प्रथम उद्भेद के समय मे। प्रतिमा अर्थान् कवि की शक्ति के आदिम उल्लेख के अवसर पर। तो इसका वास्तविक अर्थ यह हुआ कि-
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प्रथमोन्मेप १२५
कवि के प्रयत्न की (अर्थात् आहार्य कौशल की अपेक्षा न रखने वाले के वल सहज प्रतिभा से निप्पस्ष) शब्द और अर्थ की वत्रता का कोई स्वाभाविक भेद स्फुरित होसा हुआ दिखाई देता है। जैसे- कोडय भाति प्रकारस्तव पवनपद लोकपादाहतीना तेजस्विवातसेव्ये नभसि नयसि यत्पांसुपूर प्रतिष्टाम्। यस्मिन्नुत्थाप्यमाने जननयनपथोषद्रवस्तावदास्ता के नोपायेन मह्यो वपुषि कलुषतादोष एप त्यैब ॥। ८६ ॥ हे पवन। यह तुम्हारा कौन-सा ढज्ग है कि (तुम) लोक के पैरो से आहत किए जाने के पात धुलि समुदाय को तेजस्वियो के समूह द्वारा उपभोग किए जाने वाले आकाश मे (उडा) ते जाते हो ( अर्थात् इतने नीच को इतना ऊचा स्यान कयी देते हो) जिसके उठाये जाने पर लोगो के दृष्टिपय (नेत्रो) मे (होने वाले कष्ट रूप) उपद्रव की बात तो जाने दीजिए ( लेकिन जो उसे आकाश मे ले जाते समय तुम्हारे) शरीर मे यह, कालुप्य रूप दोष (आ जाता) है (उसे) तुम्ही किस प्रकार सहन कर मकते हो। (अर्थान् वह धूलि समूह जो कि इतने ऊचे उठाने वाले आपको भी कालुष्य दोप से युक्त कर देता है, उस नीच की इतने ऊँचे उठाने का यहु आपका कौन-सा ढग है।) ॥८६।। अत्रा प्रस्तुत प्रशंसालक्षणोडलकारः प्राधान्येन वाक्यार्थ। प्रतीयमान- पदार्यान्तरत्वेन प्रयुकत्वात्तत्र विचित्र कविशक्तिसमुल्लिखित वफ्- शब्दार्थोपनिबन्धमाहात्म्यात् प्रतीयमानमप्यभिधेयतामिव प्रापितम्। प्रक्रम एव प्रतिभासमानत्वान्न चार्थान्तर प्रतीतिकारित्वेऽपि पदानां श्तेषव्यपदेश: शक्यते कर्तुम्। बाच्यस्य समप्रधानभावेनानवस्थानात्। अर्थान्तर प्रतीतिकारित्वं व प्रतीयमानार्थस्फुटत्वावभासनार्थमुपनिबष्य मानमतीव घमत्कारकारितां प्रतिपद्यते। यहू। 'अप्रस्तुतप्रशसा' रूप अलकार मुख्यतया वाक्यारथे है। प्रतीयमान (किसी निम्न श्रेणी के लोगो का उद्धार करने वाले परोपकारी महापुरुष के वर्णन रूप) अन्य पदार्थ के रूप मे (वायु के चरित्र के वर्णन के) प्रयुक्त होने से वहा कवि की विचिन्न प्रतिभा से निष्पन्न (समुल्लसित) वक् (वैविनन्य- बुक्त) शब्दो एव मरथों के प्रयोग के माहात्म्य से ( महापुरुष की प्रशसा रूप अर्थ तुरन्त प्रतीत हो जाने के कारण) प्रतीसमान होते हुए भी वाच्यार्य सा हो गया है। तथा आरम्भ मे ही (श्लोफ के पढ़ते ही महापुर्षचरित- वर्णन रप प्रतीयमग्न अरये के), प्रतिभासित हो जाने से (उस श्लोक मे
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१२६ वफोक्तिजीवितम्
प्रयुक्त) पदो के (प्रतीयमान) अन्य अर्थ की प्रतीति कशने वासा होने पर भी उन्हे शलष्ट सज्ञा नही दी जा सकती, वाच्य के साम गमपाद्ान्य से (प्रतीयमान अर्थ के) स्थित न होने से (घयोकि श्लेप मे दोनो स्षर्ष वाच्य एव समपाधान्ययुक्त होते हैं)। तथा (इस श्लोक मे पयुक्त पदो की) अन्य (प्रतीयमान रूप) अर्थ की प्रतीतिवारिता, प्रतोयमान (महापुरत रूप) अर्थ की स्पष्ट प्रतीति कराने के लिए प्रयुक्त होकर अत्कन्त ही चमत्कारजनक हो गई है। तमेव विचित्ं प्रकारान्तरेण लक्षयति-अलंकारस्येत्याि। यत्र यस्मिन्मार्गे कवयो निबध्नन्ति विरचयन्ति, अलकारस्य विभूषण स्यालंकरणान्तरं विभूषणान्तरम् असंतुद्टा मन्तः। कथम् टारादेर्मेणि बन्धवत्। मुक्तकलापप्रभृतेर्यथा पदकादिमणिबन्ध रत्नविशेषविन्यासं चकटिका: यथा- उसी विचित्न (मागे) का दूसरे ढग से लक्षण करते है-अलकूारस्ये- त्यादि (३५वी कारिका के द्वारा) । जहाँ सर्थात जिस माग मे कवि लोग (एक ही अलद्धार के प्रयोग से) असन्वुष्ट होकर अलद्धार अर्थान (एक) विमूषण के अलद्वूरणान्तर अर्थात् दूसरे विभूषण का निवन्धन अर्थान् रचना करते हैं। किस प्रकार से-हारादि के मणिबन्ध के संमान। जैसे'. (चंकटिक) मुक्तावली इत्यादि (रत्नो) के पदक आदि (रूप मे मणियो का बन्ध अर्थात् विशेष रत्नो का वित्यास (करते हैं)। जैसे- दे हेला जित बोधिम स्वव चसा कि विस्तरै स्तोयघे- नास्ति त्वसटरः पर: परहिताघाने गृद्दीतघ्रतः। तृप्यत्पान्यजनोपकारघ टनवैसुख्यलब्घायश भारप्रोडहने फरोपि कृफ्या साहायकं यन्मरोः॥ 0 ।। सीलामात्र से भगवान् बुद्ध को जीक्ष लेने वाले हे सागर (महाराज) ! (आपकी तारीक करने के लिए) वाणी के अधिक विस्तार से क्या (लाभ सर्यात् ज्यादा कहने की जरूरत नहीं। वास्तव मे) आपके समान (ससार भर मे) पशेपकार करने का वत प्रहृण करने वाला कोई दूसरा नहीं (दिखाई चडता) है। जो तुम प्यासे राहियो का (पानी पिलाने रुप) उपकार करने से डिमुख होने के कारण प्राप्त अवथयश के भार को वहन करने में, कृपापूवष मरस्पल की सहायता करते हो॥। ६० ॥। अत्रात्यन्तगर्हणीयचरितं पदार्थान्तरं प्रतीयमानतया चेतसि निधाय तथाविघविलसितः सलिलनिधिर्याच्यतयोपफान्तः। तदेवाषदेषा
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प्रथमोन्मेष १२७
सानमपि वाक्यं वरुनुन्युपव्रमरमणीयत्तरयोपनिबष्यमानं तद्वि- दाहादकारितामायाति। तदेतद् व्याजम्तुनिप्रतिरूपकमाययमलक्करणा- न्तरमप्रस्तुतप्रशंसायष भूषणत्वेनोपालम्। न चात्र सङ्रालङ्कारव्यवहारो भवितुमहंति, पृथगतिपरिस्फृदतेनाघभासनात्। न चापि ससृष्टिसभव. समप्रधानभावेनानवस्थितेः। न च द्वयारपि वाच्यालद्ठारत्वमू, विभिन्ननिषयत्वात्। यथा वा- यहाँ पर (कवि ने) प्रतीयमान रूप से (किसी) अत्यन्त निन्द चरित्र चाले किसी (कंजूस धनवान रूप) अन्यै पदार्थ को हृदय मे स्थापित कर जमी प्रकार के व्यापार वाले ( अर्थान जैसे किसी धनाढघ व्यक्ति के पास अपार धन होता है लेकिन स्वभावत कजूस होने के कारण वह निर्धनो को धन देकर सन्तुष्ट नही कर सकता, उसी प्रकार समुद्र भी बयाह जल से भरा हुआ होने पर भी जलामिलायी किसी भी प्यासे राही को ( जारा होने के कारण अपेय) जल को पिला कर सन्तुष्ट नही कर सकता। अत दोनो के समान व्यापार वाला होने के कारण समुद्र को वाच्य रूप से बर्गित किया है। (इस श्लोक मे बस) इतना ही अप्रस्तुतशसा नामक सलद्वार का स्वरूप है। निन्ध चरित्र वाले धनाढय, कृपण रूप प्रतीयमान दूमरे पदार्थ मे समाप्त होने वाला भी यह श्लोक (सागर चरित्र रूप वर्ष्य) वस्तु मे बत्नपूर्वक आरम्भ की रमणीयता से उपनिबद्ध होकर सहृदयो को मह्लादित करने मे समर्थ होता है। तो इस प्रकार यह व्याजस्तुति रूप अन्य अलद्वार को अम्स्तुतप्रशसा के अलद्वार रूप मे (कवि ने) ग्रहण किया है। (अर्थान् यहाँ पर कवि ने वाच्य रूप से व्याजस्तुति अलद्धार को उपनिबद्ध किया है। व्याज-स्तुति का लक्षण 'अलद्वारसवस्वकार राजानक रुय्यक ने इस प्रकार दिया है-"स्तुतिनिन्दाभ्या निन्दस्तुत्योगंम्यत्वे व्याजस्तुति" सर्थान् जहां पर वाच्य रूप से वर्ष्यमान स्तुति एव निन्दा के द्वारा कम से निन्दा और स्तुति गम्य प्रतीयमान) हो, वहाँ व्याजस्तुति अलंद्वार होता है तथा उन्होंने उदाहरण के रूप मे भी इम पद्य को उद्धृत किया है यहां पर स्तुतिमुसेन समुद्र की निन्दा की गयी है अर्धान् वाच्य रूप से तो समुद्र की प्रशसा की गई है कि आपके ससान कोई परोपकारी है ही नहीं लेकिन उससे गम्ब होती है समुद्र की निन्दा कि तुम इतने नीच हो कि अपाह जल से युक्त होते हुए भी प्यासो की प्यास नहों बुझा सकते। साथ हो कवि ने समुद्र के चरित्र के व्णन द्वारा किसी निन्ध चरित वाले कजूस धनी व्यक्ति के चरित को प्रस्तुत किया है जो कि सागर की भाति अपार
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१२८ वकोकिजीवितम्
धन से मुक्त होते हुए भी धनाभितापी निर्धनो का धन देकर उपकार नहीं कर सकता। इस प्रकारह अप्रस्तुतप्रशसातद्वार भी प्रतीयमान रूप से उपतिवद्ध दिया गया है। इस प्रकार यह अप्रस्तुतप्ासालदार व्याजस्तुति मलद्दूार से और भी घलड्हत हो जाता है)। और न नहां पर अ्स्तुताप्रपसा तथा व्याजस्तुति के सङूरानद्वार का ही व्यवहार हो सवना है बलग अलग दोनों के स्पष्टरूप से प्रतीत होने के कारण। (अर्थान सन्देह-सडूर इसलिए नही हवीकार किया जा सकता कयों कि दोनो अलग-अलग स्पष्ट सलकते है सदेह की काई गुजाइण नहीं। बङाद्भ्रिभाव संडुर भी नहीं माना जर सकता बयोकि दोनों मे से कोई भी किसी के अङ्गरूप मे उपात्त नहीं किया गया एव एकाषयानुप्रवेश भी नहीं माना जा सकता षयोकि दोनी के आकय अलगअलग है वर्षात् एक का आशय प्रतीयमान है दूसरे: का आश्रम वाच्यार्ये है)। तथा दोवों के समप्रजान भाव से स्यत न होने के कारण दोनों की समृष्टि भी सम्भव नहीं है। (ब्योंकि वाप्यरूप से दोनो अलकार नहीं उपात हुए अत दोनों का सम प्राधान्य नहीं कहा जा सकसा)। तथा दोमो अलकार वाब्य भी नहीं है, दोनों का विषय मिश्न होने, से अर्थान् एक का विषय वाच्मार्थ है दूसरे का प्रतीयमान। अत सिद्ध हुआ कि यहाँ व्याजस्तुति का प्रयोग पप्रस्तुतप्रशंसा के अलंकार रूप मे किया गया है पयोकि कवि केवल अप्स्तुतभ्शसाजन्य चमत्कार से सतुष्ट नहीं था)। अथवा जैसे इसी का दूसरा उदाहरण- नामाप्यन्यतरोर्निमी लित मभ् त्तताबदुन्मी लितं मस्थानें रखलतः स्ववत्मनि विधेरन्यद गृहीतः करः। लोकश्रायम टष्टदर्शनकृतादू द्ृग्वैशसादुद्घृतो युक्ततं काष्टिक जूनवान् यदसि तामाम्रालिमाकालिकीम् ॥॥॥ है काछवाहक (महाचय) आपने बड़ा ही अच्छा किया जो उस असामयिक:(बिना फसल के बारहो महौने फल देने वाली) बाम (के पेड़ो) की पक्ति को काट बाला। (वयोकिउससे जो) सन्य वुक्षो का नाम भी समाप्त हो गया या उसे आपने प्रकट कर दिया (यह पहसा लाभ हुआ) तथा अपने मार्ग में पलते समय गिरते हुए ब्रह्मा का हाथ पकड लिया (अयत् उन्हे सहारा दिया) यह दूस्षरा (फल प्राप्त हुआ) तपा इस सौक का अदुष्ट के दर्शन से जन्य नेत्रो के कष्ट से उद्धार किया (यह तीसरा लाभ हुआ) ॥। ६१ ॥ टिप्पणी-कवि से इस पद् में पू्व उदाहृत पद् की भाति वाष्य रूप से
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प्रथमोन्मेप: १२१
तो लक्डहारे की प्रशसा की है लेबिन उससे गभ्य हो रही है तद्विषयक निन्दा कि तुम बडे नीच हो, योकि तुम इस बात को सहन न कर सके कि लोग सभी समय अच्छे-अच्छे माम के मधुर फलों का सेवन करें। मवः ईष्याश हर समय आऊफ्ल देने वाली उस आम्र वृक्षो की पक्ति को काट डाला इस प्रकार यहाँ स्तुतिमुसेन निन्दा के प्रस्तुत होने से व्याज-सतुति अनकार है। साथ ही इस लकडहार के चरित-वर्णन द्वारा कवि ने उस नृशस पुरुष का व्णन प्रस्तुत किया है जिसने सदव परोपकार में रत रहने वाले किसी महापुरुष का विनाश किया है अत प्रतीयमान ढंग से यहाँ अप्रस्तुतप्रससालकार उपनिबद्ध किया गथा है। वह मप्रस्तुतप्रशंसा अलकार उक्त ष्याजस्तुति अलकार से और अधिक शोभायुक्त होकर मलंकृत हुआ है अत इस उदाहरण मे भी व्याजस्तुति खलकार का उषनिबन्धन कवि ने अप्ररतुतप्रशंसा मात्र अलंकार से असन्तुप्ट होकर उसके अमकार रषप में किया है। इसीलिए आचार्य कुन्तक कहते हैं कि- अन्नायमेव न्यायोऽनुसन्धेयः। यथा प- कि तारुण्यतरोरिय रसभरोदिमा तवा वल्लरी लीलाप्रोच्छलित स्य कि लहरिका लावण्यवारांनियेः॥ उद्गाढोत्कलिकावतां सवसमयोपन्यासविभम्मिण: + कि साक्षादुषदेशय्स्थवा देवस्य मृझारिणः॥३२॥ यह! भी यही न्याय अपनाना चाहिए। (जिस पूर्व उदाहृत "ह हेलाजित" .. ""इत्यादि पद्म मे अपनाया गया था)। और जैसे ( इसो का सीसरा उदाहरण )- (किसी नायिका के सौन्दर्य का वर्णन करता हुआ कवि कहसा है कि)- क्या यह (सुन्दरी) ताह्ण्यरूपी वृक्ष की रस के अतिशय से उत्पन्न नूतन सतिका है या कि पाचत्यवतर उछले हुये लावण्यरूपी सागर की तरंग है? त्रपवा तीव्र उत्कम्ठावाले प्रेमीजनों को अपने सिद्धान्त (प्रेम) का पाठ पढ़ानेवाले शुद्गार-देवता (काम) की उपदेश-पष्टि है।। ६२ ।। अन्र रूपकलक्षणो योडयं वाक्यालङ्वार: वस्य सन्देहोिरिय
- यहाँ पर उपथार के बल पर जो सुन्दरी नायिया पर बहमरी महरिक़ा एवम् उपदेश मष्टि का आरोद किया गया है इस एृप का को पक नामक
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शनेष प्रयुक्त अलंकार है उसमे शोमाधितम को उत्पन्न करने के लिए उपनिबद्ध की गई यह सन्देह की उत्तिरप सन्देहालद्वार सहुदवो को आ्रनन्द प्रदान करती है। (अर्थान् यहा पर वान्यरप मे सन्देहालकार तो इवि ने निबद किया है जो कि प्रतीय मान रूपक अल कार के अल का रहप में पयुक्त हुआ है। तात्पय यह है कि यहां प्रतीयमान रूपक बलंकार वान्यरून सन्दहालकार से वसंकृत होकर किसी अपूर्व चमरकार की सृष्टि करता है। इसलिए यह! भी कवि ने केवल प्रतीयमान रूपक से असन्तुष्ट होकर उसके लिए मन्देहरूप अन्य बलंकार की सृष्टि की है।) ये बाने पहले उदाहृत दोनो शनोको की भाति समझ मेनी चाहिए। ( अर्थान् इन दोनो अलकारों मे सदुर नया समृष्टि को नहीं स्वीकार किया जा सकता, दोनों के अलग-अलग स्फुटरूप से प्रतीत होने से तपा समप्राधान्य से स्यित न होने के कारण) तथा देनों को वाब्य ही बलंकार ने समक्ष लेना चारिए वर्शेकि दोनों का विषय भिन्न है)।
अन्यच कोहक-रत्नेत्यादि। युगलकम्। यत्र यस्मित्रलद्गारै- भजमानेर्निजात्मना स्वनोविनेन आसमानैमुपाये परिकल्प्यते शोभाय भूष्यते 1, कथम्-यथा भूषय, कुकणादिमि:। कोटशै-
विधाय। भूषाये कलष्यते नद्देवालकुरणैव्रभादिभिर्यत्र कल्प्यते। एतच्चैतेषां भूषाये कन्पनम्-यहेतै स्वशोभातिशयान्तःस्थ निजकान्ति- कमणीयान्वर्गतमलह्वार्यमलद्करणोयं प्रकाशयने द्यात्यते। नदिदमत्र तात्पर्यम्-तदलक्वारमहिमैत तथाविवोऽत भराजते, तस्यात्यन्तो- द्रिकवृत्ते: स्वशोभा तिशयान्तर्गतम लक्टाय भकाशयते। यथा- (इस तरह विचित्-मार्ग के एक प्रकार का वर्णन कर दूसरे प्ररार को बदाते हैं फि) और कैसा है (वह विचित्न मार्ग)-रलेत्यादि, ३६ एवं ३७ वीं कारिकाओं के द्वारा इसका प्रतिपादन करते हैं। जहाँ अर्थान जिस (मार्ग) में बपनी आत्मा मर्थात् अपने प्राणों (स्वरूप) से प्राजमान अर्थान देवीप्यमान अलंकारों के द्वारा भृषा अर्थान् शोभा के लिए परिकत्पित अर्थात् भूषित की जाती है। कंे-जंसे -ककूणादि भूषणो के द्वारा। किस प्रकार के (भूषणो द्वारा)- रनरशिियों की छदा के वक्सेक से भासुर अर्थान भणियों की किरणों के उल्सास से पमरने हुए ( बमूषणों) द्वारा । क्वा करके-कान्ता के शरीर को जन्छादित कर अर्यात् रमगी के शरीर अपनी ज्योसि के विस्तार से तिरोहित कर। भूवा के लिए कहिपित् किया जाता है
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प्रथमोन्मेप: १३१
अर्थान् उसी प्रकार (जिस प्रकार कि रमणी के शरीर को फटक-कुष्डलादि अलकारो से ढँककर विभूषित किया जाता है उसी प्रकार) जहाँ उपमा आदि अलंकारो के द्वारा (अलंकार्य की) प्रकाणित किया जाता है। इुन उपमा आदि अलकारो का सोभा के लिए निबन्धन इस प्रकार होता है। कि ये उपमा आदि अलकार अपनी शोभातिशय के अन्दर स्थित अर्याद मपनी कमनीय कान्ति के अन्तगत अलङ्ाय अर्थात अलकृत करने योग्य (चस्तु) को प्रकाशित करते हैं। तो इसका तात्पर्य यह हुय कि उन अलकारो की महिमा भी उस प्रकार से शोभित होती है कि अत्यन्त उदिक स्थिति वाले उस (बलकार) सौन्दर्मातिशय से अन्तर्मृत अलंकार्य प्रकावित होता है। ज. से- आयत्याजिमिहोत्सवव्यसिकरे नासंविभकोऽत वः कश्चित् दाप्यशिष्यते त्यजत रे नकवरा: संभ्रमम् भू्यिष्ठेष्वपि का भवत्सु गणनात्यर्थ किसुसान्यते
है निशाचरो1 तुम सब वारय (धीराम) के समररूप महोत्सव के सम्बन्ध में ( कि हमे शायद हिस्ता न मिल पाये इस प्रकार की) जल्दवाजी को छोड दो, (कयोकि) यह। तुम मे से कोई भी कहीं भी बिनर हिस्ल पाये शेष नहीं रहेगा (अर्यात् सब को रामपन्द्र भारेगे)। यदि तुम समसते हो कि सुम्हारी सख्या बहुत है कैसे सबको हिस्सा मिलेगा, वो यह समझना ठौक नहीं क्योंकि) बहुत से होने पर भी तुम्हारी क्या गणना है (तुम लोग बेकार ही) अत्यध्िक, उतावले क्यो हो रहे हो, (सभी को हिस्सा मिलेगा क्योकि) विशाल भुजाओं की ग्मो से बुक् उन राम के न सो खभी (राक्षसवघ रूप) आचार समाप्त हुए हैं वर्यात् राक्षसरय करने में कृपणता नहीं आई है) और न (राक्सवध करने की सक्तिरूप) सम्पतिया हो (समाप्त हुई है अर्थान् उनके पास राक्षसवस करने की अवाह् शक्तिि विदयमान है। अतः आप लोग बबड़ामें नहीं सबका बध होगा।। ६३। अ्त्राजेमहोत्सवव्यतिकरत्वेन वथाविध रूपण विद्िवं यत्रा- लक्टार्यम् "आर्यः स्पशीरयेण युष्मान् सर्वानेष मारयवि" इत्यज्ञार- शोमातिशयान्तर्गतत्वेन भ्राजते। तथा व कश्वित् सामान्योऽवि कापि दृवीयस्यपि देशे नासंविभक्को युष्माकमवशिच्यते। सरमाव् समरमह्ोत्सवस्रविभागलम्पटवया प्रत्येक यू्यं सम्भमें स्पअय । गणनया वयं भूयिष्ठा इत्यराच्यानुष्ठानतां यदि मन्यजे सचप्य-
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१३२ वकोक्ितीवितन
युक्कन्। यस्मादसंर्यसंविमागाशक्यता फदाचिद्सम्पत्या कार्पण्येन षा सम्भाव्यते। तदेतदुभयमपि नास्तीत्युक्तम्-तस्योदारभुजोष्मणो- इनवसिता नाचारसम्पतयः [इति]।यथा च- यहाँ पर सग्राम का महोत्सव के साथ सम्बन्ध बताकर उस प्रकार के रूपक की सृष्टि की गई है जिसमे अलंकार्म "आये अपनी बीरता से तुम सघ का वघ करेंगे" यह अलंकार (रुपक) की शोभा के आधिक्य के अन्दर समाया हुआ दिखाई पडता है। जँसा कि तुम सब मे से कोई साधारण भी (राक्षस) बहुत दूर के भी देशों मे कहीं भी बिना हिस्सा पाये नहीं शेष रहेगा। इसलिए संग्रामरप महोत्सव के समुचित हिस्सा पाने की लम्पटता के कारण सुममें से हर एक (राक्षस) जल्दबाजी (उतावली) को छोड द। गिनसी में हम लोप बहत ज्यादा हैं, इस लिए (सब के विभाजन का) अनुस्ान असम्भव है। यदि ऐसा आप लोग समझते हैं तो वह भी उचित नहीं है। वर्योंकि वसंख्य लोगों में विभाजन की असम्मंता तो कवाचित् स्म्पात का बभाव होने से अपवा (सम्पतति होते हुए भी बाटने की कपणता के कारण ही सम्भव है। लेकिन मायं के पास (सम्पतति का बभाव अथवा कपणता) मे दोनो ही नहीं हैं इसे-'विशास भुजानो की उष्णता से युक्त उन (आायं) के न बदार ही समाप् हुए हैं बोर न सम्पत्तियां ही' इस कथन के द्वारा प्रतिपादित किया जा चुका है। (इस प्रकार इस श्लोक में बलंकाय अलकार के शोभातिशय मे समाया हुआ प्रतीत होता है। मत. यह विचिन्नमोंगें का उदाहरण हुआ)। औौर जैसे (इसी का दूसरा उदाहूरण) कतंभ: प्र विजम्भितविरहव्यय: शन्यतां नीतो देशः ॥a8॥ अत्मधिक बढ़ी हुई विरह की व्यमा से युक्त कौन-सा देश (आपने) मून्य कर दिया है॥ ६४ ॥। इति। यथा प- कानि प पुण्यमास्चि मजनत्यमिस्यामक्षराणि:।। र४ ॥शवि। इस वाकय में और जँसे-( इसी प्रसन्स में) तथा कौन से पुष्पदान् वर्ण आपके नाम का आाधमम परयेह॥ ८ इस वाक्य में- अत्र कस्मादागता: स्थ, कि चास्य नाम इत्यलट्टा्नेमत्रस्ूय प्श्साल कपालपारष्छा याएछुर्तत्वेन तदीयशोभान्तर्गवत्वेन सारक
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प्रथमोन्मेष:
दृदयाहादकारिता प्रापितम्। एतच्च व्याजस्तुतिपर्यायोकतप्रभृतीनां मूयसा विभाव्यते। यहाँ (कभ से) 'आप कहाँ से माये हैं,' तपा 'इनका नाम क्या है' ये ही अलंकार्म, अपस्तुतप्रशप्ता रूप अलंकार की शोभा से युक्त होने के कारण इसी ( अप्रस्तुप्रससा अलंकार की शोभा में समाये हुए हो सहृदयों के हृदमों को आह्लादित करते हैं। ( इस प्रकार का) यह (वंचित्र्य) व्याजस्तुति तथा पर्यायोक्त आदि (अलकारों) मे प्रचुरता से देखा जाता है। नमु च रूपकादीनां स्वलक्षणावसर एवं स्वरूपं निर्णेष्यते तत् कि पयोजनमेतेपामिहोदाहरणस्य ? सत्यमेतत्, कि्तवेतदेव विचित्रस्य वेचितयं नाम यदलौकिकच्छायातिशययोगित्वेन भूषणोपनिबन्धः कामवि वाक्यवकतामुन्मीलयति। (क्योकि प्रकरण यहां विचिनमार्य का चल रहा है लेकिन वदाहरण रूपक, अप्रस्तुतप्रशंसा, व्याजस्तुति आदि अलंकारो के दिये जा रहे हैं, तो पू्वपक्षी यह देख कर शंका करता है कि- रूपक आदि अलंकारों के स्वरूप का निर्मय तो उनका लक्षण करते समय ही किया जायगा तो उनके उदान हरणो को यहां (विचिनमाम के प्रसङ्ग में) क्यों उदसुत किमा जा रहा है? (इनका उत्तर देते हैं कि) यह बात सही है (कि रूपकार्दि के स्वरूप का निणम उनका लक्षण करते समय होगा अत यहाँ उनके उदाहरण न प्रस्तुत किये जाने पाहिए) किन्तु विचिन (मारग) का तो यही वेचिश्य ही है कि (उसमे) अलौकिक शोभा के अवविशय से युक्त रूप मे ही अलंकारों का प्रयोग किसी (अनिर्वचनीय, अपूर्वं) वाक्यवकता को उम्मीलित करता है। (अत उसे समझाने के लिए यहाँ भी रूपकादि अलंकारों के उदाहरणों को उद्घुत करना आवश्यक हो गया है।) विचित्रमेव रूपान्तरेण लक्षयति-यद्पीत्यादि। यदवि वस्तु वाच्यमनूतनोल्लेख मनभिनवत्वेनोल्लिखितं तदपि तन्र यस्मिमलं कामपि काष्ठां नीथते लोकोन्तरातिशय फोटि मषिरोप्यते ।
(अब) विचिन्न (मार्ग) को ही दूसरे केग से प्रतिपादित करते हैं- 'मदपि' इत्यादि (३८ वीं कारिका के द्वारा)। (जिस मार्म में) जहाँ जो भी वाज्पवस्तु अनूतनोल्लेख कर्थान) दूर्व कवियो द्वारा उल्लिबित होने के कारण) अभिनव रूप से नहीं चितित होती यह भी पर्माप्ठ किसी कारजा को
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१३४ मे बाई जाती है धर्थात् अलौकिक) सौन्दर्य के) अतिशय की कोटि पर स्वापित कर दी जाती है। किस प्रकार से-उत्तिवचित्रमान से अर्त मेवत कहने के दङ्द की धतुरता द्वारा (सौनदर्य की परकाष्टा को पहुँचा दो जाती है)। जँसे- अण्ण लवहत्तणअं अण्णं सित्र काइ वत्तणच्छाआ। सामा .सामण्णपझावइणो रेह बिअ ण होई।।।६।। (सन्यदू लटभत्वमन्येव च कावि वर्तनच्छाया। श्यामा सामान्यप्रजापते रखैव च न भवति)॥ कवि मोळमवर्षीया मुन्दरी 'प्यामा' का वर्णन करता हुष कहता है। बिसका सरीर जाएे मे गरम, गर्भो मे ठढा रहता है एवम् सभी अङ्भो से मोमा सम्पस होती है पंसा उसका लक्षण बताया गया है कि- शीतकाले भवेदुष्णा प्रीष्मे प सुखशीतसा। सर्यावययशोमाठभा सा इयामा परिकीतिता॥ इस प्यामा की मुकुमारता दूसरे ही प्रवार की ( अनिवंधनीय) है एदम् शवीर की कान्ति कुछ (मलौकिक) ही है (ऐसा समझ पडता है कि वट्। इ्यामा सामान्य प्रजापति की सृष्टि ही न हो। (अर्दात् वह ऐसे मसोफिक सोन्दर्य से बुक्त है कि बैसा सोन्दय सामान्य प्रजापति की सृष्टि में सम्मव ही महीं है, अत रसकी रचना उनसे मिस्न किसी दूसरे ने ही किया होगा। दरहा पर वदपि 'श्याम' का वर्णन बोई नवोन दर्णम नहीं है फिर भी कवि ने केवल उकति के वचित्यमात से इस वर्णन में अपूर्ष चमर्कार सा दिया है) ॥। ६६ ।। यया षा- सहेशोडयं सरसफद सीर्शेणशोभा तिशायी उश्ोत्कर्याछ्करितहरिणीविभ्रिमो नर्मदायाः। कि पेतस्मिम् सुरतमुहकस्तन्ति ते षान्ति बाता येपामप्रे सरत सिताकाण्डयोवो मनोभू:।।६७।। अपवा जैसे (इसी का दूसरा उदाहरण)- (कोई प्रेमी सपमी प्रेमिष से कहता है कि) हे सुन्दा! सबस (हूरे- नरे) केसों की बसारों से सरपक्ष शोभा के अतिशय से युक्त सया पुञ्जों के उस्पर्म से हरिनी के विभासी को यपुरित करने वासा नर्मदा नदी का यह वदेश है औौर इस (प्रदेश) मे सममोग के मिन्र वे हषाएं महती ह जिनके मागे मनवसर में भी कोषित होया हुआ कामदेव चलता है। १७ ।
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प्रथमोम्मेष:
भणितिवैचित्र्यमात्रमेवात्र काव्यार्थः। न तु नूतनोल्लेखशालि वाच्यविजुम्भितम्। एतच्च मणितिवैचित्रयं सहस्रप्रकार सम्भवतीति स्वयमेवोत्प्रेक्षणीयम्। यहाँ पर भी केवल सति-वचित्रयमात् ही काव्य का अर्थ है न कि नवीन उल्लेख से शोभित होने वाला वाच्चार्य का विलास। यह उक्ति का वैचित्र्य अनेको प्रकार का सम्भव हो सकता है अत. सहृदय तोगो को उसे स्वय जान लेना चाहिए। पुर्नवचचित्रमेव प्रकारान्तरेण लक्षर्यात-यत्रान्यथेत्यादि। यत्र यस्मिल्रन्यधाभवदन्येन प्रकारेण सत सर्वमेव पदार्थजानम्-अन्ययव प्रकारानतरेणैव भाव्यते। कथम-यथारुचि। स्वर्प्तभासानुरूपेणो रपद्यते। केन-पतिभोल्सेखमहक्वेन महाकषे:, प्रततिभासो=मेपाति शयत्वेन सत्कवे: । यव्कल वर्ण्यमानस्य वरतुनः प्रस्तावसमुचित किर्माप सहूदयहृद यहारि रूपान्तवं निमिमीते कवि । यथा- फिर विचित्र मार्ग को ही दूसरे ढंग से लक्षित करते हैं-"यत्रान्यथा"*1 (इत्या दि (३६ वी कारिका के द्वारा)। जहाँ अर्थात् जिस (मारगं) मे अन्यथा स्थित अर्धान् अन्य ढग से विद्यमान सारा का सार पदार्थ समूह अन्यथा ही अर्थात् दूसरे ही ढग से दिखाई पडता है। कसे-मयारुचि। अपने अनुभव के अनुसार उत्पन्न होता है। किस कारण से-महाकवि की प्रतिभा के उल्लेख की महत्ता से अर्थात् श्रेष्ठ कवि के अनुभव के इन्मेप के अतिशय से। तात्पर्य यह है कि कवि प्रकरण के अनुरूप वर्ण्यमान वस्तु के किसी कपूवं सहृदयो के मनोहारी अन्य स्वरूप की सृष्टि करता है। जैसे- साप: स्वात्मनि मंत्रित द्ुमलतासोपोड्वगैवर्जनं सकगं दुःशमया तृपा तव मरो कोऽसावनर्थो न यः। एकोजर्थस्तु महानवं जललवस्याभ्यस्भयोद्गजिन: समसन्ति न यत्तवोपफृतये धाराघराः प्राकृताः॥८॥ हे मरुस्थल ! तुम्हारे मपने शरीर के अन्दर ताप, (सुम्हारे) आघित वृक्षो एव सत्षाओ का सूख जाना, राहिमो के द्वारा (तुम्हारा) पारत्याग तथा बढे हो दुख के साथ शान्ति होने वाली पिपासा के साथ (तुम्हारी) मित्रता (सब तो है) कौन ऐसा अनम (शेव बचता) है जो सुम्हारे पास न हो (अर्थात् सभी मनर्य सुम्हारे वं्दर विधमान है)। हो! एक महान् अर्भ (गुभ) आपके पास यह ( बबर्ब) है वि जन के
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(थोड़े से) कणो के आधिपत्य के घमण्ड से गरजने वाले पामर जलघर सुम्हारे उपकार के लिए तंभार नहीं होते।। ६८।। टिप्पणी-पहा पर कवि ने अप्नस्तुतप्रशसा अलद्वार को बडे ही सुन्दर बंग से प्रस्तुत किया है मकस्थल के माध्यम से वह प्रतीपमान रूप से किसी उस उदार व्यक्ति का वर्णन प्रस्तुत करता है जो कि निर्घन है किन्तु स्वाभिमानी है। थोडा-सा धन पाकर घमण्डी हो गए लोगो के द्वारा अपने को उपकृत नहीं करना चाहता, बल्कि स्वय अन्य लोगों के द्वारा अपनी निर्घनता के कारण किए गये त्याग रूप अपमान को, अपने आधित स्त्री-पुन्नादिको के कष्ट को, सथा उससे उत्पन्न मपने दुख को सभी को सहन करने को संपार है। चथा था- विशति यदि नो कव्वित्कालं किलाम्बुनिधिं विधे: कृतिपु सफलास्वेको लोके प्रकाशकतां गतः। कथमितरथा धाम्नां धाता तमांसि निशाक्र स्फुादिदमियत्ताराधर्क प्रकाशयति र्फुटम् ॥ ६६ ।। विघाता की समस्त कृतियों में लोक में मकेला प्रकाशक प्रकाश को सारण करने वाला (सूयं) कुछ समय यदि सागर मे प्रवेश नहीं करता, तो मला फिर यह अ्वकार, चन्द्रमा एव चमकते हुए इनने (बडे) इस नक्षत्र-समूह को स्पष्ट रूप से कैसे प्रकाशित करता ॥ ६ै६॥ अत्र जगद्गहितस्यापि मरोः कविप्रतिमोल्लिखितेन लोकोसरी दार्यधुराधिरापणेन वाहकू सवरूगननरमुन्मोलित यप्रनोयमानतवेनी- वारचरितस्य कस्यापि सतस्तध्युचितपरिस्पन्द्सुनरेयु पदार्थनवस्त्रपु सदेव व्यपदेशपात्रनामहतोति सात्पर्यम्। अवयवार्थस्तु-दुशमयेति 'मृदू-विशेषणेन प्रतोयमानस्य वेलञोक्यराजपेनाप्यपरितोपः पर्यवस्यति। समुषित मंविभागासन्मषादर्षि- मिलग्जमानरपि स्वयमेवानभिमरणं प्रतीयते। ममिनद्ुमलनाशाप इति तदाभितानां तथाविधेडपि सक्कटे तदेकनिष्ठताप्रनिपात्तः। नस्य व पूर्शोकस्तपरिकरपरितायाक्षमतया तापः स्वात्मनि न भागल रलक्ये नेति परतिपरते। छत्तरार्घेन-ताटशे दुर्षिलमितेऽपि परीषकार- विपयत्वेन श्लापास्पदृत्यमुन्मीलितम्। यहाँ (पहले उदाहरण में) संसार में कुत्सित (रूप मे प्रमिद्ध) भी रेगिस्ान का, कबिहकि द्वारा वर्णिति लोकातिशायी औदाय की बरम सीमा को
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प्रथमोन्मेप: १३७
पहुँचा दिए जाने के कारण, वैसा दूसरा स्वरूप उन्मीलित हुआ है जो कि प्रतीयमान रूप से इस अभिप्राय को व्यक्त करता है कि, (दूसरे) हजारो सपने उचित स्वभाव से सुन्दर पदारथों के विद्यमान रहने पर भी केवल वही ( रेगिस्तान ही) किसी भी उदारचरित वाले ( व्यक्ति) की सज्ञा का भाजन बनने योग्य है (दूसरे पदार्थ नही)। वैसे इसका प्रतीकार्य तो यह होगा-'पिपासा' के 'कष्टपूर्वक शान्ति होने वाली' इस विशेषण के द्वारा प्रतीयमान (व्यक्ति) की तीनो लोको के राज्य की प्राप्ति से भी असन्तुष्टि का बोध होता है। 'राहियो द्वारा परित्याग' इस (वाक्य) उदारता के रहने पर भी उसका समुचित सविभाजन सम्भव न होने से स्वय लजाते हुए से प्राथियो द्वारा (उसके पास) न आने का बोध होता है। 'आश्रित वृक्षो एव लताओ का सूख जाना' इस (चिशेषण) से उसके आधितो की उस प्रकार का सकट पडने पर भी केवल उसी पर आश्रित रहने का बोध होता है। अर्थात् उसके परिजन सकट मे उसे छोड कर दूसरे का आधय नहीं करते) । और इस प्रकार 'उस (प्रतीयमान व्यक्ति) का अपने भीतर सन्ताप पहले कहे गये अपने कुटुम्बियों को सन्तुष्ट करने मे असमर्थ होने के कारण है न कि अपने अल्प भोग की नालन सै' यह बात प्रतीत होती है। उत्तराद्ध के द्वारा उस प्रकार के दुविलास के विद्यमान रहने पर भी उस ( उस व्यक्ति की) परोपकारविषयक प्रजसापातता को उन्मोलित किया कया है। अपरत्रापि विघिविहितिसमुचिततमयसम्भवं सलिलनिधिभज्नं निजोद्यन्यककृतनिखिलस्वपर पक्ष' प्रजापतिप्रणीतसकलपदार्थप्रकाशन- वनाभ्युपगमनिर्वह्णाय विवस्वान् स्वयमेव ममाचरतीत्यन्यथा कदाचि- •दपि शशाङ्कतमस्तारादीनामनिव्यक्तिर्मनागपि न सम्भवतीति कविना नूतनत्वेन यदुक्लिखितं तदतीतप्रतीयमान महत्त्वव्यक्तिपर खेन चमत्कार- कारिमामापदते। दूसरे (उदाहरण) मे भी विधि-विधान के अनुरूप (अपने) समया- नुसार होने बाले ( सूर्य के) सागर मे डूबने को कवि ने जो इस नये ढग से वागत किया है 'कि अपने उददय से सारे के सारे अपने व मत्र के पक्ष की तिरस्कृत कर देने वाला सूर्य स्वय ही विधरिविहित समस्त पदार्थों के प्रकाशित करने के व्रतपातन का निर्वाह करने के लिए (समुद्र मे डूबने का) वाचरण करता है नहीं तो कभो भी चन्द्रमा, अन्छकार और नक्षनादिक की चोटो मो अभिव्यकति नहीं सम्भव हो सकती' वह (कवि का नवीन
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१३५ वकोकिजीवितम्
वर्णन) प्रतीयमान महिमाशाली व्यक्ति का बोध करता हुआ अत्मन्त माहादकारी हो जाता है। विचित्रमेव प्रफारान्तरेणोन्नीलयति-प्रतीयमानतेत्यादि। यत्र यस्मिन् प्रतीयमानता गम्यमानता माव्यार्थस्य मुख्यतया विवश्षिवस्य वस्तुनः कस्यचदना्येयस्य निमध्यते। कया युक्त्या-वाच्यवाघक. युतिभ्या शब्दार्थशकतिभ्याम्। व्यतिरिकस्य तदतिरिककवृत्तेर्यस्य व्यग्यभूतस्याभव्याक: करियते। 'पृत्ति'शब्दोडत्र शब्दार्थयोस्तत्प्रकाशन- सामभ्यमभिधने। एप घ 'प्रतीयमान'व्यवहारो वाक्यवकताव्याख्याना- घसरे सुवरा समुन्मी्यते। अनन्तरोकमुदाहरणद्वग्यन योजनीयम्। यथा वा- विनिन्न (मार्ग) को ही दूसरे ढग से प्रस्तुत करते है-प्रतीयमानता- इत्यादि (४० वी कारिका के द्वारा)। जहाँ अर्थान् जिस् (मार्ग) मे काध्यार्थं अर्थान प्रधान ढगसे कहने के लिए वभिप्रेत किमी मनिर्वाच्य वस्तु की प्रतीयमानता अर्थात् व्यन्तुपरूपता (गम्यमानता) का (कवि द्वारा निबध्धन किया जाता है। किस ढङ्ग से-वाध्य और याचक की वृत्तियो द्वारा अर्थात शब्द और अर्थ को (प्रकाशक) शक्तियो के द्वारा। व्यतिरिक्त अर्थात् उस (शब्द और अर्थ की प्रकाशक अभिवा शक्ति) से भिन्न (व्यजना) शक्ति वाले अन्य व्यङ्तुपभूत (पदार्य) को प्रकाशित किया जाता है। यहां (कारिका के-'वाच्यवाचकवृतिभ्याम्'-मे प्रमुत्त) 'वृत्ति' शब्द, शब्द तथा अर्थ के -उम (व्यङ्गमूत अ्थ) के व्यकत करने की सामथ्यं का बोध कराता है। और यह व्वमुप (प्रतोयमान) अर्म का व्यवहार वाक्यवकता की व्याव्या परते समय मली नाति सुस्पष्ट हो जायगा। इस उदाहूरण रूप मे अभी-अभी उदाहूत किये गये ("सापः, स्वात्मनि"-हय॥। एव "विशति यदि नो कविस्फाल-"।६६। दोनों पद्यो की योजना कर लेना चाहिए। (अर्थात उन पत्नो मे जो प्रतीयमान कम से महापुरुपपरक अर्य हृगारे सम्मुय आाहा है वह अभिधेय न होकर स्यचना पकति द्वारा प्रतिपाय रूप मे व्यङ्तम बनकर हमारे सामने उपस्थित होता है। अथवा जैसे (इसका अन्य उदाहरण) - धक्व्रेन्दोने दर्शन्त पाप्पपयसा धारा मनोक्षां मियं निध्वासा न फदर्थयम्ति मधुरां विम्बाघरस्य धृतिम्। सस्यसत्वविर्हे रधाय फापि फपोलयोरनुदिनं सन्व्या: पर पुर्थ्यास। १०० ॥
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प्रथमोन्मेष १३६
किसी विरहिणी नायिता की दूती उसके नायक से उसकी विरह-व्यभा का निवेदन करती हुई कहती है कि) तुम्हारे विरह मे न तो अभुजलो की धाराये (ही) उस ( नामिका) के ुसषनफी रेमणीय सुषमा का अपहरण करती हैं (और) न (विरहुजय) निश्वास (ही) उसके बिम्ब (फल) के सद्स (रक्तवर्ण) अघसकी मनोहर उचि को दूवित करते है (हा एक बात जरूर है कि उस)कृश दो केमण्उस्थली की, पकेहुए लवली (लता के पत्ते) के लावण्य के सास मम्यखनेवाली कोई। न छिपाई जा सकने वाली अपूर्द) कर्ति नित्य प्रति पुष्ट होती जाती है। १०० ॥
मत्र त्व द्विर हवैघुर्य्सवरणकदर्थना मेनुभवम्वास्तरयास्तथाबिघे महति गुरुसक्ूटे वर्तमानाया-कि बहुना-वाष्पनिश्वासमोक्षायमरोडपि न सम्भवति। केवलं परिणातलवलीलावण्यसंवादसुभगा कापि कपोलयो :- कान्तिरशक्यसंवरणा प्रतिदिनं परं परिपोषमासादयतीति वाच्य- व्यतिरिक्षृत्ति दूत्युक्रतात्पय प्रतीयते' उत्तप्रकारकान्तिमन्वकथनं व कान्तकौतुकोत्कलिकाकारणतां प्रतिपद्यते। यहां पर वाच्य से अतिरिक्त वृत्ति वाला (ब्यङ्गघ रूप) दूती के कथन का 'यह तात्पय प्रतीयमान ढङ्ग से सहृदयों के सम्मुख उपस्थित होता हैं कि तुम्हारे वियोग के कारण उत्पन्न अत्यन्त दुख को आच्छादित करने मे (असमर्थता रूप) कष्ट का अनुभव करती हुई उस प्रकार के धोर सदूट मे विद्यमान उस (नीविका) की, अधिक (दुरवस्या का) क्या (वर्णन किया जाय, यही, कमा नम है कि उसे) आँसू गिराने एव निश्वास छोडने का भी ममय नहीं सम्भव होता ( अर्थान हमेशा उसे भय लगा रहता है कि कही यह भेद कोई जान न ले कि वह तुग्हारी विरहु-व्यया से अत्पन्त पीडित है। अत वह न रोती है और न आहे ही भरती है। उन आहो को भीतर ही दबा लेती है तथा आंसू के घूंट भी जाया करती है हा, एक बात जरूर है।) पके हुए लवकी ( पत्र) के लावण्य के समान सुन्दर उसके कपोलो की छिपाई न जा सपने वाली कान्ति अत्यधिक परिपुष्ट होती जाती है। (अर्थान् उसका चेहरा पीक्षा होता जाता है, और इसे वह छिपा सकने में सवथा असमर्थ है। अत वही आपकी विरह्-व्यपा को प्रकट करता है।) (इस प्रकार दूती द्वारा उस नायिका की) उक्त प्रकार की कान्ति से मुक् होने का कथन प्रियसम के कौतूहल और उतकण्ठा के कारण रूप में प्रविदित होता है। (अर्यात् मायक को उसषकी कपोस की पीस्ष कान्ति के
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१४० धकोक्तिजीवितम्
दिन प्रतिदिन बढने की बात सुनकर उस नामिका से मिलने की उत्कष्ा जागृत होती है। इस प्रकार यहाँ प्रधान रूप से कवि ने इसी प्रतीपमान अर्य को उपनिबद्ध किया है।) विचित्रमेव रूपान्तरेण प्रतिपाद्यति-स्वभाव इत्यादि। यत्र यस्मिन भावानां स्वभाव. स्वपरिस्पं्द: सरसाकृतो रसनिर्भराभिप्रायः पदार्थानां निषध्यते निवेश्यते। कोहश-केनापि कमनीयेन वैचिडये- णोपघृंहित:, लोकोत्तरेण हृदयहारिणा वैदग्व्येनोत्तेजितः। 'भाव' शन्देनान्र सर्वपदार्थोडमिधीयते, न रत्यादिरेव। उदाहरणम्- विचित्र (मार्ग) को ही दूसरे ढग से प्रतिपादित करते हैं-स्वभाव- इत्यादि (४१वी कारिका के द्वारा)। जहां अर्थान जिस (मार्ग) मे भाव अर्थान् पदार्षों का, सरसाकृत अर्थान् रस के अतिशय से युक्त अभिपाप वाला स्वभाव अर्थात् अपनी ही सत्ता का निबन्धन अर्थान वर्णन किया जाता है। कसा-(स्वभाष)-किसी रमणीय वैचिष्य से सुद्धि को प्राप्त कराया गया अर्थान् वलोकिक एव मनोहर विदण्यता से उत्सर्ग को प्राप्त 'भाव'भब्द के द्वारा यहां सभी पदार्थों का ग्रहण होता है केवल रति मदि भावो हो का नही। [इमका) उदाहरण (जैसे)- क्रोडासु बालकुसुमायुधसद्गताया यक्षत् स्मितं न खलु तत् स्मितमात्रमेव। आलोक्यते स्मितपटान्तरितं मृगाच्या- स्तस्या: परिस्फुरदिवापरमेव किश्चित्॥१०१॥ बोडाओ मे (या काम-केति मे) बाल कामदेव से सपुक्त (अर्थात् शैशवावस्था के बाद तुर्त ही नये-नये काम के विकारों से युक्त) उस भृगनयनी को जो वह मूककुराहट है वह केबल मुस्कुहाहट ही नही है, अपितु मुस्कुराहट रूपी वस्त्र से ढँकी हुई कोई अन्य हो वस्तु स्फुटित होती हुई सो दिखाई देती है । ।। १ ॥ अत्र न लक्षु तत् स्मितमात्रमेवेति प्रथमार्धेऽमिलापसुभगं सरमा- भिन्ायत्वमुक्तम्। अपरार्धे तु-हसिताशुरुतिरोहितिमन्यदेव किमपि परिस्फुरदावलक्यत इति कमनीयवैचित्र्यविच्छ्त्ति:। यह! पर "वह केवल मुसकुराहट हो नही है" इस पूर्वादं मे ( उस तरगी का सम्भोग की) इच्छा से रमणीम सरस अभिप्ाम से युक्त होना प्रति- पादित किया गया है। तपा उतराज मे "मुस्कुराहटरपी वस्न से बँकी
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प्रयमोन्मेष: १४१
हुई कोई अन्य हो (सम्भोग की इच्छासप) वस्तु परिस्फुटित होती हुई दिखाई पडती है" इसके द्वारा किसी रमणीय वैचित्य की शोभा सम्पादित फी गयी है। इदानी विचित्रमेवापसंहरति-विचित्रो यत्रेत्यादि। एवंविधो विचित्रों मार्गो यत्र यस्मिन् वफ्रोक्तिवैचिक्यम् अलद्वारविचित्रभावो जीवितायते जीवितवदाचरत । वैचित्यादेव विचित्रे 'विचित्र' शब्द: प्रवतते। तस्मात्तदेव तस्य जीवितम्। कि तद्वचित्रयं नानेत्याह- परिरफुरति यस्यान्त: सा काप्यतिरायाभिधा। यस्यान्तः स्वरूपातु- प्रवेशेन सा वाप्यलौकिकातिशयोकि परिस्फुरति भ्राजते। यथा- अब (३४ वी कारिका से ४१ वी कारिका तक विचित्मार्ग के अनेक प्रकारों को लक्षण एवम् उदाहरण द्वारा व्याख्या कर आचाय कुन्तक उसी) विचिन-मार्ग का उपसहार करते हैं- विचिनो यम"इत्यादि (४२ वीं कारिका के द्वारा) : इस ढग का विषिन्नमार्ग होता है जहाँ अर्थात् जिस मार्ग मे वकोक्ति का वचिनन्य अर्था अलकार की विचिन्नता (घमत्कार) जीवितायते अर्थान् जीवन के समान आधरण करती है ( तात्पयं यह कि वकोकि का वैचित्र्य ही विषिन- मार्ग का सर्वस्व है) वैचित्र्य के कारण ही विचित्र (मार्ग) के लिए 'विचिन' शब्द प्रदृत्त होता है। इसीलिए वह वकोकि-वंचित्र्म ही उस (विचिन्न-मार्ग) का जीवितभूत है। वह नैचित्रय है कसा-इसे बताते हैं- जिसके भीतर कोई अतिशयोक्ति परिस्फुटित होती है। जिसके भीतर अर्थात् उसके स्वरूप में प्रविष्ट होने के कारण कोई लोफोत्तर अतिशयपूर्ण कथन परिस्फुटित अर्थात् शोभायमान होता है। जैसे- यत्सेनारजसामुद्क्वति चये द्वाभ्यां दवीयोऽन्तरान् पाणिभ्यां युगपद्विलोचनपुटानष्टाक्षमो रक्षितुम्। परकक दलमुन्नमय्य गमयन् वासाम्बुजं कोशतां घाता सवरणाकुलश्िरमभूत् स्वाध्यायवद्धाननः॥। १०२॥। जिसकी सेना के (प्रयाण से उत्पन्न) घूलिसमुदाय के कपर उठने पर (आकाश को ओर उडने पर, स्वाध्याय मे लगे हए ब्रह्मा जी उस धूति से बचाने के लिए) दूर-दूर व्यवधान वाले अपने आठों झक्षिपुटो की दोनो ही हाथों से रक्षा करने मे असमर्य होकर एक-एक दल को उठाकर अपने निवास के कमल को बन्द करते हुए, बन्द करने में ब्याकुल होकर चिरकाल तक स्वाध्याम न कर सके ।।१०२॥
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२४२ वफोक्तिमीबितम्
सब् धाराधिरोहणर मणोयतयातिशयोकिपरिस्पन्दस्यन्दि सन्टश्यते। इस प्रकार सम्भावना के बनुमान से प्रवृत्त होने वानी उत्पेक्षा की पतीयमानता (हो यहां पर) वैविष्य है। और वह (वैनिम्य) चरम सीमा को पहुँची हुई सुन्दरता के कारण अतिशयोक्ति के विलसित प्रस्तुत करने चाला दिखाई पडता है। तदेव वैचितयं व्याख्याय।तस्यैव गुणान् व्याच्े- वैदग्घस्यन्दि माधुर्य पदानामत्र वध्यते। याति यत्यक्तरीथिल्यं वन्धवन्धुरताङ्गताम्। ४४॥ इस प्रकार वैचिष्य की व्याख्या कर अब उसके ही गुणो की व्यास्या पस्तुन करते हैं। (स्वप्रथम माघु्य गुग का लक्षण प्रस्तुत करते हैं)- यहां उस विचिन-मार्ग मे पदो के वैदष्वय को प्रवाहित करने वाले माधुर्य गुण को उपनिवद्ध किया जाता है जो शिमिलता का रयाग कर वाक्य विन्वास वी रमणोयना का साधन बन जाता है।। ४४ । अन्नास्मिन् माधुर्य वैदग्व्यस्यन्तिवैचित्र्यममर्पकं पदाना षध्यने नाक्यैकदेशानां निवेश्यते। यत्त्यकशैथिल्यमुज्फितकोमलभायं भवद्न्य नधुरताङ्गतां याति मन्निवेशसौनदर्योपकरणर्ता गच्छुति। यथा- 'कि तारुण्यतरोः' इत्यत्र पूर्वाघेंः॥।१०३।। यहाँ इस विविन्रमार्ग मे वाक्य के अवययभूत पदो के वैंदणय को वाहित करने वाले अर्यान् विचित्ता को प्रदान करने वाले माधुषँ (मुप) का सन्निवेश किया जाता है। जो गैयित्य का त्याग कर अर्थात कोमलता को परित्यक्त कर बन्ध के सौन्दर्य का बङ्ध अर्थाद् संघटना की सुन्दरता का साघन बनता है जैसे-'कि ताहण्पतरो'."इत्मादि पूर्वेदाहृत (उदाहरण सं० ६२ के पूर्वाद्धं में देखा जा सकता है। ॥ १० ३॥ टिप्पणी-विचित्रमार्ग के माधुर्प गुण के उदाहरण रूप में बुन्तक ने जिन पडक्ियो को उद्घुत किया है वे निम्न हैं- कि ताण्यतरोरिय रसभरोद्दिरिया नवा घल्तरो तीलाप्रोच्छतितस्य कि लहरिका सावण्यवारान्निये। इसका अर्थ उदाहरग सख्या ६२ पर देखें। यहाँ पर कवि ने नाएम्पतरोम रस म रोदद्रिन्ता, नवा वल्लरी, सावण्पवादाम्निये: आदि सभी ऐसे पदो का प्रयोष
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किया है जो एक लोकोत्तर वँचित्र्य के समर्थक हैं। -यहाँ माधुर्य गुभ होगा। एव माचुर्यम भिधाय पसादममिधत्ते- असमस्तपदन्यास: असिद्धः कविवत्मेनि। किश्विदोज: स्पृणन् प्रायः प्रसादोऽप्यत्र दृडयते ॥ ४५॥ इस प्रकार माधुर्य गुण को बताकर बद प्रसान गुण का कधन प्रस्तुत करते हैं- इस विचित्रमार्ग में विद्वानो ( कवियो) के मार्ग मे प्रसिद्ध, कुछ-कुछ ओज का स्पर्श करता हुआ, समासहीन पदो की रचना रूप, प्रसाद नामक गुण भी प्रायेण देखा जाता है।। ४५॥ असमस्ताना समासरहितानां पद्ानां न्यामो निबन्धः कवि- •वत्मेनि विपश्चिन्मागे य' प्रसिद्ध: प्रखयातः सोऽप्यस्मिन् विचित्रारये प्रसादाभिधानो गुणः किश्चित् कियन्मात्रमोज म्पृशन्नुत्तानतया व्यवस्थितः प्रायो टश्यते म्राचुर्येण लच्यने। बन्धसीगदर्यनिबन्धनत्वात्। तथाविधस्यौजस समासवती वृत्ति ओज"-शव्देन चिरन्ननैकच्यते। तदयमत्र परमार्थ-पूर्वस्मिन् प्रमादलक्षण सत्योज:सस्पर्शमात्रमिहया विधोयते। यथा- असमस्त अर्थात् समास मे वजित पदो का न्यास अर्थात निबन्ध (सहटन) जो कवियों के मार्ग मे अर्थान् पण्डितों की पद्धति मे प्रसिद्ध अर्थान् प्रवृष्ट रूप से ख्यातिप्राप्त है वह भी प्रसाद नाम का गुण इस विचित्र नामक (माग) में कुछ, थोडा-मा ओज का स्पर्श करता हुआ अर्थान् उत्तान ढङ्ग से (कुछ-कुछ समस्त पदो से युक्त रूप मे) व्यबस्थित हुआ आय दिखाई पड़ता है सर्यात् प्रचर रूप से लक्षित होता है। उस प्रकान के ओज की समास से युक्त वृत्ि को, वाक्य-विन्यास (सङ्टना) की रमणीयता का कारण होने से विर्तन ( आलद्धारिको) ने 'ओज' शब्द से व्यवहुत किया है। इसका वास्तविक अथ यह है कि पहले ( सुक्ुमार मार्ग के गुणों का प्रतिपादन करते समय ३१ वी कारिका मे किए गए) प्रसाद के लक्षण के विद्यमान रहने पर यहाँ (इस विचित्रमारग के प्रसाद गुण मे) केवल ओरज के सस्पश का ही विधान किया जावा है। (शेष लक्षण सुकुमार- मागें के प्रसाद गुण जक्षा ही है। अर्थात यहाँ भी प्रस्ाद गुण रस एवं मकोकि विषयक अभिप्राय को मनायास हो प्रकट कर देने वाला एव पढते
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१४४ दकोकिजी वितम् हो तुरन्त अर्थ की प्रतीति कराने बाला होना चाहिए। हा, यहाँ उसमे एक यही विशेषता होगी कि वह कुछ-बुछ ओज का स्पश करती हआ होगा)॥ जैसे- अपाङ्गगततारका' स्तिमितपद्मपालीभृतः स्फुरतसुभगकान्तय. स्मित समुदुगति द्योति ताः। विलासभरमन्धरास्तरल कल्पितै कभ्रधो जयन्ति रमणेऽपिता: समदसुन्दरीदृट्टय:॥१०४॥ पति की मर फेंको गई, नेत्रों के प्रान्त भाग मे स्थित कनीनिका वाली निश्चल पलको को घारण करने वाली, रफुरित होती हुई मनोहर छवि से युक्त, मुस्कुराहट आ जाने के कारण द्युतिमान्, विलास के भार से मन्द गति दाली तथा एक मोँह को सनल बना देने वाली, हकित सुन्दरियों की आधे सर्वोस्कृष्ट रूप से विद्यमान हैं॥। १०४ ॥। (यहा पर कषि ने पुद्गार रस को बढे ही रकणीय हद्द् से प्रस्तुत किया है। पदों का प्रयोग धर्ष को तुर्त स्पष्ट कर देने वाता है तथा छोटे-छौटे समासों से युक्त होने के कारप सभी पद कुछ-कुछ बोज का स्पर्श कर रहे हैं। सतः यह विचिन मार्ग के प्रसाद गुण का उदाहरण हुआ)॥ प्रसादमेव प्रफारान्तरेण प्रकटयति- गमकानि निवध्यन्ते वाक्ये वाक्यान्तराण्यपि। पदानीवात्र कोऽप्येप प्रसादस्यापरः कमः ॥४६॥ (विचिन् मार्ग के उसी) प्रमाद गुण को दूसरे दङ्ग से प्रस्तुत करते हैं- यहाँ (इस विचित्र-मार्ग मे एक ही) वाक्म मे (व्यङ्तधार्य के) समर्पक अन्य (अवान्तर) वाबयो का भी पदो के समान (परहपर अन्वित ढद्भ से) सनिवेश किया जाता है। यह (विचिन्न मार्ग के) प्रसाद (गुण) का फोई (अपूर्व हो वाकय की शोभा को उत्पत्न करने वाला) दूसरा प्रकार है।। ४६ ।। अत्रास्मिन् विचिन्ने यद्वाक्यं पदसमुदायस्तस्मिन् गमकानि समर्प काण्युन्यानि वाक्यान्तराणि निमध्यन्ते निवेश्यन्ते।कथम्-पदानीव पद्वत्, परस्परान्यिवानीत्यर्य:। एप फोऽप्यपूर्षः प्रसादस्यापरः क्रमः बन्धच्छाया प्रकार: । यथा- यहा अर्थात इस विचित्र (मार्ग) मे जो वाकय अ: पहों का समूह है उसमें गमक अवात् (व्यक्षपार्य के) समपक वन्य दूस (बबाण) वाक्य
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निबद्ध अर्थान सन्निविष्ट किए जाते हैं। किस प्रपर से-पदो के समान अर्थात् पदो की तरह परस्पर अ्वित ढङ्ग से, (निबद्ध किए जाते है)। मह (विचित्न मार्ग के) प्रसाद (गुण) का कोई अपूर्बं दूसरा ही करम सर्थान् वाक्यवित्यास की शोभा (को उत्पन्न करने) का प्रकार है। जैसे- नामाप्यन्तरो: इति ॥१०५॥ (पूर्वोदाहृत उदाहरण सख्या ६१ का) नामाप्यव्यतरो इत्यादि पद ॥ १०५॥ टिप्पणी-यहाँ ग्रन्थकार ने जिस पद को प्रसाद गुण के उदाहरण रूप मे उद्घृत किया है वह यह है-
प्रस्थाने स्पलतः स्वदत्नैनि विधेरन्यद्गृहीत करः। लोकशचा ममदृष्ट दर्शनकृताद् दुष्वशसादृदृतो युक्त काष्टिक लूनवान् मदसि तामाआालिमाकालिकीम् ॥ ६१ ॥ इसका अ्य उदाहरण सख्या २१ पर देखें। यहाँ कवि ने एक ही वाक्य रूप फ्लोक मे 'निमीलितमभूत्', 'ताबदुग्मीलित', 'पुहीक्ष कर", 'सोक उद्व इत्यादि अन्य अवान्तर वाक्यो का पदों की भाति प्रयोग किसजी। अतः यहां प्रसा्द गुण स्वीकार किया जायया। प्रसादममिधाय लावण्य लक्षयति- अन्ना लुसविसर्गान्तैः पदैः प्रोतेः परस्परम्। इस्वैः संयोगपूर्वैश लावण्यभतिरच्यते ॥४७॥ (इस प्रकार विचित मार्ग के माधुय गुण तथा) प्रसाद (गुण के दो प्रकार) बता कर अब (तीसरे गुण) लावण्य को लक्षित करते हैं- यहाँ (इस विचिन भार्ग मे) परहपर सश्लिष्ट, विसरगों से युक्त अन्त वाले सयोग से पूर्व हस्व पदो (के प्रयोग) से लावण्य (शुण) अतिरय युक्त् हो जाता है।। ४७॥ अन्नास्मिन्नेवविधैः पदैर्लवण्यमतिरिच्यते परिपोष प्राप्नोति। कीटशै-परस्परमन्योन्य प्रोतेः सश्लेष नीतेः । अन्यथ कीटश- अलुप्रविसर्गान्त, अलुप्तघिसर्गा श्रयमाणविसर्जनीय अन्ता येषां तानि तयोकानि तैः। ह्स्वैंश् लघुभिः। सयोगेभ्य: पूर्षैः 1 अति- रिच्यते इति सम्बन्धः। तदिदमन्र तात्पर्यम-पूर्योकलक्षणं लाषण्यं विधयमानमनेनातिरिकवां नीयते। या-
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१४६ वकोक्तिजीवत्भ्
यहां अर्थात् इस (विचिन मार्ग) मे इस प्रकार के पदो ( के प्रयोग) से (विचिन मार्ग का) लावज्य (गुण) अतिराय युक्त होता है अर्थाव् मसीभाति पुष्ट होता है। कैसे (पदो के प्रयोग से) परस्पर एक दूसरे से मिले हुए सश्लिष्ट (पदो से) । और कैँसे ( पदो के प्रयोग से) न लुप्त हुए विसगों के अन्त वाले। नही लुप्त हुए दिसगों वाले अर्थात् सुनाई पडते हए दिस्जंनीयों वाले अन्त हैं जिनके वे हुए तपोकत ( न नुप्त हुए विमरगों के भम्त वाले) उन (पदो से)। हस्व अर्थात् लघु (पदो) से। सयोग के पहले (हस्व पदो से)। (लावण्य भुण) परिपुष्ट होता है। यह (वाक्य के साथ क्रिया का) सम्बन्ध है। तो इसका यहाँ अभिप्राय यह हुआ कि-पहले ( सुकुमार मार्ग के गुणो का प्रतिपादन करते समय ३२वी कारिका में) कहे गए लक्षण वाला सावण्य सुकुमार मार्ग का गुण विधमान होते हुए इस (प्रकार के प्रयोगो से इस गुण के सुक्त होने के कारण इस से मिन्न हो जाता है। जैसे- श्ासोत्क्पतरङ्विणि स्तनतटे धौताख्नश्यामलाः फोर्यन्ते कणश कृशाकि किममी घाप्पाम्ममां विन्दुवः । किश्ाकुश्षित फण्ठरोधकुटिल: कर्षामृतस्थम्दिनो हुहारा फलपञ्जमप्रणयिनस्तुव्यन्ति निर्यान्ति घ॥ १०६॥ हे कुशाङ्ि, (घम के कारण) नेज साँक्षो के चसने से उमर आने के कारण हिलते हुए वदस्थल पर (बंखो मे सपे) आजन को छोने के कारण काली पड गई ये अश्जल की बूँकों को टूक ट्रक करके कयो दुलकाये दे रही हो? और क्यो मला ये कानों मे सुधा टपकाने बासी मधुर पश्चम (स्वर) की तरह प्यारी लगने वाली-हू हू को आवाजे मुडे हुए गले के भर घाने के कारण टेडी पडकर टूट टूट जाती हैं और निकल पडती है।१०६। टिप्पणी-यह! इस पद्य मे 'धोताञ्जनश्यामला.', 'कणश,' 'बिन्दव.', *- कुटिला.' एव 'हद्ारा"' 'ऐमे पदो का प्रयोग किया गया है, जिनके अन्त में विसगों का सीप नहीं हुआ है। तथा कम्प, तर्रासण्िस्तनतटे,-न शयामला-, भीर्मगो, बिनदय ... कुञ्चित, कण्छ, .. तस्यन्दिनो एवं .. पचमप्रण- मिनस्वदपन्त, पमादि पदों मे समोग के पूर्व ल्षम् वर्ण का प्रयोग हुआ है। घसे 'ब्रमेन' में 'क' का 'तर्ग्णि' में 'र' का आदि आदि। सथा सभी पद पास्पर एक दूसरे से सश्मिष्ट होकर विभिन मार्ग के सावण्य गुण का परिषोष करते हैं। चवा वा-
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प्रथमोन्मेष १४७
प्रान्तं हन्त पुलिन्दसुन्दरकरस्पर्शक्षमं लक्ष्यते। तत् पह्लीपतिपुत्रि कुश्जरकुलं कुम्भामयाभ्यर्थना- दीनं त्वामनुनाथते कुचयुगं पत्रांशुकर्मो पिघाः ॥।१०७।। अथवा जैसे (इसी का दूसरा उदाहरण)- हे पल्लीपति (छोटे से ग्राम के स्वामी) को पुति ! अधपके तेन्द्र फल के समान श्याम मध्यभागवाला तथा कुछ कुछ पीसवर्ण वट प्रदेश वाला (सुम्हारा) यह स्तनद्वन्द्व शबर के सुन्दर करों के स्पर्घयोग्य (मदन करने के लिये उपयुक्त) दिखाई पहता है। इसलिये ( अपने) गण्डस्पल की रक्षा (अभय) की प्रार्थना से कातर (यह) हाषियों का समूह सुमसे याचना करता है कि अपने इस (स्तनयुगल) को पत्ती से मत ढको। (जिससे यह शबर तुम्हारे कुचों की मोर आकुष्ट डोकर हम हाषियों के मण्डस्पन पर प्रहार करने से विमुख हो जाये)।। १०७ ।। टिप्पणी-इस पद्य मे यद्युपि 'पिधा' को छोहकर अन्य किसी असुप्त- विसर्गान्त पद का प्रयोग नहीं सुआ है। फिर भी सभी पद वापस में अच्छी नरह से सश्लिष्ट है। एवं 'एतत्मन्दविपक्वतिन्दुकफलरपामो, "'रपान्त,हन्त, पुलिन्द सुन्दरकरस्पर्शक्षम लक्ष्यते। इत्यादि सभी पदों में स्योग के पूर्व हस्व वर्णों के प्रयोग से श्लोक मे एक अपूर्य ही चनत्कार क यया है। जिससे लावण्य गुण पूर्ग परिपोष को प्राप्त हो रहा है। य्यया षा- 'हृसाना निनदेसु' इति ॥ १०८ ॥। अथवा जसे ( इसका तीसरा उदाहरण पूर्वोदाहव उदाहरण सक्या ७३ का) हसाना निनदेष ... । इत्यादि पद॥ १०८ ॥ (इसका अर्थ उदाहरण संख्या ७३ पर देखें तथा लक्षण को पूर्वोदाहित दोनो पद्यों के आधार पर स्वपं घटित कर ले)। एवं लावण्यममिघायाभिज्ात्य मभिधीयते- यन्नातिकोमलच्छायं नाविकाठिन्यमुद्दद्दद्। आभिजात्यं मनोहारि तदत प्रोदिनिर्मितम्॥४८ ॥ इस प्रकार (विचिन्न मार्ग के तीसरे गुण) सावम्य को बताकर (अब चतुय गुण) आमिजास्य को बताते हैं- यहां (इस विधिन-मार्ग में) जो न तो बहुत अधिक कोमल कान्ति (वाता होता है) और न अधिक कठिनता की हो धारण करता (है)
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वह (कवि को)पोहि से विरतिव आभिजात्य (नामक तुप) हृदय को आानन्दित करने वाला होता है ।। ४= ॥ अन्रास्मिन् तदाभिजात्यं यज्रातिकोमलच्छराय नात्यन्तमसृणकान्ति- नातिकाठिन्यमुद्वह्ल्नातिकठोरतां घारयन् ओटिनिमितं सफलफि- कौशलसम्पादितं सन्मनोहारि हृदयरख्जक भवतीत्यर्थः । यथा- यहा अर्थात् इस (विचिन मार्ग) में वह अभिजात्व (नामका पुप होग है) जो न वधिक कोमल छाया वाला अर्पात् न तो अत्यधिक स्निद्ध कान्ति वाला (और) न अधिक कठिनता को वहन करता हुआ अर्थान् न ही बधिक कठोरता को धारण करता हुआ (होता है) वह प्रौदि से निमित वर्षात् कवि की समन्र कुशलता से सम्मादित हआा मनोहारि अर्थान् हृदय को बानन्दित करनेवाला होता है, यह ज्य हुआ। जते-(कोई सखो नामिका से पूछती है कि- अधिकरतलतल्पं कल्पितस्वापलीला- परिमलननिमीलत्पाण्डिमा गण्डपाली। सुवनु कथय कस्य व्यक्षयत्यख्जसैव स्मरनरपर्विकेलीयोवराज्यामिपेकम् ॥ १०६॥। हे सुन्दरि ! (यह सो) बताओ कि-करतलरू्पां पयद्धु पर गपन-लोला के कारण होने वाले (करतल तथा कपोल के) दुढ संयोग से विरोहित होती हुई पाण्डता से युक्त (अर्थात् रक्तवर्म तुम्हारी यह) कपोलस्थली सह्सा हो कामदेवरूपी नरपति की लोडाओो के भोवराज्य पद पर किस (घन्य युवक) के अभिषेक को व्यक्त कर रही है।। १०६।। टिप्पणो-इस पद्य में कवि ने ने तो अत्यधिक कठोर और न अत्यन्त कोमल ही पदावली का प्रयोग किया है। साथ हो कवि-प्रतिभा की प्रौदि इस इलीक से भलीमाति व्यक्त हो रही है। अत. यहां आभिजात्य गुण स्वोकार किमा जायगा।
इवि मोडल्यम् एवं सुककुमारविदिवानामेव गुणाना:विचित्रे कश्िदविशयः सम्पादव
इस प्रकार सुकुमार (मार्ग) मे कवित (माधुय, प्रसाद, सावप्य एवं बभिजात्य) गुम (ही) विचिन्न मार्गे मे किसी ( अपूर्व) अविशय से सम्पन्न कर दिये जाये है।-ऐसा समझना चाहिए। (और जंखा कि) यह अन्तरश्लोक (भी) है कि-
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आमिजात्यप्रसृतय पूर्वमार्गोदिवा गुणाः। अन्रातिशयमायान्ति जनिवाहार्यसम्पदः ॥११० ।। इत्यन्तरश्लोक:। पहले (सुकुमार) मार्ग मे प्रतिपादित आभिजात्य आदि (अर्थात् माधुर्य, प्रासाद, लावण्य एव आभिजात्य चारो ही) गुभ, यहां (इस विचिन मार्ग मे कवि की व्युत्पत्याविजन्य) आचार्य-सम्प्तत की सृष्टि कर (किसी अलौकिक) अतिशय को प्राप्त होते हैं। ११०।। एवं विचित्रमभिधाय मध्यममुपक्मते- वैचित्यं सौकुमार्य च यत्र सङ्कीर्णतां गते। भ्राजेते सहजाहार्यशोभातिशयशालिनी ॥।४९॥। इस प्रकार (पहले सुकुमार मार्ग का विवेचन कर वदनन्तर ( विनिभ (मार्ग) को बताकर (अब) मध्यम (मार्ग के विवेचन) का आरमम करते हैं- जहाँ (जिस मार्ग में) सहर्ज (अर्थात् कवि प्रतिभाजन्य) तथा आहानं (अर्थात् कवि की व्युत्पत्यादि जन्य ) कान्ति के चत्कर्ष से शोभित होने वाली सुकुमारता एवं विचित्रता सङ्गीणं होकर (एक दूसरे से मिश्रित होकर) शोभित होती है॥ ४६॥ माधुर्यादिगुणग्रामो वृत्तिमाश्रित्य मध्यमाम्। यत्र कामपि पुष्णाति बन्घच्छायाविरिकताम् ॥ ५० ॥ (तपा) जहां (जिस मार्ग में) माधुयं (प्रसाद, लावभ्य एवं बभिजात्य) आदि सुणो का समुदाय मध्यम (अर्थात् सुकुमार तथा विचित्र दोनो मारगों की कान्ति से युक्त) दृति का आधयम कर सघटना की शोमा के आधिपत्य का पोषण करता है॥ ५० ॥ मार्गोऽसो मध्यमो नाम नानारुचिमनोहर:। स्पर्धया यत्र वर्तन्ते मार्गद्वितयसम्पदः॥। ५१।। (तथा) जहां (जिस मां्ग में सुकुमार तथा विबिन) दोनों मार्गों की सम्पस्तियाँ (परस्वर) सर्या से (समान रूप में) विद्मान रहती है, (ऐसा) यह विभिन्न रुचियों वाले (सहृदय बादि) के लिए मनोहर मम्बम नाम का भाग है।। ४१।।
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वकोकिजीवितम्
अत्रारोचकिन: केचिच्छायावैचित्र्यरअके। विदग्धनेपथ्यविधौ भुजङ्गा इव सादराः ॥।५२॥
यहाँ शोभा के वैचित्र्य के कारण मनोहर (इस मध्यम मा्ग) मे सम्य वेदभषा के विधान मे नागरिको के समान कुछ रमणीय वस्तु के अयसनी (वरोचकी कवि एव सहुदय) आदरयुक्त होते हैं। (अर्थात् कवि लोग इसका आधयण कर काव्यरचना करते हैं और सहृदय इसका अध्ययन कर बसौफिक षानन्द प्राप्त करते है।। ५२॥
मागोडसी मध्यमो नाम मन्यमाभिधानोडसी पन्या। फीटश'- नानाविधा रुघय: प्रतिभासा येषां ते तथोक्ास्तेषां सुकुमार विचित्र मध्य- मव्यसनिना सर्वेपामेष मनोहरो हृदयहारी। यस्मिन् स्पर्धया मार्गद्वितय- सम्पदः सुकुमार विचित्नशोभा. साम्येन वर्तन्ते व्यतति प्ठन्ते, ग न्यूनाति- रिकत्वेन। यत्र वैचिश्र्य विचित्रत्वं सौकुमार्यं सुकुमारतं सक्षीणंता गते वस्मिन् मिननतां प्राप्ते सती भ्राजेते शोभेते। कीटशे-सहजाहार्य- शोमातिशयशालिनी, र्शाव्युत्पत्तिसम्भवो यः शोभातिशयः कान्त्यु- त्कर्षस्तेन शालेते रलापेते ये ते तथोके।
यह मध्यम नाम का माग अर्थात् 'मध्यम' इस सशा से प्रफट किया माने वासा यह (काव्य का) पथ है। किस प्रकार का-नाना प्रकार की रर्चिया वर्षात् प्रतीतिया है जिनके वे हुये तथोक (नानाविद्य रुचि वाले) उनका अर्वात् सुकुमार, विचिन, एवं मध्यम मार्ग के उवसनी सभी का ही मनोहर अर्थात् हृदय को हरण करने वाला। (सब को आनन्दित करने वाला मध्यम नामक मार्ग है) । जिस (मार्ग) मे ( परस्पर) सपर्धा से दोनो मार्गों की सम्पतियां वर्बास सुकुमार एव, विषिन (मार्गो) की पविया समान रप से वर्वमान रहती है, न्यूनािक्य रूप से नहीं नियमान रहती ह। जर्हाँ नवित्य अर्थात् विचिनभाव सोकुमाय आर्थात गुकभार भाव सष्दीणेता को प्राप्त होकर अर्ात् उस (मध्यम मार्ग) मे मिश्रित होकर छानमान अर्थान् शोभायमान होते हैं। कँसी (दोनो मार्ग की सविय)- सहज एवं भाहयं लोभा के अतिशय से पलाधनीय, बर्थान पति (सहज) एव सुलात से उतन्न होने वाला (बाहमयं) जो गोषा का वतिशम अर्थात् पान्त का उत्तर्य है उससे को शामित वर्पाद प्रमंषित हुती है वे दोनों हई उपोफ (सहप एरवं आहार्य सोभा के अतिशम से स्वाबगीय सोमामे मिस घार्प में गमत्कार उल्पन्न करती है।)
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माधुर्येत्यामि। यत्र घ माघुर्यादिगुणमामो माघुर्यप्रमृतिगुण समूहो मध्यमामु मयच्छ्ायाच्छुरितां वृत्ति स्वस्पन्दृगतिमामित्य काम- प्यपूर्वों बन्घच्छायातिरिक्ततां सन्निवेशकान्त्याधिकतां पुष्णाति पुष्य सोत्यर्थ.। (और कसा होता है मध्यम मार्ग इसे प्रतिपादित करते हैं) भाधुयत्यादि (५० वी कारिका के द्वारा)। और जहाँ पर माधुर्यादि गुणो का समूह सर्थान् माधुयं (प्रसाद, लावण्य एव आभिज्वात्य) आदि (पूर्वोत्त ) गुणो का समुदाय मध्यम अर्थात् (सुकुमार एव विचिन) दोनो (मार्गो) की शोभा से सयुक्त वृत्ति अ्यानि स्वाभाविक गति का आधयण कर किसी घपूवं वन्धसन्दर्य की अतिरिकना अर्थात् सङ्टना सौन्दय के आधिक्य का पोषण करता है, (उसे मध्यम मार्ग कहते हैं)। तत्र गुणानामुदाहरणानि। तन्न माघुर्यस्य यथा- वेलानिलैमृदुभिराकुलिताल कान्ता गार्यन्ति यस्य चरितान्यपरान्तकान्ता: । लीलानताः समवलम्ब्य लतास्तरूणां हिन्तालमालिपु तटेपु महार्णपस्य।।१११।। वहा '(उस मध्यम मार्ग मे माधुर्यादि) गुणो के उदाहरण (अब प्रस्तुत किये जाते है)। उनमे ( सर्वप्रथम) माधर्य (गुण का उदाहरण) जैसे- हिन्ताल (वृक्षो) की कतारो से युक्त महासागर के लटो पर, घुक्षो की लताओ का सहारा लेकर विलास के साथ झुकी हुई, तथा समुद्र तट की मृदुल हवाओ ( झोको) से अस्त-व्यस्त (बिखरे हुए) केगपाश वाली दूसरे सट पर स्थित का मिनियाँ जिसके चरित्र को गाथा करती है। १११॥ दिप्पगी-मापाय कुसक मे सुदुमार मार्स के भामूर्य का सक्षण प्रचुर समास से रहित मनोहर पदों का विन्यास, तथा विभिनन मार्ग के माधुयं का लक्षण शैयिस्य-रहित, बन्ध-सोन्दर्य का उपकारक एवं वैधिभ्य को उत्पन्न करने वाला किया है। इस उदाहरण में दोनों का सम्मियण है। धर्पान् पदों मे न सो प्रचुर समास हो है तथा न किसी प्रकार का नविल्य है 'न्त' एव 'त' औोर 'के' आदि मनोहर वर्गों की बनेको बार आपृति होने से एक अपूर्व ही मनोहरता एव वंषिश्रय की सृष्टि हुई है जिससे बन्छ का सौन्दम बढ गमा है। अतः यह मध्यम मार्गे के आधुमं मुग रूप में सयुत हुमा है। इसके समन्तर वब प्रसाद गुच को प्रस्थुत करते हैं-
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वकोकिजीविसम्
प्रसादस्य यथा- 'तद्वक्त्रेन्दुविलोकनेन' इत्यादि-।। ११२।। प्रताद (गुण) का (उदाहरण) जैंसे- (उदाहरण सख्वा २३ पर पूर्व उदाहृत) 'तट्वजेन्दुदिलोकनेन' इत्यादि (पच) ।। १ १२ ।। टिप्पणो-मुकुमार माग के प्रसाद गुण का लक्षग है-'रस एवं वकोतिविषयक अभिन्राम को अनायास उपक्ञिन करना तथा शोघ्र अर्थ की प्रतीति कश देना' तथा विचिन मार्ग के प्रसाद की विशिष्टता है-'कुछ-कुछ ओोज का सप्श करता हुआ एव समाहहीन पदो के विन्यास से युक्त तपा एक ही वाक्य मेअनेर अशन्तर वाबशे का परो की भानि (व्यङ्गपार्य), के अदचक रप मे प्रयोग से पुक्त'। यह। उदाहुत निम्न पद्- तद्ववत्रेन्दुविलोकनेत दिवमो नीन प्रदोषस्तया
तर सम्पत्यदि मार्गदतनमना द्रष्ट प्रवुत्तस्य मे बद्गोतकण्ठमिद मन किमथवा प्रेमासमाप्तोत्सवम । -मे भुद्धार रम एव दीपक रूप अलकार बनायाय ही व्यज्ित हो जाता है। अर्थ की प्रतीति पढते ही हो जाती है। तथा अधिकतर समास्त वजित पदों का प्रयोग है। ह, तट्सेन्दुविलोकनेन, मन्मपहतोस्ाहै एवं माषदस नमनाम् आदि पदो मे कुछ समामो का प्ररोग होने से कुछ कुछ ओज का स्पर्ष भी प्राप्य है। तपा 'दिवसी नैतन' 'विद्यापि (नीता)' 'प्रदीप: (नीसः)', 'मन (अस्ति) इ्यादि अनक अवान्नर वाक्यो का भी इसके व्यचुरू हूप मे प्रयोग हुआ है। अत यह मध्मम मार्ग के प्रसाद गुण से मुर्त पद है। लावण्यस्य यया- सकान्ताकुलि पर्षसूचित करस्त्रापा कपोलस्थली नेत्रे निर्भरमुक्वापपफलुपे निव्वासतान्तोडघरः। पधोसेदविसण्ठु नालकलता निर्वेदशून्य मनः रष्ट दुर्नयवेदिभि: कुपविषेवेत्सा दढ खेधने ॥११३॥ (इस प्रकार प्रसाद गुण को उदाहून करने के अनन्तर मध्यम मा्गे के) सावभ्य (गुण) का (उदाहूरण) जैसे- ((सकी) गण्डस्पली, (कपोसो पर) सनमित अङ्पुलियो की प्रन्थियों से (रपोमों के) हाव यर (रक कर किए गये) रमन को सूचित करने
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प्रथमोन्मेप १५३ 4 वाली (है), जिसके) नेत्र अत्यधिक बहाये गए आसुओ से कलुषित (हो गए हैं), (जिसका) अघर (अत्यन्त उष्ण ) निश्वासी के कारण मुरझा गया है, (जिसकी) सयत केशो की लता खुल जाने के वारण व्यस्त (हो गई है) और (जिसका) चित्त निर्वेद (दुख) के कारण शून्य (सा हो गया है, ऐसी वह मेरी प्यारी) बच्ची हाथ (अपने अभिलषित बर वत्सराज उदयन के साथ विवाहित न की जाती हुई, इन) (केवल) दुर्नीति को जानने वाले कुत्सित मन्त्रियो के द्वारा बहुत ही ज्यादा सनाई जा रही है।। ११२॥ दिप्पणी-सुकुमार मार्ग का लावण्य, 'शब्द और अर्थ के सौकुमायं से मनोहर सङ्टना की 'महिमा' को कहते हैं, जिससे पदो एव बर्णों की शोभा अत्यध्िक वलेश से सम्पादित नही होती।' एव विचित्र मार्ग का लावण्य परस्वर सश्लिष्ट पदी वाला होता है जिनके अन्त अधिक्तर सविसर्ग होते है एव सयोग के पूर्व का वर्ण लघु होता है। उक्त उदाहरण मे दोनो लक्षण पटित होने हैं अत वहु मध्यम मार्ग के लावण्य गुग के उदाहरण रूप मे उद्घुत हुआ है। अर्थाव् यहाँ वर्णों एव पदो का वित्यास शब्द और अर्थ की रमणीयता से युक्त है। उनका प्रयोग बहुत कनेश के साथ नहीं किया गया है। साथ ही 'अधकर', 'मन', एव 'बेदिभिन पद सविसर्गान्त हैं। तथा 'सक्रान्त' 'पर्व', 'करस्वापा' 'कपोल स्थली' निर्भर- मूक्त' 'दद्ो' एव 'कष्टम्' आदि पदो मे सयोग के पूर्व आये हुए स, प, र आदि वर्ण हस्व है। आभिजात्यस्य मथा- आलम्व्य लम्बा. सरमापवक्षी: नियन्ति यस्य स्तनभारनम्रा.। स्रोतश्च्युतं शोकरकृणिताक्यो मन्दाकिनीनिर्भरमश्वमुख्यः॥११४ ॥ (अब लावण्य गुण के अनन्तर मध्यम मार्ग के चतुर्य गुभ) माभिजात्य का (उदाहरण) जैसे- (विशाल) कुची के बोझ मे झुकी हुई एव ( वायु से उड़ाये गए) जलक्णो (के फुहारो के पड़ने) से अघनिमीषित नयनो वाली घोड़ी के सदुश मूखो वाली ( किलरवधुयें जिथकी) लम्बी एव हरे हरे अप्रभागो से मुक्त लताओ वा सहारा लेकर, स्रोतो से गिरते हुए गगा के जलप्नवाह का पान करती हैं ॥ ११४॥ टिप्पणी-सुकुमार मार्ग का आभिजात्य, सुनने मे मनोहर एव स्वभावत कोमलकान्तियुक्त होता है। एवं विचित्र मार्ग का आभिजात्म
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१५४ वक्ोकिजी विसम् कवि की प्रोदि से निर्मित मनोहर एवं न अत्यन्त कोमल कान्ति वाला ही और न अधिक कठोरता को धारण करने वाला ही होता है। उक्त उदाहरण श्रद्ण सुभग तो है ही साथ ही साथ उसमे का पूर्वा्द्ध कोमल पदावसी के प्रयुक्त होने से कोमल कान्तिमुर्त है, उसमे कठोरता का अभाव है। एवं पराधं मे कुछ कठोर वर्गों के आने से कठोरता आई तो है लेकिन अधिक नही। अत यह श्लोक मध्यम मार्ग के आभिजात्म गुण के रूप मे उद्घुम किया गया है। एवं मध्यम व्याख्याय तमेवोपसंहरति-अन्रेति। अत्रैतस्मिन् केचित कतिपये सादरास्तदापयेण काव्यानि कुर्बन्ति। यस्मात् अरो- चकिनः कमनीयवस्तुव्यमनिनः । कीहशे चास्मिन्-छायावैचितय- - भुजद्गा इच, अम्राम्याकतूपवरपने नागरा यथा। सोऽपि छायावैचिश्र्य- रक्षक एव। इस प्रकार (४६-५१ कारिकाओ द्वारा) मध्यम (माग) का व्यास्यान कर (अब) उसी का उपसहार करते हैं-'मन्' इस (५२ वी कारिका के द्वारा)। यहा अर्थात् इस (मध्यम मार्ग) मे कुछ (इस माग के प्रति) आदरयुक्त (कवि जन) इस (मार्ग) का आश्रयण कर काव्यनिर्माण करते हैं। क्मोकि (वे कवि जन) अरोचको अर्थात् रमणीय वस्तु के व्यसनी (होते हैं) किस ढम ने इस (मार्द मे)-गोभा को विचिनता के कारण रक्षक अर्थात कान्ति के वं चित्र्य से आनन्द प्रदान करने दवाले ( इस माग मे रमणीम वातु के व्यसती कविजन प्रवृत्त होते है)। किस प्रकार से-वंदग्धयपूर्ण नेपय्य के विधान मे बतुरी की तरह अर्थान् अग्राम्य (सभ्य) वशभृषा की सजावट मे चतुर नगरनिवाहियो की तरह (रम्यवस्तुध्यसनी कवि इस मध्यम मार्ग मे प्रवृत्त होते हैं): तथा वह (सभ्य वेशभूषा की सजावट) भी तो (अपनी) शोभा की विचित्रता से आह्ादजनक होता है। अत्र गुणोदाददरणानि परिमितत्वात्प्रदशितानि, प्रतिपद पुन- रछायावैचितयं सहृदये: स्वयमेदानुसर्तव्यम्। अनुसरणदिकप्रदर्शनं पुनः क्रियते । यथा-मातगुम-मायुराज-मझीरप्रभृतीनां सौकु मार्यवेचितयसवलितपरिस्पन्दस्यन्दीनि काव्यानि सम्भवन्ति। तत्र मध्यनमागेसवलितं स्वरूपं विचारणीयम्। एय सहजसौकुमार्य- सुभगानि कासिवाससर्वसेनादीनां काव्यानि हायन्ते। अत सुकुमार-
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प्रथमरेम्मेष १५४
मार्गस्वरूपं चर्चनीयम्। तर्थैव च विचित्रवकत्वविज्ञुम्भितं हर्षचरिते प्राचुर्येण भट्टवाणस्य विभाव्यते,. भवभूतिराजशेखरविरचितेषु बन्ध- सौन्दर्यसुभ्गेधु मुक्तकेषु परिदृश्यते। तस्मात् सहृदय सर्वेत्र सर्व- मनुसर्वव्यम्। एव मार्गननितयलक्षणं दिङ्-मात्रमेव प्रदर्शितम्। न पुनः साकल्येन सत्कविकौशलप्रकाराणा केनचिदपि स्वरूपमभिधातुं पार्यते। मार्गेपु गुणाना समुदायधमेता। यथा न केवलं शब्दादिधर्मत्व तथा तक्षक्षणव्याख्यानावसर एव प्रतिपादितम्। यहाँ (इस मध्यममार्ग के प्रसग मे, उस मार्ग के गुणो के सीमित होने के कारण (माधुर्यादि) गुणो के उदाहरणों को (बानगी के लिए) प्रद्शित कर दिया गया है, लेकिन पद पद मे (रहने से छायार्वचिव्य के अपररिमित होने से उसका बता सकना असम्भव होने के कारण, उस) छामावेचिभ्र्य का सहूदयो को स्वमम् अनुसरण कर लेना चाहिए। हा, अनुसरण करने के लिए दुछ दिन्दर्शन हम कराये देते हैं। जैसे-मातृगुप्त, मायुराज तथा मञ्जीर यादि (कवियो) के काव्य सुकुमार भाव एव विचित्र भाव से सम्मिश्रित रमणीयता से रसमय सत्पक् होने वाले कहे जा सकते हैं। (अत) वहां (मायुराजादि के काव्यो मे) मध्यम मार्ग से सयुक्त स्वरूप का विधार करना चाहिए। (अर्थान् मध्यममार्ग की छाया का वेचित्र्य वही खोजना चाहिए)। इसी प्रकार कालिदास एव सर्वेसेन इत्यादि (महाकवियों) के काव्य स्वाभाविक सुक्मारता से सुन्दर दिखाई पडते है। (अत) वहां (कालिदासाद्ि के काव्यो मे) सुकुमार मार्ग के स्वरूप की चर्चा करना चाहिए। उसी प्रकार (महाकवि) भट्ट बाण के 'हर्ष चरित' (नामक गद्यप्रन्थ) मे विविध वऋताओ का विलास दिखाई पडता है, एव भवभूति तथा राजशेखर विरवित सह्टना के सौन्दर्य से मनोहर मुक्तको मे (विविध वकताओ का विलास) पाया जाता है। (अत समदवो को विचिनमार्ग का स्वरूप इन कवियो की रचनाओ मे देखना चाहिए)। इस लिए सहृदयो को स्वत्र (सभी कवियो की रचनाओ मे) सभी (मागों के स्वरूप) का अनुमर्ण करना चाहिए। इम प्रकार (अब तक २४ वी कारिका से ५२ वी कारिका पर्यन्त) तीन मार्गों का लक्षण कर (हमने) दिङ्मान का प्रदर्शन किया है। क्योकि शेछठ कवियों के (काव्य-निर्माण के) कोशल के (असङ्ख्य) प्रकारों का साकस्येन स्वस्थ निरूपण करने मे कोई भी समर्य नहीं हो सकता। (सुकुमारादि) मार्गों में (प्रसादादि) गुणों की समुदायसमेता है।
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अर्थात् सुप केवल शब्य आदि मे रहते है। ऐसी बात नहीं, बस्कि वे मन्दे मे समूह मे रहते हैं और) जैँसे उनकी केवल शन्दादिघमंता नहीं होती है उसना प्रतिपादन उन (माधुर्यादि गुणो) के लक्षण करते समन किया जा गुग है।। एवं प्रश्येक प्रतिनियतगुणपामरमणीय मार्गन्नितयं व्यारयाय साधारणगुणस्वरूपव्याख्यानार्थमाह- इस प्रकार प्रत्येक (मार्ग) मे अलम उग से निश्चित (माघुय, प्रसाद, सावम् एव आभिजातम रूप) गुणसमूह से सुन्दर (मुकुमार, विचित एवं मानम रूप) तोन मार्गों की व्यारुप कर (अब सभो मे समान रूप से स्थित) साधारण गुणो के स्वरूप की व्यार्या करने के लिए कहते हैं- आझ्सेन स्वभावस्य महर्त्वं येन पोष्यते। प्रकारेण तदौचित्यमुचितार्पानजोवितम्॥ ५३॥ पदार्थ का औचित्ययुक्त-कपन-रूप प्राण वाला उत्कर्ष, भलीमाति स्पष्ट ढङ्ग से, जिस (गुण) के द्वारा परिपोष को प्राप्त कराया जाता है, वह औषित्य (नामक गुण होता) है।। ५३॥ सदौचित्यं नाम गुण । कोटक्-आख्जसेन सुस्पष्टेन स्वभावस्य पदार्थस्य महत्त्वमुत्कर्षो येन पोष्यते परिवोध प्राप्यते। प्रकारेणेति प्रस्तुतत्वादभिधावेचित्र्यमन्न, 'प्रकार'-शव्देनोच्यते । कीदशम्- एचिताख्यानमुदाराभिधान जीवित परमार्थी यस्य तत्तथोक्तम्। एतदानुगुष्येनैव विभूषणविन्यासो विच्छित्तिमावहति। यथा- वह 'औौनित्य' नाम का गुग (होता) है। किस प्रकार का-म्राञ्जस अर्थान् भलोभाति स्पष्ट (ढङ्ग) से स्वभाव अर्थान् पदार्थ का महत्त्व पानी उत्कर्य जिसके द्वारा पुष्ट होता है अर्थान् परिषोष को प्राप्त कराया जाता है। (कारिका मे प्रयुक्त) प्रकारेप इस (पद के) प्रस्तुत होने के कारण उक्ति की विषिनता (हो) यहाँ 'प्रकार' शब्द से कही गई है। (अर्थान आक्वसेन प्रकारण का अर्थ है-'अत्यन्त स्पष्ट उि के वैषिशन्व द्वारा'।) कैसा (-पदार्य का उत्वयं पुष्ट किया जाता है)-औचित्य युक्त आख्पान अर्थार उदारता से युक्त कथन है जीवित अर्थान् परमार्ष (प्राण) जिसका वह हुआ सथोक (औचित्ययुक्त कपन रूप ्राण वाला-पदार्थ का महत्त्त्व)। इसी (औषित्य गुण) के अनुरूप ही अनदूारो का विन्वास सुशोभित होता है (बन्यथा नही)। जैसे-
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प्रथमोन्मेप १५७
करतल कलिनाक्षमालयोः समुदितसाध्वससन्नहरतयोः। कृतरुचिरजटनिदेशयोदपर इयेश्ववयोः समागम. ॥ ११५॥ करतलो पर सुशोभित हीती हुई अक्षमाला वाले उत्पन्न भय (या सात्विक माद) के कारण बड हो गए हुए हाथो वाते सथी निमित की गई सुन्दर जटाओं की रचना वाले ( उन दोनो का) मानो पार्वती तथा शङ्कूर का दूसरा समागम सा हुआ॥ ११५ ॥ चथा वा- उपगिरि पुरुहुतस्यैप सेनानिवेश-
भ्रुवमिह् करिणस्ते दुर्घराः सन्निकर्षे सुरगजमदलेखासौरभ न क्षमन्ते ॥ ११६॥ अथवा जैसे ( इसी का दूमरा उदाहरण)- महाड़ के पास (इस ओर तो) यह इन्द्र का संग्य सिविर है (अठ) पहाड के दूसरे सट पर ुम्हारी सेनायें निवास करें ( क्योकि) निश्नय ही तुम्हारे कठिनाई से बस मे किए जा सकने वाले हायी समीप मे स्थित देवताओ के हाथियो के दान (जल) की रेखाओ की गन्ध को नहीं सह सकते ॥ ११६॥ यथा च- हे नागराज बहुधास्य नितम्बभागं- मोगेन गाढमभिवेष्ठय मन्दराह्े:। सोढाविषह्यवृषवाहन योगलीला- पर्यक्धबन्धनविघेस्तव कोडतिभारः ॥।१२६ ।। और जसे (इसका तीस्षरा उदाहरण)- हे नागेन्द्र, इस मन्दर पर्वत के मध्य भाग को अपनी कुण्डली से कई वार क्स कर लपेट सो। क्योकि चिवजी की योगलीला के ससहा पयंदूबन्ध की विधि करे सहन कर लेने वाले तुम्हारे लिए यह कौन बड़ा बोझ होगा। यहां पर पहले के (करतल-आदि।११५'॥ एवं उपगिरि."आदि । १ १६ ।) दोनो उदाहरणों में अलद्वार के भुणों से हो वह (मौचित्य नामक) गुम परिपुष्ट हो रहा है। (अर्थान करतल इत्यादि मे जो उत्पेक्षा अलद्वार कवि ने कल्पित किया है, उस बलद्वार को पुष्ट करने के लिए कवि ने जिन 'ईसवरमों के तीन 'करतलकलिताक्षमालयो.' आदि विशेषण दिये हैं जो कि दोनों का साम्य बवाते हैं वे अत्यन्त ही मौवित्ययुक्त होने के
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१५६ वकोशिजीवितम्
कारण अलद्वार को पुष्ट करते हैं और उसी से औवित्वय गुण का परिपोषण होता है। तथा दूसरे पद्य मे कवि ने जो दूसरे राजा के हाथियो का सुरगजों की दानरेखाओ की पडकियो की गन्ध को न सहन कर सकने का वर्णन किया है, वह देवगजो की अलोकिक गन्ध का प्रतिपादन करने के कारण अत्यन्त ही औचित्यपूर्ण है अत उस .... ... .. ....... से औषित्य गुभ परिपुष्ट हुआ है।) तथा दूसरे ( 'हे नागराज ... ' इत्यादि ॥ ११७ ॥) मे स्वभाव के औचित्यपूर्ण कथन से (औचित्य गुण परिपुष्ट हुआ है)। (अर्ान उसमे मेपनाम के औदार्य का सत्य वर्णन हुआ है। जिससे सोचित्य परिपुष्ट हो रहा है।) अत्र पूर्वनोदाररणयोर्भूपणगुणेनेव तद्गुणपरितोषः, इतसत्र घ स्वभाषौददार्याभिधानेन। औचित्थस्यैव छायान्तरेण स्वरूपमुन्मीलयति- यत्र वक्तु: प्रमातुवो वाच्यं शोमाविशायिना। आच्छादयते स्वभावेन तदप्यौचित्यमुच्यते।।५४ ॥ औचित्य गुण का ही दूसरी शोभा के साप स्वरूप-निरयण कर रहे हैं- जहाँ पर कहने वाले अथवा सुनने वाले के रमणीयता के अतिशय से युक्त स्वभाव के द्वारा अभिश्वेय वस्तु बच्छत हो जाती है, वह भी प्रषित्य (गुण) कहा जाता है।। ५४॥ यत्र यस्मिन वक्तुरभिधातु: प्रमातुर्षा नोतुर्वा स्वभावेन स्वपरि- स्पन्देन वाच्यमभिधेयं वस्तु शोभातिशायिना गामणीयकमनोहरेण आच्छादते सव्रियते तदप्यौचित्यमेवोच्यते। यथा- जहां अर्थान् जिस (गुण) मे वक्ता अर्थात् कथन करने वाले अपवा प्रमाता अर्थान् श्रवण करने वाले के शोमा के अतिरम से पुक्त अर्थान् सोन्दय के कारण चित्ताकपक स्वभाव अर्थात् अपने धर्म के द्वारा वाच्य अर्पात् अभिधय वस्तु आककादित कर दो जाती है मर्थात् छिपा दो जाती है (दवा दी जाती है) वह भी औबित्म (नामक सुण) ही कहा जाता है। जसे-विश्वजिन् यक मे सर्वस्व दान दे देने के बाद रघू के पास मिक्षायं गए हुए मुनि कौत्स उनसे कहते हैं- शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्वमाभासि तीर्थप्रविपादिवद्धिः। आरण्पकोणत्तफलप्रसूति: स्तम्बेन नीवार इवावशिष्ट: ।।१८।। हे गरपति! (रघु ! दान योग्य) सस्ानों को (अपनी) सम्पत्ति प्रदान कर, केवल देह से ही स्थित (आप), अरण्य-निवासियों द्वारा गृहीत फल रूप
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प्रसव वाले, (अर्थान फल ही जिनका प्रसव है, उसे ही अरण्य-निवासी मुनियो आदि के द्वारा तोड़ पलेने पर) केदल डण्ठल रूप मे ही शेप रहने वाले नीवार (धान्य विशेष के वृक्ष) की भाति सुशोभित हो रहे हैं॥ ११८ ॥ अन्न श्लाध्यतया तथाविधमहाराजपरिस्पन्दे वर्ण्यमाने मुनिना
अन्न वक्तु: स्वभावेन च, वाच्यपरिस्पन्दः संवृतप्रायो लक्षयते। प्रमातुयथा। यहाँ प्रशसनीय रूप मे उस प्रकार के (सातिशय) महाराज (रघु) के स्वभाव को वणित किए जाते समय, मुनि (कौत्स) के द्वारा अपने अनुभव से ज्ञात व्यवहार के अनुसार (उपना रूप) अलद्कार की योजना वत्यन्त ही औचित्य का परिपोषण करती है। (अर्ान् मुनि ने जो राजा की उपभा नीवार के डण्डल से दी है वह स्वत उनके अनुभव से ज्ञात है। क्योकि मुनि होने के कारण वे उसके फल को तोडते ही थे। बत फल तोड लेने के बाद जो उन्हे उसके डण्ठल मे एक अपूर्व शोभा के दर्शन होते थे उसी गोभा का साम्य राजा मे सब कुछ दान कर देने के बाद देखने में उन्हें अनुभव-हुआ अतः उन्होने राजा की उपमा उस नीवार के डण्ठल से दे दी, जो कि उपमा देने वाले के मुनि होने के कारण अत्यधिक औचित्ययुक्त प्रतीत होती है। इसी लिए) यहाँ पर बक्ता (कौत्स मुनि) के स्वभाव मे (जो कि गम्य है। अभिधेय (राजा रधु) का स्वभाव आच्छादित सा प्रतीत होता है।) इस प्रकार इस उदाहरण के द्वारा वक्ता के स्वभाव से वाच्य के आच्छादित होने को दिखाया गया है। अब) श्रोता के (स्वभाव से वाच्य वस्तु के आच्छादित होने का उदाहरण) जैसे- निपीयमानस्तबका शिलीमुखेरशोकयष्रिश्चलबालपल्लवा। विडम्बयन्ती दद्दशे बधू जने रमन्ददष्टीपकरावधूननम् ।। ११६।। नामिका-निवह के द्वारा भ्रमरो से पान किए जाते हुए मधुवाले पुप्प- गुच्छो वाली और हिलते हुए नये किसलयो वाली अशोकलता जोर से काट लिए गये हुए अघर बाली ( कामिनी) के हाथ हिलाने को अनुकृति करती हुई उत्प्रेक्षित की गई ॥ ११६॥ अत्र वधूजनैर्निजानुभवषासनानुसारेण तथाविधशोभाभिरामतानु- भूतिरौचित्यपरिपोषमावहति। यथा घा- यहां पर नायिकाओ के द्वारा अपनी अनुभूति की वासना के अनुसार उसो सरह की विद्धिति की रमणीयता का अनुभव औवित्य को परिपुष्ट करता है। अपवा जसे-
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वापीतडे कुडुंगा पिअमहि ह्वाउ गएहि दोसति। ण धरति करेण भणति ण ति वलिउं पुण देंति ॥ १२० ॥ [वापीतटे कुर्ह्वा: प्रियमखि स्नातु गतहश्यन्ते। न धरन्ति करेण भणन्ति नेति वलितु पुनर्न दृदति ॥] ऐ प्यारी सहेली, बांबडी के किनारे नहाने गमे लोगो के द्वारा [ऐसे ] यृग देसे जाते हैं जो न तो हाथ पकड़ते हैं, न बोलते हैं और न ही मुड कर घले झाने देते है॥ १२० ॥
स्वभाचेन वाच्यमाचछ्ादित मौचित्यपरिपोषमावहति। इस रचना मे किसी सुननेवाली सहेली के अत्सधिक भोलेपन की आदस के कारण मनोहारी स्वभाव के द्वारा छिपाया गया हुआ वाच्य अर्थ वौनित्य को परिपुष्ट करता है। एव मीष्ित्यमभिघाय साभाग्यममिधत्ते- इत्युपादेयवर्गेऽस्मिन् यदर्थ प्रतिभा कवेः । सम्यक् संरभते तत्य गुण: सौमाग्यसुव्यते ॥ ५५॥ इस प्रकार औचित्य को बता कर (अब दूसरे सर्वसाधारण गुण) सौभाग्य का कथन करते है- इस प्रकार (शब्द आदि के) इस उपादेय समूह ने जिस (बस्तु) के लिये कवि को पाकि-वड़ी सावधानी से व्यापार करती है उस (वस्तु-काव्य) का गुण सोभाग्य (नाम से) कहा जाता है॥। ५५॥ इत्येवविघेऽस्मिन्नुपादेयवर्गे शन्दायुपेयसमूह्दे यद्थं यमिमितं कवे: सम्बन्धिनी प्रतिभा शक्ति सम्यक सावधानतया संरमते व्यव- स्यति तस्य वस्तुनः प्रस्तुतत्वात् काव्याभिधानस्य यो गुणः स सोभाग्यमित्यु च्यते भण्यते।। इस प्रकार के इस उपादेय वर्ग मे अर्थात् शब्द आदि के उपायो द्वारा प्राप्त होने योग्य समूह में यदर्थ अर्थान् जिसके निमित से कवि की यानी दवि सम्बन्धिनी प्रतिभा अर्थात् शक्ति सम्यक् वर्थात् सावधानी के साथ सरम्भ करती है, व्यापार करती हैउस वस्तु का अर्थात् यहाँ प्रसङ्गपराप्त होने के कारण काव्य नामक (वस्तु का) जो गुण है वह 'सौभाग्य' ( गुण है), इस प्रकार कहा जाता है। तच्च न प्तिभासंरम्भमान्नसाध्यम्, किन्तु वदिहितसमस्त-
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LIBRARY प्रथमोन्मेप.
तथा वह सौभाम्म गुण केवल शक्ति के यापार से सिंद्ध होने वाला नही होता है, अपितु उसके लिये बनाई गई ( व्युत्पति एवं अम्बांस आदि ) समस्त सामग्रियों द्वारा सम्पादित किये जाते सोग्य होता है इसे चनासे है- सर्वसम्पत्परिस्पन्दसम्पाद्यं सरसे्मनाम्। अलौकिकचमत्कारकारि काव्यैकजीवितम्॥ ५६॥ (कान्य निर्माण के लिये अभीष्ट व्यक्ति, व्युत्पति तथा अभ्याम आदि) समस्त सम्पत्ति के परिस्फुरण से सम्पन्न किये जाने योग्य तथा मरस हृदय वाले (लोगो) के लिये लोकोत्तर आनन्द प्रदान करने वाला (सौभाग्य गुण) कारण का अद्वितीय प्राण है।। ५६॥ सर्वसम्पतपरिस्पन्दसम्पार्दं सर्वर योपादेयराशेर्या सम्पत्तिर नवद्यता काष्ठा तस्या परिस्पन्द: रफुर्तित्वं तेन सम्पाद्य निष्पादनीयम्। अन्यन् कीटशम्-सरसान्मनामाठ्ेचेततसामलौफिकचमतकार कारि लोकोत्तराहाद- विधायि। कि बहुना, तब काव्यैकजीवितं काव्यस्य पर परमार्थ इत्यर्थ। यथा- समस्त सम्पतति के परिस्पन्द् से सम्पाद्य अर्थान् (काव्य-निर्माण के लिये) उपादेय (शक्ति, व्युतत्ति आदि) समस्त समूह की जो सम्पत्ति अर्थाद् रमणीवता का उत्कर्ष, उसका जो परिस्पन्द अर्थान् विलास (स्फुरितत्व) उसके द्वारा सम्पाद अर्थान सिद्ध किये जाने योग्य। और किस प्रकार का सरस आत्मावाले अर्थान साद्रहृदय वालो के अलोबिक चमत्कार का जनक अर्थनन लोकोतर आह्वाद को प्रदान करने वाला। और अधिक कहने से क्या लाभ, वह (तो) काव्य का अद्वितीय प्राण अर्थार् श्रेष्ठ तत्व है। जैसे-
किञ्चित्ताण्डवपण्डिते स्मितसुधासिक्तोक्तिपु भलते। चेत-कन्दुलितं स्मारव्यति करलोवण्यमहद्वेतं तन्वङ्गयास्तरुणित्नि सर्पति शनैरन्येव काचिल्निपि:॥१२१।। (उम्र सन्वी का) वक्ष स्थल वाहुमूलपर्मन्त विस्तृत स्तनो से सयुक्त हो गया है, (उसके) नेत्र बाहसत्यपूर्ण कटाक्षो से युक्त हो गए हैं तथा मुस्कुराहट रूपी अमृत से सने हुए भायण के समय (उसकी) मौहों की पक्तिर्या कुछ लात्य मे विलक्षण सी हो जाती हैं, (उसका) हृदय काम की अवस्थाओ से अडकुरित सा हो गया है, एव उनके अगो ने (किसी अपूर्व ही) लावण्य का वरण किया है, इूस प्रकार नवयोवन के आगमनकाल में धीरे-धोरे उस कृपागी का कुछ (अपू्बं) ही विन्यास हो गया है ॥१२१।। ११ व० जी०
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१६२ वक्ोक्तिजीवितम् तन्व्याः प्रथमतरतारण्येऽवतीर्ण, आकारस्य चेतसश्वेष्टयाच्च चैचित्र्यमन्र वर्णितम्। तत्र सून्नितस्तनमुरो लावण्यमङ्गपृतमित्याकारस्य, स्मर्यतिकर: कन्दलितमिति चेतसः, स्त्निह्यत्कटाच्े दशाविति किञ्चि- न्ताण्डवपण्डिते स्मितसुधासिक्तोकितिपु भूलते इति चेष्टायाश्च। लच्यते, स्िह्यदित्येतस्य कालविशेपावेदकः प्रत्ययवक्रभायः, अन्यैव काचिद- वर्णनीयेति संवृतिवक्ताविच्छित्तिः, अव्वर्वृतमिति कारकवक्रत्वम्। विचित्रमार्गविपयो लावण्यगुणातिरेक । तदेवमेतस्मिन् प्रतिभा- सरम्भजनितसकलसाममौसमुन्मीलितं सरसहृद्याहादकारि किमपि सौभाग्यं समुद्धासते। यहां पर कृषाङ्भी के पहिले पहल बौवन के अवनीर्ण होने पर (उसकी) आकृति, हृदय एव चेप्टाओं के वैचित्व का वर्णन किया गया है। उनमे 'विस्तृत स्तनो से युक्त वक्षास्थल' तथा 'बङ्गो ने, लावण्य का वरण किया' इस (विशेषण द्वय) से आकार के, 'काम की अवस्थायें अडकुरित हो गई है'-इस (विशेषण) से हृदय के, 'वाहसत्यपूर्ण कटाक्षो से युक्त अखें एवं मुस्कुराहट रूपी अमृत से सने हुए भाषण के समय सास्य मे विचक्षण सी हो गई मौहो की पक्तिया' इन (दो विशेषणो से) चेप्टा के वैचित्य को कवि ने प्रतिपादित [किया है)। (इस श्लोक मे प्रयुक्त) सूत्रित, सिक्त, ताण्डव, पण्डित एव कन्दलित (शब्दो) की उपचार-वकना (स्वष्ट रूप से) दिखाई देती है। 'सनह्यत्', इस (पद्र) की (वर्तमान रूप) काल विशेष का बोध कराने वाले ( पतृ) प्रत्यय की बकता (लक्षित होती है)। अन्यय काचित्' अर्थान् 'अनिर्वचनीया' इस (पद) के द्वारा 'संवृत्तिवक्रता' की शोभा (का प्रतिपादन किया गया है।) 'बङ्गंवृंतम्' मे (अङ्गं:के) इस (तृतीया विभत्ति मे प्रयोग) से 'कारक बत्ना' (प्रतिपादित की गई है) विचिन मार्ग के विषय रूप 'लावण्य' गुण का अतिशय ( इस श्लोक से लक्षित होता है) इस प्रकार इस (पद्य) में (कवि की) प्रतिभा (शक्ति) के व्यापार से जनित समस्त (वक्रा की) सामप्री से स्फुरित हुआ सरस हृदय लोगो के भानन्द को उत्पनन करने वाला कोई (अवर्णनीय) सोभाव्य (नामक गुण) भलीमाति उद्धासित हो रहा है। अनन्तरोक्तस्व गुणद्वयस्य विपयं प्रदर्शयति- एतस्त्रिष्वपि मार्गेपु गुणद्वित यमुज्जवलम्। पदवाक्यप्रवन्धानां व्यापकत्वेन वर्तते ॥५७ ॥
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प्रथमोन्मेप १६३
(सुकुमार विचित्र एव मध्यम मागों के चार चार, माघुर्य, प्रसाद, लावण्य एवं आभिजात्य गुणो का प्रतिपादन करने से) अनन्तर (साघारण गुणो के रूप मे) कहे गये दोनो (औचित्य एव सौभाग्य) गुणो का विषय प्रद्शिन करते हैं- मैं अलङ्कारादि से अत्यन्त शोभिव (उज्जवल) दोनो (सौभाग्य एव ओचित्य नामक) गुण (सुकुमार, विचित्र एवं मध्यम) तोनो ही मार्गो मे पद, वाक्य एव प्रबन्धो (अर्थान् समस्त काव्य के अवयबो) मे व्याप्त होनर स्यित रहने हैं॥ ५७॥
एतद् गुणद्वितयमौचित्यसौभाग्याभिधानम् उज्जलमतीवभ्राजिष्णु- पद्वाक्यप्रबन्धानां त्रयाणामपि व्यापकत्वेन वलते सकलावयव- व्याप्त्यावतिष्टते। क्वेत्याह-त्रिष्ववि मार्गेपु सुकुमारविचित्रमध्य- मार्येपु। तत्र पदस्य तावदीचित्यम्-बहुतिधभेदमिन्नो वक्रभावः स्वभावस्याञ्जसेन प्रकारेण परिपोपणमेव वक्रताया परं रहस्यम् उचिताभिधानजीवितत्वादू। द्विदाहादकारित्वहानि। यथा रघुबरो- यहु औचित्य और सौभाग्य सब्जक गुणह्वितय, उज्जवल, अर्थान् (अलङ्कारादि से युक्त होने के कारण) अत्यत्त ही सुशोभित, पद वाक्य एवं प्रबन्ध तीनों के ही व्यापक रूप से विद्यमान रहता है अर्यान् (काव्य के) समस्त ब्गो मे व्याप्त होकर स्थित रहता है। कहाँ (व्याप्त रहता है) इसे बताते हैं-सुकुमार, विचित्र एवं मध्यम सब्ज्ञा वाले तीनो ही (काव्य के) मार्गों मे। उस प्रसुङ्ग में पद का औचित्य तो यह है-वन्नता नाना प्रकार के भेदो के कारण भिन्न भिन्न है, स्वभाव का त्वरितविधि से संस्फुरण और परिपाक ही वकता का वास्तविक रहस्य है क्योकि उसका मोचित्यपूर्ण प्रकाशन ही प्राण है। सम्पूर्ण वाक्य के एक अश मे भी औचित्य का अभाव होने पर सहदवाह्ादकारिता की हानि होने नगती है-जैसे रघुवश (महाकाव्य) में पुरं निपादाधिपते स्नद्ेतद्यस्मिन्मया मौलिमणि विहाय। जटासु बद्धास्वरुदत्सुमन्त्र' केकेयि कामा फलितास्तचेति ॥१२२ ॥ यह निपादी के स्वामी (गुहराज) का वह नगर है जिसमे मैरे मौलि- मणियो का त्याग कर जटाये बढ़ा लेने पर (सारषि) सुमन्त्र ने-'हे केकेषि (अत्) तुम्हारा अभिलाप फलित हो गया' ऐसा कहकर आँसू बहाया था ॥ १२२।
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१६४ चकोक्िजीवितम् अन्र रघुपतेरनर्घमहापुरुपसम्पदुपेतत्वेन च्ण्मानस्य 'कैकयि कामा फलितास्तव' इत्येवंिधतुच्छतरपदार्थसंस्मरणं तदभिधानें चात्यन्तमनौचित्यमावहति।
दृग्धपटप्रायता प्रसज्यते । यथा-रघुवंशे एवं दिलीप-सिंद्दसंचादावसरे- महावुष्पो की अमूल्य निधियो से युक्त रूप मे वर्गित किे जाने वाले रघुराज (रामचन्द्र) का 'कैकेषि! सुम्हारा अभिलाय फलित हो गया' इस रूप के तुच्छ पदार्थ का सम्पक स्मरण, और (केवत स्मरण हो नहीं अपितु) उसका वहु भी जाना, अत्यधिक अनोचित्य को धारण करता है। कही कही प्रबन्ध भी प्रकरण के एक अश मे भी औचित्य के न विद्यमान रहने पर, एक भाग मे जले हुए होने से दूषित (समस्त) जले हुए वस्न के समान (दूदित) हो जाता है। (जर्थान् जैसे किसी कपडे का जलता तो एक ही अश है लेविन दूवित सारा का सारा कनडा हो जाता है। लोभ कहते हैं कि वपड़ा जल गया न कि कपड़े का एव भाग। उसी प्रकार यदि किसी प्रबन्ध काव्य के किसी प्रकरण के एक भी अंग में शेष भा जाता है। मोचित्य नही रहता, तो सारा का सारा प्रबन्ध दूषित वहा जाने लगता है। इसका उदाहरण जैसे ( कालिदास विरचित) रघुवश (प्रबन्ध कव्य) मे ही राजा दिलीप तथा सिह के संबाद (रूप प्रवरण) के तमन- अथ कघेनोरपराधचण्डादू गुरो: कृशानुप्रतिद्विभेपि। शक्योऽस्य मन्युभेवतापि जेतुं गाः कोटिश: स्पर्शयता घटोघ्नी ॥१२३।। (राजा दिसोप अपने गुह वशिष्ठ को आ्षा से पुत्र प्राप्ति हेतु 'नन्दिनो' धेनु की सेवा मे सत्पर होते हैं। एक दिन वे जते पराते पराते पर्वत की भुपमा देखने लगते है कि इनने में ही उस गाय का करुण कदन सुनाई देना है और दिलीप देखते है नि उस गाय के ऊपर एक निह् वकमण किए है। दिलीम उम सिंह को मारने के लिये तुरन्त बाण निकालने के निए जो ही तरकश में हाथ डालते हैं, जनका हाप फेम जाता है, चे विबस हो जाते हैं। विवश होकर सिंह से उम गाम को छोड देने के लिए नाना प्रकार से अनुनय करते हैं पर सिंह जब किसी भी तरह उमे छोडने को ठैयार नहीं होता तो उस गाय के बदले अपना शरीर उसे देने के निये तैयार हो जाते हैं। इसी बात पर सिंह दिलीप से कहता है कि)-
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प्रथमोन्मेप: १६५
(हे राजन् । यदि माप) एक ही घेनुवाले, (बतएव उसके विनाश के) अपराध के कारण अत्मन्त हो कुद्ध (साक्षान्) अग्निस्वरूप गुरु (वसिष्ठ) से डरने हैं (कि गुरु जी कुद् हो जगयेंगे)। अव उन्हें प्रमन्न रखने के लिए अपने प्राणो का उत्सर्ग कर देना चाहते हैं, तो यह ठीक नहीं क्योकि (एक गाय के बदले मे) घटो के समान थनो (स्तनो) वाली करोडो गाये प्रदान कर उनका कोध आप (बड़ी सरलता से) दूर कर सकते हैं। (अर्थान उन्हे मदि एक माय के बदले करोड़ो गायें मिल जायेगी तो उनका गुम्सा अपने आप रफूचककर हो जायगा) ॥ १२३॥ इति सिंहस्याभिधातुमुचितमेव, राजोपहासपरत्वेनाभिधीयमान- त्वान। राज पुनरस्य निजयश' परिरक्षणपरत्वेन तृणवल्लघुवृत्तयः प्राणा प्रतिभासन्ते। तस्यतत्पूर्व पक्षोत्तरत्वेन- ऐसा सिंह का कथन तो राजा का मजाक उड़ाने के लिये कहे जाने के औचिन्य युक्त ही है। और फिर (इम सिंह के कथन से) इस राजा दिलीप के तृच्छ वृत्ि वाले प्राण अपने यश को भजीभाति रक्षा करने में तत्पर होने से तृण के समान (तुच्छ) प्रतीत होते हैं। (अत यह सिंह का कथन कोचित्य बुक्त है) 1 इम प्रश्न के उत्तर रूप मे (कहा गया) उम ( राजा दिलीप) का यह (कथन)- कर्थ च शक्यानुनयो महर्पिविन्नाणनादन्यपयस्बिनीनाम्। इमां तनूजां सुरभेरवेहि रुदरौजसा तु प्रहृनं त्वयास्याम्॥। १२४॥। (कि इस नन्दिनी गाय के बदले मे) दूसरी (करोड़ीं) दुधारी (गायो) को प्रदान करने से (भी) महषि वशिष्ठ का ब्रोध रहित (शकयानुनय) कैसे होंगे। क्योकि इस (नन्दिनी गाय) को तुम मुरम (कामघेनु) की तनमा समझो।(यह उससे कुछ भी कम नहीं है अर्यान् कामनाओ की पूवि यह भी करने वाली है। अत अय गाये इसकी समानता में कैसे ना सबती हैं और (फिर) तुमने (भौ) इम (गाय) पर (अपने प्रभाव से नही नत्कि) भगवान् शच्र के तेज से प्रहार किया है ॥ १२४॥। इत्यन्यासां गवां तत्पतिवस्तुप्नदानये ग्यता यदि कदाचित्सम्भवति ततस्नस्य मुनेमस चोभयोरप्वेतजीवितपरिक्षणनरपेद्यमुपपत्रमिति
यथा च कुमारसम्भवे वैलोक्याकान्तिप्रवणपराकमस्य तारकाख्यस्य रिपोर्जिगीपावसरे सुरपतिर्मन्मयेनाधीयते- (इस राजा के कथन का) यदि कही अन्य गायो मे उस ( नन्दिनी) के साथ विनिमय की योग्यता सम्मव होती तो इस (नन्दिनी गाय) के जीवन
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१६६ वकोकिजीवितम्
को रक्षा की वपेक्षा न मुनि ही वो और न हमे ही, दोनो (मे से किसी) को भी न होती (अर्थात् यदि मैं यहाँ गुरु वशिष्ठ की बाज्ञा रूप अपने इस गाय के रक्षा रूप, कर्तध्य का पालन कर रहा हूँ तो केवल विवश होकर ही वयोकि मैं इस गाय का बदला नहीं बुका सकता है, अयथा कर्तव्य का पालन न करता) इस प्रकार के तात्पर्य मे (इस श्लोक के) पर्यवसित होने से (राजा का) यह कथन वत्यन्त ही अनोचित्य से भुक्त है। अपवा जैसे (प्रबन्ध काव्य के किसी एक प्रकरण के अनोचित्य का दूसरा उदाहरण (कुमार सम्भवमे-तोनो लोको को आनान्त करने मे तत्पर तारक नामक (राक्षम रूप) शत्रु को जीतने की इच्छा (से ब्रह्ा के कथनानुसार कि यदि किसी प्रकार से पङ्गर का विवाह हो जाय तो उनके वीर्य से उत्पन्न उनका पुत्र ही उस राक्षस का बध करने मे समर्थ होगा। वत. तड़ूर की समाधि भष्त् करने के लिये इन्द्र के द्वारा बामदेव के बुलाये जाने) के समय कामदेव इन्द्र से इस प्रकार कहता है कि- कामेकपननीं व्रतदु खशीलां लोलं मन्वार्तया प्रविष्ठाम्। नितम्बिनीमिच्छसि मुक्तलजां कण्ठे स्वयंभ्राहनिपक्तवाटुम्।।६२४।। पतिध्रत धर्म के कारण मठोर र्वभाव वाली (पातिव्रत के पालन मे दढ सङ्कल्प, लेकिन) तोन्द्यं के कारण (आपके) लालची चित्त मे समाई हुई, किस ( प्रशस्त नितम्ब वाली) सुन्दरी को ( हुमारे प्रभाव से) लग्जा- हीन बनाकर स्वय आपके कण्ठ मे डाले हुए बाहुपाशा वाली (बनाना) चाहते हैं ॥ १२४॥। इत्यविनयानुष्ठाननिछ्ठं त्रिविष्टपाधिपत्यप्रतिष्वितस्यापि तथाविधाभि एतच्चतस्थैय पर्यालोच्यते, न पुनरन्येपामाहार्यमात्रकाव्यकरणकौशलरलाधिनाम्। सौभाग्यमपि पदवाक्यप्रकरणप्रबन्धाना प्रत्येकमनेकाकारकमनीयकारणकलाद- कलितरामणीयकानां किमपि सहृद्यहृदयसंवेय काव्यैकजीविवम- लीकिकचमतकारकारि संवलितानेकरसास्वादसुन्दरं सफलावयन- व्यापकत्वेन काव्यस्य गुणानतरं परिस्फुरतीत्यलमतिपसद्ेन। (इस प्रकार कामदेव का) स्वर्ग के आधिपतय पर प्रतिष्ठित भी (इन्द्र) का उस प्रकार के (परस्त्री के सतोत्त का अपहरण रूप) अभिप्राम के अनुरोध रूप मे कहा जाता हुआ, उच्छसुतता के आचरण से सम्वन्धिव यह कथन अत्यन्त अनोचित्य से पूर्ण है। और यह भी स्वाभाविक मुकुमारता
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प्रथमोन्मेप. १६७
से मुद्रित सूक्तियो के विलासी के सौन्दर्य वाले इमी (श्रेष्ठ) कवि (कालिदास) की भुक्ष्म आलोचता की जा रही है, न कि केवल (व्युहपसि 'एव अभ्यास के चलपर) बनावटी (मस्वाभाविक) काव्य-निर्माण की कुशलता से प्रशंसा के पात्र बनने वाले अन्य (ऐरे गेरे पचकल्यानी) कवियो की सूक्ष्म आलोचना की जा रही है (क्योकि उनमे नो इमनी सूक्ष्मता से पर्यवेक्षण के विना हो दोप मिल जायेंगे)। नाना प्रकार के मनोहर कारण समुदाय से उत्पन्न सौन्दर्यवाले, पद, वाक्य, प्रकरण एव प्रबन्धो मे हर एक का (अलग-अलग केवल) सहृदयो के हृदयो के द्वारा अनुभव किया जाने वाला काव्य का केवल प्राणभून, अलौकिक आनन्द को प्रदान करनेवाला (काव्य से कवि द्वारा) सन्निविष्ट अनेक (शृङ्गारादि) रसो (की चर्वणा) के आस्वाद से रमणीय कोई (अनिवचनीय) सौमाग्य (नाम का) दूसरा गुण भी काव्य के [समस्त अङ्गो मे व्यापक रूप से प्रकाशित होता है। (मन. सहृदय ही उसका अनुभव कर सकते हैं।) इसलिये अति प्रसङ्ग (अर्थान् इसके अधिक विवेचन से कोई लाभ नही है।
इदानीमेतदुपसंहृत्यान्यदवतारयति- मार्गाणां त्रितयं तदेतदसकृत्प्राप्तव्यपर्युतसुकै: क्षुष्णं कैरपि यत्र कामपि भुवं प्राप्य प्रसिद्धि गताः। सर्वे स्वैरविह्दारहारि कवयो यास्यन्ति येनाधुना तस्मिन् कोडपि स साघु सुन्दरपदन्यासक्रम: कथ्यते ॥५८।। इस प्रकार (अब तक प्रथम जन्मेष मे मार्गों के, स्वरूप एव उनके गुणो का विवेचन कर) अब इस (विवेचन) का उपसंहार करके (द्वितीय उन्मेष मे विवेचित किये जाने वाले वर्णविन्यास क्म आदि) दूसरे (प्रकरण) को अवतरित करते हैं-
प्रयोजन विशेष की प्राप्ति के लिए उत्कण्ठित कुछ महाकवियो के द्वारा मार्गों की यह नयी बार-बार ससेवित होती रही है। उनमे से कुछ भाग्य- शाली महाकवियों ने अद्भुत सफलता प्राप्त करके ख्याति अजित की है। भविध्य मे भी सभी कविगण स्वेच्छापूर्वक विहार के कारण रमगीय (मागेत्रफी) पर चलेंगे। इसी हेतु अब इस मामनयी के विषय मे सुन्दर पदों के सन्निवेश की अद्भुत परम्परा का सम्यग विश्नेषण किया जायगा ॥५८॥
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१६= वकोकिजीवितम्
मार्गाणां सुकुमारादीनामेतत्व्वितयं कैरपि महाकविभिरेय, न सामान्ये:, प्राप्तव्यपर्युरसुक: प्राप्योत्कष्ठितैरसकृत् बहुवारमभ्यासेन क्षुण्णं पररिगमितम। यत्र यस्मिन् मागत्रचे कामप भुवं प्राप्य प्रसिद्धि गताः लोकोत्तरां भृमिमासाद प्रतीति आाप्ता :! सर्वे कवयस्तस्मि- न्मार्गत्रितये येन यास्यन्ति गमिरष्यान्त स्वैरनिहारहारि स्वेच्छाविहरण- रमणीयं स कोडपि अलौकिक: साधु शोभनं कृवा सुन्दरपदन्यासक्म, कथ्यते सुभगमुपिटन्तसमर्पणपरिपाठीविन्यासो वर्ण्यते। मार्गसवरविद्ार- पद-प्रमृतय: शब्दा: श्लेपच्लायाविशिद्ृत्वेन व्याख्येय। इति श्रीराजानक कुन्त कविरचिते चकोकिजीविते काव्यालकार प्रथम उन्मेप: । सुकुमारादि मागों की नयी किसी-किसी के द्वारा बर्मार महारुवियो के ही द्वारा-सामान्य कवियो के द्वारा नहीं, जी कि वदेश्य के प्रति उत्सुक मे आाने काव्यप्रयोजनो के प्रति उत्वण्डावान् थे, बार-बार वर्यान् अनेकछ: अभ्यास के द्वारा सेवित होती रही है अर्थात् ग्रहम की जाती रही है। जिस भार्गसयी मे (उनमे से कुछ) सफलता की जेची भूमिका को प्राप्त करके पसिद्ध हो चले अथानि सवशेष्ठ स्वान को प्राप्त करके सर्वप्रिय बन चते। अब सभी ववि उसी मागनयी मे जिस कारण मे लगे रहेगे अर्थान उन्ही मार्गों से चलते रहेगे, स्वेच्छा विहार के कारण मनोहारी नर्यान बपनी इच्छा से मार्गचयन और उसके ग्रहणत्याय आदि का स्वातन्न्यलाम करके एक विचित्र रमणीयता ले आते हुए उस अतिर्वचनीय अर्थान लोगेतर सुन्दर पदों के विन्यास के क्म को बताया जायगा अर्धान मनोहारी सुबन्त और विङन्त के प्रस्तुत करने की परिपाटी का विन्मास बहुत हो अच्छे दङ् से वणित किया जायगा। भार्ग, स्वैरविहार, पद वादि शब्द यहाँ पर श्लेप की सुन्दरता के वैशिष्टध की दृष्टि से समझे जाने चाहिए। इस प्रकार थी राजानक कुन्तक द्वारा विरचित काव्य के वतद्वारग्रन्य वकोकिजीचित का प्रथम उन्मेप समाप्त हुआ।
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द्वितीयोन्मेप:
सर्वत्रे सामन्यलक्षणे विहिते विशेषलक्षण विधातव्य मिति काव्यस्ष्य "शब्दार्थी सहिती" इत्यादि (१७) सामान्यलक्षण विष । तदवयाभूनयाः शत्दथयो साहित्यस्य प्रथमोन्मेप एव रिशेषलक्षण विदितम्। इदानी प्रथमोहिष्वस्य वणवित्यासवक्रवस्य विशेष- लक्षणमुपक्र मते- समी स्थानो पर (शास्त्रो मे किसी भी वस्तु का) सामान्य लक्षण करके विशेष लक्षण करना चाहिए (ऐसा नियम है) इसलिए ( प्रयम उन्मेप की ७ वीं कारिका मे) काव्य का 'शब्दार्थों सहिती इत्यादि' ऐमा सामान्य लक्षण करने के उपरान्त (विशेय लक्षग करते समय) उस (काव्य लक्षण) के अवयव रूप शब्द और अर्थ के साहित्य (सहभाव) का विशेष लक्षण प्रयम उन्मेप ( कारिका स० १६ एव १७) मे ही किया जा चुका है। अब (इस द्वितीय जन्मेप मे, प्रथम उन्मेर की १६ वी कारिका मे) पहले उदिष्ट किये गये (अर्थान् जिसका केवल नाममात्र से सङ्कीतंन किया गया था उसी) 'वर्ण विन्यास के वक्रमाव' के विशेष लक्षण को प्रारम्भ करने जा रहे हैं- एको द्वौ चहवो वर्णा वध्यमानाः पुनः पुनः। स्वल्पान्तरास्तरिया सोक्ता वर्णविन्यासवक्रता ॥ १ ॥ (जहाँ थोडे योढे व्यवधान वाले, एक, दो अथवा बहुत से व्यञ्जन (चर्ण) अनेकश-सयोजित (किए जाते हैं) वह तीन प्रकार की 'वर्णदिन्यास- वक्रता मानी गई है ॥ १॥ वर्णशव्दोन व्यञ्ञनपर्याय, तथा प्रसिद्धत्वात्। तेन सा वर्ण- विन्यासवक्रता व्यञ्ञनविन्यासनविचिदित्तिः त्रिधा त्रिभिः प्रकार- रुकता वणिता। के पुनस्ते त्यः प्रकारा इत्युच्यते-एक केवल एव, कदाचिद् द्वौ बहवो वा वर्णा पुन पुनर्वध्यमाना योज्यमानाः। कीहशा -स्वल्पान्तराः। स्वल्प स्तोकमन्तर व्यतधानं येपां ते तथोकाः। व एर नयः प्रकार इत्युच्यन्ते। अन्र वोप्सया पुनः पुनरित्ययोग- व्यवच्छेदपरत्वेन नियम, नान्ययोगव्यवच्छेद्परत्वेन। वस्मात्पुन: पुनर्वध्यमाना एव, न तु पुनः पुनरेव वध्यमाना इवि। ११ ष० जी०
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१७२ वक्रोकिजीवितम्
यहा (उक्तकारिका मे) 'वर्ण' शब्द 'व्यञ्जन' के पर्याय रूप मे प्रयुक्त हुआ है ऐसा (काव्यशास्त्र के ग्रन्थो मे) प्रसिद्ध होने से। अतः वह वर्ण- विन्यासवत्रता अर्थान व्यक्षनो के विशेष ढङ्ग के सयोजन की रमणीयता तीन भेदो द्वारा कही गई अर्थात् (असद्कारशास्त्र के प्रन्वो मे या प्रस्तुत प्रन्थ 'ककोतिजीवित' मे सीन प्रकार की वणित की गई है। आखिर वे सीन भेद है कौन से? यह बताते हैं-(कभी) एक अर्थान् केवल (अकेला व्यञ्न) ही कभी दो अथवा (कभी) बहुत से व्यक्षन अनेकश उपनिबद्ध किये जाते वचवा संयोजित किए जाते हैं। कसे ( व्यक्षन)-स्वल्प अन्तर वाले। स्वल्प अर्थाव् बहुत हो कम अन्तर अर्थान् बौच या फासना (व्यवधान) होता है जिनका वे हुए तयोक्त (अत्यल्प व्यवधान वाले वर्ण)। ये ही (अर्थात् कभी एक एक वर्णों का, कभी दो दो और कभी बहुत से वर्णों का बार बार वित्यास, वर्णविन्यास वक्ता के) तीन भेद हैं-ऐसा व हे जाते हैं। यहाँ (इस कारिका मे) दुहराने से (वीप्सा) 'पुन पुन' इस (शब्द) के द्वारा 'अयोगव्यवच्छेदपरक' नियम (का विधान किया गया) है न कि 'अन्ययोगय्यवचछेदपरक' नियम का।
टिपण्णी-विवेचको ने 'एव' शब्द के तीन रूप बताये हैं- (१) अयोगव्यवचछेदपरक (२) अन्ययोगव्यवच्छेश्परक औौर (३) अत्यन्तामोगव्यवच्छेदपरक-जंसा प्रतिपादित भी किया गया है कि-
व्यवच्छिनति धर्मस्य एवकारस्विधा मत. ॥कति॥ ऊपर व्यास्या मे आघार्य बुग्तक से इन तीन रूपो में से दो का उल्लेख किया है। यद्यपि पुन. पुन. के हारथ 'एवं' शब्द का प्रयोग नहीं है किन्तु बोप्सा (टियक्ति) के द्वारा उन्होने 'अयोगय्यवच्छेदपरक' नियम को सूचना दी है। अयोग अर्थात् असबन्ध का अवच्छेद करने वाला। जब एव का प्रयोग विशेषण के साथ होता है तो वह सयोग का व्यवच्छेदक होता है जसे-'राम पुर्पोत्तम एवं-यहां पर 'राम' विशेष्य और 'पुष्पोत्तम' विशेषण है। एव का विशेषण के साथ प्रयोग यह सूचित करता है कि विशेष्य राम मे विशेषण पुर्षोत्तम का (अयोग) अर्थात् सम्बन्धाभाव नहीं है, अर्थाद् 'राम पुष्पोत्तम ही है' इश प्रकार राम के पुरुपोत्तम होने का निममन करता है। लेकिन जब एव का प्रयोग विशेष्य के साथ होता है तो वह 'अन्ययोग का व्यवच्छदक' होता है। जंसा 'राम एव पुस्षोत्तम'-यहा पर एवकार वण्ययोग का व्पवष्दक है अर्वात 'राम ही पुस्षोत्तम है' दूसरा कोई नहों।
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द्विनीयोमेष १७३
जब एवकार का प्रयोग क्रिया के साथ होता है तो अत्यन्तायोग का व्यवच्छेदक होता है। जैसे 'नीलं कमल भवत्येव' मे अत्यन्तायोग का व्यवच्छेद है अर्थात् सभी कमल नीले होते हैं ऐसी बात नहीं और न कमल से मिल्न अन्य पदार्थ ही नीले न होते हो ऐसी भी बान नही है बल्कि कोई कोई कमल नीला होठा हैं। इस अर्थ को एवकार प्रस्तुत करता है। यहाँ कुन्तक ने अयोग व्यवच्छेद ताया है अर्थात् व्यक्षन बार बार उपनिबद्ध होकर ही वर्णविन्यास वक्ता को प्रस्तुत करते हैं। यत्रै कव्यक्षननिवद्धोदाहरणं यथा- धम्मिल्लो विनिवेशिताल्पकुसुमः सौन्दर्यधुय स्मितं विन्यासो वचसां विदग्धमधुरः कण्ठे कल पञ्मः। लीलामन्थरतारके च नयने यातं विलासालसं कोडप्येव हरिणीदशः स्मरशरापातावदातः क्रमः॥१॥ वहाँ (उन तीन प्रकारो मे से पहले प्रकार) एक व्यञ्ञन के द्वारा निबद्ध (वर्ण विन्यास वक्रता) का उदाहरण जैसे- विशेष रूप से गुथे गये पुष्पो से युक्त जूड़ा, मुन्दरता के बोझ का वहन करने वाली मुस्कान, कोशलपूर्ण एवं मनोहर वाणी का विन्यास, कण्ठ में मधुर एव घोमा पश्चम (स्वर), विलास के कारण सुस्त पुतलियो से युक्त नमन, हावभाव के कारण धीमी चाल, (इत्यादि) इस प्रकार का उस मृगाक्षी का मदन के वाणो के प्रहार से सुन्दर कोई अपूर्व ही ढङ्ज हो गया है ।। १ ॥ टिपप्णी-उक्त पद्य के प्रयम चरण मे म्, ल्, व् और य् व्यज्जनो का तथा दूसरे चरण मे व्, स्, ध् एव क् वर्णों का, तीसरे मे ल्, र, न, य एवं स् वर्णों का तथा चतुर्थ चरण मे र्, श्, एव त् वर्णों का अलग-अलग अनेकघा विन्यास हुआ है। अत यहाँ एक व्यक्षन का पुनः पुन विन्यास- रूप वर्णविन्यास वक्रता का पहला भेद है। एकस्य द्वयोबेहूनां चोदाहरणं यथा- भग्नै लावल्लरी कास्तर लित कदलीस्तम्बताम्बू नजम्बू- जम्बीरास्तालतालीसर लतरल तालासिका यस्य जहुः। वेल्लत्कल्लोलहेला बिसकल नजडा: कूलकच्छेपु सिन्घोः सेनासीमन्तिनीनामनवरतरताभ्यासत्तान्ति समीर्ष॥२।। एक, दो एव बहुत से वर्णों ( के अनेक बार विन्यास रूप वर्षविन्यास चक्रता के तीनो ही भेदो) का (एक ही) उदाहरण जसे-
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इसायची की मजरियो को तोड देने वाली, मेलो के धौदो, पान जामुन तथा नौवुओको चश्न बना देने वाली ताड, ताही, एव बहुत ही सरल लताओ को लास्य पराने वाली, सटती हुई लहरो वे विलास के खण्डित करने वे कारण उही हवायें, समुद्र के बिनार के बछारो मे जिसकी सेना की सिसे को निरन्तर सम्भोगजन्म चकावट को दूर कर देती थी। टिपप्णी-उत्त पद्य मे वुन्तक ने वर्णवित्यासवद्रता के सोनो भेदो का उदाहरण प्रस्तुत यिया है। उनमे पहले भेद वा स्वरूप जैसे- (अ) प्रथम चरण में 'त्' अकेले वर्ण वा अनेव वार प्रयोग। (ब) वृतीय चरण मे 'ल्' ही अवेले वर्ण वा बार बार प्रयोग। यथा (स) चतुर्थ चरण मे केवल 'स' का ४ बार प्रयोग। दूसरे भेद का स्वरूप जसे-(अ) द्वितीय चरण मे 'ताल ताली' मे द एव ल की दो बार आवृत्ि, (ब) तृतीय चरण मे वेल्लत्वल्लोल मे 'ल्ल' दो व्यक्षनो की दो बार आवृति तथा बल् फी 'कल्तील' 'चिसनफलन' एवं फूलमच्छेयु मे तीन बार आवृत्ति तथा (स) चतुर्थ चरण मे 'रतरताभ्यास' मे र्त की दो बार आवृति । सौसरे भेद का स्वरूप जैसे-(छ) प्रथम चरण के 'स्तम्भ ताम्बूल' मे तु मृ ब् की एक साथ दो बार आवृत्ति तथा 'जम्बू जम्बारा' मे जम्ब् की एक साथ दो बार आवृत्ति एवं (ब) द्वितीय चरण के 'सरलतरसता' में र्छ्स को एक साथ दो बार आवृत्ति । इस प्रकार इस श्लोक मे वर्णविन्यालवक्रता के तीनों भेदो के उदाहरण उपलब्ध हो जाते हैं। पतामेव वकता विच्छित्त्यन्तरेण विविनकि- चर्गोन्तयोगिन: स्पशो द्विरुक्तास्त-ल-नादय:। शिष्टाथ रादिसंयुक्ता: प्रम्तुतौचित्यशोभिनः॥२॥ (अव) इसी (वर्णवित्वासवक्रता) की दूसरी विष्छिति से प्रतिपादित करते हैं-वण्येमान वस्तु के औचित्य मे शोभित होने वाले (१) (अपने खपने) वर्ग में अन्त (अन्तिम वर्ण) से मुक्त (प से म पर्यग्त के) स्पर्श (वर्ण), (२) दो बार वहे गये (दविसक्त) त, ल, एवं न आदि (वण), एव (३) र आदि (वर्गों) से सयुक्त श्रेप (सभी वर्ण पुनः पुनः बावृत होकर इस वर्णवित्यासवक्रता के, तीन अन्य भेद कर देते) हैं। २॥
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द्वितीयोन्मेप १७५:
इयमपरा वर्णविन्यासवकता त्रिधा त्रिभि: प्रकारैरुक्तेति 'च'- शव्देनाभिसम्बन्ध । के पुनरस्यास्त्रयः प्रकार इत्याह-वर्गान्तयोगिनः स्पर्शा। स्पर्शा काद्यो मकारपर्यन्ता वर्गास्तदन्तैः डक्कारादिभि- र्योग: सयोगो येपां ते तथोकता, पुनः पुनर्वध्यमाना :- प्रथमः प्रकारः। त-ल-नादय' तकार-लकार नकार-प्रभृतयो द्विरुक्ता द्विरुच्चारिता द्विगुणाः सन्तः, पुनः पुनर्बध्यमाना :- द्वितीय। तद्व्यतिरिक्ताः शिष्ाश् व्यक्ञजनसब्ज्ञा ये वर्णास्ते रेफप्रभृतिभि: सयुक्ताः पुनः पुनर्वध्यमाना-तृतीयः। स्वल्पान्तराः परिमितव्यवहिता इति सर्वेपामभिसम्बन्धः । ते च कीदृशा .- प्रस्तुतौचित्यशोभिनः । प्रस्तुतं वर्ण्यमान वस्तु तस्य यदौचित्यमुचितभावस्तेन शोभन्ते ये ते तथोक्ताः। न पुनर्वर्णसावर्ण्यव्यसनितामत्रेणोपनियद्धाः प्रस्तुती- चित्यम्लानकारिण। प्रस्तुतौचित्यशोभित्वात् कुत्रचित्परुपरस- प्रस्तावे तादृशानेवाभ्यनुजानाति। यह दूसरी वर्णविन्यासवक्रता तीन भेदो से कही गई है-ऐसा सम्बन्ध (इस कारिका मे प्रयुक्त) 'न' शब्द से है। इस (दूसरी वर्णविन्यास- वक्रता) के आखिर ने तीन भेद हैं कौन कौन से यह बताते है-वर्ग के अन्त (अन्तिम वर्ण से) सयुक्त स्पर्श (वर्ण) 'क' से लेकर 'म' पर्यन्त के वर्ग (अर्थात् कवर्ग, चवर्ग, टबर्ग, तवरग एव पवर्ग) उनके अन्त डकाशदि (क्रम से ङ, ज, ण, न एव म) से जिनका सयोग हो, वे हुए तघोक्त (वर्गान्त से सयुक्त स्पर्श वर्ण), (वे जहां) बार बार (थोढे अन्तर से) उपनिबद्ध (किये जाते) हैं-(वह) पहला भेद (हुआ)। त, ल, न, आदि अर्थाह् तकार, लकार एव नकार अदि (वर्ण) द्विरक्त अर्थान् दो बार उच्चारित होकर, दुगुने होकर, बार बार (जहां थोड़े अतर से) उपनिबद्ध (होते) हैं, (वहां) दूसरा भेद (हुआ)। उनसे भिन्न शेष सभी व्यञन सकत्ञा वाले जो वर्ण है वे रेफादि (रकारादि) से सयुक्त रूप मे बारबार (थोड़े अतर से जहां) उपनिबद्ध होते हैं। (वह) तोसरा (भेद हुआ)। (इन) सभी (भेदो मे प्रयुक्त व्यक्षनो) का स्वल्प अंतर वाले अर्थात् परिमित व्यवधान वाले (होकर ही पुन पुन" प्रयुक्त होने) के साथ सम्बन्ध है। (अर्थात सभी भेदो मे बताये गये क्रम के अनुसार थोड़े ही थोडे व्यवधान से बार-बार आवृत्ति होनी चाहिए)। वै वर्ण कैसे होने चाहिए-प्रस्तुत के शचित्य से शोभित होने वाले। प्रस्तुत का अर्म है वर्ण्यमान वस्तु उसका जो औचित्य अर्थात् उचितभाव है उसके द्वारा जो शोभित होते हैं वे हुए तयोक्त (प्रस्तुत्त के औचित्य से शोभिठ होने वाले वर्ण)। (कहने का अभि-
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१७६ वक्रो किजीवितम्
प्राम मही है कि (केवल वर्णों की अनुरूपता (लाने) के चश्के से ही उप- निवद्ध किये गये, (वर्ष जो कि) प्रस्तुन (वस्तु के अनुरूप न होने से उसके) औचित्य को दूषित करने वाले (है उनका प्रयोग) नहीं अभोष्ट है। (अर्थाद् रस से अनुकूल ही वर्णों का प्रयोग करना चाहिए न कि शृङ्गार आदि कोमन रसो के प्रसग मे भी 'टकारादि' कठोर वर्णों का विन्यास। ह!) कही कहीं (रौदरादि) पुरष रसो का प्रकरण होने पर (कवि अपवा सहृदय) उसी प्रकार के कठोर वर्गों को पसन्द करता है। (कयो कि वहां पर वे कठोर वर्गे उस पुरुष रस के औचित्य के अनुरूत होने से अयन्त ही मोभित होते है)।
अथ प्रथमप्रकारोदाहरणं यथा-
गुञ्जन्ति मन्जु मधुपा: कमलाकरेपु। एतच्चकासत च रवेनवचन्धुजीव- पुष्पच्छदाभमुद्णचलचुम्धि बिम्बम् ॥ ३॥। अबपहले (अपने वर्ग के अन्त से सयुक्त स्पर्श वर्णों की पुन पुन" आवृत्ि रूप) भेद का उदाहरण (देते हैं। जैसे- विकसित लाल कमलो की पुप्पघलि से पीत वर्ण हो गए बंगो बाले भ्रमर कमलो के उद्भवस्यानो (अर्थात् तालाबो) मे मनोहर गुआ्जार कर रहे हैं। एवम् उदयागिरि का चुम्वन (स्पर्म) करने वाला तथा नवीन बन्छुजीव (जपाकुसुम) के पुष्प पटल के सदृश कान्ति वाला (नाल वर्ण का) यह सूर्य मण्डल प्रकाशित हो रहा है।। ३ ।। टिप्पणी-उक्त श्लोक मे पिशद्भगिताङ्गा, गुअ्जन्ति मञ्जु, चुम्बि एवं विम्बम् मे क्रमश स्पर्शवर्णग, ग, ज,ज, यथा व एव व अपने वर्ग के अस्तिम चर्णों से सयुक्त होकर दो दो बार आवृत्ति हुए हैं। अत यह वर्ण विन्यास- वक्रता के पहले भॅद का उदाहरण हुआ। यह। मचार्य विश्वेश्वर जी ने उनिंद एव बन्धु गब्द को भी उद्धत किया है शायद विवेचन करते समन वे पुन पुनबध्याना:' नियम को भूल गये थे। क्योकि इन दो पक्षे मे प्रयुक्त 'प' एव 'न्घ' को पुनरावृति ही नही होती है। यथा च- कदलीस्तम्बताम्बूल जम्बू नम्बीरा इति ॥४ ॥ और जैसे (इसी का दूमरा उदाहरण पूर्वोदाहृत २२ पद्र 'भग्नैला- बल्तरीका ' के प्रयम चरण का उतराधं)
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** द्वितीयोन्मेप: १७७
कदलीस्तम्बताम्बूलजम्बजम्बीरा ॥४ ॥ (यहां स्पर्ग वर्ण 'ब' अपने वर्ग के अन्तिम वर्ण 'म' के साथ सयुक्त होकर ४ वार आवृत हुआा हूं।)
यथा वा-
द्वितीयप्रकारोवाहरणम्- प्रथममरुणच्छायः॥६॥ इत्यस्य द्वितीपचतुयों पादी। तृतीयप्रकारोदाहरणमस्यँव तृतोयः पादः। अथवा जसे-आचार्य कुन्तक की अपनी ही प्रथम उन्मेष की १६ वी वारिका को वृति का निन्न अश-) स रस्वतीहुदयार विन्दमक रन्ददिन्डुसन्दोहसुन्दराणाम्॥ ५॥ (यहा पर स्पर्श वर्ण 'द' अपने वर्ग के अन्तिम वर्ण 'न' के साथ सयुक्त होकर ५ वार आवृत्त हुआ है। अत यह भी प्रथम भेद का उदाहरण है। (अब) दूसरे भेद (द्विरक्तत, ल, न आदि की पुन पुन आवृति]) का उदाहरण जसे- (पूर्वोदाहृत उदाहरण सख्या १।४१) प्रथममरुणच्छाय ।। ६ ॥। इस (श्लोक) का द्वितीय तथा चतुर्थ चरण। टिप्पगी-उक्त पद्य का द्वितीय चरण हूँ- तदनु बिरहोताम्य त्तन्वीक पोलतलद्य तिः। यहाँ पर 'विरहोताम्पत्तन्वी' मे तकार के द्वित्व का दो बार प्रयोगहुआ हूँ। अत यह दूमरे भेव का उदाहरण हुआ। तथा इम पद्य का चतुथ चरण है- सरस बिसिनी कन्द्घेदच्छ विमृ गवब्दन । यहां पर यद्यपि न तो त, ल एव न मे से ही किसी का द्वित्व हुआ है और न प्रमुक्त छ अथवा च् वा ही द्विस्व हुआ है। अपित यहा 'द्वेन' सून से पुर का आगम, अनुवन्धलोप एव मनुत्व होकर ते का च् हो गया है। फिर भी कुतक ने दसे यहाँ उदाहून किया है। इसके दो विरेष बारण १२ व० जी०
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वक्रोक्तिजीबीतम्
है-(क) आदि शन्द से त, ल एवं न से भिन्न भी छ, घ आदि वर्गों का महण होता है। तपा (२) द्वित्व से यहाँ ज्ी वर्ग का द्वित्व ही नही अभि- प्रेत हूं अर्थान् छ के साथ छ का ही द्वित्ज हो ऐसा विधान नही। अपितु उस वर्ग का उच्वारण द्वित्व को भाति होना चाहिए। जैसे जब हम 'वन्दच्चेद- चछदि' का उच्वारण करते हैं तो हुमारा उन्वारण एसा होना है मातो कदठ् वेरछउवि 'का उच्जारण किया जा रहा है इस प्रकार सुनने में एक अपूर्व आनन्द को उपलब्धि होते है। इनलिसे यह वर्गविनवा सवकरता के दूसरे भेद के रूप मे उदत हुआ है। (वर्गविम्पासवक्रता के) तृनीन भेद (र आदि से समुक्त शेष वर्णों की पुर पुन आवृति) का उदाहरण इरी (प्रहनरुमळ्छार।। ६।। श्टोक) का तृनीव चरण है। टिप्पगो-इतका तृनीन चरण निम्न है- प्रसरति तनो वानक्षो:्कन क्षगदामुसे।। यहाँ भी र आरि से ष आदि का भी ब्रहण हो॥। है। इनी किये यहाँ पर क् एव प् के सबुक रूप (क्ष) का बोर बार प्रसर होो में इने वर्ग- विन्तासबकत के नीनरे भेड के उदाहरण रूप में उद्धन किया गया है। जावा्म विशेसर जी ने इन उराहरग का व्यारुता करने मे पुत इषी जत्मेर के नीनरे उदाहरण को व्याक वाली भूत्र को है। उन्होने 'प्र' और 'रद्' मे भी वक्राा दिखले का अनकल प्रगास किया है जिनको कि एक बार भी आवृति नही हुर्ई है। यथा वा- सोन्दर्यपुकै हिमसम् ॥७॥। थथा प- 'कह्वार' शम्दससहच रेंग 'ह्लाद'-शादत रोग: । अयवा जैने (इप तृतेर मेर का दूवय उदाहरण पूर्वेशहू। 21१ कनोक के प्रथम चरग का अन्निम भाग- ) सौनद्यंधुर्य सिनान्॥।७।। (यहौ य का र् के साथ मयुक रूप में से बार प्रधोग हुआ है) अन तृनीय भेद के उदहरण र मे उद किस गरहै। जजैने कद्वार' शरद के साथ 'हुद' शब्द का प्रतो। अगत यही पर न के माय ह् का मगो दो बार आवुत होरेद सोऐे वा विन्यप-रकुा के मेर क उदाहरण वन जाता है।
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परुवरस-प्रस्तावे तथाविधसंयोगोदाहरणं यथा- उत्ताम्यत्तालवश्च प्रतपति तरणावांशवीं तापतन्द्री- मद्रिद्रोगीकुटीरे कुहरिगि हरिणारातयो यापयन्ति ॥।। रूष (कठोर भमानक) रस का प्रकरण होने पर उसी प्रकार के (परुप चर्णों के) सयोग का उदाहरण। जैसे-' सूर्य के खूव तपने पर (अर्थाध् दोपहर के समय) सूखती हुई तालुओं वाले मृगो के शत्रु सिंह (सूर्यं की) किरणो के सन्ताप से उत्पन्न नीद को कुहरों वाले पवा को वाटियो रुपी कुटीरो में बिताते हैं ।। ८।। टिप्पगो-रहाँ पर कवि को भया नक रस की सृष्टि करना अभिप्रेत था जो कि एक परुष रस है। इमीलिए कवि ने भयानक सिंह के भयावह निवास का वर्गम प्रस्तुन करते समय उसी के भोग्य त, प, व, र, ह, एव ण आदि परुप वर्णों को पुन पुन आवृत किया है, जिसके पढने से ही भय की प्रतीति होने लगती है। अज ऐसे परुक रपो के प्रस््ताव मे कवि अथवा सहृदय परुप वर्णों को ही पुन पुन आवृति रूप वक्रा को पसन्द करते हैं। एतामेव वँचिव््ान्तरेग व्याचष्टे- क्वचिद्व्यववानेऽपि मनोहारिनिबन्धना। सा स्राणामजारूम्पान् परां पुष्णाति वक्रतास् ।।३।। इसी (वर्गविन्नासवक्रता) को दूररे दङ्भ की विचित्रता द्वारा प्रस्तुत करते हैं- (यह वर्गविन्वासवक्रता) कही-कही (वाक्य के किसी भी अश मे) (व्यजनो के) व्यववान के अभाव मे भी (एक ही सिलमिले से पुन पुन वयक्नो को आवृति से युक्त होने पर) चिताकर्षक सघटन से युक्त होती हैं। (तथा कही-रही पर) वह (वर्णविन्यासवक्रता) स्वरी के असमान होने मे किसी अन्य अपूर्व वैचिष्व को पुष्ट करती है।। ३ ॥ वर्वचिदनियतप्रायवाक्यकदेशे कस्मिश्र्वदव्यवधानेऽि व्यव- धानाभावेऽप्येकस्प दवयो. समुदितयोक्च बहुना या पुनः पुनर्वध्यमाना- नामेवां मनोहारिनिबन्धना हुदयावर्जरुवित्यासा भवति। काचिदेवं सम्पद्यत इत्पय:। यमकथ्मवहारोडत्र न प्रवर्तते, यस्य नियतस्थान- तया व्यवस्यानात्। स्त्रररपत्रवातनत न विजक्षिन म्, तस्यानुपपतेः। कही का अर्थ है, वाक्य (श्लोक) के प्राय अ निश्चित निसी एक भाग मे जब्बवजान अर्थान् (अक्षरो के) अन्र के अमाव मे भी, एक (वर्ण),
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१८० वक्रोक्तिजी वितम्
सम्मिलित दो अथवा बहुत से बार बार उपनिवद्न किए गये इन वर्षों की मनोहारि निबन्धन बाली अर्थात वित्तावर्पक विन्यास से युक्त (वक्रता) होती है। तात्पर्य यह कि वोई (रचना) इस प्रकार (चिशाकर्षक विन्यास से युक्त) हो जाती है। (व्यवधान से रहित वर्णों की पुन. पुन आवृत्ति होने से) यहाँ यमक का व्यवहार नही प्रवृत्त हो सकता, उसकी निश्चित स्थानो (पर आवृत्ति) के रूप मे अवस्था होने से (अर्थात् यभक मे कहां कहाँ व्यज्ञनो को अवृत्ति होनी चाहिए इसका नियम होता है लेकिन यहाँ ( वर्णविन्याम- वक्रता मे.) कोई नियम नही है (अत इसे यमक नही बहा जा सबता। यहाँ पर स्वरों के व्ययधान वा अभाव विवकित नही है इसके अनुपपन्न होने से (अपितु केवल व्यअ्जनो का व्यवधान अभिभेत है):
वामं कज्जलवद्विलोचनमुरो रोहदिसारिस्तनम् ॥ ६॥ (वहाँ उन तीनो भेदो मे से) व्यवधान के अभाव मे एक (वर्ण की पुन पुन आदृति) का उदाहरण जैसे- (उदाहरण सपया १/४४ पर अद्धृत पद्य का पहला चरण-) वामं वज्जलवद्विलोचनमुरो रोहद्विसारि स्तनम् ।९॥ (यहाँ पर 'बज्बल' मे जू की रथा 'दिलोचनमुरो रोहद' से र की अकेले वर्गों की विना व्यवधान के एव ही सिलसिले मे आवृत्ति हुई है।
द्वयोयथा- सानुगाभि: पायं पायं कलाचीकृतकदलदलं नारिकेलीफलाम्भ'। सेव्यन्तां व्योमयाप्ाथमजलजयिन: सैन्यसीमन्तिनीभि- र्दोरत्यू हव्यूह फेलीकलितकुहबुहारावकान्ता वनान्ता:॥।१०।। (व्यवधान के अभाव मे) दो (वर्षों की पुन पुन आवृति का उदाहरण) जैसे-(वालरमायण (१/६३) में रामण अपने सेनापनियो के लिए बादेश देता है कि वे) व्योमगमन के कारण उत्पन्न स्वेद को हटा देने वाले जौर चानरसमूह फी ब्रीडा मे उत्पन्न होने याली मीठी वह वह के स्वर के कारण रमणीय वनम्रदेशो वा साथ साय चलने वाली सैनिक कामिनियों के साथ वेसे के पत्तो के बने हुए दोनों वाले नारियल के फल के रस वा पानकर करके पान
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द्वितीयोन्मेप.
को लतरो से बने हुए सुनर सुपाड़ी के वृभ्नो के नीवे के विसरो पर (बैडवर) सेवन करे॥ १० ॥ टिप्पगी-यहां 'दात्यूह' का अर्थ हम कोयल भी कर सकते है। जैसा कि बालरामायण के टीकाकार ने किया है। यहा सैनिकों को विश्राम की बान कवि ने प्रस्तुन की है। कीवे की बोली इतनी कर्गकटु होनी है कि उसे सुन कर लोगो को क्रोध भले आ जाय, आनन्द कदापि नहीं मिल सकता। जबकि चातक की और कोयल की मधुर वाणी सुनने मे मनुष्यो को अत्यधिक आनन्द लाभ होता है। परन्तु सेद है कि हमारे सहृदय शिरोमणि आचारय विश्वेशर जी को कोवे की कांव काँव ही आनन्द प्रदान करती है, तभी तो उन्होंने 'अमरकोय' का प्रमाण उद्घन करने हुए बालरामायण के टोकाकार द्वारा दिये गगे 'कोबिल' अर्थ का बड़े जोरो के साथ खण्डन किया है। शायद वे यह भूल गये से कि अमरकोप के अनिरिक्त भी कोई कोश है। विश्वकोश का कथन हँ-
"दात्म्ूह कलकउे स्वाद दात्यूहरचानकेपि न।" यहाँ पर 'पाय पाय', 'कदलबल', 'कैलीकलित' एव 'बुहकुहाराव' मे क्रमश प् य्, द्ल, एव क्हु को बिना किसी वर्ग के व्यववान के आवृति हुई है। पर जैसा कि आचार्य विश्वेश्वर जी ने लिखा है कि *** दात्यूहन्यूह' क्रान्ता वनान्ता आदि मे दो दो अक्षरो का अध्यववान से प्रयोग मानकर इसकी इम प्रकार को वर्गविन्यासवक्रता का उदाहरण बनलाया है, यह कथन कहाँ तक नही है, ठक स्वयं विचार वर सकते हैं जब कि स्पष्ट ही यूह-यूह के बीच मे व का व्यवधान है जो कि स्वर नही है न्ना और न्ता के बीच मे तो 'बना' दो अक्षरो का हो ववनान है। हो, यहोँ यह व्ववानयुक्त वर्गविन्यासवत्रना स्वीकार को जा सकती है जैमा कि ग्रन्थकार ने आगे स्वय अपि शब्द के ग्रहण द्वारा व्यक्त किया है। यथा वा - अयि पिबत चकोरा. कृत्स्नमुन्नाम्य करठान
विरहुविघुरिताना भंवति हरिणलक्ष्मा जी वितन्राणहेतो- येन तेजोदर्रिद्रः॥ ११॥ अथवा जैसे (इसी का दूसरा उदाहरण) सुपाडिनों को कुसरने के कारण हिलनी हुई चोचो वाले चकोरो ! विरह से विधुर लोगो के जीवन की रक्षाहेतु अपनी गर्दनो को ऊपर उठाकर साय
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१८२ वक्रोक्तिजी वितम्
का सारा चन्द्रिका का जल पी जाओ जिससे यह गगाङ्क (चन्द्रमा) तेज से होन हो जाये (और विरहियी को परेशान न करें)॥ यहाँ पर केवल अन्त में 'दरिद्व'मे द्र् और द् र् की बिना व्ययघन के आवृत्ति हुई है। रहनां पथा- सरलतरलतालासिका इति ॥ १२॥ (ध्यवधान के अभाव मे) बहुत (से वर्षों को पुन पुन आवृत्ति का उदाहरण) जैसे-(पूर्वोदाहृत स० स२ 'भग्नंला " आदि पद्य का निम्न वश) सरलतरलताला सिका ।I यह पद ।। १२। (यहाँ समुदित 'र ल त' तीन व्यञ्जनो को बिना व्यवधान के एक बार आवृत्ति हुई है) 'व्रपि-शध्दात् वर्वचत् व्यवधानेऽपि। द्वयोयया - स्वस्था: सन्तु वसन्त ते रतिपतेरप्रेसरा वासराः॥ १३।। ('ववविदव्यवघानेपि इत्यादि (२३ ) वारिया मे) 'अपि' (भी) शब्द के (प्रयोग के) कारण वही वही व्यवधान होने पर भी सह वर्ग- विन्यासवक्रता होती है ऐमा अर्थ लिया जा सकता है। और इसीलिए व्यवधान होने पर भी इस वकता के उदाहरण दिये जा रहे हैं। उनमे से व्यवधान युक्त एव वर्ण की पुन पुन आयूति का उदाहरण-'वाम कज्जल- वहिलोचनमुरो रोहद्विसारिस्तनम्' वो ही लिया जा सबता है। यहाँ 'यद्धि- लोचन' मे व कौ व्यवधान से युक्त आवति है। अथवा 'विसारिस्ननम्' में स् की व्यवधान पूर्ण आवृत्ति है। इसका उदाहरण अंधवार ने नहीं दिया। बतः उसे हमने यहाँ उदाहुत किया। अब व्यवघान होने पर) दो (वर्णों थी पुन पुन आवुति) का (उदाहरण) जैसे- हे मधुमास ' रनिरमण (मदन) के आगे आगे चलने वाले (पुरोगामी) तुम्हारे दिवस सुखी रहे ॥ १३॥ टिप्पणी-यहाँ समुदित व त, की 'ते रतिपनेरयरे' मे तमा स्रकी 'अग्रेसरा घामरा.' मे क्रम से 'निप' एव 'वा' के व्यवधान से आवृति हुई है। मद्यषि 'सन्तु वसन्त' में बेवल 'न् त्' की व्यवधान पूर्ण वावृति मानवर उसे इसका उदाहरण वहा जा सबता है। पर अधिक समीचीन यही होगा कि यहां 'स्,न् एव त्' तीनों की समुदित रूप मे पुन आवृति मान कर बटन से वर्षों की व्यवधानयुक्त पुनरावृत्ति बा उदाहरण माना जाय।
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द्वितोयोन्मेप: १८३
बहूनां व्यवघानेजपि यथा- चकितचातक मेचकितव्यति वर्यात्यये ॥१४॥ (वर्णों का) व्यवधान होने पर भी बहुत (से बर्गों की पुनरावृति) का (उदाहरण) जसे- वर्षा ऋतु के व्यतीत हो जाने पर परेशान पपीहो से श्यामव्ण आकाश मे (यहाँ 'चकितचाठवमेचतित' मे 'चवित चकित' दो बार ॥१४॥ समुदिस रप से व्क एव त की 'चाका में के व्यवधान से आवुत्ति हुई है। सा स्वराणामसास्प्यात् सेयमनन्तरोव्ता स्वरानामकारादीनाम-
मन्यां वकतां कामपि पुष्णाति पुष्यतीत्यर्थः। पथा- राजीवजीवितेश्वरे ॥ १४॥ वह अभी अभी वही गई (वर्णविन्पासवक्रता) अकारादि स्वरी के असार्प्य अर्थात् असमान होने से वही वही अर्थात् किसी आवृत्त होने वाले (वर्णाकमञ्जनो के) समुनाम के एक भाग मे किसी (अपूर्व) दूसरी वक्रता का पोषण करती है। जैसे- I राजीवजीवितेश्वरे। १५।। (यहां पर ज् एवं व् वर्ण समुदाय की आवृत्ति हुई है जिनमे कि व् का स्वर दोनों मे भिन्न है अर्थाव पहले व् के साथ स्वर 'अ' तथा दूसरे के साथ 'इ' वा प्रयोग हुआ है। जिससे एक अपूर्व चमस्कार की सृष्टि होनी है। पथा वा- घूसरसरिति इति ॥१६॥ अथवा जैसे -- घूसरसरिति॥ यह पद ॥ १६ ॥ (यहां 'र् र' वर्षों का समुदाय आवृसत हुआ है जिनमे पहले र के साथ स्वर 'अ' तथा दूसरे के साथ 'इ' प्रयुक्त है। यंथा च- स्वस्थाः सन्तु वसन्त इति ॥१७॥ और जसे- स्वस्था सन्तु वसन्त ॥ इति १७॥
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वकोक्तिजी वितम्
(यहां 'स् न् व' वर्ग समुदाय दो बार आवृत हुआ है किन्तु प्रथम व् के साथ स्वर 'उ' तथा दूसरे ये साय 'अ' रयुक्त हुआ है।) यथा वा-
तालताली इति ॥ १८ ॥
अथया जैसे- तालताली यह॥। १८ ।। (यहाँ पर 'त ल' वर्ण समुदाय की दो बार आवृति हुई पर पहले ल के साथ स्वर 'अ' प्रयुक्त है जब कि दूसरे के साथ 'ई'प्रयुक्त है। इस प्रकार स्वरो के असाहष्य के चार उदाहरण दिए।) सोयमुभयप्रकारोऽपि वर्गवित्यासवक रविशिस्टवाक रवित्यासो यमकाभास: सन्निवेशविशेजो मुक्ताक नायमध्यप्रोन्तम गमनदकबनध- बन्धुर सुतरा सहदयहुदम हारितां प्रनिरद्यते। लदिदमुशम्- वह यह (अज्यवधानपुक्त वर्णों को आवृति रूप तया व्यवधानयुक्त वर्णों की आवृति रूप ) दोनो भेदो से ुक्त, 'वर्णविन्यासवक्रता से' विशिष्ट वाक्य सङटना वाला, चमक के समान (पदो का) विशेष प्रकार का सत्ि- वेश (पदसङ्टना विशेष) मोतियो के हार के मध्य में अनुस्यूत किए गए मणिनिमित पदको की रचना के समान रमणीम (होकर) अत्यन्त ही सहृदयहृदमावजंक हो जाता है। इसी बात बो (प्रयम उन्मेष को ३५ बी कारिका में) वहा जा चुका है कि-
पसनतुष्टा निवध्नन्ति हारादेमगिबन्यवत् ॥ १६॥ इति। जहाँ (जिस मार्ग मे) कविजन (प्रयुक्त एक अरकार से) असन्तुष्ट होकर हारादि के मणिबन्ध के समान एक अलद्वार के लिए दूमरे अलद्वार का प्रयोग करते हैं ( उसे विचित्र मार्ग कहते हैं)।। १९। एतामेव विविधप्रकारां वक्रनां विशिनष्द्र, यदेववियवश्यमाण विशेषण विभिष्टा वियातव्येति- (अब) अनेक भेदो वाली इसी (वर्णवित्यासवक्रना) को विशेषतायें बराते हैं कि (यह वकरना। कही जाने वाकी इस प्रकार को रिरेशाओ से समन्वित रूप मे प्रतिपादित की जानी चाहिए-
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द्वितीयोन्मेप १८५
नाति निर्धन्वविहिता नाप्यपेशलभृपिता।
न तो अत्यन्त हठपूर्वक विरचित और न ही कठोर (वर्णो) से अलकृत (वर्णविल्वास का वैचित्र्य होना चाहिए अपितृ) पहले (बार-बार) आवृत्त किए गये ( वर्गों) के परित्याग एव नवीन वर्णो की आवृति से मुगोभित होने दाली (वर्ण विन्यास की वक्रता प्रनिपादित करनी चाहिए)।।४। नातिनिर्वन्धविहिता-'निर्वेनध' शब्दोजत व्यसनितायां बतते। तेनतिनिर्बन्धेन पुन. पुनरावर्तनव्यसनितया न विहिता, अप्रपत्न- विरचितेत्यर्थ.। व्यसनितया प्रमानबिरचने हि प्रस्तुतौनित्यपरिहाणे- र्वाव्यवाचरयो: परस्परस्पधित्वलक्षणसाहित्यविरहः पर्यवस्पति। यथा -* 'अत्यधिकु निर्वन्ध के साथ विहिन वही'-पहा निर्वन्ध शब्द 'वपसनिना' (अर्थ) के प्रयुक् हुआ है। इसलिये अत्यधिक निर्वन्ध कर्थात् चार बार (वर्षों) को आवृति कराने को अ्मरिता से न री गई जर्थान बिना (किमी) प्रयास मे (स्वभावत') विरचित होनी चाहिए। कयोकि व्यसन हो जाने के कारण पयत्नपूर्वक रचना करने पर प्रवरण के जौवित् की क्षति होने से वाच्य सथा वाचक (शब्द और अर्थ) मे परम्पर स्पर्या से युक्त रूप साहित्य (सहभाव) का निच्छेर हो जाता है। जैमे- भग सरुणि इनि ॥ २० ॥ ना्यपेशल भविता न चाप्यपेशलैरसुकुमारँरक्षरेरलइकता। यथा शोरगत्राणाइ्रि इति॥ २१॥ +
(उदाहरण सख्या ११९ पर पूर्वोदाहृत) भग तरु ॥,१०॥ यह [शोक]।[यहां पर कवि केवल अनुप्राम अथवा वर्षों की पुन पुन- आवृति कराने के व्यसन के कारण वेवलू बर्णों के मवगं होने के ही सोन्दय को प्रस्तुत कर सका है। लेकिन ऊर्थ का वैचिन्व तनिक भी नही। इसका अ्थ एव व्यासया वही देसें]। तथा (वर्णदिन्यासवक्रता) अपेशल अर्थान् कठोर वर्णो (की पुन पुन. आवृति) से अलकृत भी न होनी चाहिए। जैसे- शीणंघ्राणाइम्नि ॥२१॥ झगादि इयोक। टिप्पणी-यह श्लोक मयूरशतब का ६ वा पकोक है। पूरा इम प्रवार है-
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१८६ वक्रोक्तिजीवितम्
दीर्घाप्ातानयोर्य पुनरपि घटमत्येव ज्लाधयन् म।
दंत्तार्था निइसहविदघत् धपनः शोममहोविधानम्॥। यहों पर रवि सूर्य की किरणों से पाप नष्ट बरने की बात वह रहा है लेविन इसमे पप, घ म्र, घ्न घ्न, आदि ऐते धुतिबट वर्णो की पुन पुन आदृत्ति बराई है जिससे सुनने वाले ने कान छलनी हो जाते हैं और निनी भी प्रकार का आनन्द नही प्राप्त होता। अत ऐसी भी 'वर्गविन्यानव बत्या' बेकार होती है। तदेवं फोदृशी ताह कतंत्येत्याह-पूर्वावृत्तपरित्यागनूतनावतंनो- जवला पूर्वमावृत्तानां पुनः पुनरविरचितानां परित्यागेन प्रहाणेन मूतनाना मभिनवानां वर्णानाभावर्तनेन पुनः पुनः परिप्रहेण च तदेवम्- भाभ्यां प्रकाराभ्यामुज्जवला भ्राजिषणु:1 यथा - तो फिर [वह वर्णविन्यासवब्रता] कँमी करनी चाहिए इसे बनाते हैं- पूर्वाृस् के परित्याम तथा नवीन आवृत्ति मे उग्ज्त। पहले आावृत रिए गये अर्थात् वार बार विरचित [बगों] के वरित्याग अर्थाद [उनवी पुन पुन आवृति छोडकर ] । नये नये अभिनव वर्षों की आवृत्ति के द्वारा अर्थाद् पुन पुन. (नये वर्मों के) ग्रहण के द्वारा, इस प्रवार दोनो ढङ्गो से उज्ज्वत अर्पात सुलोभित होने वाली (वर्ण विन्यास वक्रता प्रतिपादित करनी चाहिए।। जैने- एवां पश्य पुरस्तटीमिह किल कोडाकिरातो हुरः कोदग्डेन किरोटिना सरभर्स चूडान्तरे ताडितः। इत्याकर्ण्य कथाद्भुतं हिमनिघावद्रौ सुभद्रापते- रमन्दं मन्दमकारि येन निजयोर्दोदण्डयोमंण्डनम् ॥२२॥ इन सामने की म्थली को तो देखो, यही पर अर्जुन ने धनुप के द्वारा हीला से किरात बने हुए शट्कर के सिर के बीच तेजी वे माय चोट पहुँचाई थी। हिमान्य पर इम प्रवार की सुभद्रा वे प्रति बजुंन की अद्भुत कथा सुनवर जिन (महादेव) ने अपनी दोनों भुजाओ को धीरे धीरे मण्डलागर करके सहलाया (वे सर्वातियायी है) ॥। २२ ।। टिप्पणो -इस प्लोक मे कमि ने पहले प की फिर क एव उ की आवृतति कर उसे छ्षेड तौसरे चरण से द, र, म, ण्ड़ आदि को नवोन रूप से आवृति
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द्वितीयोन्मेप* १५७
कराई है। इस प्रकार यहां किसी भी वर्ण की पुन पुन आवृति कराने दो क वि की व्यसनिता नही प्रतीत होती है। तथा बराबर नये नये वर्णों वी आवृत्ति होने से एक अपूर्व चमत्कार की मृष्टि होती जाती है। यथा वा- हंसानां निनदेषु इति ॥ २३॥ अथवा जसे- (उदाहरण सख्या १७७३ पर पूर्वोदाहृत) हसाना निनदेषु इत्यादि ॥ २३ ॥ यह इल्ेक ।I (इस श्लोक को तथा इसके अर्थ को वही देखे। इसमें कवि ने पहले न की नावृत्ति कराकर 'क' एव 'त' की, फिर 'ठ' एव 'घ' की, उसके वाद 'म्' 'क्' एव 'न' तथा 'ग्र' की आवृत्ति कराई, जिसमे उत्तरोत्तर नवीनता विकसित होकर सहृदयहृदयहारिणो बन गई है।) पया च- एतन्मन्दविपक्व इत्यादौ॥ २४॥ ओर जसे- (उदाहरण सख्या १।९०७ पर पूर्वोद्धत) एतन्मन्दविपक्व इत्या्दि मे ॥२४॥ (इमका अर्थ एव पूरा श्लोक वही देखें, साथ ही उक्तोदाहरण की भांति लकण घटित कर लें। ) यथा वा- णामह दसाणणसरह सकरतलिअ्रबलनतसेलभअ्रविहलं। वेवंतथोरथणह रहरकप्ररकंढग्गहूं गोरि ॥ २॥ (नमत दशाननसरभसक रतुल्तिबलच्छॅलभय विल्ललाम्। वेपमानस्थूलस्तनभरहरकृतकण्ठग्रहा गौरीम् ।।) अथवा जैसे सवण द्वारा वेग से बाँही में उठा लिए गए हिल्ते हुए कलाश पर्वत के भय से व्याकुल और कांपते हुए भारी वक्ष स्थल के आतिशिम्य के कारण शकर जी के द्वारा डाली गई गन्नवाही वाली को प्रणाम कीजिए। २५॥ (पहाँ भी पहले ग, स, तथा ल की आवृत्ति कराकर फिर व, ह, र एव ग आदि की आवृति कराई गई है।)
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वज्ोकिजीवितम्
एवमेता वर्णविन्यासवकतां व्यास्याय तामेवोपसंहुरति- गुणमार्गानुवरतिनी। वृषिवैचित्र्ययुक्तेति सैव प्रोक्ता चिरन्तनैः ॥ ५ ॥ इस प्रकार दस (ध्गवित्मासवक्रता) की व्यासता करने के अनन्तर (अब) उनी पन उप सँहार करते हैं- (अक्षरी की (धरम्पत्वादिगुणतनपति रूप) गोभा के अुमार (माधुर्यादि) गुणो एव (सुह्ुमारादि) भारगों का अनुवतंन करने वाली उसी (वर्गविन्यातवकता) को विरन्तनो ( उदभट आदि आचार्नो) ने (उपनागरिका आदि) वुतिनो के विषिनभाव से समन्वित बताया है॥५॥ वर्गानामक्षराणा या छाया कान्ति: श्रव्यतादियुगसँपलया हेतु- भुतमा पदनुसरणमनुसार: प्राप्पस्वरूपानुप्रवेशस्तेन। गुगान् मानुर्ग- दीन् मा्गाश्र सुकुमारप्रभुतीननुवर्तते या सा तयोनना। तन्र नुगा- नामानतरतम्यात प्रथममुपन्यसनम, गुणद्वारेगँव मार्गानुसरणोपपते: सदयमनार्थ :- यद्यप्येषा वर्णविनयासवकता व्यञ्जनच्छायानुसारेणैव,
स्वरूपानुप्रवेश विद गति तना विनातन्येनि। तत एव च तस्तास्तनि वन्धना: प्रवितता प्रकारा समुल्लसन्ति। चिर्ननैः पुनः सैय स्वातन्रयेग दुतितविध्वयुर्तेति प्रोक्ता। वुत्तिनामुपनागरिकादोनो यद् वैचितयं विचित्रभाव: स्वनिष्डसध्याभेदभिव्नलं तेन सुक्षता समन्वितेति चिरन्तनः पूर्वसुरिभिरमिहत्ा । अविदमत्र तातपर्यम्-
तसमादपारत्प परिमितप्रकारत्ं चेति नातिवतुरत्म । बर्णों अथांतु अससे को जो छारा अर्थाव धम्पत्व आदि गुणो को सम्पति रुप कान्ति है, कारणसूर उस (कान्ति) के द्वारा जो अनुसरण अर्थाइ् अनुगम है। प्रापत क रने रोख स्वरूप मे प्रवेग, उसके द्वारा गुगो अर्थाव् माचुनादि का तथा नार्गो अर्यात मुकुमार आदि का जो अनुसरण करती है वह हुई यपोकयुगा एव मारगों क अनुसरण करने चबली)। इस वनरिका में जो शुग धब्द व प्रयोग बहने तथा मार्गों का बाद मे किया गया है जनर कारण बनाते है कि) युगो के अल्न निरट बाने होने के का रण उपवा पहले बहन किया गया है। (तथा पार्गों का बाद मे वशोकि) गुणो के माध्यम से हो मार्गों का अनुवनन युतितुक्त रोता है।
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द्वितीयोन्मेष 958
अत इसका अभिप्राय यह हुआ कि-वद्यपि यह वर्णविन्यामवक्रता व्यञ्जनो की ही कान्ति के अनुगमन से आती है फिर भी हर एक के निश्चित गुणविशेष वाले मार्गों के अनुवर्तन के द्वारा ही इस तरह प्रस्तुत की जानी चाहिए जिससे कि उनके वास्तविक रूप का सनिवेग हो जाय। इसी कारण से उसके उसी आवार पर प्रष्यात भेद प्रकागित किये जाते हैं। प्राचीन आचार्यों ने उसी को आनी इच्छा से वृतियों की विचित्रता से सवलित करके प्रस्तुत किया है। उपनागरिका आदि वृतियो का जो वैचित्य है अर्थात् अद्भुत स्वरुप वाली अपने मे निहित नियतता के भेद के कारण विभिन्नता है उससे युक्त या सवलित मान कर ही उसे पुराने बाब्-शास्त्र के विद्वानों ने मान रखा है। तो यहाँ तात्पर्य यह है कि-सुकुमार आदि मागो का अनुवर्तेन करने के अव्यधान वृति वाली इस ( वर्ण विन्यासवक्रता) का सारे गुणो के स्वरूप के अनुसरण का समन्वय करने के कारण परतन्त्र होना और असस्य प्रकार की होना दोनो ही अवश्यम्भावी है, इस तरह परतन्त्रता का अभाव और असीमप्रवारता का अभाव मानना बहुत समीचीन नही प्रतीत होता। ननु च प्रथममेको ह्वावित्यादिना प्रकारेण परिमितान् प्रकारान् स्वतत्त्रत्वं च स्वयमेव व्यास्थाय किमेतदुवतामिति चेश्नष दोष:, पस्मा- ल्लक्षणका रँर्यस्य कस्यचित्पदार्थस्य समुदायपरायतवृत्त. परव्युत्पतये प्रथममपोद्वारबुद्धया स्वतत्रतया स्वर्पमुल्लिरयते, ततः समुदायान्त- र्भावो भविध्यतीत्यलमतिप्रसगेन। शङ्का उठाई जा सकती है कि पहले एक, दो इत्याद्रि प्रकार से सीमित भेदो को और स्वातन्त्र्य को स्वय ही स्पष्ट करके फिर यह वतो कहते हो (कि परतन्त्रता औौर अमीम प्रवारता का अभाव मानना समीचीन नही): वस्तुत यह दोप नही है कयोंकि लक्षणकार निमी भी पटार्थ की दूमरे को व्युत्पति ब राने के लिए उसके ममुदाय-परतन्न होने पर भी पहले अपोद्वार की दृष्टि से स्वनन्ध बद्ध से ही उसका स्वस्प लिखते है फिर तो उसका ममुदाय मे अन्त- भाव हो जायमा ही, इसदिए ज्यादा विस्तार से वहने की अपेक्षा नहीं। देयं वर्णवित्यासवत्रता नाम वाचकालकृति: स्थाननियमानाबात सकलवाक्यस्य विषयावेन समार नाता, सैव प्रकारानतरविशिष्टा नियत- स्थानतयोपनिबध्यमाना किमपि वैचित्यातरमाबध्नातीत्याह- यह जो 'वर्णविन्यामदक्रता' नासक शवदाल द्वार (यहां-्वरहा वर्गों की आदृत्ति होनी चाहिए ऐसे) स्थानों के निर्धारित न होने के वारण, सम्पूर्ण
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१९० वकोरितजीवित्म्
वाक्य के (ही) विषन रूप मे स्वोकार किया गया है, वहो (वर्गविन्वात- वक्रना अलद्धार) निर्धारित स्थानों से युक्त रूप मे उपनिबद्ध होने पर, अन्य (नमक रूप) भेद से युक्त होकर किसी (अपूर्व) दूमरे ही वैचित्रय की सृष्टि करता है, इसे बक्ाने हैं- समानवर्सनन्वार्घे प्रसादि श्रुतिपेशलम्। औचित्ययुक्त नाद्यादिनियास्थानशोभि य् ॥ ६॥ भिन्न अर्थ बाने सनान वर्षों मे बुक्त, (गीत्र ही वाववाय के ननर्षक) प्रसाद (गुण से समस्वित सुनने मे रमणीत, औवित्यपूर्ण वं (चाकन के) आदि (मव्य एव अन्) इत्यादि नियत स्थानो पर सुशोभित होने वाला जो-॥६ ॥ यमकं नाम कोऽप्यस्पा: प्रकार: परिदृश्यते। म तु शोभान्वरामातादिह नाति प्रतन्यते ॥७ ॥ चमक नाम का कोई (जबूर्ब ही) इम ( वर्शबिन्वासवकग़ा) का (एक) भेद दिखाई पडता है। (उसमे स्थान निरम के अनिरिक्, बभी वही गई दर्गबिन्तासवक़ना से मिन किमी) दूसरी शोमा का बभाव होने के बगरम, उनका यहाँ अनिक निरवार नही किया जाता है।। ७॥ कोऽप्पस्पाः प्रकार: परिकृपते, वस्शः पूर्जोवताया:, कोऽयपूईः प्रभेदो विभाध्यते। कोऽसावित्याह-यमकं नाम। यमकमिति यस्त प्रसिद्धि। तच्च कोदृशन्-सनानव गन्। सानाना, स्वपाः सद्सधुतयो वर्णा य्मित तत रोक्तन्। एवमेकस्प द्ववोबहनां सब्श- धुनोना व्यवहित मध्यव्रहितं वा यटुननिव धर्व तवेव बनरुमिनमुबयने। तदेवमेक हपे संस्थानइ्वये सतयवि-अन्यार्य मिलामिनेवन्। व्रत्यन्त्र कोदृशम्-प्रस्लादि प्रसादगुणयुक्तं सर्तिति वाववतननंकत, अररररुदर्षता- बोध्यमिति पावत। धुनिपेशलमित्येनदेव विशिष्यते-धुनि. श्बमे- न्द्रियं तन्न पेशल रञ्जकम, अक्रठोरसविरचितम्। कीडशन्- औदित्यपुवतन्। थवित्यं वस्तुन स्वमाजो-्कवतनेव युक्तं मन्ववतु। यत्र यमकोपनिबन्धनन्यसतिस्वेवा ोवित्यमवरिम्वानमित्वर्य। तदेव विशेषगान्तरेग विशिनष्ट्रि-प्राद्यादिनिवतस्यावज्ञोभि य। प्रादि रादिर्येयां ते तयोकना: प्रपममच्शलास्तापेव निवनानि स्वनानि विशिष्टा: संनिवेशास्त शोभते भ्राजते यतयोकत्। अप्राद्यापनः संबन्धिशब्दाः पदादिभिविशेरणीया। स तु प्रकार प्रोशनज्ञीग-
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द्वितीपोन्मेप १९१
संघटुपेतोऽपि भवन् इह नाहि प्रतत्मते ग्रन्थेऽस्मिनाति विस्तायते। कुतः शोभान्तराभावात्। स्याननियमव्यतिरिकनस्यान्यस्व शोनान्त- रस्य छाया तरस्यासंभवादित्यर्य.। अस्य च वर्णविन्यासवैनित्र्प- व्यतिरेकेमा्यत्कचिदपि जीवितान्तर न परिदृश्यते। तेनानन्तरोकना- लंक्ृतिप्रकारतंव सुवता। उदाहरणान्यन्न शिघ्ुपालबये चतुर्ये सर्गे समर्पकाणि कानिचिदेव यमकानि, रघुवंशे वा वसन्तवर्णने। कोई इमका भेद दिखाई पडता है, इम पू्त्रोक्त (वर्णवित्यासवक्रता) का कोई अपूर्व भेद दष्टिगोचर होता है। कोन है यह (भेद) इमे बताते है-चमक नाम का। जिमकी (साहित्य मे) यमक नाम से ख्याति है। और वह है ैमा-ममान वर्णों से युक्त। समान स्वत्प वाते अर्थात एव ही तयह मुने जाने वाले वर्ण (अक्षर) है जिममे वह हुआ तयोक्त (समान वर्णों- वाला)। इस प्रकार समान रूप से मुनाई पटने वाले एक, दो अथवा बहुत से (वणों) का जो अवधानयुक्त जथवा ववधानरहित विन्वास है वही यमक कहा जाता है। इस प्रकार ममान रप वाली (वर्गों की) दो राशियों (अथवा गचनाओं) वे होने पर भी-अन्य अर्थों से युक्त अर्थात् भिन्न-भिन्न ऊर्छों वाली (समान म्प वर्णों की राशियाँ जहाँ होती हैं) जौर किम प्वार का (दर्ग समुदाय)-समादि जर्सान शीम्र ही वायसार्थं का समपंक, प्रमाद गुण मे युक्त, बिना जिसी क्लेज वे समझ मे आ जाने वाला। और इसी को विशिष्ट करने हैं कि श्रुनिपेशल हो अर्थान् क्षत्रगेन्द्विप (बानो) के िये रम मीप हो, मुकुमार पदों से विरचित हो (और) जिस प्रवार का- औचि पपूर्ण। औचित्य अर्थान् पदार्थ के स्वर्प की जो महिमा उससे युक्त अर्थ भलीभानि सङ्गन हो। तात्पर्य यह कि जहाँ समन वे प्रयोग की जवस- निता से भी औदित्य की क्षति न होती हो। उसी की दूमरे विशेषण वे द्वारा विशिष्ट करते हैं-आदि इत्यानि नियत स्थानो से भुकोमिन होने वाला। आदि है आबि मे जिनिवे वे हुए तथोक (आद्यादि) अर्थात् प्रथम, मध्यम और अन्न, वे ही निर्धारिन स्थान अर्थात् विजिष्ट विन्वास उनके द्वारा सुमोभिन होता है जो ऐसा तमोक (जादि, मध्य एव जन्न इत्यादि निरिचत स्थानी से शोमिन होने वाल)। यहाँ जादि इत्तादि शब्द सम्बन्ध वाचन शब्द हैं। उनको पद् आदि मे विशिष्ट कर लेना चाहिए अर्यात् पदादि के आदि, मढम अथवा अ्त मे निश्चित न्यानो पर सुगोभित होने वाला) लेकिन वह (यमर ऋप) (वर्णविन्मानवअा का) भेद बक्त प्रवार की सम्पति से युक्त होने पर भी (अ्थात सुनने में मनोहर प्रमाद गुणयुक्त, औचित्यपूर्ण इत्मादि रभणी वाला होने हुए भी) वहां इम
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१९२ व क्रोनितजीवितम् वक्रोकि जीवित नामक) ग्रन्थ मे अधिक विस्तार से ( प्रतिपादित) नही किया जाता। किस कारण से-दूसरी शोमा के अभाव के वारण म्थान के निर्धारण से निन्न (किसी) दूसरी शोभा अथवा सौन्दर्य के असम्भव होने से। साथ ही इमना वर्मदिभ्यास को ही विनित्रता को छोड़कर कोई दूसरा जीवित (भून तत्व ) नही दिखाई पडता। इसलिये ( इस यमक अरुद्दार को) अभी व हे गये ( वर्णविन्यासवकरत रूप) अवधार या एक प्रकार ही स्वीकार करना सङत है। इसके उदाहरण रूप में शिशुपारवध चतुर्थ सव के कुछ ही वाक्यार्थ को शीघ्र बोधित करा देने वाले यमक म्रहण किये जा सकते है अथवा रघुवण ( महाकाव्य) के वसन्त वर्णन मे (प्रदुक्त बमष)। टिप्पणी- बन्थवार ने 'यमक' के उदाहरण के लिय रघुव के वसन्त वर्णन वो उद्धन किया है। कालिदास ने वैसे तो नबम सगे के प्रारम्भ से लेकर ५४ वे शोष तक तिरन्तर यमनका प्रयोग किया है। पर वसन्त ऋ्वनु का वर्णन २६ वे इलोक से लेकर ४७वे शोक तक है अत उभी मे से उदाहरणार्थ एव प्रोर यहा उद्घृत किया जा रहा हूँ- तुसुममंत न वेवसमार्तय नवम्शोनतरो तमरदीपनम्। किरात्यप्ननवोषप विलामिता कमिता वविताभरव परपित ।। रघुवनर, १२= तथा शिशुपार्वध के चतुर्थ सर्ग वे कुछ यमको को इन्होने उदाहरण रूप में स्वीकार निया है। नदयपि वहां प्रचुर मात्रा मे समको मा प्रयोग हुआ है विन्तु वही-ही वह प्रसादगुणयुक्त एव थुतिपेशल नही है। अन यड़ी एक ऐसा उदाहरण दिया जा रहा है जो उक्त समस्त विशेषताओ से सुक- प्राय है। रंवतव पर्वत का वर्णन वरते हुए कृष्ण का सारयि दारक वृष्ण मे कहना है- चहुति य परित ननवस्थली महरिता उसमाननवासुह। अचल एव भवानिव राजते स हरितारममानवाशुरु।। शि. पा ब ४१२१ एवं पदावमवानां वर्गानां विन्यासवत्रभावे विचारिते वर्णतम्- दायात्मकत्य पदस्य च वक्रभावविचार प्राप्तावसर। तत्र पद- पूर्वाघंस्य ताबद्वकताप्रकार कियन्त संभवन्तीति प्रतमते- इसर प्रकार पदों के अवयवभृत वर्णों ने विभ्सास की ववता का निवार कर लेने के अनन्तर बर्णों वे समूहर्प पद की वकता वा विचार करना सवयावमर हो जाता है। उसमे पहले पद वे पूर्वार की वक्रता के कितने मेद सम्भव हो सकते है इमका ( विचार) आरम्भ वरत है-
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द्वितीयोन्मेप १९३
यत्र रुढेरसंभाव्यधर्माध्यारोपगर्भेता ।' सद्धर्मातिश यारोपगर्भतवं वा प्रतीयते॥॥ लोकोचरति रर कारर लाध्योवर्पामिदि रया । वाच्यस्य सोच्यते कापि रूढिवैचित्र्यवक्रता ॥ ह ॥
जहां पर वाच्य अर्थ के सर्वातिशायी तिरस्कार अथवा प्रयमनीय उत्कर्ष को बताने की इच्छा से, रदि के द्वारा सम्भव न हो सकने वाले अध्यारोप के अभिन्वाप का भाव, अथवा पदार्थ के किसी विद्यमान धर्म के अतिशय को प्रतिपादित करने के अभिप्राय का भाव प्रतीत होता है वह कोई अलीकिक रुदि शब्द के वचित््य का वक्रभाव (रूढिवचियवक्रता) होता है॥। ८९।। -- यत्र रुढेरसंभाव्यघर्मा्यारोपगर्भता प्रतोयते। शब्दस्य नियत- वृत्तिता नाम धर्मो रूदि सव्यते, रोहणं रूढिरिति कृत्वा। सा च द्विप्रकार संभवति-नियतसामान्यवृतिता नियत विशेषवृतिता। तेन रुदिशब्देनात्र रुदिप्रधान शब्दोडभिधीयते, धमंधमिणोरभेदो- पचारदर्शनात । पत्र वस्मिन विपये रूढिशब्दस्य असंभाव्य संभा- वयितुमशक्यो य धर्म, कश्ित्परिश्पदस्तस्पाध्यारोपः समर्पण गर्भो5- भिप्रायो यस्य स तथोवतस्तस्य भावस्ततासा प्रतीयते प्रतिपद्यते। यत्रति संबन्धः। सद्धर्भातिशयारोपगर्भत्वं ा। संभ्रासौ धर्मश् सद्वर्म· विद्यमान: मदार्थस्य परिस्पन्दस्तस्मिन् यस्म कस्यचिदपूर्वस्या- विशयस्याद् भुतरूपस्य माहिम्न आरोप समर्दण गर्भोडभिप्रायो यस्य स तयोवतस्तस्य भावस्तत्त्वम्। तच्च वा पस्मिन् प्रतीयते। केन हेतुना- लोकोत्तर तिरस्कार इलाघ्योत्कर्बाभिधित्सया। लोकोतर सर्वाति- शायी यस्तिरस्कार: खलीकरणं इलाध्यश् स्पृहणीयो य उत्कर्ष: सातिशयत्वं तयोरभिधित्सा अ्रभभियातुमिच्छा वक्तुकामता तथा। कस्य वसच्यस्य। रूठिशब्दस्य वाच्यो योडभिधेयोजर्थसतस्य। सोन्यते कथ्यते काप्यलोंकिको रूढिवैवित्रयवत्रता। रुदिशब्दस्यंवविधेन वैचि- ऋ्येण विचित्नभावेन वक्रता वक्रभावः। तदिदमत्र तात्पर्यम्-यत्सामान्य- मात्रसंस्पशितां शब्दानामन् मानवत्रियत विश्योपालिंगनं यदयपि स्वभावा- देव न किचिदि संभवति, तथाप्यनया युक्त्या कविविवक्षितनियत- विशेयनिष्ठतां नीयमाना: कामपि चमरकारकारिता प्रतिपद्यते। यया- १३ व० जी०
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१९४ वक्रोक्तिजी वितम्
जहां रूढि के द्वारा सम्मवन हो सकने वाले धर्म के अध्यारोप की गभता प्रतीत होती है (उसे रूठिवचिन्यवक्राा कहते है)। रोहण और रदि पर्याय हैं ऐसा मानकर शब्द का वह धर्म जिससे कि उसका व्यापार (प्रनोगक्षेत्र) निव्त होता है रूढि कहा जाता है। वह निवतबृतिता दो प्रकार की होनी है-सामनन्नवुति का नियत होना याने नियतसामान्यवृत्तिता और विशेष वृति का नियत होना अर्थाव नियतविशेषवतिता। जत रूढि शब्द के द्वारा रूद्िप्रधान शब्द का ग्रहण होत है क्योंकि धर्म और धर्मी के बीच लक्षणा से जभेद करने का व्यवहार प्राप दिखाई देना है।
जहां अर्थात् जिरा विषय मे रूढि शब्द का असम्भाव्य अर्थात् (रूदवि गब्द के द्वारा) सम्भव न कराना जा सकने वाला जो धर्म अर्थाद कोई स्वभाव उसका अध्यारोप अर्थात प्रतीति कराना है गर्भ अर्थात् अभिप्राय जिसका वह हुआ तथोक्त (अमम्भाव्य धर्म के अध्यारोप का गर्भ) उसका भाव हुआ (असम्भाव्य धर्म के अध्यारोप की गर्भता अर्पात् रूदि शब्द के द्वारा सम्भव न कराये जा सकने वाले पदार्थ के धर्म विशेष की प्रतीति कराने वाले अभिप्राम से युक्त) यह जहां प्रतीत अर्थात् प्रतिपादित होती है। अथवा (जहां) विद्यमान धर्म के अतिशय के आरोप को गर्भता प्रतीत होनी है वहाँ भी रूठिवचिन्वक्रता होती है।
यम से सम्बन्ध का ग्रहण किया जायगा। अथवा जहा पर वर्तमान धर्म के आतिराय्य के आरोप का वुक्षीकार प्रतीत होता है। जो सद और धर्म दोनों हो उसे मद्धर्म कहते हैं अर्थात् उसमे विद्यमान पदार्थ का स्वभाव, उसमे जिस किसी अभूतपूर्व आतिवय्य का अर्थात् विस्मयकारी स्वरूप के महत्त्व का आराप या समपण ही वुक्षीकृत या अभीष्ट होकर आता है उस तरह से कहे हुए उसके भाव को वह संज्ञा दी जायगी। अथवा वह जिसमे प्रतीत होता है (वहाँ रुढिव चित्र्यवकता होती है) अब प्रश्न उठता है कि किस कारणवण-तो यहाँ पर असामान्य तिरस्कार और वाछनीय उत्कर्ष का प्रति- पादन करने की इस्छा से (ऐसा किया जाता है)। लोकोत्तर अर्थात् सबसे अधिक जो तिरस्कार याने अपमानित करना है ( उसे) और जो प्रशसनीन या घाञ्छनीय उत्करष यानी व्निरेक है उन दोनों को कहने कीया ववन करने को इच्छा अर्थात् बताने की अभिलाया के कारण (ऐता किया जाता है। यह अभिधित्सा किसकी होती है-वाच्य की। रूदिशब्द का वाच्य अर्थाव् जो अभिधा के द्वारा प्रतिपाद अर्थ है (उसकी)। तो वह कोई लोगेतर (वस्तु) रूविवबिन्यवक्रता के नाम से कही जाती है। रूठि शब्द को इस
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तरह की विचित्रता अर्थात विचिन्न होने के नाते आने वाली वक्रता याने बांकपन को यह सज्ञा देते है। इस तरह इसका यह आशय है-जो केवल साधारण तत्व का ही परामर्श करने वाले शब्द है उनका अनुमान की तरह एक नियतर्वैशिष्टय का ग्रहग करना यद्यपि स्वभावत तनिक भी सम्भव नही है फिर भी इम तर्क से उन शब्दो को कवि के द्वारा आकून एक नियत वैशिष्ट्य मे निहित कर दिये जाने पर (उनमे) एक लोकोत्तर चमत्कार उन्पस्न करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। जैसे- ताला जाग्रति गुणा जाला दे सहिअ्रएहि घेप्वंति। रइकिरणाणुग्गहिग्राइ होति कमलाइ जमलाइ ॥। २६॥ (तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहदमग हुन्ते। रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि। ) गुण तभी गुण होते हैं जब काव्प-नर्मज्ञ सहुदय उनको ग्रहण करते हैं अर्थात् सहृदम उनका आदर करते है (जैसे कि) सूर्य को किरणो से अनुग्ृहीत अर्थात् उनके कृमाभाजन कमल ही वस्तुत कमल होने हैं॥२६॥ प्रतोयते इति करियापदर्वचित्रपस्वाममभिप्रायी यदेवविधे विषये शब्दानां वाचकत्वेन न व्यापारः, अपि तुवसत्वन्तरवत्प्रतीतिकारित्व- मत्रगेति युक्तियुक्तमप्पेतदिह नाति प्रान्पते। यस्माद् ध्वनिकारेग वयड्गयव्यक जकभावोडन सुतरा सर्मायजस्तत् कि पौनहुक-पेन। कारिका मे प्रयुक्त 'परतीमते' इब क्रियापद की विचित्रना का आशय यह है कि इस प्रकार के विषय में श्दो का वाचक रूप से (ही) आपार नही होता है अर्थात उस अर्थ को प्रकट करने मे शब्द की अभिधा शक्ति असमर्ष होती है, अपितु दूसरी वस्तु की सी अर्थात कविविवक्षिननिरतविशेय की प्रतीति कशने के द्वारा ही उनका वापार प्रवृत होता है यहाँ पट इसके युक्तियुक्त होते हुए भी इसे हम विस्तार नहीं दे रहे हैं कयोंकि धवनिकार ने ऐसे स्थलो पर मङ्गच वअ्षक भाव का भली भाति समर्थन कर रखा है तो उसको दुहराने से क्या लाभ। साच रुदिवचित्पवकरना मुश्यतया द्विप्रकारा संभवति-नतत्र रूडिवाच्योऽर्य: स्वयमेव्र आत्मन्यु:कर्ष निकष वा समारोपवितुशामः कविनोपनिबध्यते, तस्यान्यो वा कश्रिद्वकतेति। यथा- तथा बहु 'हढिवैचिन्यवक्रता' प्रधान ढंग से दो तरह की सम्भव होतो है-(१) जहां कवि, रूढ (प्रधान शन्) के द्वारा वाच्य अर्य को, स्व्रपं
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ही अपने मे उस्कृष्टता अथवा निकृस्टता का समारोप करने की इच्छा से युवत रूप में, उपनिबद्द करता है। (यह पहला प्रभार है) अ्थपा (२) (जहँ विसी पदार्थ मे उत्कृष्टता अथवा निवृष्टता का समारोप करने के लिए) किसी (उस पदार्थ से भिश्न) दूसरे ववता को उपनिवद्ध करता है। वह दूसरा प्रकार है)। जैँसे -- स्निग्धश्यामलकान्तितिप्तवियतो वेल्लद्वलाका घना वाता: शोकरिणः पयोदसुहृदामानन्दकेकाः कलाः। कामं सन्तु दृढं कठोरहुदयो रामोडसिम सवं सहे वंदेही तु कथं भविप्यंति हहो हा देवि धीरा भव ॥ २७ ॥ (अपनी) मुसृण एव नीलवर्ण छवि से अन्तरिक्ष को ब्यास कर देने वाले, एव अत्यत शोभायमान बकपडकियो से युक्त ये बादल, (जल कौ) बूंदो से युक्त (रढीरढी) ये हृवायें, तथा वादलो के मिन्र (इन) मसूरों की (ये) आनन्दजन्य अव्यक्त मधुर ध्वनियां, (विरहियी को वष्ट देने वाली ये सभी वस्तुये) भले ही ही (उनसे मेरा बुछ नही बिगडने का क्यो- कि) मैं तो अत्यधिक निफ्कुर हृदय वाला राम ( हू न) मब कुछ सहन कर लूंगा। लेविन हाय (अत्यत सुबुभारी) जानकी (कैसे मेरे विर्हु मे इन्हे सहन कर सकेगी) किस दशा में होगी ? हा देवि' (मीते' जहाँ भी हो) धैर्य धारण करो ॥ २७ ॥ अत्र 'रास' -शव्देन 'दृढं कठोरहुदयः' 'एव सहे' इति 'यदुभाम्यां प्रतिपादयितु न पा्यते, तदेवविधविषिजोद्दीपनविभावविभवसहन- सामर्थ्यंकारणं दु.सहजनकसुता्हव्ययाविसप्ठुलेऽपि समये निर- पत्रपप्राणपरिरक्षावचक्षण्यलक्षण संहापदनिबन्धन किमप्यसंभाव्यम- साधारणं कौर्य प्रतीयते। वैदेहीत्यनेन जलधरसमयमुन्दरपदार्थ- संदर्शनासहत्वसमर्पकं सहजसौकुमार्यसुलभं किरमप कातरत्वं तस्याः समथ्यते। तदेव च पूवर्माद्विशयभिधायिन 'तु' शब्दस्य जोवितम्। इम उदाहरण मे 'दृद कठोरहृदय' और 'सर्व सहे' इन दोनों पदो के द्वारा भी जिस (अर्थ) का प्रतिपादन नही किया जा सवता या उस इम तरह के ताना प्रवार के उद्दीपन पिभावों के वभव को सहन घर सबनेने सामर्थ्य के वारणभूत, जननसुता की असहयविरहव्यथा वे कारण बिगडे हुए दिनो में भो निलंब्ज दद्भ से प्राणरक्षा करने वो बतुरता मे स्वरूप वाले द्रव्य शब्द हेतुक असभ्भव और अोवसामान्य एव अनिवंचनीय कोर्य को राम शब्द प्रतीत बारा देता है। 'वैदेही' इस पद के द्वारा उस सीता बा
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चर्पाक्लीन रमणीय प्राकृनिक उपादानो के देखने मे अतमर्य होने का भाव व्यक्त करने वाला स्वाभाविकु मुबुमारता मे सरलता से प्राप्त होने बाला एक निर्वचनीय भौरुत्व प्रतिपादित होता है। और वही पहले कहे गए हुए (कविविवश्षितनियत) विशेष को प्रतिपादित करने वाले 'तु' शन्द का प्राण है। विद्य मानधर्मातिराय वाच्याध्यारोपगभतवं, यया- तत. प्रहस्माह पुनः पुरनदरं व्यपेतभीर्भूमिपुरन्दरात्मज.। गृहाग शस्त्रं यदि सर्ग एष ते न खल्वनिजित्य रघुं कृती भवान् ॥२८॥ (मदार्थ मे) विद्यमान धर्म के (लोकोतर) उत्कर्ष का आरोप करने के अभिग्राय से युक्त होने का (उदाहरण) जैसे- (रघूबश महाराव्य में अपने पिता दिलीन द्वारा छोडे गये अशवमेध यज्ञ के घोड़े का अपहरण कर एव बिना ुद्ध के किसी भी तरह उसे न वापस करने के लिए उद्यत इन्द्र के) इम (प्रकार के प्रतिवचनो को सुनने) के अननर वसुन्धरा के सुरपति (राजा दिलीर) के बैठे (रध) ने भयहीन होकर पुन अट्टहास करते हुए इन्द्र से कहा कि (हे इन्द्र ) यदि यह तुम्हारा स्वभाव (ही) है (कि सीधे सीजे कहने पर शेखी बघारते जाने हो) तो हुषियार उठाओ, कनोकि (हम) रघु पर विना विजय प्राप्त किए (ही) आर काकृत्य नही ( हो सकेंगे, अर्थात् बिना मुझे परास्त किए आप अश् का अपहरण नही कर सकते। ॥२८॥ 'रघु'-शन्देनात्र सर्वत्राप्रति हतन्नभावस्यापि सुरपतेस्तयाविवाध्य वसायव्याघातसामर््यनिबन्धनः कोऽपि स्वपौरुपातिरय प्रतोयते।
यहाँ (इस इफोक मे) 'रघु' शब्द के द्वारा, समस् लोको मे अनिरुद् प्रभाव वाले भी देवताओ के स्वामी (इन्द्र) के उम प्रकार (अश्व का अपहरण करने) के उत्साह को भङ्ग करने के सामर्य्य के कारणभृत अपने (मे विद्यमान) पराक्रम के किसी (लोकोतर) उत्कर्ष की प्रनीति होती है। 'प्रहस्प' (अर्थान् अद्टहाम करके) इम पद के द्वारा इमी (पराक्रम के अलौकिक उत्तर्प) को ही परिपुष्ट किया गया है। टिप्पगो-इस प्रहार 'मिम् शामन' मे राम के अन्दर जिप कूरना की सम्मावना नही की जा सरुती थी उसके आरोर के अभिवाय को नेरुर राम' शव्द प्रयुकत हुआ था। अ वह रुदिगन्द राम के द्वारा अतम्भाव्
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धर्म के अध्यारोप की गर्भता (रप पहसे भेद) वा उदाहरण हुआ। साथ ही कवि ने स्वय राम के द्वारा हो उसे कहलाया है। मन्यो बषता यघ तत्रोदाहरणं यथा- आाज्ा शर्कशिखाम णिप्रणयिनो शास्त्राणि चक्षुनवं भक्तिर्भूतपती पिनाकिनि पदं लड्केति दिव्या पुरी। संभूतिद्वुहिणान्वये च तदहो नेदृग्वरो लम्यते स्थाच्चेदेष न रावण: वव नुपुन सवंत्र सवे गुभाः।।२६॥। जहां (कवि पदार्थ मे उत्षं अथवा अदवर्ष का आरोप कराने के लिए स्वय रूदि शब्द द्वारा वाच्य पदार्थ को ही न उपनिबद्ध कर, उससे मिल्न दूसरे वक्त्ता (को उपनिवद्ध करता है) उमका उदाहरण जैसे- (वालरामायण नाटक मे रावण के विषय मे राजा जनक से शतानन्द की निम्न उक्ति कि जिस रावण की) आज्ञा देवराज इन्द्र के भुकुट की मणियो से प्रणय करने वाली है (अर्थात् इन्द्र द्वारा शिरोधार्य है), शाखतर ही (जिसकी) अभिनव दृष्टि है, पिनाक (धनुप) को धारण करने वाले भूतनाथ (भगवान् शसूर) मे (जिसकी) भक्ति है, दिव्य लस्टा नगरी (जिसकी) निवास- स्थली है, ब्रह्मा के बुल. मे (जिसवा) जन्म हुआ है, अहो। (ऐसे उत्कृष्ट गुणो से सम्पन्न) ऐसा दूसरा वर (ससार मे) कहाँ मिलता यदि यह (रावयतीति रावण-प्राणियोको पीडित करने वाला) 'रावण' न होता (पर ऐसा होता कसे-वयोकि) वहाँ सभी मे सब गुण सन्भव होते हैं।। २१। 'रावप' - शब ्देनान सकललोकप्रसिद्धदशाननदु विलासव्यतिरिक्तमभि- जनविवेक सदाचार प्रभावसभोगसुखसमुद्धिलक्षणाया. समस्तवरगुण-
प्रतापते। यहां पर 'रावण' शब्द से सारे लोको मे पसिद्ध दशमुख के युप्रपथ्व के अतिरिक्त सज्जनों के विवेव, मदावार, प्रभाव और ऐहिक मुख की समृद्धि के स्वर्प वाली पति के सारे गुणो की समनता रूपी सम्पति वे तिरस्कार की हेतुम्प हेयता के निमितभूत अपमान की प्रीति होतो है। मत्रंव विद्यमानगुणातिशया ध्यारोपगर्भ(वं यया- रामोऽसो भुवनेषु वित्रमगुणः प्राप्तः प्रसिरद्धि पराम् ॥३० ॥ यही पर (पदार्थ से दिद्यमान) गुण के आतिशस्य की आरोपगर्भतद (का उदाहरण) जंसे-
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ये राम है जो अपने पराक्रम-गुणो से लोको मे परम प्रसिद्धि को प्राप्त हुए है ।। ३० ॥। अ्रत्र 'राम' शब्ेन सक त्रि ु ना तिशायी रावणानुचर विस्मया स्पदं शौर्यातिशय प्रतीयते। यहाँ पर 'राम' शब्द के द्वारा समस्त त्रिलोकी को अतिक्रमण कर जाने वाला, रावण के सेवक का विस्मयभूत पराक्रमानिशय प्रत्ीत होता है। एपा च रुढिव त््यवकता प्रतीयमानधर्मबाहुस्याद् बहुप्रकारा भिद्यते। तच्च स्वयमेवोत्प्रेक्षणीयम्। यथा- तथा इस 'रूढिवचित्र्यवक्रता' के प्रतीयमान धर्मों के असस्य होने के कारण अनेक भेद सम्भव है। उनको (सहृदयो को) स्वयं ही विचार कर नेना चाहिए। जैसे-
गुवर्थंमर्थी श्रुतपारदुइ्बा रघोः सकाशादनवाप्य कामम्। गतो वदान्यान्तरमित्ययं मे मा भूत्परीवादनवायतारः॥।३१॥ (रघुर्वश महाकाव्य मे-विश्वजित् यज्ञ मे सर्वस्व दान कर देने के अनतर, गुरुदक्षिणा के निमित द्वव् याचना के लिए पधारे हए, किंतु प्रथम स्वागत मे ही मिट्टी के अर्ध्यपात्र को देख कर निराश हो किसी अन्य दावा के पाम द्रव्यहेनु जाने के लिए उद्यत वरततु के मिष्य कोत्स से राजा रघु की यह उकि कि-) '(ममप्र) शास्त्रों का पारङ्भत गुरुदक्षिणा (प्रदान करने) के निमित याचना करने वाला (स्नातक कौत्स दान देने में प्रसिद्ध राजा) रघु के समोफ़ से मनोवाछित (वस्तु को) न पाकर दूसरे दानी के पास चला गया' ऐसा यह (आज तक कभी न हुआ) मेरा नवीन अपयश आविर्भूत न होवे। अत आप जब तक मैं उसका प्रबंध करू, दोनत्तीन दिन मेरी अग्नि शाला मे ठहरे।॥ ३१।1 'रघु'-शब्देनात्र त्रिभुवनातिशाय्योदार्यातिरेकः प्रतीयते। एतस्यां वकतायामयमेव परमार्यो यत् सामान्यमात्रनिष्ठतामपाकृत्य कवि- विवक्षित विशेष प्रतिपादनसामर्थ्यलक्षणः शोभातिशयय: समुल्लास्यते। संज्ञाशरदानां नियतार्थनिष्ठर वात् सामान्यविशेष भावी न कश्रित सम्भव-
निय तद शादिदंद वुतिनिष्टता सकविविवक्षिता संभवरयेव, सवरश्रुति- न्यायेन, लग्नांशुकामायेन चेति।
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इस (रुदिवचित््यवक्रता) मे यही तो तत्त्व है कि इगमें (रुदि शब्द के द्वारा उसकी) केवल सामान्यगत निप्पतियुक्ता का परित्याग कर ववि के अभिप्रेत विशेष (पदार्थ) ना बोध बराने की समता वाली रमणीपता का उत्क्ष पतिपादित किया जाता है। सत्ञा श्न्दी के ( किसी) निन्चित वर्य की (ही) प्रनीति कराने वाले होने के कारण उनमे कोई भी सामान्य और विशेष भाव हो ही नही सकता ऐसा कहना उचित नही, बयोकि उनकी भी हजारो अवस्थाओ मे समान रूप मे पाई जाने वाली वृति वाले वाच्च के एक अच्छे कवि द्वारा विवक्षित नियत अदस्याविशेष मे व्यापार की निष्ठता सम्भव होती ही है जैसे कि'स्वरधुतिन्या्य' मे और 'लग्नाशुरन्याय' में। एवं रदिवकता विवेव्य कमप्राप्तसनत्वर्या पर्यायवक्रता विविनवित-
1 रम्यच्छायान्तरस्पर्शा तरदंलंकर्तुमीर्वरः ॥१० ॥ स्वयं विशेपणेनापि स्वच्छायोत्कर्पपेशलः। असंभाव्यार्थपात्रत्वगभं पश्चामिधीयते ॥११॥ अलंकारोपसं स्ंकार मनोहारिनिचन्धन: पर्यापस्तेन वैचित्र्यें परा पर्यायवकरता ॥ १२ ॥ (१) (जो पर्दान) अभिवेष का अत्यन्त अन्तरङ्ग है, (२) उसे (अभिधेय) के अतिशय को पु्ट करनेवाला है, (३ ) स्वय ही अथवा अपने विशेषण के द्वारा (जो) रमणीन दूसरी शोभा के स्पर्श से उस (अभिषेय) वो अलकृत करने में समर्थ है, (४) अपनी काति के प्रकर्ष से रमणीप है, (५) तथा जो पर्या सम्भावित न किए जा सकने वाले अर्थ का पात होने के अभिप्राय वाला पहा जाता है, एव (६) अलद्धारों के कारण उत्पन्न दूसरी शोभा मे, अथवा अलद्गारो की दूसरी शोभा को उत्पन्न करने से मनोहर रचना वाला पर्वाय है, उसके कारण (-जहाँ) विचिन्ता होती है वह कोई प्रवृष्ट पर्माय की बद्रता होती है।। १०-१२1। पूर्वोव त विशे पणविशिषट्: कीव्येवियये पर्यामरतने हेतुना पदववित्रयं विचिन्नभावो विच्छित्तिविशेष: सा परा प्रकृष्टा काविदेव पर्याप- वकतेत्युच्यते। पर्यापप्रधानः शब्द पर्यायोऽभिधीयते। तस्य चँतदेव पर्यायप्राधान्यं यत स कदाचिद्विवक्षिते वस्तुनि वाचकतया
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प्रवतते, कदाचिद्वाचकान्तरमिति। तेन पूर्वोक्तनीत्या बहुप्रकार: पर्यायोऽभिहित, तहि क्रियन्तस्तस्य प्रकारा, सन्तीत्याह-अ्रभिवेय्या- तरतमः । अभिधेय वाच्यं वस्तु तस्यान्तरतमः प्रत्यासन्नतमः । यस्मात् पर्यायशब्दत्वे सत्यप्यन्तरंगत्वात् स यथा विवक्षित वस्तु व्यनकित तथा नात्थ. कविचदिति। यथा- पूर्वोक्त विशेषणो से विशिष्ट जो काव्य मे पर्याय होता है उसके कारण जो वैचिव्य अर्थात् विशेष प्रकार की शोभा होती है वह कोई प्रकृष्ट पर्याय- चक्रना कही जाती है। दूसरे शब्द का स्थान ग्रहण करने की क्षमता जिस्मे प्रधन रूप से पाई जाती है उसे पर्नान शब्द कहते है। उसकी पर्याय प्रधानता यही है कि वह कभी कहने के लिए अ भिप्रेत वस्तु के विषय मे वाचकरूप से प्रवुत्त होता है, कभी दूमरे वाचक के रूप मे। इमलिये पूर्वोक्त न्याय से अनेक प्रकार का पर्याय बताया गया है।
(१) (जो) अभिधेय का अत्यन्त अन्तरह्ज होता है। अभिघेय अर्थात् प्रतिपाद्य वस्तु उसका अन्तरतम अर्थात् निकटतम होना है। क्योकि पर्याय शब्द होने पर भी (अर्थात् उस शब्द के स्थान पर उसका दूसरा पर्याय भी प्रयुक्त किया जा सकता है फिर भी) अंत्यम्त अन्तरज्ज होने के भारण कहने के लिये अभिप्रत वस्तु को जैसे वह व्यक्त कर देता है वैसे कोई दूसरा (पर्याय) नही व्यत्त कर सकता है। जैसे- + नाभियोक्तुमनुतं त्वमिष्यसे कस्तपस्विविशिखेषु चादरः। सन्ति भुभृति हि नः श्वरा परे ये पराकमवसूनि वज्तिगः ॥३२।। (किरातार्जुनीय महाकाव्य मे अर्जुन के पास अपने सेनापति शिव के वाण के लिए गयर हुआ किरात अजुंन से कहता है कि)-आपसे हम मिथ्या कथन करने की इच्छा नही कर सकते (अर्थात् हम आपके बाणो के लिये झूठ बोले यह असम्भव है।) वयोकि (आप सरीसे शोच्य) मुनियो के वाणो मे (हमारी) कँसी आस्था? (वैसे तो) हमारे नरेश के पास (अनेक) ऐसे वाण हैं जो वच्घारी (इन्द्र) के शौर्य के विभव अर्थाव सर्वस्व है। (तात्पर्य यह कि वे बाण इन्द्र के वज्त का भी अतिक्रमण करने बाले हैं) ॥ ३२ ॥। अ्न्न महेन्द्रवाचकेष्वएसंयेधु संभवत्सु पर्यायशन्देपु 'वञ्त्रिग.' इति प्रयुक्त पर्यायवपतां पुष्णाति। यस्मात् सततसंनिहित वच्त्यापि सुरपतेयें पराक्रमवसुनि विक्रमधनानीति सामकानां लोकोत्तरत्व-
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प्रतीतिः। 'तपस्वि'-शब्दोऽप्यतितरां रमगीयः। यस्मात् सुभटसाय- कानामादरो बहुमान कदाचिदुपपद्यते, तापसमार्गगेयु पुनर- किंचित्करेषु क. संरम्भ इति। यहाँ महेन्द्र वे वाचक अनेक पर्याय शब्दों के होने पर भी (कवि द्वारा (प्रयुक्त 'वच्तिण' अर्थात् वत्त धारण करने वाला) यह शब्द पर्याय- वक्रता का पोषण करता है। क्योकि (जो वाण) सदैव बजू को धारण करनेवाले देवाधिप इन्द्र के भी शौर्य के विभव हैं इससे वाणो की अलौकिकता द्योनित होती है। साथ ही 'तपस्वि' पद भी अत्यधिक रमणीय है, बशोकि शूरो के बाणो के प्रति शायद कभी आदर अथवा अभिलाप उचित भी हो पर तपस्वियों के वेकार बाणो के प्रति कैसी अभिरुचि हो सकती है। (इस प्रकार यहाँ प्रयुक्त 'तपस्वि' पद भी अत्यधिक चमत्कारकारी है, नयोकि मदि किरात यहाँ केवल अजुंन के लिए किसी विशेष वाचक पद का प्रयोग करता तो वह चमत्कार न आ पाता जो सामान्य वाचक 'तपस्वि' पद से आ गया है।) यथा वा- करतवं ज्ञास्यसि मां स्मर स्मरसि मां दिष्टया किमम्यागत- स्त्वामुन्भादयितु कथं ननु बलात् कि ते बलं पश्य तत्। पश्यामीत्यभिधाय पावकमुचा यो लोचनेनव तं कान्ताकण्ठनिषवतबाहुमदहुत्तस्मं नमः शूलिने ॥।३३॥ अथवा जैने (इमी पर्यायवक्रता का दूमरा उदाहरण)-(जिस समय देवराज इन्द्र के अनुरोध से कामदेव भगवान् शद्गर की समाधि भङ्ग करने के लिए जनके पास जाता है, उसी अवसर पर काम और शङ्ूर की परस्पर नटथपूर्ण वार्ना का वर्णन कवि प्रस्तुत करता है कि-) (शङ्र-) तू कौन है रे? (काम०) अभी (अपने आप) मुझे जान जाओगे (उतायले मत बनो)। (शङ्गर) अरे ( घूर्त) काम ' तू मेरा स्मरण करता है? (या नही जो मुझे अभी पता लगवाने आया है)। (काम) हा, हा, बडे प्रेम मे (मुझे आप की याद आ रही है)। (शङ्दर) तो फिर यहां िस लिए आाया है? (कम०) तुम्हे उन्मत बनाने के लिये। (शसुर)-सो कैसे। (कामब) अरे बलपूवंक (और कसे)। (शद्दर)-(वाह) कौन-सा है तेरा वह बल (जिसके भगेसे उछलरहा है) । (काम०)-( हहह मेरा बल जानना चाहते हो तो) देखो। शङ्र-(अ। दिया अब तेरा वल ही मे देखता हूँ ऐसा कहकर जिन्होने आग उगलने वाले (अपने ललाट के) नेत्र से ही अपनी भ्रियतमा
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के गले मे बाँह डाले हुए उम ( कामदेव) को जला दिया। उन त्रिशूल को धारण करने वाले ( भगवान् शद्दर) को प्रणाम है। ३३॥ अ्न्न परमेश्वरे पर्यायसहसत्रेष्वपि संभवत्सु 'झूलिने' इति मत्प्रयुव्तं तन्रायममिप्रायो यत्तस्मे भगवते नमस्का रव्यतिरेकेण किमन्यदभि- घीयते। यत्ततथाविघोत सेकपरित्यक्तविनयवृत्तः स्मरस्य कुपितेनापि तदभिमतावलोकव्यतिरेकेण तेन सत तस निहितशूलेनापि कोपसमुचित- मायुधग्रहणं नाचरितम्। तोचनपातमात्रणव कोपका यंकरणासगवत: प्रभावातिशयः परिपोषितः। अत एव तस्म नामोऽस्वति युवित- युक्ततां प्रतिपद्यते। यहाँ भगवान् गडर के वाचक हजारो पर्मायो के सम्भव होने पर भी कवि ने जो 'शूलिन., (त्रिशूलधारी) पर्याय पद को प्रयुक्त किया है उसका आशय यह है कि उन ऐश्वर्यशाली शङ्तर के लिए नमस्कार के अलावा और कहा ही क्या जा सकता है क्योकि उस प्रकार की धृष्टता से विनस्नता का परित्याग कर देने वाले कामदेव पर क्रद्ध हो जाने पर भी एव निरन्तर मिशूल को धारण किए रहने पर भी उन्होने उस (कामदेव) के अभिमत दशेन से भिन्न अपने क्रोध के अनुरप हुथियार नही उठाया। (अर्थात् यदि वे चाहते तो अपने निशूल से काम को तमाम कर देते लेकिन फिर भी उन्होंने उसकी ओर केवल देखा ही था जैसा कि आपने स्वय कहा था कि यदि'मेरा वल देखना है तो देखो (पश्म)। इमीलिए कुन्तक ने तदभिमत् शब्द को प्रयुक्त किया है-जिसकी कि व्यास्या करना हो आचार्य विश्वेश्वर जी भूल गए।) साथ ही वेवल देखने भर से ही (काम को भस्म कर देने से) क्रोध का वार्ये सम्पन्न हो जाने के कारण भगवान् शङ्गर के प्रताप का उत्कर्ष और भी अधिक पुष्ट हो गया है। अत उनको नमस्कार है, यह कथन अत्यन्त ही समीचीन प्रवीत होता है। (इस प्रकार इस उदाहरण मे 'झूलिन' शब्द के प्रयोग से पर्यायवक्रता परिपुष्ट हुई है।। अयमपरः पदपूर्वाधवकताहेतु पर्यायः-यस्तस्यातिशयपोषक। तत्याभिधेयस्यार्थस्यातिशयमुत्कर्ष पुष्णाति य. न तयोकतः। यस्मात् सहृजसौकुमार्यसुभ गोडपि पदार्थस्तेन परिपोषितातिशय: सुतरां सहृदय- ह्दयहारितां प्रतिपद्यते। यथा- (२) पदपूर्वाद्ध वक्रता का कारण यह दूसरा पर्वाय (प्रकार) है-जो उसके अतिशय को पुष्ट करने वाला है। उस अभिघेय अर्थ के अतिशय अर्थाद सत्कर्ष का जो पोषण करता है वह (अभिधेय के उत्र्य को पुष्ट करने वाला
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पर्यार वहा जाता है)। वनोकि अपनी सहज कोनलता से रमगीम भी पदार्य उम (पर्वाय) के द्वारा परिपुष्ट किए गये उत्कर्ष से बुक्त होकर सहदयो का अत्मन्त मनोहागी वन जाता है। जमे- संबन्धी रघुभूभुजां मनसिजव्यापारदीक्षागुरु-
1 इचन्द्र. सुन्दरि दृश्यतामयमितश्रणडोशनुगामणिः॥३४ ॥। 'वालरामायण के दशम अद्ठ मे पुप्पक विनान द्वारा रूछ्ा से अनोष्या को आते समय राम सीना से चन्द्रमा का वर्गन करते हुए कहते हैं कि-है भुन्दरि सीते। इधर रघुवशी सूरो के सबधी, मदन व्यापार सवधी मत्रो के उपदेप्टा, गौर वर्ग जङ्गों वाली रमणियो के मुखी के सादश्न के लिए वि्वात, ताराङ्गुनाओं के वयतम तथा तत्काल मांजे गये दक्षिण प्रदेश की युवतियों के दांतों के नमान सफेद छवि वाले, अम्बिरकेश के जरोरत इस चन्द्रमा को देखो । ३४॥ टिप्पणो-रह वाल रामिण के दशम अङ्भ का ४१ वा पचोर है। किन्तु वहाँ इसका प्रथम चरण चतुर्थ चरण के रून मे आया है एव पद्य का प्रारन्भ 'गोराङ्गी ' इत्यदि द्वितीय चरण से होता है। अत्र पर्यायाः सहजसौन्दर्यसंपटुपेतस्यापि चन्तमसः सहुदयहृदया- ह्लादकारणं कमप्यतिशयमुत्पादयन्तः पदपूर्वार्यवकना पुष्गन्ति। तया च रामेग राण निहत्य पुष्पकेग गच्छमा सौतायाः सविस्रभं स्वैर- कथास्वेतदभिधीयते यच्चन्द्र: सुन्दरि वृश्यतामिति, रामगीपकतनो- हारिणि सकललोकलोचनोहसवश्रन्द्मा विचापतामिति। यस्नातया- विधानामेव तादृश समुवितो विवारगोवरः। संबन्धी रयुभूमुजा- मित्यनेन चास्माकं नापूर्वो बन्यु रममित्यवलोकनेन संनान्पतामिति प्रकारान्तरेगादि तद्विपयो बहुमान प्रतीयते। शिष्टश्ञ तइतिशया- रानप्रवगत्वमेवात्मनः प्रययन्ति। तत एव व प्रस्तुतमयं प्रति प्रमेशे रथवत्वेनोत्कषंप्र कटनात्पर्यायाणां बहुनामप्यपोनरुवायम। तृतोये पाडे विशेषणवक्ता विद्यते, न पर्यायवक्रत्वम्। यहाँ पर पर्यान (शब्द) स्वनावन रमगीवता की गन्त्त मे समरन्न भी चन्द्रमा के, सहूदतो के दुन्नो के आनद के हेतुभूत िनी नपूवं) अनिगय को मृष्टि करने हुए परपूर्वाद्ध वकरा का नोवण करते हैं। जेने कि सष्ट्रनति राय का बब कर (अनोन्या के लिये) पुप्वक विनान से प्रस्थान
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किए हुए राम (मार्ग में) सीता की स्वच्छन्द्र वार्ता के प्रस्ङ्ग में यह कहते है वि-हे सुन्टरि। चद्रमा को देखो। अर्थात् सौंदर्य के कारण मनोहारिणि सीते! समस्त लोक के नेत्रो की आनन्दित करने वाले चन्द्रमा का विचार करो। कयो उसी प्रकार के लोगो का वह भलीभाति विचार का विषय बन सकता है। (वात्पर्य यह कि सोने का पारखी जौहरी ही हो सकता है। रिमी की विद्वस्ता का विचार कोई विद्वान हो कर सकता है। अत तुम्ही इम सुन्दर चन्द्रमा का विचार कर सकती हो कयोकि तुम स्वम सुन्दर हो। मही 'मुन्दरि' पर्याय की बक्रता है।) 'रघुवशी राजाओ का यह सम्बन्धी है' इससे यह कोई हमारा नवीन स्वजन नही (अपितु प्राचीन ही है) अत इसकी ओर देखकर इसके प्रति सम्मान प्रक्ट करो, ऐसा दूमरे ढङ्ग से भी चन्त्रमा के विषय मे सम्मान का बोध होता है। (भाव मह कि यह केवल सुन्दर है अतः इमे सम्मान प्रदान करो यही बात नहीं है, अपितु यह हमारा प्राचीन बन्धु भी है इस लिये दर्शन से इसे सम्मानित करो) तथा शेष (मनमिजव्यापार- दीक्षागुरु इत्यारदि) शब्द उम (चन्द्रमा) वे उत्कर्ष को धारण करने की अपनी तत्परता को ही प्रवट करते है। (अर्थात चन्द्रमा के उत्करषं को व्यक्त करते है) और इमी लिए प्रम्तुत अर्थ (चन्द्रमा) के प्रति अलग-अरुग (उसके) अविशय की प्रतीति कराने से बहुन से पर्याय भी पुनर्क से नहीं प्रनीत होते। (उक्त 'सम्बन्धी रघुभभुजाम्-' इत्यर्शद पद के) तृतीय चरण (सद्यों- माजितदाक्षिणात्यतरुणीदन्तावदातय्य ति') मे 'विजेषणवब्रत्वा' है, 'पर्याय- चक्रता' नही। 1
टिप्पणी-आचार्य ने तृनीय चरण मे 'विशेषणवत्रता' बताई है। श्रेष मे पर्यायवक्रता। विशेषणवक्रता का स्वस्पजैमा कि इमी उन्मेप की १५ वीं वारिका मे बनाया जायगा-इस प्रकार है-'जहा विशेषण के महातम्य से क्रिया का रूप अथवा वारवेरप वस्तु की रमणीपता उन्दरानित है वहाँ 'विशेषणनतरना होती है।' इम प्रकार उक्त वद्य का वृतीव चरण चन्द्रमा के पर्यान के रूप में नहीं प्रयुकन हजा है वह केवल निशेषण रूप मे ही प्रयुक्त है क्योकि-'तलाल नजन किए गये दोक्षण प्रदेश की दुकतियो वे दांनों की तरह मफदे वान्ति वाल' वेवल चन्द्रमा को सफेदो से विशिष्ट बताना है अत उमना पर्माम नहीं है और इमके प्रयोग से जो चनत्कार आया वह विशेषण की ही बक्रता होगी। जनकि 'चण्डीशचूडामणि', 'तारावधूवल्लभ' इत्यादि पद चन्द्रमा के पर्वावत्राची रूप मे प्रयुक्त है। वत. उनमें जो सौन्दर्य प्रतीति हुई वह 'पर्मायवत्रता' होगी।
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न्रयमपर पर्यापप्रकार: पदपूर्वारधवक्रतानिबन्धन-यस्तदल कर्त्तुमोश्वर । तदभिधेयलक्षणं वस्तु विभूषमितुं यः प्रभवतीत्यर्यः। कस्मात्-रम्यच्छायान्तरस्पर्शात्। रम्य रमगीयं वच्छायान्तरं विच्छित्यन्तरं श्लिष्टरवादि तस्य स्पर्शात, शोभान्तरप्रतीतेरित्यर्यः। कथम्-स्वयं विशेषणेनापि। स्वयमात्मनव, स्वविशेषणभूतेन पदान्तरेण वा। तत्र स्वमं यथा- (३) पदपूर्वाज्ध वक्रता के हेतुभूत पर्यान का यह अन्य भेद है कि- जो (पर्याय) उसे अलड्कृत करने में सामर्थ्यवान है अर्थात् उस अभिघेय रूप वस्तु को मण्डित करने मे समर्थ होता है। किससे ( मण्डित करने मे)- रमणीय दूमरी शोभा के स्पर्श से। रम्य अर्थाद मनोरम जो दूतरी छाया अर्थात् स्लिष्टता आदि अन्य कान्ति उसके स्पर्श से। सात्पर्य यह कि दूसरी शोभा की प्रतीति से (भण्डित करने मे समर्थ होता है) । कैसे (समर्य होता है) स्वय तथा विशेषण से भी। स्वय अर्थात् अपने आप जयवा अपने विशेषण रूप अन्न पदार्थ के द्वारा (अभिध्ेय को विभूषित करने मे) समर्थ होता है। उनमे स्वय जैसे (अभिघेय को विभूपित करता है उसका उदाहृरण )- इत्यं जडे जगति को नु बुहत्प्रमाण- कर्ण करी ननु भवेद् ध्वनितस्य पात्रम्। इत्यागत झटिति मोडलिनमुन्ममाथ मातड्ग एव किमत परमुच्यतेऽ्रसी।। ३५॥ इस तरह के जड ससार मे (हमारे) शब्दो का पात्र कौन हो सरता है सम्भवत बहुत बडे आकार वासे कानो वाला हाथी ही हो सकता है इसी से आये हुए भ्रमर को जिसने पुरन्त ही मसल डाला अत वह मातङ़ग (चाण्डाल) ही है, इससे अधिक और उसे क्या कहा जा सकता है।।३५॥ अत्न 'मातड्ग'-शब्दः प्रस्तुते वारणमात्रे प्रवतते। शिष्टया वृत्या चण्डाल लक्षगस्याप्नस्तुतत्य वस्तुनः प्रतीतिमुत्पादमन् रूपककालंकार- च्छायासंस्पर्शाद् गोर्याहोक इत्यनेन न्यायेन सादुश्यनिबन्धनस्पोपचारस्य संभवात प्रस्तुतस्य वस्तुनस्तत्वमप्यारोपयन् पर्यायवकतां पुष्णाति। यस्मादेव विधे विषये प्रस्तुतस्याप्रस्तुतेन संबन्धोपनिबन्धो रूपकालंकार- द्वारेण कदाचिदुपमामुखेन वा। यया 'सएवायं' 'स इवाय' मिति वा। यहं पर 'मातङ्' शब्द (अभिधावृत्ति से प्रकरण द्वारा अभिघ्ा के केवल हायी रूप अर्थ में ही निपन्तिरित हो जाने से) प्रस्तुन (वर्श्यमान)
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केवल हाथी का बोध कराता है। परन्तु शेष बची हुई (लक्षणा) वृति के द्वारा 'चाण्डाल रूप अप्रस्तुत वस्तु का बोध कराता हुआ रूपकालद्वार को शोभा के स्पर्श से 'गोवहीक' मे प्रयुक्त न्याय से सादज्य के कारण उपचार के सम्भव होने से प्रस्तुत (वारण रूप) वस्तु मे उस (चाण्डान्द रूप अप्रस्तुत दस्तु के ) भाव का आरोप करता हुआ 'पर्यायवक्रता' का पोषण करता है। क्योंकि इस प्रकार (सादशयमूला लक्षणा) के विषय में प्रस्तुत के अप्रस्तुत के साथ सम्बन्ध को कभी स्पकालद्वार के द्वारा अथवा कभी उपमालद्वार के द्वारा व्पक्त किया जाता है। जैसे (उममे (स) और इसमे (अथम्) सादृशय का बोध या तो) 'वह ही यह है' इस प्रकार {रूपक के द्वारा) अथवा 'यह उसके समान है' इस प्रकार (उपमा के द्वारा कराया जा सकता है।) टिप्पणी-इस स्थल की व्यास्या करते समय कवि ने कुछ ऐसे प्रयोग किए हैं जो अधिक व्यास्या की अपेक्षा रखते हैं। उनमे हम एक एक की व्याखरा प्रस्तुत करते हैं। १ 'मातड्ग' शब्द फेवल प्रस्तुत 'हाथी' अर्य का बोध कराता है। इसका तात्र्य यह है कि यद्यपि 'मातङ्ग' शब्द का अर्थ 'हायी' एवं 'चाण्डाल' दोनो है। दोनो ही सक्केतित अर्थ है। सङ्कृतित अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति अभिधा वृति बहलाती है। जैसा कि साहित्यदर्पणकार के शब्दो मे-'तन् सह्ूतितार्थस्य बोधनादग्रिमाभिधा' ॥ २४। यही सर्वप्रथम प्रवृत होती है। किन्तु जहां एक शब्द मे अनेक अर्थों का सकेत रहना है वहाँ किसी विशेष अर्थ का बोध कराने में अभिधा का निम्न हेतुओं से नियन्त्रण हो जाता है। वे हेतु है- "सपोगो विप्रनोगशच साहचयं बिरोधिता। अर्थ प्रकरण लिद्ध शब्दस्वान्यस्त्र सननिधि।। सामथ्यमोचिती देश वालो व्यक्ति स्वरादय। विशेपस्मृतिहेतव i" इति ॥ वहाँ हमे अभिधा का प्रकरण से किसी अर्थ में कैसे नियनण होता है इन पर विचार करना है। जैसे कोई भृत्य अपने स्वामी से कहता है कि "सवं जानानि देव।" महां प्रकरण मे कारण देव श्ब्द का 'आप' अर्थ मे नियनण हो जाता है। अर्थाद अमिधा केवल 'आप' अर्थ का ही बोध करा कर क्षीण हो जाती है। उसी प्रकार यहां प्रकरण प्रमर एव हाथी का ही प्रस्तुत है इमलिये अभिधा का मानङ्ग शब्द के द्वारा हायी अर्थ देने मे
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नियन्त्रण हो जाता है। वह दूमरा चाण्डाल रूप अर्थ नही दे सकती। इमी लिए कहा गया है कि 'मातङ्ग' शब्द यहां केवल् प्रस्तुत हाथी का ही रोध कराता है। २. शिष्ट वृत्ति के द्वारा चाण्डाल रूप अप्रस्तुत वस्तु की प्रतीति कराता हुआ। यहाँ आचार्य विश्वेशवर जी ने डॉ० डे के पाठ को अमुद्ध बताते हुए 'शिष्टया' मे स्थान पर 'श्लप्टया' पाठ को समीचीन बताया है। वस्तुत वह भ्राति है। बनोकि (१) 'दिन्स्टा' नाम की कोई वृति नही होनी। (२) 'मोर्वाटीर' मे रिप्दता का लेया भी नहीं है। क्योंकि गोर्वाहीक श्निष्टता का उदाहरण नही अपितु साहस्यमूला लक्षणा का उदाहरण है। यहां ब्रन्यवार ने जो 'गौर्वाहीक' न्याय को प्रस्तुत किया है उससे स्पष्ट है कि वह लक्षणा वति बो स्वीकार करते हैं। लक्षणा का क्षेन अभिधा के बाद जाता है। इस प्रकार उबत उदाहरण मे 'मातङ्ग' का 'हाषी' रूप अर्थ देकर अभिधा तो कृतारयं हो जाती है। वह दूमरा अर्थ दे नही सबती। अव रोष बचती है रक्पा वुति। इनी के लिये अ्मकार ने 'शिष्टशा वृत्त्ता' वहा है। रक्षणा या लक्षण"'राव्यप्रग' में दिया गया है-'मुख्याष- वाधे व्द्योमे ्टिलोज्य प्रयोजनात्। अन्योडयों रध्यत मत् ता न्क्षणारोपिता क्रिना ।।"२१॥ अर्थान् भुदयार्थं का बाध होने पर, उम (मुर्यायं). के साथ सम्बन्ध होने पर रुदि अथवा प्रयोजन वे वारण जितमे द्वारा अन्य अर्थ रुद्षित होना है वह आरोपित व्यापार लक्षणा बंहा जाता है।। वह रकया्थे वा अभिध्रेनार्य के साथ सम्बन्ध ४प्रवार का होन है जैगा वहा गया है- अभिधेयेन सामीप्यात साम्मात समवायत। वपरीत्यात् रियायोमालक्षणा पख्चघा मता ।। अन्धनार ने यहो गौर्वाहीन के न्याय को प्रस्तुत किया है। गोवाहीक का निद्धान्त मम्मट मे शब्दो मे इस प्रगर है- १ जन टि स्वार्थमह्चारिणो गुणा जाव्यमान्दादवो रुम्यमामा अवि गोशव्दत्य परार्थभिधाने प्रवुतिनिमित्तत्वमुपय निति इति वेचिद। २. न्वार्थमह्चारिगुणाभेदेन परार्थगता गुणा एव लक्ष्यन्त न परार्यीमि- घीपत इत्यन्ये। ३ साधार णगुणाधयत्जेन परार्थ एव एकयते इतपरे। तीमरा सिद्धान्त ही मम्मट वो मान्य है।
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एप एव च शब्दशबितमूलानुरणरूपव्यडगघस्य पदध्वनेविषय, बहुपु चंवंविधेषु सत्सु वाक्यध्बनेर्वा। यया- कुसुमसमययुगमुपसंह रक्षु फुल्ल मल्लिकाधवला टटहासो व्यजुम्भत ग्रीष्माभिधानो महाकालः ॥ ३६ ॥ यही (पर्यायवक्रता का तीसरा भेद व्वनिवादियों के अनुसार उक्त पदाहरण की भांति एक पर्याय पद के प्रयुक्त होने पर) शब्दशक्तिमूल अनुरणन रूप व्यग्य के पदछकनि का विषय होता है। अथवा इसी प्रकार के अनेक (पर्यायो) के (प्रयुक्त) होने पर वावयध्वननि का विषय होता है। जैसे (वाक्यस्वनि का उदाहरण)- वसन्त युग का दपसहार करते हुए खिली हुई वेला के उज्जवल अट्टहास वाला ग्रीष्म नामक दीर्घकाल आ गया। (व्यायार्थ-नुसुमसमय तुल्य युग को समास करना हुआ खिले हुए बेला के फूल की तरह सफेद अट्टहास वाले यमराज ने जमाई ली) ॥ ३६॥ यया- बूसेऽस्मिन् महाप्रलये धरणीधा रणायाघना तवं शेष इति॥ ३७ ॥ और जैसे (सिहनाद के वथनातुसार हूर्षचरित वे प्रक्रान्त पक्ष में) उत्मवो के इम मवत विनाश के सघटित हो जाने पर साम्राज्य के सम्हालने के दिए व तुम्ही अवशिष्ट हो। (व्यग्यार्थ पक्ष मे) इस महापम्य के हो जाने पर (अर्थात् दशे दिवपाली और दिग्गजो के समाप्त हो जाने पर) इम वसुन्धरा के धारण के लिए शेपनाग ही रह जाते है। (यह दूमरा अर्थ ध्वनिवार्दिमो वे अनुसार उदमाध्वनि को प्रस्तुत करता है।॥। ३७।। अ्रन्न युगादय, शब्दा प्रस्तुताभिधानपरत्वेन प्रयुश्यमाना- सन्तो- जप्य प्रस्तुतवस्तुप्रतोतिकारितया कामपि काव्यच्छायां समुन्मीलयन्तः प्रतीयमानालङ्वारव्यपदेशभाजनं भवन्ति॥ यहाँ पर युग आदि शब्द को प्रकाशित करने मे लगे होने के कारण प्रयोग में लाए जाते हुए भी आक्रान्त बरतु का बोध बराने गले वे रूप मे एक अनिवचनीय वाव्य शोभा को उन्मीलित करते हुए प्रतीयमान अलद्वार की सज्ञा के पात्र बनते है। विशेपणेन यथा- विदग्ध- मालोक्म यन्मपुरमद्य विलासदिग्धम्। २x ४ु० जी०
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भस्मीचकार मदनं नन् काष्ठमेव तम्नूनमोश इति वेति पुरन्धिरिलोकः।। ३८ ।। विशेषण के द्वारा जैसे- कामिनी समुदाय ने स्नेहमनी सुन्दर शेन और विसल आँखों वाले तथा सरम मदिरा के कारण उत्तन श्रृद्धार हावो से परिपूर्ग विदग् नायक को देखकर 'शिवजी ने निश्चित रून से मदन नामक काठ को ही जला दिया था' ऐसा निश्चन किया ॥ ३८ ॥ अ्न्न काण्ठमिि विशेषणपद वश्यमानपदायविक्षया मन्मयस्य नोरसता प्रतिपादयद् रम्यच्छायान्त रस्पशिशलेयच्छाया मनोज्ष विन्यास- परमस्मिन् वस्तुन्यप्रस्तुते मदनाभिधानपादपलक्षणे प्रतीतिमुत्यादयढ़ रूपकालङ्गारच्छायाससपर्शात् कारमप पर्यापवक्रतानुन्मोलयति। यहाँ पर 'काष्ठम्' यह विशेष पद वर्णन के विषयभूत पदार्थ के प्रति अपेक्षा होने के नाते मत्मय की नीरसता को प्रकाशित करते हुए और रमणीन दूमरी कान्ति का स्पर्श करने वाले स्ेप की शोभा के कारग सुन्दर विन्यास से उत्कर्ष को पाने बाग होकर इन अप्रस्तु मशन नानक वृक्ष रू्री वस्तु के वियन मे बोत को उत्न कराते हुए क नगमह जलजर की शोमा के सर्श के कारण ए अदभून पर्यावक्रता को प्रस्नुन करता है।
अपमपर: पर्यायप्रकार: पतपुर्वनवयलामाः कारणम-यः स्वच्छायोत्क्यपेशलः। स्वस्यात्मनरछाया कान्तिर्या सुकुमारता तब्ुत्कर्षॅम तदतिश्ञपेन यः पेशलो हृदमहारी। तदिदमत्र तात्पर्यम्- यद्यपि वस्तुन. प्रकारान्तरो ल्लासकवेन सहदरहदपसारितां प्रतिपद्यते। यया- (४) 'पदपूर्वाद्र्धवक्रता' का हेतु यह अन्य पर्याप का भेद है कि-जो अपनी कान्ति के उत्कर्य से मनोइर होना है। स्वच्छावा अर्यान् जानी जो कात्ति अयवा सुकुनारवा है उसके उत्कर्ष अर्थान् आधिकक से पेरल अर्थान् मनोरम (पर्यान)। तो इसका भाव यह है कि-नद्नि वर्णन की जानी हुई वस्तु की स्यिति दूसरे प्रकार को उत्सादित करने वाली के रू में होते है फिर भी उसकी स्वामाबिक सौन्दर्य-नम्पति ही सहूदपो के हुदप को आकृष्ट कर लेने वाली हो उठनी है। जैसे-
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इत्थमुत्कयति ताण्डवलीलापण्डिता ब्धिलहरीगुरुपादैः । उस्थितं विषमकाण्डकुटुम्बस्यांशुभि- रमरवतीविरही माम् ॥३६॥ स्मरवती (प्रियतमा) का विरह नून्पणीना निपुला सागर की लहरियों की प्रशस्त आचार्य पनदाण के मित्र चन्द्र की किरणों के कारण इस तपह उठ पडे हुए मुझको गाकुल किए दे रहा है।। ३९ ।। अत्रेन्दुपर्यायो 'विषमकाण्डकुदुम्ब'-शब्दः कविनोपर्निवद:। यस्मान्मृगाड्गोदयद्वेषिणा विरहविधुरहृदयेन् केनचिदेतदुच्यते। प्रसिद्धतमतामुपनीतस्तेन अरथमतरोल्लिखिनत्वेन व चेतनचमतकारितामन्रमाहते। एव च स्वच्छायोतकर्षपेश्लः सहजसौकुमार्यंसुभगत्वेन नूतनोल्लेखरिलक्षगत्वेन च कविभि: पर्यायान्तरपरिहारपूर्वकमृपवण्यते। यया- यहाँ कवि ने चन्द्रमा के (बाबर) पर्यात् के रून में 'विपम साण्डकुदुमत'- शब्द को उपनिवद्ध किया है। (तालर्य यह कि 'विषमरण्डकुटम्ब' शब्द चन्द्रमा का पर्यापवाची नही है किन्तु जिम प्रकार से विषम वहण्डी अर्थात 4 वालो वाला कामदेव तिरहितों को कष्ट पहुँचाता है उसी प्रकार चन्द्रमा भी उनके गिए कप्टवायक होना है इमी किए चन्द्रमा को कामदेव का कुटुम्बी, उसका स्वजन रया गवा है) क्जोकि (रियतमा के) विरह से विरुल हकर चन्द्रोइर से ैर रखने दाखा कोई (बिरसी) कह रहा है। बनोकि यह (गन्द चन्त्रमा के पर्शान रूप में) अस्मा न होते हुए भी अछने सम्जन्ध के रारण अत्यन्न साति का प्राप्त कराना गया है जत मर्बन्थम (चन्द्र के पर्मार रूप मे) अत्विदित अथवा प्रयुक्त होने के कारण प्ाणिरों को अनम्विन करता है। तथा जपनी ही गोना के आविवन मे मनोहर इस (पर्यान) का जपनी स्वाभाविक मुकु्मारता से रमणीव होने के वारण एव अभिनव उल्लेख में विरुक्षण होने के करण व विजन दूसरे परानो का पक्तिवाम वर प्रयोग करते है। जैसे- कृष्मकुटिलकेशीति वर्तव्ये यमुनाकतलोल वक्राल केति। यया वा गौराडमोवइनापमापरिचित इत्यत्र वनितादिवाचकसहस्रसद्भावैजनि
'काले एव टेढे वालो वाकी' कहने के लिए 'कालिन्दी कल्लोल ममुना की तरङ्ों के समान कुश्वित चूर्णकुन्तलो वाली कहा जाय। अथवा जमें- (पहले उदाहरण सख्या २१३४ पर उद्दइन 'सम्बन्धी रघुमूमुजा' -इत्यादि 'पद के द्वितीय चरण) गगोराङ्गीवदनोपमापरिचित' में (स्री के वाचर)
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बनिता आदि हजारो पर्यायो के होने पर भी (ववि द्वारा प्रयुक्त) गौराङ्गी' यह कधन याम्य न होने के कारण अत्यन्त ही मनोहर है। अयमपरः पर्यायप्रकार: पदपूर्वार्धवकताभिधायी -- प्रसंभारयार्थ- पात्त्यगभ यञ्याभिधीयते। वर्ष्यमानस्यासंभाव्य: संभावयितुमशयो गोपर्थ: कश्तितपरिस्पनदस्तत्र पात्रवं भाजनावं गर्भोऽभिभ्नायो यत्ाभि- पाने तत्तथाविषं कृत्वा पश्चाभिधीयते भण्यते। यथा- (५) 'पदपूर्वाद्धवक्रता' का प्रतिपादक यह अन्य (पाचवा) पर्याय का भेद है वि -- जो (पर्याम) असम्भाव्य अर्थ के पात्र होने के अभिभराय वाला वहा जाता है। वर्णित की जाने वाली वस्तु का असम्भाव्यमान अर्थाव जिसकी सम्भावना नहीं की जा सबती है ऐसा जो अर्थ अर्थात् कोई विशेष धर्म होता है उसका पात् अर्थात् भाजन होने का गर्भ अर्थात् अभिप्राय जिस कयन मे निहित होता है वह उस प्रवार का जो पर्याय वहा जाता है। जैसे-
अलं महीपाल तव श्मेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात्। न पादपोन्मूलनशञवित रंहुः शिलोच्चये मूच्छीति मारतस्य ॥४0॥ (रघुवश महाकाव्य मे राजा दिलीप का गुरु की गाय के रक्षार्थ तश्वश से बाण निकाएते समय उसी में हाथ फँसा जाने पर सिंह राभा से व हता है वि) हे पृथ्वीप्ते । जब (इस गाय को मेरे चड्गुल से बचाने के लिए) आपवा (दुझ पर बाण चलने का) प्रयास व्यर्थ है, (क्योकि) इधर (मेरे ऊपर) फेवा गया (आप का) शुख निप्पल हो जायगा। जैसे (विशाल) वृक्षो को उखाड पेवने मे समर्थ भी दवा वा वेय पहाड पर मृचिछिव सो जाता है (पहाड़ वो नहीं उयाड़ पाता)॥ ४०॥ मत्र महीपालेति रातः सफलपृथ्वीपरिरक्षणमपोरुपस्यापि तथा- विधप्रयत्न परिपालनीयगुर गोरुपजवमा परित्राणासामर्थ्यं स्वप्ने-
यहाँ पर 'महीपाल' ऐसा सम्बोधन पद समस्त वसुन्धरा की भलीर्भाति रक्षा करने मे समर्थ पराक्रम वाले राजा की जो स्वप्न में भी सम्भावित न किए जा सवनेवाली उस प्रकार के प्रयत्नों से सम्बक पालन किये जाने योग्य गुर की माय रूप वेवल एक ही प्राणी की भी रका करने मे असमर्थता है, उसकी पात्ता के अभिप्नाय से युक्त रूप मे प्रयुक्त हुआ है। (अर्थात् राजा को सम्पूर्ण पृथ्वी का रक्षक बता कर उनका उपहास किया
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जा रहा है कि आप हैं तो महीराल लेकिन एक गाय की भी रक्षा नही कर सकते। दनी राजा के अतानर्ष्य को ही सूचित करने के लिए इम पर को प्रयुक किया गया है।) यया वा- भूनानुकुप्पा तत्र चेदियं गोरेका भवेन स्वस्तिमतो तवदन्ते। जीवन पुनः शश्व पुपप्तवेम्यः प्रजा प्रजानाय पितेव पासि। ४१॥ अयवा जैसे (इमरा दूमरा उदाहरण )-
(उमी दिवीर एवं मिह् संवाद मे से यह पद भी उद्यन है। जब राजा अनने प्राणों का उत्पर्म कर उन गात की रक्षा करने को तैगर हो जाते हैं तो सिंह् राजा से कहता है कि-) यह इस गाय की रक्षा के हेतु तुम्दारा अनने प्राणों का उत्सर्ग कर देना) यदि तुन्हारी जीवों पर कृता है, (तो भी तुम्हारे प्रागो का उत्सर्ष ठीकुनहीं वशोकि) तुन्हारा विनास हो जाने पर, यह अफेरी ही गाप कल्यागमती हो मफेगी। जब कि हे प्रजापति। आप जीविर रहते हुए हमेगा पिता के समान (तमाम) प्रजाओ को उपद्रवो (अयवा विरत्तिरों) से बचाओगे। (अत केवऊ एक ही गाय के लिए तुम्हारा प्राणनरित्याग ठीक नही) ॥ ४१ ॥
प्रत्न यदि प्राणिकरुणाकारणं निजप्राणपरित्यागमाचरसि पदप्य- युक्तम्। यस्मात्वदन्ते स्व्रस्तिमती भवेदियमेकैत गौरिति त्रितयमम्य- नादरास्पदम्। जीवन् पुनः शश्त्सदँवोपप्लवेभ्योऽनर्थॅम्य: पजाः सकलभुतघात्रोवलयर्वातनीः प्रजानाथ पासि रक्षसि। वितेवेत्यनाद- रातिवायः प्रथते।
यहाँ नवि तुम जीतो पर अनुरम्त होने के कारण अपने प्राणो का विनर्जन कर रहे हो तो वह भी ठीर नहीं। वरोि १-उुम्हारा विराश हो जाने पर, र-दह अरेली ही, ३-(वह भी) गाय कल्याणमती होगी। इस प्रकार ये तीरो ही वाते निरस्तारयोग्य हैं जर्व आप १-जीविन रहने हुए, २-मस्न भूमण्डल पर निवाम करनेवालो (समाम) प्रजाओ की हे प्रजा- नाय ! पिना के समान हनेगा अनेकु उपद्बो अथवा अनयों से, ३-रकषा कर सकोगे। इसके द्वारा कर कटे गए निरसार का और भी अनिरेक प्रति- पादित करता है।
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तदेवं यद्यपि सुस्पष्टसमन्वयोऽहं वाक्यार्थस्तयापि तात्पर्यान्तरमत्र प्रतोयते। वस्मात् सर्वस्य कस्यचित्प्रजानाथत्वे सति सदैव तत्परि रक्षणस्याकरणस्याकर णमसभाव्यन्। तत्पात्रत्वगर्भमेव तदभिहि्तम्।
पेक्षस्य सलो जीवतस्तवानेन न्यायेन कदाचिदपि प्रजापरिरक्षणं मनागपि न संभाव्यत इति प्रमाणोपपत्रम्। तदिदमुवतम्- प्रमाणवत्वादायातः प्रवाहः फेन वायते ॥ ४२ ॥ इति। तो इस प्रकार वद्यपि इस वावय (शलोक) का अर्थ भली-भांति समन्कित हो जाता है फिर भी यहाँ दूमरे अभिप्राय की प्रतीति होती है। कयोकि सभी किसी के प्रजापति होने पर हमेशा ही उस प्रजा के परित्ाण के म करने की सम्भावना नही की जा सकती (अर्थात् कोई भी राजा अपनी प्रजा का परिवाण तो करेगा ही क्योंकि प्रजापालन ही तो इसका धर्म है। इस प्रकार गाय की रक्षा करना राजा दिलीप का धर्म है। उसकी रक्षा उन्हे अवश्य करनी चाहिए। यही 'प्रजाताय' पद के द्वारा राजा का उपहाय किया जा रहा है कि वनते प्रजानाय हो पर एक गाय को रक्षा नही कर सकते) इसी की पातता के अभिप्रय से मुक्त रूप मे उन्हे प्रजानाथ यहा गया है। वनोंकि प्रत्यक्ष ही केवल एक जीव (सिंह) के द्वारा (जिसके पास कोई अस्त्र अथवा सेता नही है इसके द्वारा) भक्षण की जानेवाली गुरु की यज्ञ की गान के प्राणों का परिषाण करने से बिमुख तुम्हारे जीवित रहने पर भी इी प्रकार कभी प्रजा की थोड़ी भी रक्षा असम्भव है यह वान स्वय (अर्थापाण) प्रमाण से सिद्ध हो जा है। जैमा कहा भी गया है कि-प्रमाणों से युक्त होने के वारण उपस्थित प्रवृत्ति को नीन रोक सकता है॥ ४२॥ मत्राभिमानप्रतीतिगोचरीकृताना मदार्थाना परस्परप्तियोगित्व- मुदाहरण प्रत्युदाहर न्यायेनानुसंघेयम्। • इस विषन में उविनवोघ मे दृष्टिगत होते वाले पदार्थों की एक दूसरे के साथ प्रतियोगिता उदाहरणो और प्रत्युदाहरणों के द्वारा (अन्वय व्यतिरेक से) जान लेनी चाहिए। प्रयमपरः पर्यापप्रफार: पदपूर्वाधवक्रतां विदधाति-भलं- का रोपसंस्कारमनोहारिनिबन्धनः । अत्र 'भलंकारोपसंस्कार' - शब्दे तृतोपासमास: पष्ठोसमासश् करणीय। तेनायंद्रयमभिहितं भवति।
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द्वितीयोन्मेप: २१५
प्रलंकारेण रूपकादिनोपसंस्कारः शोभान्तराधानं यतेन मनोहारि हृदयरञ्जकं निबन्धनमुपनिबन्धी यस्य स तथोवतः। अलंकार- स्योत्प्रेक्षादेरपसंस्कारः शोभान्तराधानं चेति विगृहय। तत्र तृतीया- समास पक्षोदाहरणं यथा- (६ ) यह अन्य (छडवां) पर्याय का भेद 'पदपूर्वाद्धवक्रता' को प्रस्तुन करता है-(जो) अलद्वारोपसस्कार से रमणीय रचना वाला होता है। यहाँ 'अलद्वारोपसस्कार' शब्द मे तृतीमासमास तथा षष्ठीसमाम (रूप तत्पुरुष) करना चाहिए। इसलिये इस शब्द से दो अर्थ प्रतिपादित होते हैं ( तृतीया समास करने पर) अलक्वार अर्थात् रपकादि के कारण जो उपसस्कार अर्थात दूसरी शोभा को सृष्टि उसके द्वारा मनोहर हृदय को आनन्दित करने वाले निबन्धन अर्थात रचना वाला (यह अर्थ होगा। तथा पप्ठी समाम करने पर) उप्रेक्षा आदि अलद्वारो का जो उपसस्कार अर्थात् दूसरी शोभा की उत्पत्ति उससे (रमणीय रचना याला पर्याय-यह अर्थ होगा)। उनमे तृतीया समास वाले पक्ष का उदाहरण जेसे -- यो लौलातालवृन्ती रहसि निरुपधियंशच केलीप्रदीप: कोपकोडासु योइस्न्र दशनकृतरुजा योऽघरस्यकसेक:। आ्कत्पे दर्पणं यः श्रमशयनविघौ यइच गग्डोपघानं देव्या: त व्यापर्द वो हरतु हरजटाकन्दलीपुष्पमिन्दुः॥४३॥
जी देवी पार्वती का विलासव्यजन है, एकान्न का निष्डपट मेलि दीप है, प्रणयदोप के लिए जो अम्बरप है, जो दाँतों के द्वारा उत्पन्न कर दी गई हुई पीडा वाले अधर के लिए एकमात्र सेक का काम देता है, पत्ररचन, वे समय जो दर्पण का काम देना है और यक कर मोने के विषय मे जो कयोरो वे नीच वा तकिया है वह भगवात् शिव को जटारूपी वन्दली से निदला हुआ फूल चन्रमा तुम लोगो के विपसि को दूर कह॥ ४३॥
अत्न तालवुन्ता दिकार्यसामान्यादभेदोपचारनिबन्धनो रुपका- तंकारविन्यास: सर्वेपामेव पर्यायाणां शोभातिशयकारित वेनोपनिवद्ध:।
यहाँ पर ताळवन्त आदि वार्मों मे समान रूप से पाये जाने वाले एकाधित रण्य के वारण तादतम्यमूलक लक्षणा पर आधारित रूपक अलद्दार ना विन्यास सभी पर्याो की मोभा को सर्वातिशावी रूप से प्रस्तुव करनेवाले वे रूप मे किया गया है।
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२१६ वकरोक्तिजीवितम्
देवि त्वत्मुखप्ड्कजेन शशिनः शोभातिरस्कारिणा वश्याब्जानि विनिजितानि सहसा गच्छन्ति विच्छायताम्॥४४॥ षच्ठी-पमास वाले पक्ष का उदाहरण जैसे-(रत्नावली नाटिका मे नायक वत्सराज उदयन देवी वासवदत्ता की चाटुरारिता मे लगा हुआ कहता है कि)-हे देवि । देखो, शरघर की सुग्मा की अवहेनता करने वाले तुम्हारे वदनारदिन्द से पराजित अथवा तिरस्कर ये कमल अरस्माव शोमाहीन होते जा रहे है।। ४४ ॥ अन्न स्वरससंप्रवृत्तसायंसमयसमुचिता सरोर्हाणां विच्छायता- प्रतिपत्िर नावकेन नाग रकतया वल्लभोपलालनाप्रवतेन तन्निदर्शनापक्रम रमणीयत्वमुखेन निजितानीवेति प्रतीयमानो:्पेस्षालंकारकारित्वेन प्रतिपाद्यते। एतदेव च युव्तियुवतम्। यस्मात्सवंस्य कस्यचि्ङ्जस्म शशाङ्गश्ञोभातिरस्कारितां प्रतिपद्यते। त्वन्मुखनङ्धजेन पुन. शशिनः शोभातिरस्कारिणा न्यायतो निर्जितानि सन्ति विच्छायतां गच्छन्ती- वेति प्रतीयमानस्योत्प्रेक्षालक्षगस्यालंकारस्य शोभातिशयः समु- ल्लास्यते। यहां अपनी सन्ध्यावेला के अनुरूप स्वाभाविरु ढद्ग मे मम्पन्न होने वाली कमलो की शोमाहीतता को सवित्ति को, त्रियतमा की चाटुकारिता में प्रवृत्त नायक ने बडे ही चातुयंपूर्ण ढद् से उन कमलो के साथ सादृण्य बताने के उपकम मे रमणीपता के पतिवादन द्वारा 'मानो पराजिन से हो गय है' इम प्रकर से गम्य उत्प्रेक्षा अलद्वार के विधायक रून मे प्रतिपादित किया है। तथा यही समीचीन भी है। क्योकि सभी किसी कमल की कान्ति चन्द्रमा की वान्ति से अनाहत हो जाती है फिर नला चन्द्रमा की (भी) काम्ति की अवहेलना करने वाले लुम्हारे मुखारविन्द से पराजित होकर जो शोभाहीन से होते जा रहे हैं यह तो न्यायानुकूल ही है। इस प्रकार गम्य उत्प्ेक्षारूप अलद्वार का सोन्दर्यातिशय व्यक्त किया जा रहा है। एवं पर्यायवकतां विचार्य कमसमुचितावसरामुपचारवकर्ता विचारयति-
लेशे नापि नवत् कांचिद्वक्तुमु द्रिक्त चिताम् ॥। १२ ।। इम पकार पर्यापवक्रता का विवेचन कर क्रमानुनार अवमरप्राप्त जाया वक्रता का विवेचन प्रस्तुत करते हैं-
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द्वितीयोन्मेप. २१७
जहाँ किसी अतिशयपूर्ण व्यापार (धर्म) के भाव को प्रतिपादित करने के लिए अत्मधिक व्यवधानवाली वर्ण्यमान वस्तु मे दूसरे पदार्थ से किच्धि- नमाव रूप मे भी विद्यमान साधारण धर्म का आरोप किया जाता है वहाँ उपचारवक्रता होती है॥ १३॥
यन्मूला सरसोल्लेखा रूपकादिरलंकृति:। उपचारप्रधानासौ वक्रता काचिदुच्यते॥। १४ ॥ (एव) जिसके मूल मे होने के कारण रपकादि अलद्धार चमतकारयुक्त हो जाते है यह उपचार की प्रधानतावाली कोई अपूर्व ( उपचार) वक्रता कही जाती है।। १४ ॥ अ्रसौ काचिदपूर्वा वक्रतोच्यते वकभावोऽभिवोयते। कोदृशी- उपचारप्रधाना। उनचरणमुपचारः स एव प्रयानं यस्या: सा तयोकता। किस्वरूपा च-यत्र यस्यामन्यस्मात्पदार्थान्तरात् प्रस्तुतत्वाद्वण्यंमाने वस्तुनि सामान्यमुपचर्यते साधारणो धर्मः कश्िद्वव्तुमभिप्रेतः समारोप्यते। कसिमन् वर्ण्यमाने वस्तुनि-दवरान्तरे। दूरमनल्पमन्तरं व्यवधानं मश्य तत्तयोकतं तस्मिन्। यह कोई अपूर्व वक्रता लर्थात् वांकपन कहा जाता है। कैसी ( वक्रता) उपवार के प्रधान्न वाली। उपचरण को उपचार कहते हैं (उपचरण से तात्पर्य है साय-साथ गमन अर्यात गोण रूप होना-क्योकि जिसके साथ गमन किया जाता है वह तो हुआ प्रधान एव उसके साथ- साथ चलने वाला हुआ गोण। उमी प्कार शब्द का मकेतित अर्थ तो हुआ मुख्य अर्थ पर उसके साथ-माथ सनीत होने वाला अर्थ हुआ गौण। इसी गोणता को अथवा अमुस्यत्षा को उपचार कहते हैं) वही रहता हे भ्रधान रप से जिसमे उसे उपचारवक्रता कहते हैं। और कया स्वरप है (इस उरचारवक्रता का) १- जहां अर्थात जिस वक्रता मे (वर्म्पमान से भिन्न) दूसरे पदार्थ से, प्रस्तुत होने के कारण वर्ण्यमान वस्तु मे सामान्य उपचरित होता है अर्थाव उस वस्तु मे विवक्षित (दूसरे पदार्थ के) किमी साधारण धर्म का सम्यक आरोप किया जाता है (उसे उपचारवक्रतषा कहने हैं)। किस वर्ण्यमान वस्तु मे (आरोप किसा जाता है) दूरान्तरवाली (वस्तु मे) दूर माने अत्यधिक अन्तर अर्थाव व्यवधान होता है जिसमे (उम वण्यमान वस्तु मे आरोप किया जाता है)।
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२१८ वक्रोक्िजीचितम् नन च व्यवधानममूर्त्तत्वाद्व्ण्यमानस्य वस्तुनो देशविहितं तावन्न संभवति। काल बिहि्तममि नास्येव, तस्य कियाविषयत्वात्। क्रिया- स्वसपं कारकस्वरूप चेत्युभयात्मकं यद्यपि वर्ण्यमानं वस्तु, तथापि देशकालव्यवदानेनान् न भवितव्यम्।। यस्मात्पदार्थानाभनुमानवत् सामान्यमान्रमेव शब्दैविषयी कर्तु पार्यते, न विशेषः। तत्कर्थ दूरान्तर- त्वमुपपद्यते? (इस पर पूर्वपक्षी प्रश्न करता है कि आपने जो वर्ण्यमान वस्तु मे अनक्प व्यवधान बताया है, वह) व्यवधान वर्ण्मान वस्तु के अमूर्त होने के कारण देशविहित तो सम्भव ही नही हो सकता (वयोकि देशविहित व्यवधान केवल मूर्त पदार्थों में ही सम्भव होता है।) तथा (उस वस्तु में) कानवृत (व्यवधान) भी सम्भव नहीं पयोकि यह क्रियाविषयक होता है (वर्ण्येमान वस्तु मे वोई क्रिया होती ही नही। इस प्रकार यह कथन कि वस्तु मे व्यवधान होता है ठीक नहीं। इसी प्रश्न को और भी हढ करने के लिए पूर्वपक्षी और भी कहता है कि यदि आप यह बहे कि कपिवल्पना के समय उसके मस्तिष्क मे वण्यमान वस्तु क्रिया एव कारक दोनो से युक्त स्वरूप उपस्थित रहता है। अत वाल्वृत एवं देशकृत दोनो व्यवधान सम्भव है तो ठीक नही। (ययोकि) यद्यमि वर्ण्यमान वस्तु (कविकल्पना मे) कारवस्वरूम एव क्रियास्वरप दोनो प्रवार की होती है फिर भी यहाँ देशविहित अथवा कार विहित (व्यवधान) सम्भवन ही हो सकते,यो कि (अवधान तो विशेष मे होता है, सामान्य मे नहीं और कविक््पना में) पवार्यों का अनुमान की भाति वेवस सामान्य ही शब्दो का विषय वनता है, न कि विशेष, अत (वस्तु मे) अत्यधिक व्यवधान का होना फँसे सम्भव हो सकता है? सत्यमेतत्, फिन्तु 'दूरान्तर' -शब्दो मुखतया देशकालविषये विप्रकये प्रत्यासतिदिरहे वर्तमानोऽप्युपचारात् स्वभाववित्रकर्षे वतते। सोडयं स्वभाववित्रकर्षो विरुद्धुधर्माध्यासलक्षणः पदार्यानाम्। मया मुतिमत्वममर्तत्वापेक्षजा, द्रवत्वं व घनत्वापेक्षया, चेतनत्वम- घेतनत्वापेक्षयेति। (इस पूर्वपक्ष का मिद्धान्त पक्ष उत्तर देता है कि) ठीक है (आपवी) यह बात (कि चस्तु मे व्यवधान सम्भव नही) फिर भी 'दूरान्तर' शब्द मुख्य रूप से देश-वालविपयक विप्रनर्ष अथात् दूरी अर्थ का प्रतिपादय होंने पर भी उपचार अर्थात् (गोण रूप) से स्वभाव के वित्रकर्ष का भी प्रतिपादक होता है। तथा वही यह पदार्थों के स्वभाव का अग्रकुर्ष विपरीत धर्मों का
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-द्रितीयोन्मेप:
आरोपस्वरूप होता है। जैसे-मुर्तिमत्ता अमूर्तता की अपेक्षा, द्रबस्पता घनत्व की अपेक्षा, चेतनता अचेतनता की अपेक्षा (बिरुद्ध धर्मो का होने के कारण दूरव्यवधान वाली होती है)। कोदृक तत्सामान्यम्-लेशेनापि भवत्। मनाइ्मात्रेणापि सत्।
भिधातुम्। यथा-
(इस प्रवार 'दूरान्तर' पद की सम्पक् उपपति का विचेचन कर अब पुन वारिका की व्याख्या प्रस्तुत करते है कि जो सामान्य उपचरित होता है) वह सामान्य कसा होता है-सेश से भी विद्यमान अर्थात् थोडा-सा भी विद्यमान (सामान्य उपचरित होता है)। किस लिये (यह सामान्य उपचरित किसा जाता है)-किसी अपूर्व उद्रिक्तवृत्तिता अर्थान् अतिशय पूर्ण व्यापार अथवा धर्म के भाव का प्रतिपादन करने के लिए। जैसे- (उदाहरण सडस्या २ा२७ पर पूर्वोदाहृत पद्य का निम्न अश कि) (अपनी) स्निग्ध॥४५। अ्न्न यथा बुद्धिपूर्वकारिणः केचिच्चेतनवर्णच्छायातिशयोत्पाद- नेच्छया केन चिद्विय्यमानलेपनशक्तिना मूर्तेन नीलादिना रञ्जनद्रव्य- विशेषण किचिदेव लेपनीयं मूतिमद्वस्तु वस्त्रप्रायं लिम्पन्ति, तद्वदेव तत्कारित्वसामान्यं मनाड्मात्रेगापि विद्यमानं कामप्युद्रिक्तवृत्तिताम- भिधातुमुदचारात् हिनध्धशयामलया कान्तया लिप्तं वियद् दयौरित्यु- निबद्धम्। 'स्निग्घ'-शब्दौडप्युपचारबक्र एव। यथा मूर्तं बस्तु दर्शन- स्पशनसवेद्यस्नेह नगुणयोगात् स्निग्धमित्युच्यते, तथव कान्तिरमूर्ता- प्युपचारात् स्निग्धत्युवता। यथा वा- यहाँ पर जिस तरह बुद्धिपूर्वक कार्य करने पाले कुछ लोग वर्णों की चेतन वान्ति के अतिशम को उत्पन्न करने की इच्छा से हिसी लेपन शक्ति से युक्न नील आदि वास्तबिक रगने के माव्यम स्वस्य वस्तु विशेष के द्वारा किसी रगने के योग्न सूर्तिमत्री या ठोस वस्तु जैसे कि बख को रेगते हैं उसी तरह उसे कर सबने का साधर्न्या केवल थोडा-मा भी स्यित रह कर किसी अति- शारी व्यापार के भाव को लक्षणा के द्वारा प्रस्तुन करने के लिए 'चिरनी सविले वान्ति से रेगा हुआ आकाश अर्थात् स्वर्ग इस दव से प्रस्तुत रिया गया है। 'स्निब्ध' शब्द भी लक्षणा की वकता से ही सवलिन है। जैसे कि ठोस
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२२० वक्रोक्िजी वितम्
चोज देखने-छने और अनुभव करने योग सनिग्धत्व के गुण के समावेश के कारण चिकनी कही जाती है उसी सरह अमूर्त कान्ति को भी उपचार के बल पर चिकनी कहा गया है। अथवा जैसे- गच्छन्तोनां रमणवसत योषितां तन्न नवतं रुद्वालोके नरपतिपथे सचिभधयस्तमोभि:। सोदा मिन्या कनकनिकषस्तिग्घया दर्शयोवों तोयोत्सर्गस्त नितमुखरो मास्म भूविकलवास्ताः ॥ ४६॥
(मेबदूत मे विरही यक्ष अपनी प्रियतमा के पास सन्देश ले जाने वाले मेघ से मार्ग निर्देश करता हुआ उज्जयिनी के विषय मे कह्ता है कि हे मेघ ' तुम) वहां (उज्जमिनी मे) रानि मे घोर (सूचिभेच) अन्धकार के द्वारा सडको पर प्रकाश के रुद् हो जाने पर (अपने) प्रियतम के निवाम स्थान को जाती हुई अबलाओ को स्वर्ग-कसौटी के समान सनग्य (चमकीन्ी) बिजली के द्वारा भूमि दिखनाना (अर्थाव् मार्ग प्रदशन करना) बोकिन जलवृष्टि एवं गर्जन के द्वारा दुर्मुख मत हो जाना (अन्यथा वे) विह्हल हो जायेगी ॥ ४६।। अन्रामूर्तानामपि तमसामतिबाहुत्याद् घनत्वान्मूर्तसनुचित सूचिभंद्यत्वमुपचरितम्। यथा वा- गग्नणं च मतनेहं धारालुलिय्रज्जुगाइ म बगाइ। णिरहंकारमिअनंका हरंति गीलाओ कि भिसाओो॥ ४ ॥ (गगन च मतमेव घारालुलितार्जुनानि च यनानि। निरह्द्तारमृगाङ्का हुर्रान्त नीला अधि निशा. ॥।)
यहाँ पर अमूर्त भी अन्घकारो की बहुलता से उनके घने होने के कारण मूतं के लिए उचित सूचिभेद उपचरित हुआ है। अर्थान् सूई के द्वारा भेदन किसी मूर्त पदार्थ का ही सम्भत है। शिन्तु जैसे कि सूरत पदार्य घना होगा है उसी प्रकार अन्धकार के बाहुल्य के कारण अन्धकार भी घना प्रतीत होने लगता है। इमीलिए केवल इमी सघनता मान के साम्प के कारण यहाँ सूची- भेघय शब्द का प्रयोग उपचार से किया गया है। इसलिए यहां उनचार- वक्रता होगी। अथवा जैसे इमी का अन्य उदाहरण)- अहकाररूपी चन्द्रमा से शून्य काली राते भी मतवाले मेवो वाले आफान को और (वर्षा की) धाराओ से कुब्ध अजुनो वाले बनो को हटा देती है।।४७।
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द्वितीयोन्मेप. २२१
अत्र मंत्तत्वं निरहंकारत्वं व चेतनघमंसामान्यमुपचरितम्। सोडयमुपचारवकताप्रकार: सत्कविप्रवाहे सहलरः संभवतीति सहुदये: स्वयमेवोतप्रेक्षणीयः । अत एव च प्रत्यासन्नान्तरेऽ्मिन्रुपचारे न वक ताव्यवहार:, यथा गौर्वाहीक इति।
यहाँ प्राणियों का समन्यि धर्मभूत मतवालापन एव अहङ्भारहीनता उपचरित हुई है। अर्थात अहकार से रहित होना, एव मदमत्त होना तो चेतन प्राणियो का ही धर्म है वह अचेतन मे तो सम्भ नही हो सकता किन्तु यहाँ मत्तत एच निरहङ्डारता का प्रयोग क्रमश बादली एव चन्द्रमा के लिए हुआ है जो कि उनमे सम्भव नही है। लेकिन जिस प्रकार से मतवाला मनुष्य इधर वधर भटका करता है उसी प्रकार आकाश भी इघर उघर आकाश मे भ्रमण करते हैं इसीलिए केवल इधर उधर भ्रमण करने के ही साम्य को लेकर बादलो के लिए मत्त शब्द का अमुख्य रूप से उपचारन प्रयोग हुआ है, उसी प्रकार जैसे चेतन प्राणी का रूप अथवा सम्पत्ति आदि से हीन हो जाने प अहकार समाक्ष हो जाता है और वह निरहकार हो जाता हे उमी प्रकार चन्द्रमा भी बादलो के छाये रहने के कारण अपने प्रकाश अथवा अपनी चन्द्रिका से रहित रहता अत इमी रूपराहित्य के साम्य के कारण ही चन्द्रमा के लिए निरहकार शब्द का प्रयोग औज रूप से उपचारत उनकी प्रकाश हीनता को दोतिन करने के लिए किया गया है। अत यहाँ उपवार- वक्रता हुई।
इमी उदाहरण को आनन्दवर्दनाचार्य ने 'अत्यन्त तिरस्कृत वाक्य ध्वनि' के वाक्यगत उदाहरण रूप में उद्धत निया है। उसकी अरभिनवगुप्त- पादाचार्य ने इस प्रकार किया है-
इम प्रकार यह उपचार-वकरता का भेद श्रेष्ठकवियो की प्रवुत्ति के अन्तर्गत (अर्थात् उनके काव्यों मे) हजारो तरह का सम्भव हो सकता हे अत सहृदयो को स्वय ही उसका विचार कर लेना चाहिए। ( क्मोकि उसे चार छ उदाहरणों द्वारा नही वताया जा सकता)। इदम परमुपचारवयताया स्वरूपम्-यन्मूला सरसोल्लेखा रप- कादिर लंकृतिः। या मूलं यस्याः सा तयोषता। रूपकमादिर्यस्याः सा तथोवता। का सा-वतंकृतिर लंकरणं रपकप्नभुतिरलंकारविक्छिति- रित्यय: कीद्शी-सरसोल्लेखा। सरसः सास्वादः सचमत्कृति- रुलेखः समृ.मेपो वस्या सा तथोषता। समानाधिकरणयोरत्र हेतु- हेतुमन्द्ाव, यया-
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वक्रोक्तिजीवितम्
उपचार-वक्रता का यह दूसरा स्वरूप है-जिसके मूल में होने के कारण रूपकादि अलद्वार सरम उल्लेख वाले हो जाते हैं। जो जिसवा मूच होता है उसे यन्मूलक कहते हैं। रूपक जिसके आदि मे होना है उसे रूपकादि कहने हैं। वह (रूपकादि) वया है-अनद्कृति अर्थात् आभूषण। तात्पर्य यह है कि जिसके मूल में होने के कारण रूपक आदि अलद्वारो की शोमा। कसी (हो जाती है) सरम उत्लेख से युक्त। मरन का अर्थ है आम्वादपूर्ण नर्थात् चमत्कारमम्पन्न होना है उल्नेख अर्थाव भक्ती भाँति प्रकान जिमका उसे सरम उल्लेख मे युक्त कहा जाता है। ममान अधिकरण वाले अलड्दृदवि और 'सरमोग्लेखा' मे हेतुहेतुमद्दाब सम्बन्ध है, जैसे- प्रतिगुरवो राजभाषा न भक्ष्या इति ॥४८ ॥ यन्मूला सती रूपकादिरलंकति: सरसोल्लेखा 1 तेन रूपकादेर- लंकरणकलापस्य सकलस्यंवोपचारवक्र्ता जोवितमित्यर्थः। बहुत बदे-बडे वाले उददद के दाने नहीं खाना चाहिए। ४८॥ जिसके भूत मे रहने के कारण ही रूपकादि अलद्कार चमलार पूर्ण वर्गन मे युक्त हो जाते हैं ( उसे भी उपचारवक्रना कहते हैं)। इसलिए उमका आशय यह निकता कि उतचागविक्रता रूपकादि समस्न अरकार- समुदाय का जीदिनभून है। ननु च पूर्वस्मादुपचारवकनाप्रकारादेतस्य को भेद: ? पुर्वस्मिन् स्वभावविप्ररुरशत् सामान्येन मनाइनात्रमेव साम्म समाधित्य साति- शयत्वं प्रनिवादयितु तद्वमंमानाध्पारोप प्रश्तते, एतस्निन् पुनरदूर- विप्र ण्डनाइश्यम मुन्दयप्रयासतिसनुचित वाद भे दोपवार निरनधनं- तन्वमेवाघ्पारोप्पते। यया- पहने वहु गये उतचारवक्रता के प्रकार से इम उपवारवकपरकार वा वया भेद है। पहंने (वतताप्रकार) मे स्वभाव का अत्यन्त वित्कर्ष होने मे माघा- रणनमा लेगमाव हो नाटश्म का आधार ग्रहण कर (उस पदार्थ की) अत्य- धिक उत्वपंयुक्तता का बोध कराने के लिए केवल (अन्य पदार्थ के) धर्म को ही आरोपित किया जाना है, जबकि इन (द्विनीय वक्रता-प्रकार) में बहुत ही थोडे व्यवधान वाने पदार्थ के सादृस्व से उत्न्न मत्यन्न समीरता के योग्य होने से अभेदोपचार के कारणभून उम पदार्थ को ही आरोपित किया जाता है। (अर्थात् पहले भेद मे केवल पदार्थ के धर्म का आरोप होता है जबकि दूसरे प्रकार मे पदार्थ को ही आरोप किया जाता है) जैसे-
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सत्स्वेव कालथरवणोत्पलेयु सेनावनालीवियपल्लवेपु। गाम्सीर्यपातालफणीश्वरेपु खड्गेषु को वा भवतां मुरारि:।४६।। स्न्न पचार निबन्धनं तत्वमध्यारोपितम्। कस्यचिदन्यापदेश लक्षग- स्योपचारवकतंव जीविततवेन लक्ष्यते।
मृत्यु रूप पवणो के (सजाने हेतु) कमलरूप, या सन्यरूप वन- वीषिका के विप किसलपभूत, या गम्भीरनारुपी पाता के (धारण करने वाले) अहिपतिरप आपके खडगों के स्यित रहने पर मुरारि अर्थात् विष्णु क्या चीज है । ४९॥ ('यन्मूल्त मरमोल्नेखा रूपकादिरलद्क्ृति' मे रूपक के साथ) आदि के ग्रहण करने से किसी अन्योकितिक्प अप्रस्तुतप्रशमा अनक्वार के प्रकारविशेष की भी प्राणभूना उपचारवजता हो परिलक्षिन होती है। तया न किमप पदार्यान्तर प्राधान्येन प्रतीयनानतपा चेतसि निधाय तयाविधलक्षगसाम्यसमन्वयं समाधरि य पदार्थात्तरमभिवीव् मानरता प्रापयन्त प्रायश कदयो इयन्ते। यथा- और जैसा कि नविजन अधिकतर मु्यनया किसी दूसरे पदार्थ को गम्य रुप में अने हृदय मे निहित कर उमी प्रकार वे स्रूप के माददवरूप सम्पन्द को आवार बनाकर दूसरे पदार्थ का प्रतिपादन करने हुए दिवाई पडते है। जैने- त्ररनर्घ. कोऽप्यस्नसतव हरिण हेवाकमहिमा स्कुरत्येकस्यव त्रिभुषनचमाकारजनक। यदिन्दोर्मूतिस्ते दिवि विहरणारण्यवसुघा सुधासारस्यन्दी किरणनिकर: शञ्यकत्तः॥५०॥ (हरिण को प्रतिपाध बनाता हुआ दोई कहना है कि) है मृग ' तुम्हारी अनेले की हो, तीनो लोको मे चमत्कार को उत्पन्न करने बाली ( दुम्हारे द्वारा) प्रेरित कोई अमूल्य (अतुदनीय) खड्ग की महता म्फुरिन होनी है जिससे (भयभीत होकर) चन्द्रमा का बलनेवर तुम्हारे बिहार करने वे लिए अरण्यभूमि बना हुआ है एब अमृततत्व को प्रवाहित करने वाला (चन्द्रमा की) रश्मियों का समुदाय (तुम्हारे भक्षण के लिए) वानतृणो का ग्राम चना हुआ है। ५०॥
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मत्र लोकोत्तरत्वतक्षणमुनयानुपायि सामान्यं समानित्य प्राधान्येन विवक्षिलस्य वस्तुनः प्रतीयमानवुत्तेरभेदोपचारनिबन्धन तत्त्वमध्यारोपितम्। यथा चँतयोद्व योरप्यतंकारयोस्तुल्येऽप्युपचार- वघताजीवितरवे वाच्यत्वमेकत्र प्रतीयमानत्व्मपरत्मिन् रूरूपनेदस्व निबन्धनम्। एतच्चोभयोरपि स्वलक्षणव्यार्यानादसरे समुन्मील्यते। यहां (हरिण तथा अलीकिन प्रभाववाले व्यक्ति) दोनों में बनुगत वलोविवसारप सामान्य (धर्म) नो आधार बहम कर मुस्यरूप से प्रदि पादित करने के लिए अभीष्ट गम्यवृततिदाले पदार्थ वे अभेदोपचार के वारणसून उस (हरिण रूप) पदार्थ का ही आरोप वर दिया गया है। और इसी लिए इन दोनो अलद्ारों में उपचारवक्रता के ननान रूप से प्राप्त रूप होने पर भी एक जगह (रूपवालद्वार मे) वाच्यरपता एव दूसरी जगह (अप्रस्तुन प्रशंसा अलद्धार मे ) प्रतीयमानता दोनो अलद्धारो के स्वरूप भेद का कारण है। यह (बान) दोनों के ही अपने-अपने लक्षणो की व्यास्या करने समय भलीभांति स्वष्ट किया जायगा। एव मुपचा रव परतां दिवेच्य तमननतरप्राप्ताब कार्शां विदेषणवक्तां विविनकित-
विशेषणस्य माहात्म्यात् करियायाः कारकस्य वा। यत्नोल्लसति लावण्यं सा विशेपणवकता ॥ १५ ॥ इम प्रवार उपचारवक्रता का विवेचन चर तदनन्तर स्यानमास विमेषणपब्रता वा विवेक प्रारम्भ करते हैं- जहां विशेषण वे माहतत्म्य से दिया अपवा नारत (रूप वम्बु) वो रमनीयता प्रवाशिन होती है उसे 'विशेषणवव्रता' वहते है। (क्योकि वही लोशेत्तर विशेषण के नारण ही सोन्दर्य व्यक्त होता है) ॥१५॥ सा विशेदणवकता दिदेष पवपत्वविक्ितिरनिधीयते। कीदुशी पत्र यस्यां लावण्यमुल्लसति रामणीयकमुददिद्यते। कस्य-कियाया: कारकस्य वा। तियालक्षणत्व वस्तुनः कारकलक्षणस्य वा। वस्मात्-विशषपश्य माहात्थ्यात्। एतयोः प्रत्येक यद्विरोणण भेदकं (तस्य माहात्म्यात् ) पदार्था तरतय सातिदयत्वात्। कि तर सातिशय वम् -- भावश्वभावसो कुमार्थसमु लालका वमलंकारच्छाया- तिशयपरिपोषकत्वं च। पया-
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उसे विशेषणवकता अर्थात् विशेषण के वैचित्र्य में उत्पन्न शोभा कहा जाता है। केसी (है वह विशेषणवक्रता) ? जहां अर्थात् जिस (वक्रता) में लावण्य उल्लसित होता है अर्थात् रमणोयता व्यक्त होती है। किसकी (रमणीयता व्यक्त है) क्रिमा अथवा कारक की। ताहार्य यह कि क्रियारूप वस्तु की या कारकरूप वस्तु की (रमणीयता व्यक्त होती है)। किसके कारण-विशेषण के माहात्म्य के कारण। अर्थान् इन (क्रिया एव कारक रूप) दोनो (वस्तुओ) के जो विशेषण अर्थात (एक दूसरे के अपने सजानीय से) भेदक होने हैं ( उनके माहातम्य के कारण) दूसरे पदार्थ के उत्वर्ष युक्त हो जाने से (रमणीयता आती है) वव अतिशययुक्तता क्या है' (१) वस्तु की सहज सुकुमारता को भलीभांति व्यक्त करना तथा (२) अलह्वारो की शोभा के उत्कष को परिपुष्ट करना (ही अतिशययुक्त है), जैसे-(वस्तु को सहज सुनुमारता को व्यक्न करने वाले कारकविशेषण का उदाहरण)- श्रमजलसेकजनितनवलिखितनखपददाहम् चिछिता वल्लभरभसलुलितल तिताल कवलयचमाघनिह्ह ता।
जयति निशात्यये युवतिद्क तनुमधुमदविशदपाटला ।।५१।।. रात्रि के समाप् हो जाने पर तुरन्त के आरोपित नखत्रणो मे स्वेद के लगने से उत्पन्न छरछराहट के कारण मू्च्छित, प्रियतमो के द्वारा सावेश मे बिसेर दी गई हुई मुन्दर वालो की घुमराली लटो से आवी ढकी हुई, कामा- मिलाप के कारण सप्पादित अनेकानेक सम्भोग-परम्पराओ के सिलसिले से किए गये मदन के कारण उत्पन्न लज्जावश अलसामी और उतरी हुई शराव की सुमारी के कारण साफ गुलाबी सुन्दरियों की नजर सबसे वढ- चढ़चर मालम पढनी है।। ५१॥ यमा वा करान्रालीनक्कपोल्त भित्तिर्बाप्पोच्छला कृणितपत्रलेखा योत्रान्तरे पिण्डितचित्तवृतिः शृोति गीतध्वनिमत्र तन्वो ॥। ५२॥ अथवा जैसे- हथेलियों के बीच छुगामी गयी हुई क्पोलफलबवाली और आंसुओ के समडने के कारण फैल गई हुई (कपील की) पत्ररचनावालो और कर्णरन्म मे ही अपनी चिरवृति को समेटकर लगा देनेवाली यह विरहिणी वाला गीत ने बांलो को सुन रही है ॥। ५२॥ १५ व० जी०
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यपा वा- शुचिशीतलचन्द्रिकाप्तुताश्रिर निःशन्दमनोहरा दिद्यः। प्रशमस्य मनोभवस्प वा हुदि तत्पाम्यय हेतुतां यदुः ।।५३। या जसे- घवल शोतल चाँदनी से आप्लावित और बाफी देर से गुमसुम और मनोहारी दिजायें उसके भी हृदन मे या तो वैराग् या कामभावना को जगाने का कारण बनी ॥ ५३ ॥ कियाविशेषणवकत्वं पथा- सत्मार वारणपतिबिनिमोलिताक्ष: स्वेच्छाविहारवनवासमहोत्सवानाम्। ५४॥ [इस प्रकार का रकविशेषण वक्रता के तौन उदाहरण प्रस्तुत कर कुन्तक क्रिया विशेषणवक्रता का उदाहरण प्रस्तुन करने हैं-] क्रियाविशेष णवक्रता (का उदाहरण) जैसे- बरिराज जगल में रहने के समय के स्वेच्छापूर्वक किए गए विहार के महोत्सवो कोर आंध मूद कर याद करने लगा ॥५४ ॥ अन्न सर्वत्रैव स्वभावसोन्दर्यसमुल्लासकतवं विशेषणानाम्। अ्रतं. कारच्छापातिपरिपोदकत वं विशेषणस्य यथा- शशिन: शोभातिरस्कारिणा ॥५५॥। एतदेव विशेषणवकत्वं नाम प्रस्तुतौचित्यानुसारि सकतसःकाव्प- जीवित त्वेन लक्ष्यते, यस्मादनेनंव रसः परां परिपषपदवीमवतायते। यथा- करान्तरालोन इति n ५६॥ यहां सभी उदाहरणो मे विशेषण सहज रमणोयता को व्यक्त करते हैं। विशेषण को अलद्वारो की मोभा के उत्वरय की परिपुष्टि जैसे- (उदाहरण संख्वा २१४४ पर पूर्वोद्वन-शाशिन शोभाविरस्का रिणा ।। ५५॥ यह विशेषण वर्ष्पमान पदार्थ के औचित्य के अनुरूप होने पर मही विशेषणचक्रता समस्त थेष्ठ काव्यो की प्राणभ्ना प्रतीत होगे है, बगोकि इनी के कारण रस अपनी परिपुष्टि की चरम स्थिति को पहुँचाया जाता है। जैसे- उदाहरण सपया २५२ पर उदाहृत करान्तरालीन। इत्गादि इ्लोक ॥ ५६॥।
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स्वमहिम्ना विधीयन्ते येन लोकोतरश्रिय:। विशेषणम् ॥५७॥ १ इति) अन्तरश्लोक. ।। जो अपने माहात्म्प से रस, (वस्तु) स्वभाव और अलद्धार को अलोकिक सोन्दर्य से युक्त बना दे, (काव्य में महाकवियो द्वारा) वैसे ही वरिरोषण का प्रयोग करना चाहिए॥ ५७॥। यह अन्तरकलोक है। एवं विशेषणवकतां विचार्य क्मसमपितावसरां संवुतिवकतां विचारमति- यग संत्रियते वस्तु वैचित्र्यस्थ विवक्षया। सर्वनामादिमिः कक्षित् सोक्ता संवृत्िवकता॥१६॥ इम प्रकार विशेषणवक्रता का विवेचन प्रस्तुन कर अब क्रमानुकुल अवसर- प्राप्त 'संवृतिवक्ता' का विवेचन प्रस्तुत करते हैं- जहां विचित्रता का प्रतिपादन करने की इच्छा से किन्ही (अपूर्वता के प्रतिपादक) सर्वनाम आदि के द्वारा पदार्थ को छिपाया जाता है उसे सबृति- चक्रता कहते हैं ( कपोकि उसमे वस्तु के स्वरूप की सवृति अर्थान् छिपाने की प्रधानता से ही चमत्कार आता है, अत उमे सवृति चक्रता कहत हैं।)।। १७ ।। सोवता संवृतिवकता-प्रा किलँररंविधा सा संवृतिवकतेत्युवता कथिता। संवत्या वकता संवुतिप्रधाना वेति समास। यत्र यस्पां वस्तु पदार्थलक्षणं संव्रियते समाच्छाद्यते। केन हेतुना-वचित्यस् विवक्षपा विचित्रभावस्याभिधानेच्छया। यया पदार्थो विचित्रभावं समासाद्यतीत्यर्थ.। केन संब्रियते-सर्वनामाविभि: कंश्रित्। स्वस्य नाम सर्वनाम तदादिर्येशं से तयोवलाहतः केशिदपुर्वर्वाचर्क रित्यथः । उसे सवृतिवक्रता प्रधान कहा जात है। जो इस प्रकार की होती है उसे सबृनिवक्रना कहा जाता है। संबरण के कारण जो बक्रता होती है अथवा सवरण जिमने प्रवान होना है (उसे संवृति वक्रना कहते है) इस प्रवार दोनो तरह का समास यहाँ हो सकता है। जहाँ अर्थात् जिम वक्रता मे वस्तु अर्थात पदार्थ के स्वरूप की सवृत किया जाता है अर्थात छिरया जाता है। किम हेनु से (चस्तु का सवरण किया जाता है) ?- उैचित्र्य को
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वक्रोनितजीवितम्
विवधा अर्थात् विनिवता के प्रतिपादन करने की इच्छा से (वस्तु का सवरण बिया जातो है। जिसके कारण पदार्थ में जिचित्रता आ जाती है। किसके द्वारा 'वस्तु का) सवरण किया जाता है? किन्ही सर्वनामा दिय के दारा। सर्व वा नाम सर्घनाम होता है वह जिनके आदि मे होता है वे सर्वनामादि बहे जाते है उन्ही सर्वनामादि किन्ही अपूवं शब्दों के द्वारा (वस्तु का संवरण किया जाता है)। मत्र बहुबः प्रकारा: संभवन्ति। (१) यत्र किमदि सातिशमं वस्तु वषतु कधयमपि साक्षादभिधानादियस्ताप रिचिछिसतया परिमित- प्रायं मा प्रतिभासतामिति सामान्यवाचिता सर्वनाग्नाक्छाघ्य तरकार्यासिधापिना तदतिजञयाभिधानपरेण वावयान्तरेण प्रतीति- गोचरतां नोयते। पपा-
इसके बहुत से भेद हो सपते है। (१) (उनमें से पहला भेद वहाँ होता है) जही निसी वही जा सब ने वाली भी उल्व पंयुबन वस्तु बो, साक्षा वथन के वारण इयता से आच्छस होकर सीमित सो न हो जाय इमलिए सामान्य का कथन करने वाले सर्वनाम के द्वारा आक्छादित वर उसके व्यापार का वयन बनने वाले उसके उत्वर्य का प्रतिपादन करने में तत्पर दूसरे वाक्य के द्वारा ज्ञान का विषय बनाया जाता है। जैसे- तत्पित यंथ परिग्हलिप्सो स व्यघत करणोयमजोयः । पृष्पचापशिखरस्थकपोली मन्मथः किमाप येन निदध्यी।।५=॥ (अपने) पिता के (दूसरी) पत्नी के इषुव होने पर उस (देवनरत) ने उस वर्तंध्य वा पालन किया जिरुसे कि पुष्पनिर्मित धनुष की नोक पर माल रसे हुए कामदेव मुछ 3पूवं हो अदस्या वाले बना दिए गए । ५ ।1 म्न्न सदाचारप्रषणतया गुस्भवितभावितान्त,करणो लोकोत्त
भावनीयमपि शातनवो विहितवानित्यभिघातुं शवयमवि सामान्या- भिधायिता सर्वनाम्नाच्छाद्योतरार्पेन कार्यान्तराभिययायिना वाक्य न्तरेण प्रतोतिगोचरतामानीयमान का्मप चमरकारकारितामावहति। यहों पर 'शिष्टाचार में तत्पर होने के कारण पिता के प्रति बद्ा से अभिभूत चित्त वाले एव अलोकिय सरलता रूप गुण से युक्त होने के बारण नाना प्रकार के ऐन्ट्रिय उपभोगो के विरवत-हृदय भीष्म ने सम्भावित न किए जा सबने वाले अपनी इन्दियो का निरोध (अर्थाव् उन्हे विषयो से पराड्मुय).
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द्वितीयोन्मेष -
कर लिया' इस कही जा सकने वाली भी वस्तु को सामान्य का कथन करन वाले (तद्) सर्वनाम के द्वारा आच्छादित कर उत्तरा् के (कामदेव की दशा रप) अन्य कार्य का पौतपादन करने वाले दूसरे वाक्य के द्वारा, ज्ञान का विषय बनाया जाना किसी अलौकिक चमकार की सृष्टि करता है। (२) अयमपर: प्रक्ारो यत्र स्वपरिस्पन्दकाष्ठाधिरढे: सातिशय वस्तु वचसामगोचर इति प्रथितुं सर्वनाम्ना समाच्छाद्य तत्कार्या- भिधायिना तदतिशयवाचिना वाच्यान्तरेण समुन्मोल्यते। यथा- (२) यह (सर्वृति वक्रता का) दूमरा भेद है जहाँ अपने स्व्रभाव के चरमोतकर्ष को प्राप्त होने से उत्कर्पयुक्न वस्तु को अनिर्वबनीर है, ऐसा प्रतिपादित करने के लिए ( उमका) सर्वनाम के द्वारा सवरण कर उस काय का निरूपण करने वाले उसके उत्कर्ष के प्रतिपादक दूमरे वाकय के द्वारा व्यक्त कराया जाता है। जैसे- याते द्वारवतीं तदा मपुरिपौ तद्दतकम्पानता कालिन्दीजलकेलिवञ्जुनलतामलम््य सोतकाया। तद् गोतं गुरुबाष्यग इगडगनतारस्वरं रायमा येनान्तर्ज लचारिभिर्ज नत्न रैरव्युत्क मुत्कूजित म्॥ ५६॥ भगवान् कृष्म के उस समन द्वारका चले जाने पर उनके द्वारा हिना कर झुका दी गई हुई यमुना की जनधारा मे जनवेनम की लना का महारा नेकर विरह से उत्कण्ठित होकर राधा ने अत्वधिकु उमड आये हुए आमुओ के कारण भर आये हुए गले से तारस्वर से इम तरह गाना कि जिसके कारण हनी मे विचरण करनेवाले जरजन भी वहुत ही वे्वन होकर चीख उठे॥५९॥ अत्र सर्वनाम्ना संवृत वस्तु ततकार्याभियायिना वाकपान्तरेग समुन्मोल्य सहृदयहृदयहारिता प्रापिनम्। यया वा- यहां (तत्) सर्वनाम के द्वारा आच्छादित वस्तु, उम कार्य का निरूपण करने वाले दूसरे वाकय के द्वारा व्यवर कराई जाने से सहृदो के हुद को आनन्दिन करने वाली हो गई है। अथवा जैसे-
तह रुण्णं कग्ह विसाहीआए रोहगग्गरगिराए। जह फस्स वि जम्मसए वि कोइ मा वल्लहो होउ॥ ६० ॥ (तथा रुदित कृषण विशाखया रोधगद्यगिरा। यथा कस्यापि जन्मरतेउ्रि कोउपि मा वत्त्मो भवतृ ॥ )
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२३० व क्रोक्तिजीवितम्
हे कृष्ण (गला) रुंधा होने के कारण गद्गद वाणी वाली विशाखा ने स प्रकार से विलाप नि्या, जिनमे (ऐना लगना था) कि सँकडो जन्मो मे भी कोई किसी का प्रियतम न होवे॥ ६० ॥ मत्र पूर्वार्धे संवृतं वस्तु रोवनलक्षणं तर्दतिशयाभिषायिना वावयान्तरेण कामपि तद्विदाह्हादकारितां नीतम्। यहां पर पूर्वाद्ध मे (तथा सर्वनाम के द्वारा) छिपाई गई रोदन रूप वस्तु उसके अतिशय का प्रतिपादन करने वाले दूसरे वाक्य के द्वारा किसी अनिर्वचनीय सहृदयाह्लादकारिता को प्राप्त करा दी गई हु। (३) इदमपरमत्र प्रकारान्तरं यत्र सातिशयसुकुमारं वस्तु कार्यातिवयाभिधानं बिना संवृतिमात्ररमणौयतया कामपि काळ्ठाम- धिरोप्यते। यथा- (३) यह (सवृतिवक्रता) का (तीसरा) अन्य भेद है जहाँ अत्यधिक कोमल पदार्थ को (उसके) कार्य के उत्कर् का प्रतिपादन किए बिना हो केवल गोपनीयताजन्य सौन्दर्य से ही किसी अपूर्व पयवसान को प्राप्त वराया जाता है। जैसे- दरपणे च परिभोगदशिनी पष्ठतः प्रणयिनी निषेदुष। वीक्ष्य बिम्बमनुविग्वमारमनः कानि कानि न चकार लज्जमां ।।६१।। आइने मे सम्भोग (जन्य नखदन्तक्षतादि) को देखने वाली ( पार्वति) ने अपने पीछे स्थित प्रेमी (भगवान शट्ूर) को परछाही वो अपनो परछाही के पीछे देख कर लज्जा से कया क्या नहीं कर झाला ।। ६० ।। (४ ) अयमपर: प्रकारो यत्र स्वानुभवसंवेदनीयं वस्तु वचसा ववतुभवषय इति स्थापमितुं संवियते। यथा- तान्यक्षराणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ॥ ६२॥ इति पूर्वमेव व्यास्यातम्। (४) (इसी सवृतिवक्रता या) यह दूसरा भेद है जहाँ केवल अपने द्वारा अनुभवगम्य बात को वाणी के द्वारा अविर्वचनीयता प्रतिपादित करने के लिए (उस बात को सर्वनामादि के द्वारा) आक्छादित तिया जाता है। जैसे- (उदाहरण सध्य। १।५१ पर पूर्वोदाहृत 'निद्रानिमीकतद्णो'-इत्यादि इलोद के द्वारा नायक का अपनी नियतमा के अदारो का स्मरण कर यह
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कथन कि)-(प्रियतमा के) वे अक्षर (आज भी) हृदय मे कुछ (अपूर्व) ध्वनि कर कर रहे हैं ॥। ६२॥ इमकी व्यास्या पहले ही (११५१) श्लोक की व्याख्या रूप मे की जा चुकी है।
(५) इदमपि प्रकारान्तरं संभवति यत्र परानुभवसंवेद्यस्य वस्तुनो वव्तुरगोचरतां प्रतिपादयितुं संवृति: कियते। यरया- मन्मथः किमपि येन निदध्यौ॥६३॥ (५) (इम सदृतिवक्रता का) यह एक अन्य भी भेद सम्भव हो सकता है जहां दवूसरे के द्वारा अनुभचगम्य बात की वक्ता के द्वारा अगोचरता का प्रतिपादन करने के लिये (उस बात का सर्वनामादि के द्वारा) सवरण किया जाता है। जैसे- जिससे कि कामदेव कुछ (अनिवचनीय बात का) ध्यान करने लगा ॥ ६३ ॥
अत्र त्रिभुवन प्रथितप्रताप महिमा तयाविघशवित व्याघातविषण्णचेताः काम: किमपि स्वानुभवसमुचितमचिन्तयदिति। यहाँ तीनो लोको मे विख्यात पराक्रम की प्रभुता वाले कामदेव ने उस प्रकार (भीष्म के द्वारा आजीवन ब्रह्मचर्यव्रतपालन की प्रतिज्ञा को सुनकर अपनी) शक्ति की रुकावट से व्याकुलहृदय होकर कुछ अपने अनुभव के अनुरूप सोचने लगा। (इस प्रकार दूसरे कामदेव के अनुभवगम्य पदार्थ को वक्ता ने अपनी वापो द्वारा व्यक्त करने में असमर्थ होकर उसका 'किमपि' सर्वनाम के द्वारा संवरण कर दिया है। (६) इदमपरं प्रकारान्तरमत्र विद्यते-यत्र स्वभावेन कविविवक्षया वा केनचिदोपहत्येन युवत वस्तु महापातकमिव कीतनीयतां नाहंतीति समपमितुं संबरियते। यया-
(६) (सव्तिवक्रता का) यह अन्य भेद है-जहीं स्वमाव के बारण अथवा कवि के कथना भिलाय के कारण जिसी दीप से युक्त वस्तु महापातक के समान कथन करने योग्य नहीं है यह प्रतिपादित करने के लिए (उस वस्तु को सर्वनामादि के द्वारा) माच्छादित किया जाता है। जैसे- दुयचं तदय मास्म भग्मगस्त्वम्यसौ मदकरिष्यदोजसा। नंनभाशु यदि वाहि नौपतिः प्रत्यपत्स्यत शिसेन पत्रिणा ॥ ६४।।
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२३२ वक्रोलिजीवितम्
(किराताजुंनीय महाकाव्य मे किरातवेषधारी भगवान शद्ूर वा एक अनुचर सैनिक अर्जुंन से कहता है कि)-यह (हमारे) सेनापति ने (अपने) पैने तोर से इस (वराह) को शोम्र हो न मार डालते तो यह जङ्गती पशु "अपने मयद्वर) बल से जो बुछ करता वह वहने सोग्य नहीं और (ईम्वर करें कि आपके लिये (कभी) न होवे।। ६४।। यथा वा- निवार्थतामालि किनप्पयं वटुः पुनविवकु: स्फुरितोत्तराघरः। न फेवलं यो महतोऽपभाषते शृगोति तस्मादपि यः स पापभाकु।६५। अथवा जैसे- (कुमारसम्भव मे कपटवट्वेपघारी भगवान् शंङ्कर द्वारा पार्वनी की परीक्षा लेने के लिए भङ्कर की निन्दा करते समम पार्वती को अपनी सखी से यह वथन कि)-हे सखि इस वाचाट को रोको ( क्योकि) स्फुरित होते हुए होगे वाला यह फिर से बुछ बहने की इच्छा कर रहा है (बबेकि) जो महापुरुषों की निन्दा करता है केवल वह ही नही (अनितु) जो उससे ॥उस निन्द को) सुनता है वह पार का भाजन बनता है॥ ६५॥ पन्नारजुंनमारगं भगवदपभावरणं व न कोर्तनीयतामईनोति संवरणेन रमणीमता नोतम् । कविविवक्षयोषहतं पया- सोडयं दम्भधुनव्रतः प्रियनमे कतु किमः्पुछ्तः।।६६॥ इति प्रथममेव दयास्यातम् ! यहां (पहने श्नेक मे) अर्जुन का बध एवं (दूमरे इन्ो मे) भगवान् शद्ूर को निन्दा कहने के योग् नही है अव. संवरण के द्वारा उसे सुन्दर बना दिया गया है। कवि के कथनाभिलाप से उपहन। जैसे- पावसवत्मराज नाटक मे चत्मराज उदयन पपाबरी के साथ विवाह करते समय अपनी महारानी प्रियतमा वासवदत्ता की याद करके वहते हैं कि-हे पियतमे'आज घूर्तता के कारण (एकपली) व्रत वो धारण करने वाला वह यह (उदयन) पुछ (अनुचित कार्य) करने के लिए तत्पर हो गया है।। ६६ ॥ इसी व्वाख्या (१।५० के व्यास्पारप में) पहले ही को जा चुडी है। एवं संवृतिवकर्ना विचार्य प्रत्ययवकताया: कोउपि प्रकार: पद- -मध्यान्तभूं तत्वादिहैव समुचितावस रस्तस्मात्त ट्विवारमाचरति -
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द्विनीयोन्मेप:
इस प्रकार सवृतिवक्रता का विवेचन प्रस्तुत कर पदों के मध्य से अन्तर्भूत होने के कारण अवसरप्रापत 'प्रत्ययवक्रता' के किसी भेद का विवेचन प्रस्तुन करते हैं- प्रस्तुतौचित्यविच्छिति स्वमहिम्ना विकासयन्। परत्ययः पदमध्येऽयामुललासिा् ॥७॥
पद्र के मध्य मे स्थित प्रत्यय अपने उत्कर्ष से प्रस्तुत वस्तु के औचित्य की शोभा को विकमित करता हुआ अन्य (अपूर्वे) वक्रता को प्रकाशित करता है॥। १७॥ कश्चित् प्रत्यय कृदादि: पदमध्यवृत्तिरन्यामपूर्वी वत्रतामल्लासयति वक्रभावमुद्दोपयति। कि कुर्वन्-प्रस्तुतस्य वर्ण्यमानस्य वस्तुनो यदौ- चित्यमुचितभावस्तस्य विष्छितिमुपशोभां वि कासयन् समुल्लासयन्। केन-स्वमहिम्ना निजोत्कर्षेण। यथा- बेल्लद्बलाका घनाः॥ ६७ ।। यथा वा= स्निहयत्कटाक्षेदृशी इति॥६८॥ पदों के मव्य मे स्थित कोई कृदानि प्रत्यय अन्य अपूर्व वक्रता को उन्ना- मित करता है अर्थात् वैचिन्व को प्रकट करता है। क्या करता हुआ-प्रस्तुत अर्थात् वर्णन की जाती हुई वस्तु का जो ओचित्य अर्थात् उपयुक्तना अथवा योग्ता है उसकी विकिति अर्थात सौन्दर्य को विकसित करता हुआ अर्थाव व्यक्त करता हुआ। किस के द्वारा-अपनी महिमा अपनी प्रधानता के द्वारा (शोभा का विकाम करता हुआ) जँचे- बेल्लद्लाका घना ।' शोभित होती हुई वकपडिक्यो से मुक्त बादल ॥ ६७ ॥ अथवा जैसे- स्निह्य्यत्कटाक्े हगी। स्नेह करते हुए कटाक्षो वाले नेत्र । ६६॥ अ्रत्र वर्तमानकालाभिधायी शतप्रत्ययः कामप्यतीतानागत- विभ्रमविरहिता तात्कालिकपरिस्पन्दसुन्दरो प्रस्तुतौचित्यबिर्क्छित समुल्लासयन् सहृदयहृदयहारिणों प्रत्ययवकतामावहति। यही (दोनो ही उदाहरणों मे) वर्तमान काल का प्रतिपादन करने वाला शतृ प्रत्यय, भून और भविष्त की शोभा से हीन उसी समन की सहज-
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२३४ वक्रोकिजीवितम्
रमणीयतायुक्त वर्ण्यमान वस्तु की उपयुक्त्तता के सोन्दर्य को प्रकाशित करता हुआ रसिकणनो के हृदयो वे आनन्द प्रदान करने पाली प्रत्ययवक्रता को धारण करता है। इदानीमेतस्पा: प्रकारान्तरं पर्यालोचयति- आगमादिपरिस्पन्दसुन्दर: शब्दवकताम्। परः कामपि पुष्णाति बन्धच्छायाविघायिनीम्॥१८॥। अब इस (प्रत्ययवक्रता) के अन्य भेदो को विवेचित करते है- आगमादि के विलास से रमणीय दूसरा (प्रत्ययवक्रता का) भेद विन्यास के सौन्दय पो उत्पन्न करने वाली भब्द वक्रता का पोपण करता है॥ १=॥ परो द्वितीयः प्रत्ययप्रकार: ामप्यपूर्वा शब्दवत्तामाबघ्नाति वाचकवकभावं विदधाति। फीढृक आगमादिपरिरपन्वसुन्वरः । आयमो मुमादिरा दियस्य स तथोफतः तस्यागमादेः परिस्पन्द: स्वधिल- सितं तेन सुन्दरः सुकुमारः। कीदृशों शब्दवपताम्-बन्धच्छाया- विघायिनीं संनिवेशकान्तिकारिणीमित्यर्थ:। यथा- पर अर्थात् दूसरा प्रत्यय (वक्रता) का भेद किसी अपूर्व शब्दवक्रता को वतगम् करता है अर्थात् वाचक वकता की सृष्टि करता है। कमा (प्रत्यय- प्रकार)? आगमादि के परिस्फुरण से रमणीय। आगम अर्थात् मुम् इत्यादि है आदि मे जिसके उसे आपमादि बहुते हैं। उस आगमादि का परिस्पन्द अर्थात् अपना बभव कमसे सुन्दर अर्थाद् कोमल (प्रत्यय प्रकार शब्दवक्रता फो पुष्ट करता है)। कसी शब्दवक्रता वो-बन्ध पी शोभा को उत्पन्न करने बाली अर्थात् विन्यास के सौन्द्य बी सृप्टि करने थाली (शब्दचक्रता को पुष्ट करता है) । जंसे- जाने सत्यास्तव मयि मन. संभुतस्नेहमस्मा- दित्यंभूरता प्रथमविरहे तामहूं तर्कयामि। वाचालं मां न खल् सुभगंमन्यभावः करोति प्रत्यक्ष ते निखिलमचिराद् भ्रातरुवतं मया मत् ॥ ६६ ॥। (मेघदूत मे विरही यक्ष अपनी प्रेपसी की निज विरह-दशा का धणॅन कर, मेघ को अत्यधिव विश्वास दिलाने के लिये उससे कहता हूँ कि हे मैष ') मुझे मालूम है कि तुम्हारी सहेली (अर्थात् मेरी कान्ता) का हुदंय मेरे विषय में प्रेम पूर्ण है, अन एव (अपने) प्रथम वियोग के अवसर पर उसे
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इस प्रकार की अवस्थाओ से युक्त सोचता हूँ ( जैसा कि अभी मैंने तुमसे बताया हे, बयोकि तुम यह निश्चित समझ लो कि) मुझे अपना सौन्दर्याभिमान (ऐसी दशा की कल्पना करने के लिये) वाचाट नहीं बना रहा है, (अपितु उसका मेरे प्रति ऐसा अगाध स्नेह है जिससे कि ऐसी दशा उसको हो गई होगी। और अधिक कया कहूँ) भइया, मैंने जो कुछ भी कहा है वह शोघ्र ही तुम अपनी आँखो से देखोगे ।। ६९। यथा च- दाहोडम्भ: प्रसुर्तिपचः इति ॥७० ॥ यथा वा- पायँ पायं कलाचीकृतकदलदलम् इति ।। ७१॥ और जँसे- दाहोडम्भ प्रमृतिम्पच । ७०॥ यह १।४८ पर पूर्वोदाहुत पद्य का अंश अथवा जैसे-पायं पाय क्लाचीकृतकदलदरम् ।७१।। यह २1१० पट उद्धू त श्लोक का अंज। मुमादिपरिस्पन्दसुन्दरा संनिवेशच्छायाविघायिनीं वाचकवकतां प्रत्ययाः पुषणन्ति। यहाँ 'ुभगम्मन्यभाव' इत्यादि पदो मे मुमादि के विलास के कारण रमणीय प्रत्यय विन्यास की शोभा को उत्पन्न क रने वाली शन्दवक्रता को पुष्ट करते हैं। एवं प्रसंगसमुचितां पदमध्य्वतिप्रत्ययवनतां विचार्य समनन्तर- संभविनी वृत्तिवकतां विचारयति- इस प्रकार प्रमन्ष के अनुरूप पदों की मध्यवतिनी प्रत्ययक्रता का विवेचन कर तदनन्तर अवसरपराप्त वृत्तिवक्रता को प्रस्तुत करते हैं --
अव्ययीमावमुख्यानां वत्तीनां रमणीयता पत्रोल्लसति सा भेया वृचिव चिन्यवक्रता ॥१६॥ दरहां पर अव्ययीभाव (समास) प्रधान वृत्तियो की सुन्दरता परिस्फुरित होती है उसे वृत्ति की विचिव्नता से उत्पन्न (वृत्तिर्वचित्यवक्रता) जानना चाहिए । १९॥ सा वतिरवंनिष्यवमता जेया बौदध्या। वृतीनां वैचिन्यं विचित्न- भाव: सजातीयापेक्षया सौ कु मार्योत कर्पत तेन वमता चकभावविष्छत्ति।
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कोदृशी -रमणीयता यत्रोल्लसति। रामगोयकं यत्यामुद्धिद्यते। कस्य-वृत्तोनाम्। कासाम्-अध्वयोभावमुख्यानाम्। म्व्ययी- भाव: समासः मुख्यः प्रधानभूतो यासां तास्तयोवतास्तास्ां समास- तद्धितसुब्धातुवृत्तीनां वैयाकरगप्रसिद्धानाम्। तदयमत्राथ :- यत्र
मासादर्यत। यया- उसे वतिवचिभ्यवक्रता जानना अथवा समझना चाहिए। वृततियो का वैचिश्र्य अर्थात् विचित्रता, समानधतियों की अपेक्षा सुह्भारता का आधिवय, उसके कारण वक्रता वर्थात जो वाकयन की शोभा होती है (जसे वृत्ति- वैविष्यवक्रत्ञा कहते है) । कैसे (वक्रता)-जिसमे रमणीमता उल्लसित होती है, अर्थात् जिसमे सौन्दर्य झलकता रहता है। किसका (सौन्दर्य)- वृत्तिमो का। विन वृतियो का-अन्ययीभावप्रधान (वृत्तियो) का। अर्थाव अव्ययीभाव समास जिनमे मुख्य अर्थाव प्रधानभूत है उन बैपाकरणो मे प्रख्यात अव्यपीभाव प्रधान-समास-वद्धित एव सुन्धातु वृतिो का (सौन्दर्य जहां प्रस्फुटित रहता है)। इनका आजय यह हुआ कि जहाँ इन (समास- तद्धित आरि वृत्तियो) की अपनी सहज रमणीमता एक उचित भूमिका पर उपन्यस् किए जाने के वारण स्फुटित होती है। वहाँ वृतिवंचिष्ावकत्ा होती है।) जैँसे-
अभिव्यक्ति तावद् बहिरतभमानः कथमपि रफुरसन्त मनोज्ञामुदृत्तां स्वातमन्यधिकत रस नच्छितभर:। परपरिमलर्पन्दसुभगा- महा घतें शोभामधिनयु लतानो नवरसः ॥ ७२॥ आश्चर्य है कि मधुमास मे किसी भी प्रवार प्रकाशित होने मे असमर्य, अत्धिक सम्मोह के भार से युक्त अपने अन्दर ही सफुरित होता हुआ लताओ का नवरस, प्रकृष्ट सुगन्धि के स्फुरित होने से रमणीन, हुदया- वजक एवं अत्यधिक सम्पन्न यी वो धारण करता है। ७२॥ पत्र 'पधिमधु'-शब्देविभवत्यर्यविहित: समासः समयाभिवाय्यवि
वैचित्र्यमुन्मीलयति। एतड्वतिविरहिते विन्यासान्वरे वस्तुम्रतीतो सत्यामपि न ताद्कृत द्विंदाह्वादकारित्वम्। उछ् तपरिमल-स्पन्द-सुभग- शब्दानामुपचारवऋत्वं परिस्फुरद्विभाव्यते। यथा च-
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यहां 'अधिमघु' शब्द मे ('मघौ इति अधिमधु' इम प्रकार का 'अव्य्य विभकि' इत्यादि पा० २१।६ से) बिभक्ति अर्थ मे किया गया (अव्ययीभाव) समाम समय का प्रतिपादक होते हुए भी विषय सप्तभी का बोघ कराता हुआ 'नवरम' शब्द की श्लेष की शोभा के अधिगत होने से उत्न विचित्नता को उन्मीलित करता है। इम (अव्ययीभाव समास रप) वृत्ति के बिना भी दूमरे ढङ्ग से विरचित होने पर विषय का ज्ञान हो जाने पर भी उस पकार काव्यममज्ञो के लिये आनन्द नही उत्पन्न हो सकेगा। उद्वृतत, परिमल, स्पन्द एर्व सुभग शब्दो की 'उपचारवक्रता' तो साफ-साफ झलकती दिखाई देती है। और जैसे (इसी का दूसरा उदाहरण)- श्ा स्व्लोकादुरगनगरं नूतनालोकलक्ष्मी- मातर्न्वं्द्रि: किमिव सिततां चेण्टिलौस्ते न नीतम्। अप्येतासां दग्नितविहिता विद्विषत्सुन्दरीणां यैरानीता नखपदमया मण्डना पाण्डिमानम् ॥ ७३॥ देवलोक से नामचोक पर्षन्न अपूर्व प्रकाश की कान्ति को विखेरने वाले आपके कार्यों ने किसे नही सफेद बना दिशा (अर्थात् सभी को सफेद बना दिया, और यहाँ तक कि आपके) दुश्मनो दी इन पत्तियों के अपने पनियो द्वारा विलिखित नवचिह्ो वाले आभूषण को भी सफेद (पाण्डुवर्ग) का बना दिया है।। ७३।। पत्र पाण्डुत्व-पाण्डुता-पाण्डुभाव-शब्देम्यः पाण्डिम-शब्दस्य किमपि वुत्िवैचित्र्यवऋत्वं विद्यते। यथा च- ग्रहां पाण्डुत्व, पाण्डुता अथवा पाडुभाव शब्दो की अपेक्षा पाण्डिम शब्द की कोई अपूर्वें ही चूतिवेचित्य वकता नजर आती है। तथा जैसे (इसी का तीसरा उदाहरण)- कान्तत्वीर्यत सिहलीमुखरचां चूर्णाभिषेकोल्लस-
येनापान महोत्सवव्यतिकरेव्वेकातपत्रायते देवस्य त्रिदशाघिपावधि जगज्जिरणोमनोजन्मनः ॥। ७४॥ चूर्णाभिषेक के वारण विलसित होते हुए सौन्दर्यामृत का वहन करने वाले निझरों का सेवन करनेवाली सिंहलियों के मुख की कान्ति का आचमन क रनकरके चन्द्रमा (ऐसी) मनोहारिता को प्रास कर लेता है जिसके कारण देवराज इन्द्र तक के लोक को जीतने की इच्छा वाले कामदेव की पानगोष्ठियों
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२३६ वके कितिनी वितम्
के उत्सव के प्रसगों मे वह (चन्द्रमा) अद्वितीय राजच्छत् की तरह आवरण करने लगता है॥७४॥ अन्न सुब्धातुवृत्ते. समासवृत्तेश्र किमपि वक्नावैचिSं परिस्फुरतति । यहाँ सुद्तुवृत्ति तथा समासदृति की वक्रता की कोई (अताधारण) विचित्रता परिरक्षित होती है। एवं वुतितरुतां विवार्य पदपूर्वनभाविनोमुवितावसरा भाव- वक्ता विचारयति। इम प्रकार वृततिवक्ररा का विवेवन कर पदीके पूर्वाद्ध' मे स्थित होने वाली एव अवसरपास 'भाववक्रता' का विवेचन करते हैं- साध्यतामप्यनादृत्य सिद्धत्वेनाभिधीयते। यत्र भावो भवत्येपा भाववैचित्र्यवक्रता ॥२०॥ यहां पर भाव अर्थात क्रिया रूप धातु के अर्थ को (अपनी) साध्यता की भी अबहेलना करके सिद्ध रूप मे प्रतिपादित किया जाता है वहाँ यह 'भाववैचिभ्यवक्रता' होती है॥ २०॥ कृपा वणितस्वरपा भाववैचित्रयवतका भवत्यस्ति। भावो पात्ववरपस्तस्व वचित्यं विविन्नभावः प्रकारान्तराभिवानमपतिरेकि रामगीयकं तेन वकता वक्वविच्छितिः। कौदशी-पत्र यस्यां भाव सिद्धत्वेन परिनिष्पन्नत्वेनाभिघीयते भभ्यते। कि कृत्वा- साध्यतामध्यनादृत्य निष्पाद्यमानतां प्रसिद्धामप्यवघीय। तदिदमत्र तात्पर्यम्-प्रत् साष्पत्वेनापरिनिष्पतेः प्रस्तुतस्मार्यस्य दुवनः परि- पोष:, तस्मात् सिद्धवेनाभिधानं परितिष्पस्रत्वात्पर्याप्त प्रकृतार्यपरि- पोपमावहति। यया- यह जिसके स्वरन का वर्णन किया गया है माववँधिव्यवररा होती है। भाव का अर्थ है धात्वर्थ वा रूप अर्थात क्रिया, उसका वैचित् अर्वान् विचित्रता दूमरे दङ्ध से प्रनिपादित होने के कारण अतिशययुक्त सुन्दरता, उसके वारण जो वक्रता अर्थात् वाकपन की शोभा होनी है (उसे भावरवचित्र्यवक्रना बहते है।। (यह भार्वचित्पवक्रत्षा होनी) सी है- जहाँ अर्थात् जिस (वक्रता) मे घात्वर्यं रूप क्रिया को सिद्ध रून में पूरी तरह से निष्पस रूप से हा जाता है। वया करके-साध्यता का भी अनादर
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करके अर्थात् विख्यात निष्पल्रता की अबत्ञा करके। तो यहां इमका आभय यह है-कयोकि साध्य रूप से भलीमाति सिद्ध न होने के कारण वर्ण्यमान विषय कम पुष्ट हो पाता है अत सिद्ध रूप से कथन पूर्णतया सम्पन्न होने के कारण प्रस्तुत पदार्थ का भलीभाति पोषण करता है। जैसे- शासाया समलोमसाधररूचेर्दो कन्दलीतानवात केयरामितमड्गद परिणर्त पाण्डिम्नि गण्डत्विया। अस्या: कि्व विलोचनोत्पलमुगेनात्यन्तमश्रुस्तुना तारं ताद्गपाड्गयोररुणिलं वेनोत्प्रनाप: समरः॥७५॥ (गरम) सासो के चलने के आयास के कारण धूमिल पड गए हुए अधर के कान्तिवाली इसकी भुजाओ के कनदली की कृशता के कारण ककणो के द्वारा वाजूबन्द की तरह का आवरण किया गया है और कपोल की कान्ति के द्वारा सफेदी मे परिणत किया गया है, और तो और, उसके नेत्र कमलो के युगल के द्वारा अत्यविक आँसू बहाने के कारण कोरो पर इतनी तेज अर्रणमा उत्पन्न करा दी गई कि जिसके कारण काम अत्यधिक सापवाला हो उठा॥ ७५ ॥ येत्न भावस्य सिद्धत्वेनाभिधानमतीव चमतकारकारि। यहाँ पर भाव का सिद्ध रूप से प्रतिपादन अत्यन्त ही वैचित्र्य को उत्पन्न करने वाला है। एवं भाववकतां विचार्य प्रातिपदिकान्तर्वतनीं लिडगवकतां विचास्यति- इम प्रकार भाववकता का विवेचन कर प्रातिपदिक के अन्दर स्थित हिङ्भनक्रता का विवेचन करते हैं- भिन्नयोर्लिङगयोर्यस्यां सामानाधिकरण्यताः। कापि शोभाभ्युदेत्वेपा लिड्गवैचित्र्यवकता ॥ २१ ॥ जिसमे अलग-अलग सिन्गो के सामानाधिकरण्य से किसी अपूर्व सौन्दरयं की मृष्टि होती है, इसे बिन्ह वैचिव्यवक्रता कहत है।। २१ ॥ एपा कयितस्वहूपा लिड्गवैचिनमवकतास्तर्या विविचि त्रभाव- वकताविच्छिति.। भवतीति सम्बन्धः क्रियान्तराभावात्। कोदृशी- सस्यां यत्र विभिन्नयोविभव्तस्वस्पयोलिड्गयो सामानाधिकरव्य- स्तुल्याधयत्वादेकद्रव्पवुत्तित्वात् काप्पपूर्वा शोभाम्युदेति कान्तियल्ल- सति। यथा -
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२४० व कोपितिजीवितम्
यह, जिसका स्वरूप (उक्त २१ वी कारिका मे) बताया गया है, लिङ्ग- वैचिव्यवत्रता अर्थाव् खी (नपुसक) आदि (लिङ्गो) की विचितरता के वाकमन से उत्पन्न शोभा होती है। (इस वाक्य को) दूसरी क्रिया के अभाव मे भवति (होती है) ब्रिया के साथ सम्बन्ध है (अर्थात् भवति हरिया र अध्याहार होगा)। बसी है (यह वक्रता) जिसमे अर्थात् जहां पर विभिन्न, अलग-अलग स्वरप वाले लिङ्गो के मानानाधिरुरण्य अर्थाद समान आनरय होने से एक दव्य वृत्ति हो जाने के कारण बोई अपूर्व शोभा उदित होती है अर्यात् रमणीयता आ जाती है। जैसे- पस्यारोपणकर्णणापि बहवो वीरवतं त्याजिता कार्य पुडिखतबाणमीश्वरधनुस्तद्दोभिरेभिमंया। स्त्रीरत्न तदगर्भसंभवमितो लभ्यं व लीलापिता तेनँधा भम फुल्लपद्धजवनं जाता दुझां विशति ॥७६। जिसके प्रत्यच्वायुक्त करने की क्रिया से भी बहुतो से शूरता का व्रत छडवा दिया गया उसी शिवधनुष को मुझे इन भुजाओ के द्वारा वाणदुक्त करना है और इसके द्वारा उस अयोनिजा नारीरल को प्राप्त करना है, इसीलिये तो मेरी केलि सी करती हुई ये बीसो आंखे खिले हुए कमलो का समूह बन चली है ।। ७६॥। पथा वा- नभस्वता लासितकल्पवल्लीप्रबालबालव्यजनेन यस्य। उर, स्थलेऽरकीर्यंत दक्षिणेन सर्वास्प्द सौरभमड्गरागः।। ७७।। अपवा जैसे- नचाई गई वम्पलता के नवाडकुर रूप नये पखो वाले मलयानिल ने उसके हृदयस्थल पर सवंत्र सुगन्धित अङ्गराग को छिढक दिया। ७७ ।
यथा च- प्रायोज्य मालामृतुभि: प्रमत्नसंपादितामंसहार्टेडस्य च्हे। करारविन्दं सकरन्दबिन्दुस्यन्दि भिया विभ्रमकर्णपूरः॥७॥ तथा जसे- ऋतुओं के द्वारा परियमपूवक तैयार की गई माला को इसके बन्धो पर डाल कर मघुविन्दुओं को बरसाते वाने अपने करकमल को शोभावम (इसक) कीला कणपूर वना दिया ॥७द ।।
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द्वितीयोन्मेप* २४१
इयमपरा च लिडवचिक्ष्यवकत- सति लिड्गान्तरे यत्र स्त्रीलिङ्गं च प्रयुज्यते। शोभानिप्पत्तये यस्मानामैव स्थीति पेशलम् ॥ २२॥ यह दूसरी लिद्ग के वैचित्र्य की वक्रता होती है-जहाँ पर अन्य लिङ्गों के विद्यमान रहने पर भी सोन्दर्य की सृष्टि के लिए स्त्रीलिङ्ग का (ही) प्रयोग किया जाता है (वहाँ लिद्गवंचिव्यवक्रता होती है) क्योकि स्वी जंसा कथन ही सुकुमार होता।। २२।। यत्र यस्पा लिड्गान्तरे सत्यन्यस्मिन संभवत्यपि लिडगे स्त्रीलिडगं प्रयुज्यते निबध्यते। अ्र्रनेकलिडगतवेऽपि पदार्थस्य स्त्रीलिड्गविषय: प्रयोग कियते। किमथम्-शोभानिष्पत्ये। करस्मात कारणात- यस्मान्नामंव स्त्रीति पेशलम्। स्त्रीत्यभिघानमेव हृदयहारि। विच्छित्यातरेण रसादियोजनयोग्यत्वात। उदाहरणं, यथा- जहां जिम (बक्रता) दूसरे लि्ग के विद्यमान होने पर अर्थात् अन्य लिन्द के सम्भव हो सबने पर भी स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग किया जाता है, (स्नीनिङ्ग को ही) उपनिवद्ध किया जाता है। अर्थान मदार्थ के अनेक हि्भ वाला होने पर भी स्न्रीलि्गविषयक प्रयोग किया जाता है। किस लिए-शोभा की निष्पत्ति के लिये (अर्थात् सौन्दर्य की सृष्टि के लिए) किस कारण से (स्नीलिन्ट् का ही प्रमोग किया जाता है)-क्योंकि स्त्री यह नाम हो सुबुमार होता है। अर्थात् दूसरे प्रकार की शोभा वा जनक होने के कारण रसादि की समोजना के अनुर्प होने से स्त्री यह कथन ही मनोहर होता है। (इसका) उदाहरण जैसे- पथेयं ग्रोष्मोष्मव्यतिकरवती पाण्डरभिदा
तटी तारं ताम्यत्यतिश शियशा: कोडपि जलद- स्तथा मा्ये भावी भुवनवलयाकान्तिसुभगा।। ७६।। जैसे कि यह तीप्म वाल की गमों के सम्पर्क वाली, अत्यधिक पाण्ड (श्वेत मोन) वर्ण की, मुख से निकले हुए मव्नि पवन से सच्चल रताओ के नव पल्लवो से युक्त तटी अत्यनिक सन्तस हो रही है इससे मालूम पढना है कि चन्द्रमा की (भी शीतलता रूप) कीनि का जतिक्रमण करने वाला सारे भवनमण्टल की आक्रान्त बरने के कारण मनोहर कोई जल्घर उपस्थित होने वाला है।। ७१ ॥
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२४२ वक्रोक्तिजीवितम्
अत्र त्रिलिड्गत्वे सत्यपि 'तट-शब्दस्य, सौकुमार्यात स्त्रीलिङ्गमेव प्रयुक्तम्। तेन विच्छित्यन्तरेण भावी नाफकव्यवहारः कश्िदासूत्रित इत्यतोः रमगोपत्वाद्वकतामावहति। यहाँ पर तट शब्द के (स्त्री, नपुमक एव पुल्लिङ्ग) तीनो ही निङ्गो मे सम्भव होने पर भी मुकुमारता के कारण स्त्रीलि्ग को हो प्रयुक्त विया गया है। अत दूसरे दङ्ग से उपस्थित होने वाला नायक का व्यवहार प्रतिपादित किया गना है। अत यह अत्वधिक मनोहर होने के कारण वक्रता की धारण करता है। इदमपरमेतस्याः प्रकारान्तरं लक्षपति- विशिष्टं योज्यते लिङ्गमन्यसिमन् संभवत्यपि । यत्र विच्छि तये सान्या वाच्यौचित्यानुसारतः।।२३।। अब इसके अन्य भेद का लक्षण करते हैं- जहाँ पर (वर्ण्यमान) पदार्थ के औचित्य के अनुरूप अन्य (लिङ्ग) के सम्भव होने पर भी सोन्दर्य उपस्थित करने के लिए विशेष लिद् को प्रयुक्त किशा जाता है वह दूसरे प्रकार को (लिङ्ग्वविधन्नवक्रना) होती है । २३ ॥। सा चोक्तस्वरूपान्यापरा विद्यते। यत्र यत्यां विशिष्टं योज्यते लिड्गत्रयाणामेकतमं किमपि कविविक्षमा निबध्यते। कथम्- अन्यस्मिन् संभवत्यपि, लिड्गान्तरे विद्यमानेि। किमर्थम-विच्छितये शोभाष। कस्मात् कारणात्-वाच्योचित्यानुसारत। वाव्यस्य वर्ष्यमानस्य वस्तुनो यदौचित्य मुश्तिभावसास्यानुसरणमनुस्षार- स्तस्मात्। पदार्थचित्यमनुसत्येत्यर्थः। यया- वह, जिसका स्वरूप (२३ वी कारिका मे) कहा गया है अन्य अर्थाद दूसरी (लिङ्गवैचित्यवक्रता) है। जहां, जिस (वक्रता) मे विशेष (लिङ्ग) की योजना को जाती है अर्थाव तोनो लिङ्गो मे से किसी एक लिद्ग (विरेप) का प्रयोग (कवि के अभिम्रेत कथन के कारण) किया जाना हू। कँसे (लिङ्गविशेष वा प्रयोग किया जाता है?) अन्य लिद्ग के सम्भव होने पर भी अर्थात् (जिसका प्रयोग किया गया है उससे भिन्न) दूसरे लिंङ्गो के विद्यनान रहने पर भी (लिङ्गविशेष प्रयुक्त होना हू)। हिमदिए'- विष्छित्ि अर्भाक्ष सौन्दर्य (दाने) के लिए। किस कारण से-पदार्थ के औचित्य के अनुसार। वाच्य अर्थात् वर्णद किए जाने वाले पदार्थ का जो
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ओचित्य अर्थात् उपयुक्तता अथवा योग्यता है उसके अनुसरण अर्थात् अनुगमन के कारण। तात्पय यह कि पदार्थ की उपयुक्तता के अनुरूप (जहां लिङ्गविशेष का प्रयोग किया जाता है।। जैँमे- त्वं रक्षसा भीर यतोऽपनीता तंमार्गनेता: कृपया लता मे। अदशंयन् वर्तुमशकनुवन्त्य: शासा भिरावजितपल्लवाभिः॥0 (रघुवश मे पुप्पकविमान से अयोध्या के लिए लौटते हुए राम सीता से कहते हैं कि-), हे भयशीले। दैत्य रावण तुम्हे जिस मार्ग से (अपहृत कर) ले गया था, उस मार्ग को (वागि्द्रिय के अभाव के कारण) बोलने मे अशक्त इन लताओ ने झुके हुए (हस्तस्थानीय) पतलवो वाली डालो के द्वारा कृपापूर्वक (मानो हाथ के इशारे से) दिखाया था।। ८0 ॥ अ्त्र सीताया सह राम: पुष्पकेनावतरंस्तस्या: स्वयमेव तद्विरह- वैधुयंमावेदयति-यत्वं रावणेन तथाविधत्वरापरतन्त्रचेतसा मार्गे यस्मिन्नपनोता तत्र तदुपम दवशातथा विघसंस्थानयुक्तत्वं लतानाम्- नमुखत्वं मम त्वन्मागनिुमानस्य निमित्ततानापत्नमिति वस्तु वि्छि- स्यन्तरेण रामेण योज्यते। यथा-हे भीर स्वाभाविकसो कुमार्यकात- रान्त.करणे, रावणेन तथाविधकूरकर्मकारिणा यस्मिन्मार्गे त्वमपनीता तमेमा: साक्षात्परिदृश्यमानमूर्तयो लताः किल मामदर्शपन्निति। तन्मार्गप्रदर्शनं परमार्यतस्तासा निश्वेतनतया न न संभाव्यम् इति प्रती- यमानवृत्तिरुत्प्रेक्षालंकार फबैरभिप्रेतः। पया-तव भीरुतवं रावगस्य वैयं ममापि स्वत्परित्राणप्रपत्नपरता पर्यालोच्य स्त्रीस्वभावादाई हृदयत्वेन समुचितस्वविद्ययपक्षपातमाहात्म्यादेता कृपमंव्र सम
केचिदजत्पन्तो मार्गप्रदर्शन प्रकुर्यन्ति ते सदुन्मुखीभूतहस्यपल्लव्बाह- भिरित्येतदतीव युक्तियुक्तम्। तया चानव वावपान्तरमपि विद्यते- यहां मीता के साथ पुप्प्क विमान से उतरते हुए राम खुद ही सीता के वियोग की विकलता का वर्णन करते हैं-उस प्रकार (भय के कारण जीघ अपहरण करने की (शीघ्रता से पराधीन चित्त वाला रावण जिस मार्ग से तुम्हारा अपहरण कर ले गमा था उस मार्ग मे उसके प्रतिरोष (उपमर्द) के कारण उस प्रकार की अवस्या से युक्त होना अर्थाद लताओ बा खसी ओोर झुका होना मेरे लिये चुम्हारे गमन-मार्ग का अनुमान करने का कारण बवा
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२४४ वक्कोक्तिमीवितम् था, इमी बात को राम दूसरे दग से प्रस्तुत बरते हैं। जैसे-हे भयशीने ! अर्थात् सहज सुबुमारता के बारण अधीर हृदय वाली सीते! इस प्रवार के भयायह (नृशस) कार्य को करने वाला रावण जिस रास्ते से वुग्हें अपहरण कर से गया या उसे साक्षात दिखाई देने दाले विग्ह वाली इन लताओ ने मुझे दिखाया था। उन लताओ का रास्ता बताना वस्तुत उनके जड होने के बारण सग्भव नही है अस यहां पर भतीयमान उत्प्रेक्षा रुपं बलद्वार कवि को अभीप्ट है। जैसे कि तुम्हारी भयशोल्ता, रवण को नृशसता तथा मेरी भी चुम्हारी रक्षा करने के प्रयास की तत्परता का विवार कर नारीस्वभाव होने के वारण वृपालु हृदय होने वे नाने एव अपने विषय के ( अर्थात र्त्री स्पर१ के) अनुर्ष पक्षपात की महत्ता वे कारण इन्होने कृपापूर्वक ही मुझे शरसा रताया था। बिम साहन वे द्वारा (इन्होने रास्ता बनायी था)-सुके हुए दत्लवों से युक्त्त डालो वे द्वारा अर्थाद इसारे से बताना था। बयोकि वागिन्ट्रिय के अभाव के वरण बोलने मे अर्शक्त थो। जैमा कि देवा भी जाता है वि जे बुछ लोग न चोल्ते हुए सस्ता बताते हैं वे उसी और अपने कर पल्ल्वो से मुक्त भुजाओ को घुमावर के ही (रारता बताते हैं) इसत्यि (दताओो का उस प्रकार भाग बताना) युक्तिमक्गत है। और जैसे कि यही इमका उदाहरण रूप दूसरा इलोक भी है (ि-"
मृग्यश् दर्भाड्कुरनिर्व्यपेक्षास्तवागतिजं समबोधयन्मामु। व्यापारयमयो दिशीद क्षिणत्यामुर्क्ष्मराजीनि वितोषनानि ॥5 तुम्हारी गति से वनभिन् (अर्थाव् तुम किस मार्ग से गई यह न जानूने वाले) मुझे (जपने भद्य) बुश के बवुरों से नित्पृह होकर (अर्थात चुमाइबुरी बा खाना बन्द बर) दक्षिण दिना वी और उठी हुई पालको से सुशोभित होने वाने अपने नेत्रो की प्रवुत्त बरती हुई मृगियो ने (तुम्हारे गमन-मार्ग को आंख वे इशारों से) भली-मांति बताया या ॥5१॥
हरिण्यश्ष मा समबोधमन्। कोद्दम्-तवागतिज्ञन्, तताप्रद- शितमार्गमजाननतम्। ततस्ता: सन्यगवोपयन्निति, यतस्तास्तदपेक्षया किचित्प्रवुद्धा इति। ताश्र कोदृशय-तथाविघवंशन संदर्शनवशाब दुःखितर्वेन परित्यवततृणग्रासाः। कि कुर्वाणा :- तस्पां दिवि नयनानि समर्पमनयः । कीदुशानि-ऊर्ध्योकृत पक्ष्मपडय तीनि। तदेवं तयाविद- स्थानयुक्तरवेन दक्षिणां दिश्मन्तरिक्षेण नोतेति संज्ञेपा निवेदपन्त्यः। अत्र वुक्षमुगादिपु लिगान्तरेपु सभवत्स्वपि स्त्रीलिंगमेव पदार्योचित्या
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नुसारेण चेतनचमाकारकारितया कवेरनिप्रेतम्। तहमात् कार्मनि चकतामाबहति। तथा हरिणियों ने मुले भली-मांति बढाया था। कसे मुझे (बताया था) चुम्हारे गमन (मार्ग) को न जानने वाले (मुझे) अर्थात लनाओ द्वारा दिखाए गए रास्ते को न समझने वाले मुझे ( रास्ता बताना था)। इसीलिए उन्होंने भवी-भाँति रास्ता दिखाया था कनोकि वेउन लता आदि की अपेक्षा कुछ अधिक समनदार थी। वे (हरिणियां) कैनी थी-( तुम्हारे अपहरण रून) उस प्रकार के दुख के देखने से पीडित होने के कारण तृण भक्षण का परित्वाग कर चुकी थी। करा करती हुई ?- उमो दिया की ओर अननी आँखें चुनाए हुए (जियर तुन गई थी)। कैसी ऑसे जिनकी पलको की कजारें कार की ओर उडी हुई थी। तो इन प्रकार उस प्रकार की अवस्या मे युक्क होने के कारण आकाय-रस्ष से दक्षिम दिय्रा की ओर (तुन) ले जाई गई ऐना (अवभी आँखो के) इसरे से सूचित करनी हुई (मृगियों ने तुम्हारा जाने का रासत्ा बताया)। यहाँ पर (लत के स्यान पर) वृक्ष आि(तया मृमिये के स्वान पर) सृव आदि दूपरेनिङ्गो के विद्यतान होनेपर वर्भ्यमान वस्तु के ओवित के अनुकूा तह्वों का अह्वावजदक होने से स्ीकेज्ञ (लग एकं हरिगितं) हो अनिष् था। उसी के कारण (यह वर्गत) किरी अपूर्क चक्रना को धारण करता है। एवं प्रातिनदिक नक्षगस्त सुत्र-तनंनविन: परपूर्शर्निस्न ययामंमवं वक्रमावं विचार्येदानोमुनसेरपि सुरुनिडत्तरोबनुस्वरूर पूर्वभागो यः संभर्वात यस्य वकरना विवारयति। तत्त च क्रियावैविननिवन्वन- मेव वकवं बिदयते। तस्मात् रिशवैवितपस्वैव कोइसा रिपनब प्रकारा: संभवन्तीति तत्स्वरूपनिरूप गारयमाह- इम प्रकार मुबन्न से नम्मव होने वाले प्रातिपदिक रूप, पदपूर्वाद्ध की वक्रता का पयासम्भव विवेवन प्रस्पुत कर अव सुबन्त तथा निटन्त दोनों वा ही घात रूप जो पर्वभाष सम्भव होता है उसकी वक्रता का विवेचन करते हैं। उसकी वक्रता का कारण किया की विचिन्नता ही होता है। इस लिये क्रिया की विचित्रता के ही किस प्रकार के और किसने भेद सम्भव हो हते हैं उनका स्वरूप बठाने के निए (ग्रन्थकार) कहता है कि- कर्तु रत्यन्तरङ्गगत्वं कर्व्रन्तर विचित्रता । -सविशे पणवे चित्र्य सुपचार मनोजता- ॥२४॥
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२४६ वक्रोक्तिजीवितम्
कर्मादिसंवृति: पक्च प्रस्तुतौचित्यचारवः। क्रियावैचित्र्यवक्रत्वप्रकारास्त इभे स्मृताः॥ २॥ १. कर्ता का अत्यन्त जन्तरङ्ग होना, २ दूसरे कर्ता के वारण होने वाली विचिन्नता, ३ अपने विशेषण के कारण विचिनता, ४. उपचार से होने वाली रमणीयता एवं ५. वर्भ आदि का संवरण से पांच चर्ण्यमान वस्तु के औचित्म के कारण रमणीय क्रियावैचित्र्य की वक्रता के वेद कहे गए हैं॥ २४-२५॥
इमे स्मृता वर्ण्यमानस्वरूपाः कीतिता । कियन्त-पश्च पशतरसंस्या- विशिष्टाः कीदृशाः-प्रस्तुतोचित्यचारवः । प्रस्तुतं वर्ण्यमानं वस्तु तस्य यदौचित्यमुचितभावस्तेन चारवो रमणीयाः। तन प्रथमस्तावत प्रकारो य.'फर्तरत्यन्तरड्गत्वं नाम। फर्तु. स्वतन्त्रतया मुस्यभूतस्य कारकस्य क्रियां प्रति निवतयतुर्यदत्पन्तरड्गतवम् अत्यन्तमान्तरतम्यम। पया-
जिनका स्वरूप अभी बतामा जायगा, ये क्रिया वे वैचिन्य की वक्रता के प्रकार अर्थात् घात्वर्य की विचित्ता के बाकपन के भेद स्मरण बिये गए है अर्थात् बताये गये हैं। बितने (भेद बताये गये हैं)-माँच अर्थात् गपना मे ५ भेद (बताये गए हैं) कसे हैं (वे वेद ?)- प्रस्तुत के औचिन्न्य के कारण सुन्दर,। प्रस्तुत का अर्थ, है वर्णन किया जाने वाला पदार्थ, उमक् जो औचित्य अर्थात उपयुक्तता है उसने कारण सुन्दर अर्थात् चित्तावपक [ है) वो उनमे से जो कर्ता की अत्मन्त अन्तरद्गता है। (१) वर्ता नर्थाद् स्वतन्त्र होने के कारण प्रधान भून कारक की क्रिया के प्रति -तिर्वाह करने मे जो अत्यधिक अन्तरङ्भता अर्थात् अन्तर्तमता हूँ, वह (क्रियावचित्यवक्रता का) पहला भेद हैं। (उसका उदाहरण ) जमे- चूडारत्ननिष ष्णदुव हुजगद्द्गारोस्मत्कव्परो घत्तामुद्धरतामसी भगवतः शेषस्य मूर्धा परम्। स्वरं संस्पशलीषदप्यवनत यस्मिन् लुउन्त्यंकमं शून्ये नूनमियन्ति नाम भुवनान्मुद्दामकम्पोतरम्॥ ६२ ॥। 1 भगवान् शेपनाग का यह चूडामणि पर स्यित कठिनाई से वहन करने योग्य जगती के भार के कारण झुवली हुई वन्परा वाला फण मजबूती से खहा रहे, जिससे क स्वेच्छापूर्वक थोडा-सा भी सुकने का रपशों करने पर
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द्वितीयोन्मेप.
भी (अर्थात झुकने का नाम लेने पर भी) ये इतने भुवन आकाश में अत्यघिन कम्प के साय बेसिलमिला लुढकने लग जाते हैं।। द२ ॥ अन्नोध्घुरताधारणलक्षणक्रियाकर्तुः फणीश्वरमस्तकस्य प्रस्तुतौ- चित्यमाहात्म्यादन्तर्भव पथा भजते तथा नान्या काविदिति किया- वचित्र्यवक्कतामावहति। यथा वा- यहा पर खड़ा रखने के स्वरूप वाला व्यापार कर्ता रूप शेपनाग के फण का, वर्म्यमान के औचित्य की महिमा से जिस प्रकार सन्तरज्ज बन जाता है वैसे अन्य कोई व्यापार नहीं इसलिए यहाँ क्रियावँचित्रयवक्रता है। अथवा जँमे- कि शोभिताहमनयेति पिनाकपाण:। पृष्ठस्य पातु परिचुम्बनमुत्तरं वः ॥ ८३ ॥ उद्राहरण संख्या १।८१ पर उद्धृत 'क्रीडारसेन-' इत्यादि पद का यह उत्तरारघ। (कि भावंती के द्वारा अपने शिर पर चन्द्रलेखा लगाकर) 'क्या मैं इसके श्ारा अच्छी लग रही हूँ' इस प्रकर पूछे गये चन्द्रमौलि (भगवान शद्कर) का उत्तर रूप परिचुम्वन आप लोगो की रक्षा करे ॥ ८३॥ मत्र चुम्बनव्यतिरेकेण भगवता तयाविघलोकोतरं गोरीशोभाति- पायाभिधानं न कैनचित् क्रियान्तरेण कतु पार्यत इति क्रियावविभ्य- निबन्घनं वकभावमावहृति। यथा च- यहां पर पावती के उस प्रकार की अलोकिक सुन्दरता के उत्कर्प का चुम्बन से मिन्न किसी दूसरी किया के द्वारा प्रतिपादन करना सम्भव नही था इसीलिये यह (वाक्य) उस वक्रता का धारण करता है जिसका कारण (चुम्बन रूप) क्रिया की विचियता है( यही क्रिया अत्यन्त अन्तरङ्गता को प्राप्त हो गई है।) तथा जैसे-(दूमरा उदाहरण) रहस्व तइअरणग्रण पब्वइपरिचम्बिअ जम्रइ॥ ८४॥ {रुद्रम्य तृतीयनयनं पार्वतीपरिषुम्धित जयति।) 4 पावंती के द्वारा चुम्बन किया गया भगवान श्र का तृतीय नेन सर्वोत्कृप्ट रूप मे विद्यमान है।। द४ ॥ यया वा- सिदितिम्चाओओो जग्इ मग्नरद्धम्रो ॥ ६५ ॥ (शिपिलितचापो जयति मकरध्वज ।) अथवा जैसे- धनुप को ढीला किए हुए काम देव सर्वोत्वर्य सम्पन् है।। ८५
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एतयोवेचिय पूर्वमेव व्यास्यातम्। इन दोनो उदाहरणो की विविमता का विश्लेपण पहले हो ( उदा० सं० १।५= एव १६८ को व्याष्ना करते समय) कर चुके हैं। मयनपर: कियावँविश्मवकतायाः प्रकार :- कर्म्न्तरविचित्रता। सन्यः कर्ता कननन्तरं तम्मादिवित्रता वचिश्र्म्। प्रस्ुनवात् सजा- तोपत्वाच्च कर्तुरेव। एतदेव व तस्य वैचित्रमं यत किरमेव क्नररा पेक्षया विचित्रस्वरूपा संवादयति। यया- (२) यह 'दूसरे कता के कारण होनेवालो विवितना' किनार्वविध- चक्रता का दूसरा भेद है। कननन्तर का अथे हैं दूवरा क्ता उससे जो विचित्रता जर्थात् विलक्षणता होती है। (यह विलक्षणता) वर्ण्नमान एवं समानधमीं होने के करण कर्ता की ही होती है। उस ( कर्ता) की यही विलक्षणता हूँ कि वह दूमरे कर्ता की अपेशा विचिन स्वष्य वाली किरा को हो निम्पस् करता है। जैसे- नैकत् शवितिविरति क्वचिदस्ति सर्वे भावा: स्वभावपरिनिष्ठिततारतम्या: निपीयमान- पपावगस्त्य: ॥८६॥ कही एक ही स्थान पर सामर्थ्य की निषति नहीं होती है। तभी वस्तुषे जपने स्वाभा्विक न्यूनाधिकय से युक्त होती है। कल्प के प्रारम्भ से हो वडवाग्नि के द्वारा अच्छी तरह से िये जाते हुए सागर को अगस्तप (ऋषि) ने एक चुल्लू से हो पी डाला घा ॥ ८६॥
प्रोढत्वाटवाडवागने: किमपि कियाव विध्वमुतहत कामपि वकतामुन्मो- लर्यतत। यहां पर निरन्तर प्रयास के अभ्यास की चरमावधि को पहुचे होने से प्रोढ हुए बडवानल की अनेक्षा एव ही चुल्लू से भागर का पान कर जाना किसी अपूर्व क्रिया को विलक्षणता को धारण करता हुआ किसी लोकोसर वांकपन को व्यक्त करता हूं। यया वा- प्रपश्रातिच्छिदो नखाः ॥ ८७॥
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द्वितीयोन्मेप - २४९
्यथा वा - स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराग्नि. ॥ ८ ।। अथवा जैसे- शरण मे आये हुए लोगो की विपत्ति का छेदन करनेवाले नाखून (आप लोगो की रक्षा करें।॥ ८७ ।। अथवा जैसे- वह शङ्कर भगवान के वाणो की आग आप सबके पापो को भस्म कर दैं॥ द६ ॥ एतयोवँचित्र्यं पूर्वमेव प्रदशितम्। इन दोनो उदाहरणों का वैचित्र्य पहले ही (उदा०स० १।५१ एवं १।६० की व्यास्मा करते समय) दिखाया जा चुका है। अ्रयमपरः क्रियावचित्यवकतामाः प्रभेद-स्वविशेषणवैचिश्र्यम। मुस्यतया प्रस्तुतत्वात कियाया. स्वयमात्मनो यद् विशेषणं भेदकं तेन वैचित्र्यं विचित्रभावः। यथा - (३) यह 'अपने विशेषण के कारण विचिन्नता' क्रियावबिन्यवक्रता का अन्य तीसरा भेद है। प्रधान रूप से वणित होने के कारण क्रिया का जो अपना ही निजी विशेषण अर्थाद (दूमरी मजातीय र्रिनाओ से उसे) भिन्न करने चाला है, उमके कारण जो वैचित्र्य अर्थात् विलक्षणना होनी है, (वह क्रियावचित्यवत्रता का तृतीय भेद है) जैसे-
इत्युद्गते शशिनि पेशलकाम्तिदूती- संलापसंवलितलोवनमानसाभि.
इम प्रकार चन्द्रोदय के अनन्नर सुकुमार कान्तिवाली दुनियों के सुन्दर- वचनों मे सलग्न नेत्रो एव चित्तवाली स्नियो ने, विपरीत अलद्वार रचना ने कारण सगियों को हसानेवाली अलसूरण पदति को ग्रहण किया॥ ८९॥ अन्न मण्डनविधिग्रहुणलक्षणायाः करियाया विपरीतभूषाविन्यास- हासितससीजनमिति विशेषणेन किमपि सौकुमायमुन्मीतितम। यस्मातयाविघादरोपरचितं प्रसाघनं यस्य व्यञ्जकरवेनोपारत -मुख्यतया वर्ग्यमानवुत्तेर्व ल्लभानुरागस्व सोऽ्यनेन सुतरां समुतेजितः।
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२५० वक्रोकिनी वितम्
यहाँ पर अलङ्रण पद्धति ग्रहण रूप को क्रिया की, 'विपरीत लद्वार रचना के का रण सखियी को हँमानेवाली' (अलङ्टरण पद्धति) इस विशेषण के द्वारा किसी लोकोत्तर सुकुमारता को व्यक्त किया गया है। क्योकि प्रधान रूप से वर्णन किए जाते हुए जिस प्रियतम के अनुराग के व्पञ्जक रूप से उम प्रकार आदरपू्वक विरचित वेश ग्रहण किया गया है वह (त्रिमतम का अनुराग) भी इस (विशेषण) के द्वारा अच्छी तरह चमक गया है।
प्था वा- मथ्यासवतश् कितहरिणीहारिनेय्त्निभागः।। ६० ॥। अथवा जैसे- (उस प्नियतम ने) मेरे ऊपर विस्मित अथवा भयमीत मृगी के (कटाक्षो के सदृश ) रमणीय कटराक्ष को फेंका ।। ९०।। अस्य वैचित्रयं पूर्यमेवोदितम्। एतच्च त्रियाविशेषण इ्वयोरपि कियाकारकयोर्वऋ्त्वमुल्ला सयति। यस्मा द्विचित्रक्रियाफारित्वमेव का रकवैचिश्यम्। इमही विचिन्रता पहले ही (उदा० १।४९ की व्याटना करते समय) बवाई जा चुकी है। यह क्रिया विशेषणकिया तथा कारक दोनो की ही वफ्रता को प्रकट करता है, क्योकि विचिन क्रिया का करना ही कारक की विचित्नता होती है। इदमपरं क्रियावेदिव्यवकताया: प्रकारान्तरम्-उपचारमनोज्चता। उपचारः साद्शयादिसमन्वयं समाशित्य यर्मान्तराप्यारोपसतेन मनोज्ञता वकत्वम्। यथा- (४ ) यह 'उपचार के, कारण रमणीयता' क्रिया, वचित्र्यवक्रता का अन्य (चतुथं) भेद है। उपचार का अर्थ है सादृश्य आदि सम्बन्धो का सिमण कर किसी दूसरे धर्म का आरोप, उसके कारण जो मनोजता अर्थाद शकपन होता है (वही क्रियावँचित्यवक्रता का चतुर्थ प्रभेद है)। जैसे- तरन्तीवाड्गानि स्खलदमलमावण्यजलघौ प्रथिम्न. प्रागत्म्यं स्तनजघनमुन्मुद्रमत च। दृशोर्लीलारम्भा: स्फुटमपवदन्ते सरलता- महोसारडगाक्ष्यास्तवणिमनि गाढ: परिचम: ॥६१.।,
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•द्वितीयोन्मेप २५१
"अहे इस हरिणाक्षी का युवावस्था से अत्यधिक प्रणय हो गया है (क्योकि इसके) अवयव मानो चखतल एव निर्मल सौन्दर्य के समुद्र मे जैर रहे हैं (इसबी) स्तन एव जद्वायें मानो स्थूलता के अभिमान को व्यक्त्त कर रहे है तथा (इसके) नेत्रो के विलास का उद्यम भी साफ-साफ सरलता की निन्दा कर रहा है।। ९१ ।।
- अत्र रखलदमललावण्यजलघो समुल्लसद्विमल सौन्दर्यसंभारसिन्ध परिस्फुरन्तयपि स्पन्दतया प्लवमानत्वेन लक्ष्यमाणानि पारप्राप्ति- मामादयितुं व्यवस्यातीवेति चेतन पदार्थसंभाविसा दृश्योपचारातारुण्य- तरलतरुणोगात्ाणां तरणमत्प्रेक्षितम्। उत्प्रेक्षायाश्रोपचार एव भूयसा जीवितत्वेन परिस्फुरतीत्युत्प्रेक्षावसर एच विचारयिष्यते। प्रथिग्नः प्रागत्म्यं स्तनजघनमुन्मुद्रर्यत च [इति ]-अन्न स्तनजघनं कत् प्रथिम्न: प्रागत्म्य महत्त्वस्य प्रोहिमुनभुद्वयत्युन्मोलयति। यथा कश्रिश्चेतनः किमपि रक्षणीयं वस्तु मुद्रवित्वा कर्माप समयमवस्थाप्य समुचितोपयोगावसरे स्वयमुन्मुद्रयत्युद्धाट्यति, तदेवं तत्कारित्व- साग्यात् रतनजघनस्योन्मुद्रणमुपचरितम्। तदिदमुक्त भवति-यत् पदेव शंशवदशायां शक्त्यातमता निभालितस्वस्पमनवस्थितमासीत, यस्ष्य प्रथितनः प्रागत्म्यस्य प्रथमतरतास्प्यावतारावसरसमुचितं प्रथनप्रसरं समर्पयत। द्शोलीलारम्भाः स्फुटमपवदन्ते सरलताम् [ इति ]-पत्र शैशवपत प्टिता स्पष्टतां प्रकट मेवापसार्य दुशोविलासोल्लासा: कमप नवर्यावनसमुचितं विभ्रममधिरोपयन्ति। यथा केचिच्चेतनाः कुतच- द्विपये कमप व्यवहारं समासादितप्रसरमपसार्य किमपि स्वाभि- प्रायाभियतं परिस्पन्दस्तरं प्रतिष्ठापयन्तीति तत्कारित्वसादुशयाल्ली- लावतीलोचनविलासो्लासानां सरलत्वापवदनमुबचरितम् । तदेवं- विधनोपचारेणंतास्तिस्त्रोऽपि कियाः कामपि वकतामधिरोपिताः। वाययेऽस्मिन्नपरेऽपि वकताप्रकाराः प्रतिपदं संभवन्तीत्यवसरान्तरे विचार्यनते।
यहां स्खलित होने हुए निर्मल सावण्य के सागर मे अर्थान् प्रकाणमान एवं स्वच्छ सौन्दर्य समूह के सागर में फडफडाते हुए भी चच्ल होने के वारण बहते हुए से दिखाई पडते हुए पार पहुँचने के लिए मानो व्यवसाय सा बर रहे हैं। इम प्रवार के चेतन पदार्थ मे सम्भव हो सवने वाले साटृश्य के वारण रपचार (मथवा गुणवृत्ति) से युवावस्था के कारण चच्चल रदती वे उद्धो था सेशना दप्रदित रिया गया है। तथा उत्प्रेक्षा मे सपचार
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ही ज्यादातर प्राण रूप मे स्कुरित होत हू इसका विवेवन उत्पेक्ष का निरूपण करते समम हो करेंगे।
इसके 'सवन एव जयाएं स्पूलता के अभिमान को व्यक्त कर रही है।' यहाँ कर्ता रूप स्तन एवं जद्धावें पृधुना की प्रपत्मता अर्थात गुरुना की निपुणता को उन्मुद्ित कर रहे अर्थात व्यक्त कर रहे हैं। जिस प्रकार से कि कोई चेवन (प्राणी) किसी रक्षा करने योग वत्तु को छिराकर कुछ समय के लिए रखकर उसके प्रयोग के योग्य समय पर अपने आप उसे उन्मुदित कर देवा हूँ अर्यात् प्रकट कर देवा है। तो इसी प्रकार उसी प्रकार का कार्य करने की समानता के कारण स्तन एव ङ्गाओ का (पृसुनर के) प्रकट करने का उपचार से प्रयोग किया गया है। तो कहने का तात्र्य यह है कि जो ही (पृत्ठुवा को प्रगल्मता) वाल्यावस्था में आच्छव्न स्वरूप वालो होने से प्रस्तिरूप मे स्विन थी इसी पृपुता की प्रगत्मता के पहले पहले जवानी आने के समम के अनुरूष व्पक होने को प्रतिपादित किया गया है। तेनो के विलासी बा उद्यन साफ-साफ सरलता को निन्दा कर रहा हू'-यहाँ बाल्यकाल मे समाटृत सरलता को स्वष्ट ही त्यीग कर के आखो के विलासो के उद्भव किसी (अनिवँवमीन) नवजोइत के अनुस्त चेष्टा को (अथवा शोमा की) आरोनित कर रहे हैं। जैसे कुछ प्राणी किसी विषय मे (मान्यता) पजञानताप्राप्त व्यवहार का परित्याग कर अपना इच्छा- नुकूल दूसरे व्यवहार को प्रतिष्डित करते है। उसी प्रकार का काय करने के साहस के कारण विलासवती के नेत्रों के विलासो के उद्यमो को सरलता को निन्दा करने का उपवार से प्रवो किया गवा है। तो इस प्रकार के उपचार से ये तीनो ही (तरन्ति, उन्मुदरतितथा अपवदन्ते) किनाये किसी (लोकोतर) वोकपत बो प्रास्त करा दिये गये हैं। इस श्वोक में दूनरे भी वकता के भेद पद-पद मे सम्भव हो सकते है इसका विवेसत अन्य अवतरो पर किया जायगा। इदमपरं क्रियावेचिश्यव उताया: प्रकायन्तरम् कर्मारिसंगृिः। कमप्रभुतोनां कारकारणो संजति: संवरगम, प्रस्युतोचित्याद्सारेग पातिवयप्रतोतये समाच्छादयाभिया। सा च किशवचिश्वकारित्वात् प्रकारत्वेनाभिधोयते। (५) यह 'कर्म आदि का सवरण' श्रिगर्वपवक्रतठाा का न्प (पँिवा) भेद हूँ। कर्म इत्दि नवरको को सवुत अर्थाव् छिवाने का अर्थ ह वर्ग्यमान पदर्ष वने अपुक्तवा के अनुवार उनके अतिनब का
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बोध कराने के लिए (कर्मादि को) छिया करके कहना तथा यह कथन त्रिया के अचिन्य को उत्पन्न करने के कारण उसके भेद रूप से कहा जाता है। कारण कार्योपचाराद पथा- नेश्रन्तरे मघुरमर्पयतीव किचित् कर्णान्तिके कथयतीव विभप्यपूर्वम्। अ्रग्तसमुल्लिखति किचिदिवायताक्ष्या रगालसे मनसि रम्यपदार्थलक्षमीः॥६२॥। कारण मे कार्य का उपचार होने से (कर्मादि का सवरण) जैमे- इस विशाल नयनो वाली (नायिका) की रमणीय वस्तुशोभा आँखो के अन्दर कूछ मोठा मीठा भर मा देती है और कानो के पास कुछ अधुन- पूव मीठी बातें बोल सी जाती है, और प्रेम से अलसाये मन भीतर ही कुछ मधुर (भाव) उत्कीण सा कर देती है॥ ९२॥। प्त्र तदनुभवंकगोच रत्वादनार येयत्वेन करिमपि सातिशमं प्रतिपदं कष्म संपाध्यतयः तिया: स्वत्मनि कमपि वदभावमु्ावर्यन्ति। उपचारमनोज्ञाताप्पत्र विद्यते। यहमादर्पणकथनोल्लेलनान्युपचारनिब- न्घनान्येव चेतनपदार्थधर्मावात्। यथा - : यहाँ वेवल उसी के अनुभवगम्य होने के कारण अनिवंचनीय होने से, प्रत्येक पद में किमी अस्यधिक उत्वर्पपूर्ण कर्म की पुष्टि करती हुई क्रियायें अपने भीतर किसी कोकोसर चक्रता को प्रवट करती हैं। साथ ही याँ उपचार के कारण होने वाली रमणीयता भी विद्यमान है, कयोंकि प्रदान करना, कहना, उल्लेख करना क्रियायें चेतन पदार्थ का धर्म होने के नाते (साहस्य के कारण) उपचार से ही प्रयुक्त हुई हैं। तथा जैसे (दूसरा उदाहरण)- नत्तारम्भाद्विरतरभसस्तिष्ठ तावन्मुहर्त यानामोतो इलथमचलतां भूपर्णं ते नमामि। इत्यास्याय प्रणयमधुरं कार्तया योग्यमाने चूडाचन्द्रे जर्यात सुसिन: कोजपि शर्वत्य गर्व ॥ ६३॥ वेग से बिरत हो जाने नाले तुम थोडी देर तक नर्तन के उपक्रम से तब तक ठहर जाजो जब तक कि मैं तु्हारे मिर पर वे ढीले आभूषण को स्थिरता प्रदान कर दूं।। (अपनी ) प्रियंतमा (पार्वती) के द्वारा स्नेह बी
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मिठास से भरी यह बात कहने पर चूडाचन्द्र के लगाये जाते समय हर्ष विभार शिव का अनिर्वचनीय गर्व सर्वातिशायी है।। ९३ ।। अन्न 'कोऽपि' इत्यनेन सर्वनामवदेन तदनुभवैकगोचरत्वादव्यप- देशयत्वेन सातिशयः शर्वस्य गर्व इति ककृतंृति। जयति सर्वोतकर्षेग वर्तते इति क्रियावचित्यनिबन्धनम्। यहाँ 'कोई' (को्षप) इस सर्वनाम पद के द्वारा केवल शङ्र के अनुभव द्वारा ही जाने जा सकते वाले होने के कारण जनिवंचनीयता के द्वारा धकर के किसी आतिशय पूर्ण घमण्ड (का कथन कर) वर्ता को छिमाया गया है जो 'जयति' अर्थात् सर्वोत्कृष्ट रून मे विद्यमान है इम करिया की विवितता का कारण है। इत्ययं पदपूर्वार्घवक्त्भावो व्यवस्थित. । दिडमान्रमेवँतस्प शिष्डं लक्ष्मे निरुप्पते । ६४ ॥। इति संग्रहश्लोकः । इस प्रकार यह पदपूर्वाद्ध की वक्रता की व्यवस्था की गई है। (यथा उक्तविवेचन रूप मे) इन प्रकार इसका केवल एक हिस्सा (बताया गया है) दोप (वक्रतायें) लक्ष्य (काव्यादि) मे दिखाई पढते हैं ॥ ९४ ॥ यह सग्रह श्चोक है। * तदेव सुप्तिइन्तयोह योरपि पदपूर्वाघस्य प्रातिपदिकस्य घातोश्र यथायुकित वकता विचार्येदानों तवोदेव यथास्वमपराघस्य "प्रत्यय- लक्षणस्य वकतां विचारयति। तत्र कियावैविरशवक्नायाः सम- नन्तरसंभविनः कमसनन्वितत्वात् कालस्य वत्रवं पर्यालोच्यते, क्रियापरिच्छेदकवातस्य। तो इस प्रकार सुवन्त तथा तिडन्त दोनो पदो के पूर्वाद्ध प्रातिपदिक एवं धातु की यथोचित वक्रना का विवेचनकर अव उन्ही दोनों वे ययोचित प्रत्यय रूप उतराज की वक्रता का विवेचन प्रस्तुन करते हैं। उनमे क्रिया- वैचित्य वक्रता के तुख्त बाद मे सम्भव होने वाले अतएव ब्रमानुककल तथा साथ ही, उसके क्रिया की अवधि होने के कारण, काल की वक्रता का विवेचन करते हैं। औचित्यान्तर तम्पेन समयो रमणीयताम् 1 पाति यत्र भवत्येपा कालवैचित्यवकता ॥ २६।।
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द्वितीपोन्मेप: २५५
जहां पर औचित्य का अत्यन्त अन्तरङ्ज होने के कारण समय रमणोयत। को प्राप्त कर लेता है (वैसी) यह 'काल्वचित्य वक्रता' होती है । २६ ।।
एपर प्रकान्तस्वरूपा भवत्यस्ति कालवचिज्यवकता। कालो वैयाकरणादिप्रसिद्धो वर्तमानादिर्लटप्रभृतिप्रतययवाच्यो य पदार्थाना- भुदयतिरोधानविधायी तस्य वैचित्र्यं विचित्रभावस्तथाविघतवेनोप- निबन्धस्तेन वकता वकत्वविष्छित्तिः। कीदुशी-यत्र यस्यां समयः कालाएयो रमणोमतां याति रामगीपकं गच्छति। केन हेतुना- श्रचित्यातरतम्येन। प्रस्तुतत्वात्प्रस्तावाधिकृतस्य वस्तुनो यदौचित्य-
त्यर्थ: ।
या-
यह जिसका स्वरूप (अभी) बताया जा रहा हे, यह कालवैचिन्न्य वक्रता होती है। काल का अर्थ है व्याकरणपासत्र के ज्ञाताओ मे प्रसिद्ध लट् आदि प्रत्ययो के द्वारा कहे जाने वाले पदार्थों के उदित होने एव तिरोहित होने की व्यवस्था करने वाला वर्तमानादि काल उसका वैचित्य अर्थात विचित्रता, उस ढग से उसका वर्णन उसके कारण जो वक्रता अर्थात् बांकपन की सुन्दरता होता है (उसे कालवचिव्य वक्रता कहते हैं)। कैसी है ( वह कान्वक्रता) जहूां अर्थात जिम (वक्रना) मे कहा जाने वाला समय रमणीयता को प्रास्त होना है अर्थात मनौहर हो जाता है। किस वारण से ( मनोहर हो जाता है) औचित्य का अन्तरतम होने से। प्रसगप्राप्त होने के कारण प्रकरण की अधि- कारिक वस्तु का जो औवित्य अर्थात् उपयुक्तता है उसके आन्तरतम्य के द्वारा अर्थात् उसका अत्यन्त ही अन्तरग होने के कारण अर्थात उस वस्तु मे उत्कर्प लाने के कारण (रमणीप हो जाता है)। जैसे-
समविसमणिध्विसेता समंतदो मंदमंदसंवारा। अइरो होहिति पहा मणोरहाणं पि टुल्लंबा । ६x॥
(समविदयमनिविनोपा समन्ततो मन्दमन्दसक्चारा। अचिराद्द्विप्यन्ति पन्यानो मनोरयानामषि दुर्लडध्या।।)
नारो ओर से बराबरी एव ऊँबे नीने की विशेषताओ से हीन, धीरे-धीरे (बचा चचाकर) चलने लायक, ये रास्ते शीघ्र ही अभिलापाओं के निए भी दुगम हो जायेगे ॥। ९५।
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प्त्न वल्लभाविरहवँधुर्यकातरान्त करणेन भाविनः समयत् संभावनानुमानमाहात्म्यमुत्प्रेक्ष्य उद्दोपन विभावत्वविनवविलसित
शङ्भाकुलत्वेन केनचिदेतदभिघीयते-यदचिराद् भविध्यन्ति पन्यानो मनोरथानामव्यलड्मनीया इति भविष्यकालानिघायी प्रत्यपः कामप्यपराधवकता विकासयति। यथा वा- यहाँ पर भविध्य मे होने वाले समय की सम्भावना को कल्पना की महिमा की उत्पेक्षा करके उद्दोपन विभाव वभय-विलास को एव उसके स्वरूप की सुन्दरता को देखना न सहन कर सकने वाले, एव भय के वारण किमी अप्रवृतिम्पता का अनुभव कर शका से व्याकुल हो गये एव प्रियतमा के वियोग के दुय से भयभीत हृदय कोई इस प्रवार कहता है- कि शीम्र ही रास्ते मनोरथो के लिए भी दुर्तभ हो जायंगे-इन प्रवार यहाँ भविष्न पाल या प्रतिपादन करने वाला (नट्-) प्रत्यय निसी अपूर्व) उत्तराई वी वरता को व्यक करता है। अथवा जैते-
नवा: सौभाग्यातिशयस्य कामपि दर्शा मन्तु व्यत्पन्त्यमो। भावस्तावदनन्यजस्व विधुरः कोऽप्पुद्यमो जन्नते पर्याप्ते नधुविभ्रमे तु किमयं कर्लॅति फम्पामहे॥ ६६। जबकि आर्द्रहृदय लोगो को कोई अपूर्व (आनन्द) प्रदान करते हुए ये अभिनव पदार्थ रमणीयता के उत्कर्ष किसी अनिवंचनीय अवस्पा को प्रापि के लिए प्रयत्नशील है तभी कामदेव वा कोई विकल कर देने वाला उद्योग दिखाई पडने लगा है तो भला वसन्त वैभव के पूर्ण हो जाने पर यह क्या करेगा ? इन लिए हम कप रहे हैं।। ९६ ।। प्रत्न व्यवस्यन्ति जम्भते कर्ता कम्पामहे चेति प्रत्ययाः प्रत्पेकं प्रति नियतालाभिघायिनः कामपि पदपरार्धवकरता प्रस्थापयन्ति। तथा च- प्रथमत रावतीर पमयुसमयसौकु मार्यसमुल्लसित सुन्द रप दार्थसार थं तमुन्मेष- समुद्दीपित सहज विभव विलसितत वेन मकरकेतोर्मनाड्नात्रमाघवसाना- म्यसमुल्लसितातुलावतेः सरसहवयवितुरताविधायी कोर्डननि संरम्भः समुग्जम्भते। तस्मादनेनानुमानेन परं परिपोषमधिरोहति फुसुमा- करविभवविभ्रमे मानिनीमानदतनदुर्तलिततन् दितसहजसौकुमाय- संपत्संज नित समुचित जिगीपावत्तरः किमसौ विघास्यतीति विकुत्पयन्त-
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द्वितीयोन्मेप' २५७
रतरपु सुमझर निफर निपासफातरांत करणा किमवि कम्पामहे चकित- चेतस-संपध्यामहे इति प्रियतमाविरहृविधुरचेतसः सरसह्यत्य कस्य- चिदेतदभिघानम्। यहां व्यवस्पन्ति (मे नद्), जम्मते (मे लूट्, वता (मे लुट्) एवं कम्पामहे ( मे रट्)-ये प्रत्येक निश्चित काल का प्रतिपादन करने वाले प्रत्यय पद के उत्तराध की किसी अपूर्य वक्रता को व्यक्त करते हैं। जैसे कि पहले पहल अवतीर्ण हुए वसन्तवाल की सुकुमारता से अत्यधिक शोभा- यमान पदार्थ समुदाय के प्रसार से भलीभांति उद्यास किये गये ऐश्वर्य से सुशोभित होने के कारण थोड़े से ही चमन्त के समोग से उत्पल अनुपम पराक्रम वाले कामदेव का सहदय हृदयो को कष्ट प्रदान करने वाला कोई वत्माह उतान हो गया है। इमनिए इस अनुमान के द्वारा (कि यदि अभी ही ऐसा हाल है तो आगे चलक र) वसन्तकतु के वैभव विलास के पूर्णतया परिपुण्ट हो जाने पर म निनियो के मान को खण्डित पर देने के कारण ढीठ तथा उत्पन्न स्वाभाविक सुकुमारता की सम्पत्ति वाला और उत्पन्न हो गए समुचित विजय की इच्छा के अवसर वाला यह (कामदेव) क्या करेगा? इस प्रकार सोचने हुए उम (कामदेव) के पुष्पवाणो के मिरने से भयभीत हुदय वाले (हम) कुछ कांप रहे हैं अर्थात घवडा रहे है ऐमी कोई प्रियतमा के वियोग से दुखी हृदय वाले विसी सहृदय की यह उक्ति है। एवं कालवकतां विचार्य कमसमुरचितावसरां कारकवक्रतां विचारयति- इम प्रकार कालवक्रता का विवेचन कर क्रमानुबल अवसरप्राप कारक- वकता का विवेचन करते हैं- यञ कारकसामान्यं प्राधान्येन निवध्यते। तत्वाध्यारोपणानसुख्यगुणभावाभिघानतः ॥२७॥। परिपोपयितुं का श्रिद्भङ्गीभणितिरम्यताम्। कारकाणां विपर्यासः सोक्ता कारवचक्रता ॥ २८॥ यहाँ प्रधान की गौणना का प्रतिपादन करने से एव (गोण मे) मुध्यसा का अरोप करने मे विसी (अपूर्व) भगिमा के द्वारा रथन की रमणीयता को परिपुष्ट करने के लिए कारक सामान्य का प्रधान रूप से प्रयोग किया जाता है, (इस प्रवार के) वारको के परिवर्तन से युक्त उसे कारक बब्ता वहा गया है।। २७-२८ ॥ १७व० जो०
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सोक्ता कारकवकता सा कारकवकवविक्कितिरमिहिता। कीदृशो-यस्यो कारकार्णा विपर्यासः साधनानां विनरिवर्तननु, नोग- मुस्ययोरितरेतरत्वापतिः। कथम्- यतु कारक सा मा न्यं मु ध्यापेक्ष रा करणादि तत् प्राधान्येन मु्यभावे प्रनुत्यते। कश युकया-तत्वा- ध्यारोपणात्। तदिति मुकष्यपराम्शं, तस्त भावस्तत्वं तदब्ारोयगात् मुस्यभावसमर्पणात् । तदेवं मुल्यत्य का व्यवस्वेत्याह-मुडयगुण- भावाभिधानतः । मुस्यस्म यो गुणभावस्तदभियानादमुड्यवेनोप- निबन्धादित्यर्थ। किमर्थन्-परिपोधयितुं काचि, भड्गीनगितिरम्य- ताम्। कांचिदपूर्वा विस्छित्युव्तिरमणोयतामुग्लासवितुत्। तदेव- मचेतनस्यापि चेतनसंभविस्वातन्क्रासमर्गादमुस्यस्य करणादेर्वा कर्तु त्वाध्या रोपणाद्यन्न कार कविपर्यासश्चमतकारकारी संबद्यते। यय।-
उसे कारक वक्रता कहा गया है बर्षात् (कर्ता आदि) कारकों के बाकपन से होने वाली शोभा कहा गया है। कैसी है ( वह कारक वक्रग) जिसमे कारको की विलोमता बर्थाद साधनो का विशेष परिवर्तन रहता है अर्थाद अप्रधान एव प्रधान को एक दूसरे से बराबरी जा जाती है। कैसे -- जो कारक सामान्य होता है अर्थाव् प्रधान की अपेक्षा (गौग) कारण आदि है वह प्रधान रूप से अर्थात मुख्यरूप से प्रयुक्त होना है। किस ढंग से (प्राघा- न्येन प्रयुक्त होता है) प्रधानता का अध्यारोन करने से। (तत्वाष्यारोप मे) तद शन्द से मुख्य का ग्रहण होता है। तव का भाव तत्ता हुआ उसके अध्यारोप से अर्थाव् प्रधानता का प्रतिपादन करने से (गोण का प्राधान्वेन प्रयोग होता है)। तो इस प्रकार प्रधान कारक की कया व्यवस्था होती हैँ इसे बताते है-भुख्न को गौणता के कथन से। अर्यात् प्रधान को जो गौणना है उसका कथन करने मे गौमरूप में प्रधान का प्रयोग करने से यह अभि- प्राय हुआ। (ऐसा परिवर्तन) किनलिए (किया जाता है)-किसी भगी भणिति की रम्यता को पुष्ट करने के लिए। अर्थात् विक्छित्ति द्वारा कमन की किसी अपूर्व रमणीयता की सृष्टि करने के लिए। तो इस प्रकार चेनन में सम्भव होने वाली स्वतन्त्रता को अचेतन मे भी प्रतिपादित करने से अथवा गोप करणादि मे कतृता का आरोप करने से जहाँ कारको का परिवर्तन
हूं) जैसे- चमत्कार को उत्पन्न करने वाला होता है (वहां बरक वक्रता होनी
याच्जां दन्यपरिग्रहप्रणयिनों नेक्ष्वाकव शिक्षिता: सेवासंवलितः कदा रघकले मोलो निबदोऽञजलि: ।
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द्वितीयोन्मेष २५९
सर्वे तद्विहितं तथाप्युवधिना नैवोपरोध: कृतः पाणि: संप्रति मे हठातु किमपरं स्पष्टं धनुर्धावति ॥ ६७।। दैन्य को स्वीकार करने के विषय मे समुत्सुक मधुकरी वृत्ति की शिक्षा दश्वाकुवसियो ने कभी भी ग्रहण नही की। रघुकुल में भला कब सेवा भाव से सतकित (किसी के मामने) मस्तक पर रख कर हाथ जोडने की वा सुनी गई। परन्तु वह मत किना गया फिर भी सागर ने बाँध नही बँधने दिया। और क्या अव तो मेरा हाथ बरवस धनुष का स्पर्श करने के लिए दौआा जा रहा है।। १७।। अ्न्न पाणिनि धनुमंहोतुमिच्छामीति वक्तब्ये पाणि करणमृतस्य कतु स्वाध्यारोप: कामपि कारकवकतां प्रतिपद्यते। यथा वा- स्तनद्वन्द्वम् इत्यादौ ॥। ६र । वहाँ हाय मे धनुष स्रहण करना चाहता तै यह कहने के बजाय करण- भून पर कर्तृत्न के आरोर वाला पाणि किसी अपूर्व कारकवकता को प्रसतुन करता है। यथा वा- निष्पर्यायनिवेशपेशल रसै रन्योन्यनिर्भरत्सिभि- हँस्ताप्रयुगपन्निपत्य दश्भिर्वमतृतं कार्मुकम्। सव्याना पुनरप्रयोयसि विषावस्मिन् गुगोरोपणे मत्सेवाविदुषामहंप्रथमिक काप्यम्बरे वर्तते॥६६॥ अथवा जैसे- (राजण के) अपरिवर्तनीन ढग से ब्रहण करने के विषय मे पेशल अभि- निवेश वाले और एक दूमरे की भर्त्सना करने वाले दमों वामें हायो के अगले भागो के द्वारा एक माय आगे बहकर धनुप पकडा गया और अपनी सेवा को भलोमांति जानने वाले दाहिने हम्जाप्रो की इस धनुष के ऊरर प्रत्यसा वटाने को प्रककरिया की मिद्धि के अभाव मे सारे आकाश मे एक अनिर्वचनीय अहमहमिका फंती हुई है॥ ९१।। अत्र पूर्ववदेव कर्तत्वाघयारोपनिबन्धनं कारकवकत्वम्। यया वा- बद्धस्पर्द्ध इति ॥ १००॥ यहाँ पर भी पहले की ही तरह कतृत् के आरोर वाली कारकवकता है। अथवा जैसे-'बद्धस्पर्घ' इत्यादि पहने उदाव सं० १।६६ पर उदत र्योक।
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एवं कारकवपतां विचार्य नमसमस्वितां सांख्यावत्रतां विचारयति, तत्परिच्छेदकतवात् संख्याया :- कर्वन्ति काव्यवैचित्य विव्क्षापरतन्त्रिताः। यत्र संख्याविपर्यासं ता संख्यावकता विदु:॥ २६॥ इस प्रकार कारक्वक्रता का विवेचन कर, सख्या के उसकी इयता बताने बाली होने के कारण प्रमानुपूल 'सव्यावक्रता' का विचेचन करते हैं- जहाँ पर (कविजन) काव्य मे विचिषता के प्रतिपादन करने की इच्छा से पराधीन होकर वचनो का परिवर्तन कर सेते है उसे सख्यावक्रता (अथवा वचनवब्रता) बहते हैं॥ २१॥ मत्र यस्यां कवयः काव्यवचित्रयविविक्षा परतन्त्रिता: स्वरूर्मविचित्र- भावामिधित्सापरवश्ञाः संरयाविपर्यास वचनविपरिवर्तन कु्वन्त विदधते तां संख्याव्रतां विद्ुः तद्वचनवऋत्वं जानन्ति तद्विदः । तदयमत्रार्थ :- यदेकवचने द्विवचने प्रयोक्तव्ये वैचित्र्यार्थ वचनान्तर यत्र प्रयुन्यते, भिन्नवचनयोर्वा यत्र सामाना धिकरण्यं विधोयते। यथा- जहां अर्थात् जिस (वक्ता) मे वविजन काव्य के वैचिष्य को विवक्षा से परतम होकर अर्थात् अपने व्यापार की विचित्रता वा प्रतिपादन करने वी इच्छा से पराधीन (अथवा वाध्य) होकर सख्याओ मे विपर्यास अर्थात वचनो वो परिवर्तन कर देते है उसको 'संख्यावक्रता' बहते हैं अर्थात् काव्य- ममज् ऐसे वचनो की वक्रता समझते है। सो यहाँ इसका आशय यह है कि एकवचन अथवा द्विवचन का प्रयोग करने के अवसर पर जहां विचित्वता लाने के लिए अन्य वचन का प्रयोग होता है, अथवा जहाँ भिन्न- भिन्न वचनों का समान अधिकरण से युक्त रूप मे प्रयोग किया जाता है (वहां सहधावक्रता होती है) जँसे- कपोले पत्राली करतलनिरोघेन मुदिता निपीतो मुहः कण्ठ लग्नस्तरलयति वाप्प: स्तनतटीं प्रियो मन्युर्जातस्तव निरनरोधे न तु वयम् ॥ १०१ ॥ हे पराद्मुखखि! (तुम्हारे) गण्डस्यल पर बनी हुई (कस्तूरी-चन्दन वी) पत्र-रचना को हथेनी के आच्छादन ने मसल डाला है, तपा अमृत के समान मनमेहर (तुम्हारे): इस मथर रस को निःश्ामो ने पूरी तरह से पी डादा
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द्वितीयोन्मेप
है, एव बार-वर गले तक बहता हुआ आँसू तुम्हारे स्नतट को कँपा रहा है (इससे जाहिर है कि) क्रोच (ही) तुम्हारा प्रिय बन गया है, न कि मैं ।।१०१।। अ्त्र 'न त्वहम्' इति वक्तव्ये, 'न तु वयम्' इत्यनन्तरड्गत्वप्रति- पादनाथं ताटस्य्यप्रतीतमे बहुवचनं प्रयवतम्। पथा वा- वयं तत्वान्वेषान्मवुकर हृतास्तवं खलृ कृती ।। १०२॥ अन्नापि पूर्ववदेव ताटस्थ्यप्रतीतिः। यथा वा- फुल्लेन्दोवरकाननानि नयने पाणी सरोजाकराः ।१०३। यहां 'न कि मैं' (तुम्हारा प्रिय हूँ) ऐसा कहने के बजाय 'न कि हम' (तुम्हारे प्रिय हैं) ऐमा कहने मे अपने अन्तरङ्ग न होने का प्रतिपादन करने के लिए, साय ही अपनी तटस्यना का बोध कराने के लिए बहुवचन का प्रयोग किया गया है। अथवा जैसे-
(शाकुत्तल मे शकुन्तया के कर मडरते हुए स्रमर को देखकर दुष्यन्त का यह कथन कि) हे भ्रमर हम तो असलियत का पता लगाने में ही मारे गए (लेकिन) तुम कनकृत्य हो गए । १०२ ॥ यहां पर भी पहले (उदाहरण) की ही तरह (व्यं) के द्वारा ताटस्थ्य की प्रतीति कराई गई है। अथवा जैसे-( उस नायिका की) आँखें विकसित नीकरमल के वन तथा हाथ कमलो की खान है।।१० ३। अ्त्र दिवचन बहुवचनयो: सामानाधिक रण्यलक्षण. संडयाविवर्यास: सहृदय हृदयहारितामावहति। यथा वा- शास्त्राणि वक्षुर्नवम् इति ॥ २०४॥ प्न्न पूर्ववदेवैकवचनबहुव चनयो: सामानाधिकरण्यं थैंविश्वविघायि। यहां द्विवचन एव बहुवचन का सामानाधिक रण्वरूप वचनो का परिवर्तन सहुदपो के लिये मनोहर हो गया है। अभवा जैसे- शाख (रावण की) अभिनव दृष्टि है। यह । १०४ ॥ यहाँ पहले (उदाहरण) को ही तरह एकवचन और बहुवचन का सामाना- घिकरण् विचिव्रता की मृष्टि बरता है। एवं संइ्याव करतां विचार्य त व्विप यत्वात् पुरशर्गा कमसमपिताबसरा पुर्पवकतां विचारपति-
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२६२ वक्रोतिजीवितम्
प्रत्यक्तापरभावश्व विपर्यासेन योज्यते। यत्र विच्छिच्ये सैपा तेया पुरुपनकता ॥ ३० ॥ इस प्रवार राड्य्यावक्रता का विवेचन कर पुरथो के उसका विषय होने के वारण क्रमश अवसर प्राप्त पुरपवब्रमा वा विवेचन करते हैं- जहाँ वैचिन्स की सृष्टि करने के लिए अपने स्वरूप को और दूतरे के स्वरुपमो परिवर्तन के साथ निवद्ध किया जाता है उसे 'पुरुपव त्रता' समझना चाहिए॥ ३ । सन् यस्यां प्रत्यकता निजातमभावः परभावश्र सन्यत्वमुनयमप्येत- द्विपमसिन योज्यते विपरिवर्तनेन निबध्यते। किमर्थम्-विच्छितमे वैचित्याय सेवा वणितस्वरूपा जञेया शातव्या पुर्षवत्रता पुएषयनत्चविच्छितिः । तदयमन्नार्थः मदन्यस्मिश्ुतमे मध्यमे वा पुश्ष प्रयोदतत्ये वैचिव्यामात्य कदाचित् प्रथम: प्रयुज्यते। तस्माच्च वृर्यकयोगक्षेमतवादर्मदादेः प्रातिपदिकमात्रस्य व विपर्यास पर्यवस्यतत। जहां अर्थाद जिस (बब्रता) मे प्रत्यता अर्थाद् अपना स्वरुप तथा परभाव अर्थात् अन्य का स्वरुप ये दोनो ही परिवर्तत के साथ सयोजित बिये जाते हैं अर्थाद प्रयुक्त जिए जाे है। निसा लिए-विष्षिति अर्थाद विचित्रता हाने वे लिए। ऐसा जिसव वर्णन विया गया है उसे पुरुपवक्रता अर्थाद पुरषो के बावपन मे उत्पक्ष शोभा जानना अथवा समझना चाहिए। तो यहई इसवा आशय यह है कि जहाँ अन्य, उस्तम, अथवा मध्यम पुरप वा प्रयोग फरने के अवसर पर, विचित्रता लाने के लिए अन्य पुरष अर्मात प्रथम पुरुप का प्रयोग किया जाता है। और इस लिए विसी पुरप के ले आने औ: सुदक्षित रखने के कारण अस्मदादि और वेवल प्ातिपदिक वा विरोध समाक्ष हो जाता हूँ। यथा- कोशम्बो परिभूय नः कृपणकविद्व पिभि: स्वीकृतां जानाम्येव तथा प्रमादपरता पत्पुनयद्वषिण.। स्त्रीणा च प्रियविप्रयोगविधुरं चेतः सदँवात्र मे वक्तु नों सहते मनः परमतो जानावु देवी स्वयम् ॥१०५।' जञात ही हू जैसे- राजनीति से विद्वेप रक्षने वाले महाराज वी बैसी हापरवाही जिसके फारण) माभूली से शमुओो के द्वारा हम लोगो को पराजित करके बोझाम्बी
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ग्रहण कर ली गई। सिियो का हृदय प्रियतम के वियोग से विह्वल होता ही है अत इस विपय मे मेरा भन सदा से ही ुछ कह सकने मे असमर्थ रहा है। इसके आगे स्वयं देवी जानें (कि उन्हे क्या करना चाहिए)।॥१०५॥ अ्त्र 'जानातु देवी स्वयम्' इति युप्मदि मध्यमपुरुपे प्रयोक्तच्पे प्रातिम दिक्मात्रप्रयोगेण वकतुस्तदश्रकत्यनुष्ठानता, मन्यमानस्मोदासीन्य- प्रतीति. । तस्याश्रव प्रभुत्वात् स्वातन्त्रयेण हिताहितविचारपूर्वक स्वयमेव कर्तव्यार्थप्रतिपत्ति: कमपि वाक्यवक्रभावभावहृति। यस्मावेतदेवास्य वाद्यस्य जीतित्वेन परिस्फुरति। यहाँ 'युप्मद्' शब्द के मध्यम पुरुष के प्रयोग करने के स्थान पर 'देबी स्वय जाने' इस वेवल प्रातिपदिय के प्रयोग के द्वारा उसके द्वारा न किए जा सकने योग्य कार्य को जानने वाले वक्ता के औदासीन्य की प्रतीति होती है। तथा उसके प्रभु होने के कारण स्वतन्त्रतापूर्वक हित एव अहित को ध्यान मे रखकर वर्तव्य के लिये विचार करना विसी (लोकोत्तर) बावयवक्रता को धारण करता है। क्योंकि यही इस वाक्य के प्राण रूप से स्फुरित होता है। एवं पुरुषवकतां विचार्य पुरुषाश्रयत्वादात्मनेपदपरस्मपदयोरुचिता- वसरां वकतां विचारयति। धातूनां लक्षणानुसारेण नियतपदाश्रयः प्रयोग- पूर्वाचार्याणाम् 'उपग्रह'-शब्दाभिधेयतया प्रसिद्धः तस्माततदभिधानेनव व्यवहरति- पदयोरुमयोरेकमौचित्यादू विनियुज्यते। शोभायै यत जत्पन्ति-तासुपग्रह्बकताम् ॥३१॥। इस प्रकार पुरुपवक्रता का विवेचन वर पुर्पो के आश्य होने के कारण, उपयुक्त अवसर प्राप्त, आत्मनेपद्र एव परम्मपद की वक्रता का विवेचन करते हैं। आचार्यों मे, धातुओं का लक्षण के अनुसार निश्चित पद के आश्रय वाला प्रयोग 'उपग्रह' शब्द के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। इस लिये उसी नाम से ही ( ग्रन्थकार कुन्तक भी) व्यवहार करते हैं- जहाँ पर औचित्य के कारण सौन्दर्य की सृप्टि के लिए (आत्मनेपद) एवं परसमपद) दोनो पदो मे से एव का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है, ससे (व विजन) उपग्रह बब्रता कहते हैं॥ ३१ ॥ तामुवतस्वर पामुपग्रहचयतामुप प्रहवतत्ववित्छिति जल्पन्ति कवयः कथर्यात। कीद्शी-यत्र यस्मां पदमोरुभयोमंध्या देक मात्मनेपदं
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२६४ वक्रोकिजी वितम्
परस्मैपदं वा विनियुज्धते वितिब्यते निरमेन। का्मात्कारगात्- औचित्यात। वर्ष्यमानस्य वस्तुनो यदौचित्यमचितभावस्तस्मात्, तं समाधित्येत्यर्यः। किमर्यम्-शोमायं ति्छित ये। यथा- प्रनिसाकत किद गये स्वरू वाली उम (वक्रता) को कविजन उपन्रदुवकत सर्यान् उब्रह्ट के कारण उत्पन्न वाकान को गोना कहने हैं। कैनी { वक्रज को)- नहं जर्वा जिन (वक्रग) मे दोगे पदी के मध से बातनेर अयवा परम्मरद एरका विनिनोा अर्थात् नियमपर्वकु विसेयरूर से प्रबोग किया जाता है। किम कारण सेमोविल के कारण। वर्गन को जाने वाली पस्तु का जो औवित्व अनोत उनपुक्ताा होरी है उनके कारण अर्थान उतका साधन प्रहुण कर। क्रिन िने-सेना अर्यन् रमचीरता के लिे। जैसे-
तस्पापरेव्वपि मृगेबु शरान्म् मुक्षो: कर्णान्तमेत्य बिभिटे निविडोऽि मुष्टि। श्रासतिमात्रचदुत रुमरयत्तु नेत्रं: प्रोढ़ प्रियानयन विभ्न मवे ष्टिता नि ॥१०६ ॥ भय के कारण अत्यधिक चक्षत नयनो से (साम्य के कारण) प्रगल्म प्रिया के नेत् विलामो के वयपार का स्मरण कटाने वाले दूसरे हुरिणो पर भी बाण चलाने की इच्छा वाले उम [राजा दशरय) वी वत्मन्व दद मुड्गी भी यवण पर्यन्त्र पहुँचकर निथिल हो गई ॥ q०६ ॥ मत्र राज. सुललितवितासवतीलोवनविलासेव स्मरणगोवर- भवतरत्तु तत्परामत चितवुते राडिमकप्रयत्नपरिस्पन्द विनि वर्तमाना मुष्टिबिभिदे मिद्यते स्म। सवयमे वेति कर्बंकईनिनन्य नमात्मनेनदमजीव चमत्कारिणी क्ामपि वाकमवक्रनामाव हति। यहां विलामवती (प्रियतमा) के सुन्दर हाव भावो से युक्त नेत्र व्यपारो की याद आ जाने से उसके वश्ीभूत वित्तवृत्ति वाते रत्जा (दशाय) कौ शारीरिक प्रथाम के ब्यपार से हीन मुद्ी अपने बाप ही 'भिन अर्थान् शिपिल हो गई। इम कर्मे करत्ता का कारण आत्मनेरद अत्यन्त ही नमलार को उत्पन्न करने वाली किसी (अपूवं) वाकसवक्ररा को धारण करता है। एवमुपब्रहवकर्ता विचार्य तदनुसंभविनी प्रत्ययान्तरवभता विचारयति-
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द्वितीपोन्मेप २६५
विहितः प्रत्ययादन्यः प्रत्ययः कमनीयताम्। यत्रा कामपि पुष्णाति सान्यत प्रत्ययवकता ॥ ३२ ॥ इम प्रकार उपग्रहवकता का विवेचन कर उसके बाद सम्भव होने वाली दूसरे प्रत्ययो की वक्रता का विवेचन करते है- जहाँ (तिङ्गादि) प्रत्यय से किया गया प्रत्यय किसी अपूर्व रमणीयता को पुष्ट करता है वह दूसरी प्रत्ययवक्रता होती है॥ ३२। सान्या प्रत्ययवकता सा सामाम्नातसपादन्यापरा काचित् प्रत्यय- वक्नस्वविच्छित्तिः। अ्स्तीति सम्बन्धः। यत्र यस्यां प्रत्ययः कामप्यपूर्वा कमनीयतां रम्यतां पुष्णाति पुष्यति। कीदृशः-प्रत्ययात् तिडादेविहित: पदत्वेन विनिमितोऽन्य: कश्रिदिति।
वह दूसरी प्रत्ययवक्रता होती है अर्थात् जिसका स्वरूप पहले बताया गया है उससे मिन्न कोई (नवीन) प्रत्ययी के शकपन का सौन्दर्य होता है। (इम कारिका का 'अस्ति' क्रिया के साथ सम्बन्ध है।) जहां अर्थात जिस (वकता) मे प्रत्यय किसी अपूर्व कमनीयता अर्थात् सुन्दरता को पुष्ट करता है। कँसा (प्रत्यय)-तिइादि प्रत्ययो से किया गया पद रूप से बनाया गया कोई दूसरा प्रत्यय (जहां रमभीपता का पोपण करना है वह प्रत्यय- व्क्रता होती है)। जैसे --
लीनं वस्तुनि येन सूक्ष्मसुभगं तत्वं गिरा कृष्यते निर्मातुं प्रभवेन्मनोहुरमिदं वाचव यो वाक्पतिः । बन्दे द्वावपि तावहं कविवरी वन्देतरां तं पुन-
जो अपनी चीणा के द्वारा वस्तुओ मे गुपत रूप से निहित सूद्म सुन्दर तश्व को आकृष्ट कर लेता है और जो वाचस्पति अपनी वागी के ही द्वारा यह रमणीयता तत्त्व प्रस्तुन कर देने मे समर्थ होता हूँ उन दोनो कविवरो को मैं प्रणाम करता हूँ और फिर उस (महापुरुष) को और भी अधिक प्रणाम करता हू जो परिश्रम को भलीभाँति समझ् कर इन दोनों का बोज चतार ले सबने में सक्षम हो सकता हैँ ॥। x०७ ।। 'वन्देतराम' इत्पत्र कापि प्रत्ययवकरता कवेश्चेतसि परिसकुरति। नतत एव 'पुनः'-शब्द पूर्वस्माव्विशेपाभिवायित्वेन प्रमुवतः।
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२६६ वक्रोफिजीवितम्
'वन्देतराम्' यहाँ पर कोई अपूर्व प्रत्ययवक्रता कवि के हुदय में सफुरित होती है। इसीलिए 'वुन' बब्द का प्रबोग पहले को अपेक्षा विशेष का प्रतिपादन करने के लिये किया गया हूँ। एव नामारमातस्वरूपयो: पदमो प्रत्येकें प्रकृत्याद्यवयवविभाग- द्वारेण यथासंभवं वऋत्वं विचार्येदानीमुपसर्गनिपातयोरव्युत्पन्नत्वाद संभव द्विभविभवितत्वाच्च निरस्तावयवत्वे सत्यविभक्तयोः साकल्येन वफ्रता विचारयति-
इम प्रकार नाम एवं आध्यात रूप पदो मे से प्रत्येक के प्रकृति आदि अद्धों को विभक्त करके (अलग अलग) यमातम्भम वत्रता का विवेवन कर अछ् उपनर्ग तथा निपातो के रूद होने से तथा विभक्तियों के सम्भय न होने से बङ्गो से हीन होने पर समद रूप से वषता का विवेचन करते हैं- रसादिद्योतनं यस्यामुपसर्मनिपातयोः। वाक्यैकजीवितत्वेन सा परा पदवकता ॥ ३३।। जिस (वक्रता) मे उपसर्ग एव निपातो की (मृङ्गारादि) रसो कौ प्रकाशकता (व्यंजवता) वावय के एकमात्र प्राप रूप मे होती है, वह दूमरी मदवक्रता होती है।। ३३ ।।
सापरा पदवक्ता-सा समपितस्व रूपापरा पूर्वोक्तव्यतिरिकता पदवकत्व विष्छिति: । अस्तीति संबन्धः । कीद्शी-मस्मां वकताया भुपसर्ग निपातयोर्वेमाकरणप्रसिद्धा भिधानयो रसादिद्यीतनं शृगारप्रनुति. प्रकाशनम्। कथम-चापयँकजीघितत्वेन। वाक्यस्य श्लोकादेरेक- जीवितं वावयकजीवितं तत्य भावस्त्त्वं तेन। तदिदमुफ्तं भवर्ति- यट्टाषयस्यंकस्फुरित भावेन परिस्फुरति यो रक्षादिस्तत् प्रकाशनेनेत्यर्थः। पया-
वह दूसरी पदवत्रता होती है अर्थात् पहले बताई गई पदवक्रता से भिन, जिसरा स्वरप बताया जा रहा हूँ वह पदो के बाकपन की शोभा होती है। (इस कारिया वा) अस्ति इस त्रिया से सम्बन्ध है। कँसी (वक्रता)-जिस वद्रता मे वैयावरणों में प्रसिद्ध सज्जा वाले उपसर्ग एवं निर्मातो बा रसादि शा धोनन अर्थाव् भृङ्गारादि (रसो) का प्रवाशन (होता है)। वैसे (होता है)-वाबय के एक मात प्राण रप से, वाक्य अर्थात् इनदोवदि उसका जो अकेष जीवन है यह वहा जायगा वाकम का एव मात्र जीवन। उसके भाव
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से। तो इसका आशय यह है नि-वाबय के एकमात प्राण रूप मे जो रसादि स्फुरित होता है उसके प्रकाशन के द्वारा (जो जीवित भूत होता है)। जैसे- वैदेही तु कथं भविष्यति हहा हा देवि घीरा भव ॥। २०८॥ लेविन हाय (अत्यन्त सुकुमारी) जानकी किस दशा मे होगी ? हा देवि। धैर्ष धारण करो॥ ५०८ ॥
अरत्र रघुपतेस्तर कालज्बलितो ही पन विभावसंपत्समुल्लासितः संभ्रमी निश्चितजनितजानकी विपतिसंभावनस्तत्परित्राणकरणोत्साहुकारणता प्रतिपद्यमानस्तदेकाप्रतोल्लिखितसाक्षार कारस्तदा कारतया विस्मृत- विप्रकर्ष: प्रत्यग्ररसपरिस्पन्दसुन्दरो निपातपरपराप्रतिपद्यमानवृत्तिर्वा- वर्य कजीवितत वेन प्रतिभासमान: का्मप वाक्यवक्रतां समुन्मोलयति। तु-शवदस्य च वत्रभावः पुर्वमेव व्याख्यातः। यथा वा- यहाँ वर्षावाल में प्रकाशित उद्दीपन विभावो की सामग्री से उत्पन्न निश्चित रूप से उत्पन्न जानकारी की विपत्ति की सम्भावना वाला राम का सवेग सीवा के प्राणो की रक्षा करने के उत्साह का कारण बनता हुआ वैदेही के प्रति एकाग्रता के कारण उनके साक्षात्वार को विचित्र कर देने वाला तदाकारता के कारण दुरवस्था को भुला देने वाला नवीन रस के सक्फुरण के कारण सुन्दरता निपातपरम्पराओ के कारण प्राप्तमत्ताक होकर वाबय के एकमात्र प्राण रूप से प्रवीत होता हुआ विसी अनिवंचनीय वश्क्यबक्रता को प्रस्तुत करता है। तथा 'तु' शब्द की वक्ता की व्यास्या पहले ही (उदा० स० २२७ को व्यास्या करते समय) की जा चुकी है। अथवा जैसे- प्र यमेकपदे तया वियोग प्रियया चोपनत. सुदुःसहो मे।
(विद्रमोवंशीय मे उबभी के विरह से पीडित होकर पुरुरवा दुख प्रकट करता है कि जिनके भाग्य खराव हो जाने है उनके एक दुख मे दूमरा दुख लगा ही रहता है क्योकि) (एक ओर) एवाएक मुझे उस प्रियतमा का अत्यन्त असहय वियोग प्राप्त हुआ तथा (दूमरी और) नये-नये बादलो के आकाश मे छाजाने से उप्णतार हित होने के कारण रमण वरने योग्य दिन आ गए ॥। १०९।। प्रत्र ह्वयो: परस्परं सुद्ु सहतवोद्दीपनसामर्थ्यंसमेतयो: प्रियाविरह-
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२६= वक्रोपिनजीवितम्
सितर्वद्निदाहदक्षद क्षिगवातव्यजनसमानतां समर्यनत् कामपि वाश्य- वसरां समुदोपयति। 'तु' 'दुःररान्यां व प्रियाविरहस्पाघरय प्रतोकारता प्रतोपते । यथा च- यहां पर परस्वर अत्पन्न असहारा को उद्दी करने को सान््ये से नमुक प्रियतमा के विजोग एव वर्षा कात्ु, दोनों को समानका लिकता का प्रतिपादन करने मे तत्तर दो बार प्रयुक्त 'च' शब्द, एक हो समय मे उत्पन्न मग्नि, एव जलाने में नपुर दक्षिणवन रूर पसे की समानत्ा का समर्मेन करता हुआ किसी (अपूर्वं) श्लोक के वक्रमाव को प्रकाशित करता है। 'सु ' एवं 'दु' धन्दो के द्वारा प्रेनसी के विनोग का निराकरण अस्म्भव है। इस बात की प्रतीति होती है। तमा जैसे- मुहुरड्गुलिसं वृताघरोष्ठं प्रतिषेवाक्षरविश्ववानिरामम्। मुखमंसविर्वात पक्षम लाक्या: कथमप्युल्तमितं न चुम्बिं हु ॥ १०१।१ 'अभिज्ञान शाकुन्तल' मे राजा दुष्बन्त कहता है कि- सुन्दर बरोनिनो वाली आयों से युक्त, बार-जार बंगुलिसो वे दंके अवर वाते, एवं ('नही ऐवा नहीं' इस प्रकार) निवेध के अमरों के अस्पष्ट उच्चा रम के कारण रमगोन (उस बिकतमा पकुलला के) कन्बे की ओर सुडे हुए मुब को किसी प्रकार उठाया तो पर चूमा नही॥ ११९॥
तत्कालस मुचितत ददनेन्दुरसोन्दर्यस्य पूर्वप रिनुम्बतसस लितस मुद्दोपित- पश्चातापवतावेशद्योतनपरः 'तु'-शब्द का्मप वाक्यवकतामुतेनर्यत। यहां पर पहली कामना के कारण बेकावू हो उडी हुई पित वृति वाते नापक की पूर्वानुमव की स्मृनि से विशिन कर दिए गए हुए उस सनय के लिए समीचीन उस (सकुत्तरा) के मुजबन्द्र के सोन्दर्ष का चुन्जन न से पाने के कारण प्रयर हो उठे हुए पम्ात्तारवश उत्पन्न पहले के आवेज को अकाणित्ष करने मे कपा हुआ 'तु' शव एक लोमेतर वाक्पवक्ना को उद्ोस कर देता है। एतदुतरत्र प्रत्ययवऋ्वमें वं विघ्यय्रत्मपास्तरवक्रमावान्तर्मून ब्ात पथकुत्वेन नोक्तमिति स्वममेवोत्प्रेश्गीयम्। यथा- इन उपसर्गादिकों के आगे लगने वाले प्रसनयी की वकडा इस प्रकार को दूसरी प्रत्यन वकरनाओों में जम्जर्भून होने के कारण अलग से नही बजाई हाई, उनसी (सहुदवों को) स्वप उतेक्षा कर लेनी चाहिए। जैसे-
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द्वितीयोन्मेप· २६९.
येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापरस्यते तै वर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णो ।। १११।। जिसके कारण चमकती हुई कान्ति वाले मयूर पिच्छ से युक्त कृष्णावतार धारण करने वाले विष्णु के (शरीर की) अतिशायिनी कान्ति को दुम्हारा श्यामल शरीर प्राप्त करेगा ।। १११ ॥ अत्र 'अतितराम्' इत्यतीव चमर्कारकारि। एवमन्येपामपि सजा- तोयल्क्षणद्वारेण लक्षणनिप्पत्तिः स्वयमनुसर्तव्या। तदेवमियमनेका- कारा वऋत्वच्छित्तिश्रतुविघपदविषया वाक्यकदेशजीवितत्वेनापि परिस्फुरन्ती सकलवाक्यवैचित्र्यनिबन्धनतामुपयाति। यहाँ 'अतितराम्' यह पद अत्यन्त ही चमरकार को उत्पन्न करता है। इस प्रकार समानधर्भीय लक्षणो के आधार पर अपने आप लक्षणो की सिद्धि का अनुसरण कर लेना चाहिए (अर्थात् लक्षणो को घटित कर लेना चाहिए)। सो इस प्रकार यह चार प्रकार के पदो की विपयभूत अनेक प्रकार की वक्रताओ की शोभा वाक्य के एक भाग (मदो) मे ही प्राण रूप से स्फुरित होती हुई भी समस्त वाक्य की विचित्रता का कारण बनती है। वकतायाः प्रकाराणामेकोऽपि कविकर्मण: । तद्विदाह्लादकारित्वहेवुता प्रतिपद्यते ॥११२॥ इत्यन्तरश्लोक:। वक्रता के प्रभेदो मे से एक भी प्रभेद कवि व्यापार (काव्य) के काव्य- म्मजो को आनन्दित करने का कारण बन जाता है॥ ११२॥ यह अन्त रश्लोक है। यद्यवमे कस्यापि वत्रताप्रकारस्य यदैवंविधो महिमा तदेते बहवः संपतिता: सन्तः कि संपादयन्तीत्याह- मदि वक्रता के एक भी भेद का ऐमा माहात्म्य है (कि वह वाव्यतत्वज्ञो को आह्ादित करने लगता है) तो ये बहुत से भेद (एक साथ ही उपस्थित होकर) वया करते हैं-यह बताते हैं- परस्परस्य शोभायैः वहयः पतिताः क्वचिन्। प्रकारा जनयन्त्येतां चित्रच्छायामनोहराम्॥।३४॥। बरी-कही परस्पर सौन्दर्य को सृष्टि के लिये ( एक साय) बहुत से
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२७० वक्रोस्तिजीवित म्
(वक्रताओं के) प्रभेद एकत्र होकर इसे विविन कान्तियों से रमणीन वना देते हैं॥। ३४। ववचिदेकस्मिन् पदमात्रवाके वा वरताप्रकार वकर वप्रभेदा बहवः प्रभुता: कविप्रतिभामाहात्म्यसमुल्लसिताः। किमर्नम्-परस्वरहप शोभाये, अन्योत्स्य विच्छितने। एतामेव चित्रव्छायामतोहरामनेका- कारका्तिरमगीयां वक्नां जनमन्त्यु:्पादयनत। यया- तरन्तीव इति ॥ १ १६॥
कनही-वही वा अर्थ है केवल एक पद मे अथवा एक वाक्प में बहुन से वक्रताप्रकार, वाकनन के प्रभेद कवि को शक्ति महता (प्रभाव) से उत्तन्ष होकर। किस लिए-परस्वर की शोभा के लिये एक दूसरे को रमणीरता के लिए (उत्पन्न होकर) इसी वक्रता को विचिन छाता ते मनोहर अर्थात् अनेक प्रकार की कमनीमता से रमणीय बना देते हैं। जैसे- (उदाहरण सख्या २१९१ पर पूर्वोद्यृत) तरन्ीवाङ्गानि' इत्मादि पद ॥ ११३॥ अत्र कियापदानां त्रयाणामवि प्रत्येक त्रिप्रकारं वैबित् परिस्कुरति- क्रियावैचित्यं कारकर्वचित्यं कालवैविश्यं घ। प्रथिम-हतन-जघन- तरुनिम्नां त्रमाणामपि वत्तिरवचित्पम्। लावग्यजलधि-प्रागम्म
प्रकार एकस्मिन पदे वावये वा संपतिताश्रिशच्छायामनोहुरमेनामेव चेतनवमतकारकारिणों वाक्यवकनामा व हनिति । यहाँ तोनो ही कियाबदो में सेहर एक की नीन प्रकार की विवितता प्रकाशिन होती है-(१) करिया की विचिनना, (२) कारक की विचित ता तथा (३) काल की विचितना। 'विम' 'सनजयन' एव 'तरमा' तीन नब्दो मे वुतिर्वैबित्य की बकता है। 'कावण', 'जलवि', 'प्रापल्मप' 'सरलता' एव 'परिचिम शब्दें मे उपचारवक्रता है। तो इम प्रकार ये बहुत से वक्रताओ के प्रभेद एक ही पद अथवा वाक्त मे साय ही एरुन होरुर चिन्र क शोभा के सहय चित्तारुर्षक सहूदवो को आनत्द प्रदान बरने वाली इमी वाकपवक्रता को धारण करते हैं। एवं नामायातोपसर्गनिपातलक्षणस्य चनुवियसनापि पद्रस्प पयासंभवं वकताप्रकारान् विचावॅदानो प्रकररणमुपसंहुत्यान्यदव- तार्यति-
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द्वितीयोन्मेव २७१
इम प्रकार नाम, आख्यान, उपसर्ग एवं निपात रूा चार प्रकार के पद को दक्रता का सथासम्भव विवेचन कर अब इस प्रकरण का उपसहार करके दूसरे प्रकरण को अवतरित करते है वाग्वल्ल्या: पद्दपतलवास्पदतया या वक्रतोद्गासिनी विच्छित्ति: सरसत्वसंपदुचिता काप्युज्जला जुम्भते। तामालोच्य विदग्धपट्पद्टगएरववियप्रस् नाश्रयि स्फारामोदमनोहर मधु नवोत्कण्ठाकुलं पीयताम्।।३५॥। वाणीरूपी लता को पदरूपी किसलयो के आश्रय से सरसत्त (श्रृद्गारादि की व्यज्जरुता, एव तातालिक रम की प्रचुरता) की सम्पत्ति मे मम्पन वक्रता (उत्तिवचित्य, एवं बालचन्द्र के सहत सुन्दर रचना का सयोग) से सुशोभित होने वाली एव उज्ज्वर (सघटना की सुन्दरता से युक्त एवं पत्तो की शोभा से युक्त) जो कोई अलौकिक विक्किति (कविककौशल की कमनीयता एव सुन्दर ढङ्ग से पतो का विभाग) उल्नित होनी है, उसका विचार करके सहृदय रूप घ्रमरो का समूह वाक्यरूपी पुष्पो के आश्रय वाले अत्यधिक आमोद (सहृदयह्सादकारिता एव सुगन्धि) के कारण हृदयावर्जक मधु (समस्त काव्य की कारण सामनी के उदय एवं मकरन्द) का नवीन उत्कष्ठा से व्याकुल होकर पान करें॥ ३५॥ वागेव वल्ली वाणीलता तस्याः काप्पलौकिकी विच्छितिर्ज म्भते शोभा समुल्लसति। कथम्-पदपल्लवास्पदतया। पदान्येव पल्लवाति सुपुतिडन्तान्येव पत्राणि तदा स्पदतपा तदाशपत्वेन। कीदुशी विच्छि तिः-सरसत्वसंपदुचिता, रसवत्वापातिशयोपपत्रा। किविशिष्ठा च- वकतया वक्भावेनोद्द्ासते भाजते या सा तयोदता। कीदुशी-उज्ज्वला छायातिशयरमणोथा। तामेवंदिधामालोच्य विचाय विदग्घपटपदगणं- विलुघपट्चरणचकंरमधु पीयतां नकरन्द आस्वध्यिताम्। कीदृशम्- वाक्यप्रसनाअयम। वक्यान्येव पदसमुदायरूपागि प्रसूनानि पुप्पाण्याश्रयः स्थान यस्य तत्तयोवतम्। अरन्यच्च कीद्द्षम्- स्फारामोदमनोहुरम्। स्फार: स्फीतो योपसावामोदस्तद्मविशेषस्तेन मनोहरं हृदमहारि। कथमास्वाद्यताम्-नवोत्कळाकुलं नूतनो- हकलिकाव्यप्रम्। मबुकरसमूहाः सतु वल्ल्याः प्रयमोल्लसितपल्लवो- ल्लेसमालोच्य प्रतीतवेतसः समनन्तरोद्रिन्तसुक्कुमारमुकुममरुरन्द- •पानमहोत्सवमनुभवन्ति। तद्वदेव सहुदयाः पदासपदं कामपि वकता-
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वकोक्तिजीविवम्
विच्ित्तिमालोच्य नवोत कलिकाकलितचेतसो वादयाधयं किमपि वकताजी वितसर्वस्वं विचारयनत्वति तत्पर्यार्थः । अ््न्नैकत्र सरसत्व
तंकत्र बालेन्दुसुन्दरसंस्थानयुक्तत्वम्, इतरत्रोरत्यादिवचित्रयमु। विस्छितरेकत्र सुदिभक्तपत्रत्वम अन्यन्न कविकौशातकमनौयता उज्ज्व लव्वमेकत्र पर्णच्छायायुक्तत्वम्, ध्परन सन्निवेश्ञसोन्दर्मसमुदमः। धामोद पुर्पेषु सौरभम्, वावयेपु तद्विवाह्लादकारिता। मध्ु कुसुमेवु मकरन्द., वावयेवु सकलकाव्यकारणसम्पत्समुदय इति। इति धोमतकुन्त फविर चिते वक्रोतिजी चिते द्वितीय उन्मेष॥ बाणी ही है वल्ली अर्धाव् वाणीरमी लता, उसकी बोई अलैविक विष्छिति अर्थात् थोभा उल्लसित होती है। कैसे-पद पल्लवी के आयय से। पद ही है पल्लव अर्थात् सुबन्त एव तिडन्त (पद) ही किसलब है, उनकी आान्पदता से अर्थाव् उसके आश्रम से (उल्लमित होती है)। काँसी वि्छिति (उल्लगित होती है)-मुरसता को सम्पतति से युक्त बर्थात् रनयुक्तता के नतिरेन से सम्पन (विच्छिति)। और बंगी (विष्छिति) जो वम्ता से अर्थाध् बांकपन के कारण उद्धासित अर्थात् मुगोनित होती है ऐसी (विच्छिति) और केती-उज्जक अर्थात् कान्ति के उलर्यं से रममीम। इस उस प्रकार की शोभा की आयोचना अर्थात् विचार करके विदग्य रूप पट्पदों का समूह अर्धोव सहुदय रूपी भ्रमरो का समुदाय मघु का पान करें अर्यात् पुष्प रसा का आस्वादन करें। कैसे (दुप्य रस का) वाकय पुष्प के आाधय वाले (रस ना)। पदों के समुदाय रूप वाक्य ही है पुष्प अर्थाद फूल एव वे ही है आथय अर्थात् निवासस्थान जिसके ऐसे पुष्प रस पा भान कहें। और कैसा है (वह पुप्प रसष) प्रचुर आमोद के कारण मनोहर स्फार। अर्थात् अत्यधिक जो यह आमोद अर्थाव पुष्य कर धर्मविशेष (सुगन्धि) होता है उससे मनोहर चित्तारपंक (रस का आस्वादन करें) कैसे आस्वादन करेंनवीन उतरण्ठा से व्याकुस होकर अथाद अमिनद उत्वण्ठा से शुब्ध होकर। (इसका आशय यह है कि जैसे) भरमरो के समूद सता के पहले-पह निकले हुए किसलर्यों की उ्पत्ति को देखकर विश्वस्त होकर उसके बाद सिते हुए सुमोनल दुप्पो के पुथ्परता के पीने का आनन्द अनुभव करते हैं उसी प्रवार सहुदय पदों के आथय वाली जिसी मन्नैेरिक वब्रता की शोभा का विवेधन कर अभिनव उत्कण्ठा से सवतितह्दम
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द्वितीयोग्मेष: २७३
होकर वाक्य के आश्रय वासे वक्ता के प्राणस्वरूप किसी तशव का विचार करते हैं। यहां लतापक्ष में सरसता का अर्थ है अपने समय के अनुसार सतपन् होने बाली रस की प्रचुरता तथा वाणीपक्ष मे अर्थ है मृङ्गारादि रसों की व्यज्जकता। लवापक्ष मे वभता से तात्पर्य है बालचन्द्रमा की तरह सुन्दर संघटना से युक्त होना तथा वाणीपक्ष मे अर्थ है कथन आदि की विचिनता विषछिति से लनापक्ष मे अभिप्राय है पती के सुन्दर बङ्ग के विभाग से तपा वाणीपक्ष मे अर्थ है कदि की कुशलता का सौन्दर्य। लवापस मे उज्जवल होने का अर्थ है पत्तो की शोभा से युक्त होना, तथा वाणीपक्ष मे तात्पर्म है सघटना की सुन्दरता को भली-भांति सृष्टि। फूल मे आमोद से तात्पर्य है सुगन्धि से तथा वाक्प मे आमोद का अर्थ है सहृदयो को आनग्दित करने की पक्ति से। फूलो मे मधु का अर्थ है पुष्प रस तथा वाकमों मे मधु का अंघं है समस्त काव्यो की कारण सामप्री की सम्पत्ति का आविर्भाव।
इम प्रकार श्रीमान कुन्तक व्वाय विरचित मकोकिजीवित का द्वितीय सम्मेष समाप्त हुआ।
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तृतीयोन्मेप: एवं पूर्धम्मिन् परकरणे वाक्यावयवानां यथासभव वक्रभाव विचारयन चाचकवकताविचिछित्तिप्रकाराणो विकप्रदर्शन िहितवान्। इदानी वाक्यवकताघैचित्य मासूवमितुं वाच्वस्य वर्णनीयतया प्रस्तावाधिकृतस्य वस्तुनो वकतास्परूप निरुषयति, पदार्थवबोवपूर्य कत्वाद् वाक्यार्थावसिते .- इस प्रकार पहुले ( द्वितीय उन्मेष के) प्रसन्ग मे वाक्य के अद्भरूप पदो को यथासम्भव वफ्ता का विवेचन करते समय (ग्रन्थकार के) शब्दों की वकता से उत्पन्न होने वाले वैचिश्र्य के प्रभेदों का कुछ परिचय दरिया था। मब (तृतीय उन्मेष मे) वाकयो की वक्ता की विष्छित्ि का प्रतिपादन करने के लिए वाच्य अर्थात् वर्णन का विषय होने के कारण प्रकरण के आश्नित रहने वाले पदार्थ की वकना का स्वरूपनिरूपण करते हैं, कयोंकि पद्मर्थ का ज्ञान हो जाने के बाद ही वाक्यार्थ का बोध होता है। उदारस्वपरिर्पन्दसुन्दरस्वेन वर्णनम्। वस्तुनो वक्रशन्द्कगोचरत्वेन वक्रता ॥। १ ॥। (वर्ध्यमान) केवल अपने सर्वोकष्ट स्वभाव की रमणोयता से युक्त रूप मे, वस्तु का वक् बब्द के द्वाडा ही प्रतिपाध रूप मे, वर्णन, (उस पदार्थ या वस्तु को) वकता होती है ॥१॥ वस्तुनो वर्णनीयतया प्रस्नावतस्य पदार्थस्य यदेवविधतवेन वर्णन सा तस्य वक्रता वकत्ववि्छितिः। किविघत्वेनेत्याह-उदारस्वपरिस्पन्द- सुन्दरत्वेन।उदारः सोतकर्प: सर्वातिशायी यः स्वपरिस्थन्द स्वमायमहिमा तस्य सुन्दरत्वं सौकुमार्यातिशयस्नेन, अत्यन्तरमणीयस्वाभाविकथम- युकत्वे। वर्णनंपतिपादनम्।कथम्-चक्रशनदैकगोचरखेन। वक्रो थोऽसी नाना विधवकताविशिष्ट शब्द: कश्षिदेव वाचकविशेषो विवक्षितार्थममर्थ- स्वस्यैकस्य केवलस्य गोपरत्वेन प्रतिपादयतया विषयत्वेन । वाच्यत्वेनेति नोकम्, व्यद्रचन्व्रेनापि प्रतिपादनसभवात्ः तदिदमुक्तं भवति- यदेवविधे भावस्वभावसौकुमार्यवर्णनप्रस्तावे भूयसांन वाच्यालक्काराणा- सुपमादीनामुपयोगयोग्यता समत्रति, स्वभावलोकुमार्याति शयम्लानता प्रसङ्गात्। वस्तु सर्थात् वर्णन का विषय होने के कारण प्रकरणप्राप्त पदार्थ का जो इस तरह से वणन है यह उस (वस्तु) की वकता अर्थात् बाकपन का मेचिम्य होता है। किस तरह से वर्णन (बक्ता होती है) इसे ( प्रन्थकार)
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२७६ वकोतिजीवितम्
कहते है-अपने उदार स्वरूप की रमणीयता से (किया गया) वर्णन। उदार का अर्थ है उत्वृष्टता से सम्पन्न सर्वातिरिक्त ऐसा जो अपना परिस्वन्द अर्थात् अपने स्वम्प की महता उसकी मुन्दरता अर्थात् अत्यधिक सुक्ुमारता उससे अर्थात् अत्यधिक मनोहर अपने सहज धर्म में युक्त रप से (किया गया) वर्णन अर्थात् प्रतिपादन (वस्तुवकना होती है) कैसे (किया गया वर्णन) केवल वक्र शब्द के द्वारा ही गोबर रूप से । वक् का अर्थ है नाना प्रकार की वकताओ से सम्पन्न जो शब्द अर्थान् कोई ही अभीष्ट्र प्रतिपाद्य अर् का प्रतिपाटन कराने वाला विशेध शब्द केवल। उसी के गोचर रूप से अर्थात् प्रतिपाद्य होने के कारण विषय रूप मे (वर्णन) यहा वाच्य रूप से (प्रतिपादन) नहीं कहा गया बयोकि प्रतिवादन व्यङ्तप रूप से भी हो सकता है। तो इसका आपय यह है कि इस प्रकार के पदार्य की सहज सुकुमारता का प्रतिपादन करने समय बहुत मे उपमा आदि अर्पालङ्कारो का प्रयोग ठोक नही होता, कयोकि उससे पदार्थ के स्वभाव की सुकुमारता का उत्कर्ष मलिन हो जाने की सम्भावना रहती है। (इस पर स्वभावोकि को अलद्वार स्वीकार करने वालो को ओर से यह प्रश्न उठाया जाता है कि अरे वस्तु वकता के रूप में आपने जिसका प्रतिपादन किया है) महतो वही (दण्डी आदि आनार्यों द्वारा) अलदार रूप से स्वीकार की गई सहदयो को आनन्दित करने वालो स्वभावोकि है, बत उस (स्वभावोक्ति को अलद्धारता को) दूषित करने के दुर्व्यसनयुक्त प्रयास से बया मतलब) ? क्योंकि उन (स्वभावोवत्यलद्ारवादियो) की हुष्टि में वस्तु वा सामान्य धर्म ही अलद्धार्य है और अतिराययुक्त स्वभाव के सोन्दर्स की परिपुष्टि मलदवार है। अत. स्वभावोक्ति को अलंकारता ही युत्तियुक्त है ऐखा जो मानते हैं उनके प्रति (ग्रन्थकार) समाधान प्रस्तुत करता है कि यह बात सर्वपा समोचीन नही है* क्योकि अगतिकगतिन्याम से जैसे-केसे भी काव्य-रचना प्रतिक्ठ के योग्य नहीं होती क्योकि काव्य का लक्षण 'सह्दयों फो आनन्दित करने वाला' होता है। (जैसो-तैसो काव्य-रचना से सहूदयो को आनन्द नहीं मिलेगा अतः वह काव्प नही होगी।) ननु च सैपा सहृदयाद्वादवारिणी स्वभावोक्तिरलकारतया समाम्नाता, तस्मात् कि तद्दूपणदुर्व्यसनप्रयासेन ? यतस्तेपां सामान्य वस्तुधमंमात्रमलकार्यम्, सातिशयस्वभावसौन्दरयपरिपोषणमलंकार प्रतिभासते। तेन स्वभावोकेलंकारत्वमेव युक्तियुक्तमिति ये मन्यन्ते तान् प्रति समाधीयते यदेवन्नातिचतुरत्रम्। यस्मादगतिकातिन्यापेन
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तृतीयोग्मेष १७७
काव्यकरण न यवाकथचिदतुष्ठेयतामहति, तद्विदाहाटकारिकाव्यलक्षण- प्रस्तावात्। किंच-अनुत्कृष्टधमयुक्तस्य वर्णनीयस्यालकरणमप्य- शोभातिशयकारितामावहति। यरमादृत्यन्तरमणीयम्वाभाविकवर्मयुक्त वर्णनीयवस्तु परिमणीयम्। तथाविघस्य नस्य यथायोगमौचित्यानुसारेण रूपकाद्यलकार योजनया भवितत्यम्। एनावास्तु विशेषा यन् स्वामार्विकान्दर्यप्राधान्येन विवस्ितस्य न भूयसा रूपकादयलकार उपकाराय कलपयने, वस्तुस्व- भावसौक्कुमार्यस्य रसाविपरिपोपणस्य वा ममाच्छाद्नप्रसङ्गात्। तथा चैतस्मिन् विषये सर्वोकारमलंकार्ये विलासवतीर पुनरमि स्नानसमय- विरहव्रतपरिग्रह- सुरतावसानादौ नात्यन्तमलकरणसदता प्रतिपद्यते, स्वाभाबिकसा कुमार्यस्येय इसिक हदयााित्त्ा
और फिर अतिशय से द्ीन धर्म वाली वर्ष्यमान वस्तु का अलङ्कृत करना भी दीवाल के अनुषयुक्त हिस्से पर चिश्रित किये गये चित्र के समान अत्यधिक सौन्द्रय नही उत्पन्न कर पाता। अत. अत्यधिक मनोहर सहज धर्म से सम्पन्न चण्बमान वस्षु को ही पनिबद्ध करना चाहिए। तदनग्तर उम प्रकार की ( सहज रमणीय धर्म से युक्त) उस वस्तु के औचित्य को ध्यान मे रखते हुए यथासम्भव रूपकादि अलद्वारो को उपनिबद्ध करना चाहिए। हाँ गह विशेषता जरूर हे कि जिस वस्तु के वर्णन में सहज रमणीयता हो प्रधान रूप से अभिप्रेत है उसके प्रतिपादन में बहुत से रूपकादि अलङ्धारो का प्रयोग उपयुक्त नही होता क्योकि उसमे या तो उस वर्ष्य पदार्थ की सहज सुकुमारता दी नही प्रकट हो पाती अथवा सृङ्गारादि रसो का पूर्ण परिषोष नहों हो पाता। वयोंकि इस विषय मे सब तरह से अलद्कृत करने योग्य वस्तु भी अत्यधिक अलद्धारो को उसी प्रकार नही सहन कर पाती है जैसे कि विलासिनी सी नहाते समय, य विरह के कारण व्रत धारण किए रहने पर, अथवा सम्भोग की समाप्ति पट अत्यधिक अलद्धारो को नही सहन कर पाती, क्योंकि उस समय उसकी सहज मुकुमारता ही सहुदयो के हृदयो को आनन्दित करती है। जैसे- ता प्राङमुखीं तत्र निवेश्य तन्वी क्षण व्यलम्बन्त पुरो निपण्णा। भूतार्थंशामाह्ियमाणनेत्रा प्रसाघने मनिहितेऽपि नार्य.।। ।। (कुमारसम्भव मे पार्वती की सहज शोभा से शृद्गार करने वालो नारियों के मुग्ध हो जाने का यह वर्णन कि-अन्न पुर की) बिया कृशाड़ी उन (पार्वती) को वहाँ (अलद्धारगृह मण्डप मे) पूर्वाभिमुख बैठा कर सामने (अलद्वार पहनाने के लिये) बैठी हुई अलद्धारादि के समीप विद्यमान रहने
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२७८ वकोक्तिजी वितम्
पर भी (पारवती) सहज सोन्दर्य से आवृष्ट नयनो वाली होकर क्षण भर के लिए देर लगा दिया (अर्थात् उनके सहज सोन्दर्य को ही एकटक देखती हुई अलद्धार पहमाना भूल गई)। १। अत्र नथाविघस्वाभाविकमी कुमार्यमनोहर: शोभानिशयः कबेः प्रतिपादयितुमभिप्रेतः। अर्रस्यालकरणकल्ञापकलन तहवच्छायातिरो
प्रतीन्यन्तरापेक्षमलकरणकल्पन नोपकारिता प्रतिपद्यत। विशेषस्तु- रसपरिपोपपेशलाया प्रतोनेविभावानुभावव्यभिचार्याचित्यत्र्यतिरेकेण प्रकारान्तरेण प्रतिपत्ति प्रस्तुतशोभापरिरकारितामावहति। तथा च प्रथमतरवमृणोतारु्यानतारपभृतय पदार्थाः सुकुमारवसन्तादिसम यस
परिदस्पन्ते। यथा- यहां पर कवि को उस प्रकार की अपूर्व सहज सुकुमारता से हृदपावर्जक सौन्दर्यातिशय का प्रतिपादन करना ही अभीष्ट है। इसके अलद्वार समूह को रचना स्वाभारविक कान्ति के विरोहित हो जाने की पाद्टा से युक्त रूप मे उत्प्रेक्षित है। वपोकि सहज सुकुमारता की प्रधानता से युक्त रूप मे वर्णन की जाने वाली वस्तु के बपने उत्कर्म युक्त स्वभाव की महत्ता के स्वाभाविक सोन्दय को अभिभूत कर देने वाले एव दूसरी प्रतीति की अपेक्षा वाले अलद्वारो की रचना उपकारक नही होती। खारा बात तो यह है कि रसों के सम्यक् पोषण से मनोहर प्रतीति वा, विभाव, अनुभाव एव व्यमिचारिभाव के औवित्य से रहित दूसरे दद्त से प्रतिपादम वर्ष्यमान पदार्थ के सोन्दर्य का वाधरु बन जाता है। इसोलिये अधिकतर कविजन युकती की पहुलेम्पहल युयावस्या के प्रारम्भ रत्यादि एव वत्यन्त फोमल वसन्त आदि ऋतुओ के प्रारम्भ, परिषोष एव समाप्ति आदि पदार्षों को उनके प्रतिपादन करने वाली वाक्पवकता से भिन्न किसी दूसरे अलद्वूार के द्वारा बलवृत करते हुए नही दिखाई पड़ते। जैसे-
स्मित किचिन्मुग्धं तरलमधुरो दष्टिविभव: परिस्पन्दो याचाममिनव विलामोफिसरसः। गलानामारम्भ: किसलयितलीलापरिमल: स्पशन्त्यास्तारण्य किमिय दि न रम्य मृगहशः ॥२॥
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वृवोयोग्मेघ: २७९
(कोई किसी नवयोवता का स्वाभाबिक वर्णन करते हुए कहता है कि पहले-पहल जवानी का स्पर्य करने वाली हरिणाक्षी की मधुर मन्द मुसकान, चज्चल होने के कारण रमणीय नयनो की छटा, नई-नई विलासपूर्ण बातो के कारण सरस वाणी का विकास और अनेको हावभावो की सुगन्धि को विकसित करने वाली गति का उपक्म (इनमे) कोन सी वस्तु रमणीम नहीं है (अर्थात् सभी कुछ तो रमणीय है)। २ ।। यथा न- अव्युत्पन्नमनोभवा मधुरिमस्पर्शोल्लसन्मानसा भिन्नान्त:करणं दशी मुकुलयन्त्याघ्रातभूतोद्भ्रमाः। रागेच्छा न समाप्यन्ति मनसः सेद विनैवालसा वृत्तान्तं न विदन्ति यान्ति च वश कान्या मनोजन्मन: ।। ३।। अथवा जैसे- (नई-नई जवानी को प्राप्त करने वाली कुमारियो का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि)-कामदेव के पूर्णज्ञान से रहित तथा (जवानी के) मादक स्पर्श से प्रफुल्लित हृदमो वाली कुमारियां प्राणिमो के भ्रम का इशारा पाकर ही हृदय को टुकढे-टुकडे कर देती हुई आँसे बन्द कर सेती हैं। मानसिक अनुराग की अभिलाषा को नहीं समाप्त कर पाती, विना परिश्रम के ही अलसाई (रहती हैं) तपा पूरा वुत्तान्त नहीं जानती फिर भी काम के बश्य मे हो जाती है। ३ ॥ यथा च- दोर्मलावधि इति ॥४॥ तथा जैसे- उदाहरण संख्या १।१२१ पर पूर्वोदाहृत) 'दोर्मूलावधि सूत्रितस्तनमुरो' इत्यादि पद्य युवती के प्रयमतर सारम्प के सहज वर्णन को प्रस्तुत करता है॥४ ॥ यया वा- गर्ममन्थिषु वीरधां सुमनसो मध्येऽक्ुर पल्लवा वाछ्ाभान्नपरिम्रह्- पिकत्रधूकण्ठोदर भळ्चमः । किंघ तीणि जगन्ति जिष्णु दिव सैर्द्वितै मेनोजन्मनो देवस्यापि चिरोक्कित यदि भवेदभ्यासवश्य धनुः।। ४।। मवा जैसे- लताओं के गासों की पोर पर (सिले हुए) पुष्प, मदुरों के बीच (निकलने हुए) किसलम और मादा कोमल के कफडिवर में इच्मामात्र
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२८०
से प्रस्तुख किया जाने वाला वंचम स्वर यदि ये हो तो मे तोनों लोकों को जीत लेने वाला कामदेव का बहुत दिनो से छोड दिया गया हुआ धनुष भी दोन्तीन दिनो मे ही अभ्यास के द्वारा वद्यीभूत किए जाने योम हो सकता है।। ४॥
यधा वा- हंसानां निनदेधु इति ॥६॥ सपवा जैसे-
(क्लोक) ।। ६ ।। उदहरण सख्या १७३ पर पूर्वोदाहुत) हुँसाना निनदेसु इत्यादि
यथा प- सज्जेइ सुरहिमासो ण दाव अप्पेइजुअइअणलक्खसुद्दे। ञ्हिणअसहभरमुह्दे णवपल्लवपत्तले अणंगस्स सरे॥॥ सज्ज्यत्रि सुरभिमासो न सावदर्पपति युवतिजनलश्यसुखान्। अभितवसहकारमुखान् नवपल्लवपनलाननस्भत्व घरात्।) तवा जैसे- मधुमास सहणियो को निशाना बनाने वाले, अप्रभाग से युक्त, एवं नूतन किसलय रूप पक्षों को धारण करने दाले कामदेव के बाणो को जिनमें नवमुकुलित आम्र प्रधान है, बनाता तो है लेकिन (कामदेव को प्रह्ाद करने के लिए) देता नहीं है॥। ७॥ एवविधविपये स्वामा विक सौकुमार्यप्राधान्येन व्ण्येमानस्य वस्तुन- स्तदाच्छाद्नभयादेव न सूखसा तत्कविभिरलकरणमुपनिषम्यते। यदि वा कदाचिदुपनिबण्यते त्तदेव स्वाभाविक सौकुमाये सुवरा समुन्मीलयितुम्, न पुनरलंकारवैनिकयोपपततये। यथा- इस प्रकार के सथानों पर कविजन सहज सुकुमारवा की प्रधानता से युक्त रूप में वर्णन की जाने दाली वस्तु को अत्यधिक बलदारो से मुक इसी लिए नहों करते क्योंकि उन अलसारो से उस वस्तु के सहूज स्वभाव के अभिभूत हो जाने का भय रहता है। और यदि कभी (बरदारों की) रचना करते हैं तो यह केवल उसकी स्वाभाविक सुकुमारता को ही प्राट करने के लिए, न कि असद्वारो की विविनता का प्रविपादन करने के लिए। वैसे-
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रृसीयो-मेव २८१
धौताऊजने च नयने स्फटिकाच्छकान्ति- गण्डस्थली अद्गानि दन्ति शिशुदन्त विनिर्मेलानि किं यम्र सुन्दरमभूत्तरुणीजनस्य ।। = ।। सम्भवत. स्नान किए हुए युवती की सुन्दरता का वर्णन कोई करता है कि-पुवतियों के धुल गये काजल वाले नेन्र, स्फटिक के सदश निर्मल छधि वाली कपोलस्थली, एवं बनावटी लालिमा से हौन ओोड, तपा हापी के चच्चे के दांतो के सदय स्वच्छ अवयव (इनमे) कौन ऐसी वस्तु है जो रमणीय नही है ( अर्थात् सभी वस्तुये रमगीय हैं।।८।।
अत्र 'दन्तिशिशुदन्तविनिर्मलानि' इत्युपमया स्वाभाविकमेव सौन्दर्यमुन्मोलितम्। यथा वा-
यहां कवि ने 'हाथी के बच्चे के दांतो के समान स्वच्छ' (युवती के बङ्ग) इस प्रकार की उपभा के प्रयोग द्वारा (युवती की) सहज मुकुमारता को ही व्यक्त किया है। अथवा जैसे- (उदाहरण सख्या ११७३ 'हंसाना निनदेपु' आदि श्लीक के तृतीय चरण 'अकठोर वारणवपू' आदि मे उपमा के द्वारा मृणाल की नंवीन ग्रन्थियो का स्वाभाविक सोन्दर्म ही उत्कर्ष को प्राप्त हुआ है।।९।। एतदेवातोव युक्तियुक्तम्। यस्मान्महाकवीना प्रस्तुतौचित्यानु- रोधेन कदाचित् स्वाभाविकमेव सौन्दर्यमकरावयेन विजम्भयितुमभि- प्रेत भर्वत, कदाचिद् विविधरचनावैचित्नययुक्त्तमिति। अत्र पूर्वस्मिन् पक्षे, रूपकादेरलकरणकलापस्य न ताहकू तत्त्वमू। अपरस्मिन् पुन, स एव सुवरां समुज्जम्भते । तस्मादनेन न्यायेन सर्वातिशायिन. स्वामाविकमौन्दर्यलक्षणस्य पदार्थपरिस्पन्दस्यालकार्यत्चमेव युक्तियुक्त तामालम्बते। न पुनरलकरपात्वम्। मातिशयत्व्रशून्यधर्मयुक्तस्य वस्तुनो विभूषितस्यापि पिशाबादेखि तद्विदाह्यादकारित्वविरहादनु- पादेयत्वमेवेत्यलमतिप्रसद्वेन। र्याि वा प्रस्तुनीचित्यमाहात्म्यान्मुख्य- तया मावस्वभाव: सातिशयत्वेन वण्यमान. स्वमहिम्ना भूषणान्तरा सहिप्णु स्वयमेव शोभातिशयशालित्वादर्लकार्याडप्यल करनममत्यभिधीयते तद्यमास्माकीन एव पक्ष। तद्तिरिकटत्तेरलकारान्तरस्य विरस्कार- तात्पर्येणामिधानानात्र वय विवदामहे।
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२८२ तथा यही अत्यन्त युकिवक्गत है। कयोकि श्रेछठ कवियों को कभी भी वर्ष्पमान पदार्थ के ओचित्व के बनुसार (वस्तु की) अदिनीय बङ्ग से केवल सहज सुकुमारता हो उन्मीलिन करना अभिप्रेत होता है, तथा कभी- कभी नाना प्रकार की रचनाओं को विचित्वता मे युक् सोन्दर्व को (उन्नोनित करना अभिप्रेत होता है। यहाँ पहले पक्ष मे (अर्पान् वब वेवन सहज रमगोयता का प्रतिपादन ही कवि को अभिप्रेत होता है तब) रूपक बदि अलडूारों की वैसी प्रधानता नही होती। जब कि दूसरे पक्ष मे (जब नेबल रचनावेचिश्य का चाकत्व कवि को अभिन्नेत होता है तब) वह ।पकादि जलद्वार समुदाय) ही भली-भोति प्रकाशित होता है। तो इस वङ्च से सहज रमणीयता रूप पदार्थ के सर्वोतकृष्ट धर्म का अलधाय होना ही युक्िव्ङ्गत प्रतोत होता है न कि अलक्गार होना। पयोकि उत्कृष्टता से हन धर्म से सुन्त वस्तु अलद्वृत होने पर भी वितावादि को भाति सहदमो को आनन्दिव करने के अभाव के कारण बेकार ही होती है-इस प्रकार इस तति प्रवङ्ग को समाप्त करते हैं। जथवा यदि व्ष्यमान वस्तु के औचित्य की महता से मुस्य रूप से र्वािन किया गया पदार्थ का उत्तकर्षयुक्त स्वभाव हो अपने माहात्म्य से जन्य अलद्दार को न सह सकने के कारण खुद हो सन्दर्यातियन से ुकत होने के कारण, अलकार्य होने हुए भी जहद्वार कहा जाता है तो यह हमारा ही पक है। कयोकि उससे भिन्न स्पिति वाले दूसरे अलद्गार को तिरस्ृत करने के अभिप्राय से (यदि स्वभावोक्ति को) जनद्वार कहा जाता है तो हम विवाद नहों करते। एव मेपैव वर्ण्यमातत्य वस्तुनो वक्रतेत्युतान्या काचिदस्तीनयाद- अपरा सहजाहार्यकविकौशलशालिनी। निर्मितिर्नूतनोल्लेखलोकातिक्रान्तगोचरा ।। २ ।। इस प्रकार वर्णन की जाने वाली वस्तु की यही एक बकता है अथपा कोई दूसरी भी-इमे (पन्यकार) बताते हैं -- कवि की स्वाभाविक एवं व्युत्पततिजन्य निपुणता से सुदोभित होने वासी एवं अपूर्व वर्णन के कारण लोकोतर विवय (का निरूपण करते) बाछी (कदि की) सृषि (वर्ष्यमान वस्तु की) दूसरी वकता होती है॥ २॥ अपरा द्वितोया वण्यमानवृत्ते, पदार्थस्य निर्मितः सृष्टिः। वकनेति संबन्ध। फीटशी-सहजाहार्यकविकीशलशालिनी। सद्दजं स्वाभा- वकमाहार्य शिक्षाभ्यास्षममुन्लासित प रकिन्युत्पनिपरियाकमोढं
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तृसोपोग्मेप. २८३
यत् कविकौशलं निर्मातृनैपुण्य तेन शालते शलाते या सा तथोका। अन्यच्च कीदशी-नूतनोल्लेखलोकातिक्रान्तगोचरा। नूननस्तत्प्रथमो
लोकातिकान्त: प्रसिद्ध्यापारातीन कोडपि सर्वानिशायी गोचरो विषयो यस्या:मा तथाक्तेति विग्रहः । तस्मान्निमितिस्तेन रुपेण विहितिरित्यर्थ:। तदिदनत्र तान्पर्यम्-यन्ना वर्ण्यमानस्वरूपा पदार्थो. कविभिरभूताः सन्तः क्रियन्ते, केवल सत्तामात्रेण परिस्कुरता चै्षां तथाविध क्रोऽ्डय तिशय पुनराधीयते, येन कामपि महदयहृद्यदारिणी रमणीयतामवि- रोप्यने। तवदमुक्म्- लीन वस्तुनि इत्यादि॥ १० ॥ प्रस्तुन वृत्ति वाली वस्तु की निरमिति अर्यात् निर्माण मपर अर्थात् दूसरी बका होती है। कैसी वकता-सहज एव आहार्य कमिकोशल से सुशोभित होने बाली। सहुज का अर्थ है स्वाभाविक, एवं महार्य का अर्थ है-शिक्षा एव अभ्यास के द्वारा अजित अर्थात् प्रतिभा एव व्युत्पत्ति की परिपक्ता से प्रव्ृद्ध जो कि का कौशल अर्थात् (काव्य का) निर्माण करने बाले का चानुर्य उससे शोभित अर्ान् प्रशसित होने वाली (वक्ा होती है)। और कैसी है (वह वकना)-अभिनव उल्लेख के कारण लोकातिक्रान्त विषय वाली है। नवीन अर्थात् उस (वस्तु) का जो पहले-पहल उल्लेख किया जा रहा है ऐसा वर्णन अर्पात् (अभूतपूर्य) उसी समय वर्णन किया जाने वाला जो (पदार्थ का) उत्कर्य, उसके कारण लोकातिकान्त अर्थात् पसिद्ध व्यापार का अतिकमण करने वाला कोई (अपूर्व) सर्वोत्हृष्ट (आयापार) जिस (चका) का गोचर अर्थात् विषय होता है (ऐसी चफता है)। उस (वकता) निर्माण का अर्थ है उस (लोकोतर) रूप मे (पदार्थ का) वर्णन। तो यहाँ इसका आशय यह है कि-कविजन जिन पदार्थों के स्वरप का वर्णन प्रस्तुत करते है वे उनके द्वारा अविधमान रहने हुए उत्पन्न नही किए जाते, अपितु केवल सलामान से परिस्फुरण करने वाले इन पदार्थों में वे उस प्रकार के किसी अपूर्व वत्कयं को सृष्टि करते हैं जिससे कि पदार्थ (लोकोत्तर) रसिको के हृदयों को आकपित करने वालो, किसी कमनीयता से युक्त हो जाते हैं। इसीलिए ऐवा कहा गया हे -- (उदाहरणसस्वा २११०७ पर पूर्वोद्द) लीन वस्तुनि।। १० ॥ इत्यादि पद्य में। तदेवं मत्तामात्रेणैव परिस्फुरतः पदार्थस्य कोऽ्प्यलोकिकः शोभातिशयविधायो विच्छित्तितिशेषोडभिधीयते, ेन नूतनच्छाया-
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REY बशोलिजी विव्रम्
मनोहारिणा वास्तवस्थितितिरोधानप्रवणेन निजावभासोदगासित- तत्स्वरूपेण तत्कालोन्लिखित इन वर्णनीयपदार्थपरिस्पन्द्महिमा प्रतिभासते, येन विधावृव्यपदेशपात्रता प्रतिपद्यन्ते कबयः। वदिद- मुकतम्। तो इस प्रकार केवल सत्तामात्र से प्रतीत होने वाले पदार्थ के सोन्दर्याति- रब का प्रतिवादन करने वाले किवी लोसोत्तर वैचिम्व विशेष का वर्णन किया जाता है, जिससे (पदार्थ की) वास्तविक सत्ता को आव्छादित करने मे तत्पर एव अपूर्व सोन्दर्य के कारण वित्ताकर्यक अपने प्रकाश में देवीप्पमात उसके स्वरूप के द्वारा तत्काल हो निर्मित की गई-सी दर्णन किने जाने वाले पदार्थ के स्वभाव को महता झलकती है जिससे कि कविजन विधाता को सक्ज्ञा प्राप्त कर लेते हैं। इसी लिए ऐसा कहा गया है कि- अपारे काव्यससारे कविरेव प्रजपति. । यथास्म रोचते विश्व तथेद परिवर्तते ॥ ६१। (इस) अनादि एव अनन्त (अवार) काव्यससार मे (उखका निर्माता) केवल कवि हो विधाता है। जैसी उसकी रषि होती है उसी प्रकार यह इस जगत् को परिवतित कर देवा है। ११ ।। सेपा सहजाहार्यभेदमिन्ना वणनीयस्य वस्तुनो द्विप्रकार वक्रता। तदेवमाहार्या येय मा प्रस्तुतविच्छितिविधायलकारव्यतिरेकेण नान्या काचिदुपपद्यते। तस्मादू बटुविघतत्प्रकारभेदद्वारेणात्थन्त वितत- व्यवहाराः पदार्था: परिद्श्यन्ते। यथा- ऐसी वह वर्णनीय वस्तु को वत्रता स्वाभाविक (अपने प्रतिभाजन्य) एवं आहार्य अर्पाद (अपने व्र्युत्पतिजन्य) दोनो भेदो से युक्त होने के कारप दो प्रकार की होती है सो इस प्रकाट (उनमे) जो यह व्पत्पतिजन्य (बकतर) है वह वर्ण्पमान पदार्थ के सौन्दर्य को उत्पन्न करने बाली होकर भी बलद्ार से भिन्न और कुछ नही हो पाती। इसीलिए अनेषों प्रकार के उम्रके भेद प्रभेद के द्वारा बहुत ही ज्यादा विस्तृत व्यवहार वाले पदार्थ दिखाई परने
अस्या. सगविधो प्रजञापतिरभूचन्द्रो तु कान्तधुति: शृद्ारकरसः स्वयं नु मदनो मासो नु पुप्पाकर। वेदाभ्यासजड: कर्थ न विषयव्यावृत्तकौतूहलो निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः॥।१२॥
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उर्वसो के स्वरूप का वर्णन करते हुए विक्रमोवेश्यीय नाटक में कहता है कि) इस (अर्वशी) की सृष्टि करने मे क्या (साक्षान् कमनीय कान्ति वाला ( स्वयं) चन्द्रमा, या कि फिर एकमान्र शरुद्धार मे आनन्द लेने वाला स्व्मं कामदेव, अपवा फूलो की खान ( स्वद) वसन्त ही प्रजापति बना था, अन्यदा बया कभी निरन्तर वेदो का अभ्यास करने के कारण मन्दबुद्धि एव भोगो के प्रति समाप्त कोनूहल वाला वूश मुनि (नारायण) इस मनोहर रूप के निर्माण करने के लिए समर्थ हो सकता है ॥ १२॥ अत्र कान्ताया कान्तिमत्त्वममीमविलाममंपदा पद च रसवत्त्व- मपामान्यमौपव च सौकुमार्य प्रतिपादयितु प्रत्येक सत्परिस्पन्द- प्राधान्यममुचित सभावनानुमानमाहा:्म्यात् निर्माण मुत्प्रेक्षिनम्। तथा च कारणत्रितयस्याप्येतस्य सर्वेपां विशेष णानां पृथक् प्ृथगपूवमेव
स्वयम् इति सबध्यमानमे तदेव सुतरां समुद्ीपयत। यः किल स्वयमेव
कौशलमे वोपपन्म्। यश्च स्वयमेव शृद्गापरकरसस्तस्य रसिकत्वादेव रसव दस्तुविधान वैदग्ध्यमीचित्यं भजते। यश्च स्वयमेव पुष्पाकरस्त- स्याभिज्ञात्यादेव तयाविष सुकुमार एव सर्गः समुचितः। तथा चोत्तरार्घे व्यतिरेकमुखेन त्रयस्याप्येतस्य कान्तिमत्त्वादेविशेषणैरन्यया- नपपत्तिरुपपादिता। यस्माद् वेदाभ्यामजडत्वात् कान्तिमद्वस्तुविधाना नभिज्ञत्वम्, व्यावृत्तकौतुकत्वाद् रसवत्पदार्थे विदितव मुख्यम् पुरामत्वात् सोकुमार्य सरसभाव विरचनवैरस्यं प्रज्ञापने: प्रतीयने। तदेवमुत्मेकलकणोड यमजंकार: कविना वर्णनीयवस्तुनः कमप्यलौकिकलेखविलणमविशय- माधातुं निबद्ध।स च स्वभाव मौन्दर्यमहिम्ना स्वयमेव तत्सदायसम्पदा सह अर्थमह्नीयनामोहमान: सन्देहसंसर्गमह्ीकरोनीति तेनोपछ हिनः। तस्माल्लोकोत्तरनिर्मातृनिमित्तत्वं नाम नूतनः कोऽप्यतिरायः पदार्थस्य वर्ण्यमानवृत्तेरनापिकास्वरूपसौन्द्पलअपस्यात्र निर्मितः कषिना, ये न तदेव ततप्रयममुत्पादितमिव प्रतिमाति। यत्राप्युत्पायं वस्तु प्रबन्धार्थवदपूर्वतया धाक्यार्थस्ततकालमुन्लि रुयते कविमि., तस्मिन् स्वमनाममन्वयेन स्वयमेव परिस्फुरता पदार्यानां तथाविध परस्परान्वयलसणव्रब्य्धोपनिब्धनं नाम नवीन मतिशय मा त्र मे व निर्मितिविधयतां नीपते, न पुन.स्वरूपम्। यथा- यह कामिनी की सोन्दर्य सम्पन्नता, एव अनन्त विलास के सामप्री की भूमि रस सम्मन्नत्ा तपा असाधारण अतिरय से युक्त भुकुमारता का प्रतिवादन करने के लिए उसके हर एक स्वरूप की प्रधानता के अनुरूप अप्रेस्षा द्वारा
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२८६ वकोकिजीवितम्
अनुमान की महत्ता से अलग-अलग अपूर्व सृष्टि की सम्भावना की गई है। और इसीलिए इन तीनो (चन्द्र, काम एवं वसन्त रूप) कारणों का सभी विशेषणो के साथ 'स्वयम्' यह पद सम्बद्ध होता हुआ इसो ( अनुमान) को भलो भांति पुष्ट करता है। जैसे कि-जी स्वय ही कमनीय कान्ति वाला (चन्द्रमा ) है उसके लिये सोजन्य के अनुरूष अरोचको होने के कारण कान्ति से सम्पन्न कार्य करने की तिपुणता हो अमुक्त प्रतीत होती है। तरया जी स्वयं ही एकमात्र शस्वार मे आनन्ध लेने बाला है उसके सहुदय या रक्षिक) होने के कारण ही सरस वस्तु के निर्माण की कुछलता उचित पतीत होती है। और जो स्वय हो फूलो की खान है उसके सहज सोकुमार्य के करिण उस प्रकार का मुकुमार ही निर्माण उपयुक्त प्रतीत होता है। इसीलिए (इलोक के) अपरार्द्धे में प्रयुक्त विशेषणों के द्वारा कान्ति-सम्पप्नता जदि इन तीनो (विशेषणो) की व्यतिरेक के द्वारा अन्य प्रकार से अनुपपश्न बताया है। वयोकि वेदो के निरन्तर अभ्यास से मन्दबुदि हो जाते के कारण ब्ह्ा की कान्तिसम्पन्न वस्तु के निर्माण की अनभिक्ञता, कोलूहल के समाप्त हो जाने के कारण सरस पदार्थों के प्रति उत्पन्न विमुखता, एव बूढे हो जाने के कारण सुकुमारता से सरस पदार्थ को सृष्टि के प्रति विरति घोषित होती है। तो इस प्रकार वदि ने प्रस्तुत पदार्थ की किसी लोकोत्तर रचना के विलक्षन उत्कर्ष का प्रतिपादन करने के लिए सत्प्रेक्षा रूप अलद्वार का प्रयोग किया है। और वह (उतपरेक्षा अलद्वार) सहज रमणीयता के माहात्म्य से अपने आप हो उसकी सहायक सम्पत्ति के राथ पदार्थ के उस्कर्ष को चाहता हुआ सन्देहा- लद्वार के समर्ग को स्वीकार करता है इस लिए उस (सन्देहालद्वार) के द्वारा परिपुष्ट किया गमा है। इसलिये कवि ने प्रस्तुत नाषिका (उयंदी) के स्वरूप की सुन्दरता रूप पदार्थ के निर्माण मे किसी अलोकिक सष्टा को कारणवारूप मविशय को प्रस्तुन किया है जिसके कारण वह ( नामिकास्वरपसौन्दर्य) हो उस (मलोफिक स्रष्टा) के द्वारा सर्वप्रथम उत्न्न किया गया-सा लगता है। (इस प्रकार) जहां कही भी कवि लोग पहले पहल तत्पाद वस्तु को प्रबन्ध के अर्थ की भांवि अपूर्व बद्ध से वाक्यार्य रूप में वणित करते है, वहाँ वे केवल अपमरे स्यति के समन्वय के कारण अपने आप हो परिस्कुरित होने वालै पदार्थों के उस प्रकार के परत्पर सम्पर्क को प्रस्तुत करने वाले सम्बन्ष के कारणभूत किसी अपूर्व अविरय को ही प्रस्तुत करते हैं, न कि (उस पदार्थ) के स्वरूप को। जैसे- कसत्यं भो दिवि मालिकोऽहमिद कि पुप्पार्थमभ्यागव' फि से सूनमद कयो यदि मदष्पिन्न तदाकर्ण्यताम्।
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तृतीयोगमेप: २८७
संप्रामेध्वलभाभिधाननृपती दिव्याद्गनाभि: स्रजः प्रोज्मन्तीभिरविद्यमानकुमुम यस्मात्कृतं नन्दनम् । १३ ॥ (निम्न श्लोक मे कवि किसी अप्रस्तुत रजा के यश का वर्णन इस प्रकार प्रस्तुत करता है- अरे। तुम कोन हो ? मैं स्वर्ग मे माली हूँ। यहाँ (पृथ्वी पर) कैसे (पधारे) 2 फूल लेने आया हू। कया किसी पुष्पोत्सव अथवा (पुष्पयोग) के लिए । फूल) खरीदने हो? अगर आप को बडा अचरज है तो सुनिए। क्यों सङ्ग्राम मे (किसी) अशञातनामा नरपति के ऊपर पुष्पहारो की वर्षा करती हुई दिव्पादगनाओं ने (स्वास्थ) नन्दन (वन) को फूलो से विहीन कर दिया है ।। १३॥ तद्वेवंत्रिधे विषये वर्णनीयवस्तुविशिष्ठातिशयविधायी विभूषण- विन्यासो विधेयतां प्रतिपद्ते। तथा च-प्रकृतमिदमुद्ाहरणमलंकरण कल्पनं बिना सम्यक् न कथचिदपि वाक्यार्थसङ्गति भजते। यस्माद् अत्यक्षादिप्रमाणोपपत्तिनिश्चयाभावात् स्वाभाबिक वस्तु धमितयरा नयवस्थापना न सहते, तस्माद्विदग्घकवितिभोलषिखितालंकरणगोचर- त्वेनैष सहृदयहृदयाह्लादमादघाति। तथा च, दुःसहसमरसमयसमु- चितशौर्योतिशयश्लाधया प्रस्तुतनरनाथविपये वज्जभलाभरभसोन्ण
नाग्नन्दनोद्यानपाद्पप्रसूनसमृद्धिप्रध्वंसभावसिद्धि: समुत्प्रेक्षिता। यस्मा- दुन्प्नेक्षाविषय वस्तु कवयस्तदिवेति तदेवेति वा द्विविधभुपनिबव्नन्ती- येतत्तल्लक्षणावसर एव विचारयिष्यामः । तदेवमियमुत्प्रेक्षा पूर्वार्ध- विदिता प्रस्तुतप्रशसोपनिबन्धबन्धुरा प्रकृतपाथिव प्रतापातिशयपरिपोष- प्रवणतया सुतरां समुद्गासमाना तद्विदावरजन जनयति। सातिशयत्वम् तो इस प्रकार के प्रसज्गो में वर्णनीय पदार्थ के विशिष्ट उत्कर्ष को प्रतिपादित करनेवाला अलटूरणविन्यास अनिवार्य हो जाता है। जैसे कि यही प्रासगिक ('कस्त्व भो' इत्यादि) उदाहरण का वादयार्थ बिना अलद्धार विन्यास के किसी भी प्रकार भलीभोवि सख्तत नही होता। क्यों- कि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो की युक्ति से निश्चय का अभाव होने के कारण स्वाभाषिक वस्तु धर्मो के रूप में व्यवस्थित नही हो पाती अतः बह निपुण कबियों की पकि से तल्लिसित अलसारो का विषय बन कर ही महुदय- हृदय को आनन्दित करती है। जैसे कि (इसी उदाहरण में) अत्यन्त भौषण सपामकाल के अनुरूप धोर्य के उत्कर्ष की प्रथषा दाय प्रकृत नरपठि
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के विषय में प्रिवतम क प्राप्ति को उत्कण्ठा मे वायन्त हवित्रि मुरसुन्दरियों के समुदान द्वारा संगृहोव किए जाते हुए मन्दार ऋदि कहों की हजरो मालाओ को अप्रेक्षा के अनुमान से नन्दनदन के वृक्षो की बुतुमरूमृदि क प्वस भाव की तिति को सुन्दर उत्मेश्षा की गई है। क्मोंकि कविजन उत्पेक्षा विषयक वस्तु को 'यह उसके समान सगती है' अपश 'दहू वही जान पडती है' इन दो रूपो न उपनिबद् करते है, इसा विवेचन हम रुखका लक्षन करते समय करेंगे। इस प्रकार युवार्ड में प्रतिपादित अप्सृत- प्रचंसा के ससर्ग से रममोन यह उत्प्रेक्षा प्रस्तुत नरपति के सोरमोविराम को परिपुष्ट करने मे समर्य होकर भलीभाति उल्लक्षित होती हुई सव्यमर्मजो को बाह्लादित करती है। (इसके अनन्तर कुन्तक सम्भदत उन लोरो की बाद् का समाभान करते हैं जो यहाँ अतिरनोकि अलद्ार बताते है। कुन्तर इस बात को सिक करते है कि अतिरनोकि तो सर्धन सभी बलद्वारो में विद्मान हो रहडी है। जेखा कि भामइ ने 'कोडनसारोगन बिना' के द्वारा प्रतिपादित किना है। वहां 'अतिशय' से तात्पर्य 'लोकातिकान्तगोधरता' से तो है बिन्दु सतियनोकि मलसारविशेष से नहीं इनोकि अतियनोति वलदारविक्रेष का लक्षम है- निमितवो बबो पक्ष सोकातिकान्तमोषरम्। मन्जन्तेर्रतिथनोकि तामलदगारतना यथा। का घ० २य दहा! निमित का होना आवश्यक है। इसीलिये आागे कुन्तक ने भी कहा है- 'मद्रा कारमतो लोकातिकान्वगोवरत्वेन बचक सेवेपमत्वस्तु' इह्यादि। इसी बात को प्रतिपादित करते हुए कि अविदन तो सर्मन विदमान रहता है वे कहते हैं कि-
इत्यस्या: स्वलक्षणातुप्रवेश इत्यतिशयोक्ेच कोऽलंकारोऽनया बिना । १४ ॥। इति सकलालकरणानुभाह्कत्वम्। तस्मात् प्रथगतिरायोक्तिरेवेयं मुख्यतनेत्युच्चमानेकपि न िंचिदतिरिच्यते। कषिमतिभोत प्रेक्षितत्वेन
गाहंते। न पुनः स्वतन्त्रप्रेण। यद्ञा कारणतो लोकातिकान्तगोघरत्वेन समब्जमतां
वचसः मैवेयमित्यस्तु, तथापि प्रस्तुतातिशय विधानव्यतिरकेम न किचिदपूर्व मत्रास्ति ।
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तृतोयोन्मेष:
(और यह) सातिशयता तो 'उत्प्रेक्षातिशयान्विता' इस (भामह की उत्प्रेक्षा) के अपने लक्षण के "*मे ही (प्रतिपादित किमा गमा है) तथा अतिशयोकि की 'कोलद्धारोजमा विना' के द्वारा समस्त अलद्वारो की अनुग्राहकता) प्रतिपाचित ही की गई) है। बत (अगर इमे आप) बलग से प्रधानतया यह अतिशयोकि हो है (उत्प्रेक्षा नही) ऐसा कहे तो भी कुछ अन्तर नहीं पड़ता। (क्योकि) कविदकि द्वारा उत्प्रेक्षित रूप मे बिल्कुल असम्भाव्य वस्तु भी इसी युक्ि से उपनिबद्ध होकर युक्िसगत होती है। न कि स्वच्छनदतापूर्णक उपनिबद्ध किये जाने पर। अपवा निमित्तत कथन की लोकातिक्रान्तगोचरता के कारण यहां वही (अति- कयोकि बलद्वार ही) मान लिया जाय तो भी वण्यमान (पदार्थ) के उत्कर्ष के प्रतिपाद्न से भिन्न और कोई अपूर्गता यहाँ नहीं या जायगी। (अत. उतप्रेक्षा ही मानना समीचीन है)। सदेवममिधानस्य पूर्वमभिधेयस्य चेह वक्रतामभिघायेवनी वाक्यस्य वक्रत्वमभिधातुमुपक्रमते-
अन्यद्वाक्यस्य वक्रत्वं तथामिहित्िजीवितम् ॥ ३ ॥। मनोजफलकल्लेखवर्णच्छायाश्रियः पृथकू। चित्रस्पेव मनोहारि कर्तुः किमपि कॉशलम् ॥४ ॥ तो इस प्रकार पहले (द्वितीमोन्मेप में) शब्द की एध बभी (वृतीमो- *मेष के प्रारम्भ मे) अर्थ की वक्ता का प्रतिपादन कर अब वाक्य की वकता का प्रतिपादन प्रारम्भ करते हैं- (सुकुमारादि) मार्गों मे विद्यमान वक शब्दो, अर्पो, गुणो एव अलद्वारो को सम्पत्ति से भिन्न, चित्र के मनोहर चित्रपट, (उस पर अकित) रेखाचिन, (उसके ) रझ्गो तथा (उसकी) कान्ति से भिन्न चिन्नकार को किसी अलौकिक निपुणता के समान, उस प्रकार के (अनिवचनीय) छङ्ग से वर्न रूप पाणवाली कवि की कुछ अपूर्ग सरलता वाकय की वकता होती है॥। ३-४ ॥ अन्यदवाक्यस्य वक्रयम्-वाक्यस्य परस्परान्वितवृत्ते पदसमुदाय- स्यान्यदपूर्व व्यतिरिक्तमेव वरुन्चं वक्रभाव. । भव्तीति सबन्ध: क्रियन्तराभावात् 1 कुत'-मार्गस्थवकरशन्दार्थगुणालं कारसंपद:। १६ घ० जी०
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२१० वकोरिजीवितम्
मार्गा: सुकुमाराद्यस्तन्रस्थाः केचिदेव बका: प्रसिद्धव्यनहारर्यति रेकिणो ये शव्दार्थगुणालकारस्तेपां संपत् कारयुपशोभा तस्या। पृथग्भूतं किमपि वकरत्वान्तरमेव । कीटशम्-तथाभिहिति नीवितम् । तथा तेन प्रकारेण केना्यव्यपदेश्येन यामिहिति: काम्यपूर्वैचाभिधा सैव जीवित सर्वस्व यस्य तत्तथोक्तम्। किस्परूपमित्याह-कर्त. किमपि कौशलम् 1 कतुनिर्मात' किमप्यलीकिक यत्कौशलं नैपुण्यं तदेव वाक्यस्य वकत्वमित्यर्थ । कथचिद् चित्रस्येव, आलेख्यस्य यथा, मनोहारि हृदयरञजकं प्रकृतोपकरणत्यततिरेकि कतुरेव कौशलं किमपि प्रथग्भूतं व्यतिरिक्तम्। कुत इत्याह-मनोजफलको- ल्लेखवर्णच्छ्ायाश्नियः । मनोज्ा काश्विदेव हृदयहारिण्यो याः फलकोल्लेखवर्णच्छ्रायास्तासा शीरुपशोभा तस्या: । पृथप्रूप किमपि तन्वान्तरमेवेत्यर्थ, फलकमालेख्याधारभूवा भित्ति, उल्लेखश्चित्र- सूत्रपनाणोपपत्नं रेखाविन्यसनमात्रम्, वर्णा रजकद्रव्यविशेषा, छाथा कान्तिः । तदिदमत्र तात्पर्येम-यथा चित्रस्य किर्मपि फलकाययपकरणकलापव्यतिरेंकि सकतप्रकृतपदार्थजीवितायमानं चित्र करकौशलं पृथक्त्वेन मुख्यतयोद्गासते, तथैव वाक्यस्य मार्गादिप्रकृत· पदार्थसार्थेव्यतिरेकि कविकौशललक्षण किमपि सहृद्यसंबेद सफल- प्रस्तुतपदार्थस्फुरितभूतं वक्रत्वमुज्जम्भते। वाक्य की वक्ता भिन्न होती है-वाक्य अर्थात एक दूसरे से (योग्पता, आकाक्षा एवं सनिधि के कारण) सयुक अवस्या वाले पदों के समूह का अन्य ही अर्थात बपूरव कोई पृथक वक्ता अपवा बोकषन होता है। किससे पृथक (वकता होती है) मार्गों में स्थित वक शब्दो, अर्पो, गुणो एवं अलद्धारो की सम्पति से (परृथक्)। मार्ग का अर्थ है सुकुमार (विचित्र एवं मध्यम) आदि (मार्ग) उनमे विद्यमान कुछ ही धक अर्थात् लोकप्रसिद्ध व्यवहार से भिन्न जो शब्द, अर्थ गुण तथा अलद्धार उनकी सम्पत्ति अर्थात कोई (लोकोत्तर) विच्छित्ति, उस्से भिन्न कोई दूसरी ही वकता (वावय की वक्रता होती है)। (वह वाक्यवकता) कैसी होवी है-उस बद्भ से किया गया कपन जिसका प्राण है। उस प्रकार किसी अनिवंधतीय ढद्ग से जो अभिहिति अर्पात कोई अपूर्य कथन, वह हो जिस वकता का प्राण अर्थाद सर्वस्व होता है। (उस बकता का) स्वरूप कमा है इसे (प्रन्यकार) बताते हैं-कर्ता की कोई कुछलता । कर्ता अर्दात् निर्माण करनेवाले का फोई सोकोतर को कोयल सर्पात् तिपुणठा
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तृतीयोन्मेष:
होती है वही वाक्य की वकना होती है। किस तरह से? चित्र अर्थान् प्रतिमा की तरह मनोहर अर्थात् वित्ताकर्यक, एवं प्रस्तुत (चिन्रपट आदि } साधनो से भिन्न चित्रकार की निषुणता की तरह कुछ अलग ही अर्थात् भिन्न। किसमे भिन-मनोहर चियपट (उस पर बनाये गये) रेखावित्र एव रद् तथा {उसकी) कान्ति की सम्पत्ति से (मिन्न)। मनोज्ञ का अर्थ है हृदय को आकर्पित करनेवाली कुछ ही जो चिनपट, रेखाचित्र एव रेङ्त तथा कान्ति हैं उनकी जो शी वर्यात् सोन्दर्य उसमे भिन्न कोई दूसरा तत्त्व ही (चित्रकार की कुशलता है) फलक का अर्थ है मिन्न की आधारभूत दीवाल (चित्रपट)। उ्लेख का अर्थ है चित्र बनाने के सून की नाप से ठौक किया गया केवल रेखाओ का विन्यास। वर्गों का अर्थ है रगने वाले विशेष पदार्थ (रग आदि)। छाया का अभिप्राय है चमक। तो यहाँ आशय यह है कि-जैसे चित्र का (उसके) चित्रपट आदि साधनो के समुदाय से अतिरिक्त एव समस्त (चित्र मे) प्रस्तुत पदार्थों की प्राणभूत चित्रकार की निपुणता अठम से प्रधान रूप मे दिखाई पडती है उसी प्रकार वाक्य के मार्गादि प्रस्नुत पदार्थ समुदाय से अतिरिक्त एवं समस्त प्रस्तुत पदार्थों की प्राणभूत केवल सहृदयों द्वारा भलीभोति जानी जा सकनेवाली, कवि को निपुणता रूप कोई लोकोत्तर वक्ना सलकती है।
समुन्मीलने वा विचिघविभूपणविन्यासविच्छित्तिविरचने च पर: परिपोपातिशयस्तद्विदाहादकारिताया कारणम्। पदवाक्यकदेश- वृत्तिर्वो यः कश्चिद्वकताप्रकारस्तम्य कविकोशलमेव निबन्धनया व्यवतिद्विते। यस्मादाकल्पमेवेपां व्यवस्थितानां स्वभावालकरणवक्रताप्रकाराणा नवनवोल्लेखविलक्षण चेतनचमत्कारकारि किमपि स्वरूपान्तरमेतस्मादेव समुजम्भते। तेनदमभिघीयते-
और इसीलिए-पदार्थों के स्वभाव की सुकुमारता का प्रतिपादन करने मे अथवा शंगारादि रसो के स्वरूप को भलीभांति व्यकत करने मे एव अनेकौ प्रकार के अलकारों के प्रयोग से शोभा उत्पन्न करने मे उनकी भलीभाति निष्पत्ति का अत्यधिक चतकर्ष ही रसिको को आनन्दित करने का कारण बनता है। पद मथवा वाबम के एक अंस में रहने वाला जो वकता का कोई भेद होता है उसका कारण विधेपत्: कवि की निपुणवा हो होती है।
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घरोतिजीवितम् कयोकि इसी (कवि कौधल) से ही सृष्टि के पररम्भ से लेकर आजवर उसी एक हो स्वर्प मे निश्चिनरूप से सपिन वस्तुओ के) स्वभाव, [उनके) बलद्धारो एव वक्रता प्रकारो का, नपेननरे व्वद्ग में वर्मन होने वे कारण अदिवौर एवं सहूद्यों के आनन्दित करनेवाला कोई दूमरा ही स्वरूष सामने आाता है। इसीलिए ऐसा कहा जाता है- आमेंनार कइपुगरेहि पडिटिअमबािअसारा वि। अज्ा: अभिन्नमुद्दो व्व जभ्रइ वाआ परिष्कठो॥१६।। (आससार कविपुद्धये प्रतिदिवसग्होतसारोयपि। अद्याप्यभिन्नमुद्द इव जयति वाचा परिस्पन्द ॥) सृष्टि के प्रार्म्भ से हो येष्ठ कवियो द्वारा नित्य प्रति तत्व का ग्रहन किए जाने पर भी आज भी अप्ररूट रहृत्यवाला-हा वापो का परिस्पं्ड सर्वोतकर्ष से युक्त है ॥। १६ । अत्र स्गारम्भात् प्रभृति कविप्रधाने- प्रातिस्विकप्रनिभापरिस्पन्द माहात्म्यात् प्रतिदिवनगृ-ोतसर्वस्वोऽ्प्यद्यापि नवनवश्रति भालानन्तर- विजुम्भगादनुद्धाटितपराय इव यो वाक्यपरिस्पन्द स अयति सर्ो हकर्षेण चतते इन्येयमास्मिन सुमनतेऽवि वाकनार्ये कविकौशतस्च विलमितं किमप्यलाकिकमेव परिस्फृरति। चस्मात् स्वामिमान्ध्न- प्राधान्देन तेनतर्टाभस्तम यथा-आसंसार कविपुत्रयै प्रति
तथा न केनचित किमद्यतसमाद् मृद्ीतामान सत्पतिमेद्वाटितपरमार्थ स्थदानीमेव सुद्राबन्धोन्रेरेटो भविष्यतीति लोफोर(म्वपरिस्पन्द्साक ल्यापनतेर्योक्यपरिस्पन्दो जयतीति संबन्ध। यहां सृष्टि के प्रारम्भ से हो श्रेछ्ठ कवियो द्वारा जपनी-अपनी असाधारण प्रतिभा के विलास की प्रभुता से नित्य प्रति जिसके तक्ष्व का ग्रहम् किश गया है फिर भी नई-नई प्रतिनाओं के अहास्व विवासो से आज भी जिद्रा निरूपण नही किया जा सका है ऐसा जो वाषी का विल्स वह विजनी है अर्थात् सर्वोत्ृष्ट रूप मे विद्यमान है। इम बद्ध से इस वारनार्थ का समन्वन हो जाने पर भी कवि की निषुणता का कोई लोकोसर हो वैभव झनकता है क्योकि उस (कवि) ने अपने अभिमान को व्यज्जना को मधानता से इस प्रकार वहा है कि-'सुहि के प्रारम्भ से ही श्रेछ्ठ कवियों द्वारा प्रतिदिन जिसके तत्व का प्रहप किया गया हे किन्तु आज भौ जिसका उद्ाटत नहीं हो
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तृतीयोग्मेप: २९३
सका ऐमा यह वाणी का परिस्पन्द है. इस तरह इस के तत्व को न जानने के कारण कोई भी इसमे कुछ भी ग्रहण नहीं कर सका इसलिये मेरी प्रतिभा से अब परम तत्व का उद्धाटन किये जाने पर इसका रहुस्य प्रकट हो जायगा, इस प्रकार अपने अलौकिक (काव्य) व्यापार की सफलता को प्रतिपादित कर देने के कारण वाणी के परिस्पन्द के विजय की बात (कवि द्वारा) कही गई है। यद्यपि रसस्वभावालकाराणा सर्वेपां कविकौशलमेव जीवितम् तथाप्यलकारस्य विशेषनस्नदनुप्र बिना वर्णनाववपयवस्तुनो भूपणा भिधायित्नेना भिमनस्य स्वरूपमात्रण परिस्फुरता यथाथतन निवध्य- मानस्य न वैचितय- मुत्गेक्षामहे, तद्विदाला दविधा नानुपपचेमनाङूमात्रमवि प्रतिभासनात्। यथा- यदयपि कवि की कुशलता ही रस, स्वभाव एव अलकार सभी का प्राण होती है फिर भी विशेष रप मे वर्णित किए जाने वाले पदार्थ के अलकार रूप से कहे जाने वाले केवल स्वरप से ही स्फुरित होते हुए यथार्गता से निरूपित किए जाने वाले अलकार के उस (कबिकोशल) की कृपा के बिना सहृदयो के लिये आनन्ददायक न होने से कुछ भी वैचित्र्य नहीं आ सकता क्योकि प्रचुर प्रवाह मे पडे हुए दूसरे पदार्थों की भाति सामान्य रूप से ही वह भी प्रतीत होगा। जैसे- दूर्वोकाण्डमित्र श्यामा तन्वी श्यामलता यथा॥ ६७। इत्यत्र नून नोललेखमनोहारिणि: पुनरेतस्य लोकोत्तरविन्यसनविच्छित्ति विशेषितशोभातिशयस्य किमि तद्विदाहादकारित्मुद्धिद्यने। यथा- अस्या' सर्गविधने इति ॥ १८॥ यथा- कि सारुण्यतरोः इनि ॥१६॥ दूब के तिनको की तरह साँवली छरहरी स्त्री सोमलता (अथवा प्रिप- हुलता) जंसी है॥ १७ ॥ यहां पर (प्रयुक्त उपमालकार वचित्र्यजनक नहीं है)॥ जब कि नये ढग से किये गये वर्णन के कारण मनोहर एव अलोकिक रचना के गैचित्य से विशिष्ट बना दिये गयै सौन्दर्यातिशय वाला मही (अलंकार) किसी लोकोतर सहृदमाह्वादकारिता को व्यक करता है। जैसे-(उदाहरण
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२१४ वकोस्तिजीविशम्
स० ३१२ पर उद्धुत) अस्या सर्गबधी। इस बलोक मे ।१८॥। अथवा जैसे (उदाहरण स० ११२ पर उद्धृत) कि ताइन्यतरो इत्यादि इस इल्ेक मे ।। १९ ॥ तदेव पृथग्भावेनाषि भवतोऽम्य कवि कौशलायसवृत्तित्व लक्षणवाक्य वक्रतान्तर्भाव एव युक्तियुक्तताम वगाहते । तदि दमुक्त्तम- वाक्यस्य वक्रभावोऽन्यो मिद्यते यः सहसधा। यत्रालवारवर्गोडसॉँ मर्तोऽ्यन्तर्भविगयति॥ २० ॥ तो इस प्रकार मद्यप यह अलकार अलग से भी सम्भव है फिर भी कविकोशल के वशीभूत रहनेवाली वाश्र्यवक्रता में ही इसका अन्तर्भाद युक्तिसंगन है। इसीलिए (कारिका १२० मे) इम प्रकार कहा गया है कि- वाकय की वकता (पूर्वोक्त पदादि की वकताओ से) भिन्न है जिसके हजारो भैद हो जाते हैं तथा जिसमे यहु द्वारा का सारा अलकार समृह अन्तर्सृत हो जामगा॥ २० ॥ स्वभावोदाहरण यथा- तेथा गोपवधूविलाससुददां रघारह साक्षिणां क्षेम भद्र कलिन्दशैलतनयातीरे लतावेरमनाम्। विद्द्िन्ने स्मरतल्पकल्पन मृदुच्छेदोपयोगेडघुना ते जाने जरठीभवन्ति विगलन्ीलत्वप, पह्वत्ा ॥२१॥ {इस प्रकार अलकार का वदाहरण तो 'अस्या: सर्गविधो-' एवं "कि तारष्यतरो-हत्यादि दे चुक है इसलिये अब स्वभाव एवं रस का उदाहरण देना द्वेष हे। उनमे) स्वभाव का उदाहरण जैसे- हे सोम्य • गोपियो के विलास के दोस्त, राधा की एकान्त (क्रोडाओ) के गवाह, कलिन्द पर्वत की सुना (जमुना) के किनारे (विद्यमान) वे सतागृद सनुदल तो है? (अथवा में तो) सममता है कि अब काम की सेज बनाने के लिये मुलायम (पत्तो के) तोडने की आावश्मकता समाप्त हो जाने के कारण निगलित होती हुई श्यामल कान्तिवाले वे किसलय कठोर होते जा रहे होंगे। ॥ २१॥ अत्र वद्यपि सहृदयसंवैदं वस्तुस्भवि स्वभावमात्रमेव वर्णिितम् तथाध्यनुत्तानतया व्यवस्थितस्यास्य विश्लविदग्धहृदयैकगोचरं किरमपि नूतनोल्लेसम नोहारि पदार्थोन्तरतीनवृत्ति सूदमसुभगं ताहकू स्वरूप- सुन्मोलितं येन वाक्यवक्रतात्मन: कविकीशलस्य काचिदेव काषाधि-
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तृतोयोन्मेव २९५
रूढिरुपपद्यते। यस्मान्तद्वयनिरित्तवृत्तिरर्थातिशयो न कश्चिल्लभ्यते। रसोदाहरण यथा- यहाँ मद्यपि पदार्थ मे सम्भव होने वाले केवल रसिको के द्वारा जानने यहोग्य स्वभावमान्र को प्रस्तुत किया गया हे फिर भी असामान्य ढग से व्यचस्थित होने के कारण इस स्वभाव के, कुछ ही निपुणो के अनुभवैकगम् एव अपूर्ध वर्णन के कारण मनोहर, पदार्थों मे अन्तर्भूत, सूक्ष्मता के कारण सुन्दर किसी उस लोकोत्तर स्वरूप को व्यक्त किया गया है जिससे वाक्यवकतारूप कविकौशल किसी अपूर्व पद को पहॅुच गया है। क्योंकि उससे भिन्न रहनेवाला दूसरा कोई सतिशय नही प्राप्त होता है। लोको याहशमाह साहसधन त क्षत्रियापुत्रक स्यात्सत्येन स तादृगेव न भवेद्वार्त्ता विसवादिनी। एकां कामपि का लवि प्रवममी शोर्योषमकण्डव्यय- व्यप्रा: स्युश्विरचिस्सृतामरचमूडिम्बाहवा बाहयः ॥। २२॥ रस का उदाहरण जैसे-सम्भवत राम को उद्देश करके रावण कहता है कि-) साहसरूप धन वाले इस क्षत्रिया के बच्चे को लोक जिस प्रकार का (पराक्रमी) कहता है वह भले ही वैसा क्योंन हो लोगो की बातें झूठी न हो फिर भी देवताओ की सैना के बीरो के साथ के युद्ध को भूली हुई मेरी ये सुजायें समय की किसी एक भी बूँद के लिए ( अर्थात् क्षणभर के लिए हो। पयाकम की गर्मो से उत्पन्न खुजलाहट को मिटाने के लिए व्याकुल हो जाये (तो मैं उस दुष्ट का पराक्रम देख लू) ।। २२ ।। अन्रोत्साहाभिधान: स्थ्रायिभावः समुचितालम्बनविभावलक्षण- विपयसीन्दर्यातिशयश्ला घाश्द्वालुनया विजिगीषोर्वेदग्व्यभङ्गीभणिति- वैचितयेण परां परिपोपपदवीमधिरोपितः सन् रसतामानीयमान: किमपि वाक्यवकभावस्यमाच कविकौरालभाचेद्पति। अन्धे्षा पूर्वप्रकरणोदाहरणानां प्रत्येक तथाभिहितिजीवितलक्षण वक्रत्व स्वयमेव सहदयविचारणीयम्। यहाँ पर उत्साह नाम का स्थायीभाव अत्यन्त उपयुक्त आलम्बन विभाव (राम) रूप विषय क सोन्दर्यातिरय की प्रदासा के प्रति विश्वस्त होकर विजय की इच्छा रखनेवाले (रावण) की चातुर्यंपूर्ण ढग के कथन की विचिन्रता के द्वारा परिपोष की चरम सोमा को पहुँचाया जाकर रसरूपता को प्राप्त कराया जाता हुआ वाक्यवकतारूप किसी अपर्व कविकोशल को व्यक्त करता है। अन्म पहले के प्रकरणों मे उदधृत उदाहरणों मे से प्रह्येक
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के उसी प्रकार के कथन के ही प्राणोवाली वकता का सहदवो का अपने आप विचार करना चाहिए। वकनाया प्रकारणामीचित्यगुणशालिनाम्। एतदुत्तेजनायालं स्वस्पन्द् महतार्माप । - ३ ।। रसस्वभावालकारा आमंमारमपि स्थिताः । अनेन नवतां यान्ति तद्विवाहादवायिनीम्॥२५॥ इत्यन्तरश्लोकी। औचित्य गुण से सम्पन्न एवं अपने स्वभाव से ही महान् वक्ता के प्रभेदों को अव्यधिक प्रकाशित करने के लिये यह ( कविकोशल) समर्थ है। मृष्टि के प्रारम्भ मे भी स्थित रस, स्वभाव तथा अलकार इस (कवि- कौशन के द्वारा) सहृदयो को आनन्दित करतेवाली नवीनता को प्राप्त कर लेते हैं ॥। २३-२४ ॥ मे दो अन्तरइलोक हैं।
स्वरूपमुल्लिख्य वर्णनीयस्य वस्तुनो विषयविभाग विवधाति- इस प्रकार कान्म के उपयोगी शब्द, अर्थ एव जकि (अर्थाद् कवि- कोशल) इन तोनो वे स्वरूप का उल्लेख कर ( अब) वर्णनीष वस्तु का विषय की दृष्टि से विभाजन करते हैं-
चेतनानां जडानां च स्वरूपं द्विविर्ध स्मृतम् ॥५॥ चेतन (प्रागवान्) एव अचेतन पदार्षों का, सरस स्वभाष को उपयुक्त होने से रमणीप दो प्रकार का स्वरूप (विद्वानों द्वारा) स्वोकार किया गया है।। ५ ।। भावाना वर्ण्यमानवृत्तीनां स्वरूप परिस्पन्दः । कीटशम्-द्विविधम्। द्वे विधे प्रकारी यह्य तत्तथोकम। स्मृतं सूरिभिराम्नानम्! केपां भावानाम् चेतनानां जडाना च। चेतनानां सविद्वता प्राणिनामिति यावत्; जडाना तद्त्यतिरेकिया पैतन्यशूनयानाम्। एतदेव प धमिद्वेविष्य धमद्वविष्यस्य निबन्धनम्। कोटकस्वरूपम् पः स्वभाय: पारमार्थिको धर्मस्तस्य यदीनित्यमुचित्ृमावः प्रस्तावोप- योग्यदोपदुष्टत्यं तेन सुन्दर सुकुमारं तद्विदाहादकमित्यर्थः ।
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भाव अर्थात् वर्णन किये जाने वाले पदार्थों का स्वरूप अर्थात् स्वभाव। कैसा (स्वरूप ) दो प्रकार का। अर्थात् जिसके दो भेद है वह इस शब्द से बताया गया है। स्मरण किया गया है अर्थात् विद्वानों ने स्वीकार किया है। किन पदार्थों का (स्वरूप)-चेतनो एग अचेतनो का। चेतन से अभिग्राय है ऋ्णियो से जिनके अन्दर ज्ञान होता है। जड़ो का अर्थ है उनसे भिन्न एन चेतनतारहित अचेतन पदार्थ। यही दो प्रकार के धमियों का होना धर्म के दो प्रकार का होने का कारण है। (पदार्थों का) कैसा स्वरूप (दो प्रकार का होता है) सरस स्वभाव के औचित्य से सुन्दर (स्वरूप): सरस अर्थात् अपूर्ण परिपोष के कारण कोमल जो स्वभाव अर्थात् मुख्य धर्म उसका जो औवित्य अर्थात् उपयुक्तता प्रकरण के लिये उपयुक्त दोषहोनता उसके कारण सुन्दर अर्थान् सुकुमार सहृदमो की आनन्दित करनेवाला स्वरूप (दो प्रकार का होता है)। एतदेव द्वैविष्य विभज्य विचारयति- तत्र पूर्व प्रकाराम्यां द्वाभ्यामेव विभिद्यते। मुरादि सिंह प्रभृति प्राधान्येतरयोगतः ।६ ॥ इन्हों दो प्रकारो का अलग-अलग विवेचन करते हैं- उनमे से पहला (चेतन पदार्थ) देवादि तथा सिहादि के प्राधान्य एव अप्राधान्य के कारण दो ही प्रकार से (पुन) विभक्त हो जाता है ॥ ६॥ तत्र द्वया: स्वरूपयोमध्यात् पूर्व यत्प्रथम चेतनपदाथसबन्धि तद् द्वाभ्यामेव रास्यन्तराभावान् प्रकाराभ्या विभिद्यते भेदमासा- द्यति, द्विविधमेव संपद्यते। कस्मात्-सुशदिसिहप्रभृतिप्राधान्ये- तरयोगत. । सुरादि: त्रिदशप्रभृतयो ये चेतनाः सुरासुरसिद्ध- विद्याधरगनघर्वप्रभृतय ये चान्ये सिंहप्रमृतयः केसरिप्रमुखास्तेयां यत्प्राधान्य मुर्यत्वमितरदप्राधान्य च ताभ्या यथासंरूयेन प्रत्येकेंयो योग सबन्घस्तस्मात् कारणात्। जनमे अर्थात् दोनो (चेतन एग अवेतन पदार्यों) के स्वरूप के मध्य से पूर्ज अर्थात जो पहला चेतन पदार्थों से सम्बन्ध रखनेवाला (स्वरूप) है वह मिन्न-भिन्न समूहों (अथवा वसों) के कारण दो ही प्रकारो से विभक्त हो जाता है अर्थान उसके दो भेद होते हैं और वह दो प्रकार का ही हो जाता है। कैसे (वह दो ही प्रकार का होता है)-दैवादि एव सिंहू आदि के प्राधान्य एग अप्राधान्य रूप सम्बन्ध के कारण। सुरादि अर्थात् देवता
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आदि वर्पात् देवता, रासस, सिद्ध, विद्याधर एश गन्घ्ने बदि जो चेशन पदार्थ, तपा दूसरे जो सिंह् आदि जिलमे देर प्रधान है ऐने मदार्यों का जो प्राधान्य अर्थाव मुख्यलपता एव उससे भिन्न अर्पाद मौनता जन दोनों से कमानुसार प्रत्येक का जो योग अर्थात् सम्बन्ध है उसके कारण (दो प्रकार हो जाते हैं।। नदेवं सुरादीनां मुख्यचेतनानां स्वरूपनेकं कवीनां वर्णना स्पदम्। सिहादोनाममुस्यचेवनानां पशमृगपसषिसरीसृणणां म्वरूपं द्विती य मित्ये नदेव विशेषेणोन्मीलयवि- तो इस प्रकार एक तो देवादिप्रधान चेतन पदारषों का स्वरूप एक कवियों ने वर्मन का आधार होता है तथा दूसरा सिंह आदि पछुओो, भृरगों, पक्षियो एग सर्प, विन्नु जदि गोम वेवन पदावों का स्वरूप होता है इसी बात को विसेष डग से प्रतिपादित करते हैं-
स्वजात्युचितहेवाकसमुल्लेसोज्जवलं परम् ।। ७ ॥ सुतुमार रति आदि (स्थायीभादी) के परिपोत से हुदमावर्जक प्रधान (चेतन पदार्क्षों का स्वरूप) तमा अपनी जाति के बनुरूप स्वभाव के सम्यद् निल्पण से मुनोभित होनेवाला दूसरा गोम अचेवन पदापों का स्वरूप कवियों के वर्पन का विषन होता है।॥ ७॥ मुख्य यत्प्रधानं चेतनसुरासुरादिसंबन्धिस्वरूपं तद्ेवंत्रिषं सत्कवीना वर्णनास्पर्द मवति स्वज्यापारगोचरता प्रतिपद्यते।
प्रत्यमतामनोहरो यो रत्यादि: स्थायिभावस्तस्य परिपोप: शृ्वार- प्रभृतिरमत्वापादनम, स्थाध्येव तु रसो भवेदिति न्यायात्। तेन मनोहरं हृदयहारि। अत्रोदाहरणा न विमलम्भवृद्वारे चवुर्येड्क्के िक्मोर्वयामुन्मस्तस्य पुरुरयस: मरलपितानि। यया- मुख्य अर्थोत् जो चेवन देवता राक्षस आदि से सम्बन्धित प्रधान स्वरू्प है यह इस प्रकार का होने पर घेष् कवियों के वर्णन योस् होता है अर्थात घपने व्यापार (कविकर्म-काम्य) का विषय होता है। कसा होने पर- सुकुमार रति बादि के परिपोष से मनौहर। अविसषट म्रध्म कठिनता से र्रित अदूर्ग होने से मनोहर जो रति आदि स्वायोभाय है उनके परिपोष
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नृतीयोग्मेष. २११
अर्थात् शृगारादि रसो मे परिणत हो जाना-क्मोकि स्थायी ही तो रस होता है ऐसा नियम है। तिष्ठेत्कोपत्र शास्प्रभावपिहिता दीर्घ न सा कुप्यति स्वर्गायोत्पनिता भवेन्मयि पुनर्भावार्द्रमस्या मनः। तां हर्तुं विषुधद्विपोऽपि न च मे शक्ता पुरोवतिनीं सा चात्यन्त मग्ेचर नयनयोर्यातेति कोडय विधि: ॥ २५॥ उसके कारण मनोहर अर्थात् हृदयावर्जक। यहाँ विप्रलम्भ शृङ्गार के विषय मे उदाहरण स्वरूप 'विकरमोर्गशय' नाटक के चोथे अक मे (उर्गशी के वियोग मे) पायल पुरुरवा के प्रताप (समझे जा सकने) हैं। जैसे- (राजा कुछ सोचकर कहता है कि शायद) कोधवश (अपनी अन्तर्धान विद्या के) प्रभाव से छिपकर (कही) बैठी हो (पर ऐवा नही हो सकता कयोकि) वह देर तक ऋद्द नहीं रहती। (फिर सोचता है कि कही) स्वर्ग को (न) उड गई हो (पर ऐसी बात भी नहीं हो सकती क्योंकि) उसका हृदम मेरे प्रति स्नेह से सरस है। और फिर मेरे सामने स्थित उस (प्रियतमा) को हर लेने मे दानव भी समर्थ नही हैं फिर भी वह आखो के सामने वित्फुल दिखाई नही पडती, न जाने भाग्य कसा है अथवा न जाने क्या बात है । २४॥ अन्र राजो वल्लभाविरहवैधुर्यदशावेशवित्शवृत्तेस्तद संप्राप्तिनिमित्त- मनधिगच्छत. प्रथमतरमेव स्वभाविकमौकुमार्यसंभाव्यमानम् अनन्तरोचितविचारापसार्यमाणोपपत्ति किमपि तात्कालिकविकल्पा- ल्लिख्य मानमनव लो कन कार ण मुत्पेक्षमाणस्य सभवान्नैराश्यनिश्चयतिमृदमानसतया रसः परां तदासादनसमन्बया- परिपोषपद्वी- मधिरोपित. । तथा चैतदेव वाक्मान्तररुद्दीपितं यथा- यहां पर प्रियतमा (उरवशी) के वियोग को विक्लता की अवस्था के अभिनिवेश से व्याकुल हृदय तया उसकी अनुपलब्धि के कारण को न समझते हुए, न ददिसाई पडने के कारण का अनुमान करने वाले राजा की सर्वप्रयम ही सहज सुकुमारता से अनुमानित किया गया एव तुरन्त बाद मे उचित विचार के कारण अनुपपत्र हो गया उस समय के विकल्पो से वणित किये गये न दिसाई पहने के कारण का अनुमान करनेवाले राजा से उसकी प्राप्ति सम्बन्ध के असम्भव होने से निराशा के निश्चित हो जाने से मुग्ध चित्त होने के कारण रस अपने परिपोय की पराकाष को पहुँच गया है।
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३०० बकोकिजीविवम्
पद्ध्थां स्पृशेद्वसुमती यदि सा सुगात्रो मेघाभिवृष्टसिकतासु वनस्थलीपु। पशचानता गुरुनितम्बतया ततोडस्सा दृश्येत चारुपदपङ्त्िरलककाङ्ा॥२६॥ वोर जैसे कि यही (विप्रनम्भ सुद्धार) वन्य शनोको द्वारा भी उद्दीन्त करामा गया है। जैसे-पुरुरवा हो कहता है कि) यदि वह सुन्दर अङ्गो वाली (प्रियतमा उबगी) बादलो से गीली बालुकामय बनभूमि मे पृथ्वी का पैरो से स्वर्श करती तो भारी नितम्बों के कारण इसको, महावर से चिह्धित सुन्दर चरणपक्ति पीचे की ओर अविक गहरी दिसाई पडती॥२६॥ अत्र पद्धथा वसुमती कदाचित् स्पृशेदित्याशसया तत्पति सभाव्येत। यस्माज्जलघरसलिल सेकमुकुमार सिकतासु वनस्थलीयु गुरुनितम्बतया तम्य: पश्राननतत्वेन नितरा मुद्रितसस्थाना रागोपरक्ततया रमणीयनृत्िक्चरण विन्या सपर परा सुतरां समुजजम्भिता, या तदुतरवाक्योन्मत्तरिलपितानां निमित्तता मभज़त्। यहाँ 'शायद कही पृथ्वी का वैरो से स्पर्श करती' इस आया से उसरी प्राप्ति सम्भव हो सकती। कयोकि बादलो के जल से सौची होने के कारम कोमल बालुका वाली वनस्पलियो मे भारी नितम्बो से युक्त होने के कारण उसके पीछे झुके होने से अत्यधिक चिहधित स्थानो वाली एवं महावर से रेंगी होने के कारण सुन्दर पदविन्यास की शृंहला दिसाई पडती, इस प्रकार निराशा का निश्चय ही अच्छी तरह से व्यक्त किया गया है जो उसके बाद के इ्लोको के उन्मत विलाप का कारण बन गया है। कह्ुणरसोदाहरणनि तापसवत्मराजे द्वितीमेजके वत्सराजस्य परिदेयितानि। यथा- धारावरम विलोक्य दीनवदनो भ्रान्त्ा च लीलागृद्द ननिश्वस्यायतमाशयु केसरलतावीथीयु कृत्वा द्शः। कि मे पारश्वसुपैषि पुत्रक कृतै. कि चाटुभि: कूरय। मात्रा न्व परिवर्जितः सह मया यान्त्यातिदीर्या भुवम्॥२॥॥ करूुण रस के उदाहरण 'तापसवतसराज' के द्वितीय अक मे वत्सराय उदयन के प्रलाव (समझे जा सकते हैं)। जैसे- वासवदत्ता के पालवू
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वृत्षीयोन्मेप:
हरिण को धारागृह आदि स्थानों मे ूँढरूट वासवदत्ता को न पाने से निराय हो जाने पर राजा हरिण से कहता है-) हे पुत्र। धारागृह को देखकर (वहाँ अपनी माना वासवदत्ता को न पाकर) मलीन मुख होकर कौडागृहो मे भ्रमणकर (वहाँ भी न पाने से) बडी-बडी उसासें भरकर, घोघ्न ही बकुलवृक्ष की लत्षाओ की गलियो मे नजर दोडाकर मेरे पास क्यो आ रहा है, प्रियवचनो से क्या लाभ? (अर्थात सदि मैं तुमसे झूठे ही प्रियवचनी का प्रयोग करूं कि तुम्हारी माता कही अभी गई है आती होगी तो उसमे वा लाभ क्योकि) कठोरहृदय तुम्हारी। माता ने बहुत दूर देश (स्व्ग) को जाते समय मेरे ही साथ तुम्हे भी त्याग दिया है। (अब उससे मिलना असम्भव है)॥ २७ ॥ अत्र रसपरिपोषनिबन्धन विभावादिसपत्समुदय कविना सुतरा सभग्जुम्भित-। तथा चास्येव वाक्यस्यावतारक विदूषकवाक्यमेवं प्रयुक्षम्- कवि ने यहां पर रस के परिघोष के कारणयूत विभावार्दि की सामग्रौ के समुदाय को भलीभोति प्रस्तुत किया है। और जैने कि इसी श्लोक को अवतीर्ण करनेवाले विदूषक के वाक्य का इस प्रकार प्रयोग किया है- पमादो एसो कखु देवीए पुत्तकिद्को हरि्णपोदो अत्तभवंतं अणुमरदि ॥२द ॥ (प्रमाद. एप खलु देव्या पुत्रकृतको हुरिणपीनोऽतभवन्तमनुसरति।) यह बड़ी लापरवाही है कि देवी का पुत सहश यह मृगशावक आपका अनुगमन कर रहा है।। २८ । एतेन करुणरमोहीपनविभावता हरिणपोतकधारागृहप्रभृतीनां सुवरा समुत्पद्यते। तथा चायमपरः क्षते क्षारावक्षेप इति रुमण्वद्वचना- दनन्तर मे तत्परत्वेनैव वाक्यान्तरमुपनिबद्धम्' यथा- कर्णान्तस्थितपद्यारागकलिकां भुय ममाकर्षता चर्न्वा ठाडिमबीजमत्यमिहता पादेन गण्डस्थलो। येनासी तय तस्य नमसुहृद खेदानमुह्ु क्दतो निःशद्धं न शुकम्य कि प्रतिवचो देवि त्वया दौयते॥ २६॥ इर (विदूषक के कथन) से मृगशावक एव धाटागृह मादि भली भाति करण रस के उद्दीपन विभाव बन जाते है। और जैसे कि रूमण्वान के 'यह
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३०२ मकोक्तिजी वितम्
दूसरा घाव पर नमक छिडका गया' ऐसा कहने के बाद इसी को पुष्ट करने के लिये हो दूसरे स्लोक की रचता को गई है। जैसे-(याजा कहते है कि) है देदि वासवदसे। कानो के बगल मे लगी हुई पद्चराग मणि की कली को अनार का बीज समस कर चोच से सीचते हुए जिस (छुक्त) ने तुम्हारी इस कपोलस्थली पर पदप्रहार किया या उस अपने नर्मसुहृद के तोने की बातो का नि शङ्ग होकर तुम जवाब भी नही देती हो जो ( तुम्हारे वियोग से उत्पस। छोक के कारण बार-वार चिल्ला रहा है। २९॥
अन्र शुकस्यैवं विध दुललितयु क्त्वं वाहभ्यप्रतिपादन परतवे- नोपात्तम्। 'असी' इति कपोलस्थल्याः स्वानुभवस्वदमानसीकुमार्यो करुणरस: काष्ठाधिरूदिर मणीयतामनीयत। यहाँ पर तोते का इस प्रकार के दुर्ललितत्व से युक्त होना उसकी अत्मधिक प्रियता का प्रतिपादन करने के लिये प्रयुक्त किया गया है। 'अप्ञो' इस पद के द्वारा कमोलस्थली के अपने अनुभव द्वारा आस्वादित किए जाने वाले सोकु मार्मातिशय का परामर्श किया गया है। इसी प्रकार उद्दीपन विभाव हो जिसका एकमात्र प्राण हो गया है ऐसा करुण रस रमणीयता की पराफाछा को पहुचाया गया है। एवं विप्रलम्भश्द्गारकरुणयोः सौकुमार्यादुदाहरणरदर्शन विहितम्। रसान्तराणामपि स्वयमेवोत्प्रेक्षणीयम्। इस प्रकार विप्रलम्भ शृगार एव कर्ण रसो के सुकुमार होते के कारण उनका उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। अन्य रहो के भी उदाहरण अपने आप समस लेना चाहिए। एचं द्विवीयम प्रधानचेतनसिंद्ादिसंबन्धि यत्स्वरूप तदित्थ कबीनां वर्णेनास्पद संपधते। कोदशम्-स्वजात्युचित हेव।कस मुल्लेसोउजबलमू। स्वा प्रत्येकमात्मीया सामान्यलक्षणवस्तुस्परूपा या जातिस्तस्था समुचितो यो डेवाक स्वभावानसारी परिस्पन्द्रस्तस्य समुल्लेख सम्यगुल्लेखनं वास्तवेन रूपेणोपनिवन्धस्तेनोज्लं भातिष्णु तद्विदाहादकारीति यावत्। इस तरह जो गोण घेतम सिंह आदि पदापों से सम्बन्धित दूसरा स्वरूप है यह इस प्रकार का होने पर कविमों के वर्णन सोम्य बनता है। कँछ्ा
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तृतीयोन्मेय: ३०३
(होने पर)- जपनी जाति के अनुरूष स्वभाव के वर्णन मनोहर (होने पर)। स्वकीम अर्थात हर एक की अपनी जो जात अर्थाह् सामान्य रूप पद्मर्थ का स्वरप होता है उसके अनुरूप जो हेवाक अर्थात (पदार्थ) के स्वभाव का अनुभरण करनेवाला (पदार्थ) का धर्म उसका समुल्लेख अर्थान् भली-भांति व्णन, वास्तविक ढन्ज् से प्रतिपादत, उसके कारण उज्ज्वल अर्थात् प्रकाश- मान, सहुद्यो को आह्लादित करने वाला (गोण चेतन सिंहादि वदाषों का स्वरूप कवियो के वर्णन का विषय बनता है)।
यथा- कदाचिदेतेन च पारियात्रगुहागृह्े मीलितलोचनेन। व्यव्यस्तहस्तद्वित योपविष्टद भ्रराङ्गराअ्धियुक प्रसुस्म् ॥२०॥ जैसे- (किसी सिंह की स्वाप्नावस्था का वर्णत करते हुए कवि कहता है कि-) कभी पारियात्र (पर्वत विरौध) की कन्दरारपी गृह में (दोनो) आँखें मूँदे हुए इस (सिह) ने अपने आडे कग से रखे हुए दोनो हाथो पर स्थित दाद को नोक के कारण फैली हुई डोढी वाला लगाते हुए चपन किया था ॥ ३०॥
क्षत्र गिरिगहागेहान्तरे निद्धामनुभवतः केसरिणः स्वजातिसमुचितं स्थानकमुललिखितम्। यथा वा- शीदाभग्गाभिराम मुहुस्तुपतति स्थन्दने वत्तवृष्टिः पत्चार्घेन प्रविष्टः शरपतनभवाद भूयसषा पूर्वकायम्। शप्पैश्यलीहै: अमविदृतमुखभ्रंशिभि: कीर्षवत्मा पश्योदग्रे प्नुतत्वाद्वियति बहुतरं स्वोकमुर्व्यों प्रयाति।।३१॥ यहाँ पर्यत की गुफारूप गुह के भीतर निंद्रा का अनुभव करते हुए मिहु की अपनी जाति के अनुरूप स्वति का वर्गन किया गया है। अयवा जैसे-('अभिज्ञान शानुन्तल' मे राजा दुष्यन्द अपने साररथि से कहते है कि ह सारयि!) देखो, अपने पोछे चलते हुए रव पर बार्बार गर्दन मोडने से सुन्दर टट्टि लगाए हुए, बाण लगने के डर से (अपने धरीर के) पिछले मद भाग से आगे के हिस्से में बहुत उपादा सिमटा हुआ, एब परिषम के कारण खुले हुए मुख से गिरसे हुए अर्दचर्वित कुशो को रास्ते मे विषेरा हुआ (यह हरिण। ऊँची एन लम्बी छलागें मारने के कारण ज्यादावर आकाश मे तपा भोड़ा-सा जमोन पर चल रहा है।। ३१ ॥
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एतदेव प्रकाशन्तरे गोन्मीलयति-
चेतनानाममुख्यानां जडानां चापि भुयसा॥ ८।। इसी चेतन पदार्थों के दिविध स्वसप) को दूसरे उद्ध से वक करते हैं- गोण चेतन (सिहादि पदार्यों) का तपा अपिकतर जड पद्यर्थों का भी रस को उदीप्त करने के सामर्थ्य से युक्त रूप मे वर्णन के कारण मनोहर [स्वरूप कवियों का वर्मनास्पद होता है।)। ८ । चेतानाना प्राणिनाममुख्यानामप्रधानभूतानां यत्स्वर्वू्प वदेबविथं तद्वणनीयतां प्रतिपद्यते प्रस्तुताद्वतयोपयुज्यमानम। कोटशम्-रसोही
परिपोषस्तस्मिन् सामथ्यं शक्तिस्तया विनिबन्धन निवेशस्तेन बन्युव हृद्यहारि। यथा- अमुख्य अर्थात् गोणभूत चेतन अर्थात् म्राणियो का जो स्वरूप है वह इस प्रकार ना होने पर उन (कबियो) के वर्णन योग्य होता है अर्थात प्रस्तुव (पदार्थ) के अद्ग रूप से उपयोगयोग्य होता है। कैसा (होने पर)- रस को उदोप्त करने के सामर्भ्य से युक्त सम मे वणिव होने से मनोहर (होने पर) रस बर्यात् शृद्गाद्यदि उनका उद्दीपन अर्थात उल्लस्षित होना परिपुष्ट होना उसमे जो सामर्थ्य अर्थात् दति उससे विनिबन्धन अर्पात वर्णन उसके कारण बन्धुर अर्थात मनोहर (होने पर वर्णनीय होता है।) चूनादुरास्वादफपायकण्ठः पुंस्कोकिलो यन्मधुर चुकूज। भनस्विनीमानविघातदक्ष तदेव जातं वचन स्मरस्य ॥ ३२॥ (वसन्त के प्रारम्भ मे ) आम ने अद्ठरो के भक्षण से रक्त कष्ठ वाले पुषुष कोमल ने जो मधुर अध्यक्त ध्वनि किया वही मानो मानितियों के मान को भग करने मे समर्थ कामदेव का वबन (झादेश) हो गया ॥ ३२॥ अडाना चावि भूयसा-जडानामचेतनाना तलिलतरुकुसुमसमय प्रभतीनामेवंविध स्वरूपं रसीदीपनसानथ्यविनिबन्धनबन्धुर वर्णनीय तामबगाहते। यथा- तथा अधिस्तर जड पदारथों का भी (स्वरष वर्मन योग्य होता है)। जड वर्पात् अचेतन जल वृक्ष, ववन्त लादि का इस प्रकार इससो उद्दीप्
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तृतीमोग्मेष
करने के सामर्थ्य से युक्तरूप मे वर्णन के कारण मनोहर स्वरप (श्रेष्व कवियो के) वर्णन का विषय बन जाता है। जैसे- इदमसुलभवस्तुप्रार्थनादुनिवार प्रथममपि मनो मे पञ्चवाण: भिणोति।
दुर्लभ पदार्थ की कामना से कठिनतापूर्वक रोके जा सकने वाले मेरे चित को कामदेव पहले ही ल्षीण कर रहा है, तो भता दक्षिण पवन ( मनया- मिल) के द्वारा गिरा दिए गये पीले पत्तो वाले बगीचे के माम्र वृक्षो के दारा अड्डुरों के दिसाई देने पर (क्या होगा) ॥ ३३॥ यथा वा- उद्भेदाभिमुखाद्कुरा: कुरमका शैवालजालाकुल प्रान्तं भान्ति सरासि फेनपटलै: सीमन्तिता: सिन्धकः। किचाम्मिन समये कृशादि विलसत्कन्दर्पकोदण्डिक क्रीडाभाव्ि भवन्ति सन्ततलताकीर्णन्यरण्यान्यपि।३४।। अथवा जैसे- ! शीघ्र ही निकल पडने वाले अङ्गरो वाले कुरबक (वृक्ष), सेवार के जालो से व्याप्त किनारो वाले तालाब, और फेनो के समूहो से विभाजिद् कर दी गई नदियां सुशोभित हो रही है। और भी ऐ कृशागि, इस समय भलोभाति विस्तीर्ण लताओ से व्याप्त विपिन भी विलसित होते हुए कामदेष के धनुष की कोठाओं से सम्पन्न हो रहे हैं।। ३४।।
तदेवोपसहरति- शरीरमिदमर्थस्य रामणीयकनिर्मरम्। उपादेयतया ज्ेयं कवीर्ना वर्णनास्पदम् ।९।। इस प्रकार सहज सौन्दर्य के कारणभूत, पदार्थों के स्वरूप का प्रतिपादन कर उसी का उपसहार करते हैं- कवियो दे वर्णन (काव्य) के आधारभूत, सुम्दरता से परिपूर्ण पदार्थ का यह शरीर उपादेय रुप से समझना चाहिए॥ ९॥। अर्थस्य वर्णनीयस्य वस्तुनः शरीरमिदम् उपादेवतया झेयं आह्यतवेन मोदव्यम्। कीटरां सत्-रामणीयफनिर्भरम्, सौन्दर्यपरिपूर्णमा, औपहुत्यरहितत्वेन तद्विदावर्जकमिति यापत्। कबीनामेतदेव यस्माद्वर्णन, २० स० जी०
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३०६ बशेकिजीवितम्
स्पामस्िमाध्यवारमोचरम। एवविघस्यास्य रवम्नशानातियभ्राजि
अर्थ प्रर्थात् वर्णग किये जाने वाले पदार्थ का इस शरीर को जनादेष रूप से जानना चाहिए अर्थाद गरहण करने योग्य समझना चाहिए। कैशा होने पर-रमणीयता मे निर्भर वर्थाद् सुन्दरता से परिपूर्ण, दोषो मे होन होने के कारण सहुदयों को आकह करतेवाला (होने पर)। कयोंकि यही कवियों का वर्णनास्पद अर्धात् कविवाणी के व्यापार का विषय होता है। ,; इस प्रकार अपने स्वरूप की शोभा के उत्कर्ष से कान्तियुक्त इस स्वरूप के अलद्धार उपयोभा मात्र को प्रारम्भ करते हैं। एतदेव प्रकारन्तरेण विचारयति- धर्मादिसाधनोपाय परिस्पन्दनिबन्धनम्। व्यवहारोचितं चान्मल्लभते वर्णनीयताम्॥१० ॥ इसी बात का दूसरे ढंग से विवेचन करते ईै- और दूघरा भी (चेतना व अचेतना का स्बम्व) धर्म आदिपुषुषार्थ- चतुष्टप) की प्राप्ति के उपायभत पादार के कारण रूप मे, लोक व्यवहार के अनुरूप (हो कवियो के) मर्णन का विषय बनता है॥ १०॥ व्यवहारोचितं चान्यत्। अपर पदार्थानां चेतनाचेतनानां स्वरूप मेवंविध वर्णनीयतां लभते कवत्यापारविंषयतां प्रतिपधतें । कीहशय्- व्यवहारोचितम्, लोकवृत्तयोग्यम्। कीदृशं सत्-धर्मादिसाधनोपाय परिस्पन्दनिवन्धनम्। धर्माहेश्वतुवर्गस्य साधने संपादने उपायभूतो य. परिस्पन्द स्त्रविलसिव तदेव निवन्धन यस्य तत्तथोक्तम्।तवदमुर्क्त अनति-यत् काव्ये वंर्ष्यमानवृत्तयः प्रधानचेतनप्रसृतयः सर्वे पदार्था
स्वरूण: पदार्थास्तेषि ध्मार्थोदप।यभूतस्वधिलासमघान्येन कीनां वर्णनी यतामघतरन्ति।तथा न राजां शुद्धकप्रभृतीनां मन्त्रिण च झुकना समुख्यानां चतुर्नतानुश्वानोपदेशपरत्वेनैव परितानि वर्ण्यनने। अप्रधान- चेतना नां हस्ति हरिण प्रभृतीना मं ग्राम मृगयाद्यङ्वत या परिस्पन्द सुन्दर स्वरूपं लचद्ये वर्ण्यमानतया परिटश्यते। नस्मादेवप. तथाविधसवरूपोल्लेख प्राधान्येन काव्यकाजयोपकरणरुतीना चित्रचित्रोपकरणचित्रकरैः सार्म्य प्रथममेव प्रतिपादितम्। वदेवविध स्वभावम्राधान्येन, रसप्राधान्येन
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दविपकार सव्ज राकुमार्यनरग स्वरूप वर्णनाविषयवप्तुन शरीरनेय
व्यवहार के योम्य दूसरा (स्वरूप वर्णनीय होता है)। भेत्न एव जड पदार्थों का इस प्रकार का दूसरा स्वरूप वर्णनीय होता है अर्धात् कवि- व्यापार का विषय बनता है। कैसा (स्वरूप) व्यवहारोचित मर्यान् लोक- व्यवहार के अनुरूम (स्वरप) कैसा होकर-धर्मादि की प्राप्ति के तपाय- भत व्यापार का कारण होकर, धर्मार्दि (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष रूप) चनुर्वगं अथवा पुर्धार्थचतुष्टय) को सिद्ध करने में अर्थात् सम्पादित करने मे उपायभून जो परित्वन्द अभात अपना विलस्वित वही जिस (स्वरूप) का कारण होता है (ऐसा स्वरूप)। तो कहने का आद्यय यह है कि- काव्य मे जिन मुख्य चेतन आदि के व्यवहार का वर्णन किया जा रहा है जन सभी पदार्थों का (धर्मादि) चतुर्वग की सिद्धि मे उपायभुत अपने विलसितो की प्रधानता से युक्त रूप में वर्णन किया जाना चाहिए, तथा जो गौप चेतन स्वरूप वाले पदार्थ हैं वे भी धर्म, अर्थ आदि के उपायभुत जपने विलासो की प्रधानता से ही कषियों के वर्णन के विषय बनते हैं। जैसे कि शुतक इत्यादि राजाओ, शुरुनास आदि प्रमुन मन्तियों के चरितो का वर्णन (धर्मादि) चनुर्वरग के अनुष्ान के उपदेश के लिए ही किया जाता है। तथा लक्ष्य (यन्य काव्यों मे ) गोण वेवन हापी-मृग आदि पदार्यो का, लढाई तथा शिकार आदि के अन्ल रूप में अपने विलास से सुन्दर स्वरूप ही वर्णन का विषय दिखाई पडता है। और इसीलिए उस प्रकार के इरूप के वर्णन की प्रधानता से काव्य, काव्य की सामग्री एग कवि का, चित्र, चित् को सामप्रे एव विनकार के साथ साम्म पहले हो दिसाया जा चुका है। तो इस प्रकार स्वभाव की प्रधानता एन इस को प्रधानता से दो तरह का स्वाभाविक सुकुमारता के कारण सूरस वर्णनीय पदार्थ का स्वरूप शरीर ही है तपा उसका अलसार्य होना हो ठोक है। तत्र स्वाभाषिक पदार्थस्वरू रमलंकरणं यथा न भनति तथा प्रथममेव प्रत्िपानितम्। ददानी रसात्मन प्रधानचेतनपरिस्पन्दवर्व्यमानवृत्तेर लंकारकारान्नराभिमतामलंकारता निराकरोति- अलकारों न रसवत् परस्थाप्रतिभासना्। स्वरूपादतिरिकस्य शब्दार्थासङ्गतेरपि॥ ११॥ उनमें पदार्थों का स्वाभादिक स्वरूप जैसे अलद्धार नहीं होता इसका प्रविपादन पहले हो किया जा चुका है। अब मुख्य चेतन पदार्थ के बिलास
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३०८ वकेकिजीवितम
रूप ध्ययटार का जिसमे वर्मन किया जाता है ऐसे रस स्वरूप की अन्य आलद्वारिको द्वारा सवीकृत अलंकारता का निराकरण करते हैं- (पदार्थ के स्वरूप से भिग्न किसी दूसरे का बौध न कराने के कारम तथा शब्द एगं अर्थ के सङ्भत न होने से 'रसबत्' मलंकार नहीं होता ॥। अलकारो न रसवत्। रसवदिति योऽयमुत्या दिवप्रतीति्नोमालकार स्वस्थ विभूषणत्व नोपपदते इत्यर्थ. । कस्मालू कारणात्-स्वरूपादति रिक्तस्य परस्याप्रतिभासनान् । वर्ण्यमानस्य वस्तुनो यत् स्वरूपमातमीय परिस्पन्दस्तस्माद तिरि कस्यात्यधिकस्य परस्या प्रविभासनादु अनवबोध नात्। तदिदमत्र तात्पर्यम्-यत् सर्वेपामेवालंकृतीनां* सत्कविवाक्याना मिद्मल कार्यमिदमलकरणम् इत्यपोद्धारविहितो विविक्तभावः सर्वस्य कस्यचित् प्रमातुश्वतसि परिस्कुरति। रसबद्लंकार दिति वाक्ये पुनर वहितचेतसोऽपि न किचिदेतदेव बुध्यामहदे। रसवत् अलकार नहीं है। इसका अर्थ यह है कि 'रसबत नाम का अलंकार है' ऐसा जिसका (प्राचीन आलकारिको द्वारा) बोध कराया गया है उसकर अलकारत्व उचित नहीं है। किस कारण से-स्वरूप से भिन्न दूसरे का बोध न होने के कारण। वर्णन किये जाने वासे पदार्थ का जो स्वरू धर्पात् अपना स्वभाव होता है उससे भिन्न अधिक दूसरे किसी का प्रविभासन सर्थात ज्ञान न होने के कारण {'रसयद्' मलंकार नहीं होता)। वो यहां इसका आधय यह है कि-शेष् कवियों के सभी बलंकृत पारयों में यह अलंकार्य है, यह अनकार है ऐसो विभागचुदि द्वारा उत्पन्न भिन्रवा कभी
यहों पर डा० दे के सस्करण में 'सर्वेषानेवाळवूहतोनाम्' पाठ सुदिय या। इस पाठ की अपगत बताकर मचार्य विश्वेश्वर जीने अपनी िवेकामित्र सम्पादन पदति' के द्वारा सर्वेषमेवलकाराणा सत्कनिवाकयगठानामिइम एकार्यमिदमनंकरणम्1 शयादि पाठ समुचित पताया है। पर विदान हमारे पाठ को देखते हुए रये इस बात का अनुमान कर सकते हैं कि आापारनं जी का निवेक उन्हें धोक्षा दे गया है। वस्तुतः इमें तो कगता है कि सदण की गए्ती से 'ता' के स्पान पर 'तो' एव गया है। केवळ 'तो' को 'म' मान रेनेपर पकति का अर्ष समम्जस है। जब कि बानार्यें को के पाठ को मानने पर अर्ध पूर्णतवा मसगशस हो रहता है। क्योंकि सह्कारों में अहंकार्य और सरकार का भेद रद़ों से होगा। यह भेद तो अहकृत बाक्पो में हो सम्मद है। इरयरुम्।
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तृतोयोन्मेव ३०९
किसी प्रमाता के हृदस मे स्फुरित होती है। लेकिन 'रसवन् अलकार में युक्त है' इस वात्र्य से सावधान चित वाले व्यकति के हृदम मे भी कुछ नहीं प्रस्दुख होता, ऐसा ही मैं समझता हूँ।
नथा चन््यत्रि शृद्धासदुशव प्राधान्वेव वण्यमानाडलरचेसत- नन्यने फेनाचदल कर खेन अवितव्यन। यदि या तत्ल्वरूपमेवर तदि- हइनिबन्धनत्वानजंकरममित्युच्यने तथापि नद्वयतिरिक्तमन्यदल कार्ये- तया प्रकाशनोयन्। नहेवविधों न कश्चि दपि तिनेकश्विरन्तनाल काराभनले रसत दल कार लक्षणोदाहरणमार्गे मनागनि विभाव्यते। यथा च-
और भी-यदि शृगारादि ही मुख्ष्य रूप से वणित होने पर अलंकारय है तो उससे भिन्न कोई अलंकार होना चाहिए। अपवा यदि शृगारादि का स्वरूप ही सहदयो के आनन्द का जनक होने से बलद्वार कहा जाता है तो भी उमसे भिन्न अलदार्य रूप में किसी को व्यक करना चाहिए। तो इछ प्रकार का तनिक भी कोई भी विवेचन प्राचीन बालड्वारिको द्वारा स्वीकृत 'रसवन्' अलद्वार के लक्षण अथवा उदाहरण मार्ग मे नहीं दिसाई पढ्ता। जैसे कि-
[इति] रसवल्लक्षणम्। अत्र दर्शिता: सपट्ट: स्पष्ट वा मृह्राराइयो यत्रेति व्यास्थाने काव्यव्यतिरिक्तो न कश्मिदन्य समासार्थभूवसलदयते। योऽसावलकार: काव्यमेवेति वेत्, तदपि न सुस्पप्टसौपनम्। यस्मत् काष्यैकदेशयो: शब्दाथयो पृथक पृथगलंकारा सन्तीत्युपकमयेदानी काव्यमेवाल करणमित्युपक्र मोपसहारवपम्यदुष्टत्व मायाति।
यह (भामह एव उद्धट के अनुसार) रसवत् अलदवार का लक्षण है। पहां पर दिखाये गये जहाँ सूंगारादि हो मानी स्पटट रूप सो बरामृष्ट हो-ऐसौ व्यास्या करने पर काव्य से भिन्न समाप् का मर्भूत कोई दूसरा नहीं दिखाई पडवा। (और यदि ऐवा कहा जाय कि) जो यह अलकार है यह काव्य हो है, तो भी सुन्दरता स्पष्ट नहीं होती। कयोंकि पहले (ग्रन्य के आरम्भ मे) कम् के अवयवभूत शब्द ओर लय के अलगअलर अनदार होते हैं ऐसा प्ररम्भ कर अब 'काय्य ही अलसार है' ऐवा कथन प्रारंम्भ एव समाप्ति को विविमता से दूषित हो जाता है।
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३१० वशेकिजीवितम् यदि या दशिता: स्पष्ट शृद्धारादयो येनेति समास:, तथापिवक्तव्यमेव- कोडमाविति ? प्रतिपादनवेचित्यमेवेति चेत्, तद्पि न सम्यक् समर्थ- नाहम। यस्मात् प्रतिपाधमानादन्यद्वव तदुपशोभानिबन्धन प्रतिपाद्न वैचिउगम, न पुनः प्रतिपादमेव। स्पट्टनया दर्शितं रमानां प्रतिपादन- वैचित्र्य य्यभिधीयते, तदपि न सुभ्रतिपाद्नम्। स्पष्टवया दर्शने शृद्गारा दीना स्वरूपपरिनिमातरव पर्यवस्यात1 किंच, रसवतःकावय स्यालद्वार इति तथाविघस्य सतस्तस्यासाविति न विंचिदनेन तस्याभि- घेयं स्यात् । अथवा मदि 'जिसके द्वारा स्पष्ट रूप से शृगारादि दिखाये गये हो'यह रसवदलकार है। ऐसा समास स्वीकार किया जाय तो भी बताना ही पडेगा कि यह कोन है (जिसके द्वारा स्पष् रुप से शङ्गारादि दिखाये गये हो। (यदि उत्तर दें कि) प्रतिपादन की विचितता ही वह ( अलकार है) तो वह भी भलीभाति समर्थन करते पोथ्य नही है। कयोकि जिसका प्रतिपादव किया जा रहा है उसकी गीण सुन्दरता का कारण उससे भिन्न ही प्रतिपादन की विचित्रता होती है. न कि जिसका प्रतिपादन किया जा रहा है, बही (अपनी उपशोभा का कारण होता है। यदि कहा जोम कि स्पष्ट रूप से दिखाया गमा रसो के प्रतिपादन को विचित्रता ही ( रसवद् अलद्धार है) तो वह भी अच्छा समझाना नहीं होगा। (क्योकि) भृद्धायदि के साफन्साफ दिखाई पडने पर उनका स्वस्प हो भलीभांति निष्पन्न होगा। और यदि 'रसवान्' काव्य का अलसवार (रसवद संकार होता है। इस प्रकार (कहा जाम तो) उस प्रकार (रसवान्) होने पर उसवा यह (रसवद अलकार है) इस कथन से उसका कुछ भी निरपण नही होता। अथवा उसी (रसवस्) अलकार के कारण वह कान्य रसबान् होता है, (यह कहा आय) तो इस प्रकार यह रसवान (काव्य) का अलंकाड नहीं है अवितु रसवान् मलकार है यह अर्थ होने लगेगा, उसी के माहत्म्व से काव्म भी रस से सम्पश्न हो जाता है। अथवा तेनवालट्वारेण रसवत्व सस्याधीयते, तहेव तर्हसी न रसवतोऽलद्वार, अत्युत रसवानलद्वार इत्यायाति, तन्मा- हास्यात काव्यमपि रसवत् सपयते। यदि या तेनैवाहितरससम्पन्घस्य रसवतः काव्यस्यालदार इति तत्पश्चाद्रसवदलद्वारव्यपदेशमासादयवि- यथाग्निष्टोमयाज्यस्य पुत्रो भवितेत्युच्यते-तदपि न सुमरतिमदसमाघानम्। यस्माद् 'अग्निष्टोमयाजि'-शन्दः प्रथमं भूतलक्षणे विपयान्तरे निर्ष्मा-
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तृतीयोन्मेप
प.ाया ममासादित प्रसिद्धि पश्चाद् भविष्यनि वाक्यार्थसंबन्वलक्षण योग्यनया तमनुभवितु शकोति। न पुनरत्रैव प्रयुज्यते। यस्माद्वनवतः काव्यन्यालद्वार इति तत्मबन्धितयैव्ास्य स्वरूपल्धिरेव। तत्संबन्धि निबन्धन व काव्यस्य रमवन्नमित्वेवमितरेतराश्रयलक्षणदोप: केना- पसायो। सि वा रसी विद्यते यस्याती तद्वानलक्कार पयास्तु इत्यभि- धीयने तथाप्यलद्वार काव्य या नान्यत् तृतीयं किचिदवास्ति। तत्पक्षद्वितयमपि प्रत्युक्तम। उदाहरण लक्षणेकयोगन्षेमत्वात् पृथक् न विकल्पपने। अथवा यदि उसी ( रसवदलकार) के कारण रस से सम्दन्ध स्थापित होने से (वह। रस से युक्त काव्य का अलद्धार उसके बाद रसवदलद्कार कहा जाता है-जेसे इसका लडका अग्निष्ठोम यज्ञ करने वाला होगा-ऐसा कहा आाता: तो यह भी समाधान ठीक नहीं है। क्योंकि 'अग्निष्टोमयाजि' शन्द भूतरप दूमरे विषय में निष्पन्न होने के कारण प्रसिद्धि कर प्राप्त हो जाने के बाद भविष्यवाची वाक्यार्थ के साथ सम्बन्ध रूप योग्यता से उसका अनुभव कर सकता है। लेकिन यहाँ पर ऐसा प्रयोग ठीक नहीं। नमोकि रस से पुक्त काव्य का अलकार (रसबदलकार होता है) इस प्रकार इससे स्वरूप की प्राप्ति ही उस ( रसवत्काव्य) के सम्बन्धित रूप से होती है तथा वह सम्बन्भ का होना ही काव्य के रसयुक्त होने का कारण है इस प्रकार इस अन्योइन्माधप दोष को कोन दूर कर सकता है। अथवा यदि जिसके रस है वह उस रस से युत्क अलकार ही है ऐखा कहा जाय तो भी अलकार अथवा काव्य से भिन्न कोई तीमरा हे ही नहीं ( जिसे रसबदलंकार कहा जाय) तपा इन दोनों पक्षो का सण्डन किया जा चुका है। लक्षण मान के ले आाने मा समारित करने के कारण उदाहरण का अरा से खण्डन नहीं किया जाता है। मृतेति प्रेत्य सङ्गन्तु यथा मे मरण इमूतम्। सैवावन्ती मया लब्घा कथमन्नैव जन्मनि।३६॥ जैसे-(दण्डी का रसवदलंकार का निम्न उदाहरण) (प्रियावासयदता) मर गई े ऐसा सोचकर जिसके साथ सम्मिलन के लिए मुझे मृत्यु अभीष्ट पी वही वासबदत्ता मुझे इसी जन्म मे कैसे मिल गई ॥ ३६ ॥
- मक्त वस्तु न किचिद्धिमाव्यते । तस्मादलक्कायतेव युक्तिमती। यदपि कैश्चित्-
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३१२ वनोकिजीवितम्
यहां शरृगार रूप वर्णन के योग्य शरीरभूत चित्तवृत्ि से भिन् कोई अन्य वस्तु नहीं दिसाई पडती। इसलिये ( इसका) अलंकार्म होना ही युकिमपत्र है। और जो किसी ने- स्वशं्द, सथायिभाष, नज्वारीभग्व, विभाव एवं अनिनम के अधिछ्यानवाता (स्पष्ट रूप मे प्रस्युत किया गया शृगायदि रसबदलंकार होता है। । ३७ ।। इत्यनेन पूर्वमेव लक्षण शेपितम्, तत्र स्वशब्दास्पदत्वं रसानाम परिगतपूर्वमस्माकम्। वतस्त एव रसमर्वस्वनमाहहेतनेतसस्तत्परनार्थ विदो विद्वांस, पर प्रष्टव्या :- किस्तशन्दास्पदत्वं रसानामुत रमवत इति। तत्र पूर्वस्मिन् पत्ते-रस्यन्त इति रसास्ते स्वशन्दाम्पदास्तेपु तिउन्तः शृद्गारादिपु वर्तमाना: सन्तस्तजैरास्वाद्यन्ते। तदिदमुक्त भव्वति -- स्, स्वशन्दैर भिधीयमाना: क्ुतिपथमवतरन्तरचेतनानां चर्वणचमत्कारं कुर्वन्तीत्यनेन न्यायेन घृतपूरप्रभृतयः पदार्या स्वशन्दैरमिघीयमानस्त दास्वादसपद संपाद्यन्तीत्येवं सर्वस्य कस्यचिदुपभोगसुखार्थिनमनैरुटार- चरितरयतनेनैव तदभिधानमात्रादेव त्ैलोक्यराज्यसपत्सीखयमृद्ि प्रतिपाद्ते इति नमस्तेभ्यः। इससे पहले वाले लक्षण को ही विशिष्ट किया गया है। उसमे उसो को अपने शन्दो मे प्रतिष्ठित होना सो हमने पहले-पहल जाना है। इसलिये जिनका हृदय रससर्वस्व मे ही समाधिस्य है ऐसे परमार्थ को जाननेवाले उन्हीं पण्डितों से पूँछ्ना है कि-अपने शन्दो मे रस प्रतिष्ठित रहता है अपषा रसषत् (बलंकार)। उनमे पहले पक्ष मे (कि रस अपने शब्दो में प्रतिश्िन होता है) जिनका रख्न (अर्थात् आस्वादन) किया जाता है मे दस होते हैं यै स्वशन्दास्पद अर्थात् उन (अपने खन्दो) में स्यत अर्पात् शृगारादि मे विद्यमान रहते हुए उनके जानने वालो हारा बह्जदित किए जाते हैं। तो इस कथन का आशय यह हुआ कि-(शृंगारादि रस) अपने धम्दो द्वारा सुनाई पहते हुए सहदमो को रस-वर्षणा का आह्वाद प्रदान करते हैं और इस ढग से धतपूर इत्यादि पदार्थ अपने पब्दों द्वारा कहे जाते हुए उपके भास्वाद के आनम्द को उत्पलन कर देने हैं इसलिए वे उदारवरित (महापुर्ुष) उपभोग सुख की इच्छा वाले किसी भी व्यकि के लिये उसका नाम ले सेने मे हो तीनों लोको के राज्य-सम्पति के सुख वाली समृद्धि का प्रतिपादन करते है अव उन्हें नमस्कार है।
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वृतीयो्मेष. ३१३
रसवतस्तदास्पदत्त्व नोपपद्यते, रसस्यैव स्ववाच्यस्यापि तदास्पद- त्वाभावान्। किसुतान्यस्येति। तवलक्कारत्व च प्रथममेव प्रततिषिद्धम। शिष्ट म्याय्यादिलक्षणं पूव व्याख्यातमेवेति न पुन पर्योलाचयन। (अब दूसरे पक्ष मे) रसवद् ( अलंकार) का उस (शृगारादि शब्दो) मे प्रतिद्ठित होना ठीक नही लगना ( क्मोकि) अपने वाच्य भी रस वा ही जब उसमे प्रतिष्ठित होना असम्भव है तो दूसरे को प्रतिषठा उसमे कैमे ही सकती है। तथा उस रस की अलंकारता का प्रतिषेध पहले ही किया जा घुका है। शेष स्थायी आदि के लक्षण की पहले ह व्याल्या की जा चुही है अतः फिर से उसका विवेधन नहीं किया जा रहा है।
यदधि ।
इति कैक्ििन्लक्षणमकारि तदपि न सम्यकू समाधेयतामधितिव्ृति। तथा हि-रसः सनयो यस्यासी रससशय, तस्मात् कार णादय रमवद- लङ्कार- सपदते। तथापि बक्तव्यमेव-कोऽसी रसव्यतिरिक्तवृनि: पदार्थ :: काव्यमेवरति चेत् तदपि पूर्वमेव प्रत्युक्त्म्, तस्य स्त्रात्मनि क्रियाविरोधादलद्वारत्वानुपपत्तेः। अथवा रमस्य संभ्रयो रसेन सप्रियते यम्मस्माद रससशयादिति। तथापि कोडसाविति व्यतिरिक्तल्वरेन बक्त व्यतामेवायाति। उदाहरणजातमप्यस्य लक्षणस्य पूर्वेण समान- योगक्ेम प्रायमिति (न) पृथक पर्यालोचयने। और जो भी- रसवद्ससयपाद्॥ ३८।। ऐसा किसी ने (रमबदलकार का) लक्षण किया है उसे भी भलोभाति समाधानयुक नहीं कहा जा सरूता। क्योकि-रस जिसका आशम है उसे रसु के आमय वाला कहा जदयगा और समी कहरण से यह रसवदलकार सम्पन्न होता है। फिर भी यह तो बवाना ही पढेगा कि रस से भिन्न स्थिति वाला यह कोन सा पदार्थ है। (मदि यह कहा जाम कि) काव्य ही है (वह पदार्थ) तो भी उसका पहले ही सण्डन किया जा चुका है अपने में (ही) करिया विरोध होने के कारण वर्लकारता की सिद्ि न होने से। जयवा रस का जो आधय है या जिसका रस आश्रय ग्रहण करता है उसके कारण (रसबदलंकार कहा जाता है ऐसा समास करें) तो भी ( रस से) भिनन बहू कया है।
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इसे अलय से ब्मक करना वपेक्षित ही है। इस मसन के खारे के सारे उद्ाहरण भी पहले की तरह ही ले आने जाने वाले और सर्मानत किए बाने वाले से है इसी से उनका अलग विवेचन नही किया जा रहा है। रसपेशलम्॥ ३६ ॥ इति पाठे न किचिदवातिरिच्यते। अघ प्रतिपादववास्यो पारूढप टार्थसार्थस्वरूप मलं का वरसस्वरूपातुप्रवंक्ेन ।विगलितस्वपरि- स्पन्दाना द्रव्यानामिव ...... ) कथमलक्कुरणं भवतीत्येतदपि चिन्त्यनेष। किच तथाभ्युपगमेऽपि प्रधानगुणभावविपर्यास: पर्यवस्वतीति न किचिदेसत्। सवपेशलम् ॥ ३९। ऐसा पाठ कर देने पर भी बोई लग्तर नही जा पाता। और किर प्रतिपादक वाक्य में प्रतिपादित किना गया पदाथों का स्वरूप, बलकार्म रव के स्वह्प के अनुप्रवेध से अलंबर कैने हो जाता है यह भी विचारमीम ही है। मोर फिर वैसा स्वोशर कर लेने पर प्रधानता एवं गोगवा का दैशरीत उपस्यिक् से जाता है (वर्पात् पदार्थ का स्वरप जो कि अलंगर्म होने से प्रधान रहता है यही अवंकार होकर गोम बन जपगा) इसलिये यह (रसपेशलय्) कदन भी कुछ नहों है।
योर मिधानामिधेययोरसमन्वयाव्व रसवदलक्वारो पपचिर्नस्वि। अद्र अत्रैर
च रसो विद्यते विष्ववि यस्येति मतमत्ययत्रिहिते तस्चालद्वार इति पठ्ठीनमाम: कियवे। रसवांत्वासावलक्टारश्चेति विशेषमसनासो या। तत्न पूर्वा्मिन पन्ते-रसत्यतिरिकमन्यत् पदार्थोन्तरं विद्यते चत्या साबलदारः। काव्यमेवेवि चेत्, नन्रापि सहयतिरिक कोडसौ पदार्थो पत्र रसवदलट्ारव्यपदेशः सावकाशता परतिपद्यते? विशेषातिरिष पदार्धों न वक्षित् परिटरयते यस्तद्वानलक्टार इति वपशस्पितिमा सादयति। तदेवमुकलक्षणे मार्गे इसवदलक्वारस्य शम्दार्थसन्रतिने रढाचिदस्ति। इसी विषय में (और भी) मारम्भ करते है कि-शन्द एवं मर्ष की सर्गति न होने से भी (रसवदलुंबार नहीं हो सकता) छन्द तमा ऊर्द अर्थात् अभिधान एवं वभिषेय का भवोभाति अन्वव (पया समबन्ा) न होने से भी रसवदसंकार की सिटि नहों होती है। क्योंकि सहाँ पर, मिसनें
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वृतीयोग्मेप. ३१५
रस विद्यमान है या स्थित है इस प्रकार इससे मनुप प्रश्यय करने पर (वह रहवन् कहा जायगा और) उसका अलंकार (रसवदलकार हुआ इस प्रकार) यही (तत्पुर्ष) समास किया जा सकता है। अचवा रसवान् है मह अलकार अतः (रसबदलकार हुआ) ऐसा विशेषण समास किया जा सकता है। उनमे पहले (यछी समास वाले) पक्ष मे-रघ से भिन्न अन्य दूसरा : कोई) पदार्थ है जिसका कि यह अलकार है। यदि (कहे फि काव्य ही (वह पदार्थ) है तो उसमे भी उस (रख) से भिन्न कोन ऐसा पदार्थ है जिसमे 'रसबदलकार' इस सज्ञा को अवसर प्राप्त होता है। (धथा विशेषण समास पक्ष मे ) विशेषण (अर्थात् रस) से भिन्न कोई पदार्थ नहीं दिसाई, पडता जो 'रस्चान अलकार' इस व्यवस्या को प्राप्त कर सके। अर्थात् रस को ही रघवान् अलकार कहा जा सकता है जिसका कि पहले ही सण्डन कर चुके हैं कि रस अलंकार्य होता है अलकार नही) तो इस प्रकार उत्त स्वरूप वा माग मे रसवदलकार के शन्द एवं अर्थ की सङ्गति भी नहीं होती। यदि वा निवशनान्तरविपयतया समामद्वितयेऽवि शब्दार्थस्ति- योजना विधीयने, यथा- तन्वी मेघजलार्ट्पत्लवतया घौसाधरेवाश्रि: शून्येवाभरणः स्वकालविरदाद् विश्रान्तपुष्पोद्गमा। चिन्तामौन मिवास्थिता मधुफतां शब्देविना लच्ष्यते चण्डी मामवधूय पादपतितं जातानुतापेव सा॥।४० ॥। अथया यदि दूसरे उदाहरणों के इसका विषय होने से दोनी सरह के समासी मे शब्द और मर्थ की सर्गात की योजना बनाई जाती है। जैते - (मह लक्षा ) वादलों के जल से भींगे हुए नमे किसलयों वाली होने के कारण आँसुओ से धुल गये अधर वाली-सी अपना समय बीस जाने के कारण विरुसित पुष्पो से रहित होने के कारण आभूषणो से रहितनसी एवं भमरो के गुज्जन के अभाव मे, चिन्ता के कारण मौन होर स्पित-सी पैरों पर मिरे हुए मुझे तिरस्कृत कर उत्पन्न पशचासापय वाली उस नडा प्रिपतमा उ्चशी सी प्रतीत होती है॥। ४० ॥ यथा वा- राजभुभ्गा क्षुमित विद्गधेपिरशन! विकर्षन्ती फेनं मसनमिष संरम्मशियिलम्।
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व नोकिजी वितम्
यथाबिद्व यानि म्खवलिन समिसंघाय बद्दुशो नवीभवंनयं घुरससाना ना परिणता। ५१। अपया जैसे- तरंगरवी भोहों को वकता वाली, सुन्य पक्षियों क पड्िक रूपी करमनी बालो, तथा हुदवहो के कारण वोले हो गए वत्त सरीखे फेन को खोंचनो हुई (यह नदी) जिस प्रकार (जिलादि से) बार बार स्वकित होती ुयी कुदिल गति से वह रही है( तो ऐसा लगता है) मानो अनेको बार( मेरे) अपराधो को सोचकर वह मानिनी (प्रिपतमा उर्वशी) नदी रूप न यह परिवतित हो गई है। ४ ॥ अत्ररसत्वमलक्वारश्व प्रकट प्रतिभासेते। तस्मान्न कर्थविदपि सहि नकस दुरवधानता। तेन रसवतोडलद्वार इति पछोसमासपक्षे शब्दार्थयार्न किविदसद्वतत्वम्, रसपरियोषपसत्वादलद्ठारस्य तननिबन्धनमेव रस. वत्चम्। रसवाद्वासावलद्कार श्चवति विशेषणसमा सपे ा चैतयोसुदाहरण योर्लताचाः सरितश्रदोपन विमावेन वल्लभाभावितान करणतया नायकम्य तन्मयत्वेन (निश्चेतन ?) -मेव पदार्यजात सकल मवलो कयत सस्माम्यस मारोपण तद्वर्माध्यारापर्णं चेत्युपनारूपनी काव्यालद्वारियोजन विना न केनचित् प्रकारण घटते, तल्लक्षणवास्य स्यान। सत्यमेतत, विन्तु 'अलकार'-शब्दाभिधान बिना विशेषणममा सपक्षे केवलस्य रमवानित्यस्य जयोग: माध्नोति । रमगन लक्षार इवि चेतू श्रतीविरभ्युपगम्यते वदपि युक्तियुक्ततां नार्हनि. देरभावात्। रसवतोऽलकार इतिपपीसमासपक्षामि न सुस्पष्टसम्व्रय.। यस्य कस्यचित् काव्पर्त्वं रसवत्वमेव। यस्यातिशयत्वनिषन्धन तथाविय तद्विदाह्वादकारि काव्य करणीर्यामति तस्यालहवार इत्याम्रिते सर्वेपामेव रूपकादीना रसवद्लद्तारत्वमेव न्यायोपपश्नता प्रतिपथते। अलकारस्य यस्य कस्यचिद्रसवर्वाद्। विशेषणसमासेऽयेपैव वासा। यश्ीं रससू्पता एव अलंकार हाफ-साफ दिसाई पडछे है। इमलिए उनके विवेचन मे किसी भी प्रकार की कडिनाई नही है। इरमालनै रसवान का अलकार (रसवदलकार होता है) इस प्रकार पण्ठी समास वाले पक्ष मे शब्द तथा अर्थ की कोई असगति नहीं है: पयोंकि अलंकार के रस- परिपोष रूप होने के कारण रसवता उसका कारण ही है। 'रसवान् अलकार' हस विनेषण समास के पक्ष में औोर फिड इन दोनों बदाहूरणो मे लता एवं मदी के उद्दौपन विभाष होने से, मरिसवमा के निरस्र म्यान से परिपूर्ण हुदम
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तृतीयरेग्मेब ३१७
होने के कारण समस्त अचेतम पदार्थों को (प्रियतमामय) ही देखते हुए नायक का उन लता आदि जड पदार्थों मे) उस (परिगतमा) की समानता का बरोप एवं उसके धर्म का सारोप बिना उपभा एव रूपक आदि काव्य अलद्धारों का प्रमोग किए किसी भी प्रकार सम्भव नहीं क्योकि ये वाकय ही उन्ही सलकारो के चिन्हो को प्रस्तुत करने वाले हैं। ठीक है यह बात। लेकिन विशेषण समास वाले पक्ष मे अलकार शब्द के कमन के बिना केवल 'रसवान है यही प्रयोग प्राप्त होता है। यदि 'रह्वान् अलंकार' ऐसी प्रतीति र्हीकार की जाती है तो यह भी युक्तिसमत नहीं प्रतील होता .. । रसचान् का अलंकार (रसवदलंकार है) इस प्रकार घठी समास याला पक्ष भी स्पषट रप से समन्मित नहीं होता। जिस किसी का भी कान्यत्व रमयश्व ही होता है। तपा जिस (रसवतव) के उत्कर्ष का कारणभूत, सहृदयो को आह्हादिव करनेवाला उस प्रकार का काव्य निर्मोम योग्य होता हे इसलिए उसका मलकार (रसवदलकार होगा) इस आधार पर तो सभी रपक आदि अलकारों की रखवदलकारता ही सुकिसंगत होपी, जिस किसी भ अलरार मे रसवर्व होने के कारण। और यही बात विशेषण समास्र वाले दक्ष मे भी होगी। किंच, तद्भ्युपगम प्रत्येकमुत्स्खलित लक्षणोल्लेखवि ...... कृतपरि- पोपतया लब्घात्मतामलट्वाराणां प्रातिस्विकलक्षणामिद्दितातिशय व्यतिरिक्मनेन किचिदाधिक्यमास्थीयते। तस्मात्तल्वक्षणकरणवैचितयं प्रनिवारितप्रसरमेव परापतति। न चैववि्धािषये रसव दलकारव्यवहार: सावकाश तज्जैस्तयाषगमात्। अलफ्काराणां सुख्यतया व्यवस्थानात्। और फिर ससे स्वीकार कर लेने पर भी "परिपुष्टि होने के कारण अलदासता को प्राप्त अलंकारों के अलग-अलग लक्षणो मे प्रत्िपादित किए गये क्षविरम से भिन्न कुछ आभिक्य इसके द्वारा स्थापित किया जाता है। अत उन अलंकारों के लक्षण करने का सैचिम्य प्रति यारित प्रवर अर्पात् व्यर्ष ही सिद होने लगता है (नर्मोंकि सर्बन कग्य में रस होगा अत सभी अलंकार रसवत् ही होंगे सो प्रारम्भ से लेकर आज तक आलकारिकों ने जो तपभादि सलकार के वेचिन्य का बराबर प्रतिपादन किया है यह व्पर्म हो जायगा क्योंकि सभी (रहवदलकार को होमे ही)
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चकोकिजी वितम् और फिर ऐसे विषय मे (जहाँ रूपकादि अलंकार मुख्य होते है) वह। रसवदलकार के व्यवहार की गुच्जाइर ही नहीं रहती क्योकि उसको जानने वालो को घैसी ही प्रतीति होती है तथा अलकार ही प्रधान रा मे स्पित रहुते हैं। अथवा, चेतनपदार्थेगोचरतया रसवदलंकारस्य निश्चेतनवस्तुनिषय स्वेन चोपमादीनां विषयविभागो व्यवस्थाप्यते, तदपि न विद्वसना वर्जनं िदधाति। यस्माद्चेतनानामपि रसोद्ीपनमामर्थ्यममुचित सत्कविसमुल्लिखित सौकुमार्यसर सत्वादुपमादीनां प्रचिरलविषयत। निर्विषयत्व वा स्थादिति शृद्वारादिनिस्यन्दसुन्दरस्य सतकविपवाहस्य घ नीरसत्वं प्रसज्यत इति प्रतिपादितमेव पूर्वसूरिमिः। यदि वा वैचित्रयान्तरमनोहारितया रसवदलकार प्रतिपाधते, यथाभियुळ
अपवा (यदि) रसवदलकार के विषय चेतन पदा्पों के होने के कारण एवं उपमादि अलंकारों के विषय जढ पदाथो के होने के कारण। रोनों का) अल्म-अलग विषय निर्धारित किया जाता है, तो वह भी विद्वानो के लिये आकर्षक नही होता। ययोकि जह पदार्थों के भी रस को बद्ीस करने की साम्थ्य के अनुरूप स्ेध कवि द्वारा वर्णन की गई सकुमारता से सरख होने के कारण उपमादि घलद्वारो का मा तो विषय बहुत योडा रह जायगा अपवा उनका कोई विवय हो म रह जायगा और इस प्रकार शुगापदि रसो के प्रवाह से रमणीय श्रेष्ठ कृवियों के प्रवाह1 अ्पाव काम्पादि) नीरस होने सरगेगे, ऐवा पूर्व विद्वानो द्वारा प्रतिपादित हो कियाजो धुका है। प्रधानेऽ्यत्र वाक्यार्थे यत्राई तुरसादयः। काव्ये तस्मिन्नल कारो रसादिरित मे मतिः ॥।४२ ॥ अथवा यदि दूसरी विचित्रता के कारण मनोहर होने से रसवदलकार का रतिषादन किया जाता है जैसा कि उन्ही विद्वानो ने कहा है कि- 1 जित काव्य मे (रसादि से मिन्न) दूसर वाश्यार्थ के प्रधान होने पर रस आदि बङ्ध रूप होते हैं उसमे रस आर्दि मसकार होते है यंह मेरा बिधार है।। ४२॥ इति। मन्रान्यो वाक्यार्थ. मराधान्यादलंकार्यतया व्यस्थितस्तस्मिन् दहतया विनियग्यमान: शकारादिरलंकारतां प्रतिपधते। यहमाद्ू 1
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एृतीपोन्मेष:
गुणप्राधान्यं मावामित्यक्तिपूर्व मेवविधविपये विभूष्यते ! भूपणत्रिवेक नयकिरुजजम्भतें, यथा- शषितो हस्तावलग्नः प्रसभमभि्ृताऽप्याददानोऽुकान्त गृद्न् केशेश्वपास्तश्वरणनिपतितो नैश्षितः संभ्रमेण।
'कामीवार्द्रापराध स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शरामि ।।४३।। जही दूसरा वायमारय मुस्य होने के कारण अलक्वारयरप में प्रतिपादित किया जाता है उसमे उसके अङ्बरूप मे प्रयुक् होने के कारण शृगारादि ( रक्ष) अलंकार हो जाते हैं। क्योकि गोणता एवं प्रधानता ये दोनो इस तरह के षिथम में भावों को, अभिन्यक्ति के हो जाने पर सुशोभित होते हैं और अलंका रता के विवेक का प्रकाशन जादिर होता है। जैसे- (विपुरदाह के समय उत्पक्ष) आसुओ मे युक्त कमल के समान नेनो वाली पिपुर की युवरतिमों द्वारा तत्काल अपराध करनेवाले कामी (नायक) की तरह हाप पकड़ने पर सटरू दिया गया, बलपूर्वक ताहित किये जाने पर भी आचल को पकडता हुआ, बालो को पकडते हुए हदाया गया, हडबडी के कारण मेरों पर पडा हुआ भी न देखा गमा, तथा आलिङ्गन करते हुए दुककारा गया भगवान शंकुर के बाणों का अम्नि आप लोगो के पापो को भरम करे ॥ ४३॥ -- (यहं पर आचार्य आनन्दवर्धन ने रसवदलद्कार स्वीकार किया है। रसवदलद्वार उन्होंने दो प्रकार का माना है। एक शुद्ध तपा दूसरा सकीर्य। प्रस्तुत उशहरण को उन्होंने सकीर्ण रसवदलंकार के रूप मे उद्धुत किया है। इसके विषम में उनका कहना है कि- इत्यत्र धिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वे ईष्याविप्रलम्भक्षम श्लेयसहित- स्पाङ्गभाव: ।" अर्थात इस इलोक में भगवान् सकर का प्रभावातिशय वावमार्थ है। उसके अद्भ रूप मे ईर्ध्याविप्रलम्भ उपनियद्ध है। अन' वह रसवदलकार हुआ। साथ ही चूंकि शलेष भी अङ्ल रूप मे आया है मतः ईप्पार्विप्रलम्भ के इलेष से सकीर्ण होने के कारण यह सकोर्ण रसवदलफ़ार का चदाहरण् है।) न प शब्द्वाच्यत्व नाम समान कामिशराग्नितेजसो: सभन्रतीति
क्यचिद्पि व्यवस्थापयितुं पार्यते, परमेन्वरप्रयतनेऽपिं स्वभावस्या-
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३२० वकोक्िजीपितम
न्यथाकर्तुमशक्य्वात्। न च तथाविघशव्दवाच्यतामात्रादेव तद्विदां तटनुभवप्रतीतिरस्ति। 'गुडखण्ड'- शब्दाभिधानादपि प्रतिविषादेस्त- दास्याटप्रसगात् तदनुभवप्रतीती सत्यां रसद्वयसमावेशदोपोऽ्यनि वार्यतामाचरति। यदि वा भमवत्प्रभावस्य मुख्यत्वं द्वयोरप्येतयो सत्वाद् भूपणत्वमित्युच्यते तद्पि न समीचीनम्। यह्मात् काशणस्य वास्तवत्वातिरेव स्यात्। निर्मुलत्वाहेव तयोर्भावाभा वयोरित्र न कर्थचिदपि साम्योपपत्तिरित्यलमनुचितविपयचर्वण चा तुर्य चापलेन।
यहां पर कामी और वाणाग्नि के तेज की समानरूप से सन्दवाष्यत सम्भव नहीं है। और न उतने से ही उस प्रकार के विष्द धर्मों की स्थिति आदि के कारण विर्द्ध स्वभाव वाले उन दोनों का ऐक्स हो किसी प्रकार भी स्थापित किया जा सकता है, कयोकि परमेश्वर के प्रयत्न करने पर भी स्वभाव नही बदला जा सकता। और फिर केवल उस प्रकार की धन वाच्यता से हो सहृदयों को उसका अनुभव नहीं होने लगता अन्यषा 'गुडखण्ड़' शब्द के उच्चारण से भी उसके विपरीत (बस्थावाले) विष आदि भी उसी समय आस्वाद्य होने लगेगे। अपदा यदि यहां उस अनुभव की प्रतसि मान लो जाम तो दो (विरुव) रसो के समावेश का दोत अनिवासरूप से आ जायगा। अथवा परमेश्वर के प्रभाव को मुरूम रवीकार कर, इन दोनों की उसके अङ्गरूप मे विद्यमान रहने के कारण अलकारता मान ली जाय, ऐसा समाधान करे सो यह भी युक्तिसगत नहीं। औोर बयोंकि कारण के स्तुविरूप आदि ही हो सकने की सम्भावना है। उन दोनों (कामी और शराग्नि के) निर्भूल होने के कारण ही पदाषों के अभाव की तरह किसी भी प्रकार समानता की सिद्धि नहीं हो सरुती, इस प्रकार अनुचित विषय के विवेचन की चातुरी की चपलता दिखाना बेकार है।
सम्यक समोहमाना: समर्पणा उदाहरणान्तरविन्यास रसवदलंकारस्य व्यापख्यु:, यपा- कि हात्येन मे प्रयास्यसि पुनः प्राप्तरिचिराइर्शेनं केयं निष्करुणप्रवासरचिता केनासि दूरीकृक:। स्वप्नान्तेप्थिति ते वदन् प्रियत मग्यासककण्ठमद्दो - मुद्ष्या रोदिति रिकबाड्ुबलयस्तारं रिपुखीजन:॥। ४४॥
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तृतोयोन्मेष ३२१
अथवा इस उदाहरण मे आश्वस्त न होकर स्वीकृत रक्षण की सम्यक सद्भति को चाहने हुए रसवदलद्वार के दूसरे उदाहरण की व्यारुया की है- {जैसे कोई बाटुकार राजा की प्रशंसा करने हुए कहता है) हे निरदय। हँसी ( प्रणय-परिहास) से क्या? अब फिर मेरे पास से नहीं जा सकोंगे। चिरकाल के बाद तुम्हारा दर्शन हुआ है। यह कोन सी सुम्हारी परदेश मे रहने की आदत है? किसने तुम्हें दूर भेज दिया है' इस प्रकार कहती हुई अपने प्रियतम के गले में लिपटी हुई, शब्र की स्या, स्वप्न के समाप्त हो जाने पर जग कर खाली मुजमण्डल चाली होकर बढे जोरो से विलाद करती है। ४४।' अत्र भवद्विनिहतबल्लमो वैरिविलासिनीसमृह शोकावेशादशरण
वाज्यार्थस्तदङ्गतया विनिबध्यमानः प्रवासविपतम्भभृद्गार (प्रति- भासन ? परत्वमत्र परमार्थ ?) परस्परान्वितपदार्थ ममर्प्यमाणवृत्ति-
रमवदालम्बनविभावादिस्वकारणसाम मरी विरित विसिता लक्षणानुपपतिन समभवनि। रसद्वय ममानशदुष्ट-चमाप दूरमपास्तमेव। द्वयारपि वास्तव- स्वरूपस्य विद्यमानत्वात्तवनुभवप्रतीवी सत्या नात्मविरोध, स्पर्धित्वा भावान्। तेन तदपि तद्विदाहवादविधानसामर्थ्यसुन्दरम, करुणरसस्य निश्चायकप्रमाणाभावात्। महां पर 'आपके द्वारा निहृर्त पतियो वाली शप्ुओं की अंगनाओ का समूह शोक के आवेश के कारण बेसहारा होकर करण रस की पराकाछा पर पहुंचा देने वाले विधान वाले इस प्रकार के महान् कष्ट का अनुभव करता है' इस तात्पर्य का प्राधान्य होने पर उसके अग रूप मे उपनिबद्ध किया जाता हुआ प्रवास विप्रसम्भ शरृङ्गार (?] परस्पर एक दूसरे के साथ अन्वित पदायों के समूह के द्वारा समपित किए जाते हुए व्यापार वाला होकर गुण्भाव के कारग मलद्गार कहा गया है। उसके निविषम न होने के नाते रसवदलकार के अनुमम्प गुणीभून होने वाले उस रस के आलम्वन विभावादि निजी कारणो की समपता के अभाव से होने वाली लक्षण की असिद्वता भी सम्भव नहीं। साथ हो दीन्दो रसो के समावे का दोष भी बहुत दूर फेंक दिया जाता है। दोनों के ही वास्तविक स्वरूप के विद्यमान होने के नाते उनके अनुभव का बोध होने पर परसपर प्रतिमसता के अभाव मे स्वविरोध भी नहीं आता। इसलिए करुमरस का निश्चय कराने वाले प्रमाणों के सभाव के कारण वह
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१२२ वनोकिजोवितम्
भी रसिको के आानन्द विमान करने मे समर्थ होने के नाने रमनीम प्रजीउ होता है। प्रवाम विप्लम्भस्य समथर्यमाणत्व स्वप्नास्तरनमन् च तथाधतत्वं युकत्वा सम्भत्रतम्तस्यो भयमुपपन्नमिति पथमतरमेव वथमनौ समुद्भवनीति चे [न्त]दृपि न समक्मप्रायम्। यस्माक्चाटुविषय महापुरुपप्रतापाश्न्तिचाकितचेनसा मितस्तन: स्ववैंरिणा तत्प्रेयलीनां च प्रवामनैरपि (प्रकाश० ९) पृथग- वस्थानं न युक्तिपयुक्ततामतिवर्तने ...... तनेव तदपि चतुरसन्। करुणरसस्य मत्यपि निझ्नने, तथाविधपरिपोपद्शाघाराघिरटेर समरता स्तिमितमानमस्य तथाभ्यस्तरसवामनाधिवासितचेतमः सुचिरात्समा सादित स्वप्नसमागमः पूर्नोनुभू तवृत्तान्तसमुचितस ना र््ध का न्त स् ल्ञ्ा प कथमपि सम्पबुद्ध प्रबोधसमनन्तरस मुह् सित पूर्वपरानुसन्धानबहिन-
सीति करुणस्यैन परिपोषपदबीमधिरोहः। अपने कारपस्वलप वाकय मे साक्षात् कहे गए हुए प्रालम्बन विभावादि के दवार प्रवासविप्रलम्भ की समप्यमाणता तथा स्वप्न के बीन ने समय चैसा होना युकित सन्गत् है इसलिए उसके दोनो हो। प्रवासवित्तम्भ मोर कमण) समीनीन है, अतएव यह (विप्रलम्भ पक्ष) उसस पहले कसे उदभूत होता है? यदि इस तरह का तर्क प्रस्तुव किया जाय तो वह भी समीबीन महों मानर जा सरता नमोंकि खुसामद के वाघमभूत महाराज के प्रताप के वाक्रमण के कारण भयभीव हृदय वाले उनके वैरियों के इधर-उधर (पले जाने के कारण) और उनकी प्रेपसियों के प्रोषित हो जाने के कारण अलग-अलग स्यित होता तर्कसङ्भतता के बाहर नहीं जाता है। ". वह मैभी सनीचीन है। करगरस का निश्चय हो जाने पर भी वैसी परिपुष्टि वाली ददाओ की धास पर आरोहण के कारण एकाय्रता से वान्तचितवाले उद सरह अभ्यास की गई हुई रसवासना से सुवासित वित्त वाले के लिए काफी घरसे के बाद स्वप्न मे उपलब्ध समागम वाला पहले के अनुभव किए गए हुए वुत्तान्त के उपयुक्त कान्त के साथ आरम्भ किए गए संलाप ाला वथा कर्प्चिर प्रबुद्ध हुआ, और पबुद्ध होने के याद पोर्वापर्य का विचार उदभूत होने पर प्रस्तुत वस्तु के अननुरूप होने के कारण विदोर्द कर दिए गए हुए अन्तःकरण वाला 'आपके दात्ु की विलासिनियों का समुदाय रो रहा है' इस वाषय से करण रस का ही परिपोष होता है।
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नृवोपोम्मपः ३२३ प्रवामविपल्ञम्भस्य परथम्व्यापारे रसगन्धोऽि? यदि वा प्रेयसः प्राधान्ये सदङ्त्वात् करुणरमस्यालद्करणत्मियांभवीयो तदाये न निरधम । यहमाद् द्वयाजपपेतयोरुदाहर णयमुख्यभूतो वास्यार्थ करुणात्मनैव्र विवरर्तमानवृत्तिरूपनिषद्ध:। पर्यायोक्तान्यापदेशन्यायेन याय्यताच्यनिरिक्तयोः प्रनीयमानतया न करूणस्य रसत्वाद व्यन्नस्य मतो वाक्यनवमुपपन्नम्। नापि गुणीभूतत्र्यङ्गयस्य विषय, व्यह्ब:्य करुणात्मनैव प्रतिभामनात्। न च द्रयोरपि व्यद्गचतम्, अङ्गाद्विभान- स्यानुषपत्तेः। एवच यथानम्भवमस्माभिनिरुल्पितम्। न पुनस्न नमात्र .* ण । चैसे व्यभिचारिभावों के औवित्य को चास्ता अथवा उसके स्वरूप का अनुप्रवेश होने के कारा प्रवास विजनम्भ के दूसरो तरह के ब्यापार के होने पर रस का गन्ध भी कहा मिल सरूता है? यदि कोई कते कि प्रेयस के प्रवान होने के कारण उस्टके पोपक होने के नाने करग रस को अन्द्वार कडा जाना है तो वह कपन भी निर्दोप न होगा क्योंकि तन दोनों उदाहरणों में प्रधान हो जठा हुआ वाक्यार् कका के रूप में ही परिणत होने वाले ब्यापार वाला प्रस्नुत किया गया है। पर्यायोकत तथा अन्यापदेश रूप अप्सुत प्रशसा के न्याय के अनुसार वाच्यता से मिन्न इन दोनों के प्रतोपमान होते के नाटे और करण के रस होने के कारण व्यङ्गय होने पर वाच्यता समीनीन नहीं मानी जा सकती। और न गुणोभूत उयसप का ही विषय माना जा सरुता है कलोकि व्यज्प करा के रूप मे ही प्रतिभासित होता है। दोनों की भौ व्यसचना नहीं मानी जा सकती क्योंकि अङ्गाद्त्रिभान उपपन्न नहीं होता है। यहु विरुत्प हमारे द्वारा मचायक्ति प्रह्तुत किया गयर .-* "। किञ्, 'काव्ये नस्मिन्नलद्वारो रसादि"' इठि रस सवालङ्गार: केवल न तु रसन्दिति मत्पत्ययस्य जोवितम् न किस्ञिदमिहितं स्यात्। एवं सवि शशार्थदनस्ै णवसथ
और फिर उस काव्य मे रसादि अलसार होते हैं' इस कथन से केवन - रस ही अलक्कार होता है, न कि रसवन और इम तरह मन् प्रत्यय का कोई भी वास्तविक आधार कहा गमा हुआ नहीं माना जा सरूता। .. " [ इस प्रकार रसवदलङ्वार का विवेचन कर कुन्तक प्रेयस् अनसार का विवेयन प्रारम्भ करते हैं, जिसका रसवदलद्धार से बनिष्ठ सम्बन्ध है। इस विषय में के भामह के सिदान्त की आलोबना करते हैं। वे आचार्य दण्ो के प्रेय: वलसार के सम्षन 'प्रेपः प्रिमठटास्पानम्' (२ २७५) का सन्दर्भं
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२२४ धभोक्तिजीवितम् प्रश्तुत करते है सपा भामह के विषय मे कहते है कि उन्होंने केवन उदाहरण को ही लक्षण मानते हुए प्रेय अलददार का लक्षण नहीं किया (उदाहरण मात्रमेव लक्षणं मन्यमान)। दण्डी ने भामह के हो उदाहरण मे एक दूसरी पडित जोडकर उसी को उद्धृत किया है जो कि वाक्य को पूर्ष कर देता है तमा अलद्वार को स्पष्ट कर देता है। वह पक्ति है 'कालेनेषा भवेतमीतिस्त- वेवागमनात्पुन.'। इस लिए कुन्तक ने जो सम्पूर्ण पद्य उदधृत किया है, यह इम प्रकार ह- ] प्रेयो गृहागत कृष्णमवादीद्विंदुरो यथा। अद्य या मम गोविन्द जाता त्वयि सृहागते। कालेनैषा भवेत्मीतिस्नवैषागमनात्पुन.।।४५।। 'प्रेप" (अलद्दार का उदाहरण) जैसे घर आए हुए कृष्ण से विदुुर ने कहा कि है गोविन्द ! आज आपके घर आने पर मुझे जो प्रसन्नता हई वह फिर हमे आपके ही आगमन से होवे ॥ ४५॥ नदेव न कषोदक्षमतामरहति । तथा च, कालेनेत्युच्यते तदेव वर्ण्यमानविषयतया वस्तुनः स्वभर तदेव लक्षणकरणमित्यलक्वार्य न
एकक्रियाविषय युगपदेकस्यैव वस्तुनः कर्मकरणत्व नोपपद्यते। यदि दश्यन्ते नथाविधानि वाक्यानि येपामुभयमपि सम्भवति (यथा)- लेकिन फुनतर आलोचना करते हैं- तो इस प्रकार यह स्षोदक्षम नहीं हो सकता। क्योंकि जो 'हासेन' ऐसा कहते हो वही वर्भ्यमान वियम होने के कारण पदार्थ का स्वभाव है और वह (प्रेयोज्दूार के) लक्षण का प्रकृष्टतम हेतु है इस प्रकार कोई अलकार्य बचता ही नहीं। तथा उसी का बलद्कार्य तथा अलद्धार दोनो होना मुक्तिसङत नही होता क्योकि एक वस्तु की एक ही समय मे एक हो करिया की कर्मता और करणना सगत नहीं होती। (इस पर पूर्वपसी कहता है कि नहीं ऐसे बनेका वाक्य है जह। एक ही वस्तु एक ही किया का कर्म और करण दोनो है) अगर जस प्रकार के वाकय, दिखाई पडते है जिनमें ( एक ही क्रिया का कम और करण हो) दोनो सम्भव होता है जैसे- आत्मानमात्मना वेत्सि सृजस्यात्मानमातमना। आत्मना कृतिना च त्वमात्मन्येव प्रलीयसे ॥४६॥ हे भगवन्। आप अपने को !अर्थात् आदि मे अपने ब्रह स्वरूप को
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करते हैं तथा अपने सृष्टि विधान के कारयों से निवृत्त होकर अपने आप अपने में हो लीन हो जाते है॥ ४६ ॥ इत्यमिधीयन, तदषि निःसमन्वयप्रायमेव। यस्मानत्र वास्तवडगयभेदे काल्पनिकमुपचारसत्ता निबन्धनं विभागमाशनित्य तद्वचव्रहार, प्रवतते। किश्, विश्वमयत्वान् परमेश्वरस्य परमेश्वरमयत्वाद्वा विश्वम्य
जगत्प्रपव्वरचना प्रति सकतप्रमातृतास्व्रमवेद्यमानो भेदावबोध: स्फुटावकाशता न कदाचिद्प्यतिक्रामति। तस्मदित्र परमेश्वरस्यैव रूपस्य कस्यचित्तदाप्यमानत्वाद्वेदनाहेः क्रियाया कर्मत्वम्, कस्यचित् साधकतमत्वात् करणत्वमिति .. । उदाहरणे पुनरपोद्धारबुद्धिरिति कल्पनयापि न कथब्विद्विभाणो विभाव्यने। तस्भात्-
इति दूषणमत्रापि सम्बन्धनीयम्। .*... पक्षे च यदेवालद्वारय तदेवालदूरणमिति प्रेयसो रसवतञ्च स्वात्मनि क्रियाविरोधात- आत्मैव नात्मन. स्कन्ध कचिदप्यधिरोहति॥४८।। इत स्थितमेव। ऐसा कहा जाता है, तो भी यह समन्वय को नहीं उपस्थित कर पाता। कयोंकि महा पर वास्तविक अभेद के विद्यमान रहने पर भी काल्पनिक ओपचार्ररक सत्ता वाले विभाग का आश्य ग्रहग कर (उभयरूपता का) व्यवहार किया गया है। और भी, परमेश्वर के विश्वमय होने के कारण मचवा विश्व के परमेश्वरमय होने के कारण वास्तविक अभेद के विद्यमान रहने पर भी (उन परमेश्वर के) माहात्म्य का प्रतिपादन करने के लिए अपने-अपने परिस्पन्द के कारण विचिन जगत्प्रपञ्च की रचना के प्रति समस्त प्रमाताओं के द्वारा स्वसवेद्यमान भेवप्रतीति स्पष्ट रूप से कभी भी निरवकाश्य नहीं होदो। अतः यहाँ पर परमेश्वर के ही किसी रूप का उस समय भी प्रमाणाभाव के कारण वेदन (वेत्सि) आदि करिया का कर्मत्व, तथा किसी (स्वरूप) का साधकतम होने के कारण करणत्व (वणित किया गमा) है (यर्व्षि वस्तुतः अमेद ही है। )। यदि यह कल्पना कर ली जाय कि उदाहरण मे अपोहार (अर्थात अवास्तनिक भी विभाग) दुद्ि से काम लिया जाय तो भी (प्रेपस् अलद्वार के सदाहरण में मलदार और अलसार्य का) किसी भी प्रकार विभाग समझ मे नहीं पाता । गद्र :-
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मतोकिजीवितम्
अपने स्वरप से भिन्न किसी दूसरे का ज्ान म कराने के कारण (प्रेया अलद्धार नहीं हो सकता) यह दोष यहाँ भी सम्बद्ध हो जाता है। .....* अन्य पक्ष स्वीकार करने पर जो अलारयं है यही अलद्वार है इस तरहू प्रेयस औोर रसवत् दोनो ही अलद्वारों में अपने मे ही किया-विरोध होने के कारण (अलसधारता नही हो पामेगी) कयोकि कोई भी शरीर अपने ही कन्धे पर कभी भी नहीं चढ़ती यह बात सिद्ध हो है। [ इसके अनन्तर प्रेयस को अरद्गार मानने के वविषम मे एक अन्य आपति का विषेचन करने के सपशास्त कुन्तक सवेत करते है कि ऐसे स्पलो को समृप्टि तपा सकर का भी उदाहरण नहीं कहा जा सकता। मे इसी पुष्टि के लिए बर्घोलिखित श्लोक बदृत करते है- ] इन्दोरलदम त्रिपुरजयिन. कण्ठमृल मुशरि- दिड्नागाना मद्जलमसीभााअ मण्डस्थलानि। अद्याप्युर्वीवलयतिल क श्या मालम्ना नुलिप्ता न्याभासन्ते वद घर्वात कि यशोभिसव दीयोः ॥ ४६॥ अत प्रेरयोमिहतिरल्प्वार्य: ध्याजस्तुातरलद्वरणम्। न पुनकभयोर लद्वारप्तिभासो येन तद्वयपदेश सङ्कूरव्यपदेशो वा ", सृतीयस्या लङ्टारयंतया वस्त्वन्तरस्याप्रतिभासनातष है पृथ्वीमण्डल के तिलक (गजन् !) चन्द्रमा का लाग्छन, भगवान पादुर का कण्टमूल, भगवान् विष्णु, तथा दिभाजो वे मजल रूप अन्जन को धारण करने वाले म पोलरपल आज भी कालिमा से पुते हुए प्रतीत होते हैं, तो फिर मताओो कि तुम्हारी कौखियों ने किसे सफेद बनाया है॥ ४९॥ (तथा इसका विश्लेषण करते हैं कि)- यहां पर अत्यन्त प्रिय कपन अलद्धाय है, एव व्याजस्तुति (उसका) अलस्वार है न कि दोनो ही अलद्ार रूद में प्रतीत होते हैं जिससे [दोनों के लिए) बलद्वार सजा या संकर सकजा (दी जाय) ..... कयोकि इन दो के अतिरिक्त कोई तौसग पदार्य अलसदरार्य रूप से प्रतीत नही होता। अन्यस्मिन् विपये प्रेयो [पायो?] मणितिविविक्े वर्णनीयान्तरे प्रेयसो विभूषणत्वादुपमादेरिवोपनिबन्धः प्राप्तोति इति न कचिदपि दश्यतरे। तस्मादन्यत्रान्यथा [दा १] प्रेयसो न युत्ियुक्तमलककर णतषम्। रसवतोपि तहेव, योगसेमत्वात् । अन्य उदाहरणों मे (जई्ा) वर्गनीय प्रियतर आसयान से भिन्न दूसरा (पदार्थ) है यहां प्रेयस् (अतसार) के विभूषण रूप मे होने से (बग्य) उपमा आदि अलद्ारों को तरह इसका प्रयोग प्राप्त होता है (परन्तु) ऐसा
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तृतीयोग्मेष ३२७
कोई विषय ही नहीं दिखाई पडता (क्योंकि सर्वन प्रियतर आख्यान ही वर्णनीय रूप होता है जहां कही भी उसका प्रतिपादन किया जाता है।) अत अन्यन्न दूसरे बङ्म से भी प्रेमस का अलंकारत्व युत्तिसङ्भत नेहीं होता है। (वह अलंकार्य रूप मे ही आता है) रसवदलकार की भी वही स्थिति है (वह भी अलकार नहीं हो सकता क्योकि प्रेयस् के) समान ही वह भी लाया जाने वाला व समचित किया जाने वाला है। एवमलकुरणतां प्रेयसः प्रत्यादिश्य वर्णनीयशरीरत्वात्तदेवरूपाणा- मन्येषां प्रत्यादिशति- इस प्रकार प्रेयोडलकार की अलकारता का खण्डन कर कुग्तक उसी के समान स्वरप वाले अन्य अलकारों का वर्णन योग्य शरीर होने के कारण खण्डन करते हैं। प्रेपस् के अनन्तर कुन्तक ऊर्जर्व तथा उदात्त अलंकारों का विवेचन प्रारम्भ करते हैं।
अलङ्ूरणयोस्तद्वद्ूयणत्वं न विद्यते ।। १२ ॥। न विद्यते न सम्भवत। कथम्-तद्वत्। तदित्यनन्तरोक्तरस- घटाटिपरामर्श:।-रसवदादिवदेव तयोर्विभूषणत्वं नास्ति। उन्हीं (रसवदादि बलद्वारो) को तरह (भामह द्वारा) पोर्दापर्य (कमश का० ३४६ सया ३१०) द्वारा प्रतिपा्दित ऊर्जस्थ तथा उदास् सजा वाले अलद्धारों का भी अलसारत्व सम्भव नहीं होता है। नही विद्यमान है अर्थात् सम्भव नहीं होता। कैसे-उनकी तरह। यहाँ उन (तद्) से अभी प्रतिपा्दित किए गये रसवदादि अलस्ारों का परामर्श होता है। ...... माधय यह है कि रसवदादि की तरह् उनका भी अलधधारतव सम्भव नही है। [इसके बाद कुन्तक भामह तथा उद्भट द्वारा दिए गये कर्जास्व मलसूार के लक्षणों तथा उदाहरणों का खण्न करते है। सण्न करते समय वे सद्ट के ऊर्जस्यि अलद्वार के लक्षण एवं उदाहरण को उद्घृत करते हैं जो इस प्रकार है ]- अनाचित्यप्रवृत्तानां कामक्रोधादिकारणत्। भावानां घ रसानाश्व बन्घ ऊर्जस्वि कथ्यते ॥४०॥ तथा कामोडस्य वयृचे यथा दिमगिरे: सुताम्। सड्मदीतुं प्रघवृते हठेनापास्य सत्पथम्॥५१॥
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२१८ [अर्थान् ] काम तथा आदि के कारण अनौवित्य से प्रवृत होने वाले भावो और रसो का निबन्ध अर्जस्वि (अलटार, वहा जाता है॥ ५०॥ (जैसे) इनका काम ऐसा प्रवृद्ध हुआ कि ये (सिंव) सम्मार्ग को छोड कर हठान् हिमगिरि की सुता (पार्वती) को पकड़ने के लिए प्रवृत हए।। ४१। [यहाँ सिव को हठात् प्रवृत्ति के कारण उद्भट के अनुसार अनोचित्य है अत जनस्वि अलद्धार है।] [ इसके बाद वुन्तक आयह के विषय मे वह कहते हुए कि किन्ही ने बदाहरण को हो वत्व्य होने के कारण लक्षण समझने हुए उसी का प्रदशन किया है। कैशचिदुदाहरणमेव वक्तव्यास्लक्षण मन्यमानैस्वदेव प्रदशिनम्) उनके ऊर्जास्व अलद्धार के उदाहरण को उदृत करते हैं जो इस प्रकार है] ऊर्जस्वि कर्णेन यथा पार्थाय पुनरागत। द्विः मन्दधाति कि कर्ण: शन्येत्यहिरपाकृतः ।।४२॥। [इसी विषय मे वे एक अन्ग अधोलिखित दण्डी का पद्य भी उद्यहरण रुप में प्रस्तुत करते हैं। अपहर्ताऽह मस्मीति दृदि ते मास्म भूद्धयम्। विसुखेपु न मे सङ्ग: प्रहतु आतु वाञ्छति ॥४२ ॥। मुद्ध मे पीठ दिसा कर भागते हुए किसी योटा के प्रति किसो योज्ा की यह उति है कि) मैं सुम्हारा अनिष्ट करने वाला हू इस लिये तुम्हारा हृदय भमभीव न हो कयोकि मेरा खडम कभी भी पीठ दिखाने दालो पर प्रहार नही करना चाहता ॥५३ ॥ [उम्ट के लक्षण का विवेधन करते हुए ये सद्ेत करते हैं कि यदि भाव अनीवित्यप्रवृत है तो वहाँ रसभद्द ही जायगा । इसके समर्यन में वे व्वन्यालोक पृष्ठ ३२० पर उदघुत कारिका- वनोचित्या हते नान्यद्ववभङ्गत्म कारणम्।। को उद्भुष् करते हैं। लेफिन जैसा कि उदाहरण समट ने प्रस्तुत किया सै उसके विषय मे वे कहते हैं कि यहां-] समुचितोऽपि रसः परमसीन्दर्यमावहति, तत्र कथमनौित्यपरि- म्लान: कामादिकारण कल्पनोपस तवृत्तिरलद्वारताप्रतिभासः प्रयाम्यति। समुचित भी रष अ्यधिक सुन्दरता को धारण करता है, वहाँ भला कैसे औदित्य के कारण म्लान कामादि कारणों को कर्पना से मष्टवृत्ि होकर सनद्वार की प्रतोति होगो।
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तृतीमोन्मेप. ३२९
[ इसके अनन्तर कुमारसम्भव से अधोलिस्तरित इलोक को उद्वृत कर कुन्तक उसमे भरतनयनिपुणमानसो के द्वारा मान्य रसाभास अलद्वार का खण्डन करते हैं। ] पशुर्पातरप तान्यहानि कुच्छ्रादगमयदद्रिसुताममागमोतक.। कमपरमवश न विप्रकुर्युर्विभुमपि त यदमी स्पृशन्ति भावा. ।४ : भरतनयनिपुणमानसैः उदाहूरणमेवोनितम्। तदेवभयं प्रधानचेनन- लक्षणोपकृतातिशयविशिष्टाचत्तवृत्ति [वव] शेषवस्तुस्वभाव एव सुख्यतया वर्ण्यमानत्वादलङ्कार्यो न पुनरलङ्कार.। पार्वती के समागम के लिए उत्सुक भगवान शङूर ने भी उन (तीन) दिनो को बड़े कप्ट से बितामा। ये (ओतसुकयादि) भाव दूसरे किसे न विवश कर विकार युक्त बना दें जब कि ये उन समर्थ शकर का भी स्पर्श करते हैं (अर्पात् उन्हें भी विकारयुक्त बना देते हैं)। (यहां) भरत के नय मे निपुण चितवालो ने उदाहरण को ही ऊर्जिन कर दिया है। इस प्रकार यह प्रधान चेतन ( शिव के) स्वरूप से उपकृत उत्कर्ष से विशिष्ट चित्तवृत्तिविशेषरूप वस्तु का स्वभाव ही मुर्य रूप से वण्पमान होने के कारण अलद्धार्य ही है न कि अलद्ार। इस तरह कुन्तक ख़ण्डन का आधार वही रखते हैं जिसके आवार पर कि इन्होने रमवदादि अलद्धारो का खण्डन किया है और कहते है कि यह (ऊर्जस्वि ) अलद्धार भी रस्षवदादि को (अलद्धार मानने मे) प्रतिपादित किये गये दोषो की पात्रता का अतिकमण नहीं कर पाता (अर्थात् मह भो उन्ही दोषो से युक्त है) इसलिये (इसे अलद्धार मानने मे) अभी कहे गये (दोषो) को योजना कर लेनी चाहिए। इसके बाद उदात्त अलस्धार की भी उन्ही समान तर्कों के आधार पर अलद्धारता का खण्डन करते हैं। सर्वप्रथम उद्यात्त के प्रथम प्रकार के उद्भट द्वारा किमे गये लक्षण- उदात्तमृद्धिमद्वस्तु ॥ ४४ ।। की आलोघना करते हुए कहते हैं कि- अत्र यद्धस्तु यदुदात्तम् अलहरणम्। कीद्दशमित्याकाकक्षायाम् 'शद्धिमत्' इत्यनेन यदि विशेष्यते, तद्यदेव सम्पदुपेतं वस्तु वर्ण्यमान मलक्कारय यदेवालदुरणमिति स्वात्मनि क्रियाविरोधलक्षणस्य दोषस्य दुर्निवारत्वात् स्वरूपातिरिक्तस्य वस्तवन्तरस्यापतिभासनादूर्जस्वियत्। यहां जो (वर्णनीय) वस्तु है वह उदात्त अलकार है। फैसी वस्तु
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(उदात्त अलद्धार है) इस आवौक्षा से यदि उस वस्तु को (फृद्रिमद्) अर्थात् 'ऋृद्धि से सम्पन्न' इस विशेषण से विशिष्ट कर दिया जाता है तो जो ही सम्पत्ति से युक्त वस्तु वर्णनीय होने के कारण अलद्धार्थ है, वही अलद्वार है इस प्रकार अपने में ही किमाविरोध रूप दोष के हटाये न जा सकने के कारण तथा अपने अपने स्वरूप से भिन्न अन्य किसी पदार्थ की प्रतीति न कराने के कारण ऊर्जास्थि की सरह् ही (अलसार नहीं हो सकता)। अथवा ऋांदूमद्वस्तु यस्मिन यस्य वेत्यपि व्याख्यानं कियते, तथापि तदन्यपदार्थलक्षण वस्तु बक्तव्यमेव यत्समानार्थतामुपनीतं।तरद्धिमद्वस्तु यस्मिन् तस्थ वेति तत्काव्यमेव तधाविध भविष्यतीति चेतु तद्पि न किश्रिदेव। यस्मात्काव्यस्यालङ्गार इति प्रसिद्धिन न पुनः काव्यमेवा- लक्करणमिति। अपवा सम्पत्ति सम्पक् वस्तु जिसमे हो अथवा जिसकी हो (वह उदाक्ष अलद्कार है) इख प्रकार व्याख्या करते हैं। तो भी वह भिन्न पदार्थ रूप वस्तु बताना हो पडेगा जिसकी समानार्षकता को प्राप्त कगया गया है। वह ऋद्विमत् वस्तु जिसमे अथवा जिसके हो वह काय्य ही उस प्रकार (उदात्त अलकार) होगा यदि ऐसा कहते हैं तो भी यह कुछ भी नही है. कयोकि काव्य का अलकार (होता है) यही प्रसिद्ध है न कि फिर काव्य हो अलकार होता है ( ऐसी प्रसिद्धि है)। यनि वा ऋद्धिमद्वस्तु यस्मिन् यस्य वेत्यसावलकारः "तथापि वर्णनीयाल क्वुरणव्य(म१) तिरि कमलक्करणकल्पमन्यदत्र किव्िदेवोपलभ्यत इत्युभयथापि शब्दार्थासह्गतिलक्षणदापः सम्मातावसरः सम्पद्ते। अथवा यदि सुम्पति सम्पप् वस्तु जिसमे अबया जिसके हो ऐसा मलकार (ही उदात्त अलकार है) तो भी प्रतिपाद्य अलंकार से भिन्न कोई अन्य अलकार सा यहाँ प्राप्त होता है (ऐसा स्वीकार करना पडेगा) इस प्रकार दोनों ही बँगो से शब्द एवं अर्थ की असगति रूप दोथ का अवसर उपस्थित हो जाता है। (अक्ष. पद्विमद्वस्तु उदात्त अलकार होता है यह कहना अनुचित है। उदात्त अलकार नहों अवितु अलकार्य ही होता है।) इस के बाद उद्भट द्वारा प्रतिपादित द्वितीय उदात्त प्रकार का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि-
माय:। तथा पतस्य लक्षणम्-
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तृतोयोन्मेप: ३३१ चरितक्व महात्मनाम्। उपलक्षणतां प्राप्त नेविवृत्तत्वमागतम्॥ ५६॥ इस उदासालकार के दूसरे भी भेद की अलकार्यता हो उपयुक्त है न कि अलंकारता। क्योंकि इस (दूसरे प्रकार) का लक्षण है कि- (जहां पर) महात्माओ का चरित उपलक्षण होकर आता है, इतिवृत के रूप मे नही प्रयुक्त होता (वहां दूसरे प्रकार का उदातालकार होता है।)
मावाना व्यत्हारस्योपलक्षणमात्रवृत्तेरन्वयः प्रस्तुते वाक्यार्थे कन्िद्विधते वा न वेति। तत्र पूर्वस्मिन् पच्षे-तत्र सदलोनत्वात् पृथगभिधेयस्यापि पदार्थान्तरवत्तद्वयत्त्वेनैव व्यपदेशो न्याय्यः। पाण्यादेरिव शरीरे। न पुनरलक्कारभाघोऽपीति । अन्यस्मिन् पक्षे-तदन्वयाभावादेव वाक्या- न्तरवतिपदार्थवत्तस्य तत्र सत्तैव न सम्भवति, कि पुनरतक्करण- त्वचर्धा। इसमे वाक्यार्थ के परमार्थ को जाननेवाले (विद्वानो) को इस प्रकार विचार करना चाहिए-कि इख वाक्धार्थ मे महापुषषो के केवल उपलक्षण रूप ही व्यवहार का कोई संबंध है या नहीं है। उनमे से पहला पक्ष (कि सम्बन्ध है) स्वोकार करने पर-उसमे लीन न होने के कारण अलग से प्रसिपाद्य भी (उदव्यवहार का) अन्य पदार्यों की भौति उस वाकमार्थ के अवयव रूप से ही कथन करना उचित है जैसे शरीर मे हाथ इत्यादि का (शरीर के अवयय रूप मे ही प्रयोग होता है), न कि अतङ्ारवा भी सचित होती है। दूसय पक्ष (कि सम्बन्ध नहीं होता है ऐसा) स्वीकार करने पर-उसका सम्बन्ध ही न होने से दूसरे वाक्यों मे रहने वाले पदार्थ की भांति उसकी वहाँ सत्ता हो नहीं सम्भव होती है, तो भला अलदारता की चर्चा कैसे हो सकती है। [ इसके बाद, जैसा कि डा० के सकेश करते हैं, कुन्तक ने इद् निषय में किसी श्लोक को सपधृत किया है जो कि पाम्हुलिपि की प्रष्टता के कारण पड़ा नहीं जा सका। ] इस प्रकार ऊर्जस्य एव उदास्त की मलसारता का खण्डन कर कुन्तक समाहित वलकार का विवेधन करते हैं। वे कहते हैं- तथा समादितस्यापि प्रकारद्वयशोमिन ॥१३॥
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नथा तेनैव पूर्वोक्तेन प्रकारेण समाहिताभिधानस्य चालङ्वारस्य भूपणत्य न विद्यते वास्तीत्यर्थः। उसी प्रकार दो भेदो से सोभित होनेवाले समाहित की (अतङ्कार् नहो होती)।। १३।। वैसे अर्थाद उधी (ऊर्जस्वि आदि मे प्रतिपादित किये गये) पहलेवाले बद्ध से समाहित नाम के अलद्वार की अलद्धारता नहीं होती हू। यह आदाय है। इस के अनन्तर कुन्तक कारिका में निर्दिष्ट किए गये दो प्रकारो मे से प्रथम प्रकार अर्थात उद्वट द्वारा दिये गए समाहित अलसार के लक्षण का सम्डत करते हैं। परन्तु जैसा कि डा० दे ने पाठ दे रखा है वह वमट के ग्रन्थ मे प्राप्त लक्षण से कुछ भिन्न है। उद्भट के स्रन्थ मे समाहित का रक्षण इस प्रकार हे- रसभावतदाभासवृत्तः प्रशमबन्धनम् । अन्यानुभावनि शून्यरूप यत्तत्ममाहितम् ॥ ४७।। जहां पर अन्य अनुभावी से निशून्य रूप मे रस, भाव, रसाभास तपा भावाभास के व्यापार की शान्ति उपनिवद की जाती है वहाँ समाहित अलद्वार होता है ॥ ५७ । किन्तु प्रस्तुत प्रन्थ का लक्षण इस प्रकार है-
अन्यानुभावनिःशून्यरूपो यस्तत्समाहितम्॥ परन्तु यह लक्षण समीचीन नहों हैं। [इस सद्भट के अभिमत लक्षण का खण्डन कुन्तक ने किन तर्कों से किया है उसके निषय मे कुछ भी नहीं कहा जा सकता क्योकि न तो श० ऐे ने उसका भूल हो प्रकाशित किया है और न उनके विषय में कोई
दिया है-] सकेत ही किया है। इस प्रकार का उदाहरण कुन्तक ने इस पद्य को
अचणो: स्फुटा भ्रुकलुषोऽरुणिमा विलीन: शान्तं च सार्धमधरस्कुरण मुकुव्या। भावान्तरस्य (तब) गण्डगतोऽपि कोपो नोद्राढवासनतया प्रसर ददाति॥५८ ॥ स्पष्ट आतुओं की बलुपता वाली आंसों की रक्तिमा गायम हो गयी औोर भौहों के सापन्साप हो अपर का कडकूना भी समाप्त हो गमा है।
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पृतीयोन्मेष
(आश्चर्य है कि) तुम्हारे कपोलस्यल पर विद्यमान कोध प्रगाद वासना के कारण दूसरे भाव को प्रश्मय नहीं देता है। पर इसका भी विवेचन उन्होंने किस ढङ्ग से किया है और इसमे समा- हित के अलस्धारत्व का कैसे खण्डन किया है। कुछ भी नही कहा जा सकता। इसके बाद कुन्तक कारिका मे निर्दिष्ट दूसरे प्रकार अर्थान् दण्डी के अभिमत लक्षण का खण्डन प्रस्तुत करते हैं। यदपि कश्चित् प्रकारन्तरेण समाहिताख्यमलङ्गरणमाख्यातं तस्यापि तथैघ भूषणत्वं न विद्यते। तदभिधत्ते-प्रकारद्वयशोभिन पूर्वोक्तेन प्रकारेणानेन पापरेणेति दाम्यां शोभमानस्य समाहितस्यानङ्कारत्वं न सम्भवनि। मोर भी जो किन्ही आचार्यों ने दूसरे हङ्ग से समाहित नामक अलक्कार प्रतिपादित किया उसकी भी उसी प्रकार अलद्धारता नही है। इसीलिये (कारिका में कहा गया है) दो प्रकारों से सुशोभित होने वाले ( समाहित अलद्धार) का। बर्धान् पहले बताये गये ( उद्भट के अभिमत) प्रकार से एवं इस दूसरे (दण्डी द्वारा अभिमत प्रकार) से दोनो प्रकारो द्वारा शोभिन होने वाले समाहित वलटार को बलद्धारता सम्भव नहीं होती है। इस दूसरे प्रकार का खण्डन करते समय उन्होंने दण्ही के लक्षण एव वदाहरण को उद्धुत किया है जो इस प्रकार है- क्षण है- किश्विदारममाणस्य कार्य दैववशात्पुनः। तत्साधन-समापत्ियों तदाहुः समाहि तम् ॥। ५६॥ किसों कार्य को आरम्भ करने वाले को दैववश पुन उसके साधन की सम्प्राप्ति हो जाने पर समाहित अलसूार होता है । ५९ ।। एव उदाहरण है- मानमस्या निराकर्तु पाद्योमे पतिष्यतः। उपकाराय दिष्व्यैतदुदीण धनगजितम्॥६०॥ इसके मान को दूर करने के लिए पैरो पर गिरते हुए मेरे भाग्य से यह मेव गर्जन उत्पश्न हो गया ॥। ६० ॥। पर इसका खण्डन उन्होंने किन तर्कों द्वारा किया है यह कुछ कहा
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नहीं जा सकता। वमोंकि उसके विषय मे कोई भी संकेत ड० डे के सस्करण मे स्पष्ट नही।" इसके बाद कुन्तक अपने अभिमत रसवत् अलसार की व्यासया पारम्भ करते हैं उसको अवतरणिका रूप मे वे कहते हैं- तदेव चेतनाघेतनपदार्थभेदभिन्नं स्वाभाषिफ-सौकुमार्य-मनोहर वस्तुन: स्वरूप मविपादितम्। इदानी तदेव कविप्रतिभोल्षिसितलोकोत्तरा- तिशयशालितया नवनिर्मितं मनोक्षतामुपनीयमानमालोच्यते। तथा- विधभृषणविन्या सविहित सौन्दर्यातिशयन्यतिरेकेण भूतत्वनिमित्तभूत न तहिदाहादकारितायाः कारणम्। तो इस प्रवार वेतन एवं अचेतन पदार्थों का भेद होने के कारण अलग- अलग मर भद्युक्त सपा सहज सुकुमारता से मनोहर वस्तु का स्वरूप प्रतिपादित किया गया। अब कवि की पक्ति द्वारा वर्णित किए गये अलोकिक उत्कर्ष से सुरोभित होने के कारण अपूर्य निर्माण से युक एवं रमणीयता को प्राप्त कराये जाने वाले उसी स्वरूप का विवेचन (पन्थकार) प्रस्ुत करता है। उस प्रकार की वलदार रपना द्वारा जनित शोभा के उत्कर्ष के विना मेवल पदार्यठा का निमितभूत (वर्णन) सहदमो को आह्ादित करने का का रण नहों बनता है। [यहां प, जेसा कि डा० के सकेत करते हैं, फुन्तक दो अन्तरशलोको को चद्धुत कर एक अन्य- 'अभिधाया प्ररारौ सवः ॥' इत्यादि कारिका की व्यास्या प्रस्तुत करते हैं। पाण्डुलिवि के अत्यन्त पष्ट होने के कारण श० हे उमे पढ़ नहीं सके। अठः वहां कया विवेधन किया गया है कुछ भी नहीं कहा जा सरता। इसके अनस्तर वे अपने अभिमत रसवदलक्ार का विवेवन इस प्रकार प्रारम्भ करते है ]- यथा स रसवनाम सर्वालङ्कारजीवितम्। काव्यैकसारवां याति तथेदानीं विवेष्यते।।१४ ॥ रसेन वर्तते तुल्यं रसवतत्वविधानतः । योडलङ्गार: स रसवत् तद्िदाहादनिर्मिते:॥ १५ ॥ •एब समाहितस्पाप्पक पार्ेखवमेव न्याय्यम्, न पुनरस्डारमादः। इस प्रकार समारित की भी अक्ट्ायेता हो समुन्िद् हे, मशदात्तव नही।
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जैसे वह रसवद् नामक (अलसार) समस्त अलद्दारों का प्राण एव काव्य का सर्वस्व बन जाता है उसी प्रकार (ग्रन्थकार) अब विवेचन करने जा रहे हैं। सरसता का सम्पादन करने के कारण, तथा काव्यतत्व को समझने वाले (सहदयो) को आनन्द-प्रदान करने के कारण जो अलद्वार रस के समान होता है वह रसवत् (अलद्दार होता है।) यथेत्यादि। यथा स रसवन्राम यथा येन प्रकारेण पूर्वप्रत्याख्यात- वृत्तिरलद्टारो रसवद्रभिधान काव्यैकसारतां याति काव्यैरसर्वस्वतां प्रतिपद्यते सर्वोचद्वारजीवितं सर्वेपामलद्वाराणमुपमादीनां जीवितं स्फुरितं सम्पद्यते। तथा तेन प्रकारेणेदानीमधुना विशवच्यते विचार्यते लक्षणोदाहरण भेदेन वितन्यने। ययैत्यादि। जैसे वह रसवत् नामक अर्थात् जिस प्रकार से रसवत् नामक अलंकार, जिसकी स्थिति का पहले खण्डन किया जा चुका है, (यह) काव्य की एक मात्र सारता को प्राप्त होता है अर्यात् काव्य का एकमात्र (अकेला ही) सर्वस्व बन जाता है, तपा समस्त अलकारो का जीवन अर्थात् सभी उपमा आदि अलंकारो का प्राण बन जाता है, वैसे उस प्रकार से अब इस सरमय विवेषन या विचार किया जा रहा है अर्थाद लक्षण एव उदाहरण के भेद वूर्षक विस्तार किया जा रहा है। तमेव रसबदलद्वारं लक्षयति-रसेनेत्यादि। 'योऽलद्घास स रसवत्' इत्यन्वयः । यः किल एवस्वरूपो रूपकादि: रसवदभिधीयते। कि स्वभावेन-रसेन वतते तुल्यम्।शद्गारादिना तुल्यं वर्तते, यथा ब्राह्मणवन् क्षत्नियस्तथैव स रसवदलद्दार। कस्मात्-रसवत्वविनत। रसो स्यास्तीति रसवत् काव्यम् तस्य भावस्तत्वम् सतः, सरसत्वसम्पादनात्। तद्विवाहादनिर्मितेश्व। तन् कार्व्य विदन्तीति तद्वित, तब्ज्ञास्तेपामाहाद- निर्मितेरनन्दुनिष्पादनात्। यथा (तथा?) रसः काव्यस्य रमव्त्ता तद्विदाह्ादव् विद्धाति । एवमुपमादिरप्युभय निष्पादयन् भिन्नो रसवदलक्कार सम्पद्यते। यथा- उसी रसवदलंकार का लक्षण करते है-रसेनेत्यादि (कारिका के द्वारा)। 'जो मलकार है यह रसनत् होता है' यह कारिका का मन्वय है। अर्थात् जो इस प्रकार के रूपकादि हैं वे रघबत कहे जाते हैं। जिस प्रकार के (रपकादि )-(जो) रस के तुल्य होते हैं। रस अर्पाव शरृ्धारदि के समान रहते हैं, जैसे ब्राह्मण के समान क्षत्रिय होता है (ऐसा कहा आवा
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वशेकिजीवितम्
है। उसी प्रकार (रकष वे समान जो अलंकार होता है) वह ररवद अलंकार यहा जाता है। किस कारण से-रसवत्व के विधान के कारण रस है इसके पास अतः यह रसवत् हुआ फाव्य, उस ( रसवद्) का भाव रसवत्व हुआ उसतके कारण अर्पात् सरसता का सम्पादन करने के कारण (रस के तुल्य होता है।। तथा काव्यशो के आह्वाद का निर्माण करने के कारण। तद का धर्थ है काम्प उसे जो जानते है वे कहे जायगे तदिद अर्थाद् काव्य को समसने वाले उनके आदाद का निर्माग करने के कारण ( रख के तुल्य होता है)। (क्योकि) जिस प्रकार रस काव्य की रसवता तथा सहुदयो के आहाद को उत्पन्न करता है। उसी प्रकार उपमा आदि भी (काव्य की रसवत्ता एव सहुदयाह्वाद) दोनों को उत्पन्न करने हुए( उपमादि से भिन्न) रसवदलद्टार हो जाते है। जैसे-
उपोदशगेण विलोलतारक तथा गृहीतँ शशिना निशामुखम्। यथा समस्त निमिराशुक तथा पुरोऽपि शगाद्ूलित न लक्षितम ॥ ६. ॥
(सार्यकालिक) अर्धणमा (प्रियाविषयक प्रेम) को धारण करने वाले चन्द्रमा (नायक) के द्वारा चञ्चल तारो (कनीनिकाओो) वाले राति (नाविका ) के अप्रभाग (मुख) को उस प्रकार से पकड़ लिया (अर्थात् माभासित किया। (नुम्बन के लिए पकड लिया) कि जिससे सालिमा (अनुराग) के कारण सामने से भी गिरता हुआ तिमिराशुरु अर्थात किरणों द्वारा विचित् अन्धकार-समूह (नोलजालिका) लोगों द्वारा (या नाविक द्वारा) नहीं देखा गया ।। ६१ ॥
अत्र स्वावसरसमुचितसुक्कुमारस्तरूपय। निशाशशिनो्वर्णनाया." रूपकालद्वार: समारोपितकान्तवृत्तान्तः कविनापनिबद्धः। सच श्लेप-
माटितवाल्1
यहां अपने समय के अनुसप मुकुमार स्वभाव वाले रानि एवं चन्द्रमा का वर्णन करने मे ** · *. कि ने कान्त(अर्पाद् नामक एव नायिका) के वृत्तान्त का भलीभांति आरोप कर रूपक अलद्धार की योजता की है। और वह (रूपकालखर) इलेव के सौन्दर्य से रमणौय विशेषणों को वकता के कारण तपा विदेष सिङ्गो [अपवा पिह्धो) के सामर्थ्य के कारण ..... काव्य की रसवम्पन्नता को व्यक्त करते हुए तपा सहृदयो को
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चलापाद्वां दष्षिं स्पृगससि बद्शो वेपधुमनी रहस्यास्याकीव स्वनास मृदु कर्णोन्तिकचर। करी व्याधुन्वत्या' पिर्वाल रनिसर्वस्यमघर वयं तत्वान्वपान्मघुक। हनास्त्व सतु कृती ॥ ६२॥ (राजा दुष्मन्त पाकुन्तला पर मंटराते हुए समर को देशकर दहते है कि) हे भ्रमर। तू च्चल नेत्रपान्त बाली तपा कम्पित होतो हुई दृष्टि का बार-दार स्पर्श कर रहा है। रहस्य की बात बनाने वाले के समान कान के पास जाकर मधुर गुं्जन कर रहा हे तथा हाथो को हिलाती हुई ( गकुन्तल) के काम के सर्बस्व रूप अधर का पान कर रहा है। निष्नय सी हम तो तथ्य के अनुसन्धान मे (अर्थात् मेरे लिए वह ग्राह्य है या नहीं यही पता लगाने मे) मारे गये, पर दू (तो सचमु) कतार्थ हो गया॥६२॥ अर्थ परमाथ -- प्रधानवृत्त तारस्य भमरममारोपितकान्तवत्तान्तो रमपटलह्कार शोभातिशा यमाहितबान्। चथा वा- कपोले पत्राली॥ ६३ ।।
तदेवमनेन न्यायेन- सषिये हस्ताबलम्र' ॥ ६४ ॥ इन्नन्न रसवदलद्कार प्रन्याख्यानमयुक्तम्। सन्यमेवत् विन्तु निप्रलम्भ शृभारता तन्न निवार्येते। शघस्य पुनस्तत्तन्यवृत्तान्तनया सल्वार त्वमनिचार्यमेव। न चालक्ारान्नरे मति रसवदपेक्षानिबन्धन समृष्टि मह्करव्यपदेश प्रसङ्ग प्रत्याख्येयता प्रतिपद्यने। यथा- इसका विश्लेषा करते हैं कि-यहां वास्तर्बिक मर्य यह है-भ्रमण पर आरोपित किए गए नायक के व्यवहार वाले (रूपक मलद्दार ने जो नि रस के तुन्य होने वे कारण रसपदलकार हो गया है ऊत उसी) र्टबदलकार ने मुस्य रूप से स्यित शृद्धार रस की शोभा मे उत्कर्ष को उत्पन्न कर दिया है। अपवा जैसे -- (उदाहरण संख्या (२६०१ पर पूर्वोद्धत) 'कपोने पयाजी'। उत्यादि मे रसवदलकार हे)। (इस पर पूर्वपक्षी प्रश्न करता है कि इस प्रकार यदि आन रसनदलकार सनोअर करते हैं। तो इस टंग से (उदाहरण सस्या १।४३ पर पूर्रोद्ाहृत) २२ व० जी०
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वकोतिजीवितम्
'सिप्तो हस्तावलग्नः ॥' इस इलोक मे (आपके द्वारा किया गया) रसवदलकार का सण्डन उचित नहीं है। ग्रन्थकार (इसका उत्तर देते हैं) कि यह बात सही है( कि वह भी रसवद् अलंकार का उदाहूरण है) लेकिन वहा पर हम विप्रला्भ सृगार का निपेध करते हैं। शेष का तो यहाँ भी उस (कामी एव वराग्नि के) समान व्यवहार होने के कारण रसदवतस्ारता बनिवाय है। और भी मन्य अलद्वारी के विद्यमान रहने पर रसवद की अपेक्षा होनेवाली सृषि अपवा संदुर अलकार की सज्ञा का खण्डन नहीं हो जाता है। {अर्थाद रसवद् के साथ अन्य अलक्कारो को संघृष्टि जथवा समुर हमे स्थीकार है। उनका हम निषेध नही करते) जैसे- अङ्गुनीभिरिष केशनपाय सन्निगुद्द तिमिरं मरीचिभि:। कुड् मलीऊत ररोजलोपनं चुम्बतीब रजनीनुसं शशी।। ६५ ॥। अँगुलियो द्वारा केश समुदाय की तरह किरणों द्वारा अन्धकार को भली भाति पाँध कर भन्द्रमा (नाटक) बन्द किए हुए नमन रूप कमनोवाले (नारमिका) के मुख को मानो चूम रहा है ।। ६४ ॥ अन रसपदलद्वारस्य रूपकादीनान मननिपातः सुतरा न समुद्ानते। तत्र 'चुम्बसीव रजनीमुखं शशी' इत्युत्प्रेक्षालक्षणस्य रसचरलद्दारस्य पाघाव्येन निबन्धनम्, तद्ह्वत्वेनापमादीनां केवलस्य प्रस्तुतपरिपोपाय
यहां रसवदलकार की तथा रूपकादि अलकारो की समान स्पिति भली भाति य्यक नहीं होती है कयोकि उसमे 'रातरि के मुख को मानो चन्द्रमी चूम सा रहा है। इस प्रकार के उभ्पेस्षारूप रसवदलंकार को भुरु्य रूप से योजना को गई है, तथा उसके बुद् रूप में उपमा आदि अलंकारो की। योकि वेवल (उत्परेक्षित रूप रसददलकार की हो) स्पिति प्रस्तुत (म्रङ्गार) के परिपोष के लिए पर्याप्त थी। वेन्द्र धनुः पाण्डुपयोधरेण शरदधानार्द्रेनखक्षताभम्। प्रसादयन्ती सव्लक्गमिन्दुं तापं रवेरभ्यधिकं चवार ॥६६।। पाष्टुवर्क पंयोधर (स्तन या भेप) से आर्द्रनलक्षत की जाभावासे इन्द्रधनुष को धारण करती हुई, कलडयुक्त चन्द्रमा (प्रतिनामक) की प्रसन्न कपित-सुर) करती हुई दरव (नायिका) ने सूर्य (नामरु) के थाप [ गर्भी एर्वं सन्दाप) को और वधिक कर दिया।
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तृतीयोन्मेष ३३९
'प्रसादयन्नी रवेरथ्यधिकं ताप शरघकार' इति समयसम्भवपदार्थ- स्त्रभावस्तद्वाचक- 'वारित'-शव्दाभिधान विना प्रतोयमानोवेक्षालक्षपोन रमनदलङ्वारेण कविना कामपि कमनीयताम/धिरोपित, प्रतात्यन्तर- मनोहारिणां 'सकलङ्का'दीना वाचकादीनासुपनिबन्यनात्, 'पाण्डुपया- धरेणार्द्रनसक्षताभमैन्द्र धनुर्दधाना' इति श्लेपपनयोश्च तदानुगुण्येन विनिवेशनात्। एव 'सकलक्कमपि प्रसाद्यन्ती (शरत) परस्थाभ्यधिकं तापं चकार' इति रूपकालङ्कारनिबन्धन: अकटाहनावृत्तान्तसमारोप सुतरां समन्वयमासादितवान्। अन्रापि प्रतीयमानवृत्ते रसत्रदलङ्कारस्य प्राधान्यम्, तद्ङ्ृत्वसुपमादीनामिति पूर्ववदेव सङ्गति. । यहां कवि ने 'प्रसन्न करती हुई शरत ने सूर्य के ताप को और भी अधिक कर दिया' इस प्रकार के अपने समय (ऋतु) के अनुसार उत्पन्न होनेवाले पदार्थ के स्वभाव को, उसके वाचर 'वारिद' या (वादन) शब्द का कथन किये विना हो गम्यमान उतेक्षा रूप रसवदलकार के द्वारा किसी अनूवं रमणीयता से युक्त कर दिया है। (बशोकि कवि ने) उस्ी (उप्रेक्षा रूव रसबदलकार) के अनुरप अन्य प्रतोति के कारण मनोहर 'सरुतक" आदि चन्दो का प्रमोग किया है तथा 'पाण्टु पयोरवर से आर्द्रनखक्षताभ इन्द्रधनुप को धारण किए हुए' ऐस वास्य मे शलेश एवं उपमा अलकार की मोजना को है। इस प्रकार 'कलकयुक्क को भी प्रसन्न करती हुई शरत ने दूघरे ( नायक) के साप को ओर भी अधिक कर दिया इस प्रकार रूपकालकार का हेतुभूत स्पष्ट (वेश्या) अङ्गना के व्यवहार का (दरत पर) आरोप अत्यधिक समन्वित हो गमा है। यहाँ पर भी गम्यमात स्थति वाला (उन्प्रेक्षारूप रसवदलकार हो प्रधान है तथा उपमा आदि उसरे अ्ध रूप हैं इस प्रकार पहने की ही भाति यहाँ भी सङ्गति होनी है। [इसके बाद कुन्तक ने अधोलिखित श्लोक उद्वृत किया है]- लग्नद्वरेफास्नभाक्तचित्रं मुसे मधुभनीतिलकें प्रकाश्य। रगेण बालारुणकोमलेन अयं रसवतां सर्वालद्वाराणां चूडानाणेरियाभानि। वसन्त शोभा ने भ्रमरूपी अज्जन की रचना से विचित्र तिलक को मुख पर प्रकुट कर प्रात काल के सूर्य के समान सुन्दर राग (रकिमा) से आघपल्लव रूप सधर को अलंकुत किया ॥ ६० ॥ (एस के बाद रसवदलकार का उपसद्ार करते हुए कुन्तक कहते हैं) कि यह (रसवदलंकार) रसमुक्त (काव्यों के) समस्त अंकारो का चिरोरतन सा सुद्योभित होता है।
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[इसके बाद जैसा कि डा० डे सकेत करने है कुन्तरु ने उक्त कथन के समर्शन मे े अन्तररमेको को भी उश्धुत किया है जो कि पाणलिषि की अक्टता के कारण पढे नही जा सरे ।] इस प्रकार रसवदलकाट के प्रकरण का उपसहार कर कुन्तरु दीपक अलकार एव उसके प्रभेदो का विवेचन प्रारम्भ करते हैं- एवं नीरमाना पदार्थाना सरसतां समुक्षायितु रसवदलह्कार सामासादिवान्। इदानी स्वम्पमात्रेणवावस्थितानां बस्तूना कमप्यति- शयमुद्दीपयितु दीपकालद्वारमुपकमते। तथ पूर्वाधायैरादिदीपक मष्य- दीपकमन्तदीप कमिति दीप्यमानपदापेक्षया वाक्यस्यादी मध्ये चान्ते च व्यवस्थित मिति क्रिया पद्मेव दीपकास्यमलद्कर णमाख्यानम्। इछ प्रकार नीरस पदापों की सरसता को प्रकट करने के लिए रसवदलकार का विवेधन किया गया। मब केवल स्वरूप से ही स्थित पदारथों के किसी अपूर्य उत्कर्ष को व्यक करने के लिए (ग्रन्यकार कुम्नक) दैपकालद्वार (का विवेचन) प्रारम्भ करते हैं। तथा उस दीरानद्वार की प्राचीन आचार्यों ने आदि दीपक, मध्य दीपरु ता अन्त दीपक इस प्रकार प्रकाश्यमान पद की अपेक्षा से वाक्य के आदि, मध्य अपवा अन्त मे (क्रिया पंद ही) व्यवस्थित होता है ऐसा सोचकर क्रियापट को हो दोषक नामक अलद्धार बताया है। (इसके वाद कुं्तक भामह के दीपक के तोनो मेसे मे उदाहरण रूप तीनो सतोको को उददघृत करने ई जो इद प्रकार है :- मदो जनयति प्रीति, सानद्गं मानभङ्गुरम्। स प्रियासङ्गमोत्कण्ठां, सासहयां मनसः शुचम्॥ ६॥ मालिनीरशुरभृत: स्रि्रियोलङ्ुरुते मधु॥ हारीतशुकवाचऊ्र भूधराणामुपत्यकाः ॥ ६६॥ धोरीमतीररण्यानी. सरित: शुष्यदम्मस.। प्रवासिनाश्ञ पतांसि शुचिरन्त निनीपवि॥७॥ मद प्रीति को उत्पन करता है, वह मान को भंग करने वाले मदन को वह नियतमा के सिलन की उत्कषठा को और वह हुदय के अगहा छोक़ को (उत्पम्न करती है) ॥ ६८ ।। वसन्त हार पहनने वाली एवं वस्नो को धारण करने वाली खियो को विभूषित करता है तथा हारीत (मैना) एवं तोतो की वागी को और पर्वतो को (विभूषिस करता है]। ६९ ।
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तृनीयोन्मेप: ३४१
झोंगुरो से युक्त बड़े-बडे जगलो को, सूखने हुए जलवाली नदियो को तपा (विरही) परदेशियों के हृदयो को आषाड़ का महीना नष्ट कर देना चाहता है॥७० ॥ (इसके बाद कुन्तक अलग-अलग भामहकृत दीपक अलकार के लक्षण एव बर्गोकरण की आलोचना उस प्रकार करने है कि) तत्र क्रियापदाना दीपकत्वं प्रकाशमत्वम्, यस्मान् क्रिया पदेरेव प्रकाश्यन्ते स्वसम्बन्धितया स्याध्यन्ते। (भामह के अनुसार) उसमे (दीपकालकार) मे करियापदो की दीपकना अर्थात् प्रकाशकता होती है क्योंकि करियापद ही (अन्य पदो को) प्रकाशित करते हैं अर्थान् अपने से सम्बन्धित रूप मे अन्य पदो को) व्यवस्था करते है। तदेव मर्वस्य कस्यचिद्दीपकत्यातेरेकिणोऽपि करियापदस्यैकरूपत्वात् दीपकादू द्वैन प्रसज्यते।
(इसका खण्डन कुन्तक करते हैं कि) तो इस प्रकार दीपक से भिन्न भी सभी किसी करियापद के अन्य दो पदो की सम्बन्धित रूप मे व्यवस्या करने के कारण )समान होने से दीपकालद्दार से घालमेल होने लगेगा। और फिर सौन्दर्योत्पादकता के युक्तियुक्त न होने से अलद्वारता ही नहीं हर सकेगी। अन्यथ आस्ता तावक्या, एवं यस्यकस्यचिद्वाक्यवतिन: पदस्य सम्बन्धितया पदान्तरद्योतनस्वभाव एव, परस्परान्वयसम्बन्धनिबन्धना हवाक्यार्थस्वरूपस्येति पुनरपि दीपकद्वैतमायातम्। और भी, क्रिया को सब सक रहने दीजिये। इस प्रकार तो वावय में स्पित जिस किसी भी पद का, वावपार्थ के स्वरूप के परस्पर (पदो) के अन्वय सम्बन्ध-मूलर होने के कारण, (परस्पर) सम्बन्धित होने के कारण दूसरे पद को प्रकाश्चित करना स्वभाव हो है इस लिये फिर (किसी भी पद का) दीपकालकवुार के साथ पालमेल हो सकता है (अर्पात् कोई भी पद दीपक हो सकता है। आदौ मध्ये चान्ते वा व्यवस्थितं क्रियापद्मतिशयमासादयति, येनालद्वारतां प्रतिपद्यते। ते्षा वाक्यादीना परस्परं तथाविधः क: स्वरूपातिरेक सम्भवति ? (औौर यदि आप यह कहें कि) आदि, मष्य अयवा अन्त मे अरवस्पित वव्यापद उस्कर्ष मुन्ध होता है अत, यह अलखार बन जाता है (तो आप यह
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३४२ वमोल्िजीविम दताये कि उन कियापदो एवं वाकगादि का परस्पर कौन सा वैसा स्वरूप का अतिमम उत्पन्न हो जाता है(जिसने कि आप उस किया पद को अलंबार क हते हे। कये कि उसका स्वरूप तो दही रहता है)। चाक्यस्य यदादिमध्यान्तं तदेव तदर्धवाचकेध्यपि सम्भवनीत्वेव दीपकप्रकारानन्त्वप्रसङ्ग। दीप कालक्कार- विहितवाक्यान्तर्वतिन क्रियापदस्य म्वाव्यतिरिक्तस्यैव काव्यान्तर- व्यपदेशः। यदि वा समानविभक्ती (का ?) नो बहनां करका (पा ? ) नामे कक्रियापई प्रकाशकं दीपरुमित्युच्यतो, तनापि काव्यच्छायानिशाय कारितायाः कि निबन्धनमिति वक्तव्यमेव। (औौर जैसा कि आप) किवापद के प्रकार-भेट का कारण वाकय के जिस आदि, मन्य एवं अन्त (को स्वीसर करते) हैं ( वैसे ही) वही । आदि, मध्य एघ अन्त)उस (वाक्य) के अर्थ का प्रतिपादन करने वाले (अन्य पद्ो) ने भी सम्भव हो सकता है जत इस प्रकार दीपक के भेद अनन्द होने लगेगे। दीपहालवार प्रसतुत करने के लिए ले आये पये वाबय के भीवर स्पत *वादि से भिन्न विमापद की दूसरे प्रकार की बाब्यता होगी। अथवा समान मिभक्ियो वाले बहुत से कारकों का प्राय अबेला कियापद दीपक कहा जाता है, तो भी यह बवाना हो पडेगा कि काव्यसोन्दर्य में उत्कर्ष लाने का बया कारण है? इस प्रकार भामह के दोपडालंकार के लक्षण का खच्डन कर कुन्तक चश्भट की दोपकालकार को व्यास्या को भामह को अपेक्षा लधिक उपयुक समसते है। वौर इसी लिए वायद वे उद्भट को अभिमुक्तवर भी कहते है-वे कहते हैं- प्रस्तुता प्रस्तुत विध्यसा मर्ध्यसम्प्राप्तिपरतीयमानवृत्तिसाम्यमेव नान्य किकिश्विदित्यभियुक्ततरः प्रतिपादितमेव- आदिमध्यान्तविपया प्राघान्वेतरयोगिन: । अन्तर्गतोपना धर्मा यत्र तदीपक विदुः॥।।। प्रश्तुत और अप्रस्तुत के बीच विधि की असमर्थता की प्रास्ति होने के कारण प्रतीयमार व्यापार का साम्प हो आता है बर दूसरा कुछ नहीं ऐवा श्रेष विद्वानों द्वारा ही प्रतिपादित किया जा चुका है- दोपनालकार उसे कहते हैं जहाँ प्राधान्य एवं अपराधान्य से समत्य रसने वाले (वाक्य वे) आदि, मध्य एवं अन्त के विषयभूत धर्मे उननिबद्ध किए ाते है जिनमे (परहपर) उपमानोपमेयभाव विद्यमान रहवा है (अन्वर्गदोपमा)।
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इसके बाद इस दीपकारलंकार के उदाहरण रूप म कुन्तर अधोलिसित प्राकृत इलोक उदात करते हैं। चनमत करीन्दा दिसागअमअगन्घनारिअहिअआ। दुन्म वणे घ कइणो भणिइिसममझाकइ भम्े॥ जर॥ (चड् कम्यन्ते करीन्द्रा दिग्गजमदगन्धहारितहृदय।। दुख वने च कवयो भणितिविषमहाकविमार्गे।) दिम्मनो के गण्डजल की महरु से विदीर्ण कर दिए गए हृदय वाले गजेन्द्र जङ्गत मे तथा उक्तियों के कारण विषम महाकवियो के मार्गमे कविजन दुखपूर्चक सक्चरण करते हैं। यथा दिक्कुश्जरमद्यामोदहारितमानसा करीन्द्रा कानने कथमपि दुःख चड् कम्यन्ते, तथा भणितिविपमे वक्रोक्तिविचित्रे महाकविमार्गे. कवय इति 'च'-शब्दार्थे। "जिस प्रकार से दिमाजो के गण्डजल की सुगन्धि से खिन्न चित वाले गजेन्द्र बन मे किसी तरह दुःखपूर्वक विचरण करते हैं उसी प्रकार उत्तियो से विषम अर्थात् वकोकियो से विचिन महाकविमो के पय मे कविजन (विचरण करते हैं) यह (श्लोक मे आये हुए) 'च' शब्द का अभिप्राय है। कुन्तक उद्ट के इस सिदान्त को स्वीकार करते हैं कि यदि प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत मे प्रतीपमान वृत्ति द्वारा साम्य नहीं रहेगा तो वहाँ दीपका लद्दार नहीं होगा। तपा उदट द्वारा अन्तर्गतोपमाधर्म की विशेषता के जोड देने का अनुमोदन करते हैं। इस के बाद दोपहालखुार के अपने मभिमतलक्षण को इस प्रकार प्रस्तुष करते हैं- आचित्यावह्दमम्लानं तद्विदाह्ाद-कारणम्। अशक्त धर्ममर्थानां दीपयद्वस्तु दीपकम्। १॥ ॥ वर्णनीय पदार्पों के ओवित्य का वहन करने वाले, सहृदवों के आह्ाद- जनक, अभिनव एवं अस्पष्ट धर्म को प्रकाशित करता हुआ वदार्थ दोपक अलद्वार होता है। स दिदानी दीपकमलक्टारान्तरफारणं कलयन् कामपि काव्यकमनीयतां कल्पयिंतु प्रकारान्तरेण प्रफ्मते-औचित्यावह्दमित्यादि। वस्तु दीपकं वस्तुसिवरूपमल्रणं भवतीति सम्बन्ध: क्रियान्तराश्रवणात्। तदेय सर्वस्य कस्यचिद्वस्तुनः तद्गावापतिरित्याह-दीपयत् प्रकाशयदलङ्करणं सम्पद्ते। कि कस्येत्यमिघने-धर्म परिस्पन्दविशेषमर्थानां वर्णनीया-
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३४४ दहोकिजीदितय
नाम्। कीहशम्-अशक्तम् अमकटम् तेनेव मराश्यमानत्वात्। किस्न रुप-औचित्यावहम्। औचित्यमीर्यम आवहति वा स नधोक्त। अन्यय निविधम् अम्लानम्, प्रत्यमन। अनालोढमिति यावन्। एवं स्वरूपत्धान् तदविदाद्वादकारणम्, काव्यरिदाननदनिमित्तम्। द्वस कारिका को व्यास्या करते हैं-तो अब दोपक को अन्य अलद्धार का जनक समझते हुए काव्य की किसी अपूर्व रमणीयता को प्रस्तुत करने के लिए तमे दूमरे इस्क से प्रस्तुत करते हैं-औवित्यावहम् इत्यादि (कारिका के द्वारा)। वस्तु दीरक होती है अर्थान् पदार्थ का सिद्ध रूप (कारक पद) अनद्गार होवा है। (इस वाक्य का) ज्य जिया के मुनाई न पड़ने से ( भर्वत होती ते) के साथ मम्चन् है। तो इम प्रकार सभी फोई वस्तु दीप कालद्ार होने लगेगी अतः (रसका निषेध करने के लिए) कहते है ि-दोप्त करती हुई अर्थान प्रकाशित करनी हुर्ई वस्तु अनछुहर होती है। बश (प्रकाशित करती हुई वस्ु ओर) किस्शा (प्वासित करती हुई) इसे बताते है-अर्पों अवात् वर्णनीय पदार्थों के धर्ष अदात् रपनाय विशेष को (प्रकानिन दरती हुई वस्तु अलद्ुार होती है)। कैसे धर्म को-मगत अर्थात् जो प्रट नहीं रहदा क्मोनि वह उसी ( बच्तु) के दारा प्रकाशित होने वाला होता है। और किस स्वरूप का है (वह धर्म)- औोनित्य का वदन करने वाला। औपितस अर्थान् उदारता को जो वहन या भारण बरता है यह औिप की दहन करने दाला होता है। और कैसा (धर्म होता है) ननजन अर्दार अभिनन जिसना जास्दाद नही किया गया है। ऐसे स्वर्ब पाला होने दे बारग कमे जानने वाजो के आहाद का कारण अर्थान् कार्व्य को समझने पालो ये आगन का हेंतु बनता है। इस के बाद जैसा कि श० डे सरेत करते हैं कि पाण्डलिषि अत्यन्न दोपपूर्ण है नव उन्तह ने दीपक अगयूार का वर्गोकरण केते किया है इमे ठोक-ठीक नहों प्रतिपादित किया जा टाता, पर जह।ँ तक पाण्डलिपि मे विषय को समझा जा एरा है यह दस प्रकार है। कुन्तक निम्न फाखिव। को प्रस्तुत करते हैं- एक प्रकानकं मन्ति भूर्यासि भृयसां कचिद्। केवलं पद्किगंस्व का द्विविधं परिदृश्यते॥१७॥। जस्यैव प्रकारनिरूपयति-द्विविधं परिटस्यते। द्विप्कारमवलोक्यते, तत्ये विभान्यते! कवम् केवलगसहायम्, पक्िसस्वं या पङ्ही व्यपस्थितं सराल्यपद्मार्मा सदायन्तरोपरचितानां वर्तमानम्। कथम् एक बहनां भदार्र्ीनामेक प्रकाशक दीपकं के वलमित्युच्ते। वथा-
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तृतीयोन्मेष ३४५
असार संसारम्॥ ७३॥ इत्यादि। अन्र 'विधातु व्यवसित' कर्ता ससाराटीनामसारत्वप्रभृ- तीन् धर्मानुद्योतयन् दीपकालङ्कारतामानवान्। (दीपक अलकार) केवल तथा पक्तिसस्प (भेद सै) दो प्रकार का दिखाई पड़ता है। (उनमे जहाँ बहुत से पदार्यों का) एक प्रकाशक होता है (वह केवल दीपक तथा जहा) बहुतो के बहुत से (प्रकाशक) है (वह पक्तिसत्य दीपक होता है।॥ ४७ । इसी वारिका की व्यारूया करते हैं-इसी (दीपकानकार) के भैदों का निरूपण करते है-दो प्रकार का दिम्वाई पड़ता है अर्थान् (यह दीपक अलकार) लक्ष्य (काव्यादि) में दो नरह का दिखाई पडता है। कैसे-रेवल अर्थात् असहाय (रूप मे) अयवा पत्तिसस्य अर्थात् पकि मे व्यवस्वित अर्थान् अन्य सहायक द्वारा विराित उमकी समान स्थिति में विद्यमान। कैसे-एक अर्थाद् बहुत से पदार्थों का अकेला प्रकाशक केवल दीपक कहा जाता है। जैसे- (उदाहरण सस्या १।२१ पर पूर्वोदाहृत) असार ससारन्। इत्यादि दलोर। यहां 'विशातु व्यवसित' कर्ता ससार आदि के नि सारता आदि धर्मों को प्रकाशित करता हुआ दीपक अल्कार वन गया है। पङ्गिसस्थम्-भूयामि बहूनि वस्तूनि दीपकानि भूयसां प्रभूतानां वर्णनीयाना सन्ति वा कचिद् भवन्ति वा कस्मिध्चिद्विपये। चघा- कइ केसरी बअणाणं मोततिअरअणाण आइवेअटिओ। अणाठाण जाणइ कमुमाण अ जीणमालारो॥। ज४ ॥ (कविकेसरी वचनाना मोलिकरत्ानामादिवैकटिक,। स्वानास्थान जानाति कुसुमानाञव जीर्णमालकार ।) चन्दमऊएहिणिमा णलिनी कमलेहि कुसुमगुच्छेहि लआ। हुसहि मारअसोहा कब्बकदा सज्जनेहि करइ गरुई। ४४ ॥ (चन्द्रमयूखैनिकषा नलिनी कमले कुसुमगुच्छेलता। हसैश्सरदशोभा काव्यकथा सज्जनै कियते गुर्वो ।।) पड्कसस्य-' दीपक वहाँ होता है जहां) कहीं किसी विषय मे। अथया स्थल पर बहुत से अर्यात् अनेको वर्णनीय पदार्थों की बहुत-सी अर्थान अनेको वस्ुए प्रकाशक होती हैं। जैसे- घेष् कवि (कवि केसरी) उक्कियों के, प्राचीन जोहरी मौकिकरतनो के तथा पुराना माली फूंलों के ओोषित्य तथा अनोचित्य को जानता है॥ ७४ ॥
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१४६ वकोत्तिजीवियम्
पन्द्रमा की किरणें राषि को, कमल कमलिनी को, फूलो के मुच्छे सता को, हस धरद् ऋतु के सौन्दर्य को तपा सज्जन काव्य कथा को महत्वपूर्ण बना देते है॥७k॥ इसके बाद कुन्तक ने इस पक्तिसस्य दीपक के भी अन्य-अन्य प्रभेद किये है। किन्तु पाण्डुलिदि मे वह सपल अधिक रपष्ट नहीं है। कारिका तो पूर्णतः वरपष है। उसे ड० हे सम्पादित नही कर सहे। पर उस स्थल को पढ़ने से ऐसा पता चलता है कि कुन्तरू ने इस पक्तिसंस्य दीपक के पुनः तीन भैद किए हैं। कारिका तो सर्वया अस्पष्ट ही है। वृत्ति मे से जितना सपल स्वष्ट हो सका है वह इस प्रकार है- यद्षपर पकिसस्थं नाम.कारणात् त्रिप्रकारम्। त्रयः प्रकारा: प्रभेदा यस्येवि विग्रह्'। तत्र प्रथमस्तावदनन्तरोक्तो 'भूयासि भूयसां फविद्भवन्ति' इति। द्वितीयो-दीपक दीपयत्यन्यन्नान्यदिति, अन्यस्यातिशयोत्पादकत्वेन दीपकम्। यहीपित तत्कर्मभूतमन्यत् वर्तुभूत दीपयति प्रफाशयति सद स्वन्यहीपयतीति। जो दूसरा 'पक्तिसंस्य' नाम का (दीपकालद्वार का भेद है यह)-। यहा ड० डे ने पाठलोप सूचक चिन्न दिए है। अतः यह कह सकना, कि किस कारण से बहू पक्तिसष्य दीपक तोन प्रकार का होता है, कठिन है। ] कारण से तीन प्रकार का है। 'निप्रकारम्' का विग्रह होगा सीन प्रकार है जिसके वह। उनमे से पहला प्रकार तो अभी-अभी बताया गया कि बहुत से वर्ष्यमान पदाथों के कहीं बहुत से प्रकाशक होते है' यह है। (इसका उदाहरण ऊपर दिया ही जा मुका है) दूसरा प्रकार यह हे-दूसरे स्थान पर वह एक दीपक को दूवडा (दीपक) प्रकाशित करता है वह दूसरे के अतिराम को उत्पन्न करने के कारण दीपक (अलदार) होता है। जो प्रकाशित हुआ है वह कर्मसूत है मर दूसरा कटृभूठ है वह दीविक्ष अर्थात् प्रकाधित करता है, वह भी दूसरे को प्रकाशित करता है। द्वितीयदीपकप्रकारो यथा- क्षोणीमण्डलमण्डन नृपतयस्तेपां मियो भूपणं ताः शोभां गमयत्यचापलमिद प्रागल्म्यतो राजते। तद्दूष्यं नयवर्त्मनस्तदपि प क्ीर्यक्रियालसकृतं विभ्राणं यदियतदा त्रिभुवन देतुं व्यवस्येदषि॥७६।। (पंरिसंस्य दीपक के) दूसरे भेद का उदाहरण जैसे- भूमण्डल के धोभा हेतु राजा लोग है औोर उनकी पोभा हेतु सम्पसियां है। वे स्थिस्ता के द्ारा शोभा को प्राप्त कराई जाती है। बोर यह (स्पिस्ता) भी
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धृनोयोन्मेष: ६४७
प्रगन्भना से सुशोभित होती है। वह (प्रगल्भता) राजनीति के मार्ग की दोषभाकु है और वह (राजनीति का मार्ग) भी करतापूर्ण कर्मों से सर्यात् परराष्ट्र पर जकमण आदि से सुशोभित होता है यदि इस करतापूर्ण कर्म को धारण कर लिया जाय तो (व्यक्तिविशेष) निसुवन का ही उच्छेद करने पर तुल जाय।। ६।। टिप्पणी-[यहा पर डा० डे ने 'च कौर्यकरियालडकृतम्' पाठ मुद्रित ।कया है, तथा उसके अर्थवैधम्य को देखते हुए पादटिप्पणी में वन्होने 'चेच्छीर्यकरिया- लडूटनन् पाठान्तर निर्दिष्ट किया है। स्व० आचार्य विश्वेश्वर जोने 'चशोर्यक्रिया- लड्कृत' पाठ देवे समय 'शार्दूलविकोडितवृत्तगत' छन्दोभङ्ग की ओर पता नही प्यान क्यो नहीं दिया। हमने यहां पर मातृकागत पाठ को ही शेयान् मानकर रूपान्तर प्रस्तुत किया है। इस पक्ष में सात दीपक दृष्टि पय मे आने हैं। पहला है कषोगोमण्डल और नुपति के बीच। दूसरा नृपति मोर थी के बीच। तोसरा श्री झर अचापल के बीच। चोया अचापन और प्रागम्भ्य के बीच। पांचवा प्रागत्म्य और नयवद्म के बीच। छठा नयवत्म और कौर्यक्रिया के बीच और अन्तिम कोर्यकिया और विनुबनव्देर के बीन है। पहले का धर्म मण्डन, दूसरे का भूयण, तीसरे का शोभागमन, चोधे का राजन, पाँचवें का दुष्पत्व, छठे का अलङ्कृतत्त्व मर सातबें का विभ्राणत्व है। डा० हे० की आशंका का हेतु ऊपर से चला आता हुआ मण्डनादि और दूम्यत्व के बीच का वैधम्य प्रतीन होता है। परन्तु चतुर्य चरण का पाठ करने पर स्पष्ट हो जायमा कि कवि का सरम्भ एक ही प्रकार के धर्म के साथ अभिसम्बन्ध दिखाने मे नहीं है। अन्तिम बात यह भी ध्यान देने की है कि यहाँ नोयेकिया की बात करना अनुचित है। क्योकि निसुवन का उच्छेद दौर्य- किना से नहीं अपितु नोर्यकिया से ही सम्भव है। यहाँ पर इन साठों दीपकों में प्रत्येक पहले दीपक का अप्रस्तुत दूसरे दोपक का प्रस्तुत बन जाता है । इसोलिए इसे दीपिनदीपक कहा जाता है।] अत्रोत्तरो त्तराणि पूर्वपूर्वपददीपकानि मालायां कविमोपनिषद्धानीति। यथा वा- शुचि भूण्यति श्ुतं वपुः प्रशमस्तस्य भवत्यलक्क्कया। प्रशमाभरणं पराक्रम: स नयापादित सिद्धिभूपणः ॥ ७5।। यथा च- चारुतावपुरभूपयदासाम् ॥।v5।। इत्यादि। यहां पर उत्तरोतर दीपक उसके पूर्ववर्तो प्रत्येक दोपक के साप कदि के द्वारा एक माला में सुम्कित किए गए हैं।
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३४८ वशोकिजीवितम्
अथवा जैसे-(दूवश उदाहरण) शुद्ध शास्त्र (धवन) शरीर को अलद्कृत करता है तथा (परोधादि का) समन उस (शास्तर) का आभूषण होता है। दामन का अलद्धार पराक्रम होता है तदा यह (पराक्रम) नीति के द्वारा सम्पादित सिद्धि रूप अलकार वाला होता है।। ७७ ॥ और जैसे-(उदाहूरण सख्या १२४ पर पूर्धोद्ाहुत) चास्तादपुरभूपयदासाम् ॥ ७८ ॥ इत्यादि इलोक। नृनीयपकारोडबैव ग्लोकार्द्वे 'दोपक'-स्थाने 'दीपित मिति पाटान्तरं रिधाय व्यारयेय। तदयमत्रार्थ-यद्ीपितं यदन्येन केनविदुत्पाटिना विशय मम्पादित वस्तु नत्कर्तृभूनमन्यद्दीपयदुत्तेजयति"। यथा- गद्दो जनयति श्रीतिम। इत्यादि ॥। sE | (इस पक्तिसंस्य दीपक के) तीसरे भेद के लिए इसी (कारिका) श्लोक के अर्दंभाग मे 'दीपक' के स्यान पर 'दी्पित' यह दूसरा पाठ कर के व्यारया करनी चाहिए। तो यह। आदम यह है कि-जो दीपित अर्पाप किसो दूसरे के द्वारा उत्पन्ष किए गए उत्कर्ष से युक्त रूप मे सम्पादित की गई वस्तु है उसके कवभूद दूसरे को प्रकाशित करता हुआ उत्ेजित करता है जैसे- 'मदो जनयति प्रीतिम्' इत्यादि श्लोक ।। ७९ ।।
ननु पूर्वाचार्ये ्ैतदेव पूर्वमुदाहृतम्। तदेव प्रथमं प्रत्याख्यनदानी समाहि तमित्य भिप्रायो व्यार्यातन्य। सत्यमुक्तम्। तद्षय व्याख्यायते-क्ियापदमेकमेव दीपरुमिति नेपां सात्पर्यम अस्माक पुनः व्तृपदादिनिबन्धनानि दीपकानि बहूनि सम्भवन्तीति। (भामह के दोपकालंकार का सण्डन करते समय कुन्तफ ने भमह के इसी 'मदो जनर्वात' इत्यादि श्लोक की लातोचना को थो। किन्तु अब उन्होंने उसी उदाहरण को अपने अनुसार 'दीपितदोपक' के उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया है। अत. पूर्वपक्षी रख्ा करते है कि)- इसी उदाहरण को सो प्राचीन (भामह आदि) वाधामों ने उनघुत किया है। उसी का पहले सण्डन कर अब (आपने उसी का) समाधान किया है तो किन आदाय से, इसे दताने का कष्ट करें।
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तृतीयोन्मेष ३४९
कुन्तक इमका उत्तर देने हैं- ठीक कहा (तुमने) तो यह व्याख्या कर रहा हूँ। उन (प्राचीन) आानार्मा का अभिप्राय है कि रेवल (वा एक ही) कियापद दीपक होना ने, पर हमगरा मत कि रतृपदादिकमूलक बहुत से दीपक हो सकते है। [इसके वाद कुन्तक इस प्रकरण का अधोलिसित कारिका के साथ उपसहार करते है। इस कारिका जो जिस बङ्गसे डा० डे ने मुद्रित किया है उसके अनुसार यह प्रतीत होता है कि कुन्तक यहाँ यह बताना चाहने है कि 'केसा करियापद दीपक हो सकता है और कैसी वस्तु दीपक हो मकती है-] पथायोगि क्रियापद मन:संवादि तद्विदाम् । वर्णनीयस्य विच्छित्तेः कारणं वस्तुदीपकम् ॥ १८॥ टडानीमेतदेवोपमहरति-यथायोगि क्ियापदमित्यादि। यथा येन प्रकारेण युज्पते इति यथायोगि कियापर्ढ यस्य तत्तथोक्तम्। येन यथा सम्बन्धमनुभवितुं शक्नोति तशा दोपके करिया। [अन्यच्न कि रूपम् ? मन मवदि तद्विदाम ।] तद्विदां काव्यज्ञाना मनसि सवदति चेनमि प्रतिफलति यत्तत्तथोक्तम्। जिस् प्रकार मे ।वाक्यार्थ) सम्बद्ध हो सके वैसा और सहृदपो का मनोनुकूल क्रियापद (दीपक होता है) तथा वर्णनीय पदार्थ को सुन्दरता का कारणभूत वस्तु दीपक होती है।। अब (ग्रन्थकार) इसी (दीपक अलद्दार) का उपसहार करते हैं- यपायोगि करियापदम्' इत्यादि कारिका के द्वारा । जैसे अर्थात् जिस तरह युक्त होता है वह यपायोगि हुआ इस प्रकार पथायोगि प्रिय्यापद है जिसके वह पमायोगि कियापद वाला हुआ। अत जिस प्रकार से सम्बन्ध का अनुभव किया जा सकता है वैसी दीपक मे करिया होती है। उस काव्य को जानने या समझने वालो के चित्त मे जो सवाद उत्पन्न करती है अर्थाद् हुदय मे प्रतिफलित होती है यह किया दीपक होती है। [नस्मादेव सहृद्यदृदयसंवादमादात्म्यात्-'मुखमिन्दु' इत्यादी न केवलं रूपकमिनि यावत्। 'कि तारुण्यतरो.' इत्येवमादपि। तम्मादेव च सूत्ष्ममतिरिकं वा न किञ्ञ्दुपमानात् साम्य तस्य निमित्तमिति सं- चेतस- प्रमाणम् ] [इसीलिये सहृदय हृदय के सगथ सवाद होने पर 'मुख चन्द्र है' ऐसे कपनो में महाविषय होने के नाठे नेवल रूपक ही नहीं होता। और इसी से कि ताकम्-
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सरो: इत्यादि भी ऐमे ही है। इसीलिए बहुत ही सूषम और अपमान से अनति- रिक्त साम्म दोपक का निमित्त है इस विषय मे सहृदय जन ही प्रमान है।] अन्यन् कीटशम्-वर्णनीयस्य विच्छित्ते कारणम्। वर्णनीयस्थ प्रस्तावाधिकृतस्य पदार्थस्य विच्विवितरुपशोभाया कारण निमित्तभूतम् [न पुनर्जन्यत्वपमे यत्वादिसामान्यम् ]। यस्मात् पूर्वोक्लक्षणेन साम्बेन वर्णनीय सहृदयहारितामाबद्दति। ओर केसा होता है (दीपक बलद्वार)-वर्णन किए जाने वाले (पदर्थ) के सोन्दर्य का हेतु होता है। वर्णनीय अर्थात् प्रकरण के द्वारा अधिटृन पदार्थ की विष्छिति अर्वाद सोन्दर्स का कारण अर्थाव हेतुरूप (होता है)। यह जग्पत्व या प्रमेयत्व आदि के तुल्य नहीं है। करोकि पहले कहे गए लक्षन वाले साम्य मे युर्त वर्षविषम रहृदयो का जावर्जक होता है। उपचारैकमर्वस्वं यत्र तव् साम्यमुद्धह्त्। यदर्पयति रूपं स्वं वस्तु तद्ूपकं विदुः ॥। १९ ।। रूपक वितिनकि-उपचारेत्यादि। वस्तु तदूपक विदु: तद्वस्तु पदार्थ- स्व्ररूपं रूप कार्य मलंकार विदु जना इति शेप:। फीहशम्-यदर्पयती- त्यादि-चत् कर्तृभूतमर्पयति विन्यस्वति। रिम्-स्वमात्मीय रूपं, वाक्यस्य वाचकात्मकं परिस्पन्दम् , अलंकारप्रस्तावादलंकारस्थैव स्व्र- संबन्धित्वात्। कि कुर्वत्-साम्यमुद्वहृत् समत्वं धारयत् (कोदशम्) उपचारेकसर्वस्वम्-उपचारस्तत्वाध्यारोपस्वस्थैंकं सर्वस्वं केवलमेक जीदित तनिबन्धनत्वाद, उपचार: रूपकस्य प्ष्टत्ते:। जहां उपचार की एकमान प्राणभूत उस समानवा को धारण करता हुआ पदार्थ अपने स्वरूप को समपित कर देता है उसे (विद्वानो ने) रूपक (अन्दगार) कहा है।
रूपक का विवेवन करते हैं-उपचार दत्यादि कारिका के द्वारा। उस वस्ु को रूपक कहा है अर्थात् लोगों ने उस पदार्थ स्वरूप को रूपक नाम का अलद्वार बतामा है। कैसे (पदार्थ स्वरूप) को-(इसे) मदपपति इत्मादि (के दाप बताते हैं।। कर्ता रूप जो (पदार्थ) अपित करता है अर्थात् विन्वस्य करक्षा है। कमा (विन्यस्व) करता है-स्व अर्थात् अपने स्वरूप को, वाबन के बाचहरूप बपने स्वभाव को। यहां बलदार का प्रकरण चलने के कारण अपने स्वरूप से आधय मलदार स्वरूप से ही है क्योंकि वही अपना सम्बन्धी है। बया करते हुए ? हाम्प को बहन करते हुए, बरामरी को धारण करते हुए। कैसी
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वृवोयोन्मेश. ३५१
बराबरी को ? जिसका एकमातर प्राण उपवार है। उपचार अर्थात् तत्य का अध्यारोप (वह' उसका एकमान सर्वस्व अर्थात् उसका कारण होने के कारण केवल प्राणभूत होता है मयोकि उपचारो से ही रूपक की प्रवृत्ति होती है। [यहाँ प्रयुक्त साम्य वस्तुत प्रतीयमानवृति साम्य की ओर सकेत करता है जैसा कि दीपकालद्वार के विवेचन मे किया गया है। इसीलिए शायद कारिका मे तव् साम्यमुदहत करके आया है किन्नु वृत्ति मे तत् की कोई व्यास्या ही नहीं चपलब्ध है, अत. कोई निश्चित संकेत ज्ञात नही होता। पर जैसा कि डा० डे भी कहते हैं कि इस साम्य को प्रतीयमानवृत्तिसाम्यरूप मे ही ग्रहण करना चाहिए, वही उचित प्रतीत होता है । ] यस्माद्ुपचारवक्रताजीवितमेतदलङ्करणं प्रथममेव समाख्यानम्- यन्मूना रमाल्लेखा रूपकादिरलड्कृतिः। (इति) एवं च रूपहादि सामान्यलक्षणमुलिखय प्रकारपर्यालोचने। नमेवो- न्मीलयति कयोकि उपचार वकता रूप प्राण वाला यह (रूपक) अलङ््कार होता है ऐशा पहले ही (कारिका २१४) हि- जिस (उपवार वकता) के सूल मे होने के कारण रूपक आदि अलड्कार आस्वादपूर्ण अथवा चमत्कार युक्त हो जाते हैं॥ (प्रतिपादित किया जा चुका है।) इस प्रकार रूपक आदि के सामान्य लक्षण को बताकर भेदो का विवेचन करते हुए उसी ( रूपकालडटकार) का स्वरूप बताते है- समस्त वस्तुविपयमेकदेशविवर्ति च । नमस्तवम्तुतिपयो यस्य तत्तथोक्तम्। तदयमत्रार्थ :- यत् मर्धाण्येव प्राधान्यन वाच्यतया सकलवाक्योपारूढान्यमिघेयान्यलक्कर्यनया सुन्दर- स्वरूपपरिस्पन्दसमर्पणेन रूपान्तर।पादितानि गोचरो यस्येति। यथा- (यह रूपक) (१) समस्तवस्तु विषय तथा (२ ) एकदेशविवति (दो प्रकार का) होता है। जिसका विषय समस्तवस्तु होती है वह समस्तवस्तु विषय रूपक होता है। सो यहां इसका आशय यह है-कि जिस अलङ्कार के विषय समस्त वाक्य के मन्दर सन्निविष्ट सारे के सारे अभिधेय अर्थ अलड्कार्य के रूप मे वाध्यार्थ को प्रधानता के द्वारा उपात्त (विषयी के) अपने रमणीय स्वभाव के आरोपण कर देने के कारण एक दूसरे विषय रूप को प्राप्त करा दिये जाते हैं (वह समस्त- वस्तु विषम रूपक होवा है।) जैसे-
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३४२ घफोकिनीवितम्
जयत्यहा तगणतारमभ:॥८॥ कोनल कलेवर रूपी लता का वसन्त सुन्दर मुख रूपी नन्दबिम्धि का घुशलपक्ष और कामदेव स्पी हापी का मद, यह तारुप का आरम्भ सर्वातिनायी है॥=। अत्र पूर्वाचयैर्व्याव्यानम-नथा यदेकदेशेन विशर्वते विघटते विशेषण वा वर्तते (तत्) तथोक्तम् इति। उभयथाप्येतद्युक्क भर्वति । यद्वाक्यस्थ यत्कम्मिश्रिदेव स्थाने स्वपरिस्पन्दसमर्पणात्मररूपणभा- दधाति क्वचिदिवेति नदेकदेशव्धातरूपकम्। यथा- इस प्रकार समस्तवस्तु विषय रूपक की व्याख्या एव उदाहरण प्रस्तुत करने के अनन्तर कुन्तक एकदेशवि्वति रूपक की व्यास्या इस प्रकार प्रारम्भ करते हैं- इस (एकदेश विर्वर्त रूपक) के विषम मे प्राचीन आचायों ने इस प्रकार व्यारया की है, जैसे-जो एकदेश के द्वारा विवतिन अर्थात विघटित होता है अथवा विशेष रूप से विद्यमान रहता ह यह एकदेशविवर्तित रूपक होता है। इस प्रकार दोनों ही दगो से की गयी व्याख्या अनुचित है। जो वाक्य के किसी एक ही ग्थान पर कही ही अपने स्वरप के समर्पण रूप आरोप वो प्रस्तुत करता है ह एक्देश विर्वान रुपक होता है। जैमे- नदिद्वतयकन्याणा बल्ाकामालभारिणाम्। पयोमुचा ध्वनिर्धोरो दुनोति मम ता प्रियाम्॥ म१॥। विदयन मण्डल रुपी वक्ष्या (हाथी की व्मर मे बधने वाली रस्सी) वाले, बगुलो की पडिक रूपी माला का धारण करने वाले वादलो की गम्भीर धवनि मेरी उस प्रिया को पीडित करती है। ६१ । अत्र विदयुद्वन्यस्य कट्यात्नेन, जलाकाना तन्मालात्वेन रूपण विद्यने। पयोगुर्षा पुनर्दन्तिमाश्रो नास्तीत्येकदेशविवर्तिरूपकमलङ्वारः। तद््त्यर्थयुक्तियुक्तम्, यस्मादलद्वरणस्यालार यशोभातिशयो:पादनमेव प्रयोजन नान्यत्किञ्चित्। तदुत्तम्-रूपकापेक्षया किछििचिदू विलक्षणमेतेन यदि सम्पादते तदेतस्य रूपकप्रकाशन्तरतोपपति स्यात्, तदेतनास्ता नावत्। प्रत्युव क्यादिनिमित्तरूपणोचित मुख्यव स्तुविषये विघटमानत्वादलक्वारदोपतवं
म हा निय्युन्मण्डल का ददमा रूप मे बगुलो की पडिकयों का उसकी माला रुप में निसन्पण किया गया है। किन्तु यादलो की हाथी रूपता नही है अतः यह एक
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दरराविबति रूपकालद्वार हुआ। यह बहत ही युक्तिसद्तत है, क्योकि अलद्वार का प्रयोजन अल्धार्थ के सौन्दय को उपस्थित करना हो होता है दूसरा कुछ नहो।" यदि इसके द्वारा रूपक की अपेक्षा कुछ विरक्षणता लाई जाती है वो उससे इसकी रूपक की ही भेदान्तरता सिद्ध होती है जा इस सरह कहा गया है तो ससे रहने ही दौजिए। साथ ही कक्ष्या आदि निमित्तो के आरोप के लिए समीचीन मुख्यवस्तुविषय के बारे मे विघटित हो जाने के कारण यह अलद्वार- विषयरु दोषता कठिनाई से हटाने सोग्य हो उठती है। इस लिए इससे भिनन समाधान दिया जाता है।
सोकुमार्यनिबन्धनं वर्णनीयस्थ वस्तुनः साम्यममुल्लिखित स्वरूपसम रपणअ्रहणमामध्यमविसवादि। नेन 'मुखमिन्दु" इत्यत्र मुखमिबेन्दु' सस्पादने, तेन रूपण विवतने। नदेवमयमलद्कार- म्पकालद्वार का वास्तविक रहस्य यह है-वर्णनीय वस्तु का प्रसिद्ध सोन्दर्ष की अधिकता वाले पदार्थ की सुकुमारता पर आधारित साम्य के साधार पर समुद्धावित अपने स्वरप के समर्पण को म्रहण करने की अवि- संवादिनी छ्ति हुआ करती है। इस लिए 'मुख चन्द्र है' इस कपन मे मुख के तुत्य चन्द्र को बनाया जाता है और फिर उसी से आरोप निष्यन्र होता है। तो इस प्रकार इस अलद्वार की व्यवस्था है। हिमाचल सुवा वल्निगाढालिद्वितमूर्तये। ससारमरुमार्गैककल्पवृक्षाय ते नमः ॥ ६२॥ (यथा वा) उपोदगागेण विलोलतारकम ॥ ८३॥ इत्यादि। हिमालम की पुत्री रूपी ला के द्वारा प्रगाद् रूप से आलिद्वित चरीर वाले सुसार रूपी मकस्थल के भार्ग के लिए अद्वितीय कल्पयुस्ष रूप तुम्हें प्रणाम है। अथवा जसे-उपोरयागेण विलोलतारकम्॥ इतयादि ॥ प्रतीय मानरूपकं यथा- लावण्यकान्तिपरिपूरित दिरुमुखेडस्मिन् 44* स्मेरेऽघुना तब मुखे तरलायताकि। क्षोभं यदेति न मनागवि तेन मन्ये सुत्यकमेव जलराशिरयं पयोधि:॥र॥
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वकोक्तिजीवितम्
प्रतीयमान रूपक (का उदाहरण ) जैसे- हे चन्चल एवं विदाल नेवो वाली (सुन्दरि)। इस समय (कोध के कासुप्प के दूर हो जाने के अनन्तर) आकृतिसोधव एवं कान्ति से दिशाओ के मुख्ो को परिपूर्ण कर देने वाले तुम्हारे इस मुख के मुसकुराहट युक्त होने पर भी यह समुद् जो चोड़ा भी क्षोभ ( चाल्नल्य) को नही प्राप्त होता है, उसमे मैं समझता हूँ कि सपष्ट रूप से यह जल (जब) समूह ही है। नयन्ति कवय: काश्चिद्वक्रभावरहस्यतान्। अलङ्गारान्तरोल्लेखसहाये प्रतिभावशाह् ॥ २० ॥ फविजन अपनी शक्ति के सामर्थ्य से अन्य मलसारो की रबना की महायता बाले (इस रूपकालखार) को वक्रता के किसी लोकोत्तर रहस्प मे युक्त कर देते हैं ॥। २० ॥ तदेव विद्द्त्यन्तरेण विशिनष्टि-एनदेवरूपाख्यमलद्वरण काजवि- दलौकिकवकभावरहस्यतां वक्रत्वपरमार्थता नार्यान्त प्रापयन्ति। तथो- पनिबद्धानि यथा वकनाविचत्त्तिवैचित्र्यादिरूटिरमणीयनया नदेव तत्व पर प्रतिभासते। फीटशम्-अलक्कारान्तरोल्लेखसहायम्। अल- द्वारान्तरस्थान्यस्य ससन्देहोतप्रेक्षाप्रभृते. उल्लेख: समुद्रेद- सहायः काव्यशोभातिशयोत्पादने सहकारी यस्य तत्तथोकम्। कस्माल्रयन्ति- प्रतिभावशात् ! स्वशक्तरायत्तत्वात्। तथाविधे लाककान्तिक्रान्तिगोचरे विपये तस्यापनिवन्धो विधीयते। यत्र तथाप्रसिद्धाभावात् सिद्धन्य- दारावतरण साहसिकमिवावभासते विभूषणान्तरसहास्य पुनरुल्लख स्वेन विधीयमानत्वात् सहृदयहदयसवादसुन्दरी परा मोदिरुत्पद्यते। (यथा)- किं तारुण्यतरो ...... इत्याहि ॥=४॥ खस्नी (रूपक अलद्वार) को दूसरी घोभा से विशिष्ट करते हैं-इसी रुपक नाम के अलद्धार को (कविजन) किसी लोकोतर वक्भाव की रहस्पता के पास से जाने हैं अर्थात वकता की परमार्थता को प्राप्त करा देते हैं। बैस रस् से प्रस्तुत किए गए हुए होते हैं जिससे कि वकता की रमणीतता के वैचिश्स भदि को रडिसुग्दरक्षा के कारण वही तरब उत्कृष्ट रूप में प्रतिभासित होता है। कैसे (रूपकासद्वार) को ? मग्य बलसारों की रपना की सढ़ायता पासे। मलकूारान्र अर्पाद् दूसरे सखन्वेह उरप्रेक्षा बादि (मलद्वारों) का उल्लेल अर्ान् सृत्ि या रबना जिसकी सहाम बर्थात् काम्य मे सोग्दर्वाविघम की सृष्टि करने में
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वृतीयोन्मेप: ३५५
सहयोगी होती है उसे ( रूपकालद्वार को वक्ता की परमार्थता को प्राप्त करा देते हैं) किससे प्राप्त करा देते हैं-प्रतिभावद्य अर्थात् अपनी शक्ति की सामर्थ्य से। उम तरह के लौकिक कान्ति के सतिकमण कर जाने वाले विषय के गोचर होने पर उसका वर्णन किया जाता है। जहाँ उतना प्रसिद्ध होने के अभाववर प्रसिद्ध व्यवहार का प्रमोग अनुचित सा प्रतीत होता है वहा दूसरे अलद्दार को साथ लेकर आने वाले (रूपक) के पुनर्लेख के द्वारा प्रस्तुत किए जाने के नाते सहृदयो के हृदय के साथ सवादी होने के नाते सुन्दर एक उत्कृष्ट परिषाक सत्पत्र हो जाता है। जैसे- "कि तारुण्यतरो' इत्यादि। इसके बाद कुन्तक ने किमी अन्य ब्लोकार्द् को भी उदाहरण रूप मे उद्धृत् किया है जिमे कि र० हे पढ नहीं सके। इस प्रकार रूपक का विवेचन समाप्त कर कुं्तर 'अप्रस्तुतप्रशसा' अलद्धार का विवेचन प्रारम्भ करते हैं। 'अप्रस्तुतोऽपि विच्छिति पस्तुतस्यावतारयन्। यत्र तत्साम्यमाश्रित्य सम्बन्धान्तरमेव वा। २१॥ वाक्यार्थोऽसत्यभूवो वा प्राप्यते वर्णनीयताम्। अप्रस्तुवप्रशंसेति कथितासावलङ्कृतिः ॥ २२ ।। जहां उस (रूपक के लिए उपयोगी) समानता के अपवा दूसरे (निमित्त- भाजादि) सम्बन्धो के आधार पर प्रस्तुत (अर्थात् वर्णन के लिए अभिप्रेत पदार्थ) को शोभा को उत्पन्न करता हुआ अप्रस्तुत अथवा असत्यभूत भी नाकपार्थ वर्णन के योग्प बनाया जाता है उसे (आलहारिकी ने) अपस्तुतन्रशक्षा अलखार कहा है।। २१-२२।। एव रूपक विचार्य तदर्शनसम्पन्निबन्धनामप्रस्तुनप्रशंसा प्रस्तौति- अप्रस्तुतोऽपीत्यादि। अप्रस्तुतप्रशसेति कथितासावलक्कति :- अप्रस्तुत- प्रशंसेति नाम्ना सा कर्थिता-अलङ्कारविद्धिरलककृति.। कीदशी-यत्र यस्यामप्रस्तुतोऽप्यविवक्षितः पदार्थो वर्णनीयतां प्रति प्राप्यते वर्णना- विपय: सम्पादते। कि कुर्बन्-प्रस्तुतस्य विवक्षितार्थस्य विस्छित्तिमुप- शोभामवतारयन् समुल्लासयन्। इस प्रकार रुपक (अलभवार) का विवेशन कर उसके दर्शन को सम्पशि के मूछ वाले अर्थात् जिसके मूल मे रूपक की दर्शनसम्पत्ति अर्वाव तदुपमोगी समता रहती है नब) अप्रस्तुवप्रशंसा अलसार को प्रस्तुत करते है-अप्रस्तुतोड- पीरमादि-कारिका के द्वारा। अप्रस्तुतपपसा यह मद्ार कहा गया है
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वनोक्तिजीवितमु
अर्पात् अलसतारवेत्ताओ ने उसे अप्रस्तुतप्रशस्ता इस नाम का अलद्धार कहा है। किस प्रकार की (यह अप्रस्तुतपशंसा अलड्कृति है)-जहां अर्थात् जिस (अलद्वार) में अप्रस्तुत अर्थात कहने के लिए नहों भी अभिप्रेत पदार्थ वर्णनीयता को प्राप्त हो जाता है अर्थात् वर्णन का विषय बनाया है। बया करता हुआ- प्रस्तुत अर्थात् कहने के लिये अभिप्रेत पदार्थ की वि्छिति अर्थात सोन्दर्य को भवतीर्ण करता हुआ सनुक्वस्तित करता हुआ (अप्रस्तुत पदार्थ वर्णन का विषय बनाया जाता है।।
द्विविधा हि प्रस्तुनः पदार्थः सम्भवति-वाक्यान्तर्भूतपद मात्रसिद्धः सकलवाक्यव्यापककार्यो विविधस्वपरिस्पन्दातिशयविशिष्टप्राधान्येन घतमानश्र। तदुभयरूपमपि प्रस्तुत प्रतीयमानतया चेतस्ि विधाय
कवय प्रापयन्ति। कि कृत्या-तत्साम्यमाश्नित्य। तदनन्तरोकं रूप फालदारोपकारि साम्यं समत्व निमिनीकृत्य। सम्बन्धान्तरमेव वा निमित्तभावादि संश्ित्य। वाक्यार्थोऽसत्यभूतो वा-परस्परान्वयपद- समुदायल्षक्षणवाक्यकार्यभूत. । माम्य सम्बन्धान्तर या समाश्रित्या प्रस्तुत प्रस्तुतशोभाय धर्णनीयतां यत्र नयन्तीवि ।
प्रस्तुत पदार्थ दो प्रकार का सम्भव होता है-(एक तो) वाकय मे धन्तर्भूत (विद्यमान) बेवल एक पद से ही सिद्ध हो जाने वाला होता है( ता दूसरा भह है) जिसका कार्य सम्पूर्ण वाक्य मे व्यापक रहता है तथा अपने नाना प्रकार के स्वभायोत्कर्ष से विशिष्ठ प्रभानता के साथ विद्यमान रहता है। इस प्रकार इस मलदूार मे कमिजन दोनो प्रकार के उब प्रस्तुव पदार्थ को गन्यमान रूप मे अपने हुदय मे रक्ष कर, उसके सौन्दर्य की समृद्ि के लिए दूसरे अप्रस्तुत पदार्थ को वर्णन का विषय बनाते हैं। कया करके { कविजन अप्रस्तुत को वर्णन का विषय बनाते है) उस साम्य का आश्रम ग्रहण कर। उस से तात्पर्य है अभी प्रतिपादित किए गये रूपक अरदार का उपकार करने वाले साम्य अर्वाद् समानता से, उसको निमित बनाकर अथवा दूसरे सम्बन्ध अर्थात् निमित (नैमितिक) भाव आदि का आश्यण कर (अप्रस्तुत पदार्थ को कविजन वर्णन का विषय बनाते है)। अचवा असत्य भूत, वाक्यार्थ अर्थात् परस्पर अन्वय पाले पदो के समुदाय स्वरप वाष्य का कार्यभूत (वर्णन का विषय बनाया जाता है)। साम्य अयमा दूसरे सम्बन्ध का आमयण करके अप्रस्तुत को प्रस्तुत की शोभा के लिए यहीँ पर वर्णन का विषय बनाते है।
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तावण्यमिन्धुरपरैव नि केयमत्र गत्रो-पलानि शाशिना सह सम्प्लबन्ते। उन्मज्जति द्विरबकुम्भनटी च यत्र यत्रापरे कदलिकाण्डमृणालदण्डा।। र६ ।। साम्प के आधार पर वावस मे अन्तर्भूत प्रस्तुत पदार्थ की प्रशसा का उदाहरण जैमे-(कोई युवक किसी तरुणी को नदी मे स्नान करते हुए देस कर कहता है कि' यहाँ यह कोन सी दूसरी (सौन्दर्य) लावण् की सरिता (प्रबाहित हो रही है) जिसमे चन्द्रमा के साथ कमल तेर रहे है, एव जिस्रमे हाथी की कमोलस्थली उभर रही है तथा जहाँ दूसरे कदलीस्तम्भ एवं मृणालद्दण्ड (दिखाई पडते हैं)।
नाम्याश्रय मात्सकन्तवाक्यव्यापकप्रस्तुतपदार्थप्रशंसा (चशा)- छाया नात्मन एत या कयममावन्यस्य निष्प प्रहा श्रीष्मोप्मापदि शीतलस्तलमुवि स्पर्शाऽनिलाे: कुतः । वार्ता वर्षशते गते किल फलं भावीति वातव सा दाघिम्णा मुपिता: कियचचिरमहो तालेन माला चयम् ॥६s॥। साम्य के आधार पर सम्पूर्ण वाक्य मे व्यापक प्रस्तुत पदार्थ को प्रशसा का उदाहरण जैसे- हम कम समझ लोग तालवुझ की ऊचाई से कितने ही समय तक ठमे गए जिसकी छाया अपने हो लिए भलीभांति ग्रहण करने के योग्य नहीं है वह दूसरे के ग्रहण करने योग्य कैसे हो सकती है। ग्रीष्म की गर्मों की विपतति के माने पर जिस के नीचे की ही धरतो पर शोतलता नहीं दिखाई देती तो उसकी बायु आदि से शीतल स्पर्श कैसे मिल सकता है। यह कहना कि सी सालों के बाद इसमे फन लगेगा यह एक कोरी बात ही रह जाती है। यहाँ मैंने सुभाषितावली (श्लो० ८२१) का पाठ ग्रहण किया है कमोंकि 'वार्तावर्धशतैरनेकलवल' इम प्राचीन पाठ मे 'अनेकलवलम्' यह बहवरीहिपद किस विशेष्य का विरेषण होगा यह समझ मे नहीं आता। पता नहीं ग. हे इसे कैसे सगत मानते हैं। सम्बन्घान्तराअ्रयणाद्वाक्यन्तर्मूत प्रस्तुतपदार्थप्रशसा (यथा)- इन्दुर्लित इवास्नेन जडिता दष्टिमृंगीणामिव प्रम्लानारुणिमेव विद्ठुमलता श्यामेव हेमप्रभा ।
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कार्कश्यं कलया च कोकिलवधूकण्ठेष्विय प्रस्तुत सीताया पुरनश्र हन्त शिखिनां बर्हा सगर्हा इब ॥दद॥ दूसरे सम्बन्ध के आधार पर वाक्य मे अन्तर्भूत प्रस्तुत पदार्थ की प्रशंसा जैसे-आश्चर्य है! सीता के सामने चन्द्रमा मानो काजल से पोत दिया गया है, हरिणियो की आखें मानो जड़ हो गई है, मूगे की लता मानो मुरझाई हुई (अर्थात् धीमो पड गई) लालिमा बाली हो गई है, स्वर्णप्रभा मानो श्याम वर्ष हो गई है, एवं कठोरता मानो कपटपूर्वक कोकिलवधुओ के कण्ड में उपस्थित हो गई है तथा मयूरो की पूंछे मानो निम्दनीय हो गई है। सम्बन्धान्तराश्रयणाद् सकलवाक्यत्यापकप्रस्तुतप्रशसा (यथा)- परामृशति सायकं शषिपति लोचन कार्मुके विलोकयति वह्भां स्मितसुधार्द्रवक्त्र स्मर:। मधो. किमपि भापते भुवननिर्जयामचावनि गतोऽदमिति हर्षितः स्प्रशति गोत्रलेखामहो’।। = ॥ अन्य सम्बन्ध के आधार पर समस्त वाक्य मे व्यापक प्रस्तुत पदार्थ की प्रशसा जैसे- बहो। कामदेव बाणो का परामर्श करता है, धनुष पर निगाह फेंकता है, मुस्कुराहट रूपी अमृद से मुख को मार्द्र कर प्रियतमा को देखता है, मधु से कुछ बाते करता है, 'लोको की विजय के लिए रणक्षेष्र के अप्रभाग मे पहुंच गया हूँ (ऐसा सोचकर) अत हुषित होकर छपरूपी चन्द्रलेखा का स्पर्श कर रहा है। (बगर 'गानलेखा स्पृशति' यह पाठ किया जाम तो ताल ठकता है यह अर्थ अधिक संगत होगा)। इसके बाद 'असत्यभूतवाक्यार्थतात्पर्या प्रस्तुतपशसा' के उदाहरण- स्वरूप कुन्तक ने एक प्राकृत द्लोक को उद्वृत किया है जो कि पाष्ट्ुलिपि के १. आचार्यविदवेश्वर जी ने यहाँ 'गोनलेखाम्' पाठ देकर के 'कामदेव (उस नवयोवना के) मङ्गो का रपर्दा करता है।' यह मर्थ दिया है। गोत का कोर ह- "मोनं क्षेप्रेऽधये छन्ने सम्भाव्े बोधवत्मनोः। वने नाम्नि प, गोबोष्दो, गोश सुदि गर्दांगणे।।" (अनेकार्थसङपह) इन पर्यायों मे से किसी का भी ग्रहण करने पर विश्वेश्वर जी का अर्थ नहीं निकल पावा। यह।ं कुन्तक के अनुसार का मदेव का घेष्टाविशय वम्रस्तुत है जब कि प्रस्तुद युवद्री के मोवन के प्रारम्भ का निर्देध करवा है।
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तृतीयोन्मेष: ३४९
अरयन्त भ्रष्ट होने के कारण डा० डे द्वारा नहीं पढ़ा जा सका। इसके अनन्तर इस प्रकरण का उपसहार करते हुए कुन्तक कहते है कि- सनेवमयमप्रस्तुतप्शसाव्यवहार कबीनामतिविततपपञः परिदश्यते। तस्मारसह दयैक्ष स्वयमेवोत्प्रेक्षणीय । प्रशसाशन्दोऽत्र अर्थप्रकाशादि- वद्विपरीतलक्षणया वतते। तो इस प्रकार यह अप्रस्तुतप्ररशंसा का व्यवहार कवियो मे अत्त्मधिक विस्तृत क्षेत्र वाला दिसाई पडता है, अतः सहुदयजन स्वय इसको समझें। यहां पर प्रशसा शब्द अर्थप्रकाश आदि पदो के व्यवहार मे पायी जाने वाली विपरीत लक्षणा से अर्थ प्रस्तुत करता है। शैवाद्दैत मे प्रकावस्वरूप केवल शिव हैं अर्थ नहीं। वाच्यवाचकरूप जगत तो शकिपरिस्पन्दमान्र है, अत अर्थप्रकाश मे मुस्यार्ष बाधित माना जायगा। वस्तुत अर्थ प्रकाशरूप शिव के विमर्श से आभासित होता है न कि अर्थ का कोई प्रकाश हो सकता है। अतएव विपरीत लक्षणा के द्वारा प्रकाशवमृष्ट अर्थ रूप अथ ही गृहीत होगा। इस प्रकार अप्रस्तुतप्रशसा का व्यारूयान समाप्त कर कुन्तक पर्यायोकत अलस्वार का विवेचन प्रारम्भ करते हैं। पर्यामोक्त अलद्ार का लक्षण इस प्रकार है- यद्वाक्यान्तरवक्तव्यं तदन्येप समर्थ्यते। येनोपशोभानिष्पन्यै पर्यायोक्तं तदुच्यते ॥२३॥
दूसरे वाक्य द्वारा प्रतिपादित करने योग्य वस्तु सोन्दर्य की सृष्टि के लिए, उससे भिन्न जिस (वाक्य के) द्वारा प्रतिपादित की जाती है उसे पर्यायोक्त (अलद्वार) कहा जाता है॥ २३ ॥ एवमप्रस्तुतप्रशसा विचार्य वित्रक्षितार्थप्रतिपादनाय प्रकारान्तरामि- पानत्वादनयैत्र ममानपायं पर्यायोक विचारयति-यद्वाक्यान्तरेत्यादि। पर्यापोक्त तदभिधीयत्े। कीटशम्-यद्वाक्यान्तरवक्तव्यं वस्तु वाक्यार्थलक्षण पदसमुदायान्तरा- भिघेय तदन्येन वाक्यान्तरेण येन समर्थ्यते प्रतिपाधते। किमर्थम्- उपशोभानिष्पत्ये विच्छ्वित्तिसम्पत्तये। तत्पर्यायो क्कमित्यर्थः । तदेवं पर्यायवऋ्वात् किमत्रातिरिच्यते १ पर्यायवक्न्वस्य पदार्थमात्रं वाज्यतया विषय: पर्यायोकस्य वाक्यार्थोष्यङ्गतयेवि वस्मात्टृभगभि- धीयते । उदाहरणं यया-
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इस प्रकार अपस्तुतप्रदासा का विवेधन कर विबक्षित अर्थ की प्रतीति कराने के लिए दूसरे वद्त मे प्रतिपादम किये जाने के कारण लगभग इसी अप्रस्तुतप्रशसा। के सहर पर्यादोक्त (अतङ्ार) का विवेधन करते है- यदावयान्तर इत्यादि कारिका के द्वारा। पर्यायोक उमे कहा जाता े अर्थात् उसको पर्यायोक्त नाम का अलद्गार कहा जाता है। कैसे ' उसको)-जो दमने पाक्य के द्वारा कही जाने वाली अर्थात् अन्य पदममूह के द्वारा प्रतिपादित की जोने वाली वाक्यार्थरूप वस्तु उससे भिन्न जिस दूसरे वानम से स्षमदन अर्थात् प्रतिपादित की जाती है। किस लिए-उपशोना की निष्पति के लिए अर्थात् सोन्दर्य की प्रतीति कराने के लिए। वह पर्यायोकत (अलद्धार) होती ने यह अभिश्राम हुआ।
इस पर पूर्वपक्षी प्रश्न करता तै कि इस प्रकार यहाँ पर्यायबकरता मे अधिक गया उत्कर्ष माता है( यह तो पर्माबकता ही हुई) 7 इसका पन्यकार उत्तर देता है कि 'वर्षायवकता का नाच्यरूप से कबक पदार्थ हो विषय होता है जब कि पर्यायोकत अलद्वार का वाकयार्थ भी सद्त रूप मे विष्य होता है इमो लिए इसका अन्द्रग से प्रतिपादत किया गया क। इसका उदाहरण जैसे- चक्राभिघातप्रसभाज्ञयत चयर या राहुवधूजनस्य। आलिद्ग नोद्दामविल्तासबन्ध रतोत्सव चुम्बनमात्रशेपम्।। ६।। जिस (बिष्णु भगवान्) ने सुदर्शन चक के प्रहाररूप अनुष्ठङ्गनीय आदेश से ही राहू की लियो के सम्भोग के आनन्द को आलिङ्गन की प्रधानता वाले विलासों से शून्य केवल अवशिष्ट सुम्बन वाला कर दिया था। इसके बाद ग्रन्थ की पाय्डुलिपि में 'अत्र अ्रन्थपान' सिस कर कुछ ग्रन्थभाग रे सप्त होने की सूचना दी गई है। वस्तुत यह 'म्रन्थपात' का सद्ेत परण्डुलिपि मे रूपवालद्वार के विवेचन के प्रारम्भ में एव पर्यायोक्त ने अन्न में दिया गया था। किन्तु रूपकालद्वार के विवेचन के अनन्तर पुनः कुछ अश का छुप्त होना धोतित होता है कयोंकि उसके बाद विवेचित किए गए व्याजस्तुति बलद्वार वे वेधल सदाहरण ही प्राप्त होते हैं क्षण नही है। अत डा० डे जे पाण्डलिपि के कुछ पत्नों के कम की गडबडी बताई है और उन्होंने दोपकालद्वार के अनन्तर रूपकालद्दार का विवेचन प्रस्तुत किया है क्योंकि वृति मे स्वयं स्रत्यकार ने भी इष प्रकार सद्धेत किया है कि- 'एकदेशयुतित्वमनेकदेशवुतित्वञ्च रूपकस्प दीपवेन समारक्ष्यमिति सदनन्तर- मस्योपनिबन्धनम्।'
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इस लिये दौपक के अन्दर रूपक का तदनन्तर अप्रस्तुतप्रशंसा का विबेचन कर पर्यामोक्त का विवेचन किया गया है। अब पर्यामोक्त के अनन्तर 'ब्रन्थपात' इस सदुक्त के बाद जो श्लोक उद्धुम किए गये हैं वे रूपकालद्कार के उद्ाहरण न होकर व्याजस्नुति के उदाहरण है। इससे र्पष्ट है कि लुप्त ग्रन्थभाग मे व्याजस्नुति का लक्षण भी सम्मिलित है। उसके उदाहरण इस प्रकार है- भूभारीद्रहनाय शेपशिर्सां मार्थेन नन्नह्यते विश्वस्य स्थितय स्वय स भगवान् जागर्ति देवी हरि। अद्याप्यत्र व नाभिमागमसम राजस्त्वया तन्वता विश्ान्ति: क्षणनेकमेव न तयोजतिति कोऽ्य क्रम ॥६१॥ पृथ्वी के भार को बहन करने के लिए शेषनाग के फणों के समृह ही सन्नद् होते है और विश्व के पालन के लिए उन भगवान् विष्णु को ही जागरूक रहना पडता है। ऐ महाराज अप्रतिम अभिमान को धरण करते हुए तुम्हारे द्वारा एक क्षण भर के लिए आज भी उन दोनो को विश्राम म दिया जा सका यह बातो का कैसा सिनसिला रहा। (यथा च)- इन्दोल मत्रिपुरजयिनः ।। इति ॥६२॥ (यथा वा )- हे हेलाजित। इति ॥६३॥ (यथा घ)- नामाध्यन्यतरो*। इति॥ ६४॥ और जैसे (उदाहरण सं० ३४९ पर पूर्वोदाहृत) इन्द्रोलंक्षम निपुरजयिनः ॥ यह श्लोक। (या जैसे)-ऊदाहरण स० १४१० पर पहले उदाहृत) हे हेलाजित बोधिवत्व इत्यादि इलोक। तथा जैमे-उदाहुरण स० १९१ पर पहले उद्भृत) नामाप्यन्यतरोनि मीलितमभूत्। इत्यादि श्लोक। इसके अनन्तर उत्पेक्षा अलद्वार का विवेधन प्रारम्भ किया गया है। चह्पेक्षा का लक्षण इस प्रकार है- सम्भावनानुमानेन सादृश्यनोमयेन वा।
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३६२ चकोकिजीवितम्
तदिवेति तदेवेति वादिमिर्वाचकं बिना ॥। २५ ।। समुल्िखितवाक्यार्थव्यतिरिक्तार्थयोजनम्। उत्प्रेक्षा .. ॥२६॥ समभावना द्वारा लाये गए अनुमान के द्वारा अपवा साहश्य के द्वारा या दोनो के द्वारा जहां पर वर्णनीय के आतिशम्य की उल्वणता को प्रतिपादिल करने की इच्छा से 'वा' इत्मादि वाचक के बिना 'उसके से' या 'वह हो' इत्यादि प्रकारो से वाभ्य वापक के सामर्थ्य से लाए गए अपने अर्थ वाले इस बादि छम्भावना के बाधकों के द्वारा उल्षिसित वाक्यार्थ से भिन्न अर्पयोजन होता है उले उतप्रेक्षा कहते हैं।। २४-२६ ।। मम्भावनेत्यादि। समुख्िखितवाक्यार्थव्यतिरिक्तार्थयोजनम् उत्प्ेकषा। समुलिखित: सम्यगुक्िखित: स्वाभाषिकतवेन समर्पयितु परस्तावितो वाक्यार्थ पदसमुदायोऽभिेयवस्तु तस्माद् व्यतिरिक्कस्यार्थेस्य धाक्या- न्तरतात्पर्यलक्षणस्य योजनमुपपादनसुतपेक्षािधानमलरणम्। उत्प्रेक्षण मुत्नेक्षेति विगृदते। किसाधनेनेत्याह सम्भावनानुमानेन। सम्भावनया यद्नुमान सम्भाव्यमानस्य.तेन। सम्भावनेत्यादि। भलीभांति व्गित वाबवार्थ से मिन्न अर्थ की योजना उत्प्रेक्षा (होती है)। समुखिखित अर्थात् भलीभाति वर्णित स्वाभाविक दद्ग से (अभिप्रेत वस्तु की) प्रतीति कराने के लिए प्रस्तुत किया गया वायपार्य अर्थाद पदा का समूह रूप अभिधेम वस्तु उससे भिन्न अर्थ अर्थात् दूसरे वाकय के तात्पर्य- भूत (अर्ध) की बोजना अर्थात् उपपादन उत्प्रेक्षा नाम का अलद्धार होता है। उस्पेक्षणम् उ प्रेक्षा यह उत्पेक्षा का विग्रह होता है। किस साधन से (योजना को जाती है। सम्भावना द्वारा साये गए मनुमान के द्वारा। सम्भावना से जो सम्भाव्यमान का अनुमान किया जाता है उससे। प्रकारान्तरेणा्येषा सम्भवतीत्याइ-सादश्येनेति। साटरयेन साम्येनापि हेतुना समुक्षिखितवाक्यार्थन्यतिरिकार्थयोजनमुत्मेशैव। द्विवधं साहश्यं सम्मवति-वास्तय काल्पनिक्च। तत्र वास्तवमुपमादि- विपयम्। काल्पनिकमिहाननियते। (सम्भावनानुमान से भिन्न) दूबरे ब्ध से भी यह (उरप्रेक्षा ) हो सकसी है इसी बाठ को बसाते हैं-साइकयेन के दवारा। व्ाहध्य अर्थाद समता के कारण भी सम्म कू पण्िव वानयार्थ से भिन्न मर्यकी योना उछेक्षा ही होती है। साहइम
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दो प्रकार का हो सकता है-(एक) वास्तविक (सादृश्य) तथा (दूसरा) काल्पनिक (साहृर्य)। उनमे वास्तविक (साहृश्य) उपमा आदि का विषय होता है। तथा काल्पनिक सादृर्य का आश्रय यहां ( उत्प्रेक्षालद्दार मे) ग्रहण किसा जाता है। इमके बाद कुछ पडिकयां लुप्त हैं। उन लुप्त पडिकियों के अनन्तर विवेचन इस प्रकार प्रार्म्भ होता हैं- प्रकारान्तरमस्या: प्रतिपादयति-उभयेन वा। साहश्यलक्षणेनोभयेन वा कारणद्विनयेन सवलितवृत्तिना प्रस्तुतर्व्यातरिक्तार्थान्तरयोजनम्। उत्प्रेक्षा-प्रकारस्य तृनीयस्याप्यस्य केनाभिप्रायेणोपनिबन्धनमि त्याह-निर्घण्यातिशयोद्रेक प्रतिपादनवाच्छया, वर्णनीयोत्कर्षोन्मेष समर्पण- काहया। कथम्-तदिवेति तद्वेति वा द्वाभ्यां प्रकाराभ्याम्। तदिव अप्र- स्सुतमित, तदतिशयप्रतिपादनाय प्रस्तुतसादश्योपनिबन्धः । तदेवेत्य- प्रस्तुतनेवेति तत्स्वरूपप्रसारणपूर्वक प्रस्तुतस्वरूपसमारोपः। प्रस्तुतोत्कर्ष- धाराधिरोहप्रतिपत्तये तात्पर्यान्तरयोजनम् । कैर्वाक्यरुत्प्रेक्षा प्रकाश्यते इत्याह्-इवादिभिः। इवप्रभृतिभि शब्दैर्यथायोगं प्रयुज्यमानैरितयर्थः। न चनिति पक्षान्तरमभिघत्ते-वाच्यवा चकसा मर्थ्याक्षिप्त स्वार्थेः। तैरेव
इन उत्प्रेक्षा के अन्य (तीसरे) प्रकार का प्रतिपादन करते हैं-अथदा दोनों के द्वारा। साहश्य स्वरूप वाले दोनो के द्वारा अथवा दोनो ही कारणों से मिली हुई अवस्था द्वारा प्रस्तुत से भिन्न दूसरे अर्थ की योजना (उत्प्रेक्षा ही होती है।। उतप्रेक्षा के इस तीसरे प्रकार का भी किस आशय से प्रयोग किया जाता है इमे बताने हैं-वर्ण्यमान के अतिराय के बाहुल्य का प्रतिपादन करने की इच्छा से अर्थात् जिसका वर्णन किया जा रहा है उसके उत्कर्ष की अधिकता को सम्पादित करने की अभिलाषा से। कैसे-'उसके सदण' अथवा 'वह ही' इन दोनो प्रकारों से। 'उसके सदृश' का अर्थ है अप्रस्तुत के सदय। अर्थात् उस प्रस्तुत के उत्कर्ष का प्रतिपादन करने के लिए प्रस्तुत के (अप्रस्तुत के साप) साहश्य का वर्णन किया जाता है। 'वह ही' का अर्थ है अप्स्तुत हो अर्थात् उछ (मप्रस्तुत) के स्वरूप को विस्तृत कर प्रस्तुत के स्वरूप का समारोप। प्रस्तुत के सत्कर्ष को चरमसीमा पर पहुँचाने के लिए अन्य सात्पर्य की योजना उस्प्रेक्षा होती है। किन वाकपो के द्वारा उत्प्रेक्षा प्रकाशित की जाती है-इब आदि के द्वारा। यपासम्भव प्रयुक्त किए जाने वाले इव इत्पादि बब्दों के द्वारा (उतप्रेक्षा प्रकान्कित की जाती है)। यदि (इवादि) न प्रयुक पूर तो दूषरा मक
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प्रतिपादित करते हैं-अर्ष एवं पन्द की सामर्थ्य से आकिप्त हो गये अपने अर्थ वाले उन्ही प्रयुक्त किए जाने वाले इवादि के द्वारा अपवा गम्यवृति वाले इयदि के द्वारा। सम्भाधना नुमानातपेक्षाटाहरणथा- आपीड लोभादुष कर्णमेत्य प्रत्याहित पाशपुतद्विरेफ। अमृव्यमाणेन महीपतीना सम्मोडमन्त्रो मफरध्जेन ॥I E४ ।: सम्भावना के द्वारा किए गए अनुमान से उत्प्रेक्षा का उदाहरण जैमे- शिरोकम के लोभ से कानो के पास आकर मकरन्दसंवलित धमरो के माध्यम से क्षमा न करते हुए कामदेद के द्वारा राजाओ के (कानो मे) वशीकरण मन्त्र निकिप्त कर दिया गया है। काल्पनिकसा्श्योदाहरण (यथा)- राशीभूतः प्रतिदिनमिय तयम्वरुहयादूका न.।। ६६।। यथा वा- निर्मोकमुक्िरिव गगनोरगम्य इत्यादि। ६७ ॥ काल्पनिक सादृश्य (से की गई उल्प्रेक्षा) का उदहरण जैसे- मानो शिव जी का देनदिन अद्हास पुजीभूत हो उठा हो। अयवा जेसे- आकाश रूपी सर्प के केंचुलपरित्याग सा। इत्यादि। इसके बाद वास्तवसाटृश्यीत्प्रेक्षा के उदाहूरण रूप मे अन्वकार ने एक पाकृल इलोक को उद्धृत किया है जो कि पाष्टुलिपि के अर्यन्त भ्रष्ट होते के हारण पद़ा नहीं जा सका। उसका दूसरा उदाहूरण इस प्रकार है- वास्तव साटश्यादाहरणं (यथा)-
येय धुता रुविश्चूतलता मृगाच्या । शङ्के न वा विरहिणीमृदुमर्दनस्य मारस्य तार्जितमिद्र प्रति पुष्पचापम्॥८॥ पास्तविक सारृष्य (से की गई उत्पेक्षा) का उदाहरण जैसे- यृगनमनी ने जो विकसित सुन्दर पूलो के गु्छे से सुकी हुई इस मुन्दर आमलता को हिला दिया है, मैं देवा सोषता हू कहीं वियोगिनियों का यृद्ध मर्देन करने वाले कामदेव की प्रश्येक पुष्प के धनुप की सर्जना तो नहीं है। इसके बाद प्रत्यकार ने 'उभयोदाहरण के रूप मे भी एक प्राफृतशलोक को सबृत हिया है यो कि पाष्युलिपि को महपष्टता के कारण पढ़ा नटों जा सका।
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नदेवेत्यत्र वादिभिविनोदाहरणम्, यथा-
मूच्छयत्येप पर्थिकान् मधी मलयमारुत ।। ६६।। 'बह् (अप्रस्तुत) हो' इस अर्थ वा आदि के विना उत्प्रेक्षा का वदाहरण जैसे (मानो) चन्दन (के पेड) में लिपटे हुए सपों को नि श्बासमायु से पू्च्छित हुआ (ही) यह मलयपदन वसन्त ऋतु मे राहियो को मूच्छित कर रहा है।। यथा वा- देवि त्वन्मुखपङ्कजेन इत्यादि॥ १०६ ।। यथा वा- त्वं रक्षसा भीरू इत्यादि ॥१-१॥। अथवा जैसे ( उदाहरण ससया २ा४४ पर पूर्वोदाहृत)- देवि त्वन्मुखपल्ूजेन। इत्य।दि श्लोक । अधवा जैसे [चदाहरण सल्या स८० पर पूर्वोद्वृत) त्व रक्षसा भीर॥ इत्यादि ्लोक। तडेवेत्यत्र वाचक विनोदाहरणम् यथा- एककं दलमुन्नमय्य इत्यादि॥ १०० ॥ 'वह (अप्रस्तुत ही) इस अर्पमे वाचक के बिना उतप्रेक्षा का उदाहरण जैसे- (उदहरण सख्या ११०२ पर पूर्वोदृत 'यत्सेनारजसामुदळ्चति ... इस्यादि' इलोक़ का उत्तराढे) - एक्ैंक दलमुन्मय्य। इत्यादि क्लोक। इसके बाद ग्रन्थकार उत्पेक्षा के एक लन्य प्रकार को प्रस्तुव करता है जो एस प्रकार है प्रतिभासातथा बोध्ध: स्वस्पन्दमहिमोचितम् । चस्तुनो निष्क्रियस्यापि क्रियायां कर्तृतार्पणम्॥२६॥ क्रियाहीन भी पदार्थों की किया के प्रति अनुभव करने वाले को उस प्रकार की प्रतीति होने से अपने स्वभाव के उत्कर्ष के अनुरप कर्तृस्व का बारोप (उत्परेक्षा अलद्वार होता है) ॥ २६ ।। तदिदमपरमुत्प्रेक्षायाः प्रकार परिदश्यते-प्रविभासादित्यादि। क्रियायां साध्यस्वरूपायां कहतारोपण स्वतन्त्रत्वसमारोपणम्। फस्य- वस्तुनः पदार्थस्य निष्कियस्य क्रियाविरहितस्यापि । फीटराम्-स्वरुपन्द-
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महिमोचितम्। तस्य पदार्थस्य यः स्वस्पन्द्महिमा स्वभावोत्कर्पस्त- स्योचितमनुरूपम्। कस्मात्-बोद्धरनुभवितुस्तया तेन प्रकारेण प्रतिभासारदवोधात्। 'निर्वर्ण्यातिशयो ट्रेकप्र तिपादनवाब्छया' 'तविवति तदेवेति वादिभिर्वाचकं विना' इति पूर्वपदिहापि सम्बन्धनीचे। उदा- हरणं यथा- तो यह उत्पेक्षा का दूसरा भेद दिसाई पडता है-'प्रतिभासात्' इत्ादि (कारिका के द्वारा उसका स्वरूपनिरूपण करते है। साम्य रूप निया के प्रति कर्तृत्व का आरोप जर्थात स्वतन्त्रता का समारोपण (उत्प्रेक्षा होती है)। किसकी (कर्तृता का आरेप) निष्फिय वस्तु अर्थाद करिया से होन पदार्थ की (कतृता का आरोप)। कंसा (कर्तृता का आरोप)-अपने स्वभाव की महिमा के अनुरूप। उस पदार्थ की जो अपने स्पन्द की महिमा अर्थाव स्वभार का अतिशाय उसके प्रति उचित अर्थात् योग्य (कर्तृता का आरोप) । किस कारण से। ऐसा आरोप किया जाता है) बोद्धा अर्पात् अनुभव करने वाले की उसी प्रकार से प्रतीति अर्थात ज्ञान होने के कारण (आरोप किया जाता है, और यह आरोप) वर्ण्यमान पदार्थ के अतिशाम के बाहुत्य का प्रतिपादन करने को इच्छा में' एवं उस (अप्रस्तुत) के समान, इस अर्थ मे या 'वह (अपस्तुत) हो' इस अर्प मे वा आदि तपा वाचक के विना (किया जाता है)-ऐवा पहले की हो भाति यहां भी सम्बन्ध जोड़ लेना चाहिए। उदाहरण जैसे- लिम्पतीव तमोऽद्गानि वर्षतीवाअन नभः॥१०३॥ यथा वा- तरन्तीबाङ्गानि स्खलदमललावण्यजलघौ।। १०४ ॥ अन्र दण्डिना विहतमिति न पुनविधीयते। अन्धार अल्भो को लोप सा रहा है तपा आकाश कब्जल सा बरसा रहा है। अपवा जैसे-(उदाहूरण सख्या २ा९१ पर पूर्वोदाहुव) सरन्तीवाङ्गानि स्खलदमललावण्यजलधी। आदि इलोक) यहां पर (अर्थात ऐमे स्थलो पर। दण्डी ने (उत्प्रेंक्षा का विधान) कर दिया है अत. पुन विधान नही किया जा रहा है। इस के अनभ्वर कुन्बफ एक तीसरा भी उदाहरण प्रस्तुत करने हैं जो पाण्डुलिपि के अध्यन्त भष्ट होने के कारण पढ़ा नहीं जा सका। उससे बाद उदप्रेक्षा के इस प्रकार के विषय में कुन्तक इस बात का निरूपण करते है कि-
रत्प्रेम प्रथमोल्लेखजीपिसत्वेम सम्मते।। १० ।।
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दृवीपोन्मेष २६७
इत्यन्तरश्लोक:। दूसरे अलद्ारों के सौन्दर्य एवं उत्कर्ष की शोभा का अपहरण कर उत्प्रेक्षा (अलद्ार) प्रथम उल्लेख पाने वाले प्राण के रूप मे स्कुरित होता है। यह अन्तर श्लोकु है।
इस प्रकार उत्प्रेक्षा अलदार का निरूपण करने के अनन्तर कुन्तक अतिरयोकि अलहार का विवेचन प्रारम्भ करते हैं- यस्यार्मातशयः कोऽपि विच्छित्या प्रतिपाद्यते। वर्णनीयस्य धर्माणां ताद्वदाह्लाददायिनाम्॥ २७॥ जिसमे वर्णन किए जाने वाले पदार्थ के सहृदयों को मानन्दित करने वाले धर्मों का कोई लोकोत्तर उत्कर्ष वैदग्ध्यपूर्ण ढङ्ग से प्रतिपादित किया जाता है। {उसे अतिशयोक्ति अलद्धार कहते हैं)॥ २७ ॥ एवमुत्प्रेक्षां व्याख्याय नातिशयत्वमादृश्यसमुल्लमितावमरामति- शयोक्ति प्रस्तौति-यस्यामित्यादि। मातिशयोकिरलङ्कृतिरमिधीयते।
सरणि विच्वित्त्या प्रतिपाद्यते वैदग्व्यभङ्गया समप्यते। कस्थ-वर्ण- नीयल्य घर्माणाम्, प्रस्तावाधिकतस्य वस्तुनः स्वभावानुसम्बन्धिनां परिस्पन्दानाम्। कीदशानाम्-तद्विदाहाददायिनाम्, काव्यविदानन्द- कारिणाम्। यस्मात्सह्टद्यदृदयाह्लाद्कारि स्वस्पन्त्रसुन्दरत्वमेव काव्यार्थः ववस्तवतिशयपरिपोषिकायाम विशयोक्तावलद्गारकृतः कृतादरा'। इम प्रकार तरप्रेक्षा का विवेचन कर अतिरायमुक्तता रूप साम्म के कारण (उत्प्रेक्षा के अनन्वर } अवसरप्राप्त अतिशमोक्ति (अलद्धार) का निस्मण करते है-अस्याम्-इत्यादि (कारिका के द्वारा)। उसे अविरयोक्ति अतद्कार कहा जाता है। कैसी होती है ( वह अतिशयोकति)-जिसमे (लोक-) विस्याठ सपवहारपदर्ति का सुसह्वन करने वाला कोई ( लोकोतर) अतिरय अर्थाद उत्कर्ष का चरमसीमा पर पहुंच जाना विन्छिति के द्वारा प्रतिपादित किया जाता है अर्पात् मेदगभ्मपूर्ण भङ्गो के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। उसे अतिथयोकि कहते हैं)। किसके (अतिशम को इस बद्ध से प्रस्तुत किया जाता है?)-वर्णनीय के धर्मों के (अविरय को) अर्थात् प्रकरण के द्वारा अधिकृत पदार्थ के स्वभाव से सम्बन्धित ग्यापारों के (अविरय को प्रस्तुत किया जाता है) किस प्रकार के धर्मों का (अतिदम)। उसे जानने वालों को बहाद प्रमान करने वाले अर्पाद् काम्य (-सत्द) को समसने आले (सहुषयों) का वानन्द उरपनन करने वाले
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(धर्मों का अतिशय)। वयोकि सहृदयो को आनन्दित करने वाले अपने स्वभाव से सुन्दर होना ही तो माग्य का अर्थ होता है। इसी लिए उस अतिदाय को परिपुष्ट करने वाली अतिशयोक्ति के प्रति मलद्वारिको ने समादर प्रदान किया है। इसके बाद कुन्तक ने अनिययोक्ति के पाच उदाहरण देकर उनकी व्याख्या प्रस्तुत की है। पर पाण्डुलिपि के भ्रष्ट होने के कारण व्वास्या तो पढ़ी ही नही जा सकी। क्लोक भी केवल तीन ही पढे जा सके हैं जो इस प्रकार है- स्वपुष्पच्छविहारिण्या चन्द्रभासा तिरोहिता:। अन्वमीयन्त भृद्गालिवाचा सप्तच्छदद्ुमाः॥१०६। अपने ही फूलों की कान्ति का अपहरण कर लेने वाली चन्द्रमा की प्रभा से छविप गए हुए सप्तरदर्ण के वुक्षो का समरो की ध्वनि से अनुमान किया गया। (यथा या)- शक्यमोपधिपतेरनवोदयाः कर्णपूररचनाकृते तब।
अचवा जैसे- नये-नये उदययाली, अकठोर जो के अडर की तरह मुकुमार, औषधिपसि (चन्द्रमा) की किरणे तुम्हारे कर्णावतस की निर्माणक्रिया के लिए नाखूनो के अप्रभाग से काटी जा सकने योम्य है। (यथा वा)- वस्य प्रोच्छ्रयति प्रतापतपने तेजस्विनामित्यल लोकालोकधराघरावति यशःशीतांशुषिम्बे प्रथा। नैलोक्यप पिता वदानमहिमक्षोणीशवशोङ्वी सूर्याचन्द्रमसी स्वयं तु कुशलच्छाया समारोहतः ॥। ६०८।।
१. डा० डे ने बकोकि जीवित में 'खवपुष्घविष्ारिण्यशचन्द्रदासा' पाठ दे रसा है जो असमीचीन है। जैसा पाठ मैने दिया है वही पाठ मामह के कन्पाकदार (राटर) पाकमनोरमा सोरीज न० ५४ में दिया हुआ है। र. ठा के के तृतीय संस्करण में 'मुहालोवाचा' पाठ छपा है । सम्मरत. बह क में दाए ईकार छापने वालों के प्रमादव छप गया है। उसे मैंने भुडाकिनाना कर रिय है।
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वृतीयोन्मेप: ३६९
अथवा जसे- जिसके प्रतापरूपी सूर्य के ऊपर बढ़ जाने पर अन्य तेजरिवयों की चर्चा ही व्यर्थ है और जिसके बरा रूपी चन्द्रबिम्ब के समुच्क्रित होने पर लोक मे प्रकाश धारण करने वालो के निम्नवर्ती होने के विषय मे अत्यधिक चर्चा होने लगती है। नैलोक्य मे विसयाव बल की महिमा वाले राजाओ के बश के मूल भूत सूर्य ओर चन्द्रमा स्वयं कुरलता के लिए (जिसकी) छाया का आश्रयण कर लेते हैं। इसके अनप्तर कुन्तक विस्तारपूर्चक उपमा अलङ्कार का विवेचन प्ारम्भ करते है। परन्तु जैसा कि डा डे ने लिसा है इस स्थल पर पाष्डुलिपि अत्यन्त भष्ट है। अतः इस के विवेचन को पूर्ण रूप से सही सही प्रस्तुत कर सकना कठिन हो गया है। प्रयास करके जैसा डा० हे ने मू दे रखा है उसे ही उदृत कर उसका अर्थ यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। उतमा का लक्षण हैं-
वस्तुनः केनचित्साम्यं तदुस्कर्पवतोपमा ॥२८ ॥ पदार्थ के वर्णन के लिए अभिप्रेत, किसी धर्म की हुदयावर्जकता की निष्पतति के लिए उसके अविशय से सम्पन्न किसी पदार्थ के साथ (उसका) सादृश्य उपमा होता है॥। २८ ॥ तां साधारणधर्मोक्तौ वाक्यार्थे वा तदन्वयात्। इवादिरपि विच्छित्या यत्र वक्ति क्रियापद्म्॥। २९॥ उस उपमा को साधारण धर्म का कथन होते पर इव आदि शब्द अपवा वाकयार्थ मे उन (पदायों) का सम्बन्ध होने के कारण कियापर भी वैद्व्यपूर्ण उङ्ग से प्रतिपादित करते हैं ॥ २१।। इटानी साम्यसमुद्गासिनो विभूपणवर्गस्य विन्यासविच्छित्ति विचारयति-विघक्षितेत्यादि। यत्र यस्यां वस्तुनः प्रस्तावाधिकृतस्य केनविद्प्रस्तुतेन पदार्थान्तरेण साम्यं सादृश्यं सोपमा उपमालडकृति-
१. यदि श कारिका को इम रूप में रखा जाय वो सायर अधिकसमोचीन होगा- किशपर्द विच्छित्या यत बकि हवादिरपि। ता साधारणधमोंक्ो वाक्यायें वा तहसपाल्। नयोंकि वृत्ति में जैसा कि डा० दे ने दे रसा है-एवविधानुपमा क प्रति० परदवीस्याइ-करियापदमित्यादि। इसमे स्पष है कि द्वितीय कारिका का मारम्म 'कियारदम्' से हो होठा है। २४ ६० सी०
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१७० रूपमित्युकयते। किमर्थमप्रस्तुतेन साम्यमित्याह-विरक्षितपरिस्पन्द मनोहारित्वसिद्धये। विवक्षितो वक्तममिप्रेतो योऽसी परिस्पन्दः कव्विदेव धर्मविशेपस्लस्य मनोहारित्वं हृदयराख्षकत्वं तस्त सिद्धिर्निप्पत्तिम्तद र्थम्। कीहशेन पदार्थान्तरेण-तद्ुत्कर्पवता। तदिति मनोहारित्वं परामृश्यते। तस्योत्कर्ष सातिशयत्व नाम तदुत्कर्ष, स विद्यते वस्य स तथोक्तस्तेन त दुत्कर्पवता। तदिदमत्र ततत्पर्यम्-वर्णनीयस्य वित्रक्षितधर्मसौन्दर्विद्धयर्थ प्रस्तुतपदार्थस्य धर्मिणो वा साम्यं युक्तियुक्ततामर्हति। धर्मेगेति नोकं केवलस्थ तस्यामम्भवात्। नदेवमय धर्मद्वारको धर्मिणोरुपमानोपमेय- लक्षणयो फलत, साम्यममुच्चय पर्यवस्यति। ... अब साहृश्य के कारण प्रकाशिन होने वाले अलद्धार्समुदायके वर्णन- सोन्दर्य का (बन्थकार) विवेचन करता है-विवक्षित-इत्यादि कारिका के द्वारा। जहाँ अर्थात् जिसमे प्रकरण द्वारा अधिकृत वस्तु का किसी दूसरे अप्रस्तुत पदार्थ से साम्य अर्थात् साहृश्य होता है वह उपमा होती है, (विद्वान्) उसे उपमा रूप अलद्धार कहते है। अप्रस्तुत के साथ साहृश्य किस लिए प्रतिपादित किया जाता है, इमे बताते हैं-कि विवकित धर्म की मनोहारिता की तिद्धि के लिए। विवकित अर्थात् वर्णन के लिये अभिप्रेत जो यह परिस्पन्द अर्थात् कोई धर्मविरोष उसका जो मनोहारित्व अर्था् हृद्य को आनन्दित करने का भाव उसको सिद्धि अर्थात् निष्पत्ति (अथवा प्रतीति) के लिए अनस्तुत के साथ साम्य प्रतिपादित किया जाता है)। कैसे दूसरे पदार्थ के साथ-उसके उत्कर्ष से युक्त (पदार्थ के राथ)। 'उस' से यहाँ मनोहारिता का परामश होता है। उस (मनोहारिता) का उत्कर्ष अर्थात सातिरायता उसका उत्कष है, यह (उत्कर्ष) जिसमे विद्यमान हो उमे उस उत्कर्ष से युक्त कहा जायगा। उसी उत्कष युक्त अन्य मदार्थ के द्वारा (साम्य प्रतिपादित किया जाता है)। तो यहां इसका आशय यह है कि-वर्णनीय ( पदार्थ) के विवक्षित धर्म के सोन्दर्य की सिद्धि के लिये वर्णनीय पदार्थ का अथवा धर्मो का सादृश्य युक्िसद्गव होता है। धर्म के थाथ [साम्य) नही कहा गया है क्योकि (बिना धर्मो) के अकेले धर्म की स्थिति असम्भव होती है। तो इस प्रकार परिपामरूप में यह (साहृश्य का समाहार) धर्म के द्वारा उपमान एवं उपमेय रूप धमियो में पर्यवसित होता है। एवविधामुपमा क: प्रतिपादयतीत्याह-करियापदमित्यादि। क्रियापर्द धात्वर्थः। वाच्यवाचकसामान्यमान्नमन्नाभिप्रेतम् न पुनराख्यातपढ़मेव। यस्मादमुरुयभावेनापि यत्र क्रिया वतते तदप्युपभावाच कमेष। ...
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तृतीयोग्मेष: ३७१
तदेवमुभयरूपोऽ(पम)पि कियापरिस्पन्द ... तामुपमां वक्त्यमिधतते। कथम्-विच्छित्या, वैदग्धयभहया। विच्छित्तिविर हेणाभिधानेन तद्वि- दाहादकत्वं न सम्भवतीति भावः। इस प्रकार की उपमा का प्रतिपादन कोन करता है इसे बताते हैं- क्रियापदम् इत्यादि (कारिका के द्वारा)। करिया पद अर्थात् धात्वर्य। महां केवल वाच्यवाचक सामान्य मर्य हो अभीष्ट है केवल आस्यात पद अर्ष नहीं। इयोकि जहाँ क्रिया गोण रूप से भी रहती है वह ( किया पद) भी उपमा का वाचक हो होता है। इस प्रकार यह उभयरूप भी करिया का परिस्पन्द उस उपमा को प्रतिपादित करता है। (क्रिया वद) कैसे ( प्रदिपादित करता है) विष्छिति के द्वारा अर्थात मदग्ध्यपूर्ण भलतिमा के द्वारा। इसका आशय यह है कि विच्छिति से हीन प्रतिपादन के द्वारा सहृदयो की आह्लादकता सम्भुव नही। तावत् क्रियापदन केवलंतां बकि याबदू इचादि: इतप्रभृतिरपि। तत्ममर्पणसामर्थ्यसमन्वितो य. कन्विदेव शब्दविशेष: प्रत्यथोऽपि, समासो बहुलीसादि: विच्छित्या तां वक्तीत्यपिः ममुचये। कस्मिन् सति-साधारणघर्मोकी। साधारणः समानो यो साध्योप- मानोपमेययोरुभयोरुयायिनो: धर्मः .. । कुत्र-वाक्यार्थे वा। परस्परा. न्वयसम्बन्धेन पदसमूद्दो वाक्यम्। तदभिधेयं वस्तु घिभूष्यत्वेन विपयगोचर तस्याः। कथम्-यदन्वयात्। तदिति पदार्थपरामर्शः। तेषां पदार्थाना समन्वयाद् अन्योजन्यमभिसम्पद्त्वात्। वाक्ये बह्बः पदार्था: सम्भवन्ति, तत्र परस्पराभिसम्बन्धमाहात्म्यात्। और यहाँ तक कि केवल करिया पद ही उस समता का प्रतिपादन नही करता बल्कि इव आदि भी (करते हैं)। उस (साम्य को प्रतिपादित करने की सामर्थ्य से युक्त जो कोई भी शब्दविशेष, प्रत्यय या बहुबोहि आ्दि समास होने हैं सभी विच्छित्तिपूर्वक उस उपमा का प्रतिपादन करते है। इस प्रकार अपि शब्द का प्रयोग यहां समुच्चय अर्थ मे हुआ है। किस के उपस्थित होने पर (साम्य का प्रतिपादन करठे हैं) साधारण धर्म का कपन होने पर। साधारण अर्थात साध्य उपमान एवं उपमेय दोनों ही अनुयायियो का जो समान धर्म.(उसका कथन होने पर ?) कहा-वावपाये में। परसपर अन्वम रूप सम्बन्ध वाला होने के करण पदों का समूह वाकय होता है। उसके द्वारा प्रतिपाद्य पदार्थ अलसारम रूप से उस (उपमा) का निषय होता है। कैसे-उनका सम्बन्ध होने से। तत के द्वारा पदार्थ का परामर्थ होता है। उन पदार्थों का
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३७२ वकोकिजीवितम्
समन्वय होने से अर्थाद एक दूसरे से सम्बन्धित होने के कारण वाकय में बहुत से पदार्थ सम्भव होते है, उनमें परस्पर सम्बन्ध के प्रभाव से { इदादि अपवा क्रियापद उपमा का प्रतिपादन करते हैं।) तदेव तुल्येऽस्मिन् वस्तुसाम्ये सत्युपमोत्प्रेक्षावस्तुनो: पृथक्त्व मित्याह- तो इस प्रकार इस वस्तुसाम्य के समान होने पर (भी) उपमा एवं उत्प्रेक्षा की वस्तुएँ अलग अलग होती हैं इसे बताते हैं- उत्प्रेक्षावस्तुसाम्येऽपि तात्पर्यगोवरो मतः ॥ ३० ॥ नात्पर्य पदार्थेव्यतिरिकवृत्ति वाक्यार्थजीववतभूत वस्त्वन्तरमेव गोचरो विषयस्तद्विदामन्त प्रतिभास, यम्य। उत्प्रेक्षा की वम्तु अर्थात अप्रस्तुत और वाचक आदि की समानता होते हुए भी उपमा के प्रसद्ग में धर्म हो प्राधान्य प्राप्त करता है अर्थाद धर्मोपन्यास के द्वारा ही उपमा उत्प्रेक्षा से बिवित्त विषय हो जाती है। उत्परेक्षा मे समान धर्म को नहीं प्रस्तुत किया जाता। तात्पर्य अर्थात् पदो के अर्पों से भिन्न व्यापार वाला वानयार्थ का प्राणभूठ दूसरा तत्व हो गोचर अर्थात् विषय याने उसे जानने वाले सहृदयो के हृदप मे प्रतिभास होता है जिस घर्म का (वही धर्म उपमा को उत्पेक्षा से पृथक कर देता है)। [पाण्ट्ुलिपि की भ्रष्टता के कारण इन पंक्तियो का आशप सुस्पष्ट नही हो पाता ] अमुख्यकरियापद पदार्थोप मोदाहरण यथा- पूर्णेनदोस्तव मवादि बदनं बनजेक्षणे। पुष्णाति पुष्पच।पस्थ जगत्व्यजिगीपुताम्॥। १०६।। गोप कियापद पदार्थ की उपमा का उदाहरण जैमे- हे कमलो के सदृय नेत्रो वाली (प्रियतमे 1) पूर्ण चन्द्रमा के साथ साम्प रखने वाला तुम्हारा मुख पुष्पचाप (कामदेव) को तीनो लोकों मे जीवने की इच्छा को परिपुष्ट करता है॥ १०९॥
निपीयमानस्तबका शिलीमुखैः ॥ इत्यादि॥ ११०॥ इब आदि के द्वारा प्रतिपादित किये जाने वाले पदार्थ की उपमा का उदाहरण जैसे- (उदाहरणसर्या १।११९ पर पूर्वोदधृत) निषीयमानस्तबका चिलीमुसैः 11 इत्यादि दलोक ।। 1१०1
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आख्यात पढ प्रतिपाद्यपदार्थोपमोदाहरणं यधा- तनोऽरुणपरिस्पन्द्॥ इत्मदि ॥११॥ आस्यात पद के द्वारा प्रतिपाच पदार्थ की उपमा का तदाहरण जैसे- (उदाहरण संख्या १।१९ पर पूर्वोद्वृत) ततोडषन परिस्वन्द ॥ इत्यादि क्लोक ।। १ ११। तथाविधत्वाद्वाक्योपमोदाहरण यथा- मुखेन सा केनकपत्रपाण्डुना कृशाङ्गयष्टि' परिमेयभूषणा। स्थितान्पतारां तरुणीन्दुमण्डलां विभातकल्पां रजनी व्यडम्बयत् ।। ११२।। इत्यादि। उस प्रकार का होने से वाबयोपमा का उदाहरण जैसे- उस कृषासभलता वाली मोर सीमिव भूषणो वाली तर्पी ने अपने केवने की पंखुडियो की तरह पोले मुख के द्वारा थोड़े से बचे हुए तारो वाली, चन्द्रमन्ल वाली, प्रात्तप्राया रामि को तुलना प्रसतुत कर रही है ।। ११२।। हत्यादि। अप्रतिपादयपदार्थोदाहरणं यथा- चुम्बन्कपोलतलमुत्पुलकं प्रियाया:
आविर्मवन्मघुर निद्दमिवारविन्द-
अर्मतिपाद पदार्योदमा का उदाहरण जैसे- जिस सरह से चन्द्रमा के स्पर्य के कारण कमलिनी का कपर उठा हुआ और माती हुई मधुर नींद वाला अरविंद अस्तमित या स्तिमित हो उठता है उसी
१. डॉ. दे के दवारा पादरिप्पणियों में उपन्यस्त मातका में पाठ 'मिन्दरस्त' है। इन्होंने उसका रूप 'मित्रस्पृशास्त०' कर दिया है परन्तु 'भस्तमितना' या 'स्यिमितण' कमिनी में केवळ चन्द्र के ही स्पर्र से का सकती है सूर्य कै स्पर्श से तो बह मफुल् हो उठेगो न तो वह 'अस्तमित' दोगो और न 'लिनिमित'। अतः मैने यहाँ पर 'हन्दुसप्रा' पाठ अहन किया है। इसमें यहाँ पर कैवल ठकर की मात्रा बाल देने से माठका का पाठ युदध हो नायगा पूरा का पूरा पद नही सटना पढ़ेगा।
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३७४ वकोकिजोविवम्
तरहू प्रियतमा के रोमान्चिक कपोल का चुम्बन ऐते हुए नायक के सुम्बन स्पर्श के कारण उल्लसषित होते हुए उसके नेन को आनन्द निमीलित पर दिमा ॥ ११३॥
पाण्ड्योऽयम सापि तलम्बहार. कलृप्ताङ्गरामो हरिचन्दुनेन। आभाति पालातपर्कसानु: सर्निकरोद्वार इवाद्रिपजः।। ११४।। उस प्रकार की वाक्योपमा का उदाहृष्ण जैसे -- कन्धो पर धारण किए गये लम्बे हार माला एवं हरिचन्दन से शरीर पर किए गए लेप वाला यह पाभ्डुजनपद का राजा प्रात:कालिक धुप से लाल शिसरो वाले, एवं सरनो के प्रवाह से युक्त पर्वतराज (हिमालय) को तरह सुशोभित हो रहा है।। ११४॥ इन सभी उदाहरणों का विस्लेषण करने के लनन्तर इन्पकार कहता है कि- आदिमह्णादू इवादिव्यातरिव्तेनाि तथादिशन्दोत्तरे णोपमा- प्रतीतिरिति। 'आदि' शब्द का ग्रहण करने के कारण इवादि से भिन्न भी 'तपा' आदि दन्दो के द्वारा उपमा की प्रवीति होती है। पूर्जेन्दुकान्तिबदना नीलोत्पल विलोचना ।। ११४॥ पूर्ण चन्द्र की कान्ति के सहय कान्ति वाले मुख वाली एवं नील कमल के सदर नपनों वाली (सुन्दरी स्ी है) ॥ ११४॥ गा० के कहते है कि सम्भवताः यह मलोक समासोपमा का उदाहरम है। यान्त्या मुहुर्वलत कन्धरमाननं त. दावृत्तवृन्तशतपत्रनिभं वहन्त्या। दिग्घोऽमृतेन व विपेण च पद्मलाच्या गाढं निखात इष मे हृदये कटाक्ष: ।। ११६॥ मुे हुए इण्ठल वाले कमल के खहदा, बार बार मुडी हुई गर्दन बासे उस मुक को धारण करते हुए जाती हुई, घनी बरोनियो बाली जोखो वाली उस (नामिका) ने बिथ तथा अमृत से उपसिपि्त पटाक्ष को मेरे हुदय मे मानो सुर्ढ रप से गाड दिया है।। ११ ॥
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नृतीपोन्मष. ३७५
माक्िप्रीकृतपट्टसूत्रमहश पादानय पुञ्जयन् यात्यस्ताचलचुम्बिनी परिणति स्वरं अ्रहग्रामणीः ।
श्रीणज्योतिरितोऽप्यय स भगवानर्णोनिधो मज्जति ॥११७।। मंजीठ के रग के बना दिए गए हुए पट्ट सूत् के सदश अपनी किरणो को बटोरता हुआ ग्रहो के समूह का नामक (सूर्य) अस्तगिरि का स्पर्श करने वाली परिवृत्ति को स्वेच्छया प्राप्त कर रहा है। बवण्टर के देग से घुमाए गए कमल के पराग के द्वारा क्षण भर को छत्र सा धारण करते हुए क्षीणज्योति होकर यह वे भगवान सूर्य सागर मे दूबे जा रहे हैं। ११७।। रामेण मुग्धमनमा वृपलाब्दनस्य यज्जर्जरं धनुरभाजि मृणालभल्लम्। तेनाडमुना त्रिजगदपिनकीर्तिभारो रक्ष पतिनंनु मनाङ न विडम्बितोऽभूत्॥११-॥ भोले चित वाले राम ने वृषभकेतन शिव के जर्जर धनुष को जो भृणाल तोडने के तुल्य (अनायास) तोड डाला उसकी वजह से तीनों लोको मे अपनो कीति के बोक्ष को समर्पित करने वाला राक्षसराज रावण इन राम के द्वारा क्या पोडा भी कदचित नहीं हुआ ?।। ११=। महीभृतः पुत्रवतोपि दृष्टिस्तस्मिन्नपत्ये न जगाम तृतीम्। अनन्तपुपस्थ मधोति चूते द्विरफमाला सविशेषसङ्गा ॥।१६।। अनेक पुत्रो तथा पुत्रियों वाले उस पर्वत (हिमालय) की भी दृष्टि उस सन्तान (पार्वती) मे तृप्त नहीं हुई (अर्यात हिमालय की हुष्टि हमेशा उसी पर लगी रहती थी) जैसे कि असड्स्य फूलो याले वसन्त की स्रमरपङक्ति आम्र- मन्जरियों मे विशेष रूप से आसक्त रहती है॥ ११९॥ ऊपर के उद्धरणो मे अन्तिम उद्धरण 'महीभृतः इत्पादि' मे कुन्तक अर्यान्तरन्यास की ्रान्ति को स्वीकार करते हैं। इसके बाद दो अन्य श्लोक - इत्याकणितकालनेमिवचनो आदि।। तपा इतीदभाकर्ष्य तपस्विकन्या .आदि ॥ को भी कुन्तक उद्घृत करते हैं परन्नु पाण्डुलिपि के भ्रष्ट होने के कारण इन्हें पूर्णरूपेण उदभृत कर पाना कठिन या। इसी लिए इन शलोकों को मैंने नहीं उद्भृत किया। इसके वाद कुम्नक इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि कया 'प्रतिवस्ूपमा मलदूार' को मलग से एक अलस्ार स्वीकार करना आवश्यक है अथवा उपमा में ही उसका अन्तर्भाव हो जायगा। कहते हैं-
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३७६ पकोबितजी वितम्
समानवस्तुन्यामोपनिबन्धना प्रतिवस्तूपमापि न प्रथग वक्तयता मरहति, पूर्वोदा= रणेनैव समानयोगच्ेमस्वात्। [ भामह के अनुसार ] समान वस्तु विन्यास के हेतु वाली प्रतिवस्तूपमा भी अलग (स्वतत्त् मलद्वार रूद से) कही जाने योम्म नही है। पूर्व उदाहरण के समान ही योगभेम वाली होने के कारण।
समानवस्तुन्यासेन प्रतिवस्तूपमोच्यते। यथेव्वानमधानेऽपि गुणसाभ्यप्रतीतितः ॥ १२०।। समान वस्तु के विन्यास के द्वारा गुणो के सादृश्य की प्रवीति होने के कारण, 'यथा' तथा 'इब' का कथन न होने पर भी प्रतिवस्तूपमा (अलद्धार) कहा जाता है॥। २० ॥ साधु साधारणत्वादिगुणोडत्र व्यतिरिच्यते । स साम्यमापाद्यति विरोधेऽपि तयोर्यथा॥। १२१॥ यहां (उपमान तथा उपमेय के) साधुत्व एव साधारणत्वादि गुण भिन्न होते हैं, तपा उन दोनों का विरोध होने पर भी वह (प्रतिवस्तूपमा अलङ्गार) समानता की प्रतीति कराता है। जैसे- कियन्तः सन्ति गुणिन: साघुसाधारणध्ियः। स्वादुपाकफलानम्रा कियन्ता घाध्यशाखिनः॥ १२२॥। साषुओं में सामान्य रूप से पाई जाते वाली श्री वाले कितने गुणी लोग हैं? अपवा स्वादिष्ट पके हुए फसो से सुके हुए मार्ग मे स्थित वृक्ष कितने हैं ?- मर्यात् बहुत कम है। २२२ ।। अत्र समानविलसितानामुभयेषामपि कविविवक्षित विरलत्वलक्षण साम्यव्यतिरेकि न किश्जित्न्यन्मनोहारि जीवितमतिरच्यमानमुपलभ्यते। [इसक विषय मे कुन्तक का कहना है कि] यहाँ समान सोन्दर्य वाले (मुजियों तथा वुझो) दोनों का हो, कवि के वर्णन के लिये अभिप्रेत 'विरलता' रूप साहृश्य से भिन्न कोई दूसरा ममोहर एष उत्कर्षयुक्त सत्व नही दिसाई पडता है। इसक अनन्तर कुन्तक उसी प्रकार 'उपमेपोपमा' तथा 'तुल्यमोगिता' के भी मनग अदार नहीं स्वीकार करते। अदि तु उनका भी अन्तर्भाव उपमा मे ही कर देसे हैं। वे कहते हैं- नदेवं प्रतिवस्तूपमायाः प्रतीयमानोपमायामन्तर्भाषोपपत्तौ सत्या- मिदानीमुप मेयोपमादेरुपमायामन्तर्भावो विचार्यते-
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तृवोमोन्मेष. ३७७
तो इस प्रकार प्रतिवस्तूपमा (अलद्वार) का प्रतीयमानोपमा मे अन्तर्भाव सचृत हो जानेपर यब (ग्रन्थकार) उपमेयोपमा आदि का उपमा मे अन्तर्भाव करने का विवेचन करते है- सामान्या, न व्यतिरिक्ता, लक्षणानन्यथास्थितेः ॥ ३१॥ (उपमेपोपमा ) सामान्य (उपमा ही) है, उससे भिन्न नही, लक्षण की अतिरिक्त रूप मे स्थिति (सम्भद) न होने के कारण । ३१ ॥ तत्स्वरूपाभिधानं लक्षण, तस्यानन्यथास्थिते. अतिरिक्त्भावेन नाव स्थानात् । उसके स्वरूप का प्रतिपादन लक्षण होता है। उस लक्षण की अन्यथा स्थिति न होने से अर्थात् अतिरिक्त रूप से स्थिति न होने के कारण (उपमेयोपमा सामान्य उपमा ही है उससे भिन्न नहीं) (क्योकि यहाँ केवल उपमान उपमेय बन जाता है और उपमेय उपमान ।) इसके अनन्तर कुन्तक तुल्ययोगिता अलद्वार को भी उपभा मे ही अन्तर्भूद करते हैं। वे कहते हैं कि तुल्यमोगिता भी स्पष्ट रूप से उपमा हो जाती है- सा भवत्युपमिति: स्फुटम्। क्यों कि दो पदार्षों में समानता का आधिकय ही तो रहता है जिनमे से हर एक मुख्य रूप से वर्णनीय पदार्थ होता है। मतः उपमा का लक्षण इसमें पू्णतया घरित हो जाता है। इसलिए इसे उससे अलग अलक्वार स्वीकार करना उचित नहीं। तुल्यमोगिता के उदाहरण रूप मे कुन्तक अधोलिित शलोको को उदधृत करते हैं- (तुल्ययोगिताया उदाहरणे ) जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्यभूतामभिनन्दसत्वी। नृपोऽ्भि का मादधिरुप्रदश्च ॥१२३।। गुरु के दावव्य से अतिरिक्त (धन) के प्रति अनिच्छुक याचक (कौरस) तपा माचक के मनोरय से अधिक प्रदान करने वाले राजा (रघु) वे दोनों ही अयोध्यावासी लोगो के लिए प्रपसनीय प्राणी हो गए (अथवा स्तुत्य व्यापार वाले सिद्ध हुये) ॥ १२३॥ (यथा घ) उभौ यदि व्योम्नि पृथक्प्वाहावाकाशगद्गा पयसः पतेताम्। सेनोपमीयेत तमालनीलमामुक्तमुक्कालतमस्य वक्षः।।१२४।।
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२७८ पकोकिजीविसम्
अथवा जैसे- यदि आकारगगा के जल की दोनो धारायें अलग अलग आकाश से गिरे सो उससे तमाल के सदर नीला एवं लटकते हुए मुक्ताहार वाले इन (कृष्ण) के यक्षस्पल के तुलना की जा सकेगी ॥ १२४॥ इसी प्रसङ्ग मे कुन्तक भामह के तुल्ययोगिता अलद्धार के लक्षण तथा उदाहूरण को उद्धृत करते हैं जो इस प्रकार है- न्यूनस्यापि विशिष्टेन गुणसाम्यविवक्षया। तुल्यकार्येक्रियायोगादित्युक्ता तुल्ययोगिता ।। १२४।। गुण की समता को प्रस्तुत करने की इच्छा से तुल्य कार्य ओर क्रिया के योगवश न्यून का विशिष्ट के साथ जहां तुल्फत्व दिखाया जाता है उसे तुल्य- योगिता कहते हैं॥ १२५ ॥। शेपो हिमगिरिस्त्वं च महान्तो गुरबः स्थिरा: ! यदलद्वितमर्यादशश्चलन्ती विभूथ क्षितिम् ॥१२६॥। पैसे- (कोई किसी राजा को प्रशछ्ा करते हुए कहता है कि हे राजन् ।) देषनाग, हिमबान पर्षत त्मा तुम, महान् गुद एवं स्पिर हो जो कि बिना मर्यादा का अतिकमण किए इस चलती हुई (अस्पिर) पृथ्वी को धारण कर रहे हो॥। १२६ ।। पकलक्षणे ताबदुपमान्तर्भावस्तुल्ययोगितायाः। [ कुन्तक का कथन है कि] उक्त लक्षण के आधार पर तो तुल्ययोगिता का उपमा मे ही अन्तर्भाव हो जाता है। इसी प्रकार कुन्तक 'अनन्वय' अलद्धार को भी अलग मानने के लिये तैयार नहों। उनका कपन है कि अनन्यम में केवल उपमान ही तो काल्पनिक होता है। किन्तु सारी बासें तो खपमा की ही होती हैं। अतः कथन के विभिन्न प्रकार हो सकते हैं, पर लक्षण के विभिन्न प्रकार करना ठीक नही। इस लिए अनग्डम में भी उपमा का ही लक्षण घटित होने से उसे उपमा ही समसना चाहिए। अनन्यय का उदाहुरण जो कुन्तक ने दिया है वह इस प्रकार है- (अनन्वयोदाहरणं यथा) तत्पूर्षानुभवे भवन्ति लघयो भावा शशाङ्कादय- स्तद्वपत्रोपमिसे: परं परिणमेम्ेतो रसायाम्ु जातू।
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तृतीपोन्मेव: ३७९
एवं निञ्चितुते मनस्तव मुख सौन्दर्यसारावधि। बधाति व्यवसायमेतुमुपमोत्कफ स्वकान्त्या स्वयम्॥। १२७ ।। (अनन्वय का उदाहरण जैसे-) उसका पहले अनुभव हो जाने पर बन्द्र आदि बहुत ही छोटी-छोटी चोजें मालूम पडती है। उसके मुख के उपमान कमल से (भी) आनन्दग्रहण करने के लिए गया हुआ चित्त एकदम लौट आता है। इस वरह मेरा मन यह निश्चय करता है कि तुम्हारा रमगीमता के सार की सीमा रूप मुख अपनी उपमा के उत्कर्ष को अपनी ही कान्ति से सन्तुलनीय निश्चित करने के लिए स्वयं सिंद्ध हो जाता है॥ १२७॥ तदेव मभिधावैचित्रयप्रकाराणामेवविध वैश्वरूप्यम्, न पुनर्लक्षण- भेदानाम्। [इसके विषय मे कुन्तक कहते हैं कि] तो इस प्रकार उक्तिवैचिश्य के प्रकारों की अपह्यरूपता की यह (वैश्वरूयता) है न कि लक्षण के प्रकारों की। इसके वाद कुन्तक भामह के अनन्बय के लक्षण और उदाहरण को प्रस्तुत करते हैं जो इस प्रकार हैं- यत्र तेनैव सस्य स्यादुपमानोपमेयता। असाहश्य विवक्षातस्तमित्याहुरनम्वयम् ॥। १२८।। जहाँ (किसी के) स्राहृय्य के अभाव का प्रतिपाटन करने की इन्छा से उसकी उसी के साथ उपमनता एव उपमेयता (दोनो) होती है उसे विदानो ने मनन्वय (अलङ्गार) कहा है॥ १२८।। ताम्बूलरागवलयं स्फुरद्दशनदीघिति। इन्दीवराभनयनं तदेव वदनं तब।। १२६ ।। जक्षे- पान की ललाई के मण्डल वाला, एवं चमकते हुए दातों की किरणो वाल तथा कमल के समान नवनों वाला तुम्हारा मुख तुम्हारे (मुख) के ही सहय है। इस प्रकार भामह के अनन्वय के लक्षण और उदाहरण को उद्ववत कर कुन्तक ने उसकी क्या आलोचना की है। उसका क्या खण्डन प्रस्तुत कर उसे उपमा मे अन्तर्भृत किया है। पाष्युलिषि के अत्यन्त भ्रष्ट होने के कारण पढे न जा सकने से उसके विषय मे कुछ भी नहीं कहा जा सकता।। १२९॥ टिप्पणी-यहाँ पाण्डुलिपि की भ्रष्टता के कारण ड० देने अपनी Resume मे भी पाठको इस प्रकार प्रस्तुव किया है जो कि अत्यन्त भ्रामक प्रतीत होता है। पहचे
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उन्होने तुल्ययोगिता का लक्षण उदाहरण दिना फिर उखके बाद बनन्वर का उदाहरण देकर फिर आगे भामह के तुत्ययोगिता के उदहरप और लक्षन को प्रस्तुव कर उसके खण्डन का प्रसद्ध चला दिया। तथा उसके बाद दुरन्त निदर्शन अरद्वार की चर्चा कर दो श्लोको को वदाहरण रूप मे उदत किया फिर आगे भामह के अनन्वय अलकार के लक्षण एव उदाहरण को प्रस्तुत करने लगे। उसके बाद पुन परिदृति अनद्दार को बीच में डाल कर आये फिर नामह के निदर्शना अलद्दार के लक्षम और उदाहरण को प्रस्तुत किया। इस प्रकार पाठक्रम कुछ इतना भरामक एवं जटिन हो गया है जिसमे कि सरन्थ को समझने मे और भी कहिनाई उपस्थित हो जाती है। जत मैंने जहाँ तर सग्भव हो सका है एक अलकार विषयक चर्चा को एक ही स्पान पर रखने का प्रवास किया है। इस प्रकार अनन्वय को भी उपमा से अलग अलवार न स्वौकार कर कुन्तक निद्दान को भौ इसी वरह उपमा मे ही अन्तर्भूत करते हैं वे कहते है कि 'निदर्शना भी लगभग इसी प्रकार होतो है।' निदर्श नमप्येव मायमेव। इसके बाद वे उसके उदाहरण रूप में निम्न इलोको को उदवृव कर उनका विवेचन करते हैं। वे श्लोक हैं- यैर्बा टष्टा न वा टृष्ट मुपिवा: सममेव ते। दस हृदयमेतेषामन्येषां चक्षुप, फलम्।। १३०।। जिन्होंने (उस सुन्दरी को) देखा अथवा (जिन्होंने) नहीं दैसा, वे सब साप ही ठगे गए ( क्योकि) इन (देखनेवालों) का हुदय पुरा लिया गया एवं दूसरो के नयनो का फल पूरा लिया गया अर्पाद न देखने से उनकी आंसों का होना ही निष्फल रहा) । १३०॥ (यथा या) यत्काव्यार्थनिरूपणं गियकधालापा रहोवस्थिति।
*I। १३१ 11 अपवा जैसे-काव्यार्य का प्रतिरादन, प्रिय की क्या वार्ता, एकान्त निवास, रष्ट तक हो सोमित रहनेवाला मनोहूर गीठ, प्रिय मित्र के सुख का कथन॥३I॥ (पया षा) सद्वल्गुना युगपदुन्मिपितेन वाघन् सध: परस्परतुलामधिरोहतां दे।
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दृतीयोन्मेष:
प्रस्पन्दमानपरुपेतरतारमन्त- श्क्षुस्तव प्रश्वलितभ्रमरं च पम्मम् ।१३२।। अथवा जैसे-उस (लक्ष्मी के परिग्रहण) से मनोहर तथा साथ ही उन्मी- लित होने के कारण, भीतर स्फुरित होती हुई स्निग्ध कनीनिका वाले तुम्हारे नेत्र तथा चं्चल भ्रमरों वाले कमल दोनो हो एक दूसरे के सादृश्य को प्राप्त करें। (अतः आंखें खोले) । १३२ ॥ इसके बाद एक अन्य श्लोक भी उद्घृत है जो कि पढ़ा नहीं जा सका उसकी आदि की डतियाँ है- हेलावभग्रहरकार्मुक एप सोऽपि। इत्यादि इसके बाद जैसा कि मैंने ऊपर संकेत किया है ४० हे ने बीच मे परिवृत्ति सलकार का विवेचन देकर आगे पुन भामहकृत निदर्शन के लक्षण एवं उदाहरण को प्रस्तुत किया है। उस उदाहरण एवं लक्षण के प्रसङ्ग को हम इसी अवसर पर उदवृत कर देते हैं। वह इस प्रकार है- क्रिययैव विशिष्टस्य तदर्थस्योपदर्शनात्। ज्या निदर्शना नाम यथेववतिमिर्बिना।।१३३।। यथा, इब और वति आदि के बिना जहाँ पर क्रिया के द्वारा ही उस विशिष्ट अर्थ का निदशन कराचा जाता है उसे निदशना कहते हैं। १३३ ॥ श्रयं मन्दद्युतिर्भास्वानस्त प्रति यियासति। उद्य: पतनायेति श्रीमतो बोषयन्नरान्॥ १३४॥ समृद्धिशाली लोगो को यह समसाता हुआ कि उदय पतन की ओर ले जाता है, फोको आभा वाला यह सूर्य, अहताचल की ओर जा रहा है॥। १३४।। इसी प्रसंग में कुन्तक ने 'रघुवन' के दो ब्लोक उदवृत किए हैं जो इस प्रकार है। ततः प्रतस्थे कौबेरी भास्वानिव रघुर्दिशम्। शररस्त्रैरिवोदीच्यादुद्वरिध्यन् रसानिव॥। १३५।। इसके अनन्तर राजा रघु ने किरणो के समान बाणों से जलो के सददा उदीच्य राजाओं को उन्मूलित (या शोषित) करने की इच्छा से सूर्य की भांति करवेर सम्बन्धी (सत्तर) दिय्या की ओर प्रस्थान किया ॥ १३४॥ निर्याय विद्याथ दिनादिरग्याद्विम्बादिवार्कस्य मुखान्मह्षे:। पार्याननं वहिकणावदावा दीप्षि: स्फुरत्पद्मिवाभिपेदे ॥१३६।।
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३६२ पकोक्िजीवितम्
इसके बाद प्रातःफालिक सुग्दर सूर्यमण्डल के समान महर्षि (व्यास) के मुख से निकलकर आग के स्फुलिसो के सहय उज्जवल (ऐन्द्रमन्नरूप) विद्या सूर्य किरण को भांति विकसित होते हुए कमल के सददा अर्जुन के मुख मे प्रदिष्ट हो गई ॥ १३६॥ इस प्रकार निदरशन अर्लकार का विबेचन समाप्त कर कुन्तक परिदृति अलकार का विवेधन करते हैं। वे परिदुति अलकार को भी उपमा का ही एक प्रकार समझते हैं। क्योकि इस अलंकार मे दो पदार्थों में से प्रत्येक का प्रधान रूप से पर्णन किया जाता है तथा सादृश्य प्रतीति स्पष्ट रहती है। अतः उपमा ही स्यीकार करना उचित होगा वे विवेचन प्रारम्भ करते है- परिवृत्तिस्प्यनेन न्यायेन पृथड्नास्तीति निरूप्यने । परिवृति (मलद्धार) भी इसी प्रकार अलग (स्वतन्) नही हो सकती इसका निरूपण करते हैं- विनिवर्तनमेकस्य यत्तदन्यस्य चर्तनम्। न परिवर्तमानत्वादुभयोरत्र पूर्वचत् ॥। ३२ ।। जो एक का हटाना तमा उससे भिन्न का प्रयोग करना (रूप परिवृति) है दोनों के ही परिवर्तमरन होने के कारण (मुख्य रूप से प्रतिपादित होने के कारण) यहाँ भी पहले की ही भाति (अलङ्ारत्व नही हो सकता) ।। ३२।।
कस्य पदार्थस्य विनिवर्तनम् अपसारण तदन्यस्य तद्व्यतिरिक्तस्य परस्य वर्तनं तदुपनिबन्धनम्। तदलहरण न भवति। कस्मान्-उभयो: परिवर्तमानत्वात् सुर्येनाभिषीयमानत्वात्। कथम-पूर्ववत्, यथापूर्यम्। प्रत्येकं प्राधान्यान्नियमानिश्चितेश्र न कचित्कस्यचिंदलट्करणम्। तद्व- दिहापि न घ ताघन्मात्रूपतया तयो: परस्परविभूषणभावः पाधान्ये निर्वर्तनप्रसद्वान्। रूपान्तरनिरोधेपु पुनः साम्यसद्भावे भवत्युपमिति रेपा चालस्कृति: समुचिता। उपमा पूर्ववदेव। सो इस प्रकार 'परिवृति' की अलद्वारता भी उचित नही है इसी बास को प्र्वकार कहता है-विनिवर्वनमित्यादि (कारिका के द्वारा)। जो एक पदार्थ का दिनिवर्तन अर्थात् हटाना (अपसारण) तथा उससे भिन्न दूसरे का वर्तन वर्यात उसका प्रयोग है। यह ललद्वार नहीं होता। किस कारण से-दोनों के परि- वर्वमान होने के कारण मुख्य रूप से प्रतिपाद होने के कारण। केसे-पहसे की
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तृतीयोन्मेष ३८३
भाति, जैसे पहले (उपमेयोपमा अनन्यय आदि का अलस्दारत्व नहीं हुआ) प्रत्येक के प्रधानं होने के कारण तथा नियम का निश्चय न होने से (कोई) कही किसी का अलद्वार नही होता। उसी प्रकार यहाँ पर भी उन दोनों का सतने हो स्वरूप के कारण परस्पर अलद्वारभाव नहीं होगा। कयोकि निवृति प्राधान्य मे ही प्रयुक्त होती है। रूपान्तर के निरुद्ध हो जाने पर फिर भी साम्ब का सन्भाव होने पर यह उपमिति ही उपयुक्त अलकार होगी। उपमा पहले को सरह ही रहेगी। यथा- सदय वुभुजे महाभुज महसोद्रेगमिय ब्रज्ञेदिति। आचि रोपनतां स मेदिनी नवपाणिग्रहणां बधूमिष ।। १३७।। बलास्कार से (कहौं) यह डर न जाय इसलिए दीर्घ बाहुओ वाले (राजा मज) ने तत्काल (नवीन रूप से) प्राप्त हुई पृपिवी का नर्वविवाहिता वधू के समान कृपापूर्वक भोग किया था ॥ १३७।। इसके बाद कुन्तक परिवृति के कुछ प्रकारो का भी भेद निरूपण करते हैं जैसे एक प्रकार की परिवृत्ति वहाँ होती है जहाँ 'विषयान्तरपरिवर्तन' होता है तथा दूसरी परिवृत्ति वहां होती है जहाँ धर्मान्तरपरि्तन' होता है। उनमे- विषयान्तरपरिवर्तनोदाहरणं यथा-, स्वल्पं जल्प बृहस्पते ! सुरगुरो ! नैपा सभा वग्रिणः॥१३=l। (विषयान्तर परिवर्तन का उदाहरण जैसे)- हे देवगुर वृहस्पति योडा बोलो, यह इन्द्र की सभा नहीं है॥ १३६ ॥ (धर्मान्तरपरिवर्तनोदाहरण यथा-) विसृष्टरागादधारान्निवर्तिवः स्वनाङरागारुणिताच कन्दुकात्। कुशाङ्कुरादानपरिक्षताङ्गुलि कृतोऽसूत्रप्रणयी तया कर ॥१३६॥। (धर्मान्तर-परिवर्तन का उदाहरण जैसे)- उस (पार्वती) ने रक्तिमा का परित्याग कर देने वाले मधर से तथा स्तनो के अङ्गराग (लेपन द्रव्य) से लाल हो गये गेद से हटाये गये हाथ को दर्भाङ्दुरो के उसाडने के कारण परिक्षत हो गई अङ्गलियों याला तथा अक्षमाला का सहचर बना दिया।। १३९॥ अन्न गौर्या: करकमललक्षणो धर्मः परिवर्तितः। यहां पार्थती का करकमल रूप धर्म परिवर्वित कर दिया है।
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१८४ मनोरिपी मितम्
कचिदेकस्यैव धर्मिण' समुचितस्वसंवेदिधर्मावकाशे धर्मान्तरं परि- घतते। यथा- कहीं एक ही भर्मी के अनुरूप एवं अपने द्वारा अनुभव किए जाने वाले धर्म के हट जाने पर दूसरा धर्म परिवर्तित हो जाता है। जैसे- धृतं त्वया वार्द्धकशोभि बल्कलम्॥ १४० ॥ (युवावस्था मे ही पयो) तुमने वुढावस्था मे सुन्दर लगने वाले वल्कल को धारण कर लिया है॥ १४० ॥ काचद् बहूनामपि धर्मिणां परस्परस्पर्धिनां पूर्वोक्ता: सर्व विपरि- बनने। तथा च लक्षणकारेणात्रिशेदानरणं दर्शितम यथा- व ही परिस्वर्धा करने वाले बहुत से भी धमियो पूर्वोक्त (धर्म विषय आदि) सभी परिवतित हो जाते है। जेसा कि लक्षणकार (दण्डी) ने इस विषय में वदाहरल प्रद्शित किया है, जैमे- शस्त्रप्रहारं ददना भुजन तव भूगुजाम्। चिरार्जितं हृत नेषा यश कुमुदपाण्डुरम्॥ १४१॥ (कोई राजा की प्रशसा करते हुए कहता है कि हे राजन्) शस्त प्रहार देने वाली (करने वाली) तुम्हारी बाह ने उन राजाओ के निरकाल से अजित उज्ज्वल कमल के समान उब्ज्वल कीति का अपहुरण कर लिया॥। ४१॥ इस प्रसङ्ग में कुन्तक 'रघुवश' से अधोलिखित इलोक को उद्धुत करते हैं- निदिश्ं कुल्पतिना त पर्णशालामध्यास्य प्रयतपरिमहद्वितीय:। ताच्छ्िप्याध्ययननिवेदितावसानां सविष्ट: कुशशयने निशा निनाय।। कुलपति पशिष्ट द्वारा निदिषि को गई पर्णशाला मे स्पित होकर मेवल अपनी पत्नी के साथ कुशो की दाम्या पर सोते हुए उस (राजा दिलीप) ने उन (वशिषठ) के शिप्यो के अध्ययन से सूचित की गई समाप्ति वाली राति को व्यतीत दिया॥ १४२॥ इसका विवेचन करते हुए कुन्तक कहते हैं कि यहां परिवर्तनीय पदार्पान्तर प्रतोयमान है।
इसके अनन्तर कुन्तक ने अत्यन्त महत्वपूर्ण श्लेप अलद्वार का विवेचन प्रस्तुत किया है किन्तु पाण्दुलिपि इसस्पल पर बहुत ही भ्रष्ट, अपूर्ण एवं पूर्णतया अस्पष्ट है जिससे कि न तो उसे उद्धृत ही किया जा सकता है और न उसका भपूरा दुर्वोध ही वर्णन प्रस्तुत किया जा सकता है। जैसा स• के ने सद्ेत किया है
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तृतीयोन्मेष. ३८५
कुन्तक ने इलेप अलदार को तीन प्रकारो मे विभक्क किया है, पद्पि उन तीनों प्रकारो का सही सही नामकरण या उनकी विशेपताओ को बता सकना असम्भव है। डा० डे के अनुसार कुन्तक ने सम्भवत उल्ट का अनुसरण किया हे नचा इलेवालदवार को अर्थ, शब्द एवं शब्दार्थ से सम्बन्धित कर तीन भेद किए है। उनमे मे पहले भेद ( अर्थश्नेय) का उदाहरण है-
विच्छित्या हृदयेऽभिजातमनसामन्त. किमप्युल्लिसत्। आरूढ रतवासनापरिणते काठठा कवानां परं कान्तानाज् चिलोकित विजयते वैदग्ध्यवक्रं वच।। १४३।। कवियो की अपने आकून को अभिव्यक्त कर देने मे निपुण माधुर्य को आनन्दरदामिनी रचना वाली रमणीयता के कारण रस की वासना से परिषक सुक्कुमारमति सहदयों के हुदय के भौतर एक वनिवषनीय छाप छोड देने वाली. सर्माद्ा पर सिंयित विदग्धना के कारण वक्रतासम्पन्न वाणी और रमणियों की अपने मनोवाम्कित को व्यक्त कर देने मे सक्षम मिठास भरे निमीलन के चिह्न वाली भंगिमा से रसिकचित लोगो के अभिलाय और वासना के कारण परिपक हृदम मे जाने क्या अंकित कर देती हुई ऊपर की ओर उडी हुई और चतुराई के कारण वाको लाजवाब चितवन सर्वातियायिती है॥ १४३॥ वलेष के दूसरे प्रकार (शब्दरनेष) का उदाहरण इस प्रकार है- येन ध्वस्तमनोभवेन बलिजित्काय, पुपस्रीकृनो
यस्याह: शशिमच्द्विरोहर इति स्तुत्यक्व नामामरा" पायात्स स्वयमन्घकक्षयकरसत्वां मर्वदोमाघव: ॥१४४॥ ( शिवपक्ष मे) कामदेव को ध्वस्त (भरम) कर देने वाले जिन्होंने र्बाल को जीतने वाले (वामताववार भगवान्) विप्यु के घरीर को पहले (त्रिपुरदाह के समय ) वस्त्र (बाण) बनाया था और जो सुजङ्गो के ही हार एवं कडण को धारण किये हुए हैं और जिन्होने गन्ना को (अपनी जटाओ मे धारण किया था तथा देवताओ ने जिनका स्तुत्य नाम 'हर' और 'दशि- मष्छिर' (चन्द्रभा से युक्त शिरवाला) बताया है, ऐसे वे अन्धकासुर का विनाश करने वाले उमापति भगवान् शक्ूर हमेशा स्वयं ही तुम्हारो रक्षा करें। (बिप्णुपस्ष मे) जिन अजन्मा ने शकटासुर को ध्वस्त किया था । वमा बलि को जौतने वाले मपने दरीर को पहले (सागरमन्यन के समय) सत्री (मोहिनीरूप) बना दिया था, और जो दुछ्ट (कालिय) नाग का वध करने
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वकोफिजीवितम् वाले हैं तथा जो रद अर्थात् शब्दो के लयस्थान हैं और जिन्होंने (गोवर्धन) पर्वत और पृथ्वी को (वराहावनाररूप में) धारण किया था, तपा देवताओं ने जिनका स्तुत्य नाम 'धशिमच्छिरोहर' (वर्पात् राट्ग का सिरचेर करने वाला बताया है ऐम सब कुछ प्रदान करने वालै, एवं स्वयं यादवो का निवास (द्वारका) बनाने वाले अपवा विनाश करने वाले लामीपति भगवान् दिप्लु स्वय तुम्हारी रक्षा करे॥ १४४॥ इलेष के तीसरे प्रकार (उभयर्लेष) का उदाहरण है- मानामुत्यनकन्दलै: प्रतिक्च स्वायोजिनां बिभ्वनी नेत्रेणानमहाष्टरपातसुभगेनोद्दोपयन्ती स्मरम्। काइडीटा मनिबद्धभद्ि नधती व्यसश्वित बासमा मर्ति. दामरिपा मिताम्बरघरा पायाच कामारेन।। ४५ निकल गए हुए मासवाले मुण्डदलो के द्वारा बालों की ओर मे अपने द्वारा गुम्फित माला को धारद करती हुई, विषम दृष्टि के डालने के कारण मुन्दर ूर्य के समान तोसरो आख के द्वारा कामदेव को जनती हुई वस्न के बिना सपे को घुर्मचयो को माला से कस कर बधो हुई कुटिलता वाले ढङ्ग से धारण करती हुई भहम और अम्बर को धारण करने वाली कामारि भगवान् शिव की मूति नीलकमल के मृणालो से बालो के जूढे की ओर सुन्दर बद्ग मे आयोजित माला को धारण करती हुई और अपने क्टाक्षो के निपात के कारण सुन्दर नेत्र से काम को उद्दीप्त करती हुई, लटरते हुए अधोवस्र से रशना की जजीर से बनी हुई विष्छिति को धारण करती हुई श्वेतवस्रधारिणो रति देवी की रक्षा करे ॥१४X। इसके अनन्तर कुन्तक ने अधोलिखित दलोरु को 'अव्त्यमूनश्लेय' के उदाहरण रूप मे उददृत किया है- दष्ट्या केशत ! गोपरावहृतया किज्िल टष्ट मया नेनात्र स्खलितास्मि नाथ ! पतितां किन्नाम नालवबसे। एकस्तवं विपमेपुखिन्नमनसं सर्वावलानं गति- र्नोष्येव गदित मलेशमवतादू गोष्ठे हर्रिवशचिरम्॥२४६॥ ऐ केशव ! गोपेश्वर दृष्ण के प्रेम के वारण अपहृत कर लो गई हुई दृष्टि के द्वारा में कुछ न देख सकी, इसी वजह से मैं रखलित हो उठी हूँ। ए स्वामी भगवान कृष्ण मुक्ष पव्ित को कयो नहीं सहारा देते, अबेले तुम्ही तो खिन्न- हुदय सारे निर्धलो की विषमावस्था में गति हो, गोपी के द्वारा आकूजभरे उत्त से इस प्रकार कहे गए हुए भगवान् विष्णु अनन्तकाल तर तुम्हारी रक्षा क्रें (इलेश पक्ष मे- गोपरागहुतमा का अर्थ गोपूति से छोन सी गई हुई दृषटि से है
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सृवीयोन्मेष ३८७
और स्खलिविता का विछल पडी हुई, प्तिता का गिर पडी हुई ओर, सर्वाबलाना का सारी स्निरियो के लिए, अर्थ लिया जायगा।) ॥ १४६॥ डा० डे के अनुसार सम्भवत 'असत्यभून श्लेप' यहाँ गोपराग शब्द मे है क्योंकि 'गो पराग. एक वास्तविक पदार्थ नही है अपितु काल्पनिक है। इस प्रकार इलेष अलद्धार का विवेवन करने के अनन्तर कुन्तरु व्यतिरेक मलद्कार का विवेचन प्रस्तुत करते है- सति तच्छद्दवाच्यत्वे धमसाम्येऽन्यथास्थितेः। पस्तुतोत्कर्प,स द्ये ।। ३३ ॥ शाब्द: अतीयमानो वा व्यतिरेकोऽभिधोयते॥ ३॥ इ्लेषहेतुक शब्दवाच्य होने पर और धर्म साम्य के हुंने पर उपमान से प्रस्तुत के उत्कर्ष की सिद्धि के लिए अथवा उपमेय अर्यान प्रस्तुत से उपमान के उत्कर्ष की सिद्धि के लिए और तरह से स्थति प्राप्त करने वाले ( उपमान या उपमेय) से अतिशायी दिखाना व्यनिरेक कहलाता है। यह शाब्द और प्रतीयमान दो प्रकार का होता है। ३२।। एव श्लेपममिघाय साम्यकनिबन्धनत्वादुक्तरुपश्लेयकारण व्यति रेकमभिधते-मतीत्यादि। तच्छब्दवाच्यत्वे, स चासौ शब्दश्चेति विगृद्य, तच्छव्दराकत्या श्लेषनिमित्तमूत शबद परामृश्यने। तस्य वाच्यत्वेडभिघेयत्वे मति विदयमाने। धर्ममाम्ये सत्यपि परम्परस्पं्द- सादृश्ये विद्यमाने। तथाविधशब्दवाच्यत्वस्य धर्ममाम्यस्य चोभय- नियुत्वादुभयो: प्रकृतत्वात् प्रस्तुताप्रस्तुनयोरेव तयोर्धमोडेकस्य यथा रुचि केनापि विवक्िनपटार्थान्तरेण अन्यथास्थितेरतथाभावेनावस्थिते. व्यतिरेचन पृथक्ञरणम्। (कस्मान्) अन्यस्माद् उपमेयस्योपमाना दुपमानस्य वा तस्मात् । म व्यतिरकनामालङ्काराऽभिधोयते कथ्यने। किमथम्-प्रस्तुतात्कपसिद्धय। प्रस्तुनस्य वर्ण्यमानस्य वृत्तेश्वायाति- शयनिष्यत्तये। स च द्विविव सम्भवति शब्द प्रतायमाना वा। शाब्द: कतिप्रवाहप्रसिद्ध तत्समर्पणसमर्थोभिवानेनामिवियमान. । प्रतीयमानो वाक्यार्थतामध्यमात्राववोध्य:। इस प्रकार वलेय को बताकर सादृश्यमान्रमूचक होने के नाते उक्त स्वरूप इनेप के कारण वाले उपतिरेकु को बताते हैं-सतत्यादि (कारिका के द्वारा) तच्छम्दवाच्यले इस पद मे 'वही तद पद वाच्य है और वही शब्द है' इस प्रकार कर्मधारम विसह करके अर्थ प्रहुण किया जायगा। वब्म्द पक्ति के
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वक्रोक्तिजीवितम्
द्वारा क्लेप के आधारभूत शब्द का परामर्श कर रहे है। उसके वाच्यत्व अर्पात् अभिधा के द्वारा समर्पणीय होने पर अर्थात् परस्पर स्वभाव के साहृत्य के वर्तमान होने पर भी। इस प्रकार के शब्दवाच्यत्व और धर्मसाम्थ के दोनो मे स्थित होने के कारण दोनों के प्रस्तुत होने के नाते प्रस्तुत और अप्रस्तुत के बीच भी इन दोनों के धर्म से एक का रुचि के अनुमार किसी अनिरवचनीय विवक्षित अन्य पदार्थ के द्वारा और तरह से स्थित बर्यात् उस तर्ह से न स्यित रखने वाले से व्यतिरेक अर्थात् अलग करना (इसका आराप) है। दूसरे से अर्थात उपमेय का उपमान से अपवा उपमान का उपमेय से। वह व्यति रेक नाम का अनद्धार अभिहित होता है अर्यात् कहा जाता है। किस लिए- प्रस्तुत के उत्कर्य को सिद्धि के लिये। प्रस्तुत अर्थात् वर्ष्य विषय के सोन्दर्वा- विशय को प्रस्तुत करने के लिए। वह दो प्रकार का हो सकता है-चान्द अथवा प्रतीयमान। शान्द अर्थान् कविपरम्परा प्रसिद्ध उसको व्यक्त कर सकने मे समर्थ पद के द्वारा प्रकाशित किया जाता हुआ। प्रतीयमान वर्थात केवल दापयार्थ के सामर्थ्य से हो बोधित किये जाने योग्य। इसके अनन्तर कुन्तक ने व्यतिरेक के उदाहरणस्वरूप एक प्राकृत शलोक सपा दो संस्कृत श्लोको को उद्भृत किया है। जिनमे में प्रावृत इलोक तका दूसरा सस्कृत श्लोक पाण्डुलिपि मे अत्यन्त प्रष्ट एव अपूर्ण पा। जिने उद्वृत नहीं किया जा सका। तोसरा श्लोक इस प्रकार है- प्रापश्नीरेप कस्मात्युनरपि मयि तं मन्थखेदं विदध्या- ननिद्रामध्यस्य पूर्वामनलसमनसो नैव सम्भावयामि। सेतुं बभाति भूय किमिति च सकलद्वीपनाथानुयाव स्त्वय्यायाते चितर्कानिति द्घत इवाभाति कम्पः पयोधेः॥ यह महाराज तो श्री वर्षाद् रमा या सम्पत्ति को प्राप्त कर चुके हैं तो फिर किस लिए मेरे अन्दर उस मथने के कष्ट को फिर से उतपन्न करेगे, इन महाराज की पहले वाली निद्रा को भी आलस्परहित चित्त होने के नाते नहीं सम्भावित कर पाता हूँ, क्या ये सारे द्वीपों के स्वामियो से अनुगत होते हुए भी फिर से सेतुबन्ध करेंगे। इस तरह के संचयो को, तुम्हारे आने पर, मन मे धारग करता हुआ सागर का ज्वार-भाटा सुदोभित हो रहा है। (विष्णु ने अप्राव्वश्री होने पर हो सागर का मन्थन किया या प्रस्तुत महाराज बमा प्राप्तत्री होकर मथन करना पाहते हैं यह व्यदिरेक है। भगवान् विष्णु सालस्यचित होकर हो निद्वा को अविवाहित करने के लिए सागर की गोद मे आाते है परन्तु ये महाराज अनलसमन होते हुए भी सागर के अवगाहनार्य आये हुए है यह व्यविरेक है।
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तृतोपोन्मेप ३६९
रामावतारधारी विष्णु ने लता नामक एक द्वीप के अधिपति विभीषण के द्वारा अनुरत होकर ही सागर पर सेनुबन्ध किया था। इन महाराज के सेतुबन्ध कौ सम्भावना के समय अनेको द्वीपो के स्वामियो का अनुगमन प्राप्त है यह व्यतिरेक है) ॥ १४७ ॥ इसके विषय मे कुन्तक कहते हैं कि -- (अत्र) नत्त्वा ्यारोपणात् प्रतीयमाननया रूपकमेव पूर्वसूरि- भिगम्नातम्। अर्थात् प्राचीन आचार्यों ने यहाँ तत्त्व का आरोप होने के कारण प्रतीयमान रूपक ही स्वीकार किया है। इमी प्रसङ्ग मे कुन्तक (आनन्दवर्धनाचार्य) की ध्वनि की परिभाषा 'ममार्थ शब्दो वा' आदि को उद्धृत करने हैं एवं प्रतीयमानता के अर्थ का विवेचन करते हैं। (ध्वन्यालोक की कारिका इस प्रकार है)- यत्राथः शब्दों वा तमर्थभपसर्जनीकृतस्वार्थो। व्यड्ड काव्यविशेष: स ध्वनिरिति सूरिभि: कथितः ॥ १४८॥। जहा पर वर्ष अपने स्वरूप को और शब्द अपने अर्थ को गौण बना कर (प्रतीयमान ) अर्थ को व्यक्त करते हैं वह काव्मविरेष विद्वानो द्वारा 'ध्वनि' कुहर गया है।। १४८। परन्तु यहाँ प्रतोयमानता आदि के अर्थ का विवेवन आचार्य कुन्तक ने कया ओर कैसे किया है यह कुछ भी नही कहा जा सकता क्योंकि आगे पाण्ड्ुलिपि पढ़ी नहीं जा सकी। इसीलिए डा० हे ने केवल उमका सकेतमान कर दिया है। इस के अनन्तर कुन्तक श्लेषव्यतिरेक के उदाहरणस्वरूप अधोलिलिस इलोक प्रस्तुत करते हैं -- (श्तेपवयतिरेको यथा )- माष्याशेषतनुं सुदर्शनकर= सर्वाङ्तीलाजित- तैलोक्यां चरणारविन्दललितेनाक्रान्तलोको हरि। विश्राणा मुखमिन्दुरूपमखिलं चन्द्रात्म चक्षुदधत्- स्थाने यां स्वतनोरपश्यदधिका सा रुकमिणी बोऽवतात्॥।१४६।। इळेधम्यतिरेक का उदाहरण जेसे- मुदर्शनकर अर्पात् सुदर्शन को हाय मे धारण करने वाले (या जिनके हाथ ही-दर्सनीम है) अरविन्द सुन्दर (एक) चरण से लोक भर पर अधिषित हो जाने वाले और चन्द्रस्वरूप नेत्र को धारम करने वाले हरि ने जिस रषमणी
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३९० वकोकिजोविम्
को अपने शरीर से प्रशसनीय समस्त शरीर वाली, प्रत्येक अङ्गों की लोला से त्रिलोकी को जीत लेनेवाले और चन्द्रतुल्य रूप वाले सम्पूर्ण मुस को धारण करने घाली होने के नाते अविशापिन पायावह रविमणी तुम लोगो की रक्षा करें ॥४९। इसके बाद बन्थकार ध्वतिरेक के तीसरे प्रकार का विवेचन प्रारम्भ करते हैं-
व्यतिरेको यदेकस्य स परस्तद्विवक्षया ॥ ३५॥ सर्वप्रसिद्ध साधारण व्यापार से विशिष्ट होने के नाते जो एक वस्तु का ओपम्यविवक्षा से पृथककरण किया जाता है वह दूसरा व्पतिरेक है। अस्यैव प्रकासन्तरमाह-लोकप्रसद्धेत्यादि। परोऽन्य: स व्यतिरे- कालक्वारः। फीहश -यदेकस्य वस्तुनः कस्यापि व्यतिरक: पृथकरणम्। कस्मात्-लोकप्रसिद्धसामान्यपरिस्पन्दात्। नोकप्रसिद्धो जगत्पतीतः सामान्यभूत सर्वसाधारणो य परिस्पन्दो व्यापारस्तस्मात। कुतो हेतो-विशेषत, कुतश्चिदतिशयात। कथम् ? तद्विक्षया। 'तद्' इत्युप- मादीना परमार्थस्तेषां विवक्षया। तदियस्षितल्वेन तिहितः (यथा)- इसी (म्यतिरेक) के दूसरे भेव को बताने हैं-लोरुप्रसिद्ध इत्यादि (कारिका के द्वारा)। पर वर्यात् दूसरा वह व्यतिरेक अलद्वार होता है। किस तरह का। किस्ी एक वस्तु का व्यतिरेक अर्थात् जो घृथक करना त उस तरह का। किससे? लोक में प्रसिद्ध साधारण स्वभाव ने1 लोक मे प्रसिद्ध सारी दुनिया में विस्यात। सामान्यभूत अर्थात् सर्वसाधारप् जो परिस्पन्द माने व्यापार है उससे। किस कारण से विदेषता के नारण अर्थात विसी अनिर्वननीय अतिरायबश। क्यो? उसे बहने वो इच्छा से। 'तद' इस पद से उपमा आदि का वास्तविक तत्व ग्रहण किया गया है। उसके बहते की कामना से। उसके विवक्षित होने के नाते किया गया हुआ। जैसे- चापं पुष्पितभूनल सुरािता मोर्बी ह्विरेफावलि:
तैलोक्ये मदनस्य सोऽपि ललितोल्लोम्वो जिगीपाभहः॥१५०॥ योग्य स्वरूप वाले कामदेव का फूलो से युक्त पृथ्वीतल धनुष है, प्रमरो की पंकति ही मुन्दर दग से बनी हुई प्रत्यथा है पूर्णमासी के धन्द्रमा या उदय ही आकमणकाल है, वसन्त ही वागे आगे चलने वाला (चोबदार है) कमद और केवडा के पुप्प हो सास्त है, तीनो लोदो में कामियो के जीत लेने की इच्छा का यह् मामह भी सलित उल्फेस वाला है।। १४० ॥।
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तृतोपोन्मेष ३११ अत्र सकललोकपसिद्धशस्त्राययुपकरणकल्ापा्च्चा जिगीपाव्यवहारा न्मन्मथः सुनुमारोपकरणत्वाजिगीपा। ननु च भूतलादीनां चापाडिरुपणाद्वपकज्यनरेक एवायम्। नैनवस्ति। रूपकव्यनिरेके हि रूपण विधाय तस्मानेत व्यातरेचन विधीयते। एनस्मिन् पुनः सकल- लोकप्रनद्धात्मामान्यव्यवहारतात्पर्याद् वर्यातरेचनम। भूतलादीनां चापान-रूपण विशेषान्तर्शनमित्तमात्रमबधार्यताम। यहा पर समस्न जगती मे प्रसिद्ध वास्त्रादिक उपकरणसमूह के कारण जौतने को इन्छार व्यवहार से कामदेव मुकुमार उपकरणो वाला होने के नासे जिगीषा के पनि आग्रह करता है। यह पाद्ा उठाई जा सकती है कि भूतलादि पर चापादि का आरोप कटने के कारण यह रूप व्तिरेक ही है। परन्तु ऐसा नहीं है। कयोकि न्पकव्यतिरेक में आरोप करके उसी से पृथवकरण किया जाता है। इसमे तो सारे विश्व में प्रसिद्ध सर्वसाधारण व्यवहार रूप तात्पर्य से व्यतिरेक दिखाया जाता है। भूतनादि के ऊपर चापादि का आरोप दूसरे वैशिष्टय का निमित्तमात माना जाना चाहिए। इस प्रकार व्यतिरेकालद्वार का वितेचन समाप्त कर कुन्तक विरोधालद्वार का विवेचन करते हैं। उनके अनुसार विरोध श्लेप को ही उद्धादित (Involve) करता है अत उससे मिन्न उमे स्वीकार करना उचित नही है। इलेपेणाभि- सम्भिन्नख्वान्) इस अलद्वार क विषय मे प्रन्थकार ने जो कारिका और वृत्ि दी है उसे पाण्टुलिपि की भ्रष्टता के कारण डा० दे उद्वृत नहीं कर सके। इसके अनन्तर कुन्तक ने समासोकि अलद्वार का विवेचन प्रस्तुत किया है। कुनतक समासोक्ति को स्वतन्न्र अलद्वार मानने के लिए तैयार नही है। कयाकि उनवर अनुसार इसमे अन्य अलद्ार को हैसियत से सुन्दरता की कमी होती है। (अलड्वारान्तरत वेन शोभाशून्यतया) इस प्रसङ्ग मे वे भामह के समासोकि के लक्षण तथा उदाहरण को उद्धृत कर उमका विश्लेषण करते हैं जो इस प्रकार है- यत्रोक्ते गभ्यतेऽन्योऽथंस्तक्म मानविशेषण:। सा समासोकिरुडिष्टा सदिनार्थतया यका॥॥१॥ स्कन्घवानृजुख्याल: स्थिरोऽनेकमहाफल । जातस्तरुरयञ्ोषें: पातितश्च नभस्वता ॥ १४२॥। जहाँं (एक वस्तु का) वर्णन किए जाने पर, उसके समान विशेषणों वाला दूसरा पदार्थ प्रतीस् होता है उसे (विद्वानों ने) सक्षिप्तअर्थररूप होने के कारण- समासोकि नाम दिया है। जैसे ॥ १५१॥
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३१२ व्शक्तिजीवितम्
स्कन्छ (तने ) वाल, सोधा, सर्पों से रहिन स्पिर एवं तमाम बडे बडे फलो वाला एव उपत यह वृक्ष उत्पन्न हुआ और हबा के द्वारा गिरा दिया गया।। (यहां वृक्ष के अतिरिक महापुष्तपरक यह अर्थ भी प्रतीत होता है कि- विद्याल कन्धे वाला, सीधा सादा, भुजङ्गता मे रहित, धैर्यशाली, जनेको आधितो को लाभ पहुँचाने वाला, समाज मे साम्मान्य महापुरु्व, उत्पन्न हुआ पर दुर्भाम से नीचे गिरा दिया गया। इसका कुन्तक खण्डन करते है कि) अत्र तरोमेहापुरुपस्य न द्वयोरापें मुख्यत्वे महापुरुपपन्षे त्विशेष- मानि सन्तीति विशेष्यविायक पदान्तरवमिघातव्यम्। यदि वा विशेषणेऽन्यधानुपपस्था प्रतीयमानतया विशेष्य परिकल्प्पते नदेवें- विधस्य कल्पनस्य स्फुरित न फिश्विदिनि स्फुटमेव शोभाशून्यता। यहां पर युक्ष तपा महापुरष दोनों के प्रधान होने पर महापुरष पक्ष में विशेषण सो है इस लिए विनेष्य विधायक दूसरा पद भी कहना चाहिए क्योकि विदेष्य महापुरु्ष रूप पद का बोध कराने वाला कोई पद उपात नही है।) अथवा यदि (यह कहो कि) विशेषण के अन्यथा सख्ृत न होने के कारण प्रतीयमान रूप से विशेष्य की कल्पना कर लो जाती है इस प्रकार की कल्पना मे कोई तत्त्व नही है अत: यहां सौन्महीनता स्पष्ट ही है। इस प्रकार भामहुप्रदत्त समासोकि के उद्धरण का विवेवन कर उनकी अलद्वायान्तररूप से शोभाशून्यता का प्रतिपादन कर कुन्तक 'अनुरागवती- सन्ध्या' आदि शलोक को उद्भुत कर उसका विवेबन प्रस्तुत करते हैं, जिसमे भामह के अनुसार समासोकि है। पर इसमे इन्होंने किस प्रकार से इसकी शोभाशून्यता का प्रतिपादन किया है वृति की मस्पस्टना के कारण कह सकना कठिन है। फलोक इस प्रकार है- अनुरागवती सन्ध्या दिवसस्तत्युरःसक:। हो द्वगतिः कीहकू न तथापि समागमः ॥१५३॥ सन््वा (नामिका) अनुसगवती है और दिवस (नामक) उसके आगे- आागे चल रहा है, महो दैव को गति कैधी है? कि फिर भी दोनों का समापम नहों हो रहा है। १५३।। इस प्रकार समासोक्ति का प्रकरण समाप्त कर कुन्तक सहोकि अनद्वार का विवेधन प्रस्तुत करते हैं। वे पहले भामहकृत महोक्ति के कक्षण एवं उदाहरण को उद्घुव करते हैं तथा उसका विवेचन कर उसका खण्डन कर देते हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार भामह ने महोकि का उदाहूरण प्स्तुस किया है उसने परसर
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तृतीयोग्मेप. ३९३
समता के ही मनोहारिता का कारण होने से उपमा ही होगी। उनका पूर्ण विबेचन तो उपलब्ध नहीं है जो है वह इस प्रकार है- तुल्यकाले किये यत्र वस्तुद्वयसमाश्रये। पद्ेनैकेन कथ्येते सहोकि: सा मता यथा ॥ १४४॥ हिमपाताविलदिशो गाढालिङ्गनहेतवः। घुद्धिमायान्ति यामिन्य: कामिनां प्रीतिभि: सह।।१५४।। जहाँ समानकाल मे ही दो पदार्थों के आश्रय वाले (भिन्न-भिन्न) दो कार्यों का एक पद से हो कथन किया जाता है उसे ( विद्वानो ने) सहोकि (अलद्वार) स्वीकार किया है। जैसे- पाला पड़ने के कारण कलुपित दिशाओ वाली तथा (प्रेमी एव प्रेमिकाओ के) गाढ आलिंङ्गन की हेतुभूत रातें (जाड़े में) कामियो के प्रेम के साप-साथ बढ़ती हूँ।। १५४-५५।। अन्र परस्परसाग्यसमन्वयो मनोहारि( त्व)निबन्धनमित्युपमैंव। यहां एक दूसरे से साहृश्य का सम्बन्ध ही सोन्दर्य का कारण है अत उपमा ही है। इस प्रकार भामहकृत सहोकि के लक्षण तथा उदाहरण का खण्डन कर कुन्तक अपने अभिमत सहोकि अलक्ार के लक्षण को प्रस्तुत करते हैं। जो इस प्रकार है- यत्रैकेनव वाक्येन वर्णनीयार्थसिद्धये। उक्तिर्युगपदर्थानां सा सहोक्ति सतां मता ॥३६ ॥ जहाँ प्रस्तुत पदार्थ की निष्पत्ति के लिए एक हो वावय से एकसाप ही (अनेको) पदार्षों का कथन किया जाता है उसे सहुदयों ने पहोकि (मनङार) स्वीकार किया है। प्रमाणोपपन्नमभिधत्ते तन्र सहोक्तेस्तावत्-यन्रेत्यादि। सा सही- किरलइ्कतिर्मता प्रतिभाता सर्ता तद्विदां समाम्नातेत्यर्थः । कीदशी-यत्र यस्थाम् एकेनैव वाक्येनाभिन्नेनैय पदसमुहेन अर्यानां वाक्यार्थतात्पर्य- भूतानां वस्तूनां युगपत्तल्यकालमुक्तिरमिहिति:। किमर्थम्-वर्णनीया- थंसिखतये। वर्णनीयस्य प्रधानत्वेन विवक्षितस्यार्थस्य वस्तुनः सम्पत्तये। वदिदमुक्कम्भवति-यत्र वाक्यान्तरवक्तव्यमपि वस्तु प्रस्तुतार्थनिप्पत्तये विच्छित्त्या तेनैव वाक्येनामिधीपते । यथा-
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११४
तो अब महोकि के प्रमाणयुक्त (स्वरूप का) निरूपण (ग्रन्वकार) करते है-वश्रेत्या्दि (का रिका के द्वारा)। उसे शेषजनी ने बहोकि अलद्ार माना है अर्पान् सहृदयों ने उसे स्वीकार किया है। कैसी[ है वह महोकि)-जह। सर्थाव जिस में एक ही वाकय के द्वारा अर्थात् अभिन पदसमूद के द्वारा अर्यों अर्थात् वाययार्थ के सात्पर्यभूत पदारथों का एकसाय ही समान काल मे ही बकि अर्थाव् कपन होता है वह। (सहोकि होती है)। किस लिये (ऐसी उकि होती है)- वणनीय अर्थ की सिद्धि के लिए। वर्णनीय अर्थ अर्थात् प्रधान रूप मे कहने के लिए अभिप्रेत पदार्थ की निष्पतति के लिए। तो कहने का तात्पर्य यह कि-जह। पर प्रस्तुत मदार्थ की सिद्धि के लिए दूसरे वाबम के द्वारा भी कही जाने वाली वस्तु मुन्दरता के साथ उसी वाकय के द्वारा कही जाती है। जैसे- हे हस्त दक्षिण मृतस्य शिशाद्विजस्य जीवातने विसृज शृद्रमुनी कृपाणम्। समस्य पाणिरसि निर्भरगर्भ खित्र- देवीविव्रासनपटो. करुणा कुतस्ते॥ १४६॥।
ऐ रे दाहिने हाथ, ब्राह्मण के मरे हुए बच्ने के प्राणो के लिए सू [ इस) शूद्र तपसवी के ऊपर कृपाण का बार कर आसिर तू है तो एकदम भारी पड गए हुए गर्भ के कारण परशान देवी (खोता) को निकाल देने में चालाक राम की सुजा न। तुझे दया कहां ?॥ १५६ ॥
(यथा च)- उच्यता स वचनीयमशेषं नेश्वरे परुपता मखिर माध्वी। आतयन मनुनीय कथ वा विभ्रियाणि जनयन्ननुनेय॥ ४७॥ (और जैसे) (नायिका कहनी है) उस घ नायक के प्रति सारे उसके दोष कह डालो, (सबी कहती है) स्वामी के विषय मे ऐ सखी, कठोर वचन उचित नही होता (फिर नामिका कहती है) किसी भी सरह से उन्हें मना कर से बाओ। ससो रहती है) अत्रिय कार्य करने वाला व्यक्ति मनाने योग्य कैसे हो सरता है॥५७॥ (यथा षा ) किं गतेन न न्रि युक्तसुपेतुं क: प्रिये सुमगमानिनि मान:। योपितामिति कथासु समेतैः कामिभिषदठरसा घृतिरूदे ॥४न।
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तृव्रीयोन्मेष: ३१५
(अचवा जैसे वहों पर) फिर नायिका कहती है) तो जाने से ही कया अत उसके पास जाना ठोक नहीं। (सखौ कहती है) अपने को बडी सुन्दर मानने वाली, प्रियतम के विषय मे मान कसा? नायिकाओ की इस प्रकार की कथाओ के विषय में पास आाकर सुनने वाले कामी लोगो ने विविध रस वाले सन्तोष को प्राप्त किया ॥१५८॥ (यथा वा)- सर्वक्षितिभृतानाथ हष्टा सर्वाह्गसुन्दरी। रामा रम्ये वनोदेशे मया विरहिता त्वया॥ १५६॥। उर्वशी से वियुक्त पुरूरवा पर्वतराज से पूछने है। कालिदास ने यहाँ ऐसी वाक्ययोजना प्रस्तुत की है कि पर्वत की प्रनिध्वनि से प्रश्न का उत्तर भी राजा को प्राप्त प्रवीत होता है। राजा का प्रश्न है-हे समस्त पर्वतो के स्वामी। वया तुमने मुझसे वियुक्त सर्वास्ससुन्दरी रमणी (उषशी) को इस रमणीय वनप्रदेश में देखा है? पर्वतराज का उत्तर है-हे समस्त राजाओ के स्वामी। मैंने आपसे वियुक्त सर्वा्गमुन्दरी रमगी (उर्वशी) को इस रमणीय वनप्रदेश मे देखा है॥ १५१॥ अत्र प्रधानभूतविप्रलम्भशृद्वाररसपरिपाषणसिद्धये वाक्यार्थद्वय- सुपानबद्धम्। यहाँ प्रवान रूप से उपनबद्ध विप्रलम्भशुद्धार रस के परिपोष की सिद्धिहेतु दो वाक्यारयों को सपनिबद्ध किया गया है। ननु चानकाथमम्भवेशत श्लेषानुप्रवेश कर्थ न सम्भवतीत्यभिधी- यते-नन यम्मादु द्वयोरेकतरस्य वा मुख्यभावे श्लेप ( :... तस्मिन पुनस्तथाविदाभावात्। बहुनां द्वयोरगा सर्वेपाभेव गणभाव्र प्रधानार्थ- परत्वरेनारलानान्। अन्यन्न, तस्मिन्रकेनैव शब्देन युगपतदीपप्रकाशवद्- थदवयप्रकाशनें शब्दार्थद्वयप्रकाशन वति शब्दस्तन्न सामान्याय विजम्भते। सहोक्ते: पुनस्तथाविधस्वाङ्गाभावादेकनैव वाक्येन पुनः पुनरावर्तमा- नतया वस्त्न्तरप्रकाशन विधीयते। तस्मादावृत्तरत्र शबदन्यायतां प्रनिपद्यने। (इस पर पूर्वपक्षी प्रश्न करता है) कि यहाँ तो अनेक अर्थों के सम्भय होने पर इलेप का अनुप्रवेश कयो नहीं सम्भय हो जाता-इसका उत्तर देने हए कहने है-वयों वहाँ दोनो अपवा उनमे से एक के प्रधान रूप से स्पित होने पर श्लेय अलद्वार होता है ...... पर उस (सहोकि) में उस प्रकार का अभाव
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३१६ वकोकिनीपितम्
होने से (इलेष नहीं होगा) कयोंकि इसमे बहती को सपवा दो को सभी अर्षों को गौणता होनी है प्रधान अपंपरक रुप मे उनका पर्येवसान होने के कारण। ओर भी, स्लेप में एक ही दन्द के दारा एक साथ ही दीपक से प्रकाद को वरह दो मदार्थों का प्रकाशन अथवा दो शन्दो एवं अथों का प्रकाशन होता है इस प्रकार वदों पर शब्द सर्वसामारण की प्रतीति कने के लिए ही आता है। सहोक्ति के उस प्रकार के अपन लङ्त के न होने पर एक ही वाय से दार-बार आवर्तन होने क नाते दूसरी वस्तु का प्रकाशकत्व विहित किया जाता ह। इसी- लिये यहाँ पर आवृति शब्द के ओचित्य को प्राप्त करता है। 'सर्वक्षिनिभुता नाथ' इत्यत्र वाक्यैकदेशे श्लेपानुप्रनेशः नम्भनो- स्युच्यते। अत्र वाक्यकदेशे शलेषम्यान्त्वम्, मुख्यभावः पुन- सहोकेरेव। (मदि पूर्वपक्षी यह कहे कि) 'सर्वक्षितिभृता नाथ' इस वाक्य के एक अैश मे इलेव का अनुप्रवेध दो सम्भव हो जाता है। तो प्रन्यकार इसका उत्तर देते है कि-ठीक है यहां कलेव अलद्धार है परन्तु) यहा वाकय के एक अंदा मे इलेष अद्ध रूप मे ही आया है, प्रधानता तो सहोकि की ही है। (अतः 'प्राधान्वेव व्यपदेश भवन्ति' इस न्याय से यह।ं सहोकि ही कही जायगी-इलैष नहीं) तदेवभावृत्य वस्त्वन्त रावरगती सहोके: महभावाभावादर्थान्वय परि- हाणि: प्रसज्येत । नैतदस्तीति-यस्मान्मह्ोक्तिरियुचम न पुनः सह-
इस प्रकार पूर्वपक्षी पुनः प्रश्न करता है कि जब आप आवृत्ति के द्वारा भिन्न-िन्न वारपार्यों की प्रतोति होने से सहोकि अवद्वार मानते हैं) तो इस प्रकार आवुति के द्वारा अन्य पदार्थ का ज्ञान होने पर सहभाव के अभाव के कारण सहोक्ति के अर्थान्दय मे हानि होने लगेगो (अत उसे सहोकि कैसे कहा जा सकता है।। पन्थकार उत्तर देते हैं कि यह बात नहीं कयो कि मैंने खहोकि (साप कथन) यह कहा है सह प्रतिपत्ति (साप ज्ञान) नहीं कहा। अत आस्पन्तिक महाभिधान ही उत्वृष्ट बोष को प्राप्त है, अतः कुछ भी असम्बद नहीं। के्विदेपा समासोकि: सहोकि: कैभिदुच्यते। अधोन्वयाय कुछ लोग इसे समायोकि कहते हैं कुछ लोग इहोकि कहते हैं। अन्य विद्वान् इन दोनों में अर्थसम्बन्ध के भारण भिन्नता स्वीकार करते है॥ १६॥॥
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तृतीयोग्मेष
इस प्रकार सहोक्ति के अपने अभिमत लक्षण का सम्यक प्रतिपादन कर कुन्तक दष्टान्त अलद्धार का विवेचन प्रस्तुत करते हैं। पाण्डुलिपि मे दष्टान्त की कारिका लुप्त हो गई है। यृत्ति के आधार पर उसका पूर्वाद्ध डा० हे ने इस प्रकार उद्धृत किया है- वस्तुसाम्यं समाश्रित्य यदन्यस्य प्रदर्शनम्॥ ३७॥ पदार्थों के सादृश्य का आश्रयण कर जो दूसरे ( वर्णनीय से निन्न पदार्थ) का प्रदर्शन किरा जाता है। उसे दृष्टान्त अलद्दार कहते हैं)। दष्षान्त नाद इमिघन्ते-वस्तुसाम्येतयादि। यदन्यस्य वर्ण्यमानप्रस्तु- ताद्वयनिरित्तृत्ते पदार्थानतरस्य प्रदर्शनमुपनिबन्धन स दृष्टान्वनामाल- य्वारोडभिधीयते । कथ-वस्तु-साम्य समाशित्य। बस्तुन (नो .? ) पदा- थंयोट्टष्टान्तदाष्ोन्तिकयो: साम्य सादृश्य समाश्नित्य निमित्तीकृत्य। लिद्ध नड्ख्या-विभक्तिस्वरूपसाम्यवर्जितमिति वस्तुमह्दणम्। (यथा)- तत तक (ग्रन्थकार दृष्टान्त (अलद्कार) का प्रतिपादन करते हैं- वस्तुसाम्पेत्यादि (कारिका के द्वारा)। जो दूसरे का अर्थात् वर्ण्यमान प्रस्तुत (पदार्थ) से भिन्न वृत्ति वाले दूसरे पदार्थ का प्रदर्शन अर्थात् वर्णन (होता है) यह 'दृष्टान्त' नाम का अनद्वार कहा जाता है। (दूसरे पदार्थ का वर्णन) कैसे (किया जाता है ?)-वस्तुओ के साम्य का आश्रय ग्रहण कर। वस्तुओ अर्थात् दष्टान्त तथा दार्ष्टान्तिक भूत पदार्थों के साम्य अर्थात् सादृश्य को आश्रित करके अर्थान् निमित्त बना कर (अन्य पदार्थ का वर्णन किया जाता है)। लिङ्ग, सख्पा, विर्भत् एव स्वरूप के साम्य से अतिरिक्त साम्य (के कारण पदार्थान्तर का वर्णन होने पर ही दृष्टान्व अलद्धार) होता है इसीलिये लक्षण मे वस्तु (साम्य) का ग्रहण किया गया है। जैसे- सरसिजमनुविद्ध शैवलेनापि रम्य मलिनमपि हिमांशोर्लेक्षम लद्ष्मी तनोति। इयमधिकमनोज्षा वल्कलेनापि तन्वी किमिब हि भघुराणां मण्डन नाकृतीनाम् ॥ १६१॥ कमल सेवार से भी संगत होकर रमणीय लगता है। पन्द्रमा का कलदू गन्दा होठे हुए भी सौन्दर्य को बढ़ाता है। यह कृशान्त्ी वल्कल से भी अधिक मुन्दर ही लग रही है। मुन्दर आकृतियों का कोन सा ऐसा पदार्थ है जो मलद्वार नहीं बन जाता।।
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पाटतयमेवोदाहरणम्, चतुर्थे भूप णान्तरसम्भवान्। इस श्लोक के तौन चरण ही (दृष्टान्त के) उदाहरण है ( सम्पूर्ण नहीं) कयोकि चतुर्थ चरण मे दूसरा (अर्थान्तरन्यास नामक) अलद्धार सम्नद होता है। वाक्यार्थान्तरविन्यासी मुख्यतात्पर्यसाम्यतः। ज्ञेयः सोडर्थान्तरन्यासः यः समर्पकतयाहितः।३८ ।। प्रधान वहतु के तात्पर्य का सादृश्य होने के कारण (अभीष्ट अर्ष) ने समर्पक रूप से उपनिबद्ध किया गया दूसरे वाक्यार्थ का जो वर्णन होता है उसे अर्थान्तर- न्यास (अलद्धार) समस्ना चाहिए। अर्धान्तरन्यासमभिमन्ते-वाक्यार्थेत्यापि। ज्ञेयः मोडर्थान्तरन्यामः । अर्थान्तरन्यासनामालद्वारो ज्ञेय परिव्ञान (व्यः)। क :- य. वाक्या• र्ान्तरविन्यासः। परस्परान्तिरितपद् समुदायाभिधेयवस्तु वाक्यार्थ, नरमा- दन्यन्। प्रकृतत्वात् प्रस्तुनव्यतिरेकि वाक्यार्थान्तरम्। तस्य विन्यासो विशिष्टं न्यसन तद्विदाहादकारितयापनिबन्ध। कस्मात्कारणात्- मुख्यतात्पर्यमाम्यत । मुख्यं प्रस्तावाधिकृतत्वात्प्रधानभूतं वस्तु, तस्य तात्पर्य यत्परत्वेन ... .तस्य साम्यतः सादश्यात्। कथम्-ममपकत- याहितः । समर्प कत्वेनोपनियद्ध, तचदुपपत्तियोजनेनेतात् था किमित्र दि मधुराणा मण्डन नाकतीनाम्॥ १६२।। अर्थान्तरन्यास अलद्वार का निरूपण करते हैं-वाबयार्य इत्यादि कारिका के द्वारा)। उसे अर्वान्तरन्यास समझना चाहिए अर्थात् वर्धान्तरन्यास नाम का अलद्धार जानना चाहिए। किसे-जो दूसरे वावयार्थ का विन्यास होता है। एक दूसरे से सम्बन्धित पद के समूह के द्वारा प्रतिषाद्य वस्तु वावमार्थ होती है उससे भिन्न (वाक्पार्य)। यहाँ प्रकरण प्राप्त होने के कारण प्रस्तुत (वर्ण्यमान) से अतिरिक्त (वाकमार्य) दूसरा वाववार्ष हुआ, उमके विन्यास, विशिन्ट बद्ध से संयोजन अर्थाद् सहृदवो को आह्हादित करने वाले ढज्तसे वर्णन (अर्थान्तरन्याघ होता है)। किस कारण से-मुख्य के तात्पर्य से खाम्म के कारण। मुख्य अर्थाव प्रस्ताव के द्वारा अधिकृत होने से प्रधानभूत धस्तु, उसका तात्पर्य अर्यात् जिसका प्रतिपादन करने के लिए ( उसको उपनिबद्ध किया गया है) उस्का साम्य अर्थात् सादृयय होने के कारण। कसे-मम्पर्क रूप से स्थापित अर्थाद् (अभिप्रेत् अर्थ) को प्रदान करने वाले के रूप में उपनिबद् किया गया अर्थात उन-उन युकियों को प्रस्तुत करने के द्वारा।
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तृतीयोन्सेष: ३९९
जैसे-(इसके पहले उदाहरण की चतुर्थ पक्ति) किमिव हि मधुराणा मण्डन नाकृतीनाम्। यह पकति ॥१६२॥ यथा चा- असंशयं क्षत्रपरिप्रहक्षमा यदार्यमस्याममिलापि मे मनः । मतां रि सन्देहपदेपु वस्तुपु प्रमाणमन्त करणप्रवृत्तय ।१६३।। अपवा जैसे- : शकुन्तला को देख कर राजा दुष्यन्त की यह उक्ति कि- निश्चय ही ( यह वाकुन्तला) क्षत्रिय द्वारा ग्रहण करने ( अथवा क्षत्रिय की पत्नी बनने 'योम्य है कयाकि मेरा श्रेछ हृदय इसके विषय मे अनिलापयुक्त हो गया है क्योकि सन्देह की स्थलभूत वस्तुओ के विषम में श्रेष्ठ जनों के हुदय की प्रवृत्तियाँ हो प्रमाण होती हैं।। १६३॥ निषेधच्छाययाक्षेपः कान्ति प्रथयितुं पराम्। आक्षेप इति स ज्ञेयः प्रस्तुतस्यैव वस्तुनः ॥ ३९ ॥ वर्ष्यमान पदार्थ के ही परम सौन्दर्य को व्यक्त करने के लिए जो प्रतिपेध की धोभा से (प्रसुत का) अपवाद किया जाता है उसे आक्षेप (अलद्दार) समझना चाहिए॥ ३९॥ आ्षेपममिघत्ते-निषेधच्छाययेत्यादि। आक्षेप इति स ज्ेय: सोजयमाचेपालद्कारो ज्ञातव्य। स कीदश-प्रस्तुतस्येव वस्तुनः प्रकत- स्यैवार्थस्य आत्षेपः न्षेषकृत्। अभिप्रेतस्यापि निर्वरतनमिति। कथम्- निषेधच्छायया प्रतिषेधविकिवत्या। किमरथन्-कान्ति प्रथयितु पराम्। उपशोभां प्रकटयितु प्रकृष्ठम्। नाक्षेप (अलद्वार) का प्रतिपादन करते हैं-निषेधच्छायया इत्यादि (कारिका के द्वारा) उसे आक्षेप ऐसा समझना चाहिए अर्थात वह यह आक्षेप नामकु अनद्धार है ऐसा जानना चाहिए। वह कैस्षा है-प्रस्तुत ही वस्तु का वर्षाद् व्ष्यमान ही पदार्म का आक्षेप अर्थान् निन्दा करने वाला है। अभिप्रेत का भी निषेब करना। कैसे-निषेध की छाया से अर्थात् प्रतिपेध के सौन्दर्य से। किस लिए-परम कान्ति को प्रस्तुत करने के लिए। अर्थात् उत्वृष्ट सौन्दर्य को व्यक्त करने के लिए ( प्रस्तुत का आक्षेप, आक्षेशलद्वार होता है)। इस आभेगालद्वार के उदाहरण रूप में कुन्तक ने एक प्राकृत का श्लोक उद्वृत किया है, जो कि पाष्दुलिपि के अत्यन्त भ्रष्ट होने के कारण नही पड़ा जा सका । अतः उदाहरण यहाँ प्रस्तुत कर सकना कठिन है।
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वकोक्तिजी वितम्
वर्णनीयस्य केनापि विशेषेण विभावना। स्वकारण परित्यागपूर्वकं कान्तिसिद्ये॥४० ॥ प्रस्तुतपदार् के सौन्दर्य की निष्पत्ि के लिए, अपने कारण का परित्याम करके किसी विनेष (रूपान्तर) के कारण विभावना अलद्धवार होता है।
प्रतिपेषोत्तेजिता निशयमाभघत्ते -स्वकार णेत्यादि। वर्णनीयस्य प्रस्तुत- स्थार्थस्य विशेषेण केनाप्यलौकिकेन रूपान्तरेण विभावनेत्यलकृतिर- मिधीयने। .. कथम्-स्वकारणपरित्यागपूर्वकम्। तस्य विशेषस्थ स्वमा- हमीयं कारण यन्निमिस्त तम्य परित्याग: प्रहाणं पूर्व प्रथम यत्र। तत्कृत्वे- स्यर्थ. । किमर्थम्-कान्तिसिद्धये शोभा निप्पतये। तदिद्मुक्तमभवति- यमा लोकोत्तर विशेपविविष्टता वर्णनीयना नीयते। यथ- इस प्रकार स्वरूप के निषेध की विचित्रता के सोन्दर्य के कारण उत्कर्ष वाले (आक्षेप) अलद्धार का प्रतिपादन कर, कारण के निषेध से उन्मौलित उत्कर्ष वाले (विभावना अलद्वार) का प्रतिपादन करते हैं-स्वकारणेत्यादि (कारिका के द्वारा) वर्णनीय अर्थात् प्रस्तुत पदार्थ के विशेष अर्थाद् किसी अलौकिक रूपन्तर वे कारण 'विभावना' मह अनक्ार कहा जाता है।"."* कसे ?- अपने कारण के परित्यागपूर्वक। उस विशेष का जो अपना कारण अर्थान् हेतु है उसका परित्माग अर्थात् वत्सगं पूर्व अर्थात् पहला होता है अर्थात उस कारण का परित्याग करके। किसत लिए? कान्ति की सिद्धि अर्थात् सोन्दर्य की निष्पत्ति के लिए। तो कहने का आश्यम यहु होता है कि-जिस के द्वारा अलोकिक विशेप की विशेषता वर्णन का विषय बनाई जाती है। जैसे- असम्भृतं मण्डनमङ्गयष्टेरनासवाखय करणं मदस्य। का मस्य पुष्पच्यतिरिक्तमस्त्रंम्ाल्यात्पवं साऽथ वयः प्रपेदे।१६४।। इसके अनन्तर उस (पार्वती) ने वाल्यावस्था के बाद की मोवनावस्था को प्राप्त रिया जो कि अङ्गघष्टि का अनाहार्य अलद्वार हुआ करता है, जो बिना
१. यदषि डॉ० दे के ही अनुसार मैने कारिका को मूर में वद्मृत किया है। परन्तु जैसा कि दृष्ि से स्पष्ट है कारिका का प्रारम्भ 'स्वकारण' इत्यादि के होता है। अनः कारिका की पूर्वापर पक्चियों का कम परवर्तन कर यदि इस प्रकार रसा जाय तो अधिक उचित होगा। कि- रनकारणपरिस्यागपूवें के कान्तिसिदये। वर्णनीयस्य केनापि विरोषेण विभावना।।
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मदिरा के ही नशे का असाधारण कारण हुआ करता है, और जो (पाँचो) पुप्पो मे अतिरिक्त का म का (छक्) अस्त्र हुआ करता है। अत्र कृत्रिमकार णपरित्यागपूर्वक लकोत्तरसह जविशेषविशिष्टता कवे- रभिप्रेता। यहा पर बनावटी हेतुओ का परित्याग कर अलोकिक एवं स्वाभाविक विशिषटता ही कवि को अभीष्ट है। इम प्रकार ग्रन्यकार विभावना अलद्गार का विवेचन कर ससन्देह अलद्दार का विवेचन प्रस्तुत करते ह। पर कारिका के लुप्त होने से वृत्ति से भी भविभाति महायता न मिलने के कारण कारिका का पुननिर्माण कठिन हो गया है। फिर भी श० डे जो कुछ कर सके हैं उसे उद्घृत किया जा रहा है- यस्मिन्नुत्प्रेक्षितं रूपं सन्देहमेति वस्तुनः (१)। उत्प्रेक्षान्तरसद्भावाद् विच्छित्यै जिसमे सौन्दर्य उपस्पित करने के लिए पदार्थ का वत्प्रेक्षित (कविप्रतिभा के दारा व्णिति) स्वरूप अन्य उत्प्रेक्षा का (अर्थात् दूसरे पदार्थ के वर्णन का) सद्ाय होने के कारण सन्देह को प्राप्त कर लेता है (उसे ससन्देह अलङ्कार कहते हैं)। तद्वमसम्भाव्यकारणत्वादविभाव्यमानस्वभावतां विचार्य विचार- गोचरम्वरूपनया स्वरूपमन्देहसम र्पितातिशययभिघन्े-यस्मिततित्याद यस्मित्रलङ्टरणे सम्भावनानुमानात् साम्यसमन्वयाथ् स्वरूपान्तरसमा रोपद्वारेण उत्प्रैक्षितं प्रतिभालिखित रूपं पदार्थपरिस्पन्दलक्षण सन्देह- . मेति मंशयमारोद्ृति। कस्मान् कारणात्-उत्प्रेक्षान्तरसद्भावात। उत्य्रे- क्षाप्रकर्षपरस्यापरस्यापि तद्विपयस्य सद्ावात् किमर्थम्-विच्छित्य शोभायै। तदेवंविधमभिधावैचित्रयं सन्देहाभिधानं वदन्ति। थथा- तो इस प्रकार असम्भाव्यमान कारण वाला होने के कारण अवितेय स्वरूपता का विचार करके विचार मे आने वाले स्वरूप याला होने के नाते स्वरूप के सन्देह से अविचम को प्रदान करने वाले ( ससन्देह) को कहते हैं-पस्मिन्नित्यादि के हारा। जिस अलदार मे सम्भावना से अनुमान के कारण तपा ग्ाहृश्य का सम्बन्ध होने के कारण दूसरे स्वरूप के समारोप के द्वारा (परार्थक) उतप्रेक्षित अर्थात् कविप्रतिभा द्वारा य्णित रूप अर्थात् पदार्थ का स्वभाव सन्देह प्राप्त करना है अर्थात् संशयारूद हो जाता है। किस कारण से-दूसरी उत्प्रेक्षा का सद्भाव होने के कारण। अर्थात् उत्प्रेक्षा के उत्कर्ष में लगे हुए दूसरे पदार्य के भी उसका विषय हो जाने के कारण। किसलिए-विक्िति भर्चार सोन्दर्य २६ त्र जी०
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(प्रतिपादित करने) के लिए। तो इस प्रकार के उत्तिवैचिश्व को (विद्वान) सन्देह नामक (अलद्वार) कहते हैं। जैसे- यपा था- रखिता नु विविधास्नरूशैला नामित नु गगन स्थगित नु। पूरिता नु विपभेधु धरित्रो सहता नु ककुभस्तिमिरेण ॥।६XI] अन्धकार ने विविध वृक्षो और पर्वतो को रंग दिया या आकाश को सुका दिया मा आन्छादित कर लिया या इस धरती की ऊँबी-नीचो जगहो को भर कर बराबर कर दिया अपवा सारी दिशाओ को समेट लिया ॥ "६४॥ निमीलदाकेकेरलोलचक्षुपां प्रियोपकण्ठं कृनगात्रवेपथु। निमज्जतीनां वसितोद्धतस्तनःस्षमो नुतासां मदनो तु पप्रथे॥१६६।। मचमा जैसे- प्रियतम के निकट अवगाहन करती रहने के कारण मुंदती हुई आके करा हष्टि पाली चञ्बननमनाओ के अद्धो को कम्पित कर देने वाला ओर साँसों से कपर को उठ आये हुए बतनो वाला श्रम या कामदेव सर्वत व्याप्त हो उठा पा ! इसके बाद कुन्तर ने एक प्राकृत पलोक को उदाहरण रूप मे उद्धृत किया है जो पाण्डुलिपि में बहुन ही भ्रष्ट एव अस्पष्ट होने के कारण उद्बृत नही किया जा सका। इसके बाद एक अन्य संस्कृन श्नोक उदाहरण रूप मे उद्भृत किया है जो इस प्रकार है- (यधा था)- कि सौन्दय महार्थसश्जिनजञगत्कोशैकरत्न विधे: कि शृह्ारसर ्सरोकुमिदं स्यात्सीकुमार्यावधि। कि लावण्यप योनिधेरमितवं बिम्म सुधादीपिते- वधतुं फान्ततमाननें तब भया साम्य न निश्चोयते ॥१६७।। नपपा जैसे- कया ब्रह्मा के सोन्दर्य रूप महान् सम्पत्ति से सन्यित किए गये जगत रूप कोद का अद्वितोय रत्न है, या कि सुकुमारता की चरमसीमायृत यह पङ्गार- रूप वालाब से उत्पन्ष कमल है, या कि लावष्य के समुद्र अमृतकिरण (पनमा) • आकेकरा टूटि का एक्षण नृत्यविलास में इस प्रकार दिया गया है- टूटिरकेकरा किमिरखुटापाने प्रसारिता। मीलितानेपुटर लोके ताराम्यावर्तेनोधरा ।।*
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का नवीन मण्डन है (इछ प्रकार) तुम्हारी सुग्दरतम समानता का प्रतिपादन करने के लिए में (कुछ ) निश्चय नहीं कर पा रहा हूं। कुन्तक के अनुमार यह ससन्वेह अनक्कार केवल एक ही प्रकार का होता है जो कि उत्प्रेक्षा पर आधारित रहता है (ससन्वेहस्यैकवयन्रकारतवसुत्प्रेक्षा मूलत बाव) इसके बाद कुन्तक अपह्नुति अलक्कार का विवेचन प्रस्तुत करते हैं। अन्यदर्पथितुं रूपं धर्णनीयस्य वम्तुनः। स्वरूपापह्ववो वस्यामसावपह्नुनिर्मेता ॥४२॥ जिसमे वर्णनीय पदार्थ को (कोई नवीन) दूसरा स्वरूप प्रदान करने के लिये ( उसके बास्तविक) स्वर्प का अपलाप किया जाता है उसे (प्रन्वकार ने) अपहृति अनद्धार स्वीकार किया है॥। ४२॥ एच स्वरूप सन्ेहसुन्दर ससन्देहममिघाय स्वरपापहनततिरमणीया-
मस्या। सम्भावनानुमानान् सादश्याच्च वर्णनीयस्य वस्तुनः प्रस्तुत- स्थार्थस्य अन्यन्किमप्यपूर्व रूपमर्पयितुं रूपान्तर विधासु स्वरूपापह्ब स्वभावापलापः सम्भवति यस्याम्, असौ तथावधमणितिरेवापह्वति- मता प्रतिभाता तद्विदाम। इस प्रकार स्वरूपवियवक सन्देह के कारण रमणीय ससन्देह मलद्वार का प्रतिपादन कर (प्रन्यकार) स्वरूप के अपलाप के कारण रमणीय अपह् ति अलद्वार का निरूषण करता हे-अन्मदित्मादि (कारिका के द्वारा)। पहले (सन्देहालद्धार) को तरह हो उत्पेक्षा का मूल में होना ही इस (अचद्वार) का प्राप है। सम्भावना से अनुमान के कारण तया सादृश्य के कारण वर्णनीय वस्तु अर्थात प्रस्तुत पदार्थ के दूसरे किसी अपूर्व रूप को प्रदान करने के लिए अर्थात् दूसरे स्वरूप का निरूपण करने के लिए ( उसके वास्तविक) स्वरूप का अपहब अर्थाव् स्वभाद का अपलाप जिसमे सम्भव होता है वह उस प्रकार की उक्ति हो सहदयो दारा अपहुति (अलद्वार) स्वीकार की गई है अर्थात् समझी गई है। कुन्तर ने अपकुति अलद्वार के तीन वदाहरण प्रस्तुत किए हैं जिनमे से पहना उदाहरण पाण्टुलिपि की अस्पव्टता के कारण नहीं पडा जा सका, दैप दो इस प्रफार है-
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पूर्णेन्द्ो परिपोपरान्तियपुप स्फार प्रभाभासुरं नेद मण्डनमभ्युदेति गगने भामोखिहीपोर्डगल्। मारस्योन्दितमातपत्र मधुना पाण्डुमद्रोषप्रियो मानो बन्युजनाभिलापदलनोऽघोच्छिद्यते कि न ते॥१६= अपनी किरणो से ससार का उदार करने की इच्छा वाले और परिपुषि एवं सुषमा वाले शरीर वाले पूर्ण चन्द्र का यह चारो जोर फैली हुई कान्ति से दमकता हुआ मण्डल आकाश मे नहीं उदित हो रहा है अवितु इस समय हत्की पीली सन्ध्या की शोभा के सद्दा शोभावाले कामदेव का छन ऊपर तना हुआ है (ऐसी स्थिति मे) अब भी तुम्हारा प्रियजनो की अभिलाषाओ को चूर कर देनेवाला मान छिन-भिन कयो नही हो जाता ।। १६८॥ (यथा च)- तव कुसुमशरत्वं शीतरश्मित्वमिन्दो- द्वयमिदमयथार्थ टश्यते मद्विधेपु। विसृजति हिमगभैरमिमन्तर्मयूसै स्त्वमपि कुसुमवाणान् वत्तसारीकरोपि। ६६६ ।। (ओर जैसे)- तुम्हारी पुप्पबाजता और चन्द्रमा की शीतकिरणता ये दोनो ही मेरे जैसे लोगो के विषय मे ठीक नही मालूम पडती (बयोकि) हिम को अन्दर धारण करने वाली किरणों के द्वारा वह (चन्द्रमा) मेरे हृदय पर आग बरसाता है और तुम भी अपने फूल के बाणो को वच्च की दक्ति से सवन्दित बनाये दे रहे हो॥१६९॥ इम प्रकार कुन्तक अपह्तुति अतदार का विवेचन समाप्त कर दो अचना दो से अधिक अलकारो को ससृष्टि तथा ससूर वाले स्थलो का विवेचन करते हैं। इस रथल पर पाण्डुलिषि में कारिकायें तो छुप्त ही थी। साथ ही दृतिभाग भी इतना भ्रष्ट एवं दुर्वाध या कि उसके आधार पर भी कारिकाओ का पुननिर्मान मसम्भद था। अतः संमृष्टि तथा ससूर का लक्षण प्रस्तुत करने वाली कारिकामें ृति तथा उदाहरण भाग ड० डे दारा नहीं प्रस्तुत किये जा सके। अन्यकार ने ससृष्टि के दो उदाहरण प्रस्तुत किए ये जो इस प्रकार हैं- (संसृष्टिर्यया)- आफिष्टो लम्बान्ताम्बरया समेत्य भुवने ध्यानान्तरे सन्ध्यया। चन्द्रांशुत्कर कोर का फुल मतिर्ध्वान्त द्विरेफोडधुना देव्या स्थापितदोहदे कुरबके भाति प्रदोपागम: ।।१७०।।
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(ससृष्टि का उदाहरण जैमे)- नई केसर की तरह लाल सूर्य के दर्शनभात्र का आश्रयण करने वाले, भुवन भर म फैके लम्ने छोर वासे जम्बर वाोध्यान के भीनर आकर सन्ध्या के द्वारा आनिद्धित और चन्द्रमा की किरणो के समूह और कलियो के बीच व्यातुलचित अन्वकारमपी भ्रमर वालेप्रदोप का आगमन इस समय महारानी के द्वारा सप्पादित दोह वाले कुरवक न मुशोमित हो रहा है॥ १७० ॥ (यथा च) म्लानि वान्लविपानलेन नयनव्यापारलब्धात्मना नीता राजभुनङ्ग पल्लवमृदुर्नुन लतेय त्वया।
कैला मोपवने यथा सुगहने नैति प्ररोहं पुनः ।।१७१।। ऐ राजभुजङ्ग, तुमने किसलयकोमल इस लता को नेत्रो की कारगुजारी से स्वरूप को पाने वाली वमन की गई हुई विषाग्न के द्वारा इस तरह मुरक्षा दिया है कि शिवजी के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की किरणो के कारण मुहकराती हुई स्पलियों से उपलक्षित होने वाले कैनाशपर्वत के इस घने उपवन मे अब यह फिर से अडूरित नहीं हो सकती।१७१॥ इस प्रकार समृष्टि के तीन उदाहरण देकर, जिसमे से दो को उद्धृत किया गया है। कुन्तक ने सकीर्ण के भी तीन उदाहरण प्रस्तुत किए है, जो इस प्रकार हैं- (सह्ीण यथा )- रूढा जालर्जटानामुरगपतिफलैस्तन पातालकुक्ी प्रोद्यद्वालाह्ुरश्रीदिशि दिशि दशनै रेमिराशागजानाम्! अस्मित्राकाशदेशे विकसित कुसुमा राशिमिस्तारकाणां नाथ स्वत्कीर्तिवक्ली फलति फलमिद बिम्बमिन्दो: सुराद्रे॥१७२ (संकोर्ण का सदाहरण जैसे)- पाताल के उदर मे शेषनाग के फगरूपी जटाजालो के बन्दर उगी हुई और दिगाजों के इन दातो के अन्दर हर दिश्या मे निकले हुए छोटे-छोटे अंकुरों की दोभा वाली तथा इस आकाशदेश मे तारो की राशि मे खिले हुए फूलों थाली सुम्हारी कोतिलता, महाराज । सुमेर के ऊपर मह चन्द्रविम्य रुपी फन फन रही है ॥। १७२॥
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(यथा वा)- निर्मोकमुक्तिरिय गगनोरगस्य। इति ॥१७३॥ अपवा जैमे-( उदाहरण सहया ३1-पर पहले उदृत) निर्मोकमुक्तििव गगनोरगस्य । यह पक्ठि। (यथा च)- अस्या: सर्गविधौ प्रज्जापतिरभूचन्द्रो। इत्यादि ॥ १०४॥ और जैसे-(उदाहरण सस्या ३-पर पूर्वोदाहुत) अस्थाः सर्गविधो प्रजापतिरभूच्चन्द्रो ॥ इत्यादि द्लोरु। इस प्रकार कुन्तक सभी महत्त्वपूर्ण अलद्धारो का लक्षण उदाहरण सहित विवेचन प्रस्तुत कर अन्य आलद्वारिको द्वारा स्वीकृत दूसरे अलद्धारो को स्वतन्त्र अलद्वार रूप मे स्वीकार नही करत है। उनका कहना है कि या तो वे सभी मलद्वार ऊपर विवेचित अनद्वारो मे ही अन्तर्कत हो जायगे या फिर उनमे सौन्दर्य ही नहीं रहेगा। अत वे अनद्ार नही हो सकगे। इसका विषेचन उन्होंने इस प्रकार किया है कि- भूपणान्तरभावेन शोभाशन्यतया तथा। अलद्धारास्तु ये केचिन्ालङ्कारतया मनाक ॥ ४३ ॥ (प्रन्वकार द्वारा अब तक प्रतिपादित किए गए अलद्धारो से मिन्न) जो अलकार (अन्य आधार्यों द्वारा स्वीकार किए गये) है उन्हें ( पूर्व स्वीकृत) अन्य अलद्वार रूप होने के कारण तपा सौन्दर्य से रहित होने से (प्रंदकार ने) पोडा भी अलद्धार रूप मे स्वीकार नहीं किया है ॥ ४३॥ एव यथोपपचयाल्क्वारान लक्षयित्वा केपा व्िवदलक्षितत्वाल्लक्षणाव्या- प्रिदोष परिहर्तुमुपक्रमते-भूपणेत्यादि। ये पूर्षोक्व्यतिरिकाः केषिदल द्वारास्तेऽलद्वारतया मनाळून विभूवणत्वेनाभ्युपगताः। केन हेतुना- भूपणान्तरभावेन। तेभ्यो व्यतिरिक्तमन्यद् भूषणं भूपणान्तरम्, तत्स्व- भावत्वेन पूर्वोत्तानामेवान्यतमत्वेनेत्यर्थः। शोभाशून्यतया तथा- शोमा कान्तिस्तया शून्यं रहितं शोभाशून्यम्, तस्य भावः शोभाशून्यता तया हेतुभूतया ...... । तेपामलद्वूर्णत्यमनुपपन्ञम् । इस प्रकार यमायुक्ति अलद्धारो का लक्षण ( स्वरूपनिरूपण) कर के (अन्य आधायों द्वारा निरुषित दूसरे) युछ अलसारो के लक्षित न होने के कारण {बलद्ारों के) रक्षण मे अ्याप्ति दोष का परिहार करने के लिये 'भूषमे- र्यादि' कारिका का प्रारम्भ करते हैं। पहके प्रविपादित किए गये (बमक्ारों)
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से अतिरिक्त जो कोई अलद्वार (अन्य आचार्यों द्वारा स्वीकार किए गए) हैं उन्हें (प्रन्थकार ने) थोडा भी अनद्ार रूप मे नही स्वीकार किया है। किस कारण- अन्य अलद्धार स्वरूप होने से। उन ( अप्नतिपाद्ित अलद्धारो) से भिन्न दूसरे अलद्ार अद्वारान्तर हुए, उनके स्वभाव म्व होने के कारण अर्थान् पूर्वप्रति- पादित अलद्धारो मे ही एक न एक होने में। उनका स्वतन्त्र अगड्दारत्व नहीं है।) तथा शोभाशून्य (भी) होने के कारण। शोभा अर्थान् सौन्दर्य उससे शून्य अर्थान हीन शोभासूनय होगे, उनका भाव शोभाशून्यता है उसी हेतुभूत (सौन्दयहीनना) के कारपउनका अरक्कारत्व सिद्ध नही होता। इस प्रकार अन्य अलद्वारो का खण्डन करन समय कुन्तक सर्वप्रथम यमा- सख्य अलङ्गार का खण्डन प्रस्तुत करने है, जिसे प्राचीन भामह आदि आलद्वारिकों ने अरद्वार रूप म स्वीकार किया है-(पूर्वेराम्नात) वे भामह कृत 'यथासख्य' अलङ्ार का उदाहरण एव लक्षण उदवृत कर उसकी आलोचना इस प्रकार करते है-
भूयसामुपदिष्टान।मर्थानामसधमणाम्। कमशो योऽनुनिर्देशो यथासडख्य तदुच्यते ।। १७४॥ (पहले) निर्दिष्ट किए गय भिन्न-भिन्न धर्मों वाले बहुत से पदार्थों का कमानुकून जो बाद में निर्देश किया जाता है उसे यथासस्य अलद्वार कहते हैं। पद्मेन्दुभृद्ग मातङ्गपुस्कोकिलकलापिन।
भणितिवैचित्र्यविरहान्न काचिवत्र कान्तिर्विद्यते। जैसे-तुमने कमल, चन्द्रमा, भ्रमर, हायी, नरकोकिल तथा मदूरो को (कमश.) मुख, कान्ति, नयन, गमन, वचन तथा केशों के द्वारा जीत लिया है। उत्तिवैचित्र्य का मभाव होने के कारण यहाँ पर कोई खोन्दर्य नहीं है। इस प्रकार यथासरूय के शोभाशून्य होने के कारण उसके अलद्धारत्व का सण्डन कर कुन्तक प्राचीन आलङ्कारिको द्वारा स्वीकृत 'माशी' अलद्वार का सण्डन इस प्रकार करते हैं- आशिपो लक्षणोदाहरणानि नेह पठचन्ते, तेषु चाशंसनीयस्यैवार्थस्य मुख्यतया वर्णनीयत्वादलङ्कार्यत्वमिति प्रेयोलद्वारोक्तानि दूषणान्या- पतन्ति। 'मशी.' बलखार के लक्षण तपा उदाहरण को (बन्यकार) यहां नहीं प्रस्तुष् करते है। डाथ ही उनमे आससनीय ही पदार्थ के मुल्य एम से वर्मन का
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विषय होने के कारण बलंकार्यता होती है, इसलिए उसे ( अलंकार मानने में) द्रेय अलद्धार मे गिनाये गए दोप उपस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार "आशी" अलंकार की अनङ्गार्यता सिद्ध कर उसके अलद्गारत का सण्डन कर नुन्तक विरेपोकि अलद्दार की भी स्वतन्त्र अलङ्गारता का खण्डन भामह वे विरोपोकि के उद्यहरण को उद्धुत करते हुए इस प्रकार करते है कि- विशेषो क्तेरल क्का रान्तर भावेना लङ्गार्यतया न भूषणत्वानुपपत्तिः । {यथा)- म एकस्त्रीणि जयति जगन्ति वुसुमायुध: । हरतापि तनुं यस्य शम्भुना न हत पलम। १७७ । विशेषोकि के अन्य अलकार रूप होने से तथा अलद्धार्य होने के कारण मनद्वारत्य की सिद्धि नहीं होती। (जैसे-) फूलो के अस्त्रवाला वह (कामदेव) अकेले ही तोनो लोको पर विजय प्राप्त करता है, जिसके शरीर का हरण करते हुए भी शद्कर ने दाकि का हरण नही किया ॥ १७७॥
अत्र सकललो कप्रसिद्ध जगित्वव्य तिरेकिकन्द परुवभाव मात्रमेव वाक्यार्थ: । यहाँ समस्त लोको में विख्यात विजय से अतिरित कामदेव का केवल स्वभाव हो वाक्मार्थ है (अत स्वभाव होने के कारण वह अलक्कार्य है, बलद्वार नहीं हो सभाता ।) इस तरह विशेषोक्ति का सण्डन कर कुन्तक दब्डी दाथ अभिमत हेतु, सूदम तथा लेवा अलसार का सण्डन करते है। इसके समर्थन मे वे भामद् को उद्धृत करते हैं। तथा 'सूदम' के उदाहरणस्वरूप 'सम्वेतकालमनम दिट झाखवा' आादि इलोक को तथा 'लेश' के उदाहषण रूप में दण्डो के 'राजकन्यानुरकं मामू' आदि ब्लोक एवं 'हेतु' के उदाहरण रूप मे दण्डी के ही 'अयमान्दोलित प्रोठ' मादि इलोक को उद्भृत कर उनका खण्डन करते हैं। कुन्तक के अनुसार इन सभी अलद्वारों में केवल स्वभावही रमणीय होता है. मत. ये सभी अलसार्य होने हैं, अलद्वार नही। प्राप्त विवेचन इस प्रकार है- देतुश्ध सूक्ष्मो लेशोजय नालद्ुारतया मतः । समुदायाभिधानस्य वक्रोक्त्यनभिघ्गनतः।१७८।। समुदाय ने वथन (अर्थात साधारण कथन) के वकोति का प्रतिपादन म करने के कारण हेतु, सूकम तथा नश को (हमने) अतसार रूप में नहीं श्योकार िया है॥ १५८ ॥
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(सूदमं यथा) सक्केतकालमनसं विट ज्ञात्वा विदा्धया। ह्मन्नेत्रापिता कूनं लीलापद्म निमीलिनम्॥ १७६॥। आखो से अभिप्राय को बताने वाले पूर्त (नायक-विद) को सनेत समय की इच्छा वाला समझ कर कुदाल (नायिका) ने हँसने हुए लीलाकमन को बन्द कर दिया॥ १७९।। (हेतुर्यथा)- अयमान्दोलित प्रौढचन्दनद्रुमपल्लवः। उत्पादयति सर्वस्य प्रीति मलयमारुतः ॥ १० ॥। चन्दन वूक्ष के पुराने (परिपत्व) पत्तो को हिलाने वाला यह मलयपवन सभी मे प्रेम को उत्पन्न कर देता है १८० ॥ (लेशो यथा)- राजकन्यानुरक्त मां रोमोद्नेदेन रक्षका- । अवगच्छेयुराज्ञातमहो शीतानिलं वनम्॥ १८?॥ (लेश)- रोमान्च के उदित होने के कारण (अन्त पुर के) रक्षक (कहीं) मुझे राजकन्या में अनुरक्त न समश लें, ओहो ! समझ गया (रोमाज्च का कारण) मरे वन हढी हवाओ माला है। (अत' कह दूँगा कि ठंबक से रोमाञ्च हुआ है, राजकन्या के दर्शन से नहीं ॥१८१॥ इसी प्रकार कुन्तक भामह द्वारा स्वतम्त्र अल्धार रूप मे स्वीकृत्व 'उपमा- Fपक अलद्वार का भामह के उपमा रूपक के उदाहरण को उद्धृत करते हुए खण्डन करते हैं। पर पूर्ण पाठ के सुस्षष्ट न होने के कारण खण्डन कैसे किया गया है इसे कह सकना कठिन है। केचिदुपमारूपकाणामलक्करणत्व मन्यन्ते। तदयुक्तम्, अनुपपद्य- मानत्वात् । कुछ (भामह आदि) आचार्म उपमारूपको की अलद्वारता स्वीकार करते हैं। वह ठौक बहो (अलद्वारता) के सिंद्ध न होने के कारण। (यया)- सममगगनायाममानदण्डो रथाद्विनः । पादो जयति सिद्धस्त्रीमुखेन्दुनवदपंण:।। १८३ ।।1 १. यहों पाठ मैने मामह के कान्यालप्ार के आधार पर दिया है। जब कि गे० डे ने 'समस्तगगनामोगम्' यह पाठ दे रसा है जो कि कान्यालद्टार (भो वालमनोरमा सोरीज न० ५४) में तो नहीं है।
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जैसे-समस्त साकारा को लम्बाई का मानदण्ड एवं सिद्धो की पत्नियो के पनदरमा सदर मुखो के लिए नवीन दर्षण रूप चनधारी (विष्णु) का पैर सर्वोत्कर्ष से युक्त है ॥ १८३ ॥ लावण्यादिगुणोन्जला प्रतिपदन्यमैनिला माजिता
अत्यरध रसयत्तयार्द्रद्व्नया. - .... उद्ाराभिघा वाक् मनो हतु यथा नायिका ॥१८४॥। इति कुन्तलकविरचिते चकोकिजीमिते वनीयोन्मेप समाप:।
लावण्य आदि गुणो से सुशोभित होनेवाली प्रत्येक पदन्यास के द्वारा उत्पन्न विलास से संसक्त, थोडे मे ह अनदधारो को रचना द्वारा उत्पन्न रमगीयता से मनोहारिणो, अत्यधिक रसबती होने के कारण आर्द्रहृदय . एव उदार कपन से युक्त वाणी नार्यिका की तरह हृदय को आकषित करने मे (समर्य होती है)। इस प्रकार कुन्तलकविरचित वकोकिजीकिति का तृष्षीय उन्मेष समाप्त हुआ।
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चतुर्थोन्मेप: एव सकनमाहित्यस वस्व कपवाक्यवकरताप्र का शना नन्तरम वसर प्राप्रा प्रकरणचक्रनामव्रतारयति- यत्र निर्यन्त्रणोत्साहपरिस्पन्दोपशोभिनी। व्यावृत्तिर्व्य वहर्तृणां स्वाशयोल्लेखशालिनी॥१॥ अव्यामूलादनाशंक्यसमुत्थाने मनोरथे। काप्युन्मीलति निःसीमा सा प्वन्धांशवक्रता। २ ॥। इस प्रकार समग्र साहित्य की प्राणभूत 'वानयवकता' के विवेचन के अनन्तर (ब्रन्वकार) अवसरप्राप्त 'प्रकरणवक्रता' को प्रस्तुत करता है- जहां पर जड़ से लेकर ही असम्भावित अकुरणवाले कवि मनोरय के प्रस्तुत किए जाने पर एक अनिवचनीय और असीम तथा निर्बाध उत्साह के सफुरण के कारण सुशोभित होने वाली और अपने आश्य की उद्धावना के कारण मनोहर लगने वाले व्यवहार करने वानो की प्रवृत्ति दृष्टिगत होती है उसे प्रकरणवक्रता कहते हैं।। १-२ ।। वक्रता वक्रभावो भवतीति सम्बन्धः। कौदशी-निःसोमा निरबधि:। यत्र यस्यं वयत हर्त पां तद्वयापारपरिमहव्यम्राणां व्यावृति प्रवृत्तिः काष्य- लौकिकी उन्मीलति उद्धिद्यते। किविशिष्ठा-निर्यन्त्रणोत्साहपरिस्पन्दोप शोभिनी निर्र्गलव्यवसायस्फुरितिस्फारविच्छत्ति.। अतएव स्वाशयोल्लेख- शालिनी निरुपमनिज्हृद्योल्लासितालङकृतिः । कस्मिन् सति-अव्याम्- लाइनाश+यसमुत्या ने मनोरथे। कन्दांत्प्रभृत्मसम्भाव्यसमुद्धेदे समी- हिने। तदयमत्रार्थः ....** वफता नर्पात् बांकपन होता है। कैसी (वकता)-नि सीम अर्थात जिसकी कोई अवधि नहीं दोती। जहाँ अर्थात् जिस (वकता) मे व्यावहारिको अर्थात् उस (वकता) के व्यापार के साधन मे व्यय्र (कबियो की) व्यावृत्ि अर्थात् प्रवृत्ति, कोई लोकोत्तर जम्मीलित अर्थात् प्रस्फुटित होती है। केसी (प्रवृत्ि)-निर्बाध उत्साह के परिस्फुरण से सुशोभित होने वालो अर्थात् स्वच्छन्द (कवि) व्यापार के स्कुरण के कारण अत्यधिक सोन्दर्य वाली (प्रवृति स्फुटित होती है) इसीलिए (यह) अपने आशय की उद्भावना के कारण मनोहर लगने थाली अर्पाद
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४१२ वकोक्तिगीितन्
अपने हृधय से उम्मावित अद्वितीय अलंकरण वाली होती है। (ऐसी प्रवृत्ि) जिसके विद्यमान रहने पर ( स्फुटित होती है) भूल से लेकर असम्भावित समुत्यान वाले (कवि मनोरथ के अर्पात् जड से लेकर ही असम्भावरित नपुटन वाले (ररत-) मनोरय के विद्यमान रहने पर। ऐसो प्रवुत्ति स्फुटित होनी : । तो इसका आचय यह है कि इसरु बाद कुन्तक प्रकरणवक्रता का एक उदाहरण 'अभिजञात जानकी' मामक रूपक के 'सेतुबन्ध' नामक तृतीय अक से इस प्रकार उदवृत करने है- वहां से नापति नील का (यह) कथन कि- तत्र नीलस्य सेनापतेवंचनम्- शैला: सन्ति सहस्रशः प्रतिदिशं वल्मीककल्पा इमे दर्देदण्डाख् कठोरविकमरसक्रीडाममुत्कण्ठका। कर्णास्यादितकुम्भसम्भवकथा किन्राम कललोलिन: प्रायो गोष्पदपूरयोऽवि रूपय कौतूहल नास्ति: वः ॥२॥ कानो द्वारा (कुम्भज) अगर्त्य की कथा का आस्वादन कर चुकने वाने ऐ बन्दरो। प्रत्येक दिशा में वल्मीक के समान हजारो पहाड़ विद्यमान है तथा तुम्हारे ये सुनदण्ड कठोर पराक्रम के आनन्द को प्रदान करने वाली कौडा के प्रति उत्पन्न उत्कष्ठा वाले हैं (फिर भी) सागर की कया चर्चा, गोखुर को भी भर देने मे तुम्हारा कोतूहल नही दिखाई पड रहा है। (अब तक तुम्हे इमे पाठ देना पाहिए था)॥ १ ॥ वानराणामुत्त (वाक्यं नेपधये कलकलानन्तरम्- आन्दोल्यन्ते कति न गिरय: कन्दुकानन्दमुद्रां व्यातन्वाना करपरिसरे कीतुकोत्कर्पहपे। किन्तॢ बीडावेश: पवनतनयोच्छिष्ट संस्पर्शनेन ॥। २ ।। तथा नेवम्प मे कलकल (ध्दनि) के परात् बानरो का यह उत्तर वानय कि (अरे सेनापति जी !) कुलूहल के बढ़ जाने के कारण उल्लास के उत्पन्न होने पर पदापों में मोरो की क्या गयना (जबकि) हुयेली के फैलाव पर बडे बड़े पहाड भी गेद की आननदमुद्रा को उल्लाकित कर के रह जाते हैं। साथ ही मगस्तम की कथा की भी जानकारी है किन्तु हनुमान के द्वारा बुठार दिए गए हुए पदार्थ के स्पर्य के कारण बही लज्जा आ जाती है।। २॥
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"'शामेण पर्यनुयुक्तजाम्बवतोऽपि वाक्यम्-
कृ तिनस्तुल्य सरम्भमारभन्ते जयन्ति च ॥ ३ ॥ राम के द्वारा पूछे गए जाम्बवान् का भी (यह वाकय) (कभी) अदूरित न होने वाले अनन्त मनोरय की उत्पत्ति होने पर भी निपुण लोग समान उत्साह के साथ (उसे) प्रारम्भ करते हैं और विजयो होते है ॥। ३ ॥ एव ्रिधमपरमपि तन एव विभावनीयमभिनवाहुत भोगभङ्गीसुभगं सुभापितम्र्वेस्वम्। इस प्रकार के अपूर्य एव अद्भुत तथा आस्वादभ्गमा से रमणीय दूसरे भी सूक्तिसर्वस्व वहों से समन लेना चाहिए। इस प्रकार 'अभिजातजानकी' से प्रकरणवकता का उदाहरण देकर कुन्तक रघुवश महाकाव्य के पञ्चम सर्ग से रधु तथा कौत्स के वृत्तान्त को प्रकरणवकता के उदाहरण रूप में उद्घृत करते हैं। उन्होंने जिन कलोको को उद्धुत कर उनकी व्याख्या प्रस्तुत की है मे इस प्रकार हैं- (एतावदुक्त्वा प्रतियातुकाम शिष्य महर्षेर्नृपतिर्निषिध्य।) कि वस्तु विद्वन् गुरवे प्रदेय त्वया कियद्वेति तमन्वयुङ्ध ।।४ ।। ( मैं अब दूसरे के पास जा रहा हूँ कयोकि आप तो सर्वस्व दान कर चुके हैं. अतः आप से कुछ नहीं मांगूंगा) इतना ही कहकर (अन्यत) जाने की इच्छा वाले महषि (वरतन्तु) के शिष्य (कोत्स) को (जाने से) रोक कर राजा ने, 'हे विद्वन्। आप को गुरू को कौन सी और कितनी वस्तु प्रदान करनी है' ऐसा उनसे प्रश्न किया ॥। ४ ॥ गुर्वर्थमर्थी श्रतपारदश्वा रघो. सकाशावनवाप्य कामम्। गनो वढ़ान्यान्तरमित्यय मे मा भूत्परीवादनवावतारः।।४।। 'श्रस्त्रो का पारकृत, गुद्दक्षिगा के निमित्त पाचना करने वाला (स्नातक कोतस प्रसिद्ध दानी राजा) घु के समीप से मनोवाल्दित (वस्तु) न प्राप्त कर दूसरे दानी के पास चला गया' ऐसा यह ( आज तक कभी न हुआ) मेरा नवीन भपमर आविभूत न होवे। (अत आप जब तक में उसका प्रबन्ध करता हूँ. दो-तीन दिन मेरी अग्निशाला में ठहरें । ।। ४ ॥ तं भूपतिर्भासुरह्देमराशि लब्धं कुतेरादभियास्यमानात्। दिदेश कौरसाय समस्तमेव पादं सुमेरोरिष वन्त्रमिशमू॥। ६।
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YIY व नेकिनी ित्रम्
राजा (रघु) ने पढ़ाई किए जाने वाले मुबेर से प्राप्त, (इन्द्र के) वश् से विदीर्ण किए गये सुमेद पर्वत के शिखर के समान वेदीप्यमान वह सम्पूर्ण स्वर्ण- रधि फोत्स को प्रदान कर दी (केवल चोदह करोह ही नही) ॥ ६। जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्य भूताम भिनन्दसत्वौ। गुरुपद्ेयाधिकनि स्पृोजर्थी नृपोर्थि कामादधिकप्रदश्व॥७॥ गुरु के दातव्य से अतिरिक (धन) के प्रति अनिच्छुकु थाचक (कोव) सथा याचक के मनोरय से अधिर प्रदान करने वाले राजा (रसु) वे दोनो ही सयोध्यावासी लोगो के लिये प्रशसनीय पाणी हो गये ( या स्तुत्य व्यापार वाले सिंद्ध हुए)।।७ । कुषेरम्प्रति सामन्तसम्भावनया जयाध्यवसायः कामपि सहृद्य- हृदयद्दारितां प्रतिपद्यते। अन्यन्न 'जनस्य साकेत' इत्यादि, अनःपि गुरुप्रदेयदक्षिणातिरिक्तकार्तस्वरमप्रतिगृद्वत कौत्सस्य रघोरपि प्रार्थित- शतगुणं सहस्त्रगुण वा प्रयच्छतो निरवधिनि स्पृहतौदार्यसम्पत्सा- केतवासिन माशरित्यापूर्वा कामपि मोत्सवमुद्रामाततान। दवमेपा महाकविप्रबन्घेधु प्रकरणवकनाविच्छित्ति: रसनिध्यन्दिनी सहृदयैः
(यहा) कुबेर के विषय मे सामन्तत्व की उत्प्रेक्षा करके जीतने का प्रयास किसी अपूर्व ही सह्दयो की मनोहारिता को प्राप्त करता है। और भी जो 'जनस्य साकेत' इत्मादि (पद्य कहा है), यहाँ भी गुर की दातव्य दक्षिणा से अधिक स्वर्ण को न लेने वाले कोत्स की तथा याचित से सोगुना अथवा हजारगुना प्रदान करने वाले रघु की भी असोम नि स्पृहता एव उदारता की सम्पति ने अभोष्या- वासियों का आधय प्रहण कर किसी अपूर्व प्रसलता को भंगिमा को प्रस्तुत किया। इस प्रकार उस को प्रवाहित करने वाला प्रकरणवकता का यह सौन्दर्य महाकवियो के काव्यो मे सहृदयो को स्वम समस लेना भाहिए। इमामेव पकारान्तरेण प्रकाशयति- इतिवृत्तप्रयुक्त्ेऽपि कथावैचित्यवत्मनि । उत्पाद्यलवलावण्यादन्या भवतिवक्रता ॥ ३ ॥
भाति तथा, यथा बन्धस्य सकलस्यापि जीवितम्।
इस प्रकरणवकत्षा को दूसरे बस्त से प्रस्तुत करते हैं- इविहास में प्रयुत होने पर भी कथा की विधिनता के मार्ग मे कविप्रसृत
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चतुर्योगमेष: ४१X
लेशमान्र को रमगीयता के कारण उस प्रकार (कोई लोकोतर ही) दूसरी (प्रकरण की) वकता होती है, जिस प्रकार से कि चरमोत्कर्ष को प्राप्त रस से सोतप्रोत (वह) प्रकरण सम्पूर्ण प्रबन्ध के प्राण रूप में प्रतीत होने लगता है॥। ३-४॥
तथा उत्पाद्यलवलावण्यादन्या भवति वक्रता-तेन प्रकारेण कृत्रिमसंविधानककामनीय कालौकिकी वक्रभावभङ्गी समुज्जम्भते, सहद- यानावर्जयतीति यावत्। क्त-कथावैचित्यवर्त्मनि-काव्यस्य ...... वैचितयभावमार्गे। किविशिष्टे-इतिवृत्तपयुक्तेऽपि इतिहासपरिग्रहेडपि। तथेति यथाप्रयोगमपेक्षत इत्याह-यथा प्रबन्घस्य सकलस्यापि जीवतं भाति प्रकरणम्। येन प्रकारेण सर्गवन्धादे. सममरस्यापि प्राणप्रतिम-
उस प्रकार उत्पाद्य लेश मात्र के लावण्य से दूसरी वकता होती है-उस प्रकार कृत्रिम कथा की रमणीयता के कारण लोकोत्तर वकता की शोभा उत्पन्न हो जाती है अर्थात् सहृदमो को आकृष्ट करती है। कहां-कथा की विचित्रता के मार्ग मे-काव्य कीविचिन्नता के मार्ग मे। कैसे ' मार्ग) मे-इतिवुत्त में प्रयुक्त भी (मार्ग मे) अर्थाद इतिहास से ग्रहण किए गये (मार्ग) मे भी। (कारिका मे प्रयुक्त) तथा (शब्द) मथा के प्रयोग की अपेक्षा रकषता है अतः कहते हैं- जिससे सम्पूर्ण प्रबन्ध का भी (वह) प्रकरण प्राण रूप प्रतीत होना है। जिद प्रकार से सम्पूर्ण काव्यादि का भी प्रकरण प्राण सदय हो जाता है। किस स्वरूप वाला (करण)-काछा पर पहुँचे हुए रस से ओतप्रोत (प्रकरण)। अर्थात् .. पहली पक्ति मे आसन ग्रहण करने वाले शृद्गार आदि (रसो) से परिपूर्ण (प्रकरण प्राणभूत प्रतीत होने रगता है।) प्रकरणवक्रता के इस प्रकार के उदाहरण हूप मे कुन्तक अभिकान काकु न्तल में दुर्वासा ऋषि के घाप की प्रस्तावना तथा राजा के मस्तिष्क पर उसके प्रभाव को उदवृत कर उसकी व्याल्या करते हैं। इस प्रसद्ध में कुन्तक ने जिन श्लोकों को उद्धृत किया है वे इस प्रकार हैं-
विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोनिधिं बेस्सि न मामुपस्थितम्। स्मरिष्यति त्वां न स मोधितोषि सन् कर्था प्रमत्तः प्रथर्म क्ृवामिस॥८॥
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४१६ इकोकिजीचितिम्
ऋषि दुर्वासा दुष्पन्त के ध्यान मे मग्न दाकुन्तला को धाप देते हुए कहते हैं कि ऐ दाकुन्तले। अनन्य हुदय से जिसके विषय मे सोचती हुई तू अम्मागत मुघ्त तदस्वो को नही जान रही है, वह बताये जाने पर भी प्रमत के समान पहले की गइ वार्ता की तरह तुझे ाद नही करेगा। = । रम्याणि वीत्य नधुरांश्र निशम्य शब्दान् पर्युत्सुकोभवति यत् सुसितोऽपि जन्तु:। तन्चेनसा स्मरति नूनमबोधपूर्व भावस्थिराणि जो सुखी भी जीव रममोम (वस्तुओ) को देखकर तथा मीठे दन्दो को सुन कर उत्कछ्ठित हो जाया करते हैं ( इससे ऐसा लगता है कि) निश्चित ही वह (विषय विनेष के ज्ञान के विना वासना रूप से स्यित दूसरे ( पूर्व) जग्म के स्नेह सम्बन्धो को याद करता है॥ १ ।।
चिन्ताजागरण प्रतान्तनय नस्ने जोगुणादातमग: मम्कागेन्लिखिनो महामणिरिव क्षीणोऽपि नालट्यने।।?०।। (कन्चुको राजा दुष्यन्त को देखकर कहता है-) विशेष आाभगणो का धारण करना छोड देने वाले, बाई कलाई मे सोने के एक हो केरण को धारण किए हुए (विरह के कारण गर्म) सासो में साल हो गये अधर वाले एवं चिन्ता के कारण जागने से बहुत ही दुखती हुई मलो वाले ( राजा दुष्यन्त) अपनी तेजस्विना के कारण सान पर चढाये गये ( सरकारो ल्लिखित) मणि के समान क्षीन हो जाने पर भी क्षीण नही दिखाई पकतेह। १ ॥ अक्लिष्टमालत रुपज्ञवलोभनीयं पीतं मया सदयमेव स्तोर्सवेपु। रिम्बाघरं स्पृशसि चेद्भ्रमरप्रियाया रत्वां कारयामि कमलोदरबन्घनस्थम् ॥। ११।। (राजा दुष्यन्त चिंत्र में सकुन्तता के पास मेंडराते हुए औौरे को देखकर कहठे है कि) ऐ भौरे, यदि तू मेरे द्वारा सुरसोत्सवों मे दयालुता के साथ पिये गसे किसी के द्वारा भी मोजे न गए (अक्लिष्) नन्दें पोषे के पल्लव के समान सुन्दर विम्ब फल के सदच समल, मेरी मरिया के, नधर का स्पर्ध करता है वो कमस के भीवर सुमे बन्दी करा दूँया ।। १९॥।
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चुर्थानमेष:
उत्पाद्यलपलावण्यादिति द्विषा व्याखयेयन। कविदसदेवोतपाध मथवा आहृतम्, क्वनिदीचिन्यन्यक्तं मदप्यन्यथा सम्पाद्य सहदयहृद्या- हाटनाय। यथोदात्तराघये मारीनवध। तञ्व प्रागेव व्याख्यातम्।
स्प्रेशणीयम। एचमन्यटप्यस्या वक्रनाविचिछत्तववाहरणं महाकविमबन्घेषु स्वयमेनो
(कारिका मे प्रयुक्) 'उत्पाद्यलवावण्याद' इस पद की दो प्रकार से व्यास्था करनी चाहिए। कहीं तो ( इतिवृत्त में) न विद्यमान रहने वाला ही (सवरण) उत्पाद्य या काल्पनिक (प्रकरण होता है ओर) कही अनोचित्यपूर्ण (दङ्ग से) विद्यमान भी (प्रकरप) सहृदपो के हृदयो को आनन्दित करने के लिए दूसरे दद्ग से प्रस्तुत करने योग्य (बनाये जाने पर, उतपाद होता है) जैसे उदास- रायव मे मारीचवध। उसकी व्वाख्या पहले ही (प्रथम उन्मेष में) की जा चुकी है। इस प्रकार, प्रकरण) वकरता के इस सौन्दर्य के दूमरे भी उदाहरण (सहृदयो को) महाकवियों के काव्यो मे स्वय ही समझ लेना चाहिए। निरन्तरर सोद्ार गर्भतन्दर्भनिभराः। गिर कबीनां जीवन्नि न कथामात्रमाशिता॥१२॥ कवियों की वाणी केवल कया पर ही आश्रित होकर महो, अपितु निरन्तर रस का आस्वादन कराने वाले प्रसङ्गो के अनिशम से युक्त होकर जीवित रहती है ।। १२ ॥। इत्यन्नरश्लोक1 यह मन्तरदलोक है।
उपकार्योपकतृ त्वर्पारस्पन्दः परिस्फुर् ॥५॥ असामान्पसमुल्लेख प्रतिभा प्रतिभासिनः । मूते नूतनवक्रत्वरहस्यं कस्यचित्कयेः ॥६॥ प्रकरणवकता के अन्य (तृतीय) प्रकार को भी प्रकाशित करते हैं- किसरे ( प्रतिभासम्पन्न ही) कवि कौ लोकोत्तर वर्णन करने वाली शक्ति से देदीप्यमान प्रबन्ध के प्रकरणों का, फलबन्ध (वर्पात् मुरूय कार्य) का अनुवर्तेन करने वाला उपकार्य एव उपकारक भाव का माहात्म्य समुहसित होता हुआ वमिनव वक्ता के रहस्य को उत्पन्न करता है।। X ६।। सूते समुन्मीलयति। किम-नूतनवकत्वरद्स्पम् अमिनवबक १७ ६ु० जी०
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वफ्ोक्तिजीवितम्
भावोपनिषदम्। कस्यचित, न सर्वस्य कचे .... । पस्तुतीचित्यचार रचनाविचक्षणस्यति यावत। क-उपकार्योपर्कर्तृत्वपरिस्पन्दः, अनुप्रा ह्यानुम्राहकत्वमहिमा। कि कुर्वन्-परिस्फुरन् (समान (3) गीलन)। किविशिष्ट फलबन्धानुबन्धवान् प्रधानकार्यानुसन्धानवान, कार्यानु सन्धाननिपुण। कस्यवत्रिथ इत्याह-असामान्यसमुल्तस प्रति भा प्रति- भासिन.निरुप मोन्मीलितशाक्तविभावभ्राजिप्णो.। केषाम्-प्रबन्धस्यैक देशानाम् प्रकरणानाम्। तदिदमुक्तम्भवति-'सार्वत्रिकमत्रिवेश- शोभिना प्रबन्धाचयवाना प्रधानकार्यसम्बनधनिबन्धनानुमाहयपाह कभावः स्वभावसुभगप्रतिभापकाश्यमान कस्यचिद्विचक्षणस्य वक्रताचमन्का- रिण' कचेरलौकिक चकतोल्लखलावण्यं समुल्लासयति। उत्पन्न करता है अर्थात् प्रकाशित करता है। किसे नवीन वक्रता के रहस्य को, नये बाँकपन के यूढ तत्त्व को। किसी के, (यानी) सभी कवियो के नही."। अर्थात् वर्ण्यमान के अनुरूप सुन्दर रचना करने मे निपुण कवि के ही। कोन (प्रकाशित करता है) उपकार्य एव उपकारक भाव का परिस्पन्द अर्थात् अनु- ग्राह तथा अनुपाहक भाव का माहात्म्य। वमा करता हुआ-परिस्पुरित होता हुआ •। केसा (माहात्म्य/ फलबन्ध के अनुबन्ध वाला अर्थात् मुरय कार्य का अनुवर्तन करने वाला। किसका इस प्रकार का (माहात्म्य) इसे बतात है- असामान्य समुल्लेख वाली प्रतिभा से प्रतिभासित होने वाले का अर्थात् अनुपम वर्णन की शक्ति साम्री से देदीप्यमात (प्रबन्ध का)। किनका (माहात्म्य/- प्रबन्ध के एक अद्यो का अर्थात् प्रकरणो का माहात्म्य अभिनव वक्रता के रहस्य को उन्मीलित करता है।) तो कहने का आशय यह हुआ कि हर जगह प्राप्त होने वाले सम्यक प्रयोग से सुशोभित होने वाले प्रवन्ध के अवयवो (प्रकरणो) के प्रधान कार्य से सम्बन्ध का कारणभूत अनुपाह्य अनुगाहक भाव, सहज सुन्दर प्रतिभा से प्रकाशित होता हुआ, वक्ता के चमतकार को उत्पन्न करने वाले किसी दूरदर्शी कर्वि के बकता प्रतिपादन के लोकोततर सोन्दर्य को प्रकट करता है। यथा-पुष्पदूषित के द्विती ये ड्े प्रस्थानात्प्रतिनिवृत्य निविडानकारतः नवरायाविभावाद् अमन्दमदनोन्मादमुद्रेण ममुद्रदत्तेन निजमहिमकेतन
१. यहाँ डी०हे ने रिक्त स्थान छोड दिया था और पादटिप्पणो में मुल के इस पाठ को प्रश्नसूचक विछ्ध लगाकर दिया था। वह अर्थ सगत लगा अन. मैने उसे यहोँ रख दिया है। २. यहं श० डे ने रिक्स्थान छेद दिया था। तथा पादटिप्पणी में 'ियाया दर्वा पाठ दिया था। मैंने थर्या। का कोई मतनब न सगने से उसे छोट दिया है।
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चतुर्थोन्मेप ४११
तुज्यदिव प्मानन्तयन्नीसमाननाय मलिम्लचेनेत्र प्रविशता प्ररुम्पावेग विकलातम का गनिमा ननिहितिनिद्रम्य द्वारदेशशायिन कलदायमानस्यर कुवलयम्यात्कोचकरण स्करादडु नीयकदान यत्कृत तच्तुर्थडक्के मथुरा- प्रतिनिवृत्तेन तेनैवाशमदमम्य निष्कम्य समावेदिनममुद्रदत्तवृत्तान्नेन कुल कल दा नङ्करुदधर्गमानस्य सार्थवाहमागरवत्तस्य स्वतनयस्पर्शमान- समाविदूरम्नुपा शीलशुद्धिमुन्मीलयत्तदुपकाराय कल्व्यते। .....
जैमे-'पुष्पदूषिनक' म द्विनीय अङ्क मे, यात्रा मे लोट कर पूर्ण अनुक्ृतिवश नई सम्पत्ति के सम्यक सम्भावना के कारण कामदेव के प्रबल उन्माद की मुद्रा वाले समुद्रदत ने दिवसतुल्य अपने वैभवगृह मे आनन्दमन्ती को ले आने के लिए चोर की तरह प्रवेश करने हुए कपकपी के आवेग से विह्ल एव अलसाये हुए शरोर के गिराने से समाप्त निद्रा वाले, दरवाजे पर सोने वाले ( झगडा करने के लिए उतारू कुवलय के धूस को निमित्तभूत जो अँगूठी अपने हाथ से दिबा था वही चौथे अड्टू मे मथुरा से लोटे हुए उसी (कुवलय) द्वारा निष्कमण कर के बताये गये समुद्रदत के वृत्तान्त से, अद्वितीय इन्द्रियनिग्रह वाले परिवार के कलङ्ग के भय से कातर होने वाले व्यापारो सागरदत के अपने पुत्र के द्वारा रपर्शमान निकटस्य पुत्रवधू को (अवाँत् उमीके संसर्ग से गर्भवती उसकी बघू को - आचरण शुद्धि को उन्मीलित करती हुई उपकारक सिद्ध होती है।
यथा चोत्ररामचरिते प्रथुगर्भभरखेदितदेहाया विदेहराजदुहितु विनोदाय दाशरथिना चिरन्तनराजचरितचित्ररुचि दर्शयता निर्व्योन
स्यन्ति' इति यदमिहित तत्पञ्रमेडङ्टे प्रवीरचर्या चतुरेण चन्द्रकेतुना क्षण समरकेलिमाकाहता[ :]नदन्तरायकलित कलकलाइम्बराणा वरूथनीना सहज जयोत्कण्ठाभ्रा जिष्णार्जानकीनन्दनस्य जम्भकास्त्तयापारेण कमप्यु- पकारमुत्पादयति। तया च तत्र-
१. यहाँ पर हा० डे ने स्थान छोड दिवा या आर पाद टिप्पणो में उन्होंने 'महिम्लुचेनेत' के आगे (१) लगाकर 'मगिसुचैनेव" पाठ सधारा है। परन्तु कया साचकर देमा किया कह सकना कठिन है, जब कि 'मलिम्तुच' का अर्व चोर होता है और पाण्डुलिपि में पाया जाने वाला पाठ सही है। 'विधकौस' का कथन है-"मलिम्तुचो मासमेरे चौरज्वलनयो. पुमान्"। २. यहाँ मो डा० डे ने रिक्स्धान छोड दिया था। पादटिप्यणो में 'कदाह्ाय- मानसय' पाठ दिया था।
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४२० वकोपित जी पितम्
बोर जैसे- उत्तररमचरित मे-विशाल गर्ग के अतिदाय से पीडिन देहवाली विदेहराज सुता सीता के विनोद हेतु प्राचीन राजनरित वाले चित्रा क प्रति इच्छा प्रद्शित करते हुए राम ने निध्याज विजयी के विजूम्भित होते हुए जुम्भकास्त्रो को लक्ष्य करके 'अब सब प्रकार से ( ये जम्भकास्तर) तुम्हारी सन्तान के पाम रहेगे' ऐसा जो कहा या वह पञ्चम अद्दू मे वीरम्बहार मे निपुण चन्द्रोतु के साथ क्षणभर के लिए समरयीदा की आकाक्षा करने वाले तथा उसमे बिघ्न डालने के लिए कलकल शोर मचाने वहली सेनाओ को स्वाभाविरु रूप से जीतने की उत्कष्ठा वाले जानकीनन्दन लव के जम्भकार्यापार के द्वारा किसी अपूर्व उपकार को उत्पन्न करता है जैसे कि वहाँ (उत्तरशामचरित पचम अद्दू मे )। लघ :- भवतु जम्भकास्त्रेण तावत्सैन्यानि स्तम्भयामि । इनि। सुमन्त्र (मसम्भ्रमम्)-वत्स, कुमरेणानेन उम्भकासमभि मन्त्रितम। हब-होगा। तब तक जम्भकास के द्वारा सेनाओ को स्तन्ध किए देता हूँ। सुमन्न-(मबराहट के साथ) बेटा, इस कुमार के द्वारा जुम्भकासत्र का आवाहन किया गया है। चन्द्रकेतु :- आय, क. सन्देह: । व्यतिकर इव भीमा वैद्युतस्तामसञ्च पणणहितमपि चक्षुर्मस्तमुक्त हिनस्ति।
नियतम जितवीर्य जम्भते जुम्भकास्रम् ॥ !३॥ चन्द्रकेतु-श्रीमाम् जी, इसमे वया सन्देह है- उसी ओर पूरी तबह लगी हुई मोर काबू मे आकर सूब गई हुई आँख को अन्धकार और बिजुली के भमदवुर सम्पर्क-सा दुस दे रहा है। बर फिर यह सेना उत्कीर्ण सी निश्बेष्ट हो उठी है। यह निश्चित है कि (गह) अजेय धकि वाला जुम्भकास्तर ही उदीप्त हो रहा है। १३ ।। आश्च्यंम्-
रन्त:प्रस्फुरदारकूटम पिलज्योतिर्न्वलद्दीपिभि: 1
नीलाम्भोदत डित्कडार कुहरे बिन्ध्या द्रिकूटैरिव । १४॥ आाश्चर्ष है।।। पाठाल के भीतरी घुरमुटो मे एकम अन्धकार की तरह काले और सूब तपा दिए गए हुए व चमकते हुए पीतल की कपिल ज्योदि की वरह पसती शिसाओों
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वाले जुम्भकास्त्र के द्वारा आकाश आच्यादित होता जा रहा है। मानो कल्प के अवसान के समय प्रचण्ड और अत्मन्त-भयटूर तूफानों से उलट-पुलट दिए गए हुए और नीले बादलो तथा बिजुलियो के कारण पिङ़ल हो उठी हुई कन्दराओ वाले विन्ध्यागरि के शिखरो मे व्याप्त हो उठा हो॥ १४ ॥ इत्यानि। नत एक एवायम। 'एकदेशानान्' इपि बहुवचनम् अत्र द्वयो- रषि बहूनासुपकार्योपकारकत्व स्वयमुत्प्रक्षणीगम्। [यहा पर) यही एकवितित किया गया है। (इस प्रभग मे) 'एकदेशानाम्' इस पद में बहुवचन को दोना ही के प्रति बहुतो का उपकार्योपकारक भाव रूप स्वयं जान लेना चाहिए।
अस्या एव प्रकारन्तर प्रफाशयति-
प्रनिप्रकरणं प्रौद्गतिभाभोगयोजितः। एक एवाभिधेयात्मा वध्यमान: पुनः पुनः।।७।।
इसी (प्रकरणवक्रता) के अन्य (चनुर्ष। भेद का निरूपण करते हैं- प्रत्येक प्रकरण मे (कवि को) प्रदुद्ध प्रतिभा की परिपूर्णता से सम्पादित, पूर्णवया नवीन उद्ध से उस्विसित रसो एवम अलद्धार्ों से सुशोभित एक हो पदार्ष का स्वरूप बार-बार उपनिबद्ध होकर आइचर्म को उत्पन्न करने वाले, बकता की सृष्टि से उत्पन्न सौन्दर्य को पुष्ट करता है॥। ७-८ ॥ बष्जातोति अत्र निबिडयतानि यावन् । काम् चकरोद्गेभक्गोम्, वरुमावाविभाषात् शोभाम्। किंत्रिशिष्ाम्-उत्पादिताद्भुताम् कन्द- लितकुनूहलाम्। क :- एक एवाभिधेयात्मा, तदेव वस्तुस्वरूपम्। कि
फथम्-पुनः पुनः वारवारम्। क-प्रतिप्रकरणम्, प्रकरणे प्रकरणे स्थाने स्थान इति याबत्। यहँ 'बाँता है' का अर्थ है हढ़ या उुछ करता है। किसे-वकता के उद्भेद के कारण भद्गिमा को अर्यात् बाकान की सृष्टि से जन्य सोन्दर्य को ( पुत्र करता है) कैसी (भङ्गिमा) को? आरचय को उत्त करने वालो अर्थात् कोनूहल को जन्म देनेवाली। (भङ्गिमा को पुष्ट करता है।) कोन (पुट्ध करता है) एक हो अभिवेय की आत्मा अर्पाव् वही पदार्थ का स्वरूप। कया किया जाघा हुआ? वर्णित किया
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जाता हुआ. वर्ष्यमान के औचित्व से वारप सुन्दर रचना का विषय बनता हुआ । कैमे-पुन पुन बार बार (उपनिबद् होकर)। कहा-प्र्वेक प्रकरण मे, प्रकरण प्रकरण मे अर्मात स्थान स्थान पर (उपनिवल् होकर सोन्दर्म की पुष्टि करता है।। नन्वेषं पुनकक्तपात्रताममों समासादयती याह-अन्यूनन्तनोल्लेस
जिष्णु। यस्मात्प्रीढ प्रनिभाभोगयोजित:, प्रगम्भतरप्रत्ञप्रकरकाशिनः। अयमग्य परमार्थ-तदेव मरुलचन्द्रदयादिभ्करणप्रवारेपु वन्तु द्रस्तुतव धाम विधानवानरोधान्मा मुं. कर्णनवध्यमा सट र पारपूर्णपूर्ववि. लक्षण रूवाद्यल द्वाररामणीयप नन भेर भवात तठा कार्माप रामणीयक मर्यादा वत्रतामवनाश्यति । (इस पर पूर्वपस्षी प्रद्न करता है कि इस प्रकार (बार बार एक ही स्वरूप का वर्णन होने से तो। यह पुनरक(दोप। का भाजन बन जानगा? इस (का उत्तर देने के) लिए (ब्रन्थकार) कहता है कि-पूर्ण रूप मे तूतन उललेस वाले रसा एव अलद्धारो से उज्ज्वल अर्थात् अविकल दुङ्ग से नवीन रूप मे उपनिबद्ध किये गये शृद्धार आदि तथा रूपक आदि के विलसित से सुशोभित होने वाला (स्वरूप)। कयोकि वह प्रोउ प्रतिभा की पूर्णता से सम्पादित अर्थात् अत्यन्त प्रदृड (कवि की) वुद्धि वैभव से प्रकाशित हुआ। स्वरूप सौन्दर्य को उत्पन्न करता है। इसका सार यह है कि-इस प्रकार प्रकरण प्रकाश मे प्रस्तुत कपा की सघटना के अनुरोधवर वार-दार वर्मन किये जाने वाले चन्द्रोदय आदि पदार्थ यदि भलीभाति पहले से विलक्षण रूपकादि अलद्गारी की रमणीयता से ओतप्रोत होते हैं तो वे रमजीयता के पराकास्यभूत किसी लेवोत्तर बारपन को प्रस्तुत करते हैं। (इस प्रवरण वकता के उदाहरण रूप मे वुन्तक 'हर्षचरित' को उदकुत करते है। पर यह निश्चित रूप मे नही नहा जा सकता कि जिस प्रसङ्ध को विशेष रूप से निर्वेश करते हैं। उसरे बाद कुन्तरु विस्तृत रूप मे 'तापसवत्सराज चरित' नाटक के द्रकरण वतना ने दस भेर मे सं्बन्यित कुछ रमगीय उदाहरण इल्ेको को उदृत करते है। वे हृदय को प्रभावित करनेवाली द्विनीय अद्ध के प्रारम्भ की राजा को उतियो को उदयून कर उनका विवेचन करते हैं। कुरब कत रुर्गाडाश्लेप मुरगमचतालनाम्। घकुलविटपी रकाशोकस्तथा चरणाहतिम्।।१५॥। ग०है ने उक्त शनोक की केवल दो ही पक्ियां उद्भृत की है। इसके
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बाद पाष्ट्रुनिषि के अत्यन्त भ्रष्ट होने के कारण वे उमे पढ नहीं सके। श्रीयदु- गिरमनि राजमपततुमाररमानुजमुनि द्वारा प्रत्यवे नन अनल्भहर्पापरनाम शरीमात्र राजपणीत 'तापसवत्सराजनाटकम्' के द्वितीय अङ्ग का यह नेईसवां इलोक है। इसका उनराध्ध इस प्रकार हे- तब सुकतिन सम्भाव्यैते प्रसादमहोत्मवा- ननुगनदशा सर्वै (मर्वे) मर्वशमठो न वय यथा।। अन पूरे इडोक का अर्थ इस प्रकार होगा।- (के दवि वासवदत्ते ') कुरवकवृक्ष तुम्हारे गाढालिङन को, वकुलवृक्ष तुम्हारे मुख की मदिरा से लाठना को और रक्तानोक तुम्हारे चरणप्रतार को प्राप्त कर ये सभी पुण्यान्मा तुम्हारे प्रसादकप महोत्सव को प्राप्त होकर अनुकूल स्थिति वाले है। (ठीक ही है) सभी हमारी नरह शठ नही है। (अर्थात् मैंने शठना की है मत तुम्हारा प्रसाद मुझे नहीं प्राप्त हुआ ये सभी शठ न होने के कारण तुम्हारे प्रसाद भाजन बन गए है) ॥ १५ ॥ धारावेश्म विलोक्य दीनवदनो भान्वा लोलागृहा- ननिश्वस्यायनमाशु केशरलताबीथीपु कृत्वा दशः। कि मे पार्श्वमुपैषि पुत्रककृत कि चादुभि कररया मात्रा त्वपरिवर्जित मह मया यान्त्यातिदीघो भुबन्॥ १६॥ (राजा वासुवदत्ता के पालनू हरिण को सम्बोधित कर कहते हैं कि)-हे पुत्र। धारागृह को देखकर (वा सवदत्ता को नपाने मे) मलीन मुख वाला होकर, कोडागृहो मे घूमकर (वहाँ भी न पाने से, बडी बडी उसासे भर कर, शीघ्र ही वकुलबृस् की लताओ की मलियो मे नजर दोड़ा कर मेरे पास कयो आ रहा है? (झूठे) प्रियवचनो से क्या लाभ? (नषाकि) कठोर हृदय (तुम्हारी) माता ने बहुत दूर देश (स्वर्ग) को जाते हुए मेरे हो साथ तुम्हें भी तयाग दिया है। (अब उमसे मिलना वसम्भव है) ॥ १६ ॥ भूय समाकर्षता चब्च्या दाडिमनीजमित्यभिहृता पाहेन गण्डस्थली। येनासौ तब तस्य नर्मसुहदः खेदानमुह्ु कनदतो निःशाङक न शुकस्य किं प्रतिबचो देयि त्वया नीयते ॥१७॥। हे देदि (वासवसते)। कानो के बगल मे सगी हुई पद्मराग मणि को कली को अनार का बंज समक्ष कर चोच से सोनते हुए जिसने तुम्हारी इस कपोल- स्थली पर प्रहार किया था उस अपने नर्म सुदृद (अपने वियोग से उत्पन्न) धोक के कारण बार बार चिज्ाते हुए तोते की बातो का नि शुक् होकर तुम बवाब भी नहीं देवी॥। १७ ॥
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व्कोकिशीरितस्
राजा (साल््रम)- सर्वत्र जवलितेपु वेश्मसु भयादालीवने विद्वते त्रासोत्कम्पचिहस्तया प्रातपद देव्या पतन्त्या तदा। हा नाथेति मुहु प्रलापपरया दग्प वराक्या तथा शान्तेनापि घयं तु तेन दहनेनाद्यापि दस्यामह्ये। ?= ॥ राजा (रोने हुये)-सब ओर घरो मे आग लग जाने पर, हर कर महेफियो के भाग जाने पर उस समम भव के आवेग से बेसदवारा पग पग पर गिरती हुई एव बार-बार हा स्वामिन् हा स्वामिन्।ऐसा िल्लती हुई, वह देचारी देवी उसी प्रकार जलों कि धान्त हो गई भी उस आग से हम आज भी जले जा रहे हैं।। १८ ॥ उक्त उदरण की अन्तिम पर्कति 'शान्तेनापि यम तुव्षैन दहनेनादयापि दह्याम्दे' मे प्रयुक्त विरोधालद्वार' को कुन्तक करण रस का सहामक प्रतिपादित करते है।
इसके वाद चतुर्थ बद्ध का यह श्लोक उद्धृन करते हैं- च्यतुथेडक्टे राजा (सकरुणमान्मगतम्)- चतुर्थ अद्ू मे राजा [ककणापूर्वर अपने मन मे)- चक्षुर्यस्य सवाननादपगत नाभूत क्वचिन्निषृतं येनैा सतत त्वदेकशयन वक्षस्थली कल्पिता। सेनोक्तासि त्वया बिना वत अगच्छून्य क्षणाजायते सोडयं दम्भधृतवनः प्रियतमे कहुं किमप्युद्यटः॥। १६।। हे प्रियतमे ! जिसकी आँख कभी भी तुम्हारे मुख पर से हट कर सुखी नहीं हुई, जिसने हमेशया इस वक्ष रपली को केवल तुम्हारी शय्या बनाया था, जिसने तुमसे कहा था कि 'तुम्हारे बिना सारा ससार क्षण भर ने सून्य हो जाता है, बह़ी यह सूठ हो ( एक पत्नी) व्रत को धारण करने वाला ( राजा उदयन) कुछ (द्वितीय विवाह रूप निर्षण कार्य) करने के लिए तैवार हो गया है। "॥ इस उदरण के बाद पल्पम असतू से निम्न श्लोक को उदभृत करते हैं। वस्तुवः भुदित वापसवत्सराज मे भी चुर्य बछ्ू २१ मे ब्लोक के बाद समास्त होता है। पपमें शद्ध के प्रारम्भ की कुछ पक्तियों को उदभृत कर सम्पादक ने संकेत किया है कि बीच मे प्रन्यथाव के कारण बहुत सा पाठ अप्राव्य रहा है। उपो बाद के 'ढकभूते वस्मिन मुनिववसि' इत्यादि पद् को उद्भुत कर इस 'श्रुभङ्ग रुविरे' इत्मादि पद्य को उदृव करते है जिसका पाठ इससे कुछ भिन्न है जो इस प्रकार है-
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पतुर्चोम्मेय
अमङ्ज रुचिरे ललाटफलके दूरं समारोपपेत् .. व्यावृत्येव समागते ममि सखीमालीक्य लज्जानता सिष्ठेरि्क कृतकोपचारकरणैरायासयेन्मा प्रिया ।।) भ्रुभद्गं रुचिरे लल्नाटफलके तार समारोपयन् राष्पाम्युप्लुनपीतपचरचनां कुर्यात्कपोलम्थलीम्।
तिष्ेत्कि कृतकोपभारकरुणैराश्वासयैनां प्रियाम्॥ २० ।। लज्नाननां
काश । सुन्दर भालपटल पर काफी बड़ी भ्रभन्गिमा को प्रस्तुत कर देवी ओर गण्डस्थल को अणजल की धारा से घाट लो गई हुई ( धो दी गई हुई। पत- रचना वाली बना देती। (साथ ही। मेरे पहुँच जाने पर अपनी महेलो को देख कर मुड कर लाज के मारे झुक कर खडी हो जाती तथा क्या ऐसा हो सकता है कि मेरी प्रियतमा बनावटी उपचार को कर कर के मुझे परेशान करती॥ २०॥ इसके बाद पञचम अद के 'कि प्राणा न' आदि श्लोक को कुम्तक उद्पृत कर व्याह्या करते हैं कि इस श्लोक मे वर्णित राजा की उन्मादावस्था करुण रस करे अत्यधिक उद्दोप्त करती है।-यह कलोक तापसवतसराज ५I२५ के रूप मे उद्धृत है वहां कुछ पाठसेद इस प्रकार है-1 प्रतितर B.विलीमितेन + C. पुनरप्यूढ न पापेन किं। किं प्राणा न मया तवानुगमनं कर्तु समुत्साहिता पद्धा किन्र जटा न वा प्ररुदित* भ्रान्तं वने निर्जने। वत्सम्प्रापिविलोभनेन® पुनरप्यूनेन पापेन कि कि कृत्वा कुपिता यद्च न वचस्त्व मे ददासि प्रिये॥२१॥ हे प्रियतमे। वया मेंने तुम्हे पाने की लाल्षय से तुम्हारा अनुगमन करने के लिये (अपने) प्राणों को समुत्साहित नहीं किया, कया मैंने जटायें नही बाधी अथवा रोया नहीं यह कि सुनसान जङ्गल मे भटका नहीं फिर भी थोडे से अपराध के कारण कया कया सोचकर तुम नाराज हो जो आज मुझे (मेरी बातो का) जवाब भी नहीं दे रही हो।। २१।। इति। 'रोदिति' इत्यन्तेन मनागुन्मादमुद्राप्युन्मीलिता तमेव [करुणरसमेव] प्रोद्दीपयति। इस प्रकार 'रोता है' यहां तक थोडो उन्मीलिन की गई उन्माद की अवस्पा भी उस्ो (करण रख को हो) भलीभाँति वद्दीप्त करती है।
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षछ्टेड्द्रे राजा हा देवि। छउव अद्धू में राजा-हा देवि। न स्यम्भानिविलोमनेन सनिषे माणा मया धारिता स्तन्मत्वा त्यलन, शररकमिट नैवास्ति नि स्नेहता। आनत्राऽवमरस्तथानुगमने जाना धृति" किन्त्य सेदी यच्छृतधा गत म हृदय तद्वन् क्षणे दारुणे।। न२।। तुम्हारे सम्मलन की त्नव द्वारा अमात्मों ने मुझमे प्राम धारण करवाया (अन्यक्ष मैं भर गय्ा होता) (किन्तु नुम्हारे ने मिलने से सेवन प्रलोनन हो) उसको जानकर इस शरीर क परित्याम करते हुए भी तुममे स्नेह नही है ऐसी बाह नही। समन जा गया है तथा तुम्हारा अनुगमन करने के लिए वैर्य भी उत्पन्न हो गया है लेकिन कष्ट तो इसी बात का है कि जो यह मेरा हृदय उस प्रकार के दारूग समय में सौ टुकडे नहीं हो गया ।। २२।। इस प्रकार प्रकरणवकरता के इस भेद के उदाहरण रूप मे तापसवत्यराज से उद्रणों की प्रस्तुन कर कुन्तर रघुबंध व नवम सर्ग में वणित राजा दरगरय के मृगमाप्रकरण का निर्देध करते हुए विवेचत करते है कि- प्रमाद्ता दशरथेन राज्ञा स्धविरान्धनपास्ववालवधो व्वधीयनेति एकवाक्यराक्यप्रतिपादन. पुतरप्ययमथं: परमार्थसरससरस्वतीसर्वस्वा- यमानप्रातभाविधान कनेशेन ताहश्या विश्व्वित्या विस्फुरितसे वनन्वमत्का -
'प्रमाय्युक्त राजा दशरप ने वुद्ध अन्धे तपस्वो के बालक का बम किया' मह 'अर्थ) एक वाकय के द्वारा भी प्रतिपादित किया जा सकता या फिर भी यह अर्थ पस्तुत सरस वाणी के सर्वस्वभूत (मदाकवि कालिदास) की शक्ति के निर्माण के वेशमात्र से जस प्रकार के (लोकोसर) सोन्दर्यसे प्रकाश्ित होकर सहदयो के लिए चमतकारजनक हो गया है। इस के वाद कुम्क इस मृगया प्रसङ्ग के कवि दवटा किये गये निरूपण का विस्तारपूर्व कु विवेचन प्रस्तुत करते हैं-
फुललासनामविटपानिव वायुरुग्णान्। शिक्षाविशेपलघुह्स्ततया निमेषा- चूीचकार शरपूरितवक्त्ररन्भान्।। २३ ।।
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निर्भोक (धनुर्धर राजा दशरथ) ने कन्दराओ से सामने की ओर उछलल कर जाने हुए, हवा से भग्न खिले हुए वन्धक (पुप्प के वृक्षो) की आगे की डलो रे समान (स्यित), अभ्यास के आधिक्य से मिद्धहस्त होने के कारण पल भर मे वाो से भर दिए गये मुखविवर वाले उन व्यात्नों को निषङ्ग बना दिया॥ अपि तुरगसमीपादुत्पतन्त मयूर न स रुचिरकलापं बाणलत्यीचकार। मपदि गतमनस्कश्चित्रमान्यानुकीर्णे रतिविगलितबन्धे केशपाशे प्रियाया ॥२४॥ उम (राजा दशरथ) ने (अपने) घोडे के अत्यन्त पास से उडे हुए (सुप्रहार योध्य) भी मनोहर पूछ वाले मयूर पर (उनकी पूछ से साम्य होने के वारण) विविध वर्णों वाले पुष्पो की माला से गूँथे गए एव सम्भोग के समय खुल गई गांठ वाले प्रिया के के शपाश में प्रवृत चित वाले होकर बाण का निज्ञाना नही बनाया ॥ २४ ॥! लक्यीकृतस्य हरिणस्य हरिप्रभाव: प्रेक्षय स्थिता महचरी व्यवधाय देहम्। आकर्णकृष्टमपि कामिनया स धन्वी बाण कृपामृदुमना प्रतिसक्षहार ॥ =५॥ ( विष्णु मा) इन्द्र के समान पराशम वाले धनुर्धर उस ( राजा दशरय) ने (अपने बाण के) लक्ष्य बनाये गये मृग की देह को (प्रेमवश) छिपाने के लिए ( उसके सामने) लगी हो गई (उसकी) सहचरी को देस कर (स्यम) कामुकु होने के कारण करुणा से आर्द्र हृदय होकर श्रवणपर्यन्त खोंच लिए गए बाण को भी ( धनुष पर से) उतार लिया॥ २५॥
स
नरपातर तिवाह्याम्बभूव
उम राजा (दशरथ) ने परिच्यद् (अर्थान् परिजनों अथवा शयनादि की सामग्रीसे रहित होकर कहो (या कभी-कभी) मनोहर फूलों एव पतो की सेजवाली तथा अत्यन्त प्रकाशमान महोषधियो रूप दीपिकाओ से युक्त रात्ि को बिजाया। (भाव यह कि वे शिकार में इसने व्यस्त हो गए कि सभी साथी एव सामप्री पीचे हो सूट गई अत इन्हें फूलों एवं पत्तों पर ही सोकर कभी-कभी राठ बिवानी पडी।)॥ २६ ।।
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(दृति) विस्मृतान्यकरणोयमातमनः सचिषावलम्बितघुरं धराधिपम्।
मृगया जदार चतुरव कामिनी ॥ ६७ ॥ इस प्रकार (पूर्वोक्त ठद्ध से मृगया मे भिन राज्यसम्बन्धी) अपने अच्य कार्यों को भूले हुए, एव मन्नियो पर आश्रित राज्यभार वाले तथा निरन्नर सेवा के कारण (अपने प्रति) बढे हुए अनुराग वाले राजा (दरदप) को विदाय रमणी के समान मृगया ने अपनी ओर आकृषट कर लिया॥ २७॥ अथ जातु ररीर्परदा तवन्मा विपिने पारश्धंचरैरलदयमाण। समफनमुषा तपस्विगाढा तमसा प्राप नदी तुरहमेण।। न=॥ इस के अनन्तर कभी रष (मृगयिरोष) के मार्ग को पकहे हुए ( अर्थाद उसका पीछा किए हुए। जङगत मे साप चनने वालो द्वारा न दिखाई पड़ने वाले राजा ददारप, [अत्यधिक वगपूर्वक दोडने के) परिश्रम के कारण मुह मे फेन गिराने वाले घोड़े से मुनियों द्वारा सेवन को जाने वालो तमसा (नामक)नदो को भाप्त किया॥ २८॥
सानुमद्दो भगवता मयि पातितोऽयम्। कप्यां दह्ञपि खल क्षितिभिन्धनेद्वो बीजपरदजननी जलनः करोति॥।२॥ पुत्र के मुखकमल की शोभा को न देखनेवाले मुझ (दमरव) के प्रति दिया पथा आपका (पुत्र शोक से तुम भी मरोगे। यह शाप भी उपकारयुक्त ही है। अर्थात् मेरे पुन नही है, अब वापके दाप को सफल करने के लिए मुझे अवइम ही पुजर की प्राप्ति होगी। अत यह आपका दाप मेरे लिए उदकारपूर्ण है। कयों न हो ?) काछ से प्रभ्लित हुई आग खेती के योग्य भूमि को भस्म करती हुई भी बीज के अदूरों को उत्पन्न करने मे धमर्थ बना देता है।। २९॥ कथावैचित्यमात्रं तद्वकिमाणं ग्रपद्यते। यदद्गं सर्गवन्धादे: सौन्दर्याय निवध्यते॥ ९॥ काव्य की विचिनता का भाजन जो अन्ध (सर्थात् प्रकरण) काम्य आदि की
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सुन्दरता के लिये उपनिबद्ध किया जाता है, वह (प्रकरण) वकता को प्राप्त करता है। ९ ॥
प्रसन्गेनास्या एवं प्रभेदान्तरमुन्मील्तयति। कि विशिष्टम्-कथावैचितयपात्रम्, प्रस्तुतमविधानरभङ्गीभाजनम्। कि चक्रिमाणम्।
तन-यदद्ग सर्गेबन्धादे सौन्न्यीय निबष्यते। यज्जलकीडादिप्रवरणं महःकाव्यप्रभृतेरुपशोभा निष्पत्ये निवेश्यते । अयमस्य परमार्थ- प्रबन्धेपु जलके लिकुसु माव चयप्रभृति प्रकरण प्रक्रान्तसविधानकानुबन्धि निबध्यमानं निघानमिव कमनीयसम्पद सम्पद्यने। नरसङ्गानुकूल इसी (प्रकरण वकरता के दूसरे भेद को प्रकराशिन करते है। **. * वक्र्कत्वा को (प्राप्त होता है) कैसा-कथावेचितप् का पात्र, अर्थान् प्रस्तुत योजना की वि्छिति के योग्य प्रकरण)। क्या है वह-जो प्रकरण महाकाव्य आदि के सोन्दर्य के लिए उपनिबद्ध किया जाता है। जो जलविहार आदि प्रकरण महाकाव्य आदि की सोन्दर्यसिद्धि के लिये सन्निविष्ट किया जाता है। इसका सार यह है कि -प्रबन्धो में प्रस्तुत योजना से सम्बन्धित रूप मे जलकीडा एव पुष्पचयन आादि न्करण उपनिवद्ध होकर रमणीयसम्पति के कोश बैन जाते है। अथोर्मिलोलोन्मढराजहंसे रोघोलतापुतपवहे मरया। विदर्तुमिच्छा वनितामखस्य तस्याम्भमि श्रीष्मसुखे बभूब ॥ ३०।। इसके मननतर लहरों मे ( रमणहेतु) सतृष्ण एव उन्मत्त राजहंसी चाले तट की लनाओ के फूलो के बहाने वाले, एव गर्मो मे सुख देने वाले, सरयू नदी के, जल मे उन, कुश) को परनी के साथ विहार करने की इच्छा हुई॥ ३०॥ इस प्रकार विहार करने की इच्छा होने पर कुश का वनिताओ के साथ सरयू के तट पर डेरा पठ गया। पहले खियों ने जल में प्रवेध किया। उन्हें स्नान करते देख कर कुश भी जल मे कूद कर अलविहार करने लगे। उन्हीं के साप विहार करते समम कुश की सुजा पर बधा हुआ 'जेत्र' नामक आभूपण पानी मे गिर पहा जिसे राम ने राज्य के साथ हो कुश को दे दिया या जिसे उन्हें ऋृषि अगस्त्य ने प्रदान किया पा और जो सदा जिताने वाला था। स्नान के मनन्तर उस आभूषण को धीवरों ने बहुत खोना पर न या सके और आकर कुछ से कहा कि शामद लोभवश तस जल मे रहने वाले कुमुद नामक नाग ने उसे पुरा लिया है। मह सुनते ही कोधपूर्यक कुश ने ज्यों हो धनुष उठाया, सभी जल के जीव जन्तु व्याकुल हो गये। इतने मे ही एक कन्या को साथ मे लिए जैन आाभूषण हाथ में लिए कुमुदनाग निकल कर कुछ से कहता है कि-
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Y३० व शोक्तिजीबितम्
अवैमि कार्यान्तर मातुपस्य विप्णो सुताल्यामपरां तनुं त्वाम्। सोऽड कथन्राम नवाचरेयमाराधनीयत्य घृतेविघानम।३१।। मैं तुम्हे (रक्षस विनाश रूप) कार्य हेतु मनुष्य रूप धारण करने वाले विष्णु की पुत्र कहे जाने वाली मूर्ति समसता हूँ भल वही में पूजनोय आपकी प्रोति का (धृ प्रीतो' इति धातो त्िया किन्। विषाव कैसे कर सकता हूँ। अर्थात आपसे शघुता का आचरण केमे कर सकता हूँ) ॥३१॥ कराभिघातोस्थित कन्दुकेयमालोक्य बालातिकुतूहलेन। हदात्पतज्ज्योतिश्वान्तरिक्षादादन्त वैत्राभरण त्वदीयम्॥ ३२।। हाथ के धरके से उछन गए गेद वालो इस बाला ( कुनुदती) ने अत्यन्त कुतूहल के साथ अन्त्रिक् से गिरते हुए नक्षत के समान तालाब से गिरने हुए आप के 'जैत्र' नामक आभूषण को पकड लिया॥ ३२ ॥ AC भुजेन रक्षापरिघेण भूमेरुपैतु योग पुनरंसलेन॥।३३॥ तो यह (आभूषण) पुन आपके घुटनो तक लढकने वालो, प्रत्यन्चा की चोट की रेखा के चिह्न रूप लाञ्छन वालो भूमि को रक्षा के लिये अर्गल रूप बलवान् भुजा से युक्त हो जाये ( अर्थात् इसे आप अपनी मुजा मे बाध ले) ॥३३ ॥ इमां स्वसारख्व यवीयरसी मे कुमुद्वनीं नाहंमि नानुमन्तुम्। आत्मापराध नुदतीं चिराय शुम्नूषया पार्थिव पादयोस्ते॥३४।। तथा हे राजन्। आपके चरणों को चिरकाल तक सेवा के द्वारा अपने (आभूषण हरण रूप) अपराध को मिटाने को इच्छा वाली इस मेरी छोटी बहन कुमुद्रतो को आाज्ञा प्रदान करने की कृपा करे॥ ३४॥ पुनरष्यस्या' प्रभेदमुद्भावयति- यत्राङ्गिरसनिष्यन्दनिकपः कोऽप लक्ष्यते। पूर्वोत्तरैरसम्पाद्यः साङ्कादे: कापि चक्रता ॥ १० ॥ फिर भी इस (प्रकरण वक्ता) के प्रभेद को प्रकाशित करते है- जहों पर पहले तथा बाद के (अद्ठो) द्वारा सम्पादित न को जाने वालो अङ्धी रख के प्रवाह को कोई विशेष कसोटी दिखाई पडती है वह अन्ट आदि (प्रकरण) को कोई लोकोत्तर वकता होती है।। १० ।। साद्कादे कापि वकता ..... प्रकरणस्य सा काप्यलौ ककी वक्रता चक्रभावो भवतीति सम्बन्ध । यत्राद्विरसनिध्यन्दनिकप. कोऽपि
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चतुर्तान्मेष ४३१
लक्ष्यते-यत्र यस्यामङ्गी रमो य प्राणरूप तस्य निध्यन् प्रवाह, सस्य काज्नस्येव निकप: परीक्षापडविषयो विशेष कोर्ऽप 'भृतनिर्वाण निरुपमो लक्यते ·. । कि विशिष्ट पूर्वोत्तरैरममम्पाद्य:, प्राक्परवृत्तेरङ्वादे, सम्पादयितुमशक्यः । गथा- वह अङ्ध आदि की कोई वकता (होती है). 'प्रकरण की वह कोई लोकोत्तर वकता अर्थात बाकपन होता है। जहाँ अङ्गी (प्रधान) रस के प्रवाह की फोई कसोटो दिखाई पडती है। जहाँ अर्थान् जिसमे जो प्राणभूत मुख्य रस होता है, उसका निष्यन्द अर्थात् जो प्रवाह उसकी सोने की कसोटी के समान परीक्षा- स्थान का कोई विशेष विषय प्राणी के मोक्षनुल्य निरुपम परिलक्षित होता है। कैसा-(विषय)-पूर्व तथा उत्तर वालो के द्वारा असम्पादय अर्थात् पहले तथा बाद मे स्थित अङ्भ आदि के द्वारा सम्पादित न किया जा सकने वाला (विशेष दिखाई पडता है)। जैसे-
तथा च तुदुपकम एव राजा (ससम्भ्रमम् )-आ दुरात्मन्, तिप् तिष्ट, क नु खलु प्रियतमामादाय गच्छसि । (विलोक्य) कथ शैल- शिसराद् गगनमुत्प्लत्य बाणेर्मोमाअवर्पात। (विभाव्य सवा्पम्) कथ विश्र लब्घोर्ड्मि। विक्रमोरवशीय मे 'उन्मत्ताङ'। (जहा) विप्रलम्भ शृद्धार बङ्गी रस है। जैसे कि उसके प्रारम्भ मे ही-राजा (पबडाहट के साथ) ऐ दुरातमा, ठहर, ठहुर। (मेरी) प्रियतमा को लेकर कहां जा रहा है? (देख कर) अरे। मह पहाड को चोटी से आकाश मे उड़ कर मुझ पर बाण बरसा रहा है। ( समझ कर भाखो मे आसू भर कर) कैसा ठगा गया हूँ। नवजलधर सन्नदोडय न हमनिशाचर सुरधनुरिद दूराकृष्ट न नाम शरासनम्। अयमपि पटुर्धोरामारो न बाणपरम्परा कनकनिरुपसिलिग्धा विद्युत प्रिया न ममोवशी॥ ३५ ॥ (आकाश म दिखाई पशने वाला यह तो नवीन बादल है न कि युद्ध करने के लिए तैयार मतवाला राक्षश। दूर तक खोचा गया यह इन्द्र का धनुष है न कि राक्षस का धनुष। तथा यह भी तीव जलधारा का सम्पात है नकि वाणो
१ यहाँ डा. डे ने 'भूतनिर्याण' को मूल से हटा कर पता नहीं क्यों पाइटिप्पणी मैं दे दिया था। इमने वसे सगव समझ कर भूरु में दे दिया है।
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को परम्पया। तथा यह सोने की सान पर खोवी गई रेखा के हमान चमरुदार बिजली है न कि मेरी प्यारी उवेशी ॥३५॥ (अन्य)- ददूम्यां स्पृशेदसुमतीम् ..... । इत्यादि ॥ ३६ ।। (ओर भी ) (उद्ाहरण सख्या ३।२६ पर पूर्वोदतृत) पद्या स्पृरेदसुमतिय्-॥। इत्यादि क्लोक ॥ ३६ ॥ (अन्यय्न/- तरकभ्रभद्गा क्षुभतविहगशेणिरसना। इत्यादि ३७॥ (तषा) उदाहरण सरूया श४१ पर पहले उदृत तरग भ्रुभङ्गासषुभितविहृग श्रेगिरसना । इत्यादि श्लोक ।। ३७ । यथा चा किरातार्जुनीये वाट्युद्धमकरणम्। अथषा जैसे-किराता जुनीय मे बाहयुद्ध का प्रकरण जहां वीर रस उद्दीप्त किया गया है।। पुर्णारमामेवान्यथा प्रथयात- फिर इसी (प्रकरणवकता) को दूसरे बद्ध से प्रस्तुत करते है- प्रधानवस्तुनिष्पच्ये वस्त्वन्तरविचित्रता। यत्रोह्लसति सोल्लेखा सापराप्यस्य वक्रता ॥ ११ ॥ प्रधाम (आधिकारिक) वस्तु की सिद्धि के लिए जहा श्न्य (प्रास्तङ्गिक) वस्तु का उल्लेवपूर्ण विचित्रता उत्मीलित होती है वह इस (प्रकरण) को अन्य (सातवी) बकता होती है।। ११ ॥ अपरापि अस्य प्रकरणस्य वकता वक्रभावो भवतीति सम्बन्ध:। यतोह्णसति उन्मोलति सोक्षेखा अभिनवोद्रेदभद्गीसुभगा ...... प्रतिरूप- मितर द्वस्तु तस्य विचिन्रता षैचिन्यं नूननचमत्कार इति यावसू। किमर्थम्-प्रधानवस्तुनिष्वतये। प्र धानमविकृतं प्रकार्ण कामपि षकि माणमाक्कामति। इस प्रकरण की दूसरी भी बमता अर्थात् बोकपन होता है। जहाँ (उद्मित अर्थात् उम्मीलित होती है। जल्लेसपूर्ण अर्थात् नवीन वन्मेद की भज्जिमा से रमणीय ... "पतिरूप जो दूरी (प्रासतम्मिक) वस्तु उसकी विचिन्नता वर्थाप वचित्र्य तपमा अभिनय चकत्कार (जहाँ तम्मीलित होता है) किसलिए-
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चतुर्मोन्मेष. ४१३
प्रधान वस्तु की निष्पतति के लिए। [जिसके कारण) प्रधान, प्रकरण किसी अद्वितीय सोन्दर्य को प्राप्त करता है। इस प्रफरणवकता के सदाहरण रूप में कुन्तक ने 'मुद्राराक्षस' के यह मद्ग के उस प्रकरण को प्रस्तुत किया है जिसमें कि जिष्णुदास का मित्र बना हुआ एक रज्जुधारी पुरुप जिप्सुदाय के अग्निप्रवेध को जानकर आत्महत्या करने के प्रयास मे महामात्य राक्षस द्वारा अपनो आात्महत्या का कारण पूछने पर अपने मित्र जिष्णुदास के अग्निप्रवेश को बताता है। तथा जिप्णुदास के अग्निप्रवेश का कारण उसके मिन चन्दनदास (जो किमहामात्य राक्षस के परिवार की रक्षा करने के कारण मारा जाता है उस) को बचाता है। इस प्रसङ्ग में कुंतक ने मधोलिसित 'छगगुण' आ्दि पद्य को उद्ृत कर उसकी व्यास्या प्रस्तुत की है किन्तु पाण्ड्ुलिपि के मत्यन्त भ्रष्ट होने के कारण वह पढ़ी नहीं जा सकी। उक्त इलोक इस प्रकार है- (ततः प्रविशति रज्जुहस्त: पुरुष:) (इस के अनन्तर हाथ मे रस्सी लिए एक पुरु्ष प्रवेश करता है) पुरुप :- उवाअपरिवाडिदपासमुही। चाणक्कणीदिरञ्जू रिउसक्षमणउजुआ जअदि॥ ३॥ [ पडुणसंयोगटढा उपायर्पारपाटीघटितपाशमुखी। चाणक्यनीतिरज्जू रिपुसंयमनऋाजुका जर्यति ।]1
- नोट-इस श्लोक को उदधृत करने के बाद आघाये विश्वेश्वर जी ने वस पुरुष के आगे के कपन को भी ठदत किया है जब कि उसका कोई निर्देश डा है ने नहीं किया। इस वहोक के बाद इमने जो अंस उद्ृत किया है उसके बीच में 'सुदाराइस' में पयभाग के अतिरिक्त ११ पध और मी है। कोई मी मन्यकार उना रहा प्रकरण नहीं उद्पुत करेगा। साथ ही उस पूरे प्रकरण से इस प्रकरण वक्रता पर कोई विशेष असर मो नहीं पहता। डा० टे ने उस पूरे प्रकरण के विषय में नहीं निर्देश किया। उनका कहना है- "As an example is quoted the episode from the selnga iotroduced with तवः प्रविकति रजुइस्त पुरुषः (Act VI ) and the conversation which follows. in this conbexion the verse परगुगसजोमदिदा (Act VI. 4) quoted and commented on, but the verse is so corrupt in the Ms. that it is almost beyond recog- mhon. The drif of the whole conversation beiwcen tie २० ग० जी०
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वकोकिजीवितम्
पुष्र-(सन्धि, विग्रह, यान, आसन, दैधीभाव तथा आथ्य रूप, पाड्पुष्प के सयोग से सुदृद तथा (साम, दाम, दण्ड और भेद रूप) उपायो की दरम्परा से निर्मित पारमुख वाली चामकन को नीतिछ रह्तियो (अचवा ६ गुनी र्सियों) के संयोग से सुदृढ अनेको उपायो से निर्मित फन्देवाली रस्सी के समान पतु को वच मे करने ( या बाधने में बडी ही सरलता से समर्प है (अठः) सर्वोत्कर्ष युक्त है।। ३८ ॥ इस पद्य की उन्होंने कया आलोचना की यह पता नहीं, उसके बाद उन्होंने नोने उद्धृत प्रकरण को उद्धृत किया है तथा उसकी भी प्रकरणवकता को दिखाते हए व्यार्या की है जो पही नहीं जा स ही। वह प्रकरण इस प्रकार है- राक्षान-मद्र! अथासिमनेशे तब सुदृदः को हेतुः? किमापधिषथा तिगरुपहतो मदाव्याधिमिः। रक्षम-अच्छा महाशाय जी। आप के मित्र के अग्नि में प्रवेध करने का कया कारण है ? कया ओषभिपथ का अतिनमम करने वाली : दवाओी से असाध्य) महाव्याधियो के द्वारा उत्पीडित है (जो मरना चाहते है) पुरुष :- अज्न! णहि गहि।। आर्य! नाहि नहि।! पुष्प-शीमान् जो, नहीं, नहीं (ऐसी बात नहीं है) राक्षस-कियभित्रिषक:पया नरपतेनिरस्तः कुधा ? राक्षस-(तो) कया अग्नि और विष के समान (भयंकर) राजा के शोष से प्रवाहित किए गए है ! जो मरना चाहते हैं)। पुरुष :- अब्न! सन्तं पार्ष, सन्त पावं। चन्दउत्तरस अणपदेसु अणिसंसा पर्विक्षी।(आर्य१ शान्तं पापं शान्तं पापम्। चन्द्रगुनत्य जनपदेण्वनृशसा प्रतिपत्ति:।
and the gरe reistiog to चन्दून begining with मंद्रमुख, नमपवंश सुददरते को हत- and ending with पुरुष swords अजज बभई is explat ned with reference to the above IR(T." ( qo at. to REr) स्पषटटे कि यदि आचार्य को ड० डेके इस कवन को सावधानी से समझ्षे वो उन्हें यह लिसने कौ भावशवरता न पडतो कि- "उदरण बहुत एम्शा हो जाने के भम से दरशे बीच का बहुन सा माग छोड़ दिया गया है" (व० जी० ६ृ० ५१९) क्योंकि यदि मन्यन्वतो ने उस माग को अपनी पा्डुरिषि में उद्धुत् कर रसा हे तो सम्पादक को कया अषिकार कि उसे घटा दे।
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चतुर्थोग्मेष: ४३५
पुध्य-थीमानू जो, पाप श्ान्त हो, पाप शान्त हो। चन्द्रगुप्त की अपने प्रजा जन पर ऐसी नृगस नुद्धि कहां ? (हो सकती है) राअस'-अलभ्यमनुरकवान् किमयमन्यनारीजनम्? राक्षस-तो फिर क्या ये किसी अप्राप्य पराई स्त्री मे अनुरतत हो गए मे जिसके न मिलने पर मरने जा रहे हो)। पुरुष .- (कणा पिधाय) अजज! सन्त पाय, सन्त पाव। अभूमी कखु एसो विणअणिघाणस्स सेट्टिजणस्स, बरिसेसदो जिष्णुदासरस। (आर्य! शान्त पार्प, शान्त पापम्। अभूमि: खन्वेष विनयनिधानस्य वणिग्जनस्य, विशेवतो जिष्णुदासस्य।) पुष्प-(दोनो कान बन्द करके) यहाराम जी, पाप शान्त हो, पाप शान्त हो, अरे यह तो विनम्रता के मागार वाणिग्जन के लिए सर्वधा असम्भव (अभूमि) है, विरेष कर फिर जिष्णुदास के लिए ( तो इसकी कल्पना भो नहीं की जा सकली। राक्षप'-किमिस्य भवतो यथा सुहृद एव नाशो वियम्। राक्षस-तो फिर क्या इसके (भी विनाश) का जहर (तुम्हारी ही तरह) मिन्न का विनाश है। पुरुष-आर्य। अथ किम् (अज' अध इं)। पुर्ष-हा महोदय, तब वयासुहृदविनाश ही तो इसकी मृत्यु का कारण है)। पुनर्भङ्गधन्तरेण व्याचष्टे-
तङ्क्मिकां समास्थाय निर्चर्तितनटान्तरम्॥ १२॥ क्चित्प्रकरणस्यान्त: स्मृतं प्रकरणान्तरम्। सर्वप्रवन्धसर्वस्वकलां पुष्णाति वक्रताम् ॥ १३ ॥ पुनः दूसरी विच्छतत के द्वारा, प्रकरण वक्रना के अप्टम भेद को) व्याखया करते हैं- फहों (किसी एक) प्रकरण के अन्तर्गत, सामाजिक लोगो के आनन्द को उत्पन्न करने मे सिद्धहस्त नटीं दारा, जन (सामानिकों) की भूमिका मे स्थित होकर (मर्थात् सामाजिक बन कर), दूसरे नटी का निर्माण कर उपस्थित किया गया (स्मृत) अन्य प्रकरण सम्पूर्ण प्रबन्ध को प्राणभूव बन्ता को पुट करता है। १२-१३ ॥
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४६६ पकोकिजीनितम्
सर्वप्रबन्धसर्वस्वकलां पुष्णाति वस्ताम्, सकलरूपकमाणरूपक समुहासयति वक्रिमाणम्। क्यपित्पकरणस्थान्तः स्मृतं प्रकरणान्तरम्- फस्मिश्चित्कविकीशलोनमेपशालिनि नाटके न सर्घत्र। एकस्य मध्य- वर्ति अद्कान्तरगर्भीकृतम गर्भो वा नाम इति यावत्। किधिशिष्टम्- निर्वतितनटान्तरम्, विभावितान्यनर्तकम्। नटै. कीटशै :- सामाजिक- जनात्ादनिर्माणनिपुषमेः सहृदयपरिपत्परितोपणनिष्णातैः। तद्भूमिकां समास्थाय सामाजिकीभूय। समस्त प्रबन्ध की सर्वस्वभूत वकता का पोषण करता है अर्थात् सम्पूर्ण सपक के प्राणरूप वक्रभाव को व्यक्त करता है। कहीं प्रकरण के भीतर स्मरण किया गया दूसरा प्रकरण। किसी कयि कौशल की सृष्टि से मुशोभित होने वाले नाटक मे, घव जगह नहीं। अर्थात् एक (अङ) के मध्य में स्थित दूसरे अद्ू में निवेशित अथवा जिसका गर्भाङ्क यह नाम होता है। किस प्रकार का-अन्य नटो के निर्माण माला अर्थात् दूसरे नर्तक की कल्पना वाला 1 कैसे नटी के द्वारा-सामाजिक लोगो के आनन्द का निर्माण करने मे दक्ष (नटो) के द्वारा अर्वात् सहृदयगोषी को सन्तुष्ट करने मे सिद्ध हुस्त (नटो) के दवारा। उनकी भूमिका मे स्थित होकर अर्धात् सामाजिक बनकर। इदमन्न तातत्पर्यम्-वुत्रविदेव निरद्कशकौशला कुशीलया स्वीय- भूमिकापरिमद्देण रह्गमलह्वुर्वाणा: नर्वकान्तरमयुज्यमाने भरकृतार्थजीवित इव गर्भवतिनि भक्टानतर तरद्वितचक्रतामहिम्नि सामाजिकीभवन्तो विविधाभिर्भोवनाभद्गीभिः साक्षात्सामाजिकानां किमपि चमत्कार- वैचित्यमासूत्रयन्ति। यथा-पालरामायणे चतुर्थेडक्के ल्ेरानुवारी प्रहस्तानुकारिणा नटो नटेनानुवर्त्यमानः। यहाँ आाधय यह है कि-कहों-कहों पर ही अछीम कोशल वाले नट सपनी भूमिका के निर्वाह से रङ्ग्भन्व को अलंकृत करते हुए अन्य नतंकों द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले एवं प्रस्तुत पदार्थ के प्राग सददा, तथा वका के माहात्म्म को उह्सित करने वाले मध्मवर्ती दूसरे प्रकरण में सामाजिक से होफर नाना प्रकार की भामनाओं के वैचित्यों से साक्षाद सामाजिकों के किसी अपूर्व बमरकार की विचिनता को प्रस्तुत करते हैं। जैसे-बासराभायण के धतुर्ष अदू (वस्तुत" प्राप्त संसकरण मे यह दृतीय अन्तू में आाता हू) में प्रहस्त का अनुकरण करने वाले नट से चनुसरण किया जाता हुआ रावण का अनुवतन करने वाला मह {गर्भादू में प्रस्तुत 'सीतास्कयवर' नाटक को सामाजिक रूप में स्थित होकर देलते हए वैचित्य को सृष्टि करता है। रख 'सीवषास्वमंबर' नामक गर्भाक्क माटक का मान्दी इस प्रकार हे-)
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चतुर्थो-मेष ४३७
कपूर इत दग्धोऽषि शक्तिमान् यो जने जने। नमः शृद्धारवीजाय तस्मे कुसुमधन्यने॥३६॥ कर्पूर के समान जला दिए गए भी जो जन-जन मे शक्तिमान (रूप से विद्यमान) है उस फूलो का धनुष धारण करने वाले शु्धार के बीजभूत (कामदेव) को नमस्कार है॥ ३९॥ श्रवणः पेयमनेकैर्दश्य दीर्घेरच लोचन पहुमि:। भवटर्थमिव निषद्धं नाव्य सीतास्वयंबरणम्।४० ।। यह 'सीतास्वयवरण' नामक नाटय मानो आप लोगो के लिये ही विर्चित है इसको, संगीत सुधा आप लोगा के श्रवणों के द्वारा पान करने योग्य है और इसकी (अभिनयरमणीयता आपके) अनेकानेक विशाल लोचनो के द्वारा दर्शनीय है॥ ४० ॥ इसको जो व्यारुपा कुन्तक ने को है वह पाण्डुलिपि की प्रष्टता के कारम उद्वृत नहीं की जा सकी। इस के बाद कुन्तक ने उत्तररामर्चरितम् के सातवें भड से उदरण प्रस्तुत किया है जहा राम 'हा कुमार हा लक्ष्मण' इत्यादि कहते हैं। अपरमपि प्रकरणवकतायाः प्रकारमाविष्करोति- प्रकरन वकता के अन्य (नवम) भेद को प्रस्तुत करते हैं- मुखादिसन्घिसन्धायि संविधानकयन्धुरम्। पूर्वोत्तरादिसाङ्ग्त्यादङ्गानां विनिवेशनम् ॥१४॥ न त्वमार्गग्रहग्रस्तग्रहकाण्डकदर्थितम्। वफ्रतोल्लेखलावण्यमुल्लासयति नूतनम् ॥ १५ ॥ मुसादि सन्धिपों को नर्यादा के अनुसू्प, कपानक से शोभित होने वाला, पूर्व वपा उत्तर के समन्वय से बङ्गो (अर्पात् प्रकरणो) का विन्यास वकता की सृष्टि से अपूर्ष सोन्दर्य को प्रकट करता है न कि मनुचित मार्ग रूपी गह से प्रस्त ग्रहण के अभसर से कदचित प्रकुरण ॥ १४-१५।। नोट-दुर्भाग्य से इस कारिका की युत्ति का एक भाग पाण्डुलिपि मे गायव हो गया है। तथा जो सेष बचा है वहु खना भ्रष्ट है कि यह भी एक सहो अभिप्राय को दे सुकने मे सर्वपा अद्यमर्थ है। कारिका में आाये हुए 'पूवोतरादि- सासत्ृत्याद्' की व्याह्या ड० के द्वारा सम्पादित इस प्रकार है- कस्मात्-पूर्वोत्तरादिसाङ्गत्यान्, पूर्वस्य पूर्वस्योत्तरेणोत्तरेण यत्सा- वृत्त्यमविशयितसौगन्यम उपजीव्योपजीव कामवलक्षणं तस्मात्।
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Y३G वशक्तिजीवितम्
किससे-पूर्वोतरादि के साद्गत्व से, पूर्व पूर्ष का उत्तर उतर के साथ जो सा्त्य अर्थात् उपजीव्य उपजीधक भावरूप अत्यधिक सुगमता उससे (प्रकरणो का दिन्यास आहादकारी होता है)। इदमुधम्भर्वात-प्रबन्धेपु पूर्वप्रशरणम् अपरस्मान् परस्य परस्य प्रकरणान्तरस्य सरससम्पादित सन्धिसम्बन्पतविदयान कसम् र्दमाणकत्षा पाणं मदि परूढव क्रतोल्लेस माहादर्याद। उत्तरोत्तर कहने का अभिप्राय यह है कि-प्रबन्धो में पूर्व पूर्व प्रकरण उत्तरोत्तर अन्य प्रकरणो की सरस रद्ध से सम्पादित की गयी (मुख आदि) सन्धियो के सम्बन्ध के संविधान द्वारा की गई प्राणप्रतिष्ठा वाली प्रौदि से उत्पन्न होने वाला चर्रता विधान आल्लादित करता है। यथा 'पुष्पदूषितके' प्रथम प्रका णम्। अतिदारुणाभिनव" वेदना- निरानन्दस्य "सभागतस्य समुद्रतीरे समुद्रदत्तस्थोत्वण्ठाप्रकाशनम्। द्वितीयमपि-प्रस्थानात् प्रतिनिवृत्तस्य निशीथिन्यामुत्कोचलक्वारदान- मूफीकृतवुन्वलयस्थ कुसुमवाटिकायामनाकलिनमेव तस्य सहचरो- सङ्गमनम्। तृतीयर्मपि-सम्भावितदुर्षिन येऽि(१)नयद रूनन्दिनी निर्वा-
कुवलयप्र टृश्यमानाङ्कुलीयव समावेदित विमलसम्पदः । क्ठोरतर गर्भभार सिन्नार्यां रतुपायां निष्वारर्णनकासनाटनाहित प्रृत्तेमेहापान किन- मात्मानं मन्यमानस्य सार्थवाहसागरवतस्य ती्थयात्राप्रवर्तनम्। मञ्चम- मपि-चनान्त, ... समुद्रदतकुशलोदन्तकथनम्।पष्टमपि-सर्वेपा विचित्र सक्ख्यासमागमाभ्युपायसम्पादपरमिति। एवमेतेपा' रसनिप्यन्दतरप- राणां तत्परिपाटि: कामपि कामनीयकसम्पदमुस्भावर्य। नैसे पुप्पदूपितक मे प्रथम प्रकरण अत्यवत दार्ण नयी.""*वेटना के कारण धानन्दहीन-और समुद्र के बिमारे आये हुए समुदत्त की उत्वष्ठाविशेष का प्रकाशन किया गया है· दूसरा (प्रकरण) भी -यात्रा से वापस लोटे हुए, सरषा रात मे धूंस रूप में (बगूठी रूप) आभूषण देकर (द्वारपाल) दुवतय को मूक कर देने वाले उस (समुददत) का पुश्पवाटिका मे असम्भावित सहचरो के साथ समागम (ही प्रस्तुत करता है) तीसरा (प्रकरण भी)-सम्भावित भृष्टता पासे होने पर भी नयदत्त की पुत्री के निर्वासन की विपत्ति एव उसके समाधान का पर्णन (प्रस्तुत करता है) 1 चतुर्थ (प्रवरण) भी-मपुरा को लोट आए हुए मुवलय के दारा दिसाई जाती हुई अँगूठी से सूचित विमल सुख सम्पदा वाले मत्यन्द परिपषय गर्भ के भार से सिन्न पुत्रयधुविष्यक निक्कारण निष्कासन के कारण प्रदुसिहीन औोर अपने को महापापी मानने वाळे म्यापारी सागरदस के
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तर्थयाचा की प्रवृत्ति को दस्तुत करता है। पञ्चन (प्रकरण) भी-वन के मध्य मे""! कुछ लोगो द्वारा) समुददत्त के कुशल वृतान्त का निवेदन (प्रसुत करता)। यष प्रकरण भी सभी के विचिन्न बोध की प्राप्ति कराने वाले उपाप को सम्पादिन करता है। इस प्रकार इन रसनिष्यन्द मे लगे हुए (सभी प्रकरणे को) परमपरा किसी अनिरवचनीय रमणीयता की सम्पत्ति को प्रस्तुत करती है यथा वा कुमारसम्भने-पर्वत्या प्रथमनारु्यायनारवर्णनम्। हर- शुभूग दुम्तरतारकपराभवपारवार, त्तरणकारणमित्यर विन्दसूतेरुपदेश। फुसुमानरसुहदः कन्दर्पस्य पुरन्दरादेशादू गौर्यो सौन्दर्यबलाद्वि प्रहरतो हरिितोंचन विचित्रभानुना भस्मीकरणदुखावेशविवशाया रत्या. बिल- पनम् । विवक्षितं विकलमवसो नेनकात्मजायास्तपश्चरणम्। निररर्गल प्राग्भारगरिमृष्वचेनसा विचित्नशिखण्डिभि शिखरिनाथेन वारणम्, पाणिपीटन्म् इति प्रकरणानि पौत्राप्यपर्यवासतसुन्दरसविधानबन्धुरणि
अथवा जैसे कुमारसम्भव मे-(पहले) पार्वती के पहले पहल यीवन के प्रारम्भ का वर्णन। (फिर) तारकासुर के पराजय रूप दुस्तर सागर के पार उतरने की बीज शङूर की सेवा है, ऐखा कमलोद्भव ब्रह्मा का उपदेश(का वर्णन)। (तदनन्तर) इन्द्र के निवेदन एव पार्वती के सौन्दर्म बल से (शङ्र पर) प्रहार करते हुए वसन्त के सखा कामदेव के शङ्ूर के (तृतीय ) नेप् की अदसुत आग से जलाये जाने के दुखावेश से विवश रति का विलाय (वर्णन) "1 उसके अनन्तर) विह्वल हृदय मेन काहमजा पार्चती की विवक्षित तपरचर्या (का वर्गन)। (फिर) विचिन मयूरों द्वारा (अध्युधित) विश्ृखल ढलाने से परिमुषित मनोवृति वाले पर्षतराज (हिमालय) के द्वारा वरण कराया गया हुआ विवाह (वर्णन)। ये प्रकरण पोर्वापर्य के कारण सुन्दर सविधान मे परिणत होकर मनोहारी हैं और सुन्दरता की चरमसीमा को पहचे हुए हैं। इससे स्पष्ट है कि कुन्तक को जिस कुमारसम्भद का पता या यह भगवती पार्षती के विवाह के प्रकरण तरु को ही कथा को प्रस्तुत करता था। मल्लिनाथ की टोका भी अष्टम सर्ग तक ही मिलती है। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास की रचना निश्चिस रूप से अष्टमसर्गान्ता थी। बाद के सर्ग प्रकिप्त हैं। और ये कालिदासकृत नहीं माने जा सकते। एवमन्येप्वपि महाकविप्रबन्धेपु प्रकरणवकतावैचितर्यमेव विवेच- नीयम्।
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इस प्रकार महाकुवियों के अन्य प्रबन्धो में भी प्रकरणवकता की विनित्रता ही समसना पाहिए। इसके बाद कुन्तक ने प्रकरण वकता के इस भेद के उदाहूरण रूप में वेमी- संहार के द्वितीय मदू को उद्पुत् किया है- (यथा वेणीसहारे प्रतिमुख सं््यङ्गभागिनि ह्वितीयेज्ट्के) तथा कुछ उदरण शिशुपालवष से प्रस्तुत किए हैं। इनके विनेवन का सारा का द्वारा विषय 'अन्तरश्लोको' से भरा पद है, जो कि पाष्डुलिषि मे अध्यमत भषट तथा अपूर्ण है। मतः का० के उन्हे नहीं प्रस्तुत कर सके। इस प्रकार कुन्तक प्रकरणवक्रसा के विवेचन को समाप्त कर प्रबन्धवपता का विवेचन प्रस्तुत करते हैं जो कि स्पष्ट रूप से विवेधन का अन्तिम विषय है। प्रबन्धवक्रता का वक्षण प्रस्तुत करने वाली कारिका इस प्रकार प्रारम्भ होती है-
- रसान्तरेण रम्येण यत्र निर्वहणं भवेत् ॥ १६ ।। तस्या एव कथामूर्तेरामूलोन्मीलितश्रिय:। विनेयानन्दनिष्यच्यें सा ग्रवन्धस्य वक्रता ॥ १७॥ (पश्युनादि) विनेयों के लिये आनन्द की सृव्टिहेतु वहाँ इतिहास में भ्रम्य प्रकार से किए गने निर्वाह वाली रस सम्पत्ति का तिरस्कार कर, प्रारम्भ से ही उन्मीसित किए गये सौग्दर्य वाले फाव्य शरीर का दूसरे मनोहर रह ने द्वारा निर्बाह किया गया हो वह प्रबन्ध की बकता होती है) ॥१६-१७।। सा प्रबन्धस्य नाटकसर्गन्धादेः वकता वक्रभावो भ वतीति सन्बन्कः। यत्र निर्वदणं भवेत्, यस्यामुपसंदरणं स्थात्, रसान्तवेण इतरेण रम्वेण रसेन रमणीयकविधिना कया-इतिवृत्तान्यथाघृत्तरससम्पदुपेक्षया। इतिघृत्तमितिहा सोऽन्यथापरेण प्रकारेण धृत्ा निव्यूंदा या रससम्पत् शृद्गारादिभद्री वदुपेक्षया नदनावरेण वां परित्यञ्ेति यायत्। फस्या :- तस्या एव कथामूर्ते., तस्यैव काव्यशरीरस्य। किम्भुवाया :- आामूलो- न्मीलितपिय:। आमूलं प्रारम्भादुन्मीलिता धोर्वाच्यवाचकरचनासम्पद् यस्यास्तयोका तस्या। किमर्थम्-विनेयानन्दनिष्पत्तयै, तिपायपार्मि वादिप्रमोदसम्पादनाय। यहू प्रबन्ध अर्पाव् नाटक तथा वाम्य आदि की वकता या बरपन होवा है। जहां निर्याह हो। अर्यात् जिसमे उपसहार हो। रसन्तर के द्वारा, दूसने रछ के द्वारा रम्प वर्वाद रमणीयता के विधाव द्वारा। किस प्रकार से ईविवृत
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तुर्योन्मेपः Y1 तथा अन्वया निर्वाह की गई रस सम्पति की उपेक्षा से। इठिवृत का अर्थ है इविहास, (उसमे) अन्वथा अर्थात् दूसरे दङ्ध से वृत अर्थात् निर्वाह की गई जो रससम्पत्ति अर्थात् शृद्धार आदि की सदा उसकी अपेकषा अर्थात् उसके अनादर द्वारा, उसका परित्याग कर के (जहां अत्य रम्य रस के दार निर्वाह किया जाता है।। किसका (निर्वाह)-उयी कमामुर्ति का अर्थात् उसी काव्य शरीर का (निर्वाह) कँसी (कथामूर्ति का) मूल से ही उन्मीलित शोभा बाली (कयामृति का) आमूल अर्थात प्रारम्भ से ही जन्मोनित की गई है जिसकी शी अर्थात शब्द एवं वर्ष रचना की सम्पत्ति उस (कमामति का निर्बाह)। किस लिए-बिनेयो के आनन्द की निभ्पति के लिए अर्थात् प्रतिपाद्य राजा आदि के आनन्द को सम्पादित करने के लिए (जहाँ उस कपामति का जन्म रस के दवारा निर्वाह हो, उसे प्रबन्ध वक्रष कहते है)॥ प्रबन्धवकता के इस प्रकार के बदाहरण रूप में कुन्तक वेणीसहार' तपा उत्तररामचरित' को उद्धुत करते हैं। ये दोनो नाटक कमशः 'महाभारत' एव 'रमायण' पर आधारित है जिनमे कि प्रधान रस 'शान्त रस' है। जेसा कि कुन्तक कहते हैं- 'रामायण महाभारत योश शान्ताहित्वं पूर्वसूरिमिरेव निरूषितम्।' किन्तु इन दोनो नाटको मे इतिवृत्त कुछ दूसरे दङ्ग से प्रस्तुत किया गया है, जिसमे फमधः बीर रस तथा 'शृद्गार रम' अङ्गी रूप मे वणित हैं। कुन्तक एक 'अन्तरश्लोक' उद्भुत कर इस विषय को समाप्त करते है किन्तु पाष्ुलिषि की भ्रप्टता के कारण डा० देवह ब्लोक उद्दभृत नहों कर सके। इसके अनम्सर कुन्टक प्रबन्धवकतार के दूसरे भेद का निरूमण करते हैं-
इतिहासैकदेशेन प्रबन्धस्य समापनम्॥ १८।। वदुचरकथावर्तिविरसत्वजिहासया। कुर्चात यत्र सुकविः सा विचित्रासप वक्रता ॥ १९ ॥ जर्हाँ श्रेष्ठ कमि सोनों लोको में अपूर्ष वर्णन के कारण नायक के उत्कर्ष को पुष्ट करने वाले इठिहास के एक अश् से, उस के बाद की कथा मे विद्यमान नीरसता का परििमाग करने की इच्छा से, प्रबन्ध को समाप्त कर दे, वह इस प्रबन्ध) को विभिन बकता होती है॥। १८-११॥ सा विचित्रा विविधभद्गीभाजिणुरस्य प्रधन्धस्य वकता वक्रमाशो भवतीति सम्बन्धः। कुर्वीव यत्र सुकविः-कुर्वी विद्धीत यत्र यस्यां
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मकोकिनीवितम्
सुकरि औित्यसर्द्धनिप्रभेदचतुरः। प्रवन्यत्य नमापनम्-प्रबन्धस्य सवतन्धादे: ममापनमुपसंहरणं, समर्थनमति याबत्। इतिहा मेंकदेशेन इतिवृरतस्यावयवेन। वह प्रबन्ध की विचित् अरथात् अनेको प्रकार की छटाओ से सुगोभित होने वाली वकता घर्थाद् वारुपन होता है। जहों सुकदि करे। जिसमे मुकुवि अर्थान शनित्यमार्ग के प्रभेशे मे दक्ष कवि कर दे। (क्या?) प्रबन्ध की समास्ति प्रबन्ध अर्थात् महाकाव्य आदि का समापन अर्पात् उपसहार अपवा समर्दन (करे।। (किसने)-इतिहास के एकदेश से अर्पाद इतिवुत के एक अंश से। किम्भूवेन-त्ैलोक्याभि गोल्लेख नाय कोत्कर्पपोपिणा, जमदसाधार- पस्फुरितिनेतृ पर रुर्षप्रकाशकेन किमर्धन्-तदुत्तरकथाव र्तिवितसत्व- जिदासया। तस्मादुत्तरा या कथा तद्वर्ति तदन्तर्गेत यद्विरतत्वं वैरस्य- मनानव तस्य जिहासया परिजिहीपया। कैसे (अश) से-तोनो लोका में अभिनव उन्लेस के कारम नायक के उत्कर्य को पुष्ट करने वाले ( अय्य) से, अर्थात् ससार मे अद्ामान्य स्पन्द वाले नेता के प्रकर्ष को व्यक करने वाले ( इविहास के एकदेश्ष) से (कमा को समाप्त कर दे) किस लिये उसके बाद को कपा मे वर्तमान नीरसशा का त्याग करने की इच्छा है। उसमे बांद मे आने वाली जो कपा है उसमे विदमान, उसहे अन्दर निहित जो विरसता अर्थात् वैरस्य याने कठोरता उसके त्वान की इच्छा से दूर कर देने कौ षभिनाषा से (प्रबन्ध को एक अंग से जहा कवि समाप्त कर दे वह प्रबन्ध वकता होती है।) इदमुक्त्मवति-इतिहासोदाहतां कशचन महाकवि: सकला कर्था सरभ्यापि तद्वयवेन तलोकयचमत्कारका रणनिरूपमाननायकयश:
उपसंहरमाणस्य प्रबन्धस्य कामनीयकनिकेतनायमानवक्किमाणभाद- धानि। यथा किर ताजुनीये सगपन्धे- बहने का अभिप्राम यह है-कोई महाकवि इतिहास से उद्भृव सम्पूर्ण कच्षा का प्रा रम्भ करके भी तीनों लोको के चमसकार के कारणभूत अद्वितीय नायक की कीति के अतिराम को ध्यक्त करने याले उख कमा के एक अच् से ही, उसके आपे प्रन्म विस्तार में या जाने वाली नीरसता का परित्याय करने को इन्छा से समास् होने वाले महाकाम्य मादि की कमनीयता से वदन को भाति साचरण करने वाली वश्या को प्रतिपादित करता है। जैसे 'किरावार्युनीय' महाकाव्य में महाकवि भारव ह्वारा-
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चतुर्पोग्मेप. ४४३
दिपा विघातम्य विधातुमिच्छतो रहस्यनुज्ञामधिगम्य भृमृतः ॥४।। X x X रिपुतिमिरमुदस्योदीयमानं दिनादौ दिनकृतमिव लक्ष्मीसत्वां समभ्येतु भूय. । पर ॥ X x एने दुराप समवान्य चीर्यमुन्मूलितारः कपिकेतनेन ।। ४३ ॥ रतुरुओ के विचश के लिये व्यापार करने को इच्छा रखने वाले राजा (सुधिधिर) की एकान्त मे अनुमति प्राप्त कर (वनेचर ने कहा) । ४१॥ X x x ( तया) अब्धकार के समान रायुओ को दूर कर उदित होने वाले सूर्य की भाँति खदीयमान तुम्हे लक्ष्मी पुन प्राप्त हो॥ ४२॥ x x तथा (इस प्रकार पाशुपत आदि के लिये तपस्या कर जनकी प्राप्ति से) दुर्लभ पराकष को प्राप्त कर अर्जुन इन (दुर्योधनादि वषओ) का उन्मूलन करेगे । ४३ । इत्यादिना दुर्योघननिधनान्तां धर्मराजाभ्युदयदायिनीं सकलामपि कयामुपक्रम्य कविना निवध्यमानं यत् तेजस्विघृन्दारकस्य दुरोदरद्वारा दूरोभूनत्रिभूते: प्रभूतन्वपदातमजानिकारनिरतिशयोही पित मन्योः कृष्णद्वैपा- वनोपदिष्टविद्यासंयोग सम्पद पाशुपतादिदिव्याख पापये तपस्यतो गाण्डीय सुह पाण्डुनन्दनस्यान्तरा किरातराजसम्प्रहरणात समुन्मीलिता- नुपमनिक्रमोल्लेख कमप्यभिप्रायं प्रकाशयति । इन्यादि के द्वारा दुर्योधन के मरमपर्यन्त युधिष्विर के सम्युद्य को प्रदान करनेवाली सम्पूर्ण कथा को भी प्रारम्भ वर उपनिबद् किया जाने वाला जो, 1 तेजस्वियों में प्रधान, जुए के द्वारा दूर हो गये ऐशवर्म वाले, द्वोपदी के प्रचुर अधकार से अम्यधिक उद्दीप्त कोध वाले, कृष्णद्वैपायन द्वारा शिक्षित दिया के वयोग की सम्ति वाले पाशुपत आदि दिव्य जक्ों की प्राप्ति के लिये सपस्या करने हु गाण्डीवससा पाण्डुपुत्र अर्जुन के किरातराज से युद्ध के बीव प्रकट किए गए अद्वितीय पराफम का वर्णने है। (वह) किसी (अनिवचनीय) आशय को व्यक कर रहा है। इम प्रकार व्याह्या, इस विवेचन को और अधिक विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती हुई एक अनतरप्लोक के साथ समाप्त हो जाती है। उस स्पल के भाम्ु- लिदि मे अतमभिक अस्बष्ट एव अपूर्ण होने से उसे डा. के सद्मुव नहों कर महें।
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YWY वकोकिजोवितम्
इसके बाद कुन्तक इस प्रबन्धवनता के अन्य भेद का विवेवन प्रस्तुन करते हैं, जो इस प्रकार है- भूयोऽपि भेदान्तर मस्याः सम्भाव्यत- फिर भी इस (प्रबन्ध-वतता) के अन्य (तृलीय) भेद को प्रस्तुत करते है- प्रधानवस्तुसम्बन्ध तिरोधानविधायिना कार्यान्तरान्तरायेण विच्छिनविरसा कथा ॥ २० ॥ तत्रैव तस्य निष्पनेनिनिबन्धरसोज्ज्वलाम्। प्रबन्धस्थातुवध्नाति नवं कामपि वक्रताम् ॥ २१ ॥ प्रधान वस्तु (अर्थात् अधिकारिक कथावस्तु) के सम्बन्ध का तिरोधान कर देने वाले दूसरे कार्य के विघ्न से नि्छिन एव नीरस हो गई कथा, वही उस (प्रधान कार्य) को सिद्ि हो जाने से प्रबन्ध की निविध्न रस से देदीप्यमान (सहूदयो द्वारा अनुभूषमान) किसी भपूर्व वकता को पुष्ट करती है॥२०-२१॥ प्रबन्धस्य सर्गबन्धादेरनुबष्नाति द्रदयति नवामपूर्वोल्लेखां कामपि सहृदयानुभूयमानाम्-न पुनरभिधागोचरसचमत्काराम् वक्रतां पक्रि- माणम्। काऽसी-कार्यान्तरान्तरायेण विच्छिननविरसा कथा। वार्या- न्तरान्तरायेण अपरकृत्यप्रत्यूहेन। विच्छिननविरसा विच्छिना चासी- विरसा च सा, विच्विदमानत्वादनावर्जनसन्जेत्यर्थः। किम्भूतेन- प्रधानवस्तुसम्बन्धतिरोघानविधायिना, अधिकारिकफलसिद्ध पुपायतिरो- धानकारिणा। कृत :- तत्रैव तस्य निष्पन्ेः तत्रैव कार्यान्तरानुष्ाने एतस्याधिकारिकस्य निष्पत्तेः ससिद्वेः। तत एव निर्निबन्धरसोजवलां
प्रबन्ध अर्थात् महाकाव्य आदि की नवीन अर्थात् अपूर्य सृष्टि वाली किसी, सहृदवों के द्वारा बनुभव की जाने वाली, न कि अभिषा के विषयभूत चमतकार से युक्त वकता अर्थात् बांकपन को पुष्ट करती है अर्षात् हढ़ करती है। कौन है यह (पुष्ट करने थाली)-अन्य कार्य के दिम्न से विच्छिनन एवं विरस कपा । कार्यान्तर के अन्तराय से अर्पात दूसरे कार्य के विम्न से, बिच्छिन् विरस र्थाद भङ्ग हो गई एवं नीरस यह कथा अर्थात (प्रधान कार्य के बीच मे हो) भङ्ग हो जाने के कारण आफर्षणहीन कही जाने वालो कपा (वकता को पूष्ट करती है)। कैसे (कार्यान्तर के विघ्न) के द्वारा [दिरव)-प्रधान वस्तु के सम्बन्ध का तिरोधान करने वाले अर्वात आधिकारिक फल को निम्पत्ति के उपाय को मान्छादित कर देने वाने ( कार्यान्तर के द्वारा) । कैसे (पनना को
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चतुर्योन्मेव: ४४५
पुष्ट करती है)-वहीं उसकी निष्पत्ति हो जाने से यहीं अर्थात दूसरे कार्य की सिद्धि में ही इस आबिकारिक (फल) की सिद्धि हो जाने से। ओर इसी लिए निर्विधन रस से उज्जवल अर्थान बिना किसी, बाधा के प्रवाहित होने वाले मुख्य रद् की कान्ति से सुशोभित (प्रबन्ध वकता को दृढ़ करती है) अयमस्य परमार्थ :- या कलाधिकारिककथानिपेधिकार्यान्तरव्यव- धानाव्गिति विघटमाना अलव्यावक्काशापि विकाश्यमाना सा प्रस्तु- तेतरच्यापारादेवं प्रस्तुतनिष्पन्नेन्दीवरसितरसनिर्भरा प्रबन्धस्य राम पोयकम नोहरं वक्रिमाणमादधाति। इमका सार यह है कि-जो आधिकारिक कथा, बाधक अन्य कार्य के व्यवधान मे तीघ्र ही विघटित होकर अवसर न पाकर भी विकसित होने वाली होती है, वह इस प्रकार प्रस्तुत से भिन्न व्यापार के कारण प्रस्तुत को निष्पन्न कर देनेवाली सफेद कमल के रस से परिपूर्ण सी प्रबन्ध की रममणीयता से मनोहर वकता को धारण करती है। इसके उदाहरण रूप में कुन्तक ने 'शिशुपालवभ' को उद्दघृत किया है। इस के बाद प्रबन्धवकता के अन्य भेद का विवेचन प्रारम्भ किया गया हे जो इ्म प्रकार है-
फलान्तरेष्वनन्तेषु तत्तल्यप्रतिपततिषु॥ २२॥ घन्ते निमिचतां स्फारयशःसम्भारमाजनम्। स्वमाहात्म्यचमत्कारात सापरा चास्य वक्रता।। २३ ।। जहां प्रभूत पच्यास्मृद्धि का पान् नामक सपने माहात्म्य के चमरकार से एक ही फल की प्राप्ति में लगा हुआ होने पर भी उसी के सदय सिट्धियों वाले दूसरे ससल्य फलों के प्रति निमित बन जाता है वह इस ( प्रबन्ध) की अ्रग्य (चदुर्ष) चकता होती है।। २२-२३।। सापरापि अन्यापि, न प्रागुक्ता, अस्य रूपकादेरवक्ता वक्रमावो मवतीति सम्बन्ध:। यत्रैकफलसम्पशतिसमुद्युकोऽपि नायकः-यत्र यस्याम् एकफल सम्पत्ति समुदुक्तोऽपि अपराभिमत वस्तुसाधनव्यवसिखोऽपिनायक फलान्तरेष्वनन्तेषु तत्तुल्यप्रतिपत्तिपु घत्ते निमित्तताम्। फलान्तरेध्वपि साध्यरूपेपु वस्तुषु अनन्तेपु अगणनां नीतेषु वत्तल्यप्रतिपत्तिषु आघिका- रिकफलसमानोमपत्तिपु, प्रस्तुतार्यसिद्वेरेवायिगत सिद्धिष्विति। यह् मपर वर्षात् वन्य भी, पहले न प्रव्िपादित की गई, इद् रूपक बादि
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४४E
वकता अर्थान् बाकापन होता है। जह।ं एक फ की प्राप्ति मे लगा हुआ भी नामक अर्थात् जिसमे एक फल की प्राप्ति मे लगा हुआ अर्थान् एक हो अभी वस्तु के मिल् करने में प्रपत्न करता हुआ भी नायकु उसके समान सिदियो वाले दूसरे अनन्त फलो के प्रति निमित्त बनता है। अनन्त अर्थात् अस्य उसके समान प्रतिपतियों वा ले अर्थात अधिकारिक फन के समान सिद्धियों वाले फनान्तर वर्षात् साध्य रूप अन्म वस्तुओ के प्रति अर्थाद प्रस्तुत खर्ष की सिद्धि से ही सिद्धि को प्राप्त कर लेने साले ( फलों का निमित बन जाता है)। इसके वाद इस वारिका की वृत्ति या सेष भाग गायब प्रतीत होता है वद्यपि पाण्डुलिदि में पाठलोप सूचक कोई चिह्न नही है परन्तु यह बात अत्यन्त स्पष्ट है, गयोकि कारिका के कुछ शब्दो को उक्त वृत्ि भाग मे व्यासया नहीं की गई है एथ कोई उदाहरण भी नहीं प्रस्तुत किया गया है। साप ही आगे आाने वाली कारिका का भी एक चरण गामव ही है। और वह वृत्ति के साप ही पाष्टलिमि मे आयी है। अत्त' प्रवीत होता है कि सम्भवत" एक पन्ना हो गामय हो गया है, इसीलिए पाहलोपसूचक चिह नही दिया गया है। इस कारिका की वृत्ति का एर अंश २५ वों कारिका को वृत्तिभाग के अन्त मे उद्भुत प्रतीत होता है जो इस प्रकार है- यथा नागानन्दे-तत्र दुर्निवारवैगदपि वैनतेयान्तकादेक (म्) सकलकारुणिकचूडामणि: शंखचूडं जीमूतवाहनो देद्दानादभिरक्षत्र केवलं तत्कुल (म् ).॥ वर्याय-जैसे नामानन्द में। वहा दूर न किये जा सकने वाले बैर वाले गरुड से अकेले शंखचड को समस्त दयालुओं के धिरोमणि जीमूतवाहन ने (अपने) ररीर को प्रदान करने से रक्षा करते हुए वेवल उसके कुल को { ही नहों बचाया अितु अनेक अन्य राज्यलाभादि फलो को प्राप्त किया।। कुन्वरु पब अन्य प्रबन्धवकता प्रकार को इस प्रकार प्रस्तुत करते है -- अस्तां वस्तुपु वैदग्व्यं काव्पे कामपि वक्रताम्। प्रधानसंविधानाङ्कनाम्नापि कुरुते कविः ॥ २४॥ काषय मे प्रतिपाध पदार्थ के सोन्दर्य को तो रहने दीजिये, केवल प्रधान योजना के चिह्न वाले नाम के द्वारा भी कवि किसी ( अपूर्य) वक्ता को उत्पन्न कर देता है।। २४।। भास्तां वस्तुपु वैद्ग्व्यम्-आास्तां दूरव एव वर्ततां वस्तुपु अभि- वेपेपु प्रकरणेपु प्रतिपारेपु वैदपमवं विष्छित्ति:। काठ्ये कामपि षक्ता
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चतुर्थोन्मेष ४४७
कुरने करय-कावये नाटके स्गवन्धादौ कामपि वकनां कुरुते विदधाति कर्विारत्यद् मुतपतिभाप्रसार प्रकाशः। केन सविधानाङ्कनास्नापि। प्रधान- प्रबन्धप्राणगतप्रायं यत्सविधान कथायोजनं तददुश्चिह्मुपलद्ण यस्य तत्तथाकं तच्च तन्राम-"। 'अपि'- शब्दो विस्मयमुद्योतयति। वस्तुओ मे वैदरध्य रहने दीजिए अर्थात् प्रतिपादित किए जाने वाले प्रकरणो मे प्रतिपाद्य वस्तु में वैदाध अर्थात् सौन्दर्य तो दूर ही रहे। काव्य मे कवि किषी बकता को उत््पन्न करता है-काव्य अर्थात् नाटक एवं महाकाव्म आदि मे कवि सर्ान् अद्भुत प्रतिभा के विकास के प्रकाश वाला (ही) कवि किसी चमना को करता है अर्थान् उपनिबद्ध कर देता है। किसमे-सविधान के चिंह्न वाले नाम से भी। प्रधान प्रबन्ध का प्राण रूप जो सविधान अर्थान् कथा की योजना उमका मड्ड चिह्न है उपलक्षण जिसका उसे हम कहेगे सविधानाड नाम (उसके द्वारा भी) 'अपि' शब्द विस्मय का बोध कराता है। यग-अभिज्ञानशाकुन्तल-मुद्राराक्षस-प्रनिमानिरुद्ध -मायापुष्पक- कृत्यारावण-छलितराम-पुष्पदूषित कादीनि । .. .न पुनर्हृयश्रौव्वव- शिशुपालवध-पाण्डवाम्युदय- रामानम्-रामचरि त प्रायाणर जैसे-अमिज्ानश्ञाकुन्तल, मुद्राक्षस, प्रतिमानिरुद्ध, मामापुष्पक, कृतया- रवम, छलितराम तथा पुष्पदूपितक आदि । ..* न कि हयप्रीववन, शिशुपाल- वष, पाण्डवा्युदय, रामानन्द तथा रामचरित आदि ) प्रबन्धवकताया: प्रकारान्तरमप्याह- प्रबन्ध वकता के अन्य (छठवे) भेद को भी बवाते हैं- अप्येककक्ष्यया बद्ा: काव्यवन्धा: कवीश्वरैः। पुष्णन्त्यनर्घामन्योऽन्यवैलक्षण्येन वक्रताम्॥ २५॥ श्रेष्ठ कवियो द्वारा एक ही कक्षा से उपनिबद्ध किए गवे काव्यबत्व परस्पर एक दूमरे मे असमान (विनक्न हाने के कारण अपूल्य वकता को पुष्ट करते है।। २५॥ पुन्मन्ति उल्लाक्षयन्ति अनर्धामपरिच्छेद्याम् अन्योऽन्यवैलनण्येन परस्पवैसादश्येन वक्तांम् वक्रमाव्रम्। के ते-काव्यबन्धा: रुपकपुर- सरा: किविशिष्टा-अधपेककत्या बद्धा: एकेनापीतिवृत्तेन येजिता। कै .- कवाश्चर। एकत् विस्तीर्ण वस्तु सह्विपद्वि, अन्यत्र सडूक्षिनं वा विस्तारयद्रि :..... विचिन्न वाच्यवाचकालह्कर णसङ्कलनया नवतां नयद्ि- रित्यर्थ: ।
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YYE पकोतिजीवितन्
पुष्ट करते हैं अर्थात् उन्मोलित करते हैं। (किसे)अनर्ध अर्पात् भमूल्य, इपत्ता से रहित। एक दूसरे से विलक्षण होने के कारण अर्थात् आपस मे समान न होने के कारण वकता अर्पाव बाकपन को ( पुष्ट करते हैं। कोन हैं वे पुषट करने वाले) काव्यबन्ध अर्थात् रूपक आदि। केमे (काव्यबन्ध)-एक हो कक्ष्या से उप- निबद्ध अर्थात् एक ही इतिवृत्त से संयोजित किए गए। किनके द्वारा (उपनिबद्ध किए गए) कवीश्वरो के द्वारा। एक स्थान पर विन्तृत वस्तु को सक्षिप्त करने वाले अथवा दूसरी जगह सक्षिप्त वस्तु को विस्तृत करने वाले चन्द तपा अर्थ के विचिन अलद्वारो को एकन कर नवीनता को प्राप्त कराने वाले (कबीरवरो द्वारा काव्यबन्ध वकता को पुष्ट करते हैं)। इनमत्र तात्पर्यम्-एकामेव काम कन्दलितकामनीयकां क्था निया: द्विर्वटुमिरपि वविकुज्जर निवष्यमाना घहनः प्रबन्धा मनागप्यन्योड- न्यसवादनमनासातयन्त सदृदयहदयाहादकं कमपि वक्रिमाणमाद्षाति।
पुष्परुप्रभृतय' ते हि प्रबन्धप्रवरास्तेनैव कथामार्गेण निरर्गलरसासार- गर्भसम्णदा प्रतिपद प्रतिवाक्य प्रतिप्रकरणञ्ञ प्रकाशमानाभिनव-भङ्गी-
हुर्षातिरे कम मे कशोऽधयास्वाद्यमाना समुस्पाद्यन्ति सहृद्यानाम्। एवम-
यहाँ इसका आराय यह है कि-कमनीयता को उत्पन्न करने वाली किसी एक ही कथा का निर्वाह करने वाले बहुत से श्रेष् कवियो द्वारा विश्चत बहुत से प्रबन्ध पोडा भी एक दूसरे के साहरय को न प्राप्त करते हुए सहदयो के हृदमों को आमन्दित करने वाली किसी (अपूर्ष) वकता को धारण करते हैं। जैसे- (एक ही राम कपा पर आधारित) रामाभ्युव्य, उदात्तराघव, वीरचरित, बाल रामायण, कृत्यारायण, मायापुष्पक आदि (अनेक प्रबन्ध परस्पर वैलक्षप्य के कारण वकता का वहन करते हैं)। वे श्रेष प्रबन्ध उसी ( एक हो) कपामार्ग से (उपनिबद् होकर भी) स्वच्छन्द्र रस को प्रवाहित करने वाली सम्पत्ति के द्वारा पद-पद मे, वाक्य-वाक्य मे, प्रकरण-प्रकरण मे (सर्वत्र, अपूर्य भङ्गिमा को प्रस्तुव करते हुए रमणीयता को धारण करते हुए नायक ने नये-नये उन्मीलित किए गए गुणो के उत्कर्ष से मुक्त होकर अनेको बार आस्वादित किए जाने पर भी उन सहृदयो के हर्षातिरेक को सत्पन्न करते हैं। इस प्रकार दूसरे भी उद्हूरण स्वयं देने लेने चाहिए। कथोनमेपसमानेऽपि वपुपीब निजैगणैः। प्रबन्धा: प्राणिन इष प्रभासन्ते पृथक् पृथक्॥। ४४।।
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चतुर्थोन्मेष ४४९
इत्यन्नरश्लोक। कथा को उत््पत्ति के समान होने पर भी (सभी श्रेख कवियो द्वारा विरचित) प्रबन्ध अपने-अपने गुणो मे उसी प्रकार भिन्-भिन्न मालूम पडने हैं-जैसे कि प्राणी शरीर के समान होने पर भी अपने-अपन गुणो से भिन्न-भिन्न मालूम पडते हैं।। ४४ ।।
मह अग्तरश्लोक हे।
महाकविप्रवन्धानां सर्वेषामस्ति वक्रता ॥ २६ ॥ नवीन (सामादि) उपयो मे सिद्ध होने वाले नीतिमार्ग की शिक्षा देने वाले महाकवियो वे सम्पूर्ण प्रन्नन्त्ों मे वकता रहती ह। २द ॥
महा कवित बन्धाना नत्र निर्भाणतैपुण्य। रुपमान कविप्रकाण्डाना प्रबन्वानां सर्वेषां सकलानामस्ति वक्रता वक्भावविद्छित्ति:। कीदशा- नाम्-नूतनोपार्याष्पन्ननयवर्त्मोपदेशिनाम ! नतना प्रत्यमा उपाया सामादिप्रयोगप्रकारास्तदविस नोचरा ये तैर्निष्पत्रं सिद्ध यन्नयवर्त्म नीनिमाग नदुपदिशन्ति शिक्षयन्ति ये ने तथोक्तास्तेषाम। महाकवियो के समस्न प्रबन्धो मे अर्धान् अपूर्व सृष्टि की कुशलना मे अद्वितीय शेछ कवियो के सम्पूर्ण (महाकाव्य आदि) प्रबन्धो मे वकता अर्थात् बाकपन की शोभा रहती है। कैसे ( प्रबन्धो) मे-नवीन उपायों से सिद्ध नीतिमार्ग का उपदेश करने वाले (प्रबन्धो) मे। नूतन अर्थात् नये-नये उपाय अर्थात उन्हें जानने वालो के ज्ञान के विषयभूत सामादि के प्रयोग के बङ्ग, उनके द्वारा निष्पस अर्थाद सिद्ध जो नीतिमार्ग-नीतिपथ उसका जो उपदेश करते है अर्यात् सिखाते हैं वे (नीतिमार्ग का उपदेश करने वाले हुए) उन प्रबन्धो मे (बतता रहती है)।
पेशलताशालि नीत्या फ्लमुपपद्यमान प्रतिपाद्योपदेशद्वारेण किमपि कारणमुपलभ्यत एव । यथा-मुद्राराक्षसे। तन्न हि प्रवरप्रज्ञाप्रभाव- प्रपञ्वितविचित्रनीतिव्यापारा प्रगन्भ्यन्त एव। तापसवत्सराजोददश एव व्यास्यात। एतमन्यदप्युत्पेक्षणीयम। तो कहने का आशय यह है श्रेष्ठ कवियो के समस्त प्रबन्धों मे अभिनव वक्ता के सन्निवेश के कारण रमणीय नीति का फल रुपी एक मनिर्वचचनीय कारण प्रतिपास के उपदेश के द्वारा उत्पन्न किया जाता हुआ मिलता ही है। जैसे-
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४५० वकोकिजीवितम्
मुद्रा राक्षस मे। वहा पर श्रेष् प्रत्ा के प्रभाव से वितत अद्सुत नीति के व्यापार परिस्कुरित होते ही है। तापसवतसराज का उद्देश्य पहले ही व्यास्यात हो चुका है। इसी प्रकार अन्य उदाहरणों को स्व्यं समझ लेना चाहिए। वकतोल्लेखवेफल्य. ·. " लाक्यते। प्रबन्धेपु कवीन्द्राणां कीर्तिफन्देपु कि पुन । ४४।। इत्यन्तरश्लोक:। इसके अनन्तर बुन्तक का 'वफतोत्लेस' आदि अपूर्ण अन्तर शलोक प्राप्त होता है। अत उसका सुसरिलष्ट अर्थ नहीं दिया जा सकता। इस अन्तरश्लोक को पूर्ण करने का स्वतन्त्र प्रयास आचार्य विश्वेश्वर के संस्करण मे दृष्टिगत होता है परन्तु इस प्रकार के स्वेन्छासमावेश की कोशिरा सर्यपा उचित नही मानी जाती है। रवान्तरकार अथवा व्पास्याकार का उद्देश्य उपलब्ध मूल के अप को हो सममाना हुआ करता है उसमे परिवर्तन या परिवर्धन करना सर्घपा अनुचित है। ड० से ने इस ग्रन्थ के असषमाप्त होने का ही सकत दिया है। परन्तु ग्रन्थ के विवेच्य विषय से यह पता लगता है कि दोडा ही अर अर्वशिष्ट है। उसके विषय मे अभी कोई सुनिश्चित मत देना समीचीन नही।
कुण्त कस्प कृतिमुंदि। स्पाल्कविसहूदयाना व्याख्यातृणा सदैव पै।। घास्तकृत्प्रतिभास्व्ण कपणे निकपा पितम। एव मन्दा नम बुद्धिश्व बव च वकोकिजीवितम्।। राष्ट्रभाषा समाशित्य गुरुणाममुरुम्पमा। व्यवासि व्यास्या मिश्रेण राधेश्यामेन मेशमा ।।
असमातोऽयं अ्रन्थ.
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परिशिष्ट-१
कारिकानुक्रमणिका
पृष्ट- पृछ् प्रथम उन्मेष' १२२
अक्लेशव्य सिताकतम् रोकोत्तर चमरकार
अव्रारोचकिन केचित् वक्रभाष: प्रकरणे ८९ १५३ चन्दे कवीन्द्वववबेन्दु 18% 4
१०२ अलप्करकृना येपा ४९ अलद्टारस्य कवयो वाक्यस्य वक्रमावोऽन्यो
भं्डकतिरलद्वाय चाच्यवाचकवक्रोकि 1६ २३
अविभावितसंस्थान वाच्च वाचर मौभारय १३
मसमस्तपद्न्यास वाच्योडर्थो वाचक शब्द 18३ अममस्तमनोहारि विचित्रो यत्र वक्रोकि 11 १२३ वैचित्यं सौकुमार्यस आअ्जसेन स्वभावस्य १५६ वेंदुग्ध्यस्यन्दि माधुयम् 1४२ ९६० उभावेतावल ह्ार्या वयवहारपरिर्पन्दं १२
एतत् निध्वपि मार्गेषु शब्दार्थी सहितावेव ५५ 1६३ शब्दार्थो सहिती धक्र 1७ ६२ गमक्ानि निवध्यन्ते शब्दो विवसिताथैक परीर चेदलह्वार परे धतुसंर्गफलास्वाद 11८ धर्मादिसाधनोपाय 10 प्रतिभापयमोन्नेद सम्प्रति तत ये मार्गा- ९६ १२२ पतीयमानता यत् स्वसम्परपरिस्पन्द १२३ 1६१ साहित्यमनयो शोभा
भूषजश्ये स्वभावस्य सुकुमाराभिघ सोडयम् 10३ ५२ सोडनिदु सज्जरो येन १२३ 1४९ ५३ मार्गार्णा त्रिनयम् स्पष्टे सर्वत्र समुष्टि:
मार्गोजसी मध्यमो नाम स्वमावग्यतिरेकेण १४९ यत् किश्वापि वेचित्य स्वभाव सरसाकृतो १२३ 10३ पत्र तहदलटारै: १२२ द्वितीय उन्मेष
पत्र वा्तुः पमातुर्वा 546 यत्रान्यधामवरसवम् १२३ अलङ्कारोप संस्कार २००
यदध्यन्न नोइलेखम् १२२ अव्ययीभावमुख्याना २३५
पत्राति कोमलरडायम् आगमादिपरिस्पन्द
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४५२ पकोकिनी वितम्
एके ही वह्पो वर्जा. उपधारकसम्वरवम् ३५०
भचित्यान्तर तम्येन २५४ ऊर्जए्दुद्ात्ताभिधयो ३२०
२४५ एक प्रकाशकं सन्ति ३४४
क्म्मादि संवृनिः पञ्ठ २४६ जचितयावडमरान ३४३
पर्वन्ति काष्यवेकिय २६० नत पूर्व प्रकाशभ्याम २१३
कचिषष्य वधानेउपि १७९ तथा समाहितस्यादि ना.तिनिर्बन्धविहिता 1८५ ता साधारणधर्मोनी ३३९
पदयोकभयोर्ेक २६३ धर्मादि साधनोपा्य ३०॥
परस्परस्य शोभायै २६१ नयन्ति कवय काजिस ३५४
परियोषयितु कालिद २५० निषेधरमायया सेप ३१९ २६२ प्निभासातथा बोद्ध: ३१५ २३३ भावानामपरिम्लान १९९ मिसयोईिङ्ग यार्यस्य २३९ भूषणान्तरभाचन
यम कार कसामान्यम् २५७ मनोजफल कोद्ऐेष् यत्र दूशन्तरऽन्यस्माव २११ २८९
यत्र रूढेरसग्भाध्य १९३ मुख्य मक्लिए्ट रस्याददि २९८
यम्र सवियते वस्तु २२७ पत्रेकेमेव वाक्येन ३९३ पन्मूछा सरसोइलेसा २१७ यथापोगि वियापदम् ३v९
यमक नाम कोऽप्यस्पा यथा स रमवताम ३३४
रसादि चोतन पस्या ३५९ २६६ लोकोसर तिररकार या्मिन्नुतनेविन रूपम् 1९३ वर्गान्तयोगिन स्पर्था यस्यामतिशय कोउवि ३६: १७५ वर्णष्छा पानुसारेण रसेन वर्सते तुचयम् ३३४
चाग्वसल्या. पदपठलवा 1८८ २७१ विशिष्ट योज्यते दिक्रम् स्वप्यादिगुणोज्वला विशेषणस्य माहा्यात् २४२
विदित, प्रत्यमादन्य २२४ वर्णनीपश्य केनापि ३९० सति लिद्गान्नरे यम्र वस्तुसाम्य समाश्चिरय २४१ वाक्यार्थान्तर विन्यासी ३९८ समानवर्णमन्यार्थम् ३५५ साध्य तामध्यनाहरय 1९० २३८ स्वय विशेषणेनापि २०० तृनीय उन्मेप: विनियर्त्तन मेकुश्य ३८२ वियसतपरिष्पन् ३१९ अन्यदर्पयितु रूपम् शबीर मिद् मर्थरप ३०५ अपरा सहजाहाय २८२ शब्द पतीयमानो था अप्रस्तुलाउपि विवत्ति ३५५ सनि सबदन्दवास्यरवे अलदारो न रमवद् ३०७ समश्नवातुिषयम् ३५१ उश्प्र प्ावस्तुसाभ्येजवि ३७२ उवारस्वपरिषपन्द समुविल खित वाषपाथं २७५ ! सग्भावनानुमानेन
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कारिकानुक्मणिका ४५३
सामान्या • ज्यतिरिय्का नदुत्तरकथावति तस्या पव कथामूर्ने चतुर्थ उन्मेष न्ैलोक्यामिन वोसूले 8४1 धन्ते निमिच्तताम् ४४५ अन्यू ननूत नोशलेख ४२५ ४३७ नदये क क चया बद्धा. नूत नोपायनिष्पस ४४९ प्रनिप्रकरण म्रौदि ४२१ असामान्यसमुइलेख ४३२ आसता वस्तुषु चेदगध्यम् ५५६ प्रधान वस्तुसम्बन्ध ४१४ प्रचन्धस्येकदेशानाम् ४१७ मुननादिसन्धिसन्धायि ४३७ कथावेच्नित्यपात्रम् ५२८ यन्न निर्यम्त्रणोरसाह कव सित्म करणस्यान्त ४:4 ४३० तत्रंव सस्य निष्पजे यञ्रे कफल सम्पत्ति ४४५ तथा थथा प्रषन्धम्य 198 मामाजिक जनाह्वान ४३५ +
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परिशिष्ट-२
पृनिगतोद्गर णानुकमणिका
पृष्त प्रथम उन्मेप. चकार चागैरसुर। 11७ क्षद्रराज सेनापते! चापाचाय खिपुर विजयी ८३ अव्णलडहत्तत शें अथै कपे नोर पराध चारता वपुरभूपपदा ,६५ ज्याबन्धनिप्पनदभुजेन 111 अधिकर तल तवपम् ज्योतिलेसवलय गलितं अनुरणमममिमेखल । तताउहणरपारक पनद ३५ अनेन साबू विद्वरभु । तत्ानुिखिताएय मेव ४० अपाहगततारका. तदेतदाहु मौशन्द अय जन प्ष्टुमना तनावहेदभावी हि असारं ससारम् ३०, १५२ अश्यद्भाग्य विपर्यय्याद् सस्य स्तनप्रण विमि 1३1 तान्यपराणि हृदये आलरय एगी. १५३ ताप. स्वार्मनि १३५ हरध जडे जगति २२ उद्देशोऽपं सरसकरकी 1३४ दधवा वामकर नितशब उपगिरि पुर्हृत 14 उपस्थिता पूर्वमपास्प दाहोजभ: प्रसुतिम्पच दोर्मूलावबिसूपित पकों कामपि काल ६१ पुतन्मनविपनव एतो पशय पुरहलटी दन्दानि भाष कियया ७६ इयं गते सम्मति कप् जुमपळदल नामाप्यन्तरो. १२८, १५५ कतमः प्रविजम्भित १६६ निषीय मानस्तरका १५१ करतलक लितासमाळा 140 निष्काररण निकारकणिका ६८
३५ पाण्डिग्नि मम पपु. कानि च पुण्यभाजि १३२ १६४ कामे स्पर नीमत पुर मिपादाधिपते
रकि साटप्यतरोरियम् पूर्वानुभूतं इमरता स १२१, १५२ रोड्यं भाति प्रकारास्तव प्रकाशसवाभाव्यम् १२५ कमा दैक द्वित्रि भतीयमानं पुनरन्यदेव २३ कीडारसेन रहसि प्रयु्य सामापरिसं श्रीशासु बालकुमुमायुभ 1४० प्रवृस्ततापो दिवसी
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वृत्तिगतोद्धरणानुक्रमणिका
कुछेन्दीवर काननानि ८1। है नागराज । चहुधा 1५७ बलन्दुवक्राण्य विक्ञाश १.७, ११६ हे हेलाजितवोभि १२६ भण नर्हाण रमप्त 1८ द्विनीय उन्मेष' मतुमिन प्रियमविधवे ४३ अनिमुरवो राजभाषा २२२ मध्यउद्डुर पज्ञवा ७४ अनर्ध कोषप्यस्तस्तव २२३ मानिनीज नविलोचन २३ प्रमिरव्यकि नावदु २३६ मेथिल मस्य दारा ७६, ८६ अयमे+पदे तथा २६७ यरमेनाइजमाम अथि पिबन चकोरा रइकेलि हि र्आफि अलद्वारस्प रवयो 14४ रामाडमी भुघनेपु ६- जल महीपाल २१२ रामोशरेम सर्व सह आज शकशिख्वा लागोजय मालमृतुभि: २४०
रूपकाद्ि म लद्कार २४ आा स्वर्लोअदुरगनगर २३०
रूपकादिष्लप्भारसतथा २४ दत्ध जडे जगनि २०६
लोलाइ कुब लअं २६ हर्थमुस्यति ताण्डव २११
वत्त्रेन्दोन हरग्ति 1३८ इश्युद्गते वाशिनि २४९
वाजिवारण लोद्दानाम् ३६ १७९
वापीलटे कुडगा उतरिद् कोक्नद् १६० वाम कज्जलयद् पतन्मन्दविपकव 1८७ ६६ विशनि यदि नो कव्िव पुता पश्य पुरस्तटी १८६ १३६ वेलानिलैर्मृदुमि कदलीस्तम्चताग्बूल
दीडालोलानतवद नया कपोले पव्राली २१०
शरीर मात्रेण नरन्द करान्तगलीनकपोल २२५, २२६ 14८ भडण च स्पर्श केसवे जास्यमि मामू २०२
श्ासीरकम्पनरद्विण काम्नर्वीयनि सिंहली २३० २४० सड्कान्ताइगुलिपर्व कि शोभिताउइमनयेति १५२ कुसुमसमययुग २०९ सरम्भ करिकोटमेघ ३९ कौशान्ीं परिभूय न: २६२ स ददतु दुरितम् ग अण च मतमेहं सय पुरीपरिसरेण गध्दन्तीनां रमण २२०
सुधाविसरनिष्यन्द ७५ गुर्वर्थमर्थी भषुनपार १९%
सोधय दम्मछतवतः ७२, ८५ चकितचानकमेचकित १८३
र्तनबून्द्र मन्दम् ८२ चूढारल निषप्णदुचह खानादमुक्वु जाने सक्यास्तय २३४
स्व्ेष्ट्राकेसरिण: स्वच्छ 64 णसह दशाणण हंसानां निनदेषु १५ तत मरहस्याह हस्तापचेयं थश: ६८ सस्वितयय परिप्रह २२८
दिमष्यपायाद विशद तरन्तीषाङ्गानि २५०, २७०
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४५६ वकोक्तिजीवितम्
तम्यापरेप्ववि मृगेषु २६४ पो लीलनार वृन्नो तह रण्ण कण्ड २२९ राजोवजीवितेशरे १८३ नान्य पराणि हृदये २३० गमा डपी भुनेपु १९८
ताम्बूली नव मुग्ध रुदसस तह अण अर्ण नालताली 1८४ लोन वस्तुनि वेन ताला जा कति चय तरवान्येपान् रव रस़सा भीरु २४३ वाम कजलबद् 1८० दुर्पण घ परिभोग २३० दाहोडम्भ प्रसृतिम्पच वृत्तडस्मिम् मदापलये २०१ २३५ पहद्बलाक। घना दुर्वच 7दय मा २३१ देवि रन्मुखपइजजेन वैदेही तु कथ भिप्यात २१६ धम्मित्रो विनिवेशि शशिन शोभातिररकारिणा २२६ शाताणि वतुर्नवम् २६१ धूपर सरितति 1८३ शीर्णमाणाषप्ि नभरवतावासित २४० नाभियाफमनृतम् शुविश्ञीत चन्दिक २२६
निवार्यतामालि शमजलमेक्जनित २३२ मासायासमलीममा निष्पर्याय निवेश २५९ नृत्तारमभाद् विरत मरबन्धा रघुभू भुजाम् २५३ मावेद काल सवजो २२३ नेकत पाकिविरति स दकतु दुश्निम् पाय पाय कलाची २५५
159 मालतरलता १८२
२४८ सशवतीहृदयारविन्द 1७७
पमाणवावादयति. २१४ सरमार पाश्णपति फुछनेन्दीवरका न नानि मिठि हिजयओ्री बदुस्प धस्तव २५९ सुस्निध्यमुग्ध २०९
१७३ सोडपं दग्भघुतमतः २३२ भण तरण रमण 1८५ सौन्दपंघुर्प समितम् भूतानुकम्पा तव चेदु २१३ स्तनदृन्द मन्द २५९
मन्मय किर्मपप दनग्धरपामल 1१६, ११२ मयपासकभ्च कितह रिणी २५० दिन हार कटा से सौ २३३
मुहरह दिसंवृता २६८ स्वस्था सन्तु वसन्त १८१, १८३ मृग्यम दर्भाकर हसाना निनदेशु पपेय म्ीप्मोष्म २५१ तृतीय उन्मेप: यस्यारोपण कर्मणापि याष्जादेन्यपरिपद २५८ ३१२ पाते हारवर्ती तदा २२९ अहुलीभिरिव केश पावद किमर पूर्ष २५६ अयुशगवती सम्या वेन श्यामं पपुरति २११ शनीचितय प्रपृसानाम्
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नुतिगतोद्वर णानुक्रमणिका ४५७
अपछर्तताह मस्मीति ३२८ । किमिन डि मधुराणाम् ३ १८ अपारे काव्यससारे २८४ कियन्तः सन्ति ३७६ अयमान्दोलितप्रौड़ ४०९ र्कि हास्येन न मे प्रयाश्यसि १२० भय मन्दपुतिर्भात्वा ३८१ कोडलट्टररोडन या विना २८८ अड नुश्पन्नम नोभवा: २७९ क्रिपये व विशिष्टस्य ३८२ असशय पतपरिग्रह ३१९ विक्षो इस्तावलग्न: ३१९, ३३७ असाभृत मण्डनम् असार ससारम् ३४५ गर्भग्रन्थिपु वीरुषाम २७५ अ्या सर्गविधो २८४, २९३, ४०६ ३०३ आत्मानमारमना चैरिस ३२४ चकाभिघातप्रसभा ३६० आमैव नार्मन स्कन्म् ३२५ चड्टमन्ति करीन्दा ३४३ आदि मध्यान्त विपया ३४२ चन्दनमऊपदि ३४५ आन्दोक्ष्यमते कति न गिरय: ३२२ चा्द्नासकभुजग आागडलोभादुप कर्ण ३६४ चरितञ महामनाम् ३३१ आश्लिशे नवकुक्कुमा ४०४ चलापार्ा रष्टिम् आससारं कहपुरवेदि २९२ चापं पुष्पितभूत्तछम् ३९०
३०५ चारता वपुरभूषपदासाम् ३४७
इन्दुलिस इवाअनेन ३५७ चीरीमतीररण्यानी ३४० इन्दोलंचम त्रिपुर जथिना ३२६, ३६१ चुम्बनू कपोलतल उस्यर्तों म वचनीयमशेषम् ३९४ चूताकुशरवाद ३०४
उतम्रेष्षातिशयान्विता २८८ छाया नातमन एव ३५७
उस्फुल्ल चारुकुसुम ३६४ जनस्य सकेत ३७७
उदात्तमृद्िमद्वस्तु ३२९ तत• प्रतस्थे कोमेरीम् उद्भेदा मिसु खाकरा ३०५ तडिदु यलय कचयाणाम् ३५२
उपोढरागेश चिलोल ३३६,३५३ ३७३ उभी यदि न्योरिन ३७७ तरपूर्वानुभवे भवन्ति ३७९
ळजजंस्वि कर्णेन ३२८ तथा कामोडस्य वबृधे ३२७
पुकेक दुछमुन्नमरय ३६५ तभूरगुना युगपदु ३८०
ऐेन्द्र धनु पाण्ड ३३८ तन्वी मेधजलारई ३१५
कह के सरी वअ्णाण ३४५ ३१५
कदाचिद्तेन व पारियात्र ३०३ तरन्तीवाङ्ानि कपोले पनाली ३३७ तय कुसुमशरश्वम् कर्णाम्तस्थित पममराग ३० तो प्राहमुखी तन्न २०७
कहय नास्यसि भो २८१ ताम्बू लरागवलयम ३२१
रकिं गतेन नदि युक तिष्ठेद कोपवशातू २१९ 1
कि सौन्दर्पंमदार्थ ४०२ नुष्य काले क्रिये यत्र ३९३
३३१ तेवा गोपवधुविलास २९४
किं सारप्यतरोरियम २९३,३५४ एवं रघसा भीर ३१५
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वनोकिजी वितम
दूर्धाकाण्डमिष श्यामा २९३ यप काग्यार्थनिरूपणं सषया देशष मोप ३८६ यम्न तेनैव तस्य ३०१ दंवि खवन्मुखपट्टजेन ३१५ यत्रार्थ शब्दो वा ३८१ दोमूंछावधि सुम्रिन २७९ यशोकं गग्यतेऽन्प. घारावेश्म विलोष्य ३००। यन्मूला सरसोइलेवा ३५1 एत तवया वार्दु कश्षोभि ३८४ यस्थ प्रोध्छूयति ३६८ घोत्तापने घ नयने यान्या मुहुवलित ३७५ येन प्वसनमनोभवेन ३८५ निपीयगालस्तषका ३७२ यैशे रप्टा न वा रष्टा ३८• निमी लि्दा के कर लोह रज्िसानुविविधास्तर ४०२ निर्दिश् कुलपतिना ३८४ (रसषद्) हसपेशलम् निमोंक मुखिरिय ३६५, ४०६ ! रसमावतदाभास ३१२ निर्याम विद्याय ३८१ रसवद् दर्दवितस्पष्ट न्यू नस्यापि विशिष्टेन रसवद् रससंभ्रयाद् ३१३ पदर्था स्पूशेद् वसुमनी ३०t राजकन्यानुरकं माम् VOU ३०५ पमादो पूसो कसु रामेण सुग्धमनसा
परामृशति सापर्के राशीभूत प्रतिदिनमिष ३4८ ४०५ पशुपतिरपि तान्पहानि ३२० पाण्ड पेड्य मंसापिति लगनटिरेफाशन
पूर्णेन्दु कान्तिवहना लावणपकान्तिपरिपूरित ३५३ ३७४ ३५७ पूणेन्दो: परिपोषका- पूर्णेन्दोस्तव संवादि ४०४ | लिग्पतीव तमोआद्वानि ३७२ २८३ पधानेडन्पत्न वाक्यार्थे लीनं वस्तुनि मेन ३१८ प्रासतभ्ीरेप करमाव लोको पाहरामाह साइस २९५
प्रेयो गृहागतम् वाक्यस्य वक्रभावोडन्यो ३२५ ३८३ भूमारोदइनाय ३६ शग्यमोपधिपते ३६८ मूयसामुपदिषान। मदो जनयति प्रीति ५००! दासप्रद्वार पदता ३४०, ३४८ महाभृत. पुशववोपि ! शुधि मूयति श्ुतं ३७५ माशिष्ठीकृत पट्सूत्र शेषो हिमगिरिसवं ३०५ इछाध्याशेय ततुं सुदर्शन ३८९ मानमसया निराकसम् ३३३ मालामुश्छकन्दूलै: स पकसीणि
मालिनीतशकमृत: सङ्केस कालमनसे
मुखेन सा क़ेतफ मज्जेह सुरहिमासो २८० सदय वुभुजे मही मृतेति म्रेरप सान्तु १५१ समप्गगन याम ४०९ मृदुनुछताधसम्त: २५१ समानवस्तुन्वासेन म्लार्नि वान्सरिपानलेन ४०५, सरसिज्ञमनुदिदम्
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सवचितिमृतान्नाथ ३९५ रकि प्राणा न मया ४२५ साधुसाधारणरवादि ३७६ कि वस्तु विद्वन् रेकन्ध वानृजुरप्याल: ३९१ ४२२ स्वपुष्पक्छवि ३६८ गुर्वर्थमर्थी ध्ुतपारचा स्मिन किज्िनमुग्धम २७८ चशुर्यस्य तवाननादु स्वरूपादतिरिकस्य ३८५ छग्गुणसजोअ दिढा ४३३ रशब्दुस्थायि ३11 सवल्पे जरप वृदस्पते जनस्य माकेतनिवासिन, ३८३ ४३० ३८५ तरमभमद्गा ४३२ इसाना निनदेपु २८० ४१३ हिमपाताविलदिशो १९३ तं भूपतिर्भासुरहेम
हिम्चलसुता वद्ि ३५३ ४२६
हेतुश्च सूदमो लेशोडय ४06 द्विषा विघाताय ४४३
हेलावभप्हरकार्मुक ३८१ घारावेश्म चिलोक्य ५२३
हे दस्न दव्विण मृतस्य ३९४ नवजलधर सफछोडयं
हे हलाजिनबोधिसत्व ३६1 पद्म्यां स्पृशेद् वस्षुभर्ती ४३२
चतुर्थ उन्मेष' पातालोदरकुअपुक्ित प्रश्यादिष्टविशेषमण्ड न ४१६ ४१६ अप जातु ररोरगृद्ोत भ्रभद्ग रुचिरे ललाट ३२५ ४२८ रग्याणि वीषय मधुराध ४६ अथोमिलोलोन्मदराज ४२९ ४४३ बनकुरितनि सीम ४१३ अपि तुरगसमीपात् लचयीकृतस्य हरणस्य ४२७
अवैमि कार्यान्तरमानुषस्य विचिन्तयन्ती यमनन्य 814 ४३० ४२० श्न्दोक्यम्ते कति न गिरय। ४१२ ग्यतिकर इव भीमो
इति विस्मृतान्यकर ग्याघानमीरममिसु ४२६
हमा स्वसारभ् ४३० शापोऽप्यदष्टत नया पते दुरापं समवाप्य ४V३ शैला सनिति सदसश करामिघातो्थित ४३० श्रयण: पेयस् कर्णान्तस्थित पद्मराग ४२३ सवत्र ज्वलितेषु वेशमसु कर्पूर दव दग्घोडपि ४३७ सललितिकुरग्म ४१७
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परिशिष्ट-३
घृस्ि गतान्तरादि श्ोकानुकमणिका
LIBRARY पृष्ठ
प्रथम ेम्पेप: स काउ्प्यवस्धिति: र्वमनीपिकयैषाथ ६1 द्वितीय उन्मेप:
14 इस्ययं पदपूर्वाजं किभमच्तर्कसन्दमे YIOX वकतापा प्रकारणम २१९
ककुसपव छासम् 14 रवमहिग्ना विधीयन्ते
तृतीय उन्मेप: ५९ पथातररषं विवेष्पन्ते अपहस्यान्यालहवार ३६६
परमात् किमपि सौमासं कैमिदेपा समासोफि 51 येन दवितयमप्येप्तव रसस्वमावालद्ारा २९१
वाचो विषयनैयरव वकताया: प्रकाराणाम् २१६
चतुर्थ उन्मेपा
गरीरं जीविवेनेष कथोन्मेथममानेडवि
समसवँगुणो सस्तो निरन्तरसोद्गारगर्भ vo एकमोसलेखवैकशय
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परिशिष्ट-४
उद्धत ग्रन्थों एवं ग्रन्थकारों की सूची
पृष्ठ पृष्ठ
प्रथम चन्मेप. चतृर्थ उन्मेष: अभिजातजानकी वदात्तराघय कालिदास अमिज्ञानशाकुन्तल 10र, 148 11५, ४४७
किराताजुनीय उत्तररामसरित ४१९, ४३७, ४४1 ९०
कुमारसम्मव १०९, १६६ उदाप्तशाघव
तापसवरसराज किरातार्जुनीय ४३२, ४४२ ९२ वाणमट्ट १५५ कुमारसम्भव ४३९
भवभूति १५५ कृश्यारावण
मझौर छलितराम ४४७
मालृगुप्त ४२२, ४९९ 14४ तापसवस्सराज
148 नागानन्द ४४६ मायुराज मेघदूत ४५ पाण्यवाम्युदय
नघुवश 102, 10९, 143, 148 पुष्पदूषितक ४१८, ४३८, ४४७
राजरेखर १५५ प्रतिमानिषद
समायण ३९ बालरामायण ४३६, ४४८
सर्वसेन १५४ महाभारत
हषंरिन १५५ माथापुष्पक 820, 886
मुदारासस २३३, ४४०, ४४९
द्वितीय उन्मेष रघुवना ४१३, ४२६, ५२९
ववनिकार १९५ रामचरित
रघुवंश 1९१ रामानन्द
शिशुपालवध रामाभ्युद्दय रामायण तृतीय सन्मेष
साएमदर्सराज ३०० वीरनरि्ति दण्डिन् ३६६ नेणीमंहार
भरत ३२९ शिशुपालवध लतगकार (दण्डिन्) ३८V दयग्रीयवध विकरमोघंशीय २१८ हुषचरित