Books / Vakrokti Jivita Kuntuka Vyakhya Vishveshwara Siddhanta Shiromani Nagendra (Hindi)

1. Vakrokti Jivita Kuntuka Vyakhya Vishveshwara Siddhanta Shiromani Nagendra (Hindi)

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Barcode : 99999990000770 Title - vakroaktijeevit Author - dr.narendra Language - hindi Pages - 881 Publication Year - 1955 Barcode EAN.UCC-13

9 999999 000077

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हिन्दी वक्रोक्तिजीवित

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हमारा सर्वश्रेष्ठ आलोचनात्मक साहित्य प्रेमचन्द जीवन, कला और कृतित्व सुमित्रानन्दन पंत ", हंसराज 'रहवर' ६।।)

महादेवी वर्मा " शचीरानी गुर्टट ६) 11 शचीरानी गुदू ६) 4 प्रालोचक रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के आलोचक गुलावराय-स्नातक ६)

महाकवि सूरदास शचीरानी गुट ८)

कबीर-साहित्य और सिद्धान्न नन्ददुलारे वाजपेयी ४)

जायसी-साहित्य और सिद्धान्त यशदत्त शर्मा २1।) यश्ञदत्त शर्मा २॥।) सूर-साहित्य औरप्रौर सिद्धान्त यज्ञदत्त शर्मा २॥) प्रबन्ध-सागर हिन्दी काव्य-विमर्श यज्ञदत्त शर्मा k।I)

हिन्दी-नाटककार गुलावराय ३।।) जयनाथ 'नलिन' ५) हिन्दी-निबन्धकार जयनाथ 'नलिन' कहानी और कहानीकार मोहनलाल जिश्ञासु ३) तुलनातमक अध्ययन शर्मा-रस्तोगी ३) मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ डा० सावित्री सिन्हा ८) सुफीमत औ्रौर हिन्दी-साहित्य डॉ० विमलकुमार जैन ८) कामायनी-दर्शन सद्दल तथा स्नातक ४) कान्य के रूप गुलावराय x) सिद्धान्त और अररध्ययन गुलावराय ६) रोमाटिक साहि त्यशास्त्र देवराज उपान्याय ३।।।) साहित्य-विवेचन क्षेमचन्द्र सुमन - योगेन्द्रकुमार मल्लिक ७ साहित्य-विवेचन के सिद्धान्त "' ३) हिन्दी काव्यालकारसूत्र आचार्य विश्वेश्वर, सं० डा० नगेन्द्र १२) वक्रोक्तिजीवितम् श्ाचार्य विश्वेश्वर, म० डा० नगेन्द्र १६) साहित्य, शिक्षा और सस्कृति डा० राजेन्द्र प्रसाद ५) भारतीय शिक्षा डा० राजेन्द्र प्रसाद ३) क्ला औौर सौन्टर्य रामकृप्ण शुक्ल 'शिलीमुख' ३।।।) समीक्षायण कन्हैयालाल सहल ३) दृष्टिकोग कन्हैयालाल सहल १।) मगतिवाद की रूपरेखा मन्मथनाथ गुप्त ७) साहित्य-जिज्ञासा ललिताप्रमाद सुकुल ३) सन्तुलन प्रभाकर माचव ४) साहित्यानुगीलन शिवदानसिंह चौहान ६) प्रनुसन्धान का स्वरूप टा० साविन्री मिन्दा ३) हिन्दी साहित्य और उसकी प्रर्गात स्नातक तथा सुमन ३) साहित्यगास्त्र का पारिभापिक शव्द-कोप राजेन्द्र द्विवेदी ८) आलोचना फे सिद्धान्त व्यौहार राजन्द्रमिंद ३) आत्माराम एएड संस, दिल्ली-६

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-- हिन्दी अनुसन्धान परिषद् ग्रन्थमाला, ग्रन्य ५

हिन्दी

वक्रोक्तिजीवित

['वक्रोक्तिजीवितम्' की हिन्दी व्याख्या ]

व्याख्याकार आचार्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमशिः अध्यक्ष,'श्रीघर अनुसन्धान विभाग' गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृन्दावन तथा सम्मान्य सदस्य, हिन्दी अनुसन्वान परिपद् दिल्ली विश्वविद्यालय

सम्पादक -- डा० नगेन्द्र, एम. ए, डी. लिट

हिन्दी अरनुसन्धान परिपद्, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली की ओर से आत्माराम एए्ड संस प्रकाशक तथा पुस्तक-विकता काश्मीरी गेट दिल्ली-६ द्वारा प्रकाशित

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प्रकाशक रामलाल पुरी आ्रत्माराम एएड संस काश्मीरी गेट, दिल्ली-६

(सर्वाधिकार सुरक्षित) मूल्य सोलह रुपये सं० २०१२ : १६५५

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हमारी योजना

'हिन्दी वक्रोक्तिजीवित' हिन्दी-अनुसत्धान-प्रन्यमाला का पाँचवाँ ग्रत्थ है। हिन्दी अनुसन्धान परिषद्, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, की संस्था है जिसकी स्थापना अक्तूवर १६५२ ई० में हुई थी। इसका कार्य-क्षेत्र हिन्दी भाषा एव साहित्य-विषयक अनुसन्धान तक ही सीमित है और कार्यक्रम मूलत दो भागों में विभक्त है। पहले विभाग पर गवेषणात्मक अनुशीलन औरौर दूसरे पर उसके फलस्वरूप उपलब्ध साहित्य के प्रकाशन का वायित्व है। गत वर्ष परिषद् की ओर से तीन ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। 'हिन्दी काव्या- लड्गार सूत्र, 'मध्यकालीन हिन्दी-कवयित्रिया' तथा 'अनुसन्धान का स्वरूप'। 'हिन्दी नाटक-उद्भव और विकास', 'हिन्दी वक्रोवितजीवित' तथा सूफीमत और 'हिन्दी साहित्य' हमारे इस वर्ष के प्रकाशन है। इन प्रन्थो में 'हिन्दी काव्यालड्धारसूत्र' 'आ्रचार्य वामन के 'काव्यालङ्धारसूत्रवृत्ति.' का हिन्दी भाष्य है। 'अनुसन्धान का स्वरूप' अनुसन्धान के मूल सिद्धान्त तथा प्रक्रिया के सम्बन्ध में मान्य आचार्यो के निवन्धों का संकलन है। 'मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ' 'हिन्दी नाटक-उद्भव और विकास' तथा 'सूफीमत और हिन्दी साहित्य' दिल्ला विश्वविद्यालय द्वारा पी-एच० डी० के लिए स्वीकृत गवेषरगात्मक प्रबन्ध है। इस योजना को कार्यान्वित करने में हमें दिल्ली की प्रसिद्ध प्रफाशन-सस्था-आ्ात्माराम एण्ड सस से वाछित सहयोग प्राप्त हुआ है। हिन्दी अनुसन्वान परिषद् उसके अध्यक्ष श्री रामलाल पुरी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करती हैं।

नगेन्द्र अध्यक्ष, हिन्दी अनुसन्धान परिपद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली

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भूमिका

आचार्य कुन्तक

और

वक्रोक्ति-सिद्धान्त

लेखक-डॉ० नगेन्द्र

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वक्तव्य

सामान्यत. भूमिका की भूमिका लिखना विचित्र हो लगता है। फिर भी दो-एक बातों का पृथक उल्लेख करना कुछ आवश्यक-सा हो गया है। काव्यशास्त्र के अरध्ययन में ज्यो-ज्यों मेने प्रवेश किया है त्यों-त्यो यह एक तथ्य मेरे मन में स्पष्ट होता गया हूँ कि भारत तथा पश्चिम के दर्शनो की तरह ही यहाँ के काव्यशास्त्र भी एक- दूसरे के पूरक है, और पुनरास्यान आदि के द्वारा उनके आघार पर हमारे अपने साहित्य की परम्परा के अनुकूल एक सश्लिष्ट, आ्रघुनिक काव्यशास्त्र का निर्मास सहज-सम्भव है। हिन्दी-धवन्यालोक, हिन्दी-काव्यालङ्धारसूत्र तथा प्रस्तुत ग्रन्थ श्रौर इनकी विस्तृत भूमिकाएँ इसी दिशा में विनस्र प्रयास है। आाज हिन्दी के वर्ण-योग के स्थिरीकरण के लिए प्रयत्न हो रहे हैं। थोड़ा कठिन होते हुए भी यह फार्य आवश्यक है, इसमें संदेह नहीं। मुझे खेद है कि प्रस्तुत ग्रन्थ के मुद्रसा में यह सम्भव नहीं हो सका। फिर भी मैने पचम वर्ण का प्रयोग प्रायः बचाया है, औौर हल् चिह्न का प्रयोग भी कम ही किया है। संस्कृत के नियमानुसार जगत, महान, विद्वान, बुद्धिमान, पश्चात और पृथक सभी को हलन्त करने से हिन्दी के मुद्रणगादि में अनावश्यक उलभन पंदा हो जाती है। मैने इस सम्बन्ध में अपने लिए एक साघारस-सा नियम बना लिया है-और वह यह कि हल का प्रयोग हमें या तो ऐसे शन्दों मे करना चाहिए जो हिन्दी में हलन्त रूप में सर्व-स्वीकृत हो गये हैं यथा 'अर्यात्', 'वरन' आदि, या फिर कुछ ऐसे शब्दों को हलन्त किया जा सकता है। जिनका, हिन्दी में अपेक्षाफृत कम प्रचलन होने से, अभी संस्कृत-संस्कार नहीं छूटा है उदाहरसार्य-सम्यक, ईथत, किंचित् आदि। मेने सामान्यत इसी नियम का अनुसरण किया है-जहां कहीं नहीं हो सका वहाँ उसके लिए मेरा या मेरे प्रूफ-शोधक का सस्कार ही उत्तरदायी हो सकता हैँ। -नगेन्द्र

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विषय-क्रम

(पृष्ठ १ से २८२ तक )

१ वक्रोक्ति-सिद्धान्त पूर्व वृत्त परवर्ती आचार्य और वक्रोक्ति कुन्तक द्वारा वक्रोक्ति की स्थापना

२. वक्रोक्ति-सिद्धान्त के अन्तर्गत काव्य का स्वरूप १५

काव्य का प्रयोजन काव्य-हेतु काव्य की आात्मा वक्रोक्ति और उसकी परिभाषा काव्य की शैली और शास्त्र तथा व्यवहार की शैली काव्य में कवि का कर्तृत्व प्रतिभा कुन्तक का प्रतिभा-विवेचन

३. वक्रोक्ति के भेद ५४

(क) वर्णविन्यास-वक्रता (स) पदपूर्वार्ध-वक्रता (ग) पदपरार्घ-वक्रता (घ) वाक्य-वक्रता और वस्तु-वक्र्ता वक्रोक्ति-सिद्धान्त में वस्तु (काव्य-विपय) का स्वरूप (ङ) प्रकरण-वक्रता (च) प्रवन्ध-वक्रता कुन्तक और प्रवन्व-कल्पना (पाश्चात्य काव्यशास्त्र में प्रबन्ध-विधान)

४. वक्रोक्ति तथा अन्य काव्य-सिद्धान्त १२३ (क) वक्रोक्ति और अलंकार वक्रोकि-सिद्धान्त श्रोर स्वमावोक्ति रसवदादि भलंकार रसवत् वर्ग के अन्य अलंकार

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( ग )

(ख) वक्रोक्ति-सिद्धान्त और रीति मार्ग का अर्थ और स्वरूप मार्ग-भेद का आधार मार्गो का तारतम्य मार्ग-भेद और उनका स्वरूप (ग) वक्रोक्ति और ध्वनि (घ) वक्रोकि और रस (ङ) वक्रोक्ति भर श्रचित्य

५ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति प्लेटो के पूर्ववर्ती विचारक और प्लेटो, अ्रस्तू, रोमी आचार्य सिसरो और होरेस, लाजाइनस, दान्ते, पुनर्जागरण काल, नव्यशास्त्र वाद, स्वच्छन्दतावाद का पूर्वाभ स. स्वच्छन्दतावाद, स्वच्छन्दतावाद ने उपरान्त, अभिव्यजनाबाद और वक्रोक्तिवाद, क्रोचे और कुन्तक वे सिद्धान्त, अन्य आधुनिक बाद, रिचर्ड्स

६. हिन्दी औरर वक्रोक्ति सिद्धान्त आदि काल भक्तिकाल रोति काल भाघुनिक युग के प्रालोचक विवेचन

७ वक्रोक्ति-सिद्धान्त की परीक्षा

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वक्रोक्ति सिद्धान्त

वक्रोक्ति के संस्यापक आचार्य कुन्तक भारतीय काव्य-शास्त्र के प्रमुख आधार- स्तम्भ है। अपनी मौलिक प्रतिभा और प्रखर मेधा के द्वारा उन्होंने काव्य के मूल सिद्धान्तों का सर्वया नवीन रूप में पुनरास्यान किया और ध्वनि-सिद्धान्त के उद्भावक आनन्दवर्घंन की सार्वभौम प्रतिष्ठा को ललकारा :-

निर्मूलत्वादेव तयोर्भावाभावयोरिव न कयचिदपि साम्योपपत्तिरित्यलमनुचित- विषयचर्वणाचातुर्यचापल्येन।

-अर्यात् भाव और अभाव के समान उन दोनों (कामी तथा शराग्नि के सादृश्य) के निर्मूल होने से उन दोनों के साम्य का किसी प्रकार भी उपपादन नहीं हो सकता। इसलिए अनुचित विषय के समर्यन में चातुर्य दिखलाने का (ध्वन्या- लोककार का) प्रयत्न व्यर्थ है। (हिन्दी वक्रोक्तिजीवित-तृ० उन्मेप परिशिष्ट)

इसी साहसपूर्ण मौलिक विवेचन के कारण कुन्तक का वकोकिसिद्धान्त केवल सिद्धान्त न रह कर सम्प्रदाय वन गया है।

पूर्व वृत्त

काव्य के जीवित रूप में वक्रोक्ति की स्थापना तो दशवीं शताब्दी में कुंतक के द्वारा ही हुई, परन्तु उसके वीज संस्कृत काव्य-शास्त्र में पहले ने ही वर्तमान थे। अन्य सिद्धान्तों की भाँति वक्रोत्ति-सिद्धान्त भी कोई आकस्मिक घटना न होकर एक विचार-परम्परा की परिणति ही थी

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भूमिका [पूर्व वृत्त

बाए भट्ट वक्ोक्ति के व्यापक अर्थ की कल्पना कुंतक के पूर्ववर्तो आचार्यो में ही नह कवियों में भी मिलती है। उदाहरण के लिए वाण भट्ट ने कादम्वरी में वफ्रोक्ति क इसी व्यापक अर्थ में प्रयोग करते हुए लिखा है वक्रोक्तिनिपुणेन आख्यायिकाख्यान- परिचयचतुरेख (कादम्बरी)। यहाँ वक्रोक्ति का प्रयोग निश्चय ही केवल वाक्छल रूप शब्दालकार के अर्थ में नहीं किया गया। वास्तव में वाणग स्वय भी वाणी के चमत्कार के बडे प्रेमी थे लगभग पाँच छह शताब्दी के उपरान्त कविराज ने 'वक्रोक्तिमार्ग- निपुण' विशेषण देकर उनकी तथा सुबन्धु की प्रशस्ति की है

सुवन्धुर्बाणभट्टश्च कविराज इति त्रय । वक्रोक्तिमार्गनिपुणाश्चतुर्थो विद्यते न वा । (राघवपाण्डवीयम् १।१४१)

वाण ने भी श्लेष, प्रहेलिका आदि का प्रयोग करते हुए शब्दकोडा का रस लिया है- परन्तु उपर्युक्त पक्ति में वक्रोक्ति का अर्य शब्दक्रोडा मात्र नहीं है यद्यपि शब्दक्रीडा- 'परिहास जल्पित'-का भी अन्तर्भाव उसमें है अवश्य। वाख की यह वक्रोक्ति इति- वृत्त वर्णन से भिन्न काव्य की चमत्कारपूर्ण शैली तथा वचन-विदग्धता की ही पर्याय है जिसका उन्होंने अन्यत्र इस प्रकार विश्लेषण किया है

नवोऽर्थो जातिरग्राम्या, इ्लेपोडक्लिप्ट स्फुटो रस । विकटाक्षरवन्वर्च कृत्स्नमेकत्र दुर्लभम् ॥ (हर्षचरित, १।८) इस प्रकार स्पष्ट है कि वाण का वक्रोक्ति मार्ग शब्द और अर्थ दोनों के चमत्कार से सम्पन्न है, उसमें अक्लिष्ट श्ले और नवीन अरयं दोनो का चमत्कार है।

भामह काव्य-शास्त्र में वक्ोक्ति का सर्वप्रथम नियमित विवेचन भामह के काव्यालकार में मिलता है और इसमें सदेह नहीं कि वकाक्ति के व्यापक अर्य की कल्पना का मूल उद्गम भामह का विवेचन ही है।

वफोक्ति में भामह ने शब्द और अर्थ दोनों की वकता का अन्तर्भाव माना है.

(काव्यालकार १।६)

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पूर्व वृत्त ] भूमिका [३

, वाचा वक्ार्थशन्दोक्तिरलकाराय कल्पते (का० ५।६६) अर्यात् वक्ोक्ति से अभिप्राय है अर्थ और शब्द की वकता-'वक्राभिघेय शव्दोक्ति' और 'वकार्य शन्दोति' का एक ही अर्थ है। इस प्रकार भामह के अनुसार शब्द-वक्रता और अर्य-वक्रता का समन्वित रूप ही वक्रोक्ति है। यह वकोक्ति ही इष्ट (अर्थ) और वाणी (शब्द) का मूल अलंकार है-अयवा यो कहिए कि अलंकार का मूल आधार है। आगे चलकर भामह ने अतिशयोक्ति के स्वरूप-वर्णन द्वारा वकता का आशय स्पष्ट किया है। अतिशयोक्ति के विषय में भामह का मत है. -

निमित्ततो वचो यतु लोकातिक्रान्तगोचरम्। मन्यतेऽतिशयोकि तामलंकारतया यथा॥ २।८१

इत्येवमादिरुदिता गुणातिशययोगत. । सर्ववानिशयोक्तिस्तु तर्कयेत् ता यनागमम् ॥ २/८४

इसका निष्कर्ष यह है .-

१. अतिशयोक्ति उस उक्ति का नाम है जिसमें गुण के अतिशय का योग हो।

२. अतिशय का अर्थ है लोकातिक्रान्तगोचरता-लोक का अतिकमण अर्यात्-लोकसामान्य से वचित्र्य।

३ अतएव अतिशय-उक्ति का शरर्य हुआ लोकसामान्य (उत्ति) से विचित्र उक्ति : ऐसी उक्ति जिसमें शब्द और अर्य का लोकोत्तर अर्थात् असाधारण या चमत्कारपूर्ण प्रयोग किया गया हो।

यह अतिशयोक्ति ही वक्रोक्ति है-

सैपा सर्वत्र वफोति + +1 (२1८X) +

अतएव भामह की वकोक्ति और प्रतिशयोक्ति पर्याय है :- एव चातिशयोक्तिरिति वक्रोक्तिरिति पर्याय इति बोध्यम् (काव्यप्रकाश वालवोघिनी टीका प०६०६), औ्रर उन दोनों का एक हो लक्षणा है लोकातिकान्तगोचर उत्ति-आधुनिक शब्दावली में शब्द-अ्रर्य का लोकोत्तर अर्यात इतिवृत्त कथन से भिन्न चमत्कारपूर्ण प्रयोग :-

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भूमिका [पूर्व वृत्त

(१) शब्दस्य हि वक्रता अभिघेयस्य च वक्रता लोकोत्तीर्येन रूपेणावस्थानम्। (२) लोकोत्तरेण चैवातिशय .... । (लोचन-अभिनवगुप्त) आगे चलकर भामह उपर्युक्त श्लोक में ही वक्रोक्ति की विशेषता को और स्पष्ट करते हुए लिखते है

अनयार्थो विभाव्यते। अर्थात् इसके द्वारा अर्थ का विचित्र रूप में भावन होता है -

श्रनया अरतिशयोक्तया विचित्रतया भाव्यते (लोचन)।

वक्रोक्ति का साम्राज्य सार्वभौम है-कोडलकारोऽनया विना।२।८५। काव्य का समस्त सौन्दर्य उसी के आश्रित है। स्फुट अलकारो में ही नहीं काव्य के सभी व्यापक रूपों में-महाकाव्य रूपक आदि में भी वक्रोक्ति का ही चमत्कार है युक्त वक्रस्वभावोक्त या सर्वमेवंतदिष्यते। १।३०। जहा वक्रता नहीं है वहा अलकारत्व ही नहीं है-इसीलिए हेतु, सूक्ष्म और लेश को भामह ने अलकार नहीं माना है :

हेनु सूक्ष्मोऽथ लेशश्च नालकारतया मत। समुद याभिघानस्य वक्रोक्त्यनभिधानत ॥

अर्थात् वक्रोक्ति के अभाव के कारण हेतु, सूक्ष्म और लेश अलकार नहीं है। वक्रोकि से होन कथन को भामह ने वार्ता नाम दिया है। सूर्य अस्त हो गया, चन्द्रमा उदित है, पक्षी अपने नीडो को जा रहे हैं-यह भी कोई काव्य है ? यह तो वार्ता है (२८७)। इसे ही शुक्ल जी ने इतिवृत्त कथन कहा है-इसमें शब्द-अर्थ का साधारण प्रयोग होता है जता कि जन-सामान्य नित्न-प्रति की बोलचाल में करते हैं।

साराश यह है कि भामह के अनुसार- (१) वक्रोक्ति का मूल गुण-वफ्रोक्ति का मूल गुण है शब्द और अर्थ का वचित्र्य । -

(२) वक्रोक्ति का प्रयोजन-वक्रोक्ति का प्रयोजन है अर्थ का विवित्र रूप से भावन। (३) वक्रोक्ति का महत्व-वक्रोक्ति का महत्व सर्वव्यापी है, इसके बिना अलकार का अलकारत्व ही सम्भव नहीं है। इसके अभाव में वाक्य काव्य न होकर वार्ता मात्र रह जाता है।

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पूर्व वृत्त ] भूमिका [ ५

टएडी

भामह के उपरान्त दण्डी ने भी काव्यदर्श में चक्रोक्ति की चर्चा को है। उन्होने वाड्मय के दो व्यापक भेद किने है स्व्रभावोक्ति और वक्रोकिति .- द्विघा भिन्न स्वभावोक्तिवंक्रोक्तिश्चेति वाड्मयम् २।३६२। स्वभावोकित में पदार्थो का साक्षात् स्वरूप-वर्णन होता है, वह आाद्य अलकार है .-

नानावस्थ पदार्थाना रप साक्षाद् विवृण्वती। स्वभावोक्तिश्च जातिश्चेत्याद्या सालकृतिर्यथा ॥ २१८

शास्त्रादि में उसी का साम्राज्य रहता है-शास्त्रेष्वस्यंव साम्राज्य। २।१३। वक्रोक्ति इससे भिन्न है, उसमें साक्षात् अथवा सहज वर्णन न होकर वक्र अर्थात् चमत्कारपूर्ण वर्णन होता है, उपमादि अन्य अलंकार सभी वक्रोक्ति के प्रकार है-वक्रोफ्तिशन्देन उपमादय सकीर्णपर्यन्ता अलंकारा उच्यन्ते (हृदयगमा टीका)। इन सभी के चमत्कार में, प्राय, किसी न किसी रूप से श्लेष का योग रहता है-श्लेपो सर्वासु पुष्णाति प्राय वक्रोक्तिषु श्रियम्। २।३६३। उधर अतिशयोक्ति के प्रसग में दण्डी ने अति- शयोक्ति को भी सभी अलकारों का आधार माना है : अलंकारान्तराणामप्येकमाहुः परायसाम्। २।२२०। इस प्रकार एक और वक्रोक्ति को ओर दूसरी और अति- शयोक्ति को सभी अलकारों का आघारं मान कर भामह की भाति दण्डी भी दोनों. की पर्यायता सिद्ध कर देते है। पर्ताय हो जाने पर दोनों के परिभाषा भी फिर वही हो जाती है जो अतिशयोक्ति की। दोनों का मूल उद्गम एक ही है 'लोकतीमांति- वर्तिनी विवक्षा' अर्यात् वस्तुं के लोकोत्तर वर्णन की इच्छा-विवक्षा या विशेषम्य लोकसीमातिर्वातनी (२।२१४)। यही लक्षणा भामह ने भी नाना है। अतएव वक्रोक्ति के सम्बन्ध में भामह और दण्डी का मत प्राय एक ही है-दोनो लोकवार्ता से भिन्न वाक-भगिमा को वक्रोक्ति मानते है, अन्य सभी अलंकार इसी के (आश्रित) प्रकार है। अन्तर केवल इतना है कि भामह स्वभावोक्ति को भी वक्रोक्ति की परिघि के भीतर मानते हं, परन्तु दण्डी के अनुसार दोनों भिन्न है। भामह के अनुसार स्वभाव- कयन भी अपने ढग से वक्र-कयन होगा, परन्तु दण्डी स्वभाव-कथन को वक्र-कथन से निश्चय ही पृथक तथा कम महत्वपूर्ण मानते है-काव्य के लिए वह अनिवार्य नहीं है-ईप्सित सयवा वाद्नीय मात्र है. काव्गेप्वप्येतर्द प्सितम् २।१३।

इस प्रकार वक्रोक्ति के विषय में दण्डी का अभिमत भामह के मत से मुलतः भिन्न नहीं है।

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६ 1 भूमिका I पूर्व वृत्त

(१) वफ्रोक्ति को उन्होने व्यापक अर्थ में ही ग्रहण किया है-वह विशिष्ट अलकार न होकर सर्व-सामान्य अलकार है।

(२) वक्रोक्ति अतिशयोक्ति से अभिन्न है। (३) किन्तु वह स्वभावोक्ति से भिन्न है, यद्यपि उसके विपरीत नहीं है। स्वभावोक्ति शास्त्र का सहज माध्यम है-काव्य में भे वह वाछनीय है, उधर वक्रोक्ति काव्य का अनिवार्य माध्यम है।

वामन वामन ने वक्ोक्ति को सामान्य अलकार न मानकर विशिष्ट ही माना है- किन्तु परवर्ती आचार्यो की स्वीकृत मान्यता के विपरीत उनकी वक्रोक्ति शब्दालकार न होकर अर्थालकार है और उसका लक्षण है सादृश्याल्लक्षणा वकोक्ति: (काव्यालकार सूत्र ४।३।८)

अ्रर्ात् 'लक्षणा के बहुत से निवन् होते है, उनमें से सादृश्यनिवन्धना लक्षणा ही वकोक्ति कहलाती है। असादृश्यनिवन्धना लक्षणा वक्रोक्ति नहीं होती (वृत्ति)"। वामन की इस धारणा का आघार क्या है यह कहना कठिन है, किन्तु वकोक्तिकी यह परिभाषा प्राय उनके पूर्ववर्ती अथवा परवर्ती किसी भी ग्रन्थ में नहीं मिलती और अन्तत स्वीकार्य भी नहीं हुई-उसका केवल ऐतिहासिक महत्व ही रहा। यह परिभाषा एक ओ वामन के पूवंवर्ती दण्डी के समाघिगुण लक्षण का स्मरण दिलाती है और दूसरी ओर उनके परवर्ती आनन्दवर्धन की ध्वनि-कल्पना का पूर्व-सफेत देती है। लक्षणा में थोडी सी वक्रता अवश्य रहती है-अभिघा से भिन्नता ही वकता है, परन्तु फिर यह प्रश्न उठता है कि केवल सादृश्यनिवन्धना लक्षणा को ही वक्ोक्ति क्यो माना गया है : विपरीत लक्षणा आदि वततर रपो को क्यो छोड दिया गया है?

यह तो हुआ विशिष्ट अयं। सामान्य अर्य में भी वकोक्ति को वामन ने सवथा उपेक्षा की है, यह नहीं कहा जा सकता। वामन की विशिष्टा पदरचना रोति में विशिष्टता वकता से एकात भिन्न नहीं है। वामन के शब्दों में विशेष का अर्य है गुणात्मा औोर उनके अनेक शब्द तथा अयं गुणों में वक्रोक्ति के अनेक रपो का स्पष्ट अन्तर्भाव है। उदाहरण के लिए वामन के ओज, श्लेय, उदारता, कान्ति आदि अनेक शब्दगुणों में कु तक की वर्ण-विन्यास-वक्ता का अन्तर्भाव है।-कान्ति में जहां पद- रचना उज्जवल होती है और जिसके अभाव में रचना पुराण की छाया-सी लगती है, और उदारता में जहा पद नृत्य-सा करते प्रतीत होते हैं, वर्ण-वक्ा अत्यन्त

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पूर्व वृत्त ] भूमिका

मुखर रूप में प्रकट है। इसी प्रकार अर्थंगुण ओोज की अर्थप्रौढ़ि का वह रूप, जिसका मूल चमत्कार है साभिप्राय-विशेषण-प्रयोग, निश्चय ही कुतक की पर्याय- वक्रता अथवा विशेषण-वक्रता का समानधर्मा है।

उक्तिवंचित्रयमय अर्यगुण माघुयं पदार्थ-वक्रता का ही रूप है। यही उदारता के विषय में कहा जा सकता है-उसमें ग्राम्य अर्य का अभाव रहता है और यह अभाव पदार्थ-वक्रता का द्योतक है। सौकुमार्य में अप्रिय (अपरुष) अर्थ में प्रिय शब्द का प्रयोग होता है यह कुत्तक की पद-वक्रता का एक रूप है। वामन के अर्यगुण श्लेष की परिभाषा है क्रियाओ का ऐसी चतुराई के साथ एकत्र वर्णन करना कि सम्वन्धित व्यक्ति उसे समझ न सके। यहाँ भी चतुराई (मूल शब्द-कौटिल्य) वक्रता का ही दोतक है-भोज के टीकाकार रत्नेश्वर का भी यही मत है। उनके मत से अर्थरण समता में भी वक्रना है, परन्तु वास्तव में वह अधिक स्पष्ट नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि वामन ने अपने ढंग से वक्रता के अनेक एपों का वर्णन किया है-केवल वक्रता या वक्रोक्ति शब्द का प्रयोग इस अर्थ में नहीं किया। वक्रता के व्यापक रूप की कल्पना उन्होने प्रकारान्तर से अपने सिद्धान्त के अनुसार निश्चय ही की है- उसका लोकोत्तर चमत्कार उन्हें पूर्णतया ग्राह्यहै-केवल शन्दावली भिन्न है।

रुद्रट रुद्रट वामन से एक पग और आगे बढ़े-उन्होने वक्रोक्ति को सामान्य अलंकार को पदवी से च्युत तो किया ही, साथ ही उससे अर्यालंकार का पद भी छीन लिया। वक्र उक्ति का अर्थ वक्रीकृता उक्ति करते हुए उन्होंने उसे वाक्छल पर आश्रित शब्दा- लकार मात्र माना-और इस प्रकार वक्रोक्तिचिंतन में एक क्रान्ति उपस्यित कर दी। रुद्रट ने इस वक्रोक्ति के दो भेद किये है : (१) काकु वक्रोक्ति और (२) भंग-श्लेख वक्रोक्ति। काकु में उच्चारण और स्वर के उतार-चढाव द्वारा उक्ति का वक्र अर्थ किया जाता है और भग-श्लेष में इ्लेष के द्वारा। रुद्ट को स्यापना का प्रभाव कवियों पर भी पड़ा और उनके कुछ ही समय उपरान्त रत्नाकर नामक कवि ने भग-श्लेष का चमत्कार प्रदशित करते हुए वक्रोकि पचाशिका' की रचना की।

आ्रनन्टवर्धन आनन्दवर्घन ने वक्रोकि का स्व्रतत्र विवेचन नहीं किया। घ्वन्यालोक में वकोकि शब्द का उल्लेख, दूमरे उद्योत की २१ वीं कारिका की वृत्ति के अंतगंत, केवल एक स्यान पर हो मिलता है "तत्र वकोरृत्यादिवाच्यालकार व्यवहार एव।" इससे यह स्पष्ट है कि आनन्दवर्घन ने उसे विशिष्ट अलंकार के रूप में ग्रहण किया

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भूमिका [पूर्व वृत्त 15

है और कदाचित् रुय्यक की भौति अर्थालकार माना है। परन्तु यह बात नहीं है- तृतीय उद्योत में उसके सामान्य रूप की भी स्पष्ट स्वीकृति है जहा उन्होंने भामह की वकरोत्तिविषयक इस प्रसिद्ध स्थापना की पुष्टि की है -

सपा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयाऽर्थो विभाव्यते। यत्नोऽस्या कविना कार्य कोऽलकारोऽनया बिना॥

अ्परतिशयोक्ति और वक्रोक्ति की पर्यायता स्वीकार करते हुए श्र््रानन्दवर्धन ने लिखा है ++'सबसे पहले तो सभी अलकार अतिशयोत्ति-गर्भ हो सफते है। महाकवियों द्वारा विरचित वह (अन्य अलकारों की अतिशयोक्तिगर्भता) काव्य को अ्रनिर्वचनीय शोभा प्रदान करती है। अपने विषय के अनुसार किया हुआ अतिशयोक्ति का सम्बन्ध (योग) काव्य में उत्कर्ष क्यों नहीं लाएगा। भामह ने भी अतिशयोत्ति के लक्षण में यह हा है :- (जो अतिशयोक्ति पहले कह चुके हैं, सब अलकारो की चम- त्कार-जननी) यह सब वही वक्रोक्ति है। इसके द्वारा पदार्थ चमक उठता है। कवियो को इसमें विशेष प्रयत्न करना चाहिए। इसके बिना अलकार ही क्या है?

उसमें कवि की प्रतिभावश अतिशयोक्ति जिस अलकार को प्रभावित करती है, उसको (ही) शोभातिशय प्राप्त होता है। अन्य तो (चमत्कारातिशय-रहित) अलकार ही रह जाते है। इसी से सभी अलकारो का रूप धारण कर सकने की क्षमता के कारण अ्ररभेदोपचार से वही सर्वालकाररूप है, यही अर्थ समझना चाहिए।"-(हिन्दी ध्वन्यालोक पृ० ३६४-६५)

उपर्युक्त विवेचन का निष्कर्ष यह है कि आनन्दवर्धन के मत से (१) वक्रोक्ति प्प्रतिशयोक्ति की पर्याय एव सर्वालकाररूपा है, (२) उसका चमत्कार कवि-प्रतिभाजन्य है, (३) विषय का औचित्य उसका नियामक है अर्थात् वकरना अ्रथवा अतिशय का प्रयोग विषय के अनुहूल हो होना चाहिए। इस तीसरे तथ्य के द्वारा आनन्दवर्घन ने वक्रोक्ति को अपने सिद्धान्त के अनु- शासन में ले लिया है। प्रत्यक्ष रूप में आ्र््रानन्दवर्घन के ग्रन्थ में वक्रोक्ति को इतनी ही चर्चा है। और वह भी अतिशयोकिति के द्वारा। किन्तु अप्रत्यक्ष र्प में उनके ध्वनि-निरपण का कु तक के वक्रोक्ति-विवेचन पर गहरा और व्यापक प्रभाव है। वक्रक्ति-जीवितम् फी रपरेगा

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पूर्व वृत्त ] भूमिका

का विधान ही कुतक ने ध्वन्यालोक के आधार पर किया है : दोनो ग्रन्यो की निरुपण- योजनाएं समानान्तर रूप से चलती हैं। इसके अ्तिरिक्त वक्रोफ्ति-जीवितम् में अनेक प्रसंग ऐसे है जहाँ ध्वनि-सिद्धान्त को प्रतिध्व्वनि स्पष्ड सुनाई देती है. उदाहरण के लिए वक्रोक्ति का विस्तार भी ध्वनि की भांति वर्ण तया प्रत्यय, विभक्ति आदि से लेकर सम्पूर्ण प्रबन्ध काव्य तक माना गया है. वर्ण-विन्यास-वक्रना और वर्ण-ध्वनि, पद-वक्रता और पद-ध्वनि में कोई मौलिक भेद नहीं है। अ्नेक चमत्कार-भेद तो ऐसे है जिनमें केवल ध्वनि और वक्रोकिति का नाम-भेद मात्र है-आनन्द ने उने ध्वनि कहा है कु तक ने वक्रोक्ति। आ्दन्दवर्घन की उक्ति है:

सुप्-तिड-वचन-सम्बन्वैस्तया कारकशक्तिभि। वृत्-तद्धित-समान्च द्योत्योऽलक्यक्रम क्वचित् ॥ (३१६ व्वन्या-

लोक) +++ च शव्दान्निपातोपसगकालादिभि प्रयुक्तरभिव्यज्यमानो हृथ्यते। अर्थात् सुप् (प्रथमादि बिभक्तिया), तिड् (क्रिया विभक्तिया), वचन, सम्वन्व (पष्ठी विभक्ति), कारक शञक्ति, कृत् (घातु से विहित तिड् भिन्न प्रत्यय), तद्धित और समास से कहीं-कहीं असलक्ष्यक्रम ध्वनि अभिव्यक्त होती है।

+++च शब्द से निपात, उपनर्ग, कालादि के प्रयोग से अभिव्यक्त होता देखा जाता है। इन भेदों की व्याख्या में ध्वनिकार ने अनेक उदाहनण दिये है जिनमें विभ- वितया, क्रिया-रूप, वचन, कारक, काल, उपलर्ग, निपात आदि की ध्वनि अन्तर्भूत है। इनमें से कतिपय उदाहरण कुन्तक ने उसी प्रसग में यथावत् उठा कर रख दिये हैं- उदाहरण के लिए शाकुन्तलम् का यह उद्धरण 'कयमप्युन्नमित न चन्वित तु-अर्थात् किसी प्रकार शकुन्तला के मुख को ऊपर उठा तो लिया किन्तु चूम नहीं सका' दोनो में क्रमश 'तु' की निपात-ध्वनि और निपात-वक्रना को उदाहृत करने के लिए दिया है। इसी प्रकार अन्य उदाहरण भी सकलित किये जा सकने हैं। पदार्य-वक्रना और पदार्य-ध्वनि के मूल रूप भी तत्वत भिन्न नहीं है-और यही वात अशत प्रबन्ध- वक्रता और प्रबन्ध-ध्वनि के विषय में भी कही जा सकती है। उदाहरस के लिए प्रवन्ध-वक्रता के अतिम रूप को स्पष्ट करते हुए कुन्तक ने लिखा है "नये नये उपायो से सिद्ध होने वाले, नीतिमार्ग का उपदेश करने वाले महाकवियों के सभी (प्रवन्व- फाव्य तथा नाटक आदि) ग्रन्थो में (अपना-अपना कुद् अपूर्व) सौन्दर्य (चक्रभान) रहता हो है।" हिन्दी वकोक्तिजीवित ४।२६॥। इतको आ्रधनिक आलोचना-शास्त्र में

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१० 1 भूमिका [पूर्व वृत्त

मूलार्थ कहते हैं-भोज ने इसे महावाक्यार्थ कहा है, और यही ध्वनिकार की प्रबन्ध- ध्वनि है। इस प्रकार यह सिद्ध है कि कुन्तक ने आनन्दवर्घन की ध्वनि कल्पना से निश्चय ही वक्रोक्ति के सकेत ग्रहण किये हैं।

अभिनवगुप्त ने वक्रोक्ति का सामान्य रूप ग्रहण किया है। भामह के वक्रोक्ति- लक्षण- वक्राभिधेय शब्दोक्तिरिष्टा वाचा त्वलड्कृति। काव्यालकार १।३२६ की व्यास्या करते हुए अभिनव ने लिखा है शव्दस्य हि वक्रता, अभिधेयस्य च वक्रता लोकोत्तरेण रूपेण अवस्थानम्। + + लोकोत्तरेण चैवातिशय.। तेन अतिशयोकिति सर्वालकारसामान्यम् ।।लोचन पृ० २०८॥ अर्थात् शब्द और अर्थ की वक्रना का आशय है उनका लोकोत्तर रूप से अवस्थान। लोकोत्तर का अर्थ है अतिशय। इस प्रकार अर्प्रतिशयोक्ति सामान्य अलकार है। ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत में ध्वनि की भूमिका बाँधते हुए आनन्दवर्धन ने निम्नलिखित श्लोक उद्धूत किया है

यस्मिन्नस्ति न वस्तु किंचन मन प्रह्नादि सालकृति, व्युत्पन्नै रचित न चैव वचनैर्वक्रोक्तिशून्य च यन्।

7 + +

अभिनवगृप्त ने इस श्लोक को मनोरथ कवि का मानते हुए, 'वक्रोषितिशून्यं च यत्' पर टिप्पणी की है "वक्रोक्तिशन्येन शव्देन सर्वालकाराभावश्च उक्त।" अतएव यहाँ भी वे वक्रोक्ति की अलकार-सामान्यता की पुष्टि करते है। अभिनव, भोज और कुन्तक प्राय समकालीन ही थे। भोज के विशेषज्ञ डा० राघवन का मत है कि भोज और कुन्तक दोनों प्राय एक ही समय में अर्वन्तिका और काशमीर में वैठ कर परस्पर अपररिचित रहते हुए भामह के वक्रोकिति (अलकार)- वाद की पुनर्प्रतिष्ठा करने का प्रयत्न कर रहे थे। वास्तव में इन दोनो के विवेचन में इतना अधिक अर्थ-साम्य है कि डा० राघवन की स्यापना में शका होने लगती है। ऐसा प्रतोत होता है कि या तो इन दोनो ने भामह के किसी अद्यावधि-प्रज्ञात व्यास्या- फार का आश्रय लिया था अ्रथवा इनमें किसी एक न, सम्भवत भोज ने, दूसरे के ग्रथ का अध्ययन किया था। परन्तु यह हमारे विवेचन-क्षेत्र मे बाहर का विपय है सामान्यत हम डा० राघवन के प्रामाणिक अनुसन्वान को अ्मान्यता देने के अधिकारी नहीं है।

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पूर्व वृत्त ] भूमिका [११

भोज ने वक्रोक्ति का यथेप्ट मनोनिवेशपूर्वक विवेचन किया है-उनके शृंगारप्रकाश और सरस्वतीकण्ठाभरण दोनों में वक्रोक्ति-विषयक अनेक उवितयाँ विखरी हुई है जिनके आधार पर डा० राघवन ने अपने 'भोज का शृगार प्रकाश' नामक ग्रंथ में भोज-कृत वक्रोकिति-विवेचना को बड़ी प्रामाशिक समीक्षा की है। भोज ने अपने पूर्ववर्ती सभी आचार्यों की वक्रोकिति-विषयक धारणाओ का समन्वय प्रस्तुत कर दिया है। उनसे पूर्व वक्रोक्ति के विषय में चार धारणाएँ थी-

१ भामह की धारणा-जिसके अनुसार वक्रोक्ति काव्य-सौन्दर्य का पर्याय है और उसके अन्तर्गत रस, अलकार तया स्वभावकयन अदि सभी आ जाते है। २. दण्डी की धारणा-जो भामह की धारणा से केवल इस बात में भिन्न है कि उसमें स्वभाव-कथन का अन्तर्भाव नहीं है। इस प्रकार दण्डी की वक्रोक्ति भामह की वक्रोक्ति से थोड़ी सी संकीर्ण है।

३ वामन की धारणा-जिसके अनुसार चक्रोकिति सादृश्य-गर्भा लक्षणा पर आश्नित अर्थालकार है। ४. रुद्रट की धारणा-जिसके अ्रनुमार वकोक्ति वाक्छल रूप शन्दालंकार है।

भोज ने सरस्व्रतीकण्ठाभरण तया शृगारप्रकाश में उपर्युक्त चारो धारणाओ्र््रो को ग्रहण किया है। सबसे पूर्व भामह की व्यापक धारणा को लीजिए। भोज ने शृगारप्रकाश में लिखा है.

क पुनरनयो काव्यवचसो व्वनितात्पर्ययो विशेप ? उच्यते- यदवक्र वच शास्त्रे लोके च वच एव तत्। वक्र यदर्यवादी तस्य काव्यमिति स्मृति । शृगारप्रकाश ६,६, पृ० ४२७

अर्थात् शास्त्र और लोक में जो अवक्र वचन है उसका नाम वचन है, और अर्यवाद आदि में (निन्दास्तुति-विषयक अ्र्प्रतिशयोक्नि में) जो वक्रना है उतका नाम काव्य है।

शृगारप्रकाश के द्वितीय खण्ड में इसको और भी स्पष्ट किया गया है. इत्येतदपि सर्वालकारताधारण लक्षस अनुसर्तव्यम्। अस्मिन् नति सर्वालकारजातयो वक्रोक्त्यभिघानवाच्या भवन्ति। तदुक्तम्-

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१२ ] भूमिका [ पूर्व वृत्त

वक्रत्वमेव काव्याना पराभूपेति भामह । इस सबका तात्पर्यार्थ यह है-'अलकारो के इस सामान्य लक्षण का अनुसरण करना चाहिए।' इस प्रकार सभी अलकार वक्रोक्ति के अन्तर्गत आ जाते है।

दण्डी ने वक्रोक्ति की परिघि से स्वभावोषिति का बहिष्कार कर उसको थोड़ा- सा सकुचित कर दिया है। उनके मतानुसार वक्रोक्ति समस्त काव्य की पर्याय तो नहीं है, किन्तु स्व्रभावोक्ति के अतिरिक्त उपमा, रसवदादि अन्य सभी अलकारों की पर्याय है। भोज ने दण्डी का यह ईषत्-सकुचित अर्थ भी ग्रहण किया है, तथा उसका थोडा औरौर भी सकोचन कर दिया है। भामह ने वक्रोक्ति के अन्तर्गत काव्य का समग्र रूप ग्रहण किया था, दण्डी ने स्वभावोक्ति को पृथक कर दिया, और भोज ने रस- सिद्धान्त की मान्यता स्वीकार करते हुए रस को भी स्वतत्र कर दिया

वक्रोतिश्च रसोक्तिश्च स्वभावोक्तिश्चेति वाड्मयम् । सरस्वतीकण्ठाभरण ५।८

अर्थात् वाड्मय के तीन रूप हैं वक्रोक्ति, रसोक्ति और स्वभावोक्ति। त्रिविध खलु अलकारवर्ग वक्रोक्ति स्वभावोक्ति रसोक्तिरिति। तत्रोपमाद्यलकारप्राधान्ये वक्रोक्ति. सोऽपि गुणप्राधान्ये स्वभावोक्ति विभावानभावव्यभिचारिसयोगातु रसनिप्पत्त। रसोतति- रिति। शृगारप्रकाश २।११। अर्थात् अलकार (काव्यसौन्दर्य) के तीन रूप होते हैं उपमादि अलकारो का प्रापान्य होने पर वक्रोक्ति होती है, गुण का प्राधान्य स्वभावोक्ति का द्योतक है औरर विभाव, अ्रनुभाव तथा व्यभिचारी के सयोग से रस-निप्पत्ति होने पर रनोक्ि होती है। इस प्रकार वक्रोक्ति की सामान्य धारणा क्रमश सकुचित होती गयी।

भामह की वक्रोक्ति का अर्थ था का सम्पूर्ण काव्य-सौन्दर्य जिसमें स्वभावोत्ति, उपमादि अरलकार तथा रस-प्रपच सभी कुद् अ्रतर्भूत था, तथा दण्डी के लिए उसका अर्थ था उपमादि अल्कार-प्रपच एव रस-प्रपच, और भोज ने वक्तोक्ति का अर्थ किया केवल उपमादि अलकार-प्रपच।

वामन की सादृश्याल्लक्षणा वक्रोकि बहुत कुछ मनमानी कल्पना थी-परवर्तों आचार्यों में वह मान्य नहीं हुई। किन्नु भोज की साग्ग्राहिणी दृप्टि ने उसको भी नहीं छोडा। शृगार प्रकाश के शव्द-शक्ति प्रसग में लक्षणा की परिभाषा फरते हुए वे लिसते हैं

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परवर्ती आचार्य औरर वक्रोक्ति । भूमिका [ १३

मैपा विदग्ववक्रोक्तिजीवित वृत्तिरिप्यते।

अरर्थात् लक्षणा वक्रोक्ति का प्राण हे। किन्तु वामन और भोज के विवेचन मे एक अन्तर है-और वह यह कि वामन ने केवल सादृश्य-गर्भा लक्षणा में ही वक्रोक्ति की स्यिति मानी है जब कि भोज ने सभी प्रकार को लक्षणा को उसका मूलावार माना है। जैसा कि हमने वामन के प्रसग में निर्देश किया है, वामन की अपेक्षा भोज का मत अधिक ग्राह्य है क्योंकि लक्षणा के केवल तावृश्य-मूलक रूप में ही वक्रा की इयत्ता मान लेना निराधार कल्पना है।

चौयी घारणा है रद्रट की जो वक्रोक्ति को वाकुछल पर आश्रित शन्दालकार मात्र मानते हैं। भोज ने यह विशिष्ट तथा क्षुद्र रूप भी पूर्ण आग्रह के साय स्वीकार किया है। उन्होने वक्रोत्ति को शव्दालकार ही माना है-किन्तु रुद्रट की परिभाषा में थोडा परिवर्तन-संशोधन करते हुए। वक्रोक्ति का वाकछल रूप चमत्कार सर्वत्र कथोपकयन में ही प्रकट होता है अतएव उन्होंने वाकोवाक्य (कथोपकथन) नाम ते एक नवीन शन्दालकार की कल्पना की है। वाकोवाक्य के छ भेद हैं-जिनमें से एक है वक्रोक्ति। वक्रोक्ति में भोज ने केवल श्लेष वक्रोकि को ही स्वीकार किया है- काकु वक्राक्ति को उन्होने 'पठिति' नामक एक पृथक् शब्दालकार माना है। उपर्युक्त इलेष वक्रोक्ति के दो भेद हैं •निर्व्यूढ और अनिर्व्यूद-निर्व्यूद वक्रोक्ति समस्त छन्द में व्याप्त रहती है, अनिर्व्यूढ एकदेशीय होती है।

परवर्ती आचार्य : वक्रोवित की विशिष्ट अलंकार रूप में स्वीकृति

भोज के उपरात मम्मट आदि ने वक्रोक्ति का विशेष त्प ही स्वोकार किया। मम्मट ने उसे स्द्रट के अनुसरण पर शव्दालकार ही माना-और काकु तथा भंग-श्लेष, इन दो स्पो के अतिरित्त अभगश्लेप वक्रोक्ति नामक एक तीसरा रूप भी परिकल्पित किया। सुव्यक ने एक बार फिर उसके सामान्य र्प की चर्चा की किन्तु उसे माना विशेष अलकार ही --

१ यह गब्द हमारे इन अ्नुमान को पृष्ट करता है कि भोज ने कुन्तक का वक्ोकि- जीवितम् देखा घा।

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१४ ] भूमिका [ वक्रोक्ति की स्थापना

वक्रोक्तिशब्दश्च अलकारसामान्यवचनोऽपि इह अलकार विशेपे सज्ञित. अलकार सर्वस्व, पृ० १७७

पर रुय्यक की स्थिति मम्मट से भिन्न है-रुय्यक ने वक्रोक्ति को अर्थालकार माना है-शन्दालकार नहीं। विद्यानाथ और अप्पय दीक्षित का भी यही मत था। अन्तत मम्मट का मत ही ग्राह्य हुआ-और विश्वनाथ आदि ने वक्रोक्ति को शब्दा- लंकार मात्र माना। विश्वनाथ ने वक्रोक्ति के सामान्य रूप की सर्वथा उपेक्षा करते हुए कुन्तक ने सिद्धान्त को एक वाक्य में उडा दिया वक्रोक्तेरलकारविशेषरूपत्वात्।

इस प्रकार वक्रोक्ति के स्वरूप का विकास अत्यन्त मनोरजक है-भामह से लेकर विश्वनाथ तक उसके गौरव में आकाश पाताल का अन्तर पड गया। काव्य- सौन्दर्य के मूल आधार से स्खलित होकर वह वाक्छल मात्र रह गयी।

कुन्तक द्वारा वक्रोक्ति की स्थापना

कुन्तक ने वक्रोक्ति का मौलिक व्यास्यान करते हुए उसे काव्य के आधारभूत एव सर्वग्राही रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होने भामह से प्रेरणा ग्रहण कर-वक्रता को काव्य का मूलतत्व मानते हुये उसी के आधार पर काव्य के सर्वांग की व्याख्या प्रस्तुत की। काव्य का काव्यत्व उसके आश्रित है, काव्य के सभी रूपो में उसकी अनिवार्य स्यिति है-काव्य के सभी अग उसमें अतर्भूत हैं। इस प्रकार कुन्तक के विवेचन में वक्रोक्ति मौलिक तत्व से सर्वव्यापक तत्व वनी, और अन्त में एक व्यव- स्थित सिद्धान्त तथा काव्य-सम्प्रदाय वन गई।

वक्रोक्ति-सिद्धान्त के अनुसार वक्रोक्ति काव्य की आत्मा है। अतएव वक्रोक्ति के स्वरूप को हृदयगम करने के लिए पहले इस सिद्धान्त के अन्तर्गत काव्य का स्वरूप स्पष्ट कर लेना चाहिए।

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वक्रोक्ति सिद्धान्त के अंतर्गत काव्य का स्वरूप

कुन्तक ने वक्रता की व्याख्या करने से पूर्व काव्य के स्वरूप को ही स्पप्ट किया है। वक्रोक्तिजीवितम् के प्रथम उन्मेष में काव्य के स्वरूप का विस्तृत व्यास्यान है।

आरम्भ में काव्य का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ करते हैं- कवे: कर्म काव्यम्। १,२ (वृत्ति), अर्थात् कवि का कर्म काव्य है। इसको स्पष्ट करते हुए आगे चलकर कहते हैं :

+++ तत्व सालकारस्य काव्यता ।१,६।

अ्रयमत्र परमार्थ। सालकरस्यालकरणसहितस्य सकलस्य निरस्तावयवस्य मत काव्यता कविकमंत्वम्। तेन अलकृतस्य काव्यत्वमिति स्थिति न पुन. काव्यस्यालकारयोग इति।

अर्थात् सालकार (शब्दार्य) की काव्यता है, यह यथार्थ (तत्व) है। इसका अरभिप्राय यह हुआ कि अलकार सहित अर्यात् अलकरण सहित सम्पूर्ण अर्थात् अवयव- रहित समस्त समुदाय की काव्यता पर्थात् कविकर्मत्व है। इसलिये अलकृत का ही काव्यत्व है (अर्थात् अलंकार काव्य का स्वरपाधायक धर्म है) न कि काव्य में अलंकार का योग होता है। (हिन्दी वक्रोक्ति जीवित पृ० १७)

इसके तीन निष्कर्ष निकलते हैं :

(१) सालंकार शब्द-अ्रर्थ ही काव्य है। (२) अ्रलकार काव्य का मूल तत्व है वाह्य भूषण मात्र नहीं है। (३) काव्यत्व की स्थिति अलंकार औरर अलकार्य शब्द-अर्य के नवयव- रहित समस्त समुदाय में ही रहती है।

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१६ । भूमिका [ काव्य का स्वरूप

'उपर्युक्त कारिका में काव्य का अस्पष्ट-सा स्वरूप-निरूपण किया है', इसलिये काव्य का व्यवस्थित लक्षण करते हैं :

शब्दार्थौं सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि। बन्वे व्यवस्थितौ काव्य तद्विदाह्ललादकारिणि। १।७। -- काव्य-मर्मज्ञो को आनन्द देने वाली सुन्दर (वक्र) कवि-व्यापार-युक्त रचना (बन्ध) में व्यवस्थित शब्द और अर्थ मिलकर (सहित रूप में) काव्य कहलाते हैं। इस कारिका पर स्वय कुन्तक की वृत्ति है

शब्दाथों काव्य अर्थात् वाचक (शब्द) और वाच्य (अर्थ) दोनो मिलकर काव्य हैं, (अलग अलग नहीं)। दो (शव्द और अर्थ मिलकर) एक (काव्य कहलाते) हैं, यह विचित्र ही उक्ति है। (हम वक्रोकि को काव्य का जीवित निर्धारित करने जा रहे हैं, यह वात काव्य के लक्षण से स्पष्ट होती है। शब्द और अर्थ ये दोनो मिलकर एक काव्य नाम को प्राप्त करते हैं, यह कथन स्वय एक प्रकार की वक्रोक्ति से पूर्ण होने से वक्रोक्ति है)। इसलिये यह जो किन्ही का मत है कि कवि-कौशल से कल्पित किया गया है सौन्दर्यातिशय जिसका ऐसा केवल शब्द ही काव्य है, और किन्हों का रचना के वैचित्र्य से चमत्कारकारी अर्थ ही काव्य है (यह जो मत है), ये दोनों मत खण्डित हो जाते हैं (न केवल शब्द को और न केवल अर्थ को काव्य कहा जा सकता है, अपितु शब्द और अर्थ दोनो मिल कर काव्य कहलाते हैं) इसलिए जैसे प्रत्येक तिल में तैल रहता है, इसी प्रकार इन दोनो (शब्द तथा अर्थ) में तद्विदाह्ह्ादकारित्व होता है। फिसी एक में नहीं।

यह वात निश्चित हुई कि न केवल रमणीयता विशिष्ट शब्द काव्य है और न (केवल) अर्थ ॥ हिन्दी वक्रोक्तिजीवित, पृ० १८-१६॥

इस विवेचन का साराश यह है कि शब्द और अर्थ का साहित्य ही काव्य है-केवल शब्द-सौन्दर्य प्रथवा फेवल अर्थ-चमत्कार काव्य नहीं हो सकता।

किन्तु 'साहित्य' शब्द की क्या सर्थकता है ? यह प्रश्न उठ सकता है। फुन्तक ने स्वय यह प्रश्न उठा कर इसका समाधान किया है

(प्रश्न) वाच्य औरर वाचक के सम्बन्ध के (नित्य) विद्यमान होने से इन दोनो (शब्द और श्रर्य) फे रहित्य (सहभाव) का अनाव कभी नहीं होता है। (तब शब्दाचो' सहिती फाय्यं यह फहने का क्या प्रयोजन है ?)'

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काव्य का स्वरूप ] भूमिका [१७

(उत्तर) सत्य है। किन्तु यहां विशिष्ट 'साहित्य' अ्रभिप्रेत है। कँसा? वक्र से विचित्र गुण तथा अलकार-सम्पत्ति की परस्पर-स्पर्वा-रूप। इसलिए मेरे मत सर्वगुणयुक्त और मित्रो के समान पस्परर संगत शब्द और अर्य दोनों एक दूसरे लिए शोभाजनक होते हैं (वे ही काव्य पद वाच्य होते हैं॥ हिन्दी व० जी०। २५-२६ वीं कारिका की वृत्ति)॥ इसी तथ्य को और स्पष्ट करते हुए कुन्तक ने अन्यत्र लिखा है. साहि तुल्यकक्षत्वेनान्यूनानतिरित्तत्वम्। अर्थात् साहित्य का अपर्थ यह है कि शब्द अर्थ समान महत्व हो-किसी एक का भी महत्व न न्यून हो और न अतिरिक्त। क्योंकि समर्थ शब्द के अभाव में अ्र्य स्वरूपतः स्फुरित होने पर भी निज सा ही रहता है। शब्द भी काव्योपयोगी (चमत्कारी) अर्थ के अभाव में (वि साधारण), अन्य अर्थ का वाचक होकर वाक्य का भारभूत सा प्रतीत होने लगता, प्रथम उन्मेप, हर्वी का० वृत्ति॥ अतएव कुन्तक के मतानुसार साहित्य शब्द का अर्थ हुआ शब्द-अर्थ का। सामंजस्य। यह सामजस्य वाचक-वाच्य का सामान्य सहभाव न होकर विशिष्ट सह है जो वक्रना-वचित्र्य तथा गुणालकार-सम्पदा से युक्त होता है। कहने का तात्पर्य है कि इसमें शब्द के सम्पूर्ण सौन्दर्य और अर्य के सम्पूर्ण चमत्कार दोनो का सम सामंजस्य रहता है। यह विशिष्ट सहभाव है। विशिष्ट सहभाव का अर्थ यह है इसके शब्द और प्रर्यं दोनों ताघारण, चमत्कार-शून्य न होकर विशिष्ट होते हैं'-

(पर्यायवाची) अन्य (शन्दो) के रहते हुए भी विवक्षित अर्थ का बोघक के एक (शब्द ही वस्तुत) शब्द (कहलाता) है। इसी प्रकार सहृदयो के हृदय आनन्दित करने वाला अपने स्वभाव से सुन्दर (पदार्थ ही काव्यमार्ग में वस्तुत) है।। प्रथम उन्मेप वीं कारिका की वृत्ति॥

इसलिए (शब्दायी' सहिती काव्यम्-इम काव्यलक्षण में) इस प्रका विशिष्ट शब्द और अर्थ का ही लक्षण लेना चाहिए। (१।१३ वीं कारिका की वृरि अब केवल एक शब्द रह जाता है जिसकी व्यारया अपेक्षित है, और वह तद्विदाह्हादकारी। कुन्तक ने स्व्य अपना आशय स्पष्ट किया है। तत् का अप काव्य और विद् का अर्थ है म्मज्ञ। अतएव तद्विदाह्वाद से अभिप्राय काव्य-स्मज् सहृदय के आह्हाद से ही है। "इसका अभिप्राय यह हुआ कि यद्यपि पदार्य नाना धर्म से युक्त हो सकता है फिर भी उस प्रकार के धर्म से इसका सम्बन्ध-वर्णन f

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१८' भूमिका [ काव्य का स्वरूप

जाता है जो धर्म विशेष सहृदयो के आनन्द उत्पन्न करने में समर्थ हो सकता है और उस (धर्म में) ऐसी सामर्थ्य सम्भव होती है जिससे कोई अपूर्व स्वभाव की महत्ता अथवा रस को परिपुष्ट करने की अगता अभिव्यक्ति को प्राप्त करती है।" १६ वीं कारिका की वृत्ति। इस प्रकार कुन्तक के अनुसार सहृदय-आह्लादकारित्व के दो आधार हें- (१) अपूर्वता अर्थात् वचित्र्य अथवा अ्साधारणता और (२) रस-पोषण की शक्ति। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर, काव्य के लक्षण तथा स्वरूप के विषय में कुन्तक की मान्यताओ का विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता है .-

(१) काव्य का आधार शब्द-अर्थ है-यह शन्द-श्र्थ साधारण न होकर विशिष्ट होता है। विशिष्ट शब्द से तात्पर्य यह है कि अनेक पर्याय रूपो के रहते हुए भी केवल एक शब्द ही विवक्षित अर्थ का अनिवार्यत वाचक होता है। वाचक का प्रयोग यहा त्व अर्थ में नहीं है-उसमें द्योतक तथा व्यजक का भी अन्तर्भाव है। विशिष्ट अर्थ से अभिप्राय यह है कि पदार्थ के अनेक धर्मो में से केवल उसी धर्म का ग्रहण किया जाता है जिसमें अपूर्वता तथा रस पोषण की शक्ति हो।

(२) काव्य के लिए इस विशिष्ट शब्द-अर्थ का पूर्ण साहित्य अनिवा्य है। साहित्य का अररथं है पूर्ण सामजस्य शव्द और अरर्थ दोनो का महत्व सर्वथा समान होना चाहिए। किन्तु यह तो अभावात्मक स्थिति हुई। शब्द-अर्थ का यह साहित्य भावात्मक रप से गुणालकार-सम्पदा से यक्त होना चाहिए। इसमें शब्द-सौन्दर्य और अर्थ-सौन्दर्य अहमहमिका से एक दूसरे के साथ स्पर्वा करते हैं। अर्यात् काव्य में शब्द अपने समस्त सौन्दर्य के साथ और अर्थ अपनी समस्त रमणीयता के साथ परस्पर पूर्णतया समजित रहते हैं।

(३) यह सामजस्य शब्द-अर्य के वन्य अर्थात् रचना या क्रमवन्वन में व्यक्त होता है। यह रचना सामान्य व्यवहार की वचनरचना से भिन्न वक्रतापूर्ण एव कविकौशल-युक्त होती है। कुन्तक की शब्दावली में वक्रता अलकार अथवा कविकोशल का हो पर्याय है-अतएव वक्रकविव्यापारशाली वन्य का स्पष्ट मर्थ है कविकौशल्पूर्ण रचना। सालकारस्य काव्यता में भी उन्होंने यही बात फही है।

(४) यह सम्पूर्ण व्यवत्था-शब्द, अ्य, उनका साहित्य, फवि-फौशाल, तथा

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काव्य का स्वरूप ] भूमिका [ १६

निष्कर्ष यह है कि कुन्तक के अनुसार काव्य उस कविकौशलपूर्ण रचना को कहते हैं जो अपने शब्द-सौन्दर्य और अर्थ-सौन्दर्य के अनिवार्य सामंजस्य द्वारा काव्य- मर्मज्ञ को मह्नाद देती है।

आधुनिक काव्य-शास्त्र की शब्दावली में कुन्तक की स्थापनाएं इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती हैं :-

पूर्ण तादात्म्य रहता है। (१) काव्य में वस्तु-तत्व और माध्यम का-अनुभूति और अभिव्यक्ति का

(२) काव्य का वस्तु-तत्व साधारण न होकर विशिष्ट होता है-अर्थात् उसमें ऐसे तथ्यो का वर्णन नहीं होता जो अपनी सामान्यता में प्रभावहीन हो गये हैं- वरन् उन अनुभवों की अभिव्यक्ति होती है ो रमणीय-अर्थात् विशेष प्रभावोत्पादक होते हैं।

(३) काव्य में अभिव्यंजना की अद्वितीयता रहती है-अर्यात् किसी विशेष अनुभव की अभिव्यक्ति के लिए केवल एक हो शब्द अथवा शब्दावली का प्रयोग सम्भव होता है। (४) अलंकार काव्य का मूल तत्व है, वाह्य भूषण मात्र नहीं है। अतएव अलकार और अलंकार्य में मौलिक भेद नहीं है-केवल व्यवहार के लिए भेद मान लिया जाता है।

(५) काव्य का काव्यत्व कविकौशल पर आश्रित है-दूसरे शब्दों मे काव्य एक कला है।

(६) काव्य-मर्मज्ञो का मन प्रसादन काव्य की कलौटी है। भारतीय काव्यशास्त्र में कुन्तक मूलत. देहवादी आचार्य हे-अतएव उनका संसर्ग भामह, दण्डी तथा वामन आदि अलंकार-रोतिवादियो के साथ स्वभाव से ही अधिक घनिष्ठ है। उनका काव्य-लक्षण भी इन पूर्त्रवर्तो आचानो के काव्य- लक्षणों की परम्परा का ही विकास है। भामह का काव्यलक्षण है : शव्दायौ' सहिती काव्यं। दण्डी ने इप्टार्यव्यवच्छिन्ना पदावली को काव्य सज्ञा दी है। और उघर वामन ने गु से अनिवा्यत तथा अलकार से सामान्यत विभूषित दोषरहित शब्दार्य को काव्य माना है। कुन्तक की परिभाषा पर इनका स्पप्ट प्रभाव है-वास्तव में यह कहना चाहिए कि कुन्तक की परिभाषा में इन तीनो को तात्विक व्यास्या मिलती है।

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२० ] भूमिका [ काव्य का स्वरूप

परिभाषा का मूल अश 'शब्दाथौ' सहितौ काव्य' यथावत् भामह का ही उद्धरण है। 'वक्रकविव्यापारशालिनि बन्धे व्यवस्थितौ-अर्थात् वक्रतापूर्ण कविकौशलयुक्त रचना में व्यवस्थित' वामन के 'गुणालकारसस्कृतयो-अर्थात् गुण तथा अलकार से विभूषित' का ही रूपान्तर है। बन्ध शब्द वामन की रीति या पदरचना का स्मरण दिलाता है, वक्रतापूर्ण कविकौशल गुण तथा अलकार का ही समष्टि रूप है-कुन्तक कविकौशल को सिद्धि वक्रोक्ति में मानते हैं, वामन गुण तथा अलकार-योजना में, दोनो का अभि- प्राय एक ही है। आरम्भ में स्वयं कुन्तक ने 'सालकारस्य काव्यता' कह कर केवल अलंकार को ही उक्त अर्थ में प्रयुक्त किया है। अलंकारवादी अथवा देहवादी समस्त आचार्य अलकार में ही सम्पूर्ण काव्यकौशल को निहित मानते थे-भामह और दण्डी ने इस व्यापक अर् में अलकार शब्द का ही प्रयोग किया है, वामन ने भी अलकार को काव्य-सौन्दर्य का पर्याय मान कर उक्त अर्थ को यथावत् ग्रहण किया है, और गए तथा उपमादि विशेष अलकारों को इस व्यापक अलकार के ही अग माना है।१ कुन्तक ने भी अलकार का पहले यही व्यापक अर्थ करते हुए फिर उसे वक्रोक्ति सज्ञा दे दी है। कहने का तात्पर्य यह है कि कुन्तक का 'वक्रकविव्यापारशालिनि वन्धे व्यवस्थितौ' यह विशेषण निश्चय ही वामन के 'गुणालकारसस्कृतयो.' से प्रेरित है- अथवा यह कुन्तक के अपने सिद्धान्त के अनुसार उसकी व्याख्या है। 'इष्टार्थव्यव- च्छिन्ना' के इष्ट शब्द को ग्रहण करते हुए कदाचित् कुन्तक ने अपने 'तद्विह्ादकारी' विशेषण का प्रयोग किया है। इष्ट शन्द में श्राह्लाद की ध्वनि स्पष्ट सुनी जा सकती है। अतएव कुन्तक ने अपने काव्यलक्षण में पूर्ववर्ती अलकारवादियों के लक्षणो का समन्वय कर वृत्ति द्वारा उनकी सूक्ष्म-गहन व्याख्या की है।

लक्षण की दृष्टि से कुन्तक की काव्य-परिभाषा अधिक सफल नहीं फही जा सकती। उन्होंने भामह के लक्षण को ही, कुछ विशेषण लगा कर, प्रस्तुत किया है। भामह ने सहित रूप में प्रयुक्त शब्द-अ्रर्य को काव्य कहा था-कुन्तक ने इस लक्षण को अनिश्चित तया अतिव्याप्त माना। अनिश्चित इसलिए कि साहित्य शब्द का अर्थ अथवा यों कहिये कि साहित्य (सहभाव) का स्वसप स्पप्ट नहीं है, और प्र्प्रति- व्याप्त इसलिए कि शब्द अर्य का सहभाव तो प्रत्येक वावय में रहता है। अतएव उन्होने ुछ निश्चयात्मक विशेषण जोड दिये। एक ता काव्य के शब्द और अर्थ बन्ध अर्थात् रचना में व्यवस्थित होते हैं-श्रव्यवस्थित प्रथवा अनर्गल रूप मे प्रयुक्त नहीं होते। दूसरे यह रचना वक्रनापूर्ण कविव्यापारशाली और सहृदय-आह्वादकारी

१ सौन्दरयमलकार म दोपगुमालनाहानादानाभ्याम्।

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काव्य का स्वरूप 1 भूमिका । २१

होती है। आधुनिक शब्दावल में कविव्यापारशाली का शर्थ है कविकौशलयुक्त अथवा' कलात्मक। वक्रतापूर्ण का पृथक प्रयोग कुन्तक ने अपने वक्रोक्तिसिद्धान्त का वैशिष्टय स्थापित करने के निमित्त किया है ·वैसे सशिलष्ट रूप में बक्रकविव्यापारशाली इस समस्त पद का अर्थ 'कलात्मक' हो पर्याप्त है। तद्विदाह्ह्ादकारी का श्रर्थ है काव्य- मर्मज्ञों को आनन्दायक। इस विशेषण के द्वारा कुन्तक साहित्य (शब्द-अर्थ के सहभाव) के मूल गुण या धर्म का निर्णय करते हैं. यह साहित्य आनन्ददायक होना चाहिए। आनन्द में भी अतिव्याप्ति हो सकती है-इसलिए उसका भी निराकरण करने के लिए कहते हैं तद्विदा-अर्यात् केवल काव्य-ममज्ञों का क्योंकि सामान्य जन का आनन्द स्थूल तथा अपरिष्कृत हो सकता है। अत तद्विदाह्लाद का अर्थ हुआ ऐन्द्रिय आनन्द अथवा क्षुद्र मनोरजन से भिन्न सूक्ष्म-सस्कृत आनन्द जिसका सम्बन्ध ऐन्द्रिय तुष्टि या क्षुद्र कुतूहल से न होकर चेतना के सस्कार से है। इस प्रकार कुन्तक के अनुसार, आ्धुनिक आलोचनाशास्त्र की शब्दावली में, काव्य का लक्षण हुआ: कलात्मक तथा परिष्कृत आनन्द-दायक रचना में पूर्ण तादात्म्य के साथ व्यवस्थित शन्द-अर् का नाम काव्य है। इसमें संदेह नहीं कि कुन्तक ने अपने लक्षग में अतिव्याप्ति तथा अव्याप्ति दोनों को बचाने का प्रयत्न किया है और उपर्युक्त व्याख्या के उपरात निर्धारित यह लक्षण आ्रधुनिक आलोचनाशास्त्र को दृष्टि से भी वुरा नहीं है। परन्तु कुन्तक की अपनी शब्दावली सर्वथा निर्दोष नहीं कही जा सकती। एक तो 'बन्घे व्यवस्थितौ' का पूथक उल्लेख अपने आप में सर्वया आवश्यक नहीं है क्योकि 'सहित' शब्द के पश्चात् इसके लिए कोई विशेष अवकाश नहीं रह जाता : 'सहित' बन्ध में व्यवस्थित ही होगा। शब्द-प्रर्थ का अव्यवस्यित जंजाल 'सहित' में सम्भव नहीं है। किन्तु जैसा कि मेंने अन्यत्र निर्देश किया है कुन्तक ने कदाचित् वामन के सिद्धान्त का भी अन्तर्भाव करने के लिए ऐसा किया है। दूसरे, वक्रकविव्यापारशाली विशेषण व्यास्या- सापेक्ष्य है। कुन्तक की वक्रता स्वय एक विशिष्ट प्रयोग है-फिर कविव्यापार की व्यवस्था भी अपेक्षित है। पहले कवि का लक्षण और फिर व्यापार का लक्षण करना पडेगा, तब कविव्यापारशाली का आशय व्यक्त हो सकेगा। इसके अ्रनन्तर तद्विद् का आशय भी स्पष्टीकरण की अपेक्षा करता है। काव्य काव्य-मर्मज्ञ को शह्लाद देता है, यह तो कोई बात नहीं हुई। अतएव लक्षण की दृष्टि से कुन्तक की शब्दावली दोशमुक्त नहीं है. लक्षण की शब्दावली तो स्वत स्पष्ट एवं अन्यून-अ्रनतिरिक्त होनी चाहिए। उपर्युक्त लक्षण की शन्दावली व्याख्यापेक्षी है, साथ ही उसमें अतिरिक्त शब्दों का प्रयोग भी है। इस दृष्टि से भामह का लक्षण ही सवते अधिक सतोषप्रद है। कुन्तक से पूर्व भी अनेक आचार्यों ने उसमें सशोधन करने का प्रयत्न किया है- किन्तु वे सभी असफल रहे हैं।

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२२ 1 भूमिका [ काव्य का स्वरूप

-'परन्तु कुन्तक का गोरव काव्य का स्वतन्त्र लक्षण प्रस्तुत करने में नहीं है। उनका महत्व भामह के लक्षण-सूत्र की व्याख्या करने में है। वास्तव में उन्होंने शब्द, अर्थ तथा साहित्य, भामह के इन तीनो शब्दों की मार्मिक व्याख्या प्रस्तुत की है। इनमें से अर्थ की व्याख्या के लिए तो रसध्वनिवादियो को भी-आनन्दवर्धन को विशेष रूप से-महत्व दिया जा सकता है। किन्तु शब्द की और शब्द से भी अधिक साहित्य की व्याख्या कुन्तक को अरपूर्व है। कुन्तक के पूर्ववर्ती किसी आचार्य को यह गौरव नहीं दिया जा सकता उनके परवर्ती आचार्यों में भी भोज तथा राजशेखर आदि कुछ गिने-चुने आचार्यों ने ही इस महत्वपूर्ण शब्द की व्याख्या की है। कुन्तक इस तथ्य से परिचित थे-उन्होंने स्वय लिखा है

"यह साहित्य इतने अ्रसीम समय की परम्परा में केवल साहित्य शब्द से प्रसिद्ध ही रहा है। कविकर्म-कौशल के कारण रमणीय इस (साहित्य शब्द) का यह वास्तविक अर्थ है, इस बात का आज तक किसी विद्वान् ने तनिक भी विचार नहीं किया। इसलिए सरस्वती के हृदयारविन्द के मकरन्द-बिन्दु-समूह से सुन्दर कविवचनों के आान्तरिक आमोद से मनोहर रूप में प्रस्फुटित होने वाले इस (साहित्य) को सहृदय- मधुपों के सामने प्रकट करते हैं। (अर्थात् साहित्य शब्द का प्रयोग अ्व तक काव्य आ्रादि के लिए होता रहा है-परन्तु इसके वास्तविक अर्थ का प्रकाशन श्रव तक किसी भी विद्वान् ने नही किया। अब तक इसका रसास्वादन ही हुआ है विश्लेषण- विवेचन नहीं ।) हिन्दी व० जी० १६वीं कारिका की वृत्ति पृ० ६०।

अभिव्यंजना के प्रसग में जिन गहन तथ्यों के द्वारा क्रोचे ने आधुनिक काळ शास्त्र में क्रान्ति उपस्थित कर दी है, उनका उद्घाटन कुन्तक दसवीं-ग्यारहवीं शत में कर चुके थे। यह उनके दृष्टिकोण की तत्व-प्राहकता और साथ ही आधुनिकत का भी ज्वलत प्रमाण है। कहने का तात्पर्य यह है कि कुन्तक की मौलिकता लक्ष में न होकर लक्षण के व्यास्यान में है। 'शन्द' की अद्वि नीयता 'अर्थ' की रसात्मकत तया 'साहित्य' की पूर्ण तादात्म्य-क्षमता का प्रवल शब्दो में प्रतिपादन कर उन्हो फाव्य के स्वरप-विवेचन में अपूर्व योग दिया है। सस्कृत फाव्यशास्त्र के आचार में कुन्तक का विवेचन सवसे अधिक आधुनिक है।

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काव्य का प्रयोजन ] भूमिका [ २३

काव्य का प्रयोजन

कुन्तक ने भारतीय काव्य-शास्त्र की परम्परा के अनुसार अपने ग्रन्थ के आरम्भ में ही ३, ४ और ५वीं कारिकाओं और उन पर स्वरचित वृत्तियो में काव्य- प्रयोजन का अत्यन्त विशद निरूपण किया है।

घर्मादिसावनोपाय मुकुमारक्रमोदितः । कान्यबन्धोऽभिजातना हृदयाहनादकारक ॥ १,३।।

काव्यबन्ध (काव्य) उच्च कुल में समुत्पन्न (परिश्रमहीन और सुकुमार- स्वभाव राजकुमार आदि) के लिए, हृदय को आ्ह्हादित करने वाला और कोमल मृदु शंली में कहा हुआ धर्मादि की सिद्धि का मार्ग है।

व्यवहारपरिस्पन्दमौन्दर्य्य व्यवहारिभि। सत्काव्याविगमादेव नूतनौचितयमाप्यते ॥ १,४ ।।

व्यवहार करने वाले (लौकिक) पुरुषो को, अनुदिन के नूतन शचित्य से युक्त, व्यवहार-चेष्टा आदि का सौन्दर्य सत्काव्य के परिज्ञान से ही प्राप्त हो सकता है।

चतुर्वर्गफलास्वादमप्यतिक्रम्यतद्विदाम् । काव्यामृतरसेनान्तश्चमत्कारो वितन्यते। १,५।

काव्यामृत का रस उस (काव्य) को समभनेवालों (सहृदयो) के अन्त करण में चतुर्वरग रूप फल के आस्वाद से भी बढ़ कर चमत्कार उत्पन्न करता है।

इस प्रकार कुन्तक के अनुसार काव्य के तीन प्रयोजन हैं : (१) चतुर्वर्ग - फल - प्राप्ति (२) व्यवहार-औचित्व का परिज्ञान (३ ) चतुर्वर्ग -फलास्वाद से भी बढ कर अ्रन्तश्चमत्कार की प्राप्ति ।

(१) चतुर्वर्ग-फल-प्राप्ति : चतुर्वर्ग-फल-प्राप्ति अर्यात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चार परमपुरुयार्थों की प्राप्ति काव्य का महत्वपूर्ण प्रयोजन है। काव्य अभिजात राजकुमार आदि के लिए सुकुमार शैली में चतुर्वर्ग की प्राप्ति का सहज- सरल साघन है। इस प्रयोजन की व्यास्या में-तीसरी कारिका की वृत्ति में, कुन्तक ने दो तय्यों का स्पष्टीकरण किया है : एक तो यह कि अभिजात राजकुमार आदि का विशेष उल्लेख करने का क्या अभिप्राय है? उनका कहना है कि राजकुमार

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२४ ] भूमिका [काव्य का प्रयोजन

आदि का धर्म आदि परमपुरुषार्थो से सम्पन्न होना नितात आवश्यक है अन्यथा उचित शिक्षा-संस्कार में अभाव में शक्ति औ्र प्रभुत्व प्राप्त कर ये राज्य में श्रव्यवस्था उत्पन्न कर सकते हैं 'राजपुत्र आदि वैभव को प्राप्त करके समस्त पृथ्वी (राज्य) के व्यवस्थापक बनकर, उत्तम उपदेश से शून्य होने के कारण समस्त उचित लोक- व्यवहार का नाश करने में समर्थ हो सकते हैं।' हि० व० जी० पृ० १०॥ कुन्तक यह कहना चाहते हैं कि राजकुमार आदि एक एक बृहत् भूभाग के भाग्य-विधायक होते हैं-अतएव वे व्यक्ति न होकर समष्टि के ही प्रतीक हैं। उनका प्रभाव उनकी सत्ता के अनुकूल अत्यत व्यापक होता है अतएव धर्म आदि की सिद्धि उनके अपने व्यक्तित्व तक सीमित न रह कर समाज तक व्याप्त हो जाती है।

भारतीय काव्य में राजा, राजवश, राजकुमार आदि का प्रयोग इसी प्रतोकार्थ में किया गया है। अभिजात शब्द से एक ध्वनि और निकलती है, और वह है सस्कारशीलता की। आभिजात्य में घन-वैभव की व्यजना इतनी नहीं है जितनी सस्कारिता की ।-उत्तम वश में उत्पन्न, भद्र वातावरण में पोपित राजकुमार आदि स्वभावत हो सस्कारवान् होते हैं, अतएव आभिजात्य सस्कारिता का प्रतीक है, और अभिजत राजकुमार आदि सस्कारी सहृदय-समाज के। अतएव उन्हें उपलक्षण मात्र मानना चाहिए। कुन्तक ने यह बात स्पष्ट रूप से नहीं कही-परन्तु उनकी वृत्ति से यह ध्वनित अवश्य होती है।

दूसरा तथ्य यह है कि काव्य द्वारा उक्त प्रयोजन की सिद्धि अत्यन्त सहज रूप में-विना श्रम के-सुख-सरल विधि से हो जाती है। राजकुमार आदि का स्वभाव सुकुमार होता है-वे परिश्रम नहीं कर सफते, अतएव शास्त्र की श्रमसाध्य विधि उनके लिए अनुरूल नहीं पडती। यहाँ भी राजकुमार आदि को प्रतीक प्थवा उपलक्षण मान कर सहृदय-समाज का ही ग्रहण करना चाहिए। शास्त्र की सावना अ्र्परत्यन्त कठिन है। शास्त्र-सदर्भ "सुनने में कटु, बोलने में कठिन, और समभने में दुर्ह आ्रादि अ्र्प्रनेक दोपो से दुप्ट औ्र्प्रौर पढ़ने के समय में ही स्र्पत्यन्त दुसदायी होता है।" द० जी० पृ० १३ ॥ इसके विपरीत काव्य की विधि उतनी ही सुकुमार है। मम्मट ने फुन्तक के इस मंतव्य को 'कान्तामम्मिततवोपदेशयुजे' द्वारा व्यक्त किया है। काव्य द्वारा चतुवंग की साधना का उपदेश कान्ता सममित होता है। कुन्तक का सुकुमारवतोदित हो मम्मट का फान्तासम्मित बन जाता है।"

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काव्य का प्रयोजन ] भूमिका [ २५

चतुर्वर्ग-फल-प्राप्ति को काव्य का प्रथम प्रयोजन घोजित कर कुन्तक भारतीय काव्य-शास्त्र की उस गम्भीर परम्परा का पालन कर रहे हैं जिसके अनुसार काव्य मनोरजन का साधन न होकर जीवन के परमपुरुषार्यो का साधनोपाय माना गया है। उनसे पूर्व भामह, रुद्रट आदि मान्य आचार्यो-और उनके उपरात विश्वनाथ आदि ने भी चतुर्वर्ग फल-प्राप्ति को निर्भ्रान्त रूप से काव्य का मुख्य प्रयोजन स्वीकृत किया है।

भामह ·- वर्मार्थकाममोक्षेपु, वैचक्ष्ण्य कलासु च। करोति कीति प्रीति च साघुकाव्यनिपेवरम् । उत्तम काव्य के सेवन से धर्म, शर्थ, काम, मोक्ष रूप चतुर्वर्ग-फल-प्राप्ति, फलाओ में नैपुण्य, कीति तथा प्रीति (आनन्द) की उपलन्धि होती है। रुद्रट - ननु काव्ेन क्रियते सरमानामवगमञ्चतुर्बगे। लघु मृदु च नीरसेऽम्यस्ते हि त्रस्यन्ति शास्त्रेम्य ।। पर्थात् रसिक जन नीरस शास्त्रों से भय खाते हैं, अतएव उनको शोघ्र सहज उपाय के द्वारा काव्य से चतुर्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है (र्द्रट-काव्यालकार १२।१)

विश्वनाथ -- चनुर्वर्गफलप्राप्ति सुखादल्पघियामपि। काव्य के द्वारा मन्दबुद्धि भी सरल और रुचिकर विधि से चतुर्वर्ग-धर्यात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-इन चार परमपुरुपार्थो को प्राप्त कर लेते हैं। उपर्युक्त उक्ति तो कुन्तक की शब्दावली की व्याख्या सी प्रतोत होती है-यद्यपि ऐसा है नहीं क्योकि विश्वनाथ पर कुन्तक का कोई विशेष प्रभाव लक्षित नहीं होता।-कदाचित् विश्वनाय के समय में कुन्तक का ग्रंथ लुप्त हो गया था।

(२) व्यवहार-त्र्र्रौचित्य का परिज्ञान : इसकी व्यास्या में कुन्तक ने लिखा हैव्यवहार अर्ात् लोकाचार के सौन्दर्य का ज्ञान व्यवहार करने वाले जनो को उत्तम काव्यों के पारिज्ञान से ही होता है। X वह मौन्दर्य कंना X X है नूतन शचित्य-युक्त। इसका यह अ्र्रभिप्राय हुआ कि (उत्तम काव्यो में) राजा आरदि के व्यवहार का वर्णन होने पर उनके अ्ंगभूत प्रधान मन्त्री आर्प्रादि नव ही अपने-अपने उचित फर्तव्य और व्यवहार में निपुण रूप में ही र्वणित होने से व्यवहार करने वाने समस्त जनों को (उनके उचित) व्यवहार की शिक्षा देने वाले होते हैं। इमलिए

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२६ ] भूमिका [ काव्य का प्रयोजन

सुन्दर काव्यों में परिश्रम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति लोक-व्यवहार की क्रियाओं में सौन्दर्य को प्राप्त कर श्लाघनीय फल का पात्र होता है। (हि० व० जी० १।४ कारिका की वृत्ति पृष्ठ ११)

इस व्याख्या से दो बातो पर प्रकाश पडता है एक तो यह कि व्यवहार- सौन्दर्य से अभिप्राय ऐसे लोकाचार का है जो सर्वथा उचित अर्थात् पात्र, परिस्थिति तथा अपनी मर्यादा के अनुकूल होने के कारण रमणीय एव आकर्षक हो। दूसरी यह कि काव्य का फल राजकुमार आदि तक ही सीमित नहीं है, वरन् प्रत्येक सहृदय के लिए सुलभ है। यह ठीक है कि उत्तम काव्यों में नायक-प्रतिनायक आरदि प्रमुख पात्र राजवश के होते हैं, अतएव सम्भवत उनके व्यवहार-सौन्दर्य का अनुकरण सामान्य-जन-सुलभ न हो, परन्तु नायक-प्रतिनायक आदि के अरप्रतिरित्त और भी तो पात्र है जो उसी शोभन मर्यादा और औचित्य का पालन करते हैं। ये पात्र सामान्य जन के निकट होते हैं, अतएघ उनके लिए इनके सुन्दर व्यवहार का पनुकरण करना सहज-सरल होता है।

यहाँ कुन्तक एक शका उठा कर उसका समाधान करते हैं। वह शका यह है कि उत्तम काव्यो -- महाकाव्य, नाटक आदि-के नायक-प्रतिनायक राजा या राजकुमार ही होते हैं। उनके सस्कार नहीं तो कम से कम परिस्थितियाँ सामान्य जन की परिस्थितियो से भिन्न होती हैं। अतएव उनके व्यवहार का ज्ञान किस प्रकार लाभकारी हो सकता है ? इसका रसवादियों ने साधारणीकरण के आधार पर मनो- वैज्ञानिक उत्तर दिया है। कुन्तक जैसा मेधावी आचार्य इस मौलिक सत्य से अनवगत या यह तो कहना अ्नुचित होगा, परन्तु उन्होंने उपर्युक्त शका का समाधान सामान्य विवेक के आरधार पर ही किया है। उनका तर्क है कि उत्तम काव्यो की विस्तृत परिघि के अन्तर्गत पात्र तथा परिस्थिति की अनेकरूपता का चित्रण रहता है- अतएव प्रत्येक सहृदय अपनी मर्यादा तथा परिस्यिति के अनुरूप शिक्षा ग्रहण कर सकता है।

इम प्रकार सत्काव्य के सेवन से उचित एव शोभन व्यवहार-ज्ञान प्राप्त होता है।

लोकाचार को शिक्षा काव्य का व्यावहारिक प्रयोजन है। जीवन के प्रत्येफ फार्य की भांति काव्य का भी जीवन मे घनिष्ठ सम्बन्ध है। उमका उद्देश्य भी, भ्रन्त में, जोवन को श्धिक सुन्दर और त्पृहणीय बनाना हो है। अतएव पौरस्त्य तया

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काव्य का प्रयोजन ] भूमिका [२७

पाश्चात्य काव्यशास्त्रों में लोक-शिक्षण या उपदेश भी काव्य का काम्य प्रयोजन माना गया है। भारतीय काव्यशास्त्र में भरत, मम्मट आदि अनेक आचार्यो ने इसका स्पस्ट उल्लेख किया है :

भरत का कथन है-लोकोपदेशजनन नाटघमेतद् भविष्यति। अर्थात् नाटच (या काव्य) लोकोपदेशकारो होता है। मम्मट ने "व्यवहारविदे" में व्यवहार-ज्ञान को स्पष्ट शब्दों में काव्य-प्रयोजन स्वीकार किया है। (३) अर्रन्तश्चमत्कार : काव्यामृत रस का पान कर सहृदय के हृदय में एक अपूर्व चमत्कार का उदय होता है जो चतुर्वर्ग-फल-प्राप्ति से भी अधिक काम्य है। कुन्तक के शब्दों में इसका यह अभिप्राय हुआ कि "जो चतुर्वर्ग पल का आस्वाद प्रकृष्ट पुरुपार्थ होने से सब शास्त्रों के प्रयोजन रूप में प्रसिद्ध है वह भी इस काव्यामृत रस की चर्ाणा के चमत्कार को कला मात्र के साथ भी किसी प्रकार बरावरी नहीं कर सकता"। एक श्लोक है :-

"शास्त्र कड़वी औषधि के समान अविद्या रूप व्ाि का नाश करता है। और काव्य आानन्ददायक श्रमृत के समान अ्ज्ञान रूप रोग का नाश करता है।" इस प्रकार कुन्तक का मत है कि काव्य अपने अध्ययन काल में और उसके उपरान्त भी श्राह्लादकारी होता है-उमकी साधना और परिणाम दोनो ही रुचिकर होते हैं। (देखिए व० जी० १।५ वीं कारिका की वृत्ति पृ० १३) स्पष्ट है कि कुन्तक आनन्द को काव्य की परम सिद्धि मानते हैं-उसका महत्व्र चतुर्वर्ग से भी अधिक है। काव्य के क्षेत्र में यह कोई नवीन उद्धावना नहीं है। कुन्तक के पूर्तवर्ती तथा परवर्ती सभी आाचार्यो ने आ्नन्द की महत्व-प्रतिष्ठा की है। इम विषय में अलकार, रीति, ध्वनि तया रस सभी सम्प्रदाय एकमत हैं। अलकारवादी भामह और रीतिवादी वामन दोनों ने प्रीति-अर्थात शनन्द को काव्य का मुख्य प्रयोजन माना है :

प्रीति करोति कीति च साचुकाव्यनिपेवएम्। (भामह) काव्य सद् दृष्टाटष्टार्थ प्रोतिकीतिहेतुत्वात्। (वामन) रस-ध्वनिवादियो के विषय में तो प्रश्न ही नहीं उठताउनका तो मूल आवार ही यह है- "सकलप्रयोजनमौलिभूतं रसास्वादनसमृद्भूत विर्गलितवेद्यान्तरमानन्दम् । -पर्थात् रसास्वादन से उद्भूत अन्य ज्ञान-रहित आनन्द सकल प्रयोजन-मौलिभूत है।

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२८ ] भुमिका [ काव्य का प्रयोजन

वास्तव में काव्य में आ्ानन्द की महत्ता स्वत स्पष्ट है-किन्तु रसवादियों को आनन्द-कल्पना और अलकारवादियों की आनन्द-कल्पना क्या एक ही हैं? यह प्रश्न विचारणीय है। सामान्यत इनमें आचार्यों न कोई स्पष्ट भेव नहीं किया। आानन्द आ्ानन्द ही है। किन्तु उनके सिद्धान्तो का विश्लेषण करने पर दोनों, की कल्पनाओ में सूक्ष्म भेद निस्सन्देह मिलता है। अलकारवादियो का आनन्द अ्थवा चमत्कार बहुत कुछ बौद्धिक है, रसवादियो के शनन्द में मानसिक-शारीरिक सवेदनों का अपेक्षाकृत प्राधान्य है। अलकारवादियो के आनन्द में कुतूहल का भी पर्याप्त अश वर्तमान है, किन्तु रसवादियो का आ्ानन्द शुद्ध अ्प्रनुभूतिमूलक श्रानन्द है-वेद्यान्तरशून्य तन्मयता उसका आवश्यक उपबन्ध है। कुन्तक का आनन्द किस कोटि का है ? कुन्तक ने अपनी कारिका में आनन्द के लिए अन्तश्चमत्कार शब्द का प्रयोग किया है- और वत्ति में चमत्कार, चमत्कृति तथा अह्वाद का अ्रह्साद का प्रयोग काव्यानन्द के लिए कुन्तक ने अन्यत्र भी अनेक बार किया है। इसके अतिरित्त उन्होने कुतूहल आदि अवर वृत्तियो का वक्रोक्ति के प्रसग में तिरस्कार भी किया है। उपर्युक्त पचमी कारिका में भी अनेक शब्द ऐसे हैं जो कुन्तकीय शानन्द के स्वरूप को स्पष्ट करने में सहायक हो सकते जैसे आस्वाद, काव्यामृतरस आदि जिनसे इस बात का सकेत मिलता है कि कुन्तक यद्यपि अलकारवादी हैं फिर भी कुन्तक की श्राह्नाद-कल्पन अलकारवादियो की अपेक्षा रसवादियो के अधिक निकट है। चतुर्वर्गफलास्वाद से भी अधिक मधुर यह आलौकिक शह्हाद निश्चय ही मनोरजन, कुतूहल, आदि से एकात भिन्न अत्यन्त गम्भीर प्रकृति का आरानन्द ही हो सकता है जिसमें चेतना के पूर्णत निभग्न करने की क्षमता हो।

कुन्तक के उपर्युक्त विवेचन में एक तथ्य अनायास ही हमारा ध्यान आकृष्ट कर लेता है-और वह यह है कि कुन्तक ने सहृदय की दृष्टि से ही काव्य के प्रयोजनो का निर्देश किया है, कवि की दष्टि से नहीं। चतुर्वर्गफलास्वाद, व्यवहार-ज्ञान तथा अन्तश्चमत्कार ये सब सहृदय के ही प्राप्य हैं। सस्कृत काव्यशास्त्र में आ्रारम्भ से ही काव्य-प्रयोजन का विवेचन कवि और सहृदय दोनो की दृष्टि से हुग है भरत भामह, वामन, रुद्रट, मम्मट आदि सभी ने दोनो को ही दृष्टि में रखा है। रुद्रट के टीकाकार नमिसाधु ने इस पार्यक्य को सवया स्पष्ट करते हुए लिगा है ननु काव्य- फरणे कवे पूर्वमेवफनमुत्तम्, श्रोतृणा तु कि फलमित्याह-अर्थात् काव्य का कवि मे लिए क्या फल है यह पहले कह चुके हैं, श्रोताओ के लिए उसका क्या फल है, शब इसका वर्णन परते हैं। (स्द्रट काव्यालकार पृ० १४६)

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काव्य का प्रयोजन ] भूमिका ।२६ कवि के लिए रुद्रट ने यश को काव्य का मख्य फल माना है, और श्रोता के लिए चतुर्वर्गफलास्वाद को। रुद्रट का कथन है कि कवि जब दूसरो की अर्थात् अपने काव्य-नायको की कीति को अमर कर देता है तो फिर उसकी अपनो कीति को तो बात ही क्या है, उसे कीति के साथ धन की प्राप्ति भी होती है। अव यह विचारणीय है कि कुन्तक ने कवि के प्राप्य का उल्लेख क्यो नहीं किया। इस प्रश्न के दो उत्तर हो सकते हैं एक तो यह कि कुन्तक कवि के लिए उपर्युक्त तोनों फलो की प्राप्ति स्वत. सिद्ध मानकर चले हैं। जो कवि अपनी प्रतिभा और साधना द्वारा श्रोता के लिए उन्हें सुलभ करता है, उसके अपने लिए तो वे हस्तामलकवत् हैं ही। जो काव्य अपने उपभोत्ता के लिए चतुर्वर्ग-फलास्वाद अरथवा उससे भी श्रष्ठतर अतश्चमत्कार सुलभ कर देता है वह अपने स्रष्टा के लिए क्यो न करेगा ? जिस कवि की प्रतिभा पाठक के लिए लोक-व्यवहार के सौन्दर्य का उद्धाटन करती है, वह कवि स्वयं लोकविद् क्यों न होगा ? अतएव कुन्तक ने कवि के लिए इन फलो की प्राप्ति स्वत सिद्ध मानी है, और इसीलिए उसका पृथक निर्देश अनावश्यक ममझा है। दूसरा उत्तर यह भी हो सकता है कि कुन्तक की दृष्टि में उपर्युक्त तीन महत् प्रयोजन ही वास्तव मे काम्य हैं जो निश्चय ही उभय-निष्ठ हैं. यश तथा अर्थ जो केवल कवि के प्राप्य हैं कुन्तक जैसे गम्भीरचेता आचार्य की वृप्टि में सर्वथा नगण्य हैं, उनके उल्लेख का प्रश्न ही नहों उठता।

वास्तव में कुन्तक ने प्रस्तुत प्रसंग में कोई मौलिक उद्भावना नहीं की। उनके तीनों प्रयोजनों का भारतीय काव्यशास्त्र की परम्परा में यथावत् उल्लेख मिलता है : भामह और रुद्रट आदि ने चतुर्वर्ग का स्पष्ट उल्लेख किया है, भरत ने लोक-व्यवहार ज्ञान का, और भामह, वामन आदि ने प्रीति पथवा आनन्द का। परन्तु कुन्तक के विवेचन का मूल्याकन मौलिक उद्भावना की दृष्टि से करना समीचीन नहीं होगा क्योकि इस विषय में मौलिकता के लिए अवकाश भी कहां था ? कुन्तक की गरिमा का प्रमाण यह है कि एक तो उन्होंने केवल गम्भीर प्रयोजनो को ही ग्रहण किया है, और दूसरे उनमें भी श्रह्लाद को मूर्घन्य पर प्रतिष्ठित कर शुद्ध काव्य-दृष्टि का परिचय दिया है। उन्होंने काव्य के वे ही तीन प्रयोजन स्वीकार किये जो अन्तरग एव मूलभूत है-व्यापक प्रभावशाली, और उदात्त है। अ्रर्, यश, शिवेतरक्षति, कला-नंपुण्य आदि प्रयोजनों को उन्होने त्याग दिया है कनोंकि वे जीवन की हीनतर सफलताए हैं, श्रथवा अ्रव्यापक है। समीक्षा के क्षेत्र में-अथवा जीवन के सभी क्षेत्रो में-व्यवस्था तथा स्यिरीकरण का महत्व उदभावना के समकक्ष ही है ओर विशेष परिस्यितियों में कुछ अ्रधिक भी माना जा सकता है। कुन्तक का यह गौरव है कि

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३०1 भूमिका [ काव्यहेतु

उन्होंने केवल मूलभूत प्रयोजनो को ही मान्यता देकर काव्य के स्तर को उदात्त किया और फिर शेष दो प्रयोजनो से भी श्ह्लाद की श्रष्ठता का प्रतिपादन कर काव्य के मरौलिक रूप को अक्षुण्णा रखा। इस प्रकार गम्भीर-परिष्कृत आ्नन्द को काव्य का मूल प्रयोजन घोषित कर कुन्तक ने आानन्दवर्घन और अरभिनवगुप्त श्रदि के समान हो काव्य के शुद्ध औ्रर साथ हो गम्भीर मूल्यों की प्रतिष्ठा की है।

काव्यहेतु

कुन्तक ने काव्यहेतु का पृथक विवेचन नहीं किया। किन्तु काव्य-मार्ग के प्रसग में कवि-स्वभाव की व्याखया करते हुए उन्होंने शक्ति, व्युत्पत्ति औ्रर अभ्यास -- इन तीन काव्यहेतुओ् का स्पष्ट निर्वेश किया है. सुकुमारस्वभावस्य कवेस्तथाविघव सहजा शक्ति. समुद्भवति, शक्ति शक्तिमतोरभेदात्। तया च तथाविधसौकुमार्य- रमरगीया व्युत्पत्तिमावघ्नाति। ताभ्या च सुकुमारवर्त्मनाम्यासतत्पर क्रियते।- अर्थात् सुकुमार स्वभाव वाले कवि की उसी प्रकार की (सुकुमार) सहज शक्ति उत्पन्न होती है। शक्ति तथा शक्तिमान् के अ्भिन्न होने से। और उस (सुकुमार शक्ति) से उसी प्रकार की सौकुमार्य-रमणीय (सुकुमार) व्युत्पत्ति की प्राप्ति होती है। उन दोनों से सुकुमार मार्ग से अभ्यास किया जाता है। (हिन्दी वक्रोत्तिजीवित १।२४ वीं कारिका की वृत्ति)। इस प्रकार कुन्तक परम्परा द्वारा स्वीकृत शक्ति, निपुणता और अरपरभ्यास को ही काव्य के हेतु मानते है। किन्तु उन्होने इस प्रसग में भी एक मौलिक तथ्य का उद्धाटन किया है वे इन तीनों काव्यहेतुओ को कवि-स्वभाव के आश्रित मानते है-अतएव काव्य का मूल हेतु कवि-स्वभाव ही है। तीनों का एक ही उद्गम होने के कारण इन में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। कवि की प्रतिभा के अनुसार ही उसको व्युत्पत्ति होगी, और प्रतिभा तथा व्युत्पत्ति के अनुसार है उसका काव्याभ्यास होगा। इसी प्रकार व्युत्पत्ति तथा श्रभ्यास भी प्रतिभा का परिपोप करते हैं- "काव्यरचना की बात छोड दें तो भी अन्य विषयो में भी अनादि वासना के प्रन्यास से सम्कृत चित्तवाले किसी व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार ही व्युत्पतति तथा अन्यास होता है। औरर वे व्युत्पत्ति तथा अभ्यास स्वभाव को अभिव्यक्ति द्वारा ही सफलता प्राप्त करते हैं। स्वभाव तथा उन दोनो के उपकायं और उपकारक भाव से स्थित होने मे, स्वभाव उन दोनो को (व्युत्पत्ति तथा प्रन्याम को) उत्पन्न करता है और वे दोनो उसे परिपुष्ट करते हैं।" (ब० जो० १।२४ वी फारिका की वृत्ति)

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वक्रोक्ति को परिभाषा ] भूमिका [ ३१

कुन्तक का तर्क यह है कि जीवन के समस्त व्यापारो की भांति काव्य में भी (कवि का) स्वभाव ही मूर्घन्य पर स्थित है। स्वभाव के अ्रनुसार ही कवि की शक्ति या प्रतिभा होती है-उसी के अनुसार वह लोक तथा शास्त्र ज्ञान का अर्जन करता है, और उसी के अनुकूल उसकी अभ्यास-प्रक्रिया होती है। मनुष्य की शिक्षा और व्यवहार आदि मूलत. उसकी प्रवृत्ति के ही अनुकूल होते हैं और होने चाहिए, तभी वे उसका उचित परिपोष कर सकते हैं-यह एक स्वीकृत मनोवैज्ञानिक तथ्य है। आधुनिक शिक्षा-शास्त्र का विकास इसी के आघार पर किया जा रहा है। कुन्तक ने इसका निर्भ्रान्त शब्दो में उद्धाटन कर अपनी आवुनिक दृष्टि का परिचय दिया है, औौर प्रस्तुत प्रसग में भी आर्ात्मपरक तथा वस्तुपरक दृष्टियो का समन्वय करने का प्रयत्न किया है।

काव्य की आत्मा वक्रोक्ति और उसकी की परिभाषा

कुन्तक के सिद्धान्त के अनुसार काव्य की आ्रात्मा वकोक्ति है। वक्रोक्ति को परिभाषा उनके शब्दों में इस प्रकार है :- वक्रोक्ति. प्रसिद्धाभिघानव्यतिरेकिणी विचित्रंवाभिया। कीदृशी वैदग्ध्यभगीभणिति.। वैदग्ध्यं विदग्घभाव, कविकर्मकौशलं, तस्य भगी विच्छिति, तया भणिति.। विचित्रंवाभिधा वक्रोक्तिरित्युच्यते। अरयात्- प्रसिद्ध कथन से भिन्न विचित्र अभिधा अर्यात् वर्णनशली ही वक्रोकि है। यह कँसी है ? वंदग्व्यपूर्ण शैली द्वारा उक्ति (ही वक्रोक्ति है) । वैदग्ध्य का अर्थ है विदगध्ता- कवि-फर्म-कौशल उसकी भगिमा या शोभा (चारुता), उसके द्वारा (उस पर आषित) उक्ति। (सक्षेप में) विचित्र अभिधा (वर्णन-शैली) का नाम ही वक्रोक्ति है। (हिन्दी व० जी० १।१० की वृत्ि पृ० ५१) उपर्युक्त व्यास्या के अनुसार (१) वक्रोक्ति का अर्थ है विचित्र अभिवा अर्या्त उक्ति (कथन-प्रकार)। (२) विचित्र का अ्र्प्रभावात्मक श्र्प्र्य है .- प्रसिद्ध कयन-शैली से भिन्न। प्रसिद्ध शन्द का स्वयं कुन्तक ने दो स्वलो पर स्पप्टीकरण किया है :

(अ्र) शात्त्रादिप्रसिद्धशव्दार्योपनिवन्धव्यतिरेकिः। शास्त्र शदि में उपनिवद्ध शब्द-प्रर्य के सामान्य प्रयोग से भिन्न-पर्यात् प्रसिद्ध का श्रर्य है शास्त्र आदि में प्रयुक्त।

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३२1 भूमिफा [वक्रोक्ति को परिभाषा

(श्रा) श्रतिक्रान्तप्रसिद्धव्यवहारसरणि-प्रचलित (सामान्य) व्यवहारसरणि का श्र्प्रतिक्मण करने वाली (वक्रोक्ति)। श्रर्यात् प्रसिद्ध से श्रभिप्राय है सामान्य व्यवहार मे प्रयुक्त। इन दोनो व्यारया्रो के आवार पर 'प्रसिद्ध' का तर्थ हुग-'शास्त्र और व्यवहार में प्रयुक्त'।

(३) विचित्र का भावात्मक अर्प्र्य है -वंदग्ध्य-जन्य चारता से युक्त। कुन्तक ने स्थान-स्थान पर वक्र, विचित्र, चारु, आदि शब्दो का पर्याय रूप में प्रयोग किया है।

(४) वदग्ध्य से अभिप्राय है कवि-कर्म-कौशल का। अ्रपरतएव वैदग्ध्य-जन्य चारुता का अर्थ हुआ कविकौशल-जन्य चमत्कार।

(५) कविकौशल के लिए कुन्तक ने कवि-व्यापार शब्द का प्रयोग अधिक किया है 'शब्दार्थौं' सहिती वक्रकविव्यापारशालिनि।'

कविव्यापार का अर्थ है कवि-प्रतिभा पर आश्रित कर्म व्यापारस्य कविप्रति- भोल्लिखितस्य कर्मण (जयरथ1)। प्रतिभा की परिभाषा कुन्तक ने इस प्रकार की है प्रात्तनाद्यतन-सस्कार-परिपाकप्रोढ़ा प्रतिभा काचिदेव कविशक्ति। अर्थात् पूर्वजन्म तथा इस जन्म के सस्कारो के परिपाक से प्रौढ कविशक्ति का नाम प्रतिभा है। इस प्रकार कविकौशल से अभिप्राय उस व्यापार का है जो पूर्वजन्म तथा इस जन्म के सकारो के परिपाक से प्रौढ कवि- शक्ति द्वारा अनुप्रेरित होता है।

(६) चक्रोक्ति के इस वैचित्र्य या वक्रत्व के लिए कुन्तक ने एक अनिवार्य उपबध रखा है-तद्विदाह्लादकारित्व। अर्थात् उक्ति का विचित्र अ्रथवा लोक-शास्त्र में प्रयक्त शब्द-अर्थ के उपनिबध से भिन्न होना ही पर्याप्त नहीं है, और कवि-कौशल पर आश्रित होना भी अन्तिम प्रमाण नहीं है-उसमें तो सहृदय का मन प्रसादन करने की क्षमता अनिवार्यत होनी चाहिए। इससे दो निष्कर्ष निकलते हैं : एक तो यह कि वक्रोक्ति केवल शब्द-क्रीडा अथवा अर्थ-क्रोडा नहीं है-और दूसरा यह कि वक्रोक्ति का स्वभावोक्ति से कोई विरोध नहीं है क्योकि स्वभावोक्ति में स्वभाव-वर्णन की सहज चायता और उसके कारण मन प्रसादन की क्षमता निश्चय ही वर्तमान

१ सुय्यक के काव्यालकारसर्वस्व की टीका-डा० डे की भूमिका में उद्धृत।

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वक्रोक्ति की परिभाषा ] भूमिका [ ३३

रहती हैअर्थात् वक्रोक्ति का विरोध, इतिवृत्त-वर्णन, या भामह आदि के शब्दों में, वार्ता से ही है।

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर .- वक्रोक्ति का अर्थ है वक्र या विचित्र उक्ति। इस वक्रता या वैचित्र्य में तीन गुण सन्निहित रहते हैं :

(क) लोक-व्यवहार तथा शास्त्र में रूढ़ शब्द-अर्य-प्रयोग से भिन्नता। (ख) कवि-प्रतिभा-जन्य चमत्कार। (ग) सहृदय के मन प्रसादन की क्षमता।

अतएव कुन्तक के अनुसार वक्रोक्ति उस उक्ति अथवा कथनशली का नाम है जो लोकव्यवहार तथा शास्त्र में प्रयुक्त शव्द-अ्रर्थ के उनिवन्व से भिन्न, कवि-प्रतिभा- जन्य चमत्कार के कारण सहृदय-आ्ाह्हादकारी होती है।

इस विवेचन से कुन्तक के तीन मूल सिद्धान्त सामने आते हैं : (१) काव्य की शैली शास्त्र और लोक-व्यवहार की शैली से अनिवायतः भिन्न होती है।

(२) काव्य का मूल हेत है कवि की प्रतिभा और स्वभाव। कवि काव्य का माध्यम मात्र नहीं है, कर्ता है। अर्थात् काव्य कवि का कर्म है-अव्यत्तिगत सृष्टि नहीं है। इस प्रकार कुन्तक ने अत्यन्त प्रबल शब्दो में काव्य में कवि के कर्तुत्व की घोपखा को हे।

(३) प्रतिभा इस जन्म और पूर्वजन्मो के संस्कारो का परिपाक है। अव हम आधुनिक आलोचनाशास्त्र के अनुसार उपर्युक्त मंतव्यो का क्रमशः विवेचन करते हैं।

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३४ ] भूमिका । फाव्य-शैली तथा व्यवहार-शॉँली काव्य की शैली और शास्त्र तथा व्यवहार की शैली फाव्य की शैली और शास्त्र तया व्यवहार को शैली का भेद कुन्तक की नवीन उद्धावना नहीं है। उनमे पूर्व भामह, दण्डी, आदि इस तय्य की ओर निर्देश कर चुके ये। भामह ने वक्रोक्ति जैर अतिशयोक्ति को पर्याय रप में ग्रहण करते हुए लोकातिक्रान्तगोचरता को उसका मल तत्व माना है -

निमित्तती वचो यत्तु लोगातिक्रातगोचरम्।

इसका अभिप्राय यह हुआ कि भामह के अनुसार वक्रोक्ति श्रथवा अतिशयोक्ति का मूल तत्व है शब्द-अर्थ का लोकोत्तर उपनिवन्व-और उघर वक्रोक्ति को भामह काव्य-शैली का सर्व-सामान्य प्राणतत्व भी मानते है। अतएव भामह के मत से काव्य-शैली मे शब्द-अर्य का उपनिवन्ध लोकोत्तर अर्थात् लोकव्यवहार से भिन्न होता है। लोक-सामान्य शव्दार्थ-प्रयोग को भामह ने वार्ता माना है जो काव्य की कोटि के अन्तर्गत नहीं मती। दण्डी ने भी शास्त्र की शैली और काव्य की शैली को मूलत भिन्न माना है। उन्होंने वाड्मय के दो भेद किये हैं-स्वभावोक्ति और वक्रोकि। इन में से स्वभावोक्ति1 का साम्राज्य शास्त्र में है और वक्रोक्ति का काव्य में।

आगे चलकर ध्वनिवादी अभिनवगुप्त ने फिर वक्रता का अर्थ 'लोकोत्तर रूप में अवस्थित' करते हुए काव्य की वक्र शैली और लोकसामान्य की ऋज-रूढ शैली में मौलिक भेद स्त्रीकार किया है। और अन्त में, कुन्तक के समसामयिक भोज ने इस पायक्य को और भी स्पष्ट कर दिया है -

यदवक्र वच शास्त्रे लोके च वच एव तत्। वक्र यार्थंवादादी तस्य काव्यमिति स्मृति ।। (शृगारनकाश)

-शास्त्र और लोकव्यवहार में प्रयुक्त अवक्र अर्थात् वचित्र्य-रहित वचन वचन मात्र है। अर्थवाद आदि में प्रयुक्त जो वक्रवचन है उसकी सज्ञा काव्य है। इस प्रकार भोज ने काव्य की शैली और काव्येतर शास्त्र तथा लोकव्यवहार की शैली में वक्रता के आधार पर स्पष्ट भेद कर दिया है।

शास्त्रेष्वस्येव साम्राज्य +

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काव्य-शैली तथा व्यवहार-शैली ] भूमिका [ ३५

अतएव काव्य की शैली और शास्त्र तथा व्यवहार की शैली का भेद संस्कृत काव्यशास्त्र में आरम्भ से ही स्पष्ट था। कुन्तक ने अपने वक्रोक्ति सिद्धान्त के प्रति- पादन में उसे अत्यन्त निर्भ्नान्त और प्रामाणिक शब्दो में व्यक्त कर काव्य और अकाव्य को सीमाओ को भी सर्वथा पृथक कर दिया है।

इस प्रकार का भेद पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में भी आरम्भ से मान्य रहा है। अरस्तू ने काव्य-शैली की गरिमा का व्यास्यान करते हुए लिखा है. 'सामान्य प्रयोगो से भिन्नता भाषा को गरिमा प्रदान करती है क्योकि शैली से भी मनुष्य उसी प्रकार प्रभावित होते हैं जिस प्रकार विदेशियो से अथवा नागरिकों से। इसलिए आप अपनी पद-रचना को विदेशी रग दीजिये क्योकि मनुष्य असाधारण की प्रशंसा करता है और जो प्रशंसा का विषय है वह प्रसन्नता का भी विषय होता है।"१

अरस्तू के उपरात डिमेंट्रियस ने भी इस पार्थक्य का प्रबल शब्दो में समर्थन किया है : 'प्रत्येक सामान्य वस्तु प्रभावहीन होती है।' उन्होने भी असामान्यता को काव्य की उदात्त शैली का प्राण-तत्व माना है।

अठारहवीं शतान्दी में अंगरेजी के प्रसिद्ध समालोचक एडिसन ने लोकव्यवहार की प्रचलित और परिचित शब्दावली को काव्य के सवया अनुपयुक्त घोषित किया। उन्होंने 'प्रसाद' को तो काव्य-शेली का आवश्यक उपादान माना है, परन्तु सर्व-साधारण के प्रयोगो को अकाव्योचित ठहराया है। "अनेक शब्द सर्व- साधारण के प्रयोग के कारण क्षुद्र वन जाते हैं। अतएव प्रसाद को अति-प्रचलित शब्दो तथा महावरो की क्षुद्रता से मुक्त रखना चाहिए।' आगे चलकर वर्ड सवर्य ने ऐसे भेद को अस्वाभाविक मानते हुए इसका निषध करने का असफल प्रयत्न किया- किन्तु अपने काव्य-व्यवहार से हो उनके सिद्धान्त का खण्डन हो गया और कॉलरिज ने वर्ड्सवर्थ को उनके ही काव्य का प्रमाण देकर निरुत्तर कर दिया। कॉलरिज का तर्क था, "पहले तो स्वय गद्य की भाषा ही-कम से कम सभी तर्क-प्रधान तथा निबद्ध रचनाओ की भाषा बोलचाल की भाषा से भिन्न होती है और होनी चाहिए, जिस प्रकार पढने में और वातचीत करने में भेद होता है"। कॉलरिज ने चित्रभाषा को काव्य का सहज माध्यम स्वीकार किया है-और उसे सामान्य व्यवहार की भाषा से सर्वया भिन्न माना है। इघर आधुनिक युग में आकर रिचर्ड्स ने काव्य के अन्य मावश्यक उपादानो की भांति काव्य की भाषा शैली का भी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है :- १. लोताइ क्रिटीकी पृ० २६

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३६] भूमिका [ काव्य-शैली तया व्यवहार-शैली

"किसी उक्ति का प्रयोग उसके शुद्ध अथवा अशुद्ध अर्थ सकेत के लिए भी हो सकता है। यह भाषा का वैज्ञानिक प्रयोग है। किन्तु उसका प्रयोग कुछ ऐसे प्रभावो के लिए भी हो सकता है जो उसके अर्थ-सकेत द्वारा हमारे भाव और प्रवृत्ति पर पडते हैं। यह भाषा का रागात्मक प्रयोग है। X X X। हम शब्दों का प्रयोग या तो उनके अर्य-सकेतो के लिए कर सकते हैं या फिर उनके परिणाम-रूप भावों और प्रवृत्तियों के लिए। X X X

उपर्युक्त दोनों प्रयोगो में सन्निहित मानसिक प्रक्रियाओ में बडा अन्तर है- यद्यपि लोग सरलता से उसकी उपेक्षा कर जाते हैं। अव इस बात पर विचार कीजिए कि दोनो प्रयोगो में विफलता का क्या परिणाम होता है। वैज्ञानिक भाषा के लिए तो अर्थ-सकेतों में अरन्तर होना ही विफलता है क्योंकि ऐसी स्थिति में उद्देश्य की प्राप्ति ही नहीं हो पाती। किन्तु रागात्मक भाषा के लिए अर्थ-सकेत-विषयक बड़े से बडा अन्तर भी तब तक कोई महत्व नहीं रखता जब तक कि उससे अभीष्ट रागात्मक प्रभाव में कोई वाधा नहीं आती।

इसके अतिरिक्त, वैज्ञानिक भाषा में केवल अर्थ सकेत ही शुद्ध नहीं होने चर्महए, किन्तु उनके पारस्परिक सम्बध भी तर्क-सगत होने चाहिए। उनको एक दूसरे का गतिरोध नहीं करना चाहिए-उनका समन्वय इस प्रकार होना चाहिए कि उनसे आागे के अर्थ-सकेतों में बाधा न पडे। किन्तु रागात्मक प्रयोग के लिए किसी ऐसे तर्क-सगत विधान की आवश्यकता नहीं रहती। इस प्रकार का विधान तो बाधक हो सकता है और होता भी है। क्योंकि यहाँ तो महत्व इस बात का है कि अर्थ- सकेतों पर आश्रित प्रवृत्तियाँ अपने सहज रूप में- समन्वित हो- उनका अपना रागात्मक अन्त सम्बन्ध यथावत् रहे, और यह सब इन प्रवृत्तियों के आ्धारभूत अर्थ- सफेतों के तर्क-सगत विधान पर किसी प्रकार निर्भर नहीं रहता। (प्रिसिपल्स आफ लिटरेरी क्रिटिसिज्म, पृ० २६८)।

कहने की आवश्यकता नहीं कि रिचर्ड्स की 'वैज्ञानिक भाषा' ही भारतीय काव्यशास्त्र की 'शास्त्र तथा लोक-व्यवहार की भाषा' है, और 'रागात्मक' भाषा ही हमारे प्राचीन आचार्यो की 'काव्य-भाषा' है। दोनो के अन्तर को मनोविज्ञान की सहायता से अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में व्यक्त कर रिचर्ड्स ने भारतीय काव्यशास्त्र के उपर्युक्त विवेचन को वैज्ञानिक अनुमोदन प्रदान किया है। कुन्तक और भोज- या उनसे पूर्व दण्डी और भामह भी-अर्थ-सकेत और रागात्मक प्रभाव के भेद से पूर्णतया अवगत थे। कुन्तक के वोनों विशेषण 'कवि-प्रतिभा-जन्य चमत्कार से युक्त'

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काव्य में कवि का कर्त्तुत्व ] भूमिका -[३७

औ्रर 'सहृदय-श्रह्लादकारी' वास्तव में रागात्मक प्रभाव के ही व्यजक हैं। अन्तर इतना ही है कि रिचर्ड्स केवल अनुभूति को ही प्रमाण मानते हैं किन्तु फुन्तक भारतीय दर्शन तथा काव्यशास्त्र की परम्परा के अनुसार आानन्द को काव्य की सिद्धि मानते हैं। भोज के 'अर्थवाद' शब्द में रिचर्ड्स के विवेचन का और भी स्पष्ट सकेत है क्योकि 'अर्यवाद' में 'अयं-सकेत' (रिफरेन्स) की उपेक्षा रहती है और प्रभाव का ही महत्व होता है। भोज के इस एक शब्द में रिचर्ड्स के विवेचन का मानों सार अन्तर्भूत है। तात्पर्य यह है कि काव्य-शैली और शास्त्र-शैली का कुन्तक- कृत उपर्युक्त भेद तथा उसका विवेचन सर्वया मनोवैज्ञानिक है। मनोविज्ञान-शास्त्र के अभाव में वे उपयुक्त पारिभाषिक शन्दावली का प्रयोग नह कर सके। अन्यया वे इस मौलिक भेद और उसके मनोवैज्ञानिक आधार से पूर्गतया परिचित थे।

काव्य में कवि का कर्त्तृत्व

काव्य में कवि के कतुत्व का प्राधान्य स्थापित कर कुन्तक ने अपने स्वतत्र एवं मौलिक चिन्तन का दूसरा प्रमाण दिया है। वैसे सस्कृत काव्यशास्त्र में कवि- कर्त्तृत्व की स्वीकृति प्र्रारम्भ से ही रही है-अलकारवादी तथा रस-ध्वनिवादी, दूसरे शब्दों में देहवादी तथा आत्मवादी-दोनो ने कवि-प्रतिभा को काव्य का मूल हेतु मान कर वास्तव में कवि-कत्तुत्य का ही प्राधान्य स्वीकार किया है। वामन जसे आाचार्य को भी, जिनकी वृष्टि अन्य आचार्यों को अपेक्षा अधिक वस्तुपरक थी, अन्त में प्रतिभान को कवित्व का वीज मानना पड़ा है। संस्कृत सुभाित की श्रनेक सूक्तियों में भी, जहाँ कवि को अपनी रचना-प्रक्रिया में प्रजापति के समकक्ष माना गया है, इसी तथ्य की प्रबल घोपणा है। परन्तु व्यवहार-रप में हमारे काव्यशास्त्र में फाव्य के वस्तु-रूप का इतना अधिक विवेचन हुआ है कि कर्तु पक्ष उसमें दब गया है। यहाँ काव्य की विषय-वस्तु, काव्य की शैली के तत्वशब्द-शक्ति, रीति, अलंकार, दोष आदि, तथा काव्य-निवद्ध पात्र नायक-नायिका भेद आदि का वर्णन प्राय. वस्तुपरक ही हुआ है। रस का सूक्ष्म विश्लेषण हमारे काव्यशास्त्र की प्रमुख विशेषता है, किन्तु उसमें भी भोक्तृ पक्ष ही प्रवल है कर्तृ पक्ष नहीं अर्यात् रस के भोक्ता सहृदय-मानस का तो अत्यन्त पूर्ण एवं सूक्ष्म-गहन विश्लेषण किया गया है, परन्तु रस के स्त्रष्टा कवि-मानस की प्राय उपेक्षा कर दी गयी है। कुन्तक का विषय रस नहीं या, अतएव इस प्रसग में तो उन्होने कोई विशेष योगदान नहीं किया, फिर भी कवि के स्वभाव को मूर्धन्य पर स्थान देकर उन्होने इस ओर सफल निर्देश

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३८ ] भूमिका [काव्य में कवि का फ्त्तृ त्व

अवश्य ही किया है। हाँ, कवि के कर्त्तृ पक्ष की प्रतिष्ठा उन्होने अत्यन्त सवल शब्दों में की है। काव्य की आत्मा के प्रसग में किसी आचार्य ने कवि के कत्तृ त्व को सामने नहीं रखा, किन्तु कुन्तक ने काव्य के मूल तत्व वक्रोकि को सरवथा कविव्यापार-जन्य घोषित कर कवि के व्यक्तित्व को काव्य मे सबसे आ्ररागे लाकर खडा कर दिया है। फुन्तक ने काव्य का अर्थ मूलत कत्रिकर्म ही माना। उन्होंने कति की परिभाषा ही यह की है 'कचेः कर्म काव्य-कवि का कर्म काव्य है। अपने आप में यह एक सामान्य उक्ति प्रतीत होती है, किन्तु इसमें काव्य के दो मौलिक सिद्धान्तो का- वस्तुपरक काव्य-दृष्टि और व्यत्तिपरक काव्य-दृष्टि का-चिरन्तन सघर्ष सन्निहित है जो भारतीय साहित्यशास्त्र में प्रछन्न रूप से और यूरोपीय काव्यशास्त्र में व्यक्त रूप से आरम्भ से ही चला आ रहा है। काव्यत्व काव्य को विषय-वस्तु, अ्रभिव्यंजना के उपकरण पर्थात् रोति अतकार श्रादि में निहित है अ्ररथवा कत्रि द्वारा उनके प्रयोग में ? वस्तुपरक दृण्टिकोण पहले पक्ष पर वल देता है, व्यत्तिपरक दृष्टिकोण दूसरे पर। भारतीय काव्य-शास्त्र में कत्ि-प्रतिभा आदि का कीर्तन होते हुए भी काव्य- वस्तु का व्यवहार में अत्यधिक महत्व रहा है। उदाहरण के लिए महाकाव्य, नाटक आदि गभीर काव्य-रपों में विषय-वस्तु तथा नेता-विषयक नियम निश्चय ही वस्तुपरक दृष्टि के प्रमाण हैं। महाकाव्य तथा नाटक की वस्तु प्रामाणिक औरौर धर्मपरक होनी चाहिए, नेता धीरोदात्त होना चहिए। यह वरतु के महत्व्व की स्पष्ट स्वीकृति है। इसी प्रकार काव्य-साधनो में वैदर्भी पाचाली तथा गौडी से श्रेष्ठ रीति है, गौडी युद्ध आदि प्रसग के और पाचाली शृगार आदि के शधिक उपयुक्त है, अलकरण सामग्री का उपयोग अर्थात् अप्रस्तुन और प्रस्तुत का पारस्पररिक सम्बन्ध किस प्रकार होना चाहिए, अभिधा की ऊपेक्षा व्यजना और लक्षणा शधिक काव्योपयोगी हैं- आदि मान्यताए भी निश्चय ही वस्तु की महत्व-प्रतिष्ठा करती हैं। यहाँ तक कि रस के प्रसग में भी जो मूलत श्रत्मपरक है विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी का सयोजन बहुत पुछ वस्तुगत ही बन गया है क्योकि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी सभी की तो सीमा-रेखाए निश्चित कर दी गयी हैं। आधुनिक युग में स्वय शुक्लजी ने काव्य-विषय की गरिमा को महत्व दिया है। पाश्चात्य काव्यशास्त्र में भी यह सिद्धान्त मान्य रहा है। वहाँ भी अ्ररस्तू से लेकर मैथ्यू शरनल्ड तक 'महान विषय- वस्तु (ग्रेट थीम्स)' का बडा महत्व रहा है। बीच-बीच में व्यक्तिपरक दृष्टिकोण भी उतने ही उद्घोष के साथ उत्तीर्ग हुआ है-प्राचीनों में लाजाइनस और परवर्ती विचारकों में रूसो, स्विनबर्न, और इघर अर्वाचीनो में कोचे आदि ने वस्तु का विरोध किया है-क्रोचे ने तो इसका एकात निषेध ही कर दिया है। परन्तु वस्तु-समर्थको का

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काव्य में कवि का कर्तुत्य ] भूमिका [ ३६

स्वर भी क्षीण नहीं रहा और बहुमत शताब्दियों तक उनका हो रहा है। वीसवों शतान्दी में इलियट ने अति-व्यक्तिवाद से खीभ कर काव्य में कवि के कतु त्व को ही मानने से इन्कार फर दिया। वे र काव को केवल माध्यम मानते हैं कर्ता नहीं। "सफल कवि होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसकी मानसिक शक्ति भी समृद्ध हो-आवश्यकता इस बात की है कि उसका मन अ्धिक से अधिक भावों श्रौर सवेदनाओ का शरधिक से अधिक सफल माध्यम वन सके। X X X कला-सृजन की इस प्रेरणा के समय जो समन्वय होता है, उससे कति के व्यक्तित्व का कोई सम्बन्ध नहीं है-इस समस्त प्रक्रिया में उसका व्यक्तित्व सवरथा पृथक एव निर्विकार रहता है जैसा किसी किसी रासायनिक क्रिया में होता है। उदाहरस के लिए ऑक्सीजन और सल्फर डायोक्साइड से भरे किसी कमरे में अगर आप प्लेटीनम का एक तन्तु डाल दें तो वे दोनों तो सल्फर एसिड में परिवतित हो जाएगे, परन्तु प्लेटीनम के तन्तु में िसी प्रकार का विकार नहीं आएगा। कवि का मन इसी प्लेटीनम तन्तु के समान है जो उसकी अनुभूतियो को प्रभावित और समन्वित करता हुआ स्वयं निर्विकार रहता है।" (परम्परा और वैयक्तिक प्रतिभा, पृ० १८)। उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि इलियट काव्य में कवि के व्यत्तित्व का किसी प्रकार का योग-दान नहीं मानते। वे उसे सर्वया तटस्य मानते हैं। वे कतुत्व का एकान्त निषेध तो नहीं करते, किन्तु कवि का सक्रिय कत्तु त्व उन्हें स्त्रीकार्य नहीं है। उनकी मान्यता है कि सृजन-प्रेरणा के प्रभाव में भावों औ्रर सवेदनो के समन्वय का नाम ही काव्य-रचना है। किन्तु यह समन्वय कवि की सचेष्ट क्रिया नहीं है, यह तो सृजन-प्रेरणा के प्रभाव से आप घटित हो जाता है।

इस पक्ष में इलियट अकेले नहीं हैं-मनोविश्लेपण-शास्त्र के यूंग जैसे मेघावी युग-प्रवर्तक आचार्य उनके साथ है। युग भी एक दूसरे मार्ग से इसी गन्तव्य पर पहँचे हैं :

एक बार फिर, आात्मा को आदिम अवस्या में प्रवेश करने पर हो कला के सृजन और उसके प्रभाव का रहस्य प्राप्त होता है, क्योंकि इस अवस्या में अ्रनुभव- फर्ता व्यष्टि न होकर समष्टि हो होती है X X X । इसी कारण महान कला वस्तुपरक और अव्यक्तिगत होती है, यद्यपि वह हमारे अन्तरतम के तारों को भंकृत कर देती है। और इसी कारण कवि का व्यत्तित्व उसकी कला के लिए अनिवार्य नहीं है-वह केवल एक (उपयोगी) साधन या वाघा मात्र हो सकता है। अपने

१ कॉन्टस ऐक्टिविटी

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४० 1 भूमिका [काव्य मे कवि का कत्तुत्व

जीवन में फवि एफ सस्कारहीन स्वार्यरत व्यक्ति हो सफता है, अरथवा भद्र नागरिफ, रुग्सामना हो सकता है या मूढ़ या अपराधी-ये सभी रूप उसके अपने व्यत्तित्व के लिए आवश्यक है किन्तु उसके कवित्व के लिए ये सभी श्ननावश्यक हैं।

X X + X

कलाकार तो मूलत साधन है और अपनी कला से हीनतर है।

प्रत्येक स्रष्टा कलाकार का व्यक्तित्व दुहरा होता है-प्रथवा यो कहिए कि उसमें परस्पर विरोधी गुसो का समन्वय रहता है। एक ओ्रर वह मानव-व्यक्ति है, दूसरी ओ्ोर एक अव्यक्तिगत सृजन-प्रक्रिया। मानव-व्यक्ति रूप में वह स्वस्थ हो सकता है अथवा रुग्ण, अतएव उसके व्यक्तिगत मनोजीवन का तो वैयक्तिक रूप में विश्लेषण हो सकता है और होना चाहिए। किन्तु कलाकार के रूप में उसका अध्ययन उसकी सृजना-क्रिया द्वारा ही हो सकता है। (यु ग मनोविज्ञान-सम्बन्धी विचार-सग्रह पृ० १८१, १८३)

इस प्रकार शास्त्रवादी इलियट औ्रौर मनोविश्लेषण-विज्ञान के आचार्य युग दोनो के निष्कर्ष प्राय समान ही है -वैसे दोनों की चिन्ताधारा भी मूलत असमान नहीं है, दोनों ही दो भिन्न पार्गों से पुरातनवादी आस्तिकता पर पहुँच जाते है। अन्तर केवल इतना है कि शास्त्रवादी होने के कारण इलियट बीच में ही रुक जाते है और सृजन-प्रेरणा को एक अप्रत्याशित अरनिर्वचनीय घटना मान कर छोड देते है। य ग का सिद्धान्त उन्हें और भी आगे ले जाता है। यृग का सिद्धान्त यह है कि युग-विशेष की सामूहिक आवश्यकताओं के दबाव से विशिष्ट प्रतिभासम्पन्न कषि के अन्तश्चेतन में स्थित आदिम मानव-वृत्तियाँ प्रबल वेग से सक्रिय हो उठती हैं। चेतन के साथ इनका सम्पर्क ही कला-सृजन है। अ्रत यु'ग के अनुसार कवि की अ्र्पन्तश्चेतना में विद्यमान शदिम मानव-वृत्तियों की सक्रियता ही सृजन प्रक्रिया का उद्गम है। भारतीय काव्यशास्त्र में प्रतिपादित कवि की सवासनता युग की इस स्थापना के निकट पहुंच जाती है। आदिम मानव वृत्तियो को ही भारतीय दर्शन में वासना का नाम दिया गया है। इस प्रसग में युग ने अपने विवेचन के अन्तर्गत जिस सामूहिक अनुभव (कलेक्टिव एक्सपीरियम) का बार-बार उल्लेख किया है, हमारा साधारणीकरण भी वैसी ही कोई वस्तु है। अतएव अन्य प्रसगों की भाति यहाँ भी मेरी यह धारखा पुष्ट होती है कि भारतीय साहित्यवेत्ता शताब्दियो पूर्व साहित्य के मूल मर्मो तक पहुंच गया था-उसकी शब्दावली मात्र भिन्न थी।

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काव्य में कवि का कर्तु त्व ] भूमिका [४१

यहाँ व्यत्तित्व और कर्तृत्व का अन्तरस्पष्ट कर लेना समीचीन होगा। व्यक्तित्व मनुष्य के समग्र रप को अपनी परिधि में बाँधे हुए है। व्यक्तित्व में उसका श्रचेतन और चेतन, भोत्ता तथा फर्ता रूप सभी कुछ आ जाता है। कर्त्तृ त्व मे मुख्यत उसका कर्ता रूप ही आता है। सामान्य रूप से कतृरव अपने आप में स्वतन्त्र, कोई यान्त्रिक क्रिया नहीं है-उसके पीछे भी कति के चेतन-अचेतन तथा भोक्ता रूपो की प्रेरणा निश्चय ही वर्तमान रहती है, फिर भी उसमें चेतन तथा सचेष्ट क्रिया का ही प्राघान्य है। कवि के व्यक्तित्व और कर्तृत्व मात्र में यही अन्तर है। काव्य को कवि के व्यक्तित्व का प्रतिफलन मानने का अर्य यह हुआ कि कवि अपने जीवन के अनुभवो को-अनुभूत घटनाओं और तथ्यों को-चेतन और अचेतन के राग-विरागो को काव्य में अभिव्यक्त करता हैउसकी कृति आत्माभिव्यक्ति है। काव्य-निवद्ध भाव अयवा अ्रनुभूतियाँ उसकी स्वानुसूति से सम्बद्ध हैं। अयात् कत्रि के भोक्ता और स्रष्टा रूपों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। 'प्रत्येक काव्य-कृति एक आत्मकया है'। अथवा 'कृति के पीछे कर्ता का व्यक्तित्व निहित रहता है-इस प्रकार के वाक्यों का यही अर्थ है। कर्त्तु त्व के लिए यह सब आवश्यक नहीं है। किसी काव्य का कर्ता उसमें निवद्ध सामग्रो का-अर्थात् अनुभूतियो और तय्यों का भोक्ता भी हो यह आवश्यक नहीं है, ऐसा प्राय होता भी नहीं है। यह दूसरा पक्ष है। जो काव्य में कवि का कृतित्व मात्र मानते हैं उनका यही मत है। भारतीय काव्यशास्त्र सामान्य रूप में कवि के फत्त त्व को इसी रूप में ग्रहण करता है, वह कवि को सवासन तो अवश्य मानता है पर कवि के भोक्ता और स्रष्टा रूपो में तादात्म्य नहीं मानता। किन्तु साथ ही वह कवि को माध्यम मात्र भी नहीं मानता; कवि अपनी प्रतिभा, निपुणता तथा अभ्यास के बल पर काव्य की रचना करता है। फाव्य कवि की सचेष्ट क्रिया है जिसको वह उपर्युक्त तीन गुणों के द्वारा सफलतापूर्वक सम्पादित करता है। इलियट एक पग और और आगे बढ जाते हैं, वे कवि को माध्यम मात्र मान कर उसे सचेष्ट कतत्व से भी वंचित कर देते हैं। उनकी मान्यता है कि सृजन-प्रेरण के प्रभाव में भावों और सवेदनो के समंजन-हप में काव्य-रचना आपसे आप घटित हो जाती है, कवि का व्यत्तित्व इस समजन का माध्यम मात्र है, कर्ता नहीं है। यु'ग भी मनोविज्ञान के आ्धार पर प्राय. इसी तय्य का प्रतिपादन करते हैं।

इस विषय में कुन्तक की स्थिति क्या है ? स्पष्ट है कि कुन्तक कवि को फेवल माध्यम मात्र मानने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होने कवि के कर्तत्व की निन्नन्ति शब्दो में घोपणा की है। परन्तु, फत्तु त्व मे उनका अभिप्राय केवल कति को सक्रियता मात्र से है अथवा वे काव्य को कवि के व्यत्तित्व की अ्रनिव्यत्ति भी

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४४] भूमिका [प्रतिभा

अनादिप्राक्तनसस्कारप्रतिभानमय (अभिनवभारती खण्ड १)

सामान्यत सस्कृत काव्यशास्त्र में प्रतिभा को जन्मजात हो माना गया है, परन्तु हेमचन्द्र आदि कुछ आचार्यो ने उसके दो भेद भी माने हैं जन्मजात और कारण- जन्य-इनको ही सहजा और श्पाधिकी भी कहा गया है। पण्डितराज जगन्नाथ का भी प्राय यही मत है। ये आ्रचार्य सहजा प्रतिभा को जन्मान्तरगत सस्कार औ्रर औपाधिकी को व्युत्पत्ति तथा अ्रभ्यास का परिपाक मानते हैं।

यूरोप में भी प्रतिभा के इस रूप का विवेचन मिलता है। वहाँ पूर्वजन्म की स्वीकृति तो नहीं है क्योकि मसीही दर्शन में उस के लिए अवकाश नहीं है, परन्तु उस के समकक्ष वश-प्रभाव या पितर-प्रभाव को स्पष्टत प्रतिभा के निर्माता फारणो में माना गया है। यूरोप के मनोवैज्ञानिको ने सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार के अनुसन्धानो द्वारा प्रसिभा को भूलत वशानुगत उपलब्धि ही सिद्ध किया है। इस विषय में गाल्टन नामक विद्वान ने विशेष परिश्रम किया है। उनके कुछ उद्धरण इस प्रकार हैं मेरा विचार प्रतिभा शब्द का प्रयोग किसी पारिभाषिक अरर्थ में करने का नहीं था। मैंतो उसके द्वारा एक ऐसी शक्ति का द्योतन करना चाहता था जो असाधारण हो और साथ ही सहजात भी हो (वशक्रमागत प्रतिभा, भूमिका पृ० ८)।

मैं अपनी इस प्रतिज्ञा की सिद्धि के लिए कि प्रतिभा वशक्रमागत होती है, यह दिखाना चाहता हूँ कि प्रसिद्ध व्यक्तियो के वशजन प्राय प्रसिद्ध ही होते हैं। (वही पू० ५)। सहज समानता (अर्थात् सब में समान जन्मजात शक्ति होती है) के भूठे दावो पर तो मुझे निरपवाद रूप से आपत्ति है। (यही पृ० १२)।

वास्तव में पूर्वजन्म और वश-प्रभाव एक बात नहीं है-और इसका एक प्रमाण तो यही है कि भारतीय दर्शन वोनों की युगपत् मान्यता स्वीकार करता है। परन्तु आत्मा की परिकल्पना के अभाव में प्राक्त्तन सस्कार के विषय में वैज्ञानिक कल्पना वश-प्रभाव से आगे नहीं जाती। इस प्रकार वश-प्रभाव और पूर्वजन्म के सस्कार सिद्धान्त रूप में सरवथा पृथक हैं, परन्तु प्रस्तुत प्रसग में कम से कम दोनों का दृष्टिकोए मूलत एक ही है।

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प्रतिभा ] भूमिका [४५

प्रतिभा का स्वरूप :- प्रतिभा का दूसरा नाम शक्ति भी है, अर्यात् प्रतिभा एक प्रकार की मानसिक शक्ति है। भट्ट तौत तथा अभिनवगुप्त ने उसे प्रज्ञा का एक विशेष प्रकार माना है।

प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता।

नव-नव उन्मेष करने वाली प्रज्ञा का नाम प्रतिभा है-दूसरे शन्दों में प्रतिभा प्रज्ञा का वह प्रकार है जो नवीन रूपों का सृजन अथवा उद्घाटन करती है। अभिनवगुप्त ने इसी परिभाषा को और भी विशद रूप में प्रस्तुत किया है -- प्रतिभा श्रपूर्ववस्तु- निर्माणक्षमा प्रज्ञा। अर्थात अपूर्व रूपों की सृष्टि करने वाली प्रज्ञा का नाम प्रतिभा है। कवि-प्रतिभा इसी का एक विशेष प्रकार है जिसके द्वारा सहृदय कवि रसावेश की स्थिति में काव्य-निर्माण-क्षमता प्राप्त करता है :- तस्या विशेषो रसावेशवशद्य- सौन्दर्य काव्यनिर्मालक्षमत्वम्। (ध्वन्यालोकलोचन पृ० २६)। अभिनवगुप्त के वत्तच्य का साराश यह है: १. प्रतिभा प्रज्ञा का ही एक रूप है। २. इसका कार्य है अपूर्व-नवनव रूपों की सृप्टि करना। ३. प्रतिभा का एक विशिष्ट रूप है कवि- प्रतिभा जिसके द्वारा रसाविष्ट कवि काव्य-सूजन में समर्थ होता है। अर्थात् सामान्य रूपों की सृष्टि करने वाली शक्ति सामान्य प्रतिभा है और रसात्मक रूपों की सृष्टि करने वाली शक्ति कवि-प्रतिभा है।

कवि-प्रतिभा रसात्मक रूपों की सृष्टि किस प्रकार करती है, इसकी मामिक विवेचना सु्द्रट, महिम भट्ट और राजशेखर ने प्रतिभा के प्रसग में की है। रुद्रट के प्रनुसार-

मनमि सदा सुसमाधिनि विस्फुरणामनेकघाऽमिघेयस्य। अ्क्लिष्टानि पदानि च विभान्ति यस्यामसौ शक्ति: ॥

इसका भावार्य यह है कि समाहित चित्त में जिसका उन्मेप होने पर प्रसन्न पदावली में अभिघेय अर्य का अ्रनेक प्रकार से प्रस्फुरण होता है वही शक्ति अ्रथवा प्रतिभा है। अर्थात् जिस समय कवि का मन समाहित हो जाता है, उम समय प्रतिभा के उन्मेप से ही अभिधेय अर्थ शनेक प्रकार से रमणीय शव्दावली में अभिव्यक्त होता है। यही मन्तव्य महिम भट्ट का भी है।

रसानु गुणशव्दार्थ चिन्तास्तिमितचेतस क्षण स्वरपस्पर्शोत्या प्रजव प्रतिभा कवे.।

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भूमिफा [ प्रतिभा

रसानुकूल शब्द-अर्थ के चिन्तन में तल्लीन समाहितचित्त कवि की प्रज्ञा ही, व कि वह शब्द-अ्र्थ के वास्तविक स्वरूप का स्पर्श करती हुई सहसा उद्दीप्त हो उती है, प्रतिभा सज्ञा को धारण करती है। इसका अभिप्राय यह है कि जिस मय शब्द-अ्रर्थ के भावन में तल्लीन कवि का मन पूर्णत समाहित हो जाता है, उस मय एक क्षणा ऐसा आता है कि कवि की प्रज्ञा शब्द-अर्य के वास्तविक स्वरूप का हज साक्षात्कार कर लेती है। यही काव्य-सृजन का क्षण होता है, औौर इस क्ष प्रज्ञा प्रतिभा का रूप धारण कर लेती है। अर्थथात् महिम भट्ट के अनुसार भी तिभा प्रज्ञा का ही एक विशेष रूप है-जिसके द्वारा शब्द-अर्थ के वास्तविक स्वरूप साक्षात्कार होता है। उनके अनुसार प्रतिभा प्रज्ञा का वह विशेष रूप है जिसके रा कवि शन्द-प्रर्थ के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है। 'शब्द-अर्य के स वास्तविक रूप' को राजशेखर ने पदार्थसार्थ कहा है और मूर्त रूप में विवरण साथ प्रस्तुत किया है -- या शन्दग्रामम्, अ्रथंसार्थम्, अलकारतन्त्रम्, उक्तिमार्गम्, न्यदपि तथाविघमघिहृदयम् प्रतिभासयति सा प्रतिभा। अपर्था्त् पदार्थ-समूह से भिप्राय शब्द, अर्थ, अलकार, उत्ति तथा इस प्रकार के अन्य काव्य-प्रसाधनो से । वस्तुपरक दृष्टि से ये सभी शब्द-अरर्थ के चमत्कार हैं, और प्रतिभा इन सबको वि के हृदय में प्रतिभासित कर देती है। यह तो हुई वस्तुपरक दृष्टि। भावपरक स्टि से शब्द-अर्थ के वास्तविक रूप का यह उत्मेष ही रसात्मक रूप की सृष्टि है योंकि वक्ता अथवा श्रोता के मन का उक्त अथवा श्रृत शब्द-अर्थ के साथ पूर्ण मजस्य ही शब्द-अर्थ के सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार है- वही रस है। अन्त में, प्रतिभा के विषय में, सस्कृत साहित्य-शास्त्र के विवेचन का निष्कर्ष स प्रकार है· मनुष्य की मौलिक वौद्धिक शक्ति का नाम है प्रज्ञा जो जन्म-जन्मान्तर के स्कारों का परिपाक है। प्रज्ञा के अनेक रूप हैं और अनेक कार्य-इनर्मे से एक प है प्रतिभा जिसका कार्य है नवननव रूपों का उन्मेष अथवा सृजन। प्रतिभा का ही एक विशिष्ट रूप है कवि-प्रतिभा, जो रसात्मक रूपों का उन्मेष अथवा सृजन रती है। साहित्यशास्त्र में प्रतिभा के इसी रूप का वर्णन है। पश्चिम में प्रतिभा के स्वरूप का विशव विवेचन मनोविज्ञान शास्त्र के रन्तर्गत किया गया है। मनोविज्ञान के अनुसार प्रतिभा का अरर् है असाघारण रोटि की मेघा-अथवा श्सामान्य सहज (मानसिक) शक्ति। अत्यन्त उच्च कोटि दी न्यू डिक्शनरी ऑफ साइकोलोजी

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प्रतिभा ] भूमिका i ४७

की मानसिक शक्ति-विशेष रूप से किसी भी प्रकार की आविष्करण अ्रथवा सृजन- शक्ति। X X X इसका कोई विशेष पारिभाषिक अरथ नहीं है, कहीं कहीं इसे १४० साघारण प्रज्ञा के वरावर माना गया है।'

मनोवैज्ञानिकों ने प्रतिभा के मूल गुणगो का भी विश्लेषण किया है। सामान्यत प्रतिभा की मूल विशेषताएँ इस प्रकार हैं :

प्रतिभा का विकास व्यक्तित्व के अन्य अ्र््ंगो के अनुपात से नहीं होता, उसके परिपाक के फलस्वरूप व्यक्तित्व के अन्य अरग-प्राय. उसके मानवीय गुए, भ्पुष्ट रह जाते हैं।

प्रतिभा अपने आपको वातावर के अनुकूल ढालने में प्राय. अ्रसमर्थ रहती है।

प्रतिभा की गति निर्वाध होती है-वह किसी प्रकार का व्याघात या प्रतिबन्ध सहन नहीं कर सकती।

प्रतिभा औौर सहजगुण में यह अ्रन्तर है कि सहजगुर का नियन्त्रण किया जा सकता है, परन्तु प्रतिभा उत्मुक्त एव स्वच्छन्द है। वह एक दैवी विस्फोट है, नियन्त्रित घटना नहीं।

प्रतिभा परिस्यिति और रोति का वन्घन स्वीकार नहीं करती, अपने सम- सामयिक समाज की रुढ़िनों औरर मर्यादाओ का उल्लधन करती हुई वह पर्वत की तरह सहसा उद्भूत हो उठती है।

प्रतिभा को 'साधारणता' का नीरस वातावरण प्सह्य है-वह प्रसाघारणता में ही खल खेलती है।

इस प्रकार मनोविज्ञान के अनुसार प्रतिभा सामान्य नियमो और रूढि- रीतियो के वन्धन से मुक्त एक असाधार दवी शक्ति है जिसका कार्य है सृजन प्रथवा आविष्करण। मनोविज्ञान का यह विवेचन भारतीय काव्यशास्त्र के विवेचन से

१ डिकशनरी झाफ साइोलोजी

२ युग के मनोवैज्ञानिक विचार-मग्रह 'साइकोलोजीकल रिफ्लेकशन्स' नाम ्रन्य के आधार पर पृ० १६४-१६६

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४८ ] भूमिका [ प्रतिभा

मूलत भिन्न नहीं है। भारतीय काव्यशास्त्र के प्रतिनिधि आ्चार्यों के पूर्वोद्धत मन्तव्यो का साराश भी प्राय. यही है कि प्रतिभा एक अ्रसाधारण जन्मान्तरागत दवी शक्ति है जो नियतिकृतनियमरहिता है1 और जिसमे अपूर्व-वस्तु-निर्माण को क्षमता है।

फ्रायड तथा उनके अनुयायी मनोविश्लेपकों ने भी प्रतिभा की अपने सिद्धान्त के अनुकूल व्यास्या की है। वे प्रतिभा का मूल उद्गम अवचेतन तथा चेतन मन दूसरे शब्दों में इद२ और नैतिफ चेतना के सघर्ष में मानते हैं। हमारी अ्नेक इच्छाए दमित होकर अवचेतन मन में सचित हो जाती हैं जहाँ से वे अत्यन्त प्रवल रूप धारण कर अभिव्यक्ति के लिए प्रयत्न करती रहती है। परन्तु उनकी अ्रभिव्यक्ति में सबसे बडी बाधा है हमारी नैतिक चेतना (श्रति-प्ह-सुपर-ऐगो) जो उनका परपवरोध करती है। इसके परिणामस्वरूप हमारे अवचेतन और चेतन मन में- अ्रथवा इद और नैतिक शरह के वीच तीव्र सघर्प हो जाता है यही सघर्ष प्रतिभा का मूल उद्गम है. जिसके व्यक्तित्व में यह सघर्ष जितना अधिक तीव्र एव प्रबल होगा, उसकी प्रतिभा भी उतनी ही प्रबल और प्रखर होगी। इस प्रकार मनोविश्लेषण शास्त्र के आचार्य प्रतिभा की असाधारण तथा अरतिमानवीय विशेषताओ का कारण अवचेतन के इस प्रच्छन्न सघर्ष में खोज निकालते हैं। भारतीय शास्त्र ने जिस तत्व को दैवी वरदान या प्राक्तन सस्कार का परिपाक कह कर सतोष कर लिया था, पश्चिम के शस्तिक दर्शन ने जिसे दैवी स्फुलिंग मान कर अपनी जिज्ञासा का समाधान कर लिया था, आधुनिक युग के भौतिक-वैज्ञानिक शास्त्रों ने वश-प्रभाव और अवचेतन मन के अन्तर्द्वन्द्वों में उसका उद्गम खोजने का प्रयत्न किया है। वास्तव में प्रतिभा आ्ररम्भ से ही मानव-व्यत्तित्व का एक रहस्यमय प्रग रही है औरर प्रत्येक देश तथा प्रत्येक युग अपने विश्वासों तथा दार्शनिक परम्पराओ के अनुसार उसके स्वरूप की व्याख्या करता रहा है। प्रतिभा के विषय में एक तथ्य तो स्वत स्पष्ट ही है, और वह यह कि प्रतिभा श्न्त करण की एक असाधारण शक्ति है, अथवा यो कहिए कि एक प्रकार की असाधारण मानसिक शक्ति है और इस प्रकार यह अन्त सस्कारों का परिपाक है। कुछ व्यक्तियों के अन्त सस्कार असाधारण रूप से प्रबल होते हैं और उनमें 1

इन सस्कारों के समीकरण की अपूर्व शक्ति भी होती है। इस असाधारता को व्याख्या भारतीय शास्त्रों ने आत्मा की अमरता तथा पूर्वजन्म के आधार पर की है-उनका

१ मम्मट ने कवि-प्रतिभा की सृष्टि को नियतिकृतनियमरहिता कहा है- २ Id काव्यप्रकाश १।१

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प्रतिभा ] भूमिका

स्पष्ट तर्क है कि यह असाधारणता पूर्वजन्मो के सचित सस्कारो का परिपाक है: प्रतिभा एक जन्म की सिद्धि न होकर जन्मजन्मान्तर की सिद्धि है। पाश्चात्य दर्शन में पूर्वजन्म का सिद्धान्त मान्य नहीं रहा, अतएव उन्हें प्रतिभा की अ्रसाधारणता को दैवी चरदान मानना पड़ा. प्रतिभावान व्यक्ति जन-सामान्य की अपेक्षा अ्रधिक समर्य इसलिए होता है क्योंकि उसमें दैवी अ्रश श्रधिक रहता है अथवा दैवी शक्तियो के साथ उसका सम्पर्क रहता है। स्वभावत आज का वौद्धिक युग इन व्यास्याओ को स्वीकार करने में श्रसमर्य रहा और उसने बुद्धि-सम्मत अनुसन्वानो के द्वारा प्रतिभा को अ्रसाघारणता का समाधान करने का प्रयत्न किया। अन्त संस्कारों की प्रवलता के उसने दो कारण प्रस्तुत किए : १ (पूर्व-जन्म के वजन पर) वंश-प्रभाव २. श्व- चेतन का अन्तर्द्वन्द्व। आस्तिक दशनों ने जिन प्रच्छन्न प्रभावो का सम्वन्ध पूर्वजन्म के सस्कारों के साय अथवा दैवीसम्पर्क के साथ स्थापित किया था उनको भौतिक विज्ञानों ने अवचेतन तथा पितर-प्रभाव में खोजने का प्रयत्न किया।

संस्कृत काव्यशास्त्र में जिसे अभिनवगुप्त आदि ने कवि-प्रतिभा कहा है उसका विवेचन पाश्चात्य आलोचनाशास्त्र तथा मनोविज्ञान में फल्पना के प्रसग किया गया है। पाश्चात्य आलोचनाशास्त्र में कॉलरिज और इधर रिचर्ड्स ने कल्पना का विशद विवेचन किया है। उनके अनुसार अस्त-व्यस्त ऐन्द्रिय सवेदनों अ्रथवा प्रत्यक्ष प्रभाव-प्रतिविम्वो को समन्वित कर पूर्ण विम्व-रूपों में ढालना कल्पना का मुस्य कर्तव्य-कर्म है। "इस प्रकार विश्ृखलित तथा असम्वद्ध अन्तवृत्तियों को एक समजस प्रतिक्रिया में ढालती हुई कल्पना सभी कलाओं में अपना श्रस्तित्व व्यक्त करती है।" (रिचर्ड्स-प्रिंसिपल्स ऑ्रफ लिटरेरी क्रिटिसिज्न पृ० २४५)। यही सामंजस्य- विधान अथवा शनेकता में एकता की स्थापना-दूसरे शब्दो में व्यस्त प्रतिक्रियाओं को पूर्ण अनुभूतियों में मूर्तित करना कवि-कल्पना अथवा सूजनशील कल्पना का मूल घर्म है। कॉलरिज के शब्दों में 'इस समन्वय औौर जादू की शक्ति के लिए ही मैंने कल्पना शब्द का प्रयोग किया है। इनका धर्म है विरोधी या असम्वद्ध गुणों का एक-दूसरे के साथ सन्तुलन अथवा समन्वय करना अर्थात् एकस्पता का अनेकरपता के साथ, साधारण का विशेष के साथ, भाव का चित्र के साथ, स्यष्टि का सम्टि के साथ, नवीन का प्राचीन के साथ, असाधारण भावावेश का असीम सयम अथवा प्रनुकम के साथ अथवा चिर-जागृत विवेक एव स्वस्थ आत्म-सयम का दुर्दम तथा गम्भीर भावुकता के साथ।""इसी के बल पर कवि अनेकता में एकता ढूढ निकालता है और विभिन्न विचारों एव भावों को एक विशेष दिचार प्रथवा भाव से श्रन्वित कर देता है।" शेक्सपिनर ने इसे ही स्वत्य पल्पना कहा है।

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५०1 भूमिका [ कुन्तक का प्रतिभा-विवेचन

दार्शनिको में फाट और इघर क्रोचे आदि ने भी इसी मत की पुष्टि की है कान्ट ने इसे उत्पादनशील कल्पना और क्रोचे ने सहजानुभूति कहा है। इन दोनों शक्तियों का मूल धर्म एक ही है-जीवन के सम्पर्क से मानव-चेतना में उत्पन्न प्रूप भकृतियो को रूप देना। भारतीय आ्राचार्यो की पुर्तोद्धृत शन्दावली में भी प्रकारान्तर से इन्हीं तथ्यों की अ्रभिव्यक्ति है समाहित चित्त में शब्द-अर्य के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार, अ्रथवा उसके वास्तविक सौन्दर्य का प्रतिभासन सहजानुभूति ही है जो मूलत अभिव्यजना से अभिन्न है-औ्रौर यही श्र्प्रस्तव्यस्त सवेदनो का समजन अथवा अरूप भककृतियो को रूप देना है। समाहित चित्त में विश्भृखलता व्यवस्थित हो जाती है-अ्रनेकता एकाग्र हो जाती है, तभी विश्ृखल सवेदन समजित होकर मूर्तित हो उठते हैं और तभी शब्द-अ्रर्थ का सच्चा स्वरूप प्रतिभासित हो जाता है। जिस शक्ति के द्वारा यह सब सघटित होता है वही कान्ट को सृजनशील कल्पना है, वही क्रोचे की सहजानुभूति है और वही अभिनवगुप्त की काव्यनिर्माणक्षमा प्रतिभा है।

कुन्तक का प्रतिभा-विवेचन

कुन्तक ने पूर्ण आग्रह के साथ प्रतिभा का महत्व स्वीकार किया है। अपने ग्रन्थ में किसी एक स्थल पर क्रमबद्ध विवेचन तो उन्होंने नहीं किया फिर भी यन्र तत्र विकीर्ण उद्धरणो को सकलित कर प्रतिभा के विषय में उनका व्यवस्थित अभिमत उपलब्घ किया जा सकता है। वास्तव में कवि-प्रतिभा का कुन्तक के मन पर इतना गहरा प्रभाव रहा है कि जहाँ कहीं अवसर आया है, वहीं उन्होंने अत्यन्त उच्छ्वसित शब्दों में उसका कीर्तिगान किया है।

प्रतिभा का महत्व -कुन्तक के अनुसार सम्पूर्ण काव्य-विधान का केन्द्रबिन्दु ही प्रतिभा है

१ यद्यपि द्वयोरप्येतयोस्नत्प्राधान्यनंव वाक्योपनिबन्ध तथापि नत्रिप्रतिभा- प्रोढिरेव प्र, धान्येनावतिष्ठते। (हि० व० जी० पृ० ३२) अर्थात् यद्यपि (उपर्युक्त) दोनों (उदाहरणों) में उस (शन्दार्थ के साहित्य) के प्राधान्य से ही काव्य-रचना की गयी है फिर भी कविप्रतिभा की भौढ़ता ही प्रधान रूप से अवस्थित रहती है।

१ प्रोडक्टिव इमेजिनेशन २ इन्टयू शन

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कुन्तक का प्रतिभा-विवेचन] भूमिका [५१

२ य्किचनापि वैचित्य तत्सर्वं प्रतिभोद्भवम्। सौकुमार्यपरिस्पन्दस्यन्दि यत्र विर जते। (हि० व० जी० १।२=)

वैसे तो यह सुकुमार मार्ग का ही वर्णन है, परन्तु इसमें प्रसगवश प्रतभा के महत्व का निर्देशन भी कर दिया गया है। इस श्लोक का अर्थ है. सुकुमार मार्ग वह है जहाँ प्रतिभा से उद्भूत जितना भी वचित्र्य है वह सव सुकुमार स्व्रभाव से प्रवाहित होता हुआ शोभित रहता है। एक विद्वान ने इस श्लोक के प्रथम चरण को पृथक कर उसकी किचित् भिन्न व्यास्या की है. 'जो कुछ भी वैचित्र्य है, वह सभी प्रतिभा से उद्भूत है।' यह व्याख्या यद्यपि हमारे अभिप्राय की पुष्टि के लिए अ्धिक अनुकूल पड़ती है, तयापि प्रसंगानुमोदित न होने से यथावत् मान्य नहीं है। किन्तु प्रतिभा की महत्व-प्रतिष्ठा इस श्लोक में भी है, इसमें सन्देह नहीं किया जा सकता। प्रतिभा से उद्भूत सौन्दर्य को कुन्तक ने सवंत्र आहार्य अर्थात् व्युत्पत्ति-साध्य सौन्दर्य की अपेक्षा फहीं अधिक महत्व दिया है : कालिदास की प्रशस्ति करते हुए एक स्थान पर उन्होंने स्पष्ट लिखा है : एतच्चतस्यव कवे सहजसौकुमार्यमुद्रितसूक्तिपरिस्पन्दसौन्दर्यस्य पर्यालोच्यते, न पुनरन्येषामाहायमात्रकाव्यकरणकौशलश्लाघिनाम्।

"पर्थात् यह भी इसी कवि के विषय में (इतनी सूक्ष्म) आलोचना की जा सकती है जिसकी सूक्तियों का सौन्दर्य सहज सौकुमार्य की मद्रा से अकित हो रहा है। फेवल आहार्य (व्युत्पत्ति बल से बनावटी) काव्य-रचना के कौशल के लिए प्रसिद्ध अन्य के विषय में नहीं।" (हिन्दी व० जी० ५८वीं कारिका की वृत्ति)। इन शब्दों से व्यक्त है कि कुन्तक की दृष्टि में प्रतिभाजन्य सौन्दर्य और आहार्य सौन्दर्य का सापेक्षिक मूल्य क्या है। इसके अतिरित्त जैसा कि 'काव्यहेतु' के प्रसग में स्पष्ट किया जा चुका है, कुन्तक अन्य काव्यहेतुओं को अर्थात् व्यत्पत्ति तया अन्यास को भी प्रतिभा जन्य हो मानते हैं :- "स्वभाव तथा उन दोनो के (व्युत्पत्ति तथा अभ्यास के) उपकारय और उपकारक भाव से स्थित होने से स्वभाव उन दोनों को उत्पन्न करता है, और वे दोनो उसे परिपुष्ट करते हैं।" (हिन्दी व० जी० १।२४ वीं कारिका की वृत्ति)। -इस प्रकार कुन्तक ने प्रतिभा का कीर्तिगान अनेक प्रकार से अनेक प्रसरगों में किया है।

प्रतिभा का क्ृतित :- कुन्तक के अनुसार कवि-प्रतिभा अ्रनन्त है : यस्मात् कविप्रतिभानन्त्यान्नियतत्वं न सम्भवति (हिन्दी व० जी० पृ० ६४), भतएव उसके

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५२1 भूमिका [ कुन्तक का प्रतिभा-विवेचन

कृतित्व का भी अन्त नहीं। प्रतिभा में वह शक्ति है जिससे कि प्रयत्न के बिना ही शब्द-अर्य में फोई अपूर्व सौन्दर्य स्फुरित सा दिखाई देता है.

प्रतिभा प्रथमोन्द्ेदसमये यत्र वक्रना। शब्दाभिघेययोरन्त स्फुरतीव विभाव्यते। (हिन्दी व० जी० १।३४ पृ१२४)

अर्थार्त् कवि-प्रतिभा का मुख्य कार्य है शब्द और अर्थ में अपूर्व सौंदर्य का प्रस्फुरण क्योंकि कुन्तक का स्पष्ट मत है कि अम्लान प्रतिभा के द्वारा ही शब्द और अर्थ में नवीन चमत्कार प्रस्फुटित होता है अम्लानप्रतिभोवि्भन्न नवशन्दार्थ .(हिन्दी व० जी० १।२५)। किन्तु प्रस्फुटन का अर्थ असत् को सत् रूप देना नहीं है-अतएव कुन्तक यह नहीं स्वीकार करते कि प्रतिभा अभत को अस्तित्व देती है प्रतिभा का कार्य तो वास्तव में उद्धाटन अथवा उन्मेष करना है। अर्थात् कवि के वर्ण्यमान पदार्थ सामान्यत सत्तामात्र से प्रस्फुटित रहते हैं, कवि की प्रतिभा उनके किसी नवीन स्वरूप की सुन्टि नहीं करती-वह तो उनमें अनिर्वचनीय अतिशय उत्पन्न करती हुई एक विचित्र प्रकार की सहृदय-हृदयहारिणी रमणीयता का अध्यारोप कर देती है। कुन्तक के इस फथन का अभिप्राय यह है कि कवि की प्रतिभा रूपों का उस अ्रर्थ में 'आवि- ष्कार' नहीं करती जिस अर्थ में वैज्ञानिक की प्रतिभा करती है। वह पदार्थ के स्वरूप में ही विद्यमान गुरो को ऐसे कौशल के साथ अतिरजित कर प्रस्तुत कर देती है कि पदार्थ का साधारण स्थूल रूप तो छिप जाता है और एक नवीन रमणीय रूप उपस्थित हो जाता है। विधाता की सृष्टि में असख्य नामरूपमय पदार्थ वर्तमान है। जन- साधारण नित्य प्रति उनका अवलोकन तथा व्यवहारादि करते हैं, किन्तु उनकी दृष्टि उन पदार्थो के स्थूल रूपों की ओोर ही प्राय जाती है। कवि-प्रतिभा अनायास ही इनके विशिष्ट गणों का साक्षात्कार कर लेती है, और इन्हीं विशिष्ट गुणो को उभार कर ऐसी निपुणता के साथ प्रस्तुत करती है कि पदार्थो का सामान्य, जनसाधारण- लक्षित रूप आच्छन्न हो जाता है, और वे नवीन सहृदयहृदयहारी रूप धारण कर लेते हैं। यही कवि-प्रतिभा की सृजन-प्रक्रिया है। वह सामान्य के त्याग और विशेष की अतिरजना या लोकोत्तर रूप में उपस्थापना द्वारा नवीन रूप तो प्रदान कर देती है किन्तु अस्तित्वहीन को अस्तित्व नहीं देती-यह उसका कार्य नहीं है।

इस प्रसग में भी कुन्तक ने रसवाद और अलकारवाद का मष्यवर्ती तथा समन्वयकारी मार्ग ग्रहण किया है उनका श्रतिशय शब्द यदि अलकारवाद की ओर सफेत करता है, तो सहृदयहृदयकारी विशेषण में रसवाद क्री प्रतिर्ध्वनि है। इस

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कुन्तक का प्रतिभा-विवेचन 1 भूमिका [ ५३

प्रकार अतिशय अ्रथवा अतिरजना के द्वारा रमणीय रूप की इस सृष्टि में अलकारवाद तथा रसवाद दोनो की स्पष्ट समन्विति है।

प्रतिभा के स्वरूप के विषय में भी कुन्तक का दृष्टिकोण समन्वयवादी है। उनके अनुसार प्रतिभा पूर्वजन्म और इस जन्म के सस्कारो का परिपाक है।

प्राक्तनादतनसस्कारपरिपाकप्रौढ़ा प्रतिभा

इस प्रकार कुन्तक ने एक तो पूर्वजन्म के ही नहीं वरन् इस जन्म के सस्कारों को भी मान्यता दी है औौर दूसरे प्रतिभा को संस्कार विशेष न मानकर सचित सस्कारों का परिपाक माना है। इसका अभिप्राय यह है कि जीवन का प्रत्येक कर्म मानव-प्त्मा पर एक प्रभाव या सस्कार छोड़ जाता है, ये सस्कार जन्मजन्मान्तर से सचित होते हुए अपने सारभूत रूप में मानव प्रतिभा का निर्माण करते रहते हैं। जन्मान्तर के साथ इस जन्म का भी समाचेश कर कुन्तक ने प्रतिभा को जन्मजात मानने के साथ- साथ विकासशील भी माना है।

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वक्रोक्ति के भेद

व्यापक स्वरूप :- कुन्तक की वक्रोक्ति अथवा वक्रना वास्तव में फवि-कौशल अथवा काव्य-सौन्दर्य का पर्याय है। कुन्तक ने स्पष्ट शब्दों में वक्रोक्ति को काव्य के अलकार का पर्याय माना है.

उभावेतावलकार्यों तयो पुनरलकृति। वक्रोक्तिरेव ·

शब्द और अर्थ अलकार्य है, और वक्रोक्ति उनका अलकार है। अर्थात् शब्द-अर्थ के सौन्दर्य अथवा अलकार की समप्ट का ही दूतरा नाम वक्रोक्ति है। काव्य मे जो कुछ सुन्दर चनत्कारपूर्ण अथवा अलकृत है. वह सब वक्रता का ही चमत्कार है। अ्रतरव उतके अन्तर्गत फुन्तक ने कवि-कौशल अथवा काव्य-सौन्दर्य के सभी प्रकार- भेदो को अन्तर्भूत करने का प्रयत्न किया है। कवि प्रतिभा के बल पर अपनी कृति में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए सहज अथवा सचेष्ट रूप में जिन साघनो-प्रसाधनों का उपयोग करता है वे सभी वक्रोक्ति के भेद हैं। अतएव कुन्तक की वक्रोक्ति का - साम्र्राज्य वर्ण-विन्यास से लेकर प्रबन्ध-कल्पना तक और उवर उपसर्ग, प्रत्यय आवि पदावयवों से लेकर महाकाव्य तक विस्तृत है। ध्वनिकार ने व्यत्तिपरक दृष्टि से जिस प्रकार ध्वनि की सार्वभौम सत्ता की स्थापना की थी, उसी प्रकार उनके उत्तर मे, वस्तुपरक वृष्टि से अलकारवादियों की ओर से कुन्तफ ने अलकार की सम्टि- रूपिणी यक्रोक्ति की सार्वभौम प्रभुता स्थापित करने का प्रयत्न किया। वक्रोक्ति के भेद-प्रभेद ·- कुन्तक ने मूलत वक्रोक्ति के ६ भेद किये हैं। ये भेइ विस्तार-क्रम से वैज्ञानिक पद्धति पर किये गये हैं। काव्य के लघुतम अवयव वर्ण से आरम्भ होकर ये उसके महत्तम रूप महाकाव्य तक क्रमश विकसित होते जाते हैं। कुन्तक के अनुसार वक्रोक्ति के ६ मौलिक भेद इस प्रकार हैं :

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वर्णविन्यास-वक्रता ] भूमिका [ ५५

१. वर्णविन्यास-वक्रता २. पदपूर्वार्ध-वक्रता ३. पदपरार्घ-वक्रता ४. वाक्य- वक्रता ५. प्रकरण-वकता ६. प्रवन्ध-वक्रता। इनके फिर अनेक प्रभेद हैं।

वर्णविन्यास-वक्रता

एको द्वौ वहवो वर्णा वघ्यमाना पुन. पुन। स्वल्पान्तरास्त्रिधा सोक्ता वर्णविन्यासवक्रता। व० जी० २,१

अर्थात् जिसमें एक दो या बहुत से वर्ण थोडे थोड़े अन्तर से बार बार (उसी रूप में) प्रयित होते हैं, वह वर्ण-विन्यास-वक्रता अर्थात् वर्ण-रचना की वक्रता कहलाती है।

प्रसिद्ध होने से। यह वर्ण शब्द व्यंजन का पर्याय है। इस प्रकार (वर्ण शब्द के व्यंजन अर्थ में) (हिन्दी व० जं० २।२ की वृत्ति)

यह वर्णविन्यास-वक्रता अन्य आचार्यो का अ्नुप्रास ही है .अनुप्रास में भी व्यंजन का साम्य ही अपेक्षित है, स्वर का नहीं। कुन्तक ने इस तथ्य को स्वयं स्पष्ट कर दिया है। एतदेव वर्णविन्यासवक्र्व चिरन्तनेष्वनुप्रास इति प्रसिद्धम्। अर्थात् यही वर्णविन्यास-वक्रना प्राचीन आचार्यो में अनुप्रास नाम से प्रसिद्ध है। (हिन्दी व० जी० पृ० ६६)। वर्णविन्यास-वक्रना कुन्तक के अनुसार तीन प्रकार की है: इन तीनो प्रकारो का आधार है क्रमश. एक वर्ण की आवृत्ति, दो वर्गों की आवृत्ति और अनेक वर्गों की आवृत्ति। आगे चलकर कुन्तक ने फिर एक अन्म रीति से वर्ण- विन्यास-धक्रता के भेद किये हैं : "इस (दूसरे प्रकार की व्णविन्यास-वक्रता) के वे कौन से तोन प्रकार हैं, यह फहते हैं। १. वर्गान्त से युक्त स्पर्श। ककार मे लेकर मकार पर्यन्त वर्ग के वर्ण स्पर्श कहलाते हैं। इनके अन्त के डकार आदि के साथ सयोग जिनका हो वे वर्गान्तयोगी है। इन को पुन पुन आवृत्ति वर्णविन्यास-वक्रता का प्रथम प्रकार है। तलनादय. अर्थात् तकार लफार और नकार शदि द्विरुक्त अर्यात् द्वित्व रूप में दो वार उच्चारित होकर जहाँ बार वार निबद हों वह दूमरा प्रकार है। इन दोनों से भिन्न शेप व्यंजन-संज्ञक वर्ण रेफ आदि से सयुक्त रूप में जहाँ निवद्ध हो वह तीसरा प्रकार है। इन सभी भेदो में पुन. पुन निवद्ध व्यंजन थोड़े अन्तर वाले अर्यार्त् परिमित व्यवधान वाले होने चाहिए यह सबके साथ सम्बद्ध है।" (हिन्दी व० जी० २।२ फारिका की वृत्ति)

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वक्रोक्ति के भेद

व्यापक स्वरूप :- कुन्तक की वक्रोक्ति अयवा वक्रता वास्तव में कवि-कौशल अथवा काव्य-सौन्दर्य का पर्याय है। कुन्तक ने स्पष्ट शब्दों में वकोक्ति को काव्य के अलकार का पर्याय माना है.

उभावेतावलकायो तयो पुनरलकृति। वक्रोक्तिरेव·

शब्द और अर्थ अलकार्य हैं, और वक्रोक्ति उनका अलकार है। अर्थात् शब्द-अर्थ के सौन्दर्य अथवा अलकार की समष्टि का ही दूतरा नाम वक्रोक्ति है। काव्य में जो कुछ सुन्दर चनत्कारपूर्ण अथवा अलकृत है· वह सब वक्रता का ही चमत्कार है। अतएव उतके अन्तर्गत कुन्तक ने कवि-कौशल अथवा काव्य-सौन्दर्य के सभी प्रकार- भेदों को अन्तर्भूत करने का प्रयत्न किया है। कवि प्रतिभा के बल पर अपनी कृति में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए सहज अथवा सचेष्ट रूप में जिन साधनों-प्रसाधनो का उपयोग करता है वे सभी वक्रोक्ति के भेद हैं। अतएव कुन्तक की वक्रोक्ति का सास्राज्य वर्ण-विन्यास से लेकर प्रबन्ध-कल्पना तक और उवर उपसर्ग, प्रत्यय आ्रदि पदावयवों से लेकर महाकाव्य तक विस्तृत है। ध्वनिकार ने व्यत्तिपरक दृष्टि से जिस प्रकार ध्वनि की सार्वभोम सत्ता की स्यापना की थी, उसी प्रकार उनके उत्तर में, वस्तुपरक दृष्टि से अलकारवादियों की ओर से कुन्तक ने अलकार की समष्टि- रूपिणी वक्रोक्ति की सार्वभौम प्रभुता स्थापित करने क प्रयत्न किया। वक्रोक्ति के भेद-प्रभेद ·- कुन्तक ने मूलत वक्रोक्ति के ६ भेद किये हैं। ये भे ३ विस्तार-क्रम से वैज्ञानिक पद्धति पर किये गये हैं। फाव्य के लघुतम अवयव वर्ण से आरम्भ होकर ये उसके महत्तम रूप महाकाव्य तक क्रमश विकसित होते जाते हैं। कुन्तक के अनुसार वक्रोक्ति के ६ मौलिक भेद इस प्रकार है.

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वर्णविन्यास-वक्रता ] भूमिका

१. वर्णविन्यास-क्रता २. पदपूर्वार्घ-वक्रना ३. पदपरार्घ-वक्रा ४. वाक्य- वक्रता ५. प्रकरण-वकता ६. प्रबन्ध-वक्रता। इनके फिर अनेक प्रभेद हैं।

वर्णविन्यास-वक्रता

एको द्वो वहवो वर्णा वष्यमाना पुन पुन। स्वल्पान्तरास्त्रिया सोक्ता वर्णविन्यासवक्रा। व० जी० २,१

अर्ात् जिसमें एक दो या बहुत से वर्ण थोड़े थोड़े मन्तर से वार वार (उसी रूप में) प्रयित होते हैं, वह वर्ण-विन्यास-वक्रता अर्थात् वर्ण-रचना की वक्रता कहलाती है।

यह वर्ण शब्द व्यंजन का पर्याय है। इस प्रकार (वर्ण शब्द के व्यंजन अर्थ में) प्रसिद्ध होने से। (हिन्दी व० जं० २।२ की वृत्ति)

यह वर्णविन्यास-वकता अन्य आचार्यो का अनुप्रास ही है : अनुप्रास में भी व्यंजन का साम्य ही अपेक्षित है, स्वर का नहीं। कुन्तक ने इस तथ्य को स्वय स्पष्ट कर दिया है। एतदेव वर्णविन्यासवकरत्वं चिरन्तनेष्वनुप्रास इति प्रसिद्धम्। अर्थात् यही वर्णविन्यास-वक्रना प्राचीन आचार्यो में अनुप्रास नाम से प्रतिद्ध है। (हिन्दी व० जी० पृ० ६६) । वर्णविन्यास-वक्रता कुन्तक के अनुसार तीन प्रकार की है : इन तीनों प्रकारों का आधार है क्रमश. एक वर्ण की आवृत्ति, दो वर्गों की आवृत्ति औ्रौर अरनेक वर्णों को आवृत्ति। आगे चलकर कुन्तक ने फिर एक अ्रन्य रीति से वर्ण- विन्यास-वक्रा के भेद किये हैं : "इस (दूसरे प्रकार की वर्णविन्यास-वक्रता) के वे कौन से तीन प्रकार हैं, यह फहते हैं। १. वर्गान्त से युक्त स्पर्श। ककार से लेकर मकार पर्यन्त वर्ग के वर्ण स्पर्श कहलाते हैं। इनके अ्रन्त के इकार आदि के ताय मयोग जिनका हो वे वर्गान्तयोगी है। इन की पुन पुनः आवृत्ति वणंविन्यास-वक्रा का प्रथम प्रकार है। तलनादय अर्थात् तकार लकार और नकार आदि द्विरक्त अर्यात् द्वित्व रूप में दो बार उच्चारित होकर जहाँ वार बार निबद्ध हो वह दूसरा प्रकार है। इन दोनो से भिन्न शेय व्यंजन-सज्ञक वर्ण रेफ आदि से संयुक्त रप में जहाँ निवद्ध हो वह तीसरा प्रकार है। इन सभी भेदों में पुन. पुन निवद्ध व्यंजन थोड़े अन्तर वाले अर्यात् परिमित व्यवघान वाले होने चाहिए यह सबके ताय सम्बद्ध है।" (हिन्दी व० जो० २।२ फारिका फी वृत्ति)

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५६ ] भूमिका [ वर्णविन्यास-वक्रता

इस प्रकार वर्णविन्यास-वक्रना के ये तीन भेद सक्षेप में इस प्रकार हैं (१) जहाँ वर्गान्तयोगी स्पर्शो की आ्रावृत्ति हो, (२) जहां त, ल, न आदि वर्गों को द्वित्व रूप में आवृत्ति हो, और (३) जहाँ इन दोनो वर्गो के अतिरिक्त वर्णो की रेफ आदि से सयुक्त रूप में आवृत्ति हो।

ये वास्तव में वर्णसयोजनाओं के विभिन्न रूप-प्रकार हैं। प्राचीन आ्राचार्यों ने वृत्तियो तथा अर्प्रनुप्रास-चक्र में इनका अ्रन्तर्भाव किया है। उनके अरनुसार भी अ्र्प्रनुप्रास में व्यजनो का ही चमत्कार है और व्यजनो की सयोजनाओ के प्रकार भी बहुत कुछ ये ही हैं। साहित्यदर्पणकार ने अनुप्रास की परिभाषा श्रर रूप-भेदो का विवे- चन इस प्रकार किया है स्वर की विषमता रहने पर भी शब्द अर्थात् पद, पदाश के साम्य (सादृश्य) को 'अनुप्रास' कहते हैं। व्यजनो के समदाय की एक ही बार अनेक प्रकार की समानता होने से उसे 'छेक' अर्थात् छेकानुप्रास कहते है। शनेक व्यजनो की एक ही प्रकार से (केवल स्वरूप से ही, क्रम से नहीं) समानता होने पर, अथवा अनेक व्यजनो की अ्रनेक वार अरवृत्ति होने पर, यद्वा अनेक प्रकार से (स्वरूप औ्रर क्रम दोनों से) अनेक बार अ्रनेक वर्णो की आवृत्ति होने पर, किंवा एक ही वर्ण की एक हो बार समानता (आवृत्ति द्वारा) होने पर, या एक ही वर्ण की अ्नेक वार आवृत्ति होने पर 'वृत्यनुप्रास' नामक शब्दालकार होता है। तालु कण्ठ, मूर्धा, दन्त आदि किसी एक स्थान में उच्चरित होने वाले व्यजनों की (स्वरो की नहीं) समता को श्रुत्यनप्रास कहते हैं। पहले स्वर के साथ ही यदि यथावस्थ व्यजन की प्वृत्ति हो तो वह अन्त्यानुप्रास कहाता है। केवल तात्पर्य भिन्न होने पर शब्द और अर्थ दोनो की आवृत्ति होने से लाटानुप्रास होता है। इनके अतिरिक्त प्राचीनो की वृत्तियों-उपनागरिका, परुषा और कोमला का भी कुन्तक ने वर्णविन्यास-वक्रता में ही अन्तर्भाव कर लिया है।

झागे चलकर कुन्तक ने यमक को भी इसी परिधि में ले लिया है। यमक, यमकाभास अथवा यमक से साम्य रखने वाले अन्य वर्ण-चमत्कार वर्णविन्यास-वक्रना के अन्तर्गत आ जाते हैं -समान वर्ण वाले किन्तु भिन्नार्थक, प्रसादगुणयुक्त, श्रुति- मघुर, औचित्य से युक्त आदि, (मध्य तथा अन्त) आदि स्थानो पर शोभित होने वाला जो यमक नामक प्रकार है वह भी इसी का भेद है। (२।६-७)। इसी प्रकार यमकाभास भी वर्ण-विन्यास का ही चमत्कार है जो सहृदयो का हृदयहारी होता है। यमकाभास से अ्भिप्राय ऐसे वर्ण-चमत्कार से है जिसमें भिन्नार्थक वर्ण-योजना सर्वथा समान न होकर ईषत् भिन्न होती है। उदाहरण के लिए 'स्वस्था सन्तु वसन्त'

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वर्णं-विन्यास-वक्रता ] भूमिका [५७

में सन्तु और सन्त की आवृत्ति अथवा 'राजीवजीवितेश्वरे' में जीव औ्र जीवि के आवृत्ति यमफाभास है। इन्हीं से मिलता-जुलता एक और भी वर्ण-चमत्कार होता है 'जहाँ कहीं कहीं व्यवधान के न होने पर भी केवल (वीच में आने वाले) स्वरों के भेद से हृदयाकर्षक रचना सौन्दर्य को अत्यन्त परिपुष्ट, करती है।' (२३)। यह वर्ण-योजना यमक के गोत्र की होती हुई भी यमक से भिन्न है। यमफ में नियत स्यान पर वर्णों की आवृत्ति करने का नियम है पर यहाँ स्थान का कोई नियम नहीं है। यहाँ आवृत्ति वाले वर्ण वे ही होते हैं, परन्तु बोच में अ्रवस्थित स्वरो का वैषम्य चमत्कार उत्पन्न कर देता है। उदाहरणार्थ 'केलोकलित', 'कदलदलं' आदि में उपर्युक्त प्रकार का चमत्कार लक्षित होता है।

इस प्रकार वर्णवित्यास के प्राय सभी प्रसिद्ध प्रयोगो को कुन्तक ने अपनी वर्णविन्यास-चक्रता के अन्तर्गत माना है। अनुप्रास के समस्त भेद, वृत्तियाँ, यमक तथा यमकामास आदि सभी का अन्तर्भाव इसमें हो जाता है। फिर भी वर्ण-सौन्दर्य परिमितभेद नहीं है और न वह स्वतन्त्र ही है। वर्गों को कवि-प्रतिभा के अनुसार असख्य सयोजनाए हो सकती हैं-जिनसे अ्नेक प्रकार के चमत्कार की सृष्टि हो सकती है। इन सबकी गणना कर वर्णविन्यास-वक्रता के भेदो को परिमित कर देना सभव नहीं है। इसके साथ ही, वर्णविन्यास-कौशल अपने आप में स्वतन्त्र भी नहीं है। इसीलिए कुन्तक ने उसके लिए कतिपय प्रतिबन्ध आवश्यक माने हैं ..

(१) महला प्रतिबन् यह है कि वर्ण-योजना सदा प्रस्तुत विषय के अनुकूल होनी चाहिए। 'और वे (वर्ण) कसे होने चाहिए? प्रस्तुत अर्थात् वर्ण्यमान वस्तु के शचित्य से शोभित। न कि वर्णसाम्य के व्यसन मात्र के कारण उपनिवद्ध होने से प्रस्तुत वस्तु के औचित्य को मलिन करने वाले।' (हि० व० जी० २।२ कारिका की वृत्ति)।

(२) दूसरा प्रतिबन्ध यह है कि वर्णविन्यास-वक्रता अत्यंत आग्रहपूर्वक विरचित न हो और न असुन्दर वर्गों से भूषित हो*। (२४)। (३) उसमें वचित्रम होना चाहिए : 'उसे चूर्व आवृत वर्णो को छोड नवीन के पुनरावर्तन से मनोहर बनाना चाहिए।* (२४)। (४) इसके अ्रतिरित्त वमकादि की वर्ण-योजना के लिए विशेष रप से, ध्रौर साधारण वर्ण-योजना के लिए सामान्य रप मे प्रसाद गृण भी सवथा आवश्यक है।*

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५८] भूमिका

(५) वर्ण-योजना फा छठा प्रतिबन्ध है श्रुतिपेशलता। अर्थात् प्रस्तुत रसादि के अनुकूल वर्णविन्यास में अ्रन्य चाहे कोई भी चमत्कार वर्तमान हो, किन्तु वह श्रुति-सुखद तो प्रत्येक स्थिति में ही होना चाहिये।* (२।४)

कुन्तक ने अपनी वर्णविन्यास-वक्रता का विवेचन सामान्यत इसी रूप में किया है। काव्य का प्रथम आरधार है वर्ण। सभी आचार्यों ने अपने अपने सिद्धान्त के अनुसार वर्ण पर आश्रित चमत्कारो का वर्णन अ्नेक रूपो में किया है। कुन्तक के पूर्ववर्तो आरचार्यों ने अनुप्रासादि शब्दालंकारों तथा वृत्तियो के आश्रय से वर्णचमत्कार का विवेचन किया है। किन्तु कुन्तक ने वर्णगत समस्त सौंदर्य को सर्वव्यापी वक्रोक्ति का प्रथम अग मानते हुए, वर्णविन्यास-वक्रता के अन्तर्गत अपने सिद्धान्त के अनुकूल ही सर्वथा मौलिक रूप में, उसका उद्धाटन किया है। व्वनिकार के विवेचन के समान उनके विवेचन का भी महत्व यह है कि वर्ण-सौंदर्य काव्यशास्त्र का एक पृथक विषय न रह कर सम्पूर्ण काव्य-चक्र का एक अविच्छिन्न भग बन गया है।

पदपूर्वार्ध-वक्रता

वर्ण के उपरान्त काव्य का दूसरा श्रवयव पद है जो अनेक वर्गों का समुदाय रूप होता है। अतएत क्रमानुसार कुन्तक उसी को ग्रहण करते हैं। परन्तु पद के भी दो अग है (१) पदपूर्वार्ध और (२) पदपरार्घ। अतएव उन दोनो का पृथक वर्णन किया जाता है।

व्याकरण में पदपूर्वार्ध का दूसरा नाम प्रकृति भी है। सस्कृत में पद मूलत दा प्रकार के होते हैं सुबन्त और तिडन्त। सुबन्त का पूर्वार्घ प्रातिपदिक और तिडन्त का धातु कहलाता है। सस्कृत व्याकरण के अनुसार पद का अर्थ है विभक्ति से युक्त शब्द जो वाक्य में प्रयुक्त होता है। पद के दो अग हैं· (१) प्रकृति और प्रत्यय। प्रकृति के भी दो रूप हैं (१) प्रातिपदिक औ्रर धातु। सुबन्त पद का पूर्वार्घ प्रातिपदिक और तिडन्त का धातु कहलाता है। प्रकृति मूल शब्द है-प्रत्यय में भी अरथ निहित रहता है जिस के सयोग से मूल अर्थ की वाच्यता सिद्ध हो जाती है। हिन्दी में इस प्रकार का शब्द-विभाजन है तो अवश्य किन्तु वह इतना स्पष्ट नहीं है जितना संस्कृत में।

  • नातिनिर्बन्धविहिता नाप्यपेशलभूषिता। पूर्वावृत्तपरित्यागनूतनावर्तनोज्ज्वला ।। (व० जी० २।४)

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पदपर्यार्ष-वक्रता ] भूमिका

अतएव पदपूर्वार्घ-वक्रना से अभिप्राय प्रातिपदिक तथा धातु की-अथवा यों कहिए कि मूल शन्द की वक्रता से है।

पदपूर्वार्घ-वक्रता के 5 मुस्य भेद हैं: १. रूढ़िवैचित्र्य-वक्रता, २. पर्याय- वकता, ३ उपचार-वक्रता, ४. विशेषण-वक्रता, ५. सवृति-वक्रता, ६. वृत्ति- वकता, ७. लिगवैचित्र्य-वक्रता, 5. क्रियावैचित्र्य-वक्रता।

रूढिवैचित्र्य-वक्रता

(जहा लोकोत्तर तिरस्कार अथवा प्रशसा का कथन करने के अभिप्राय से वाच्य अर्य क रूढ़ि से असम्भव अर्य का अध्यारोप अथवा उत्तम घर्म के अतिशय का आरोप गभित रूप में कहा जाता है, वह कोई अपूर्वसौंदर्याघायक) रूढिवचित्र्म-वक्रता कही जाती है। (हिन्दी व० जी० २।८-६)। यह वक्रता रूढ़ि के वचित्र्य पर आश्रित है। रूढि से अभिप्राय है परम्परागत अथवा कोश तया लोक-व्यवहार में प्रसिद्ध वाच्य अर्य का। जहा कवि अपनी प्रतिभा के द्वारा रूढ अय पर किसी कमनीय असम्भाव्य अर्य का अध्यारोप अयवा किसी उत्तम धर्म के अतिशय का गभित रूप में आरोप कर देता है, वहा (उत प्रयोग विशंज में) एक विचित्र सौदर्य या चमत्कार उत्पन्न हो जाता है। वहा वास्तव में कोई लोकोत्तर चमत्कार उत्पन्न करने के लिए रुढ अर्थ का किसी श्रन्य अर्थ में सक्रमण कर दिया जाता है। यह चनत्कार लक्षणा के आश्रित है-और ध्वनिकार ने अर्यान्तरसक्रमितवाच्य-ध्वनि के अन्तर्गत इसका ययावत् विवेचन किया है। कुन्तक ने अपनें दोनों उदाहरण भी ध्जन्यालोक से ही लिए हैं :

१ ताला जाग्रन्ति गुणा जाला दे सहित्रएहिं वेप्पन्ति। रइ किरणानुग्गहिय्राई होन्ति कमलाइ कमलाइ।।

(तब ही गुन सोभा लहें, सहृदय जवहिं सराहिं। कमल कमल हैं तर्वाह जब रविकर सो विकमाहिं॥)

२. काम मन्तु दड कठोरहृदयो रामोऽस्मि सर्व सहे। वैदेही तु कथ भविष्यत हहा हा देवि धीरा भव।।

(मैं तो कठोर हृदय राम हूँ, सव फुछ सह लूगा-परन्तु वैदेही की क्या दशा होगी ? हा देवि, धय रखना।)

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६० ] भूमिका [ पदपूर्वार्ध-चक्रता

हिन्दी में तुलसीदास का भी एक प्रयोग ऐसा ही है-

सीताहरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ। जो में राम तो कुल-सहित कहहि दशानन आइ॥

पहले प्राकृत छन्द में कमल के रूढ अरर्थ का विस्तार करते हुए उस पर एक कमनीय अर्य का अध्यारोप किया गया है, और सस्कृत श्लोक तथा हिन्दी के दोहे में राम के रूढ़ अर्थ का चमत्कारपूर्ण विस्तार है। रूढ़ अर्य का यही चमत्कारपूर्ण विस्तार रूढिवेचित्र्य-वक्रता है।

२ पर्याय-वक्रता पर्याय पर आश्रित वक्रना का नाम पर्याय-वक्रना है। पर्याय से अभिप्राय है समानार्थक सज्ञा शब्द। उसके कुशल प्रयोग से उत्पन्न चमत्कार का नाम है पर्याय- वक्रता। प्रत्येक भाषा में एक अर्थ के वाचक अ्रनेक शब्द होते हैं-प््रारम्भ में उनके अर्थ-विशेषत व्युत्पत्ति-अर्थ भिन्न होते हैं, पर वे एक मूल अर्थ से सम्वद्ध हो कर अन्त में समानार्थक बन जाते हैं। प्रतिभावान कवि प्रत्येक शब्द की आत्मा का साक्षात्कार कर इन पर्यायवाची शब्दो के प्रयोग द्वारा अपने काव्य में अ्रपूर्व सौंदर्य की उद्धावना कर देता है। यह प्रयोग-कौशल है पर्याय-वक्रना है।

कुन्तक की शब्दावली में पर्याय-वक्रता का वर्णन इस प्रकार है. जो वाच्य का अन्तरतम, उसके अतिशय का पोषक, सुन्दर शोभान्तर के स्पर्श से उस वाच्यार्थ को सुशोभित करने में समर्थ है, जो स्वय (बिना विशेषण के), अथवा विशेषण के योग से भी अपने सौन्दर्या- तिशय के कारण मनोहर है, और जो असम्भव अर्थ के आधार रूप से भी वाच्य होता है, जो अलकार से सस्कृत होने अथवा अलकार का शोभाधायक होने से मनोहर रचना से युक्त है, ऐसे पर्याय अर्थात् सज्ञा शब्द (के प्रयोग) से परमोत्कृष्ट पर्याय-वक्रता होती है। (हिन्दी व० ज० २।१०-११-१२) उपर्युक्त कारिकाओ में पर्याय के अनेक विशेषणों का प्रयोग किया गया है- कहीं पर्याय शब्द वाच्य अर्य के अन्तरतम रहस्य को प्रकट करता है, तो कहीं उसके

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पदपूर्वार्ध-वक्रता ] भूमिका [ ६१

प्रतिशय की रजना करता है। कहीं वह किसी अन्य शोभा के स्पर्श से उसमें चनत्कार उत्पन्न कर देता है, तो कहीं अपने हो सौन्दर्यातिशय के कारण मनोहर होता है। एक स्थान पर यदि विशेषण के योग से उसमें अपूर्व चमत्कार आ जाता है तो अन्यन्न किसी लोकोत्तर अर्थ का अध्यारोप रहता है। इसी प्रकार यदि कहीं पर्याय स्वयं अलकारयुक्त होता है तो कहीं अलंकार की ही शोभा उसके आश्रित रहती है। पर्याय के इन विभिन्न चमत्कारो का कुशल प्रयोग-अथवा इन चमत्कारो से युक्त पर्याय शब्दों का कुशल प्रयोग पर्याय-वक्रता है। कुन्तक ने पर्याय-वक्रता के ६ अवान्तर भेदो का वर्णन किया है।

ध्वनिवादियों ने इसे पर्याय-ध्वनि और अलकारवादियो ने परिकरालकार के नाम से अभिहित किया है। उदाहरण के लिए शिव के शूली, पिनाकी, कपाली शदि और इन्द्र के वज्त्री आदि अनेक नाम हैं। कुशल कवि प्रसगानुकूल इनके चयन में चमत्कार उत्पन्न कर पर्याय-चक्रता का सफल प्रयोग करता है।

१ सन्ति भूभृति हि न शरा परे ये पराक्रमवसूनि वच्त्रि ।

हमारे राजा के पास ऐसे वाण है जो वज्रधारी इन्द्र के भी पराक्रम की निधि है। यहाँ वज्त्रधारी इन्द्र-वज्त्री-शब्द का प्रयोग पर्याय-वक्रता का उदाहरण है।

२ लख कर सायर अरु तुम्हें कर सायक सर चाप। देसत हूँ खेदत मनो मृगहिं पिनाकी आप।। (हिन्दी शकुन्तला )

यहां शिव का पिनाकी नाम अत्यन्त सार्थक रूप में प्रयुक्त हुआ् है।

३. कृपक-वालिका के जलवर। (पतः वादल)

यहाँ जलधर का प्रयोग कृषक वर्ग के साहचर्य से अत्यत चमत्कारपूर्ण है। ३ उपचार-वक्रता

कुन्तक के शब्दो में"उप शर्थात् सादृश्यवश गौण चरण अर्थात् व्यवहार को उपचार कहते हैं। + + + किसी श्न्य वस्तु के सामान्य धर्म का, लेशमात्र सम्बन्ध से भी, दूरान्तर वस्तु पर आरोप उपचार कहलाता हैं।" ( २६३)। इसका अर्य यह है कि जहां प्रस्तुत दूरान्तर अर्थात् सर्वया भिन्न-स्वभाव वस्तु पर अप्रस्तुत

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६२ ] भूमिका [पदपूर्वार्घ-वक्र्ता

वस्तु के सामान्य धर्म का लेशमात्र सम्बन्ध से आरोप किया जाता है, वहाँ उपचार होता है। यहाँ प्रस्तुत और अप्रस्तुत एक दूसरे से अत्यन्त दूर होते हैं, उनमें देशकाल की नहीं वरन् मूल स्वभाव की दूरी होती है। मूल स्वभाव की दूरी का अय यह है कि एक मूर्त है तो दूमरा श्र्मूर्त है, एक चेतन है तो दूसरा अचेतन और एक में यदि घनता है तो दूसरे में द्रवता। फिर भी, लेशमात्र सम्वन्ध से अप्रस्तुन के सामान्य धर्म का प्रस्तुन पर इस प्रकार अ्ररभेद आरोप किया जाता है कि दोनों की भेद-प्रतीति नष्ट होकर अभेद-प्रतीति उत्पन्न हो जाती है। यही उपचार है। यह मूलत गौणी अर्थात् लक्षणा वृत्ति का चमत्कार और रूपकादि अलकारों का मूल आधार है। कुन्तक ने भी स्पष्ट कहा है कि इसके कारण रूपादिक अलकारों में सरसता आ जाती है :

-यन्मूला सरसोल्लेखा रूपकादिरलकृति। व० जी० २।१४

कुन्तक ने उपचार-वक्रता के चार-पाँच उदाहर दिये हैं और अन्त में फिर यह भी कह दिया है कि इसके सहस्त्रावधि भेद हैं। अ्रमूर्त पर मूर्त का आ्र्प्रारोप (१) स्निग्धश्यामलकान्तिलिप्तवियत अर्थात् अण्नी चिकनी और कृष्ण वर्ण कान्ति से आकाश को लिप्त करने वाले (बादल)।

लेपन द्रव्य सदा मूर्त होता है और लेपन भी मूर्त वस्तु का ही किया जाता है, किन्तु यहाँ लेपन द्रव्य रूप श्यामल कान्ति और लेप्य वस्तु आकाश दोनों ही अमूर्त हैं। मूर्त पदार्थ के धर्मो का अ्मूर्त पदार्थो पर आरोप होने के कारण यहाँ उपचार है, और इस उपचार में रमणीय कल्पना का विलास होने के कारण उपचार- वक्रता है। (२) सूचिभेद्यै स्तमोभि ( मेघदूत पूर्वार्घ ३९ ) मागर सूभि जिन्हें न पर जह सूचिका-भेद भुकी अँघियारी। (हिन्दी मेघदूत)

धर्म है 'सूचिभेद्य अन्धकार' में अ्रन्धकार अमूर्त है किन्तु सूचीभेद्यता मूर्त वस्तु का

भ्रच्ेतन पर चेतन का आ्र्प्ारोप गगए च मक्तमेह धारालुलिभज्जुखाइ वराइ शिगरहकारमिभनका हरति णीलाओ वि सिसाओ।

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पदपूर्वार्ध-वक्रता ] भूमिका [६३

मदमाते बादलों से युक्त आकाश, घाराओं से आन्दोलित अर्जुन वृक्षों के वन, निरहंकारमयका (गर्व-रहित चन्द्रमा वाली) काली राते भी मन को हरती है।

यहाँ मतत्व (मस्ती) तथा निरंहकारत्व आदि चेतन के धर्म-सामान्य मेघ और चन्द्रमा आदि अचेतन पर उपचार से आरोपित हैं।

३. रुपकादि अलकार की मूलाघार उपचार-वक्रता .-

अतिगुरवो राजमाषा न भक्ष्या। २।१४।४८

राजमाव अर्थात् उरद-राजा का अन्न-नहीं खाना चाहिए क्योकि वह बहुत भारी-महगा पडता है। यहाँ अलंकार का सौन्दर्य उपचार पर आश्रित है।

इसी प्रकार रूपकादि के भी कतिपय अन्य उदाहरण दिये गये हैं।

विवेचन

इसमें संदेह नहीं कि उपचार-वक्रता काव्य-कला का अत्यंत मूल्यवान उपकरण है। लक्षणा का वैभव मूलत उपचार-वक्रता में ही निहित रहता है। यूरोपीय काव्य- शास्त्र के अनेक अलकार उपचार के हो आश्रित हैं-जैसे विशेषण-विपयय और मानवीकरण का चमत्कार उपचार-वक्रना के अंतर्गत ही आता है। उपर्युक्त उदाहरणो में से तीसरे उद्धरण के सभी प्रयोग मानवीकरण के अन्तर्गत आते हैं। आ्रधुनिक हिन्दी काव्य में-विशेषकर छायावाद काव्य में, इस प्रकार की उपचार-वक्रना का प्रचुर प्रयोग है। प्रसाद या पंत की कविता का कोई भी पद ले लीजिए, उसमें आपको उपचार-वक्रता के अनेक उदाहरण अनायात ही मिल जाऐंगे :

नीरव सन्व्या में प्रशान्त डूवा है सारा ग्राम प्रान्त ।

पत्रों के आनत चवरो पर, सोगया निसिल वन का मर्मर, ज्यो वीणा के तारो में स्वर।

भीगुर के स्वर का प्रखर तीर, केवल प्रशान्ति को रहा चोर सन्व्या प्रशान्ति को कर गभीर।

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६४ ] भूमिका

इस महाशान्ति का उर उदार. चिर आ्काक्षा की तीचण धार, ज्यो वेंध रही हो आर-पार। (पत) ४ विशेपण-वक्रता

जहाँ कारक या क्रिया के माहात्म्य या प्रभाव से वाक्य का सौन्दर्य प्रस्फुटित होता है वहाँ विशेषण-वक्रता होती है। (व० जी० २।१५)

विशेषण का अर्थ है भेदक धर्म-कहीं उसका सन्बन्ध कारक से होता है और कहीं क्रिया से। उसके प्रभाव से विशेष्य अतिशययुक्त हो जाता है। यह अतिशय दो प्रकार का होता है-एक तो स्वाभाविक सौन्दर्य का प्रकाशक और दूसरा अलकार के सौन्दर्यातिशय का परिपोषक। स्पष्ट शब्दो में विशेषण दो प्रकार से अपना माहा- त्म्य सिद्ध करता है-एक तो विशेष्य के स्वाभाविक सौन्दर्य को प्रकाशित कर, औ्रर दूसरे अलकार के सौन्दर्य को परिवृद्ध कर। अन्य भेदो की भाँति इस भेद के विपय में भी कुन्तक औचित्य पर बल देते हैं विशेषण प्रस्तुत प्रसग के अनुकूल होना चाहिए। वह रस, वस्तु-स्वभाव तथा अलकार का पोषक होना चाहिए। तभी उसकी सार्थकता 1

है। रसादि का पोषक उचित विशेषण-प्रयोग उत्तम काव्य का प्राण है-अन्यथा वह भार रूप है। कुन्तक ने विशेषण-वक्रता के निम्न-लिखित उदाहरण दिये हैं. कारक-विशेषण - दोनों हाथों के बीच जिसके कपोल दबे हुए हैं, आसुनं के बहने से (कपोलों पर आ्र्प्राभूषण रूप में चित्रित) जिसकी पत्र-लेखा विगड गई है, और जिसकी समस्त वृत्तियॉ कानों में आरकर एकत्र हो गई हैं ऐसी (अत्यन्त ध्यानमग्ना विरहिणी) गीत की ध्वनि को यहाँ सुन रही है।१ इस छन्द में तन्वी के अनेक विशेषण अपनी रमणीयता के कारण रस-परिपाक में सहायक हैं-दूसरा विशेषण अपनी चित्रात्मकता के द्वारा भाव को उद्बुद्ध करता देखिए वक्रोतिजीवितम् कारिका १५ की व्याख्या- * स्वमहिम्ना विघीयन्ते येन लोकोत्तरश्रिय । रसस्वभावालकारास्तद् विधेय विशेषणाम् ।। (२।१५।५७) १ करान्तरालीन कपोलभित्तिर्वाष्योच्छलत कूितपत्रलेखा। श्रोत्रान्तरे पिंडितचित्तवृत्तिः श्रृणोति गीतध्वनिमत्र तन्वी ।

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पदपूर्वार्ध-वक्रता ] भूमिका [६५

हुआ, और तीसरा प्रत्यक्ष रूप ते भावाभिव्यजना करता हुआ रस परिपाक में योग देता है।

क्रिया-विशेपण

गजपति आखें वन्द कर अपने नव-जीवन के वन महोत्सवो का स्मरण करने लगा जव वह स्वच्छन्द होकर वन-विहार किया करता था।

यहाँ 'निमीलिताक्ष'-अर्थात् 'आँखें वन्द कर' पद 'सस्मार अर्थात् स्मरण करने लगा' क्रिया का विशेषण है। यह विशेषण उस गजराज की असहायावस्था के प्रति करुणा का उद्बोधन करने के कारण निश्चय ही सरस है।9

अलकार के सौन्दर्यातिशय का पोपक

हे देवि देखो, चन्द्रमा की शोभा को तिरम्कृत करने वाले तुम्हारे मुख के द्वारा पराजित कमल कान्तिहीन हो रहे हैं।2

यहाँ 'चन्द्रमा की शोभा को तिरस्कृत करने वाले' इस विशेषण के द्वारा प्रतीयमान उत्प्रेक्षा अलकार की सौन्दर्न्य-वृद्धि हो रही है।

विवेचन

काव्य में विशेषण-वक्रता का माहात्म्य असदिग्ध है। विशेषण निश्चय ही काव्य का एक उपयोगी उपकरण है। सचित्र अथवा चित्रात्मक विशेषण चर्ण्य वस्तु के स्वभाव का चित्र प्रस्तुत करने में सहायक होता है, भावमय विशेषण भाव को उद्बुद्ध करने में योग देता है, श्रौर विचारप्रधान तर्कमय विशेषण विचार तथा चितन को जगाता है। इसके अतिरिक्त विशेषण का एक प्रमुख गृण है उसकी सक्षिप्तता, उसके द्वारा काव्य में समासगुण का समावेश होता है जो अपनें आप में एक वडी सिद्धि है। जो बात अन्यथा एक वाक्य में कही जाएगी उसे समर्य कवि एक विशेषण के द्वारा अ्रभिव्यक्त कर देता है। यो तो, यह प्रयोग ही अपने आप में वक्रनायुक्त है,

१ सस्मार वारसपनिविनिमीलिताक्ष। स्वेच्छाविहारवनवासमहोत्मवानाम्। २. देवि त्वन्मुखपकजेन शगिन शोभातिरस्कारिणा। पश्याव्जानि विनिजिंतानि सहता गच्छन्ति विच्छायताम्।।

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६६। भूमिका [पदपूर्वार्ध-वक्रता

श्रौर फिर यदि विशेषण भी सरस अथवा सचित्र हो तो उक्ति का सौन्दय द्विगुणित हो जाता है। सस्कृत के कवियो की समस्त शैली में इस प्रकार के विशेषण मणियो की तरह जडे हुए मिलते है। हिन्दी की विश्लेपात्मक प्रकृति समास के अनुकूल नहीं पडती, अतएव ब्रज तथा अ्वघी के काव्य में और वाद में खडी वोली की कविता में भी विशेषण-वक्रता का उतना प्रचर प्रयोग नहीं मिलता जितना सस्कृत काव्य मे। तुलसी और बिहारी आदि को विशेषण-वक्रता के लिए सस्कृत की समस्त पदावली की ही शरण लेनी पडी है। नवीन काव्य में अभिव्यजना के वर्धमान महत्व के कारण विशेषण-वक्रता का पुनरुत्थान हुआ और छायावादी शैली कालिदास श्रादि सस्कृत कवियो तथा यूरोप के रोमानी कवियो की लक्षणाजन्य समृद्धि से प्रेरणा लेकर चित्रमय, सरस तथा विचार-गभित विशेषणो से जगमगाने लगी। प्रसाद, पत, निराला, महादेवी, दिनकर आदि का काव्य इस प्रकार के विशेषणों के वैभव से देदीप्यमान है। चित्रमय विशेपण -

सशकित ज्योत्स्ना-सी चुपचाप जडित-पद, नमित-पलक-हग-पात, पास जब आ न सकोगी प्राण, मधुरता-में-सी मरी आजान। (पत)

तारक-चिह्न-दुकूलिनी पी पी कर मधु मात्र। उलट गई श्यामा यहां रिक्त सुधाधर पात्र॥। (मे० श० गुप्त)

भावमय विशेषण -खिंच गये सामने सीता के राममय नयन। (निराला)

भेंट हैं तुमको सखे ये अश्रनगीले गीत।

यह स्वप्न-मुग्ध कौमार्य तुम्हारा चिर-सलज्ज। विचार-गर्भित विशेष -तुम पूर्ण इकाई जीवन की जिसमें असार भव-सिन्धु लीन। (बापू के प्रति पक्ष)

निर्वाणोन्मुख आररदर्शो के अररतिम दीप-शिखोदय। (महात्मा जी के प्रति पत)

(गाँधी जी के लिए प्रयुक्त ये विशेषण अपने गर्भ में एक मार्मिक विचार अथवा विचारधारा धारण किये हुए हैं।)

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पदपूर्वार्घ-वक्रता ] भूमिका [६७

उपचार-वक्रता के संयोग से इस प्रकार के विशेषणो का महत्व और भी बढ । जाता है : वास्तव में छायावादी कविता में इस दुहरी वक्रता का अत्यत प्राचुर्य्य है। आधुनिक काव्यशास्त्र मे पर्याय-चक्रता और विशेषण-वक्रना के वीच स्पष्ट विभाजक रेखा खोंचना कठिन है। कुन्तक-कृत भेद भी बहुत कुछ व्याकरण पर आश्रित हैं- पर्याय संज्ञा शब्द है विशेषण भेदक धर्म। परन्तु वास्तव में यह कोई मौलिक भेद नहीं है, अनेक पर्याय शब्द ऐसे हैं जो विशेषण के ही समानघर्मी है-कम से कम अपने मूल रूप में वे विशेषण हो रहे होगे, पीछ्े चल कर व्यक्ति अथवा वस्तु विशेष के लिये रू् हो गये। पर्याय-वक्रना के प्रसग में उद्धुत 'वज्त्रो' और 'शूली' शब्द इसी प्रकार के हैं। अतएव कहीं कहीं वक्रता के इन दोनो भेदो की सीनाए मिल सकती है। वैसे कुन्तक ने उनको अपनी ओर से पृथक रखने का ही प्रयत्न किया है। ५ सवृति-वक्रता

जहाँ वैचित्र्य-कथन की इच्छा से किन्हीं सर्वनाम आदि के द्वारा वस्तु का सवरस (गोपन) किया जाता है वहाँ सबृति-वक्रता होती है। (हिन्दी व० जी० २।१६) कुन्तक ने अभिव्यजना के इस प्रकार विशेष का अत्यंत मनोवैज्ञानिक विश्ले- प किया है। उनका मत है कि अनेक स्यितियो में-अथवा अनेक कारणों से स्पप्ट कथन की अपेक्षा साकेतिक सर्वनाम आदि के द्वारा उक्ति में कहों अधिक चारता आ जाती है। ऐसी परिस्यितिया अनेक हो सकती हैं कुन्तक ने फेवल उपलक्षण रूप में छह-सात का निर्देश किया है।

१ कोई अत्यंत सुन्दर वस्तु है, उसका वर्णन सम्भव होने पर भी मर्मज्ञ कवि साक्षात् कथन नहीं करता क्योंकि साक्षात् कयन से उसका सौन्दर्य परिमित हो जाएगा। ऐसी स्यिति में सर्वनाम आदि द्वारा उसकी सवृति ही श्रेयस्कर है।

उदाहरण-पिता के (योजनगन्धा सत्यवती) के साथ विवाह करने के लिए उन्सुक होने पर उस नवयुतक ने करणीय कर्तव्य कर लिया (भाजन्म ब्रह्मचर्य्य की प्रतिज्ञा कर ली), और तव पुष्पचाप की नोक पर कपोल रखे हुए (चिन्तामग्न) फामदेव का कुछ अपू्वं रूप से ध्यान किया।

यहाँ सदाचारपरायण होने से पितृभक्ति से परिपूर्ण हृदय और लोकोत्तर उदारता रण के योग से विविध विषयों से विरत्तचित्त भीप्म ने, अ्रसम्भव होने पर भी, अपनी इन्द्रियों का निग्रह कर लिया-यह बात कहने में शक्त होने पर भी सामान्य-

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६८ ] भूमिका I पदपूर्वार्ध-वक्रना

वाचक 'किमपि'-(फुछ-अपूर्व-रूप से) सर्वनाम से आच्छादित होकर, उत्तरार्ध में (मन्मथ के ध्यान रूप) अन्य कार्य का कथन करने वाले वाक्य से प्रतीत फराये जाने पर, कुछ प्रपूर्व चमत्कारिता को प्राप्त हो रही है।

अर्थात् भीष्म के अद्भुत इन्द्रिय-निग्रह की प्रशसा शब्दो द्वारा असम्भव नहीं थी फिर भी कवि ने सर्वनाम के द्वारा एक अ्पूर्व चमत्कार उत्पन्न कर दिया है जो साक्षात् कथन में सम्भव नहीं था।

२ कहीं कहीं अपने स्वभाव-सौन्दर्य की चरम सीमा पर आरूढ़ होने के कारण अतिशययुक्त (प्रतिपाद्) वस्तु का वर्णन शब्दों द्वारा असम्भव है, यह दिखाने के लिए उसे सर्वनाम आ्रदि से आच्छादित कर दिया जाता है। स्पष्ट शब्दो में इसका अभिप्राय यह है कि किसी किसी वस्तु का सौन्दर्यातिशय अनिर्वचनीय होता है, उसे शब्दों में बाँधने का प्रयत्न व्यर्य होता है अतएव कुशल कवि सर्वनाम आदि से उसको सवृत कर उसकी अनिर्वचनीयता की व्यजना कर देता है।

उदाहरण - हे कृष्ण ! रुद्ध कण्ठ और गद्गद वाणी से विशाखा ऐसी रोई कि जन्म-जन्मान्तर में भी कभी कोई किसी को प्यार न करे।

यहा अनिर्वचनीय आतिशय्य को 'ऐसी' शब्द के द्वारा सवृत कर व्यक्त किया गया है।

३ कभी-कभी अत्यत सुकुमार वस्तु अपने कार्य के अतिशय के कथन के बिना ही सवृति (आच्छादन) मात्र से रमणीय होकर चरम सीमा को पहुँच जाती है।

उवाहरण -दर्प में (अपने मुख आदि पर अकित) सम्भोग-चिह्नों को देखती हुई पार्वती ने पीछे की ओर बैठे हुए प्रियतम (शिवजी) के प्रतिबिम्ब को दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब के समीप देखकर लज्जा से क्या क्या चेष्टाए नहीं को। (कुमार सम्भव ८1११)।

उपर्युक्त छन्द में पार्वती की चेष्टाए इतनी सुकुमार है कि वर्णन द्वारा उनका सौकुमार्य नष्ट हो जाता। इस कला-मर्म को समझ कर कालिदास ने उनका वर्णन करने का असफल प्रयत्न नहीं किया, वरन् 'क्या-षया' सर्वनाम द्वारा सवृत कर उन्हें और भी रमणीय रूप में प्रस्तुत कर दिया है।

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पदपूर्वार्ध-वक्रता ] भूमिका I६६

विहारी की उक्ति "वह चितवन और कछ जेहि वस होत सुजान" भी इसी वक्रता से विभूषित है।

४. कोई वस्तु केवल अनुभव-गम्य ही होती है, वाणी से उसका कथन नहीं हो सकता : वहा भी सवरण की कला अपना चमत्कार दिखाती है।

'प्रियतमा के वे शब्द आाज भी हृदय में कुछ अपूर्व प्रतिध्वनि कर रहे हैं।' न्रथवा हिन्दी-"मन में वछ पीर नई उमही है।"

५ कहीं फहीं इस वात का प्रतिपादन करने के लिए कि श्रन्य की अनुभव- संवेद्य वस्तु का वर्णन करना सम्भव नहीं है, संवरण क्रिया का प्रयोग किया जाता है।

६. सवृति-वक्रता का एक रूप वह भी है जिसमें कोई वस्तु स्वभाव से अथवा कवि की विवक्षा (वर्णन करने की इच्छा) से किसी दोष या तटि से युक्त होकर महा- पातक के समान कहने योग्य नहीं होती।

उदाहरण •यदि सेनापति ने तीक्ष्ण वाण से उसको तुरन्त न मार दिया होता तो इस वाराह ने तुम्हारा जो हाल किया होता वह कहने योग्य नहीं है। प्रथवा हिन्दी-"घिक् धिक् ऐसे प्रेम को कहा कहहुँ मे नाथ।"

अर्यात् कहों कहीं अशुभ वात का सवरण काव्य के लिए सुन्दर हो जाता है- उससे पारुष्य (अमंगल और अप्रिय) का निवारण होता है।

७. कभी कभी कवि की विवक्षा से भी किसी वस्तु के हीनता को प्राप्त होने की आशंका रहती है, अतएव ऐसी परिस्थिति में भी संवृति के द्वारा काव्य-सौन्दर्य की रक्षा होती है

हे प्रियतमे (वासवदत्ते) मिथ्या एकपत्नीव्रत को धारण करने वाला में (उदयन, आज पद्मावती के साथ विवाह करने का निश्चय कर) न जाने कैमा कुछ भी करने को उद्यत हो गया हू। यह वक्रता गोपन-कला के चमत्कार पर आशित है। इसका मूलवर्ती सिद्धान्त है कला क। उतकर्ष कला की सवृति में है। अनेक वार कथन की अपेक्षा मफेत का

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७० ] भू मिका [ पदपूर्वार्घ-वक्रता

प्रभाव अधिकु होना है। व्यजना का अविष्कार ही इस मिद्धान्त के आधार पर किया गया है।

६. वृत्ति-नक्त।

वृत्ति से अभिप्राय यहा कोमला, परुषा आदि वर्ण-योजनाओ से न होकर, वंयाकरणो में प्रसिद्ध समास, तद्धित, सुध्यातु आदि वृत्तियो से है। इन पर आश्रित चमत्कार वृत्ति-वक्रना के प्रतर्गत आता है। इन वृत्तियो में मुख्य है अव्ययीभाव समास जो प्राय इस प्रकार के चमत्कार का आधार होता है। कुन्तक के शब्दों में-

जिसमें अरव्ययीभाव आ्र्प्रादि (समास, तद्धि न, फृत् श्रदि) वृत्तियो का सौन्दर्य प्रकाशित होता है उसको वृत्तिवचित्र्य-वक्रता समझना चाहिए। (हिन्दी व० जी० २।१६)

कुन्तक ने इस प्रसग में र्दो-तीन उदाहरण दिये हैं अधिमध्, २ पाडिमा, ३ एकातपत्रायते।

अधिमधु में अव्ययीभाव समास है. 'मघुऋतु में' कहने के स्थान पर अधिमध् कह कर चमत्कार उत्पन्न किया गया है। अनेक अव्ययीभाय समासो के मूल में प्राय यही सौन्दर्य रहता है।

पाडिमा-पाडत्व, पाडडुता और पाड्भाव आदि शब्दो के रहते हुए भी र्पाडिमा का प्रयोग वृत्ति-वक्रना का चमत्कार है। पाडु शब्द में इर्मनिच् प्रत्यय कर के बना हुआ तद्धितान्त पाडिमा शब्द उपर्युक्त पर्यायो की प्रपेक्षा अधिक कोमलता-विशिष्ट है: इसलिए उसके प्रयोग में अधिक चमत्कार है।

एकातपत्रायते-सुबन्त एकातपत्र (एकछत्र) शब्द को धातु बना कर उसके द्वारा निर्मित एकातपत्रायते (एकछत्र राज्य है) शब्द में सुब्धातु (हिन्दी-नामधातु) की वृत्ति से चमत्कार उत्पन्न हो गया है।

यह शब्द-निर्माण हिन्दी की, विशेषकर खड़ी बोली की, प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं पडता। हिन्दी के शब्द-भाण्डार में नामधातुओं को सख्या अघिक नहीं है भुठलाना लजाना, गर्माना आदि शब्द इती वर्ग के है परन्तु इन में एकातपत्रायते का चमत्कार ढूँढना व्यर्थ है। खड़ी बोली में इस प्रकार के शब्द 'करण' लगा कर बनाये जा रहे हैं भारतीयकरण, विकेन्द्रीकरण, मूर्तीकरण, नाटकीकरण आादि, परन्तु उनका वर्ग सर्वथा

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पदपूर्वार्घ-वक्रता 1 भूमिका [ ७१

भिन्न हो जाता है। जनपद भाषाओं की प्रवृत्ति इसके अघिक अनुकल है : उन में मटियाना आदि व्यजक शब्द सरलता से वन जाते हैं।

इनके अतिरिक्त समास-जन्य और भी चमत्कार इसके अन्तर्गत आते हैं। परन्तु समास-वक्रना का रूप वास्तव में क्या है ? इस प्रश्न के दो उत्तर हमारे मन में आते हैं। समास-वक्रता से अभिप्राय एक तो चमत्कारपूर्ण समस्त शब्दों का हो सकता है। प्रत्येक मर्मज्ञ कवि कतिपय पृथक शब्दो के समास से ऐसे नवीन शब्दों का निर्माण कर लेता है जिनका वचित्र्य अपूर्व होता है उदाहरण के लिए पंत का निम्न-लिखित समस्त पद लीजिए.

१ तुमने यह कुसुम-विहग। लिवास क्या अपने सुस से स्वय बुना ?

इनमें कुसुम और विहग दो पृथक शब्दो के योग से तितली के एक नवीन पर्याय का निर्माण किया गया है जिसका सौन्दर्य वास्तव में अपूर्व है। परन्तु यह कदाचित् कुन्तक की पर्याय-वक्रता का ही उपचार-जन्य रूप है : जिसमें पर्याय और उपचार दोनो की वक्रता का चमत्कार है।

समास-वक्रता से दूसरा अभिप्राय उस सौन्दर्य का हो सकता है जो समास की पद-रचना पर आश्रित रहता है, जिसके अनेक भेदो का विवेचन वामन ने अपने श्लेष, मौदार्य्यं आदि शब्द-गुणो के अतर्गत किया है। यहाँ चमत्कार मूलत समास-रचना पर ही आधृत है-अर्य से उसा विशेष सम्बन्ध नहीं है। उदाहरण के लिए निराला को 'राम की शक्ति पूजा' नामक प्रसिद्ध रचना की आरम्भिक पंक्तियाँ उदूत की जा सकती हैं :

आरज, का तीक्ष्ण-शर-विघृत-क्षिप्र कर, वेग-प्रखर, गतशेलनवरगगील, नीलनभ-गज्जित स्वर,

राक्षस-विरुद्ध प्रत्यूह, क्रद्व-कपि-विपम-ूह,

लोहितलोचन-रावण-मद-मोचन-महीयान। + + यहाँ समस्त पद-रचना के द्वारा युद्ध का वातावरण उत्पन्न फरने का तफल प्रयत्न किया गया है।

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७२ 1 भूमिका [प्रतिभा

हमारा अनुमान है कि अन्य प्रकार की समास-वक्रता से कुन्तक का अभिप्राय ऐसे ही रचना-चमत्कार से है।

जहां सौन्दर्य लिंग-प्रयोग पर आश्रित रहता है, वहां लिंगवचित्र्य-वफ्रता होती है, अयवा लिंग का चमत्कारपूर्ण प्रयोग जहा सौन्दर्य्य की सृष्टि करता है, वहा कुन्तक के अनुसार लिंगवचित्रय-वक्रना रहती है। इस वक्रता के कई रूप हैं।

१ विभिन्न लिंगो का समानाधिकरण्य-कहीं कहीं विभिन्न लिंग के शब्दों का समानाधिकरण रूप से प्रयोग कर प्रतिभावान् कवि अपनी उक्ति में एक अ्नपूर्व विच्छित्ति उत्पन्न कर देता है। (२।२१)।

उदाहरण-नेनैपा मम फुल्नपकजवन जाता दशा विशति अर्थात् इस कारण से मेरे नेत्रो की विशति (मेरे बीस नेत्र) फुल्लपकजवन (के समान) हो गयी है। यहा विशति स्त्रीलिंग है और पकजवन सस्कृत व्याकरण के अनुसार नपुसक लिंग है। इन दोनों का समानाधिकरण चमत्कार का का विधायक है। हृदय की सौन्दर्य्य-प्रतिमा ! कौन तुम छवि-धाम ? यह भी लिंग-वक्रता का चमत्कार है, प्रतिमा स्त्रीलिंग है और धाम पुल्लिंग। सामान्यत इस प्रकार का समानाधिकरण्य विशेष गुण नहीं कहा जा सकता है, उपमान और उपनेय का समान लिंग होना ही अधिक उचित है। कहीं कहों वैषम्य अथवा विरोधाभास के आधार पर उसमें चमत्कार उत्पन्न हो सकता है, परन्तु नियमित रूप से इस प्रकार के प्रयोगो में चमत्कार नहीं माना जा सकता।

२ स्त्रीलिंग का प्रयोग -जहाँ अन्य लिंग सम्भव होने पर भी, स्त्री नाम ही सुन्दर है, इसलिए (ऐसा मान कर) शोभातिरेक के सम्पावन के लिए स्त्रीलिंग का प्रयोग किया जाता है, वहां भी लिंगवैचित्र्य-वक्रता होती है। (२।२२)।

उदाहरण के लिए तट आदि ऐसे अनेक शब्द हैं जिनके सस्कृत में पुल्लिंग तट., नपुसक लिंग तटम् और स्त्रीलिंग तटी तोनों ही रूप मिलते हैं, परन्तु कवि पैशलता की व्यजना करने के लिए स्त्रीलिंग तटी आदि का ही प्रयोग करता है। हिन्दी में पत जी को इस प्रकार के प्रयोग अत्यत प्रिय हैं-उन्होने अनेक स्त्रीलिंग रूप स्वय हो बना लिए हैं। छायाघाद की एक मुख्य प्रवृत्ति-प्रकृति पर नारी-भाव का आरोप- मूलत इसी धारणा पर आधृत है।

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पदपूर्वार्घ-वक्रता ] भूमिका i ७३

३. विगिष्ट लिंग का प्रयोग -जहां अन्य लिंगो के सम्भव होने पर भी विशेष शोभा के लिए, अर्थ के औचित्य के अनुसार, किसी विशेष लिंग का प्रयोग किया जाता है वहा भी एक प्रकार की लिंगवचित्रय-वक्रता होती है। (२।२३)। इसके उदाहरण रूप में कुन्तक ने रघुवंश के त्रयोदश सर्ग से दो श्लोक सं० २४ और २५ उद्धत किये हैं। इनमें लताओं तया मृगियों द्वारा विरही राम के साय सहानुभूति-प्रदर्शन का उल्लेख है। कुन्तक की टिप्परी है कि कवि यहा वृक्षो और मृगो की भी चर्चा कर सकता था किन्तु फिर भी उसने लताओं और मृगियो का ही उल्लेख किया है क्योंकि सीता से विप्रयुक्त राम के साथ लताओ तया मृगियों की ही नारी-सुलभ सहानुभूति अधिक स्वाभाविक थी। हिन्दी में भी इस प्रकार के राशि-राशि उदाहरण मिलेंग-

(१) प्रथम रश्मि का आना रगिसि ! तूने कैसे पहचाना ? कहां कहाँ हे वाल-विहगिनि। सीखा तूने वह गाना ! (२) सिसा दो ना हे मधुप-कुमारि। मुझे भी अपने मीठे गान। (पत-वीणा)

यहाँ 'वाल-विहग' और 'मधुप-कुमार' भी उपर्युक्त कर्तव्यो का निर्वाह कर सकते थे, किन्तु भावना को पेशलता के आग्रह से स्त्रीलिंग का प्रयोग किया गया है।

विभिन्न लिंगों के पर्याय शब्दों के मूल में प्राय इसी प्रकार की नारीत्व और पोरुष व्यजक कल्पना निहित रहती है-हिन्दी में वायु और पवन में इसी आघार पर अन्तर किया जाता है। वास्तव में हिन्दी भाषा में अचेतन पदार्यों की लिंग-कल्पना का आधार ही यह भावना है। अब तक सुवन्त पदो के प्रातिपदिक-रूप पूर्वार्घ पर आराथित वक्रना का विवेचन किया गया है। अव सुबन्त तथा तिडन्त दोनों प्रकार के पदो के धातु-रूप पूर्वार्ध को वकता का वर्णन करते हैं।

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धातु-रूप पदपूर्वाव पर श्राश्रित वचित्र्य क्रिया-वक्रा के अन्तर्गत ाता है। इसके पांच रप हुँ.

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७४ ] भूमिका [ पदपूर्वार्ध-वक्रता

१ क्रिया का कर्ता के अत्यन्त अतरगभूत होना-जहाँ करिया फर्ता की अत्यन्त अन्तरग हो अर्थात् उससे अत्यन्त अ्ररभिन्न हो - क्रीडारमेन रहसि स्मितपूर्वमिन्दो लेखा विक्ृप्य विनिवध्य च मूध्नि गौर्या। कि शोभिताऽ्हमनयेति अगाङ्कमौले पृष्टस्य पातु परिचुम्नननमुत्तर व । परिहास में गौर चन्द्रलेखा को खींच अपने मस्तक पर बाँध कर शिव से पूछने लगों कि क्या मैं इसे धारण कर सुन्दर लगती हूँ ? इस प्रश्न पर शिव का चुम्वन रूप उत्तर हमारी रक्षा करे। यहाँ चुम्बन रूप क्रिया उत्तर रूप कर्ता का अभिन्न अग है। इस पर कुन्तक की टिप्परणी है कि पार्वती के उस लोकोत्तर सौन्दर्य्य का शिवजी के द्वारा कथन चुम्बन के अतिरिक्त शर किसी प्रकार सम्भव नहीं था। (हिन्दी व० जी० २।२४ वीं कारिका की वृति)

अ्थवा पार्वनी-चुम्बित रुद्र का तृतीय नेत्र सर्वोत्कर्पयुक्त है। यहाँ 'चुम्बन' क्रिया 'नेत्र' कर्ता का अभिन्न अग है। इसके द्वारा उसके सौन्दर्य्य की श्रीवृद्धि होती है। २ कर्ता की अ्रन्य कर्ताओ से विचित्रता जहाँ क्रिया द्वारा किसी कर्ता की विचित्रता का प्रतिपादन हो। शिवजी की वह शराग्नि तुम्हारे दुखो को दूर करे।

शराग्नि का कार्य बुख देना है-यहाँ वह दु.खो को दूर करती है। यह क्रिया द्वारा कर्ता की वैचित्र्य-सिद्धि है। भगवान नृसिंह के प्रपन्नातिच्छिद् (अर्थात् दुखियों के वुख को बुर करने वाले) नख तुम्हारो रक्षा करें। यहाँ नखरों की छेदन रूप क्रिया उन्हें वैचित्र्य प्रवान करती है-क्योंकि वे ही अन्त में जाकर रक्षा करते हैं। ३ क्रिया के विशेषण का वैचित्र्य-कहीं कहीं चमत्कार क्रिया के अपने विशेषण के वैचित्र्य पर आश्रित होता है। यह क्रियाविशेषण क्रिया तथा कारक

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पदपूर्वार्ध-वक्रता ] भूमिका

दोनों के सौन्दर्य को बढाता है। (क्रियाविशेषण होने से क्रिया का सौन्दर्य तो वह स्वभावत. बढ़ाता ही है, परन्तु विचिन्न क्रिया का करना ही कारक का भी वैचित्र्य है, इसलिए कारक का सौन्दर्य भी उसके द्वारा परिवृद्ध होता है)।

"4++ हडवडी के कारण अपने टल्टे वेशविन्यान से सखीजन को हंसाते हुए उन तरुणियों ने आभूषण धारण करना आरम्भ किया।" यहाँ उलटे वेश-विन्यास से सखीजन को हसाते हुए-यह क्रियाविशेषण चमत्कार का आधार है।

घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अम्बर। यहाँ 'घनाकार' 'घुमा रहे है क्रिया का विशेषण है जो भीपण दृश्य की उ्धावना कर उस में एक अपूर्व चमत्कार उत्पन्न कर देता है।

कालाकांकर का राजभवन, सोया जल में निश्चित प्रमन

पलको में वैभव-स्वप्न सघन।

यहाँ निश्चिन्त और प्रमन तो 'सोया (है)' क्रिया के विशेषण हैं हो, श्रर्थ को दृष्टि से 'पलकों में वभव-स्वप्न सघन' भी उसी का विशेषण है। हिन्दी व्याकरण में इस प्रकार के समस्त क्रियाविशेषण पदो के लिए अवकाश अधिक नहीं है-अतएव इस प्रकार के प्रयोग कम ही मिलते हैं। वैसे अर्थ की दृष्टि से इनका भी प्रयोजन क्रिया की सौन्दर्य-वृद्धि ही होता है।

४ उपचार-मनोनता -उपचार का अर्थ है सादृश्य आदि सम्बन्य के आधार पर अन्य धर्म का आरोप करना। मनेक रूपो में उपचार के कारण भी त्रिया में मनोज्ञता उत्पन्न हो जाती है।

उदाहरण के लिए : इसके अंग मानो छलकते हुए स्वच्छ लावण्य के सागर में तर रहे हैं। स्तन और नितम्ब विस्तार की प्रौढता को खोल रहे हैं और आाँसो के चचल व्यापार स्पप्ट रप मे (वाल्योचित) सरलता का अपवा कर रहे है। श्हो इस मृगनयनी का अब तारुण्य के साथ घनिष्ठ परिचय हो गया है।

यहाँ तंगों का तैरना, स्तनादि का उन्मुदस व्यापार, धौर नेत्रो द्वारा सरलता का अपचाद आदि क्रियाओों में उपचार का चमत्कार है। १ उन्नत वक्षों में आनिगन-मुख लहरो-ता तिरना।

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७६ ] भूमिका [ पदपरार्घंवक्रता

३ प्रानन ते छुलकी परे आांगे।

४ रूप के सरोवर मे तैर रहे थे अ्र्प्रग ।

कर्मादि-सवृति -यहाँ क्रिया के कर्म श्ादि के सवरण द्वारा चमत्कार की सृष्टि की जाती हे

प्ायतनयना सुन्दरी के रागालस मन में प्रेम की शोभा नेत्रों के भीतर 'कुछ' मधुरता अरर्पित कर रही है, कानो के पास 'कुछ' अ्पूर्व कथन कर रही है, हृदय में मानो 'कुछ' लिख रही है।

इन सभी क्रियाओ के कर्मो का कथन सम्भव था परन्तु कवि ने 'कुछ' सर्वनाम द्वारा उनका आच्छादन कर एक अपूर्व चमत्कार उत्पन्न कर दिया है।

पदपूर्वार्ध-वक्रता के ये ही मुख्य आठ प्रकार है। इनके अतिरिक्त फुन्तक ने दो और रूपों का भी इसी वर्ग के अन्तर्गत वर्णन किया है-१ प्रत्यय-वक्र्ता, २ भाव- वक्रता। शतृ आदि कुछ प्रत्यय पद के पूर्वार्ध में वर्तमान रहते है-अतएव इन प्रत्ययो पर आश्रित प्रत्यय-चमत्कार पदपूर्वार्ध-वक्रता का ही अग है। इसी तरह साध्य रूप क्रिया का सिद्ध रूप में अर्थात् तिडन्त का सुबन्त रूप में प्रयोग भी अपने आप में कहीं कहीं अत्यन्त चमत्कारपूर्ण होता है इसे ही कुन्तक ने भाव-वक्रता का नाम दिया है। यह भी पदपूर्वार्ध का ही अग है। वैसे, सामान्य रूप में प्रत्यय-वक्रता तथा भाव-वक्रता मुख्यतया पदपरार्घ-वक्रता के हो अन्तर्गत आती है। अत. इनका विवेचन आगे के प्रसग में किया जाएगा।

अनन्त भेद - इस प्रकार पदपूर्वार्ध-वक्रता सिद्ध हुई, यहां केवल उसका दिड्मात्र प्रदर्शन किया गया है। शेष विस्तार लक्ष्य काव्यों में पाया जाता है।

पदपरार्ध-वक्रता

पदपूर्वार्ध के अन्तर्गत पदों के पूर्वार्ध अर्ात् प्रातिपरदिक और धातु का विचार किया गया। पदपरार्ध के अन्तर्गत पदों के उत्तरार्ध का विचार किया जाएगा। यह सामान्यत प्रत्यय रूप होता है, अतएव पदपरार्ध-वक्रना को प्रत्यय-वक्रता भी कहते है। कुन्तक नें पदपरार्ध-वक्रता के छह मुखय भेदों का वर्णन किया है।

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पदपरार्ध-वक्रता । भूमिका [७७

?. कालवैचित्र्य-वक्रता पदपूर्वांर्ध-वक्रता का प्रसंग क्रिया-वक्रता के साथ समाप्त हुआ था, अतएव उसी क्रम-शृंखला में क्रिया से सम्बद्ध काल की वक्रता का वर्णन आरम्भ में करते हैं। जहां शचित्य के अनुरूप काल रमसोयता को प्राप्त हो जाता है, वहा काल- वैचित्र्यनवक्रता होती है। (२ ।२६) । अर्थात् जिसमें चमत्कार काल विशेष के प्रयोग पर आश्रित रहता है, उसे कालवचित्र्य-वक्रता कहते हैं। परन्तु इसमें श्रचित्य का प्रतिबन्ध है, काल का यह वक्र प्रयोग प्रसंग एवं परिस्थिति के अनुकल तथा सार्थक होना चाहिए। अन्यथा वह व्याकरण की त्रुटि मात्र होकर रह जाएगा। उदारहण -'समविषम के भेद से रहित, मन्द मन्द सचरण-योग्य (प्रर्थात् जिन पर घीरे धीरे सावधानी के साथ ही चलना सम्भव है) मार्ग शोघ्र ही मनोरथों के लिए भी दु्ल्लघ्य हो जाऍँगे'। यह किसी विरही की कातर उक्ति है. यहा 'हो जाएंगे,-यह भविष्यत्कालिक क्रियापद चमत्कार का आधार है। अभी वर्पा समय की उस्प्रेक्षा-कल्पना मात्र से ही इतना भय है, तो उसके वर्तमान होने पर अर्या्त वास्तव में उपस्थित हो जाने पर क्या होगा ? वचित्र्य का मूल कारण यह अर्थ-व्यजना है, जो निश्चय ही काल पर आाश्रित है। अतएव यह कालवचित्र्य-वक्रता का उदा- हरण हुआ। हिन्दी उदाहरण-वीरन चूमि कोएलिया घूमि करेजन की किरचे करि दहैं।

पाश्चात्य काव्यशास्त्र के 'ऐतिहासिक वर्तमान' मादि प्रयोगो में भी यही काल-वक्रता रहती है। 'ऐतिहासिक वर्तमान' में भूतकालिक घटना का वर्तमान कालिक ्रियाओ द्वारा वर्णन कर सजीवता उत्पन्न को जाती है। बिहारी के निम्नलिखित दोहे में भी एक प्रकार की कालवचित्र्य-वकता है : नासा मोरि नचाय हग करी बका की सौह। कोटे सी कसकति हिये गडी केंटीली नाह॥

नाषिका ने ये चेप्टाए भूतकाल में की थी-भाँह न जाने कब गडी थी, पर वह आ्रज भी कसक रही है। यहाँ 'कसकति' क्रिया का वर्तमान फाल चमत्कार का आधार है। २ कारकवकता इस वैचित्र्य का आ्राधार है कारक-प्रयोग। सामान्य कारक का मुर्य रप से और मुएय का सामान्य रूप से फथन कर, तथा कारकों का विपर्यय फर अर्थात्

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७८ ] भूमिका पदपरार्ध-वक़रता ]

कर्ता को कर्म या करण का एप, और कर्म या करण को फर्ता का रप देकर प्रतिभावान कवि अपनी उक्ति में एक अपूर्व चमत्कार उत्पन्न कर देता है। यही कारकवैचित्र्य-वक्रता है। (२।२७-२८)।

उदाहरण

पाशि सम्प्रति ते हठात् किमपर स्प्रप्टु धनुर्धावति।

राम फ्रुद्ध होकर समुद्र से कहते है कि तेरी घृष्ठता से मेरा हाथ अव विवश होकर घनुष को पकडने के लिए बढ़ रहा है।

यहाँ हाथ वास्तव में करण कारक होना चाहिए, किन्तु कवि ने उसका कर्ता रूप में प्रयोग किया है। देखिए-हर धनुर्भग को पुनर्वार ज्यो उठा हस्त। (निराला) भीगुर के स्वर का प्रखर तीर, केवल प्रशान्ति को रहा चीर। (पत)

२ सख्या-वक्रता या चचन-वक्रता काव्य में वैचित्र्य उत्पन्न करने के लिए जहाँ कविजन इच्छापूर्वक सख्या अर्थात् वचन का विपर्ास कर देते हैं, वहाँ कुन्तक के मत से सख्या-वक्रता होती है। (श२ह)।

मर्मंज्ञ कवि वास्तव में अपने काव्य के छोटे से छोटे अवयव को सार्थक बना देता है। वुष्यन्त की इस प्रसिद्ध उक्ति में वचन का ही चमत्कार है -

वय तत्वान्वेपान्मधुकर हतास्त्व खलु कृती।

अर्थात् हम पूछत जातिहि पाँति मरे, घनि रे घनि भौर कहावत तू। यहाँ राजा को सामान्यत अपने लिए एक वचन अहं या मैं का प्रयोग करना चाहिए था किन्तु आत्म-निन्दा या विरक्ति की व्यजना के लिए वह बहुवचन वय या हम का प्रयोग करता है। कहों कहीं भिन्न वचनान्त शब्दों के समानाधिकरण्य में भी विचित्र चमत्वार होता है। इस प्रसग में कुन्तक ने यह उदाहरण दिया है शास्त्रारि चक्षुर्नवम्-अर्थात् शास्त्र उसका नवीन नेत्र हैं। इसमें शास्त्र बहुवचनान्त हैं और नेत्र एकवचन है। इसी प्रकार-हें ये उजड़ गाम देश का हृदय चिरतन- यहां भी वही चमत्कार है।

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पदपरार्ध-वक्रता ] भूमिकर [७६

४. पुरुष-वकना जहाँ सौन्दर्य्य के लिए उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष का विपरीत रूप से प्रयोग होता है, वहाँ कुन्तक के अनुसार पुरुष-वकना समभनी चाहिए। २३०। विपरीत रूप से प्रयोग का अर्य यह है कि उत्तम और मध्यम पुरुषो के स्थान पर अन्य पुरुप का प्रयोग काव्य-शोभा के निमित्त किया जाता है। इसका तात्प्य्य वास्तव में यह है कि उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष दोनो का वाचन प्रत्यक्ष रूप से होता है-इन दोनों के प्रयोग में एक प्रकार की प्रत्यक्षता और तज्जन्य निकटता रहती है। कभी कभी उदासीन भाव, सम्मान, अथवा निरहकारिता आदि की अभिव्यक्ति के लिए इन दोनो प्रत्यक्ष-वाचक पुरुषो के स्थान पर अन्य-वाचक अन्य पुरुष का प्रयोग अत्यंत सार्थक और व्यंजक होता है। पुरुष का यह चमत्कारपूर्ण सार्थक प्रयोग ही पुरुष-चक्रता है। इसके उदाहरण में तापसवत्सराज का यह श्लोक उद्धत किया गया है .- 'दुष्ट शत्रुओो द्वारा अधिकृत कौशाम्वी को जीत कर नीतिद्वेषी महाराज की प्रमादी प्रकृति को में जानता हूं। में यह भी जानता हू कि पति के वियोग में स्त्रियो का चित्त

देवी स्वयं जाने। सदव खिन्न रहता है। अतएव मेरा मन कुछ कहने का साहस नहीं करता। आगे,

यहाँ 'आप' मध्यम पुरुष के स्थान पर कवि ने अ्रन्य पुरुष 'देवी' का सायक प्रयोग अपनी उदासीनता की व्यंजना करने के निमित्त किया है। 'आप' में निकटता के कारण अधिकार और आग्रह का भाव श जाता, जिसे कवि-निवद्ध पात्र-मत्री योगन्घ- रायण, रानी पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने के लिए छ्विपाना चाहता है। अतएव कवि ने अन्य पुरुष का प्रयोग किया है। हिन्दी में पुरुष-विपर्यय का प्रयोग इतना प्रचुर नहीं है जितना मस्कृत में। किन्तु फिर भी यह प्रयोग भाषागत रूढि न होकर मनोवेज्ञानिक अभिव्यक्ति है, इसलिए न फेवल हिन्दी में वरन् अन्य भापाओ में भी इनकी सार्वनौम स्वीकृति है। संस्कृत के अन्रभवान् आदि और अगरेजी के 'योर मेजेस्टी' आदि सम्मानार्थ प्रयोगो में 1

यही प्रेरणा वर्तमान है। सामान्य वार्तालाप में भी 'मैं' न कहकर हम कभी क्रभी विनय आदि की व्यंजना के लिए 'आपका दास' आदि पदों का प्रयोग करते हैं। सस्कृत में 'अयं जन.' का प्रयोग भी इसी आशय से किया जाता है। कुछ उदाहरण लीजिए :- १. करके ध्यान आ्राज इस जन का निर्चय वे मुनकाये फूल डठे हैं कमल, अघर-ने ये बंघूक सुहाये। (म० श० गुप्त)

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८० भूमिका [ पदपरार्ध-वक्रता

२ किंवा यह,-देव हें दया-शरीर, देख कर भूतल के तप्त क्षेत्र प्रभु के सहस्र नेत्र तप्त हो उठे थे प्राणियो के दुखताप मे औ्ररौर इसी हेनु बिना जाने ही, बिना कही प्राप्त हुई आ्ाज्ञा वही सवक को अपने ही आप से। + + गुरुवर पदाब्जो मे + + + राजाधिप शूरसेन-सूनु यह नत है। (सियारामशरण गुप्त) ५ उपग्रह-वक्रता उपग्रह का अर्थ है धातु-पद। सस्कृत मे धातुओ् के दो पद होते हैं- परस्मैपद और आत्मनेपद। जिसमें काव्य की शोभा के लिए (परस्मैपद और आत्मनेपद) दोनो पदों में से औचित्य के कारण किसी एक का प्रयोग किया जाता है, उसको उपग्रह-वक्रता कहते हैं। (३३६)। वास्तव में अपने रूढ़ रूप में तो उपग्रह का चमत्कार सस्कृत में ही सम्भव है क्योकि हिन्दी आदि में आत्मनेपद यथावत् नहीं होता। फिर भी इस प्रकार के कर्म- कर्तु वाच्य प्रयोगो का हिन्दी में अभाव नहीं है-और कहीं कहीं उनमें अपूर्व चमत्ार भी निहित रहता है। 'हाथ छूट जाना' आदि महावरो में इसका पूरा चमत्कार वर्तमान रहता है। इसके अ्रतिरिक्त आत्मनेपद का सस्कार तो हिन्दी में स्पष्ट लक्षित ही है आाँख खुल गयी, हाथ टूट गया, जीभ कट गयी आवि कर्मकर्तृ प्रयोग ही हैं। जहां इनका प्रयोग सचेष्ट रूप में विशेष सौन्दर्य की व्यजना करने के लिए किया जाता है, वहा हिन्दी प्रयोगों में भ निश्चय ही उपग्रह-वक्रता का चमत्कार वर्तमान रहता है। १ उठती यह भौंह भी भला उनके ऊपर तो अचचला। (मै०श० गप्त) २ मे जभी तोलने का करती उपचार स्वय तुल जाती हूँ। (प्रसाव ३. छूटि गयो मान वा सलोनी मुसकानि में। ४ हों तो याही सोच में विचारत रही ही काहे दर्पन हाथ ते न छिन विसरत है। (भारतेन्दु)

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पदपरार्घ-वक्रता 1 भूमिका

६ प्रत्यय-वक्रता

सामान्यत. यह सभी प्रत्यय का ही चमत्कार है। परन्तु कहीं कहीं उपर्युक्त प्रत्यय-प्रयोगो से भिन्न, एक प्रत्यय में दूसरा प्रत्यय लगा कर मर्मज्ञ कवि एक अपूर्व सौन्दर्य उत्पन्न कर देता है। इसी को कुन्तक ने स्वतत्र रूप से प्रत्यय-वक्रता का नाम दिया है। २।३२।

उदाहरस : येन श्याम वपुरतितरा कान्तिमापत्स्यते ते वहेंगेव स्फुत्तिरुचिना गोपवेपस्य विष्णो।१

अर्थात् जिसके ससर्ग से, मोर पंख को धारण करने वाले गोपवेश विप्णु के (शरीर के) समान तेरा श्यामल शरीर भी कान्तिमय हो जायगा।

उपर्युक्त संस्कृत छद में 'अतितरा' इस प्रत्यय-वक्रता का उदाहरण है। अति में तरपू प्रत्यय लगा कर अ्प्रतितरा पद का निर्माण हुआ है : -अ्रति में तो प्रत्यय पहले से ही वर्तमान है, उसमे तरप् प्रत्यय और लगाकर यह चमत्कार उत्पन्न किया गया है।

हिन्दी में प्रत्यय की स्थिति उतनी स्पष्ट नहीं है जितनी संस्कृत मे। जैसा सस्कृत के सुवन्त और तिडन्त पदो में मिलता है, वैसा, शन्द के मूल प्रत्यय का अस्तित्व तो हिन्दी में प्राय रहा ही नहीं है। अतएव हिन्दी में प्राय दुहरा प्रत्यय ही लक्षित होता है जैसे सदेसड़ा, घइलवा आदि। सदेस (श) और घइल में घड् जैसा फोई मूल प्रत्यय पहले से ही वर्तमान है, उसमें स्वार्यवाचक 'ड़ा' 'वा' और लगाकर 'संदेसड़ा तथा 'घइलवा' का निर्माण हुआ है। इनका भावप्रेरित प्रयोग ही प्रत्यय-वक्रना का मूल आघार है:

पिय नो कहहु सँदेसडा, हे भोरा, हे काग। वह धनि विरहै जरि मुई, तेहिक घुगां हम लाग।। (जायसी)

इन्द्र चाप रुचिदान जानु मिलि तो तनु कारो। पावत है छ्वि अधिक लगत नंनन को प्यारो॥। मोरचन्द्रिका सग सुभग जैने मन मोहन। गोपवेष गोविन्द बहुत दयामन नन मोहत ॥ (हिन्दी मेघदूत-लक्ष्मपसिंह)

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पदपरार्घ-वक्रता ] भूमिका [८३

अरर्थात् एक ओर तो प्रिया के सुदु सह विरह को सहन करने का समय उपस्थित हो गया है ..... । यहा सु और दुस् (र्) इन दो उपसर्गो का प्रयोग भी विशेष चमत्कार पूर्ण है-ये दुहरे उपसर्ग विरह की असह्यता को व्यक्त करते हैं।

हिन्दी कविता में भी उपसर्ग का कुशल प्रयोग रस तथा भावादि के उत्कर्ष के लिए-प्राचीन तथा नवीन-सभी कवियो ने किया है।

१. इन्दु-विचुम्बित वाल जलद-मा मेरी आशा का अभिनय । (वालापन. पत)

२ विकम्पित मृदु उर पुलकित गात। (भावी पत्नी के प्रति पंत)

३ मे तरिविध-दु ख-विनिवृत्ति हेतु। (यशोधरा-गुप्त)

इनमें से प्रत्येक उपसर्ग विशेष रस-पोषक चमत्कार से युक्त है। 'विकम्पित' में 'वि' उपसर्ग द्वारा विशेष भाव का द्ोतन किया गया है। चन्द्रमा द्वारा नवमेघ का स्पर्श सामान्य स्पर्श न हो कर विशेष रमणीय स्पर्श है, इसलिए 'विचुम्वित' शन्द का प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार सामान्य भय के कम्पन से प्रणय के मादक उर-कम्पन का पार्यक्य प्रव्शित करने के लिए 'विकम्पित' शब्द का प्रयोग हुआ है। निवृत्ति में भी 'वि' उपसर्ग का योग अत्यन्त निवृत्ति या सर्वथा निवृत्ति की अभिव्यजना करता है।

निपात-वक्रता

निपात से अभिप्राय उन अव्ययों से है जो अवयव-रहति, अव्युत्पन्न पद होते हैं। कुशल कवि इनका भी रसोत्कर्ष के लिए पूर्ण उपयोग करता है। निपात अर्थ के द्योतक हो होते हैं, वाचक नहीं। 'दोतका प्रादयो येन निपाताश्चादयो यथा'। निपात का यही कुदाल उपयोग निपात-वक्रा के नाम से अभिहित है।

उदाहरस · वैदेही तु कय भविष्यति ह हा हा देवि घीरा भव।

यहां 'तु' शब्द में निपात-वक्रा है। 'पर वैदेही तो स्वय ही इतनी कोमल है उसका क्या होगा"' इस प्रकार 'तु' शब्द राम की व्यया को और भी प्रगाढ़ कर देता है।

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८४ ] भूमिका [ पदपरार्घ-वक्रता

कुन्तक ने दूसरा उदाहरण शाकु तलम् से दिया है - मुखममविवति पक्षमलाक्ष्या कथमप्युन्नमित न चुम्बित तु। अभि० शा० ३।२३

राजा दुष्यत की अ्रवसादमयी उक्ति हे मै ने उस का मुख उठा तो लिया पर चूम नहीं पाया। यहाँ भी 'तु' शब्द के द्वारा राजा की अपूर्ण लिप्सा और तज्जन्य पश्चात्ताप की व्यजना की गयी है।

हिन्दी काव्य से भी निपात-वक्रता के प्रभूत उदाहरणो का सचय किया जा सकता हे.

१ उसके आशय की थाह मिलेगी किसको ? जन कर जननी ही जान पायी जिसको।

क्या लिया वम हे यहीं सब शल्य। किन्तु मेरा भी यही वात्सल्य।

उपर्युक्त उद्धरणों में 'ही' का प्रयोग अत्यन्त अर्थ-गरभित है। वह भरत के उज्ज्वल चरित्र की गरिमा और तज्जन्य आश्चर्य को व्यक्त करता है। दूसरे उद्धरण में यहीं (यहा ही) का 'ही' कैकेयी की अ्न्तर्व्यथा का द्योतक है और 'भी' में भयकर अपराधजन्य ग्लानि का परिमार्जन है।

इसी प्रकार-'आह ' सर्ग के अग्रदूत तुम असफल हुए विलीन हुए।' यहों 'आह' मनु के पशचात्ताप और अवसाद का द्योतक है।

'च्युत हुए अहो नाथ जो यथा। धिक् वृथा हुई उमिला व्यथा।' यहा धिक् निपात के द्वारा उर्मिला की निराशा का द्योतन किया गया है।

पद के चारों भेदों पर आश्रित वक्रता का यह वर्णन यहा समाप्त हो जाता है। शब्द के छोटे से छोटे सार्थक अवयव के चमत्कार का इतना सूक्ष्म विश्लेषण कुन्तक की अद्भत मर्मज्ञता का परिचायक है। वे शब्दार्थ के सूक्ष्म रहस्यो से सर्वथा अरवगत थे-अतएव उन्होंने बडे विशद रूप में यह प्रतिपादित किया है कि प्रतिभा- वान् कवि शब्दार्थ के छोटे से छोटे अवयवो में वकता का प्रयोग कर अपने वाक्यो को

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वाक्य-वक्रता और वस्तु-वक्रता । भूमिका [ ८५

चमत्कारपूर्ण बना देता है। यह कार्य प्रतिभा के लिए इतना सहज होता है। कि एक ही वाक्य में अ्नेक वक्रना-भेदो का प्रयोग अ्रनायास हो हो जाता है। कुन्तक ने स्पष्ट लिखा है: "कहीं कहीं एक दूसरे की शोभा के लिए बहुत से वक्रना-प्रकार एकत्र होकर इसको (काव्य को) (अनेक रगों से युक्त) चित्र की छाया के समान मनोहर बना देते हैं।"-और, जब वक्रता के एक रूप से ही काव्य इतना सहृदयाह्लादकारी हो सकता है, तव ये अनेक भेद एकत्र हो कर तो उसके सौन्दर्य को न जाने कितना समृद्ध कर सकते हैं? अतएव काव्य में वक्रना का प्रभाव असोम है।

वाक्य-वक्रता और वस्तु-वक्रता ⑈ वरों से प्रकृति तथा प्रत्यय-पदपूर्वार्ध तथा पदपरार्घ का निर्माण होता है औरर पदों से वाक्यों का। इस प्रकार कमश वक्रना के प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार करते हुए कुन्तक वर्ण के पश्चात् प्रकृति-प्रत्मय और प्रकृति-प्रत्यय के पश्चात् वाक्य की वक्रता का विवेचन करते हैं। अनेक पदों के सयोजन का नाम वाक्य है। वाक्य का यह अपने- आाप-में-पूर्ण अ्रर्थ अनक पदो के अ्र्र्य का समजित रूप होता है। इस प्रकार वाक्य की चक्रना सामान्यत पदार्थ अथवा अर्थ की वक्रना है-जिसकी परिभाषा कुन्तक के शब्दो में यह है :

वस्तु का उत्कर्ष-युक्त स्वभाव से सुन्दर रूप में केवल शब्दों द्वारा वर्णन शपर्य प्रथवा वाच्य की वक्रता कहलाती है। (हिनदी व० जी० ३।१) अतएवं वाच्य-वक्रना का दूसरा नाम वस्तु-वक्रना भी है। कुन्तक ने तृतीय उन्मेष के आरम्भ में प्रस्तुत विषय का विवेचन किया है। उसका निष्कर्ष इस प्रकार है-वाक्य अथवा वाच्य अ्यवा वस्तु की वक्ता सामान्यत एक हो बात है। इसके दो भेद हैं १ सहजा औौर २. शहार्य्या सेपा सहजाहार्यभेदभिन्ना वर्णनीयस्य वस्तुनो द्वि प्रकारस्य वक्ना (व० जो० ३।२ वृत्ि)। वस्तु की सहज औ्रर शाहायं भेद से दो प्रकार की वक्रता होती है। सहज का अ्रर्य है सहज शक्ति द्वारा उत्पन्न- इसके अन्तर्गत वस्तु के स्वभाव का सहज सुन्दर वर्णन आता है। आहार्य का अर्य है व्युत्पत्ति तथा शिक्षाभ्यास द्वारा अजित-प्रस्तुत सौन्दयंरूपिणी होने पर भी यह अर्यालकार के अ्रतिरिक्त और्प्रौर कुछ नहीं है तदेवमाहार्या येय सा प्रस्तुत-विच्छत्ति- विधाप्यलकारव्यतिरेकेण नान्या काचिदुनपद्यते। (हिन्दी व० जी० ३।२ की वृत्ति)। इस प्रकार वाच्य या वस्तु-वक्रना के दो भेद हुए. १. पदार्य की स्वाभाविक शोभा का अणंन (स्वाभायोक्ति, जो कुन्तक के अनुसार अलकार्य है), : श्रर्यालकार।

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८६ ॥ भूमिफा [ घकोक्ति में वस्तु का स्वरूप

वक्रोक्ति-सिद्धान्त में वस्तु (काव्य-विषय) का स्वरूप

कुन्तक ने किसी एकागी सिद्धान्त का प्रतिपादन न फर वास्तव में एक स्वत- सम्पूर्ण काव्य-सम्प्रद्राय की स्थापना की है-अरतएव उन्होने अपने मूल सिद्धान्त के आधार पर काव्य के प्राय सभी मुख्य पहलुओ पर प्रकाश डाला है। उनके मत से काव्य-वस्तु* दो प्रकार की होती है सहज और श्राहार्य।

सहज -सहज का अर्थ है स्वाभाविक अ्ररथवा प्रकृत-फवि अ्रपनी सहज प्रतिभा के द्वारा प्रकृत वस्तुओ का सजीव चित्रण कर सहृदय को श्रह्हाद प्रदान करता है। परन्तु ये प्रकृत वस्तुए भी उत्कर्षयुक्त और स्वभाव से सुन्दर होनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि इनके स्वाभाविक धर्म प्रकृत्या रमणीय होने चाहिए :

यस्मादत्यन्तरमणीयस्वाभाविकधर्मयुक्त वर्णनीय वस्तु परिग्रहणीयम्। (हिन्दी व० जी० पृ० २।१ वृत्ति)

प्रत्येक वस्तु के कुछ स्वाभाविक धर्म या सहजात विशेषताए होती हैं-कवि को ऐसी ही वस्तुओं का वर्णन करना चाहिए जिनके स्वाभाविक धर्म उत्कर्षयुक्त एव रमशीय हो। कहने का तात्पर्य यह है कि कुछ वस्तुए अथवा विषय ऐसे होते हैं जिनका प्रकृत रूप ही मन में उल्लास भर देता है कुन्तक ने वय सन्धि, ऋतु-सन्घि, श्रादि के उदाहरण देकर यह निर्देश किया है कि नारी-श्रगों का सौन्दर्य, तथा प्रकृति की रगोज्ज्वल छटा अपने स्वाभाविक रूप में ही रमरीय होती है। इस प्रकार के पदार्थ काव्य के मुख्य वर्णनीय विषय है। सुकुमार-स्वभाव कवि अपनी सहज प्रतिभा के द्वारा इन पदार्थो का चयन और उनकी रमसीय विशेषताओं का उद्घाटन करने में समर्थ होता है। अतएव हे ये भी कवि-कोशल के आश्रित-स्वभाव-रमणीय पदार्थों का भी रमरणीय वर्णन कवि कौशल का ही प्रसाद है। स्पष्ट शब्दों में कुन्तक का यह मत है कि मूलतः तो काव्य-वस्तु का सौन्दर्य कविकौशल-जन्य ही होता है, परन्तु फिर भी ऐसे पदार्थ जो स्वभाव से रमणीय और आह्लादफारी हैं सुकुमार-स्वभाव कवियों के लिए अधिक उपयुक्त काव्य-विषय हैं।। यहा, बहुत कुछ भावगत दृष्टिकोण रखते हुए भी कुन्तक अत में रमणीय काव्य-विषय को प्राथमिकता दे देते हैं।

*वस्तु से अभिप्रायक्रेयहा विषय का है-कथानक आरादि का नही।

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वक्रोक्ति में वस्तु का स्वरूप ] भूमिका

आहार्य .-

शहार्य्य का अर्य है निपुणता तथा शिक्षाभ्यास आदि द्वारा सम्पादित। यह रूप सहज वस्तु से भिन्न है क्योकि सहज वस्तु जहा प्रधान रूप से प्रकृत औ्ररर स्वाभा- विक होती है-उसके धर्म सहजात होते हैं, वहा आहार्य्य वस्तु कविकौशल-जन्य, दूसरे शब्दों में, उत्पाद्य होती है-आधुनिक आलोचनाशास्त्र की शब्दावली में उसे 'कल्पित' कहेंगे। श्हार्य्य वस्तु के विषय में अपने आशय को और स्पष्ट करते हुए कुन्तक ने लिखा है कि शहार्य्य वस्तु भी कोई एकान्त काल्पनिक वस्तु नहीं होती।- वह सता मात्र से प्रतिभासित रहती है: कवि अपने कौशल के द्वारा उसमे कुद् अलौकिक शोभातिशय की उद्भावना या आधान कर देता है जिससे उसका सत्ता मात्र से प्रतीत होनवाला मूलरूप आच्छादित हो जाता है और वह लोकोत्तर सौन्दर्य्य से सम्पन्न एक नया ही रूप धारण कर लेती है। कुन्तक का अभिप्राय स्पष्ट शब्दों में यह है : शरहार्य्य वस्तु का अर्य यह नहीं है कि उसका कोई वास्तविक अस्तित्व होता ही नहीं और स्वर्णलूता की तरह कवि अ्रपनी कल्नना में से उसे उदीर्ग कर रख देना है। श्हार्य्य वस्तु का भी प्रस्तित्व निश्चय ही होता है-परन्तु वह सामान्यत सता मात्र से प्रतिभासित रहता है अर्यात उसकी सत्ता तो रहती है किन्तु उसमें कोई आकर्षण नहीं रहता। कवि उसके शनेक धर्मों में से कतिपय विशिष्ट धर्मों को अतिरजित कर इस रूप में प्रस्तुत करता है कि उसका वास्तविक रूप छिप जाता है और एक नवीन लोकोत्तर रूप प्राप्त हो जाता है -लोकोत्तर इस लिए कि विशेष घर्मों की अतिरंजना के कारण उसका रूप सामान्य वस्तुओं से भिन्न हो जाता है। यही वस्तु का शहार्य्य रूप है-इसी रूप में वह सहज न होकर उत्पाद्य या कल्पित होती है। परन्तु यह 'उत्पादन' या 'आहरण' निरकुश नहों हो सकता-अपने शाहार्य्य रूप में भी वह स्वाभाविक होना चाहिए, कौतुक मात्र नहीं। स्वभावव्यनिरेकेशा वकतुमेव न युज्यते। वस्तु तद्रहित यस्मात् निरुपास्य प्रसज्यते ॥१,१२। अर्यात् स्वभाव के बिना वस्तु का वर्णन ही सम्भव नहीं हो सकता, क्योकि स्वभाव से रहित वस्तु वुच्छ असत्कल्प हो जाती है। प्र्ाहार्य्य वस्तु के विषय में कुन्तक का स्पष्ट मत है कि वह प्रर्थालंकार से अभिन्न है-इस लिए उसके अनेक प्रकार के भेदो द्वारा पदार्यों का वर्णन

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भूमिका [ वक्रोक्ति में वस्तु का स्वरूप

बहुत विस्तृत हो जाता है। यद्यपि रस, स्वभाव, आदि सब के वर्णन में कवि का कौशल ही प्राशभूत है, फिर भी विशेष रूप से कवि-कौशल के अनुग्रह के विना श्राहार्य वस्तु में नाम मात्र को भी वैचित्र्य नहीं हो सकता। वस्तु के अ्रन्य भेद-

पागे चलकर कुतक ने वर्णनीय वस्तु के कुछ और भेद किये हैं। स्वभाव और शचित्य से सुन्दर चेतन और अचेतन पदार्यों का स्वरूप दो प्रकार का कहा गया है। उनमें से पहला भेद अरर्थात् चेतन देवता आदि (उच्च योनि) से लेकर सिंह आदि (तर्यक् योनि) तक प्रधान तथा अप्रधान रूप से दो प्रकार का होता है।

वर्सनीय वस्तु

चेतन प्रचेतन (प्राकृतिक पदार्थ)

प्रधान प्रप्रधान (देवता, मनुष्य आादि) (पशु, पक्षी आादि) उच्च योनि तिर्यक योनि

इस प्रकार देव तथा मानव-जीवन काव्य का मुख्य विषय है और पशु-पक्षी- जीवन गौए विषय है। पशु-पक्षी-सिंह आदि तिर्यक् योनि के जीवो के वर्णन में जाति-स्वभाव प्रमाण है प्रत्येक जीव का अपना अपना जाति-स्वभाव होता है- कुशल कवि सूक्ष्म निरीक्षण के आधार पर यथावत् चित्रण करता हुआ अपने वर्रन को सहृदय के लिए शह्लादकारी बना देता है। अचेतन के अन्तर्गत प्राकृतिक पदार्थों तथा दृश्यों का वर्णन आता है। काव्य-परम्परा के अनुसार कुन्तक ने इन्हे रस के उद्दीपन माना है,१ परन्तु फिर भी इनके सहज सौन्दर्य के प्रति वे उदासीन नहीं हैं, उनकी स्वाभाविक शोभा का कुन्तक ने अत्यन्त उच्छवासपूर्ण शब्दों में वर्णन किया है। इस प्रकार सामान्य रूप से काव्य वस्तु के दो भेव हुए-१ स्वभाव-प्रधान और १ रस-प्रधान तदेव विध स्वभाव-प्रधान्येन, रस प्राधान्येन द्विप्रकार।२ इन रूपों

१ हिन्दी व० जीवित ३।८ वृत्ति २ हिन्दी व० जीवित ३११० वृत्ति।

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वक्रोक्ति में वस्तु का स्वरूप ] भूमिका

के अतिरिक्त धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप पुरुषार्थ-चतुष्टय की सिद्धि के उपाय भी काव्य-वस्तु के अन्तर्गत आते हैं। इन उपायो से तात्पर्य उन सभी मानव-व्यापारो तथा अन्य प्रािगयो के भी क्रिया-कलाप से है जो धर्म, अर्य, काम, मोक्ष के प्रनुष्ठान में उपदेश-परक रूप से सहायक होते हैं। आधुनिक शब्दावली में इन्हे नैतिक व्यापार कहेंगे. कुन्तक ने इस प्रसंग में कादम्बरी इत्यादि में वगिगत शूद्रक श्रादि राजाओ्र तथा शुकनास आदि मत्रियो के चरित्रो को उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया है।

उपर्युक्त वस्तु-विवेचन के अनुसार वफ्रोकि-सिद्धान्त में काव्य-वस्तु के तीन प्रकार हैं १ स्वभाव-प्रधान, २. रस-प्रधान औ्र ३. नीति-प्रधान। जो पदार्थ अपनी सहज शोभा के कारण वर्णनीय होते हैं वे स्वभाव-प्रधान वस्तु के अन्तर्गत प्राते हैं, मानव हृदय की वृत्तियो का वर्णन मूलत. दूसरे वर्ग के अ्रन्तर्गत आता है, औ्रौर, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष नीति-वर्णन तीसरे वर्ग में आता है। नवीन आलोचनाशास्त्र की शब्दावली में इन्हे ही क्रमश प्राकृत तत्व, रागात्मक तत्व तथा नैतिक (वौद्धिक) तत्व के नाम से अभिहित किया गया है, और आ्धुनिक काव्यशास्त्र के अनुसार ये ही विषय-वस्तु के तीन मूलभूत तत्व हैं।

इस प्रकार कुन्तक ने वस्तु का विभाग दो दृष्टियो से किया है-१. कवि की दृष्टि मे, २ सहृदय की दृष्टि से। सहज औ्रर श्राहार्य भेदो का आधार कवि की सर्जना है, और स्वभाव-प्रधान, रस-प्रधान तया नीति-प्रधान का आघार सहृदय की ग्रहण-प्रतिक्रिया है. पहले रूप से सहृदय प्रत्यभिज्ञान का आ्ररानन्द ग्रहण करता है, दूसरे से रस और तीसरे से उपदेश तया सद्ज्ञान। पहले विभाग का आधार है-कवि जैसा उसे प्रस्तुत करता है। दूसरे विभाग का आ्वार है-गाठक जैसा उसे ग्रहण करता है।

काव्य-विपय के सम्बन्ध मे कुन्तक की दो मान्यताए

कुन्तक ने इस प्रसग में दो स्यापनाए की है (१) काव्य का विषय स्वभाव से रमसीय होना चाहिए। मूलत कविकौशल पर आ्राश्रित होने पर भी काव्य-वस्तु के धर्म सहृदय-्राह्लादकारी होने चाहिए। (२) प्रकृति का व्णन काव्य में मूलत रस क उद्दीपक होता है।

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भू मिका [ वक्रोक्ति में वस्तु का स्वरूप

काव्य-विषय की रमणीयता ये दोनो मान्यताए विवादास्पद हें पाशचात्य काव्यशास्त्र में आलोचको का एक वर्ग ऐसा है जिनके मत से कोई भी विषय काव्योचित हो सकता है। विक्टर ह्यूगो ने स्पष्ट लिखा है कि कवि क्या कहता है यह महत्वपूर्ण नहीं है-कैसे कहता है इसका महत्व है। गॉवर्ट 'कुछ नहीं' पर ग्रन्य-रचना करने का स्वप्न देखते थे। अभिव्य जनावादियो ने तो काव्य-विषय की पृथक कल्पना को ही निरर्यक माना है- क्रोचे के अनुसार काव्य-वस्तु का सौन्दर्य अभिव्यजना के सौन्दर्य से अभिन्न है। इसके विपरीत अ्ररस्तू से लेकर श्ार्नंल्ड तक श्रनेक आ्रचार्यों का दूसरा वर्ग भी है जो वस्तु के सौन्दर्य को सत्काव्य के लिए अनिवार्य मानता है। इनके अनुसार काव्य का- सौन्दर्य मूलत वस्तु के सौन्दर्प पर निर्भर रहता है। क्षुद्र विषय महान काव्य का- अ्रसुन्दर विषय सुन्दर काव्य का आश्रय नहीं वन सकता। हिन्दी में भी उपर्युक्त दोनों मतो की अनुगूज मिलती है ललित कला कुत्सित कुरूप जग का जो रूप करे निर्माए। (युगवाणी-पत) सामान्यत तो सुकुमार विषय का चयन पत जी की कविता का मुख्य गु रहा है परन्तु उनके परिवर्तित दृष्टिकोण की यह अभिव्यक्ति काव्य के तथाकथित सुन्दर अथवा अभिजात विषयों को अरमान्य घोषित करती हुई, काव्य अथवा ललित कला को सिद्धि इसी में मानती है कि वह कुरूप को रूप प्रदान कर दे। भर्ात् सौन्दर्य वस्तुत कवि के हृदय में बसता है-वह अपने हृदयगत सौन्दर्य के द्वारा असुन्दर को भी सुन्दर बना देता है। रवि ठाकुर की एक प्रसिद्ध कविता है जिसका आ्राशय यह है कि तुम्हारे विभिन्न अरगों की छवि मेरी भावनाओं के ही राग से रञ्जित है। यह दृष्टिकोण वास्तव में पाश्चात्म दर्शन की प्रत्ययवादी चिताधारा का प्रोन्धास है जिसके अनुसार वस्तु भाव की प्रतिच्छाया मात्र है वूसरे शब्दों में सौन्दर्ग की स्थिति दृश्य में नहीं द्रष्टा के मन में है-(ब्यूटी लाईज इन दी माइन्ड ऑफ दी बिहोल्डर)। इसके विपरीत शुक्ल जी का निम्नोक्त अ्भिमत है जो उतने ही निश्चय और वृढ़ता के साथ व्यक्त किया गया है सौन्वर्ग बाहर की कोई वस्तु नहीं है, मन के भीतर की वस्तु है। योरपीम कला-समीक्षा की यह एक बडी ऊची उडान या दूर को कौडी समझी गयी। पर वास्तव में यह भाषा के गढवडभाले के सिवा और कुछ नहीं है। जैसे वीरकर्म से पृथक् वीरत्व कोई पदार्थ नहीं, वैसे ही सुन्दर वस्तु से

१ भाइडीयलिस्ट

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वक्रोक्ति में वस्तु का स्वरूप 1 भूमिका

पृथक् सौन्दर्ग कोई पदार्थ नहीं। (चितामणि (१) कविता क्या है-पृ० १६४)। अब प्रश्न यह है कि इन दोनों में से सत्य वास्तव में क्या है ? यह प्रश्न सरल नहीं है, और इसका उत्तर दर्शन के क्षेत्र में भी दुर्लभ ही रहा है-इसका समाधान वस्तुत साख्य और वेदान्त और उघर मार्क्स तथा होगल भी नहीं कर पाये। तत्व- दृष्टि से अन्तिम सत्य चाहे इनमें कुछ भी हो ... हम स्वय वेदान्त और होगल के मत को ही स्वीकार करते हैं, परन्तु दाशनिक उलभन को वचा कर व्यावहारिक धरातल पर समन्वयवादियो ने विषय और विषयी, प्रकृति और पुरुष, श्रह औ्रप्ौर इद अपर्यात् अ्रन्तर्ज- गत और वहिजंत, वस्तु-तत्व और व्यक्ति-तत्व के सामंजस्य को ही श्रेयस्कर माना है। कुन्तक भी इसी सामजस्य के पक्ष में है : उनके सिद्धान्त में व्यत्ति-तत्व और वस्तु- तत्व का समन्वय है। सौन्दर्ग को वक्रता-निष्ठ मान कर उन्होने वस्तु-तत्व की प्रतिप्ठा की है क्योंकि वक्ता निश्चय ही रूपगत' है, और उघर वक्रता को मूलत कवि-व्यापार- जन्य मान कर व्यक्ति-तत्व को सिद्ध किया है। प्रस्तुत प्रसग में भी एक ओर जहां वे स्वभाव-रमणीय विषय के चयन के लिए आग्रह करते हैं, वहां दूसरी शर उसके सौन्दर्य का उद्घाटन पूर्णत कवि-प्रतिभा पर आश्रित मानते हैं। स्वभाव-रमणीय पदार्थ से अभिप्राय ऐसे पदार्थ से है जिसमें संस्कारवश मानव मन अघिक रमता है. आ्ररम्भ में सम्भवत यह रमणीयता व्यक्तिनिष्ठ ही रही होगी किन्तु सचित सस्कारो के परिणामरूप वह वस्तुनिष्ठ प्रतीत होने लगी है। परन्तु इस वरतुनिष्ठ सौन्दर्य के भी उद्घाटन की आवश्यकता होती है, जो कवि की प्रतिभा का कार्य है।-इस प्रकार दोनो पक्षो का-वस्तु और व्यक्ति का-समन्वय हो जाता है। कुन्तक ने यही किया है। प्रकृति का रस के उद्दीपन रूप में वर्णन

कुन्तक ने प्रकृति को मलत रस के उद्दीपन रूप में ही वर्णनीय माना है। 'प्रमुख्य चेतन औौर बहुत-से जड पदार्थों का भी रस के उद्दीरन की सामर्थ्य के कारण वर्णन से मनोहर स्वरूप भी कवियों की वर्णना का दूसरे प्रकार का विषय होता है।' ३८। आ्राधुनिक हिन्दी आर्प्रालोचना में इम प्रश्न पर आ्रचार्यों का प्राय एकमत है कि प्रकृति रस का उद्दीपन मात्र नहीं है। शुक्ल जी इस मत के सब से प्रवल समर्थक थे। उनका सहज प्रकृति-प्रेम और उघर चित्रकला के माय उनका आरम्भिक सम्पर्क यह सहन नहीं कर मकता या कि प्रकृति का उपयोग रति आदि भावनाओं को उद्दीप्त करने के लिए ही किया जाए। रीतिकाल में इस प्रवृत्ति का स्सलन उपयुक्त सिद्धान्त की असफलता का प्रमाण दे चुका या। अ्रतएव उन्होंने नारत के १. फार्मल

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भूमिका [ वक्रोक्ति में वस्तु का स्वरूप

वाल्मीकि तथ। फालिदास और यूरोप के अ्नेक प्रकृति-कवियो के प्रकृति-बंनो के साक्ष्य पर शास्त्रीय परम्परा के विरुद्ध प्रकृति को काव्य का श्रालम्बन ही घोषित नही किया, वरन् उसके साक्षात् दर्शन में भी रस का परिपाक माना• औ्रर इसके लिए ही कदाचित् उन्हे अपनी यह नवीन स्यापना करनी पडी कि रस हृदय की मुक्तावस्था का नाम है। किन्तु शुक्ल जी की स्थापना भी विवाद-मुक्त नहीं है। इसमें सदेह नहीं कि केवल रति आदि भावो को उद्दीप्त करने के लिए प्राकृतिक दृश्यो अ्रथवा पदार्थो का उपयोग अत्यन्त परिसीमित दृष्टिकोण का परिचायक है- और रीति युग अ्थवा उससे भी पहले सस्कृत काव्य के ह्रास-काल के शृगार- चित्रों में उसका जो रुग्ण रूप सामने आया वह वास्तव में शकाव्योचित ही था। इसमें भी सदेह नहीं कि प्रकृति का सौन्दर्य प्रत्यक्ष रूप में मानव-मन में स्फूर्ति और उल्लास-विस्मय, ओज स्फीति, गाभीर्य आदि का सचार करता है और इन सबकी समजित प्रतिक्रिया सात्विक प्रानन्द रूप ही होती है, परन्तु क्या इस प्रकार के आनन्द को रस-परिपाक कहा जा सकता है? शुक्ल जी ने वासना-मुक्त, निर्वयक्तिक, राग द्वेष से शुद्ध आ्रनन्द को रस माना है। उनका तर्क यह है कि जिस प्रकार कला अथवा काव्य-जन्य आनन्द वैयक्तिक राग-द्वेष से मुक्त एक प्रकार का निर्वयक्तिक सात्विक आनन्द होता है इसी प्रकार प्राकृतिक सौन्दर्यं से उद्भूत आनन्द भी एक प्रकार का विशद भाव है जो वैयक्तिक लिप्सा से मुक्त होता है। परन्तु यह रस- कल्पना शास्त्रीय परम्परा के अनुकूल नही है-सस्कृत काव्यशास्त्र के अनुसार रस मानसिक विशदता मात्र नहीं है वह स्थायी भाव को चरम उद्दीप्ति या परिपाक है। स्थायो भाव अपनी चरम उत्कट अव्स्था में निरवयक्तिक हो जाता है-यह प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है। उदाहरण के लिए एक इन्द्रिय की परितृप्ति अपनी चरम परिणति में समग्र चेतना की निर्विशिष्ट अनुभूति हो जाती है, इसी प्रकार एक भाव विशेष का आस्वाद अपनी अत्यन्त उत्कट अवस्था में भाव मात्र का निर्विशिष्ट आ्रास्वाद बन जाता है-जो केवल आनन्द रूप है। अतएव भारतीय रस की स्थिति उत्कट आस्वाद की अत्यन्त भावात्मक स्थिति है, हृदय की मुक्तावस्था मात्र नहीं है। इस वृष्टि से शुक्ल जी द्वारा निरूपित रस के अनुभूत्यात्मक रूप में शास्त्रीय रस के अनुभूत्यात्मक रूप की अपेक्षा आनन्द की मात्रा कम है। और इसके लिए शुक्ल जी का वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण उत्तरदायी है जो पूर्ण तन्मयता में बाघक होता है। इसीलिए शुक्ल जी रस को आलम्बन-प्रधान मानते हैं'और यही उनके द्वारा प्रतिपादित 'प्रकृति की रसात्मक अ्र्प्रनुभूति' का भी रहस्य है।

अब कुन्तक के पक्ष (शास्त्रीय पक्ष) और शुक्ल जी के पक्ष, अर्यात

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वक्रोक्ति में वस्तु का स्वरूप । भूमिका [६३

प्रकृति के आलम्वनत्व और उद्दीपनत्व का सापेक्षिक विवेचन कीजिए। प्रकृति के सौन्दर्य का वर्णन निश्चय ही श्रह्लादकारी होता है; कवि को अथवा कवि-निबद्ध पात्र को आश्रय मान कर प्रकृति की शोभा को उसके रति भाव का आ्लम्बन माना जा सकता है और रस-प्रक्रिया की शास्त्रीय व्यवस्था हो सकती है-शुक्ल जी ने अपने निबन्ध में यही व्याख्या प्रस्तुत भी की है। परन्तु यहाँ एक दोष रह जाता है क्या प्रकृति के प्रति वास्तव में रति भाव उत्कट अवस्था में उद्बुद्ध हो सकता है? हमारी धारणा है कि उषा और ज्योत्स्ना आदि का सौन्दर्य मन में उल्लास, स्फूर्ति का सचार तो कर सकता है किन्तु उतना तीव्र उन्मुखीभाव (रति) जागृत नहीं कर सकता जितना कि मानव-सौन्दर्य विशेषकर इष्ट व्यक्ति का सौन्दर्य। इसका मनोवंज्ञानिक कारण स्पष्ट है। भाव का पूर्ण परिपोप वस्तु से नहीं भाव से होता है-उन्मुखीभाव प्रत्युन्मुखीभाव की अ्पेक्षा करता है.

इस भावभरे मानव उर को चाहिए भाव।

रसशास्त्र में आलम्बन के अनुभाव आदि को इसी दृष्टि से उद्दीपन माना गया है, औ्रौर ये उद्दीपन अन्य उद्टीपनो की अपेक्षा कहीं अविक प्रवल हैं। आचार्य शुक्ल का आलम्बनवाद यहीं आकर कमजोर पड़ जाता है। आलम्वन की वस्तुगत सत्ता पर शुक्ल जी इतना अधिक वल देते हैं कि उनका विवेचन मनोवंज्ञानिक न रह कर नैतिक हो जाता है। रस मूलत भाव का व्यापार है, वस्तु भी उसमें भावपरक होकर हो अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है। अतएव आालम्वन का भावपरक तथा भावात्मक रूप ही वस्तुत. रस-परिपाक के लिए अधिक उपयोगी है। जिन कवियो ने प्रकृति को ही आालम्बन माना है, उनको भी इसीलिए श्रनिवार्यत उस पर चेतना का आरोप करना पडा है। प्रकृति का उद्दीपन रूप में उपयोग इसी दृष्टि से सार्थक है-इसीलिए भारतीय रसशास्त्र में प्रकृति के प्ररालम्वनत्व की प्रपेक्षा उद्दीपनत्व पर हो अधिक बल दिया गया है, और वह अनुचित नहीं, है कम से कम इतना अनुचित नहीं है जितना शुक्ल जी ने माना है। सस्कृत के ह्ास-काल अयवा रीति युग के होनतर कवियों ने प्रकृति का रूठ उपनोग-सामग्री के रूप मे जो प्रका- व्योचित उपयोग किया है उसका उत्तरदामित्व इस सिद्धान्त पर नहीं है उन रस- क्षीण कवियो ने तो प्रेम और नारी-सौन्दर्य को भी रुढ उपभोग-नामग्री बना दिया है.इनका वर्णन भी वहाँ काव्यानन्द की अ्रपेक्षा इन्द्रियानन्द ही अ्र्प्रधिक दे सफता है।

फुन्तक ने प्रचेतन काव्य-वरतु अर्थात् प्रफृति को इनी दृष्टि से, रन-्श्राम्त्र की परम्परा के अनुसार, उद्दीपन रूप में वगंनीय माना है।

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भूमिफा प्रकरण-वक्नत,

प्रकरण-वक्रता

प्रकरण-वक्रता की परिभाषा को कुन्तक विशेष स्पष्ट नहीं कर सके जहाँ अपने अ्रभिप्राय को अप्रभिव्यक्त करने वाली औररर अपरिमित उत्साह के व्यापार से शोभायमान व्यवहर्ताओं (कवियो) की प्रवृत्ति होती है वहाँ, और प्रारम्भ से ही नि शक रूप से उठने या उठाने की इच्छा होने पर (अर्थात् जहाँ प्रारम्भ से ही निर्भय होकर अपने अथवा अपनी रचना को उठाने की शदम्य इच्छा हो, वहां) वह प्रकरण-वक्रता निस्सीम होकर प्रकाशित हो उठनी है। व० ज० ४।१२।

यह वाक्य अधिक स्वच्छ नहीं है, वृत्ति के खण्डान्वय से यह और भी उलद्ञ जाता है, परन्तु कुन्तक के आशय में कोई भ्रान्ति नहीं है। उनका अभिप्राय यह है कि सुजन के उत्साह से प्रेरित होकर कवि अपने वस्तु-वर्णन में जो शपूर्व उत्कर्ष उत्पन्न करता है वह प्रकरण-वक्रता है। आगे चलकर कुन्तक ने भेद-प्रभेदो का इतना विशद निरूपण किया है कि प्रकरण-वक्रता का स्वरूप सर्वथा स्पष्ट हो जाता है।

प्रकरण का अर्थ कुन्तक के शन्दों में है प्रबन्ध का एक देश अर्थात् कथा का एक प्रसग -प्रबन्धस्यकदेशाना ... । (हिन्दी व० जी० परिशिष्ट ४।५)। समग्र कथाविधान का नाम प्रबन्ध है और उसके अग अयवा प्रसग का नाम प्रकरण है। प्रकरण पर आश्रित, अथवा प्रकरण में निहित काव्य-चमत्कार का नाम प्रकरण- वक्रता है। जहाँ प्रसग विशेष के उत्कर्ष से सम्पूर्ण प्रबन्ध उज्ज्वल हो उठता है, वहाँ प्रकरण-वक्रता होती है। अर्थात् सम्पूर्ण प्रबन्ध को दीप्त करने वाला प्रबन्ध के एक देश का चमत्कार प्रकरण-वक्रता के नाम से अभिहित होता है। प्रकरण वक्रता के सामान्य रूप का उद्धाटन एक दो उदाहरणों द्वारा करने के उपरान्त फुन्तक ने आठ-नौ विशिष्ट भेदों का उल्लेख किया है। सामान्य रूप में स्थिति के सजीव चित्रण को ही कुन्तक ने प्रकरण-वकता माना है और सस्कृत के सेतुबन्ध नामक नाटक के तृतीय अक 'भिजात-जानकी' से एक इलोक उद्धृत किया है जिसमें सेनापति नील की प्रेरक उक्ति के परिणाम-स्वरूप वानरों के आन्दोलन का सजीव चित्रस है। यहाँ प्रकरण-वक्रता की परिषि अत्यन्त सीमित है।-इसके आागे आाठ-नौ विशिष्ट भेवों का वर्णन इस प्रकार है -

१ भावपूर्ण स्थिति की उद्भावना जहां किसी ऐसी भावपूर्ण स्थिति की उद्धावना की जाए जो पात्रो के चरित्र

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प्रकरण-वत्रता ] भूमिका

का उत्कर्ष करती हो, वहाँ प्रकरण-वक्रना का प्रथम भेद उपलव्ध होता है. उदाहए के लिए रघुवंश के पंचम सर्ग में रघु और कौत्स का सवाद। इस प्रसग का साराश यह है :- वरन्तु मुनि के शिष्य कौत्स गुरु दक्षिरणा चुकाने के लिए महाराज रघु के पास १४ कोटि द्रव्य माँगने आये। किन्तु उससे पूर्व ही रघ विश्वजित नामक याग सम्पन्न कर चुके थे और उनके पास मिट्टी के पात्रो के श्रतिरिक्त और कुछ भी शेप नहीं रह गया था। कौत्स मुनि को जब यह ज्ञात हुआ तो वे राजा को आ्शीर्वाद देकर जाने लगे। किन्तु राजा को इस प्रकार ब्राह्मण का विमुख होकर लौटना अ्र्प्रसह्य प्रतीत हुआ और वे कुवेर पर चढ़ाई करने का विचार कर ही रहे थे कि कुबेर के यहाँ से आवश्यकता से कहीं अधिक द्रव्य उसी रात्रि को प्राप्त हो गया। राजा ने वह सारा धन कीत्स मुनि के समक्ष प्रस्तुत कर दिया परन्तु निस्पृह मुनि ने आवश्यकता से अ्रघिक प्रणुमात्र भी स्वीकार नहीं किया। साकेतवासी इन दोनों के ही व्यवहार को देखकर मुग्ध हो गये एक ओर गुरु-दक्षिणणा से अधिक दान के प्रति निस्पृह याचक था और दूसरी ओर याचक की इच्छा से अधिक दान करने वाला राजा। कालिदास ने इस भावपूर्ण स्यिति की उद्धावना से दोनों पात्रों के चरित्र का उत्कर्ष प्रदर्शित करते हुए अपनी प्रवन्ध-कल्पना को और भी अधिक प्रभाव- शाली बना दिया है। हिन्दी में भी इस प्रकार के अ्रनेक प्रसग उपलब्ब हो सकते हैं : उवाहरस के लिए साकेत का वह मार्मिक स्थल उद्धृत किया जा सकता है. 'गा भाई, वह वैर भूल कर, हम दोनो समदु सी मिन्र, आजा क्षणा भर भेंट परस्पर, कर लें अपने नेत पवित्र।'

हाय ! किन्तु इससे पहने ही मूदिन हुआ निशाचर-राज, प्रभु भी यह कह गिरे राम ने रावण ही सहृदय है आज।

लक्ष्मण-शक्ति के उपरात शोक-विक्षिप्त राम युद्ध में प्रलय मचा देते हैं,- इतने हो में उनके सम्मुस कुम्भकर्र आ जाता है और वे 'भाई का बदला भाई ही' कह कर उसका वव कर डालते हैं। उसी समय रावण को देख कर राम की उतेजना क्षण भर के लिए शात हो जाती है औ्रौर भ्रातहीन रावस तथा अपने बीच वे एक प्रकार के शोक-सौहारद का प्रनुनव करने लगते है। परन्तु राम रावण की ओ्र सवे- दनार्थ चढने भी न पाये थे कि उससे पहले ही रात्रण मू्छित हो जाता है और राम भी अ्रन्त में विह्वल होकर भूलुण्ठित हो जाते हैं।-उपर्युत्त प्रसग राम को उदारता तथा रावस को सहृदयता का उन्कर्ष करता हुआ प्रबन्ध-विधान में एक अपूर्व प्रभाव-क्षमता उत्पन्न कर वेता है।

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६६। भूमिका [ प्रकरण-वक्रता

२ उत्पाद्य-लावरय

इतिहास में वणित कथा के मार्ग में तनिक से फल्पनाप्रसूत अरश् के सौन्दर्य से (उत्पाद्य-लावण्य के स्पर्श मात्र से) उसका सौन्दर्य कुछ और ही हो जाता है। उत्पाद्य- लावण्य के उस स्पर्श मात्र से काव्य में इतना सौन्दर्य आ जाता है कि वह प्रकरण चरम सीमा को प्राप्त रस से परिपूर्ण होकर समस्त प्रबन्ध का प्राण-सा प्रतीत होने लगता है। व० जी० ४।३-४। स्पष्ट शब्दों में इसका अभिप्राय यह है कि कहीं कहीं ऐतिहासिक कथावस्तु में कवि अपनी कल्पना के द्वारा कुछ ऐसे सुन्दर परिवर्तन कर देता है कि समस्त प्रबन्ध ही उनसे रसदीप्त हो उठता है। यह उत्पाद्य-लावण्य अर्थांत् कल्पना-प्रसूत मधुर उद्भावना भी प्रकरण-वक्रता का ही प्रकार-भेद है। इस उत्पाद्य- लावण्य के दो भेद हैं• १ अविद्यमान की कल्पना, २ विद्यमान का सशोवन।

प्रथम रूप -अविद्यमान ची कल्पना-

पविद्यमान की कल्पना का अर्थ है नवीन प्रसग की उद्भावना। प्रतिभावान कवि कल्पना के द्वारा प्राय नवीन प्रसगो की उद्भावना कर अपने काव्य का उत्कर्ष करता है। इतिहास जीवन के सत्यों का निर्मम आलेख है उसका प्रत्येक प्रकरण मानव-मन का पारितोष करे यह सम्भव नहीं है- उसमें कटुता और मधुरता दोनों ही निस्संग भाव से रहती हैं। किन्तु काव्य जीवन के सत्यो का सहृदय शलेख है-उसमें कटता भी मधुर बन कर आती है। ऐसी स्थिति में काव्य की अन्तरग आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कवि को अपनी कल्पना का उपयोग करना पडता है। कहीं कहीं इतिहास की कटता का परिहार करने के लिए उसे किसो नवीन प्रसग की उद्भावना करनी पडती है जैसे शाकुन्तलम् के चतुर्थ अक में दुर्वासा-शाप की कल्पना, जो राजा के व्यक्तित्व-दोष का प्रक्षालन कर, क्रमश समग्र कथ।वस्तु पर प्रभाव डालती हुई, अन्त में नाटक के मूल रस का उत्कर्ष करती है। इस उत्पाद्य-लव-लावण्य से शाफुन्तलम् के रसास्वाद में बाधक तत्वो का परिहार और परिणामत रसपरिपाक पूर्ण हो जाता है।

३ द्वितीय रूप -विद्यमान का सशोधन-

जहा (मूलकथा) में विद्यमान होने पर भी सहृदय के हृदय-्राह्लाद के लिए शचित्यरहित अर्थ का परिवर्तन कर दिया जाय, वहा उत्पाद्य-लावण्य का 'विद्यमान का सशोधन' नामक द्वितीय प्रकार समझना चाहिए जैसे उदात्तराघव में मारीचवध।

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प्रकरण-वक्रा ] भूमिका [६७

उदातराघव मायूराज कवि का अप्राप्य नाटक है, इसमें कवि ने राम के उदात्त चरित्र को रक्षा के निमित्त मारचवध-प्रसंग में थोडा परिवर्तन कर अनीचित्य का परिष्कार करने का प्रयत्न किया है। यहा मा चित्रव के लिए राम नहीं वरन् लक्ष्मण जाते हैं औ्रौर सीता उनकी प्राणरक्षा के निमित्त कातर होकर राम को भेजती हैं। इनमें सन्देह नहीं कि घटना के इस सशोघित रूप में अ्रधिक सौन्दर्य है।

हिन्दी में प्रियप्रवास, साकेत, यशोधरा, कामायनी, चन्द्रगुप्त नाटक, आ्रदि में इस प्रकार के अनेक प्रसगो में सशोवन किया गया है। उदाहरस के लिए साकेत में लक्ष्मणा-शक्ति का सवाद सुनकर अयोध्यावासियो की रस-रज्जा, अ्ररयवा कँकयी का पाश्चात्ताप, कामावनी में मन और इडा के पिता पुत्री नन्वन्व का सशोवन, चन्द्रगुप्त में चन्द्रगुप्त के स्थान पर शकटार द्वारा नन्द की हत्या आरादि।

४ प्रधान कार्य से सम्बद्ध प्रकररों का उपकार्य-उपकारक भाव

(फलबन्ध) प्रधान कार्य का प्रनुनन्यान करने वाला प्रबन्ध के प्रफरणों का उपकार्योनकारक भाव असाधारण समुल्लेख वाली प्रतिभा से प्रतिभासित किसी कवि के (कावादि) में अ्भिनन सौन्दर्य के तत्न को उत्पन कर देवा है। व0 जी० ४५-६। यह प्रकरण पक्रश का चौया भेद है। स्पप्ट शब्दों में कुन्तक का पभिप्राय वह है कि प्रधान फार्य से नम्बद्ध प्रफणो का पातस्परिक उदकार्य-उकक नान प्रकरण-दक्रना का चतुर्य भेद है। प्रत्नेक प्रकरण की सार्थकता दास्तव में यह है ति वह श्रन्य प्रकदशों से सम्बद्ध तथा अ्न्त में प्रवान कार्य का उपकारक हो। अंग की सार्थकता इसी में है कि वह प्रन्व अररगो से समन्त्रित होफर मगो का उत्कर्ष करता है-मतन होकर तो वह अरने उदयव को ही निकल कर दे है। ग्ररस्तू ने इने ही कार्यान्तिति कहा है। यूनानी काव्यमारत्र मे तीन अन्दितियों में फार्य की अ्र्प्रन्विति सबमे प्रमुल मानी गयी है। भारतीय शास्त्र में भी वन्तु की अ्रव्रन्याओ तथा पच मन्धियो की विवेचना इसी कार्यान्विति की नहत्व-प्रतिप्ठा है।

उदाहरस के लिए उत्तररामचरित के प्रथन अक्र में रामचन्द्र द्वारा जम्भ- कान्त्रों का वर्णन पाँचवें श्कु में लत द्वारा उनके प्रयोग का उपकार कन्ता हुआ घ्न्त मे नाटक के प्रधान कार्य सोना-राम के मिलन में साघफ होता है।-घाम्नव में ववना का यह भेद कयाकाव्य के वस्तु-विन्यान का प्राण है. इसरा प्रयोग सरवत्र ही पनिवा-

१. विस्सुन व्वारवा के लिए देनिए-नानेन एक अध्ययन [नाके वी पयावस्तु]

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भूमिका [ प्रकरण-वक्रता

र्यत किया जाता है। हिन्दी में फामायनी के काम सर्ग में मन काम की वार्ता श्रागे चलकर इडा सर्ग में काम के अभिशाप का उपकार फरती हुई मनु को पतन के मार्ग पर और भी वेग से अग्रसर कर देती है और इस प्रकार चरम घटना को सिद्धि में सहायक होती है।

५ विशिष्ट प्रकरण की अ्र्प्रतिर जना

एक ही अर्य कवि की प्रौढ़ प्रतिभा से आयोजित होकर अलग-अलग प्रकरणो में बार बार निवद्ध होकर भी सर्वत्र विल्कुल नये रस तथा अलकारों से मनोहर प्रतीत होता हुआ आश्चयंजनक वक्रता शैलो को उत्पन्न और पुष्ट करता है। व० जी० ४१७ द। सामान्यत एक ही अर्थ का बार वार कथन पुनरुक दोष हो जाता है, परन्तु प्रतिभावान कवि उसे इस प्रकार वैचित्र्यपूर्ण रीति से निबद्ध करता है कि वह काव्य में नवीन शोभा उत्पन्न कर देता है। कथा में कुछ ऐसे सरस प्रसग होते है कि उनमें वार बार रग भरने से रस-परिपाक में बडी सहायता मिलती है, जैसे सभोग-क्रोढाओं का अथवा विरह की अवस्थाओं आदि का विस्तार से वर्णन सम्पूर्ण कथा में सरसता का समावेश कर देता है। कुनतक ने इस भेद के उदाहरण रूप में तापसवत्सराज नामक अलभ्य नाटक से उदयन के विरह-वर्णन, रघुवश के नवम सर्ग से दशरथ के मुगया-वर्णन आदि का निर्देश किया है। इन प्रसगो में घटना प्राय नगण्य है, परन्तु कवि विरह, मृगया आदि के रमणीक प्रसगो में रम गया है, और उसने उनका इतना मनोरम वर्णन किया है कि सम्पूर्ण कथा-भाग रस-प्लावित हो गया है। हिन्दी में इस वक्रता के अत्यन्त सरस उदाहरण मिलते हैं-जैसे कामायनी के लज्जा-वर्णन को ही लीजिए जो अपने काव्यवैभव से घटना के अभाव को पूर्णत आच्छादित कर प्रबन्ध को रस से दीपित कर देता है। साकेत के नवम सर्ग में उरमिला-विरह-वर्णन में इसका अतिरजित रूप मिलता है।

६ जलकोडा उत्सव आदि रोचक प्रसगों का विशेष विस्तार स वर्णन

सर्गबन्ध (महाकाव्य) आदि की कथा-वैचिष्य का सम्पादक जो (जलक्रीडा आदि) भग सौन्दर्य के लिए वणित किया जाता है वह भी प्रकरण-वक्रता कहलाता है। 'व०जी० ४६। प्रबन्धकाव्य में जीवन को समग्र रूप में अ्र्रकित करने के उद्दश्य से मूल घटनाओ के अतिरिक्त अनक सरस प्रसगों के समुद्ध चित्र रहते हैं। काव्य की रोचकता की अभिवृद्धि करने के कारण यह भी प्रकरण-वक्रता का ही एक मेद है।

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प्रकरण-वक्रता ] भूमिका

सस्कृत काव्यशास्त्र में तो इस प्रकार के वर्णनों का अ्न्तर्भाव महाकाव्य के लक्षण में हो कर दिया गया है :

उद्यानसलिलक्रीडामधुपानरतोत्सव ।। दडी, काव्यादर्श ।।

अर्थात् प्रवन्ध काव्य का कलेवर नगर, समुद्र, शैल, ऋतु, चन्द्रोदय, सूर्योदय, उद्यान, सलिल-कोडा, मघुपान, रति-उत्सव आदि से समृद्ध होता है।

इस प्रकार के वर्गन जीवन के प्राकृतिक तथा मानवीय दोनो पक्षों से सम्बद्ध होते हैं। कुन्तक ने इस वक्रता-भेद के दो उदाहरण दिये हैं (१) रघुवश के पोडश सर्ग में कुश की जलक्रीडा का वर्णन (२) किरातार्जुनीयम् में बाहुयुद्ध का प्रकरण। हिन्दी में प्रियप्रवास के रास-क्रीडा आदि अनेक वर्णन, जयद्रथवध में स्वर्गवर्णन इत्यादि इसके उदाहरण है।

७ प्रधान उद्देश्य की सिद्धि के लिए सुन्दर अप्रधान प्रसंग की उद्भावना

जिसमें प्रधान वस्तु की सिद्धि के लिए अन्य (अप्रधान) वस्तु की उल्लेखनीय विचित्रता प्रतीत होती है, वह भी इस (प्रकरण) की ही दूसरी प्रकार की वक्रता होती है। व० जी० ४।११। कभी कभी प्रधान उद्दश्य की सिद्धि के लिए कवि किसी सुन्दर किन्तु अप्रधान प्रसग की अवतारणा कर समग्र कथा में एक वैचित्र्य उत्पन्न कर देता है। उदाहरण के लिए मुद्राराक्षस नाटक के छठे अक में प्रधान उद्दश्य की सिद्धि के लिए चाएक्य-नियुक्त पुरुष द्वारा आ्ात्महत्या का प्रपंच इसके अन्तर्गत आता है। चाणक्य राक्षस को जीवित ही वन्दी वनाना चाहता है उसी उद्दश्य की सिद्धि के लिए उपर्युक्त रोचक प्रकरण की उद्भावना की गयी है। राजनीतिक प्रवन्धो में ऐसे उदाहरस प्राय मिल जाते हैं-जासूती उपन्यास इस प्रकार के प्रसंगों की अक्षय निधि हैं।

८ गर्भाक

सामाजिको के मनोरजन में निपुण नटो के द्वारा स्वय सामाजिक का रप धारण कर अन्य नटों को नट वना फर, कहीं एक नाटक के भीतर जो दूसरा नाटक प्रयुत्त किया जाता है, वह ममस्त प्रसंगो की सर्वस्वभूत अ्रलौफिफ वकना को पुप्ट

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१०० । भूमिका [प्रबन्ध-वक्रता

करता है। ४।१२-१३। सपष्ट शब्दी में अक के अन्तर्गत गर्भाक आ्ररदि का नियोजन भी प्रकरण-वक्रता का एक रूप है। राजशेखर के वालरामावण नाटक के तृनीय अक में 'सीता-स्यम्बर' नामक गर्भाक की निोजना इसका सुन्दर उदहरण है।

ह प्रकरणों का पूर्वापर-त्र्प्रन्विति-क्रम

मुख, प्रतिमख आदि सन्धियो के सविधान से मनोहर उत्तरवर्तो अगो का (उचित) सत्निवेश भी प्रकरण-वक्रता का प्रकार होता है। (व० जी० ४१४)।

इसका अर्थ यह है कि पूर्व प्रकरणो का उत्तर प्रकरणों के साथ सामजस्य अर्थात् पूर्वापर-अ्रन्विति कम प्रकरण-वक्रता का एक प्रमुख रूप है। यह तो वास्तव में कथा की मूल आवश्यकता है। यदि विभिन्न प्रसग पूर्वापर-क्रम से परस्पर सम्बद्ध नहीं होगे तो कथा का सूत्र ही टूट जायगा। कुन्तक ने कुमारसम्भव मे विभिन्न घटनाओं की पूर्वापर-अन्विति को इस भेद के उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया हे। हिन्दी के सभी सफल प्रबन्धो में-साकेत, यशोधरा, आर्यावर्त, वर्धमान आदि महाकाव्यों और पचवटी, नहुष, नूरजहा शदि खण्डकाव्यो की पूर्वापर-अ्रन्विति में उपर्युक्त वक्रता का दिग्दर्शन होता है।

प्रबन्ध-वक्रता

प्रबन्ध-वक्रता की परिधि में समग्र प्रबन्धकाव्य-महाकाव्य, नाटक आदि का वास्तु कौशाल अन्त्निहित है। इसका आधार-फलक सबसे अधिक व्यापक है। प्रबन्ध- वक्रता वास्तव में प्रबध-कल्पना के समग्र सौन्दर्य का पर्याय है। कुन्तक ने उसके छह भेदों का वर्णन किया है।

१ मूल-रस-परिवर्तन जहा इतिवत्त अर्थात् आधारभूत ऐतिहासिक कथा वस्तु में अन्यथानिरुपित रस-सम्पदा की उपेक्षा करते हुए किसी अन्य हृदयाह्लादकारी रस में निर्वहण (पर्यव्- सान) करने के उद्श्य से कथामर्ति में आ्र््रामूल परिवर्तन किया जाय वहॉ प्रबन्व-वक्रता का उपर्युक्त भेद मिलता है। (देखिए हिन्दी वक्रोक्तिजीवित ४।१६-१७)। स्पष्ट शब्दों में इसका अ्र्थ यह है-कभी कभी कवि की मौलिक प्रतिभा प्रसिद्ध कथा के मूल रस मे परिदर्तन करने के अभिप्राय से समस्त कथा-विधान में ही आमूल परिवर्तन

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प्रबन्ध-वक्रता 1 भूमिका i १०१

कर देती है और इस प्रकार एक नवीन प्रबन्ध कल्पना का उदय होता है-यही कुन्तक की प्रवन्ध-वक्रना का प्रथम भेद है। समम्त कया-विधान का प्राण रस है मूल रस के अनुरूप ही कया के विभिन्न प्रसरों की कल्पना तया आयोजना की जाती है। -समस्त कथामूर्ति का निमाण प्राणभूत रस के अनुरूप ही होता है। अतएव जब कवि की मौलिक प्रतिभा पुनरावृत्ति के प्रति असहिपण हो कर मूल रस में परिवर्तन करना चाहती है, तो स्वभावत उसे समस्त घटना-विधान में ही आमल परिवर्तन करना पडता है। इस प्रकार एक नवीन प्रचन्ध-कौशल की उद्धावना होती है-जो कुन्तक को प्रवन्ध-तक्रता का प्रयम रूप अ्थवा प्रकार है। इस प्रसग में उन्होने उत्तर रामचरित तया वैरगीसहार नाटकों की प्रबन्ध-कल्पना को उदाहग्ण रप में प्रस्तुत किया है। उत्तररामचरित की कथा का आधार रामायण और वेरोसहार का महा- भारत है। प्राचीन आ्राचार्यों के मत से रामायण तथा महाभारत दोनों का प्रधान रम शान्त है, परन्तु उत्तररामचरित का मूर रस करुशा औ्रर वेशोसहार का वीर है। दोनों के रचयिताओ ने अपनी प्रतिभा के द्वारा मूल रस में और तदनुकूल कया-विधान में परिवर्तन कर अपने : बन्य-कौशल का परिचय दिया है। महाभारत का प्रधान रस निश्चय ही शान्त है और भट्ट सरायण ने नाट्य-कला की आवश्यकतानुतार वेणी- सहार में शात के स्थान पर वीर को प्रधानता देकर अपूर्व चनत्कार उत्पन्न कर दिया है, इममें सदेह नहीं। परन्तु रामामण का भी प्रधान रम शञात है-इन नम्बन्व में मतभेद हो सकता है। यहा कुन्तक ने अपना मा न देकर प्राची। विद्वानो का प्माण दिना है रामायसमहाभारत नैश्व आनागि व पूरपुरिभिरेव निरुशिनम्। (देखि हि० व० जी० १७वो कारिका की बनि)। 'पूर्वतूरिभि' से उनका अ्रप्रभित्राय कित आ्राचार्यो से है यह स्पप्ट नहीं है। यद्यनि हम स्वय यह मानने को तैयार है कि रामा यण में शात के अगित्व की कल्नना सर्वया त्रनर्गल नहीं है, फिर भी आ्रप्रानन्दवर्धन आदि मान्य आचार्यो के मत से रामायण का प्रवान रस करण है जात नहीं 'रामायशं हि, करुरो रस स्वयमादिकविना सूत्रित शोक श्लोकत्वमागत. एव वादिना।'-प्र्यात् रामायण में आदि कवि ने स्वय ही यह कह कर कि 'शोक श्लोक में परिणत हो गया' करुण रस सूचित किया है। हिन्दी ध्वन्यालोक पृ० ४६ः। परन्तु इस प्रासगिक विवाद को छोड मृरय विषय पर आाइए। कुन्तक का अ्रभिप्राय यह है कि रामायण का मुख्य रस शात है, किन्तु भवभूनि ने उत्तररामचरित में करुसा

१ इनके नमयंन मे भी युक्तिया दी जा नव ती है-एक प्रबल युकिि तो यही है कि गमायणा का प्रनिवाद्य परमपुर्र्य की मिद्धि ही है, गम मीना का मिलन नही है।

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१०२ ] भूमिका प्रबन्ध-वक्रता

को अगित्व प्रदान कर प्रवन्ध-वक्रता का सुन्दर प्रयोग किया है। यदि रामायण में प्रधान रस करुण माना जाय तब भी इस चमत्कार की सरक्षा की जा सकती है क्यो कि उत्तररामचरित श्रानन्दपर्य वसायी नाटक है, रामायण की भाँति शोकपर्य वसायी नहीं अतएव उसका शरगी रस करुण न होकर शृगार ही हो सकत है। इस प्रकार भी उसकी प्रवन्ध-वक्रता प्र्रक्षुण्ण रहती है।

हिन्दी में रामचरितमानस, रामचन्द्रिका तथा साकेत आदि प्रबन्ध उदाहरण रूप में प्रस्तुत किये जा सकते हैं। कहणरसाश्रशी रामायण-कथा पर आ्रधृत राम- चरितमानस काअ्रगी रस शात है, रामचद्रिका का वीर, साकेत का शृगार।

२ नायक के चरित्र का उत्कर्प करनेवाली चरम घटना पर कथा का उपसहार

जहा कवि उत्तरभाग की नीरसता का परिहार करने के उद्दश्य से, त्रलोक्य को चकित करने वाले, नायक-चरित्र के पोषक, इतिहास-प्रसिद्ध कथा के प्रकरण विशेष पर ही कथा की परिसमाप्ति कर देता है, वहा द्वितीय प्रकार की प्रबन्ध-वक्रता होती है। (व० जी० ४।१८-१६)। इसका आशय यह है कि चरित्र-प्रधान काव्यो के सम्बन्ध में कभी कभी कुशल कवि यह अ्नुभव करता है कि समस्त कथा रस-पुष्ट नहीं है-एक विशेष सीमा पर पहुँचने के पश्चात फिर वह कोरा इतिवृत्त कथन रह जाती है, अतएव नायक के पूर्ण उत्कर्ष को स्थिति को चरम घटना मान कर वह अपने प्रबन्ध का नाटकीय ढग से वहीं निर्वहण कर देता है। इससे दो लाभ होते हैं एक तो विरस कथा का परिहार हो जाता है और दूसरे चरम उत्कर्ष पर पाठक या प्रेक्षक का ध्यान केन्द्रित तथा स्थिर हो जाता है। इस विधान में निश्चय ही एक प्रकार का प्रबन्ध-कौशल वर्तमान रहता है, जिसे कुन्तक अपनी प्रबन्ध-वक्रता का वूसरा भेद मानते हैं।

कुन्तक ने प्रस्तुत प्रसग में किरातार्जुनीयम् का उदाहरण दिया है। फिराता- जुनीयम् के प्रारम्भिक श्लोकों से यह प्रतीत होता है कि कवि मूल से लेकर दुर्योधन के नाश और युघिष्ठिर के राज्यारोहण तक समग्र कथा-वर्णन का उपक्रम कर 1 रहा है। किन्तु होता यह नहीं है, जहा अर्जुन किरातवेषवारी शिव के साथ युद्ध में पराक्रम प्रद्शित कर पाशुपत अस्त्र की उपलब्धि करता है, वहीं -- नायक के इस चर्मोत्कर्ष की स्थिति पर-कथा समाप्त हो जाती है। इस प्रकार उत्तरवर्ती नीरस प्रसगो का परिहार हो जाता है और नायक के पूर्ण उत्कर्ष का चित्र सहृदय के मन में स्थिर रूप से अक्ित हो जाता है। हिन्दी में चन्द्रगुप्त नाटक आदि का उदाहरए

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प्रवन्ध-वक्रा 1 भूमिका [१०३

प्रस्तुत किया जा सकता है। यवनो के निष्कासन के उपरान्त भी चन्द्रगुप्त के जीवन में अनेक महत्वपूर्ण घटनाए हुई. वास्तव में उसके जीवन की कहानी एक नये रूप में इसके उपरान्त हो आरम्भ हुई, परन्तु प्रसादजी ने उन सब विरस इतिवृत्त घटनाओ का त्याग कर नायक के पूर्ण उत्कर्प के अवसर पर ही नाटक का अन्त कर दिया है। इसी प्रकार जयद्रथवध में भी यही वक्रता है। जयद्रथवध के उपरान्त दुर्योघन के नाश और युधिष्ठिर के राजतिलक तक अनेक महत्वपूर्स घटनाए हुई, किन्तु कवि उनका वर्णन न कर प्रतिज्ञा-पूति के साथ नायक के चरम उत्कर्ष पर हो कथा का अ्रन्त कर दिया है।

कथा के मध्य में ही किसी अ्रप्रन्य कार्य द्वागा प्रधान कार्य की मिद्धि m-

प्रघानवस्तु के सम्बन्व का तिरोधान करने वाले किसी अन्य कार्य द्वारा वीच में ही विच्छिन्न हो जाने के कारण विरस हुई कथा, उमी विच्छेदस्यल पर प्रधान कार्य की सिद्धि हो जाने से, अवाध रस से उज्जल, प्रवन्ध की किमी अ्रनिर्वचनीय नवीन वक्रता की सृप्टि करती है। व० जी० ४।२०-२१।-अर्थात् प्रतिभावान कवि कभी कभी किसी अन्य घटना को उत्कर्य प्रदान कर कथा के स्वाभाविक विकास का विच्छेद करता हुआ अपने काव्य-कौशल के वल पर वीच में ही प्रधान कारय की सिद्धि कर देता है। प्रधान कार्य की इम अनायाम सिद्धि से प्रबन्ध-विधान में एक अपूर्व चमत्कार उत्पन्न हो जाता है. यही कुन्तक की प्रबन्ध-वक्रता का तीसरा प्रकार है- उदाहरण शिशुपाल-बघ। शिशुपाल-वच महाभारत के युधिप्ठिर-राजसूय प्रकरण की घटना है। इस प्रकरण का प्रधान कार्य है यज्ञ को पूर्ति-किन्तु महाकवि माघ ने शिशुपाल-वघ की घटना को अत्यन्त उत्कर्ष प्रदान कर कया को इस कोशल के साय उच्छिन्न कर दिया है कि यन के फल की सिद्धि वहीं हो जाती है। यह नाटकीय चमत्कार निश्चय हो सहृदय का मन प्रनादन करता है।

वास्तव में द्वितीपन्तृतोप भेदों का चमत्कार उनको आकम्मिकना तथा एकाग्रता में निहित है-ये ही गुण पाचान्य फाव्यशास्त में 'नाटकीय गृण' कहलाते हैं जिनया प्रवन्ध के सभी रपों में बडा महत्व है। आकत्मिकता विस्मय को उद्युद्ध करती है, एकाग्रता से ध्यान केन्द्रित होता है ; उत्तरवर्ती घटनाओ का त्याग कल्पना को उत्तेजित करता है : और ये तीनो गुए मिलकर क्या के प्रति पाठ के अ्नुराग की परिवृदि करते हैं। व्ही इन वव्नाओ का मूल रहम्य है।

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१०४ ] भूमिका प्रबन्ध-वक्रता

४ नायक द्वारा अपनेक फलों की प्राप्ति

जहा एक फल विशेष की सिद्धि में तत्पर नायक अपने माहात्म्य के चमत्कार से वैसे ही श्रनेक फलो की प्राप्ति कर प्रथित यश का भाजन वनता है, वहा प्रबन्ध- वक्रना का एक अपर-(अर्थात् चनुर्य) प्रकार मिल्ता है। (व० जी० ४।२२-२३)। कभी कभी कुशल कनि अपन नायक को मूलत किली ए फल विशेष की प्राप्ति में तत्पर दिखा कर, कनश ऐसी स्थितियो की सृष्टि करता चलता है कि उसे वैसे ही अनेक स्पृहरगीन फलो की प्राप्ति भी हो जाती है। इस प्रकार रोचक स्थितियो की उद्धावना द्वारा नायक के उत्कर्ष की वृद्धि कर मर्मज्ञ कवि की प्रतिभा अपने प्रबन्ध- विधान में एक अपूर्व चमत्कार उत्पन्न कर देती है-यही प्रब्रन्ध-वक्रना का चतुर्थ भेद है। कुन्तक ने इसके लिए नागानन्द का उदाहरण दिया है। नागानन्द का नायक जीमूतवाहन मूलत अपने पिता की सेवा के लिए वन में जाता है, किन्तु वहा उसका गन्धर्व-कन्या मलयवती से प्रेम और विवाह होता है। फिर वह शखनूड नामक नाग की रक्ष के लिए अपने प्राणो का उत्सर्ग कर नागकुल की रक्षा करता है। इस प्रकार नायक को पितृभत्ति के साथ प्रेम तथा लोककल्याणमयी भूमा का सुख भी उसी प्रसग में प्राप्त हो जाता है।

हिन्दी में चित्रागवा (अनूदित), हिडिम्बा आदि में इस प्रकार की वफ्र्ता उपनःध होती है।-नानक एक कार्य की सिद्धि में त पर होते है, 'कन्तु उन्हें अनेक स्पृहणीय फल प्राप्त हो जाते है वनवाा-दण्ड-भोगी अर्जुन की वात्रा का उद्श्य मनोरजन है, परन्तु वहा उन्हें चित्रागदा की प्राप्ति हो जाती है। इली प्रकार हिडिम्बा में भीम लाक्षागृह से बचकर प्राणरक्षा के निमित वन में जाते हैं-वहा उन्हे मूल उद्दश्न की पूर्ति के साथ हिडिम्बा की उपलब्ति भी हो जाती है।

इस वक्रता का मूल रहस्प भी फुतूहल-वृत्ति के परितोष में ही निहित है। मानव-मन वैचित््न का प्रेमी है-विधाता की सृष्टि चित्र-विचित्र रहस्यो का आकर है, जीवन में पग पग पर अनेक रहस्नो का उद्धाटन मानव को मुग्ध-चकित करता रहता है। एक उद्दश््य की साधना में अ्रनुरत सदाशय व्यक्ति द्वारा अप्रत्याशित रूप से अनेक फलों की प्राप्ति हमारे मन मे अनायास ही एक मधुर विस्मय का भाव भर देती है। प्रतिभावान कवि इस मनोवैज्ञानिक सत्य को पहचानता हुआ इसके आधार पर घटनाओ का सयोजन कर अपने प्रबन्ध-कौशल का परिचय देता है।

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प्रबन्ध-वक्रता ] भूमिका [१०५

५ प्रधान कथा का द्योतक नाम

प्रधान कथा के द्योतक चिह्ह रूप नाम से भी कवि काव्य में कुछ अपूर्व सौन्दर्य उत्पन्न कर देता है और वह भी प्रवन्ध-वकता का एक भेद कहा जा सकता है। ४।२४। विदग्ध कवि कथा-विवान में तो चमतकार उत्पन करता हो हे-कभी कभी वह अपने काव् का नामकरण भी इतने अपूर्व कौशल के साथ करता है कि नाम के द्वारा हो कया का मूल रहस्य प्रकट हो जाता है। उदाहरण के लिए अभिज्ञानशाकुन्तलम् या मुद्राराक्षस नामो को लीजिए। अभिज्ञानशाकुन्तलम् की कथा का मूल चमत्कार अभिज्ञान मद्रिका द्वारा शफुन्तला के स्मरण पर निर्भर हेअभिज्ञान के सरो जाने पर शकुन्तला का विस्मरण और उसके पुन प्राप्त हो जाने पर शकुन्तला का पुन स्मरण-यही अभिज्ञानशाकुन्तलम् की कथा का मूल मौन्दर्य हे। कवि कालिदास ने इमे नाम में ही सन्निहित कर अपने फौशल का परिचय दिया है अभिज्ञानेन स्मृता शकुन्तला अभिन्ञानशफुन्तला, तामधिकृत्य कृत नाटकम् अभिज्ञानशाकुन्तलम्। मुद्राराक्षस का नामकरण भी ऐना ही है। इघर हिन्दी में कामायते, साकेत आदि काव्यों और रंगभूमि, कावाकल्प शरदि उपन्यामों के नामों में भी इती प्रकार का चमत्कार है। 'काम' अर्यात् जीवन को मागलिक इच्छा को आधार मान कर भाव, ज्ञान तथा कर्म वृत्तियों का समन्वय है फामायनी का मूल सदेश हे। इती को नाम द्वारा अभिव्यत्त क ने के उद्देश्व से कवि ने ननु और श्रद्धा की रुहानी का नाम कामायनी रसा है। माकेत नाम कथा के स्यान-ऐक्य का श्रनिव्यजक है-इसी प्रकार रगभूमि, कायाकल्प आदि से भी कथा के ध्वन्वार्य का वोध होना है। इनके विवरोत रामचरित, निगुनालवन, (हिन्दी में जयद्रयवष आरदि) नाम सर्वया अभिघात्मक हैं, कुन्तक ने इन्हे कल्पनाशून्य होने के कारण सवथा चमत्कारहोन माना है।

सामान्यत. यह प्रबन्ध-विघान का कोई विशेष नौन्दर्य नहीं है-किन्तु इनर्मे भी प्रबन्ध-कम्पना का योडा बहुत चमत्कार तो रहता ही है। कथा के प्राणभून चनत्कार को नाम में ही मनिहित फर देना भी प्रत्न्व-कल्पना की विदग्वता का धोतक है, इसीलिए फुन्तक ने इसे प्रबन्ध-वक्रता का एक भेद माना है।

६. एक ही मृन्न कथा पर व्ान्ित प्रबन्धों का वेचित्य च्वोवे-

एक हो कक्षा में महारुवियों द्वारा आावद्व काव्यबन्ध एक दूनरे में दिलक्षण होने के कारण किसी अमूल्य चक्रना का पोपण करते हैं। ४२५।

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१०६ । भूमिका प्रबन्ध-वक्रता

कयाभाग का वणंन समान होने पर भी अपने अपने गुणो से काव्य नाटक आदि प्रबन्ध पृथक पृथक होते है जैसे प्रारगो के शरीर में समान होने पर भी उनके अपने अपने गुरो से भेद होता है। ४।२५। श्रतश्लोक।

(इस प्रकार) नये नये उपायो से सिद्ध होने वाले, नीतिमा्गं का उपदेश करने वाले, महाकवियो के सभी प्रवन्धों में (अपनी अपनी) वक्रता अथवा सौन्दर्य रहता है। ४।२६ ।

उपर्युक्त वाक्यो का निष्कर्ष यह है कि एक ही मूल कथा का आश्रय लेकर भी प्रवन्ध-फुशल कवि अपनी प्रतिभा के चमत्कार से एक दूसरे से स्वया विलक्षण प्रबन्ध-काव्य, नाटकादि की सृष्टि करने में सफल हो जाते हैं। इन काव्य-नाटकादि को आ्धारभृत कथा एक होती है, परन्तु इन सभी का मूल उद्दश्य-आनन्दवर्घन के शब्दो में ध्वन्यार्थ सवया भिन्न होता है, और उसी के कारण इनका काव्य-सौन्दय भी एक दूसरे से विलक्षण होता है।

उदाहरण के लिए रामायण की मूल कथा के आधार पर सस्कृत में रामा- म्युदय, उदात्तराघव, वीरचरित, बालरामायण, फृत्यारावण, मायापुष्पक आदि अनेक नाटको की रचना हुई है। इन सभी की आधारभत कथा समान है, किन्तु फाव्य-सौन्दर्य एक दूसरे से सर्वथा विलक्षण है।-इसी प्रकार हिन्दी में भी राम- चरितमानस, रामचन्द्रिका, मेघनादवध (अनूदित), रामचरितचिन्तामणि, रामचन्द्रोदय, साकेत, साकेत-सत आरदि अ्रनेक प्रबन्ध-काव्यों का वस्तु-आ्धार एक होते हुए भी ध्वन्यार्थ और तदनसार काव्य-सौन्दर्य सवथा भिन्न है। एक ही मूल कथा का आाश्रय लेकर अनेक परस्पर-भिन्न प्रबन्धों को सृष्टि करना अपूर्व प्रबन्ध-कौशल का परिचायक है-इसीलिए कुन्तक ने इसे प्रबन्ध-वक्रता का एक महत्वपूर्ण (अनर्घ) भेद माना है।

यह भेद आानन्दवर्धन को प्रवन्ध-ध्वनि के समकक्ष है-आनन्दवर्घन का मत है कि कवि का इतिवृत्त-निर्वहण से कोई प्रयोजन नहीं, काव्य का प्राण तो वह ध्वन्यार्थ है जिसके माध्यम रूप में कवि कथा का प्रयोग करता है। अतएव एक हो कथा पर आश्रित काव्य अपने ध्वन्यार्थ के भेद से परस्पर भिन्न हो सकते हैं। कुन्तक न वस्तुपरक दृष्टि से विवेचन करते हुए इसे कविकोशल का एक प्रकार मान लिया है-जबकि श्ानन्द इसे रसानुभति-परक ही मानते है।

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कुन्तक और प्रवन्ध-कल्ना । भूमिका [१०७

प्रवन्ध-वक्रता के इन भेदो के साथ कुन्तक का वक्रता-वर्णन समाप्त हो जाता है।-कवि-प्रतिभा की वस्तुगत अभिव्यक्ति का नाम है वक्रता, अतएव कवि-प्रतिभा के आनन्त्य के अ्रनुसार वक्रता का भी श्रनन्त्य स्वत सिद्ध है। कवि की प्रतिभा न जाने किस प्रसग में किस प्रकार की नूतन कल्पना या नूतन चमत्कार की सृष्टि कर सकती है, इसका निश्चित ज्ञान किसको है? इसीलिए तो उपर्युक्त भेद सामान्य वर्गों का ही निर्देश मात्र करते हैं .वक्रता का आनन्त्य उनमें सीमावद्ध नहीं है।

कुन्तक और प्रबन्ध-कल्पना

अन्तिम दो वक्रता-भेदो के निरूपण में कुन्तक की प्रबन्ध-विधान-विषयक प्रौढ़ घारखाए सन्निहित है।

१ प्रबन्ध काव्य का श्रेष्ठतम रूप है। इसमें सन्देह नहीं कि अन्य आचार्यो की भाँति कुनतक भी प्रबन्ध को फाव्य का श्रष्ठतम रूप मानते हैं-प्रबन्ध को उन्होंने महाकवियों का फोतिफन्द अर्थात् उनके यश का मूल आधार माना है 'प्रबन्धेपु कवीन्द्राख कीतिकन्देपु कि पुन।' ४।२६ वों कारिका का श्रन्तश्लोंक। भारतीय परम्परा श्रारम्भ से ही प्रवन्ध काव्य को, जिसके अन्तर्गत महाकाव्य तया चरित-काव्य के अतिरिक्त नाटक तथा कथा-काव्य का भी अन्तर्भाव है, वाड मय का चरम विकास मानती आायी है। भरत, वामन, आनन्दवर्वन, श्रभिनवगुप्त, आादि समस्त गम्भीरचेता आचार्यों ने इसी मत का अत्यन्त प्रवल शब्दो में प्रतिपादन किया है.

भरत ·

नाटक महारस, महास्वाद, उदात्त भापाशली, महापुरुषो के वृत्त, समस्त भाव, रस, फमंप्रवृत्ि तथा नाना अ्रवस्याओं से युक्त होता है। ++कोई भी ज्ञान, शिल्प, विद्या, फला, कर्म अयवा योग ऐसा नहीं है जो नाटक में दृष्टिगत न होता हो। नाट्यशास्त्र २१।११६,,१२६,१२२।

वामन

क्रमनिद्धिम्नयो मगुत्तमवत्-अर्यात् मुत्तक और प्रबन्ध में वही मम्बन्य है जो माला और उत्तंत में-जिस प्रकार मालाग फन की कला में पारगंत होने थे

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१०८ ] भूमिका [ कुन्तक औौर प्रबन्ध-फल्पना

उपरान्त ही उत्तस-गुम्फन में सिद्धि प्राप्त होती है, इसी प्रकार मुक्तक-रचना की सिद्धि के उपरान्त ही कवि प्रबन्ध-रचना में सिद्धि लाभ करता है।-कुद व्यक्त्ति मुक्तक में हो अपने कविकर्म की महत्ता मान बैठते हैं-पर वह उचित नहीं है क्योकि जिस प्रकार अ्र्रग्नि का पथक परिमाणु प्रकाश-दान नहीं करता, उसी प्रकार मुत्तक काव्य भी सम्यक रूप से प्रकाशित नहीं होता। हिन्दी का० सूत्र १।३।२८-२६।

अ्रभिनवगुप्त

तच्च (रसाम्वादोत्कर्पकारक विभावादीना समप्राधान्यम्) प्रवन्ध एव। (अभिनवभारती, गायकव्राड सस्करण पृ० २२८)। विभाव आदि समस्त रसागो का सम्यक वर्णन रस के उत्कर्ष का कारण है, और वह प्रबन्ध काव्य में ही सम्भव होता है-अतएव मुक्तक की अपेक्षा प्रबन्ध का महत्व निश्यय ही अधिक है। मुक्तक में (जंना कि अभिनवगुप्त ने इसी प्रसग में आगे चलफर कहा है) इन सबकी पूर्व- पीठिका मन में कल्पित करनी पडती है-जबकि प्रबध में इनका प्रत्यक्ष वर्णन रहता है। आचार्यो के इस पक्षपात का कारण अपने आप में अत्यन्त स्पष्ट है। सबसे प्रमुख कारण तो यह है कि विभावादि रसागो के वर्णन का पूर्ण अवकाश होने के कारण रस का सम्यक परिपाक प्रबन्ध में ही सम्भव है-जीवन की अनेक परिस्थितियों में बारबार पुष्ट स्थायी भाव का जितना स्थायी परिपाक प्रबन्ध में हो सकता है, उतना मुक्तक की एक परिस्थिति में नही। प्ररो में निरन्तर प्रवहमान रस-धारा और रस के एक घूट के आस्वाद में जो अन्तर है वही प्रबन्ध और मुक्तक के आस्त्राद में अन्तर है। मुकक एक मन स्थिति की काव्याभिव्यक्ति है, प्रबन्ध जीवन-दर्शन की। प्रबन्ध में जीवन का सर्वाग-विस्तार तथा सम्पूर्ण अभिव्यक्ति रहती है, इसलिए आनन्द के अतिरिक्त काव्य के अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य पुरुषाथचतुष्टय की प्राप्ति का सान प्रबन्ध काव्य ही अधिक है। इस प्रकार काव्य की ऐहिक और आमुष्मिक दोनो सिद्धियों का माध्यम होने के कारण प्रबन्ध काव्य भारतीय काव्यशास्त्र में मूर्धन्य पर शोभित रहा है। - पाइचात्य काव्यशास्त्र में भी इस मत का प्रचार कम नहीं रहा। प्राचीनों का निर्णय तो निश्चय ही प्रबन्ध के पक्ष में था ही, आधुनिको में भी गम्भीरतर आलोचकों का प्राय यही मत है। अरस्तू ने प्रबन्ध काव्य को-दु खान्तकी और महा- काव्य-विशेष रूप से वुखान्तकी को कला का सबसे उत्कृष्ट रूप माना है। आघु- निको में, महान विषय वस्तु से सम्पन्न प्रबन्ध काव्य के प्रति मैथ्यू आर्नंर्ल्ड का पक्षपात प्रसिद्ध ही है। इघर रिचर्ड्स ने मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर दुखान्तको का 'मूल्य' सबसे अधिक निर्धारित किया है उनका तर्क है कि काव्य की सिद्धि मनो-

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कुन्तक और प्रबन्ध-कल्पना ] भूमिका [१०६

वृत्तियों के समन्वय में है। दुःखान्तकी की आधारनूत वृत्तिया है करणा और भय जो एक दूसरे के सर्वया विपरीत है क्योंकि करुणा का गुण आकर्षण है, भय का विफर्षण, अ्रतएव इनका समन्वय अ्रत्यन्त कठिन श्र उती अनुपात से पूर्ण भी होता है। हिन्दी के आचार्यो में प० रामचन्द्र शुक्ल की यह नान्यता तो इतनी बद्नमूल थो कि वे सूरदास तथा अन्य प्रगीत कवियो के साथ अन्याय कर बैठे हैं।

इसमें सन्देह नहीं कि उपर्युक्त अभिमत के पीछे पुष्ट तर्क है : व्यापक जोवन- दर्शन की अ्रभिव्यक्ति तथा रस का म्यायी परिपाक दोनों ही गण अपने आप में इतने महान हैं कि नामान्यत उनके आघार पर प्रवन्ध का गौरच स्वीकार करना ही पड़ता है। इसका एक स्यूल प्रमाण यह है कि सतार में ऐसे नाम चिरल हैं जो प्रबन्ध काव्प को रचना किये विना महाकवि के गौरव-भागी हुए हो।-यह कोई नियम नहीं है, एक प्रत्यक्ष प्रमाण मात्र है। परन्तु इम मान्यता को बहुत दूर तक नहीं ले जाना चाहिए-अन्यया इससे जीवन और काव्य के अन्य मौलकि सत्वो की उपेक्षा हो सकती है। तर्क की दृष्टि ने भी, इसमें सदेह नहीं कि व्यापकता महान गए है परन्तु तीव्रता का भी महत्व कम नहीं •जीवन का अनुभव-विस्तार वडी बात है तो क्षण की एकाग्र तन्मयता का भी प्रभाव कम नहीं होता है। निर्तर प्रवहमान रस काम्य है, परन्तु किसी किसी एक घूट में भी बड़ा तीखा आ्ानन्द होता है। इसीिए प्रगीत के पक्षपातियों की भी तस्या अल्य नहीं है-भारत में अमरुफ के एक इ्लोक को शत प्रबन्धो से अरधिक मूल्य देने वाले भी य ही। उघर पश्चिम के रोमानी युग में भी प्रगीत को ही अधिक प्रश्नय दिया गया था L आधुनिक युग के प्रनिद्ध कवि तथा काव्यममंज्ञ ड्रिंक्वाटर की तो स्पप्ट घोपणा है कि प्रत तत्त्र ही काव्य का प्राण है, और समस्त श्रष्ठ काव्य मूलत प्रगोत हो होता है। अ्रतएव जीरन-काव्य के मल्नो को विस्तार में ही आ्रांकना सर्वया सगत नहीं होगा-िन्तार के नाथ गहगई और ऊंचाई : समतल-सचरण के साथ ऊध्वं-सचर भी त्रपेक्षिन है। समतल विस्तार प्रचन्ध का क्षेत्र है, उध्व तथा अन्तःसचरण प्रगीत का. इन दोनो के नमन्वय मे ही जोवन-काव्व की पूर्णता सिद्व हो सकती है।-कहने का तात्पर्य यह है कि प्रबन्न को एफान्त महत्व र्वीकृति तो सवंया नान्य नहीं है, किन्तु उने एक विशेष लाभ यह प्राप्त है कि अपने व्यापक पलेवर में वह मृत्तक और प्रगीत को नो प्रन्तभूंत कर सेता है औौर इम प्रकार प्रगीत या मुत्तक को स्फटता नवोजित रप धारण कर पूर्णता की श्रोर अप्रनर हो मक्ती है। अतएव प्रबन्ध की श्रखठना एव मापेक्षिक नत्व है जिनका पधार यह है कि प्रबन्ध के अन्तर्गत प्रगीत का भी नवाधेन हो नकता है और प्रापः

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११० ॥ भूमिका [कुन्तक औररौर प्रवन्ध कल्पना

सभी उत्कृष्ट प्रबन्धो में प्रचुर मात्रा में होता है, परन्तु प्रगीत के सर्वथा सक्षिप्त कलेवर में प्रबन्ध गु के लिए अवकाश नहीं है।

२ प्रबन्धकाव्य का सौन्दर्य इतिवृत्त पर आश्रित न होकर कवि की सयोजक कल्पना या प्रसग-विधान-कौशल पर निर्भर रहता है।

गिर कवीना जीवन्ति न कथामायमाश्रिता ।।४।११

कुन्तक ने प्रबन्ध-वक्रता के भेद-निरूप में यह स्पष्ट निर्देश किया है कि प्रबन्ध काव्य का चमत्कार मूल इतिवृत्त पर आश्रित नहीं है। इस सौन्दर्य का आ्रधार तो कवि का प्रबन्ध कौशल है, तभी तो एक ही इतिवृत्त को लेकर श्रनेक सफल प्रबन्ध काव्यो की सृष्टि होती रही है जिनका चमत्कार एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। एक कथा कवि की विधायिनी कल्पना के द्वारा विभिन्न ध्वन्यार्थो-कुन्तक के शब्दो में वक्रताओ-को माध्यम बन सकती है। अर्थात् प्रबन्धत्व घटनावली में नहीं वरन् उनके विधान में निहित रहता है।

३ प्रबन्ध-विधान के कई प्रकार हैं।

(क) मूल रस में परिवर्तन-अर्थात् सवेद्य अनुभूति के अनुसार कथा का पुनर्भावन इसके लिए कवि प्रसिद्ध कथा को अपने स्वभाव के अ्रनुकूल एक भिन्न अनुभूति का माध्यम बनाकर, उसका पुनर्भावन करता है। इस प्रकार मनोविज्ञान की शब्दावली में मूल रस में परिवर्तन का अर्थ है कथा का पुनर्भावन।

(ख) नायक-चरित्र के किसी एक प्रधान पक्ष का चरम उत्कर्ष प्रदर्शित करने के लिए अग को अगी का रूप देकर कथा का पुनराख्यान।

(ग) कथा की नाटकीय परिणति-अर्थात् घटनाओं का तर्क-सगत विकास न दिखा कर बीच में ही किसी एक प्रधान घटना की चरमावस्था पर, आकस्मिक ढग से, कथा का अ्न्त कर देना। इसके लिए नियोजन में सहज विकास-क्रम की सगति के स्थान पर प्रकस्मिफता का फुतूहल रहता है।

(घ) प्रतिपाद्य के अनुसार कथा का पुनराख्यान -प्रत्येक कवि का अपने स्वभाव-सस्कार तथा परिस्थिति के अनुफूल एक विशिष्ट वृष्टिकोण होता है औ्रर

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कुन्तक और प्रवन्ध-कल्पना 1 भूमिका [१११

वहु प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काव्य में उसी को प्रतिफलित करने की चेष्टा करता है-ही उसका प्रतिपाद्य या सदेश होताै। इस प्रकार अपने अपने दुष्टिकोण के अनुकल श्रनेक कवि किसी एक हो प्रसिद्ध कथा का पुनरास्यान कर अपने प्रवन्ध- कौशल का परिचय देते हैं।

४ प्रबन्ध-विधान का आधार है प्रकरण-नियोजन।

यहा तक तो प्रबन्ध-विधान के समग्र रूप की विवेचना हुई, अब उसके शगो को लीजिए। प्रकरो की समष्टि का नाम प्रबन्ध है, अतएच प्रवन्ध-विधान अरन्त में प्रकरणो की नियोजना पर निर्भर रहता है। फुन्तक ने प्रकरणो-स्पष्ट शब्दों में- घटनाओं को नियोजन-कला के विषय में कतिमय स्पष्ट सकेत दिये हैं।

प्रकरण-नियोजन के मूल तत्व इस प्रकार हैं :

(प) घटनाओं का सजीव वर्णन।

(श्रा) घटनाग्नो का पूर्वापर-क्रम-चन्घन।

(इ) मूल उद्दश्य के सम्बन्ध से घटनाओं का उपकार्य-उपकारक सम्बन्ध, सामजस्य तया एकसूत्नता।

(ई) नवोन उद्भावना .-

१. चरित्र, उद्दक्य, अथवा रस के उत्कषं की दृष्टि से नवीन प्रसंगो की उद्भावना।

२ श्रचित्यादि को रक्षा के लिए प्रतिकूल अथवा अनावश्यक प्रसगो में परिघर्तन अ्रथवा उनका परित्याग ।

३. मनोरम प्रसगों की प्रतिरजना द्वारा रोचकता का समावेश।

भारतीय काव्यशास्त्र में प्रबन्ध-फौशरू का यह सर्वप्रथम मौलिक तया नांगो- पांग विवेचन है। कुन्तक मे पू्वं नाटक को कयावस्तु के नम्बन्व में भरत आदि ने, घौर रस के सम्बन्ध में आानन्दवर्घन ने प्रबन्ध-विधान का विवेचन किया है, परन्तु यरहा यह साध्य न होकर साधन मान् है। उदाहरण के लिए भरत ने नादक मी

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११४ । भूमिका [ कुन्तक औ्ौर प्रबन्ध-कल्पना

(४) यथावसर (रसो के) उद्दीपन तथा प्रशमन (की योजना) औ्रौर विश्रान्त होते हुए प्रधान रस का अ्रनुसधान। ३।१३।

(५) शक्ति होने पर भी (रस के) अ्रनुरूप ही अलकारो की योजना।

उपर्युक्त विवेचन के अनुसार आ्रनन्दवर्घन के मत से प्रबन्ध काव्य का प्राणतत्व रस है। यदि आधार-कथा ऐतिहासिक है तो उसमें वाह्य-चित्रण तथा शील निरूपण आदि सभी रस के अनुरूप होने चाहिए और यदि कथा कल्पित है तो उसकी कल्पना का मूल आधार रस ही होना चाहिए वस्तु के अन्तर्वाह्य शगों के निर्माण में रसौचित्य का पूर्ण निर्वाह होना चाहिए। इस दृष्टि से यदि प्रसिद्ध कथा का कोई श्रंश रसौचित्य में वाघक हो तो उसका परित्याग तथा अनुकूल प्रसग की उद्धावना कर कथा का सशोधन कर लेना चाहिए। कुन्तक ने प्रकरण-वक्रता के द्वितीय भेद- उत्पाद्य-लावण्य में इसी हेतु का मार्मिक विवेचन किया है। उत्पाद्य-लावण्य को- अ्रविद्यमान की कल्पना और विद्यमान का सशोधन-इन दो उपभेदों में विभक्त कर उन्होने अपनी समीक्षा को और भी सूक्ष्म तथा परिपूर्ण बना दिया है।

तीसरा हेतु है सन्धि-सन्ध्यगों की रचना • इसका उद्दश्य है कथा के विभिन्न अगो में सामजस्य। प्रधान कार्य को लक्ष्य मान कर कथा के समस्त प्रकरण परस्पर समजित होने चाहिए, यह वस्तु-विधान की मौलिक आवश्यकता है। आनन्दवर्घन का मत है कि यह सघि सध्यंग-विधान औौर इसका परिणाम-रूप समजन फेवल यान्त्रिक प्रक्रिया नहीं होना चाहिए उसके पीछे रस की प्रेरणा होनी चाहिए। फेवल श्ंगों का वस्तुगत सयोजन मात्र पर्याप्त नहीं है, यह विधान ऐसा होना चाहिए कि सहृदय के मन के साथ भी उसका पूर्ण सामजस्य हो सके। वास्तव में यही अन्तर्बाह्य-समजन प्रबन्ध का प्राणतत्व है। कुन्तक ने प्रकरण-वक्रता के दो भेदों के अन्तर्गत इस महत्व- पूर्ण तध्य का विवेवन किया है. उनके निर्वेशानुसार प्रकररों में प्रधान कार्य के सम्बन्ध से परस्पर उपकार्य-उपकारक भाव तथा पूर्वापर-पन्विति-क्रम रहना चाहिए। यह सामजस्य का ही प्रकारान्तर से निर्देश है, सामंजस्य का अर्थ भी तो यही है कि किसी एक मूलाधार पर विभिन्न प्रकरण पूर्वापर-क्रम तथा उपकार्य-उपकारक भाव से परस्पर समन्वित हों। इस समजन के पीछे रस की प्रेरणा रहनी चाहिए-यह उपबन्ध मूलत कुन्तक के दृष्टिकोण की परिधि में नहीं आता क्यों कि वस्तु रूप में कौशल ही उनका मुख्य विवेच्य है, फिर भी प्रबन्ध-वक्र्ता के विघान में रस की महत्व- प्रतिष्ठा उन्होंने प्रबल शब्दों में फी है

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कुन्तक मोर प्रधन्ध-कल्पना । भूमिका [ ११५

निरन्तररसोद्गारगर्भसदर्भनिर्भरा गिर कवीना जीवन्ति न कथामात्रमाशिता ४।४११।

अ्रर्थात् निरन्तर रस को प्रवाहित करने वाते सन्दर्भो से परिपूर्ण कवियो की वाएी कथा-मात्र के आश्रय से जोवित नहीं रहती है।

प्रवन्ध का चौया रसाभिव्यंजक हेतु अर्यात् श्रानन्दवर्धन के मत से प्रवन्ध- सौन्दर्य की चौथी साधन-विधि है यथावसर रसों के उद्दीपन तथा प्रशमन की योजना और विश्रान्त होते हुए प्रधान रस का अ्रनुसन्धान। इसका अर्य यह है कि यद्या प्रत्येक सफल प्रवन्ध काव्य का प्राणभूत एक मूल रस होता है जिसका अनुसन्धान कवि को निरन्तर करते रहना चाहिए फिर भो एकस्वरता का निवारण करने के लिए उसमें विभिन्न रसों के उद्दीपन और प्रशमन की व्यवस्था रहनी चाहिए-रसों का यह वचित्र्य रोचकता का मूल कारण है। कुन्तक ने प्रबन्ध-वक्रता के प्रथम भेद के अ्न्तर्गत ही यह स्वीकार किया है कि प्रबन्ध काव्य में ध्रात्मा रूप से एक रस का ही प्राधान्य होना चाहिए-इसके अतिरित्त प्रकरणन्वक्रता के दो भेदों के विवेचन में उन्होने रस के उद्दोपन और प्रशमन को बात भी प्रकारान्तर से कही है। प्रकरण- वक्रता के चतुर्य और पचम भेदों में सरस प्रसगो की अ्रतिरजना और रोचक प्रसंगों के विस्तृत वर्णन का निर्देश है। सरस प्रसर्गों की अ्रपतिरजना में रस का उद्दीपन निहित है-उधर ऋतुवणन, उत्सव, युद्ध आदि विभिन्न रोचक प्रसगों के विस्तृत वर्णनों का उद्दश्य भी एक रस के उद्दीपन और दूसरे के प्रशमन द्वारा रस-वैचित्र्य की सृप्टि करना ही है। इस प्रकार आानन्दवर्घन और कुन्तक के मन्तव्य एक ही है किन्तु यहां भी भेद दृष्टिकोण का ही है : आानन्दवर्घन रस को प्रवन्ध का साध्य मानते हैं, फुन्तक प्रवन्ध-वक्रता या प्रवन्ध-कोशल का साधन। इसके अतिरिक्त प्रानन्द ने जहा आगमन विषि का प्रयोग किया है, वहां कुन्तक ने निगमन-विधि फो अपनाया है-मर्यात् आनन्दवघन ने रस-सिद्धान्त को दुप्टि में रसकर कथाशों की रतपरक विवेचना की है, शरौर कुन्तक ने उपलब्ध प्रबन्ध काव्यों का विद्लेपण कर उनके कतिपय प्रफरणों की सरसता को प्रबन्ध चक्रता में समाहृत किया है।

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११६ । भूमिका [ पाशचात्य काव्य में प्रबन्ध-विधान

पाश्चात्य काव्यशास्त्र में प्रबन्ध-विधान

तरस्तृ का मत

पश्चिम में प्रबन्ध-विधान का सर्वप्रथम विस्तृत विवेचन अरस्तू के प्रसिद्ध ग्रथ काव्यशास्त्र (पोयटिक्स) में ही मिलता है। अरस्तू ने दुखान्तकी के प्रसग में, और फिर महाकाव्य के प्रसग में कथावसतु के गुणदोपो की विस्तार से चर्चा की है। उनके अनुसार कथावस्तु दो प्रकार की होती है सरल और जटिल। इस सरलता और जटिलता का निर्णायक है कार्य कार्य यदि सरल है तो कथानक सरल होगा, और कार्य यदि जटिल है तो कथानक जटिल होगा। सरल का अर्थ यह है कि कार्य में किसी प्रकार की द्विधा नहीं होगी-वह चरम घटना की ओर सीधा और अकरेला ही आगे बढता जाएगा। जटिल कार्य में विपर्यास अथवा विवृति अ्रथवा इन दोनो का ही प्रयोग रहता है। विपर्यास से अभिप्राय उस अप्रत्याशित स्थिति का है जिसके कारण सहसा किसी का भाग्यचक्र घूम जाता है। उपर्युक्त दोनो प्रयोग प्रबन्ध-विधान के चमत्कार हैं जिनके द्वारा कुशल कवि अपने काव्य में कूतूहल की सृष्टि करता है। (भारतीय काव्य में शकुन्तला के हाथ से मुद्रिका का जल में गिर जाना विपयार्स का और दुष्यत द्वारा भरत के मत्रसिद्ध मणिबन्ध का निर्बाध स्पर्श विवृति का उदाहरण है।) कुन्तक इन चमत्कारो से अवगत थे। प्रकरण-वक्रता के सप्तम भेद का चमत्कार बहुत कुछ ऐसा ही है, उसमें भी किसी रोचक अप्रधान प्रसग की अवतारणा द्वारा ऐसे रहस्य का उद्घाटन किया जाता है जो कथा में नतन चमत्कार की सृष्टि कर देता है। इसके अतिरिक्त उत्पाद्य-लावण्य नामक प्रकरण-वक्रता में भी इस प्रकार की परिस्थितियो की उद्भावनाए अन्तर्भूत हैं। भारतीय नाटक की निर्वहण सधि में प्राय इसी प्रकार की विवृति निहित रहती है इसीलिए वहा अद्भुत रस का समावेश आवश्यक माना गया है।

अरस्तू ने प्रबन्ध-विधान के कुछ आवश्यक गुण माने हैं जो सक्षेप में इस प्रकार हैं

१ प्रबन्ध का उद्दृश्य एक होना चाहिए-उसमें किसी प्रकार की द्विधा नहीं होनी चाहिए।

१ पैरीपैटिशा (आयरनी) २ एनेग्नारिसिस (डिस्क्लोज़र)

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पाइचात्य काव्य में प्रवन्ध-विधान] भूमिका [११७

२ कथानक में पूर्ण अन्विति होनी चाहिए। अ्र्परन्विति का प्रर्यं यह नहीं है कि उसमें केवल एक व्यक्ति की हो कथा हो-एक व्यक्ति की कया में भी अ्नेकता तथा अन्विति का अभाव हो सकता है। कथानक के ऐक्य का अर्थ है काय का ऐक्य, सफल कथानक का कार्य पूर्ण इकाई के समान होता है, उसकी भिन्न-भिन्न घटनाए इस प्रकार से एकसूत्रवद्ध होती हैं कि उनमें से एक के भी इघर-उधर होने से सम्पूर्ण विघान अस्त-व्यस्त हो जाता है।

३ पूर्ण इकाई से आशय यह है कि कथानक के आदि, मध्य और अवसान ये तीनो ही चरण निश्चित रहते हैं-और तीनो की ही अनिवार्यता स्वत सिद्ध होती है, न आदि के विना मध्य की स्यिति सम्भव है न मव्य के बिना शदि और अवसान को, शौर न अवसान के बिना आदि और मध्य का ही सगत विकास सभव है।

४. घटनाओं में औचित्य का निर्वाह सदा होना चाहिए। अनुचित घटनाओ से आनन्द की प्राप्ति नहीं होती।

५ कथानक के सभी प्रसंगो में सम्भाव्यता होनी चाहिए-सम्भाव्यता का अर्य यह है कि जो हुआ है वही पर्याप्त नहीं है वरन् जो हो सकता है उमका वर्णन भी निश्चय ही काम्य है, परन्तु जो हो सकता है उसी का-जो नहीं हो सकता उसका नहीं। सम्भाव्यता कथानक का अत्यन्त आवश्यक गुण है, जिन घटनाओं का विकास एक-दूसरे में से सहज रूप से नहीं होता, वरन् जो सयोग पर आश्रित रह कर मनमाने ढंग से आागे बढती हैं वे पाठक के मन का उचित परितोष नहीं कर सकतीं। इमीलिए यह आावश्यक है कि निर्गत आदि का सहज विकास कथानक में मे ही होना चाहिए, उनका आरोप बाहर से नहीं होना चाहिए।

६ प्रबन्ध-विधान का एक अन्य गुए है मजीव परिकल्पना। इमका आादाय यह है कि कवि को नभी वण्यं विषयो और घटनाग्ों का मनमा साक्षात्कार कर लेना चाहिए।

७ सजीव परिकल्पना के उपरान्त सजोव वर्णन भी उतना हो आावश््यक है। जब तक कवि घटनाओ का श्रौर परिम्यिनियों का मजीव वर्णन नहीं करेगा तब तक उनमें रोचकता का अभाव रहेगा।

८ प्ररन्य-कोशल का मौलिक आधार है नाधारणोकरण। नाधारणीकरता का अर्य यह है कि कवि घटना-विन्यास करने में पूर्व अपने वयानम की एक सार्वनोम,

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११८ ] भूमिका [ पाश्चात्य काव्य में प्रबन्ध-विधान

सर्वसाधारण एपरेखा वना लेता है। यह रुपरेखा देश-फाल के वन्धनों से मुक्त सर्व- ग्राह्य एव सर्वप्रिय होती है जिसके साथ सभी तादात्म्य कर सकते हैं। कुशल कवि इस रुपरेखा में ही प्रतिभा के द्वारा रूप और रग का समावेश कर अपने प्रबन्ध-विधान को पूर्ण कर देता है। शररस्तू के अनुसार प्रवन्ध काव्य का हो नहीं वरन समस्त काव्य का यही मूल आधार है।

कुन्तक ने अपने विवेचन में उपर्युक्त प्राय सभी विशेपताओ का समावेश अपने ढग से कर लिया है। उन्होने स्पष्ट लिखा है कि प्रधान कार्य निश्चय ही एक होना चाहिए, उसी के सम्बन्ध से कथानक के विभिन्न प्रकरण परस्पर उपकार्य-उपकारक भाव से सूत्रबद्ध रहने चाहिए। इन प्रकरो में निश्चित पूर्वापर-क्रम तथा अन्विति होनी चाहिए। इस विवेचन में अरस्तू के अनेक प्रबन्धगुणो का अ्र्पन्तर्भाव है-एक उद्दश्य, अरपरन्विति, आ्रादि-मध्य-अवसान की निश्चित स्थिति, घटनाओं का एक दूसरे से सहज निस्सरण, आादि गुरों का विवेचन अरस्तू और कुन्तक दोनो ने अपने अपने ढंग से किया है। वास्तव में ये वस्तु-विधान के मौलिक गु हैं, अतएव दोनों समीक्षक निगमन शैली का अनुसरण करते हुए स्वतत्र रूप से स्वभावत ही इन तक पहुच गये हैं। यही बात घटनाओ के औचित्य के विषय में भी कही जा सकती है। कुन्तक के उत्पाद्य-लावण्य भेद का आघार औचित्य ही है श्रानन्दवर्धन, धनजय आदि की भाँति वे भी अनुचित घटनाओं के निवारण पर वल देते हैं। 'सजीव परिकल्पना' और 'सजीव वर्णन' का उल्लेख कुन्तक ने शरम्भ में ही प्रकरण-वक्र्कता के सामान्य निरूपण में कर दिया है •अपने अभिप्राय को व्यक्त करने के लिए अपरिमित उत्साह की प्रवुत्ति' से उनका आशय वर्ण्य विषय की सजीव परिकल्पना तथा सजीव वर्णना का ही है। विषय के उत्फर्ष का अर्थ ही सजीव परिकल्पना और वर्णना है, और विषय का यह उत्कर्ष ही कुन्तक की प्रकरण-वक्रता का प्राण है।

अब अन्तिम प्रबन्धगुए साधारणीकरण रह जाता है। अरस्तू का मन्तव्य का यह है कि प्रत्येक कथानक के मूल में-चाहे वह कितना ही महाकार क्यों न हो जीवन की कतिपय मौलिक प्रवृत्तिया रहती हैं। कुशल कवि घटना-परम्परा का विस्तार करने से पूर्व इन्हीं मौलिक प्रवृत्तियों पर आश्रित शाश्वत सत्यों के आधार पर अपने प्रधान कार्य की रूप रेखा बना लेता है। यह रूपरेखा स्वभावत ही सार्वभौम और सर्व-साधारण होती है क्योकि इसका आधार जीवन की शाश्वत वृत्तिया होती है। इसी रूपरेखा में फिर वह अनेक नाम-रूप-मय तथ्यों का समावेश कर अपने प्रबन्ध-विधान को पूर्णता प्रदान करता है। भारतीय काव्यशास्त्र में साधारणी-

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पाश्चात्य काव्य में प्रबन्ध-विघान भूमिका I ११६

करण का अत्यन्त विशद विवेचन किया गया है, कुन्तक से पूर्व भट्टनायक इस सिद्धान्त की उद्भावना कर चुके थे। विशेष को साधारण रप में प्रस्तुत करना हो भट्टनायक का भावकत्व अथवा साधारणीकरण व्यापार है-और यह प्रबन्ध काव्य का ही नहीं, काव्य मात्र का मूल आधार है। कुन्तक ने इस मौलिक सिद्धान्त का पृथक विवेचन नहीं किया और इसका कारण यह है कि उनकी दुष्टि कविकॉशल पर हो अधिक थी। साधारणीकरण के सिद्धान्त का सम्वन्ध मूल्त काव्य के आस्वादन से है-कवि-व्यापार से इतना नहीं है, इसलिए वह कुन्तक के विचेचन से वाहर ही पड़ा। वैसे इसका एक वस्तुगत पक्ष भी है जिसका उल्लेख मरस्तू ने किया है, कुन्तक उससे अपरिचित नहीं थे-प्रधान कार्य की महत्व-प्रतिष्ठा कर, कथानक को गोए ठहरा कर तथा भूल-रस-परिवर्तन को प्रबन्ध-कौशल का प्रमुख गए मान कर उन्होंने शाशवत जीवन-वुत्तियों पर आश्रित उपर्युक्त प्रबन्धगण की श्रव्गत का परिचय दिया है, इसमें सन्देह नहीं।

अरस्तू के उपरान्त यूरोप के साहित्यशास्त्र में प्रवन्ध कौशल का लगभग प्रत्येक युग में ही गम्भीर विवेचन हुआ। वस्तु-विधान का अनेक दृष्टियों से आगमन- निगमन शंती से, अनेक रपो में विश्लेषण किया गया और उसके सामान्य तथा विशेष सिद्धान्त स्थिर करने के प्रयत्न हुए। प्रबन्ध-कोशल का आरधार है मानव का मानव के प्रति अनुराग। यह अनुराग रागात्मक सम्वन्धो को अतुभूति तथा जिज्ञामा में अभित्यक्त होता है। मानव-सम्बधो की अनुभूति का काव्यगत रप 'रस' है औ्रर जिलासा का है 'फुतूहल'। रस और कुतूहल ही काव्य की दृष्टि से प्रबन्ध के प्राणतत्व हैं-सफल प्रबन्ध में इनका अन्योन्याश्रय सम्बन्ध श्रर अन्तत. सामंजस्य रहता है। कुतहल रस के परिपाक में योग देता है और रस कुतूहल में रागात्मक सरसता उत्पन्न करता है। रस से जवनानुभूति की प्रगाढता और कुतूहत से वचित्र्य का ममावेश होता है-इस प्रकार जीवन-चित्र में समतल-विस्तार के ाथ ऊँचाई तथा गहराई आती है और वह पूर्ण हो जाता है। इन्हों दो प्रात-तत्वों के आवार पर प्रबन्ध-विधान के अन्य सामान्य एवं विशेष तत्वों का विकात हुआ है।

पाशच्ात्य साहित्यशास्त्र के अन्तगंत प्रवन्ध-विवेचन के सामान्य निष्कष इस प्रकार हे :-

वस्तुचिन्यास के प्रकार वस्तु-विन्यास मामान्यत तोन प्रकार का होना हैँ:

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१२०॥ भूमिका [ पाश्चात्य फाष्य में प्रवन्ध-विधान

(क) नायक-प्रधान-जिसमें घटनाचक्र नायक तथा उससे सम्बद्ध प्रमुख पात्रों के चारों ओर केन्व्रित रहता है। इसमें घटनाए अपने आप में कोई स्वतन्त्र महत्व नहीं रखतीं-वे चरित्र के उत्कर्ष की माध्यम या बाहक होती हैं औ्रर उनका गुम्फन-सूत्र प्रमुख पात्र के चरित्र-विकास के साथ प्रावद्ध रहता है।

(ख) घटना-प्रवान-जिसमें घटना-चक्र का स्वतन्त्र महत्व होता है। अनेक अनुकूल-प्रतिफूल परिस्थितियो से टकराता हुआ कथा का प्रवाह पविच्छन्न रूप से शगे बढता रहता है। घटना-प्रधान प्रबन्ध में कभी कभी एक ही कथा होती है जो बिना किसी द्विधा अथवा प्रतिघात के फलागम तक आगे बढती जाती है, कभी दो कथाए समानान्तर चलकर अ्रन्त में मिल जाती है, और कभी कभी अनेक कथाओं का सगम रहता है। इनका प्रवाह क्रमश पर्वती नदी के समान, समानान्तरवाही घाराओं के समान अ्रथवा समुद्र के तरगावर्त के समान होता है।

(ग) नाटकीय-जिसमें घटनाओं को अविच्छिन्न घारा न होकर महत्वपूर्ण परिस्थितियो का एकाग्र चिश्रण रहता है। ये परिस्थितिया भी परस्पर-सम्बद्ध तो होती हें परन्तु यहा सम्बन्ध-सूत्र प्रच्छन्न रहता है और विशेष परिस्थितियाँ इतनी उभार कर सामने रखी जाती है कि पाठक या प्रेक्षक का मन इन्हीं पर विराम करता हुआ क्रमश. कथा के अन्त तक पहुँचता है। यहाँ कथा की खण्ड वृश्यावली प्रत्यक्ष रहती है अखण्ड सम्बन्धसूत्र अप्रत्यक्ष रहता है। यह नाटकीय कथा-विधान केवल दृश्य काव्य में ही नहीं होता, श्रव्य काग्य में भी उसका प्रयोग सहज सम्भाव्य है-वेश-विदेश के अनेक श्रव्य काव्यो में इस प्रकार के नाटकीय वृश्यविधान का कोशल लक्षित होता है।

(घ) कुतूहल-प्रधान-फुतूहल-प्रधान प्रबन्ध-विधान में भी निश्चय ही घटनाए अपने आप में स्वतन्त्र महत्व न रख कर कुतूहल की उद्बुद्धि और परितृप्ति की साधन-मात्र होती हैं। इस प्रकार के प्रबन्ध-विधान में कथाकार प्राय रहस्य, चमत्कार, दैवयोग, आदि के द्वारा पाठक की कुतूहल-वृत्ति के साथ क्रोठा करता है। उसका मूल उपकरण होती है कल्पना, जो मानव-जीवन के रागात्मक सम्बन्धो से दूर अ्रपार्थिव अथवा अर्ध-पपार्थिय कृत्यों की सृष्टि करती रहती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रकार के प्रबन्ध-विधान में जीवन का गाम्भीयं कम ही मिलता है।

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पाशचाव्य काव्य में प्रबन्ध-विधान ] भूमिका

कथा-विधान का विकास

यूरोप में जीवन को मूलत सघर्ष माना गया है अतएव वहाँ के काव्यशास्त्र में सघर्ष के आधार पर ही जोवन-कथा के विकास की कल्पना की गई है। भारत का विश्वास-प्रधान श्रस्तिक जीवन-दर्शन, इसके विपरीत, सिद्धि अथवा फलागम को ही जीवन का मूल तत्व मानता है। वैसे तो न पाश्चात्य जीवन-दर्शन सिद्धि को उपेक्षा करता है और न भारतीय जीवन-द्शन संघर्ष के बिना सिद्धि की आ्राशा कर सकता है; परन्तु मूल भेद दृष्टि का है। सिद्धि को आ्रधार-्तत्व मान लेने से जीवन एक निश्चित उद्दश्य की नियमित साधना वन जाता है और उसके विकास में विश्वास की प्रेररा निहित रहती है। उघर संघर्ष पर अ्रधिक बल देने से जोवन में घात-प्रतिघात, द्वन्द्व, प्रतिकूल परिस्थितियों का विरोध और इन सब के परिणामस्वरूप सन्देह और अविश्वास का स्वतः ही प्राधान्य हो जाता है। एक में निश्चित सिद्धि की विश्वासमयी सावना है और दूसरे में अनिश्चित लक्ष्य की ओर सन्देहपूर्ण संघर्ष। जीवन-दृष्टि के इसी भेद के कारण भारतीय और पाइचात्य कथा-विकास में मौलिक अन्तर पड़ जाता है। भारतीय कथा-विकास की पच श्र्रवस्याओ्र और पाश्चात्य काव्य- शास्त्र में प्रतिपादित कथा के पाँच संस्यानो में यह अन्तर स्पष्ट है। एक में जहां चरम घटना वाधाओं को पार कर प्राप्त्याशा उत्पन्न करती है वहाँ दूसरे में चरम घटना का अरथं सशय की चरम परिणति मात्र है। एक का श्रन्त जहाँ निश्चय ही फलागम में होता है वहाँ दूसरे के अन्त में फल का नाश भी उतना ही सम्भव है।

पाशचात्य साहित्यशास्त्र में कया-विकास का सब से प्रवल माध्यम घात- प्रतिघात माना गया है। अनेक प्रकार के विघ्नो की फल्पना वहां कया के विकास में मूल रूप से ही निहित रहती है। यूरोप के कयाशास्त्रियों ने प्राय. तीन प्रकार के विरोधों की कल्पना की है :

१ पात तथा परिस्थिति-जन्य विरोध -जहां नायक श्रयवा प्रमुस पात्र के प्रयत्नों फा विरोध अन्य पात्रों अ्रथवा जीवनगत परिस्थितियों द्वारा होता है। A २ दैविक विरोध-जहा प्राकृतिक अथवा अरलौकिक परिस्यितिया प्रनिघात करती हैं।

३ चारित्रिक द्वन्द्व प्रथना दोप-जहा नायक या मुस्य पाग का अपना ही चरित्रगत दन्द, ग्रन्यि, पथवा दोष उसके प्रयत्नों में वाघक होता है।

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१२२ 1 भूमिका [ पाश्चात्य काव्य में प्रवन्ध-विधान

कुन्तफ के दृष्टिकोण में निश्चय ही भारतीय जीवन-दर्शन की अ्रभिव्यक्ति मिलती है। उन्होंने भी अपने ढग से पाश्चात्य काव्यशास्त्र के उपर्युक्त तोनों कथा- प्रकारो को मान्यता दी है। प्रबन्ध-वक्र्ता के द्वितीय भेद में जहां नायक के चरमोत्कर्ष पर ही कथा समाप्त कर दी जाती है नायक-केन्द्रित कथा की ही स्वीकृति है। मध्य में ही किसी उत्कर्षपूर्ण घटना पर कथा का आकस्मिक अन्त नाटकीय कथा- विधान का द्योतक है। एक फल की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील नायक के द्वारा अप्रत्याशित रूप से अ्र्नेक फलों की प्राप्ति, जिसे कुन्तक ने प्रवन्ध-वक्रता का चतुर्थ भेद माना है, घटना-प्रधान कथा का ही एक प्रकार है। फलागम की अनेकता के साथ कथा स्वत ही अनेकमुखी हो जाती है और उस में फलागम से सम्बद्ध घटनाओं का महत्व अरनायास ही सिद्ध हो जाता हैहल्के कुतूहल पर आश्रित कथाओं का संस्कृत वाड्मय में अरभाव नहीं है किन्तु गम्भीरचेता आचार्यों ने उनको कभी महत्व नहीं दिया। इसलिए कुन्तक के प्रबन्ध-विवेचन में इस प्रकार के कुतूहल-वर्द्धक कथा- चमत्कारों का उल्लेख नहीं है। कथा के विकास में कुन्तक ने भारतीय जीवन-दृष्टि के अनुसार ही सवत्र फलागम का प्रभुत्व स्थापित किया है। प्रवन्ध-कौशल के जिन विभिन्न तत्वों का उल्लेख उन्होंने किया है उन सभी का आधार नायक की सिद्धि ही है। नवीन उद्भावनाएं-अविद्यमान की कल्पना और विद्यमान का सशोघन- भी नायक के फलागम में सहायक होने के लिए ही की जाती हैं। कथा के प्रकररों के उपकार्य-उपकारक भाव और अन्विति का मूल आधार भी फलागम ही है। विपरीत परिस्थितियों की कल्पना से कुन्तक पराड्मुख नहीं हैं किन्तु उनको कहों भी उभार कर नहीं रखा गया-वे तो मानों फलागम के साधना-मार्ग की सहज परिस्थितिया मात्र हैं, उनसे अधिक कुछ नहीं।

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वक्रोक्ति तथा अन्य काव्य सिद्धान्त

वक्रोक्ति और अलंकार

वक्रोक्ति का अलंकार के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है-आलोचकों ने वक्रोक्ति को प्राय अलंकार का अग मान कर वक्रोति-सम्प्रदाय को अलंकार-सम्प्रदाय का ही पुनरुत्यान मात्र सिद्ध किया है। इस कथन में निश्चय हो सत्यता है, परन्तु फिर भी इन दोनो में स्पष्ट भेद है, और यह भेव स्ूल अवयवगत न होकर तत्वगत है। वक्रोक्ति के स्वरूप को पूर्णतया हृदयंगम करने के लिए अलकार, और फेवल अलंकार हो नहीं, अन्य काव्य-तत्वो के साय भी उसका तुलनात्मक अ्ध्ययन आवश्यक है।

अलंकार औरर श्र्प्रलंकार्य :-

अलंकार और अलकार्य के भेदाभेद का प्रश्न यूरोप में अभिव्यंजनावाद के प्रवतन के पश्चात् आ्रधुनिक काव्यशास्त्र में विशेष चर्चा का विषय वन गया है। परन्तु भारतीय काव्यशास्त्र के लिए यह फोई नवीन विषय नहीं है। प्राचीन आालंकारिफों ने-भामह, दण्डी, वामन शदि ने अलकार और अलंकार्य का अभेद माना है और समस्त काव्य-सौन्दर्य को भलकार के अन्तगंत ही रखा है।

काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान्प्रचक्षते। दण्डो

सोन्दर्यमलकार। वामन n'

इस प्रकार इन आचार्यों के अनुसार पलंकार काव्य-ोभा के कारण अथवा पर्याय है: इन्होंने इसी दृष्टि से समस्त रस-प्रपंच को रसवदादि अलंकार-चक्र में अन्तर्भूत कर लिया है। इनके मत से काव्य का प्रस्तुन पक्ष अरमणीय या चमन्कार-रहित होने पर काय्य न होकर बार्ता मात्र रह जाता हैँ।

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१२४ । भूमिका [ वक्रोक्ति और अलंकार

गतोऽस्तमर्को भातीन्दु यान्ति वासाय पक्षिण। इत्येवमादि कि काव्य? वार्तामेना प्रचक्षते ॥ भामह-काव्यालकार २, ८६

अर्थात् सूर्य अ्रस्त हो गया, चन्द्रमा का उदय हो गया है, पक्षिगण अपने अपने नीडों को लौट रहे हैं ... इत्यादि-यह क्या कोई काव्य है ? इनको वार्ता कहते हैं। रमणीय प्रपथवा चमत्कारपूर्ण होने पर काव्य का यह प्रस्तुत पक्ष अलकार से श्र्भिन्न हो जाता है। अभिप्राय यह है कि अलकारवादी प्रस्तुत अर् का निषेध नहीं करते, परन्तु उसमें यथावत् काव्यत्व की सम्भावना नहीं मानते-किसी भी प्रकार के सौन्दर्य से विशिष्ट होने पर फिर वह अपने समग्र रूप में अलकार बन जाता है। अर्थात् शब्द-अर्थ के दो रूप हैं (१) प्रकृत (अनलकृत रूप) (२) अलफृत रूप।-इनमें से प्रथम अकाव्य है द्वितीय अपने समग्र रूप में ही काव्य है-वही अलकार भी है, उसमें अलकार और अलकार्य का भेद नहीं है। रस-ध्वनिवादियो ने रस को श्रथवा शब्द-अर्थ को-और स्पष्ट शब्दों में शब्द-अर्थ को प्रत्यक्षत और रस को मूलत .- अलकार्य माना है और उपमा अनुप्रासादि को अलकार नाम से अभिहित किया है। उन्होंने अलकार और अलकार्य की पृथक सत्ता का स्पष्ट निर्देश किया है। अलकार की उपादेयता के विषय में आानन्दवर्धन का मत है

विवक्षा तत्परत्वेन नागित्वेन कदाचन। २-१८

अर्थात् अलकार की विवक्षा रस को प्रधान मान कर ही होनी चाहिये अगी रूप में नहीं। इसका अभिप्राय यह है कि अगी होने के नाते रस अलकार्य है-अलकार की सार्थकता उसका उत्कर्षवर्धन करने में ही है। इस प्रकार अलकार और अलकार्य की पुथक्ता सिद्ध है। मम्मट और विश्वनाथ ने इसी मन्तव्य की अपने अपने ढग पर पुष्टि की है

उपकुर्वन्ति त सन्त येजङ्गद्वारेणा जातुचित्- हारादिवदलका रास्ते काव्यप्रकाश ६६७

अरथात् रस रूप श्रगी को अलकार शब्द-अर्थ रूप श्रग के द्वारा उपकृत करते हैं हारादि आ्रराभूषण जिस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से शरीर को सुशोभित करते हुए मूलत आत्मा का उत्कर्ष करते हें, इसी प्रकार अलकार प्रत्यक्षत. शब्द-अर्थ को भूषित करते हुए मूल रूप में रस का उपकार करते हैं। इस सिद्धात के अनुसार उपमादि अलकार हैं और शन्द-अर्थ प्रत्यक्ष रूप में तथा रस मूल रूप में अलकार्य है इसी तथ्य का प्रतिपादन विश्वनाथ भिन्न प्रकार से करते हैं

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वक्रोक्ति और अलकार 1 भूमिका [१२५

शन्दार्ययोरस्थिरा ये धर्मा शोभातिशायिन रसादीनुपकुर्वन्तोऽलकारास्ते ......... । (सा० द०)

परर्थात् अलकार शब्द-अ्रर्थ के अस्थिर धर्म हैं जो उनकी शोभा की अभिवृद्धि करते हए मूलत रस का उपकार करते है। यहा अलकरण का अर्थ किया गया है शोभा- वर्घन-प्रकृत शोभा की अभिवृद्धि, और प्रत्यक्ष रूप से शब्द-प्रर्थ को तथा तत्व रूप से रस को अलकार्य माना गया है। रस-ध्वनिवादियो की उपमा-हारादिवत् वा अगदादिवत्-ही अलकार की भिन्नता को पुष्ट करती है। परन्तु भ्ागे चलकर इन आाचार्यों ने भी, ऐसे श्रनेक अलकारो की अलकारता स्वीकार कर ली है जो वास्तव में वर्णन-शैलो के प्रकार न होकर वण्यं विषय के ही रूप हैं। अत यह शका हो सकती कि उनके मन में भी कदाचित अलकार और अलकार्य का पार्थक्य एकांत स्पष्ट नहीं था।

कुन्तक की दृष्टि इस विषय में सर्वथा निर्भ्रान्त है, उन्होने अ्रनेक प्रसंगो में अ्रपनेक प्रकार से इस प्रश्न को उठाया है और अत्यन्त स्पष्ट शब्दो में अपना मन्तव्य 1 व्यक्त किया है। १ अलकार औौर अलंकार्य को अलग अ्प्रलग करके उनकी विवेचना उस (काव्य की व्युत्पत्ति) का उपाय होने से ही की जाती है। (वास्तव में तो) अलंकार- सहित (शन्द-अर्थ और अलकार की समपप्टि) हो काव्य है।

अलकृति का अ्पर्य अलकार है। जिसके द्वारा अलफृत किया जाय (उसको अलकार कहते हैं) इस प्रकार विग्रह करने से। उसका विवेचन अर्यात् विचार किया जाता है। और जो अलकरसीय वाचक (शब्द) रूप तथा वाच्य (प्रयं) रूप है उसका भी विवेचन किया जाता है। सामान्य तथा विशेष लक्षण द्वारा उनका निस्पण किया जाता है। किस प्रकार? अलग करके, निकाल कर, पथक् पूथक् करके। जिस समुदाय (रूप वाक्य) में उन दोनों का अन्तर्नाव है उस से विभक्त करके। किस कारण? उस का उपाय होने से। x X X इस प्रकार का विवेचन माव्य-व्युत्पत्ति का उपाय हो जाता है। X X समुदाय के अत पाती शसत्य पदार्थों का भी व्युत्पत्ति के लिए (शास्त्रो में) विवेचन पाया जाता है। जैसे षैयाकरों के मत में वाक्य के अन्तर्गगत पदो का और पदो के अ्रन्तगंत वर्णों का अलग अलग कोई अस्तित्व नहीं हैं, फिर भी पदों के अन्तगंत प्रकृति-प्रन्यय का औौर वावय के अ्न्तगंत पदों का ललग भलग विवेचन व्याकरण- प्रन्नो में किया जाता है। X X X

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१२६ ] भूमिका [वक्रोक्ति और अलकार

यदि इस प्रकार काव्य-व्युत्पत्ति का उपाय होने से श्रसत्यभ्त (अलंकार तथा अलंकार्य) उन दोनों का पार्थक्य किया जाता है, तो फिर सत्य क्या है, इसको कहते है। तत्वं सालंकारस्य काव्यता ...... अर्थात् सालकार (शव्दार्थ) की काव्यता है, यह यथार्थ (तत्व) है।

इसका अभिप्राय यह हुआ कि अलकार-सहित अर्थात् अलंकरण-सहित सम्पूर्ण, अवयवरहित समस्त समुदाय की काव्यता है-कविकर्मत्व है। इसलिए अलकृत (शब्द-अर्थ) का ही काव्यत्व है ... न कि अलकार का काव्य में योग होता है। (हिन्दी वक्रोक्तिजीवित-कारिका ६ की वृत्ति।)

आागे चल कर प्रथम उन्मेष की ही दसवीं कारिका में कुन्तक ने एक स्थान पर अलकार और अलकार्य का पृथक उल्लेख किया है

ये दोनो (शब्द और अर्थ) अलंकार्य होते हैं, और चतुरतापूर्ण शैली से कथन (वैदग्ध्यभगीभगिगति) रूप वक्रोक्ति ही उन दोनों का अलंकार होती है। (व० जी० १।१०)। परन्तु तुरन्त ही वे एक शका उठा कर उसका निराकरण कर देते हैं.

पूर्व पक्ष-आपने पहले स्थापित किया है कि (अलंकार और अलकार्य के विभाग से रहित सालकार काव्य का ही काव्यत्व है तो यह क्यों कहते हैं ?

उत्तर पक्ष-ठीक है। किन्तु वहाँ भेवविवक्षा से वर्णपद-न्याय से अ्थवा वाक्यपद-न्याय से (तत्व रूप में) असत्य होते हुए भी विभाग किया जा सकता है, यह कहा जा चुका है। (ग्यारहवीं कारिका की वृत्ति)।

इस प्रकार कुन्तक का दृष्टिकोए इस विषय में सर्वथा निर्भरान्त है। उन के मन्तव्य का सार यह है -

(१) तत्व रूप में अ्र्प्रलंकार औ्र्प्रौर अलकार्य की पृथक् सत्ता नहीं है।

(२) काव्य में शब्द-अर्थ रूप अलकार्य का और वक्रोक्ति रूप (जिसके अ्रन्तगंत काव्य के उपमादि सभी प्रकार के शोभादायक तत्वों का समावेश है) अलंकार का पूर्ण तादात्म्य रहता है। अलंकार कोई वाह्य वस्तु नहीं है जिसका शव्व-अर्थ के साम योग होता है।

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वक्रोक्ति और अलंकार ] भूमिका [१२७

(३) फिर भी काव्य-सौन्दर्य को हृवयंगम करने के लिए व्यवहार रूप में ( इन दोनों का पृथक विवेचन किया जा सकता है और वह उपादेय भी होता है। केवल काव्यशास्त्र में ही नहीं वरन् व्याकरणादि अन्य शास्त्रों में भी तत्व और व्यवहार में इसी प्रकार की भेद-कल्पना की जाती है। उदाहरण के लिए व्याकरण का सिद्धान्त यह है कि वाक्य के अन्तर्गत पदों का औ्रर पद के अ्न्तर्गत वर्णगों का पृथक अस्तित्व नहीं है, तो भी, व्यवहार रूप में, व्याकरण के तत्व को समझने के लिए, पदो के अन्तर्गत प्रकृति-प्रत्यय का और वाक्य के अन्तर्गत पदो का पृथक विचार सफलताप वंक किया जाता है।

क्रोचे का मत

पाइचात्य काव्यशास्त्र में भी अलंकार और अलकार्य का व्यवहारगत भेद प्रायः प्रारम्भ से ही मान्य रहा है, वहां इस भेद की स्पष्टता की मात्रा में तो अन्तर होता रहा है परन्तु उसका निषेध क्रोचे से पूर्व किसी ने नहीं किया। क्रोचे का सिद्धान्त संक्षेप में इस प्रकार है. कला मूलत सहजानभूति अथवा स्वयंप्रकाश्य ज्ञान है ; मर सहजानुभूति अररभिव्यजना से अभिन्न है, जो अभिव्यजना में मूर्त नहीं होती वह सहजानुभूति न होकर सवेदन या प्रकृत विकार मात्र है। अपने मूर्त रूप में वस्तु यन्त्रवत् है, निष्क्रिय है, मानवात्मा उसका अनृभव तो करती है, परन्तु सृजन नहीं करती। तहजानुभूति से अभिन्न होने के कारण अभिव्यंजना श्र्खंड है-रोति, अलंकार आदि में उसका विभाजन नहीं हो सकता।

"अभिव्यजना का विभिन्न श्रेसियो में अ्रवैंध विभाजन साहित्य में अपरलंकार- सिद्धान्त अ्रयवा रीतिवर्ग के नाम से प्रसिद्ध है। X X उपचार के चौदह भेद, शब्द और वाकय के अलकार ...... ये अयवा अभिव्यजना के ऐसे ही प्रकार वा कोटिक्रम, परिभाषा का प्रयत्न करने पर यह प्रकट कर देते है कि तत्व रूप में उनका फोई अस्तित्व नहीं है क्योकि या तो वे शून्य में खो जाते हैं-या निरयंक वाग्जाल मात्र रह जाते है। इसका एक उदाहरस उपचार की यह परिभाषा है कि उचित शब्द के त्यान पर किसी अन्य शब्द का प्रयोग उपचार है। अव प्रश्न है कि यह कष्ट क्यो उठाया जाय ? उपयुत्त शब्द के लिए अनुपयुक्त शब्द का प्रयोग हो क्यों किया जाय ? जब प छोटा और सुगन मार्ग जानते हैं तो तम्बे औ्रौर दुगम माग से जाने का कया लाभ ? इसका उत्तर कदाचित् यह दिया जाना है कि कुछ १. मेटाफ़र

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१२८ ] भूमिका [ वक्रोक्ति और अलकार

परिस्थितियो में उपयुक्त शब्द उतना अभिव्यजक नहीं होता जितना कि तथाकथित अनुपयुक्त द्योतक (लाक्षणिगक) शब्द। किन्तु ऐसी स्यिति में यह द्योतक शब्द ही वास्तव में उचित शब्द है, और तथाकरथित उपयुक्त शब्द श्रव्यजक अतएव अत्यन्त 1,

अरनुपयुक्त है। इसी प्रकार की युक्तियाँ अरन्य वर्ग-भेदो के विषय में भी दी जा सकती हे-उदाहरण के लिए अलकार को लीजिए। "यहाँ यह पूछा जा सकता है कि उक्ति में अलकार का नियोजन किस प्रकार किया जा सकता है ? वाहर से ? तब तो वह उक्ति से सदव पृथक रहेगा। भीतर से? ऐसी दशा में या तो वह उक्ति का साधक न होकर वाधक हो जाएगा, या फिर उसका अरग वन कर अलकार ही न रह जाएगा। तव तो वह उक्ति का ही एक अभिन्न अग वन जाएगा। (एस्येटिक पृ० ६६)। आचार्य शुक्ल का मत क्रोचे का उत्तर शुक्ल जी ने उतने ही प्रबल शब्दो में दिया है "अलकार-अलकार्य का भेद मिट नहीं सकता। शब्द-शक्ति के प्रसग में हम दिखा आये हैं कि उक्ति चाहे कितनी ही कल्पनामयी हो उसकी तह में कोई 'प्रस्तुत अर्थ' अवश्य ही होना चाहिए। इस शर्थ से या तो किसी तथ्य की या भाव की व्यजना होगी। इस 'अर्थ' का पता लगा कर इस बात का निर्णय होगा कि व्यंजना ठीक हुई है या नहीं। अलकारों (अर्थालकारों) के भीतर भी कोई न कोई अर्थ व्यग्य रहता है, चाहे उसे गौ ही कहिए। उदाहरण के लिए पन्त जी की ये पक्तियाँ लीजिए . "बाल्य-सरिता के कूलो से खेलती थी तरग सी नित -इसी में था असीम अवसित"।

इसका प्रस्तुत अर्थ इस प्रकार कहा जा सकता है-"वह बालिका अपने बाल्य-जीवन" के प्रवाह की सीमा के भीतर उछलती कूदती थी। उसके उस बाल्य-जीवन में अत्यन्त अरधिक और अनिर्वचनीय आनन्द प्रकट होता था।"

बिना इस प्रस्तुत अर्थ को सामने रखे, न तो कवि की उक्ति की समीचीनता की परीक्षा हो सकती है, न उस की रमणीयता के स्थल ही सूचित किये जा सकते है। अब यह देखिए कि उक्त प्रस्तुत अर्थ को कवि की उक्ति सुन्दरता के साथ अच्छी तरह व्यजित कर सकी है या नहीं। पहले 'वाल्य-सरिता' यह रूपक लीजिए। कोई अवस्या स्थिर नहीं होतीं, प्रवाह-रूप में बहती चली जाती है, इससे साम्य ठीक है।

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वक्रोक्ति औौर अलंकार 1 भूमिका [१२६

प्रब नदी की मूर्त भावना का प्रभाव लीजिए। नदी की धारा देखने से स्वच्छता, द्रुत गति, चपलता, उल्लास आदि की स्वभावत भावना होती है, अत प्रभाव भी बैसा ही रम्य है जैसा भोली भाली स्वच्छ-हृदय प्रफुल्ल अंर चचल वालिका को देखने से पडता है। अत कह सकते हैं कि यह रूपक समीचीन और रम्य है। वात्यावस्या या कोई अवस्या हो उस की दो सीमाए होती हैं-एक सीमा के पार व्यतीत अ्वस्था होती है दूसरी के पार आने वाली अवस्था। अत. 'दो कूलो' भी बहुत ठीक है। तरंग नदी की सीमा के भीतर ही उछलती है, वालिका भी वाल्यावस्था के बीच स्वच्छन्द कोडा करती है। अत 'तरग सी' उपमा भी अच्छी है। असीम अर्थात व्रह्म अनन्त-म्ानन्द-स्वरूप है और उस वालिका में भी अपरिमित आ्नन्द का आभास मिलता है अ्र्पत यह कहना ठीक ही है कि मानो उस ससीम वाल्य जीवन के भीतर प्रसीम प्रानन्द-स्वरप व्रह्म ही आ बैठा है। इसलिए यह प्रतीयमान उत्प्रेक्षा भी अनूठी है क्यो कि इसके भीतर 'मधिक' अलंकार के वचित्य की भी भलक है।"

शुवल जी के वत्तव्य का सारांश इस प्रकार है :-

(१) प्रत्येक काव्य-उक्ति में एक प्रस्तुत अर्प्र्थ वर्तमान रहता है-यह प्रस्तुत अर्य हो अलकार्य है। यह अलकार्य प्रस्तुत भ्रर्य भाव रूप होता है या (रमरीय) तथ्य रूप।

(२) प्रत्येक अलकार (अर्थालकार) के पीद्धे भी एक प्रस्तुत श्रर्य रहता है-उसी के द्वारा अलंकार में सन्निहित अप्रस्तुत-विधान के शचित्यानौचित्य का वणंन हो सकता है।

(३) अतएव अलंकार्य और अ्पलकार में अपरनिवार्य भेद है जो मिट नहीं सकता।

विवेचन

भलकार्य-अलकार-भेद आधुनिक समालोचनाशास्त्र का अ्रत्यन्त रोचक प्रसंग है। एक उदाहरा लेकर उस के पक्ष-विपक्ष की आलोचना करना अधिक ममीचीन होगा।

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१३० ] भूमिका [ वक्रोक्ति औरर अपरलक्

नील परिधान बीच सुकुमार खुल रहा मृदुल अघखुला अग, खिला हो ज्यो विजली का फूल मेघ-वन वीच गुलावी र्ग। (श्रद्धा, कामायर्न

सस्कृत काव्यशास्त्र के अरनुसार, प्रस्तुत उद्धरण में, 'कोमल नील परिधान श्रद्धा का सुकुमार अधखुला अ्रङ्ग अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होता था' यह तो है प्रस्तु अर्य अथवा वस्तु, मनु के हृदय में उद्वुद्ध उसके प्रति आकर्षण अथवा अनुराग भाव (रस), और 'मानो मेघो के वन में बिजली का गुलावी फूल खिला हो' य अरप्रस्तुत-विधान है उत्प्रेक्षा अलद्धार। यहा उत्प्रेक्षा अलड्ार वस्तु के चित्रण (प्रस्तु अर्थ) को रमणीय बनाता हुआ, भाव का भी उत्कर्ष करता है। प्रस्तुत अर्थ 'नी परिधान में श्रद्धा का अरग अर््रत्यन्त सुन्दर लगता है' तथ्य-कथन मात्र है, उससे सहृद के मन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पडता। इसीलिए अप्रस्तुत-विधान की भावश्यकर पडी। श्रद्धा का रक्तिम-गौर अग प्रस्तुत है और बिजली का फूल अप्रस्तुत, उघ रुएदार नीली ऊन का परिधान प्रस्तुत है और मेध-वन अप्रस्तुत-इसके आगे फि नील परिधान से भलकता हुआ रक्तिम-गौर अग सयुक्त रूप में प्रस्तुत है और मेघव में हँसता हुआ विद्युत्पुष्प अप्रस्तुत। यह अप्रस्तुत-विधान श्रद्धा के रूप को निश्चय ह प्रभावक बना देता है क्यों कि सहृदय की कल्पना को उत्तजित करता हुआ यह उर के चित्त को उद्दीप्त कर देता है जिस से उस के उद्बुद्ध रति भाव के 'भाव' अयव 'रस' रूप में आस्वाद्य होने में सहायता मिलती है। इस प्रकार सस्कृत काव्यशास्त्र में वस्तु, रस (भाव) और अलकार की सत्ता पृथक मानी गयी है-इन तीनों : घनिष्ठ सम्बन्ध श्रवश्य है, परन्तु उनकी अपनी-अ्पनी सत्ता भी है। यूरोप का प्राचीन काव्यशास्त्र भी इस पार्थक्य को स्वीकार करता है-अरस्तू से लेकर आर्नेल्ड तब यह मान्यता प्राय' अक्षुण्सा रही है।

क्रोचे को यह विश्लेषण सर्वथा अमान्य है। उनके अनुसार उपर्युक्त उत्ति अपने छन्दोबद्ध रूप में ही अखण्ड है, वस्तु, भाव और अलकार की पृथक खण्ड- कल्पना अनर्गल है। इसी प्रकार प्रस्तुत और अप्रस्तुत का भेद भी स्वथा मिथ्या है- जिसे प्रस्तुत अर्थ कहा गया है वह भिन्न अर्थ है, उक्ति का समग्र अर्थ ही प्रस्तुत अर्थ है। 'नील परिधान में श्रद्धा का प्र्रग अ्ररत्यन्त सुन्दर लगता है' यह एक बात हुई, औौर, 'नोल परिधान में श्रद्धा का अरग ऐसा लगता है जसे मेध-वन में बिजली का फूल' यह बसरी बात। इन दोनों उक्तियों में केवल उत्प्रक्षा अलकार का ही अन्तर नहीं

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वक्रोक्ति मौर अलंकार। भूमिका [ १३१

है-दोनो की मूल व्यंजना ही भिन्न है। इस प्रकार क्रोचे को वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ का भेद भी अमान्य है, उनके अनुसार वे एक ही उक्ति के दो अर् न होकर वो पृथक उक्तियां हैं। प्रत्येक उक्ति का वाच्यार्य ही उस का एक मात्र अर्थ है-एक उक्ति का ए ही अर्य, एक ही व्यजना हो सकती है। उस विशप परिस्यिति में गान्धार-कन्या श्रद्धा के प्रति अपने कवि-निवद्ध पात्र मनु की प्रतिक्रिया की सहजानु- भूति प्रसाद को एक ही रूप में हो सकती थी, अतएव उसकी अभिव्यक्ति भी एक ही रूप में सम्भव थी। वह सहजानुभूति श्रखण्ड थी, अत उसकी अभिव्यक्ति भी अखण्ड ही होनी चाहिए।

इन दोनों में कौन-सा मत मान्य होना चाहिए ? वास्तव में अलकार-अलकार्य के भेदाभेद का प्रश्न प्रत्यक्ष रूप से वाणी और अ्रर्थ के भेदाभेद के साथ सम्बद्ध है। भारतीय चिन्ताधारा के लिए यह फोई नया प्रश्न भी नहीं है। संस्कृत के व्याकरण- शास्त्र में निश्चय ही वारगी और अर्य के अ्भेद, उक्ति की शखण्डता, प्रत्येक शब्द की एकार्थता आदि का स्पष्ट विवचन मिलता है,

पदे न वर्गा विद्यन्ते वर्णोप्ववयवा न च। वाक्यात्पदानामत्यन्त प्रविवेको न कश्चन ।। [(वंयाकर एभूपससार) का० ६८] एक शव्द सकृदेकमेवार्थ गमयते। (परिभाषेन्दुशेखर)

यह प्रश्न यहीं नहीं समाप्त हो जाता। इसका मूल दर्शन में है। रप श्र तत्व-परथवा इसके भी आगे प्रकृति और ब्रह्म का भेदाभेद भारतीय दर्शन का प्रमुख विवेच्य विषय रहा है और अन्ततोगत्वा भेद औौर अ्र्भेद दोनो हो स्वीकार कर लिये गये हैं। तत्व रूप में तो ब्रह्म को अ्र्सण्ड सत्ता है और प्रकृति उसी की प्र्परनिप्न अभिव्यक्ति है। इसी प्रकार न्र्यं की भी सत्ता अ्सण्ड है-शव्द उसका अविभाज्य माध्यम है। परन्तु व्यवहार में दोनों की पार्यक्य-फल्पना अनिवार्य है, अन्यया चिन्तन- प्रक्रिया हो व्यर्य हो जाती है। वास्तव में पार्यक्य का वोध प्थवा आनाम ही भ्रन्त में अपायक्य को सिद्धि कराता है, इसलिये तत्व-उपलव्धि के लिए प्राकल्पना के रप में प्रकृति की वृथक सत्ता माननी ही पडती है। यही अरवं औ्रर वार के लिए भी मान्य है-औोर यही फिर आगे चल कर अलंकाय-अलंकार के लिये भो मानना पटेगा। फ्रोचे का यह तक सवया संगत है कि प्रत्येक प्रतिक्रिया का अपना पस्तित्व होता है जो

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१३२ । भूमिका [ वक्रोक्ति और अलंकार

अन्य किसी भी प्रतिक्रिया से भिन्न होता है, और यह भी ठीक ही है कि यह प्रतिक्रिया अभिव्यजना में ही रूप ग्रहण करती है उसके बिना वह अरूप सवेदन मात्र होती है। परिरामत प्रत्येक उक्ति भी किसी भी अन्य उक्ति से भिन्न होती है। इस दृष्टि स 'नीले परिधान में श्रद्धा का अग अ््त्यन्त सुन्दर लगता है' और 'नीले परिधान में श्रद्धा का अ्रग ऐसा लगता है मानो मघवन में विजली का फूल हो' दोनों उक्तिया निश्चय ही भिन्न हैं-इसे कौन अस्वीकार करता है?

tw tho to h तुम चन्द्रमा-सी सुन्दर हो। तुम उपा-सी कान्तिमयी हो। तुम गुलाब-सी प्रसन्न हो। तुम लता-सी सुकुमार हो।

ये सभी उक्तिया निश्चय ही भिन्न हैं-इन सभी में आलम्वन के सौन्दर्य के विभिन्न पक्षो की व्यजना है। परन्तु इस अनेकता के मूल में क्या यह एक भावना विद्यमान नहीं है 'तुम मुझे प्रिय लगती हो।' यदि ऐसा नहीं है तो उपर्युक्त सभी उक्तियां अर्थहीन प्रलाप हैं क्योंकि पहले तो चन्द्रमा, उषा, गुलाब और लता में सौन्दर्य, कान्ति, प्रसन्नता, सौकुमार्य आदि गुणों का आरोप मिय्या हो सकता है, और दूसरे कोई स्त्री न चन्द्रमा के समान सुन्दर हो सकती है, न उषा के समान कान्ति- मयी, त गुलाब के समान प्रसन्न और न लता के सद्श सुकुमार। उपर्युक्त उक्तियों की सार्थकता का एकमात्र आघार यही भाव है कि 'तुम मुझे प्रिय लगती हो'। यही उनका व्यग्यार्थ है। यही शुक्ल जी के शब्दों में प्रस्तुत अर्थ है, इसी को व्यक्त करने के लिए अनेक प्रकार का अप्रस्तुत-विधान किया गया है जिसका काव्यशास्त्र ने विवेचन की सुविधा के लिए नामकरण कर दिया है।-ये नाम निरक्षेप नहीं हैं परन्तु स्वरूप-बोध के लिए उनकी अपनी उपयोगिता है, उसी सीमा तक मूल रूप में असत्यभूत होने पर भी, व्यवहार में वे मान्य हैं। अनेकता की धारणा के बिना एकता, या भेद के बिना अभेद की कल्पना कैसे सम्भव है ? अभेद को हृद्गत करने के लिए भेद का ज्ञान अनिवार्य है। भारतीय दर्शन और उस पर आधृत भारतीय अलकार- शास्त्र इस सत्य से अवगत रहा है, इसीलिए मूलत अभेद का विश्वासी होने पर भी उसने व्यवहारत भेदाभेद की सापेक्षता को निस्सकोच रूप से स्वीकार किया है। काव्य को इसी लिए अर्घनारीश्वर का रूप माना गया है जिसमें वाक् और अर्थ शभु और शिवा के समान सपूक्त है १-वागर्थाविव सम्पृत्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। (कालिदास)

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वक्रोक्ति औ्रौर अलकार ] भूमिका i १३३

२-अर्थ शम्भु शिवा वाणी (लिगपुराण)

दोनों तत्वत एक हैं, किन्तु प्रत्यक्षत दो है ही। व्यवहार रूप में इस भेद को अनगल कह कर उड़ा देने से समस्त शास्त्र-विवेचन ही व्यर्य हो जाता है, अलकारशास्त्र हो नहीं, दशनशास्त्र का भी अस्तित्व नहीं रह जाता। फिर क्रोचे का सौन्दर्यशास्त्र और उस में स्वीकृत मानव-चेतना के धारणा तथा सहजानुभूति-मूलक भेद-प्रभेद सभी निरयक सिद्ध हो जाते हैं. एक अ्रखण्ड सत्य की सत्ता शेष रह जाती है जिमकी सहजानुभूति मात्र सम्भव है चिवेचन-विश्लेषण नहीं। इसी कारण से अन्त में क्रोचे को यह स्वीकार करना पडा : 'स्वय हम ने ही इस निबन्ध में कई बार इम प्रकार को शन्दावली का प्रयोग किया है, और आगे भी प्रयोग करने का विचार है जिस से कि हम अपने द्वागा प्रयुक्त, अ्रथवा (विवेच्य प्रसग में) अन्य द्वारा प्रयुक्त शब्दों का अ्य स्पष्ट कर सकें। किन्तु यह विज्ञान और दर्शनशास्त्र-सम्वन्धी विवेचन के लिए तो उपयुक्त हैं, फला के विवेचन में इसका कोई मूल्य नहीं है + + ++ (क्योंकि) कला में तो उपयुक्त शब्दो के अतिरित्त अन्य शब्दो का प्रश्न ही नहीं है : वह सहजानुभूति1 है, धारणार नहीं।" (क्रोचे-ऐस्येटिक)

बस यहीं समस्या हल हो जाती है। जहा तक कला की अनुभूति या सहजान्- भूति का प्रश्न है, कोई भी उसकी अखण्डता में सन्देह नहों करता वह भ्रसण्ड है, वस्तु-तत्व और रप-आकार अथवा अलकार तथा अलकार्य की पयक मत्ता उम में नहीं है। परन्तु वह तो कला को सहजान्भूनि है जिसे हमारे शास्त्र में (सहृदय की दृष्टि से) आत्वाद कहा गया है। और, आस्वाद की असण्डता की इतनी प्रबल घोपएा भारतीय काव्यशास्त्र के अतिरित्त अन्यत्र कहा मिलेगी ?- उस ने तो आस्वाद को मसण्ड, स्वप्रकाश, वैद्यान्तरस्पर्शदून्य और अन्त में अनिवंचनीयता के कारण ग्रह्मा- स्यादसहोदर कह दिया है। फिर भी यह यला की झलोचना तो नहीं है : फ्ला को आलोचना सहजानुभूति प्रथवा आस्वाद रूप न हो कर धारणा रप ही होती है। न्पप्ट शन्दों में (सहृदव द्वारा) कला को नहजानुभूति तो फल का आ्म्वाद है, क्ला फी आालोचना इस सहजानुभूति की धारणा (विवेचना) का ही नाम है। अपने भ्रसण्ड रव में सहजानुनूति श्र्विवेच्य है-सनिवंचनीय है, धारणामों में सण्डिन होकर हो

१. इन्ट्यूश्न २. कन्सेप्ट

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१३४ ] भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावोक्ति

वह विवेच्य हो सकती है 'यही उसकी अलोचना है। शुक्लजी की विवेक-परिपुष्ट अलोचना दृष्टि ने क्रोचे को यहीं पकड लिया है "रस अलकार आदि के नाना भेद- निरूपण क्रोचे के अनुसार कला के निरूपण में योग न देकर तर्क या शास्त्र पक्ष में सहायक होते हैं। उन सबका मूल्य केवल वैज्ञानिक समीक्षा में है, कला-निरूपणी समीक्षा में नहीं। इस सम्बन्ध में मेरा वत्तव्य यह है कि वैज्ञानिक या विचारात्मक समीक्षा ही कला-निरूपणी समीक्षा है। उसी का नाम समीक्षा है।" (चितामणि भाग २ पृष्ठ १६१ )

उपर्युक्त समीक्षा के आधार पर आप देखें कि कु तक का मन्तव्य कितना शद्ध है। इस क्रान्तदर्शो आचार्य ने आजसे एक सहस्र वर्ष पूर्व ही मानो क्रोचे की युगान्तर- कारी स्थापना की प्राकल्पना कर उसका समाधान भी प्रस्तुत कर दिया था।

अलकृतिरलकार्यमपोद्धृत्य विवेच्यते तदुपायतया तत्व सालकारस्य काव्यता ॥ १-६

वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावोकिति

सस्कृत अलकारशास्त्र में स्वभावोक्ति की स्थिति भी विचित्र है। वह काव्य है अथवा अकाव्य ? और, यदि काव्य है तो वह अलकार है अथवा अलकार्य ? शादि अनेक तर्क-वितर्क इस प्रसग में उठते हैं। कुन्तक ने अपनी स्थापना को पुष्ट करने के लिए प्रथम उन्मेष की ११ से १४ वीं कारिकाओं में प्रस्तुत प्रसग का अत्यन्त मार्मिक विवेचन किया है-

"जिन (वडी सदृश) आलकारिक आचार्यो के मत में स्वभावोक्ति अलकार है उनके मत में अलकार्य क्या रह जाता है ?

जिन आलकारिकों का मत यह है कि स्वभावोक्ति भी अलकार है-अर्थात् जिनके मत में स्वभाव अथवा पदार्थ के धर्मभूत लक्षण की उक्ति या कथन ही अलकार है, वे सुकुमारवुद्धि होने से विवेक का कष्ट नहीं उठाना चाहते। क्योकि स्वभावोकिति का क्या अर्थ है। स्वभाव ही उच्यमान अर्थार्त् उक्ति का विषय-वर्ण्य विषय है। यदि वही अलकार है तो फिर उससे भिन्न काव्य की शरीर-स्थानीय कौनसी वस्तु है जो उनके मत में अलकार्य अथवा विभूष्य रूप से स्थित होकर पृथक सत्ता को प्राप्त

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वक्रोत्ति-सिद्धान्त और स्वभावोक्ति] भूमिका [१३५

करती है-पर्थात् और कुछ नहीं है।

  • 1 + +

स्वभाव (कथन) के बिना वस्तु का वर्णन ही सम्भव नहीं हो सकता क्योंकि उस (स्वभाव) से रहित वस्तु तो निरुपास्य अर्थात् असत्कल्प हो जाती है। ++ + स्वभाव-शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार होती है। जिससे (अर्थ का) कयन औरर ज्ञान होता है, वह भाव है। और स्व का अर्थात् अपना भाव स्वभाव (स्वरूप) है। इसलिए वह (स्वभाव या स्वरूप) हो सब पदार्थों के ज्ञान और कयन रूप व्यवहार का कारण होता है। उससे रहित वस्तु शशिविषाण सदृश शब्द के लिए अगोचर हो जाती है, अर्यात् उसका शब्द से कयन सम्भव नहीं है क्योकि स्वभावयुक्त वस्तु ही सर्वया कयनयोग्य होती है। (भौर यदि स्वभाव-वर्णन को ही अलंकार माना जाय तो) स्वभावोक्तियुक्त होने से गाडीवालो के वाक्यो में सालकारता अर्थात् काव्यत्व प्राप्त होगा।

इस वात को दूसरी यृक्ति से फिर कहते हैं .-

(स्वभाव अर्थात् स्वरूप तो फाव्य का शरीर-एप है) वह शरीर ही यदि अलकार हो जाय तो वह दूसरे किस को अलकृत फरेगा? कहीं कोई स्वयं अपने कन्घे पर नहीं चढ़ सकता।

7- + +

स्वभाव को यदि अलकार मान लिया जाय तो अन्य अलकारों की रचना होने पर जन दोनों का अर्थात् स्वभावोक्ति तथा उपमादि का भेद-ज्ञान या तो स्पष्ट होता है या श्स्पष्ट। स्पष्ट होने पर (दोनों अलंकारों की निरपेक्ष स्यिति होने मे) सर्वत्र संसृष्टि अलंकार होगा और अ्रस्पष्ट होने से सकर। इसलिए शुद्ध रूप से (उपमादि) अन्य अलकारो का विषय (उदाहरण) ही नहीं बचेगा।

अथवा यदि वह ससृ्टि औौर सफर ही उन (उपमादि अलकारों) के विषय मान लिए जांय तो भी कुछ बनता नहीं क्योकि (स्वभावोक्ति का प्रतिपादन फरने वाते) वे हो भालकारिक इस वात को स्वोकृत नहीं करते। इस प्रकार आ्रकाश-चवंर के समान (स्वभावोक्ति अलकार का) मि्या वर्णन व्यर्य है। इसलिए प्रफन मार्ग

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१३६ ] भूमिका [ धक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावं

का अनुसरण करना ही उचित है। सब प्रकार से कवि-व्यापार के विषय होने कारण अवर्णनीयता को प्राप्त होने वाले सभी पदार्थों का सहृदय-श्राह्हादकारी स्व हो (काव्य में) वर्णनीय होता है। वह हो सब अलकारो से अलंकृत किया जाता (११-१५ कारिका व० जी० प्रथम उन्मे

यही वात प्रथम उन्मेष की नवम औरदशम कारिकाओो में कह चुके हैं.

अन्य पर्याय शब्दों के रहते हुए भी विवक्षित अर्य का वोधक केवल एक ३ हो वस्तुत (काव्य में) शब्द है, इसी प्रकार सहृदयो के हृदय को श्नन्दित क वाला अपने स्वभाव से सुन्दर श्रर्थ ही वास्तव में अर्थ है। (का०

ये दोनो (शन्द और श्रथं) ही अलकायं होते हैं। वैदग्ध्यपूर्ण उक्ति वक्रोक्ति ही उन दोनो का अलकार है। (का० १०)।"

कुन्तक का मंतव्य सर्वथा निभ्रन्ति है। स्वभायोक्ति के निराकरण में उन्ह अत्यन्त प्रवल त्क प्रस्तुत किये हैं जिनका साराश इस प्रकार है

१. स्वभावोक्ति का अर्थ है स्वभाव का कथन। स्वभाव से अ्र्प्रभिप्राय मूल विशेषताओं का है जिनके द्वारा किसी पदार्थ का कथन या ज्ञान होता है। अ्त किसी वस्तु का वर्णन निसर्गत उसके स्वभाव का ही वर्णन है क्योंकि उससे र्रा वस्तु तो शब्द के लिए अगोचर हो जाती है। अर्थात् वस्तु-वर्णन मूलत स्वभ वर्णन-स्वभावोक्ति ही है।

२ लोक तथा शास्त्र में सभी वस्तुओं का वर्णन रहता है, किन्तु काव्य उन्हों का वर्णन होता है जो स्वभाव से सुन्दर हो-अथवा यह भी कहा जा सकता कि लोक और शास्त्र में किसी वस्तु के सभी गुणो का वर्णन मिल जाता है, पर फान्य में केवल उन्हों का वर्णन प्रेय है जो स्वभाव से सुन्दर हों। अतएव सुन स्वभाव काव्य का प्रकृत वर्ण्य विषय है, और वर्ण्य विषय होने ते वह अलंकार्य है ग्रलकार नहीं हो सकता।

३ स्वभाव-कथन यदि अलंकार है तो जन-सामान्य के साधारण वाक्य अलकार हो जाएगे।

४. स्वभाव का वर्णन ही यवि अलकार मान लिया जाय तो उतका अलका क्या होगा? यदि यह कहा जाय कि वह स्वय ही अलकार्य भी है तो यह प्रतम्भ

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वक्रो-सिसिद्वान्त और स्वभायोसि] भूमिका [१३७

है। अलकार तो शरीर पर धारण किया जाता है, यदि शरीर ही अलंकार है तो शरोर अपने को कैसे धारण कर सकता है?

५. यदि स्वभावोक्ति अलकार है तो उपमा आदि सभी अलकारों में उसकी स्थति माननी पडेगी क्योकि स्वभाव-कथन तो सभी वर्णनों में अनिवार्य है। ऐसी स्यिति में शुद्ध अतकार कोई भी नहीं रह जाएगा •स्वभावोक्ति का योग होने से वे या तो ससृष्टि वन जाएगे या संकर।

उपर्युक्त मन्तव्य कुन्तक की निर्भोक प्रकृति औ्रर मौलिक प्रतिभा का प्रमाण है। उनके पूर्वयर्ती तथा परवर्ती प्राय समस्त आलंकारिक आरचार्यों ने स्वभावोक्ति की मलंकारता को स्वीकार किया है। सस्कृत के प्द्याचाय भरत हैं-किन्तु भरत ने स्वभावोक्ति का वणंन न तो 'लक्षणो' के अन्त्गंत जिया है और न अलकारों के ही अन्तर्गत। उन्होंने ३६ 'लक्षणों' और ४ अलंकारों का विवेचन किया है : उनके 'लक्षए' भी बहुत कुछ अलकारों के ही समवर्ती हैं और परवर्ती आचार्यों ने अनेक 'लक्षणों' को अलकार रूप में ग्रहण कर ही लिया है। यों तो 'लक्षणो' के अ्रनेक भेद वर्ण्य विषय से भी सम्बन्ध रखते हैं, परन्तु उनमें स्वभावोक्ति का कहो उल्लेख नहों है- स्वभावोक्ति का समफक्ष भी उनमें कोई नहीं है। वास्तव में स्वभावोक्ति का यथावत् विवेचन सवप्रयम भामह के काव्यालकार में ही मिलता है। परन्तु भामह मे पूर्व, स्वभावोक्ति का नामोल्लेख न होने पर भी प्रकारान्तर से उसका वगन वाए के हर्षचरित तया भट्टिकाव्य में उपलब्ध हो जाता है। वाण ने 'जाति' नाम के एक काव्य-उपफरण का उल्लेख किया है 'नवोऽर्यो जातिरप्राम्या', जो स्वभावोक्ति का हो समतुल्य है और दण्डी आदि ने उसे इसी एप में प्रहण भी किया है। डा० राघवन ने प्रस्तुत प्रमग का दो1-२ स्थलों पर अत्यन्त प्रमासिक विवेचन किया है। उनका मन्तव्य है कि 'जाति' के दो अर्यं हो सकते हैं (१) किसी पदायं के सहजात रप का वणंन (जन् धातु से ), (२) (जाति-वर्ग के आघार पर) किसी पदार्य को जाति- गत विशेपताओं का घगन। इनमें से एक या दोनो ही प्रयं कदाचित् बाद में चल्फर प्रतकार रप में रढ़ हो गये है। भट्टिकाव्य में प्रस्तुत अर्य में' वार्ता का प्रयोग हुआ है। इस प्रकार भामह से पूर्व स्वभावोक्ति का धणन जाति और वार्ता रप में हुपा है। भ मह ने जाति का प्रयोग नहीं किया और यार्ता को अकाव्य माना है।

१-'भोज्स नृगार प्रकाय : भोज एड न्वभावीकि। २-मम पन्मेप्टूस मॉफ अनकारणास्तर : दि हिन्री श्रॉफ ्यभावोकि इन नम्कृन पोयटिक्स।

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१३८ ] भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावोकि

उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वभावोक्ति का उल्लेख किया है.

स्वभावोक्तिरलकार इति केचित्प्रचक्षते। अर्थस्य तदवस्थत्व स्वभावोऽभिहितो यथा॥ (भामह २६३)

अर्थात् कुछ आलंकारिको ने स्वभावोक्ति नामक अलकार का वर्णन किया है। अरर्थ का यथावत् कथन स्वभाव कहलाता है ।-भामह के स्वभावोत्ति-विवेचन के विषय में विद्वानों में मतभेद है। भामह ने इतने आग्रह के साथ वकोक्ति को अलकार का प्राण-तत्व माना है कि सामान्यत उनके विधान में स्वभावोक्ति के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। इसीलिए सकरन आदि का मत है कि भामह स्वय स्वभावोक्ति को अलकार नहीं मानते-स्वभावोक्ति अलकार है यह किसी-किसी का मत है 'केचित्प्- चक्षते', भामह का अपना मत नहीं है। परन्तु वास्तविकता यह नहीं है जैसा कि डा० राघवन का कथन है 'केचित्प्रचक्षते' से भामह की श्स्वीकृति अ्रथवा उदासीनता व्यक्त नहीं होती, यह वर्णन-परम्परा का द्योतक सामान्य वाक्य मात्र है। जहा भामह को किसी अलकार का निराकरण करना होता है, वहा वे अत्यन्त स्पष्ट कथन करते हैं और फिर लक्षण देने की आवश्यकता नहीं समझते। उपर्युक्त उद्धरण में भामह ने स्वभाव का लक्षण देकर अपनी स्वीकृति निश्चित रूप से दे वी है। अब प्रश्न यह है 'स्वभावोक्तिरलकार' और 'कोऽलकारोऽनया (वक्रोक्त् या) विना' में किस प्रकार सामजस्य हो सकता है? इसका उत्तर यह है कि वक्रोक्ति और स्वभावोक्ति में कोई विरोध नहीं है। वक्र का अर्थ स्वभाव से भिन्न अथवा अस्वाभाविक नहीं है। वक्र का अर्थ है साधारण से भिन्न अर्थात् विशिष्ट और स्वभायोक्ति में भी निश्चय ही विशि- ष्टता का सद्भाव रहता है। स्वभावोक्ति में किसी वस्तु के उन मूलगुणों का वर्णन होता है जो स्वभाव से सुन्दर हों-सभी सामान्य गुणो का यथावत् वर्णन स्वभावोक्ति न होकर वार्ता मात्र होता है। स्वभावोक्ति में कवि रमणीय के ग्रहण तथा अरमणीय के त्याग में अपनी प्रतिभा अथवा फल्पना का उपयोग करता है। इस दृष्टि से उसमें वक्रता या विशिष्टता के मात्रा निश्चय ही वर्तमान रहती है और इसीलिए वह अलकार है।

भामह के उपरान्त दण्डी ने स्वभावोक्ति का विस्तार के साथ विवेचन किया है। उन्होंने जाति, द्रव्य, गुण और क्रिया के आधार पर स्वभावोक्ति के चार भेद

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वक्रोति सिद्धान्त और स्वभावोक्ति ] भूमिका [ १३६

किये हैं। उनके अनुसार स्वभावोक्ति जाति की पर्याय है और उसकी परिभाषा इस प्रकार है. D. नानावस्य पदार्थाना रूप साक्षात् विवृण्वती। स्वभावोक्तिश्च जातित्चेत्याद्या सालकृतिर्यथा ॥ २

अरथात् विभिन्न अवस्याओो में पदार्य के स्वरूप का साक्षात् वर्णन करता हुआ प्राथमिक पतकार स्वभावोक्ति या जाति कहलाता है। यहाँ साक्षात् के अर् के विषय में मतभेद है : तरुणवाचस्पति ने साक्षात् का प्र्प्र्य किया है प्रत्यक्षमिव दर्शयन्ती अरर्यात् प्रत्यक्ष- सा दिखाती हुई, हृवयगमा टीका में साक्षात् का अर्थ किया गया है अव्याजेन- प्रकृत रूप में। इन दोनों में प्रसगानुसार दूसरा अर्थ ही अ्रधिक संगत प्रतीत होता है क्योंकि एक तो उदाहरणो में सजीवता की अ्पेक्षा श्रव्याजता ही अधिक है, दूसरे दण्डी ने स्वभावोक्ति को वक्रोक्ति से पृथक माना है :

भिन्न द्विघा स्वभावोक्तिर्वक्रोक्तिश्चेति वाङ्मयम् । २३६१

तोसरे उन्होंने स्वभावोक्ति को आदि अर्थात् प्रारम्भिक अलंकार मानते हुए उसका साम्राज्य मूलत शास्त्र में हो माना है। इस दृष्टि से दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति में पदार्यों के अपने गुरो का प्रकृत वर्णन रहता है : उनका यह अनारोपित प्रकृत र्पन्वर्णन ही अपने आप में श्रकर्षक होने के कारण स्वभावोत्ति-अलकार-पदवी का अधिकारी और काव्य के लिए भी वाछनीय हो जाता है 'काच्येप्तप्पेतदीप्सितम।'

उन्डूट ने स्वभावोक्ति का क्षेत्र सीमित फर दिया है-उनके मत में क्रिया में प्रवृत्त मुगशावकादि की लोलाओ का वर्णन हो स्वभावोक्ति है.

क्रियाया नप्रवृत्तत्य हेवाकाना निवन्धनम्। कस्वचित् मृगडिम्भादे ल्वभावोक्तिमदाहता ॥ ३।८९

यहां वास्तव में 'भुगशावकादि की लीता' का प्रयोग सांफेतिक रप से प्राकृतिक स्यापार के ध्यापक अरथ में ही किया गया है; फिर भी स्वभावोक्ति की परिषि संबुचित तो हो ही जाती है कयोंकि उससे मानव-व्यापार का सवया वहिप्कार भी समीचीन नहीं माना जा सकता। रुद्रट ने, इसके विपरीत, स्वनावोति के क्षेग्र का मम्चक विस्तार कर दिया है, उन्होंने अर्यालंकारों के चार वर्ग किये है-वास्तय, सौपम्ब, प्रतिशय तया द्लेप। इननें स्वनायोति अयवा जाति 'वास्तव' वर्ग का प्रमुस अलंकार

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१४० 1 भूमिका [ वक्रोत्ति-सिद्धान्त और स्वभायोक्ति

है-इस प्रकार से रुव्रट ने जाति को 'वास्तव' का ही सहव्यापी बना दिया है। 'वास्तव' में वस्तु के स्वरूप का कथन होता है-यह स्वरूप-कथन पुष्टार्यं (रमणीयार्थ) तो होता है, परन्तु वैपरीत्य, औपम्य, अतिशय तथा श्लेष आदि के चमत्कार पर निर्भर नहीं रहता।

वास्तवमिति तज्ज्ञेय क्रियते वस्तु-स्वरूपकथन यत। पुष्टार्थमविपरीत निरुपमनतिशयम् अश्लेषम्॥ ८1१०

रुद्रट की यह परिभाषा पदार्थ के वस्तुगत सौन्दर्य की अत्यन्त स्पष्ट व्यास्या है। वस्तुगत सौन्दयं का भी अर्थ यही है कि यथासम्भव वस्तु का सहजात रूप ही प्रस्तुत किया जाय, भावना-कल्पना के द्वारा उस पर बाह्य गुणों का आरोप न किया जाय। विरोध-मूलक, शपम्य अर्थात् साद्श्य-साधर्म्य-मूलक, अतिशय-मूलक तथा श्लेष-मूलक समग्र अप्रस्तुत-विधान कल्पना का चमत्कार है। इस कल्पनात्मक अप्रस्तुत-विधान के बिना पदार्थ के प्रस्तुत रमणीय गुो का चित्रण ही वस्तुगत सौन्दर्य का चित्रण है-वही रुव्रट के मत में 'वास्तव' है। इस प्रकार रु्द्रट के अनुसार स्वभावोफि का स्वरूप अ्त्यन्त स्पष्ट है.किसी प्रकार के अप्रस्तुत गुणों के आरोप के बिना पदार्थ का प्रस्तुत पुष्ट अर्थात् रमणीय रूप अकित करना ही स्वभाव-कथन या स्वभावोक्ति है। यह पुष्ट अर्थ क्या है, इसका सकेत रुद्रट के टीकाकार नमिसाघु को व्याख्या में मिल जाता है। 'जाति' का निरूपण करते हुए नमिसाधु कहते हैं जातिस्तु अनुभवं जनयति। यत्र परस्थ स्वरूप वर्ण्यमानमेव अनुभवमिवैतीतिस्थितम्। अर्थात् जाति में वस्तु-स्वरूप का ऐसा सजीव वणंन रहता है कि वह श्रोता के मन में भनुभव-सा उत्पन्न कर देता है।-जो रूप अनुभव में परिणत हो जाता है वही रमणीय है, वही पुष्टार्थ है। वस्तुगत सॉन्दर्य ओर भावगत सौन्दर्य में यही भेद है कि एक दृष्टि का विषय अधिक होता है, दूसरा भावना का। स्वभावोक्ति या जाति वस्तु के दर्शनीय स्वरूप का यथावत् शोता अ्रथवा पाठक के मन में सचार कर प्राय वही अनुभव उत्पन्न कर देती है जो उसके साक्षात् दर्शन से होता है। स्वरूप की यह अनुभव- रूपता ही उसकी रमणीयता या पुष्टार्थता है।

रुद्रट के उपरान्त भोज ने अपनी प्रकृति के अनुसार स्वभावोत्ति-सम्बन्धी प्रचलित मतों का समन्वयात्मक विवेचन किया है। उन्होंने अलकार रूप में जाति नाम ही ग्रहण किया है और उसकी व्युत्पत्तिमूलक परिभाषा की है

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वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावोक्ति ] भूमिका [१४१

नानावस्थासु जायन्ते यानि र्पाणि वस्तुन स्वेम्प स्वेम्य निसर्गेम्य तानि जाति प्रचक्षते ।। (सरस्वतीकण्ठाभरण ३।४५)

अर्यात् जाति के अन्तगंत वस्तु के ऐसे रूपों का वणन आता है जो अपने स्वभाव से हो भिन्न भिन्न अवस्याओ में उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार भोज ने 'जाति' का 'जायन्ते' के साथ सम्बन्ध घटा कर वस्तु के जायमान एपों का वर्णन ही स्वभावोक्ति के अन्तर्गत माना है। इसी आघार पर अर्थव्यक्ति गुए से उसका भेद करते हुए उन्होंने लिखा है कि अर्यव्यक्ति और जाति में यह भेद है कि उसमें सार्वकालिक रूपो का वर्गन रहता है, इसमें जायमान अर्थात् मागन्तुक रपों का। जंसा कि डा० राघवन आादि प्रायः सभी विद्वानों का मत है, भोज का यह भेद निरयंक है और इसी प्रकार स्वभावोक्ति को पदार्थ के जायमान रूपो तक सीमित करने का प्रयत्न भी व्यर्थ है। इसकी अपेक्षा भोज की एक अ्रन्य उद्भावना कहीं अ्रधिक महत्वपूर्र है। दण्डी के आधार पर, किन्तु उनके मत का सशोधन करते हुए, भोज ने वाड्मय का तीन रूपो में विभाजन किया है : वकोकित, रसोकि और स्वभावोत्ति-

वक्रोक्तिश्च रसोक्तियच स्वभावोक्तिचेरति वाड्मयम्।

इनमें अलकार-प्रधान साहित्य वक्रोक्ति के अन्तर्गत आाता है, रस-भावादि-प्रधान रसोक्ति के अन्तर्गत, और गए-प्रधान साहित्य स्वभावोक्ति के अन्तगंत। (देखिए शृगारप्रकाश भाग २, मध्याय ११)। भोज ने समन्वय के अनावश्यक उत्साह के कारण स्वनावोक्ति को गुए-प्रधान मान लिया है क्योंकि वे अलफार, रस और रीति सम्प्रदायों का समंजन करना चाहते थे। परन्तु स्पष्टतया यह मत प्रधिक तर्कपुप्ट नहीं है। इसकी उपेक्षा कर देने पर भोज का उपरयुक्त विभाजन आधुनिक झालोचनाशास्त्र की फसौटी पर भी सरा उतरता है। काव्य के तोन प्रमुस तत्व है-सत्य, नाव और कल्पना। साहित्य के विभिन्न एमों में इनका महत्व भिन्न अनुपात में रहता है। इनमें सत्य का भ्रर् है सहज रप, कहीं जीवन और जगत के सहज या प्रन्तुत रप का चिनण प्रधान होता 4 है-इसी को भोज ने स्वभावोक्ति कहा है। कहीं भाव का प्राधान्य होता है-वहीं भोज के शब्दो में रसोक्ति होगी, औौर कहीं फल्पना का प्राधान्य रहना हे भर्वात् प्रस्तुत की अपेक्षा कवि अप्रस्तुत-विधान को सृष्टि में अ्रधिक रचि लेता है-ऐसा काव्य अलकृत होता है और दण्डी या भोज के शब्दो में ववरोत्ति के अ्न्तर्गत आाता है। एक प्रन्य दृष्टि से भी भोज का यह विभाजन प्राधुनिक आलोचनागास्त्र के अनुभस

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१४२ ] भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावोक्ति

पडता है। सौन्दर्य के दो व्यापक रूप हैं. (१) वस्तुपरक औ्र्रौर (२) व्यत्ति- परक। इनमें से वस्तुगत सौन्दर्य भोज की स्वभावोक्ति का हो पर्याय है। व्यक्तिपरक सौन्दर्य भावना या कल्पना की प्रसृति है और इस दृष्टि से उसके दो रूप ही सकते 1

हैं-एक वह जो मन के माधुर्य का प्रक्षेपण हो और दूसरा वह जो कल्पना का विलास हो। इनर्में से पहला रसोक्ति है, दूसरा वक्रोक्ति।

भोज के समसाम्यिक कुन्तक ने यह सब स्वीकार न करते हुए स्वभावोक्ति की अलकारता का निषेध किया। परन्तु महिमभट्ट ने उनके आह्वान का उचित उत्तर दिया •महिमभट्ट और उनके अनुयायी हेमचन्द्र तथा माणिक्यचन्द्र के तर्क का साराश इस प्रकार है।-स्वभाव मात्र का वर्णन स्वभावोक्ति नहीं है, इसमें सन्देह नहीं। परन्तु वस्तु के दो रूप होते हैं . एक सामान्य रूप दूसरा विशिष्ट रूप। सामान्यरूप का ग्रहण सभी जनेसाधारण कर सकते हैं, किन्तु विशिष्ट रूप का साक्षात्कार केवल प्रतिभावान् ही कर पाते हैं। अतएव सामान्य स्वभाव का वर्णन मात्र अलकार नहीं है। इस सामान्य लौकिक अर्थ को अरधिक से अधिक अलकार्य कहा जा सकता है कवि-प्रतिभा हो इसे अपने ससर्ग से चमका देती है, अन्यथा अपने सहज रूप में तो यह अपुष्ट अर्थ-दोष है। इसके विपरीत विशिष्ट स्वभाव लोफोत्तर-प्रतिभा-गोचर है. जिसमें केवल रमणीय वाच्य का वाचन होता है, अवाच्य का वाचन नहीं। कवि का प्रातिभ नयन ही उसका उद्धाटन फर सकता है। यह विशष्ट-स्वभाव-वर्णन ही स्वभा- वोक्ति अलकार है। महिमभट्ट तथा उनके अनुयायी आचार्यो की धारणा है कि कुन्तक ने सामान्य और विशेष के इस भेद को न समझ कर स्वभावोक्ति का वास्तविक स्वरूप नहीं पहचाना है।*

*देखिए डा० राघवन का लेख हिस्टरी ऑ्फ स्वभावोक्ति। न हि स्वभावमात्रोक्ती विशेष करचनानयो । उच्यते वस्तुनस्तावद् द्वैरूप्यमिह विद्यते। तत्रकमस्य सामान्य यद्विकल्पकगोचर। स एव सर्वशब्द्वाना विषय परिकीतित अत एवाभिधेय ते ध्यामल बोघयन्त्यलम्। विशिष्टमस्य यद्रप तत् प्रत्यक्षस्य गोचर । स एव सत्कविगिरा गोचर प्रतिभासुवम्। व्यक्तिवियेक २।११३-१६ (अगले पृष्ठ पर)

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वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावोक्ति ] भूमिका [ १४३

स्वभावोक्ति के पक्ष में महिम भट्ट से अधिक प्रबल तर्क औ्रौर कोई नहीं दे

: सका-परवर्तो आचार्यों ने इस प्रसंग में कोई नवीन योगदान नहीं किया उन्होने या तो इन्हों के शब्दों में थोडा-बहुत फेर-वदल कर सतोष कर लिया या स्वभावोक्ति को छोउ ही दिया। मम्मट ने उद्भट के भुगडिम्भ के स्थान पर फेवल डिम्भ का और हेवाक (लीला) के स्थान पर स्वक्रियारूप (रूप=वर्ण, संस्थान आदि) का प्रयोग किया और इस प्रकार उङ्ट के लक्षण की अव्याप्ति का निराकरण कर दिया। मम्मट के मत में डिम्भादि की अपनी अपनी क्रिया तथा रूप परर्ात् वर्ण एवं संस्थान का वर्णन स्वभावोक्ति कहलाता है 'स्वभावोत्तिस्तु डिम्भावे स्वक्रियार्रपवर्णनम्।' इस परिभाषा के अनुसार प्राकृतिक जगत के अतिरिक्त मानव जगत के भी एकाशरय व्यापार का वर्णन स्वभावोक्ति के अन्तर्गत माता है। यहां मम्मट का एकाश्रय शब्द (स्वयोस्तदेकाश्रयोः) अ्र्परत्यत मार्मिक है। इसका अर्य यह है कि मानव जीवन के अंतर्गत शिशु आदि के स्वनिष्ठ व्यापार ही स्वभावोक्ति के अन्तर्गत आ्राते हैं। जहा वे अन्य के आलम्वन या आश्रय बन जाते हैं वहा स्वभावोक्ति न होकर रसोकि हो जाती है। यहा मम्मट ने वस्तुपरक सौन्दर्य और व्यत्तिपरक सौन्दर्य के अन्तर की ओर अ्र्पत्यन्त मार्मिक संकेत किया है।

मम्मट के उपरान्त रुव्रट ने महिमभट्ट-प्रतिपादित विशिष्ट स्वभाव के स्थान पर सूक्ष्म स्वभाव का वर्णन स्वभावोक्ति के लिए अ्भीष्ट माना-विद्यानाथ ने वर्णन के लिए चारु विशेषण का प्रयोग किया और स्वभाव के लिए उच्चस् का। अरर्ात् उनके अनुसार उच्चस्स्वभाव का वर्णन या चारु यथावत् वस्तु-वर्णन ही स्वभावोक्ति है। रसवादी विश्वनाय भी परम्परा की उपेक्षा नहीं कर सके, और उनको भी स्वभावोक्ति की सत्ता को स्व्रीकार करना पडा। उनकी परिभाषा पर मम्मट की गहरी छाप है

दुरूहयो कविमाश्रवेद्ययोरयंस्य डिम्भादे स्वयोस्तदेकाथ्योपचेष्टास्वर्पयो । (सा० द० १०१६२)

वस्नुमात्रानुवादस्तु पूरणंकफलो मन अर्थदोपस्म दोपनैरपुष्ट इति गीयते।। (व्यक्ति वि०) वम्तुनो हि सामान्यत्वभावो लोफिकोज्ॉजनकार्य। कविप्रतिभानरम्भविदयेप- विषयस्तु नोकोत्तरार्योज्नरुरणमिति । (हेमचन्द्र फाव्यानुशासन पुर २७५

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:४४ 1 भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावौक्ति

नर्थात् कविमात्र द्वारा ज्ञातव्य बालक शदि की एकाशय चेष्टा तथा स्वरूप का वर्णन वभावोक्ति कहलाता है।

उपर्युक्त परिभाषा में 'डिम्भावे' 'एकाश्रय' 'क्रियारूप' ये तीन तत्व तो यथावत् रम्मट की परिभाषा से उद्धत हैं। केवल 'दुरूह' शब्द का दुरूह प्रयोग विश्वनाथ का पपना है-यद्यपि मूल विचार यहां भी उनका अपना नहीं है। दुरूह का अर्थ विश्व- गाथ के अनुसार है कविमात्रवेद्य जिसका कथन महिमभट्ट तथा उनके अनुयायी हेमचन्द्र- वणिक्यचन्द्र प्रतिभोव्भव, कविप्रतिभासरम्भ, कविप्रतिभागोचर आादि अपेक्षाफृत प्रधिक व्यजक शब्दों से कर चुके थे। इस प्रकार विश्वनाथ ने महिमभट्ट तथा मम्मट को परिभाषाओं के समन्वय से स्त्रभावोक्ति की परिभाषा को अ्रधिक पूर्ण बनाने का नयत्न किया है। पडितराज जगन्नाथ ने स्वभावोक्ति को छोड ही दिया है। नेष्कर्ष

वभावक्ति के पोषक मन्तव्यो का साराश यह है -

(१) स्वभाव-मात्र का वर्णन स्वभावोक्ति नहीं है। स्वभाव के भी दो रूप हैं नामान्य और विशिष्ट। सामान्य के अन्तर्गत जातिगत रूप, गुण आवि आते हैं जिनका रहण अथवा वर्न सभी जनसाधारण कर सकते हैं। यह लौकिक है-अप्रतिभोद्डव है। विशिष्ट रूप लोकोत्तर है-अपने प्रकृत रूप में रोचक है, प्रतिभा-गोचर है अर्थात् उसका उद्धाटन प्रतिभा अथवा कवि-कल्पना के द्वारा ही सम्भव है। स्वभायोक्ति परलकार में स्वभाव के इसी विशिष्ट रूप का वर्णन रहता है, सामान्य रूप का नहीं। अ्रतएय यह प्रतिभाजन्य है, सुन्दर है उसमें बाह्य रूपों के आरोपण के लिए नहीं प्ररन् प्रकृत सौन्दर्य के उद्धाटन के निमित्त फवि-फल्पना का सन्निवेश होता है। इसीलिए वह शोभाकारक लकार है।

(२) स्वभावोक्ति में मानव औरौर प्राकृत जगत का वस्तुगत सौन्वर्य-चित्रण होता है। अपने रग में रंगने वाली भावना और बाह्य रूपों का आरोपण करने वाली कल्पना का असम्पर्क उसे क्रमश रसोक्ति तथा वक्रोक्ति से पृथक करता है।

(३) किन्तु स्वभावोक्ति का वक्रोक्ति से विरोध नहीं है-क्योंकि चक्र का प्रर्थ स्वभावेतर अथवा अस्वाभाविक न होकर केवल असामान्य अथवा विशिष्ट ही है।

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वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावोक्ति। भूमिका [१४५

यह असामान्यता या विशिष्टता ही चमत्कार है जिसका सद्भाव स्वभावोक्ति में भी निश्चय ही रहता है।

इस प्रकार सब मिलाकर सस्कृत आ्रचार्यों का बहुमत कुन्तक के विरुद्ध हो रहा। मम्मट जैसे ध्वनिवादी औरर विशवनाथ जैमे प्रवल रनवादी आचार्यो ने भी उसकी सत्ता त्वीकार की। हिन्दी आलकारिको ने भी इसी परिपाटी का यथावत् अनुकरण किया। उन्होने कुन्तक के आक्षेप को बिना किसी प्रत्युक्ति के यो ही उड़ा दिया। "वक्रोक्तिजीवितकार राजानक कुन्तक ने स्वभावोक्ति को अलकार नहीं माना है .. । किन्तु यह वक्रोक्ति को ही फाव्य का सर्वस्व मानने वाले राजानक कुन्तक का दुगग्रह मात्र है। प्राकृतिक दृश्यो के स्वाभाविक वर्णन वस्तुत चमत्कारक और अत्यन्त मनोहारी होते है।" (मेठ कन्हैयालाल पोद्दार-का० क० अलकार-मजरी, पृ० ३६६-७०) सेठजी के उपर्युक्त वत्तव्य से स्पप्ट है कि हिन्दी के रीतिकार कुन्तक के आशय को थाह नहीं पा सके है। किन्तु भारतीय काव्यशास्त्र का पुनरालोचन करते हुए शुक्लजी की दृष्टि इस प्रसग पर भी पडो और उन्होने इसे विबेक की कसौटी पर फस कर फुन्तक के पक्ष में निर्णय दिया।

आर्रचार्य शुनल का मत

+++ वण्य वग्तु औ्ररौर वर्णन-प्रणाली बहुत दिनो से एक दूसरे से अलग फर दी गई हैं। प्रस्तुत-अप्रस्तुन के भेद ने बहुन-नो बातो के विचार और निर्णय के सोधे रान्ते सोल दिये हैं। श्व यह स्पष्ट हो गया है कि अलकार प्रस्तुत या वर्ण्य वस्तु नही, बल्कि वर्शन की भिन्न-निन् प्रणालियाँ है, कहने के साम-साम ढग है। पर पाचीन प्रव्यवस्था के स्मारफ-स्वगप युछ अलकार ऐमे चते भरा रहे है जो वर्ण्वं वस्तु का निर्देश करते हैं और अलकार नहीं पहे जा मकते-जैमे, स्वभावोति, उदात्त, प्रत्युक्ति। स्वभावोक्ति को लेकर पुद अलफार प्रेमी कह बैठते है कि प्रकृति का वंन भी तो स्वभावोति अलकार ही है। पर स्वभावोति अलकार-फोटि में आा हो नहीं मकती। अलार व्णन करने की प्रणाली है।-11

अलकारों के भीतर स्वावोति का ठीक-्ठीफ लक्षण-निरपण हो भी नहीं नका है। फाव्यप्रकाश की फानकिा मे यह लक्षण दिया गया है-

व्भानोनिन्तु हिम्मादे वयरिया-ता-्वजनम्।

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१४६ ] भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावोक्ति

अर्थात् 'जिसमें बालकादिकों को निज की क्रिया या रूप का वर्णन हो वह स्वभावोक्ति है।' प्रथम तो बालकादिक पद की व्याप्ति कहाँ तक है, यही स्पष्ट नहीं। अत यही समझा जा सकता है कि सृष्टि की वस्तुओं के रूप और व्यापार का वर्णन स्वभावोक्ति है, खैंर, बालक की रूप-चेष्टा को लेकर ही स्वभावोक्ति की अलकारता पर विचार कीजिए। वात्सल्य में बालक के रूप आदि का वर्णन विभाव के अन्तर्गत और उसकी चेष्टाओं का वर्णन उद्दीपन विभाव के अन्तर्गत होगा। प्रस्तुत वस्तु की रूप-क्रिया आदि के वर्णन को रस-क्षेत्र से घसीटकर अलकार-क्षेत्र में हम कभी नहीं ले जा सकते। मम्मट ही के ढग के और आचार्यो के लक्षण भी हैं। अलकार-सर्वस्व-कार रुय्यक कहते हें-सूक्ष्मवस्तु-स्वभाव-यथावद्वर्णन स्वभावोक्ति। आचार्य दण्डी ने अ्वस्था की योजना करके यह लक्षण लिखा है-

नानावस्थ पदार्थना साक्षाद्विवृवण्वती। स्वभावोक्तिश्च जातिश्चेत्याद्या सालकृतिर्यथा।

बात यह है कि स्वभावोक्ति अलकारों के भीतर आ ही नहीं सकती। वक्रोक्तिवादी कुन्तक ने भी इसे झलकार नहीं माना है। (चिन्तामणि-१ कविता क्या है ? पृ० १८३-८४)

सक्षेप में शुक्ल जी के तर्क इस प्रकार हैं -

१ प्रस्तुत विषय और अप्रस्तुत-विधान अर्थात् वर्ण्य वस्तु तथा वर्णन- प्रणाली में स्पष्ट अन्तर है। स्वभावोक्ति प्रस्तुत वर्ण्य वस्तु है, अलकार वर्णन-प्रणाली है-अतएव स्वभावोक्ति अलकार नहीं हो सकती।

२ स्वभावोक्ति की अलकारता इसी से असिद्ध है ि उसका कोई निश्चित लक्षण नहीं मिलता। किसी ने उसे स्वक्रिया-रूप-वर्णन कहा है-किसी ने अवस्था- वर्णन और किसी ने उसे सूक्ष्म स्वभाव-वर्णन।

३ मम्मट की परिभाषा में निर्दिष्ट बालक आदि पद का आशय अ्त्यन्त प्रस्पष्ट है। स्वयं बालकों की रूप-चेष्टा का वर्णन वात्सल्य रस के अन्तर्गत मता है वह रस का अग है, अलकार नहीं है। और यदि 'डिम्भादे' की व्याप्ति सृष्टि की नाना वस्तुओ के रूप और व्यापार तक मान ली जाय तो वह वर्ण्य वस्तु ही है वर्गन प्रसाली नहीं है।

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वक्रोत्ति-सिद्धान्त मौर स्वभावोक्ति ] भूमिका [१४७

विवेचन

स्वभावोक्ति के विषय में पक्ष-विपक्ष को प्रस्तुत कर देने के उपरान्त श्व उनका परीक्षण करना और अपना निर्णय देना सरल होगा। स्वभावोक्ति के विरुद्ध कुन्तक का पहला तर्क यह है :-

१. यदि स्वभाव-फयन अलंकार है तो जनसाधारण के सभी वर्णन अलंकार सो जायेंगे क्योकि कोई भी वस्तु-वणन स्वभाव-कयन के बिना सम्भव नहीं है।

स्वभावोक्ति पक्ष ने इसका अत्यन्त उपयुक्त उत्तर दिया है और वह यह फि स्वभाव मात्र का कयन स्वभावोक्ति नहीं है : स्वभाव के सामान्य एप का त्याग कर विशेष रमणीय रूप का ग्रहण ही स्वभावोक्ति है।

फिन्तु फुन्तक का दूसरा तर्क और भी प्रबल है .-

२. रमणीय स्वभाव -- स्वपरिस्पन्दसुन्दर-का यह वर्णन तो अलंकार्य है- यदि यह अलकार है तो अलकार्य क्या है? अलकार का अरय है मलंकरण का साधन, किन्तु यह तो शरीर है।

इसका उत्तर विपक्ष के पास नहीं है-महिमभट्ट के आ्रधार पर हेमचन्द्र ने इसका उत्तर यह दिया है कि पदार्य का सामान्य एप अलकार्य अयवा शरीर है, विशेष प्रतिभा-गोचर एप अलकार है। परन्तु यह उत्तर विशेष तर्क-सम्मत नहीं है वयोंकि सामान्य हो या विशेष, रूप तो एप ही रहेगा अलंकरण का साधन कने होगा ? काव्य में भी व्यवहारत. यह होता नहीं है, हो भी नहीं सकता। स्वनावोकि के जितने उदाहरता अलंकार-प्रन्थों में दिये गये है उनमें सामान्य का अलकार्य रूप में और विशेष का अलंकार रूप में प्रयोग कहां नहीं मिलता-वास्तव में नामान्य को तो अ्रवान्य मानकर छोड़ हो दिया जाता है: विशेष का ही वाचन होता है। अलंकार-प्रन्यों के प्रमिद्ध उदाहरणों के आघार पर हम अपने मन्नस्य को श्र स्पष्ट फरते हैं। पलकारिको में सामान्य एव के वहन का यह उदाहरण प्रत्यन्त प्रसिद्ध है:

गोरपत्य वनीवर्द नृसान्यत्ति मुखेन न. । मूगं सचति गिर्नेन प्रपानेन नु गोमवम्।।

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१४८ ] भूमिका [ वक्रोक्ति सिद्धान्त और स्वभावोक्ति

अर्थात् बैल गाय की सन्तान है, वह मुख से घास खाता है, शिश्न से मूत्र-मोचन करता है और अपान से गोबर रुद्रट के टीकाकार की स्पष्ट घोषणा है कि 'शस्य वास्तवत्व न भवति,' अर्थात् यहाँ 'वास्तव' नहीं है क्योकि उसका आ्रवश्यक उपबन्ध९ है पुष्टार्थ का ग्रहण और अपुष्टार्थ की निवुनि। पुष्टार्थ को ही महिमभट्ट तथा हेमचन्द्र आदि ने विशेष रूप और अपुष्टार्थ को सामान्य रूप कहा है। उपर्युक्त उद्धरण में न तो अपुष्टार्थ 'सामान्य' की निवृत्ति है और न पुष्टार्थ 'विर्शष' का ग्रहण ही। इसलिए इसमें अलकारत्व नहीं है-यह जाति गथवा स्वभावोक्ति नहीं है।

इसके विपरीत कालिदास का यह प्रसिद्ध छन्द है -

ग्रीवाभगाभिराम मुहुरनुपतात स्यन्दनेदत्तृष्टि पश्चार्घेन प्रविष्ट शरपतनभयात् भूयसा पूर्वकायम्। दर्भरर्घावलीढे श्रमविवृतमुखभ्र शिभि कीर्णबर्त्मा पशयोदग्रप्लुतत्वाद्वियति बहुतर स्तोकमुर्व्या प्रयाति ॥ (अ० शा० १।७)

अ्रर्थात्

फिर फिर सुन्दर ग्रीवा मोरत। देखत रथ पाछे जो घोरत। कबहुक डरपि बान मत लागी। पिछलो गात समेटत आगी॥ अधराथी मग दाभ गिरावत। थकित खुले मुख ते बिखरावत। लेत कुलांच लखो तुम अवही। घरत पाँव घरती जब-तबही॥ (रा० लक्ष्मणसिंहकृत अनुवाद)

सस्कृत काव्यशास्त्र में स्वभावोक्ति का यह उत्कृष्ट उदाहरण माना गया है। इसमें आप देखें कि मृग की कोई भी चेष्टा या क्रिया ऐसी नहीं है जो अपुष्टार्थ अथवा ग्राम्य हो। सम्भव है कि भयभीत मृग ने भी मूत्र और पुरीष का मोचन किया हो किन्तु कवि की परिष्कृत ्दृष्टि ने उसकी उपेक्षा कर पुष्टार्थ विशेष चेष्टाओ का ही ग्रहण किय है-वहाँ मृग की समस्त चेष्टाएँ एक से एक 'चारु' है।

अब प्रश्न यह है कि यदि मृग का उपर्युक्त रूप अलकार है तो अलकार्य क्या है ? हेमचन्द्र के अनुसार मृग का सामान्य अर्थात् चार पैर, दो सींग और निश्चित लम्बाई-ऊँचाई वाला रूप अलकार्य है और ग्रीवाभगि, अग का समेटना, थके मुख से वाभ गिराना, अत्यत तीव्रगति से कुलॉच भरना आदि चेष्टाएँ अलकार है। परन्तु

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वक्रोक्ति-सिद्धान्त और स्वभावोक्ति] भूमिका

क्या यह सत्य है? ध्वनि की स्यापना के उपरात अलकार-अलकार्य का पृयक स्वरूप . निर्णय हो जाने पर तो यह त्कसगत माना ही नहीं जा सकता क्योकि ग्रीवा, पश्चार्घ- पूर्वफाय, थका अ्र्प्रधखुला मुल, आ्र्प्रादि सभी शरीर (व्ष्य वस्तु) फे अग हैं, अतएव उनकी चेष्टाएँ भी शरीर की ही चेष्टाएँ है-शरीर ही शरीर को अलकृत फैसे कर सकता है? परन्तु पूर्वध्वनि अलकार-सिद्धान्त के अनुमार शोभाकारक सभी धर्म अलकार है-चाहे वे शरीर के हो या शरीर से बाहर के। इस दृष्टि से मृग की चेष्टाओ को अलकार माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त एक युक्ति और हो सकती है-शृगार रस के अन्तर्गत नायिका के तीन प्रकार के अलकार माने गये हैं. (१) अगज, (२) अर्प्रयत्नज औप्रौर (३) स्वभावज। शरीर से सम्बन्धित तीन प्रकार के अलंकार अगज हैं ·- भाव, हाव और हेला। अयत्नज अलकार जो फृति-साध्य नहीं है, सात है•शोभा, काति, आदि। फृति-माध्य लीला, विलास आरादि अठारह पलकार स्वभावज हैं। इस वरिचार-पद्धति का विस्तार करते हुए क्या मृग की उपयुक्त चेप्टाश्रो में अलकार की कल्पना सर्वथा अरनर्गत है?

परन्तु इस युक्ति का निराकरण किया जा मकता है। एक तो मृग का सामान्य रूप जिसे अलकार्य कहा जा सकता है प्रस्तुत छन्द में वशित हो नहीं है प्रफृति में उसफी स्थिति अवश्य है, उसके आधार पर पाठरु की फल्पना में भी हो सकती हैं किन्तु विवेच्य कविता में उसकी स्थिति नहीं है। वह विज्ञान का सत्य है काव्य का सत्य नहीं है, अत्तएच कवि के लिए 'अवाच्य' रहा। ऐमी स्थिति में जिमे हेमचन्द्र ने अलकार्य यहा है उसका तो काव्य में ग्रहण ही नहीं होता। जैसा कि फुन्तक ने फहा है फाव्य का वर्ण्य तो म्वभाव से सुन्दर-स्वपरिस्पन्द सुन्दर ही होता है। थलफार्य और अप्रलकार दोनो की नह-स्यिति होनी चाहिए-यह नहीं हो सकता कि प्रल्लकार कविता में हो और अ्प्रलकार्य प्रकृति में या पाठक के मन मे। दूसरे, हाव- भाव, शोभा, कान्ति आदि के लिए अलकार शन्द का प्रयोग केवन लाक्षणिक है। शोभा, कान्ति, आदि शरीर के हो सौन्दर्य-विकार हें, अतएय वे शरीर ही है। उन्हें अलकार तब तक नहीं माना जा सकना जब तक कि वामन के अनुसार 'तौन्दयंम- नकार'-प््यात् अलकार को समन्त सौन्दर्य का ही पर्याय न मान लिया जाय। किन्तु वामन के मत की अ्रनिव्याप्ति मिन्न हो चुरी है अनकार के 'पार' में निहिन कृतित्व या प्रयत्न-नाध्यता उनकी पनिति को प्रसाधन तक ही मीमिन पर देनी है। चाम्नव में महिमभट्ट तया हेमचन्द्र आदि का तके सवनानोकि वे 'काव्यन्य' को तो सिद्ध पर देता है परन्तु उसको तो कुन्नक भी अत्नीकार नहीं फरते। प्रदन न्यना्योति के अनकारत्व का है जिसयी मिनि नहां होती।

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  • १५० 1 भूमिका [ रसवदादि अरलकर

रसवदादि अलंकार

स्वभावोक्ति की भाँति कुन्तक ने रसवदादि अलकारों को भी अ्मान्य घोषित किया है और इनके निराकरण का भी मूल तर्क लगभग वही है। तृतीय उन्मेष की ग्यारहवीं कारिका और उसकी विस्तृत वत्ति में कुन्तक ने अ्रनेक सूक्ष्म युक्तियो द्वारा रसवत् अलंकार का खण्डन किया है। सक्षेप में उनके दो मूल आक्षेप हैं -

अलकारो न रसवत् परस्याप्रतिभासनात्। स्वरूपादतिरिक्तस्य शब्दार्थासगतेरपि॥ ३११॥

अर्थात् (१) एक तो अपने स्वरूप के अतिरिक्त (अलकार्य रूप से) अन्य किसी की प्रतीति नहीं होती, और (२) दूसरे (अलफार्य रस के साथ अलकार शन्द का प्रयोग होने पर) शब्द और अर्थ की सगति नहीं बैठती, इसलिए रसवत् अलकार नहीं है।

वृत्ति में इन्हों दो युक्तियों का प्प्रत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए कुन्तक ने रसवत् के खण्डन में अनेक छोटे-मोटे तर्क उपस्थित किये हैं जिनका सारांश इस प्रकार है -

(क) सहृदयों को सत्कवियों के काव्य में सभी अलकारों के विषय में अलकार्य और अलकरण की पृथक सत्ता की प्रतीति निश्चयपूर्यक होती है। किन्तु 'रसवदलंकारयुक्त' इस वाक्य में कौन अलकार्य है और कौन अलकार इसका परिज्ञान सम्भव नहीं है। यदि शृगार आदि रस ही प्रधान रूप से वर्ण्यमान अलकार्य हैं तो उनका अलफार किसी अन्य को होना चाहिए, अथवा यदि सहृदय-आह्नादकारी होने के कारण रस को ही अलकार कहते हैं तो भी उससे भिन्न कोई अन्य पदार्थ अलकार्य रूप से प्रस्तुत होना चाहिए। परन्तु भामह आदि प्राचीन आलकारिकों के अभिमत रसवत् अलकार के उदाहरणों में इस प्रकार का कोई तत्व नाम को भी नहीं है।

(ख) भामह ने इस अलकार का निरूपण इस प्रकार किया है 'रसवव् दशितस्पष्टशृगारादिरस यथा।' इस वाक्य की व्याख्या कई प्रकार से सम्भव हो सकती है परन्तु किसी भी रूप में रसवत् का अलकारत्व सिद्ध नहीं होता। यदि बहुद्रीहि समास मानकर उपर्युक्त लक्षण का अर्थ यह किया जाय-दशित तथा स्पूष्ट अथवा स्पष्ट है शृंगार आदि जिसमें-तो बहस्रीहि समास का अर्थभूत अ्न्य

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रसवदादि अलंकार ] भूमिका [ १५१

पदार्थ यहाँ क्या होगा? यदि यह अन्य पदार्थ काव्य ही है तो उपर्युक्त उक्ति में उपक्रम तया उपसंहार का विरोध रप दोष आ जाता है क्योकि भामह आदि सभी आालकारिक श्र्परारम्भ में ही काव्य के अ्वयव रूप शब्द तया अर्थ के पृथक अलकार मान चुके हैं। यदि उपर्युक्त लक्षण का अर्थ यह किया जाय-प्रदशित किए हैं स्पष्ट सप से शृगार आदि जिसने-तो भी 'जिसने' द्वारा सूचित वह अभिकरण कोनना है? यदि इसके उत्तर में कहा जाय कि वह अभिकरण प्रतिपादन का वचित्र्य ही है तो भी उसकी पुष्टि नहीं हो सकती क्योंकि प्रतिपाद्य स्वय ही प्रतिपादन-वैचित्रय दूसरे शब्दों में अलंकार्य स्वय अ्रपना अ्लकार हो सकता है, यह अ्र्सम्भव है। प्र्रयवा स्पष्ट रूप से प्रदर्शित रसो का प्रतिपादन-वैचित्र्य-यदि इस प्रकार की व्यास्या को जाय तो भी वह संगत नहीं है क्योंकि शृगारादि रसों के स्पष्ट दशन में उनके अपने स्वरूप को ही सिद्धि होती है, उसके अतिरित्त अलंकार अ्थवा अलकाय किसी की भी सिद्धि नहीं होती।

(३) उ्भट की परिभाषा और भी श्रसंगत है : अभिनय के योग्य स्थायी भाव, सचारी भाव, विभाव आदि को (अभिनय द्वारा अ्भिव्यक्त न कर) शृगार आदि रस का नाम लेकर स्वशब्द से प्रकट करना रमवदालकार है स्वशव्दस्यामि- सचारिविभावाभिनयास्पदम् । (भा० फा० वि०-उन्डट) इसके विषय में कुन्तक का तक यह है कि रसो की स्वशच्दवाच्यता स्वय ही अनिद्ध है उसके द्वारा रमवत् अलकार को सिद्धि फैसे हो सकती है?

(४) किसी-किसी ने यह लक्षण भी किया है कि रम के सश्रय से रमवत् अलंकार होता है 'रसवद् रसमश्नयात्। परन्तु यह भी तर्कननम्मत नहीं है। रम- संश्रय का अ्रयं है रस जिसका सश्रय है-ध्रव ऐता पदार्य जिसका सथय रन है, षपा है? यदि कहिए कि फाव्य ही है तो उसका सण्डन पहने ही किया जा चुका है। भरयवा यदि रमसशय का अयं य्ठो तत्पुरुष मान कर किया जाय-रन का सथय, तो भी रन का समय काव्य के अतिरित्त औोर कया हो मकता है?

(x) रसवत् अतकार की मिद्धि एक प्रन्य प्रकार मे नी की जाती है. (जिम प्रकार रन के सवार से हसे-मूसे वृक्ष हरे-नरे हो जाने है, उनी प्रकार) रन के भनुप्रवेश से वाक्य का पदार्य रप धलंकार्य ललंकारता घारण फर नेना है। यह युत्ति भी मान्य नहीं है क्योकि जो पहने धनंकार्य या वही याद में अनंकार कमे हो सकता है?

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१५२ । भूमिका [ रसवदादि अलकार

(६) शब्द और्रौर अ्र्र्थ की अ्र्रसगति होने से भी रसवत् अलकार सिद्ध नहीं होता। रसवदलकार का विग्रह दो प्रकार से हो सकता है। (१) तत्पुरुप के रूप में इसका विग्रह होता है-रसवत अलकार अर्यात् रसवान् का अलकार, (२) कर्म- घारय के रूप में रसवाञ्चासौडलकार अर्था्त् रसवान् जो अलकार है। इन दोनों ही विग्रह-रूपों में शब्द और अर्थ की सगति नहीं बैठती क्नोकि (१) रसवान् का अलकार और (२) रसवान् जो अलकार है-ये दोनो ही वाक्य प्राय निरर्थक से हैं। पहले तो रसवान् क्या है जिसका अलकार रसवत् है, और फिर रसवान् तो अलकार्य है वह अलकार का विशेषण कैसे हो सकता है?

(७) 'रसवान् का अलकार' में यदि रसवान् को काव्य का पर्याय माना जाय तो काव्य का अलकार होने से रसवत् सर्व-साधारण अलकार हुआ जिसकी सत्ता उपमादि सभी अलकारों में अनिवार्यत माननी पडेगी क्योकि उपमादि सभी अलकार काव्य के अलकार पहले है, और उपमादि बाद में। इस प्रकार रसवत् का अनिवार्य सयोग होने से किसी भी अलकार का रूप शुद्ध नहीं रह जायगा।

(८) आनन्दवर्धन द्वारा प्रस्तुत रसवत् अलकार की परिभाषा यद्यपि भामह प्रादि की परिभाषा से भिन्न है तथापि उसकी मान्यता भी स्वीकार नहीं की जा सकती। आनन्दवर्धन के अनुसार जहाँ अन्य व क्यार्थ का प्राधान्य हो और रसादि उसके शरग हों वहा रसवत् अलकार होता है। उदाहरए रूप में आनन्दवर्धन ने यह श्लोक िया है. क्षिप्तो हस्तावलग्न प्रसभमभिहतोऽप्याददानोऽशुकान्तम् गृह्लून् केशेष्वपास्नश्चरणनिपतितो नेक्षित सम्भ्रमेण। साश्रुनेत्रोत्पलाभि कामीवाद्रार्पराध स दहतु दुरित शाम्भवो व शराग्नि ।।

अर्थात् त्रिपुर दाह के समय, सद्य अपराघी कामी के समान हाथ से छने पर भी भटका हुआ, जोर से पटक देने पर भी वस्त्रों के किनारो को पकडता हुआ, केशो को ग्रहण करते समय हटाया गया, पैरों में पडा हुआ भी सम्भ्रम के कारण उपेक्षित, और प्र्प्रार्लिंगन का प्रयत्न करने पर भी अश्रुपूर्ण कमललोचनी त्रिपुर-सुन्दरियों द्वारा तिरस्कृत शिवजी के बाण की अग्नि तुम्हारे दुखो को दूर करे। इसमें शिवजी के प्रभाव का अरतिशय कवि का मुख्य अभिप्रेत विषय है, श्लेष-सिद्ध ईर्ष्या-विप्रलम्भ तथा करुण रस उसके परिपोषक श्रग हैं, इसलिए रस की अलकार रूप में निबन्धना होने से यहाँ रस- वदलकार हुआ।

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रसवदादि अलफार ] भूमिका [१५३

यह ध्वन्यालोककार का मत है, परन्तु फुन्तक इससे सहमत नहीं हैं। उनका तर्क यह है कि एक तो करुण और शृगार -इन दो विरोधी रसो की सह-स्यिति श्रक्षम्य रसदोय है, और दूसरे कामी तथा शम्भु की शराग्नि में साम्य-भावना करना असम्भव है क्योंकि दोनों के धर्म नर्वथा विरुद्ध हैं। इमलिए अनुचित विषय के समर्यन में चातुयं दिखाने का यह प्रयत्न व्यर्थ है।

इस अनोचित्य-प्रदर्शन के अपतिरित्त उपर्युक्त स्यापना के विरुद्ध भी कुन्तक ने फिर यही आक्षेप किया है कि यहा भी अलकार्य और अनकार की परस्पर-भ्रान्ति विद्यमान है-जो अलकार्य है वही अलकार हो जाता है।

(६) कुद् आलंकारिको के अनुसार चेतन पदार्यो के सम्वन्ध में रसवत् अलंकार और श्रचेतन पदार्यों के मम्बन्ध में उपमा आरदि अ्रन्य अलंकार होते हैं। इस स्थापना का खण्डन कुन्तक ने आनन्दवर्धन के तर्कों का आधार लेकर किया है जिनका साराश इस प्रकार है -अचेतन वस्तु के वर्णन मे भी किसी न किसी रूप में चेतन सम्बन्ध विद्यमान रहता है-यदि चेतन सम्वन्ध होने पर रसवत् अलकार हो जाय तो फिर उपमा आदि अन्य अलकारो का कोई विषय ही नहीं रह जाता। और, यदि चेतन स बन्ध होने पर भी अवंनन नस्तु वर्णा में रसवत्न न नाना जाय तो महाफविनो के अनेक वणन सर्वया नीरस हो जाऐंगे। अत उपर्युक्त धारणा मिश्रा है।

इस प्रकार अ्रनेक युत्तियों के द्वारा कुन्तक ने रसवदलकार-विययक विभिन्न धारणाओ्रों फा विस्तार से राण्डन किया है। फुन्तफ को युक्तिशो का मूल प्ावार वास्तव में यही है कि तयाकयित रसवत् अलकार में अलंकार्य और अलकार की परस्पर भ्रान्ति है, अर्थात् अलकार्य को ही अलंकार मान लिया गया है जिनमे अ्रलकार्य वया है और सलकार क्या है इमकी प्रतीति नहीं हो पाती। और, इममें सन्देह नहीं कि यह तक प्रकाट्य ही है।

ग्मवत् सलंकार का वान्नविक न्वस्प

फुन्तक के मत से

किस प्रकार यह रसवत् समन्त चलकारो का प्राण और पाम्य का घ्द्वितीय नार-नवंत् हो नवता है, इनका पत फु्बक अपने मौलिक दष्टिशोण मे वर्णन करते हैं

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१५४ भूमिका [ रसवदादि अलकार

रसेन वर्तते तुल्य रसवत्वविधानत योऽलकार स रसवत् तद्विदा ह्वादनिमिते। ३-१४

अरर्थात् रसतत्व के विधान से, सहृदयो के लिए आह्लादकारी होने के कारस मलंकार रस के समान हो जाता है वह अलकार रसवत् कहा जा सकता है।' प्रसग में कुन्त ने कई-एक उदाहरण दिये हैं। एक तो पागिनि का निम्नति श्लोक है

उपोढरागेण विलोलतारक तथा गृहीत शशिना निशामुखम्। यथा समस्त तिमिराशुक तया पुरोऽपि रागाद् गलित न लक्षितम् ॥

अर्थात् सान्ध्य अरुशिमा को धारण किये हुए ( प्रेमोन्मत) चन्द्रमा ने रात्रि के तारकयुक्त मुख को इस प्रकार पकडा कि, राग के कारण, समस्त पधकार रूप गिर जाने पर भी रात्रि को दिखायी नहीं दिया। यहाँ प्रसगोचित सुन्दर निशा शशि के वर्णन में नायक-दायिका-वृत्तान्त के आरोप द्वारा कवि ने रूपकालका रचना की है, और यह रूपकालकार श्लेष की छाया से मनोहर विशेषणो की से तथा विशेष लिंगो की सामर्थ्य से (शशि और निशा के पुल्लिंग तथा स्त्रीलि चमत्कारपूर्ण प्रयोग से ) काव्य की सरसता को प्रस्फुटित करता हुआ तथा सह का मन प्रसादन करता हुआ स्वय ही रसवदलकारता को प्राप्त कर लेता है।

दूसरा शाकुन्तलम् का यह प्रसिद्ध छन्द है ·-

चलापागा दृष्टि स्पृशसि बहुशो वेपथुमती। रहस्याख्यायीव स्वनसि मृदु कर्र्गान्तिकचर । करो व्याघुन्वत्या पिबसि रतिमर्वस्वमधर 1, वय तत्वान्वेपान्मधुकर हतास्त्व खलु कृती॥

अर्थोत्

दृग चौंकत कोए चलें चहेंधा अँग बारहि बार लगावत तू। लगि कानन गूंजत मजु कछू मनो मर्म की बात सुनावत तू॥ कर रोकती को अधरामृत ले रति को सुखसार उठावत तू। हम खोजत जातिहि पाँति मरे घनि रे घनि भौंर कहावत तू।

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रसवदादि अलकार ] भूमिफा [१५५

कुन्तक के अनुसार उपर्युक्त पद में भ्रमर में कान्त के व्यवहार का आरोप करने वाला रूपकालंकार प्रधान वृत्ति शृगार के योग से काव्य की सरसता के अतिशय का कारण होने से रसवत् शोभादायक हो रहा है-अत. यहाँ रसचदलंकार है।

कुन्तक के मत से

(१) रसवत् अलकार अलकारों का चूडामणि है। (२) नीरस अर्यात् अचेतन अरथवा जड पदार्थों की सरसता को प्रकाशित करने के लिए सत्कवियो को यह अद्भुत साघन प्राप्त है। (३) यह अलंकार प्रतीयमान ही होता है।

विवेचन

संस्कृत काव्यशास्त्र में रसवत् अलंकार के विषय में चार धारणाएं उपलब्ध होती हैं।

१. भामह से लेकर उ्ट तक प्राचीन आलकारिको के मत से रस का स्पष्ट प्रकाशन अर्यात् रसयुक्त वगंन हो रसवत् अलकार है। उनके अनुसार अलकार फाव्य-सौन्दर्य का पर्याय है अतएव काव्य-सौन्दर्य का विधायक प्रत्येक तत्व अलं- कार के अन्तर्गत आ जाता है। इस दृष्टि से रस भी अलकार का हो तत्व है शरीर ऐमी उक्तिशे में जिनका सौन्दर्य भूलत. रस पर हो निर्भर रहता है इन मालकारिकों के अनुसार रसवत् अलंकार होता है। उद्भट ने भामह की परिभाषा में योडा-सा परिवर्तन कर दिया है। उनके मत से जहाँ रस का स्वयाचक शब्दों के द्वारा स्पष्ट प्रकाशन हो वहाँ रमवत् भलकार होता है। परन्तु इससे मूल धारणा में फोई अन्तर नहीं पडता-उद्भट ने यह परिवर्तन दृश्य फाव्य और श्रव्य फाव्य फे रम का अ्रन्तर स्पष्ट करने के लिए ही किया है, दृश्य काव्य में जिम रस का परिपाक दृश्य श्रोर श्रव्य वोतों प्रकार के उपकरणों द्वारा सम्पन्न होता है, शव्य काव्प में उसका केवल स्ववाचक शब्दों द्वारा ही वर्णन किया जा सकता है।

२ कुछ विद्वानों के मत से चेतन म्यत्तियो के प्रसग में रमवत् अलंकार औोर अचेतन पदार्यो के प्रसंग में उपमादि अनकार होते हैं। उनका अभिप्राय कदाचित् यह है कि रस का चमस्कार चूंकि मानव -व्यापारों के वर्णन में हो रहता है इसलिए रमषत् अलकार फो स्यिति भी वहीं हो नकनी है। और उपमादि अलंकारो में अप्रस्तुत-विधान चूंकि शचेतन, प्राकृतिक उपमान प्रादि के आधार पर किया जाता है इसलिए इन अलंकारों को स्थिति प्राय अचेतन पदार्चों ये यणन मे ही होनी है।

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१५६ भूमिका [ रसवदादि अ्र्प्रलकार

रमवत् के आधारभूत भाव, अनुभाव, विभाव, शदि की सता चैतन्य मानव-व्यापारो में ही सम्भव है और अप्रस्तुत-विधान के आधारभूत उपकरण अविकतर अ्र्प्रचेतन प्राकृतिक जगत में ही उपलब्ध होते हैं। इसीलिए इन ध्वनि पूर्व आ्र्प्रालकारिको ने मानव-जोवन के चित्रए-सौन्दर्य को रमवत् के आश्रित और मानवेतर जगत के वर्णन- चमत्कार को उपमादि अ्रन्य अलकारों पर निर्भर माना है। ये आचार्य भी काव्य के समस्त सौन्दर्य को अलकार ही मानते हैं अत यह वारणा भी मूलन प्रयम धारणा मे भिन्न न होकर उसी का आरयानमात्र है।

्रानन्दवर्घन ने उपर्युक्त दोनो धारणाओ का खण्डन कर रसवत् अ्प्रलं- कार की एक तीसरी ही परिभाषा की हैजहाँ रस अ्गी हो वड़ा रमध्वनि और जहाँ रस किमी अन्य वाक्यार्थ का चमत्कारवर्धक अग हो वहाँ रसवत् अलंकार होता है। यहाँ रस वस्तु-ध्वनि अथवा अलकार-ध्वनि का चमत्कारवर्वक होने के कारण अलकार का कार्य करता है, इसी आवार पर आनन्दवर्धन ने वह नवीन कल्पना की है।

४ चौघी स्थापना कुन्तक की है जो इन तोनो से ही भिन्न है। इनके अनुसार रत के योग से जिस अलकार में सरसता का समावेश हो जाता है वह रमवत् अलकार है। कुन्तक को धारणा से यह स्पष्ट है कि वे चनत्कार के दो रूप मानने हैं, एक भावगत चनत्कार दूमरा कल्पनाजन्य चनत्कार। रसप्रपच भावगत चनत्कार के अन्तर्गत है और अलकारप्रपच कल्ननाजन्य चमत्कार के अन्तर्गन। जहाँ कल्पना के चमत्कार के नाथ भाव-सौन्दर्य का ननोग हो जाता है वहाँ कुन्तक के मत से अलकार रसवत् हो जाता है अथवा रसवत् अलकार की स्थिति हो जाती है। कल्पना औ्रर अनुभूति का यह मणि-काचन योग निश्चय ही काव्य की सबसे वडी मिद्धि है इनीलिए कुन्तक ने रसवत् अलकार को अलकार-चूडामणि कहा है।

यहाँ शव दो प्रश्न उठते हैं -(१) रसवत् अलकार की सत्ता मान्य है अथवा नहीं१ (२) यदि मान्य है तो किम रूप में अर्ात् उपर्युक्त धारणाओ में से कौनसी धाररा ग्राह्य है?

रसवत् अलकार की सत्ता के विषय में रस-ध्जनिवादी आचार्यो तथा कुन्तक का तर्क ही वास्तव में सगत है। अलंकार शब्द ही सावन का वाचक है। इनीलिए अलकार शब्द का एक पर्यान प्रमाधन भी है। वह नौन्दर्य का पर्वात अयया कारण भी नहीं हो सकता। जहाँ कहीं सौन्दर्य अयवा रप आदि को अलकार कहा भी जाता है वहाँ अलकार शब्द का लाकणिक प्रयोग ही मानना चाहिए। सौन्दर्य अयवा रूप निग्चय

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रनवदादि अलकार भूमिका [१५७

हो अलकार्य है, अलंकार नहीं। अलकार उसको अलकृत अथवा भूषित ही करता है- दूमरे शब्दो में उस अन्यया विद्यमान रप की अनिवृद्धि ही करता है। इनीलिए ध्वनि- * रसवातियों ने 'शोभाकर' के स्थान पर 'शोभातिशायी' विशेषण का प्रयोग किया है। इस दृष्टि से सरम वर्णन अलकार्य ही है घलकार नहीं है। काव्य का आस्वाद्य रूप हो उसका मौन्दर्य है और आस्त्राद्यता मूलत भाव पर ही पश्रिन है। ब्रास्वादन अनुभूति का विषय है, और वस्तु भी अनुभूति रूप होकर ही आ्स्वाद्य वनती है। अत अनुभूति का श्रह्लादकारी रप ही काव्य का मौन्दर्य है। अलकार क्ल्पना का चमत्कार है।-अनुभूति की उत्तेजना से कल्पना भी उत्तेजित होकर अलकारमयी वाणी मे उसको अभिव्यक्त कर देती है। जिस अनुभूनि की प्रेरणा मे कल्पना को उत्तेजना मिली, उती के मूर्त रूप को बदले में कल्पना से चमत्कार प्राप्न हो जाता है। प्नुभूति कल्पना को उद्बुद्ध करती है, कल्पना उसके (व्यक्त) मृर्त रप को चमत्कृन कर देती है-इसीलिए प्निव्यजना में दोनो अविभाज्य-मे प्रतीत होते हैं। किन्तु विश्लेषण करने पर यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि अनिव्यजना का निषय तो अनुभूति ही है-कल्पना उसको चमन्कारपूर्ण मृर्त रूप प्रदान करती है। इमलिए सज्जा कल्पना को क्रिया है, अनुभूति इन सज्जा का विषय है। अनुभति का कारय नज्जा नहीं है, वह कल्पना को उत्तेजित करती हुई सज्जा की प्रेरसा तो वन जाती है जैमे नहज मौन्द्य शृंगार-सज्जा की प्रेरणा बन जाता है, परन्तु अरन्त मे तो मज्जा का प्रयोजन उमी का उत्कर्षवर्घन होता है। त्पष्ट शब्दो में इनका तर्थ यह है. अनुभूति काव्य का प्राए-तत्व है, कल्पना उसका रप-विधायक नत्व है श्रर अलकार इन रूप-विधान की प्रक्रिया के माघन हैं। अतएव अनुभूति अ्रनंकार े भिन्न वत्तु है. अनकारविदायिनी कलना की प्रेरकनाति होने के कारण वह अलकार की प्रेरक पत्ति तो है, परन्तु न तो अल- फार है और न अनंकार का श्र है औौर न अलकार की किया। इम प्रकार अल्कार- वादी दप्टिकोण का सण्डन हो जाता है जिनमें रस को या तो अनकार नान लिया गया है, या उनका अरग या उनकी मृष्टि-और इनी के साथ र्सवत् अनकार का भी सण्टन हो जाता है।

टूमरी धरणा इसी धारसा का विस्वार मात्र है। उसका सून साधार यह तथ्य है कि रन का नम्बन्ध मानव-जोवन मे है और प्प्रस्तुन-विघान वा सम्बन्न मानवेतर जगन नें-इनीलए चेनन जगन से चर्णन में नवचन् बनपार भर अचेनन जगत के वर्गन में उपमादि अन्य अनकार रहते तै। इसये नण्डन में आनन्दवर्घंन ने निम्ननिगिन तवं दिये है .

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१५८ ] भूमिका [ रसवदादि अलंकार

१ अचेतन जगत के वर्णन मे चेतन का भी सम्पर्क शनिवार्य रूप से रहता है, अतएव उपमादि समस्त अलकार रसवत् से सकीर्ण हो जाते हैं-कोई भी अलकार शुद्ध नहीं रह जाता।

२ अचेतन पदार्थो के वर्णन में रस का अभाव सर्वत्र नहीं होता-अनेक कवियों के इस प्रकार के वर्णन अत्यन्त सरस हैं। यदि रसवत् को केवल चेतन जीवन के वर्णन तक ही सोमित कर दिया जायगा तो अचेतन जगत के सभी चित्र नीरस हो जायंगे।

इनके अतिरिक्त ३ एक तीसरा तर्क यह भी है कि इस धारणा का आधार- भूत तथ्य भी अशत ही मान्य है। अचेतन अथवा मानवेतर जगत के अनेक चित्र मानव-भावना के आरोप से रसपेशल हैं, और उधर उपमादि के अप्रस्तुत-विधान में भी मानव-भावनाओ, चेष्टाओं आदि का प्रयोग मिलता है। रम्याव्भुत काव्य में इन दोनो विशेषताओं का प्राचुर्य है।

-और फिर इस धारखा के अतर्गत भी तो मूल आक्षेप का कोई समाधान नहीं है अर्थात् अलकार्य अलकार कैसे हो सकता है ?

आानन्दवर्धन की स्थापना उनके ध्वनि-सिद्धान्त के अनुकूल ही है। कहीं कहीं मूल व्यग्य रस-रूप न होकर वस्तु-रूप या अलकार-रूप होता है और रस का उपयोग वस्तु-ध्वनि अथवा अलकार-ध्वनि का उत्कर्ष-वर्धन करने के लिए ही किया जाता है। यहाँ रस अलंकार बन जाता है। पर यह स्थापना भी अधिक मान्य नहों है-आनन्व ने यहाँ अलकार का रूढ़ अर्थ ग्रहण न कर लाक्षणिक अर्थ ही ग्रहण किया है। उनके अ्रनुसार अमरुक के मगल छन्द में शिय-प्रताप मूल व्यग्य है और करुण आदि रस उसका अलकार है। परन्तु उनका यह मत अधिक तर्क-सम्मत नहीं है क्योंकि शिव- प्रताप कोई स्वतन्त्र तथ्य नहीं है-उसके द्वारा रौद्र रस का परिपाक होता है और आलम्बनगत करुण रस इस रौव्ररस का पोषक है। अब यदि मगल श्लोक होने के कारण यहाँ मूल रस भक्ति माना जाय तो आलम्बन शिव का यह प्रताप-व्यजक रौद्र रूप भक्ति का उद्दीपक हो जाता है और इस प्रकार रसो की यह परम्परा पोषक-पोष्य रूप में ठीक बैठ जाती है। यहाँ पोषक रस को यदि उत्कर्षवर्धक होने के कारण 帝 記 帝 अलंकार फहा जाय तो वह निश्चय ही अलकार शब्द का लाक्षणिक प्रयोग ही होगा। वैसे, रस प्रपच में एक रस द्वारा दूसरे रस के पोषण का स्पष्ट विधान होने के कारण

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रसवदादि अलकार ] भूमिका I १५E

यह सब अनावश्यक ही है-पोपक रस को अलकार और पोष्य रस को अलकार्य कहने में कोई विशेष सगति नहीं है। वास्तव में उपर्युक्त भ्रान्त धारणा का कारण आानन्दवर्धन को वस्तु-ध्वनि की कल्पना है जिसे उन्होने रस-ध्वनि से भिन्न स्वतन्त्र रूप दे दिया है। जंसा कि शुफ्लजी ने सिद्ध किया है, वस्तु-ध्वनि रस-ध्वनि (और रस के अन्तर्गत फेवल रस-परिपाक को न मानकर समस्त रस-प्रपच को ही मानना चाहिए) से स्वतन्त्र नहीं है। भाव के ससर्ग के बिना वस्तु ध्वनि काव्य ही नहीं रह जाती कोरी तथ्य-व्यजना रह जाती है। इस प्रकार उपर्युक्त छन्द में रस की अलंकार एप में फल्पना का आघार यही मिथ्या घाररा है।

कुन्तक की रसवदलकार-कल्पना में रसवत् वातव मे फोई स्वतत्र अलकार नहीं है। उनके मतानुसार कहीं-कही रस के सयोग से अलकार भी रसवत् धर्यात् रस के समान ही सहृदय-श्राह्लादकारी हो जाता है-यही अलंकार का रसवत् स्वरूप अयवा रसवत् भलंकार है। परन्तु यह सामान्य काव्य-सिद्धान्त है-रसवत् नामफ किसी विशेष अलंकार का निरुपण नहीं है : यहाँ रस और अलकार दोनो की पृथक सत्ता है और उनमें उपमान-उपमेय सम्वन्ध मात्र है। जहाँ तक इस सिद्धान्त का सम्बन्ध है, वहां तक तो दो मत हो ही नहीं सफते। क्योकि काव्य के मनोविज्ञान फा यह स्वीकृत सत्य है कि कल्पना भाव के ससर्ग से ही रमसीय वनती है-काव्यशास्त्र की शब्दावली में, रस फे सयोग से ही अलकार में काव्यत्व अयवा चारुता आाती है। रस और फल्पना का मणिकाचन योग ही काव्य की सबसे बडी सिद्धि है और कुन्तक ने उसका प्रतिपादन कर निश्चय ही अपने प्रौढ़ काव्य-ज्ञान का परिचय दिया है। परन्तु रसवत् अलंकार फी स्यापना यह नहीं है, यह तो काव्य की रसवत्ता फी स्थापना है।

अत उपर्युक्त विवेचन का निष्यर्ष यही है कि रमवत् अलकार वास्तव में कोई अलकार नहीं है क्योकि विषय से सम्बद्ध होने के कारण रस अतंकारय हो है, परलंकार नहीं है। उसकी स्थापना के लिए प्रकारान्तर से भी जो प्रयत्न किये गये है, उनसे भी कम से फम उसकी अलफारता की सिद्धि नहीं होती।

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१६० भूमिका [अ्रन्य अर्प्रलंकार

रसवत् वर्ग के अन्य अलकार

रसवत् वर्ग के अन्य अलकार हैं प्रेयोऽलकार, ऊर्जस्वी और समाहित। भामह, दण्डी तथा उद्भट आदि आचार्यो ने इनके भिन्न भिन्न लक्षण दिये हैं। भामह ने तो बास्तव में लक्षण दिये ही नहीं, केवल उदाहरणो से ही उनका स्वरूपोल्लेख कर दिया है। दण्डी तथा उद्भट के लक्षरो में भी अन्तर है। दण्डी के अनुसार प्रियतर आ्राख्यान या प्रिय कथन प्रेयोऽलकार है और ऊर्जस्वी कथन ऊर्जस्वी अलकार है। उद्ट ने इनकी परिभाषा इस प्रकार की है 'भाव-देवादि विषयक रति-का अग रूप में प्रयोग प्रेयोऽलकार, रसाभास तथा भावाभास का अ्ररग रूप में प्रयोग ऊर्जस्वी अलकार, और भावशाति का समाहित अलकार कहलाता है।' कुन्तक ने दोनो के मतों का खण्डन करते हुए उपर्युक्त सभी अलकारो का भी रसवदलकार की भॉति ही निषेध किया है। उनका एक सामान्य तर्क तो यही है कि रसपूर्ण कथन की भाँति प्रिय कथन अथवा ऊर्जस्वी कथन आदि, उद्भट के अनुसार भाव, भावाभास, रसाभास, तथा भावशान्ति भी, अलकार्य ही है, वे अलकार नहीं हो सकते। इसके अतिरित्त प्रत्येक अलकार के विरुद्ध विशेष तर्क भी कुन्तक ने प्रस्तुत किये हैं उदाहरण के लिए दण्डी का 'प्रियतर आख्यान' व्याजस्तुति मात्र है, उद्भट का 'भाव-कथन' भी व्याजस्तुति आदि कोई अलकार हो सकता है। उद्भट का ऊर्जस्वी तो किसी प्रकार मान्य हो ही नहीं सकता क्योकि शचित्य का विघातक रसाभास अथवा भावाभास काव्य में सर्वथा अग्राह्य है, वह अलकार कैसे हो सकता है ? रन्य अप्रलकारों का विवेचन कुन्तक ने अपने सिद्धान्त के अनुसार अन्य अलकारो का भी मौलिक निरूपर किया है। इस क्षेत्र में उनका सबसे स्तुत्य प्रयत्न है अलकारों की व्यवस्था अलकारों की बढ़ती हुई सख्या को विवेक के आधार पर सीमित करने का सस्कृत काव्यशास्त्र में यह कदाचित् पहला और अन्तिम प्रयत्न था। इस व्यवस्था के लिए कुन्तक ने तीन विधियो का अवलम्बन किया है (१) अनेक अलकारो का अलकार्य होने के कारण निषेध, (२) चमत्कारहीन तथाकथित अलकारो का त्याग और (३) अनावश्यक भेद-विस्तार रूप अलकारो का अन्य अलकारों में अन्तर्भाव। १ इस दृष्टि से रसवत् वर्ग के अलकारो के अतिरिक्त उदात्त को भी कुन्तक ने अलकार ही माना है और अलकारो की श्रेरगी से वहिष्कृत कर दिया है। उनकी युक्ति है कि ऋद्विमत् वस्तु-वर्णन अथवा महापुरुषो के चरित्र का वर्णन तो वर्ण्य विषय या अलकार्य है, अलकार नहीं। इसी युक्ति का समर्थन आचार्य रामचन्द्र

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अन्य अलकार ] भूमिका [ १६१

शुक्ल ने किया है 'पर प्राचीन अ्व्यवस्या के स्मारक स्वरूप कुछ अलकार ऐसे चले आ रहे हैं जो वर्ण्य वस्तु का निर्देश करते हैं और अलकार नहीं कहे जा सकते- जैसे स्वभावोक्ति, उदात, अ्रत्युक्ति।' (चिन्तामरिग १-कविता क्या है? पृ० १८३) श्रौर, इसमें सन्देह के लिए वास्तव में स्थान नहीं है।

इन्हों के समतुल्य सस्कृत अलकारशास्त्र के और भी अलकार है जिनका सम्बन्ध भी मूलत वर्णन-शैली मे न होकर वर्ण्य वस्तु से ही है। ये अलकार हें आशी, विशेषोक्ति, आदि। इनमें 'स्वभावमात्रमेव रमणीयम् (कुन्तक)-रमणीयता स्वभाव फी ही है, प्रत पूर्वोक्त युक्ति के अनुसार इन्हे अलकार नहीं माना जा सकता।

२ कतिपय तथाकयित अलंकारो का खण्डन कुन्तक ने इस आरधार पर किया है कि उनमें कोई चमत्कार नहीं है। ऐसे अलकारो में सवसे मुर्य हैं ययासटय, हेतु, सूक्ष्म, लेश आदि जिनमें भगिति-वैचित्र्य के अभाव में कोई कान्ति नहीं होती : भणितिवंचित्र्यविरहान्न काचिदत्रकान्तिविद्यते। (३४ की वृति)। इसी तर् से आगे चलकर उन्होने सन्देह के भेदो का भी निषेध किया है।

३. इनके अरतिरित्त अनेक अलकारो को कुन्तक ने केवल अ्नावश्यक भेद-विस्तार माघ्र मानकर अन्य महत्वपूर्ण अलकारो में उनका अ्रन्तर्भाव कर दिया है। उदाहरण के लिए, साम्यमूलक अ्र्धिकाश अलकारो को उन्होने उपमा के अ्रन्तगंत ही स्यान दिया है-पृथक नहीं। उपमालकार के प्रारम्भ में ही उन्होने यहा है: 'इदानीं साम्यसमुद्भामिनो विभूपणावर्गस्य विन्यासविच्छिति विचारयति अर्ा्त् भ्रव साम्यमूलक अलकारों की रचना-शैली का विचार करते हैं।' इस कयन से स्पप्ट हो यह ध्वनि निकलती है कि वे साम्यमूलक समस्त अलकारो का पृथक निरपए अ्रपनावश्यक समकते है-घौर उनमें से अ्विकाश का उपमा में अ्रन्तर्भाव मानते हैं। प्रतिवस्तूपमा, तुत्ययोगिता, निदर्शना, परिवृति तया अनन्वय इसी फोटि में श्राते हैं। फुन्तफु का स्पष्ट मत है कि ये सभी उपमा के ही रप हैं अनन्वय को उन्होंने इसी दृष्टि से फल्पितोपमान उपमा नाम दिया है। इसी प्रकार समानोत्ति की सत्ता भो फुन्तक को इ्लेप से पथक मान्य नहीं है। वास्तव में उपर्युत्त धारणा का यह प्राधारनूत सिद्धान्न तो सर्वया मान्य है हो कि अलकार-नमुदाय का अ्नावश्यरु भेद-प्रस्तार याव्य की व्युत्पत्ति में महायक न होकर वाधक ही होता है, पतएव उनके लिए व्यवन्या औौर मर्यादा पनिवार्य है। इम दृष्टि ने उन्होने उपर्यत्त जिन तीन विघियों का श्रवलम्बन दिया है ये भी निरचय हो तर्क-सम्मन है। पनन्तु कुन्तक ने पदाचिन् इन प्रनग पर निपेष ध्यान नहीं

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१६२ ] भूमिका [ अन्य अलकार

दिया-वैसे वक्रोक्तिजीवितम् का यह तृतीय उन्मेष भी अत्यन्त खण्डित रूप में ही उपलब्ध है, इसलिए उसकी वाधा भी नगण्य नहीं है। फिर भी उनके विवेचन को यथावत् स्वीकार करने में कुछ कठिनाई अवश्य होती है-उदाहरण के लिए कुन्तक ने एक ओर तो प्रतिवस्तृपमा और निवर्शना जैसे अलकारो फो स्वतन्त्र नहीं माना, और दूसरी ओर उत्प्रेक्षा तथा सन्देह आदि को स्वतन्त्र मान लिया है। किन्तु साम्य के आधार पर यदि परीक्षा करें तो हमारा विचार है कि उत्प्रेक्षा और सन्देह निदर्शना आदि की अपेक्षा उपमा के कहीं अधिक निकट हैं। इसी प्रकार समासोक्ति का चमत्कार श्लेष पर अशत आश्रित अवश्य है, परन्तु समग्र रूप में उसकी रमणीयता का समावेश श्लेष में नहीं हो सकता। वास्तव में दोनों की प्रकृति ही भिन्न है श्लेष में बौद्धिक चमत्कार है और समासोक्ति का चमत्कार भाव और कल्पना पर आश्रित रहता है। छायावादी काव्य का समासोत्ति-वैभव भला श्लेष की खिलवाड में कैसे सीमित किया जा सकता है ? श्लेष तो समासोक्ति का एक साघन मात्र है-अतएव प्रस्तुत विषय में हमारा निष्कर्ष यही है कि भेद-प्रभेद के विवेचन में कुन्तक ने थोडी जल्दबाजी से काम लिया है जिसके परिरामस्वरूप वह अ्रधिक तर्कसगत नहीं बन पाया। अन्य अलकारों के विषय में कुन्तक को कुछ विशेष नहीं कहना, उन्होंने फेवल मुख्य अलकारो का ही मौलिक ढंग से निरूपण किया है। जिसमें मौलिकता के लिए अवकाश नहीं है उसका उन्होंने स्पर्श ही नहीं किया है। उनके विवेचन में केवल दो साधारण-सी विशेषताएँ हैं-एक तो रूपक और व्यतिरेक के उन्होंने दो भेद माने हैं (१) वाच्य तथा (२) प्रतीयमान, और दूसरे दीपक की प्राचीनों से भिन्न परिभाषा की है। इनर्में से प्रतीयमान अलकार की कल्पना तो वास्तव में नवीन नहीं है क्योंकि आनन्दवर्घन की अलंकार-घ्वनि में उसका निश्चित समावेश है आ्ानन्दवर्धन की रूपक-ध्वनि ही कुन्तक का प्रतीयमान रूपक है। वीपक के सम्बन्ध में उन्होंने प्राचीनों को इस घारणा का खण्डन किया है कि केवल क्रियापद ही दीपक हो सकते है और यह स्थापना की है कि क्रियापदों के समान अन्य पद भी दीपक-पद हो सकते हैं। कुन्तक के अनुसार दीपक के दो भेद होते हैं (१) फेवल दीपक और (२) पत्ति- दीपक। ये वास्तव में कोई महत्वपूर्ण उ्धावनाएँ नहीं हैं क्योंकि एक तो अलकार का चमत्कार जितना क्रियापद दीपक से निखरता है उतना कर्त पदादि से नहीं, औौर दूसरे पत्ति-दीपक दण्डी आदि के माला-दीपक का नामान्तर मात्र है। किन्तु यह अपने आप में इतनी बडी बात नहीं है-वास्तविक् महत्व तो सस्कृत अलकारशास्त्र को सबसे बडी वुर्बलता-अनावश्यक भेद-प्रस्तार का अत्यन्त निर्भीक तथा आश्वस्त होकर उद्धाटन करने वाली उस अन्तर्प्रवेशिनी दृष्टि का है। भारतीय अलकारशास्त्र

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अलकार का महत्त्व ] भूमिका [१६३

का यह दुर्भाग्य हो रहा कि परवर्ती रम-व्त्रनि-वादी आ्र्ाचार्यो ने भी फुन्तक के इस . मार्ग-दर्शन का वाछित उपयोग नहीं किया, अन्यया हमारे अलंकार-विधान का आधार प्राज कहीं श्रधिक व्यवस्थित तथा विवेक-पुष्ट होता।

लंकार का महत्त्व

आलाचकों ने कुन्तक को प्राय.अलकारवादी ही माना है-परन्तु वे उस अ्य में अलंकारवादी नहीं हैं जिस अर्थ में जयदेव आदि, जो अलकारहीन काव्य की अ्र्नुरण अनल से उपमा देते हैं। उन्होंने काव्य को सालकार तो अवश्य माना है परन्तु अलंकार के अ्तिचार का प्रवल शन्दों में अ्र्परनेक बार विरोध किया है-

१. इसका अभिप्राम यह हुआ कि इस प्रकार के पदारथों की स्वभाव सुकु- मारता के वर्णन में वाच्य अलकार उपमा आदि का अधिक उपयोग उचित नहीं हो सकता क्योंकि उससे स्वाभाविक सौन्दर्य के प्रतिशाय में मलिनता आने का भय रहता है। (३।१ फारिका की वुत्ति)

२. इस प्रकार के समस्त उदाहरणों में स्वानाविक सौन्दय की प्रघानता से वर्ण्य वस्तु के जस स्वाभाविक सौन्दर्य के आच्छादित हो जाने के भय से उनके रचयिता कवियों ने अधिक अलंकारो प्रवा सजावट की रचना नहीं की है, और यदि कहीं झलकारों का प्रयोग फरते भी हैं तो उसी स्वाभाविक मोन्दय को और भो प्रधिक प्रकाशित करने के लिए ही करते हैं न कि घलंकार की विचिन्नता दिसाने के लिए। (३।१ कारिका की वृत्ति)

  1. (सत्कवियो फो) उद्दार-पनिषा वाणी नौन्दर्य आादि गुपों से उज्जवल, प्रत्येक पग रसते समय हावभाव से युत्त, मुन्दर रोति मे घारस किये हुए चोटे से परिमित पतंकारों में पलंकृत, अ्रत्यन्त रनपूर्ण होने से पार्द्र-दृदया नाविका के समान मन को हरण फरने में नमर्य होती है। (३।४० फारिका की यृत्ि-परिशिष्ट मे उदृत)

उपर्युक्त उदरस मुन्तक की सदृदयता के अनक्य प्रमाण हैं। उनमे वह म्पष्ट हो जाता है कि वे अलंकार को फाव्य का नाघन हो मानते है निद्धि नहीं। स्रन्व सापनों की भाँति धलकारों को भो नायंकना यही है कि उनका मुरचिपूरा विवेर-

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१६४ ] भूर्मिका [ अलकार औरर वकोक्तिसिद्धान्त

सम्मत उपयोग किया जाय। सुरुचि श्रथवा विवेक के अभाव में केवल विचित्रता- प्रदर्शन के लिए अलकारो का अनावश्यक प्रयोग काव्य-सौन्दर्य का साघक न होकर बाघक हो जाता है। साघन का उपयोग साध्य पर निर्भर रहता है, साध्य से स्वतत्र होकर जिस प्रकार साधन अपनी वास्तविक स्थिति से भ्रष्ट हो जाता है, इसी प्रकार अलकार भी। उसकी सार्थकता तो स्वाभाविक सौन्दर्य को और अधिक प्रकाशित करने में है अर्यात् वह शोभातिशायी है-स्वतत्र रूप में सौन्दर्य का स्थानापन्न नहीं है। काव्य का मूल सौन्दर्य अलकृति-जन्य न होकर रस-जन्य ही है। - इस प्रकार अलकार की स्थिति के विषय में कुन्तक का मत रस-ध्वनिवादियो से मूलत भिन्न नहीं है। उनके शब्दो में और आनन्दवर्धन के शन्दो में कितना साम्य है

(रूपकादि की) विवक्षा (सवैव रस को प्रधान मान कर ही), रस-परत्वेन ही हो, प्रधान रूप से किसी भी दशा में नहीं। (उचित) समय पर (उनका) ग्रहण और त्याग होना चाहिए। (आदि से अन्त तक) अत्यन्त निर्वाह की इच्छा नहीं करनी चाहिए। अ्त्यन्त निर्वाह हो जाने पर भी (वह) अग रूप में (ही) हो, यह बात सावधानी से फिर देख लेनी चाहिए। (ध्वन्यालोक २।१८-१६)

और वास्तव में यही उचित भी है-अलकार का उपयोग साधन मान कर, शोभा का अतिशय करने के लिए, परतन्त्र रूप में ही होना चाहिए वे 'प्रसाघन' ही हैं सौन्वर्य के पर्याय नहीं।

अलकार-सिद्धान्त और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

अधिकांश विद्वानों ने वक्रोत्तिसम्प्रवाय को अलकार-सम्प्रदाय का रूपान्तर अथवा उसके पुनरुत्थान का प्रयत्न माना है। यह मत मूलत मान्य होते हुए भी अतिव्याप्त अवश्य है और वास्तव में इन वोनों सम्प्रदायो में साम्य की अपेक्षा वैषम्य भी कम नहीं है -

साम्य. (१) कुन्तक ने वक्रोक्ति को काव्य का प्राए माना है और साथ ही अलकार भी.

उभावेतावलकार्यों तयो पुनरलकृति। वक्रोक्तिरेव ·. · 1 + + 11

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अलंकार श्रर वक्रोक्ति-सिद्धान्त। भूमिका [ १६५

इस दृष्टि से वक्रोक्ति-सिद्धान्त भी नाम-भेद से घलकार-सिद्धान्त ही ठहरता है। कुन्तक ने 'सालकारस्य फाव्यता' कह कर भी अलकार की अ्रपनिवार्यता स्वीकार करली है।

(२) इन सिद्धान्तो में दूसरी मौलिक समानता यह है कि दोनों के दृष्टिकोए वस्तुपरक है : अ्रयात् दोनों काव्य-सौन्दर्य को मूलत वस्तुगत मानते हैं। दोनों सिद्धान्तो में काव्य को फवि-कौशल पर ही आश्रित माना गया है। दोनों की वस्तुपरकता में मात्रा का अ्रन्तर प्रवश्य हो सकता है-परन्तु काव्य को भ्रनुभूति न मानकर कौशल मानना निश्चय रूप से भावपरक दृष्टिकोण का निषेध औ्रर वस्तु- परक दृष्टिकोण की स्वीकृति ही है।

(३) दोनो सिद्धान्तों के अनुसार वर्ण सौन्दर्य से लेकर प्रबन्ध सौन्दर्य तफ समस्त काव्य-रप चमत्कारप्राण हें एक में उसे अलकार कहा गया है दूसरे में वक्रना • दोनो में शब्द का भेद है अर्य का नहीं क्योफि दोनों में उत्ति-वंदग्ध्य का हो प्राधान्य है।

(४) दोनों में रत को उक्ति के आाशित मार्ना गया है। वैषम्य (१) अलकार-सिद्धान्त ी प्रपेक्षा वक्रोत्ति-सिद्धान्त में व्यक्ति- तत्व का कहीं अधिफ समावेश है. अलफार-सम्प्रदाय में जहा शब्द और धर्य के चमत्कार का निर्वयत्तिक विधान है, वहां वक्रोक्ति में कवि-स्वभाव को मूर्घन्य पर स्थान दिया गया है।

(२) अलकार-सिद्धान्त को अपेक्षा घक्रोक्तिमिद्धान्त रस को अत्यधिक महत्व देता है -रसवत् को अलकार मे अलंकार्य के पद पर प्रतिप्ठिन कर फुन्तर ने निश्चय ही रम के प्रति अधिक आदर वयक्त किया है। वक्रोति-मिद्धान्त में प्रबन्ध- व्रता को वव्रोक्ति का नवसे प्रोठ रप माना गया है-और प्रबन्ध-वपता में रस का गौरव सर्वाधिक है।

(2) अलकार-निद्धान्त में स्वभाव-वर्णन को प्राय हेय माना गया है. भामह ने तो वार्ता मात्र कह कर स्पष्ट हो उमे अवाव्य घोषिन कर दिया है, दण्टी ने भी साद अनफार मान पर उसको फोई विशेष श्रादर नहीं दिया क्योषि उन्होंने शान्त्र में हो उनपा साम्राज्य माना है-पाव्य के लिए यह पेचल चाहनीय है।

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१६६ ] भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त और रीति

इसके विपरीत वक्रोक्तिसिद्धान्त में स्वभाव-सौन्दर्य का वर्णन शहार्य की अपेक्षा श्रधिक काम्य है अलकार की सार्थकता स्वभाव-सौन्दर्य को प्रकाशित करने में ही है अपनी विचित्रता दिखाने में नहीं, स्वभाव-सौन्दर्य को आच्छादित करने वाला। अलंकार त्याज्य है।

(४ ) वक्रोत्ति-सिद्धान्त में काव्य के अन्तरग का विवेचन अ्रधिक है, अलकार सिद्धान्त वहिरग से ही उलझ कर रह जाता है अर्थात् वक्रता द्वारा अभिप्रेत चमत्कार अलकार की अपेक्षा अधिक अन्तरग है।

इस प्रकार वक्रोक्ति-सिद्धान्त अलकार-सिद्धान्त से कहीं अधिक उदार, सूक्ष्म तथा पूर्र है।

वक्रोक्ति-सिद्धान्त और रीति

रीति-सिद्धान्त के अनुसार रीति काव्य की आत्मा है, और वक्रोफि के अनुसार रीति या पदरचना वक्रता का एक भेद है। रीति के लिए फुन्तक ने भी दण्डी की भाँति मार्ग शब्द का प्रयोग किया है।

मार्ग का अर्थ त्रर स्वरूप मार्ग को परिभाषा तो कुन्तक ने नहीं की परन्तु उनके अनेक वाक्यो में मार्ग शब्द की व्याख्या वश्य मिलती है

सम्प्रति तत्र ये मार्गा कविप्रस्थानहेतव। १।२४।

X + ते च कीदृशा कविप्रस्थानहेतव। कवीना प्रस्थान प्रवर्तन तस्य हेतव काव्यकरणस्य कारणभूता। २४ वीं कारिका वृत्ति।

अर्थात् मार्ग का अर्थ है कविप्रस्थानहेतु-कवि के प्रस्थान से अभिप्राय है रचना में प्रवृत होना अर्थात् काव्य-रचना ।

इसी प्रसंग में आगे चलकर एक बार फिर कुन्तक ने मार्ग शब्द के आशय पर प्रकाश डाला है :

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वक्रोक्ति-सिद्धान्त और रीति । भूमिका [१६७

सुकुमाराभिध सोऽ्यं येन सत्कवयो गता। मार्गेणोत्फुल्लकुसुमकाननमेव पटपदा ।। १। २९ ।

      • गता प्रयाता तदात्रयेण काव्यानि कृतवन्त। (वृत्ति) -यह वही सुकुमार मार्ग है जिससे, सिले हुए पुप्पो के वन में भ्रमरों के समान, सत्कवि जाते रहे हैं।+ :- जाते रहे हैं अरयात जिसका अवलम्बन कर काव्य- रचना करते रहे हैं।

अर्यात् जिसका अ्रवलम्बन कर कवि फाव्य-रचना करता है वही मार्ग है।

इस प्रकार कुन्तक के अनुसार जिस विधि का अवलम्बन कर कवि काव्य- रचना में प्रवृत्त होता है, उसका नाम मार्ग है और स्पष्ट शब्दो में फाव्य-रचना को रीति का नाम भाग है। यह परिभाषा संस्कृत रीतिशास्त्र की मान्य परिभाषा मे मूलत अभिन्न है। दण्डी ने यद्यपि कोई परिभाषा नहीं की, तो भी काव्य-मार्ग शब्द का प्रयोग अपने आप में सर्वया स्पष्ट है और उसका आशय वही हो सकताहै जो फुन्तफ ने दिया है। वामन के अनुसार रीति का अर्य है शब्द और अयंगत सौन्दर्य से युक्त पदरचना : उनके मतानुसार यही वास्तव में काव्य-रचना है। भोज ने इस श्रर्यं में प्रयुक्त रीति, मार्ग, पन्थ सादि अनेक शव्दों को, व्यृत्पत्ति के अ्रनुसार, पर्यायता सिद्ध करते हुए मार्ग प्थवा रीति का अरथं फविनामन-मार्ग ही माना है और यही फुन्तक फा कवि-प्रस्थान-हेतु है।

मार्ग भेद का आाधार

कुन्तक से पूर्व मार्ग-भेद के दो आधार-मान्य ये. एक प्रादेशिक और दूसरा गुणात्मक। वास्तन में मार्गो का नामकरण मूसत. प्रादेशिक आधार पर ही हृष था- भरत, वाला, भामह तथा दण्डी आदि पूर्व-रीति आचार्यों के विवेचन मे यह सवया स्पष्ट है कि मार्गो का सम्बन्ध भारत के निन्न भिन्न प्रदेशों से था। विन्तु इन सभी प्राचा्यों ने किसी न किसी रूप में प्रादेशिक आधार में सन्देह भी प्रकट किया है-श्रोर भामह ने तो स्पप्ट ही प्रादेशिक आ्रायार पर मार्गों के तारतम्य का निपेध किया है, वंदभं औौर गोडीव के पायंक्य को भी उन्होंने अनायश्यक या श्रधिक मे अधिक सपचा- .'

रिक माना है. वेदर्न को अपने आम में श्रेष्ठ और गोडीय को सपने आप में निदृष्ट मानना अन्ध गतानुगतिपता है। वामन ने प्रादेशिक आधार का सण्डन पर गुलत्मक

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१६८ I' भूमिका [ वक्रोक्ति सिद्धान्त और रीति

आधार की प्रतिष्ठा की है-प्रादेशिक नामकरण को उन्होने सयोग मात्र माना है। इस विषय में उनका मत यह है 1 "किन्तु क्या भिन्न भिन्न द्रव्यों की भाँति काव्य के गुणो की भे उत्पत्ति पृथक- पृथक देशों से होती है जो उनका नामकरण देशो के आधार पर किया गया है?

नहीं ऐसा नहीं है। वैदर्भी आदि रीतियो के नाम विदर्भादि देशो के नाम पर इसलिए रखे गये हैं कि इन देशो में उनका विशेष प्रयोग मिलता है।

विदर्भ, गौड और पांचाल देशों में वहा के कवियो ने क्रमश वैदर्भी, गौडीया और पाचाली रीतियो का उनके वास्तविक रूपों में मुख्यत प्रयोग किया है। इसलिए इनके नाम विदर्भादि के नामो पर रखे गये हैं, इसलिए नहीं कि इन देशो का उपर्युक्त रीतियो पर कोई विशेष प्रभाव पडा है।" (का० सू० अध्याय २० )।

अर्थात् वामन के अनुसार-(१) रीतियों पर प्रदेश का कोई प्रभाव नहीं पठता।

२ रीतिया निश्चय ही गुणात्मक अर्थात् शब्द और अर्थगत सौन्दर्य के आश्रित हैं। (३ ) वैदर्भी आरादि रीतियों के नाम विदर्भादि प्रदेशो पर इसलिए रखे गये हैं कि उन प्रदेशों के कवियों ने इन रीतियो का इनके वास्तविक रूप में मुख्यत. प्रयोग किया है।-परन्तु यह सयोग मात्र है कि इन प्रदेशों की परम्पराए ऐसी थीं, द्रव्यादि की भाति कोई रीति किसी प्रदेश विशेष की उपज नही है।

कुन्तक ने अपनी अ्मोघ शैली में मार्गों के प्रादेशिक आधार का तो तिरस्कार किया ही है-साथ ही अपने व्यग्य की लपेट में वामन को भी ले लिया है। कुन्तक का विवेचन इस प्रकार है -

"यहाँ अनेक प्रकार के मतभेद हो सकते हैं क्योंकि (वामन आदि) प्राचीन आचार्यो ने विदर्भादि देश विशेष के आश्रय से वैदर्भी आदि तीन रीतियों का वर्णन किया है, और अन्य (दण्डो) ने वैदर्भ तथा गौडीय रूप दो मार्गो का वर्णन किया है। ये दोनों ही मत सगत नहीं हैं क्योकि रीतियों को देशभेद के आधार पर मानने से तो देशो के अ्रनन्त होने से रीति-भेदों की भी अनन्तता होने लगेगी। और, ममेरी वहिन

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वक्रोकि-निद्धान्त और रोति ] भूमिका

मे विवाह के समान विशेष रीति से युक्त होने से काव्य की व्यवस्था नहीं की जा सकती कयोंकि देशघर्म तो वृद्धों की व्यवहार-परम्परा मात्र पर आश्ित है, इसलिए " उनका अनुष्ठान श्रशक्य नहीं है। परन्तु उम प्रकार के (सहृदयाह्लादकारी) काव्य को रचना-शक्ति (काव्य-प्रतिभा) आदि कारणसमुदाय की पूर्णता की अपेक्षा रसती है, इसलिए (देश मे प्रचलित वृद्ध-व्यवहार) के समान जैसे-तमे नहीं की सकती है।

और न दाक्षिणात्यों की संगीत-विषयक सुस्वरतादि रूप ध्वनि की रमणीयता के समान उस (काव्य-रचना) को न्याभाविक कहा जा सकता है क्योंकि वेना होने पर तो सभी फोई उस प्रकार का काव्य बनाने लगे। और शत्ति के होने पर भी व्युत्पत्ति आदि श्राहारय कारण सामग्री (भी) प्रतिनियत-देश-विषय रप से स्थित नहीं होती है (अर्यात् शक्ति को स्वाभाविक मान लिया जाय तो भी यह नहीं महा जा सफना कि शेप व्युत्पत्ति आदि आहार्य सामग्री देश विद्येप के आधार पर प्राप्त होती है)।- (ऐसा फोई) नियम न होने से, उम देश में (कवियो के अ्रतिरिक्त अन्य व्य तयों में) उसफा अ्रभाव होने मे, श्रन्यन प्राप्त होने मे। (हिन्दी-वव्रोत्तिजीवित १।२४ वॉ कारिका की वृति)।

उपयुत्त उद्धरणों में कुन्तक ने प्रादेगिक आर््राधार के विरुद्ध तीन तफ दिये हैं :

१. काय्य-रचना देशवर्म नहीं है।-देशवर्म तो परम्परागत प्रयाग्रों पर आधित रहता है जिनका अ्रनुफरण पिनी के लिए भी प्रदाक्य नहीं है, परन्तु काव्य- रचना तो प्रतिभा की अपेक्षा करती है जिनका नभी में सद्भाव सम्भव नहीं है।

२. काव्य-रचना मधुर स्वर शदि के नमान प्रदेश विशेष का भौगोलिक प्रनाय भी नहीं है पर्योंकि यदि ऐसा होता तो उन प्रदेश के ननी व्यत्ति सत्काव्य की रचना करने में समर्य होते।

३ केयल प्रतिना हो नहीं व्वुत्पतति आदि श्राहार्य गुख भी देवजन्य नहीं है, वे भी व्यत्तिनिष्ठ ही है।

मार्ग का वन्नविल आरधार : न्वभाय

पुत्तव पाच-चना में न्वनाय को मूर्घन्य पर म्यान देने हैं श्रर इमी मिदधान्न के अनुमार वे न्यनाव के प्या पर मार्ग-भेद वो मंगन मानते है .-

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१७० ] भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त औ्र रीति

"कवियो के स्वभावभेद के आधार पर किया गया काव्यमार्ग का भेद युक्तिसंगत हो सकता है। सुकुमार स्वभाव वाले कवि की उसी प्रकार की (सुकुमार) सहजशक्ति उत्पन्न होती है : शक्ति तथा शक्तिमान् के श्रभिन्न होने से। और उससे कवि उसो प्रकार के सौकुमार्य से रमणीय व्युत्पत्ति को प्राप्त करता है। उन दोनों से सुकुमार मार्ग से ही अभ्यास में तत्पर होता है। उसी प्रकार जिस कवि का स्वभाव इस (सुकुमार स्वभाव) से विचित्र होता है, वह भी सहृदयाह्नादकारी काव्य-निर्माण के प्रस्ताव से सौकुमार्य से व्यतिरिक्त वैचित्र्य से रमणीय ही होता है। उसको उसी प्रकार की कोई विचित्र तदनुरूप शक्ति प्राप्त होती है और उससे वह उसी प्रकार की, वैदग्ध्य-सुन्दर व्युत्पत्ति को प्राप्त करता है। और उन दोनों से वैचित्र्य से अरधिवासित मन वाला (वह कवि) विचित्र मार्ग से अभ्यास करता है। इसी प्रकार इन दोनों (में से किसी एक) प्रकार के कवित्व-मूलक स्वभाव से युक्त कवि की उसी के योग्य मिश्रित शोभाशालिनी कोई शक्ति उत्पन्न होती है। उस (शक्ति) से उन दोनों प्रकार के स्वभाव से सुन्दर व्युत्पत्ति को प्राप्त करता है और उसके बाद उन दोनो की छाया के परिपोष से सुन्दर अभ्यास करने वाला हो जाता है।

इस प्रकार ये कवि समस्तकाव्यरचनाकलाप के चरम सौन्दर्य से युक्त कुछ अपूर्व सुकुमार, विचित्र और उभयात्मक काव्य का निर्माण करते हैं। वे ही (सुकुमार, विचित्र और उभयात्मक)-इन कवियों को प्रवृत्त करने वाले मार्ग कहलाते हैं। यद्यपि कवि-स्वभाव-भेद-मूलक होने से (कवियो और उनके स्वभावों के अ्रनन्त होने से) मार्गो का भी आनन्त्य अनिवार्य है, परन्तु उसकी गणना असम्भव होने से साधा- रणत त्रैविध्य ही युक्तिसगत है।" (व० जी० १।२८ वीं कारिका की वृत्ति) ।

अर्थात् (१) कुन्तक के अनुसार काव्य-भेद का वास्तविक आधार है कवि-स्वभाव।

(२) स्वभाव के अ्रनुसार ही प्रत्येक कवि की शक्ति होती है-शक्ति के अनुरूप ही वह व्युत्पत्ति का अर्जन करता है और इन दोनों के अनुरूप ही उसका अ्भ्यास होता है। अतएव काव्य के तीनों हेतु शक्ति, निपुणता और अभ्यास स्वभाव पर ही पाश्रित हैं।

(३) प्रत्येक कवि का अपना विशिष्ट स्वभाव होने से कवि-स्वभाव के अनन्त भेद हैं, परन्तु उनके तीन सामान्य वर्ग बनाए जा सकते है. सुकुमार, विचित्र और उभयात्मक या मध्यम ।

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वकोत्ति-सिद्धान्त औोर रीति ] भूमिका [१७१

(४) तदनुसार काव्यमार्ग के भी मूलत अनन्त भेद है, परन्तु फिर भी उनके तीन सामान्य भेद किये जा सकते हैं : सुकुमार, विचित्र और मध्यम।

विवेचन

सामान्यत कुन्तक का यह मन्तव्य मान्य ही है कि प्रदेश की अ्रपेक्षा स्वभाव के आधार पर मार्ग-भेद करना अधिक सगत है। काव्य-शैली का व्यक्ति के साथ प्रत्यक्ष तया घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसमें सदेह नहीं आधुनिक आलोचनाशास्त्र में शैली को भाषा का व्यक्तिगत प्रयोग इसी अ्र्यं में माना गया है। परन्तु फुन्तक का विवेचन भी सवंया निर्दोप नहीं है। उन्होने वामन के आशय को श्रशुद्ध रप में प्रस्तुत किया है, अथवा वामन के सिद्धान्त का सम्यक अध्ययन नहीं किया। वामन ने स्वय हो प्रादेशिक आधार का प्रबल शव्दों में खण्डन किया है। उनकी रीतियों का आ्राधार गुलात्मक है। प्रादेशिक नामकरण को तो उन्होंने संयोग मात्र माना है और इसमें स्वयं कुन्तक को भी आपति नहीं है: तदेवं निर्वचनममारयामान्रकरणकारतत्वे देशविशेषाअयणस्य वय न विवदामहे। अ्रर्यात् इस प्रकार देश विशेष के आश्रय से (रीतियों के) निर्वचन प्रयवा नामकरण के विषय में हमारा विवाद तहीं है। १।२४- वीं कारिका की वृति। प्रत वामन के साथ कुन्तक ने न्याय नहीं किया, और एक उड़तो हुई बात को लेकर उन पर आक्षेप किया है।

यह तो वामन का मत रहा-परन्तु व्यापक दृष्टि से विचार करने पर प्रादेशिक आघार की कल्पना इतनी अ्रनर्गल नहीं है। शैली के पीछे कवि का व्यत्तिन्त् और व्यत्तित्व के पीछे देश-काल रहता है यह निद्धान्त प्राय सवमान्य-सा हो है। शैलो के निर्माण में कवि के व्यत्तिन्व का औौर कवि-व्यत्तिन्व के निर्माण में देश-्काल फा प्रनाव अनन्दिग्घ है; इम प्रकार काव्य-शंली के साथ देश का अप्रत्यक्ष सम्बन्ध अवस्व है। इसके विरुद्ध वामन का यह तर्क है कि काव्य की रचना द्रव्य के नमान प्रादेशिक जलवायु का उत्पादन नहीं है, पर फुन्तरु की आपत्ति यह है कि तन तो फिर किमी प्रदेश के सनी नर-नारी एव सी फाव्य-रचना करने लगेंगे। परन्तु ये दोनो तर्क एकागी हैं। नमान जनवायु में द्रव्य के उन्पादन में भी कर्यक के कोटन का वडा महत्व है। पर्यंक का फौदाल उत्पादन के गुण और परिभाल दोनों में पन्नर डाल देता है, फिर भी भोगोलिक परिस्यितियों के प्रभाव को तो अ्रन्यीकार नहीं किया जा नक्ता। इमी तव्ह पुन्नक को युत्ति भी पूर्ण नहीं हैँ एव प्रवेश मे इजा ननी व्यत्तियो के न्यभाव एकन्ने होते है जब ममान जनगयु सनो नरन्नारियों

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१७२ ] भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त औरर रीति

को एक-सा व्यक्तित्व अथवा स्वभाव प्रदान नहीं कर सकती तो सवको समान काव्य- शैली प्रदान कैसे करेगी? तथापि इस युक्ति के आधार पर प्रादेशिक अथवा भौगोलिक प्रभाव का निषेध तो नहीं किया जा सकता। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्तित्व 4 की शक्ति असीम है-हम भी उसको ही प्रमुख मानते हैं, सामान्य जीवन की अपेक्षा काव्य के क्षेत्र में तो उसका प्रभुत्व और भी अ्रधिक है। परन्तु व्यक्तित्व के निर्माण में और व्यक्तित्व के माध्यम से काव्य-शैली के निर्माण में देश-काल का प्रभाव भी असदिग्घ है, उसका इतनी सरलता से खण्डन नहीं किया जा सकता।१ फिर भी, समग्रत, प्रदेश तथा स्वभाव-इन दोनों आधारों में स्वभाव ही अधिक मान्य है, कुन्तक की इस स्थापना में भी सदेह के लिए स्थान नहीं है। स्वभाव अथवा व्यक्तित्व ही मूलत प्रतिभा का माध्यम है, और जीवन तथा काव्य दोनो में ही प्रतिभा का प्रभुत्व है। स्वभाव के अनुसार प्रत्येक कवि की अपनी शैली या रोति होती है.

तद्भेदास्तु न शक्यन्ते वक्तु प्रतिकविस्थिता । (दण्डी १।१०१ )

अरपनी अपनी रीति के काव्य और कविरीति। (देव-शब्दरसायन )

अतएव यदि काव्य-रीतियो का वर्गीकरण ही करना है, तो स्वभाव अथवा व्यक्तित्व के आधार पर ही वह अधिक सगत होगा। पाश्चात्य काव्यशास्त्र में भी, यद्यपि क्सिन्टी- लियन आदि कतिपय आचार्यो ने प्रादेशिक आधार भी ग्रहण किया है तथापि मान्यता स्वभावगत आधार को ही दी गयी है। वहाँ आरम्भ से ही ऐटिक-एशियाटिक आदि को अपेक्षा मधुर-उदात्त अथवा कोमल-परुष आदि शैली-वर्गो का ही अधिक प्रचार रहा है और आज भी ये ही मान्य हैं।

मार्गो का तारतम्य

मार्गों के तारतम्य का खण्डन करने में कुन्तक ने फिर अपने आधुनिक वृष्टि- कोण का परिचय दिया है। भामह की भाँति उनका भी यही मत है कि वैदर्भी, गोडी आदि को उत्तम और अरधम मानना अनुचित है

"और न उत्तम, अघम तथा मध्यम रूप से रीतियों का त्रविध्य स्थापित करना ही उचित है। क्योंकि सहृदयाह्लादकारी काव्य की रचना में बैदर्भी के समान सौन्दर्य (अन्य भेदों में ) अरसम्भव होने से मध्यम और अधम का उपदेश व्यर्थ हो जाता है।

१ देखिए हिन्दी काव्यालकारसूत्र की भूमिका पृ० ४४।

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वक्रोक्ति-सिद्धान्त औ्र रीति । भूमिका [१७३

ऐसा परित्याग करने के लिए किया गया है, यह ( कयन भी) युत्तियुक्त नहीं है। वे (रीतिकार वामन ) हो इसको नहीं मानते। और शक्ति अनुसार ( थोडा बहुत) दरिद्वों को वान फरने के समान (याशक्ति भला-चुरा) काव्य करणीय नहीं हो सकता।"

/++ रमशीय काव्य के ग्रहण करने के प्रसग में सुकुमार-स्वभाव काव्य एक (प्रथा) है। उससे भिन्न अ्रमणोय काव्य के अनुपादेय होने से। उस (सुकुमार ) से भिन्न और रमणीयता-विशिष्ट 'विचित्र' कहलाता है। इन दोनो के ही रमणीय होने से इन दोनों को छाया पर आश्रित अन्य अर्थात् तृतीय भेद का भी रमशीयत्व मानना ही युत्तिमगत है। इसलिए इन (तोनों भेदो) में अलग अलग अपने निर्दोप स्वभाव से तहिदाह्वादकारित्व की पूणंता होने से किली की न्यूनता नहीं है।" (व० जी० १।२४ वीं कारिका की वृत्ति)

कुन्तक के तर्क इस प्रकार है

१. काव्य की फसौटी है सहृदयाह्लादफारित्व है-यदि सहुदयाह्ादकारी काव्य को रचना समग्रगणभूपिता वैदर्भी रोति से हो सकती है, तो अन्य रोतियो को चर्चा व्यर्थ है। किन्तु यदि अन्य रीतियो द्वारा भी यह फार्य सिद्ध हो सकता है तो वंद्नी को श्रेष्ठता की फल्पना व्यर्थ है। इसका उत्तर यह दिया जा सकता है कि जन्य रोतिया उतनी शाह्लादकारी नहीं है, पर भारतीय काव्यदशन के अनुसार पुन्तक कदाचित् प्राह्नाद को फोटिया मानने को प्रस्तुत नहीं है।

२. सुकुमार तथा रमसोय का नम्बन्ध एक प्रथा मात्र है- विचिन् मार्ग भी उतना ही रमणीय होता है, और जब सुकुमार और निचित्र दोनो ही रमणीय हैं तो इन दोनों का समन्वय एप मध्यम मार्ग भी रमणीप ही होगा •परमशीय तो वास्तव में काव्य ही नहीं है। सहवयाह्लादकारी होने से कारण तीनों ही पाव्यनमागों में रम- गोवता का परिपूर्ण रूप रहता है-फिर तारतम्य को नम्नावना पहाँ है?

फुनतक शो यह स्वापना अत्यन्त आधुनिय है- मुन्नक मे पूरे एक हजार चप बाद यूरोप में य्रोचे ने ऐमी हो घोषणा पर नौन्दर्यगान्य वे क्षेत्र में पुछ नमय के लिए मनननी पदा फग्दी पी, औीर लाज पी प्राय नौन्दर्व घारणाएं इनी पिद्वान्न मे प्रनावित है।

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१७४ ] भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त और रीति

"सुन्दर के अन्तर्गत कोटिया नहीं होती क्योंकि सुन्दर से सुन्दरतर अर्थात् अभिव्यजक की अपेक्षा अधिक अभिव्यंजक-यथेष्ट की अपेक्षा अधिक यथेष्ट की कल्पना सम्भव नहीं है। (क्रोचे. एस्थेटिक)

इसमें सन्देह नहीं कि इस सिद्धान्त ने स्थूल वर्ग-विभाजन की प्रवृत्ति को नियत्रित कर सौन्दर्यशास्त्र का उपकार ही किया है, और इसमें सत्य का पर्याप्त श्श विद्यमान है। सामान्यत भारतीय दर्शन भी आानन्द की कोटिया मानने के पक्ष में नहीं है और तदनुसार भारतीय रसशास्त्र में भी रस के अन्तर्गत कोटिक्रम की स्थिति साधारणत अ्रमान्य है। फिर भी तात्विक निरूपण के पतिरिक्त व्यावहारिक विवेचन में क्या आनन्व अ्रथवा रस के अन्तर्गत मात्रा-भेद की कल्पना नहीं की जाती ? यदि ऐसा है तो रसराज का सारा प्रपच ही मिथ्या है। यूरोप के काव्यशास्त्र में अरस्तू ने डु खान्तकी को काव्य का सर्वश्रष्ठ रूप मान कर कोटिक्रम को स्वीकृति प्रदान को है। आधुनिक मनोवंज्ञानिक आलोचना के प्रतिनिधि डा० रिचर्ड्स ने भी अन्त- वृत्तियों के समजन के आधार पर काव्यगत मूल्यो की प्रतिष्ठा करते हुए दु खान्तकी को काव्य का सर्वश्रष्ठ रूप माना है। जब अन्त प्रवृत्तियो के समजन में मात्राभेद 4

माना जा सकता है तो आनन्द में मात्राभेद मानने में क्या आपत्ति हो सकती है? यों तो रिचर्ड्स ने काव्य में शह्लाद की स्थिति अनिवार्य नहीं मानी परन्तु वह केवल शब्दों का हेर-फेर है। अन्त वृत्तियों का समीकरण आनन्द से भिन्न स्थिति नहीं है। वास्तव में रिचर्ड्र्स ने प्लेजर' की अनिवार्यता का खण्डन किया है-उनके यहाँ आनन्द शब्द का पर्याय नहीं. 'प्लेज़र' का निषेध कर वे जिस गम्भीर मनोदशा की व्यजना करना चाहते हैं वह हमारे आनन्द में सहज ही निहित है। कहने का अभिप्राय यह है कि तत्व रूप में वाहे कुछ भी हो, व्यवहार में तो आनन्द की कोटियां मानी ही जाती हैं अन्यथा काव्य तथा कवियों के सापेक्षिक महत्व की कल्पना निरर्थक हो जाती है क्योकि काव्य के मूल्याकन की फसौटी अन्तत रस अथवा आनन्द ही तो है। ऐसी स्थिति में कुन्तक शथवा क्रोचे का यह अभिमत पत्यन्त तात्विक तथा महत्वपूर्ण होते हुए भी कम से कम व्याहारिक नहीं है। किन्तु कुन्तक सम्भवत इतनी दूरी न जाते हो-कुन्तक के मन्तव्य में क्रोचे के मन्तव्य का यथावत् अर्थानुसन्धान कदाचित् सगत न हो। कुन्तक वास्तव में इस तथ्य पर बल देना चाहते हैं कि काव्य-मार्ग अपने आ्रप में उत्कृष्ट या निकृष्ट नहीं हैं-न उनके प्रफृत रूपों में तारतम्य ही है। सुकुमार मार्ग की सर्वशष्ठ रचना को विचित्र अथवा मध्यम मार्ग की उसी कोटि की रचना से अधिक उत्कृष्ट मानने का कोई कारण नहीं है. तारतम्य कवि की शक्ति तथा व्युत्पत्ति आदि पर निर्भर तो हो सकता है, परन्तु मार्ग के आधार पर उसकी

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वक्रोक्तिसिद्धान्त औ्रर रीति ] भूमिका [ १७५

कल्पना मिय्या है-यदि कुन्तक केवल इतना ही कहना चाहते हैं तव तो उनका मन्तव्य सर्वया ग्राह्य ह और उसके साथ मतभेद के लिए फोई स्थान नहीं है।

मार्गभेट और उनका स्वरूप

कुन्तक ने प्रदेश पर आश्रित वँदर्भी, गौड़ी, पांचाली का निषेध कर स्वभाव के अनुसार सुकुमार, विचित्र तथा मध्यम या उभवात्मक-इन तीन काव्य मार्गो का प्रतिपादन किया है और मौलिक रीति से उनके लक्षण किये हैं।

नुकुमार मार्ग :

कुन्तक ने प्रथम उन्मेष की पांच कारिकाओं में सुकुमार मार्ग का वर्णन इन प्रकार किया है-"कवि को अम्लान प्रतिभा से उद्भन्न नवीन शब्द तथा अर्थ से मनोहर, और अनायास रचित परिमित अलकारों से युक्त, पदार्थ के स्वभाव के प्राधान्य से आहाय फौशल का तिरस्कार करने वाला, रसादि के तत्वन् सहृदयो के मन के अनुरुप होने के फारण सुन्दर (मन नवादसुन्दर), पज्ञात रप से स्थित तौन्दर्य के द्वारा श्राह्मादकारी, विघाता के वैदग्ध्य से उत्पसन अलौकिक अ्रतिशय के समान, जो कुछ भी वंचित्र्य प्रतिभा से उत्पन्न हो सकता है वह सब सुकुमार स्वभाव से प्रवाहित होता हुआ जहा शोभा देता है-यह वही सुकुमार नामक मार्ग है जिसमे उत्फुल्ल फुसुमवन में भ्रमरों के समान सत्कवि जाते हैं।" (१।२४-२६)

जसे -

प्रत्यंचा से चाँघ दिये जाने के कारण जिनको भुजाएं निश्चल हो गयी है, औौर जिसके (दद) मुखो की परम्परा हांफ रही है, (ऐसा) इन्द्रजित् रावस (भी) जिस (शातंवीयं) के फारागृह में उसफी कृपा होने तक पड़ा रहा। रघवंग ६।४०।'- यहा वर्णन के अ्रन्व प्रकार से निरपेक्ष, कवि को पत्ति का परिशाम चरम परिपाफ को प्राप्त हो गया है।" (उपरयुत्त फारिकासों की वृत्ति)।

इस लक्षता से सुयुमार मार्ग पे निम्नलिगित तन्व उपलब्ध होते है:

(क) सहज प्रनिना का प्रम्फुरण (र) न्यानाविक सौन्दयं, (ग) आहायं शौदान का जनाय

1

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१७६ ] भूमिका [ वक्रोक्ति-सिद्धान्त औरर रीति

(घ) रसज्ञो के मन के अनुरूप सरसता, (ड) अलौकिक तथा अविचारित वैदग्ध्य, (च) शब्द औौर श्रर्य का सहज (प्रतिभाजात) चमत्कार, (छ) अररनायास रचित परिमित अलकारों की स्थिति, और (ज) श्रन्त में उदाहरण से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सुकुमार का अर्थ केवल कोमल अथवा मधुर नहीं है।-कालिदास, सर्वसेन आदि इस मार्ग के प्रसिद्ध कवि हैं।

विचित्र मार्ग

"जहाँ प्रतिभा के प्रथम विलास के समय पर (ही) शब्द और अर्थ के भीतर वक्रता स्फुरित होने लगती है, जहाँ कवि (एक ही अलकार से) सन्तुष्ट न होने से एक अलकार के लिए हार आदि में मणियों के जडाव के समान दूसर अलकार जोडते हैं, रत्न-किरणो की छटा के बाहुल्य से भास्वर आभूषणो के द्वारा ढक देने से जैसे कान्ता का शरीर (और भी) भूषित हो जाता है (इसी प्रकार अनेक अलकारों की जगमगाहट से जहाँ काव्य का कलेवर और भी रमरीय हो जाता है), जहाँ इसी प्रकार भ्राजमान अलकारों के द्वारा अपनी शोभा के भीतर छिपा हुआ अलकार्य अपने स्वरूप से प्रकाशित होता है, जहाँ प्राचीन कवियो द्वारा र्व्णित वस्तु भी केवल उक्ति के वैचित्र्य मात्र से चरम सौन्दर्य को प्राप्त हो जाती है, जहाँ वाच्य-वाचक वृत्ति से भिन्न किसी वाक्यार्थ की प्रतीयमानता की रचना की जाती है, जहाँ किसी कमनीय वैचित्र्य से परिपोषित और सरस आशय से युक्त पदार्थ स्वभाव का वर्णन किया जाता है, जहाँ वक्रोक्ति का वैचित्र्य जीवन के समान प्रतीत होता है और जिसमें किसी अपूर्व प्र्पतिशय (चमत्कार) की अ्र्प्रभिधा स्फुरित होती है-वह विचित्र मार्ग है।

यह मार्ग अत्यन्त कठिन (दुसचर है) है। सुभटों के मनोरथ जिस प्रकार खडग-धारा के मार्ग पर चलते हैं, इसी प्रकार चतुर कवि इस मार्ग से विचरण करते रहे हैं।

    • (१।३४ से ४३) +- +

जसे -

कौनसा देश आपने विरह-व्यथा-युक्त और शून्य कर दिया है ?-

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मार्गों के गुए । भूमिका [१७७

श्थवा कौन-से पुण्यशाली प्रक्षर प्रापके नाम फी सेवा करते हैं? (हर्ष-चरित १।४०-४१)

उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार विचित्र मार्ग की विशेषताएं इस प्रकार हैं. (फ) शब्द और श्र्य का प्रतिभाजात चमत्कार (स) अलकारों को जगमगाहट (ग) उत्तिवचित्र्य (घ) प्रतोयमान अ्रर्य का चमत्कार (ड) वक्रोक्ति की प्रतिरंजना औ्रर (च) उदाहरखों से यह भी स्पष्ट है कि विचित्न मा्ग का ओोज से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है।-वाणभट्ट, भवभूति तथा राजशेखर प्रभुति कवि इसी मार्ग के प्रभ्यासी है।

(३) मध्यम मार्ग

जहा सहज तया श्राहाय शोभा के अ्तिशय से युक्त विचिन्न तथा सुकुमार (वोनो मार्ग) परस्पर मिश्रित होफर शोभित होते हैं, जहां माघुयं आदि गुए-समूह मध्यम वृत्ति का अ्रवलम्यन फर रचना के सौन्दर्यातिशय को पुप्ट करता है, जहां दोनों मा्गों का सौन्दर्य स्पर्धापूर्वक विद्यमान होता है, छाया-वंचित्र्म मे मनोरम जिस मार्ग के प्रति सौन्दर्य-व्यसनी (कवि-सहृदय), चित्रविचित्र भूषा के प्रति रसिक नागरिको के समान, शादरवान् होते हैं-वही मध्यम मार्ग है। अर्यात् मध्यम मार्ग की विशेषताए हैं .- (क) सहज तया आहायं शोभा के उत्कृष्ट रूपों का समन्यय। (स) मध्यम वृत्ति का अ्र्प्रवलम्बन।

मध्यम मार्ग का अवलम्बन फरने वाले कवि हैं मातृगुप्त, मायुराज, मंजीर पादि।

मार्गो के गृए कुन्तर ने मार्गों के दो प्रकार के गुण माने है : सामान्य और रिशेष। मामान्य गुण दो है-श्रौवित्व घोर मौनाग्य-इनको ननी मार्गों में ममान म्मिति रहनी है।

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१८० ] भूमिका [ मार्गो के गुण

की रेखा पड गई है। आखो में स्नेह-युक्त कटाक्षों का प्रवेश हो गया है। स्मित-रूप सुधा से सिक्त अर्थात् मुस्कराते हुए बात करते समय भाँहें नाचने में कुछ प्रवीण-सी हो चली है, मन में काम के अकुर-से उदय होने लगे है और शरीर के अगो ने लावण्य' ग्रहण कर लिया है। इस प्रकार यौवन के आते ही धीरे घीरे उस तन्वगी की रूपरेखा कुछ और ही हो गई है।१

उपर्युक्त विवेचन से सौभाग्य का स्वरूप स्व्रत स्पष्ट नहीं होता-परन्तु विश्ले- षस करने पर इस सामान्य गुए के निम्नलिखित तत्व उपलब्ध होते हैं- (क) कल्पना का प्राचुर्य, और

(ख) वक्रता, गुण, अलकार, आदि समस्त काव्य-सम्पदा का विलास। अर्थात् सौभाग्य से कुन्तक का अभिप्राय कल्पना-विलास अ्थवा काव्य-समृद्धि का है।

हिन्दी में विद्यापति और सूर के काव्य में और इघर छायावाद की कविता में सौभाग्य गुण का अनन्त वैभव मिलता है उदाहरण के लिए पत के पल्लव, गुजन, स्वएंकिरण, रजतशिखर, शिल्पी आदि में और प्रसाद की कामायनी में सौभाग्य गुण का अपूर्व उत्कर्ष है।

उवाहरण के लिए लज्जा सर्ग के अन्तर्गत सौन्दर्य का वर्णन देखिए। विशेष गुण

विशेष गुणो के स्वरूप सुकुपा, नचित्र तथा मध्यम तीनों गर्गो में भिन्न होते है, अत मार्ग के अनुकूल ही उनके लक्ष ि 7 -

सुकुमार मार्ग के गुण

१ माधुर्य समासरहित मनोहर पदो का विन्यास जिसका प्राण है, इस प्रकार का माघुर्य सुकुमार मार्ग का पहला गुए है।

१ दोर्मूलावधि सूत्रितस्तनमुर स्निह्यत्कटाक्षे दृशौ किचित्ताडवपडिते स्मितसुघासिक्तोक्तिपु भ्र लते। चेत कन्दलित स्मरव्यतिकरैर्लावण्यमगैर्धृ त तन्वग्यास्तरुशिम्नि सर्पति शनैरन्यैव काचिद्गति ॥ १२१ ॥ (काव्यानुशासन में हेमचन्द्र द्वारा उब्धत श्लोक )

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मार्गों के गुए भूमिका [ १८१

२ प्रमाद : रस तया वक्रोक्ति के विषय में अरनायास ही अ्ररभिप्राय को व्यक्त कर देने वाला तुरन्त अर्य-समर्पकत्व्र रूप जो गुण है उसका नाम प्रसाद है।

३ लावण्य. वर्णविन्यास-शोभा से युक्त पद-योजना को थोडी-सी सम्पदा से उत्पन्न बन्ध-सौन्दर्य अर्थात् रचना-सौ्ठव का नाम लावण्य है। अर्यात् सुरुचिपूर्ण वर्ण-योजना पर आश्रित रचना-सौष्ठव हो सुकुमार मार्ग का लावण्य गुर है।

४ आभिजात्य स्वभाव से मसृण छाया-युत्त, श्रुति-कोमल तथा सु्द स्पर्श के समान चित्त से छूता हुआ ( वन्ध-सौन्दर्य) आभिजात्य नामक गुए फह- लाता है।

जंसा कि पं० वलदेव उपाध्याय ने लिखा है, यह आभिजात्य गए भी वास्तव में लावण्य की फोटि का हो गुण है-इसका आधार भी वर्ण-योजना है। दोनो में यह अ्रन्तर प्रतीत होता है कि लावण्य से वरगगों की भ्कार अभिप्रेत है और आभिजात्य से कदाचित् उनकी स्निग्धता या मसणता-एक में वर्ण परस्पर भनक कर कवणन-सा फरते हैं, दूसरे में वे परस्पर घुलते-ढुलकते चले जाते हैं।

कुन्तक के उदाहरण हमारी इस धारणा को पुप्ट करते हैं।

लावण्य- कामो वसन्तात्ययमन्दवीर्य केशेवु लेभे वनमगनानाम्।। (रघुवंद्र १६।५०)

इम श्लोक को वन्ध-रचना में त, न तथा अनस्वारयुक्त द और ग आदि फी सुरुचिपूर्ण आयृत्ति के द्वागा भरार उत्पन्न को गयो है।

श्रभिजात्य-

ज्वोतिनॅगायलयि गनिन बन्ब वहुँ ननानी। (मेघदूत ) -1 यहां म, ल, ग आदि यरशों की फोमल ध्यनिया एक दूमरे में घुलनी हुई, ममूण प्रनाय उत्पन्न करती है।

हिन्दी रति-फव् में देव की या आधुनिक माय्य में पन की नफारमवी भाषा मावण्य मे और मनिराम को मयया चनंमान युग में महादेवी को पोमलरान्त पदारनी पभिजात्व तुल मे समुद् है। वो-एव उदाहरण कीलिए-

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१८२ J भूमिका । मार्गों के गुण

लावण्य-

पीत रंग सारी गोरे श्रग मिलि गई देव, श्रीफल-उरोज-आभा आभासै अविक-सी। छूटी अलानि छलकनि जलबूंदन की बिना वैदी बदन बदन शोभा बिकसी। तजि-तजि कुज पुज ऊपर मधुप-गुज- गुँजरत, मजु-रव बोल बाल पिक-सी नीवी उकसाइ नेकु नयन हँसाय हंसि, ससिमुखी सकुचि सरोवर ते निकसी।। (वेव)

आ्ाभिजात्य-

आनन पूरनचद लसै, अरबिंद-बिलास बिलोचन पेखे। अबर पीत लस चपला, छबि अबुद मेचक अग उरेखे। काम हूँ ते अभिराम महा, मतिराम हिए निहच करि लेखे। ते बरने निज बैनन सो, सखि में निज नैनन सो जनु देखे॥ (मतिराम)

विचित्र मार्ग के गुए

१. माधुयं विचित्र मार्ग के अन्तर्गत पदों के वैवध्य-प्रदर्शक माधुर्य की रचना की जाती है जो शैथिल्य को छोड़ कर रचना के सौन्दर्य का वर्द्धक होता है। १।४४ । इस परिभाषा के अनुसार वैचित्र्य के अगभूत माधुर्य में सुकुमार मार्गगत माधुर्य की अपेक्षा दो तत्वो का विशेषरूप से समावेश है-(१) वैदग्ध्य (२) शिथिलता का अभाव।

२ प्रसाद समस्त पदों से रहित तथा कवियों की रचना-शैली का प्रसिद्ध श्रग प्रसाद इस विचित्र मार्ग में ओज का किचित् स्पर्श करता हुआ देखा जाता है। १। ४५। अर्थात् सुकुमार मार्ग के प्रसाद गुण से विचित्र मार्ग के प्रसाद गुण में मूल अन्तर यह है कि यहा प्रसाद गुण में ओरोज का स्पर्श भी है, और भ्रोज का मूल आाधार है गाढबन्धत्व अतएव विचित्र मार्ग के अगभूत प्रसाद गुए में समस्त पदरचना

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मार्गों के गुण । भूमिका

का अनिवार्यत. समावेश हो जाता है। कुन्तक द्वारा उदाहृत छद इस घारणा को और भी स्पष्ट कर देता है :

अगगगतनारका म्निमितपर्मपालीभृत स्फुरत्मुभगकान्तय म्मितममुद्दगतिद्योतिता । विलामभरमन्घरास्तर लकत्पितकभ्र वो जयन्ति रमरोऽपिंता समदसुन्दरीदृष्टय ।।'

प्रसाद गुए ा एक और लक्षण भी कुन्तक ने दिया है जो इस प्रकार है .- जहा वाक्य में पदो के समान अरन्य व्यंजक वाक्य भी ग्रयित किये जाने हैं वह प्रसाद गुण फा एक दूसरा हो प्रकार है। १।४६। इस लक्षण के अनसार प्रसाद गुण का आ्ाधार है वाक्यगुम्फ।

इस तरह कुन्तक के अनुसार विचित्न मार्गगत प्रमाद गुण के मून तत्व हैं (१) गाठवन्धत्व (२) वाक्यगुम्फ, और इस दृष्टि से यह न फेवल सुकुमार मार्ग के ही प्रसाद गण से भिन्न हो जाता है वरन् वामन तथा आनन्दवर्घन आदि के प्रमाद गुण से भी इसमें वचित्र्य आा जाता है।

३ यहा अ्रर्यात् इम विचित्र मार्ग में परल्पर-गुम्फिन ऐसे पदों से जिनके अंत में विसर्गों का लोप नहीं होता और संयोगपूर्वक हस्व स्वर की बहुलता रहती है लावण्म फी वृदि हो जाती है। १।४७। वास्तव में यह गुए भी विचित्र मार्ग के प्रसाद गुण फी ही फोटि का है-रचना का रूप दोनों में मूलत भिन्न नहीं है।

४ माभिजात्व जो न तो अरधिक कोमल छाया से युत्त हो और न प्रत्यन्त फठिन ही हो ऐसे प्रोदि-निर्मित वन्ध-गुण को विचित्र मार्ग के अन्तर्गत लनि- जात्य फहते है। १४८।-इस गए का आधार है प्रोट रचना। प्रौदि का यह स्यभाव है कि उममें एक प्रपूर्य संतुननन तथा सामजत्य रहता है। इनीलिए कुन्तक के इस गुण में न तो श्रत्यन्त धुतिपेशल वर्णयोजना का आपरह है ग्ररोग न उद्धत्त पदग्चना का ही : उसमें तो दोनों की महज स्वीकृति है। उनके उदाहन्स मे इम गुए का क्यम्य सवंचा स्पष्ट हो जाता है

१ पाउक इन मसुन इलोहों का घ्र हिन्दी ककोलिजीनिम मे यणास्यान देसने -वहा उनकी पदर्चना मे ही प्रयोश्न है, अनाप्य व्यान्या नग्ना ग्राजम्या है।

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१८४] भूमिका [ मार्गों के गुण

अरधिकरतलतल्प कल्पितस्वापलीला परिमलननिमीलत्पाण्डिमा गण्डपाली सुतनु कथय कस्य व्यजयत्यजसैव स्मरनरपतिकेली-यौवराज्याभिपेकम् ।9

इस श्लोक में ल, न आदि माघुर्य-व्यजक कोमल और ण्ड, स्म आदि कठिन, सयुक्त वर्गगों का सतुलित प्रयोग प्रौढ़ि का निदर्शक है।

मध्यम मार्ग के गुए

सुकुमार तथा विचित्र मार्गों की भाति मध्यम मार्ग में भी उपर्युक्त चार गुणों की अपनी पृथक सत्ता होती है। कुन्तक ने इन गुणो के लक्षण न देकर केवल उदाहरस ही दिये हैं परन्तु उन्होंने आ्रम्भ में कुछ ऐसे सफेत अवश्य कर दिये, हैं जिनसे मध्यममार्गीय चारों गुणों का सामान्य रूप स्पष्ट हो जाता है।

माघुर्यादिगुरग्रामो वृत्तिमाश्रित्य मध्यमाम्। यत्र क मपि पुष्णाति बन्त्रच्छायातिरिक्तताम्।। ११५०

अर्थात् यहाँ माधुर्य आदि गुण-समूह मध्यमा वृत्ति का अवलम्वन कर रचना के सोन्दर्यातिशय को पुष्ट करता है।

इसका अभिप्राय यह हुआ कि मध्यम मार्ग के प्रत्येक गृण में सुकुमार तथा विचित्र मार्गो के उसी गुण की विशेषताओं का सन्तुलन रहता है अर्थात् मध्यम मार्ग के माधुर्य आदि गुणों की स्थिति सुकुमार मार्ग के माधर्यादि तथा विचित्र मार्ग के माधुर्यादि गुणों की मध्यवर्ती है, उनमें दोनों की सीन्दर्य-विवृत्तियो का समन्वय है।- इस सामान्य लक्षर के उपरान्त फिर प्रत्येक मार्ग का विशेष लक्ष करना अनावश्यक हो जाता है। वास्तव में मध्यम मार्ग का भी कुन्तक ने फोई विशेष लक्षण न कर उसे पूर्वोक्त दोनों मार्गो का मध्यवर्ती रूप ही माना है क्योंकि मध्यम अथवा उभयात्मक विशेषण अपने आप में इतना स्पष्ट है कि फिर उसकी व्याख्या की अपेक्षा नहीं रह जाती। यही कारण है कि कुन्तक ने मध्यम मार्ग के गुणों के लक्षण नहीं किये- उदाहरण मात्र ेकर यह स्पष्ट कर दिया है कि इन गुणो में पूर्वोक्त वोनो रूपो की मध्यमा वृत्ति का अवलम्बन किया गया है। १. पाठक इन सस्कृत श्लोको का अर्थ हिन्दी वक्रोक्ति वित में यथास्थान देखलें- यहाँ उनकी पदरचना से ही प्रयोजन है, अतएव व्याख्या करना अनावश्यक है।

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मार्गों के गुए । भूमिका [१८५

विवेचन

कुन्तफ फा गुण-विवेचन निश्चय ही उनकी मौलिक प्रतिभा का द्योतक है। उन्होने केवल नवीन गुों की उद्धावना हो नहीं को, वरन् गुण के मूलभूत सिद्धान्त में भी सशोघन किया है। कुन्तक के गुए मार्गों के श्रग है, पधार नहीं है-अर्यात् विशेष गुणो का सद्भाव मार्ग के स्वस्प तया तारतम्य का निश्चय नहीं करता सभी मार्गों में चारो गुण स्वरप-भेद से विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार गृणो की अधिकता या न्यूनता का प्रश्न नहीं उठता। इसके प्तिरिक्त गुणों में फिसी प्रकार का तारतम्य भी नहीं है कयोकि सभी गुरो का एक-सा महत्व है और साथ हो सभी मार्गों के गणों में भी स्वरप का भेद है सौन्द्य की मात्रा का नहीं। फहने का तापरय यह है कि चारों गुणों का काव्य-सौन्दर्य समान है, विभिन्न मार्गों के एक हो नाम के गुणो में भी केवल स्वरप-भेद है. फाव्य-सौन्दर्य समान है, और तीनो मार्गों में गुएों की नस्या भी समान है। अतएव मार्गों का अपने अपने प्रफृत रूप में समान महत्व स्वत सिद्ध है-उनमें काव्य-सौन्दर्य की माना का भेद नहीं है केवल प्रफृति का भेद है। कुन्तक का यह तरक सर्वागपूर्ण है और उसके उपरान्त मार्गों के तारतम्य के लिए कोई त्रवकाश नहीं रह जाता।

फुन्तफः फी दूमरी उद्धावना है गुणों की मार्ग-सापेक्ष्यता-उनके मत में गुणों फो स्वतन्त्र अयवा निरपेक्ष स्यिति नहीं है, उनका स्वरप मार्ग के अनुसार वदल जाता है। यह स्थापना वास्तय में विचारणीय है। रया जीवन में माघुय आर्परादि गुए व्यत्ति- सापेक्ष्य है ? उदाहरण के लिए क्या सरल-सुकुमार व्यत्ति का प्रणय-च्यापार वेचिव्य- प्रिय स्पत्ति के प्रणयन्यापार से भिन्न होता है? क्या दोनों की चित्त-दुति भिग्न होती है ? दोनों में मात्रा का भेद हो सकता है-अनिव्यत्ति का भेद हो सकता है, किन्तु मूल स्वरप द्ुति का भिन्न केमे हो नरना है ? डाकुन्नला और वामवदत्ता के प्रसाय फो अभिव्यक्ति तो निन्न अवश्य थी-किन्तु प्रेमानुभूति की दद्ा में दोनों के मन फो दुनि तो मूलन एक ही थी। फुन्तक का मत इनके निपरीन नहीं है क्योकि एक तो ये गए को अनिव्वनि का ही अग मानते है चित्त की घ्वस्या नहीं, दूमरे उन्होंने जनिरजना के रूप में माना-भेद का भी नवेत किया है :

प्रामिज तप्रमृनय पक्मलोदिता सुसा शतिवजमायान्ि उिनाहायंनन्पद।

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१८८ [ भूमिका [ कुन्तक और वामन का रीति-विवेचन

है, पर वह उनका भ्रम है वामन ने स्पष्ट शब्दो में प्रादेशिक आधार का निषेध किया है। किन्तु इसके अरतिरिक्त भी दोनो के मतो में पर्याप्त वैषम्य है। वामन ने जहाँ गुण को रीति का आधार माना है, वहाँ कुन्तक ने स्वभाव को-वामन ने गुणो को न्यूनाधिकता के आधार पर वैदर्भी, गौडी आदि रीतियो का निरूपण तथा मूल्या- कन किया है, किन्तु कुन्तक ने स्वभाव को प्रमाण मानते हुए तीनो मार्गो में समान गुरगों की स्थिति स्वीकार की है। उघर तारतम्य के विषय में तो दोनो के मन्तव्य सर्वथा विपरीत हें वामन ने समग्रगुरभूषिता वैदर्भी को वास्तव में काव्य की मूल रीति स्वीकार किया है-अन्य को काव्योचित नहीं माना, यहाँ तक कि अभ्यास के लिए भी उनकी उपादेयता स्वीकार नहीं की। इसके विपरीत कुन्तक ने तारतम्य का सर्वथा निषेध किया है-उनके मत से रीतियो में काव्य-सौन्दर्य की मात्रा का भेद नहीं है, प्रकार का या प्रकृति का भेद है।

रीतियों के स्वरूप के विषय में प्राचीन और नवीन पण्डितो का प्राय यह मत रहा है कि कुन्तक के सुकुमार, विचित्र तथा मध्यम मार्ग क्रमश वामनीया वैदर्भी, गौडी, पाचाली के पर्याय मात्र है। परन्तु यह समजन वास्तव में अघिक सगत नहीं है। कुन्तक के मत को अनादृत करने के लिए कदाचित् परवर्ती आचार्यो ने उचित विचार के बिना ही उनके मार्गो का वामनीया रीतियों में अन्तर्भाव कर दिया है। लक्षणों का विश्लेषण करने पर कुन्तकीय सार्गो तथा वामनीया रीतियों का स्वरूप-भेद स्पष्ट हो जाता है। सबसे प्रथम तो वैदर्भी रीति और सुकुमार मार्ग को लीजिए। वामन के अ्नुसार वैदर्भी रीति समग्र-गुण-सम्पन्न है और इस प्रकार आदर्श काव्य की समानार्थी है-कुन्तक सुकुमार मार्ग के लिए ऐसा कोई दावा नहीं करते। ुन्तक के सुकुमार मार्ग की आत्मा है स्वाभाविकता, वह सहज प्रतिभा की सृष्टि है और आहार्य कौशल का उसमें अभाव है। वामन के वैदर्भी-लक्षण में पूरा बल समस्त गुणों के सद्भाव औौर दोषों के एकान्त प्रभाव पर ही दिया गया है, उसमें कहीं शहार्य कौशल की अस्वीकृति नहीं है वरन् समग्रगुसभषिता होने से उसमें में स्वाभाविक तथा शहार्य दोनों प्रकार की शोभा का समावेश अनिवार्य है। इस वैषम्य के अतिरिक्त दोनों में पर्याप्य साम्य भी है दोनों ही रसनिर्भरा हैं, दोनों में मधुर-कोमल, परुष तथा प्रसन्न आदि सभी वृत्तियों का समावेश है और दोनो का प्रतिनिधि कवि कालिदास है। किन्तु फिर भी समग्रत उनमें साम्य की अपेक्षा वैषम्य ही अधिक है, अतएव दोनों को समानार्थी मानने का प्रश्न ही नहीं उठता। विचित्र मार्ग और गौडीया रीति में भी कम श्समानता नहीं है वास्तव में दीनो का मूलवर्ती दृष्टिकोर

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कुन्तक और वामन का रीति-विवेचन । भूमिका [१६६

ही भिन्न है। इसमें सन्देह नहीं कि दोनो मे रचनागत साम्य भी पर्याप्त है अर्यात् समासवहुलता, गाठबन्घत्व, वाक्यगुम्फ, अलकार का प्राचुर्य आदि तत्व दोनों में समान "हैं और दोनों के प्रतिनिधि फवि वाणभट्ट आररादि भी समान है। परन्तु वामन की गौडीया जहां अग्राह्य है, वहां कुन्तक का विचिन मार्ग अपने ढग से उतना ही काम्य है जितना सुकुमार मार्ग; उसमें भी रमणीयता को पराकाफ्ठा रहती है। कुन्तक ने इसके प्रयोग की 'खड्गघारापय' विशेषण द्वारा प्रशस्ति की है। वामन के परवर्ती आानन्दयर्घन, मम्मट आादि की परपा वृत्ति का, जिसे गौडीया की समानार्थो माना गया है, मनोवंज्ञानिक आर्राधार सर्वया भिन्न है उसका प्रास-तत्व है भ्रोजत् जो मूलत चित्त की दीप्ति-रप है। चित्त की दीप्ति-र्प श्रोजस् और विचित्र स्वभाव अयवा वचित्र्य-प्रेम दोनों की सत्ता अलग अलग है। विचिन स्वभाव सहज स्वभाव का विपयय तो अवश्य है, परन्तु शोजस्वी का पर्याय नहीं है. श्ोजस् सहज स्वभाव का भी उतना हो घनिष्ठ भ्रग हो सकता है जितना विचित्न का। अतएव वाह्य, पदरचनागत साम्य के आ्राधार पर दोनों का एकीकर संगत नहीं है। निष्कर्ष यह है कि परवर्ती रस-ध्व- निवादियों की परुपा वृत्ति उपनाम गौडीया रीति तथा कुन्तक के विचित्न मार्ग फो तो कल्पना का आधार ही भिन्न है। हां वामन का दृष्टिकोण चूकि वस्तुपरक है- इस दृष्टि से उनकी 'शोज .- कान्तिमती गौडी'-जो गाढवन्वत्व, नृत्य-सी करती हुई पदरचना, सगुम्फित विचारघारा तथा रसदीप्ति पादि से सम्पन्न होती है-सहज 'सुकुमार' से भिन्न तथा 'विचित्न' के निकट अ्रवर्य है। परन्तु उनके भी दुप्टिकोए का मौलिक भेद, जिसके अनुनार गोडीया अग्राह्या रीति है, विचित्र मार्ग पौर गोडीया रीति को प्रभेद-फल्पना को स्वया बिफल कर देता है।-तीमरे मार्ग अर्थात् मध्यम माग धौर पाच लो रीति में लगभग कोई साम्य नहीं है, फुन्तक के मध्यम मार्ग में भी रमशोयता फी सैसी ही पराकाला है, जैनो सुकुमार प्यवा विचिन मार्ग में, सामान्य रसिक नहीं शरोचकी, परर्ा्त् ऐने रसिक जो सदा अमाधारण मौन्दर्य की फामना करते है, इसी मध्यम मार्ग से सतुष्ट होते हैं। किन्तु चामन की पाचाली रीति 'विच्छाया" है। यामन की पांचाली में जहा फेवल माधुयं और नीकुमार्य का ममायेश है, वहा पुन्तक फा मध्यम मार्ग चारों गुखों से ही विनूषित नहीं है यरन् आहायं तमा स्वाभा- विक दोनों प्रकार को शोभा फा सुन्दर नमंजन है। वामन के परवर्ती आचार्यों ने रोति औीर घृति का एफोकरण करते हुए पाचाली रोनि को प्रमादगुरामयी फोमला वृति को समानार्थो माना है। शिगनूपाल ने वामनीया गीनिवो के नाम ही बदल दिये है: उनके परनुनार यामन पे चदरभो कोमला, गोटी पठिना श्र पाचाली मिश्रा हो 1. विच्हाया प-ा. न० भग१३ से पुनि

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१६० ] भूमिका [ कुन्तक औपरौर वामन का रीति-विवेचन

जाती है। इस प्रकार समजन का यह प्रयत्न सस्कृत काव्यशास्त्र में नियमित रूप से चल रहा था। अतएव कुन्तक का मध्यम मार्ग यदि पाचाली का प्रतिरूप मान गया तो इसमें विशेष आश्चर्य नहीं है-क्योकि शिंगभूपाल आदि ने भी पाचाली को मिश्रा ही '' माना था। फिर भी, स्थिति चाहे कुछ भी रही हो, एकीकरण का यह प्रयत्न विशेष सगत तथा तर्फपुष्ट नहीं था, वास्तव में परवर्ती आचार्यों ने कुन्तक का धैर्यपूर्वक अ्रध्ययन नहीं किया था।-प्रन्थ के लुप्त हो जाने से यह सम्भव भी नहीं था।

कुन्तक के गुणों का स्वरूप भी स्वभावत. वामन आ्रदि के गुणो के स्वरूप से अत्यन्त भिन्न है। सुकुमार मार्ग के माधुर्य और प्रसाद गृए तो वामन के शब्दगए माधुर्य तथा शव्वगुण प्रसाद से बहुत कुछ मिलते-जुलते है। कुन्तक के सुकुमार-मार्गोय माधुर्य गुण का प्राण है 'समासरहित मनोहर पदों का विन्यास' और उधर वामन का माधुर्य भी पथक्पदत्व का ही नाम है। कुन्तक का सुकुमारमार्ग गत प्रसाद वामन के शब्दगुण अर्थव्यक्ति तथा अर्थगुण प्रसाद का समतुल्य है। सुकुमारमार्ग के लावण्य श्रौर आभिजात्य नाम से तो सर्वथा मौलिक गुण हैं, परन्तु स्वरूप की दृष्टि से वे वामन के कान्ति, उदारता तथा सौकुमार्य नामक शब्दगुरों से मिलते-जुलते हैं। सुकुमारमार्ग-गत लावण्य में जो वर्णग-भ्ककार है वही वामन के शब्दगुण 'कान्ति' में है जहा उज्ज्वल पदरचना का चमत्कार रहता है, मौर वही शब्दगुण 'उदारता' में भी है जिसमें पद नृत्य-सा करते हैं। सुकुमारगत आभिजात्य का प्राण है स्निग्ध पदरचना जिसका वामन के दो शब्दगुणों में अन्तर्भाव है-श्लेष में जिसका आधार है मसणत्व जहाँ अनेक पद एक-से प्रतीत होते हैं, और सौकुमार्य में जहाँ पवरचना कोमल होती है।

विचित्रमार्ग-गत गुणों की स्थिति और भी भिन्न है। माघुर्य तो, जिसमें पथक्पदत्व के अतिरित्त शैथिल्य का प्र्भाव तथा वैदग्ध्य का सन्भ्ाव रहता है, वामन के उपर्युक्त उदारता नामक शब्दगुण के निकट है जहाँ पद नृत्य-सा करते हैं-क्योंकि पदों का नर्तन तभी सम्भव है जब पदरचना शैथिल्यरहित तथा वैदग्ध्यपूर्ण हो। प्रसाद में कुन्तक ने ओोज अर्थात् गाढ़बन्धत्व और उघर वाक्य-गुम्फ का समावेश कर उसे एक ऐसा नवीन रूप प्रदान कर दिया है जो वामन तथा श्ानन्ववर्घनादि के प्रसाद से तो एकान्त भिन्न है किन्तु वामनीया ओज के शव्वगुण रूप तथा अर्थगुण रूप दोनो के निकट है। विचित्र मार्ग का लावण्य गुण भी वामन के शब्दगुण ओज या दण्डी के शन्दगु श्लेष की परिधि में आ जाता है, आभिजात्य ऐसे प्रौढ़ि-निरमित बन्धगुए का नाम है जो न तो अषिक कोमल छाया से युत्त हो और न अत्यत फठिन ही हो। यह

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वकोक्ति और रीति-सिद्धान्त ] भूमिका [ १६१

'विचित' गुए वास्तव में वामन के किसी गुण की अपेक्षा दण्डी के सौकुमार्य गृण के अ्रध्िक सन्निकट है जिसमें एक ओर अतिनिष्ठुर वलों का और दूसरी श्रर रचना में 'शैंयित्य उत्पन्न करने वाले प्रति कोमल व्णों का त्याग, अ्रयवा-दूसरे शब्दों में- कोमल तथा परुष वर्गो का रमसीय सतुलन रहता है।१ वामन के गृणों में शब्दगुए समाधि से ही इस गुण का थोड़ा बहुत साम्य है क्योंकि समाधि में भी कोमल तथा परुष वरशगों की संयोजना द्वारा रचना में आरोह-अवरोह का चमत्कार उत्पन्न किया जाता है। मध्यम मार्ग के गुणों की स्यिति मध्यवर्ती है-उनमें सुकुमार तथा विचित्र मार्गों के गृणो की विशेषताओं का मिश्रसा रहता है, अतएव उनका पूथक विवेचन अनावश्यक है।

वक्रोक्ति औरर रीति-सिद्धान्त सस्कृत काव्यशास्त्र में ये दोनों देहवादी सिद्धान्त मान गये हैं क्योकि इनमें से एक में पगसस्यावत् रीति को औ्रौर दूसरे में अ्प्रतकृति-एप वक्रोतति को ही काव्य का जोवन-सर्वस्व माना गया है। इसमें सदेह नहीं कि इन दोनो मिद्धान्तो का आ्रवारभूत दृष्टिकोण वस्तुपरक है किन्तु दोनों को वस्तुपरफता में मात्रा-भेद है। रीति-सिद्धान्त में जहां रचना-नपुण्य मात्र को हो फाव्य-सर्वन्व मान कर व्यत्तितत्व की लगनग उपेक्षा फर दी गयी है, वहां वक्रोत्ति में स्वनाव को मूर्धन्य पर स्थान दिया गया है। टयत्ति-तत्व के इसी मान्ना-भेद के अनुपात से रस तथा ध्वनि के प्रति दोनों के दृष्टि- कोण में भेद है। रोति की अपेक्षा वक्रोति-मिद्वान्त फी रन और ध्वनि दोनों के प्रनि अधिक निष्ठा है: रोति-मिद्धान्त के अन्तगंत रन को बीन गुणो में मे केवल एफ गुए अर्य-फान्ति का श्रग मान कर सर्वचा प्रमुरय न्यान दिया गया है, किन्तु चक्रोति- सिद्धान्त में प्रबन्ध-वकना, वस्तु-वज्ना आदि प्रमुख भेदो का प्रापन्तन्व मान कर रन को निश्चय ही अत्यन्त महत्व प्रदान किया गया है। औौर यास्तव में यह स्वाभाविक भी या व्योकि यकोति-मिद्धान्त को स्थापना तक ध्वनि अचवा रस-ध्वनि निद्धान्त का ध्यापक प्रचार हो चुका या और मुन्तक के लिए उसके प्रभाव ने मुत्त रहना सनव नहीं या। इस प्रपार रस मर म्वनि के नाथ वकोसि का रौनि को अपेक्षा निश्चस हो अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध है।-फिर भी दोनों में मूल साम्प यह है कि दोनों काव्य को शौदल या नंपुण्य हो मानते हे, मृजन नहीं. दोनों के मत मे काव्य रचना है आत्माभिष्यतति नहीं है।

(गव्यानयां १६६:)

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१६२ ] भूमिका [ वक्रोक्ति और रीति-सिद्धान्त

रीति तथा वक्रोक्ति के आधार-तत्व, श्रग-उपाग, भेद-प्रभेद आदि का तुलना- त्मक विवेचन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वक्रोक्ति का कलेवर निश्चय ही रीति की अपेक्षा कहीं व्यापक है। रीति की परिघि जहा पद-रचना तक ही सीमित है वहाँ वक्रोक्ति की परिधि में प्रकरण-रचना, प्रबन्ध-कल्पना आदि का भी यथावत् समावेश हैरीति की परिधि में, वास्तव में वक्रोक्ति के प्रथम चार भेद अर्थात् वर्णविन्यास-वक्रता, पदपूर्वार्ध-वक्रता, पदपरार्ध-वक्रता तथा वाक्य-वक्रता हो आते हैं। वामन प्रबन्ध-कौशल के महत्व से अनभिज्ञ नहीं थे -उन्होने मुक्तक की अपेक्षा प्रबन्ध- रचना को अधिक मूल्यवान माना है

क्रमसिद्धिस्तयो. स्रगुत्तसवत । १।३।२६

नानिबद्ध चकास्त्येकतेज परमारुवत्। १३।२९

अर्थात् माला और उत्तस के समान उन दोनों (मुक्तक और प्रबन्ध) की सिद्धि क्रमश होती है। १।३।२८ ।

जैसे अग्नि का एक परमाणु नहीं चमकता है इसी प्रकार अनिबद्ध अर्थात् मुक्तक काव्य प्रकाशित नहीं होता है। १३२६।

उपर्युक्त सत्रो से इसमें सन्देह नहीं रह जाता कि वामन के मन में प्रबत्ध- रचना के प्रति कितना आदर है। फिर भी प्रबन्ध में भी वे रीति अर्थात् पदरचना के नैपुण्य को ही प्रमाण मानते हैं-निबद्ध काव्य का महत्व उनकी दृष्टि में कदाचित इसीलिए अधिक है कि उसमें विशिष्ट पदरचना की निरन्तर शृखला रहती है, इसलिए नहीं कि उसमें जीवन के व्यापक और महत् तत्वों के विराट कल्पना-विधान के लिए विस्तृत क्षेत्र है। इस दृष्टि से कुन्तक की वक्रोक्ति का आ्राधार निश्चय ही अधिक व्यापक और उसकी परिधि अधिक विस्तृत है। आधुनिक आलोचनाशास्त्र की शब्दावली में यह कहना असगत न होगा कि वक्रोक्ति वास्तव में काव्यकला9 की समा- नार्थी है और रीति काव्वशिल्पर की, इस प्रकार वामन की रीति वक्रोक्ति का एक अग मात्र रह जाती है-और मैं समझना हू इन दोनों सिद्धान्तों के अन्तर का सार यही है।

१ पोयटिक आ्रार्ट २ पोयटिक क्राफ्ट

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वक्रोक्ति और ध्वनि

स्वरूपगत साम्य

वक्रोति-सम्प्रदाय ा जन्म वास्तव में प्रत्युत्तर रूप में हुग्रा था। फाव्यात्मवाद के विरुद्ध देहवादियों का यह शन्तिम विफल विद्रोह था। काय्य के जिन सौन्दय- भेदो की आनन्दवर्धन ने ध्वनि के द्वारा आत्मपरक व्यासया फी थी, उन सभी की फुन्तफ ने अपनी अपूर्व मेधा के वल पर वकोक्ति के द्वारा वस्तुपरफ विवेचना प्रस्तुत करने फी चेष्टा को। इस प्रकार वक्रोत्ति प्राय ध्वनि की वस्तुगत परिकल्पना-सी प्रतीत होती है।

उपर्युक्त तथ्य को हम उद्धरखों द्वारा पुप्ट करते हैं। भानन्दवघंन ने ध्वनि की परिभापा इस प्रकार की है :

जहाँ पयं स्वय को तथा शब्द अपने श्रभिघेय धरवं फो नौए फरके 'उस भ्रपं फो' प्रकाशित फरते हैं, उन काव्य विशेष को विव्वानों ने ध्वनि कहा है। (घ्य० १।१३) 'उस सयं' से पया तात्पर्य है?

प्रतीयमान कुछ औपरौर हो चोत है जो रमलियों के प्रनिद्ध (भग, नैत्र, धोत्र, नासिफादि) अवययो मे भिग्न (उनके) लाजण्य के समान महाकषियो की सूत्तियों में 3 (याच्य अर्ष मे सल्ग हो) भातित होता है। (प्य० १४)

उम स्वादु भर्व को विेरती दुई बडे-चडे फवियों की सरस्वती भनोकिप तथा जनिभानमान प्रतिभा विदोष को प्ररट करती है। (प०l१E)

भरतए यह विगिष्ट एयं पनोरिक प्रतिभाजय है, म्वादु है, याच्य मे निम्न पृषट विचिन्न पस्तु है जौर प्रतीयमान है।

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१६४ ] भूमिका [ वक्रोक्ति और ध्वनि

अब कुन्तक-कृत वक्रोक्ति की परिभाषा लीजिए -'प्रसिद्ध कथन से भिन्न विचित्र अभिधा अर्थात् वर्णनशली ही वक्रोक्ति है।-यह फैसी है ? वैदग्ध्यपूर्ण शैली।' द्वारा उक्ति। वैदग्ध्य का अर्थ है कविकर्म-कौशल ।' ++(व० जी० ११० की वृत्ति)। प्रसिद्ध कथन से भिन्न का अर्थ है (१) 'शास्त्र आदि में उपनिबद्ध शब्द-अर्थ के सामान्य प्रयोग से भिन्न' तथा (२) 'प्रचलित (सामान्य) व्यवहार सरणि का अ्रतिक्रमण करने वाला।'

इन दोनो परिभाषाओ का तुलनात्मक परीक्षण करने पर ध्वनि और वक्रोक्ति का साम्य सहज ही स्पष्ट हो जाता है।

१ दोनों में प्रसिद्ध वाच्य अर्थ और वाचक शब्द का श्रतिक्रमण है : श्ानन्व- वर्धन का सूत्र 'यत्रार्थ शब्दो वा .उपसर्जनीकृतस्वाथौ" (जहाँ अर्थ अपने आपको और शब्द अपने अर्थ को गौण करके) ही कुन्तक की शब्दावली में 'शास्त्रादिप्रसिद्ध- शब्दार्थोपनिबन्धव्यतिरेकि' (शास्त्रादि में उपनिबद्ध शब्द-अर्थ के प्रसिद्ध अर्थात् सामान्य प्रयोग से भिन्न ) का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार ध्वनि और वक्रोक्ति दोनों में साधारण का त्याग और असाधारण की विवक्षा है।

२ ध्वनि तथा वक्रोक्ति दोनों में वैचित्र्य की समान वाछा है-आ्ानन्व ने 'अन्यदेव वस्तु' के द्वारा और कुत्तक ने 'विचित्रा अभिधा' के द्वारा इसको स्पष्ट किया है।

३ दोनों आचार्य इस वैचित्र्य-सिद्धि को अलौकिक प्रतिभाजन्य मानते हैं। किन्तु यह सब होते हुए भी दोनो में मूल दृष्टि का भेद है ध्वनि का वैचित्र्य अर्थ रूप होने से आत्मपरक है, उघर वक्रोक्ति का वैचित्र्य अभिधा-रूप अर्थात् उत्ति- रूप होने के कारण मूलत वस्तुपरक है।-इसीलिए हमारी स्थापना है कि वक्ोक्ति प्राय ध्वनि की वस्तुपरक परिकल्पना ही है।

(२) भेद-प्रस्तारगत साम्य : C स्वरूप की अपेक्षा ध्वनि तथा वक्रोक्ति के भेद-प्रस्तार में और भी अधिक साम्य है। जिस प्रकार आानन्दवर्घन ने ध्यनि में काव्य के सूक्ष्मातिसूक्ष्म अवयव से लेकर व्यापक से व्यापक रूप का भी अन्तर्भाव कर उसको सर्वागपूर्ण बनाने की चेष्टा की

१ शास्त्रादिप्रसिद्धशब्दार्थोपनिवन्घव्यतिरेकि व० जी०। २ प्रसिद्ध प्रस्थानव्यतिरेकि व० जी० ।

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धक्रोकि औ्रौर ध्वनि । भूमिका [ १६५

थी, वैमे हो कुन्तक ने बहुन कुछ उनकी पद्धति का है अनलम्बन कर वकरोकि में फाठ्ज के सभी अ्रवयवो का समावेश कर उसे भी सर्वव्यापक रूप प्रदान करने का प्रयत्न किया है। इम प्रकार वक्रोक्ति और ध्वनि में स्पष्ट सहग्याप्ति है . ध्वनि का चमत्कार जैसे सुप, तिट, वचन, कारक, फृत, तद्धित, समास, उपपर्ग, निपात, काल, लिंग, रचना, अलंकार, वस्तु, तया प्रवन्ध आदि में है, वैसे ही बक्रोकि का विस्तार भी पद- पूर्वार्ध और पदपरार्ध से लेकर प्रकरण तथा प्रबन्ध तक है। वास्तय में ध्वनि के आत्म- परक सोन्दय-भेदों की कुन्तक ने वस्तुपरक व्यातया करने का हो प्रयत्न किया है इसलिए उनके विवेचन की रुपरेसा अ्रथवा योजना बहुत कुछ वही है जो ध्वनिकार ने अपनी स्यापनाओ के लिए बनाई थी।

ध्वन तया वकोक्ि के भेदों का तुलनात्मक विवरण देने से यह धारणा सवया स्पष्ट हो जायगो। वक्रोक्ति का सर्वप्रथम भेद है वर्णविन्यास-वक्रता जिसका चमत्कार वणरचना पर आरश्रित है। इसी फो आ्नन्दव्घंन ने वर्ण-ध्वनि प्रथवा रचना- ध्वनन कहा है।

पदपूर्वार्ध-चक्रता और ध्वनि :

पदपूर्यार्ध-वक्रना के प्रंतर्गन एदित्रैचित््य-वक्रना, पर्याय वक्रना, उपचार-वक्रना, विशेषण-वक्रना, सनूनि-वक्रना, वृति-वक्रता, लिगवेचित््य-वप्रना ओ्रर क्रियावेचित्र्य- वक्रता-ये आाठ भेद हैं। इनमें से अधिकाश का ध्वनि के विभिन्न रपों में सहज हो अन्तर्भाव हो जाता है-अयवा यह फहिये कि अधिकांश ध्वनि-भेदों के रूपान्तर हैं। रूढि वैचिता-तक्रता लक्षणामला ध्यनन के अर्यात्तरसंक्रमिनत्राच्य भेद का ही रूपान्तर है-यहा तक कि कुन्तक ने अपने दोनों उदाहरण भी ध्वन्यालोक से ही लिए हैं.

(१) ताला जाग्रन्ति गुखा जाला दे नहित्एहि घप्पन्ति। रद्द किरणानुग्गहिपाइ होन्ति कमलाई कमलाई। अर्थात् तब हो गुन सोभा लहें, सहृदय जबहिं सराहिं। कमल कमल है तवािं जब, रविकर सो विकसाहिं।।

U(3) काम सन्नु दृढ कठोरहृदयो रामोडस्मि सर्व सहे। वैदेही तु कथ भवष्यति हहा हा देवि धीरा भव।।

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१६६ ] भूमिका [ वक्रोक्ति औ्रौर ध्वनि

त्रर्थात्

मे कठोर हृदय राम हू, सब कुछ सह लूगा। परन्तु सीता की क्या दशा होगी? -हा देवि ! धर्य रखना।

उपर्युक्त प्रथम उदाहरण में कमल में और द्वितीय में राम पद में चमत्कार है। इसी को आनन्दवर्घन ने अर्थान्तरसक्रमितवाच्य ध्वनि और फुन्तक ने रूढ़िवँचित्र्य- वक्रता नाम से अभिहित किया है।

पदपूर्वार्घ-वक्रता के अन्य भेदो का ध्वनि मे समाहार पदपूर्वार्ध-वक्रता के अन्य भेदों का भी ध्वनि में सहज ही समाहार हो जाता है। जैसे पर्याय-वक्रता पर्याय-ध्वनि का रूपान्तर मात्र है, पारिभाषिक शब्दावली में जिसे शब्दशक्तिमूला अनुरणनरूपव्यग्य पदध्वनि कहते है। स्वय कुन्तक ने इसी तथ्य को स्पष्ट शब्दो में स्वीकार किया है।

एष एव शब्दशक्तिमूला अनुरसनरूपव्यग्यस्य पदध्वनेविर्षय (व० जी० २। १२ वृत्ति भाग)।

उपचार-वक्रता भी स्पष्टत. लक्षणामूला ध्वनि के द्वितीय भेद अत्यन्ततिरस्कृत- वाच्य ध्वनि की समानार्थी है दोनों में उपचार अर्ात् लक्षरणा का ही चमत्कार है। उधर सवूति-वक्रता तो ध्वनन अथवा व्यजना पर ही पूर्णतया आश्रित है : यहा साके- तिक सर्वनाम आदि के द्वारा रमणीय अर्थ की व्यजना रहती है। पारिभाषिक दृष्टि से यह भी अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य के ही अतगंत आती है; इसमें भी सर्वनाम आदि साके- तिक शब्दों पर कमनीय अथो का अध्यारोप रहता है-ध्वनिवाद की दृष्टि से अनेक कमनीय अर्थो का ध्वनन किया जाता है। वृत्तिवैचित्र्य-वक्रता समास-ध्वनि के समतुल्य है 1 सुप्तिड्वचनसम्बन्घैस्तथा कारकशक्तिभि.। कृत्तद्धितसमासर्च द्योत्योऽलक्ष्यक्रम क्वचित्।। ध्व० ३।१६।

ध्वन्यालोक की इस कारिका में जिन कृत्तद्धित समास-ध्वनि रूपों की विवृत्ति है, वे वृत्तिवचित्र्य-वक्रना के ही समानान्तर है। लिंग का उल्लेख आनन्दवर्धन ने यहां पृथक रूप से नहीं किया किन्तु उनके उद्धरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि लिंग पर आश्रित रमणीय अर्थ-सकेतो से वे अपरिचित नहीं थे। उपर्युक्त कारिका में भी वचन, कारक, शादि का तो स्पष्ट सकेत है ही-साथ ही 'घ' के द्वारा निपात, उपसर्ग, काल

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वकोक्ति शर ध्वनि ] भूमिका

आदि की ध्यंजना भी आनन्दवर्घन ने सपने आप स्वीकार की है : च शब्दात् निपा- तोपसग-कालादिभि: प्रयुवतरभिव्यज्यमानो दृश्यते। वास्तव में उपयुक्त भेद उपलक्षण मात्र है-आानन्दवर्घन ने लिंग, प्रत्यय आदि सभी में ध्यनि के चमत्कार की व्यंजना- क्षमता मानी है। इस प्रकार लिंगवचित्र्य-वक्रना लिंग-ध्वनि को पर्याय सिद्ध होती है। शप दो भेदो विशेषण-चक्रना तथा क्रिमायैचित्य-वक्रता की स्यिति एकान्त स्वतन्त्र नहीं है-विशेषण-वकरना को पर्याय-वक्रता का ही एक रूप मानना अनुचित न होगा। इस प्रकार वह तो पर्याय-ध्वनि के अन्तर्गत आ जाती है' वैसे 'च' शब्द के आधार पर विशेषण-ध्वनि की फल्पना भी अ्रसगत नहीं होगी। क्रियावचित््य वक्रना के अ्न्तर्गत भी अनेफ वक्रना-एपों का सक्रमण है; उपनारमनोजता उपचार-वक्रता को समतुल्य होने के कारणा अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि के अ्रतर्गत आती है। फर्मादि-सर्वति सवृति-वक्रना से अधिक भिन्न नहीं है, अ्त उसका तो ध्यनि के साथ सहज सम्बन्ध ही है। क्रियाविशेषण-वक्रता भी विशेषण-वक्रता और उसके आगे पर्याय-वक्रता के निकट पहुंच जाती है और अन्त में पर्याय-ध्यनि से मिल जाती है।

पदपगर्घ-वकता और ध्यनि

पदपरार्ध-वक्रता के भी लगभग आठ हो भेद हैं वैचित्र्य-वक्रता, फारक-वक्रता, वचन-वक्रता, पुरुप-वक्रता, उपग्रह-वक्रता, प्रत्यय-वप्रता, उपसर्ग-वक्रता औोर निपात- वक्रता। इनर्में से प्रत्यय, काल, कारक, वचन, उपसर्ग, निपात का तो ध्वनिकार की उपयुक्त कारिका में स्पप्ट उल्लेख ही है, शेष दो, पुरुष और उपग्रह फो भी, 'च' में गभित माना जा सकना है। काल, फारक, प्रत्यय आदि के जिन चमत्कारो को घ्वनि- कार ने व्यक्तिनिष्ठ मान कर ध्यनि के भेद-प्रभेदो में स्थान दिया है, उन्हीं को कुन्तक ने वस्तुनिष्ठ मानते हुए वक्रा-भेदो में परिगशित कर लिया है। चमत्फार वे ही हैं, केवल उन्हें परखने का दृष्टि-भेद है।

वन्तु-चक्रता श्रर वस्तु-बनि

वस्तु-चक्रा की परिभाषा कुन्तक ने इस प्रकार की है : 'वस्तु का उत्कर्पयुक्त्त स्वभाव से सुन्दर रूप में केवल सुन्दर शब्दों द्वारा वर्णन अर्थ (वस्तु) या वाच्य को वक्रता फहलाती है।' (हिन्दी व० जी० प ३१)। आगे वस्तु-स्वभाव-वर्णन की व्यारया करते हुए कुन्तक ने इसी प्रसंग में लिखा है .'वर्णन का अर्यं है प्रतिपादन। कँसे ? केवल वक्र शब्द के विषय रूप से। वक्र अर्यात नाना प्रकार की (पूर्वोक्त) वक्रना से युक्त जो कोई शब्द-विशेष विवक्षित अर्य के समपण में समर्थ हो-केवल

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१६८ ] भूमिका [ वक्रोक्ति औ्रर ध्यनि

उस एक ही के गोचर अर्यात् प्रतिराद्यतया विषय होने से। यहाँ (उन शब्द विशेष के) वाच्य रूप से विषय यह नहीं कहा है, (प्रतिनाद्यनजा विषन कहा है) कजोंकि प्रतिपावन तो व्यग्य रूप से भी हो सकता हैं। (हिन्दी व० जी० ३१ वृत्तिभाग)।' उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि कुन्तक की वस्तु-वक्रता पूर्णत नहीं तो कम से कम श्रशत. वस्तु-ध्वनि की समनार्थी अ्रवश्य है। अन्तर इतना है कि कुन्तक वस्तु-सौन्दर्य का प्रतिपादन वाच्य रूप में भी सम्भव मानते हैं, फिन्तु आनन्दवर्घन उसे केवल व्यग्य रूप में ही स्वीकार करते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि यहा वस्तुत आनन्द का ही मत मान्य है क्योंकि मूलरूप में अनुभवगम्य होने से सौन्दर्य वाच्य न होकर व्यग्य हो हो सकता है, फिर भी कुन्तक की वस्तु-वक्रना-जहाँ तक कि उसका आधार व्यग्य है-वस्तु-ध्वनि से अभिन्न ही है, इसमें सन्देह नहीं।

वाक्य-वक्रता और अलकार-ध्वनि

वाक्य-वक्रता के अन्तर्गत सामान्यत अर्थालकारो का सन्निवेश है। वाच्य पर आश्रित अर्यालकारों का सौ दर्ष तो निश्चन ही अलकार-ध्वनि के अ्रन्तर्गत नहीं आाता, किन्तु कुन्तक ने रूपक, व्यतिरेक, आदि कतिपय अलकारों का प्रतीयमान रूप भी माना है। ये प्रतीयमान अलकार स्पष्टत अलकार-ध्वनि के ही समरूप है- कुन्तक के प्रतीमान रूपक को आनन्दवर्वन रूनक छ्वनन नाम से अभिहित कर चुके थे। दोनों का उदाहरण भी एक ही है -

लावग्यकान्तिपरिपूरित दिङमुखेऽम्मिन् स्मेरेऽधुना तव मुखे तरलायताक्षि। क्षोभ यदेति न मनागपि तेन मन्ये सुव्यक्तमेव जलराशिरय पयोधि।

अर्थात् हे तरलायतनयने अब लावण्य और कान्ति से दिग्दिगन्तर को परिपूणं कर बेने वाले तुम्हारे मुख के मन्द मुसकानयुक्त होने पर भी इस में तनिक भी चचलता दिखाई नहीं पड़ती है, इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह पयोधि जलराशि मात्र है।

उपर्युक्त श्लोक के व्यंग्य रूपक पर दोनों आचार्यों ने अपने अपने ढग से टिप्पणी को है. आनन्दवर्धन -'इस प्रकार के उदाहरणो में सलक्ष्यक्रमव्यग्य रूपक के आश्रय से ही काव्य का चारुत्व व्यवस्थित होता है, इसलिए (यहाँ) रूपक-ध्वनि व्यवहार (नामकरण) ही उचित है। (हिन्दी ध्वन्यालोक पृ० १६५)"

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वक्रोक्ति औौर ध्वनि भूमिका I १६६

कुन्तक-"यह प्रतीयमान रूपक का उदाहरण है-प्रतीयमानरूपक यथा। (हिन्दी वक्रोक्तिजीविन-३।१६ फी वृत्ति के भ्रन्तगंत उब्ुत) ।"

पुन्तक ने स्वतत्र विवेचन तो रेवल दो तीन ही प्रतीयमान अलकारो का किया है, किन्तु उनकी वुत्तिो से प्रतीत होता है कि उन्हें उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अ्रनेक अलंकारो के भी प्रतीयमान रूप स्वीकार्य थे।

इस प्रकार वाक्य-वकता के प्रतोयमान भेदो में अलंकार ध्वनि का स्पष्ट प्रन्तर्भाव है।

प्रवन्ध-वकता शर प्रबन्ध-ध्वनि

कुन्तक फी प्रबन्ध-वक्रना वास्तव में प्रवन्ध-कौशल का ही पर्याम है जिसके अन्तर्गत कथाविधान को विभिन्न प्रणालियों का समाहार किया गया है। परन्तु अपने समप्टि रूप में वह प्रबन्ध-ध्वनि से अभिन्न है। फुन्तक ने स्पष्ट लिसा है : 'फिसी महाकवि के बनाये हुए रामकयामूलक नाटफ आदि में पाँच प्रकार की (वर्णविन्यास- वकता, पदपूर्वार्ध-चक्रना, प्रत्यय-वक्रता, वाषय-वक्रा तया प्रकरण-वक्रता) वम्रता से सुन्दर सहृदयाह्हादकारी. (नायफ-एप) महापुरुष का वर्णन ऊपर से किया गया प्रतीत होता है। परन्तु वारतन में [कवि का प्रयोजन उस के चरित्र का वर्णन मात्र नहीं होता, अपितु] 'राम के समान आचरस करना चाहिए, रावण के समान नहीं' इस प्रकार का, विधि-निषेधात्मक धर्म का उपदेश (उस काव्य या नाटक का) परमार्य होता है। यही उस प्रवम्न काव्ज की वक्ना या सौन्दर्व है।' (१२१ वीं कारिका को वृति)। फहने को आ्रवश्मकता नहीं कि यह परमायं रूप प्रबन्ध वक्ता ही प्रबन्ध- ध्वनि है। इस समष्टि एप के अतिरिक्त प्रवन्ध-वक्रा के दो-एक भेद भी ऐसे हैं जो प्रवन्ध-ध्वनि के प्रतिरूप हैं। उदाहरस के लिए प्रबन्ध-वक्रता का छठा भेद कुन्तक के शब्दों में इस प्रकार है :

"कयाभाग का वर्णन समान होने पर भी अपने अपने गुणों से काव्य, नाटक आदि प्रबन्ध पृथक पृथक होते हैं जैसे प्राणों के शरीर में समान होने पर भी उनके अपने अपने गुणों से भेद होता है। ४।२५ का अन्तर्श्लोक।

(इस प्रकार) नये-नये उपायो से सिद्ध होने वाले, नीतिमार्ग का उपदेश करने वाले, महाकवियों के सभी प्रबन्धो में (अपनी-अपनी) वक्रता अयवा सौन्दर्य रहता है।" ४।२६ ।

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भूमिका [ धक्रोक्ति और ध्वनि

इसका अभिप्राय यह है कि एक ही कथा पर आश्रित फाव्य अपने ध्वन्यार्थ के भेद से परस्पर भिन्न हो सकते हैं कुन्तक के शब्दो में यही प्रबन्ध-वक्रता है और आनन्दवर्धन के शन्दों में प्रबन्ध-ध्वनि।

इसी प्रकार प्रबन्-वक्रता का प्रथम भेद भी, जहा प्रतिभाशाली कवि अपने काव्य में उपजीव्य कथा से भिन्न रस का परिपाक कर उसे सर्वथा नवीन रूप प्रदान कर देता है, प्रबन्ध-ध्वनि से भिन्न नहीं है क्योकि अन्तत काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से प्रबन्ध-ध्वनि रस रूप ही होती है, अत रस-परिवर्तन का अर्य प्रवन्ध-ध्वनि का परिवर्तन ही है। इस भेद विशेष की चर्चा वक्रोक्ति और रस के प्रसग में करेगे।

वक्रोक्ति औरपरर व्यंजना :

ध्वनि-सिद्धान्त का आघार है व्यजना शक्ति। कुन्तक मूलत अभिघावादी हैं-उन्होंने अपनी वक्रोक्ति को विचित्र अभिधा ही माना है। परन्तु उन्होने लक्षणा और व्यजना की स्थिति का निषेध नहीं किया-वास्तव में इन दोनों को उन्होने प्रभिधा का ही विस्तार माना है, अभिधा के गर्भ में ही इन दोनों की स्यिति उन्हें मान्य है अर्थात् वाचक शब्द में द्योतक और व्यजक शब्द, वाच्य अ्रथ में द्योत्य और न्यग्य अर्थ स्वय ही अन्तर्भूत हो जाते हैं।

(प्रश्न)-द्योतक और व्यजक भी शब्द हो सकते हैं। (आपने केवल वाचक को शब्द कहा है।) उनका सप्रह न होने से अव्याप्ति होगी। (उत्तर)-यह नहों कहना चाहिए क्योंकि (वाचक शब्दों के समान व्यंजक तथा द्योतक शब्दों में भी) अर्थप्रतीतिकारित्व की समानता होने से उपचार (गौणी वृत्ति) से वे (दोतक और व्यजक) दोनों भी वाचक ही है। इसी प्रकार द्योत्य और व्यग्य दोनों अर्थों में भी बोष्यत्व की समानता होने से वाच्यत्व ही रहता है। (हिन्दी वक्रोक्तिजीवित पृ० ३७)

निष्कष

उपर्युक्त विवेचन के फलस्वरूप यह स्पष्ट हो जाता है कि ध्वनि-सम्प्रदाय के 1

विरोध में एक प्रतिद्वन्द्वी सम्प्रदाय खडा कर देने पर भी कुन्तक ने ध्वनि का तिरस्कार नहीं किया-अथवा नहीं कर सके। वास्तव में ध्वनि का जादू उनके सिर पर चढ़कर बोलता रहा है, इसीलिए अपने सिद्धान्त-निरूपण के आरम्भ से अन्त तक स्थान स्यान पर वे उसे साकेतिक अयवा स्पष्ट रूप में स्वीकृति देते रहे हैं।

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वक्रोक्ति और ध्वनि । भृमिका {२०१

जंसा कि मैंने आरम्भ में ही स्पप्ट किया है इन दोनो आचार्यों की सौन्दर्य- कल्पना में मौतिक भेद नहीं है। दोनों निश्चित रूप से कल्पनावादी हैं-आनन्द- वर्घन और कुन्तफ दोनों ने ही अपने सिद्धान्तों में अनुभूति तथा वुद्धि तत्व की अपेक्षा फल्पना-तत्व की महत्व-प्रतिष्ठा की है। किन्तु दोनों फी दृष्टि श्रथवा विवेचन-पद्धति भिन्न है। आनन्दवर्धन कल्पना को आत्मगत मानते हैं अर्ात् कल्पना से तात्पर्य प्रमाता की फल्पना से है : सत्काव्य प्रमाता को कल्पना को उद्वुद्ध कर सिद्धि-लाभ करता है। फुन्तक कल्पना को वस्तुगत मानते हैं-उनको दुष्टि से यह है तो मूलत कवि की ही फल्पना, किन्तु रचना के उपरान्त कवि के भूमिफा से हट जाने के कारण, वह अब काव्य में सन्निविष्ट हो गई है, अतः उसकी स्थिति फाव्य में वस्तुगत ही रह जाती है। इस प्रकार वक्रोक्ति और ध्वनि सिद्धान्तों में वाह्य प्रतिद्वन्द्व होते हुए भी मौलिक साम्य है।-और फुन्तक इससे अवगत थे। एक प्रमाण के द्वारा अपनी स्थापना को पुष्ट कर में इस प्रसंग को समाप्त करता हूँ। कुन्तक के दो मार्गों- सुकुमार और विचित्र-में मूल अन्तर यह है कि एक में स्वाभाविफता का सहज सौन्दर्य है, और दूसरे में वक्रता का प्राचुर्य अर्यात् फल्पना का विलास। इसके लिए किसी प्रमाण की पपेक्षा नहीं है, विचित्र मार्ग के नाम और गुए दोनो ही इसके साक्षी है। कुन्तक ने ध्वनि१ अयवा प्रतीयमानता को इस कल्पना-विशिष्ट विचित्र मार्ग का प्रमुख गए घोषित कर कल्पना पर आश्रित वक्रता और ध्वनि के इसी मौलिक साम्य की पुष्टि की है. वक्रता-फल्पना-ध्वनि।

१ प्रतीयमानता यत्र वाक्यार्थस्य निवध्यते। वाच्यवाचववृत्तिभ्यामतिरिक्तस्य कस्यचित्। व०जी० ११४० अर्थात जहा वाच्यन्वाचक वृत्ति से भिन्न वाक्यार्थ की किसी प्रतीयमानता की रचना की जाती है।

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२०२ ] भूमिका [ वक्रोक्ति और रस

वक्रोक्ति और रस

यद्यपि कुन्तक ने उच्च स्वर से सालकारस्य काव्यता की घोषणा को है, फिर भी उनकी सहृदयता रस का अनादर नहीं कर सकी। सिद्धान्त रूप से वक्रोक्ति और रस में वैसा मौलिक साम्य तो नहीं है जैसा ध्वनि और वक्रोक्ति में है, किन्तु सब मिला कर वक्रोक्ति-चक्र में रस का स्थान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है वास्तव में यह कहना असगत न होगा कि रस के प्रति वक्रोक्ति और ध्वनि दोनो सम्प्रदायों का वृष्टिकोण बहुत कुछ समान है।

काव्य के लक्षण और प्रयोजन के अन्तर्गत रस की महत्ता : सब से पूर्व तो कुन्तक ने काव्य के लक्षण और प्रयोजन के प्तर्गत ही रस का महत्व स्वीकृत किया है। काव्य-लक्षण -

शब्दाथौं सहिती वक्रकविव्यापारशालिनि। बन्धे व्यवस्थितौ काव्य तद्विदाह्हादकारिणि ॥ १। १०।

यहां काव्य-बन्ध के लिए वक्रकविव्यापार के साथ ही तद्विदाह्लादकारिता को भी अनिवार्य माना गया है तद्विव् का अर्थ है काव्य-मर्मज्ञ अथवा सहृदय ... इस प्रकार कुन्तक के अनुसार काव्य को अनिवार्यत सहृदय-श्राह्नादकारी होना चाहिये।

काव्य-प्रयोजन -

चतुर्वर्गफलास्वादमप्यतिक्रम्य तद्विदाम्। काव्याम्तरसेनान्तश्चत्कारोवितन्यते॥ १।५

अर्थात् काव्यामृत का रस उसको समझने वाले (सहृदयों) के अन्त करण में चतुर्वर्गरूप फल के आस्वाद से भी बढकर चमत्कार उत्पन्न करता है।

चमत्कारो वितन्यते का अर्थ स्वय कुन्तक की वृत्ति के अनुसार यह है. शह्नाद पुन पुन क्रियते अर्थात् आनन्द का विस्तार करता है। इस प्रकार कुन्तक आनन्द को काव्य का चरम प्रयोजन मानते हैं।

यहा यह शका की जा सकती है कि कुन्तक इतना महत्व शह्ाद को वे रहे है-रस को नहीं, अर्थात् काव्यानन्द को रसास्वाद का पर्याय क्यो माना जाय ? भामह आदि अलकारवादियो ने भी प्रीति अथवा आनन्द को मूल प्रयोजन माना है, परन्तु

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वक़ोकि और रस ] भूमिका [२०३

उनकी आनन्द-विषयक धारणा रस से भिन्न है। इसी प्रफार कुन्तक का श्रह्हाद-स्तवन रस का स्तवन नहीं है।-इस शका का समाधान स्वयं कुन्तक के शन्दो का आघार 'लेकर किया जा सकता है। सुकुमार मार्ग के विवेचन में कुन्तक ने सहृदय या तद्विद् को स्पष्टतया रसादिपरमायंज्ञ अर्थात् रसादि के परम तत्व का वेता कहा है : रसादि- परमार्यज्ञ मन संवादसुन्दर।१। २६। इसके प्र्तिरित्त अ्रन्यन्न भी कई स्थलो पर तथा कई रपों में उन्होंने सहृदय को रतज्ञ का ही पर्याय माना है। उदाहरण के लिए तौभाग्य गुण के लक्षण में सहृदय के लिए 'सरसात्मनाम्' शब्द का प्रयोग किया गया है और उसको व्यारया करने के लिए 'पद्रंचेनसाम्' शन्द का

नर्वसम्पत्रिस्पन्दसम्पाद्य सरसात्मनाम्।१।५६। + मरमात्मनाम् श्राद्रचेतसाम् ""। +

इस प्रकार यह स्पष्ड हो जाता है कि कुन्तक का 'सहृदय' निश्चय रूप से सरसात्मा अयवा आारद्रंचित प्रयता रसज्ञ ही है और उसका श्रह्लाद रसास्त्राद से अ्रधिक भिन्न नहीं है।

कुन्तक के मत से काव्य में रस का स्थान

फुन्तक के विचेचन में फई प्रसगो के अन्तगत ऐसी स्पष्ट उक्तियां है जिनसे यह सिद्ध हो जाता है कि ध्वनिकार को भाति वे भी रस को काव्य का परम तत्व मानते हैं। प्रबन्ध-वक्रता के विवेचन में उन्होंने निर्भान्त शब्दो में यह घोषित किया है कि वक्रोक्ति का सबसे प्रौढ़ और उत्कृष्ट रूप प्रवन्ध-वक्रता है :- प्रवन्घेषु कवीन्द्रारां कोतिकन्देवु कि पुन। ४। २६ वीं कारिका का अंत्श्लोक। अर्यात् प्रबन्ध कुन्तक के मत से साधारण कवियों की नहीं वरन् कवोन्द्रों की कीति का मूल कारण है। इसी प्रबन्ध के विषय में उनका यह वृढ़ विश्वास है :

निरन्तरसोद्गारगभंसदर्भनिर्भरा गिर कवीना जीवन्ति न कथामायमाश्रिता ॥४।११।

अर्थात् निरन्तर रस को प्रवाहित करने वाले सदर्भों से परिपूर्णं फवियो की वाणी कथामात्र के मशय से जीवित नहों रहती है। उपर्युक्त दोनों ही उद्धरण अपने आप में अत्यन्त स्पष्ट हैं। उनसे यह निष्कर्ज सहज ही निकन आता है कि कुन्तक के अनुसार भी काव्य का सर्वोत्कृष्ट रप है प्रवन्ध और प्रवन्ध का प्राणतत्व है रस-इस प्रकार ध्वनि-काव्य की भाँति वक्रोक्तिजीवित काव्य का भी प्राण-तत्व रस ही सिद्ध होता है।

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२०४ ] भूमिका [वक्रोक्ति औौर रस

ध्वनि-सिद्धान्त के समान ही वक्रोक्तिसिद्धान्त के अन्तर्गत भी रस को वाच्य नहीं वरन व्यग्य माना गया है-इस प्रसग में कुन्तक ने उद्भट द्वारा मान्य रस के स्वशब्द-वाच्यत्व का उपहास करते हुए लिखा है उसके ( उपर्युक्त मन्तव्य) के विषय 1 में रसों की स्वशन्दवाच्यता हमने आज तक नहीं देखी है।++ इसका यह अभिप्राय हुआ कि शृगार आदि रस अपने वाचक शब्दो के द्वाग कहे जाकर श्रवरग से गृहोत होते हुए चेतन सहृदयो को चर्वणा का चमत्कार-आस्वाद का आनन्द प्रदान करते हैं। इस युक्ति से घृतपूप आदि खाद्य पदार्थ अपने नामों से कहे जाने पर (ही) प्ररास्वादन-सम्पत्ति अर्थात् खाने का आ्रानन्द उत्पन्न कर देते हैं, (यह सिद्ध हो जाएगा)। इस प्रकार उन उदारचरित महाशयो की कृपा से किसी भी पदार्थ के उपभोग-सुख की कामना करने वाले सभी व्यक्तियों के लिए, बिना प्रयत्न के उस पदार्थ का नाम लेने मात्र से त्रलोक्य-राज्य की सुख-सम्पदा बिना प्रयत्न के सिद्ध हो जाती है। व० जी० ३।११ की वृत्ति।.

काव्यवस्तु के विवेचन में भी कुन्तक ने रस को अत्यधिक महत्व दिया है। उन्होंने काव्य की वर्ण्य वस्तु को स्पष्ट शब्दो में रसस्वरूप माना है औ्रर विविध प्रकार से उसकी रसनिर्भरता का प्रतिपादन किया है. "इस प्रकार स्वभाव-प्राधान्य और रस-प्राधान्य से दो प्रकार की वर्ण्य विषय-वस्तु का सहज सौकुमार्य से रसस्वरूप शरीर ही अलकार्यता के योग्य है।" व० जी० ३।११ कारिका की वृत्ति। इसका अभिप्राय यह है कि कुन्तक रसनिरभरता को काव्यवस्तु का प्रमुख अग मानते हैं- उन्होंने रस-प्रधान वस्तु के अन्तर्गत ही रसों का वर्णन किया है। काव्यवस्तु के चेतन और जड नाम से वो भेद करते हुए उन्होने प्रथम भेव अर्थात् चेतन को ही मुख्य माना है और उसके लिए रसादि का परिपोष आवश्यक ठहराया है.

"मुख्य चेतन (देवादि की) अक्लिष्ट अर्थात् बिना खींचतान के, रत्यादि के परिपोष से मनोहर और अपने जाति-योग्य स्वभाव-वर्णन से परम मनोहर (वस्तु महाकवियों की वर्णना का प्रमुख विषय होती है) व० जी० ३७+++ श्रर रत्यादि स्थायी भाव का परिपोष ही रस बन जाता है।" (उपर्युक्त कारिका का वृत्ति भाग)।

यहीं कुन्तक ने विप्रलम्भ और करुण रस के अनेक उदाहरण वेकर अन्य रसों की श्रोर सकेत कर दिया है"कोमल रस होने से विप्रलम्भ और करुण रस के उदाहरणों को प्रदशित कर दिया है-अन्य रसों के उदाहरण भी स्वय समझ लेने चाहिएँ।"

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वक्रोति और रस । भूमिका [ २०५

नड़ का वर्गन भी फाव्य का श्रग है-परन्तु जड़ अर्यात् प्राकृतिक दृश्यो कमयवा पदार्थों का यह वर्णन प्राय अपनी रसोद्दीपन-साम्थ्य के कारण ही फाम्य होता है :

"मुदय चेतन (सिंहादि तिर्यक् योनि के प्राणियो) और बहुत से जड़ पदार्यो का भी रसोद्दीपन-सामर्थ्य के कारण मनोहर रूप भी फवियो की वर्णना का विषय होता है।" व० जी० ३८

इस प्रकार काव्य-वस्तु के दोनो रूपों में रस का प्राधान्य है; वास्तव में अ्रपनी रस-वाधुरता के कारण ही वण्य वस्तु काव्म के लिए इतनी स्पूहणीय होती है।

वक्रोक्ति-सिद्धान्त के मार्गों के विवेचन में भी रस को इसी प्रकार उचित महत्व दिया गया है। सुकुमार और विचित्र दोनों मार्गों में कुन्तक ने प्रकारान्तर से रस के चमत्कार का उल्लेख फिया है। सुकुमार मार्ग अपने सहज रूप में रसादिपरमार्यज्ञ- .मन संवादसुन्दर' अर्यात् रसादि के परम तत्व को जानने वाले सहृदयो के मन के अ्रनुरूप होने के कारण सुन्दर होता है, और विचित्र मार्ग कमनीय वैचित्र्य से परि- पोषित होने के साथ साथ सरसाफृत-कुन्तक की अपनी वृत्ि के अनुसार रसनिर्भरा- भिप्राय (रसनिर्भर अरभिप्राय से युक्त) भी होता है। उधर, तीसरा-मध्यम मार्ग भी, इन दोनों का मिध रूप होने के कारण, स्वत ही रस-पुष्ट होना चाहिए। इस प्रकार तीनों मार्गों में रस का सचरण अनिवार्य है। साराश यह है कि काव्य-भेद, काव्य-वस्तु और काव्य-मार्ग-इन तीनो में ही कुन्तक ने रस की महत्व-प्रतिष्ठा की है।

रसवत् अलंकार का निषेध और रस की अलकार्यता

अरन्त में रसवत् अलकार का निषेध और रस की अलकार्यता की सिद्धि के )द्वारा यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि कुन्तक के मन में रस के प्रति कितना अधिक आग्रह है। वास्तव में रस का तिरस्कार तो कुन्तक के पूर्ववर्ती अलंकारवादियों ने भी नहीं किया, किन्तु उन्होने रस को अलकार ही माना है। रस-ध्वनिवादियो की दृष्टि में यह रस का तिरस्कार ही है क्योकि इस प्रकार आत्मभूत रस आभूपस मात्र रह जाता है। इसी दृष्टि से उन्होने रसवत् अलंकार का निषेध कर रस की अलंका- १ ११२६ २ १४१

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भू मिका [ वक्रोक्ति और रस

यंता की प्रतिष्ठा की। कुन्तक ने रस के विषय में भामह, दण्ड़ी तथा उद्भट की परम्परा का त्याग कर रस-ध्वनिवादियो का ही अनुसरण किया है

अलकारो न रसवत् परस्याप्रतिभासनात्। स्वरूपातिरिक्तस्य शव्दार्थसगतेरपि॥ ३११।

अर्थात् रसवत् अलकार नहीं है और इसके कारण दो हैं-एक तो अपने स्वरूप के अतिरिक्त इसमें अलकार्य रूप से किसी अन्य की प्रतोति नहीं होती और दूसरे अलकार्य रस के साथ अलकार शब्द का प्रयोग होने से शब्द और अर्थ की सगति नहीं बैठती। इसका स्पष्ट पर्थ यही है कि रस अलंकार्य है, अलकार नहीं है।

यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि अलकार्य मान लेने से भी रस की विशेष महत्व-प्रतिष्ठा नहीं होती रस अधिक से अधिक शरीर बन जाता है, आत्मा फिर भी नहीं बनता। परन्तु यह बात नहीं है-इसी प्रसग में कुन्तक ने उपर्युत्त सन्देह का निवारण कर दिया है 'रसवतोऽलकार इति षष्ठीसमासपक्षोऽपि न सुस्प- ष्टसमन्वय । यस्य कस्यचित् काव्यत्व रसवत्वमेव।' अर्थात् 'रसवान् का अलकार' इस षष्ठी समास पक्ष का भी स्पष्ट समन्वय नहीं हो सकता है क्योंकि किसी भी काव्य का रसवत्व ही उसका काव्यत्व है। (३।११ वृत्ति भाग)।

इसी प्रसग में आगे चलकर फिर कुन्तक ने प्रकारान्तर से रस के प्रति अपना पक्षपात व्यक्त किया है। रसवत् के परम्परागत रूप का खण्डन करने के उपरान्त वे अपने मत से उसके वास्तविक स्वरूप का विवेचन करते हैं -'रस तत्व के विघान से, सहृदयों के लिए आह्लादकारी होने के कारण, जो अलकार रस के समान हो जाता है, वह अलंकार रसवत् कहा जा सकता है। १।१४।'-उपर्युक्त लक्ष से यह स्पष्ट है, और कुन्तक ने अपनी वृत्ति में कहा भी है कि 'इस प्रकार अर्थात् (रस-तत्व के विधान से) यह अलकार समस्त अलंकारों का प्राण और काव्य का शद्वितीय सार-सर्वस्व हो जाता है।'

इससे अधिक रस का स्तवन और क्या हो सकता है? रस और चक्रोक्ति का सम्बन्ध अब प्रश्न यह रह जाता है कि एक ओर जब अलकाररूपा वक्रोक्ति ही काव्य का जीवित है, और दूसरी ओर रस भी काव्य का परम तत्व है, तो इन दोनों का समजन कैसे किया जाय ? अर्थात् वक्ोक्ति और रस का वास्तविक सम्बन्ध क्या है?

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वक्रोक्ति और रस । भूमिका [२०७

इस प्रश्न का उत्तर फठिन नहीं है। कुन्तक की मूल धारा का सूत्र पकड़ लेने से इस शंका का समाधान हो जाता है। कुन्तक के मत से फाव्य का प्राण तो निश्चय ही वक्रोक्ति है: और वक्रोत्ति का अर्थ, जैसा कि हम अन्यन्न स्पष्ट कर चुके हैं, उत्ति- चमत्कार मात्र न होकर कविकौशल अथवा फाव्य-फला ही है। फुन्तक के अनुसार काव्य वक्रोक्ति सर्यात् कला है। इस फला की रचना के लिए कवि शब्द-अर्थ की प्रनेरु त्रिभूतियों का उपरोग करता है-प्रर्य की विभूतिनो में सबने अधिक मूल्यवान है रस। अतएव रस वक्रोक्तिरुपिणी काव्पकला का परम तत्व है : काव्य की प्राण- चेतना है वक्रता और वक्रना की समृद्धि का प्रमुख आघार है रस-सम्पदा। इस प्रकार वक्रोक्ति के साथ रस का सम्वन्ध लगभग वही है जो ध्वनि के साथ है।

रस और ध्वनि का सम्बन्ध दो प्रकार का है. एक तो रस अनिवार्यत. ध्वनि- रूप ही हो सकता है (फयन रूप नहीं), दूसरे रस ध्वनि का र्सोत्कृष्ट रूप है। इन दोनों सम्बन्धों के विश्लेषण से एक तीसरा तथ्य भी सामने आता है और वह यह कि ध्वनि और रस में, ध्वनि-सिद्धान्त के अनुसार, पलड़ा ध्वनि का ही भारी। रस की स्यिति ध्वनि के बिना सम्भव नहीं है, परन्तु ध्वनि की स्थिति रस-विहीन हो सकती है : वस्तु-ध्वनि, अलकार ध्वनि भी काव्य के उत्कृष्ट रूप हैं। अ्रत काव्य में श्र्प्रनि- वार्यता ध्वनि फी ही है रस की नहीं। रस के विना काव्यत्व सन्भव है, ध्वनि के बिना नहीं, इसीलिए आनन्दवर्धन के मत से ध्वनि काव्य की आरत्मा है, रस परमश्रेष्ठ तत्व अवश्य है फिन्तु आत्मा नहीं है।-कुछ ऐसी ही स्थिति वक्रोक्ति और इस के परस्पर सम्बन्ध की भी है। (१) रस वक्रोक्ति की परम विभूति है, (२) रस की काव्यगत अभिव्यजना वक्रता-विहीन नहों हो सकती-रसोत्कर्ष की प्रेरणा से अभिव्यक्ति का उत्कर्ष अनिवार्य है, और अरभिव्यक्ति का यही उत्कर्ष वक्रना है। अर्थात् काव्य में रस की स्यिति वक्रना-विरहित सम्भव नहीं है-काव्य से बाहर हो सकती है। किन्तु वह भाव-सम्पदा, फाव्य-वस्तु मात्र है काव्य नहीं है। उघर वक्रता तो रस के बिना भी अनेक रूपों में विद्यमान रह सकती है चाहे वे रूप उतने उत्कृष्ट न हो जितना कि रसमय रूप। कम से कम कुन्तक का यही मत है। रस के विना काव्य जीवित रह सकता है वक्रोक्ति के बिना नहीं। इसी लिए वक्रोक्ति ही काव्य का जीवित है, रस काव्य की अमूल्य सम्पत्ति होते हुये भी जीवित नहीं है। संक्षेप मे रस के साथ वक्रोक्ति का यही सम्बन्ध है जो ध्वनि-रस-सम्बन्ध से अ्रधिक भिन्न नहीं है। वास्तव में रस- सम्प्रदाय द्वारा स्थापित रागतत्व के एकाघिपत्य के विरुद्ध ध्वनि और वक्रोक्ति दोनों ने अपने अपने ढग से कल्पना की महत्व-प्रतिष्ठा की है। रागतत्व का सौन्दर्य तो दोनों

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२०८ 1 भूमिका [ वक्रोक्ि और रस

को स्वीकार्य है किन्तु अपने सहज रूप में नहीं-कल्पना-रजित रूप में। इस कल्पना- रजन की प्रक्रिया भिन्न है : ध्वनि-सिद्धान्त के अतर्गगत कल्पना आत्मनिष्ठ है और वक्रोक्ति में वस्तुनिष्ठ। रस के साथ इन दोनो के सम्बन्ध में भी बस इतना ही अन्तर पड़ जाता है। रस और ध्वनि दोनों आत्मनिष्ठ हैं अतएव उनका सम्वन्ध श्रधिक अतरंग है. वक्रोक्ति मूलतः वस्तुनिष्ठ है अत रस के साथ उसका सम्बन्ध आधार- आ्राधेय का ही है।

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वक्रोवित और शचित्य

जोवन के समान काव्य में भी श्चित्य की महिमा अक्षुण्ण है। वास्तव में जीवन के और तदनुसार काव्य के मूल्यो का आ्धार ही शचित्य है औरचित्य ही जोवन औ्रौर काव्य दोनो के सत्य, शिव और सुन्दर का प्रमाण है। इसी दृष्टि से कुन्तक के परवर्तो आचार्य क्षेमेन्द्र ने लगभग ग्यारहवी शताब्दी के मध्य में काव्य में श्र्चित्य- सम्प्रदाय को स्थापना की "काव्य में अलकारो का स्थान अलंकार का है, गुण केवल गुण हैं। रससिद्ध काव्य का स्थिर जीवन तो औचित्य ही है।" श्र्रौचित्य- विचार-चर्चा १५। औचित्य की परिभाषा करते हुए क्षेमेन्द्र लिखते हैं. "जो जिसके अनुरुप है उसे प्राचीन आचार्यो ने उचित कहा है-उचित का भाव ही औचित्य है।" १।७।-वास्तव में इस अनिवार्य तत्व की उपेक्षा जीवन अ्रयवा काव्य में फीन विवेकशील पुरुष कर सकता था, मेघावी आचार्यो की तो वात ही क्या ? अतएव भरत से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तक ने प्रकारान्तर से श्र्रौचित्य के महत्व को स्वीकृत किया है। कुन्तक भी इसका अपवाद नहीं है। उनके मत से काव्य का प्राण तो निश्चय ही वक्रता है, किन्तु वक्रता का मूल आधार शचित्य ही है. उचिता- भिधानजीवितत्वाद् अर्थात् उचित (यथानरूप) कथन ही (वक्रता का) जीवन है।

तत्र पदस्य तावदौचित्य X X X वक्रताया पर रहस्यम्। उचिताभि- वानजीवितत्वाद्। वाच्यस्याप्येकदेशेप्योचित्यविरहात् तद्विदाह्लादकारित्वहानि । १५७ वों कारिका की वृत्ति। इस प्रकार कुन्तक के अनुसार भचित्य वक्ता का प्रास है।

काव्य-लक्षण में शरचित्य की स्वीकृति :

कुन्तक ने अपने काव्य-लक्षण, काव्य-गुणो तथा वक्रता-भेदो में भी औचित्य को आधार तत्व माना है। उनका काव्य-लक्षणा है.

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२१० ] भूमिका [ वक्राक्ति और औौचित्य

शब्दारथौं सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि। वन्धे व्यवरथिती काव्य तद्विदाह्हादकारिखि ॥।१।७

यहा शब्वार्थ का 'साहित्य' काव्य के आधार रूप में स्वीकृत किया गया है। और 'साहित्य' से कुन्तक का अभिप्राय निश्चित रूप से शब्द और श्रर्थ का पूर्ण सामजस्य ही है -"समर्थ शब्द के अभाव में अर्थ स्वरूपत स्फरित होने पर भी निर्जीव-सा ही रहता है। (इसी प्रकार) शब्द भी वाक्योपयोगी अर्थ के अभाव में अन्य अर्थ का वाचक होकर वाक्य का भार-सा प्रतीत होता है।" १७ वीं कारिका की वृत्ति। इस विवेचन से स्पष्ट है कि 'साहित्य' का अर्थ है शब्द और अर्थ का उचित सहभाव अथवा सम्बन्ध, और कुन्तक ने प्रथम उन्मेष की सप्तमी फारिका की वृत्ति में अनेक प्रकार से शब्द-अर्थ-सम्बन्ध के इसी श्चित्य का अत्यन्त मार्मिक आख्यान किया है।

औचित्य गुए

कुन्तक के अनुसार प्रत्येक मार्ग में दो सामान्य गुए और चार विशेष गृण होते हैं। सामान्य गुए हैं श्चित्य और सौभाग्य जो तीनों मार्गो में अनिवार्य रूप से वर्तमान रहते हैं.

"एतत् त्रिष्वपि मागेष गुणद्वितयमुज्ज्वलम्, पदवाक्यप्रवन्धाना व्यापकत्वेन वर्तते॥ १५७॥

पर्थात्-इन तीनो मार्गो में (शचित्य तथा सौभाग्य) ये दोनों गुण पद, वाक्य तथा प्रबन्ध में व्यापक और उज्ज्वल रूप से वर्तमान रहते है।" इस प्रकार औचित्य गुण सम्पूर्ण काव्य की उज्जवल सम्पदा है। औचित्य की परिभाषा कुन्तक ने भी प्राय वही की है जो उनके लगभग अर्-शताब्दी बाद क्षेमेन्द्र ने की थी.

आजसेन स्वभावस्य महत्व येन पोष्यते। प्रकारेण तदौचित्यमुचिताख्यानजीवितम् ॥ व० जी० १५३।

अर्यात्-जिस स्पष्ट वर्णन-प्रकार के द्वारा स्वभाव के महत्व का पोषण होता है वही औचित्य नामक गुण है इसका मूल आधार है उचित अर्थात् यथानुरूप-कथन। अतएव कुन्तक औ्रौर क्षेमेन्द्र दोनो की श्रचित्य-कल्पना सर्वथा समान ही है जिसका आधार है यथानुरूप-कथन।

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वक्रोक्ति औ्ौर श्रौचित्य J भूमिका [ २११

वक्रता-भेदों में शचित्य का आधार

वक्रोत्तिकार ने अपने प्राय सभी वक्रना-भेदो में किसी न किसी रूप में औचित्य का आ्रधार स्वीकार किया है। उदाहरण के लिए, व्णंविन्यास-वफ्रना के विवेचन में कुन्तक ने स्पष्ट लिखा है कि वक्रनापूर्ण वर्ण-योजना अनिवार्य रप से प्रस्तुतौचित्य- शोभिनी होती है अर्थात् काव्य के अ्रन्तर्गत वर्णों का विन्यास प्रस्तुत प्रसंग के अ्नुर्प हो होना चाहिए, उससे स्वतन्त्र नहीं।9 इसी प्रकार पदपूर्वार्घ-वक्रना तथा प्रत्यय-वक्रता के अनेक प्रमुस भेद भी श्रचित्यमूलक ही है .- (१) पर्याय-चक्रता का आधार है उचित पर्याय का चयन अथवा पर्यायौचित्य, (२) विशेषण-वक्रना का आधार है उचित विशेषण का निर्वाचन, (३) वृत्ति-वक्रता में समास-रचना का श्चित्य अपेक्षित होता है, और (४) लिंग-वकता का आधारभूत सौन्दर्य लिंग-प्रयोग के श्रचित्य के ही भ्राश्रित है। इसी प्रकार प्रत्यय-वक्रता के भी प्रमुख भेदो में कारक, पुरुष, संस्या, फाल, उपग्रह आदि के औचित्य का ही चमत्कार व्तमान रहता है। चक्रा का चतुर्य भेद है वाक्य- वक्रा जिसके दो रूप हैं (१) वस्तु-वक्रना, (२) अर्यालकार। इन दोनो में भी कुन्तफ ने शचित्य को ही प्रमाण माना है। वस्तु-वक्रता के प्रसंग में कुन्तक ने एक स्यान पर औचित्य को वस्तु-वर्णन का आ्घारभृत अपनिवाय सिद्धान्त घोषित किया है। स्वभावोक्ति का निराकरण करते हुए उन्होने लिखा है :- "स्वभाव के (स्वरूप के) कयन के विना वस्तु का वर्णन ही सम्भव नहीं हो मकता क्योकि स्वभाव से रहित वस्तु निरुपारय पर्यात् अ्रसत्कल्प हो जाती है।" १।१२ की वृत्ति। फहने की श्राव- शयकता नही कि यह स्वभाव-वर्णन अयवा स्वरप-वर्णन 'उचित अभिधान' अ्रयवा क्षेमेद्र के 'सद्शम् किल यस्य यत्' अर्ात् यथानुरूपवर्णन से मूलत अभिन्न है। ऐसे ही अर्या- लकार के प्रयोग में भी श्चित्य ही प्रमाण है। कुन्तक के मत, से अलंकारो का वर्ण्य विषय के अनुरूप उचित प्रयोग ही वाछनीय है. "वाच्य अलकार उपमा आदि का अ्र्रधिक उपयोग उचित नहीं हो सकता क्योंकि उससे स्वाभाविक सौन्दर्य के अरपतिशय में मलिनता आने का भय रहता है।" ३।१ कारिका की वृति।-यह अनधिक प्रयोग वास्तव में अलकारोचित्य का ही दूसरा नाम है। इसके अतिरिक्त दीपक आदि कतिपय विशेष अलंकारो के प्रसग में कुन्तक ने शचित्य का स्पप्ट उल्लेख भी किया है : "श्रोचित्य के अनुरूप सुन्दर और सहृदयों के श्रह्लावकारक (प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत ) पदार्थो के अप्रकट अर्थात् प्रतोममान धर्म को प्रकाशित करने वाला अलंकार दीपक अलंकार है।" ३।१५।

१ वर्गान्तयोगिन स्पर्शा द्विरुक्तास्तलनादय । शिष्टाइच रादिसयुक्ता प्रस्तुतौचित्यशोभिन ॥२।२॥

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२१२ | भूमिका [ वकोक्ति औप्रौर औ्रौचित्य

अपन्त में प्रकरण तथा प्रबन्ध-वक्रता के प्रसग में भी कुन्तक ने अ्नेक प्रकार से औचित्य का स्तवन किया है। उदाहरण के लिए प्रबन्ध-वक्रता का एक प्रमुख भेद है उत्पाद्य-लावण्य जिसके दो रूप हैं (१) अविद्यमान की कल्पना (२) विद्यमान का सशोधन। इन दोनो वक्रता-भेदो का आधार स्पष्ट रूप से शचित्य-कल्पना ही है- कवि अपनी प्रसिद्ध कथा के अनौचित्य के परिहार और औचित्य के सरक्षण के निमित्त ही उपर्युक्त चमत्कारपूर्ण पद्धतियो का प्रयोग करता है। कुन्तक ने इस तथ्य को स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है "उत्पाद्यलवलावण्यादिति द्विघा व्याख्येयम्। क्वचिदसदे- वोत्पाद्यम अथवा आहृतम्। वर्वाचदोचित्यत्यक्त सदप्यन्यथासम्पाद्यम् सहृदयाह्ाद- नाय।"४।४ कारिका की वृत्ति। अर्थात् उत्पाद्य-लावण्य के दो रूप हैं (१) अविद्यमान को कल्पना, औौर (२) सहृदय के आ्ह्लाद के निमित्त औचित्यरहित विद्यमान का अन्यथा प्रतिपादन। इसके पतिरिक्त प्रकरण-वक्रता के दो अन्य भेद है (क) प्रधान कार्य से सम्बद्ध प्रकरणों का उपकार्य-उपकारक रूप में नियोजन। और (ख) प्रकरणों का पूर्वापर-अन्विति-क्रम। ये दोनों भेद भी औचित्य की ही आधारशिला पर अवस्थित है।

प्रबन्ध-वक्र्ता के कुन्तक ने सब मिला कर छह भेवो का निरूपण किया है, इनमें से दो-तीन भेदों में शचित्य की अवस्थिति स्पष्ट है। उदाहरण के लिए, द्वितीय भेद में नायक के चरित्र का उत्कर्ष करने वाली चरम-घटना पर ही कथा का उपसहार करने का विधान है क्योकि शेष कथा-भाग नीरस इतिवृत्त मात्र रह जाता है, और पचम भेद में प्रबन्ध काव्य का नामकरण ऐसा किया जाता है कि नाम से ही प्रधान कथा का द्योतन हो जाय। यहा द्वितीय भेद में अवाछित का त्याग औचित्य का ही परिणाम है, और पचम भेद में क्षेमेन्द्र के नामौचित्य का सकेत है।

प्रतिपादन-योजना में साम्य वास्तव में वक्रोक्ति तथा औचित्य दोनों सिद्धान्तों की प्रतिपादन-योजना में ही मूलगत साम्य है। कुन्तक और क्षेमेन्द्र दोनों ने काव्य के रूक्ष्मतम तत्व से लेकर महत्तम रूप तक प्राय एक ही क्रम से अपने सिद्धान्त का विस्तार फर उसे सर्वव्यापक बनाने का प्रयत्न किया है। जिस प्रकार वर्ण तथा लिंग, कारक आवि से लेकर वाक्य, प्रकरण तथा प्रवन्ध तक वक्रता का साम्राज्य है, इसी प्रकार औचित्य का भी - पदे, वाक्ये प्रबन्धार्थे, गुणेऽलकरणे रसे। क्रियाया, कारके, लिंगे, वचने च विशेषणे॥ + + +

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वक्रोक्ति शर श्रौचित्य । भूमिका [२१३

काव्यस्यागेपु न प्राहुरीचित्य व्यापि जीवितम् ।। औचित्य-वि० च० ७-१०।

परन्तु इस योजना-साम्य का कारण कदाचित यह नहीं है कि क्षेमेन्द्र ने कुन्तक का अनुकरण किया है .हम समभते हें कि इस साम्य का कारण यह है कि दोनो ही ध्वनिकार को योजना को आदर्श मान कर चले हैं।

निष्कर्प

उपर्युक्त विवेचन से स्पप्ट है कि वक्रोक्ति और औचित्य में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। किन्तु फिर भी उन दोनो को पर्याय अथवा एक रूप मान लेता संगत नहीं होगा। कुन्तक ने शचित्य को वक्रोक्िति का जीवन मानते हुए भी दोनो को एक- रूप नहीं माना। उनकी मान्यता तो फेवल यह है कि वकता अथवा काव्य-सौन्दर्य का मूल आधार शचित्व है कनोकि, (उन्हीं के स्पष्ट शब्दों में) औचित्य की यत्किचित् हानि से भी सहृदय के आह्वाद में व्याघात त्पन्न हो जाता है ...... वाक्यस्याप्येकदेशं- प्यीचित्यविरहात् सहृदयाह्वादकारित्वहानि। अतएव कुन्तक के मत से श्र्रचित्य काव्य- सौन्दर्य अयवा वकता का अनिवार्य किन्तु सामान्य गण मात्र है, न व्यावतंक धर्म है और न पर्याय ही। अर्यात् सौन्दर्य के सभी रनो में शचित्य की श्रवस्यिति अनिवार्य है, परन्तु श्रचित्म के सभी रूपों में कदाचित् वक्रता की अनिवार्य स्यिति फुन्तक को मान्य नहीं है।

इसके अतिरिक्त दोनों सम्प्रदायों के मूल वृष्टिकोण में स्पष्ट भ्न्तर है। वक्रोक्ति का आधार है वस्तुनिष्ठ फल्पना और औचित्य का आवार है व्यक्तिनिष्ठ विवेक-आाधुनिक शब्दावली में वक्रोक्तिवाद जहाँ रोमानी काव्यरूप की प्रतिष्ठा करता है, वहाँ औचित्य-सिद्धान्त विचारगत सौष्ठव की, और इन दोनों का मिलनतीर्य है रस जहाँ दो भिन्न दिशाओं से आकर ये लीन हो जाते हैं।

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में वक्रोक्ति का, काव्य-सम्प्रदाय अथवा आत्मभूत काव्य- सिद्धान्त के रूप में, विवेचन तो नहीं हुआ, परन्तु वक्रता के मौलिक तत्व की मान्यता वहाँ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सदा रही है। वास्तव में तथ्य और कल्पना का प्रतिद्वन्द्व किसी न किसी रूप में प्रत्येक युग और प्रत्येक वेश की चिन्ताधारा में उपस्थित होता आया है। इसका जन्म एक प्रकार से काव्य की सृष्टि के साथ हो हो जाता है-काव्य के सम्बन्ध में यही पहला विचार है और यही कारण है कि पाश्चात्य सभ्यता के आदिम युग में ही उसकी प्रतिध्वनि सुनाई पढने लगी थी। प्लेटो-पूर्व युग में काव्यशास्त्र का कोई स्वतत्र ग्रन्थ तो उपलब्ध नहीं होता, परन्तु काव्य तथा दर्शन ग्रन्थो में इस बात के सकेत निश्चय ही मिल जाते हैं कि उस युग में काव्यशास्त्र का अरस्तित्व अवश्य था, चाहे उसका स्वतत्र नाम रहा हो या न रहा हो। प्लेटो के पूर्ववर्ती विचारक औ्र्प्रौर प्लेटो पश्चिम का आदि कवि है होमर। यों तो होमर के काव्य में भी एक ऐसा उद्धरस है (जिसे बोसाके ने पाश्चात्य कला-चेतना का प्रथम सूत्र माना है और जिसे एटफिन्स ने 'कला की माया' का प्राथमिक अभिज्ञान कहा है) जिसमें फाव्यगत चक्रता को प्रचछन्न स्वीकृति मिलती है,१ परन्तु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण वह विवाद है जो होमर के काव्य को लेकर प्लेटो से पहले दो-तीन शताब्दियों तक चलता रहा। इस विवाद में निश्चय रूप से तथ्य और कल्पना अथवा भारतीय काव्यशास्त्र की शन्वा- वली में वार्ता और वक्रता का प्रश्न ही प्रकारान्तर से उठाया गया है। दाशनिको ने १. होमर की पक्तियों इस प्रकार हैं ढाल सोने की वनी हुई थी, परन्तु (उस पर भकित) जुती हुई भूमि श्यामल प्रनीत होती थी। यह उसकी कला का चमन्कार या।

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वकोक्ति ] भूमिका [ २१५

होमर को इस आधार पर भत्संना की फि उसके वर्णन प्राकृति तथ्यों के विपरीत हैं अत. मिय्या हैं, और फाव्य-प्रेमियो ने तथ्य और फल्पना के भेद को पहचानते हुए उनकी काव्यगत वकता का अनुमोदन किया। इस युग में एक प्रसिद्ध आचार्य हुए जाजिजास (पाँचवीं शताब्दी ई० पू०)। उनका ग्रन्य तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु दो अभिभाषण अवश्य प्राप्त है जिनसे उनके फाव्य-सम्वन्धी विचारों का परिचय मिल जाता है। अन्य काव्यतत्वो के साथ साथ जाजिग्रास ने भाषा के तौन्दर्य पर भी विशेष यल दिया है'उन्होने ही सबसे पहले यह निर्देश किया कि (गद्य में) अलकारों का प्रयोग करना चाहिए, इतिवृत्त-वर्णन के स्थान पर रूपकादि का उपयोग करना चाहिए-अर्यात सामान्य रप से गद्य में भी कविता के रग और वचित्र्य का समावेश करना चाहिए।२ इन शब्दों में वक्रता की स्पष्ट स्वीकृति है क्योकि रग और वैचित्र्य वक्रता के ही पर्याय हैं।

प्लटो-पूर्व युग का, फाव्यशास्त्र की दृष्टि से, सवप्रमुख ग्रन्थ है, एरिस्टोफेनीज (रचना फाल ४२५-३८८ ई० पू०) का हास्य-नाटक फ्रॉग्स (मेंढक)। इसमें यूनानी भाषा के दो वरिष्ठ नाटककारो-ऐस्काइलस तया यूरिपाइडीज़ के आलोचनात्मक विवाद का अत्यन्त सजीव हास्यमय वर्णन है। इस विवाद के अन्तगत दोनों कलाकारों की वैयत्तिक आलोचना के अ्तिरित्त, फाव्य के अनेक सामान्य सिद्धान्तों का भी प्रति- पादन किया गया है। अतएव इसमें ऋज़ और वक्र अभिव्यजनाओ अयवा काव्य-मार्गो की भी थोड़ी-सो समीक्षा स्वभावत. मिल जाती है। एस्काइलस (मानो कुन्तक के विचित्र मार्ग का अनुयायी होने के कारण) काव्य में वक्रता-वंचित्र्य का पक्षपाती है :

"नहीं, उनकी बाह्य वसन-सज्जा भी देखने में रगोज्ज्वल तथा वैभवपूर्ण होनी चाहिए-हमारे जंसी नहीं।" यूरिपाइडीज की निन्दा करते हुए वह फहता है :- 'तुमने उन उदग्त्त चरित्रो को (उनफे भावो को) गुदडी से परिवृत्त कर दिया।' आप देसें कि उपर्युक्त उत्वरणो में से पहले में वकता का स्तवन और दूसरे में वार्ता (ग्राम्य उक्ति) का ही प्रकारान्तर से तिरस्कार किया गया है।

इसके उपरान्त प्लेटो (४२७-३४७ ई० पू०) का समय आ जाता है-प्लेटो ने भी अपने पूर्ववर्तो यवन दाशनिको का ही साथ दिया और की वक्रता को स्वीकार नहीं किया। उन्होने प्राकृत तथ्य की अपूर्ण अथवा मि्या-प्रनुकृति मान कर काव्य को

एटकिन्स

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२१६ ] भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

निन्दा की। उनके मतानुसार एक तो स्वय प्राफृत तथ्य ही विचार के तथ्य (सत्य) की अ्रनुकृति है, और फिर काव्य तो उसकी भी अपूर्ण या मिथ्या अनुकृति है, अतएव वह सत्य से और भी दूर है। इसका अभिप्राय यही है कि प्लेटो भी विचार के सत्य और कल्पना के सत्य का भेद नहीं पहचान पाये।-कुन्तक ने वस्तु-वक्रता के प्रसग में इस रहस्य का उद्धाटन किया है उनका तर्क है कि किसी प्राकृत पदार्थ के सभी अरग-उपागों का इतिवृत्त वर्णन (प्लेटो के शब्दों में पूर्ण अनुफृति) प्रस्तुत कर देने में कोई चमत्कार नहीं है, कावि की वृष्टि तो उसके केवल उन्हीं अगो तथा रूपो को ग्रहण करती है जो आकर्षक हैं अर्थात् वह समग्र पदार्थ का स्थूल वर्णन न कर केवल उसके मर्म को ही ग्रहण करती है। यह मर्म-ग्रहण ही वस्तु-वक्रता है जो पूर्ण अनुफृति की अपेक्षा शरधिक पूर्ण तथा सत्य भी है। प्लेटो ने इसी वस्तु-वक्रता के रहस्य को- सामान्य रूप मे वार्ता तथा वक्रता के भेद को -- नहीं समझा है, इसीलिए उन्होने काव्य का तिरस्कार किया है।

होमर से प्लेटो के समय त्क पाश्चात्य काव्य-चिंता के अन्तर्गत वक्रता के विषय में इसी प्रकार के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सकेत प्राप्त होते हैं। उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि काव्य का यह मौलिक प्रश्न उस आदिम युग में भी उठ खड़ा हुआ था और मनीषी उसकी ओर आफृष्ट होने लगे थे।

श्ररस्तू (ईसा-पूर्व ३८४-२२१)

अरस्तू ने तथ्य और कल्पना के भेद को स्पष्ट करते हुए काव्यगत वक्रता के रहस्य को पहचाना है। उन्होंने प्लेटो की भ्रान्ति का सशोधन करते हुए यह स्पष्ट किया हैं कि काव्यगत अनुकृति स्थूल अर्थ में पदार्थ का अनुकरण न होकर उसका कल्पनात्मक पुन सृजन ही है-अत.न वह अपूर्ण है और न मिथ्या, उसमें तथ्य की विकृति नहीं सस्कार मिलता है, क्योंकि वह तो तथ्य के मर्म को शब्दबद्ध करती है। इस दृष्टि से काव्य का सत्य भौतिक सत्य की अपेक्षा अधिक मार्मिक होता है। अर्थात् काव्य की जिस वक्रता को प्लेटो ने मिथ्या कल्पना मान कर तिरस्कृत किया है, अरस्तू ने उसे काव्य का प्रारभूत सौन्दर्य माना है। अरस्तू का वह प्रसिद्ध वाक्य इस प्रकार है. "उपर्युक्त विवेचन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कवि का कर्तव्य-कर्म जो हुआ है उसका वर्णन करना नहीं है वरन् जो हो सकता है उसका वर्णन करता है-अर्थात् जो सम्भावना अथवा आवश्यकता के अनुसार हो सकता है उसका वर्णन करना है।" (पोर्यटटिक्स . फॅम्ब्रिज यूनिवर्सटी प्रेस पृ० २६) 'जो हो सफता है'-अर्थात् 'जो सम्भावना अथवा आवश्यमकता के अनुरूप हैं', वास्तव में, यह भावना का वही सत्य

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति] भूमिका [२१७

है जो द्रप्डा, वत्ता अ्थवा श्रोता को प्राह्य है। कुन्तक ने इसी को वस्तु का 'सहृदया- ह्वादकारीस्वस्पन्द' अर्यात् सहृदयो को श्रह्लाद देने वाला धर्म कहा है। प्रथम उन्मेष में नवमी कारिका की वृत्ति के अन्तर्गत कुन्तक ने लिखा है "यद्यपि पदार्य नानाविघ धर्म से युक्त हो सफता है फिर भी (काव्य में) ऐसे धर्म से उसका सम्वन्ध वणन किया जाता है जो सहृदयो के हृदय में प्रानन्द की सृप्टि करने में समर्य हो सकता है। और उस (धर्म) में ऐसी मामर्थ्य सम्भव होती है जिससे कोई अपूर्व स्वभाव की महत्ता, अयवा रस को परिपुष्ट करने की अगता अभिव्यक्ति को प्राप्त होती है।" उपर्युक्त दोनों उद्धरणो का आ्रशय एक ही है . भेद शव्दावली का है, पहले उद्धरण में दारश- निक की साकेतिक शब्दावली है, और दूसरे में फाव्य-रसिक की वाक्छटा।

इस प्रकार अरस्तू ने अपने ढग से वस्तु-वक्रता का प्रतिपादन किया है।

शंली के प्रसग में तो श्ररस्तू ने अत्यन्त स्पष्ट शब्दो में वक्रता को महत्ता स्वाकार को है। उनके दोनो ग्रन्थो के-काव्यशास्त्र (पोयटिक्स) तथा रीतिशाम्त्र (रहै टरिक्स) के-अनेक उद्धरण वक्रना का पोषण करते हैं :-

१ "प्रचलित प्रयोग से वचित्र्य भाषा को एक प्रकार की गरिमा प्रदान करता है।+++ इसलिए भाषा में वैचित्र्य का रग देना चाहिए क्योकि मनुष्य अ्रसाघारण की प्रशसा करता है और जो प्रशसा का विषय है वह श्राह्हाद का भी विषय होता है।" (रहे टरिक्स पृ० १५०)*

२ "भाषा का गुण यह है कि वह स्पष्ट तो हो किन्तु उसका स्तर नीचा न हो। प्रचलित (रढ) शब्दो पर आश्रित पदावली सबसे स्पप्ट होती है, परन्तु उसका स्तर नीचा होता है। ++ + अ्साधारण शब्दावली से सामान्य भाषा में गरिमा आती है और उसका रूप सुन्दर हो जाता है, असाधारण शब्दावली से मेरा अभिप्राय है : दूसरी भाषाओ से गृहीत शब्द, लाक्षणिक प्रयोग, विस्तारित पद तथा प्रचलित शव्दावली से भिन्न अन्य सभी प्रकार का वैचित्र्य।" (पोयटिक्स-पृ०४८) (३) "इन साधनों का प्रयोग केवल भाषा में लावण्य का समावेश करने के लिए ही करना चाहिए। ऐसा करने से अन्य भाषाओ के शब्द, लाक्षणिक प्रयोग, और कल्पित तथा अन्य सभी प्रकार के शब्द जिनका मैंने उल्लेख किया है भाषा शैली को साधारण तथा निम्न स्तर पर नहीं आने देंगे, और प्रचलित शब्द अर्य को स्पष्ट करने में सहायक होंगे।" (पृ० ४६) * हॉव्स टाइजैस्ट।

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२१८ ] भू मिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्र्कोक्ति

४. "यद्यपि वे सारे साधन जिनका मैंने उल्लेख किया है, उचित रीति से प्रयुक्त होने पर भाषा-शैली को विशिष्टता प्रदान करते हैं-यह बात समस्त शन्दों तथा अन्य भाषा के शब्दो के लिए भी उतनी ही सत्य है, तथापि सबसे अधिक वैचित्र्य का समावेश लाक्षणिक प्रयोगो से होता है क्योंकि मौलिकता की आवश्यकता इन्हीं में होती है और यह प्रतिभा के द्योतक भी हैं।" (पृ० ५०)

लाक्षणिक प्रयोगों का विस्तार से विवेचन करते हुए अरस्तू ने अन्यत्र लिखा है-

५ "उपचार का अर्थ है किसी वूसरी सज्ञा का आरोप, यह आरोप जाति का व्यक्ति पर हो सकता है, या व्यक्ति का जाति पर या व्यक्ति का व्यक्ति पर, या साम्य की परिकल्पना द्वारा। उदाहरण के लिए 'यहा मेरा जहाज़ खडा है।' इस पक्ति में जाति का व्यक्ति पर आरोप है क्योंकि 'लगर डालना' भी खडे होने का ही एक विशेष रूप है।' 'ओर्रोडीसियस हजारों वीर कृत्य कर चुका है-' यहा व्यक्ति का आरोप जाति पर है क्योंकि 'हज्ारों' 'अनेक' का ही एक रूप-भेद है, और इसलिए 'अनेक' के स्थान पर इसका प्रयोग होने लगा है। व्यक्ति के व्यक्ति पर आरोप का उदाहरण इस वाक्य-युग्म में मिलेगा-'लोहे के द्वारा जीवन-रक्त का शोषण करता हुआ' और 'कठोर लोहे से काटता हुआ'-यहा 'शोषण करता हुआ' और 'काटता हुआ' इन दो शब्दों का प्रयोग पर्याय रूप में हुआ है क्योंकि दोनो हं 'छेदन' या 'अपहरण' क्रिया के रूप विशेष हैं। साम्य-स्थापन उस स्थिति में होता है जब एक वस्तु का दूसरी वस्तु से वही सम्बन्ध होता है जो तीसरी का चौयी से, और वक्ता चौथी का दूसरी के लिए और दूसरी का चौथी के लिए प्रयोग कर देता है। + +

दूसरा उदाहरण लीजिये -

वृद्धावस्था का जीवन से वही सम्बन्ध है जो सन्ध्या का दिवस से, अतएव सन्ध्या को 'मरणासन्न दिवस' या वृद्धावस्था को 'जीवन-सन्ध्या' कहा जाता है।" (पृ० ४६-४७) *

कहने की आवश्यकता नहीं कि यही कुन्तक की उपचार-वक्रता है

  • यत्र दूरान्तरेऽन्यस्मात् सामान्यमुपचर्यते। लेशेनापि भवत्काचिद् वक्तुमुद्रिक्तवृत्तिताम् ॥

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में पक्रोक्ति ] भूमिका [ २१६

इसका भावार्य यह है :-

जहा अन्य (अर्थात् प्रस्तुत व्ण्यमान पदार्य) का सामान्य धर्म अत्यन्त य्यवहित (दूरवाले) पदार्य पर लेशमात्र सम्वन्ध से आरोपित किया जाता है, वहा उपचार-वक्रता होती है।

दोनों के उदाहरणों में भी इतना ही अ्धिक साम्य है। कुन्तक के अनुसार (१) स्निग्घश्यामलकान्तिलिप्तवियत अर्यात् 'आकाश मेघों की स्निग्ध श्यामलता से लिपा हुमा था' और (२) सूचिभद्यस्तमोभि-'सूचीभेद अधकार से' में उपचार- वक्रता है। अरस्तू के अनुसार इन दोनों में व्यक्ति का जाति पर आरोप है क्योंकि 'लोपना' 'ढेफना' या 'फैलाना' क्रिया का हो एक रूप-भेद है और 'सूचीभेद्यता' 'घनत्व' का। इन सकेतों के पतिरिक्त भरस्तू के कयावस्तु-विवेचन में प्रबन्ध-वक्रता तथा प्रकरण-वक्रा के कई एपों के पूर्व-सकेत मिल सकते हैं। प्रबन्ध-काव्य और इतिवृत्त के विभेद को तीव्र शब्दो में व्यक्त करने वाला निम्नलिखित वाकम प्रवन्ध-वक्रता की मस दिग्ध स्वीकृति का द्योतक है:

"प्रवन्ध काव्यो की रचना इतिहास की भाँति नहीं होनी चाहिए।" (पृ० ५१)

कुन्तक ने भी ठीक इन्हों शब्दो में प्रबन्ध-वकता के रहस्य को पभिव्यक्त किया डै. गिर कवोनां जीवन्ति न कयामात्रमाप्रिता। ४।११। अर्था्त् प्रबन्ध काव्यों में कवियो की वाणी केवल इतिवृत पर आग्रित होकर जीवित नहीं रहती। इसी प्रकार अरस्तू के विपर्यास तथा विवृति नामक दोनों प्रवन्ध-चमत्कारों का, जिन्हें उन्होंने प्रबन्ध-कल्पना का उत्कृष्टतम रूप माना है, कुन्तक को प्रकरण-वक्रता के उत्पाद्यन्लावण्य आादि भेदो में सहज ही अंतर्भाव हो जाता है। इस प्रसग का विस्तृत विवेचन 'कुन्तक और प्रबन्ध-कल्पना' के अतर्गत हो चुका है यहा उसकी पुनरावृति अनावश्यक होगी।

रोमी आचार्य : सिसरो और होरेस (ईसा-पूर्व प्रथम शती) यूनान के पशचात् रोम सस्कृति और साहित्य का केन्द्र बना। काव्यशास्त्र के क्षेत्र में अरस्तु की परम्परा सिसरो, होरेस आदि रोमी तथा डयोनीसियस और ढेमें- -

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२२० ] भूमिका [पाइचात्य काव्पशास्त्र में वक्रोक्ति

टियस प्रभूति यूनानी आचा्यों के ग्रन्थों में आगे बढी। रोमी सस्कृति और साहित्य के मूल आाधार थे गरिमा और औचित्य-अथवा श्रचित्यमूलक गरिमा। सिसरो तथा होरेस ने स्वभावत अपने विवेचन में इन्हीं दो तत्वो को महत्व दिया है और इनके आधार पर अभिव्यजना में भी सयम, स्पष्टता, अग्राम्यता, गंभीर पद-रचना आदि गुणो पर ही अधिक बल दिया है। यो तो कुन्तक ने भी श्रचित्य को ही वक्रता का आ्राधार माना है, परन्तु जैसा कि हमने अन्यत्र स्पष्ट किया है वक्रता और औचित्य का व्यावर्तक धर्म भिन्न है ·वक्रोक्तिवाद जहा रोमानी काव्य-रप की प्रतिष्ठा करता है वहा औचित्य विचारगत सौष्ठव की। अतएय इन दोनो में प्रकृति का भेद है और निसर्गत रोमी प्रकृति के साथ कुन्तक की वक्ता की विशेष सगति नहीं बैठती, यद्यपि न रोमी काव्यशास्त्र वक्रता का पूर्ण बहिष्कार कर सकता है और न कुन्तक औचित्य का, कुन्तक ने तो उसे अनिवार्य तत्व ही माना है।

सिसरो स्वतत्रचेता तथा तेजस्वी पुरुष थे। उन्होंने भव्य औ्र्चित्य (डेकोरम) को जीवन और साहित्य का प्राणतत्व माना माना है। भव्यता में असामान्यता, का भी भन्तर्भाव है, अतएव उसके साथ वक्रता फी स्वीकृति भी उसी मात्रा में स्वत हो जाती है। सिसरो उद्दश्य के अनुरूप तीन प्रकार की शैलियों की स्यिति मानते हैं. ऋजु-सरल अनलकृत शैली उपदेश के लिए, मध्यम शैली-जिसमें रग की छटा हो किन्तु साथ ही सयम भी हो-प्रसावन के लिए, और उदात्त शेली-जो भव्य तथा सप्राए हो-सप्रेरित करने के लिए। इन में से रग की छटा वक्रता की द्योतक है प्रसावन के लिए सिसरो सयत वक्ता के पक्षपाती हैं। एक स्थान पर वे कहते हैं कि सामान्य व्यवहार की भाषा से भिन्न भाषा का प्रयोग गुरुतम अपराध है।1 परन्तु अन्यत्र अपने मन्तव्य को स्पष्ट करते हुए उन्होने लिखा है २ सुष्ठ शैली उपयुक्त शब्द- चयन पर आधित है। उपयुक्त का अर्थ है जनता के वास्तविक व्यवहार की शब्दावली जो स्वतन्त्र शब्द-जाल मात्र न हो-ऐसी शब्जावली जो जनपदीय घिसे-पिटे तथा प्राम्य तत्वों से मुक्त हो और गरिमा एव छटा प्रवान करने वाले अ्साधारण रूपों तथा लाक्षशिक प्रयोगों से सम्पन्न हो। इस प्रकार सिसरो शचित्य के साथ अलंकार रूप में वक्रता को भी प्रश्य दे देते हैं। वास्तव में कुन्तक और सिसरो की दृष्टि में भेद है, कुन्तक के लिए साहित्य का प्रास है वक्रता-औचित्य उसका सामान्य उपबन्ध है, किन्तु सिसरो के अनुसार प्राणतत्व है शचित्य पर वक्रता को छटा भी विद्यमान होने से उसका आकर्षण और बढ़ जाता है। होरेस ने वक्रता को इतनी भी मान्यता नहीं दी

१ ओोरेटॅरे १।१२। २ वही ३१७१।

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति । भूमिका [ २२१

है : उनकी शास्त्रवादी दृप्टि संगति, अनुपात तथा अनुक्रम आदि पर ही केन्द्रित रही है। ये तत्व यद्यपि वक्रता के विरोधी नहीं हैं फिर भी मूलत कदाचित् ऋजुता के साथ ही इनका घनिष्ठतर सम्बन्ध है।

लाजाइनस (ईसा की तीमरी शर्ती)

यूनानी रोमी आचार्यों में वक्रता का सबसे प्रवल समर्थन लाजाइनस ने किया है, परन्तु यह समर्थन अ्रप्रत्यक्ष रूप में ही किया गया है। लांजाइनस के प्रसिद्ध निबन्व का प्रतिपाद्य है 'उदात्त भावना' यह 'उदात भावना' निश्चय ही जीवन और काव्य के अ्रमाघारण तत्वों पर श्रघृत रहती है। इस प्रकार उदात्त की परिकल्पना में वक्रता का प्रवेश अनिवार्य रूप से हो जाता है। लांजाइनस ने श्रनेक स्थलो पर वक्ता के महत्व पर प्रकाश डाला है.

(8) " + + + उदात्त भावना एक प्रकार का अरमिव्यजनागत चमत्कार अथवा विशिष्ट गुण है औरौर महान कवियों तथा लेखकों ने इसी के द्वारा अमर स्याति का अ्जन किया है। क्योकि जो असाघारण है अथवा सामान्य से विलक्षण है, वह श्रोता के मन में प्रवृत्ति मात्र जगा कर नहीं रह जाता है, वह तो शह्लाद का उद्रेक करता है।"

(२) "उदात्त शैली के पाँच मुख्य आराघार है। प्रयम औरौर सबसे प्रमुख हैं महान परिकल्पना-शक्ति+ ++ दूसरा है प्रवल और अन्त प्रेरित आवेग। अलंकार-विधान के अन्तर्गत दो प्रकार के अलकार आते हैं-विचार से सम्बद्ध और अ्रभिव्यजना से सम्बद्ध। इसके उपरान्त है भाषागत आभिजात्य जिसके अ्र्पन्तर्गत शब्द- चयन, लाक्षणिक प्रयोग और भाषा का अलकरण आदि प्रसाधन आते हैं। पाँचवां आधार है-++ रचना की गरिमा और शदार्य।"

इन आघार तत्वो में से प्राय सभी वक्रतामूलक हैं। पहला वस्तु-वक्रता तथा प्रकरण-वक्रता के अन्तर्गत आता है। दूसरा भी रस के आश्रय से उसी के अन्तर्गत माना जा सकता है। शेप का सम्बन्ध वाक्य-वक्रता से है।

(३ ) "इस प्रकार हम सभी प्रमंगो में कह सकते हैं कि जो उपयोगी अथवा आवश्यक है उसे तो मनुष्य साधारण समझता है, किन्तु जो चमत्कारपूर्ण और विस्म- यकारी है वह उसकी प्रशसा तथा आवर का पात्र है।"

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२२२ । भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

"मैं तो यह अच्छी तरह समझना हूं कि उदात्त प्रतिभा निर्वोषता से दूर ही होती है। क्योंकि अनिवार्य शुद्धना में क्षुत्रता की आशका रहती है और उदात्त में कुछ न कुछ त्रुटि रह जाती है।"

इस प्रकार वक्ता लांजाइनस की उदात्त-विषयक परिकल्पना का एक मूल तत्व है, जो उदात्त है वह अरनिवार्यत सामान्य से विलक्षण अ्रथवा वक्र होगा। यहों कुन्तक और उनके दृष्टिकोण का भेद भी स्पष्ट हो जाता है। कुन्तक के अनुसार काव्य का प्राणतत्व है वक्रता, उदात्त या भव्य उसका एक प्रकार है जो वीर रस तथा ऊर्जस्वी भावना से पुष्ट होता है इसके अतिरित्त कोमल, मधुर, विचित्र आदि उसके अन्य रूप भी होते है। उघर लाजाइनस के मत से काव्य की आत्मा है भव्यता। यह भव्यता अनिवार्य रूप से वक्रता-विशिष्ट होगी, परन्तु सभी प्रकार की वक्रता भव्य नहीं हो सकती-अर्थात् वक्रता भव्यता की अभिव्यजना का प्रकार मात्र है, पर्याय नहीं है।

लाजाइनस के शतिरिक्त अन्य यूनानी रोमी आचार्यो ने वकता पर कोई विशेष। बल नहीं दिया। लांजाइनस के पूर्ववर्ती डायोनीसियस और परवर्ती डिमेट्रियस आवि यूनानी आचार्य तथा क्विन्टीलियन आदि रोमी विद्वान वास्तव में रीतिकार ही थे जिनका ध्यान अनुकम, अनुपात सगति आदि रचना-तत्वों पर ही प्राय केन्द्रित रहा, उनके रीतिनिष्ठ दृष्टिकोर में वक्रता जैसे रोमानी तत्व के लिए विशेष स्थान नहीं था।

रोम के पतन के साथ काव्यशास्त्र का यह यूनानी-रोमी युग समाप्त हो जाता है और यूरोप के इतिहास में मध्ययुग का आरम्भ होता है। यह समय यूरोप के काव्यशास्त्र के लिए एक प्रकार से अधकार-युग है। इस युग में काव्य, नाटक, इति- हास, आदि सभी क्षेत्रों में सर्जना का इतना दुर्दाम वेग था कि काव्य-विवेचन के लिए कोई अवकाश न रहा। कुछ सामान्य प्रतिभा के लेखकों ने इस दिशा में प्रयत्न किया भी, परन्तु वे या तो यूनानी-रोमी रीति-लक्षणों की पुनरावृत्ति मात्र करते रहे, या रीतिशास्त्र के नाम पर व्याकरण, छन्वशास्त्र, अलकार, चित्रकाव्य आदि का रूठ़ि- बद्ध व्याख्यान-विवेचन करते रहे। काव्य का तात्विक विवेचन इस युग में नहीं हुआ। ग्रीक लिटरेरी क्रिटिसिज्म में उद्धृत लाजाइनस के ग्रन्थ 'उदात्त' का अनुवाद (डवल्यू० रॉबर्ट्र्स) (१) प् १६६ (२) पृ० १७० (३) पृ० १८८, १८५

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति ] भूमिका [ २२३

दान्ते (तरहवीं शती) यूरोप के अघकारमय मध्ययुग के सवसे उज्ज्वल नक्षत्र दान्ते हैं, उन्होंने केवल सजन के क्षेत्र में ही नहीं विवेचन के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। इस दिशा में उनको सबसे बडी सिद्धि थी युग की आवश्यकता के अनुसार रीतिवद्ध लॅटिन के विरुद्ध 'उज्ज्वल जनवाणी' इटालियन की गौरव-प्रतिष्ठा। उज्जवल जन- वाशगी से अभिप्राय उनका उस भाषा से था जो काव्यरढ़ एव रीतिवद् नहीं हो गई थी वरन् जीवन को विचित्रता और प्रफुल्लता से सम्पन्न थी। इस प्रकार दान्ते ने उज्जवल जनवाणी की प्रतिष्ठा द्वारा अभिव्यक्ति के क्षेत्र में रोमानी वक्रता की प्रतिष्ठा की है। इस स्यापना की पुष्टि में उनके शब्द-विवेचन तथा शैली-सम्बन्धी वत्तव्य भी उद्धृत किये जा सकते हैं। दान्ते के अनुतार शब्द मूलत तीन प्रकार के होते हैं : कुछ शब्द बच्चों को तरह तुतलाते हैं, कुछ में स्त्रियोचित पेलवता होती है औरर कुछ शब्दो में पौरुष होता है। अरन्तिम वर्ग के शब्दो में फुछ ग्राम्य होते हैं औ्र कुछ नागर; नागर शब्दों में कुछ मसण और चिक्कण होते हैं, कुछ प्रकृत तथा अ्नगढ।

"इन शब्दों में से मस्ए और प्रकृत को ही हम उदात्त शब्दावली कहते हैं, चिक्कण और अनगढ़ शब्दों में आडम्बर मात्र रहता है। + + उदात्त शैली में तुतले शब्दों के लिए फोई स्थान नहीं है क्योंकि वे अतिपरिचित शब्द होते हैं, स्त्रैण शब्द अपनी स्त्रगता के फारण और ग्राम्य शब्द अपनी परुपता के कारण त्याज्य हैं। नागर शब्दावली के चिक्कण और अनगढ शब्द भी ग्राह्य नहीं हैं। इस प्रकार केवल मसूल और प्रकृत शब्द रह जाते हैं, और ये ही शब्द भव्य हैं।"

उपर्युक्त शब्द-विवेचन में दान्ते ने अपने ढग से-अशास्त्रीय शैली में-मुख्य रूप से वर्णविन्यास-वक्रता और सामान्य रूप से पर्याय-वक्रता आदि वक्रोक्तिभेदो का विवेचन किया है। परिचित शब्दों का वहिरकार, ग्राम्य तथा अनगढ का त्याग वर्ण- विन्यास के आघार पर शब्द की वक्रता का ही प्रतिपादन है। इसी प्रकार शैली के चार भेदों में से निर्जोव एव रुचिविहीन तथा केवल सुरुचिपूर्ण, आदि का अस्योकार और सुरुचिपूर्ण, सुन्दर तथा उदात्त गुणों से विभूषित सर्वागसुन्दर शैली की शुभाशसा भी 'वक्रताविचित्रगुणालकारसम्पदा' की ही प्रतिष्ठा है। इस प्रकार दान्ते काव्य-रचना के क्षेत्र में अपनी कल्पना के मुक्त प्रवाह द्वारा और काव्य-विवेचन के क्षेत्र में स्वतन्त्र चिन्तना द्वारा अर्थ तथा वाणो की वक़ताओं के लिए ह्ार खोल देते हैं। (१) उज्ज्वल वह है जो दूसरो को उज्ज्वल करे और स्वय उज्ज्वल हो। (डी वल्गेरी एलोक्वेन्शिया)

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२२४] भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ि

पुनजोगरण काल

दान्ते को यूरोप के मनीषियों ने 'प्राचीनों में अन्तिम और शधुनिको में प्रथम माना है। उनका समय वास्तव में यरोप के इतिहास में अन्धकार-युग था-दान्ते ने कुछ समय के लिए उसे अपनी प्रखर प्रतिभा से आलोफित तो अवश्य कर दिया किन्तु फिर भी अन्घकार दूर होते होते लगभग दो शतान्दिया बीत गई और सोलहवीं शताब्दी में जाकर पुनर्जागरण का प्रभात हुआ। यह युग वास्तव में स्वर्णयुग है जिसमें यूरोप की अवरुद्ध प्रतिभा सहस्रमुखी होकर तरगायित हो उठी। इटली, स्पेन, इग्लंड आदि सभी देशो में यह अदम्य सर्जना का युग था. एक ओर प्राचीन अमर वाड्मय का पुनरुद्वार हुआ और दूसरी ओर नवीन उत्कृष्ट साहित्य का सृजन। जीवन और साहित्य में शास्त्रीय मूल्यों के स्थान पर रोमानी मूल्यों की प्रतिष्ठा होने लगी और रीति के स्थान पर वक्रता-वैचित्र्य का आकर्षण बढ़ने लगा। सोलहवीं शती में इटालियन भाषा के आलोचको तथा रीतिकारो के लेखों में वक्रता-वैचित्र्य का स्वर स्पष्ट सुनाई देता है

१ मैं सत्य और कल्पना के मिश्रण की बात इसलिए करता हूँ क्योंकि इतिहासकार की भाँति कवि वस्तुओ या घटनाओं का यथावत् वर्णन करने के लिए बाध्य नहीं होता उसका काम तो यह दिखाना है कि वे फैसी होनी चाहिए थीं। (डेनियलो-१५३६ ई०)

२. अब हम एक सार्वमान्य और शाश्वत निर्णय पर पहुँच सकते हैं-और वह यह कि विज्ञान, कला, इतिहास-कोई भी विषय काव्य का प्रतिपाद्य हो सकता है किन्तु शर्त यह है कि उसका प्रतिपादन काव्यमय रीति से हो। (पंट्रिज्ी, १५८६ ई०) ।

इन उद्धरणो में 'कल्पना का मिश्रस' 'यथावत् वर्णन का त्याग' और 'काव्यमय रीति'-ये तीनों ही वक्रता के प्रकार हैं। 4.

इगलैड में प्रतिभा का विस्फोट और भी वेग से हुआ-शेक्सपियर ने शास्त्र- रीति का तिरस्कार कर विषय-वस्तु में विक्षेष औ्रर तदनकूल शैली में वैचित्र्य-वक्रता को आग्रह के साथ ग्रहण किया। यह युग वास्तव में वैचित्र्य का ही युग था, इसमें एक सोर परम्परा की पुन प्रतिष्ठा और दूसरी श्रोर नवीन प्रयोग की आतुरता थी।

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पाश्चारय काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति ] भूमिका [२२५

अगरेज आालोचक सर फिलिप सिडनी की आलोचना में श्रद्धा और विद्रोह दोनों के हो तत्व लिम जाते है-उन्होने परम्परावादी होरेस आदि का अनुसरण न कर लाजाइनस का अनुकरण किया, शिक्षण तथा मनोरजन की अपेक्षा सप्रेरणा को काव्प की सिद्धि माना और इस प्रकार रोमानी मूल्यो के प्रति अपना अनुराग व्यक्त किया। बैन जॉन्सन जैसे शास्त्रनिष्ठ आलोचक ने भी साहसपूर्वक यह उद्धोपर की : 'अरस्तू और अन्य आचार्यों को उनका देय मिलना चाहिए किन्तु यदि हम उनसे आगे सत्य तया श्रचित्य-विषयक अ्रन्वेपलाए करें तो हमारे प्रति यह विद्वेप क्यों ?"१ फिर भी समग्र रूप में परम्परा में ही जॉन्सन की निष्ठा अचल रही और उन्होंने उद्धावना को अपेक्षा रीति तया अनुशासन पर, और इघर वैचित्र्य-वक्रता की अपेक्षा स्पष्टता, समास-गृण, शचित्य-विवेक आदि पर ही अधिक बल दिया।

नव्यशास्त्रवाद (सतरहवीं-अठारहवीं शती) पुनर्जागरण युग के उपरात सतरहवीं शती में यूरोपीय आलोचना में क्रमश नव्यशास्त्रवाद का आ्र्ररम्भ होता है। नव्यशास्त्रवाद का जन्म फ्रास में हुआ-फ्रास के कोरनंई तथा वोइलो की आलोचनामो में वह पुप्पित हुआ और इगलंड में पोप के साहित्य में उसका पूर्ण विकास हुआ। नव्यशास्त्रवाद का मूल सिद्धान्त यह है कि प्राचीन अमर साहित्य का अनुकरण ही साहित्य-सृजन की सफलता का रहस्य है उनके अनुकरण से विवेक और सुरूचि प्राप्त होती है और विवेक अथवा सुरुचि का नाम ही प्रकृति है। इस प्रकार नव्यशास्त्रवाद में रीति की पूर्ण प्रतिष्ठा हुई और वक्रता-वचित्र्य फो, श्राडम्वर मात्र मान कर, भर्त्सना की गई। वोइलो ने इटली के काव्य के वक्रता-वचित्र्य की नकली हीरों से तुलना की और सत्कवियों को उनका बहिष्कार करने की नेतावनी दी। इंगलंड में ड्राइडन का दृष्टिकोर अ्र्रधिक स्वतंत्र तथा संतुलित था ; उन्होंने निष्ठा के साय साथ आवश्यक उद्धावना पर बल दिया। उन्होने श्भिव्यंजना के क्षेत्र में गरिमा और भव्यता का स्वागत किया किन्तु औचित्य को प्रमाण माना। कहने का अभिप्राय यह है कि ड़ाइडन की दृष्टि रीतिवद्ध नहीं थी-प्राचीन रीति का उन्होंने तिरस्कार नहीं किया, परन्तु वैचित्र्य भी उन्हें इतना ही मान्य था जितना कुन्तक को। पोप ने उनका अनुसरण न कर वोइलो के ही प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है। पोप में वक्ता की स्वीकृति केवल उसी अनुपात से मिलती है जिस अनुपात से रीति-सिद्धान्त में वक्रोत्ति-सिद्धान्त की। अर्थात् पोप का दृष्टिकोर शुद्ध रीतिवादी है-परन्तु कुन्तक की वक्रता का क्षेत्र तो सर्वग्यापी है औरौर रीति १. डिस्कवरीज।

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२२६ | भूमिका [पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

अर्रथात् पदरचना का सौन्दर्य भी वक्रता का एक प्रकार है। पद-लालित्य-रसिक पोप ने अपनी रचनाओ में इसी सीमित अर्थ में वक्रता को स्वीकृति दी है। अन्यथा बोइलो को भोति उन्होंने भी शैलीगत वैचित्र्य-वक्रता का तिरस्कार ही किया है, "मिथ्या वाग्मिता ही अशुद्ध शैली है। उसकी स्थिति एक ऐसे शीशे के समान है, जो चारों ओर अपने भडकीले रगों को बिखेर देता है जिनके कारण हम पदार्थो के सहज रूपों को नहीं देख पाते। सभी में एक-जैसी चमक-दमक उत्पन्न हो जाती है किसी में फोई भेद नहीं रहता।" (ऐसे ऑन क्रिटिसिज्म ) उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि पोप शैलीगत वक्रताओं के विरुद्ध है और इस प्रकार की शैली को अशुद्ध शैली तथा मिथ्या वाग्मिता का पर्याय मात्र मानते है। मिथ्या अलकरण तथा शब्दाडम्बर का तिरस्कार कुन्तक ने भी किया है। परन्तु दोनों में वृष्टि का भेद है पोप तो स्वच्छ-शुद्ध शैली के पक्षपातवश वैचित्र्य मात्र का विरोध करते है।

ऐडिसन (अठारहवीं शती)

ऐडिसन पोप के ही समसामयिक थे, परन्तु उनकी वृष्टि कहीं अषिक उदार और मुक्त थी, उन्होंने काव्य में कल्पना के महत्व की पुन प्रतिष्ठा की। लाजाइनस के उपरान्त पहली बार कल्पना की इतने स्पष्ट शब्दों में स्थापना करने के कारण ही ऐडिसन को आज यूरोपीय काव्यशास्त्र के इतिहास में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। कल्पना की यह स्वीफृति प्रकारान्तर से वक्रता की भी स्वीफृति है, और एडिसन के प्रतिपादन द्वारा दान्ते के पश्चत् शताब्दियों बाद यूरोप के काव्यशास्त्र में वक्रता के प्रत सम्मान की भावना का उदय होता है। एडिसन ने वक्रता के अनेक रूपो को अपने ढग से स्वीकार किया है

१. "+ + मै स्पष्टीकरण के लिए केवल ये शब्द और जोड देना चाहता हू कि प्रत्येक प्रकार के भाव-साम्य में चमत्कार नहीं है, केवल वही साम्य इसके अतर्गत आता है जिसमें श्रह्लाद और विस्मय उत्पन्न करने की क्षमता हो. चमत्कार के लिए ये दो गुए अनिवार्य है-विशेषकर विस्मय। कोई भी सादृश्य अथवा । साम्य-वर्णन तभी चमत्कार के अन्तर्गत आ सकता है जब समान तथ्य अपने प्रकृत रूप में एक दूसरे के बहुत अधिक निकट न हों क्योकि जहा साम्य सर्वथा स्पष्ट है वहा विस्मय की उद्बुद्धि नहीं होती। एक व्यक्ति के सगीत की दूसरे के सगीत से उपमा देने अथवा किसी पदार्थ की शुभ्रता की दूध या बर्फ से तुलना करने या उसके रगों को इन्द्रधनुष के रगो के समान कहने में तब तक कोई चमत्कार नहीं है जब तक इस स्पष्ट

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वकोकि। भूमिका [२२७

साम्य के अतिरिक्त लेखक किसी ऐसी संगति की अ्रन्वेषणा नहीं कर लेता जो पाठक > के मन में विस्मय की उद्बुद्धि कर सके।" (स्पैश्टेटर अक ६२)। उपर्युक्त उद्धरण में एडिसन वार्ता और वफ्रता के भेद की व्याख्या कर रहे हैं साधारण साम्य-स्थापना वार्ता मात्र है, जब कवि उसमें किसी वैचित्य की उद्भानना करता है तभी उसमें चमत्कार का समावेश होता है। श्रह्लाद और विस्मय पर आश्रित यही चमत्कार कुन्तक को वक्रता है।

कुन्तक के समान एडिसन भी 'कोरे चमत्कार' की निन्दा करते है "जिस प्रकार वास्तविक चमत्कार इस तरह के भाव या तथ्य-साम्य तथा सगति में निहित है, इसी प्रकार मिथ्या चमत्कार का आधार होता है पृथक वर्णों का साम्य तथा सगति जैसे कतिपय अनुप्रास-भेदो या एकाक्षर आदि में, या शब्दो का साम्य तथा सगत जैसे यमकादि में, अथवा समग्र वाक्य या रचनागत साम्य और सगति जैसे खड्ग-बघ आ्ादि में।" (स्पेक्टेटर अ्रक ६२)।

तुलना कोजिए --- व्यसनितया प्रयत्नविरचने हि प्रस्तुतीचित्यपरिहाण वाच्यवाचकयो परस्पर- स्पधित्वलक्षणासाहित्यविरह पर्यवस्यति।

अर्थात् व्यसन के कारण प्रयत्नपूर्वक (अनुप्रास यमकादि ) क रचना करने से प्रस्तुत (रसादि) की हानि हो जाती है और इस प्रकार शब्द और अर्थ के उरस्पर-स्पर्धा-रूप साहित्य का अ्रभाव हो जाता है। ( हिन्दी व० जी० २।४ फारिका की वृति )।

एक अन्य स्यान पर एडिसन ने वस्तु-वकता का भी वडा सुन्दर विवेचन किया है : "में पहले कल्पना के ऐसे श्राह्लाद का विचार करू गा जो बाह्य पदार्यो के प्रत्यक्ष अवलोकन से उपलच्ब होता है, जो महान है, असावारण अथवा विलक्षण हैं तथा सुन्दर है। +++

महान से मेरा अभिप्राय विशाल आकार का नहीं है, वरन् सम्पूर्ण दृश्य की अखण्ड विराटता का है। +++

प्रत्येक नवीन तथा असाधारण वस्तु से कल्पना के त्रनन्द की उद्बुद्धि होती है क्योकि इससे आत्मा एक सुखद विस्मय की भावना से ओतप्रोत हो जाती है। + + + +

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२२८। भूमिका [पाइचात्य काव्यशास्त्र में वकोक्ति

किन्तु आत्मा पर सौन्दर्य से अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव और किसी तत्व का नहीं पढता। सौन्दर्य से कल्पना के द्वारा हमारी आत्मा एक प्रच्छन्न परितोष की भावना से ४ व्याप्त हो जाती है और महान तथा असाधारण का आकर्षण मानो पूर्ण हो जाता है।"१

यह कुन्तक के 'सहृदयाह्लादकारी स्वस्पन्दसुन्दर' पदार्थ की प्रकारान्तर से विवेचना है, जिसकी व्याख्या कुन्तक ने भी प्राय समान शब्दो में की है : 'यस्मात् प्रतिभाया तत्कालोल्लिखितेन केनचित्परिस्पन्वेन परिस्फरन्त पदार्था प्रकृत- प्रस्तावसमचितेन केनचिदुत्कर्षेण वा समाच्छादितस्वभावा सन्त +++ चेतन-चमत्कारिता आपद्यन्ते।' हिन्दी व० जी० १६ वीं कारिका की पृत्ति। अर्थात् कवि का विवक्षित पदार्थ (१) विशेष रूप से प्रतिभात (प्रतिभोल्लिखित), (२) किसी विशेष स्वभाव से यृक्त (३) प्रसगोचित अपूर्य उत्कर्ष से समाच्छादित होकर सहृदय के चित्त को चमत्कृत करता है।

इसी प्रकार भाषा-शैली में भी एडिसन ने वक्रंता की उपादेयता स्वीकार की है

"रचना के आचार्य इस रहस्य से भली भांति परिचित थे कि अनेक सुन्दर पद या उक्तियां जन-सामान्य के प्रयोग द्वारा 'भ्रष्ट' होकर काव्य अथवा साहित्यिक वक्तृता के उपयुक्त नहीं रह जातीं। + +

अतएव महाकाव्य को भाषा के लिए प्रसाद गुण पर्याप्त नहीं है-उसमें भव्यता का भी समावेश रहना चाहिए। इसके लिए यह आवश्यक है कि उसमें साधा- रख प्रयोग तथा पदावली से विलक्षणता होनी चाहिए। कवि के विवेक का एक बडा प्रमाण यह भी है कि वह अपनी भाषा-शैली में सामान्य 'मार्गो' का त्याग करे किन्तु साथ ही उसे जड तथा अप्राकृतिक भी न होने दे।"२

१ स्पेक्टेटर अक ५१२। २. स्पेक्टेटर भक २८५।

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पाइवात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति] भूमिका [ २२८

स्वच्छन्दतावाद का पृर्वाभास

7 अठारहवीं शती का उत्तरार्ध

अ्रठारहवों शतान्दी के उत्तरार्घ में रीति-वद्ध प्रकृति तया रूढि-वद्ध काव्य-शिल्प के विरुद्ध प्रतिक्रिया आरम्भ हो गई। इगलंड में यग आदि और जर्मनी में लैसिंग शिलर, गेअटे आादि ने कवि-प्रतिभा के स्वातन्त्रय और कला को स्वच्छन्दता की प्रवल शब्दों में पुन प्रतिष्ठा को। यंग ने प्राचीन के अनुकरण की अपेक्षा मौलिक-सृजन का स्तवन किया और नव्यशास्त्रवादियों द्वारा प्रतिपादित रीतिवाद की निन्दा की। उन्होंने रढ और सामान्य मार्ग के त्याग तया चैचित्र्य-वक्रता के ग्रहण का अनुमोदन किया :

"रढ मार्ग को त्याग कर ही कवि कीति प्राप्त कर सकता है, उसके लिये लोक को छोडना आवश्यक है, सामान्य मार्ग से जितनी दूर तुम्हारा पथ होगा उतना ही यश तुम्हें मिलेगा। X X X

कविता में गद्य के विवेक की अपेक्षा कुछ अधिक रहता है, उसमें कुछ ऐसे रहस्य विद्यमान रहते हैं जिनकी व्यास्या नहीं केवल प्रशसा ही को जा सफती है- जिससे ेवल गद्यमय व्यक्ति उनके दिव्य-चमत्कार के प्रति नास्तिक हो जाते हैं।"१

प्रसिद्ध जमन आालोचक लैसिंग ने भी अत्यन्त सूक्ष्म-हन रीति से काव्य के भावात्मक रूप की स्थापना की और अपने परवर्ती स्वच्छन्दतावादी कवि-कलाकारों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। काव्य और चित्र के पारस्परिक सम्बन्ध को व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने अमर ग्रन्य 'लेओोकोऊन' में एक स्थान पर वत्तु-वकता का अत्यन्त वैज्ञा- निक विवेचन प्रस्तुत किया है-

"इसी प्रकार कवि भी काव्यरचना के समय अपनी अविरल अनुक्रिया में वस्तु के केवल एक ही गुए का ग्रहण कर सकता है, इसलिए उसे ऐसे ही गुण का चयन करना चाहिए जो वस्तु का सवसे सजीच चित्र मन में जगा सके+

"कवि का अभोष्ट केवल अर्थ-बोध कराना नहीं होता, उसका वर्णन केवल स्पष्ट-सरल हो यही पर्याप्त नहीं है, यद्यपि गद्य-लेखक का इतने से ही परितोष हो सकता है। वह तो अपनी कविता द्वारा पाठक के मन में उदवद विचारों को जीवन्त

१. कन्जक्चस ऑॉन ओरिजिनल कम्पोज़िशन !

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२३० 1 भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

रूप देना चाहता है जिससे कि हम उस समय वर्णनीय पदार्थ के वास्तविक ऐन्द्रिय प्रभाव की अनुभूति फर सकें और माया के इन क्षरणो में हमें उसके साधनो का- 1 अर्थात् शब्दों का ज्ञान ही न रहे।"

साधारण गुरों का यह त्याग और विशेष प्रभावक गुणों का ग्रहण वस्तु वक्रता का मूल सिद्धान्त है-कुन्तक ने भी लगभग समान शब्दो में उसका दिवेचन किया है. "इसका अभिप्राय यह हुआ कि यद्यपि पदार्थ नानाविध धर्म से युक्त हो सकता है, फिर भी उस प्रकार के धर्म से उसका धर्म (काव्य में) वगिगत किया जाता है जो सहृदयों के हृदय में श्ानन्द उत्पन्न करने में समर्थ हो सकता है, और उसमें ऐसी सामर्थ्य सम्भव होती है जिससे कोई अपूर्व स्वभाव की महत्ता अथवा रस को परिपुष्ट करने की अगता अ्भिव्यक्ति को प्राप्त करती है। (हिन्दी व० जी० ६ वीं कारिका की वृत्ति)

शिलर और गेशटे लैसिंग के ही समसामयिक थे।-शिलर ने जर्मनी में स्वच्छन्दतावाद का प्रबल समर्थन किया। अपनी प्रसिद्ध रचना 'सरल और भांव- प्रधान काव्य' में उन्होंने वास्तव में प्राचीन अमर काव्य तथा नवीन स्वच्छन्दतावादी काव्य का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए स्वच्छन्दतावादी मूल्यो की स्थापना की है-और वस्तुनिष्ठ सरलता के स्थान पर भावपरक वैचित्रय-वक्रता का अनुमोदन किया है। गेअटे प्रकृति से स्वच्छन्दतावादी कलाकार थे, उनकी रचनाओ में रम्य औ्रर अद्भुत के प्रति प्रबल आकर्षण मिलता है। वैसे सिद्धान्त में गेअटे ने प्राचीनों की शास्त्रीय परम्परा की स्थान स्थान पर दुहाई दी है, परन्तु जैसा कि शिलर ने एक बार लिखा था, उनके काव्य को आत्मा और तदनुसार उनके कलात्मक दृष्टिकोए का निर्माण, उनकी इच्छा के विरुद्ध, निश्चय ही रोमानी तत्वो से हुआ है। -

"सूक्ष्म अवयशों के अकन में कलाकार को निश्चय ही श्रद्धा तथा निष्ठा के साथ प्रकृति का अनुकरण करना चाहिए। + ++ किन्तु कलासृजन के उच्च- तर क्षेत्र में, जिसके कारण चित्र वास्तव में चित्र बनता है, उसे स्वच्छन्दता रहती है शर वह कल्पना का उपयोग कर सकता है।"१

प्रकृति का सर्वथा अनुकरण न कर कल्पना के उपयोग द्वारा-वस्तु के चित्र में उसके प्रकृत रूप से विलक्षणता उत्पन्न करना ही वस्तु-वक्रता है। इस प्रकार_इन कलाकारो ने अपनी विवेचना और रचना के द्वारा अगरेजी काव्य के उस समृद्ध युग के लिए द्वार खोल दिया जो इतिहास में रोमानी युग के नाम से प्रसिद्ध है।

१ कन्वरसेशन्स विद ऐकरमंन।

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वफ्रोक्ति। भूमिका [ २३१

स्वच्छन्दतावाद

मान्य आलोचकों के अनुसार स्वच्छन्दतावादी कला के आधार-तत्व हैं रम्य और अद्भुत और उसकी प्रेरक शक्ति है अदम्य आवेग। भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार इस युग का दृष्टिकोए आरवेग की प्रवानता के कारण निश्चय ही रसवादी है-परन्तु अभिव्यजना में रम्य और अद्भुत का वैभव-विलास होने के कारण वत्रता की वांछा भी उसमें कम नहीं है उसका विरोध वास्तव में रीतिवाद से है जो यूरोप में नव्यशास्त्रवाद का आश्रय लेकर प्रकट हुआ था। भार- तोय काव्यशास्त्र में भी रसवाद और बक्रोक्तिवाद में कोई मौलिक विरोध नहीं है- वक्रता वस्तुत रमणीयता का हो दूसरा नाम है और कुन्तक ने स्थान स्यान पर उसे रस-निर्भर अथवा रस-परिपुष्ट माना है। इस प्रकार रस और वक्रता एक दूसरे के पूरक हैं विरोधी नहीं। यूरोप के रोमानी काव्य में रम्य के साथ अद्भुत के प्रति भी प्रबल आग्रह विद्यमान है, अरवएव उसमें तो रस के साथ साथ वक्रता-वैचित्र्य का समावेश भी उसी अनुपात से हुआ है।

अगरेजी साहित्य में स्वच्छन्दतावाद का प्रवर्तन वर्ड सवर्थ द्वारा लिखित 'लिरि- फल बॅलड्स को भूमिका' के साथ होता है वह मानो युग परिवर्तन की उद्घोषर थी। वड सवय की प्रकृति सरल और गम्भीर थी, उनकी भावुकता वैचित्र्य-विलास को अपेक्षा जीवन और जगत के सरल गम्भीर रूपो में अधिक रमती थी। उधर अपने समसामयिक फाव्य की कृत्रिम समृद्ि के प्रति उनके मन में घोर वितृष्णा की भावना जगी हुई थी। अतएव उन्होंने मूल मानव मनोवृत्तियों पर आश्रित शुद्ध रसवाद की अत्यघिक आग्रह के साथ प्रतिष्ठा की। कविता उनके मत से प्रचल मनोवेगो का सहज उच्छलन है-वह शाति के क्षरो में भाव-स्मरस है। मानव को सहज-शुद्ध रागात्मक प्रवृत्तियों का परितोष उसका उद्दश्य है। शुद्धता के प्रति इस प्रवल आग्रह के कारण वर्ड सवर्थ अपने सिद्धान्त निरूपण में स्थान स्थान पर वक्रता-वैचित्र्य का तिरस्कार करते प्रतीत होते हैं·

(१) "इन कविताओ में मेरा उद्दश्य रहा है जन-सावारण के जीवन से घटनाओं तथा स्थितियो का चयन करना तथा उन्हे जनता के वास्तविक व्यवहार की भाषा से चुनी हुई शब्दावली में अ्भिव्यक्त करना।"

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२३२ । भूमिका । पाश्चात्य काव्यशास्त्र में घकोक्ति

(२) "सामान्यत' मैंने ग्रामीण तथा निम्न वर्ग के जनजीवन को अपना विषय बनाय है+++ क्योकि ये लोग अपनी सामाजिक स्यिति तथा संकुचित एव परिवर्तनहीन कार्यक्षेत्र के कारण सामाजिक दम्भ से अ्पेक्षाकृत मुक्त रहते हें और अपनी भावनाओ तथा धारणाओ को सरल तथा अलंकारहीन भाषा में व्यक्त करते हैं।" (३ ) वर्ड सवर्थ ने उन कत्ियों की निन्दा की है "जो यह समभते हैं कि अरपने को जन साधारण की अनुभूतियों से पृथक रख तथा अपने कल्पना-प्रसूत रुचि- चापल्य के लिए खाद्य प्रस्तुत कर वे अपनी तथा अपनी कला की मान-वृद्धि कर रहे हैं।"

(४) "पाठक देखेंगे कि इन रचनाओं में अमूर्त भावनाओ या विचारों का मानवीकरण बहुत ही कम किया गया है-शैली का उन्नयन करने, उसे गद्य-भाषा से ऊपर उठाने के साधन रूप में इस प्रकार के प्रयोगों का सर्वथा बहिष्कार किया गया है। मेरा उद्दश्य यह रहा है कि जन-व्यवहार की वास्तविक भाषा का अनुकरण किया जाय और यथासम्भय उसे ही ग्रहण किया जाय। +++ इन रचनाओं में तथाकथित काग्य-भाषा का प्रयोग नहीं है।"

(५) "यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि गद्य और कविता की भाषा में न कोई मूल भेद है और, न हो सकता है।"

(६) तथाकथित काव्य-भाषा की निन्दा करते हुए वर्ड सवर्थ ने लिखा है "सभी राष्ट्रों के प्राचीन कवियों ने सच्ची घटनाओं से उद्बुद्ध मनोवेग की प्रेरणा से रचना की है। उन्होंने सहज मानव-भाषा का प्रयोग किया है •चूकि उनकी अनुभूति प्रबल थी, अत. उनकी भाषा ओजपूर्ण और सालकार थी। बाद में कवियों ने अथवा कवियश प्रार्थी व्यक्तियों ने देखा कि इस प्रकार की भाषा में बडा प्रभाव है, और प्रबल मनोवेगो के अभाव में ही उनके मन में भी इसी प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करने की वांछा उत्पन्न हुई तो उन्होंने इन अलकारों का यन्त्रवत् प्रयोग आरम्भ कर दिया। कहीं कहीं तो इनका उचित उपयोग किया गया, परन्तु अधिकतर इनका आरोपर ऐसी भावनाओं और विचारों पर होने लगा जिनसे इनका कोई सहज सम्बन्ध नहीं था। इस प्रकार पज्ञात रूप से एक ऐसी भाषा का जन्म हो गया जो किसी भी स्थिति में जन-भाषा से अत्यन्त भिन्न थी। + ++

१, २, ३, ४, ५, ६-प्रिफेस हू लिरिकल वैलड्स।

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पाइचात्य काव्यशास्त्र में धक्रोक्ति ] भूमिका [२३३

प्रागे चल कर यह कुप्रवृत्ति औौर भी बढ गई और कविगए अपनी रचनाओं में ऐसी शब्दावली का प्रयोग करने लगे जो वाहर से तो आवेग की सालकार शब्दा- ?घली के समान प्रतोत होती थी, परन्तु वास्तव में वह उनको अ्पनी ही करामात होती थी और मनमाने ढंग पर सुरुचि तथा प्रकृति से भिन्न होती थी।

यह ठीक है कि प्राचीन कवियों की भाषा जन-साधारण की भाषा से बहुत-कुछ भिन्न होती थी क्योंकि वह अ्साधारण क्षणों की वाणी होती थी। + ++ परवर्ती काव्य की विकृतियो को इस तथ्य से बड़ा प्रोत्साहन मिला, इसकी आड़ में परवर्ती फवियों ने ऐसी शब्दावली का निर्माण कर डाला जो सच्ची काव्य-भाषा से एक बात में अ्वश्य समान थी, और वह यह कि सामान्य व्यवहार में उसका प्रयोग नहीं होता था-वह साधारण से भिन्न थी।

+++ इस प्रकार को विकृतियों का एक देश से दूसरे देश में आयात होता रहा, ज्यों ज्यो संस्कार-परिप्कार की भावना बढ़ती गयी त्यों त्यो कवियों को भाषा अधिकाघिक विकृत होती गयी और उसके प्रकृत मानव-तत्व नाना प्रकार के चमत्कारों, वचित्र्य-वक्रताओं, चित्रालकारों तथा प्रहेलिकाओं के श्राडम्बर में लुप्त होते गये।"

उपरयुक्त उत्तरणों में वर्ड् सवय ने सफ्रता-वैचित्र्य पर निर्मम प्रहार किये हैं और ऐसा प्रतीत होता है मानो वे वक्रोतिवाद के घोर विरोधी हैं। परन्तु स्थिति इतनी विषम नहीं है। इसमें सन्देह नहीं कि वक्रता-विलास वर्ड सवर्थ की गम्भीर प्रकृति के अनुकूल नहीं था, और यह भी सत्य है कि युगप्रवतंक के उत्साह तथा आवेश में उन्होंने कुछ अत्युक्तियाँ भी को है जिनका निराकरण उनके अपने काव्य से ही हो जाता है, फिर भी उनके विचारों का विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि यह विरोध मूलत वक्रता से न होफर कृत्रिम अथवा मिथ्या वक्रता-विलास से ही है। संयत वक्रता का उन्होंने स्वय अ्नेक प्रकार से महत्व स्वीकार किया है।

(१) "जिस प्रकार को कविता का समर्यन में कर रहा हू, उसफी शन्ावली यथासम्भव मानव-व्यवहार की भापा से घुनी हुई होती है, और जहाँ कहीं यह चयन सुरुचि एव सहृदयता के साथ किया जाता है, वहाँ इसके द्वारा ही भाषा में कल्पना- तीत विलक्षणता भा जाती है तथा वह जन-साधारण की भाषा की क्षुद्रता और ग्राम्यता से एकवम ऊपर उठ जाती है, और फिर छन्द का योग हो जाने पर तो, मेरा विश्वास

1

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२३४] भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

है कि उसमें इतनी विलक्षणता का समावेश अवश्य हो जाता है जिससे किसी भी विवेकशील व्यक्ति का परितोष हो सके।"

(२) "कुछ् अप्रलकार ऐसे भी है जो आ्र््रावेग-प्रेरित होते है औनौर मैंने उनका इसी रूप में प्रयोग किया है।"

(३) "क्योंकि यदि कवि उपयुक्त विषय का निर्वाचन करेगा तो स्वभावत वह विषय यथाप्रसंग आवेगो को जन्म देता चलेगा जिनकी भाषा विवेकपूर्ण उचित चयन करने पर, उदात्त एव वैचित्र्य-सम्पन्न और लाक्षसिक प्रयोगो तथा अलकारों से विभूषित हो जायगी।"

४ "दूसरी ओर यदि कवि के शब्द आवेग-दीप्त तथा सहृदय की भावना की उचित उद्वुद्धि करने में समर्थ हों, X X X तो उनसे छान्दिक सगीत- जन्य मानन्द की और भी वृद्धि होगी।"

साराश यह है कि वर्ड् सवर्थ का वृष्टिकोण शुद्ध रसवादी है और वक्रता के कृत्रिम चमत्कार उन्हे सवथा असह्य है, परन्तु वे रसाश्रित वक्रता-वैचित्र्य और रमणीयता की महत्ता को मक्तकण्ठ से स्वीकार करते हैं। वास्तव में उन्होंने काव्य के इस सिद्धान्त को स्पष्ट शब्दो में स्वीफृति दी है कि रस की दीप्ति से शैली अनियार्यत. वक्रता-सम्पन्न हो जाती है-और यही काव्य का अन्तिम सिद्धान्त भी है जहा रस और वक्रोकि सम्प्रदाय एक दूसरे के प्रतिव्वन्ही न होकर पूरक बन जाते हैं।

कॉलरिज ने वह सवर्थ की पतिरजनाओ का प्रतिवाद करते हुए इस सिद्धान्त का अत्यन्त सूक्ष्म-गहन एव निर्भ्नान्त विवेचन किया है। वर्ड् सवर्थ की अत्युक्तियों का स्पष्टीकरण करते हुए उन्होंने यही लिखा है कि समसामयिक कवियों के वागाडम्बर से क्षुब्ध होकर वर्ड् सवर्थ ने अपने दृष्टिकोण को थोडा सकुचित कर लिया था। इसी वितृष्णा के कारण उनका वत्तव्य अतिव्याप्त हो गया है। कॉलरिज ने इस अतिव्याप्ति का निराकरण किया है और काव्य के प्रकृत, विवेक-सम्मत वागर्थ-सम्पृक्ति के सिद्धान्त का मार्मिक प्रतिपादन किया है। 1'

"मैं पाठक को स्मरण कराना चाहता हूँ कि जिन मन्तव्यों का मुझे खण्डन करना है वे इन वाक्यों में अन्तनिहित हैं-'मानव-व्यवहार की वारतविक भाषा से

१, २, ३,४, प्रिफेस हू निरिकल वैलड्स से उद्दृत ।

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पाश्चात्य काटयशास्त्र में वक्रोक्ति। भूमिका [ २३५

चयन,' मैं इनकी (अर्यात् ग्रामीण तथा निम्न वर्ग के लोगो को) भाषा का अनुफरर औौर ययासम्भव वास्तविक जन-भाषा का ग्रहण करना चाहता हूँ,' 'गद्य और कविता की भाषा में न कोई भेद है और न हो सकता है।'(क)

इन तीनों स्थापनाओं का फॉलरिज ने क्रमश खण्डन किया है। उनका तर्क है कि 'वास्तविक भाषा' प्रयोग शुद्ध नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी भाषा होती हैजो वैयत्तिक, वर्गगत और सार्वजनीन तत्वो से युक्त होती है। अ्रतएव 'वास्तविक भाषा जैसी कोई वस्तु नहीं है-'वास्तविक' के स्थान पर साधारण शब्द का प्रयोग अपेक्षित है। इसके श्रतिरिक्त ग्रामीण तथा निम्नवर्ग की जनता की भाषा का ग्रहसा भी काव्य के लिये श्रेयस्कर नहीं हो सकता क्योंकि शिक्षा-दीक्षा के अभाव में उसका विचार-क्षेत्र अत्यन्त सकुचित होता है, अतएव उसकी अभिव्यक्ति के साधन सर्वया सोमित तथा अस्पष्ट होते हैं।

गद्य और पद्य को भाषा के अभेद का निषेध कॉलरिज ने विस्तार से तथा अत्यन्त समर्थ युक्तियो के द्वारा किया है.

१. "दन्द का श्राविर्भाव आ्र्प्रावेग-दोप्ति के कारण होता है, अ्रत. यह आ्रवश्यक है कि छन्दोमयी रचना की भाषा भी सर्वत्र आवेग-दीप्त हो। X X I X कविता का सम्वन्ध, वर्ड् सवर्य ने ठीक ही कहा है, आवेग से है। X X X औररर जिस प्रकार प्रत्येक आवेग का अपना स्पन्दन होता है, उसी प्रकार उसकी अपनी अरभिव्यक्ति का विशेष प्रकार भी होता है।"

२ "छन्द के प्रयोग से चित्रमय तथा सजीव भाषा का प्रचुर प्रयोग आरवश्यक ही नहीं वरन् सहज-स्वाभाविक हो जाता है। X X X जहां तक छन्द के प्रभाव का सम्बन्ध है, छन्द से सामान्य भावना तथा अवधान की सजीवता एव तोव्रता में वुद्धि होती है। यह प्रभाव उत्पन्न होता है विस्मय भाव के निरन्तर उद्योधन और जिज्ञासा की वार-वार उद्दीप्ति तथा परितृप्ति से। श्रषध-सिक्त वातावरण अथवा उद्दोप्त वार्तालाप के समय मदिरा की भाँति उनका प्रबल किन्तु अलक्षित प्रभाव पडता है।"

छन्द स्वय शवधान को तोव्र करता है-और यह प्रश्न उठता है कि श्रवधान (क) वायोग्रेफिया लिटरेरिया परिच्छेद १७ (१), (२) वही। -

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२३६। भूमिका [पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

को तीव्र करने का क्या प्रयोजन है? X X X इसका एक हो युक्तियुक्त उत्तर मेरे मन में आता है और वह यह कि मैं छन्दोवद्ध रचना इसलिए करता हूँ क्योंकि गद्य से भिन्न भाषा का प्रयोग करने वाला हूँ।

X X X

अतएव गद्य और कविता की भाषा में तात्विक अन्तर है और होना चाहिए।"

इस प्रकार कॉलरिज ने अपने कवि मित्र की सम्मति में संशोधन करते हुए वक्रता की अनिवार्यता की पुन प्रतिष्ठा की है। उनका स्पष्ट मत है कि कविता की शैली में आवेग की दीप्ति के कारण, एक प्रकार का वकता-वैचित्र्य स्वभावत ही उत्पन्न हो जाता है . यह वैकल्पिक नहीं है, अनिवार्य है, अतएव वक्रता भी काव्य- शैली का अनिवार्य तत्व है।

रोमानी युग की आलोचना और कविता दोनों में वक्रता की महिमा में वृद्धि होती गय। (१) डीक्विन्सी ने भाषा को आत्मा का व्यक्त रूप माना है-जो उसकी (भाषा की) व्यजना-शक्ति तथा वक्रता की ही प्रबल स्वीकृति मात्र है। उनके अनुसार साहित्य के दो भेद हैं (१) ज्ञान का साहित्य जिसका आधार तथ्य और माध्यम इतिवृत्त शैली है, और (२) प्रेरणा का साहित्य, जिसका आधार मानव-मनोवेग तथा कल्पना, और माध्यम उच्छवासमयी वक्र शैली है। शेली ने 'कविता के पक्ष में' नामक प्रसिद्ध निबन्ध में एक ओर कविता के शब्दों के विद्युत्-प्रभाव तथा स्फुलिंग शक्ति का अत्यन्त उच्छ्वास के साथ उल्लेख किया है और दूसरी ओोर वस्तु-वक्रता का मार्मिक प्रतिपादन किया है। "कविता विश्व के ऊपर से परिचय-जन्य साधारणता का आवरण हटा कर उसके सुप्त सौन्दर्य का उद्धाटन कर देती है।" कोट्स की कविता में वक्रता-वैचित्र्य-सम्पदा का अपूर्व उल्लास है। उन्होने भाषा की चित्र-शक्ति का अव्भुत विकास किया है-अगरेजी आलोचकों का मत है कि उनकी भाषा में फेवल रूप और रस की ही नहीं गन्ध की व्यजना करने की भी अपूर्व क्षमता है। वास्तव में धक्रता का ऐसा वैभव अन्यत्र वुर्लभ है।

स्वच्छन्दतावाद के उपरान्त

स्वच्छन्दतावाद के आवेगमय विस्फोटों के उपरान्त यूरोप की चिन्ताधारा में विज्ञान के वर्घमान प्रभाव के कारण फिर विचार-विवेक की प्रतिष्ठा होने लगी। फ्रांस में सेंट-व्युव (सां बुय) ने काव्य में व्यक्ति-तत्व पर बल वेते हुए भी प्राचीनों के संयम-

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति ] भूमिका [ २३७

संस्कार का स्तवन किया और व्यापक आधार पर शास्त्रीय मूल्यो की फिर से स्थापना को। टेन ने साहित्य पर जाति, देश, काल आदि के नियामक प्रभाव को महत्व देते हुए ऐतिहासिक आलोचना का व्यवस्थापन किया। इन आलोचको की विचार-पद्धति ही सर्वथा भिन्न थी-उसमें वक्रता, ऋजुता आदि कला-दृष्टियो के लिए स्थान नहीं था यद्यपि यह भी सत्य है कि वक्रता से इनका कोई विरोध नहीं था। इंगलंड में विक्टोरिया का युग संयम और सुरुचि का प्रतीक था। मैथ्यू आर्नल्ड ने काव्य में "उदात्त गम्भीरता' को प्रमाण माना और काव्य-वस्तु को प्रधानता दी. उन्होंने काव्यशली को भी उचित मान दिया, परन्तु उसे 'वस्तु के अधीन' ही माना। सामान्यत कला-विलास का आ्रर्नंल्ड को दृष्टि में विशेष मूल्य नहीं था, उन्होंने वक्रता-वैचित्र्य तथा अलंकरण आदि के प्राचुर्य का विशेष आदर नहीं किया। किंग लीअर की आलोचना करते हुए आनल्ड ने लिखा है. 'अभिव्यंजना की यह अ्र्प्रति- वक्रता वास्तव में एक अद्भृत गुण विशेष का आवश्यकता से अधिक उपयोग है. वह गुण है-दूसरों की अपेक्षा सुन्दर रीति से कथन करने की क्षमता। किन्तु फिर भी इस गुण का इतना अधिक-इतनी दूर तक प्रयोग किया गया है कि मसियो गिजो की इस आलोचना का आशय सहज ही हृद्गत हो जाता है-"शेक्सपियर ने अपनी भाषा में केवल एक को छोड सभी शैलियों का प्रयोग किया है और वह एक शैली है सरल शैली।"१

कीट्स की प्रसिद्ध कविता इजावेला के विरुद्ध भी आर्नल्ड का यही निर्णाय है : "इज्रावेला कविता सुन्दर तथा रमणीय शब्दों और चित्रों का परिपूर्ण भाडार है.प्राय. प्रत्येक पद में एक न एक ऐसी सजीव और चित्रमय अभिव्यजना है जिसके द्वारा वर्ण्य वस्तु मन चक्षु के सम्मुख चमक उठती है और पाठक का चित्त सहसा आनन्द से तर- गित हो उठता है।+++ किन्तु कार्य-व्यापार और कथा-वस्तु ? कार्य- व्यापार अपने आप में सुन्दर है, परन्तु कवि ने उसका भावन इतने निर्जीव रूप में तथा विधान इतनी शिथिलता से किया है कि उसका प्रभाव कुछ नहीं रह जाता। कीट्स को कविता पढने के उपरांत पाठक यदि उसी कहानी को डेकामेरन में पढ़े तो उसे यह अ्नुभव होगा कि वही कार्यव्यापार एक ऐसे महान कलाकार के हाथो में पडफर कितना सार्थक और रोचक वन जाता है जो सवसे अधिक ध्यान अपने 'उद्दश्य' को देता है औ्ौर अभिव्यंजना को अ्र्भीष्ट अर्थ के अधीन रखता है।२

१-२. प्रिफेस ह पोइम्स।

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२३८ ] भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

उपयुक्त उद्धरणो से स्पष्ट है कि आर्नल्ड के मन में वक्रता-विलास के लिए अधिक मान नहीं था। किन्तु कला की गरिमा के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा थी- इसमें भी सन्देह नहीं है। वे यक्ता के विषयगत रूपो का आवर करते थे। प्राचीनों की विषय-वस्तु के काव्यमय स्वरूप और उसके सम्यक् विन्यास का उन्होने स्थान स्थान पर स्तवन किया है"उनका ध्यान विषय वस्तु के काव्यात्मक स्वरूप और उसके विन्यास पर पहले जाता था।"१ वस्तु का यह काव्यात्मक स्वरूप वास्तव में कुन्तक की वस्तु-वक्रता और उसका विन्यास प्रकरण-वक्रता अथवा प्रबन्ध-वक्रता का ही पर्याय है। उधर शैलीगत वक्रता की भी उन्होंने उपेक्षा नहीं की है, िन्तु उसे वस्तु से निरपेक्ष रूप में स्वीकार नहीं किया है। उनके मत से वस्तु और शैली का सौन्दर्य परस्पर- सम्बद्ध है. "कवि की विषय-वस्तु में जिस मात्रा में उदात्त काव्यमय तत्व तथा गभीरता का अभाव रहेगा, उसी मात्रा में उसकी शैली में भी उदात्त काव्यमय पदावली और प्रवाह का अभाव होगा। इसी प्रकार जिस मात्रा में उसकी शैली में उदात्त काव्यमय पदावली तथा प्रवाह का पभाव होगा, उसी मात्रा में उसकी विषय-वस्तु में भी उदात काव्यमय तत्व औौर गम्भीरता का अभाव रहेगा।"२

कहने का अभिप्राय यह है कि आर्नल्ड ने वक्रता के स्वच्छन्द विलास को तो स्वीकार नहीं किया, किन्तु उसके गम्भीर रूपों को निश्चय ही उचित महत्व दिया है- जहां वक्रता औचित्य से अनुशासित और गम्भीर सत्य से अनुप्राणित रहती है।

आर्नल्ड का युग काव्य में टेनीसन और स्थिनबर्न जैसे फला-विलासी कवियों का भी युग था स्विनबर्न की कविता में वैचित्र्य-वक्रता का उत्मुक्त विहार है। परन्तु युग की चिंताधारा ने उसे स्वीकार न फर रस्किन और आर्नल्ड जैसे गम्भीर-चेताओनों की सयत सौन्वर्य-धारणाओं को ही ग्रहण किया

"सर्वोत्कृष्ट उदाहरणों में भी अलफृत कला परिष्कृत रुचि के व्यक्ति के मन में यह धारणा छोढ जाती है कि यह सर्वोत्कृष्ट कला के नमूने नहीं है, इस कला में कुछ अप्रतिशय समृद्धि है-यह न अपने आप में सस्कृत है और न प्रेक्षक या पाठक के चित्त का ही सस्कार करती है।" (बेजहाट, १८६४ ई०)।

यह शद्धतावादी प्रवृत्ति प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार टाल्सटाय के कला-सिद्धान्त में पराकाष्ठा पर पहुँच गयी। टाल्सटाय ने सौन्वर्य और आनन्द को कला का मूल १ प्रिफेस हू पोइम्स । २ स्टडी आ्फ पोइट्री।

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पाश्चात्य, काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति] भूमिका [ २३६

तत्व मानने में आपत्ति की और मानवता की रागात्मक एकता को कला का श्राधार - घोषित किया : "-अन्त में यह (कला) आनन्द नहीं है, वरन् मानव एकता का साधन है जो मानव-मानव को सह-अनुभूति के द्वारा परस्पर-सम्वद्ध करती है।" यहा वक्रोक्ति सिद्धान्त का जिसका, उद्गम सौन्दर्य और उस पर आश्रित आानन्द-सिद्धान्त है, चरम निषेध हो जाता है।

परन्तु टाल्सटाय का यह सिद्धान्त अपने अ्रतिवाद के कारण आ्रप ही विफल हो गया। इस प्रकार की अति-गम्भीरता और शद्धता के विरुद्ध मानव की सौन्दर्य औ्रर आनन्द-चेतना ने विद्रोह किया जिसके फलस्वरूप एक ग्रोर नवीन सौन्दर्यशास्त्र औौर दूसरी ओर मनोविज्ञान पर आघुत आलोचना-सिद्धान्तो का आविर्भाव हुआ। सौन्दर्य पर आश्रित 'कला कला के लिए'२ सिद्धान्त जिसका विकास उन्नीसवीं शती के अन्त में ही पेटर तथा ह्विसलर के निवन्धों में हो चुका था, क्रमश, क्रोचे के अभिव्यंजनावाद में दार्शनिक भूमिका प्राप्त कर शास्त्र रूप में प्रतिष्ठित हो गया। उघर आानन्द का सिद्धान्त मनोविश्लेपण-शास्त्र के आचार्यो की गवेषाओ में नवीन वृज्ञानिक रूप धारण कर सामने आ गया। अ्रभिव्यंजनावाद औरर वक्कोक्तिवाद

  • (इन्दौर के भापण में) शुक्लजी के इस वक्तव्य के उपरात कि कोचे का श्मि- व्यजनावाद भारतीय वक्रोक्तिवाद का ही विलायती उत्थान है, इन दोनो का तुलनात्मक

1 अध्ययन हिन्दी काव्यशास्त्र का एक रोचक विषय वन गया है। शुक्लजी का यह निर्णय अधिक सुदिचारित नहीं है, कोचे की इस घारणा से चिढ कर कि 'कला में विषय- वस्तु की कोई सत्ता नहीं है-अभिव्यजना ही कला है' शुफ्लजी ने आवेश में आाकर अ्रभिव्यजनावाद का द्विगुण तिरस्कार करने के लिए हो कदाचित् ऐसा कह दिया है। वास्तव में शृवलजी का यह वत्त्य है तो क्रोचे और फुन्तक दोनों के साथ ही अन्याय, फिर भी आधुनिक आलोचनाशास्त्र के प्रकाश में कुन्तक के सिद्धान्त को और भी स्पष्ट करने के लिए दोनो का सापेक्षिक विवेचन अनुपयोगी नहीं है। क्रोचे की मूल धारणाएं : क्रोचे मूलत आत्मवांदी दार्शनिक है जिन्होंने अपने ढग से आत्मा की अन्तः सत्ता की प्रतिष्ठा की है। उनके अनुसार आत्मा की दो कियाए हैं (१) विचारात्मक3

१: व्हॉट इज आ्र्ट (१८९८) । २. 'ल ग्रात पोर 'ल आ्र्प्रार्त ३. थ्योरिटीकल एक्टिविटी

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२४० ] भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोकि

(२) व्यवहारात्मक।9 "विचारात्मक क्रिया श्रथवा ज्ञान के दो रूप हैं 'ज्ञान स्वयकाश्य होता है अथवा प्रमेय, कल्पना द्वारा प्राप्त ज्ञान अरथवा प्रमा (बुद्धि) द्वारा प्राप्त ज्ञान, व्यष्टि (विशेष) का ज्ञान अथवा समष्टि (सामान्य) का ज्ञान, विशिष्ट वस्तुओं का ज्ञान अथवा उनके परस्पर सम्बन्ध का ज्ञान वास्तव में ज्ञान या तो विम्ब का उत्पादक होता हे या घारखा का।"

व्यवहारात्मक क्रिया का आधार है सकल्प जिसका फल ज्ञान में नहीं वरन् कर्म में प्रकट होता है। व्यवहारात्मक क्रिया के भी दो भेद हैं (१) आर्थिक२ अर्थात् सासारिक योगक्षेम से सम्बद्ध, और (२) नैतिक अर्थात् सत्-असत् से सम्वद्ध। विचार औौर व्यवहार में सगति की स्थापना करते हुए क्रोचे ने आर्थिक क्रिया को व्यवहार का सौन्दर्यशास्त्र और नैतिक क्रिया को उसका तर्कशास्त्र कहा है।

१ कला का सम्बन्ध ज्ञान के प्रथम भेद अर्थात् स्वयप्रकाश्य ज्ञान से है- इसी का नाम सहजानुभूति भी है। कला, क्रोचे के मत से, सहजानभूति ही है। सह- जानुभूति पदार्थ-बोध से भिन्न है पदार्थ-बोध के लिए पदार्थ की स्थिति अनिवार्य है, किन्तु सहजानुभूति उसके अरभाव में भी होती है-उसके लिए वास्तविक औ्रौर सम्भाव्य में भेद नहीं है। सहजानुभूति सवेदन से भी भिन्न है सवेदन एक प्रकार का भरूप स्पन्दन है.आत्मा इसका अनुभव तो करती है, पर इसे अभिव्यक्त नहीं कर सकती। यह एक प्रकार का अमूर्त विषय है जो जड़ है-निष्क्रिय है। इसका केवल इतना ही महत्व है कि इसके आधार पर सहजानुभूतियों में परस्पर भेद हो जाता है। किन्तु सहजानुभूति अपरनिवार्यत अभिव्यजना रूप ही होती है-अतएव वह अभिव्यजना से अरभिन्न है-प्रत्येक सच्ची सहानुभूति अरभिव्यजना भी होती है। जो अभिव्यजना में मूर्त नहीं होती, वह सहजानुभूति न होकर सवेदन मात्र है। आत्मा निर्माण, सृजन तथा अभिव्यक्ति के रूप में ही सहजानुभूति करती है।3 सारांश यह है कि सहजानुभूतिमय ज्ञान अभिव्यजनात्मक होता है। बौद्धिक क्रिया से स्वतत्र, वास्तव-अवास्तव तथा देशकाल के बोघ से निरपेक्ष। सहजानुभूति प्रकृत अ्रनुभूति से-सवेवन की तरंगों से अथवा चेतना के विषय से अपने 'रूप' के कार भिन्न है, और यह 'रूप' ही अभिव्यजना है। अतएव सहजानुभूति का अर्थ है अभिव्यक्ति : फेवल अभिव्यक्ति न कम न अघिक।४ यही कला है। (१) प्रेक्टिकल एक्टिविटी एस्थेटिक पृ० १४ (२) आ्रार्थिक शब्द का प्रयोग यहाँ प्राचीन शास्त्रीय अर्थ में किया गया है-सासारिक जीवन के सिए उपयोगी। (३) एस्पेटिक पृ० ८। (४) पृ० ११।

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पाइचात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति भूमिका [२४१

२. इसका अभिप्राय यह हुआ्रा कि प्रत्येक व्यक्ति स्वभावत कलाकार है क्योंकि प्राय. सभी में सहजानुभूति की क्षमता रहती है। जो सहजानुभूति कर सकता है, • 7' वह प्रभिव्यजना में भी समर्य है और इसलिए कलाकार भी है। फिर मान्य कलाकार तया सामान्य व्यक्ति में क्या भेद है ? यह भेद सहजानुभूति के प्रकार का नहीं है, तीव्रता का भी नहीं है-केवल व्यापकता का है। अर्थात् सामान्य व्यक्ति की सहजा- नुभूति से फलाकार की सहजानुभूति न तो प्रकार में भिन्न है और न तो तीव्रता फी मात्रा में। कुछ व्यक्तियो में आत्मा की जटिल स्थितियो को अभिव्यक्त करने की शक्ति तथा प्रवृत्ति औरों की प्र्प्रपेक्षा श्र्प्रधिक होती है, इनको ही विशेष अर्थ में कलाकार कहते हैं। इस प्रकार यह अ्न्तर मात्रा का नहीं है, विस्तार का है। 'कवि-प्रतिभा जन्मजात होती है' कहने की अपेक्षा यह कहना अधिक सगत है कि 'मनुष्य जन्मजात कवि होता है।"

३. तत्व और रूप अथवा वस्तु और अ्भिव्यजना के विषय में क्रोचे का मत काव्यशास्त्र की परम्परा से भिन्न है। सौन्दर्य वस्तु में निहित है, अथवा अभिव्यंजना में, अयवा दोनों में? यदि वस्तु से अभिप्राय अनभिव्यक्त भावतत्व अयवा अन्त. संस्कारों का और अ्रभिव्यंजना से तात्पर्य व्य्क्त करकए की क्रिया का है तो न सौन्दर्य वस्तु में निहित है औरर न वस्तु तथा अभिव्यजना के योग में। सौन्दर्य के सृजन में अभिव्यक्ति का भाव-तत्व में योग नहीं किया जाता, वरन् भाव-तत्व ही अभिव्यक्ति के द्वारा मूर्त रूप धारण करता है, अर्थात् यह भाव-तत्व ही मानों अभिव्यंजना के रूप फिर प्रफट हो जाता है जो मभिन्न होते हुए भी भिन्न प्रतीत होता है। अतएव सौन्दर्य अभिव्यंजना का नाम है-उसके अतिरित्त और कुद् नहीं है।

४. कला मूलत एक आध्यात्मिक क्रिया है, फलाकृति उरुका मूर्त भौतिफ रूप है जो सदैव अनिवार्य नहीं होता। कला-सजन के सम्पूर्ण प्रक्रिया पाँच चरणो में विभक्त की जा सकती है-(अ) अरूप सवेदन (आ) अभिव्यजना अर्थात् शरूप सवेदनों की आ्तरिक समन्विति-सहजानुभूति (इ) आनन्दानुभूति (सफल अभि- व्यंजना के आानन्द की अनुभूति (ई) आन्तरिक अ्रभिव्यजना अ्रथवा सहजानुभूति का शब्द, ध्वनि, रग, रेखा आदि भौतिक तत्वों में मूर्तोकरण और (उ) काव्य, चित्र इत्यादि-कलाकृति का भौतिक मूर्त रूप। इन पाँचो में मुख्य क्रिया (अर्यात् वास्तविक कला-सर्जना) दूसरी है।

(१) पृ०-१३-१४

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२४२ । भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

५ सहजानुभूति अ्रथवा आ्र्परातरिक सौन्दर्यानुभूति तो ऐच्छिफ नहीं है किन्तु यह हमारी इच्छा पर निर्भर है कि उसे बाह्य रूप प्रदान करें या न करें अर्थात् बाह्य रूप में प्रस्तुत कर उसको सुरक्षित रखें या न रखें और दूसरो के लिए प्रेषिरीय बनाए 1

या न बनाए। इस दूसरी प्रक्रिया के लिए शिल्पविधान की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए अनेक भौतिक उपकरण अपेक्षित होते हैं-उन भौतिक उपकरणों के प्रयोग को अ्रनेक विघिया, अनेक नियम आदि होते हैं जिन्हें सामान्य रूप से कला- शास्त्र-काव्यशास्त्र आदि के नाम से अभिहित किया जाता है। इससे कुछ व्यक्तियो के मन में यह भ्राति उत्पन्न हो जाती है कि आतरिक अभिव्यजना का भी शिल्प- विधान और उसके उपकरण होते हैं। परन्तु यह तो सम्भव ही नहीं है : आन्तरिक अभिव्यजना के उपकरण नहीं होते क्योंकि उसका कोई उद्दश्य ही नहीं होता। कारण स्पष्ट है . अभिव्यजना मूलत एक आन्तरिक क्रिया है जो व्यवहार तथा उसका निर्दे- शन करने वाले बौद्धिक ज्ञान से पहले होती है, और जो इन दोनो से स्वतन्त्र है। जहाँ अभिव्यंजना के आन्तरिक रूप के शिल्पविधान की चर्चा की जाती है, वहाँ उसे अभिव्यंजना से अभिन्न ही मानना चाहिए।

६ कला भाव रूप न होकर ज्ञान रूप ही है कनोकि सहजानुभूति ज्ञान का ही एक रूप है। वह धारणा से मुक्त होती है। तथाकथित पदाथ-बोध की अपेक्षा अधिक सरल होती ह, परन्तु होती ज्ञान रप ही है। सहजानुभूति को एक विशिष्ट अनुभूति-सौन्दर्यानुभूति मानना भी व्यर्थ है क्योंकि उसमें कोई वैशिष्ट्य या वैचित्र्य नहीं होता।१

७ कला अथवा अभिव्यजना शरखण्ड होती है। प्रत्येक अभिव्यजना का एक ही रूप होता है। सवेदनो को एकान्वित करने की क्रिया का नाम ही तो अभि- व्यजना है। इसी धारणा के आघार पर कला में एकता अथवा अनेकता में एकता के सिद्धान्त की स्थापना की गयी है क्योकि अभिय्यजना अनेक का एक में समन्वय ही तो है। इसलिए किसी कला के भाग करना या काव्य को दृश्यो, प्रकरणो, उपमाओं तथा वाक्यो में विभक्त करना उचित नहीं है। इससे कला का नाश हो जाता है जिस प्रकार हृदय, मस्तिष्क, स्नायु, पेशी आदि में विश्लिष्ट करने से प्रारी को मृत्यु हो जाती है। इसी प्रकार अलकार और अलकार्य तथा अन्य रीतिशास्त्रीय काव्यावयवों की फल्पना भी मिथ्या है।

(१) एस्थेटिक पृ० १७-१९

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पाइचात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति ] भूमिका [ २४३

द. कला अथवा अभिव्यजना का वर्गोकरस भी असगत है। अभिव्यंजना में न सरल और मिश्र का भेद होता है, न आत्मपरक और वस्तुपरक का, न यथार्थ और प्रतीकात्मक का, न सहज और अलकृत का, न अभिधा और लक्षणा का। अभिव्यनना इकाई ही है, वह जाति नहीं हो सकती। इसी प्रकार अनुवाद की भी सम्भावना नहीं है क्योकि अनुवाद तो एक भिन्न अभिव्यजना ही हो जाता है।

. अभिव्यजना में कोटिक्रम का भेद भी नहीं होता कला की अयवा सौन्दर्य की शणिया नहीं होतीं. सुन्दर से सुन्दरतर की कल्पना सम्भव नहीं है। सफल अ्रभिव्यजना हो श्रभिव्यजना है-असफल अयवा अपूर्ण अभिव्यजना तो अभिव्यजना हो नहीं है। हां, कुरूपता की श्रसियाँ अवश्य होती हैंफुरूप से कुरूपतर, कुरूप्रतम तक उसकी श्रणिया हो सकती हैं।

१०. अभिव्यजना अपना उद्दश्य आप ही है-अभिव्यक्त करने के अतिरिक्त उसका कोई अपर उद्दश्य नहीं होता। तदनुसार कला का अपने से भिन्न कोई उद्दश्य नहीं है : शिक्षण, प्रसादन, कीति, धन आदि कुछ नहीं। कला कला के लिए ही है। आानन्द भी उसका सहचारी अवश्य है किन्तु लक्ष्य नहीं है। कला का तो एक ही कार्य है-आात्मा को विशद करना। सकुल भावनाओं को अभिव्यक्त कर देने से आत्मा मुक्त हो जाती है जैसे बादलो के बरस जाने पर आफाश निर्मल हो जाता है। कला की यही चरम सिद्धि है। इसीलिए कला अपने मूल रूप में नैतिकता, उपयोगिता आदि के बघनो से भी मुक्त है। किन्तु यह कला के मूल (आतरिक) रूप का ही लक्षण है-कला को जव कलाकार मूर्तरूप प्रदान करता है तव वह सामाजिक नियमों के अधीन हो जाता है, उस स्थिति में उसे अपनी उन्हों सहजानुभूतियों को मूर्त रूप देने का अधिकार रह जाता है नो समाज के लिए हितकर हैं।

सक्षेप में काव्य के विषय में क्रोचे के मूल सिद्धान्त ये ही है। इनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यद्यपि क्रोचे और कुन्तक के सिद्धान्तों में स्पष्ट अरन्तर है, फिर भी उन में कुछ मौलिक साम्य भी है जिसके आघार पर दोनो की सम्वन्ध-कल्पना सर्वथा अनर्गल प्रतीत नहीं होती।

क्रोचे और कुन्तक के सिद्धान्त

साम्य

१ क्रोचे और कुन्तक के सिद्धान्तो में एक मौलिक साम्य तो यही है कि दोनों अभिव्यंजना को ही फाव्य का प्राणतत्व मानते हैं। क्रोचे को वक्र उत्ति पथवा

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२४४ ] भूमिका । पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

वैदग्ध्यभगीभणिति मूलत उक्ति या भगिति-दूसरे शब्दों में अभिव्यजना ही है। जिस प्रकार कुन्तक की उक्ति अथवा भखिति से आशय वाक्य मात्र का न होकर समस्त कवि-व्यापार या काव्य-कौशल का है, इसी प्रकार क्रोचे की अभिव्यजना की परिघि में सभी प्रकार का रूपविधान आ जाता है। इस दृष्टि से दोनों कलावादी प्राचार्य हैं।

२ 'दोनों ने काव्य में कल्पना-तत्व को प्रमुखता दी है। क्रोचे की सहजानु- भूति तो निश्चय ही कल्पनात्मक क्रिया है-उन्होने स्पष्ट ही कल्पना शब्द का प्रयोग किया है। कुन्तक ने इस शब्द का प्रयोग नहीं किया था, परन्तु उनकी 'वक्रता' 'कवि- व्यापार' 'वैदग्ध्य' 'उत्पाद्य लावण्य', आदि में कल्पना की व्यजना असदिग्ध है। वास्तव में जैसा कि डा० से आदि का मत है, वक्रोक्ति का आधार कल्पना ही है।

३ क्रोचे और कुन्तक दोनो ही अभिव्यजना अ्रथवा उक्ति को मूलत. अखण्ड, अविभाज्य और श्रद्वितीय मानते हैं। क्रोचे की भांति कुन्तक ने भी स्पष्ट कहा है कि तत्व दृष्टि से उत्ति अ्खण्ड है, उसमें अलकार और अलकार्य का भेद नहीं हो सकता- इस प्रसग में दोनों की शब्दावली तक मिल जाती है। (देखिए अलकार और अलकार्य प्रसग-)। इसी प्रकार काव्य में एक अर्थ के लिए एक ही शब्द का प्रयोग होता है 'अन्यूनमनतिरिक्त' शब्द-प्रयोग, काव्योक्ति पथवा वक्रोक्ति के लिए अनिवार्य है। यही अभिव्यजना की अद्वितीयता है .'पर्यायवाची अन्य (शब्दों ) के रहते हुए भी विवक्षित अर्थ का बोधक केवल एक (शब्द ही वस्तुत) शब्द कहलाता है-

शब्दो विवक्षितार्थेकवाचकोऽन्येषु सत्स्वपि ।१।९' (हिन्दी व० जी० पृ० ३८) ।

४ क्रोचे और कुन्तक दोनो ही सफल अभिव्यंजना अथवा सौन्दर्याभिव्यजना में श्रसियां नहीं मानते। कुन्तक ने काव्यमार्गो के विवेचन में यह अत्यन्त स्पष्ट कर दिया है कि उनमें मूलत प्रकार का भेद है सौन्दर्य की मात्रा का नहीं है 'न च रोतोनाम् उत्तमाघममध्यमभेवेन त्रंविष्यम् व्यवस्थापयितुम् न्याय्यम्।'

क्रोचे ने भी अपने ढग से यही कहा है कि एक सफल अभिव्यजना (वास्तव में उन्होने सफल विशेषण को भी व्यर्थ ही माना है क्योकि असफल अभिव्यजना तो अभिव्यजना ही नहीं है) और दूसरी सफल अभिव्यजना में सौन्दर्य की मात्रा का अथवा श्रणी का भेद नहीं है। दोनों ही अपने आप में पूर्ण हैं।

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पाइचात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति ] भूमिका [ २४५

वैपम्य

परन्तु क्रोचे और कुन्तक के सिद्धान्तो में साम्य की अपेक्षा वैषम्य ही अघिक है।

१. पहला अतर तो यही है कि क्रोचे मूलतः वार्शनिक है जिन्होने सम्पूर्र परलकारशास्त्र का निषेध किया है। कुन्तक इसके विपरीत मूलत आलकारिक हैं जिन्होंने लोकोत्तरचमत्कारकारी वचित्र्य की सिद्धि और उसके द्वारा काव्य की सम्यक व्युत्पत्ति के लिए कृतसकल्प होकर अलकारशास्त्र की रचना की है.

लोकोत्तरचमत्कारकारिवंचित्र्यसिद्धये, काव्यस्यायमलकार कोऽप्यपूर्वो विधीयते।

इस प्रकार दोनों के दृष्टिकोण में ही मौलिक भेद है।

२ क्रोचे के प्रतिपाद्य का मूल आधार है उक्ति: जिसमें वक्र और ऋज- वक्रता और वार्ता का भेद नहीं है। क्रोचे के अनुसार वक्रोक्ति भी सहजोत्ति ही है क्योंकि अरभीष्ट अर्य को अभिव्यक्त करने के लिए वही एकमात्र उत्ति हो सकती थी। कुन्तक ने वक्रता और वार्ता अर्थात् चमत्कारपूर्ण तथा चमत्कारहीन उक्ति में स्पष्ट भेद माना है : उन्होंने अनेक मान्य अलकारों का निषेध ही इस आधार पर किया है कि उनमें चमत्कार नहीं है। उनके विदग्य और वक्र आदि विशेषण वार्ता और वक्रोक्ति के भेदक है।

३. क्रोचे के अनुसार काव्य की आात्मा सहजानुभूति है और कुन्तक के अ््रनु- सार कवि-्पापार। इन दोनों में कवि-व्यापार की परिधि अधिक व्यापक है. उसके अन्तर्गत काव्य का भावन-व्यापार और रचना-प्रक्रया, कोचे के शब्दों में सहजानुभूति तथा वाह्य अभिव्यंजना दोनो का समावेश है। कुन्तक ने वक्रता (सौन्दर्य) को मूलत. तो प्रतिभा द्वारा अंत स्फुरित ही माना है.

प्रतिभा प्रथमोद्भेदसमये यत्र वक्रता। शन्दाभिघेययोरन्त स्फुरतीच विभाव्यते॥

अर्थात् 'प्रतिभा के प्रथम विलास के समय ही (जहा) शब्द और अर्थ के भीतर वक्रता स्फरित होती हुई-सी प्रतीत होने लगती हैं' १।२४। परन्तु इसके साथ हो रचना;

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२४६ ] भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

निबन्धन आदि का महत्व भी उन्हों ने निश्चय रूप से स्वीकार किया है। इस प्रकार सौन्दर्य का प्रातिभ श्रन्त स्फुरण तथा रचना कौशल दोनो ही कुन्तक के कवि-व्यापार के अंग हैं, यह ठीक है कि दोनो में अ्न्त स्फुरण का ही महत्व श्रधिक है-वही f सौन्दर्य का मूल रूप भी है, फिर भी रचना-कौशल भी उतना ही अनिवार्य है। मूल तत्व अन्त स्फुरण ही है, परन्तु कवि-व्यापार रचना के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। क्रोचे ने बाह्य-रचना' की सत्ता तो स्वीकार की है पर उसे सर्वथा आनुषगिक माना है. वह सहजानभूति की पुनरुद्बुद्धि का विभावक, स्मृति का सहायक आ्रादि तो है, काव्य का श्निवार्य अग नहीं है। दोनों आचार्यों के दृष्टिकोण का यह अत्यन्त मौलिक भेद है। भारतीय काव्यशास्त्र में भी मूर्त कलाकृति को इस रूप में ग्रहण किया गया है उसके द्वारा सहृदय के चित्त में वासना रूप से स्थित स्थायी भाव उद्बुद्ध होकर रस में परिणत हो जाता है। कुन्तक का भी इस मत से विरोध नहीं है। परन्तु यह तो सृजन के उपरान्त की स्थिति है। सृजन की प्रक्रिया में अ्रन्त स्फुरण निश्चय ही मूल क्रिया है, किन्तु वह पर्याप्त तो नहीं है . जब तक उसको शब्द-अर्थ में विम्बित नहीं किया जाता तब तक तो उसका कला रूप ही प्रस्तुत नहीं होता-मूर्त आकार धारण कर ही वह काव्य अथवा कला रूप में ग्राह्य होता है। अतएव रचना-कौशल (भर्थात् व्युत्पत्ति और अभ्यास) का महत्व गौए होते हुए भी अनिवार्य है। इसी दृष्टि से कुन्तक ने स्वाभाविक प्रतिभा को मूर्धन्य पर स्थान देकर फिर बाद में व्युत्पत्ति औ्रर अभ्यास को भी उसके द्वारा अनुशासित मान लिया है और इस प्रकार वे भी काव्य के अनिवार्य हेतु बन गये हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि क्रोचे ने जहाँ केवल आन्तरिक क्रिया-आध्यात्मिक सृजन, अथवा पारिभाषिक शब्दावली में सहजानुभूति को ही काव्य-सर्वस्व माना है वहाँ कुन्तक ने इस आध्यात्मिक क्रिया अथवा प्रातिभ अन्त स्फुरण को काव्य का मूल उद्गम मानते हुए रचना-कौशल को भी अपने कवि- व्यापार का अनिवार्य अग माना है। यह दार्शनिक की तत्व-दृष्टि और शास्त्रकार की व्यवहार-दृष्टि का भेद है।

४. क्रोचे के अनुसार सौन्दर्य और उसकी प्रतिरूप अभिव्यजना अपना उद्दश्य आ्राप ही है: आनन्द उसका सहचारी भाव तो है, परन्तु उद्दश्य नहीं है। कुन्तक श्र्ानन्द को सौन्दर्य की सिद्धि ही नहीं वरन् कारण भी मानते है। सौन्दर्य

१ ऐक्सटरनला इजेशन

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वकरोक्ति। भमिका /२४७

का निर्सायक धर्म उसका आह्लादकत्व हो है। उनके मत से अर्य की रमसीयता उसके सहृदय-प्राह्लादकारित्व में हो निहित है-भ्ररयं सहृदयाह्लादक।रिस्वस्पन्दसुन्दर । शह-क्रोचे के अनुसार काव्य का उद्दश्य है आत्मा का विशदीकरण, किन्तु कुन्तक परम आनन्दवादी है. वे आनन्द को चतुर्वर्गफलास्वाद से भी बढकर मानते हैं।

५. वस्तु-तत्व के विषय में भी दोनों में पर्याप्त मतभेद है। क्रोचे के सिद्धान्त की अपेक्षा कुन्तक के सिद्धान्त में वस्तु-तत्व की श्रधिक स्वीकृति है। क्रोचे तो उसे अरूप सवेदन-जाल या प्रकृत सामग्री मात्र मानते हैं जिसका अभिव्यजना के बिना फाव्य में कोई प्रस्तित्व नहीं है। कुन्तक भी विषय की अपेक्षा उसके नियोजन को ही अधिक महत्व देते हैं, परन्तु वे विषय के महत्व को अस्वीकार नहीं करते। उनकी प्रबन्ध-वक्रता में वस्तु तथा रस का महत्व श्नेक रूपों में स्वीकृत है औ्रौर उघर वस्तु-वक्रता का सौन्दर्य तो वस्तु पर ही माश्रित है।

इस प्रकार क्रोचे के अभिव्यंजना-सिद्धान्त का वक्रता के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है। वह वास्तव में अभिव्यंजना का दर्शन है, काव्यशास्त्र है भी नहीं। परन्तु यूरोप में जल्दी ही उसके आधार पर अभिव्यंजनावाद नाम से एक कला-सम्प्रदाय उठ खड़ा हुआ। इस सम्प्रदाय के नेताओं में स्वभावत. क्रोचे की प्रपेक्षा अघिक जोश था और उस जोश में उन्होंने अभिव्यंजना-सिद्धान्त का अ्खण्ड एवं तत्व रूप में ग्रहस न कर खण्ड रूप में व्यावहारिक घरातल पर प्रयोग करना आारम्भ कर दिया। क्रोचे का सिद्धान्त तो एक सार्वभोम मौलिक सिद्धान्त था जो काव्य मोर कला के सभी रूपों तथा सभी देशों और कालो के कवि-फलाकारों पर समान रूप से घटित होता था, परन्तु उनके अनुयायी (पिरांडेलो आदि) अभिव्यजनावादी नाटक, कविता, चित्र आदि को रचना करने लगे। यह सब क्रोचे के सिद्धान्त के प्रतिकूल था। इन लोगों ने वास्तव में क्रोचे के सिद्धान्त की मूल धारणा को ग्रहण न कर उसके कतिपय निष्कर्षो को हो ग्रहर कर लिया। करोचे का एक निष्कर्ष यह था कि प्रत्येक उक्ति अपने आप में स्वतन्त्र, अन्य से भिन्न तथा अद्वितीय होती है, और दूसरा निष्कर्ष यह था कि सहजानुभूति अनिवायत विम्ब रूप में ही अ्रभिव्यक्त होती है, तीसरा यह था कि कला अपना उरद्दश्य आप है। इन खण्ड सिद्धान्तों को लेकर वीसवों शती के प्रथम चरण में यूरोप के कला-जगत में (१) प्रभाववाद (२) विम्ववाद (३) घनवाद

१. इम्प्रेशनिजम २. इमेजिज्म ३ क्यूविज्म

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२४८ 1 भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रो़ि

(४) वकतावाद (५) अतिवस्तुवाद आदि अनेक सिद्धान्तों या सम्प्रदायों का आविर्भाष हो गया जिन्हें मनोविश्लेषएशास्त्र के अन्तर्गत अवचेतन-सम्बन्धी अन्वेषणों से उचित-अ्रनुचित पोषण मिलता रहा।

उपर्युक्त सभी वादों में सामान्य परम्परागत अभिव्यक्ति के विरुद्ध अ्रसामान्य अ्रभिव्यजना-प्रणालियो की किसी न किसी रूप में प्रतिष्ठा की गयी है औौर इस दृष्टि से इन में वक्रता-वैचित्र्य का अपना महत्व है। उदाहरण के लिए प्रभाववाद को लीजिए। इसका आविर्भाव तो यद्यपि उन्नीसवीं शती के अन्त में चित्रकला के क्षेत्र में हुआ था, परन्तु बीसवीं शती के आरम्भ में कर्मिंग्स, ऐमी लोवेल आदि के द्वारा साहित्य में भी इसका प्रवर्तन हो गया था। प्रभाववाद में अ्रन्त सस्कारों को अनूदित करने के निमित्त ही भाषा का प्रयोग किया जाता है। प्रभाववाद का मूल आधार है स्थायी तथा वास्तविक तथ्य के स्थान पर अस्यायी प्रतीति का अकन। प्रभाववादी वस्तु को वैसी ही अकित करता है जैसी कि वह क्षण विशेष में उसे प्रतीत होती है : वह उसके वास्तविक स्थायी रूप-आ्कार का चित्रण नहीं करता। इस प्रकार प्रभाववाद का उद्दश्य क्षणिगक प्रभावो को शब्द-बद्ध करना ही है, और इस उद्दश्य के प्रति उसे इतना शधिक आाग्रह रहता है कि तत्व और रूप लगभग उसके हाथ से निकल जाते हैं-केवल अन्त सस्कार रह जाते हैं। शैली के क्षेत्र में इन कवियो ने लेखन-सम्बन्धी विचित्रताओं तथा छन्द-पक्तियो की विषमताओं के अतिरिक्त कहीं अनमेल स्वतत्र शब्दो के योग और कहीं शब्दच्छेद आदि के द्वारा अभीष्ट 'प्रभाव' उत्पन्न करने का साग्रह प्रयत्न किया है।

दूसरा वाद था बिम्बवाद जो प्रभाववाद का ही ओरस पुत्र था। इस आग्ल- अमरीकी काव्य-आन्दोलन का समय बीसवीं शती का द्वितीय दशक था-और नेता थे ऐजरा पाउन्ड। इस सिद्धान्त का आविर्भाव स्वच्छन्दतावाद की प्रतिक्रिया रूप में हुआ था। बिम्बवाद की मूल धारणा यह है कि कला अथवा कविता का माध्यम केवल बिम्ब है : काव्यगत अनुभूतिया बिम्बों में ही प्रकट हो सकती है, साधारण व्याकरण- सम्मत भाषा कविता का सहज माध्यन नहीं है। अतएव ये स्पष्ट तथा निश्चित ऐन्द्रिय बिग्ब विधान को ही काव्य का मूल आधार मानते हैं। छन्द में इन्होंने इसी

४ प्रिंसिपल ऑ्फ ऑ्ब्लीक आर्ट ५. सुर-रियलिज़्म।

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पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति। भूमिका [ २४६

तथ्य को सामने रखकर नवीन लयों का आविष्कार करते हुए कविता को नवीन कलेवर प्रदान किया। इसी का एक सगोत्रीय घनवाद था, यह भी वास्तव में चित्रफला - का ही शब्द था जो बाद में काव्य में भी आा गया। इसका मूल सिद्धान्त यह है कि हम प्रत्येक वस्तु को घन रूप में ही देखते हैं जिसमें लम्बाई, चौड़ाई के साथ गहराई भी रहती है : यही वस्तु का समग्र ग्रहस है। चित्रकला तथा काव्यकला या अन्य फिसी भी कला में वस्तु का घन रूप में ही अकन होना चाहिए। इन वादों में सबसे नया है वफतावाद जिसका मूल आधार यह है कि प्रत्येक वस्तु पर हमारी दृष्टि तिरछी ही पड़ती है : अ्तएव यह तिरछापन या वक्रता ही हमारे वस्तु-दशन की स्वाभाविक विधि है। यह बाद भी श्रारम्भ में चित्रकला से ही सम्वद्ध था, परन्तु कमश काव्य में भी इसका प्रवेश हो गया। इसके अनुसार वक्रा ही हमारे ग्रहण और अरभिव्यंजन की सहज विधि है

इस विवेचन से स्पष्ट है कि ये सभी कला-सिद्धान्त केवल वक्रता ही नहीं अतिवक्रता का प्रतिपादन करते हैं-जिसमें विचित्रता तथा लोकातिक्रातगोचरता का अ्रतिचार मिलता है। शुक्ल जी के प्रहार का लक्ष्य वास्तव में ये ही अतिवाद थे। वे इन वैचित्र्यवादियों से इतने रुष्ट हो गये थे कि बेचारे क्रोचे और कुन्तफ पर वरस पडे। परन्तु क्रोचे इस प्रसंग में निर्दोष थे और कुन्तक ने भी कहीं किसी अतिवाद का समर्थन नहीं किया। क्रोचे के सिद्धान्त में तो वचित्य की ही स्वीकृति नहीं है-कुन्तक का वक्रता-वैचित्र्य भी श््चित्य पर पूर्णतया अवलग्वित है। कुन्तक की वक्रता सुन्दरता की ही पर्याय है जिसका आघार औचित्य है-जिसमें इन वैचित्र्यमुलक विफृतियों के लिए कोई स्थान नहीं है।

इगलंड के वर्तमान आलोचक आई०ए० रिचडस इन अतिवादों का खण्डन पहले ही कर चुके थे। उन्होंने स्वस्थ-प्रफृत चेतन मन को ही प्रमाण मानकर साधारण व्यावहारिक मनोविज्ञान के आघार पर काव्य-मूल्यो की स्थापना की। उन्होंने काव्य की अ्नुभूति में मानस-चित्रो तथा अभिव्यक्ति में चित्रभाषा को अनिवार्य माना और वादगत वक्रता-विफृतियों के स्थान पर शुद्ध वक्रता की प्रतिष्ठा की। उनका भाषा- विषयक वत्तव्य इसका प्रमाण है: 'किसी उक्ति का प्रयोग अर्थ-सकेत के लिए हो सकता है, यह अपर्थ-सकेत सत्य हो सकता है अथवा मिय्या। यह भापा का वैज्ञानिक प्रयोग है.किन्तु भाषा का प्रयोग उन भावगत तथा प्रवुत्तिगत प्रभावों के निमित्त भी हो सकता है जो शर्य-सकेतो से उत्पन्न होते हैं। यह भाषा का रागात्मक प्रयोग है।" (प्रिसिपिल्स ऑॉफ लिटरेरी क्रिटिसिक्म पृ० २६७-६८ )।

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२५० 1 भूमिका [ पाश्चात्य काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति

इन्हों दोनों भेदो को अन्य मनोवैज्ञानिकों ने शून्यभाषा और बिम्बभाषा२ या चित्रभाषा कहा है। भाषा का यह रागात्मक प्रयोग या चित्रभाषा स्पष्टतः कुन्तक की वक्रता के प्रथम चार भेदों-वर्ण-वक्रता, पदपूवार्ध-वक्रता, पदपरार्ध-वक्रता, तथा वाक्य-है वक्रता का सघात है। इसे काव्य का अनिवार्य माध्यम मान कर रिचर्ड्स आदि ने वक्रता को ही प्रकारान्तर से स्वीकार किया है।

यूरोपीय काव्यशास्त्र में वक्रता-सिद्धान्त की स्वीकृति-श्रस्वीकृति का, सक्षेप में, यही इतिहास है। काव्य-सम्प्रदाय के रूप में वक्रोक्तिवाद चाहे भारतीय काव्यशास्त्र तक हो सीमित रहा हो, परन्तु उसका आधारभूत सिद्धान्त काव्य का एक मौलिक सिद्धान्त है, अतएव उसकी सत्ता सार्वभौम है। वक्रता की प्रतिष्ठा वास्तव में कल्पनामूलक काव्यकौशल के साथ सम्बद्ध है. और इस रूप में यूरोप के काव्यशास्त्र में भी आरम्भ से ही, प्रकारान्तर से, उसका अत्यत मनोयोगपूर्वक विवेचन होता आया है।

(१) साइफर-लेग्वेज (२) इमेज-लंग्वेज़।

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हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

जंसा कि 'ऐतिहासिक विकास' प्रसग से स्पष्ट है, वक्रोतति-सिद्धान्त कुन्तक के साथ हो समाप्त हो गया था। उसका अतीत तो थोड़ा बहुत था भी, भविष्यत् कुछ नहीं रहा। संस्कृत काव्यशास्त्र में भी एकाघ शताब्दो के उपरान्त ही उसकी चर्चा समाप्त हो गई। मूलतः मलंकार की ही एक शाखा होने के कारण और साय हो वक्रोक्तिजीवितम ग्रन्थ के लुप्त हो जाने के कारण भी, चक्रोक्ति-सिद्धान्त के स्वतंत्र अस्तित्व का लोप हो गया। अतएव हिन्दी काव्यशास्त्र के लिए भी वक्रोक्तिवाद प्रज्ञात हो रहा।

परन्तु कुन्तक की वक्र्ता तो काव्य का कोई एक विशेष अ्रंग न होकर वस्तुतः कवि-ध्यापार का ही पर्याय है : उसकी स्थापना साहित्य में वैदग्व्य श्रथवा कविकोशल -आधुनिक शब्दावली में साहित्य के कला पक्ष को प्रतिष्ठा है। इस दृष्टि से हिन्दी साहित्य अथवा किसी भी साहित्य में वक्रता-सम्बन्धी चिन्तना का सर्वया अभाव नहीं हो सकता। हिन्दी रीतिशास्त्र में कुन्तक की वक्रता का चाहे उल्लेख न हुआ हो, परन्तु हिन्दी काव्य में तो आरम्भ से ही वक्रता-वभव मिलता है। हिन्दी के आदि काल में ही स्वयम्भू आदि अपभ्नश अथवा पुरानी हिन्दी के कवियो को लीजिए, चाहे चन्द आदि पिंगल-डिंगल के कवियो को, सभी में वक्रता के एक-दो नहीं समस्त भेद सरलता से उपलब्ध हो सकते हैं। स्वयम्भू तथा चन्द के प्रवन्ध का्व्यों में अ्रनुप्रासादि शब्दा- लंकारों में वर्ण-वक्रता, उपमादि अर्यालंकारों में वाक्य-वक्रता, वस्तु-चयन में वस्तु- वक्रता, लाक्षिक तथा व्यंजनात्मक प्रयोगों में पदपूर्वार्ध एवं पदपरार्ध-वक्रता और प्रवन्ध-विधान में प्रकर तथा प्रबन्ध-वक्रता के लगभग समस्त भेद-प्रकार मिलते हैं। स्वयम्भू ने तो आरम्भ में ही अपने कला-विधान को स्पष्ट कर दिया है-उनको निम्नोबुत प्रसिद्ध चौपाइयो में अ्रनेक वक्रता-भेदों का उल्लेख है :

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२५४] भूमिका [ हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

भनिति विचित्र सुकवि-कृत जोऊ। राम बिनु सोह न सोऊ।। परन्तु व्यवहार में वक्रता की उपेक्षा उन्होंने भी नहीं की। अपने काव्य के जिन गुरो के प्रति वे सचेष्ट हैं उनमें वक्रता का भी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों प्रकारो से उल्लेख है अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोइ पराग मकरन्द सुबासा। घुनि अवरेब कवित गुन जाती। मीन मनोहर से बहु भांती।। उपर्युक्त पक्तियों में 'अनूप अरथ' कुन्तक की वस्तु-वक्रता का पर्याय है, और अवरेब का स्पष्ट अर्थ वक्रता ही है। इस उद्धरण से यह सकेत मिल जाता है कि तुलसी वक्रता को भी काव्य के प्रसाधन के रूप में स्वीकार करते थे।

रीतिकाल

सगुण भक्ति के प्रौढि काल में ही रीतिकाव्य की परम्परा चल पड़ी थी-और केशय आदि आचार्यो के ग्रन्थों में विधिवत् काव्यशास्त्र का विवेचन आरम्भ हो गया था। रीतिकाल में भी यों तो रसवाद का ही प्राधान्य रहा, तथापि ध्वनि, रीति-गुए तथा अलकार की भी समय समय पर अवतारसा होती रही. परन्तु वक्रोक्तिवाद का नामोल्लेख तक किसी ने नहीं किया। रुव्रट के अनुकरण पर सस्कृत के परवर्ती काव्य- शास्त्र में वक्रोक्ति का स्थान वक्रीकृता उक्ति के अर्थ में शब्दालकार वर्ग के अतर्गत प्नतिम रूप से निश्चित हो गया था-हिन्दी के रीतिकार उसी का यथावत् अनुकरण करते रहे। केवल केशव इसका अपवाद थे जिन्होंने मम्मटादि का अनुसरण न कर प्राय पूर्वध्वनि आचार्यो का ही मार्ग-ग्रहण किया। उन्होंने वक्रोक्ति को वक्रीफृता उक्ति रूप शब्दालकार न मान कर वक्र अर्थात् विदग्ध उक्ति रूप अर्थालकार ही माना है। कविप्रिया के बारहवें प्रभाव में 'उक्ति' अलकार के पाँच भेदों का वर्णन है

वक्र, अन्य, व्यधिकरण कहि, और विशेष समान। सहित सहोकति में कही, उक्ति सु पच प्रमान ॥

इनमें से प्रथम भेद है वक्रोक्ति

केशव सूधी बात में बरणत टेढ़ो भाव। वक्रोकति तासो कहत, सदा सवै कविराब॥।

केशव के अनुसार जहा सीधी-सरल उक्ति में वक्र भाव व्यक्त किया जाय, वहा वक्रोक्ति होती है। अर्थात् ेशव की वक्रोक्ति का मूल आधार है विदग्धता जिसमें फेवल उत्ति-

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हिन्दी और वक्रोक्तिसिद्धान्त ] भूमिका [२५५

चमत्कार या शब्द-कौतुक न होकर भाव-प्रेरित वक्रा रहती है। उन्होंने वक्रोक्ति के दो उवाहरख प्रस्तुत किये हैं :

उदाहरण १

ज्यो-ज्यो हुलास सो केशवदास, विलास निवास हिये अवरेख्यो। त्यो-त्यो वढयो उर कप फछू भ्रम, भीत भयो किधौ शीत विशेख्यो। मुद्रित होत सखी बरही मम नैन सरोजनि साँच के लेख्यो। ते जु कह्यो मुख मोहन को अरविंद सो है, सो तो चन्द सो देख्यो।।

यहां खण्डिता की वचन वक्रता है। खण्डिता नायिका अपनी सखी से कहती है कि तू ने मोहन के मुख को अरविन्द के सदृश वताया था-परन्तु पर-नायिका के कज्जल आदि चिह्नों से युक्त वह तो मुझे (कलकयुक्त) चन्द्रमा के समान प्रतीत हुआ क्योकि एक तो उसका दर्शन कर मुझे मानो शीत के कारण कम्प हो गया और दूसरे मेरे नेत्र-फमल वरवस मुद गये। प्रस्तुत उक्ति में विदग्धता अर्थात् वाँकपन का भी * अभाव नहीं है; परन्तु प्राधान्य वस्तुत शब्द और अर्य के उन चारु चमत्कारों का ही है जिनका विवेचन कुन्तक ने अपने कतिपय वक्रता-भेदो के अन्तर्गत किया है।

उदारहण २

अरग अली घरिय अंगियाऊ न आजु तें नीद न आवन दीजै। जानति हो जिय नाते सखीन के, लाज हू को तब साथ न लीजं। थोरेहि द्योस ते खेलन तेऊ लगी उनसो, जिन्हे देखि के जीज। नाह के नेह के मामले आपनी छाँहहु को परतीति न कीज।।

सामान्यत तो इस उत्ति में सखी की वचना पर मार्मिक व्यग्य है किन्तु उसका आधार मूलत कुन्तक की लिंग-वक्रता का चमत्कार ही है।

केशय के परवर्तो अधिकाश आचार्यों ने वक्रोक्ति को शब्दालकार ही माना है औरौर खद्रट के आधार पर उसके काकु और इलेष दो भेद किये हैं।

चितामणि. और भाँति को वचन जो और लगाव कोइ। के सलेष कै काकु सो वक्रोकति है सोइ।। (फविकुलकल्पतरु २।५)

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२५६ ] भूमिका [ हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

जसवन्तसिंह वक्रोक्ती स्वर श्लेष सो अर्थ-फेर जो होइ, रसिक अपूरब हौ पिया, वुरो कहत नहिं कोइ। (भाषाभूषण-अलकार संख्या १८६).

भूषण जहा श्लेष सो काकु सो, अरथ लगावै और। वक्र उकति वाको कहत, भूषन कवि-सिरमौर॥ (शिवराज भूषण पृ० १२७)

दास व्यर्थ काकु ते अर्थ को, फेरि लगाव तर्क। वक्र उक्ति तासौं कहे जे बुध-अम्बुज-अर्क। (काव्यनिर्णय पृ० २०८)

देव काकु बचन अ्श्लेप करि, और अरथ ह्वं जाइ। सो वक्रोक्ति सु बरनियँ, उत्तम काव्य सुभाइ॥ (भाव विलास पृ० १४८)

जसवन्तसिंह तथा भूषण ने वक्रोक्ति-विवेचन शब्दालकार के अन्तर्गत न कर अर्थालंकार के अन्तर्गत ही किया है और उघर दास ने भी ्लेषादि अलकार वर्ग के अन्तर्गत उसका निरूपण किया है। हिन्दी के इन आचार्यो ने स्वीकृत परम्परा का त्याग कर रुय्यक अथवा विद्याधर का अनुकरण क्यों किया यह कहना कठिन है- परन्तु यह असदिग्ध है कि इस वर्गीकरण का मूल स्रोत रुम्यक का अलकार-सर्वस्व हो है जिसमें रुय्यक ने रुद्रट की परिभाषा को यथावत् ग्रहण करते हुए भी वक्रोक्ति को अर्थालकार माना है। परवर्ती रीतिकारों ने भी इसी परिभाषा की पुनरावृत्ति की है। सभी ने शब्दभेद से ही यही कहा है कि काकु और श्लेष के आधार पर उक्ति के वक्रीकरण का नाम वक्रोक्ति है।

रीतियुग के लक्ष्य काव्य में अवश्य, कुन्तक की वक्रता का सुष्ठ प्रयोग मिलता है। इस युग के अधिकाश समर्थ कवियो की रचनाओ में वर्ण-वक्रता, पद-वक्रता तथा वाक्य-वक्रता की छटा दर्शनीय है। खण्डिता तथा वचन-विदग्धा एव क्रिया-विदग्घा नायिकाओं को उक्तियों में वैदग्ध्य का भी अपूर्व चमत्कार है। बिहारी ने तो बाकपन को और भी आग्रह के साथ ग्रहण किया है। जैसा कि मैंने अन्यत्र स्पष्ट किया है वक्रता वस्तुत ध्वनि का व्यक्त रूप है .कल्पना का आत्मगत रूप ध्वनि है और वस्तु- गत व्यक्त रूप वक्रता है। बिहारी सिद्धान्तत ध्वनिवादी थे-अतएव उनकी अभि-

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हिन्दी और वक्रोक्ि-सिद्धान्त ] भूमिका [२५७

व्यजना में वांकपन का समावेश स्वत. ही हो गया है, और अपनी कविता की इस- 3 वक़ता या बाकपन के प्रति वे जागरूक भी थे :

गढ-रचना, वरनी, अलक, चितवनि, भौह, कमान। आघु वेकाई ही चढ, तरनि, तुरगम, तान।। (विहारी रत्नाकर ३१६)

अर्थात् दुर्ग-रचना, वरुनी, अलफ, चितवन, भाँह, कमान, तरुणी, तुरगम और तान (सगीत की तान) का अर्घ (मूल्य) दंकाई-वकिमा अथवा वक्रता-से ही बढ़ता है। यहाँ काव्य का उल्लेख नहीं है, किन्तु 'तान' में उसका अन्तर्भाय माना जा सकता है। वस्तुत. उपर्युक्त दोहे में वरुनो, अलक, चितवन, तरुणी और तान ये सौन्दर्य के विभिन्न रूपो के उपलक्षण हैं, और गढरचना तथा तुरगम ओज के। अतः यह निष्कर्ष निकालना स्वाभाविक ही है कि विहारी की दृष्टि में सौन्दर्य का पूर्ण उत्कर्ष वक्रता द्वारा ही होता है। इस वाँकपन के लिए वास्तव में विहारी के मन में बड़ा मोह या.

तिय कित कमनैती पढी, विनु जिहि भौह-कमान। चल चित बेभ चुकति नहिं वक विलोकनि-वान।। (३५६) अनियारे दीरघ दृगनु किती न तरुनि समान। वह चितवनि और कछू जिहिं वस होत सुजान ।। (५5८) कियौ जु, चिबुक उठाइ के, कपित कर भरतार। टेढीयै टेढी फिरति टेढॅ तिलक लिलार।। (५१८) विहारी के प्रतिद्वन्द्वी देव का दृष्टिकोण इसके विपरीत था : स्वभाव से अत्यन्त भावक यह कवि वकता का प्रेमी नहीं था। इसीलिए उसने शब्द-शक्तियों में अभिघा को और अलकारो में उपमा और स्वभाव को ही प्रधानता वी है १ अभिधा उत्तम काव्य है 1

(२) अलकार में मुस्य हैं, उपमा और सुभाव। सकल अलकारनि विपै, परसत प्रगट प्रभाव॥

उन्होने अभिधात्मक अर्थात् शुद्ध भावात्मक काव्य को सुघा के समान और व्यजना- वक्रता-मूलक काव्य को तिक्त्ी पेय के समान माना है। इसका यह अय नहीं है कि

(१) नलजीरा

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२५८ ] भूमिका [ हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

देव का काव्य वक्रता की सम्पदा से रिक्त है-हमारे कहने का अभिप्राय यही है कि शुद्ध रसवादी देव ने वक्रता को कोई स्वतत्र महत्व नहीं दिया. उनकी दृष्टि में हृदय। के रस का ही महत्व है, कल्पना-वैदग्ध्य का नहीं।

रीति युग के लक्ष्य काव्य में वक्रता का चरम विकास घनानन्द के कवितो में मिलता है। उनके सिद्धान्त औ्रर व्यवहार दोनो में ही वक्रता की प्रतिष्ठा है।

सिद्धान्त-

(१) घन आानन्द बूभनि अक बसै, विलसै रिभवार सुजान धनी। (२) उर-भौन में मौन को घूंघट के दुरि बैठी बिराजति बात बनी। (३) सूछम उसास गुन बुन्यौ ताहि लखै कौन ? पौन-पट रँग्यौ पेखिरियत ग्ग-राग मैं। (४) भचिरज यहै और होत रग-राग मैं।

इन उद्धरणों में घनानन्द ने अत्यन्त मार्मिक शब्दो में काव्य में वक्रता के महत्व की स्थापना की है। (१) प्रीति (अर्थात् रस) बूझनि अथवा वक्रता-वैदग्ध्य के अक में आसीन होकर ही शोभा को प्राप्त करती है। (२) उत्ति हृदय के भवन में अपने सौन्दर्य को छिपाये बैठी रहती है-अर्थात् उक्ति का सौन्वर्य भाव-प्रेरित व्यजना में ही है। (३) वाणी तो सूक्ष्म श्वासों से बुना हुआ अदृश्य वितान है यह वायवी पट भाव के रग में रंग कर ही वृश्य रूप धारण करता है। अर्थात् अरूप वाणी भाव को प्रेररा से चित्रमय बन जाती है। (४) यह सामान्य वारगी भाव के रग में एक विचित्र ही रूप धारण कर लेती है।

व्यवहार-

१ लाजनि लपेटी चितवनि भेद-भाय-भरी, लसति ललित लोल चख-तिरछानि में। छवि को सदन गोरो बदन रुचिर भाल, रस निचुरत मीठी मृदु मुसकानि मैं। दसन-दमक फैलि हिये मोती माल होति, पिय सो लडकि प्रेम-पगी वतरानि मैं। प्रानन्द की निधि जगमगति छतीली वाल, मगनि अनग रग ढुरि मुरिजानि मैं।

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हहन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त ] भूमिका [ २५६

इस पद में सौन्दर्य के जिस रूप का वर्गन है उसमें बकिमा के चमत्कार का हो प्राधान्य है। चितवन भेद-भाय-भरी है, दृष्टि कटाक्ष-्युक्त है और गति में बंकिमा है।

२ बदरा वरसैं रितु मैं घिरिके नितही अखियॉ उघरी बरसें।

३ उजरनि वसी है हमारी श्रँखियानि देखौ सुवस सुदेस जहाँ रावरे वसत हौ। ४ भूळ की सचार्ड छाक्यो त्यो हित कचाई पाक्यो, ताके गुन गन घनआानद कहा गनौं।

५ मति दौरि थकी न लहै ठिक ठीर अरमोही के मोह-मिठास ठगी।

उपर्युक्त पंक्तियों की रेखाकित शब्दावली में वक्रता का चमत्कार स्वत स्पष्ट है, अ्रतएव उसका व्यास्यान अनावश्यक है। बिहारी तया घनानन्द और उनके पूर्ववर्ती मुवारक आदि कवियों के काव्य में भारतीय संस्कारो के अतिरिक्त फारसी का भी गहरा प्रभाव है श्रोर यह वक्रता-विलास, यह उत्ति-वचित्र्य, बात का यह वाकपन बहुत कुछ उसी का परिलाम है।

रीतिकाल के उपरात जो रीति-परम्परा चलती रही, उसमें वक्रोक्ति-विषयक कोई नवीन उद्धावना नहीं हुई। कविराजा मुरारिदान, सेठ फन्हैयालाल पोदार, सेठ अर्जुनदास केडिया, मिश्रबन्धु आवि प्राय. समस्त आघुनिक रीतिकारो ने वक्रोक्ति को उसी रूप में ग्रहणा किया है जिस रूप में उनके पूर्ववर्ती आचार्यों ने किया था। परिभाषा सभी की वही है.

१ सेठ कन्हैयालाल पोद्दार "किसी के कहे हुए वाक्य का किसी अन्य व्यक्ति द्वारा-इलेष से अथवा काकु-उक्ति से-अ्रन्य अर्थ कल्पना किये जाने को वक्रोक्ति अलंकार कहते हैं। अर्थात् वक्ता ने जिस अभिप्राय से जो वाक्य कहा हो, उसका श्रोता द्वारा भिन्न अर्थ कल्पना करके उत्तर दिया जाना। भिन्न अर्थ की कल्पना वो प्रकार से हो सकती है-इलेष द्वारा और काकु द्वारा। अत. वक्रोक्ति के दो भेद हैं-श्लेष-वक्रोक्ति और काकु-वक्रोक्ति। (अलकारमजरी पृ० ४)।

२ मिश्रवन्धु (१ शुकदेवविहारी मिश्र तथा प० प्रतापनारायण मिश्र) वक्रोक्ति-में दूसरे की उक्ति का अर्थ काकु या श्लेष से बदला जाता है। वक्रोकि शब्दालंकार तथा अर्थालंकार दो प्रकार की-वक्रोक्ति दो प्रकार फी होती है, एक

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२६० J भूमिका [ हिन्दी औरर वक्रोक्ति-सिद्धान्त

शब्द-वक्रोक्ति, दूसरी शर्थ-वक्रोक्ति। जहाँ शब्द बदल देने से यह अलकार न रहे वहाँ शब्द-वक्रोक्ति समझी जायगी, जो कवियों ने शब्दालंकार का भेद माना है। नोट- हम वक्रोक्ति को अर्थालकार में मानते हैं। ऐसा मानने की तर्कावली श्लेष अलकार (न० २६) वाली ही है। X X अर्थात्-इस कारण जहाँ शब्द परिवर्तन से अलकार न रहे, वहाँ शब्दालकार वाला सिद्धान्त नहीं टिकता। इस हेतु यहाँ यह सिद्धान्त मानना चाहिए कि जहा सुनने में सुन्दर लगे, वहां शम्दालकार हो, और जहां अर्य विचारने में सौन्दर्य ज्ञात हो, वहां अर्थालकार। (साहित्य-पारिजात पृ० ३२३, ३२५, १७८) इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि वक्रोक्ति के सम्बन्ध में मूल धारणा में कोई परि- वर्तन नहीं हुआ। केवल इतना अन्तर अवश्य पड़ा है कि पं० शुकदेवबिहारी मिश्र आवि ने उसको शब्दालकारवर्ग के अन्तर्गत न रख कर अर्थालकारवर्ग के श्न्तगत ही रखा है। और यह वर्णन-क्रम मात्र का भेद नहीं है वे स्पष्टत तथा सकारण उसको अर्या- लकार मानते हैं. उनका तर्क है कि जो अलकार केवल श्रुति सुखद हो वह शब्दालकार है और जिरुके प्रर्थ में चमत्कार हो वह अर्थालकार। आधनिक मनोविज्ञान की शब्दावली में यह कहा जा सकता है कि जो अलकार वाक्चित्र मात्र उत्पन्न करने की क्षमता रखता है वह शब्वालकार है और जो मानस-चित्र भी उत्पन्न करता है वह अर्थालकार है: रिचर्ड्स ने पहले में सम्बद्ध मूर्तिविधान और दूसरे में स्वतत्र मूर्तिविधान की कल्पना की है। मिश्रद्वय का यह तर्क परम्परा-मान्य तर्क से भिन्न है। जैसा कि उन्होंने स्वय ही लिखा है, उन्हें प्राचीन आलंकारिकों का यह सिद्धान्त अ्रमान्य है कि जहा चमत्कार शब्द के आश्रित हो अर्थात् शब्द-परिवर्तन से जहा चमत्कार नष्ट हो जाए वहा शब्दालकार होता है, और जहा शब्द-परिवर्तन के उपरान्त भी चमत्कार यथावत् बना रहे वहाँ अर्थालकार होता है। यह स्थापना निश्चय ही साहसपूर्ण है और एकदम अग्राह्य भी नहीं है। वास्तव में तो यह समस्या श्लेष के कारण उत्पन्न हुई है जिसके विषय में सस्कृत के आलकारिको में प्रचण्ड विवाद चला है, और स्वतन्त्रचेता मिश्र जी ने अपने ढग से सामान्य विवेक के आधार पर इसका समाधान करने का प्रयत्न किया है। परन्तु उनका समाधान भी सर्वथा निर्दोष नहीं है। इस प्रकार यमक भी अर्या- लकार वर्ग के अन्तर्गत मा जाता है क्योंकि उसका चमत्कार भी केवल श्रवण मात्र से-अर्थ-ज्ञान के बिना-हृद्गत नहीं होता, पर स्वय मिशर जी ने उसे शब्दालकार माना है। अतएव परम्परा की अस्वीकृति से कोई विशेष सिद्धि नहीं होती। वक्रोक्ति को प्राचीनों ने इसी कारण से शब्दालकार माना है क्योकि उसका आधार शन्द- घमत्कार ही है : काकु में उच्चारण का चमत्फार है, श्लेष में शन्च-विशेष का। मिश्

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हिन्दी और वक्रोकि-सिद्धान्त 1 भूमिका [ २६१

जो के तर्कानुसार वक्रोक्ति का चमत्कार मूलत अर्य का ही चमत्कार है, इसलिए उसे सर्यालंकार ही मानना सगत होगा। इसमें सन्देह नहीं कि वक्रोक्ति का आश्रप चाहे सच्चारण-वक्रता हो या शब्द-विशेष परन्तु उसमें निश्चय ही व्यग्य का चमत्कार रहता है और ऐसी वशा में उसकी अर्यालकार-कल्पना भी सर्वया अनर्गल नहीं है। संस्कृत के रुय्यक, विद्यानाथ तथा अप्यय दीक्षित, और इघर हिन्दी के के जसवन्तसिंह भूषस आदि कतिपय आचार्यों ने भी उसे अर्यालकारवर्ग के अ्रन्तर्गत हो रखा है।

आधुनिक युग के आरालोचक

द्विवेदी युग में सस्कृत-हिन्दी की रीति-परम्परा से भिन्न पाशचात्य पद्धति पर आधुनिक हिन्दी आलोचना का जन्म हुआ। इस नवीन अलोचना-पद्धति में काव्य के प्राचीन और नवीन सिद्धातो तथा मूल्यो का समन्वय अथवा मिश्रण था। इसका प्रारम्भ तो भारतेन्दु के युग में ही हो चुका था, परन्तु सम्यक विकास द्विवेदी-युग में ही हुआ। पं० महावीरप्रसाद द्विवेदी के अतिरिक्त मिश्रवन्धु, पं० पद्मसिंह शर्मा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आदि ने आलोचना के सैद्वान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों पक्षों को ग्रहण किया-और अपने अपने ढंग से प्राचीन तथा नवीन काव्य एव काव्य-सिद्धान्तों का विवेचन किया। द्विवेदी जी ने मुस्यत. फाव्य के शिक्षा तथा आनन्द पक्षो को ही महत्व दिया है, परन्तु चमत्कार का भी अवमूल्यन नहीं किया। उन्होंने अपने अनेक निवन्धो में काव्य में कला-चमत्कार का समर्यन किया है और इस प्रकार वक्रता को मान्यता दी है :

"शिक्षित कवि को उत्तियो में चमत्कार होना परमावश्यक है। यदि कविता में चमत्कार नहीं-फोई विलक्षरता ही नहीं-तो उससे आनन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती। क्षेमेन्द्र की राय है-

'न हि चमत्कारविरहितस्य कवे. कवित्वं काव्यस्य वा काव्यत्वम्' यदि कवि में चमत्कार पैदा करने की शक्ति नहीं तो वह कवि कवि नहीं, और यदि चमत्कारपूर्ण नहीं तो काव्य का काव्यत्व भी नहीं। भर्थात् जिस गद्य या पद्य में चमत्कार नहीं वह काव्य या कविता की सीमा के भीतर नहीं आ सकता। एकेन काव्यं चमत्कृतिपदेन विना सुवर्णम्। निर्दोषनेशमपि रोहति कस्य चित्ते लावण्यहीनमिव यौवनमगनानाम्।।

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२६२ । भूमिका । हिन्दी और धक्रोक्ति-सिद्धान्त

काव्य चाहे कैसा भी निर्दोष क्यो न हो, उसके सुवर्ण चाहे कैसे ही मनोहर क्यों न हों-यदि उसमें अनमोल रत्न के समान कोई चमत्कारपूर्ण पद न हुआ तो वह, स्त्रियों के लावण्य-हीन यौवन के समान, चित्त पर नहीं चढ़ता।

एक विरहिणी अशोक को देखकर कहती है-तुम खूब फूल रहे हो, लताएं तुम पर बेतरह छाई हुई हैं, कलियो के गुच्छे सब कहीं लटक हे हैं, भ्रमर के समूह जहा तहां गु जार कर रहे हैं। परन्तु मुझे तुम्हारा यह आडम्बर पसन्द नहीं। इसे हटाओ। मेरा प्रियतम मेरे पास नहीं। अत्एव मेरे प्राण कण्ठगत हो रहे हैं। -

इस युक्ति में कोई विशेषता नहीं-इसमें कोई चमत्कार नहीं। अतएव इसे काव्य को पदवी नहीं मिल सकती। अब एक चमत्कारपूर्ण उक्ति सुनिए। कोई वियोगी रक्ताशोक को देखकर कहता है-नवीन पत्तो से तुम रक्त (लाल) हो रहे हो, प्रियतमा के प्रशसनीय गुणों से मैं भी रक्त (अनुरक्त) हू। तुम पर शिलोमुख (भ्रमर आ रहे हैं, मेरे ऊपर भी मनसिज के धनुष से छूटे हुए शिलीमुख (बाग) आ रहे हैं। कान्ता के चरणों का स्पर्श तुम्हारे आनन्द को बढ़ाता है, उसके स्पर्श से मुझे भी परमानन्द होता है, अतएव हमारी तुम्हारी दोनों की अवस्था में पूरी-पूरी समता है। भेद यदि कुछ है । तो इतना ही कि तुम अशोक हो और में सशोक। इस उक्ति में सशोक शब्द रखने से विशेष चमत्कार आ गया। उसने 'अनमोल रत्न' का काम किया। यह चमत्कार किसी पिंगल-पाठ का प्रसाव नहीं और न किसी कार्व्यांग-विवेचक प्रन्थ के नियम- परिपालन का ही फल है।" (सचयन, पृ० ६६-६७)

२ यदि किसी कवि को कविता में केवल शुष्क विचारों का विजम्भण है, यदि उसकी भाषा निरी नोरस है, यदि उसमें कुछ भी चमत्कार नहीं तो ऊपर जिन घटनाओं की कल्पना की गई उनका होना कदापि सम्भव नहीं।

जो कवि शब्द-चयन, वाक्य-विन्यास और वाक्य-समुदाय के आकार प्रकार की काट-छाँट में भी कौशल नहीं दिखा अकते उनकी रचना विस्मृति के अन्धकार में अवश्य ही विलीन हो जाती है। जिसमें रचना-चातुर्य तक नहीं उसकी कवियशोलिप्सा विडम्बना-मात्र है। किसी ने लिखा है- 4

तान्यर्थरत्नानि न सन्ति येषा सुवर्णसघेन च ये न पूर्णा ते रीतिमात्रेण दरिद्रकल्पा यान्तीश्वरत्व हि कथ कवीनाम् ?

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हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त 1 भूमिका [ २६३

जिनके पास न तो अर्यं-रूपी रत्न ही हैं और न सुघर्ण-रूपी सुवर्ण-समूह ही वे कवियो की रीति मात्र का आश्य लेकर -- काँसे और पीतल के दो-चार टुकड़े रखने वाले किसी दरिद्र-कल्प मनुष्य के सदृश भला कहीं कवीश्वरत्व पाने के अधिकारी हो सकते है ?" (सचयन : भ्राजकल की कविता, पृ० १००-१०१ ) द्विवेदोजी का दृष्टिकोए सवंया स्पष्ट है। उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र तथा अगरेजी के उत्तर-मध्यकालीन आलोचना-सिद्धान्तो के सस्कार ग्रहणा किये ये। स्वभाव से वे नीतिवादी पुरुष थे किन्तु काव्य के आनन्द-तत्व से भी अनभिज्ञ नहीं थे। 'कान्ता- सम्मित उपदेश'-अथवा 'श्ह्हाद के माध्यम से शिक्षा' को ही वे काव्य का चरम लक्ष्य मानते थे। उनको दृष्टि में नीति-शिक्षा काव्य का मूल उद्दश्य है परन्तु वाक्- वैदग्ध्य के बिना उसकी पूर्ति सम्भव नहीं है। अतएव द्विवेदी जी के मत से वक्रता अथवा उत्तिचमत्कार सत्काव्य का अनिवार्य माध्यम है वह प्रात्मा नहीं है, परन्तु वाह्य व्यक्तित्व अ्रवश्य है। उनके उपर्युक्त उद्धरण (१) से यह सर्वथा स्पष्ट हो जाता है कि केवल मधुर भाव, या केवल उत्तम विचार काव्य के लिए पर्याप्त नहीं है। काव्य-विषय तो स्वर्ण-मात्र है, जव तक उसमें चमत्कार-रूपी अनमोल रत्न नहीं जड़ा जाएगा तव तक उसका सौन्दर्य नहीं चमकेगा : रत्न जड़ने की यही क्रिया कुन्तक की कविव्यापार- वक्रता है जिसे द्विवेदी जी, क्षेमेन्द्र के मतानुसार, सत्काव्य के लिए अनिवार्य मानते हैं।

यह तो सिद्धान्त की बात रही। व्यवहार में वस्तुत. वक्रता का इतना दुष्काल हिन्दी के किसी काव्य-युग में नहीं निलता जितना द्विवेदी युग में। स्वयं द्विवेदी जो तया उनके प्रभाव से समसामयिक कवियो ने भाषा की शुद्धि पर इतना अधिक बल दिया कि उसका लावण्य सवथा उपेक्षित हो गया। खडी बोली उस समय वैसे भी अर्ध-विकसित काव्य-भाषा थो-ह्विवेदी जी के कठोर नियंत्रण के कारण उसमें स्वच्छता और शुद्धता का समावेश तो हुआ किन्तु लावण्य का प्रस्फटन अ्रवरुद हो गया। परिणाम यह हुआ कि द्विवेदी यग की काव्य-शैली एकान्त अभिधात्मक तथा अवक्र हो गई। रामचरित उपाध्याय की कविता वक्रा के घोर पभाव का उदाहरण है। सिद्धान्तत. ये फवि चमत्कार अथवा उक्ति के वक्रता-वचित्रय से विमख नहीं थे; द्विवेदी जी की भाँति इन सभी की उसमें पूरी आस्था थी, परन्तु इनकी अपनी परि- सीमाएं थीं। वह काव्य के क्षेत्र में संक्रान्ति का काल था जिसमें सृजन की अपेक्षा निर्माण की प्रवृत्ति मधिक सजग थी, अत. चेष्टा और प्रयत्न के उस युग में सौन्द्य- दृष्टि के सम्यक् विकास तथा उससे उद्भूत वक्रना-वंभव के लिए अवकाश न था ;

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२६४ ] भूमिका [ हिन्वी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

इस युग में वक्रता को उचित प्रश्रय वस्तुत. प्राचीन काव्य के रसिक आचार्यों से ही मिला। इनमें पं० पद्मसिह शर्मा, कविवर जगन्नाथदास रत्नाकर तथा कवि श्री हरिभ्रौघ सर्व-प्रमुख थे। बिहारी-काव्य-रसिक प० पद्मसिंह जी तो वाकपन पर । सौ जान से फिदा थे .-

(१) "इस प्रकार के स्थलो में ऐसा कोई सवसर नहीं जहां इन्होंने 'बात में बात' पैदा न क़वर दी हो।" (बिहारी सतसई पृ० २५)

(२) आ्रप्राजकल का सम्भ्रान्त शिक्षित समाज कोरी 'स्वभावोत्ति' पर फिदा है, अन्य अलकारों की सत्ता उसकी परिष्फृत रुचि की आँख में काँटा सी खटकती है, और विशेषकर 'अतिशयोक्ति' से तो उसे कुछ चिढ़ सी है। प्राचीन साहित्य-विधाताओं के मत में जो चीज़ कविता-कामिनी के लिये नितान्त उपादेय थी, वही इसके मत में सर्वथा हेय है। यह भी एक रुचि-वचित्र्य का 'दौरात्म्य' है। जो कुछ भी हो, प्राचीन काव्य वर्तमान परिष्कृत सुरुचि के आदर्श पर नहीं रचे गये, उन्हें इस नये गज़ से नहीं नापना चाहिये, प्राचीनता की दृष्टि से परखने पर ही उनकी खूबी समझ में आ सकती है। 'सतसई' भी एक ऐसा ही काव्य है, बिहारी उस प्राचीन मत के अनुयायी थे जिसमें 'अतिशयोत्तिशून्य' अलकार चमत्काररहित माना गया है। उपमा, उत्प्रेक्षा, पर्याय, शर निदर्शना आदि अलकार अतिशयोक्ति से अनुप्राणित होकर ही जीवनलाभ करते हैं-अतिशयोक्ति ही उन्हें जिला देकर चमकाती है, मनोमोहक बनाती है, उनमें चारुत्व लाती है-यह न हो तो वे कुछ भी नहीं, बिना नमक का भोजन, ताररहित सितार और लावण्यहीन रूप है।

'अतिशयोक्ति' के विषय में आ्पराचार्य 'भामह' की यह शुभ सम्मति है-

"सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयार्थो विभाव्यते। यत्नोऽस्या कविना कार्य कोऽलकारस्तया विना॥"

X X X

-अर्थात् फाव्य में सवत्र 'वक्रोक्ति' (श्रतिशयोक्ति) हो का चमत्कार है, यही अर्थ को चमकाकर दिखाती है, कवि को इसमें प्रयत्न करना चाहिये, सब अलकारो में एक इसी की करामात तो काम कर रही है। + ++ + पुराने काव्यों में 'नेघुरल सादगी'-(जिसे कुछ लोग 'स्वभावोक्ति' भी कहते है) के उदाहरण कुछ कम नहीं है। पर उनमें भी कुछ निराला चमत्फार है। 'तेरे चेहरे पर भाँह के नीचे

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हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त। भूमिका [२६५

आँखे है, और मुंह के भीतर दाँत है-इस क़िस्म को सादगी कविता की शोभा नहीं बढ़ा सकती-कविता का सिंगार या लंकार नहीं कहला सकती, यह आाँख और दाँत वाली बात साफ, सीधी औौर सच हो सकती है, कोई सादगीमसन्द सज्जन अपनी परिभाषा में इसे 'स्वभावोक्ति' भी कह सकते हैं, पर यह साहित्य-सम्मत 'स्वभावोक्ति' नहीं है।

नवीन आदर्श के अनुयायी काव्यविवेचक प्राचीन काव्यों का विवेचन करते समय इसे न भूलें, और यह भी याद रखें कि सब जगह 'सादगी' ही शदर नहीं पाती, 'कविता' की तरह और और भी कुछ चोजें ऐसी हैं, जहां 'वक्रता' (वाँकपन, वकई) ही क़दर और क़ोमत पाती है। बिहारी ही ने कहा है-

'गढ-रचना वरुनी अलक् चितवनि भौह कमान। आधु-वकई ही व (च)ढै तरुनि तुरगम तान ।।' [विहारी की सतसई पृ० २१७] (३) "अन्य कवियो की अ्रपेक्षा विहारी ने विरह का वर्सन बडी विचिन्नता से किया है, इनके इस वर्णन में एक निराला वांकपन-कुछ विशेष वक्रता है, व्यग्य का प्रावल्य है, अतिशयोक्ति का (जो कविता की जान और रस की खान है) और अत्युक्ति का अत्युत्तम उदाहरण है। जिस पर रसिक सुजान सौ जान से फिदा है। इस मजमून पर और कवियो ने भी खूब जोर मारा है, बहुत ऊँचे उडे हैं, बडा तूफान वाँघा है, क़यामत बरपा कर दी है, पर विहारी की चाल-इनका मनोहारी पद- सिन्यास सबसे अलग है। उस पर नीलकण्ठ दीक्षित को यह उत्ति पूरे तौर पर घटती है-

वक्रोक्तयो यत्र विभूपसानि वाक्यार्थवाध: परम प्रकर्प अर्थेपु वोष्येष्वभिषैव दोप सा काचिदन्या सरगि कवीनाम्।।१" (विहारी सतसई पृ० १६०) वक्ोक्ति-वाकपन ही जहा विभूपण है, वाक्या (च्या) र्थं का वाघ-शब्दो के सीधे प्रसिद्ध अ्र्य का तिरस्कार ही जहाँ अत्यन्त आदरणीय प्रवर्ष है। अभिधा शक्ति से वाच्यार्थ का प्रकट करना ही जहा दोप है, कवियो का वह व्यजना- प्रधान टेढा मार्ग सबसे निराला है।

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२६६ ] भूमिका [ हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

उपर्युक्त उद्धरणो के विश्लेषण का परिणाम इस प्रकार है -

(१) शर्मा जी प्राचीन वक्रतावादी आचार्यो-भामह आदि-की भौति वक्रोक्ति और अतिशयोक्ति को पर्याय तथा समस्त अलकार-प्रपंच का मूल आधार मानते हैं। कुन्तक का मत भी भामह के मत से मूलत भिन्न नहीं है। वास्तव में वह भामह के उक्त सिद्धान्त का हो पल्लवन है।

(२) वे स्वभावोक्ति के प्रति विशेष आरकृष्ट नहीं हैं-स्वभावोक्ति भी उन्हे अरपनी सादगी के कारण नहीं वरन् बाकपन के कारण ही काव्य-फोटि में ग्राह्य है।

(३ ) सस्कृत की शास्त्रीय परम्परा के अनुसार वे हैं तो रसष्वनिवादी1 ही, परन्तु रसघ्वनि के माध्यम रूप में वे वक्रोक्ति को भी कविता की जान तथा रस का आरराधार मानते हैं।

कविवर रत्नाकर ने सिद्धान्त तथा व्यवहार दोनों में ही वक्रता के प्रति प्रबल प्रकर्षण व्यक्त किया है। 'काव्य क्या है ?'-इसका विवेचन करते हुए उन्होंने लिखा है.

"यह बात तो सर्वमान्य तथा युक्तियुक्त है कि काव्य एक प्रकार का वाक्य ही है। अ्त इस विषय में विशेष लिखना अनावश्यक है। अब 'सामान्य वाक्य' तथा काव्य में जो मुख्य भेद है वह हम अपने मतानुसार संक्षेपत निवेदित करते हैं। सामान्य अर्थात् काव्पातिरित्त वाक्यों का उद्दश्य श्रोता को किसी वस्तु, घटना अथवा वतान्त आदि का बोध करा देना मात्र होता है। उस वाक्य से यदि श्रोता को किसी प्रकार का हर्ष अथवा विषाद उत्पन्न होता है तो उस वर्ण्य विषय के उसके निमित्त प्रिय अथवा अप्रिय होने के कारण वह हर्ष अथवा विषाद लौकिक मात्र होता है, अर्थात् श्रोता अथवा उसके पक्ष के लोगों के उससे लौफिक तथा व्यक्तिगत इष्टानिष्ट- सम्बन्ध के कारण होता है, जसे-'रावण मारा गया' इस वाक्य से राम के पक्षवालो को हर्ष तथा मदोदरी आदि को विषाद सम्भावित है। काव्य वाक्य का उद्देश्य, वर्रगन-वैदग्ध्य तथा वाकपटनावि के द्वारा श्रोताओ के हृदय में एक विशेष प्रकार का आनन्दोत्पादन होता है। वह आनन्द वगिगत विषय-जनित हर्ष विषाद से कुछ पृथक ही होता है। उसको साहित्यकारो ने 'अलौकिक' माना है, अर्थात् वह र्वणत

१ "इस प्रकार के रसघ्वनिवादी काव्य के निर्माता ही वास्तव में महाकवि' पद के समुचित अधिकारी हैं।" (ब्रिहारी की सतमई पृ० २१)।

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हिन्दी और धक्रोक्ति-सिद्धान्त 1 भूमिका [ २६७

विषय से श्रोता के इष्टानिष्ट सम्वन्ध के कारण नहीं होता। वह कवि के द्वारा किसी विषय को एक विशेष प्रकार से वशित करने के कारण सहृदय श्रोता के हृदय में उत्पन्न होता है। इसी अलौकिक श्राह्मादजनक ज्ञानगोचरता को पडितराज जगन्नाय ने 'रमणीयता' कहा है। वाक्य में उक्त रमणीयता के लाने के भिन्न भिन्न साघन तथा भिन्न भिन्न लक्षण स्वीकृत किये गए हैं। किसी आचार्य ने अलकार, किसी ने रीति, किसी ने रस, किसी ने वक्रोक्ति तथा किसी ने ध्वनि को काव्य के मुख्य लक्षस में परिगणित किया है। हमारी समभ में ये सब अलग अलग अ्रथवा मिल जुल कर रमणीयता लाने की मुरय निर्दिष्ट सामग्री मात्र है।" (कविवर बिहारी पृ० ३)

रत्नाकर जी का वक्तव्य भी स्पतःस्पष्ट ही है। उनके मतानुसार :-

रमणीय वाक्य का नाम काव्य है।

२. रमणीय वाश्य सामान्य वाक्य से भिन्न होता है। सामान्य वाक्य का प्रयोजन है वस्तु-ोध, और रमरीय वाक्य का उद्दश्य है चमत्कार की उत्पत्ति। यही प्राचीन आालकारिको की शव्दावली में वार्ता और वक्रता का भेद है।

३ यह चमत्कार काव्य-वस्तु से उत्पन्न नहीं होता।-काव्य-वस्तु से भी प्रानन्द की उत्पत्ति सम्भव है, परन्तु वह लौकिक होता है। काव्य-चमत्कार भलौकिक होता है जो कवि के वर्णन-कौशल पर निर्भर रहता है, और कवि का वर्णन-कौशल कुन्तक को कविव्यापार-वक्रता ही है।

४ रस, अलंकार, रीति, ध्वनि तथा वक्रोक्ति काव्य के तत्व हैं जिनके द्वारा काव्य के मूल आधार 'रमशीयता' का निर्माण होता है। इनमें से किसी एक को काव्य का प्रासतत्व मानना अ्सगत है-ये सभी मिल कर काव्य के 'रमसीय' रूप का निर्माण करते हैं।

इस विवेचन से यह व्यक्त होता है कि रत्नाकर जी समन्वयवादी आचार्य हैं जो समस्त काव्य-सम्प्रदायो के महत्व को स्वीकार कर उनको प्रतिस्पर्षी न मान कर परस्पर सहयोगी मानते हैं। वस्तुत आरज तर्क और विवेक के आधार पर यही मत मान्य भी हो सकता है, परन्तु क्या उपर्युक्त उद्धरण में वक्रता के प्रति उनका पक्षपात लक्षित नहीं होता? काव्य के चमत्कार को वस्तु से पृथक कवि के वर्णन-चातुर्म में मान कर वे भाव की अपेक्षा कला अथवा रस की अपेक्षा कविव्यापार-वक्रता को

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२६८ J भूमिका [ हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

ही प्रमुखता दे रहे हैं। और उनका अपना मुक्तक काव्य, जिसमें सूर और बिहारी दोनों के वाकवैदग्ष्य का चमत्कार एकत्र मिल जाता है, हमारे निष्कर्ष की पुष्टि करता है -

स्याम सहतूत लौं सलूनी रस-रासि भरी, सूघी ते सहस्रगुनी टेढी भौंह मीठी है। (शृगार लहरी-१२२ ) इस युग में वक्रता पर सबसे प्रवल प्रहार किया शुक्लजी ने। दर्शन और मनो- विज्ञान की सहायता से भारतीय रस-सिद्धान्त को सास्कृतिक-नैतिक आधार पर प्रति- ष्ठित कर शुक्लजी सर्वया आश्वस्त हो गये थे। अतएव श्रन्य काव्य-मूल्यो के लिए उनके मन में स्थान नहीं था. चमत्कार के प्रति वे विशेष रूप से निर्मम थे। उनका विश्वास था कि चमत्कार का सम्बन्ध मनोरंजन से है-'इससे जो लोग मनोरजन को ही काव्य का लक्ष्य मानते हैं, वे यदि कविता में चमत्कार ही ढूढ़ा करें तो कोई आशचय की सात नहीं।" 'परन्तु काव्य का लक्ष्य निश्चय ही कहीं गभीर तथा उदात्त है-और जो लोग इससे ऊँचा और गम्भोर लक्ष्य समझते हैं वे चमत्कार मात्र को काव्य नहीं मान सकते।'२ शुक्लजी की निश्चित धारणा थी कि चमत्कार या उक्तिवैचित्र्य काव्य का नित्य लक्षण नहीं हो सकता ऐसी अनेक मार्मिक उक्तिया हो सकती हैं जिनमें किसी प्रकार का वैचित्र्य अथवा वक्रता न हो, साथ ही ऐसी भी अनेक वक्र उस्िया उद्धत को जा सकती हैं जो चमत्कार रहने पर भी सरसता के प्भाव में काव्य-सज्ञा की अधिकारिणी नहीं है। शक्लजी ने अपनी पहली स्थापना की पुष्टि में पभ्माकर, मडन तथा ठाफुर की ये पक्तिया उद्धृत की हैं

१ नैन नचाय कही मुसकाय लला फिर आ्ाइयो खेलन होरी। (पभ्माकर)

२ चिर जीबहु नन्द को बारो अरी, गहि वाँह गरीव ने ठाडी करी। (मडन)

वा निरमोहिनी रूप की रासि जऊ उर हेतु न ठानति ह है। बारहि बार बिलोकि घरी घरी सूरति तो पहिचानति ह है। ठाकुर या मन की परतीति है जो पै सनेह न मानति ह है। आवत है नित मेरे लिए इतनो तो बिशेष के जानति ह है।। (ठाकुर)

शुक्लजी के मत से 'पद्माकर का वाक्य सीधा-सादा है, 'मण्डन ने प्रेम-गोपन के जो २ कविता क्या है? चिंतामणि भाग, पृ० १६८/

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हिन्वी शर वक्रोक्ति सिद्धान्त ] भूमिका [ २६६

वचन कहलाए हें वे ऐसे ही हैं जैसे स्वभावत. मुंह से निकल पड़ते हैं। उनमें विदग्वता 1 की अपेक्षा स्वाभाविकता कहीं अ्रधिक भलक रही है', और 'ठाकुर के सवये में भी अपने प्रेम का परिचय देने के लिए आतुर नये प्रेमी के चित्त के वितर्क की सधे-सादे शब्दों में, बिना किसी वैचित्र्य या लोकोत्तर चमत्कार के व्यजना की गई है।'- अर्थात् ये सभी उक्तियां वक्ता वँचित्र्य से रहित होने पर भी निश्चय ही सत्काव्य हैं, इनकी मारमिक रसव्यजना इनके काव्यत्व का प्रमाण है।

शुक्लजी की दूसरी स्थापना यह है कि भाव-स्पर्श के अभाव मे केवल उक्ति वचित्रय अ्रथवा चमत्कार काव्य नहीं है, और इसकी मुष्टि में उन्होंने केशवदास के कतिपय उद्धरण प्रस्तुत किये हैं :

पताका-

अ्र्प्रति सुन्दर अ्ति साधु। घिर न रहत पल आधु। परम तपोमय मानि। दण्डघारिणी जानि।।

इनके विषय में उनका निर्णय है कि ये पक्तियाँ मर्म का स्पर्श नहीं करतीं अतः कोई भावुक इन उत्तियों को शुद्ध काव्य नहीं कह सकता ?

इन युक्तियो का अभिप्राय यह नहीं है कि शुक्लजी वक्रता का सवया निषेध हो करते हैं। वे तो केवल वो तम्पो पर बल देते हैं : (१) वक्रता (या चमत्कार) अपने प्राप में काव्यत्व के लिए पर्याप्त नहीं है और (२) वक्रता काव्यत्व के लिए अनिवार्य भी नहीं है। किन्तु वक्रता-वचित्र्य के उपयोग को वे अवश्य स्वीकार करते हैं-भाव- प्रेरित वक्रता की उन्होने भी अत्यन्त उच्छ्वासपूर्ण वाशो में प्रशसा की है : 'भावोद्र क से उक्ति में जो एक प्रकार का बांकपन आ जाता है, तात्पर्य-कथन के सीघे मार्ग को छोड़ कर वचन जो एक भिन्न प्रणाली ग्रहण करते हैं, उसी की रमणोयता काव्य की रमरीयता के भीतर आ सकती है।' (भ्रमरगीत-सार की भूमिका पृ० ७१)। इस भाव-प्ररित वक्रोक्ति को वे काव्यजीवित भी मानने को प्रस्तुत हैं।

वास्तव में शुक्लजी रसानभूति की श्रणिया मानते हैं और उन्हों के आधार पर काव्य और सूक्ति में स्पष्ट भेद मानते हैं -"यह तो ठीक है कि काव्य सदा उत्ति-रूप ही होता है, परन्तु यह आवश्यक नही कि यह उक्ति सदा विचित्र, लोकोत्तर या श्रद्भुत हो। जो उत्ति अवसगत होते ही ोता को भावलीन कर दे वह फाव्य है,

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२७० ] भू मिका I हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

और जो उत्ति केवल कथन के ढग के अनूठेपन, रचना-वैचित्र्य, चमत्कार, कवि के श्रम या निपुणता के विचार में ही प्रवृत्त करे, वह है सूक्ति। काव्य से सच्ची रसानुभूति। और सूक्ति से निम्न कोटि की रसानुभूति होती है जो मनोरजन से मिलती-जुलती होती है।"

इस प्रकार 'वक्रोक्ति, काव्यजीवितम्' के सिद्धान्त के प्रति शुक्लजी का दृष्टि- कोए स्पष्ट हो जाता है "उक्ति की वहीं तक की वचन-भगी या वक्रता के सम्बन्ध में हमसे कुन्तलजी का "वक्रोक्ति काव्यजीवितम्" मानते 'बनता है, जहाँ तक कि वह भावानुमोदित हो या किसी मार्मिक अन्तर्वृति से सम्बद्ध हो, उसके आगे नहीं। कुन्तलजी को वक्रता बहुत व्यापक है जिसके अन्तर्गत वे वाक्य-वैचित्र्य की वक्रता और वस्तु वचित्रय को वक्रता दोनों लेते हैं। सालकृत वक्रता के चमत्कार ही में वे काव्यत्व मानते हैं। योरप में भी आजकल क्रोसे के प्रभाव से एक प्रकार का वक्रोक्तिवाद ज़ोर पर है। विलायती वक्रोक्तिवाद लक्षराप्रधान है। लाक्षणिक चपलता और प्रगल्भता में ही, उक्ति के अनूठे स्वरूप में ही, बहुत से लोग वहाँ कविता मानने लगे हैं। उक्ति ही काव्य होती है, यह तो सिद्ध बात है। हमारे यहाँ भी व्यजक वाक्म ही काव्य माना जाता है। अब प्रश्न यह है कि कैसी उक्ति, किस प्रकार की व्यजना करने वाला वाक्य? वक्रोक्तिवादी कहेंगे कि ऐसी उक्ति जिसमें कुछ वैचित्र्य या चमत्कार हो, व्यजना चाहे जिसकी हो, या किसी ठीक ठीक बात की न भी हो। पर जैसा कि हम कह चुके हे, मनोरजन मात्र को काव्य का उद्वेश्य न मानने वाले उनकी इस बात का समर्थन करने में श्रसमर्थ होंगे। वे किसी लक्षरणा में उसका प्रयोजन अवश्य ढूढेंगे।" (चिंतामरि पृ०

सक्षेप में वक्रोक्ति के विषय में शुक्ल जी की धारणाएँ इस प्रकार है

१. सत्काव्य में वक्रता का स्वतत्र महत्व नहीं है. (अ्र) वक्रता मात्र काव्य नहीं है और (आ) न वक्रता के अभाव में काव्यत्व की भ्त्यत हानि ही होती है अर्थात् वक्रता काव्य के लिए अनिवार्य भी नहीं है।

२ काव्य में वक्रता का महत्व तभी है जब वह भाव-प्रेरित हो। भाव-प्रेरित वक्रता निश्चय ही उत्कृष्ट काव्य है।

३ भाव-स्पर्शं से रहित केवल वक्र उक्ति सक्ति मात्र है सूक्ति से मनोरंजन के ढग की निम्न कोटि की रसानुभूति होती है।

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हिन्दी और वफोक्ति-सिद्धान्त ] भूमिका [ २७१

कुन्तक का वकोक्ति-सिद्धान्त वहीं तक मान्य है जहां तक वकोक्ि xभावानुमोदित रहती है : वक्रोक्तिवाद में जहां केवल चमत्कार की प्रतिष्ठा है अर्ात् उक्ति-वैचित्र्य का ही महत्व है विषय-वस्तु का नहीं, वहां गम्भीरचेता सहृदय उसका समर्थन नहीं कर सकता।

५. फुन्तक के वक्रोक्ति-सिद्धान्त और फ्रोचे के अभिव्यजना-सिद्धान्त का मूल आाषार एक ही है . उक्ति-वैचित्र्य।

विवेचन आाचार्य शपल के निप्कर्ष अत्यत प्रबल है। शुक्लजी रसवादी है- और उनका दृष्टिको वक्रोक्ि के प्रति लगभग वही है जो रसवादी का होना चाहिए। काव्य मूल रूप में भावना का ही व्यापार है, इसमें सदेह नहीं, अतएब भावना का अभाव निश्चय ही काव्यत्व का अ्रभाव है। इसलिए शुक्लजी का यह मन्तव्य सर्वथा अकाटय है कि केवल वक्रता काव्य नहीं है। केवल वक्रता से भी एक प्रकार का चमत्कार उत्पन्न होता है, परन्तु वह मनोरंजन की कोटि का होता है जो काव्य-जन्य परिष्कृत आ्नन्द की कोटि से अत्यन्त निम्नतर कोटि है। कुन्तक की भी यही धाररा है उन्होने मार्मिक भावस्पर्श से विरहित फोरे चमत्कार को हेय ही माना है।

तब फिर कुन्तक और शुफ्ल जी में क्या मतभेद है ? दोनो में वस्तुत एक ही मौलिफ मतभेद है और वह यह कि कुन्तक काव्य में वक्रता की स्थिति अनिवार्य मानते हैं, किन्तु शुक्ल जी नहीं मानते। फुन्तक का मत है सालकारस्य काव्यता; परन्तु शुकल जी का आ्रग्रह है कि वकता के बिना केवल मार्मिक भावस्पर्श के सद्भाव में भी काव्य की हानि नहों होती। इन में कौन-सा मत मान्य है ? हमारा उत्तर है कुन्तक का। यद्यपि हमें मूल सिद्धान्त शुक्लजी का ही ग्राह्य है, फिर भी प्रस्तुत प्रसंग में शुकलजी का तर्क मनोविज्ञान के विरुद्ध है। उन्होंने पद्माकर, मडन तथा ठाकुर की जिन उस्तियों को अपने मत की पुप्टि में उद्धृत किया है उनमें से एक में भी वक्रता . का प्रभाव नहीं है. पद्माकर की उक्ति तो व्यग्य से वक्र है, मउन की उक्ति में 'गरीब' शब्द में अपूर्व वक्रता है। ठाकुर की भावाभिव्यक्ति अपेक्षाकृत अ्धिक शुद्ध है, परन्तु उसमें भी वक्रता का अभाव देखना अलकारशास्त्र के मर्मझ्ञ के लिए सम्भव नहीं है· उदाहरण के लिए सबसे पहले तो 'बा' शब्द ही अर्थान्तरसक्रमितवाच्य ध्वनि (रूढिवचित्र्य-वक्रता) से वक्र है, फिर 'निरमोहिनी' तथा 'रूप की रासि' में पृथक् रूप १ जिंतामणि भाग २, पृ० २२०।

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२७२ ] भूमिका [ हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त

से विशेषण-वक्रता और सम्मिलित रूप से सूक्ष्म वैषम्यमूलक अलकार का चमत्कार भी उपेक्षणीय नहीं है। वास्तव में यह सम्भव ही नहीं है कि भाव के स्पर्श से वाणीE में कोई चमत्कार ही उत्पन्न न हो भाव की दीप्ति से भाषा अनायास ही दीप्त हो जाती है-चित्त की उदीप्ति से वाणी में भी उत्तेजना मा जाती है, और भाषा की यह वीप्ति अथवा वाणगी की उत्तेजना ही उसे वार्ता से भिन्न वक्रता का रूप प्रदान कर देती है। अतएव न तो उपर्युक्त उक्तियो में वक्रता का अभाव है और न किसी अन्य रमणीय उक्ति में ही सम्भव हो सकता है-मार्मिक उक्ति में वक्रता का निषेध मनोविज्ञान के स्वत सिद्ध नियम का निषेध है।

इसके अतिरिक्त शुक्लजी ने वक्रोक्तिवाद और अभिव्यजनावाद का एकीकरए कर दोनों पर वस्तु तत्व के तिरस्कार का आरोप लगाया है। वह भी ठीक नहीं है। एक तो वक्रोक्तिवाद और अभिव्यजनावाद का एकीकरण भी अमान्य है, दूसरे कुन्तक ने वस्तु-तत्व का तिरस्कार नहीं किया, जैसा कि स्वय शुक्ल जी ने भी माना है। कुन्तक ने वस्तु-वक्रता के रूप में वस्तु-तत्व के महत्व को स्पष्टतः स्वीकार किया है। क्रोचे भी आन्तरिक अभिव्यजना में ही वस्तु-तत्व का महत्व स्वीकार नहीं करते-बाह्य मूर्त अभिव्यजना में वस्तु-तत्व उनको भी सर्वथा मान्य है। इसके अ्प्रति- रिक्त सवेदन आदि के रूप में भी वस्तु-तत्व उन्हें ग्राह्य है। वास्तव में वस्तु-तत्व की ऐसी अवहेलना कि 'व्यजना चाहे जिसकी हो, या किसी ठीक-ठीक बात की न भी हो' कुन्तक ने तो की ही नहीं, क्रोचे ने भी इस सीमा तक नहीं की : हाँ क्रोचे के अनुयायी अरभिव्यजनावादियो ने अवश्य की है। शुक्लजी ने उनका दोष क्रोचे के माथे और सस्कृत तथा हिन्दी के चमत्कारवादियों का दोष कुन्तक के माथे मढ़कर काव्य की इस छिछली मनोवृत्ति के विरुद्ध अपना क्षोभ व्यक्त किया है। इस प्रकार उनका यह आरोपण बहुत कुछ मनोवैज्ञानिक है। एक कारण यह भी हो सकता है कि कदाचित् कुन्तक का ग्रन्थ तो उनको मूल रूप में उपलब्ध नहीं हुआ था, और क्रोचे का भी उन्होंने कदाचित् भामूल श्ध्ययन नहीं किया था।

छायायाद युग के प्रादुर्भाव के साथ हिन्दी साहित्य में वक्रता की एक बार फिर साग्रह प्रतिष्ठा हुई। आरम्भ में छायावाद के प्रवर्तको को वक्रता के प्रति इतना प्रबल आग्रह था कि आचार्य शुक्ल जैसे तत्वदर्शी आलोचक को भी उसे (छायावाद को) शैली का एक प्रकार मात्र मानने को बाध्य होना पडा। इसमें सन्देह नहीं कि आरम्भ में अन्य कविता से उसका भेदक धर्म बहुत कुछ शैलीगत वक्रता ही थी। परन्तु वास्तव में शैंलीगत वक्रता की स्थिति वस्तु-वक्रता के बिना असम्भव है, और प्रसाद, मुफुटधर

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दी और वकाक्ति-सिद्धान्त । भमिका [२७३

पाण्डेय, माखनलाल चतुर्वेदी आादि की आरम्भिक रचनाओं में इतिवृत्त के स्थान पर रमणीय भावमय वस्तु का ग्रहण भी इतना ही स्पष्ट है जितना अभिघात्मक शैली के स्थान पर वक्र शैली का।

छायावाद का युग वास्तव में वक्रता के वैभव का स्वर्ण-युग है। उसके समर्थ कवियो ने व्यवहार में जहा वक्रता का अपूर्व उत्कर्ष किया वहां सिद्धान्त में भी उसकी अत्यन्त मार्मिक रीति से प्रतिष्ठा की। प्रसादजी के विश्लेषण के अनुसार रीतिकविता में वाह्य वर्णन अर्थात् घटना या शारीरिक रूप आदि का प्राधान्य था नवीन कविता में भावना का प्राधान्य हुआ जो आंतरिक स्पर्श से पुरुकित थी। आम्यन्तर सूक्ष्म भावों की प्रेरणा से बाह्य स्यूल आकार में भी विचित्रता उत्पन्न हो गई और हिन्दी में नवीन शब्दों की भगिमा का प्रयोग होने लगा•'शब्दविन्यास पर ऐसा पानी चढ़ा' कि उससे अभिव्यजना में एक तडप उत्पन्न हो गई। अभिव्यक्ति के इस निराले ढग में अपना स्वतत्र लावण्य था। इसी लावण्य की शास्त्रीय प्रतिष्ठा में प्रयत्नशील प्रसाद की शोघप्रिय वृष्टि 'वक्रोततिजीवितम' पर भी पडी और उन्होने कुन्तक के प्रमाण देकर छायावाद की आप्तता सिद्ध की "इस लावण्य को सस्कृत-साहित्य में छाया और विच्छित्ति के द्वारा कुछ लोगो ने निरूपित किया था। कुन्तक ने वक्रोक्ति- जीवित में कहा है-

प्रतिभाप्रथमोद्भेदसमये यत्र चक्रता शन्दामिघेययोरन्त स्फुरतीव विभाव्यते।

शब्द और अर्थ की यह स्वाभाविक वकता विच्छिति, छाया और क्रान्ति का सृजन करती है। इम वैचित्र्य का सजन करना विदग्ध कवि का ही ाम है। वैदग्ध्य-भगी- भणिति में शब्द की वक्रता और अर्थ की वक्ता लोकोत्तीर्ण रूप से अवस्थित होती है। (शब्दस्य हि वक्रता अभिधेयस्य च वक्रता लोकोत्तीर्णेन रूपेणावस्थानम्-लोचन २०८) फुन्तक के मत में ऐसी भणिति शास्त्रादिप्रसिद्धशन्दार्थोपनिवन्धव्यतिरेकी होती है। यह रम्यच्छायान्तरस्पर्शी वक्रता वर्ण से लेकर प्रबन्ध तक में होती है। कुन्तक 3. के शब्दों में यह उज्जवल छायातिशय रमणीयता वक्रता की उद्धासिनी है। (काव्यकला तथा अन्य निबन्ध पृ० ६०) इस विवेचन से यह सिद्ध है कि प्रसाद जी कुन्तक की वक्रता को वास्तविक काव्य का श्रान्तरिक गुए मानते थे। रीतिकाल तथा द्विवेदी युग की कविता के विरुद जिस नवीन कविता का सृजन वे कर रहे थे वही उनके अपने मत से कविता का

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२७४ । भूमिका [ हिन्दी औरौर वक्रोक्ति-सिद्धान्त

सच्चा स्वरूप था और उसका आधार था भाव-भगिमा तथा शब्द भगिमा अर्थात् कुन्तक की शब्द-वकता तथा वस्तु-वक्रता। इस प्रकार वे कुन्तक की वक्रता को समग्र रूप में ग्रहण करते थे।

छायावाद में वक्रता के दोनो रूपो का-विदग्धता और चारुता दोनो का ही वैभेव मिलता है। प्रसाद तथा पत में जहाँ चारुता का चरम उत्कर्ष है, वहा निराला में विदग्धता का। महादेवी के प्रणय-काव्य में भाव-प्रेरित वक्रना का सुन्दर विकास है। वास्तव में छायावाद का कोष इतना समुद्ध है कि कुन्तक के नाना वक्रता-रूपो के जितने प्रचुर उदाहरण इस एक दशक की कविता में अनायास ही उपलब्ध हो जाते हैं उतने शताब्दियो तक प्रसारित काव्य-धारा में नहीं मिल सकते।

पत ने सिद्धान्त रूप में भी, नवीन विचारो के प्रकाश में वक्रता की व्याख्या में योगदान किया। इस प्रसग में काव्य-भाषा तथा अलकार के सम्बन्ध में उनके आार- म्भिक वक्तव्य उल्लेखनीय हैं·

१. "कविता के लिए चित्र-भाषा की आवश्यकता पडती है-उसके शन्द सस्वर होने चाहिए जो बोलते हो X X जो भकार में चित्र, चित्र X में भ्कार हों।"

२ "अलकार वाणगी की सजावट के लिए नहीं, + + वे वाणी के हास, प्श्रु, स्वप्न, पुलक, हाव-भाव हैं। (प्रवेश-पल्लव)। पहले उद्धर में पतजी कुन्तक की 'चित्रच्छाया मनोहराम् २।३४। और दूसरे में 'सालकारस्य काव्यता' को व्याख्या कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त 'पर्याय-वक्रता' का तो पत ने नये ढंग से अपूर्व व्याख्यान किया है वह केवल हिन्दी के लिए ही नहीं सस्कृत काव्यशास्त्र के लिए भी नवीन है।

छायावाद युग के आलोचकों में श्री लक्ष्मीनारायण सुघाशु तथा प्रो० गुलाबराय ने वक्रोक्ति का श्ररषिक विशद विवेचन किया है। एक तो छायावाद द्वारा काव्य में वक्रता का मूल्य अपने आप ही बहुत बढ़ गया था, दूसरे इन आलोचकों की दृष्टि नवीन के प्रति अधिक उदार थी। और तीसरे उन्होंने कदाचित् कुन्तक और क्रोचे दोनों का अधिक मनोयोगपूर्वक अध्ययन भी किया था क्रोचे का ये विधिवत् मनन कर चुके थे और कुन्तक की कृति भी तब तक अघिक सुलभ हो चुकी थी। इन सब कारणों से इनकी घाराए निश्चय ही अधिक स्पष्ट हैं। सुधाशु जी ने अपने ग्रथ

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हिन्दी और वक्रोक्ति-सिद्धान्त ] भूमिका [२७५

'काव्य में अभिव्यजनावाद' में वक्रोक्तिसिद्धान्त का पहले भारतीय काव्यशास्त्र की दृष्टि से, और आगे चलकर अभिव्यजनावाद की सापेक्षता में विवेचन किया है। इस ग्रथ में भारतीय काव्यशास्त्र की दृष्टि से वफोकि की परिभाषा, वक्रता के छह भेद, तथा रस, ध्वनि, अलकार से वक्रोक्ति का सम्जन्ध, आदि प्रश्नो पर सक्षेप में किन्तु विशदता से विचार किया है। इस प्रसग में सुधाशु जो के कतिपय निष्कर्ष ये हैं :

१ कुन्तक की वक्रोक्ति का आधार कल्पना है, यद्यपि इस शन्द का प्रयोग उन्होंने नहीं किया।

२ कुन्तक का वक्रोकितिसिद्धान्त भामह के अलकार-सिद्धान्त का ही परिष्कृत एव सुगठित नवीन रूप है।

३. वक्रता के आधार-तत्व लोकोत्तर वचिन््य का तद्विवाल्ल्ाद के साथ तादात्म्य कर कुन्तक रस-सिद्धान्त को मानने के लिए बाध्य-से हो जाते हैं।

४. कुन्तक ने ध्वनि-सिद्धान्त से कई बातें उधार की है।

अभिव्यंजनावाद के प्रसग में सुघाश जो ने शुक्ल जी के इस मत का युक्तिपूर्वक प्रतिवाद किया है कि अ्भिव्यंजनावाद वक्रोक्तिवाद का हो नया रूप या विलायती उत्यान है। उनके मत से दोनों की प्रकृति में ही भेद है। वक्रोक्ति का अलकार से घनिष्ठ सम्बन्ध है, किन्तु गभिव्यजना के लिए अलकार का स्वतन्त्र मूल्य नहीं है वक्रोक्ति में अलंकार सहगामी है, अभिव्यंजना में अनुगामी। अ्रभिव्यंजना में स्वभावोक्ति का भी मान है, परन्तु वक्रोक्तिवाद में उसके लिए कोई स्थान नहीं है।

सुघाशुजी के निष्कर्ष प्राय- मान्य ही हैं, कुछ-एक का संकेत उन्होने डा० सुशील कुमार डे से भी ग्रहण किया है। अभिव्यंजना और व्रोक्ति का यह पार्थक्य- विश्लेषण तत्व रूप में तो मान्य है हो परन्तु उसमें दो-एक भ्रान्तियां भी हैं। उदाहरण के लिए यह सत्य नहीं है कि वक्रोक्तिवाद में स्वभावोक्ति के लिए स्थान ही नहीं है। जंसा कि मैंने अन्यत्र स्पष्ट किया है कुन्तक स्वभावोक्ति की काव्यता का निषेध नहीं करते उसकी अलकारता-मात्र का निषेध करते हैं : उनकी वक्रता में स्वभाव का वड़ा महत्व है।

प्रो० गुलावराय ने इस तथ्य को और भी स्पष्ट किया है। उन्होंने भी वक्रोत्ति बाद तथा अभिव्यंजनावाद के ऐकात्म्य का निषेध किया है. "अब हम वेख सकते हैं कि

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२७६ | भूमिका हिन्दी औरप्रौर वक्रोक्ति सिद्धान्त

क्रोचे का 'उक्ति-वैचित्र्य' से कहां तक सम्बन्ध है? क्रोचे ने उक्ति को प्रधानता दी है, उक्ति-वैचित्र्य को नहीं, उसके मत से सफल अभिव्यक्ति या केवल अभिव्यक्ति कला है। 4 इसीलिए अभिव्यजनावाद और वक्रोक्तिवाद की समानता नहीं है जैसा कि शुक्लजी ने माना है।"

बाबूजी की भेद-विवेचना सुधाशुजी की विवेचना का अधिक विशद तथा परि- ष्कृत रूप है। उनके मत से "अभिव्यजनावाद में स्वभावोक्ति और वक्रोक्ति का भेद ही नहीं है। उक्ति केवल एक ही प्रकार की हो सकती है। यदि पूर्ण अभिव्य्त्ति वक्रोक्ति द्वारा होती है तो वही स्वभावोक्ति या उक्ति है, वही कला है। वार्ग्वैचित्र्य का मान वैचित्र्य के कारण नहीं है, वरन यदि है तो पूर्ण अभिव्यक्ति के कारण।"-अर्यात् अ्रभि- व्यजनावाद पर वक्रतावाद का आरोप करना इसलिए अनुचित है कि अभिव्यजनावाद में तो केवल उक्ति का ही महत्व है, यह उक्ति अखण्ड है, इसमें ऋजु और वक्र या प्रस्तुत-अ्रप्रस्तुत का भेद नहीं हो सकता।

वास्तव में स्थिति यही है-अभिव्यजनावाद और वक्रोक्तिवाद में मौलिक अन्तर है और वह यह कि अभिव्यजनगवाद में उक्ति का केवल एक ही रूप मान्य है- वह वक्र हो या ऋजु, उसमें वार्ता तथा वक्रता का भेद नहीं होता। परन्तु वक्रोक्तिवाद वार्ता से भिन्न विदग्ध उक्ति को ही काव्य मानता है। उपर्युक्त उद्धरण में बाबूजी ने वक्रोक्ति का विपरीत शब्द स्वभावोक्ति दिया है, परन्तु कुन्तक स्वभावोक्ति में वक्रता का निषेध नहीं करते, अतएव स्वभावोक्ति तथा वक्रोक्ति मे वैपरीत्य नहीं है · वैपरीत्य वस्तुत वार्ता और वक्रोक्ति में है।

छायावाद के उपरान्त प्रगतिवाद का प्रादुर्भाव हुआ। इसमें छायावाद के अन्य तत्वों की भाँति शैलीगत वक्रता-विलास का भी विरोध हुआ। स्वय पत जी यह कहने लगे कि

तुम वहन कर सको जन-मन मे मेरे विचार। वाणी मेरी क्या तुम्हें चाहिए अलकार ?

प्रगति-काव्य में विदग्ध चारुता के स्थान पर जन-मन को प्रभावित करने वाली 'खरी और खडी' शैली की माग हुई। वक्रता-विलास को दिमागी ऐयाशी ठहराया गया और लोकातिक्रान्तगोचरता को अस्वस्थ बूर्जुआ साहित्य का दम्भ मात्र मान कर एक असा- हित्यिक प्रवृत्ति घोषित किया गया। प्रगतिवादी आलोचक ने दावा किया कि भारत

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हिन्दी और वक्रोक्तिसिद्धान्त 1 भूमिका [२७७

का किसान पत को भाषा का प्रयोग सिखा सकता है। कुन्तक की विदग्घता त्राहि त्राहि 5 कर उठी। हा, वक्रता के दूसरे रूप का, जिसे अगरेज़ी में आयरनी कहते हैं, प्रगतिवाद में सम्मान अवश्य वढ़ गया-परन्तु उससे कदाचित कुन्तक का कोई घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं है।

प्रगतिवाद की सहगामिनी वर्तमान युग की अन्य प्रवृत्ति है प्रयोगवाद; यह यूरोप की नवीन वौद्धिक काव्य-प्रवृत्तियो से प्रभावित प्रवृत्ति है जो वस्तु तथा शैली- शिल्प दोनों के क्षेत्र में प्रयोग की अनिवार्यता पर बल देती है। यूरोप के प्रभाववाद, बिम्बवाद, प्रतीकवाद, अभिव्यजनावाद आदि, वादवचित्र्य का इस पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गहरा प्रभाव है। उपर्युक्त वादो की भांति हिन्दी का प्रयोगवाद भी अरप्रतिवक्रता से श्रराक्रान्त है 'यह चक्रना फेवल आ्रप्रातरिक ही नहीं है, वह प्राय. 'सोधी-तिरछी लकीरों, छोटे-वडे टाइप, सीधे या उलटे अक्षरों के विन्यास के द्वारा भी अपने को व्यक्त करती रहती है। मैं सोचता हू कि आज यदि कुन्तक जीवित होते तो इन चम- त्कारों से त्रस्त होकर अपने वक्रता-सिद्धान्त का ही त्याग कर देते।

छायावाद के वाद का यृग वास्तव में काव्य के ह्रास का यग है। सृजन की अन्त प्रेररा के अ्रभाव में इस युग के साहित्य पर बौद्धिकता का प्रभाव गहरा होता गया-परिमाणत आलोचना के अतिरित्त शेष साहित्यांग क्षीणा होते गये। आ्रालोचना के क्षेत्र में अवश्य अच्छी चहल-पहल रही है। एक श्रोर गम्भीर आलोचक छायावाद का मडन करते रहे हैं, दूसरी ओर नवीन आलोचक छायावादी मूल्यों के खण्डन और प्रगतिशील तथा बौद्धिक मूल्यो की प्रतिष्ठा में सलग्न है। काव्यशास्त्र में भी एक जहां नवीन वादो की विषय-वस्तु और शैली-शिल्प की आग्रह-पूर्वक चर्चा हो रही है और वहाँ दूसरी ओर प्राचीन काव्य-सिद्धान्तो को भी हिन्दी में प्रस्तुत करने का प्रयत्न चल रहा है। इन प्रयत्नों के फलस्वरूप वक्रोत्तिवाद पर भी विचार-विनिमय हुआ है। प्रस्तुत पक्तियों के लेखक ने 'रीतिकाव्य की भूमिका' में वक्रोत्ति-सिद्धान्त का अभिव्य- जनावाद तथा अन्य आधुनिक काव्य-सिद्धान्तों के प्रकाश में सक्षिप्त विवेचन किया है। 'रीतिकाव्य को भूमिका' की रचना के कुछ समय पश्चात् प० वल्देव उपाध्याय का प्रसिद्ध ग्रन्थ भारतीय साहित्यशास्त्र (भाग २ औौर भाग १) प्रकाशित हुआ। द्वितीय भाग में उपाध्याय जी ने वक्रोक्ति-सिद्धान्त का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है। वास्तव में हिन्दी में वक्रोक्तिवाद का यह प्रथम प्रामाणिक व्याख्यान है-विद्वान लेखक ने वक्रोक्ति के लक्षण, ऐतिहासिक विकास, वक्रोक्ति तथा अन्य सिद्धान्तो का पारस्प- रिक सम्बन्ध, वक्रोक्ति के भेद-प्रभेद आदि का विस्तार से वर्णन-विवेचन किया है।

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२७८ ] भूमिका । हिन्दी औ्रौर वक्रोत्ति-सिद्धान्त

उपाध्याय जी सस्कृत के मान्य विद्वान हैं, अतएव उनका निरूपण मूल ग्रन्थ पर प्रत्य- क्षत. आश्रित होने के कारण अत्यन्त विशद है। उपाध्याय जी के विवेचन के अपने गुए दोष हैं। तथापि हिन्दी में वक्रोत्ति-सिद्धान्त की समग्र रूप मे अवतारणा करने का शय वास्तव में उन्हीं को है. उनसे पूर्व वक्रोक्ति पर जो कुछ लिखा गया था वह डा० सुशीलकुमार डे तथा प्रो० कारे की भूमिकाओं पर ही आश्रित था। शुक्ल जी ने अ्रभिव्यंजनावाद के साथ उसकी तुलना कर उसके पुनरास्यान की एक नवीन दिशा की ओर तकेत किया था, परन्तु स्वयं शुक्ल जी का ज्ञान वक्रोक्ति के विषय में अत्यन्त सीमित तया असम्बद्ध-सा था। इसलिए उनके निप्कर्षों से वक्रोक्ति का स्वरूप तो अधिक स्पष्ट नहीं हुआ, वरन् कुछ भ्रान्तिया ही उत्पन्न हो गइ। इन सभी वातों को देसते हुए उपाध्याय जो का वक्रोक्तिवर्णन निश्चय ही अपना महत्व रख्ता है। उन्होने कुन्तक को हृवय से मान्यता प्रदान की है++ वक्रोक्ति काव्य का नितान्त व्यापक, रुचिर तथा सुगूढ तत्व है।'

इस प्रकार कुन्तक का वक्रोत्ति-सिद्धान्त घीरे घीरे हिन्दी काव्यशास्त्र का अग बनता जा रहा है। हिन्दी का आलोचक अब भारतीय काव्य-सिद्धान्तों का महत्व समकने लगा है और उसे यह अनुभव होने लगा है कि पाश्चात्य सिद्धान्तों के साथ भारत के प्राचीन सिद्धान्तो का पर्यालोचन भी काव्य के सत्य को हृद्गत करने में सहायक हो सकता है। परन्तु केवल प्राचीन की अवतारणा मात्र पर्याप्त नहीं है उसको आज की साहित्यिक चेतना में अन्तर्भूत करना पडेगा और उसकी एक मात्र विघि है पुनरा्यान।

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वक्रोक्ति-सिद्धान्त की परीक्षा

वक्रोक्ति-सिद्धान्त के अनेक पक्षो का विस्तृत विवेचन कर लेने के उपरान्त अररब उसकी परीक्षा एव मूल्याकन सरल हो गया है। वक्रोत्ति-सिद्धान्त अत्यन्त व्यापक काव्य-सिद्धान्त है। इसके अन्त्गंत कुन्तक ने एक ओर वर्-चमत्कार, शब्द-सौन्दर्य, विषय-वस्तु की रमणीयता, अप्रस्तुत-विधान, प्रबन्ध-कल्पना आदि समस्त काव्यागों का, और दूसरी ओर अलकार, रोति, ध्वनि तथा रस आदि सभी काव्य-सिद्धान्तों का समाहार करने का प्रयत्न किया है। कालक्रमानुसार अन्य सभी सिद्धान्तो का पश्चा- द्वर्तो होने के कारण वक्रोक्तिसिद्धान्त को उन सभी से लाभ उठाने का सुयोग प्राप्त था और उसके मेघावी प्रवर्तक ने निश्चय ही उसका पूरा उपयोग किया है। इस प्रकार कुन्तक ने वकोक्ति को सम्पूर्ण काव्य-सौन्दर्य के पर्याय रूप में प्रतिष्ठित किया है। काव्य-सौन्दर्य के समस्त रूप-सूक्ष्म से सूक्ष्म वर्ण-चमत्कार से लेकर अधिक से व्यापक रूप प्रबन्ध-कोशल तक सभी वक्रता के ही प्रकार है, इसी प्रकार अलकार, रीति (पदरचना), गुण, ध्यनि, श्चित्य तथा रस भी वक्रता के प्रकार-भेद अथवा पोषक तत्व हैं। अतएव वक्रोक्ति-सिद्धान्त का पहला गुण उसकी व्यापकता है।

वक्रोक्ति फेवल वाक्चातुर्य अथवा उत्ति-चमत्कार नहीं है, वह कवि-व्यापार अर्थात् कविकौशल या कला की प्रतिष्ठा है। आधुनिक आलोचनाशास्त्र की शब्दावली में वक्रोक्तिवाद का अर्थ कलावाद ही है।-अर्थात् काव्य का सर्च-प्रमुख तत्व कला या उपस्थापन-कौशल ही है। इस प्रसग में भी कुन्तक अतिवादी नहीं है। उन्नसवों- बीसवीं छती के पाश्चात्य कलावादियो की भाँति उन्होंने विषय-वस्तु का निषेध नहीं किया. उन्होंने तो स्पष्ट रूप में यह माना है कि काव्य-वस्तु स्वभाव से रमणीय होनी चाहिए अर्थात् काव्य में वस्तु के उन्हीं रूपो का वर्णन अभीष्ट है जो सहृदय- शाह्लादकारी हो। परन्तु यहां भी महत्व वस्तु का नहीं है, वस्तु का महत्व होने से तो 'कषि फहँ कौन निहोर ?' कवि का क्या महत्व हुआ? यहाँ भी वास्तविक मूल्य

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२८० भूमिका [ वक्ोक्ति सिद्धान्त की परीक्षा

वस्तु के सहृदय-रमसीय धर्मो के उद्धाटन का ही हैसामान्य धर्मों का अभिज्ञान तो जनसाधारण भी कर लेते हैं किन्तु विशेष सहृदय-आह्लादकारी धर्मो का उद्धाटन कवि का प्रातिभ नयन ही कर सकता है। अतएव महत्व यहा भी उद्धाटन या चयन रूप कवि-व्यापार का ही है, और यह भी कला ही है चाहें तो इसे आप कला का आन्तरिक रूप कह लीजिए, परन्तु है यह भी कला ही।

मनोमय जीवन के तीन पक्ष है (५) बोघ-पक्ष, (२) अनुभति-पक्ष और (३) कल्पना-पक्ष। इनमें से काव्य में वस्तुत अनुभूति और कल्पना-पक्ष का ही महत्व है- बोध-पक्ष तो सामान्य आधार मात्र है। प्रतिद्वन्द्वी सम्प्रदायों में इन्हीं दो तत्वो के प्राधान्य को लेकर विरोध चलता रहा है। रस-सम्प्रदाय में स्पष्टत अनुभूति का प्राधान्य है उसके अनुसार काव्य का प्राणतत्व है भाव, भाव के आधार पर ही काव्य सहदय को प्रभावित करता हुआ उसके चित्त में वासना रूप से स्थित भाव को आनन्द रूप में परिणत कर देता है। इस प्रकार काव्य मूलत भाव का व्यापार है। इसके विपरीत अलंकार सिद्धान्त में काव्य का आ्ह्हाद भाव की परिणति नहीं है वरन् एक प्रकार का कल्पनात्मक (मानसिक-बौद्धिक) चमत्कार है। रस-सिद्धान्त के अनुसार काव्य के आस्वाद में मूलत हमारी चित्तवृत्ति उद्दीपित होती है, परन्तु अलकार-सिद्धात के अनुसार हमारी कल्पना की उद्दीप्ति होती है। वक्रोक्ति-सिद्धान्त भी वास्तव में अल- कार-सिद्धान्त का ही विकास है अलकार में जहा कल्पना का सीमित रूप गृहीत है, वहा वक्रोक्ति में उसका व्यापक रूप ग्रहण किया गया है। अलंकार-सिद्धान्त की कल्पना का आधार कॉलरिज की 'ललित कल्पना' है और वक्रोक्तिसिद्धान्त की कल्पना का आधार कॉलरिज की मौलिक कल्पना है। इस प्रकार वक्रोक्ति का आधार है कल्पना वक्ोक्ति = कविव्यापार (कला) = मौलिक कल्पना। परन्तु यह कल्पना कविनिष्ठ है सहृदयनिष्ठ नहों है और यही ध्वनि के साथ वक्रोक्ति के मूल भेद का कारए है। ध्वनि की 'कल्पना' सहृदयनिष्ठ होने के कारण व्यक्तिपरक है। कुन्तक की कल्पना कविकोशल पर आशित होने के कारण काव्यनिष्ठ और अतत. वस्तुनिष्ठ बन जाती है।

कुन्तक की कल्पना अनुभूति के विरोध में खडी नहीं हुई। उनकी कला को रस का, और उनकी कल्पना को अनुभूति का परिपोष प्राप्त है। वक्रोक्ि और रस के प्रसग में हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि कुन्तक ने रस को वक्रोक्ति का प्राणरप माना है। अत. कुन्तक के सिद्धान्त में अनुभूति का गौरव अक्षुण्ण है। किन्तु प्रश्न सापेक्षिक

फैन्सी २ प्राइमरी इमेजिनेशन।

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वक्ोकिसिद्धान्त की परीक्षा । भूमिका [ २८१

महत्व का है। यों तो रस-सिद्धान्त में भी कल्पना का महत्व अतवर्य है। क्योकि विभानुभाव-व्यभिचारी का सयोग उसके द्वारा ही सम्भव है। वस्तुत कला और रम के सिद्धान्तों में मूल अन्तर कल्पना और अनुभूति की प्राथमिकता का ही है कला- सिद्धान्त में प्राणतत्त्व है कल्पना, अनुभूति उसका पोषक तत्व है; उघर रस-सिद्धान्त में मूल तत्व है अनुभूति, कल्पना उसका अरनिवार्य सावन है। यही स्यिति वक्रोति और रस की है-कुन्तक ने रस को वक्रता का सबसे समृद्ध अग माना है, परन्तु अगी वत्रता ही है। इसका एक परिणाम यह भी निकलता है कि रस के अभाव में भी वक्रता की स्थिति सम्भव है रस वक्रता का उत्कर्ष तो करता है, परन्तु उसके अस्तित्व के लिए सर्वथा अनिवार्य नहीं है। कुन्तक ने ऐसी स्यिति को अ्धिक प्रश्य नहीं दिया; उन्होने प्राय रस-विरहित धक्रता का तिरस्कार ही किया है। फिर भी वक्रोक्ति को काव्य-जीवित मानने का केवल एक ही अर्थ हो सकता है और वह यह कि उसका अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है : रस के बिना भी दक्रता की अपनी सत्ता है। और स्पष्ट शब्दों में, वक्रोक्ति सिद्धान्त के अनुसार ऐसी स्थिति तो आसकतो है जब काव्य रस के बिना भी वक्रता के सद्भाव में जीवित रह सकता है,' किन्तु ऐसी स्थिति सम्भव नहीं है जव वह केवल रस के आधार पर वक्रता के अ्भाव में भी जीवित रहे।

वुन्तक के वक्रोतति-सिद्धान्त के ये हो दो पक्ष हैं

इनमें से दूसरी स्थिति अधिक सम्भाव्य नहीं है क्योकि रस की दीप्ति से उक्ति में वकता का समावेश अनिवार्यत हो जाता है रस पथवा भाव के दीप्त होने से उक्ति अनायास ही दीप्त हो उठती है, और उक्ति की यही दीप्ति कुन्तक की वक्ता है। अतरव उक्ति में रस के सद्भाव में वकरता का अ्रभाव हो ही नहीं सकता-कम से कम फुन्तक की वकता का प्भाव तो सम्भव ही नहीं है। शुक्ल जी ने जहा इस तथ्य का निषेध किया है, धहा उन्होने वद्रता को स्थूल चमत्कार-शब्द-क्रीड़ा या अर्थ-कीड़ा अथवा परिगशित विशिष् अलकार के अर्थ में ही ग्रहण किया है। परन्तु कुन्तक की वक्ता तो इतनी सूक्ष्म और व्यपक है कि वह शुक्लजी के प्राय सभी तथ कथित वक्रताहीन उद्धरणों में अनेक रूपो में उपस्थित है। इसलिए काव्य में वक्रता की अनिवार्यता में तो सन्देह नहीं किया जा सकता, किन्तु वह होगी भाव- प्रेरित ही। ऐसी अवस्था में प्रायमिक महत्व भाव का ही हुआ्र्प्रा। १. इसमें सन्देह नही कि कुन्तक ने बार-बार इस स्थिति को बचाने का प्रयत्न किया है, परन्तु वह वच नही सकती अन्यथा 'वक्रोत्ति काव्यजीवितम्' वाक्य ही निरर्यक हो जाता है।

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भूमिका [वक्रोक्ति सिद्धान्त की परीक्षा

पहली स्थिति वास्तव में चिन्त्य है काव्य रस अर्थात् भाव-रमणीयता के अभाव में वक्रता मात्र के बल पर जीवित रह सकता है। भाव-सौन्दर्य से होन शब्द-4 क्रीडा या अर्थ-कोडा में निश्चय हो एक प्रकार का चमत्कार होता है, परन्तु वह काव्य का चमत्कार नहीं है क्योकि इस प्रकार के चमत्कार से हमारी कुतूहल-वृत्ति का ही परितोष होता है, उससे अतश्चमत्कार या आनन्द की उपलब्धि नहीं होती जो काव्य का अभीष्ट है। कुन्तक ने स्वय स्थान स्थान पर इस धारणा का अ्रनुमोदन किया है, परन्तु यहीं और इसी मात्रा में उनके वक्रोक्ति-सिद्धान्त का भी खण्डन हो जाता है। वक्रता काव्य का अनिवार्य माध्यम है यह सत्य है, परन्तु वह उसका जीवित या प्राण-तत्व है यह सत्य नहीं है। अनिवार्य माध्यम का भी अपना महत्व है : व्यक्तित्व के अभाव में आ्रत्मा की अ्रभिव्यक्ति सम्भव नहीं है, फिर भी व्यक्तित्व प्रात्मा अथवा जीवित तो नहीं है। यही वक्रोक्तिवाद की परिसीमा है और यही कलावाद की या कल्पनावाद की।

किन्तु वक्रोक्तिवाद की सिद्धि भी कम स्तुत्य नहीं है। भारतीय काव्यशास्त्र के इतिहास में ध्वनि के श्रतिरिक्त इतना व्यवस्थित विधान किसी अन्य काव्य-सिद्धान्त का नहीं है, और काव्य-कला का इतना व्यापक एव गहन विवेचन तो ध्वनि-सिद्धान्त के अन्तर्गत भी नहीं हुआ। वास्तव में काव्य के वस्तुगत सौन्दर्य का ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण केवल हमारे काव्यशास्त्र में ही नहीं पाश्चात्य काव्यशास्त्र में भी सर्वथा दुर्लभ है। कुन्तक से पूर्व वामन ने रीति-गुण, और भामह, दण्डी आदि ने अलकार तथा गए के विवेचन में भी इसी दिशा में सफल प्रयत्न किया था किन्तु उनकी परिधि सीमित थी वे पदरचना तथा शब्द-भ्रर्थ के स्फुट सौन्दर्य-तत्वो का विश्लेषण ही कर सके थे। कुन्तक ने काव्य-रचना के सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्व से लेकर अधिक से अधिक व्यापक तत्व का विस्तार से विवेचन प्रस्तुत कर भारतीय सौन्दर्यशास्त्र में एक नवीन पद्धति का उद्धाटन किया है। काव्य में कला का गौरव स्वत सिद्ध है, वस्तुत उसके मौलिक तत्व दो ही हैं रस और कला। इस दृष्टि से कला का विवेचन काव्यशास्त्र में रस के विवेचन के समान ही महत्वपूर्ण है। वक्रोक्ति सिद्धान्त ने इसी कला-तत्व की मार्मिक व्याख्या प्रस्तुत कर भारतीय काव्यशास्त्र में अपूर्व योगदान किया है।

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आचार्य कुन्तक-कृत

वक्रोक्तिजीवितम्

की

हिन्दी व्याख्या

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त्र्रामुख ग्रन्थ गाथा- इस ग्रन्थ के इसके पूर्व दो सस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इन दोनो संस्करणो का सम्पादन ढाका विश्वविद्यालय के संस्कृत-विभाग के अध्यक्ष श्रीयुत 'सुशीलकुमार दे' महोदय ने किया है। इनमें से पहिला संस्करण १६२३ में प्रकाशित हुआ था। उसमें केवल दो ही उत्मेष थे। दूसरा संस्करण १६२८ में प्रकाशित हुआ था। उसमें प्रथम दो उत्मेषों के अ्तिरिक्त तृतीय उन्मेष की दस कारिकाओ को सम्पादित रूप में औ्रर तृतीय उन्मेष के शेष भाग तथा चतुर्थ उन्मेष को असम्पादित परिशिष्ट के रूप में दिया गया था। इस प्रकार इन दोनों ही सस्कररगो में यह ग्रन्थ अपूर्णं ही रहा है। प्रयम सस्करण का सम्पादन कार्य 'शी सुशीलकुमार दे' महोदय ने योरोप में, प्रसिद्ध सस्कृत विद्वान् 'प्रो० जैकोवी' महोदय के सहयोग से किया था। सन् १६२० में मद्रास के हस्त लिखित पुस्तको के राजकीय पुस्तकालय की सूची में सबसे पहिले इस 'वकोक्तिजीवित' ग्रन्थ का नाम तथा परिचय प्रकाशित हुआ। उस समय श्रीयुत 'सुशील कुमार दे' महोदय 'इडिया आफिस लाइब्रेरी लन्दन' में कार्य कर रहे थे। उस विशाल पुस्तकालय के अ्ध्यक्ष श्रीयुत 'प्रो. एफ० डब्ल्यू० थामस महोवय' ने इस ग्रन्थ की ओर सुशीलकुमार दे महोदय का ध्यान विशेष रूप से आफर्षित किया। और उन्होने 'इण्डिया आफिस के द्वारा इस ग्रन्थ को ऋण रूप में प्राप्त करने का प्रयत्न भी किया। परन्तु उसमें उनको सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। तव 'डा० भामस' के विशेष प्रयत्न से मव्रास पुस्तकालय के अध्यक्ष महोदय ने उस ग्रन्थ की एक प्रमाशित प्रतिलिपि तैयार करवा कर १६२० में इग्लैण्ड में श्री 'दे' महोदय के पास भेज दी थी। परन्तु वह अत्यन्त प्शुद्ध थी। जिसके कारण कुछ समय तक वह यो ही रखी रही। उस पर कोई कार्य नहीं किया जा सका। इसी बीच में 'प्रा०जैकोबो' को यह मालूम हुआ कि सस्कृत अलद्गार-शास्त्र के * इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की प्रतिलिपि 'श्रीयुत दे महोदय' के पास है। तो उन्होने श्री 'दे' महोदय को बर्न-यूनिवर्सिटी में जहां कि 'श्री जैफोवी' महोदय कार्य कर रहे थे आने के लिए निमन्त्रित किया। और वहाँ बैठ कर श्री'दे'महोदय तथा 'जैकोवी' महोदय दोनों ने मिल कर प्रथम तथा द्वितीय दो उन्मेषों का सम्पादन किया। जब ये लोग तृतीय और चतुर्थ उन्मेष पर पहुँचे तो आगे का पाठ इन लोगो की समझ में न आ सका

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इसलिए उस अवशिष्ट भाग के सम्पादन-कार्य को स्थगित कर देना पडा। इस प्रकार इस ग्रन्थ के प्रथम तथा द्वितीय उत्मेष के सम्पादन का कार्य श्रीयुत 'जैकोवी' महोदय तथा श्रीयुत 'सुशीलकुमार दे' महोदय के सयुक्त प्रयत्न से पूर्र हो गया। परन्तु अ्रवशिष्ट भाग का सम्पादन मूल पाति के अत्यन्त अ्शुद्ध होने के कारण सम्भव न हो सका। सन् १६२२ में श्रीयुत 'दे' महोदय भारत लौट आए और कलकत्ता विश्व- विद्यालय में कार्य करने लगे। तब उन्होने एक फिर मद्रास पुस्तकालय से उस मूल प्रति को कलकत्ता विश्वविद्यालय के द्वारा उधार लेने का प्रयत्न किया। परन्तु इस बार भी उनको इस कार्य में सफलता नहीं मिल सकी। और वे स्वय मदास जा कर रह सकने की स्थिति में नहीं थे। इसलिए कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाइस चासलर 'श्ी श्रशुतोष मुकर्जो' महोदय के सामने उन्होने अपनी कठिनाई उपस्थित की। श्री मुफर्जी महोदय ने कृपा पूर्वक 'श्री श्रनन्तफृष्ण शास्त्री' को विशेष रूप से मद्रास जा कर उसकी एक नवीन प्रतिलिपि तैयार करने के लिए नियुक्त किया। 'श्री अनन्तकृष्ण शास्त्री' ने मद्रास जाकर वहाँ के इस विभाग के मुख्य कार्यवाहक 'श्रीरामकृष्ण कवि' महोदय की सहायता से एक नई प्रतिलिपि अपने हाथो से तैयार की। इस प्रति से प्रथम द्वितीय उन्मेषो में रह गई बहुत सी त्रुटियो का सशोंधन करने में बहुत सहायता मिली। बल्कि उसमें एक स्थान पर पाँच पूष्ठो के लुप्त भाग की भी पति हो गई। ये पाँच पृष्ठ वस्तुत मद्ास पुस्तकालय की मूल प्रति मे नहीं थे। श्री रामकृष्ण कवि महोदय ने किसी अ्न्य स्थान से उनकी पूर्ति की थी। परन्तु वे वस्तुत उस ग्रत्थ के भाग ही थे। क्योकि बाद में मिली हुई दूसरी पाण्डुलिपि में वे ज्यो के त्यों पाए जाते है। इस प्रकार इन दो प्रतिलिपियो के आधार पर सम्पादित प्रथम दा उन्मेष का एक सस्करण सन् १६२३ में प्रकाशित कर बिया गया। यह ही व ोषित- जीवित का प्रथम सस्करण था। जिससे कुन्तक का यह बहुमूल्य ग्रन्थ विद्वानों के सामने आया। मजास पुस्तकालय के कार्यकर्ता श्री 'रामकृष्ण कवि' महोदय ने, जिन्होने इन प्रतिलिपियो के तैयार करने में सहायता दी थी, श्रीयुत 'दे' महोदय को यह भी सूचित किया या कि उनके पुस्तकालय में जो 'वकरोषितिजोवितम्' की प्रति है वह जैसलमेर के एक अध्यापक के पास प्राप्त हुई एक हस्तलिखित प्रति की प्रतिलिपि मात्र है। मद्रास पुस्तकालय की ओर से हस्तलिखित पुस्तकों के सग्ह के लिए धूमने वाले पण्डितों में से एक पण्डित ने जैसलमेर के एक अध्यापक महोदय के पास 'वकोवितिजीवितम्' की हस्तलिखित प्रति होने की सूचना पाकर उसको प्राप्त करने का

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प्रयत्न किया। परन्तु वे अध्यापक महोदय किसी भी मूल्य पर उसको देने को तैयार नहीं हुए। तब उन्होंने अध्यापक महोदय की मूलप्रति से मद्रास पुस्तकालय के लिए एक प्रतिलिपि तैयार की। वही प्रतितिपि शी 'दे' महोदय द्वारा सम्पादित होकर भन्त में इस रूप में आ्रई। भीयुत 'रामकृष्ण कवि' महोदय ने २५ फरवरी १६२५ को श्रीयुत 'सुशील कुमार दे' महोदय के नाम लिखे हुए अपने एक पत्र में यह लिखा था कि- "वकरोकितिजीवित के सम्वन्ध में जो प्रतिलिपि आपको लन्दन भेजी गई थी वह हमारे यहाँ [ मदरास पुस्तकालय में] विद्यमान प्रति की पूर्णत यथार्थ प्रतिलिपि है। साथ ही जिस मूल प्रति से हमारे यहाँ की प्रति तैयार की गई है उसकी भी यथार्थ प्रतिलिपि है। और इस प्रतिलिपि से जितनी भी प्रतिलिपियाँ तैयार की जावेगी उन सब में वे सब अशुद्धियां जो भी आपके पास भेजी गई प्रतिलिपि में है, पाई जावेंगी। इस विषय में में आपको यह भी सूचित करना चाहता हूँ कि इस ग्रन्थ की मूल प्रति के स्वामी [ जैसलमेर के अरध्यापक महोदय ] अपने ग्रन्थ का एक सस्करर स्वय प्रकाशित करने का प्रयत्न कर रहे हे उसमें पाँच उन्मेष होंगे। अध्यापक महोदय पांच उन्मेष वाले इस ग्रन्थ को अपने विद्यार्थियो को अ्रनेक वार पढ़ा चुके हैं। और सारा ग्रन्थ उनको कण्ठस्थ है। परन्तु इस समाचार से आपके सस्करण के प्रकाशन में कोई वाघा नहीं पड़नी चाहिए।" श्रीयुत 'रामकृष्ण कवि' महोदय ने शयुत 'सुशीलकमार दे' महोदय के नाम लिखे हुए अपने इस पत्र में जैसलमेर के अध्यापक महोदय की ओर से प्रकाशित होने वाले पांच उन्मेषो के जिस सस्करण के, शोघ्र प्रकाशित होने की सूचना दी थी वह सस्करण आाज तक भी कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है। यदि उस सूचना से अनुत्साहित हो कर श्री 'दे' महोदय अपने इस अपूर्ण सस्करण को प्रकाशित न करते तो इस बहुमूल्य ग्रन्थ का, वर्तमान विद्वानों को कोई पता न चल सकता था। अपूर्ण होने पर भी श्री- युत 'वे' महोदय के इस संस्करण के प्रकाशित हो जाने से विद्वानो को 'कुन्तक' के 'वक्रोकिति-जोवितम्' का न्ञान प्राप्त करने के लिए पर्याप्त सामप्री मिल गई है और वह बहुत उपयोगी रहा है। सन् १६२४ में ओरिऍटल कानफ्रस का अ्रधिवेशन मदास में हुआ। श्रीयुत 'दे' महोदय को भी उसमें सम्मिलित होने के लिए मद्रास जाने का अवसर मिला। उस समय श्रीयुत 'रामकृष्ण कवि' महोदय वहाँ नहीं थे। 'दे' महोदय ने एक सप्ताह मद्रास में रह कर उस मूलप्रति से अपने सस्करण का मिलान किया परन्तु उसके पाठ सशोधन आदि में उससे कोई नई सहायता प्राप्त नहीं हुई। अर्थात् जो प्रतिलिपि दुबारा उनके पास भेजी गई थी वह पर्याप्त विश्वसनीय प्रतिलिपि थी। हाँ यहाँ के अन्य पण्डितों

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ने यह बतलाया कि इसकी मूल प्रति कहीं मालाबार के फिनारे पाई गई थी। जब कि इसके पूर्व मिले समाचार में वह जैसलमेर के किसी अध्यापक के पास से प्राप्त हुई हस्तलिखित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपि थी। इसी बीच में सन् १६२३ में जैसलमेर के हस्तलिखित पुस्तकों के जैन भण्डार के श्रीयुत 'सी० डी० दलाल' महोदय द्वारा सम्पादित सूचीपत्र [गायकवाड सीरीज नं०ड. २१ पृष्ट ६२, ६३ ] में इस ग्रन्थ की एक और हस्तलिखित प्रति का विवरस प्रकाशित हुआ। उसके आरधार पर श्रीयुत 'दे' महोदय की ओर से ढाका विश्वविद्यालय के अधिकारियो द्वारा उस हस्तलिखित प्रति को प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया परन्तु इस प्रयत्न मे भी कोई सफलता नहीं मिली। जैन-भण्डार, के अतिरिक्त जैसलमेर दरवार, और पश्चिमी राजपूताना के रेजीडेण्ट महोदय तक को भेजे हुए प्रार्थना पत्रों का भी कोई फल नहीं निकला। अन्त में रेज़ीडेण्ट महोदय के प्रयन्न से उसकी एक प्रमाशित प्रतिलिपि सन् १६२६ में प्राप्त हो सकी। यह प्रतिनिपि पूर्व प्रतिलिपियों को अपेक्षा अधिक शुद्ध और सन्तोष जनक थी इसके आधार पर ग्रन्थ के पाठ आदि का पुन सशोधन किया गया। परन्तु दुर्भाग्यवश यह पति भी अरपूर्ण थी। इसमें केवल दो उन्मेष और तृतीय उन्मेष का लग-भग एक तिहाई भाग जितना कि द्वितीय सस्करण में सम्पादित भाग के रूप दिया गया है विद्यमान था। इसके आधार पर ग्रन्थ का पुन सम्पादन करके यह द्वितीय सस्करण प्रकाशित किया था। इसमें उतना ही भाग सम्पादित रूप में दिया जा सका जितना इस जैसलमेर वाली प्रति में भी पाया जाता है। इसलिए इन वोनो प्रतिलिपियों के आधार पर 'दे' महोदय ने उसको सम्पादित करके प्रकाशित कर दिया। परन्तु तृतीय उन्मेष का जो भाग सम्पादित करने का प्रयत्न 'दे' महोदय ने किया है, वह पर्याप्त रूप से सन्तोष जनक नहीं है। विशेषत अन्तिम दो तीन पृष्ट तो पाठ की अश्ञुद्धियो और त्रुटियो से अत्यन्त भरे हुए हैं। बीच बीच में से पाठ छूटे हुए है। जिसके कारण उनकी ठीक सङ्गति भी नहीं लग सकती है। तृतीय उन्मेष के शेष अश और चतुर्थ उत्मेष का जैसलमेर की प्रनि में कोई पता नहीं चलता है। उसकी केवल एक प्रति जो मव्रास पुस्तकालय की प्रति से तैयार की गई थी श्रीयुत दे महोदय के पास थी। इस अपूर्ण और त्रुटित पाठो वाली ति के आधार पर ही श्रीयुत 'दे महोदय' ने अवशिष्ट भाग को परिशिष्ट के रूप में अ्रसम्पादित दशा में ही इस द्वितीय सस्कद्रर में छाप दिया। इसके बाद अब तक इस ग्रन्थ की और कोई प्रति उपलब्ध नहीं हुई है। इसलिए शेष भाग के पुनः सम्पावन का कोई नया प्रयत्न सम्भव हो नहीं हो सका है।

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हमारी सम्पादन पद्धति- प्राचीन ग्रन्थों का सम्पादन प्राय पाण्डुलिपियो के आधार पर किया जाता है। एक ग्रन्थ की जितनी भी पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध हो सकें उनका सग्रह कर उनमें से किसी एक को प्रमुख आधार मान कर अन्य पाण्डुलिपियो में पाए जाने वाले पाठ भेदों का निर्देश करते हुए अधिक से अधिक प्रामासिक पाठ निर्धारित करने का यत्न किया जाता है। इसे हम 'पाण्डलिपिमूलक सम्पादन पद्धति' कह सकते हैं। साघारणत. सभी ग्रन्थों के सम्पादन में इस 'पाण्डुलिपिमूलक सम्पावन पद्धति' का ही अवलम्बन किया जाता है। वकोक्तिजीवित के जो वो संस्करण इसके पूर्व प्रकाशित हुए थे उनका सम्पादन भी इमी पद्धति के आधार पर हुआ था। परन्तु पाण्डुलिपियो की भ्रष्टता, अपूर्णता, दुर्लभता और अप्ामणिगकता के कारण उस पद्धति से ग्रन्थ का प्रामाशिक सस्करण तैयार करने में सफलता नहीं मिल सकी। प्रामाशिकता का प्रश्न तो पीछे आाता तृतोय औप्रौर चतुर्थ उत्मेष का तो सुसम्बद्ध पाठ भी नहीं दिया जा सका। आदर सीय श्री 'सुशीलकुमार वे' महोदय तथा शरी 'जकोवी' सदृश धुरन्घर विद्वानो के वर्षो के प्रयत्न और परिश्रम के बाद भी इन दो उन्मेषो का सुबोध एव सम्बद्ध सस्करण तैयार नहीं हो सका। इसलिए 'दे' महोदय को जो कुछ सामग्री उनके पास थी उसको असम्पादित रूप में ही प्रकाशित करना पडा। उन्होने इस असम्पादित सामग्री को भी प्रफाशित कर दिया यह अच्छा ही किया। अन्यथा 'पाण्डुलिपिमूलक सम्पादन पद्धति' से उनका सम्पादन सम्भव न होने से यह अप्रकाशित सामग्री यो ही पड़ी रहती और थोड़े समय में वह बिलकुल ही विलुप्त हो जाती। इस भाग में दिए हुए कुन्तक के महत्त्व पूर्ण सिद्धान्तो का हमे कुछ भी परिचय प्राप्त न होता। हमारे सामने जब इस भाग के सम्पादन का प्रश्न आया तो समस्या पहिले से अरधिक कठिन थी। 'पाण्डलिपिमूलक सम्पादन पद्धति' से इस ग्रन्थ पर जो कुछ भी कार्य हा सकता था उसे पूर्व सम्पावक महोदय कर ही चुके थे। उस दिशा से कार्य में और किसी प्रगति के होने की आश्ञा नहीं थी। उसके अतिरिक्त और कोई नवीन पाण्डुलिपि आदि सामग्री उपलब्ध नहीं थी। तव किस आधार पर इसका सम्पादन किया जाय यह विकट प्रश्न था। और उसको यों ही छोड़ दिया जाय यह भी उचित नहीं प्रतीत हुआ। तव हमने इस शेष भाग के सम्पादन के लिए अपनी स्वतन्त्र 'विवेका- भित सम्पादन पद्धति' का अ्ररवलम्वन किया। 'विचेकाश्रित सम्पादन पद्धति' का अ्प्रभिप्राय यह है कि हमें ग्रन्थ के पाठ निर्धारण के लिए केवल पाण्डुलिपियो के ही आश्रित न रह कर स्वतन्त्र विवेक से भी काम लेना चाहिए। यह हो सकता है कि किसी एक स्थल का पाठ सभी पाण्डुलिपियो में एक सा पाया जाता हो परन्तु वह शृद्ध न हो।

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ऐसी दशा में हम 'पाण्टुलिपिमूलक सम्पादन पद्धति' के आधार पर उनको शुद्ध मानने के लिए वाघित नहीं है। पाण्डलिपियो के सर्वसम्मत पाठ को भी उपेक्षा करके हमें वहाँ शुद्ध पाठ देना चाहिए। यही 'विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' का आ्रशय है। इस 'विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' का अवलम्बन करते हुए हमें इस वात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हम उस अशुद्ध पाठ को बिल्फुल विलुप्त न कर दें बल्कि मूल ग्रन्थ के पाठ से हटा कर उसको पाद टिप्परी रूप में नीचे सुरक्षित कर दें। मयोकि हो सकता है कि हमारा विवेक इस समय हमें धोखा दे रहा हो। काला- न्तर में हमें स्वयं इस पाठ की उपयोगिता समभ में आ जाय। अथवा 'तर्काप्रतिष्ठनात्' के सिद्धान्त के अनुसार किसी अन्य विद्वान् को उसकी सङ्गति लगाने का मार्ग मिल जाय। इसलिए 'विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' का अ्रवलम्बन करते समय जहाँ हमें पाण्डुलिपियों के सर्वसम्मत पाठ की भी उपेक्षा करके अपने 'विवेकानुमोदित' पाठ को निर्धारित करने का अधिकार है वहाँ उस अशुद्ध पाठ को भी पाद टिप्पणी के रूप में सुरक्षित रखना भी हमारा कर्त्तव्य है। यही हमारी 'विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' का सार हैं। तृतीय और चतुर्थ उन्मेष के सम्पादन में 'पाण्डुलिपिमूलक सम्पावन पद्धति' की असफलता के कारण हमने उसको छोड कर इसी विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' का अवलम्बन किया है। उसके द्वारा ही हम इन दोनो उन्मेषो को बोघगम्य बनाने। में समर्थ हो सके है। अन्यथा 'पाण्डुलिपिमूलक सम्पादन पद्धति' का अवलम्बन कर यदि हम पूर्व सस्करण का अनुगमन करते तो इन दोनो उन्मेषों के आधे भाग को भी हम न समझ सकते थे और न उसकी व्याख्या ही प्रस्तुत कर सकते थे। कयोंकि पूर्व सस्करण और उनकी आधारभूत पाण्डुलिपियाँ अधिक-पाठ, असङ्त-पाठ, अ्स्थान- पाठ, अस्पष्ट-पाठ, और पाठ-लोप आदि अनेक दोषो से भरी हुई है। इस कारण प्रन्थ का न विषय समभ में आता है न कोई सङ्गति लगती है और न कोई व्याख्या की जा सकती है। अनेक जगह ऐसे पाठ पाए जाते है जो वस्तुत दूसरे प्रफरण में दिए जाने चाहिए थे परन्तु पाण्डलिपियों के लेखक के प्रमाद वश अन्यत्र लिख दिए गए है। जैसे किसी अन्य अलद्धार के प्रकरण की पक्तियां अन्य अलद्धार के प्रकरर में आजायें, या अन्य कारिका की वृत्ति भाग की पक्तियाँ अन्य कारिका की वृत्ति में आ जायं ती उन स्थानों पर उन पकि्तियो की सङ्गति लगना असम्भव है। उससे ग्रन्थ एक दम ु्ज्ञेय सा प्रतीत होने लगता है। ऐसे स्थान पर 'पाण्डलिपिमूलक सम्पादन पद्धति' 6 हमारी कोई सहायता नहीं कर सकती है। 'विवेकाश्रित सम्पावन पद्धति' के द्वारा ही हम पाठ का उद्धार कर सकते है। और वही हमने किया है। उदाहरणार्थ-

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-१ तृतीय उन्मेष की १६वीं कारिका में दीपकालद्धार का विवेचन किया है। इसके वृत्ति भाग में निम्नलिखित पंकितियाँ पूर्व संस्कर में छपी हुई थीं- तस्मादेव सहृदयहृदयसवादमाहात्म्यात् 'मुखमिन्टु' इत्यादौ न केवल रूपक- मिति यावत्, किं तारुण्यतरो इत्येवमादावपि। तस्मावेव च सूक्ष्मव्यतिरिक्त वा न नकन्चिदुपमानात् साम्य तस्य निभित्तमिति सचेतसः प्रमाणम। इन पक्तियों का दीपकालद्वार से कोई सम्बन्ध नहीं है। वे वस्तृत. रूपका- लड्गार से सम्बन्ध रखने वाली पक्तियाँ है। पाण्डुलिपि के लेखक के प्रमादवश वे दीपकालद्धार से सम्बद्ध कारिका के वृत्ति भाग में जोड दी गई थी। और 'पाण्डुलिपि मूलक सम्पादन पध्धति' के आधार पर वे दीपकाङ्कार से सम्बद् १६वीं कारिका के वृत्िभाग के साथ छाप दी गई थी। हमने अपनी 'विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' के आधार पर उनका उद्धार कर उनलो यथा स्थान पहुंचाया है। ग्रन्थ का ४०४ तथा ४०७वे पृष्ठ देखो। २. इसी प्रकार- न पुनर्जन्यत्वप्रमेयत्वादि सामान्यम्। यस्मात् पूर्वोक्तलक्षणन साम्येन वर्ण- ीय सहृवयहृदयहारितामवतरति। [ पृ० १०६ ] ये पक्तियाँ भी रूपकालद्धार से सम्बन्ध रखती है परन्तु पूर्व सस्करण में वे दीपकालद्धार से सम्बन्ध रखने वाली १६वीं कारिका के वृत्ि भाग के साथ छपी हुई थीं। हमने अपनी 'विवेकाश्रित कद्धति' के आधार पर उनको वहाँ से हटाकर पृष्ठ ४०६ पर यथा स्थान छापा हूँ। पहिले वाली पंमितियों में तो रूपक का स्पष्ट रूप से उल्लेख है इसलिए उनको पढते ही दीपकालड्कार के प्रसङ्ग में उनकी अनुपयुक्तता की प्रतीति हो जाती थी। और उनका रूपक से सम्वन्ध है यह भी प्रतीत हो जाता है। विवेक से केवल यह निश्चय करना रहता है कि रूपक के प्रकरण में इनका उचित स्थान क्या है। परन्तु इन पक्तियों में ऐसा कोई शन्द नहीं है जिससे हम यह समझ सकें कि ये पंकितिया दीपक के प्रसङ्ग की नहीं है या रूपक के प्रसद्ध की है। इसलिए उनका निकालना बड़ा कठिन था। पर 'विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' के आधार पर ही उनको अनुचित स्थान से हटा कर उचित स्थान पर ला सके है। उसके अतिरिक्त इस स्थान परिवर्तन का और कोई आधार नहीं था। वे पक्तियाँ १६वीं कारिका के वृत्ति भाग के अन्त में छपी हुई थी। परन्तु वहाँ उनकी सङ्गति नहीं लग रही थी। इधर २०वीं कारिका के वृत्ति में 'साम्यमुद्वहत् समत्व धारयत्' ये शब्द आए हुए थे। उनका विचार करते समय यह ध्यान आया कि दीपक के प्रसङ्ग में आए हुए 'साम्य' या 'सामान्य'

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शन्द का अर्थ कोई जन्यत्व, प्रमेयत्व आवि साम्य न ले ले इसलिए वृत्तिकार ने उसका निषेध करते हुए ये शब्द लिखे हैं। इस प्रकार 'विवेकाश्रित सम्पावन पद्धति ने ही इन शन्दों के उचित स्थान का निर्धारण करने में सहायता की। ३. इसी प्रकार चतुर्थ उन्मेष की अन्तिम २६वीं कारिका के वृतति भाग के धन्त में निम्न पवितयां छपी हुई थों- यथा नागानन्दे। तत्र दुर्निवारवरावपि वैनतेयान्तकादेक सकल कारुरिक चूडामरि शखचूड जीमूतवाहनो देहदानादभिरक्षन्न केवलं तत्फुल- इन पंकितियों का वहाँ फोई सम्बन्ध नहीं है यह वात तो पक्तियों को पढ़ते ही स्पष्ट हो जाती है। परन्तु उनका उचित स्थान कहाँ है यह ढूँढना तनिक कठिन था। हमने अपनी 'विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' के आधार पर १३वीं कारिका के वृत्ति भाग के अन्त में उनका उचित स्थान निश्चित कर वहीं [ पृ० ५३६ पर ] उनको छापा है। इसी 'विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' के आधार पर हमने अनेक स्थलो पर पाए जाने वाले अरधिक और असङ्भत पाठो को मूल ग्रन्थ से हटा कर पाद टिप्परिगयों में स्थान दिया है। इस प्रकार के असङ्गत या अ्रघिक पाठ न केवल असम्पावित भाग में ही पाए जाते है अपितु तृतीय उन्मेष का जो भाग सम्पावित रूप में छपा था उसमें भी पाए जाते है। हमने जहाँ इन अ्धिक पाठ या असङ्भत पाठों को मूल ग्रन्थ से निकाला है वहाँ सब जगह उसको पाद टिप्परियों में दे दिया है। इस प्रकार हमने अपनी इस 'विवेकाश्रित सम्पावन पध्धति' के आधार पर तृतीय एव चतुर्थ उन्मेष के अस्थान पाठ, अधिक पाठ और असङ्गत पाठो का सशोधन तो यथा सम्भव कर दिया है। परन्तु लुप्त पाठो की पूर्ति का प्रश्न इससे भी अ््रधिक कठिन है। हमने उसको भी अपनी इस पद्धति से सुलभाने का प्रयत्न किया है परन्तु सर्वत्र नहीं। जहां ऐसा प्रतीत हुआ कि यहाँ एक, वो या तीन शब्द ही छूटे हुए थे वहाँ हमने उनकी पूर्ति अपने विवेक के आधार पर करने का यत्न किया है और उसमें सफलता भी मिली है। उदाहरणार्थ पृ० ३५० पर 'पि न किज्चिदसङ्गतम' यह पाठ हमने बढाया है। पूर्व सस्करण में वह लुप्त पाठ माना गया था। इस बढ़ाए हुए पाठ को हमने इटैलिक में दिया है। पृ० ३६६ पर केवल 'तच्च' बढा देनेसे पाठ की सङ्गति लग जाती है। इसलिए उन स्थानो पर हमने उपयुक्त पाठ देकर लुप्त पाठ की पूर्ति कर दी हं। परन्तु जहाँ अधिक पाठ छूटा हुआ प्रतीत हुआ यहाँ इस पद्धति, का अवलम्बन हमने नहीं किया है। ष्योंकि उसमें ग्रन्थकार के अभिप्राय का अ्नुसरर करना कठिन होता। इसलिए ऐसे स्थलो पर हमने पाठ लोप सूचक पुष्प चिन्ह दे दिए

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हैं। औरौर उनका सद्भत पाद टिप्परिगयों में भी कर दिया है। पाठ लोप के स्थलो में कुछ स्थल ऐसे भी है जिनमें उस लुप्त हुए पाठ के बिना भी अर् की सङ्गति में कोई वाघा नहीं होती है। जान पढता है कि ऐसे स्थलों पर एण्ठ लोप चिन्ह भ्रान्तिवश ही दे दिए गए थे। उदाहरसार्य पृ० ३८६ पर 8विशिष्ट िद्ध साम्य्याच्च काव्यस्य सरसतामुल्लासयस्तद्विदाह्हादमादघान। इत्यादि में पुष्पचिन्हित स्थान पर पाठ लोप माना गया था। परन्तु उसके अर्थ में कोई अस- ङ्गति नहीं है। अरत. वहाँ वस्तुत पाठ लोप नहीं अपितु पाठ लोप की भ्रान्ति ही हैं। इस प्रकार के स्थलो में ग्रन्थ की व्याख्या आदि करने में कोई फठिनाई अनुभव नहीं हुई। फिर भी हमने पुराने पाठ सोप के स्थल को चिन्हाद्धित कर दिया है। इस प्रकार हमने अपनी 'विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति' का अ्वलम्बन कर तृतीय तथा चतुर्थ उन्मेष के इस प्रसम्पादित भाग को अधिक से अधिक सुन्वर और सुसम्बद्ध रूप में सम्पादित करने का प्रयत्न किया है। फिर भी ऐसे दुरूह कार्य में त्रुटियाँ रह जाना स्वभाविक है। परन्तु यह निश्चित है कि इस 'विवेकाश्रित पद्धति' के श्रवलम्वन से ही यह लगभग सारा ग्रन्य सुसम्बद्ध और सुबोध हो गया है। त्रुटियाँ जो कुछ रह गई है उन्हे यदि अवसर मिला तो अगले सस्करण में ठौक करने का यत्न किया जायगा। अधिकाश आाधुनिक विद्वान् प्राचीन ग्रन्थो के सम्पावन में 'पाण्डुलिपि मूलक सम्पादन पद्धति' का ही उपयोग करते है और केवल उसी को वैज्ञानिक सम्पादन पद्धति मानते हैं। विवेकाश्रित सम्पादन पद्धति के लिए उनके यहां कोई स्थान नहीं हैं। परन्तु देखने में यह आया है कि तथा करथित 'वैज्ञानिक' सम्पादन पद्धति का पवलम्बन करने वाले विद्वानों द्वारा सम्पादित ग्रन्थो में कहीं कहीं नितान्त अशुद्ध पाठों को ही प्रामाशिक पाठ मान कर ज्यो का त्यो छाप दिया गया है। 'मक्षिकास्याने मक्षिकापातः' की यह अवैज्ञानिक पद्धति ग्रन्थकार और सम्पावक दोनो के गौरव को क्षति पहुँचाती है। अतएव ऐसे अवसरों वर विवेकाश्रित पद्वति का अवलम्वन करना आावश्यक है। विशेषत वक्रोक्तिजीवित जैसे ग्रन्य का सम्पादन तो उसके बिना सम्भव ही नहीं था। अतएत्र हमने उसका अवलम्बन किया है।- 'प्रतोक पद्धति' तृतीय औौर चतुर्थ उन्मेष के लुप्त पाठो के विषय में विचार कर हम इस परिाम पर पहुँचे है कि इस भाग में लिखते समय कुन्तक ने प्राय. 'प्रतीक पत्धति' का अवलम्बन किया है। 'प्रतीक पद्धति से हमारा यह अरभिप्राय यह है कि कन्तक ने इस भाग को परिमाजित ग्रन्थ के रूप में नहीं लिखा है अपितु वे जो कुछ लिखना चाहते

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थे उसके सक्षिप्त सद्त ही यहां उन्होने अद्धित किए है। इसी लिए उसमें उदाहरसं प्राय अधूरे हैं। कारिकाएँ बिल्कुल ही नहीं पाई जाती है। और वृत्ति भी अनेक स्थलों पर प्रतोक मात्र ही उपलब्ध होती है। कुन्तक का केवल एक यही ग्रन्थ पाया जाता है। इसकी रचना तीन कक्षा या तीन ममयो में हुई है। सबसे पहिले उन्होंने ग्रन्थ की मूल कारिकाओं की रचना को और उसका नाम भामह आदि के ग्रन्यों के समान 'काव्यालड्कार' रखा। उसके बाद उसकी वृत्ति की रचना भी स्वय ही की और इसका नाम 'वक्रोकितिजीवित रखा। इसकी चर्चा हमने अपनी व्याख्या के बिल्कुल प्रारम्भ में ही की है। इस वृत्ति की रचना में उन्होंने दो बार श्रम किया जान पडता है। पहिले उन्होने एक रूप रेखा तैयार की और फिर उसको परिमारजित कर अ्रन्तिम रूप दिया। सभी ग्रन्थकार प्राय. इस पहति का अवलम्बन करते है। इसलिए कुन्तक ने भी इस पध्धति को अपनाया है यह स्वभाविक ही है। प्रथम औ्रर द्वितीय उन्मेष में तो वे इन दोनो धेियों को पार कर गए है। अर्थात् पहिले अपरिमाजित रूप में लिख चुफने के बाद उसे परि- माजित कर अन्तिम रूप दे दिया है। इसलिए उतना भाग पूर्ण और स्पष्ट है। परन्तु तृतीय चतुर्थ उन्मेष की उन्होने केवल रूपरेखा तैयार की थी उसको परिमार्जित कर अन्तिम रूप नहीं दे सके थे इसलिए वह भाग अपूर्ण सा प्रतीत होता है। इसीलिए उसमें जगह-जगह पाठ छूटे हुए से प्रतीत है और उदाहरण आदि अधूरे से पाए जातेह है। इसकी परिमाजित प्रति तैयार करते समय ये जो न्यूनतायँ रह गई है उन सबकी पूर्ति हो, जाती, परन्तु अस्वस्थता के कारण या अन्य किसी कारण से उनको इस भाग को परिमाजित करने का अवसर नहीं मिल पाया। इसलिए यह ग्रन्थ त्रुटिपूर्ण रह गया प्रतीत होता हैँ। इस अनुमान की पुष्टि इस बात से भी होती है कि इस भाग में कारिकाएं बिल्कुल नहीं पाई जाती है। केवल वृत्ि और उवाहरए मिलते है। कारिकाएँ कुन्तक ने पहिले अलग लिख ली यी। इस प्रति की दूसरी परिमाजित प्रतिलिपि तैयार करनी ही है इस विचार से इसमें कारिकाओ को दुवारा न लिख कर केवल उनके प्रतीकों द्वारा उनकी वृत्ति ही यहाँ अद्धित है। इसी प्रकार अ्नेक उदाहरण भी पूर्ण रूप में न लिख कर प्रतीक मात्र लिख दिए हैं। कहीं-कहीं वृत्ति भाग के गद्य में भी इसी प्रकार का लाघव कर गए है। इसीलिए इसमें अपूर्णता प्रतीत होती है। कारिकाओ की रचना- जैसा कि ऊपर कहा जो चुका है इस भाग में कारिकाओ का बिल्कुल अभाव है। उनके केवल प्रतीकमात्र ही वृत्ति भाग में पाए जाते। उन्हीं के आधार पर

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कारिकाओ का पुननिर्मार किया गया है। सौभाग्य को बात है कि कुन्तक ने अपनी कारिकाओं की व्याख्या में 'खण्डान्वय' की पद्धति अपनाई है। इस पद्वति में कारिका का प्राय प्रत्येक पद ति भाग में आप्र जाता है। वृतिभाग में आरए हुए इन्हीं प्रतीक पदों को जोड देने से कारिका बन जाती है। इसी मार्ग का अवलम्बन कर इस भाग ३ कारिकाओं का पुननिर्माण करने का प्रयत्न श्री 'दे' महोदय ने किया था। उसी रूप में इन पुनर्निमाण की हुई कारिकाओ को हमने दिया है। इस बात का उल्लेख हमने उन कारिकाओ के साथ प्राय कर दिया है। और पृ० ३०६ पर इस विषय का वरिशेष रूप से उल्लेख भी कर दिया है। ग्रन्थ की पूर्णता- पिछले दोनों सस्करसो तथा उनकी आधार भूत पाण्डुलिपियों में ग्रन्थ के श्न्त में 'असमाप्तोऽय ग्रन्थ' इस प्रकार की पुष्पिका दी गई है जिससे प्रतीत होता है ये सब लोग ग्रन्य को असमाप्त मानते है। अभी हमने श्री 'दे महोदय' के नाम श्री 'राम कृष्ण कवि' महोदय द्वारा लिखे गए पत्र का उद्धरस दिया था। उस पत्र के देखने से प्रतीत होता है कि जैसलमेर के अध्यापक महोदय के पास वक्रोक्तिजीवित की जो प्रति है उसमें पाँच उन्मेष है। इसलिए उपलब्ध संस्करण अवश्य ही 'असमाप्त' और अ्र्प्रपूर्ण हैं यह धारखा होना स्वभाविक हैं। तदनुसार अब तक सभी विद्वान् इस ग्रन्थ को 1 अरसमाप्त मानते है। परन्तु हम इससे सहमत नहीं है। हमारे विचार से यह ग्रन्थ जहां समाप्त हो रहा है वहीं इसकी समाप्ति हैं। पाँच उत्मेष वाले 'वक्रोषितिजीवितम' की बात केवल किंधदन्ती और कल्पना मात्र है। उसमें कोई तथ्य नहीं है। हमारे इस मत का आधार यह है कि ग्रन्थ विषय की दृष्टि से अपने में परि- पूर्ण है प्रथम उन्मेष की १८वीं कारिका में ग्रन्थकार ने ६ प्रकार की वक्रता का 'उद्देश' या निर्देश किया था। अपनी 'उद्दिष्ट' इन्हीं ६ प्रकार की वकताओ का विवेचन करने के लिए ही उन्होने इस ग्रत्थ की रचना की है। प्रथम उत्मेष उसका अवतरसिका भाग ह। उसमें काव्य साहित्य विषयक प्रारम्भिक चर्चा के बाद ६ प्रकार की वक्र्ता का 'उद्देश' [ नाममात्रेए वस्तुसद्धीर्तन उद्देश ] किया है। और उनका सामान्य परिचय दिया है। इसके बाद द्वितीय उत्मेष में पहिली तीन वक्रताओ का तृतीय उन्मेष में 'वाक्यवकता' रूप चौथी वकता का तथा चतुर्थ उन्मेष में 'परकरणवक्ता' तथा प्रबन्धवकता' रूप पाँचवी तथा छठी प्रकार की वक्रता का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। इस प्रकार उनका प्रतिपाद्य विषय इस भाग में पूर्णरूप से समाप्त हो जाता हैं। उसका कोई भी भाग ऐसा शेष नहीं रह जाता है कि जिसके लिए आगे और ग्रन्थ की रचना आवश्यक होती। इसलिए हमारा मत है कि इस ग्रन्थ को 'भसमाप्त'

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ग्रन्थ नहीं कहना चाहिए। इसीलिए हमने इस सस्करण के अ्न्त में 'असमाप्तोऽय ग्रन्थः' इस प्रकार की पुष्पिका न देकर 'समाप्तोऽय ग्रन्थ' इस प्रकार की पुष्पिका दी है औ्र्प्रौर उसके साथ ही इस सब हेतु का विस्तारपूर्वक उल्लेख भी कर दिया है। कुन्तक का कालनिर्गय- १-'कुन्तक' ने अपने ग्रन्थ में कालिदास भवभूति राजशेखर आदि श्रनेक कवियो के ग्रन्थो से प्रचुर मात्रा में उदाहरण प्रस्तुत किए है। और नामत भी उनका उल्लेख किया है। 'वक्रोषित-जीवित' के पृ० १५५-५६ पर स्पष्ट ही इन महाकवियों का नामतः उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा है- एव सहजसौकुमार्यसुभगानि कालिवाससर्वंसेनावीना काव्यानि दृश्यन्त। तत्र सुकुमार्गमार्गस्वरूप चर्चनीयम्। तथव च विचित्रवऋत्वविजम्भित हर्षचरिते प्राचुर्येरग भट्टवाशणस्य विभाव्यते। मवभूतिराजशेखरविरचितेध बन्धसौन्दर्यसुभगेषु मुक्तकेषु परिदृश्यते। तस्मात् सहृदर्य सर्वत्र सर्वमनुसतव्यम्। इससे सिद्ध होता है कि कुन्तक सातवीं आठवीं शताब्दो तक के इन कवियों के वाद हुए थे। २-कुन्तक ने ध्वन्यालोककार आ्नन्दवर्धनाचार्य का उल्लेख यद्यपि नाम से नहीं किया है परन्तु वह उनके ग्रन्थ तथा सिद्धान्त से भली प्रकार परिचित है यह बात उनके ग्रन्थ में अनेक स्थानों पर स्पष्ट प्रतीत होती है। आ्रनन्दवर्धनाचार्य के 'विषमवासलीला' नामक ग्रन्थ का निम्न इलोक जो ध्वन्यालोक [पृष्ठ १००] में भी दिया गया है कुन्तक ने अपने ग्रन्थ के द्वितीयोन्मेष में उदाहरण सख्या २६ पृ० १६६ पर उद्धत किया है- ताला जाशति गुणा जाला दे सहित्रएहि घेप्पंति। रइकिरणानुग्गहित्राई होती कमलाई कमलाइ॥। [तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहृदयैगृहयन्ते । रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि]। तृतीय उन्मेष की दशम कारिका में रसवदलद्धार का खण्डन करते हुए कुन्तक ने ध्वन्यालोककार के मत की आलोचना बहुत विस्तार के साथ की है। और उसमें ध्वन्यालोक की निम्न कारिका भी उब्धृत की है- प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्ग तु रसाद्य'। काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मति. ॥ -ध्वन्यालोक २,५।

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इन उल्लेखों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि 'कुन्तफ' धवन्यालोककार आानन्दवर्घनाचार्य के बाद हुए है। 'श्ानन्दवर्घनाचार्य' का नाम राजतरङ्ग्ी के निम्न श्लोक में स्पष्ट रूप से पाया जाता है-

मुक्ताकण: शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः। प्रथां रत्नाकरश्चागात् साम्राज्येऽवन्तिवमखः ॥ -- राजतरङ्गिरी ५,३४। फाशमीर के इतिहास में 'अवन्तिवर्मा' का राज्यकाल ८५७ से ८८४ ई० तक माना जाता है। अत 'आनन्दवर्घनाचार्य' का समय यही, नवम शताब्दी में माना जाता है। वक्रोिति-जीवितकार कुन्तक ने विषमवारलीला' नामक फाव्य ग्रन्य से तथा 'धवन्यालोक' से भी आ्ानन्द वर्धनाचा के श्लोकों तथा मत का उल्लेख अपने 'वक्रोकति- जीवित' ग्रन्थ में किया है इस लिए वे निश्चय से इनके बाद हुए है। ध्वन्यालोककार आनन्दवर्घनाचार्य कुन्तक के काल निर्णय की पूर्व वर्ती सीभा रेखा हैं तो दूसरी ओर महिमभट्ट उनकी उत्तरवर्ती सीमा रेखा है। कुन्तक के उत्तरवर्ती आचार्यों में सबसे पहिले 'व्यक्तिविवेक' के निर्माता महिममट्टने उनका उल्लेख इस प्रकार किया है। काव्यकाञ्चनकशाश्ममानिना कुन्तकेन निजकाव्यलक्ष्मणि। यस्य सवेनिरवद्यतोदिता श्लोक एप सनिदर्शितो मया॥ -व्यक्ति विवेक ५ू८, तथा ३७१ । व्यक्तिविवेक के इस श्लोक में कुन्तक का नामत. स्पष्ट उल्लेख होने के कारस यह स्वय सिद्ध है कि 'कुन्तक' 'महिमभट्ट' के पूर्ववर्ती है। महिमभट्ट का समय ११वीं शतान्दी में माना जाता है। इसलिए यह स्पष्ट है कि कन्तक का काल नवम शताब्दी के आनन्दवर्धनाचार्य तथा ११वीं शतान्दी के महिमभट्ट के वीच में अर्थात् वशम शताब्दी के किसी भाग में निर्धारित किया जा सकता है। ३-ध्वन्यालोकककार श्री आनन्दवर्धनाचार्य के प्रसिद्ध टीकाकार श्री अभिनवगुप्तपादाचार्य का समय भी इन दोनों के बीच में ही पडता है। क्योंकि वे आनन्दवर्धन के टीकाकार है इसलिए उनके बाद होना स्वाभाविक है। दूसरी ओ्रर गहिमभट्ट ने उनकी 'लोचन' टीका के अनेक अ्र्प्रश्ों की आ्र््रालोचना अप्रपने ग्रन्थ में की है। उदाहरणार्थ ध्वन्यालोक की 'लोचन' टीका के पृ० ३१ के एक विस्तृत उद्ध रण को पालोचना के लिए महिमट्ट ने अपने 'व्यक्तिविवेक' ग्रन्थ के पृ० १६ पर उद्धत किया है। इसलिए लोचनकार अरभिनवगुप्तपादाचार्य का काल भी कुन्तक के समान श्रनन्द-

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वर्षन और महिमभट्ट के बाच में दशम शताब्दी के किसी भाग में ही निर्धारित किया जा सकता है। इसलिए कुन्तक तथा अभिनवगुप्त का समय एक दूसरे के बहुत निकट पडता है। फिर भी इन दोनो को समकालीन नहीं माना जा सकता है। अपितु 'कुन्तक' निश्चित रूप से अमिनवगप्त के पूर्ववर्ती ही है। क्योंकि अभिनवगुप्त कृत घ्वन्यालोक की 'लोचन' टीका में कुन्तक के मत की छाया कई जगह पाई जाती है। उदाहरणही कुन्तक ने प्रथम उन्मेष में लिङ्ग वैचित्र्य-वक्रता का वर्णन करते हुए लिखा है कि- अन्यदपि लिङ्गवैचित्र्यवकत्वम्। यत्रानेकलिङ्ग सम्भवेऽवि सौकुमार्यात् कविभि स्त्रीलिङ्गमेव प्रयुज्यने 'नामव स्त्रीति पेशलम्' इति कृत्वा। [ पृष्ठ ३६ ] द्वितीय उम्मेष में इसी लिङ्गवचित्र्य-वक्रता का वर्गन करते हुए कुन्तक ने फिर लिखा है- सति लिङ्गान्तरे यत्र स्त्रीलिङ्गन्च प्रयुज्यते। शोभानिष्पत्तये यस्मान्नामैव स्त्रीतिपेशलम्।। -२, २२/पृ० २५५ इसका उदाहरण इस प्रकार दिया है- यथेयं श्रीष्मोष्मव्यतिकरवती पाएडुरभिदा मुखोद् भिन्नम्लाना निलतरलवल्ली किसलया। तटी तारं ताम्यत्यतिशशियशा कोऽपि जलद- स्तथा मन्ये भावी भुवनवलयाक्रान्तिसुभग ॥ अत्र त्रिलिङ्गत्वे सत्यपि सौकुमार्यात् स्त्रीलिङ्गमेव प्रयुक्तम् । -- वक्रोतिजीवित पृ० २५५ अ्रभिनवगुप्त ने 'लोचन' के पृष्ठ १६० पर लिखा है कि- तथा हि 'तटी तार ताम्यति' इत्यत्र तटशब्दस्य पुस्त्वनपुंसकत्वे अनादृत्य स्त्रीत्वमेवाश्रित सहृवय 'स्त्रीति नामापि मधुरमिति' कृत्वा । अभिनवगुप्त के इस विवेचन के ऊपर कन्तक के उपर्युक्त सिद्धान्त तथा विवेचन की छाया स्पष्ट रूप से दिखलाई दे रही है। इसलिए कुन्तक का समय शनन्द- वर्धन के बाद और और महिमभट्ट तथा अभिनवगुप्त से पूर्व दशम शताब्दी में निश्चित होता हैं। ग्रन्थकार का नाम- मद्रास पुस्तकालय से प्रा प्रतिलिपि की पुष्पिकाओं में इस ग्रन्थ के निर्मातों का 'कुन्तल' या 'कुन्तलक' नाम से उल्लेख किया गया है। परन्तु जैसलमेर वाली प्रति की पुष्पिकाओं में 'कुन्तक' नाम से ग्रन्थकार का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार इन

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दोनो प्रतियों में ग्रन्थफार के नाम में थोडा सा भेद पाया जाता है। इनमें से जैसलमेर वाली प्रति में पाया जाने वाला 'कुन्तक' नाम ही ठीक जान पडता है। क्योकि उत्तरवर्ती साहित्य में जहाँ भी इस ग्रन्थ के लेखक का नामत उल्लेख आया है वहाँ सर्वत्र 'कुन्तक' नाम का ही व्यवहार किया गया है। वक्रोवितिजीवित के प्रथमोन्मेष में आए हर 'संरम्भ करिकीट मेघशकलोद्देशेन सिंहस्य य' इत्यादि २८वें उदाहरण श्लोक की 'कुन्तक' द्वारा को गई विचेचना की आलोचना करते हुए 'वयवितविवेककार' महिमसद्ट ने उसे विधेयाविमर्ष दोष से ग्रस्त बतलाया है। उसी प्रसङ्ग में एक श्लोक में जिसे कि हम अ्रभी पृ० १३ पर उद्धत कर चुके हें महिम भट्ट ने 'काव्यकाञ्चनकशाश्ममानिना' यह विशेषण देते हुए 'कुन्तक' इस नाम से ही वक्रोक्तिजीवितकार का उल्लेख किया है। इसलिए वकोकिति जीवित के लेखक का नान कुन्तक ही प्रतीत होता है। महिम भट्ट के अ्तिरिक्त गोपा भट्ट ने भी अपने 'साहित्य-सौदामिनी' नामक ग्रन्थ के प्रारम्भ में साहित्य शास्त्र के सभो प्रधान आचार्यो का कीर्तन किया है। उसमें उन्होने दण्डी तथा वामन के बाद तीसरा स्थान कुन्तक को दिया है। कुन्तक का वर्गन करते हुए उन्होंने लिखा हं- वक्रानुरज्जिनीमुक्ति शुक डव मुखे वहन्। कुन्तक: क्रीड़ति सुख कीर्तिस्फटिकपञ्जरे॥ मे यहां भी 'कुन्तक' नाम से ही वक्ोवितिकार का उल्लेख हुआ है। अरुराचल नाथ ने भी कुमारसम्भव की टीक्ा में दो जगह 'यदाह कुन्तकः' 'यदाह कुन्तकाचार्य' लिख कर 'कुन्तक' नाम से ही इस ग्रन्यकार का उल्लेख किया है। इस प्रकार साहित्य के अ्नेक ग्रन्थो में 'कुन्तक' नाम से इस ग्रन्थ के निर्माता का उल्लेख पाया जाता है। इसलिए मद्रास वाली प्रति के 'कुन्तल' तथा 'कुन्तलक' दोनों पाठ प्रशुद्ध है। औौर जैसलमेर वालो प्रति के अ्रनुसार इस ग्रन्थ के निर्माता का नाम 'कुन्तक' ही है, 'कुन्तल' या 'कुन्तलक' नहीं। वक्रोक्तिजीवित का विश्लेषण- जिस प्रकार ध्वन्यालोककार ने अपने ग्रन्थ को चार उद्योतो में पूर्ण किया है उसी शैली पर कुन्तक ने अपने ग्रन्थ को चार उत्मेषों में समाप्त किया है। ध्वन्या- लोक के समान इस ग्रन्थ की रचना भी कारिका तथा वृत्ति रूप दो भागो में हुई है। और दोनों भागों के लेखक एक ही व्यक्ति है। कन्तक के मूल कारिकात्मक ग्रन्थ का नाम 'काव्यालङ्कार' और वृत्तिभाग का नाम 'वकोकितिजीवित' है। इस बात को कुन्तक ने अपने ग्रन्थ के आरम्भ में प्रथम कारिका में ही स्पष्ट कर दिया है। प्रथमोन्मेप-इन चार उन्मेषों में से प्रथम उन्मेष एक प्रकार से प्रारम्भिक

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भूमिका या प्रवेश परक है। इसमें काव्य के प्रयोजन आदि का प्रतिपादन तथा ग्रन्थ के प्रतिपाद्य विषय 'षड्विध वक्रता' का सक्षिप्त परिचय दिया गया है। इस उत्मेष में कुल ५८ कारिकाएँ है। इनमें से पहली पाँच कारिकाओं में काव्य के प्रयोजन आरादि का वर्णन किया है। उसके बाद ६ से १० कारिका तक काव्य के लक्षण के सम्बन्ध में विवेचन किया गया है। कुन्तक के मतानुसार सक्षेप में 'शब्दार्थो सहिती काव्यके' यह काव्य लक्षणा है। इस लक्षण के स्पष्टीकरण के लिए १६-१७ कारिका में 'शब्द', अररथं तथा साहित्य तीनों का विवेचन कर काव्य लक्षण की व्याख्या पूर्ण की गई हैँ। इस बीच में ११, से १५ तक की पाँच कारिकाओ से उन्होंने 'स्वभावोकिति' को अलद्धार मानने वाले सिद्धान्त का खण्डन किया है। उसका यह अभिप्राय है कि पदार्थ का स्वभाव जिसका कि वर्णन स्वभावोकिति में होता है वह तो 'भलद्धार्य' हं 'अलङ्गार' नहीं। यदि उसको 'अलद्धार' मान लिया जायगा तो फिर उसके प्र्पतिरिक्त 'भलङ्धार्य' क्या रह जायगा। इसलिए 'स्वभावोषिति' को 'अलङ्धार' नहीं कहना चाहिए। इस प्रकार १ से १७ कारिका तक फाव्य के प्रयोजन तथा लक्षण आदि की विवेचना की गई है। यह भाग ग्रन्थ का भूमिका रूप कहा जा सकता है। इसके बाद ग्रन्थ के प्रतिपाध विषय 'वकता' का परिचय दिया गया है। इसमें १८ से २१ तक चार कारिकाओं में ऊपर कहे हुए 'वक्रता' के छः प्रकारों का साधारण परिचय दिया गया हैं। कुन्तक ने ७वीं कारिका में काव्य का लक्षण किया था उसमें एक 'बन्घ' शब्द आया था। २२वीं औंर २३वीं कारिका में 'बन्ध' की विवेचना की है। इसी 'बन्ध' के प्रसङ्ग में तीन प्रकार के काव्य 'मार्गो' का विवेचन किया है। कुन्तक के ये 'मार्ग' वस्तुत वामन की रीतियों के स्थानापन्न है। मुख्य भेद यह है कि वामन अदि ने रीतियों का विभाजन देश विशेष के नाम पर पाञ्चाली, वैदर्भी, गौडी आादि नामों से किया है। कुन्तक का कहना ह कि वेश के आधार पर तो देशों के अनन्त होने से 'रीतियों' के भेद भी अनन्त हो जावेंगे। इसलिए वेश के आधार पर रीतियों के सिद्धान्त का खण्डन कर कुन्तक ने अपने तीन मार्गो के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। सम्प्रति तन्र ये मार्गा कविप्रस्थानहेतव । सुक्कुमारो विचित्रश्च मध्यमश्चोभयात्मकः॥१, २४॥ कुन्तक के मत में कवियों के व्यवहार के आधारभूत सुकुमार, विचित्र तथा मध्यम ये तीन प्रकार के 'मार्ग' है। रीतियों के वैशिक आधार को निकाल कर उनके आन्तरिक गुरो के आधार पर कुन्तक ने अपने तीन 'मार्गो' का निर्धारण किया है। इसलिए जैसे रीतियों के साथ गुखों का विवेचन आा जाता है इसी प्रकार कुन्तक के

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'मार्गो' के साथ ओज, प्रसाद तथा माघुर्य आदि गुणो का निरुपण भी समाविष्ट हो गया है। पग्न्तु कुन्तक के यहाँ इन घ्रोज, प्रसाद, मावुर्य के अ्तिरिक्त लावण्य, अ्ररभिजात्य आरादि अ्रत्य भी गुए है। कुन्तक ने २५ से २६ तक पाँच कारिकाओ्ों में सुकुमार मार्ग का और उसके वाद ३०-३३ तार कारिकाओ में कमश, माघुर्य, प्रसाद, लावण्य तथा अभिजात्य इन चार गुणो का प्रतिपादन किया है। ये चारो गुए सुकुमार मार्ग में प्रयुषत होते है इसलिए तुकमार मार्ग के ताथ इन चारो गुखों का निरुपण कर दिया है। इसके बाद ३४ से ४३ तक १० कारिकाओ 'विचित्र मार्ग' का निरुपण और उसके साथ ४४ से ४८ तक पाँच कारिकाओ में विचित्र मार्ग के उपयोगी गुणों का विवेचन किया गया है। इस 'विचित्र मार्ग' मे भी माधुर्य, प्रसाद, लावण्य और अ्रभिजात्य ये चार ही गु उपयुक्त होते है। परन्तु यहां उनके लक्षण पहिले से भिन्न हैं। इन्हीं लक्षणो का प्रतिपादन पाँच कारिकाओ में किया गया है। जैसे वामन ने दस शब्द गुख तथा अर्थ गुएा माने। इन शब्द गुणो तथा शर्थ गुणो के नामो में भेद नहीं है। दस शब्द गुणो के जो नाम है वस अर्थगुणो के भी वे ही नाम है। परन्तु उनके लक्षण दोनो जगह अलग मलग हो जाते है। इसी प्रकार कुन्तक के जो माधुर्य प्रसाद, लावण्य और आभिजात्य ये चार गुए 'सुकुमार मार्ग' में उपयुक्त होते है वे ही चार गुए 'विचित्र मार्ग' मे भी उपयुक्त होते है। परन्तु उनके लक्षणा दोनों जगह अररलरग अ्रलग होते है। 'सुकुमार मार्ग' के उपयोगी इन चारों गुणों के लक्षण ३० से ३३ तक चार कारिकात्रो में और 'विचित्र मार्ग' के उपयोगी इन्हीं चार गुखो के लक्ष ४४ से ४द तक पाँच कारिकाओ में दिए गए है। इसके बाद ४६ से ५२ तक चार कारिकाओो में तीसरे मार्ग अर्थात् 'मध्यम मार्ग' का विवेचन किया गया है यह 'मध्यम मार्ग' जैसा कि उसके नाम से ही विदित होता है सुकुमार तथा विचित्र दोनो मार्गो के वीच का मार्ग है उसमें दोनों प्रकार के मार्गो के लक्षण तथा गुए पाए जाते है। परन्तु जैसे अनेक रगो के मिश्रण से एक विचित्र चमहकार उत्पन्न हो जाता है इसी प्रकार इन दोनो मार्गो के मिश्रण से इस मध्यम मार्ग में कुछ विशेष चमत्कार उत्पन्न हो जाता है। इसीलिए उसको अलग मार्ग माता है। मौर बहुत से विद्वान् उसको बहुत पसन्द करते है। कुन्तक ने कहा है- अत्रारोचकिन. केचिच्छायावैचित्रयरबजके। विद्ग्धनेपथ्यविधो भुजद्वा इव सादराः ॥१, ५२।। मध्यम मार्ग के निरुपस के बाद ५३ से ५७ कारिका तक पाँच कारिकाओ में कुन्तक ने औचित्य तथा सौभाग्य नामक दो गुखो का और प्रतिपादन किया है। ये दोनो

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गुए तीनो मार्गो में उपयुक्त होते हैं। इसलिए सामान्य गुण होने से उनका प्रतिपादन अन्त में किया गया है। इस प्रकार कुन्तक के तीनों मार्गो मे प्रयुक्त होने वाले छ गुए हो जाते हैं। इनमें से माधुर्य, प्रसाद, ये दो नान तो शन्य आचार्यों के श्भिमत गुखों के नामो के आधार पर ही है। शेष लावण्य, अ्भिनात्य, श्चित्य तथा सौभाग्य ये चारों गुए कुन्तक की अ्रपनी कल्पना स्वरूप है। प्राचीन आचार्यो के ओज गुण का नाम भीद कुन्तक ने ४५वीं कारिका में लिया है। इस उन्मेष की अन्तिम कारिका की रचना शार्दूलविकीडित छन्द में की गई है। यों तो वह प्रथमोन्मेष की अन्तिम कारिका है पर उसमें द्वितीय उत्मेष के विषय की अ्रवताररा की गई है। द्वितीयोन्मेष-प्रथमोन्मेष में ग्रन्थ के मुख्य प्रतिपाद्य विषय 'षडविध वक्ता' का सामान्य निरूपण किया गया था। इस द्वितीय उन्मेष में उसी 'षडविध वक्रता' का विस्तारपूर्वक विशेष विवेचन प्रारम्भ किया गया है। प्रथमोन्मेष में कुल ५८ कारिकाएँ थों, द्वितीयोन्मेष कुल ३५ कारिकाओ में पूर्ण हो गया है। इन षडविध वकताओ में से इसमें केवल तीन वत्रताओ का ही निरूपण किया गया है। इसमें पहिली से सातवीं कारिका तक वक्ता के प्रथम भेद 'वर्णविन्यास वक्रता' का विवेचन किया गया है। इसी वर्सविन्यास वक्रता को अलद्धार सम्प्रदाय में अनुप्रास तथा यमक रूप शब्दालङ्धार कहा जाता हैं। आगे द्वितीय उन्मेष की द से लेकर २५वों कारिका तक की १८ कारिकाओ में षड्विध वकता के दूसरे भेद 'पवपूर्वार्द्ध वत्र ता' का निरूपस किया गया है। प्रथमोन्मेष में इस 'पदपूर्वार्द्ध वक्रता' का जो सक्षिप्त परिचय दिया था उसमें इसके (१) रूढि वक्रता, (२) पर्याय वकता, (३) उपचार वकता, (४) विशेषण वक्रता, (५) सवृति वक्रता और (६) वृत्तिवैचित्र्य वकता ये छ. शवान्तर भेद दिखलाए ये। और तिडन्त पद के पूर्वार्द्ध अर्थात् धातु की वक्रता का वहाँ उल्लेख नहीं किया था। यहाँ उस धातु वंचित्र्य वकता का भी समावेश कर लिया गया है और 'पदपूर्वाद्धवक्रता' के अरन्तर्गत ही कृदादि प्रत्यय और मुम आर्प्रादि आ्र््रागम जो वस्तुत पद का ही भाग बन जाता है उनकी वक्रता को तथा भाववकता, लिङ्गवक्रता एव 'क्रिया वैचित्य वक्रता' को भी पदपूर्वार्द्ध वत्रता में सम्मिलित कर लिया है। इस प्रकार इस उन्मेष में पदपूर्वार्द्ध वकरता के पूर्वोक्त पाँच भेदों के स्थान पर ग्यारह भेद बगिगत हुए है। उन अवान्तर भेदो का प्रतिपादन इस प्रकार किया गया है-

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१. रूढ़ि वैचित्र्य वक्रता [कारिका द, है ]। २ पर्यायवैचित्र्य वक्ता [कारिका १०, ११, १२ ]। ३ उपचार वक्रता [ कारिका १३, १४ ]। ४ विशेषण वक्रता [कारिका १५, ]। ५ सवृति वकता [ कारिका १६ ] । ६ क़वादि वक्र्कता [कारिका १७ ]। ७. शगम वक्ता [कारिका १८ ]। 5 वृति वकता [कारिका १६ ] इसी का नाम समासवकता भी है। भाव वकता [ कारिका २०]। १० लिङ्गवचित्र्य वक्रता [ कारिका २१, २२, २३ ]। ११. क्रियावचित्रय वत्रता [ कारिका २४, २५ ] इस प्रकार प्रथम उत्मेष में जिस 'पदपूर्वार्द्ध वकता' के केवल छ भेद किए गए थे उसके यहाँ ६ के वजाय ११ भेद हो गए है। इसके वाद २६ से ३४ तक नौ कारिकाओ में 'षडविध वक्ता' के तृतीय भेद प्रत्यय वकरता' प्रथवा 'पद उत्तरार्द्ध वक्रता' का निरूपण किया गया है। इस 'प्रत्यय वक्र्ता' के शवान्तर भेदो के नाम तथा उनके वर्णन का क्म इस प्रकार है- १ काल वकता [का० २६ ] २ कारक वक्रता[ कारिका २७ २८ ]। ३. संख्या वक्रता [ का० २६ ] पुरुष वकता का० ३० ]। ५. उपग्रह वक्ना [ का० ३१ । ६ प्रत्ययमाला वकता [ का० ३२ ] आ्र्परात्मनेपद या प्रस्मपद के प्रयोग के कारण जो वक्रता होती है उसको 'उपग्रह वक्ता' कहते है। 'सुप्तिडपग्रह लिङ्गनराणा' इत्यादि वचन में आत्मनेपद परस्मपद के लिए ही उपग्रह शब्द का प्रयोग किया गया है। अतः उपग्रह शब्द से यहाँ उन्हीं का ग्रहण करना चाहिए। प्रत्ययमाला प्रक्रिया के अनुसार 'जहाँ वन्देतराम्' आरादि के समान प्रत्ययान्त से -दूसरा प्रत्यय होता है उसे प्रत्यय माला वकता नाम दिया गया है। इस प्रकार प्रत्यय वक्रता के ६ भेदो के निरुपण के बाद उपसर्ग तथा निपात की वक्रता का प्रतिपादन कारिका ३३ में किया गया है। यह उपसर्ग और निपात की

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वकता वस्तुतः पदवकता के घ्न्तर्गत है। परन्तु उनके गौए होने से उनको यहाँ प्रत्यय वता के बाद स्थान मिला है। इसके बाद ३४वीं कारिका में इन अनेक प्रकार की वक्रताओं के सड्कर से होने वाली चित्रच्छाया मनोहर 'सडूर वक्ता' का उल्लेख किया हैं और अन्त में इस प्रकरण का उपसहार कर द्वितीय उन्मेष को समाप्त कर दिया गया है। तृतीयोन्मेष-पिछले अर्थात् द्वितीय उत्मेष नें 'षडविघ वकरता' में से प्रथम तीन भेदो का निरूपण किया गया था। उसके बाद चौया भेद 'वाक्य वकता' है। इस- लिए इस तृतीय उत्मेष में उस वाक्य वकरना का विचार किया गया है कुन्तक का मत यह है कि इस 'वाक्य वक्रता' में सारे अलद्गार वर्ग का अन्तर्भाव हो जाता है। 'यत्रा- लड्गारवर्गोडसौ सर्वोऽप्यन्तर्भवप्यति'। इसलिए 'वाज्य वक्रता' के विवेचन के रूप इस उन्मेष में अलद्धारो के विषय में विचार किया गया है। इसमे यद्यपि एक ही वकता के एक ही भेद का विवेचन किया गया है परन्तु उसके अवान्तर विस्तार में सारे अलद्धार वर्ग के प्र्राजान्त से उसका क्षेन बहुत व्यापक हो गया है। और उसका कलेवर भी और सब उन्मेषो की अपेक्षा अधिक बढ गया है। यह उन्मेष अपने आकार औ्रर विस्तार की दृष्टि से ही नहीं अपितु अ्रन्य दृष्टियो से भी इस ग्रन्थ का सबसे मुस्य और महत्त्वपूर्ण भाग है। सबसे अ््रधिक महत्त्वपूर्ण भाग हम इसलिए कह रहे है कि इसमें कुन्तक ने अलङ्गारो के विवेचन के विषय में एक तया दृष्टिकोए उपस्थित किया है। उसने अलद्धारो के अधिक विस्तार को घटाकर अलङ्धारो की गएना को बहुत परिमित करने का प्रयत्न किया है। अरलद्धारों की विवेचना में कुन्तक ने अपने पूर्ववर्ती भामह के ग्रन्थ को आधार मानकर अलद्धारो की विवेचना की है। परन्तु भामह के अधिकाश अलद्धारो के विवेचन को अपर्याप्त तथा त्रुटित मान कर उनका अरपने प्रकार से नए ढग से विवेचन किया है आर बहुत से अलद्धारों का अ्रन्य अलद्धारो में घन्तर्भाव करके अरलद्धारो की सख्या बहुत कम कर दी है। इसलिए वस्तुत. यह तृतीय उत्मेष कुन्तक के इस ग्रन्य का सबसे अ्रघिक महत्त्वपूर्ण भाग है। किन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि फुन्तक के ग्रन्य के इस सवसे महत्त्वपूणं भाग की अविकल प्रति हमको नहीं मिल सकी है। श्री 'सुशीलकुमार दे' महोदय ने जो वकोकितिजीवितम् का सस्करण प्रकाशित किया था उसमें इस उन्मेष की केवल ११वीं कारिका तक के भाग को ही सम्पादित किया या। उसका भी पाठ बहुत अ्धिक खण्डित और त्रुटिपूर्णा था। इसलिए उसको भी असम्पादित भाग ही कहना चाहिए। ग्रन्य के शेष भाग अर्यात् तृतीय उन्मेष के अवशिष्ड भाग तथा चतुर्थ उन्मेष का सम्पादन श्री 'दे महोदय' नहीं कर सके। उनको जो सामग्री प्राप्त हुई थी उसके खण्डित, अस्पष्ट

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त्रुटिपूर्ण होने आवि के कारण उसका सुसम्पादित पाठ देना सम्भव नहीं था। परन्तु फिर भी उन्होने बहुत प्रयत्न करके उसका पढने का प्रयत्न किया। और जहाँ कहीं का जितना भाव समझ में आया उस सबको अपने ग्रन्य के अन्त में परिशिष्ट रू में छाप दिया था। मूल ग्रन्थ की प्राप्ति के विषय में 'दे महोदय' के कार्य के बद अररब तक औरौर कोई नया प्रकाश नहीं पड़ा है इसलिए मूल पाठ की स्िति अब भी ज्यो की त्यों है। परन्तु हमने अपने इस संस्करण में इतना किया है कि 'दे महोदय' के उस परिशिष्ट भाग को भी उनके सम्पादित शेष भाग के अनुसार ही फिर से व्यवस्थित कर उसकी व्याख्या कर दी है। इस सस्करण में शेष भाग का मुद्रस आदि पहिले के सम्पादित भाग के अनुसार ही व्यवस्यित कर दिया गया है। कहीं कहीं एक जगह का पाठ दूसरी जगह पहुंच गया था उसको भी निकालकर यथा स्थान पहुँचा देने का प्रयत्न किया है। कहों कहीं अशुद्ध पाठ का शोधन भी कर दिया हैँ। परन्तु जो खण्डित पाठ था उमको पूरा करने का कोई सावन न होने से उसको पुष्पचिन्हों द्वारा प्रकट कर दिया है। इस सुधार के आधार पर इस तृतीय उत्मेष के विषय आदि का विश्लेषण निम्न प्रकार से किया जा सकता है। तृतीयोन्मेष कुल ४६ कारिकाओ में समाप्त हुआ है। इनमे से केवल ११वीं कारिका तक के भाग को श्री 'दे महोदय' ने सम्पादित किया है। द्वितीय उत्मेष तक (१) वर्गविन्यास वत्रता, (२) पवपूर्वार्द्ध वकता तथा (३) प्रत्यय वक्रना के रूप में केवल 'वाचक वक्रता का ही विचार किया गया है। वाच्य वक्रता अयवा अर्य वकता का विवेचन नहों हुआ है। इस तृतीयोन्मेष में मुख्य रूप से वाक्य वक्रता का विचार करेंगे। इसलिए वाक्य वक्रता का विचार प्रारम्भ करने के पूर्व प्रतिपाद्य वस्तु अ्रथवा अर्थ की वक्रता का विचार प्रथम दो कारिकाओं में किया गया है। इनमें वस्तु के सुन्दर स्व्रभाव का वर्सन एक प्रकार की वस्तु वकता और कवि के सहज या आहार्य शिक्षा अ्रन्ास श्रादि से सम्पादित कौशल से वस्तु का वर्णन यह वूसरे प्रकार की वस्तु वक्ना कहलाती है। तीसरी तथा चौथी कारिका में यह वतलाया है कि जैसे चित्र की रचना में चित्र के उपकरसो से भिन्न चित्रकार का कौशल कुछ विशेष वक्रता उत्पन्न करता है इसी प्रकार काव्य में वर्णवित्यासवकरना या पदवकरता आदि से भिन्न वाक्य वकना का कुछ और ही प्रकार का विशेष चमत्कार होता है। इसके बाद ६ से १० तक पांच कारिकाओ में वर्णनीय वम्तु का विभाग श्रौर उसकी काव्य में उपयोगिता का प्रतिपादन किया है। काव्य के वणनीय पशार्थ दो "्रेंकार के होते हैं एक चेतन और दूसरे जड़। चेतन पदार्यों के भी वो भेद है एक

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प्रधान चेतन औ्रर दूसरे गौए चेतन । मनुष्य और उससे उत्कृष्ट श्रेणी के देवता आररदि प्रधान चेतन हे और मनुष्य से निम्न श्रेणी के पशु, पक्षी आदि प्राणणी प्र्प्रधान या गौ चेतन है। इनमें से प्रधान चेतन का वर्णन रति आरदि के परिपोष से मनोहर रूप में वशिगत होना चाहिए। अर्यात् रसो का परिपाक मुख्य चेतन मनुष्य या देव आ्रदि को ही आलम्बन विभाव ना कर दिखलाना चाहिए पशु पक्षी आदि में नहीं। पशु पक्षी आदि का वर्णन उनके स्वभाव वर्णन के साथ स्वभाविक रूप में रसों के सहायर्क रूप में ही करना चाहिए। इसी प्रकार जड पदार्थो का प्रयोग भी रसो के उद्दोपक सामग्री के रूप में ही फरना चाहिए। यह जो चेतन अचेतन पदार्थो का स्वरूप है यही काव्य में वर्णन का विषय होता है। इसके वर्सन के मुख्यतः दो प्रयोजन है एक रसादि का परिपोष या अभिव्यक्ति और दूसरा धर्म अर्थ आदि पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि की शिक्षा। यह वात दसवीं कारिका तक कुन्तक ने प्रतिपादित की है। इसके बाद ११वी कारिका से कुन्तक ने अलद्धारो का विवेचन प्रारम्भ कर दिया है। सबमे पहिले उन्होने 'रसवत् अलद्धार' का विवेचन प्रारम्भ किया है। प्रसिद्ध उपमा शरादि अलद्धारों के साथ भामह ने रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्वी और समाहित नाम के चार अलङ्गारो का विवेचन किया है। जहा रस किसी अन्य पदार्थ का श्रद्ध बन जाय वहाँ रसवत् अलद्धार होता है। इस प्रकार के 'रसवत्' अलद्धार के लक्षण भामह, उद्भट आरदि ने किए है। कुन्तक ने उनका बहुत विस्तार के साथ खण्डन किया है। उनका कहना यह है कि इनमें जो कुछ पदार्थ का स्वरूप वर्णित होता है। वह तो 'अलङ्धाय' रूप होता है उससे अतिरिक्त कुछ और उपलब्ध नहीं होता है। शरतएव भामह आदि के अभिमत 'रसवत्' को अलद्धार नहीं कहा जा सकता है। ११वीं फारिका की वृत्ति में बहत विस्तार के साथ इसका विवेचन किया गया है। परन्तु इस कारिका के वृतिभाग का पाठ बडा त्रुटिपूर्ण तथा खण्डित है। इसलिए उसकी सुसगत व्याख्या करना कठिन है। इस ११वीं कारिका की वृत्ति के वाद श्री 'दे महोदष' का सम्पादित भाग समाप्त हो जाता हैं। इसके बाद तृतीय उन्मेष की ३५ कारिकाएँ और शेष रह जाती है परन्तु ग्रन्थ की मूल प्रतिलिषि के दोष के कारण उस भाग का सम्पादन सम्भव नहीं हो सका औरौर दे महोदय जहाँ जितना पढ़ सके है उसको उसी प्रकार उन्होंने परिशिष्ट रूप में दे दिया है। इस भाग में एक विशेषता यह और है कि ग्रन्थ में नूल कारिकाओं का लेस् नहीं मिलता है केवल खण्डित और त्रुटित वृत्ति भाग ही मिलता है। परन्तु वृत्ति भाग में जो प्रतीक देकर व्याख्या की गई है उन प्रतीको को जोड़ कर कारिका का अनुमान के आधार पर निर्माण किया जा सकता है। इस भाग की जिन

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३५ कारिकाओों का हम उल्लेख कर रहे है उनका निर्मास इसी प्रकार वृत्ति ग्रन्थ में आाए हुए प्रतीकों आरधार पर किया गया है। यह अनुमान होता है कि ग्रन्यकार ने पहिले मूल कारिकाओ का निर्माण किया था वह केवल मूल कारिकाओं का ग्रन्थ जिसका नाम 'काव्यालङ्गार' या अलद्दार या अरलग लिखा हुआ था उसके आ्धार पर वुत्ति ग्रन्थ की रचना ग्रत्यकार ने की। यहाँ आगे सन्यकार ने व्यास्या प्रारम्भ करने के पूर्व मूल कारिका को उद्धत करना छोड दिया है औ्र केवल वृत्ति लिखनी प्रारम्भ कर दी है। सम्भवत. यह वृत्ति भाग एक प्रारम्भिक कार्य के रूप में लिसा होगा जिसे पुन. सशोधित रूप में लिखने का उनका विचार होगा। इसीलिए इममें कारिकाएँ नहीं लिखी है। यही कारण मालूम होता है जिसके कारण ग्रन्थ में वृत्ति भाग भी बहुत जगह अपूर्ण रह गया है। और अन्त नें ग्रन्य समाप्ति का उपसहारात्मक पुष्पिका आप्रादि भी नहीं लिखी गई है। यह सव ग्रन्यकार ग्रन्थ की दूमरी शुद्ध परिमाजित प्रतिलिपि में लिखना चाहते थे जिमे लिखने का या तो उनको शवसर नहीं मिला अथवा उनकी लिखी हुई प्रति अव तक नहों मिल सकी हूं। इसी लिए ग्रन्थ का वीच बीच का पाठ त्रुटि पूसां और अ्न्त का भाग असमाप्त सा उपलब्ध हो रहा है। हाँ तो इस असम्पादित भाग का प्रारम्भ 'रसवत्' के वाद के 'प्रेपोलद्कार' के विवेचन से होता है। भामह ने तो इन अलङ्धारो के लक्षणा न करके केवल उदाहरण मात्र दे दिए हैं। इस पर कुन्तक ने 'उदाहरएमात्रमेव लक्षण मन्यमान,' कह फर भामह की चुटकी ली है। फिर दण्डी के 'प्रेयोलङ्ार' के 'प्रेय प्रियतराख्यान' इस लक्षण को लेकर उसका भी 'रसवत्' अलद्धार के खण्डन में दी हुई युक्तियों से ही खण्डन किया है। अर्थात् जिस 'प्रियतरास्यान' को आरप अलङ्गार कहना चाहते हे उससे भिन्न वहाँ 'अलङ्धार्य' रूप में तो कुछ उपलब्ध ही नहीं होता है। इसलिए उसको 'अलङ्गार' नहीं कहा जा सकता है। इसी प्रकार 'ऊर्जस्वि' तया 'समाहित' का भी खण्डन किया है। यह सब खण्डन १२-१३ तक तीन कारिकाओ मे किया गया है। परन्तु १३वी कारिका पूर्स उपभव्ध नहीं हो सकी है। इसके बाद १४-१५ कारिका में कुन्तक ने अपने श्रभिमत 'रसवदलङ्गार' के लक्षण का निरूपर किया है। उनका कहना है कि जहां उपमादि अलद्धार के साथ रक का विशेष रूप से समावेश हो जाता है वहाँ उपमा प्रादि 'लद्धारों' को 'रस- वदुपमा आदि नाम से कहा जाना चाहिए। भामह आदि समान कोई अलग 'रसवत्' अलड्गार नहीं है। उपमा आदि अलद्धारों के ही रसवद्ठुपमा और साधारण उपमा 7 आदि रूप से दो भेद हो जा है। यही स्यिति प्रेय, ऊर्जस्वि तथा समाहित के विषय में भी समभनी चाहिए। यह कुन्तक का अपना मत है।

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इसके वाद कुन्तफ न दीपकालद्वार का विवेचन किया है। उसमे भी भामह आ्ररादि के अभिमत लक्षण का खण्डन कर १७वीं कारिका में दीपक का अपना लक्षण किया है। उसमें विशेषता यह है कि भामह आादि के अनुसार क्रिया पद ही दीपक पद हो सकता है परन्तु कुन्तक क्रिया के अतिरिक्त वस्तु को भी दीपक मानते है। अर्थात वस्तु वाचक पद भी दीपक पद के रूप में प्रयुक्त हो सकता है। १८वीं कारिका 'में दीपक के केवल दीपक तथा पक्तिसस्थ दीपक ये दो भेद किए है। पकनसस्य दीपक को अन्य लोगो ने माला दीपक नाम से लिखा है। १६वीं कारिका में वस्तु दीपक का निरूपण किया है। इसके बाद २०-२१ फारिका में रूपक तथा २२-२३ कारिका में अप्रस्तुत प्रशसा का निरुपण किया है और २४वीं कारिका में पर्यायोक्त अलद्धार का विवेचन किया है। २५ से २८ तक चार कारिकाशो में उत्प्रेक्षालङ्कार का और २वीं कारिका में अर्प्रतिशयोक्ति विषय में विवेचन किया गया है। इसके बाद साम्यमूलक अलङ्गारो का विवेचन किया है। ३०-३१ कारिकाओं में उपमा-विवेचन करने के बाद उपमेयोपमा, तुल्ययोगिता, उसी के साथ अनन्वय [का०३२] परिवृत्ति [का० ३३]और निदर्शन [का० ३४ ] इन पाँचो प्रलद्धारो को सादृश्यमूलक अलद्धार मान कर उपमा के भीतर ही इन सबका अन्तर्भाव दिखलाया है। यह विवेचन ३४वीं कारिका तक किया है। उसी के अन्तर्गत श्लेषालद्धार का विवेचन है। श्लेष के बाद ३५-३६ कारिकाओ में व्यतिरेक का विवेचन किया है। उसके बाद ३७-३८ कारिकाओ में समासोित का वर्णन है। कुन्तक का विचार यह है कि समासो किति को श्लेष के अन्तर्गत ही मानना चाहिए अलगअलद्धार मानने कीआ्राव- इयकता नहीं है। क्योंकि समासोकिति में श्लेष भ्रवश्य रहता है। श्लेष के बिना समासो किति नहीं हो सकती है। अत समासोषिति श्लेष का ही भेव है अलग अलद्कार नहीं। उसके बाद सहोकिति का विवेचन है। सहोकिति का जो लक्षण और उदाहरस भामह के मतानुसार माना गया है उसके विषय में कुन्तक का यह कहना है कि यदि वही सहोिति का लक्षण तथा उदाहरण है तो सहोषिति को अरलग अ्र्परलद्धार मानने की आ्र््रवश्यकता नहीं। वह सादृश्यमूलक उपमालद्धार में अ्र्प्रन्तर्भूत हो सकती है। इस प्रकार भामह के अ्रभिमत सहोकिति के लक्षण का खण्डन करके उन्होंने अपने ढग से सहोकिति का मलग विवेचन किया है। यह २७वीं कारिका में है। यह लक्षणा उनका समासोषित के लक्षणा से मिलता- जुलता है। इसलिए उन्होने सहोकति का दूसरा नाम समाशोकिति भी माना है। इसका प्रतिपादन कारिका ३६ में किया है। इसके वाद कारिका ३६ में वृष्टान्त तथा ४० में६ अर्यान्तरत्यास का निरूपण किया है। उसके बाद ४१ में श्र्ाक्षेप, ४२ में विभावना, ४३ में ससन्देह, ४४ में अ्रपन्हुति का निरूपण किया है। और ४५वीं फारिका में अ्न्य सब

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अलद्धारों का इन्हीं अलङ्धारो में अ्र्प्रन्तर्भाव दिखला दिया है। इस प्रकार कुन्तक ने अ्नेक अ्रलङ्धारो की स्वतन्त्र सत्ता का खण्डन कर अ्रपने श्रभिमत अ्रत्य अपरलद्धारों में ही उनके सब का अन्तर्भाव दिखला दिया है। अन्तिम ४६वीं कारिका इस उत्मेष की उपसहारात्मक कारिका है। चतुर्थ उन्मेप-वक्रोकितिजीवित का चतुर्योन्मेष भी व्वन्यालोक के चतुर्थ उद्योत के समान सबसे छोटा भाग है। इसमें कुल २६ कारिकाएँ है। सौभाग्य से इम उन्मेष की मूल प्रति की स्थिति तीसरे तन्मेष की प्रति की अपेक्षा अ्रच्छी है। इस कारण इसकी सभी कारिकाएँ प्राय., वृत्ति के प्रतीको के आधार पर ठीक बन गई है। कुन्तक की षड्विध वक्रताओ में से (१) वर्णविन्यास वक्रता, (२) पदपूर्वार्द्ध वक्रता और (३) प्रत्यय वक्रना इन तीन का विस्तृत विवेचन द्वितीय उन्मेष में औरर वाक्य वत्रता का विस्तृत विवेचन तृतीयोन्मेप में हो चुका है। अब वक्रता के मुस्य भेदों में ६ भेदो में से 'प्रकरण वकता' तथा 'प्रवन्ध वक्रता' ये वो भेद शेष रह जाते है। इन दोनो भेदो का विवेचन कुन्तक ने इस चतुर्थ उन्मेपमें किया है। इस उन्मेष की २६ कारिकाओ में से प्रारम्भिक १५ कारिकाओ में 'प्रकरण वक्रता' तथा १० कारिकाओ में प्रबन्ध वक्रता का विवेचन किया गया है। इनमें से 'प्रकरण वकता' के और 'प्रबन्ध वक्ता' के छ परवान्तर भेद दिखलाए है। प्रकरण वक्रता के आठ भेद मुख्य रूप से इस प्रकार कहे गए है।

१ पात्रो की प्रवृत्ति वक्रता [ कारिका १, २ ]। २. उत्पाद्यकथा वकता [ कारिका ३, ४ ]। ३ उपकार्योपकारकभाव वकता [ कारिका ५, ६ ]। ४ आवृत्ति वकता [ कारिका ७, ८ ]। ५ प्रासद्भिक प्रकरण वकता [ कारिका ६]। ६ प्रकरण रस वक्रता [कारिका १० ]। ७ अवान्तरवस्तु वक्रता [कारिका ११ ]। ८ नाटकान्तर्गत नाटक वकता [कारिका १२, १३ ]। ६. मुखसन्व्यादि विनिवेश वक्रता [कारिका १४, १५ ]।

इस प्रकार 'प्रकरण वक्रता' के नौ अवान्तर भेदो के निरुपण के बाद कुन्तक ने अपने ग्रन्थ के अन्तिम प्रतिपाद विषय 'प्रवन्ध वकता' का निरूपए करते हुए उसके छःअवान्तर भेदो का निरुपण किया है। इनका सक्षेप इस प्रकार किया जा सकता है-

२५

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१. प्रबन्धरस परिवर्तन वघता फारका १६, १७ ]। २. समापन वक्ता [ कारिका १८, १६ ]। ३ कथाविच्छेद वक्रता कारिफा २०, २१ ]। ४ आनुषद्िक फल वत्रता [कारिका २२, २३ ]। ५. नामकरण वक्रता कारिका २४ ]। ६ कथासाम्य वत्र्रता [कारिका २५ ]। अ्रन्तिम २६वीं कारिका उपसहारात्मक है जिसमें यह कहा गया है कि नए नए उपायो से नीति की शिक्षा देने वाले महाकवियो की सभी रचनाओ मे किसी न किसी प्रकार की वक्रता अवश्य रहती है। यह सक्षेप मे कुन्तक के इस महत्त्वपूर्ण 'वक्रोकितिजीवितम्' ग्रन्थ के प्रतिपाद्य विषय की रूपरेखा है। इस विश्लेषण को पढ जाने से पाठको को ग्रन्थ के समभने मे और अ्रधिक सरलता होगी, ऐसी आशा है। आ्रराभार- इस ग्रन्थ की रचना एक विशेष योजना के अनुसार हुई है। इस योजना के जन्मदाता श्री डा० नगेन्द्र जी है। उन्हीं की योजना के अनुसार १६५२ मे हिन्दी ध्वन्यालोक प्रकाशित हुआ। जिस पर उत्तरप्रदेशीय शासन तथा विन्ध्यप्रदेशीय ६ शासन ने पुरस्कार वेकर सम्मानित किया। १६५३ मे 'हिन्दी लर्कभाषा' का प्रकाशन हुआ। उसको भी उत्तरप्रवेशीय शासन तथा विन्ध्यप्रदेशीय शासन ने पुरस्कार देकर सम्मानित किया। सन् १६५४ में 'हिन्दी काव्यालङ्धारसूत्र प्रकाशित' हुआ। इस पर भी पुरस्कार देकर उत्तरप्रदेशीय शासन ने उसको समादृत किया है। इसी योजना के अ्रन्तर्गत अ्र्प्रस्त्र यह 'हिन्दीवत्रोषितिजीवित' आ्रपके हाथ मे आरहा है। अगले वर्ष सम्भवत 'हिन्दी काव्य प्रकाश' आपके पास पहुँचेगा। यह सब कार्य भा डॉ० नगेन्द्र जी की योजना के अनुसार चल रहा है अत हमें उनका आभारी होना चाहिए। 'हिन्दी ध्वन्यालोक' तथा हिन्दी तर्फभाषा का प्रकाशन भिन्न-भिन्न स्थानों से हुआ था। परन्तु गतवर्ष से इस महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए दिल्ली के प्रमुख प्रकाशक 'श्री आत्माराम एण्ड सस' का सक्रिय सहयोग प्राप्त हो गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय की हिन्दी अनुसन्ान परिषद् की ओर से सम्पादित इन सभी ग्रन्यों के प्रकाशन का भार आत्माराम एण्ड सस के अध्यक्ष 'श्री रामलाल पुरी' महोवय ने अपने ऊपर ले"' लिया हैं। उन्हीं के प्रयत्न से यह ग्रन्थ इतने सुन्दर रूप में प्रकाशित हो रहा है। इसलिए हमें उनका आभारी होना चाहिए।

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क्षमा याचना- पाण्डुलिपि के त्रुटित होने के कारण इस ग्रन्य का सम्पादन बढा कठिन कार्य था। कत्पनातीत परिश्रम करके उसको तैयार किया गया है। उस श्रमाघिक्य के कारस तथा अ्रन्त ने शरीर अत्यन्त अ्रस्वस्य हो जाने से अन्तिम भाग के प्रूफों का ठीक रशोधन नहीं हो सका। पर्याप्त प्रयत्न करने पर जहां-तहाँ त्रुटियां रह गई है। इनके लिए हम इस समय क्षमा चाहने हैं। अवसर मिला तो द्वितीय संस्करण में उनका परिमार्जन करने का यत्न किया जायगा। परिशिष्ट सूची आदि के तैयार करने का कार्य चिरञ्जीव स्नातक नित्यानन्द तथा उपस्नातक श्म्प्रकाश ने किया है, अत. वे साघुवाद के पात्र है-

नववर्ष विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि चंत्र शु० १, स० २०१२ प्राचार्य २५ मार्च, १६५५ गुरुकुल विश्वविद्यालय, बृन्दावन

: 2

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विषय-सूची प्रथम उन्मेष [ १-१६८ ]

रन्थ का नामकरण काव्य लक्षा में आए हुए साहित्य स्वभावोक्ति तथा वकोक्ति रूप शब्द के अर्थ पर शङ्का वाड्मय के दो भढ २ [का० १६] ५८ स्वभावोक्तिवादी पूर्व पक्ष काव्य लक्षण में साहित्य शब्द वकोक्ति की स्थापना ४ का अर्थ [का०१७] ६० मल ग्रन्थ का मङ्लाचरण [का० १ ] ४ वश्रता के छ भेद [का० १८] ६५ काव्यालद्कार नाम [कारिका १] ७ वक्ता के प्रथम तीन भेद काव्य का प्रथम प्रयोजन [का० ३] ह [का० १ ६] ६५ काव्य का द्वितीय प्रयोजन १ वर्णाविन्यास वक्रता ६५ [का० ४] ११ २ पद पूर्वाध वकता के ६ भेद ६६ -= १ काव्य का तृतीय प्रयोजन [का० ५]१२ ३ प्रत्यय वक्नना के ३ भेद ८१-५६ अलद्काय अलक्कार भाव की ४ वाक्य वकता [का० २०] ८७ गोणता [का० ६] १५ ५ प्रकरण वकना [का० २१] ६० काव्य का लक्षण [का० ७] १८ ६ प्रबन्ध वक्ता [का० २१ ] ६३ साहित्य मीमामा के २८ श्लोक २० काव्य लक्षण में वन्ध शब्द का लोक और काव्य में शब्द अर्थ अर्थ [का० २२ ] ४ का भेद [का० = ] ३७ वन् का सहृदया ह्वादकत्व काव्यगत विशिष्ट शन्द तथा अर्थ [का० २३ ] ६६ [का० ६ ] ३८ काव्य के विविध मार्ग [का० २३] ६६ केवल वक्रोक्ति की अलड्कारता सुकुमार मार्ग का लक्षण ।का० १०] ५१ [का० २५-२६] १०४ स्वभावोक्ति का अलक्कार्यत्व मुकुमार मार्ग में प्रसाद गुए [का० १२] ५४ स्वभावोक्ति काव्य का शरीर [का० ३०] ११४ सुकुमार मार्ग में मावुर्य गुए [का० १३ ] ५५ [का० ३१] ११५ स्वभावोक्ति का प्रङ्ककार माने सुकुमार मार्ग का लावण्य गुर पर सच़र या ससृष्टि से भिन्न [का० ३२ ] ११७ अ्रलद्धारो की अनुपपत्ति सुकुमार मार्ग का आ्रभिजात्य गुण [का० १४-१५] ५६ [का० ३३ ] ११६

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वक्रोषितिजीवितम्

विचित्र [द्वितीय] मार्ग यमक षष्ठ भेद [का० ६-७] १८६ [३४-४३ ] १२४-१४४ पदपूर्वार्द्ध वकता- विचित्र मार्ग का माधुर्य गुण रूढि वैचित्र्य वक्र्ता [का० ४४] १४५ [का० ८-६] १६२ विचित्र मार्ग का प्रसाद गए पर्याय वक्रता [का० १०-१२] २०३ [का ० ४ ५-४६ ] १४६ उपचार वक्रता [का० १३-१४] विचित्र मार्ग लावण्य गुए २२३

[का० ४७] विशेषणा वकता [का० १४] २३३ १४७ २३७ विचित्र मार्ग का अभिजात्य गुण सवृति वक्रता [का० १६] पद मध्य प्रत्यय वक्रता [का० ४८ ] १५० मध्यम [तृतीय] मार्ग [का० १७] २४४

[का० ४६-५२] १५१-१५६ पद मध्य, ,, २ [का० १८] २४५

तीनो मार्गो का शचित्य गण वृत्ति वचित्र्य वक्ता

[का० ५३-५४] १५६ [का० १ ६] २४८ 7

तीनो मार्गो का सौभाग्य गुण भाव वैचित्र्य वक्रता [का० २०] २५१

[का० ५५] १६० लिङ्ग वैचित्र्य वक्रता [का० २१] २५३ १

सौभाग्य गुण की सामग्री लिङ्ग वैचित्रय वक्रता २ [का० २२] २५५

[का० ५६] १६१ लिङ्ग वैचित्र्य वक्रता ३

[शचित्य तथा सौभाग्य [का० २३] २५६

गुणो को व्यापकता क्रिया वैचित्र्य वकता

[का० ५७] १६३ [का० २४-२५] २६०

मेष का उपसहार काल वैचित्र्य वक्रता [का० २६]। २७०] [का० ५८] १६८ कारक वकता [का० २७-२६] २७४ द्वतीय उन्मेष [पृ० १६६-२६२] सर्या वकता [का० २६] २७७ वर्णाविन्यास वफ्रता-प्रथम भेद पुरुष वकता [का० १ ] [का० ३०] २८० १६६ वणं विन्यास वक्रता-द्वितीय भेद उपग्रह वक्र्रता [का० ३१ ] २८२

[का० २ ] १७३ प्रत्ययान्तर वक्र्रता [का० ३२] २८३ ई

तृतीय भेद [का० ३ ] १७६ उपसर्ग वक्रता [का० ३३]- २८५ चतुर्थ भेद [का० ४ ] १८४ बहुविघ वकता सद्कर [का० ३४] २५६ 11 पञन्चम भेद [का० ५] १८६ उन्मेप का उपसहार [का० ३५] २६०

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विषय-सूची

5: तृतीय उन्मेषत [पृo २६३-४६२] ।उदात्त अलङ्काड का खण्डन M27:5 वस्तु वकता १ [को० १ ] 7 २६३ [का० 2२] ३७७

वस्तु वक्रना ररे [कां० २] ३०२ समाहित अलक्कार का खण्डन

वाक्य वक्ना [का ३-४] ३१४ " [[काo ,३] ३८१

वर्ण्य वस्तु का विभागका० ५ ३२२ अपन्े मतानुसार रसवद्रल द्वार क़ा । ... :

चेतन वस्तु का द्विविध विभाग लक्षणं [का० , १४-१५],.३८३। दीपकालद्वार के भामह कृत लक्षण [का० ६] ३२४ का खण्डन [१७] ३६७ मुख्य चेतन का स्वरूप [का० ७ ] दीपकालद्कार का अपना लक्षण, प्रमुस्य चेतन की वणंनीयता [का० १७]: :३६७ [काo, =] ३३२ दीपकालद्वार के दो भेद पदार्थ स्वरूप वक्रता १ [का० ६] ३३४ [का ० १८] :: ३६ पदार्थं स्वरूप वक्रता २, वस्तु दीपक़ [का० १६] ४०३ [का० १० ] ३३५ रूपकालद्वार [का० २०],४०छ. ,रसवदलद्वार का खण्डन, 1 रूपक के दो भेद [का० २१ ] ३ ; [का० ११]। ३३८ रूपक का तीसरा प्रकायं - 17 भामह के मत का खण्डन i३२६ [का० 2२] . ४१२. उड्लूट के मत का खण्डन। दण्डी के मत का खण्डन ३४६ [का० २३-२४] ४१३ ध्वन्यालोककार के मत का खण्डन ३४८ पर्यायोक्त अलद्वार [का० २४] ४१६ उपमादि से रसवदलद्कार के विभाग उत्प्रेक्षालक्कार [का० २५-२७] ४२२ का खण्डन ३५ उत्प्रेक्षा का दूसरा भेद [का० २८] ४२६ रसवदलद्कार के अन्य उदाहरणो अतिशयोक्ति अलद्धार [का० २६] ४२६ का उपपादन और उसका निराकरण ३६० उपमालङ्वार [का० ३०-३१] ४३२ अगले ग्रन्थ भाग सदोष ३६६ उपमेयोपमा [का० ३२] ४४१ अगला ग्रन्थ भाग केवल सद्कत रूप ३६६ तुल्योगिवा [का० ३२] ४४१ गली कारिकाओं की सम्पादन अनन्वय [का० ३२] ४४३ शैली ३६६ परिवृत्ति अलद्धार [का० ३३ ] ४४५ प्रेयोऽलद्वार का खण्डन ३६७ श्लेषालक्ार [का० ३४] ४५० उजस्वी अलक्कार का खण्डन व्यतिरेकालद्कार [का० ३५] ४५४ [का० १२] ३७३ व्यतिरेक का भेद [का० ३६] ४५७

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घ सक्रोषितिजीवितम्

सहोक्ति भलद्दार [का० ३८ ] ४६१ प्रासद्धिक प्रकरण वत्ता [का० ६] ५१३ सहोक्ति समासोक्ति [का० ३८] ४४६ प्रकरररसवकता [का० १० ] ५१६ दृष्टान्तालद्वार [का० ३८] ४६७ अवान्तरवस्तुवक्रता ।का० ११] अर्थन्तिरन्यासाल द्वार [का० ३६]४६८ नाटकान्तर्गत नाटक वक्ता आक्षेपालद्कार [का० ४०] ४७० [का० १२-१३] ५२१ विभावनालद्वार [का० ४१ ] ४७१ सन्ध्यङ्ज विनिवेश वक्रता सन्देहालद्वार [का० ४२] ४७२ [का० १४-१५] ५२४ अपन्हुति अलक्दार [का० ४३ ] ४७४ प्रबन्ध वक्रता के छ भेद । अन्य अलद्कारो का खण्डन रस परिवर्तन वकता [का० ४४ ] ४७८ [का० १६-१७] ५ू२८ तृतीयोन्मेष का उपसहार [का० ४६] समापन वत्रता [का० १८-१६] ५३० ४८२ कथा विच्छेद वकता चतुर्थे उन्मेष [पृ० ४८३-५४३] [का० २०-२१ ] ५३३ प्रकरण वकता के नौ भेद प्रानुषङ्गिक फल वक्र्ता पात्र प्रवृत्ि वत्र्ता [का० १-२] 853 [का० २२-२३] ५३५ ६ उत्पाद्यकथावक्रता [का० ३-४] ४८६ नामकरण वक्रता [का० २४] ५३६ उपकार्योपकारक वक्रता [फा० ५-६] ४६६ कथा साम्य वकता [का० २५] ५३८ आवृत्ति वकता [का० ७-८] ५०३ उपसहार [का० २६] ५४०

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श्रीमद्राजानककुन्तकविरचितं

प्रथमोन्सेष:

प्रथ श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचिता 'वकोकितिदीपिका' हिन्दीव्याख्या। श्र््रह्मेव स्वयमिदं वढामि जुष्ट वेवेभिरुत मानुषेभि । यं कामये त तमुम्रं कृणोमि त ब्रह्मांण तमृपि तं सुमेधाम्॥' यस्य प्रसावमासाद्य वाचि चार्थे च वक्रता। स्पन्दते तमह वन्दे नित्यानन्द परेश्वरम्। साहित्यदर्शनपरान् प्रथितान प्रवन्धान् व्याख्यातुमस्ति मम चेतसि काऽपि काक्षा। तामेव नित्यमतुसृत्य प्रयत्नशीलो वक्रोकिजीवितमिद विशठीकरोमि॥ श्रीमद्राजानक कुन्तकविरचित 'वक्रोक्तिजीवितम्' नामक इम ग्रन्थ के दो भाग हैं। एक 'कारिका भाग' और दूसरा 'वृत्ति भाग'। ध्वन्यालोक आररदि के समान इस ग्रन्थ में भी कारिका भाग तथा वृत्ति भाग दोनो के रचयिता स्वय कुन्तक ही हैं। उन्होने अपनी लिखी मूल कारिकाएँ लिखकर उन पर स्वय ही वृत्ति भी लिखी है। 'भामह', 'वामन' आदि अ्रलङ्कारशास्त्र के प्राचीन आ्र्प्राचार्यों ने अप्रपने ग्रन्थो को प्राय. 'काव्यालद्दार' नाम से प्रसिद्ध किया है। राजानक कुन्तक ने भी उसी शैली का अव- लम्वन कर अपने मूल कारिका भाग का नाम 'काव्यालद्वार' रखा है औ्र उसके वृत्ति भाग का नाम 'वक्रोक्तिजीवितम्' रखा है। यह अनुमान इस आधार पर किया जाता है कि इस ग्रन्थ की प्रथम कारिका की वृत्ति में उन्होने स्वय लिखा है- 'अस्य ग्रन्थस्याल्ार इत्यभिधानम्, उपमादिप्रमेयजातमभिधेयम्, उक्तरूप- वैचित्र्यसिद्धि प्रयोजनम्, इति।

१ ऋग्वेद १०, १२५, ५।

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२ 1 चक्रोक्तिजीवितम [ पूवंपीठिका

जगत्त्रितयवैचित्रयचित्रकमेविधायिनम्। शिर्व शक्तिपरिस्पन्दमात्रोपकरएं नुमः।१॥ परन्तु इस ग्रन्थ का 'अलद्दार' अथवा 'काव्यालद्कार' नाम है यह बात वृत्ति ग्रन्थ की इन पक्तियो तक ही सीमित रही। साहित्यशास्त्र में कुन्तक का ग्रन्थ 'काव्या- लङ्कार' नाम से नही अपितु केवल 'वक्त्ोक्तिजीवितम्' नाम से ही प्रसिद्ध है। इस वृत्ति भाग का मङ्गलाचरण करते हुए ग्रन्थकार लिखते है- [केवल] शक्तिमात्र [प्रकृतिमात्र] उपकरण से [वाले] तीनो लोको के वैचित्र्य रूप चित्रफर्म की रचना करने वाले शिव को हम [ग्रन्थकार तथा उनके पाठक, व्यास्याता शादि] सब नमस्कार करते हैं ।।१॥ इस मङ्गलाचरण के प्रथम श्लोक में ग्रन्थकार ने अपने इष्टदेव शिव को जगत् त्रितय के वैचित्र्य रूप चित्रकर्म के निर्माता के रूप में स्मरण किया है। ग्रन्थकार अपने ग्रन्थ में उक्ति-वैचित्र्य रूप 'वक्रता' के सिद्धान्त का प्रतिपादन करेंगे। इसलिए 'विदग्ध- भङ्गीभिति' रूप 'वक्रोक्ति' के निरूपण करनेवाले ग्रन्थ के आरम्भ में 'जगत्- त्रितय-वैचित्र्य' रूप 'चित्रकर्म' के निर्माता का स्मरण सर्वथा प्रासद्गिक तथा विषयानुरूप ही है। इसी दृष्टि मे ग्रन्थकार ने इस रूप में यहाँ अपने इष्टदेव का स्मरण किया है। लोक में तथा काव्य में दोनो ही जगह वस्तु-सौन्दर्य के विषय मे प्राय दो प्रकार के दृष्टिकोण पाए जाते है। कुछ लोगो को वस्तु का स्वाभाविक सौन्दर्य प्रिय होता है और किन्ही को कृत्रिम सौन्दयं अधिक रुचिकर प्रतीत होता है। कोई लोग उद्यान में कृत्रिम रूप से सजाकर लगाई हुई लताओ के सौन्दर्य के प्रेमी है तो किन्ही को वनो मे स्वाभाविक रूप से पुष्पित और पल्लवित लताओ का सौन्दर्य अधिक आकर्षक प्रतीत होता है। यही बात काव्य के विषय में भी लागू होती है। काव्य में कुछ लोग विलकुल स्वाभाविक ढग से कही गई बात को अिक चमत्कारजनक मानते है और कुछ लोग कृत्रिम रूप से अलकृत भाषा में वर्णन को अधिक हृदयग्राही मानते है। इसीलिए साहित्यशास्त्र में 'स्वभावोक्तिवादी' और 'वक्रोक्तिवादी' दो प्रकार के सिद्धान्तो का उल्लेख मिलता है। दण्डी ने अपने 'काव्यादर्श' नामक ग्रन्थ में इन दोनो प्रकारो का निरूपण करते हुए लिखा है- भिन्न द्विधा स्वभावोक्तिर्वक्रोक्तिश्चेति वाड्मयम् । क्लेप सर्वासु पुष्णाति प्रायो वक्रोक्तिषु श्रियम् ॥१ कुन्तक, इनमे से 'वक्रोक्ति' सिद्धान्त के मानने वाले है। वैसे कुन्तक के पूर्व

१ काव्याटर्डा 2 ३६3।

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पूर्व पीठिका ] -प्रथमोन्मेष [ ३

यथातत्त्वं विवेच्यन्ते भावास्त्र लोक्यवर्तिनः यदि तन्नाद्सुतं नाम दैवरक्ता हि किंशुकाः॥॥ स्वमनीषिकयैवाथ तत्त्वं तेषा यथारुचि। स्थाप्यते प्रौढ़िमात्रं तत्परमार्थो न ताहश:ः ॥।३॥ 'भामह' आादि आचार्यों ने भी 'वकोक्ति' को काव्य का जीवनाघायक मूल तत्त्व माना है। 'भामह' ने लिखा है- सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयाऽर्यो विभाव्यते। यत्नोऽस्या कविना कार्य. कोऽलड्कारोऽनया विना।' परन्तु 'चक्रोक्ति' का जैसा वर्णन कुन्तक ने किया है वैसा अन्यत्र कही नही पाया जाता है। इसीलिए कुन्तक इस 'वक्रोक्ति' सम्प्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं। परन्तु कुन्तक के इस 'वक्रोक्ति' सिद्धान्त का विरोधी 'स्वभावोक्ति' सिद्धान्त है जो इस वैचित्र्य में विश्वास नही रखता है। उसका कहना है कि वस्तु का यदि यथार् रूप से वर्णन किया जाय तो उसमें वैचित्र्य का कोई स्थान नही है। उसमें जो कुछ सौन्दर्य है वह सब स्वाभाविक है। उसमें जो विचित्रता के वर्णन करने का प्रयत्न , किया जाता है वह पदार्थ का वास्तविक रूप नही अपितु स्ववुद्धि से कल्पित होने से कृत्रिम है। इस स्वभावोक्ति पक्ष के आशय का निरूपण कुन्तक ने अपने ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही करना आवश्यक समझा है। और वृत्ति ग्रन्थ के मङ्जल श्लोक के बाद 1 दूसरे ही श्लोक में उन्होने इस सिद्धान्त की चर्चा इस प्रकार की है- [पूर्वपक्ष स्वभाववादी सिद्धान्त] यदि ससार के [त्रलोक्यवतिनः] पदार्थों को वास्तविक रूप से [यथातत्व] निरूपण किया जाय तो [आपके पूर्वोक्त मङ्गल श्लोक में कहा हुआ वैचित्र्य या] अतभुत [नामक] कोई पदार्थ नहीं है। [किंशुक] ढाक के फूल स्वभावत. लाल [दैव रक्ता. ] होते हैं। [उसी प्रकार ससार के समस्त पदार्थों का सौन्दर्य] स्वाभाविक ही होता है ।।२।। औौर [वक्रोक्ति के प्रेमी] यदि अपनी बुद्धि से कल्पना करके ही अपनी रुचि के अनुसार उन [पदार्थों] के स्वरूप [तत्व] को स्थापना करते है तो वह [उनका] 'प्रौढ़िवाद' मात्र [जबरवस्ती] है। वास्तविक अर्थ वैसा नहीं है। [इसलिए वैचित्र्य- -शदी अथवा वक्रोक्तिवादी दृष्टिकोण यथार्थ नहीं है। स्वभाववादी वृष्टिकोए ही यथार्थ है।] ॥३॥ कुन्तक 'वक्ोक्ति' सिद्धान्त का प्रतिपादन करने जा रहे हैं। पर उनके विरोधी 'स्वभावोकितिवादी' लोग उस वैचित्र्य सिद्धान्त अथवा वक्रोक्तिवाद को स्वमनः

१. भामह काव्यालक्ार २, ८५।

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४ ] [कारिका १

इत्यसत्तकेसन्दर्भे साहित्यार्थसुधासिन्धोः सारमुन्मीलयाम्यहम्॥४॥ येन द्वितयमप्येतत् तच्वनिर्मितिलक्षणम्। तद्विदामद्भुतामोदचमत्कारं विधास्यति॥५॥। प्रन्थारम्भेऽभिमतदेवतानमस्कारकरण समाचार। तस्मात्तदेव तावदु- पक्रमते- वन्दे कवीन्द्रवक्त्रेन्दुलास्यमन्दिरनर्तकीम्। देवीं सूक्तिपरिस्पन्दसुन्दराभिनयोज्वलाम् ॥१॥ कल्पित और अयथार्थ सिद्धान्त कहते है। इसलिए कुन्तक को सबसे पहले अपने सिद्धान्त की उपयोगिता प्रदर्शित करने को और भी आवश्यकता हो जाती है। इसीलिए ग्रन्थकार ने ग्रन्थ के मङ्गलाचरण के प्रसङ्ग में ही इस विरोधी पक्ष का दो श्लोको में अ्नुवाद करके पूर्वपक्ष दिखलाया है। अगले दो श्लोको में इस पूर्वपक्ष का निराकरण और अपने वकोक्तिपक्ष की उपादेयता का प्रतिपादन करने के लिए कहते हैं- [स्वभावोक्तिवादियो के] इस प्रकार के स्वतन्त्र [अ्हेतुक, अप्रामाशिगक अरथवा स्वतन्त्र, अपने शास्त्र, साहित्यशास्त्र, मे स्वभावोक्तिवाद की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले] अनुचित तर्क सन्दर्भ की पर्वाह न करके मे [अपने सिद्धान्त के अनुसार] सांहित्यार्थ रूप सुधा के सागर [साहित्यशास्त्र] के सार [भूत वकरोषिति सिद्धान्त] को प्रकाशित [करने के लिए इस ग्रन्थ का निर्माण] करता हूँ॥४॥ जिस [ग्रन्थ] से ।इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय अर्थात् वक्रोक्ति रूप अ्रपभिनव] तत्त्व की स्थापना [निर्मिति] और [उसका प्रतिपादक यह लक्षण अर्थात] ग्रत्थ दोनो ही उसको समभने वाले [सहृदय विद्वानो] को अद्भुत आ्र्ानन्द [अथवी परद्भुत अपर्थात् वंचित्य या वक्रता का श्रमोद अर्थार्त सौन्दर्य] औ्रौर चमत्कार प्रदान करेंगे ।।५।। इस प्रकार वत्तिकार कुन्तक अपने वृत्ति ग्रन्थ का मङ्गलाचरण करके अपने 'काव्यालङ्कार' नामक मूल कारिका ग्रन्थ की व्याख्या प्रारम्भ करते है। और इस काव्यालद्दार ग्रन्थ के मङ्गलाचरण श्लोक की अवतारणा करते हैं- ग्रन्थ के आरम्भ में अभिमत देवता को नमस्कार करने की परिपाटी [सभा 1

चार] है इसलिए सबमे पहले उसी [वेवता नमस्कार रूप मङ्गलाचरण] को प्रारम्भ फरते है। महाकवियो के मुखचन्द्र रूप नाट्य भवन मे नर्तन करने वाली और सुभाषितो के विलास से सुन्दर अ्भिनय से [उज्ज्वल] मनोहारिणी [सरस्वती] देवी की ने वन्दना करता हूँ ॥१॥

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कारिका १ ] प्रथमोन्मेप [x

इति। देवीं वन्टे, ठेवतां स्तौमि। कामित्याह, कवीन्द्रवक्त्रेन्दुलास्य- मन्दिरनर्तकीम् । कवीन्द्रा. कविप्रवरास्तेपां वक्त्रेन्दुर्मुखचन्द्र. स एव ूास्यमन्टिर नाट्यवेश्म, तन्र नर्तकीं लासिकाम्। कि विशिष्ठाम, सृक्तिपरि- स्पन्द्सुन्दराभिनयोज्वलाम्। सूक्तिपरिस्पन्टा सुभापितविलसितानि तान्येव सुन्दरा अभिनया, सुकुमारा सात्विकादय, तैरुज्वला भ्राजमानाम्। या किल सत्कविवक्त्रे लास्यवेश्मनीव नर्तकी सविलासमभिनयविशिष्टा नृत्यन्ती विरा- जते, ता चन्टे नौमि, इति वाक्यार्थ। तविदमत्र तात्पर्य, यन् किल प्रस्तुतं वस्तु किमपि काव्यालङ्कारकरण, तवधिटैवतभूता एव विवरामसीयकहदयहारिणों वायूपां सरस्वतीं स्तौमीति ॥।१।

वाचो विषयनैयत्यमुत्पादयितुमुच्यते। 1 आदिवाक्येSभिधानादि निमितेर्मानसूत्रवत् ।।६।।

यह [इष्टदेवता नमस्कार रूप मङ्गलाचरस किया है। वैसे १ शशीर्वा, २ नमस्कार और वस्तु निर्देश रूप तीन प्रकार की मङ्गलाचरस की शैलियाँ पाई जाती है।] 'देवीं वन्दे' का अर्य देवता की स्तुति करता है, यह है। किस [देची] की [वन्दना करते है] यह चतलाते है। कविराजो के मुखचन्द्र रूप नाटच मन्दिर की नर्तकी की। कवीन्द्र अ्रर्ात् कविप्रवर [कविराज, महाकवि] उनका वक्त्रेन्दु अर्थात् मुखचन्द्र। वही लास्यमन्दिर अरथात् नाट्य भवन, उसमें नाचनेवाली अर्यात् लास्य करनेवाली। फँसी [किविशिष्टा देवीं] को [वन्दना करता हूँ, यह कहते है] सूकिति- परिस्पन्द् रूप सुन्दर अभिनयों से उज्ज्वला को। सूक्तिपरिस्पन्द अर्थात् सुभाषितों का विलास, वही है सुन्दर अभिनय, अर्थात् सुकुमार सात्विकावि भाव, उनसे उज्ज्वला अर्थात् प्रकाशमान। जो नाट्य भवन में हावभाव-युक्त, श्भिनयसहित, नतकी के समान सत्कवियों के मुख में विराजती है उस [सरस्वती देवी] को नमस्कार करता हूँ। यह [इस मङ्गल] वाक्य का अर्थ हँ। इसका तात्पर्य यह है कि जो प्रस्तुत वस्तु [वकोकिति] वाष्य शोभा का आधायक अपूर्व [किमपि] साघन है उसकी अ्रधिष्ठात्री ·,देवता और इस प्रकार के [अपूर्व] सौन्दर्य से हृदय को हरसा करनेवाली वासी रूप सरस्वती [देवी] की स्तुति करता हूँ॥१॥ 7 इस प्रकार [इष्टदेवता को] नमस्कार करके अब [ग्रन्थ के] प्रतिपाद् वस्तु के विषयभूत नाम, [प्रतिपाद्य] विषय और प्रयोजन [आदि रूप अनुबन्ध चतुष्टच]' को [झगली दूसरी कारिका में वर्णन करते हुए] लिखते हं- वारगी के विषय को निश्चित करने [विषय से सम्बद्ध बात ही ग्रन्थ में

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वक्रोषितिजीवितम् [ क्ारिका १

इत्यन्तरश्लोक ।।१।।

लिखी जाय, इस दृष्टि से विषय का निर्धारण करने] के लिए [मङ्गलाचरण श्लोक के बाद] आदि श्लोक [अर्थात् द्वितीय कारिका] में, रचना [भवन आदि के निर्मार] के मानसूत्र [भवन निर्माण के आ्रम्भ में जैसे डोरी डालकर जमीन पर लकीर खींच वी जाती है ताकि नींव खोवने वाले उनके अनुसार ही नींव खोदे। उस] के समान [अपने विषय को नियत करने के लिए हम अपने ग्रन्थ के आरम्भ में] नाम आवि [विषय प्रयोजन, अ्धिकारी तथा सम्बन्ध रूप अ्रनुबन्ध चतुष्टय] को कहते हैं ॥६॥ यह बीच का श्लोक है।१॥ कुन्तक ने इस ग्रन्थ की रचना करते समय सवसे पहले मूल ग्रन्थ को कारिका रूप मे लिखा था और उसका नाम 'काव्यालद्दार' रखा था। जैसे कि, इसी कारिका मे ग्रन्थ के अभिधान शदि को कहने की प्रतिज्ञा करके 'काव्यस्यायमलद्वार विघीयते' लिखकर उसके नाम की सूचना दी है। और उसकी वृत्ति में भी 'ग्रन्थस्यास्य अ्लङ्कार इत्यभिधानम्' लिख अपने ग्रन्थ का 'काव्यालद्दार' अथवा 'अलद्दार' यह नाम सूचित किया है। कुन्तक के मूल ग्रन्थ का नाम 'काव्यालद्वार' अथवा 'अलक्कार' है, यह बात यद्यपि कुन्तक ने स्वय अप्रत्यन्त स्पष्ट शब्दो मे लिख दी है। परन्तु उसकी ओ्र ध्यान नही दिया गया। सभी लोग कुन्तक के ग्रन्थ को 'वक्रोक्तिजीवितम्' नाम से कहते है। यह 'वक्ोक्तिजीवितम्' वस्तुत 'काव्यालद्वार' की व्याख्या या वृत्ति ग्रन्थ है। परन्तु मूल 'काव्यालद्वार' ग्रन्थ अपरलग नही मिलता है। 'वक्रोक्तिजीवितम्' नामक वृत्ति ग्रन्थ के साथ ही मिलता है इसलिए 'काव्यालङ्कार' नाम प्रचलित नही हुआ। वक्रोक्तिजीवितम् नाम ही प्रसिद्ध हुआ्रर। कुन्तक ने पहले मूल कारिकाएँ लिखी थी। उसके बाद जब उनकी व्याख्या लिखनी प्रारम्भ की तो स्थल-स्थल पर उन्होने सग्रह रूप कुछ अन्य श्लोको की रचना भी की थी, ऐसे श्लोको को उन्होने अपने वृत्ति ग्रन्थ मे 'अन्तरश्लोक' कहकर उद्धृत किया है। जैसे इसी 'वाचो विषयनैयत्यमुत्पादयितुमुच्यते' इत्यादि श्लोक को 'अन्तरश्लोक' बीच का श्लोक कहा है। अर्थात् वह कारिका के समान महत्त्व का नही है परन्तु वृत्ति ग्रन्थ से अधिक महत्त्व का है। इसलिए अन्तरश्लोक' है। कही इस प्रकार के दो क्लोक और दो से अधिक श्लोक भी लिखे है। उनको 'इत्यन्तरश्लोको' या 'इत्यन्तर- श्लोका' शब्दो से यथास्थान उद्धृत किया है। 'काव्यालद्कार सत्रवृत्ति' के निर्माता वामन ने भी इस प्रकार के श्लोक स्थल-स्थल पर लिखे है। और ध्वन्यालोककार आनन्द- वर्धनाचार्य ने भी इस शैली का अवलम्वन किया है। कुन्तक ने इस प्रकार के श्लोको को 'अन्तरश्लोक' नाम दिया है और आनन्दवर्धनाचार्य ने उनको 'सग्रह' श्लोक तथा वामन ने केवल 'श्लोक' नाम से उद्धृत किया है।

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कारिका २ ] प्रथमोन्मेष

लोकोत्तर चमत्कारकारिवैचित्र्यसिद् ये । काव्यास्यायमलद्कारः कोऽप्यपूर्वो विधीयते ॥२॥ अलक्कारो विधीयते अलङ्करएं क्रियते। कस्य काव्यस्य। कवे. कर्म कार्व्य, तस्य। ननु च सन्ति चिरन्तनास्तद्लक्कारास्तत् किमर्थमित्याह, अपूर्व. तद्व्यतिरिक्तार्थाभिघायी। तदपूर्वत्व तदुत्कृष्टस्य तन्निकृष्टस्य च द्वयोरपि सम्भवतीत्याह कोऽपि, अलौकिक सातिशाय। साऽपि किमर्थमित्याह लोकात्तरचमत्कारकारिवेचित्र्य- सिद्धये, अर्रसामान्याह्वादविधायिविचित्रभावसम्पत्तये। यद्यपि सन्ति शतशः काव्यालङ्कारास्तथापि न कुतश्चिदप्येवविधवैचित्र्यसिद्धि. । लोकोत्तर चमत्कारकारी वँचित्र्य की सिद्धि के लिए यह कुछ [सर्वोत्कृष्ट] प्पूर्व काव्य के अलद्धार [काव्यालद्धार] की रचना की जा रही है।२॥ इसके पहले भी भामह, वामन और रुद्रट आदि अनेक आचार्यो ने काव्या- लद्कार नाम से अपने ग्रन्थो की रचना की है। और उसमें काव्य के अलक्कारो का निरूपण किया है। परन्तु हम अपने इस 'काव्यालद्वार' में वक्रता रूप जिस काव्य के अलद्दार का निरूपण करने जा रहे हैं, उसका निरूपण आज तक किसी ने नही किया है, इसलिए वह अपूर्व है। काव्य का अतिशय सौन्दर्याधायक होने से वह 'वक्ता' कुछ लोकोत्तर अपूर्व तत्त्व है। इस वात को ग्रन्थकार ने 'कोऽप्यपूर्व' शब्दो से अभिव्यक्त करने का प्रयत्न किया है। 'अलद्धारो विधायते' का अर्य अलद्धार की रचना की जाती। किसके, काव्य के। कवि का कर्म [रचना] काव्य है उस [काव्य] के [अलद्धार की रचना की जाती है।] [प्रश्न-भामह, वामन, रुद्रट आदि प्रणीत] बहत से प्राचीन उस [काव्य] के अलद्धार ['काव्यालद्वार'] विद्यमान है फिर [आप यह प्रयत्न ] किसलिए [क्र रहे है इस प्रश्न के उत्तर रूप] यह कहते है। अपूर्व, उन [काव्यालद्धार ग्रन्थों] से भिन्न [वक्रता रूप नवीन तत्त्व] अर्थ का प्रतिपादक [होने से हमारा यह प्रयत्न फेवल पिष्टपेषसमात्र नहीं है अवितु वस्तुत अपूर्व] हैं। [प्रश्न ] वह अपूर्वत्व तो उन [प्राचीन काव्यालद्वारों] से उत्कृष्ट और निकृष्ट दोनों का ही हो सकता है। [तो आपका यह नया प्रयास प्राचीन आचार्यों से उत्कृष्ट तो हो ही नहीं सकता है, फिर इस रद्दी निकृष्ट नये ग्रन्थ को लिखने से क्या लाभ ?] इस [शङ्धा के समाधान] के लिए यह कहते हैं-कोऽपि अर्थात् लोकोत्र, अतिशययुक्त [हमारा प्रयत्न हैं। निकृष्ट नहीं]। वह [अपूर्व प्रयत्न या ग्रन्थ] भी किस [प्रयोजन के] लिए [रच रहे है] यह कहते हैं। लोकोत्तर 1

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वक्रोक्तिजीवितम् [ फारिका २

तरपरलङ्कारशब्द शरीरस्य शोभातिशयकारित्वान्मुख्यतया कटकादिपु वर्तते। तत्कारित्वसामान्यादुपचारादुपमादिपु। तद्वदेव च तत्सदशेपु गुणादिपु। तथैव च तदभिधायिनी ग्रन्थे। शच्दार्थयारेकयोगक्षेमत्वादैक्येन व्यवहार: यथा गौरिति शच्द गौरित्यर्थ इति। तदयमर्थ। ग्रन्थस्यास्य अरप्रलद्कार इत्यभिवानम्, उपमादिप्रमेयजातम- भिधेयम्, उत्तरूपवैचित्र्यसिद्धि प्रयोजनमिति ॥२।। एवमलङ्कारस्य प्रयोजनमस्तीति स्थापितेऽपि तटलङ्कार्यस्य काव्यस्य प्रयोजन विना, तदपि सदपार्थकमित्याह-

चमत्कारकारी वैचित्य की सिद्धि के लिए। अर्थात् [काव्य मे] असाधारण श्राह्माददायक सौन्दर्य [वैचित्रयभाव] के सम्पावन के लिए। यद्यपि बहुत से 'काय्या- लद्वार' विद्यमान है परन्तु [उनमे से] किसी से भी इस प्रकार के [लोकोत्तर] वेचित्रय [काव्यसौन्दर्य] की सिद्धि नही हो सकती है। अलद्धार शब्द शरीर के शोभातिशयजनक होने से मुख्यतया कटक [कण्डल] आ्रादि के अरर्थ मे प्रयुक्त होता है। और [काव्य मे] उस [शोभा] के जनकत्व की समानता से [सादृश्यमूलक लक्षणा रूप] गौणीवृत्ति [उपचार] से उपमा श्रादि [काव्य के अलद्धारों] मे, और उसी प्रफार [उपचार से] उन [अलङ्धारो] के सदृश [काव्यशोभाजनक] गुए [तथा वामनाभिप्रेत रीति] आवि मे, और उसी प्रकार उपचार से उन [गुए, रीति, अलद्धार आदि] के प्रतिपादन करनेवाले ग्रन्थ [के अ्र्र्थ] मे [श्रलद्धार शब्द का प्रयोग होता] है। शब्द औौर अर् के तुल्य योग क्षेम [अरप्राप्तस्य प्राप्तिर्योग, प्राप्तस्य परिरक्षण क्षेम] वाला होने से [शन्दालद्भार अर्थालद्वार दोनों के लिए। एकरूप से [अरलद्धार शब्द का] व्यवहार होता है। जैसे गौ यह शब्द [के लिए] और 'गौ' यह अर्थ [ के लिए, दोनो के लिए गौ. इस एक ही शब्द का व्यवहार होता है। इसी प्रकार शब्द और अर्थ दोनो के शोभाधायक धर्मो के लिए 'अलद्धार' इस सामान्य शब्द का प्रयोग होता ] है। - इसलिए [ सक्षेप मे इस कारिका का] यह अभिप्राय हुआ कि इस [वक्रोकति- जीवितम् के मल कारिका का रूप] ग्रन्थ का 'अलङ्गार' [अ्थवा 'काव्यालद्वार'] यह नाम है। उपमा आदि प्रमेय समुदाय इसका अभिधेय [पतिपाद्य विषय] है और पूर्व प्रतिपादित [लोकोत्तरचमत्कारी] वचित्र्य [काव्य सौन्दर्य] की सिद्धि [इस ग्रन्थ का] प्रयोजन है ॥२॥ इस प्रकार [श्रापके इस काव्यालद्वार नामक] अलद्गार [पन्थ] का प्रयो- जन है [उसकी रचना व्यर्थ नही हं] यह निश्चित हो जाने पर भी, उस

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कारिका ३ ] प्रथमोन्मेष.

धर्मादिसाधनोपायः सुकुमारक्रमोदितः । काव्यवन्धोऽभिजातानां हृदयाह्ादकारकः ॥।३॥ ३ हृदयाह्वाटकारकश्चित्तानन्दजनक. काव्यवन्ध, सर्गवन्धानिर्भवतीति सम्चन्ध. । कस्येत्याकाक्षायामाह, अभिजातानाम। अभिजाता' खलु राजपुत्रा- दयो धर्माद्यु पेयार्थिनो विजिगीयव. क्लेशभीरवश्च, सुकुमाराशयत्वात्तेपाम्। तथा पत्यपि तदाह्नाटकत्वे काव्यवन्धस्य, क्रोडनकाठिप्रख्यता प्राप्नोतीत्याह, धर्मादिसाधनोपाय. । धर्मावेरुपेयभूतस्य चतुवर्गस्य साधने सम्पाटने तदुपदेश-

तथापि तथाविधपुरुपार्थोपटेशपरैरपरैरपि शास्त्रै किमपराद- मित्यभिधीयते, सुकुमारक्रमादित। सुकुमार. सुन्टरः सहृद्यहदयहारी [काव्यालद्धार] के अलङ्धार्य [रूप मुख्य] काव्य के प्रयोजन [के अस्तित्व तथा प्रतिपावन] के विना [काव्यालद्धार का प्रयोजन] होने पर भी वह [काव्यालद्कार का निर्माख] व्यर्य है। इसलिए [अपने 'काव्यालद्वार' की सार्थकता के निर्वाह के लिए आवश्यक काव्य के प्रयोजन को, अगली ३, ४, ५ इन तीन कारिकाओं में] कहते है। काव्यवन्ध उच्चकुल में समुत्पन्न [परिश्रमहीन और मन्दवुद्धि राजकुमार आदि] के हृदयो को शह्लादित करनेवाला और कोमल मृदु शैली से कहा हुआ धर्मादि की सिद्धि का मार्ग है। [इसलिए पत्यन्त उपादेय है] ।।३।। हृदयाह्ल्लादकारक अर्थात चित्त को श्रानन्द देनेवाला। काव्यवन्घ अर्ात् सर्ग- बन्ध [महाकाव्य, मुक्तक] आदि होता है यह [मुख्य वाक्य का 'भर्वत' इस करिया के साथ] सम्बन्ध है। किसका [हृदयाह्ादकारक होता हूँ] इसकी जिज्ञासा होने पर [समाधानार्थ] कहते हे-अभिजातानाम् अर्थात् उच्चकुलोत्पन्नों के [हृदय का श्ह्लादकारक होता हं]। उच्चकुल में उत्पन्न होनेवासे राजपुत्र श्दि, धर्मादि [रूप] प्राप्य [पुरुपार्थ चतुष्टच] के इच्छुक, विजय की इच्छा रखनेवाले [किन्तु क्लेश] परिश्रम से डरनेवाले होते है। उनके सुकुमार स्वभाव होने से। [उनका परिश्रम से डरना स्वाभाविक है] इस प्रकार न [राजपुत्रादि] के हृदय को प्रसन्न करनेवाला होने पर काव्यबन्घ को खिलौने की समानता प्राप्त होती है। इसलिए कहते हैं [कि काव्य केवल खिलौनों के समान मनोरञ्जक ही नहीं है अररपितु] धर्मादि [पुरुपार्य चतुष्टच] की प्राप्ति का उपाय [भी] हू। प्राप्तव्य [उद्दश्यभूत] धर्मादि रूप चतुर्वगं के साधन अरथात् सम्पादन में उसका उपदेश रूप [वतलाने वाला] होने से उपाय अर्ात् उसकी प्राप्ति का निमित्त होता है। तो भी उस प्रकार के [प्राप्तव्य] पुरुषार्थ का उपदेश करनेवाले अन्य शास्त्रो

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१० ] वक्रोकितिजीवितम् [कारिका ३

क्रम परिपाटीविन्यासस्तेनोदित कथित. सन्। अभिजातानामाह्नादकत्वे सति प्रवर्तकत्वात् काव्यबन्धो धर्मादिप्राप्त्युपायतां प्रतिपद्यते। शास्त्रेपु पुन. कठोरक्रमाभिहितत्वाद् धर्माद्युपदेशो दुरवगाह। तथाविधे विपये विद्यमानोऽप्यकिन्चित्कर एव। राजपुत्रा. खलु समासादितविभवा समस्तजगतीव्यवस्थाकारितां प्रतिपद्यमाना: श्लाध्योपायोपदेशशून्यतया स्वतन्त्रा. सन्त समुचितसकलव्य- वहारोच्छेद प्रवर्तयितुं प्रभवन्तीत्येतदर्थमेतद्व्युत्पत्तये व्यतीतसच्चरितराजचरित तन्निदर्शनाय निवघ्नन्ति कवय'। तदेवं शास्त्रातिरिक्त प्रगुणामस्त्येव प्रयोजनं काव्यबन्धस्य ।३।। मुख्यं पुरुषार्थसिद्धिलक्षणं प्रयोजनमास्ता तावत्, अन्यदपि लोकयात्रा- प्रवर्तननिमित्त भृत्यसुहृत्स्वाम्या दिसमावर्जनमनेन विना न सम्भवतीत्याह- ने क्या अपराध किया है[कि आप उनको छोड़कर काव्य के लिए यह प्रयत्न कर रहे हे।] इस [शङ्धा के निवारण] के लिए कहते है-सुकुमार क्रम से कहा हुआ [साधन] है। सुकुमार अर्थात् सुन्दर सहृदयो के हृवय को हरण करनेवाला जो क्रम अर्थात् रचना-शैली उस सरल शेली से कहा हुआ [साधन] है। अभिजातो [उच्च- कुलोत्पन्न राजपुत्र आदि] के आह्नादफ होने पर [सत्कार्यों में] प्रवर्तक होने से काव्य- बन्ध धर्मादि की प्राप्ति का उपाय हो जाता है। और शास्त्रो में कठिन शैली से कहा होने के कारस धर्मादि का उपदेश मुश्किल से समझ में आता है। इसलिए उस प्रकार के ['सुकुमार-मति' और परिश्रमहीन राजपुन्रादि के ] विषय में [राजपुत्रावि के लिए] वह [धर्मादि का उपवेश, शास्त्रादि में] विद्यमान होने पर भी [उनकी समझ में न आने से] व्यर्थ ही रहता है। [काव्य के प्रयोजन के प्रतिपावन में आरापने अ्र्प्रभिजात राजपुत्रादि का ही ध्यान क्यो रखा है, सामान्य पाठक का निर्देश क्यों नहीं किया इसके लिए कहते है] राजपुत्र आदि [वयस्क होकर यथासमय पेतृक] वंभव को प्राप्त करके समस्त [राज्य] पृथ्वी के व्यवस्थापक बनकर उत्तम उपदेश से शून्य होने के कारण स्वतन्त्र होकर समस्त उचित लोकव्यवहार का नाश करने में समर्थ हो सकते है, इसलिए उनके [शचित्य या कर्तव्या- कर्तव्य के] परिज्ञान के लिए, कवि, अतीत सच्चरित्र [रामचन्द्र आादि] राजाओं के चरित्र को [काव्य रूप में] लिखते हैं। इसलिए शास्त्र से श्रपरतिरिक्त काव्य का [और भी अ्रधिक] महत्त्वपूर्णग प्रयोजन है ही। [जिसके कारण काव्य विशेष रूप से उपादेय है।] ।।३॥ इस पुरुषाथ सिद्धि [शर्थात् चतुर्वर्गफलप्राप्ति और राजपुत्रादि की उपवेश- सिद्धि] रूप [प्रयोजन] को रहने भी वें [छोड दे,] किन्तु लोकयात्रा [लोक- व्यवहार] के सञ्चालन के लिए भृत्य, मित्र, स्वामी आदि का आकर्षण आदि अन्य

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कारिका ४ ] प्रथमोन्मेष. [११

व्यवहारपरिस्पन्दसौन्द व्यवहारिभिः । सत्काव्याधिगमादेव नूतनौचित्यमाप्यते।।४।। व्यवहारो लोकवृत्तं, तस्य परिस्पन्दो व्यापार क्रियाक्रमलक्षसस्तस्य सौन्दर्य रामणीयक तद्, व्यवहारिभि-र्व्यवहत भि, सत्काव्याधिगमादेव कमनीयकाव्यपरिज्ञानादेव नान्यस्माद्, आप्यते लभ्यते, इत्यर्थ.। कीनश तत्सौन्दर्य नूतनौचित्यम्। नूतनमभिनवलौकिकमौचित्यमुचितभावो यम्य । तदिदमुक्त भवति, महता हि राजादीना व्यवहारे वषर्यमाने तदङ्गभूता. सर्वे मुख्यामात्यप्रभृतयः समुचितप्रांतिस्चिककर्त व्यव्यव हारनिपुरातया निवष्यमाना. सकलव्यवहारिवृत्तोपदेशतामापद्यन्ते तत. सर्व:कश्चित् कमनीयकाव्ये कृतश्रम. समासाढितव्यवहारपरिस्पन्दसौन्दर्यातिशयः श्लाघनीयफलभाग् भवतीति ।।४।।

[कार्य] भी इस [कान्य] के बिना भली प्रकार सम्भव नहीं हो सकते है। यह [बात अगली कारिका में] कहते है। व्यवहार करनेवाले [लौकिक] पुरुषो को अ्रनुदिन के नूतन औ्रचित्य से युक्त, व्यवहार, चेप्टा आादि का सौन्दर्य; सत्काव्य के परिज्ञान से ही प्राप्त हो सकता है [इसलिए भी काव्य उपादेय है ]।॥।४। व्यवहार अर्थात् लोकाचार, उसका परिस्पन्द अर्यात् करियाओं के क्रम रूप में व्यापार, उसका सौन्दर्य अर्थात् रमरीयता। वह [लोकाचार के अनुष्ठान का सौन्दर्य] व्यवहार करनेवाले [सामान्य लौकिक] जनों को उत्तम काव्यो के परिज्ञान से ही होता है। अन्य [किसी साधन] से प्राप्त नहीं हो सकता है। यह अभिप्राय है। वह सौन्दर्य फैसा है कि, नूतन औचित्य-युक्त। नूतन अर्थात् अपूर्व अलौकिक श्चित्य अर्थात् उचितत्व जिसका है। [ऐसा लोकव्यवहार का सौन्दर्य काव्य से ही प्राप्त हो सकता हूँ अन्य प्रकार से नहीं] इसका यह अभिप्राय हुआ कि [उत्तम काव्यों में] राजा आदि के व्यवहार का वर्णन करने पर उनके अ्ङ्गभूत प्रधान मन्त्री आदि सब ही के अपने-अपने [प्रातिस्विक] उचित कर्तव्य और व्यवहार में निपुण रूप में ही [काव्य में]वशिगत होने से [उसके पढने वाले] व्यवहार करने वाले समस्त जनो को [उनके उचित] व्यवहार की शिक्षा देने वाले होते है। इसलिए सुन्दर काव्यों में परिशम करनेवाला [सर्व कश्चित् सब कोई] प्रत्येक व्यक्ति लोकव्यवहार की क्रियाओर में सौन्दर्य को प्राप्त कर श्लाघनीय फल का पात्र होता हैं।।४।। औौर [तीसरी कारिका में] जो इस चतुर्वर्ग रूप पुरुषार्थ [धर्मादि] को, उस

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१२ ] वक्रोषितिजीवितम् [कारिका ५

काव्यस्य पारम्पर्येण प्रयोजनमित्याम्नात, सोऽपि समयान्तरभावितया तदुप- भोगस्य तत्फलभूताह्वाढकारित्वेन तत्कालमेव पर्यवस्यति। त्र््रतस्तवतिरिक्तं किमपि सहृदयदृदयसवासुभगं तदात्वरमणीय प्रयोजनान्तरमभिधातुमाह। चतुर्वर्गफलास्वादमप्यतिक्रम्य तद्विदाम्। काव्यामृतरसेनान्तश्चमत्कारो वितन्यते ॥५॥ चमत्कारो वितन्यते चमत्कृतिर्विस्तार्यते, ह्वाट पुन पुन क्रियत इत्यर्थ.। केन, काव्यामृतरसेन। काव्यमेवामृत तस्य रसस्तवास्वादस्तटनुभव- स्तेन। क्वेत्यभिदधाति, अन्तश्चेतसि। कस्य, तद्विदाम्। तं विदन्ति जानन्तीति तद्विदस्तव्ज्ञास्तेपाम्। कथम्, चतुरवर्गफलास्वाटमप्यतिक्रम्य। चतुर्वर्गस्य धर्माढे. फलं तदुपभोगस्तस्यास्व्राटस्तदनुभवस्तमपि प्रसिद्धातिशयमतिक्रम्य विजित्य पस्पशप्रायं सम्पाद्य।

[धर्मादि] के उपार्जन के विषय मे व्युत्पत्ति कराने वाला होने से, काव्य का परम्परा से प्रयोजन बतलाया (, वह [धर्मादि का फल काव्य के अध्ययनकाल मे नहीं अपितु समयान्तर मे होता है इसलिए] भी उसके फलभोग के कालान्तरभावी होने से, उसके फलभूत अ्रह्माद के जनक होने से उस [समयान्तररूप] काल मे ही परिणत होता है। [अध्ययनकाल में उससे कोई लाभ नहीं है] इसलिए उससे भिन्न सहृदयो के हृदय के अनुरूप सुन्दर और उसी [अध्ययन समय मे ही] काल में रमणीय दूसरा प्रयोजन बतलाने के लिए [अगली कारिका ]कहते है- काव्यामृत का रस उस [काव्य] को समभने वालों [सहृदयो] के अन्त करण मे चतुर्वर्ग रूप फल के आस्वाद से भी बढकर चमत्कार को उत्पन्न करता है।।५॥ 'चमत्कारो वितन्यते' का अर्थ् अपरलौकिक आ्रानन्द [चमत्कृति] का सञ्चार किया जाता है, यह है। बार-वार आनन्द की अनुभूति कराता है यह अभिप्राय है। किससे [यह आ्र्रानन्दानुभूति होती है] काव्यामृतरस से। काव्य ही [मानो] अ्रमृत है, उस का रस शर्थात् उसका आस्वाद, उसका अनुभव, उससे। कहा [वह अनुभूति होती है] J यह कहते हैं। अ््न्त अपर्थात् चित्त मे। किसके [चित्त से] उस [काव्य] को समझने- वालो के। उस [काव्य] को जो जानते है वह तह्वित् [काव्यज्ञ] हुए, उनके [हृदय में चमत्कार उत्पन्न करता है]। कैसे, कि चतुर्वर्ग रूप फल के आस्वाद से भी बढ़कर। चतुर्वर्ग धर्मादि का फल पर्ात् उसका उपभोग, उसका आस्वाद अर्थात् उसका अनुभव, प्रसिद्ध महत्त्व वाले उस [चतुर्वर्ग रूप फल] को भी श्र््रतिक्रमण करके, जीत करके

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कारिका ५ ] प्रथमोन्मेष [१३

तवयमभिप्राय। योऽसौ चतुर्वर्गफलाम्वाठ प्रकृष्टपुरुपार्थतया सर्व- शास्त्रप्रयोजनत्वेन प्रसिद्ध, सोऽप्यस्य काव्यामृतचर्वएचमत्कारकलामात्रस्य न जामपि साम्यकलना कर्तुमर्हतीति। दु श्रव-दुर्भरा-दुरधिगमत्वादिठोपदुष्टो- डध्ययनावसर एव सुदुःसहदु.खदायी शास्त्रसन्द्रभस्तत्कालकल्पितकमनीय- चमत्कृते काव्यस्य न कथन्चिदपि भवति। कटुक।षघवच्छास्त्र मावद्याव्याघिनाशनम्। आह्माद्यामृतवत् काव्यमविवेकगदापहम्॥७

भूमिका [सदृश] वनाकर [अलौकिक चमत्कार को उत्पन्न करता है]। ग्रन्थकार ने यहाँ 'पस्पश' शब्द का प्रयोग किया है। व्याकरण महाभाप्य का प्रथम शह्निक 'पम्पशाह्निक' नाम से प्रसिद्ध है। उसमें व्याकरण के प्रयोजन आदि प्रारम्भिक बातो का वणन है। मुस्य और अधिक महत्त्वपूर्ण विषय का निरूपण आगे के शह्निकों में किया गया है। इसी प्रकार काव्य से वर्मादि की शिक्षा अर्थात कर्तव्या- कर्तव्य का परिजान उसका मुख्य फल नही गौण फल है। मुख्य फल तो आनन्दानुभूति हैं। इसी बात को सूचित करने के लिए ग्रन्थकार ने यहाँ 'पस्पशप्राय सम्पाद्य' इस शब्द का प्रयोग किया है। वैसे 'भूमिका' अर्थ में 'पस्पश' शन्द प्रचलित नही है। इसका यह अभिप्राय हुआ कि जो चतुर्वर्ग फल का आस्वाद [पर्थात् पुरुषार्थ चतुष्टय], प्रकृप्ट पुरुणार्थ होने से सब शास्त्रों के प्रयोजन रूप में प्रसिद्ध है, वह भी इस काव्यामृत रस की चर्षरगा के चमत्कार की कलामात्र के साथ भी किसी प्रकार की तनिक भी बरावरी नहीं कर सकता है। सुनने में कटु, बोलने में कठिन, शर समभने में मुश्किल आरदि [अ्नेक ] दोषो से दुष्ट और पढने के समय में ही अत्यन्त दु खदायी, शास्त्र सन्दर्भ, पढने के साथ [तत्काल] ही सुन्दर, चमत्कार [आनन्दानुभूति] को उत्पन्न करने वाले काव्य की बरावरी [स्पर्धा] किसी प्रकार भी नहीं कर सकता है। यह वात भी अर्थापत्ति से [कथित होती है] निकलती है। इसी बात को दिखलाने के लिए काव्य और शास्त्र की तुलना निम्नलिखित दो श्लोको में की गई हूँ। शास्त्र कडवी औषधि के समान [दु खजनक होता हुआ] अ्रविद्यारूप व्याघि का नाश करता है। शरर काव्य आनन्ददायक [सुस्वादु] अ्रमृत के समान [श्ानन्द- वायक होता हुआ] अज्ञानरूप रोग का नाश करता है।।७।।

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१४ वक्रोक्तिजीवितम् [ कारिका ५ू

आयत्याञ्च तदात्वे च रसमिःस्यन्दसुन्दरम्। येन सम्पद्यते का्व्यं तदिदानीं विचार्यते ।८/19 इत्यन्तरश्लोकौ ।।५।।

जिसके द्वारा काव्य उस समय [अध्ययनकाल में ] औरर पीछे [परिामरूप में दोनों समय] रस के प्रवाह से सुन्वर बनता है, अब [अगले ग्रन्थ भाग में] उसका विचार [प्रारम्भ] करते है ॥८।। यह दोनों 'अन्तरश्लोक' है। इन पिछली तीन कारिकाओ मे कुन्तक ने काव्य के प्रयोजनो का निरूपण किया है। इनमे मुख्यत (१) राजपुत्रादि को कर्तव्याकर्तव्यरूप धर्मादि की शिक्षा, (२) राजा, अमात्य, सेनापति, सुहृद्, स्वामी, भृत्य आदि को उनके उचित व्यवहार की शिक्षा, औ्ररौर (३) लोकोत्तर श्र्प्रानन्द की अ्र्प्रनुभूति यह तीन प्रकार के काव्य के फल बतलाए हैं। यह तीनो फल काव्य का अध्ययन करनेवालो की दृष्टि से लिखे गये हैं। काव्य के निर्माता कवि की दृष्टि से कोई फल नही कहा गया है। 'कुन्तक' से पहिले 'भामह' आदि आचार्यों ने काव्य-निर्माता कवि की दृष्टि से कीति आदि को भी काव्य- फल माना है। भामह ने काव्य फलो का निरूपण करते हुए लिखा है- धर्मार्थकाममोक्षेपु वैचक्षण्य कलासु च। करोति कीति प्रीतिञ्च साधुकाव्यनिबन्धनम् ॥२ इसमें भामह ने 'साधुकाव्यनिबन्धनम्' अपर्थात् उत्तम काव्य 'रचना' के फल दिखलाए है। वह रचना के फल मुख्यत काव्य-रचना करनेवाले कवि की दृष्टि से ही हो सकते हैं पाठक की दृष्टि से नही। परन्तु कीर्ति को छोडकर शेष सब फल कवि के समान पाठक को भी प्राप्त हो सकते हैं। इसीलिए जहाँ विश्वनाथ आदि नवीन आचार्यों ने भामह के इस श्लोक को उद्धृत किया है वहाँ 'साधुकाव्य निबन्धनम्' के स्थान पर 'साघुकाव्यनिषेवणम्' पाठ रखा है। वामन ने काव्य के प्रयोजनो का निरूपण करते हुए लिखा है- काव्य सद् दृष्टादृष्टाथं प्रीतिकीतिहेतुत्वात्। अर्थात् कवि की दृष्टि से कीति और पाठक की दृष्टि से प्रीति यह दो ही काव्य के मुख्य प्रयोजन हैं। अर्थात् वामन की दृष्टि में लोकव्यवहार की शिक्षा काव्य

१ वामन काव्यालद्कार सूत्रवृत्ति की कामघेनु टीका के प्र० ६ पर उब्बृत है। २ भामह, काव्यालद्कार, १, २। ३. काव्यालद्ार सूत्रवृत्ति १, १, ५।

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कारिका ६ ] प्रथमोन्मेष [१५

अलंकृतिरलक्कार्यमपोद्धत्य विवेच्यते। तदुपायतया तत्त्वं सालङ्वारस्य काव्यता ॥६॥। - 3 अलकृतिलङ्गरणम् । अ्रलंक्रियते ययेति विग्रृह्य। सा विवेच्यते विचार्यते। यच्चालङ्गायमलङ्करणीय वाचकरूप वाच्यरूपञच तदपि विवेच्यते। तया. सामान्यविशेपलक्षणद्वारेण स्वरूपनिरूपण क्रियते। कथम्, अपोद्धृत्य। निकृष्य, पृथक पृथगवस्थाप्य, यत्र समुदायरूपे तयोरन्तर्भावस्तस्माद्विभज्य। का मुख्य प्रयोजन नही है। काव्यप्रकाशकार मम्मट ने इन सबका समन्वय करते हुए लिखा है- काव्य यशमेऽर्यकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतने। सद्य परनिर्वृ तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥ इसमें काव्य के ६ फल बतलाए हैं। उनमें से (१) यशसे, (२) अर्थकृते, तथा (३) शिवेतरक्षतये, यह तीन प्रयोजन मुख्यत कवि से सम्बद्ध है औ्रर (१) व्यवहारविदे, (२) सद्य परनिवृतये औरर (३) कान्तासम्मिततया उपदेशयुजे, यह तीन प्रयोजन मुख्यत पाठक की दृष्टि से रखे गये है। कवि की दृष्टि से सबसे मुख्य फल यश की प्राप्ति, दूसरा अर्थ की प्राप्ति, और तीसरा शिवेतर अर्थात् अशिव अकल्याण की निवृत्ति है। पाठक की दृष्टि से सबसे मुख्य फल सद्य परनिवृति अपर्ात्, परमानन्द की प्राप्ति है। जिमे यहाँ कुन्तक ने 'अन्तश्चमत्कार' कहा है ॥५॥ [उपमादि] अलद्धार औप्रौर [उसके] अलक्धार्य [शब्द तथा अर्य] को अ्लग- अलग करके उनकी विवेचना उस [काव्य की व्युत्पत्ति] का उपाय होने से [ही] की जाती है। [वास्तव में तो] अ्रलद्धारसहित [शब्द औौर अ्रर्थ, अर्थात् तीनों की समष्टि] काव्य है। [अत तीनों का अलग-अलग विवेचन उचित नहीं है। फिर भी उस अलग- अलग विवेचन से काव्य-सौन्दर्य को ग्रहण करने की शक्ति प्राप्त होती है इसलिए उनको अलग अलग करके विवेचन करने की शैली अलङ्धार-ग्रन्थों में पाई जाती है] ॥६।। अलकृति का अर्थ अलङ्धार है। जिसके द्वारा अलकृत किया जाय [उसको अलद्धार कहते है] इस प्रकार का विग्रह करने से [अलकृति शन्द अलद्धार के लिए प्रयुक्त होता है]उसका [काव्यालङ्गार ग्रन्थो में] विवेचन अर्थात विचार किया जाता है।और जो [उस अलकृति का] अ्र्प्रलद्धरणीय, [अर्थात्] वाचक [शब्द] रूप तथा वाच्य [अ्रथं] रूप है उसका भी विवेचन [विचार] किया जाता है। [शर्थात्] सामान्य तथा विशेष लक्षण द्वारा उसका स्वरूप निरूपण किया जाता है। किस प्रकार। १. काव्य प्रकाश १, २।

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१८ ] वक्रीितजावितम् 1 कारका ७

शब्दार्थौ सहितौ वक्रकविव्यापारशालिनि। बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्वादकारिसि ।७ शब्दार्थो काव्यम, वाचका वाच्यश्चेति द्वौ सम्मिलितौ काव्यम् द्वावेकमिति विचित्रैवोक्ति। तेन यत्केपाञ्चिन्मत कवि कौशलकल्पितकमनीया- तिशय शब्द एव केवलं काव्यमिति, केपाञ्चिद् वाच्यमेव रचनावैचित्र्य- चमत्कारकारि काव्यमिति, पक्षद्वयमपि निरस्त भवति। तस्माद् द्वयोरपि प्रति- तिलमिव तैलं तदविह्वादकारित्वं वर्तते, न पुनरेकस्मिन्। यथा- भणा तरुणि रमणमन्दिरमानन्दस्यन्दिसुन्दरेन्दुमुखि। यदि सलीलोल्लापिनि गच्छसि तत्कि त्वदीयं मे ॥६//२

काव्यमर्मज्ञो के शह्हादकारक, सुन्दर [वक्र] कवि व्यापार से युक्त रचना [बन्ध] मे व्यवस्थित शब्द औौर अरपर्थ मिलकर काव्य [कहलाते] हैं।७। 'शब्दार्थौं काव्य' अर्ात् वाचक [शब्द] और वाच्य [अर्थ] दोनो मिलकर काव्य है। [अलग-अलग नहीं] दो [शन्द और अ्रर्थ मिलकर] एक [काव्य कहलाते] है, यह विचित्र ही [सी] उक्ति है। [अथात् हम वक्रोिति को काव्य का जीवित निर्धारण करने जा रहे है। वह बात काव्य के लक्षण से भी स्पष्ट होती है। शब्द औ्रौर अर्थ यह दोनो मिलकर एक काव्य नाम को प्राप्त करते हैं यह कथन स्वय एक प्रकार की वकता से पूर्रग होने से वक्रोषिति है ]। इसलिए यह जो किन्ही का मत है कि कवि कौशल से कल्पित किया गया है सौन्दर्यातिशय जिसका ऐसा केवल शब्द ही काव्य है, और किन्हीं का रचना के वैचित्र्य से चमत्कारकारी अर्थ ही काव्य है [यह जो मत है] यह दोनो पक्ष खण्डित हो जाते है। [अर्थात् न केवल शब्द को और न केवल अर्थ को काव्य कहा जा सकता है, अपितु शब्द और अरथ दोनो मिलकर काव्य कहलाते है]। इसलिर जैसे प्रत्येक तिल में तेल रहता है इसी प्रकार [शब्द तथा अर्थ] दोनों में ही तद्विदाह्नावकारित्व [काव्यत्व] होता है। किसी एक मे नहीं।जिसे- आनन्दस्यन्वी सुन्दर [शरत्पू्णिमा के] चन्द्रमा के समान [सुन्दर या प्रकाश मान] मुख वाली, सुन्दर हाव-भावो के साथ बात करने वाली, [सलील लीलाभि सहित उल्लपितु वक्तु शील यस्यास्तथाभूते] रक्तचरण वाली [इन दोनों श्लोको का अर्थ एक साथ होता है इसलिए अगले इ्लोक के 'अरुणचरणे' पद का यहाँ अन्वय हो रहात हैँ] हे सुन्दरि [तरुरिग], अनल्परूप से मणि-मेखला का शब्द करती हुई और निरन्तर नूपुर की मनोरम ध्वनि करती हुई तुम यदि अपने पति [या प्रिय] के घर को जाती हो १ महिम भट्ट के 'व्यक्ति विवेक' मे पृ० २८ पर तथा समुद्रबन्ध मे पृ० ८ पर यह कारिका उद्धृत की गई है। २ रुद्रट काव्यालद्वार २, २२-२३।

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कारिका ७ ] प्रथमोन्मेषः [ १६

परिसरणामरुणचरो रसारएकमकारं कुरुते ॥?०॥l प्रतिभादारिद्रयदैन्यादृतिस्वल्पसुभापितेन कविना वणोसावएयरम्यता- मात्रमन्रोदितम्। न पुनर्वाच्यवैचित्र्यकणिका काचिदस्तीति। यत्किल नूतनतारुस्यतरङ्वितलावएयलटभकान्ते कान्ताया कामयमानेन केनचिदेतदुच्यते। यदि त्व तरुणि रमणामन्दिर व्रजसि ततिकिं त्वदीयं रणरणकमकारणं मम करोतीत्यतिग्राम्येयमुक्ति । किञ्च, न त्र्रकारणम् । यतस्तस्याम्तटनादरेण गमनेन तनुरक्तान्त करणस्य विरहविधुरताशङ्काकातरता कारण रसरसकस्य। यदि वा परिसरणाम्य मया किमपराद्धमित्यकारणता- समर्पकम्, एतदप्यतिग्राम्यतरम्। सम्बोधनानि च वहू नि मुनिप्नणीतस्तोत्रामन्त्रण-

तो तुम्हारा वह जाना [त्वदीय तत् परिसरख] मुझे व्यर्थ ही क्यों सता रहा है [दु ख दे रहा है]।६-१०। यह ब्लोक काव्यप्रकाश में भी उद्धृत हुए है। परन्तु द्वितीय श्लोक के प्रारम्भ में काव्यप्रकाश में 'अनसरणन्' पाठ है। वक्रोक्तिजीवित में 'अननुरणन्' पाठ सम्भवत. सशोधन की भूल से हो गया है। हमने 'अनणु रणन्' पाठ ही रखा है। [यहाँ] प्रतिभा के दारिच और दैन्य के कारण अत्यन्त स्वल्प सुभाषित [वक्तव्य] वाले [अर्थात् जिसके पास कहने योग्य, वर्शन करने योग्य कोई सुन्दर पदार्थ नहीं है, ऐसे] कवि ने [अनुप्रास के प्रलोभन में] वरगों की समानता की रम्यतामात्र का कथन किया हूँ। परन्तु अर्थ चमत्कार का लश भी उसमें नहीं है। और जो नवयौवन से तरङ्गित लावण्य तथा सुन्दर [लटभ] कान्ति वाले [किसी युवक] की कान्ता को चाहने वाला कोई [उपनायक इस इ्लोक में जो यह] कह रहा है कि तुम यदि पतिगृह को जाती हो तो तुम्हारा वह [गमन, परिसरण] मुझे विना कारण के कष्ट क्यो देता है। यह [वकता, सौन्दर्ययुक्त न होकर] पत्यन्त प्राम्य उक्ति है। और [ 'कि मे रणरणकम- कारण कुरुते' यह 'रसरसक' अर्थात् दु ख] पकारण नहीं है। क्योकि उस [कामुक] का अनादर करके उस [सुन्दरी] के [चले] जाने से उसके प्रति अनुरक्त अ्रन्त.करण 'वाले उस [उपनायक] की विरहविघुरता की शङ्धा ही उसके दु.ख का कारण है। अथवा यदि [तुम्हारे] परिसरस [गमन] का मेने क्या बिगाडा [अपराध किया] है इस प्रकार [परिसरख, गमन में] फारणता के अभाव का कथन करना हो तो यह भी १ 'लटभललनाभोगसुलभ'। 'तस्या पादनसश्रेणि शोभते लटभभ्रुव'। 'न कस्य लोभं लटभा तनोति। केशवन्वविभवर्लटभानाम्। आदि में 'लटभ' शन्द सुन्दर भर्य वाचक है।

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२० ] [ कारिका ७

कल्पानि न काञ्चिदापि तद्विदामाह्नादकारिता पुप्सन्तीति यत्किञ्चदेतत्। वस्तुमात्रञच शोभातिशयशून्यं न काव्यव्यपदेशमहति। यथा- प्रकाशस्वाभाव्य विद्धति न भावास्तमसि यत् ६. तथा नैते ते स्युर्यदि कल तथा तत्र न कथम्। गुणाध्यासाभ्यासव्यसनदृढदी कागुरुगुणो रविव्यापारोजय किमथ सदशं तस्य महस.॥११॥ त्त्र हिशुकतर्कवाक्यवासना िवासिेाा परतिामान मेव वस्तु व्यसनितया कविना केवलमुपनिवद्धम्। न पुनर्वाचकवक्रताविच्छि- त्तिलवाऽपि लक्ष्यते। यस्मात्तर्कवाक्यशैय्यैव शरीरमस्य श्लोकस्य। तथा च,

अत्यन्त ग्राम्य कथन होगा। और [ एक साथ ही दिए हुए] बहुत से सम्वोधन, मुनि- प्रशीत स्तोत्र पाठ के समान [उपहासजनक से] प्रतीत होते है। औ्रर काव्यमर्मज्ञो की आह्नादकारिता का तनिक भी पोषण नही करते है। इसलिए यह [उदाहरस] ऐसा ही [रद्दी-सा, व्यर्थ] है। [उसे काव्य नही कहना चाहिए]। शोभातिशय से रहित वस्तुमात्र को काव्य नाम से नहीं कहा जा सकता है। जैसे-[ निम्न उवाहरख भी? चमत्कारहोन होने से काव्य नहीं कहा जा सकता है]- [घट पट आरादि] पदार्थ [स्वय] प्रकाश स्वरूप नही होते है। क्योंकि वे अन्धकार में वैसे [प्रकाश स्वरूप] नहीं वीखते। यदि वे वैसे [प्रकाशस्वरूप] है तो अरन्धकार मे वसे [प्रकाशस्वभाव] क्यो नहीं है। [नील, पीत रूप आरदि] गुरो का [पदार्थो मे] अध्यास [मिथ्या प्रतीति] करने के अभ्यास और व्यसन की वढ़ दीक्षा के कारण प्रवल गुण वाला यह सूर्य का व्यापार है [जो मब पदार्थो को प्रकाशित करता हैं। उस [सूर्य] के तेज के समान और क्या है। [कुछ भी नही] ।११। यहां शुष्क तर्क वाक्य [अनुमान वाक्य] की वासना से अधिवासित चित्त वाले कवि ने अभ्यासवश [व्यसनितया] केवल प्रतिभा से कल्पित वस्तुमात्र को [श्लोक मे] उपनिबद्ध कर दिया है। परन्तु [उसमे ] शब्द सौन्दर्य का लवलेश भी दिखलाई नहीं देता है। क्योकि तर्क इस श्लोक का स्वरूप [शरीर] अनुमान वाक्य [तर्क वाक्ष्य] पर ही प्ाश्रित है। जैसे कि, अन्धकार से अतिरिदत पदार्थ रूप धर्मी [स्वय ] प्रकाश र्वभाव वाले नहीं होते ह, यह [ इस अनुमान वाक्य रूप श्लोक में प्रतिज्ञा या] साध्य हैं। अन्वकार मे उस प्रकार के [स्वय प्रकाश स्वभाव] न होने से यह [उकत साव्य की सिद्धि के लिए] हेतु हं [अत यह किसी नैयायिक का अररनुमान वाक्यमात्र प्रतीत होता है, काव्य नही ]।

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कारिका ७ 1 प्रथमोन्मेप: [ २१

तमोव्यतिरिक्ताः पदार्था धर्मिखः प्रकाशस्वभावा न सवन्ति, इति साध्यम्। तमस्यतथामूतत्वाठिति हेतु । दृष्टान्तस्तर्हि कर्थ न दर्शित.१ तर्कन्यायस्यैव चेतसि प्रतिभासमानत्वान। तथोच्यते- तद्भावहेनुभावौ हि हप्टान्ते तद्वेदिनः। स्थाप्येते, विदुपा वाच्यो हेतुरेव हि केवल: ॥१२॥ [प्रश्न] यदि इस श्लोक में प्रनुमान वाक्य ही प्रम्तुत किया गया हैँ [तो अरनुमान वाक्य में श्र््पेक्षित] तो दृष्टान्त क्यो नहीं दिसलाया है ? [उत्तर ] तर्क की नीति के ही चित्त में प्रतिभासमान होने से। [दृष्टान्त इस अनुमान वाक्य में, नहीं दिया है। अर्थात् वौद्ध आदि के न्याय के सिद्धान्त के अनुसार विशिष्ट विद्वानो के लिए अ्रनुमान वाक्य में दृष्टान्त का होना आवश्यक नहीं है ]। जंसा कि [निम्नलिखित श्लोक में] कहा हं- उस [हेतु और साध्य के साध्य साधन भाव] को न समझ सकने वाले [अल्पज्ञ पुरुष] के लिए [ही] दृष्टान्त में साध्य-साधन भाव [तद्भाव हेतुभावौ] · दिखाए [स्थापित किए] जाते है। [विव्वानों के लिए उनकी आ्रावश्यकता नहीं है। क्योंकि विद्वान् उम साध्य-साघन भाव को स्वय समझ सकते हैं। इसलिए] विद्वानों के लिए केवल हेतु ही कहना चाहिए।१२। न्यायदर्शन मे ग्रनुसार परार्यानुमान मे पञ्चावयव वाक्य का प्रयोग अ्प्रनिवार्य माना गया है, परन्तु अन्य गाम्त्रो में प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरणा, उपनय और निगमन के प्रयोग के विपय में अन्य कई प्रकार के मत पाये जाते है। सास्य कारिका की 'माठर- वृत्ति' मे पाँचवी कारिका की व्याख्या में प्रतिना, हेतु और उदाहरण केवल इन तीन अवयवो का ही प्रतिपादन आवश्यक माना गया है। प्रभाकर के अ्रनुयायी मीमामक 'शालिकनाथ' ने अपनी 'प्रकरण पञ्चिका" में और कुमारिलभट्ट के अनुयायी मीमामक पार्थसारथिमिश् ने श्लोक वार्तिक की व्यास्या में तीन अवयवो के ही प्रयोग का प्रतिपादन किया है। प्रसिद्ध जन आरचार्य हेमचन्द्र तथा अनन्तवीर्य3 ने चार अरवयवो का प्रयोग मानने वाले किती मीमासक नम्प्रदाय का भी उल्लेख किया है। परन्तु ·"' उस प्रकार का कोई मीमामक सम्प्रदाय इम समय मिलता नही है। वौद्ध तथा कुछ जन तार्किक४ हेतु तथा दृप्टान्त इन दो प्वपत्ो का ही प्रयाग मानने हैं अयवा केवन

१. पृ० ८३, ८४ । २. अनुमान श्लोक ५४। ३. प्रमेय र० ३,३७ । ४. प्रमाणवार्तिक १, २८, स्याद्वाद र० ६ृ० ५५६।

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२२ ] वक्रोषितिजीवितम् [ कारिका ७

इति। विदधतीति विपूर्वो दधाति करोत्यर्थे वर्तते। स च करोत्यर्थोSन्र न सुस्पष्टसमन्वय प्रकाशस्वाभाव्यं न कुर्वन्तीति। प्रकाशस्वाभाव्यशब्दोऽपि चिन्त्य एव। प्रकाश स्वभावो यस्यासौ प्रकाशस्वभाव । तस्य भाव इति- भावप्रत्यये विहिते पूर्वपदम्य वृद्धि प्राप्नोति। अथ स्वभावस्य भाव स्वाभा व्यमित्यत्रापि भावप्रत्ययान्ताद्भावप्रत्ययो न प्रचुरप्रयोगाह। तथा प्रकाशश्चासौ स्वाभाव्यञचेति विशेषणासमासोSपि न समीचीन। हेतु से भी काम चलाने का प्रतिपादन करते है। जैसा कि इस श्लोक में प्रतिपादन किया है। जैन आचार्य 'माशिक्य नन्दी' ने प्रदेश भेद की दृष्टि से दो अथवा पाँच अवयवो के प्रयोग का निर्देश किया है। उनके अनुसार 'वाद' प्रदेश में तो पाँच अरवयवो के प्रयोग का नियम समभना चाहिए और 'शास्त्र' प्रदेश में अधिकारिभेद से दो अथवा पाँच अवयवो का प्रयोग वैकल्पिक है। यहाँ कुन्तक ने जो श्लोक उद्धृत किया है उसमे केवल हेतु रूप एक अवयव के प्रयोग का औचित्य प्रतिपादन किया गया है। वह वौद्ध अथवा जैन सिद्धान्त के अनुरूप है। यह उद्धृत श्लोक कहाँ का है यह पता नही चला। कुन्तक ने जो एक हेतुमात्र के प्रयोग का समर्थन किया है वह हेतु की मुख्यता को ध्यान में रखकर सामान्य रूप से कर दिया है। उससे कुन्तक को है बौद्ध या जैन मानना उचित नही होगा। क्योकि कुन्तक न अपने मङ्गलाचरण में स्पप्ट रूप से शिव को नमस्कार किया है। [ऊपर उवाहरण रूप में उद्धृत 'प्रकाशस्वाभाव्य' वाले श्लोक में] विदघति इस [प्रयोग] में वि [उपसर्ग] पूर्वक धा [दधाति] धातु कृ [डुकृन करणे] धातु [करोति] के अर्थ में [प्रयुक्त] है। और वह, करोति [कृज धातु] का अर्य [यहाँ] स्पष्ट रूप से समन्वित नहीं होता है। प्रकाशस्वाभा्य नहीं करते है। [यह अर्थ स्पष्ट रूप से सङ्गत नहों प्रतीत होता है। अत उसका प्रयोग अनुचित है]। औ्रर 'प्रकाशस्वाभाटय' शब्द [का प्रयोग] भी चिन्त्य [श्शुद्ध] है। [क्योकि] प्रकाश जिसका स्वभाव है वह प्रकाश स्वभाव [हुआ] उसका भाव इस [अर्थ] मे [प्रकाश स्वभाव शब्व से फिर एक श्रोर] भावप्रत्यय [प्यञ] करने पर पूर्व पद की वृद्धि, प्राप्त होती है। [पूर्वपद की वृद्धि होकर प्राकाशस्वाभाव्य प्रयोग बनेगा, 'प्रकाशस्वाभाव्य' प्रयोग नही बनेगा]। और यदि [पहिले] स्वभाव का भाव स्वाभाव्य [ऐसा प्रयोग बनाकर फिर उनका प्रकाश के ₹. साथ समास करके 'प्रकाशस्वाभाव्य' पद को बनाने का प्रयत्न करे तो भी ठीक नहीं होगा। [कयोकि] इस [त्वाभाव्य प्रयोग] मे भी भाव प्रत्ययान्त [भाव शन्दान्त स्वभाव शब्द] से [फिर] भाव प्रत्यय का विशेष प्रयोग नहीं होता है। इसलिए [पहिले स्वाभाव्य पद बनाकर उसका प्रकाश शब्द के साथ] प्रकाशश्चासौ स्वाभाव्य च यह विशेषण [कर्मधारण] समास भी उचित नहीं है। [अत, यह प्रयोग ठीक नहीं हैं]।

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कारिका ७ ] प्रथमोन्मेष. [ २३

मावहृति। 'रविव्यापार' इति रविशब्दस्य प्राधान्येनाभिमतस्यू समासे गुणीभावो ज विकल्पित। पाठान्तरस्य 'रवे' इति सम्भवान् ।/ ४ ननु वस्तुमात्रस्यालङ्कारशून्यतया कथ तद्विवाह्वादकारित्वमिति चेन्, तन्न। यस्मादलङ्कारेणाप्रस्तुतप्रशंसालक्षणेनान्यापदेशतया स्फुरितमेव कविचेतसि। प्रथम च प्रतिभाप्रतिभासमानमघटितपापाणशकलकल्पमखि प्रख्यमेव वस्तु विदग्वकविविरचितवक्रवाक्योपारूढ शागोल्लीढ़मणिम नोहरतया तद्विदाह्नाटकारिकाव्यत्वमधिराहति। तथा चैकस्मिन्नेव वस्तुनि, त्र्रवहितानव- हितकाविद्वितयविरचित वाक्यद्वयमिद महदन्तरमावेवयति- और [उक्त प्रकाशल्वाभाव्य वाले श्लोक के] तृतीय पाद में अ्त्यन्त [अथं के] श्रसमर्पक [अर्थ बोध के वाधक] समासों का बाहुल्यरूप अत्याचार [सहृवय] काव्यमर्मज्ञों के लिए श्ाह्लादकारक नहीं होता है। [चतुर्थ चरस में] रविव्यापार इस [समस्त पद] में प्राधान्येन अ्र््रभिमत रवि शब्द को समास में गुसीभाव से नहीं बचाया गया है [ जो कि बचाया जा सकता था। 'रविव्यापारोज्य' के स्थान पर समास ) को तोडकर] 'रवे' [व्यापारोऽय] यह पाठान्तर भी सम्भव होने से। [रविच्यापार इस समस्त पद का प्रयोग उचित नहीं हुआ है। क्योकि उससे रवि का अभिमत प्राधान्य नहीं रहता है। इसलिए शोभातिशय से शून्य औौर अ्र्प्रनेक दोषग्रस्त यह 'प्रकाशस्वाभाव्य' वाला श्लोक काव्य कहलाने योग्य नहीं है]। [पश्न, यदि शञोभातिशयशून्य वस्तुमात्र को काव्य नहीं कहा जा सकता है तो, अप्रस्तुत प्रशसा जैसे किन्हीं स्थलों में] अलङ्धारशून्य होने से वस्तुमात्र का सहृदयहृदया- हहादकारित्व फैसे होता है? [उत्तर] यह शङ्गा हो तो वह ठीक नहीं है। क्योंकि [ऐसे उदाहररो में] अन्योक्ति [अन्यापवेश] के रूप में अप्रस्तृत प्रशसा रूप अ्लङ्गार कवि [तथा पाठक] के चित्त में स्फुरित हो ही जाता है। और पहिले बिना गढ़े हुए पत्थर के टुकडे सी [लगने वाली] मणि के समान, प्रतिभा से प्रतिभासमान वस्तु विदग्धकविरचित वाक्य [काव्य] में उपाल्ढ़ होकर [वाद को] सान पर घिसे हुए मणि के समान मनोहर होकर [काव्यमर्मज्ञ] सहृदयों के आ्ह्लादकारित्व को प्राप्त करती है। इसीलिए एक ही विषय [वस्तुनि] में सावधान और अ्रसाववान कवि द्वारा रचित [निम्नाङित ] दो वाक्य [श्लोक ] प्रचुर भेव को प्रद्शित करते हैं। यह श्लोक किरातार्जुनीय के नवमसर्ग का २६वां श्लोक है। रुद्रट के काव्यालद्वार की टीका में नमिसाधु ने पृ० ६६ पर इसको उद्धृत भी किया है।

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२४ ] वक्रोक्तिजीवितम् [ कारिका ७

मन्दमन्दमुदितः प्रययौ खं भीतमीत इव शीतमयूखः।१३॥।' क्रमादेकद्वित्रिप्रभृति परिपाटी: प्रकटयन् कलाः स्वैरं स्वैरं नवकमलकन्दाकुररुचः। पुरन्ध्रीणा प्रेयो विरहृद हनोद्दीपितदृशा कटाक्षेभ्यो विभ्यन्निभृत इच चन्द्रोऽभ्यृदयते।४।। एतयोरन्तर सहदयदृदयसंवेद्यमिति तैरेव विचारणीयम्। तस्मात स्थितमेतत, न शब्दस्यैव रमणीयताविशिष्टस्य केवलस्व काव्यत्वं, नाग्यर्थ- स्येति। तदिदमुक्तम्- रूपका दिरलङ्कारस्तथान्यैर्वहुधोदितः। न कान्तमपि निर्भूप विभाति वनितामुखम्।१५॥२ गरम गरम आंसुओं से कलुषित मानिनी जनो के दृष्टिपातो [कटाक्षो] को ग्रहण करता हआ, डरता-डरता-सा धीरे-धीरे उदय होता हुआ चन्द्रमा आकाश [में आ्राया] को चला।१३। यह सावधान रहने वाले महाकवि 'भारवि' की उक्ति है। इसी विपय को किसी दूसरे अनवहित, असावधान कवि ने इस प्रकार वर्णन किया है। नवीन कमलकन्द से समान कान्ति वाली कलाओ को, एक-दो-तीन की परिपाटी से धोरे-धीरे प्रकट करते हुए, प्रियो के विरहाग्नि से दीप्त नेत्र वाली [कुृद्ध] स्त्रियों के फटाक्षो से डरता हुआ मानो छिपा हुआ-सा चन्द्रमा उदय हो रहा है।१४। इन दोनो का अन्तर सहृदय सवेद है यह [श्रन्तर] वही [सहृदय] समझ [विचार ] सकते है। इसलिए यह बात निश्चित हुई कि न केवल रमणीयता विशिष्ट शब्द काव्य है और न [केवल] अर्। [अपिति शब्द औ्रर प्रर्थ दोनो की समष्टि में 'व्याप्यर्वृत्ति' काव्यत्व है]। यह बात [भामह ने अपने काव्यालद्गार १,१५-१७ मे] कही [भी] है- अ्न्यों [अनेक आलङ्कारिको] ने रूपकादि [अर्थालडार] अलद्धार वर्ग का अ्रनेक प्रकार से निरुपण किया है। [क्योकि अ्रलद्गारो के बिना गुणावियुक्त काव्य भी इस प्रकार शोभित नहीं होता है जिस प्रकार कि] सुन्दर होने पर भी, अलद्धारों के बिना स्त्रो का मुख [पूर्ण रूप से] शोभित नहीं होता है.१५। १ किरात ६, २६, तथा रुट्रट का प्र० टीका पृ० ६६ २ भामह काव्यालद्कार १,१५।

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का ७ ] प्रथमोन्मेष ६ २५

रूपकादिमलक्कार वाह्यमाचक्षने परे। सृपा तिडाञ्च व्युत्पत्ति वाचा वाञ्छन्त्यत्क्वृतिम् ॥१६।। तदेतदाहुः सौशन्द नार्थव्युत्पत्तिरीदशी। शब्दाभिधेयालङ्कारभेदादिष्ट द्वयन्त न।१७॥१ तेन शच्दार्थों द्वौ सम्सिलितौ काव्यसिति स्थतम्। एवसवस्थापिते द्वयो काव्यत्वे कदाचिटेकस्य मनाड्मान्रन्यूनतायां सत्या काव्यव्यवहार: प्रवर्ततेत्याह,सहिता विति। सहिती सहितभावेन साहित्येनावस्थितौ। ननु च वाच्यवाचकसम्वन्वस्य विद्यमानत्वादेतयोरन कथन्चिदपि साहित्यविरह । सत्यमेतत, किन्तु विशिष्टमेवेह साहित्यमभिप्रेतम् । कीहशम्, वक्रताविचित्रगुसालङ्कारसम्पदा परस्परम्पर्वाघिरोह: तेन- दूसरे लोग [जो शन्दालङ्गार को प्रधान मानते है] रूपकादि [श्रर्थालद्धारो] अलद्धारों को [शब्द सौन्दर्य तथा अर्थ के प्रनुभव के वाद प्रतीत होने से] वाह्य [अप्रधान] कहते है सौर सुधन्त तिडन्त पदों के सौन्दर्य [घ्रलकृति] को ही वाी का [प्रधान] अलद्धार सानते है।१६। इसी [सुवन्त तिडन्त पदो के तौन्दर्य] को [शन्दालद्वारप्रधानतावादी] 'सौशन्य' कहते हैं। [वही काव्य में शधिक चमत्कारजनक होने से प्रधान है] शर्थ [अर्यालङ्गारो] की व्युत्पति इतनी चमत्कारजनक नहीं होती है। [इसलिए शन्दा- लङ्गार ही प्रधान और रूपकादि अर्यालद्गार वाह्य प्थदा प्पधान है। यह दूसरे लोगो का मत है] परन्तु हम [भामह] को तो शन्दालद्गार तथा अर्थालङ्गार भेद से दोनों ही इष्ट है ।१७। इसलिए शब्द औ्रौर धर्थ दोनो नम्मिलित रूप मे काव्य हं यह स्थिर हुआ। इस प्रकार [शब्द तथा सर्थ] बोलो के काव्यत्व के निर्वारित हो जाने पर कभी [उन दोनों ने से] किसी एक की कुछ न्यूनता हो जाने पर भी काव्य व्यवहार होने लगे [जो कि इष्ट नहीं है] इसलिए [उस एक मे काव्य व्यवहार के निवारण के लिए] कहते है, 'सहिती'। सहिती अात सहभाव स 'साहित्य' से अरवस्थित [शब्द और अर्य दोनो मिलकर काव्य कहलाते है] [प्रश्न] वाच्य और वाचक के तम्वन्व के [नित्य] विद्यमान होने से इन दोनो [शब्द और श्रर्थ] के साहित्य [नहभाव] का अ्रभाव फभी नहीं होता है। [तव शब्दार्थों सहितौ काव्यन यह कहने का क्या प्रयोजन है]? [उत्तर] सत्य है। [सभी वाक्यो मे शब्द और अर्यं का सहभाव या साहित्य रहता है] किन्तु यहाँ विशिष्ट [प्रकार का] साहित्य अनिप्रेत ने कैसा [विशिष्ट १ भामह काव्यालद्वार १, १६-१७।

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२६ ] वक्रोक्तिजीवितम् कारिका

मम सर्वगुणौ सन्तौ सुहृदाविव सङ्गतौ। परस्परस्य शोभायै शब्दार्थो भवतो यथा॥८॥ शशी। दब्र कामपरिक्षामकामिनीगएडपायडताम् ॥१६॥। अत्ारुएपरिस्पन्दमन्टीकृतवपुप शशिन कामपरिक्षामवृत्ते कामिन कपोलफलकस्य च पाएडुत्वसाम्यसमर्थनादर्थालङ्कारपरिपोप शोभातिशयम वहति। वक््यमाणवर्ण विन्यासवक्रतालक्षण शच्दालङ्कारोडयतितरा रमणीय वर्सविन्यासविच्छित्तिविहिता लावएयगुएासम्पटस्त्येव ।

सहभाव अभिप्रेत है। इसका उत्तर देते है] वक्रता [सौन्दर्य] से विचित्र गुरणो तथ अलङ्कारो की सम्पत्ति [सौन्दर्य] का परस्पर स्पर्धा पर आर्प्र जाना [रूप विशिष्ट प्रका का साहित्य काव्यत्व का प्रयोजक है] इसलिए- मेरे मत में सर्वगुण-युक्त और मित्रो के समान परस्पर सङ़त शब्द और भ् दोनो एक दूसरे के लिए शोभाननक होते है [वही काव्य पद वाच्य होते है] जैसे-॥१८। उसके बाद [प्रात काल के समय] अरुण के आगमन से कान्तिरहित हु् चन्द्रमा, [काम] सम्भोग से दुर्बल कामिनी के कपोल के समान पीला पड गया [पाण्डुता को प्राप्त हो गया] ।१६। इस [उदाहरण] में प्र्प्ररुरोदय के कारण कान्तिरहित चन्द्रमा के, सम्भो [काम] से क्षीण हुई कामिनी के कपोलतल के साथ पाण्डुत्व की समानता के समर्थन अर्थालद्गार का परिपोष [उसको] शोभातिशय प्रदान करता है। और आगे कहा जा वाला वर्णविन्यास वत्रता [अनुप्रास] रूप शब्दालङ्गार भी अत्यन्त रमीय है [इसलिए] वर्णविन्यास के सौन्दर्य से उत्पन्न। [अर्थगत] लावण्य गुए की सम्परि [भी इस उदाहरण में] है ही। [अत शब्द और अर्थ का विशिष्ट साहित्य होने ₹ यह पद्य काव्य कहलाने योग्य है]। 'ततोऽरुणपरिस्पन्द' इत्यादि श्लोक अलद्दार शास्त्र के ग्रन्थो मे बहुत उद्धृत हुआ है। राजशेखर की काव्यमीमासा के पृ० ६७ पर, हेमचन्द्र ने काव्यानुशासन के पृ० २०६ पर, और मम्मट ने अपने काव्यप्रकाश में पृ० ४६६ पर इस पद्य को उद्धृत किया है। सुभापितावली [२१३३] में इस पद्य को वाल्मीकि का पद्य बतलाया है। औ्रौर काव्यप्रकाश के टीकाकार कमलाकरभट्ट तथा चक्र्वर्ती दोनो ने इसे द्रोणपर्व के

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कारिका ७ ] प्रथमोन्मेष. [२७

रात्रि-युद्ध के अ्न्त में प्रभात-वर्न का पद्य बताया है। परन्तु वस्तुत यह पद्य न रामायण मे पाया जाता है और न महाभारत मे। मालूम नही कहा से लिया गया है। हमने अपने 'साहित्य-मीमासा' नामक ग्रन्थ में 'साहित्य' शब्द का विवेचन इस प्रकार किया है- निखिल वाड्मय लोके यावच्छव्दम्य गोचरम्। शव्दार्थयोस्तु साहित्यात् सर्व साहित्यमिष्यते ।१॥ शन्दार्थो सहिती काव्यमिति कत्वा च लक्षराम्। कृत काव्यपरामर्गी शब्दोऽय भामहादिभि ॥२॥

जात ततोडलद्वारशास्त्रादि मम्बद्ध काव्यतोऽखिलम्। वेदान्तवन् सर्व साहित्यव्यपदेशभाक्॥३॥ परेषा वाड्मयाङ्गाना भिन्ना सज्ञा पृथक् श्रुता। काव्यलङ्कारगो जात परिशेपात्ततोऽप्ययम् ॥।४।। एव साहित्यशन्दोऽ्यमर्थंभेदाद् द्विधा कृत। व्याप्य काव्यादिगसत्वेको व्यापको वाड्मयेऽखिरले ।।६।। लिखितेनैव स्पेणाधुना साहित्यनिमिति । शक्या, किन्तु पुरासीत् साडलिखितेति 'श्रुति''स्मृति'॥७॥

नव्य पुरा साहिन्यशव्दोऽय दृप्ट काव्यादिगोचर। एव प्रयोगोऽस्य दृश्यते वाड्मयेऽखिले ॥८॥ शव्दा सन्त्येव सन्त्वर्था मम्बन्वोऽपि तयोर्घुव। किन्तु वैशिष्ट्यमेवेँपा साहित्येऽस्ति प्रयोजकम् ॥६।। तुल्यार्थवेपु शन्देपु नैकेष् विम्फुरत्स्वपि । कविविगिष्टमादत्ते क्चिदेकन्तु मुन्दरम् ॥१०॥ अरनन्तेप्वपि चार्येषु विगिप्टा एव केचन। साहित्ये वाथ काव्ये वा सन्ति किन्तूपयोगिन ॥११।। इतिहासादिमिद्ध वा लोकमिद्धमथापि वा। कवय काव्यमार्गेऽथं त्वन्ययापि प्रयुञ्जते ॥१२॥ सम्वन्वोऽपि द्वादरवा भोजराजेन वणित। तेपा विगिष्ट एवात्र माहित्येऽस्ति प्रयोजक ॥१३।। विशिप्टोऽर्थञ्च शव्दञ्च सम्वन्वेऽपि विगिप्टता। शब्दारथंयोस्तु साहिते विशिप्टेस्पवर्गिता ।।१४।।

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२८ वक्रोक्तिजीवितम [ कारिका ७

यथा च- लीलाइ कुवलत कवलत् व सीसे समुव्वहनेए। सेसेएा सेसपुरिसाण पुरिसतरो समुव्वसिन् ॥२०॥ [लीलया कुवलय कुवलयमिव शीषे समुद्रहता। शेपेए शेषपुरुपाणा पुरुपकारः समुपहसितः ॥ इतिच्छाया सारमुन्मीलगाम्यहम्।' कुन्तकेन प्रतिज्ञाय कृतमित्थ विवेचनम् ॥१५॥ "शब्दार्थौं सहितावेव प्रतीतौ स्फुरत सदा। महिनाविति तावेव शब्दारथौं किमपूर्व विधीयते।। सहिती वक्रकविव्यापारगालिनौ। बन्धे व्यवस्थितौ काव्य तद्विदाह्वादकारिणि॥ साहित्यमनयो शोभाशालिता प्रति काप्यसौ।

एव साहित्यशव्दस्य चार्थतत्त्वविवेचनम्। कुन्तकेन कृत स्वीये ग्रन्थे वक्रोक्तिजीविते ॥१६॥ दर्शनाद् वर्णनाच्चैव साहित्यमर्थगव्दयो दर्शन वर्णन काव्यबीज 'तौतेन' दशितम् ॥१७॥ अतोऽभिनवगुप्तस्य भट्टतौतोऽस्ति यो गुरु। ऋषित्व तेन सम्प्रोक्त कवीना काव्यकमरि ॥१८॥ "नानृपि कविरित्युक्त ऋपिश्च किल दर्शनात्। विचित्रभावधर्माशतत्व प्रख्या च स तत्त्वदर्शनादेव शास्त्रेपु पठित दर्शनम् ॥ कवि। दर्शनाद् वर्णनाच्चाथ रूढा लोके कविश्रुति ॥ तथाहि दर्शने स्वच्छे नित्येऽप्यादिकवेर्मुने नोदिता कविता लोके यावज्जाता न वर्णना।" एव श्री भट्टतौतेन स्वग्रन्थे काव्यकौतुके। ऋपित्व दर्शनात् प्रोक्त कवित्व वर्णनात् तथा ॥२०॥१ श्रौर जैसे- [कुवलय शब्द के अर्थ नील कमल औ्र्रर कु अर्थात् पृथ्वी का वलय प्रथात् मण्डल पृथ्वीमण्डल यह दो हे।] लीलाकमल के समान पृथ्वीमण्डल को अनायास [लीलया] धारण करते हुए शेष [नाग] ने, शेष [सब] पुरुषो के पुरुषार्थ [पराक्रम] का उपहास-सा किया।२०। १ साहित्यमीमासा १।

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कारिका ७ ] प्रथमोन्मेष [२६

चितयमकानुप्रासहारिणी समर्पकत्वनुभगा कापि काव्यच्छाया सहद्रयहदय- मुरहादयति। द्विवचनेनात वाच्यवाचकजातिद्वित्वमभिधीयते। व्यक्तिद्वित्वाभिवाने पुनरेकपदव्यवस्थितयारनि काव्यत्व स्यादित्याह-'बन्धे व्यवस्थिती। बन्धो वाक्यविन्यास, तन्न व्यवस्थितौ। विशेपे लावसयािगुणालक्कारशोभिना सन्निवेशेन कृतावस्थानौ। सहिता वित्यत्रापि यथायुक्ति म्वजातीयापेक्षया शब्दस्य शव्दान्तरेख वाच्यम्य वाच्यान्तरेण च साहित्य परम्परस्पवित्वलक्षणामेव विवनितम्। अन्यथा तद्विवाह्मावकारित्वहानि प्रसज्येत। यथा-

यहाँ अप्रस्तुतप्रशसा औौर उपमा रूप [वाच्य] परर्थालद्धार के वैचित्रय से उत्पन्न, और अनायासविरचित यमकानुप्रास [रूप शब्दालद्धार] से मनोहर, समर्पकत्व [भटिति शरर्य-वोधकत्व] के कार सुन्दर [शब्द तथा अर्य का] कुछ अपूर्व रचना सौन्दर्य सहृदय के हृदय को आह्हादित करता है। [मूल कारिका में प्रयुक्त शब्दार्थों पद में] द्विवचन से यहां [वाच्य और वाचक] अर्य और शब्ब के जातिगत द्वित्व [अर्थात् वाक्य के समस्त शब्दो और समस्त श्ररथों का साहित्य] कहा गया है। [क्योकि उसके अ्रभाव में] व्यक्ति द्वित्व [अर्थात् एक शब्द और एक शर्थ के साहित्य] का कथन होने पर तो एक पद में स्थित [शन्द और श्ररयं के साहित्यो] का भी काव्यत्व प्राप्त होने लगेगा। इसलिए कहा है 'वन्धे व्यवस्थितौ'। बन्ध अर्थात् वाक्य-रचता। उसमें व्यवस्थित अर्थात् विशेष लावण्यादि [साधक] गुरग अलद्कार आरदि से शोभिन विन्यास [विशेष] से स्थित [शब्द और अर्य]। सहितौ इस [पद] में भी पूर्वोक्त युक्ति के अनुसार [व्यक्तिगत साहित्य न मानकर जातिगत साहित्य मानने से] शन्द का स्वजातीय [शब्द] को अपेक्षा से शन्दान्तर के साथ औ्र अरर्यं [वाच्य] का [सजातीय] अर्थान्तर के साथ 'परस्परस्पधित्व' रूप 'साहित्य' ही विक्षित है। [अरर्थात् जिस वाक्य का प्रत्येक शब्द दूसरे शब्द के साथ औप्रौर प्रत्येक अ्रर्थं दूसरे अ्रय के साथ, सौन्दर्य के लिए 'अहमहमिका' से मानो प्रतिस्पर्धा कर रहा हो। *ऐसा वाक्य ही 'साहित्य' से युक्त अतएव काव्यपद से वाच्य है। ] अत्यथा [इस प्रकार के शब्द और अ्ररयं के साहित्य से विरहित वाक्य में] तद्विदाह्लावकारित्व नहीं वन सकता हैँ। जैसे- यह श्लोक महाकवि भवभूति के प्रसिद्ध नाटक मालती माधव मे लिया गया है। कापालिक को मालती के वध के लिए उद्यत देखकर माधव कह रहा है।

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३० ] वक्रोक्तिजीवितम् [ कारिका ७

तर्रसारं संसारं परिमुपितरत्नं त्रिभुवन निरालोक लोक मरणशरणं बान्धवजनम्। तररदर्प कन्दर्प जननयननिर्मारामफल जगज्जीर्णणाररय कथमसि विघातु व्यवसितः॥२१॥१ त्रत्र किल कुत्रचित् प्रवन्धे कश्चित् कापालिक कामपि कान्ता व्यापाद- यितुमध्यवसितो भवन्नेवमभिधीयते। यदपगतसार संसार, हृतसर्वस्व त्रैलोक्यं, आरलोक्कमनीयवस्तुवर्जितो जीवलोक, सकललोकलोचन निर्माण निष्फलप्राय, त्रिभुवनविजयित्वदर्पहीन कन्दर्प, जगज्जीर्णारएयकल्पमनया विना भवतीति कि त्वमेवंविधमकरणीय कतु व्यवसित इति। एतस्मिन् श्लोके महावाक्यकल्पे वाक्यान्तराएयवान्तरवाक्यसदशानि तस्या सकललोकलोभनीयलावस्यसम्पत्प्रतिपादनपराणि परस्परस्पर्धीन्यतिरम- सीयान्युपनिवद्धानि कमपि काव्यच्छायातिशयं पुष्ान्ति। मरणाशरण बान्धव- जनमिति न पुनरेतेपा कलामात्रमपि स्पर्धितुमर्हतीति न तद्विदामाह्वादकारि।

अरे तू [इस मालती को मारकर] ससार को अ्रसार, त्रिभुवन को रत्नविहीन [अपहृत रत्न] विश्व को अन्धकारमय, [मालती के] बान्धन लोगो को मरण का शरशा, कामदेव को दर्पहीन, जगत् के नेत्रो के निर्माण को व्यर्थ और जगत् को जीर्सं अरण्य बना देने पर क्यो तुल गया है ?।२१। इस [श्लोक मे] किसी प्रबन्ध [मालतीमाधव नाटक अरङ्ध, ५, श्लोक० ३०] मैं किसी कापालिक के किसी स्त्री [मालती] को मारने को उद्यत होने पर उससे इस प्रकार कहा गया है कि [इसके मरने से इसके अ्रभाव मे] ससार सारहीन, त्रैलोक्य रत्नसर्वस्व से रहित, जीवलोक आ्रलोक [सौन्दर्य] से कमनीय वस्तु से विहीन, समस्त जनो के नेत्रो का निर्माण निष्फलप्राय, कामदेव त्रिभुवनविजयित्व के दर्प से रहित और जगत् जीरणाारण्य के समान हो जायगा, इसलिए तू इस प्रकार के न करने योग्य [अनुचित] कार्य के करने को क्यो उद्यत हो रहा है ? इस महावाक्य के सदृश श्लोक मे अ्वान्तर वाक्य के सदृश [अन्य समस्त] वाक्य उस [मालती] की सकललोकलोभनीय सौन्दय सम्पत्ति के प्रतिपादन परक, एक दूसरे से स्पर्धा करने वाले से, अत्यन्त सुन्वर रूप से ग्रथित होकर काव्य के कुछ अनिवर्चनीय सौन्दर्य को प्रकट करते है। [परन्तु इन अ्र््रवान्तर वाक्यो में से], मरणशरण बान्घवजनम्' यह [अवान्तर वाक्य] इन [श्रसार तसार आदि अ्रन्य श्रवान्तर वाक्यो] की कलामात्र के साथ भी स्पर्धा करने योग्य नहीं है। इसलिए [ वह] काव्यममज्ञा के लिए श्राह्लाद-

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कारिका ७ ] प्रथमोन्मेष [ ३१

वहुपु च रमसीयेप्वेकवाक्योपयोगिपु युगपत्प्रतिभासपठवीमवतरत्सु, वाक्यार्थ- परिपूरसार्थ तत्प्रतिमं प्राप्तुमपर, प्रयत्नेन प्रतिभा प्रसादते। तथा चास्मिन्नेव पुस्तुतवस्तुसब्रह्मचारि वस्त्वन्तरमपि सुप्रापमेव- 'विधिमपि विपन्नाद्भुत-विविम्' इति।

रोन कामपि काव्यच्छायामुन्मीलयन्ति कवय। यथा- रुद्राद्रेस्तुन्ननं स्वकरठविपिनोच्छेदो हरर्वासनं। कारावेश्मनि. पुष्पकापहर एाम् इत्युपनिव द्वय पूर्वोपनिव द्वपदार्थानुरूपवस्त्वन्तरासम्भवादपूर्वमेव -'यस्येदशा केलय'। कारी नहीं है। एक [इलोक] वाक्य के उपयोगी बहुत से रमरीय वाक्यों के एक साथ स्फुरित होने पर [भी इ्लोक की पूति में कुछ कमी रह जाय पर उस इलोक] वाक्य के शर्थ को पूर्ण करने के लिए उन ही के समान [सुन्दर अविशिष्ट] अ्रन्य [वाक्य] को ढूँढ़ने के लिए वडे प्रयत्न से बुद्धि लगानी होती है। [परन्तु यहाँ कवि ने 'मरखशरण बान्धवजनम्' इस वाक्य के स्थान पर अन्य अवान्तर वाक्यो के सदृश उनसे स्पर्धा करने वाला अ्व्य वाक्य के खोजने का प्रयत्न नहीं किया है। यो ही भरती के लिए 'मरसशरण वान्घवजनम्' यह अ्रवान्तर वाक्य बीच में डाल दिया है। इसलिए श्लोक का चमत्कार कम हो गया है। यदि कवि प्रयत्न करता तो इसके स्थान पर अ्र्रधिक चमत्कारी वाक्य मिल सकता था] क्यों कि इस [श्लोक] में प्रस्तुत वस्तु के समान [चमत्कारी] दूसरी वस्त्ु [अन्य प्रवान्तर वाक्य] भी सरलना से मिल सकता है। जैसे ['मरसशरस बान्ववजनम्' के स्थान पर] 'विघिमपि विपन्ना- द्भुतविघिम्' यह [पाठ कर देने से यह दोष दूर हो सकता है]। [और कहीं-कहीं] प्रथम प्रतीत हुए पदार्थ के स्थान पर प्रतिनिधि रूप, अन्य अ्रवान्तर वाक्यो] से स्पर्धा करने वाले अन्य पदार्थ का [मिलना] सम्भव न होने पर कुछ और भी अधिक सुकुमार अपूर्व शैली से वर्णन करके कवि लोग कुछ अ्रपरनिर्वचनीय काव्यशोभा का प्रकट करते [हुए वेखे जाते] हैं। जैसे [बाल गमाय नाटक के शङ्ध १, इलोक ५१ में निम्न प्रकार चमत्कार उत्पन्न किया गया है]- 7 केलाश को उठाना, अपने अनेक शिरों को [शिव को प्रसना करने के लिए] काट डालना, इन्द्र को कारावास में डाल देना, [कुवेर के] पुष्पक [विमान] को छोन लेना-।२२। इस प्रकार [रावण के उत्फर्ष का ] वर्णन करके, पूर्वोपनिवद्ध पदार्यो के अ्नुरूप १ वाल रामायर १,५१।

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३२ वक्रोदितजीवितम् [ कारिका ७

इति न्यस्तम् । येनान्येऽपि कामपि कमनीयतामनीयन्त। यथा च- तद्वकत्रेन्दुविलोकनेन दिवसो नीतः पदोषस्तथा तद्गोष्ठ्यैव निशापि मन्मथकृतात्सा हैस्तदङ्गापगौ। ता सम्प्रत्यपि मार्गदत्तनयना द्रप्टु' प्रवृत्तस्य मे बद्धोत्कराठमिद मनः, कि- इति। सम्प्रत्यपि तामेवविधा वीक्षितु प्रवृत्तस्य मम मन. किमिति वद्धोत्कएठमिति परिममाग्तेऽपि तथाविधवस्तुविन्यासो विहित - -'अथवा प्रेमासमाप्तोत्सवम्' इति। येन पूर्वेपा जीवितमिवार्पितम्। यद्यपि द्वयोरप्येतयोस्तत्प्राधान्येनैव वाक्योपनिबन्ध, तथापि कवि- प्रतिभाप्रौढिरेव प्राधान्येनावतिष्ठते। [महत्त्वशाली] अन्य पदार्थ का [मिलना] अ्रसम्भव होने से [पुष्पकापहरण के श्रागे] 'जिसकी इस प्रकार की कीडाए है' [यस्येदृश केलय]। यह [श्रवान्तर वाक्य कवि ने] रख दिया है। जिससे [न केवल यह वाक्य उनकी स्पर्धा मे आर गया है अपितु उसके कारण] अन्य [वाष्य] भी दुछ अपूर्व शोभा को प्राप्त हो गये है। औरर जैसे [तापस वत्सराज चरितम् के निम्नलिखित श्लोक में]- सके मुखचन्द्र को देखकर दिवस बिता दिया, उसके साथ वार्तालाप मे सन्घ्या व्यतीत की औरर कामदेव के द्वारा उत्साहित उसके देहार्पर द्वारा रात्रि व्यतीत कर दी। परन्तु अवभी [मेरे आाने का प्रतीक्षा मे] रास्ते मे श्र्खे गडाए हुई उसको देखने के लिए मेरा मन उत्कण्ठित क्यो हो रहा है।२३। यहाँ अब भी 'इस प्रकार की [मार्गदत्तनयना] उसको देखने के लिए तत्पर मेरा मन क्यों उत्कण्ठित है' इस प्रकार [वादय के] समाप्त हो जाने पर भी [कवि ने श्लोक के अन्त मे] 'अथवा पेमासमाप्तोत्पवम्' प्रेम का उत्सव कभी समाप्त नहीं होता है। यह कहकर ऐसी वस्तु [वाक्य या वाक्यार्थ] का विन्यास कर दिया है जिसने पूर्व वाक्यो मे जान-सी डाल दी है। यद्यपि इन दोनो [वाक्यो या उदाहरणो] मे उस [शब्दार्थ के 'साहित्य' के प्राधान्य से ही वाक्य की रचना की गई है फिर भी [उस रचना मे] कवि की प्रतिभा की प्रौढता ही प्रधान रूप से स्थित होती है। [इसलिए 'अरसार ससार' आ्र्रादि श्लोक में 'मरणशरण बान्ववजनम्' वाले वाक्यार्थ का शेष वाक्यार्थो के साथ पररपरस्पधित्व रूप 'साहित्य' की न्यनता हो जाने से वह हलका पड जाता है और 'तद्वक्त्रेन्दु' आदि श्लोक में कवि प्रति ॥ के बल से अर्थ का प्र्थान्तर के नाथ परस्पर स्पर्धी 'साहित्य' होने से इननोक मे और भी स्रधिक चमत्कार उत्पन्न हो गयाहै]। १. तापस वत्सराज चरितम् १, ६८।

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फारिका ७] प्रथमोन्मेष. [३३

शब्दस्यापि शव्दान्तरेण साहित्यविरहोगाहरएं यथा- चारुतावपुरभूपयदासा तामनूननवयौवनयोग। त पुनर्मकरकेतनलक्ष्मी स्ता मदो दयतसङ्गमभूप. ॥२४॥१ दयितसङ्गमस्तामभूपयढिति वक्तव्ये, कीछशो मद., दयितसङ्गमो भूपा यस्येति। दयितसङ्गमशब्दस्य प्राधान्येनाभिमतस्य ममासवृत्तावन्तर्भूतत्वाद् गुरीभावो न तद्विदाहाटकारी। दीपकालङ्कारस्य च काव्यशोभा- कारित्वेनोपनिवद्धस्य निर्वहणावसरे त्रुटितप्रायत्वात् प्रक्रममङ्गविहित सरस- हृठयवैरस्यमनिवार्यम्। 'दयितसङ्गतिरेनम्' इति पाठान्तर सुलभमेव।

[इस प्रकार 'प्र्रसार ससार' इत्यादि उदाहरण में अर् का अर्थान्तिर के साथ साहित्य का विरह दिखला कर श्रव] शन्द का भी दूसरे शन्द के साथ साहित्य के विरह का उदाहरण [दिखलाते हं] जैसे- सौन्दर्य ने उन [स्त्रियो] के शरीर को शोभित किया, उस [चारुता] को पूर्णयौवन के योग ने [भूषित किया] और उस [पूर्ण नवयौवन] को कामदेव की लक्ष्मी ने [भूषित किया] और उस [कामदेव की लक्ष्मी] को प्रियसङ्गम से अलकृत मद ने [भूषित किया]॥२४।। [यह श्लोक माघ काव्य के दशम सर्ग का ३३वाँ श्लोक है। इसमें] दयित- सङ्गन्म ने उस [मकरकेतनलक्ष्मी ] को भूषित किया यह कहना चाहिए था उसके स्थान पर [मद के] कैसे मद ने, कि दयितसङ्गम [प्रियसङ्गम] जिसका भूषण है [ऐसे मद ने भूषित किया यह कहा है] इसमें प्राधान्येन अर्रभिमत दयितसङ्गम शब्द के समास में अ्रव्तर्भूत हो जाने से गुणीभाव [हो जाता है औौर वह] काव्यममंज्ञों के लिए श्ह्हाद- कारी नहीं है। शर काव्य के शोभातिशयकारी के रूप में उपनिबद्ध दीपकालद्वार के, अन्त में भानप्राय हो जाने से 'प्रक्रमभङ्ग' से उत्पन्न सरस हृदयो का वैरस्य [का अनुभव] अनिवार्य है। [इस दोष से वचने के लिए] 'दयितसङ्गतिरेनम्' यह पाठान्तर सुलभ ही है। [यदि कवि इस पाठान्तर का प्रयोग करता तो दयितसङ्गनमभूष, इस शन्द का अ्रन्य शब्दो के साथ साहित्य का जो विरह भ्व अनुभव होता ह वह न होता ]। इसका अभिप्राय यह है कि इस श्लोक के अन्तिम चरण की रचना 'ता मदो दयितसङ्गतिरेनम्' इन प्रकार होनी चाहिए थी।

१. शिशुपाल वघ १०,३३ ।

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३४ 1 वक्ोषितिजीवितम् [ कारिका ७

कुन्तक ने इस श्लोक में दीपक अलद्दार माना है। दीपकालद्कार का लक्षण वामन ने अपनी काव्यालद्वार सूत्र में वृत्ति में इस प्रकार किया है। उपमानोपमेयवाक्येषु एका क्रिया दीपकम्। तत्त्रैविध्यं, आदिमध्यान्तवाक्यवृत्तिभेदात् ॥१ अर्थात् उपमान और उपमेय वाक्यो में एक क्रिया का योग होने पर 'दीपक' अलङ्कार होता है। 'चारुता वपुरभूपयदासान्' आदि 'माघ' के श्लोक में पठित भिन्न- भिन्न वाक्यो में उपमानोपमेय भाव-कल्पना करना कठिन है। इसलिए 'वामन' का दीपकालद्वार का लक्षण वहाँ सुसङ्गत नही हो सकता है। 'भामह' ने अपरपने 'काव्यालद्कार' में दीपकालद्वार का लक्षण तो स्पष्ट नही किया है, पर उसके भेद आदि का विस्तार से निरूपण किया है- आादि मध्यान्तविपयं त्रिधा दीपकमिष्यते। एकस्येव त्र्यवस्थत्वादिति तद्भिद्यते त्रिधा॥ २५ ॥ अमूनि कुर्वतेऽन्वर्थामस्याख्यामर्थदीपनात्। त्रिभिनिदर्शनैश्चेद त्रिधा निर्दिश्यते यथा ॥२६॥२ इस रूप में दीपक के तीन भेदो का प्रतिपादन कर उनके उदाहरण इस प्रकास दिए हैं- मदो जनयति प्रीति सानङ्ग मानभगुरम्। स प्रियासङ्गमोत्कण्ठा साऽसह्या मनस शुचम् ॥२७॥ मालिनीरशुकभृत स्न्नियोऽलकुरुते मधु। हारीतशुकवाचश्च भूधरणामुपत्यका ।।२८।। चारीमतीररण्यानी सरित शुष्यदम्भस। प्रवासिनाञ्च चेतासि शुचिरन्त निनीषति ॥२६॥। 'भामह' के दिए हुए दीपकालद्कार के इन उदाहरणो में से भी उपमान उपमेय भाव- कल्पना करना कठिन है। इसलिए यह प्रतीत होता है कि 'भामह' आदि आचार्य दीपकालद्दार में केवल एक क्रिया के सम्बन्ध को ही आवश्यक मानते हैं। उन अ्नेक वाक्यो में उपमानोपमेय भाव को आ्र्परवश्यक नही मानते है। कुन्तक ने भी इसी भाव को ध्यान में रखकर 'चारुतावपुरभूपयदासा' इत्यादि श्लोक में दीपकालद्वार का निर्देश किया है। उनका यह उदाहरण भामह के प्रथम उदाहर से विलकुल मिलता है। मम्मट विश्वनाथ आदि नवीन आचार्यो ने जिन अनेक पदार्थो में एक धर्म

१ वामन काव्यालद्ार सूत्रवृत्ति ४, ३, १८-१६। २ भामह काव्यालद्वार ३, २५-२६ । ३ वही २८-२६ ।

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कारिका ७ ] प्रथमोन्मेष [ ३५

द्वयोरप्येतयोरुवाहरणयोः प्रावान्येन प्रत्येकमेकतरस्य साहित्यविरहो व्याख्यात परमार्थत. पुनरुभयोरेकतरस्व साहित्यविरहोऽन्यतरस्यापि पर्य-

का सम्बन्ध हो उन सबका प्रकृत अथवा अप्रकृत दोनो प्रकार का होना दीपकालद्वारु में आवश्यक माना है। मम्मट ने दीपकालद्वार का लक्षणा इस प्रकार किया है- सकृद्वृत्तिस्तु वर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम्। सव क्रियासु वह्नीपृ कारकस्येति दीपकम्।।' विश्वनाथ ने दीपक का लक्षण इस प्रकार किया ह- अप्रस्तुतप्रस्तुतयोर्दीपकन्तु निगद्यते। अथ कारकमेकं स्यादनेकानु क्रियामु चेत् ।2 यह दीपकालद्वार के नवीन लक्षणा भी उक्त शलोक मे कठिनता से सङ्गत हो सकेंगे। इसलिए मल्लिनाथ ने इस श्लोक मे दीपकालह्कार न मानकर 'एकावली' अलङ्कार माना है। उन्होने लिखा है- अ त्ोत्तरोत्तरस्य पूर्वपूर्वविशेपकत्वादेकावली। यत्रोत्तरोत्तरेपा स्यात् पूर्व पूर्व प्रति क्र्रमात् ॥ विशेषकत्वकथनमसावेकावली मता। इति तल्लक्षणात्। कुन्तक ने स्वय दीपकालद्वार का लक्षण इस प्रकार दिया है- औचित्यावहयम्लान अ्शक्त धर्ममर्थाना दीपयद्वस्तु दीपकम्॥ एक प्रकाशक सन्ति भूयासि भूयसा क्वचित्। केवल पक्तिसत्थवा द्विविध परिदृश्यते।3 इसी के अनुसार 'अभूपपत्' इस एक पद को अ्रनेक वाक्यो का प्रकाशक मानकर कुन्तक ने यहां दीपकालद्वार निर्वारित किया है। [अर्थ तथा शन्द के साहित्य विरह के 'पसार ससार' तथा 'चारुतावपु'o] इन दोनों उदाहरसो में से प्रत्येक [उदाहरस] में एक [अर्थ तथा शब्द] के प्राघान्य से ·[अर्य अथवा शब्द के] 'साहित्य' का अ्रपभाव दिखलाया है। वास्तव में तो उन दोनों में से किसी एक के साहित्य का अभाव होने पर दूसरे का साहित्य विरह स्वय ही शर

१ का० प्र० १०, १०३। २. साहित्य दर्पर १० । ३. वक्रोक्तित्रीवितम् ३, १६।

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३६ ] वतेवितिजी वितम [ कारिका ७

वस्यति। तथा चार्थ समथवाचका ऽसद्भावे स्वात्मना स्फुरन्नपि मृतकल्प एवाव- तिष्ठते शब्दोऽपि वाक्योपयोगिवाच्यासम्भवे वाच्यान्तरवाचक सन् वाक्यास्य व्याविभूत प्रतिभातीत्यलमतिप्रसगेन। प्रकृतन्तु। कीदशे, बन्धे, 'वक्रकविव्यापारशालिनि'। वक्रो योऽसौ शास्त्राठिप्रसिद्वशव्दार्थोपनिबन्धव्यतिरेकी पट्प्रकारवक्रताविशिष्ट कवि- व्यापारस्तत्क्रियाक्रमस्तेन शालते श्लाघते यस्तस्मिन्। एवमपि कष्टकल्पनोपहते- डपि प्रसिद्ध व्यतिरेकित्वमम्तीत्याह-'तद्विदाह्नाढकारिणि' । तदिति काव्य- परामश । तद्विदन्तीति तद्विदस्तज्जा, तेषामाह्नाट करोति यस्तस्मिन्, तद्वि- दाह्नादकारिखि बन्धे व्यवस्थितौ। वक्रता वक्रताप्रकारास्तद्विदाह्नाकारित्वञच प्रत्येक यथाऽवसरमेवोदाहरिष्यते ।।७।। एवं काव्यस्य सामान्यलक्षणे, विहिते विशेपमुपक्रमते। तत्र शब्दार्थ- यस्तावत्स्वरूपं निरूपयति जाता है। इसलिए [अर्थ को भेली प्रकार प्रकाशित करने में] समर्थ शब्द के अभाव में [उत्तम चमत्कारी] अर् स्वरूपत स्फुरित होने पर भी निर्जीव-सा ही रहता है। [इसी प्रकार] शब्द भी वाक्योपयोगी [चमत्कारी] अ्र्र्थ के अ्रभाव में [किसी साधा -- रए] अन्य अर्थ का चाचक होकर वाक्य का भारभूत [व्याधिभूत] सा प्रतीत होने लगता है। इसलिए [इस प्रसकतानुप्रसक्त विषय के] अ्रधिक [करने] विस्तार की प्र््रावश्यकता नहीं है। प्रकृत [कारिका की व्याख्या] तो [इस प्रकार है कि]-किस प्रकार के बन्ध में [शब्द औरीर अरर्थ का साहित्य होना चाहिए] 'मनोहर कवि व्यापार से युक्त' [बन्ध] में। वक्र अर्थात् शास्त्रादि में प्रसिद्ध शब्द और अर्थ के उपनिबन्धन से भिन्न, [शगे कही जाने वाली छ प्रकार की वक्ता से युक्त, जो कवि व्यापार अर्थात् कवि की रचना [क्रिया] का क्रम, उससे जो [बन्ध] शोभित अथवा प्रशसित होता है उस [बन्ध] में [साहित्य से अरवस्थित शब्द तथा अर्थ काव्य कहलाते है]। इस प्रकार [लक्षण करने पर] भी कष्ट कल्पना से उपहत [बन्घ] में भी प्रसिद्ध भिन्नत्व हो सकता है [वह भी काव्य कहलाने लगेगा] इसलिए [उसके निवारसार्य] कहते हैं-'तद्विदाह्हाद- कारिसि'। तत् इस [पद] से काव्य का ग्रहण होता है। उस [काव्य] को जानसे है वह 'तव्विद्' अ्रर्थात् काव्यमर्मज्ञ [हुए]। उनको श्राह्लाद अर्थात् आ्र््रानन्ददायक जो [बन्ध] उस तद्विदाह्वादकारी बन्ध मे व्यवस्थित [शब्द और अर्थ काव्य कहलाते है]। वक्रता, वत्रता के भेद और तद्विदाह्हादकारित्व को अरलग-अलग यथास्थान [आगे उदाहरणो द्वारा] दिखलावेंगे ।।७।। इस प्रकार काव्य का सामान्य लक्षण कर चकने के वाद, [काव्य के]

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कारिका = 1 प्रथमोन्मेषः [ ३७

वाच्योर्ऽर्थो वाचकः शब्दः प्रसिद्धमिति यद्यपि। तथापि काव्यसार्गेऽस्मिन् परमार्थोऽयमतयोः ॥=॥ इति एवविध वस्तु प्रसिद्धं प्रतीतम्। यो वाचक स शब्द, यो वाच्य- श्चाभिधेय. सोडर्थ. ति। ननु च द्योतकव्यञजकावपि शब्दौ सम्भवत । यस्मार्थप्रतीतिकारित्वसामान्यादुपचारात्तावपि वाचकावेव। एवं ्योत्यव्यङ्गन्य्योरर्थयो. प्रत्येयत्वसामान्यादुपचाराद् वाच्य त्वमेव। तस्माद् वाचकत्वं वाच्यत्व च शव्दार्थर्योलोंके सुप्रसिद्ध यद्यपि लक्षण, तथाप्यस्मिन्, अलौकिके काव्यमार्गे काव्यवर्त्मनि, अ्रयमेतयोर्वद्यमाण- लक्षण. परमार्थ:, किमप्चपूर्वं तत्त्वमित्यर्थ ।।=। कीदशमित्याह-

विशेष लक्षणा का [निरूपण] प्रारम्भ करते है। उनमें से पहिले [काव्य के श्रङ्गभूत] शब्द तथा अर्थ के स्वरूप का निरुपण करते हैं- यद्यपि [साधारणत ] वाच्य अर्थ, औौर वाचक शब्द [होता है यह बात] प्रसिद्ध ही है, फिर भी इस काव्यमार्ग में [केवल वाच्य को अर्थ औरौर केवल वाचक को शब्द नहीं कहते हैं। अपितु] उन [शन्द तथा अर्थ] का वास्तविक अर्य यह [अगली कारिका में दिखलाया हुआ] है।८। इति अर्थात् इस प्रकार की बात प्रसिद्ध है कि जो वाचक होता है वह शब्द होता है और जो वाच्य होता है वह अर्थ होता है। [प्रश्न] द्योतक और व्यञ्जक भी शन्द हो सकते हैं [आपने केवल वाचक को शब्द कहा है। उस वाचक पद से द्योतक तथा व्यञ्जक शब्दों का] उनका सग्रह न होने से अव्याप्ति होगी। [उत्तर] यह नहीं कहना चाहिए। क्योकि [वाचक शब्दो के समान व्यञ्जक तथा द्योतक शब्दो में भी] अरथंप्रतीतिकारित्व की समानता होने से उपचार [गौणी वृत्ति] से वह [द्योतक तथा व्यञ्जक] दोनों भी वाचक ही [कहे जा सकते] है। इसी प्रकार द्योत्य श्रर व्यङ्गय् दोनो अर्यों में भी वोध्यत्व [प्रत्येयत्व] की समानता [होने] से वाच्यत्व ही रहता है। इसलिए वाचकत्व और वाच्यत्व लोक में [क्मश ] शब्द तथा अर्थ का प्रतिद्ध लक्षसा है, फिर भी इस अलौकिक काव्यमार्ग में अर्यात् कवियों की पद्धति में [फेवल वाचकत्व या वाच्यत्व शब्द तथा अर्थ का ययार्थ लक्षणा नहीं है अपितु] यह भागे [अगली नवम कारिका में] कहे जाने वाला इन दोनो [शब्दो] का वास्तविक 'अर्य' अर्थात् कुछ अपूर्व रहस्य है ॥।। [वह अपूर्व रहस्य तत्त्व] कँसा है यह [अगली फारिका में] कहते हैं-

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३८ ] वक्रोकितिजीवितम् [ कारिका ६

शब्दो विवच्ितार्थेकवाचकोऽन्येपु सत्स्वपि। अर्थः स शब्द काव्ये यस्तत्समुचितसमस्तसामग्रीक। कीहक्, 'विवच्तिताथै कवाचक.'। विवलितो योऽसौ वक्तुमिष्टोऽर्थस्तदेकवाचक, तस्य एक. केवल एव वाचक। कथम्, अन्येपु सत्स्वपि। अपरेपु तद्वाचकेपु बहुष्वपि विद्य- मानेषु। तथा च, सामान्यात्मना वक्तुमभिप्रेतो योऽर्थस्तस्य विशेपाभिधायी शब्द. सम्यग वाचकतां न प्रतिपद्यते। यथा- कल्लोवेल्लि त दषत्परुष महारै: रत्नान्यमूनि मकराकर मावमंस्थाः । कि कौस्तुभेन भवतो विहितो न नाम याञ्चाप्रसारितकरः पुरुषोत्तमोऽपि ।।२५/।१ [पर्यायवाची] अन्य [शब्दो] के रहते हुए भी विवक्षित अपर्थ का बोधक केवल एक [शब्द हो धस्तुत ] शब्द [कहलाता] है [अर्थात अ्नेक पर्यायवाचक शब्वों के होते हुए भी उन सब की अपेक्षा विलक्षण रूप से जो अर्थ को प्रकाशित कर सके केवल वही शब्द काव्यमार्ग में 'शब्द' कहा जाता है। इसी प्रकार] सहृवयो को आनन्दित :- करने वाला अपने [स्पन्द] स्वभाव से सुन्वर [पदार्थ ही काव्यमार्ग में वस्तुत ] 'शर्थ' [शब्द से व्यवहार किये जाने योग्य होता] है।६। काव्य में [वस्तुत] शब्द वह है जो उस [काव्य] के शोग्य समस्त सामप्री से युवत है। कैसा, कि. विवक्षित अर्थ का जो पकेला वाचक हो [शन्य कोई शब्द जिस अर्थ को प्रकट न कर सके उस अर्थ को प्रकाशित करने वाला] विवक्षित अर्थात् [कवि] जिसको कहना चाहता है उसका अद्वितीय वाचक, उसका केवल श्केला [एकमात्र] वाचक [पद ही काव्य में 'शब्द' कहा जा सकता है]। यँसे, अन्य [अनेक समानार्थक] शब्दों के रहते हुए भी। उस प्रर्थ के वाचक अत्य बहुत से [शब्दो] के विद्यमान होने पर भी। [जो कवि के विवक्षित ऋर्य को पूर्ण रूप से कह सके वही 'शब्द' कहलाता है] इसलिए सामान्य रूप से जो अर्थ विवक्षित है उसके लिए विशेष [शरर्थ] का कथन करने वाला शब्द भली प्रकार से वाचक [रूप से प्रयुष्त] नहीं हो सकता है। जैसे- हे मकराकर [समुद्र] इन [अपने भीतर स्थित बहुमूल्य] रत्नो को, लहरो द्वारा चलाए गये पत्थरो के कठोर प्रहारो से तिरस्कृत मत करो। क्या [इन रत्नों में से अकेले एक] 'कौस्तुभ' [रत्न] ने ही पुरुषोत्तम [विष्णु भगवान्] को भी तुम्हारे आगे याचना के लिए हाथ फैलाने वाला नही बना दिया। [अर्थात् उन रत्नो में से १ भल्लट शतक ६२, सुभापितावली स० ८६६ में इसको भागवत त्रिविक्रम का श्लोक कहा। काव्य प्रकाश पृ० ३६७ पर भी उद्धृत हुआ्र है।

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कारिका &] प्रथमोन्मेषः [३६

अत्र रत्नसामान्यात्कर्पाभिधानमुपक्रान्तम्। 'कौस्तुभेन' इति रत्नविशेपा- भिवायी शब्दस्तद्विशेषात्कर्षाभिधानमुपसहरतीति प्रक्रमोपसहारवैपन्यं न शोभातिशयमावहति। न चैतद् वत्तुं शक्यते, य. कश्चिद् विशेषे गुणग्रामगरिमा विद्यते स सर्व: सामान्येSपि सम्भवत्येवेति। यस्मात्- वाजिवारणलोहाना काष्ठपाषाएवाससाम्। नारीपुरुषतोयानामन्तरं महदन्तरम् ॥२६॥१ तस्मादेवंविधे विपये सामान्याभिधाय्येव शब्द. सहृदयहृदयहारिता प्रतिपद्यते। तथा चास्मिन् प्रकृते पाठान्तर सुलभमेव- 'एकेन कि न विहितो भवत. स नाम' इति। प्क्रेल 'कौस्तुभ' के कारण ही पुरुषोत्तम विष्णु भगवान् तुम्हारे सामने याचक के समान हाथ फैला कर खडे होते हैं। अत.जिन रत्नों के कारण तुमको इतना गौरव प्राप्त होता है उनका तिरस्कार मत करो] ।२५। यहाँ सामान्यतः [सब] रत्नों के उत्कर्ष का निरूपण प्रारम्भ किया था 7 किन्तु [श्रन्त में] 'कोस्तुभेन' कौस्तुभ [रत्न विशेष] ने [यह कहकर] इस रत्न विशेष को कथन करने वाले [कौस्तुभ] शन्द से उन [रत्नो] में से विशेष [रत्न] का कथन करके उसका उपसंहार किया है। इसलिए उपक्रम और उपसहार का वैषम्य शोभातिशय को उत्पन्न नहीं करता है। [इसलिए यहाँ रत्न विशेष वाचक कौस्तुभ पद का प्रयोग उचित नहीं है। उसके स्यान पर रत्न सामान्य के वाचक किसी शब्द का प्रयोग ही किया जाना चाहिए था उसके न होने से यह पद्य 'भग्नप्रकमता' दोष से युक्त हो गया है]। और यह नहीं कहा जा सकता है कि विशेष [अर्थ] में जो कुछ गुए-गरिमा है वह सब सामान्य [अर्थं] में भी हो ही सकता है। [इसलिए सामान्य वाचक शब्द के स्थान पर विशेष वाचक कौस्तुभादि शबद का प्रयोग दोषाधायक नहीं है।] क्योंकि, [तंत्रास्यायिका नामक ग्रथ में कहा है]- घोडा, हाथी, घातु [लोह], लकडी, पत्यर, कपडा, स्त्री, पुरुष और जल [शदि समस्त पदार्थो] का [अपने ही सजातीय श्रन्य पदार्थ की अपेक्षा] भ्नन्तर और महान् अन्तर होता है ॥२६॥ इसलिए इस प्रकार के [कल्लोलवेल्लित आदि श्लोक के सदृश] स्थलो मे सामान्य [रत्न आरदि] का बोधक शब्द ही सहृदयो का हृदयहारी हो सकता है [हृदयहारित्व को प्राप्त करता है]। इसलिए प्रकृत [कल्लोलवेल्लित आदि श्लोक] १. तन्त्रास्यायिका १,४०, सुभाषित रत्नभाण्डागार पृ० १७० ।

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४० ] वक्रोक्तिजीवितम [ काररिका &

यत्रविशेषात्मना वस्तु प्रतिपादयितुमभिमत तत्र विशेपाभिधायकमेवा- भिधानं निबघ्नन्ति कवय। यथा- द्वयं गतं सम्प्रति शोचनीयता समागमप्रार्थनया कपालिनः। कला च सा कान्तिमती कलावतस्त्वमस्य लोकस्य च नेत्र कौमुदी ॥२७।" अत्र परमेश्वरवाचकशव्दसहस्त्रसम्भवेऽपि 'कपालिन' इति वीभत्स- रसालम्वनविभाववाचक शव्दो जुगुप्सास्पदत्वेन प्रयुज्यमान कामपि वाचक- वकतां विदधाति। 'सम्प्रति' 'द्वय' चेत्यतीव रमणीयम्। यत्किल पूर्वमेका सैव दुर्व्यसनदूपितत्वेन शोचनीया सञ्जाता, सम्प्रति पुनस्त्वया तस्यास्तथाविध- दुरध्यवसायसाहायकमिवारव्धमित्युपहस्यते। 'प्रार्थना' शब्दोऽप्यतितरां रमणीय, यस्मात् काकतालीययोगेन तत्समागमः कदाचिन्न वाच्यतावहः।

में [विशेष रत्न वाचक 'कौस्तुभ' शब्द के स्थान पर सामान्य वाचक ] दूसरा पाठ भी मिल ही सकता है। [अर्थात् तीसरे चरण को बदलकर इस प्रकार लिरूना उचित होगा]- एकेन कि न विहितो भवतः स नाम, क्या [उन अ्रनेक रत्नो में से अकरेले] एक ही [कौस्तुभ नामक रत्न] ने उस [पुरुषोत्तम विष्णु भगवान्] को भी तुम्हारा [सामने हाथ फैलाने वाला] याचक नहीं बना दिया हैं। और जहाँ विशेष रूप से वस्तु का प्रतिपादन करना अरभिमत हो वहां कवि लोग विशेष [अर्थ] के अभिधायक [शब्द] को ही प्रयुक्त, [उपनिबद्ध] करते हे। जैसे- ब इस समय उस 'कपाली' [कपालो को माला रूप में धारण करने वाले शिव] के समागभ की प्रार्थना से एक तो कलामय [चन्द्रमा] की वह सुन्दर कला और दूसरी इस लोक के नेत्रो की कौमुदी रूप तुम [ पार्वती] यह दोनो [वस्तुएं] शोच- नीयता को प्राप्त हो रही है.।।२७। यह महाकवि कालिदास के कुमारसम्भव नामक काव्य का ५,७१ श्लोक है। शिव की प्राप्ति के लिए तपस्या करती हुई पार्वती के समीप वटुवेषधारी शिव आकेर उसको' शिव की ओर से विमुख करने के लिए कह रहे है] यहाँ शिव [परमेश्वर] के वाचक सहस्त्रो शब्दों के होने पर भी 'कपालिन' यह वीभत्स रस के आलम्बन विभाव का वाचक शब्द [शिव के प्रति] घृणा के व्यञ्जक रूप से उपनिबद्ध होकर कुछ अपूर्व शब्द-सौन्दर्य

१ कुमारसम्भव ५, ७१।

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कारिका & ] प्रेथमोन्मेष [ ४१

'प्रार्थना' पुनरत्रात्यन्यन्त कौलीनक्लट्कारिगी। 'सा च' 'त्वञ्' इति द्वयो-

कान्तिमती' इति च मत्वर्थीयप्रत्ययेन द्वयोरपि प्रशसा प्रनीयत इत्येतेपा प्रत्येकं कश्चिदप्यर्थ शव्दान्तराभिधेयता नोत्सहते। कविविचक्ितविशेपाभिधानक्षमत्वमेव वाचकत्वलक्षणाम्। यस्मात प्रतिभाया तत्कालोल्लिखितेन केनचित्परिस्पन्देन परिस्फुरन्त पढार्था. प्रकृत- प्रस्तावसमुचितेन केनचिदुत्कर्पेण वा समाच्छादितस्वभावा. सन्तो विव्ञा-

नाभिधीयमानाश्चेतनचमत्कारितामापद्यन्ते। यथा- [वाचकवतता] को उत्पन्न कर रहा है। [श्लोक में] 'सम्प्रति, औररौर 'द्वय' [यह दोनो पद] भी अत्यन्त सुन्दर है। क्योकि पहिले तो अकेली वह [चन्द्रमा की कला ] ही [कपाली के समागम की प्रार्थना रूप] दुव्यंसन से दूषित होने से शोचनीया थी और भव तुमने भी उसके उस प्रकार के दुर्भाग्यपूर्ण कार्य में महायता देना प्रारम्भ कर दिया, इस प्रकार [ब्रह्मचारी वटु द्वारा पार्वती का ] उपहास किया जा रहा है। [इ्लोक में प्रयुक्त] 'प्रार्थना' शन्द ? भी अत्यन्त रमणीय है। क्योकि काकतालीय न्याय से [अकस्मात्] उस [कपाली शिव] का समागम कदाचित् निन्दनीय न होता। परन्तु उस [कपाली] के विषय में 'प्रार्यना' [वस्तुत.] कुलीनता के लिए अ्त्यन्त कलङ्धकारिी है। [यह भाव प्रार्थना-पद से व्यक्त होकर काव्यशोभा को अपूर्वता प्रदान कर रहा है]। 'सा च' 'त्व च' [श्लोक के यह दोनों पद] दोनो [चन्द्रमा की कान्तिमती कला और पार्वती] के अनुभूयमान परस्परस्पर्धी लावण्यातिशय के प्रतिपावक रूप से गृहीत हुए हैं [और बड़े चमत्कारजनक है]। 'कलावत' और 'कान्तिमती' [इन दोनो पदो में] इस 'मत्वर्थीय प्रत्यय' से दोनो को प्रशसा प्रतीत हो रही है। इसलिए इन [उपर्युवत समम्न पदो] नें से किसी भी [शब्द के] अर्थ को [उसके पयार्यवाची] किसी अ्रन्य शब्द से नहीं कहा जा सकता है। [उस विशिष्ट अर्थ का वाचक केवल वही शब्द है जिसे कवि ने स्वय श्लोक में प्रयुक्त किया है। वही 'विवक्षितार्थकवाचक' शब्द काव्य में 'शब्द' पद से कहा जाता है]। [इसलिए] कवि के विवक्षित विशेष [अर्थ] के कथन करने की क्षमता ही वाचकत्व पर्थात् शब्द का लक्षण है। जिससे उस [काव्य-निर्माणण के] समय [कवि को] प्रतिभा में उल्लिखित [विशष रूप से प्रतिभात] किसी विशेष स्वभाव से युक्त स्फुरित होते हुए, अथवा प्रकृत प्रकरण के योग्य किसी चपूर्व गौरव से समाच्छादित होते हुए पदार्य [कवि की] विवक्षा के अनुगत [विधेय] रूप से वाच्य हुए उस प्रकार के विशेष। [अर्य] के प्रतिपादन में समर्थ शब्द से कथित होकर सहृदयों [चेतन] के

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४२ ] [ कारिका ६

सरम्भ: करिकीटमेघशकलोद्देशेन सिंहस्य य' सर्वस्यैव स जातिमात्रविहितो हेवाकलेशः किल। इत्याशाद्विर दक्षयाम्वुदघट।बन्धेऽप्यसंरम्भवान् योऽसी कुत्र चमत्कनेरतिशयं यात्वम्धिकाकेसरी ॥२८।। अत्र करिणां 'कीट' व्यादेशेन तिरस्कार, तायदाना च 'शकल' शब्दा- भिधानेनानादर,। 'सर्वस्य' इति यस्य कस्यचित् तुच्छतरप्रायस्येत्यवहेला, जातेश्च 'मात्र' शब्दविशिष्टत्वेनावलेप. । हेवाकस्य 'लेश' शब्दाभिधानेनाल्पताप्रति- पत्तिरित्येते विवच्षितार्थैकवाचकत्व द्योतयन्ति। 'घटावन्ध' शव्दश्च प्रस्तुत- महत्त्वप्रतिपादनपरत्वेनोपात्तस्तन्निबन्वनतां प्रतिपद्यते। विशेपाभिधानाकाचिए पुन पदार्यस्वरूपस्य तत्प्रतिपाठनपरविशेषण- शून्यतया शोभाहानिरुत्पद्यते। यथा-

लिए चमत्कार जनक होते है। जैसे- हाथी रूप [तुच्छ] कोडे अथवा मेघ के [क्षुद्र] टुकडे के [शन्द को सुनकर उसके] उद्देश्य से सिंह का जो क्रोध है वह [सिंहत्व] जातिमात्र से उत्पन्न सभी [सिंहो] का साधारण स्वभाव है। इसलिए [यह सोचकर] दिग्गजो औ्ररर प्रलयकाल के मेघो के घटावन्घो में भी सरम्भ [क्रोध] न करने वाला जो यह पार्वती [अम्बिका का सिंह है वह और कहाँ अधिक चमकेगा। [और कहाँ अधिक सरम्भ को प्राप्त करेगा ] ।२८ । इस [उदाहरर] में हाथियो को 'फीट' कहकर [उनके प्रति] तिरस्कार [प्रद शित किया गया है] और मेघो का 'शकल' [टुकडा] शब्द से अनादर [सूचित किय गया है]। 'सर्वस्य' [पद के प्रयोग] से जिस किसी अत्यन्त तुच्छगाय इस [के सूचन] से [उसके प्रति] अवहेलना [निवद्ध की गई है]। जाति के 'मात्र' शब्द से विशिष्ट [करके जातिमात्रविहितो कथन] होने से [प्रम्बिकाकेसरी का] अर्प्रभिमान [सूचित होता है]। 'हेवाक' [स्वभाव] का लेश शब्द के कथन से अ्पता [तुच्छता] की प्रतीति [होती है] इसलिए यह [सब शब्द अप्रपने] 'विवक्षतार्थेक वाचकत्व' को द्योतित करते हैं औरर 'घटाबन्घ' शब्द प्रस्तुत [अम्बिका केसरी के] महत्त्व के प्रतिपादन के अभिप्रार से प्रयुक्त होकर उस [महत्त्व प्रतीति] का कारण होता है। [यहाँ विशिष्ट अरयों वे अभिधान के लिए कवि ने विशिष्ट शब्दो का ही प्रयोग किया है]। विशेष रूप से कथन के योग्य [आकांक्षी] पदार्थ स्वरूप के, उस [विशेष अर्थ] के प्रतिपादन में समर्थ विशपसो से शून्य होने से [काव्य की] शोभा की हानि होती है। [इसका उदाहरण देते है] जेसे-

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कारिका &] प्रंथर्मोत्मषः [ ४३

यत्रानुल्लिखिरितार्यमेव निखिल निर्माणमेतद्विषे- रुत्कर्षपतियोगिकल्पनमपि न्यक्कारकोटि. परा। याता: प्राणाकता मनोरथगतारुल्लघ्य यत्सम्पद, तस्याभासमणीकृताश्मसु मणेरश्मत्वमेवोचितम् ।।२६।।' अन्न 'आभास' शब्द स्वयमेव सात्रानिविशिष्टत्वमभिलपॅल्लच्यते।

वाचकवक्रताप्रकारस्वरूपनिरुपणावसरे प्रतिपद प्रकटीभविष्यतीत्यलमति- प्रसङ्ग न। अर्थश्च वाच्यलक्षण कीदश काव्ये य. 'सहदयाह्ाटकारिस्वस्पन्द- सुन्दर'। सहया. काव्यार्यविदस्तेपामाह्नादमानन्द करोति यस्तेन स्वस्पन्देन

उस [चिन्तामरिग नामक मणि विशेष] के होने पर ब्रह्मा की यह सारी रचन। [ससार] नाम लेने थोग्य भी नहीं है, जिसके उत्कर्ष की त्रवधि [चिन्तामणि अमुक वस्तु से उत्कृष्ट हं इस प्रकार उसके उत्कर्ष की सीमा] की कल्पना करना भी [उसके] अत्यन्त तिरस्कार की चरन सीना है। और जिस का वैभव प्ाशियों के मनोरथ [कल्पना] की पहुँच से भी परे है [जिसके सामर्थ्य तथा वँभव को प्राणी सोच भी नहीं सकते है] जिसकी एक भनक [आभासमात्र] मे ही मणि बन जाने वाले पत्यरो [के गणना प्रसङ्ग] में उम [चित्तरामशि नामक] मणि [विशेष] को [शन्य मरियों के समान] पत्थर मानना ही उचित है।[यह सोपहास व्यङ्गय वचन है। अर्थात् अ्र्परन्य मणियो के समान चिन्तामरिग को भी एक पत्थर समभ लेना अनुचित है। यह अन्योकिति है। किसी अत्यन्त विशिष्ट गुयुक्त कार्यकर्ता को भी अ्रन्य सबके समान एक साघारख सेवक या कार्यकर्त्ता मान लेना उचित नहीं है। उसके गुणो का यथार्थ और उचित आादर होना चाहिए] ।२६। यह श्लोक काव्यप्रकाश के राप्तम उल्लास में उदाहरण सख्या २७३ पर उद्ृत हुआ है। वहां इलोकारम्भ में तत्र के स्थान पर यत्र पाठ है। वतोक्तिजीवितम् में श्लोक का आरम्भ तत्र पाठ से हुआ है। परन्तु यत्र का पाठ है अघिक उपयुक्त है। -3 इसलिए मूल नें हमने काव्य प्रकाश के समान 'यत्र' पाठ ही रखा है। यहाँ [इस उदाहरण में प्रयुक्त] प्राभास शब्द स्वय [अपूर्ण होने से] मात्र [आभासमात्र] आदि विशिष्टत्व को चाहता हुआ दिखाई देता है। [अर्था्त् आ्रभास- मात्र से पत्थरो को मशि बना देने वाले, इस प्रकार मात्र शब्द के प्रयोग करने पर

१ काव्यप्रकाश पृ० ३६८ पर भो उद्धतनै।

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४४ j [कारिका ६ आरत्मीयेन स्वभावेन सुन्दर: सुकुमार:। तदेतदुक्त भवति-यद्यपि पदार्थर नानाविधधर्मरचितत्त्वं सम्भवति तथापि तथाविधेन धर्मेण सम्बन्ध समाख्यायते य, सहदयहृदयाह्नाटमाधातुं च्षमते। तस्य च तदाह्नादसामथ सम्भांव्यते येन काचिदेव स्वभावमहत्ता रसपरिपोपाङ्गत्वं वा व्यत्तिमास दयति। यथा-

ही वाक्य में सौन्दर्य आ सकता है। उसका प्रयोग न होने से काव्य-सौन्दर्य की हा हो रही है। अतएव उसके स्थान पर ] दूसरा पाठ- छायामात्रमणीकृताशमसु मशोरश्मत्वमेवोचितम्। यह [परिव्तित पाठ अरधिक उपयुक्त] है। यह [सब] वाचक वकरता उसके भेद श्र्प्रौ स्वरूप के निरूपण के अवसर पर प्रतिपद [स्वय] प्रकट हो जायगा। इसलिए [ यहा अधिक लिखने की आ्वश्यकता नहीं हैँ।

यहाँ तक काव्यमार्ग मे किस प्रकार का शब्द वस्तुत 'शब्द' कहा जा सकद है, इस बात का प्रतिपादन किया है। अब कारिक। के उत्तरार्द में उसी प्रकार के 'भथ का निरूपण करते है- और वाच्य रूप अरथ कैसा [काव्य मे अ्र्प्रभिप्रेत हं]। काव्य मे जो सहृदयो हृदयों का श्रह्हादकारी अपने स्वभाव से सुन्दर हो। सहृद्य अर्थात काव्य के मर्म 'उनके आह्लाद अर्रात् आ्रानत्व को करने वाला जो स्वस्पन्द अर्थात् अरपना स्वभा उससे सुन्दर' अर्थात् सुकुमार। इसका अभिप्राय यह हुआ कि यद्यपि पदार्थ नानावि धर्म से युक्त हो सकता है फिर भी उस प्रकार के धर्म से [ उसका] सम्बन्ध [काव में] वर्णन किया जाता है जो [धर्म विशेष] सहृदयो के हृवय में आ्ानन्द को उत्पन् करने में समर्थ हो सकता है। और उस [धर्म] मे ऐसी सामर्थ्य सम्भव होती जिससे कोई अपूर्व स्वभाव को महत्ता अथवा रस को परिपुष्ट करने की क्षमत [अरङ्गत्ता] अ्र्प्रभिव्यक्ति को प्राप्त करती है। जँसे- यह श्लोक वराहमिहिर के सदुवतिक्णाभृतम् नामक ग्रन्थ में तथा सुभाषित- रत्नभाण्डागार मे सङ्कलित हुआ है। परन्तु उसका रचयिता कौन है यह नही कहा जा सकता है। सदुक्तिकणममितम् मे 'खरकुहरविशत्तोयतुच्छेपु' यह पाठान्तर पाया जाता *

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फारिका & ] प्रथमोन्मेष

दष्ट्रापिष्टेषु सद्य शिखरिषु न कृत स्कन्धकराड्विनाद सिन्धुष्ङ्गावगाहः खुरकुहरगलत्तुच्नोयेपु नाप्त । लब्धा पातालपङ्ग न लुठनरतय पोत्रमात्रोपयुवने येनोद्धारे धरित्र्या स जयति विभुताविध्नितेच्छो वराहः ॥३०॥१ अ्त्र च तथाविध पदार्थपरिम्पन्ठसहिमा निवद्धोय न्वभावसम्भ- विनस्तत्परिस्न्दानन्तरस्य सरोधसम्पावनेन स्वभावमहत्ता समुल्लासयन् सह- दयाह्लादकारितां प्रपन्न । यथा च-

[वराहाचतार के समय ] जिस [वराह रूपवारी विष्णु भगवान्] ने दांत [के लगन] से ही तुरन्त चूर्ण हो जाने वाले पर्वतो पर कन्धे की खुजली नहीं मिटाई। खुर के कुहगे में ही जिनका तुच्छ [अति स्वल्प] पानो समा गया है ऐसे समुद्रों में स्नान [भी] नहीं किया और केवल पोतने योग्य [स्वल्प] पाताल की पङ्ध में लोटने का श्रानन्द [भी] नहीं रठा पाया। अपने विभुत्व के कारण [वराहजीवनोचित जलावगाहन, पङ्चलोटन आदि विषय में] अपूर् कामना वाले वह वराह [रूपधारी विष्णु भगवान्] सब से उत्कृष्ट है॥३०॥ यहाँ उस प्रकार की वराहावतार का स्वाभाविक महिमा वशित है जो [वराह के] स्वाभाविक [स्कन्घघर्षण, जलावगाहन, और पड्धसुठन आदि] अ्रन्य व्वापारो के निरोध द्वारा [वराह रूपधारी विष्णु भगवान् स] स्वाभाविक महत्ता को प्रकट करता हुआ सहृदयो के हृदय [के शह्हादकारित्व को प्राप्त हो रहा हं] का श्रह्नाद- कारी हो रहा है। यहां गद्यभाग में वकोक्तिजीवितम् के पूर्व सस्करण में 'निवद्धोदय' पाठ छपा है। उसकी अपेक्षा 'निवद्धो य' यह पाठ अधिक अच्छा है। औौर जैसे [इसी प्रकार का दूसरा उदाहरस निम्न पद्य है]

यह श्लोक महाकवि कालिदास कृत रघुवश के १४ वे सर्ग का ७०वाँ ग्लोक हैं। उसमे लक्ष्मणा के द्वारा वातमीकि आश्रम के समीप सीता को छोड दिवे जाने के वाद, सीता के रदन को मुनकर उस रोने की आवाज का अनुसग्स करते हुए वाल्मीकि मुनि के उसके पास जाने का वर्णन है। कवि लिखता है-

१. 'सदुक्ति कर्णामृत में वराह मिहिर के नाम से दिया है।

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४६ J वक्रोकितिजीवितम् [कारिका ६

तामभ्यगच्छद्रदितानुसारी मुनिः कुशेष्माहरणाय यातः। निषादविद्धाएडजदर्शनांत्थः श्रोकत्वमापद्यत यस्य शाकः ।। ३१।।१ त्रत्र ोुनिवा्मीिरिति र्यायपमे क्तव्ये परमकारुरि कस्य निपादनिर्भिन्न शकुनिसन्दर्शनमान्रसमुत्थित शोक श्लोकत्वमभजत यस्येों तस्य तद वस्थजनकराजपुत्रीदशनविवशवृत्तेरन्त करगापरिस्पन्द करुणरस परिपोपाङ्गतया सहदयहदयाह्वादकारी कवेरभिग्नेत। यथा च- भर्तुमित्रं प्रियमविधवे विद्धि मामम्बुवाहं तत्सन्देशाद्ध दयनिहितादागत त्वत्समीपम् । यो वृन्दानि त्वरयति पथि श्राम्यता प्रोपिताना

कुश और समिधाओ के लाने के लिए निकले हुए [साल्मीकि] मुनि रोने क आ्रवाज [जिधर से आ्र रही थी उस] का अनुसरण करते हुए उसके पास पहुँचे। जि. [वाल्मीकि मनि] का निषाव के द्वारा मारे गये [क्रौञच] पक्षी को देखने से उत्पन्न हुआ शोक [मा निषाद प्रतिष्ठा त्वमनम शाशवती समा। यत्कौञ्चमिथुनादेकमवघी काममोहितम् ॥ इत्यादि प्रथम] इलोक के रूप में परिणत हुआ ॥३१॥ यहॉ वह कौन से मुनि थे [इस जिज्ञासा की निवृत्ति के लिए] वाल्मीहि [मुनि] केवल इस नाम के कथन करने क अवसर पर 'जिस परम कारुशिक क निषाद द्वारा मारे गये [ क्रौञ्च] पक्षी के दर्शनमात्र से उत्पन्न शोक, श्लोकत्व को प्राप हो गया,' उनका, उस पकार की [पर्रगर्भा और वन मे परित्यक्ता] अ्वस्था वाल जनकराजपुत्री [सीता] के दर्शन से विववृत्ति, श्रन्त करण का व्यापार [प्रथव स्वभाव। कुन्तक 'परिस्पन्द' शब्द का प्रयोग स्वभाव शर्थ में बहुत करते है।] करुशरर के परिपोषण मे सहायक [अ्रङ्ग] होकर सहृवयहृद्याहहनादकारी [हो यह बात इर श्लोक के निर्माता महाकषि कालिदास को] कवि को अभिमत है। [इसी प्रकार का तीसरा उदाहरण महाकवि कालिदास के मेघदूत से निम् प्रकार दिया जा सकता है।] और जैसे- हे सौभा्यवती [सुहागिन] मुझे [शरपने] पति का, हृदय में रखे हुए [अर्थात पत्र रूप में नही मौखिक] उसके सन्देश [को तुम्हारे पास पहुँचाने के प्रयोजन] रें तुम्हारे समीप आया हुआ, अम्बुवाह [मेघ, नामक] मित्र समझो। जो मार्ग में विश्रामर करने वाले प्रवासियो के समूहो को अपनी प्रवत औ्र मधुर [गर्जन फी] ध्वनि से, [अपनी प्रियतमा रूप] अ्र्प्रवलाग्नो की [पतियो के प्रवास-काल मे विना शृद्गार के वाँधे हुए केशो की] वेरी को खोलने [और पति के आगमन पर यथोचित शृद्गार करने] के लिए उत्सुक [वनाकर] घर भेजता है ॥३२॥ १ रघुवश १४, ७०। २ मेघदूत ५६।

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कारिका &] प्रथमोन्मेष [४७

अ्रत्र प्रथममामन्त्रपढार्थस्तवाश्वासकारिपरिस्पन्टनिवन्धन । 'भर्तुमित्र मा विद्ध' इत्युपादेयत्वमात्मन प्रथयति। तच्च न सामान्यम, 'प्रियम' इति विश्र- ङुभकथापात्रताम्। इति तामाश्वास्य उन्मुखीकृत्य च तत्सन्देशात् त्वत्समीपमा- गमनमिति प्रकृतं प्रस्तौति। 'हृदयनिहितान' इति स्वहृदयनिहित सावधानत्व द्योत्यते। नतु चान्य कश्चिदेव विधव्यव हारविदग्धवुद्धि. कथ न नियुक्त इत्याह, ममैवात्र किमपि कौशल विजम्भत । 'अम्बुवाहम' इत्यात्मनस्तत्कारिताभिधान द्योतयति।य. 'प्रोपिताना वृन्दानि त्वरयति,' सञ्जातत्वराणि करोति। कीदशाना, 'श्राम्यता,' त्वरायामसमर्थानामपि। 'वृन्दानि' इति वाहुल्यात तत्कारिताभ्यासं कथयति। केन, 'मन्द्रस्निग्धैध्वनिभि'। माघुर्यरमणीयै. शब्दै., विदग्धदूत यहाँ [इस श्लोक में] प्रथम सम्बोधन पद [अ्रविधवे] का अर्थ उस [यक्ष की पत्नी] को आश्चासन देने वाले व्यापार का कारण होता है। [अ्रविषवे शब्द से यह सूचित होता है कि तुम्हारा पति जीवित है। अत यह सर्व-प्रथम सम्बोधन पद यक्षपत्नी के लिए अत्यन्त आश्वासदायक है]। 'मुझे [अपने] पति का मित्र समझो' यह [वाक्य] अपनी [मेध की] उपादेयता [औ्र विश्वसनीयता] को सूचित करता है। औप्रोर वह [मित्र] भी सामान्य नहीं [अपितु] 'प्रिय' [मित्र] इस [पद] से विश्रम्भकथा [सब प्रकार की गोप्य कथा] की [भी] पात्रता को सूचित करता है। इस प्रकार [प्रथम चरण में] उस [वियोगिनी यक्षपत्नी] को आाश्वासन देकर औररर [अपनी वात सुनने के लिए] उन्मुख करके उसके सन्देश से तुम्हारे पास आया हू' इस [कथन] से प्रकृत [विषय] को प्रस्तुत करता है। 'हृदयनिहित' पद से हृदय में रिथत [या सन्देश का हृदयनिहितत्त्व अर्था्त् पत्र रूप नहीं अ्पितु मौखिक- त्व श्र्ौर] सावधानत्ता दोतित होती है। [यक्षपत्नी के मन में शङ्का हो सकती हु कि ] इस प्रकार के [सन्देश ले जा सकने के] व्यवहार में निपुण मति वाला कोई अरन्य व्यक्ति [इस सन्देश लाने के कार्य में] क्यों नियुक्त नही किया। [तुमको ही क्यों भेजा है?] इस [शङ्धा के निवारण] के लिए कहते है, [मुझे जो इस कार्य के लिए भेजा गय। हैं] इसमे कुछ मेरा ही कौशल कारण हं। [ ेरे समान सुन्दर रूप में और जल्दी, अन्य कोई इस कार्य को नहीं कर सकता है। इस बात का उपपादन करने के लिए भगे हेतु देता है] 'अम्बुवाह' इस [पद] मे [वहन करना ही मेरा कार्य हैं। जव जल को ले जा सकता हूँ तो सन्देश को वहन करने की क्षमता भी मुझ मे हैं। इस प्रकार] अपनी तत्कारिता [सन्देशवहनकारिता] और [ उसके साथ ही] नाम को सूचित करता हैं। 'जो प्रवासियो के समूहों' [हजारों प्रवासियो] को 'त्वरयति' जिनको [घर] जाने की जल्दी पड गई है इस प्रकार का कर देता है। किस प्रकार के [प्रवासियों को, कि] 'विश्राम करते हुए' [थकावट के कारण] जल्वी करने में श्रसमर्थ होने पर भी

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४८ ] वक्रोकितिजीवितम् [ कारिका 2

प्ररोचनावचनप्रायैरित्यर्थ । क्व, 'पथि' मार्गे। यदच्छया यथा कथाश्विद हमे- तदाचरामीति। किं पुनः प्रयत्नेन सुहृत्प्रेमनिमित्त सरव्धवुद्धि न करोमीति। कीदशानि वृन्दानि, 'अबलावेशिमोकोतसुका नि'। अबलाशव्देनात्र तत्प्रेयसि विरहवैधुर्यासहत्वं भरयते। तद्वेिमोक्षोत्सुकानीति तेषा तदनुरक्तचित्त- वृत्तित्वम् । तदयमत्र वाक्यार्थ। विधिविहितविरहवैधुर्यस्य परस्परानुरक्तचित्तवृत्ते- र्यस्य कस्यचित कामिजनस्य समागमसौख्यसम्पादनसौहार्दे सदैव गृहती- त्रतोऽस्मीति। अरत्र य पदार्थपरिस्पन्दः कविनोपनिबद्ध. प्रवन्धस्य, 'मेघदूतत्त्वे' परमार्थतः स एव जीवितमिति सुतरा सहृदयहृदयाह्हादकारी।

[मेघ फी आरावाज सुनते ही उठकर घर को भागने के लिए तैयार हो जाते है]। 'वृन्दानि' इस [पद] से बाहुल्य [सूचन] द्वारा उस क्रिया के करने के अभ्यास को सूचित करता है। किस से [वृन्दानि त्वरयति] 'गम्भीर औौर मधुर ध्वनियों से,' माघुर्य से, रमणीय शब्दों से, चतुर दूत के प्ररोचना शब्दो के समान [अर्थात मानो कोई दूत उन प्रवा- सियों के पास आकर उनको अपनी पत्ती के पास चलने के लिए तैयार कर रहा हो। उसके शब्दो के समान मधुर अपने गर्जन के शब्द से में उन विश्राम करते हुए पथिकों को घर जाने के लिए उत्सुक कर देता हूँ] यह अभिप्राय हुआ। कहाँ [विश्राम करते हुए, कि] 'मार्ग मे'। [अर्थात् उनको उत्सुक करने के लिए मुझं किसी स्थान विशेष की आवश्यकता नहीं होती है अपितु] स्वेच्छा से जैसे [भी हो] तैसे यह [कार्य] कर सकता हूँ। फिर [अपने] मित्र [यक्ष] के प्रेम [की पूर्ति] के लिए प्रपत्न से उत्सुक [सरब्ध बुद्धि] क्यों नहीं कर सकता हूँ। किस प्रकार के वृन्दो को। [अपनी वियो- गिनी पत्नी रूप] 'अवलाओं के वेणी को खोलने के लिए उत्सुक' [वृन्दो को]। 'अबला' शब्द से यहाँ उनकी प्रियतमाओ के विरह-वुख को सहन करने की अक्षमता को सूचित किया गया है। 'तद्वेशिमोक्षोत्सुकानि' इस [पद] से उन [प्रवासियो] का उन [वियोगिनी पत्नियो] के प्रति अनुरक्तचित्तत्व [सूचित किया गया है]। इस प्रकार श्लोक [वाक्य] का यह अभिप्राय हुआ कि [तुम दोनो के समान] भाग्यवश विरह-दु ख भोगने वाले और परस्वर अनुरक्त चित्त सभी प्रेमीजनों के समागम सुख के सम्पादन रूप प्रिय कार्य को करने का मैने सदव से व्रत लिया हुआ है। यहाँ [इस श्लोक में] कवि ने जो [मेघरूप] पदार्थ का स्वभाव वशिगत किया है, वस्तुत [इस मेघदूत नामक] काव्य के मेघदूतत्व [मेघवूत इस नामकरण] में वही [कारण] जीवन है। इसलिए [यह श्र्र्थ] स्वयं ही सह्वयो के लिए अ्त्यन्त आ्रानन्दवायक है।

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कारिका & J प्रथमोन्मेष:

न पुनरेवंविधो यथा- सद्यः पुरीपरिसरेऽपि शिरीषसृद्दी, सीता जवात् त्रिचतुराणि पदानि गत्वा। गन्तव्यमद्य करियदित्यसकृद् व्र वाणा, रामाश्र एः कृतवती प्रथमावतारस् ।।३३॥१ अरप्रत्र अरसकृत् प्रतिन्षं, कियवद् गन्तव्यमित्यभिधानलक्षणः परिस्पन्दा न स्व्रभावमहत्तामुन्मीलयति, न च रसपरिपापाङ्गतां प्रतिपद्यते। यस्मात् सीताया. सहजेन केनाप्यौचित्येन गन्तुमव्यवसिताया. सौकुमार्यादेवंविधं वस्तु

[इसके विपरीत नीचे दिये हुए श्लोक में दिखलाया हुआ] इस प्रकार का [अर्य सहृदयहृदयाह्नादकारी] नहीं होता है। जैसे- [यह श्लोक वालरामायण नाटक के पञ्चम अ्रड्ड का ३४वाँ इ्लोक है। उसमें वन को जाते समय सीता की अवस्था और उसकी सुकुमारता का वर्णन किया गया हैं]। शिरीष के समान कोमल सीता ने [अयोध्या] नगरी के वाह्य भाग में हा [पहले- पहल] जल्दी से तीन-चार क़दम चलकर [उतने में ही श्रान्त हो जाने के कारण] आ्राज कितनी दूर [और] चलना है बार-वार यह कहते हुए, रामचन्द्र की आंखों में प्रथम बार आंसुओरं को प्रवाहित कर दिया ॥।३३॥ अर्थात् सीता वन को वडे उत्साह से चली थीं। परन्तु अभी तो वह अयोष्या नगरी की सीमा को भी पार न कर पाई थी कि दो-चार कदम चलकर ही थक गई, और रामचन्द्र से वार-वार पूछने लगी कि आज अभी और कितना चलना है ? इसको देखकर रामचन्द्र की आंखों में आंसू आ गये। इससे पहले तक कभी रामचन्द्र रोए नही थे। परन्तु मीता की इम अवस्था को देखकर वह विवश रोने लगे। यह कवि का भाव है। महाकवि तुलसीदास ने इसी पद्य का छायानुवाद इस प्रकार दिया है- पुरतें निकसी रघुवीरवधू, धरि धीर दिये मग में पग द्वै, भलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराघर वै। पुनि वृभति है चलनो अब केतक पनकुटी करिहौ कित हं, सिय की लसि आातुरता पिय की अखियाँ अतिचारु चली जल च्वै।। यहां [इस श्लोक में] 'अ्रसकृत्' वार-वार अ्रप्र्यात् प्रतिक्षस औ्रर 'आराज कितना चलना है' यह कथन रूप [स्वभाव या ] व्यापार, न स्वभाव की महत्ता को प्रकट करता है और न रस के परिपोष में सहायक [अ्रङ्ग] होता है। क्योकि [पत्नीत्व के नाते] किसी स्वाभाविक शचित्य के कारण [राम के साथ वन को] जाने का निश्चय कर १. वालरामायण ४, ३४।

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वक्कोक्तिजीवितम् [ कारिका e

हृदये परिस्फुरदपि वचनमारोहतीति सहदयैः सम्भावयितुं न पार्यते। न च प्रतिक्षषमभिधीयमानमपि राघवाश्रुप्रथमावतारस्य सम्यकू सङ्गति भजते। सकृदाकणंनादेव तस्योत्पत्तेः। एतच्चात्यन्तरमणीयमपि मनाड्मात्रचलित वधानत्वेन कवे. कदर्थितम्। तस्माद् 'अवशम्' इत्यत्र पाठ कर्त्तव्यः । तदेवविधं विशिष्टमेव शब्दार्थयोलक्षणमुपादेय। तेन नेयार्थापार्थादयो दूरोत्सारितत्वात् पृथङ्् न वक्तव्या ।।६।। एवं शब्दाथेयोः प्रसि द्वस्वरूपातिरित्तमन्यदेव रूपान्तरमभिवाय, न तावन्मान्नमेव काव्योपयोगि किन्तु वैचित्र्यान्तरविशिष्टमित्याह- लेने वाली सीता के हृदय में [ उसके] सुकुमार होने से [कष्ट पढने पर] इस प्रकार की वस्तु [जो भाव इस पद्य में व्यक्त किया गया है वह] स्फुरित होने पर भी [उस जैसी वृढ़ प्रतिज्ञ आदर्श नारी के] मुँह से निफल सकती है यह बात सहृवय पाठक कल्पना भी नहीं कर सकता है। [इसलिए सीता के विषय में इस प्रकार का कथन उसके स्वभाव की महत्ता को बढाने वाला नहीं है]। और न 'प्रतिक्षण कहे जाने पर रामचन्द्र के [नेत्रों में] प्रथम बार आंसुओं को प्रवाहित किया' [इस कथन] की भली प्रकार सङ्गति लगती है। एक बार सुनने से ही उस [आँसुओ के प्रवाह] की उत्पत्ति [उचित] होने से [असकृद् वृवारण रामाश्रुए प्रथमावतार कृतवती यह कथन भी सुसङ्गत नहीं होता है। इसलिए] यह [पद्य] अत्यनत रमणीय होने पर भी कवि की थोडी-सी असावधानी से बिगड गया है। इसलिए यहाँ [असकृत के स्थान पर] 'अवशम्' [गन्तव्यमद्य कियदित्यवश ब्ुवारणा] यह पाठ रखना चाहिए था। इसलिए [शब्बाथों' सहितौ काव्यम् इस काव्य लक्षण में] इस प्रकार का शब्द और अर्थ का विशिष्ट ही लक्षण लेना चाहिए। [सामान्य शन्द और अरयं ग्रहण नहीं करना चाहिए]। इस [प्रकार के विशिष्ट शब्द औरर अ्ररयं के लिए ही काव्य शब्द का प्रयोग होने] से 'नयार्थ' और '्र्पार्थ' [नामक काव्य-दोष] आरदि एकदम निकल जाते हैं [उनकी कोई सम्भावना ही फाव्य में नहीं रहती है। क्योकि उस प्रकार के शब्द या अर्थ काव्य ही नहीं कहलाते है]; इसलिए उन [दोषों] का अरलग वर्णन करने की आवश्यकता नहों रहती है ।।६।। इस प्रकार [काव्य के लक्षणा में अ््रभिप्रेत] शब्द और अर्य के, प्रसिद्ध स्वरूप से अ्तिरिक्त कुछ अ्रन्य ही [विशेष प्रकार के] रूपान्तर को यह कहकर, केवल उतना ही काव्य में उपयोगी नहीं है किन्तु कुछ अन्य प्रकार के वैचित्र्य से युक्त [शब्दायं स्वरूप ही फाव्य में उपयुक्त होने योग्य होता है] यह [बात इस १०वीं कारिका में] कहते हैं-

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कारिका १०] प्रथमोन्मेष: [५१

उभावेतावलङ्कार्यौ तयोः पुनरलंकृतिः । वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यभङ्गीभसितिरुच्यते ॥१०॥ उभौ द्वावप्येतौ शच्दार्थावलङ्कार्यावलङ्गरणीयौ, केनापि शोभातिशय- कारिणालङ्करगोन योजनीयो। कि तत् तयोरलङ्करणमित्यभिधीयते, 'तयोः पुनरलंकृति.'। तयोरद्वित्वसख्याविशिष्टयोरप्यलंकृति. पुनरेकेव, यया 'द्वावप्य- लंक्रियेते। काSसौ, वक्रोकिरेव। वक्रोकि, प्रस्तिद्वाभिनानव्यतिरेकिणी विचित्रै- वाभिवा। कीदशी, वैदग्व्यभङ्गीभखिति। वैदगव्य विदग्धभावः, कविकर्म- कौशलं, तस्य भङ्गी विच्छित्ति, तया भखिति। विचित्रैवाभिधा वक्रोक्तिरित्युच्यते। तटिदमत्र तात्पर्यम्। यत् शब्दार्थौं पृथगवस्थितौ केनापि व्यतिरिकेना- लङ्करगोन योज्येते। किन्तु वक्रतावैचित्रययोगितयाभिधानमेवानयोरलङ्कार:।

यह दोनों [शब्द और अ्ररथ] अलङ्धायं होते है। और चतुरतापूर्ण शैली से कथन [वंदग्व्यभङ्गीभशिति] रूप वक्ोकिति ही उन वोना [शब्द तथा अर्यं] का 3 अलद्धार होती है ॥१० ॥ यह शब्द और शरर्थ दोनों ही अरलङ्धार्य अ्र्प्र्र्थात् [अलद्धार द्वारा] अलद्धरणीय अर्थात् शोभातिशयकारी किसी न किसी अलद्धार से युक्त करने योग्य होते है। उनका वह अलद्धार कौनसा है यह, 'और उन दोनो का अलद्धार' [इत्यादि पदो से] कहते है। उन द्वित्व सख्या से युक्त [शब्द तथा अर्य] का अलद्वार, फेवल एक [वक्रोषित] ही है, जिससे [शन्द और अर्य] दोनों ही अलकृत होते हैं। [प्रश्न] वह [शब्द अर्थ दोनों का एक ही अलद्धार] कौनसा है। [उत्तर कहते है] वकोषिति ही [शब्द तथा अर्थ दोनों का एकमात्र अलद्धार है] । पसिद्ध कथन से भिन्न प्रकार की विचित्र वणन शंली ही वकोकिति [कही जाती] है। केसी, वदग्ध्य- पूर्ए शैंली से कथन [वक्रोषिति है] । वंदग्ध्य अर्ात् चतुरतापूर्ण कवि कर्म [काव्य- निर्माण]-का कौशल, उसकी भङ्गो शैली या शोभा उससे भखिति अर्थात् [वसन] कथन करना। विचित्र [भसाधारण] प्रकार की वर्रगन-शैली ही वनोदित कहलाती है। यहाँ इसका यह अभिप्राय हुआ कि शब्ब औ्र अ््प्रय [अलक्कार्य रूप से] अरलग स्थित है औौर वे [उनसे भिन्न] किसी अ्रन्य अल्धार से युफ्त किये जाते है। किन्तु

१ यहाँ पुराने सस्करस में 'यथा द्वावप्यक्रियेते' पाठ छपा हुआ है। यह पाठ वस्तुत अ्रशुद्ध है। यया के स्थान पर यथा छप गया है और 'द्वावप्यक्रियेते' में 'ल' छूट गया । उसको जोड देने से 'यया ह्वावप्यलक्रियेते' यह पाठ शुद्ध होगा।

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धक्रोक्तिजीवितम् [ कारिका ११

तस्यैव शोभातिशयकारित्वात्। एतच्च वक्रताव्याख्यानावसर एवोदा- हरिष्यते॥१०॥ ननु च किमिदं प्रसिद्धार्थविरुद्वं प्रतिज्ञायते, यद्वक्ोक्तिरेवालङ्कारो नान्य कश्चिदिति। यतश्चिरन्तनैरपरं स्वभावोक्तिलक्षणामलङ्करणमाम्नातम् । तच्चातीवरमणीयम्। इत्यसहमानस्तदेव निराकतु माह- अलङ्कारकृतां येषां स्वभावोक्तिरलंकृतिः । अलङ्कार्यतया तेपां किमन्यदवतिष्ठते ॥११॥ येषामलक्कारकृतामलङ्कारकाराणा स्वभावाक्तिरलंकृतिः, या स्वभावस्य पदार्थधर्मलक्षणास्य परिस्पन्दस्य उक्तिरभिधा, सैवालकृतिरलङ्गरणं प्रतिभाति, ते सुकुमारमानसत्वाद् विवेकक्लेशद्वेपिएः। यस्मात् स्वभावोक्तिरिति कोऽथेः। वक्ता वैचित्र्य के उपयोगी रूप से कथन करना ही उनका अलद्धार है। उसी [कथन] के शोभातिशयकारी होने से। वक्ता के [भेदों] के व्याखयान के अवसर पर ही इसके उदाहरण देंगे ॥१०॥ [प्रश्न] प्रसिद्ध अर्थ के विरुद्ध आप यह प्रतिज्ञा कसे करते हैं कि वक्रोकिति ही [एकमात्र] फ्लद्गार हँ श्न्य [कोई अलङ्धार] नहीं है। क्योकि [दण्डी आरावि] अ्रन्य प्राचीन आचार्यो ने स्वभावोक्ति रूप अन्य अलद्धार [भी] कह्दा है और वह अ्रत्यन्त सुन्दर [होने से उपेक्षणीय नहीं] हैं। [उत्तर ] इस [स्वभावोकिति वादी के पूर्वपक्ष] को सहन न कर सकने के कारए [वक्रोवितिवावी आचार्य कुन्तक] उसी [स्वभावोषितिवाद] के निराकर करने के लिए [अगली ११ से १५ तक पाँच कारिकाओं में युक्तियाँ] कहते है- जिन [दण्डी मदृश] आलद्धारिक आचार्यो के मत में स्वभावोक्ति [भी] अलद्धार है उनके मत में औ्प्रौर अ्रलद्धार्य क्या रह जाता हैं। [अर्थात् स्वभाव ही अलङ्धार्य है। उसको अलद्धार मान लेने पर फिर 'अलङ्धार्य' किसको कहा जायगा। अत अलङ्धार्य भूत स्वभावोषित को अलद्धार मानना उचित नहीं है]॥११॥ जिन अलद्धारकारो अरर्ात् अलद्धार [शास्त्र] के रचने वाले आ्र््राचार्यों के मत मे 'स्वभावोषित' अलद्धार है अर्ात् जो पदार्थ के [स्वरूपाधायक] धर्मभूत स्वभाव की 1 उक्ति अर्थार्त् कथन वही [जिनको] अलकृति अर्थात् अलङ्कार प्रतीत होता है वह विवेचन शक्ति से रहित [सुकमारबुद्धि] होने से [अलद्धार्य और अलद्धार के] विवेक [भेद, 'विचिर पृथगभावे'] का कष्ट नहीं उठाना चाहते है। [यदि उसके विवेचना का कष्ट करें तो उन्हें विदित हो जाय कि स्वभावोक्ति अलद्धार नहीं अलङ्धार्य है क्योकि] स्वभावोषित इस [शब्द] का क्या अ्रर् है? स्वभाव ही का वर्णान [होने पर

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कारिका ११ ] प्रथमोन्मेष· [५३

स्वभाव एवोच्यमानः । स एव यदयलङ्कारस्तत्किमन्यत् तद्व्यतिरिक्तं काव्य- शरीरकल्पं वस्तु विद्यते यत्तेपामलङ्कार्यतया विभूष्यत्वेनावतिष्ठते पृथगवस्थिति- मासादयति। न किञ्व्िदित्यर्थ.॥११॥ 1 ननु च पूर्वमेवावस्थापितं यत्, वाक्यस्यैवाविभागस्य सालङ्कारस्य काव्यत्वमिति [१,६] तत्किमथमेतदभिधीयते१ सत्यम्। किन्तु तत्रासत्यभूतोऽपि, अपोद्धारुद्धिविहितो विभाग कर्तु शक्यते वर्णपढन्यायेन वाक्यपढ- न्यायेन चेत्युक्तमेव। एतदेव प्रकारान्तरेण विकल्पयितुमाह- स्वभावोकित कही जा सकती है। यही स्वभावोक्ति शब्द का अ्ररथ हुआ्प्]। वह [स्वभाव- वशन] ही यदि अलद्धार है तो फिर उस [स्वभाव-वर्सन ] से भिन्न काव्य के शरीर स्थानीय कोन-सी वस्तु है जो उनके मत में 'अलङ्धार्य' तथा अर्थात् विभूष्पत्वेन स्थित हो। [स्वभावोक्ति से] पृथग् [अपनी] सत्ता को प्राप्त करे। अ्पर्रथात् औौर कुछ नहीं हैं [जिसे 'अलङ्भाय' कहा जा सके। स्वभाव-वर्णन ही 'अलङ्धार्य' है। अरतः उसको 'अलङ्धार' कहना उचित नहीं हैँ।] ।।११। [पूर्वपक्ष, इस पर स्व्रभावोकिति वादी प्रश्न करता है कि आपनं अरर्थात् वकोक्ति वादी ने ही ग्रन्थ की १, ६ कारिका में] पहले यह [सिद्धान्त] स्थापित किया है कि [अलद्धाय औौर अलद्धार के] विभाग से रहित सालङ्वार [शन्दार्थ रूप ] वाक्य का ही काव्यत्व है। तो [नव आप स्वय अलङ्गाय औ्रौर अ्रलङ्गार का विभाग नहीं मानते हे तब हम से] यह क्यों कहते है [ कि स्वभावोषित को अलद्धार मानने पर अलङ्धार्य क्या होगा। हम भी अलद्धार और अलड्धार्य का विभाग नहीं मानते हैं। आप ऐसा समभ सकते है ]। [उत्तरपक्ष] ठीक है। [हम अलद्धार्य और अलद्धार का वास्तविक विभाग नहीं मानते है] किन्तु [हमारे मत में] वहाँ भेदविवक्षा [अपोद्धार बुद्धि] से पूर्वोक्त [पृ० १६ पर दिखलाये हुए] 'वर्णगपद न्याय' से अथवा 'वाक्यपद न्याय' से [जिस प्रकार व्याकरण सिद्धान्त में पद से भिन्न उसके श्वयव रूप 'वर्गग' नहीं होते हं और वाक्य से भिन्न उसके प्रवयवभूत 'पदों' की स्वतन्त्र वास्तविक स्थिति नहीं है फिर भी प्रकृति, प्रत्यय, क्रिया, कारक, आदि व्यवहार किया जाता है। इसी प्रकार काव्य में भी अलद्धार तथा अलड्धार्य की अलग पारमार्थिक स्थिति न होने पर भी भेद विवक्षा में अलद्धाय अलद्धार] विभाग किया जा सकता है। यह कह ही चुके हैं। [इसलिए यहाँ भी अलङ्धायं तथा अलद्धार का भेद होना आवश्यक है। भले ही वह पारमार्थिक न हो। 'स्वभावोकित-वाद' में अलङ्धायं भूत पदार्थस्वरूप को ही अ्लद्धार मान लेने पर वह भेद नहीं बनता हैं। अतः यह स्वभाघोक्ति की अलङ्धारता का पक्ष ठोक नहीं है ]। इसी बात को प्रकारान्तर से प्रतिपादन करने के लिए [ विकल्पयित्] कहते हैं-

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[कारिका १२

स्वभावव्यतिरेकेण वक्तुमेव न युज्यते। वस्तु तद्रहितं यस्मान्निरुपारव्यं प्रसज्यते ॥१२। स्वभावव्यतिरेकेण स्वपरिस्पन्द विना निःस्वभावं वक्तुमभिधातुमेव न युज्यते, न शक्यते। वस्तु वाच्यलक्षएम। कुत., तद्रहित तेन स्वभावेन रहित वर्जित यस्मान्निरुपार्यं प्रसज्यते। उपाख्याया निष्क्रान्त निरुपाख्यम्। उपाख्या, शब्द:, तस्यागोचरभूतमभिवानायोग्यमेव सम्पद्यते। यस्मात स्वभावशब्दस्येद्दशी व्युत्पत्ति, भवतोऽस्मादभिधानप्रत्ययौ इति भाव, स्वस्यात्मनो भाव स्वभाव। तेन स एव यस्य कस्यचित् पदार्थस्य प्रख्यापार्यावतारनिवन्धनम्। तेन वर्जित असत्कल्पं वस्तु शशविषाएप्राय शव्दज्ञानागोचरता प्रतिपद्यते। स्वभावयुक्तमेव सर्वथाभिधेयपदवीमवतरतीति शाकटिकवाक्यानामपि सालङ्कारता प्राप्नोति, स्वभावोक्तियुक्तत्वेन ।।१२।।

[स्वमावोषित को जब अलद्धार मानोगे तब उससे भिन्न कुछ श्रन्य अलङ्धार्यं होगा। परन्तु उस] स्वभाव के [स्वरूप के कथन के] बिना वस्तु का वर्णन [कथन] है ही सम्भव नहीं हो सकता है। क्योकि उस [स्वभाव] से रहित वस्तु [शशविषाए, वन्ध्यापुत्र आदि के समान] तुच्छ प्रसत्कल्प [निरुपास्य] हो जाती है ॥१२। स्वभाव व्यतिरेकेश अरथात् स्व-स्वरूप [स्वपरिस्पन्द] के बिना नि स्वभाव, स्वरूप रहित [वम्तु] का वर्णन ही नहीं किया जा सकता है। वस्तु अर्थात् वाच्यभूत [का घर्णन] क्यो [नहीं हो सकता है] ? तद्रहित अर्थात् उस स्वभाव से रहित अर्थात् वजित [वस्तु] क्योकि 'निरुपाख्य' हो जाती है। उपाख्या से निष्कान्त [इस विग्रह में 'निरादय क्रान्तादर्थे पञ्चम्या' इस वातिक से समास होकर] निरुपाखय [पद बनता है और उसका अर्थ अवर्णनीय या तुच्छ असत्कल्प आदि होता है। क्योकि] उपास्या [शब्द का अरर्थ] 'शब्द' है। [उससे निष्क्ान्त अर्थात्] उसका अ्रगोचर [अविषय ] भूत [वस्तु] वर्णन के अयोग्य ही हो जाता है। क्योंकि स्वभाव शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार होती है। जिससे [अर्थ का ] कथन [अभिधान] और ज्ञान [प्रत्यय] होते हैं वह 'भाव' है। और 'स्व' का अर्थात् अपना 'भाव' [अर्यात् स्वरूप जिससे पदार्थ का कथन और ज्ञान रूप व्यवहार होता है वह] 'स्वभाय' [स्वरूप] है। इसलिए वह [स्वभाव या स्वरूप] ही सब पदार्थो [यस्य कस्यचित् पदार्थस्य] का ज्ञान औरौर फथन [प्रस्या ज्ञान, और उपास्या माने कथन] रूप व्यवहार का कारण होता है। उस [स्वभाव अर्थात् स्वरूप] से रहित वस्तु शशविषाण सदृश शन्द और ज्ञान [व्यवहार] के अगोचर हो जाती है। [उसका शब्द से कथन या ज्ञान नहीं हो सकता है] क्योकि स्वभाव

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कारिका १३ ] प्रथमोन्मेषः [५५

एतदेव युक्त्यन्तरेख विकल्पयति- शरीरं चेदलङ्कार: किमलंकुरुते परम्। आत्मेंच नात्मनः स्कन्धं कर्वचिदप्यधिरोहति ॥१३।। यस्य कस्यचिद् वएयमानस्य वस्तुनो वर्णनीयत्वेन स्वभाव एव वर्थ- शरीरम्। स एव चेदलङ्कारो, यदि विभूपणं, तत्किमपरं तद्व्यतिरिक्तं विद्यते यदलंकुरुते विभूषयति। स्वात्मानमेवालङ्करोतीति चेत, तदयुक्तम, अ्र्प्रनुपपत्ते.। यस्मादात्मैव नात्मन: स्कन्धं क्वचिदप्यधिरोहति। शरीरमेव शरीरस्य न कुत्र- चिद्प्यंसमधिरोहतीत्यर्थः । स्वात्मनि क्रियाविरोधात् ॥१३॥

[स्वरूप] युक्त वस्तु ही सर्वया कथन करने योग्य हाती है। इसलिए [स्वभाव कथन, स्वरूप कथन, स्वभावोक्ति, अलङ्धायं हो हो सकता है अलद्धार नहीं। और यदि स्वभाव वगंन को आप प्रलङ्गार मानने का आ्र्प्राग्रह ही करते है तो आपके मत में] स्वभावोषित से युक्त होने से [अत्यन्त अशिक्षित और मूख] गाडी हाँकने वालो के वाक्यो में भी सालङ्ारता [अतएव काव्यत्व] प्राप्त होने लगेगी। [जो कि अ्भीष्ट नहीं है। भ्र्तः स्वभावोषिति अलद्धार नहीं हैं] ।।१२। इस बात को दूसरी युक्ति से फिर कहते हैं- [स्वभाव अपर्थात् स्वरूप तो फाव्य का शरीर स्थानीय है] वह शरीर ही यवि [स्वभावोक्ति नामक ] अलद्धार हो जाय तो वह [स्वभावोक्ति अलद्धार] दूसरे किस [अलङ्धायं] को अलकृत करेगा। [वह स्वभाव या स्वरूप ही अलङ्धार्य हो औरौर स्वाभावोषित ही अलङ्धार हो यह नहीं कहा जा सकता है क्योंकि ससार में] कहीं कोई स्वयं अपने फन्घे पर नहीं चढ सकता है ।१३।। किसी भी वर्ण्यमान वस्तु का स्वभाव [स्वरूप] ही वर्णनीय होने से वर्ण्य शरीर से रूप होता है। वह [वण्यं शरीर रूप स्वभाव] ही वदि अलद्दार अ्रर्थात् विभूषए हो जाय तो उससे भिन्न औ्रर [अलङ्धार्य] क्या है जिसको [यह स्वभावोकित अलङ्गार] अलफृत अर्थात् विभूषित करता है। यवि यह कहो कि [स्वभावोषित अलङ्धार] स्वय अपने स्वरूप को अलकृत करता है, तो यह अनुपपन्न [युक्तिविरुद्ध] होने से अनुचित है। ययोकि [ससार में] कहीं भी [कोई] अपने आ्प अपने कन्धे पर नहीं चढ़ता है। शरीर ही शरीर के कन्घे पर कहीं नहीं चढता है, यह अभिप्राय हुआ। स्वय अपने में [अधि-रोहणगदि रूप स्वाश्रित] किया का विरोध होने से। [इसलिए भी स्वभावोषित को अलद्धार मानना उचित नहीं हैं]।१३।।

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धक्रोक्तिजीवितम् फारिका १४-१४

अन्यच्च, अभ्युपगम्यापि न्रम :- भूषरात्वे म्वभावस्य विहिते भूषणान्तरे। भेदावचोधः प्रकटस्तयोरप्रकटोऽथवा ।१४।। स्पष्टे सवत्र संसृप्टिरस्पष्टे सङ्करस्ततः । अलङ्कारान्तराणां च विषयो नावशिष्यते ॥१५॥ भूषणात्वे स्वभावस्य अ्रप्रलद्कारत्वे स्वपरिस्पन्दस्य यटा भूषणान्तरमलद्वारा- न्तरं विधीयते तदा विहिते कृते तरिमन् सति, दवयी गति सम्भवति। काडसौ? तयो: स्वभावोक्त्यलङ्गारान्तरयोः भेदाववोधो भिन्नत्वप्रतिभास. प्रकट. सुसपष्ट कदाचिदप्रकटश्चापरिस्फुटो वेति। तदा स्पष्टे प्रकटे तस्मिन् सर्वत्र सर्वस्मिन् कविविषये संसृष्टिरेवैकालकृतिः प्राप्नोति। अर्स्पष्टे तस्मिन्नप्रकटे सर्वत्रैकैकः

औ्ौर [दुर्जनतोष न्याय से यदि थोडी देर के लिए स्वभावोक्ति को अलद्धार मान भी लिया जाय तो] उसको मानकर भी हम कहते है [ कि इष्टसिद्धि नहीं होगी। क्योंफि ]- स्वभाव [स्वभाघोषित] को अलद्धार मानने पर [काव्य में उसके श्रतिरिक्त उपमा आदि] अन्य अलद्धार की रचना होने पर उन दोनो [अर्थात् स्वभावोकिति तथा उपमादि अन्य अलङ्धारों] के भेद का ज्ञान स्पष्ट होता है अ्थवा अस्पष्ट। [यह बतलाओ] ॥१४॥ [स्वभावोक्ति अलद्धार का अन्य उपमादि अलद्धारो से भेदज्ञान] स्पष्ट होगे पर [उन दोनो अलद्धारो की निरपेक्ष स्थिति होने से 'मिथोऽनपेक्षतयषा स्थिति. ससृष्टि- रुच्यत' इस लक्षणा के अनुसार] सर्वत्र ससृष्टि [अलद्धार] होगा। और [उपमावि के साथ स्वभावोषित के भेवज्ञान के] स्पष्ट न होने पर [अङ्गाद्गिभाव रूप से अ्रथवा एकाश्यानुप्रवेश प्रथवा सन्देह रूप तीन प्रफार के सद्करो में से किसी प्रकार का] सद्र ही सर्वत्र होने लगेगा। इसलिए [शुद्ध रूप से उपमादि] अरन्य अलङ्धारो का विषय [उदाहरण] ही नहीं बचेगा [अर्थात् शुद्ध उपमावि अलद्धार जहाँ रह सकें ऐसा कोई उदाहरसा नहीं मिलेगा] ॥१५॥ स्वभाव के भूषण होने पर अर्थात् स्वरूप [स्वपरिस्पन्व] के अलद्धार मानने पर जब [उपमादि] अ्रन्य अलद्धार वनाये [रचे] जाते है तब उनके रचे जाने पर दो प्रार की स्थिति हो सकती है। वह [दो प्रकार की गति] कौनसी है? उन दोनो अर्थात् स्वभावोविति [अलद्धार] और अन्य [उपमादि] अलद्धारो का भेदाववोध अर्थात् भेद का ज्ञान प्रकट अर्थात् स्पष्ट [रूप से हो] भथवा कभी

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फारिका १४-१५ ] प्रथमोन्मेष [५७

सङ्करोऽलङ्कारःप्राप्नोति। तत. को दोप: स्याित्याह-'अलङ्कारान्तराणाञ्व विपयो नावशिष्यते'। अ्रन्येपामलङ्काराणामुपमादीनां विपयो गोचरो न कश्चिनव- शिष्यते, निर्विपयत्वमेवायातीत्यर्थ । ततस्तेपां लक्षणकरणवैयर्थ्यप्रसङ्गः। यदि वा तावेव ससृष्टिसङ्करौ तेपां विपयत्वेन कल्ज्येते तदपि न किख्वित्। तैरेवालङ्कारकारैस्तस्यार्थस्यानङ्गीकृतत्वात इत्यनेनाकाशर्चवणप्रतिमेनालमलीक- निवन्धनेन। प्रकृतमनुसराम। सर्वथा यस्य कस्यचित् पदार्थजातस्य कविव्यापार- विषयत्वेन वर्णनापद्वीमवतरत स्वभाव एव सहदयहदयाह्नादकारी काव्यशरीर- त्वेन वर्णानीयता प्रतिपद्यते। सएव च यथायोगं शोभातिशयकारिणा येन अप्रकट अर्थात् श्रस्पष्ट रूप से हो। तब [उन दोनों से प्रथम पक्ष में ] उम [स्वाभा- योकिति अलद्धार के उपमा आदि अन्य अलद्धारों के साथ भेद के ज्ञान के] के स्पष्ट होने पर सर्वत्र अर्थात् समस्त फविवाक्यो [काव्यों] में [स्वभावोकिति तथा उपमादि अ्रन्य अलद्धारो की अनपेक्षतया स्थिति होने से 'मिथोऽनपेक्षतयपा स्थिति ससृष्टिरुच्यते' इस लक्षण के अनुसार] केवल ससृष्टि हो एक अलद्धार होगा। और उस [भेदज्ञान] > के अस्पष्ट होने पर [अ्रङ्गाङ्गिभाव अथवा एकायानुप्रवेश प्रथवा सन्देह सङ्धर इन 1

तीन प्रकार के सङ्रो में से किसी न किसी प्रकार का] एक सडरालङ्गार ही सवंत्र होने लगेगा। उससे क्या हानि होगी यह कहते हैं। शरर [शुद्ध या केशल उपमादि अलद्धार जहाँ हो ऐसा ] अन्य अ्रलङ्धारो का विषय [उदाहरण] ही शेप नहीं रह जावेगा। शन्य उपमादि अलद्धारों का विषय अर्थात् क्षेत्र कहीं भी नहीं रहेगा। अर्थात् [वह उपमादि अ्न्य अलद्धार] निरविषय हो जाता है। अ्रतः उनके लक्षणो का करना व्यर्य हो जाता है। अ्रथवा [इस वैयर्थ्य को बचाने के लिए] यदि वह संसृष्टि और सङ्र ही उन [उपमादि अलङ्धारों] के विषय मान लिये जाये तो भी वह कुछ बनता नहीं हैं। उन्हों [स्वभावोषित को स्वतन्त्र अलद्धार प्रतिपादन करने वाले] आालङ्धारिकों के द्वारा [अर्थात् उपमादि अलद्धार केवल ससृप्टि या सङ्र रूप मे ही उपलब्ध हो सकते हैं। स्वतन्त्र रूप से उनकी सत्ता सम्भव नहीं है] इस वात के स्वीकृत न होने से। [यह -कहना भी उचित नहीं है]। इसलिए आकाश-चर्वर के समान [श्सम्भव औ्रौर] मिथ्या [पदार्थ पर्थात् स्वभावोवित के अलद्धारत्व का] लिखना व्यर्थ है। [उसको छोडकर] प्रकृत का अनुसरण करते है। सब प्रकार से किसी भी पदार्थ के कविव्यापार के विषय रूप से वर्र्गनीयता को प्राप्त होने पर उसका सहृदयाह्लादकारी स्वभाव [स्वरूप] ही काव्य के शरीर रूप में वर्णानीयता को प्राप्त होता है। वह ही [अलङ्धायं होने से] यथोचित सब अलङ्धारो से युक्त किया

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५८] वक्रोकितिजीवितम् [कारिका १६

केनचिटलङ्कारेण योजयितव्य । तदिदमुक्तं, 'अ्रर्थः सहृदयह्ृदयाह्नादकारि- स्वस्पन्द सुन्दर'। [१, ६] इति, 'उभावेतावलङ्कायौं' [१, १०] इति च ॥१४।। एवं शब्दार्थयो परमाथेमभिधाय 'शब्दार्थौ' इति [१, ७] काव्यलक्षणा- वाक्ये पदमेकं व्याख्यातम्। इदानीं 'सहितौ' इति [१,७] वयाख्यातु साहित्य- मेतयो पर्यालोच्यते। काला प्रतालि शब्दार्थो सहितावेव प्रतीतों स्फुरतः सदा। सहिताविति तावेव किमपूर्व विधीयते ॥१६॥ शब्दार्थावभिधानाभिधेयौ सहिताववियुक्तौ सदा सर्वकालं प्रतीतौ स्फुरत, ज्ञाने प्रतिभासेते। ततस्तावेव सहिताववियुक्तौ इति किमपूर्व विधीयते न किश्व्िदभूत निष्पाद्यते। सिद्वं साध्यत इत्यर्थ। तदेव शब्दार्थयोः निसर्ग- सिद्वं साहित्यम्। क' सचेता' पुनस्तवभिधानेन निष्प्रयोजनमात्मानमायासयति। जाना चाहिये। यही बात 'अर्थ सहृदया ह्लादकारिस्वस्पन्दसुन्दर.' इस [प्रथमोन्मेष की नवम कारिका मे] और 'उभावेतावलङ्कायौ" इस [दशम कारिका] में कह चुके है। ॥१४-१५।। इस प्रकार ['शन्दार्थी' सहितौ काव्यम्' इस काव्यलक्षण की व्याख्या करते हुए] शब्द औौर अरर्थ [इन दोनों पदो] के [काव्य में अरभिप्रेत] वास्तविक अर्य का कथन करके 'शब्दाथौ" [शब्दार्थों' सहितो फाव्यम्' १, ७] इस काव्य के लक्षण वाक्य में [से 'शन्दाथौ"' इस] एक पद की व्याख्या कर दी। श्रब [लक्षणवाक्य के दूसरे] 'सहितौ' इस [१, ७ पद ] की व्यास्या करने के लिए उन दोनों [शब्द तथा अर्थ] के 'साहित्य' [सहभाव] का विचार करते हे- [प्रश्न] शब्द और अथ तो सदा साथ-साथ ही ज्ञान में भासते [स्फुरित होते] हैं। [क्योंकि 'नित्य शब्दार्थसम्बन्ध.' इस नियम के अनुसार शब्द औ्र्रर श्रपर् का नित्य सम्बन्ध होने से शब्द और अर्थ की साथ-साथ ही प्रतोति होती है। उनका 'साहित्य' सदा ही बना रहता है]। इसलिए [ काव्य के लक्षण में] 'सहितौ' इस [पव] से [आप] कौन सी नई बात प्रतिपादन कर रहे है। [कोई नई अपूर्व बात आराप नहीं कह रहे है। तब आपका यह लक्षण करना व्यर्थ प्रयास है] ।१६॥ शब्द और अर्थ अर्थात् वाचक और वाध्य सदा सब कालो में 'सहित' अर्थात अवियुक्त रूप में ही प्रतीति अर्थात् ज्ञान में स्फुरित अर्र्रात् प्रतिभासित होते है। तब उन्हीं दोनो को सहित अर्थात् अवियुक्त यह कहकर कौनसी नई बात कह रहे है। कोई अपूर्व अरर्थ सिद्ध नहीं होता है [श्रर्थात्] केवल पिष्टपेष [सिद्ध साधन ] ही होता है। यह अभिप्राय हुआ। इस प्रकार शब्द और अर्थ का 'साहित्य' नित्यसिद्ध है। [सहितौ इस शब्द से] उसको फिर कहकर कौन बुद्धिमान् [व्यक्ति] अपने आपको व्यर्थ परिश्रम में डालेगा।

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कारिका १६ ] प्रथमोन्मेष ५ह

सत्यमेतत्। किन्तु न वाच्यवाचकलक्षणशाश्वदसम्वन्धनिवन्धनं वस्तुतः साहित्यमुच्यते। यस्मावेतस्मिन् साहित्यशवद्रेनाभिवीयमाने कष्टकल्पनोपरचितानि 1.गाङ्कुटा दिवाक्यानि, असम्वद्वानि शाकटिकादिवाक्यानि च सर्वाणि साहित्य- शव्दरेनाभिधीयेरन्। तेन पढवाक्यप्रमाणत्यतिरिक्तं किमपि तत्वान्तरं साहित्य मिति विभागोपि न स्यात्। ननु च पदादिव्यतिरिक्त यत्किमपि साहित्यं नाम तदपि सुप्रद्विमेव, पुनस्तदभिधानेऽपि कथ न पौनरुक्यप्रसङ्ग :? अतएवैतदुच्यते, यदिदं साहित्यं नाम तदेतावति नि.सीमनि समया- ध्वनि साहित्यशब्दमात्रेगौव प्रसिद्वम् । न पुनरेतस्य कविकर्मकौशलकाछाधि- रूढ़िरमणीयस्याद्यापि कश्चिदपि विपश्चिवयमस्य परमार्थ इति मनाड्मात्रमपि विचारपढवीमवतीएा.। तद्य सरम्वती दृदयारविन्द्मकरन्दविन्दुसन्दोहसुन्दराणा सत्कविवचसामन्तरामोदं मनोहरत्वेन परिस्फुरदेतत सहृदयपटूचरणगोचरता नीयते ॥१६॥ [उत्तर] ठीक है।[पिष्टपेषण करना वस्तुत बुद्धिमत्ता का कार्य नहीं है]। किन्तु [यहाँ काव्य लक्षण में] वस्तुत शन्द और अ्रयं के वाच्य वावक रूप नित्य सम्बन्ध को लेकर 'साहित्य' नहीं कहा गया है। क्योंकि इस [नित्य सम्बन्धमूलक साहित्य] का 'साहित्य' शब्द से कथन मानने पर [तो] क्लिष्टकल्पना द्वारा रचे गये 'गड्कुटादि ['गाइकुटा दिभ्योडसिज्डित्' पाणिनि व्याकरण के १, २,१ इस सूत्र रप ] वाश्य, और गाड़ीवान आदि के असम्बद्ध वाक्य आादि सब ही [वाक्य] 'साहित्य' कहलाने लगेंगे। उससे, व्याकरण [पद], मीमासा [वाक्य] औ्रर न्याय [प्रमार], से भिन्न 'साहित्य' कुछ और ही तत्त्व है यह विभाग भी न हो सकेगा। [इसलिए शब्द और अर्थ का नित्य सम्वन्घमूलक 'साहित्य' यहाँ अभिप्रेत नहीं है]। [प्रश्न] व्याकरणादि शास्त्रो से भिन्न [पदादिव्यतिरक्त] जो 'साहित्य' [नामक शास्त्र] है वह भी प्रसिद्ध [सबको ज्ञात] ही है। फिर [आप जो उसका लक्षरा कर रहे हैं।] उसको कहने से पुनरुषित क्यो नहीं होती? [उत्तर ] इसीलिए हम कहते है कि यह जो [वास्तविक] 'साहित्य' है वह [आज तक अर्ात् ग्रन्यकार कुन्तक के समय तक] इतने [विस्तृत] श्रसीम समय की परम्परा में केवल [नाममात्र को] 'साहित्य' शन्द से प्रसिद्ध रहा है। परन्तु फविकर्म के कौशल की काष्ठा-प्राप्ति से रमणीय 'इस [साहित्य शब्द] का यह वास्तविक अर्य हैं' इस बात का आज [तक] भी किसी विद्वान् ने तनिक भी विचार नहीं किया है। इसलिए आज हम सरस्वती के हृदयारविन्द के मकरन्दविन्दुसमूह से सुन्दर और सत्कवि-वाक्यों के आन्तरिक आरमो से मनोहर स्वरूप से अनुभव होने वाले इस

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वक्रोक्तिजीवितम् [ कारिका १७

साहित्यमनयोः शोभाशालितां प्रति काप्यसौ।

-1 सहितयोर्भाव साहित्यम्। अररनयो शच्दार्थयोर्यां काप्यलौकिकी वितनचमत्कारकारिताया कार, अवस्थितिर्विचित्रैव विन्यासभङ्गी। कीदशी, अन्यूनानतिरिक्तत्वमनोहारिणी, परस्परस्पधित्वरमणीया। यस्यां द्वयोरेकतर- ्यापि न्यूनत्वं निकर्षो न विद्यते नाप्यतिरिक्तत्वमुत्कर्पो वास्तीत्यर्थ । ननु च तथाविध साम्यं द्वयोरुपह्तयोरपि सम्भवतीत्याह, 'शोभाशालिता प्रति'। शोभा सौन्दर्यमुच्यते। तया शालते श्लाघते य. स शोभाशाली, तस्य भाव शोभाशालिता, ता प्रति सौन्दर्यश्लाघिता प्रतीत्यर्थ । सैव च सहृदयाह्नादकारिता।

[साहित्य शब्व के अ्पर्थ] को सहृदय रूप भ्रमरों के सामने प्रस्तुत करते हैं। [शर्थात् 'साहित्य' शब्द का प्रयोग काव्य आदि के लिए अवश्य होता है परन्तु उनका वास्तविक अर्थ यहाँ कया होना चाहिए। इस बात का विचार अब तक किसी विद्वान् ने नहीं किया है। इसलिए हम जो उस 'साहित्य' शब्द के वास्तविक अरर्थ का विवेचन कर रहे है वह पिष्टपेषस या पुनरुष्ति रूप नहीं है।] ॥ १६।। [काव्य की] शोभाशालिता [सौन्दर्याधायकता] के प्रति इन दोनों [शब्द तथा अर्थ] की न्यून और आधिक्य से रहित [परस्परस्पद्धि समभाव से] कुछ अनिर्वच- नीय [लोकोत्तर ] मनोहर स्थिति [ही] 'साहित्य' [शब्द का यथार्थ श्र्पर्थ] है ।१७।। सहित [शब्द तथा अर्थ] का भाव 'साहित्य' है। इन [सहित] शब्द औररौर अर्य की सहृदय श्राह्लावकारिता की कारणभूत जो कोई अ्रलौकिक अ्रवस्थिति अर्थात् विचित्र रचनाशली [हैं वही साहित्य हैं]। कैसी कि -- न्यूनता और अ्रधिकता से रहित होने से मनोहारिरी, अर्थात् परस्परस्पद्धित्व से रमणीया। जिसमें [शब्द-अर्थ] दोनो में से किसी भी एक का न्यूनत्व अर्थात् अपफर्ष नहीं है और न अतिरिक्तत्व अर्थात् उत्कर्ष ही है। [ऐसी अन्यूनातिरिक्तत्व विशिष्ट स्थिति को 'साहित्य' कहते है] यह अरभिप्राय हैं।१७॥ [प्रश्न] इस प्रकार का साम्य दोनों दूषित [शब्दार्थ में] भी हो सफता है। [तो क्या उसको भी 'साहित्य' कहा जा सकेगा] ? [उत्तर ] इस [शङ्धा के निवारण के] लिए कहते हैं। 'शोभाशालिता प्रति'। शोभा सौन्दर्य को कहते हैं उससे जो शोभित प्रशसित होता है वह शोभाशाली हुआ। उसका भाव शोभाशालिता, उसके प्रति अर्थात् सौन्दर्यशालिता के प्रति यह अर्थ हुआ। और यही सहृदय श्रह्हादकारिता है। उस [सौनदर्यशालिता अथवा

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कारिका १७ [ प्रथमोन्मेष. [ ६१

तस्यां स्पर्धित्वेन याऽसाववस्थितिः परस्परसाम्यमुभगमवस्थानं सा साहित्य- मुच्यते। तत्र वाचकस्य वाचकान्तरेण वाच्यस्य वाच्यान्तरेण साहित्यमभि- खेतम्। वाक्ये काव्यलक्षणस्य परिसमाप्तत्वादिति प्रतिपादितमेव [१,७]। ननु च वाचकस्य वाच्यान्तरेण, वाच्यस्य वाचकान्तरेण कर्थ न साहित्य- मिति चेत्। तन्न, क्रमव्युक्कमे प्रयोजनाभावाद्समन्वयाच्च। तस्मादेतयो शब्दाथयोर्यथास्वं यस्यां स्वसम्पत्सामग्रीसमुदायः सहदयाह्नादकारी परस्पर- स्पर्धया परिस्ुरति, सा काचिरेव वाक्यविन्याससम्पत साहित्यव्यपदेशभाग भवति। मार्गानगुएयसुभगो माधुर्यादिगुणोदयः। तलङ्करणविन्यासो वकतातिशयान्वितः॥३४।।

सहुदयाह्लादकारिता] के लिए ['चर्मरिग द्वीपिन हन्ति' के समान 'तस्या' यहाँ निमित्त में सप्तमी है] स्पधित्वेन [अन्यूनानतिरिक्तत्वेन] जो स्थिति अर्यात् परस्पर समानता 3 से सुन्दर रूप में जो [शब्द औौर श्रथं] की स्थिति है वह 'साहित्य' कहलाती है। उस [साहित्य] में [काव्य के शब्दो से एक ]शब्द का दूसरे शब्द के साथ औरर एक शर् का दूसरे अर्थ के साथ 'साहित्य' अभिप्रेत है। [शनेक शब्द तथा अ्नेक अर्थय रूप] वाक्य में काव्य के लक्षण की परिसमाप्ति होती है यह [१, ७ सातवीं कारिका में] प्रतिपादन हो कर चुके हें। [प्रश्न] एक शब्द का दूसरे शर्थ के साथ और एक अर्थ का दूसरे शन्द के साथ 'साहित्य' क्यों नहीं मानते हो। यह प्रश्न करो तो- [उत्तर] वह ठीक नहीं है। [एक शब्द का दूसरे शव्द के साथ औ्रौर एक अर्प्र्यं का दूसरे अर्यं के साथ 'साहित्य' होना चाहिए। इस] क्रम के परिवर्तन में कोई प्रयोजन न होने से और [परिवतित रूप का] समन्वय न हो सकने से। [इस क्रम का परिवर्तन करना उचित नहीं हैं]। इसलिए जिस रचना में इन शब्द तथा अ्थों का यथायोग्य अपनी [अन्दूनानतिरिक्त रूप] सम्पत्सामग्री का समुदाय सहृदयाह्लादकारी परस्पर स्पर्धा से स्फुरित होता है वह कोई [विशिष्ट] ही वाक्य-रचना 'साहित्य' नाम की प्रघिकारिरी होती हैं। [यही वात निम्नलिखित अन्तरश्लोकों में कही गई है]। मार्गो [रीतियो] की अनुकूलता से सुन्दर, माघुर्यादि गुणो से युक्त, वक्रता [बांकपन] के अ्रतिशय से युक्त अ्लङ्धार का विन्यास [जिसमें विद्यमान है वह] ॥३४॥

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६२ ] वक्रोकितिजीवितम् [ कारिका १७

वृत्यौचित्यमनोहारि रसाना परिपोषणाम्। स्पर्धया विद्यते यत्र यथास्त्रमुभयोरपि ॥३५॥ सा काप्यवस्थितिस्तद्विदानन्दस्पन्दसुन्दरा। पदादिवाकपरिस्पन्दसारः साहित्यमुच्यते ॥३६॥ एतेपाञ्च पद-वाक्य-प्रमाण-साहित्याना चतुर्णामपि प्रतिवाक्यमुपयोग.। १. तथा चैतत्पदमेव स्वरूप गकारौकार विसर्जनीयात्मकं, एतस्य चार्थस्य प्राति पदिकार्थनञ््कलक्षणस्य आ्र्प्रख्यातपठार्यषट्कलक्षणास्य वाचकमिति पदसंस्कार- लक्षसास्य व्यापार । पदानास्व परस्परान्वयलक्षएसम्बन्धनिवन्धनमेतद्वाकया- र्थताल्र्यमिति वाक्यविचारलन्षणस्योपयोग। ३. प्रमाणेन प्रत्यक्षादिनैतदुपपन्न- मिति युक्तियुत्त्व नाम प्रमाणलक्षणास्य प्रयोजनम्। ४. इदमेव परिस्पन्द- माहात्म्यात् सहृदयहृदयहारिता प्रतिपन्नमिति साहित्यस्योपयुप्यमानता। वृत्तियो के औचित्य से मनोहारी रसो का परिपोषण, उचित रूप से [शन्द औरर अर्थ] दोनो में स्पर्धा से जहां रहता है॥३५॥ काव्य-मर्मज्ञो को आनन्द प्रदान करने वाले व्यापार से सुन्दर [शन्द और अर्थ की] वह कुछ अनिर्वचनीय [श्रतिसुन्दर ] स्थिति' पद [व्याकरण] आदि [वाक्य मीमासा, तथा प्रमाण न्यायशास्त्र[ वाड्मय का सार [सर्वोत्तम भाग] 'साहित्य' [शब्द से] कहा जाता है ॥३६।। इन व्याकरण, मीमासा, न्याय तथा साहित्य चारो का ही प्रत्येक वाक्य में [अर्थात् बहुत अरधिक] प्रयोग होता है। १ जैसे गकार श्रकार विसर्जनीयात्मक यह [गौ] इस प्रकार का पद, इस प्रातिपदिकार्थ पञ्चक [१ प्रातिपदिकार्थ, २ लिङ्ग, ३ परिमाण, ४ वचन और ५ कारक] अथवा आख्यातार्थ ट्क [१ व्यापाराश्रय कर्त्ता, २ फलाश्रय कर्म, ३ काल, ४ पुरुष, ५ वचन, और ६ भाव] रूप इस [अ्रमुक] अर्थ का वाचक है। यह 'पद सस्कार शास्त्र' [व्याकरण शास्त्र] का काम [व्यापार] है। २ पदो के परस्परान्वय रूप सम्वन्धमूलक [पदो के परस्पर अ्रन्वय के उपस्थित होने वाला] यह वाक्यार्य का तात्पर्य है, यह 'वाक्यविचार शास्त्र' [मीमासा] का उपयोग है। ३ प्रत्यक्षादि प्रमारो से यह उपपन्न है। इस प्रकार युक्ति- युक्तत्त्व [का प्रतिपादन] 'प्रमाणशास्त्र' [न्याय] का प्रयोजन है। [इन सब स्थलों में 'लक्षर' शब्द का अर्थ 'शास्त्र' है] ४ यह [वाक्य विशेष] ही स्वभावगत सौन्दर्य से सहृदयो की हृदयहारिता को प्राप्त हो जाता है यह 'साहित्य' [शास्त्र] की उपयोगिता हैं। इन [व्याकरण आ्ररादि शास्त्रों] में से यद्यपि प्रत्येक का अपने-अपने विषय [क्षेत्र] में प्राधान्य और अ्रन्यो का [उस क्षेत्र में] गुणीभाव है, किन्तु फिर भी सारे वाड्मय के

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फारिका १७ ] प्रथमोन्मेषः [ ६३

एतेषां यद्यपि प्रत्येक स्वविपये प्राधान्यमन्येपां गुणींभावस्तथापि सकल- वाक्परिस्पन्दजीवितायमानस्यास्य साहित्यलक्षणस्यैव कविव्यापारस्य वस्तुतः अर्वत्रातिशायित्वम्। यस्मादेतवमुख्यतयापि यत्र वाक्यसन्दर्भान्तरे स्वपरि- मलमात्रेएैव संस्कारमारभते तस्वैतदविवासशून्यतामात्रैैव रामसीयकविरहः पर्यवस्यति। तस्मादुपादेयतायाः परिहाशिरुपद्यते। तथा च स्वप्रवृत्तिवैयर्थ्य- प्रसङ्ग:। शास्त्रातिरित्तप्रयोजनत्व शास्त्रा भिधेयचतुर्वर्गफलाधिकत्वख्रवास्य पूर्वमेव प्रतिपादितम [१, ३, ५]। अपर्यालोचिते डप्यर्थे बन्धसौन्दर्यसम्पदा' गीतवद् हृदयाह्लाद तद्विदा विदधाति यत् ।।३७।। वाच्याववोधनिप्पत्तो पदवाक्यार्थवर्जितस्। यत्किमप्यर्पयत्यन्तः पानकास्वादवत् सताम् ॥३=॥ शरीरं जीवितेनेव स्फुरितेनेव जीवितम्। चिना निर्जीवना येन चाक्यं याति विपाइचताम् ।।३६।। प्राशभून 'साहित्य' रूप [यहाँ लक्षण शब्द का अर्थं स्वरूप हं] कविव्यापार का ही 3) वस्तुन. सबसे अरधिक महत्त्व है। क्योकि यह [साहित्य का भाव] जहाँ अ्रमुख्य रूप से भी जिस अन्य [व्याकरस प्रधान भट्टिकाव्य जैसे] वाक्य समूह [रचना] में अपनी परिमल मात्र [गन्धमात्र 'नाममान्र'] से ही सस्कार करता है [नहां साहित्य का अश गोस हो जाता है] इस [साहित्य] के शरघिवास [प्राधान्येन] से रहित होने मात्र से ही उस [वाक्यसन्दर्भ] की रमसीयता का अ्र्परभाव हो जाता है। औ्रौर उस [मणीयताभाव] के कारण [उस वाक्य सदर्म या काव्य] की उपादेयता की हानि हो जाता हूँ। इसलिए [उस गुरगोभूत काव्य की] अपनी रचना [प्रवृत्ति] व्यर्थ हो जाती है। [व्याकरस, मोमांसा, न्याय आरादि] शास्त्रो से [साहित्य-शास्त्र का] भिन्न प्रयोजनत्व और शास्त्रों के प्रतिपाद्य चतुवंग [रूप-ल]से अघिक फलत्व इस [साहित्य] का पहिले [१, ३, ५ कारिकाओरों में] ही प्रतिपादन कर चुके है। [यही बात निम्नलिखित सग्रह श्लोको में भी कही हू]- अ्ररथं का विचार किये बिना भी [अपनी] रचना के सौन्दर्य से [ही] सङ्गीत [के शब्दों] के समान जो काव्यममंक्ञो को आ्रनन्द प्रदान करता हैं॥३७।। श्रर्थ की प्रतीति हो जाने के वाद पद और वाक्य के अर्थ से भिन्न [व्यङ्गय स्वरूप] जो ठडाई आदि [पानक] के आस्वाद के समान अ्रत.करण में कुछ प्रपूर्व श्स्वाद [आनन्द] प्रदान करता है।।३८।। प्रारों के बिना शरीर और स्फूति के बिना जीवन [जैसे व्ययं और निर्जोव हं उस] के समान जिस [साहित्य तत्त्व] के विना विद्वानों के वाक्य निर्जीव [श्रकर्षण- विहीन, चमत्काररहित] हो जाते हु॥३६॥

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६४ ] वक्रोकितिजीवितम [ कारिका १८

यस्मात् किमपि सौभाग्यं तद्विदामेव गोचरम्। सरस्वती समभ्येति तदिदानीं विचार्यत॥४०।। इत्यन्तरश्लोका.॥१७॥ एवं सहिताविति व्याख्याय कविव्यापारवक्रत्वं व्याचष्र- कविव्यापारवक्रत्वप्रकारा: सम्भवन्ति पट्। प्रत्येकं वहवो भेदास्तेषां विच्छिचिशोभिनः ॥१८।। कवीनां व्यापार कविव्यापार, काव्यक्रियालक्षणस्तस्य वकत्व वक्रभाव. प्रसिद्धप्रस्थानव्यतिरेकि वैचित्र्यं, तस्य प्रकारा: प्रभेटा. पट् सम्भवन्ति। मुख्यतया तावन्त एव सम्भवन्तीत्यर्थः । तेषा प्रत्येक प्रकारा: बहवो भेदा विशेषा। कीदशाः विच्छित्तिशोभिन· वैचित्र्यभङ्गीभ्राजिष्यव.। सम्भवन्तीति सम्बन्धः ॥१८॥

जिससे केवल सहृदय सवेद कुछ अपूर्व सौन्दर्य सरस्वती को प्राप्त होता है उस [वक्रोक्ति रूप कविव्यापार] का अ्ररब [अगले ग्रन्थ भाग में] विचार [प्रारम्भ] करते है।॥४० ।। यह अ्रन्तरश्लोक [सग्रह श्लोक] है। ॥१७।। इस प्रकार [शब्दार्थों सहितौ काव्यम् इस काव्य लक्षण के] सहितौ [इस पद] की व्याख्या करने के बाद कवियों के व्यापार की 'वक्रता' [बाँकपन, लोकोतरता] की व्याख्या [प्रारम्भ] करते हे- कवियों के व्यापार की 'वकता' के [मुख्यत] छ प्रकार हो सकते हैं। उन [छ भेदों] में से प्रत्येक [भेद] के वैचित्र्य से शोभित होने वाले अ्र्नेक भेद हो सकते हैं।।१८ ।। कवियों का काव्य-रचना रूप व्यापार [यहाँ] कवि-व्यापार [समझना चाहिए]। उसका वऋत्व या बाँकपन अर्थात् प्रसिद्ध [गुए अलद्धार आदि] प्रस्थान से भिन्न जो [काव्य का सौन्दर्य या] वैचित्र्य, उसके ६ प्रकार या भेद हो सकते हैं। ८ [अर्थात् वैसे उनके अ्रवान्तर भेव तो बहुत हो जाते हे परन्तु] मुख्य रूप से उतने [अर्थात् ६] ही हो सकते है। [फिर] उनमें से प्रत्येक के बहुत से प्रकार या भेद [हो जाते] हैं। किस प्रकार के [वे अ्ररवान्तर भेद है कि] 'वैचित्रय से सुन्दर लगने वाले' अर्थात् वैचित्र्य [युक्त रचना] शैली से चमकते हुए [प्रवान्तर भेद] हो सकते है य्रह [भवति त्रिया का अध्याहार करके] सम्बन्ध होता है ॥१८॥

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कारिका १६ ] प्रथमोन्मेषः [ ६५

तदेव दर्शयति- पदपूर्वार्द्धवक्रता। वक्रताया: परोऽप्यस्ति प्रकार: प्रत्ययाश्रयः।१६ १ वर्ष विन्यासवक्रता- वर्णानां विन्यासो वर्णाविन्यास.। अक्षराणां विशिष्ठन्यसनं, तस्य वक्रत्व वक्रभावः प्रसिद्धप्रस्थानातिरेकिणा वैचित्र्येणोपनिबन्धः । सन्निवेश- विशेषविहितस्तद्विदाह्लादकारी शब्दशोभातिशय.। यथा- प्रथममरुणच्छायस्तावत् ततः कनकप्रभः तदनु विरहोत्ताम्यत्तन्वीकपोलतलद्यु तिः। प्रसरति ततो ध्वान्तकोदक्षमः क्णदामुखे सरसविसिनीकन्दच्छेदर्च्छावसृ गलाव्छनः।।४१।। उसी [वक्रता के षड्विघ मुस्य प्रकार] को दिखलाते है-(१) वर्णविन्यास वक्रता, (२) पदपूर्वाद्ध -वक्रता और वकता का तीसरा प्रकार (३) प्रत्यय-वक्ता भी है। [यह तीन भेद इस कारिका में दिखलाये है। शेष तीन भेद अगली दो अर्ात् २०, २१ कारिकाओो में दिखलावेंगे] ॥१६॥ १ वर्ण विन्यास वक्रता- वर्गों का विन्यास वर्णविन्यास है। [अर्थत] श्रक्षरों का विशेष प्रकार से [रचना में] रखना [वर्स-विन्यास कहलाता है]। उसका वशत्व, वक्रता [बाकपन] प्रसिद्ध [साधारण] शेली से [भिन्न प्रकार से] [वैचित्र्य से] रचना। सन्निवेशविशेष से विहित सहृदयाह्ल्ादकारी शोभातिशय ['वर्णविन्यासवक्रता' कहलाती] है। जैसे- यह श्लोक सुभापितावली स० २००४, काव्यप्रकाश पृ० २६० श्लोक स० १३६, सरस्वतीकण्ठाभरण १, ८७, सदुक्तिकर्णामृतम् ३६६, शृङ्गारतिलक [वाग्भट्] पृ० ४५, अलस्ारशेखर ८, १, में उद्धृत हुआ है। काव्यप्रकाश की 'चन्द्रिका' नामक व्यास्या में इसको 'मालतीमाघव' नामक भवभूति के नाटक में चन्द्रोदय के बगंन में लिसा गया बतलाया है। परन्तु 'मालतीमाधव' में यह श्लोक नही मिलता है। इसमें चन्द्रोदय का वर्णन करते हुए कवि लिखता है- [चन्द्रमा उदय के समय सबसे ] प्रथम [अत्यन्त] लाल वर्स फा, उसके बाद [थोडा और उदय होने पर] सोने के समान [पीली] कान्ति का, उसके बाद विरह- सन्तप्त सुन्दरी के कपोल तल के समान [पीत] कान्ति वाला, औ्र उसके वाद रात्रि के प्रारम्म में प्रन्यकार को नष्ट करने में समर्थ और सरस [ताजे] मणाल खण्डो के समान कान्ति वाला [मुगलञ्छन युक्त] चन्द्रमा चढ़ने लगता है।। ४१ ।।

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६६ J वकराक्तजाावतम् [ शारका रह

अ्त्र वर्णविन्यासवक्रतामात्रविहित: शोभातिशयः सुतरां समुन्मीलितः। एतदेव वर्विन्यासवक्रत्वं चिरन्तनेष्वनुप्रास इति प्रसिद्धम्। अ्रत्र च प्रभेद- स्वरूपनिरूपणं लक्षणावसरे [२, १] करिष्यते। २ पदपूर्वाद्ध वक्रता- पदस्य सुवन्तस्य तिडन्तस्य वा यत्पूर्वार्द्ध प्रातिपदिकलच्तरं धातु- लक्षण वा तस्य वक्रता वक्रभावो विन्यासवैचित्र्यम्। तत्र च वहवः प्रकाराः सम्भवन्ति। [क] -- यत्र रुढ़िशव्दस्यैव प्रस्तावसमुचितत्वेन वाच्यप्रसिद्धधर्मा- न्तराध्यारोपगभत्वेन निबन्धः स पदपूर्वाद्धवक्रताया. प्रथम. प्रकारः। यथा- रामोऽस्मि सर्व सहे॥४२॥' इसमें केवल वर्ण-विन्यास की वक्रता से उत्पन्न सौन्दर्य का पतिशय साफ दिखलाई दे रहा है। यही 'वर्णविन्यास-वक्रता' प्राचीन पलङ्धारिकों में 'भ्रनुप्रास' [नाम से] प्रसिद्ध हैं। इसके अ्र्प्रवान्तर भेदो के स्वरूप का निरुपण [२,१ में उनके] लक्षण के अवसर पर करेंगे। २-पदपूर्वाद्धवत्रता-सुबन्त या तिडन्त रूप पद' का जो पूर्वान [सुवन्त पद का पूर्वा्द्ध] प्रातिपदिक अथवा [तिडन्त पद का पूर्वाद्ध'] धातु रूप, उसकी वक्रता बांकपन, अर्यात् विन्यास का वैचित्र्य [उसी को 'पदपूर्वार्त्-वक्रता' कहते है]। उस [पवपूर्वार्द्ध वतता] के बहुत से प्रकार हो सकते हैं। [क]- जहाँ रूढि शब्द का ही प्रकरण मे अनुरूप, वाच्य रूप से प्रसिद्ध धर्म से भिन्न धर्म के अध्यारोप को लेकर प्रयोग किया जाय वह 'पदपूर्वार्द्ध-वक्र्ता' का प्रथम प्रकार है। जसे- मे [कठोरहृदय] 'राम' हूँ सब सह लूंगा ॥४२॥ यह तदा, 'महानाटक' के पञ्चम श्रद्ध के ७वें श्लोक में से लिया गया है। यह श्लोक 'ध्वन्यालोक' पृ० e६, 'काव्यप्रकाश' पृ० १८८, अभिषावृत्तिमातृका' पृ० ११, में उद्धृत हुआ है। 'साहित्यदर्पण' में इसी को 'धर्मीगत फल' की व्यञ्जना का उदाहरण माना है। पूरा श्लोक इस प्रकार है- स्निग्धश्यामलकान्तिलिप्तवियतो वेल्लद्वलाका घना दाता शीकरिए पयोदसुहृदामानन्दकेका कला। काम सन्तु दृढ कठोरहृदयो रामोऽस्मि सवं सहे वैदेही तु कथभ विष्यति हहा हा देवि धीरा भव।। १. महानाटक ५, ७ । २ सुप्तिडन्त पदम् मष्टा० १, ४, १४।

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कारिका १६ ] प्रथमोन्मेष: [६७

[स]-द्वितीयः। यत्र संज्ञाशव्दस्य वाच्यप्रसिद्धघर्मस्य लोकोत्तरातिश- याध्यारोप गर्भीकृत्योपनिवन्धः यथा- रामोऽसौ भुवनेपु विक्मगुरौः प्राप्तः पसिद्धि परा अस्मद्वा्यविपर्ययादयदि परं देवो न जानाति तम्। स्निग्ध एव श्याम कान्ति से आकाश को व्याप्त करने वाले, और वलाका [बक-पक्ति] जिनमें विहार कर रही है ऐसे मेघ [भले ही उमडें] शीकरो, [छोटे- छोटे जलकरगों] से युक्त [शीतल मन्द] समीर [भले ही वहे] और मेघो के मिन्न मयूरो की आनन्दभरी कूके भी चाहे जितनी [श्रवणागोचर] हो, मैं तो [कठोर हृदय] 'राम' हूँ, सव कुछ सह लूंगा। परन्तु [अतिसुकुमारी कोमलहृदया वियोगिनी] वैदेही की क्या दशा होगी। हा देवि। घंरयं रखना। इसमें 'राम' शन्द केवल वाच्यमृत साघारस राम अर्थ को नही कहता है। अपितु वाच्यत्वेन प्रसिद्ध साधारण राम से भिन्न अत्यन्त दु खसहिष्णुत्व रूप वर्मान्तर का अध्यारोप करके प्रत्युक्त किया गया है। इसलिए यह 'पदपूर्वार्द्ध-वक्रना' के प्रथम प्रकार का उदाहरसा है। आनन्दवर्घनाचार्य आदि ध्वनि सम्प्रदाय के अन्य आचार्यो ने इसी को 'अर्थान्तरसक्रमित वाच्य ध्वनि' का उदाहरण माना है। [ख]- दूसरा [पदपूर्वार्द्धवक्रता का प्रकार वह होता है] जहां [रूढ़ि] संज्ञा शन्द वाच्य रूप से प्रसिद्ध धर्म में लोकोत्तर अ्र्तिशय का अध्यारोप गर्भ में रखकर प्रयुक्त किया जाता है। [इसका अरभिप्राय यह हुआ कि पहिला भेद धर्मिगत प्रतिशय का और दूसरा भेद धर्मगत अतिशय का बोधक होता है। व्यञ्जनावाद में भी फल के धर्मोगत तथा घर्मगत रूप से दो भेद किये गये हैं]। जैसे- यह श्लोक 'काव्यप्रकाश' पृ० १८२ उदाहरण स० १०६ पर उद्धृत हुआ है। काव्यप्रकाश के टीकाकारो ने उसे 'राघवानन्द' नामक अप्राप्य नाटक का इ्लोक बतलाया है। परन्तु उनमें थोडा-सा मतभेद है। 'मासिक्यचन्द्र' उसे रावण के प्रति कम्भकर्र की उक्ति वतलाते है। और 'चन्द्रिकाकार' उसे रावण के प्रति विभीषण की उक्ति बतलाते है। श्री ध्रुव जी द्वारा सम्पादित 'मुद्राराक्षस' नाटक की भूमिका में पृo २२ पर लिखा है कि 'सदुक्तिकरणमृत' में यह 'विशाखदत्त' के श्लोक के रूप में उदृत हुआ है। 'सरस्वतीकण्ठाभरसा' पृ० ३४१ पर यह ब्लोक बिना लेखक का नाम दिये हुए उद्धृत किया गया है। 'चन्द्रिकाकार' के अनुसार इस श्लोक में विभीपणा रावण से कह रहा है कि- यह [खरदूषरादि का मारने वाला और सकलजनप्रिय] रामचन्द्र [अपने] पराक्रम [दयालुत्ता आदि] गुणों से समस्त लोफों में अ्त्यन्त प्रसिद्धि को प्राप्त है। परन्तहतते प्रसिन व्यक्ति को भी परसिमातव] प्रा प्राप नहीं जातते है तो ग्त

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वक्रोवितिजीवितम् [ कारिका १६

वन्दीवेष यशांसि गायति मरुद्यस्यैकबाणाहति- श्रे एीभूतविशालताल विवरोद्गीर्णै: स्वरेः सप्तमिः॥४३॥१ अत्र 'राम' शब्दो लोकोत्तरशौर्यादिधर्मातिशयाध्यारोपपरत्वेनोपाी क्रतां प्रथयति।

मारे [लड्गावासियों के] वुर्भाग्य से ही है। [हम लङ्गावासी राक्षसों का विनाश नमीप आ गया है इसीलिए आप इतने विश्वविख्यात राम को भी अपने अभिमानवश सुद्र मानकर 'हम नहीं जानते' यह कह रहे हो। अन्यथा] केवल एक वाए के प्रहार ने पक्तिबद्ध ओ्रर विशाल [सप्त] तालों [में उत्पन्न] विवरो से निकलते हुए [सङ्गीत के ] सप्त स्वरो से, चारस के समान वायु [भी] जिनके यश का गायन कर रहा है [उसको आप न जानते यह कैसे हो सकता था। इस न जानने का कारसा केवल हमारा दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। अन्य कुछ नहीं ] ॥४३॥ 1यहां 'राम' शब्द लोकोत्तर शौर्यादि धर्म के अतिशय के अध्यारोप परत्वेन प्रयुक्त होने से [पद पूर्वार्द्ध] वक्रता को सूचित करता है। 'पदपूर्वार्द्ध-वक्रता' के अभी तक दो भेद दिखलाए हैं और दोनो के उदाहरणों 1 में 'राम' पद में ही वक्रता का प्रतिपादन किया है। इन दोनो में भेद यह है कि प्रथम उदाहरण में, वाच्य रूप से प्रसिद्ध धर्म से भिन्न धर्मान्तर को अध्यारोप और दूसरे मे वाच्य रूप से प्रसिद्ध धर्म में ही लोकोत्तर प्रतिशय का अरध्यारोप गर्भित है। इसको अधिक स्पष्ट रूप से यो कहना चाहिए कि प्रथम भेद में वाच्यत्वेन प्रसिद्ध राम रूप धर्मी में 'अत्यन्त दु ख सहिष्णात्व' रूप धर्मान्तर का अध्यारोप कर धर्मीगत वैशिष्ट्य सूचित किया गया है और दूसरे उदाहरण में राम के प्रसिद्ध शौर्यादि गुो में ही लोकोत्तरत्व का अ्ध्यारोप करके धर्मगत वैशिष्ट्य सूचित किया गया है। वैसे यह दोनो उदाहरण बहुत मिलते हुए हैं। काव्यप्रकाश मे इस उदाहरण में 'असौ' पद से सर्वनाम का, 'भुवनेषु' पद में प्रातिपदिक का, 'गुएै' पद में बहुवचन रूप वचन का, 'अस्मत्' पद से केवल तुम्हारा या केवल हमारा नही अपितु समस्त लड्कावासियो का औ्रप्रर 'भाग्यविपर्ययात्' पद से अन्यथा विपरिणाम द्वारा कथन का वीररस-व्यञ्जकत्व प्रतिपादन किया है। अर्थात् 4'

कुन्तक ने इसमें केवल एक 'राम' पद में ही 'वकता' का प्रतिपादन किया है जब कि काव्यप्रकाशकार ने इसके अ्रनेक पदो में व्यञ्जकत्व अथवा वक्रता का प्रतिपादन माना है।

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कारिका १६ ] प्रथमोन्मेपः [ ६६

[ग]-'पर्यायवक्रत्व"' नाम प्रकारान्तरं पदपूर्वार्द्धवक्रतायाः। यत्रानेक- शब्दाभिधेयत्वे वस्तुनः किमपि पर्यायपद प्रस्तुतानुगुरात्वेन प्रयुज्यते। यथा- वामं कज्जलवद्विलोचनमुरो रोहद्दिसारिस्तन मष्यं क्ाममकाएड एव विपुलाभोगा नितम्बस्थली। सद्यः प्रोदगतविस्मयैरिति गणैरालोक्यमानं मुहुः पायाद्वः पथमं वपुः स्मररिपोर्मिश्रीभवत् कान्तया॥ ४४॥ त्रत्र 'स्मररिपो' इि पर्याय: कामपि वक्रतामुन्मीलयति। यस्मात् कामशत्रोः कान्तया मिश्रीभावः शरीरस्य न कथव्निदपि सम्भाव्यते, इति गणाना सदः प्रोद्गवविस्मयत्वमुपपन्नम्। सोऽपि पुनः पुनः परिशीलने नाश्चर्यकारीति 'प्रथम' पदस्य जीवितम्। एतच्च 'पर्यायवक्रत्वं' वाच्यासम्भविधर्मान्तरगर्भीकारेणपि दृश्यते। यथा- [ग]-पदपूर्वाद्धं [प्रातिपविक] वक्रता का [तीसरा] अ्रन्य प्रकार 'पर्याय घक्रता' है। जिसमें वस्तु का अ्रनेक शब्दो से कथन सम्भव होने पर [भी] प्रकरण के अनुरूप होने से कोई [सेर्वातिशायी] विशेष पव [ही] प्रयुक्त किया जाता है। जसे- [पार्वती के साथ सयोग होने के कारण जिसका] वाम नेत्र कज्जलयुक्त [हो गया है] चक्ष.स्थल पर [वाई ओर] बड़ा-सा स्तन उदय हो रहा है। कमर बिना बात के ही पतली हो गई है और नितम्ब का अ्त्यन्त विस्तार हो गया है। कान्ता [पार्वती] के साथ प्रथम वार [श्रर्द्धनारीश्वर के रूप में] सयुक्त होते हुए स्मरारि [शिव] का तुरन्त [संयुक्त होने और देखने के साथ हो] विस्मययुक्त हुए गएों के द्वारा देखे जाने वाला शरीर तुम्हारी रक्षा करे॥४४॥ यहाँ [शिव के वाचक प्रनेक पद रहते हुए भी विशेष रूप से छाँटकर प्रयुक्त किया हुआ] 'स्मररिपो.' यह पर्याय शब्द कुछ अपूर्व चमत्कार को प्रकाशित कर रहा हैं। क्योंकि कामदेव के शत्रु शिव के शरीर का स्त्री के शरीर के साय संयोग किसी प्रकार भी सम्भव नहीं हो सकता है। इसलिए गरो का [उस सयोग को देखकर] 'सद्य.' विस्मययुक्त हो जाना भी युक्तिसङ्गत है। वह [सयोग] भी वारार देसने पर आश्चर्यंजनक नहीं रह सकता है यह [श्लोक में प्रयुक्त हुए] 'प्रथम' इस पद का -प्रास [चमत्कारजनक सार] है। [इसलिए यह 'पर्यायवक्रता' का उवाहरण है]। यह 'पर्यायवक्रता' वाच्यार्थ में प्रसम्भव धर्मान्तर के गभित होने पर भी हो सकती है। जैसे- यह उद्धरण वरगीसहार नाटक के तृतीयाद्ट पृ० ४६ से लिया गया है। यह व्यक्तिविवेक पृ० ४५ तथा माहित्यदर्पण आदि में भी उद्धृत हुआ है। दु शासन के वध के प्रसध में भीम, कररग का उपहास करता हआ उससे कह रहा है-

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9० ] धक्रोक्तिजीवितम् [ कारिका १६

अ्गराज सेनापते राजवल्लभ रक्षेन भीमाद्द:शासनम्। इति ॥ ४५ ॥ अत्र त्रयाामपि पर्यायाणामसम्भाव्यमानतत्परित्राणपात्रत्वलक्षणम- किश्वित्करत्वं गर्भीकृत्योपहस्यते रक्षैनमिति। [घ]पदपूर्वाद्धवक्रताया 'उपचारवक्रत्व' नाम प्रकारान्तरं विद्यते। यत्रामूतम्य वस्तुनो मूर्तद्रव्याभिधायिना शव्देनाभिधानमुपचारात्। यथा- 'निष्कारणं निकारकणिकापि मनस्विनां मानसमायासयति' यथा वा- /हस्तापचेयं यशः'। 'कणिका' शब्दो मूर्तवस्तुस्तोकार्थाभिधायी स्तोकत्वसामान्योपचारादमूर्त- स्यापि निकारस्य स्तोकाभिधानपरत्वेन प्रयुक्तस्त द्विदाह्हादकारित्वाद्वक्रता पुष्णाति। 'हस्तापचेयम्' इति मूर्तपुष्पादिवस्तुसम्भविसहतत्वसामान्योपचाराद- मूर्तस्यापि यशसो 'हस्तापचेयम्' इत्यभिधानं वक्रत्वमाव हति। अरे राजा साहब [अङ्गराज], सेनापति महोदय, राजा [दुर्योघन] के प्रिय [कर्स जी अगर आरप में सामर्थ्य हो तो आाश्नो मुझ] भीम से [इस] दुःशासन को बचा लो [में इसका खून पीने जा रहा हूँ]।४५।। इसमें [दिये हुए अङ्गराज, सेनापते और राजवल्लभ इन] तीनों पर्यायो [विशेषणों] में उसकी रक्षा के सामर्थ्य की असम्भाव्यता रूप अरकिन्चित्करत्व को गभित फरके 'इसको बचाओ' इस प्रकार [कर्शग का] उपहास किया जा रहा है। [घ] पदपूर्वार्द्धवक्ता का 'उपचारवक्रता' नामक [चौथा] अन्य प्रकार है। जहाँ प्मूर्त, वस्तु का मूत्त वस्तु के वाचक शब्द द्वारा [सावृश्य लक्षणगामूलक]उपचार से कथन किया जाय। जैसे- बिना कारण अपमान की किका [लेशमात्र] भी मनस्वियों के मन क्ो दु.खी कर देती है। और जैसे [इसी का दूसरा उदाहरण]- हाथ से बटोरने [इकट्ठा करने] योग्य यश। [इनमें से पहले उदाहरण में] मूततं वस्तु के स्वल्प भाग का वाचक 'कणिगका' शब्द अल्पता रूप साम्य के कारण उपचार से अमूर्त [भाववाचक] 'अपमान' की1 अल्पता के बोधन के अभिप्राय से प्रयुक्त हआ, सहृदयों का श्राह्लादकारी होने से वकता को परिपुप्ट करता है। [दूसरे उदाहरण में] 'हस्तापचेयम्' इस [पद के प्रयोग] से मूर्त पुष्पादि वस्तुश में सम्भव एकत्रीकरण [सहतत्त्व] के साम्य के कारण उपचार से अमूर्त यश का/भी [पुष्पादि के समान] 'हस्तापचेयत्व' का कथन, वकता को व्यक्त करता है।

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कारिका १2 ] प्रयमोन्मेप: [ ७१

द्रवरूपस्य वस्तुनो वाचकशव्दस्तरङ्वितत्वादिधर्मनिबन्धनः किमपि सादृश्यमात्रमवलम्व्य संहृतस्यापि वाचकत्वेन प्रयुज्यमानः कविप्रवाहे रसिद्धः। यथा- श्वासोत्कम्पतरह्निणि स्तनतटे । इति ॥४६ ॥ क्वचिदमूर्तस्यापि द्रवरूपार्थाभिघायी वाचकत्वेन प्रयुज्यते। यथा- एकां कामपि कालविप्रुषममी शौर्योष्मकराङूव्यय- व्यग्राः स्युश्चिरविस्तृतामरचमूडिम्वाहवा वाहवः॥४७।।

दव रूप वस्तु का धाचक शब्द, तरङ्तत्व आदि धर्म के कारस किसी [रमसणीय] सादृश्य को लेकर ठोस [द्रव्य] के वाचक रूप में भी प्रयुक्त होता हुम कवि-समाज में प्रसिद्ध है। [अर्थात् द्रववाचक शन्द का ठोस अर् के लिए भी प्रयोग कवियों में देखा जाता है। यहाँ 'कवि-प्रवाह' शब्द भी इस भाव से विशेष रूप से प्रयुक्त किया गया हं] जैसे- इयासजन्य कम्प से तर्राखत स्तन तट में ॥४६॥ यह पद्यांघ कवीन्द्रवचनसमुच्चय में सख्या ४५० पर उद्ृत है। वक्रोवितजीवित में भी आागे उस पूर्ण श्लोक को उदृत किया गया है जिसका यह एक भाग है। यहाँ ठोस स्तनतट को द्रव वाचक तरङ्ड से युक्त [तरद्गित] कहा है। उस शब्द के प्रयोग से श्वास से कम्पित स्तन में तरङ्ग के साम्य का प्रतिपादन कर कवि ने विशेष प्रकार का चमत्कार उत्पन्न कर दिया है। इसलिए यह भी 'पद पूर्वाद्ध-वक्रता' के 'उपचार-वक्ता' नामक चतुर्थ भेद का उदाहरण है। इसी' उपचार-वफ्ता' का एक औौर प्रकार आगे दिखलाते हैं। कहों अ्र्मूर्तं [ध्र्थ] के लिए भी द्रव पवार्थ का वाचक [शब्द], वाचक रूप से प्रयुक्त होता है। अंसे- यह श्लोक कहाँ का है यह पता नही चलता। पूरा श्लोक तृत्तीय उन्मेप में फिर उदधृत किया गया है। जो इस प्रकार है- लोको यादुवमाहं साहसधनं त क्षत्रियापुत्रक, स्यात् सत्येन स तादृगेव न भवेद् वार्ता विसंवादिनी। एका कामपि कालविप्रुषममी शौर्योष्मकण्डूव्यय- व्यग्रा स्मुश्चिरविस्मृतामरचमूडिम्बाहवा वाहव। उस साहसी [मुझ से युद्ध करने का दु साहस करने वाले। तुच्छ] क्षत्रिया पुत्र [तुच्छता सूचन के लिए 'क' प्रत्यय का औौर 'क्षत्रिया' शब्द का प्रयोग किया गया है]- को लोग जैसा [शूर] कहते हं वह सचमुच वैसा ही [भले ही] हो [शर उसके विपय में कही जाने वाली] वात सत्य ही हो सही-

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७२ ] वकोक्तिजीवितम् [ कारिका १ह

एतयोस्तरङ्गिीति विप्रुषमिति च वक्रतामावहृतः । [ड] 'विशेषणवक्रत्व' नाम पदपूर्वार्धवक्रतायाः प्रकारो विद्यते। यत्र विशेषणामा हात्म्यादेव तद्विदाह्लादकारित्वलक्षणं वक्रत्वमभिव्यज्यते। यथा- ८ दाहोऽम्मः प्सृतिम्पचः प्रचयवान् वाष्पः प्रणालोचितः श्वासाः प्रेस्वितदीप्रदीपलतिकाः पायडिम्नि मग्नं वपुः। किञ्चान्यत् कथयामि रात्रिमखिला त्वन्मार्गवातायने हस्तच्छ त्रनिरुद्धचन्द्र महसस्तस्या' स्थितिर्वर्तते ॥४८॥

[किन्तु] बहुत दिन से वेवताओ की सेना के सैनिकों के साथ का युद्ध भी [देवताओं के पराजित हो जाने के कारण] जिनको विस्मृत हो गया है, ऐसे मेरे बाहु थोड़ी देर के लिए [कामपि कालविपुष] शौर्य की उष्णता से उत्पन्न खुजली को मिटाने के लिए व्यग्र हो रहे है। [अतः उसके साथ युद्ध करना ही है]॥४॥ [श्वासोत्कम्प०, तथा एकां कामपि] इन दोनों [उदाहररो] में [कमशः मूर्त के और अमूर्त के लिए द्रव पदार्थाभिधायी] 'तर्राङ्गरि' यह और 'विप्रुष' [ बूँद]

युक्त है]। यह [पद प्रयुक्त होफर] वक्रता को उत्पन्न करते है। [अर्थात् उपचार-वक्रता से

[ड] 'विशेषणवक्रता' [भी] 'पदपूर्धाद्वंचकता' का [पाँचवां] प्रकार है। जहाँ विशेषण के माहात्म्य से ही सहृदयाहलावकारित्व रूप वक्रत्व अभिव्यक्त होता है। जैसे- यह श्लोक 'विद्धशालभन्जिका' के द्वितीयाङ्क का २१वाँ श्लोक है। सुभा- षितावली स० १४११, कवीन्द्रवचनामृत स० २७६, रुय्यक पृ० ६८, जयरथ पृ० ४१, प्रलक्कारशेखर पृ० ६८, और चित्रमीमाँसा पृ० १०३ पर भी उद्ृत हुआ है। [तुम्हारे वियोग में उस नायिका के शरीर का] वाह चुल्हुओं पानी को सुखा देने वाला, आंसू नाली में बहने योग्य [प्रचुर मात्रा में] है, [उष्ण] निश्वास हिलते हुए प्रज्वलित दीपमाला के समान है और [सारा] शरीर सफेदी में डूबा हुआ है। और अधिक क्या कहे सारी रात तुम्हारे मार्ग की ओर वाले भरोखे में अपने हाथ के छाते से [हाथ को छाते समान चन्द्रमा के सामने लगाफर] चांदनी को रोके हुए वह [तुम्हारी प्रतीक्षा में] बैठी रहती है ॥४८।।

१ विद्धशालभज्जिका २, २१।

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कारिका १६ ] प्रथमोन्मेषः [ ७३

श्र््रन्र दाहो, वाष्पः, श्वासो, वपुरिति न किञ्चिद्वैचित्रमुन्मीलितम्। प्रत्येक विशेषणमा हात्म्यात् पुनः काचिदेव वक्रताप्रतीति.। -सथा च- - ब्रीडायोगान्नतवदनया सन्निधाने गुरुणा च दोत्कम्पस्तनकलशया मन्युमन्तर्निग्रृह्य। तिष्ठेत्युक्तं किमिव न तया यत्समुत्सृज्य वाष्प

अ्रत्र 'चकितहरिणीहारि' इति क्रियाविशेषएं नेत्रत्रिभागसङ्गस्य गुरु- सन्निधानविहिताप्रगल्भत्वरमणीयस्य कामपि कमनीयतामावहृति, चकित-

[च] प्र्रयमपर: पदपूर्वाद्धवक्रताया. प्रकारो यदिद 'सवृतिवक्रत्वं' नाम। यत्र पदा्थेस्वरूपं प्रस्तावानुगुएयेन केनापि निकर्पेणोत्कर्पेण वा युर्क्त व्यक्ततया साक्षादभिधातुमशक्यं संवृत्तिसामर्थ्योपयागिना शव्देनाभिधीयते। यथा- यहाँ [फेवल विशेष्य रूप] दाह, वाष्प, श्वास और वपु इन [शन्दों] से कोई वैचित्र्य प्रफट नहीं होता है। किन्तु प्रत्येक के साथ विशेषण [दाह के साथ 'प्रसृति- >म्पच:', वाष्प. के साथ 'प्रशालोचित.', श्वास के साथ 'प्रेद्गितदीप्रदीपलतिका', औ्रर वपुः के साथ 'पाण्डिम्नि मग्न' इन विशेषणो के लग जाने से] के माहात्म्य से कुछ और ही चारुता की प्रतीति होने लगती है। और जैसे [उसी 'विशेषणव्रता' का और उदाहरण ]- गुरुजनो [सास-शवसुर आदि] के समीप होने के कारण लज्जा से सिर भुकाए कुचकलशों, को कम्पित करने वाले मन्यु [कोधावेग] को हृदय में [ही] दवाकर [भी] आ्रांसू टपकाते हुए, चकित हरिसी [के दृष्टिपात] के समान हृदयाकर्षक नेत्र का त्रिभाग [कटाक्ष] जो मेरे ऊपर जमाया [या फेंका] सो [उसके द्वारा] क्या उसने[मुझ से तिष्ठ] ठहरो, मत जाओ, यह नहीं कहा ॥४ह।। यहाँ 'चकितहरिसीहारि' यह क्रियाविशेषण [चकितहरिरी के मनोहर लोचन के साथ साम्य से] गुरुओं [सास शवसुर आदि] के समीप [स्त्री द्वारा] किये हुए अप्रगल्भता से रमसीय [नेत्र त्रिभाग] कटाक्ष की [गड़ाने] आसक्ति को कुछ अ्रपूर्व सौन्दर्य प्रदान कर रहा है। [च ]यह जो 'सवृत्तिवतता' है वह 'पदपूर्वाद्ध-वक्रता' का [छठा] और प्रकार 5 है। जहां प्रकरण के अनुरूप किसी अपकर्ष अ्रथवा उत्कर्ष [विशेष] के कारण पदार्य का स्वरूप व्यक्त रूप से साक्षात् नहीं कहा ना सकता है और [अथं] छिपाने को सामर्थ्य से युक्त किसी शन्द से [अस्पष्ट रूप] कहा जाता है। वहाँ 'सवृत्ति-वक्रता' होती है] जैसे- १ शाङ्गंघरपद्धति ३४६४।

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७४ ] धक्रोफ्तिजीवितम् [कारिका ११

सोऽयं दम्मधृतव्रतः प्रियतमे कर्तु किमप्युद्यतः ॥५०।। अन्न वत्सराजो वासवद्त्ताविपत्तिविघुरहृद्यस्तवाप्तिलोभवशेन पद्मावतीं परिगोतुमीहमानस्तदेवाकरणीयमित्यव गच्छन् तस्य धस्तुनो महा- पातकस्येवाकीर्तनीयतां ख्यापयति, 'किमपि' इत्यनेन संवरणसमर्थेन सर्वनाम- पदेन। यधा च- निद्रानिमीलितदृशो मदमन्थराया नाप्यर्थवन्ति न च यानि निर्थकानि।

यह श्लोक 'तापलवत्तराजचरित' के चतुर्थ श्रद्त में आाया है। वक्रोक्ति जीवित के चतुर्थ उन्मेष में पूरा श्लोक इस प्रकार उद्धूत हुआ है चतुर्घेज्ड्े राजा सकरणामात्मगतम्- चक्षुर्यत्य तवाननादपगत नाभूत क्वचिन् निवृत पैनैपा सतत त्वदेकशयन वक्षस्थली कल्पिता। येनोन्भातितया बिना वत जगच्छून्य क्षणाज्जायते सोज्य दम्भवृतव्रत प्रियतमे कतुँ किमप्युद्यतः ।। अपनी पत्नी वासवदत्ता की विपत्ति के समाचार से दुसित हृदय राजा उदयन व्योविषियो के कथनानुसार उतकी प्राप्ति की आाशा से जब पम्मावती से विवाह करने को उद्यत होता है तो उस समय वह स्वगत रूप से अपने मन में कह रहा है। जिस [वत्सराज उदयन अर्थात्] मेरी शांख ने तुम्हारे मुख् से हटकर भौर कहीं सुख नहीं पाया, जिसने [अपने] इस वक्षःस्थल को सदा फेवल तुम्हारी शम्या [विश्राम स्थली] बनाया, जिसकी [भर्यात् मेरी] अनुपस्थिति में उद्धासित [शोभित] न होने के कारण [तुम्हारे लिए भी] पल भर में जगत् जीसरण्य [के समान सारहीन, ओर भयानक] वन जाता था- हे प्रियतमे [एकपत्नीत्व का] मिथ्या व्रत धारस करने वासा वह में भ्राज [पझ्मावती के साथ विवाह करके अत्यन्त निन्दनीय] कुछ भी करने को तैयार हो गया हूँ॥५0।l यहाँ [अपनी पत्नी] वामवदत्ता की [मृत्यु के समाचार रूप] विपत्ति से खिन्न हृवय वत्सराज [उदयन] उत [वासववत्ता] की [पुनः] प्राप्ति के सोभवश पसमावती के साथ विवाह करने की इच्छा करते हुए उत [विवाह] को मनुचित [भकरीय] समभकर महापातक के तमान उस [विवाह] की अकीतनीयता को 'किमपि' इस संवरण समर्य सर्वनाम पद से लूचित करता है। [अ्रत. 'संवुतियकता' का उवाहरण हैं]। सोर जते [संकृति वत्ता का दूसरा उवाहरण]-

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कारिका १६ ] प्रथमोन्मेष· [७५

अरद्यापि मे चरतनोर्मघुराणि तस्या स्तान्यक्षराणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ॥५१॥' . 3 अत्र 'किमपि' इति तदाकर्णनविहितायाश्चित्तचमत्कृतेरनुभवैकगोचरत्व- लक्षरामव्यपदेश्यत्वं प्रतिपाद्यते। 'तानि' इति तथाविधानुभवविशिष्टतया स्मर्यमागानि। 'नाप्यर्थवन्ति' इति स्वसवेद्यत्वेन व्यपदेशाविषयत्वं प्रकाश्यते। तेपां च 'न च यानि निरर्थकानि' इत्यलौंकिकचमत्कारकारित्वादपार्थकत्व निवार्यते। त्रिष्वप्येतेपु 'विशेपणवक्रत्वं' प्रतीयते। [छ] इदमपरं पदपूर्वाद्धवक्रतायाः प्रकारान्तरं सम्भवति 'वृत्तिवैचित्र्य- वक्रत्व' नाम। यत्र समासादितवृत्तीनां कासान्चिद्विचित्राणामेव कविभि: परिग्रहः क्रियते। यथा-

यह श्लोक 'विल्ह' की 'चौरपञ्चाशिका' स० ३६, का कहा जाता है। परन्तु वर्लिन वाले संस्करण में नही मिलता है। 'सुभापितावली' स० १२८०, 'जल्हण' कृत 'सूक्तिमुक्तावली' स० ७४२, और 'दगरूपक' की 'अवलोक' नामक व्याल्या में इसे कलशक का श्लोक कह गया है। हेमचन्द्र ने पृo ८६, और समुद्रवन्व पृ० ६ पर यह बिना कवि नाम के उद्धृत हुआ है। मद से अलसाई हुई और निद्रा से आँखे वन्द किए हुए उस सुन्दरी के [मुझ को लक्ष्य में रखकर कहे हुए और अरस्पष्ट होने के कारण समझ में न आ्र्प्रा सकने से] न सार्यक ही और न अर्थहीन ही वह मघुर श्रक्षर आज भी मेरे हृदय में न जाने . कया प्रतिध्वनित कर रहे है॥ ५१॥ यहाँ [किमपि ध्वनन्ति के] 'किमपि' इस [पद] से उनके [उच्चारण के समय] सुनने से उत्पन्न आनन्द की अ्रनुभवकगोचरता रूप अवर्णनीयता का प्रतिपादन किया गया है। 'तानि' इस [पद] से उस प्रकार के [श्रनन्दमय] अनुभव-विशिष्ट रूप से स्मयंमासा [पदों की अनुभवैकगोचरता रूप श्रनिर्वचनीयता सूचित होती] है। 'नाप्यर्थवन्ति' इस [पद] से [केवल] स्वसवेद्य होने से अनिर्वचनीयता प्रफाशित होती है। और 'न च यानि निरर्यकानि' इससे उनके अलौकिक चमत्कारकारी होने से [उनको] निरयंकता का निवारण किया गया है। इन तीनो में ही 'विशेषण वक्रता' प्रतीत होती है। [छ]यह 'वृत्तिवचित्र्यवऋत्व' भी 'पदपूर्वार्द्धवक्कना' का [सातवां भेद] अ्रन्य प्रकार हो सकता है। [वृत्ति शन्द का पर्य यहाँ सम्बन्ध है। सम्वन्ध के वैचित्र्य से जहाँ वकता हो उसे 'वृत्तिवचित्रयवत्रता' फहते हैं। समासादितवृत्तीनां अर्थात्] जहाँ प्राप्त [अ्रनुभूत अ्रर्यात् अ्नुभवसिद्ध] सम्बन्धों में से पर्वि, किसी विशेष [सम्बन्ध] का- हो ग्रहण करते हैं। [वहां 'वृत्तिवंचित्र्यवप्रता' होती है] जैमे- १ चौरपञन्वाशिका स० ३६।

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७६ ] वक्रोक्तिजीवितम् [कारिका १६

मध्येऽकुरं पल्लवाः ॥५२।।१ यथा च- पायिडम्नि मग्नं वपुः ॥५३।/२ यथा वा- सुधाविसरनिष्यन्दसमुल्लासविधायिनि हिमधामनि खएडेऽपि न जनो नोन्मनायते ॥५४॥। [ज]अपरलिङ्गवैचित्रय' नाम 'पदपूर्वाद्धवक्रतायाः'प्रकारान्तर दृश्यते। यत्र भिन्नलिङ्गानामपि शब्दानां वैचित्र्याय सामानाधिकरएयोपनिबन्ध /यथा- इत्थं जड़े जगति को नु बृहत्पमाण- कर्ा: करी ननु भवेद् ध्वनितस्य पात्रम्।५५/3 अकुर के बीच में पल्लव है। [यहाँ भकुर के बीच मे पल्लवो की स्थिति उनकी सुकुमारता के पतिशय को व्यक्त करने वाली होने से वक्रताजनक है। यह श्लोक खण्ड, 'विद्वशालाभज्जिका' का है] ॥५२॥ और जैसे [वृत्तिवचित्र्यवकता का ही दूसरा उदाहरण]- शरीर सफेदी में डूब रहा है। [यह अभी पिछले उद्धत किए हुए ४८वें श्लोक का भाग है। वियोग वुःख में पीले पढ जाने के लिए 'पाण्डिम्नि मग्न वपु.' ५ फा प्रयोग अत्यन्त शोभाधायक होने से 'वृत्तिवचित्र्यवक्रता' का उदाहरण है] ।५३॥ अथवा [उसी 'वृत्तिवचित्र्यवकरता' का तीसरा उदाहरण] जैसे- प्रमृत धारा के प्रवाह से आह्लादित करने वाले [पूर्णिमा के श्रतिरिक्त श्रन्य तिथियो के] अपूर्ण चन्द्रमा [के उदय] में भी [प्रियजन के वियोग की दशा में] मनुष्य उन्मना न होता हो सो बात नहीं है। [यहाँ अपूर्ण चन्द्रमा भी मनुष्य को उन्मन कर देता है। फिर पूर्णिमा के चन्द्रमा की तो बात ही क्या कहना। यह कथन चमतकारविघायक होने से 'वृत्तिवैचित्रयवक्रता' का उदाहरण है]॥५४॥ [ज] पदपूर्वाद्धवक्रता का [आठवाँ] अ्रन्य प्रकार 'लिङ्गवैचित्रय' पाया जाता है। जहाँ वैचित्र्य सम्पावन के लिए भिन्न लिङ्ग के शब्दों का भी समानाधिकरण रूप से प्रयोग होता है। [वहाँ 'लिङ्गवक्रता' नामक पदपूर्वार्द्धचक्रता का भेद होता हं] जैसे- यह पद्य 'सुभाषितावली' में स० ६२८ पर भट्ट वासुदेव के नाम से, आया है। और वक्रोक्तिजीवित में आगे द्वितीय उत्मेष में पूरा पद्य इस प्रकार उद्धृत हुआ है- इत्य जडे जगति को नु बृहत्प्रमाण- कणं करी ननु भवेद् ध्वनितस्य पात्रम्। १ विद्धशालभञ्जिका १, २३। २ उदाहरण स० ४८ देखो। ३. सुभाषितावली स० ६२5, भट्टवासुदेवस्य।

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कारिका १६] प्रथमोन्मेषः [७७

यथा च- मेथिली तस्य दारा:१ इति ॥५६॥ 7 त्रन्यदपि 'लिङ्ग वैचित्र्यवक्रत्वम्'। यत्रानेकलिङ्गसम्भवेऽपि सौकुमार्यात् कविभि: स्त्रीलिद्गमेव प्रयुज्यते, 'नामैव स्त्रीति पेशलम्' [२, २२] इति कृत्वा। .यथा-

इत्यागत भटिति योऽलिनमुन्ममाथ मातङ्ज एव किमत परमृच्यतेऽसौ।। यह अन्योक्ति है। हाथी के कान भी वडे है और कर अर्थात् सूंड या हाथ भी बडा है। अत यह हमारी विपत्ति की बात को भली प्रकार सुन सकता है और उसके प्रतिकार के लिए कुछ कर भी सकता है यह समभकर भ्रमर उसके पास आया। परन्तु उसने तुरन्त कान फडफडाकर उसको भगा दिया। इसी प्रकार किसी बडे समर्थ व्यक्ति के पास कोई दुखी पुरुप अपनी बात लेकर आवे और वह उसको यो ही भगा दे तो उस हाथी और उस व्यक्ति को 'मातङ्ग' ['मातङ्ग' शन्द का अपर् हाथी औ्रर चाण्डाल दोनो होते हैं] के अतिरिक्त और क्या कहा जाय। जउ जगत् में [हाथी के समान] इस प्रकार वडे-बड़े कानो वाला और वड प्रशस्त हाथ वाला [सुनने और कर सकने में समर्थ] कथन करने का पात्र और कौन होगा [कोई नहों] ॥। ५५॥ 'बृहत्प्रमाणकर्ण क ध्वनितस्य पात्रम् भवेत्' यहाँ 'कः' तथा 'पात्र' में भिन्न लिङ्ग शब्दो का समानाघिकरण से प्रयोग किया गया है। उससे वाक्य में वक्ता का आधान होता है। अत यह 'लिङ्गवक्रता' का उदाहरण है। औ्ौर [इसी 'लिङ्गवक्रता' का दूसरा उदाहर] जैसे- मैथिली [सीता] उसकी पत्नी है। यहाँ 'मैथिली' शब्द स्त्रीलिङ्ग एकवचनान्त औ्र्प्रर 'दारा' पद नित्य वहुवचनान्त पुलिङ्ग शब्द है। उन दोनो का समानाधिकरण्य से साथ प्रयोग होने यह 'लिङ्गवक्ता' का उदाहरण है। 'लिङ्गवक्रता' का और भी प्रकार हो सकता है। जहाँ [एक शन्द में] अ्र्परनेक लिद्ध सम्भव होने पर भी सौकुमार्यातिशय [दयोतन करने] के लिए कवि लोग 'स्त्री यह नाम ही सुन्दर है' [२, ३२२,] ऐसा मानफर, स्त्रीलिङ्ग का ही प्रयोग करते हैं। जैसे- १. वालरामायए ३, २७।

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वक्रोकितिजीवितम् [ कारिका ११

एतां पश्य पुरस्तटीम्। इति ॥५७|। [भ] पदपूर्वार्द्धस्य धातो 'क्रियावैचित्र्यवक्रत्व' नाम वक्रत्वप्रकारान्तर

रयोगान् निवध्नन्ति कवय। तत्र क्रियावैचित्रयं बहुविध विच्छित्तिविततव्यवद्दारं दश्यते। यथा- रइकेलिहित्र्णिन्न् सणकरकिस ल अरू द्वए त्रणाजु अलस्स । रुद्दस्स तइअएएं पव्वइपरिचुम्बि्न जअइ ।।५८119 [रतिकेलिहृतनिवसनकर किसलयरुद्धनयनयुगलस्य । रूद्रस्य तृतीयनयनं पार्वतीपरिचुम्बितं जयति ॥ इति संस्कृतम् ] श्रत्र समानेऽपि हि स्थगनप्रयोजने साध्ये, तुल्ये च लोचनत्वे, देव्या. परिचुम्बनेन यस्य निरोध: सम्पाद्यते तङ्गगवतस्तृतीयं नयनं 'जयति' सर्वोत्कर्षेण वर्तत इति वाक्यार्थ.। अत्र 'जयति' इति क्रियापदस्य किमपि सहृद्यहृद्यसंवेद्यं चैचित्र्यं परिस्फुरदेव लक्ष्यते। सामने इस तटी [किनारे] को देखो। तट शब्द सभी लिङ्गो में प्रयक्त हो सकता है। परन्तु कवि ने सौकुमार्यातिशय द्योतन के लिए यहॉ उसका प्रयोग केवल स्त्रीलिङ्ग मे किया है। यहां तक सुबन्त पद के पूर्वाद्ध अर्थात् प्रातिपादिक की वक्रता के भ्रनेक भेद दिखलाए। इसी प्रकार तिडन्त पदो के पूर्वार्द्ध अर्थात् धातु, या क्रिया के वैचित्र्य के कुछ भेद आगे दिखलाते है। (भ) [तिडन्त] पद के पूर्वार्द्ध धातु का 'क्रियावचित्र्यवक्र्ता' नामक वक्र्ता का और [नवां] भेद है। जहाँ करिया वैचित्र्य के प्रतिपादनपर रूप से वैदग्व्य भङ्गी भखिति से रमीय [क्रिया पदो के] प्रयोगों को कविगण प्रयुक्त फरते हैं [वहा 'क्रिया-वक्रता' होती है] जसे- रतिकीडा के समय नङ्गी हो जाने के कारण करकिसलयों से जिनके दोनों नेत्र [पार्वती के द्वारा] बन्द कर लिए गये है ऐसे रुद्र का [तृतीय नेत्र को बन्द करने का और कोई उपाय न होने से] पार्वती द्वारा परिचम्बित [चुम्बन फरके ढंका हुआ] तृतीय नेत्र 'जयति' अर्थात् सर्वोत्कर्ष युक्त हैं॥५८॥ यहाँ [शिव के तीनो नेत्रो के] बन्द करने का प्रयोजन अर्थात् साध्य, समान होने पर भी औौर [तीनो नेत्रो में] लोचनत्व समान होने पर भी देवी [पार्वती] के परिचुम्बन से जिसका निरोध [बन्द करना] सम्पादन किया गया है वह भगवान् [शिव] का तृतीय नेत्र 'जयति' अर्ा्त् सर्वोत्कर्ष से युक्त है। यह [इस इ्लोक] वाक्य १ गाथा सप्तशती ४५५ ।

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कारिका १९ ] प्रथमोन्मेषा [ ७६

यथा वा- स्वेच्छाकेसरिण: स्वच्छस्वछायायासितेन्दवः । त्रायान्तां वो मघुरिपोः प्रपनार्तिच्छिदो नखाः ॥५६/' अत्र नखानां सकललोकप्रसिद्धच्छेदनव्यापारव्यतिरेकि किमप्यपूर्वभेव प्रपन्नार्तिच्छेदनलक्षर्णं क्रियावैचित्र्यमुपनिवद्धम्। यथा च- स दहतु दुरितं शाम्भवो षः शराग्निः ॥६०।/२ त्रप्रत्र च पूर्ववदेव क्रियावैचित्र्यप्रतीतिः।

का भथ है। इसमें 'जर्णत' इस क्रियापव का सहृदयसंवेद्य कुछ अपूर्व वैचित्र्य स्फुरित होता हुआ प्रतीत होता है। [पथवा] नैसे [क्रिया-वक्रता' का दूसरा उदाहरण]- स्वय अपती इच्छा से सिंह [नृसिंह] रूप धारण किए हुए [मधुरिपु] विष्णु भगयान के, अपनी निर्मल कान्ति से चन्द्रमा को खिन्न [लज्जित] करने वाले, शरखागतों के दुःखनाशन में समर्थ- नख तुम सबकी रक्षा करें॥ ५६॥ [यह ध्वन्यालोक के वृत्तिभाग का मङ्गलश्लोक है] इसमें नखों का सकललोक प्रसिद्ध जो छेदन व्यापार है उससे भिन्न प्रकार का शरखागतों के दु खनाशन रूप कुछ भ्रपूर्व क्रियावचित्र्य उपनिबद किया गया है। [श्रतः यह 'क्रियावकता' का उवाहरख है]। औ्रौर जैसे [उसी 'क्रियावकता' का तीसरा उदाहरण ]- वह शम्भु [शिव] के वाण से उत्पन्न अग्नि तुम्हारे दु.ख [और पापों] का भस्म करे॥६०॥ यहाँ भी पूर्व [उवाहरण] के समान [सकललोकप्रसिद्ध अ्न्य वस्तुओं के दहन सेभिन्न दुरित-वहन रूप कुछ अपूर्व] 'त्रियावचित्र्य' की प्रतीति होती है। यह 'अमरुक-शतक' का दूसरा श्लोक है। पूरा श्लोक इस प्रकार है- क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभमभिह्तोऽप्याददानोऽशुकान्त, गृहन् केशेष्वपास्तश्चरसानिपतितो नेक्षित. सम्भ्रमेण। प्रालिङ्गन् योऽवधूतस्त्रिपुरयुवतिभि साश्रुनेत्रोत्पलाभि., कामीवार्द्रापराघ स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराग्नि।

१ व्यन्यालोक मङ्ग्गलाचरए। २. ममकक पातक २।

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वकोक्तिजीवितम् [ कारिका १६

यथा च-

लोलइ लीलावईहि शिरुद्धओ, सिढिल अचाओ जन्रइ मअरद्ओ ।।६१॥। य [कर्णोत्पलदल मिलितलोचनै हेलालोलनमानितनयनाभिः। लीलया लीलावतीभिर्निरुद्धःशिथि लीकृतचापो जयति मकरध्वजः॥ इति संस्कृतम् ] श्र्प्रत्र लोचनैर्लीलया लीलावतीभिनिरुद्व स्वव्यापारपराड्मुखीकृतः सन शिथिलीकृतचाप कन्दर्पो जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते इति किमुच्यते यतस्ता- स्तथाविधविजयावाप्तौ सत्या जयन्तीति वक्तव्यम्।

इसका अर्थ इस प्रकार है- त्रिपुरदाह के समय शम्मु के बाण से समुद्भूत, त्रिपुर की युवतियो के द्वारा आर्द्रापराध [तत्कालकृत पराङ्गनोपभोगादि रूप अपराध से युक्त] कामी के समान हाथ छूने पर भटक दिया गया, ज़ोर से ताडित होने पर भी वस्त्र के छोर को पकडता हुआ, केशो को छूते समय हटाया गया, पैरो पर पडा हुआ भी सम्भ्रम [क्रोध या भय] के कारण न देखा गया, और आलिङ्गन करने [ का प्रयत्न करते] पर आँसुओ से पूर्णा।८ नेत्र कमल वाली [कामपक्ष में ईर्ष्या के कारण और अग्नि-पक्ष में बचाव की आशा रहित होने के कारण रोती हुई] त्रिपुर सुन्दरियो द्वारा तिरस्कृत [कामी पक्ष में प्रत्यालिङ्गन द्वारा स्वीकृत न करके और अग्नि-पक्ष में भटककर फेंका गया]। - शम्भु का शराग्नि तुम्हारे दुखो [अ्रथवा पापो] को भस्म करे। और जैसे [उसी क्रियावचित्र्य का चौथा उवाहरण]- कीठा में हिलाते हुए कर्रोत्पलों के स्पर्श से नेत्रों को सम्मानित करने वाली, कानों के [भूषण रूप में धारण किये हुए] कमलों के पत्रों से मिलते हुए नकों [के सकेत ] से लीलावती [सुन्दरियों] के द्वारा, [अपने चापारोपण व्यापार से] रोका गया [अतएव] शिथिल धनुष वाला कामदेव [विजयी] सर्वोत्कर्ष युक्त होता हैं॥६१।। यहां [लीलावती] सुन्वरियो के द्वारा लीलापूर्वक [किये गये] नेत्रों [के सकेत] से रोका गया अर्थात् अपने [चापारोपण रूप] व्यापार से विमुख किया गया होकत शिथिल चाप वाला कामदेव 'जयति' अर्ात् सर्वोत्कर्ष से युक्त होता हैं। यह क्या फहते है [अर्थात् यह बात उतनी चमत्कारयुक्त नहीं है] क्योंकि [कामवेव के प्रयास के बिना ही अथवा उसके ऊपर भी] उस प्रकार की विजय-प्राप्ति सिद्ध हो जाने से [कामदेव नहीं अपितु] वह [सुन्दरियां] ही सर्वोत्कर्षं युक्त होती है। यह फहना चाहिए।

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फारिका १६ ] प्रथमोत्मेष:

तयमन्नाभिप्राय-पत् तल्लोचनविलासानामेवंविधं जैत्रताप्रौढ़भाव पर्यालोच्य चेतनत्वेन स स्वचापारोपणायासमुपसंहतवान्। यतस्तेनैव त्रिभुवन- विजयावाप्ति. परिसमाग्यते ममेति मन्यमानस्य तस्य सहायत्वोत्कर्पातिशयो 'जयति' इति क्रियापटेन कत तायाः कारणत्वेन कवेश्चेतसि परिस्फुरित.। तेन किमपि क्रियावैचित्र्यमत्र तद्विद्वाह्ादकारि प्रतीयते। यथा च- तान्यक्षराखि हृदये किमपि व्वान्ति ।६२।। ञ्रन्न 'जल्पन्ति' 'वदन्ति' इत्यादि न प्रयुक्तं, यस्मान् तानि कयापि विच्छित्या किमप्यनारुयेय समर्पयन्तीति कवेरभिप्रेतम्।

इसका यह अभिप्राय है कि उनके नेत्रों के हावभाषों [ विलासो ] के ही इस प्रकार की विजयशीलता प्रौढता को विचारकर बुद्धिमान् [चेतन] होने से उस [कामदेव] ने अपने चापारोपण के प्रमत्न को समाप्त कर दिया। क्योंकि उसी [लीलावतियों के नेत्रविलास ] से मेरी त्रिभुवन विजय सिद्ध हो जाती है ऐसा मानने वाले उस [कामदेव] 3) के सहायकत्वोत्कर्ष का अ्र्प्रतिशय [लीलावतियों के नेत्रविलास में] 'जयति' इस क्रिया पद से कर्तृ त्व के फारणत्व रूप से कवि के हृदय में परिस्फरित हुआ है [उसी फो कवि ने इस रूप में यहाँ उपनिवद्ध कर दिया है]। उससे [जयति] इस क्रिया का सहृदयहृदया- ह्लादकारी कुछ प्पूर्व वैचित्य यहाँ प्रतीत हो रहा है। [अतएव यह भी क्रिया-वचित्र्य का सुन्दर उदाहरए है ]। और जैसे [इसी किया वैचित्र्य का तीसरा उदाहरख पूर्वोक्त 'निद्रानिमीलित' इत्यादि ५१ श्लोक का निम्नभाग ]- [प्रियतमा के स्वप्न अथवा मदावस्था में उच्चारण किये हुए] वह अ्क्षर हृदय में कुछ अपूर्व ध्वनि करते हैं ॥६२।। यहां [कहने के अर्थ में] 'जल्पन्ति' या 'वदन्ति' आद्दि [पद] प्रयुक्त नहीं किए [अपितु 'ध्वनन्ति' पद का प्रयोग किया है]। कयोकि वह [प्रियतमा के अव्यक्त शब्द] किसी अनिर्वचनीय शैली से किसी अनास्येय वस्तु को समर्पित करते है। [उस भ्रनिर्वच- नीय अनास्येय अपूर्य वस्तु की अभिव्यक्ति 'जल्पन्ति', 'मदन्ति' आदि पदों से नहीं हो सकती हैं। अपितु 'ध्वनन्ति' पद से ही हो सकती है] यह कवि का अभिप्राय है। [इसीलिए उसने 'ध्वनन्ति' पद का ही प्रयोग किया है। यह 'क्रिया-वचित्र्य' का तीसरा उदाहरण है ]।

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वत्रोक्तिजीवितम् [ कारिका १६

'वक्रताया परोऽप्यस्ति प्रकार' प्रत्ययाश्रय' इति। वक्रभावस्यान्योऽपि प्रभेो विद्यते। कीदश, 'प्रत्ययाश्रय'। प्रत्यय. सुप तिड च यस्याश्रय स्थान स तथोक्त। तस्यपि वहव प्रकारा. सम्भवन्ति, संख्यावैचित्र्यिहित., कारक वैचित्र्यविहित, पुरुषवैचित्रयविहितश्च। तत्र सख्यावैचित्र्यविहित :- यस्मिन वचनवैचित्र्य काव्यवन्वशोभायै निवद्धयते। यथा- मैथिली तस्य दाराः। इति।६३।। यथा च- फुल्लेन्दीवरकाननानि नयने पाणी सरोजाकराः॥६४॥। अत्र द्विवचनवहुवचनयो सामानाधिकररयमतीव चमत्कारकारि। इस प्रकार पद पूर्वार्द्ध वकता के १० भेदो का निरूपण कर अब वक्रता के मुस्य प्रकारो में से तीसरे भेद 'प्रत्यय वकरता' का निरूपण करते है- वक्ना का एक और [मुख्य भेदो में तीसरा] प्रकार 'प्रत्ययानित' [प्रत्ययवकता] भी है। [वक्रताया परोऽप्यस्ति प्रकार प्रत्ययाश्रय। यह इस १६वीं कारिका का उत्तरार्द्ध भाग है। उसको प्रतीक रूप से उद्धत कर उसकी व्याख्या करते हैं] वक्रता का अन्य भेद भी है। कैसा कि, प्रत्यय के आश्रित रहने वाला। प्रत्यय अर्थात् सुप या तिड् [प्रत्यय] वह आ्राश्रय अरर्थात् स्थान है जिसका, वह उस प्रकार का [प्रत्ययाश्रय प्रभेव] है। उस [प्रत्यय वक्रता] के भी बहुत से भेद हो सकते हैं। [जैसे] (१) 'सख्यावेचित्र्यकृता,' (२) 'कारक-वैचित्रयकृत, (३) पुरुष-वँचित््यकृत, [आदि] उनमें से सख्यावचित्र्यकृत [प्रत्ययवक्रता उसको कहते ह] जिसमें काव्य की शोभा के लिए वचनवचित्र्य की रचना की जाती है जैसे- मथिली [सीता] उस [रामचन्द्र] की पत्नी है ॥६३।। यहाँ 'मैथिली' एक वचन और 'दारा' बहुवचन का प्रयोग है। उससे उचिति मे वैचित्र्य प्रतीत होता है। इसलिए यह 'वचनवत्रता' या 'प्रत्ययवक्रता का उदाहरण है। इसके पूर्व यही पद्याश 'लिङ्गवत्रता' के उदाहरण में प्रस्तुत किया जा चुका है। क्योकि उसमें 'मैथिली' पद स्त्रीलिङ्ग तथा 'दारा' पद पुल्लिङ्ग में प्रयुक्त हुआ है। इसलिए यह उदाहरण वस्तुत 'लिङ्गवक्रता' औ्ररर 'वचनवकना' अ्रर्थात् 'प्रत्ययवक्रता' दोनो का दिया गया है। और जैसे [उसी वचनवकरता रूप प्रत्ययवकता का दूसरा उदाहरण]- [उसके] नेत्र खिले हुए कमलो के वन तथा दोनो हाथ कमलाकर है ॥६४॥ यहाँ [उपमेयभूत 'नयने' तथा 'पाणी' पदों में प्रयुक्ष्त] द्विवचन औ्र्प्रौर [उपमान भूत 'फुल्लेन्दीवरकाननानि' तथा 'सरोजाकरा' पदो में प्रयुक्त हुए] बहुवचन इन दोनो का समानाधिकरण्य [सह प्रयोग] अत्यन्त चमत्कारजनक है । [इसलिए यह सख्या- वैचित्र्यकृत 'प्रत्ययवत्रता' का उदाहरण है]।

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कारिका १६ ] प्रयमोन्मेष: [ =३

कारकवैचित्र्यविहित :- यत्राचेतनस्यापि पदार्थस्य चेतनत्वाध्यारोपेण चेतनस्यैव क्रियासमावेशलक्षणं रसाठिपरिपोपणार्थ कत त्वाटिकारक निवध्यते। यथा- स्तनद्वन्द्व' मन्द स्नपयति चलाद्वाप्पनिवहो हठादन्तः कएठ लुउति सरसः पञ्चमरनः । शरज्ज्योत्म्नापारड्ड: पतति च कपोल: करतले न जनीमस्तस्याः क इव हि विकारव्यतिकरः ॥६५॥ चेतनाध्यारोपेस कविना कतृ त्वमुपनिवद्धम्। यत्तस्या विवशायाः सत्यास्तेपामेवविधा व्यवहारःसा पुन. स्वयं किञ्चिदप्याचरितुं समर्थेत्यभिग्राय।अन्यच्च कपोलादीना तदवयवानामे- तदवस्थत्व प्रत्यक्षतयाऽस्मदादिगोचरतामापद्यते। तस्या. पुनर्योऽसावन्तर्विकार- व्यतिकरस्तं तदनुभवैकविपयत्वाद्वयं न जानीमः। यथा च-

['प्रत्ययवकरता' का दूसरा भेद] कारकर्वचित्र्यकृत [होता है]-जहां श्रचेतन पदार्य में भी चेतनत्व का अध्यारोप करके रसादि के परिषोषण के लिए [उनमें] चेतन की ही क्रिया का समावेश रूप करतृ त्वादि कारक [के रूप में उस प्रचेतन पदार्थ] का वर्णन किया जाता है [वहाँ कारकवचित्र्यकृत प्रत्ययवकता होती है] जैसे- श्र्प्रांसुओ्रों का प्रवाह घीरे-धीरे वोनों स्तनो को नहला रहा है, मधुर पञ्चम स्वर वलात् कण्ठ के भीतर अववद् हो रहा हैं और शरज्ज्योत्सना के समान घवलवर्ण कपोल तल हाथ पर पडा हुआ है। [ उसका वाह्य रूप तो इस प्रकार हं परन्तु] न जाने उसका [मानसिक-प्रन्तर] विकार किस प्रकार [अनिर्वचनीय] है॥६५॥। यहाँ वाष्प निवह अदि पचेतन पदार्थो में भी चेतनत्व का अध्यारोप करके कवि ने [उनमें स्नपयति, लुठति और पतति करियाओो का] कतृ त्व प्रतिपादन किया है। इमलिए कि उसके विवश होने पर उन [वाष्पनिवह आदि अ्रचेतन कर्त्ताओ्ो ] का जब इस प्रकार का व्यवहार है तब स्वय तो कुछ भी [मरण ग्रादि असम्भाव्य कार्य] करने में समर्य [हो सकती] है यह [कवि का] अभिप्राय है। और उसके कपोल आदि अवयवों की वह अ्नवस्था प्रत्यक्ष रूप से हमको दिखाई देती है। परन्तु उसका जो यह अरन्तर्विकार का सम्बन्ध है उसको, केवल उसी के अनुभवगोचर होने से हम नहीं जान सकते हैं [यह भी कवि का प्र्प्रभिप्राय कहा जा सकता हैँ इसलिए यह क्रियावचित्र्य का भेद है] । और जैसे [क्रियावंचित्र्य का तीसरा उदाहरस]-

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5४ ] वक्रोक्तिजीवितम् [कारिका १६

चापाचायेस्त्रिपुरविजयी कार्तिकेयो विजेयः शस्त्रव्यस्त. सदनमुदधिर्भूरियं हन्तकारः । अस्त्यैवेतत् किमु कृतवता रेखुकाकराठवाधा वद्धस्पर्घस्तव परशुना लब्जते चन्द्रहासः ॥६६।। यह श्लोक राजशेखरकृत बालरामायण नाटक के द्वितीय अ्रङ्ध से लिया गया है। परशुराम ने शिच से घनुविद्या सीखी थी, कार्तिकेय तथा कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन को जीतकर और समस्त क्षत्रियो का नाश करके समस्त पृथ्वी कश्यप को दान करदी थी। और अपने परशु के द्वारा समुद्र को दूर फेंक कर वहाँ अपना निवासस्थान बनाया था। तथा पिता की आज्ञा से अपनी माता रेखका का गला काट दिया था। इत्यादि परशुराम सम्बन्धिनी कथा इस श्लोक की पृष्ठभूमि है। इसमें प्रयुक्त हुआ 'हन्तकार' शब्द एक पारिभाषिक शब्द है। उसका लक्षण करते हुए मार्कण्डेय पुराण में लिखा है- ग्रासप्रमाणा भिक्षा स्यादग्र ग्रसचतुष्टयम्। अग्र चतुर्गुण प्राहुर्हन्तकार द्विजोत्तमा ॥ अर्थात् ग्रास के परिमाण से भिक्षा दी जानी चाहिए। पहिले चार ग्रास भिक्षा कहलाते है। और उसके बाद के चतुर्गुरा अर्थात् सोलह ग्रास को 'हन्तकार' कहते है। अर्थात् पहिले चार ग्रास योग्य भिक्षा प्रत्येक गृहस्थ सुविधा तथा प्रसन्नतापूर्वक दे सकता है। इसलिए वह तो उचित 'भिक्षा' है, बाद सोलह ग्रास तक की भिक्षा तनिक अपरनखाकर देता है। अतएव उसको 'हन्तकार' कहा है। * इस श्लोक मे 'विजित' के अर्थ में 'विजेय' शब्द का प्रयोग किया गया है इसलिए कृत्य प्रत्यय 'व्त' प्रत्यय के अर्थ में अ्रवाचक है। ऐसा मानकर काव्यप्रकाशकार ने [श्लोक स० २०१] पर्दकदेशगत अ्ररवाचकत्व दोष के उदाहरण के रूप में इस श्लोक को उद्ध त किया है। बालरामायगा में यह परशुराम के प्रति रावण की उकिति है। चन्द्रिकाकार ने इसे परशुराम के प्रति रावण के दूत की उक्ति लिखा है जो ठीक नही है। श्लोक का अर्थ इस प्रकार है- [हे परशुराम यह ठीक है कि] त्रिपुरविजयी [शिवजी तुम्हारे] घनुविद्या के आचार्य हे और कार्तिकेय को तुमने जीत लिया है [विजित प्रयुक्त होना चाहिए था, परन्तु उसके प्रयुक्त करने पर छन्दोभङ्ग हो जाता अत कवि हे विजेय. का प्रयोग कर दिया है परन्तु वह उचित नहीं हुआ है] शस्त्र [परश] से फेंका गया समुद्र [का जत् उससे रिक्त हुआ स्थान] तुम्हारा घर है [यह भी ठीक है] यह पृथ्वी तुम्हारे द्वारा कश्यप को दी हुई [षोडशग्रासात्मिका गिक्षा ] 'हन्तकार' है। यह सब ठीफ है। फिर भी [ व्यर्थ ही अपनी माता ] रेणुका के फण्ठ को काटने वाले तुम्हारे परशु के साथ

होती है ।।६६।। स्पर्वा [उसके साथ युद्ध का विचार करते हुए] करते हुए मेरी तलवार लज्जित

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फारिका १६ ] प्रथमोन्मेपः

त्रत्र 'चन्द्रहासो लज्जत' इति पूर्ववत् कारकवैचित्रयप्रतीत ः पुरुपवैचित्र्यविहितं वक्रत्वं विद्यते-यत्र प्रत्यक्तापरभावविपर्यायास -सयुञ्जते कवय. काव्यवैचित्रयार्थ युष्मदि अ्र्स्मदि वा प्रयोक्तव्ये प्रा तपदिक- मात्र निवध्नन्ति। यथा- अस्मद्भाग्यव्विपर्येयाद्यदि परं देवो न जानाति तम् ॥६७! अरत्र त्वं न जानासीति वक्तव्ये वैचित्र्याय 'देवो न जानाति' इत्युक्तम्। एवं युष्मदादिविपयसः क्रियापढं विना प्रातिपठिकमात्रेडपि दृश्यते। यथा- अ्रर्यं जनः न चेद्रहस्यं प्रतिवक्तुमर्हसि॥६८॥

इसमें [अचेतन में चेतनत्व का अ्रध्यारोप करके] तलवार लज्जित होती है इस [कथन] से पूर्ववत् कारकर्वचित्र्य की प्रतीति होती है। [अत. यह कारकवचितय का तीसरा उदाहरस है]। [प्रत्ययवक्रता का तीसरा भेद] 'पुरुषषचित्रयवकत्व' [वहाँ होता] है, जहाँ प्रथम पुरुष का [मध्यम अथवा उत्तम पुरुष रूप] अन्य के साथ विपर्ययास का कवि लोग प्रयोग करते हैं। [अर्थात्] काव्य के वैचित्र्य के लिए [मव्यमपुरुष बोधक] युष्मद् [शब्द ] अथवा [उत्तमपुर्ष बोधक ] अस्मद् [शब्द] के प्रयोग करने के स्थान पर प्रातिपदिकमात्र [प्रथमपुरुष] का प्रयोग करते है। जसे- यदि आप [रावस] उस [लोकप्रसिद्ध रामचन्द्र] को नहीं जानते हैं [यह अभिमानवश कहते हैं] तो वह हमारे [लङ्धावासियों के] दुर्भाग्य से ही है [अर्थात् हमारे दुर्भाग्य का सूचक है। यह श्लोक जिसका यह चतुर्थ चरण है पीछे उवाहरण स० ४३ पर उद्धत किया जा चुका है] ।६श।। यहाँ 'त्व न जानासि' तुम नहीं जानते इस [मध्यमपुरुष के ] के स्थान पर 'देवो न जानाति' आप नहीं जानते [यह प्रथमपरुष प्रातिपदिक-मात्र का प्रयोग किया गया है। [उससे काव्य में चमत्कार उत्पन्न हो गया है। इसलिए यह 'पुरुपवकता' का * उदाहरण है ]। इसी प्रकार क्रियापद के बिना प्रातिपदिकमात्र के प्रयोग से भी युप्मवादि पद का विपर्यास देखा जाता है। जैसे- हे तपोधने ! यह सेवक कुछ पूछना चाहता है यदि कोई गोपनीय बात न हो तो उत्तर देने की कृपा करे॥६८॥

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६ ] वत्र ावतिजावतम् [ काारका १य

अन्र 'अह प्रष्टुकाम' इति वक्तव्ये ताटस्थ्यप्रतीत्यर्थ 'अ्र्प्रय जन' इत्युक्तम्। यथा वा- सोऽयं दम्भघृतवतः ॥६६।। इति अत्र सोडहमिति वक्तव्ये पूर्ववत् अयम् इति वैचित्र्यप्रतीति.। एते च मुख्यतया वक्रताप्रकारा कतिचिन्निदशेनार्थ प्रदर्शिता। शष्टाश्च सहस्त्रश. सम्भवन्तीति महाकविप्रवाहे सहद्यै. स्वयमेवो- पेक्षरीयाः ॥१६।।

यहाँ 'में [उत्तमपुरुष] पूछना चाहता हूँ' यह कहने के स्थान पर उदासीनता बोधन के लिए [अह के स्थान पर] 'अय जन' 'यह सेवक' यह कहा है। [उससे भी उक्ति में चमत्कार झा गया है इसलिए यह भी 'पुरुषवक्रता' का उदाहरण है ]। यह पद्याश कुमारसम्भव के पञ्चम सर्ग के ४०वें इ्लोक का उत्तराद्ध भाग ह। पूरा श्लोक इस प्रकार है। अतोऽत किन्चिद् भवती बहुक्षमा द्विजातिभावादुपपन्नचापल। अ्रय जन त्रष्टुमनास्पतोधने न चेद्रहस्य प्रतिवक्तुमर्हसि ॥ अरथवा जैसे [पुरुषवकता का तीसरा उदाहरण]- वह यह मिथ्याव्रत घारस किए हुए न जाने कया करने पर उतर आाया है] है ।६६।। [यह पूरा श्लोक पहिले आगे चतुर्थ उत्मेश में दिया जायगा ] इसमें 'सोऽह' वह मै' यह कहने के स्थान पर पूर्ववत् [उत्तम पुरुष के स्थान पर प्रथन पुरुष 'यह' नयुक्त किया है] उससे उक्ति में वैचित्र्य की प्रतीति हो रही है। यह वकता के मुख्य रूप से कुछ भेव उदाहरसार्थ [यहाँ] दिखला दिए है। औ्रौर मी सैकड़ो भेद हो सकते है। इसलिए सहृवय लोग महकवियो के प्रवाह में [उन भेदो को] स्वय देख लें ॥१६॥। इस प्रकार इस १६वी कारिका मे वत्रता के निम्न भेद गिनाए हे- [१] वर्णविन्यासवकता [जिसे प्राचीन आ्र्प्राचार्य अरनुप्रास और्प्रौर यमक कहते है ]। [२]पदपूर्वाद्धवत्नता [अर्थात् प्रातिपदिक वक्रता तथा धातु वकता अ्थवा क्रिया वकता]'प्रातिपदिक वत्रता' रूप पदपूर्वाद्ध वक्रता के निम्न भेद दिख लाये हैं- [क] रूढिवंचित्रय वकता जिसके अ्रन्तर्गत (अ्र) वाच्यप्रसिद्ध धर्मान्तराध्या-1 रोप और (व) वाच्यप्रसिद्धवर्म में लोकोत्तरातिशयाध्यारोप। इनको प्राचीन ध्वनिवादी 'आचार्य अर्थान्त रसक्रकमित वाच्य-ध्वनि' कहते हैं। [ख] पर्यायवकता के दो भेद-(अ्) प्रस्तुतानुगुए विशेष पर्यायपद का प्रयोग औ्र (व) वाच्यासम्भविधर्मान्तरगर्भीकृत पर्याय पद का प्रयोग। इन दोनो

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कारिका २० ] प्रथमोन्मेष: [=७

एवं वाक्यावयावानां पदानां प्रत्येकं वर्णाद्यवयवद्वारेण यथासम्भवं चुकभावं व्याख्याय, इदानीं पदसमुदायभूतस्य वाक्यस्य वक्रता व्याख्यायते- वाक्यस्य वक्रभावोऽन्यो भिद्यते यः सहस्त्रधा।

वाक्यस्य वक्रभावोऽन्य. । वाक्यस्य पदसमुद्ायभूतस्य। 'आख्यातं साव्ययकारकविशेपण वाक्यम्' इति यस्य प्रतीतिस्तस्य श्लोकादेरवक्रभावो

प्रकार के प्रयोगो को मम्मट आदि ने परिकारालद्वार माना है जिसका लक्षण निम्न प्रकार है- 'विशैपणांर्यत्साकृतरुक्ति परिकरस्तु स.' ग उपचारवकता के २ भेद-(क) अ्रमूर्तके लिए मू्त्तवाचक शन्द का प्रयोग और (सर) ठोस द्रव्य के लिए द्रववाचक शन्द का प्रयोग। घ विशेपणवक्रता के दो उदाहर। ङ सवृतिवक्रता के दो उदाहरण। च वृत्तिवैचित्र्यवक्रता या सम्बन्धवकता के दो उदाहरण। छ लिङ्गवचित्र्य या लिङ्गवक्र्ता के दो भेद-(अ) भिन्न लिङ्गो का समानाघिकरण और (व) सौकुमार्यातिशय के द्योतन के लिए केवल स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग । कित्यावचित्र्य रूप पदपूर्वाद्ध वक्रता के पाँच उदाहरण- (ग) प्रत्ययाश्रित वक्रा- (श्र) सतत्यावैचित्र्यकृतवकता, (व) कारकर्वचित्र्यकृतवतता औ्रौर (स) पुरुपवं चित्र्यकृतवकता। यह तीन भेद। इस प्रकार वाक्य के प्रवयवभूत पदों में प्रत्येक के अ्रलग-अ्रलग वर्ण्ादि श्रवयवो के द्वारा यथासम्भव वक्रता को दिखलाकर अब पदो के समुदाय भूत वाक्य की वफ्रता का प्रतिपादन करते हैं- वाक्य का वकभाव [पदवकरता से भिन्न] अ्रन्य ही है। जिसके सहस्त्रो नेद हो सकते है। और जिसमें यह [उपमादि रूप 5सिद्ध] समस्त अलद्धार वर्ग का अन्तर्भाव हो जायगा ।२०। वाक्य को वकता [ पदवकता से] अन्य हू। वाक्य फी, अर्थात् पदसमदाय रप [वाक्य] की। 'श्रव्यय, कारक, विशेषण [आदि] से युक्त पिया [श्रारयात] वाक्ये [कहलाती] है' इस प्रकार [के लक्षण द्वारा] जिसकी प्रतीति होती है उस [वावय] इलोकादि [रूप वाक्य] का वक्रभाव अर्थात वणन-शली का वैचितर्य अ्रन्य घर्थात

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वक्रोक्तिजीवितम् [ कारिका २०

भङ्गीभगितिवैचित्र्यं, अन्यः पूर्वोक्तवक्रताव्यतिरेकी समुदायवैचित्र्यनिवन्वनः कोऽपि सम्भवति। यथा- उपस्थिर्ता पूर्वमपास्य लद्षमीं वनं मया सार्धमसि प्रपन्नः । त्वामाश्रय प्राप्य तया नु कोपात् सोढाऽस्मि न लवद्धवने वसन्ती॥७०|। एतत् सीतया तथाविधकरुणाक्रान्तान्त.करसाया वल्लभ प्रति सन्दिश्यते। यदुपस्थिता सेवासमापन्ना लक्ष्मीमपाम्य श्रियं परित्वज्य, पूर्व यसत्वं मया साध वन प्रपन्नो विपिनं प्रयातस्तस्य तव स्वप्नेऽप्येतन्न सम्भाव्यते। तया पुनस्त- स्मादेव कोपात् स्त्रीस्वभावसमुचितसपत्नीविद्वेपात् त्वद्गृहे वसन्ती न सोढा- डस्मि। तदिदमुक्त भवति-यत् तस्मिन् विधुरद्शाविसष्ठुलेऽपि समये तथा-

पूर्वोक्त [(१) वर्णविन्यासवकता, (२) पदपूर्वार्द्धवत्रता तथा (३) प्रत्ययाश्रित- वक्रता] वकता से भिन्न, समुदाय [रूप वाकय] वंचित्र्यमूलक [वाक्य का] कुछ अपूर्व वक्रभाव हो सकता है। जैसे- [यह रघुवश का १४, ६० इ्लोक है। इसमे परित्यवता सीता लक्ष्मण के लौटते समय उनके द्वारा रामचन्द्र के पास यह सन्देश भेज रही है कि] पहिले [राज्याभिषेक के समय सेवार्थ] उपस्थित हुई लक्ष्मी को छोडकर तुम मेरे साथ वन को चले गये थे। इसलिए आ्ज तुम्हारा झाश्रय पाकर [सपत्नी सुलभ] कोध के कारण उसने तुम्हारे घर मेरा रहना सहना नहीं किया॥७०॥ [ परित्याग के समय ] उस प्रकार के [ श्ननिर्वचनीय ] करण [रस] से प्राक्रान्त हृदय वाली सीता पति के पास यह सन्देश भेज रही है कि-उपस्थित श्र्थात् सेवा के लिए आई हुई लक्ष्मी को दूर करके अर्थात् शी को छोडकर, पहिले [राज्या- भिषेक के समय] जो तुम [रामचन्द्र] मेरे साथ वन को चले गए [ब्रह] तुमसे स्वप्न में भी यह [लक्ष्मी के अर्थात् अपने परित्याग की] आशा नहीं करती थी। [इसलिए आ्राज] उसी क्रोध से स्त्री-स्वभाव के अनुरूप सपत्नी-विद्वेष के कारण [बदला लेने के लिए] उसने तुम्हारे घर में [रहती हुई मुझ को सहन नहीं किया।] मेरा रहना सहन नहों किया। इसका अभिप्राय यह हुआ कि [चनवास के समय की] उस दु खमयी अ्वस्था के

१ रघवद ३४, ६० ।

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कारिका २० ] प्रथमोन्मेप: [ =

विधप्रसावास्पदतामध्यारोप्य यदिदानी साम्राज्ये निष्कारणपरित्यागतिरस्कार- पात्रतां नीताडस्म, इत्येतदुचितमनुचित वा विदितव्यवहारपरम्परेण भवना स्वयमेव विचार्यतामिति। स च चक्रभावस्तथाविधो य सहस्त्रधा भिद्यते वहुप्रकार भेठमासाद- यति। सहस्त्रशब्द्रोऽत्र संरयाभूयस्त्वमात्रवाची, न नियतार्थवृत्ति., यथा सहस्त्र- दलमिति। यम्मात् कवि प्रतिभानन्त्यान्नियतत्वं न सम्भवति। योऽसौ वाक्यस्य चक्रभावो वहुप्रकार, न जानीमस्त कीहशमित्याह-'यत्रालङ्गारवगोऽसौ सर्वो- Sप्यन्तर्मविष्यति'। यत्र यस्मिन्नसावनङ्कारवर्गः कविप्रवाहप्रसिद्धप्रतीति रुपमादिरलङ्करणकलाप. सर्व: सकलोऽप्यन्तर्भविष्यति अन्तर्भावं त्रजिष्यति। पृथक्त्वेन नावस्थास्यते, तत्प्रकारभेढत्वेनैव व्यपदेशमासादयिष्यतीत्यर्थ.।स चालङ्कारवर्ग रवलन्णावसरे प्रतिपद्मुदाहरिष्यते ॥२०।। एवं वाक्यवक्रतां व्या्याय वाक्यसमूहरुपस्य प्रकरसस्य तत्समुदाया- त्मकस्य च प्रवन्धस्य वक्रता व्याख्यायते- कठिन समय में भी उस प्रकार की कपापात्रता प्रदान करके भव साम्राज्य पाने पर '[आपने] जो मुझ को निष्कारण परित्याग से तिरस्कार का पात्र बना दिया है यह [आपके लिए] उचित है अथवा अनुचित इसका व्यवहारपरम्परा को समभने वाले आपको स्वय विचार करना चाहिए। औरौर वह [वाक्य का ] वक्रभाव ऐसा है जिसके सहस्त्रो भेद हो सकते हैं। सहस्र शन्द यहाँ केवम सख्या के बाहुल्य का वाचक है, निश्चित अर्थं [१०००] का बोधक नहीं। जैसे सहस्त्रदलम् [पद कसल के लिए प्रयुक्त होता है। ससमें भी सहस्र शन्द नियत सहस्त्र सख्या का नहीं अपितु सखया बाहुल्य का वाचक हूँ ]। षयोंकि कवि प्रतिभा के अनन्त होने से [कविप्रतिभाजन्य वाक्यवक्रता का भी] नियतत्व सम्भव नहीं है। यह जो वाषय का बहुत प्रकार का वभ्रभाव है वह कैसा है उसको हम नहीं जानते [यह शङ्धा हो सकती है] इसलिए कहते है-जिसमें यह [प्रसिद्ध उपमादि] सारा अलद्धार समुदाय अन्तर्भूत हो जायगा। यत्र यस्मिन् जिस [वाक्य- चक्रता] में कवि समुदाय में प्रसिद्ध प्रतीति वाला यह सारा अलद्धार वर्ग अ्र्ात् उपमा आदि अलद्धार समुदाय सब का सब अन्तर्भूत हो जायगा अर्थान् अ्न्तर्भाव को प्राप्त हो जायगा। अलग स्थित नहीं रह सकेगा। उस [वाक्यवकता] के प्रकार या भेद के रूप में हो व्यवहुत होगा। यह अभिप्राय है। उस अलद्धार वर्ग के [अलद्धारों के] अपने लक्षणों के अवसर पर अलग-अलग उदाहर दिये जावेंगे॥२०॥ इस प्रकार [संक्षेप से] 'चाक्यवक्रना' का प्रतिपादन [निर्देश या उद्देश्यमात्र] करके [घब] वाक्यसमूह रूप 'प्रकरण' और 'प्रकरण समुदाय' रूप प्रबन्ध की वकना

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वक्रोकितिजी वितम् [कारिका २१

वक्रभावः प्रकरसे प्रबन्धे वास्ति यादशः । उच्यते सहजाहार्थसौकुमार्यमनोहरः ॥२१॥ वक्रभावो विन्यासवैचित्र्य, प्रबन्धैकदेशभूते प्रकरणो याद्ृशोऽस्ति याहगें विद्यते, प्रवन्धे वा नाटकादौ सोऽप्युच्यते कथ्यते। कीहश., 'सहजाहार्यसौकुमार्य- मनोहर.'। सहजं स्वाभाविक, आर्रहार्य व्युत्पत्युपार्जित, यत्सौकुमार्यं रामणीयकं तेन मनोहरो हृदयहारी य. स तथोतत.। तत्र प्रकरो वक्रभावो यथा-रामायणो मारीचमायामयमाशिक्यमृगानु सारिणो रामस्य करुणाक्रनदाकणनकातरान्तःकरणया जनकराजपुत्र्या तत्प्राएपरित्राणाय स्वजीवितपरिरक्षानिरपेक्षया लक्षमणो निर्भतस्य प्रेपित । तदेतदत्यन्तमनौचित्ययुक्तम्। यस्मादनुचरसन्निधाने प्रधानस्य तथा- विधव्यापारकरमसम्भावनीयम्। तस्य च सर्वांतिशयचरितयुक्तत्वेन वएर्य- [वाक्य समुदायात्मक] 'प्रकरण' अथवा [प्रकरण-समुवायात्मक] 'प्रबन्ध' में सहज [स्वाभाविक] औ्रर आ्रहार्य [व्युत्पत्ि द्वारा उपाजित] सौकुमार्य से मनोहर जिस प्रकार का वक्रभाव है उसको [भी इस २१वीं कारिका मे] कहते है ।२॥ वक्रभाव अर्थात् रचनावचित्र्य, प्रबन्ध [काव्य नाटक आदि] के एकदेश [अवयव ] भूत 'प्रकरर' में जैसा है, अथवा [प्रकरण-समुदायात्मक्] 'प्रबन्ध' अर्प्र्थात नाटकादि में जैसा [वक्रभाव] है यह भी [इस कारिका में] कहा जाता है। कंसा कि सहज और आहार्य सौकुमार्य से मनोहर। सहज माने स्वाभाविक और श्रहार्य माने व्युत्पत्ति से उपाजित जो सौकुमार्य अर्थात् सौन्दर्य उससे मनोहर हृदयहारी जो वह उस प्रकार का 'सहजाहार्यसौकुमार्यमनोहर' हुआ। उनमें से प्रकरण में वक्रभाव का उदाहरण जैसे-रामायण में छन्मधारी स्वर्णमय मारीच मृग के पीछे जाने वाले रामचन्द्र के करुण आक्रदन को सुनकर भयभीत अ्रन्त करण वाली जनकराज की पुत्री [सीता] ने उनके प्राणो की रक्षा करने के लिए अपने जीवन की रक्षा की पर्वाह न करके डाँट-पटकर लक्ष्मण को भेजा है। यह [वर्णन] अ्त्यन्त अ्र्प्रनुचित हुआ है। क्योकि अनुचर [रूप लक्ष्मरण] के समीप विद्यमान होने पर भी प्रधान [रामचन्द्र] का [मृग को मारने ६। पकडने के लिए जाने रूप ] उस प्रकार का करना असम्भय-सा है। [ अर्ात् जब लक्ष्मण वहाँ विद्यमान थे और वे सीता तथा राम की सब प्रकार की सेवा करते थे। तो इस समय मृग के पीछे उनका जाना ही अधिक युक्तिसङ्त हो सकता है। राम का जाना नहीं। यह एक प्रकार का अनौचित्य रामायण के वर्णन में पाया जाता है। इसके अ्र्प्रतिरिक्त इसी प्रसङ्ग में वूसरे प्रकार का अ्रनौचित्य यह पाया

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कारिका २१ ] प्रथमोन्मेषः

मानस्य तेन कनीयसा प्राणपरित्राणसम्भावनेत्येतदत्यन्तमसमीचीनमिति पर्या- लोच्य, 'उदात्तराघवे' कविना वैदग्ध्यवशेन मारीचमृगमारणाय प्रयातस्य प्ररित्राणार्थ लक्ष्मास्य, सीतया कातरत्वेन राम: प्रेरित इत्युपनिवद्धम्। अत्र च तद्विदाह्वादकारित्वमेव वक्रत्वम्। यथा च 'किरातार्जुनीये' किरातपुरुपोक्तियु वाच्यत्वेन स्वमार्गगमार्गण मात्रमेवोपक्रान्तम्। वस्तुत. पुनरर्जुनेन सह तात्पर्यार्थपर्यालोचनया विग्रहो वाक्यार्थतामुपनीतः । जाता है कि] काव्य के मुख्य पात्र [वर्ण्यमान] और सर्वातिशय युक्त चरित्र वाले [क व्य नायक] उस [रामचन्द्र] के प्रारगो की रक्षा छोटे [भाई] के द्वारा किये जाने की सम्भावना यह [भी] अ्रत्यन्त अनुचित है। यह [ही] विचार कर [वर्तमान समय में श्रप्राप्य किन्तु वशरूपक के श्लोक में हेमचन्त द्वारा तथा साहित्य-दर्पण आदि में उद्धत ]'उदात्तराघव'. [नामक नाटक] में वैदग्व्य के वशीभूत [कवि ने] मारीच मुग के मारने के लिए गये हुए लक्ष्मण के परित्रास के लिए कातर होकर सीता ने राम को प्रेरित किया हैँ इस प्रकार का वर्सन किया है। इस [उदात्तराधव के वर्णन] में सहृदयाह्लादकारित्व ही वकरतव हैं। [यह प्रकरण वक्रता का उदाहरण हुआ। इसी का दूसरा उदाहरस भगे किरातार्जुनीय काव्य में से देते हैं]। और जैसे 'किरातार्जुनीय' [भारवि निर्मित काव्य] में किरात पुरुष के वचनों में वाच्य रूप से केवल अपने वागो की खोज मात्र का वर्णान किया है। परन्तु वास्तव में तात्पर्य्र्थ की पर्यालोचना से अर्जुन के साथ युद्ध [उस प्रकरण की] वाक्यार्थता को प्राप्त हुआ है। [अर्यातत् युद्ध की भूमिका वाँघी गई है ]। किरातार्जुनीय महाकाव्य में व्यास मुनि के आदेश से दिव्यास्त्र की प्राप्ति के लिए अरजुन की तपस्या का वर्णगन है। उसी तपस्या के प्रसङ्ग में ग्यारहवें सर्ग में मुनिरपघारी इन्द्र, अर्जुन के आश्रम में आकर और सवाद के वाद प्रत्यक्ष होकर अर्जुन, को शिव की आराधना का उपदेश देते है। उस परामर्श के अनुसार अर्जुन शिव की आरावना में तत्पर हो जाते है। उसी अवसर पर वराह 7 रूप घारस कर एक मूफदानव अर्जुन के बध के लिए आाता है। उससे अर्जुन की रक्षा और परीक्षा के लिए शिवजी किरात का रूप वारण कर और किरात वेपवारी अपने गणो की सेनासहित मृगया के व्याज से अर्जुन के आश्म के समीप आाते हैं। यह कथा वारहवें सर्ग तक की है। तेरहवें सर्ग में उस वराह रूपघारी मूकदानव के ऊपर किरात- वेपधारी शिव तथा अर्जुन दोनो एक साथ वाण छोडते है। जिसमें अर्जुन का वाण लगने से वराह की मृत्यु हो जाती है। अर्जुन उसके समीप जाकर उसके शरीर मे से

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सक्रोषितिजीवितम् [कारिका २१ तथा च तत्रैवोच्यते- प्रयुज्य सामाचरितं विलोभनं, भयं विभेदाय घिय प्रदर्शितम्। 0 तथाभियुक्त च शिलीमुखार्यिना, यथेतरन्न्याय्यमिचावभासते ।।७१॥1 अपना बाण निकालने लगते है। उसी समय शिव जी का भेजा हुआ वनेचर सैनिक आ्ाकर कहता हूँ कि यह बाण हमारे सेनापति का है। अत तुम उसको दे दो अन्यथा तुम्हारे लिए अच्छा नही होगा। वनेचर का यहाँ पर बडा लम्बा वक्तव्य है। जो इस प्रकार प्रारम्भ होता है- शान्तता विनययोगि मानस भूरिधाम विमल तप श्रुतम्। प्राह ते नु सदृशी दिवीकसामन्ववायमवदातमाकृति ॥ १३, ३७ ॥ इसमें साम से अपने कथन का प्रारम्भ किया है। उसके बाद ५१वें श्लोक में अपने सेनापति के साथ मित्रता का प्रलोभन दिखलाते हुए वनेचर कहता है- मित्रमिप्टमुपकारि सशये मेदिनीपतिरय तथा च ते। त विरोध्य भवता निरासि मा सज्जनैकवसति. कृतज्ञता ॥१३,५१॥ उसके बाद ६१ वे श्लोक में मय का प्रदर्शन भी किया है- शक्तिरर्थपतिपु स्वयग्रह प्रेम कारर्यांि वा निरत्ययम् । कारएद्वयमिद निरस्यत प्रार्थनाधिकबले विपत्फला ॥१३, ६१।। तत् तितिक्षितमिद मया मुनरित्यवोचत वचश्चभूपति । बाणमत्रभवते निज दिशन्नाप्नुहि त्वमपि सर्वसम्पद ॥१३, ६८॥ ३७ से लेकर ७१ तक ३४ श्लोको में वनेचर ने साम, दाम, दण्ड, मेद सब प्रकार का प्रयोग कर अरजुन से वाण दे देने को कहा है। वह वस्तुत शिव तथा अर्जुन के युद्ध की भूमिका हे। यही इस प्रकरण की वक्रता है। वनेचर के कथन का उत्तर १४वें सर्गं में अर्जुन ने दिया है। उसी में से यह श्लोक यहाँ उद्धृत किया है। उसमें वनेचर के वचनो का निर्देश करते हुए अर्जुन कहते हैं कि- जैसा कि वहीं कहा है- [सबसे पहिले अपने वक्तव्य के प्रारम्भ में 'शान्तता' आ्रादि १३, ३७ श्लोक में * तुमने] साम का प्रयोग करके [फिर मित्रमिष्टमुपकारि इत्यादि ५१वे श्लोक में अपने राजा के साथ मि्रता का ] लोभ दिखलाया है। उसके वाद ['शक्तिरर्थपतिषु' ६१ तथा 'तत् तितिक्षित' मुने इत्यादि ६८ तक अ्नेक श्लोको में] विचार को बदल देने के लिए भय भी दिखाया है। और इस बाण को लेने के लिए इस प्रकार का कथन तुमने किया हैं जिससे अ्न्याय्य बात भी [अ्रन्यत्] न्याय्य-सी प्रतीत होने लगती है।।७१।।

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कारिका २१ ] प्रयमोन्मेपः

प्रबन्धे वक्रभावो यथा-कुत्रचिन्महाकविविरचिते रामकथोपनिवन्धे नाटकादौ पञ्विधवक्रतासामग्रीसमुदायसुन्दरं सहदयहृदयहारि महापुरुप- नर्णन मुपक्रमे प्रतिभासते। परमार्थतस्तु विधिनिपेधात्मकधर्मोपदेश. पर्यवस्यति, रामवद्वर्तित्व्य न रावणवठिति।. यथा च तापसवत्सराजे कुसुमसुकुमारचेतस. सर विनोदैकरसिकस्य नायकस्य चरितवर्ण नमुपक्रान्तम्। वस्तुतस्तु व्यसनार्णवे निमज्जन्निजो राजा

अर्जुन के पास जव किरात वेषधारी शिव सेना सहित आये है तव वह युद्ध के लिए तैयार होकर ही आये हैं। वराह को मारने के लिए अर्जुन के साथ यद्यपि उन्होने भी वाण छोडा था परन्तु वह वराह के नही लगा लक्ष्यभ्रप्ट होकर कहीं अन्यन चला गया। वगह का वघ शिव के वाण से नही अपितु अर्जुन के वाए से हुआ था। फिर भी शिव को तो युद्ध का एक वहाना ढूंढना था इसलिए अर्जुन के वाण पर ही शिव जी ने अपना अधिकार जमाने का यह प्रयास किया है। और उनके इस प्रयास से अर्जुन के साथ युद्ध का अवसर मिल गया है। इस प्रकार यह वाण की खोज का वहाना वस्तुत युद्र की भूमिका मात्र है। यही इस सारे प्रकरण का सौन्दर्य या 'वकता' है। इसी के लिए कुन्तक ने इस प्रकरण को यहाँ उद्धृत किया है। 'प्रकरख- वकता' के बाद आगे 'प्रवन्ध-वक्रता' को दिखलाते हुए कहते है- प्रबन्ध [रामायण महाभारत आदि महाकाव्य या नाटक आादि] में वक्रभाव [का उदाहरख] जंसे-किसी महाकवि के बनाए हुए, रामकथामूलक नाटफ आदि में /१.वर्णविन्यासवकता, २ पदपूर्वाद्धंवक्रता, ३ प्रत्ययाधितवक्रता ४ वाक्यवकता श्रौर ५ प्रकरणवकता ] इस पाँच प्रकार की वक्ता से सुन्दर सहृदयहृदयाह्हादकारी [नायक रूप] महापुरुष का वर्णन ऊपर से [मोटे रूप से] किया गया प्रतीत होता है। परन्तु वास्तव में [कवि का प्रयोजन केवल उस महापुरुप के चरित्र का वर्गन करना मात्र नहीं होता है अपितु] 'राम के समान आचरण करना चाहिए राव के समान नहीं' इस प्रकार का विि और निषेघात्मक धर्म का उपदेश [उस काव्य या नाटक का] फलितार्थ होता है। [यही उस प्रबन्ध काव्य आदि की वक्ता या सौन्दर्य है]। और जैसे तापसवत्सराज [नाटक] में कुसुम के समान सुकुमारचित और मधुर विनोद के रसिक नायक [उदयन] के चरित्र का वर्णन प्रारम्भ किया है। परन्तु बास्तव में [उदयन के समान] किसी विपत्ति में पड जाने पर [उदयन के मंत्री यौग- न्वरायण के समान] उस प्रकार के नीति-व्यवहार में निपुस मत्री उस-उस प्रकार के [चातुयंपूर्ण अ्रनेक] उपायों से अपने राजा का उद्धार करे यह उपदेश [उस नाटक की रचना द्वारा उसके निर्माता कवि ने] दिया है। [इसीलिए काव्यप्रकाश-कार आरपदि ने

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वक्रोकितिजीवितम् [ कारिका २२

स्वलक्षणाव्याख्यानावसरे व्यक्ततामायास्यति। एवं कविव्यापारवक्रतापट्कमुद्देशमात्रेण व्याख्यातम्। विस्तरेण तु स्वुलक्षणावसरे व्याख्यास्यते ॥२१।। रचना न्याष क्रमप्राप्तत्वेन बन्धोडघुना व्याख्यायते-mo वाच्यवाचकसौभाग्यलावरायपरिपोषकः । 2रचना व्यापारशाली वाक्यस्य विन्यासो बन्ध उच्यते ॥२२॥। विन्यासो विशिष्टं न्यसनं य' सन्निवेशः स एव व्यापारशाली 'बन्ध' उच्यते। व्यापारोऽन्र प्रस्तुतकाव्यक्रियालक्षा। तेन शालते श्लाघते य स

व्यवहार ज्ञान को भी काव्य का मुख्य प्रयोजन माना है ]। यह बात [नाटकादि के] अपने लक्षण [अथवा स्वलक्षण अर्थात् विशेष लक्षण] के व्याख्यान के अवसर स्पष्ट हो जायगी। इस प्रकार कविव्यापार [काव्य] की वकता के [१ वर्णविन्यासवक्र्ता, २ पद- पूर्वार्द्धवकता, ३ प्रत्ययाश्रितवकता, ४. वाक्यवक्रता, ५ प्रकरणवक्रता और ६ प्रबन्ध- वक्रता रूप] छ वक्ताएँ उद्देश-मात्र [नाममात्रेण वस्तुसङ्कीर्तन उद्देश, नाम मात्र से। वस्तु का कथन करना 'उद्देश' कहलाता है] से कह दी है [अरथात् उनके नाममात्र यहाँ गिना दिये है] विस्तारपूर्वक अपने लक्षण के अवसर पर व्याख्यान करेंगे ॥२१॥ शब्दाथौं सहितौ वक्रकविव्यापारघालिनि। बन्धे व्यवस्थितौ काव्य तद्विदाह्ह्ादकारिणि ।१, ७।। सातवी कारिका में काव्य का लक्षणा इस प्रकार किया था। उसके बाद १५वी कारिका तक इस काव्य-लक्षण के शब्दाथौ पदो की व्याख्या की गई है। १६, १७ कारिकाओ में उन शब्दार्थ के 'साहित्य' का विवेचन किया गया है। उसके बाद १८ से २१वी कारिका तक छ प्रकार की कवि 'व्यापारवकता' का सक्षिप्त उद्देश-मात्रेण कथन किया गया है। इस प्रकार यहाँ तक 'शब्दाथौ", 'सहिती,' 'वत्रकविव्यापारशालिनि' इन तीन पदो की व्याख्या कर दी गई। अब लक्षणा में आए हुए 'बन्ध' पद की व्याख्या प्रारम्भ करते हुए कहते हैं। कम से प्राप्त होने के कारण अब 'वन्ध' की व्याख्या करते हैं- वाच्य [अर्थ] तथा वाचक [शब्द] के [चेतनचमत्कारित्व रूप] सौभाग्य तथा [रचना सौदन्य रूप ] लावण् के परिपोषक व्यापार से युक्त वाक्य की रचना को 'बन्घ' कहते है ।।२२।। विन्यास अर्था्त् विशेष रूप से [शब्दों का ] रखना रूप जो सन्निवेश है वह ही व्यापारयुक्त [होने पर] 'वन्व' कहलाता है। व्यापार [का अर्थ] यहाँ प्रस्तुत काव्य

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कारिका २२ ] प्रथमोन्मेष: [ Ex

तथोक्तः । कस्य, वाक्यस्य श्लोकाढे.। कीहरा., 'वाच्यवाचकसौभाग्यलावसय- पुरिपोपक'। वाच्यवाचकयोरद्योरपि वाच्यस्याभिधेयस्य वाचकस्य च शव्दस्य वच्यमाण सौभाग्यलावसयलन्षएं यद् गुरद्वयं तस्य परिपोपक, पुष्टतातिशय- कारी। सौभाग्यं प्रतिभासरम्भफत्तभूतं चेतनचमत्कारित्वलन्सम्। लावएयं सन्निवेशमौन्डर्यम्। तयो परिपोपक। यथा च- दत्वा वामकर नितम्वफलके लीलावलन्मध्यया, प्रोत्तुह्रस्तनमंसचुम्विचिवुकं कृत्वा तया मा प्रति।

सासूय प्रहिता: स्मरज्वरमुचो द्वित्रा: कटाक्षच्छटाः॥७२॥। रचना रूप है। जो उससे शोभित या प्रशसित हो वह 'ध्यापारशाली'। किसका [विन्यास] वाक्य अपर्यात् श्लोकावि का। कसा [विन्यास] कि वाच्य [शर्थ] और वाचक [शब्द] के [चेतनचमत्कारित्व रूप] 'सौभाग्य' तथा [सन्निवेशसौन्वर्य रूप] 'लावण्य' का परिपोषक। वाच्य वाचक दोनों के ही। वाच्य पर्यात् अ्रभिघेय [अर्थ] और वाचक शब्द का, जो आगे कहा जाने वाला 'सौभाग्य' और 'लावण्य' रूप जो गुराद्वय उसका परिपोषक अर्थात् पुष्टातातिशय को करने वाला। 'सोभार्य' अ्प्र्यात् प्रतिभा के प्रभाव का फलरूप [चेतन] सहृदय चमत्कारित्व। [और] 'लावण्य' अर्थात् रचना का सौन्दर्य उन दोनों का परिपोषक। [वाक्य का विन्यास वन्व कहलाता है] जैसे- [यह कवीन्द्रवचन० में का २१३वां इलोक है] लीला [ अर्यात् श्दा] से कमर भुकाए हुए, बाएँ हाथ को नितम्ब पर रखकर, स्तन को ऊचा करके और ठोड़ी को कन्घे से लगा करके उसने मेरे प्रति किनारे पर लगी हुई नवीन इन्द्रनील मणि से युक्त मुक्ताओ की पक्ति के समान सुन्दर और कामज्वर को [देने या] छोड़ने वाले तीन [बार] ईर्ष्या सहित कटाक्ष किए ।।७२।। इसका अभिप्राय यह है कि उसने मुडकर मेरी ओर दो-्तीन बार कटाक्ष से देखा। 'मुडकर' इस वात को कहने के लिए कवि ने श्लोक के पहिले दोनो चरण लगा दिए हैं। उनमे उसने मुडने के समय की अवस्था का बडा मुन्दर शव्दचित् खींचा है। पीछे की ओर अधिक मुडने पर ही ठोडी का कन्वे से स्पर्ग हो मकता है। जब ठोडी कन्धे को स्पर्श करेगी उस समय दूमरी ओर के स्तन का कुछ ऊँचा हो जाना ऊपर को सिंच जाना स्वाभाविक ही है। और कमर भी मुड जाती है। और उम मुडती हुई कमर पर हाथ रखना भी स्वाभाविक हैं। इस प्रकार पूर्वार्द्ध में नायिका के मुडने का वडा मुन्दर वंन है। तीसरे चरण में आांख के सफेद भाग के बीच की काली पुतली का वर्णन करने के लिए कवि ने किनारे पर नई जडी हुई इन्त्रनील मणि से युक्त

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६६ ] वकरोकि्तिजीवितम् [ कारिका २३

अ्र्न्न समग्रकविकौशलसम्पाद्यस्य चेतनचमत्कारित्वलक्षणस्य सौभाग्यस्य

एयस्य पर परिपोषो विद्यते ॥२२॥। एवञ्च स्वरूपमभिधाय तद्विदाह्वाटकारित्वमभिधते- वाच्यवाचकवक्रोक्तित्रितयातिशयोचरम् । तद्विदाह्वादकारित्वं किमप्यामोदसुन्दरम् ।।२३।। तद्विदाह्नादकारित्व काव्यविदानन्दविधायित्वम्। कीदशम् 'वाच्यवाचक वक्रोक्तित्रितयातिशयोत्तरम्'। वाच्यमभिधेयं, वाचकं शब्दो, वक्रांक्तिरलक्करसम्। एतस्य त्रितयस्य योऽतिशय. कोऽप्युत्कर्षस्तस्मादुत्तरमतिरिक्तम्, स्वरूपेणाति- -शयेन च स्वरूपेणान्यन् किसपि तत्वान्तरमेतदतिशयेन एतस्मात् त्रितयादपि

मुक्तावली को उपमान कल्पित किया है। फिर 'स्मरज्वरमुचो द्वित्रा कटाक्षच्छटा प्रहिता' कहा है। और वह भी 'सासूयम्'। यह सब कुछ ही बहुत सुन्दर है। उसमें शब्दों का भी सौन्दर्य है और अर्थ का भी। इसी प्रकार का वाच्यवाचक के सौभाग्य और लावण्य का परिपोपक वाक्यविन्यास कुन्तक को 'बन्ध' पद से अभिप्रेत है। इसमें समस्त कवि कौशल से सम्पावन करने योग्य चेतन चमत्कारित्व रूप 'सौभाग्य' का, और थोडे से वर्णविन्यास के सौन्दर्य से उत्पन्न तथा पदों के जोड़ने के सौन्दर्य से उपाजित 'लावण्य' का अत्यन्त परिपोष हो रहा है। [इसी प्रकार के वाक्यविन्यास को 'बन्ध' कहते है] ।। २२। इस प्रकार [बन्ध का ] स्वरूप दिखलाकर सहदयाह्लादकारित्व कहते हैं- वाच्य [अर्थ], वाचक [शस्व] और वक्रोदित [अलद्धार] इन तीनों के [लोकोत्तर] अ्र्प्रतिशय से भरा हुआ [युक्त] औ्रौर रञ्जकत्व [आ्मोव] से रमणीय कुछ अपूर्व [वस्तुधर्म] ही [तद्विवाह्लादकारित्व] सहृदयहृदयाह्मावकत्व है। ।।२३।। 'तद्विदाल्ल्ादकारित्व'[ का श्रर्थ] काव्यमर्मज्ञों का आानन्वदायकत्व है। फँसा [वह तद्विदाह्हादकारित्व] कि-वाच्य, चाचक और वकोषिति तीनों के अ्रतिशय से युक्त। वाच्य अर्थात् अ्रभिघेय [शथं], वाचक शब्द, और अलद्धार रूप 'वफ्रोक्ति' इन तीनों का जो, प्रतिशय अरथात कोई अ्प्रनिर्वचनीय उत्कर्ष उससे उत्तर-अ्रर्थात् श्र्प्तिरिवत [लोकोततर] स्वरूप से और अ्रतिशय से [दोनो से लोकोत्तर, साधारण लौकिक वस्तु से भिन्न हो जाता है ]। स्वरूप से अन्य [अर्थात् लौकिक साघारण वस्तु ] इस अ्रतिशय से कुछ और ही तत्वान्तर हो जाता है। [वाच्य, वाचक तथा वक्रोवित या अलङ्ग(र] इन तीनो [के अतिशय] से [तो वह] लोकोत्तर [हो जाता है] यह अ्रभिप्राय हैं।

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कारिका २३ ] प्रथमोन्मेष

लोकोत्तरमित्यर्थः । अन्यच्च कीहशम्-'किमयामोटसुन्दरम्'। किमप्यव्यपदेश्यं सहृदयहृदयसंबेद्यं, आमोद: सुकुमार-वस्तुधर्मो रूजकत्व नाम, तेन सुन्दर रव्जकत्वरमणीयम् । यथा- हंसाना निनदेषु यैः कवलितेरासज्यते कूजता- मन्यः कोऽपि कषायकरठलुठनादाघर्घरो विभ्रम । ते सम्प्रत्यकठोरवारणवधूदन्ताकुरस्पधिनो, निर्याताः कमलाकरेपु विसिनीकन्दागिमयन्धयः॥७३।। त्रत्र त्रितयेपि वाच्यवाचकवक्रोक्तिलक्षो प्राधान्येन न कश्चिदपि कवे: संरम्भो विभाव्यते। किन्तु प्रतिभावैचित्र्यवशेन किमपि तद्विदाह्नादकारि- त्वमुन्मीलितम् । यद्यपि सर्वेपामुदाहरणानामविकलकाव्यलक्षणापरिसमाप्ति: सम्भवति तथापि यत् प्राधान्येनाभिघीयते स एवाश प्रत्येकमुद्रिक्ततया तेपा परिस्फुरतीति सहृद्यैः स्वयमेवोत्ेक्षणीयम् ॥२३।। और वह कँसा कि किसी अपूर्व आमोद अर्थात रञ्जकत्व धर्म से सुन्दर'। 'कुछ' अनिर्वचनीय सहूदयहृदयसवेद्य जो 'आमोद' घर्थात् रज्जकत्व नाम का सुकुमार [सुन्दर कोमल] वस्तु का घर्म, उससे सुन्दर अर्थात् रञ्जकत्व [विशेष] से रमणीय [वर्णन को तद्विदाह्हादकारी कहते हैं।] जैसे [निम्नलिखित श्लोक में]- जिनके खाने से कूजने वाले हसो के स्वरो में [मधुर कण्ठ के सयोग से] कुछ प्रपूर्व ही घर्घर-ध्वनि युक्त सौन्दर्य उत्पन्न हो जाता है। हथिनी के नवीन दन्ताकुरो से स्पर्धा करने वाली मृखाल की वे नवीन ग्रन्थियाँ इस समय लालावो में वाहर निकल भाई हैं।। ७३।। यहां [इस श्लोक में] वाच्य [अर्य] वाचक [शब्द] तथा वकोवित [अलद्धार] तीनो के विषय में ही प्रधान रूप से [किया गया] कवि का फोई भी विशेष प्रयत्न नहीं मालूम होता है। [विलकुल स्वाभाविक रूप से कवि की प्रतिभा के कारण इस प्रकार की सुन्दर रचना बन गई है] किन्तु प्रतिभा के वैचित्रय के कारस कुछ भ्पूर्व ही सहदयहृदया ह्ादफत्व [उस रचना में] प्रकट हो रहा है। यद्यपि [शन्त, अर्थ, उनके साहित्य, कविव्यापारवक्रता अ्थवा बन्ध श्रदि की व्याल्या के प्रसङ्ग में जितने भी उदाहरस दिसलाए हे उन] सब में ही काव्य का सम्पूर्ण लक्षण घटित हो सकता है [अ्रर्थात् वे फेवल उस एक प्रश का ही उदाहरण नहीं है अफ्तु पूर्ण काव्पलक्षणा के उदाहरण है] फिर भी [उनमें से] प्रत्येक में जो-जो अश प्रधान रूप से बतलाया गया है वहीं प्रत्येक में मुरय रूप से प्रतीत होता है यह बात सहृवय स्वय समझ सफते है॥। २३ ।।

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वकोकितिजीवितम् [कारिका २४ 1 एवं काव्यसामान्यलक्षणाममिधाय तद्विशेषलक्षणविपयप्रदर्शनार्थ मार्ग- भेदनिबन्धन त्रैविध्यमभिधत्ते- सम्प्रति तत्र ये मार्गाः कविप्रस्थानहेतवः । सुकुमारो विचित्रश्च मध्यमश्चोभयात्मकः ॥२४॥। तन्न तस्मिन् काव्ये मार्गा: पन्थानस्त्रयः सम्भवन्ति। न द्वौ न चत्वारः। स्वरादिसंख्यावत् तावतामेव वस्तुतस्तव्ज्ञैरुपलम्भात् । ते च कीदशा'- 'कविप्रस्थानहेतव'। कवीना प्रस्थान प्रवर्तनं तस्य हेतव., काव्यकरणस्य कारण- भूताः। किमभिधाना -'सुकुमारो, विचित्रश्च, मध्यमश्चेति'। कीदशो मध्यम .- 'उभयात्मक'। उभयमनन्तरोक्तं मागद्वयमात्मा यस्येति विग्रह। छायाद्वयोप- जीवीत्युक्तं भवति। तेषां च स्वलक्षणावसरे स्वरूपमाख्यास्यते। अप्रत्र च बहुविधा विप्रतिपत्तय. सम्भवन्ति। यस्माच्चिरन्तनैविदर्भादि- देशविशेषसमाश्रयेण वैदर्भीप्रभृतयो रीतयरितिस्त्र समाख्याता.। तासां चोत्त-

इस प्रकार काव्य के सामान्य लक्षण को कहकर उसके विशेष लक्षण के विषय को प्रदशित करने के लिए मार्गभेदमूलक त्रैविध्य को कहते हैं- उस [काव्य] में (१) सुकुमार, (२) विचित्र और उभयात्मक अर्थात् (३) मध्यम [यह तीन प्रकार के] जो मार्ग सम्भव हे [उनको कहते है] ।२४। तत्र अर्थात् उस काव्य में तीन मार्ग हो सफते है। न वो और न चार [केवल तीन ही मार्ग सम्भव हे]। स्वर आर््रादि की [निश्चित सात] सख्या के समान उतने [नियत रूप से तीन] ही [मार्गो] के सहृव्यो द्वारा उपलब्ध होने से [तीन ही प्रकार के मार्ग है। कम या अघिक नहीं]। और वे [ मार्ग] किस प्रकार के होते हं-कवियो के [काव्य-रचना रूप कार्य के लिए] प्रस्थान [प्रवृत्ति] के हेतु। कवियों का प्रस्थान अर्थात् [काव्य-रचना में] प्रवर्तन, उसके 'हेतु' अर्थात् काव्य-रचना के हेतुभूत। किस नाम के-(१) 'सुकुमार, (२) विचित्र और (३) मध्यम'। मध्यम [मार्ग] कैसा-उभयात्मक अर्थात् अभी कहे हुए [सुकमार तथा विचिन्न] वोनो मार्ग जिसका स्वरूप हं [वह उभयात्मक हुआ्र्प्रा] यह [उभयात्मक शन् का] विग्रह है। अ्प्र्थात् [सुकुमार औरौर विचित्र] दोनों की छाया से युक्त, यह भभिप्राय है। उनका [भारगों का ] स्वरूप उनके अपने लक्षणो के अवसर पर कहेंगे। यहाँ [मार्गो के इस त्रित्ववाद के सम्बन्ध में] अ्रनेक प्रकार के मतभेव हो सकते है। क्योकि प्राचीन [वामन आादि] आ्रचार्यो ने विदर्भादि देश विशेष के आधय

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कारिका २४ ] प्रथमोन्मेष: [ ee

माधममध्यमत्ववैचित्र्यैण त्रैविध्यम्। अन्यैश्च वैदर्भगौड़ीयलक्षणं मार्गद्वित- यमाख्यातम्। एतच्चाभयमप्ययुक्तियुक्तम् । यस्माद शभेदनिवन्धनत्वे रीति- नेदानां देशानामानन्त्यादसर्यत्वं प्रसज्येत। न च विशिष्टरीतियुक्तत्वेन काव्य- करणा मातुलेयभगिनीविवा हवद् देशधर्मतया व्यवस्थापयितुं शक्यम्। देशधर्मो हि वृद्धव्यवहारपरम्परामात्रशरणः शक्यानुष्ठानतां नातिवर्तते। तथाविधकाव्य- करएं पुन. शक्त्यादिकारणकलापसाकल्यमपेक्षमाएं न शक्यते यथाकथवन्िद- नुष्ठातुम्।

विकत्वं वक्तुं पार्यते। तस्मिन् सति तथाविधकाव्यकरण सर्वस्य स्यात्। कि्न्

से वैदर्भी आदि तीन रीतियो१ का वर्न किया है। और उनके उत्तम, मध्यम, और अधम रूप से तीन भेब किए है। और [दण्डी आदि] अ्न्यो२ ने वैदर्भ तथा गौड़ीय रूप दो मार्गों का वर्णन किया है। ये [वामन तथा दण्डी] दोनों ही [के मत] युक्ति सङ्भत नहीं [कहे जा सकते] हैं। कयोंकि [वामन के मतानुसार] रीतियों को देश-भेद फे आघार पर मानने से तो देशो के अनन्त होने से रीति भेदों की भी अनन्तता होने लगेगी। और देशविशेष के व्यवहार के आधार पर ममेरी वहिन [मातुल, का पुत्र मातुलेय, ममेरा भाई, मातुलेय-भगिनी ममेरी बहिन] के विवाह के समान [विशेष देश में उसकी] विशिष्ट रीति से युक्ष्त रूप में काव्य-रचना की व्यवस्था नहीं की जा सकती हैं। [अर्थात् जैसे किसी देश में ममेरी वहिन के साथ विवाह प्रचलित हो तो केवल उस देश की प्रथा के आाघार पर वही वहाँ किया जा सकता है। परन्तु इस प्रकार केवल देश-भेद के आधार पर काव्य की व्यवस्था नहीं की जा सकती है] क्योंकि देश-धर्म केवल वृद्धों की व्यवहार-परम्परामात्र पर आश्रित हैं इसलिए उसका प्रनुष्ठान [उस वेश में] अ्रशक्य नहीं है। परन्तु उस प्रकार की [सहुदयहृवयाह्वावकारी] काव्य-रचना [देश विशेष पर तो आश्रित नहीं है। वह तो] शक्ति [काव्य-प्रतिभा और व्युत्पत्ति] आवि कारस समुदाय की पूर्सता की अपेक्षा रखती है। इसलिए [देश- धर्म के समान केवल विदर्भ या पाञ्चाल में रहने मात्र से वैदर्भी या पाज्चाली श्रीतिमयी काव्य-रचना] जैसे-तसे नहीं की जा सकती है। और न दाक्षिसात्यों के सङ्गीत विषयक सुस्वरतादि रूप, ध्वनि की रमणी- यता के समान उस [काव्य-रचना] को स्वाभाविक कहा जा सकता है। [क्योंकि] वसा [काव्य-रचना का स्वाभाविकत्व] होने पर सव कोई उस प्रकार का [सहृदय- १ वामन काव्यालद्कार सूत्रवृत्ति अ्घि० १, भष्याय २. सूत्र ६ से १३ तक। २ दण्डी काव्यादर्न 2 ४१।

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१०२ ] वक्रोफ्तिजी वितम् [ कारिका २४

एवमेतदुभयकविनिबन्धन-संवलितस्वभावस्य कवेस्तदुचितैव शबलशोभा- तिशयशालिनी शक्ति समुदेति। तथा च तदुभयपरिस्पन्दसुन्दरव्युत्पत्युपार्जन- माचरति। ततस्तच्छायाद्वितथपरिपोपपेशलाभ्यासपरवशः सम्पद्यते। तढेचमेते कवय सकलकाव्यकरणकलापकाष्ठाधिरूढ़िरमणीय किमप काव्यमारभन्ते, सुकुमार विचित्रमुभयात्मकख्। त एव तत्प्रवर्तननिमित्तभूता मार्गा इत्युच्यन्ते।

परिसंख्यातुमशक्यत्वात् सामान्येन त्रैविष्यमेवोपपद्यते। तथा च रमणीयकाव्यपरिग्रहप्रस्तावे स्वभावसुकुमारस्तावदेको राशि। तद्व्यतिरिक्त- स्यारमणीयस्यानुपादेयत्वात्। तद्व्यतिरेकी रामणीयकविशिष्टो विचित्र इत्युच्यते। तदेतयोदवयोरपि रमीयत्वादेतदीयच्छायाद्वितयोपजीविनोऽन्यस्य रमणीयत्वमेव न्यायोपपन्नं पर्यवस्यति। तस्मादेषां प्रत्येकमस्खलितस्वपरिम्पन्द- महिम्ना तद्विदाह्हादकारित्वपरिसमाप्तेन कस्यचिन्यूनता। इसी प्रकार [सुकुमार औौर विचित्र स्वभाव वाले] इन दोनों प्रकार के, कवि के मूलभूत स्वभाव से युक्त कवि की उसी के योग्य मिश्रित शोभाशालिनी कोई शक्ति उत्पन्न होती है। उस [शबल शक्ति] से उन दोनों प्रकार के स्वभाव से सुन्दर। व्युत्पत्ति को प्राप्त करता है और उसके बाद उन दोनों को छाया के परिपोष से सुन्दर अभ्यास फरने वाला हो जाता है। इस प्रकार ये [तीनों प्रकार के] कवि [अभ्यास के परिपक्व हो जाने पर] फाव्य-रचना के समस्त साधन-समुदाय के चरम सीमा को प्राप्त सौन्दर्य से युक्त कुछ अपूर्व सुकुमार [अ्पूर्व] विचित्र और [अपूव] उभयात्मक काव्य का निर्माण करते है। वे हो [सुकुमार, विचिन्न और उभयात्मक तीन प्रकार के] उन [कवियों] को प्रवृत्त करने वाले 'माग' कहलाते है। यद्यपि कवि स्वभावभेदमूलक होने से [कवियो और उनके स्वभावों के प्रनन्त होने से 'मार्गों' का भी] अ्रनन्तत्व प्राप्त होना अनिवार्य है परन्तु उसकी गएना असम्भव होने से साधारणत त्रंविध्य ही युक्तिसङ्भत है। इसलिए रमशीय काव्य के प्रहण करने के प्रसद्भ में (१) सफुमारस्वभाव [काव्य] एक [प्रथम] भेद है। उससे भिन्न शरमणीय [फाव्य] के अ्रनुपादेय होने से। (२) उस [सुकुमार] से भिन्न औरर रमसीयता चिशिष्ट [दूसरा भेद] 'विचित्र' कहलाता है। इन दोनो के ही रमरणीयं होने से इन दोनों की छाया [ह्वितय] पर आ्रश्रित (३) [उभयात्मक] अ्रन्य [तीसरे मध्यम भेद] का भी रमणीयत्व [मानना] ही युक्तिसङ्गत है। इसलिए इन [तीनो भेदो] में अलग-अलग अपने-अपने निर्दोष स्वभाव से तद्विदाह्लादकारित्व की [परि- समाप्ति] पूर्णता होने ने किसी की न्यूनता नहीं है। [तीनो ही भेद उत्तम काव्य हो सकते। उभयात्मक-मार्ग को मिश्रित रचना-शैली की दृष्टि से ही मध्यम मार्ग कहा है]।

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कारिका २४ ] प्रथमोन्मेष: [१० ३

ननु च शक्त्योरान्तरतम्यात् स्वाभाविकत्वं वक्तुं युज्यते, व्युत्पत्यभ्या सयो: पुनरा हाययो: कथमेतद् घटते। नैप दोष:, यस्मादास्तां, तावत्काव्यकरम. विपयान्तरेSपि सर्वस्य कस्यचिदनादिवासनाभ्यासाधिवासितचेतसः स्वभावानुसारिणावेव व्युत्पत्यभ्यासौप्रवर्तेते। तौ च स्वभावाभिव्यञ्जनेनैव साफल्यं भजतः । स्वभावस्य तयोश्च_परस्परमुपकार्योपकारकभावेनावस्थानात्, स्वभाव- स्तावारभते तौ च तत्परिपोपमातनुतः । तथा चाचेतनानामपि भावः स्वभाव- संवादिभावान्तरसन्निधानमाहात्म्यादभिव्यक्तिमासादयति, यथा चन्द्रकान्त- [मणायश्चन्द्रमसः करपरामशवशेन स्यन्दमानसहजरसप्रसरा, सम्पद्यन्ते ॥२४।। ऊपर के अनुच्छेद में यह कहा हैं कि 'मार्गों' का भेद देश-भेद के आधार पर नही अपितु कवियो के स्वभाव के आधार पर करना उचित होगा। और इसके पूर्व काव्य का कारण शक्ति, व्युत्पत्ति तथा अ्भ्यास इन तीन को बतलाया है। इस पर शङ्का यह हो सकती है कि इनमें से शक्ति को तो स्वाभाविक कहा जा सकता है परन्तु व्युत्पत्ति तथा अभ्यास यह दोनो तो स्वाभाविक नही 'हार्य' है। तब तन्मूलक काव्य में स्वभाव भेद को भेदक कैसे माना जा सकता है। इसी शङ्का का समाधान करने के लिए ग्रन्थकार ने अगला शनुच्छेद लिखा है। [प्रश्न (१) सुकुमार और (२) विचित्र] दोनो प्रकार की शक्तियों के आान्तरिक होने से [उनका] स्वाभाविकत्व कहा जा सकता है। परन्तु व्युत्पत्ति तथा झभ्यास [ये दोनों] तो [बाहर से प्राप्त होने वाले] श्रहार्य हैं। उनका यह [स्वाभाविकत्व] कैसे बन सकता है? [अर्थात् व्युत्पत्ति तथा अ्रभ्यास को स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता है। अतएव काव्यमार्गो का विभाजन स्वभाव के आधार पर करना उचित नहीं है]। [उत्तर] यह वोष ठीक नहीं है। क्योकि काव्य-रचना की बात छोड़ दें तो भी, अन्य विषयों में भी अनादि वासना के अभ्यास से सस्कृत-चित्त वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार ही व्युत्पत्ति तथा अ्रभ्यास होता है। औरोर वह व्युत्पत्ति तथा अभ्यास स्वभाव को अभिव्यकिति द्वारा ही सफलता प्राप्त करते हैं। स्वभाव तथा [व्युत्पत्ति और अ्रभ्यास] उन दोनों के उपकार्य और उपकारक भाव से स्थित होने से स्वभाव उन दोनो [व्युत्पत्ति तथा अ्भ्यास] को उत्पन्न करता है और वे [व्युत्पत्ति तथा अभ्यास] दोनो उस [स्वभाव] को परिपुष्ट करते है। इसलिए अ्चेतन [पदार्थो] का स्वभाव भी अपने स्वभाव के अ्नुरूप अन्य पदार्थों के सन्निधान के प्रभाव से अभिव्यक्ति को प्राप्त होता है। जैसे चन्द्रकान्तमखिपयाँ चन्द्रमा की किरणो के स्पर्शमात्र से स्वाभाविक रूप से जल को प्रवाहित करने लगती हैं। अर्थात् चन्द्रकान्तमणि का जो स्वभाव है वही चन्द्र की किरणो के स्पर्श से

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१०६ ] वकोक्तिजीवितम् [ कारिका २६

कविशक्तिसमुल्लसितमेव, न पुनराहार्य यथाकथञ्च्ित् प्रयत्नेन निष्पाद्यम्। कीशम्, 'सौकुमार्यपरिस्पन्दस्यन्टि' सौकुमार्यमाभिजात्य, तस्य परिस्पन्दस्त- द्विदाह्वादकारित्वलक्षणा रामणीयकं, तेन स्यन्दते रसमय सम्पद्यते यत्क तथोक्तम्। 'यत्र विराजते' शोभातिशय पुष्णातीति सम्बन्धः। यथा- प्रवृत्ततापो दिवसोऽतिमात्र- मत्यर्थमेव क्षणदा च तन्वी। उभौ विरोघक्रियया विभिन्नौ जायापती सानुशयाविवास्ताम्॥।७४।।'

कामपि कमनीयतां पुप्णाति। तथा च 'प्रवृतताप.' 'तन्वी' इति वाचकौ सुन्दरस्वभावमात्रसमपेणापरत्वेन वर्तमानावर्थान्तरप्रतीत्यनुरोधपरत्वेन प्रवृर्त्ति न प्रतिभा से उत्पन्न अलद्धारादि वह सव, अर्थात् कवि की प्रतिभा से ही उत्पन्न होने वाला हो, न कि वनावटी या प्रयत्नपूर्व जैसे-तसे सिद्ध किया हुआ [वंचित्र्प]। फिर कँसा, सुकुमार स्वभाव से प्रवाहित होने वाला । सौकमार्य श्रर्थात् उत्तमता [आभिजात्य] उसका परिस्प्रन्द अर्थात् तद्विदाह्लादकारित्व रूप रामणीयक, उससे प्रस्यन्दित अर्ात् रसमयता को प्राप्त होने वाला जो [चैचित्र्य], वह उस प्रकार का [वैचित्र्य] जहाँ चिशेष रप से शोनित होता है अर्थात् शोभातिशय को पुष्ट करता है [वह सुकमार नामक मार्ग है] यह सम्चन्ध हुआ। जैसे- [यह रघुवंश के १६वें सर्ग का ४५वाँ श्लोक है। इसमें ग्रीष्म का वर्शन करते हुए कवि कहते हैं कि आजकल] दिन अत्यन्त सन्तापयुक्त [और वडा] तथा रात्रि अ्त्यन्त ही क्षीसा [छोटो] हो गई है। दोनों विरोधी क्रिया [रात्रि के अत्यन्त छोटा और दिन के अत्यन्त वडा हो जाने रूप, तथा पति-पत्नी के प्रशय-कलह आदि रूप विपरीत क्रिया] के फारण [विभिन्न ] परस्पर विर्द्व हो जाने पर [पीछे] पश्चा- साप-युक्त दम्पति के समान हो [दिन सन्ताप-युक्त और रात्रि क्षीए] रहे है ॥७४॥ इसमें इ्लेप की छाया से युक्त, कवि की शक्तिमात्र से स्फुरित होने वाला भ्रदृत्रिम [उपमा] पलद्धार कुछ प्र्पूर्ज तौन्दर्य को परिपोषित कर रहा है। जसे कि 'प्रवृत्तताप' औौर 'तन्वी' यह दोनों वाचक [शन्त] सुन्दर स्वभाव मात्र के समर्पक [वर्सनपरक] रप से वर्तमान होने से [पति के सन्ताप तथा पत्नी के कृशत्व रूप] श्र्रन्य अवं की प्रतीनि के अनुरोधपरत्वेन प्रवृत्त नहीं होते हैं [प्रर्थात् पति-पत्नी विपयक दूसरे अर्य का अमिया शनिति से वोध नहीं कराते है। इसका यह अभिप्राय १ रघुदग ६६,४५।

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कारिका २६ ] प्रथमोन्मेष: [१०७

सम्मन्येते। कविव्यक्तकौशलसमुल्लसितस्य पुनः प्रकारान्तरस्य प्रतीतावानुगुएय- मात्रेण तद्विदाह्ादकारिता प्रतिपद्य ते। किं तत्प्रकारान्तरं नाम। विरोधविभिन्नयोः शव्द्योरर्थान्तर प्रतीतिकारिणोरुपनिवन्धः । तथा चोपमेययोः सहानवस्थानलक्षणो विरोध: स्वभावभेद्लक्षाञ्त्र विभिन्नत्वम्। उपमानयोः पुनरीर्ष्याकलह- लक्षणो विरोधः, कोपात् पृथगवस्थानलक्षणं विभिन्नत्वम् । 'अ्र्प्रतिमात्रम' 'अत्यर्थम्' चेति विशेषणाद्वितयं पक्द्वयेSपि सातिशयताप्रतीतका रित्वेनातितरां रमणीयम्। श्लेपच्छायोत्क्लेशसम्पाद्याऽप्ययत्नघटितत्वेनात्र मनोहारिणी। यश्च कीदशः-'अम्लानप्रतिभोद्विन्ननवशव्दार्थेवन्धुरः' । अ्र््रम्लाना यासावदोपोपहता प्राक्तनाद्यतनसंस्कारप्रौढ़ा प्रतिभा काचिदेव कविशक्तिः, तत उद्धित्रो नूतनांकुरन्यायेन स्वयमेव समुल्लसितौ, न पुनःकदर्थनाकृष्टौ, नवौ प्रत्यग्रौ तद्विदाह्ादकारित्वसामध्येयुक्तौ, शब्दार्थावभिधानाभिधेयौ ताभ्यां वन्धुरो है कि, यद्यपि 'प्रवृत्ततापः' तथा 'तत्वी' यह दोनों शब्द दिन-रात के सन्ताप तथा कशता और पति-पत्नी के सन्ताप एव कशता-रूप दोनों शथो को बोित कर सकते हैं परन्तु प्रकररावश ग्रीष्म ऋतु का वर्णन होने से एकार्थ में ही नियन्त्रित हो जाते है। इसलिए अर्थान्तर की प्रतीति के साघक घर्थात वाचफ नहीं होते है] परन्तु कवि कौशल से समुल्लसित ['विरोध' तथा 'विभिन्न' शब्दों के प्रयोग रूप] दूसरे प्रकार की [दम्पति के प्रराय-कलह आरादि रूप अर्यान्तर की] प्रतीति में अनुकूल होने मात्र से [द्वितीयार्थ की प्रतीति करा कर] सहृदयाह्ादकारित्व को प्राप्त होते हैं। वह प्रकारान्तर क्या है कि-अर्यान्तर की प्रतीति करने में हेतुभूत [अर्थान्तर- प्रतीति की प्रेरणा करने वाले] 'विरोध' और 'विभिन्न' शन्दों का प्रयोग। [उस 'विरोध' तथा 'विभिन्न' शब्दो के प्रयोग के कारण अर्थान्तर प्रतीति में सहायता मिलती है] जसे कि उपमेयभूत [दिवस तथा क्षरदा रात्रि] में सहानवस्थान रूप विरोध और स्वभावभेद रूप विभिन्नत्व है। [अर्थात् दिन और रात की एक साथ स्थिति सम्भव न होने से उनमें सहानवस्थान रूप विरोध और उन दोनो का स्वभाव भिन्न है यह उनका विभिन्नत्व है] और उपमानो [जाया तथा पति] का ईर्ष्या कलह स्प विरोध तथा क्रोध के कारण अलग-अलग रहने लगना रूप विभिन्नत्व है। 'अतिमात्र' ता ्यर्' य ोनो विशेषण दोनों ही पक्षों में सातिशयता ी प्रतीति कराने वाले होने से अत्यन्त रमसीय है। और इलेष को छाया तनिक क्लेश साध्य होने पर भी स्वाभाषिक रूप से [बिना प्रयत्न के] आा जाने से यहां बहुत सुन्दर' बन पड़ी है॥२८॥। [कारिका २५]-और फिर जो [ बन्ध]कंसा कि, अम्लान प्रतिभा से समुव्भूत पभिनव शन्द तथा अर्थ के कारख सुन्दर'। अम्लान अर्था्त् दोषो से अनुपहृत, पूर्वजन्म के और इस जन्म के सस्कारो के परिपाक से प्रौढ़, प्रतिभा रूप जो श्रनिर्वचनीय कोई भ्रपूर्व .

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१०८ l यकोपितजी वितम् [कारिका २६ हदयहारी। अन्यन्च कीहश-'अयत्नविहितम्वल्पमनोहारिविभूपस"। अयत्नेनाक्लेशेन विहित कृर्त यत् स्वल्पं मनाड्मात्रं मनोहारि हृदयाह्नाढकं विभूपएमलक्करणा यत्र स तथाक्त। स्वल्पगन्दोऽन्र प्रकरणाद्यपेक्ष न वाक्य- मात्रपर'। उदाहरण यथा- वालेन्दुवकारायविकासभावाद्, वभु पलाशान्यतिलोहितानि। सद्यों वसन्तेन समागताना नखक्षतानीव वनस्थलीनाम्।।७५।।9 कवि-शक्ति, उससे उद्भन्न प्रर्थात् नवीन भकुर के समान स्वय समुल्लसित न कि जबरदस्ती खींचन्तानकर निकाले गये, नवीन [पिष्टपेषण करने वाले वासी नहीं] एकदम अ्रभिनव सहृवयो के श्रह्ावकारित्व की सीमर्थ्य से युक्त जो [अभिधान औौर अभिषय] शब्ब औरर अ्पर्थंथ उन वोनों से [बत्धुर] हृदयहारी। और कैसा कि, बिना प्रयत्न के [स्वाभाविक रूप से] आए हुए परिमित मनोहर अलद्धारों से विभूषित। बिना प्रयत्न के अर्थात बिना वलेश के किये हुए जो परिमित स्वल्पमात्र मनोहारी हृवया- ह्लादक विभूषण अलद्ार जिसमें हो वह [सुकुमार-मार्ग कहलाता है]। [प्रकृत स्थल में]'स्वल्प' शब्द प्रकर की अ्र्परपेक्षा से है केवल वाक्य [एक इ्लोक] परक नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि केवल एक श्लोक में ही नही अपितु प्रकरख में ही स्वल्प अलद्धारो का प्रयोग होना चाहिए। और जो भी अलक्कार आवें वे बिलकुल स्वाभाविक रूप से बिना किसी विशेष प्रयत्न के होने चाहिएँ। अलद्दार लाने के प्रयत्नपूर्वक जो अलद्कार का प्रयोग किया जाता है वह सहृदयहृदयहारी नही होता है। यही वक्रोवितजीवितकार कुन्तक का मत है। इसलिए 'अयत्नविहितस्वल्पमनोहारि- विभूपण' से युक्त बन्ध वाला मार्ग ही 'सुकुमार मार्ग' कहलाता है। इसी 'अपृथक्यत्नसाध्य' अलद्धार की उपयोगिता का प्रतिपादन ध्वन्यालोक- कार ने इस प्रकार किया है- रसाक्षिप्ततया यस्य वन्घ शक्यक्रियो भवेत्। उदाहर जँसे- अ्पृथग्यत्ननिर्वर्त्य सोऽलद्कारो ध्वनी मत ।।२ [पूरस रप से] विकसित न होने के कारण [द्वितीया के] वाल-चन्द्रमा के तमान वक और शत्यन्त रकतवर्ण ढाक [के फूल], वसन्त [रूप पति] के साथ समागम फरने वाली [नायिकारपिरगी] वनस्यलियों के [वक्षस्थल आादि पर श्रद्धित] नराक्षतो के समान सुश्नोभित हुए।।७५॥। १ कुमारसम्भव ३, २६। २ ध्वन्यालोक २, १६ ।

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फीरिका २६ ] प्रथमोन्मेष. [१०६

अत्र 'वालेन्दुवक्राणि' 'अतिलोहितानि' 'सद्ो वसन्तेन समागतानाम्' इति पदानि सौकुमार्यात् स्वभाववर्णनामान्रपरत्वेनोपात्तान्यपि 'नखन्तानीव' इत्यलङ्करसास्य मनोहारिण क्लेश विना स्वभावोद्विन्नत्वेन योजना भजमानानि चमत्कारितामापद्यन्ते। यश्चान्यच्न कीहश .- 'भावस्वभावप्राधान्यन्यक्कृता हार्यकौशल'। भावा. पदार्थास्तेपां स्वभावस्तत्व, तस्य प्राधान्य मुख्यभावस्तेन न्यक्कृतं तिररकृतम् : आहार्य व्युत्पत्तिविहितं कौशलं नैपुएयं यत्र स तथोक्त। तद्यमभिप्राय .- पदार्थ परमार्थमहिमैव कविशक्तिसमुन्मीलितः, तथाविधो यत्र विजम्भते येन विविध- मपि न्युत्पत्तिविलसित काव्यान्तरगतं तिरस्कारास्पदं सम्पद्यते। त्र्रत्रोदाहरणं रघुवंशे मृगयावर्णनपरं प्रकरसाम्। यथा- तस्य स्तनप्रणयिभिर्भु महुरेणशावै- व्यौहन्यमानहरिणीगमनं पुरस्तात्।

यहां [इस उदाहरण में] 'बालेन्दुवकाणि', प्रतिलोहितानि' औरर 'सद्यो वसन्तेन समागताना' ये पद केवल स्वभावमात्र के वर्णनपरक रूप में गृहीत होने पर भी 'नखक्षतानीव' इस [पद से द्योत्य]-सुन्दर और अनायास [बिना कलेश के स्वभावत ] व्यक्त होने वाले [उपमा रूप] अलद्धार के साथ मिलकर [अत्यन्त] चमत्कार-युक्त हो रहे है ।।३५।। [कारिका २६]-और जो [बनध] कैसा कि, 'भाव के स्वभाव [वणन] के प्राधान्य के पारए [प्रयत्नसाध्य] 'हार्य' कौशल को तिरस्कार [उपेक्षा] करने वाला' है। भाव अर्थात्ं पदार्थ, उनका स्वभाव अर्थात् तत्त्व, उसका प्राधान्य अर्थात् मुख्यता, उससे तिरस्फृत कर दिया है आ्र्हार्य अर्थात् व्युत्पत्ति से उपाजित, कौशल अर्थार्त् निपुणता [कृत्रिम या बनावटी चमत्कार] को जिसमें उस प्रकार का [बन्ध]। इसका यह अभिप्राय हुआ कि जहाँ कवि की [प्रतिभा रूप] शक्ति से उन्मीलित पदार्थ के स्वभाव [स्वाभाविक सौन्दर्य] का चमत्कार ही उस प्रकार का [अलौकिक-सा] प्रतीत होता है कि जिसके सामने अन्य काव्यों का श्रदेक प्रकार का व्युत्पत्तिजनित [कृत्रिम] सौन्दर्य हेय [तिरस्कार के योग्य] प्रतीत होने लगता है। इसका उदाहरण रघुवंश [के नवम सर्ग], में मृगया वर्णनपरक प्रकरण है। [उस प्रकरण में से एक श्लोक इस प्रकार यहाँ दिया जा सकता है] जैसे- दूध पीने वाले छोटे-छोटे मृगशावकों के द्वारा जिस [भुण्ड] मे, [भागती हुई] हरिशियों के चलने में वोधा डाली जा रही है, और जिसके आगे गर्वयुक्त कृष्सासार मृग चल रहा : [आधे खाए हुए] कृशो को मुख में दवाए हुए इस प्रकार

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११० ] वक्रोक्तिजीवितम [ कारिका २६

आविर्वभूव कुशगर्भमुख सृगाणा यूथं तदग्रसरगर्वितकृष्णसारम् ।७६।।१ यथा च कुमारसम्भवे- दवन्दानि भावं क्रियया विवन:॥७७|२ इत' पर प्राशिधर्मवर्णनम् यथा- श्रृंगेण च स्पर्शनिमीलिताक्षी सृगीमकराडूयत कृष्णसार: ।1७द 1 13 अन्यच्च कीदश :- 'रसादिपरमाथेज्ञमन.संवादसुन्दर.'। रसाः शृङ्गारा- दयः । तदादिग्रहणेन रत्यादयोऽपि गृह्यन्ते। तेषा परमार्थः परमरहस्यं, का मृगों का झुण्ड उस राजा को सामने भागता हुआ दिखलाई दिया॥ ७६ ॥

श्लोक में आए हुए]- और जैसे [महाकवि कालिदास के ही] कुमारसम्भव में ।तृतीय सर्ग के ३५वें

[वसन्त के आाने पर वन में प्रायो के] जोडो ने अपने [रति विषयक] भावो को क्रिया से प्रकाशित किया। यहाँ से आगे [४२वें श्लोक तक] प्रारियों के धर्म का वर्रन। [उसमें से 1 उदाहर रार्थ एक श्लोक को यहां उद्धृत कर रहे है] जैसे- यह पूरा श्लोक इस प्रकार है- मधु द्विरेफ कुसुमकपात्रे पपौ प्रिया स्वामनुवर्तमान। शृङ्गेणा च स्पर्शनिमीलिताक्षी मृगीमण्डूयत कृष्णसार ।।* [वसन्त के आररागमन होने पर] अपनी प्रिया का अनुगमन करने वाला भौंरा, फसुम र्प एक ही पात्र में [उसके साथ] मघु का पान करने लगा और- कृष्णासार-मृग, स्पर्श [के सुख] से आंखें वन्द की हुई मृगी को अपने सींगों से खुजलाने लगा॥७८॥। रघुवश तथा कुमारसम्भव के इन प्रकरणो में और उनमें से उद्धृत इन दोनो श्लोको में मृगो का बडा स्वाभाविक वर्णन हुआ है। उसमें किसी प्रकार की कृत्रिमता नही आाने पार्ड है। इसलिए इस स्वभावोवित में अत्यन्त अप्रलौकिक चमत्कार प्रतीत होता है। स्वभावोक्तिवादी पक्ष इसी को स्वभावोक्ति का चमत्कार कहता है। और उसके लिए वह आहार्य कौशल या वक्रोवित को अ्नुपयुक्त समभता है। कुन्तक इस स्वभावोक्ति को भी, वर्णान का एक अलौकिक वक्रमार्ग हीने से 'वक्रोक्ति' ही कहते हैं और उसे सुकमार-मा्ग का नाम देते है। और किस प्रकार का [बन्ध सुरुमार मार्ग में अरपेक्षित है फि]-'रसादि के तत्त्व फो १ रघुवश ६, ५। २ कुमारसम्भव ३ ३५। ३-४ कुमारसम्भव ३, ३६ ।

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कारिका २६ ] प्रथमोन्मेषः [ १११

तज्जानन्तीति तन्ज्ञाः, तद्विदः, तेपां मनःसंवादो हृदयसंवेदनं स्वानुभव- गोचरतया प्रतिभास:, तेन सुन्दर: सुकुमारः, सहदयहदयाह्नादकारी वाक्योप- त्मेवन्ध इत्यर्थः। त्र्प्रन्नोदा हरणानि रघौ रावणं निहृत्य पुष्पकेणगच्छतो रामस्य सीतायास्तद्विरहविघुरह्ृदयेन मयास्मिन्नस्मिन् समुद्दशे किमप्येवंभूतं वैशसमनु- भूतमिति वर्णयतः सर्वाएयेव वाक्यानि। यथा- पूर्वानुभूतं स्मरता च रात्रौ कम्पोत्तरं भीरु तवोपगूढम्।

जानने वालों के मन के अनुरूप होने से सुन्दर। रस अर्थात् शृङ्गार आदि। रसादि पद से रत्यादि [स्थायी भाव तथा रसाभास, भाव, भावाभास आदि] भी गृहीत होते है। [अनौचित्य से वर्णन किए गए रसो को 'रसाभास' औ्रर देवादि विषयक रति को 'भाव' कहते हैं। ऊपर रघुंवश तथा कुमारसम्भव के उदाहरणों में मुगों की शृङ्गार-चेष्टाश्र का वर्णन है वह 'रस' नहीं अपितु रसाभास'माना गया है। यहां ग्रन्थकार ने उसे सुकुमार मार्ग के उदाहरण में दिया है। इसलिए उन्हें 'रस' शब्द की व्यास्या करने की आवश्यकता पड़ी। 'रस्यते इति रस" इस व्युत्पत्ति के अनुसार अन्य आचार्यों ने भी 'रस' शन्द से स्यांयीभाव, रसाभास, भाव और भावाभास आदि का ग्रहण किया है। यहाँ भी कुन्तक उन सबके ग्रहण के लिए यह लिख रहे है कि तवादि ग्रहस से रत्यादि भी ग्रहसा किए जाते है]। उनका जो परमार्थ अर्थात् परम रहस्य उसको जो समझते हैं वे 'तज्ज' अर्थात् रसादिपरमार्थज्ञ हुए, उनका मन संवाद अर्थात् हृदयसवेदन अर्थात् स्वानुभवगोचरतया साक्षात्कार, उससे सुन्दर अर्थात् सुकुमार अर्थात् सहृदय-हृदयाह्ाव- कारो वाक्य की रचना। इस [रसादिपरमार्थज्ञमनःसंवादसुन्दर:] के उदाहरण रघुवश में रावण को मारकर पुष्पक [विमान] से लौटते हुए राम के, सीता से 'तुम्हारे [सीता के ] विरह से दुःखित हृदय, मेने अ्रमुक प्रदेश में कुछ इस प्रकार क दु.ख अनुभव किया था' इसका वर्न करते हुए [रामचन्द्र के] सव ही वाक्य है। [उनमें से उवाहरणार्य एक श्लोक निम्न रूप से उद्धृत करते है] जैसे- हे भीर [डरपोक स्वभाव वाली सीते] रात्रि में [वर्षा ऋतु में रात को ग्जन करते हुए मेघो की भयानक गड़गडाहट को सुनकर भय से काँपती हुई जब तुम मुझ से चिपट जाती थीं तुम्हारे उस] पूर्वानुभूत कम्पप्रधान पलिङ्गन को स्मरण करते हुए मैंने [तुम्हारे वियोग-काल में वर्षा ऋसु की रात्रियो में उसी प्रकार के धन गर्जन के होने पर इस पर्वत की] गुफाओ में [भी] भर जाने वाले

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११२ ] वकोषितिजीवितम् [ कारिका २६

गुहाविसारयतिवाहि तानि मया कथन्चिद् घनगर्जितानि ।७६/।१ तत्र राशिद्वयकरणस्यायमभिप्रायो यद् विभावादिरुपेण रसाङ्गभूताई शकुनिरुत तरु-सलिल कुसुमसमयप्रभृतय' पदार्था सातिशयस्वभाववर्णनप्राधा न्येनैव रसाङता प्रतिपद्यन्ते। तद्व्यतिरिक्ता सुर-गन्वर्वप्रभृतय सोर्त्कषचेतना- योगिन शृद्गारादिरसनिर्भरतया वर्यमाना सरसहदयाह्वानकारितामाया- न्तीति कविभिरभ्युपगतम्। तथाविधमेव लक्ष्ये दृश्यते। त्रन्यच्च कीदशः-'अरविभावितसस्थानरामणीयकरञ्जक'। तरविभावित- मनालोचित सस्थानं संस्थितिर्यत्र तेन रामणीयकेन रमणीयत्वेन रञ्जक सहदय- हृदयाह्नादक। तेनायमर्थ-यदि तथाविध कविकौशलमन्र सम्भवति तद् व्यपदेष्टुमियत्तया न कथञ्ज्िदपि पार्यते, केवलं सर्वातिशायितया चेतसि परिस्फुरति । यश्च कीदश .- 'विधिवैदग्ध्यनिष्पन्ननिर्माणातिशयोपम'। विधि- मेघ के गर्जनों को किसी प्रकार [महता फष्टेन] सहन किया॥७६॥ यहाँ ['भावस्वभावप्राधान्यन्यक्कृतहार्यकौशल', तथा 'रसादि परमार्थज्ञमन सवादसुन्दर' इस प्रकार के] दो विभाग करने का यह अभिप्राय है कि विभाव आदि रूप से रस के श्रङ्गभूत पक्षियो के शब्द, वृक्ष, जल, और पुष्प-समय [वसन्त] आ्ररादि पदार्थ अ्तिशय युक्त स्वभाव-वर्णन की प्रघानता [होने] से ही रस [की अ्ङ्गता को प्राप्त] के श्रङ्ग होते है। [इसी के वोधनार्थ पहिला विशेषण और उदाहरण रखा है] और उनसे भिन्न विशिष्ट चेतना से युक्त, देव गन्वर्वं पदि,शृङ्गारादि रस से परिपूर्णग रूप से वशिगत होने पर सहृदयो के हृदायाह्ादकारी होते है, यह कवियो ने माना हुआ है। उसी प्रकार उदाहररो [लक्ष्यभूत काव्यादि] में दिखलाई देता है ॥२६॥ [कारिफा २६]-प्रौर कैसा [बन्ध सुकुमार मार्ग के अनुरूप होता है कि]अ्र्रविभा वित जो सस्थान की रमसीयता उससे मनोहर।श्नविभावित अर्ात् अ्नालोचित [अथात विचार या प्रयत्नपूर्वक नहीं अपितु स्वाभाविक रूप से अनायास विरचित, पदादि का जो] सस्यान अ्रर्थात् स्थिति जिसमें हो उस, रामणीयक अर्थ्थात् सौन्दर्य से, रज्जक अर्ांत सहृदयों के हृदय को आह्हादित करने वाला। इमलिए यह अर्थ हुआ कि-यदि इस प्रकार का कवि का कौशल [यहाँ] रचना में होता है तो उसको 'इतना' [सौन्दर्य है इस] रूप से सीमित करके कसे भी नहीं कहा जा सकता है। वह केवल सर्वातिशायी रप से [सहृदयो फे] चित्त में प्रतीत होता है। औ्र्परोर जो फंसा कि, 'विधाता की निपुणता से निर्मित जो [सर्गादि] रचना का १ रघुवर १३, २८।

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कारिका २६ ] प्रथमोन्मेप. [ ११३

विधाता तस्य वैदग्व्यं कौशल, तेन निष्पन्न: परिसमाप्तो योसौ निर्माणातिशय. सुन्दर: सर्गोल्लेखो रमणीयरमसीलावएयाटि., स उपमा निदर्शनं यस्य स •जथोक्तः। तेन विधातुरिच कवे कौशलं यत्र विवेक्तुम शक्यम्। यथा- ज्यावन्घनिप्पन्दभुजेन यस्य

कारागृहे निर्जिंतवासवेन दशाननेनोषित माप्रसादात् ।८0।। अत्र व्यपदेशप्रकारान्तरनिरपेक्ष कविशक्तिपरिणाम. परं परिपाक- मघिरूढ: । प्रतिशय उसके सद्श। 'विधि' अर्ात् विधाता [ब्रह्मा] उसका वैदग्व्य अर्भात् कौशल [चतुरता], उससे निप्पन्न अर्यात् पूर्ण हुआ जो रचनातिशय अर्ात् सुन्दर सृष्टि रचना रूप रमशीय रमणगी-लावण्य आदि वह [ही] उपमा भर्थात् उदाहरण है जिसका, वह उम प्रकार का [विधिवदग्ध्यनिष्पन्ननिर्मार्रगातिशयोपम ]। इसलिए जहाँ [जिस बन्ध में] विधाता के कौशल के समान कवि का कौशल श्वर्नीय हो [वह वन्ध सुकुमार्ग-मार्ग कहलाता है ] जसे- [कार्तवीर्य के द्वारा] प्रत्यञ्चा से वांध दिए जाने के कारण जिस [रावण] को भुनाएँ व्यर्थ [निश्चल] हो गई है, और जिसके [दसों] मुखों की परम्परा हांफ रही हूँ [एसी दयनीय अ््वस्था में], इन्द्र को भी जीतने वाले लंकेश्वर [रावण को भी] जिस [कार्तवीर्यं] के कारागृह में उसकी कृपा होने पर्यन्त पड़ा रहना पड़ा। [अर्थात् उस कार्तवीर्य को कृपा से ही कारागार से छूट सका अपनी शक्ति से नहीं] ॥८०॥ यहां [इस श्लोक में] के अ्र्न्य प्रकार के विशेषण [व्यपदेश] से निरपेक्ष, कवि का शक्लि [प्रतिभा] का परिणाम चरम परिपाक को प्राप्त हो गया है। [यह श्लोक रघुवश के छठे सर्ग में इन्दुमता के स्वयम्वर के वर्णन में से कार्तवीर्य के वशधर प्रतीप नामक राजा के परिचय के प्रसङ्ग में सुनन्दा ने कहा है। इसमें उस प्रतीप नामक राजा के पूर्वच कार्तचीर्य के प्ररभाव का वर्णन किया है। जिसने इन्द्र को भी जीतने वाले रावण को पकड़कर अपने कारागृह में डाल दिया था। उस रावण की दुर्दशा को 'ज्यावन्धनिपन्दभुजन' और 'चिनि शवसद्वक्तपरम्परेण' इन दोनों विशेषणों के द्वारा कवि ने जिस सुन्दरता से व्यक्त किया वह शायद किसी अ्रन्य प्रकार से उतनी सुन्दरता से अभिव्यकत नहीं हो सकती थी। इसलिए ग्रन्यकार ने 'व्यपदेशप्रकारन्तरनिरपेक्ष' लिखकर कवि की प्रतिभा के परिणाम को परम परिपाक फोटि पर घिरढ कहा है।।२७।। १. रघुवंश ६, ४० ।

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११४ ] वक्रोक्तिजीवितम् [ कारिका ३०

एतस्मिन् 'कुलके'-प्रथमश्लोके प्राधान्येन शब्दालङ्गरणायो सौन्दर्य प्रतिपादितम्। द्वितीये वर्रानीयरय वरतुन सौकुमार्यम्। तृतीये प्रकारान्तर- निरपेक्षस्य सन्निवेशश्य सौकुमार्यम्। चतुर्थे वैचित्यमपि सौकुमार्याविसवादि विधेयमित्युनम्। पञ्चमो विपयविपयिसौकुमार्यप्रतिपादनपर ॥२५-२६॥। एव सुकुमाराभिधानस्य मार्गस्य लक्षसां विधाय तस्यैव गुणान् लक्षयति- त्ररसमस्तमनोहारिपदविन्यासजीवितम्। माधुर्यं सुकुमारस्य मार्गस्य प्रथमो गुखः॥३०॥ असमस्तानि समासवर्जितानि मनोहारीणि हृदयाह्वादकानि श्रुति रम्यत्वेनार्थरमसीयत्वेन च यानि पदानि सुप्निडन्तानि, तेपां विन्यास. सन्निवेश- वैचित्र्य, जीवित सवस्व यस्य तत्तथोत्तम्। माधुर्य नाम सुकुमारलक्षस्य मार्गस्य प्रथम प्रधानभूतो गुए। त्र्प्रसमस्तशन्दोऽन्र प्राचुर्यार्थ:, न स्वभाव- नियमार्थ। उदाहरण यथा- [सुकुमार मार्ग के लक्षण परक २५ से २६ कारिका तक के पाँच श्लोक वाले] इस 'वुलक' [चार इलोको से अधिक का एक साथ अन्वय होने पर उस इलोक- समुदाय को 'कुलक' कहते है] मे से प्रथम श्लोक में प्रधान रूप से शब्द औरर प्रलङ्कारो के सौन्दर्य का प्रतिपादन किया है। वूसरे [श्लोक] में वर्णनीय वस्तु के सौकुमार्य का, तीसरे में अन्य भेदो से निरपेक्ष सन्निवेश के सौकुमार्य का [प्रतिपादन किया हं। चतुर्थ [श्लोक] मे सौकमार्य का अविरोधि वैचित्र्य भी [काव्य में प्रयुक्त] करना चाहिए यह कहा है। और पाँचवाँ [श्लोक] विषय तथा विषयी [लक्ष्य श्ौर लक्षस] के सौकुमार्य का प्रतिपादन कर रहा है ॥२५-२६॥ इस प्रकार सुकुमार नामक मार्ग का लक्षण करके उसी [मार्ग] के गुगों का निरपण [लक्षण] करते हैं- समास-रहित मनोहर पदो का विन्यास जिसका प्राए है इस प्रकार का 'माघुर्य' [गुण] सुकुमार-मार्ग का सबसे पहिला गण है ।३०।। अ्र्प्रसमस्त प्र्र्थात् समास-रहित, मनोहर अर्थात् सुनने में रमीय और श्ररथंत सुन्दर होने से हृदयाह्लादक, जो सुबन्त तिडन्त रूप पद, उनका विन्यास अर्थात् रचना- वचित्र्य जिसका प्राणभूत है उस प्रकार का [अ्रसमस्तमनोहारिपदविन्यासजीवितम्]L 'माधुर्य' नाम का [गुण] मुकमार रूप मार्ग का प्रथम अर्थात प्रधानभूत गुए है। 'प्रममस्त' पद यहां [समासविहीन पदो के] प्राचुर्य के [बोधन] के लिए [रखा गया] हैं। [समास के प्रभाव के नियम] अ्रपरिहायंत्व [प्रतिपादन करने] के लिए नहीं। [अर्थात् समास का नितान्त अ्रभाव आ्ररवश्यक नहीं है। स्वल्प मात्रा में छोटे समास भी माधुयं गुए में प्रयुक्त हो सकते है। उस का उदाह रस आागे देते है] जैसे-

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कारिका ३१ ] प्रथमोन्मेष: [ ११५

क्रीडारसेन रहसि स्मितपूर्व मिन्दो- लेखा विकृष्य विनिव्य च मून्नि गौर्या। किं शोभिताहमनयेति शशाङ्गमौले: पृष्टस्य पातु परिचुम्बनमुत्तर वः ॥ =? ।। पदानामसमस्तत्वं शब्दार्थरमसीयना विन्यासवैचित्यं च त्रितय- मपि चकास्ति॥३०।। तदेवं माधुर्यमभिवाय प्रसादमभिवत्ते- अक्लेशव्यज्जिताकूतं भगित्यर्थेसमपेशाम् । रसवक्रोक्तिविपयं यत् प्रसाद: स कथ्यते।३१।। भगिति प्रथमतरमेवार्थसमर्पएं वस्तुप्रतिपाठनम्। कीहशम्, 'अ्र्प्रक्लेश- व्यक्जिताकृतम्', त्रकदर्थनाप्रकटिताभिप्रायम्। किंविपयम्, 'रसवक्राक्तिविपयम्। रसा. शृङ्गाराठय, वक्रोक्ति सकलालद्वारसामान्य, विपयो गोचरो यस्य तत्-

एकान्त मे रतिक्रीडा के रस से मुस्कराते हुए पार्वती के द्वारा चन्द्रमा को रेखा को [शिव के मस्तक पर से] खींचकर औ्रर [अपने] सिर पर लगाकर, क्या में इस [चन्द्रमा की रेखा] से शोभित होती हूँ इस प्रकार पूछे गये [शशाङ्मौलि] शिव का [पार्वती को अ्थवा उसके व्याज से चन्द्रलेखा को प्रदान किया हुआ] परिचुम्बन रुप उत्तर तुम्हारी रक्षा करे ॥८१॥ यहाँ [इस उदाहरण में] पदो का समासरहित होना, शब्द और अर्थ को रमरीयता, तथा रचना की निचित्रता यह तीनों ही प्रतीत रहे है। [अतएव यह इलोक माघुर्य गुए का उत्तम उदाहरण है] ।३०।

कहते है- इस प्रकार माघुर्य [गृण] को कहकर [आगे] प्रसाद [गुर] को

रस तथा वकोक्ति के विषय में बिना किसी कलेश के [अनायास सरलतापूर्वक] अभिप्राय को व्यक्त कर देने वाला, तुरन्त अर्थ का प्रतिपादन रूप जो [गुए है] वह "प्रसाद' [नाम से] कहा जाता हैँ ॥।३१।। भगिति, [सुनने के साथ] प्रथमतर ही अर्थसमर्पण पर्ात् वस्तु का प्रतिपादन। कैसा, 'बिना कलेश के अभिप्राय को प्रकट करने वाला' अर्यात् विना खंचतान के अर्थ को प्रफट करने वाला। किस विषय में, 'रस औ्र वकोकिति विषय में' रस [शब्द से] शृङ्गार आदि और वकोषित अरथथातत सामान्य रूप से समस्त अलङ्धार जिसके विषय अर्थात गोचर है, वह उस प्रकार का [रस-वक्रोषित-विषय]। वह ही

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११६ ] वक्रोपितिजीवितम् [फारिका ३१

तथोक्तम्। स एव प्रसादास्यो गुणो कथ्यते भरयते । श्रत्र पदानामसम- स्तत्वं प्रसिद्धाभिधानत्व तरव्यवहितसम्वन्धत्व समाससङ्गावेऽपि गमकसमाम- युक्तता च परमार्थ। 'श्रराकृत' शब्दस्तात्पर्यविच्छित्ती च वर्तते। उदाहरएं यथा- हि मव्यपायाद्विशदाघराणा- मापाएडुरीभृतमुखच्छवीनाम्। स्वेदोदगम: किम्पुरुपाद्गनाना चक्रे पदं पत्रविशेपकंपु ॥८२॥। अ्रत्रासमस्तत्वादि सामग्री विद्यते। यदपि विविधपत्रविशेपकचैंचित्र्य- विहितं किमपि वटनसौन्दर्य मुत्तकारस्वेदलवोपवृ'हित तदपि सुव्यत्तमेव। यथा वा-

'प्रसाद' नाभक गृए कहलाता है। यहां [प्रसाद-गुणा में] (१) पदो का समासहीन होना, (२) प्रसिद्ध अर्थ का प्रतिपादफ होना, (३) [अयं के साथ] बिना व्यवधान [लक्षणणा आरदि] के [साक्षात्] सम्बन्ध होना और (४) समास होने पर भी स्पपटार्थक समासयुवतता होना यह [प्रसाद-गुण का ] वास्तविक रहस्य है। [कारिका में] 'आाकूत' शब्द तात्पर्य के सौन्दर्य [प्रतिपादन] मे [प्रयुक्त हुआ्र्र्रा] हैं। [उस प्रसाद-गुण का] उदाहरण जैसे [कुमारसम्भव ३, ३३]- [वसन्त ऋतु का आ्र्प्रागमन होने पर] हिम [जाडे अथवा बर्फ] के हट जाने से स्वच्छ अ्रधर वाली [जाडे के दिनो में हाथ, पैर, होंठ शदि फट जाते है। इसलिए हिम-व्यपाय में विशदाघरत्व का कथन किया है] और गौरत्व को प्राप्त मुख कान्ति वाली किम्पुरुषो की स्त्रियों के [कपोलों पर बने हुए] पत्र-विशेषक [रूप अलद्धारो] में पसीने के उद्गम ने अपना स्थान बना लिया। [अथात् गालों पर बने पत्रविशेषको पर पसीना आना आरम्भ हो गया] ।८२॥ यहां [इस उवाहरण में भी] अ्र्प्समस्तत्व आ्दि सामग्री विद्यमान् है। औ्रर [तात्पर्य विच्छित्ति का द्योतक] जो नाना प्रकार के पत्रविशेषको के वैचित्र्य से विहित मुख का अपूर्व सौन्दर्य है वह मोतियो के आकार वाले पसीने की बूँदों से और भी बढ़ गया है वह भी स्पष्ट रूप से प्रतीत हो रहा है। [इसलिए यह प्रसाव-गुण का उत्तम उदाहरण है]। अथवा जैसे [उसी प्रसाद-गुण का दूसरा उदाहरण रघुवश के छठे सर्ग में इन्दुमती के स्वयवर के अवसर पर हेमाङ्गव नामक कलिङ्ग देश के राजा के वणन- प्रसद्ग में सुनन्दा का कहा हुआ निम्नलिख़ित श्लोक]-

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का ३२ j प्रथमोन्मेप:

त्र्प्रनेन सार्ध विहराम्बुराशे- स्तीरेषुता ड़ीवनमर्मरेु। द्वीपान्तरानीतलवङ्गपुष्पै रपाककृतस्वेदलवा मरुद्भिः ।८२।।'

वालेन्दुवक्राणि। इति ॥।८४।1 एवं प्रसादमभिधाय लावरयं लक्षयति-

स्व्रल्पया बन्धसौन्दर्य लावएयमभिधीयते।३२।।

[समात्रा, जावा आदि] अरन्य द्वीपों से लवङ्ग के पुष्पो को उडाकर लाने ले वायु के द्वारा जिसके [सरतश्रम-जन्य] पसीने की बूँदें सुखाई जा रही हों इस कार की होकर इस [कलिङ्ग राज हेमाङ्गद] के साथ, ताड़ के वनो में मर्मर शदद से युक्त समुद्र के तटों पर विहार करो ॥ ८३॥ इसमें प्रसाद गुणा की सम्पूर्ण सामग्री विद्यमान है। इसलिए यह 'प्रसाद' गुण का उत्तम उदाहर है।

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११=] वक्रोपितिजीवितम् [कारिका ३२

'वन्धो' वाक्यचिन्यासस्तस्य 'मीन्दर्य' रामसीयक 'लावरयमभिधीयने' लावसयभित्युन्यते। कीदशम-वर्ानामक्षराणा विन्यासी विचित्र न्यसन तस्य विन्छित्ति शोभा वैदगध्यभङ्गी, तया लक्षित. पदाना सुप्िडन्ताना सन्वानं सयोजन, तस्य सम्पन, सापि शोभेव, तया लन्ितम। कीहृश्या, उभयरूपयापि स्वल्पया मनाडमात्रया नातिनिर्वन्धनिर्मितया। तवयमत्रार्थ- शब्दार्थसौकुमार्यसुभग सन्निवेशमहिमा लावएयारयो गुण कभयते। यथा- स्नानार्ट् मुक्ते ्चनुधृपवास विन्यस्तसायन्त नमल्लिकेपु । कामो वसन्तात्ययमनदवीर्य. केशेपु लेंभे वलमह्गनानाम् ।।८५॥ अत्र सन्निवेशसौन्दर्यमहिमा सहदयमवेद्यो न व्यपदेप्टु पार्यते।

बम्ध [का अ्रर्थं] वाक्य-रचना [है]। उसका सौन्दर्य श्र्थात् रमोयत्व, लावण्य कहा जाता है अर्थात् लावण्य पद से व्यवहृत होता हूं। कंसा [चन्वसौन्दर्य] वरगो अर्थात् प्रक्षरो का जो विन्यास विचित्र रूप से सन्निवेश, उसका जो शोभाश्र्ात् सुन्दर। रचना-शैली, उससे युक्त सुन्त तिडन्त पदो का सन्धान अर्थात् योजना, उसको सम्पत [ऊपर विच्छिति शब्द का अपर्थ शोभा किया है। यहां सम्पत् शब्द का अर् भी शोभा ही है यह कहते है] वह [सम्पत्] भी शोभा ही है। उससे युक्त [लक्षित]। किस प्रकार की [शोभा] से [युक्त], दोनों ही प्रफार की [अर्यात् श्रक्षर-रचना तथा पद- रचना से जन्य वर्णाविन्यासविच्छिति तथा पदसन्धानसम्पत्ति से जन्य] थोडी तनिक-सी अर्यात् अ्रत्यन्त आग्रह से निर्मित न की हुई [शोभा से युक्त बन्ध का सौन्दर्य लावण्य कहलाता है]। इसका यह अभिप्राय हुआ््ररा कि-शन्द और अरर् के सौकुमार्य ने सुन्दर रचना का सौष्ठव लावण्य नामक गुए कहलाता है। जैसे [रघुवश के सोलहवें सर्ग में कुश के कुमदृती के साथ सङ्जम के वर्शन के प्रसङ्ग में कहा हुआ कुमुद्वती का वर्शन- परक ५०वा यह श्लोक ]- स्नान के कारए गीले, खुले हुए और धूप की गन्ध देने के बाद सायफालीन [अलङ्धग्ण के योग्य] मल्लिका पृष्पो के विन्यास से युक्त स्त्रियो के केशो- में, वसन्त के बीत जाने के कारण मन्दवीर्य कामदेव ने बल को प्राप्त किया। [अर्थात् उन केशो से ही काम का उद्दीपन हुआ।] ॥८५॥ यहां [इस उदाहरण में] रचना के सौन्दर्य का प्रभाव सहृदय सवेद्य [ही] हं उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है।

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कारिका ३३ ] प्रथमोन्मेषः [११

यथा वा- चकार वा एौर सुराङनाना गएडस्थली: प्रोषितपत्रलेखाः ॥२६।।' 3 अन्रापि वर्णविन्यासवि्छित्ति पद्सन्धानसम्पच्च सन्निवेशसौन्दर्य

एवं लावएयममिधाय आाभिजात्यमभिधत्ते- श्रुतिपेशलताशालि सुस्पर्शमित्र चेतसा। स्वभावमसृस च्छायमाभिजात्यं प्रचन्षते ॥३३। प्रथवा जैसे- जिस [ककृत्स्य राजा] ने अपने वाणों से असुरो की स्त्रियों के कपोलस्थलों के पत्रलेखा [रूप पलङ्रण] से विहीन कर दिया ॥८६॥ यहाँ भी वररगो के विन्यास का सौन्दर्य और पद-योजना का सौष्ठव, रचना के सौन्दर्य के कारण स्पष्ट रूप से ही प्रतीत हो रहा है। यह श्लोक भी रघुवश के छठे सर्ग से इन्दुमती के स्वयवर-वर्णन के प्रसङ्ग से लिया गया है। उसमें सुनन्दा इक्ष्वाकुवश के ककृत्स्थ नामक राजा का वर्सन कर रही है। इस राजा के विषय में पुराणो में इस प्रकार की कथा पाई जाती है कि वह राजा साक्षात् विष्णु का पशावतार था। देवासुर-सग्राम में देवो की ओर से वह लडा था। उस समय इन्द्र को वृषभ वनाकर उसके ऊपर चढकर उसने युद्ध किया और समस्त असुरो का विनाश कर दिया। महेन्द्र के ककद [साँड की पीठ पर उठे हुए भाग को ककुद कहते है] पर बैठकर उसने भसुरों का विनाश किया था इसलिए ककत पर स्थित होने से उसका 'ककृत्स्थ' यह नाम पडा था। इसी घटना का निर्देश करते हुए सुनन्दा ने यहाँ उसका परिचय कराया है। यहाँ श्लोक के केवन दो चरण उदाहरसा रूप में प्रस्तुत किए गए है। पूरा श्लोक इस प्रकार है- महेन्द्रमास्थाय महोक्षरूप य सयति प्राप्तपिनाकिलील । चकार वाणेरसुराङ़नाना गण्डस्थली प्रोपितपत्रलेखा ।।३२।।२ इस प्रकार [सुकुमार मार्ग के] लावण्य [गुए] को कहकर [चौथे] * भाभिजात्य [नामक गुख] को कहते हैं- सुनने में मुदुता-युक्त और सुखद स्पर्श के समान चित्त को छूता हुआ-ता, स्वभाव से कोमल छाया वाला, [बन्ध का सौन्वर्य] 'आाभिनात्य' [नामक गुण] कहा जाता है ॥।३३।

१-२ रघुवश ६, ७२ १३२।

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१२० 1 वफौपितजीवितम् [ फारिका ३३

एवंविधं वस्तु आभिजात्यं प्रचक्षते, अ्भिजात्याभिधानं गुएं वर्णयन्ति। श्रुति श्रवणेन्द्रियं तत्र पेशलता रामणीयकं तेन शालते श्लाघते यत तथोक्तम्। सुस्पर्शमिव चेतसा मनसा सुस्परशमिव। सुखेन स्पृश्यत डवेत्यति- शयोक्तिरियम्। यस्मादुभयमपि स्पर्शयोग्यत्वे सति सौकुमार्यात् किमपि चेतसि स्पर्शसुखमर्पयतीव। यत. स्वभावमसृराच्छायं अहायरलक्षए कान्ति यत, तदाभिजात्यं कथयन्तीत्यर्थ.।

यथा-

इस प्रकार की वस्तु को 'भाभिजात्य' [नामफ गए] कहते हैं। श्रृति अर्र्यात् अवसेन्व्रिय [कान] उसमें जो पेशलता अर्थात् रमीयता उससे जो श्लाघित अरर्थात् प्रशसित [शोभित] होता है, वह उस प्रकार का [श्रुतिपेशलताशालि हुआ्ररा]। 'चित्त से सुस्पर्श के समान' प्रर्ात् मन से सुन्दर सुखद स्पर्श फे समान [छूता हुआ-सा]। सुख से स्पर्श किया जाता है [छूता है] यह [कथन] अ्र्प्रतिशयोक्ति हैं। [वास्तव मे वह आ्रभिजात्य गुए कोई मूर्त भौतिक पदार्थ नहीं है जो चित्त का स्पर्श कर सके। और न चित्त ही स्पर्श के योग्य है। परन्तु जैसे स्पर्श योग्य कोई अत्यन्त मुदु पदार्थ अपने मृदु-स्पर्श से चित्त में आनन्द को उत्पन्न करता है। इसी प्रकार यह आभिजात्य गुए भी चित्त में अनिर्वचनीय आ्र्ानन्द को उत्पन्न करता है इसलिए उसको भी अतिशयोकिति से 'सुस्पशमिव चेतसा' कह दिया है।] क्योकि [स्पर्श करने योग्य मृदु वस्तु तथा स्पर्श करने वाली त्वगिन्द्रिय] दोनों स्पर्श के योग्य होने पर सौकुमार्य [के अतिशय के कारण] से चित में स्पर्श सुख-सा देती है। [इसी प्रकार यहाँ भी होने से 'सुस्पशमिव चेतसा' कह दिया है] क्योकि जो स्वभाव से कोमल कान्ति अर्यात् [अ्रहार्यं कृत्रिम रूप से न लाई हुई] स्वाभाविक मृदु कान्ति वाला [गुस ] है उसको 'भाभिजात्य' कहते हैं। [यहाँ 'स्वभावमसृसच्छाय' का अपर्थ 'अहार्यश्लक्ष्साकान्ति' किया है। 'अ्रहार्य' का अर्थ अ्र्प्रकृत्रिम या स्वाभाविक है। परन्तु उसे 'भाहाय' समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। 'घहार्य' वस्तु तो स्वाभाविक नहीं होती। अत. शहार्य पाठ उचित है।

उस आभिजात्य गुण का उदाहरण मेघदूत से उद्धूत करते है। यहां उदाहरण रूप में आधा ब्लोक ही उद्धृत किया है। मेघदूत का परा श्लोक इस

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कारिका ३३ ] प्रथमोन्मेप [ १२१

ज्योतिलखावलयि गलितं यस्य वर्ह भवानी पुत्रप्रीत्या कुवलयदलप्रापि कर्रों करोति ॥८७॥ -3 अ्त्र श्रुतिपेशलतादि स्वभावमसराच्छ्रायत्व किमपि सहृदयसवेद परिस्फुरति। ननु च लावस्यमाभिजात्यञ्च लोकोत्तरतरुणीरूपलक्षणवस्तुधमंतया यत् प्रसिद्धं तत्कथं काव्यस्य भवितुमहतीति चेत्- तन्न। यस्मादनेन न्यायेन पूर्वप्रसिद्धयोरपि माधुर्यप्रसादयो. काव्यधर्मत्वं

प्रकार है- ज्योतिर्लेखाव लियगलित यस्य वहँ भवानी, पुत्रप्रोत्या कुवलयदल प्रापि कर्णो करोति। घोतापाङ्ग हरशशिरुचा पावकेस्त मयूर, पश्चादद्रिग्रहणगुरुभिर्गजितर्नतयेथा = यक्ष मेघ को कह रहा है कि देवगिरि पर स्थापित स्कन्द की मूर्ति के ऊपर पुप्पवृष्टि के रूप में अपनी सुखद वृष्टि करके और उनको स्नान कराने के बाद अपने गम्भीर गर्जनो से उनके वाहनभूत मयूर को आ्ानन्दोल्लास से नाचने के लिए प्रेरित करना। जिस मयूर के चमकीले रेखामण्डल से यूक्त, गिरे हुए पंख को पावती देवी अपने पुत्र स्कन्द के प्रेम से अर्थात यह मेरे पुत्र स्कन्द के मोर का पख है इस- लिए अ्त्यन्त प्रेम से कुवलय दल को धारण करने वाले कान में अथवा कुवलय दल के साथ कान में आभूषण रूप में धारण करती है। [इसी श्लोक के पूर्वार्द्ध को यहां ग्रन्थकार ने आभिजात गुण के उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत किया है] जैसे- जिस [स्कन्द के मोर] के चमकदार रेखामण्डल से युक्त और [स्वय] गिरे हुए [न कि बलात् नोचे हए] पंख को पार्वती देवी [यह मेरे पुत्र स्कन्द के मयूर का सुन्दर मख है इस प्रकार की] पुत्र स्नेह की भावना से कवलय दल को धारस करने योग्य कान में [अथवा कवलय दल के साथ कान में आ्भूषण रूप से] धारण करती हैं ।।८७॥ यहाँ श्रुतिसुभगत्व आदि और स्वभावत. मृदु कान्ति [रूप श्रभिजात्य] सहृदयसवेद्य रूप से [अपूर्व तत्व] परिस्फुरित होता है। [प्रश्न] लावप्य और आभिजात्य तो लोकोत्तर तरुसी-सौन्दर्य रूप वस्तु के धर्म रूप से [लोक में] प्रसिद्ध है वह फाव्य का [धर्म] कसे हो सकता है। [उत्तर] यहाँ शंद्ा करें तो वह ठीक नहीं है। क्योंकि इस युक्ति से तो पूर्व १. मेघदूत ४४।

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१२२] वकोवितिजीवितम् [ फारिका ३३

विघटते। माधुर्य हि गुडादिमधुरद्रव्यधर्मतया प्रसिद्ध नथाविवाह्नाद- कारित्वसामान्यापचारात् काव्ये व्यपनिष्यते। तर्थेव च प्रमाद

भगिति'प्रतीतिपेशलता प्रतिपद्यते। नद्ववेव च काव्ये कविशक्तिकौंशली ल्लिखितकान्तिकमनीय वन्धसौन्टर्य वतनचमत्कार कारित्वसामा योपचारा- ल्लावस्यशब्दव्यतिरेकेश शब्छान्तराभिधेयता नोतसहते । तर्थव च काव्ये स्वभाव मसृच्छायत्वमाभिजात्यशब्देना भिवीयत। ननु, च, कैश्चित् प्रतीयमान वस्तु ललनालावएयसाम्याल्लावएयमित्यु- पपा दितमिति- प्रतीयमान पुनरन्यदेव वस्त्वा्त वाणीपु महाकवीनाम। यत् ततप्रसिद्धावयवातिरिकतं विभाति लावएयमिवाहनासु ॥।८=॥ [प्रसिद्ध अर्थात् पूव आ्राचार्यों द्वारा पथवा उसफे पहले] प्रतिपादित माघुयं तथा प्रसाद-गुण का भी काव्यघर्मत्व नहीं बनता है। क्योकि [लोक म] माधुयं, गुलआदि मधुर पदार्था के धर्म रूप में प्रसिद्ध हैं । [परन्तु] उस प्रकार के [मधुर पदार्थों के समान] शह्हादकारित्व साधम्य के कारण उपचार [गौसी वृत्ति] से काव्य में [भी माधुर्य शब्द से] कहा जाता है। औ्रौर उसी प्रकार प्रसाद [शब्द भी] स्वच्छ जल अथवा स्फटिक आदि [पदार्थो] के धम रूप से [मुख्यतया] प्रसिद्ध है [किन्तु] स्फुटावभासित्व रूप साधर्म्य के द्वारा उपचार [गौणी वृति] से तुरन्त अर्य प्रतीति रूप सुन्दरता का बोधक हो जाता हैं। और उसी [माधुय एव प्रसाद-गुरणो के और्पचारिक प्रयोग] के समान काव्य में कवि की प्रतिभा के कौशल से समुल्लसित कान्ति से कमनीय, रचना का सौन्दर्य सहृदयों में चमत्कारोत्पादन के साधर्म्य से उपचार द्वारा लावण्य के अतिरिषत अन्य किसी शब्द से कहा नहीं जा सकता है। और वही स्वाभाविक सुकुमार सौन्दर्य काव्य में 'आभिजात्य' शब्द से कहा जाता है। [प्रश्न] किन्हीं [ध्वन्यालोककार आ्रनन्दवर्घनाचार्य] ने 'प्रतीयमान' वस्तु ललनाओं के लावण्य के समान होने से लावण्य कहा जाता है यह उपपादन किया है। यहाँ पूर्व-सस्करण में 'इत्युत्पादितप्रतीति' पाठ छपा है परन्तु वह बहुत सङ्गत नही दीखता है। उसके स्थान पर 'इत्युपपादितमिति' यह पाठ त्रधिक सङ्गत है।4 इसलिए हमने वही पाठ रखा है। इस कथन के समर्थन के लिए ग्रन्थकार आ्प्रागे ध्वन्यालोक का १, ४ श्लोक नीचे उद्धृत करते हे- प्रतीयमान [व्यङ्गघ अरर्थ] कुछ और ही चीज़ है जो रर्माणयों के प्रसिद्ध [मुखादि] अ्रवयवो से भिन्न [उनके] लावण्य के समान महाकवियों की सूकितियो में [वाच्यार्थ से अल्ग] प्रतोत होता है ॥८८।।

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कारिका ३३ ] प्रथमोन्मेष. [१२३ तत्कथं बन्धसौन्दर्यमात्र लावएयमित्यमिधीयते ? नैष दोप., यस्मादनेन दृष्टान्तेन वाच्यवाचकलक्षणाप्रसिद्धावयवव्यति- वरक्तत्वेनास्तित्वमात्र साध्यते प्रतीयमानस्य, न पुन. सकललोकलोचनसंवेद्यस्य ललनालावसयस्य, सहृदयहृद्यानामेव सवेद्यं सत् प्रतीयमानं समीकर्तु पार्यते।

रित्वस्पर्धया व्यपदिश्यते। प्रतीयमान पुनः काव्यपरमार्थज्ञानामेवानुभवगोचरतां प्रतिपद्यते। यथा कामिनीनां किमपि सौभाग्य तदुपभोगोचितानां नायकानामेव

तव आप रचना के सौन्दर्य मात्र को लावण्य कैसे कहते हैं? [उत्तर] यह दोष [देना] ठीक नहीं है। क्योंकि [विभाति लावण्यमिवा- डनासु ] इस दष्टान्त से वाच्य वाचक रूप प्रसिद्ध अवयवो से भिन्न रूप में प्रतीयमान का अस्तित्वमात्र सिद्ध होता है। परन्तु समस्त [लौकिक साधारण] पुरुषो के नेत्रों द्वारा ग्रहण किए जाने वाला स्त्रियो का सौन्दय, केवल सहृदयों द्वारा ही अनुभव किए जाने योग्य प्रतीयमान अ्पर्य के बरावर नहीं किया [माना] जा सकता है। अ्र्पर्ात् ललनाओ का लावण्य तो हर एक साधारण पुरुप भी ग्रहण करता है परन्तु काव्य के प्रतीयमान व्यङ्गघ अरथ का अनुभव हर एक व्यक्ति नही कर सकता है उसे केवल सहृदय पुरुष ही समझ सकते है। इसलिए ललना-लावण्य को प्रतीयमान भर्थ के बरावर का महत्त्व नही दिया जा सकता है। ध्वनिकार ने जो उनकी समानता दिखलाई है उसका अभिप्राय केवल इतना ही हो सकता है कि जैसे ललनाओ का लावण्य उनके प्रसिद्ध अवयवो से अलग होता है इसी प्रकार काव्य में प्रतीयमान अर्थ वाच्यादि अर्थो से भिन्न ही होता है यहाँ पूर्व-सस्करण में 'लावण्यस्य' के बाद विराम-चिन्ह दिया हुआ है। वह नही होना चाहिए। और अगले वाक्य के प्रारम्भ में जो तस्य पाठ दिया गया है वहाँ तच्च पाठ अ्रधिक उपयुक्त है। और पद और पदार्थो को न जानने वालो को भी अवसमात्र से ही हृदयहारी रचना सौष्ठव ही वह [लावण्य] कहा जाता है। [जैसे ललना का लावग्य साधारसा पुरुषों को भी धनुभव हो जाता है इसी प्रकार काव्य का बन्घसौन्दर्य पद-पदार्थ की व्युत्पत्ति से रहित साघारण पुरुषों को भी श्रवसमात्र से प्रतीति हो जाता है। इस कारस बन्धसौन्दर्य के लिए ही लावण्य पद का प्रयोग उचित है।] और प्रतीयमान अ्र्य काव्य के मर्मज्ञो को ही अनुभव होता है। जैसे कामिनियों का कुछ सौभाग्य विशेष उनका उपभोग करने योग्य नायकों के ही सवेदन का विषय होता है। परन्तु

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१२४ ] [फारिका ३४

सवेद्यतामरहति। लावएयं पुनस्तासामेव मतकविगिरामिय मौन्टर्य सकललोकगोचरतामायातीत्युक्त मेवे। इत्यलमतिप्रसद्गन ॥३३॥ एव सुकुमारस्य लक्षसामभिधाय विचित्र लक्षयति- प्रतिभाप्रथमोद्ध दसमये यत्र चक्रता । शब्दाभिधेययोरन्तः स्फुरतीव विभाव्यते॥३४॥ अलङ्कारस्य कवयो यत्रालङ्करणान्तरम्। उ्रसन्तुष्टा निवस्नन्ति हारादेरमशिबन्धवन् ॥३५॥ रत्मुरश्मिच्छटोत्सेकभासुर भ परौर्यथा। कान्ताशरीरमाच्छाद्ये भृपायँ परिकल्प्यते ॥३६॥ यत्र तद्वदलद्वारे भ्रजिमानैनिजात्मना। स्व्रशोभातिशयान्तःस्थमलङ्कार्य प्रकाश्यते ॥३७।। उनका लावण्य सत्कवियो के वारणी के सौन्दर्य [या बन्घसौन्दर्य] के समान सव लोगो का [अनुभव] विषय होता हैं। यह कह ही दके है। इसलिए [इस विषय में] अ्रधिक लिखने की आवश्यकता नहीं रहती है ।३३।। इस प्रकार सुकमार [मार्ग] का लक्षण [और उसके रणों] को कह फर [आगे] विचित्र [मार्ग के लक्षण] को कहते हैं- जहाँ [कवि की] प्रतिभा के प्रथम विलास के समय पर [ही] शब्द और अर्थ के भीतर [कुछ अपूर्व] वक्रता स्फुरित होती हुईं सी [प्रतीत] होने लगती है। [वह विचित्र मार्ग हैं ।।३४।।] [अथवा] जहाँ कवि [एक ही अलद्धार से] सन्तुष्ट न होने से एक अलद्धार [को अरलकृत करने] के लिए हार आदि में मसियों के जड़ाव के समान दूसरा अलद्धार जोडते है। [वह विचित्र मार्ग है।।३५।] रत्नों की किरणों की छटा के बाहुल्य से चमकते हुए आभूषरो से ढक देने से जसे कान्ता का शरीर [और भी] भूषित हो जाता है। [इसी प्रकार अनेक अलद्धारों से जहां काव्य को अलकृत करने का प्रयत्न किया जाता है वह विचिन्र मार्ग फहलाता है।।३ ६।।] जहाँ इसी प्रकार भ्राजमान अलद्धारों के द्वारा अपनी [स्वाभाविक] शोभा के भीसर छिपा हुआ अलद्धार्य [रसावि] अपने स्वरूप से प्रकाशित होता है। [वह विचित्र मार्ग है ।।३७।।]

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कारिका ४३ ] प्रथमोन्मेष: [१२५

यदप्यनूतनोल्लेखं वस्तु यत्र, तदप्यलम्। उक्तिवैचित्र्यमात्रेण काष्ठां कामपि नीयते ॥३८।। यत्रान्यथाभवत् सर्वमन्यथव यथारुचि। भाव्यते प्रतिभो्लेखमहत्वेन महाकवेः।।३६ प्रतीयमानता यत्र वाक्यार्थस्य निवध्यते।. वाच्यवाचकवृतिभ्यां व्यतिरिक्तस्य कस्यचित्॥४।।। स्व्भावः सरसाकूती भावानां यत्र चध्यते। केनापि कमनीयेन वैचित्र्येणोपव हितः ।४१।। विचित्रो यत्र वक्रोक्तिवैचित्र्यं जीवितायते। परिस्फुरति यस्यान्तः सा काप्यतिशयाभिधा ॥४२।। सोऽति दुःसञ्चरो येन विद्ग्धकवयो गताः । खङ्गधारापथेनेव सुभटानां मनोरथाः ॥४३।।

जहां पुराने कवियों द्वारा वशित [अनूतोल्लेख जिसका वर्गन नया नहीं है अर्थात् पुरातन कवियो द्वारा वशिगत है] वस्तु भी केवल उषित के वैचित्र्यमात्र से [सौन्दय की] चरम सीमा को ले जाई जाती हैं। [वह विचित्र मार्ग है ॥३८॥] जहाँ महाकवि की प्रतिभा के प्रयोग के प्रभाव से अन्य प्रकार की [सौन्दर्य होन] वस्तु भी [कवि की अपनी] रुचि के अनुसार अन्य ही प्रकार की [लोकोत्तर- सौनदर्ययुक्त-सी] हो जाती है। [वह विचित्र मार्ग है।३६।।] जहाँ वाच्य वाचक वृत्ति से भिन्न किसा [भनिर्वचनीय] वाक्यार्य [विषय] की प्रतीयमानता [य्यङ्गघ रूपता] की रचना की जाती है। [वह विचित्र मार्ग है॥४०।।] जहाँ किसी कमनीय वैचित्र्य से परिपोषित और सरस अभिप्राय वाला पदार्थों का स्वभाव वर्न किया जाता है [वह विचित्र मार्ग है ।।४१।।] जहां वकोषित का वंचित्र्य [ही] जीवन के समान प्रतीत होता है और जिसके अन्दर किसी अपूर्व अतिशय की अभिधा [कथन उवित] स्फुरित होती है [वह विचित्र मार्ग है ।४३॥] सुभटों के मनोरथ जैसे खङ्गधारा के मार्ग पर चलते हं इस प्रकार चतुर कवि जिस [मार्ग] से गये है [जिस विचित्र मार्ग का अ्रवलम्चन कर विदग्ध सत्कवियो ने अपने काव्यों की रचना की है] वह [मार्ग खङ्गधारा के समान] अ्रत्यन्त [कठिन और] दु सञ्चर [विचित्र मार्ग] हैं। [उसी को विचित्र मार्ग कहते है।।४२॥]

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१२६ ] [फारिका ४३

स विचित्राभिधान पन्था कीटक-'अतिद् स5्चर', यन्नातिदु खेन सञ्चरते। कि बहुना, 'येन विदग्वकवय' केचिदेव व्युतर्ना केवल गता प्रयाता तदाश्रयेण, काव्यानि चक्ररित्वर्य । कथम्, 'सन्नवारापथेनेय सुभटाना मनोरथा। निर्त्रिशवाराभार्गेण यथा सुभटाना महावीराख मनोरथा सकल्पविशेपा। तनयमत्राभिप्नाय-यदमिवारामार्गगमने मनोरथा- नामौचित्यानुसारे यथारुचि प्रवर्तमानाना मनाड्मात्रमपि म्लानता न सम्भाव्यते। साक्षात् समरसम देसमाचरणे पुन कढाचित् किमपि म्लानत्वमपि सम्भाव्यते। तदनेन मार्गस्य दुर्गमत्व तत्प्नस्थिानानाञ्च बिहरणप्रौढि. प्रतिपाद्यते। कीटक स मार्ग, यत्र यस्मिन् शब्दाभिधेययोरभिधानाभिधीयमा- योरन्त स्वरूपानुप्रवेशिनी चक्रता भणितिविन्छिति स्फुरतीव प्रस्यन्दमानेव विभाव्यते लक्ष्यते । कटा 'प्रतिभाप्रथमोद्गठसमये' प्रतिभाया कविशक्ते,

सुकुमार-मार्ग के निस्पण में ग्रन्थकार ने जैसे पाँच श्लोको का समुदाय रूप 'कुलक' लिखा था इसी प्रकार इस 'विचिन-मार्ग' का निरूपण ३४ ने ४३ तक दस कारिकाओ के 'कुलक' में किया है। सुकुमारमार्ग की व्यास्या में भी वृत्तिभाग के लिखते समय ग्रन्थकार ने पाठक्रम को छोडकर अर्थक्रम से ही इस कुलक की व्यारया की थी। इसी प्रकार इस विचित्र माग की व्याख्या में पाठकम को छोडकर अर्थक्र्म को ही ग्रन्थकार ने अपनाया है। इसलिए इसकी व्यास्या भी नीचे की ओर से अथवा ४३वी कारिका से ग्रन्थकार प्रारम्भ करते है- ४३-वह विचित्र मार्ग किस प्रकार का है। 'अर्रत''न्त दुर्गम' जिसमें बडी कठिनता से चला जा सके। अधिक क्या कहा जाय [केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि] जिस से केवल विदग्ध कवि अर्ात् केवल विरले निपुण कवि ही गये है पर्थात् उसके छाश्रय से अपने फाव्यों की रचना कर सके है। कैसा [दुर्गम है अथवा कसे गये है कि] वीरों के मनोरथ जैमे तलवार की धार पर चलते है। जैसे महावीर पुरुषो के मनोरथ अपरथात् सकल्पविशेष तलवार के मार्ग से चलते हैं। इसका यह अ्र्प्रभिप्राय हुआ्र कि औचित्य के अनुसार यथारुचि चलने वाले मनोरयों के असिधारा के मार्ग पर चलने से तनिक-सी भी म्लानता की सम्भावना नहीं रहती है। और साक्षात् युद्ध को सघर्ष करने पर तो शायद कभी कुछ म्लानता भी सम्भव हो जाय। इसलिए इस [असिघारा के उदाहरण] से मार्ग की दुर्गमता और उस पर चलने वालो को चलने की गढ़ि का प्रतिपादन किया गया है॥४३॥ ३४-वह मार्ग कैसा है कि-जिसमें वाचक और वाच्य अर्थात् शब्द और अर्थ के स्वरूप के भीतर भरी हुई वकता अथवा उक्ति का वैचित्र्य स्फुरित अर्थात् प्रवाहित

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फारिका ४३ ] प्रथमोन्मेष: [१२७

अचरमोल्लेखावसरे। तद्यमत्र परसार्थ. यत कविप्रयत्ननिरपेक्षयोरेव शब्दार्थयो. स्वाभाविक्. कोऽपि वक्रताप्रकार. परिस्वुरन् परिदृश्यते। -3 यथा- कोऽयं भाति प्रकारस्तव पवन पदं लोकपादाहतीना तेजस्वििव्रातसेव्ये नमसि नयसि यत्पासुपूर प्रतिष्ठाम् ।

होती हुई सी प्रतीत होती है। कब-'प्रतिभा के प्रथम वार उद्भेद के अवसर पर'। प्रतिभा अर्थात् कवित्व शक्ति के प्रथम विकास के अवसर पर। इसका अ््रभिप्राय यह हुआ कि कवि के प्रयत्न की अपेक्षा किए बिना [उसकी प्रतिभा के बल से] स्वभावत शब्द तथा अंर्थ में कोई अपूर्व सौन्दर्य चमकता हुआ-सा दिखलाई देता है। जैसे- [यह सुभाषितावली में स० १०३२ पर भागवतामृतपाद का श्लोक है। लोगो के पैरो-तले कुचले जाने वाली घूल उडकर आकाश में व्याप्त हो जाती है शर वायु उसको चारो ओर फैला देता है । इसको देखकर अन्योक्ति रूप में कवि वायु को कह रहा है कि]- है वायु देव यह आपका कौनसा तरीक़ा है कि लोगों के पैरो से कुचले गये घलि के समूह को आप उठाकर तेजस्वी [सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि] से सेवित [उनके 'रहने योग्य स्थान] आ्रकाश में प्रतिष्ठित कर देते हैं । जिस [घूलि] के उठने पर, लोगों की आंखो को जो कप्ट होता है उसे जाने भी दें [उस पर ध्यान न भी दिया जाय] तो भी; इस [तुम्हारे अपने] शरीर में उत्पन्न किए हुए मलिनता रूप दोष को तुम स्वयं ही फते सहन कर सकते हो। [अर्थात् वह घूलि और लोगों को कष्ट देती है उसे जान भी दें तो तुम तो उसका उपकार करने वाले हो परन्तु वह स्वय तुम्हारे शरीर को भी मलिन कर देता है। ऐसे दुष्ट धृलिपुञ्ज को उठाकर आ्ाप तेजस्वी देवताओं के बैठने योग्य आ्रकाश में प्रतिष्ठित कर देते हो यह आपका कौन सा तरीक़ा है।] यहां [इस उदाहरण में] अ्रप्रस्तुत-प्रशसा अलद्धार प्रधान रूप से वाक्यार्थ है। [अप्राकरणिगक के कथन से जहाँ प्राकरणिक अर्थ का श्रराक्षेप होता है उसको अप्रस्तुत प्रशसा अरलद्धार कहते है। मम्मटाचार्य ने उसका लक्षण यह किया है कि अ्प्रस्तुतप्रशसा या सा संव प्रस्तुताश्रया।१ इस लक्षण के अनुसार इस श्लोक में अप्रस्तुत वायु के वगंन से नीच जनों का उद्धार करने वाले किसी प्रस्तुत महापुरुष रूप] प्रतीयमान अ्रन्य पदार्थ के [द्योतक के] रूप में [वायु वगंन के ] प्रयुक्त होने से उसमें विचित्र कवि-शषित से, समु- ल्लिखित शब्द तथा अर्थ की रचना के प्रभाव से प्रारम्भ में [श्लोक को पढते] ही १ का प्र १०, ६६ ।

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१३० ] वकोपितिजीवितम् [फारिफा ३५

अत्रात्यन्तगर्हणीयचरितं पदार्थान्तरं प्रतीयमानतया चेतसि निघाय तथाविधविलसित. सलिलनिविर्वाच्यतयोपक्रान्त। तदेतावदेवालकृतेरप्रस्तुत- प्रशसायाः स्वरुपम्। गर्हणीयग्रतीयमानपदार्थान्तरपर्गवसानमपि वाक्य वस्तुन्युपक्रमरमणीयतयोपनिवध्यमानं तहिदाहाठकारितामायाति। तेतद्

न चात्र सङ्गरालङ्कारव्यव हारो भवितुमहति, पृथगतिपरिस्फुटत्वेनावभासनात्। न चापि संसृष्टिसम्भव समप्रधानभावेनानवस्थिते.। न च द्वयोरपि वाच्या- लङ्कारत्व, विभिन्नविपयत्वात् । यहां [इस श्लोक में] श्र्प्रत्यन्त निन्दनीय चरित्र वाले [कृप घनिफ रूप] पवार्थान्तर को मन में रखकर उसी प्रकार का [जल रहते भी प्यासो के लिए व्ययं] समुद्र [वाच्यतया ] वर्णनीय रूप से लिया गया है। इतना ही प्र्प्रस्तुत प्रशसा प्र््रलद्धार का स्वरूप है। प्रतीयमान निन्दनीय [कृपए धनिक रप] दूसरे पदार्थ [के बोधन] में समाप्त होने वाला वाक्य भी, उस विषय में [वस्तुनि] प्रारम्म में ही [श्रत्यन्त] रमसीय रूप से विरचित होफर सहृदयो के प्राह्मादकारित्व को प्राप्त हो गया है। इस प्रकार वह व्याजस्तुति जैसा [प्रतिरूपक-प्राय] दूसरा अलद्धार श्र्प्रप्रस्तुत प्रशसा [रूप८ प्रथम अलद्धार] फे आभूषण के रूप में [कवि के द्वारा] ग्रहण किया गया है। [इस प्रकार यहां व्याजस्तुति तथा अ्रप्रस्तुत प्रशसा रूप दो अलद्धार होने पर भी उनकी सङ्कर पथवा ससृष्टि अलद्धार नहीं कहा जा सकता है। क्योकि सद्भरा- लद्धार तो अ्रङ्गाद्गिभाव, अथवा एकाश्रयानुप्रवेश प्रथवा सन्वेह रूप तीन प्रकार का होता है। यहाँ इन तीनों में से कोई बात नहीं है। और ससृष्टि में दोनो अलद्धार निरपेक्षतया समप्रधान रूप से स्यित होते है। यहाँ दोनो अलङ्धारो का 'समप्राधान्य' भी नहीं है इसलिए यहाँ दो अलद्गार होते हुए भी उसको सङ्करालड्गार या ससृष्टि का उदाहरण नहीं कहा जा सकता है। यह वात कहते है] [ अप्रस्तुत प्रशसा तथा व्याजस्तुति के] अ्प्रलग-अ्रलग अ्र्प्रत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रतीत होने से यहां सद्दर अलद्धार का व्यवहार भी नहीं किया जा सफता है और [अप्रस्तुत प्रशसा तथा व्याजस्तुति दोनो अलद्धारो के] तुल्य प्राधान्य रूप से न रहने के कारण [उनकी] ससुष्टि भी नहीं हो सकती है। और न दोनो वाच्य अलद्धार है। भिन्न विषय [अर्था्त् एक वाच्य औ्रर दूसरा प्रतीयमान] होने से [दोनो को वाच्य नहीं फहा जा सकता है। और न उनको सड़ूर या ससृष्टि रूप माना जा सकता है। इसलिए यहां व्याजस्तुति, अप्रस्तुत प्रशसा के, अलङ्धार-रूप में ही प्रयुक्त हुई है अतएव हारादि में रत्नों के जउने के समान अलद्धार में दूसरे अलद्धार के सन्निवेश का यह उदाहर है। और विचित्र मार्ग का प्रदर्शक है ]।

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कारिका ३५ ] प्रथमोन्मेष: [१३१

यथा वा- नामाप्यन्यतरोनिमीलितमभूत् तत्तावदुन्मीलित प्रस्थाने स्खलतः स्ववर्त्मनि विधेरन्यद् गृहीतः करः। लोकश्चायमदृष्टदर्शनकृताद्' दग्वैशसादुद्ध तो युक्तं काष्ठिक लूनतान् यदसि तामाम्रालिमाकालिकीम् ॥६१।। अ्न्रायमेव न्यायोऽनुसन्धेय.। यथा च- किं तारुएयतरोरिय रसमरोद्िन्ना नवा वल्लरी लीलाप्रोच्छलितस्य कि लहरिका लावएयवारानिधे:।

अ्रथवा जसे [इसी प्रकार का दूसरा उदाहरस देते है]- यह श्लोक भल्लटशतक का द६वाँ श्लोक हे। सुभापितावलो में १०१७ सख्या पर भी उद्धृत हुआ है। किसी लकडहारे द्वारा विना फ़सल के, पकाल में फलने वाले श्मो की पक्ति के काटे जाने की प्रशसा द्वारा, अनायास समृद्ध हो जाने वाले व्यक्तियों के धनादि का अपहरण करने वाले राजा आदि की प्रशसा की गई है। श्लोक का अर्थ इस प्रकार है- [इस आ्कालिक विना फसल के फलने वाली आम्त्र पक्ति के कारण] अन्य वृक्षों का नाम भी लुप्त-सा हो चला था [आम्र्र पक्ति को फाटकर] उसका उद्धार किया।वधि अर्थात् ब्रह्मा अपने मार्ग से चलते हुए [अकाल में श्रमों के फलने से] जो [स्खलित पतित या] पथभ्रष्ट हो रहा था उसका हाथ पकड़कर सहारा दिया यह दूसरा लाभ हुआ। और संसार को [असमय में] न देसे गए [पदार्थ] के देखने से होने वाले नेत्रों के कष्ट से बचा लिया। इसलिए हे लकडहारे तुमने जो आकालिक [असमय में फलने वाली] आम्-वृक्षों की पक्ति को काट डाला सो उचित ही किया है।६१। इस उदाहरण में भी [इससे पहले के 'हे हेलाजितवोघिसत्व' इत्यादि श्लोक में कही गई] इसी युक्ति का अ्रवलम्वन करना चाहिए। [शथति् इसमें अप्रस्तुत- प्रशसा अलद्धार के विभूषए रूप में व्याजस्तुति अलद्गार का उपादान कवि ने किया हैं। और उन दोनों में सङ्र ध्रथवा ससृप्टि अलद्धार नहीं माना जा सकता है ]। और जैसे [इसा का तीसरा उदाहरण]- 7यह पद्य सुभाषितावली १४७१ मे 'बन्धु' नामक किसी कवि का वतलाया गया है। 'वन्घो' पद से सम्भवत सुबन्वु कवि का हए अभिप्रेत होगा। व्य्यक के 'भ्रलद्कार सर्वस्व' में पृ० ४३ पर भी उद्धृत हुआ है। यह [नायिका] क्या नव-यौवन रूप वृक्ष की रस-बाहुल्य से [परिपूर्ण अरत्यन्त रसमयो] सिली हुई नवीन लता हैँ, अथवा मर्यादा का अतिनमण करने १. पूर्व सस्करण में कृता पाठ है। परन्तु पञ्चम्पन्त पाठ होना चाहिए ।

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१३२] वक्रोकितिजी वित्तम् [ फारिक ३६-३७

उद्दामोत्कलिकावता स्वसमयोपन्यासविश्रम्मिण. कि साक्षादुपदेशयप्टिरथचा देवस्य शमारिखः ।।६२॥' अत्र रुपकलक्षणो योऽयं वाक्यालह्वार, तम्य सन्देहोक्तिरिय द्वाया- न्तरातिशयोत्पाद्नायोपनिवद्धा चेतनचमत्कारितामावहति। निष्ट पर्वो-

अन्यच्च कीटकू-'रत्नेत्याहि युगलकम्। यत्र यम्गिन्नलङ्वारभ्राजमाने- निजात्मना स्वजीवितेन भासमानेभूपाये परिकल्पयते गोभावे भृष्चते। कथम- 'यथा भूपएैः कङ्कणादिभि ' कीहशे, 'रत्नरग्मिन्छटो(मेकभासुरे' मणिमयखो- ल्लासभ्राजिष्णुभि'। कि कृत्या 'कान्ताशरीरमाच्छाद' कामिनीवपु स्वप्रभाप्र- सरतिरोहितं विधाय, भूपाये, कल्प्यते। तद्वदेवालद्वारएँरुपमाटि भिर्यत्र कल््यंते। वाले सौन्दर्यसागर की लहर है, अथवा अत्यन्त उत्कण्ठित होने वाले प्रेमियो को अपने सिद्धान्तो [फामशास्त्र के व्यवहारो] का शिक्षा देने में तत्पर [शरृङ्गार रस के अधिष्ठाता] कामदेव की उपदेश यष्टि [शिक्षा देने वाली जादू की छी] है।६२। [इसमें कामिनी नायिका के ऊपर वल्लरी, लहरिका, उपदेशय्टि श्रादि का आरोप होने से] यहां जो यह रूपक नामक अलद्धार है उसके सौन्दर्यातिशय ५ उत्पावन के लिए उपनिवद्ध यह सन्देहोपित [सन्देहालङ्गार] सहवयो के लिए श्त्यन्त चमत्कारजनक प्रतीत हो रही है। पूर्वोक्त दोनो उदाहरणों में गही गई शेप बात यहाँ भी समझ लेनी चाहिए। [अर्थात् दो प्रलङ्गागे के होने पर भी सद्दर वथवा ससूष्टि अलद्धार यहां नहीं है। और न दोनों वाच्यालङ्कार मान है। इसलिए यहाँ भी हारावि में मणियों के प्रयोग के समान एक अलद्धार के विभूषण रूप में दूसरे शलद्धार का प्रयोग है]। [कारिका ३६, ३७]-और कंसा-यह रत्नेत्यादि वो श्लोफों[३६-३७वीं फारिका] में कहते है। जहां जिस [मार्ग] में अप्रपने स्वरूप में प्रकाशमान अ्र्प्रधात् अपने स्वरूप से प्रसीत होने वाले अलद्धार के द्वारा भूषित करने के लिए [काव्य की] रचना की जाती है। अर्थात् शोभा के लिए [रचना] अलकृत की जाती है। फैसे कि जैसे- 'कडूएा आदि भूषणों से'। कैसे [भूषणों से]- रत्नो की रश्मियों की छटा से चमकते हुए' अर्थात् मणियों की किरणों के निकलने से देदीप्यमान [कङ्ण आदि आभूषरणो] से। क्या करके-' कान्ता के शरीर को ढँककर', अपनी कान्ति के प्रसार से कामिनी के शरीर को ढककर जैसे [आभूषण उस कामिनी के शरीर को] विभूषित करते हैं उसी प्रकार उपमावि अलद्धारो से जहां [जिस मार्ग में काव्य की शोभा] की जाती है [उसको विचित्र मार्ग कहते है]। उन [उपमादि] की। शोभा के लिए रचना यह २. सुभाषितावली १४७१।

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कारिका ३६-३७ ] प्रथमोन्मेपः [१३३

एतच्चैतेषां भूपायै कल्पनं यदेतैः स्वशोभातिशयान्त स्थं निजकान्तिकमनीया- न्तर्गत मलक्कार्यमलद्कूरणीयं प्रकाश्यते द्योत्यते। तदिदमत्र तात्पर्यम्-तदलक्कार- नहहिमैव तथाविधोऽत्र भ्राजते, तस्यात्यन्तोद्रिक्तवृत्तेः स्वशोभातिशयान्तर्गत मलद्कार्य प्रकाश्यते। यथा- आर्यस्याजिमहोत्सवव्यतिकरे नासविभक्तोऽन्र वः कश्चित् वत्राप्यवशिष्यते त्यजत रे नवतञ्चराः सम्म्रमम्। भूयिष्ठेप्वपि का भवत्सु गणनात्यर्थ कियुत्ताम्भते

[कहलाती] है कि अपनी शोभातिशय के भीतर अर्थात् अपनी कान्ति की कमनीयता के अ्रन्तर्गत अलद्धार्य अर्थात् मुख्य [घरलङ्धरणीय], अ्रर्थ प्रकाशित अर्थात् [शोभातिशय से] द्योतित होता हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि उस [वाच्य] अलद्धार का इस प्रकार का प्रभाव दिखलाई देता है कि [घलकृत किये जाने योग्य] अलङ्धार्य [अर्थं] प्रत्यन्त तीव्र वृत्ति वाले उस अलद्धार के शोभातिशय के अन्तर्गत [तिरोहित हुआ-सा] प्रकाशित होता है। जसे ['लड्गा-युद्ध' के समय राक्षसो का सम्बोधन करके लक्ष्मण कह रहे हैं कि]- हे राक्षसो घचड़ाओ्रो नहीं, आयं [रामचन्द्र] के [इस] संग्राम रूप महोत्सव में तुम में से कोई फहीं ऐसा नहीं वचेगा जिसे उसका भाग पप्त न हो। [तुम शायद यह समझते हो कि हम तो बहुत बडी संख्या में है इसलिए राम हमारा क्या कर सकेंगे? सो बात नहीं है] बहुत होने पर भी [रामचन्द्रजी के सामने] तुम्हारी कया गिनती है इसलिए [व्यर्थ] प्रधिक उछल-कूद क्यो फर रहे हो। भुजाओ्नों की उदार उष्सता से युक्त उन [राम] का न आचार समाप्त हुआ है [कि तुमको तुम्हारा भाग देने की शिष्टता न दिखलाव] और न सम्पत्ति समाप्त हुई है [कि तुम्हारा भाग तुमको न दें। तुम्हारा भाग तुमको न मिल सके इसके दो ही कारण हो सकते थे या तो रामचन्द्र जी में इतना आचार पर्थात् शिष्टता न होती कि आपका ध्यान रखते पथवा कृपसता आदि के कारण सम्पत्ति के न होने से आपका भाग देने की इच्छा होते हुए भी न दे सकते। इनमें से दोनों ही वातें नहीं है। इसलिए आप लोग घवडावें नहीं। आर्य रामचन्द्रजी के रचाए हुए इस युद्ध रूप महोत्सव में आप सबका भाग आपको अवश्य मिलेगा। अर्थात् आ्रप चाहे कितनी ही वड़ी संख्या में हों शप सवकी खबर ली जायगी। एक भी वचने नहीं पावेगा ]।६३।

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१३४ ] वकोफ्तिजीवितम [कारिका ३६-३७ अत्राजेरम होत्सवव्यतिकरत्वेन तथाविध रूपणा विहत यत्रालद्वार्य आर्य स्वशौर्येण युष्मान् सर्वानव मारयति' इत्यलद्वारशाभातिशयान्तर्गतत्वेन भ्राजते। तथा च कश्चित् सामान्योऽपि क्वापि दवीयस्यपि देशे नामघिभक्तो युप्माकक वशिष्यते। तस्मात समरमहोत्सवसविभागलम्पटतया प्रत्येक यृय सम्भ्रम त्यजत। गणनया वय भूयिष्ठा इत्यशक्यानुष्ठानता यदि मन्यध्वे तदप्ययुक्तम। यस्मादसंख्यसविभागाशक्यता कटाचिदसम्पत्या कार्पएयेन वा सम्भाव्यते। तदेतदुभयमपि नास्तीत्युक्तम्-'तन्योदारभुजोप्मणोऽनवमिता नाचार- सम्पत्तयः' इति।

यथा च- कतमः ग्रविजृम्भितावरहव्यथः शून्यता नीतो देशः ॥६४।।' इति।

यहां [इस उदाहरस में] युद्ध को महोत्सव बनाकर इस प्रकार का रूपक वाँधा हे कि जिसमें अलङ्धार्य 'ार्य [रामचम्द्र जी] अपने परात्रम से तुम सब राक्षसों को मार डालेंगे' यह [व्यङ्गय थथ] अ्रलङ्गार [रूपक] के शोभा के श्र्प्रतिशय के अ्र्प्रन्तर्गत [दवा हुआ्रा-सा] प्रतीत होता हैं। जसे कि तुम [राक्षसो] में से फोई साधारण-सा भी कहीं दूर देश में [होने पर] भी [अपना उचित] भाग पाये बिना नहीं बचेगा। इसलिए युद्ध रूप महोत्सव के भाग पाने के लिए लालची से [तुम जो घवडा रहे हो सो उस] घबराहट को तुम सब छोड [ही] दो। हम गएना में बहुत अ्रधिक हे इसलिए [हम सबको भाग देने का] अनुप्ठान असम्भव है यदि ऐसा समझते हो तो वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि असख्य [व्यक्तियो] को भाग देने की अ्र्रसक्यता[असम्भवता दो ही कारणो से हो सकती ह] या तो सम्पत्ति [शक्ति] के अ्रभाव से अथवा[श्चारहीनता अशिष्टतारूप] अनुदारता [कृपणता] से ही हो सकती है। ये दोनो ही वातें नहीं हैं। यह, 'उनकी उवार भुजाओ की गर्मी से युक्त उन [राम] का न आचार [शिष्टता उदारता] समाप्त हुआ है और न सम्पत्ति [शक्ति] समाप्त हुई है' इस [पक्ति] के द्वारा कह दी है। और जैसे [इसी प्रकार का दूसरा उदाहरण]- [आपने] कौन सा देश विरहनव्यथा युक्त और शून्य कर दिया है ?।६४।

१. हर्षचरित, १ प० ४०-४१

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कारिका ३६-३७ ] प्रथमोन्मेषः [१३५

यथा च- कानि च पुरायभान्जि मजन्त्यमिर्यामक्षराणि ।।६५॥।' इति। अत्र 'कस्मादागताः स्थ', किञ्चास्य नाम इत्यलङ्गार्यमप्रस्तुत प्रशंसा-

प्रापितम्। एतच्च व्याजस्तुतिपर्यायोक्तप्रभृतीनां भूयसा विभाव्यते। नतु च रूपकादीनां स्वलक्षणावसर एव स्वरूपं निर्णोष्यते, तत्किं प्रयोजन- मेतेपामिहोदाहरसास्य ? सत्यमेतत्, किन्त्वेतदेव विचित्रस्य वैचित्र्यं नाम यदलौ- किकच्छायातिशययोगित्वेन भूषणोपनिवन्धः कामपि वाक्यवक्रतामुन्मीलयति।

और जैसे [हर्षचरित के उसी प्रसङ्ग में]- फौन से पुण्यशाली अक्षर [आ्पके] नाम की सेवा करते है?।६५। यहा [इन उदाहरणों में पहिले का अभिप्राय यह है कि आ्प] 'कहाँ से आराए है'? और [दूसरे का अ्र्रभिप्राय यह है कि] 'इसका क्या नाम है' यह अ्र्लद्धार्य [भर्थं] अ्रप्रस्तुत प्रशंसा रूप अलद्धार के सौन्दर्य से आच्छादित-सा उसकी शोभा के अन्तर्गत-सा [होकर] सहृदयों के हृदय के श्ह्लादकारित्व को प्राप्त हो रहा है। यह बात व्याजस्तुति तथा पर्यायोपत आदि [अलद्धारों] में बहुधा पाई जाती है। [अर्थात् व्याजस्तुति, पर्यायोक्त आदि अलद्धारो में प्रतिपाद्य मस्य अर्थ बहुवा उन अलङ्कारों की शोभा के अतिशय के अन्तर्गत तिरोहित-सा प्रतीत होता है]। [प्रश्न] रूपक [अ्रप्रस्तुत प्रशसा] आ्ादि [अलङ्धारो] के अपने लक्षणों के अवसर पर ही उनके स्वरूप का निर्साय आगे किया जायगा तो यहाँ उनके उदाहरस देने का क्या प्रयोजन है [विना अवसर के उनके उदाहरण क्यो दे रहे हैं]? [उत्तर ] यह ठीक है [फि रूपकादि के स्वरूप-निरुपण के अवसर पर ही उनके उदाहरस आदि शागे यथास्यान दिये जावें] किन्तु विचित्र [माग] की यह ही विचित्रता है कि [उसमें] अलोकिक सौन्दर्यातिशय से युक्त अलद्धारों की रचना वाक्य की कुछ अपूर्व-सो वक्रता को प्रकट करती है। [उसी को दिखलाने के लिए यहाँ रूपकादि के उदाहरण प्रसङ्गत दे दिए है। उनका मुरय रूप से वर्णन तो भागे ही ययास्थान दिया जायगा] ।३७।। १ हषंचरित, १ प० ४०-४१।

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१३६ ] पक्रोफ्विजोवितम् [ फारिफा ३६

विचित्रमेव रुपान्तरेण लक्षयति-यहपीत्यादि। यदपि वस्तु वाच्यम- नूतनोल्लेख मन भिनवत्वेनोल्लिखित तदपि यत्र यस्मिन्नल कामपि काष्ठा नीयते लोकोत्तरातिशयकोटिमध्वारोग्यते। कथम्-'उक्तिव चित्रयमान्नेण',t

अरां लडहत्तरात्र अएा च्चित् काइ वत्तराच्छाया। सामा सामणपत्ररवइणी रेह च्चिश्र ए होइ ।६६।।' [अम्यल्लटभतवमन्यैव कापि वर्तनचछाया। श्यामा सामन्यप्रजापते रेसेव च न भवति ॥ इतिच्छाया ॥] [कारिका ३८]-विचित्र [मार्ग] फो ही दूसरे प्रकार से 'यदपि' इत्यादि[३८वी कारिका] से दिखलाते है। जो भी वासी [शरन्य कवियों द्वारा पूर्व वशिगत] वस्तु, सर्थात् वाच्यार्थं, पुराने रूप से वर्णन किया गया है वह भी जहां जिस मार्ग में किसी [अनिर्वचनीय सौन्दर्य की] सीमा को पहुँचा दिया जाता है अर्यातत् लोफोत्तर [सौन्दयं की] चरम सीमा पर स्थापित कर दिया जाता है। कैसे ि-'केवल उक्ति की विचित्रता मात्र से'अर्थात् वर्णन-शेली के चातुर्य से। जसे [गायासप्तशती फो ६६६वीं गाथा। यह गाया काव्यप्रकाश पु० ६३० तथा अलद्धारसर्वंस्व पृ० ६७ ८ पर भी उद्धत हुई है। मूल गाथा प्राकृत भाषा में है। उसकी सस्कृत छाया ऊपर दे दी है। अर्थ इस प्रकार है ]- उसको सुकुमारता कुछ और ही हैं और उसके शरीर का सौन्दर्य भी कुछ अपूर्व [लोकोत्तर] ही है। जान पड़ता है कि वह श्यामा [सुन्दरी विशेष ] सामान्य [रूप से प्रसिद्ध सृष्टि का निर्माण करने वाले] प्रजापति [ब्रह्मा] की रचना [रेखा] हो नहीं है। [अर्थात् सामान्य सृष्टि की रचना फरने वाला प्रजापति ब्रह्मा इतनी अलोकिक लावण्यवती सुन्दरी की रचना नहीं कर सकता है। उसकी रचना किसी और ने ही की होगी ] ।६.। इस गाथा में 'लडहृत्तरग्र' 'वत्तनच्छाआ' और 'श्यामा' ये तीन शब्द विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। वक्रोक्तिजीवित में सम्पादक महोदय ने पहिले पद की सस्कत छाया 'अन्यल्लटभत्व' यह दी है। काव्यप्रकाश के टीकाकारो ने 'लटभत्व' के स्थान पर 'अन्यत्सौकुमार्य' यह सस्कृत छाया दी है। उनका कहना है कि प्राकृत भाषा में 'सुकुमार' शब्द के स्थान पर 'लडह' आ्रदेश हो जाता है। इसलिए उसकी सस्कृत छाया 'सौकुमार्य' ही रखनी चाहिए। 'लटभत्व' नही। क्योकि 'लटभत्व' शब्द सस्कृत का नही है। यह 'सुघासागरकार' का मत है। काव्यप्रकाश की दूसरी टीका 'चन्द्रिका' के निर्माता का मत यह है कि 'लडहत्तश्' यह 'सौकुमार्य' के अर्थ में १. गायासप्तशती स० ६६६।

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कारिका ३८ ] प्रथमोन्मेप. [१३७

यथा वा- उद्देशोज्य सरसकदल्तीश्रेणिशोभातिशायी कुञ्जोत्कर्पाङ्क रितरमणीविभ्रमो१ नर्मदायाः। किञ्चैतस्मिन् सुरतसुहृदस्तन्विर ते वान्ति वाता येपामग्रे सरति कलिताकाएडकोपो मनोभू:॥६७/।२ भगितिवैचित्र्यमान्नसेवात्र काव्यार्थ। न तु नूतनोल्लेखशालि वाच्य- विजुस्मितम्। एतच्च भगतिवैचित्र्य सहस्रप्रकार सम्भवतीति स्वयमेवो- प्प्रेक्षणीयम् ॥२८॥

'देश्य' शब्द का प्रयोग किया गया है। हर अवस्था में उसका अर्थ सौकुमार्य ही होगा। दूसरा शब्द 'वर्तनच्छाया' है। इसमें वर्तन शब्द की व्युत्पत्ति 'वर्तते जीवतीति वर्तन' यह मानकर 'वर्तन' शब्द 'शरीर' का वाचक माना गया है। तीसरा 'इ्यामा' शब्द भी ध्यान देने योग्य है। जिसका स्पर्ग शीतकाल मे उष्ण और उष्ण काल से शीत प्रतीत हो इस प्रकार की समस्त सुन्दर अवयवो वाली पोडपवपंदेशीया सुन्दरी के लिए 'श्यामा' शब्द का प्रयोग होता है। उसका लक्षण इस प्रकार किया गया है- शीतकाले भवेदुष्णा ग्रीष्मे च सुखशीतला। सर्वावयवशोभाढ्या सा श्यामा परिकीतिता ॥ प्रथवा जैसे [इसी प्रकार का दूसरा उदाहरण। यह काव्य प्रकाश में पृ० ७६ पर उद्धृत हुआ है]- हे तन्वि, हरी-हरी केलो की पक्ति से अत्यन्त मनोहर लगने वाला, [एकान्त और फुसुमादि से सुवासित] कञ्जों के उत्कर्ष के द्वारा रमरियो के हाव-भावो को प्रकरुरित कर देने वाला यह नमंदा नदी [ के किनारे] का ऊँचा प्रदेश है। और इसमें सुरत [सम्भोग] के [समय शीतल हवा के कारण] सहायक वे [शीतल, मन्द, सुगन्ध] वायु वह रही है जिनके आगे श्रागे बिना अवसर के भी क्रोध करता हुआ कामदेव चल रहा है।६७। यहां [इस उदाहरण में] कथन-शैली की विचित्रता ही मुख्य वाक्यार्य है। न कि कोई नया [अभिनव उल्लेख वाला] वाच्य प्रर्थ का वैचित्र्य । यह वर्णन शैली १ की विचित्रता सहत्ो प्रकार की हो सकती है। [उसका वर्णन कर सकना सम्भव नहीं हैं। इसलिए पाठक] उसे स्वय समझ ले ॥३=॥। १ प्रथम सस्करण मे रमी विभ्रमों के स्थान पर 'हरिणी विभ्रमो' पाठ दिया हे। परन्तु वह ठोक नही है। २ काव्य प्रकाश पृ० ६७१, पुञ्जराजकृत वाकयपदीय की टीका २,२४६।

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वशोषितिजीवितम् [फारिका ३६

पुनवैचित्र्यमेव प्रकारान्तरेण लक्षयति-यन्नान्यथेत्यादि। यत्र यस्मिन्न- न्यथाभवठन्येन प्रकारेण मन् सर्वमेव पदार्थजात अन्वर्थव प्रकारान्तरेश भाव्यते। कथम्-'चथारुचि'। न्वप्रतिभानुरूपेणात्पद्यते। केन-प्रतिभोल्लेख- महत्वेन महाकचे प्रतिभामन्मपातिशयन्वेन सत्कवे। तत्किन वरसर्यमानस्य वस्तुन प्रस्तावसमुचित किमपि नहटरयहदयहारि रूपान्तर निर्मिमीते कवि.।

यथा- ताप: स्वात्मनि संश्रित द्रमल ताशोपोऽ्न्वगर्वर्जन सस्य टु शमया तृपा तब मरो का डमावनर्या न य।

[कारिका ३६]-फिर [उन] विचिन्न[माग]को ही दूमरे प्रकार मे 'यतान्यया' इत्यादि [३६वीं कारिका] में वर्णन करते हैं। जहां जिम [मागं] में अन्यया होता हुआ अर्थात् प्रन्य [साधारण] प्रकार ने विद्यमान सब ही पदार्थं अ्न्यथा अपर्यति दूसरे प्रकार के [अलौकिक चयत्कार-युक्त] हो जाते है। मंने कि [षवि फी] प्पनी रुचि के ध्नुसार। अपनी प्रतिभा के प्रनुरप बन जाते है। किसि [पारल] से कि-महाकवि को प्रतिभा के प्रयोग के प्रनाव से अर्यात् उत्तम कवियो के विशेष अ्रनुभव से। कयोकि कवि वर्ण्यमान वस्तु का, विषय के त्रनुर्प सहृदयो के हुदय को हर करने वाला कुछ अपूर्व अप्रलौकिक स्वरूप वना देता ह। जैने- यहाँ दो वार 'प्रतिभास' शव्द का प्रयोग मूल में किया गया है। उसके स्थान पर 'प्रतिभा शब्द का प्रयोग श्रविक उपयुक्त होता। 'प्रतिभा' औरर 'प्रतिभास' शब्द के प्रयोग से यहाँ चमत्कार में बहुत अन्तर हो जाता हैँ। मूल कारिका में 'प्रतिभा' शन्द ही प्रयोग है इसलिए यहाँ व्यास्या में भी उसी 'प्रतिभा' शब्द का प्रयोग न करके जानबूभ कर 'प्रतिभास' पद का प्रयोग वृत्तिकार ने किया है। परन्तु वस्तुत 'प्रतिभा' शन्द के मुकावले में 'प्रतिभास' शब्द बहुत हलका पड जाता है अत उसका प्रयोग उचित नही प्रतीत है। [यह ग्लोक सुभाषितावली में ६४८ सत्या पर 'ईश्वर' के पुत्र 'लोटक' के नाम से दिया गया है। उसका अर् इस प्रकार है] हे मरुनूमे, [तुम्हारे] अपने शरीर के भीतर ताप हो रहा है, तुम्हारे आश्नित रहने वाले वृक्ष और लता सूख रही है, पथिक लोग तुमसे वचना चाहते है [तुम्हारा परित्याग करते है] वडी कठिनाई से शान्त हो सकने वाला प्यास के साथ तुम्हारी मिन्रता हं, इसलिए ऐंसा कौन सा अनर्थ है

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कारिका ३६ ] प्रथमोन्मेष: [१३६ एकोऽर्थस्तु महानयं जललवस्वाम्यस्मयोद्गजिनः सन्नह्यन्ति न यत् तवोपकृतये धाराधराः प्राकृताः ॥६८॥' यथा वा- विशति यदि नो कब्चित् कालं किलाम्बुनिधि विधे: कृतिषु सकलास्वेको लोके प्रकाशकता गत. । कथमितरथा धाम्नां धाता तमासि निशाकर स्फुरदिदमियत्ताराचक प्रकाशयति स्फुटम् ॥६६।। अर्रत्र जगद्गार्हितस्य मरोः कविप्रतिभोल्लिखितेन लोकोत्तरौ दार्यघुराधि -

जो तुम्हारे भीतर नहीं हैं, [तुम सब अ्रवगुों की खान हो]। केवल एक ही यह महान् गुएा तुम में है कि थोडी-सी जल की बूंदों के स्वामी बनकर अभिमान से गनन करने वाले मूर्ख मेघ तुम्हारा उपकार करने के लिए तैयार नहीं होते है। ६म। यह श्लोक भी अन्योक्ति रूप है। इसका अभिप्राय यह है कि तनिक से धन को पाकर अभिमानपूर्वक गर्जन-तर्जन करने वाले दुष्ट धनिको की सहायता प्राप्त करने की अपेक्षा स्वय हर प्रकार का कष्ट उठा लेना अपने आश्रित जनों को दु खित रखना और देखना आदि कही अधिक गौरवपूर्णं है। दुप्टो की सहायता से सुखमय जीवन का भोग गौरवास्पद नही है। जैसे महाराणा प्रताप ने सब प्रकार के कष्ट उठाकर भी अकवर की आघीनता स्वीकार नही की। पथवा जैसे [इसी प्रकार का दूसरा उदाहरस हं]- ब्रह्मा की समस्त रचनाओ से जो अकेला संसार का प्रकाश कर रहा है यह [सूर्य] यदि [शान्ति औौर शक्ति प्राप्त करने के लिए] थोड़ी देर के लिए समुद्र में प्रवेश न फरे तो उसके बिना वह तेज को घारण कर अन्धकार [मय जगत्] को, चन्द्रमा को, औौर इतने [विशाल] तारा-मण्डल को कैसे प्रकाशित कर सके। [अर्थात् लोक नेता को समय-समय पर एकान्त-सेवन द्वारा शक्ति का उपार्जन करते रहना चाहिए। तनी वह ठीक नेतृत्व कर सकता है। इसीलिए गांघी जी सप्ताह में एक दिन मौन धारण करते थे] ।ह। यहाँ [इन दोनों उदाहरणों में से पहिले उदाहरण में] जगत् में अत्यन्त निन्दित मरुभूमि को कवि ने अपनी प्रतिभा के प्रयोग से लोकोत्तर उदारता के

१ सुभापितावली ६४८।

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१४० ] वक्रोकि्तिजीवितम [ फारिका ३६

रापणोन ताहक् स्वरूपान्तरमुन्मीलित यत्प्रतीयमानत्वेनोदारचरितम्य कम्यापि

तात्पयेम । अ्वयवार्थस्तु-दु शमयेति 'तृड्ड' विशेषशन प्रतीयमानन्य त्रैलोक्यराज्येनायपरितोप पर्यवस्यति। श्रव्यगर्वर्जनमितवोदार्येडपि तस्य समुचित विभागासम्भवादर्थिभिर्लग्जमानैरिव म्वयमेवानमिसरगम्। 'सत्रित- द्रुमलताशोप' इति तदाश्रिताना तथाविधेऽपि सदट तनेकनिष्ठताप्रतिपत्ति । तस्य च पूर्वोक्तस्वपरिकरपरितोपाक्षमतया ताप म्वान्मनि, न भोगलवलौल्येनेति प्रतिपद्यते। उत्तरार्वेन-तादशे दुर्विलसितेप परोपकारविपयत्वन ग्लधा- स्पदृत्वमुन्मीलितम् । अर्परत्रापि विधिविहितसमुचितसमयसम्भव सलिलनिधिमज्जन निजो-

शिखर पर चढाकर, उसका इस प्रकार का प्रपूर्व-नया स्वरप प्रकाशित किया है जो प्रतीयमान होकर, किसी भी उदार चरित पुरष के लिए, यवोचित सौन्दग मे युषत सहस्त्रो पदार्थो के होते हुए भी [केवल एकमात्र] वही कहने योग्य [विशेष गुए पतीत] होता है। यह तात्पर्य है। भावार्थ [अ्रवयवार्य] तो इस प्रकार होगा। 'तपा' के [साथ लगे हुए] 'दु.शमया' इस विशेषण से प्रतीयमान [निर्धन व्यक्ति] का नंलोक्य राज्य से भी सन्तोष नहीं हो सकता है यह ध्वनित होता है। 'अ्रध्वग' श्रर्थात् पथिको के द्वारा [मरुभूमि के] परित्याग से [प्रतीयमान निर्धन व्यक्ति के] उदार होने पर भी [पर्याप्त धन के अभाव के कारण] उचित बंटवारा सम्भव न होने से [कहीं हमको न मिला इस शङ्धा से] लज्जित हुए याचको का उलके पात स्वय न जाना प्रतीत होता है। a Bond 'साथ्रित लताओ्रो औप्रौर वृक्षो के शोषण' से उस [प्रतीयमान निर्घन] के पाश्रितो [पुत्र- पत्नी आदि] के केवल उसी [निर्वन] पर आश्रित होने की सूचना प्राप्त होती है। औ्रौर [ताप स्वात्मनि इस पद से] अपने चोडे से भोग के लालच से नहीं अपितु पूर्वोक्त [अपने आाश्रित पुत्र-पत्नी आदि] अपने परिवार के सन्तुष्ट करने में असमर्थ होने से उसके [अपने] मानसिक टुख की प्रतीति होती है। [उसी इ्लोफ के] उत्तरार्ध में ऐसी दुरवस्था में भी [उसके भीतर मन मे] परोपफारपरता होने से उसकी प्रशसनीयता व्यक्त होती है। 1

दूसरे श्लोक मे भी विधाता के नियम के अनुसार [तायड्काल के] समय पर होने वाले, [सूर्य के] समुद्र मे डूबने [रूप कार्य] को, अपने उदय से स्वपक्ष [शर्थात् प्रकाशमान चन्द्रमा नक्षत्र थादि] और परपक्ष [थर्थात् अन्धकार] दोनो को दवा देने वाला सूर्य, मानो, ब्रह्मा के बनाये समस्त पदार्थो को प्रकाशित करने के व्रत रूप

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कारिका ४० ] प्रयमोन्मेप: [१४१

निर्वहसाय विवस्वान स्व्रयमेव समाचरतीति। अन्यथा कदाचिदपि शशाङ्कतम- स्तारादीनामसव्यक्तिर्मनागपि न सम्भवतीति कविना नूतनत्वेन यदुल्लिखितं तदतीव प्रतीयमानमहत्वव्यक्तिपरत्वेन चमत्कारकारितामापद्यते। 4

विचित्रमेव प्रकारान्तरेशोन्मीलयति-प्रतीयमानेत्यादि [४०]। यत्र यस्मिन् प्रतीयमानता गम्यमानता काव्यार्थस्य मुख्यतया विवनितस्य वन्तुनः कस्यचिद्नाख्येयस्य निव्यते। कया युक्त्या-'वाच्यवाचकवृत्तिभ्यां' शब्दार्थ- शक्निभ्याम्, तदतिरिक्तस्य तदतिरिक्तवृत्तेरन्यस्य व्यद्गचभूतस्याभिव्यक्तिः

'प्रतीमान'-्यवहारो वाक्यवक्रताव्याख्यानावसरे सुतरां समुन्मील्यते। प्रनन्तरोक्तमुदाहरराद्टयमत्र योजनीयम्।

स्वीकृत कार्य को पूर्ण करने के लिए [समुद्र-निमञ्जन] सानो स्वय ही करता हू। अन्यथा [यदि सूर्य कुछ समय के लिए समुद्र में श्रस्त न हो तो] चन्द्रमा, भ्रन्धकार औ्रौर तारा आादि की कभी अ्िव्यक्ति हो न हो सके यह जो अरभिनव तत्त्व कवि ने यहाँ वर्णन किया है वह प्रतीयनान महत्वश्ञाली पुरुष परक होने से अत्यन्त चमत्कारजनक प्रतीत होता है।[अति धोडी देर के लिए कार्यक्षेत्र से हटकर अपने पक्ष के और दूसरे पक्ष के लोगों को सामने आने का अवसर देने वाला नहापुरुष यहाँ सूर्य के उदाहरण से प्रतीत होता है। इम रूप मे अभिव्यक्त की हुई उसकी स्यिति अ्त्यन्त चमत्कार जनक प्रतीत होती है] ॥३६।।

[कारिका ४०]-विचित्र [मार्ग] को ही [फिर] दूसरी तरह से दिखलाते है। 'प्रतीयमान' इत्यादि [४० फारिका] से। जिन [मार्ग] में काव्यार्य, अर्यात् मुत्यत्या प्रतिपाद्य किसी अनर्वचनीय पदार्थ की, प्रतीयमानता नर्यात् व्यङगयता प्रतीत होती है। किस युक्ति से-'वाच्य और वाचक की ृत्ति ते' श्रर्थात् शब्द और अर्थ की शक्ति से अरतिरिक्त पपर्यात् उनसे सिन्न [व्यञ्जना पादि] में रहने वाले व्यङ्गघभूत [अर्थ] की अनिव्यकति की जाती है। वहाँ वृत्ति शन्द [का प्रयोग] 'शब्द' और 'अरर्थ' ने उस [न्यङ्गय अयं] के प्रकाशन करने की सामर्थ्य को प्रकाशित करता हैं। यह प्रतीयमान का व्यवहार वाकय-वक्रता के व्यास्यान के प्रवतर पर स्वय प्रकट हो जाता है। अभी कहे हुए ['तापः स्वात्ननि' ६5 और्पौर 'विशति यदि नो ६६] दोनो उदाहरस यहाँ भी जोड लेने चाहिएँ। [धर्थात् ये दोनों उदाहरण इसके भी हो सकते है]।

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१४२] वक्रोफितिजीवितम् [कारिका ४०

यथा चा- ववत्रेन्दोर्न हरन्ति वाप्पपयसा धारा मनोज्ञां श्रियं निःश्वासा न कदर्थयन्ति मधुरा चिम्त्राधरस्य द्युतिम्। तस्यास्त्वद्धिरहे विपववलवलीलावएय मवादिनी- चाया कापि कपोलयोरनुदिन तन्व्या: पर पुप्यत ॥१००॥'

गुरुसक्कटे वर्तमानायाः, कि बहुना, वाष्पनि:रवा समोक्षावसरोडपि न सम्भवति। केवलं परिएतलचलीलावएयसंवाद सुभगा कापि कपोलयो: कान्तिरशक्यसंचरणा प्रतिदिनं पर परिपापमासायतीति वाच्य्ग्रतिरिक्तवृत्ति दूत्युक्तितात्प्य प्रतीयते। उक्तप्रकार कान्तिमत्वकथन च कान्तकीतुकोत्कलिका का रणता प्रतिपद्यते अथवा जैसे [उसका स्वतन्त्र अ्रन्य उदाहरण। यह श्लोक 'धर्मकीति' का है। कवीन्द्रवचनामृत में सं० २७५ पर और सदुक्तिकर्णामृतम् में सं० १४१ पर वह 'धर्मकीति' के नाम से उद्ृत हुआ है। सुभापितावली में पृ० ४७ पर भी पाया है। [तुम्हारे वियोग में, नायिका के] आ्रँसुओ्र की धारा [भी] उसके मुखचन्द्र की मनोहारिसी कान्ति को नष्ट नहीं करती है। औ्रर उसके [उप्स] नि.श्वास [भी] विम्व सवुशा अघर की मघुर फान्ति को मतिन नहीं फरते हैं। [अर्थात् वह न रोती है औ्र न उसासे भरती है किन्तु] तुम्हारे विरह में उसके पफे हुए लवली पत्र से मिलती-जुलती कपोलों फी [पीली] कान्ति दिन-प्रतिदिन वढ़ती ही जाती है।१००। यहां तुम्हारे विरह दुख को छिपाने की फदर्यना के फप्ट को अनुभव करते हुए उतने बडे भारी सडूट में पडे होने पर भी अधिक कया कहा जाय, रोने और उसासें भरने का अवसर भी उसको नहीं मिल पाता है [अरथात कहीं दूसरे लोग मेरे रोने या निःशयासो को देखकर तुम्हारे वियोग से उसका सम्बन्ध न समझ ले इसलिए वह विचारी जहां तक सम्भव होता है ऐसे अवसरों को बचाती ही है।] परन्तु फेवल पके हुए लवली पत्र के समान सुन्दर कपोलो की कुछ अ्पूर्व-सी कान्ति, जो छिपाई नहीं जा सफती है प्रतिदिन बढ़ती जाती है। [अर्थात् तुम्हारे वियोग में यद्यपि वह रोती या उसासे नहीं भरती है कि कहीं भेद न खुल जाय परन्तु उसके गाल जो प्रतिदिन पीले पडते जाते है दह तो छिप नहीं सकते है]। यह, वाच्य अर्थ से अ्र्प्रतिरिय्त, दूति का तात्पर्य यहाँ [व्यङ्गघय रूप से] प्रतीत होता है। और उस प्रकार का कान्ति की सत्ता का वर्णन उसके पति के उत्कण्ठातिशय का कारण बनता है। [अर्थात् अ्पनी प्रियतमा की इस प्रकार की अवस्था को सुन के उसके पति अथवा प्रियतम के मन में उससे मिलने की उस्फट उत्कण्ठा उत्पन्न होने लगती है। यही उसका चमत्कार है] ।४॥ १ काव्य प्रकाश पृ० ३४२ पर उद्धृत।

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कारिका ४१ ] प्रथमोन्मेषः [१४३

विचित्रमेव स्वरूपान्तरेण प्रतिपाद्यति-'स्वभाव' इत्यादि [४१]। यत्र यस्मिन् भावानां स्वभाव: स्वपरिस्पनद. सरसाकृतो रसनिर्भराभिप्रायः पदार्थानां निबध्यते निवेश्यते। की दश :- 'केनापि कमनीयेन वैचित्येणोपवृ'हितः' लोको- त्तरेख हृदय हारिणा वैदग्ध्येनोत्तेजितः । 'भाव' शव्देनात्र सर्वपदार्थोSभिधीयते। न रत्यादिरेव। उदाहरएम्-

कीडासु बालकुसुमायुधसङ्गताया यत्तत् स्मितं न खत्ु तत् स्मितमात्रमेव। आलोक्यते स्मितपटान्तरित मृगाच्या- स्तस्याः परिस्फुरदिवापरमेव किञ्चित् ॥१०१॥ श्रत्र 'न खलु तत् स्मितमान्रमेवेति' प्रथमार्धेऽभिलापसुभगं सरसाभि- प्रायत्वमुक्तम्। अपरार्धे तु इसितांशुकतिरोहितमन्यदेव किमपि परिस्फुरदा- लोक्यते इति कमनीयवैचित्र्यविच्छ्वित्तिः।

[कारिका ४१]-विचित्र [मार्ग] को ही 'स्वभाव' इत्यादि [४१वीं कारिका में] दूसरे रूप से प्रतिपादन करते है। जहाँ 'जिस मार्ग में पदार्थों का स्वभाव अर्थात् भपना स्वरूप, सरस-अभिप्राययुक्त अर्थात् रसमय, रसप्रधान, रूप से वगिगत किया जाता है [काव्य में] समाविष्ट किया जाता है [वह विचित्र मार्ग है]। 'कंसा-'किसी सुन्दर विचित्रता से युक्त' अर्थात् हृदयहारी किसी लोकोत्तर वैदग्व्य से उत्तेजित। 'भाव' शन्द यहां समस्त पदार्थों का वोधक है। केवल रत्यादि का ही नहीं। उदाहरस [जैसे]- [वय. सन्धि के अवसर पर] नवीन काम विकारो से युक्त [उस] तरुी कर [मुझको देखकर] वह जो मुस्कराना था वह केवल मुस्कराना-मात्र ही नहीं था। उस मुस्कराहट के परदे के पीछे छिपा हुआ उस मृगनयनी का कुछ और ही भाव भलकता हुआ-सा दिखलाई देता था।१०१।

यहां पूर्वार्घ में वह केवल मुस्कराहन मात्र नहीं थी इससे [सम्भोग के] अभिलाष से सुन्दर 'सरस' अभिप्राय सूचित होता है। और उत्तरार्घ में तो मुस्कराहट के परदे के पीछे छिपा हुआ कुछ और ही [सम्भोगाभिलाष] भलकता हुआ दिखलाई देता हूँ इस [कथन] से बड़े मनोहर सौन्दर्य की अभित्यपित हो रही है ॥४१॥

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१४६ ] घकोफितिजीवितम् [फारिका ४५

एवं माधुर्यमभिवाय प्रसाठमभिघत्ते- असमस्तपदन्यासः ग्रसिद्धः कविवर्त्मनि। किञ्चिदोजः स्पृशन् प्रायः ग्रसादोऽप्यत्र दृश्यते॥४५॥ असमस्तानां समासरहिताना पदाना न्यासो निबन्धः कविवत्मेनि विपश्चिन्मार्गे यः प्रसिद्व प्रख्यात.। सोऽयस्मिन् विचित्रास्ये प्रसादाभिधानो गुए किञ्चित् कियन्मात्र ओ्रोज स्पृशन, उत्तानतया व्यवस्थित. प्राया दश्यते प्राचुर्येण लक्ष्यते। वन्धसौन्दर्यनिवन्धनत्वात् तथाविधस्यौजस समामवती वृत्ति 'ओज.' शव्देन चिरन्तनैरुच्यते। तठयमत्र परमार्थ., पूर्वस्मिन प्रसाद लक्षणो सति त्र्प्राज स्पर्शमात्रमिह विधीयते। यथा- अपाङ्गगततारता. स्तिमितपद्मपालीभृत स्फुरत्सुभगकान्तय स्मितसमुद्गतिद्योतिता। विलासभरमन्थरास्तरलकल्पितैकत्र वो जयन्ति रमरोडपिंता समदसुन्दरी दृप्टय।१०४॥४५। इस प्रकार 'माधुर्य' का फथन करके अब 'प्रसाद' [गुण] को फहते है- समास युक्त पदो से रहित और ओज का तनिक-सा स्पर्श करने वाला फवियों के मार्ग में प्रसिद्ध 'प्रसाद' गुए' भी प्राय इस [विचित्र मार्ग] में देसा जाता है।४४। श्रसमस्त अर्थांत् समास रहित पदो का न्यास अर्थात् रचना। कविमागं में अर्थात् विद्वानों के सिद्धान्त में, मार्ग में, जो प्रसिद्ध अर्थात् प्ररयात ह वह 'प्रसाद' नामक गुए भी तनिक-सा 'भोज' का स्पर्श करता हुआ अर्थात् [ऊपर की ओ्र] भ्रोज की ओर बढा हुआ जो 'प्रसाद' गुए है वह भी इह विचित्र नामक मार्ग में प्राय दिखलाई देता है अर्थात् अधिकतर पाया जाता है। [उसके ] रचना मे सौन्दर्य का उत्पादक होने से ['किञ्चिदोज स्पृशन्' में प्रसाद को जिस ओरज का स्पर्श करने वाला वतलाया है] उस श्र््रोज की समास युक्त वृत्ति यहाँ प्राचीन लोगो ने 'श्रोज' शब्द से कही हैं। इसका यहाँ यह अ्र्रभिप्राय हुआ कि [३१वीं कारिका में कहे हुए] पूर्वोक्त प्रसाद गुए के लक्षण के [होने पर ओ्ज अर्थात्] समासवती वृत्ति के सस्पर्शमात्र का यहाँ [विचित्र मार्ग में] विधान किया गया है। [प्रचुर मात्रा मे समास के प्रयोग का विधान नहीं है] जैसे- मदमाती सुन्दरियो की अपने प्रियतम के प्रति सम्पित, नेत्र के किनारे पर स्थित पुतली से युक्त [कटाक्ष रूप], अपलक और सुन्दर कान्ति से सुशोभित, मुस्कराहट के आ जाने से चमकती हुई, हाव-भाव के आघिक्य से मन्थर, और एक ओोर फी भाह को चञ्चल करने वाली दृष्टि सर्वोत्कर्ष युक्त हैँ।१०४।४५।

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कारिका ४६ ] प्रथमोन्मेष: [१४७

प्रसादमेव प्रकारान्तरेण प्रकटयति- गमकानि निवन्ध्यन्ते वाक्ये वाक्यान्तराएयपि। पदानीवात्र कोऽप्येष प्रसादस्यापरः क्रमः ॥४६॥ त्रप्रन्नास्मिन् विचित्रे यद्वाक्य पद्समुदायस्तस्मिन् गमकानि समपेका- रयन्यानि वाक्यान्तराणि निवध्यन्ते निवेश्यन्ते। कथम्, पदानीव पदवत् परस्परान्वितानीत्यर्थः। एप कोऽप्यपूर्व. प्रसादस्यापरः क्रमः वन्वच्छायाप्रकारः । यथा- 'नामाप्यन्यतरोः' इति ॥१०५ ॥४६॥' प्रसादमभिधाय लावएयं लक्षयति- अत्रालुप्तविसर्गान्तैः पदैः प्रोतैः परम्परम्। ह्रस्वैः संयोगपूर्वैश्च लावयसतिरिच्यते ॥४७॥

प्रसाद [गुख] को ही दूसरी तरह से दिखलाते है- यहां [विचित्र मार्ग में] वाक्य में [परस्पर अ्रन्वित] पदो के समान [परस्पर श्रन्वित रूप से अरन्य सुन्दर व्यङ्गय अ्रर्थ] के व्यञ्जक अन्य वाक्य भी ग्रथित किए जाते हैं वह [भी] प्रसाव [गए] का कोई [अपूर्व सौन्दर्यशाली] दूसरा ही प्रकार है ।४६। यहाँ इस विचित्र मार्ग में जो वाक्य अर्थात् पद समुदाय है उसमें व्यञ्जक [अलौशिकि सौन्वर्य के] समर्नक अ्रन्य वाक्य जोड दिए अर्थात् सन्निविष्ट कर दिए जाते है। कँमे-पदो के समान, पदों के तुल्य परस्पर शन्वित रूप से यह अपरभित्राय है। यह प्रसाद [गुए] का कोई अपूर्व दूसरा क्रम है अर्थात् रचना की दूसरी शैला है। जैसे- [पुर्भेदाहृत ६१वें उदाहरण] नामाप्यन्यतरो: इत्यादि में ॥१०५॥४६॥ 'प्रसाद' को कहकर [विचित्र मार्ग के उपयोगी] 'लावण्य' को कहते हं- यहाँ [विचित्र मार्ग में] एक दूसरे से मिले हुए, जिनके अ्न्त के विसर्गों का लोप नहीं हुआ है और सयोग से पूर्व हस्व [लघ] पदों से 'लावण्य' की वृद्धि हो जाती है। [अर्यात् विचित्र मार्ग में इस प्रकार के पदो का प्रयोग लावण्य के भ्र्प्रति- शय का जनक होता है]।४७।

१ उदाहरण स० ६१ पर उद्धत।

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१४८ ] घकोयितिजीवितम् [कारिका ४७

अत्रास्मिन्नेवंविधेः पटैलावसयमतिरिच्यते परिपोर्ष प्राप्नोति। कीटशै-परस्परमन्योन्यं ग्रोतैः संग्लेप नीतें,। अन्यच्च कीहशै-अलुप्त- विसर्गान्तै, अरप्रलुप्तविमर्गाः श्रयमाणविसर्जनीया अन्ता येपा तानि तर्थों- क्तानि तै.। हस्वैश्च लघुभि, सयोगेम्य पूर्व.। श्रतिरिच्यते इति सम्बन्ध. । तदिढमत्र तात्पर्यम् पूर्वोक्तलन्षण लावएय विनामानमनेनातिरिक्ततां नीयते। यथा- श्वासोत्कम्पतरद्गिणि स्तनतटे धौतान्जनश्यामलाः कीर्यनते कराश कृशादि किममी वाप्पाम्मसा विन्दवः । किन्चा कुन्चित करठरोघकुटिला कर्णामृतर्यन्दिनो हुङ्कारा. कलपञ्चमप्रणयिनस्प्रृ्यन्ति निर्यान्ति च ॥१०६।।'

यहां इस [विचित्र मार्ग] में इस प्रकार के पदों से लावण्य बढ़ता है अर्यात् परिपुष्ट होता हैं। कैसे [पदो से] कि, एक दूसरे साथ मिले हुए सश्लेप को प्राप्त हुए। और फैसे [पदो] से कि-अलुप्त विसर्गान्त अ्रर्थात जिनके ध्रन्त के विसर्ग लुप्त- नहीं हुए हे, अर्थात् धूयमाण ह वह वैसे [अलुप्त विसर्गान्त] हुए, उनसे। औौर हस्व अर्थात् लघुओ से, सयोग के पूर्दवर्ती [लघु प्रक्षर वाले पदो] से। [लावण्य] वृद्धि को प्राप्त होता हैं। यह [श्लोक के पदों का अ्रन्वय रूप] सम्बन्ध है। यहाँ इसका यह तात्पर्य हुआ कि [सुकुमार मार्ग के निरुपण में ३२वीं कारिफा में जिस लावण्य गुए का लक्षसा किया है वह] पूर्वोक्त लक्षण वाला विद्यमान लावण्य [विवित्र मार्ग में] इस [प्रकार के पदो के योग] से बढ जाता है। जैसे- यह कलोक कवीन्द्रवचनामृत में स० ४५० पर दिया गया है। लेखक का पता नही है। वकोक्तिजीबित में इसके पूवं उदाहरण सर्या ४६ पर भी इस श्लोक की प्रथम पक्ति को प्रतीक रूप में उदृत किया जा चुका है। उसमें किसी रोती हुई सुन्दरी का वरन इस प्रकार किया गया है- हे फृशाद्ि [तुम्हारे] श्वास के से भ्र्रावेग से हिलते हुए स्तनों के ऊपर [आांखो के] घुले हुए कज्जल [के मिल जाने] से काले शांसुओ्रो की बूँदों के कररण क्यों विखर रहे हैं ? और सकचित [दवाए हुए] कण्ठ के अवरोध से अ्परस्पष्ट [कटित] तथा [कोकिल के] सुन्दर पञ्चम स्वर के समान कानों में अमुत घोलने वाली [हद्धार] हिचकियाँ क्यों [बार-बार] निकलती और रुक जाती है॥१०६।।

१ कवीन्द्रवचनामत ४५० ।

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कोरिका ४७ ] प्रथमोन्मेष:

यथा वा-

प्रान्त हन्त पुलिन्दसुन्दरकरस्पर्शक्षम लच्ष्यते। तत् पल्लीपतिपुत्रि कुब्जरकुल कुम्भाभयाम्यर्थेना- दीनं लामनुनाथते कुचयुगं पत्राशुकैर्मा पिघाः ॥१०७।।१

इसमें श्यामला, करश., बिन्दव, कुटिला., हुद्वारा और प्रणायिन आदि ये अलुप्त विसर्गान्त पद है। प्रथम चरण में 'कम्प' में 'म्प' के सयोग के पूर्व 'क' 'तरङ्गित' में 'ङ्ग' के सयोग के पूर्व 'र', 'स्तन' में 'स्त' के सयोग के पूर्व 'खि' तीसरे चरण में 'किञ्च' में 'ञ्व' के सयोग के पूर्व 'कि' तथा कण्ठ' में 'ण्ठ' के सयोग के पूर्व 'क' तथा 'कर्ग' में 'एं' के सयोग के पूर्व 'क' इत्यादि सयोग के पूर्व ह्रस्व वर्ण पाए जाते हैं। और 'इवासोत्कम्पतरङ्गिणि' तथा 'घौाञ्जनश्योमला' आदि श्लोक के सारे पद एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए इन सबसे यहाँ 'विचित्र-मागें' के 'लावण्य' की अभिवृद्धि हो रही है। प्रथवा जैसे- यह श्लोक सदुक्तिकर्णणामृतम् में स० ३७६ पर वल्लभस्य' नाम से दिया हुआ है। काव्यप्रकाश पृ० २६६ पर भी उद्धृत हुआ है। अर् इस प्रकार है- हे पल्लीपति की पुत्रि [शवरों की छोटी-सी बस्ती पल्ली कहलाती है उसके भुखिया की पुत्रि] तुम्हारा यह [उन्नत होने के फारण स्पष्ट दिखाई देने वाला] थोडे-थोड़े पके हुए तिन्दुक फल के समान बीच में श्याम वर्ण और चारो ओर पीला स्तन युगल, शबर युवक के कर मर्दन के योग्य दिखलाई दे रहा है। इसलिए [ हे पल्ली- पति पुत्रि] अपने कुम्भस्थल के अभय दान की भिक्षा के लिए दीन होकर हाथियो का समूह तुमसे यह याचना कर रहा है कि अपने इस कुचयुगल को पत्रों से आच्छादित मत करो। [खुला रहने दो। उसके खुले रहने से हमारे कुम्भस्यलो की रक्षा हो सकती है। तुम्हारे-पल्लीपतिपुत्रि के-विशाल स्तनों के खुले रहने के वस्त्रो से हाथियों के कुम्भ की रक्षा केसे हो सकेगी इसका उपपादन कई प्रकार से किया जा सकता है। पहिला प्रकार यह है कि तुम्हारे स्तनों के समान हमारे कुम्भस्थल हैं इस लिए शायद इस साम्य के कारण शवर युवक दया के कारण कुम्भस्थल का भेदन न करें श्रथवा उसमें श्रासवत होकर हमारे शिकार का उनको फोई ध्यान ही न रहे। आदि]॥१०७॥ १ सदुक्तिकर्णणामृतम् २,३७६ (वल्लभस्य) ।

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१५० ] [ कारिफा ४८

यथा वा- हंसानां निनदेपु। इति॥2ocl3|।'

यन्नातिकोमलच्छायं नातिकाठिन्यमुद्वह्क त् । भिजात्य मनोहारि तदत्र प्रोहिनिमितम् ॥४=॥ त्रपरन्नास्मिन् आर््भिजात्यं ग्न्नातिकोमलच्छाय नात्यन्तमसृणकान्ति नातिकाठिन्यमुद्वहन् नाति कठोरता धारयत तन प्रीढिनिर्मित सकलकवि- कौशलसम्पादितं सन्मनोहारि हृदयरञजक भवतीत्यर्थ। यथा- त्रघिकरतलतल्प कल्पितस्वापलीला परिमलननिमीलत्पाएिडमा गएडपाली। सुतनु कथय कस्य व्यन्जयत्यञ्जसैव स्मरनरपतिकेलीयोवराज्याभिपेक्म् ।१०६।/२ अ्रथवा जैसे [इसी प्रकार का तीसरा उदाहरण]- [उदा० स० ७३ पर पूर्वोदाहृत] 'हसाना निनद्षु'। इत्यादि ॥१०८॥८७॥ इस प्रकार लावण्य का कथन करके प्र्प्व आ्र्ाभिजात्य [गुण]का निरुूपण करते हैं- यहाँ [इस विचित्र मार्ग में] जो न तो अ्रधिक कोमलता की छाया से युवत हो न अत्यन्त कठिन हो ऐसे प्रौढि-निरमित [बन्ध के गण] को आभिजात्य [गुर] फहते हैं।४८। यहां इस [विचित्र मार्ग] में उसको 'परराभिजात्य' [नामक गुए] कहते हं जो न तो अत्यन्त कोमलच्छाया वाला अर्थथात् सुक्मार कान्ति वाला हो औ्रर न श्र्रत्यन्त कठोरता को धारस करने वाला हो। वह प्रौढि [विदग्घता] से रचा हुआ अर्थात् कवि की समस्त शक्ति से सम्पादित किया हुआ होकर मनोहारी अर्थात् हृदयाह्हादक होता है। यह भावार्थ है। जैसे- [यह श्लोक काव्य प्रकाश पृ० ३४२ पर भी उद्धत हुआ है। हथेली पर गाल रख कर अपने प्रियतम की चिन्ता में निमग्न नायिका को देखकर उसकी सखी के उसके प्रति उषित है] करतल [हथेली] रूप शैय्या के ऊपर शयन करने वालो [हथेली के साथ] मिलन के कारण पीलेपन से रहित [हथेली की रगड से लाल पडी हुई] यह कपोलस्थली कहो किस [सौभाग्यशाली] के स्मर रूप नरपति की [चम्वनादि] लीलाओं के युवराज पद पर अ्र्प्रभिषेक को सूचित कर रही हैं ।१०६। १ उदा० स० ७३ पर पूर्व उद्धृत। २ काव्यप्रकाश पृ० ३४२ पर उद्घृत।

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कारिका ४६-५ू०] प्रथमोन्मेष: [ १५१'

एवं सुकुमारविहितानामेव गुखानां विचित्रे कश्चिदतिशयः सम्पाद्यत इति वोद्धव्यम् । आभिजात्यप्रभृतयः पूर्वमार्गोदिता गुणाः। अत्रातिशयमायान्ति जनिताहार्यसम्पदः ॥११०।।

एवं विचित्रमभिधाय मध्यममुपक्रमते- वैचित्र्यं सौकुर्यमाञ्च यत्र सङ्कीर्राता गते। भ्राजेते सहजाहार्यशोभातिशयशालिनी॥४६।। माधुर्यादिगुखग्रामो वृत्तिमाश्रित्य मध्यमाम्। यत्र कामपि पुष्णाति वन्धच्छायातिरिक्तताम्॥५।।

इस प्रकार सकुमार [मार्ग] में कहे हुए [माधुर्य, प्रसाद, आभिज्ञात्य औ्रर लावप्य चारो] गुखों का ही विचित्र [मार्ग] में [इस प्रकार के वर्गगो के प्रयोग से] कुछ झपूर्व अ्रतिशय सम्पादित हो जाता है यह समझना चाहिए। पूर्व [अर्थात् सुकुमार] मार्ग में कहे हुए [१ माघुर्य, २ प्रसाद, ३ लावण्य और ४-] अभिजात्य आदि गुण [ही] आ्हार्य [अर्थात् कवि की व्युत्पत्ति आरदि से उत्पन्न लोकोत्तर चमत्कार रूप]सम्पत्ति को प्राप्त कर अ्रतिशय को प्राप्त हो जाते है। यह भ्रन्तरश्लोक है॥४८।। इस प्रकार विधित्र [मार्ग] का वर्णन करके अ्र्रव [तीसरे] मध्यम [मार्ग] का प्रतिपादन करते हें- जहां [जिस मार्ग में] सहज [अरथात् स्वाभाविक] और आरहार्य [अरर्थात् कवि की व्युत्पत्ति आदि से जन्य] शोभा के अतिशय से युक्त पूर्वोक्त] विचित्र तथा सकुमार [दोनो मार्ग] परस्पर मिश्रित [सद्धोर्ण] होकर शोभित होते है। [वह मध्यम मार्ग है]।४६।। जहां [जिस मार्ग में] माधुर्य आरदि [पूर्वोकत] गुए समूह [न श्रति कोमल औोर न अति कठोर रूप] मध्यम वृत्ति का अ्रवलम्बन कर, रचना के सौन्दर्यातिशय को पुष्ट करता है [ उसको मध्यम मार्ग कहते है] ॥५०।

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१५२ ] वक्ोपितजीचितम् [फारिका ५१-५२

मागोडसौ मध्यमो नाम नानारुचिमनोहर:। स्पर्धया यत्र वर्तन्ते सार्गद्वितयसम्पदः ।५१।। तन्रारोचकिन: कचिच्छायावेचित्यरञ्जरं। विदग्धनेपथ्यविधौ भुजङ्गा इव सादराः ॥५२।। मार्गोडसौ मध्यमो नाम मध्यमाभिधानोडसी पन्था। कीहशः-नाना- विधा रुचय प्रतिभामा येपा ते तयोक्तास्तेपा सुकुमारविचित्रमध्यमव्यसनिना, सर्वेपामेव मनाहरो हृदयहारी। यस्मिन् स्पर्धया मार्गद्वितयसम्पदः सुकुमार- विचित्रशोभा: साम्येन वर्तन्ते व्यवतिप्ठन्ते न न्यूनातिरिक्तत्वेन। यत्र वैचित्र्य विचित्रत्व सौकुमार्यं सुकुमारत्वं सङ्कीर्णता गते तस्मिन् मिश्रता प्राप्ते सती

जहां [जिस मार्ग में सुकुमार तथा विचिन्न] दोनो मार्गो का सौन्दय स्पर्धा- पूर्वक विद्यमान होता है औ्रर [नाना] विभिन्न प्रफार की रुचियो वाले सहृदयो के लिए. मनोहर होता है [उसको मध्यम मार्ग कहते है] ॥५१॥ यहाँ [इस काव्य मार्ग में] सुन्दर वेष-भूपा के रसिक [भुजङ्गा-इब] नागरिको के समान कोई-कोई सौन्दर्यानुसन्वान के व्यसनी [शरोचकी, सहृदय कवि-विशेष सुकुमार तथा विचित्र द्विविध मार्गो की] छाया के वंचित्र्य से मनोरञ्जक इस [मध्यम मार्ग] में आ्र्प्रावरवान् होते है ॥।५२।। जैसे रसिक नागरिक जनो को नाना रग के विचित्र वस्त्रादि की वेप- भूषा के प्रति विशेप आ््प्राग्रह होता है इसी प्रकार 'अरोचकी' अपर्थात् जिनको साधारण वस्तु पसन्द ही नही आती है ऐ से सौन्दर्य के विशेष प्रेमी कुछ कविगण अन्य मार्गो की अपेक्षा इस मध्यम मार्ग को शधिक पसन्द करते हैं।

वह 'मध्यम' नामक मार्ग है अपर्यात् उस मार्ग को मध्यम मार्ग कहा जाता है। कँसा कि, जो नाना प्रकार की रुचि [अरर्थात् सौन्दर्य विषयक ज्ञान] जिनका है उन सुकुमार, विचित्र और मध्यम मार्ग के प्रेमी सभी के मन को हरए करने वाला अर्थात् हृदयहारी। जिसमें [सकुमार तथा विचित्र] दोनो मार्गो की सम्पत्ति अर्थात् सुकुमार और विचित्र शोभा, समान रूप से स्थित होती है। [किसी भी मार्ग की शोभा उसमें] न कम और न अधिक होती है। जहाँ [जिस मार्ग में] वचित्र्य अर्थात् विचित्रता और सौकुमार्य घर्थात् सुकुमारता सङ्कीणं हो गई है अर्थात्

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कारिका ५१-२२] प्रथमोन्मेषः i१५३

भ्राजेते शोभेते। कीद्ृशे-सहजाहार्यशोभातिशयशालिनी, शक्तिव्युत्पत्ति- सम्भवो यः शोभातिशय. कान्त्युत्कर्पस्तेन शालेते श्लाघेते ये ते तथोक्ते। माधुर्येत्यादि। यत्र च माधुर्यादिगुराम्रामो माघुर्यप्रभृतिगुरसमूददो मध्यमासुभयच्छायच्छुरितां वृत्ति स्वस्पन्दगतिमाश्रित्य कामप्यपूर्वां बन्वच्छा- यातिरिक्ततां सन्निवेशकान्त्यधिकता पुष्णाति पुष्यतीत्यर्थ.। तत्र गुखानामुदाहरखानि। तत्र माघुर्यस्य यथा- वेलानिलैर्मृ दुभिराकुलितालकान्ता. गायान्ति यस्य चरितान्यपरान्तकान्ताः । लीलानताः समवलम्व्य लतास्तरूण हिन्तालमालिषु तटेषु महार्णवस्य।।१११।।१

मिल गई है। उसमें मिश्रित होकर शोभित होती है। कैसे-स्वाभाबिक [प्रतिभा सम्पाद्य] तथा शहार्य [व्युत्पत्ति सम्पाद] शोभातिशय से युक्त, अर्थात् [कवि की] शक्ति [प्रतिभा] और व्युत्पत्ति [ज्ञानादि] से उत्पन्न जो शोभा का अ्र्परतिशय अर्थात् काव्य का उत्कर्ष, उससे शोभित प्रथवा प्रशसित [सौकुमार्य और वंचित्र्य] वे उस प्रकार के अर्थात् 'सहजाहार्यशोभातिशयशालिनी' हुए। [वह जिस मार्ग में पाए जायँ उसको मध्यम मार्ग कहते है]।४६। और जहां [जिस मार्ग में] माघर्य आदि गुो का समूह मध्यम अर्थात् उन दोनों की सौन्दर्य से युक्त वृत्ति अर्थात् अपनी स्वभाव-गति को धारण कर रचना में सन्निचेश के फिसी अपूर्व शोभातिशय को उत्पन्न या पुष्ट करता है [वह मध्यम मार्ग कहलाता है] ।२१। उस [मध्यम मार्ग] में गुखों [माधुर्य आदि] के उदाहरण [दिखलाते हं]। उनमे से [शंथिल्य-रहित सुन्दर रचना रूप] माधुर्य का [उदाहरण] जैसे- [यह श्लोक दादताड़ितक भाणग का ५५वा श्लोक है। अर्थ इस प्रकार है]- पेडो [पर फली हुई] को लताओ को पकडकर नज्ाकत से भुकी 1ई, हिन्ताल [वृक्ष विशेष] की पक्तियों से युक्त समु के किनारो पर, सागर तट की [शीतल] मन्द वायु से तरलित केशों वाली समुद्रपार की स्त्रियाँ जिसके चरित का गान करती है ।१११।

१. पादताहितक-भाण, श्लोक ५ू५।

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१५४ ] वकोपितिजीवितम् [कारिका ५२

प्रसादस्य यथा- तद्वक्त्रेन्दुविलोकनेन इत्यादि ॥११२॥ लावएयस्य यथा- सङ्कान्तागुलिपवंसूचितकरस्वापा कपोलस्थली नेत्रे निर्भरमुक्तवाप्पकलुपे नि श्वासतान्तोडघर । व द्दोद्भेदविसंप्टुलाल कलता निर्वद्शून्य मन कप्ट दुर्नयवेदिभि. कुसचिवेर्वत्सा दृढ सेघते॥११३॥ अनिजात्यस्य यथा- त्रलग्व्य लम्बा सरसामवल्ली पिवन्ति यस्य स्तनभारनम्रा. । स्रोतश्च्युत शीकरकूणिताच्यो मन्दाकिनीनिर्भरमश्वमुख्य ।।११४।।

[यह मध्यम मार्गोचित माधुर्य गुण का उदाहरण है।] प्रसाद [गुए] का जैसे- [उदाहरण स० २३ पर पूर्वोदाहृत] 'तद्वषत्रेन्दु विलोकनेन' इत्यादि ॥११२। लावण्य का [मध्यममार्गोचित उदाहरण] जैसे- [यह श्लोक तापसवत्सराज के तृतीयाड् का ७६वा श्लोक है] गालो पर बने हुए अंगुलियों के निशानो से हाथ पर गालो के रखने की [चिन्ता मुद्रा] सूचना होती है [रोन के कारण] आंखें आ्र्पंसुओ्र्प्रो के प्रवाह से मलिन हो रही है, [उष्ण एव दीर्घ] नि श्वासो से अधर सूख रहा है, वेरी के खुल जाने से बाल बिखर रहे हैं और मन दुख के कारण शून्य-सा हो रहा है, दु ख की बात है कि दुर्नय को [ही] जानने वाले दुष्ट मन्त्री [अपनी दुर्नीति के कारण] मेरी पुत्री को [उसके अभीष्ट राजा उदयन के साथ विवाह न करने देकर] अत्यन्त दु.खी कर रहे हैं ॥११३। आभिजात्य [गुण] का [मध्यम मार्गोचित उदाहग्ण] जैसे- स्तनों के भार से भुफी हुई, जिसकी हरी-हरी लम्बी शगे की लता को पकड कर जलकरगों [के गिरने] से अर्धमुकुलित नेत्रो वाली अश्व मुखियाँ [अश्वमुख नामक किन्नर जाति विशेष की स्त्रियाँ] जिस [पर्वत] के स्त्रोत से गिरने वाले गङ्गा के निर्भर से जल को पीती है ॥११४॥

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कारिका ५२] प्रथमोन्मेपः [१५५

एवं मध्यमं व्याख्याय तमेवोपसंहरति-'अ्रन्नेति'। अ्रत्रैतस्मिन् केचित् कतिपये, सादरास्तदाश्रयेणा काव्यानि कुर्वन्ति। यस्मात् अरोचकिनः कमनीय- वस्तुव्यसनिनः। कीदशे चाम्मिन्-'छायावैचित्र्थरञ्जके कान्तिविचित्रभावा- ह्वादके। कथम् 'विदग्धनेपथ्यविधौ भुजद्गा इव', अरग्राम्याकल्पकल्पने नागरा यथा। सोऽपि छायावैचित्रयरञ्जक एव।

अत्र गुणोदाहर शानि परिमितत्वात् प्रदर्शितानि, प्रतिपद पुनश्छाया- वैचित्र्यं सहृदयै. स्वयमेवानुसर्तव्यम्। अनुसरसदिक प्रदर्शनं पुन क्रियते। यथा-मातृगुप्त-मायुराज-मञ्जीरप्रभृतीनां सौकुमार्यवैचित्र्यसंव लित परि- स्पन्दीनि काव्यानि सम्भवन्ति। तन्र मध्यममार्गसंवलितं स्वरूपं विचारणीयम्। एवं सहजसौकुमायसुभगानि कालिदास-सवसेनादीनां काव्यानि दश्यन्ते।

इस प्रकार मध्यम [मार्ग] की व्याख्या करके उसका ही [आगे] उपसंहार करते हे। यहाँ इस [मध्यम मार्ग] में कोई पप्र्थात कुछ लोग आ्रादर-भाव रखते हैं अर्थात् उसका अवलम्बन करके काव्यो की रचना करते हैं। क्योंकि [वे] आरोचकी अर्थात् सुन्दर वस्तु के प्रेमी है। किस प्रकार के इस [मध्यम मार्ग] में-'छाया की विविघता से शह्ादक' अर्ात् [सुकुमार तथा विचित्र दोनों मार्गो की] नाना प्रकार को कान्ति की विचित्रता से हृदयों को प्रसन्न करने वाले [मध्यम मार्ग में]। फैसे- चातुर्यपूर्ण [सुन्दर] चेष-भूषा की रचना में रसिक नागरिको के समान। ग्राम्य से भिन्न [सुन्दर] वेष की रचना में जैसे नगरनिवासी [आदरवान् होते है। इस प्रकार सौन्दर्य के उपासक कुछ लोग इस मध्यम मार्ग को पसन्द करते है ]। वह [ विदग्ध नागरिकों का प्रिय विचित्र वेष] भी छाया की विचित्रता से ही मनोरञ्जक होता है।

इस प्रकार गुरों के उदाहरण थोड़े से [परिमित] होने से दिखला दिए गये हैं। परन्तु [उनमें भी और अ्नन्यन्न भी] प्रत्येक पद की अलग-अ््लग सौन्दर्य की विचित्रता सहृदयों को स्वयं देख लेनी चाहिए । [उसके] अनुसरण करने का प्रकार 7 [हम] दिखलाए देते हैं। जैसे मातृगुप्त, मायुराज, मञ्जीर आदि [नामक सुकवियों] के, सुकुमारता तथा विचित्रता युक्त स्वभाव से सुन्दर काव्य हो सफते है। [अर्थात् इन कवियों के काव्यों में मध्यम मार्ग की प्रधानता रहती है]। उसमें मध्यम मार्ग से युवत अश का विचार [खोज] कर लेना चाहिए। इसी प्रकार कातिदास, सर्वसेन आदि के काव्य सहज सौधुमार्य से युक्त होते हैं। उनमें तुकुमार मार्ग का

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१५६ ] व्रोकितिजी वितम् [कारिफा ५३

तत्र सुकुमार्गमार्गस्वरूपं चर्चनीयम्। तथव च विचित्रवक्क्वविजम्भित हपचरिते प्राचुर्येए भट्टवाणस्य विभाव्यते। भवभूति-राजशेखरविरचितेपु बन्धसौन्दर्यसुभगेपु मुक्तकेपु परिद्वण्यते । तरमात सहदयै, सर्वेत्र सर्वमनु-" सर्तव्यम्। एव मार्गत्रितयलक्षर्णं दि ड्मात्रमेव प्रदशितम्। न पुन. साकल्येन सत्कविकौशलप्रकाशण कनचिदपि स्वरूपमभिवातुं पार्यते। मार्गेपु गुखानां समुदायधर्मता। यथा न केवल शब्दादिघमेत्व तथा तल्लक्षणव्यास्या- नासर एव प्रतिपादितम् ।।५२।। एव प्रत्येक प्रतिनियतगुणग्रामरमणीयं मार्गत्रितयं व्यास्याय साधारण- गुएस्व रूपव्याख्यानार्थमाह- त्ञ्जसेन स्वभावस्य महत्व' येन पोष्यते। प्रकारेण तदौचित्यमुचिताख्यानजीवितम्॥५३।।

स्वरूप देख लेना चाहिए। औौर उसी प्रकार हर्षचरित में वाणभट्ट का विचित्र वकता का विलास प्राचुर्य से पाया जाता है। और भवभूति, राजशेसर के द्वारा निर्मित रचना के सौन्दर्य से युयत, मुक्तफो में[ वैचित्र्य का विलास]दिखलाई देता है। इसलिए सहृदयों को सव जगह [यथोचित रीति से] सबका अ्रतुसन्धान करना चाहिए। इस प्रकार [यहां तक हमने] तीनो मार्गो के लक्षणो का दिडमात्र प्रदर्शन कराया है परन्तु सत्कवियो के कौशल के [अ्रनन्त] प्रकाशे का स्वरूप पूर्ण र्व से कोई भी नहीं दिखला सकता है। [सुकुमार, विचित्र तथा मध्यम] तीनों मार्गों में [प्रसाद, माधुर्य, लावण्य, आभिजात्य आादि] गुणो का 'समुदाय-धर्मत्व' है। [अर्थात् माधुर्य आदि गुण तीनों मार्गो में समान रूप से पद-समुदाय में रहते है अलग-अलग शब्दों के धर्म नहीं होते है] केवल शब्द के धर्म [माधुयं आदि गुण] जसे नहीं होते हैं उसे उनके लक्षणों के व्यास्यान के अवसर पर ही प्रतिपादन किया जा चुका है ।५२। वामन ने दश गुखो का तथा भामह आदि ने तीन ही गुो का प्रतिपादन किया है। परन्तु कुन्तक ने तीनो मार्गों में माधुर्य प्रसाद, लावण्य शर और आभिजात्य इन चार गुणो का यहा तक प्रतिपादन किया है। आगे श्रचित्य तथा सौभाग्य नामक दो गुरो का और वर्णन करते है। इस प्रकार कुन्तक के मत मे छ गुण हो जाते है। इस प्रकार अलग-अररलग गुख समुदाय से रमाीय तीनो-मार्गों की व्याख्या करफे साधारण गुए के स्वरूप का वर्णन करने के लिए कहते है- उचित [स्वभावानुरूप] वर्णन ही जिसका प्राण है इस प्रकार के स्वभाव का महत्त्व, स्पष्ट रूप से [आञ्जसेन प्रकारेण] जिसके द्वारा परिपृष्ट किया जाता है वह 'श्ौचित्य' [नामक गुख] हे।

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फ़ारिका ५३ ] प्रथमोन्मेषः [ १५७

तदौचित्यं नाम गुराः। कीटक् आख्जसेन सुस्पष्देन स्वभावस्य पदार्थ- स्य महत्त्वमुत्कर्पो येन पोष्यते परिपोपं प्राप्यते। प्रकारेोति-प्रस्तुतत्वाद- २ भिधावैचित्रयमन्न 'प्रकार'-शव्देनोच्यते। कीहशम्-उचिताख्यानमुदाराभि- धानं जीवितं परमार्थो यस्य तत् तथोक्तम्। एतदानुगुरयेनैव विभूपसविन्यासो

यथा- करतलकलिताक्षमालयोः समुदितसाध्वससन्नहस्तयोः। कृतरुचिर जटानिवेशयोरपर इवेश्वरयोः समागमः ॥११५॥।' यथा वा- उपगिरि पुरुहूतस्यैष सेनानिवेश- स्तटमपरमितोऽद्र स्तद्वलान्यावसन्तु। प्र वमिह करिास्ते दुर्घरा: सन्निकर्षे सुरगजमदलेखासौरभं न क्षमन्ते ॥११६॥ वह शचित्य नामक गुए है। फंसा-'गञ्जस' अर्थात् सुस्पष्ट रूप से स्वभाव अर्थात् पदार्थ का महत्त्व, उत्कर्ष जिस [गुण] से पोषित किया जाता है अ्रर्यात् पुष्टता को प्राप्त कराया जाता है। यहाँ प्रस्तुत होने के कारण, महने की वि चत्रता को ही 'प्रकार' शब्द से ग्रहण किया जाता है। कैसे-उचित कथन अर्थात् [स्वभावानुकल] उदार वर्सन जिसका जीवित अर्थात् वास्तविक परमार्थ है वह उस प्रकार का [उचिताख्याननीवितम् हुआ]। इसके अनुकूल ही अलद्धारों की रचना शोभाजनक होती है। जैसे- [यह श्लोक तापसवत्सराजचरित का ३, ८४ है]। हाथों में जयमाला लिये हुए, साध्यस [भय या सात्विक भाव] के उत्पन्न हो जाने से निनके हाथ सन्न [कार्याक्षम] हो गये है और जटाओं की सुन्दर रचना किए हुए [जटा वाधे हुए] दोनों का, मानों दूसरे शिव-पार्वती-का-सा समागम हुआ ॥११५॥ प्रथवा जसे- पर्वत के समीप में [एक ओर] इन्द्र की सेना का पड़ाघ है, [इसलिए] पवंत को दूसरी और अपनी सेनाओं का पड़ाव डालो। कयोकि समीप में रहने पर तुम्हारे [दुर्घर] भयद्गर हाथी देवताओ [ को सेना] के हाथियों की मद लेखा क्रो, गन्घ को सहन नहीं कर सफते है॥११६॥

१. तापसवत्सराजचरित ३,८४।

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१५८ ] घफोपितिजीवितम् [फारिका ५४

यथा च- हे नागराज बहुघास्य नितम्वभार्ग भोगेन गाढममिवेष्टय मन्दराटे.।

पयंङ्ग चन्धनविधेस्तव कोडतिमार ।।११७।।' अ्रन्न तरत्र च

औचित्यस्यैव छायान्तरेण स्वरूपमुन्मीलयति- यत्र वक्तुःप्रभातुर्वा चाच्यं शोभातिशायिना। आच्छाययते स्वभावेन तदप्यौचित्यसुच्यते॥४॥ यत्र यस्मिन वक्तुरभिवातु. प्रमातुर्वा श्रोतुर्वा स्वभावेन स्वपरिस्पन्देन वाच्यमभिधेय वस्तु शोभातिशयशायिना रामसीयकमनोहरेण आ्रच्छाय्यते सव्रियते तदप्यौचित्यमेवोच्यते। यथा-

और जैसे- हे नागराज [शेषनाग] इस मन्दराचल के पार्श्वभाग को अपने [विस्तृत] फन से कसकर पकड लो। तुमने वृषवाहन शिव जी के योगाभ्यास के समय श्रसह् पर्य कबन्धन विधि [शसनविशेष में बन्धन विधि] को सहन किया है तुम्हारे लिए इसमें कौन बडी फठिनाई है।।११७।। यहाँ [इन तीनों उदाहुरणो में से] पहिले दो उदाहरणों में अलद्धारो के गुगा से ही उस शचित्य [रूप] गुसा का परिपोष हो रहा है और तीसरे उवाहरण में स्वभाव के शदार्य कथन से [ही औ्चित्य का परिपोष हो रहा है] ॥५३॥ श्र््रौचित्य [गुए] के ही स्वरूप को दूसरे प्रकार से स्पष्ट करते हैं- जहाँ ववता प्रथवा बोद्धा [प्रमाता] के शोभातिजय-युक्त स्वभाव से वाच्य वस्तु आराच्छादित हो [दब] जाती है वह भी 'श्ररौचित्य' कहलाता है। यहाँ जिस [गुए] में वषता अर्थरथात् कहने वाले और प्रमाता अर्थात् सुनने वाले [बोन्धा] के शोभातिशायी अर्थात् रमीयना के कारण मनोहर स्वभाव से, वाच्य अर्थात् प्रतिपाद [वस्तु] अर्थ आ्च्छादित कर दिया अर्थात् ढेक दिया जाता है वह भी शचित्य [गुए] ही कहलाता है। जैसे- १ काव्य मीमासा पृ० दम तथा सरस्वती कण्ठाभरण पृ० ६५ पर उद्धृत।

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फारिका ५४] प्रथमोन्मेष [१५६

शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठन्नामासि तीर्थप्रतिपादितद्धिः। आरयय कोपात्तफल प्रसूति., स्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः ।।११८॥' अत्र श्लाध्यतया तथाविधमहाराजपरिस्पन्दे वरसर्चमाने मुनिना स्वानु- त्रत्न वक्तुः स्वभावेन च वाच्यपरिस्पन्द संवृतप्रायो लक्ष्यते। प्रमातुर्यथा- निपीयमानस्तवका शिलीमुखेर शोकयष्टिश्चल वाल पल्लवा। विडम्त्रयन्ती दद्दशे वधूजनेरमन्ददप्टौष्ठकरावधूननम् ।११६/२ अरपरत्र वधूजनैर्निजानुभव वासनानुसारेण तथाविघशोभाभिरामतानु- भूतिरौचित्यपरिपोषमाव हति।

यह श्लोक रघुवश के पञ्चम सर्ग का १५ वा श्लोक है। 'वरतन्तु मुनि' के शिष्य 'कोत्स' विश्वजित् याग में सर्वस्व दान कर देने वाले रघु के पास भिक्षा लेने आए हैं। उस समय वह कौत्स-मुनि रघु से कह रहे है- हे राजन्, सत्पात्रो को अपनी सम्पत्ति दान देकर अव शरीर मात्र से स्थित आप वनवासियों द्वारा [नीवार पर] उत्पन्न फल को ले लिये जाने के बाद ढूंठ मात्र शेष रहे नीवार के समान शोभित होते है ॥११६॥ यहाँ श्लाध्य रूप से इस प्रकार के [लोकोत्तर प्रभावशाली] महाराज [रघ] के स्वभाव के वर्णनीय होने पर [वनवासी कौत्स] मुनि के अपने अरनुभवसिद्ध ['आरण्यकोपात्तफलप्रसूति स्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः' इस उपमा] अलद्धार की योजना, शचित्य को अ्रत्यन्त परिपुष्ट करती ह। यहां वक्ता [कौत्स मुनि] के स्वभाव से वाच्य अर्थ का स्वभाव ढँक-सा गया है। ओ्रोता [प्रमाता के स्वभाव से अर्थ के दव जाने] का [उदाहरण] जसे- भौरों के द्वारा जिसके पुप्पगुच्छों का रस पान किया जा रहा है और जिसके छोटे-छोटे पल्लव हिल रहे है इस प्रकार की अशोक की लता को, वघू जनों ने जोर से अघरोष्ठ में काट लेने मे हाथ हिलाने का अनुकरए करता हुआ-सा देखा।११६। यहाँ वधू जनों के अपने अनुभव अनुसार लताओं की उस प्रकार की शोभा की अभिरामता का वगन श्चित्य का परिपोष कराता है।

१ रघुवश ५, १५। २. किरातार्जुनीय ८, ६।

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१६० ] [फारिफा ५५

यथा वा- वापितडे कुड्'गा पिश्रमहि हाउं गपहि दीसंति। ए घरति करेण भणति ए ति बलिउ पुए सर्देति ।।१२०।। [वापीतटे कुरा प्रिगससि हाऊ गायन्तो दृश्यन्ते। न घ्रियन्ते करेए भवान्ति नेति वहुलं पुनर्नयन्ति ॥इतिच्छाया] त्रान्न कस्याश्चित्प्र मातृभताया सातिशयमोग्ध्यपरिम्पन्द सुन्दरेख

एवमौचित्यमभिवाय सौभाग्यमभिघते- इत्युपादेयवर्गऽस्मिन् यदर्थ प्रतिभा कबेः । सम्यक् संरभते तस्य गुपः सौभाग्यमुच्यते ॥५५॥

अ्रथवा जैसे[यह प्राकृत गाथा चिल्कुल पस्पप्ट-सी है। इसलिए उसकी न सस्कृत छाया ही ठीक चनती है और न पुछ तथं ही। फिर भी उसका भाव इस प्रकार निकाला जा सफता है]- हे प्रिय सखि वापी के फिनारे [मेधस्प कुरङ्ग] हाऊ [?] गाते हुए दिसलाई देते हैं। हाथ से पकडने में नहीं आराते है और न [पूछने पर स्पष्ट] चोलते है लेकिन जोर से गर्जन फरते है ॥१२०॥ इसमें किसी [भोली-भाली ग्रामी स्त्री रूप] प्रमाता रूप स्त्री के अ्रत्यन्त भोलेपन के स्वभाव से सुन्दर स्वभाव से आ्च्छादित हुआ वास्य [शर्थ], औरचित्य का परिपोषक हो रहा है॥।५४।। इसे यद्यपि वक्ता के वैशिष्ट्य का उदाहरण भी कहा जा सकता है। परन्तु यहाँ श्रोता को वशिष्ट्य के प्रदर्शनार्थ दिया गया है अत सुनने वाली स्त्री का भोला- पन यहा शचित्य का पोषक है। इस प्रकार [प्रथम सामान्य गुख] 'श्ररौचित्य' का वर्णन करके अ्रव [दूसरे, सामान्य गुए ] 'सौभाग्य' का प्रतिपादन करते है- इस प्रकार इस [शब्दादि रूप] उप देय वर्ग में कवि की प्रतिभा जिस [अर्थ के उपादान या ग्रहण करने] के लिए विशेष रूप से [अत्यन्त सावधानता से] प्रयत्न- शील होती है उस वस्तु का जो [सौन्दर्य रूप] गुण है वह 'सौभाग्य' [नाम से सामान्य] गुए कहा जाता है।५५।

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कारिका ५६ ] पथमोन्मेपः [१६१

इत्येवंविधेSस्मिन्नुप्राटेयवर्गे शब्दाद्युपेयसमूहदे यदर्थ यन्निमिर्त्त कवे सम्बन्धिनी प्रतिभा शक्ति. सम्यक सावधानतया संरभते व्यवस्यति तस्य वस्तुन प्रस्तुत्त्वात् काव्याभिधानस्य यो गुएः स सौभाग्यमुच्यते भरयते॥४५॥ तच्च न प्रतिभासरम्भमात्रसाध्यं, किन्तु तद्विहितसमस्तसामग्रीसम्पा- द्यमित्याह- सर्वसम्पत्प रस्पन्दसम्पाद्यं सरसात्मनाम्। अलौंकिकचमत्कारकारि काव्यैकजीवितम् ॥५६।। सवसम्पत्परिस्पन्द सम्पा्द्य र्वस्योा देयराशर्य्य्ाा सम्पत्तिरनवद्यता का्ठा तस्या परिस्न्द, स्फुरितत्वं तेन सम्पाद्यनिष्पादनीयम्। अन्यच्च कीदशम्- सरसात्मनामाद्रचेतसामलौकिकचमत्कारकारि लोकोत्तराह्वादविधायि। किम्ब- हुना. तच्च काव्यैकजीवितं काव्यस्य पर परमार्थ इत्यथः। यथा-

इस प्रकार के इस [पूर्वोक्त] उपादेय वर्ग अर्थात् शब्दादि रूप [उपेय] पदार्थ समूह में से, जिसके लिए अर्यात जिसके कारण, कवि की पर्थात् कवि सम्वन्धिनी, प्रतिभा शक्ति भली प्रकार से अर्थात् सावधानतया प्रयत्न करती है उस वस्तु के प्रस्तुत होने से घर्थात् काव्य का विषय होने से जो [सौन्दर्य रूप ]गुए है वह 'सौभाग्य' इस नाम से कहा जाता है ।५५।। औौर वह [सौभाग्य गुण] केवल प्रतिभा के व्यापारमात्र से साध्य नहीं हैं अपितु उस [कवि या फाच्य] के लिए विहित समस्त सामग्री से सम्पावन करने योग्य है, यह [बात अगली फारिका में] कहते है- [प्रतिभा के साथ-साथ व्युत्पत्ति वक्रोकिति,गुए, मार्ग आादि काव्योचित ] सम्पूर्ण सामगी से सम्पादित फरने योग्य सहृदयों के लिए अलौकिक चमत्कारकारी औ्रर फाव्य का प्राण स्वरूप [सौभाग्य-गुण] हं। [न फेवल प्रतिभा-मात्र से अपितु काव्योचित व्युत्पत्ति आदि] सम्पूर्ण सामग्री के व्यापार से तम्पादन करने योग्य अर्थात् समस्त उपादेय राशि की जो सम्पत्ति अर्थात अनवद्यता [सौन्दर्य] उसका जो परिस्पन्द या परिस्फुरण [व्यापार] उससे सम्पाद्य अर्यात् निप्पन्न करने योग्य। और कंसा कि सरस हृदय पर्थात् आर्द्र चित वालो [सहृदयो] के लिए प्लोकिक चमत्कारकारी अ्रर्थात् लोकोत्तर-प्रानन्द-दायक। अ्रधिक क्या फहा जाय [सक्षेप में वह तौभाग्य-गुसा] काव्य का प्राण अर्यात परम तत्त्व हैं। यह अ्ररभिप्राय हुआ। जैसे-

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१६२ ] वकोपितिजीविनम् [ कारिका ५ू६

दोर्मृ लावधि सन्नितम्तनमुर म्निहालकटाने हशी

चेत कन्दलित स्मरव्यतिकरेरलवरायमन र्वृंत तन्वद्यास्तरुशिम्नि सर्पति शनेरन्यैव काचिल्लिपि ।?२१।। तन्व्या प्रथमतरतारुएयंऽवनीर्से प्रकारस्य चेतसम्चे्टायाग्व चैचित्र्य- मत्र वगितम। तत्र सृत्ितस्तनमुरो लावयमनर्वतमत्वकार्य, न्मरव्य तकरें कन्दलितमिति चेतम स्नितात्कटाने हशाविति, किस्िनाएडयपसिडते स्मितसुधासिक्तोक्तिपु भ्रलत इति चेग्टायाश्च। सृत्रित-मिक्त ताएडव-पसिडत- कन्दलितानामुपचारवक्रव लक्ष्यते। सिनिहादित्येतस्य कालविशेषावेवक ग्रथय- वक्रभाव। अन्यैव काचिनवर्रानीयेत संवृतिवक्राविद्छ्ित्ति। अर्रंरगैर्वृ तमिति कारकवक्रत्वम्। विित्रमार्गविपयो लावएयगुणातिरेकः । तनेवमेतस्मिन्

[हेमचन्द्र ने पृ० ३०२ पर इस इलोक को उदृत किया है।] तन्वङ्गी के शरीर में योवन का पदापण होने पर उसकी रूप-रेसा धीरे-घोरे कुछ औौर ही होती जा रही है। जैसे कि उसकी छातो पर बग़ल तर स्तनो के उभार की रेखा पड गई है। प्रांखों में स्नेह युक्त कटाक्षो का प्रवेश हो गया है। स्मित रूप सुधा से सिवत [अर्थात् मुस्कराते हुए] बात करते समय भौहे नाचने में कुछ पण्डित-सी हो चली है, मन में काम के शकुर-से उदय होने लगे है और शरीर के श्रङ्गो ने [नया] अपूर्व लावण्य ग्रहण कर लिया हूं। [इस प्रकार तन्वङ्गी के योवन में आ्रराते ही घीरे-धीरे उसको र्परेखा कुछ और ही हो गई हैं] ।१२१॥ तन्वी [नायिका] के यौवन के प्रथम प्वतार के समय उसके आ्कार, मन, और चेष्टा [सब] का वैचित्र्य यहां वगिगत किया गया है। उनमें 'छाती पर स्तनो की रेखा [स्तनो का डोरा] पड गई है' और '्रङ्गों ने लावण्य धारण कर लिया है' इन [वो] से आकार का, 'काम के सम्पर्क के अकुरित' इस से मन का, शर स्नेहमय कटाक्ष से युक्त नेत्र, तथा 'स्मित रूप सुधा से सिक्त वचनों में नाचने में चतुर भौंहें' इससे चेप्टा के [वचित्र्य का प्रतिपादन किया गया है]। सुत्रित, सिफ्त, ताण्डव, पण्डित औौर कन्दलित [इन पदो] की 'उपचारवकता' प्रतीत होती है। 'स्निह्यत्' इससे काल विशेष के आ्रावेदक [वर्तमान काल वोधक शत्] 'प्रत्यय की वकता' [प्रतीत होती है] 'पन्येव काचित्' से 'अवर्सनीया' इस अर्थ के द्वारा 'सवृति-वकरता' का सौन्दर्य [धोतित होता है], पपङ्गो ने लावण्य का वरण कर लिया है' इसमें [तृतीया विभक्ति से करा

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कारिका ५७ । प्रथमोन्मेष. [१६३

सौभाग्यं समुद्धासते ॥५६॥ अनन्तरोक्तस्य गुरद्वयस्य विपयं दर्शयति- एतत्त्रिष्तपि मार्गेपु गुखद्वितय मुज्ज्वलम्। स्पटर 124 मे -

पदवाक्यप्रचन्धानां व्यापकत्वेन चर्तंते ॥५७॥ एतद् गुणद्वितयमौचित्यसीभाग्याभिधानं, उज्जवलमतीव भ्राजिष्ु, पद्वाक्यप्रवन्धानां त्रयाणामपि व्यापकत्वेन वर्तते सकलावयवव्याप्त्या- वतिष्ठते। क्वेत्याह-त्रिष्वपि मार्गेपु सुकुमारविचित्रमध्यमाख्येपु। तत्र ५दस्य तावदौचित्य बहुविधभेदभिन्नो वक्रभाव.। स्वभावत्याञ्जसेन प्रकारेख परिपोपणमेव वक्रताया पर रहस्यम्। उचिताभिधानजीवितत्वाद् वाक्य-

कारक रूप] 'कारकवक्ता' [लक्षित होती है]। और विचित्र मार्ग के विषय भूत लावण्य गुए का अतिरेक [इस श्लोक में पाया जाता] है। इस प्रकार इस [श्लोक] में प्रतिभा के सरम्भ से उत्पन्न समस्त सामग्री से उन्मीलित सहृदयहृदयाहहादकारी कुछ अनिर्वचनीय 'सौभाग्य' प्रकाशित हो रहा है ॥५६। अभी कहे हुए [शचित्य तथा सौभाग्य रूप] दोनो गुगों का विषय दिखलाते हे- [सुकुमार, विचित्र और मध्यम रूप] इन तीनो मार्गों में [श्रौचित्य तया सौभाग्य रूप] दोनो गुए, पदों, वाक्यों तथा रचना में व्यापक और उज्जवल रूप से रहते हैं।।५७॥ यह शचित्य तथा सौभाग्य नामक दोनों गुण उज्ज्वल प्रर्थात् प्रत्यन्त स्पष्ट चमकते हुए, पद, वाक्य और प्रवन्ध तीनो में व्यापक रूप से विद्यमान रहते है। अर्थात् [काव्य के] सारे अवययो में व्याप्त रहते है। कहाँ [रहते है] यह फहते है। सुकमार, विचित्र और मध्यम नामक तीनो ही मार्गो में। उनमें से पदो का शरचित्य उनका नाना प्रकार के भेदों से युक्षत वक्रनाव है। स्वभाव का स्पष्ट रूप से [पाञ्जसेन प्रफारेण] परिपोषस ही वतता का परम रहम्य है। [क्योंकि पदार्य का उचित रूप से] कथन के ही [वतता के] जीवन-स्वरूप होने के कारण वाक्य के एक वेश में भी शचित्य का अभाव होने से सहृदयों के श्ह्लादफारित्व की हानि होती है।

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१६४ ] वकोदितजी वितम् [फारिका ५७

यथा रघुवंशे- पुर निपादाघिपतेस्तदेद् यस्मिन् मया मौलिमणि विहाय। जटासु वद्धास्वरुदत् सुमन्त्र: ककेयि कामा. फलिताम्तवेति ॥१२२।।१८ अपत्र रघुपतेरनर्घमहापुरुपसम्पदुपेतत्वेन वर्षर्यमानस्य 'कैकेयि कामाः फलितास्तव' इत्येवविधतुच्छतरपदार्थमस्मरण तदभिधानं चात्यन्तमनौचित्य- मावहति। प्रवन्धस्यापि कस्यचित प्रकरणौकटेशेऽय चित्यविर हाटेकदेशदाहदृपित- दग्धपट प्रायता प्रस्यते। यश्रा रघुवशे एव दिलीपसिंहसंवादावसरे- अप्रथैकधेनोरपराघ चरडाद् गुरो कृशानुप्रतिमाद् विभेपि ।

जैसे रघुवश में- रघुवश के १३वें सर्ग में लड्का-विजय के बाद पुप्पक विमान द्वारा भयोष्या को लौटते समय रामचन्द्र जी रास्ते के भिन्न-भिन्न स्थानो को सीता जी को दिसलाते जाते हे। उमी प्रसङ्ग से जव निपादराज के स्थान पर आ्रकर रामचन्द्र जी पहुँचे तो उस स्थान का परिचय कराते हुए सीता जी से कह रहे हे कि- यह निवादराज [गुह] की वह नगरी है जहां शिर पर मसियों फो उतार कर मेरे जटाएँ वाँघ लेने पर सुमघ्र ने 'हे फंफेयि!लो तुम्हारा मनोरथ सफल हो गया' यह कहा था॥१२२॥ यहाँ महापुरुषों [के चरित्र] की [समस्त] सम्पति से युक्त रूप में रघुपति [रामचन्द्र जी] के वण्यमान होने के कारण उन रामचन्द्र के मुख से 'कैकेयी! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया' इस प्रकार की तुच्छ बात का स्मरस और फथन अत्यन्त अ्रनुचित प्रतीत होता है। कहीं-कहीं प्रबन्ध [काव्य] के किसी प्रकरण के एक देश में भी श्रचित्य का पभाव होने पर, एक देश में जल जाने के कारण [ सम्पूर्ण रूप से ] दूषित वस्त्र के समान [सारा काव्य भी]दूषित हो जाता है। जैसे रघुवश में[ तृतीय सर्ग में]रघु तथा । दिलोप के सवाद के शवसर पर- औ्रर यदि एक गाय के [विनाश फरा देने रूप] अपराध के कारण भयङ्धर [रूप से रुष्ट हुए] अ्ग्नि के समान [उग्र] रूप धारण किए हुए गुरु से भय लगता

१ रघ्वश १३, ५६।

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कारिका ५७ ] प्रथमोन्मेष: [ १६५

शक्योऽस्य मन्युर्भवतापि जेतु" गाः कोटिशः स्पर्शयता घटोघ्नी:।१२३।। 5 इति सिंहस्याभिधातुमुचितमेव राजोपहासपरत्वेनाभिधीयमानत्वात्। राज: पुनरस्य निजयश.परिरक्षणपरत्वेन तृणवल्लघुवृत्तयः प्राणाः प्रतिभासन्ते। तस्यैतत्पूर्वपक्षोत्तरत्वेन- कथञ्च शक्योऽनुनयो महर्षेविश्राणानाच्चान्यपयस्विनीनाम्। इमा तनूजा सुरभेरवेहि रुद्रौजसा तु प्रहृतं त्वयाऽस्याम्॥१२४।२ इत्यन्यासां गवा तत्प्रतिवस्तुप्रदानयोग्यता यदि कदाचित् सम्भवति ततस्तस्य मुनेमम चोभयोरप्येतज्जीवितपरिरक्षणनैरपेद्ष्यमुपपन्नमिति तात्पर्य- पर्यवसानादत्यन्तमनौचित्ययुक्तेयमुक्तिः ।

हो तो तुम [उस एक गाय के बदले में] घडे के समान अयन वाली करोड़ों गौए देकर उनके क्रोध को दूर कर सकते हो॥१२३॥ यह सिंह का कथन तो उचित ही है। क्योंकि वह राजा का उपहास करने के लिए कहा गया है। परन्तु इस राजा दिलीप को अपने यश की रक्षा में तत्पर होने से प्राण तिनके के समान प्रतीत होते है। उसकी ओ्रोर से [सिंह के द्वारा किए गए] इस पूर्वपक्ष के उत्तर रूप में [कहे गए]- अन्य गौओ्ं के देने से महषि वशिष्ठ के क्रोध को दूर करना कैसे सम्भव हो सकता है। क्योकि इस [नन्विनी गौ] को कामघेनु की पुत्री समझो। तुमने जो इस पर प्रहार किया है वह तो शिव के प्रभाव से किया है [अपनी सामर्थ्यं से तुम इस पर प्रहार नहीं कर सकते थे] ।१२४॥ इस [उत्तर रूप में कहे गए कलोक] में, यदि अरन्य गौओ को उसके बदले में दिए जाने योग्य [प्रतिवस्तु] समझ लिया जाय तो कदाचित् उन [वशिष्ठ] मुनि तथा मेरे दोनो के लिए उसके प्राणो की रक्षा की उपेक्षा करना उचित हो सकता है यह [जो इस कथन का] फलितार्थ निकलता है। उसके कार यह कथन अत्यन्त अनुचित प्रतीत होता है। अर्थात् यदि इसके वदले में अन्य गाय देकर मुनि की क्षति पूर्ति यदि की जा सकती तो में इस गाय की प्राो की रक्षा के लिए प्रयत्न न करता। राजा दलीप के मन में इस प्रकार के भाव का माना भी वडा भद्दा और उनके गौरव के प्रतिकूल है। जो राजा एक वार तो यह कहता है कि- १ रघुवंश २, ४६। २. 'विनेतु' पाठ भी पाया जाता है।

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१६६ ] वक्रोनितिजीवितम् [कारिका ५ू७

यथा च कुमारसम्भचे त्रेंलोक्याकान्तिप्रवगपराकमग्य तारकास्यन्य रिपोर्जिंगीपाव सरे सुरपततिर्मन्मशेनाभिवीयते- कामे कपत्नीत्रतदु सशीला लोल मनश्चारुनया प्रविष्टाम् । नितम्व्रिनीमिच्छसि मुक्नलज्जा कराठे स्वयग्राहनिपननवाहम् ।१२५।।' किमप्यहिम्यस्तव चेन्मतोऽह यमशरीरे भव मे दयालु। एकान्तविध्वसिपु मद्विघाना पिण्डेत्वनाम्था मलु भौनिवेषु॥ अर्थात् इस भीतिक शरीर मे मेरी आ्रस्था नही है। उस भीनिर शरीर की भपेक्षा मझे 'यग -शरीर' अविक प्रिय है। उसी महापुरष के मुस ने यह कहलाना कि यदि दूसरी गाय देकर मुनि को सन्तुष्ट किया जा नके तो मै इने बनाने का प्रयत्न न करता, वन्तृत शोभा नहीं देता है। इस प्रकार इम एव देश में श्रचित्व का प्भाव हो जाने मे एक देश में जल जाने के कारण दूपित हुए पट के नमान इस काव्य में यह मारा गकरण दूपित हो जाता हूँ। घोर जसे 'कुमारसम्भव' में त्रंलोय का पराभव फरने में समर्य, पराकमशील तारकासुर रूप शत्रु के जीतने के [उपाय सोचने के] श्रवसर पर कामदेव इन्द्र से कह रहा है- सुन्दरता के कारए तुम्हारे चञ्चल मन में प्रविष्ट हुई परन्तु पतिव्रत धम के फारस तुम्हारे वश में न आ सकने वाली कोन सी पतिव्रता स्त्री को चाहते हो कि वह लज्जा का परित्याग करके स्वय तुम्ारे कण्ठ में अपने बाहु डाल दे॥१२५॥ कुमारसम्भव की कथा में तारकासुर के अत्याचारो से पीडित होकर देवता लोग ब्रह्मा जी के पास गए हैं। उनकी कष्टगाथा सुनने के वाद ब्रह्मा जी ने उनको बतलाया कि शिव जी का पुत्र तुम्हारा सेनापति बनकर उसको मारेगा। इसलिए तुम लोग पार्वती के द्वारा शिव को आकृष्ट करो। जिससे पार्वती और शिव का पुत्र तुम्हारे इस कष्ट को दूर कर सके। इस प्रसद्ग में शिव को पार्वती की ओ्र्ोर आकृष्ट करने के लिए इन्द्र ने कामदेव को बुलवाया है। कामदेव ने इन्द्र को राज- सभा में उपस्थित होकर वुलाए जाने का कारण पूछा कि हे महाराज! मुभे किस लिए स्मरण किया है ? उसी प्रसङ्ग का यह श्लोक है। इसका भाव यह हुआ कि यदि आप किसी पतिव्रता सुन्दरी पर अनुरक्त हो गए है। और पतिव्रता होने के कारण आपका उसके साथ सम्बन्ध आपको सम्भव प्रतीत न होता हो तो उसका नाम मुझे वतलाइए। मे अपने प्रभाव से उसको इतना विवश कर दूंगा कि वह १ कुमारसम्भव ३, ७।

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कारिका ५७ ] प्रथमोन्मेष [१६७

इत्यविनयानुष्ठाननिष्ठ त्रिविष्टाधिपत्यप्रतिष्ठितस्यापि तथाविधाभि-

एतैच्चतस्यैव कवे. सहजसीकुमार्यमुद्रितसक्तिपरिस्पन्दसौन्दयस्य पर्या- लोच्यते, न पुनरन्येषा श्रहार्यमात्रकाव्यकरणकौशल्लाघिनाम् । मौभाग्यमपि पढवाक्यप्र+रसप्रवन्वानां प्रत्येकमनेकाकारकमनीयकारण कलापकलितरामणीयकाना किमपि सहृदयहदयसवेद्यं काव्यैकजीवितम लौकिक- चमत्कारकारि सवलितानेकरसास्वादसुन्दर सकलावयवव्यापकत्वेन काव्यस्य गुणान्तरं परिस्फुरतीत्यलमतिप्रसङ्गेन ।५७॥ इदानीमेतदुपसहत्यान्यदवतारयति- -

अपने पातिव्रत्य और लज्जा आदि सबका परित्याग करके स्वय आकर तुम्हारे गले में हाथ डालकर तुम्हारा आलिङ्गन करने लगेगी। [परन्तु] स्वर्ग के अधिपति पद पर प्रतिष्ठित [इन्द्र] का [कामदेव के कहे हुए] उस प्रकार के अभिप्राय को पूर्ण करने के द्वारा सूचित इस प्रकार का [किसी पतिव्रता के, पातिव्त्य को नष्ट करने रूप] अविनय शचरपरक कथन [इन्द्र जैसे 'देवराज के लिए] अत्यन्त अनुचित प्रतीत होता है। [इसलिए कुमारसम्भव का यह प्रंश भी 'एकदेशदाहदूषित पट' के समान दूषित हो गया है]। और यह भी इसी [महा] कवि [कालिदास] के विषय में [इतनी सूक्ष्म] आलोचना की जा सकती है जिसकी सूक्तियों का स्वाभाविक सौन्दर्य सहज सौकुमार्य की मुद्रा से अ्रद्धित हो रहा हैं। केवल आाहार्य [व्युत्पत्ति बल से बनावटी] काव्य- रचना के कौशल के लिए प्रसिद्ध [श्री हर्ष आदि] अन्य [कवियों] के विषय में [इतनी सूक्ष्म आलोचना] नहीं [की जा सकती है]। औ्रर पद, वाक्य, प्रकरस तथा प्रबन्धों का सौभाग्य [गुए] भी [उनमें से] प्रत्येक की अ्रपनेक प्रकार की[ अलग-अतग] सुन्दर कारण सामग्री [लोकोत्तर] से रमशीयता को घारस करने वाले काव्य का एकमात्र प्राएस्वरूप अलोकिक, चमत्कारकारी, सहृदयसवेद्य [उस काव्य में] आए हुए अ्रनेक रसो के आ्रास्वाद से सुन्दर औरर सारे अवयवो में व्यापक रूप से काव्य का कुछ और ही गुएा [सा] परिस्फुरित होता है। इसलिए [इस विषय में अरब औ्रौर] अ्रधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है। अब इस [मार्गों के गुणों के निरुपण] का उपसहार कर [अगले द्वितीय उन्मेष में कहे जाने वाले वर्ण-विन्यास आदि की वक्रता रूप] अन्य [विषय] की भवतारणा करते है-

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१६८ ] वकोक्तिजीवितम् [फारिका ५६

मार्गाणां त्रितय तदेतदसकृत् प्राप्तव्यपर्युत्सुकँ: ुएगं कैरपि यत्र कामपि भुवं प्राप्य प्रसिद्धि गताः । सर्वे स्वैरविहारहारिकवयो यास्यन्ति येनाधुना तस्मिन् कोऽपि स साधु सुन्दरपदन्यासक्रमः कथ्यते॥५८॥ मार्गाणं सुकुमारादीनामेतत् त्रितय कैरपि महाकविभिग्य न सामान्ये, प्राप्तव्यपर्यत्सुकें प्राप्योत्करिठतेरसकन बहुवारमभ्यासेन तुएण परिगमितम् । यत्र यस्मिन मार्गत्रये कामपि भुव प्राष्त प्रमिद्धि गता। लोकोत्तरां भूमिमासाद्य प्रतीति प्राप्ता। उदानीं मर्वे स्वैरविहारहारि. स्वेच्छाविहरणरमणीया कवयस्तस्मिन मार्गत्रितये येन यास्यन्ति गमिग्यन्ति सकोऽपि अलौकिक. सुन्दरपदन्यासक्रम साधु शाभन कृना कथ्यते। सुभग- सुप्-तिड्-समर्पणपरिपाटीविन्यासो वरर्यते। मार्ग-स्वैरविहार-पद प्रभृतय शब्दा. श्लेपच्छायाविशिष्टत्वेन व्याख्येया॥५८॥ इति श्रीराजानककुन्तकविरचिते वक्रोचितिजीविते काव्यालदारे प्रथम उन्मेप। प्राप्तव्य [महाकवित्व पद] के लिए उत्सुक कुछ [विशेष महाकवियो] के द्वारा चला गया यह [सुकुमार, विचित्र तथा मध्यम रूप] तीनो मार्गो का समूह हूं। जिसमें किसी उच्च स्थिति को प्राप्त कर [वह कालिदास आदि महाकवि] प्रनिद्धि को प्राप्त हुए हे। स्वच्छन्द विहरण के करने वाले सभी उत्तम कविगए अब [भविष्य में] जिस पर चलेंगे उस [मार्ग-त्रितय] में [उपादेय] उस अ्रनिर्वचनीय साधु तथा सुन्दर पदों की रचना का क्रम [आगे द्वितीय उन्मेष में] कहते हैं ॥५८॥ सुकुमार आदि मार्गो का यह त्रितय किन्हीं महाकषियों के द्वारा हो सामान्यो के द्वारा नहीं, प्राप्तव्य [महाकवित्व आदि] के लिए उत्कण्ठितो के द्वारा क्षुण्ण [ रोधा हुआ ] चला हुआ है। जहाँ जिस मार्ग-त्रितय में कुछ लोकोत्तर स्थिति प्राप्त करके [वे महाकवि] प्रसिद्धि को प्राप्त हुए। औ्रौर अब स्वच्छन्द विहार के कारण रमसीय उन तीनो मार्गो में जिस [सुन्दर क्रम] से सारे कवि चलेगे, वह अलौकिक कोई सुन्दर पदों की रचना का क्रम साधु, सुन्दर रूप से, कहते है। अर्थात् सुन्वर सुबन्त तिङन्त [रूप पदो] के समर्पण की शैली का वर्णन करते है। [यहां] 'मार्ग', 'स्वैरविहार' आदि पद शब्द श्लेष की छाया से युक्त है इस प्रकार व्यारया । करना चाहिए। इति श्री राजानक कुन्तक विरचित वक्रोवितिजीवित नामक 'काव्यालद्वार' (गन्थ) में प्रथम उन्मेष समाप्त हुआ। श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचिताया वक्रोक्तिदीपिकाया हिन्दीव्याख्याया प्रथमोन्मेष समाप्त ।

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द्वितीयोन्सेष:

सर्वत्रैव सामान्यलक्षणो चिहिते विशेषलक्षणां विधातव्यमिति काव्यस्य 'शब्दाथां सहितौ' इति [१,७] सामान्यलक्षणं विधाय तदवयवभूतयोः शब्दा- र्थयोः साहित्यस्य प्रथमोन्मेष एव विशेपलक्षणं विहितम्। इदानीं प्रथमोद्दिष्टस्य वणोविन्यासवक्रत्वस्य विशेषलक्षणा मुपक्रमते- एको द्वौ वहवो वर्णा वध्यमानाः पुनः पुनः । स्वल्पान्तरास्त्रिधा सोक्ता वर्णाविन्यासवक्रता॥१॥

अथ वक्रोवितिदीपिकाया द्वितीयोन्मेष

पिछले उन्मेष के मध्य में ग्रन्थकार ने 'कविव्यापारवऋत्वप्रकारा सम्भवन्ति षट्' [१, १८ ] कारिका में कविव्यापार की वक्रता के छ प्रकारो का उल्लेख किया था। उसके बाद उसी उन्मेष मे छहो प्रकार की वक्र्ता के सामान्य लक्षण भी किए थे। अब इस द्वितीय उन्मेष में उस पड्विध-वक्र्ता का विशेप रूप से निरुपण करने के लिए इस उन्मेष का आरम्भ किया है। इस उन्मेष की प्रथम उन्मेष के साथ सङ़्ति दिखलाते हुए ग्रन्थकार इस उन्मेष का प्रारम्भ इस प्रकार करते है। १ [क-अ्रनुप्रास रूप] 'वर्णविन्यास-वकर्ता' [१० भेद]- सब ही जगह [सभी ग्रन्थों में] तामान्य लक्षण के करने के बाद विशेष लक्षण किया जाना उचित है इसलिए 'शब्दार्थ सहिती काव्यम्' शन्द और शरथ सहभाव से युक्त होने पर 'काव्य' फहलाते है इस प्रकार [प्रथम उन्मेष की सप्तम कारिका में काव्य का] सामान्य लक्षण करके, उस [काव्य लक्षण] के अवयव भूत 'शब्द' तथा 'अर्थ' के 'सहभाव' का विशेष लक्षण प्रथम उन्मेष में हो कर चुके है। [उसके वाद कवि व्यापार की षड्विघ-वकता का सामान्य निरुपण प्रथम उन्मेष में किया था। उस पड़विध-वत्रता के भेदों में से] सवसे पहिले कही गई [उहिष्ट] 'वर्सगविन्यास-वक्रता' का विशेष लक्षण प्रारम्भ करते है- [जिस रचना में] एक, दो अथवा वृत से वर्स थोडे-थोड़े अन्तर से बार-बार [उसी रूप में] ग्रथित होते है, वह [एक, दो अथवा बहुत वर्गगों की] रचना को वक्ता तीन प्रकार की 'वणांविन्यास-वमता' कहलाती है ॥१।।

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१७० ] वत्रोविनजीवितम् [बारिका १

वरेशचोऽतर व्यजनपर्याय, तथा प्रनिद्टत्वान। तेन ना वर्रविन्यान- वक्रता व्यख्नविन्यसनर्वि नि त्रिया त्रिभि प्रकारैरन बसिता । के पुनस्ते त्रय प्रकारा इत्युच्यते-एक केवल गव. कवाचिद ही वयो, वा वर्गा पुन.' पुनर्वध्यमाना योज्यमाना। कीहशा 'सवन्पान्तरा:। न्वत् न्नोक्मन्नर व्यय- धान येपा ते तथोका। त एव त्रय प्रकार टन्युन्यन्ने। श्रत्र वीष्मया पुनः

पुन.पुनवष्यमाना एव. न तु पुन पुनरव वन्यमाना दनि।

यहां वरा शब्द व्यञ्जन का पर्यायवाचर हू। इस प्रवार [बसे शव्द के व्यञ्जन अरयं में प्रनिद्ध होने ने। इसलिए वह वर्साविन्यान-रजना' पर्ात् व्यज्जन रचना की तुन्दरता तीन प्रकार की वही पर्वान् वरान की गई है। वे तीन प्रकार कौन से हे यह कहने है। [कहों] वेवल एन ही श्रर क्भी दो भ्रववा बहुत बरां वारन्वार [उसी रूप में] प्रचित या प्रयुक्न किए जाने हुए। मंने, थोडे चोटे अन्तर- भृक्न। न्वल्प घर्ात् बहत चोटा ना अन्नर अर्ात् व्यवचान जिनका है वे उत प्रकार मे [स्वपान्तरा] हए। वे ही [वराविन्यास-वनना के] तीन प्रवार कहे जाते है। यहाँ दुन पन इल [हिरवित मे सूचिन] वीप्मा से अयोगव्यवच्ठेवपरक नियम [सूचिन होना] है अ्रन्ययोग व्यवच्छेदनरक [नियम सूचित] नहीं [होता है]। इसलिए वार बार निवद्ध हुए ही [वर्ण, वर्णविन्यात-वकता के प्रयोज्क होते हे यह प्रयोगव्यवच्छेदपरत्वेन नियम है] न कि 7रन्वार ही निवद्ध हुए [वर्ण, वांविन्यास- वमनना के प्रयोजद हैं। एकन्दो वार प्रवृत वर्ण इन वर्णविन्यासवकता के प्रयोजक नहीं हें इस प्रकार का अन्ययोगव्यवच्छेद््परक नियम नहीं है]। इसका अनिप्राय यह है कि 'दुन नुन बच्चमाना' इम दविर्वचन से गरव्वार प्रथित होने का नियम सूचित होता है। यह नियम दो प्रकार वा हो नकना है एक 'प्रयोगव्यवच्छेवपरक' नियन और दूसरा 'अन्ययोगव्यवच्छेदपरक' नियम। 'विशेषण- मखुतस्त्वेवकारो अयोगव्शवच्छेक' जब एव का नम्बन्ध विभेपण वे नाथ होता है तद वह 'प्रयोगव्यवच्छेद्न' कहलाना है। जैने 'पार्थो घनुर्घर एवं अरथत् सर्जन बनुघर ही है। वहाँ अर्जुन के साथ वनुर्वरत्व के त्योग अर्त् सम्बन्धाभाव का निषेष एवकार के प्रयोग से नूचिति होना है। अरथत् अरजुन मे साथ छनुर्घरत्व का योग शव्श्य है यह उमन् अभिप्राय होता है। इसी प्रकार 'दुन पुन दध्यमाना एव बार्दार निद्द हुए दरा व्रावित्यासावमता मे प्रयोज्क होने ही है यह 'पयोग- व्यवच्छेन्परक' नियन किया गया है। सर्थात् पुन -मुन निद्जच्मान वशों ने वसं- बिन्यानवन्रत्ञा अवश्य रहती है। वह ऋर््योगव्यवच्छेदपरक नियन का अ्र्प्रनिप्राय हुआ्र्प्रा।

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कारिका १ ] द्वितीयोन्मेष: [१७१

तत्रैकव्यञ्जननिवद्धोदाहरं यथा- धम्मिल्लो विनिवेशिताल्पकुसुमः सौन्दर्यघुर्य स्मितं -2 विन्यासो वचसा विदग्धमधुरः कएठे कल: पञ्चमः । लीलामन्थरतारके च नयने यातं विलासालसं कोडप्येव हरिणीदृशः स्मरशरापातावदातः क्रमः ॥१॥ जब 'एव' का प्रयोग विशेष्य पद के साथ होता है तब वह 'अन्ययोगव्यवच्छेद' का सूचक होता है। जैसे 'पार्थ एव धनुर्घर'। भर्जुन ही धनुर्धर है इस वाक्य में विशेष्य भूत पार्थ के साथ एव का प्रयोग हुआ है वह 'अन्ययोगव्यवच्छेदप रक' है। अर्थात् पार्थ से भिन्न अन्य कोई धनुर्धर नहीं है यह श्रन्य के साथ घनुघरत्व के योग का व्यवच्छेद इस नियम से सूचित होता है। इस प्रकार का 'अन्ययोगव्यवच्छेदपरक' नियम यहाँ नही है। अर्थात् वहुत वार आवृत्त वर्ण ही 'वंविन्यासवतता' के प्रयोजक हो, एक-दो बार आवृत्त वर्ण उसके प्रयोजक न हो यह नियम यहां अभिप्रेत नहीं है। यहां तो एक-दो वार भी एक से वर्णों की आ्रवृत्ति 'वर्ण- विन्यासवक्रता' की जनक होती है यह अभिप्रेत है। इसलिए ग्रन्थकार ने यहां 'भन्य- योगव्यवच्कदक-परक' नियम न मानकर 'अयोगव्यवच्छेदपरक' नियम माना है। ग्रन्थकार यह बात पहिले लिख चुके हे कि इस 'वणविन्यासवऋता' को ही अन्य आचार्यो ने 'अनुप्रास' नाम से कहा है। अनुप्रास में एक वणं की एक वार की हुई आवृत्ति भी अनुप्रास की प्रयोजिका मानी गई है। इसी प्रकार यहाँ पुन .- पुन. पर्थात् बहुत वार आवृत्ति से निवद्ध वसं हो 'वशंविन्यासवत्रता' के प्रयोजक हो एक दो बार आवृन वसं उसके प्रयोजक न हो यह अभिप्रेत नही है। इसलिए यहां 'अयोगव्यवच्छेदपरक' नियम ही मानना उचित है। उनमें से एक व्यञ्जन के [स्वल्पान्तर से पुन .- पुन.] प्रयोग का उदाहरण [निम्नलिखित श्लोक में है]। जैसे- केशपाश में थोडे से फूल गुंथे हुए है, मुस्कराहट कुछ अपूर्व सौन्दयमयी है, वचनों का प्रयोग चतुरतापूर्ण औौर मधुर है, गले में सुन्दर पञ्चम स्वर [कोकिल की सी आ्वाज] हं, आँखे भावपूर्ण और मन्दगति वाली पुततियों से युक्त है, हाव-भाव से अलस [अर्थात् मन्द] गति है इस प्रकार कामदेव के वाो के विद्व उस मृगनयनी फा [सारा व्यापार का] कम कुछ प्रपूर्व-सा हो गया है।।१। इसमें 'विनिवेशित' पद में 'वकार' की और 'सौन्दर्यघुय' में 'य' की आवृत्ति है। दूसरे चरण में 'विन्यासो वचसा विदग्व' में 'वकार' की, 'कण्ठे कल' में 'ककार' की 'तीलामन्यरतारके' में 'लकार' और रकार की 'नयने यात' में 'यकार' की,

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१७२ ] वकोफ्तिजीवितम् [फारिका १

एकस्यद्वयोवहूनाख्ोदाहरण यथा- भन्ने लावल्लरी कान्तर लित नदलीम्तम्वताग्वूलजम्नू- जम्बीर/न्तालतालीसर लेनरलतालानिका चन्य जह। 1

बलत्कन्लोलहेला विसकलनजया कनक्लेयु मिन्दो सेनालीमन्तिनी नामननर तरताभ्यासतान्ति सनीग ॥२।।

'विलासालत' में 'लकार' तवा 'नवार की, और बोने तरण में 'नमरणरापातावदात' मे 'तकार' की आ्वृत्ति होने ने ग्लोक में कृछ तपूर्व नौन्दय प्रनीत हो रहा है। इसलिए यह कुन्तक के मत मे 'वसविन्यानवघना का पर ग्रन्यो के मत में अनुप्रास का उत्तम उदाहरणा हैं। एक, दो औौर बहुत वगगों [को पुन-पुन पावृात्त] का उदाहरशा जसे- इलायाचियो की बेलो को तोड लेने वाल [श्रतण्व उनकी सुगन्ध से युकत] फेलो के समूह, पान [की वेलो] जामुन तथा नीबू [के वृक्षो] को हिलाने वाले ताड ताडी और सरलतर लताओ को नचाने वाली चञ्चल लहरों के साथ कोडा करने के कारस शीतल वायु, समुद्र-तट अयवा नदी-तट के कछारो में जिसकी सेना को स्त्रियो की निरन्तर रति [वहुमस्यक संनिमो के साथ प्रमश ] के अन्यास मे उत्पन्न श्रान्ति को दूर करती थी ॥२॥ यहाँ प्रघम चरण में एक 'लकार' का पांच बार प्रयोग किया गया है। स्तम्ब ताम्बूल जम्बू जम्बीर ताल ताली सरलतरलतालासिका आदि में अ्नेक वरों की अ्रनेक बार आ्र््रवृत्ति की गई है। इन्ही में ताल, ताली आदि दो वर्गों की भावृत्ति के उदाहरण भी हैं। इस प्रकार यह श्लोक भी कन्तक के मत में 'वर्णविन्यासवता' का और अन्यो के मत मे अनुप्रास का उत्तम उदाहरण है। नवीन आचार्यो ने अ्प्रनुप्रास के छेकानुप्रास, वृत्यनुप्रास, श्रृत्यनुप्रास, अ्न्त्वा- नुप्रास तथा लाटानुप्रास इस प्रकार पाँच भेद किए हैं। अनुप्रास का सामान्य लक्षणा साहित्यदपण में 'अनुप्रात शब्दत्ताम्य वषम्येऽपि स्वरस्य यत्'। इस प्रकार किया गया है। अर्थात् कुन्तक जिस प्रकार 'वर्णविन्यासवत्रता' में केवल व्यञ्जनो के विन्यास को ही विशेष महत्त्व देते है स्वरो के नाम्य को नही, उसी प्रकार अ्नुप्रातत अलद्वार को मानने वाले अनुप्रास मे स्वरो का वैषम्य होते हुए भी केवल व्यञ्जनो के साम्य को ही महत्त्व देते है। अनेक व्यञ्जनो का उसी स्वरप और उसी त्रम से एक वार आवृत्ति होने पर 'छेकानुप्रास' कहा जाता हू जैसे इस उदाहरण में 'तालताली', अववरतरताभ्यास' मादि में अनेक व्यञ्जनो की एक वार पवृत्ति होने से 'छेकानुप्रास' ह। वृत्यनुप्रास

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कारिका २ ] द्वितीयोन्मेष [१७३

एतामेव वक्रतां विच्छ्ित्यन्तरेण विविनक्ति- वर्गान्तयोगिनः स्पर्शा द्विरुक्तास्त-ल-नादयः । शिष्टाश्च रादिसंयुक्ताः प्रस्तुताचित्यशोभिनः ॥२॥ इयमपरा वर्गाविन्यासवक्रता त्रिधा त्रिभि. प्रकारैरुक्तोत 'च' शव्देना- भिसम्बन्ध. । के पुनरन्यस्यास्त्रय. प्रकारा इत्याह, 'वर्गान्तयोगिनः स्पर्शाः'।

में केवल एक प्रकार का अरथा्त् केवल स्वरूपत साम्य अपेक्षित होता है। उसी क्रम का होना आवश्यक नही है। अनुप्रास के पाँचो भेदो के लक्षण साहित्य-दर्पणकार ने इस प्रकार किए हैं- अ्नुप्रास शब्दसाम्यं वैषम्येऽपि स्वरस्य यत्। छेको व्य्जनसङ्कस्य सकृत्साम्यमनेकघा ॥३॥

एकस्य सकृदप्यप वृत्यनुप्रास उच्यते ।।४। उच्चार्यत्वाद्यदेकत्र स्थाने तालुरदादिके। सादृश्य व्यञ्जनस्पँव श्रृत्यनुप्रास उच्यते। ५॥ व्यञ्जन चेद्यथावस्थ सहाद्येन स्वरेण तु। आ्ररवर्त्यतेऽन्त्ययोजित्वादन्त्यानुप्रास एव तत् ॥।६।। शन्दार्थयो पौनरुकत्व भेदे तात्पर्यमात्रत । लाटानुप्रास इत्युक्तोऽनुप्रास पञ्चघा तत ।।७।। साहित्यदर्पस १०। ३-७ इसी [वर्साविन्यास की] वतता को वूसरे [प्रकार के] सौन्वर्य से दिखाते है- [कादयो मावसाना. स्पर्शा 'क' से लेकर 'मकार' पर्यन्त अर्था्त् 'कवर्ग' से 'पवर्ग' पर्यन्त पांचों वर्गो के पच्चीस अक्षर स्पर्श कहलाते है ये] स्पर्श [वर्ण] अपने वर्ग के अन्तिम वर्ण से सयुक्त [होने पर], तकार लकार तथा नकार द्विरुक्त [अर्थात् द्वित्व किए हुए रूप में प्रयुषत होने पर], तथा प्रस्तुत [रसादि] के [अनुसार] श्र्रचित्य से युकत, रकारादि से सयुषत शेष वर्ण [इस वरणविन्यासवकता के सूचक होते है] ।२॥ यह दूसरी [प्रकार की ] 'वर्णविन्यासवकता' तीन प्रकार की कही गई है। यह [इस कारिका में प्रयुक्त] च शब्द का सम्वन्ध है। [१ तथा २ दानों कारिका में तीन- तोन प्रकार की वर्णविन्यासवक्रता' कही हैं ] इस [ दूसरे प्रकार की व्णंविन्यासवकता के] वह कौन से तीन प्रकार है यह कहते है-(१) वर्गान्त से युक्त स्पर्श। ककार

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१७४ ] चक्नोषिति जीवित [फारिका २

स्पर्शा: काढयो सकारपर्यन्ता वर्गास्तनन्तें टकागनिभिर्योग सम्बन्धो येपा ते तथोक्ता पुन. पुनर्वध्यमाना, प्रथम प्रकार। न-ल-न आ्र्प्रादय तकार- लकार-नकार-प्रभृतयो द्विरुक्ता द्विरुच्चारिता द्विगुरणा सन्त पुन पुनवव्यमाक, द्वितीयः । तद्व्यतिरिक्ता शिष्टाश्च व्यज्ञनमना ये वर्रगास्त रेफप्रभृतिभि संयुक्ता., पुन. पुनवध्यमाना', तृतीयः । स्वल्पान्तरा परिमितव्यवहिता इति सर्वेपामभिसम्बन्धः । ते च कीहशा', प्रम्तुतीचित्यशोभिन। प्रन्तुत वर्यमानं वस्तु तस्य यदौचित्यमुचितभाव. तेन शोभन्ते ये ते तयोक्त। न पुनर्वर्श- सावसर्यव्यसनितामात्रेणोपनिवद्वा, प्रस्तुताचित्यम्लानकारिया। प्रम्तुतीचित्य- शोभित्वात् कुत्रचित् परुपरसप्रम्तावे ताहशानवाम्यनुजानाति।

से लेकर मकार पर्यन्त [अर्था्त् कवर्ग से पवग पयन्त पांचो ] वर्ग 'स्पश' कहलाते है। उन [पांचो वर्गो] के अ्रन्त के टकार श्र्प्रादि के साथ योग शर्यात सयोग जिनका हो वह उस प्रकार के [अर्थात् वर्गान्तयोगिन ] हैं। [इस प्रकार अपने वर्ग के शन्तिम वर्ण के साथ सयुक्त रूप में] वार-वार प्रयुक्त [वर्ण, वर्णविन्यासवनता के प्रयोजक होते हैं] यह [वर्णविन्यासवकता फा] प्रयम प्रकार है। त-ल-नादय श्र्थात् तकार लकार और नकार आदि द्विरुक्त पर्थात् द्वित्व रूप में दो बार उच्चारित होफर वार- बार निवद्ध हो [यह वर्णविन्यासवकना का] दूसरा प्रकार है। उन [वर्गान्त योगी स्पर्श वों तथा द्विसुकत तकार तकार नकार श्रादि] से भिन्न शेप व्यञ्जन सज्ञक जो वर्ण है चे रेफ आदि से सयुक्त रूप में बार-वार निबद्ध हो यह [वर्णविन्यास- वक्रता का] तृतीय प्रकार है। [इन सभी भेदो में पुन पुन निवद्ध व्यञ्जन] थोडे अन्तर वाले अर्ात् परिमित व्यवधान वाले होने चाहिएँ यह सबके साथ सम्बन्ध है। औरप्रौर वह किस प्रकार के [होने चाहिएं] प्रस्तुत [रसादि के अनुरूप] श्रौचित्य से युक्त प्रथवा मनोहर। प्रस्तुत अर्थात् वर्ण्यमान वस्तु, उसका जो श्रचित्य श्र्थात् उचित रूपता, उससे शोभित होने वाले जो वर्ण वे उस प्रकार के [प्रस्तुतौचित्य- शालिन ] है। वर्शो की समानता [अर्थात् अनुप्रास] के प्रयोग के रोग के कारण [जबरदस्ती] उपनियद्ध [और इसलिए] प्रस्तुत [वस्तु के सौन्दर्य] को मलिन करने वाले न होने चाहिएं। कहीं-वही [वीर, वीभत्स, रौद्र, भयानक आदि] फठे,र रसों के प्रसङ्ग में प्रस्तुत [रस] के शचित्य से शोभित होने के कारण उसी प्रकार के [अनुप्रास की आदत के कारण प्रयुक्त हुए] वर्रगो के प्रयोग की अ्प्नुमति दी गई ह। अन्य आचार्यो ने इस द्वितीय वर्णविन्यासवक्रता का वर्णन गुो वृत्तियो भ्र््रौर रीतियो के प्रसङ्ग में किया है। अलग-अलग गुणो में भिन्न प्रकार के वर्णों के प्रयोग का

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कारिका २] द्वितीयोन्मेष [१७५

वधान किया गया है। साहित्यदर्पसकार ने उनका वणन करते हुए लिखा है। चित्तद्रवीभावमयो ल्हादो माघुर्यमुच्यते। मूव्नि वर्गान्त्यवरॉन युवताष्टठडढान् विना। रसौ लघू च तद्व्यक्ती वर्णा कारणता गता। अ्वृत्तिरल्पवृत्तिर्वा मधुरा रचना तथा। अर्थात 'माधुर्य' गुए में टवर्ग को छोडकर अन्य वर्गा के शक्षर अपने वर्ग के प्रपरन्तिम वर्ण से सयुवत रूप में प्रयुक्त किए जाते है। और लघु रकार तथा णकार का प्रयोग तथा समासरहित अरथवा अत्पसमाम वाले पदो का प्रयोग 'माघुरय' का अरभिव्यञ्जक होता है। 'पोज' गुए का निरुपण करते हुए साहित्यद्पकार ने लिखा ह- श्ोजश्चित्तस्य विस्ताररूप दीप्तत्वमुच्यते। वर्गस्याद्यतृतीयाभ्या युक्ती वररगा तदन्तिमी। उपयंधो द्वयोर्वा सरेफो टठडढं सह। शकारश्च पकारकशच तस्य व्यञ्जकता गत । तथा समासवहुला घटनौद्धत्यशालिनी । अर्थात् चित्त के विस्तार रूप दीप्तत्व को 'ओज' कहते है। वीर, वीभत्स तथा रौद्र रसो में क्रमश 'भोज'-गुणा का आधिक्य होता है। वर्ग के प्रथम तथा तृतीय वर्ण के साथ उसी वर्ग के उसमे अगले वएां अर्थात् प्रथम वर्ग का द्वितीय वर्ा के साथ और तृतीय वर्ण का चसुर्थ वर्ण के साथ सयोग, ऊपर या नीचे या दोनो जगह लगने वाले रेफ का प्रयोग, टठडढश और प ये वर्णं उस ओज' गुए की अभिव्यक्ति में कारण होते है। इम में समास वहुल उद्धत रचना होती है। तीसरे 'प्रसाद' गुण का निरूपण करते हुए साहित्यदर्पणकार ने लिखा है- चित्त व्याप्नोति य क्षिप्र शुप्केन्घनमिवानल। स प्रसाद समस्तेषु रसेपु रचनासु च। शब्दास्तद्व्यञ्जका अयंोधका श्रतिमात्रत । इस प्रकार कुन्तक ने वर्णविन्यामवकता के द्वितीय प्रकार में विशेष प्रकार के वरगों के जिस प्रयोग का वणन किया है उसका वर्णन नवीन आचार्यो ने गुणों, वृत्तियो तथा रीतियो के प्रसङ्ग में किया है। गणो, वृतियो तथा रीतियो का समन्वय करते हुए मम्मट ने लिखा है- माधुर्यंव्यञ्जकवर्रोरुपना गरिकोच्यते। श्रोज प्रकाशकंस्तंस्तु परुषा कोमला पर ॥८0॥। केपाञ्चिदेता वैदर्भी प्रमुखा रीतयो मताः।

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१७६ ] वकोरितजीवितम् [फारिका २

तन्न प्रथमप्रकारादाहरण यथा-

गु्जन्ति मन्जु मचुपा कमलाहरेप। एतच्चकान्नि च र्वेर्नचवन्धुजीन- पुष्पच्छदाभ मृदयाचल चुम्बि निम्बम् ।।३।।' यथा च-

ग्रथा वा- सरस्वतीहृदयारविन्दम करन्दविन्दुसन्दोहमुन्दराणाम् ।इति॥।।

पव प्रथम प्रकार [वर्गान्तयोगिन स्पर्शा ] का उदाहरण [देते हे] जैमे- यह श्लोक 'ागवरपद्नति' मे नरया ३७३६ पर दिया गया है ग्रीर काव्य- प्रका्ण' में भी पृ० १६२ पर उदृत हृआर्रा है। सिले हुए रकत कमलो के पराग से पीले श्रद्गों वाले भरे कमलो के तालावों में मधुर गुज्जन फर रहे है और उदयाचल का चुम्बन करने वाले [उदयाचल पर स्थित] दुपहरिया अ्ररथवा गुडहल के फूल के समान [अत्यन्त रक्त वरं] यह [प्रात- काल उदय हुए] सूर्य का विम्व शोभित हो रहा है ।३॥ उन्निद्र, पिशङ्गिताङ्गा, गुञ्जन्ति, मञ्जु, वन्ध, चुम्वि, बिम्बम् आदि शब्दो में स्पर्श वर्ण वर्गान्त वर्णों के साथ सयुक्त रूप मे प्रयुवत हुए हे। इसलिए यह प्रथम प्रकार अर्थात् 'वर्गान्तयोगिन स्पर्शा' का उदाहरण है। और जैसे [ऊपर उद्धृत किए हुए उदाहरण स० २ े प्रथम चरण मे]- फदलीस्तम्व, ताम्वलजम्बजम्वीरवा ॥।४। इसमे स्तम्व, जम्बू, जम्वीर आदि शब्दो में वकार अपने वर्ग के अन्तिम वर्स मकार के साथ सयुक्त रूप में प्रयुक्त हुआ है। अतएव वह भी 'वर्गान्तयोगिन स्पर्शा' का उदाहरण है। पथवा जैसे- सरस्वती के हृदयारविन्द के मकरन्दविन्दुओ के [सन्दोह] समूह से सुन्दरों के ।।५॥

१ शार्ङ्गघर पद्धति स० ३७३६, काव्यप्रकाश उदाहरण स० ११० । २. इसी उन्मेष का उदाहरण स० २ देखो।

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कारिका २ ] द्वितीयोन्मेष: [१७७

द्वितीयप्रकारोदाहरस-

इत्यस्य द्वितीयचतुर्थों पादौ। तृतीयप्रकारोदाहरसामस्यैव तृतीयः पादः। यथा वा-

इस उदाहरण में तवर्ग के तृतीयाक्षर दकार का अपने वर्ग के अन्तिम वरं नकार के साथ पाँच जगह प्रयोग हुआ है। अतएव यह भी प्रथम प्रकार अर्थात् 'वर्गान्तयोगिन स्पर्शा' का उदाहरण है। द्वितीय प्रकार [श्रर्थात् 'ह्विरुक्तास्त-ल-नादयः' त, ल, न, घ्रादि के द्वित्व रूप के प्रयोग] का उदाहरण जैसे [पहिले प्रयमोन्मेष में उदाहरस स० ४१ पर उद्धूत]- 'प्रथममरुच्छाय.' इस [श्लोक] के द्वितीय तथा चतुर्थ पाद ॥६।। श्लोक के वे दोनो चरणा इस प्रकार हे- तदनु विरहोत्ताम्यत्तन्वीकपोलतलद्युति । सरसविसिनीकन्दच्छेदच्छविर्मृ गलाञ्छन' ॥ इसके द्वितीय चरण में 'विरहोत्ताम्यत्तन्वी' पदो में दो जगह तकार का द्वित्व किया हुआ प्रयोग है इसलिए यह दूसरे वकता प्रकार का उदाहरस हो सकता है। परन्तु चतुर्थ चर में तो त, ल, न, में से किसी के हित्व का प्रयोग नहीं हुआ है। परन्तु उसमें च्छेदच्छवि में च्छ के सयोग का दो बार प्रयोग हुआ है इसी कारए उसको भी द्वितीय प्रकार के वक्ता-भेद का उदाहरए ग्रन्थकार ने बतलाया है। 'त-ल-नादय' आदि पद से च्छ के सयोग का भी ग्रहण किया जा सकता है। तृतीय प्रकार [फी वक्रता भेद] का उदाहरण इसी [प्रथममरुणच्छाय. प्ादि श्लोक] का ततीय पाद [प्रसरति ततो ध्वान्तक्षोदक्षमः क्षरादामुखे] हैं। इस उदाहरण में प्र, ध्व, क्ष आादि सयुक्त वर्गों के प्रयोग के कारण ग्रन्थ- कार ने उसे तृतीय प्रकार के वकता-भेद का उदाहरण बतलाया है। अ्रथवा जेसे [इसी उत्मेष के सवसे पहिले उदाहरण के प्रथम चरण में आाया हुआ]- सौन्दर्यघुयस्मितम् ॥७॥।

१. उदाहरण १, ४१। २ उदाहरण २, १।

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१७८ ] वघोपित जीवितम् [फारिका २

यथा च 'कल्हार' शब्माह्चर्येस 'ल्हाट' शब्दप्रयोग। परुपरसप्रस्तावे तथाविघसयोगोवाहरण यथा- उत्ताम्यत्तालवश्च प्रतपतति तरणावाशवी तापतन्द्ी- मद्रिद्रोणीकुटीरे कुहुरिि हरिणारातयो यापयन्ति ।८।।1

इस अश में दो बार रेफ के सयोग का पयोग होने गे वह ततीय पगना-भेद का उदाहरण होता है।

औरर जैसे 'कल्हार' शब्द फे साहत्तयं म 'ल्हाद' शब्द का प्रयोग [भी इस तृतीय प्रकार के वक्रता-भेद का उदाहरण हो सकता है]। फठोर रस के प्रसङ्ग में उस प्रकार के सयोग का उदाहरण जैसे- यह श्लोक कवीन्द्रवचनामृत स० ६३ पर दिया गया है।

[मध्यान्ह फाल में] सूर्य के [श्त्यधिफ] तपने पर [गर्मो के फारण] चटफते हुए तालुओं वाले सिंह [हरिसारातय ] पहाडी तलहटी के [गृफा रूप] फुटीर में किरणों की गर्मी की तन्द्रा को पूर्ण करते हैं ॥5॥ यहां भयद्र, गर्मी के समय पर्वत की गुफा में पडे हुए मिहो के वसंन के कठोर प्रसङ्ग में कठोर रचना ही उपयक्त है इसलिए कवि ने उस प्रकार की रचना की है। इस श्लोक में 'आाशवी तापतन्द्री' के स्थान पर 'शिकी तापतन्द्रा' पाठ भी हो सकता है। उसका अभिप्राय यह होगा कि गर्मी के समय जो थोडी-सी तन्द्रा माती है उसको सिंह व्यतीत करते हैं। अर्थात् गर्मी से व्याकुल मिंह पवंत की गुफा में थोडी देर के लिए तनिक-सी तन्द्रा प्राप्त कर दिन को काटते है। प्रथम तथा द्वितीय कारिका में जो 'वर्णविन्यास-वक्रता' दिखलाई थी उसम थोडे-थोडे भन्तर से वर्णों की आवृत्ति का विधान किया है 'स्वल्पान्तरा' पद से उन दोनो में समान वर्णों की आवृत्ति में थोडा-सा व्यवधान होना आवश्यक बतलाया है। अब अगली कारिका में यह दिखलाते हैं कि कही-कही व्यवधान के न होने पर भी केवल स्वरो का वैष्य होने से समान वर्ो की एक साथ रचना मे भी। मनोहरता भा जाती है। यह भी 'वर्णविन्यास-वक्रता' का तीसरा प्रकार हो सकता है।

१. फवीन्द्रवचनामृत स० ६३।

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फारिका ३] द्वितीयोन्मेप

एतामेव वैचित्र्यान्तरेण व्याचप्टे क्वचिदव्यवधानेऽपि मनोहारिनिवन्धना। सा स्वराणामसारूप्यात् परां पुष्णाति वक्रताम् ॥३। क्वचिद नियतप्रायवाक्यैकदेशे कस्मिश्चिद्व्यववानेSपि व्यवधानाभावे- उप्यकस्य द्वया समुदितयोश्च बहूना वा पुन. पुनर्वध्यमानानामेपा मनोहारि- निवन्धना कनयावर्जकविन्यासा भवति। काचिदेव सम्पद्त इत्यर्थः। यमक- व्यवहारोऽन्र न प्रवर्तते तस्य नियतस्थानतया व्यवस्थानात् । सवरैरव्यवधान- मत्र न विवचित, तस्यानुपपत्ते.। तत्रैकम्याव्यवधानोदाहरएं यथा- वामं कज्जलवद्विलोचनमुरो रोहद्विमारिस्तनम् ॥६/19

करते है- इसी [वर्णविन्यास-वकता] को अ्रन्य प्रकार के वेचित्र्य द्वारा प्रतिपादन

कहीं व्यवधान के न होने पर भी [केवल बीच में आने वाले] स्वरो के भेद [शसादव्य] से हृदयाकर्षक वह [रचना काव्यनिष्ठ] सौन्दर्य को घ्रत्यत्त परिपुष्ट करती है। कहीं अर्थात् वाक्य के किसी अ्र्प्रनियत-प्राय एक देश में श्रव्यवधान अनर्यात् [सवृश व्यञ्जनो की स्थिति में] अ्न्तर न होने पर भी एक [ही वर्ण] अ्थवा मिले हुए दो [ वरगगो ] अ्रथवा बहुतन्ते वार-वार ग्रचित किए हुए इन वणों की मनोहर अर्थात् हृदयाप षंक विन्यासयुक्षत रचना होती है। कोई [विशेष रचना ही] इस प्रकार की [हुदयाकर्षक वित्यास वाली] होती है [सब नहीं]। इम जगह यमक [अ्रलङ्गार का] व्यवहार नहीं किया जा सकता है। उस [ यमक] के नियत स्थान रूप से व्यवस्थित होने से। [अर्थात् यमक में पाद के आर्ादि, मध्य या अ्र्प्न्त में किसी नियत स्थान पर वर्गों की आवृत्ति करने का नियम है परन्तु वर्णविन्यास-वम्नता के इस भेद में स्यान का फोई नियम नहीं है। अत इसको यमक नहीं कहा जा सकता है। कारिका में जो 'वचिदव्यवघानेऽपि' इन शब्दो का प्रयोग किया गया है वहां] स्वरो से प्रव्यवधान यहाँ उसके अरनुपपत्न होने से विविक्षित नहीं है। [किन्तु व्यञ्जनों का परम्पर अव्यवधान ही विवसिन है]। उसमें एक [वर्ण] के प्रव्यवधान का उदाहन्स जैसे- वाम नेत्र कज्जलयुकत औ्रौर त्तन चढ़ते हुए विस्तार मे युकत है ।।६।। इन मल ग्लोक में कज्जल शब्द में जवार का अव्यवधान से प्रयोग मानकर उदाहन्स दिया है।

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१८० ] वक्रोपितजीवितम [कारिका ३

द्वयोर्यथा- ताम्बूलीनद्धमुग्ध कमु कतरुतलस्रम्तरे सानुगाभि:। पायं पाय कज्ञाचीह तकदलदल नारिकेलीफलाम्भ। सेव्यन्ता व्योमयात्राश्रमजलजयिन. सैन्यसीमन्तिनोभि- र्दात्यूहव्यूहकेलीकलित कुह कुहारावकान्ता चनान्ताः ॥१०|' दो [वर्गो] के श्व्यवधान से प्रयोग का उदाहरण] जैसे- राजणेखर कृत 'वालरामायण' नाटक के प्रथम श्रक्क के अ्रन्त में मीता-स्वयम्बर के शवसर पर मिथिलापुरी आया हुआ रावए अपने सेनापतियों को आ्देश दे रहा हैं कि हम सब दो-चार दिन मिथिलापुरी के समीपवर्ती भाग मे ठहरेंगे रमलिए हमारी सेना की महिलाएँ निश्चिन्त होकर यहाँ के वनप्रान्त का श्रानन्द अनुभव करें। व्लोक का अ्रर्थ इस प्रकार हैं- पान की बेलों से घिरे हुए सुपारी के वृक्षो के नोचे पडे हुए विस्तरो के ऊपर [बैठकर] मेले के पत्तो के दोने [कलाची-कृत पोने के पात्र] वनाकर नारियल के फलो का पानी [य्थेच्छ रूप से] पी-पी फर [लड्ा से मिथिला तक की] आ्रफाश-मार्ग से की गई यात्रा के [कारण उत्पन्न] पसीनो को, सुसा देने वाले और फोशो के समूह की कीडा से होने वाले काँव-फाँव शब्द से गूजते हुए, सुन्दर वन प्रदेशों को हमारी सेना की महिलाएँ अपने [सहचारियों प्ररथवा] सहचरो के साथ [यर्थेप्ट] सेवन फरें ॥१०॥ इस इलोक में पाय पाय, कदलदल, दात्यूहव्युह, केलीकलित, कुहकहाराव, कान्ता वनान्ता पादि में दो-दो पक्षरो का अव्यवधान से प्रयोग मानकर इसकी इस प्रकार की वर्णाविन्यास-वक्रता का उदाहरण बतलाया है। बालरामायण में कलाचीकृत के स्थान पर कलावीकृत पाठ पाया जाता है। औौर 'कलावीकृतानि' का अर्थ पात्रीकृतानि किया गया है। वक्रोक्तिजीवितकार ने कलाचीकृतकदलदल पाठ रखा है। उसका भी अर्थ वह ही है। नारियल के जल को पीने के लिए केले के पत्तो के दोनो जैसे पीने के पात्र बनाकर, यह अर्थ उस पद से प्रतीत होता है। बालरामायण के टीकाकार ने 'दात्यूह' का अरथ कोकिल किया है परन्तु वह ठीक नही है। श्मर कोष में 'दात्यूह' शब्द को कौए का पर्यायवाची माना" है कोकिल का नही। द्रोसाकाकस्तु काकोल दात्यूह कालकण्ठक। अर्थात् काली गर्दन वाले कौए को दात्यूह कहते हैं।

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कारिका ३] द्वितीयोन्मेषः [१८१

यथा वा- अयि पिवत चकोरा: कृत्स्नमुन्नाम्य करठान् क्रमुकवलन चञ्चच्च्चवश्चन्द्रिकाम्भ: - विरहविधुरिताना जीवितत्राणहेतो- भंवति हरिणलद्मा येन तेजोदरिद्रः.।११॥१ बहूनां यथा- सरलतरलतालासिका ॥।इति ॥१२॥२ 'अपि' शब्दात् क्वचिद् व्यवधानेऽपि।

अ्थवा जसे- यह श्लोक भी राजशेखर कृत वालरामायण से लिया गया है। पञ्चम भ्रङ्ट में, सीता को प्राप्त न कर सकने के कारण उन्मत् होकर रावण ने जो वपापार किए है उन्ही का वर्णन पञ्चम अ्द्ध में किया गया है। उसी प्रसद्ग में से यह श्लोक उदृत किया गया है। रावण चकोरो को सम्वोधन करके कह रहा है- सुपारियों के खाने से तेज चोचों वाले हे चकोरो, विरह दु.ख से दृःखी जनो के प्राणों की रक्षा के लिए अपनी गर्दनो को ऊँचा करके सारे के सारे चाँदनी रूप जल को पी जाओ। जिससे चन्द्रमा अपनी कान्ति से विल्कुल रहित हो जाय ।।११॥ इस श्लोक में कृत्स्न, उन्नाम्य, कण्ठान् पञ्च्चचन्द्रवश्चन्द्रिकाम्भ, त्रासाहेतो, लक्ष्मा आदि पदो में दो-दो वर्शों का अ्रव्यवधानेन प्रयोग होने से इसको उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसके पूर्वार्द्ध का पाठ वालरामायण में इस पाठ से कुछ भिन्न प्रकार का पाया जाता है जो इस प्रकार है- भयि पिवत चकोरा कृत्स्नमुन्मामिकण्ठ = परन्तु यह पाठ अत्यन्त अशुद्ध और असङ्भत होने से अनुपादेय है। बहुत [से वररगों के अ्रव्यवधान से प्रयोग] का [उशहरण] जंसे- सरलतरलतालासिका ॥१२॥ इस उवाहरण में ल त र ल त आदि अ्रनेक वर्शों का श्व्यवधान से प्रयोग होने के कारण उसको इस प्रकार की वर्णवित्यास-वत्ता उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया गया हैं। [कारिका में कहे हुए] 'अ््पि' शब्द से कहीं व्यवधान में भी [इस प्रकार की वर्णविन्यास-वक्रता हो सफती है। यह वात सूचित होती हैं]। १ वालरामायर ५, ७३। २. उदाहरण २, २।

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१६२ ] वक्रोमितिजीवितम् [फारिका ३

द्वयोयथा- स्वस्था सन्तु वसन्त ते रततिपतेरनेंसरा वासरा ।।?३।।' बहूना व्यववानऽपि यथा- चकितचातकमे चकितवियति वर्षात्यये॥१४।। 'सा स्वराणामसारप्यात्' सेयगनन्तरोक्ता स्वरागामकारादीनामसार- प्यादसादश्यात्। क्वचित् कस्मिश्चिदावर्तमानसमुहायेकदेशे परामन्या चक्ता कामपि पुग्णाति पुप्यतीत्यथ। यथा- राजीवजीवितेश्वर ।।१५।। यथा वा- धूसरसरिति। इति॥१६॥

दो [वर्शो] के अव्यवधान में [वर्णचिन्यास-वत्रता का उदाहरण] जैसे- हे वसन्त! कामदेव के आ्रागे आ्रगे चलने वाले तुम्हारे दिन स्वस्य हो॥१३॥ इस मूल उदाहरस में 'अग्रेसरा' वासरा में सरा इन दो वगों की वा के व्यवघान से आवृत्ति हुई है, अप्रत यह 'क्वचिद् व्यवधानेऽपि' का उदाहरणा है।- व्यवधान होने पर भी बहुतो [बहुत से वर्शो की आवृत्ति] फा [उदाहरण] जैसे- 1, ज्वर्षा की समाप्ति के वाद चक्ति चातको से व्याप्त आ्रकाश में ॥१४॥ .इस उदाहरण मे 'चकित' पद की दो बार आ्र्रवृत्ति है परन्तु उनके बीच मे 'चातकमे' इन वर्शों का व्यवधान है। इसलिए यह व्यवधान में बहुत से वणों की आ्वृत्ति का उदाहरण हुआ्रप्रा । वह स्वरो के भेद होने से अर्थात् 'वह' जो [वर्संविन्यासवकता] अभी कही है वह पकार आदि स्वरो के पसादृश्य से कहीं अर्थात् आ्वर्तमान [वर्शो के] समुदाय के एक देश में किसी अ्रन्य [अपूर्च] वक्रता फी पुष्ट करती है अर्थात बढ़ाती हैं जैसे- 'राजीवजीवितेश्वरे'[में जीव औ्रर जीवि की आ्ररवृत्ति हैँ उसमें वकार के साथ स्वरों का अ्रसादृश्य हं] कमलो के जीवनाघार [सूर्य] के उदय होने पर ॥१५॥

11 भ्रथवा जंसे- ;, 'धूसरसरिति' [ 'मलिन नदी में' सर, सरि की आरवृत्ति है औ्रर उसमें र के साथ के स्वर में असादृश्य है।] ॥१६।।

१ उदाहरण २, १७ ।

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कारिका ३] द्वितीयोन्मेष

यथा च- स्वस्थाः सन्तु वसन्त । इति ।१७॥१ यथा वा- नालताली। इति॥१८॥।२ सोऽयमुभयप्रकारोऽपि वर्णविन्यासवक्रताविशिष्टवाक्यविन्यासो यम- काभास: सन्निवेशविशेपो मुक्ताकला पमध्यप्रोत्तम शिमयपदकवन्धवन्धुरः सुतरां सहृद्यहृदयहारितां प्रतिपद्यते। तदिदमुक्तम्- अलङ्कारस्य कवयो यत्रालङ्करणान्तरम्। -पसन्तुप्टा निवष्नन्ति हारादेमशिवन्धवत्। इति ॥१६॥3 एतामेव विविधप्रकारां वक्रतां विशिनष्टि, यदेवं विधवक्यमाणविशेपण- विशिष्टा विधातव्येति -

और जैसे- 'स्वस्थाः सन्तु वसन्त' इस में [सन्तु सन्त की आ्रवृत्ति* । परन्तु उसके अन्तिम 3 स्वर में श्रंसादृश्य हैं।] ।।१७।। प्रथवा जैसे- 4 'तालताली' यह ॥१८॥। [इसमें लकार के साथ में प्रयुक्त स्वरो में अ्रसादृश्य है और तालताली पदो की आवृत्ति है। भत यह भी वर्णविन्यासवकता का उदाहरण हँ]। 1 यह [व्यवधान अथवा अ्रव्यवधान से विरचित] दोनो प्रकार की 'वर्णविन्यास- वकता' से युक्त वाक्य की रचना यमकाभ स रूप सन्निवेश विशेष है जो मुक्ता-हाट के बोच में गूये गए मशिगमय पदक। मसिमय छोटी-छोटी पदको] के समान सुन्दर [होने से] स्वय ही सहृदयों का हृदयहारी हो जाता है। इसी को [ग्रन्यकार नं प्रथम उन्मेष की निम्नलिखित : ५वीं कारिका में] कहा हं- जहाँ कवि लोग [एफ अलद्धार से] सन्तुप्ट न होकर हार आप्रादि [श्रतद्धार] में मणियों [दूसरे मलद्धार] के जडाने के समान एक अ्लद्धार के अ्रलद्धरण रूप में दूसरे अलद्ार की रचना करते हैं। [वह चित्र नामक दूसरे प्रकार का मार्ग हूं] यह [पहिले कह चुके है] ।१६।। इसी नाना प्रकार की वक्रता की विशेषता कहते हैं कि उसे [भागे कहे जाने वाले] इस प्रकार के विशेषणों से युक्त करना चाहिए। १ उदाहरस २, १३। २. उदाहर खर, २। ३. कारिका १, ३५।

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१८४ ] [फारिका ४

नाति निर्वन्धविहिता नाप्यपेशलभृपिता। पूर्वावृ चपरित्यागनूतनावर्तनोज्ज्वला ।।४।। 'नातिनिर्वन्धविहिता', 'निर्वन्ध'शब्दोऽत् व्यसनिनाया वर्तते। तेनाति- निर्वन्धेन पुन पुनरावतेनव्यसनितया न विहिता । त्र्प्रयत्नविरचितेत्यर्थ । व्यसनितया प्रयत्नविरचने हि प्रस्तुतौचित्यपरिहाणोर्वाच्यवाचकयो परस्पर- स्पर्भित्वलक्षणसाहित्यविरह पर्यवस्यति। यथा- भणा तरुषि ।।इति ।।२०।।' 'नाप्य पेशलभूपिता', न चाप्यपेशलैरसुकुमारैरलंकृता। यथा- शीर्णघ्राणाघ्रि ।।इति ॥।२१।२

[वह वर्णविन्यासवक्रता] प्र्प्रत्यन्त आ्र्प्राग्रहपूर्वक विरचित न हो श्रौर न अ्र्प्रसुन्दर [प्रकृत रस-विरोधी] वर्गो से भूषित हो। औ्रौर [बार-वार एफ ही प्रकार के वगों की आवृत्ति अर्ात एक ही प्रकार के यमक का प्रवृत्ति रूप न होफर] पूर्व आवृत्त [यमक ] को छोड कर नवीन [ वशगों के यमक ] के पुनरावर्तंन से मनोहर बनानी चाहिए।।४।। अत्यन्त आग्रहपूर्वक विरचित न हो। यहाँ निर्बन्ध' शन्द व्यसनिता का बोधक है। अत्यन्त आग्रह से अर्थात् बार-बार वर्गगों के दुहराने की आादत से [वह आावृत्ति] न की गई हो। [अपितु] बिना प्रयत्न के [स्वाभाविक रूप से] विरचित हो। आदत के कारण प्रयत्नपूर्वक [वर्गगों की आ्र्प्रावृत्ति की ] रचना करने से प्रस्तुत [रसादि] के श्चित्य की हानि होने से शब्द और श्र्पर्थ का [सौन्दर्यजनन में] परस्परस्पधित्व रूप 'साहित्य' का अ्र्परभाव हो जाता है। जैसे- [उदा० स० ६ पर उद्धत ] 'भण तरुखि' इत्यादि में [दिखला चुके है]॥२०। और न अपेशल अर्थात् अ्सुकुमार वर्गगो से भूषित हो। जैसे- 'शीर्सप्रारा्रि' इसमें ॥२१॥ यह 'शीणघ्रााघ्रि' आदि श्लोक महाकवि मयूरभट्ट विरचित 'सूर्यशतक- नामक काव्य का छठा श्लोक है। पूरा श्लोक इस प्रकार है- शीएंघ्राणात्रिपारीन् व्रणि भिर पधनैर्धघराव्यक्तघोषान् दीर्घाघ्ातानघौघे पुनरपि घटयत्येक उल्लाघयन् य। १. उदाहरण १, ६। २ सूर्यशतक इ्लोक ६, काव्यप्रकाश उदा० स० ३०१ पर उद्धत ।

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कारिका ४ ] द्वितोयोन्मेष [१८४

तढेवं कीहशी तर्हिं कर्तव्येत्याह-'पूर्वावृत्तपरित्यागनूतनावर्तनोज्ज्ला'। पूवमावृत्तानां पुन पुनर्विरचितानां परित्यागेन प्रहागोन नूतनानामभिनवानां वेर्ानामावर्तनेन पुनः पुन. परिग्रहेण च। तदेवमुमाभ्या प्रकाराभ्यामु्ज्वला भ्राजिष्णुः। यथा- एता पश्य पुरस्तटीमिह किल क्रीडाकिरातो हरः कोद एडेन किरीटिना सरमसं चूडान्तरे ताड़ितः । इत्याकरर्य कथाद्भुत हिमनिघावद्रौ सुभद्रापते- मन्दं मन्दमकारि येन निजयोर्दोर्दएडयोर्मएडनम् ॥।२२॥।

दत्तार्धा सिद्धसिद्धै विदधतु घृणया शीघ्रमहोविधातम्॥ इस श्लोक में सभी जगह कठोर वर्गगों का प्रयोग किया गया है। भ्रत वह वर्ण विन्यासवत्रता का सुन्दर उदाहरण नही कहा जा सकता है। इस प्रफार वह [वर्सविन्यासवत्रता] फँसी करनी चाहिए यह कहते हैं। 3 पहले शवृत्त [वर्णो] को छोडकर नवीन [वर्गगो] की आवृत्ति से उज्ज्वल। पूर्व आवृत्त अर्थात् वार-वार ग्रथित [वर्गो] को परित्याग फर नूतन, नए-नए वर्णों की प्रावृत्ति से अर्थात वार-वार ग्रहण या दुहराने से, इस प्रकार [पूर्वावृत्तपरित्याग तथा नूतनावर्तन रूप] दोनो प्रकारो से उज्जवन अ्र्प्रयात् शोभायमान [करनी चाहिए] । जसे- इस श्लोक को भरत नाट्यशास्त्र की अभिनव भारतीय टीका में १६वे भध्याय में सरस्वतीकष्ठाभरण में पृ० ३०० पर हेमचन्द्र के काव्यानु शासन में पृ० २६७ पर भी उद्ृत किया गया है। इस सामने के किनारे को देखो, यहाँ पहले समय में नफली फिरात वेषघारी शिव के मस्तक पर [युद्ध के समय] अर्जुन ने अपने धनुष से बड़े जोर से प्रहार किया था। इस प्रकार हिमालय पर्वत पर सुभद्रापति अ्र्जुन की [शिव पर प्रहार करने रूप] प्रद्भुत कथा को सुनकर जिसने घीरे-धीरे अपनी भुजाओं को [लड़ने के लिए] सन्नद्ध [अलंकृत तैंयार] किया ॥२२॥ इस श्लोक के पूर्वाद्ध में ककार की श्रनेक वार श्रवृत्ति है उसका परित्याग कर चतुर्थ चरण में 'दण्डयोमण्डनम्' में नूतन वर्णों की आवृत्ति की गई है। इसलिए इसमें पूर्वावृत का परित्याग और नूतन की आवृति होने से यह दोनो प्रकार की मनोहरता से युक्त है।

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१८६ ] घकोपितजीवितम् [फारिका ५

यथा वा- हसाना निनदेप इति ॥।२३। यथा च- एतन्मन्दविपकत्र इत्यादो ॥२४।। यथा वा- एमह दसाएएसर हसकर तुलित्ररवलन्तसेलगप्न्प्रनिहल । ेव तयोरथण हरहर कन्न्रकठर गहं गोरि

वेपमानस्थृलस्तनभरहरकृतकराठयरहा गौरीम् ॥।२५॥ इतिचछागा ]४ll एवमेता वणेविन्यासवक्रतां व्यास्याय तामेवोपसंहरति- वर्सच्छायानुसारेण गुएमार्गानुवतिनी। वृत्तिवैचित्र्ययुक्तेति सैव प्रोक्ता चिरन्तनै ।।५।।

प्थवा जैसे- [पिछले उदा० १, ७३ पर उद्धृत ] 'हसाना निनदेष' इत्यादि [श्लोफ में]॥२३॥। प्रथवा जसे- [पिछले उवा० १, १०७ पर उद्धृत ] 'एतन्मन्दविपक्व' इत्यादि [इलोक]मे ॥२४॥ अथवा जैसे- रावण के द्वारा वेग से हाथ पर उठा लेने के कारण हिलते हुए कलाश पर्वत पर भय से विह्वल हुई और हिलते हुए स्तनो के भार से युक्त शिव के गले में चिपट जाने वाली पार्वती को नमस्कार करो ॥२५॥ इसमें भी पूर्वाद्ध तथा उत्तराद्व भाग में अर्प्रलग-अ्रलग वर्णों की भ्रावृत्ति है। अरत यह भी 'पूर्वावृत्तपरित्याग' तथा 'नूतनावर्तनोज्ज्वलता' का उदाहरण है ।,४।। इस प्रकार वर्णविन्यासवक्रता की व्यास्या करके अब उसी का उपसहार करते हैं- वर्गों के सौन्दर्य [ श्रव्यता प्रादि ] के अनुसार [माधुर्य आदि] गुणों और [सुकुमार आरदि] मार्ग का अ्र्प्रनुसरण करने वाली उसी [वणंविन्यासवफ्रता] को प्राचीन [उ्धट आदि] आच्ार्यों ने [उपनागरिका आदि] वृत्तियो के वचित्र्य से युक्त कहा है।।५।।

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कारिका ५] द्वितीयोन्मेष [१८७

वर्णानामक्षराणा या छाया कान्ति. श्रव्यतादिगुएसम्पत्, तया हेतुभूतया यद्नुसरणामनुसारः प्राप्यस्वरूपानुप्रवेशस्तेन। गुणन् माधुर्यादीन् मार्गोश्च पुकमारप्रभृतीननुवतते या सा तथोक्ता। तत्र गुणानामन्तरम्यात् प्रथममुपन्य- सनम्। गुराद्वारेगैव मार्गानुसरणोपपत्तेः। तद्यमत्रार्थ .- यद्यप्येषा वर्णविन्यासवक्रता व्यञ्जनच्छायानुसारेएैव, तथापि प्रतिनियतगुणविशिष्टानां मार्गाामनुवर्तनद्वारेण यथा स्वरूपानु- प्रवेशं विद्वाति तथा विधातव्येति। तत एव च वस्यास्तन्निवन्धना प्रवितताः प्रकाराः समुह्लसन्ति । चिरन्तनै. पुनः सैव स्वातन्त्र्येण वृत्तिवैचित्रययुक्तति प्रोक्ता। वृत्तीन सुपनागरिकादीनां यद् वैचित्र्य विचित्रभाव. स्वनिष्ठसंख्या- भेदभिन्नत्वं तेन युक्ता समन्वितेति चिरन्तनै. पूर्वसूरिभिरभिहिता। तदिद्मत्र तात्पयम्, यदस्याः सकलगुणस्वरूपानुसरणसमन्वयेन सुकु-

वर्शगो अथवा श्रक्षरो की जो छाया अर्थात् क्रान्ति प्रथवा श्रव्यता आदि गुरो की सम्पत्ति, उसके द्वारा जो [रसादि का] अनुसरण, अनुगमन अर्यात् वर्ण्य [प्राप्य] वस्तु के साथ में अनुप्रवेश, उससे। माघुर्य आदि गुरो तथा सुकुमार आदि मार्गो की जो अ्रनुगामिनी होती है वह उस प्रकार की [गुएमार्गानुवतनी] हुई। उन [गुए तथा मार्गो] में से गुणों के अ्न्तरतम होने से [गुण शब्त को], पहिले रखा गया हू। गुणों के द्वारा ही [सकुमार आदि] मार्गों का अ्रनुसरण युक्ति सङ्गत हो सकने से [ गुणों के वाद 'मार्ग' पद को रखा है]।

इसलिए इसका यह अर्थ हुआ कि-यद्यपि यह धर्सवित्यासवक्रता व्यञ्जन 'वशगों के सौन्दर्य [श्रव्यता आदि] के कारण ही होती ह फिर भी निश्चित गुणों से युक्त [सुकुमार आदि] मार्गों के अनुवर्तन द्वारा जिस प्रकार [काव्य के] स्वरूप में प्रवेश करे इस प्रकार [उसकी] रचना करनी चाहिए। और उस ही [सुकुमार आ्रादि मार्गो के अनुसरण] से उस [वर्णविन्यासवतता] के मार्गानुसरण निमित्तक अ्रनेक प्रकार के भेद हो जाते है। प्राचीन [सं्ट आदि] आ्चार्यों ने स्वतंत्र रूप से उसी १ वसंविन्यासवकता] को 'वृत्िर्वचित््ययु्त' कहा है। उपनागरिका आदि वृत्तियों का जो वैचित्र्य या विचित्रता अर्थात् स्वगत स्या भेद से भिन्नता, उससे युकत [वर्ग- विन्य ासवतता ] प्राचीन आचार्यो ने फही है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि इस [वर्णविन्यासवकता] का [माधर्य आदि] समस्त [अर्थात् वामन प्रतिपावित दस शब्दगणो और दसो अर्यं] गणो के स्वरूप के

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१८८ ] वकोपितिजीचितम् [फारिका ४

मारादिमार्गानुवर्तनायत्तवृत्ते पारतन्त्र्यमपरिगशितप्रकाग्त्व चैनदुभयम ्यवश्य- स्भावि। तस्मावपारतन्त्रय परिमितप्रकारकत्वञ्वति नानिचतुरस्म्। ननु च प्रथम 'एका द्ो' इत्याहिना प्रकारे परिमिनान प्रकारय स्त्रतन्त्रत्व च स्वयमेव व्याख्याय किमेतटुक्तमिति चेन्। नैप दोप। य्रस्माल्लक्षसकारैयस्य कस्यचिन् पदार्थस्य समुदायपरायत्त वृत्त' परव्युत्पत्तये प्रथममपोद्वारवुद्वया स्वतन्त्रतया स्वरू्पमुलिन्यते । तत. समुदायान्तर्भावा भविष्यतीत्यलमतिप्रमन्गंन ।।४।। ये्य वर्णविन्यासवक्रता नाम वाचकालकृति स्थाननियमाभावात सकलवाक्यस्य विपयत्वेन समाम्नाता सैव प्रकारान्तरविशिष्टा नियतस्थान-

अ्रनुसरस के समन्वय से और सुकुमार आदि मार्गो के परावीन वृत्ि होने से [व्णं- विन्यासवक्ता की] परतत्रता और श्रनन्त भेद ये दोनों वाते श्रवश्यम्भावी है। इस लिए [उसको ] स्वतत्र औरौर [तीन-चार आादि] परिमित भेद युक्त फहना बहुत उचित नहीं है। [प्रश्न] पहिले [इसी उन्मेष की प्रथम फारिका में] 'एको हवौ वहवो वर्णा' इत्यादि प्रकार से [वर्णविन्यासवक्रता के] परिमित [तोन] प्रकारो फो और स्वतत्रता का स्वय हो प्रतिपादन करके अब यह क्या कह रहे हैं [ कि समस्त गुो का अ्रनुसरण करने से उसके अपरिमित भेद और मागों के अनसरण के आधीन होने से पराधीनता प्रवश्यम्भावी है] यह शद्धा हो तो [उत्तर यह है कि]- [उत्तर] यह [स्ववचनविरोध या बदतो व्याघातत्प] दोष नहीं आाता है। कयोंकि [लक्षसकार ] शास्त्रकार दूसरो को समझाने के लिए समुदाय में रहने वाले किसी पदार्थ को पहिले अलग करके भी उसके स्वरूप का निरूपण करते हैं। [क्योंकि] उस [पृथक् रूप से स्वरूप-निरूपण] के बाद समुदाय में [उसका] अ्रन्तर्भाव [स्वय ही] हो जायगा। इसीलए [ यहा भी 'एको द्वौ वहवो' इत्यादि कारिका में तीन भेदों का वर्णन किया है। अब इस विषय में भ्ार]त्रधिक कहने की आवश्यकता नहीं है ॥।४" [स-यमक रूप वणविन्यासवक्रता] यह जो वर्णग विन्यासवकता [अनुपरास रूप] शब्दालद्गार स्थान नियम के बिना सारे [श्लोक] वाक्य के विषय रूप से प्रतिपादन किया है वह ही स्थान नियत करके प्रकारान्तर [यमक रूप] से विशिष्ट होकर कुछ अन्य ही प्रकार के सौन्वर्य

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कारिका ६-७] द्वितीयोन्मेष: [१८६

तयोपनिबध्यमाना किमपि वैचित्र्यान्तरमावघ्नातीत्याह- समानवर्णमन्यार्थ प्रसादि श्रुतिपेशलम्। 7 औचित्ययुक्तमाद्यादि नियतस्थानशोभि यत् ।६।। यसकं नाम कोऽप्यस्याः प्रकार: परिदृश्यते। स तु शोभान्तराभावादिह नातिप्रतन्यते।।७।। 'कोऽप्यस्या: प्रकार. परिद्ृश्यते' । 'अस्या:' पूर्वोक्ताया कोऽप्यपूर्व. प्रभेटो विभाव्यते। कोऽसावित्याह, 'यमक नाम', यमकमिति यम्य प्रसिद्धि.। तच्च कीहशम् 'समानवर्णाम्', समाना: सरूपाः सहशश्रुतयो वर्णा यस्मिन तत तथोक्तम्। एवमेकस्य द्वयोर्वहूनां सदृशश्रतीना व्यवहितमव्यवहित वा यदुपनिब धनं तदेव यमकमित्युच्यते। तदेवमेकरूपे संस्थानद्वये सत्यपि अन्यार्थ', भिन्नाभिधेयम् ।

को उत्पन्न करती है इस बात को [अगली कारिकाओ] में कहते है। [अर्ात् वण- विन्यासवक्रता को अन्य आचार्यो में से उद्भट आवि ने 'वृत्ति' नाम से तथा भामह भादि ने 'अनुप्रास' नाम से कहा है। अनुप्रास रूप इस वर्णविन्यासवक्रता का ही दूसरा विशेष रूप यमकालङ्गार होता है। उसी का निरूपण करते हैं ]। समान वर्ण वाले किन्तु भिन्नायक, प्रसाद गुएायुक्त, श्रुतिमधुर, [रसादि के] शचित्य से युक्त, प्रारम्भ [मध्य या अ्रन्त] आदि स्थानो पर शोभित होने वाला जो [प्रकार है]।।६।। 'यमक' नामक प्रकार की [अ्रपूर्व ] इसी [वर्णविन्यास (कना ] का प्रकार पाया जाता है। [परन्तु स्थान की विशेषता के अतिरिक्त पूर्वोक्त वर्णविन्यासवक्रता से भिन्न] अन्य किसी शोभा का जनक न होने से यहाँ उसका अ्रधिक विवेचन नहीं किया जा रहा है।७।। औरौर जो फोई [श्रपूर्व]इस [वर्णविन्यासवघ्रता] का [यमक रूप दूसरा] प्रकार पाया जाता है। इस पूर्वोक्त [वर्णविन्यासवक्रता] का कोई अ्प्रपूर्व भेद दिखलाई देता हैं। वह कौन-सा [प्रकार] यह कहते हैं, 'यमक' नामक [प्रकार]। जो 'यमक' नाम से प्रसिद्ध है। औौर वह कैसा कि समान वर्ण वाला। समान एक-से पपर्ात् सुनने में एक समान प्रतीत होने वाले वर्ण जिसमें हों। इस प्रकार के एक, दो श्रथवा बहुत से, सुनने भें समान प्रतीत होने वाले, वर्गों का व्यवधान से घ्रयवा बिना व्यवधान के

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१६० ] वकोषितिजीचितम् कारिका ७

अ्रन्यच्च कीदशम्, 'प्रसादि' प्रमादगुगायुक्तं भगिति समर्पकम्, अकटर्थनावोध्यमिति यावत् 1 श्रुनिषेशलगित्येव विशिप्यते। श्रुति श्रवोन्द्रियं, तत्र पेशल रज्जक, श्र्प्रकठोरशच्विरचितमूई, कीहशम्, 'शचित्ययुक्तम्'। श्रीचित्यं वस्तुन न्वभायात्कर्पम्तन युक्त मम- - तदेव विशेपणान्तरेए विशिनप्टि, 'आद्याटिनियतम्थानशोभि यत्'। श्रदिरा- िर्येपा ते तथोक्ता प्रथममध्यमान्तास्तान्येव नियतानि स्थानानि विशिष्टाः सन्निवेशास्तै. शोभते भ्राजते यत्तथोक्तम्। म््रत्राद्ाटय सम्बन्विशच्दा पदा- दिभिर्विशेपणीयाः। स तु प्रकार: प्रोक्तलक्षणामम्पदुपेतोऽपि भवन 'डह नाति-

जो सन्निवेश करना है वही 'यमक' [अलद्धार] कहलाता है। इस प्रकार [यमक में] एक रूप के दो समुदायों की रचना होने पर भी [उन दोनो समुदायो फो] श्रन्यायं भिन्न धर्थ वाला होना चाहिए। इसीलिए साहित्य दर्पसकार ने 'यमक' का लक्षण इस प्रकार किया है- सत्यर्थे पृथगर्थाया स्वरव्यञ्जनसहते। क्रमेए तनैवावृत्तियमक विनिगद्यते।। अर्थात् स्वर-व्यञ्जन-समुदाय की उसी क्रम से आ्वृत्ति को 'यमक' कहते हैं। इस आवृत्ति में यदि दोनो भाग सार्थक हे तो उन दोनों का भिन्नार्थंवत्व आवद्यक है। और यदि उनमें से कोई एक भाग अथवा दोनो धनथंक है तो कोई वात नही हे। और फैसा 'प्रसादी' प्रसादगुण युक्त तुरन्त [ वाक्यार्थ का ] बोधक, धर्यात् विना वलश के समझ में आ जाने वाला। 'श्रुतिपेशलम्' पद से इसी को विशेषित किया है। श्रुति का अथं श्रोत्रेन्द्रिय है, उसमें पेशल अर्यात् सुन्दर लगने वाले अ्र्प्र्यात् कोमल [अकठोर] शब्दों से विरचित। और कैसा, श्र्प्रचिन्ययकत। श्रचित्य पर्थात् वस्तु के स्वभाव का उत्कर्ष उससे युक्त या समन्वित। अर्ात् जहाँ 'यमक' रचना के व्यसन से भी शचित्य की न्यूनता न हुई हो। उसी फो दूसरे विशेषो से विशिष्ट करते हैं। 'जो आदि [मध्य या अ्र्न्त] आदि नियत स्थानों पर शोभा देने वाला हो'। आवि जिनके प्रारम्भ में है वह उस प्रकार के 'आद्यादि' अर्याति् प्रथम मध्यम और अन्त भाग। वही नियत स्थान और [यमक के] विशेष [स्थान पर] सन्निवेश हुए। उनसे शोभित होने वाले। यहां 'आदि' प्रभुति [शन्द] सम्बन्धवोधक शब्द है। उनको पदावि [शन्दों] से विशिष्ट समझना चाहिए [अर्थात् पद के या पाद के आदि, मध्य अथवा अ्रन्त में यमक का प्रयोग किया जाता है]। वह [यमक रूप वर्श्विन्यास-वकता का] प्रकार पूर्वोक्त अर्थसम्पत्ति [चमत्कारकारित्व] से युक्त

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कारिका ७] द्वितीयोन्मेष: [१६१

प्रतन्यते ग्रन्थे Sस्मिन्नाति विस्तार्यते। कुतः 'शोभान्तराभावान्'। स्थाननियम- व्यतिरिक्तस्यान्यस्य शोभान्तरस्य छायान्तरस्यासम्भवादित्यर्थ। त्र््रस्य च वर्स- विन्या सवैचित्र्यव्यतिरेकेरणान्यत् किव्िदपि जीवितान्तरं न परिद्ृश्यते। तेना- नन्तरोक्तालंकृतिप्रकारतैव युक्ता। उदाहरणान्यत्र शिशुपाज्बधे चतुर्थे सर्गे समर्पकाणि कानिचिदेव यमकानि, रघुवशे वा वसन्तवर्णाने ॥।।।। एवं पदावयवाना वर्णानां विन्यासवक्रभावे विचारिते वर्णासमुदाया- त्मकस्य पदस्य च वक्रभावविचारः प्राप्तावसरः । तन्र पदपूर्वार्द्धस्य तावद् वक्रताप्रकारा कियन्तः सम्भवन्तीति प्रक्रमते-

होने पर भी यहाँ इस ग्रन्थ में अधिक विस्तार से वर्णित नहीं किया गया हैं। [उससे] अन्य किसी विशेष शोभा के न होने से। स्थान नियम के अतिरिक्त [अनुप्रास से भिन्न] अन्य किसी शोभा अर्थात् सौन्दर्य विशेष के न होने से । [अरर्थात] इस [यमक] का वर्णविन्यास वंचित्र्य के अ्रतिरिक्त और कोई दूसरा तत्त्व दिखलाई नहीं देता है। इसलिए [इस थमक को भी] अरभी कहे हुए [ वर्सविन्यासवकता अ्रथवा अरनुप्रास] अलद्धार का भेद ही मानना उचित है। [अलग अलद्धार मानने "को आ्वश्यकता नहीं है]। इसके उदाहरण शिशुपालवध के चतुर्थ सर्ग में [प्रयुधत बहुत से यमको में से चुने हुए अर्थ के तुरन्त] समर्पक कुछ ही यमक है [शेष कठिन यमक, वस्तुत यमक नहीं यमकाभास हे जिन्हें माघ ने यमक के रूप में इस चतुर्थ सर्ग में प्रयुक्त किया है]। अथवा रघुदश [के नवम सर्ग में] में वसन्त वर्णन में [प्रयुक्त सभी यमक समर्षक होने से घमक में वास्तविक उदाहरख] है ॥६,७॥। २ पद पूर्वाद्ध वक्रता [८ भेद]- इस प्रकार पदों के अवयवभूत वर्ों की विन्यासवत्रता का विचार हो चुकने के बाद वर्ण समुदायात्मक पद की 'वघ्ता' के विचार का शवसर प्राप्त है। उसमें पद के पूर्वाद्धं [अर्थात् प्रकृति रप] की वक्रता के कितने प्रकार हो सकते है इसका वर्णन प्रारम्भ करते हं- सुबन्त अथवा तिङन्त रूप पद के पूर्वार्द्ध अर्थात् सुवन्त पद के पूर्वार्द्ध प्राति- उदिक तथा तिडन्त पद के पूर्वाद्ध रूप वातु की वमता 'पदपूर्वार्द्ध वक्रता' के अन्तर्गत होती है। प्रथम उन्मेप की १६वी कारिका में पद-पूर्वाद्ध वक्रता के निम्नलिखित प्रकार दिखलाए थे- १. रूढि वैचित्र्यवक्रता। २ पर्यायवक्रता।

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१९२ ] वक्रोपितिजीवितम् [फारिका ८-६

यत्र रूढेरसम्भाव्यधर्माध्यारोपगर्भता। सद्वर्मातिशयारोपगर्भत्वं वा प्रतीयते ॥=।। लोकोत्तरतिरस्कार श्लाव्योत्कर्पाभिधित्सया। वाच्यस्य सोच्यते कापि रूढित्रैंचित्र्यवक्रता ।।६।।

यत्र रूढ़ेरसम्भाव्यधर्माध्यारोपगर्भता प्रतीयते। शब्दस्य नियतवृत्तिता नाम कश्चिद् धर्मो रूढिरुच्यते। रोहण रुढिरिति कृत्वा। सा च द्विप्रकारा सम्भवति, नियतसामान्यवृत्तिता, नियतविशेपवृत्तिता। तेन रुढिशव्देनात्र रूढिप्रधान शव्दोऽभिधीयते, वर्मधर्मिशोरभेदोपचारदर्शनात। यत्र यस्मिन्

३ उपचारवक्रता। ४ विशेषसावक्रता। ५. सवृतिवकता। ६ वृत्तिरवचित्र्यवक्रता। ७ लिङ्भ वक््ता। इन्ही भेदो का आगे विस्तार पूर्वक विवेचन प्रारम्भ करते है। क-रूढिवं चित्र्यवक्रता-

जहाँ लोकोत्तर तिरस्कार अ्र्प्रथवा [लोकोत्तर] प्रशसा के कथन फरने के अभिप्राय से वाच्य अर्थ की, रूढि [शन्द] से अ्सम्भव अ्रर्थ के अ्रध्यारोप से युक्त, प्रथवा [किसी] विद्यमान धर्म के अतिशय के आरोप से युक्त [गर्भित] रूप में प्रतीति होती है वह कोई [ अरपूर्व सौन्दर्याधायक ] 'रुढिवचित्रयवक्र्ता' [नामक पद पूर्वार्द्ध-वत्र्ता का अ्ररवान्तर भेव] कही जाती है ।७, ८।। जहाँ रूढि [शब्द] से अररसम्भाव्य [रूढ़ि से जिसकी प्रतीति सम्भव नहीं ऐसे] धर्म फा [वाच्यार्थ में] अध्यारोप गभित रूप में प्रतीत होता है [उसे रूढ़िवचित्र्य- वफ्रता कहते है]। शब्द के नियत [अ्रर्थ] बोघकत्व रूप धर्मविशेष को रूढ़ि कहते है। [अ्थ विशेष पर] रोहस करना [चढ जाना, नियत रूप से एक ही अरथं विशेष का बोधन करना] रूढ़ि [शब्द का यौगिक अर्थ] है ऐसी [रूढि शब्द की] व्युत्पति करके [रूढि अर्थात् किसी नियत अर्थ-विशेष को बोध कराने वाला शन्द रूढि कहा है]। और वह [रूढि] दो प्रकार की हो सकती है। एक नियत सामान्य बोघकत्व और [दूसरी] नियतविशेष बोधकत्व। इसलिए [कारिका में प्रयुक्त] रूढि [इस]

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कारिका &] द्वितीयोन्मेष [ १६३

िपये, रूढिशब्दस्य अ्रसम्भाव्यः सम्भावयितुमशक्यो यो धर्मः कश्चित् परि- स्पन्दस्तस्याध्यारोपः समर्पएं गर्भोडभिप्रायो यस्य स तथोक्तस्तस्य भावस्ततता सा प्रतीयते प्रतिपद्यते। यत्रेति सम्बन्धः । 'सड्धर्मातिशयारोपगर्भत्वं वा' । संश्चासौ धर्मश्च सद्धर्मः विद्यमानः पदार्थस्य परिस्पन्द्, तस्मिन् य्स्य कस्यचिदपूर्वस्यातिशयस्याद्भुत्तरूपस्य महिम्न आरोपः समर्पसं गर्भोडभिप्रायो यस्य स तथोक्तस्वस्य भावस्तत्वम्। तच्च वा यस्मिन प्रतीयते। केन हेतुना, 'लोकोत्तरतिरस्कश्लाव्योत्कर्पाभिधित्सया'। लोकोत्तर: संर्वातिशायी यस्तिरस्कारः खलीकररं, इ्लाध्यश्च स्पृदृणीयो य उत्कर्पः सातिशयत्वं तयोरभिधिंत्सा अरभिधातुमिच्छ्ा वत्तुकामता तया। शब्द से रूढि प्रधान शन्द का ग्रहर किया जाता है। धर्म और धर्मी का उपचारतः श्रभेद होने से। [रूढ़ि शब्द यद्यपि नियत सामान्यवृत्तिता अ्रथवा नियत विशेष वृत्तिता रूप घर्म विशेष का बोधक है। परन्तु धर्म और धर्मो का उपचार से अभेद मानकर रूढि पद यहाँ रूढ़ि प्रधान शब्द का बोधक है] जहाँ, जिस विषय [उवाहरख, प्रयोग] में रूढि शब्द का जो श्सम्भव श्रर्थात् रूढि शब्द से जिस धर्म या अर्थ के बोध की कल्पना करना सम्भव न हो ऐसा जो धर्म या [किसी पदार्य का] कोई अपूर्व स्वभाव विशेष उसका अध्यारोप श्रर्थात् [उस रूढि शब्द से उस श्रसम्भाव्य अपूर्व अ्रर्थ का ] समर्पण [बोधन ] जिसका गभितार्थ अर्ात् अभिप्राय हो वह उस प्रकार का [असम्भाव्यघर्माध्यारोपगर्भ ] हुआ। उसका भाव [पतम्भाव्यधर्माव्यारोप- गर्भता हुई ] वह जहाँ प्रतीत होती है, यह सम्बन्ध हुग्रा। [अर्थात् जहाँ लोकोत्तर तिरस्कार या निन्दा के बोधन के लिए रूढि शब्द में किसी असम्भाव्य (श्रपूर्व) धर्म का अध्यारोप करके उसकी निन्दा की जावे वह 'पद पूर्वार्द्धवत्रता' का 'रूठिवचित्रय- वकता' नामक प्रथम भेद हुआ]। अ्रथवा [ जहां ] 'सद्धर्मातिशयाध्यारोपगर्भता' [प्रतीत होती है वह भी रूढ़ि- वंचित्र्य-वक्रना का दूसग भेद हुआ] विद्यमान जो धर्म वह 'सहर्म' अर्ात् पदार्थ का विद्यमान स्वभाव। उत्तमें जिस किसी अपूर्व प्र्प्रतिशय प्ररथात् श्र्द्भुत रूप की महिमा का आरोप अरथात् बोधन करना जिसफा अ्भिप्राय है वह उस प्रकार का अर्ात् 'सद्वर्मा- तिशयाध्यारोपगर्म' हुग्रा। उसका भाव सहर्भातिशयाध्यारोपगर्भता हुआ। श्रीर वह जिसमें प्रतीत होता है [वह भी 'रूढि वचित्र्यवत्र 7' का उदाहरण होता है]। [ यह प्रविद्यमान असम्भाव्य धर्म का अध्यारोप अथवा सहर्म विद्यमान धर्म के पतिशय का अध्यारोप] किस फारस से [बतो किया जाता है यह कहते है]

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१e४ ] [फारि ६

कस्य, 'वाच्यस्य'। रुढिशब्दस्य वान्यो योडभिधेयोडर्यम्तग्य।'सोयते' कुथ्यते। काप्यलौकिकी 'रुदिचैचित्यवत्रता'। रुढिगब्वस्वव विधेन चैचिहये। वचित्र- भावेन वक्रता चक्रभाव:। वदिदमत्र तात्पर्यम्। यत सामान्यमात्रसम्पर्शिना शवदानामनुमानव- न्नियतविशेपालिद्गन यद्यापि स्वभावादेव न किक्िपि सम्भवति, तथाग्यनया युक्त्या कविविवच्षितनियतचिशेपनिष्ठता नीयमाना कामप चमककारकारिता प्रतिपद्यन्ते।

लोकोत्तर तिरसफार [निन्वा] अ्थवा श्लाध्य [प्रशसनीय] उत्तर्ष के बाहुत्य के षथन करने के अभिप्राय से। लोफोत्तर शर्थात् सबको प्रतिपमण का जाने वाला जो तिरस्कार अपमान और इलाध्य प्रशसनीय जो उत्कर्प वडप्पन उन दोनों ी भ्रभि- घित्सा अर्थात् कहने की इच्छा। उससे। किसकी-'वाच्य [श्रबं] की'। रठि शन्द का वाच्य अरथात् अ्रभिधेय जो अर्थ उसकी। वह फोई अ्रपूर्व घर्लोफिक 'रठिच चित्र्यवकता' फही जाती है। रूढ़ि शन्द की इस प्रकार की [श्रसम्भाव्य धर्माध्यारोपगभंना श्रथवा सद्र्मातिशयाध्यारोपगर्भता रूप], वैचित्र्य अर्थात् विचित्र भाव से वघता अ्र्थात् रमखीयता [रूदिवंचित्रयवकता कहलाती] है। [यहां इसका यह तात्पर्य हुआा कि सामान्यमात्र बोधक शब्दो का सामान्यमात्रो पसहारे कृतोपक्षय मनुमान न विशेष प्रतियत्ति समर्थम्। सामान्य मान के बोधन में अ्नुमान के समाप्त हो जाने से वह विशेष का बोघक नही हो सकता है इस नियम के अनुसार ] अ्रनुमान के समान नियत विशेष का बोधक व यद्यपि स्वभाव से ही तनिक भी सिद्ध नहीं होता है फिर भी हस[ शरसम्भाव्यघर्म के अ्रध्यारोप अ्रथवा विद्यमान धर्म के श्रतिशय के अध्यारोप रूप] युक्ति से कवि के विवक्षित नियत विशेष के बोधक होकर [ वे शब्द ] कुछ पपूर्व चमत्कारकारी हो जाते है। योग दर्शन में १, सूत के व्यास भाष्य में इसी बात को स्वष्ट रूप से यो लिखा है कि-'सामान्यमात्रोपसहारे कृतोपक्षयमनुमान न विशेष प्रतिपत्तिसमर्थमिति तस्य सज्ञादिविशेष प्रतिपात्तरागमत पर्यन्वेष्या'। ईश्वर की सर्वज्ञता की सिद्धि के प्रसङ्ग में यह पक्ति आ्ई है। जो सातिशय होता है, अर्थात् जिसमें छोटे-बडे का व्यवहार होता है उसकी कही चरमसीमा काष्ठा-प्राप्ति भवश्य होती है। जैसे परिमाण छोटा-बडा भ्नेक प्रकार का होने से सातिशय माना जाता है। उसकी

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कारिका ६ ] द्वितीयोन्मेष. [ १६५

छोटेपन में परमाणृ परिमाण में तथा वडेपन में आकाशादि के परम महत् परिमाण मे काष्ठा-प्राप्ति होती है। इसी प्रकार ज्ञान भी सातिशय पदार्थ है इसलिए उस ज्ञान की भी कही काष्ठा-प्राप्ति चरम सीमा होनी चाहिए। जहाँ ज्ञान की चरम उत्कर्ष की सीमा है, जिससे बढकर और ज्ञान नहीं हो सकता है, वही सर्वज्ञ है उसी का नाम ईश्वर है। इस प्रकार ईश्वर की सर्वज्ञता की सिद्धि की गई है। इसी प्रसङ्ग में ऊपर उद्धत की हुई पक्ति लिखी गई है। उसका भाव यह है कि अनुमान तो सामान्य रूप से ज्ञान का कही काष्ठा-प्राप्ति होनी चाहिए यही सिद्ध करके समाप्त हो जाता है। ईश्वर में ही वह काष्ठा-प्राप्ति होती है इस विशेष का बोध नही करा सकता है। उस विशेष के वोध के लिए आगम का अवलम्वन करना होगा। इसी प्रकार प्रकृत में सामान्य मात्र वोधक शन्दो से विशेषार्थ के बोधन में व्यञ्जना आदि का आश्रय लेना होगा यह तात्पर्य है। यह सामान्य या विशेष की वोघकता का प्रश्न योगदर्शन में उठाया गया है। 'सास्य' तथा 'योग' दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द ये तीन ही प्रमाण माने गए है। योग दर्शन के 'व्यासभाष्य' में इन प्रमाणो के लक्षण करते हुए प्रत्यक्ष को 'विशेपावधारणाप्रधान' तथा अनुमान शब्द को 'सामान्यावधारण प्रधान' कहा है। प्रत्येक पदार्थ के दो अश या रूप होते हैं। एक 'सामान्य' रूप भ्रौर दूसरा 'विशेष' रूप। जैसे यह पुस्तक है उसका पुस्तकत्व एक सामान्य रूप है। जैसी ससार की और बहुत-सी पुस्तकें होती हे उसी प्रकार की यह भी एक पुस्तक है यह उसका 'सामान्य' रूप हुआ। परन्तु दूसरा उस पुस्तक का व्यक्तिगत विशेष रूप भी है। जितनी लम्बी- चौडी जिस आकार-प्रकार की यह पुस्तक है यह उसका 'विशेष' रूप है। जव हम पुस्तक को प्रत्यक्ष देखते है तब उसके विशेष रूप को ग्रहण करते है सामान्य रूप को नही। और जब हम अनुमान से अथवा किसी के कथन से शब्द प्रमाण द्वारा पुस्तक का ज्ञान प्राप्त करते हैं तब वह ज्ञान उसके सामान्य रूप का ही होता है विशेष रूप का नहीं। इसीलिए योगदर्शन में प्रत्यक्ष प्रमाण को 'सामान्यविशेषात्मनो- जर्यस्य विशेषावघारणप्रधाना वृत्ति प्रत्यक्षम्' अर्थात् 'विशेषावधारणप्रधान' कहा? और अनुमान आदि को 'सामान्यावधारणप्रधाना वृत्तिरनुमानम्' कहा है। उसी के आधार पर यहाँ ग्रन्थकार ने प्रनुमान को 'सामान्यमात्र' का वोधक कहा है। सामान्य- मात्र को बोधक होने के कारण अनुमान से सामान्य वन्हि आदि की ही मिद्ि होती हैं विशेष वन्हि की नही। इसनिए जिस प्रकार सामान्यमात्र सस्पर्शी अनुमान से विशेष वन्हि का बोध नहीं होता है इसी प्रकार सामान्यमात्रसस्पर्शी शब्दो से अभिवा शक्ति के द्वारा विशेष अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती है। उसके लिए व्यञजना आ्रादि विशेष उपाय का अवलम्वन करना होगा।

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१६६ ] वश्रोपितिजीवितम् [फारिफा ६

यथा- ताला जात्त्रींति गुणा जाला दे सहित्यणहि घेप्पति। रडकिरणायुग्गहिप्राट हाति कमलाट कमलाइ॥ [तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहदयेर्ग्ृसते। रविकिर् णानुगहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ।इतिर्सं रकृनम्] प्रतीयते इति क्रियापनवैचित््यस्यायमभिप्नायो यवेवविधे विपये शच्दाना वाचकत्वेन न व्यापार, अ्पितु वस्त्वन्तरवत्मनीनिकारित्वमात्रखेति युक्तियुक्तमप्यंतादह नातिप्रतन्यंत। यम्माद म्वनिकारेण व्यतयव्य्जक- भावोऽत्र सुतरा समयिंतस्तत किं पानरुक्तयेन। सा च रूढिवचित्र्यवक्रता मुस्यतया द्विप्रकाश सम्भवति। यत्र रूढिवाच्योऽर्थ स्वयमेव आरत्मन्युत्कर्प निकप वा समारोपयितुकाम कविनो- पनिवध्यते, तस्यान्यो वा कश्चिद् वक्तेति। जैसे- जव सहृदयो के द्वारा [गुणो को ] ग्रहस किया जाता है तब [ही ] वे 'गुए' होते है। जसे सूर्य की फिरणों से अ्रनुगृहीत होने पर [ही] कमल [सौन्दर्यादि विशेष गुरो से युक्त] 'कमल' होते है ॥।२६॥। [कारिका ८ में प्रयुक्त] 'प्रतीयते' इस क्रियापद के वैचित्र्य का यह अ्प्रभिप्राय है फि इस प्रकार के उदाहररो नें शब्दो का वाचक्त्व रूप [अ्रभिधा] व्यापार नहीं होता है अ्पितु श्र्न्य [प्रतीयमान] वस्तु के प्रतीतिकारित्व [व्यञ्जकत्व] रूप से ही [शब्दों का व्यापार होता है]। इसलिए इस [व्यङ्गघव्यञ्जक भाव] के युक्तियुक्त होने पर भी यहाँ उसका विशेष विवेचन नहीं किया जा रहा है, क्योकि ध्वनिकार [ध्वन्यालोफ फे रचयिता श्री आनन्दवर्धनाचार्य] ने यहाँ व्यङ्गचव्यञ्जकभाव का [बहुत विस्तारपूर्वक] अत्यन्त समर्थन किया है। उसको फिर दुबारा [यहाँ] कहने से क्या लाभ ? अर्थात् ध्वनिकार के 'अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य' तथा 'अर्थान्तरसफमितवाच्य' रूप ध्वनि-भेदो को कुन्तक ने 'रुढिवेचित्रयवक्रता' के 'असम्भाव्यधर्मध्यारोपगभंता' तथा 'सद्धर्मातिशयाध्यारोपगर्भता' अ््न्तर्गत किया जा सकता है। वह 'रूढिवंचित्र्यवमता' मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं। [पहिली] जहाँ कवि, रूढि [शब्द] से दाच्य अर्थ [राम आ्र.द रूप वक्ता] को स्वय ही अपने में उत्कर्ष पथवा अपकर्ष का समारोप करते हुए वर्णन करता है। अथवा [दूसरा वह भेव जहाँ कि उस [उत्कर्ष या अ्पकर्ष] का वक्ता कोई और हो।

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कारिका ६] द्वितीयोन्मेष. [ १६७

यथा- --: स्निग्घश्यामलकान्तिलिप्तवियतो वेल्लद्वलाका घनाः वाताः शीकरिण पयोदसुहृदामानन्दकेकाः कलाः। 7 कामं सन्तु दृढ कठोरहृदयो रामोडस्म सवै सहे वैदेही तु कथं भविष्पति हहा हा देवि धीरा भव ।।२७।। अत्र 'राम' शव्देन हढ 'कठारहृदय.' 'सर्व सहे' इति यदुभाभ्यां प्रतिपाद्यितुं न पार्यते, तदेवविध-विधिवोदीपनविभावविभवसहनसाम्य-

वैचकएयलक्षणा सज्ञापदनिवन्धन किमप्यसम्भाव्यमसाधारण क्रौय प्रतीयते।

जसे- [स्वय वक्ता के द्वारा अपने उत्कर्ष या अ्रपकर्ष को सूचित करते हुए रूप में कवि द्वारा उपनिबद्ध वक्ता का वर्णन करने वाला निम्न श्लोक 'सद्धर्मातिशयाध्यारोप- गर्भता' रूप 'रूढ़िवचित्र्यवत्रता' अथवा आ्ररानन्दवर्घन के मत में 'अपर्ान्तरसक्रामितवाच्य ध्वनि' का उदाहरण कहा जा सकता है ]- स्निग्घ एवं श्याम कान्ति से आ्रकाश को व्याप्त करने वाले, और बलाका अर्थात् वकपक्ति जिनके पास विहार कर रही है, ऐमे तघन मेघ [भले ही उमड़े] शीकर छोटे-छोटे जल-फरगो से युक्त [ शीतल मन्द ] समीर [ भले ही वहे ] औ्र मेधों के मित्र मयूरो की आनन्द-भरी कर्फे भी चाहे जितनों [श्रवरगोचर] हो, मं तो अत्यन्त कठोर हृदय 'राम' हूँ तब कुछ सह लूँगा। परन्तु [श्ररति सुकुमारी, फोमलहृदया, वियोगिनी] सीता की क्या दशा होगी [इसकी कल्पना करने से भी हृदय व्याकुल हो जाता है।] हा देवि' धंर्य रखना ।।२७।। इसमे 'राम' शब्द [अर्थान्तरसक्रमित वाच्य ध्वनि का उदाहरण है। उस] से, 'दृढ कठोरहृदय' मे श्त्यन्त कठोर हृदय हूँ और 'सर्व सहे' सब कुछ सहन कर सकता हूँ इन दोनो [वाक्याशो]से [भी] जो [ विशेष अथ ] प्रतिपादन नहीं की जा सकती है ऐसी, नाना प्रकार के उद्दीपन विभाव के वैभव को सहन करने फी साम्य्य को [ देने वाली ] कारणभूत, और जनक-नन्दिनी तीता के डु.सह वियोग-व्यया से [कठिन]दु खमय समय में भी निर्लज्ज के समान प्राों की रक्षा में निपुणता रूप [राम के लिए] कुछ प्सम्भव-सी असाधारण फूरता [शम इस] सज्ञापव के [प्रयोग के]

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१६८ ] वक्रोपितजीवितम् [फारिका ६

'वैदेही' इत्यनन जलधरसमयसुन्दरपदार्थमन्दशेनासहत्त्वसमर्पक महजमौकुमाये- सुलभ किमपि कातरत्वं तस्या समर्र्यते। तदेव च पूर्वम्माद्विशेपा- भिधायिन 'तु' शव्स्य जीवितम् ।

तत प्रहस्याह पुनः पुरन्दर व्यपेतभीर्भूमिपुरन्दरात्मज. गृहाए शस्त्र यदि सर्ग एप ते न खल्वनिजित्य रघु कृती भवान् ॥।२८।।

फारण [ यहां ] प्रतीत हो रही है। 'वंदेही' इस [ पव ] से वर्षाकास के [ मे बलाका, मयूर आरवि] सुन्दर पदार्थो के देखने की प्समर्यता का सूनक, सहज सौकुमाय के कारण स्वाभाविक उस सोता का कुछ प्रपूर्व कातरत्व श्रभिव्ययत होता है। श्रौर वह [सीता का अ्रसाधारण सौकुमार्य सुलभ कातरत्व ] ही पहिले फहे हुए [ चैवेही पव के जनक-सुतारूप साधारण अर्थ] से भिन्न [सौकुमार्यातिशय रूप] विशेषता को कथन करने वाले [श्लोक में प्रयुयत हुए] 'तु' शन्द की 'जान' है। इस उदाहरण में 'रामोऽस्मि' से राम गत जो असाधारण कौर्य आदि सूनित होता है वह वक्ता द्वारा स्वय अपने मे आशेपित किया गया है। और 'वंदेही' पद से जो सहज सौकुमार्यसुलभ कातरत्व अ्रभिव्यक्त होना है उसका वक्ता जानकी से भिन्न रामचन्द्र है। इसलिए इसी एक श्लोक में दोनो के उदाहरण मिल जाते हैं। विद्यमान वाच्य धर्म के शतिशय के अध्यारोपगभंता [का उदाहरख] जैसे- यह श्लोक रघुवश के तृतीय सर्ग का ५१्वा श्लोक हं। दिलीप के द्वारा छोडे गए अश्वमेघ यज्ञ के अश्व को जब इन्द्र ने अपहरणा कर लिया उस समय इन्द्र के साथ हुए रघु के सवाद से यह श्लोक लिया गया है। रघु, इन्द्र से कह रहे है- तब [ इन्द्र की बात सुनने के बाद ] पृथ्वी के इन्द्र [अर्थात् राजा दिलीप] के पुत्र [रघु] ने निर्भयतापूर्वक हँसकर इन्द्र से कहा कि [यदि आप सीधी तरह से घोण नहीं छोडना चाहते है] यदि तुम्हारी यही इच्छा है कि [रघु के बल की परीक्षा किए बिना घोडा नहीं देंगे] तो फिर [अपना] शस्त्र उठाओ, कयोकि [मुझ] रघु को जीते बिना [घोडे के अपहरण रूप कार्य में] आाप [कृतकृत्य या] सफल नहीं हो सकते है। [आापका मनोरथ पूर्ण नहीं हो सकता है] ॥२८॥

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कारिका e] द्वितीयोन्मेषः

'रघु' शच्देनात्र सर्वत्राप्रतिइतप्रभावस्यापि सुरपतेस्तथाविधाष्यवसाय- व्याघात सामर्थ्यनिबन्धन. कोडपि स्वपौरुपातिशयः प्रतीयते । 'प्रहस्य' इत्यने- -शनैतदेवोपळ'हितम्। अरन्यो वक्ता यत्र तत्रोदाहरएं यथा- आज्ञा शकशिखामणिपरसायिनी शास्त्राणि चक्षनव भक्तिर्भृतपतौ पिनाकिनि पदं लंकेति दिव्या पुरी।

यहाँ 'रघु' शब्ब से, सवत्र अप्रतिहत प्रभाव वाले देवराज इन्द्र के भी [पश्वापहरण रूप] उस प्रकार के निश्चय का व्याघात करने की सामर्थ्य [ सूचन ] के कारण कुछ श्रपूर्व पौरुष का प्र्प्रतिशय प्रतीत होता है। [इसलिए यहाँ 'रघु' शब्द में 'रूदिवँचिभ्र्य- वक्ता' है और ध्वनि सिद्धान्त के अनुसार इसमें 'अर्थान्तर सक्रमित वाच्य ध्वनि है।] 'प्रहस्य' इस पद से उसी [लोकोत्तर मौरुषातिशय] की और भी पुष्टि [या वृद्धि] हो जाती है। इन दोनो उदाहरणो में कवि ने वक्ता को स्वय अपने में उत्कर्ष का श्रध्यारोप करते हुए दिखलाया है। पहिल श्लोक में रामचन्द्र में वस्तुत अ्विद्यमान 'कौर्य' का अध्यारोप किया गया है इसलिए वह 'असम्भाव्यधर्माध्यारोपगभता' का उदाहरण है। और दूसरे उदाह'ण में 'रघु' में विद्यमान लोकोत्तर पौरुष के अतिशय का वोधन किया गमा है इसलिए वह 'सद्धर्मातिशमारोपगभता' का उदाहरण है। इस 'रुढि- वै चित्र्यवकता' का दूसरा भेद वह वतलाया था जहाँ उस 'असम्भाव्य धर्म' अथवा 'सद्धमें' के पतिशय का अध्यारोप वक्ता स्वय अपने में न करे अपितु उसका आरोप अन्य कोई करे। इसका उदाहरण थागे देते है। जहाँ शन्य धक्ता [धर्म का अ्रध्यारोप करने वाला] है उसका उदाहरण जंसे- यह श्लोक राजशेखर कृत 'वालरामायण' नाटक के पञ्वम भ्रङ्ट का ३६वा श्लोक है। जनक और शतानन्द के सवाद के पवसर पर शतानन्द जनक से कह रहे है कि कभी-कभी एक ही दोप से सैकडो गुए भी नप्ट हो जाते है। अगर रावए 'रावण' न होता तो सीता के लिए उससे अच्छा और कोई चर नहीं हो सकता था। क्योकि- [इस रावण की] आाज्ञा इन्द्र के लिए भी शिरोधायं है [इन्द्र भी इसको आ्राज्ञा के उल्लघन करने का साहस नहीं कर सकता है], शास्त्र इसके नवीन नेत्र हैं [अर्थात् समस्त शास्त्रों का पारङ्त विद्वान् है], भूतनाथ भगवान् शिव का भक्त हूँ, दिव्य लड्डापुरी उसका निवास-स्थान है, ब्रह्मा जी के [उच्च] बश में उत्पन्न हुआ

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200] वप्रेपित जीचितम् [कारिका 2

मम्भूतिर्द्रहिणानगे च तदहों नेहग्वरे लग्यते स्याच्चेदेप न गवणः व नु पुन' सर्वत्र सर्वे गुणाः ।।२६।।' रावण' शब्देनात्र सकललोकप्रमिद्वदशाननदु्घिलासव्यनिरिक्तम- भिजन विवेकमदाचार प्रभावसम्भो गसुखसमृद्विलन्तखाया समग्तवरगुस-

है[ इस प्रकार वह सवंगुण सम्पन्न है इसके समान सर्वगर सम्पन्न दूसरा वर नहीं मिल सकता है]। यदि यह [ नाम औौर कर्म से बदनाम ] 'रावण' न हो तो इसके समान [सर्वगण सम्पन्न] दूसरा वर नहीं मिल सकता है। श्रथवा सब में सब गए कहाँ मिलते है ॥।२६॥ यहां 'राव' शब्ब से समस्त लोको मे प्रसिद्ध दशानन के दुर्विलास के प्रतिरियत कुल, विवेक, [विद्या] सदाचार, प्रभाव, सम्भोग-सुस समृद्धिर्प विलक्षस वरोचित समस्त गुएसमूह की सम्पत्ति के भी तिरस्फार की कारणभूत [ उसफी उपादेयता का व्याघात अ्थवा ] अ्रनुपादेयता की निमित्तभूत कोई [ लोकोत्तर ] घ्रूटि [न्यूनता रावण में] प्रतीत होती है। [जिसके कारण रावण मे पाए जाने वाले वरोचित समस्त गुण भी व्यर्थ हो जाते हे]। यहाँ 'रावण' पद 'अर्थान्तरसक्रमित वाच्य ध्वनि' का उदाहरण है। उसमें जिस त्रुटि या अपघात का अतिशय प्रतीत होता है उसका प्रतिपादन अ्रथवा अध्यारोप स्वय रावण अपने में नहीं कर रहा है। अपितु उसका वक्ता रावण से भिन्न दूसरा व्यक्ति शतानन्द है। इसलिए यह वक्ता के भेद का उदाहरण है। इस [अरन्य वक्ता द्वारा] प्रतिपादित विद्यमान घर्म के श्रतिशय की अ्रध्यारोप- गर्भता [सद्धर्मातिशयाध्यारोपगर्भता का उदाहरण] जैसे- यह श्लोक पहिले १,४३ पर भी उद्धृत हो चुका है। काव्यप्रकाश के टीकाकारो के अनुसार राघवानन्द नाटक मे जो इस समय प्राप्त नही होता है यह विभीषण की अथवा कुम्भकर्ण की रावण के प्रति उवित है। इस श्लोक का वक्ता रामचन्द्र में विद्यमान धर्म के अतिशय का अध्यारोप करते हुए रावण से कह रहा है।

१ वाल रामायण १, ३६, काव्यप्रकाश उदा० स० २७८ । 11

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कारिका &] द्वितीयोत्मेष· [२०१

रामोऽसौ भुवनेपु विक्रमगुएैः प्राप्तः प्रसिद्धिं पराम् ॥३०।।

-शशीर्यातिशय. प्रतीयते। ञत्र 'राम' शव्देन सकलत्रिभुवनातिशायी रावणनुचरविस्मयास्पद

एपा च रुढ़िवैचित्र्यवक्रता प्रतीयमानधर्मवाहुल्याद् वहुप्रकारा भिद्यते। तच्च स्वयमेवोत्प्रेक्तसीयम्। यथा- गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारहश्वा रघोः सकाशादनवाप्य कामम्। गतो वदान्यान्तरमित्ययं मे मा भूत् परीवादनवावतार ।।३१।। 'रघु' शब्देनात्र त्रिभुवनातिशय्यौदार्यातिरेक प्रतीयते। एतस्यां वक्रतायामयमेव परमार्थो यत् सामान्यमान्ननिष्ठतामपाकृत्य कविविवचित- यह 'रामचन्द्र' अपने पराक्रम और गुणो से तीना लोको में अ्त्यन्त प्रसिद्धि को प्राप्त हो रहे है॥३०॥ इस [ श्लोक] में 'राम' शब्द से तीनो त्रिभुवनों को अ्र््रतिक्रमण करने वाला और रावण के अनुचरो के लिए आ्श्चर्यजनक [रामचन्द्र का] शौर्यातिशय प्रकाशित होता है। और यह 'रढिवंचित्रयवक्र्ता' प्रतीयमान धर्मो के वाहुल्य के कारण नाना प्रकार के भेदो को प्राप्त हो जाती है। उसको [सहृदय पाठकों को] स्वय हो समक लेना चाहिए। जैसे- यह श्लोक रघुवश के पञ्चम सर्ग का २४वां श्लोक है। विश्वजित् याग करने के वाद जव रघु अपनी समस्त सम्पत्ति का दान कर देते है और उनके पास मिट्टी के पात्रो के अतिरिवत और कुछ शेप नहीं रह जाता है। 'मृत्पात्रशेपामकरोद्वि- भूतिम्'। उस समय 'वरन्तन्तु' नामक ऋपि के 'कौत्स' नामक शिप्य गुरु से प्राप्त की हुई चौदह विद्याओ के लिए चौदह करोड रुपया, गुरुदक्षिरा देने के लिए रघु के पास माँगने गए हैं। उस यमय 'रघु' तथा 'कौत्स' के संवाद में से यह श्लोक लिया गया है। रघु कह रहे हं- वेदो का पारङ्गत [ एक स्नातक ] गुरुदक्षिणा के लिए याचक होकर रघु के पास से, अपनी इच्छा की पूर्ति न हो सकने के कारण, दूसरे किसी अन्य दाता के पास चला गया इस प्रकार की मेरी अपफीति जो भाज तक कभी नहीं हुई थी न होने पावे।।३१॥ यहां [इस उदाहरण में] 'रघु' शब्ब से सभस्त ससार को अ्र्प्रतिकमण करने वाला उदारता का अतिशय प्रतीत होता है। [इसमें वक्ता रघु स्वयं अपने में

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२०२ ] वकोपितजीवितम् [पारिफा ह

विशेपप्रतिपाठनसामधर्यलन्गा गोभानिराय समुल्लाम्यते। संन्ञाराव्ाना नियतार्थनिष्ठत्वात् सामान्यविशपमावो न पव्चिन सम्भवनीति न वक्तव्यम। यम्मात्तेपाम्यवस्थासहसरमा वा र एवृत्तेव्यम्य नियतदश्ाविशेपा वृत्तिनिष्ठता सत्कविविवनिता सम्भवत्यंय, स्वरश्तुतिन्यायेन लग्शुकन्यायेन चेति ।।६।। विद्यमान शदार्य के अतिशय रूप धर्म का अ्रध्यारोप फर रहा है। इम वतता में यही रहस्य है कि ( वाचक शब्द ] सामान्यमान निष्ठता को छोटफर यवि के विवक्षित विशेष अरथ के प्रतिपादन का सामथ्य रूप शोभातिशय को प्रकाशित करता है। [व्यक्तिवाचक राम, रघु आदि] सज्ञा शब्दो के नियत शर्थ [व्यषित विशेष ] में निश्चित होने से [ उनका]किसी प्रकार का सामान्य विशेष भाव नहीं हो मक्ता है यह नहीं कहना चाहिए। क्योकि उन [व्यक्तिवाचक सज्ञा शब्दो] के भी सहस्त्रो अवस्थाओ्नो में साधारण रहने वाले वाच्य [व्यश्ति] की 'स्वरश्रुति न्याय से अ्रथवा 'लग्नाशुक न्याय' से। कवि-विवक्षित नियत दशा विशेष निष्ठता हो ही सकती हैं। 'स्वरश्रुति न्याय' का प्र्रभिप्राय यह है कि जैमे पञ्चम धवत आरादि सङ्गोत के सात स्वरो में से प्रत्येक स्वर एक विशेष व्यक्तिवाचक सज्ञा के समान एक विशेष स्वर का ही बोधक होता है। परन्तु उस एक स्वर में भी अनेक प्रकार की उतार- चढाव की ध्वनि अथवा श्रुति हो सकती ह। गायक जब चाहता है उस एक ही स्वर की भिन्न-भिन्न प्रकार की श्रुतियो का अ्वलम्बन करता है। इसी प्रकार व्यविति- वाचक राम, रघु आदि सज्ञा शब्द यद्यपि एव व्यक्ति विशेष के ही वाचक होते हैं परन्तु उस व्यक्ति की भी अनेक अवस्थाओ मे स्थिति हो सकती है। इसलिए व्यविति- वाचक शब्द भी विविध अवस्था विशिष्ट व्यक्ति का वाचक होने से सामान्यवाचक शब्द हो सकता है और उसमें भी कवि विवक्षित अवस्था विशेष के अनुसार विशेषार्य- परता बन सकती है ।६।। ३-पर्याय वक्रता [६ भेद] प्रथम उन्मेष की १८-२१ कारिकाओ में छ प्रकार की जिस वकता का प्रति- पादन किया गया है उसमें 'वर्णविन्यासवक्रता' के बाद 'पदपूर्वाद्ववयता' का उल्लेख किया गया है। 'पदपूर्वार्द्ध' से सुवन्त पद के पूर्वाद्व रूप में प्रातिपदिक तथा तिडन्त पद के पूर्वाद्ध रूप में धातु का ग्रहण होता है। व्यक्तिवाचक सज्ञा शेव्दो के लिए 'रूढि' शब्द का तथा जाति, गुए या द्रव्य के वाचक अ्रन्य प्रातिपदिको के लिए 'पर्याय' शन्द का प्रयोग करके प्रातिपदिक वक्रना रूप 'पदपूर्वाद्धवफ्रता' को भी ग्रन्थ- कार ने १-रूठिवेचित्र्यवक्रता तथा २-पर्यायवक्रता नाम से दो भागी में विभक्त कर दिया है। आगे 'पर्यायवत्र्ता' का निरूपण करते हैं।

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कारिका १०-१२ ] द्वितीयोन्मेष [२०३

एव 'पर्यायवक्रतां' विविनक्ति- 'रुढिवक्रतां' विवेच्य क्रमप्राप्तसमन्वर्या

अभिधेयान्तरतमस्तस्यातिशयपोपकः ।

स्त्यं विशेषरोनापि स्वच्छायोत्कर्षपेशलः। असम्भाव्यार्थपात्रत्वगर्भ यश्चाभिधीयते।१ १।।

अलङ्कारोप संस्कारमनोहारिनिवन्धनः । पर्यायस्तेन वैचित्र्यं परा पर्यायवक्रता ॥१२॥ पूर्वोक्त विशेपसाविशिष्ट. काव्यिपये पर्यायस्तेन हेतुना यद्वैचित्रयं विचित्रभावो विच्छित्तिविशेप: सा परा प्रकृष्टा काचिदेव पर्यायवक्रतेत्युच्यते। पर्यायप्रधान. शब्दः पर्वायोऽभिधीयते। तस्य चैतदेव पर्यायप्राधान्यं यत् स

इस प्रकार 'रुढिवमता' का विवेचन करके त्रम से प्राप्त 'पर्यायवऋ्रता' का विवेचन करते हैं। जो वाच्य [अभिघेय या वरसनीय अर्थ] का अन्तरतम [निकटतम भाव का स्पर्श करने वाला] उसके अतिशय का पोषक, सुन्दर शोभान्तर के स्पर्श से उस [वाच्यार्थ] को सुशोभित करने नें समर्थ [पर्याय शब्द है] ॥१० ।। जो स्वय [बिना विशेषण के ही] अ्रथवा विशेषण [ के योग ] से भी अरपपने सौन्दर्यातिशय के फारण मनोहर है और जो असम्भव अर्य के [पात्र] आाषार [पसम्भव सदृश गुणों से युक्त] रूप से भी कहा जाता [वाच्य होता] हैं [ऐसा जो पर्याय शब्द है] ।११। जो अलद्धार से सस्कृत [शोभित ] होने [ अयवा अलद्धार का उपस्कारक शोभाधायक होने ] से मनोहर रचनायुक्त पर्याय [संज्ञा शब्व ] है उस [के प्रयोग] से परमोत्कृष्ट 'पर्यायवक्रना' होती है ॥१२॥ पूर्वोक्त [तीनो कारिकाओो में कहे हुए श्रराठ] विशेषणो से युक्त, काव्य के अनवर जो पर्याय [सज्ञा शब्द] उसके कारण जो वैचित्रय अर्यात् शोभा अर्ात् सौन्दर्यविशेष [होता है] वह परमोत्कृप्ट कुछ पपूर्व ही 'पर्यायवक्रना' फहलाती है। पर्याय-प्रधान शब्द [उपचार से] 'पर्याय' कहलाता है। उस [पर्याय शब्द] का यही

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२०४ ] वकोफितिजोवितम् [फारिका १०

कटाचिद् विवक्षिते वस्तुन वाचकतया प्रवर्तते, कटाचिद्वाचकान्तरमिति। तेन पूर्वोक्तरीत्या बहुप्रकार पर्यायोऽभिहित । तत्कियन्तोऽस्य प्रकारा सन्तीत्याह, 'अरभिधेयान्तरतम'। अ्र्भिधेय वाच्य वस्तु, तस्यान्तरतम प्रत्यासन्नतम । यम्मात पर्यायशब्दत्वे सत्यप्यन्तरमौं त्वात् स यथा विवच्ित वस्तु व्यनक्ति तथा नान्य कश्चिदिति। यथा- नाभियाक्तुमनृत त्वमिप्यसे कस्तपस्विविशखेपु चादर सन्ति भूभृति हि न शरा परे ये पराक्रमवसूनि वज्िए. ॥३२॥ पर्याय-प्रघानत्व है कि वह कभी-कभी विवक्षित वस्तु फे वाचक रूप में प्रयुक्त होता है और कभी [उसके ठीक न बैठने पर] अन्य कोई शन्द [वाचक]। इसलिए पूर्वोकत [ तीनो कारिकाओ में कही हुई नीति] शैली से भनेक प्रकार के पर्यायो का वरंन किया है। तो [पर्यायवकरता के] कितने प्रकार हो सकते है यह फहते हैं। [ पहिला भेद में-पर्याय शब्द ] वाच्य अ्पर्यं का प्रन्तरतम हो। भ्र्प्रभिघेय अर्थात् वाच्य वस्तु उसका अ्र्परन्तरतम अर्थात् अ्ररत्यन्त निकटस्थ हो। अ्रर्ात् [अन्य शब्दों के समान ]पर्याय शन्द होने पर भी अ्रन्तरग अ्रन्तरतम होने से वह विवक्षित वस्तु १ को जसे जिस प्रकार से प्रकट करता है उस प्रकार से अ्रन्य कोई [ शब्द प्रकट ] नहीं करता है। जैसे- यह श्लोक किरातार्जुनीय के तेरहवे सर्ग का ५दवां श्लोक है। वन में तपस्या करते हुए अर्जुन की परीक्षा के लिए किरात वेप धारण कर शिवजी वहाँ गए हैं और एक ही शिकार पर अर्जुन तथा शिव ने साथ-साथ वाण छोडा है। श्रर्जुन के बाण से शिकार वराह के बिद्व होने पर अर्जुन जब उससे अपना वाण निकाल रहे हे उसी समय शिव का दूत अर्जुन के पास जाकर कहता है कि यह तो हमारे सेनापति का वा है। तुम क्यो ले रहे हो इसे हमें दो। अर्जुन के साथ उस दूत के सवाद में से यह श्लोक उद्धृत किया गया है। शिवजी का दूत कहता है कि- हम तुम्हारे ऊपर मिथ्या अभियोग नहीं लगाना चाहते है [कि तुम हमारे सेनापति का बाण ले रहे हो। क्योकि भूठा अभियोग लगाकर यदि हम तुम्हारा बाण ले ही लेंगे तो उससे हमारा क्या लाभ होगा ? तुम] तपस्वियो के वारणो नो हमारा क्या आदर हो सकता है? [तपस्वियों के बा हमारे लिए व्यर्थ हं] हमारे राजा के पास तो औौर [ बहुत-से ] वाण है जो वज्त्रधारी इन्द्र के भी पराक्रम को निधि है। [ अर्थात् इन्द्र का बप्त्र भी उतना काम नहीं देता जितना कि वे बाए जो हमारे; राजा या सेनापति के पास है काम देते हैं] ।।३२॥

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कारिका १० ] द्वितीयोन्मेष

श्त्र महेन्द्रवाचकेष्वसंर्येपु सत्स्वपि पर्यायशव्देपु 'वज्रिए' इति रप्रयुक्तः पर्यायवक्रता पुष्णाति। यस्मात सततसन्निहितवञ्रस्यापि सुरपते्ये 'पराक्रमवसूनि' विक्रमधनानीति सायकानां लोकोत्तरत्वप्रतीति. । 'तपस्वि' शन्दोऽप्यतितरा रमसीय। यस्मात् सुभटसायकानामादरो बहुमान कढा- चिदुमपद्यते, तापसमार्गोपु पुनरकिञ्चित्करेपु क संरम्भ इति। यथा वा- कस्त्वं, ज्ञास्यसि मा, स्मर स्मरसि मा, दिष्ट्या, किमभ्यागत- स्त्ामुन्मादयितु, कथ ननु, वलात्, किन्ते वलं, पश्य तत् ।

यहाँ इन्द्र के वाचक संकड़ों शब्दों के होते हुए भी 'ब्त्रिए' इस, पर्याय शब्द का प्रयोग 'पर्यायवकरता' को पुष्ट करता है। क्योंकि जिसके पास वन्त्र सवा रहता है उस देवराज इन्द्र के भी जो [ परात्रम की निधि ] शक्ति के स्रोत हैं इस [कथन ] से [ उन ] वारो के लोकोत्तरत्व की प्रतीति होती है। 'तपस्वि' शन्द भी [यहा] अत्यन्त सुन्दर [रूप में प्रयुक्त हुआ] है। कयोकि वीरो के वारो का आ्वर तो कवाचित् उपयुक्त हो सकता है किन्तु तपस्वियों के पक्रिञ्चित्कर वारो में कया आदर। [वे तो सैनिक या राजा के लिए बरिल्कुल व्यर्य ही है। यह अर्य 'तपस्वी' पद से अभिव्यक्त होता है। उससे उषित में और भी चमत्कार आ गया हैँ]। अथवा जैसे [अभिधेयान्तरतम पर्यायवक्रता का दूसरा उदाहरण ]- इस श्लोक में कामदेव औौर शिव के सवाद का वसंन करते हुए उसके भस्म किए जाने का उल्लेख बडे सुन्दर ढग से किया गया है। उनका यह सवाद प्रश्नोत्तर रूप में दिखलाया गया है। जिस समय कामदेव शिवजी को अपने वगीभूत करने के लिए आया था उस समय शिवजी कामदेव को देखकर अनादरपूर्वक उससे पूछते है कि- [शिवजी]-अरे तू कौन हैं ? कामदेव इस प्रश्न को सुनकर अपना वडा अपमान-सा अनुभव करता है कि मे सारे समार में प्रसिद्ध हूँ, तसार के सारे प्राणी मेरे वशीभूत हं। श्र यह मझ् से पूछता है कि तू कौन है? जैसे यह जानता ही नही। इस अपमान को अरनुभव करते हुए भी एक वलवान् प्रतिद्वन्दी के समान कामदेव अत्यन्त शान्ति के साथ परन्तु व्यङ्गयमिश्रित उत्तर देता है कि- [कामदेव-तनिक ठहरो अभी] तुम मुझे जान जाओ्रोगे [कि मैं कौन हूँ] कामदेव के इस उत्तर को सुनकर शिवजी को तनिक प्ावेश हो जाता है।

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२०६ ] वकरोचितजीवितम [ फारिका १०

पश्यामीत्यभिघाय पावकम्चा यो लोचनेनैव तं कान्ताकएठनिपवतवाहुमदहत् तस्मे नमः शुलिन ।३३॥ अत्र परमेश्वरे पर्यायसहस्त्रेष्वपि सम्भवत्सु 'शलिन' इति यत्मयुक्तं तन्नायमभिप्रायो यत तरमै भगवते नमस्कारव्यतिरकेण किमन्यदभिधीयते। यत्तथाविधोत्सेकपरित्यक्तविनयवृत्ते. स्मरस्य कुपितेनापि तदभिमतावलोक- ्यतिरेकेण तेन सततसन्निहितशलेनापि चोपसमुचितमायुवग्रहएं नाचरितम।

वह फिर कामदेव से फहते हे कि- [शिव]अरे' तू मुझे जानता है[ मं कौन हँ? सीधे उत्तर ययो नहीं देता है]? [कामदेव व्यङ्गचपूर्वक उत्तर देता है] भाग्य से [मे आपको खूय जानता हूँ। आ्रराप क्या है] । [ इस पर शिवजी कहते है कि यदि तू मुभको जानता है कि में कौन हूँ तो फिर] तू [मेरे पास] क्यों आया हैं?मेरे ऊपर तेरा दांव नहीं चलेगा इसको याद रख।] [कामदेव उत्तर देता है। इसीलिए तो ] तुम्हें उन्मादयुक्त करने के लिए भाया हूँ। [शिवजी कहते हे कि देखें] तू कसे [मुभे उन्मत करेगा] ? [कामदेव कहता है कि देखोगे क्या] में जवरदस्ती [तुमको उन्मत्त करुँगा ]। [शिवजी कामदेव को अ्रत्यन्त अनादरपूर्वक कहते हैं ] श्ररे तेरी कया ताक़त है [जो तृ मुझे उन्मत कर सके]। [इस अपमान से उद्विग्न होकर कामदेव कहता है] ले उसको देख [फि मेरी कया ताक़त है। बात-बात में दोनों अखाडे में आए जाते हैं ]। [शिवजी बोले] अच्छा आ्र, देखता हूँ। ऐसा कहकर जिस [शिच] ने [अपनी] पत्नी [ रति] के गले में हाथ डाले हुए कामदेव को श्रग बरसाने वाले अपने [तृतीय] नेत्र से ही भस्म कर दिया उस त्रिशूलधारी [शिव] को नमस्कार है ॥३३॥। [परमेश्वर] शिव के पर्यायवाची सैकडो शब्द रहने पर भी यहाँ 'शूलिन' [पद] का जो प्रयोग किया है उसका यह अ्निप्राय हँ कि उस भगवान् शिव को नमस्कार के अतिरिक्त और क्या किया जाय जिसने उस प्रकार के [शसाधारण] अभिमान के कारण विनयाचरण का परित्याग करने वाले कामदेव पर कुपित होने पर और सदा त्रिशूल समीप में रहने पर भी उसकी ओर देखने के अतिरिक्त क्रोष [काल में ग्रह करने] के योग्य शस्त्र का ग्रहण नहीं किया। फेवल दृष्टिपातमात्र

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कारिका १० ] द्वितीयोन्मेष. [२०७

लोचनपातमात्रेगोव कोपकार्यकरणाद् भगवतः प्रभावातिशयः परिपोपित। अतएव तस्मै नमोऽस्विति युक्तियुक्ततां प्रतिपद्यते। अपमपरः पदपूर्वारद्धवक्रताहेतु पर्यायो यस्तस्यातिशयपोपकः। तस्या- भिधेयस्यार्थस्यातिशयमुत्कर् पुप्साति य. स तथोक्तः । यस्मात सहज- सौकुमार्यसुभगोऽपि पदार्थस्तेन परिपोपितातिशय. सुतरा सहदयहदयहारितां प्रतिपद्यते। यथा- सम्बन्धी रघुभूमुजा मनसिजव्यापारदीक्षागुरु-

शचन्द्र: सुन्दरि दृश्यतामयमितश्चरडीशचूड़ामखिः॥३४॥१

से क्रोध का कार्य सम्पादन कर देने से भगवान् शिव के प्रभावातिशय को परिपुष्ट किया गया है। इसलिए [ऐसे प्रभावशाली] उस [शिव] को नमस्कार हो मह [कयन] युक्तियुकष्त हो जाता है। [इस प्रकार 'शूलिन' यह पद शिव के अरन्य पर्याय शब्दों की अपेक्षा यहाँ 'अन्तरतम' होने से चारुतातिशय का पोषक है। अ्रत यह प्रथम प्रकार की पर्यायवतरता का उदाहरण हुआ]। २ यह पद पूर्वार्द्धवक्र्ता का हेतु, पर्यायवकरता का दूसरा प्रकार है कि जो [पर्याय शन्द] उस [वाच्यार्थ] के प्रतिशय अर्थात् उत्कर्ष का पोषक हो। उस [अभिघय] वाच्यार्थ के अतिशय अर्यात् उत्कर्ष को जो पुप्ट करता है वह उस प्रकार का [तस्यातिशयपोषक] हुआ। क्योंकि स्वाभाविक सुकृमारता से सुन्दर पदार्य भी उस [विशेष पर्याय शब्द] से उत्कर्ष के पुष्ड किए जाने पर सहृदयों के हृदय के लिए अत्यन्त चमत्कारजनक हो जाता है। जैसे- यह श्लोक राजशेखरकृत 'बालरामायण' नाटक के दशम अक का ४१वां श्लोक हैं। लङ्का-विजय के वाद पुप्पकविमान से अयोव्या को लौटते हुए रामचन्द्र जी सीता जी को चन्द्रमा को दिखलाते हुए कह रहे है कि- [सूर्यं तथा चन्द्रमा के परस्पर श्रदान-प्रदान सम्बन्ध होने के कारण] जो [चन्न्रमा ] रघुवंशी राजाघ्ों का सम्बन्धी, और काम [जन्य ] न्यापारो की दीक्षा देने वाला गुरु है। जो गौर भ्रङ्गो वाली [ सुन्दरियों ] के मुख की उपमा के लिए प्रसिद्ध और तारा रूप [सहस्त्रो ] वधुओ का प्रिय [ प्रासपति ] है। तुरन्त साफ किए हुए दक्षिस देश की स्त्री के दांतों के समान स्वच्छ कान्ति वाला और शिव के मस्तक का चूडामि प्राभूपण यह चन्द्रमा है इसको देखो ॥३४॥ १ वालरामायर १०, ४१।

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२०८ ] वक्रोषितिजी वितम् [ कारिफा १०

त्रप्रत्र पर्याया सहजसौन्टर्यसम्पदुपेतस्यापि चन्द्रमस सहद्वहदयाल्हाट- कारण कमप्यतिशयमुत्पादयन्त पदपूर्वाद्ववकना पुप्मान्ति। तथा च रामेणा रावण निहृत्य पुप्पकेन गन्छता सीताया सविभ्रम म्वैरकथास्वरेतके भिघीयते 'यच्चन्द्र' सुन्दरि दश्यताम्' इति। रामणीयकमनोहारिणि मकल- लोकलोचनोत्सवश्चन्द्रमा विचार्यतामिति। यस्मात्तथाविधानामेव नादश. ममुचितो विचारगोचर । 'सम्बन्धी रघुभृमुजाम' इत्यनेन चाम्माक नापूर्वो वन्धुरयमित्यवलोकनेन सम्मान्यतामिति प्रकारान्तेशापि तद्विपयो बहुमान प्रतीयते। शिष्टाश्च तदतिशयावानप्रवणत्वमेवात्मन प्रथयन्ति। तत एव च प्रस्तुतमर्थ प्रति प्रत्येक परृथक्त्वेनोत्कर्पप्रकटनात् पयार्याण चहनामग्य- पौनरुक्त्यम्। तृतीये पादे विशेपणवक्रता विद्यते, न पर्यायवक्वम् ।

[ इस श्लोक में दिए हुए ] पर्याय [विशेषण भूत शब्द ] स्वाभाविक सौन्दर्य से युक्त चन्द्रमा के भी सहृदय हृदयाल्हावकारफ [ किसी]श्रपूर्व उत्कर्ष को उत्पन्न करते हुए 'पवपूर्वाद्धवकता' को पुष्ट करते हं। [ उसका श्रभिप्राय यो समझो ] जैसे कि रावण को मारकर पुष्पकविमान से [प्रयोध्या को] जाते हुए रामचन्द्र जी, सीता के साथ एकान्त की विस्रम्भ कथा के शवसर पर यह कह रहे है कि हे सुन्त इस चन्द्रमा को देखो। रमणीयता के कारण मन को हरए करने वाली [ हे सीते] सब लोगों के नेत्रो के [ उत्सव] आ्रनन्ददायक चन्द्रमा का विचार फरना चाहिए। क्योंकि उस प्रकार के [तुम्हारे जैसे सौन्दर्य के पारखी] लोगो ही के विचार का विषय, उस प्रकार का [लोफोत्तर सौन्दर्यशाली चन्द्रमा] उचित रूप से हो सफता है। [ यह चन्द्रमा ] रघुवशी राजाओ्ररो का सम्बन्धी है इस [फथन ] से हमारा फोई नया [अपरिचित] बन्धु नहीं है इसलिए [पुराना परिचित बन्धु होने फे नाते] उसको देख कर सम्मानित करो। ध्रन्य [विशेषणो द्वारा ] प्रकारान्तर से भी उस । चन्द्रमा ] फे विषय में आदरतिशय प्रतीत होता है। शेष [शन्द ] अपनी उस सौन्दर्य की अतिशयाधानपरता को ही सूचित करते हैं। इसलिए प्रस्तुत अर् के प्रति प्रत्येक पद के द्वारा अलग-अलग उत्कर्ष के प्रकट करने से बहुत से पर्यायो [शब्दों] की भी पुनरुषिति [प्रतीत] नहीं होती है। तीसरे चरण [सद्योमाजितदाक्षिणात्यतरुणीदन्तावदातद्युति ] में 'विशेषणावत्रता' है 'पर्यायवत्रता' नहीं। [शेष सब चरसो मे 'पर्यायवमरता'ह विशेषसावकता नहीं ]। यह श्लोक जैसा कि पहिले कह चुके हे बालरामाय नाटक से लिया गया हैं। परन्तु बालरामायण मे इसका पाठ यहाँ से भिन्न प्रकार का है। यहाँ जो प्रथम चरण दिया गया है वह बालरामायण में चतुर्थ चरण है अर्थात् 'गौराङ़ी वदनोपमा' वाले द्वितीय चरणा से बालरामायण में शलोक का प्रारम्भ होता है। और 'सम्वन्धी

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कारिका ११ ] द्वितीयोन्मेष [२०६

त्ररयमपरः पर्यायप्रकार: पढपूर्वार्द्धवक्रतानिवन्धन. 'यस्तदलङ्वर्तुमीश्वरः' तदमिधेयलक्षण वस्तु विभूपयितुं य. प्रभवतीत्यर्थ. । कस्मात्, 'रम्यच्छायन्तर- सर्शात्'। रम्यं रमसीयं यच्छायान्तर विच्छित्यन्तरं श्लिष्टत्वादि, तस्य स्पर्शात् शोभान्तरप्रतीतेरित्यर्थ.। कथम्, 'स्व्रय विशेपणोनापि'। स्वयमात्मनैव स्वविशेपणाभूतेन पदान्तरेख वा। तत्र स्वय यथा- इत्थ जड़े जगति को नु वृहत्प्रमाण- कर्ण: करी ननु भवेद् धवनितस्य पात्रम्। इत्यागतं सटिति योऽनिलमुन्ममाथ मातङ् एव किमतः परमुच्यतेऽसौ ।।३५॥' रघुभूभुजा' वाला चरण सबसे अन्त में रखकर शलोक की समाप्ति होती है। कुन्तक ने वालरामायण के इस श्लोक के चतुर्थ चरण को सवसे पहिले रख दिया है। यह परिवर्तन स्वय कुन्तक ने कर दिया या वीच मे पाण्डुलिपियो में हो गया यह कहना कठिन है। ३-'दपूर्वाद्ववतरता' का कारण भून यह औ्र्र [तीसरा], पर्याय [वक्रता] का प्रकार है जो 'उस [श्रभिधेयार्थ] को अलकृत करने में समर्थ हो'। जो उस श्रभिघेय [वाच्यार्थ] रूप वस्तु को सजाने में समर्थ हो। किससे [ सजाने में समर्थ हो कि] [दूमरी व्यङ्गयभूत ] रम्य छायान्तर के स्पर्श मे। रम्य शर्थात् रमणीय जो छामान्तर अरर्थात् [वाच्यार्थ से भिन्न] जो श्लिप्टत्व आदि रूप सौन्दर्मविशेष उसके संयोग या स्पर्श से। श्रव्य प्रकार की सौन्दर्य की प्रतीति होने से। कैसे कि, 'स्वय और विशेषण के द्वारा भी'। स्वय अपने ही [श्लेष आदि के कारण] प्रथवा अपने में विशेषण-भूत अन्य पदार्थ[के श्लेय आरादि युक्त होने] के द्वारा। उसमें स्वय [अर्थात् विशेष्य पद के श्लिष्ट होने से वाच्यार्य से भिन्न प्रकार के सौन्दर्यातिशय का उदाहरण] जैसे- इस जड [मूर्ख और प्रच्ेतन] जगत् में [हाथी के समान] इस प्रकार के वडे- वडे कानो वाला और बडे [ प्रशस्त] हाथ [सड] वाला [अर्थात् सुनने औरर कर नकने मे समर्य] कथन [कष्ट गाथा सुनाने योग्य अ्रथवा भूङ्गगुञ्जन रूप शन्ब] का पात्र और कोन होगा ऐसा समभकर आए हुए भ्रमर को जिस [हाथी]ने झपने कानो की फडफडाहट से] सत्रस्त कर दिया उसे 'मातङ्ग' [ हाथी या दूसरे पक्ष में नाण्डाल] के अ्तिरिक्त और क्या कहा जाय ॥३५।। यह श्लोक सुभापितावली में सच्या ६२८ पर 'भट्ट वासुदेव' के नाम से दिया गया है। कुन्तक भी इसी ग्रन्थ में उदाहरण स० १, ५५ पर इसके पूर्वार्द्ध भाग को उद्धृत कर चुके हे। यह अन्योचित है। हाथी के कान बडे हे और कर पर्थात् सूड भी बडी है। अत वह हमारी विपत्ति-कथा को भली प्रकार सुन सकता है

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२१० ] वकरोपितजीनितम् [ फारिका ११

अरन्न 'मातद्गशब्द'प्रम्तुते वारणमात्रे प्रवर्नते। श्लि्टया वृत्या चाएडाल-

'गोर्वाहीकः' इत्यनेन न्यायेन सादृश्यनिवन्वनस्योपचारस्य सम्मवान प्रस्तुतम्य वस्तुनस्तत्वमध्यारोपयन् पर्यायवकता पुप्णाति। यस्मादेचविधे विपये प्रस्तुतम्या- प्रस्तुतेन सम्बन्धोपनिबन्धो रूपकालक्वारद्वारेण कटाचिदुपमामुसेन वा। यथा-

और उसका प्रतीकार करने में भी समर्थ हो सकता है । यह समभकर बोई भ्रमर अरपनी कष्ट-कथा को लेकर उसके पाम गया। परन्तु उसने वात मुनने और सुनकर उसकी सहायता करने के बजाय अपने कान फडफडाकर उसको भगा दिया। यह इस श्लोक का भाव है। उससे दूमरा अर्थ यह प्रतीत होता है कि कोई दीन-हीन सत्रस्त व्यक्ति किसी बढे समर्य तथा साधनसम्पन्न पुरुप के पास अपनी विपन्ना- वस्था में किसी प्रकार की सहायता प्राप्त करने की आाशा से जाय और वह उसकी किसी प्रकार की सहायता न करके यो ही फटकारकर भगा दे ता वह पुर्प चाण्डाल के समान समझा जाना चाहिए। इसी भाव को द्योतित करने के लिए श्लोक के चतुर्थ चरण में 'मातङ्ग एव किमत परमुच्यतेऽसी' कहा है। यहां 'मातङ्ग' पद४ श्लिष्ट है। उसका एक अर्थ हाथी होता है और दूसरा अर्थ चाण्डाल होता है। ऐसे व्यक्ति को मातङ्ग अर्थात् एक पक्ष में हाथी और दूसरे पक्ष में चाण्डाल के सिवाय और क्या कहा जाय। यह कवि का प्भिनाय है। इसमें विशेष्यभूत 'मातङ्ग' शब्द के श्लिष्ट होने से उसके साथ चाण्डाल रपदूसरे अर्थ के सस्पर्श से वाच्यार्थ में चारुत्व आ गया है। इसलिए यह 'तदलद्गर्तुमीद्वर' वाला 'पर्याय-वन्ता' का उदाहरण है। यह 'मातङ्ग' शन्द प्रस्तुत प्रकरण में केवल हाथी का बोधक होता है। परन्तु श्लेष व्यवहार [यहां पूर्व संस्करण में 'शिष्टया वृत्या' पाठ दिया गया था वह ठीफ नहीं था। उसके स्थान पर '्लिष्टया वृत्या' पाठ ठीक है] से चाण्डाल रूप अप्रस्तुत वस्तु की प्रतीति को उत्पन्न करता हुआ रूपकालद्धार की छाया के स्पर्श से 'गौवाहीक' इस न्याय से सादृश्यमूलक उपचार के सम्भव होने से प्रस्तुत [हाथी रूप] वस्तु पर उस [चाण्डालत्व] के आरोप को कराकर 'पर्यायवकता' को पुष्ट करता है। क्योंि इस प्रकार के उदाहररो में प्रस्तुत [हाथी आदि] का अ्र्प्रस्तुत [चाण्डाल आदि] के साथ सम्बन्ध का निरूपण कभी रूपकालद्वार के द्वारा अ्रथवा कभी उपमालद्धार के द्वारा [ही]हो सकता है। जैसे- रुपकालङ्गार की अवस्था में ] 'स एवाय' अर्थात् [चाण्डाल एवायं मातन्ः] इस प्रकार [विग्रह होगा ] अ्रथवा [उपमालङ्गार की वशा में

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कारिका ११ ] द्वितीयोन्मेष: [२११

'स एवायं' 'स इवायं वा'। एप एव च शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्गयस्य पदध्वनेर्विषयः।

'चाण्डाल इवायंमातङ्ग' ] उसके समान यह [ इस प्रकार का विग्रह] होगा। [ इसलिए ऐसे श्लिष्ट स्थलो में प्रस्तुत तथा अरप्रस्तुत का सम्बन्ध कभी रूपकालद्गार द्वारा और कभी उपमालङ्गार द्वारा निबद्ध किया जाता है]। और यही [ ध्वनिवादियो के मत में ] शव्दशकितिमूल सलक्ष्यक्रम व्यङ्गय पद ध्वनि का विषय होता है। इम प्रकरण में 'गोर्वाीक-न्याय' का उल्लेख हुआ है। 'गौर्वाहीकनन्याय' का भभिप्राय यह है कि जिस प्रकार त्रराजकल 'शिकारपुर' अ्र््रथवा 'भोर्गांव' के लोग मूर्खता के लिए प्रसिद्ध है इसी प्रकार प्राचीन काल में 'वाहीक' नामक स्थान विशेष के मनुष्य अपनी मूर्खता के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी मर्खता के अतिराय के सूचन के लिए वाहीक देशवासी पुरुष को गौ अर्थात् गाय के समान कहा जाता था। गाय में रहने वाले जाड्य मान्द आदि गुणो के सादृश्य के कारण वाहीक देशवासी पुरुष भी 'गौ' कहलाता था। इस प्रकार प्रकृत में निष्ठुराचरण के सादृव्य के कारण मातङ्ज अर्थात् हाथी को मातङ्क अर्ात् चाण्डाल कहा गया है। प्रस्तुत और्प्रौर अ्र्प्रप्रस्तुत के सम्बन्ध के निरुपण के विषय में इस प्रकरण में कुन्तक ने लिखा है कि 'एवविधे विषये प्रस्तुतस्याप्रस्तुतेन सम्त्रन्वोपनिवन्वो रूपका- लद्दारद्वारेण कदाचिटुपमामुखेन वा'। अरथात् इस प्रकार के श्लेप स्थलो में प्रस्तुत अरथ अर्थात् वाच्यार्थ का प्प्रस्तुत अरथात् प्रतीयमान व्यङ्गन अर्थ के साथ कभी रूपक द्वारा और कभी उपमा द्वारा सम्बन्ध होता है। जैसे- जटाभाभिर्भाभि करवृतकलक्काक्षवलयो वियोगिव्यापलेरिव कलितवराग्यविगद।

शशी भम्मापाण्डु पिनृवन इव व्योम्नि चरति॥ इस इलोक में चन्द्रमा पर योगी के घर्म का आरोप किया गया है। योगी अथवा तपस्वी जटाश्रो से युक्त हाथ में अक्षमाला [जपमाला] लिये, भस्म रमाए हुए इमशान आादि में धमता रहता है। इसी प्रकार भस्म के समान श्वेत वर, वियोगियो के आपत्ति से विरक्त हो हाथ में कलङ्क त्प प्नक्षमाला को धारण किए हुए जटा रप अपनी किरणो से उपलक्ित चन्द्रमा दमशान के तुल्य आ्काश में विचरण करता है। यह श्लोक का अभिप्राय है। यहाँ 'करे धृत कलङ्ट्ाक्षवलय येन न कर- घृतलड्काक्षवलय' इस समास के अन्तर्गत 'कलङ्चाक्षवलयम्' पद आता है। इस

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२१२ ] वक्रोपितिजीवितम् फारिफा १

बहुपु चैवंविधेपु सत्मु राक्यबनर्धा। यथा- कुसुम समययुग मुपसहरन्नुत्फुल्लम ल्लिका बवलादृहासो व्यजुम्भत प्रीप भिधानो महाकाल ॥३६॥ यथा, वा-

'करघृतकलद्वाक्षवलय' पद में 'कलङ्क एव श्र्प्रक्षवलय कलद्वाक्षवनय' इम प्रा का विग्रह करके 'मयू रव्यसकादयरच' अप्टा० २, १, ७२। इस पाणिनि सूत्र के श्रनुम समाम मानने पर रपकालद्वार होगा। और 'उपमित व्याघ्रादिभि मामान्याप्रयो अ्रष्टा० २,१,५६ । इस पाशिनि सूय के अनुसार समास करने पर 'कलङ्गो अक्षवलयि इति कलड्काक्षवलयम्' उस प्रकार का विग्रह करके उपमा अ्लद्दार होगा। इम प्रक प्रस्तुत अ्रप्र्थं चन्द्रमा औ्र्प्रौर अ्र्प्रप्रस्तुत प्रपर्य प्रघोरी साधु का यहां रूपकालद्वार द्वारा अ्र्प्रथ उपमा अलद्दार द्वारा दोनो प्रकार से समन्वय हो सकता है। उसमें रूपकालद्वार पक्ष 'मयूव्यमकादयश्च' इस मूत्र से समास करने पर 'कलङ्क एव अ्रक्षवलय कलङ्काक्षरलय इस प्रकार का विग्रह होगा। उपमालद्वार मानने पर 'कलङ्को अक्षवलयमिव इ कलड्काक्षवलयम्' इस प्रकार के विग्रह करके 'उपमित व्याघ्रादिभि सामान्याप्नयोगे' सूत्र से समास होगा। इसी द्विविध समाम प्रक्रिया का यहाँ ग्रन्थकार ने 'स एवाय इवायमिति वा' कहकर उल्लेख किया है। प्र्प्रथवा इस प्रकार के अ्र्प्रनेक [श्लिष्ट] पदो के [प्रयुक्त] होने पर [शददशवि मूल सलक्ष्यकम व्यङ्गय का] वाक्य-ध्वनि का [उदाहरण होगा]। जैसे- यह उद्धरण हपचरित के द्वितीय उच्छ्वाम से लिया गया है। और ध्वन्यालो में भी उद्धृत हुआ है। पुष्पसमृद्धि के युग [अ्रर्थात् वसन्त ऋतु के चंत्र तथा वैशाख दो मासो ]। समाप्ति [उपसहार] करता हुआर, खिली हुई जुही [मल्लिका] के, भ्रट्टालिकाओं। धर्वलित करने वाले हास [विकास] से परिपूर्ण [दूसरे पक्ष में दूसरा अर् प्रलयका कृतयुग आदि समय युगो का सहार करते हुए] और खिली हुई जुही के सम धवल अटृहास करते हुए 'महाकाल' शिव के समान ग्रीष्म नामक 'महाकाल' प्रव हुगन॥३६॥ [और]जैसे [उसी प्रकार का दूसरा उदाहरण भी हर्षचरित से लिया ग है। उसका अर्थ इस प्रकार है]- १ हर्षचरित २, ववन्यालोक पृ० १७२।

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कारिका ११ ] द्वितीयोन्मेष [ २१३

वृत्तेडस्मिन् महाप्रलये धरणीधारणायाधुना त्वं शेपः ।इति॥३७॥१ अ्रत्र युगादय. शब्दाः प्रस्तुताभिधानपरत्वेन प्रयुज्यमाना. सन्तोऽ -१व्यप्रस्तुतवस्तुप्रतीतिकारितया कामपि काव्यच्छाया समुन्मीलयन्त प्रतीय- मानालद्कारव्यपदेशभाजनं भवन्ति। विशेपरोन यथा- सुस्निग्घमुग्धधवलो रुद्दशं विद्ग्ध मालोक्य यन्मधुरमद्य विलासदिग्घम्। भस्मीचकार मदनं ननु काष्ठमेव तन्नूनमीश इति वेत्ति पुरन्त्रिलोक ।।३८।। अत्र काष्ठममिति विशेपणपद वरर्यमानपदार्थापेक्षया मन्मथस्य [तुम्हारे अर्थात् हर्षवर्घन के पिता प्रभाकरवर्धन तथा माता राज्यश्री की मृत्यु रूप] इस महाप्रलय के हो जाने पर पुथिवी [अर्थात् राज्यभार] के धारण करने के लिए अब [शेषनाग के समान केवल] तुम 'शेष' [शेषनाग] हो।३७॥ इनने 'मुग' आदि शब्द प्रस्तुत [चंत्र-वशाख मास रूप] अर्थ परतया प्रयुक्त :- होने पर भी महाकाल शन्द का प्रस्तुतपरक अर्थ ग्रीष्म ऋतु का दीर्घ काल है परन्तु उससे अप्रस्तुत शिव रूप श्रर्थं भी प्रतीत होता हो है। इसलिए वे शब्द ] अप्रस्तुत वस्तु [शिव आादि ] के प्रतीतिकारी होने से काव्य के कुछ अरपूर्व सौन्दर्य को प्रकाशित करते हुए [वाक्यगत शन्दशक्तिमूल] अलङ्धारघ्चनि के पात् होते हैं। [ इम प्रकार यह विशेप्य पद के श्लेप के तीन उदाहर दिए है। आरागे विशेषण पद के श्लेष के उदाहरण देते हैं ]। विशषण [पद के श्लेष] से [छायान्तरत्पर्श का उदाहरण] जैसे- अ्र्रत्यन्त स्नेहयुत, मनोहर, शुभ्र और बडी-वडी श्रांखो वाले, चतुर, सुन्दर और हाव भाव आदि से परिपूर्ण जिस [ राजा या नायक ] को देखकर स्त्रियाँ यह समभती है कि [वास्तव में देहधारी कामदेव तो हमारे सामने उपस्थित है। तब मदन को शिव जी ने भस्म कर डाला था इस प्रकार का जो प्रवाद सुनाई देता है वह वास्तव में कामदेव रूप मदन के विदय में नहीं है। अपितु 'मयनफल' नामफ जो - 'मदन' नाम से प्रसिद्ध वृक्ष विशेष के विषय में है। उस ] काष्ठ को ही शिव जी ने भस्म किया है[का्मदेव को नहीं। अरन्यथा यह हमारे सामने कैसे उपस्थित होता]।३=॥ यहां [इस उदाहरख में] 'यार' यह [पद मयनफल नामक वृक्ष विशेष के वाचक मदन का] विशेषण [है। जो ] वर्ण्यमान [नायक रूप ] पदार्थ की अपेक्षा

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२१४ ] धक्ोपित जीवितम् [फारिफा ११

नीरसता प्रतिपाठयद् रम्यन्छायान्तरम्पर्शिश्लपदाय्ामनोक्षवि्यासपरमम्मिन वस्तुन्यप्रस्तुते मदनाभिवानपादपलनगो प्रतीतिमुन्पावयद् रूपकालकारच्छाया- सस्पर्शात् कामपि पर्यायवकतामुन्मीलयति। अरयमपर पर्यायपकार' पदपर्वार्द्ववक्रताया कारगाम्, 'य स्वच्छायो- त्कर्पपेशल १ स्वस्यात्मनश्छाया कान्तिर्या सुकुमारता तदुत्कर्प तदतिशयेन यः पेशलो हृदयहारी। तहिटमत्र तात्पर्यम्। यद्यपि वसर्यमानम्य वस्तुन प्रकारान्तरोल्जासकत्वेन व्यवस्थितिस्तथा,प परिस्पन्दसौन्ठर्यमम्पठेव सहद्य- हृदयहारितां प्रतिपद्यते। यथा- इत्थमुत्कयत ताएडवलीला-पिडताव्घिल हरीगुरुपादे·। उत्थित विपमकाएड कुटुम्वस्याशुभि. स्मरवतीविरहो माम् ॥२६॥

[काष्ठ रूप होने से ] कामदेव की नीरसता [सौन्व्यहीनता] का प्रतिपादन फरते हु ए, रमसीय सौन्दर्यान्तर को स्पर्श करने वाले [कुछ श्रन्य ही प्रकार के भ्रपूर्व सौन्दर्य को अभिव्यक्त करने वाले ] इ्लेप की छाया से सुन्दर रचना का बोधक हैं। यहां इस मयनफल नामक वृक्षविशेष रूप अ्र्प्रप्रस्तुत वस्तु की प्रतीति फो उत्पन्न फरता हुआ रूपकालद्धार की छाया के स्पर्श से किसी अप्व 'पर्यायवमता' को प्रकट फर रहा है। [आगे कारिका मे आ्र्प्राए हुए 'स्वच्छायोत्कपंपेशल' पद की व्यास्या करते है] ४-यह औरर [चौथा] पर्याय [बनता] का भेद 'पदपूर्वाद्ववक्ता' का कारण होता है। जो [कारिका में] 'स्वच्छायोत्कर्षपेशल' [पद से कहा गया है। उसका अर्थ इस प्रकार है कि] स्वकी श्रर्थात् [श्रभिधेयार्थ की ]अ्रपनी जो छाया या कान्ति अर्थात् सुकमारता उसके उत्कर्ष अ्र्थात् उसके श्रतिशय से जो पेशल अर्थात् मनोहारी हो। इसका यहां यह अभिग्नाय हआ््र कि यद्यपि वर्ण्यमान [प्रस्तुत] वस्तु की [प्रतीय- मान वस्तु रूप] अन्य प्रकार [के त्रर्थ] के अ्रभिव्यञ्जक रूप में स्थिति है तथापि [ उस वर्ण्यमान प्रस्तुत वस्तु के अप्रपने ] स्वभाव की सौन्दर्य सम्पत्ति ही सहृदयो के लिए [हृवयहारित्व को प्राप्त ]। हृदयहारिणी होती है। जैसे- [इस श्लोक का अर्थ कुछ प्र्परस्पष्ट-सा प्रतीत होता है। उसका अ्रभिप्राय यह हं कि] समुद्र की नाचती हुई तरङ्गों पर पडती हुई विषम काण्ड अर्थात् पञ्चवाए कामदेव के [कुटुम्बी] सम्बन्धी चन्द्रमा की [ अ्शु अरर्थात ] किरसो के द्वारा, उठे हुए [अर्थात् सो न सकने के कारण व्याकुल होफर इधर-उधर घूमते [ए] मुभफो

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कारिका ११ ] द्वितीयोन्मेष. [ २१५

अत्रेन्दुपर्याय्ो 'विषमकाएडकुटुम्वरव्दः' कविनोपनिवद्धः। यस्मान्मृ- गाड्ोद्यद्वेपिणा विरहविधुरहृदयेन केनचिदेतदुच्यते। यदयमप्रसिद्धोऽप्य- ययरिम्लानसमन्वयतया प्रसिद्धतमतामुपनीतस्तेन प्रथमतरोल्लिखितत्वेन च चेतन चमत्कारका रितामवगाहते। एष च 'स्वच्छायोत्कर्पपेशल.' सहजसीकुमार्य- सुभगत्वेन नूतनोल्लेखविलक्षणत्वेन च कविभि पर्यायान्तरपरिहारपूर्वकमुप- वस्यते।

कामपीड़िता प्रियतमा [स्मरवती] का विरह, [प्रियतमा के मिलन के लिए] उत्कण्ठित कर रहा है। [जिस प्रकार चन्द्रमा की किरणे लहरो के ऊपर गिरकर अठखेलियां कर रही है रसी प्रकार मेरा मन प्रियतमा से मिलकर केलि करने के लिए उत्सुक हो रहा हैँ ]। यह श्लोक कहां का है यह ज्ञात नहीं है। जान पह्ता है चाँदनी रात में समुद्र-तट पर खडा हुआ कोई नायक अपनी प्रियतमा का स्मरण करके यह वनोक कह रहा है। चांदनी रात में प्रियतमा के विरह में उसको नीद नही आती है। इसलिए वह समुद्र-तट पर उत्यित अर्थात् खडा हुआ है। सामने समुद्र की नाचती हुई लहरो पर चन्द्रमा की चादनी पूर्ण जोर के साथ पडकर एक अपूर्व सौन्दर्य को उत्पन्न कर रही है। जो इस वियोग की अवस्था में उद्दीपन विभाव का काम कर रही है। उसी सुन्दर दृश्य को देखकर नायक अपनी प्रियतमा का स्मरण करता हुआ उपर्युक्त श्लोक कह रहा है। यहाँ [ इस श्लोक में] कवि ने चन्द्रमा का पर्यायवाची 'विपमकाण्डफुट्म्व' शन्द का प्रयोग किया है।[इसका अर्य विषमकाण्ड अरपर्थात् पञ्चवास्र कामदेव उसका कुटुम्ब शर्थात् सहायक, सम्बन्धी, चनमा यह होता है] क्योकि विरह व्यथित पतएव चन्द्रमा से द्वेष करने वाले किसी नायक के द्वारा यह श्लोक कहा गया है। इसलिए यह [चन्द्रमा के लिए प्रयुक्त 'विषमकाण्डकुटुम्व' शब्द] श्रप्रसिद्ध होने पर भी सुन्दर सम्बन्ध के कारस प्रतिद्धतमत्व को प्राप्त होकर, 'अ्रपूर्व कल्पना' [प्रथम वार वशित या र्कल्पित] होने के कारण सहृदयो के चित्त को चमत्कृत करता है। और यह [ विषमकाण्डफटम्ब शब्द ] अपने निजी सौन्दर्य के शधिक्य से मनोहर शथवा सहज सौकुमार्य के कारण सुन्दर होने, एव नवीन कल्पना रूप होने से, कवियो के द्वारा [चन्द्रमा के वाचक] न्य पर्यायो को छोटकर [उनकी अपेक्षा अ्रधिक चमत्कारजनक तथा नवीन फल्पना होने से विशेष रूप से ] ग्रहण [वर्णन] किया जाता है।

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२१६ ] उशोपितजीनितम [पारिषा १२

यथा वा - कृप्एाकुटिलकेशीति वक्तव्ये यमुनाकल्लोलचकाल के ति । यथा वा-'गोरादीवटनोपमापरिचित' त्यत्र वनिताहिवाचनसहन्त सद्भावेऽपि 'गौराङ्गी' इत्यतीवायाम्यतारमगीयम । अरयमपर पर्यायप्रकार पदपर्वार्द्धवत्रताभिवायी। 'शसम्भाव्याथपात्र- त्वगभे यश्चाभिवीयते'। वएर्यमानम्यासम्भाव्य सम्भावयितुमशक्वो योडयं कश्चित्परिम्पन्दस्तत्र पात्रत्व भाजनत्व गर्भीडभिप्रायो यत्राभिवाने तन्तथाविय कृत्वा यश्चाभिधीयते भरयते। यथा- प्रथवा जंसे- 'काले औौर घुंघराते वालो वाली' इस अर्थ के कहने के अवसर पर 'यमुन। की लहरो के समान सुन्दर अलको वाली यह क्थन [पर्यायवपता का उदाहरण होता हं]। अथवा जैसे [इसी प्रकार की पर्यायवत्रता का तीसरा उदाहरण पहिले उदा० २, .४ पर उद्धृत श्लोक में ] 'गौराङ्ग्ी के मुख की उपमा से परिचित' इस [गौराङ्गीवदनोपमापरिचित ] प्रयोग में 'स्त्रो' आ्प्रदि सैकडो वाचक शब्द होने पर भी [कवि उन सबको छोडकर विशेष रूप से उमी 'गौराङ्ग्री' शव्द को ग्रहण कर रहा है, क्योकि] 'गौराङ्ग्ी' यह [ पद ] अ्रग्राम्यता के कारण अ्र्परत्यन्त सु-दर [ प्रतीत होता] हूँ। ५-'पदपूर्वार्द्धवकरता' का द्योतक यह [पाँचर्वा] और 'पर्यायवतता' का प्रकार है। [ जिसे कारिका में]'्रप्रसम्भाव्यार्यपात्रत्वगर्भ यश्चाभिघीयते' [पद में फहा है। इसका अभिप्राय यह है कि] वर्ण्यमान [प्रस्तुत ] वस्तु का श्रसम्भाव्य अार्थात् जिसकी कल्पना भी न की जा सके ऐसा जो अर्थ अर्थात स्वभाव विशेष, उसकी पात्रता अर्थात् भाजनता [ वाच्य या वर्ण्यमान दस्तु में वोधन फराने ] में गर्भ अरर्थात् अभिप्राय जिस वाचक पद [अ्रभिधान] का हो वह ।अमम्भाव्यार्थपात्रत्वगर्भ हुश्र्प्रा] उस प्रकार का करके [अर्थात् सामान्य शब्द से किसी श्रसम्भाव्य-तुल्य अर्थ विशेष को बोधित कराने के अभिप्राय को अपने मन में रखकर कवि] जिस [शन्द विशेषज रूप पर्याय] को प्रयुयत करता है या कहता है [ वह भी पर्यायवक्रता का उदाहरण होता है।] जसे- यह श्लोक रघुवश के द्वितीय सर्ग का ३४ वाँ श्लोक है। नन्दिनी गाय को चराते हुए राजा दिलीप वन का सौन्दर्य देखने में तल्लीन हो जाते है।

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कारिका १२ ] द्वितीयोन्मेष [२१७

अलं महीपाल तव श्रमेए पयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात्। -7 न पादपोन्मूलनशक्तिरंहः शिलोच्चये मृच्छेति मारुतस्य ।४।।" अ्न्र महीपालेति राजः सकलपृथिवीपरिरक्षणक्षमपौरुपस्थापि तथाविध-

यत् तत्पात्रत्वगभेमामन्त्रणमुपनिवद्धम्।

इतने में शिव जी के रखे हुए सिंह ने उस पर आक्रमण कर दिया उसकी आवाज़ सुनकर औ्र्रौर उघर देखकर सिंह को मारने के लिए जब राजा दिलीप वाण निकालने लगे तब सिंह ने उनसे कहा कि- हे राजन् 1 इस कार्य के लिए व्यर्य परिश्रम मत करो क्योंकि मेरे कपर चलाया गया तुम्हारा अस्त्र व्यर्य जायगा [यह माना कि तुम्हारा श्रस्त्र बड़े-बड़े वीरो के छक्के छुडा देता है फिर भी वह मेरे ऊपर फोई असर नहीं डाल सकेगा। मेरा कुछ भी नहीं विगाड सकेगा। क्योकि जैसे बडे-बटे] वक्षों को उसाड़ देने की सामर्थ्य रखने वाला आँघी का बेग भी [उससे भी अधिक दृढ़] पहाड़ का कुछ नहीं विगाड पाता है। [इसो प्रकार तुम्हारा प्रयुक्त किया हुआ अ्रस्त्र भी मेरा कुछ नहीं विगाड सकेगा और व्यर्थ ही जायगा] ॥४०॥ यहाँ [राजा के वाचक संकडो पद होते हुए भी कवि ने 'महीपाल' शब्द का विशेष रूप से प्रयोग किया है। क्योकि] 'महीपाल' यह शन्द [राजा के अ्रसम्भा- व्यार्थपात्रत्व को मन मे रखकर प्रयुक्त हुआ है]। समस्त पुयिवी की रक्षा करने में समर्थ पील्ष वाले राजा मे उस प्रकार के [असाधारण] प्रयत्नों से [हर मूल्य पर] परिपालनीय गुरु की गाय रूप एक जीवमात्र की रक्षा करने की भी, अ्सामर्थ्य जो स्वप्न में भी [कल्पना करना] अ्रसम्भव हैं। [ किन्तु यहां ] उसी [भस्म्भव अर्य ? कि तुम इस गाय को मुझ सिंह से नहीं बचा सकते हो] को बोघित करने के अभिप्राय से [ महीपाल ] यह [व्यङ्गर ] तम्बोधन पद [कवि ने ] रखा है। [इसलिए यह 'पर्पायवकरता' रूप पदपूर्वाद्धवक्रता का उदाहरस हं ]।

१ ग्घुवश २, ३४ ।

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२१६ ] वश्रोपितजीनितम [ पारिकिा १२

यथा वा- कृप्णकुटिलकेशीति वक्तव्ये यमुनाकल्लोलवका ल के ति । यथा वा-'गोराद्वीवटनोपमापरिचित' उत्यत्न वनिताहिवाचकसहन् सद्भावेडपि 'गौराङ्गी' टत्यतीवाग्राम्यतारमगीयम्। अरयमपर पर्यायप्रकार पदपर्वाद्गवत्रताभिचायी। 'श्रसम्भाव्यार्थपान्न- त्वगर्भ यश्चाभिधीयते'। वसर्थमानम्यासम्भाव्य सम्भावयितुमशक्यो चोडवं कश्चित्परिस्पन्दरतत्र पात्रत्व भागनत्व गर्भीडमिप्रायो यत्राभिधाने तत्तथाबिध कृत्वा यश्चाभिधीयते भयते। यथा-

अ्रथवा जसे- 'काले और घुंघराले वालो वाली' इस अर्य के कहने के अवसर पर 'यमुना फो लहरो के समान सुन्दर अलको वाली यह कथन [पर्यायवतता का उदाहरण होता है]। अथवा जैसे [इसी प्रकार को पर्यायचनता का तीसरा उदाहग्स पहिले उदा० २, .४ पर उद्धृत श्लोक में ] 'गौराङ्ग्री के मुख की उपमा से परिचित' इस [गौराङ्गीवदनोपमापरिचित ] प्रयोग में 'स्त्री' आरादि सैकडो वाचक शब्द होने पर भी [कवि उन सबको छोडकर विशेष रूप से उसी 'गौराङ्ग्रो' शन्द को ग्रहण कर रहा है, क्योकि] 'गौराङ्ग्गी' यह [ पद ] अ्ग्राम्यता के फारस अ्र्त्यन्त सु.दर [ प्रतीत होता] हूं। ५-'पदपूर्वार्द्धवक्रता' का द्योतक यह [पांचरवा] औ्र 'पर्यायवत्रता' का प्रकार है। [जिसे कारिका में]'अरसम्भाव्यार्थपात्रत्वगर्भ यश्चाभिधीयते' [पद में कहा है। इसका अभिप्राय यह है कि] वर्ण्यमान [ प्रस्तुत] वस्तु का भ्रसम्भाव्य अर्थात् जिसकी कल्पना भी न को जा सके ऐसा जो अर्थ अर्थात स्वभाव विशेष, उसकी पात्रता अर्थात् भाजनता [ वाच्य या वर्ण्यमान दस्तु में बोधन कराने ] में गर्भ अर्थात् अभिप्राय जिस वाचक पद [अ्रभिधान] का हो वहअमम्भाव्यार्यपात्नत्वगर्भ हुआ्प्र्रा] उस प्रकार का करके [अर्थात् सामान्य शब्द से किसी श्रसम्भाव्य-तुल्य श्रर्थ विशेष को बोधित कराने के अभिप्राय को अपने मन में रखकर कवि] जिस [शब्द विशेष रूप पर्याय ] को प्रयुपत करता है या कहता है [ वह भी पर्यायवफ्ता का उदाहरण होता है ।] जसे- -यह श्लोक रघुवश के द्वितीय सर्ग का ३४वाँ श्लोक है। नन्दिनी गाय को चराते हुए राजा दिलीप वन का सौन्दर्य देखने में तल्लीन हो जाते है।

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कारिका १२ ] द्वितीयोन्मेष i२१७

अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात्। -7 न पादपोन्मृलनशक्तिरंहः शिलोच्चये मूच्छेति मारुतस्य ।।2।" अत्र महीपालेति राज. सकलपृथिवीपरिरक्षणक्षमपौरुपस्यापि तथाविध- प्रयत्नरपरिपालनीयगुरुगोरूपजी वमान्नपरित्राणणसामथ्ये स्वप्नेऽप्यसम्भावनीयं यत् तत्पात्रत्वगभमामन्त्रसमुपनिवद्धम्।

इतने में शिव जी के रखे हुए सिंह ने उस पर आक्रमण कर दिया उसकी आावाज़ सुनकर और उधर देखकर सिंह को मारने के लिए जव राजा दिलीप वाण निकालने लगे तव सिंह ने उनसे कहा कि- हे राजन् ! इस कार्य के लिए व्यर्थ परिशम मत करो क्योंकि मेरे ऊपर चलाया गया तुम्हारा अस्त्र व्यर्थ जायगा [यह माना कि तुम्हारा अ्रस्त्र बड़े-वडे वीरो के छबके छुडा देता है फिर भी वह मेरे ऊपर कोई असर नहीं डाल सकेगा। मेरा कुछ भी नहीं विगाड सकेगा। क्योकि जैसे बड़े-बटे] वक्षो को उखाड़ देने की सामर्थ्य रखने वाला श्राँधी का वेग भी [उससे भी अधिक दृढ] पहाड का कुछ नहीं विगाड पाता है। [इसी प्रकार तुम्हारा प्रयुक्त किया हुआ अ्रस्त्र भी मेरा कुछ नहीं विगाड सकेगा और व्यर्य ही जायगा]॥४०॥ यहाँ [राजा के वाचक सैकडो पद होते हुए भी कवि मे 'महीपाल' शब्द का विशेष रूप से प्रयोग किया है। क्योकि] 'महीपाल' यह शन्द [राजा के असम्भा- व्यार्थपात्रत्व को मन में रखकर प्रयुक्त हुआ है।। समस्त पुथिवी की रक्षा करने में समर्थ मौल्प वाले राजा मे उस प्रकार के [अत्ाधारण] प्रयत्नों से [हर मूल्य पर] परिपालनीय गुरु की गाय रप एक जीवमात्र की रक्षा करने की भी, अ्रसामर्थ्य जो स्वप्न में भी [कल्पना करना] अ्र्प्रसम्भय हैं। [ किन्तु यहां ] उसी [अ्रसम्भव भ्रर्य है कि तुम इस गाय को मुक सिंह से नहीं बचा सकते हो] को वोधित करने के अभिप्राम से [महोपाल ] यह [ व्यङ्गय ] तम्बोधन पद [ कवि ने] रखा है। [इसलिए यह 'पर्पायवकता' रूप पदपूर्वाद्धवत्रता का उदाहरण है ]।

१ रघुवश २, ३४।

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२१= j धकोपितजीितम् [ कारिका १२

यथा वा- भृतानुकम्पा तव चेदिय गौ- रेंका भवेत् न्वस्तिमती तवदन्ते। जीवन्पुनः शश्वदुपप्लवेभ्यः प्रजा: प्रजानाय पितेव पासि ।४?।' अत्र यदि प्राशिकरुणकारणं निजप्राणपरित्यागमाचरमि तदाय- युक्तम्। यस्मात त्वदन्ते स्वस्तिमती भवठियमेकँ गौरिति त्रितयनप्चनादरा-

अ्रयवा जंसे [इसी प्रफार का दूसरा उदाहरण जिसमें किमी श्रसम्भव अ्र्परयं को द्योतित फरने के लिए फवि ने फिसी विशेष शब्द का प्रयोग किया है, निम्न श्लोक में पाया जा सकता है]- यह श्लोक भी रघुवद के द्वितीय मर्ग का ४८वाँ श्लोक है जो उसी प्रसङ्ग में आया है। जब राजा दिलीप ने देखा कि मेरे अस्त से इस गाय की रक्षा होना सचमुच भसम्भव है क्योकि जव वह वाण चलाने का उद्योग करने लगे तो शिव जी के प्रभाव से उनका हाथ वाण के पुंखों में ही चिपका हुआ रह गया और वह चित्रलिखित-मे खडे रह गए। 'सक्तागुलि सायकपुख एय चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे' अपनी इस विवशता को देखकर दिलीप ने सिंह के सामने यह प्रस्ताव रखा कि आाप मेरे शरीर को अपने भोजन के लिए स्वीकार करें और इस गाय को छोड दें। दिलीप के इस प्रकार के प्रस्ताव को सुनकर उनको समभाते हुए सिंह दिलीप से कह रहा हँ कि- अगर यह कहो कि [ इस गाय की रक्षा करने में अपने शरीर का बलिदान कर देने से ] यह तुम्हारी प्रारियो पर दया है, तो [ उसके उत्तर में मेरा कहना यह है कि ] तुम्हारे मरने पर तो यह अफेली एक गाय ही रक्षित होगी औप्रौर स्वय जीवित रहते हुए हे प्रजानाथ, तुम सदव पिता के समान उपद्रवों [दु खों] से, सारी प्रजाओो की रक्षा कर सकोगे [ इसलिए उस 'बहुजनहिताय' को छोडकर इस अकेली गाय की रक्षा के लिए अपने प्राण दे देने का तुम्हारा प्रस्ताव उचित नहीं कहा जा सकता है] ।।४१।। यहाँ [इस श्लोक में कवि का कहना यह है कि] यदि प्रासियों पर दया करने के लिए अ्रप्ने प्राणों का परित्याग करना चाहते हो तो वह भी उचित नहीं है। क्योंकि १ तुम्हारे मरने पर, २ यह अकेली गाय ही, ३ रक्षित होगी इसलिए [ १-अ्रनेक १ रघुवश २, ४८ ।

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कारिका १२ ] द्वितीयोन्मेष. [२१६

स्पदम्। जीवन् पुनः शश्वत् सदेव उपप्लवेभ्योऽनर्थेभ्यः प्रजा. सकलभूतधात्री- वलयवर्तिनी. प्रजानाथ पासि रक्षसि पितेवेत्यनादरातिशयः प्रथते । तदेवं यद्यपि सुस्पष्टसमन्वयोऽयं वाक्यार्थस्तथापि तात्पर्यान्तरमत्र प्रतीयते। यस्मात् सर्वस्य कस्यचित् प्रजानाथत्वे सति सदैव तत्परिरक्षरस्या करएमसम्भाव्यम्। तत्पान्रत्वगभमेव तदभिहितिम्। यस्मात प्रत्यक्षप्राणिमात्र- भक्त्यमाणगुरुहोमधेनुपाणपरिरक्षणापेक्षानिरपेक्षस्य सतो जीवतस्तवानेन न्यायेनकदाचिदृपि प्रजापरिरक्षणं मनागपि न सम्भाव्यत इति प्रमाणोपपन्नम्। तदितमुक्तम्- प्रमाणवत्वादायातः प्रवाहः केन वार्यते ॥४२॥ प्राणियो की रक्षा को ध्यान में न रखना, २-एक गाय की रक्षा को विशेष महत्व देना, और ३-उसकी रक्षा के लिए अपने वहुमूल्य प्रारगों को गँवा देना ] ये तीनो ही [ बातें ] अ््पनुचित है। औौर स्वय जीते रहने पर हे प्रजानाथ, सारी पृथिवी- मण्डल पर रहने वाली समस्त प्रजाओो को आप पिता के समान उपद्रवो से सदव. वचाते रह सकोगे। इससे [दिलीप के शरीर परित्याग रूप प्रस्ताव के प्रति] अ्रत्यन्त अ्रनादर प्रकाशित होता है। इस प्रकार यद्यपि इस श्लोक का समन्वय बहुत स्पप्ट रूप से हो जाता है। परन्तु फिर भी यहाँ [इस श्लोक वाक्य में] कुछ अन्य तात्पर्य [भी] प्रतीत हो रहा है। क्योकि किसी के भी प्रजाओ के स्वामी [राजा] होने पर उनकी रक्षा न करना उसके लिए सदा ही अनम्भव हैं। [अर्थात् प्रजा की सदा हो रक्षा करना राजा का अनिवार्य कर्तव्य है। यहाँ यदि राजा दिलीप अपने शरीर को गाय की रक्षा के लिए सिंह को दे देते है तो वे अपनी शेष प्रजा की रक्षा से विमुख होगे, जो किसी भी राजा के लिए उचित या सम्भव नहीं है] उसी [असम्भव अर्थ] की पात्रता [दिलीप में श्र्प्रा- जाती है उसी] को मन में रखकर [ कवि ने ] उस, [ प्रजानाथ पद अ्थवा सम्पूर्ण श्लोक] को कहा है। वयोंकि सामने दिखलाई देने वाले एक साधारण प्रासी [सिंह] के द्वारा साई जाती हुई गुरु की, यज्ञ की [ पवित्र ] गाय, के प्राणों की रक्षा में उदासीन होकर जीचित रहने वाले राजा से [गाय की रक्षा न कर सकने के समान ] इसी न्याय से कभी भी प्रजा की तनिक-सी भी रक्षा की सम्भावना [श्राश] नहीं हो सकती है यह बात स्पष्ट [प्रमाणसिद्न] हो जाती है। यही बात फही है- प्रमाणसिद्ध होने से [पूर्वपरम्परा से] प्राए् हुए प्रवाह को कौन रोक सकता है। [जब राजा एक साधारत मिंह से गाय की रक्षा नहीं कर सका वह आगे भी किसी आपत्ति से अपनी प्ज्को रक्षा नहीं बर सबेगा। यह बात स्पष्ट सिद्ध हैं। उसको रोका नहीं जा सकता है]।

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२२० ] [फारिका १२

इति। पत्राभिधानप्रतीतिगोचरीकृनाना पदार्थाना परम्परप्रतियोगित्व-

प्रयमपर पर्यायप्रकार: पदपूर्वाव्ववक्रता विदधाति, 'अलद्धारोज सम्कारमनो हारिनिवन्धन'। अत्र 'अरलद्वारीपसंन्कार' शब्दे तृतीयासमास पष्ठीममासश्च करणीय। तेनाथेद्वयमभिहितं भवति। अलद्ारण रूपकादि- नोपसस्कार शोभान्तराधान यत्तेन मनोहारि हृदयरज्जक निबन्धनमुपनिबन्धो

यहां [पर्यायवत्रता में] वाच्यार्य रूपसे प्रतीत होने वाले पदार्थों फी परस्पर प्रतियोगिता उदाहरण प्रत्युदाहरणा के न्याय से निफालनी चाहिए। अर्थात् पर्यायवय्रता के उदाहरणभूत किमी श्लोक में दिए हुए विशेप पदो की क्या उपयोगिता है औौर उनका क्या विशेप महत्त्व है यह बात उदाहरसा प्रत्यु- दाहरस के समान उस पद के स्थान पर उसके पर्यायवाची दूमरे शन्द को रखकर औौर हटाकर देखने से भली प्रकार मालूम हो जावेगी। उसी विशेप पद के रहने पर काव्य का सौन्दय वनता है उसको बदलकर उसका दूमरा पर्यायवाची शब्द रख देने पर उस प्रकार का चमत्कार नही रहता है। वहाँ उस पर्याय शब्द विशेष का प्रयोग ही चमत्कार का कारण है इसीलिए उसको पर्ययवपता वा प्रकार कहा गया है। - 'उदाहरण प्रत्युदाहरण न्याय' का भभिप्राय यह है कि जैसे व्याकरण के 'इको यणचि' आ्दि सूत्रो में अचि इति कि, अचि पद क्यो रखा है कि हल परे होने पर इक के स्थान में यणादेश न हो। इस प्रकार पदो के रखने का प्रयोजन निकाला जाता है। इसी प्रकार पर्यायवक्रता में उस पद विशेष के रखने का प्रयोजन निकलना चाहिए।

६-यह [ छठा ] औ्रर पर्याय [वक्रता] का भेद है जो 'पदपूर्वाद्धवक्रता' का कारण होता है। [कारिका मे] 'पलङ्धारोपसरकारमनोहारिनिबन्धन' [इस रूप में उसका निर्देश किया गया है]। यहाँ 'अलड्रारोपलस्कार' शब्द में तृतीया [तत्पुरुष] तथा षष्ठी [तत्पुरुष दो प्रकार का] समास करना चाहिए। उस से दो धर्थ निकल सकते हैं। १-रूपकादि अ्रलद्धार से जो उपसरकार अ्र्पर्थात् शोभान्तरा- धान [अन्य ही प्रकार के सौन्दर्य विशेष का उत्पादन ] उससे मनोहारी अर्थात् हृदयरञ्जक जिसकी रचना है।[ यह तृतीया समास मानकर एक प्रकार का अरर्थं

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कारिका १२ ] द्वितीयोन्मेष. [२२१

यस्य स तथोक्त। अपरलङ्कारस्योमप्ेक्षाटेरुपसंस्कार. शोभान्तराधानं चेति विगृह्य। तत्र तृतीयासमासपच्ोदाहरण यथा- यो लीलातालवृन्तो रहसि निरुपधिर्यश्च केलीप्रदीपः कोपकीडासु योऽस्त्र दशनकृतरुजो योऽधरस्यैकसेकः । त्कल्ये दर्परां यः श्रमशयनविघौ यश्चगएडोपधानं देव्याः स व्यापद वो हरतु हरजटाकन्दलीपुप्पमिन्दुः।४३।।

विन्यास. सर्वेपामेव पर्यायाणां शोभातिशयकारित्वेनापनिबद्ध। पष्ठीसमासपक्षोदाहरएं यथा-

हुआ। पष्ठी समास पक्ष में दूसरा अर्य इस प्रकार होगा कि] २-उत्प्रेक्षा आदि अल्द्वार का जो उपसस्कार अर्थात् शोभान्तर का आ्रधान इस प्रकार का विग्रह करके [दूसरा अर्थ होता है]। उनमें से तृतीया समास पक्ष का उदाहरसा जँसे- जो [ शिव के मस्तक पर का चन्द्रमा पार्वती के खेल में या] लीला के समय ताड़ के पखे का काम देता है, एकान्त में [ तेल वत्ती आदि] उपाधि के बिना ही 'सुरत क्रोड़ा' के समय के प्रदीप का काम देता है, त्रोध [ प्रदर्शन ] की कीडा में जो श्रस्त्र है, [ सुरतक्रोडा में शिव जी के द्वारा ] फाटने से कप्ट उत्पन्न होने पर जो अघर का शद्वितीय [आल्हाददायक] सेक है, प्रात काल [शकल्ये कल्ये प्रभाते प्रत्युषसि] के समय जो दर्पर का काम देता है और सुरतश्रम के वाद सोने के समय जो देवी पार्वती के गाल का तकिया होता है, शिव जी की जटा कन्दली का पुप्प रूप वह चन्द्रमा [तुम सब भक्त जनों की ] सुम्हारी विपत्तियों को दूर करे॥४३॥ यहाँ [ इम उदाहरण में ] ताड के पखे आदि के साथ [चन्द्रकला के ] कार्य प्रादि की समानता के कारख [ चन्द्रकला औौर तालवत्तादि के ] प्रभेदोपचार से रूपकालद्वार का विन्यास [पूर्वोक्त] सब ही पर्याय शब्दो के शोभातिशय के जनक रूप में उपनिवद्ध किया गया है। [अतएव यह रूपकादि अलद्धार से जहां उपसस्कार अर्थात् शोभान्तर का आधान किया गया है इस प्रकार का तृतीया समास पक्ष का उदाहरस दन जाता है। इसलिए इसे तृतीया तमास पक्ष के उदाहरस रूप में प्रस्तुत किया हँ ]। पष्ठो समास पक्ष का उदाहरसा जँसे-

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२२२ ] यपो पितिजी चित म् [फारिफा १२

देवि त्वन्मुखपकनन शशिन शोगातिरम्कारिणा पड्याध्जानि विनिजितानि सहसा गन्दन्ति निन्दायताम॥४४॥ अ्रत्र स्वरममप्रवृत्तसायसमयममुचिता सरोरुहागा वि्छायताप्रतिपत्ति र्नायकेन नागरकतया वल्लभोपलालनाप्रवृत्तेन तन्निदशनोपक्रमरमणीय- त्व-मुसेन निर्जितानीवेति प्रतीयमानो परेचालवारकारित्वेन प्रनिपागते। एतदेव च युक्तियुक्तम। यस्मात सर्वस्य कस्यचित पत्ाजस्य गोभा गशावशोभया तिरस्कप्रतिपद्यते। तवन्मुखपन्जन पुन शशिन शोभातिरम्कारिया न्यायतो निर्जिंतानि सन्ति, विच्छायता गच्छन्तीवेति प्रतीयमानस्योत्प्रेचालनणास्या- लद्कारस्य शोभातिशय' समुल्लास्यते ॥१२॥ हे देवि देखो चन्द्रमा को शोभा को तिरस्कृत करने वाले तुम्हारे मुस फमल से हारे हुए कमल मुर्भाए [ कान्तिहीन हुए] जा रहे हैं।४४।। यहाँ सायद्काल के समय स्वाभाविक रूप से होने वाली कमलो की फान्ति- होनता की प्रतीति को, प्रियतमा नायिफा की सुशामद मे लगे हुए चतुर नायक के द्वारा उन [कमलो ] के उपमान वनने योग्य सुन्दर [निदशंनोपमरमराय] तुम्हारे मुख से पराजित-से हो गए हो इस प्रकार प्रतीयमान उत्प्रेक्षा अलद्गार केउत्पादक रूप से प्रतिपादन फी जारही है। और यह ही युक्तिसङ्गत भी है। षयोकि [ ससार के ] सभी कमलो की शोभा चन्द्रमा की शोभा से तिरस्कृत हो जाती हैं। [चन्द्रमा का उदय होने पर सभी कमल बन्द हो जाते है] लेकिन चन्द्रमा की शोभा फो भी तिरस्फृत करने वाले तुम्हारे मुख कमल से [ शेष सव पङ्दज ] अप्रपने आ्र्प्राप [ न्याय ] उचित रूप से पराजित हो गए है औ््रर मलिनता को [ कान्तिहीनता को ] प्राप्त-से हो रहे है। इस प्रकार प्रतीयमान उत्प्रेक्षा रूप अलद्धार की शोभा का पतिशय प्रकाशित होता है। प्रथमोन्मेष में मुख्यत छ प्रकार की वक्रताओ का प्रतिपादन १६वीं कारिका में किया था-उनमें प्रथम 'वर्णविन्यासवक्रता' के बाद द्वितीय स्थान 'पदपूर्वातवकरता' का था। इसके फिर १-'रूढिवंचित्र्य वक्रता', २-'पर्याय वक्ता' और ३-'उपचार वक्रता' ४-'विशेषण वकता', ५-'सवूति वक्रता', ६-'वृत्तिवचित्र्य वक्र्ता', ७-'लिङ्ग्वंचित्रय वकता' और द-क्रियावचित्र्य वक्रता' ये आठ पद पदपूर्वार्द्ध वक्रता के किए थे इनमें 'रूढ़िवचित्र्यवक्रता' के चार भेदों तथा 'पर्यायवकता' के छ भेदो का यहां तके विस्तार पूर्वक विवेचन समाप्त किया। अव 'पदपूर्वार्द्ध वत्रता' के तती 'उपचार- वफ्ता' का निरुपण प्रारम्भ करेंगे।

नही है। १ रत्नावली १, २५। २ पद्धजस्य शशाद्दशोभा तिरस्कारिता पाठ ठीक

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कारिका १३-१४] द्वि तीयोन्मेष: [२२३

एवं पर्यायवक्रतां विचार्य क्रमसमुचितावसरामुपचारवक्रतां विचारयति- यत्र दूरान्तरेऽन्यस्माद् सामान्यमुपचर्यते। लेशेनापि भवत् काश्िद् वक्तुसुद्रिक्तवचिताम् ॥१३।। यन्मूला सरसोल्लेखा रूपकादिरलंकृतिः । उपचारप्रधानासौ वक्रता काचिदुच्यते ॥१४॥ 'असौ' काचिदपूर्वा 'वक्रतोच्यते' वक्रभावोऽभिधीयते। कीदशी 'उपचार- प्रधाना'। उपचरणमुपचारः, स एव प्रधानं यस्याः सा तथोकता। कि स्वरूपा च, यत्र यस्यामन्यस्मात्पदार्थान्तरात् प्रस्तुताद् चरर्यमाने वस्तुनि 'सामान्यमुप- चर्यते' साधारणा धर्मः कश्चिद् वक्तुमभिप्रेतः समारोप्यते। कस्मिन् वर्यमाने वस्तुनि 'दूरान्तरे'। दूरमनल्पमन्तर व्यवधानं यस्य तत्तथोक्त, तस्मिन्। ४-उपचार वक्रता [२ भेद] इस प्रकार पर्यायवकरता का विचार फरके श्रव क्रम के अनुसार प्राप्त होने वाली 'उपचारवक्रता' का विचार करते हैं। जहां अ्रन्य [ शर्थात् प्रस्कुत वर्ण्यमान पदार्थ] से अ्रत्यन्त व्यवहित [श्रप्रस्तुत] ददार्थ में रहने वाली [ नाम मात्र की] तनिक सी भी समानता को किसी धर्म के अ्रतिशय [उद्रिक्तवुत्तिता] को प्रतिपादन करने के लिए उपचार या गौी वृत्ति से वर्रगन किया जाता हैं [उसको 'उपचारवक्रता कहते है] ॥१३॥ औौर जिसके फारण से रूपक आदि अलद्धार सरसता को प्राप्त [सरस उल्लेख ] हो जाते हैं, उपचार [ सादृश्यमूतक गौणी लक्षणा वृत्ति] के प्रधान होने से उसको 'उपचारवतता' कहा जाता है ॥१४॥ वह कोई अपूर्व वत्रता पर्थात सौन्दर्य [उपचारवकता शब्द से] कहा जाता है। कैसी कि उपचार प्रधान। उप अर्थात् साृश्य वश गोए चरस अर्यात् व्यवहार को उपचार कहते है। वह ही जिसमें प्रधान हो वह उस प्रकार की [ उपचार प्रधान] हुई। किस प्रकार की [वक्रता उपचारवक्रता कहलाती हं फि] जहां जिस [ वक्रता] में श्रन्य अर्थात् प्रस्तुत होने के कारण वर्ण्यमान पदार्यान्तर में [ अरप्रस्तुत पदार्थ के वक्ता के लिए अभिप्रेत ] किसी सामान्य धर्म का उपचार से आरोप किया जाता है। किस वर्ण्यमान वस्तु में [आरोपित किया जाता है कि] 'त्यन्त भिन्न' [श्त्यन्त अन्तर चाले पत्यन्त भिन्न वस्तु] में। दूर अर्रथात् अ्र्त्यधिक अ्रन्तर अरर्यात् व्यवधान जिसका हो वह उस प्रवार का [दूरान्तर वस्तु ] हुआ्र्रा। उस [शर्ात् वर्ण्यमान प्रस्तुत वस्तु से अ्रत्यन्त भिन्न अ्रप्रस्तुत वस्तु] में [किसी धर्म विशेष के अतिशय को बोधन करने के लिए नाममान्न के तनिक से भा सामान्य धर्म का वसन किया जाता है उसका नाम 'उपचारवत्रता' है]। इस पर पूर्वपक्षी शध्धा यह करता है कि]-

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२२६ ] वक्रोवितिजीवितम् [फारिका १३

कारकस्वरूपं चेत्युभयात्मर्क यद्यपि वरर्यमान वम्तु तथापि देशकालव्यववाने- नात्र न भवितव्यम्। यम्मात्पदार्यानामनुमानवन सामान्यमात्रमेव श्व्दे- विपयीकर्तु पायते, न विशेष, तत्क्थं दरान्तरत्वमुपपद्यने। सत्यमेतत्। किन्तु 'दूरान्तर' शब्दो मुख्यतया देशकालविपये विप्रकुर्षे प्रत्यासत्तिविरहे वर्तमानोडयुपचारान स्वमावचिप्रकर्ष वर्तते। सोरडयं न्वभाव- विप्रकर्षो विरुद्व वर्मान्यासलन्षण पदार्यानाग। यथा मृतिमन्त्रममूर्तत्वापेनया, द्रवत्व च घनत्वापेक्षया, चेतनत्वमचेतनतापेनयेति। कीटक तत्मामान्यम 'लेशनापि भवन', मनाड्मात्रेगापि मत्। किमर्थम,

कालकृत व्यवधान भी नहीं वन सकता है। [तब फारिकाकार 'दूरान्तरे' इस पद का प्रयोग कसे फर रहे है। यह पूर्वपक्षी का प्रश्न है]। इस पर एकदेशी जो उत्तर दे सवता है उसको प्रस्तुत कर उसका सण्डन करते है। यद्यपि वर्ण्यमान वस्तु तरिया स्वरप औरर कारक स्वरप दोनो प्रकार की हो सकती है फिर भी उसमे देशकृत अ्रथवा कालकृत व्यवधान सम्भव नहीं है। ययोकि अ्रनुमान प्रमाण के समान शब्दो से सामान्यमात्र का ग्रहण हो सकता है विशेष का ग्रहश [शब्द प्रमाण से]नहीं हो सकता है। [इमलिए केवल शब्द प्रमाण से उपस्थित होने वाले कवि कल्पना प्रसूत श्र्थों में दैशिक प्रथवा फालिक व्यवधान सम्भव नहीं है]। तब [कारिकाकार ने] 'दूरान्तरे' यह फँसे कहा हैं। [उत्तर सिद्धान्तपक्ष] ठीक है। किन्तु दूरान्तर शन्द मुस्यतया देश-काल विषयक व्यवधान का बोधक होने पर भी उपचार से स्वभाव के व्यवधान का बोधक होता है। और पदार्थों का वह स्वभाव विप्रकष अर्थात् व्यवधान विरुद्ध धर्म के अध्यास रूप होता है। जैसे मू्तिमत्व अ्रमूतत्त्व की त्रपेक्षा, द्रवत्व घनत्व की अपेक्षा और चेतनत्व अ्रचेतनत्व की अपेक्षा से [दूरान्तर युक्त अ्रथवा अ्र्प्रत्यन्त व्यवधानयुषत हं। यहां तक 'दूरान्तर' शन्द की व्याख्या हुई ]। वह कँसा सामान्य है [ जो दूरान्तर युक्त वस्तु में उपचार से प्रयुक्त होने पर उपचारववता को प्राप्त करता है ] 'लेशेनापि भवत्' अर्थात नाममात्र को तनिक-सा भी विद्यमान हो। किसलिए [ उपचार से कथित होता है कि ] किसी अपूर्व उद्रिक्तता को बोधन करने के लिए अर्थात् श्रतिशययुक्त स्वभाव का कथन करने के लिए। जसे-

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कारिका १३] द्वितीयोन्मेष [२२७

स्निग्धश्यामल कान्तिलिप्तवियतः॥४५।।१ अ्त्र यथा बुद्धिपूर्वकारिण केचिच्चेतना वर्सच्छायातिशयोत्पाटनेच्छया कnन विद्यमानलेपनशक्तिना मूर्तैन नीलाढिना रख्जनद्रव्यविशेषेण किब्िदेव लेपनीयं मूर्तिमद् वस्तु वस्त्रप्रायं लिम्पन्ति, तद्वदेव तत्कारित्वसामान्य मानड्-मात्रेणापि विद्यमान कामप्युद्रिकतवृत्तितानभिधातुमुपचारात स्निग्ध- श्यामलया कान्त्या लिप्तं वियद् दयौरित्युपनिबद्धम्। 'स्निग्ध' शब्दोऽयुपचार- चक्र एव। यथा मूर्तं वस्तु दर्शनस्पर्शनसवेद्यस्नेहगुणयोगात् स्निग्धमित्युच्यते, तथैव कान्तिरमूर्ताSप्युपचारात् स्निग्धेत्युक्ता।

अपनी चिकनी और कृप्वर्ण कान्ति से आ्काश को लिप्त [व्याप्त] करने वाले [मेघ]।।४ ५।।

यहां [भेघो की स्निग्घता तथा श्यामलता के अतिशय को वोधन करने के लिए आकाश को 'लिप्त' लीपा हुआ कहा है] जैसे कोई चेतन [मनुप्य वस्त्र आरदि में ] रग की गहराई [ वरंच्छाया ] के अरतिशय को उत्पन्न करने की इच्छा से, जिसमें कि [ लीपने ] लेपन की शक्ति विद्यमान है ऐसे किसी रगने वाले नील आदि मूर्त द्रव्य से, मूर्तिमत् लेपनीय वस्तु वस्त्रादि को रग देते हैं, [लीप देते हं ] उसी प्रकार [मेघो में आ्ररकाश को] रग देने रूप सामान्य के नाममात्र को विद्यमान होने पर भी किसी अ्पूर्व [ श्यामलता के ] श्रतिशय को बोधित करने के लिए उपचार से 'स्निग्ध तथा श्यामल कान्ति से आकाश को लिप्त कर देने वाले' [ मेघ ] इस रूप में [ कवि के द्वारा] उपनिबद्ध हुआ है। [इस प्रकार यहाँ लिप्त शब्द का प्रयोग उपचार से हुआ्र्प्रा है। अरतएव यह उपचार- वक्रता का उदाहरस हं] । इसी प्रकार 'स्निग्घ' शब्द भी यहाँ उपचारबक [उपचार- वत्रता से युवत] ही है। जैसे कोई मूर्तत वस्तु देखने तथा न्प्श में अनुनव करने योग्य स्नेहन रूप गुण के सम्बन्ध से 'स्निग्व' कही जाती है उसी प्रकार [ यहां] अ्मृर्त्ता कान्ति भी 'स्निग्धा' कही गई है। [इसलिए 'स्निग्या' शव्द का प्रयोग भी उपचार मूलक होने से उपचारवमता का उदाहरण कहलाता है]।

१ महानाटक ५, ७, ध्वन्यालोक पृ० ६६, काव्यप्रकाश उदा० ११२, प्रतिहारेन्दु राज उद्भट, ६६ पर उबृत तथा पूर्व पृ० २, २७ पर इम ग्रन्थ में भी उद्ध व।

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२८] वकोपितिजीवितम् [फारिका १३

यथा वा- गच्छन्तीना रमणवसत योपिता तन्न नक्त रुद्धालोके नरपतिपथे मृचिभेर्ध स्तमोभि: । सौदामिन्या कनुनिरुपन्निग्धया दर्शयोर्वी तोयोत्सर्गस्तनितमुसरो मा न्म भूविक्लवान्ता ।।४६।।' त्रत्रामूर्तानामपि तमसामतिव्राहुल्याद घनत्वान्मूर्तसमुचितं सूचिभेद्य- वमुपचरितम्। यथा वा- गअ्ण च मत्तमेह धारालुलिअप्जुएाइ शर चसाइ। शिरंह कारमित्का हरति णीलाओ वि सिसाओ्रो।४७॥२

अ्रथवा जैसे [उपचारवकता पा औरौर उदाहरण निम्न श्लोक में पाया जाता ह। यह श्लोक कालिदास के मेघदूत का ३७वाँ श्लोक हैं]।' वहां [उज्जयिनी नगरी में] रात को अरपने प्रिय के घर को जाती हुई स्त्रियों [अर्थात् अ्रभिसारिकाओ] को जव राजमार्ग में [बरसात की अ्रँधेरी रात को ] सूचीभेद्य गहन श्रन्घकार में दृष्टि से कुछ दिसलाई न दे पडे उस समय फसौटी पर की सोने की रेखा के समान स्निग्ध विद्युत-रेखा से [ उनको मार्ग की ] पथिवी को दिखलाना। किन्तु वरस और गरज कर [अ्रधिक] आ्रवाज न करना जिससे कि वह भयभीत हो जाय ।४६।। यहाँ [ तेज के अ्रभाव रूप तम के ] श्रमूत्तं अ्रन्धकार के बाहुल्य से मूतं पवार्थ के योग्य सूचिभेद्य का [अ्रन्वकार में ] उपचार से प्रयोग किया गया है। [सौदामिनी अर्ात् बिजली के लिए स्निग्ध विशेषण का प्रयोग भी उपचारवकता में आ्रा सकता हैं]। अ्रथवा जैसे [उपचारवकता का तीसरा उदाहरण]- यह श्लोक 'गौडबहो' नामक प्राकृत भाषा के महाकाव्य से लिया गया है।

१ मेघदूत ३७ । २. गोडवहो श्लोक ४०६ ध्वन्यालोक पृ० १०२, व्यक्ति विवेक पृ० ११६, जयरथ पृ० ८ और मािक्यचन्द ने पृ० २५ पर उद्धत किया है।

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कारिका १३ ] द्वितीयोन्मेष: [२२ह

[गगनञ्च मत्तमेघं घारालुलितार्जुनानि च चनानि। निरक्कारमगाड्का हरन्ति नीला अपि निशाः ॥ इति संस्कृतम् ] अ्रत्र मत्तत्वं निरहद्कारत्वं च चेतनवर्मसामान्यमुपचरितम्। सोडयमुपचारवक्रताप्रकार: सत्कावप्रवाहे सहस्त्रशः सम्भवतीति सहृदयै. स्वयमेवोलेक्षणीय। अतएव च प्रत्यासन्नान्तरेSस्निन्नुपचारे न वक्रताव्यवहारः । था 'गौर्वाहीक' इति। [ न केवल ताराओं से भरा हुआ निर्मल आकाश ही अर्पितु ] मदमाते उमड़ते मेघों से आच्छादित आकाश [ भी, न केवल मन्द-मन्द मलय मारुत से भान्दोलित आम्त्र वन ही अपितु वर्षा की ] घाराओ से आन्दोतित अर्जुन वृक्षों के बन [मी, और न केवल चन्द्रमा की उज्ज्वल किरसों से घवलित चांदनी रातें ही मन को लुभाने वाली होती है अपितु सौन्दर्य से रहित ] गर्व रहित चन्द्रमा वाली [वर्षाकाल की अ्रन्धफारमयी] काली रातें भी मन को हरने वाली होती है॥४७।। यहाँ 'मतत्व' और 'निरहृङ्धारत्व' चेतन [ मनुष्य आदि प्रासणी ] का सामान्य ~; धर्म उपचार से [ मेघ और चन्द्रमा आ्रादि में ] आ्प्रारोपित हुआ््र है। यह श्लोक ध्वन्यालोक में 'अत्यन्त तिरम्कृत वाच्य ध्वनि' के उदाहरस में दिया गया है। और वहाँ भी इन 'मत्त' तथा 'निरहद्कार' पदों में ही 'प्रत्यन्त तिरस्कृत वाच्य ध्वनि' माना हैं। [ध्वन्यालोक पृ० १०२]। यह 'उपचारवत्रता' का प्रकार उत्तम कवियों की परम्परा में सहस्त्रो प्रकार से हो सकता ह इसलिए [ उसका पूर्ण रूप से वर्शन सम्भव नहीं है ] सहृदय पाठकों को स्वय समन लेना चाहिए। मूल कारिका में कारिकाकार ने वर्ण्यमान पदार्थों के 'दूरान्तरे' भत्यन्त व्यवधान या विरुद्ध धर्म का आरोप होने पर ही 'उपचारवकता' होती है यह कहा है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि- थोड़ा-सा [साधारण-सा] अन्तर होने पर इस उपचार में वतता [ सौन्दय ] का व्यवहार नहीं होता है। जैते 'गौर्वाहीफ' इस [ प्रयोग ] में। 'गौर्वाहीक' अर्यात् वाहीक देशवाती पुरुष गाय के समान मूखं या सीधा होता है। यहां 'वाहीके' के लिए 'गौ' शब्द का प्रयोग उपचार या सादृश्यमूलक गोणी लक्षखा से होता है। इसी प्रकार 'सिंहो माणवक' मे वालक के शोर्य, कोर्य भादि गुखो को देखकर उसके लिए 'सिंह' पद का प्रयोग भी सादृय्य मूलक नौली लक्षणा से होने के कारण उपचारात्मक प्रयोग है। पर्न्तु इन प्रकार के उदाहरणी में सपचारवशता नही मानी जाती है 11 95।

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२३० ] वक्रोवितिजीवितम् [कारिका १४

इटमपरमुपचारवक्रनाया स्वरूपम, 'यन्मूला मरमोल्लेखारुपकाटिर- लंकृति'। या मूल यस्या गा तयोकता। र्पकमाठियस्या सा तयोक्ता। का सा अलकृतरलकरण र्पकप्रभृतिरद्वारविन्द्वित्तिरित्वये। कीठणी 'सरसोल्लेखा'। सरस सान्वाद मचमत्कृतिस्ल्लख समुन्मेपो यस्या सा तथोक्ता। समानाविकरणयारत्र हेतुहेतुमद्भाव । यथा- त्र्रतिगुरवी राजमापा न भद्त्या । इति॥४८॥ यन्मृला सती रुपकादिरलकृति सरसोल्लेसा। तेन रुपकाटेरलङ- रएकलापस्य सकलस्यैवापचारवक्रता जीववतमित्यये।

२-उपचारवत्रता का यह एक और भी [दूसरा।स्वरप है जिसके कारए रूपक आदि अ्रलद्धारो का उल्लेख [औौर अ्रधिक] रसमय हो जाता है। जो [उपचारवयना] जिस [रूपक प्र्रादि अ्र्प्रलद्धारो की सरसता] का मूल है वह उस प्रकार की [यन्मूना] हुई। रूपक जिसके आदि मे हे वह उस प्रकार की [रपफादि अ्लद्धार रप] हुई। वह कौनसी कि अलद्धार अ्रलड्कृति अर्यात् रूपक इत्यादि श्रतद्गारो की शोभा। फंसी [हो जाती हे कि ]'सरसोल्लेखा' सरस अप्र्थात् प्ररास्वेद युक्त चमत्कारयुपत हं उल्लेख वर्णन या समुन्मेष जिसका, वह उस प्रकार की [सरसो-लेसा अलकृति] हुई। यहाँ [सरसोल्लेखा अलकृति इस, वावय में 'सरसोल्लेखा' और 'भलकृति' ये दोर्ना पद प्रथमा के एक वचन होने से समानाधिकरण पद है। उन दोनो समानाघिकरण पदों में सामान्यत अ्रभेदान्वय से विशेष्य विशेषसभाव सम्बनध होता है। परन्तु यहां उन दोनों समानाघिकरण पदों में कारण कार्य भाव [सम्बन्ध] है। जैसे- -अत्यन्त महुगा [भारी] राजा फा अरनन [माप का शरर्थ उरव अ्र्न्न विशेष है। परन्तु यहाँ वह अरन्न सामान्य का बोधक है] नही खाना चाहिए ॥४८॥ -यहां 'अ्रतिगुरवो' औ्र्प्रौर 'राजमापा' यह दोनो समानाघिकरण पद है परन्तु उन दोनो मे विशेष्य विशेपण भाव मात्र नही अपितु कारण कार्य भाव सम्बन्ध है। राजों के उरद या राजा का अ्न्न नहीं खाना चाहिए। क्योकि वह बहुत भारी बहुत महँगे, बहुत कष्टदायक होते हे। [इसी प्रकार यहां]'यन्मूलक' होकर [जिस उपचारवक्रता के कारण रूपकादि] अलद्धार सरसोल्लेख हो जाता है। [इसमें 'उपचारवकरता' कारण है, औ्रर रूपकादि अलद्धार की सरसना कार्यरूप है ।] इसलिए उपचारवक्रता रूपक आदि सभी अलद्धारों [के सौन्दर्य] का प्राएस्वरूप है यह अ्र्परभिप्राय हुआना।

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कारिका १४ ] द्वितीयोन्मेष. [२३१

नतु च पूर्वस्मादुपचारवक्रनाप्रकारावेतन्य को भेद ? पूर्वन्मिन स्वभाव- विप्रकर्पात् सामान्येन मनाड्मात्रमेव सान्य नमाश्रित्य नार्तिशयत्व प्रति- -आाद्यितु तद्वममात्राध्यारोप प्रवर्तते । एतन्मिन पुनरदूर वप्रकृप्टसादृश्य- तत्वमेवाध्यारोप्यते। यथा- सत्स्वेव कालश्रवणोत्पलेपु सेनावनालीनिषपल्लवेपृ। गाम्भीर्यणतालप एीय्वरेपृ खङ्गपु को वा भबता सुरारि।।४६।l त्रन्न निवन्धन तत्वमध्यारोपितम्। कालश्रव शोत्पला टिसा दश्य जनिन प्रत्यसतिविहि तम भेदोपचार-

[प्रश्न ] अ्पच्छा पहिले [ कहे हुए 'पत्र दूरान्तरेऽन्यत्मात सामान्यमुपचर्यते' इत्यादि रूप] उपचारवक्ता के प्रकार से इन [यन्मला सरसोल्लेला इत्यादि रूप] का क्या भेद हैं ? [उत्तर] पहिले [कहे हुए, प्रकार] मे न्वभाव का भेद [तरिप्रकर्ष] होने से सामान्य रूप से नाममात्र के तनिक से साम्य को लेकर ही अ्र्पतिशयत्व के प्रतिपादन के लिए केवल उस धर्म [लिप्तन्वादि] का अध्यारोप किया जाता है। और इस [बाद में कहे हुए 'यन्मूला सरसोल्लेखा' इत्यादि हितीय प्रक्ार] में अ्रदर विप्रकृष्ट अर्यात घोडे-से प्न्तर के कारस सादृयय मे उत्पन्न प्रत्यासति के योग्य अरभेदोपचार [निमित्त] से [ केवल उस पदार्थ के धर्म मात्र का ही नहीं अरपितु] उस [पदार्थ] का ही आरोप किया जाता है। जँसे- काल [यमराज] के कान के कमतो [ आभपण र्प ], अ्रथवा सेना रूप वन पक्ति के विद पत्लव रूप, अ्रथवा गाम्भीय रूप पाताल के मर्पराज [रूप] तलवारो के दिद्यमान होने पर तुम्हारे सामने वह राक्षन कया है। [ युछ भी नहीं। तुम्हारी सेना की तलवारो से उसका तुन्न्त नाश कर दिया जायगा] ॥४६॥ यहाँ यमराज [काल] के शवणेत्पल पादि के [ साथ तलचानो के ] सादृश्य के कारण शभेदोपचार मे [सड्गो में] उसी [काल के अदशोन्पलन्व आरादि] का छारोप किया गया है। इसका अभिप्राय यह हुआ वि उपचारवकर्ता की त्पर जो दो प्रकार को व्याल्या की गई है उनमें ने प्रथ्म व्यास्या के अनुनार 'उपचारचत्रना' मानने पर वेवन किनी पदार्थ के धर्ममाघ्र का आरोप किया आता है। और दनगे व्यात्या के अनुनार 'उपचारवघा' मानने पर धर्ममात का नहीं अदितु उम पदार्य वा हा

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२३२ ] वक्रोपितिजीवितम् [कारिका १४

वक्रतैव जीवितत्वेनलद्यते । तथा च किमपि पदार्थान्तर प्राधान्येन प्रतीयमानतया चेतसि निवाय तथाविधलक्षणासाम्यसमन्वय समाश्रित्य पदार्थान्तरमभिधीयमानता प्रापयन्त प्रायश कवयो दश्यन्ते। यथा- त््रनर्घ: कोऽप्यन्तस्तव हरिण हेवाक महिमा स्फुग त्येकस्येव त्रिभुवनचमत्काग्जनक । यदिन्दोमृर्तिस्ते दिवि विहरणारययवमुधा सुधासारस्यन्दो फिरशानिकर शप्पकवल ॥५०।।' अध्यागेप किया जाता है। इस प्रकार उम आरोष्यमाण औप्रर प्राेप विपय में अ्रभेद व्यवहार होता है। यही रूपकालक्वार का बीज है। [कारिका के रूपकादिरलफृति पद में ] आव्ादि [पद ] के ग्रहस से 'भ्रप्रस्तुत प्रशसा' अलद्धार के अन्योषित रूप भेद विशेष में 'उपचारवकता' ही उसके प्राण स्वरूप प्रतीत होती है। जैसे [ उपचारवत्ता ] के द्वारा किसी [ सत्पुरुष आदि रूप श्र्रप्रस्तुत ] अ्रन्य पदार्थ को प्रधानतया प्रतीयमान रूप से मन में रखकर और्रर [ उन दोनो के ] उस प्रकार के [व्शित] लक्षणो की समानता के समन्वय को अ्रवलम्वन करके अ्रन्य [अप्रस्तुत वृक्ष आदि ] पदार्थ को अर््भिघीयमान [ प्रस्तुत सा] वना कर [अन्योषित रूप से ] वर्णन करते हुए कवि प्राय देखे जाते है। [ श्रर्थात् अ्र्प्रन्योवितयो में फवि अभिधीयमान अर्रप्रस्तुत रूप से किसी श्र्य वस्तु का वर्शन करता है परन्तु उसका वास्तविक अभिप्राय किसी अ्न्य प्रस्तुत वस्तु की स्तुति अ्रथवा निन्दा के प्रतिपादन में होता है। इस प्रकार की अन्योवितयो की शैली कवियो में बहुतायत से पाई जाती है। वह सब 'उपचारवत्रता' का ही भेद हं यह ग्रन्थकार का अभिप्राय है।] जैसे- [ यहाँ चन्द्रमा में के हरिस को सम्वोधन करके कवि कह रहा है कि ] हे हरिए, केवल एक तुम्हारे भीतर तीनों लोकों को आश्चर्य में डालने वाला कोई अपूर्व प्रभाव प्रतोत होता है कि जिसके कारण आ्र््रकाश में चन्द्रमा की मूर्ति तुम्हारे विहरस के लिए वन भूमि बनी है और सुधासार को प्रवाहित करने वाली [ चन्द्रमा की] किरणों का समूह [तुम्हारे खाने के लिए] घास का ग्रास बना है॥५०॥ १. पहिली दो पक्तियाँ अमरचन्द्र ने काव्यकल्पलता पृ० ५१ पर तथा माशिक्यचन्द ने पृ० २० पर उद्धत की हैं।

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कारिका १५ ] द्वितीयोन्मेपः [२३३

अन्र लोकोत्त रत्वलक्षण मुभयानुयायसामान्यं समाश्नित्य्राधान्येन विवत्षितस्य वस्तुनः, प्रतीयमानवृतेरभेदोपचारनिवन्धनं तत्वमध्यारोपितम।

कत्र प्रतीयमानत्वमपरस्मिन् स्वरूपभेदस्य निवन्धनम्। एतच्चोभयोरपि स्व- लक्षणव्याख्यानावसरे समुन्मील्यते ॥१४॥। एवमुपचारवक्रतां विवेच्य समनन्तरप्राप्तावकाशां विशेपणवक्रता विविनक्ति- विशेषसास्य माहात्म्याद् क्रियायाः कारकस्य वा। यत्रोल्लसति लावएयं सा विशेषसवक्रता ॥१५॥ सा विशेपणचक्रता विशेपवक्रत्वविच्छिवित्तिरभिघीयते। कीदशी

[इस इलोक में अभिधीयमान रूप से चन्द्रमा में के हरिण का वर्णन किया गया हैं परन्तु उससे लोकोत्तर प्रभाव वाले किसी अन्य व्यक्ति का वर्णन करना कवि का मुख्य थभिप्रेत शर् है। इसी को अ्रन्योषित फहते हैं] यहाँ [प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत] दोनों में तम्बद्ध लोकोत्तरत्व रूप सामान्य का अ्रवलम्वन करके प्रतीयमान रूप विवक्षित वस्तु में अ्भेदोपचारमूलफ [लोकोत्तरत्व युयत पुरुषविशेष में ] उस [हरिशात्व] का आरोप कर दिया गया है। इस प्रकार [रूपक तथा श्रप्रस्तुत प्रशसा रूप अ्रन्योित] इन दोनो अलद्धारो में 'उपचारवत्रता' रूप जीवनाधायक [तत्व] के, समान होने पर भी एक जगह [घर्थात् रूपकालद्धार में ] वाच्यत्व औरर दूसरी जगह [अ्रप्रस्तुतप्रशसा अलद्धार में] प्रतीयमानत्व [उन दोनों के] स्वरूप भेद का फाग्स है। यह बात [रुपक तथा अप्रस्तुतप्रशसा अलद्धार] दोनों के अपने अपने लक्षसो के अवसर पर ही [और पधिक या पूरसर्प से] स्पष्ट हो सकेगी ॥१४। विशेषसवक्ता [ पदपूर्वद्विंवयता का भेद मे प्रकार ] इस प्रकार 'उपचारवकता' का विवेचन करके उसके बाद शवसर प्राप्त 'विशेषणवतता' का विवेचन करते है। १-जहाँ विशेषण के माहात्म्य या प्रभाव से तरिया प्रयवा कारक का सौन्दर्य प्रस्फुटित होता हूँ वह 'विशेषसवत्रता' [कहलाती] है। वह 'विशेषणावकता' अर्थात विशेषणवत्रता की शोभा कहलाती है। कँसी

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२३४ ] वक्रोपितिजी वितम् [कारिका १५

यत्न यस्या लावरयमुन्लसति रामगीयकमुद्धियने। कम्य-'कियायाः कारकम्य वा'। क्रियालक्षसस्य वस्तुन कारकलन्तगाम्थ वा। कम्मान-'विशेषसम्य माहात्म्यात्'। एतयो प्रत्येक यद विशेषण भेढक, नम्य माहात्म्यात् । पदार्थान्तरस्य सातिशयत्वात। कि तत्सातिशयत्वम ? भावस्वभावमोकुमार्य- समुल्लासकत्व मलद्वारच्छायातिशयपापकत्वञच । यथा- श्रम जलसेकज नित नव विलिसितन सपद दा हमृहिता वल्लभरभसलुलितर्लालताल कव लय चयार्ध निन्हुता। म्मरर सवि विध विहित सुरतक्र मपर्मिलन्र पा ल स। जयति निशात्यये युवतिहक् तनुमधुमदविशदपाटला।।५?।।

कि जहाँ, जिसमे, सौन्दय प्रस्फुटित होता ह, रमसीयता नियर थाती हैं। किसकी? क्रिया की अ्रथवा कारफ की। अर्धात् किया रप वस्तु की अ्रथवा फारक रप वस्तु की। किससे [प्रस्फुटित होती है] विशेषण के माहात्म्य मे [घिया और कारक] इन दोनों का जो विशेपस पर्थात् भेदक धर्म उसके माहात्म्य या प्रभाव से। दूसरे- पदार्थ [अर्थात विशेष्य] के अतिशययबत हो जाने से। वह कौन सा सतिशयत्व हैं [जो विशेषण के माहात्म्य से प्रस्फुटित होता है। यह प्रश्न है। उसका उत्तर है कि वह अतिशय दो प्रकार का होता है एक तो] मदार्थ के स्वाभाविक सौन्दय के प्रकाशकत्व रूप दूसरा अरद्धार के सौनदर्यातिशय का परिपोषकत्व रू्प । [१-स्वाभाविक सौन्दर्य के प्रकाशकत्व का उदाहरए] जसे- [प्रियतम के सम्भोग के समय] नए किए हुए नख पदो में सुरतजन्य [खारी, नमकीन] श्रमजल अरर्थात् पसीने के लगने से उत्पन्न जो जलन उससे वन्द-सी हई जाती हुई [दृष्टि, उसी सम्भोग काल मे ] प्रियतम के द्वारा जोर से पकडकर खींचने के कारण खुले हुए केशपाश से आधी ढॅकी हुई [सम्भोग काल में ही] कामोप- भोग के आनन्द में परवश होकर किए हुए सुरतफ़म में अनेक प्रकार से दबाए या मसले जाने की लज्जा से अलसाई हुई और हलके से सुरा के मद से कुछ सपे कछ लाल-सी, युवतियों की प्रात काल के समय की आँख सर्वोत्कर्ष से युक्त होती है॥।५१। यहां प्रस्तुत अ्र्पनेक विशेषणो के माहात्म्य से सम्भुक्त युवती के नेत्रो का स्वाभाविक सौन्दर्य बडे मनोहर रूप से प्रकाशित हो रहा है।

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कारिका १५ ] द्वितीयोन्मेप. [२३५

यथा वा- कसन्तरालीनकपोल भित्तिर्वाप्पोच्छलत् कूणित पत्रलेखा। श्रोत्रान्तरे पिसिडतचित्तवृत्तिः श्रृणोति गीतव्वनिमत्र तन्वी ॥५२। यथा वा-

प्रशमस्य मनोभवस्य वा हृदि कस्याप्यथ हेतुता ययुः ॥५३॥। क्रिया विशेषणवक्रत्वं यथा- सस्मार वारणपतिविनिमीलिताक्षः स्वेच्छाविहारचनवासमहोत्सवानाम् ।।५४॥9 त्रत्र सर्वत्रैव स्वभावसौन्दर्यसमुल्लासकत्वं विशेपणनाम्।

अथवा जैसे [उसी प्रकार का दूसरा उदाहरण ]- [दोनो] हाथो के बीच में जिसके [दोनो] गाल दवे हुए है, आंसुओ के चहने से [गालो पर आभूषण रूप में बनी हुई] जिसकी पत्रलेखा बिगड गई है और जिसकी चित्त की सारी वृत्तियाँ कानो के भीतर इकट्ठी हो गई हे इस प्रकार को [ अ्रत्यन्त ध्यान-मग्ना विरहिसी, उद्दीपनविभाव रूप ] गीत की ध्वनि को यहां सुन रही है ।५२।। यहाँ भी विशेपणो के माहात्म्य से तन्वी रूप वस्तु के स्वाभाविक सौन्दर्य की प्रभिव्यक्ति और भी अधिक मनोहर रूप में हो रही है। २-और [अलद्धार के छायातिशय के परिपोषकत्व का उदाहरण] जैसे- स्वच्छ तथा शीतल चांदनी ने व्याप्त, और बहुत देर से निशब्द होने के फारण मनोहर दिशाएँ किसी के हृदय में भी शात [रस] तथा किसी के हृदय में शृद्गार [रस की कारणता को प्राप्त] को उत्पन्न करने वानी हुई ॥।५३।। ३-तियाविशेषणवक्ना [का उदाहरण] जैसे- [नया पकडा हुआ्र] हाथी आाँखे वन्द करके [अ्रपनी स्वतन्त्रता के समय] किए हुए अपनी इच्छानुसार स्वच्छन्द वन विहार [ जहां चाहे वहाँ घूमने रूप वनवास] के महोत्सवो को स्मरण करने लगा। इन सब ही [उदाहरलो] में विशेषस स्वानाविक सौन्दर्य को प्रकाशित करते है। १ समुद्रवन्व प० ६ पर उदन ।

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२३६ ] घमोक्तिजी वितम् [कारिका १५.

शशिन शोभातिरम्कारिया ।।४५।।' एतटेव विशेषसावक्रत्व नाम प्रस्तुतोचित्यानुसारि सक्लसत्काव्य- जीवितत्वेन लक्ष्यते। यम्मादनेनैव रस परा परिपोपपदवीमयतार्यते। यथा- करान्तरालीन। इति ।५६॥२ स्वमहिम्ना विधीयन्ते येन लोकोत्तरश्रिय । रसस्वमावालक्वारास्ता्वधेयं विशेषराम् ।।५७।। इत्यन्तरश्लोक ।।१५।। एच विशेपणवक्रता विचार्य क्रमसमपितायसग सवृत्तिवक्रता विचारयति-

विशेपण का अलद्धार की छायातिशय के पोपकत्व [का उदाहरण] जैसे- चन्द्रमा की शोभा को तिरस्कृत करने वाले [तुम्हारे मुस कमल] से ॥५५।। इसमे चन्द्रमा की शोभा को तिरस्कृत करने वाले तुम्हारे मुस कमल से हारे हुए कमल मलिन हो रहे है इस प्रकार 'प्रतीयमानोत्प्रेक्षालक्कारम्य शोभातिशय समुल्लास्यते'। यह लिसा है। अर्थात् यहां विशेपण के माहात्म्य से उत्प्रेक्षा अ्लद्वार की शोभा को परिपुष्ट किया गया है। और यही 'विशेषणवत्रता' प्रस्तुत औ्र्रचित्य के अरनसार समस्त उत्तम काव्यो का जीवन रूप प्रतीत होती है, क्योकि इसी के द्वारा रस परम परिपोष पववी फो प्राप्त कराया जा सकता है। जैसे- [उवा० स० २, ५२ पर उद्धृत किए हुए] 'करान्तरालीन' इत्यादि [उदाहरण में इसी 'विशेषसवक्रता' के कारण भृङ्गार रस का परिपोष हो रहा है]। जिसके द्वारा अपने माहात्म्य से रस, वस्तुओ के स्वभाव और अ्रलद्धार लोकोत्तर सौन्दर्ययुक्त बनाए जा सकते हो उसी को विशेषण [रूप में प्रमुक्त] करना चाहिए ॥५७।। यह अन्तरश्लाक है।।१५॥ सवृत्तिवकता [ पदपूर्वाद्धवकता का भेद ६ प्रकार] इस प्रकार 'विशेषणवत्रता' का विचार करके उसके बाद क्रम से प्राप्त होने वाली 'सवृतिवक्रता' का विचार [प्रारम्भ] करते हे- १ पूर्व २, ४४ पर उद्धृत । २. पूर्व २, ५२ पर उद्धृत ।

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कारिका १६ ] द्वितीयोन्मेष [२३७

यत्र संत्रियते वस्तु वैचित््यस्य विवक्षया। सर्वनामादिभिः कैश्चित् सोक्ता संवृतिवक्ता ॥१६॥ 'सोक्ता सवृतिवक्रता' या किलैवविधा सा सवृतिवक्रतेत्युक्ता कथिता। संवृत्या वक्रता सवृतिप्रधाना वेति समास.। यत्र यस्या वस्तु पदार्थ- लक्षण संत्रियते समाच्छादयते। केन हेतुना 'वैचित्र्यस्व विवक्षया' विचित्रभाव- स्याभिधानेच्छया। यया पदार्थो विचित्रभाव समासाठयतीत्यर्थ। केन सत्रियते, 'सर्वनामादिभि कैश्चित्' । सर्वस्य नाम सर्वनाम, तदार्दियेपां ते तथोक्तास्तै. कश्चिदपूर्वैर्वाचकैरित्यर्थ । अ्रत्र च वहुव. प्रकारा सम्भवन्ति। यत्र किमपि सातिशयं वस्तु वक्तुं शक्यमपि साक्षादभिधानादियत्तापरिच्छिन्नतया परिमितप्राय मा प्रतिभासता-

जहां किसी वँचित्र्य के कथन की इच्छा से फिन्हीं सर्वनाम आदि के द्वारा वस्तु का [सवरण] निगूहन [छिपाना ] किया जाता है वह 'सवृतिवमता' कही गई हैं। वह 'सवृतिवफता' कही जाती है। जो इस [कारिका में कहे हुए या वृत्ति में फहे जाने वाले] प्रकार की है वह 'संवृतिवमता' कहलाती है। [ इस संवृति- वक्रता पद में] सवति से वत्रता, [यह तृतीया तत्पुरुष ] अ्रथवा सवृतिप्रधाना वतता [सवृतिवषता यह दो प्रकार का ] समास होता है। जहां जिसमें, पदार्थ रूप वस्तु सवरण की जाती है अर्थात् आच्छादित की [छिपाई] जाती है। किस कारण से [ छिपाई जाती हैँ ]? वचित्र्य के कथन करने की इच्छा से अर्थात् विचित्रता को फहने की इच्छा से। जिस [ सवरस या आच्छादन ] के द्वारा पदार्य विचित्र स्पता को प्राप्त करता है। किस से आच्छादित की जाती है? 'किन्हीं सर्वनाम आर्रादि से'। [जो सामान्य रूप से ] सबका नाम [हो वह] 'सर्वनाम' [कहलाता] है। वह आदि में जिनके हो वह उस प्रकार के [सर्वनामादि हुए] उन किन्हीं अपूर्व [अर्थ के] वाचको से [सवृत की जाती हैं]। -4 [यहां] इस सवृतिवतता के अ्रनेक प्रकार हो सकते हैं। १-[उनमें से पहिला प्रकार यह है कि] जहाँ कोई अ्रत्यन्त सुन्दर वस्तु, जिसका वर्णन करना सम्भव होने पर भी, साक्षात् दहने से 'इतनी है' इस प्रकार [ इयत्ता से ] परिच्छित्न-सी होकर परिमित रूप में प्रतीत न होने लगे इस दृष्टि से सामान्यवाचक सर्वनाम से आ्च्छादित करके उसके फार्य [रूप धयं] को कहने

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२३८ चक्रोपितजीवितम [ फारिका १६

मिति सामान्यवाचिना सर्वनाम्नाच्छाय तत्कार्याभिनायिना तदनिशया- भिधानपरेस वाक्यान्तरण प्रतीतिगाचरता नीयते। यथा- तत्पितर्यथ परिगहलिप्सो स न्यधत्तकग्णीयमणाग। पुष्पचापशिग्नरस्यकपालो मन्मय किमपि नेन निदध्यो ।५ ।। अ्र्प्रत्र सदाचारप्रवसतया गुरुभक्तिभावितान्त करगो लोकोत्तरीदार्य-

शान्तनवो विहितवानित्यभिधातु शक्यमपि सामान्याभि रायिना सर्वनाम्ना- च्छाद्योत्तरार्द्वेन कार्यान्तराभिवायिना वाक्यान्नरस प्रतीनिगोचरनामानीय मान कामपि चमत्कारकारितामावहति। वाले, उसके अतिशय के बोधनपरक किसी श्रन्य वाक्य मे प्रतीत फराई जाती है [वह सवृतिवकरता का प्रथम प्रकार होता है] जैसे- उस [देवव्रत भीष्म] के पिता [शान्तनु] के [योजनगन्वा सत्यवती के साथ] विवाह करने के लिए इच्छक होने पर उस [शल्पवयस्क] नवयुवक [देवव्रत भीष्म] ने [अपनी पितृभषित के आदर्श के अनुर्प] करने योग्य [आजन्म ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा] कर ली। [औ्रर उस श्राजन्म ब्रह्मचर्य रहने की प्रतिज्ञा को करके] उसने कामदेव को अपनी पुष्पचाप की नोक पर गाल रसकर कुछ श्पूर्व रूप से चिन्ताभग्न कर दिया ॥५८॥ अर्थात् जब भीष्म ने अपने वृद्ध पिता के विवाह के मार्ग को निष्कण्टक वना देने के लिए आजन्म ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा कर ली तो उस प्रतिज्ञा को सुनकर कामदेव बडी चिन्ता में पड गया कि इस पर कसे विजय प्राप्त की जाय ? कयोकि यदि वह कामदेव उस पर विजय प्राप्त करने मे सफल नहीं होता है तो उसकी त्रिलोक विजय की की्ति समाप्त हो जाती है। इसी कारण कामदेव भीष्म पर अपने वाणो के प्रयोग का अवसर न पाकर अपने पुप्पचाप को पृथ्वी पर टेककर उसके ऊपर के सिरे पर अपना गाल रखे हुए चिन्ता-ग्रस्त मुद्रा में खडा हुआ। यहाँ [इस श्लोक में] सदाचार परायस होने से पितृभषित से परिपूर्णा हृदय और लोकोत्तर उदारता गुए के योग से विविध विषयो के उपभोग से विरक्त चित्त, भीष्म ने 'असम्भव होने पर भी अपनी इन्द्रियों का निग्रह कर लिया' यह बात [ सामान्य शन्दों द्वारा ] कहने में शष्य होने पर भी, सामान्य मात्र के वाचक [किमपि इस ] सर्वनाम से आच्छादित कर [ श्लोक के ] उत्तरार्द्ध में [ मन्मथ के ध्यान रूप] अन्य कार्य का कथन करने वाले दूसरे वाषय से प्रतीत कराई जाकर फुछप्नपूर्व चमत्कार को उत्पन्न कर रही है।

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कारिका १६ ] द्वितीयोन्मेप [ २३६

अयमपर. प्रकारो यत्र स्वपरिस्पन्दकाष्ठाघिरूढ़े: सातिशय वस्तु वचसा- मगोचर इति प्रथयितु सर्वनाम्ना समाच्छाद्य तत्कार्याभिधायिना तद्तिशय- राचिना वाक्यान्तरेण समुन्मील्यते। यथा- याते द्वारवतीं तदा मधुरिपौ तद्दत्तसम्पादनां, कालिन्दीजलकेलिवञ्जुललतामालम्व्य सोतएठया। तद्गीत गुरुवाप्पगद्गद्गलत्तारस्वरं राधया, येनान्तर्जल चारिभिजंलचरेरप्युत्कमुत्कूजित म् ।।५६। अ्रन्न सर्वनाम्ना संवृत वस्तु तत्कार्याभिधायिना वाक्यान्तरेण समुन्मील्य सहृदयहृदय हारितां प्रापितम्। ग्रथा वा-

२-यह [सवृतिवकरता का] दूसरा और प्रकार है जहां अपने स्वभाव सौन्दर्य की चरम सीमा पर श्रूठ होने के कारण अतिशय युक्त [प्रतिपाद्] वस्तु का शब्दो द्वारा वर्सन करना असम्भव है। इस ब्रात को दिखलाने के लिए सर्वनाम [के प्रयोग] से [वस्तु को] आच्छादित करके उसके कार्य को कहने वाले औ्रर उसके अतिशय के प्रतिपादक किसी दूसरे वाक्य के द्वारा प्रकाशित किया जाता है। जँसे- तघ [मधुरिपु] कृष्ण के द्वारिका को चले जाने पर उनके द्वारा सम्मानित की गई हुई यमुना जल में [प्रतिदिन] फेलि करने वाली [अ्रर्थात् जिस लता को पकड- कर कृप्स जल-केलि किया करते थे, उस ] वेतस लता को पकडकर श्रँसुओ से रूँधे हुए और भारी गले से जोर-ज़ोर से [ रोते हुए] रावा ने वह [करण रसमय] गीत गाया जिसको सुनकर [ यमुना ] जल के भीतर के जलचर भी व्याकुल होकर कराहने लगे ।५६। यहां [ तद्ग त के तत् इस ] सर्वनाम से सवृत [ राघा के करणरमात्मक गान के उत्कर्ष रूप] वस्तु को [मेनान्तजंलचारिनिजल चररप्युत्कमुत्कूजितम् रप]उसके कार्य को कथन करने वाले वाक्य से प्रकट करके सहृदय हृदय हारिता को प्राप्त करा दिया गया हैं। प्रथवा जसे जसे उसी स्वतिवस्ता का दसरा उवाहरर -

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२४० ] वशोफितिजीवितम् [फारिफा १६

तह रुणा कन्ह विसाहीआए राघगर्गरगिराए। जह कस्स वि जग्मसण वि कोड़ मा बल्लही होड॥६८॥ [तथा रुदित कृण विशासया रोधगगदगिग । यथा कस्यापि जन्मशतेऽपि कोऽपि मा वल्लभो गवतु ॥ इतिच्छाया] श्रत्र पूर्वार्द्े सवृत वन्तु रोनल्ातिाभिायिना वाक्यान्तरे कामपि तद्विदाह्वाटकारिता नीनम। इदमपरमन्न प्रकारान्तर यन्र सातिमयसुकुमार वन्नु कार्यातिशया- भिधान विना संवृतिमात्ररमणीयतया कामपि काष्ठामविरोयते। यथा- दर्परो च परिभोगदर्शिनी प्ृप्त. ग्रणयिनो निपंद्प। वीच्य विम्वमनुविम्वमात्मन कानि कानि न चकार लज्जया ।।६१।। तर्रयमपर प्रकारो यत्र स्वानुभवसवेदनीय वन्तु वचमा वक्तुमविपय

हे कृष्स। भरे गले और गद्गद वासी में विशासा ऐसी [फूट-फूट कर] रोई कि [जिसको सुनकर सुनने वाले यह नोचने लगे कि] जन्म-जन्मान्तर में भी कभी कोई किसी को प्यार न करे [यही तच्छा हैं। क्योकि प्यार करने का फल भयडूर औौर दुखदायी होता है] ॥।। यहाँ पूर्वार्द्ध मे सवृत की हुई रोदन रूप वस्तु [उत्तराद्व में] उसके अरतिशय कारक दूसरे वाक्य के द्वारा [प्रतिपादित होने पर] सहृदयो के हृदय के लिए अ्रत्यन्त श्राह्नादकारक हो गई है। 1 ३-इस [सवृतिवकता] में यह भी एक और [तीसरा] प्रकार हैं कि जिसमें अत्यन्त सुकुमार वस्तु उसके कार्य के शरतिशय कथन के बिना ही केवल आच्छावनमात्र से रमणीय होकर [सौन्दर्य की] चरम सीमा को पहुँच जाती है। जसे- [यह श्लोक कुमारसम्भव के अ्र्परष्टम सर्ग का ११वां श्लोक है। ] दपस में [अपने मुख आरप्रादि पर श्रद्धित] सम्भोग-चिन्हो को देखती हुई [पावती] ने अपने पीछे की श्रर बैठे हुए प्रियतम [शिव जी] के प्रतिबिम्ब को [दर्प में] अपने प्रतिविम्ब के समीप देखकर लज्जा से क्या-क्या चेष्टाएँ नहीं कों ।६१॥ यहाँ 'कानि कानि' पदो से उन चेप्टाओ का सवरसमान किया गया है परन्तु उससे सौन्दय अपनी चरम सीमा को पहुँच गया है। ४-यह [सवूतिवकता का चौथा] और प्रकार है जिसमें [कोई वस्तु केवल] अपने अनुभव द्वारा सवेदन करने योग्य है वाणी से कही नहीं जा सकती है

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कारिका १६ ] tद्व योन्मेष. [२४१

इूति ख्यापयितं संव्रियते। यथा- तान्यक्षराणि हृदये किमपि घ्वनन्ति ॥६२॥।' इति पूर्वमेव व्याख्यातम्। इद्मपि प्रकारान्तर सम्भवति यन्न परानुभवसंवेद्यस्य वस्तुनो वक्तुर- गोचरतां प्रतिपादयितुं संवृति: क्रियते। यथा- मन्मथ किमपि तेन निदप्यौ।६३।।२ अत्र त्रिभुवन प्रथितप्रतापमहिमा तथाविधशक्तिव्याघातविपएणचेताः काम: किमपि स्वानुभवसमुचितमचिन्तयदिति। इदमपर प्रकारान्तरमन्न विद्यते, यत्र स्वभावेन कविविवक्तया वा [सर्थात् अ्रनिर्वचनीय] है इस बात को प्रदशित करने के लिए सवरस की जाती है। जैसे- [ प्रियतमा के सम्भोग काल के ] वह शन्द आज भी हृदय में कुछ अपूर्व प्रतिध्वनि कर रहे है ॥६२।। इसकी व्यास्या पहिले ही [उदा० स० १, ५१ पर] कर चुके है। ५-[ सवुतिवतता का ] यह भी [ पाँचवाँ ] प्रकार हो सकता है जिसमें दूसरे के अनुभव सवेद वस्तु का वर्णन करना सम्भव नहीं है इस बात का प्रतिपादन करने के लिए [वस्तु का] सवरण किया जाता है। जैसे [उदा० सं० २, ५६ पर पूर्व उद्धत श्लोक में]- उस [ देवव्रत भीष्म ] ने [ मन्मय ] कामदेव को कुछ श्रवर्सानीय रूप से चिन्तामग्न कर दिया ॥६३।। यहाँ [ इस श्लोक में ] तीनो लोको में जिसके प्रताप की महिमा प्रसिद्ध है ऐसा कामदेव [भीष्म के आजन्म ब्रह्मचर्य की प्रतित्ञा से] उस प्रकार [श्रपनी] सामर्थ्य के सण्डित होने से खिन्न होकर अपने अनुभव के योग्य [फिन्तु शन्दो में वर्णन करने के शयोग्य 'अनिर्वचनीय'] किसी चिन्ता में पड गया यह [दूमरे के अनुनव गोचर वस्तु फी शब्दो में वर्णन किए जाने की प्रसामर्थ्य को सूचित करने वाला 'सवृतिवपता' का पांचर्वा उदाहरण हुआ]। ६-यह भी [सवृतिवमता का छठा] और प्रकार है जिसमें फोई वस्तु स्वभाव अथवा कवि की विवक्षता से किसी दोष [ या कमी] से युक्त महा- . १. पूर्व १. ५१ पर उदत । २ पिछले उदा० २, ५= पर उदत।

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२४२ ] वत्ोफितिजीचितम् [ फारिका १६

केनचिदौपहत्येन युक्त वम्तु महापानकमिय कीर्तनीयता नार्हतीति ममर्पयितुं सत्रियते। यथा- दुर्वच तदथ माम्म भून्मृगस्त्वय्यसी यदकरिप्यदोजमा । नैनमाशु यदि वाहिनीपतिः प्रत्यपत््यत शिंतन पत्रिया।६४।।' यथा वा- निवार्यतामालि किमप्ययं वटुः पुनविवत्तु स्फुरितोत्तराधरः। न केवल यो महतोऽपभापते श्रृणोति तस्मादपि य. स पापभाक् ॥६५॥२ पातक के समान कहने के योग्य नहीं है इस बात को सूचित फरने के लिए सवरस की जाता है। जैसे- यह ब्लोक किरातार्जुनीय के १३वॅ सग का ४६्वो ब्लोक है। किरातवेष- घारी शिव वन मे तपस्या करते हुए अर्जुन की परीक्षा के लिए आए है। एक जगली सुगर जो अर्जुन की ओर चला शा रहा या उसके अभिप्राय को जानकर प्रर्जुन ने उसे अपने वाण से मार दिया। उस समय एक किरात मैनिक भाकर प्ररजुंन से कहता है कि यह वाण जो सुमर के तगा है वह मेरे नेनापति का है। इसलिए मुभे दे दो। किरात के साथ ग्रर्जन व उसी समय वे सवाद में से यह श्लोक लिया गया है। यदि [मेरे] सेनापति ने [गपने] तीक्ष्ण वाण से इसको तुरन्त न मार दिया होता तो इस जानवर ने अपने पराक्रम से तुम्हारा जो अकणनीय हाल किया होता वह [भगवान् करे वैसा] कभी न हो ॥६४॥। पथवा जैसे- हे सखि'इस लडके के होठ फडक रहे है, जान पउता है, यह फिर युछ कहन। चाहता है। इसको मना कर दो। [व्यर्थ की बकवाद न करे]। जो वडो की निन्दा करता है केवल वह ही पापी नही होता, वत्कि उससे जो दूसरे की निन्दा सुनता है वह भी पाप का भागी होता है। [इसलिए हम इसके मुँह से किसी महापुरष की निन्दा नही सुन सकती है] ।६५।। यह श्लोक कुमारसम्भव के ५वे सर्ग का र३्वा इलोफ है। शिव वी प्राति के लिए जब पार्वती तपस्या कर रही ह उस समय ग्वय शिव जी उनकी परीक्षा करने के लिए ब्रह्मचारी का वेष धारण करके आते है। और पावती को अनेक १ किरात १३ ४६। २ कुमार सम्भव ५, ८३। व्यक्ति विवेक पृ० ६

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कारिका १६ ] द्वि तीयोन्मेषः [२४३

श्नत्रार्जुनमारणं भगवदपभापणं च न कीर्तनीयतामर्हतीति संवरगेन रमणीयता नीतम्। कविविवक्षयोपहतं यथा- सोऽयं दम्भघृतव्रतः प्रियतमे कर्तु किमप्युद्यतः ॥६६॥' इति प्रथममेव व्याख्यातम् ॥१६॥

तरह से समझाते हैं कि तुम किस के पीछे पडी हो, वह शिव तुम्हारे योग्य किसी प्रकार भी नही है इमलिए तुम उसका विचार छोड दो : पावंती जी को यह सब कुछ वडा अरुचिकर प्रतीत होता है। अपनी सखी के द्वारा उन्होने उसका उचित उत्तर भी दिलवाया है। उसके वाद जब वह ब्रह्मचारी दुवारा कुछ कहने को तैयार हुआ उस समय पार्वती अपनी सखी से यह सब कह रही है।

यहाँ [पहिले फिरातार्जुनीय के श्ननोक में] अर्जुन को मार डालने की बात और [ कुमारसम्भव के दूसरे श्लोक में ] शिव जी की निन्दा की बात कहने योग्य नहीं है, इसलिए सवरण से वह अत्यन्त रमरीयता को प्राप्त हो गई है। यह वस्तु की भकीर्तनीयता के कारण होने वाली सवृतिवऋत का उदाहरण है। कविविवक्षा के कारण होने वाली सवृतिवकना का उदाहरण आगे देते हैं। कवि की विवक्षा के कारण हीनता को प्राप्त [वस्तु के सवरण का उदा- हरस] जैसे-

हे प्रियतमे [वासवदत्ते] मिथ्या [एकपत्नीत्व के] द्रत को धारण करने वाला यह [में वत्सराज उदयन, श्ाज पद्मावती के साथ विवाह करने की स्वीकृति देकर न जाने कैसे] कुछ भी [अ्रत्यन्त नीच कारय] करने को उद्यत हो गया हूँ ॥६६॥। इसकी व्यारया पहिले ही [ उदा० स० १, ५० पृ० ६० पर ] कर चुके हं ॥१६।

१. तापम वत्सराज नाटक का यह पद्य कुतक ने चतुर्य सन्मेप में उदा० स० १० पर पूरा और इसके पूर्व उदा० स० १, ५० तथा १, ६६ पर भी उद्धृत किया गया हैं।

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२४४ । वक्रोपितिजी वितम ! कारिका १७

एच सवृतिवक्रता विचार्य प्रत्ययवक्रनाया कोऽपि प्रकार: पदमध्यान्तर्भू- तत्वादिहैव समुचितावसरन्तस्मात तद्विचारमाचरति- प्रस्तुतौचित्यविच्छिचि स्वमहिम्ना विकासयन। प्रत्ययः पदमध्येऽन्यामुल्लासयति वक्रताम् ॥१७।। कश्चित्प्रत्यय कृमानि. पदमम्यवृत्तिरन्यामपूर्वा वक्रतामुल्लामयति वक्रभावमुीपयति। कि कुर्वन, प्रस्तुतस्य वरर्यमानस्य वम्तुनो यहौचित्य- मुचितभावस्तस्य विच्छित्तिमुपशोभा विकासयन समुल्लासयन । केन, स्वमहिम्ना निजाकर्पेण। यथा- वेल्लट्लाका घनाः ।।६७।।" यथा वा- स्निह्यत्कटाक्षे हशौ। इति ॥६८।।२

पदमध्यान्तर्भूत प्रत्ययवत्रता [पद पूवाद्धवपता का भेद] इस प्रकार[६ प्रवार की] सवतिवय्रता का विचार कर चुकने के बाद 'प्रत्ययवकता' काकृदादि रूप ] कोई भेद, पद के अरन्तर्गत होने से यहां [पदपूर्वाद्ध- वकरता के प्रफरस मे। ही विचार करने योग्य है उसका विचार [प्रारम्भ] करते हं- अपने प्रभाव से प्रस्तुत [श्रर्थ या प्रकरण] के श्रचित्य के अनुरूप सौन्दर्य को प्रकाशित करता हुआ पद के बीच में आया हुआ प्रत्यय कुछ शन्य प्रकार के ही [वफता] सौन्दय को प्रकट करता हैं ॥१७।। १-कोई कृदादि प्रयय पद के बीच में आया हुआ और ही कुछ भपूर्व वक्रता को प्रकाशित करता है अरथात् सौनदर्य को उद्दीप्त करता है। यया करता हुआ ? प्रस्तुत अर्थात वर्ष्यमान वत्तु का जो श्रचित्य अर्थात् उचित भाव उसकी विध्छिति अर्थात् शोभा को प्रकाशिन अ्रथवा विकसित करता हुआ। किस से ? अपने प्रभाव श्रथवा अपने उत्कर्ष से। जैसे- [उदा० स० २, २७ पर पूर्वोद्धृत ] बेल्लद्वलाका घना ।।६७ ।। अ्रथवा जसे- [उदा० स० १, १२१ पर पूर्वोद्ध त] स्निह्यक्ष टाक्षे दृशौ ।।६८।।

१-२. उदा० स० २, २७ तथा १, १२१ पर दोनों पूरे-पूरे दिए जा चुके हैं।

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कारिका १८] द्वितीयोन्मेप: [ २४५

त्रत्र वर्तमानकालाभिधायो शतृप्रत्यय. कामप्यतीतानागतविभ्रमविर- हिता तात्कालिकुपरिस्पन्द्सुन्दरी प्रस्तुतोचित्यविच्छित्ति समुन्जामचन् सहदय- हृदय हारिणीं प्रत्ययवक्रतामावहृति॥।१७।। इदानीमेतस्याः प्रकारान्तर पर्यालोचयति- आगमादिपरिस्पन्दसुन्दरः शब्दवक्रताम्। परः कामपि पुष्साति वन्धच्छायाविधायिनीम् ॥१८॥। परो द्वितीय. प्रत्ययप्रकार कामप्यपूर्वां शब्दवक्रतामावध्नाति वाचक- वक्रभाव विद्धाति। कीहक, 'आरगमादिपरिस्पन्दसुन्दर.' आगमो मुमाढिरा- दिर्यस्य स तथोक्तः । तस्यागमादे. परिस्पन्द. स्वविलसितं तेन सुन्दर. सुकुमारः। कीछशी शब्दवकरताम्, 'बन्वच्छायाविधायिनीम्' सन्निवेशकान्ति- कारिणीमित्यर्थः । यथा-

यहां [इन दोनो उदाहरणो में] वर्तमान काल का कधन करने वाला [वेल्लत् तथा सिनिह्यत् पदो में श्रूयमाण ] शतृ-प्रत्यय प्र्प्रतीत और्प्रौर प्र्प्रनागन सौन्दर्य से रहित तातकालिक स्वभावत सुन्दर प्रस्तुत [ वस्तु ] के श्रचित्य की शोभा को प्रकाशित करता हुआ सहृदयहृदयहारिरी 'प्रत्ययवतता' को उत्पन्न करता है ॥१७।। २-अरव इस [प्रत्ययवत्रता के] दूसरे भेद का, विवेचन करने हे- आरगम आदि के र्वभाव से मुन्दर [प्रत्ययवकता का] दूसगा प्रकार, रचना की शोभा को उत्पन्न करने वाली किसी अपूर्व शन्दवकना को परिपृष्ट करता है ॥१८॥। पर अर्थात् 'प्रत्ययवका' का दूसरा प्रकार किती पपूर्व शब्दवबना की रचना करता है और वाचक [शब्द] के मौन्दर्य को उत्पन्न करता हूँ। कसा ? प्रागम आदि के अपने सौन्दर्य से मनोहर। आगम प्रर्थात् 'मुम' आदि [का आ्रगम] वह है आदि में जिसके वह उस प्रकार का [आगमादि] हुग। उन आगमादि का जो परिस्पन्द अर्यात् स्वभाव सौन्दर्य उस से सुकमार अर्ान मनोहर। किन प्रकार की शब्दवपता को [उत्पन्न करता है] रचना [बन्ध] के मौन्दवं को उत्पन्न करने· वाली धर्थात् रचना की शोभा को बटाने वाली [शर्दवनता को उत्पन्न करता है]। जँसे-

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२४६ / वकरापतजावतम् फरफा रम

जाने सरयास्तव म्यि मनः गंभृनस्नेहमरमा- दित्थम्भूता प्रथमविरहे तामहं तर्कयामि। वाचाल मा न सतु सुभगम्मन्यमान: करोति प्रत्यक्ष ते निसिलमचिराद् भ्ातरुक्त मया यत ॥।६६/।' यथा च- दाहोडम्भः पसृतिम्पच: ।७0/२ यह मेघदूत का ६०वां प्लोक है। यक्ष ने मेघ के सामने अपनी पत्नी की वियोग-अवस्था का वर्णन वटे सुन्दर रूप से किया है। उनमे जान पडता है कि यक्ष की पत्नी मानो उसे बहुत प्रेम करती है। यह सब कहते-कहते यक्ष को स्वय अपने मन में यह वाङ्का उत्पन्न हुई कि कही मेघ यह न समभ ले कि यह यक्ष यो ही अपनी पत्नी की अ्वस्था की कल्पना करके कह रहा है। यह समझता है कि मे बडा सुन्दर हूँ, मेरे ऊपर मेरी पत्नी इतनी आसक्त है कि मेरे वियोग में उसकी ऐसी अवस्था हो रही है इस प्रकार की कल्पना वह अपनी 'सुभगम्मन्यता' की भावना से कर रहा है। मेघ के मन में उठने वाली इस पाछ्ा के दूर करने के लिए यक्ष अपनी सफाई दे रहा है- मे जानता हूँ कि तुम्हारी सखी [अर्थात् मेरी स्त्री] फा मन मेरे प्रति स्नेह से भरा हुआ है इसीलिए, पहिली वार उपस्थित हुए विरह के शवसर पर मे उसकी इस प्रफार [पूर्ववशिगत अवस्था ] की कल्पना करता हूँ। अ्र्प्रपनी 'सुभगम्मन्यता' का भाव [में अपने को बहुत सुन्दर समभता हूँ यह भाव] मुभे [पत्नी की फल्पना प्रसूत वियोगावस्था के वर्णन करने मे] वाचाल नहीं वना रहा है। [औ्र अधिक सफाई क्या दी जाय] हे भाई! मेंने जो कुछ कहा है वह शीघ्र ही तुमको प्रत्यक्ष हो जायगा। [जब तुम उसके पास पहुँचोगे तो जो कुछ में कह रहा हूँ उसको स्वय अपनी आँखो से देख सकोगे]॥६६। इसमें 'सुभगम्मन्य' पद में 'सुभग आत्मान मन्यते इस विग्रह मे 'आात्ममाने खश्च' अष्टाध्यायो ३, २, ८३ इस सूत्र से खश् प्रत्यय औ्र्रौर 'खित्यनव्ययस्य' अ्ष्टाध्यायी ६, ३, ६६ सूत्र से मुम् का आ्ागम होकर 'सुभगम्मन्य' पद वनता है। इस मुम के आगम से 'सुभगन्मन्य' पद में और उसके सन्निवेश से इस श्लोक वाक्य की रचना में विशेष सौन्दर्य आगया है। इसलिए यह भी 'प्रत्ययवकता' के दूसरे भेद का उदाहरणा है। औौर जैसे [उदा० स० १, ४८ पर पहिले उनृत किए हुए श्लोक के] दाहोडम्भ. प्रसृतिम्पच इस [भाग] मे ॥७०॥। १ मेघदूत ६०।२ प्रथमोन्मेष उदा० १, ४८ ।

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कारिका १८ ] द्वितीयोन्मेप [२४७

यथा वा- पायं पायं कलाचीकृतकदलदलम्।७२॥ इति। 'सुभगम्मन्यभाव'-प्रभृतिश्देपु मुमाढिपरिस्पन्दसुन्दराः सन्नि- वेशच्छायाविधायिनीं वाचकवक्रतां प्रत्यया. पुष्न्ति ॥=।। एवं प्रसङ्गसमुचितां पद्मध्यवर्तिप्रत्ययवक्रतां विचार्य समन-तर- सम्भाविनीं वृत्तिवक्रतां विचारयति-

यहाँ 'प्रसृतिम्पच' शब्द में 'प्रसृति पचति इति' इस विग्रह से परिमाण पच'भष्टा० ३, २, ३३ सूध्र से 'खश्' प्रत्यय औौर 'खित्रित्यनव्यमस्य' से मुम का भागम होकर 'प्रसृतिमपच' प्रयोग बनता है। प्रसृति शब्द का अ्रथं चुल्हू है। 'पारिनिकुव्ज प्रसृति, तौ युतावञ्जलि पुमान्'। इस कोश के अनुसार चुल्ह के रूप में मुडा हुआ या सिकोडा हुआ एक हाथ 'प्रसृति' कहलाता है और मिले हुए दोनो हाथ भञ्जलि' कहलाते है। अथति् श्रञ्जलि का आथा भाग या चुल्हू 'प्रसृति' कहलाता है। वियोगिनी के शरीर मे इतना दाह है कि यदि चुल्हू में पानी भर लिया जाय तो तनिक सी देर में वह पककर उड जायगा। प्रथवा जैसे [उदा० स० २, १० पर पूर्व उदृत किए हुए श्लोक के]- 'पाय पायं फलाचीकृतकदलदलम्' ।७१। इसमें। यहाँ 'पाय पाय' मे पीत्वा पीत्वा बार-वार पी पी कर इस प्रकार के पौन- पुन्य के द्योतन के लिए 'आभीक्ष्ण्ये सामुल् च' अष्टा ३, ४, २२ इस सू मे सामुल प्रत्यय और उसके कारण 'पातो युक् चिरकृतो' अष्टा ७, ३, ३३ से पा धातु के भगे युक् का आगम होकर और लोप आदि तथा द्वित्व होकर 'पाय पाय' यह प्रयोग बनाता है। इस प्रयोग के कारण वाक्य में विशेष चमत्कार आ गया है अतएव यह भी 'प्रत्ययवकता' के दूमरे प्रकार के भेद का उदाहरत है। इन [तोनो उदाहरणो] में 'सुभगम्मन्यभाव' ['प्रसृतिम्पच' तथा 'पायं पाय'] आदि शब्दो में मुम आदि स्वभाव से मुन्दर 'प्रत्यय' रचना के सौन्दर्याधायक 3 शन्द सौन्दर्य को बढाते है।१८।। वृत्तिवंचित्र्यवकता [पदपूर्वाद्ववकता का नेद] इस प्रकार प्रकरस के धनुसार पद के बीच में रहने वाली 'प्रत्ययवकना' का विचार कर चुकने पर उसके बाद आने वाली वृतिचरता' का विचार [पारम्भ] करते हं-

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२४८ ] वक्रोफितिजोवितम् [फारिफा १६

अ्व्ययीभावमुख्यानां वृचीनां रमशीयता। यत्रोल्लसति सा ज्ञेया वृत्तिवचित्र्यवक्रता ।।१ ६।। सा वृत्तिवं चित्यवक्रना जेया बोहव्या। वत्तीना वेनित्रय निचित्रभाव सजातीयापेक्षया मौकुमार्योत्कर्पस्तेन वक्ता वक्रभावविच्िनि। कीहगी रमसीयता यत्रोल्लसति। रामसीयक वम्यामुद्धिदात।कम्य, वृत्तोनाम्"। कासाम्, 'अव्ययीभावमुख्यानाम' अ्र्रव्ययीभाव समास मुग्य प्रवानभूतो यामा तास्तथोक्तास्तासां, समास-तद्वित-सुव्धानुचवृत्तीना वैयारुरगप्रसिद्वानाम। तद्यमन्रार्थ, यन्न स्वपरिम्पन्दसन्दिर्यमेतामा समुचितभित्तिमागोपनिवन्धाद- भिव्यक्तिमासाटयति। यथा- अभिव्यकितिं तावद् चहिरलभमान कनमपि स्फुरन्नन्तः सात्मन्यधिकतर सम्मृदितभरः । मनोज्ञामुद्वृत्ता परपरिमलस्पन्दसुभगा- महो धत्ते शोभामधिमधु लताना नवरस ॥७२॥।

जिसमें श्व्ययीभाव आ्रदि [समाम, तद्धित फृत आरादि] वृत्तियो फा सौन्दर्य प्रफाशित होता है उसको 'वृत्तिवँचित्रयवकना' समझना चाहिए ॥१६। उसको 'वृत्तिवचित्रयवकता' जानना या समझना चाहिए। वृत्तियो [कृत् तद्धित समास आदि] का वंचित्य अर्यात् विचित्रता पर्थात् समान जातीय [अन्य शब्दो ] की अपेक्षा सौकुमार्य का उत्कर्ष, उसमे [ उत्पन्न ] वक्रना अर्यान् सौन्दर्य। कैसी ? कि जहां रमसीयता प्रकट होती है पर्थात जिसमे सुन्दरता प्रस्फुटित होती है। किसकी? वृत्तियो की। किन [वृत्तियो] की श्रव्ययीभाव जिन में मुरय है। अर्थात अ्रव्ययोभाव समास जिनमे जुएय या प्रधान है वह उस प्रकार की [शव्ययी- भावमुख्या] हुईं। उनकी अर्थात् वैयाकरणो में प्रसिद्ध समास, तद्धित तथा [सुब्धातु] नामधातु की वृत्तियों की। इसका यहाँ यह अर्परभिप्राय हुआ कि जहां उचित आधार पर निर्मित इन [समास आदि वृत्तियो]का स्वाभाविक [व्यापार का]सौन्दर्य अभिव्यक्त होता है वह वृत्तिवचित्र्यवक्रता कहलाती है। जसे -- 3

[अधिमधु अर्ार्त् ] वसन्त ऋतु में लताओ का नवीन [सज्चित] रस किसी प्रकार भी बाहर निकलने या अभिव्यकिति का मार्ग न पाकर अपने भीतर हो उमडता हुआ अधिक वृद्धि को प्राप्त होकर बाहर फूटी-सी पडने वाली मनोहर और अत्यन्त सुगन्ध के प्रसार से हृवयहारिरी शोभा को उत्पन्न करता है ॥७२॥

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कारिका १६ ] द्वितीयोन्मेष. ।२४६

त्रप्रन्न 'अ्र्धिमधु'-श्दरे विभक्त्यर्थविहित. समास. समयाभिधाय्यपि वपयसप्तमीप्रतीतमुत्पादयन् 'नवरस'-शव्दस्य श्लेपच्छायाच्छुरणवैचित्र्य- सुन्मीलयति। एतद्दृत्तिविरहिते विन्यासान्तरे वस्तुप्रतीतौ सत्यामपि न ताहकू

परिस्फुरद्विभाव्यते। यथा च- शर स्वलोंकादुरगनगरं नूतनालोकल दमी- मातन्वद्धिः किमिव सितता चेष्टिवेस्ते न नीतम्। अप्येतासा दयितविहिता विद्विषत्सुन्दरीख येरानीता नखपदमयी मएडना पाएिडमानम् ।७३।१

यहाँ 'अधिमधु' शब्द में ['मधौ इति अ्रधिमघु' इस विग्रह में 'अ्व्ययय विभक्ति समीप०' आदि सूत्र से ] विहित [श्रव्ययीभाच ] समास [वसन्त रूप] समय का वाचक होने पर भी [मधौ इति अधिमधु इस प्रकार] विषय सप्तमी की प्रतीति को उत्पन्न करता हुआ नवरस शब्द के श्लेषच्छाया से व्याप्त वैचित्य को प्रकाशित फरता है। इस [ अ्रव्यमीभाव समास रूप ] वृत्ति से रहित ['मघौ' इस सप्तम्यन्त शब्द के द्वारा] दूसरे प्रकार की रचना करने पर वस्तु की प्रतीति हो जाने पर भ। वह सहृदयो के लिए [उतनी ] श्राह्णादकारी नहीं होती है। [ इसलिए 'घिमधु' पद में वृत्तिवत्रता का उदाहरण पाया जाता हैँ। इसके पतिरिक्त इस श्लोफ में ही प्रयुक्त हुए] उद्वृत्त, परिमल, स्पन्द, सुभग, शब्दो की 'उपचारवत्रता' भी फड़कती हुई सी प्रतीत होती हैं। और जँसे- यह श्लोक सुभापितावली में सल्या २६५४ पर दिया गया है। [ हे राजन् ] स्वर्ग से लेकर [ उरगनगर नागलोक अ्रर्थात् ] पाताल तक अ्र्रभिनव सौन्दर्य को उत्पन्न करने वाले, तुम्हारे [ कीतिमय ] व्यापारो [या चरित्रो] ने किसको श्वेत नहीं कर दिया है, जिन्होने कि इन शब्रभो की स्त्रियो का उनफे प्रियतम द्वारा विरचित नखपदी को [महावर की रवतवएं ] प्लफृति को भी पाण्डता को प्राप्त करा दिया है।।७३।।

१. सुभापितावली स० २६३४।

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३५० ] वषोपितजीयितग [फारिका १६

श्रत्र पाएडुत्व-पाएडुता-पागदुभाव-शव्ेभ्यः 'पागिउम' शव्दम्य किमपि वृत्तिचैचित्र्यवक्रत्व विद्यते। यथा च- कान्त्योन्मीलति सिहलीमुसरुचा चूर्णामिषेकोल्लस- ल्लावराया मृतवा हि निरर्भजुपा माचान्तिमिश्चन्द्रमाः ।

देवस्य त्रिद शाधिपावधि-जगज्जिप्णर्मनाजन्मन।ज सुध्धातुवृत्ते समामवृन्नेश्च किमपि वक्रतावचितय परि- स्फुरति ॥४६।।

यहां पाण्डुत्व, पाण्डुता, पाष्डुभाव [आदि] शब्दो की अपेक्षा पाण्डिमा' शब्द के प्रयोग में कुछ अपूर्व 'ृतिवचित्यवत्रता' विद्यमान है। [इसमे पाण्ड शब्द से इमनिच् प्रत्यय करके बना हुआ तद्धितान्त 'पाण्डिमा' शब्द श्रन्य सजातीय सब शब्वो को परपेक्षा अधिक चमतकारजनक प्रतीत होता है। इसलिए यह भी 'वृतिवंचित््य- वक्रता' का उदाहरए है]। श्रर जंसे- ['चूर्खानि वासयो". स्यु' सुगन्धकारफ उबटना पाउपर आदि का नाम 'चूएं' है। सुगन्धित द्रव्यो को शरीर में लगाकर जो स्नान किया जाय उसको 'चूर्णाभि- षेक' कहा जाता हैँ। ] सुगन्धित द्रव्यो का लेप करके किए गर स्नान के कारस प्रस्फुटित लावण्यामृत को प्रवाहित करने वाले [सौन्दर्य के] भरने से युफत, सिंहल वेश की तरुशियो की मुख की कान्ति का पान [ आचान्ति प्राचमन पान ] करने से [ही चन्द्रमा] कान्ति से विकसित हो रहा हैं। इसलिए देवराज इन्द्र पर्यन्त समस्त जगत् को जीत लेने वाले कामदेव के पानगोष्ठी के महोत्सव के प्रवसर पर [ उस चन्द्रमा का] एकछत्र राज्य होता है।[ धर्थात् मदिरापान को गोष्ठी में चन्द्रमा का प्रभुत्व सबसे अधिक रहता हैँ]।।७४।। महा [एकातपत्रायते' पद में 'एकातपत्रमिवाचरतीति एकातपत्रायते' इस प्रकार सुबन्त एकातपत्र शब्द को धातु बनाकर उससे बनाए हुए 'एफातपत्रायते' शब्द में] सुब्धातु की वृत्ति से और [ अन्य समस्त पदों में ] समास वृत्ति से कुछ प्र्पूर्व वक्रतावचित्र्य प्रकाशित होता है। [ इसलिए ये सब 'वृत्तिवंचित्र्यवऋ्रता' के उदा- हरख है] ।१६।।

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कारिका २० ] द्वितीयोन्मेप [ २५१

एव वृत्तिवक्रतां विचाय पदपूर्वार्द्धभाविनीमुचितावसरां 'भाववक्रतां' विचारयति- साध्यतामप्यनादृत्य सिद्धत्वेनाभिधीयते। यत्र भावो भवत्येपा भाववैचित्र्यवक्रता ॥२० ।। एपा 'वर्णितस्वरूपा' भाववैचित्र्यवक्रता भवति अ्रस्ति। भावो धात्वर्थ- रूपस्तस्य वैचित्र्य विचित्रभाव. प्रकागन्तराभिधानव्यतिरेकि रामणीयक, तेन वक्रता वक्रत्वविच्छित्ति। कीदशी, 'यत्र'यस्या 'भावः'सिद्धत्वेन'परिनिष्पन्नत्वेन 'अभिधीयते' भएयते। किं कृत्वा, 'साध्यतामप्यनाहत्य,' निष्पाद्यमानतां प्रसिद्धा- मध्यवधीय। तदिदमन्र तात्पर्यम्, यत् साध्यत्वेनापरिनिष्पत्तेः प्रस्तुतस्यार्थस्य दुर्वल: परिपोप, तस्मात् सिद्धत्वेनाभिधान परिनिष्पन्नत्वात् पर्याप्तं प्रकृतार्थ- परिपोपमावहृति। यथा-

भाववैचित्र्यवफ्र्ता [ पदपूर्वार्द्धवक्रता का भेव ] इस प्रकार वृत्तिवक्रता का विचार करके पवपूर्वार्द्ध में होने वाली और प्रवसर प्राप्त 'भाववत्रता' का विचार करते हैं- [ भाव शब्द का श्रर्थ करिया है। क्रिया या 'भाव' सदा साध्य रूप होता है। फिन्तु जहां उस क्रिया या 'भाव' को ] साध्यता [ साध्यरूपता ] का भी तिरस्कार करके [ उसको ] सिद्ध के रूप में कहा जाता है वह 'भाववचित्यवक्रता' होती [ या कही जाती] हैं। यह [कारिका में ] व्शिगत स्वरूप वाली 'भाववेचित्रयवक्रता' होती है। भाव घात्वर्थ रूप [क्रिया व्यापार] हैं ['फलव्यापारयोर्धातुराश्रये तु तिड स्मृता.'। भरर्यात् फल और व्यापार धातु का अर्थ होता है और उन दोनो के आश्रय अर्यात् व्यापारा- श्रय रप कर्ता तथ। फलाश्रय रूप कर्म ये दोनों तिड् प्रत्यय के अर्य होते हैं] उस [क्रिया व्यापार रूप भाव ] का वैचित्र्य विचित्र भाव शर्थात् अ्रन्य किसी प्रकार से जिसका वर्शान न किया जा सके इस प्रकार की रमणीयता, उससे जो वतता अर्थात् सौन्दर्य। फैसी [बतता कि]? जहाँ जिस [ वक्रता ] में [ साध्य रूप ] भाव [क्रिया, उसकी साध्यता की उपेक्षा करके ] सिद्ध रूप मे, परिनिप्पन्न रूप से, कहा जाता हूँ। क्या करके कि [उसकी] साध्यता का भी पनावर करके अप्रर्यात् सर्व- लोकविदित साध्यत की भी उपेक्षा [तिरस्कार] करके। इसका यहाँ यह अ्रभिप्राय हुआ कि-साध्य अर्थात् अपरिपवव होने के कारण, प्रस्तुत वस्तु फी पूर् परिपुष्टि नहीं हो पाती है। इसलिए 'सिद्ध' रूप से [उम वस्तु का] वशन परिपयव या परिपूर्ण हो जाने से प्रकृत अ्र्थं को पर्याप्त रूप से पुप्ट कर सकता है। जैसे-

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२५२ ] वक्रोपितिजीवितम् [फारिका २०

श्वासायासमलीमसाधररुचे र्दो. कन्दलीतानवान केयृरायितमन्नदे परिएत पाएिडम्नि गगडत्विपा। अस्याः कि च विलोचनोत्पलयुगेनातन्तमश्रुस् ना तार ताहगपान्योररुित यनोन्प्रतापः स्मर ॥७।। छपत्र भावस्व सिद्वत्वेनाभिवानमतीय चमत्कारकारि ।२०।।

एव भाववक्रता विचार्य प्रातिपदिकान्तवर्तिनीं लिन्नवक्रता विचारयति-

[उष्ण] निश्वासो की उत्सता [जन्य आ्ररयास] से जिसकी अ्रघर को कान्ति मलिन हो गई है और बाहु-लता की फृशता के पार्स [शनुद बाहु के पतले भाग में पहिने जाने वाले आभूषण विशेष] बाजुबन्द, [बाहू के त्रिक स्यूल- तर भाग पर पहिने जाने वाले श्राभूषण विशेष ] फेयूर के समान हो रहे है। कपोलो की काति सफेद पड गई है। श्रौर अ्रत्यधिक रोने से [श्ांसू वहाने वाले] इसके दोनों नेत्रो के किनारे इतने अ्रधिक लाल पड गए है जिसके कारण कामदेव का प्रताप औरर भी अधिक बढ़ गया है। [इसकी इस प्ररवस्था को देखकर काम का वेग और भी श्रधिक बढ जाता है] ।।७५।। यहाँ कवि ने केयूर तथा श्रङ्गद को अलग-अलग आभूपण मानकर 'केयू रा- यित्तमङ्गद' ऐसा लिखा है। वास्तव मे तो ये दोनो शब्द पर्यायवाची शब्द है, दोनो एक ही वाजूबन्द के वाचक हे। अमरकोप २,१०७ मे, 'केयूरमङ्गद तुल्ये' लिखकर भौर उसके टीकाकार ने 'प्रगण्डाभूपणस्य' अ्रर्थात् केयूर तथा अ्ङ्गद दोनो प्रगण्ड अ्र्थात् कोहनी के ऊपर और कन्धे के नीचे, कोहनी और कन्वे के बीच के भाग में पहिने जाने वाले आभूषण है, जिन्हे बाजूवन्द कहते है। सम्भवत इस भाग में भी दो आभूषण पहिने जाते हो, उनका भेद मानकर कवि ने इस प्रकार का प्रयोग किया हो। यहाँ [फामदेव का प्रताप औप्रौर भी अधिक हो रहा है इस क्रिया रूप] भाछ का [उत्प्रताप शब्द से] सिद्ध रूप से कथन अत्यन्त चमत्कारकारी है ॥२०॥ लिङ्गवैचित्र्यवक्र्कता[ पदपूर्वार्द्धत्कता का भेद। ३ प्रकार ] इस प्रकार 'भाववश्ता' का विचार करके प्रातिपदिक के अ्न्तर्गत लिङ्ग वत्रता का विचार करते है।

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कारिका २१ ] द्वितीयोन्मेष: [२५३

भिन्नयोलिङ्गयोर्यस्यां सामानाधिकररयतः । कापि शोभाभ्युदेत्येपा लिङ्गचैचित्र्यवक्रता ॥२१।। 7 एपा कथितस्वरूपा लिङ्गवैचित्र्यवक्रता स्त्र्यादिविचित्रभाववक्रता- विच्छित्तिः । भवतीनि सम्वन्ध, क्रियान्तराभावात्। कीछशी, यस्या यत्र

वृत्तित्वात् काप्यपूर्वा शोभाभ्युदेति कान्तिरुल्लसति। यथा- यस्यारोपणकर्मणापि वहवो वीरततं त्याजिता कार्य पु्ितचा एमीश्वर घनुस्तद्दोर्मिरेभिर्मया। स्त्रीरत्नं तदगर्भसम्भवमितो लभ्य च लीलायिता तेनैषा मम फुल्लपङ्गजवनं जाता दशा विशतिः॥७६॥।

जिस [वक्रता ] में भिन्न लि्गों [ भिन्न लिद्ग वाले शब्दों ] के समानाधि करण्य [समानविभवत्यन्त ] रूप से प्रयोग से कुछ श्रपूर्व शोभा उत्पन्न हो जाती है यह 'लिङ्गवंचित्र्यवत्रता' [कहलाती] है॥२१॥ यह [ इस कारिका में ] कहे गए स्वरूप वाली 'लिङ्गवचित्र्पवकता' अर्ात् स्त्री आदि [ लिङ्ग ] के विचित्रभाव की वकता [सौन्दर्य विशेष]। होती है यह [ भवति क्रिया का भ्रध्याहार करके ] सम्बन्ध होता है। [ यहाँ कारिका में ] अ्रन्य फोई किया न होने से। [ इसलिए भवति किया का अध्याहार करके ही भ्र्यं करना उचित है]। केसी, जिसमें विभिन्न अर्थात् अलग-अलग तिङ्गों [के दो शब्वो] के समानाधिकरण्य से अर्थात् तुत्य आश्रय प्रथवा एकद्रव्य बोधक होने से कोई अपूर्व शोभा उदित होती है अर्थात नवीन सौन्दर्य प्रकट होता है। जैसे- यह श्लोक राजशेखर कृत वालरामायण नाटक के प्रथम अद्ध का ३०वां पलोक है। सीता-स्वयम्वर में सम्मिलित होने के लिए आए हुए रावण की यह उवित है। रावण कह रहा है कि- जिस [शिव धनुष] के आरोपण के व्यापार ने हो बहुतों को वीर व्रत से च्युत कर दिया है [शर्थात् बहुत-से राजाओ्नों ने उस धनुष पर प्रत्यञ्चा चढाने का प्रयत्न किया परन्तु उसमें सफल न होने के कारण वे अपने वीरता के स्रत अयवा गर्व फो छोडकर चैठ रहे है ]। इन [अपनी ] भुजाओ से मुझे उम धनुप पर [प्रत्यञ्चा ही नहीं] वाण चढ़ाना है, औ्रर उस [बाण के चढाने] से [सदगरभसम्नव] स्त्री के गर्भ से न उत्पन्न होने वाले उस [ श्रयोनिजा सीता रूप] स्त्री-रत्न की प्राप्ति होगो इसलिए मेरी ये बीसों आांसे खिले हुए कमलों के समूह के समान [सौन्दययुक्त] हो रही है॥७६।।

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२५४ ] यक्रोपिति जीवितम् [फारिका २१

यथा वा- नभस्व्रता लासितकत्पवल्ली-प्रवालवालव्यजनेन तस्य । उर स्थलेऽकीर्यत दक्षिरोन सर्वास्वद सौरभमनरागः ।।ज। L यथा च- आरयोज्य मालामृतुभि. प्रयत्न-सम्पादितामसतटेजम्य चके। करारविन्दे मकरन्दविन्दु-स्यन्दि श्रिया विसम करंपूर.॥5ा इयमपरा च लिङ्गवैचित्र्यवकता-

यहां 'फुल्लपङ्गजवन जाता दृक्षा विगति' में 'दृया विशति' के न्नीलिन्न और 'फुत्लपङ्मजवन' के नपुसकलिङ्ज होने मे तथ। उन दोनों का समानाघिकग्ण रूप से प्रयोग होने से यह 'लिङ्गव चिन्यवफ्रना' का उदाहग्ण हूं। अ्रथवा जैसे- वायु के द्वारा कम्पित कल्प लता के नवीन पल्लवो के नन्हें-से पसे के द्वारा वक्षिए [नायक के समान, दक्षिण दिशा के] पवन ने उसके वक्ष स्यल पर सर्वोत्तम सौरभ युक्त श्रङ्गराग [विलेपन द्रव्य] विखेर दिया ॥७७।। इस उदाहरण मे नपुसक लिद्ग 'सर्वास्पद सीरभ' और पुत्लिज्ग 'अङ्भराग' पदो का समानाघिकरण रूप से प्रयोग होने से यह 'लिङ्भवचिन्यवक्ता' का उदाहरण होता है। और जैसे- अ्रनेक ऋतुओ्रों के [ फूलो के ] द्वारा प्रयत्नपूर्वक वनाई गई माला फो उसके [ कन्धों के किनारे पर अ्प्र्थात् ] गले में डालकर, [ उस माला के पुष्पो से] मकरन्द बिन्दुओ् को टपकाने वाले करफमल को सौन्दर्य से शोभाघायक कर्णपूर [कान में पहिने जाने वाले श्राभूषण] रूप कर दिया। अनर्थात् जव गले में माला डाली उस समय माला पहिनाने वाले के दोनो हाथ पहिनने वाले के दोनों फानों के समीपस्थ होने से वह हाथ कर्णपूर आ्रभूषण के समान प्रतीत हो रहे थे] ॥७८॥ इस श्लोक में 'करारविन्द विभ्रमकर्णंपूर चक्र' ऐसा अन्वय है। 'करारविन्द' शब्द नपुसक लिङ्ग है और विभ्रमकरंपूर' इब्द पुल्लिङ्ग है। इन,- भिन्न लिङ्ग वाले शब्दो के समानाधिकरण्य के कारण यह भी 'लिङ्गवैचित्र्यवक्रता' का उदाहरण हूँ।।२१।। २-यह दूसरी प्रकार की लिङ्गवचित्यवक्रता और भी होती है- १ बाल रामायर ७, ६६ ।

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कारिका २२ ] द्वितीयोन्मेष. [२५५

सति लिङ्गान्तरे यत्र स्त्रीलिङ्गञच प्रयुज्यते। शोभानिष्पत्त ये यस्मान्नामैंघ स्त्रीति पेशलम् ॥२२।। 'यत्र' यस्या 'लिङ्गान्तरे सति' अन्यस्मिन् सम्भवत्यपि लिद्ग 'स्त्रीलिङ्ग प्रयुव्यते' निवध्यते। त्रनेकलिद्गत्वेऽपि पदार्थस्य स्त्रीलिद्गविषय. प्रयोग. क्रियते। किमर्थम्? शोभानिष्यत्तये। कम्मात् कारणात 'यस्मान्नामैव स्त्रीति पेशलम्'। स्त्रीत्यभिधानमेव हृदयहारि । विच्छित्यन्तरेए रसाियोजनयोग्यत्वात्। उदाहरएं यथा- यथेय त्रीष्मोष्मव्यततकरवती पायडुरभिदा

तटी तारं ताम्यत्यतशशियशाः कोऽपि जलद- स्तथा मन्ये भावी भुवनवलयाक्रान्तिसुभगः॥७६1l9 जहां [ उसी शब्द का ] अ्रन्य लिङ्ग सम्भव होने पर भी 'स्त्री नाम ही सुन्दर' हं [ इसलिए] ऐसा मानकर शोभातिरेक के सम्पादन के लिए स्त्रीलिङ्ग का [ही विशेष रप से ] प्रयोग किया जाता है [वह भी 'लिङ्ग वंचित्रवय्रता' का वूमरा भेद है] ।।२२।। जहां जिस [वफ्रता] में [उसी शब्द में] श्रन्य लिद्ग सम्भव होने पर भी [ विशेष रूप से ] स्त्रीतिङ्ग का प्रयोग किया जाता है। अर्थात पदार्थ के श्रनेक तिङ्ग होने पर भी स्त्रीलिङ्ग विषयक ही प्रयोग किया जाता है। क्यो, [किसलिए] कि-सौन्दर्यातिशय के सम्पादन के लिए। किस कारण से कि-क्योि स्त्री यह नाम ही [पुरुष के लिए] सुन्दर [प्कर्षक] है। स्त्री का नाम ही हृदय का प्राफषंण करने वाला है। कयोकि वह [स्त्री नाम] अ्रन्य प्रकार के अपूर्व सौन्दर्य से [पुरुष के मन के भीतर शृङ्गार आरादि] रतो फी योजना करने के योग्य होता है। [उसका ] उदाहरण, जैसे- कयोकि प्रीप्म ऋतु की उष्णता से सन्तप्त, पीली पडी हुई, और [गुफा आादि के] मुसो से निफलनो हुई गरम वायु से हिलते हुए लताओं के नवीन पत्तों से युक्त यह तटी [ पवत या नदी का प्रान्त भाग ] अ्रत्यन्त नन्प्त हो रही है इसलिए जान पडता है कि शीध्र ही चन्द्रमा की ज्योत्स्ना को [ तिरस्कृत] आच्छादित कर रदेने वाला और सारे पध्वीमण्डल को व्याप्त कर तेने के फारण मनोहर कोई मेघ आाने वाला है।।७६।' १ ध्वन्यानोक के 'लोचन' में अ्र्प्रभिनवगृप्त ने इसको उद्धृत करते हुए लिम्वा है-'तटी तारताम्यति इत्यय नद् शव्दम्य पृन्त्वनपुनकन्वे त्रनादृत्य न्त्रीत्वमेवाश्रित - सहृदय स्यीति नामाि मघुरमिति वृत्वा' यह कुन्तक के इन लेस का ही मकेन है।

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२५६ ] [फारिका २३

श्रत्र त्रिलिद्धत्वे सत्यप तटशब्दम्य मौकुमार्यान स्त्रीलिद्धमेव प्रयुक्तम। नेन विच्छित्यन्तरेश भावी नायकव्यवहार कश्चिदासत्रित टत्यतीय रमसीय- त्वाद् वक्रतामावहति ।।२२।। इद मपरमेतस्या प्रकारान्तरं लन्नयति- विशिष्टं योज्यते लिङ्गमन्यस्मिन् सम्भवत्यपि। यत्र विच्छित्तये सान्या वाच्यौचित्यानुसाग्तः ॥२३। 'सा'चोक्तस्वरूपा अन्या अपरा लिद्रवकता विद्यते। 'चत्र' यम्या 'विशिष्टं योज्यते लिद्ग त्रयाणामेकतम किमपि कविविवत्तया निवन्यते। कथम, 'अन्य- स्मिन् सम्भवत्यपि', लिद्गान्तरे विद्यमानेऽपि। किमर्थम् ? 'विच्छित्ये' शोभायै।

यह श्लोक अन्योनिति रूप है। किसी पोउशी कन्या के नवयोवन को देस कर कवि यह कह रहा है कि अव इसके उपभोग का कर्ने वाला कोई नायक इसको शीघ्र ही प्राप्त होने वाला है। यहाँ [ प्रयुयत हुए ] 'तट' शब्द के तीनो सिङ्गो [ तट तटी, तटम्] में सम्भव होने पर भी सुकुमारता [ के श्रतिशय का व्यञ्जक होने ] के कारण स्त्री- लि्ग [तटी ] का हो प्रयोग किया है। और उस [ स्त्रीलिङ्ग 'तटी' शब्द के प्रयोग ] से अनोख ढग से किसी अपूर्व [सौन्दर्यापादक ] नायक व्यवहार फा कथन किया है इसलिए [ यह स्त्रीलिङ्ग का प्रयोग ] अ्रत्यन्त रमीय होने से सौन्दर्य को उत्पन्न कर रहा है ।।२२॥ ३-इस [लिङ्ग वैचित्र्यवत्रता] का यह औ्ररर [तीसरा] प्रकारान्तर बतलाते हैं- जहाँ अन्य लिद्ग सम्भव होने पर भी विशेष शोभा के लिए अर्थ के श्रचित्य के अनुसार किसी विशेष सिङ्ग का ही प्रयोग किया जाता है वह [पूर्वोक्त दो प्रकारों से भिन्न तीसरे प्रकार की] श्रत्य ही [लिङ्ग वेचित्र्यवन्रता] हैं।२३।। औरर [इस कारिका में] कहे गये स्वरूप [लक्षण] वाली वह 'लिङ्गवँचित्रय- वत्रता' [इसके पूर्वोक्त दो भेदों से भिन्न] दूसरी ही है। जहां [शर्थात्] जिस [ वकता] में विशिष्ट लिद्ध का प्रयोग किया जाता है [ अर्थात् ] तीनो लिङ्गो में, से कवि की इच्छा के अनुसार किसी एक सिद्ध का प्रयोग किया जाता है। दै कि-अन्य [लिद्ग में उस शब्द के प्रयोग] के सम्भव होने पर भी, अर्थात् अ्रन्य लिङ्ग [ में उस शब्द ] के विद्यमान होने पर भी। कयो [ विशेष लिङ्ग का प्रयोग कवि करता है कि ]-विच्छितति अर्थात शोभा के लिए। किस कारण से [ उस

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फारिका २३ ] द्वितोयोन्मेष [२५७

कस्मात् कारसात्? 'वाच्योचित्यानुसारत'। वाच्यत्य वर्एर्यमानस्य वस्तुनो यदीचित्या मुचतभावग्तस्यानुसरएामनुसारस्तस्मात्। पदार्थोचित्यमनुसृत्येत्यर्थ.। यथ - त्व रक्षसा भीरु यतोऽपनीता तं मार्गमेता कृपया लता मे। अरदर्शयन् वतुमशवनुवन्त्य शासत्रभिरावर्जितपल्लवामि 1/८0 119 अत्र सीतया सह राम पुष्पकेरवतरस्तस्याः स्वयमेव तद्विरहवैधुर्य- मावेदयति यत त्व रावणेन तथाविधत्वरापरतन्त्रचेतसा मार्गे यस्मिन्न- पनीता तत्र तदुपमदेवशात तथाविधसस्थानयुक्तत्व लतानामुन्मुखत्व मम त्वन्मार्गानुमानस्य निमित्ततामापन्नमिति वस्तु विच्छित्यन्तरेण रामेण योज्यते। यथा-हे भीरु स्वाभाविकसीकुमार्यकातरान्त करणो रावणेन तथाविधक्रर-

विशेष लिङ्ग के प्रयोग से शोभा होती है कि] वाच्य अर्यात् वर्ण्यमान वस्तु का जो औचित्य उचित रूपता उसके अनुसरण करने से। अर्थात् पदार्थ के श्चित्य का अनुसरख करके। जैसे- यह श्लोक रघ्वश के तेरहवे सर्ग का २४ वाँ श्लोक हं। लङ्डाविजय के बाद पुष्पक-विमान द्वारा अयोध्या को जाते हुए रास्ते में पडने वाले स्थानो का परिचय सीता जी को कराते हुए रामचन्द्र जी उनमे कह रहे हं- हे भीरु। तुमको राक्षस रावण जिस मार्ग से [हरस करके] ले गया था उस मार्ग को, बोलने में असमर्थ इन लताओो ने अपने [रावण के उघर से निकलने के कारण उसके और तुम्हारे शरीर के ससर्ग से] मुडे हुए पत्तों से युक्त शाखाओं के द्वारा कृपा करके मुभे दिखलाया था। [या मुझे दिखाने की कृपा फी थी] ॥८०॥ यहाँ सीता के साथ पुष्पक विमान से जाते [ ज्तरते ] हुए रामचन्द्र स्वय [अपने ] विरह दु ख को [ सीता के सामने ] वतलाते है। कि उस प्रकार फी हडबडी में रावण तुमको जिस मार्ग से [में] ले गया वहाँ पर उसके [शरीर हाथ-पैर 'भदि के द्वारा] उपमर्द के कारण लताओ की जो उस प्रकार स्यति-विशेष पर्थात् लताओनों का उन्मुसत्व [ उस दिशा की ओ्रोर मुड़ जाना आदि ] मेरे द्वारा •१ तुम्हारे ले जाए जाने के मार्ग के अ्रनुमान का फारण हुआ [अर्थात् लताओो को मुडा देस कर मेने यह अनुमान किया कि तुमको उसी ओ्रोर रावण ले गया है]। इस बात की रामचन्द्र जी ने बडे सुन्दर ढग से योजना की हू। जैसे कि हे नीर। अर्यात् स्वाभाविक सुकुमारता के फारण भयनीत चित्त वाली सीते, उत प्रकार के [तुम्हारे १. रघुवदा १३, २४।

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२५८ ] कारिफिा २३

कर्मकारिणा यस्मिन मार्ग न्नगपनीना नमेना साझ्ातकारवरिहृश्यमान- मृर्तया लता किल मामटशेयन्निति। तन्मार्गप्रवशन पर्मार्यनस्तासा निश्चेतन तया न सम्भाव्यन उवि प्रतीयमानवृत्तिर प्रेसषाल पर क्वेरमिम्रत। यथा- तव भीरुत्व रावगास्य क्रोन ममापि तवतपरित्रामणप्रयन्नपरता पर्याल।न्य

मार्गपदर्शन कुर्वन्ति ते तदु-मुन्वीभूनहस्तपल्लनवाहभिरि्वंननतीव युक्ति- युक्तम। तथा चात्रव वास्यान्तरमपि नियन- मृग्यश्च दर्भाकुर्रनिर्व्यंपक्षास्तवार्गातन्य समोधयन माम। व्यापारयन्त्या दिशि दक्षिएस्यामृत्यदम राजीनि विलीचनानि ।।=१ ।।'

पपहरण रूप ] कर कर्म को नरने जता रवस तुमको जिम मार्ग से [ में] ले गया उसको [ इस समय] सामने दिसलाई देने वाली इन लतागो ने ही मुझको दिखलाया था। उनके प्रचेतन होन से वह माग-प्रदशन वस्तुत उनके लिए सम्भव नही था इसलिए [ 'मानो' उन्होन दिसालाया इन प्रकार का ] प्रतीयमान उत्प्रेक्षा अलद्धार कवि को प्रभिश्नेत है। जैने कि तुम्हारी भीरता, रावण की करता औ्रर तम्हारी रक्षा के लिए मेरी व्यगता को देसकर ग्ी स्वभाव के कारण कोमल- हृदय होने से अपने सजातीय स्नी रप तुम्हारे प्रति [स्वभावत ] उचित पक्षपात के वशीभूत होकर इन [ लतान्ो] ने कृपापूवक ही मुझे मार्ग-प्रदर्शन किया। किस साधन के द्वारा कि-'मुडे हुए पत्ती वाली शाखागो से'। क्योकि वासी रप इन्द्रिय से रहित होने के कारस बोलने मे शसमर्थ थीं। जो फोई भी बिना बोले मार्ग- प्रदर्शन कराते है वे सव उस ओ्रर हाथ उठाए हुए बाहुओ् से ही [ मार्ग-प्रदर्शन कराते है इसलिए यह [ लताओ के मार्ग-दर्शन व्यवहार का वर्णन ] बहुत सुन्दर हुआ है। उसी प्रकार का दूसरा [इ्लोक] वाक्य भी यहाँ [रघुवश के इसी १३वे सर्ग में २५वाँ श्लोक] पाया जाता है। [उसका अर्थ इस प्रकार है]- [लताओ के मूक सकेत द्वारा बतताए जाने पर भी] तुम्हारे जाने [ के मार्ग] . को न जानने वाले भुभको [ दर्भ ] कुश के अकुरो के खाने को छोडकर दक्षिण दिशा की ओर ऊपर को भ्ाँखे उठाती हुई हरिरियो ने भी [ तुम्हारे जाने का मार्ग मुझे] बतलाया ।८१॥

१ रघुवश १३, २५।

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कारिका २३ ] द्वितोयोन्मेष. [ २५E

हरिएयश्च मा समबोधयन् कीदशम-'तवागतिज्ञम्' लताप्दशितमार्ग- जानन्तम् । ततस्ता सम्यगवोधयन्निति, यतस्तास्ृदपेक्षया किञ्चित्प्रवुद्धा ति। ताश्च कीदृश्य-तथाविधवैशसन्दर्शनवशाद् दुःखित्वेन परित्यक्ततृग्रासाः। के कुर्वाणा-तस्यां दिशि नयनानि समर्पयनत्य। कीदशानि-उर्ध्वीकृतपक्म- क्तीनि। तवेवंविवस्थानकयुक्ततवन दक्षिणा निरामन्तरिक्षेण नीतेनि सजया नेवेदयन्त्य. । अत्र वृक्षमृगाठिपु लिङ्गान्तरेपु सम्भवत्स्वपि स्त्रीलिङ्गमेव पठार्थों- चत्यानुसारेण चेतनचमत्कारकारितया कवेरभिप्रेतम्। तस्मात कामपि रक्रतामावहति ॥२३।।

हरिसियों ने भी मुझको [तुम्हारे ले जाए जाने का मार्ग] वतलाया। कैसे नुभको? तुम्हारे जाने [के मार्ग] को न जानने वाले को अर्ात् [अ्रचेतन] लताओं के वतलाए हुए मार्ग को न समभ सकने वाले मुभको। उन [श्रचेतन लताओं] के गद उन [मृगियो] ने बतलाया। और वे [ मृगियाँ ] फैसी थीं कि-उस प्रकार हे [ सीतापहरण रूप ] अ्रत्याचार को देखकर [ प्रत्यन्त ] दुखी होने के फारस तनकों के ग्रास को भी जिन्होने छोड दिया है। क्या करती हुई कि-उस [दक्षिण] दिशा में आंखें करती हुई। फैसे [नेत्] जिनके पल ऊपर को उठ रहे है। इसलिए इस प्रकार के [दक्षिर दिशा की ओर ऊपर को प्रांसें उठाए हुए ] आ्र्राकार विशेष े युक्त होने से दक्षिए दिशा की ओर और आ्काश-मार्ग से ने जाई गई थीं यह तात [उन मृगियों ने अपने आ्ररकार-प्रकार से] सूचित की।

यहाँ [ लता शरौर मृगी इन स्त्रीतिङ्ज शब्दो के स्थान पर ] वृक्ष मृग जादि दूसरे पुल्तिङ्ग शब्द सम्भव होने पर भी पदार्थ के शचित्य के अनुसार स्न्रीलिङ्ग ही सहृदयो के लिए अधिक चमत्कारजनक होने से कवि को प्रिय है। इनलिए [ उन स्त्रीलिङ्ग शब्दों का प्रयोग ] कुछ न्रपूर्व तौन्दर्य को उत्पन्न कर रहा हूँ।

यहाँ स्थीलिन्न के प्रयोग के जो उदाहरसा दिए है उनी अपेक्षा किनी अ्न्य लिङ्ग के प्रयोग के उदाहरण अधिक उपयवत होने। न्योकि म्यीलिन्न के प्रयोग में विशेष चमत्कार आा जाता है यह बात 'नामेच न्नी पेमलम्' वाली विछली कारिका में हो कही जा चुकी थी अ्तः यहाँ न्वीनिङ्ज को रोडका अ्रन्य निन्के प्रयोग से चमत्कार के प्रदर्शन उदाहरस देना उचित था ॥२३॥

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२६० ] [फारिका २८-२५

एव प्रातिपठिकलन्गाम्य गुवन्नसं्भविन पपर्वार्म्य यथासम्भव वक्रभाव विचार्यदानीमुभयोरवि सुग्निटन्नयो वतुन्वम्प पर्वभागो य सम्भ- वति तम्य वक्रता विचारयनि। तन्य च कियायेंनित्र्यनिव वनमेव वक्रय- विद्यते। तस्मान क्रियावैचिन्यम्नेव कीन्शा किचन्तञ्च प्रकाग सम्भवन्तीति

कर्तरत्यन्तरङ्गत्वं कर्त्रन्तर विचित्रता । स्वविशेप एवेंचित्र्यमुपचार्मनोजता ।।२४।। कर्मादिसवृतिः पञ्च ग्रम्तुतौचित्यचारवः । क्रियावँचित्र्यवक्रत्वप्रकागम्त इमे म्मृताः ॥२५॥ 'क्रियावैचित्र्यवकत्वप्रकाग' वात्वर्थविचित्रभाववत्रताप्रभेदास्त इमे स्मृता वसर्यमानस्वरूपा कीर्तिता । कियन्न -'पञच' पचसग्याविशिष्टा। कीहशा 'प्रस्तुतोचित्यचारव' प्रस्तुत वसर्यमान वन्तु तस्य यहीचित्यमुचितभावस्तेन चारवो रमसीया।

११-कियावैचित्र्य या धातुवचित्यवनता [५ भेद] इस प्रकार [यहाँ तक] सुवन्त [पदो] में पाए जाने वाले प्रातिपदिक रूप पवपूर्वार्द्ध के [वक्रभाव] सौन्दर्य का यथासम्भव विचार करके श्व सुवन्त तथा तिडन्त दोनो प्रकार के पदो ला जो धातु रूप पूर्वभाग सम्भव हो सकता है उसकी वकता [सौन्दर्य] का विचार करते है। उत [धातु] का नि्यारवचिन्य के कारण ही वकभाव होता है। इसलिए तियावैचित्र्य के ही कितने औौर कैसे-कँसे प्रकार हो सफते हैं उनके स्वरूप का निरूपण करने के लिए कहते है- १ कर्ता की अत्यन्त अ्न्तरङ्गता, २ दूसरे कर्ता फो विचित्रता, ३ अपने विशेषण की विचित्रता, ४ उपचार के कारण सुन्दरता ॥२४॥ और ५ कर्म आदि की सर्वृति [सवरण, छिपाना] प्रस्तुत के श्र्रचित्य से सुन्दर यह पांच प्रकार के 'करियावंचित्र्य' के भेद माने गए है॥२५॥ [ ऊपर की दोनों कारिकाओ में ] वर्ण्यमान स्वरूप वाले 'क्रियावैचित्र्य' को वत्रता के प्रकार शर्थात् घात्वर्थ के विचित्रभाव की वकता के ये भेद कहे गए हैं। कितने कि 'पाँच' अर्थात् पञ्च सख्या युयत। कैसे कि प्रस्तुत के श्रचित्य से, मनोहर। प्रस्तुत अर्थात् वर्ष्यमान वस्तु उसका जो शचित्य उचित भाव उससे मनोरम रमरीय।

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कारिका २४ ] द्वितीयोन्मेप [२६१

तन्र प्रथमस्तावत्प्रकारो यः, 'कर्तुरत्यन्तरङ्गत्वं' नाम। कर्तु स्वतन्त्रतया मुख्यभूतस्य कारकस्य क्रियां प्रति निर्वरतयितु यदृत्यन्तरङ्गत्वमत्यन्तमान्तर- तम्यम्। यथा- चूड़ारल्ननिपराए दुर्वह जगद्भारोन्नमत्कन्घरो घत्तामुद्ध रतामसौ भगवत शेपस्य मूर्धा परम्। स्वैर सस्पृशतीपदप्यवनत यस्मिन् लुटन्त्यक्रमं शून्ये नूनमियन्ति नाम सुधनान्युद्दामकम्पोत्तरम् ।।८२।। अत्र उद्धूरता धारणलन्णक्रिया कर्त. फणीश्वरमस्तकत्य प्रस्तुतौचित्य- माहात्म्यादन्तर्भाव यथा भजते तथा नान्या काचिढिति क्रियावैचित्र्यवक्रता- मावहति। यथा चा-

उन [पाँच प्रकार के 'क्रियावैचित्रयवम्रता' भेदो] ने से पहिला प्रकार है 'फर्ता की अत्यन्त अन्तरङ्गता' ['स्वतन्न्न कर्ता' अप्टाध्यायी १, ४, ५४ पाणिनि मुनि फृत इस कर्ता के लक्षण के अनुसार] स्वतन्त्र होने के कारण [सब कारफो में] मुख्यभूत [फर्ता] कारक की [उस] क्रिया के सम्पादन में जो प्रन्तरङ्गता वा अ्र्प्रत्यधिक अ्रन्तर्तमता [यह 'क्रियावंचित्र्यवक्ता' का पहिला भेद होता हूँ]। जसे- [शेषनाग के] चूडा रत्न [शिर पर धारण किए रत्न ] पर रसे हुए [ सारी पूर्यिवीमण्डल के] दुर्वह भार से कन्घो को ऊपर उठाए हुए केवल भगवान् शेपनाग का सिर ही [ससार में] उद्रता [ससार के धारस करने की क्षमता ] को घारस कर सकता है। जिसके कभी अनायास तनिक-सा भी नीचे भुक जाने पर यह सारे लोक- लोकान्तर भयडगूर रूप से हिलते हुए झकाश में इवर-उवर लुटकने लगते हैं ॥८२॥ यहां 'उद्धरता' घर्थात् [तारे जगत् की ] धारण रप किया, कर्ता अर्ान् सर्पराज शेपनाग के मस्तक, के प्रस्तुत [जगत् के धारस रूप काय के] श्रचित्य के माहात्म्य से [ उद्धरता रूप करिया] जितनी अन्तरद्गता को प्राप्त हो न्ही है उतनी [अन्तरङ्गता या मौन्दर्य को ] अ्रन्य पोई [ िया] प्राप्त नहीं हो सकती है। इसलिए वह 'त्रियारवचित्र्यवपता' को उत्पन्न कर रही है। अ्रथवा जैसे [इसी का दूमरा उदाहरण ]-

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२६२ ] वतरोरितिजीवितम् [पारिका २४

कि शोभिताहमनवेति पिना रुपारगे पृप्टस्य पातु परिचुम्बनमुत्तर 7 ।।=३।1" श्रत्र ुम्बनव्यनिरवेय भगनता तथाविवलोका गौरीशोभाति शयाभिवान न केनचित क्रियान्तरेगा कर्तु पार्यन ति क्रियावचित्र्यनिवं्बन वक्रभावमावहति। गथा च- महस्स तटप्ररणननणा पवटपारचुम्बित्न नय्र॥=।। [रुद्रस्य तृतीयनयन पावतीपरिचुम्धित जयात। इतिच्ह्ाया] यथा वा-

यह इ्लोक पहिले उदा० १, ८१ पर ग्रा चुका है। और मूलत कुमारगम्भव के तीसरे सर्ग का ३३वा बलोक है। कया मे इस [चन्द्रलेराा के धारण कर लेन] से सुन्दर लगती हूँ इस प्रकार [पार्वती द्वारा ] पूछे गए शिव जी का [उस प्रश्न के उत्तर में पार्वती के मस्तक में जहाँ चन्द्रलेखा बंधी थी उस स्थान का] चुम्बन [कर लेना] रूप उत्तर तुम्हारी रक्षा करे ॥८३॥ यहाँ पार्वती के उस पकार लोकोत्तर सौन्दर्य का शिव जी के द्वारा कथन, चुम्बन के अतिरकित - म किसी प्रकार की निया से करना सम्भव नही था। इसलिए वह क्रियावँचित्र्य मूलक वकभाव सौन्दर्यातिशय को [धारण] उत्पन्न कर रहा है। औरर जैसे-

यह श्लोक गाथासप्तरती का ४५५वाँ श्लोक है। काव्य प्रकाश में उदा० स० ६७ पर उद्धत हुग्रा है। औौर वकोक्तिजीवित मे भी इसके पूर्व उदा० १, ५८ पर उद्धृत किया जा चुका है। 4- पार्वती के द्वारा चूमा गया महादेव का तीसरा नेत्र सर्वोत्कर्ष युक्त है ॥।८४॥

प्रथवा जैसे-

१ कुमारसम्भव ३, ३३। प्रथमोन्मेप उदा० ८१ पर भी यह उद्धृत हुआ है। परन्तु वहा 'पिनाकपाणे' के स्थान पर 'शशाङ्कमौले' पाठ दिया गया है।

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फारिका २४ ] द्वितीयोन्मेप [ २६३

सिडिलिअचाओ जन्न्रइ मत्ररद्वत्।=५। [शिथिलीकृत चापो जर्यात मकर्वज । इतिच्छाया] एतयोवैंचित््यं पूर्वमेव व्याख्यातम्। अ्रयमपरः क्रियावैचित्र्यवक्रतायाः प्रकार 'कर्त्रन्तरविचित्रता'। अन्यः कर्ता कव्ेन्तरम्. तस्माद्विचित्रता वैचित््यम। प्रन्तुतत्वान् मजातीयत्वाच्च कर्तुरेव। एतदेव च तस्य चैचित्रयं यत् क्रियामेव कर्तन्तरापेक्षया विचिन्न- स्वरूपा सम्पाद्यति यथा- नैकत्र शक्तिविरति क्वचिदस्ति सच भावा स्वभावपरिनिप्टिततारतम्याः । आकल्पमौर्वदहनेन निपीयमान- मम्भोधिमेकचुलकेन पपावगस्त्य ॥८६।।

द्वाडवाग्नेः किमपि क्रियावेचित्र्यसुद्दहन कामपि वक्रतामुन्मीलयति।

चाप को शिथिल किए हुए कामदेव सर्वोत्कर्षयुक्त है।८५॥ इन दोनों के वैचित्र्य की व्यास्या पहिले ही [ नमश पृरठ उदा० १, ५८ तथा १, ६१ पर ] कर चुके हैं। २-यह क्रियावंचित्र्यवचना का [दूसरा] और भी प्रकार है[जिमे कारिका में] 'फर्त्नन्तरविचिन्नता' [कहा है]। व्त्रन्तर [का अ्र् है] दूमरा कर्ता। उसके कारण [होने वाली] विचित्रता वा वैचित्र्य [ होता है]। प्रस्तुत औरप्रोर सजातीय [कतृ' जातीय] होने से [वह फर्त्रन्तर विचित्रता] कर्ता की ही [विचिन्नना होती] हैं। और उसकी विचित्रता इतनी ही है कि वह अन्य कर्ता की अरपेक्षा किया को ही विचित्र रूप से [विशेष सुन्दरता के माथ] सम्पादित करता है। जैसे- किसी एक हो जगह शक्ति की समाप्ति नहीं होती है। नभी पदारयं [श्पन- अपने ] स्वभाव से [ भले-त्ुर्े कम-अचिर नादि] तातम्ययुक्त होते है। वड़वानल के द्वारा सृष्टि के आ्ादि से पिए जाने [ पर भी समाप्त न होने] वाल समुद्र को अगस्त्व मुनि एक हो चुल्हू में पी गए ॥।=६।। यहाँ एक चुल्हू में समुद् का पी जाना, निरन्तर प्रपत्न श्रर अभ्यास से चरमोत्स्पं को प्राप्त वाडवागिन की अ्रपेक्षा [नी, उनसे नी नधिरु]किमी श्रनिर्वचनीय कियाचित्र्य को धान्स करता हुआ किमी पपूर्य सौन्दर्व को अ्रभिव्यक्त पन्ता है।

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२६४ ] चमोक्तिजोनितम [कारिया २४

यथा वा- प्रपन्नार्तिचछिदो नया ॥७। यथा वा- स दहतु दुरित शाम्मवा व शगग्नि।=८।। एतयोवचित्र्य पूर्वमेव प्रदर्गितम। अयमपर क्रियाचेचित्चवक्रताया प्रभेद, 'स्वविशेपएचैचित्र्यम्'। मुख्यतया पस्तुतत्वात क्रियाया स्वम्यात्मनो यद्विशेपण भेठक तेन वैचित्र्य विचित्रभाव। वथा- इत्युद्गते शशिनि पेशलकान्तिदूती- सलापसम्त्रलितलोचनमानसामि । अपाहि मयडनवेविपरीतभूपा-

प्रथवा जैसे- शरखागतो [अ्रथवा दुखितो] फे दुख को मिटाने वाले नाखून ।।८७॥ प्रथवा जैसे- शिवजी के वास की वह भ्रग्नि तम्हारे दुखो को दूर करे ॥८८॥ इन दोनो की विचित्रता पहिले ही [कमश उदा० १, ५६ और १, ६० पर] दिखला चुके है। [वहाँ से देख लेना चाहिए]। ३-यह 'त्रियावंचित्रयवतता' का [तीसरा] और भेद है। अपने विशेषण की विचित्रता। मुस्य रूप से प्रस्तुत [वर्ण्यमान] होने से किया का अपना जो विशेषण अर्थात् भेदक उसके कारण जो वैचिन्य अ्रर्थात् सुन्वरता [वह भी क्रिया- वैचित्र्यवकता का तीसरा भेद है।। जैसे- इस प्रकार [सन्ध्या के समय] चन्द्रमा के उदय होने पर स्त्रियो न सुन्दर कान्ति वाली दूती के साथ बात करने में नेत्र और मन लगे होने के कार विपरीत भूषा के विन्यास से [अर्थात् अन्य स्थान पर पहिने जाने वाले आ्रभूषण को अ्र्न्य स्थान पर पहिन लेने से] सखी जनो को हँसाते हुए आभूषण धारण की विधि को ग्रहण किया। १ काव्यमीमासा पृ० ७० तथा दशरूपकावलोक २, ३८ तथा रसाणंव सुधाकर १, २७२ पर उद्धृत हुआ है।

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कारिका २४ ] द्वितीयोन्मेष [२६५

अत्र मएडनविधिग्रहणलक्षणाया क्रियाया विपरीतभूषाविन्यासहासित- सखीजनमिति विशेपणोन किमपि सौकुमार्यमुन्मीलितम्। यस्मात्तथाविघाद- रपरचित प्रसाधनं यस्य व्यञ्जकत्वेनोपात, मुख्यतया वररर्यमानवृत्तेर्वल्लभा- नुरागस्य सोऽप्यनेन सुतरा समुत्तेजित । यथा वा- मय्यासक्तश्चकितहरिणी हारिनेत्रत्रिमाग: ।६0। अस्य वैचित्र्य पूर्वमेवोदितम्। एतच्च क्रिय विशेषण द्वयोरपि क्रिया- कारकयोर्वकरत्वमुल्लासयति। यस्माद्विचित्रक्रियाकारित्वमेव कारकवैचित्रयम्।

भर्थात् रात होने पर प्रियतम का मिलन-सन्देश पाकर सुन्दरियो ने सज- धज कर अपने प्रियतम के पास जाने के लिए बडी उत्सुकता से अलद्दारो को पहिनना प्रारम्भ किया। परन्तु दूती के साथ बात करने में शखॅ और मन तो उसकी ओर लगा हुआ था इसलिए कही का आ्भूपण कही और पहिन लिया इसको देखकर सखियो को हँसी आ रही थी ॥८ह॥। यहां मण्डन-विधि के ग्रहण करने रूप निया का 'विपरीतभ्षाविन्यासहासित- सखोजनम्' इस [ क्रिया ] विशेषण से कुछ अपूर्व सौन्दर्य प्रफट होता है। क्योकि उस प्रकार का आ्रवरपूर्वक [अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक] घारण किया हुआ अ्रलद्धार जिस [ मुख्यतया वर्प्यमान प्रियतम के अनुराग ] के व्यञ्जक रूप में ग्रहस किया गया है वह [प्रियतम का अनुराग] भी इससे उत्तेजित होता है। [श्रधिक सुन्दर प्रतीत होता है]। अ्रथवा जसे [उदा० स० १, ४६ पर पूर्व उद्ृत श्लोक में ]- चकितहरिसी के [ नेत्रो के ] समान मनोहर [ नेत्र का प्रान्त भाग प्र्प्रयात् ] फटाक्ष मेरे ऊपर किया ॥६०॥। इसका सौन्दर्य पहिले हो [उदा० १, ४६ पर ] दिखला चुके हैं। यह क्रिया- विशेषण क्रिया तथा कारक दोनों के सौन्दर्य को बढाने वाला होता हैँ। [क्रियाविशेषण होने से क्रिया के सौन्वर्य को तो स्वभावत बढ़ाता ही है। परन्तु ] विचिन्न किया का करना ही फारक का सौन्दयं है[ इमलिए यह पियाविशेष कारक के सौन्दर्य को भी चढाने वाला होता है]।

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२६६ ]' वकोवितिजी चितम् [पारिकिा २५

इनमपर क्रियावैचित्र्यवक्रताया प्रकारान्तरम-'उपचारमनोज्ञता' । उपचार सानश्याठिसमन्वय समाश्रित्य वर्मान्तराम्यारोप्तन मनोजत वक्रत्वम्। यथा- तरन्तीवाङ्गानि म्सलदमल लावरायजलघो प्रथिम्न प्रागत्भ्य स्तनजघनमुन्मुद्र्यन न। हशोर्लीलारम्भा: स्फटमपवदन ने सरलता- महो सारप्रादयास्तरुर्मान गाट परिचय ।।६?।" अत्न 'रखलदमललावरगजलवा' समुल्नसमलसान्दर्यमम्भार मिन्वी परिस्फुरन्त्यपि स्पन्टतया लवमानत्वेन लच्यमाणानि पारभान्निमामादयितु व्यवस्यन्तीवेति चेतनपदार्थसम्मविसाह्यापचारान तारुएयनरलतरूगीगात्राणा

४-औ्रर यह [आ्राग कहे जाने वाला] 'निषावचिन्यवनना' का श्रर [चौथा] प्रकार है, 'उपचाग्मनोज्ञता'। उपचार का त्रय सादृद्य आदि सम्बन्ध के आधार पर अ्न्य [पदाय] के धम का श्रव्यानेप करना। ['उपचागे हि नामा- त्यन्त विशकलितयो पदार्थयो सादृश्यातशयमहिम्ना भेदप्रतीतिस्यगनमानम्] जैसे [उपचारवकता का उदाहगण]- [तारुण्य का उदय होने पर वय नन्धि मे वतमान मुन्दरी के ] श्रद्ग [माना भरने के रूप में ऊपर से] गिरते हुए स्वच्छ लावण् न सागर में तग्ते हुए-से प्रतीत होते है। [उसके] स्तन औ्र नितम्ब विस्तार की न्रौटता [श्रधिक्य] को [कमश. ] खोल रहे हे। तर आ्र्प्रांखो के चञ्चल व्यापार स्पष्ट रूप से [बाल्योचित] सरलता का अपवाद कर रहे हे [अर्थात् वनता को प्रद्शित कर रहे है]। श्रहो इस मृगनयनी का अब तारुण्य के साथ घनिष्ट परिचय हो गया है। [शव यह पूर्ण रूप से यौवन में प्रवेश कर चुकी हँ]।६१।। यहाँ गिरते हुए निर्मल लावण्य के सागर में अर्थात शोभायमान स्वच्छ सौन्दर्य सम्भार के सागर मे गतिशील होने से चलत हुए-ते, पार पहुँचने के लिए मानो तरते हुए प्रयत्न-सा कर रहे है। इस चेतन पदार्थ में ही सम्भव होने वाले सादृश्य के कारण उपचार से चञ्चल तरुणियो के अ्रङ्गो के तैरने की उत्प्रेक्षा की है

१ सदुक्ति कर्ण्णामृत २,११ पृ० १२६ मे इसे राजशेसर का श्लोक लिखा माना है। सूक्तिमुक्तावली ने इसे 'कुम्भक का श्लोक लिखा है। हेमचन्द पृ० ३०२ तथा वाग्भट्ट [अलद्कार तिलक ] पृ० ६२ और माणिक्यचन्द्र पृ० २५ पर भी यह पद्य उद्धृत हुआ है।

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कारिका २५ ] द्वितीयोन्मेपः [ २६७

तरसमुत्प्रेत्षितम। उत्प्रेक्षायाश्चोपचार एव भूयसा जीवितत्वेन परिस्कुरती- त्युत्प्रेत्तावसर एव विचारयिष्यते। 'प्रथिम्नः प्रागल्भ्यं स्तनजघनमुन्मुद्रयति च' इति।अ्र स्तनजघन कर्तृ प्रथिम्न. प्रागल्म्य महत्वस्य प्रोढ़िमुन्मुद्रयत्वुन्मीलयत। यथा कश्चिच्चेतन किमपि रक्तणीयं वस्तु मुद्रयित्वा कमपि समयमवस्थाप्य समुचितोपयोगावसरे स्वयमुन्मुद्रयत्युद्धाटयति। तदेव तत्कारित्वसाम्यात स्तनजघनस्योन्मुद्रण- सुपचरितम्। तदिदमुक्त भवति-यत्, यदेव शंशवदशाया शक्त्वात्मना निमी- लितस्वरूपममवस्थितमासीत् तस।प्रथिम्न प्रागल्भ्यस्य प्रथमतरतारुएयावतारा- वसरसमचित प्रथनप्रसर समर्पयत। 'दशोर्लीलारम्भा' स्फुट मपवटन्ते सरलताम्' इति, त्रत्र शेशवप्रतिष्ठितां

और उत्प्रेक्षा में अघिकतर उपचार ही उसकी जान होती हैं यह वात उत्प्रेक्षा के [विचार के] श्र्रवसर पर हो कहेंगे [विचार करेंगे]। [उस तरुणी के ] 'हतन और नितम्ब विस्तार के अ्रतिशय को खोल रहे है'। यहां स्तन और नितम्ब [ जघन ] कर्ता [ वाचक पद है] विस्तार के प्रतिशय को खोल रहे हैं। [यह जो कहा हैँ उससे यह प्रतीत होता हैं कि] जैसे फोई चेतन किसी सुरक्षित रखने योग्य अपनी किसी वस्तु को कुछ समय तक [ढंककर] छिपाकर रखता है और उसके उपयोग के उचित श्वसर पर अपने आप उघाड कर खोल देता हैं। उसी प्रकार उद्घाटन-कर्ता की समानता से स्तन और जघन में खोलने का उपचार से प्रयोग किया गया है। [वास्तव में स्तन औ्रौर जघन ्रचेतन होने से स्वय उद्घाटन नहीं कर सकते है]। इसका अ्र्प्रभिप्राय यह हुआा कि जो [ स्तन औ्रर जघन के विस्तार] शशव श्रवस्था में [आगे विस्तार प्राप्त करने की ] शक्ति रूप से श्रव्यकत रूप में स्यित थे [ प्रव्यक्त त्प से स्थित स्तन औ्र््रर जघन ] उस ही विस्तार के अतिशय को [प्रथमतर तारुण्य] नवौवन के आने के समय [ उन्मुद्रयति पद ] उचित रप से वोघित करता है। और 'आांखों की चपल चेप्डाएँ स्पप्ट रप से सरतता का प्रतिवाद करती है'। यहाँ मूल में पूर्व नस्करण में अनवस्थितम् पाठ पाया जाता है। परन्तु उसकी अपेक्षा प्दस्थितम् पाठ अ्रधिक उपयुक्त है। नलिए हमने प्र्वस्थितम् पाठ ही रखा है। पूर्व नस्करण में वहाँ 'स्पष्टता' पाठ पाया जाता है। पग्न्ु मन शलोक जिसका प्रतीक यहाँ साथ ही दिया है में 'मरलता' पाठ है। उसके अनुमार 'नरलता' पाठ ही भधिक उपयुवत है ऐमा मानकर हमने न्पप्टता' की जगह 'मरलता' पाठ दिया है।

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२६८ ] वक्रोपितजीवितम [ फारिका २५

सरलता प्रकटमेवापसार्य नशोर्विलामोल्लामा कमपि नवरयोवनसमुचित विभ्रममधिरोपयन्ति। यथा केचिच्चेतना कुत्रचिद्विपये कुमप व्यवहार समासा- दितप्रसरमपसार्य किमपि स्वाभिप्नायाभिमत परिम्पन्दान्तर प्रतिष्ठापयन्तीति

चरितम्। तटेवंविधेनोपचारेएांनास्तिस्राऽपि क्रिया कामपि वक्रतागधिरोपिताः। वक्रताप्रकारा प्रतिपद विचार्यन्ते ॥२४॥ इदमपरं क्रियावैचित्र्यवक्रताया प्रकारान्तरम, '7र्मानिसवृति' कर्म- प्रभृतीना कारकाणा सवृति सवरगाम। प्रस्तुतीचित्यानुमारेण सातिशय- प्रतीतये समाच्छाद्याभिघा। मा च क्रियावेंचित्र्यकारित्वात प्रकारत्वेना- भिधीयते। कारयो कार्योपचाराद यथा-

इस [ वाक्य] में वात्यावस्था में [श्रांसो में ] स्यित मरलता को स्पष्ट रूप से हटा आंखो के हाव-भाव नवयीवन के अनुरप किली अ्रपू्वं सौन्द्य का आधान कर रहे हैं। जैसे कोई चेतन [व्यव्ति] किसी विषय में प्रचलित किसी व्यवहार को समाप्त करके अपने अप्रभिप्राय के अ्रनुसार किसी प्रन्य प्रकार के व्यवहार को स्थापित करते हैं उस अ्भिनव व्यवहार-कारित्व की समानता से सुन्दरियों के नेत्रो के हाव-भावो में सरलता के प्रतिवाद करने का श्रपचारिक प्रयोग किया गया हैं। इस प्रकार के इस उपचार से [ श्लोक के तीन चरणो में श्राई हुई 'तरन्ति', 'उन्मुद्रयति' तथा 'अपवदन्ते' ] ये तीनो ही क्रियाएँ किसी अपूर्व सौन्दर्य को प्राप्त हो गई है। इस [ श्लोक रूप ] वाक्य में [ इस तीन स्यानो की उपचारवत्रता के अ्रतिरिक्त] अरन्य भी वकता के प्रकार प्रत्येक पद में सम्भव हो सकते है [खोजे जा सकते ह] इसका विचार किसी अन्य [उपयुवत] अ्रवसर पर करेंगे। २-त्रियाव चित्र्यवक्रता का यह [ पाँचवां] और भी प्रकार है 'कर्मादि का सवरण'। कर्म आदि कारको की सवृति अर्थात् सवरण आच्छादन। अर्थात् प्रस्तुत [वर्ण्यमान वस्तु] के श्ररचित्य के अनुसार [सौन्दर्य के ] अ्र््रतिशय की प्रतीति के लिए [ वस्तु को ] छिपाकर फहना। वह [ भी ] करिया के वचित्य को करने वाला होता है इसलिए [क्रियावचित्र्यवफ्रता के] प्रकार [पञ्चम भेद] के रूप में बतलाया गया हैं। कारस में कार्य के उपचार [गौण व्यवहार] से [कर्मादि सवूति रूप 'क्रिया- वैचित्र्यवकता' का उदाहरण] जैसे-

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कारिका २५ ] द्वितीयोन्मेप. [ २६६

नेत्रान्तरे मधुरमर्पयतीव किञ्चित् कर्णान्तिके कथयतीव किमप्यपूर्वम्। अन्तः समुल्लिखति किञ्चिदिवायताच्याः रागालसे मनसि रम्यपदार्थलच्षमी:॥६२॥ श्रत्रन तदनुभवैकगोचरत्वादनाख्येयवेन किसपि सातिशय प्रतिपद कम सम्पाटन्त्य क्रिया. स्वात्मनि कमपि वक्रभावमुद्भावयन्ति। उपचारमनोज्ञता- डप्यत्र चिद्यते । यस्मादपेणकथनोल्लेखान्युपचारनिबन्धनान्येव चेतनपदार्थ- ध्मत्वात। यथा च- नृत्तारम्भाद्विरतरभसस्तिष्ठ तावन्मुहर्ते यावन्मौलौ श्लथमचलता भूपए ते नयामि। इत्याख्याय प्रणायमधुरं कान्तया योज्यमाने चूड़ाचन्द्रे जयति सुखिन कोडपि शर्वस्य गर्वः ।।६३।। वडी-बढी शांखो वाली सुन्दरी के हृदय में प्रेम की मादकता उत्पन्न हो जाने [ किसी भी] सुन्दर पदार्थ का सौन्दर्य उसकी आंखों में को कुछ अपूर्व ूरता प्रदान करता है, कानो में कुछ अ्पूर्व [मधुर प्रिय बात] कहता सा है श्रौर न के भीतर कुछ प्रद्भुत कसक-सी पैदा कर देता है ।।६२।। यहां केवल उत [ सुन्दरी] के अ्रनुभव गोचर होने से, वर्णन करने के श्रयोग्य नर्वचनीय किसी सातिशय वस्तु को प्रत्येक पद से प्रतिपादन करती हुई [अरपरयतत, वर्यत औरौर उत्लिखति] बियाऐ अ्रपने भीतर किसी अ्र्रपूर्व सौन्र्य को उत्पन्न र देती हैं। [इम 'अपर्ययति', 'क्ययति' औ्रर 'समुल्लिखति' तीनों क्रियाओों के कर्म शब्दत, कथन न करके 'किमपि' सर्वनाम से समाच्छादित रूप में कयन किया ग है। इसलिए यह कर्मादिसवृति रूप तियारवचित्र्यवपता के मञ्चम भेद का दाहरस हैं। इसके प्रप्रतिरिषत इस उदाहरण में] यहाँ उपचारवमता भी विद्यमान । पयोकि [अररपयति आदि तीनों करियाओ में ] प्रपण, कथन उल्लेखन [ पद] र्चारमूलक हो [ प्रयुक्त ] है। [ वस्तुत इन ररियाथ्ों के] चेतन [ पदार्थों] का ही] धम [नम्भत]होने से। श्रीर जैसे- ज़रा ठहरो, तुम्हारे शिर का आभूपरा [चन्द्रकला] ढीला हो गया है उसे रा कस दूँ. इस प्रकार प्रेम से मीठी तरह से कहकर प्रियतमा पावती के द्वारा र पर चन्द्रकना के बाँघे जाने पर ध्रन्दित शिवजी का फोई अपूर्व श्र्प्रिमान शत्कषयुक्त है।।६३।।

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२७० ] वकोपितिजीनितम [कारिका २६

छत्र 'कोSपि' इत्यनेन सर्वनामपदेन तदनुभवकगाचग्त्वादव्यपवेष्य- त्वेन सातिशय 'शर्वस्य गर्व' इति कर्तृ सवृति। 'जयति' सर्वोकरुर्पगा वर्तते इति क्रियाचैचित्र्यनिवन्धनम। इत्यय पूर्वपादाधिनक्रभावा व्यवन्थित । दिड्मान्रमेवमंतम्य शिष्ट लक्ष्ये निर्यने ॥६४।। इति सग्रहश्लाक ।।२y।। तदेव सुप्तिडन्तयोद्वयोगपि पढपर्वाद्वन्य प्रातिपदिकम्य घातोशच यथा- युक्ति वक्रता विचार्येदानीं तयोग्व यथाग्वमपरार्व्वम्य म्रत्ययलन्तम्य वक्रता विचारयति। तन्न क्रियावेंचि्नवक्ताया समनन्तरगम्भविन क्रमसमन्वितत्वान् कालस्य वक्रत्व पर्यालाच्यते, क्रियापरिचछेदकन्नात तम्य। औ्रचित्यान्तरतम्येन समयो रमणीयताम्। याति यत्र भवत्येपा कालवचित्र्यवक्रता ।२६।।

यहाँ [ इस श्लोक में ] 'कोडपि' इस सर्वनाम पद ने रेवल उन [शिनजी ] के ही अनुभव का विषय होने से अवर्णनीय अतिशययुयत शिवजी का प्रभिमान हैं, इस रूप में [ कोडपि पद रो ] कर्ता का सवरण किया गया है। औ्रर वह 'जयति' सर्वोत्कषयुकत ह इस 'क्रियाचैचित्र्य' का कारण है। इस प्रकार पदपूर्वाद्धवकता सिद्ध हुई। यहां उसका केवल दिडमान प्रदर्शन किया गया है। शेष [विशेष विस्तार] लक्ष्य [काव्यो] मे पाया जाता है।।४।। यह [ पदपूर्वार्द्धवकता के निरुपण के श्रन्त में उपसहार रूप अ्रपन्तरश्लोक ] सग्रहश्लोक हैं॥२५। ३-प्रत्यय-वक्ता [१ कालवचित्र्यवकता] इस प्रकार [यहां तक] सुवन्त तथा तिडन्त दोनो ही प्रकार के पदो के पूर्वाद्धं अर्थात् प्रातिपदिक नौर धातु की यथायोग्य [११ प्रकार की पदपूर्वाद्धवक्रता] वकता का विचार करके अब उन्हीं [ सुवन्त और तिडन्त रूप पदो ] के प्रत्यय रूप उत्तरार्द्ध की वकरता का विचार करते है। उनमें से कियावचित्र्य के बाद उपस्थित होने वाले अतएव क्रमप्राप्त काल की वकता का विचार [पहिले] फरते है। उस [काल] के क्रिया परिच्छेदक रूप होने से। जहाँ शचित्य की अन्तरतमता से काल [विशेष] रमशीयता को प्राप्त हो जाता है वह 'कालवचित्र्यवकता' होती [कहलाती] है।

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कारिका २६ ] द्वितीयोन्मेष [२७१

एपा प्रक्रान्तस्वरूपा भवत्यस्ति कालवैचित्र्यवक्ता। कालो वैयाकरणादि

खवायी। तस्य वैचित्र्य विचित्रभावस्तथाविवत्वेनोपनिबन्धस्तेन वक्रता वक्रत्वविच्छित्ति। कौहशी, यत्र यस्या समय कालास्यो रमीयता याति रामसीयकं गच्छति। केन हेतुना 'शचित्यान्तरतम्येन'। प्रस्तुतत्वात प्रस्तावाधि- कृतस्य वस्तुनो यदौचित्यमुचितभावस्तस्यान्तरतम्येनान्तरद्गत्वेन। तढतिशयो-

यथा- समविसमणिव्विसेसा समतदो मदमदसंचारा। अंइरो होहिति पहा मणोरहाए पि दुल्लंघा ॥६५।।' [समचिपमनर्विशेषा समन्ततो मन्दमन्दसञ्चाराः । अचिराद्दविष्यन्ति पन्थानो मनोरथानामपि दुर्लव्याः ॥ इतिच्चाया]

यह जिसके स्वरूप का [वर्णन] आ्ररम्भ कर रहे हैं यह 'कालवंचित्र्यवक्रना' होती है अर्थात् हूं। काल [शब्द से यहाँ] वंयाकरण आरप्ादि [के सिद्धान्त] ने प्रमिद्ध, लट् आदि [लकारो में होने वाले]प्रत्ययो से वाच्य, पदार्थों के उदय और तिरोघान का कराने वाला वतमान [भूत भविष्यत्] आदि [श्भिग्रेत] है। उसका वैचित्र्य प्र्प्र्य्यात् उस [ विशेष ] प्रकार से रचना रूप विचित्रता, उससे जो वकता प्रर्थात् वाँकपन का तौन्दर्य [वह कालवंचित्रयवत्रता होती है ]। कँसी-जहाँ जिसमें काल पद वाच्य समय रमणीयता को प्राप्त होता है सुन्दरता का जनफ हो जाता है। किस कारण से-शचित्य के अन्तरतम होने से, प्रस्तुत होने से, प्रकरण में अ्रघिकृत [मुस्य र्प से वर्ण्यमान ] वस्तु का जो श्ररचिन्य उचित रूपता उसके श्रन्तरनम अ्रर्यात श्रन्तरङ्ज होने से। अर्थात् उसके अतिशय का उत्पादक होने से। जसे- [वर्षाकाल में सब राग्तो में पानी भर जाने पर ] ऊँचे नीचे के भेद से .. र्ुहित [ जिनमें पृथ्वी के पानी में दूधे होने के कारण ऊँचे साले का भेद प्रतीत नहों होता है ] अ्रत्यन्त पम [सरया में ] चल सक्ने योग्य [ अ्रथवा जहां चला जाय वहाँ भी कोचड आदि के कारस सभलकर अन्यन्त मन्द वति ने चलने योग्य] शीघ्र ही सारे रास्ते मनोरथ से भी घ्रगम्य हो जावेंने ।।६५।।

१ नाथामप्नगती स० ६७५. धधन्यानोक पृ० २ू३ पर इदून।

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२७२ ] वकोपितिजोवितम [पारिका २६

अ्र्प्रत्र वल्लभाविरह्वैधुयेकातरान्त कररोन भाविन समास्य सम्भाव-

1 सन्टशनामहिप्णुना किमपि भर्यावमष्ठुलत्वमनुभूय गक्गाबुलत्वेन केनचिदेत- दभिधीयते-यटचिराद भविष्यन्ति पन्थानो मनोग्थानामप्यलानीया इति भविष्यत्कालाभिधायी प्रत्यय कामग्यपरार्धवक्रता विकासयनि।

यथा वा-

यावत किन्चिद पूर्वमार्द् मनसामावेदयनतो नया सोभाग्यातिशयस्य कामपि दशा गन्तु व्यवत्न्त्यमी। भावास्तावदनन्यजम्य विचुर कोडयुदयमो जम्भते पर्याप्ने मधुविभ्रम तु किमयं कर्तेति रुम्पामहे ॥६६।।

[यह इलोक गायासप्तशती का ६७५वाँ श्लोफ हं। घवन्यालोक मे भी पृष्ठ २८३ पर उद्धृत हुआ है] यहां अपनी प्रियतमा के विरह से दुसी होने के कारण आगे आाने वाले । वर्षा ऋतु के ] समय की सम्भावना के अ्रनुमान के माहात्म्य की कल्पना फरके उद्दीपन विभाव के सामर्थ्य से युक्त उस प्रकार के [वर्षाकाल के] सौन्दर्य को देख सकने में असमर्थ अनिर्वचनीय भयजन्य श्ररव्यवस्था को अ्रनुभव करफे शद्धित किसी व्यक्ति के द्वारा यह [ श्लोक] कहा जा रहा है कि शोघ्र ही रास्ते मनोरथों के लिए अलङ्गनीय हो जावेंगे। इस प्रकार भविष्यत् फाल का बोधफ [स्य], प्रत्यय किसी अ्र्प्रपूर्व अ्र्प्रपरार्द्धवकता [प्रत्ययवत्रता] को प्रकट फर रहा है। प्रथवा जैसे-

अभी जब तक [ वसन्त ऋतु के आ्ारम्भ में ] नवीन [ शोभायुक्त ] ये पदार्थ सहृदयों के मन में कुछ अपूर्व गुदगुदी को उत्पन्न करते हुए सौन्दर्य के अतिशय की किसी अनिर्वचनीय दशा को प्राप्त करने के लिए तैयारी कर रहे हैं [ऋतु सन्धि होने के कारण अभी वसन्त का पूर्ण विकास न होने से वसन्तोचित सौन्वर्य को प्राप्त नहीं हुए है] तब तक ही कामदेव का कुछ अपूर्व मनोहर उद्योग प्रारम्भ हो गया है। जब वसन्त का वैभव पूर्ण रूप से आवेगा तव वह क्या [्या भ्रनर्थ] करेंगे इससे [यह सोचकर ] हम [ डर के मारे] फाँप रहे है ।।६६।।

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फारिका २६ ] द्वितीयोन्मेष: [ २७३

त्रपत्र 'व्यवस्यन्ति' 'जम्भते' 'कर्ता' 'कम्पामहे' चेति प्रत्यया. प्रत्येकं प्रतिनियनकालाभिवायिन कामपि पदपरार्ववक्रतां प्रस्यापयन्ति। तथा -3च-प्रथमावतीरणामघुसमय सौकुमार्यसमुल्ल सितसुन्दर पढार्थेसार्थ ममुन्मेपसमुद्दी- पितसहजविभवविलसितत्वेन सकरकेनोर्मनाडमात्रमाधवसानाथ्यसमुल्लसिता- तुलशक्ते सरसहृदयविधुरताविवायी कोऽपि सरम्भ समुज्जुम्भते। तस्माद- नेनानुमानेन पर परिपोपमधिरोहति कुसुमाकरविभवविभ्रमे, मानिनीमानदलन- दुर्ल लितसमुदितस ह ज सौकुमार्यसम्पत् मञ्जनितससु चितजिगीपावसर किमसौ विधास्यतीति विकल्पयन्तस्तत्कुसुमशरनिकरनिपातकातरान्त.करणा. किमपि कम्पामहे चकितचेतसः सम्पद्यामह इति प्रियतमात्रिरहविधुरचेतस सरसहृदय- स्य कस्यचिदेतदभिधानम् ॥२६॥। एव कालवक्रता विचार्य क्रमसमुचितावसरा कारकवक्रतां विचारयति-

यहाँ 'न्यदस्यन्ति', 'जुम्भते', 'कर्ता', और 'कम्पामहे' इनमें से प्रत्येक प्रत्यय एक नियत काल का बोधक होकर पदो के उत्तरारघ की कुछ अदभुत वकता [प्रत्यय- वक्ता] को प्रकाशित करते हैं। जैसे कि [इस श्लोक का अ्र्प्रभिप्राय यह है कि] नएननए आए हुए वसन्त ऋतु के सौन्दर्य से शोभित सुन्दर पदार्थो के सगूह के विकास से समुद्दीपित स्वाभाविक उद्दोपन विभावो के विलास से वसन्त के अ्नभी नाम- मात्र के सहयोग से अतुल शक्ति को प्राप्त कर लेने वाले फामदेव का सहृदयो को खिन्न करने वाला कोई अपूर्व बेग उत्पन्न हो गया है। इसलिए [जब इस समय वसन्त के आरम्भ में ही कामदेव की यह दशा हो रही है तब आाने वसन्त का पूर्ण साम्राज्य होने पर कामदेव न जाने क्या करेगा] इस अनुमान मे [आगे चल फर] कामदेव के चरम उत्कर्ष के पहुंचने के समय पर मानिनियों के मान भङ्ग करने के फारण अभिमानयुक्त स्वाभाविक तौकुमार्य सम्पत्ति के उदय हो जाने पर औ्रर विजय प्राप्ति का [वसन्त रप] उचित अवसर पाकर यह [कामदेव न जाने] क्या करेगा ऐसा सोचकर फामदेव के वाणो के प्रहार से भयभीत अन्तफरण वाले २ हम फुछ कम्पित अर्थात् चकित चित हो रहे है। यह प्रियतमा के विर्ह से दुसी हृदय वाले किसी सहृदय का कथन है॥।२६।। १३-कारक वकता [पद उत्तरार्द्व-प्रत्यय-त्रपता २] इस प्रकार फालवकरा का विचार करके क्रम-प्राप्त 'कारक्वप््ता' का विचार फरते हं-

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२७४ ] वकोपितिजीवितम् [ फारिका २७-२८

यत्र कारकसामान्यं प्राधान्येन निवध्यते।

परिपापयितु कान्चिद् भङ्गीभणितिरम्यताम्। कारकासां विपर्यासः सोक्ता कारकवक्रता ॥२=॥

'सोक्ता कारकवक्रता' सा कारकवक्रत्वविन्छित्तिरभिहिता। कीगी- 'यस्यां कारकाणा विपर्याम.' साधनाना विपरिवर्तेन, गौगामु्ययोरितरेतरत्वा- पत्तिः। कथम, यन कारकमामान्य मुख्यापेत्तया करणादि तत प्राधान्येन मख्यभावेन प्रयु्यते। कया युक्त्या-'तत्त्वाध्यार।पणात'। तदिति मुस्यपरा- मर्श., तस्य भावस्तत्त्व, तदध्याराणन। मुरयभावसमर्पेणन। तटेवं मुख्यस्य का व्यवस्थेत्याह-'गुएभावाभिवानत.'। मुरयस्य यो गुएभावस्तदभिघानात

जहां फारक-सामान्य [श्रप्रधान गौए कारक] को [उसमें तत्त्व ] मुस्यत्व का अध्यारोप करके प्राधान्येन, अ्रथवा मुरय [कारक में तत्त्व भरर्यात् गौत्व का अ्रध्यारोप करके ] को गौए रूप से कथन किया जाता है [ वह कारफवचित्र्यवक्रता होती है]।।२७।। [और जहां ] किसी कथन शैली की रमीयता को परिपुष्ट फरने के लिए कारकों का विपर्यास[ अर्थात् फर्ता को कर्म या करण बना देना अ्थवा कर्म या करण को कर्ता बनाकर प्रयोग करना] होता है वह [ भी दूसरे प्रकार की ] 'फारक- वैचित्र्यवकता' कही जाती है॥२८॥

वह 'कारफवक्रता' कहलाती है। वह 'कारकर्वचित्र्य' की वकता कही गई है। कैसी कि-जिसमें कारकों का विपर्यास प्रर्थात् साधनो का परिवर्तन शर्थात् गौस का मुख्यत्व और मुख्य का गौसात्व हो जाता है। फैसे कि-जो कारफ सामान्य अर्थात् मुख्य [कारक] की अ्र्प्रपेक्षा से [ गुणीभूत] करस आादि [रूप अ्रमुख्य साधन] है उसका प्रधान रूप से अर्थात् मुख्य रूप से प्रयोग। कया जाय। किस युक्ति से-तत्व के शध्यारोपण से। तत् पद से मुख्य का ग्रहण होता है। उस 4' [मुख्य] का भाव मुख्यत्व तत्त्व [शन्द का अर्थ] है। उसके अध्यारोप से अर्थात मुख्य भाव के आरोप से। [अर्थात् गौण कारक सामान्य मे मुख्य भाव का आ्रोप करके प्राधान्येन उसका वर्न एक प्रकार की कारकवक्रता हुई]। तब फिर मुखय को क्या व्यवस्थाहोगी, यह हते है। मुख्य के गुएभाव के कथन से। मुख्य का

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कारिका २७-२८ ] द्वितोयोन्मेष. [२७५

अर््रमुख्यत्वेनापनिवन्धादित्यर्थ. । किमर्थम्-'परिपोपयितुं काञ्चिद् भङ्गीभगिति- रम्यताम्'। काब्चिदपृर्वो विच्छित्युक्तिर मीयतामुल्लासययिदुम। तदेवम- चतनस्यापि चेतनसम्भविस्वातंत्र्यसमर्षादमुख्यस्य करणाढेर्वा कर्त त्वाध्यारो- पणादत्र कारकविपर्यासश्चमत्कारकारी सम्पद्यते। यथा- याञ्चा दैन्यपरिग्रह प्रणयिनी नेद्वाकव: शिक्षिताः सेवासवलितः कदा रघुकुले मौलो निव द्ोजर््जालः। सर्वे तद्विहित तथाप्युदधिना नैवापरोधः कृतः पागि: सम्प्रति ते हठात् किमपर स्प्रप्टु धनुर्धावति ।।६७I' अत्र पाणिना धनुर्गहीतुमिच्छामीति वक्तव्ये पाणे. करसभूतस्य कत त्वाध्यारोप: कामपि कारकवक्रता प्रतिपद्यते।

जो गौसभाव है उसके कथन से अर्थात् अमुरयत्वेन वर्णन से। फिसलिए कि-किसी श्रपूर्व वर्णन-शैली को परिपुष्ट करने के लिए। किसी अपूर्व सुन्दर कथन-शैली को विकसित करने के लिए। इस प्रकार-प्रचेतन में भी चेतन में रहने वाले स्वातन्त्र्य को प्रतिपावन करते हुए अप्रधान प्रथवा कर आदि [ फारक ] में फर्तृत्व के अरध्यारोप से जहां कारक विपर्यास चमत्कारकारी प्रतीत होता है। [वह कारक- वैचित्र्पवक्रता कहलाती है] जैसे- यह कलोक महानाटक के चतुर्थ अ्द्ध का ७८वाँ श्लोक है।सरस्वती कण्ठा- भरणा में पृ० ५२ पर उद्धृत हुआ है। समद्र पर पुल वांघने के पूर्व समुद्र में से लड्का जाने का रास्ता न मिलने पर कुद्ध होकर रामचन्द्र जी कह रहे हे कि- दीनता और दान को ग्रहण करने वाली याचना करना इक्ष्वाकुवशियों ने कभी नहीं सोखा। और रघुवश में किसी ने सेवा-भाव के सूचक हाथ जोडने की रिया फब की है [ प्रर्थात् रघुवशियों ने कभी किसी के सामने हाथ नहीं जोडे श्रौर न किसी से भीख मांगना सीखा है। लेकिन आ्रज इस समुद्र के सामने में ने ] वह सब [ भी ] किया [समुद्र से रास्ता देने, की याचना भी की, उसके हाथ भी जोढे] पुरन्तु समुद्र ने [हमारे लिए रास्ता] खोला नहीं, तब श्रव और कया किया जाय, विवश होकर मेरा हाथ घनुष को उठाने के लिए बढ रहा हैं ।।६७।। यहाँ 'में हाथ में धनुष उठाना चाहता हूँ' इस कहने के स्थान पर करण रूप हाथ पर फर्तृत्व का अध्यारोप [ करके 'पाणिग. धन स्प्रष्टु घावति' यह प्रयोग फरना] किसी पपूर्व कारफवक्ता को प्राप्त करा देता है। १. महानाटक ४, ७८। सरम्वतीकफाभरण पृ० ५२ पर उद्धन।

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२७६ ] वमो पितिजी मितम [ कारिका २७ २८

गथा वा- स्तनदन्दम, उत्यादो ।।६८॥। यथा वा- निग्पर्यायनिवेशपशल रमरन्योन्यनिभन्सिमि- र्हस्तायैर्यु गर्पान्नपत्य दशभिर्वामेर्धृत कार्मु कम। सव्याना पुनरप्रथीयसि विधावस्मिन गुखारी पे मत्सेवाविदुपामहम्प्रथ्मिका काप्यम्बरे वर्तते ।।६६॥।' त्रप्रत्र पूर्व वदेव सतृ त्वाध्यारोपनिवन्धन कारकवक्रचम् । यथा वा- वद्वस्पर्द्व इति ।१००|२=।। पथवा जैसे- [ पहिले उदा० स० १, ६५ पर उद्धृत ] 'तनद्वनद' इत्यादि [द्लोक] में श्रचेतन वाष्प-निवह रूप करण मे मतृत्व का अ्रध्यारोप भी कारफवत्रता का उदाहरस होता है] ॥६८॥ प्रथवा जैसे- यह श्लोक राजशेखरकृत वालरामायण नाटक के प्रयम श्रद्भ का ५०वो श्लोक है। सीता-स्वयम्बर के समय शिव धनुष को पक्च्कर प्रत्यञ्चा चढाने मे लिए उद्यत हुए रावण की उचित है। राचण वह रहा है कि- [मेरी वीस भुजाओ्रो में से ] एक दूसरे को टोकते हुए एक साथ [बिना पर्याय के] धनुष को छूने के कारण [ पेशलरसै ] प्रसनन, मेरे दस बाएँ हाथो ने धनुष को पकड लिया है अब प्रत्यञ्चा के आरोपण के छोटे-से कार्य में [सहायता करने के लिए ] मेरी सेवा परने में चतुर दाहिने दसो हाथो की पहिले में आऊ पहिले में आराऊं इस प्रकार की आफाश में कुछ अपूर्व स्पर्धा [अ्रहम्प्रथमिका ] हो रही है।।६E।। यहाँ भी पहिले के समान ही[ करण भूत बाए हाथों में धनुर्गंहण तथा दाए हाथो मे श्रहम्प्रथमिका के प्रति] कतृत्व के शध्यारोप के कारण कारकवक्रता है। प्रथवा जैसे [ पहिले उदा० स० १, ६६ पर उद्धत]- [ तुम्हारे फरसे के साथ ] स्पर्धा करने में [ मेरी तलवार लज्जित होती हे] ।।१०0। यहाँ तलवार मे क्तृ तव के अध्यारोप से कारकवऋ्रत होती है॥२८॥ १. बालरामायण १, ५० ।

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कारिका २६] द्वितीयोन्मेप. [२७७

एवं कारकवक्रतां विचार्य क्रमसमन्विता सख्यावक्रतां विचारयति। तत्- पररिच्छेदकत्वात् सख्याया .- कुर्वन्ति काव्यवेंचित्र्यविवक्षापरतन्त्रिताः । यत्र संख्याविपर्यासं तां संख्यावक्रतां विदुः ॥।२६।। यत्र यस्यां कवय काव्यवैचित्र्यविवक्षापरतन्त्रिताः स्वकर्मविचित्रभावा- मिधित्सापरवशाः सख्याविपर्यासं वचनपरिवर्तन कुर्वन्ति विदधते, तां सख्या- चक्रतां विदुः । तद्वचनवक्रत्व जानन्ति तदविद. । तवयमत्रार्थ. यदेकवचने द्वि- वचने वा प्रयोक्तव्ये चैचित्र्यार्थ वचनान्तर यत्र प्रयुज्यते, भिन्नवचनयोर्वा यत्र सामानाधिकरएयं विधीयते।

१४-संख्या वत्रता [पद उत्तराद्ध-प्रत्ययवफता ३] इस प्रकार कारकवक्रता का विचार करके क्रम से प्राप्त 'सरयावत्रता' का विचार करते है। सरया के कारक का परिच्छेदक [एक दो तीन आदि रूप में नियमित करने वाली ] होने से [ कारकवकता के वाद सरयावकता या वचनवक्रता का विचार करते हैं]। जहां जिस [वकता] में कवि लोग काव्य में वैचित्र्य के वर्सन की इच्छा फे परतन्त्र होकर ससया [वचन] का परिवर्तन कर देते है उसको 'सरयावकता' [या वचनवकता] कहते हैं। इसका यह अभिप्राय है कि कभी-कभी एकवचन द्विवचन के स्थान पर बहुधचन या बहुवचन के स्थान पर एकवचन आदि का प्रयोग करने से काव्य में विशेष चमत्फार उत्पन्न हो जाता है। ऐसी दशा में कुन्तक उसको 'तरया-वयना' या 'वचन- वकता' कहते हैं। जहां जिस [चक्रता] में काव्य के वैचित्य की विवक्षा के आश्रित होरुर पर्यात् [कवि] अपने कर्म [अर्थात् फाव्य] के विचित्र भाव के प्रतिपादन करने को इच्छा के आश्रित होकर मरया का विपर्यास अर्वत वचन का परिवर्तन कर देते हैं उसको 'सरयावत्रता' कहते है। अरर्थात् विद्वान् लोग उसको 'चनवनना' कहते है। इसका यहाँ यह अरभिप्राय हुआ कि [ जहां] एकवचन अ्यघा व्विवचन के प्रयोग करने के स्थान पर वैचित्र्य के लिए भन्य वचन का प्रयोग किया जाता है, बरथवा भिन्न वचन वाले दो शब्दों का सामानाधिकरव्य कर दिया जाता है [ उसका नाम 'वचनवत्रता' या सरपाननता होता है] ॥।२६॥

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२७८ ] [कारिका २६

यथा- कपोले पत्राली करतलनिरोधेन मृदिता निःपीता निःश्नासैरयममृतह्ृद्याऽघररमः । मुहुः कएठे लग्नस्तरलयतत वाप: स्नननटी प्रिया मन्युर्जातस्तव निरनुरोधे न त चयम् ॥?०?।। श्र्प्रत्र 'न त्वहम' इति वक्तव्ये 'न तु वयम' इत्यन्नरद्गत्वप्रतिपाठनाथं ताटस्थ्यप्रतीतये वहवचन प्रशुक्तम । यथा वा- वय तत्वान्वेपान्मवुकुर हतान्त्व सलु रुनी ॥१०२॥। जसे- यह इ्लोक अमरुकशतक का मपू्यां ब्लोक है। गुभापितावली मे म० १६८७ पर कवीन्द्रवचनामृत मे ३७७ पर, सदुग्तिवणाममतम् में २,२४५ और धयन्यालोक में पृष्ठ १४६ पर उद्धृत हुआ है। कोई नायक रूठी हुई मानिनी नायिका को मनाते हुए उससे कह रहा है कि- हे प्रियतमे, [तुम्हारे] गालो पर बनी हुई पत्रलेसा फो [ तुम्हारे पुल्लिन्ग ] हाथो ने मल डाला, अ्मृत के समान स्वादु तुम्हारे अ्धरामृत को [एक नहीं बहुत से पुल्लिङ्ग ] नि श्वासी ने पी डाला और यह [ पुल्लिङ्ग ] आ्रांसू वार-वार गले में लग- लग कर [तुम्हारे] स्तन को हिला रहे है। हे [हमारे] प्रार्थना फो न मानने वाली [निरनुरोधे प्रियतमे] तुम्हे क्रोध तो इतना प्यारा हो गया [कि उसके आ्र्प्रावेश में कोई तुम्हारे कपोल की पत्रलेखा को मसल रहा है, कोई तुम्हारा अधरामृत पान फर रहा है] पर हमारी कही कोई पूछ नहीं ॥१०१॥ यहाँ 'में तो नही' [प्रिय हुआ्प्र] यह कहने के स्थान पर [बहुवचन रूप] 'हम तो नहीं' [इस प्रकार उनके] अ्रन्तरङ्गत्व ज्ञापन के लिए औ्रर [अपनी] तटस्थता [औौदासीन्य] के बोध कराने के लिए बहुवचन का प्रयोग किया है। [इसलिए यह वचनवक्रता या सख्यावक्रता का उदाहरण होता है]। अथवा जसे [कालिदास कृत अ्रभिज्ञान शाकुन्तल नाटक के प्रथम झक शकुन्तला .. के ऊपर उडते हुए भौरे को देखकर दुष्यन्त की उकति है फि ]- हे भ्रमर ! हम तो। यह हमारे भोग के योग्य क्षत्रिया है अथवा नहीं इस] तत्वान्वेषण में ही मारे गए औप्रर तुम [इसके कान में बात करके और इसका अ्रधर- पान फरके] कृतार्थ हो गए॥१०२।

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कारिका २६] द्वितीयोन्मेप [२७६

अ्रत्रापि पूर्ववद़ेव ताटस्थ्यप्रतीतिः। यथा वा- फुल्लेन्दी वरका ननानि नयने पारी सरोजाकराः॥१०३॥ अत्र द्विवचनवहुवचनयोः सामानाधिकरएयलक्षण' सख्याविपर्यास सहृदयहृदय हारितामावहति। यथा वा- शास्त्राणि चतुर्नवम् ॥।/०४।। त्रपरत्र पूर्ववदेक्तवचनवहुवचनयो.सामानाधिकर एयं वैचित्र्यविधायि।।२।।। एव संख्यावक्रता विचार्य तद्विपयत्वात् पुरुपाा क्रमसमर्पितावसरां पुरुपचक्रतां विचारयति-

यहाँ भी पूर्व श्लोक के समान [भ्रमर की अन्तरङ्गता सूचना द्वारा अपनी] तटस्थता की प्रतीति होती है। अथवा जैसे [उदा० स० १, ६४ पर पूर्व उद्धत इलोक में]- [दोनो] आांखे खिले हुए कमलों के वन, औ्रौर हाथ कमलो के तालाच हो रहे हं ॥१०३। यहाँ ['नयने' और 'पासो' के]द्विवचन और [काननानि तथा सरोजाकरा के] बहुवचन के साथ का समानाधिकरण्य रूप वचनविपर्यय सहृदयो के हृदय के लिए चमत्कारकारी होता है। प्रथवा जैसे [ पहिले उदा० स० २, २६ पर उद्धत किए हुए वालरामायण के १, ३६वे श्लोक में]- शास्त्र उसके नवीन नेत्र है ॥१०४।। [यहां शास्त्राणि बहुवचन है और चक्षुनंव एक्वचन हैं] यहाँ [भी] पहिले [उदाहरण] के समान एकवचन और बहुवचन का समानाघिकरण्य विचित्रता [सौन्द्य] को उत्पन्न फरने चाला है॥२६।। १५-पुरुष वचना [पद-उत्तरादं-प्रत्यय-वष्ता ४] इस प्रकार सरया [या ववन] की वक्रता का विचार करके पुरषों के नरया से सम्बद्ध [सरया विषयक] होने से [सर्या निरपता के वाद ] श्रम से प्राप्त 'पुरुषवतता' का विचार करते है-

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२८०] वक्रोपितिजीनितम् [कारिका ३०

प्रत्यक्तापरभावश्च विपर्यासन योज्यते। यत्र विच्छित्तये सैपा जेया पुरुपवत्रता ॥३०।। यत्र यस्या प्रत्यक्ता निजात्मभाव, परभावश्च अ्न्यत्व, उभयमग्येन- द्विपर्यासेन योज्यते निवष्यत। किमर्थम, विन्नित्तये वेनित्र्याय। सेपा वर्णित- स्वरूपा ज्ञेया ज्ञातव्या पुरुपवक्रता पुरुषवत वित्छित्ति। तवयमत्रार्थ, यम्मि- न्नुत्तमे मध्यमे वा पुरुष प्रयोक्तव्ये वेचिकवायान्य ववाचित प्रथम प्रयुज्यते। तस्माच्च पुरुपैकयोगक्षेमत्वादम्मदाढे प्रानिपठतमात्रम्य न विपर्यास पर्य- वस्यति। यथा-

जहाँ [काव्य के] सौन्दर्य के लिए आ्र्त्मभाव [उत्तम पुरष जो अपने लिए ही प्रयुवत होता है] औ््रौर परभाव [मध्यम पुरुप जो दूसरे के लिए प्रयुक्त होता ह] फा विपरीत रूप से प्रयोग किया जाता हैं वह 'पुरुषवक्र्ता' समभनी चाहिए ॥३०॥

जहाँ जिस [वक्रता] में 'प्रत्यवता' अ्रप्पर्थात् अ्र्रपना प्रात्मभाव [अपने लिए प्रयुक्त होने वाले उत्तम पुरुष] धौर परभाव [दूसरे के लिए प्रयुक्त होने वाले मध्यम पुरुष] इन दोनों का विपर्यास से अर्थात् परिव्तित रूप से प्रयोग किया जाता है। फिस लिए-शोभा के लिए, वैचित्र्य के लिए। वह वर्शित स्वरूप वाली यह 'पुरुषवऋता' पुरुष [प्रयोगमूलक] वक्रता, सुन्दरता समभनी चाहिए। इसका यहाँ यह अभिप्राय हुआप्रा कि जिसमें [ प्रयुक्त हुए प्रथम पुरुष से भिन्न किसी अरन्य] उत्तम या मध्यम पुरुष के प्रयोग के स्थान पर विचित्रता [काव्य सौ दर्य] के लिए कभी अ्र््य अ्र्प्र्रथात् प्रथम पुरुष प्रयुक्त किया जाता है [उसका नाम पुरुषवत्रता हं]। औ्रौर उससे पुरुष विपर्यास के साथ समान योगक्षेम वाले प्रातिपदिक का विपर्यास भी फलित होता है। [अर्थात् उत्तम या मध्यम परुष के प्रयोग के स्थान पर प्रथम पुरुष का प्रयोग होने पर तो पुरुषवत्रता होगी ही परन्तु यदि उसके बजाय केवल प्रातिपदिक का प्रयोग किया जाय तो वह भी दूसरे प्रकार को पुरुषवतता कही जावेगी]।

जैसे [ तापसवत्सराज के १, ६७ 6लोक मे ]-

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कारिका ३० ] द्वितीयोन्मेष [ २८१

कौशाम्चीं परिभूय नः कृपणाकेविद्वेपिभिः स्वीकृतां जानाम्येव तथा ममादपरता पत्युर्नयद्वेपिणः। स्त्रीण ्रियविप्रयोगविधुर चेतः सदैवात्र मे वक्तु' नोत्सहते मनः परमतो जानातु देवी स्वयम् ॥१०५॥ अ्रप्रन्न 'जानातु देवी स्वयम' इति युष्मदि मध्यमपुरुपे प्रयोक्तव्ये प्राति- पदिकमात्रपरयोगेण वक्तुस्तदशक्यानुष्ठानतां मन्यमानस्थोदामीन्यप्रतीतिः । तस्याश्च प्रभुत्वात् स्वातन्त्र्येण हिताहितविचारपूर्वक स्वयमेव कर्तव्यार्थप्रति- पत्ति: कमपि वाक्यवक्रभावमावहृति। यस्मादेतदेवास्य वाक्यस्य जीवितत्वेन परिस्फुरति ।।३०।।

दुष्ट या कायर शत्रुओ द्वारा अधिकृत कौशाम्वी [नगरी ] फो जीतकर, नीति से द्वेष करने वाले [नीति के अनुसार श्रचरण न करने वाले] महाराज [पत्यु स्वामी महाराज ] की प्रमादपरता [ विजय के गर्व में श्राकर प्रमादी हो जाने की सवथा सम्भावना है इस बात] को में जानता हूँ। और स्त्रियो का चित्त सदैव प्रिय के वियोग से दु.सी रहता है [स्त्रियाँ कभी अपने प्रिय ा अरलग रहना पसन्द नहीं फरती है, यह भी में जानता हूँ। इसका घर्थ यह हुआ कि कौशाम्ची के विजय के वाद राजा उदयन आपसे मिलने के लिए औौर आप उनसे मिलने के लिए उत्सुक होगी] इसलिए मेरा मन बुछ कहने का [धर्यात् आप दोनों के मिलन का प्रतिवाद करने का] साहस नहीं करता है। [परन्तु वस्तुत नीति के अनुसार अ्रभी महाराज को फौशाम्बी छोडकर आना नहीं चाहिए] इसके बाद भागे आ्रप स्वय जाने। [आप जो उचित समझे सो करे] ॥१०५॥ यहाँ 'जानातु देवी स्वय' के स्थान पर युप्मद् शब्द के मध्यम पुरुष [फे त्व इस रप] के प्रयोग करने के स्थान पर [देवी इस] प्रतिपादिक मात्र के प्रयोग से वषता[मत्री यौगन्धरायण जो कुछ कहना और करना चाहता है उम] को अ्रनुष्ठान 3 असम्भव-सा है यह मानकर [मन्त्री की] श्दासीन्य की प्रतीति [मध्यम पुरुष के 'त्व' के स्थान पर प्रातिपदिक मात्र 'देवी' पद के प्रयोग से] हो रही है। और उस [रानी] के मालिक होने से हित और अ्रहित का विचार करफे [स्वतन्त्रनापूर्वफ]सवय ही कर्तव्य [और त्रक्तंव्य] धर्य का निर्रय [करना भी] कुछ श्रपूर्व वावय-सौन्दर्य को धारत कर रहा है। वयोकि यह [अर्थात् स्वतन्त्रतापृवंक कतंच्य का निएंय] हो इम [शलोक] वाकय का प्रासा स्वरुप से प्रतीत हो रहा हैं॥३०।।

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२८० ] वक्रोक्तिजीवितम [कारिका ३०

प्रत्यक्तापरभावश्च विपर्यासेन योज्यते। यत्र विच्छिच्ये सेंपा नेया पुरुपचक्रता ।३०।। 1 .-

यत्र यम्या प्रत्यक्ता निजात्मभाव, परभावन्च अ्रन्यत्व, उभयमप्येन- द्विपर्यासेन योज्यते निवम्यन । क्मिर्थम, विन्छित्तये वेनित्याय। सेपा वणित- स्वरूपा ज्ञेया जातव्गा पुरुपवक्रता पुरुषवन वबिन्छित्ति। नवयमत्रार्थ, यस्मि- न्नुत्तमे मध्यम वा पुरुपे प्रयोकतव्ये वेवि्णायान्य वाचित प्रथम प्रयुज्यते। तस्माच्च पुरुपैकयोगनेसत्वाहम्मदा्ठे पातिपठिकमात्र्य च विपर्यास पर्य- वस्यति। यथा-

जहां [काव्य के] सौन्दर्य के लिए प्र्रात्मभाव [उत्तम पुरप जो अपने लिए ही प्रयुषत होता है] औौर परभाव [मध्यम पुरुष जो दूसरे के लिए प्रयुयत होता है] फा विपरीत रप से प्रयोग किया जाता हैं वह 'पुरुषवक्ता' समभनी चाहिए ॥३०॥

जहां जिस [वकता] में 'प्रत्यवता' अ्रर्थात् अपना आ्र्प्रात्मनाव [अपने लिए अयुधत होने वाले उत्तम पुरुष] और परभाव [दूसरे के लिए प्रयुक्त होने वाले मध्यम पुरुप] इन दोनों का विपर्यास से अर्थात् परिवर्तित रूप से प्रयोग किया जाता है। फिस लिए-शोभा के लिए, वैचित्र्य के लिए। वह वशित स्वरूप वाली यह 'पुरुषवकता' पुरुष [प्रयोगमूलक] वक्रता, सुन्दरता समभनी चाहिए। इसका यहाँ यह अरभिप्राय हुआ्रा कि जिसमें [प्रयुक्त हुए प्रथम पुरुष से भिन्न किसी श्रन्य] उत्तम या मध्यम पुरुष के प्रयोग के स्थान पर विचिन्नता [काव्य सौन्दर्य] के लिए फभी श्रन्य अर्थात् प्रथम पुरुष प्रयुक्त किया जाता है [ उसका नाम पुरुषवमता है]। औ्रर उससे पुरुष विपर्यास के साथ समान योगक्षेम वाले प्रातिपदिक का विपर्यास भी फलित होता है। [अर्थात् उत्तम या मध्यम परुष के प्रयोग के स्थान पर प्रथम पुरुष का प्रयोग होने ह पर तो पुरुषवत्रता होगी ही परन्तु यदि उसके बजाय केवल प्रातिपदिक का प्रयोग किया जाय तो वह भी दूसरे प्रकार की पुरुषवक्रता कही जावेगी]।

जैसे [ तापसवत्सराज के १, ६७ म्लोक में ]-

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कारिका ३० ] द्वितोयोन्मेष. [२८१

कौशाम्वीं परिभूय नः कृपएकेविद्विषिभिः स्व्रीकृता जानाम्येव तथा ममादपरता पत्युर्नयट्वेपिराः । स्त्रीणां म्रियविप्रयोगविधुरं चेतः सदैवात्र मे वक्तु' नोत्सहते मनः परमतो जानातु देवी स्वयम् ॥१०५॥ अपन्न 'जानातु देवी स्वयम्' इति युष्मदि मध्यमपुरुपे प्रयोक्तव्ये प्राति- पदिकमात्रप्रयोगेण वक्तुस्तदशक्यानुष्ठानतां मन्यमानस्यीदामीन्यप्रतीतिः । तस्याश्च प्रभुत्वात् स्वातन्त्रयेण हिताहितविचारपूर्वक स्वयमेव कर्तन्यार्थप्रति- पत्ति: कमपि वाक्यवक्रभावमावहृति। यस्मादेतदेवास्य वाक्यस्य जीवितत्वेन परिस्फुरति ।।३०।।

दुष्ट या फायर शत्रुओ द्वारा अधिकृत कौशाम्वी [नगरी ] को जीतकर, नीति से द्वेष करने वाले [नीति के अनुसार आचरस न करने वाले] महाराज [पत्यु स्वामी महाराज ] की प्रमादपरता [ विजय के गर्व में आकर प्रमादी हो जाने की सवथा सम्भावना है इस बात] को में जानता हूँ। और स्त्रियो का चित्त सदैव प्रिय के वियोग से दुखी रहता है [स्त्रियाँ कभी अपने प्रिय का अ्रलग रहना पसन्द नहीं करती है, यह भी में जानता हूँ। इसका अर्य यह हुआ कि कौशाम्बी के विजय के बाद राजा उदयन आपसे मिलने के लिए और आप उनसे मिलने के लिए उत्सुक होंगी] इसलिए मेरा मन दुछ कहने का [अर्थात् आप दोनों के मिलन का प्रतिवाद करने का] साहस नहीं करता है। [परन्तु वस्तुत नोति के अनुसार प्रभी महाराज को फौशाम्बी छोठकर आाना नहीं चाहिए] इसके बाद सागे आ्रप स्वय जानें। [आाप जो उचित समझे सो करे] ॥१०५॥ यहाँ 'जानातु देवी स्वय' के स्थान पर युप्मद् शब्द के मध्यम पुरुष [फेरव इस रप] के प्रयोग परने के स्थान पर [देवी इस] प्रतिपादिक मात्र के प्रयोग से वक्ता [मात्री यौगन्घरायण जो फुछ कहना और फग्ना चाहता है उस] की श्रनुष्ठान - 3 अतम्भव-ता है यह मानकर [मन्त्री की ] धदासीन्य की प्रतीति [मध्यम पुरुष के 'त्व' के स्थान पर प्रातिपदिक मात्र 'देवी' पद के प्रयोग से] हो रही है। और उस [रानी] के मालिक होने मे हित और श्रहित का विचार करके [न्वतन्त्रतापूर्वक] स्वय ही कर्तव्य [औौर प्रवर्तव्य] प्रयं का निर्राय [करना भी] दुछ अ्पूर्व वाषय-सौन्दर्य को धारस कर रहा है। धयोकि यह [ग्रर्थात् स्वतन्त्रतापृर्चक फर्तंव्य का निसय] ही इम [इलोफ] वाक्य का प्राणत स्वरप से प्रतीत हो रहा ह।३०।।

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२८० ] वक्रोक्तिजीचितम् [कारिका ३०

प्रत्यकतापरभावश्च विपर्यासेन यंज्यते। यत्र विच्छित्तये सेपा ज्ञेया पुरुषत्रता ।३०।। यत्र यस्या प्रत्यक्ता निजात्मभाव, परमावश्न अन्यत्व, उभयमयेत- द्विपर्यासेन योज्यत निवध्यते। किमर्थम, विनउित्तये वेचित्याय। सेपा वर्शित- स्वरूपा नरेया ज्ञातव्या पुरुपवक्रता पुरुषयन बबबिन्छित्ति। तदयमत्रार्थ, यम्मि- न्नुत्तमे मध्यमे वा पुरुपे प्रयोकतव्ये वेविकणायान्य कवाचित प्रथम प्रशुज्यते। तस्माच्च पुरुपैकयोगक्षेमत्वादम्मदाढे प्रातिपठितमात्रम्य च विपर्याग. पर्य- वस्यति। यथा-

जहां [काव्य के] सौन्दर्य के लिए आ्त्मभाव [उत्तम पुरष जो अपने लिए ही प्रयुवत होता है] श्रौर परभाव [मध्यम पुरुष जो दूसरे के लिए प्रयुफ्त होता हं] का विपरीत रूप से प्रयोग किया जाता है वह 'पुरपवक्रता' समभनी चाहिए ॥३०॥

जहाँ जिस [बकता] में 'प्रत्यकता' अर्थात् अ्रप्रपना प्र्प्रात्मभाव [अपने लिए प्रयुदत होने वाले उत्तम पुरुष] औरर परभाव [दूसरे के लिए प्रयुक्त होने वाले मध्यम पुरुष] इन दोनों का विपर्यास से अर्थात् परिवर्तित रूप से प्रयोग किया जाता है। फिस लिए-शोभा के लिए, वैचित्र्य के लिए। वह व्रित स्वरूप वाली यह 'पुरुषवकता' पुरुष [प्रयोगमूलक] वकता, सुन्दरता समभनी चाहिए। इसका यहाँ यह अरभिप्राय हुआरप्रा कि जिसमें [प्रयुक्त हुए प्रथम पुरुष से भिन्न किसी अ्रन्य] उत्तम या मध्यम पुरुष के प्रयोग के स्थान पर विचित्रता [काव्य सौनदर्य ] के लिए कभी अ्रन्य अर्थात् प्रथम पुरुष प्रयुक्त किया जाता है [उसका नाम पुरुषवपता है]। औररर उससे पुरुष विपर्यास के साथ समान योगक्षेम वाले प्रातिपदिक का विपर्यास भी फलित होता है। [अथात् उत्तम या मध्यम परुष के प्रयोग के स्थान पर प्रथम पुरुष का प्रयोग होने पर तो पुरुपवत्रता होगी ही परन्तु यदि उसके बजाय फेवल प्रातिपदिक का प्रयोग किया जाय तो वह भी दूसरे प्रकार की पुरुषवत्रता कही जावेगो]।

जैसे [ तापसवत्सराज के १, ६७ ग्लोक में ]-

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कारिका ३०] द्वितीयोन्मेष. [ २८१

कौशाम्बीं परिभूय नः कृपएाकेविद्विषिभि: स्वीकृता जानाम्येव तथा प्रमादपरता पत्युर्नयद्वेंपिएः। स्त्रीणा म्रियविप्रयोगविधुर चेतः सदैवात्र मे वक्तु' नोत्सहते मनः परमतो जानातु देवी स्वयम् ॥१०५।। अरन्र 'जानातु देवी स्वयम' इति युष्मदि मध्यमपुरुपे प्रयोक्तव्ये प्राति- पदिकमान्रप्रयोगेण वक्तुस्तदशक्यानुष्ठानतां मन्यमानस्यीदामीन्यप्रतीतिः । तस्याश्च प्रभुत्वात स्वातन्त्र्येण हिताहितविचारपूर्वक स्वयमेव कर्तव्यार्थप्रति- पत्तिः कमपि वाक्यवक्रभावमावहृति। यस्मादेतदेवास्य वाक्यस्य जीवितत्वेन परिस्फुरति ॥।३०।।

दुष्ट या फायर शत्रुओ द्वारा अधिकृत कौशाम्वी [नगरी] को जीतकर, नीति से द्वेष करने वाले [नीति के अनुसार प्राचरण न करने वाले] महाराज [पत्यु स्वामी महाराज] की प्रमादपरता [ विजय के गर्व में आ्र्प्राकर प्रमादी हो जाने की सयथा सम्भावना है इस बात] को मे जानता हू। और स्तियों का चित्त सदव प्रिय के वियोग से दुखी रहता है [स्त्रियाँ कभी अपने प्रिय का अलग रहना पसन्द नहीं करती है, यह भी में जानता हूँ। इसका अर्थ यह हुआ कि कौशाम्बी के विजय के बाद राजा उदयन आपसे मिलने के लिए और आप उनसे मिलने के लिए उत्सुक होंगी] इसलिए मेरा मन कुछ फहने का [अर्यात् आप दोनों के मिलन का प्रतिवाद करने का] साहस नहीं करता है। [परन्तु वस्तुत नीति के अनुसार अभी महाराज फो कौशाम्बी छोड़कर आना नहीं चाहिए] इसके बाद प्रागे आप स्वय जानें। [आप जो उचित समझे सो करे] ॥१०५॥ यहाँ 'जानातु देवी स्वय' के स्थान पर युप्मद् शब्द के मध्यम पुरुष [फे तव इस रप] के प्रयोग फरने के स्थान पर [देवी इस] प्रतिपादिक मात्र के प्रयोग से वक्ता[मत्री यौगन्धरायण जो कुछ कहना औौर करना चाहता है उत] की भ्र्रनुष्ठान असम्भव सा है यह मानकर [मन्नी की ] श्रदासीन्य की प्रतीति [मध्यम पुरुप के 'त्व' के स्थान पर प्रातिपिक मात्र 'देवी' पद के प्रयोग से] हो रही है। औ्रर उस [रानी] के मालिक होने मे हित और प्रहित का विचार करके [स्वतन्त्रनापूर्यक]स्वय हो कर्तव्य [और प्रवर्तव्य] अ्रर्थं का निसंय [करना भी] कुछ भपूर्व वाक्य-सोन्दर्य फो धारण फर रहा हैं। कयोंकि यह [पर्यात स्वतन्त्रतापवंक फतंव्य का निरय] ही इम [इसोफ] वाषय का प्रास स्वरप से प्रतीत हो रहा है॥३०।।

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वकोपितिजीयितम् [पारिका'

एवं पुरुषवकता विचार्य पुरुपाश्रयात्वादात्मनेपटपरन्मेपटश्ोरुचिना सरा वक्रता विचारयति। वातृना लक्षगानुमारश नियतपदाश्रय प्रयोर पूर्वाचार्याणाम 'उपग्रह' शव्दाभिधेयतया प्रमिद्व। तस्मात्तदभिवानेने व्यवहरति- पदयोरुभयोरेकमोचित्याद्वि नियुज्यतें। शोमाये यत्र जल्पन्ति तामुपग्रहवक्रताम्॥३१॥ तामुक्तस्व रूपामुपग्र हवक्रतामुपग्रहवकत्वविच्छितति जल्पन्ति, रव कथयन्ति। कीटशीम्, यत्र यम्या पदयोरुभयोरमध्यानेक्कमात्मनेपट परस्मेवर्व व विनियुज्यते विनिवध्यते नियमेन। कम्मान कारखात, श्रचित्यात्। वरएर्यमान वस्तुनो यदौचित्यमुचितभावम्तस्मात्, त समाश्रित्येत्यर्थ। किमर्थ, शोभाने विच्छित्तये।

१६ उपग्रहवक्रता [आत्मने पद परस्य पद रूप पद उत्तरार्द्व प्रत्यय-वक्रता ५]- इस प्रकार 'पुरुषवत्रता' का विचार करके, 'ध्ात्मनेपद' तथा 'परस्मपद' मे पुरुषों के आश्रित होने से उचित अवसर पर प्राप्त [भत्मनेपद तया परस्मैपद के प्रयोग की] वकता का विचार करते है। धातुओ के लक्षण [आत्मनेपद तथा परस्म- पद उभय पद आदि] के अनुसार नियत पद [श्रात्मनेपद या परस्मपद ] का प्रयोग, प्राचीन आचार्यो में 'उपग्रह' नाम से प्रसिद्ध है। इसलिये[यहाँ भी उन आ्र्प्रात्मने- पद परस्मपद के लिए]उसी [उपग्रह] नाम से व्यवहार करते है। [शर्थात् कारिका में 'उपग्रह' शब्द से ही आात्मनैपद परस्मपद को कहा है]। जहां [काव्य] की शोभा के लिए [आत्मनेपद और परस्मपद] दोनों पदो में से शचित्य के कारण [विशेष रूप से] किसी एक का प्रयोग किया जाता है उसको 'उपप्रहवक्रता' कहते है ॥३१॥ उस उक्त स्वरूपा [वत्रता] को कवि लोग 'उपग्रहवकता' कहते है। फँसी- जहाँ जिस [वक्रता] में [आत्मनेपद और परस्मपद] दोनो पदो में से कोई एक आ्र्पात्मनेपद अ्रथवा परस्मपद नियम से [विशेष रूप से] प्रयुक्त किया जाता है। किस कारण से-शचित्य के कारण से। वर्ष्यमान वस्तु का जो श्रचित्य अर्थात् उचित- भाव उससे अर्थात् उसको अ्रवलम्बन करके। किस लिए-शोभा अर्थात् सौन्दर्य के लिए।

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कारिका ३२ ] द्वितीयोन्मेष [ २८३

यथा- तस्यापरेष्वपि सृगेपु शरान्मुमुक्षोः कर्णान्तमेत्य विभिदे निविडोऽपि मुष्टिः । त्रासातिमात्रचटुलैः स्मरयत्सु नेत्रैः

अत्र राज सुललितविलासवतीलो चन विलिा स ेपु स्मरएागो चर म्वतर त्सु तत्परायत्तचित्तवृतेराङ्गिकप्रयत्न परिस्पन्ट विनि वर्तनान्मु्टिर्विभिटे भिद्यते- स्म । स्वयमेवेति कमेकतृ निवन्धनमात्मनेपदमतीव चमत्कारकारिणी कामपि वाक्यवक्रतामावहति॥३१॥ एवमुपग्रह्वक्रता विचार्य तटनुसम्भविनी प्रत्ययान्तरवक्रता विचारयति- विहितः प्रत्ययादन्यः प्रत्ययः कमनीयताम् । यत्र कामपि पुष्साति सान्या प्रत्ययवक्रता ॥३२।।

जसे- यह रघुवश का ६, ५द्वा श्लोक है। दशरय की मृगया का वगन करते हुए कवि लिख रहा ह वि- भय के आधिवय के कारस श्रत्यन्त चपल नेत्रों से प्रौढ प्रियतमा के नयनो की चेष्टाओ का स्मरस दिलाने वाले अन्य मुगो पर भी वास छोडने की इच्छा रखने वाले उस राजा की मजवूत मुट्ठी भी कान के पास तक आकर स्वय ही ढीली पड़ गई ॥१०६।। यहां [ भयभीत हरिसियो के नेत्रो की चपल चेप्टाओं से सुन्दर त्नी] प्रियतमा के नेत्रों के हाव-भावो का स्मरस आाने पर उनके परवश राजा [वशरथ] के शारोरिक प्रयत्न [शर्यात् मुगो के मारने के उत्साह] के शिथिल हो जाने से मुट्ठी अपने आप खुन जाती थी। [अर्थात् वाण नहीं चला पाते थे ] यह कर्म फर्ता मे हुषा आत्मनेपद अ्त्यन्त चमतफारकारिणी किसी अपूर्व वत्रता को उत्पन्न कर रहा ३ ह।।३१।। १७ प्रत्यय आला वयता [पद उत्तराद्-प्रत्यय-वय्ता ६]- इस प्रकार 'उपग्रह-वत्ता' [आत्मनेपद परस्नंपद की वयता] का विचार परके सव अन्य प्त्यवो फी वत्रना का विचार [प्रारम्भ] करते हें- जहाँ एक प्रत्यय से किया हुआ दूसरा प्रत्यय किसी भ्रपूर्व सौन्दर्य का पोषक होता है वह दूसरे प्रकार को 'प्रत्ययवप्रता' होती हैं ।३२।।

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२८४ ] वक्ोपितिजीवितम [पारिषा ३२

'सान्या प्रत्ययवक्रता' सा समाम्नानम्पाठन्यापग काचित् प्रत्वयवकन्व- वेच्छित्ति, अररस्तीति सम्बन्ध। यत्र बम्या प्रत्यय कामयर्वा कमनोयता, म्यता पुप्णाति पुप्यति। कीश प्रत्ययात तिडावेविहित पदत्वेन विनिर्मितो- ऽन्य कश्चिढिति।

यथा- लीन वस्तुनि येन मृद्षमसुभग तत्य गि. उयने निर्मातु प्रभवेन्मनोरम।मट वाचव या या बहि। चन्दे द्वावपि तावहं कविवरा वन्देतरा त पुन- र्या विज्ञातपरिश्रमोऽयमनयोर्भारावतारक्षमः ॥१०s।।

वह अन्य प्रकार को पप्र्थथात् ऊपर कही हुई [श्रत्मनेवद परस्मेपद आरादि रप प्रत्ययवकरता ] से भिन्न कोई औ्र्रौर ही [श्रन्य प्रकार थी] 'प्रत्ययवयना' की शोभा 'होती है' यह [कारिका के शब्दो का श्राक्षिप्त श्रस्ति निया के साय] सम्बन्ध है। जहाँ जिस [वकता] में प्रत्यय किसी प्रपूर्व रमरोयता सौनदर्य को पुष्टि करता है। कंसा [प्रत्यय फि]-प्रत्यय अर्थात् तिडादि से विहित [तिडन्त आ्रादि के] पद होने से । उस तिडन्त पद से] किया हुआ कोई अ्रन्य [तरप् तमप् आदि प्रत्यय रमखीयता का पोषक होता है वहां दूसरे प्रकार की 'प्रत्ययवकना' होती है]। जसे- जो [सत्काव्य का निर्माता महाकवि] वस्तुओ के भीतर निहित सूक्ष्म और सुन्वर तत्व को अपनी वासी द्वारा वाहर निकालता [काच्य में प्रदशित करता] है [उस महाकवि को] औ्र््रौर [उसके साथ सृष्टि के निर्माना 'कवि' परमात्मा को] जो [अपनी] वारी मात्र से इस मनोहर जगत् का बाहर निर्नाण करता है [ श्रदि- कवि रूप परमात्मा 'एकोऽह बहुस्याम्' आदि अपनी वाणी से अ्रथवा 'सर्वं वेदात प्रसिद्धयति' इसके अनुसार वेद रूप वारी से सारे दृश्यमान जगत् को उत्पन्न करता है। औ्रर दूसरा काव्य-निर्माता कवि समस्त पदार्थो के सौन्दर्य को श्रपनी वाणी द्वारा वर्शन करता है] उन दोनो कविवरो फो मैं नमस्फार करता हूँ। परन्तु इन दोनो से भी अधिक मे [आलोचक या भावक रूप] उस [कवि या विद्वान्] को नमस्कार करता हूँ जो इन दोनो के परिश्रम को समझने वाला और [ उनकी रचना की ययार्थ प्रशसा द्वारा] इन दोनों के [मानसिक] बोभ को हलका करने में समर्थ है॥१०७॥

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कारिका ३३] द्वितीयोन्मेप: [२८५

'वन्देतर।म्' इत्यत्र कापि प्रत्ययवक्रता कवेश्चेतसि परिस्कुरति। तत एव 'पुनः' शब्द. पूर्वस्माद् विशेषाभिधायित्वेन प्रयुक्तः ॥१२।। एवं नामाख्यातस्वरूपयो पदयो प्रत्येकं प्रकृत्याद्यवयवविभागढ्वारेण यथासम्भवं वक्रत्व विचार्येदानीमुपसर्गनिपातयोरव्युत्पन्नत्वादसम्भवविभक्ति- त्वाच्च निरस्तावयवत्वे सत्यविभक्तयो साकल्येन वक्रतां विचारयति- रसादिद्योतनं यस्यासुपसर्गनिपातयोः । वाक्यैकजीवितत्वेन सापरा पदवक्रता ॥३३॥ 'सापरा पठचक्रता' सा समर्वितस्वरूपापरा पूर्वोक्तव्यतिरिक्ता पद्- वक्रत्वविच्छित्ति.। त्र्रस्तीति सम्बन्ध । कीदशी-यस्यां वक्रतायामुपसर्ग- निपातयोर्वैयाकरणप्रसिद्धाभिधानयो रसादिद्योतनं शद्गारप्रभृतिप्रककाशनम्।

[इस श्लोक के 'वन्देतराम्' इस तिडन्त से तरप् प्रत्यय किए हुए] 'वन्देतरा' इस पद में कवि के मन में फोई अपूर्व 'प्रत्ययवत्रता' भास रही है। [इसलिए अत्यन्त सुन्दर समझ कर कवि ने इस शब्द का प्रयोग किया है]। इसीलिए पूर्व [दो कवियों के नमस्कार] मे विशेषता का बोध करान वाले 'पुन' शब्द का प्रयोग किया गया हैं ॥३२।। १७ उपसर्ग निपात वत्ता [पदवकता ]- इस प्रकार [नाम, आल्यात, उपसर्ग और निपात इन चारों प्रकार के पदों में से] नाम और आ्रास्यात [सुवन्त तथा तिडन्त] पदो मे से प्रत्येक के प्रकृति प्रत्यय आदि अवयव विभाग के द्वारा वथासम्भव वपत्व का विचार करके अ्रव उपसर्ग तथा निपात [रप शेष] दोनों [पदो] के श्र्व्युत्पन्न [प्रकृति प्रत्यय विभाग से रहित] होने के फारण [उनमें प्रफृति प्रत्यय का] विभाग अ्रसम्भव होने से प्रवववरहित श्रविभक्त [उपसर्ग और निपातो] की सम्पूर्ण रूप से वम्नता का विचार [आ्ररम्भ] करते हैं- जिस [वत्ता] मे 'उपसर्ग' और 'निपातों' का वाक्य [श्लोक शदि] के जीवन स्वरप रसादि का द्योतकत्व होता है वह [पूर्वोक्त अ्रन्य वत्रनाओरो से भिन्न] दूसरी हो पदवत्रता होती है।।३३।। वह दूसरे प्रकार की 'पदवप्नता' है। वह अर्थात् जिसका म्वटप वणन [इस कारिका में] किया जा रहा है, दूसरे प्रकार की अर्था्त् पूर्वोक्त वनता-प्रफारों से भिन्न पदवकता की शोभा हं । 'अस्ति' इस [अध्याह्दत त्रिया का] सम्वन्ध है। कंसी-जिस वत्ता में वैयाफरसो में प्रसिद्ध [नाम वाले] 'उपनर्ग' तथा 'निपात' का रसादि ध्ोतकत्व अर्थान् शरृद्गार आदि [रसो] का प्रकाशवत्व [प्रतीत होता है]।

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२८६ ] वघोपितजीवितम् [कारिका ३३

कथम्-वाक्यैकजीवितत्वेन, वाक्यम्य ग्लोकाटेरेकजीचिन वाक्यरूजीवित, तम्य भावस्तत्त्वं तेन। तदिदमुक्त भवति यद्वाक्यस्ये कम्फुरितभावेन परिक्फुरति यो रसादिस्तत प्रकाशनेनेत्यर्थ·। यथा- चैदेही तु कथ भविष्यत हहा हा देवि धीरा मव ॥?०८॥।

त्रन्न रघुपतेस्तत्कालञ्व लिता हीप न विभावसम्पत्ममुल्लसित सम्भ्रमो निश्चितजनितजानकीचिपत्तिसम्भावन, प्रतिपद्यमान., स्तदेकाग्रतोल्लिखिितसान्तारकार, तदाफारतया विम्सृतधिप्कर्ष

प्रतिभासमान कामपि वाक्यवक्रता समु-मीलर्यात। 'तु' गव्दस्य च वक्रभाव. पूर्वमेव व्याख्यात. ।

कैसे कि-[ श्लोक आदि रूप ] वाक्य के जीवन स्वरप से। वाषय अर्यात श्लोकादि का एक अद्धितीय जीवित प्राण वार्क्यकजीवित हुआ। उसका भाव 'वाक्यफजीवितत्व' हुआ, उस से। इसका अभिप्राय यह हुआ कि-जिस वाक्य के श्रद्वितीय प्रास्वरूप से जो रसावि प्रतीत होता है उसके प्रकाशक रूप से [जो उपसग श्रथवा निपात का प्रयोग किया जाता है। वहाँ यह दूसरे प्रकार की पदवकता होती है]। जैसे [उदा० स० २, २७ पर उद्धृत पूर्व इ्लोक के अ्ररन्तिम चरण में]- हाय-हाय, वैदेही [विचारी] की तो [इस वर्षा ऋतु में वियोग को अ्रवस्था में] क्या वशा होगी ? हा देवि ! धैर्य धारण करना ॥१०८॥ यहाँ [वर्षाकाल में, उज्ज्वलित] उग्र रूप में उपस्थित जो उद्दीपन विभावों की सम्पत्ति उससे निश्चित रूप से उत्पन्न जानकी की विप्त्ति [मरस ] की सम्भावना से रामचन्द्र जी की घबराहट, उनके बचाने के उत्साह का फारण बन कर, उन [रामचन्द्र जी] की [सीताविषयक] एकाग्रता के कारण [मानस रूप में] साक्षात्कार रूप से तवाकार होने से [अपनी और सीता के] व्यवधान को भूलकर नूतन रसानुभूति से सुन्दर निपात परम्परा से उपस्थित होकर [ जो रामधन्द्र नी फी घयराहट, ] वाक्य [इलोक] के एकमात्र प्राएस्वरूप-सी प्रतीत होती छुई किसी अपूर्ष [पत] वक्रता को प्रकाशित कर रही है। [इन भ्नेक निपातो से विशेष रूप से] 'तु' शब्द की वक्रता की व्याख्या पहिले [ उदा० २, २७ पर] फर चुके हैं।

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कारिका ३१ ] द्वितीयोन्मेष. [२८७

यथा वा- अप्रयमेकपदे तया वियोग: प्रियया चोपनतः सुदुःसहो मे। नववारिधरोदयादहोभिर्भवितव्यं च निरातपत्वरम्यैः।१६ अ्त्र द्वयो: परस्पर सुदुःसहत्वोद्दीपनसामथ्येसमेतयोः प्रियाविरहवर्षा- कालयोस्तुल्यकालत्वप्रतिपादनपरं 'च' शब्दद्वितयं समसमयसमुल्लसितवन्हि- दाहदक्तदक्िएवातव्य जनसमानतां समथेयत् कामपि वाक्यवक्रतां समुद्दीप- यति 'सु'-'दुः'-शब्दाभ्यां च प्रियाविरहस्याशक्यप्रतीकारता प्रतीयते। यथा च-

अ्रथवा जंसे- उसी निपात वकता का दूसरा उदाहरस विक्रमोवंशी के ४, ३ श्लोक में इस प्रकार दिखलाया जा सकता है। यह श्लोक ध्वन्यालोक में भी पृ० २७६ पर भी उदृत हुआ है। उवशी के चले जाने के वाद उसके वियोग में सन्तप्त पुरूरवा कह रहे हे- एक साथ ही उस [हृदयेश्वरी] प्रियतमा का वियोग और [उसके ऊपर से] नए बादलों के उमड आाने से धूप से रहित [वर्षा ऋतु के] मनोहर दिवस दोनों [एक साथ] ही आा पडे। [ इन दिनों प्रियतमा का नया वियोग भला कैसे सहा जायगा] ॥१०६। यहाँ [प्रिया-वियोग और वर्षा के आ्रम्भ रूप] दोनों के परस्पर दु.सहत्व और उद्दीपन सामथ्यं से युषत प्रियावियोग और वर्षाकाल की समानकालीनता का बोधक 'च' शब्द का दो बार का प्रयोग, एक साथ उत्पन्न अग्नि को प्रज्वलित करने में समर्थ दक्षिा की वायु औौर पसे की समानता का [समर्यन] अ्नुसरण करता हुआ कुछ अपूर्व वाचफवयता [पदवपरता] को प्रकाशित कर रहा हं। ['सुट्ठ'सहो' पद में] 'सु' और 'दु' [ दोनो उपसर्गो का एक साथ प्रयोग] शब्दो से प्रिया के विरह की सशक्य प्रतीकारता [अर्थात् उस विरह को दूर करने का और कोई भी मार्ग नहीं है यह बात] प्रतीत होती है।

7 और जैसे- इसी निपातादि वकता का तीसरा उह्दारस कानिदास के नकुन्तला नाटफ का ३, ७८ निम्न प्लीक है। दुप्यन्न ने एक बार शकुन्तला को एकान्त मे पाकर भी जो उसका पहिली वार चुन्बन आादि नहीं किया उसका पश्चाताप के ते हए वह फह रहे है-

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२८८ ] वक्रोपितजीपितम् [करिफा ३३

मुहुरं गुलिसवृताघरोप्टं प्रतिपंधाक्षरविकलनाभिगमम। मुखमसविर्वत पचमलाच्या: कुनमायुन्नमित न चुम्तित तु ॥१?o।।

वेशद्योतनपर 'तु' शव्द कामपि वाक्यवक्रतामुनतेजयति। एतदुत्तरत्र प्रत्ययवक्वमेवविवप्रत्ययान्तरवक्रभावान्तभू तत्त्वात् प्रथ- क्त्वेन नोक्तमिति स्वयमेवोत्प्रेक्षणीयम। यथा- येन श्याम वपुरतितरा कान्तिमापत्म्यने ने वर्हरोव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विप्णी॥१११। अत्र 'अ्रतितराम' उत्यतीव चमतकारि। णवमन्यपामपि मजातीयलन्ण- द्वारेए लक्षणनिष्पत्ति स्वयममनुसर्तव्या ।

अ्ंगुलियो से निचले होठ को ढेंवे हुए, न, न, मान जाओ्नो, मान जाओो, इस प्रकार के निषेव करने वाले श्रक्षरो से न्यापुल और इसलिए सुन्दर लगने वाला, फन्घे की ओर मुडा हुआ [शकुन्तला का] मुख [मेने] किसी प्रकार [बडे प्रयत्न से] ऊपर तो उठा लिया पर चूम नहीं पाया॥११०॥ यहां प्रथम [बार के दर्शन के समय उत्पन्न] अ्नरभिलाप से विवश [चित्त] ति वाले [ दुष्यन्त के उस प्रथम मिलन के समय ] के अ्रनुभव की स्मूति से उस समय के योग्य मुखचन्द्र का सौन्दर्य जिसके हृदय पर प्द्धित है इस प्रकार के नायक [ दुष्यन्त] के पहिली बार चुम्बन में चूक जाने से उद्दीप्त पश्चात्ताप के प्रावेश का द्योतन फरने वाला 'तु' शन्द किसी अपूर्व 'वाक्यवक्कता' को उत्तेजित करता है। इन [उपसर्ग तथा निपात]के आगे[ जुडे हुए तरप् तमप् आ्रादि] की प्रत्ययवक्रता इसी प्रकार की अन्य प्रत्ययवकताओ के अ््न्तर्गत हो जाती है इसलिए भलग नहीं विखलाई है। [सह्वय पाठकों को] स्वय समझ लेनी चाहिए। जैसे- मोर पख के समान चमकते हुए जिस [इन्द्र धनुष] से गोप वेष धारी विष्णु [फृष्स भगवान्] के [शरीर के] समान तुम्हारा श्यामल शरीर अत्यन्त सौन्दर्य शोभा को प्राप्त होगा। [मेघदूत १५] यहाँ 'अतितरा' यह [ पद ] श्रत्यन्त चमत्कारकारी है।[ उसका अन्तर्भाव 'वन्देतरा' जैसी प्रत्ययवतरता में हो जायगा। उस में तिडन्त पद से 'तरप्' प्रत्यय किया गया या यहाँ 'अति' निपान से तरप् प्रत्यय किया है। ] इसी प्रकार मिलते- जुलते लक्षण द्वारा श्रन्य प्रकार की वक्रता की सिद्धि भी स्वय समभ लेनी चाहिए।

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कारिका ३४ ] द्वितीयोन्मेप' [ २८६

विच्छित्तिश्चतुर्विधपट विपया वाक्यैकटेशजीवितत्वेनापि परिम्फुरन्ती सकल-

वक्रनायाः प्रकाराणामेकोऽपि कविकर्मणः । तद्विदाह्वादकारित्वहेतुता प्रतिपदते ॥:१२ ।। इत्यन्तरश्लोकः ॥।३३॥ यद्येचमेकस्यापि वक्रताप्रकारस्य यदेवविधो महिमा तदेते वहव' सम्प- तिता: सन्त' कि सम्पाठयन्तीत्याह- परस्परस्य शोभायें वहवः पतिताः क्वचित्। प्रकारा जनयन्त्येतां चित्रच्छायामनोहराम् ।।३४।। क्वचिटेकस्मिन् पदमात्रे वाक्ये वा वक्रताप्रकारा वक्रत्वप्रभेना बहुचः प्रभूता. कचिप्रतिभामाहात्म्यसमुल्लसिता. । किमर्थम्, परस्परस्य शोभायै, अन्योन्यस्य विच्छित्तये। एतामेव चित्रच्छायामनोहरामनेकाकार का न्तिरमणीयां वक्रतां जनयन्त्युत्पादयन्ति।

चाहिए। इस प्रकार यह अ्नेक प्रकार की वन्ता की शोभा [ नाम, आ्रर्यात, उपसर्ग और्रौर निपात रूप ] चार प्रकार के पद विषयक होती हुई और वाक्य के एक देश के प्राएस्वरूप से प्रतीत होती हुई भो मारे वाक्य की विचित्रता या सौन्दर्य का कारए बनती है। वकता के [इन अ्नेक] भेदो में से फोई एक [भेद] भी [कवि कर्म पर्थात्] काव्य को सहदयाह्लादकारित्व को प्राप्त कराता है ॥११२॥ यह अन्तरश्लोक [ सग्रह श्लोक ] हैं।३३॥ यदि एक बकता प्रकार का भी इतना प्रभाव है [जैमा कि आपने वर्णन किया है] तो इनमें से बहुत से इकड्ठे होकर कया करते हें यह कहने हैं- कहों-फहीं एक दूसरे की शोभा के लिए बहुत से [ वनना प्रकार ] इफ्ट्ठे होकर इस [शोभा ] को [ ग्ननेक रगों से युवत रगीन ] चित्र की छाया के ममान मनोहर वना देते है॥३४॥ किसी पेवल एक पद घ्रथवा वापम नात्र नें बहुत से वन्ता मे प्रकार धर्यान वनन्य के भेद फधि की प्रतिभा के माहात्म्व से [इपट्ठे] उप्यित होरुर। किम लिए [उपस्थित होकर कि] एक दूनरे की धोना के लिए। एक दूनरे के सौन्दय के लिए। इस [मोना] को ही चिन को छाया के समान मनोहर, प्रनेक प्रकार के [रगो तथा] आाकारो से मनोहर वमता को उत्पन्न कर देने है।

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२६०] वनोपिनजीविनम् [फारिका ३५

यथा- तरन्तीव इति ॥११३।। अन्न क्रियापदाना त्रयागामपि प्रत्येक त्रिप्रकार वैचित्रय परिभ्फुरति क्रियावैचित्र्य, कारकवचिव्य कालवैचित्र्य च । प्थिम-न्तनजघन-तरुशिम्नां त्रयाणामपि वृत्तिवेचित्रयम। लावएय-जलि-प्रागत्म्य-सरलता-परिचय शब्दानामुपचारवंचित्यम। तवेनमेते वत्वो वक्रताप्रकारा ।कुम्मिन पढे वाक्ये वा सम्पनिताश्चित्रन्छायामनोहरामेतामेव चंतनचमत्कारकारिणीं वाक्य- वक्रतामाचहन्ति ॥३४।। एव नामाख्यातोपसर्गनिपातलन्षणम्य चतुविचम्यापि पदस्य यवासम्भव वक्रताप्नकारान् विचार्गेदानी प्रकरणमुपसहत्यान्यववयतार्यति- वाग्वल्ल्याः पदपल्लवास्पदतया या वञ्रतोकासिनी विच्छित्ति: मग्सत्वसम्पदचिता का युज्ज्वला जम्भते।

रफारामोदमनोहर सधु नवोत्कएठाकुलं पीयताम्॥३५॥ जैसे [पिछले उदा० स० २, ६१ पर उद्धृत ]- तरन्तीवाङ्गानि इत्यादि [श्लोक में] ॥११३॥ यहाँ [ तरन्ति, उन्मुद्यति प्रपवदन्ते ] तोनो शरिया-पदो में से प्रत्येक में तीन प्रकार का वैचित्य प्रतीत होता है। १-तियावचित्रय, २-फारक- नैचित्र्य और ३-कालवैचित््य। प्रथिम, स्तन-जघन और तरुशिमा इन तीनो शन्दो में 'वृत्तिवचित्र्य'। और लावण्य, प्रागत्म्य, सरलता, परिचय शब्दो में 'उपचारवक्रता' पाई जाती है। इस प्रकार इस एक श्लोक में यह बहुत से वक्ता के भेद मिलकर चित्र को छाया के समान मनोहर इसी सहृदय हुदयहारिएी वाष्य- वक्रता को उत्पन्न करते है॥३४॥ इस प्रकार नाम, आ्ख्यात, उपसर्ग और निपात रूप चारो प्रफार के पदो के जितने [ १७ ] वक्रता के प्रकार हो सकते ये उनका विचार करफे अव इस प्रकरण का उपसहार कर [अगले तृतीय उन्मेष ने] दूसरे [नए प्रफरण] की अ्रवतारखा करते है। [इस उन्मेष के उपसहारात्मक श्लोक का शर्र् इस प्रकार है]- वासी रूप लता के पद रूप पल्लवो मे रहने वाली सरसत्व सम्पत्ति के अनुरूप और वक्ता से उदभासित होने वाली जो कोई अपूर्व उज्जवल शोभा प्रकाशित हो रही है उसको देखकर चतुर [ विद्वान् रूप ] भ्रमरगणो को वाक्य रूप फूलों में रहने वाले सुगन्ध फंलाने वाले मनोहर मधु को नवीन उत्कण्ठा से युक्त होकर पान करना चाहिए।।३५।।

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कारिका ३५ ] द्वितीयो मेप. [२६१

ागेव वल्ली वाणीलता तस्या काप्यलौकिकी विच्छित्ति्जु म्भते शोभा समुल्लसति। कथम्-'पढपल्लवास्पदतया', पदान्येव पल्लवानि सुप्तिडन्तान्येव -प्न्नाणि तदास्पदतया तदाश्रयत्वेन। कीहशी विच्छित्ति .- 'सरसत्वसम्पदुचिता', रसवत्वातिशयोपपन्ना । किं विशिष्टा च-वक्रतया वक्रभावेनोद्धासदे भ्राजते या सा तथोक्ता। कीदशी-'उज्ज्वला' छायातिशयरमणीया। तामेवंविधामा- लोच्य विचार्य, विदग्धपट्पटगएैवियुधपट्चरणचक्रैर्मधु पीयताम् मकरन्द आस्वाद्यताम्। कीहशम्. 'वाक्यप्रसूनाश्रयम्'। वाक्यान्येव पढसमुदायरूपाणि प्रसूनानि पुष्याएयाश्रय स्थान यस्य तत्तथोक्तम् । अर्न्यच्च कीदशम् '्फारा- मोटमनोहरम्'। स्फार. स्फीतो योऽसावामोनस्तद्धर्मविशेषस्तेन मनोहरं हृदयहारि। कथमास्वद्यताम्-'नवोत्कषठाकुलं' नृतनोत्कलिकाव्यग्रम्। मधुकर- समूहा. खलु वल्ल्या: प्रथमोल्लसितपल्लवोल्लेखमालोच्य प्रतीतचेतस. समन- न्तरोद्विन्नसुकुमारकुसुममकरन्दपानमहोत्सवमनुभवन्ति। तद्ूदेव सहदया. पदास्पदां कामपि वक्रताविच्छित्तिमालोच्य नवोत्कलिकाकलितचेतसी वाक्या-

वासी ही लता रूप अर्थात् वासी लता, उतकी कुछ अलीकिक विच्छित्ति अपूर्व शोभा विकसित हो रही है। फंसी कि-पद रूप पल्लवो में रहने वाली। पद पर्थात् सुवन्त तिडन्त रूप पव ही पल्लव अर्थात् पत्ते के सदृश उनके शश्रित, उनमें रहने वाली। फंसी सुन्दरता-सरसत्व की सम्पत्ति के अनुर्प अर्थात् रसवत्ता के अतिशय से युक्त। और फंसी-वक्तया पर्ात् वक्रभाव से जो उद्भासित थर्थात् शोभित होने वाली है वह उस प्रकार की [ वपतोद्भासिनी ]। फिर फँसी-उज्ज्वला अर्यात् सौन्दर्यातिशय के कारण रमसोया। इस प्रकार की उस [चम्नता] को देस फर पर्ात् विचार करके चतुर रूप भ्रमर गणो को मछ अ्रर्थात मकरन्द का पान आ्रस्वादन करना चाहिए। कैसे [मघु का]-वाक्य एप फूलो में रहने वाने। पदसमुदाय रूप वाक्य ही फूल हे आश्रय जिसका वह उस प्रकार का वाक्यप्रसूनाश्रय हुआ। औौर फसे [मधु] को-फलती हुई सुगन्ध से मन को हरए करने वाले। स्फार अर्यात् फंला हुआ प्रचुर जो आ्मोद अर्थात् उसका सुगन्न रूप धर्म विशोष, उन से मनोहर प्र्यात् हृदय को हरस फरने वाला [ मघु]। कमे पीना चाहिए, नवीन उत्कष्ठा से आकुल होकर नवीन उत्सुकता ने व्यप्र होकर। त्रमर समूह सताग्रों के पहिले निक्लते हुए पतों को देखफर विश्वस्त मन होफर बाद में मिलने वाले कोमल पुष्पों के मकरन्द पान का आनन्द उठाते हैं। इस प्रकार सहृदव [विद्वान्] पदों में रहने वाली किसी अपूर्य वघता का विचार फरके नवीन उत्मुरता ने पुस्त मन

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२६=1 वक्रोपित जोवितम [कारिका ३५

श्रय किमपि वक्रताजीवितसर्वम्व विचारयन्तीति तात्पर्यार्थ। अत्रैकन्न सरसत्वं स्वसमयसम्भनि रमाळ्वत अ्न्वन्न शृद्गारािव्यज्जक- त्वम। वक्रतैकत्र वालेन्दुमुन्दरसम्थानयुक्तत्म, उतरत्रोकत्यादिवैचितर्यम। विन्छित्तिरकत्र सुविभक्तपत्रत्वम, अ््रन्यत्र कविकोशलकमनीयता। उज्वल- त्वमेकत्र पर्णन्छायायुक्तत्वम, न्य्रपरत्र सन्निवेशमौन्दर्यसमुदय।श्रामोद. पुप्पेपु सौरभम्, वाक्येपु नदिदाहादका रिता। मधु कुसुमेपु मकरन्द, वाक्येपु सकलकाव्यकारएसम्पत्समुदय इति ॥39॥ इति श्रीमत्कन्तकनिगनिते वनोसिजीविने द्वितीय उन्मेप।

होकर वाक्य में रहने वाले किसी वनता के प्रासभूत तत्व का विचार करते हैं। यह अ्रभिप्राय है। इसमे 'सरसत्व' का श्रर् एक [भ्रमर] पक्ष में उस समय [ऋतु ] में होने वाले रस का बाहुल्य और दूसरे पक्ष में [काव्य प्रसिद्ध] शरृद्गार आदि रस फा व्यञ्जकत्व [समभना चाहिए। इसी प्रकार] 'वनता' एक पक्ष में द्वितीया के चन्द्रमा के समान सुन्दर विन्यास से युक्त होना और दूसरे [ काव्य ] पक्ष में कवि को कयन- शैली आदि की विचित्रता [ वक्रता शब्द का परर्य समझना चाहिए ] । 'विच्छिति' एक [लता ] पक्ष में पत्रो का भली प्रकार अ्रलग-त्रलग विभक्त होना और दूसरे [ काव्य ] पक्ष में कवि के कौशल की कमनीयता [समभनी चाहिए]। 'उज्जवलत्व' [ का अर्यं ] एक श्रर पत्तो की छाया से युक्त होना और दूसरी ओ्रोर रचना के सौन्दर्य का बाहुल्य [ समझना चाहिए। इसी प्रकार ] 'प्र्रामोद' [का श्रर्थं] पुष्पो [के पक्ष ] में सुगन्धि औ्रौर वाक्यो [के पक्ष] में सहृदयहृदयाह्वादकारिता [लेना चाहिए। इसी प्रकार] 'मघु' [शब्द का अ्रपरथ] फूलो [के पक्ष] में मकरन्द श्रौर वाक्यो [के पक्ष] में काव्य के समस्त कारसों की उपस्थिति [समभाना चाहिए] ॥३५। श्रीमान् कुन्तक द्वारा विरचित वक्रोचितजीवित में द्वितीय उन्मेप समाप्त हुग्र््रा । श्रीमदाचार्य विश्वेश्वरसिद्धानतशिरोमणिविरचिताया वकोक्तिदीपिकाया हिन्दीव्याख्याया, द्वितीय उन्मेप समाप्त ।

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तृतीयोन्मेषः

एवं पूर्वस्मिन् प्रकरणे वाक्यावयवाना पदानां यथासम्भव वक्रभावं विचारयन् वाचकवक्रत।विच्छित्तिप्रकाराख दिक्कप्रदर्शन विहितवान। इदानीं वाक्यवक्रतावैचित्र्यमासूत्रयितु वाच्यस्य वर्णनीयतया प्रस्तावाधिकृतस्य वस्तुनो वक्रतास्वरूप निरूपयति। पदार्थावबोधपूर्वकत्वाद् वाक्यार्थावसिते । उदारस्वपरिस्पन्दसुन्दरत्वेन वर्णनम्। वस्तुनो वक्रशव्दैकगोचरत्वेन वक्रता ॥१॥ चस्तुनो वर्णनीयतया प्रस्तावित्तम्य पदार्थस्य यदेवविधत्वेन वर्यन सा तस्य वक्रता वक्रत्वविच्छिति। किविधत्व्रेनेत्याह-'उदारस्वपरिस्पन्नसुन्दरत्वेन'। उदार.

तीसरा उन्मेप १८ 'वाच्यवघता' या 'वस्तुवत्रता' इस प्रकार पहिले प्रकरण [द्वितीयोन्मेप] में वाक्य के श्रवयव पदो की वघता के जितने भंद हो सकते थे उनका विचार करते हुए ।गन्थकार कुन्तक ने वाचक सर्थात्] शब्दो की वत्रताविस्छिति के भेदो का दिन्दर्शन कराया था। घब [इस तृतीयोन्मेष में] वाक्यों के वनतार्वचित्र्य का बशन करने के लिए [ पहिले ] वाच्य अर्यात् वर्णनीयतया प्रकरण में मुरय रूप से अ्रघिकृत वस्तु की वस्ता [ वात्यवकता ] का निरूपण [प्रारम्भ ] करते है। क्योंकि पदा्चों के ज्ञान के होने पर ही वाक्यार्थ का ज्ञान हो सकता है। [अर्थात् द्वितीयोन्मेष में वाचक शब्दो की वकता का विचार किया था अब इस तृतीयोन्मेष में सबसे पहिले 'वाच्य' अर्यात् 'अयं' की वकता का विचार फरके फिर 'वाक्य' की वकता का विचार करेंगे। इसलिए घव पहिले 'पदार्थ वकता' का विचार प्रारम्भ करते है ]। [चर्णनीय पदार्य रूप] वस्तु का उत्कर्पशाली स्वभाव ने मुन्दर रप में केवन सुन्दर शब्दों द्वारा वर्णन [वाच्य] प्रथ या वन्तु की वरुता [कहलाती] हैं ।।१।। वस्तु अर्थात् वर्णनीय र्प से प्रस्तुत पदार्थ का जो [कारिया में फहे हए] इस प्रकार मे जो वन ह वह उस [ पदार्थ] की वस्ता अर्ा्त् वॉक्पन या सौन्दर्य

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२६४ ] चक्रोपितिजीवितम् [कारिफा १

सोत्कर्प. सर्वातिशायी य स्वपरिम्पन्ट स्वभायमहिमा तम्यसुन्हरत्व मौकुमार्या- तिशयस्तेन, श्र््रत्यन्तरमणीयम्बामाविकधर्मयुक्तत्वेन, वर्गान प्रतिपाटनम। कथम्-'वक्रशब्वेकगोचरत्वेन'। वक्रो योऽसी नानाविचयक्रताविशिष्ट शर्व्द कश्चिदेव वाचकविशेषो विवच्नितार्थसमर्पराममर्थ, तम्यैरस्व केवलम्य गोचर- त्वेन प्रतिपाद्यतया विपयत्वेन। वान्यत्वेनंति नोक्त, व्यह्गयत्वेनापि प्रतिपादन- सम्भवात्। तदिदमुक्त भवति ग्रदेवविधे भावम्तभावमीकुमार्यवर्णन प्रस्ताचे भूयसा न वाच्यालद्वाराणामुपमादीनामुपयोगयोग्यता मम्भवति, म्वभाच-

है। फिस प्रफार से [ वसंन], यह म हते है-अपने उदार स्वभाव से मनोहर रूप में। उदार अर्थात् उत्कर्पयुक्त सर्वातिशायी [सुन्दरता में सबका प्र्प्रतिरुमश कर जाने वाला ] जो [पदार्थ का]अपना व्यापार श्रर्थात् स्वभाव सहिमा, उसका जो सुन्दरत्व अर्थात् सुकमारता का पतिशय, उससे अर्यात् अ्त्यन्त रमणीय स्वाभाविक धम से, युक्त रूप से, वर्णन अर्थात् प्रतिपादन [ वाच्यवफता कहलाती है]। फँसे-केवल वक्र शब्द के विषय रूप से [ वस्तु का प्रतिपादन ]। वकर अर्थात् नाना प्रफार की [पूर्वोक्त ] वकता से युवत जो फोई [ विरला ] ही शब्द विशेष [कचि के] विवक्षित अर्थ को समर्दशा [बोधन] करने में समथ हो वेवल उस एक ही [विशिष्ट शब्द] के गोचर अर्थात् प्रतिपाद्तया विषय होने से। यहां [उस शब्द विशेष के] 'वाच्य रूप में' [विषय यह] नहीं कहा है, ['प्रतिपादतया' विषय कहा है। योकि ] प्रतिपादन तो [ वाच्यता को छोडकर ] व्यङ्गय रूप से भी हो सफता है। [यदि 'वाच्यत्वेन' कह देते तो उससे व्यङ्गय अर्थ का रहण नहीं होता। इसलिए यहाँ 'वाच्य' न कह कर 'प्रतिपाद शब्द का प्रयोग किया गया है इसा अभिप्राय यह हुआकि इस प्रकार के पदार्थो के स्वभाव की सुकुमारता के वर्शान के प्रसन्भ में वाच्य अलद्धार उपमा आदि का अ्रधिक उपयोग उचित नहीं हो सकता है। घयोंकि उससे [पदार्थो के] स्वाभाविक सौनदर्य के अ्रतिशय में मलिनता आ्राने का भय रहता है। [अर्थात उपमादि वच्यालद्वारों के अ्रधिक प्रयोग से अ्रधिक सुषमार और सुन्दर पदार्थ के सौन्दर्य में न्यनता आ जाने की सम्भावना रहती है। इसलिए 'वाध्यवशता' या 'वस्तु-वत्रता' में अलद्धार आादि के सन्निवैश के बिना वस्तु के स्वाभाविक स्वर्प का ही सुन्दर रूप में सुन्दर शन्दो में वर्णन किया जाता है।]

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कारिका १ ] तृतीयोन्मेप [२६५

यहाँ यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि 'कुन्तक' जिसको 'वस्तुवनता' अथवा 'वाच्य- बकना' कह रहे हैं वस्तु के इसी स्वाभाविक औ्र सुन्दर वर्णन को भामह आदि प्राचीन आचार्यो ने 'स्वभावोक्ति' अलद्धार के नाम से कहा है। इसका अ्ररथं यह हुआ कि वस्तु का स्वभाव-सुन्दर-वणन जिसे कुन्तक 'वस्तुवकना' कह रहे हैं, भामह आदि के मत में वह एक अलद्वार है, अलद्कार्य नही। उपमा आदि अलद्धारों से सीन्दर्य, भथवा अननुरूप शभूषणो से सौन्दर्य की मलिनता आदि तो अलद्धार्य की मम्भव हैं। अलद्दार की नहीं। तब यहाँ कुन्तक यह कसे लिख रहे है कि इस प्रकार पदार्थ के स्वाभाविक तीन्दर्य के वगन के प्रनङ्ग में उपमा आदि वाच्य अ्रलद्कारो के अधिक प्रयोग से स्वाभाविक सौकुमार्य में मलिनता आजाने की सम्भा- वना होने से उनका अधिक उपयोग नही करना चाहिए। कुन्तक का वह कथन तो तव सम्भव होता जब पदार्थ के स्वाभाविक वरंन या स्वभावोकिति को 'अलद्कार' नही अपितु 'अलद्धार्य' माना जाता। परन्तु यह बात तो है नही। इसलिए कुन्तक का यह लेख ठीक नही है। इनी बात को मूल गन्थ के अपले त्रनुच्छेद में 'तस्मात् कि तद्द पणदुर्व्यसनप्रयासेन' इन पक्ति मे ग्रन्थकार ने सूचित किया है। 'स्वभावोक्ति' को 'अलद्वार' मानने पर एक प्रश्न यह हो सकता है कि उम दशा में 'अलद्वार्य' क्या होगा? 'स्वभावोनिति' को अ्लद्वार मानने वाले इन प्रश्न का उत्तर यह देते हैं कि वन्तु का सामान्य धर्म मात्र 'अलङ्कार्य' हू और उमके सातिमय स्वभाव का परिपोपण ही 'स्वभावोक्ति अ्रलद्धार' कहलाता है। इनलिए कुन्तक जिस सातिशय वर्णन को 'वस्तुवकता' कह रहे हैं वह वस्तुन म्वभावोक्ति अलद्धार है। अतए उपमा आदि अलद्धारों से उसके मलिन होने का प्रश्न ही नहीं उठना है। अत कुन्तक ने जो ऊपर लिखा है वह ठोक नहीं है। यह 'त्वभावोकि' को अ्लद्गार मानने वालो की भोर ने शङ्का की जा नवती है। इन पूर्व पक्ष के सण्डन में कुन्तक यह सुवनि देते हैं कि जिसे हम 'वस्तुवयता' कह रहे है और आप 'स्वभावोक्ति अलद्दार' वहना चाहते है वह वास्तव में 'अलद्वार नही अपितु 'मनक्गायं' हो है। यदि त्र्प्रापके पूर्वपक्ष के त्र्प्रनुनार वम्तु के सामान्य धर्म मात्र को 'मनकूर्य' तथा 'नातिमय न्वनाव वर्गान' को 'स्वभाचोनित मनद्ार' माना जाय तो उसमें दो दोप होगे। १. एक तो यह कि चन्तु के नामान्य धर्मे मान्र का दगान तो हरएक व्यवनि कर नकता है। उनमें पवित्व शनित वी पो आरदध्यवना नही है। औोर न वह चमत्कारगून्य नामान्य धर्म का वर्न नहदयों के निए प्रहादकानी हो सकता है। इनलिए सहृदया ल्ादवारी काव्य के प्रनभ् में उस वमकान्शून्य नामान्य धर्म का 'मलद्वाय' रूप में कोई न्यान नही हो गवता है।

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२६६ ] वक्रोपितजीवितम् [कारिका १

ननु च सपा सहदयाह्वाटकारिगी ग्वभावोक्तिरलार्तया समाननाता तस्मात कि तद्दपणदुर्व्यसनप्रयासेन। यतस्तंपा सामान्यवन्तु वर्ममात्रमलप्वार्यम, सातिशयरवभावसौन्दर्यपरिपोपसमलद्वार प्रनिभासत। नेन ्वभवकत रलद्वारत्वमेव युक्तियुक्तमिति ये मन्यन्ते तान प्रति समावीयते- यदेतन्नातिचतुरस्त्रम्। वम्माढ गतिकगतिन्याचन काव्यकारग न

२ दूमरा यह दोप हागा कि अननसृष्ट धर्मयान सामान्य प्प शभो सदय मानने पर अ्योग्य भित्ति पर बनाए चिय हे नमान मुन्दर अतद्वागे मे भी उममे सौन्दर्य का आधान नही विया जा सकता है। गलिए प्रतिमययुक्त पदार्य स्वम्प को जिसे हम 'वस्तुवनता' कह रहे हे 'अल द्वाय' मानना नाहिए। प्रर उसते ययोचित अल्कागे से सजाना चाहिए। इतनी वात अ्रवव्य ध्यान मे रनी नाहिए कि जहा केनल ग्वाभाविर सौन्दर्य के प्राधान्य की विवक्षा हो वहाँ रुपकादि अलद्वारों का अविष प्रयोग न हो। तयोकि उससे वस्तु का स्वाभाविक सौन्दय दब जाने की आपदा रहती है। उनी बात को ग्रन्थकार आ्प्रागे प्रतिपादन करते हे- [ प्रश्न ] अच्छा यह स्वभावोषित तो [ भामह वादि प्राचीन आ्राचार्यो ने ] परलद्धार रूप में कही हैं। इसलिए [उपमादि वाच्य प्रलद्धारो से] उस [स्वाभाविक सौन्दर्य ] के दूषित (म्लान] करने के अ्रनुचित प्रयास से कया लाभ? [श्रर्थात् आ्राप जो यह कहते है कि उपमा आदि वाच्य अलङ्गारो के प्रयोग मे वस्तु के स्वाभाविक सौन्दर्य मे न्युनता या मलिनता घा जाने की सम्भावना होने से वाच्यालद्वारो का अधिक प्रयोग उचित नहीं है। आपका यह कहना ठीक नहीं है। क्योकि उन उपमा आदि अलद्वारो] का 'लङ्धार्य', वत्तु का सामान्य धर्म मात्र है। और त्र्प्रतिशययुक्त स्वभाव का परिपोषण करना ही 'अलद्धार' रूप से प्रतीत होता है। [ औ्र््रौर क्योकि स्वभावोकिति में वस्तु के प्र्प्रतिशययुत स्वभाव का परिपोपण ही किया जाता है] इसलिए स्वभावोवित को अलद्धार मानना ही उचित है। [इसलिए उपमादि के प्रयोग से स्वाभाविक सौन्दर्य की म्लानता सम्भव नहीं है] ऐसा जो [ भामह श्ररादि ] मानते है उनके प्रति [पूर्वपक्ष का] समाधान करते है कि- [उत्तर] यह [जो आपने कहा कि वस्तु का सामान्य धर्म मात्र 'लङ्धार्य' होता है और उसके सातिशय स्वभाव का वर्णन 'स्वभावोषित' अलद्धार होता है। इसलिए सातिशय स्वभाव वर्णन त्प स्वभावोवित प्रथवा 'वस्तुचकता' के अलद्धार रूप होने से रूपकादि अलद्गारो से उसकी नलिनता होने का प्रश्न ही नहीं उठता है] यह कहना उचित नहीं है। क्योकि [ऐसा मानने में दो दोष आ्रा जायेंगे। एक तो

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फारिका १ ] तृतोयोन्मेष [२६७

ल्लिखितालेख्यवन्न शोभातिशयकारितामावहति। तस्मादत्यन्तर मणीयस्वाभाविक अमयुक्त वर्णनीयं वग्तु परिग्रहणीयम। तथाविधस्य तस्य यथायोगमौचित्यानु- सारेण रूपकाद्यलक्कारयोजनया भवितव्यम। एतावांस्तु विशेपो यत् स्वाभाविक- सौन्टर्यप्राधान्येन विवतितस्य न भूयसा रूपकाद्यलद्वार उपकाराय कल्पते। वस्तुस्वभा वसीकुमार्यस्य रसादिपपोपसस्य वा समाच्छादनप्रसङ्गान। तथा चैतस्मिन विपये सर्वाकारमलद्वार्य विलासवतीव पुनरि म्नानसमय-विरह व्रतपरिग्रह-सुरतावसानाटौ नात्यन्तमलङ्गरणसहतां प्रतिपद्यते। स्वाभाविक- सौकुमार्यस्यैव रसिकहदयाह्रादकारित्वात्।

यह फि] सहृदयहृदयाह्लादारी काव्य-रचना के इस प्रसद्ध में भेड-चाल से [वस्तु के सामान्य घर्म मात्र को वर्णन करने वाले] जैसे-तसे काव्य का निर्माण वरना उचित नहीं है। [ कवि को उसी उत्तम काव्य की रचना का प्रयत्न करना चाहिए जो वस्तृत ] सहदयो के हृदय के लिए शह्लाददायक काव्य के लवक्षण का प्रसङ्ग होने मे।

औीर [दूसरा दोष यह होगा कि ] अ्रनुत्कृप्ट धर्म से युक्त [रद्ी] वर्णनीय [ पदार्थ] को अ्रलकृत करने पर भी प्रयोग्य आधार निति पर चनाए हुए चित्र के समान [वह प्रयत्न उस रही काव्य या तुकबन्दी के लिए] अ्रधिक शोभाजनक नहीं हो सकता हैं। इसलिए अत्यन्त रमशीय स्वाभाविक घर्मे से युथत व्णनीय वस्तु का ही ग्रहए [कवि को] करना चाहिए। और उस प्रकार की [ अ्ररत्यन्त रमणीय स्वभावयुयत ] उस वस्तु को शचित्य के अ्रनुसार यथायोग्य रूपकादि श्रलङ्धारो से युक्त करना [सजाना ] चाहिए। हां, इतनी बात अ्रवश्य [विशेष] है कि जहां वस्तु के स्वाभाविक सौन्दर्य का प्राधान्य [फवि को] विवक्षित है उसके लिए रूपफादि अल्गार का अ्रधिक प्रयोग [लाभदायक] या उपयोगी नहीं होता है। [ययोंकि उससे ] वस्तु के स्वाभाविक तौकमार्य का अ्ररथवा रस आरदि के परिपोषण का दब जाना सम्भव हो सफता है। जैसे कि इस विषय में [ यह उदाहरण दिया जा सकता हं फि ] सुन्दरी n त्ी सब प्रकार में अ्रलद्धायं [अलद्धारो द्वारा सजाने योग्य ] होने पर भी स्नान के समय, प्रथवा चिरह के कारण व्रत तिये होने पर, और सुरत के वाद श्रधिफ अलक्ारो को सहन नहीं करती है[ पयोकि उन दशाघों में तो उसका स्वाभाविक सौन्दर्य ही रसिकों के हृदय के लिए शह्हादायक होता हूँ। [इसी प्रकार स्वाभाविक सौन्दय के विवक्षित होने पर अधिक अलद्दारी का प्रयोग उचित नहीं होता है]।

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२६८ ] चक्रोवितिजीचितम् [कारिका १

गथा- ता प्राड्मुसी तत्र निवेश्य तन्वी अर्रा व्लम्वन्त परा निपरणा। भृतार्यशोमाहियमाणनेत्र प्रसाधने सन्निहितेऽपि नार्य ॥?॥' त्रत् तथाविधम्वाभाविकमाकुमार्यमनोहर शोभातिशय कबे प्रति- - स्पटत्वेन सम्भावितम। यस्मात न्वाभाविक्सी कुमार्यप्रावान्वेन वर्रर्मानम्यो- दारस्वपरि पन्दमाहम्न मलद्वरणकल्पन नोपकारिता प्रतिपद्दते।

जमे-

यह कुमारसम्भव वे सग्तम नग हा १त स्लोकके। निव औोर पादनी के विवाह हो जाने के बाद मुहागगत वे मनाने से अ्रवन पर जब म्थ्िया पावती को प्राभृपण आदि पहिनाने के लिए बैठी उस नमय का वहन करने हए ववि कह रहा हँ कि- [आभूपण आदि धारण कराने वाली] स्त्रिर्या, उस पतली कमर वाली पार्वती] तन्वी को [सजाने के लिए] सामने बठालकर, अलद्धार आादि [प्रसाधनो ] के पास में रखे हुए होने पर भी [ उम पावती की] रवाभाविक शोना।के श्रव- लोकन] से [ ही] नेत्रो के आकर्षित हो जाने के फारण थोडो देर[रिकतव्यविमूढ होकर] चुपचाप बैठी रह गई।१।।

यहाँ उस प्रकार की स्वाभाविक सुकुमारता से मनोहर शोभा का प्तिशय प्रतिपादन करना कवि को अपरभिप्रेत है। औ्रौर उसका अलद्धारो से सजाना उस[ पावती] के स्वाभाविक सौन्दर्य को मलिन करने वाला हो सकता है ऐसी शङ्का की सम्भावना [ही उनके चुप बैठे रहने का कारण] हैं। क्योकि स्वाभाविक सौन्दर्य की प्रधानता से [अररथात् प्रधान रूप से स्वाभाविक सौन्दर्य के ही] वर्ण्यमान वस्तु के, श्र्प्रतिशययुक्त सुन्दर स्वभाव की महिमा के [वशन में उसकी]स्वाभाविक सौन्दर्य का तिरोधान करने वाले [ स्वभाव से मिन्न 'सादृश्य' या 'रूपफ' अलद्धार के प्रयोजक ] अ्र््न्य [धर्मो]4, को प्रतीति की अपेक्षा रखने वाले अलद्धारों की कल्पना उपकारक नहीं हो सकती है। [ इसलिए कवि जब वस्तु को उसके स्वाभाविक सौन्दर्य से युक्त दिखलाना चाहता है तव अन्य अ्रलद्धारो का अधिक प्रयोग उचित नहीं होता है]।

१ कुमारसम्भव ७,१३।

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कारिका १ ] तृतौयोन्मेष विशेपस्तु-रसपरिपोपपेशलाया. प्रतीतेर्विभावानुभावव्यभिचार्यीचित्य- व्यतिरेकेण प्रकारान्तरेण प्रतिपत्ति. प्रस्तुतशोभापरिहारकारितामावहति । रैथा च प्रथमतरतरुणीतारुएयावतारप्रभृतय पदार्था. सुक्कुमारवसन्तादिसमय- समुन्मेपपरिपोपपरिसमाप्तिप्रभृतयरच भूयसा न कस्यचिद्लद्घरणान्तरस्य परिद्ृश्यन्ते। कविभिरलद्करणी यतामुपनीयमाना:

यथा- स्मित किन्चिन्मुग्घं तरलमधुरो दृष्टिविभव. परिस्पन्दो वाचामभिनवविलासोवितिसरसः। गतानामारम्भः किसलयितलीलापरिमल: स्पृशन्त्यास्तारुरय किमिव हि न रम्यं मृगदृशः ॥२॥'

विशेष [बात] तो यह हं कि रस के परिपोष से सुन्दर [ रसादि की] प्रतीति की, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावो के शचित्य के विना अ्रन्य प्रकार से ) [साक्षात् रस आ्रादि शब्द द्वारा] उपस्थिति, प्रस्तुत [वर्ण्यमान पदार्थ रस आदि] की शोभा की वाघक हो जाती है। इसीलिए स्त्रियो के प्रथम नवयोवन के आ्ररगमन आदि पदार्थ, और सुकुमार वसन्त पादि ऋतुशं के प्रारम्भ, पूर्णता और परिसमाप्ति आदि, अपने प्रतिपादक वाक्यो की वकता के अतिरिक्त किसी अन्य अलद्धार के अलद्धरणीय रूप में कवियों द्वारा प्रस्तुत किए जाते हुए प्राय नहीं देखे जाते हैं। जसे- नवयोवन का स्पर्श करने वाली [ वय सन्धि में वर्तमान] मृगनयनी की हल्की-सी मधुर मुसकान, चञ्चल और मधुर शांसो की शोभा, अ्भिनव भावपूर्ण वाक्यो से रसमयी वाली और हाथ-भाव मयी सुन्दर चाल [इत्यादि] फौन सी चीज मन को हरणा करने वाली नहीं है ।।२। यह श्लोक ध्वन्यालोक में भी पृष्ठ ४५५ पर उद्धत हुआ है। इसमें नवयोवन में प्रवेश वन्ने वाली तरुसी के स्वाभाविक सौन्दर्य का वणन किया गया है। यहाँ तरुसी के स्वाभाविक सौन्दर्य का मनोहर शव्दचिन उपस्थित करना ही ववि को परभिप्रेत है इसलिए उसने उसको बिमी प्रवार के वाह्य अलद्दारों मे सजाने का प्रयत्न नही किया है। स्वभावोकित ने ही यह मुन्दर व्णन किया है। इमी प्रकार का दूसग उदाहरण ग्रार देते हैं। १ ध्वन्यालोक प० ४५५ पर भी उदृत हूँ।

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३०० ] वक्रोयितजीचितम् [फारित?

यथा वा- अव्युत्पन्नमनोमना मधुरिमम्पर्शाल्लसन्मानसा भिन्नान्त:करण दशा मुकुलयन्त्याघ्नातभूतादग्रमा. । रागेच्छा न समापयन्ति मनसः सेद विनवालसा वृत्तान्त न विदन्ति यान्ति च वश सन्गा मनोजन्मन. ।३।।

यथा वा- दोर्मृ लार्वव। इति ॥४।'

प्रथवा जसे- चय सन्धि अरर्थात् वात्य औौर यीचन के मध्य में राती हुई। वायाए फाम- वासनाओ से अपरिचित होने पर भी योवन के श्रशिक प्रभाव से उत्पन्न माघुयं के स्पर्श से प्रसन्न मन वाली, मनुष्यों के त्रम को ताडकर [आम्नातभूतोद्भ्रमा पर्यात् कोई युवक जब यह सोचकर कि यह मेरी प्रोर देस रही है या मुझ पर मुग्ध है तव उसके इस भ्रान्ति के आभास को पाकर] वे [ भिन्नान्त फरण] हृदय को वेघती हुई-सी आंखे मींघती है।अर्यात् अपनी आांसो फा सकोच फरके इस प्रकार उसको देखती हैं जिससे उसका हृदय घायल हो जाता है]। मन की अनुराग की इच्छा को [ सम्भोग द्वारा] समाप्त या परिपूर्ण नहीं फरती हँ और बिना ही [सुरत] श्रम के अलसाई-सी हो जाती है। [औौर जब किसी पर शनुरक्त होती है तव उसके] वृत्तान्त [फल वश चरित्र आादि] का परिचय प्राप्त किए बिना ही [केवल उसके सौन्दर्य से हो] काम के वशीभूत हो जाती है ॥३॥ यहाँ भी कवि ने वय सन्धि में वर्तमान कन्याओ का विल्फुल स्वाभाविक रूप से वर्णन किया है उसमें किसी प्रकार के अलद्धार आ्र्प्रादि का प्रयोग नहीं किया है। अ्र्पत यह भी पहिली प्रकार का ही 'वाच्यदफ्रता' अ्ररयवा 'वस्तु वक्रता' उदाहर है। और जंसे [पहिले उदा० स० १, १२१ पर उद्धृत किए हुए]- बगलों तक स्तनों के निकलने की रेखा बनी हुई है यह [ भी इसी प्रकार का उदाहरख है] ॥४।

१ प्रथमोन्मेष उदाहरण १२१।

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कारिका १ ] तृतोयोन्मेप

यथा चा- गर्भनन्थिपु चीरुधा सुनमसो मध्येडकुंर पल्लवा 2 वाञ्छामात्रपरियहः पिकवृकरठोदरे पश्चमः । किञ्च त्रीणि जगन्ति जिष्णु दिवसैद्वितैर्मनोजन्मनो देवस्यापि चिरोज्भितं यदि भवेदभ्यासवश्यं धनुः ।।५।।' यथा चा- हंसाना निनदेपु इति ॥६।।२ यथा च- सज्जेड़ सुरहिमासों ए दाव अप्पेइ जुअइशरालक्ख मुहे। त्र्रहित्र्न्रसहआ्प्र्रारमुहे एवपल्लवपत्तले अ्रणंगस्स सरे ।।७।।3 [सज्जयति सुरभिमासो न तावदर्पयति युवतिजनलक्ष्यमुखान्। अरभिनवसहकार मुखान् नवपल्लवपत्रलाननह्गस्य शरान् ।। इतिच्छाया] अथवा जसे- [वसन्त ऋतु के प्रारम्भ की ऋतुसन्धि की चेला में] लताशो की भीतर की 'द्रन्यियों में फूल, और अकुरों के भीतर पत्ते [निक्ल-से रहे हें, अभी पूर्ण रप से बाहर नहीं निक्ले ] हैं। कोफिलि वधू के गले में पञ्चम स्वर की इच्छामात्र उत्पन्न हुई है [अभी पञ्चम स्वर में कूफना प्रारम्भ नहीं किया है] किन्तु दो-्तीन दिन में [हो वसन्त ऋतु का पूर्ण साम्राज्य हो जाने पर] बहुत दिनों से छोडा हुआ, परन्तु अभ्यास के भाघीन कामदेव का धनुष भी तीनो लोको का जीतने वाला हो जायगा ।।५।। अरथवा जमे [पहिलं उदा० स० १, ७३ पर उद्ृत]'हसानां निनदेद्' आादि ॥६।। और जैसे- [कामदेव का ससा] वमन्त माम युवतिजनों को लक्ष्य बनाने वाले [विद्ध करने वाले] मुसों [अ्रप्रभाग फलभाग] से युक्ष्त, नवीन पत्तो से पुद्धित [बाशों के पीछे जो वद्ध लगे रहते ह उनसे युश्त], प्राम प्रादि कामदेव के चालों को निर्माल

"रहा है ।।3।। तो कर रहा है [परन्तु अभी प्रहार करने के लिए फामदेव के हाथ में] े नह्दों

१ विद्मालभज्जिका ६,६३, ववीन्द्रवचना० न० ६८, हेमचन्द्र पृ० १३४, सदुविन वर्शाामिन २,७५१। प्रयमोन्मेष उदाहरगा ७:। ३ स्वन्यालोक पृ० १८६ तथा २०० पर रदृत ।

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३०२ ] वकोफितिजीवितम् [फारिफा १ एव विधविपये स्नाभाविकसीकुमार्यप्राधान्येन वएर्यमानस्य् वस्तुनम्नदा- च्छादनभयादेव न भूयसा ततवभिरलगामुपनिवध्यते। गदि वा कदाचिदु- पनिवध्यते तत्तदेव स्वाभाविक सौकुमार्य सुतरा समुन्भीलवितुम। न पुनर-

यथा- धीताजने च नयने स्फटिकाछकान्ति- गेरडस्थली विगतकत्रिमरागभोप्ठम्। अज्ञानि दन्तिशिशुदन्तविनिर्मलानि कि यन्न सुन्दरमभूततरुणीजनस्य ॥।=। छपत्र 'दन्तिशिशुदन्ततिनिर्मलानि' उत्युपमया म्वाभाविकमेय मन्दर्य- मुन्मीलितम्।

इस प्रकार फे [समस्त] उदाहरणो में स्वाभाविक सौन्दर्य की प्रधानता से वर्ष्यमान वस्तु के स्वाभाविक सौन्दर्य के आच्छादित होजाने के भय से ही उनके [निर्माण करने वाले] फविगण अ्रघिक अ्लद्धारो [प्रथवा सजावट] की रचना नहीं करते है। अथवा यदि फहीं [ अ्लद्धारो की ] रचना करते भी है तो उसी स्वाभाविक सौन्दर्य को और भी प्धिक रूप से प्रकाशित करने के लिए हो [करते है] न कि अलद्धारों की विचित्रता दिखलाने के लिए। जंसे- [यह जल विहार के वाद का वर्णन प्रतोत होता है। उस समय स्त्रियो की] धुले हुए अञ्जन [सुरमा] वाली [स्वाभाविक सौन्दर्य युक्त] थ्राँसं, सगमरमर के समान कान्ति वाले गाल, फृत्रिम लालिमा से रहित होठ, हाथी के चच्चे के दांतों के समान गौरवर्ण श्रङ्ध, नवयौवनाओं की कौन सी चीज़ थो जो [उस समय] सुन्दर न [लग रही] हो ॥।८।। यहां [इस श्लोक में] 'वग्तिशिशूदन्तविनिर्मलानि' 'हाथी के वच्चे के दाँतों के समान गोरवर्स अङ्ग' इस उपमा [अलद्धार] के द्वारा स्वाभाविक सौन्दर्य को ही प्रकाशित किया है।[ इसका अभिप्राय यह है कि यहाँ उपमालद्गार का प्रयोग र उपमा के सौष्ठव के प्रदर्शन लिए नहीं अपितु वस्तु के स्वाभाविक सौन्वर्य को अ्र्धिक स्पष्ट रूप से प्रतिपादन करने के लिए ही किया है। ऐसे उदाहरणों में कवि अलद्धारों का प्रयोग अलद्धारो की शोभा प्रवशित करने के लिए नहीं अ्पितु स्वाभा- विक् सौन्वर्य को ही और श्रघिक प्रकाशित करने के लिए करते ह ]।

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कारिका १ ] तृतीयोन्मेष [ ३०३

यथा वा-

एतदेवातीच युक्तियुक्तम्। यस्मान्महाकवीनां प्रस्तुतौचित्यानुरोधेन कटाचित् स्वाभाविकमेव सौन्दर्यमेकराज्येन चिजम्भयितुमभिप्रेतं भवति, कदा- चिद्विविधरचनावैचित्रययुक्तमिति। अररत्र पूर्वस्मिन पक्षे रूपकादेरलक्कर एकला- पस्य न ताहक तत्त्वम्। अ्र्रपरस्मिन पुन' स एव सुतरा समुज्जुम्भते। तर्माद- नेन न्यायेन सर्वातिशायिनः स्वाभाविकसौन्दर्यलक्षणास्य पदार्थपरिम्पन्दस्या- लङ्कार्यत्वमेव युक्तियुक्ततामालम्वते, न पुनरलद्गरणत्वम्। सातिशयत्वशून्य- धर्मयुक्तर्य वस्तुनो विभूपितस्यापि पिशाचादेरिव तद्विदाह्वाकारित्वविरद्या-

अ्रयवा जैसे [पहिले उदा० स० १, ६३ पर उद्धत ]- नई हथिनी के नन्हे-नन्हें दाँतो के अकुरो के समान ॥६॥। [यहां भी उपमा का प्रयोग स्वाभाविक सौन्दर्य को अधिफ सुन्दर रूप से प्रकाशित करने के लिए ही किया गया है।] श्ररोर यह [प्रक्रिया] बहुत ही युकतिसङ्गत [ प्रतीत होती ] हं। प्योकि वर्ष्यमान [ प्रस्तुत वस्तु ] के शचित्य के अनुरोध से महाकवियो फो कभी फेवल स्वाभाविक सौन्दर्य ही एकछत्र रूप से प्रफाशित करना श्रभीष्ट होता है, श्रौर कभी विविध प्रकार के रचना के वंचिश्र्य [ अर्थात् अ्रतङ्गार आरदि ] से युक्त [सौन्दर्य का वर्णन फरना अ्रभीष्ट होता हैं ]। उनमें से पहिले पक्ष में [पर्थात् जहां केवलमात्र स्वाभाविक सौन्दर्य का व्णेन करना ही फचि का उद्देश्य है वहाँ] रपक आदि पलद्धारों का वैसा [स्वाभ्गविकसीन्द्य के समान महत्तव का ] कोई तत्व नहीं है। [उनफा प्रयोग व्यर्थ है] औ्रोर दूसरे पक्ष कें[ जहाँ नाना प्रकार के रचना के वचित्र्य से युक्त रप में पदार्यों का बसंन करना कवि को अभीष्ट है वहाँ] वह [शतद्धारादि रप रचना वैचित्र्य] हो मुरय रप से प्रनीत होता है [स्वाभाविक सौन्दर्य उसके नीचे दब जाता है।। इसलिए [इस युक्ति से] स्वामाविक सौन्दय रूप सबमे उत्कृष्ट पवार्य के स्वभाव [वे चशन सदा] को अ्रलङ्धायं [प्रधान] मानना ही युक्तिसङ्भत है। अतद्धार [अ्र्रप्रधानत्व मानना युक्तिमङ्गत ] नहीं [ हूं ]। [ इसके विपरीत सर्वातिशायी स्वाभाविक सौन्दर्य के न होने पर] फिमी प्र्रतिशय मे रहित [साघारण या रद्दी] धर्म से युक्त वस्तु फो [अ्रत्यन्त] अ्रलफृत करने पर [सजाए या अलकृत किए हुए] पिशाच गादि के समान [उसमे ] महुदयह्वयाह्लादकारित्व के न होने से उसकी अनुवादेयता हो होगी। इसलिए इम विषय में श्ौर ग्रधिक चर्चा करने की आवम्यवता नहीं हैं। १. प्रथमोन्मेप उदाहरण ६३।

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३०४ ] वक्रोपितिजीयितम् [परिका ?

यदि वा प्रस्तुतौचित्यमाहात्म्या-मुग्यतया भावम्वभाव नानिशव त्वेन वरसर्यमान स्वमहिम्ना भूपकान्तगामहिगा स्वयमेव गोभानिशयणालि- त्वादलक्वार्योऽ यलद्वरगमित्यभिवीयत तदग्रमाम्माकीन गव पत । तनिरिक्न-" वृत्तरलङ्कारन्तरस्य अर्प्रलद्वारतान्पर्येणाभिवानान्नात्र वयं विवदामहे ।।१।।

एवमे पैव वस्यमानस्य वस्तुनो वक्रता, उतान्या काचिदस्तीत्वाह-

अ्रथवा यदि [यह कहा जाय कि] प्रस्तुत [वण्यमान पदाय] के श्रचिन्य के कारण पदार्थ का स्वाभाविक सीन्दर्य हो प्रप्रतिजाययुयन रपमे वण्यमान होकर, अपनी सुकमारता [रप महिमा] से अ्रन्य /किसी भी प्रकार के प्रानपणा ।पे भार] को सहन करने में श्समर्य होने से स्वय ही शोभातिशायशाली होने से अलक्कायं होने पर भी 'अलङ्धार' कहा जा सकता है। तो यह हमारा हो पक्ष हुआ। [अर्थात यह हमारी ही बात का समर्थन हुआ। कोई नई बात नहीं हुई। इसका अरभिप्राय यह हुआ कि ग्रन्थकार स्वभावोषित को मुरय स्प मे 'अलद्धाय' मानना हो उचित समझते है। उसको गौए रूप से ही 'अलद्धार' कहा जा सन्ता। जो लोग स्वभा- वोषिति को 'अलद्धार' कहते है उनके मत में भी स्वभावोकिति के लिए अलङ्गार शब्द का प्रयोग सादृश्यमूलक गौणी लक्षणा से ही हो सकता है। मुरय रूप से नहीं।] उससे [ अर्यात् स्वाभाविक सौन्दर्य के वन स्थल से ] अन्यत्र रहने वाले [ उपमा रूपक आदि ] अ्रन्य अ्रलद्धारो को अ्रलद्धार [के अ्र्प्रभिप्राय से] कहने में हमारा फोई विवाद नहीं हैं। ग्रन्थ के आ्रम्भ में अलद्ारो के विपय मे स्वभावोकतिवादी औरपरर वक्रोवित- बादी दो पक्षो का उल्लेख किया गया था। कुछ लोग 'स्वभाचोकिति' को अलद्भार मानते हे और कुछ लोग 'वक्ोक्ति' को। यहाँ कुन्तक ने पपना मत स्पप्ट रूप से यह दिया है कि स्वभावोक्ति वस्तुत कभी भी 'अलङ्वार' नही हो सकती है। वह सदा 'अलङ्कार्य' है, 'अलङ्कार' नही। यदि उसके लिए 'अलद्वार' शब्द का प्रयोग होता है तो लाक्षणिक प्रयोग ही होगा ॥१॥

इस प्रकार [इस प्रथम कारिका में फही हुई केवल] यह ही [एक ] वर्ष्यमान वस्तु की वक्रता ['पदार्थ वक्रता'] है या कोई और [ प्रकार की पदार्थवक्रता ] भी है। यह [बात अगली कारिका में ] कहते हैं [ कि इससे भिन्न और प्रकार की पदार्थ- वक्रता भी होती है]।

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कारिका २ ] तृतीयोन्मेष: [३०५

अपरा सह जाहार्यकविकौशलशालिनी। निमिंतिर्नतनोल्लेखलो कातिक्रान्तगोचरा ।२ ।। अरपरा द्वितीया। वर्यमानवृत्तेः पदार्थस्य निर्मिति सृष्टि। वक्रतेति सम्बन्धः । कीहशी-'सहजाहार्य+ विकौशलशालिनी'। सहज स्वाभाविरक, शरहार्य शिक्षाभ्याससमुल्लासितं च शक्तिव्युत्पतिपरिपाकप्रौढ़ं यन् कवि कोशल निर्मातृनैपुएयं तेन शालते श्लाघते या सा तथोक्ता। त्रन्यच्च कीदशी-'नृतनोल्लेखलोकातिक्रान्तगोचरा'। नूतनम्तत्परथमो योऽमावुल्लि- ख्यते डत्युल्लेखः, तत्कालसमुल्लिख्यमानोऽतिशयः तेन लोकातिक्रान्त प्रसिद्ध- व्यापारातीत कोऽपि सर्वातिशायी गोचरो विपयो यस्या. सा तथोक्तेति विग्रह्। तस्मान्निर्भितिस्तेन रूपेण विहितिरित्यर्थः। तदिवमत्र तात्पर्यम्- यन्न वएर्यमानस्वरूपा पदार्था. कविभिरभूताः सन्तः क्रियन्ते। केवलं सत्ता- कवि के सहज [शक्तिजन्य ] औ्रर श्राहायं [ शिक्षाभ्यास से सम्पादित या व्युत्पत्तिजन्य ] कौशल से शोभित होने वाली, अभिनव कविकल्पनाप्रसूत होने से लोकप्रसिद्ध [पुराने सुन्दर ] पदार्थों का प्र्प्रतितमण कर जाने वाली रचना दूसरे प्रकार की [पदार्यवकता रूप]होती है॥२। वर्ण्यमान पदार्य की निरमिति अर्थात् [ लोकोत्तर ] रचना दूसरी प्रकार फी [पदार्थ] वघ्रता होती है यह [वत्रता पद का अ्रध्याहार फरके] सम्बन्ध होता हं। किस प्रकार फी ?- 'सहज औ्र आ्र्ाहार्य फवि कौशल से शोभित होने वाली'। सहज अर्थात् स्वाभाविक और श्र्ाहाय अ्र्प्र्ात् शिक्षा तथा अ्रभ्यास से समुपाजित, अ्र्थात् शक्ति तथा व्युत्पत्ति के परिपाक से प्रौढ जो फवि का कौशल अर्ा्त् [फाव्य ] निर्मा फी निपुणता, उससे जो शोभित हो वह उस प्रकार की [सहजाहायंकविकौशल- शालिनी] हुई। और फिर फंसी-'नवीन फल्पना के कारण लोक [प्रसिद्ध पदार्थों] फो भतिफ्रमण करने वाले [ पदार्थ ] विषयक'। नूतन अर्थान् [अ्पूर्व ] जो पहिली बार वर्णन की जा रही है, ऐसी अ्पूर्व विशेपता, उसमे लोक को प्तिमान्त र जाने वाला अर्थात् प्रसिद्ध व्यवहार को तिरम्कृत फर देने वाला फोई तोफोत्तर सर्वोत्कृष्ट पदार्य जिस [रचना] का विषय है। वह उन प्रकार फी [नूतनोन्लेस- ·" तोफातिकान्नगोचरा रचना] हुई यह [उन समस्त पद का] वितह हैं। [इन प्रकार फो जो वकना] उसमे की हुई, जो रचना [वह नी पदायंवयता का भेद होनी हूँ]। इसका [यहाँ] यह अरभिप्राय हुआ कि-कवि व्प्यमान, अ्रदिद्यमान पदार्थो को उत्पन्न नहीं करते है। [अर्थान् फवि जिनका चणन करता है वे वर्ण्त्रमान पदाथ उसके पूतर संसार में न हों धौर कवि उनको उत्पन्न पर देता हो यह बात नहीं है ] बिन्दु

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३०६ ] वफोपितिजीवितम् [फारिका २

मात्रेण परिम्फुरता चैपा तथािव कोडयतिशय. पुनरावीयते, येन कामपि सहदयहदयहारिगी रसग्ीयतामविरोग्यनत'। तविदमुक्तम- लीन वम्तुनि। इत्यादि ।2०।।2 तटेव सत्तामात्रेशीव परिम्फुरत पदार्वत्य कोऽयलोकिक गोभातिशय- विधायी विच्छित्तिचिशेपोडभिधीयते येन नतनस्छायामनोहारिया वाल्व- स्थितितिरोवानपवेन निजावभासइानिततल्रपेग तलालोल्लिखिन डव वर्णनीयपटार्थपरिम्पन्ठमठिमा प्रतिभासते, येन विधातृव्यपदेशपात्रता प्रति- पद्यन्ते कवयः। तदिदमुक्तम-

[लोफ में ] केवल सत्ता मान से प्रतीत होने वाले इन । पदार्थो] में [कवि] कुछ इस प्रफार की विशेपता उत्पन्न कर देता ह जिमने कि वे [साघारण लौकिफ पदार्थ भी] सहृदयो के हृदय को हरए करने वाली किसी गपूय रमसोयता को प्राप्त हो जाते हैं। यह हो[बात उदा० स० २, १०७ पर पू्व उद्ृत श्लोक में) कही हैं- 'लोन वरतु' इत्यादि॥१०॥ इस प्रकार सत्तामात्र से प्रतीत होने वाले पदार्थ में [ सुकवियो द्वारा] फुछ अलौफिक शोभातिशय को उत्पन्न करने वाले सौन्दय विशेष का फथन या आ्धान कर दिया जाता है जिसने पदार्थ के वास्तविक [सत्तामात्र से प्रतीत होने वाले] स्वरप को आच्छादित कर देने में समर्य और[पहिले से पदार्थ में प्रतीत न होने वाले अ्र्प्रतएव] नवीन सौन्दर्य से मन को हरण करने वाले, अपने [पूर्व अनुभव होने वाले सत्तामात्र] स्वरूप के दब जाने से उद्भासित [नवीन लोफोत्तरसौन्दर्यशाली] स्वरूप से, उसी समय प्रतीत होने वाला [एफ दम नवीन-सा] वणनीय पदार्थ का स्वाभाविक सौन्दर्य-सा प्रस्फुटित होने लगता है। जिस [साधारण लोकिक पदार्थों में अपनी प्रतिभा द्वारा अलौकिक सौन्दर्य को उत्पन्न करने की क्षमता] के कारण ही फवि लोग 'प्रजाति' [ब्रह्ा] कहलाने के प्रधिकारी हो जाते है। यही बात [ अर्थात् फवि प्रजापति या ब्रह्मा होता है निम्न श्लोक में ] कही भी हँ- [यह नीचे उद्धृत किया हुआ्र्लो मूलरग्निपुराण के ३३८ वे अध्याय का १०याँ इलोक है। और ध्वन्पालोक में भी पृष्ठ ४२२ पर उद्धत हुआ है।] १ यहाँ प्रथम सस्करण में 'अरधिरोप्यते' यह एकवचन का पाठ है। परन्तु वस्तुत बहुवचनान्त 'अरधिरोप्यन्ते' पाठ श्रधिक उपयुवत है इसलिए हमने बहुवचनान्त पाठ ही रखा है। २. द्वितीयोन्मेप उदाहरए १०७।

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क्ारिका २ ] तृतीयोन्मेष· [३०७

अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः। यथाऽस्मे रोचते विश्व तथेद परिवर्तते ॥११॥।१ मैपा सहजाहार्यभेदभिन्ना वर्णनीयरय वस्तुनो द्विप्रकारा वक्रता। तेवमाहार्या येयं सा प्रस्तुतविच्छित्तिविधाऽप्यलद्ढारव्यतिरेकेण नान्या काचि- दुपपद्यते । तस्मादद्व हुविधतत्प्रकारभेटद्वारेणात्यन्तवितनव्यव हारा पदार्था परिद्ृश्यन्ते। यथा- अरस्या: सर्गविधौ प्रजापतिरभृच्चन्द्रो नु कान्तिप्रदः शरृद्गारेकरसः स्वयं नु मदनो मासो नु पुप्पाकरः। वेदाभ्यासजडः कथन्नु विपयव्यावृत्तकौतूहलो निर्मातु' प्रभवन्मनोहरमिद रूप पुराणो मुनिः ॥१२॥२ अ्रनन्त काव्य जगत् में [उसका निर्माण करगे वाला] फेवल कवि ही एकमात्र 'प्रजापति' [ब्रह्मा ] है। उसे जसा अच्छा लगता है [उसकी इच्छानुसार] यह विश्व उसी प्रकार बदल जाता है ॥११॥ यह सहज और श्रहार्य [ स्वानाविक शक्ति या प्रतिभा से समुद्भूत सहजा, ' तथा शिक्षा अभ्यास आदि से समुपाजित व्युत्पत्ति-समुद्भूत श्राहार्य ] भेद से वसंनीय वस्तु की दो प्रकार की वकता होती है। इस प्रकार [उनमें से ] यह जो आ्रहार्य [ वकता है] है वह प्रस्तुत [अर्थात् वत्रोषित] तौन्दर्य र्पा होने पर भी अलङ्गार के बिना [अ्रतिरिक्त] औ्ौर कुछ नहीं बनती है। इसलिए उस [शलद्धार रूप श्राहाय पदार्थवक्ता] के अनेक प्रकार के नेदी द्वारा पदार्थो का [बंन घादि] व्यवहार बहुत विस्तृत हो जाता हैं। जैसे- इस [नायिका उर्वशी] की रचना [करने ] मे क्या [सुन्दर ] कान्ति फो देने वाला चन्द्रमा [ प्रजापति ] ब्रह्मा था, प्रथवा केवल भृद्गार रन वाला न्वय कामदेव [हो इसका विघाता था]अथवा कया [पुरपाकर] वसन्त के मास ने ही इमकी रचना की है [वही ब्रह्मा था। 'नु' शब्द वितर्क या तन्देह का चाचक है। इन तीनो में से ही फोई ब्रह्ा रप में इसका निर्मास कर सकता है। इस प्रकार का वितर्क इनके वक्ता, पुरुरवा के मन में उत्पन्न हो रहा है। क्योकि] वेदो का प्रभ्याम करने से जड़ वुदद्धि औौर विषयो से विमुस [आदि पुरुप रूप प्रसिद्ध ] बूहा मुनि [द्ह्या निचारा] ऐमे सुन्दर रूप की रचना करने में फसे समर्य हो सकना हैँ॥१२॥ १ परग्निपुराए अध्याय :३८, ध्वन्यालोक पृ० ४०२ पर उदत। विषमोवंगीय ६, ८, मुभापितादली न० १७६५, भाजंपर पदनि स० ३२६८, ददामपकावनोक ४, २, गरस्वती वफ्ाभरणा १ृ० १७५ माहित्दपसा, पाव्य- प्रदीप १०, ६ पर उदृत ।

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वक्रोपितिजीवितम् 1 पारिका २

शत्र कान्ताया कान्तिमत्वमसीमविलासम्टासव् सामान्यसौष्ठव च सौधुमार्य प्रतिपादितु म्रत्येक तत्परिम्पन्दप्वान्यसमुचित- सम्भावनानुमानमाहालयान पूथत उथगपरवमेव निर्माणामुत्ेनिनम। तथा च कारणत्रितयास्यायंतम्य सर्वेपा विशेषणाना 'वय' उि नम्ममयमानमेत- देव सुतरा समुहीपन्ति। य. हिल न्नयमेव कान्तवुनिस्तन्य सौजन्यममुचिता दरोचकित्वात् कान्तिमक्कार्यकर एकोशलमेवापपन्नम। वश्च ग्वयमेव शतारेकर- सम्तस्य रसिकत्वावेत रमवद्वस्तुविवानवैदव्यमोचिन्धं भजते। वश्च व्वयमेव पुप्पाकरम्तम्याभिजालाटेव तवाबिन सुकुमार एन सर्ग समुचित। तथा चोत्तरारधे व्यतिरेकमुखेन त्रयम्याऽयेतस्य कान्तिमत्याटेविशेपगार्वथानुपपत्ति- रुपपाटिता। यर्माद्वेदाम्यासजडत्वान कान्तिमद्वम्तुविद्यानानभिन्ञलवम, व्या- यहाँ [इस इ्लोफ पे ववता राजा पुत्तवा के द्वारा अपनी] पान्ता [प्रियतमा उर्वशी के कान्तिमत्व, प्सीम विलास सम्पत्ति की पात्ता, सरमता औ्रर लोफोत्तर सौन्दर्य एव सुकुमारता को प्रतिपादन करने के लिए [फान्ति प्रदान परने वाले चन्द्रमा को, अ्रसीम विलास सम्पत्ति के आश्रयभूत फामदेव को, और नरसता, अ्रसामान्य सौन्दर्य, एव सुकुमारता के कारसभृत वसन्त को ब्रहा या विघाता फहा है। उनमें से] प्रत्येक में उस-उस स्वभाव के प्राघान्य मे समुचित सम्भावना के अ्रनुमान द्वारा, पथक्-पृथफ पपूर्त निर्माण की उत्तेक्षा की गई है। [श्रर्थात् चन्द्रमा फी रचना होने से कान्तिमत्व, कामदेव की रचना होने से प्रसीम विलास सम्पत्ि तथा रसवत्ता, और पुप्पाकर वसन्त की रचना होने से सरसता, शसामान्य सौष्ठव एव सौकमाय की सम्भावना हो सकती है। इसलिए उनको ब्रह्मा रूप में उत्प्रेक्षित किया गया हैं] औरर इन तीनों कारणो में सब विशेपरो के साथ 'स्वय' इस पद का सम्बन्ध इस ही बात को शत्यन्त स्पष्ट कर देता है। जो [चन्द्रमा] स्वय ही मनोहर फान्ति से युक्त है उसके, सौजन्य के प्रनुरूप अरोचकी [जिसको अ्र्सुन्दर पदार्थ रुचिकर न हो] होने से [ उसमें ] सुन्दर कार्य के निर्माण में निपुणता का होना स्वभावतः उचित ही है। और जो [कामदेव] स्वय शृङ्गाररस-प्रधान ह उसके रसिक होने से ही रसयवत वस्तु के निर्माण में निपुता उचित प्रतीत होती है। और जो [वसन्त मास] स्वय ही पुष्पाकर है उसके आाभिजात्य [उच्च कुल में जन्म] के कारण ही उस प्रकार की [लोकोत्तर] सुकमार रचना ही [उसके लिए] उचित है । इसीलिए [उषत कलोक के] उत्तरार्द् में [प्रयुवत] विशेषरो से इन कान्तिमत्व आदि तीनो की व्यतिरेक द्वारा अन्यथा अनुपपत्ति का प्रतिपादन किया है। क्योकि [प्सिद्ध ब्रह्मा के ] वेबाभ्यास से जड होने के कारण फान्तियुक्त [सुन्दर] वस्तु की रघना से अनभिज्ञता, [विषयो के प्रति ] उत्सुकता [फौतूहल ] से रहित होने से

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कारिका २ ] तृतीयोन्मेष [ ३०६

वृत्तकौतुकत्वाद् रसवत्पदार्थे विहितवैमुख्यम्, पुराणत्वात सौकुमार्यसरसभाव- विरचनवैरस्यं प्रजापतेः प्रतीयते। तदेवमुत्प्रेक्षालक्षणोSयमलद्वारः कविना वर्णनीयवस्तुन कमप्यलीकिक- लेखविलक्षणमतिशयमावातुं निवद्धः । स च स्वभावसौन्द्र्यमहिम्ना स्वयमेव तत्सहायसम्पदा सह अथमहनीयतामीहमान. सन्देहसंसर्गमङ्गीकरोतीति तेनोपटट हितः। तस्माल्लोकोत्तरनिर्मातनिमितत्वं नाम नूतन कोऽ्यतिशयः पदार्थस्य वर्ष्यमानवृत्तेर्नायिकाम्वरूपसौन्दर्यलक्षणाम्यात्र निर्मित कविना, येन तदेव तत्प्रथममुत्पादितमिव प्रतिभाति। यत्राप्युत्पाद्यं वस्तु प्रवन्धार्थपूर्वतया वाक्यार्थस्तत्कालमुल्लिख्यते कविभिः, तस्मिन् स्नसत्तासमन्वयेन स्वयमेव परिस्फुरता पदार्थानां तथाविध- परस्परान्वय नक्षणासम्तन्धोपनिवन्वनं नाम नवीनमतिरायमात्रमेव निर्मिति- विपयतां नीयते, न पुनः स्वरूपम्।

रसवत् पदार्थ की रचना से विमुखता औ्रर [ पुराने] वृढ्ध होने से सुकुमारता तथा सरसता की रचना में [प्रजापति] ब्रह्मा की पराड्मुखता प्रतीत होती है। इस प्रकार वरणनीय वस्तु में किसी अ्रपूर्व [औरर अब तक के] लेसो से विलक्षण, अतिशय का आ्रधान करने के लिए कवि ने [यहां] इस उत्पेक्षा अलद्धार की रचना की है। शर वह [श्रतिराय] स्वय अपने स्वानाविक महत्त्व मे तथा उत्प्रेक्षालद्धार की सहायता से [तत्सहायसम्पदा] नायिका [वर्ण्यमान श्रर्य] की महनीयता को चाहता हुआ मन्देहालद्वार के साथ सम्बन्ध को प्राप्त करता है। इसलिए उस [सन्देहालद्धार] से [ नायिका का सौन्दर्यातिशय] परिपुप्ट होता है। इसलिए यहाँ [वण्यमान] नायिका में रहने वाले नायिका के सौन्दर्य रूप पदार्च में लोकोत्तर निर्माता के द्वारा निर्मित होने वाली कोई प्पूर्व विशेषना [श्रतिशय] कवि ने उत्पन्न कर दी हैं जिसके फार वह [नायिका पा सौन्दर्य रप पदार्य मानो पहिली वार /उत्पन्न हुआ हो इस प्रकार का] प्रपूर्व-ना प्रतीत होने लगता है। और जहां फाव्य में प्रथम बार उनी समय वछित कल्पित [उन्पात् ] चन्तु फवियो के द्वारा प्रतिपादिन होती हु वहाँ [ उम वस्तु में ] अ्पनी [चन्पिन] सत्ता के सम्बन्ध से स्वय ही प्रतीत होने वाले पदार्यो का उन प्रकार का प्रपूव, परग्पर स्बन्ध का जनक कुछ अपूवं प्पतिशय मात्र ही( ववि की उस। रचना का विष्य होना हू। [वस्तु फा ] स्वम्प [कवि की रचना का विपय] नहीं [होताहै]।

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३१० ] चन्तोकिति जो चितम् [फारिका २

यथा- करत्व भो दिवि मालिकोऽ्रहमिह कि पु्पार्यमभ्यागत. कि त सूनमहक्तया गदि महचिनिम नदारगर्यताम।

ग्रोज्फतीभिरविद्यमानकुसुम यरमारकत नन्दनम् ।।2३।। तदेवविधे विषये वर्गानीयवन्तुर्ति दातिशयविवायी भूपगा विन्यासो विधेयता प्रतिपद्यते। तथा च प्रक्रनमिट मुदाहरसमलकरगारन्पन चिना सम्यड न कथन्चिद पि वाक्यार्थमन्गति भजते। न्मान प्रत्यन्नादिप्रमागोप- पत्तिनिश्चयाभावात् स्वाभाविक वस्तु वर्मिनया व्नम्थापना न सहते। तम्मात्

जंसे- इस श्लोक मे स्वर्ग के नन्दन वन से माली को पृथ्जीनन े किसी फूनो के बाज़ार मे फूल लरीदते हुए देसकर को व्याक्त उसमे प्रम्न कर रहा है ग्रर वह माली उनके उत्तर दे रहा है। उन दोनों का सवाद रूप ही यह दलोक है। [प्रश्न] अरे भाई तुम फौन हो? [उत्तर] मं स्वर्ग का माली हूँ। [प्रश्न] यहां फैसे [आए हो]? [उत्तर ] फूलो के [मोल लेने फे] लिए आया हूं। [प्रश्न] क्यो तुमको फूल मोल लेने की क्या भ्रवश्यकता पट गई? [यहाँ 'सूनमह करयो' यह पाठ कुछ अटपटा-सा प्रतीत होता हूं]। [उत्तर] यदि [मुझे यहाँ फूल खरीदते हुए देसकर आ्र्रापको। बहुत श्राश्चयं हो रहा है तो सुनिए [कि मुझे यहाँ फूल खरीदने के लिए कयो आाना पडा । इमफा कारण यह हैं कि]- युद्ध मे किसी अज्ञात नाम वाले राजा के ऊपर [ पुप्पो की ] मालाओ की वर्षा करने वाली स्वर्ग की अप्सराओ ने नन्दन वन को फूलों से रहित फर दिया* [इसलिए अ्ररब औप्रौर फूल खरीदने के लिए मुझे यहाँ आ्राना पडा है ] ॥१३॥ इस प्रकार के उदाहरणो में वर्णनीय वस्तु के विशेष श्रतिशय को सम्पादन कराने वाले अलद्धारो की रचना करनी आवश्यक हो जाती है। जैसे कि इस प्रकृत उदाहरण में अलद्धारों की फल्पना के विना किसी प्रकार भी वाक्यार्थ की सङ्गति नहीं हो सकती है। क्योकि [ इस प्रकार के कल्पित विषय में] प्रत्यक्ष श्र्प्रादि प्रमारो की उपपत्ति का निश्चय न होने से [ स्वर्ग के माली आदि का यहां श्र्राकर फूल खरीदना आदि वर्ण्यमान पदार्थ] स्वाभाविक वस्तु [ यहां] धर्मो रूप से

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कारिका २ ] तृतीयोन्मेप. [ ३११

विदग्धकविप्रतिभो ल्लिखितालङ्करएगाचरत्वेनैव सहदयहृदयाह्वादमादवाति। तथा च दुःसहसमरसमयसमुचितशौर्याति रायश्लाघयाप्रस्तुतनरनाथ- *विपये वल्लभलाभरभसोल्लसित सुरसुन्दरीस मूददसंगृह्यमाएमन्दारादिक्कुसुमदाम- सहस्त्रसम्भावनानुमानात् नन्दनोद्यानपादपप्रसूनसमृद्विप्रध्वसभा वसििद्वि: समु- सप्रेच्िता। यस्मात्प्रेक्षाविपयं वस्तु कवयस्तविचेति तदेवेति वा द्विविधमुपनि वध्नन्तीत्येतत तल्लक्षणावसर एव विचारयिष्यामः। तदेवमियमुम्मेक्षा पूर्वार्द्धविहिता अप्रस्तुतप्रशंसोपनिवन्ववन्धुरा प्रफृत- पार्थिवप्रतापातिशयपरिपोषप्रवणतया सुतरां समुद्धासमाना तद्विदावर्जनं जनयति।

स्थापित नहीं की जा सकती है। इसलिए चतुर कवि की प्रतिभा ते निवद् अलद्धार का विषय होफर ही सहृदयो के हृदय के लिए श्रानन्द वो उत्पन्न करती है। जसे फि [इस श्लोक में] धनघोर युद्ध के समय उचित परानम के अपतिशाय की प्रशसा द्वारा प्रफृत [अलभाभिघाननुपती] प्रज्ञातनामा राजा के विषय में, [अर्लौफिक] प्रिय की प्राप्ति के उत्साह से युक्त देवाङ्गनाघो के समूह के हारा इकट्ठे किए जाते हुए मन्दार आादि [नन्दन कानन के वृक्षो के] फूलो की [बनी हुई] सहलो मालाश्रो की सम्भावना के अनुमान से नन्दन वन के वृक्षो के पुप्पो के प्रमाव की सिद्धि की उत्प्रेक्षा की गई है। पयोकि उत्परेक्षा की विषयभूत [प्र्ात् जिसकी उत्प्रेक्षा करते हं उस ] वस्तु फो [उपमितं व्याघ्रादिभि सामान्याप्रयोगे अप्डाध्यायी २, १,५६ इस सूत्र से] 'तदिव' उसके समान [इस विग्रह में उपमित समास करके] गथवा [मयूरव्यंसकादयश्च भ्प्टाध्यायी २, १, ७२ इस सूत्र मे समास करके] 'तदेव' वह ही [यह उसे समान है सथवा वह ही है] इन प्रकार दो रपो में वंन ररते हं। यह बात जन [ 'तदिव' विग्रह में उपमा और 'तदेव' इम विग्रह में होने वाले एपफ अलद्धार ] के लक्षण के अ्रवमर पर ही [ विशेष रप से] विचार कारेंगे। [और सामान्य रूप से इसका विचार इनके पूर्व भी पृ० २१२ पर पर चुडे है]। इस प्रकार (श्लोक के] पूर्वाद् में की गई यह उत्प्रेक्षा, प्रप्तु प्रदामा के सम्वन्ध से और नी मनोहर रूप में प्रकुत [व्ण्पमान] गजा के प्रसाप के प्निशय का परिपोपरा वरती हुई और अ्त्यन्त मुन्दर रप से स्वन प्रराशित होनी हुर्ष महदयो के हृदयों को आ्ररफषित करती हैं।

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३१२ ] वफोपितजी चितम् [फारिका २

ग्रन्थकार ने म दलोक में श्रपप्रन्नुतप्रणगा मे परिवोषिन उत्प्रेक्षा अनद्वार गाना है। शप्रस्तुतप्रशगा का लक्षणा भागत ने निम्न प्रवार रिया ते- प्रधिकारादपेतम्य वन्तुनोऽन्यम्य या नुनि। अप्रम्तुतप्रशमेति मा चंन कथ्यने यथा ।३, २६।, पीसितप्रणायि स्वादु वाले परिमान नह। विना पुरुषकारे फन पप्यत नागिनाम 12, 20॥ उत्प्रेक्षा का लक्षण तथा उदाहरणा भामह के अव्याल द्वार में उम प्रकार दिए गए हं- अविवक्षितसामान्य किन्चिच्चोपमया गह।

विशुकव्यपदेशेन तरमागह सर्वत। दग्वादग्वमरण्यान्या पव्यतीव विभावसु ॥।२ ६२। दूसरे लोग इस श्लोक में अतिगयोवित अलद्वार मानते है। प्र्तिमयोत्नि का लक्षण तथा उदाहरण भामह के काव्यालद्वार में इस प्रकार दिए गए ह- निमित्ततो वचो यत्तु लोकातिक्रान्तगोचरम्। मन्यन्तेऽतिशयोविति तामलङ्कारतया यथा ॥२, ८१॥ स्वपुष्पच्छविहारिण्या चन्द्रभासा तिरोहिता । अन्वमीयन्त भृङ्गालिवाचा सप्तच्छदद्रुमा ॥२, ८२।। अपने मत का अरतिशयोवितिवादी मत के साथ समन्वय करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि जैसा कि भामहकृत उत्प्रेक्षा के लक्षण, 'उत्प्रेक्षातिमान्विता' मे प्रतीत होता हे, उत्प्रेक्षालद्दार का मूल भी अतिशयोवित होती है। और अतिशयोकिति के अपने लक्षण मे अ्रप्रतिशयोवित ही होती है। इसीलिए उसको 'अतिशायोवित' नाम से कहा जाता है। और न केवल उत्प्रेक्षा मे ही अपितु अ्न्य सव अलद्धारो में भी अ्प्रतिशयोक्ति ही मूल होती है। इसीलिए भामह ने अ्रतिशयोकिति के निरुपण में ही भागे कहा है कि- संपा सर्वत्र वक्रोक्तिरनयार्ऽर्यो विभाव्यते। यत्नोऽस्या कविना कार्य कोऽलड्कारोऽनया विना ॥२,८५॥ अर्थात् सभी अलद्धारो में मूल रूप से अ्प्रतिशयोवित विद्यमान रहती है उसके बिना कोई अलद्धार नही हो सकता है। इसलिए जहाँ हम उत्प्रेक्षा अलद्कार कह रहे है उसमे यदि दूसरे लोग पतिशयोकिति अलद्गार मानते है तो उनका हमारे मत से कोई विरोध नही होता है। क्योकि अतिशयत्व जो अतिशयोक्ति अलद्धार का मूल है वही अन्य सब अलद्दारो का पोपक है। यही बात आगे कहते है-

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कारिका २] तृतीयोन्मेष [ ३१३

सातिशयत्व- उत्रेक्षातिशयान्विता ।।१४।। इत्यस्या - स्वलक्तणानुप्रवेश इति। अरप्रतिशयोक्तेश्च- कोऽलद्वारोऽनया विना॥१४॥ इति सकलालद्वुरणानुग्राह्कत्वम। तस्मात् पृथगतिशयोक्तिरेवेयं मुख्य- तयेत्युच्यमानेऽपि न किञिचिदतिरिच्यते। चात्यन्तमसम्भाव्यममुपनिवष्यमानमनयैव युक्त्या समञ्जसता गाहते न पुनः स्वातन्त्र्येण। यद्वा कारणतो लोकाति- क्रान्तगोचरत्वेन वचस सैवेयमित्वस्तु। तथापि प्रस्तुतातिशयविधानव्यतिरेकेस न किब्चिदपूर्वमत्रास्ति ।।२।।

[अतिशयोषित का मूलभूत] सातिशयत्व [धर्म सकल पलद्धारो का अ्रनुग्राहक है। जंसे कि]- 'उत्प्रेक्षातिशयान्विता' [इस लक्षण के अनुसार अ्रतिशय] इस [उत्प्रेक्षा] का [भ्रनुग्राहरु है ]। और [अ्ररतिशयोपित के ] अनपने लक्षण में [अ्तिशय का] श्रनुप्रवेश होने से [प्रतिशय] प्रतिशयोषिति का भी [अ्रनुषहक] हैं। [इसके अरतिरिक्त भामह के] 'कोडलङ्धारोऽनया बिना' इस कथन के अनुसार [पतिशयोपिति का मूलभूत प्रतिशय ही श्र्न्य] सब अ्रलद्धारो का [ भी] धनुग्राहफ हैं। इसलिए यहाँ [इस इ्लोक में] मुरयतया अ््रतिशयोपित अ्रलङ्गार ही अलग हैं, ऐसा मानने पर भी [हमारे उत्प्रेक्षावादी सिद्धान्त से] कोई भेद नहीं होता हैं। कवि प्रतिभा से उत्प्रक्षित अत्यन्त असम्भव अ््रयों का वरणन भी इसी युषित से[ कि तय प्रलद्धारो का मूलभूत अ्र्प्रतिशयोषित ही होती हैं। इसलिए वही उत्प्रेक्षा का भी मूल है। इसलिए अ्त्यन्त असम्भव रप से उत्प्रेक्षित अयं की पल्पना में वस्तुत प्रतिशयोवित से ही काम लिया जाता है] सनगत हो सफता है। स्वतन्त्र रूप से [सभ्गत]नहीं[ हो मरता है]। पवा 'कारण देकर धलौरिकि [लोफ में न पाए जाने वाले]पदार्थ का वर्णन किया जाता है वह पतिशायोषित होनी हैं[ यह जो श्रतिरायोषिति का लक्षसा भामह ने किया है उनके अनुमार यहाँ अरथान 'म्त भो' इन्यादि द्लोक में फेवल] वह [घतिशयोविति] ह।माननी चाहिए [ भप्रन्तुतप्रगसा ये परिपुष्ठ उत्प्रेक्षा नहीं]। फिर भी प्रस्तुत [वर्ण्यमान राजा] के अतिशय सम्पादन फरने के प्रतिरिक्त [पतिशायोनिति मलद्वार मानने में भी] यहा धर वुछ विशेषता नहीं है॥२।।

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३१४ ] वक्रोपितजीवितम् [फारिफा ३-४

तदेवमभिधानम्य पर्व, प्रभिधेयम्य चेह वकनाममिवायदानी वाक्यस्य वक्रत्वमभिधातुमुपक्रमते-

अन्यद्वाक्यस्य वक्रत्वं तथाभिहितिजीविनम् ॥३॥। मनोज़फल कोल्लेखवर्सच्छा याश्रिय: पृथक। चित्रस्येव मनोहारि कतेः किमपि कौशलम् ॥४॥ 'अन्यद्वाक्यम्य वक्रव'-वाक्यम्य परम्परान्वितवृन्त पदममुदायास्यान्य- दपूर्व व्यतिररिक्तमेव वक्रत्व वक्रभाव। भवतीति सम्बन्ब कियापदान्तरा- भावात्। कुत -'मार्गस्थवक्रशब्ार्वगुणालढ्ारसम्प। मार्गा सुक्मारादय, तत्रस्था केचिदेव वक्रा. प्रसिद्वव्यवहारव्यतिर किरों ये शच्दार्यगुसालद्वारा-

इस प्रकार पहले [द्वितीय उत्मेष में] चाचक [शन्द] फी, औ्रर यहां [तृतीय उन्मेष की १, २ कारिकाओो में] वाच्य श्र्प्र्थ को 'वमोवित' का प्रतिपादन करफे अ्रव [अगली फारिकाओ में शब्द और श्ररथं के समुदाय रूप] वाक्य की वश्ता का वांन करना आरम्भ करते हैं- [सुकुमार विचित्र और्रौर मध्यम] मार्गों में स्थित शब्द, भ्रर्थं, गुण तथा अलङ्गारो के सौन्दर्य से भिन्न उस प्रकार [फो विशेष शैली] से फथन फरना हो जिसका प्राए हैं इस प्रकार की 'वाक्यवप्रता' भलग ही होती है ॥३॥ सुन्दर आाघारभित्ि पर प्रद्धित चित्र के रगो के सौन्दय से भिन्न चित्रकार को, मन को हरस करने वाती अनिर्वचनीय निपुणता के समान [मार्गस्थ वक् शब्द, गुए अलद्धार शादि से भिन्न, काव्य के] निर्माता का कुछ और अरपरनिवंचनीय कौशल वाक्यवक्रता है॥४।। वाकय की वक्रता अलग ही है। वाक्य अर्थात् परस्पर अन्वित वृत्ति वाले पद समुदाय की [वकता] अन्य अ्रप्र्रात् अ्रप्रपूर्व [और शव्दादि की वकता से] भ्नलग ही हैं। [कारिका में] अन्य कोई क्रिया [श्रुत] न होने से [अध्याहार की हुई] 'भवति' 'होता है' इस [ क्रिया ] के साथ सम्बन्ध है [ यह समझाना चाहिए ]। किस से [भिन्न 'वाक्य-वत्रता' होती है कि-] मार्गों में स्थित सुन्वर शब्द, अर्थ गुए तथा अलद्धारों के सौन्दर्य से अरलग। मार्ग [का अथं प्रयमोन्मेष में कहे हुए] सुकषुमार आदि [मार्ग] है। उनमें स्थित जो कोई [ विरले ] ही [ सब नहीं ] वक्र [सुन्वर अर्थात्] प्रचालत [नित्य प्रति के सर्वंसाधारण के] व्यवहार में आने वाले से भिन्न

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कारिका ४] तृतीयोन्मेष [३१५

स्तेपां सम्पत् काप्युपशोभा तत्ा. प्रथग्भूत किमपि वक्रत्वान्तरमेव। कीहशम्-'तथामिहितिजीवितम्'। तथा तेन प्रकारेण केनाप्यव्यपदेश्येन ३यामिहिति. काप्यपूवैवाभिधा, सैव जीवितं सर्वस्व यस्य तत्तयोक्तम । किं स्वरूपमित्याह-'कर्तुः किमपि कौशलम्। कर्तु. निर्मातृ किमप्यलौकिक यत् कौशल नैपुएयं तवेच वाक्यस्त वक्रतवमित्यर्थः। कथञच तट्-'चिन्नस्येव'। श्रालेख्यस्य यथा। 'मनोहारि' हृन्यरञ्जकं ग्रकृतोपकरएव्यतिरेकि क्तुरेव कौशलम्। 'किमपि' पृथग्भूत व्यतिरिक्तम्। कुत इत्याह-'मनोज्फलकोल्लेख- वर्रच्छायाश्रिय.'। मनोज्ञा काश्चिदेव हृदयहारिएयो या फलकोन्लेखवर्र- च्छायास्तासां श्रीरूपशोभा तस्याः । पृथनपं किमनि तत्त्वान्तरमेवेत्यर्थ.। फलकमाल्लेख्याधारभूता भित्तिः। उल्लेखश्चित्रसृत्रप्रमाणोपपन्न रेखा- विन्यसनमात्रम्। चर्णा रञ्जकद्रव्यविशेपा । छाया कान्ति। जो शब्द, अर्थ, गुए और अलद्धार, उनकी जो कुछ अपू्व शोभा उमते, पृयक् भूत कुछ अन्य ही वकता [वाक्यदत्रता होती हैं]। कँसी [वह वघना होती है कि-] उस प्रकार [उस वाक्य में कही हुई 1 शंली] से वर्सन फरना ही जिसका जीवन स्वस्प है। 'तथा' अर्ा्त् भ्रन्व किसी प्रकार से जो न कहा जा सके उस [ विशेष ] प्रकार का कथन ही अर्ा्त् कुछ अ्रपूर्व शैली का वर्णन वह हो जिसका जीवन है वह [उस प्रकार की तथानिहित- जीचितन् ] हुई। किस प्रकार फा [वह वाश्यवनन्व होता है कि-] 'फर्ता के अपूर्व कौशात रप'। फर्ता प्रर्थात [उस इलोफ वावय के ] निर्माता का जो कोई प्रपूर्व फौशल है वह ही वाक्य का चप्रन्व है, यह अनिप्राय हुआ। किसी प्रकार मे चित्र अ्र्यात् आलेरय कासा मनोहर अर्थात् हृदय को घानन्द देने वाला। प्रकृत [ चित्र के ] साधनों से निन्न चित्रकार का कुछ प्रपूर्य कौशल जैसे [उन चित्र के धन्य साधनों से] सलग पृथक् रूप से [बिन्र का नोन्दर्वाधायक जीवन रूप होता है इसी प्रकार इलोक वाक्य मे भी उनके निर्माता कवि का फौदाल ही वाक्य की वपना का जीवना- घायक होता है]। किसने [शलग नि-] सुन्दर आ्रघारनिति पर प्रद्धित रगो के > सौन्दर्य से [भिन्न], मनोहर सर्वान सुन्दर जो विरली रगो की सुन्दरता उनकी जो शोभा उनने जो पृथस्भूत कुछ और ही घ्रपूवं तत्व [होता है जो वाक्यवश्ना नाम से यहा जा सबता है। इम कारिका में प्रयुश्न हुए निशेष शब्दों का प्रय भ्रागे देते हं] फ्नर [शद्द का सर्य] चित्र की आाघाननिति हु। उल्लेस [शव्द का अप चित्र ही नाप के अनुसार घद्ित रेसानो की रचना [रेसाचित्र] मात्र है। व्प [शद का प्रय) रगने वाले दव्य विशेष हैं। हाया [शद्द का पथं] कान्ति है।

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३१६ ] वघोपितिजीवितम ।फरिका ४

तहिदमत्र तात्पर्थम्-यथा चित्रस्य कमिपि फ्लकामनकरगाकलापव्यति- रेकि सकल प्रकृतपदार्थजीवितायमानं चित्रकार कोशल परथरक्वेन सुग्यनयोहासते, तथैव वाक्यस्य मार्गादिप्रकृतपदार्थसार्थव्यतिरेकि कतिकोशललत्तम किमपि सहदयसवेद्यं मकल प्रस्तुतपदार्थम्फुरितभृत वक्रन्पमुज्ज़न्भने। तथा च-भावस्वमायसौ कुमार्यवान शृद्ारादिग्सन्वरपसमुन्मीलने

कारिताया कारगाम्। पढवा्क्यकदेशवृत्तिर्वाय करिचिह् वक्नाप्रकारस्तस्य कविकौशलमेव निवन्धनतया व्यवतिष्ठिते। यम्मादाकन्पमेवपा तावन्मात्र- स्वरपनियतनिष्ठतया व्यवस्थिताना स्वभावालकरसकनाप्रकाराखा नव- नवोल्लेखविलक्षणा चेतनचमत्कारकारि किमपि स्वरूपान्तरमेतन्माठेव समु- ज्जम्भते। तेनेदमभिधीयते-

इस सबका यहां यह अभिप्राय हुआ कि चिन के फलक आदि समस्त साधन समूह से अलग और प्रकृत [चित्र में प्रदशित] समस्त गदार्थो का जीवन स्वर्प मुर्य रूप से चित्रकार का कौशल ही जैसे अलग प्रतीत होता है इसी प्रकार [सुकमार विचित्र औौर मध्यम] मार्ग आदि समस्त पदार्थों के समूह से भिन्न, [फाव्य में वलिगत] समस्त प्रस्तुत पदार्थो का प्राणस्वरूप सहृदयसवेद्य कवि कौशल रूप [वाक्म का] कुछ भ्रपूर्च वतरतत्व अ्रलग ही प्रतीत होता हैं। इसलिए पदार्थो के स्वाभाविक सौकुमार्य के वर्णन में श्रथवा शरृद्धार भ्रावि रसो के वर्णन में और नाना प्रकार के अलद्धारो के चमत्कार को उत्पन्न करने में [वाक्यवकरता का]अत्यन्त परिपोष सहुदयों के हृदय के श्राह्लाद का फारए होता है। और पद श्रथवा वाक्य के एक वेश में रहने वाला जो कोई वकता का प्रकार है उस [ सब] का [ भी] कवि का कौशल ही कारण रूप से निश्चित होता है। क्योंकि केवल अपने [ सत्तामात्र ] स्वरूप से सवा [ एक रस ] रहने वाल, स्वभाव, अलद्कार आादि रूप वकता के प्रकारो का नए-नए रूप से वर्णन के कारए विलक्षण [अपूर्व ] और सहृदयो का चमत्कारकारी कुछ अलौकिक [सुन्दर ] स्वरूप भी इसी [फवि कौशल] से उत्पन्न होता है। इसलिए यह कहा है कि-

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कारिका ४ ] तृतीयोन्मेष [३१७

आसंसारं कड़पुं गवेहि पडिदिश्रहगहित्रसारो वि। अज्रवि अ्रभिन्नमुहो व्व जन्ररड वाश् परिष्फंदो ॥१६।। [आ्र््राससार कविपृङ्गवैः प्रतिदिवसगृहीतसारोऽपि। श्रद्याप्यभिन्नमुद्र इव जयति वाचा परिस्पन्दः ॥इतिच्छाया]' श्रत्र सर्गारम्भात् प्रभृति कविप्रधानै. प्रातिस्विकप्रतिभापरिस्पन्दमाहा- त्म्यात् प्रतिदिवसगृहीतसर्वस्वोऽ्यद्यापि नवनवप्रतिभासानन्त्यविजम्भणदनु- द्धाटितप्राय डव यो वाक्यपरिस्पन्द् स जयति सर्वोत्कर्पेण वर्तते। इत्येवमस्मिन् सुसङ्गतेऽपि वाक्यार्थे कविकीशलस्य विलसित किमप्यलीकिकमेव परिस्फुरति। यस्मात् स्वाभिमानव्वनिप्राधान्येन तेनैतवभिहित वथा-आससार कवि- पुद्गवैः प्रतिदिवसगृह्दीतसारोऽयद्याप्यभिन्नमुद्र इवायम्'। एवमपरिज्ञाततत्व- तया न केनचित किमप्येतस्माद् गृह्ीतमिति मत्प्रतिभोद्वाटित परमार्थस्येदानीमेव

सृष्टि के आरम्भ से उत्तम कवियो द्वारा प्रतिदिन सार का ग्रहण करने पर भी वाशी के सौन्दर्य की अभी तक मुहर भी नहीं टूटी है [प्राज तक भी पूर्ण रूप से खुला हुआ प्रतीत नहीं होता है] ॥१६॥

यहाँ [इस इ्लोक में] सृष्टि के प्र््रारम्भ से महाकवियों के द्वारा अपनी-प्रपनी व्यक्तिगत प्रतिभा की पहुँच के अनुसार प्रतिदिन [सर्वस्व] मारतत्व फे लिए जाने पर भी आ्राज भी श्रनन्त नई-नई कल्पनाओ के स्फुरण के कारए जो प्रभी वन्द-सा पड़ा है इस प्रकार का जो वाणणी का सौदर्य वह 'जयति' अर्थात् सर्वोत्कर्ष से युक्त है। इस प्रकार इस वाष्यार्थ के सुसङ्त हो जाने पर भी कवि के कौशल का कुछ झलौ- किक हो सौन्दर्ग प्रतीत होता है। क्योंकि [इस इनोक के रचयिता ने] अ्ररपने भनिमान को प्रधान रप मे ध्वनित करते हुए [इम इलोक में ] यह कहा हैं कि सुपिटि के आ्रम्भ से प्रतिदिन महाकवियों के द्वारा साग्तत्व का अ्रपहरण किए जाते रहने पर भी भ्राज नी [वाली के कोष] की मुद्रा भी नहीं मुली-सी जान पडनी है। इसलिए [वस्तुत] तत्त्व [सार] का ज्ञान न होने मे प्र्ाज तक मनी [महाकवि] ने भी इस [चाो ये फोप) में से दृछ नो [सार] नहीं ले पाया है। [सनी की उक्तियाँ सारहीन है] अ्रब मेचल मेरी प्रतिभा से ही यचार्यं तत्त्व का पना चला है।

१ राजदोसस्कृत वाव्यमोमाना से पृषठ ४२ पर यह पद्म सम्कूत साया रुप में उद़न है।

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३१८ ] वक्ोपिनजीचित म् [ पारिफिा ४

जयतीति सम्वन्ध । यदयपि रसस्वभावालव्वारासा सर्वपा कविकोशलमे जीविनम नय- ्यलद्वारस्य विशेपनम्तटनुप्रत विना वर्णानानिषयवन्तुनो भृपगभि गविवेना- भिमतस्य स्वरूपमात्रेण परिरफुरतो यवार्यत्वेन निवनयमानस्य नवदादाविवाना

सामान्येन प्रतिभासनान। ग्रथा- दूर्वाकाएडमिव श्मामा तन्वी श्यामा लता गया ।।?७।। डत्यत्र।

इसलिए अब उसकी महर [सील] टूटेगी इस प्रकार अपने लोकोत्तर व्यापार को सफलता [के सूचन] से, वारी का सौन्दर्य [व्यापार] सर्वात्वयं से सुपन होता है यह ['जयति' किया के साथ] सम्बन्ध है। यद्यपि रस, स्वभाव तथा प्रलद्धार सब [के सौन्दन] का कवि का कौशल हो प्रासभूत होता है फिर भी विशेष रूप से प्रलद्धार का, उस [फविकोशल] के अ्रनुग्रह [साहाय्य] के बिना [नाम मात्र को भी वचित्य नहीं हो सकता है इस अरगले वापय से सम्बन्ध हैं। वीच में कहे हुए सच पष्ठ्यन्त पद 'अलद्धारस्य' के विशेषण है] वर्णन के विषयभूत पदार्थ के आ्भूपण [श्नलद्धार] कहलाने योग्य किन्तु [ अलद्ारत्वोपयोगि सौन्दर्य से रहित ] पेवल स्वत्पमान से प्रतीत होने वाले और वास्तविक रूप में निवद्ध किए गए [स्पक आदि सलद्धार ] में सहदयह्दया- ह्लादकत्व के अनुपपन्न होने से [ कवि मौशल के बिना अनुभव के] प्रवाह में आए हुए अन्य सैकडो पदार्थो के समान ही [ उन रूपक, सादृश्य आ्रादि की ] प्रतीत होने से नाममात्र को भी वैचित्र्य नहीं हो सकता है। [उनमें किसी का श्नन्य के प्रति शोभा जनकत्व प्रतीत नहीं हो सकता है ]। जंसे- दूब [घास]के समान श्याम वर्सगा [अथवा बोडशवर्पदेशीया] सुन्दरी [श्यामा] प्रियङ्भ लता जैसी लगती है ॥१७॥ इसमें [कवि कौशल के प्रभाव के कारण फेवल सादृश्य मात्र से किसी प्रकार का सहदयहृदयाह्नाव घमत्कार प्रतीत नहीं होता हं]।

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कारिका ४ ] तृतीयोन्मेप. [३१६

नूत नोल्लेखमनोहारिए. पुनरेतस्य लोकोत्तरविन्यसनविच्छित्ति- विशेपित शोभातिशयस्य किमपि तद्विदाह्वादकारित्वमुद्गिद्ते। यथा- अस्या: सर्गविधौ। इति ।१८।।' यथा वा- कि तारुएयतरो: । इति ॥१६॥' तदेव पृथग्भावेनापि भवतोऽस्य कविकौशलावत्तवृत्तित्वलक्षणवाक्य- क्रतान्तर्भाव एव युक्तियुक्ततामवगाहते। तदिदमुक्तम्- वाक्यस्य वक्रभावोऽन्यो भिद्यते यः सहस्त्रधा। यत्राल ङ्वारवर्गोऽसी सर्वोऽप्यन्तर्भविध्यति ॥।२०/। और[ कवि की प्रतिभा के योग से इसी प्रकार के दूसरे उदाहरणो में ] नई फल्पना से मनोहर इसी [प्रकार के उदाहरणो] का लोकोत्तर रचना-शाली से विशिष्ट शोभातिशय कुछ अ्र्प्पूर्वं सहृदयहृदया ह्वादक-सा प्रतीत होने लगता है[ खिल उठता है]। जसे- [उदा० ३, १२ पर पीछे उद्धृत किए हुए ]'भ्रस्या नर्गविधी' इममे ॥१८॥ औ्रर जमे- [उदा० १, ६२ पर उदृत किए हुए]'कि तारुप्यतरो' इस [श्लोक]मैं ॥१६॥ [फवि कौशल के योग से ही शलद्धारो का चमत्कार प्रतीत होता है]। इस प्रकार इस [अलङ्धारवयता] के पृथक रप से सम्भव होने पर भी कवि कोशल के आधीन होने से वाययवप्ता के भीतर ही उसका त्रन्तर्भाव युवतयुक्त प्रतीत होता हैं। यह वात। पहिले प्रयमोन्मेप की २०वीं फारिका में] यह चुके हे कि- वाक्य की वकता [पदादि फी वघना से] ध्रन्य है जो सहम्रों भेदों में विभक्त हो मक्ती है। औौर जिसमे यह। प्रमिद्ध ] मारा प्रतद्कार समुदाय भ्रन्तर्गत हो जायगा ॥२०॥ सभी प० ३१८ पर 'वद्यपि 'रन-स्वभाव-तलव्वाराणा सर्वेपा कविकोगल मेव जीवितम्' लिसनर कुन्तक ने ववि कौमल को ही इन सबका कारख बतलाया है। इन मे अलकारो का उदाहरण ऊपर दे बुके है। हेप सवनाव तथा रन के उदाहरर भागे देते है। १. तृतीयोन्नेप उदाहरणा १२। २. प्रथमोन्मेद इदाहरण ६?। : प्रथमोन्मेप कारिका २०।

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३२० ] वक्रोपितिजोवितम [ पारिका ४

भावादाहरणा यथा- तेपां गोपववृविलाससुहदा गधारह मानिया क्षेम भद्ट कलिन्दशलननयानीरे लतावेरसनाम। विच्छिन्ने स्मरततपरु पनमृदु ्न्ेदापयोगेजघुना ते मन्ये जरटीमवन्नि निगलन्नीललिप पल्लना ।।२१।। शरत्र यद्यपि स्वष्यमे्ा व्तुस् ावगत्मेव वित, तथाप्यनुत्तानतया व्यवस्थितस्वाम्य विरलवव्वतने गोच किमपि नननो- ल्लेखमनोहारि पदार्यान्तरलानवृत्ति सृत्मसुभग तानक न्वम्पमुन्मीलित येन वाक्यवक्रनात्मन रुविकाशलम्ण काचिदेन काठाबिरटिरपपणने। वन्मात

रसादाहरणा यथा- लोको याहशमाह साहमधनं न अतनियापुन स्यात् सत्येन स तादृगेव न भवेहाना विसवािनी।

स्वभाव [चकता] का उदाहरण जैसे- हे भद्र [उद्धव] गोपवधुप्नो के / भोग। विलान के सतता, राधा की एकान्त क्रीडाओ के साक्षी, यमुना तट के लताकुञ्ज तो कुशल से हं। प्रथवा भ्रत तो [कप्ण के वहां से चले आने के फारण] मदन शय्या के निर्माण के निए कोमल पतो के तोडे जाने की आ्रवश्यकता न रहने के कारए, मे समभता हूँ कि अपनी नीली कान्ति को फैलाते हुष वह वे पल्लव [पुराने] रूढे हो जाते होंगे ॥२१। यहाँ [ इस श्लोक में ] यद्यपि वस्तु में सम्भव होने वाले सहृदय नवेद्य स्वभाव मात्र का वर्णन किया है फिर भी उसको [ सीधी तरह से न फहकर ] चनभाव से कहने से विरले [ विदग्ध] सहृदयो के प्रनुभव गोचर, पदार्थ में छिपा हुआ, नवीन कल्पन से मनोहर, सूक्ष्म और सुन्दर कुछ ऐमा स्वरूप उन्मीलित होता है जिससे वाक्यवक्रता रूप कवि के कौशल को अपूर्व चरम सौन्दर्य की प्राप्ति होती हैं। क्योंकि उस [कचि कौशल] के बिना कोई चमत्कार [इसमें] प्रतीत नहीं होता हैँ। [कवि कौशल निमित्तक] रस [के सौन्दर्य] का उदाहरण जसे- उस साहसी [मुझ से युद्ध करने का साहस करने वाले] क्षत्रिया के बच्चे- [यहां तुच्छता सूचन के लिए ही 'क्षत्रिया' शब्द का और पुत्रक पद मे 'क' प्रत्यय का प्रयोग किया गया है ।] को लोग जैसा [शरवीर] कहते हे वह सचमुच वंसा ही [भले ही] हो [और उसके विषय में कही जाने वाली प्रशसा की] बात सत्य ही १ ध्वन्यालोक पृ० १२६ पर उद्धृत ।

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फारिफा ४ ] तृतीयोन्मेप: [ ३२१

एका कामपि कालविप्रुपममी शौर्योप्मकराडव्यय- व्यग्रा: स्युश्चिरविस्मृतामरचमूडिम्बाहवा चाहबः ॥।२२॥' 2 अत्रोत्साहाभिधान स्थायिभावः समुचितालम्वनचिभावलक्षणविपय- सौन्टर्यातिशयश्लाघाश्रद्धालुतया विजिगीपोर्वेदगध्यमङ्गीभितिवैचित्येण परां परिपोपपठवीमधिरोपित. सन् रसतामानीयमानः किमपि वाक्यवक्रस्वभावं कविकौशलमावेद्यति। अ्रन्येपा पूर्वप्रकरगोठाहरणानां प्रत्येक तथाभिहिति- जीवितलक्षणं वक्रत्व स्वयमेव सहन्यैविचारणीयम्। वकनायाः प्रकाराणामौचित्यगुएशालिनाम्। एतदुत्तेजनायालं स्वस्पन्दमहतामपि ।।२३। हो सही। [किन्तु] बहुत दिनो से देवताओ् की मेना के मैनिकों के साथ युद्ध करना भी [देवताओं के पराजय मान लेने से । जिनको विन्मृत हो गया है ऐसे मेरे बाहु थोडी देर के लिए [ कामपि कालविभ्रुष ] पराक्रम की गर्मी ने उत्पन्न खुजली को मिटाने के लिए व्याकुल हो रहे हैं ॥।२२।। यह श्लोक रामचन्द्र जी के पराक्रम आदि की प्रशंना सुनकर भी उनके साथ युद्ध करने की इच्छा रखने वाले रावस द्वाग कहा गया हैँ। यहां समुचित पालम्वन विभाव रूप विषय [श्थति रामचन्द्र] के सौन्दर्या- तिशय [यहाँ सौन्दर्यातिशय से पराकमातिशय अ्रभिपेत है क्योकि वीररस का सौन्दर्य पराष्मातिशय ही हो सकता है] की प्रशसा में [ विश्वासयुक्त] श्रद्धावान् होने से [रामचन्द्र जी के परारमातिशय का जो वसन रावस के सामने किया गया है उस पर विश्वास फरता हुआ हो वह फह रहा हं कि] विजय की इच्छा रखने वाले [रावस] की चतुरतापूर्ण करनशैली की विचित्रता मे उत्साह नामक [वीर रस का] स्थायी भाव प्रत्यन्त परिपोष पदवी को प्राप्त होकर आ्रत्वाद्यमानता अ्रयवा रसरपता [वीररसरूपता] को पहुँचकर वावयवन्ना रूप छुछ प्रपूर्व कवि कौशल को सूचित करता हं। पूर्व [पर्यात् वाच्यवकता फे ] प्रमरस के ध्न्य उदाहरणों की, उस रप में यन हो जिसका परारा हैं इम प्रकार की [वार्य] वनना का [इसी नरह से] सहदम [पाठक] स्वय विचार कर लें। [इन विषय को सक्षेप में मच्चुनित करने वाले दो सग्रह द्लोक निम्न प्रकार है]- यह [कविपौदल], अपने स्वाभानिक महत्व मे वुनन घ्रौर श्रोवित्यानी घनना के [समस्त] प्रकारों को भी उनेंजित [शौर भी अरिक मनोहर] करने में समयं ह ।।२३॥ १ प्रथमोत्मेप उदाहरण ४७।

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३२२ ] वपोपित जीवितम् [कारिका v,

रसस्वमावाल द्वारा शरर्ससारमपि स्थिता। शनेन नवता यान्ति तदिदाहाददायिनीम् ।।२४।। इत्यन्तरश्लो की ॥।४॥। एवमभिवानाभिधेयाभिवालनगाम्य काव्योयोगिनस्त्नितयम्य स्वरूप- मुल्लिख्य वर्णानीयस्य वम्तुनो विपयविभाग विवधाति-

चेतनानां जड़ानां च स्वरूपं द्विविधं स्मृतम् ।५।। 'भावाना' वर्गर्यमानवृत्तीना 'म्वस्प' परिम्पन्द । कीहशम्-'द्विविधम'। द्वे विधे प्रकारी यस्य नत्तवोक्तम। 'म्मृत', सृरिभिराम्नातम। केपा भावानाम्, 'चेतनाना जडाना च'। चेतनाना सविद्वता, प्रासिनामिति यावत। जडाना तद्व्यतिरेकिरण चंतन्यशून्यानाम्। तनेव च बभिरद्वविव्य वर्मदैविध्यम्य निवन्वनम्। कीहक म्वरुपम-'अपरिम्लानम्वभाचोचित्यसुन्दरम्' ।

सृष्टि के आदि से स्थित [अत्यन्त प्राचीन नूतनता रहित] रस, स्वभाव तया अलद्धार इस [कविकौशल] के द्वारा सहृदयो को श्राह्हाद देने वाली [भलोकिफ] भ्पूर्वता को प्राप्त हो जाते है ॥२४॥ ये दो अन्तरश्लोक है।४।। वस्तुवकता- इस प्रकार [यहां तक] वाचक [शब्द], वाच्य [श्रथं], और अ्र्रभिघा [चकता युक्त कथन शैली] काव्य के उपयोगी इन तीनो के स्वस्प का वर्णन करके श्रव वर्णनीय वस्तु का विषय विभाग करते हं- नवीन [अ्नरपरिम्लान ] स्वभाव तथा प्रचित्य से सुन्दर चेतन औ्र्प्रौर श्रचेतन पदार्थो का स्वरूप दो प्रकार का कहा गया हैं।।५।। भाव अर्थात वर्ण्यमान वृत्ति पदार्थो का स्वरूप अर्थात् स्वभाव। फँसा है कि-दो प्रकार का। दो विधा अर्थात् प्रकार जिसके है वह उस प्रकार का [द्वि- विघम्] है। 'स्मृतम्' [शब्द का प्रर्थ] विद्वानों ने बार बार कहा है। किन पदार्थों का कि-चेतन और जड पदार्थो का। चेतनो का धर्थात् ज्ञान युपत का अर्थात् प्रालियों का। जडो अर्थात् उनसे भिन्न चंतन्य रहितो का। यह ही धर्मियो का द्वैविध्य धर्मों के दवूँविध्य का कारण होता है। किस प्रकार का, नदीन सन्दर स्वभाव के

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कारिका ६] तृतीयोन्मेष [३२३

अर्प्रपरिम्लान. प्रत्यग्र. परिपोपपेशलो य स्वभाव पारमार्थिको धमस्तस्व यदौ- चित्यमुचितभाव. प्रस्तावोपयोग्यदोषदुष्टत्व तेन सुन्दर सुकुनार, तद्विदाह्ादक- मित्यर्थ.॥५॥ एतडेच द्वैविध्यं विभज्य विचारयति- तन्न पूर्व प्रकाराभ्यां द्वाभ्यामेव विभिद्यते। सुरादिसिंह प्रभृतिप्राधान्येतरयोगतः ।।६।l तत्र द्वयो: स्वरूपयोर्मध्यात् 'पूर्व' चत्रथम चेतनपढार्थसम्बन्धि तद् राश्यन्तराभावात् द्वाम्यामेव प्रकाराभ्या विभिद्यते भेमासाद्यति, द्विविधमेव सम्पद्यते। कस्मात्-'सुराठिसिहप्रभृतिप्राधान्येतरयोगत। सुरादि त्रिदश- प्रभृतयो ये चेतना: सुरासुरसिद्धविद्याधरगन्र्वप्रभृतय, ये चान्ये सिंहप्रभृतयः केसरिप्रमुन्वास्तेपां यत्प्राधान्य मुख्यत्वमितरदप्राधान्य च, ताभ्या यथासख्येन

. श्रीचित्य से मनोहर । अपरिम्लान अरर्थात् नवीन परिपोष से सुन्दर जो स्वभाव अरर्ात् वस्तु का वास्तविक धर्म उसका जो त्रौचित्य पपर्र्थात् उचित भाव, अ्रर्थात् प्रक- रए के उपयोगी दोपरहित स्वरप, उसते सुन्दर मुकुमार प्रथात् सहदयाह्लादक [जो पदार्यों फा स्वरूप वह दो प्रकार का होता है] यह श्रभिप्राय हुआ।५॥। उन्हों दो भेदों का अलग-धलग करके विचार करते है- उन [ चेतन तथा अ्रचेतन पदा्यों ] में से पहिले [ चेतन पदार्चो अ्रर्ात् ] देवता आदि [ उच्च योनियो] से लेकर सिंह आदि [ तिर्यक् योनि ] तक [चेतन प्रासियो स्वरप] के प्रधान तथा [इतर गौए] ग्रप्रधान रूप से दो प्रकार के ही भेद होते हैं ॥६॥। उन [चेतन ता अचेतन] दोनों स्वरपों में मे जो पहिला चेतन पदार्य सम्बन्धी [स्वरप है] वह, अन्य कोई [तीसरा] प्रकार न होने से, दो ही प्रकारो ने विभक्त होता है अर्यात् [दो ही] भेदो को प्राप्त होता है। दो ही प्रतार का होता है। कसे-देवताघ्रो [ देग्योनियो ] से लेफर सिंह छादि [नियक योनियो] पर्यन्त [समस्त चेतनों में] प्राघान्य औौर [इतर] प्रपाधान्य [नौएत्व] के योग से। सुरादि भर्थात् देवता आदि जो चेतन सर्वात् सुर, धनुर, निद्ध, विद्याघर गन्नवं श्रादि, और [उनते भिन्न] जो सिंह आदि धर्वान और शदि उनना जो प्राघान्य अर्यान् मुरयत्य औौर सप्राधान्य उन दोनो [नेदों] से वयानाय प्रनयेय या जो योग अर्यान सम्बन्य इसके फान्सा से । पर्यात् देवादि में चेतन-पम वुद्धि आादि या नग्य र्व मे मम्बन्य है

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३२४ ] वकोपिनजोवितम [पारिषा ७

प्रत्येक यो योग सम्यन्धस्तम्मान हरगान ॥६।। तटेव सुरादीना मुग्यचेननाना न्वरुपमेक कवीना वर्गोनां्पवम्ह सिहादीनाममुख्यचंतनाना पशुमृगपतिसरीसपारा व्वन्प दवितीयमिन्येतवेव चिशेपेगोन्मीलयति-

मुख्य चत्प्रधान चतनसुरासुराहिसम्बन्धि स्म्प तेवविव सन्कवीना वर्णनास्पद भवति स्वव्यापारगोचरता प्रतिपद्यते। कीटगम-'पक्लिष्ठरत्वादि- परिपोपमनोहरम'। पपरक्लिष्ट कर्थनाविरहित प्रत्यग्ननामनोतरी यो रत्यादि. स्थायिभावस्तस्य परिपोप शृद्वारप्रभृतिरसत्वापाठन-'स्याग्येय तु रसो

क्योफि वे ज्ञानवान् पराएी है औ्रौर सिंह आ्र्रादि तिर्यक् योनियों को गौए रूप से चेतन कहा जा सकता है क्योकि उनमे ज्ञान या बुद्धि की उतनी माना नहीं पाई जाती है। इसी चंतन्य के मुख्य तथा गौए सम्बन्ध ] के फारण [चेतन पदाय के 'मुष्य-चेतन' देव आ्रादि तथा 'गौण-चेतन' सिंह आादि दो भेद होते है] ॥६॥ इस प्रकार देवता आरादि मुरय चेतनो का एक स्वर्प कवियों की वरांना का विषय होता है। औ्रौर सिंह आरादि सर्यात् पशु, मृग, पक्षि, सरीसृप [सर्पादि] अ्रमुरय चेतनों का दूसरा स्वरूप [कनियो की वर्णना का विषय होता है] इसी [बात] को [अगली कारिका में] विशेष रूप से सोतते हं- मुखय [चेतन देवादि फा] सुन्दर रत्यादि के परिपोप से मनोहर और अपने जाति के योग्य स्वभाव के वर्णन से प्रत्यन्त सुन्दर [स्वरूप का वर्णन महाफवियो की वर्ना का प्रथम मुख्य विषय होता है]।।७।। जो मुख्य अर्थात् प्रधान-चेतन सुरासुरादि सम्बन्धी स्वरूप हैं वह इस प्रकार, का [कारिका में दिए हुए विशेषणों से युक्त] सत्कवियो की वर्णना का विषय होता है। अर्यात् [महाकवियो के] अपने [काव्य निर्माण रूप] व्यापार का विषय होता है। किस प्रकार का-'सरल सुन्दर रत्यादि के परिपोप से मनोहर'। अफ्लिप्ट अर्ात् [कदर्थना] खोंचतान से रहित नवीनता स सुन्दर जो रत्यादि स्थायिभाव उसका जो परिपोष, अर्थात् [रत्यादि ] 'स्थायिभाव ही रस बन जाता है' इस नियम के

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कारिफा ७ ] तृतीयोन्मेष [३२५

भवेत्' इति न्यायात्। तेन मनोहर हदयहारि। श्रत्ोदहरणानि विप्रलम्भशृद्गारे चतुर्थेडक्के विक्रमोर्वश्यामुन्मत्तस्य पुरुरवस प्रलपिनानि। यथा- तिप्ठेन् कोपवशात् प्रभावपिहिता दीर्घे न सा कुप्यति स्वर्गायोत्पतिता भवन्मयि पुनर्भावार्द्रमस्या मनः ।

अरनुसार रसरूपता को प्राप्ति उससे मन को हरणा फरने वाला [मुख्य चेतन पदार्यों फा स्वरूप कचियों की वना का प्रथम विषम होता है]। इस विषय के उदाहरस 'विक्रमोवशीय' [नाटक] के चतुर्य श्रद्ध में उन्मत्त पुरूरवा के प्रलाप [कहे जा सफते] हैं। जैसे- [विकमोवंशीय के चतुर्य अ्रद्ध में जव उर्वशी पुररवा को छोडकर स्वगं लोफ फो चली गई है उस समय उसके वियोग में उन्मत-सा हुआ राजा पुरुरवा उसे इधर- उघर खोज रहा है। परन्तु उर्वशी उसको फहीं दिखलाई नहीं देती है। तव उसफे दिखलाई न देने के विषय में वह नाना प्रकार के तर्क-वितक करता हुआ फह · रहा है कि]- [सम्भव है नाराज होकर] क्रोध के कारण [अपनी दवी शक्ति के] प्रभाव से छिपकर फहीं जा बैठी हो [इसलिए मुझे दिसलाई न दे रही हो। यह एफ फारस उवंशी के दिसलाई न देने का उसकी समभ में आाता है। परन्तु तुरन्त ही खण्डन भी उसकी समभ में आ जाता है कि 'वह नाराज होकर कहीं छिप गई हो' ऐसा नहीं हो सकता है श्योंकि] वह बहुत देर नाराज नहीं रहती है। [अरगर नाराज होकर फहीं छिपो होती तो भव तफ अवश्य निफल झाती। में तो उसको बहुत देर से ढूँढ रहा हूँ]। [फिर उसके न दिसलाई देने का दूसरा फारण उसे यह मालूम होता है कि] शायद स्वर्ग को उड़कर चती गई हो [ इसलिग मुके दिसलाई नहीं दे रही हो। परन्तु तुरन्त हो इसका भी प्रतिवाद हो जाता है कि] मेरे प्रति उसका मन अ्रत्यन्त अनुरत हैं।इसलिए मुझे छोडकर वह स्वर्ग को नहीं जा मरुनी हूं ]। [फिर उसके न दिसताई देने पा तीमरा फारल यह हो सफता है फि शायद कोई उसका त्रपहरस फर ले गया हो। परन्नु इसका प्रतिवाद भी तुग्न्त ही मामने घा जाता है कि] मेरे सामने से उनका पपहरता करने की साम्व्य किसी राक्स आदि मे भी नहीं है।[इनलिए कोई प्पहन्य पर ले नया हो यह भी नहीं हो सकता हँ]।

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३२६ ] वप्ोपितजीचितम् [पारिकिा ७

ता हर्तु विवधद्धिपोडपि न न मे शक्ता परोननिनी सा चात्यन्तमगाचरं नयनगोर्गनंति कोर्डर्यं निधि ।२५।।' अत्र राजो वल्लभाविर हवे वुर्यवशावेशविवशवृत्तेम्न टप्ामिनिमित्मनभि गच्छतः प्रथमतरमेव स्वाभािकमाकुमार्यसम्भाव्यमानम, पनन्तरोचितविचा रापसार्यमाणोपपत्ति किमपि तात्कालिकविकन्पोन्तिग् यमानमनवलोकनकारग

रस. परां परिपोपपढवीमविरोपित। तथा नेतवेव वाक्यान्तरैस्हीपितम। यथा- पद्भ्या स्पृशेद् वसुमती यदि सा मृगाक्षी मेघाभिवप्टसिकतासु चनस्वलीपु। पश्चान्नता गुरुनितग्वतया ततोडस्या दृश्येत चारुपदपंवितरलनताकाक्का ॥२६॥ परन्तु वह तो श्रांसी से एकदम श्रभल हो गई है।कहों भी दिसताई नहीं दे रही है] यह पया बात है॥।२५।। यहाँ प्रियतमा [उबश्ञी] के चिरह में दुसित दशा के आ्ररवेश में वतमान 1 राजा [पुरुरवा] को उस [उवशी] के दिखलाई न देने का फारण समझ में न थाने पर, स्वाभाविक सौकुमार्य से पहिले ही। शायद यह कारण हो इस प्रकार की] सम्भावना करके फिर उसके बाद उचित विचार करने से [उस सम्भावना के] हटाए जाने की उक्ति से तात्कालिक विफल्प से व्शित दिसलाई देने के किसी फारण की कल्पना करके [ और फिर] उसके [ निराकरण हो जाने से] न दिसलाई देने का कारण समझ में न आने से नैराश्य का निश्चय हो जाने के कारण [पुरवा के] मूढ चित्त के हो जाने से [विप्रलम्भ शृङ्गार] रस, परिपोप फी चरम सीमा को पहुँचा दिया गया है। इसीलिए [विक्रमोचंशीय के उसी प्रकरण में] इसी [विप्रलम्भ शृद्गार] को अन्य [श्लोक] वाष्यो से भी उद्दीप्त किया हैं। जैसे- वह सुगात्री [उरवशी] पहिले पानी पड चुकने से गोली मिट्टी वाली वन भूमि को यदि पैर से स्पर्श करती [अर्थात जमीन पर चलकर कहीं गई होती] तो, नितम्यो के भारी होने से पीछे [एडी की ओ्र] के भाग मे गहरी [और पजे की ओर" हलकी], महावर से युक्त उस [उर्वशी] की सुन्दर पैरो [के निशानों] की पवित अवश्य दिखलाई देती। [परन्तु जमीन पर कहो उसके पैरो के नशान दिखलाई नहीं दे रहे है]।२६।। १ विक्रमोर्वशीय ४, २।

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फारिका ७ ] तृतीयोन्मेष: [३२७

त्र्रत्र पद्भ्यां वसुमती कठाचिद् स्पृशेठित्याशंसया तत्पराप्तिः सम्भाव्येत। यस्माज्जलधरसलिलसेकमुकुमारसिकतासु वनस्थलीपु गुरुनितम्बतया तस्या. पश्चान्नतत्वेन नितरां मुदितसंस्थाना रागोपरक्ततया रमशीयवृत्तिश्चरण- विन्यासपरम्परा दश्येत। तस्मान्नैराश्यनिञ्चितिरेव सुतरा ममुज्जुम्भिता, या तदुत्तरवाक्योन्मत्त विलपितानां निमित्ततामभजत्। करुपरसोदाहरखानि तापसवत्सराजे द्वितीयेडक्के वत्सराजस्त परिदेवि- तानि। यथा-

यहाँ [इस श्लोक में] परो से पूर्यिवी को कदाचित हागा हो [इस सम्भावना से उसके परों के चिन्हों को देखते हुए उनके सहारे] शायद उसकी प्राप्ति सम्भव हो सके। क्योंकि पानी वरस जाने के फारण [नम ] गीली वन भूमियो में, नितम्वो के भारी होने से पिछली ओ्ोर [एडी के भाग में] गहरी प्र्थात् अ्त्यन्त स्पष्ट रूप से प्रद्धित, महावर से रगे होने से रमणीय रचना वाले उसके [ परों के निशानो फो पकिति दिसलाई [अ्रवश्य ] देती। [ परन्तु वह दिसलाई नहीं दे रही है] इसलिए [उसकी प्राप्ति के विषय में] निराशा का निश्चय हो [श्रन्तत] होता है। और यही घगले वाक्यो [इलोकों] में उस [पुररवा] के उन्मत प्रतापों का कारण हुआ हैँ। इम प्रकार 'वित्मोर्वशीय' के चतुर्य त्द्ध ने विप्रलम्न शृजार के उदाहग्य दिसलाकर अब 'तापनवत्सराज' ने करण रस के उदाहरसा दिग्पलाते है। 'तापसवत्सराजचरित' के द्वितीय श्रद्धु में वत्सराज [उदयन] के विलाप करुण रस के उदाहरण है। जंसे- वासवदत्ता वे जनकर मर जाने का नमानार पानर उनके वियोग में उन्मस हुआावत्सराज उदयन जो विलाप कर रहा है उममें ने यह एक ट्नोत लिया गया है। वामवदत्ता का पालन् हिरस आज उसको न पाकर अपनी बुद्धि के अनुसार वह जहां कही मिल नकनी की रहां उनको नोज रहा है। पग्नु वह कही भी उसको नही मिल रही हूं। इसको देवकर रजा उम हरिा मे कह रहा है कि अरे बैटा तेरी निष्ठुर माता तो तेरे साथ भुने भी छोडकर कहीं बुन द्ूर चनी गई हैं।

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३२८ ] चक्रोपिति जीवितम् [कारिका ७

धारावेश्म विलोगय दीननदनी मान्ता च लीलागृहान निश्नस्यायतमाशु केसरल्तारीयीप कृत्वा हश। कि मे पारश्र्वमुंपैषि पुत्रक कृनः कि नाटुभि कूर्या मात्रा त परिवजितः सह मया यान्त्यातिदीर्घा भृनम् ॥।२७।

अत्र रसपरिपोपनिवन्धन विभावाटिसम्पत्ससुटय कविना सुनरा समु- जुम्भित.। तथा चार्स्यैव वाक्यम्याततारक विदृपकवास्यमंव प्रयुक्तम- 'पमादो एसो क्सु देवीए पुत्तकिदको हग्णिपोटी अत्तभवत प्रणुसरदि ॥२८॥। [प्रमाद:, एप सलु देव्याः पुत्रकृतक। हरिणपोतो श्रत्रभवन्तमनुसरति । इतिच्छाया ]

[वासवदत्ता को खोजता हुग उसका प्यारा हरिए] धारागृह [ जिसमें फव्वारो के नीचे बठकर स्नान किया जाता हं] को देराकर [वहां वासवदत्ता को न पाने से] खिन्नवदन, [फिर उसके] लीलागृह [ प्रसाधनागार या करीटागार] में चक्कर लगाकर, लम्बी [निराशाजनक] सांस छोटता हुआ, [फिर] केसर श्रर लताओ की क्यारियो की ओर नजर दौडाता हुआ [जन फहीं वासवदत्ता को नहीं पाता हैं तो अत्यन्त उदास होकर वत्तराज उदयन के पास आकर उसकी सुशामद करने लगता है कि तुमको मालूम हे मेरी माता कहाँ गई है तुम्हीं बता दो। तव राजा उदयन उससे कहते है कि] अरे बेटा मेरे पास क्यो आा रहा है। तेरे इस खुशामद करने से क्या लाभ हं, तेरी निष्ठर माता ने दूर देश [स्वर्ग] की यात्रा पर जाते हुए [निष्ठरतापूर्वक ] मेरे साथ तुभको भी छोउ दिया है। [भरब उसका मिलना सम्भव नहीं है] ।।२७।।

यहां रस के परिपोष का कारण रूप विभाव आदि सामग्री का वभव कवि ने पूर्ण रूप से प्रदशित किया।जैसा कि इसी [ ऊपर के श्लोक ] वाक्य के अ्र्रव- तरसिगका रूप विदूषक का वाक्य डस रूप में प्रयुक्त किया है-

बडा प्रमाद हुआ कि यह देवी [वासवदत्ता] का पुत्रवत् पाला हुआ हरिए का वच्चा आपके पीछे चला आ रहा है ॥२८॥

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कारिफा ७] तृतीयोन्मेप [३२६

एतेन करुरसोद्ीपनविभावता हरिसापोतक-धारागृहप्रभृतीनां सुतरां समुत्पद्यते। 'तथा चायमपर नते कारान्नेप' इति रुमस्टृचनादनन्तरमेतत्परत्वेनैव ्वाक्यान्तरमुपनिवद्धम्। यथा- कर्णान्तस्थितपद्मरागकलिका भूयः समाकर्षता चञ्चा दाडिमवीजमित्यभिहता पादेन गएडस्थली। येनासौ तव तस्य नर्मसुहृद: खेदान्मुहुः कन्दतो नि.शङ्क' न शुकम्य कि प्रतिवचो देवि त्या दीयते ॥।२६।। अत्र शुकस्यैवविधदुर्ु्त्वंपरतिपात्वतम् 'असौ' इति कपोलस्थल्या स्वानुभवम्ववमानसौकुमार्योत्क्पपरामर्शः। एवमेवो- दीपनविभावैकजीवितत्वेन करुणरस' काष्ठाविरूढ़िरमणीयतामनीयत।

1 इसमे उस हरिएशावक और धारागृह आदि स्पष्ट रूप से करुण रस के उद्दीपन-विभाव हो जाते है। इसीलिए रुमण्नान के 'क्षते क्षारमिच' इत्यादि वच्चन के अनन्तर इसी [करुण रस के उद्दीपन] के लिए यह दूसरा श्लोक [जो भागे दिया जा रहा है] लिखा है।

जमे-

हे देवि ! कान [के प्रानूपण] में लगी हुई [गहरे लाल न्ग को] पघ्मराग मशि के टुकटे को अनार का दाना समभफर निकालते हुए जिम [ तोते] ने अपने पजों से तुम्हारे गाल पर [भो] प्रहार किया [प्राज तुम्हारे वियोग में] दुग्नी श्रोर नि.शका होकर जोर से चिल्लाते हुए अपने उत नमं सुहद[शृद्गार-व्यापार से सहायक] तोते षो भी तुम उत्तर नहीं दे रही हो यह क्या बात है ।२६॥। यहां तोते को इतनी घुप्टता [कि उसने तुम्हारे पान से पघराग मणि को निकालने और उसी प्रमन्न में तुम्हारे गाल पर पाद प्रहार करने का साहस फिया, उसपे। सत्पन्त प्रिय होने ये प्रदशन के लिए वर्हन की है। 'पनो' यह [गण्डन्पली का विहेषसा पद] अपने [राना के ] अ्रनुभव ने स्वदमान [पपोल गत] सौकुमायं मे उल्लवं का सूचय हू। इसी प्रफार उद्दीपन विभाव की विशेषता फे द्वारा [जोवितत्वन] परसा रस, सौन्दय को चरम सीमा को पहुंचा दिया गया है।

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1३० ] चकोपितिजीचितम् 1पारिका ७

सान्तराणामपि स्वयमेवात्प्रेक्षणीयम।

इम प्रकार सकुमार कोमल रस होने से निप्रतम्भ-भन्वार औरर पस रस के उदाहरखो को प्रवशित फर दिया है। श्रन्य रसो के [उदाहरण] भी स्वय ममझ नेने चाहिएँ।

यहाँ जो उदाहरणा दिए है उनयो स्थिति बहत उुछ एव-मी है। वित्रमो- वशीय' और 'तापसवत्पराज' दानों मे लिए गए उदाहरण अपनी-सपनी श्रियतमा के वियोग से सन्तप्त नायको के प्रलाप वबनी में से लिये गए है। परन्तु विषमोवंशीय' मे लिये हुए उदाहरणों को विप्रलम्भ गृद्गार का तथा तापसवत्मगज नरित मे लिये हुए उदाहरणों को करुण-रस का उदाहरण वहा है। इसका कारण यह हे कि विषमो- वशीय में राजा पुरुरवा का जो अपनी प्रियतमा से वियोग हुआ है वह पात्यन्तिरु प्रर्थात् सदा के लिए हुआ वियोग नहीं है। अर्थात उमम नायिया उरवशी की मृत्यु नही हुई है। मरतएव उसका वियोग, वियोग वी ही सीमा में रहता है श्रत उने चिप्रलम्भ पङ्गार माना है। तापसवत्सराज में जो नायिका का वियोग है वहाँ वासवदत्ता के प्र्प्रग्नि में जलकर मर जाने के कारण हुआ है। रमनिए वह, विप्रलम्भ शृङ्जार की सीमा समाप्त होकर करुण रस सीभा प्रारम्भ हो जाने से उनको करुए रस का उदाहरण माना है। अर्थात् नायक तथा नायिका दोनो की जीवित ग्रवस्था में जो वियोग होता है वह विप्रलम्भ और उनमें से किसी एक की मृत्यु से जो वियोग होता है वह करुणा रस के अ्रन्तर्गत होता है।

तापसवत्सराज में भी उदयन को जो रानी वासवदत्ता की मृत्यु का समाचार दिया गया है वह वास्तविक नही अपितु राजनीतिक मन्त्री का एक राजनैतिक प्रयोग है। परन्तु उसका भेद जब तक नही सलता है तब तक उसको वास्तविक मत्य मान कर ही उम पसङ्भ को करुण रस का उदाहरण कहा गया है। अन्यथा वह भी विप्र- लम्भ पृङ्गार का ही विपय होता।

इस प्रकार यहाँ तक प्रधान-चेतन अर्थात् सुरासुरादि सम्बन्धी स्वरूप किस प्रकार कवियो की वर्णना का विषय होता है यह दिखलाया है। अब सप्रधान-चेतन भर्थात् पशु, पक्षी आदि तिर्यक योनियो के प्रासियो का स्वरूप किस प्रकार कवियो की वणना का विषय हो सकता है, यह भगे दिखलाते है।

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कारिका ७ ] तृतोयोन्मेप· [ ३११

एव द्वितीयमप्रधानचेतनसिंहादिसम्वन्धि यत् स्वरूपं तदित्थ कवीनां

स्वा प्रत्येकमात्मीया सामान्यलक्षणवस्तुस्वरूपा या जातिस्तस्याः समुचितो यो हेवाक स्वभावानुसारी परिम्पन्ट., तस्व समुल्लेख. सम्यगुल्लेखनं वास्तवेन रूपेणोपनिवन्धस्तेनोब्ज्वलं भ्राजिप्णु तद्विदाह्वाढकारीति यावत्। यथा- कदाचिदेतेन च पारियात्र-गुहागृहे मीलितलोचनेन। व्यत्यस्तहस्तद्वितयोपविप्ट दंष्ट्राकुराव्चच्चिवुक्कं प्रसुप्तम् ॥३०।। अ्र्प्रत्र गिरिगुहान्तरे निद्रामनुभवत. केसरि स्वजातिसमुचितं स्थानक- मल्लिखितम्।

यथा वा-

इस प्रकार अ्रप्रधान-चेतन सिंह आादि सम्वन्ची जो दूसरा स्वरप है वह इस तरह से कवियो की वर्णना का विषय होता है कि। फँसे-'घपनी जाति के योग्य जो स्वभाव [ हेवाक ] उसके उल्लेख मे मनोहर। प्रत्येफ प्राणणी की अ्प्रपनी-प्रपनी सामान्य रूप [ न्यायवशेषिक की परिभाषा में सामान्य शब्द से कही जाने वाली ] जो जाति, उसके योग्य जो 'हेवाक' अर्थात् स्वभाव के अनुफूल व्यापार, उसका समुल्लेख अर्थात् सम्यक भली प्रकार से उल्लेख वास्तचिक रप से वर्णन, उसमे उज्ज्वल शोभाय- मान अर्थात् सहृदयहृदयाह्ह्ादक [रूप से वर्णन कवियों की बणना का द्वितीय विषय होता है] जैसे- कभी इस [सिंह] ने पारियान [नामक पर्वत विशेष] के शुफा रूप घर में दोनो हाय [अर्यात् आागे के पैर] एक दूनरे के ऊपर रसकर बैठे हुए जिसमें दप्ट्रांकुर [दाढो की कान्ति] से ठोडी शोभायुक्त हो रही हे इन प्रकार [अर्थात् मुस सोले हए] नोंद ली॥३०। यहां [इस श्लोक ने] पर्वत की गुफा रूप घर के अन्दर सोते हुए में शेर का छपनी जाति के घ्रनुरप आासन [सोते समय बठने के टग] का उल्लेस किया है। अपवा नंमे- यह कानिदान के अभिशान शाफुन्नल नाटक का ब्नोक है। राजा दुष्यन्त जब हरिए का गिकार करने के लिए उनके पीछे अपना रय बोडाते है उम समय मागे-भागे भागने हुए मृग का बहा स्वाभाविक वशन दस प्रकार किया गया हँ।

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३६२ ] वक्रोपितिजीवितम् फारिफा द

ग्रीचाभभामिराम मृहरनुपतति म्यन्दने दत्तटष्टि पश्चार्घेन प्रविटः शरगतनभयाद भृयगा पूर्वकायम। शम्पैरर्धावलीट श्रमनिवृतमुगत् शिमि: कीर्गानर्त्मा पश्योदयालुतिरवाढ़ विर्यत बहुतर न्तोरमृन्यां प्रयाति ।३१।।७।।

रसोदीपनसामर््र्य विनिवन्धनवन्धुग्म्। चेतनानाममुख्यानां जडानां चापि भृयसा ॥=।। चेत नाना प्रािनाममुस्यानामप्रवानभृताना यनपर्प तवेचविव तद्वर्स नीयता प्रतिपद्ते, प्रस्तुतान्नयोपयुज्यमानम। कीहशम्-'रमोहीपन-

स्तस्मिन् सामर्थ्य शक्तिस्तस्या विनिबन्धन निघेशस्तेन बन्धुरं हदयहारि। वार-वार गर्दन मोडकर, पीछे आाते दवए रथ पर दृष्टि लगाए हुए, [पीछे को श्ोर से वाए लगने के भय से पिछले आधे शरीर को अ्रगल भाग में घुसेडते हए, थक जाने से खुले हुए मुह में मे गिरते हुए ग्राधे साए हुए तिनको फो रास्ते में विखेरते हुए [ यह हरिए] लम्ती छलांगें मारने के कारण देगो पुथिवी पर बहुत योडा और आ्रकाश में [ उसकी प्र्पपेक्षा बहुत श्र््रधिक चल [ भाग] रहा है [ यह हरिए के भागने का अत्यन्त स्वाभाविक वर्णन है। ॥३१॥ इसमें अ्रप्रधान चेतन रप मृग का 'स्वजात्युचितहेवाकसमुल्लेगोज्ज्वल' वगान किया गया है। इसलिए यह द्वितीय प्रकार के कवि बरना के विषय का प्रद्शक उदाहरण है ।।७।। इसी [विषय की उपादेयता के प्रथम प्रकार] को श्रन्य प्रकार से सोलते हं- अ्रमुख्य चेतन [पशु पक्षी आरदि तियक योनियो के पाणियो] औरर बहुत-से जड पदार्थो का भी, रस के उद्दीपन की सामय्य के सन्निवेश से मनोहर [स्वरूप भी कवियों की वर्गना का दूसरे प्रकार का विषय होता है]॥॥ अमुख्य अनर्थात् अप्रधान भूत चेतन [ सिंह आर्रदि तिर्यक योनि के ] प्राणियो का जो स्वरूप है वह प्रस्तुत [विषय ] के श्रद्भ रूप में उपयुक्त होने पर इस प्रफार वर्णनीयता को प्राप्त होता हैं। फँसा कि-'रस के उद्दीपन की सामर्थ्य के प्रदर्शन से सुन्दर' [होकर]। रस अर्थात् शृद्धार आादि, उनका उद्दीपन अर्थात् उल्लासन, उत्तेजन, परिपोषण, उसमें सामय्य शक्ति योग्यता उसका जो रचना में सन्निवेश करना उसके कारण सुन्दर अर्थात् हुवयहारी [जो स्वरूप, उस रूप में अप्रधान चेतन पशु मृग आदि और बहुत से जड पदार्थ भी फवि के वर्णना की विषय हो सकते है ]।

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कारिका = ] तृतोयोन्मेप [ ३३३

यथा- चूताकुरास्वादकपायकरठ: पुंस्कोकिलो यन्मधुरं चुकृज। मनस्विनीमानविवातदक्ष तंदेव जत वचनं स्मरस्य ।३२।। 'जढ़ानां चापि भूयसा'। जड़ानामचेतनाना सलिलतरुवृ सुमसमयप्रभृ- तीनामेवविध स्वरुपं रसोद्वीपनसामर्थ्र्यविनिबन्धनवन्धुर वर्णनीयतामच- गाहते। यथा- इदमसुलभवस्तुप्रार्थनादुनिवार प्रथममपि मनो में पञ्चवाण: सिरोति। किमुत मलयवातोन्मृलितापाएडपत्रे-रुपवनसह कारैरदशितष्वकुरेपु ।।३३।। यथा वा-

जसे- [ यह श्लोक कुमारसम्भव ३, ३२ का है ] भास्त्र मञ्जरियो [ या भ्रंकुरो ] को साने से [कापाय] मघुर फण्ठ मे यक्त नर कोसि्नि जो मीठा-मीठा वोत रहा या वही मानिनियों के मान को भद्त करने वाला मानो कामदेव का वचन हो गया या ॥३२॥।

औौर बहुत से जद पदार्थों का भी [स्वम्प रस मे उह्टीपन विनाव के रूप में कवियों फी वर्णना का विषय होता है]। जउ पर्यात् प्रचेतन जल, वृक्ष, पुप्प श्रोर समय [ग्रथवा पुप्पसमय को एक वद मानकर वसन्त] इत्यादि का इम प्रकार का रस के उहीपन की सामव्य के प्रदर्दन से मनोरम न्वरप वर्णनीयता को प्राप्त [वर्सं- नीय] होता हैं। जैसे-[यह प्लोक विनमोर्वंशीय , ६ का इलोफ है]- दुलभ वन्तु की प्राथंना [चाह] से जिनवो हढाना नठिन है ऐमे मेरे मन को पचवासा] पामदेव पहिले भी बिद्ध कर रहा है फिर मलय पतन से पुराने [पीले] पत्तों के पिरा दिए जाने वे वाद उद्यानों के श्म्र्रृक्षों में[ नवीन किसलयों मे] धंकुर निषस आने परवसन्त ऋतु का नाम्राज्य हो जाने ] पर तो पहना हो कया हुँ।।३३।। सचना जंमे-

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२३४। घक्रोपितजीवितम [फारिय

उद्भददाभिमुगाकुग कश्त्रका शनालजालाकुन्न- प्रान्त भान्ति सरामि फेनपटन्ने सीमन्निता: सिन्। किज्चास्मिन् समये कशाति निलसत्कनदर्प कोटगिडर- क्रीडामान्जि भान्ति सन्तनलना कीर्रान्वरगयान्यपि।।थ॥1 एव स्वाभाविकसुन्दरपरिम्पन्निवन्धन पदार्थेस्वरपसभिवाय तने पमहरति- शरीरमिदमर्थस्य गमसीयकनिर्भग्म्। उपाठंयतया जेयं कवीनां वर्णानास्पदम् ।६।। अर्थस्य वणनीयस्य वस्तुन शरीरमिदमुपाठेयतवा वेयं प्राप्पखेन वे व्यम्। कीहश सत्-'रामणीयकनिर्भरम्' सौन्दर्यपरिपृगा, न्प्रीपहत्यरहित

कुरबको [नामक विशेष वक्षो] में [नवीन पनों के] श्ररकुर फूटने वाल सिवार [जल की घास विशेष] के समूह से व्याप्त हो रहे हं [प्रान्न] किनारे ति ऐसे तालाव शोभित हो रहे है, नदियाँ फेन पटलो से व्याप्त हो रही हैं। श्रौ कृशाद्भि इस समय फली हुई लताओ से भरे हुए बन भी सुन्दर धनुर्धारी कामदे कीडास्थल बने हुए हैं।३४।।

इन श्लोको में जल, वृक्ष और कुसुम समय [ वसन्त] आदि अ्चेतन प को भी रस के उद्दीपन विभाव के रूप में वर्णन किया गया है ॥=॥

इसी [ वशंनीय वस्तु के विषय विभाग रूप काव्य के विषय की उपादेयत दूसरे प्रकार] का उपसहार करते हैं- वर्णनीय वस्तु का रमसीयता से परिपूणं [रसोद्दीपनसमर्थ ] इस [ अ्रचेतन पदार्थ रूप] शरीर को ही [काव्य में] उपादेय होने से कवियो की वर्णना विषय समझना चाहिए ।।E।। अर्थ का, वर्नीय वस्तु का यह [ चेतनाचेतन पदार्थ रूप ] शरीर उप अर्थात् ग्राह्य समभना चाहिए। किस प्रकार का होकर कि-'रमणणीयता से परि होकर। सौन्दर्य से परिपूर्णा, किसी प्रकार की कमी या दोष से रहित होने से सह

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कारिका १०] तृतीयोन्मेष· तद्विदावर्जकमिति यावत्। कवीनामेतदेव यस्माद् वर्णनास्पदमभिधाव्यापार- गोचरम्। एव विघस्यास्य स्वरूपशोभा तिशय भ्राजिप्णोर्विभूपणान्युपशोभान्तर- मारभन्ते ॥।६।। एतदेव प्रकारान्तरेण विचारयति- धर्मादिसाधनोपायपरिस्पन्दनिवन्धनम्। व्यवहारोचितं चान्यल्लभते वर्णानीयताम्॥१०॥ 'वयवहारोचित चान्यत्'। अपर पदार्थानां चेतनानामचेननानां स्वरूपमेवविध वर्णानीयतां लभते, कविव्यापारविपयता प्रतिपद्यते। कीदशम्- 'न्यवहारोचितम', लोकवृत्तयोग्यम्। कीदशं सत्-'धर्मादिसाधनोपायपरिस्पन्द-

) को प्रराकषित करने वाला, यह अभिप्राय है। कयोकि यही कवियो की बराना का विषय धर्थात् अ्रभिधा [कथन शैली] के व्यापार का विषय है। इस प्रकार के-अ्रपने स्वरूप की शोभा के अतिशय से शोभित होने वाले इस [वसंनीय वस्तु के शरोर] फो अलद्धार दूसरी उपशोभा [गौए शोभा] से अलंकृत करते है। [अर्यात् पदार्थों का अपना वास्तविक सौन्दर्य ही उनकी ययार्य या मुरय शोभा है। अलङ्धारो के द्वारा होने वाली शोभा मुस्य शोभा, यथार्थ शोना, नहीं अपितु उपशोभा मात्र है]।।८।।

इसी [ फाव्य में वशेनीय विषय की उपादेयता के तीसरे प्रकार ] फा दूसरी तरह से विचार करते हैं- धर्म आदि [धर्म, अर्य, काम और मोक्ष एप पुरपार्य चतुष्टय] को सिद्धि का उपाय होने के फारण [वर्शनीय वस्तु का] व्यवहार योग्य, म्रन्य स्वस्प [भी कवियो फी] वर्णना का विषय बनता है ॥।६।।

व्यवहार [में आर्प्रानं वोग्म] औौर भी [पदार्षों का प, धर्मादि दुरुषायं चतुष्टय की प्राप्ति के साधन रूप मे वर्सनीयता को प्राप्त करता हैं ]। चेतन औोर प्रचेतन पदारचों का दूमरा इस प्रकार स्वरप भी वशेनीय होता है सर्यात् कवियों के व्यापार [पाव्य रचना] का विषय होता है। फिस प्रकार कि-'व्ययहार के योग्य' सर्ात् लोफ व्यवहार के योग्य। कि्स प्रकार पा होष- धर्मादि को सिदि का

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३३६] वक्रोपितिजी वितम् [कारिफा १०

निवन्धनम्' । धर्मादेश्चतुर्वर्गन्य सावने सम्पाटने उपायमतो व परिम्पन्द म्वविलसितं तदेव निवन्धन यस्य तत्तयोक्तम। *1 तनिदमुक्त भवति-यत्काव्यं वर््यमानवृत्तय प्रवाननेननप्रभृतय. सर्वे पदार्थाश्चतुर्वर्गसावनोपायपरिस्पन्त्प्रावान्येन बगानीया। चेडयम्रवान- चेतनस्वरूपा पदार्थाम्तेऽपि वर्मार्थशुपायभृतस्वनिलासप्रावार्येन रनीना वर्णनीयतामवतरन्ति। तथा च रात्ञा गद्रकप्रभृनीना मन्त्रिणा च शुना- समुख्याना चतुर्वर्गानुष्ठानापदेशपरत्वेनैव चरितानि वरग्यंते। अ्र्प्प्रधान- चेतनाना हस्तिहरिसाप्रभृतीना संग्राममृगयाय्यवतया परिन्वनतसुन्दर न्वस्पं लक्ष्ये वर्स्यमानतया परिदृश्यते। तम्मानेन च तथाविनन्वरूपोल्लेसप्रा वान्ेन काव्य-काव्योपकरण-कवीना चित्र-चित्रोपकरण-चित्रकरे साम्य प्रथममेव प्रतिपादि। तदेवंिध स्वभावप्रावान्येन रसप्राचान्येन द्विप्रकार सहज-

फारण रूप होकर। धर्मादि अ्रयात् [घम, प्रथ, फाम और मोक्ष रूप] चतुवंग के साधन थर्थात् प्राप्त करने में उपाय भूत, जो '- ल का] 'परित्पन्द' प्ररपना प्रभाव वह ही जिसका कारण है। वह उस प्रकण ज[ धर्मादिमाधनोपायपरिस्पन्दनिव- न्धनम् ] हुआ।

इसका अभिप्राय यह है कि रव्य में वर्ण्यमान स्वरप वाले, मुरय चेतन [देवासुरगन्धवविद्याघर] आदि समस्त पदाथ चतुवर्ग के सम्पादन में उपायभूत स्वभाव को मुख्यता से [ही] वर्णनीय होते है। और जो अ्रप्रान चेतन स्वरूप[पशु, पक्षी श्नादि तिर्यक् योनि के प्राएी ] है वे [भी] धर्मादि के उपाय भूत अपने व्यापार की मुरयता से ही कवियो के वंनीय होते है। इसीलिए शूद्रक आदि राजाओ् और शकुनास आदि मत्रियों के चरित्र [ फादम्वरी आरादि में ] चतुर्वर्ग के अनुष्ठान के उपदेशपरक रूप से ही वगिगत किए गए है। अप्रधान चेतन हाथी हरिए आदि का, युद्ध और, मृगया आदि के व्यापार से सुन्दर स्वरूप फाव्यों [लक्ष्य] में वर्ण्यमान रूप से दिसलाई देता है। इसीलिए उस प्रकार के स्वरूप के उल्लेख की प्रधानता से १ काव्य, २ काव्य के उपकरस, और ३ कवि का, १ चित्र, २ चित्रोपकरण और ३ चित्रकार के साथ सावृश्य पहिले ही दिखला चुके है। इस प्रकार १ स्वभावप्राधान्य से और २ रस प्राधान्य से वो प्रकार से वर्णना के विषय भूत वस्तु का सहज सौकुमार्य से रसमय स्वरूप

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फारिका १० ] तृतीयोन्मेप: [३३७

सौकुमार्यसरसं स्वरूपं वर्गानाविषयवस्तुन. शरीरमलद्वार्यतामेवाहेति ॥६।।' तन्न स्वाभाविकं पदाथेस्वरुपमलङ्गरएं यथा न भवति तथा ग्रथममेव नतिपादितम्। इदानी रसात्मन. प्रधानचेतनपरिस्पन्दवएयमानवृत्तेरलद्वार- कारान्तराभिमतामलद्वारतां निराकरोति- भूत शरीर अलङ्धायंता के ही योग्य हं। [अलद्धारो के द्वारा वर्णनीय वस्तु के स्वभावप्रधान अथवा रतप्रधान स्वरूप को ही अलंकृत किया जाता है इसलिए वह 'अल्ङ्धार्ष' कहलाने योग्य ही होता है]।।६।। रसवत् अलद्धार का खण्डन- पदार्धो के १ रवभावप्रधान स्वरूप तथा २ रमप्रधान स्वर्प दो प्रकार के स्वर्प कवि की वर्गना के विषय हो सकते है यह ऊपर के प्रकरण में कहा था। उनमें से पदार्थों का स्वाभाविक स्वर्प अलद्धार रूप नहीं हो सकता है, वह केचल 'पलद्धाय' ही होता है यह भी पहिले [पिछली कारिका में] कह चके है। पदार्थ का दूसरा रसप्रधान स्वस्प भी अलद्दार नही हो सकता है, 'अलङ्गायं' ही होता है यह बात आगे इस कारिका में कहना चाहते हे। इसके कहने की आवद्यकता इसलिए पडी कि भामह आदि प्राचीन आ्रचार्यो ने रनवत्, प्रय, ्जंस्वित और समाहित नाम के चार अलद्वार और माने है। इनमें रस जहां किसी अन्य का ब्रभ्भभूत या अलद्ार हो उनको 'रसवत् अलद्वार' कहते है। -स प्रकार प्राचीन आ्र्प्राचार्य भामह रस को भी अलद्कार कहते हे। परन्तु कुन्तक इस विचार से सहमत नही है। उनका कहना है कि रस अ्रलक्कार नही होता, वह मदव 'अल्स्धायं' ही रहता है। इसलिए 'रसवत्' नाम का कोई अलद्धार नही मानना चाहिए। अपने इसी सिट्ान्त को प्रतिपादन करने के लिए कुन्तव ने रस कारिमा में ददुत विस्तार वे माथ 'रमवत् अनद्वार' की पलट्वारता का सण्डन कर भामह के मत का निरावरण करने का प्रवत्न किया है। रसवदलस्ारवादी भामह के मत का विस्तारपूर्वक निगकरता करने के लिए ही वे अ्वतरसिका करते है- उन[ र्वभावप्रधान तथा रतप्रधान दो प्रकार के पदार्थों के स्वर्पी ] में से पदार्यों का त्वाभाविफ स्वतप जैसे अलदधरण नहीं [भलङ्गायं ही] होता है यह पहिले हो [पिछनी पारिका मे] मह चुके हे। अररव [नामह आादि] सन्य आालद्धारिकों के अभिमत प्रधानचेतन [देवासुरादि] ये सवनाव [पन्त्पिन्द] रप वर्ष्यमान पदार्थ . में रहने वालं रसात्मय [स्वरप] वी भी प्रतद्गारता का निराकरण करते है। [अर्थात् नामह आदि प्राचीन झाचार्यों के भ्रनिमत रसवत् अलद्धार की पतज्गारता पा सण्टन करने के लिए सगली कारिका लिसने हैं।]- ई 'शरीरमेवाल द्वाय नामेवाहति' यह पाठ ठीफ नही या।

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३३८ ] वगोपितिजीचितम् [फारिका ११

त्ररलद्वागे न रसवत परस्याप्रतिमासनात।

'अलद्धांग न रसवन'। रनदिति यो्यसुन्पाितप्रनीनिर्वामा- लक्वारस्तम्य चिभृपण व नवपनते दत्वर्ग। कम्मान कर्खान-'स्वरुपाठति- रिक्तस्य परग्याप्रतिभासनान'। वर्व्यमानग्य वस्तुनो यन न्वर्पमात्मीय: परिस्पन्द, तर्मावतिरिक्तम्यान्यधिकस्य परम्प्रिभासनान अनवयोधात्। तदिदमत्र तात्पर्यम-यन सर्वेपामेवालेक्वागगा सविवाक्यगतानामिदम- लद्ार्यमिटमलदरगम उत्यपोद्वारविहितो विविक्तभाव सर्वन्य प्रमातुन्चेतसि परिस्फुरत।रसवत् त्यलारवक्ये पुनवततच सि न किस्र्ेतदेव वु यामहे।

रसादि की प्रतीनि से न्थल में नम घे] अपने स्वम्प के श्रतिन्यित [श्रत- द्वाय स्प से] मन्य विसी पी तीति न होने से और रस पे साथ अ्रलक्दार शब्द फा 5योग दरने पर। शब्द तथा अ्रथ थी सन्तति भी न होने से 'रसच!' अतक्कार नहीं हो सकता है॥१०॥

'रसवत्' अ्रलद्धार नही है। '२सचत्' नाम से कत्पित पिया हुआ्र्प्रा [उत्पादित- प्रतीति, जिसकी वास्तव में प्रतीति नहीं होती, जबरदस्ती प्रतीति उत्पन्न अपर्यात् कल्पित की गई है ऐसा] जो प्रलद्धार है उसका अ्रलद्धारत्व नहीं बनता है यह प्रभिप्राय है। घिस पारण से [ रसवत् का अ्रल्द्धार्त्व नहीं बनता है ] फि-अपने स्वरूप के परतिरिपत [अलद्धार्य र्प से] अ्रन्य किसी की प्रतीति न होने से। वर्ण्यमान वस्तु का जो स्वर्प अरथातत् अ्रपना व्यापार उसके प्रपतिरियत अत्यधिक [उत्कृष्ट होने से अल्ार्य कहलाने योग्य] परवय किसी की प्रतीति न होने से [ रसवत् को अलद्धार नहीं कह सकते है]। इसका यहाँ यह श्रभिप्नाय हुआ कि सत्कवियो के वाक्य में आए हुए सब ही अलङ्धारे में 'यह अलङ्धार्यं है' औरर 'यह श्रलद्धार है' इस प्रकार पूथक् रूप से किया हुआ[अलद्धार्य अलद्धार भाव] अलग अ्रलग सभी ज्ञाताओ््रों [विद्वानों] के मन मे प्रतीत होता है। परन्तु 'रसवत' इस [ नाम के ]अ्लद्धार से युक्त वाक्य में ध्यान देने पर भी यह [ अलद्धार्य तथा अलद्वरण का विभाग ] कुछ समभक में ही नहीं घाता हैं। १ 'सर्वेषामेवालङ्ग तीना सत्कविवाक्याना' यह पाठ प्रसङ्गत था। २ 'रसवदल ह्लरवादिति वाक्य' यह पाठ ठोक नही था।

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कारिका ११ ] तृतोयोन्मेष. [ ३३६

तथा च-यदि शृङ्गारािरेव प्राधान्येन वर्एर्यमानोडलद्वायेस्तदन्येन केनचिदलङ्कररोन भवितव्यम। यदि वा तत्वस्पमेव तद्विदाह्लादनिवन्धनत्वाट- लङ्करएामित्युच्यते तथापि तट्व्यतिरिक्तमन्यलङ्कायतया प्रकाशनीयम्। तदेवविधो न कश्चिदपि विवेकशिचिरन्तनालद्वारवाराभिकते रसवदलद्वार- लक्षणोगाहरणभागे मनागपि विभाव्यते।

यथा च- रसवद् दर्शितस्पष्टशृद्गारादि ।३५।।

जंसे कि-[जहां भामह आदि 'रसवत्' अरलद्धार मानना चाहते हे वहां] यदि भृद्गार आरादि [रस] ही प्रधान रूप से वर्ण्यमान[हंतो प्रधान रूप से वर्ण्यमान होने से वह] 'अलङ्गायं' है तो उसका अलङ्गार किसी श्रन्य को होना चाहिए। [वह स्वयं तो अपना अलद्धार नहीं हो सकना है]। अ्रथवा यदि [प्रधान रूप से वगित] उसी [रस] को सहृदयों के श्रह्लाद का जनक होने से अलद्धार कहते हं तो भी उससे भिन्न फोई अ्न्य पदार्य 'अलङ्धार्य' रूप से दिसलाना चाहिए। [जिसको कि प्रधान रूप से वशिगत वह रस रप अलद्धार प्रलफृत करे]। परन्तु [भामह आ्रादि] प्राचीन अलद्धारकारों के अ्रभिमत 'रमवत्' रूप प्रलद्धार के उदाहरणों में इस प्रकार का फोई तत्व [जिसे अ्तङ्गायं कहा जा तके] नाम को भी नहीं दिसलाई देता है। भामह तथा उद्धट के लक्षण का सणन- भामह तथा उन्हट दोनों ने रसवत् अलद्गार के लक्षण निम्न प्रकार किए हं- रगवद् दर्गितमपष्टशङ्गारादिरन यथा [भामह ३, ६ ] रनवददनितम्पप्टशद्वारादि रसोदाम् [उद्धट ४, ४] न दानो लक्षणी मे 'दगितम्पष्टमज्वारादि इतना प्र्ण एक समान ही है। न उसके सण्डन के लिए इस लक्षणा की नम्भाविन प्रनेक प्रकार की व्याग्याथो को दिसनाते हुए प्रन्थवार कन्तक प्रतिपादन कर्ने हू कि नमे पिनी भी व्यात्या के मानने पर न पलद्वायं, अलद्धार वा विभाव बनता है और न रसवन् का पकह्ारत्व मिद्ध होता है। औोर जैना कि- 'रसवष् द्दितम्पष्टभ्टृभ्ानदि' ॥३y॥।

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३४० ] बगोरितजीनितम [पागि्षिा११

इनि रसवल्लनगाम। पत्न दमिता सवृण्डा साट वा भृदारादयो यत्रेति व्यारयाने काव्यत्यतिरिवतों न पविविन्व समासायभृन सलच्चने। मोडमावलद्वार काव्गमेवेति चेन, नदषि न सुन्पाटमौष्ठवम। चन्मान काव्येकटेशयो गव्ार्थिरयो प्रथक पथगलग सं्तीन्युपनम्य वार्नी

यदि वा दर्शिता न्प्ड शत्ाराठयो गनेनि समास। तवापि वक्तव्य- मेव कोऽसाविनि। प्रतिपाठनवचि्धमेवेति चेन तदपि न सन्यक समर्बनार्हम। य्रस्मात प्रतिपाद्यमानाटवयवेच नदुपशोमानिवन्धन प्रतिपादनवैविय न पुन प्रतिपाद्यमेव ।

यह 'रसवत्' [अलदार] या लक्षसा [भामह तथा उन्धट ने] किया हूँ। [इसमें स्पृप्टा प्रथवा स्पष्टा दो प्रकार ये पाठ हो सपते ह।यहां, दिरालाए गए है, हुए हुए [सपृप्टा ]प्नथवा स्पप्ट[म्पप्टा]शृद्गार आदि जिसमे[यह द्शिततपृप्ट-ङ्गारादि रसवत् अलद्धार होता है] यदि इस प्रकार की व्यारया की जाय तो [ 'जिसमें' इस अ्रन्य पदार्थ प्रधान बहुव्रीहि समास के होने से] काव्य के प्र्प्रतिरियत समाम का अर्थं रूप ['न्यपदार्थप्रधानो बहुवीहि' बहुदीहि समास मे श्रन्य पदार्थ का प्राधान्य होता है इसलिए वह अ्रन्य पदार्थ ही बहनीहि समास का श्रथं भत होता हँ] फोई श्रन्य पदार्थ दिखलाई नहीं देता है। औ्रर यदि कहो कि वह [ रसवत् ] मल्द्वार फाव्य ही है तो उसका भी सौन्दर्य [समन्वय ] स्पष्ट रूप से नहीं होता है। क्योकि 'काव्य के [ एक देश ] प्वयव रूप शब्द तथा अ्रर्थ के पलग-प्लग प्रलद्धार है' [अपने काव्यालङ्गार ग्रन्थ के] प्रारम्भ मे ऐसी प्रतिज्ञा करके घत 'काव्य ही अ्तद्धार हँ' इस प्रकार का उपसहार करने में 'उपरुम तथा उपसहार का विरोध' रूप दोष प्रा जाता है।

३-अथवा यदि 'दिखलाए है स्पप्ट रूप से शृद्धार आरदि [रस] जिसने' इस प्रकार का समास [करते] है तो भी 'वह [यन से सूचित होने वाला] कौन है' यह बतलाना ही होगा। प्रतिपादन का वैचित्र्य ही 'वह' है यदि यह कहो तो उसका भी भली प्रकार समर्थन नहीं किया जा सकता है। कयोकि 'प्रतिपाद्यमान' [शलङ्धायं] से भिन्न उसकी शोभा का कारण भूत [प्रलद्धार रूप ] 'प्रतिपादन का वचित्र्य' अल्लग ही मानना होगा। न कि अ्रलद्धार्य ही [अ्रलद्धार हो जायगा ]।

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कारिका ११ ] तृतीयोन्मेप [ ३४१

स्पष्टतया दशितं रसानां प्रतिपादनवैचित्र्यं वद्यभिधीयते तद्पि न सुप्रतिपादनम्। स्पष्टतया दर्शने शङ्गाराठीना स्वरूपपरिनिष्पत्तिरेव पर्यवम्यति । किद्व्र रसवतः काव्यस्यालद्वार इति तथाविधस्व सनस्तस्यासाचिति न किश्व्िवनेन तस्याभिधेयं स्यात्। अ्थवा तेनेवालङ्कारेग रसवत्व तस्या- धीयते, तदेवं तह्म सौ न रसवतोडलद्वार प्रत्युत रसवानलद्कार इत्यायाति। तन्माहात्म्यात् काव्यमपि रसवन् सम्पद्यते। यदि वा तेनैवाहितरससम्बन्धस्य रसवत काव्यस्यालक्वार इति तत्पश्चाद्र सबदलङ्कारव्यपदेशतामसा्यतति। यथाग्निष्टोमयाजी अस्य पुत्रो भवितेत्युच्यते। तदपि न सुप्रतिवद्धसमावानम्।

४ - [पथवा] स्पष्ट रूप से दिखलाया हुआ्र रसो का प्रतिपादन वैचित्र्य ही ['दशितस्पष्टशृङ्गारादि'] है।[ रसवत् अद्धार के लक्षण की ] यदि इस प्रकार व्याख्या कहो तो उसका प्रतिपादन भी भली प्रकार से नहीं किया जा सकता है। क्योकि शृद्गार श्रादि [रमो] के स्पष्ट दर्शन में [उनके] अपने स्वर्प की ही मिद्धि होती है। [उनसे अपरतिरिक्त अलद्धार प्रथत्रा अलङ्धामं किसी की भी मिद्धि नहीं होती है ]। पू-और रसवत् फाव्य का प्रलद्धार [रसवदलक्कार होता है] यह कहो तो उस प्रकार के [रमवत्]होने पर उस [काव्य]का यह [रनवत् भलद्गार] होता है इम [फथन] से उस [रसवदलङ्गार शब्द ] का कोई अर्थ नहीं निकलता है। अ्चवा उसी [रसवत्] अलद्धार से उस [कान्] को 'रसवत्' कहा जाय तो फिर वह 'रसवत् फा अलङ्गार' नहीं हुआपपितु 'रसवत् ही अ्रलद्धार' हुम्रा यह प्रयं निकलता है। उसके कारण [रसवत् ] काव्य भी रसवत् [घलद्गार] हो जाता हैं।[इसलिए रसवन् पद की इस प्रकार व्यार्या भी नहों की जा सपती है]।

६-प्थवा यदि उसी [घलद्गार] से जिस [काव्य] का रस के नाच सम्बन्य प्रतिपादन किया गया है उसी रमवन् काव्य या प्रलद्धार पीछे से 'रस्षयत् अतद्धार' नाम मे प्रयुवत होने लगता है। जैमे इनका पुन 'घग्निष्टोमपाजी' होगा। यह यहा जाता है। [इस प्रयोग में नद इन शब्द को प्रयुधन रिया जाता है उम समय पुत्र वे साथ पग्तिष्टोम याग पा वात्विक नम्पत्य नहीं है। येचन शव्द से द्वारा उसका फल्पित सम्बन्य पुत्न के साथ किया गया है। परन्तु याद पो जब दुय

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३४२ ] उपोपितजोनिनम् [फारिकिा ?१

यन्मान पग्निटोमयाणी गळ्द प्रथम भनलन्बभो विषयान्तर

लक्षणायोग्यतया तमनुभवितु अवनोति। न पुनरवर्य अथु्यत। चन्मादसवन काव्यम्यालद्वार इति तत्मस्वन्बितयनाग रवम्पलि ि। तन्सम्वन्चिनिबन्धनं च काव्यस्य रसवत्वमित्येवरमितरनगय्वशेप केनापगार्गते । यदि वा रसो निदते यम्यासी तवनलदार ग्वान्तु जव्वभिचीयते, तथायलद्वार काव्य वा नान्यन तृतीय किस्िततत्रास्ति। नतनद्वितयमपि प्रत्युक्तम। उद्ाहरण लन्नगी कयो गतेसव्वान य नविकलचते । अ्ग्निष्टोम याग कर लेता हैं तब उनको वास्तनिक र्व मे 'पग्निष्टोमयाजी' कहा जाता है। इसी प्रकार पहिने अलद्धायं फाव्य ही रसवत् होता है, बाद को उस 'रसवत काव्य' के साथ सम्बन्ध होने मे अलद्ार को भी 'रसवत' कहा जा सकता है। इस रूप में यदि रसवदलकार का ममयन मिया जाय तो बह भी मुसम्बद्ध समाधान नहीं होता हैं। क्योकि अग्निष्टोमयाजी शब्द पहिते [ग्रग्निष्टोमेन इष्टवान इम विग्रह में भूतकाल में 'भते' अप्टा० ३, २, ८४ इस अ्रष्टाध्यायी सून के अ्र्प्रधिकार में' करसे यज अप्टा० ३, २, ८५ इस सून से सिनि होकर शग्निप्टोमयाजी शब्द सिद्ध होता हैं] भतार्थ में निप्पन्न [सिद्ध] होने से [ जिस किसी ने पहिले सोम याग किया है उस ] श्रन्य विषय में प्रसिद्धि को प्राप्त हो चुका है। इसलिए वाद को 'भविष्यति,' 'होगा' इस वाक्यार्थ के साथ सम्बन्ध के योग्य होने से [ उस सम्बन्ध को अनुभव कर ] -सके साथ सम्वद्ध हो सकता है। परन्तु यहां [ रसवदलद्वार में] इस प्रकार का प्रयोग नहीं हो सकता है। धयोकि 'रसवत् काव्य का अलद्धार' इस प्रकार [के प्रयोग में] उस [रसवत् काव्य] के साय सम्वल् रूप से ही उस[रसवत् अलद्धार]को अपने स्वरूप की प्राप्ति होती है, और उस रसवदलद्धार] के सम्बन्ध से ही काव्य में रसवत्ता झाती है। इसलिए इतरेतराश्रय दोप का निवारण फौन फरेगा। ७-अथवा रस जिसमे विद्यमान हो वह रसवंत् [ फाव्य] हुआ उससे युक्त अलद्धार ही [ रसवदलद्धार है यदि यह सातवे प्रकार से रसवदलद्धार की व्याएगा] हो-तो भी [ जिसमें रस विद्यमान हो वह पदार्थ ] काव्य या अलद्धार ही हो सकता है उनके सिवाय तीसरा और कुछ यहाँ नहीं है। और उन दोनो पक्षो का खण्डन कर चुके है। [कि रसवान् 'अरलङ्धार' है तो 'अलङ्धार्य' अ्ररलग होना चाहिए और यदि 'अलड्कार्य' है तो 'अलद्धार' शलग होना चाहिए]। और उसके उदाहरण भी लक्षण के समान योग क्षेम वाले ही है इसलिए फिर दुबारा उनका विचार नहीं किया है।

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कारिका ११ ] तूतोयोन्मेष [ ३४३

यथा- पृतेति प्रेत्य सद्गन्नुं यया मे मरण स्मृतम्। सवावन्ती मया लव्वा कथमत्रैव जन्मनि ॥३६॥। अरपत्र रतिपरिप।पलक्षणवर्णानीयशरीर भूतायाश्चतवृत्तेर तिरिक्तमन्यद्वि- भक्त वस्तु न किव्व्िद्विभाव्यते। तम्मादलङ्कायेतेव युक्तिमती। यदपि कश्चित्-

इत्यनेन पूर्वमेव लक्षण विशेपितम्। तत्र स्वशव्दास्पदत्व रसानामपरि- गतपूर्व मस्माकम्। ततस्न एव रसमर्वस्वसमाहितचतसम्तत्पर मार्थविदो विद्वास जसे- [वासवदत्ता ] मर गई है ऐसा समभकर जिससे मिलने के लिए मैंने [प्रपने] मरण का स्मरण किया [ मृत्यु की इच्छा की ] उसी श्रवन्ती [वासवदत्ता ] को मेने इसी जन्म में कैसे पा लिया॥३६॥ [इसको दण्डी के काव्यादर्श २, २८० में रसवदलद्गार का उदाहरस कहा गया । है। परन्तु]यहां वर्णनीय के शरीरभूत रतिपरिपोप[अर्ात् शरृद्धार रस]रूप चित्तवृत्ति के श्रतिरि्त और कुछ अलग [अ्रलद्धार रूप ] वस्तु प्रतीत नहीं होती है। [औौर जो रतिपरिपोपरूप चित वृत्ति प्रतीत हो रही तै वह वणनीय पदार्थ की शरीरभूत होने से] उसको अलद्धारयता ही युक्तिसङ्गत है [अलद्गारता युक्तिमङ्गत नहीं है]। 'रतचन्' घलद्धार विपयक उन्धूट के मत का सण्डन- उन्भट ने पराने 'क्व्यानक्वार नार मयह' के चतुर्ष वर्ग की चौधी कारिका म रमवदनद्वार का नक्षणा किया है। उनका पूर्वार्द्ध भाग भामह के लक्षण ने मिलता हुआ हू। उनका उल्लेख ग्रभी कर चुके है। उसके उत्तराद भाग 'स्वनःदम्यायि 'सम्चारिविभावाभिनयातपदम् को आगे उद्धत कर उमका सण्टन वर्त हु। ८-और जो फिन्हीं [उन्धूट] ने [अपने काव्यालकारम'रसग्रह ये ४,४ में रसवदलकजार का यह लक्षणा किया है फि ]- १ स्वशव्द, स्थायोनाच, ३. सञ्चारिभाव, ४ विभाव तथा ५ अनुभाव : [अभिनय] में रहने वाले [रत यो स्पष्ठ रूप से द्शित कागने वाला रमवदलङ्गार होता है। ।।३७।। इस [कयन] से [उद्दूद ने अपनी कारिया के पूर्वव्व में पहँ हुए] पूर्व तक्षण की हा विशष मात्या थो हे। उनरे दिपय में [माना कहना यह है कि] रसो की र्वशद्दनिष्ठना हमने भ्राज तब नही मुनी है। इनलिए इन विषय में रन पे नरवस्ब [ को चिन्त्र] में एनालनित । ममाविन्य] पोर उनपे पतमार्य को

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४४ ] चक्रोफितिजीवितम् [ फारिफा ११

रं प्रष्टव्या-किं स्वशब्दास्पनत्वं रमानामुत रसवन इति। तत्र पूर्वम्मिन पच़े रस्यन्त इति रसा" ते स्वशव्दास्पदास्तेपु तिष्ठन्त शद्नारादिपु वर्तमाना

तदिदमुक्तं भवति-यत् स्वशब्ेरभिधीयमाना. श्रुतिपथमवत- न्तश्चेतनानां चर्वएचमत्कार कुर्वन्तीत्यनन न्यायेन घृतपरप्रभृतय उदार्थाः स्वशन्दैरभिधीयमाना तदास्वादसम्पद सम्पादयन्तीत्येव सर्वस्य

पन्यसम्पत्सौख्यसमृद्वि: प्रतिपाद्ते इति ्ते म्' नमभने वाले उन्हीं [उन्ट आदि] विद्वानों से यह पूछना चाहिए कि स्वशन्द-निष्ठत्न केसका होता है ? रस का प्रथवा रसवत् [श्लद्गार] का ? उसमें से पहिले [शर्यात् रसो की स्वशन्दनिष्ठता के] पक्ष में [व्युत्पति के अनुसार] 'जिनका पास्वाद किया जाता है वे रस होते है'। वे स्वश्दनिष्ठ हे [शरर्थात् रस शब्द से उनका श्रास्वाद केया जा सकता है यह रसो के 'स्वशच्वास्पदत्व' का श्र्रयं हुआ््रा]। इसलिए उन [शपने वाचक शब्दो] में रहते हुए अर्यात् शृद्गार आरादि [शब्दो] में वर्तमान होफर उसके तानने वाले [रसज्ञो] के द्वारा आ्रस्वादित किए जाते है। [यह मानना होगा]। इसका यह भभिप्राय हुआ कि अपमे वाचक शब्दों के द्वारा कहे जाकर [श्रो ... हारा] श्रवस से गृहीत होते हुए [शृङ्गार आदि शब्द ], सहृदयो को [ रसो के ] सस्वाद का श्रनन्द प्रदान करते है। इस युक्ति से तो छुतपूर [घेवर या हचौड़ी ] आदि [खाद्य] पदार्थ [अपने नामों से कहे जाने पर] नाम लेने मात्र से घाने को आनन्द देने लगते है [ यह सिद्ध हो जावगा]। इस प्रकार उन उदार चरित महाशयो ने [ यह व्यङ्जयोित है] किसी भी पदार्थ के उपभोग का दुख प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले सभी व्यवितियों के लिए, उस पदार्थ का नाम नेने मात्र से त्रलोक्य के राज्य प्राप्ति तक के सुस की प्राप्ति चिना प्रयत्न के सिद्ध कर दी है। इसलिए उन महापुरुषो को नमस्कार है। इसका अपभिप्राय यह हुआ कि रस तो उसको कहते है कि जिसका आस्वादन कया जाय। उसको यदि स्वशब्द-वाच्य माने तो शृद्गारादि शब्दो के श्रवण मात्र शुद्गार का आ्र्स्वाद होने लगेगा यह मानना होगा। और यदि एक बार इस सद्धान्त को मान लिया जाय तो प्रत्येक पदार्थ के नाम मात्र के लेने से उस पदाथ काआस्वाद हो सकेगा यह भी मानना होगा। इसका अर्थ यह हुआकि रस को वशब्द-वाच्य मानने से नाममात्रत भोग प्राप्ति का सिद्धान्त सिद्ध हो जायगा। गौर शैलोक्य के राज्य का सुख भी बिना प्रयत्न के नाम के लेने मात्र से ही हाप्त होने लगेगा। यह असम्भव है। इसलिए पृङ्गारादि शन्दो से

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कारिका ११ ] तृतीयोन्मेप [३४५

रसवतस्तवास्पठत्वं नोपपयाते, रसस्वैव स्ववाच्यस्यापि तटास्पदत्वा- भावात्। किमुतान्यस्येति। तटलङ्वारत्वञ्च प्रथममेव प्रतिपिद्धम्। शिष्टं स्याय्यादिलक्षणं पूर्व व्याख्यातमेवेति न पुन. पर्यालोच्यते। यदपि- रसचद् रससश्रयात् ॥३८॥। इति कैश्चिल्लन्तगमकारि. तदपि न सम्यक् समाधेयतामधितिप्ठति'। तथा हि, रस सश्रयो स्यासी रससश्रय', तस्मात्काररदयं रसवदलद्वार: सम्पद्यते। तथापि वक्तव्यमेव काऽसी रसव्यतिरिक्तवृत्ति पदार्थः । काव्य- मेवेति चेत् तढपि पर्वमेव प्रत्युक्तम्। तस्य स्वात्मनि क्रियाविरोधादलद्वार-

रसो के स्वगन्द वाच्य होने पर रसवदलद्वार मानने का सिद्धान्त उचित नहीं हे। उन्डट के मत का खण्डन करते हुए १ रस की प्रथवा २ रसवत् की स्वशन्द निष्ठता हो सबती है, ये दो विकल्प किए थे। उनमें से प्रथम विकल्प का खण्डन करने के बाद भव द्वितीय विकल्प का खण्डन करते है- औरर रसवत का तदास्पदव [अर्थात् रमादि शच्द निष्ठत्व ] नहीं वन सकता है। स्वशब्द [रस शब्द] से वाच्य रसादि के भी तन्निष्ठ न होने से, धन्य [रसवत्] की तो बात ही यया है। औ्रौर [ रस के अ्रल्रङ्धायं होने से ] उसके अलद्धारत्व का सण्डन पहिले हो कर आए है। शेप रथायी भावादि के लक्षस फी न्यारया पहिले कर छुफ है इसलिए फिर दुवारा उनको आलोचना नहीं करेंगे। ह-और जो- नस के सश्रय से रनवत्' [अलद्धार होता] हैं। यह पिन्हों [दाण्डी आ्रादि] नेजो [नवम प्रफार का] लक्षण किया है उसका भी भली प्रकार से समाधान नहीं पिया जा सफता है। दयोंकि 'रस जिमका सथय ह वह रमसश्रय है'। उस [ रससक्षय रप ध्रन्थ पदार्थ] के पारस से यह रसवदलकार होता है। फिर नी यह बतलाना ही होगा कि [रत मधय है जिमयत] यह रस से व्यतिरयत कॉन सा ददार्थ है [जिसपा सध्य रस है]। काव्य हो [बह रस सश्य ददार्थ]है वह महो तो उसपा सण्टन पहिले ही पर चुषे है। [कि याव्य भलक्ुार नहीं है, मान्य के एफ देश शब्द या घर्य मे धर्म ही पलद्धार होते ह। पत पाव्य यो र्छदसद्वार पहमा दुषस्कृत नहीं है]।घर उम [षाव्य] मे अपने १ 'ममाधीपतामनितित' यह प ठ ममनृत था।

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३४६ ] वक्रोपितिजीवितम् [कारिका ११

त्वानुपपत्ते । अथवा रसम्य सश्नयो रनेन सश्रीयते चम्नम्मान रसमश्रयादिति। तथापि कोSसाविति व्यनिरिकि्तित्वेनवक्नव्यतामेवायानि। उवहरगाजानम प्यस्य लक्षास्य पर्वगा समान योगनेमप्रायमिनि न पूबक पर्याल।-यते। रसपेशलम ॥३६॥ इति पाठे न किश्त्रानिरिन्यते।

ही भीतर [शलद्धरस रप]प्रिया का विरोध होने से [पतद्गारय मान्य का]मलक्वारत्व नहीं हो सकता है। [शर्थात् काव्य या फोई भी पदाय जिसे प्राप रमनत् महोगे वह म्वम ही अलङ्धारयं तथा श्रलद्धार दोनो हो, यह तो नहीं हो सकना है]। रस सश्रयात् को दूसरी व्यारया- १०-अथवा रस का सश्रय [ रसमश्रय यह पण्ठी तत्पुर्ब समास ] या रस जिसका आ्ाश्रय ले वह [ रस सश्रय हुआ्रा] उससे [यह रमवत् रसस्रयात् का भ्ररयं हुआ।। फिरि भी वह। रस का सश्रय या रस जिसका आ्राश्रय ले ऐसा।कौन ता पदार्थ है [जिसको रसवत् प्रप्रलद्धार फहा जा सके] यह फहना ही होगा। [परन्तु वह फाव्य के अतिरिषत और वुछ नहीं हो सकता ह और काव्य को रसवत् अ्रलद्धार मानने में उपक्रमोपसहार के विरोध हो जाने से उसका सण्डन हम पोहिले ही फर चुके हं। इसलिए 'रसवत् रससश्रयात् यह भी रसवदलङ्वार का लक्षणा ठीक नहीं कहा जा सकता है]। और इस लक्षणा के उदाहरण भी लक्षणा के समान योगक्षेम वाले ही है इसलिए उनकी अलग आलोचना करने की आ्वश्यकता नही है। [११-दण्डी के काव्यादर्श २, २८० में कही 'रसवत् रससश्रयम्' इस प्रकार का पाठ पाया जाता है और कहीं उसके स्थान पर 'रसवव्रसपेशलम्' इस प्रकार का पाठ मिलता है। परन्तु रसवत् प्रलद्धार के इस लक्षण मे 'रससश्रयात् के स्थान पर ]- रसपेशलम्- इस पाठ के मानने पर भी यहां [पूर्व लक्षण से] फोई विशेष भेद नहीं होता है ।।३६ ।। १२-और यदि प्रतिपादक वाक्य में [उपारूढ] प्रतीत होने वाला पदार्थ समूह स्वरूप 'अलद्धार्य' ही रस के [स्वरूप के अनुप्रवेश प्र्प्रथात्]सम्बन्ध से [जैसे रूख- सूखे वृक्ष आदि रस के अनुप्रवेश से भरे भरे सुन्दर और शतकृत हो उठते है। इसी प्रकार [रसानुप्रवेश से] अप्रपने [रूखे सूखे, अलङ्धार्य भूत]स्वरूप को छोडकर[वृक्षादि]द्रव्यों के १ 'व्यक्तव्यत मेवायाति' पाठ प्रशुद्ध था। # लुप्त पाठ-सूचक चिन्ह हैं।

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फारिका ११ ] तृतीयोरमेप [३४७

विगलितस्व्रपरिम्पन्दानां व्रव्यानां इव अल्करसं भवतीत्येतवपि चिन्त्यमेव। किञ् तथाऽभ्युपगमेऽपि प्रधानगुगभावविचर्यास पर्यवस्यतीति न किष्िदेतत्। अत्रैव उपक्रमते 'शव्दार्थासङ्गतेरपि'। शब्ार्थयोरभिघानाभिधेययो- रसमन्वयाच्च रसवटलद्वारोपपत्तिनोन्ति। श्रत्र च रसा विद्यते तिष्ठति- यस्येति मत्त्यये बिहिते तस्यालद्वार इति पष्ठीसमास क्रियते। रसवांश्चा- सावलदाएचेति विशेपणसमासो वा। तत्र पूर्वम्मिन् पन्ते रसव्यतिरिकतं किमन्यत पदार्थान्तर विद्यते चन्यासावलक्कार। काव्यमेवेति चेतु तत्रापि तद् व्यतिरिक्त. कोडमो पवार्थो यत्र रसचटलद्वारव्यपदेश. सावकाशता प्रतिपदते। विशेपातिरिक्त. पदार्थो न कश्चित् परिदश्यते चम्तद्वानलद्दार इति व्यवास्थति- तमान [प्रतिपादक वाषय से उपस्थित पदार्य भी त्ररलद्धायंत्व को छोड़फर] कथज्चित् अरतद्धार हो सकते है। यह कथन भी चिन्त्य ही है। औरर यदि [दुर्जन तोष न्याय से ] यह मान भी ते तो भी [ प्रधान भूत अलङ्धायं के अ्नलङ्गार रूप में गौला हो जाने पर ] गुए प्रधान भाव का परिवतन हो जाता है। इसलिए यह कुछ [ मान्य सिद्वान्त ] नहीं बनता है। वहा तक ११वी कारिका में दिए हुए 'स्व्पादतिरिकतस्य परस्याप्रतिभामनात्' इम अ्रम की व्यास्या हुई। अनी वारिका में दिया हुआ दूसरा हेतु 'गब्दार्थामङ्भतेर पि' व्यान्या के लिए गेप रह गया है। उसकी व्याग्या परने के लिए उपकम करते है। 'शब्दार्थासस्भुतेरपि' शब्द धोर अर्व की अ्रमस्सति होने से भी [रस्वत् अल- द्वार नहीं है। शन्द और अर्य का प्र्ात् वाच्य और वाचक का समन्वय [सन्गति] न होने से भी रसवदलड्ार नहीं हो सता है। यहां [रमवदलद्गार इस नाम में ]रम जिसमें रहता हैं [इम विग्रह में रस शब्द से] मतुप प्रत्यय करने के बाद उस [ रसवत्] या भलद्टार यह पष्ठीततपुरय समास [रसवदतद्गार पद मे ] किया जाता है। अथवा 'रसवान् जो अलक्कार' इस प्रकार का विशेपस समाल [कर्मधारय समास] किया जा सकता है। उनमे से पहिले [ पा्ठीतत्पुरप समाम ] पक्ष में रस फो छोडफर [रन जिसमें रहता हैं वह 'रसवत्'] फोन-ना पदार्य ह जिसका यह। [रसरत्] घतक्ान होता है। [वह रसव्यतिरियत मदार्य ] फाव्य ही है यह हो तो उस [दाव्य] में भी उन [प्रवकय पाव्य मे निल्न शीन ना पदार्थ है जिनमें 'रसवत् का थतदूर यह नना सार्यक हो तके। ['मनन्दाय' तरा 'घलद्गार' दोगो फो शल्रग-मलय प्रतीनि होने पर हो इस नाम को नार्यवता हो मयती हूँ]। श्रीर पोई विदाय वनिरितत पदाम दिवलाई नहीं देता है जिममें रतवदलकार १. चहा पृर्व सस्फरण में ध्यम पह सधिर पाठ तवा लुन पठका चिन्ह था। न महनतमय बिहिते पाठ था। 2. व्यतिरिदनमन्बन् पाठ या।

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३४८ j वकरोकितिजी वितम [ फारिका ११

मासाव्यति। तवेवमुक्तलनणे मार्गे स्सवदलद्ारन्य गव्दार्थसन्गनिर्न 'काचिटकति।

पद प्रयुकत [या सार्यरु] होसे। इमलिए दस [पाठोनवगव समाम के]मा्ग में रसवदतद्गार शन्द तथा [उमके।अर्यं को कोई मनन नहीं होती है। [भर्यात् रसवत् कोई अलग पदार्य सिद्ध हो जाय तत्र तो उमका सनद्वर इम प्रकार पा पष्ठीतत्पुरुष समास हो सकता है। जत रनय या रस क सनित्यिन प्रत्य फोई रमवत् पदार्थ दिखलाई नहीं देता है तब 'रसवन् का ग्रलक्कान' दूर शध्य तथा श्ररयं की सझति नहीं बनती है। इमनिए रसनदनद्वार सिद्ध नहीं होता ह]। धतन्यालोककार के मत का सण्डन- 'शब्दार्थासङ्गतेरगि' इस कारिका भग की व्याप्या रते तए ग्रयवार ने 'रसवदलद्ार' इस पद में दो प्रकार के समास किए ने। ए पाठीनतपुन्प समान और दूसरा कमधाग्य समास। उनमें से पष्ठी तत्पुन्प समास ये पक्ष मे ऊपर दोप दिसलाया है। विशेपण समास या व मवाग्य समाम के पक्ष में दो मागे पृ० ३५० पर दिगलावेंगे। इस बीच में ध्वन्यालोकगर के मत के मण्टन करने के लिए उनके द्वाना प्रसुन किए हुए रसवदलद्धार के उदाहरणो की विवेबना कगते है। ध्वन्यालोककार ने 'रसवदलद्वार' का लक्षणा इस प्रकार किया है- प्रधानेऽ्न्यत्र वाकयार्थे यनाङ्गन्तु रमादय । काव्ये तस्मि नलद्वारो रमादिरिति मे मति ॥ -हवन्या नोरु २,५। इसका अभिप्राय यह है कि जहाँ किसी अन्य वन्नु आदि की प्रधानता हो श्रीर रस उसका अ्रद्ध हो वहां मेरी अर्थात् ध्वन्यालोककार आ्र््रानन्दवर्वन की सम्मति में रसवदलद्वार होता है। धवन्यालोककार ने इस प्रकार के तीन उदाहरण दिए है जिनमें से दो उदा- हरण [श्लोक स० ४०, ४१] यहां कुन्तक ने उद्धृत किए हे। ध्वन्यालोककार का मत यह है कि इन दोनो उदाहरणो मे नायिकाओ पर क्रमश लता तथा नदी रूप वस्तु के आरोप के कारण रूपक का प्राधान्य है। और उन दोनों में जो शृद्धार रस की प्रतीति हो रही है वह उस रूपक के श्रङ्ग या उसके परिपोषक रूप में ही होती है इसलिए अरप्रधान है। अ्रत यहां रस की प्रतीति अलद्धार के परिपोषक रूप में अप्रधानतया होने से ये दोनो श्लोक रसवदलङ्कार के उदाहरए है।

१ पुराने मस्करण में 'काचिदस्ति' के स्थान पर 'कदाचिदस्ति' यह पाठ था। परन्तु उसकी अपेक्षा 'काचित्' पाठ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।

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कारिका ११ ] तृतोयोन्मेष [ ३४६

यदि वा निदशंनान्तरविपयतया समासद्वितर्यऽपि शब्दार्थसह्गतियोजना विधीयते।

यथा-

तन्वी मेघजलार्द्रपल्लवतया धौताघरेवाश्रुभि. शून्येवाभरणो: स्वकालविरहाद् विश्रान्तपुप्पोद्गमा। चिन्तामौनभिवास्यिता मधुकता शव्देविना लक्ष्यने चराडी मामवधूय पादपतितं जातानुतापेव सा ॥४0॥

कुन्तक इन दोनो उदाहरणो को प्रस्तुत कर पूर्व पक्ष की ओ्र्रोर से पहिले यह सिद्ध र रहे हे कि रसवदलद्वार इस नाम में चाहे पछ्ठी समास माने अ्रथवा विशेपण गास माने दोनो पक्षों मे शव्द और अर्थ की असङ्भति नहीं होती है। रनवतो नदार इन पषीतत्पुस्ष समान पक्ष मे रसवत् वन्तु लता तथा नदी 'म्रनद्धायं' दुई रत्पक उनका अतक्कार हुषा इन प्रकार रनवदलद्वार में शब्द तथा प्रर्थ की ननि हो जाती है। और रसवास्चासी अलद्धार' इस विशेषण नमाम पक्ष में कालदूार के नाय रन का सम्बन्ब होने मे वह रमवदलक्वार होता है। इसलिए सा भा पक्ष मे नब्द तथा अर्थ की अननति नहीं है। रस पूर्व पक्ष का खण्डन रने ने लिए पहिले उनका उपपादन करत हुए कुन्तक प्रागे लिखते है वि- अरयवा यदि[रसवतो अतद्धार रसवदलद्गार, इन पा्ठी समान पक्ष में र'रसगरचानी अलद्धार रनवदलद्वार' इन विशेषणा समाम या कर्मधारय नाक्ष] दोनो ही समातो में अत्य उदाहरणो के विषय रूप में [ रनवत् औौर श्त्त- र दोनों के ] शब्द तथा घर्य की सस्गति लगाई जाती है- जमे- प्रत्यन्त प्रपुपित हुई [चण्डी] तन्वी [ उबशी] पंरो पर गिरे हुए मुक को ररकृत परफे [मेरी उपक्षा यर्के] चले जाने से पारस [पोछ मे होदा मे प्राने :] पहताती हुई पश्चालप मे यप्त होफर, शासुभो ने भोगे हुए घघर के समान श पे पानी से नीगे हुए विमनयो को धारता लिए हुए, [फनो ये मिसनें का] मय [ऋतुपाल] न होने से दुप्नों मे उद्गम से रहिन, प्रानरतपून औोर भौगे के न्द के प्रभाय में पिन्ता से मौन सडी हुई [लता रप में] दिसताई दे रही है॥४

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३५० ] [फारिका ११

यथा वा- तर्हम्र मन्त। सुमितविहग न्रेिरशना विकर्पन्ती फेन वस्नामन भर्मशिनिलम। यथा विद्व' याति स्सलितमगसन्धाय वहशा नदीभावेनेय भ्र चमसहना सा परिणता ॥४?॥ अ्त्न रसवत्वमलद्वारन्च प्रवट प्रतिभामेते। तम्मान्न क्यक्रिपि तद्विवेकस्य दुरवधानता। तेन रमवतोडलद्वार ति प्ठीसमासपने शव्तार्थचोर्न

रसपरिपोपपरत्वादलद्वारम्य तन्निबन्धनमेव रसवलम्।रसवास्चासाव- लद्गरश्चेति विशेपणसमासपन्ने, १अपि न किन्चिदसद्गतलम । प्रथवा जैसे- टेढ़ी भौँहो के समान तरङ्गो को और [रदाना] के तगी समान क्षुद्ध पक्षियों की पषत को घारस किए हुए प्रोधावेश मे सिसके हुए वस्त्र के समान फेनो को खींचती हुई, वार-बार [द्वत आादि या ऊँची भूमि बी] ठोकर साफर [यह नदी] जो टेढी चाल से जा रही है सो जान पडता हैं कि मेरे श्रनेयो त्रपराधो का देसकर रूठी हुई वह [उवशी ही] नदी रूप मे परिणत [बदल] हो गई हो [मानो उवंशी ही नदी रूप में वह रही हो]।।४१। [ इन दोनो उदाहरणो में नदी तथा लता रप वत्तु श्रलग प्रतीत होती है, उनके साथ शद्गार रस का सम्बन्ध है। परन्तु वह रस कूरय नहीं है। नायिका पर लता तथा नदी रूप वस्तु का आरोप होने और रस के उनका श्रद्ध होने से वे बोनों वस्तुएँ 'रसवत्' और्रौर 'अलङ्गार्य' हुई तथा रूपक अ्रलद्धार हुआर्र।] यहां रसवत्व औ्र््रौर अ्ररलङ्धारत्व दोनो अर्प्रलग-अ्रलग, स्पप्ट प्रतीत हो रहे हं। इसलिए [ऐसे स्थलों में रसवदलद्ार के स्पष्ट होने से] उनके अ्न्तर को समभना कहीं भी कठिन नहीं है। अतएव 'रसवत्' [नदी लता आदि] का अ्रलद्धार [भूत रूपक] इस पष्ठी समास पक्ष में शब्द और श्रर्थथ की कोई अ्सङ्गति नहीं है। [ नायिका के ऊपर नवी भाव अ्रथवा लता भाव के आरोपमूलक रूपक ] अलद्धार के रसपरिपोषपरक होने से, उसी [रस] से उस अ्लद्धार का रसवत्व होता है। [इस कारर] रसवान् जो अलद्धार[ वह रसवदलद्धार होता है ] इस विशेषण समास [कर्मधारय] के पक्ष में भी [शन्द तथा अर्थ की] कोई अ्सङ्गति नहीं है। १ पूर्व सस्करण मे यहा त्रुटित पाठ के सूचकविन्दु दिए है। हमने प्रसङ्गानुसार उस पाठ की पूर्ति कर दी है। इटलिक मे दिया पाठ हमारा बनाया हुआ है।

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फारिका ११ ] वृतीयोन्मेष [ ३५१

तथा चैतयोरुदाहर एायोर्लताया सरितश्चोदीपनविभावत्वेन वल्लभाभावितान्त करणतया नायकम्य तन्मयत्वेन निश्चेतनमेव पार्थजाते सकलमवलोकयत. तत्साम्यसमारोपण तद्वर्मा्यारोपणं चत्युपमारूपक- काव्यालद्वारयोजन विना न केनचिन प्रकारेण घटते तल्लक्षसावाक्यत्वात्। सत्यमेतन किन्तु अलक्वारशव्दाभिधानं विना विशेपरसमासपक्षे वेवलस्य 'रसवान' इत्यस्य प्रयोग प्राप्नोति। रमवानलद्वार इति चेत प्रतीनिरभ्युपगभ्यते तदपि युक्तियुकतता नार्हति ढेरभावान।

इस प्रफार इन दोनो उदाहरखों में लता और नदी के उद्दोपन विभाव होने से, और नायक [पुरुरवा] के [ अ्रपनी बल्लभा ] प्रियतमा [ उरवशी ] की भावना [या चिन्ता] से प्रभावित अ्र्त फरण मे युषत होने के कारस तन्मय [उवंशी- मय] होने से [हर समय चारो ओोर उर्वशी के ही दिसलाई देने से नदी और लता जसे] हराक प्रचेतन पदार्थ को देपकर उसके साम्य का अ्रध्यारेपण प्रथवा उसके धर्म का अध्यारोपस उपमा तथा रपक अलद्गार की योजना के बिना औ्रर किसी प्रकार से नहीं घटता है। [षयोकि साम्यारोपण में उपना, नौर उसके धर्म के प्रारोप में रुपक अलद्धार होता है इस प्रकार] उनका लक्षसा वाक्य होने से। [शतएय यहा नदी तथा लता पदार्थ अलङ्कार्य हुए, उपमा तथा रपक प्रलद्धार हुए। औ्र्प्रर नदी तथा लता पदाय के साथ भृद्धार रस का मम्बन्ध होने से वे पदार्थ 'गसवत्' है। उनका पलद्धार ररुवदलद्धार हो सपता है। इसलिए उपमा या रूपक फो रसवदलद्वार मानने में कोई दोष नहीं है। यह रमयदलद्वार को मानने वाले पूर्व पक्ष का ओ्रोर से वहा जा नवता है ।। रग पूर्व पक्ष वा उत्तर देने हुए वन्ता अपने मिद्ान्त के नमर्थन मे प्र्थात रसवदद्व्वार के व्डन में निसने हं- [उत्तर] ठोप है। विन्तु [रमवाशचासी अलक्धारमच इस प्रकार फे कर्मधारय मचवा] विशेषण सनास पक्ष में भतद्धार शब्द के प्रयोग को छोडकर मेवत 'रसवान् है' इनका हो प्रयोग प्राप्त होता है। [पर्त् रनवदतकार पहने में न्म की मुर्यता नहीं रहती है रस गौरा हो जाता ( इसलिए उसके स्थान पर यह प्लोफ 'रमवान्' है यह हो कहना उचित है। यह पभिश्ाय है]। 'समवान् अ्रतद्गार है' ऐमी प्रतीनि [रसवदलद्वार शव्द से] यदि मानी जाय तो भी युवितयुपत नहीं हो मक्ती है। इमये पागे मृन ग्रम्म की कुछ पतिनयाँ सप्त है। अनित मा अपनी वान मे सिद पन्ने मे लिए प्र्पकार ने तवर विशेष हेतु दिया यह नही कहा ना

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३५२ ] यघ्ोपितिजीवितम् [फारिका ११

रसवतोऽलद्वार इति पप्टीसमासपन्तोजपि न सुम्प्टसमन्वय। चम्य कस्यचित् काव्यत्वं रसवत्वमेव। यम्यानिशयत्वनिवन्धन तवाबिव तद्विदाहाद- कारि काव्य करीयमिति तम्यालद्वार उत्यान्रित सर्वेपामेय रूपकादीर्ना रसवदलद्वारत्वमेव न्यायोपपन्नता प्रनिपदांत। अलवारन्य वम्य कम्यचित रसवत्वात। विशेपणसमासपक्षेऽयपेव वार्ता। किञ्च तदयुपगमे प्रत्येकमन्सलितलनतगोल्लस नपरियोपतया लव्धात्मनामलद्वाराणा प्रतिस्विकल क्षणाभिहितातिरा यव्यतिरिक्तमनेन किश्रिदा

मकता है। अ्न्त में केवल 'देरभावान्' यह अ्रक्षर पाण्डुलिपि में पटने में ग्राए है। बीच का भाग पढने में नही आया है। इसलिए इम स्थान पर ठटे तए पाठ की सूचना के लिए मूल में हमने विन्दिरया लगा दी हे। 'रसवान् का अलङ्गार' इस पप्ठी समास पक्ष का भी स्पष्ट रूप मे समन्वय नहीं हो सफता है। क्योकि िसी भी काव्य म रसवत्व ही उसका काव्यत्व है। जिस [ रसवत्व] के प्रप्रतिशय के लिए ही उस प्रकार के सहदयहृदयाह्ादकारक फाव्य की रचना की जाती है। इसलिए उस [रसवत काव्य]का ब्रलङ्गार [रसवदलद्वार कहलाता है] ऐसा पर्थ लेने पर तो स्पक आ्र्प्रादि सभी अ्रलद्धारो का ही रसवदलद्भाग्त युक्ति- सङ्भत होता है। सभी अलद्धारो के [रसवत् काव्य मे प्रयोग होने के कारण] रसवत् होने से। [ रसवाश्चासी अलद्धार रसवदलङ्गार इस ] विशेषण समास [कर्मधारय समास] में भी यही बात है [प्रर्थात् सभी अलद्धारो के रसवत् काव्य में प्रयोग द्वारा रसवान् होने से सभी फो रसवदलद्कार मानना होगा ]। इसका अभिप्राय यह है कि रसात्मक वाक्य ही सहृदयहृदयाह्लादक होने से काव्य कहलाने योग्य होते है। इसलिए प्रत्येक काव्य रसवत् काव्य होना है। अतएव रसवदलद्वार शब्द में चाहे पष्ठी समास माने या विशेपण समास माने दोनो दशाओ में रसवत् काव्य मे प्रयुक्त होने वाले सभी अलद्धार रसवदलद्कार कहलावेंगे। अ्र्पत अलग रसवदलद्वार नही हो सकता है। औ्रौर ऐसा मान लेने पर [ शर्थात् सभी अलद्धारो को रसवदलङ्गार मान लेने पर धथवा रसवदलद्धार की सत्ता मान लेने पर ] प्रत्येक भलद्धार के शुद्ध [अस्खलित ] लक्षणो के निरूपण से परिपुष्ट रूप में अपने स्वरूप को प्राप्त करने वाले अलद्धारो के अपने-अपने लक्षणो में कही हुई विशेषताओं *पुष्पाद्ित स्थल पर कुछ पाठ लुप्त है ऐसा सकेत पूर्व सस्करण में पाया जाता है।

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कारिका ११] तृतीयोन्मेष: [३५३

धिक्यमास्थीयते। तस्मात् तल्लक्षणकरएवैचित्र्यं प्रतिवारितप्रसरमेव परापतति। न चैवंविधविपये रसवदलङ्कारव्यवहारः सावकाश, तज्जैम्तथाव- जमात्, अलद्गाराणां च मुख्यतया व्यवम्थानात। अथवा चेतनपदार्थगोचरतया रसचद्लद्वारस्य, निश्चेतन वस्तुविपियत्वेन चोपमादीनां विपयविभागो व्यवस्थाप्यते तदपि न विद्वज्जनावर्जनं विद्धाति। यस्मादचेतनानानपि रसोद्दीपनसामर्थ्यसमुचितसत्कविसमुल्लि-

के प्रतिरयत इस [ रसवदलद्वार] से उनमें कुछ अधिक्ता स्थापित की जाती है। इस कारण उम [श्लग-भनलग] अलद्गारो के लक्षस करने के वचित्र्य में वाधा उपस्थित होती है।[अर्ात् जव सब ही अलङ्गार रसवदलद्गार है तव उनके अलग-मलग लक्षण करने की घया आवश्यकता है? सबका एक ही तक्षस हो सकता हैं। इसलिए रसवदलद्धार का मानना उचित नहीं है।] फिर इस प्रकार के उदाहरणों में [जहां अन्य प्लद्धार विद्यमान है] रसव- दतद्वार का व्यवहार करने का अवसर भी नहीं है। क्योकि अ्रसद्धार शास्त्र के ज्ञाता वैसा ही स्वोकार करते हैं[ अर्यात् अ्रन्य अतद्गारों के साथ रसवदतद्वार को न मानकर अलग-मरलग अलद्धारों को हो मानते हैं]। औ्ररौर [ अ्रन्य ] प्रलद्धारो को ही मुश्य रप से रसते हैं।[ इसलिए अन्य अलद्गारो के स्थान पर रसवदलङ्गार नहीं माना जा सकता है। फलत सब पक्षो का सण्डन हो जाने से रसचदलद्ुार का फोई विषय नहीं रह जाता हैं। इसलिए रसवदलद्गार मानना उचित नहीं है]। उपमा आरादि तथा रसवदलद्गार के विषय विभाग का सण्डन- अथवा चेतन पदार्थ के [रसादि के वर्न के ] विषय में रसवदतद्गार होता हैं और स्र्रचेतन पदार्थों के वहन में उपमा आदि अन्थ अलक्कार होते हैं इस प्रकार [रसवदलद्गार तथा उपमादि मलद्धारी का] विषय विभाग [कुछ लोग] करते हैं। वह भी विट्वानों के चित्त को श्र्क्षित नहीं करता है। पररयात् युवितिमन्भत नहीं है]। क्योकि प्च्ेतन पदार्थों में भी रस के रद्दीपन की सामर्थ के योग्य, सतकवियों द्वारा समुत्लिसित सुयुमारता और सरमता होने से [ उनपे साथ चेतन -सम्बन्य हो जाने पर प्रचेतन विषयक] उपमा आदि अ्रन्न अतक्जागें को प्रविरत- विपयता प्रयवा निदिषयता हो जावेगी। [क्योकि स्रवेतन पदार्यों के साप किमी-न- किसी रूप में चेतन का सम्न्य पवश्य जुछ जाता है। औरर चेतन का सम्बन्ध होने पर रसवदतद्वार ही हो जायगा। तब उपमादि श्रव्य अनद्धागें से लिए सोई रप न नहीं निष्स मयेगा। और यदि यहों फोई भवमर मिला भी तो बटन फम श्यमर

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चकोषितिजीवितम् [कारिफा ११

खितसौकुमार्गसरसत्वादुपमादीना प्रविरलविषयता निविषयन्व वा न्यादिति शृह्गारादिनि स्यन्दसुन्दरस्य सत्कविप्रवाहम्य च नीरमत्व प्रमन्यन इनि प्रतिपाितमेव पूर्वसूरिभि ।

मिल सकेगा। इसलिए 'उपमादीना प्रविरलविषियता निविययता या स्यात्'। उपमा आदि के उदाहरण बहुत कम मिलेंगे अथवा मिलेंगे ही नहीं। और यदि श्रचेतन पदार्थो में किसी प्रकार भी रस का सम्बन्ध न माना जाय तो] शजार ग्रादि के प्रवाह से मनोहर सत्फियो के बहुत-से श्रचेतन पदार्यों के वर्णन [ उन श्रचेतन पदार्यों में रस का सम्बन्ध न होने से ] नीरस हो जावेंगे। यह पहिले निद्वान्[श्रानन्दवघन ध्वनयालोक पृ० १२८ पर ] फह ही चुके है।[ इसलिए चेतन पदार्थ के सम्बन्न में रसवदलद्वार औ्रर प्रचेतन पदार्थ के सम्बन्ध में उपमा आादि म्रतद्धार होते है। इस प्रकार का विषय विभाग भी नहीं किया जा सकता है। अ्रत रसवदनद्वार के मानने के लिए फोई अवसर नहीं है यह ग्रण्थकार का अ्रपरभिप्राय है ]। यहाँ कुन्तक ने 'परतिपादितमेव पूर्वसूरिभि' वहकर 'पूर्व सूरी' शब्द मे 'धवन्या- लोवकार' श्री आ्रनन्दवघंनाचार्य की प्रोर सकेत किया है। ध्वन्यालोरवार ने रसव- दलद्वार के विपय में विस्तृत विवेचन किया है। चेतन पदार्थो के सम्बन्ध में रसवद- लद्वार और त्रचेतन पदार्थो के सम्बन्ध मे उपमा आरदि अन्य भलद्धार होते हैं। इम प्रकार की विपय-व्यवस्था का आ्र्प्रानन्दवधंनाचार्य ने विस्तारपूर्वक सण्डन किया है। कु तक ने इस सिद्धान्त का वही खण्डन लेकर यहाँ रख दिया है। ध्वन्यालोक में इस विषय की चर्चा इस प्रकार हुई है- यदि तु चेतनाना वाकयार्थीभावो रसाद्यलङ्कारस्य चिपय इत्युच्यते तहिं, उपमादीना प्रविरलविपयता निविपयता वाभिहिता स्यात्। यस्मादचेतनवस्तुवृत्त वावयार्थीभूते पुनश्चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजनया कथञ्चिद् भवितव्यम्। अ्रथ सत्यामपि तस्या यत्राचेतनाना वाक्यार्थीभावो नासौ रसवदलद्व्ारविषय इत्युच्यते, तन्महत काव्यप्रवन्धस्य रसनिधानभूतस्य नीरसत्वमभिहित स्यात् । यथा-

तरङ्जभ्नभङ्गा क्षुभितविहगश्रेिरशना विकर्पन्ती फेन वसनमिव सरम्भशियिलम्। यथा विद्ध याति स्खलितमभिसन्धाय बहशो नदी रूपेरोय धवमसहना सा परिणता।।

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कारिफा ११ ] तृतीयोन्मेप. [३५५

यथा वा- तन्वी मेघजलाद्रेपल्लवतया धौताधरेवाधुभि शून्येवाभरएं स्वकालविरहाद् विश्रान्तपुपपोद्गमा। चिन्तामोनमिवाश्निता मधुकृता श्व्दविना लक्ष्यते चण्डी मामवघूय पादपतित जातानुतापेव सा।।

यथा वा- तेषा गोपवधूविलाससुहदा राघारह साक्षिणा क्षेम भद्र कलिन्दर्शलतनयातीरे लतावेमरनाम्। विच्ठिन्ने ते जाने जरठीभवन्ति विगलन्नीलत्विप पल्लवा ।। वत्येवमादी विपयेचेतनाना वाक्यार्थीभ।वेऽपि चेतनवस्तुवृत्तान्तयो ननास्त्येव। अथ यत्र चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजनाऽस्ति तत्र रसादिरलङ्कार। तदेव सत्युरमादयो निविषया प्रविस्लविपया वा स्यु। यस्मान्नास्त्येवासावचेतनवन्तुवृत्तान्तो यत चेतन- वस्तुवृ त्ान्तयोजना नास्त्यन्ततो विभायत्वेन। ध्वन्यालोक को इन पकतयो का अभिप्राय यह है कि चेतन वस्तुमो का मुरष वावयार्थी भाव मानने पर रसवदलद्वार और अ्रचेतन वस्तुप्ो को मुग्य वार्यार्यं मानने पर उपमा आदि अनद्धार होते हैं ऐसा जो विषय विभाग किन्ही ने किया है, वह उचित नही है। नयोकि त्र्चेतन वस्तु वृत्तान्त के मुग्य प्रतिपाद्य होने पर भी उसके नाथ विमी-न-किसी रूप में चेतन वम्तु का सम्बन्ध गा ही जाता है और उसके होने पर रसवदतद्वार हो जाता है, तो उपमा श्रदि प्रन्य थलक्वारों का विषय ही कही नही रहता है। और यदि प्रचेतन वस्तु रूप वात्यार्थं के नाथ चेतन का सम्बन्ध होने पर भी रसवत्व नही होना है तो महारुवियों द्वारा म प्रकार का वर्गान पिया हुपरा विषय नीरस हो जायगा। जैसे ऊपर के तीनो द्लोको में श्रचेतन पदार्घों का वर्णन मुग्य रप से है। इमनिए वे सब नीरम हो जावेंगे। पन्ु नहृदय लोग इनसे रस का निधान मानते हं। उमलिए इम आ्धार पर उपमा आदि अबकारो पोर रसवरनक्वारो के विषय का विभाग नहीं किया जा नकता है। धजन्यालोकर ने जो किमी सन् मन का उस प्रकार सण्दन विया या वृन्नक ने 'रवि प्रतिपादिनमेव पूर्यनूरिनि' लिरर उमी का नवेत मिया है। उपर्युक्त प्रवार सें ध्यन्यामनयार ने रचत्वद्वार तर्रा उपमा मादि प- पूररें का जो भेद सन्य रोगों ने पिया या उसरा सन पर दिया। दरत्तु उसके

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३५६ ] वकोपितजीवितम् [फारिका ११

वाद उन दोनों में वस्तुत कया भेद है नम वात का आ्ानवसयनान,सं के अपने मत से जो उपपादन किया है। वह दग प्रकार है- प्रधानेऽन्यथ वाक्यारये यमान् तु रसादष। काव्ये तस्मिन्नल द्वारो रमादिरिति मे मति ॥२ यद्यपि रसवदल द्वारतयान्यर्देशितो विपयस्तथापि यम्मिन काव्ये प्रधानतया- न्योरऽर्थो वावयार्थीभूतस्तस्य चान्जभूता ये रसादयरते रसादेरतव्वाग्स्य विपया पति माम- कीन पक्ष। तद्यथा चाटपु प्रेयोल द्वारस्य वाक्यार्थे वेडपि रनादयोनभृता दृश्यन्ते। स च रसादिरलद्कार शुद्ध सङ्ीणों वा। तमादो यथा- कि हास्येन न मे प्रयास्यसि पुन प्राप्तशचिराद् दशन वेय निग्वस्स प्रवासरुचिता फेनासि दूरीकृत। स्वप्नान्तेष्विति ते वदन् प्रियतमव्यासवताष्ठग्रहो बुद्धवा रोदिति रिवतवाहुवलयस्तार रिपुस्थीजन ।। इत्यम्र करुणास्य शद्धस्याङ्ट्भावात् स्पप्टमेव रसवदलद्वारत्वम्। एव्मेवविधे- विपये रसान्तराणा सह स्पष्ट एवास्गभाव । सङ्कीणों रसादिरङ्गभूतो यथा- क्षिप्तो हस्तावलग्न प्रसभमभिह्तोऽप्याददानोडशुक्कात गृहहन् केशेष्वपास्तव्चरणनिपतितो नेक्षित सम्भ्रमेण। पलिङ्गन् योऽवधूतस्त्रिपुरयुवतिभि साधुनेमोरपल भि कामीवार्द्रापराध स दहतु दुरित शाम्भवो व शराग्नि ।। इत्यम् त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वावयार्थत्वे ईर्प्याविप्रलम्भर्य श्लेपसहित- स्याङ्गभाव इति। एवविध एव रसवदादयलङ्कारस्य याय्यो विषय। अ्ररतएव चेर्प्या- विप्रलम्भकरुणयोरङ्त्वेन व्यवस्थानात् समादेशो न दोप। यत्र हि रसस्य वाक्यार्थीभावस्तस्य कथमलद्वारत्वम्। श्रलद्वारो हि चारुत्व- हेतु प्रसिद्ध। नत्वसावात्मवात्मनश्चारुत्वहेतु। तथा चायमत्र सक्षेप- रसभावादितात्पयंमाश्रित्यविनिवेशनम् । अलकृतीना सर्वासामलङ्कारत्वसाधनम् ॥ तस्माद्यत्र रसादयो वाक्यार्थीभूता स सर्वो न रसादेरलव्वारत्य विषय, सं घवने प्रभेद। तस्योपमादयोऽलद्कारा। यत्र तु प्राधान्येनार्थान्तरस्य वाक्यार्थीभावे रसादिभिश्चारु वनिष्पत्ति ननियते स रसादेरलक्क्ारताया विषय,। एव धवने., उपमा- दीना, रसवदलङ्ारस्य च विभक्तविषयता भवति। -- धवन्यालोक १२३ से १२८ तक

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कारिका ११ ] तृतीयोन्मेष. [३५७

यदि वा वैचित्र्यान्तरमनोहारितया रसवदलद्कारः प्रतिपादते, यधाभि- नुक्तस्तैरेवाभ्यधायि- प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राद्ग तु रसादयः । काव्ये तस्मिन्नलझ्वारो रसादिरिति मे मतिः ॥४२।।

इसका भावार्थ यह है कि जहाँ अन्य वावयारय का प्राधान्य होऔर रसादि उसके भ्रङ्ग हो उसको 'रसादि अलद्गार' कहते है। औ्र्रौर जहां रस का ही प्राधान्य हो वह। रस ध्वनि होगा भौर उपमादि अलद्दार होगे। जैसे चाटु वचनो [ राजा आदि की स्तुति ] में [ 'प्रेय प्रियतराख्यान' प्रिय बात का कथन करना प्रेयो मलद्दार होता है] प्रेशे भलद्कार के होने पर रसादि अ्रद्ग के रूप में प्रयुक्त होते है। भ्रत वहां रसवदलद्कार होता है।

यह रसवदलद्वार शुद्ध तथा सङ्गोशं दो प्रकार का होता है। 'कि हास्पेन न मे प्रयास्यामि' आदि श्लोक में शुद्ध रसवदलद्वार है, क्योंकि यहां शुद्ध वरण रस राजविषयक रति या राजस्तुति का श्रङ्भ है। दूमरे तक्ीएां रमवदलव्वार के उदा- हरएा जैमे-'क्षिप्तो हम्तावलग्न' आदि श्लोक में शिव का प्रतापातिमय मृग्य वाक्यारयं है और दलेप सहित ईर्ष्या विशलम्भ उसका श्रद्ध है। इसलिए अ्लद्धार से सस्ीएां रस के, दिव के प्रतापातिशय का भ्रङ्ग होने से वह सङ्कीसां रमचदलद्वार- का उदाहरण है। और इसमे दलेप से सूचित करुस रस तथा ईर्प्याविप्रलम्भ दोनों के भगवद्विषयक रति का भ्रज्त होने से करण तथा विप्रलम्भश्वार का विरोध भी नही होता है। इस प्रकार ध्वन्यलोककार ने रसवदलद्वार तथा उपमादि मलद्वारी के विषय का विचार किया है।

परन्तु कुन्तक इस विषय विभाग से भी सहमत नहीं है। रसलिए वह इम बार धजन्यालोककार के इस मत की घालोचना करने हुए कहते है कि-

औौर यदि किसी अन्य यंचित्र्व के कारस मनोहर होने से रनवदलक्कार मानते हैं जंसा कि उन्हीं आाचार्यो [ध्वन्यालोसकार] ने कहाहं वि-

जहां ध्रन्य वावयार्य का प्राधान्य होने पर रमादि भ्रत्ध रूप में प्रयुक्त होते है उस काव्य में रसादि प्रतद्धार होता है यह मेरा [जन्मालोकर] या मत है ।४२।।

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३५८ ] वकोवित जीचितम [फारिफिा ११

इति। यतान्यो वाक्यार्थ प्रावान्यादलार्यतया व्यनस्थितम्नम्मिन, तदङ्गतया विनिवध्यमान शृद्ाराहिरलद्वारता प्रतिपणने। यम्माद गुगापा वान्य- भावार्भिव्यक्तिपूर्वमचंविधविपये विभृग्यते। भूपसविवेक्पकितरूजम्भते। यथा- जञिप्तो हस्तावलग्न. प्रसभममिहतोड्याददानोऽशुंकार्त गृहन् केशेष्वपास्तश्चरणनिपतितो नेक्षित सम्भमेणा।

कामीवार्द्ापराध: स दहतु दुरिति शाम्भवो वः शरान्नि ।।४३।

यह। अर्थात् जहां अन्य वापयार्य प्रधानतया अर्यान् भ्रलद्धारयतया प्चित होता है। उसमें उसके श्रङ्ग रूप में ग्रथित शृद्धार आादि [रसवत्] अरलद्धार होता है। ययोकि इस प्रकार के उदाहरणों में गुण-प्रधान भाव को प्रभिव्यकिति पूनरु [गुए से प्रधान] विभूषित होता है। और भनलङ्गार [तथा अरलद्धाय] का पायक्य स्पष्ट हो जाता है। जैसे- त्रिपुरदाह के समय शिव जी के वाण से उत्पन्न, निपुर की तरियों द्वारा ताजे अपराधी [सद् कृतपराङनोपभोगादि रूप अरपराध से युकत] फामी [पुरष] के समान, हाथ से छूने पर भी भटक दिया गया, जोर से पटक देने पर भी वस्त्र के किनारो को पकडता हुआ, केशो को पकडते समय हटाया गया हुआ, पंरे में पडा हुआ भी सम्भ्रम [ क्रोध प्रथवा घवराहट] के कारण न देखा गया और श्रतिङ्गन फरने का प्रयत्न करने पर आंसुओ से परिपूर्ण नेत्रकमल वाली [ फामी पक्ष में ईर्ष्या के कारण और श्रग्ति पक्ष में बचाव की आशा न रहने के फारण रोनी हुई ] त्रिपुर सुन्दरियों द्वारा तिरस्कृत [कामी पक्ष में गाढालिङ्भन द्वारा स्वीकृत न करके औ्र्रौर अ्रग्नि पक्ष में सारे शरीर को भटककर फेंका गया हुआ] शिव जो के वाए का श्रग्नि तुम्हारे दुखों को दूर करे॥४३॥ इसमें शिव जी के प्रभाव का श्रतिशय वर्णन करना कवि का मुरय अभिप्रेत~ विषय है इसलिए वह मुख्य रूप से अलद्धार्य है। शाम्भव शराग्नि से जन्य त्रिपुर युवतियो की दुर्दशा से अनुभूयमान करु रस, और 'कामीवार्द्रापराध' इस बथन से श्लेष सहित ईर्प्याविप्रलम्भ दोनो उस शिव जी के प्रतापातिशय के समर्थक होने से श्रद्ध है। इसलिए रति के यहाँ अलद्धार रूप में निवद्ध होने से यह रसवदलद्वार का उदाहुरण होता है। यह ध्वन्यालोककार का मत है।

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फारिका ११ ] तृतीयोन्मेष। [३५६

न च शच्दवाच्यत्वं नाम समानं कामिशराग्नितेजसो सम्भववीति तावतैव तयोस्तथाविधविस्द्वधर्माध्यासादि चिरुद्वस्वभावयोरेक्यं वथक्ििपि व्यवस्थापयितुं पार्यते। परमेश्वरप्रयत्नेऽपि स्वभावम्यान्यथाकर्तुमशक्यल्ान। न च तथाविधशच्दवाच्यतामात्रादेव तद्विदा तदनुभवप्रतीतिरन्त। गुढ-

सत्यां रसद्वयसमावेशदोपोऽप्यनिवार्यतामाचरति। यदि चा भगवत्मभावस्य मुख्यत्वे

कुन्तक इस ध्वन्यालोककार के मत से सहमत नही जान पडते हैं। उनका कहना यह है कि यहाँ कामी के साथ जो शाम्भवनराग्नि की उपमा सथवा स्पक कुछ भी रखा जाय वह उचित नही है। क्योकि वे दोनो पदार्थ अत्यन्त विर्द्व स्वभाव है अतएव उन दोनो के विरुद्ध धर्मों का एक दूसरे में त्रध्यारोप आ्र्प्रादि प्र्पथवा उन दोनों का ऐचय सम्भव नहीं है। ऐसे विरोध को न्वय परमात्मा भी प्रवत्न करके नही हटा सकता है। यह वहो कि श्नोक के विशेष प्रकार के शब्दो द्वागा उन दोनो के एक्य की प्रतीति भी हो नवती है तो 'गूड का टुकडा' इन र्व्द के कहने मे उसके विरोधी विष आदि की प्रतीति भी होने लगेगी। इसलिए वर्ण तथा विप्रलम्भ गृद्गार जैसे विरोधियों में साम्य या ऐकय मानना उचित नहीं है। इस पुक्ति को देकर कुन्तक ध्वन्यालोककार के मत का खण्डन करते हं- [ इरा क्षिप्तो हरतावलग्न 'आादि श्लोक में] फामी तथा शाम्भव घ्गग्नि के तेज फी शब्द वाच्यता समान हो सकती है इसलिए उतने ही [ अर्ात् दोनों के शब्द वाच्य होने माघ्र] से उनके उस प्रकार के विरद्ध धर्मो का [एक दूसरे में] अ्रध्यास सदि औ्रर [उन दोनो ] विरुद्ध धर्म वाले पदार्थों का ऐक्य किमी प्रकार भी प्रतिपादित नहों किया जा सकता है। ्योंकि [इस प्रकार के परम्पर चिरोधी] स्वनाव को परमेश्वर के प्रयत्न से नी दूर नहीं किया जा सकता है। शर न उस प्रकार के [श्लिष्ट] शब्दो से प्रतिपादन मात्र से हो नहृदयो को उस [ विरद्धधर्मा प्यास पयवा विरद्ध पदार्थों के ऐक्य] की प्रतीनि हो सकती है। [ मयीकि ऐमा मानने पर तो ] मद फी उली' इस शद्द के कहने पर उमके विरोधी विष सादि पो भी प्रतोति होने लगेगो। [दूमरी बात यह है कि एय ही प्रकार के शब्दी मे] उन [बरस तपा शृद्धार एप विरोधी रसो] की प्रतीति मानने परइस एक इलोक में विरोधी] दो रसों की स्यति रप दोप नी पनिवायं हो जाता है। और यदि [प्वन्यालोयकार के कयनानुसार] भगयान् जिव के प्रभाव के मुरय होने पर इन [फयस तथा विद्रतम्भ शृद्गार] दोनों मे [भगवत्म्तापातिशय में] भद्त

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३६० ] वक्रोपित जोवितम [फारिका ११

भूपणत्वमित्युच्यत तदपिन समीचीनम। यस्मान काररम्य वाग्तवत्वाहिरेव स्यात। निर्मलत्वादेव तयोर्भवाभावयोरिव न कथा्विपि साम्योपपत्तिरित्य- लमनुचित विपय चर्च णाचातुर्यचा पलन।

सम्यकू समीहमाना समर्पणा उदाहरणान्तरविन्यास1 रसवदलद्वारस्य व्याचस्यु । यथा-

होने से अलद्धारत्व [रसवदतद्गारत्व] हो सकता है यह कहा जाय तो वह[ फहना] भी उचित नहीं है। क्योकि [कामी तथा शगग्नि के साम्य के] कारण का वास्तवत्व होना चाहिए। परन्तु भाव श्रोर प्रपरभाव [के सादृश्य]के समान उन दोनो [फामी तया शराग्नि के सादृक्य] के निर्मूल होने से उन दोनों के साम्य का किसी प्रपार भी उपपादन नहीं हो सकता है। [ इसलिए फरुश तथा विप्रतम्भ शृद्धार दोनो रसों के भगवद्- विषयक रति का श्रङ्ग होने से यहां रसवदलद्ार है। यह ध्वन्यालोककार का मत ठीक नहीं है ]। इसलिए अनुचित विषय के समर्थन में चातुयं दिखताने का [घ्वन्या- लोककार का] प्रयत्न व्यर्थ है। रसवदलङ्गार का दूसरे उदाहरण द्वारा उपपादन- इस प्रकार 'क्षिप्तो हस्तावलग्न' इत्यादि उदाहरण में रसवदलद्धार का खण्डन कर, ध्वन्यालोककार द्वारा उपस्थित किए हुए रसवदलद्धार के दूसरे उदाहरए 'कि हास्येन' इत्यादि की विवेचना प्रारम्भ करते हैं- अथवा यदि [क्षिप्तो हस्तावलग्न ] इस उवाहरण में [ उसफा खण्डन कर दिए जाने के कारण अथवा स्वय दोषो की सम्भावना देखकर। विश्वास न करके अपने कहे हुए लक्षण के [किसी अन्य] उवाहरण में सङ्गति लगाने फी इच्छा से [हमारे क्षिप्तो हस्तावलग्न' को खण्डन को ] सहन कर [अर्ात् स्वीकार करके ध्वन्यालोकफार ने रसववलद्गार का] वूसरा उवाहरण रखकर उसकी व्यारया की हैं। जैसे-

१. यह पाठ कुछ अटपटा-सा प्रतीत होता है।

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कारिका ११ ] तृतोयोन्मेष. [ ३६१

कि हास्येन न मे प्रयास्यसि पुन. प्राप्तश्चिराद् दर्शनं केयं निष्करुण मवासरुचिता केनासि दूरीकृतः । स्वापन्तेप्विति ते वदन् प्रियतमव्यासव्नतकरठग्रहो बुद्ध वा रोदिति रिक्तवाहुवलयस्तारं रिपुस्त्री जनः ।।४४।। अत्र 'भवद्विनिहतवल्लभो वैरिविलासिनीसमूदः शोकावेशादशरण: करुणरसकाष्ठाधिरूढ़िविहितमे वं विघवैशसमनुभवतीति तारपर्यप्राधान्येन

[इस श्लोफ में किसी राजा की स्तुति की गई है। स्तुति करने वाला फह रहा है कि-] तुमने अपने समस्त शघ्ुओ का नाश कर डाला है। उन मरे हुए शत्रुओो की स्त्रिर्या रात में सोते समय स्वप्न में अपने पति को देसती है औ्रर उनके गले में हाथ डालकर कहती है कि-] इस हँसी [मखाफ] करने से पया लाभ है। वड दिन के बाद मिले हो। अब में जाने नहीं दूंगी। हे निष्ठर! चतलाओ तुम्हारी वाहर [प्रवास में ] रहने फी आ्रप्रादत [रुचि] कयो हो गई हैं। तुमको विसने मुझसे भ्रलग कर लिया है। स्वप्न में [देसे हुए ] अपने पति के गले में वाहें डालकर इस प्रकार फहने वाली तुम्हारे शत्रुओो की स्त्रियां उठकर [जागने के वाद देसती है कि प्रियतम के गले में डालने के लिए उन्होने जो वाहो का घेरा-चलय-चना रसा था वह तो साली है] अपने खाली [ प्रियतम के गले से रहित ] बाहुवलय को देसफर जोर-जोर से रो रही है।।४४।। इसमे अलक्कारन्तर से असक्कीसं शुद्ध करुण रस राजविपयक रति का भत् हो रहा है। इसलिए यह मुद्ध रतवदनद्वार का उदाहरस है। यह ध्वन्यानोरकार का मत है। कुन्तक ध्वनिकार के इस मत का उपपादन करते हुए कहते है कि- यहाँ आ्प के द्वारा जिनके पतियो का नाशा कर दिया गया है इस प्रफार को रघुओ की स्म्रियो का समूह शोफाचेश में अदारस होकर, कसए रम के चरम सीमा को पहुँचने के फारस इस प्रफार के दुर को अनुभव कर रहा है। यह तात्पर्य ही प्रधान रूप से याकय का धर्य हैं। [यह परसरस] उस [राजा के प्रतापातिराय] के सद्ध रूप में निव्द किया हुआ है। और [ यहा] प्रवास विप्रनम्भनार को प्रतीति फराने में[ कवि का अनिप्रित] वास्तविप तात्पर्य नहीं है। इस प्रकान १. 'भगद्विहिन' यह पाठ सगद्टत पा। २ 'तिभामन परव्मनार्षं'पाठ हीक नहीं थ।

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३६२ ] व क्रोपितजी चितम् [फारिका ११

स्वकारएस।मग्रीविरहविहिता लक्षणानुपपत्तिर्न सम्भवति। रसट्टयसमावेशदुष्टत्मपि दगपम्तमेव। द्वयोरषि वास्तवन्वर्पस्य विद्यमानत्वात्तटनुभवप्रतीती सत्या नात्मविरोध स्पवित्वामायात । नेन

समर्ष्यमाएत्व स्वानान्तरसमये च तथाविवत्व युक्त्या सम्भवत। १तस्मादुभयमुपपन्नमिति। एक दूसरे से सम्बद्ध पदार्थ समूह की सामर्थ्यं से समर्पित [करसरस के ] गीए रू से प्रतीत होने से [ यहां रसवत्] पनलद्गार महलाता हैं। औ्रौर [रमवदलक्कार के अनेक उदाहरस पाए जाने के कारण। उसके निरविषय न होने से [तथा उसके अ्रनेक उदाहरण मिल जाने से] रसयुक्त श्ररालम्बनविभावादि रप अ्रपनी कारण सामग्री [विद्य मान होने से उस] के अभाव से उत्पन्न [रसवदलद्धार के] स्वत्प की अ्नुपपत्ति सम्भव नहीं है। [अर्थात रसवदलद्धार मानना ही चाहिए यह ध्वन्यानोककार का मत है ]। और दो [ विरोधी ] रसो के समावेश का दोप भी [जो कि पिछले 'क्षिप्तो हस्तावलग्न' इत्यादि श्लोक में करुण तथा ईर्ष्या विप्रलम्भ रूप दो विरोधी रसो के एक साथ उस श्लोक में समावेश के कारण उत्पन्न हो गया था वह दोप भी इस दूसरे उदाहरस में नहीं आता है] दूर हट जाता है। [अत ध्वन्यालोफफार ने जो रसवदलद्धार का लक्षण किया था वह भी इस उदाहरण में भली प्रकार घट जाता है।] और [प्रधान भूत करुण तथा गौए रूप विप्रलम्भ शृद्गार] दोनों के वारतविक होने से उन [ दोनो] की अनुभव में प्रतीति होने पर भी [एक के गौए और दूसरे के प्रधान होने के कारण] उनमें परस्पर स्पर्धा न होने से उनमे परस्पर विरोध नहीं है। इसलिए वह [रसवदलङ्गार] भी सहृदयो का श्राह्नादजनक होने से सुन्दर हैं। [ इस इ्लोक में केवल करुण रस ही है दूसरा कोई औ्रौर रस नहीं है इस प्रकार का ] करुण रस का निश्चायफ कोई प्रमाण न होने से और प्रवास विप्रलम्भ की, अपने कारख भृत, वाक्य में वखित, आलम्वनविभावादि रूप सामप्री से [ समर्प्यमाण] उपस्थिति और स्वप्न के समय में इस प्रकार की बात दोनो सम्भव हो सकती है। इसलिए [इसमें करुण तथा विप्रलम्भ शृङ्गार] दोनो युक्तिसङ्भत है। २ 'तस्योभयमुपपन्नम्' यह पाठ असद्धत था।

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कारिका ११ ] तृतोयोन्मेप: [ ३६३

इति चेत्तदपि न समञ्जसप्रायम्। यस्माच्चाटुविपयम हापुरुपप्रतापा- कान्तिचकित चेत सामितरतत स्वचैरिा तत्प्रेयसीना चपलानैपि पृथग- वस्थानं न युक्तियुक्ततामतिवर्तते।१

यहाँ तक ध्वनिकार के मत के अनुसार उस व्लोक की व्यारया की है और उसमें करुण को प्रयान और विप्रलम्भ को गौणा रस तथा उन दोनों को राज विपयक रति का श्रद्ग मान कर रसवदलद्वार का नमर्थन किया है। म्रगे 'तदपि न नमञ्जस- प्रायम्' 'वह भी ठीक ता नहीं मालूम होता है' यहाँ से इस मत का खण्डन करते है- ध्वन्यालोककार ने इसमें करुण रस को प्रधान रस और विप्रतम्भृद्गार को गौए रस माना है। इन दोनों ही रसी में नावकननायिका का वियोग होता है। परन्तु उनमें भ्न्तर यह है कि यदि वह वियोग दोनों की जीवितावस्य में होता है तो वहा वितलम्भशृङ्गार माना जाता है। और यदि उनमें किसी एक की मृत्यु हो जाय तो वहा विप्रलम्भमृद्गार नही अपितु बरस रस माना जाता है। मृत्यु वह सीमा-रेखा है जिसके एक ग्रर विद्लम्भ तथा दूसरी और पस्सा की रिघति मानी जाती है। यहाँ वरुण रस मानने का अर्य यह है कि अत्रु-स्त्रियों के पतियो के मारे जाने ने ही यह वियोग हुआ है। परन्तु कुन्तक यह क हते है कि श्लोक में प्रदर्गित, वियोग मृत्यु के कारस ही हुआ हो यह मानना आवम्यक नही है अपितु वह पयुओो के डर के मारे भाग जाने पलायन कर जाने-से भी हो सवता है। अर्धान यहा करणा रस के स्थान पर विप्रलम्भशद्दार को भी प्रधान रस माना जा सकता है। यही बात कहते है- यदि यह फहें तो वह भी कुछ ठीक-सा नहीं प्रतीत होता है। कयोकि चाट [सशामद, राजा आदि की स्तुति] के विषय भूत [जिस राजा की चापलूमी या स्तुति फी जा रही है उस] महापुरुष के अपने प्रताप के [ शत्रुप्रो के दिलो पर ] छा जाने से चकित चित्त वाले शत्रुओं और उनकी स्त्रियों के इघर-उघर भाग जाने से भी अलग-श्रलग रहना युक्तिसङ्गत हो सकता है। पचवा करण-रस को ही यहाँ प्रधान रस मान लेने पर विप्रतम्भ शृद्वार के मानने का कोई सवसर नही रहता है। कृन्तक के मत से इसमें एक ही रम मानना चाहिए। दोनों रसो की गुण-प्रधान भाव ने न्यिति मानना व्यर्य है। दूसगे बात यह है कि इन दोनों में मे चाहे किसी भी रख को माना जाय परन्तु उसकी राज विषयक रति मादि किसी मन्य का अज नहीं माना जा नपता है। इसलिए भी 'क्षिप्ती हस्तावसन्न' उदा० सं० ४: तथा 'कि हारयेन' वदाहग्य मत्या ४४ दोनों में ही ध्यटम रस मी १ 'पकाणन'यह पाठ ठीक नहीं है। २. इसफे बाद प्रुटित पाठ के चिन्ह दिए गए है और उतये बाद म्नमेव तदपि चमुरमम्' इनना सचिक और अवदृत पाठ पूर्व तम्बरख में पाया जाता है।

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३६४ ] धक्रोपितिजीवितम् [पारिफा ११

करुणरसस्य सत्यपि निम्चये तथाविवपरिपोषठशावाराविर्द्वेरेकाप्रता- स्तिमितमानस.' तथा्यस्तरसवासनाविवासितचेतमा सुचिरान समासाठित- स्वप्नसमागम कथमषि सम्प्रवुद्ध। प्रनोधसमनन्तरसमुल्लसितपवपरानुगन्धानविदित प्रस्तुतवर्तु विसवादविदारितान्त करणो भवद्वैरिविलासिनीसार्यी रोटिनीति कम्पस्येव परिपोपपटवीमविरोह। तथाविधव्यभिचार्योचित्वचासत्व ततम्र्पानुप्वेगो वेति कुतः प्रवासविप्रलम्भम्य प्रथगव्यापारे रमगन्धोऽपि। यदि वा प्रेयसः प्राधान्ये तवह्त्वान करुगारसम्यालव्वरगात्वमिन्यभि- धीयते तदपि न निरवद्यम्। यम्माद् द्वयोरयेतयारुाहरणयोर्मुग्यभूतो वाक्यार्थ. करुणात्मनैव विवर्तमानवृत्तिरुपनिचद््। पर्यायोक्तान्यापदेश प्रधानता ही है। रस किसी का त्रङ्ग नही है अत रमवदल दार नहीं माना जा मकता है। इसी वात को ग्रन्थकार अ्र्प्रगले अ्र्प्रनुच्छेद में कहने है- करएा-रस का निर्चय होने पर नी [ अर्थात् शनुशो की स्त्रियों के वणित वियोग को, पतियो के पलायन-निमित्तक नहीं अवितु मृत्यु-निमित्तक मान लेने पर भी ] उस प्रकार [वियोग दुख के ] परिपोपस दशा के चोटी पर पहुँच जाने से एकाग्रता के फारण स्थिर चित्त के व्वारा, बहुत समय वाद स्वप्न में [ अपने पति के साथ] समागम को प्राप्त करके, पूर्वानुभूत व्यवहार के अनुसार पति के साय वार्ता लाप करते समय [शत्रु की स्त्रियाँ] कैसे भी [किसी कारण] जाग पडीं। औ्रौर आ्र्रास खुलने के वाद आगे-पीछे की बातो का ध्यान आाने पर प्रस्तुत [पति की प्राप्ति रूप] वस्तु के मिथ्यात्व को जानकर जिसका हृदय [ दुखातिशय के फारण ] फट रहा है ऐसा आपके शत्रुओ् की स्त्रियों का समृह रो रहा है, इस [वर्णन] से करुण रस का ही चरम परिपोषण हो रहा है। उस प्रकार के [व्णित ] व्यभिचारीभावो के श्रचित्य के कारण सुन्दरता और उसी [ करु ] स्वरूप का [ सहृदय के हृदय में] प्रवेश होता है। इसलिए विप्रलम्भ शृङ्गार के पूथक् रूप से व्यापार में रस की गन्व भी कहाँ से आाई। [ अर्थात् विप्रलम्भ शृङ्गार की लेशत सत्ता भी वहां नहीं है]। अ्थवा [प्रियतर आस्यान, चाटूवित रूप] 'परेयोऽलद्कार' का प्राधान्य होने और करुण रस के उस [ राजस्तुति रूप चाटूित ] के प्रति श्रङ्ग होने से [ करुए रस ] रसवदलद्धार है यदि [ ध्वन्यालोककार की ओ्रोर से ] यह कहा जाय तो वह भी ठीक [निर्दोष पक्ष ] नहीं हैं। क्योंकि [उदाहरण स० ४३ तथा ४४ ] इन दोनो उदाहरणों में मुख्य रूप से प्रतिपाद्य अर्थ [ वाक्यार्थ] करुण रस रूप से ही प्रतीत होता हुआ अद्धित किया गया है। और पर्यायोक्त तथा अप्रस्तुत प्रशसा १ मानसस्य। २ चेतस। ३. विहित प्रस्तुतवस्तुविसवादविंदारितान्त करणो। ये तीन पाठ पुराने सस्करण में पाए जाते है जो शशुद्ध है।

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कारिका ११ ] तृतीयोन्मेष. [ ३६५

न्यायेन वाच्यताव्यतिरिक्तयोः प्रतीयमानतया न करुशस्य रसत्वाद् व्यह्गपस्य सतो वाच्यत्वमुपपन्नम्। नापि गुणीभूतव्यङ्गयस्य चिपयः, व्यङ्गवस्य करुणा- मनैव प्रतिभासनात। न च द्वयोरपि व्यद्गनत्वम्, श्रद्गाद्विभावस्यानुपपत्ते.। एतच्च यथासम्भवमस्माभिर्विक्कल्पितम। न पुनम्तन्मात्रम्। किद्र्व 'काव्ये तस्मिन्नलद्वारो रसादि' इति रस एवालद्ार: केवलः, न तु रसवदिति मत्पत्ययस्य जीवितं न किख्विदभिहितम् स्थात्।'

[अन्योषित] में प्रद्शित मुक्ति के अनुसार [ इन दोनों उदाहरणो में ] वाच्य से भिन्न अ्ररयों के प्रतीयमान होने के फारण और करुण के 'रस' होने के कारस व्यङ्नन्य हो होने से उसका वाच्यत्व युक्तिसङ्गत नहीं है।[ व्यङ्गय होने से ककएा रस प्रधान ही हैं। वह राजस्तृति रप प्रेयोडलद्ार आदि किसी अन्य का श्रद्ग नहीं हु। इसलिए यहां रसवदलद्गार नहीं हो सक्ता है]। और न [ फरुश रस ] गुणी भूत व्यङ्गय का विषय है। षयोंकि व्यङ्गय पर्थ करुण रप से प्रतीत हो रहा है। [फरुण से भिन्न औौर कोई व्यङ्गय अरय नहीं है जिसके प्रति करण रस को गुसी भूत फहा जा सके]। और न करए तथा विप्रलम्भ शद्धार ] दोनों को ही ध्यन्नय कहा जा सकता हूँ कयोकि उस दशा में [ दोनों के समकक्ष होने के कारण उनफा ] अ्रङ्गाद्वि- भाव [जो आप मानते हैं] नहीं वन सकता है। [ इसलिए यहां फरण रस में ही चवा की विधान्ति होती है। वह न किसी दूसरे का श्रद्ग है और न गृणीभूत है। इसलिए यहां रसवदलद्वार नहीं हो सकता है]।

इस प्रयार हमने [ मुन्तक ने रसवदलद्वार के सव्टन के लिए ] यचासम्भव अन्फ विषल्प दिसलाए है। परन्तु पेवल उतने ही [ विकल्व ] नहीं है [ पपितु उनके पतिरियत औरौर भी विकल्प हो सरते है ]। औ्रर[ध्यन्यालोपपार ने अरपनी पूर्व उदृत 'प्रधान्येऽत्र वावयार्चे' इत्यावि फारिफा के उत्तराद में जो यह कहा है फि] 'उस पाव्य में रसादि धतक्कार होता - है' उसके अनुसार तो घेवल रस ही अतद्दार होता है रसवन् [ भनक्कार] नहीं होता है। इसलिए 'सवत्' पद में किए गए मतुप प्रत्यय का कोई सर्थ नहीं रहता है। वहा वुछ दाठ छूट होने वा वेन पुराने मन्करा में मिलता है। उसके दाद 'एव गनि गमार्थ एरनस्यंव निष्टनी चेतदवि न वि्चिन्' इनना अधिर औौर ममटन पाठ पाया जाता है।

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३६६ ] घरोपितजीवितम [कारिका १-

अ्रगते ग्रन्य भाग मे पाठ दोप- ग्रन्थ के आ्र्रारम्भ से यहां तक का पाठ प्राय ठीक है। वेचल उग ११ कारिका में दो तीन स्थानो पर सण्टिन पाठ पाया जाता है। परन्तु उसके पागे श्न्त त का सारा ही पाठ स्थान-स्यान पर स्डित है। पूर्व गन्करण के प्रकानित होन के बा अब तक कोई नवीन पाण्डलिपि आदि सामग्री ऐगी नही मिली है जिमके आधार प उस पाठ का सशोधन किया जा सहे। दमलिए पाठ को उम पुटि से मुल ग्रन पुष्प चिन्ह आरदि सवेतो द्वारा सूचित कर दिया है। उन म्यनों की वार्सा भी पा की त्रुटि के कारण नही हो सकती है। अरगला ग्रन्य भाग केवल सकेत रप हैं- एक विशेष वात यह प्रतीत होती है कि कुन्तक ने वहां तरु के ग्रन्थ की त परिमार्जित प्रति तैयार कर ली थी परन्तु श्गला ग्रन्थ परिमाजित नप में न लिर सके थे। केवल साङ्ग तिक रूप में शेप ग्रन्थ की अपरिमाजित प्रति ही लिग पाए ये वीच में कदाचित् उनका देशन्त हो जाने से उस अपरिमारजित पाण्ड्रलिपि कं परिमाजित प्रति तैयार नही हो सकी। इसी वारए अगले ग्रन्थ का शुद्ध पाठ उपलब् नही होता हैं। इस अनुमान का आघार यह भी है कि अगले भाग में मूल कारिकाए उपलन्द नही होती है, केवल व्यारया मात्र पाई जाती है। जान पडता है कि ग्रन्यकार मूल कारिकाएं अलग लिख ली थी। इस भाग को लिखते समय अस्वस्थता आरति किसी कारण से केवल व्याख्या मात्र और उदाहरण आदि के सकेत ही लिसे थे उन्ही के आधार पर परिमार्जित पाण्डुलिपि में व्यारया के साथ कारिकाश्रो तथा उदाहरण आदि को पूर् रूप से अरद्धित कर देने की योजना रही होगी। परन्तु असमय में देहान्त हो जाने प्रथवा अन्य किसी कारण से वह योजना पूर्णं न हो सकी। इसलिए इस समय इस भाग की परिमाजित पाण्टलिपि हमको प्राप्त नही होती है। जो पाण्डुलिपि मिलती है उसमे कारिकाशो का प्रभाव, उदाहरण आदि का सकेत मात्र और खण्डित पाठ आदि अ्नेक दोप पाए जाते हैं। अ्रगली कारिकाशो की सम्पादन शैती- कुन्तक ने अपनी कारिकाओ की व्याख्पा के लिए खण्डान्वय' की शैली अपनाई है। हिन्दी व्याख्या में यह शैली बडी अटपटी-सी प्रतीत होती है। उससे भाषा में प्रवाह नहीं भा पाना है। इसलिए इस व्याख्या मे अ्नेक स्थलो पर पाठको को कुछ अटपटा- पन प्रतीत होता होगा। परन्तु कुन्तक की इस व्याख्या-शैली ने ग्रन्थ के इस अपरिमाजित

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फारिका ११ ] तृतोयोन्मेप [२६७

प्रेयः प्रियतराख्यानम् ॥४५॥० पाण्डुलिपि वाले भाग के सम्पादन में बडी सहयता की है। कयोकि 'खण्डान्वय' की शैली में इ्लोक के प्राय सभी पदो का आनुपूर्वी रप से व्यारया भाग में ममावेश हो जाता है। इसलिए इस व्यास्या में से कारिका के मल पदो को मरलता से छाटा जा सकता है। अगली सारी कारिकाओ की रचना इसी आधार पर की गई हैं। तृतीय उ.मेप के यहाँ से आगे के भाग की तथा चतुर्थ उत्मेप की मारी कारिकाए मूल पाण्ड- लिपि में अनुपूर्वी से वारिका रूप में अरदद्मित नही हुई है। व्यार्या भाग के पदो की योजना करके ही उनका सम्पादन किया गया है। प्रेयोडलद्भार का खण्डन- विगत प्रकरण में रमवदनद्वार की विवेनना के बाद अव आागे 'प्रेयोडनद्वार' की विवेचना प्रारम्भ करते है। जने पिछले प्रकरण में भामह आादि के अभिमन 'रसवदलङ्वार' का सण्डन किया था। इमी प्रकार यहां परेयोऽनट्वार' के पनद्दारत्व का खण्टन करेंगे। प्रेयोऽनद्वार के विषय में वामन ने इस प्रकार लिसा है- प्रयो गृहागत कृप्यमवादीद् विदुरी यथा। श्रद्य या मम गोविन्द जाता त्वयि गृहागते॥ कालेनैपा भवेत् प्रीतिम्तववागमनात् पुन ।। -भामह फाव्यालद्वार ३, ५। भामह ने यह जो 'प्रेयोडनद्वार' का विवेचन दिया है इसमें वन्तुत उसका लक्षणा न करके, पेवल उदाहम्ण मान दे दिया है। दण्डी ने 'प्रेवोऽलद्वार' का लक्षग् 'प्रेय प्रियतरारयानम्' अरथात् प्रियतर बात का वथन वरना 'प्रेयोडनद्वार' होता है यह चिया है। और उसके उदाहरण के लिए दण्डी ने भी मामह का दिया हुआ उदाहग्ण ही प्रन्तुत किया है। निए भामह और दण्डी दोनों के अ्रभिमन पप्रेयो- इलद्वार' का सण्डन, इस प्रकग्स मे वुन्तक वर नहे हे। भामह के ऊपर उनवा पहिला प्रक्षेप तो यह हो है कि उन्होने 'प्रेथोडनद्धार' के लमण परने की श्रवश्यकता नही समभी और वेवल उदाहरण को ही उमपा लक्ष्सा समभ लिया है। उनके वाद दप्डी के लक्षण की और दण्डी तथा भामह दोनों के प्रनिमन प्रेमोडनद्वार' के उदाहर्ण की मालोचना करते हुए उन्होने एस प्रकश्ण का प्रारम्भ किया है। [किसी व्यपतति के तामने उनको]प्रियतर बात या मथन करना[र्थात् उमको चाटुपारिता, धापलूसी परना] प्रेयोडनपान' है[यह प्रेयोधनक्वार या सक्षसा दण्डी ने सपने पाव्यादर्द में किया है]।४५। यरहा कृछ पाठ छूट होने का नोन पुगने नम्करत में मिरा है। रमूत यह पाठ वा सवेत माय निया नय हैपरु दृन्त नती हषा हू।

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३६= ] वत्ोपितिजीवितम् [कारिका ११

उदाहरणनात्रमेव लक्षणा मन्यमान .* कालेनेपा भवेत् प्रीतिस्तवैवागमनात पुनः । प्रेयोगृहागत कृ एमवादीद्विदुरो यथा। अद्य मम या गोविन्द जाता त्यि गृहगने। कालेनेपा भवेत् प्रीतिस्तवैद्यागमनात् पुन।।४:।'

[भामह तो] उदाहरण मात्र फो ही लक्षण मानफर [ सन्तुष्ट हो गए जान पडते है इसीतिए उन्होने 'प्रयोनतद्वार' का तक्षण करने की आ्वश्यकता नहीं समभी है ।। दण्टी ने भामह के ही आाधार पर 'कालेनैपा भवत् प्रीति तववागमनान् पुन' इत्यादि प्रेयोऽलद्वार का उदाहरण दिया है। उसका प्रभिप्राय यह है कि- [फिर कभी दूसरे] समय पर आ्र््राप हो के दुवारा आाने पर वँसा श्रानन्द प्राप्त होगा [जंसा आाज आपके आप्राने से प्राप्त हुआ है। उसफे अ्प्रतिरिफ्त अ्र्प्रन्य किसी भी कारण से आपके दर्शन जैसा आनन्द प्राप्त नहीं हो सफता है। यह भामह ने प्रेयोडलद्धार का उदाहरण दिया हं ]- भामह ने 'प्रेयोऽलद्वार' का स्पष्ट लक्षणा तो नहीं किया है परन्तु उसको उदाहरण द्वारा ही स्पप्ट करने का प्रयत्न किया है। भामह ने प्रेयोऽलद्वार का जो उदाहरण दिया है उसका अरथं इस प्रकार हं- 'प्रेयोडलद्वार' [वह है] जैसे-[अपने] घर पर आए हुए कृप्ण से विदुर जी ने कहा कि हे गोविन्द आज आपके घर आाने से जो आनन्द मुझको प्राप्त हुआ हैं वैसा आनन्द फिर कभी दूसरे समय आपके आने पर ही प्राप्त होगा। [ उसके अ्रतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से वैसा आनन्द प्राप्त नहीं हो सफता है]।४६॥ यहाँ तक भामह तथा दण्डी के अभिमत 'प्रेयोऽलद्वार' का अनुवाद या प्रतिपादन किया अव आगे कुन्तक उसका ख़ण्डन प्रारम्भ करते है-

*यहा कुछ पाठ छूटे होने का सकेत पुराने सस्करण में मिलता है। पर वस्तुत सकेतमात्र दिया गया है। पाठ का लोप नही है। १. भामह काव्यालद्वार ३, ५। दण्डी काव्यादर्श २, २७६ ।

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कारिका ११] तृतीपोन्मेप: [३६६

तदेवं न छोदक्तमतामर्हति। तथा च 'कालेन इति यदुच्यते"१ तदेव वर्स्य- मानविपयतया वस्तुनः स्वभाघ। तदेव लक्षणाकरणामित्यलद्वाय न किव्िद- वशिष्यते। तस्यैवोभयमलक्कार्यत्वमलद्वरणत्वं चेत्ययुक्तियुक्तम्। एकक्रिया- विपयं युगपदेकस्यैव वस्तुनः कर्मकरणत्वं नोपपद्यते। यदि दृश्यन्ते तथाविधानि वाक्यानि येषामुभयमपि सम्भवति- पात्मानमात्मना वेत्सि सृजस्यात्मानमात्मना। आ्रात्मना कृतिना च त आत्मन्येव परलीयसे।४७।।2

इस प्रकार [प्रेयोडलद्वार ] विचार के योग्य [फोई तत्त्व] नहीं है। कयोकि 'फालन' आदि से जो बात कही गई हैं [प्ात् उतत विदुर की उषित का जो भाव हूं] वही [तो] वर्ण्यमान होने से वस्तु का स्वभाव [अर्ात् अलद्धारय] है। उसी को [ प्रेथोडलद्वार का ] लक्षणा फर दिया है[ अर्ात् पलक्कार फह रहे है। जव वह विदुर की उपित प्रेयोऽलद्वार रूप हो गई तो] अ्रतङ्कायं तो कुछ भी शेष नहीं रहा। [फिर वह प्रेयोडलद्वार किसको अलकृत करेगा ]। वह स्वय ही ध्लक्काय और अ्र्प्रत- द़रस दोनो रूप हो जाय यह युकतितककत नहीं हो सफता है। [अलङ्गरत रप ] एक हो प्रिया में एक साथ, एक ही वस्तु [ विट्ठुर का उक्ति का ] फर्म [भ्रलद्धायंत्व] औौर फरस [अलङ्धारत्व] दोनों होना यविनसस्गत नहीं है। [ इमतिए वह स्वम ही अलद्धायं तपा पलङत्स रूप नहीं हो सकता है ]। यदि [ यह फहा जाय कि ] ऐसे वाक्य भी पाए जाते है जिनमे [ कर्मत्व औौर फरसत्व] दोनों [ एक ही यन्तु में ] दिसलाई देते है। जने [ युमारसम्भव में शिव जी स्तुति में प्रयुक्त हुए निम्न इ्लोक में ]- [आप, शिव जी ] सपने आपको स्वय अपने आ्र्प्राप से जानते हूं। अपने सापफो स्वय अपने आप [नाना रूप में] उत्पन्न करते है। औ्रर [सृष्टि की उत्पत्ति स्पिति द्वारा] कृतायं हुए घपने त्वरप से अपने में ही लीन हो जाते है।४७॥ इसमे एक दिव जी 'ेलिम' म पिसा के परसा भी हे सौर कर्मे भी। इसी प्रकार 'सृजनि' और 'लीपने' विनाषो मे भी वर्म न्वम्प तवा कग् स्यरप स्वय गिव जी हूं, इमसिए एक ही चन्तु एव नार रम पर परस दोनो हो नकती है। और इसके परिणामन्वम्प उन्न उदाहरण में बिपुर की अिन, बन्नु या स्वरून होने ने अवकायं, तथा प्रिय-वधन रूप होने मे प्रेयोडवार दोनो हो गपती है। यह पूर्वपक्ष है। ६. वातनलस्पते। हसने । ३, स्मारन्मर 2 50।

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२७० ] वनोपिनजोनिनम् [फारिका ११

इत्यभिधीयते, नदपि निसमन्वयप्रायमेन। यन्सादत्र वाम्तवेडयभेढे काल्पनिकमुपचारसत्तानिवन्धन विभागमानित्व तदव्यवहार प्रवर्तेते। किञ्न विश्वमयत्वात्वरसे्वरन्तर परमेग्वरमयत्वाद्वा विश्वन्य पारमार्थिके डयमेदे माहात्म्यप्रतिपादनार्थ प्रानिम्विक्परिम्पन्द्विचित्रा जगतपखरचनां प्रति सकलप्रमातृनान्वर्ववमानो भेवववोव स्फुटावकाशता नकाचि- प्यतिकामति। तस्मादन्न परमेश्वरन्यैव रपन्य कम्यचित तदाग्यमानत्वाद्वेद- नाने क्रियाया कर्मत्वम्। क्म्वचिन साधक्तमत्वात करगान्वमिति।* उदाहरणे पुनरपोद्वारवुद्धिरिति नल्पनयापि न कथक्चिवपि विभागो विभाव्यते। तस्मात- स्वरूपादतिरिक्तस्य परस्यापतिमासनात् ॥४=।।

यह कहा जाय तो-[कुन्तफ इसका सण्डन फरते ह फि-] यह [फहना] नो श्रसन्गत-मा हो हे। क्योकि यहां [ इम उदाहरस में ] वास्तव में श्रभेद के रहते हुए भी लक्षणा से फाल्पनिक भेद मानकर [ शित जी का दो रूप में ] विभाग करके उस प्रकार का [कर्म औौर करण रप उभयविघ]व्यवहार हुआ है। श्रौर[दूसरी वात] यह भी हैं कि परमेश्वर के विश्वरप होने से अथवा ससारक के परमेश्वरमय होने से पारमार्थिक अ्र््रमेद होने पर भी [ शिव जी के ] माहात्म्य के प्रतिपादन के लिए प्रत्येक वस्तु के स्वभाव-भेद से भिन्न विश्-प्रपञ्च की रचना में समस्त प्रमाताश्ो के द्वारा अ्नुभयमान भेद की प्रतीति स्पप्टता का कभी भी श्रतितमण नहीं करती हैं।[ अनर्थात फाल्पनिक प्रभेव से श्लोक में एक ही शिव में फर्मत्व तथा करसत्व का कथन करने पर भी समभने वालो को उनका भेद स्पष्ट प्रतीत होता रहता है]। इसलिए यहाँ परमेश्वर के ही किसी रूप के [ ज्ञान के विषय या ज्ञेय रूप में ] उससे प्राप्त होने से [उसमें 'चेदिस'] वेदन आ्रादि क्रिया का कर्मत्व होता है। औौर [उसी परमेश्वर के] किसी [अन्य ] रप के साधकतम होने से [ उस दूसरे रूप में] करसत्व हो सकता है। परन्तु [ प्रेयोऽलद्गार के 'श्रद्य मम या गोविन्द' इत्यादि पूर्वोषत] उदाहरण में [अ्र्रलङ्धार्य तथा अलद्धरण का श्ररभेद होने पर भी कर्थञ्चित् लक्षण या] भेद व्यवहार है इस प्रफार की फल्पना से भी किसी प्रकार [अलङ्कार्य-प्रलङ्कार] विभाग सम्भव नहीं हो सकता हैं। इसलिए- [अलङ्धार्य के] स्वरूप से अ्र्प्रतिरिवत [शलद्धरण रूप में अ्नलग विभयत ] किसी दूसरी वस्तु की प्रतीति न होने से [ प्रेयोडलद्गार को अलद्धार नहीं कहा जा सकता है]॥४८॥

मिलता है। शपुष्पाद्धित स्थान पर कुछ पाठ छूटे होने का सवेत पुराने सस्करण में

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कारिका ११ ] तृतोयोन्मेष. [३७१

इति दूपणामत्रापि सम्बन्धनीयम। 8 पक्षे च चदेवालङ्वार्य तदेवा- लट्गरमिति प्रेयसो रसवतश्च स्वात्मनि क्रियाविरोधात्- 7 आत्मेव नात्मनः स्कन्घ क्वचिदप्यधिरोहति ॥४६।। इति स्थितमेव। इन्दोर्लद्तम त्रिपुरजयिन: कराठमूलं सुरारि: दिड्नागाना मदजलमसीभान्जि गएडस्थलानि। अद्याप्युर्वीवलयतिलक श्यामलिग्नानुलिप्ता- न्याभासन्ते चद घवलितं कि यशोभिस्तदीयेः ॥५०। [इत्यादि ११वीं कारिका में रसवदलद्धार के सण्डन में दिया गया हुआ] यह दोष यहां भी जोट लेना चाहिए। और दूसरी ओ्रर [ पक्षे ] जो हो अतद्धार्य है वह ही अलद्धरण भी है यह [ दोष ] प्रेयोऽलद्गार तथा रसवदलद्वार दोनो में अपने में ही [ अलङ्धायं औौर अलङ्गरण र्प ] क्रिया का विरोध होने से [दोप है -थ्रर्थात् रसवत् तथा प्रेय दोनों ही अलद्धार नहीं फहे जा सफते है। कयोकि दोनों जग्ह वह वस्तुत अलङ्गायं है]- फहों नी फोई स्वय अपने कन्घ पर अपने श्प नहीं चढता है ।४६॥ यह निश्चित ही हूं। [इसलिए रसवत् तथा प्रेय दोनों अतक्धार्य है अतद्धार नहीं ]। इस प्रकार 'प्रेयोऽनक्वार' की अलक्कारता का खण्टन करने के वाद पूर्वपक्ष की शोर मे व्याजस्तुति या उदाहरण लेकर पू्व पक्ष वह बनाते है कि व्याजस्तुति अलद्धार है, उसमे व्याज मे ही किसी की स्तुति की जाती हूँ। वह स्तुति वाला पशा 'प्रेय प्रियतरारयानम्' इम तक्षण वे अनुनार 'प्रेय' स्वरूप है। उनको भ्राप सर्ात् कुन्नक यदि त्र्प्रलङ्भाषं मानते हे तो व्याजन्ृति भी अनज्गार न होकर प्रनन्धायं हो जायगो। अथवा चदि भामह यादि के अनुगार अनद्वार भी मान ले तो वहाँ व्याजन्तुति तथा प्रेयोहनद्वार का नकर प्थवा समृष्धि मनद्धार हो जायगा। इन मत का सण्डन करने के लिए पगना उदाहरस प्रन्नुत कर रहे है। [उर्वी पुथिवी के तिलक] हे गजन चन्द्रमा के भीनर का पनचु चिन्ह, त्रिपुर का विजय फरने वाले [ शिप जी] या गला [पण्मूत], स्वय विष्णु भगवान्, और मद जल को फातिमा मे युष्त दिदनागों के गण्डम्यम, भान भी फालिमा से निप्त हो रहे ह। तब सापफे बदा ने किनको शुत्र किया है यह तो यतलाइए ॥५0॥ दुष्परवत स्थान पर ृछ पाठ छुटे होने का मरेर पुराने सन्करस में

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३७२ ] यत्रोफतिजोनिनम् [फारिया ११

छत्र प्रेयाऽभिहिनिरलदर्या व्याजन्तुनिगलडरगम। न पुनरभयोर- लद्वारप्रतिभामो येन तटव्यपेश गगव्यपनशा ना प्रवर्तत', तृनीय- स्यालद्वार्यतया वस्त्वन्तरम्याप्रतिभासनान। अन्यस्मिन विपये प्रेयोमगितिचिवियते वणानीयान्तर प्रेयमो विभूपणत्वाटुपमावेरिवोपनिचन्त्र प्रागनोति ति न क्वनिदषि दश्यते। तस्मादन्यत्रान्यवापि प्रेयसों न वुक्तियुक्तमलद्सालम। रमवनोऽपि तदेव तुल्ययागन्नेमत्वात ॥।११।।

उसमें यन्पपि देखवने मे राजा की निव्दा प्नीा होनी है कि सापके यश ने इन वस्तुओ को तो युत्र रिया ही नही, परन्तु नाम्नन में वह पमना परक है। गमलिए यह व्याजस्तुति अलद्वार है। औौर उमे गजा की प्रिय बात का कथन होने से नाटु या प्रेयोल द्वार भी है। लिए यहा अलद्वाय म ा ् है। प्रयोनका [चाटु] अलक्कायं है और व्याजस्तृनि स्रवद्वार नव है। भवा वह दोनो नवव ै यह पर्व पक्ष का भाव है। इसना सष्टन करते हुए उुन्नक कहते है कि- यहाँ पिय कथन [प्रेय] झलक्वारय ह श्रर व्याजस्तुति [अनचुरस या] ग्रत-/ द्वार रूप है। दोनो [ और विशेष रप से प्रेय भाग ] की भलद्गार रप में प्रतीति नहीं होती है जिससे [प्रेय भाग के लिए] पलक्ान पद का प्रयोग हो अथवा [प्रेय तथा व्याजस्तुति दोनो को अलद्धार मानकर उन दोनो पे ] सचूर नाम से व्यवहार हो। क्योकि [यदि उन दोनों को शलद्धार माने तो उन से भिन्न कोई तीसरा अन्नद्धार्य होना चाहिए। परन्तु ] मरलद्धायं रप से कोई तीसरी वस्तु प्रतीत नहीं हो रही है।[पय प्रियकयन, चाटु के लिए यहां अलद्धार शब्द का प्रयोग नहीं हो सदता है। वह स्वय अ्र्रलङ्गाय है अ्र्प्रतद्धार नहीं। इसलिए यहाँ न प्रेयोऽलद्धार है औ्रर न सङ्गरालद्धार का अ्रवसर है। प्ररपितु उसमें फेवल व्याजस्तुति अ्लद्धार हैं]। [और यदि प्रेय को अपरलद्धार मानते है तो उसमें दूसरा दोष यह आाता है कि किसी श्न्य उदाहरण में प्रेयो भलिति से रहित श्रन्य किसी वंनीय विषय में भी प्रेय का उपमा आदि के समान अलद्धार रूप मे प्रयोग होना चाहिए। [ यदि ऐसा कोई उदाहर मिल जाय कि प्रियवचन किसी अ्रन्य वस्तु को अलकृत फर रहे हो तवू तो वहां प्रेय. के लिए अलङ्ार पद का प्रयोग किया जा सकता है ] परन्तु वह [वंसा कोई उदाहरण ] तो कहीं दिखलाई नहीं देता है। इसलिए अन्यत्र [अर्थात् घाट वचनो में] भी अन्य समय भी प्रेय का अलद्धारत्व युक्तिसङ्भत नहीं हो सफता है। और रसवत् का भी वही हाल है। दोनो के तुल्य योग-क्षेम होने से। व्यावतते पाठपशन्न था। र पयोभजिाति पाह एाबा2 भ 1

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कारिका १२ ] तृतायोन्मेष एवमलङ्गरणतां प्रेयस. प्रत्यादिज्य वर्णानीयशरीरत्वान तनेकरुपाण- मन्येपां प्रत्यादिशति। ऊर्जस्वपृदात्ताभिधानं पौर्धापर्यप्रणीतयोः। अलद्करयायोरभृ पणत्वं तद्वन्न विद्यते ॥१२।। न विद्यते, न सम्भवति। कथम्, तद्वत। तदित्यनन्तरोक्तरमवदादि- परामर्शः। रसवदादिवदेव तय्ोर्विभृपणत्व नाम्ति।

अर्थात् र्नवत् तथा प्रेव स्थली में दोनो जगह वह रम तथा प्रेय दोनो स्वय अलद्धायं ही होते है। अलद्वार तो वे तब हो जब उनने भिन्न को शर वस्तु अलस्धार्य स्प में उपस्चित हो। परन्तु अन्य काई अन्नद्वाय वस्नु उम प्रकार के उदाहरणों में नहीं निकल सकती है। इनीनिए रनवन् अथदा प्रेय रो वही भी भ्रनद्वार नही कहा जा सकता है ॥११। ३ उजस्वि तथा उदात पतङ्गारो का सण्डन- 1 इस प्रकार प्रेय की पतङ्गारता का सण्डन करके वसनीय [के] शरीर रूप [पर्यात् अ्रतङ्गायं] होने से उन [रसवत् तथा प्रेय] के समान [अ्रलद्धायं रप] अन्यो [उजंस्वि, उदात्त तया समाहित की पतङ्गारता] ना सडन कर्ते हं- उसी प्रफार[अर्ात् रमयत् तथा प्रेय के सण्डन में दिसलाए हुए प्रकार] से भागे-पीछे पहे हुए उजस्वि तथा उदात्त फयनरप अ्तक्काग का भी अतद्धारत्व नहीं बनता है। नहीं है पर्थात् सम्भय नहीं है। फैमे कि उन [रसवत् तथा प्रेय] के ममान। तत् [ पद] से सभी पहे हृए रसवदादि या प्रहस परना चाहिए। रगनदादि मे

नहीं हैँ। समान हो उन दोनों [पर्थान् उजरिव तया उदास] या [नी]प्मल्गारत्व

रनन् तथा पेय के गमान उजसी नता उदान नामा दो प्रापहर नी भामह ने भीर माने है। इन दोनों मे भी नकख नहीं किए हू पेवा बनहरण दिए हं। उन्ही से उनये नक्षण निगसे ज नने है। नमे रव पिवाय तानम्' रिव बात के पमन को प्रेय पवद्धार वहा या दसी प्रजर वरन्कित वोर्वादि प्राार बात या वबन उ्जन्च पवसुार के पा भामह के दिए सदकृणों मे वर्रन्चि पन- दवार या तकक निरशय का गपता है। इतरि पद्वार व वने रमे रस नामह ने निया हूँ f-

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३७४ ] पत्रोपिनजीचिनम् [गरिफा १२

कैश्चिदुदाहर एामेव व्यक्तत्वाल्लचग मन्यमानैन्नवेव दशितम। अ्र््रपहर्ताहमस्मीति रृदि ते माम्म मुदमयम। विमुसेपु न मे सम्ः ग्रहत जातु बा्दति ॥ !? ।। 1 ऊजस्वि वशेन यथा पार्याय पुनरागन। द्वि सन्दवाति कि कगं, नत्मेत्यहिरपाकृत ॥३, ७।। इसी प्रकार उदात्त के विषय में भामह का लेग एस प्रार है- उदात्त शक्तिमान् रामो गुस्नावयानुरेया। विहायोपनत राज्य यवा वनमुपागत ।2, ?/॥ इन दोनो ब्लोको में भामह ने उन पनद्वारी के लक्षणा न देकर वेवन उदाहरण दिए है। परन्तु उनमे यह प्रतीत होता हू ि भामह 'कनम्त्री वचन' को ऊजस्वी अलक्वार और उदात्त वस्तु के बर्गान को उदान्त मनद्वार पहना नाहते है। इन अलद्गागे के ये लक्षण उनवे उदाहरणो से स्वय ही निरन मनंगे। ऐसा मानकर ही वदाचित् भामह ने उनके लक्षणा नहीं किए है। परन्तु कुन्नय उनके इस लक्षणा न करने से अत्यन्त प्र्सन्तुष्ट है ननिए उनके मत का उत्लेग केवन एक पकिति में करके छोट देते हं- किन्हों [भामह] ने उदाहरण को ही स्पप्ट होने से [ ऊजस्वी तथा उदात्त पलद्धार ] फा लक्षण मानकर फेवल वह [ उदाहरण ] ही दिरालाया है [तक्षण नहीं फिया है]। में शरपहरण कर लूँगा इस प्रफार भय तुम मत करो। फ्योंकि मेरी तलवार विमुख भागते हुए व्यक्ति पर कभी भी प्रहार करना नही चाहती हैं ।५१।। यह श्लोक कजम्ची अयवा उदात्त कथन के कागण उक्त अलद्वार का उदाहरण कहा जा सकता है। परन्तु कुन्तक उस ऊजस्वत् वणंन को 'अलद्वाय' ही मानते है। प्नन्य आाचार्यो ने- रसस्याङ्गत्वे रसवदलङ्वार। भावस्याङ्गत्वे प्रेयोडलक्वार। रमाभासभावा - भासस्य चाङ्गत्वे ऊजस्वि नामालद्दार। भावशान्तेरङ्तत्वे समाहितालद्वार। इत्यादि रूप से इन अलङ्कागे के लक्षण किए है। इन लक्षणो के अनुसार रसाभास तथा भावाभास के अ्रद्ध होने पर ऊर्जस्वित नामक अलद्वार होता है। रस शब्द से प्रसिद्ध शद्गार आरादि का ग्रहण होता है। वह जहां किसी के अ्रङ्ग हो जाय वहां रसवदलद्धार होता है। भाव शब्द का अर्थ है- रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाञ्जित । भाव प्रोक्त तदाभासा ह्यनौचित्यप्रव्तिता ।। अर्थात् स्त्री-पुरुष चिषयक रति शङ्गार रस में परिात हो जाती है। परन्तु

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कारिका १२ ] तृतीयोन्नेष. [३७४

अनौचित्यप्रवृत्तानाम् .... .... तथाः कामोऽस्व वधृधे'

उनको छोड़कर देवता, राजा, गुरु आदि के प्रति जो रति या स्नेह का भाव है वह 'भाव' शब्द ने कहा जाता है। और जहां ये 'रम' तथा 'भाव' ये दोनी अ्नुचित रूप से व्गित हो उनको 'रस्षाभास' तथा 'भावाभास' कहा जाता है। यह 'रसाभाम' तथा 'नावाभास' जहाँ किसी अ्रन्य के ग्रङ्भ हो जावे वहां 'ऊजन्वी' नामक मलद्वार होता है। कुन्तक इस उजस्वी अतद्कार को नही मानने है। उन के सण्डन में कुन्तक की युमित यह है कि अनीचित्व के अ्प्रतिरिक्त और कोई रमभङ्ज का कारण नही है। जहाँ अनीचित्य का नसर्ग आा जाता है वहाँ उम अनौचित्य से रस अलकृत नही अपितु दूपिन होता है। उसको अनज्का कमे कहा जा सकता है। और दूमरी युक्ति वही हू जो रमवदादि के विपय में दी जा चुकी है। प्ररथात वे सब, वगंनीय वस्नु के स्वरप भूत होने है श्रत अनक्ाय ही हो सकते हं, भलक्वार नही। यहां तक कुन्तक ने नामह के अभिमत ऊर्जन्बी तथा उदात्त मनदवार का -- 3 मण्डन किया है। अव आगे वह उन्भट के श्रभिमत लक्षणा का सण्डन प्रारम्भ पग्ते है। मूल में 'पनोचित्व प्रवृत्ताना' और 'तथा वामोऽन्य बदुधे' ये दोनों उद्धरम उन्धट के 'काव्यालक्गारनार नगरह' के चनुर्य वर्ग ६, १० के प्रनीग रूप में उदृत हुए है। उन्धट ने ऊर्जम्वी का लक्षणा इस प्रकार किया हं-

पनोचित्य प्रवृत्ताना कामपोधादिवारसात्। भावाना रमाना न बन्ध ऊर्जत्व पच्पने ॥ ४,६।

पयांत् काम श्रोध मादि के कारस ने अ्नु्चित रव से प्रवृत्त भावो नवा रनो का वरंन कजस्वी कहलाता है। 'मन्याविरोध तु प्रेवी रमवद्लकारी। कगती वदम्य विद्यमानत्वाच्चोर्जस्यिता'। उन्ट ने अपने ही 'युमारनम्भन' कात से पती स उसरररा भ्रागे दिया है- सवा कामोइन्य बनृध पथा हिमगिरे नुगम्। सन्हीतु प्रनवने हठेनापान्य नपनम्। न पिय जी के वाम या वेग पनना कर गग कि वे सत्माों को छोटसर पावंती को उपरदसती पकपने लेगे। हतार में सवदन्ती या दपारार कर्ना मनुचित है। परन्मु यह प्रपुनित वर्रन गमावेव्मून मोने में उसट गायनुनार यहा इ्नम्वी मनदवार दन गया है। या व्सट ग पमिवाम है।

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३७६ ] चक्ोपितिजीचितम् [फारिका १२

अ्रनोचित्यप्रवृत्त ..... रसभद्ग ....... प्रनोचित्याहते नान्यद् रसभनम्य कारणम ॥५२।। समुचितोऽपि रसः परममौन्दर्गमावहति। तन्न क्थमनीचित्वपरिम्लान

पशुपतिरपि तान्यहानि ॥५३॥ भरतनयनिपुणमानसै उदाहरगमेवोजितम। तदेवमय प्रवानचेतनलक्षणापकनतातिशयविशिष्टचित्त वृत्तिविशेषवस्तु- स्वभाव एव मुख्यतया वर्यमानत्वादलकार्यो न पुनरलहवार। अ्रनौचित्य से प्रवृत्त [ होन पर] रमभन्नहोना श्रवश्यक है कर्योंकि श्री आ्रानन्दवर्घनाचार्य ने ध्वन्यालोफ में कहा हे कि]- अनौचित्यादते नान्यद् रसभन्जम्य फारणम्। प्रसिद्धीचित्यवन्धस्तु रमस्योपनिवत् परा ॥ घ्व० ८ृ० २५६॥। अ्रनोचित्य के प्र्प्रतिरिक्त रसनङ्ग का प्रौर फोई फार नहीं है। ['तथा कामोऽस्य ववूधे' इत्यादि उदाहरणो में] समुचित [वर्ण्यमान शृद्गार] रस भी परम सौन्दर्य को धारण करता है उसमें भ्रनौचित्य से दूषित [ परिम्लान ] हुआ्र्प्रा वह काम आदि के कारण की कल्पना से उपहत दूषित रूप होकर [ प्रतद्गार नहीं अलङ्गाराभास [भी] कैसे हो सकेगा।' [आगे कुमारसम्भव से रसाभास का दूसरा उदाहरण देते हैं। पूरा श्लोक कुमारसम्भव के छठे सर्ग के अन्त में ६,६५ इस प्रकार आाया है]- पशुपतिरपि तान्यहानि कृच्छादगमयदद्रिसुतासमागमोत्क। कमपरमवश न विप्रकुर्यविभुमपि त यदमी स्पृशन्ति भावा ॥ कुमार ६६५॥ [तीन दिन वाद विवाह की तिथि है इसका निश्चय हो जाने पर पावती के समागम के लिए उत्सुक ] शिव जी ने वह तीन दिन बड़ी कठिनाई से बिताए। [जब इस प्रकार के काम विकार उस सर्वशवितिमान देव को भी सता सकते हैं तब अन्य साधारण काम परवश लोगो की तो बात ही क्या है]। भरत के मार्ग में [ अपने को ] निपुण समभने वाले [ उद्धट, दण्डी, भामह आदि ने इस ऊर्जस्वी अलद्गार की कल्पना फैसे कर ली यह ही आश्चर्य की बात ह]. [रसाभास परक यह] उदाहरण ही ऊजित है। यह कैसे कहा- इस प्रकार [कुमारसम्भव के उपर्युक्त पशुपतिरपि इत्यादि श्लोक मे देवता"' स्वरूप] प्रधान चेतन रूप की उपकृत अतिशय युक्त चित्तवृत्ति विशेष रूप वस्तु मुख्य रूप से वर्ण्यमान होने के कारण अलङ्धार्य है अलद्धार नहीं। विन्दुओ््र से अ्र्प्रद्धित स्थलो के पाठ केवल प्रतीक रूप में अ्र्प्रद्धित जा1 पडते हैं अत अत्यन्त अ्र्परस्पष्ट हे। १ प्रतिभास पाठ अरधिक था।

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कारिका १२ ] तृतीयोन्मेष [३७७

न रमवदाद्यभिहितदूपएपात्रतामतिक्रामति तदेतदुक्तमत्र योजनीयम।

औ्रौर वह रसवदादि [के सण्डन में फहे गए] दोषो की पात्रता से भी परे नहीं है। इसलिए वहाँ कहे हुए दोष यहाँ भी जोड लेना चाहिए। [इसलिए कजस्वी नाम का फोई अलद्धार सम्भव नहीं है ]। ४ उदात अलद्धार का खण्डन- उदात्त भलद्वार का भामह ने इस प्रकार निरुपण किया है- उदात्त शक्तिमान् शमो गुरुवाक्यानुरोघक । विहायोपनन राज्य यथा वनमुपागत। का० ३,११॥ रामचन्द्र जी राज्य पर अपना अविकार करने की शक्ति रखते हुए भी पिता जी की आज्ञा का पालन करने के लिए आए हुए राज्य को भी छोडकर वन को चले गए। इम उदाहरस में रामचन्द्र के चरित्र को वठे उदात्त रूप में प्रस्तुत किया गया है इसलिए यह 'उदात्त' अनद्वार का उदाहरणा है। उदात्त के दूसरे भेद का लक्षण भामह ने इस प्रकार किया है- उत देवा परेऽन्येन व्यान्यानेनान्यथा विदु। नाना रत्नादिगुवन यत् तत् किलोदात्तमुच्यते। चाएक्यो नातमुपयान्नन्दक्ीटागृह यथा। पधिकान्नोपनच्छन्न विवेद पया नां।। यह भानह वे अनुसार उदात्त अनद्वार का विनेचन हगरर परन्तु रद्ध तथा दण्डी ने उदात्त अलकार दो प्रकार का माना है एक तो यह जिनमे 'ऋब्धिमद्' वस्तु का चरन किया जाय। उदात्त' नृद्विमद्वस्तु' और उनका दूनरा स्वम् महापुरषी के चरित्र वा वर्शन है 'नरित च महात्मनाम्'। इन दोनो अगो को मिलाकर उन्भट के भनुसार उदात्त भनदवार का लक्षणा वह हुग्र्रा हि- उपात्तम्दिमा्न तु चरित न महन्मनाम्। कास्पालज्वार मानo ४, ६७। न दोनो प्रकार से उदान के लक्षणो का कय्टन करने हुए सुन्नव रावदादि वे गण्डन वाली सषित हो पिर यहां भी देने है। उनका अनिवाय यह है कि नाहे 'अद्धिमद् नन्तु' मा व्शान हो वाण 'मह्ापु्वो के नत्नि' का बगन हो का यम्तु भयन वह नन्मि तो वर्व्यमान होने से सवदार्य हो नरता है। भनकर नहीं हो सरता हू। पही नान कहने ह-

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३७८ ] बधोपितिजीनितम् [ फारिका १२

एवमुदात्तस्योभय प्रकारन्याग्यल ्वार्यतव युक्तिमनी, न पुनर- लद्गरणल्वम्। 1t 'उदात्तमृद्धिमद्वम्तु' मत्र यद्वम्नु तदुदात्तम् अपरलकरगाम। कीहशमित्या- काक्षाया 'ऋद्विमत्' इत्यनेन यदि विशेष्यते तत् तदेव मम्पदुपेत वस्तु वएयमानमलद्वार्यं तटेवालदुवरगमिति त्वात्मनि क्रियाविरोधलनणस्व ठोपन्य दुनिंचारत्वात् स्वरुपातिरिक्तस्य वम्त्न्तरम्याप्रतिभासनाटर्जेम्विवन्। अथवा ऋद्विमद्वम्नु यम्मिन यम्पेत्याषि वाग्यान कियते तथापि तदन्यपदार्थलनएं वस्तु वक्नव्यमेव यममानार्थनामुपनीतम्। तद् कद्विमद्व- स्तु यस्मिन् यम्य चेि नत्काव्यमेत तवाविध भविष्पनीनि चेन्, तदपि न किश्न्िेव। यस्मान काव्यस्पालद्वार इति प्रमिद्धि। न पुन काव्यमेवा- लद्करणमिति।

इस तरह दोनो प्रकार के उदात्त [नामरु तयारुषित पतद्धार] की अलङ्धार्यता हो उचित है अलद्धारत्व नहीं। [उदात्त नामक तयाकयित अ्रपलद्धार के प्रयम भेद का लक्षण है] रद्धि युक्त वस्तु' [का वर्णन उदात्त' है। इस लक्षता का यया अ्र्प्रभिप्राय हुआ कि] यहां जा [ऋद्धिमद्] वस्तु [वर्सनीय अर्थ] है वह 'उदात्त' अ्र्प्रलद्धार हैं केमी वस्तु इस आ्र्प्राकाक्षा में यदि वस्तु को 'ऋद्धिमत्' इस पद से विशेषित करते है तो वह ही [ऋद्धि ] सम्पत्ति से युक्त वस्तु व्ण्यमान होने से प्रलङ्गार्य है, औ्रर वही अ्रलङ्गरण रूप हं इस प्रकार स्वय अपने में [स्वस्कन्धाधिरोहण न्याय से] क्रिया के विरोध रूप दोप का निवारण करना असम्भव होने से औ्रर [ उस वर्ण्पमान वस्तु के ] स्वरुप से अ्र्प्रतिरिक्त [अलद्धारय रूप] अरन्य वस्तु की प्रतीति न होने से इप उदात्त अलद्गार की स्यिति भी] ऊजस्वो के समान ही समभनी चाहिए। [इसलिए अ्रतङ्धार्य की अल्रग प्रताति न होने से उदात्त को भी अलङ्कार नहीं कह सकते है ]। अथवा [ 'उदात्तमृन्टिमद् वस्तु' उदात्तालङ्गार के इस लक्षण की ] ऋद्धिमव् वम्तु जिसमें या जिसकी हो इस प्रकार की व्याखया करें तो भी वह शरन्य पदार्थ रूप वस्तु बतलानी ही होगी। जो [ 'ऋद्विमद्वस्तु' इस पद को] समानार्थता को प्राप्त हो सके। वह ऋद्धिमद्वस्तु जिसमें या जिसकी है वह काव्य ही उस प्रकार का [ऋद्धिमव्वस्तु रूप] हो सकेगा। यह कहो तो उसका भी कुछ अरयं नहीं है। क्योकि अलद्धार काव्य का होता है यह प्रसिद्धि है न कि काव्य ही अलद्धार होता है।

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कारिका १२ ] तृतीयोन्मेष [ ३७६

यदि वा ऋृद्विमद्दस्तु यम्मिन यस्य वेत्यसावलङ्गारः तथापि

इत्युभयथापि शब्दार्थासद्गतिलक्षणादोप सम्प्राप्तावरः सम्पद्यते।

तथा चैतस्य लक्षण- द्विनीयस्या युदात्तप्रकारस्यालद्वार्यत्वमेवोपपन्नं न पुनरलद्कारभाव।

3चरितं च महात्मनाम् उपलक्षणता प्राप्त नेतिवृत्तत्वमागतम् ॥५४।। इति। अत्र वाक्यार्थपरमाथेविद्धिरेवं पर्यालोच्यताम्। यन्महानु- भावाना व्यवहारस्योपलक्षणामान्नवृत्तेरन्वय प्रस्तुते वाक्यार्थे क्वचिद् विद्यते वा नवेति। तन्न पूर्वस्मिन पने तन्न तदलीनत्वात् प्रथगभिधेयस्यापि पदार्था- प्रथवा यदि ऋद्धिमद्वस्तु जिसमें या जिसकी है वह [फोई विशेष] अतद्धार ही हैं तो वर्गानीय [मुश्य] प्रलद्धार से भिन्न अलङ्गार-कल्प दूसरा [अर्थात् अ्रलङ्धायं से भिन्न अलङ्गार] यहां फोई दिसलाई नहीं देता है इमलिए शब्द और श्ररथं की प्रसङ्भति रूप दोष [ जो रसवत् के अलद्धारत्व के सण्टन में दिया या, यहां] भी प्राप्त A होता हैँ। [ इसलिए प्रथम प्रकार के उदात्त को प्रलद्धार नहीं कहा जा सफता हैं यह भ्रलङ्धायं ही हो सकता हं। ] औरर ['चरित च महात्मनाम्' रप] दूसरे प्रकार के उदात्त [तयाकयित अरलद्गार ] फी भी अलक्कायंता [ मानना ] ही उचित है न फि शलस्वाररपता । जंसा कि इन [ दूनरे प्रकार के उदात्त] का लक्षणा[उद्धट ने अपने काव्यातद्वार सारसंग्रह की ४, १७ कारिका में इस प्रकार किया] है- महापुरषो मे चरिप्[फा वसंन] जहां प्रधान रप से वप्यंमान [इतिवृत्त रूप] न होफर उप-लक्षणता [गौणता ] फो प्राप्त हों वहां [ उदात्त अलङ्गार होता

यह[किया हैं]। इसमे वाज्याय के तत्व को समभने वाले निव्वानो [चद्धूटादि] के इस प्रकार निचार करना चाहिए कि उपलक्षसामात्र [गोस रप] ने स्थित महा- पूरपों के व्यवहार या प्रस्तुत वावयार्यं में कोई सम्बन्ध है या नहीं। उनमें मे महिले पक्ष में [पर्थात् सम्बन्ध है इन पक्ष में] उस [वापयारय] में डम[महापुरष व्यवहार ] े तीन न होने से, पृषद् रूप मे प्रनिधा द्वारा उपम्चित हुए [स्यवहार] ह पन कुन्नमनिरित पाठ क नती है । २ न पूर्व नम्रग्स में नती है। : उदूड कासान पुवारसारगप ८,१० पारिया।

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२८० ] वत्रोपितजीविरम् [करिया १२

न्तरवत तदवयवन्वेनैव व्यपनेशो न्यास्य पाग्यादेरिन शरीर। न पुनरल द्वारभावोऽपीति। रन्याम्मिन पते नदन्यवाभावादेव वास्यान्तरवर्ति- पदार्थवन् तस्य तन्न सत्तैव न सम्भवति कि पुनग्लवरगनचर्चा ॥१२।।

फा उस [ वाक्यायं] के अ्रवयय रप में ही सम्चन्न मानना उचित है। जैसे हाय प्रादि फा शरीर के साथ[श्रवथन रूप से हो सम्बन्त होता] है। न कि अलक्धार भाव भी मानना चाहिए।अयात जैमे हाथ पर आदि सो सरीर का अपयत हो माना जाता है लचार नहीं दसी प्रवार महापुरतो पे चर्ति का प्रवृत वाश्यायं अर्थात् जिस वाक्य में उसका बंन रहता है उस वार्म के प्रयं पे साय प्रवमय रप से ही सम्बन्ध हो सफता ह अलदार रप से नहीं।। और दूमरे [सम्चन्य नहीं है इस] पक्ष में उस [महापुरुषों के व्यवहार] का सम्बन्ध न होन मे दूसरे याय के पवार्यों के समान उस [ महापुरष व्यवहार ] की यहां सत्ता हो सम्भव नहीं है तो अलद्धरसत्व का चर्चा हो पया हो सकती है?[ इसलिए दोनों प्रफार के तथाकयित उदात्त अलद्धार के स्वरूपों मे से फिसी को भी अलद्धार नहीं कहा जा सफता है। दोनो फो अलङ्धार्य कहना ही उचित है] ॥१२।। ५ समाहित अलद्धार का खण्डन- समाहित अलकार का विवरण भामह ने इम प्रकार किया है- समाहित राजमिये यथा क्षत्रिययोपिताम् । रामप्रसवत्यं यान्तीना पुरोऽदृश्यत नारद ॥ ३,१०। राजमित्र नामक किसी अज्ञात नाटक मे परशराम को अपने वश मे करके क्षत्रियो के नाश से बचाने के उद्देश्य से परशुराम के पास जाती हु क्षत्रियो की स्त्रियो को रास्ते में नारद मिल गए। यहां समाहित अलक्कार है। जिस प्रकार रसवत् प्रेय ऊ्जस्वी आादि अलक्कारो के लक्षण न करके भामह ने उनके केवल उदाहरसमात्र दे दिए हे। इसी प्रकार यहां समाहित अलक्कार का भी लक्षण न करके केवल उसका उदाहरण मात्र दे दिया है। परन्तु उससे लक्षण- इस प्रकार निकाला जा सकता है कि परशुरम के पास क्षत्रिय नारियां जिस भाव से जा रही थी, रास्ते मे नारद को देखकर उनका वह भाव एक दम दूर हो गया। अर्थात् इस इलोक में भाव शान्ति का प्रदर्शन किया गया है। इसलिए भाव शान्ति आ्दि की अङ्गरूपता हो जाने पर समाहित अलद्कार होता है। इस प्रकार का समाहित का लक्षण अभी ऊपर दे चुके हैं। भावशान्तेरद्भत्वे समाहितालङ्वार ।

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रिका १३] तृतीयोन्मेप: [३८१.

एव समाहितस्याप्यल र्यत्वमेव न्याय्यम्, न पुनरलद्वारभावः। तथा समाहितस्यापि प्रकारद्वयशोभिनः । तथा तेनैव पूर्वोक्तेन प्रकारेण ममाहिताभित्रानस्य चालद्वारस्य भूपरत्वं न विद्यते नाम्तीत्यर्थ.। *रसभावतदाभास वृत्ते. प्रशमवन्घनम्। अ्र्पन्यानुभवनिःशून्यरूप यत्तत् समाहितम्।।५५।। यदपि कैश्चित् प्रकारान्तरेण समाहितास्यमलद्वरसमाख्यात तस्यापि

रमभावतदाभामवृत्त प्रयमवन्धनम् । प्रन्यानुभवनि धून्यम्पो यत्तान् ममाहितम् ॥ मामह तथा उन्धट के प्भिमत इन दोनों प्रवार के ममाहिती की मलकारता का भी कुन्तक पहिले कही गई युवितयों मे ही सण्डन करने हैं- इस प्रकार 'समाहित' का भी अ्रलद्धायंत्व ही उचित है अलद्भार भाय [उचित] नहीं [हैं]। इसी प्रफार दो प्रफार से शोभित होने वाले 'समाहित' का भी [मतक्कायंत्व मानना ही उचित हैं, अलद्धारत्व नहीं ] ॥१३। उस प्रकार अर्थात् पूर्वोवत शेली से 'समाहित' नामक [तथापयित] भलद्धार का भलद्धारत्व नहीं हैं।

रस, भाव और तदाभास, [शर्था रसाभास तथा भावाभान आादि] के प्रशम [पर्यात् भावशान्ति आदि] व श्र्ध रूप मे स्यित होने पर[समाधिफाल पे समान] स्रन्य रसादि पे अनुनव मे सून्य जो है यह 'ममाहित' अवन्वार ह ॥४y॥ शरोर [उन्दूट धादि] फिन्हों ने श्रन्य प्रकार मे ममाहिन अलद्गार की जो ्याद्या पी हुं उनपा भी उसी प्रशार में अ्तन्दारत्व नहीं बनता है। इसी पो बहने है।

: मात्यवद रनारमयह ४,:1 दर्य समता मे एस सलोष का 'रनभाव तदाभान नावपा जादिग्गम 'ह पाठ डिया गण पा जो पपुर था। तमने उन्ट के हन्य के एनसार रह दाठ प् रि ता है

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३८२ ] [कारिकिा १३

तथच भृपत्व न विद्यने। नदभिवते-'भहार यशोगिन' । पर्वोक्नेन नकारेश अनेन चपनेसा हाक्था वंममानन्य सर्वानव्यालदारव न पम्भवति। श्रदणों स्फुटानुकनुपाडरुखिमा हिलीन शान्त च सानमचन्मपृ्ण ग्रमुद्या। भावान्तरस्य तन गगदगनोज हापा नोदगाट्वासनतया मसर ददानि ।1६।।

नतिपादितम। उदानीं तदेव क विप्रतिगान्लियितलोोत्तरानिशवशालितया

कारसाम् ।१ अभिधायाः ग्रकारे रतः ॥।१३॥ 'दो प्रकारो से शोभित होने वाने'। पूर्जावत कहे गए [ अरथात् भामह के प्रनिपादित ] प्रकार से और अ्र्न्य [ अ्रर्थात् उद्भट प्रति पादित ] द्विनीय प्रकार में दोनो प्रकारो से शोभित होने वाले समाहित का प्रलद्धारत्व सम्भव नहीं हो सकता है। [इनमें से पहिले भावशान्त्यादि की श्रङ्गता का उदाहरण निम्न प्रकार से है] -- उमडते हुए प्न्रांसुश्रो से कलुपित भ्र्रांसो को [रुदनजन्य ] गररसाई [पोध का पविर्भाव होते ही] जाती रही, भ्रकुटि [भौंहो के चढ़ने] के साथ हो [रदन काल फा] होठ का फडकना [ भी ] शान्त हो गया, तुम्हारे गालो तफ श्राया हुआ्र क्रोध, प्रवल सस्कार के कारण किसी दूसरे भाव को प्नाने का श्वमर नहीं देता है ॥५६॥। चेतन और अचेतन पदार्थो के भेद से भिन्न, और स्वाभाविक सौन्दर्य से मनोहर वस्तु के स्वरूप का प्रतिपादन [ ३, ८ फारिका में ] किया गया था। शव [रसवदलद्गार आपरदि के प्रकरण में] वही [ पदार्थो का स्वस्प ] फवियो की प्रतिभा के प्रयोग से लोकोत्तर सौन्दर्य युक्त हो जाने से नवनिमित अ्रपूर्व सौन्दर्य को प्राप्त होता हुआ विखलाया जा रहा है। उस प्रकार के अलद्धारो की रचना से उत्पन्न सौन्दर्याति- शय के अ्रतिरिक्त केवल भूतत्व मात्र [ पदार्थ मात्र ] के कारण से उत्पन्न सहृदयो की आह्मादकारिता का औ्र कोई कारण नहीं है। [ यह सारा अ्रनुच्छेद बीच में पाठ लोप के कारस सुसङ्गत रूप से लग नहीं रहा है]।।१४।। [समाहित अलद्धार के ये दोनो स्वरूप वस्तुतः अरलग अ्रतद्धार नहीं अपितु कथन शैलो] अमिधा के प्रकार मात्र है।१३। पुष्पाद्ित स्थानो पर लुप्त पाठ सूचक चिन्ह मिलते हैं।

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कारिका १४-१५ ] तृतीयोन्मेष [ ३८३

यथा स रसवन्नाम सर्वालक्कारजीवितम्। काव्यैकसारतां याति तथेदानीं विवेच्यत।।१४।। रसेन वर्तते तुल्यं रसवत्वविधानतः । योऽलद्वारः स रसवत् तद्विदाह्वादनिमिंते:॥१५॥

रसवदनड्गार की कुन्तक की अ्रपनी व्यास्य।- इस प्रकार यहा तक कुन्तक ने भामह, उद्धट तथा दण्डी के मनानुभार प्रभिमत स्वरूप वाले, रमवत्, प्रेय, ऊर्जम्बि, उदात्त तथा समाहिन अनकारो की अलक्वारता का खण्डन किया है। उसके अनुसार उन नव म्यलो पर व्गिगिन वम्नुएँ सब 'अलकार्य' ही हो सकती है। उनके लिए 'अलक्वार नब्द का प्रयोग उचित नही है। इसके त्रपरगे श्रव कुन्तक यह कहने जा रहे है कि रसवत् आदि को यदि अलक्कार मानना ही चाहते हूं तो उनकी व्यास्या दूसरे प्रकार मे करनी होगी। उनके अनुसार ने रनवन् नाम मे अ्रत्क्वार का व्यवहार हो मकता है। अन्यया उन्गट या नामह आदि के अभिमत र्प में रमवदादि के लिए पनद्वार गन्द का प्रयोग ही नहीं हो सकता है।

भामह, उद्भट आादि ने जो 'रसवत् भलद्वार शब्द का प्रयोग किया है उममें रस शब्द का से 'मतुप्-प्रत्यय करके 'रनवत्' शब्द बनाया गया है। परन्तु कुन्तक ने 'रसवत्' पद में मतुप-प्रत्यय न मानक 'नेननुत्य मिया नेहनि' इम सूय मे नादृष्यायंक 'वति' प्रत्यय माना है। इम प्रत्यय-भेद का यह प्रभिप्राय हुपा कि सद्भट के मत में रन मे युशन अलद्वार 'रसवत्' वहलाना हैं नो कुन्तक के मन में 'रन के समान पाल्याददायक' पलद्वार 'रनवन्' कहलाना है। उनी बात को कुन्तक ने 'रनेन वनंते तुल्य': त्यादि १५वी कारिका में कहा है। जिस प्रवार से वह रसवत् समस्त अलद्दारो का जीवन स्वम् औौर पाव्य .. का घदितीय सार रूप हो गस्ता हू उन [प्रकार] या श्रय हम[अपने नए दुव्टिकोल से वणंन करते हूं।।१५।। रस तत्व के विघान मे सहृदयो के पाहाववायय होने मे जो [मोई पनद्धार [भी] रस के समान हो जाना हू का अतद्वार [हमारे मन में] 'रनवत्' कहा जा सकना हुं ।।१६।।

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३८४ ।

सथत्यादि। 'गया स स्सनन्नाम गना बन प्रशरण पवप्र नग्यान- वृनिरल द्वारो रसवद भिवान: कान्यक्वारण गति गन्नेीसम्यता प्रनिषणने,

'तथा' तेन प्रकारसोननोमचुना विविध्धत विनार्यन, मनमोभेदेन वितन्यते। तमेव रमवदलदार लव्षयनि रगन सदि । 'गाडल, ग ग्मनन' इत्यन्वय ।य किलि वस्यस्पो म्पकादि रसवानिभीगने। कि स्वभावेन 'रसेन वर्तत तुन्यम' रसेन ऋमराहिना तुल्ण वनने नवा त्रालमगानत् नत्िय- स्तथैव स रमवनलदार। कम्मात् -'रसा्वविचानन'। रसोडम्ास्नीति स्सवत् काव्य, तम्यभावस्त्व, तत सग्स नसम्पाउनान्, ना दावाटनिमि- तेश्च। तत् काव्य विनन्तीनि तहविट नप्तान्नेपामाादानमितेरानमनिग्वाद नात्। यथा रस. काव्यस्व रसवत्ता नहिदालाठ व विव नानि एमुषमादिर-

'यथा' इत्याद[कारिकाश्ो की व्याग्या इस प्रवार होगी] जिम प्रकार से वह 'रसवत्' पहिले जिसकी सत्ता का सण्न कर चुते है वह ररावत् नाम का अलद्धार जिस प्रफार से काव्य का श्रद्वितीय सार हो सफता हूं कान्य का स्वस्व हो सकता है, सव अलद्धारो का प्राण अर्ययात उपमा प्रादि सद्य प्रलद्धारो का जीवन स्वरूप से हो जाता है। उस प्रफार से प्रब [ उम रसवदलद्गार का ] विवेचन अर्थात् विचार करते हैं। अर्यात् लक्षण और उदाहरण द्वारा विस्तार करते हैं। उसी रसवदलद्धार का लक्षण करते है-'रसेन' इत्यादि से। जो अलद्दार है वह [ सब] 'रसवत्' हो सकता है। यह अ्र्परन्वय करना चाहिए। जो इस [श्रागे फहे गए] प्रकार का रूपक आदि [अलद्धार] है वह 'रसवत्' कहलाता है। किस स्वभाव से [ युक्त होने पर रसवत् कहलाता हं कि जब वह] 'रस के तुल्य होता है'। रस सर्ातत् शृङ्गार आदि के तुल्य होता है [ गौए रूप से तात्कम्यं सम्बन्धमूलक लक्षणा से] जसे ब्राह्मणा के समान [फर्म फरने वाला] क्षत्रिय [ब्राह्मरवत् कहलाता ] है। इसी प्रकार वह रसवदलद्गार [रस के समान श्ाह्लादफारक होने से तात्कर्म्य- लक्षणा द्वारा रसवत् कहलाता है] है। किस कारण से 'रसवत्त्व के विधान से'। रस जिसमें है वह रसवत् काव्य हुआ। उसका भाव रसवत्व, उससे अर्थात् सरसता के सम्पादन से, और सहृदयो का श्रह्नादकारक होने से। उस काव्य को जानने वाले 'तहित्' [ काव्यमर्मज्ञ हुए ] उनके आनन्द का जनक होने से। जैसे रस काव्य को सरस करता है और काव्यज्ञो के पनन्द का कारण होता है हसी प्रकार उपमा आदि उन दोनों [ फाव्य की सरसता और तद्विवाह्लाद]

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कारिका १६ ] तृतीयोन्मेप. [ ३८४

प्युभर्यं निष्पादयन भिन्नो रसवदलद्दार: सम्पद्यते। यथा- -२ उपोढ़रागेण विलोलतारकं तथा गृहीत शशिना निशामुखम्। यथा समस्तं तिमिरांशुक तया पुरोऽपि रागाद् गलित न लक्षितम् ॥५७।। अत्न स्वाचसरसमुचितसुकुमा रस्वरूपय। निशाशशिनो वगोना्यां रूपका- लद्वारः समारोपितकान्तवृत्तान्तः कविनोपनिबद्धः । स च श्लेपच्छावा मनोज्-

को सम्पादन फरते हुए [साधारण उपमा आदि से] भिन्न [ विशेष रूप से ] रसय- दलद्धार हो जाता है। जसे- सन्ध्याकालीन आ्ररण्य को घारस किए हुए [ दूसरे पक्ष में प्रेमोन्मत ] शशी अर्यात् चन्द्रमा [दूसरे वक्ष में पुल्लिङ्ग शशी शब्द से व्यङ्गय नायफ] ने निशा [रात्रि पक्षान्तर में स्त्रीलिङ्ग निशा शब्द से प्रतीयमान नामिका] के चञ्चल तारों [तारफ नक्षत्र और पक्षान्तर में चञ्चल फनीनिका आंस मे तारा] से युक्त मुस [प्रारम्भिक अप्रभाग, प्रदोषफाल, पक्षान्तर में मुस आ्रानन] को [ चुम्बन करने के लिए] इस प्रकार पकटा कि राग[ सन्ध्याफालीन पदस प्रकाश पक्षान्तर में नामफ के स्पश से समुद्भूत अनुरागातिदय ] के फारस सारा अ्रन्यकार एूप [पक्षा न्तर शरीर या आवरण करने वाला ] वस्त्र गिर जाने पर भी उस [ निश्षा तथा नायिका] को दिसलाई नहीं दिया॥५७।। यह दलोक पाणिनि का बनाया हुआ वहा जाना है। इममें मन््या के समय सदय होते हुए चन्द्रमा या वशन है। चन्द्रमा के लिए पुत्विस्त भगी' शब्द तथा रामि के लिए प्रयुवत स्व्ीनिम्न 'निमा' शब्द से उनमें नायफ नायिका के व्यवहार का ममारोप किया गया है। इसलिए ध्वन्यानोककार आदि नव पाचारयों ने नमें समानोवित अलद्वार माना है। परन्तु कुन्तक तकी विचेचना करते हुए उनमें र्पवासद्वार प्रतिपादन कर रहे है। मयम में वन्नु वा पारेप होना है, नमानीस्ति में स्यवहार का ममारोप होता है। परन्तु कृन्तव यहाँ वृत्तान्न पर्वान् स्वचनार का 'धारोप मानते हुए भी उसे मपानद्वार यह रहे है। यहां अपने अनसर से योग्य सुन्दर रप वाले निशा और ननी पे वहन में नायवन्युत्तान्त के [शशो में तथा नामिया ध्वयहार मे निद्या में] प्रारोप द्वारा रवि नें रूपकालकार की रचना थी है। और वह [रपपाल्गार] पलंघ की कपूयं मन्करण में इसने वाद नुष्न पाठ का सृभर निन् पाया जता है।

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३८६ ] वघ्नोकितिजीवितम् [फारिका १६

विशेपवक्रभावाद् विशिष्टलिद्गमामर्थ्याचच काव्यन्य सग्सनामुल्लामयंम्न- द्विदाह्वादमादधान स्वयमेव रसवदलद्वारता समासादितवान। चलापान्गा दृष्टिं स्पृशसि बहुशा वपयुमती रहस्याख्यायीव स्वर्नास मृदु करर्ान्तिकचरः । करो व्याधुन्वत्या विर्घास रनिसर्वम्बमघर वय तत्वान्वेपान्मधुकर हतास्त्व सतु कुती ॥५८॥।

छाया से मनोहर विशेषरो की वनता से औ्ौर[ निशा तथा शशी शब्दो ये पुन्तिन्न तथा स्त्रीलिङ्ग रूप ] विशेष सिङ्गो की सामर्थ्य मे काव्य की मरसता को प्रस्फुटित करता हुआ और सहृदयो को श्राह्वाद प्रदान करता हुआ स्वय ही रमवदतकुार को प्राप्त हो गया है। इसी रसवदलद्वार का कुन्तक एक और उदाहरणा देते है। यह उदाहृग्य कालिदास के 'अभिज्ञान शाकुन्तल' नाटक से लिया गया है। [अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक के द्वितीयाचु में वाटिका के सीचने में लगी हुई शकुन्तला फो पेडो की ग्राड में छिपकर देसते हुए राजा दुप्पन्त उसके मुख के ऊपर मँडराते हुए भौरे को देखकर अपने मन में फह रहे हैं कि]- हे मधुकर तुम इस [ शकुन्तला ] की [ भय से परिकम्पित ] चञ्चल औौर तिरछी चितवन का [ खब ] स्पर्श कर रहे हो, एकान्त में या फोई रहस्य की [गोपनीय बात] कहने वाले के समान फान के समीप जाकर गुनगनाते हो [ तुमको भगाने, तुमसे बचने के लिए] हाथ चलाती हुई इस [ तरूणी शकुन्तला ] के रति के सर्वस्व भूत अ्र््रधर [के श्र्प्रमृत ] का [ बलात् जवरदस्ती ] पान कर रहे हो, हे मधुकर हम तो तत्त्व के अ्न्वेपण [ श्र्थात् यह हमारे ग्रहण फरने योग्य हैं या नहीं इसके सोचने ] मे ही मारे गए और तुम [ इसका इस प्रकार का भोग फरके ] कृतकृत्य भी हो गए ॥५८॥। कुन्तक के इस विवेचन में अ्न्य आरचार्यो के विवेचन से दो प्रकार के भेद प्रतीत होते हे। एक तो यह कि इस प्रकार के उदाहरणो में अन्य आ्रचार्य समासोविति अलद्दार मानते हे परन्तु कुन्तक उसमें व्यवहार समारोप होने पर रूपकालद्वार मानते है। दूसरा मुख्य भेद यह है कि इस प्रकार की शृङ्गार आ्र्प्रादि की अ्र्प्रभिव्यञ्जक सभासोवित में प्रतीयमान रस की ओ्र्पर अ्र्प्रन्य आाचार्यो ने ध्यान नही दिया है। कुन्तक ने उसी के द्वारा इस रूपक या समासोवित को साधारण रूपक या एमासोक्ति से *पूर्व सस्करण में यहाँ लुप्त पाठ का सूचक चिन्ह पाया जाता है।

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कारिका १६ ] तृतीयोन्मेप [ ३८७

अत्र परमार्थः प्रधानवृत्ते. शृद्धारस्य भ्रमरसमारोपितकान्तयृत्तान्तो रसवदलद्वारः शोभातिशयमाहिववान । यथा वा 'कपोले पत्राली' इत्यादौ।

अलग कर दिया है। और इस प्रकार के रसाप्लुत रपक या समासोकिति को ही वह रसवदलद्वार कहते है। यदि यहाँ प्रतीयमान पृङ्गार रस को रूपकालद्वार का प्रङ्ग मान लिया जाय तो रस की भङ्जस्पता हो जाने पर अन्व आचार्यों के मत से भी यह रसवदलद्वार हो सकता है। प्रन्य भाचायं राजा, देवता आदि किसी की स्तुति के स्थल में पतीय- मान करए या गृद्गार आादि रसो को प्रकृत वस्तु का श्रद्ध मानकर रसवदलद्वार का उपपादन तो करते है। परन्तु यहाँ रूपक या समानोकित मे प्रतीयमान रस को अलद्वार का श्रद्ध नहीं मानते है। वे यहाँ रस को प्रधान तथा दवार भी उसका उपकारक याशोभाधायक मानते है प्र्रत उसे वे समासोषिति अलद्धार कहते है।

कुन्तक के मत से यहां अलद्दार के माथ रम का विशेष नम्बन्ध होने मान से वह 'रनवदल द्वार' कहलाता है। फिर चाहे वह रस प्रधान हो या मपधान। हाँ, इस रूप में कुन्तक के मत में अनद्वारों की स्थिति विरेप रस के सम्बन्ध के बिना भी हो सकती है। उम दशा में उपमा रूपक आदि साधारगा अलङ्गार कहलाते है। परन्तु जहां उनके साथ रस का विशेष सम्बन्ध हो जाता है वहाँ वह तावारण प्न- द्वारों मे भिन्न 'रसवदलज्ार' हो जाते है।

यहां वन्तक ने रसवदलद्वार के जितने उदाहरण दिए है वे नन समासोरित मलद्वार के ही उदाहरण है। इनसे प्रतीत होता है कि कुन्तक समानोपिन स्यन में सवत्र रसवदल द्वार मानते है। क्मोकि उसमे ही नायव न्नायिता मदि के व्ययहार का नमारेप होने मे रनवता की विशेष रूप मे प्रतीति होती है। इसका [परमार्थ] वास्तविफ अनिप्राय यह है कि नमर में [पान्त] नायक के व्यवहार का धारोप करने वाला रसवदतच्वार [फारय मी सरसना के प्र््रतिराय तथा सहृदयों के पाहादपारित्व पा पारस होने से इनोप में] प्रधान रप से म्पित शृद्गार [रस] की रोभा [प्रपूर्व] को उत्पन्न कर रहा हैँ। भपया जसे [पहिस २, ६०१ पर उदत] 'कपोले पमानी' ह्त्यादि दनोष में [ नो इसी प्रकार रसवदनक्ार होता हूं ]।

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[फारिका १६

नदेवमनेन न्यायेन 'चिग्नो हस्तावचस्न,'उत्यन रसनटलदारप्रन्यारया- नमयुक्तम। सत्यमेतत्। किनतु निम्नलम्भवगारता तत् निवार्धन, शेव्य पुनस्तु -- ल्यवृन्नान्ततया रसवटलद्वारत्गनिवार्यसेय। न वालदागन्तर मन रसवन- पेक्षानिबन्धन ससृक्टिसा र्यपवेशप्रस् प्रत्यान्येयता प्रतिपणते। गथा- प्रगुलीभिग्वि केशसनय सन्निगृ तिमिर मरीनिमि। कुड्म लीकत सरोजलोचने चुग्नती रजनीमुग शशी।।V६॥l अरप्रन रसव दवराीन न्निा सुनरा समुनासता । तत्र 'चुम्बनीय रजनीमुख गणी' ज्युन्रतालक्षगान्त रमवदलदारम्य प्राधा- न्येन निबन्वनं, तदन्गत्वेनोपमाटीनाम । केवलम्य प्रस्तुतपरिपापाय परिनिष्पन्नवृत्ते:।

प्रश्न।[ जब आर्राप इन उदाहरणों में रमवदलद्जार स्नीकार फर रहे है तब ] इसी युषिति से [उदाहरण स० 3, ४३ पर ज्दत ] 'क्षिप्तो हस्ताघलग्न' इसमे रसवदलद्वार का सण्डन [ जो थापने किया है वह] ग्रनुचित हैं । [ क्योफि उसमें भी इसी प्रफार रसववलद्दार हो सफता है] [उत्तर-ठीफ हं [उसमें इस प्रकार से रसवदलद्धार नवश्य हो सकता है ] किन्तु उसमे [ हमने केवल] चिप्रलम्भ भुद्गार का सण्डन किया है। शेप के [ इन उदाहरणो के ] तुल्य होने से रसवदलद्गारत्व प्नरनिवार्य हूं। श्र््रौर [रसव- दलद्ार के प्र्प्रतिरिक्त ] अ्रन्य [कोई साधारस] श्रलद्धार होने पर रसवदतद्भार मूलक ससृप्टि अथवा सङ्गर अलद्धार का सण्न [भी] नहीं किया जा सकता है। जसे- अँंगुलियो से केश समूह के समान, किरणो से ग्रन्धकार को नियन्त्रित करके, चन्द्रमा, बन्द नेत्र कमलो वाले रात्रि के मुख [ प्रारम्भ भाग ] को चूम सा रहा

इसमें [ उत्पोक्षा रूप ] रसवदलद्धार औप्रौर रूपकादि [अ्रलङ्धारो ] की एक - साथ उपस्थिति स्पष्ट प्रतीत हो रही है। उसमें रात्रि के मुख को चन्द्रमा चम-सा रहा है। इस उत्प्रेक्षा रूप रसवदलद्कार का प्रधान रूप से निवेश हुआ है और उसके श्रङ्ध रूप से [अगुलीभिरिव मरीघिभि इत्यादि में विद्यमान] उपमा आदि का। [रसवत्व रहित] केवल के [उपमादि] प्रस्तुत [उत्प्रेक्षा रूप रसवदलङ्वार के ] के परिपोष के लिए ही विद्यमान होने से।

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फारिका १६ ] तृतीयोन्मेप. - [ ३८६

ऐन्द्रं धनुः पारदृपयोवरेण शरद्दधानार्द्रनसक्षताभम। प्रसादयन्ती सकलक्मिन्दु' ताप रवेरभ्यधिक चकार ॥६०।। 'प्रसादयन्ती, रचेरम्यधिकं तापं गृरच्चकार इति समयसम्भवः पदार्थ- स्वभावस्तह्वाचक 'वारिद" शव्दाभिधानं विना प्रतीयमानोलमेनालक्षणोन रसवद- लद्गारंण कविना कामपि कमनीयतामविरोपित. । प्रतीत्न्तरमनोहारिणा' सकलद्वादीनां श्वाचकानामुपनिवन्धनात् 'पाए्डुपयोधरे णार्टनखक्षताभ- मेन्द्र धनुर्दधाना' इति श्लेपोपमयोश्च नदानुगुरयेन विनिवेशनात्। एवं

गौरवसं [स्तनो के समान ] मुत्र पयोधर [मंघो ] पर ताले नसक्षत के समान इन्द्र-धनुष को धारण घिए हुए [ पराङगनोपभोग के चिन्ह रूप] फलड्ू से युक्त चन्द्रमा को प्रसन्न [निर्भल, स्वच्छ ] करती हुई शरत् [रूप नायिका ] ने सूर्य [रूप नायक] के सन्ताप को औ्रौर भी तटा दिया ॥६०॥। शरद ऋतु में बादल सफेद हो जाते है। चन्द्रमा का प्रकाश साफ हो जाता है। और गर्मी बढ जाती है। इम सब स्वाभाविक वम्तु का कवि ने इन ढग ने वणन किया है कि वारत् मानो एक नायिका है और मूर्य नावक है। ग्रीर चन्द्र मानो प्रतिनायक है। पयोघर गब्द के अरथ नेघ और र्तन दोनी हो सकते है। शरन् के सफेद पयोधरो अर्थात मेघो मे हन्द्र-वनुष निकन रहा है। वह मानो नायिका के गौर वर्सा स्तनो के क्पर उसका भोग करने वाने जिनी प्तिनायक के द्वारा अस्कित किए हुए ताजे नखक्षन हो। और वह गरत् रूप नायिका, प्रनिन यक रूप चन्द्र को प्रगन्न कर रही है या मना रही है। गरत् के पाण्ड पयोपरीं पर थारद्र नरक्षत के नमान दिसलाई देने वाले इन्त्र-धनुप को देसकर सूर्यं रप नायर का सन्ताप सर भी बर गना है। मानो यह मेरी नायिका मुक को छो-कर नम पलदी वदनाम चन्द्रमा की समामद कर रही है। यह इस प्लोर का अनिप्राय है। [चन्द्र फो ] 'प्रसन्न फरती हुई शरत् ने सू्य के ताप को बटा दिया'। यह [दरत् पाल फे] समय में होने वाना स्वनाव उसके चाचक 'बारिद' या नेव शब्य के फहे बिना भी प्रतीयमान उत्प्ेक्षा रूप रसवबद्व से यवि ने िसी भ्प्य सुन्दरता पर चढा दिया हैं। श्रन्थ [नावफ नाविश सा्दि] यी प्रनोनि। ये होने के कारस] मे मनोहर सपलस् धादि नब्दों पे प्रयोग से 'पन' या गोर] पयोषगे [मेघो तथा स्तनो] पर ताज नसक्षत पे नमान रन्ट्रघनुद का धान्ता रिए हए इन दलेय तथा उपमा मे, जमप्रतीयमानत्त्रंक्षा रूप न्सवदनदर के शरुपन इय से सन्नयेश मे [ भी उत्पेक्षा ने पाब्ब से सौन्दर् से सन्बाल दरषे दुश पर

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वक्रोपितजीवितम् [फारिका १'

तदेवमनेन न्यायेन 'च्षिप्तो हस्ताव न्ग्न.' इत्यत्र रसचदलद्वारप्रत्यास्या नमयुक्तम्। सत्यमेतत्। कितु विप्रलम्भश्वद्गारता तत्र निवार्यते, शेपस्य पुनस्तु ल्यवृत्तान्ततया रसवटलद्वारतवमनिवार्यमेव। न चालद्वारान्तरे सति रसवन पेक्षानिवन्वन ससृष्टिसद्वरव्यपदेशप्रएद्ग प्रत्यास्येयता प्रतिपद्यते। यथा- त्ररगुलीभिरिव केशसञ्चयं सन्निगृह्य तिमिरं मरीचिभिः। कुड्मलीकतसरोजलोचन चुग्वतीव रजनीमुसं शशी॥५६।l अत्न रसवदलद्वारस्य रूपकाटीना च सन्निपात. सुतरा समुद्धासते तत्र 'चुम्वतीव रजनीमुख शशी' इत्युत्प्रेक्षालक्षणस्त्र रसवदलङ्कारस्य प्राध न्येन निबन्धनं, तदङ्गत्वेनोपमादीनाम्। केवलस्य प्रस्तुतपरिपोपा परिनिष्पन्नवृत्ते:।

[प्रश्न ।[ जब आप इन उदाहरणों में रसवदलद्धार स्वीकार कर रहे तब ] इसी युक्ति से [उदाहरस स० ३, ४३ पर उद्धृत ] 'क्षिप्तो हस्तावलग्न इसमे रसवदलद्कार का खण्डन [ जो आपने किया है वह ] अ्नुचित हैं। [ क्यो उसमें भी इसी प्रकार रसवदलङ्गार हो सफता है] [ उत्तर-ठीक है [उसमें इस प्रकार से रसवदलद्गार भवश्य हो सक है ] किन्तु उसमें [ हमने केवल ] विप्रलम्भ शृद्गार का खण्डन किया है। शेष [ इन उदाहरणो के ] तुल्य होने से रसवदलङ्भारत्व अप्रनिवार्य है। औ्र्प्रौर [रस वलङ्वार के प्प्रतिरियत ] अ्रन्य [ कोई साधारण ] अलद्धार होने पर रसवदलङ्ध मूलक ससृष्टि अथवा सड्डूर अलद्धार का खण्डन [ भी ] नहीं किया जा सकता है जसे- अंगुलियों से केश समूह के समान, किरसो से अन्धकार को नियन्त्रित कर चन्द्रमा, बन्द नेत्र कमलो वाले रात्रि के मुख [ प्रारम्भ भाग] को चूम-सा र है।।५६।। इसमें [ उत्प्रेक्षा रूप ] रसवदलङ्कार और रूपकादि [अलङ्धारो ] की ए साथ उपस्थिति स्पष्ट प्रतीत हो रही है। उसमें रात्रि के मुख को चन्द्रमा चम-सा रहा है। इस उत्प्रेक्षा रूप रसवदलद्धार का प्रधान रूप से निवेश हुआ है और उसके अ्रङ्ग रूप से [ अगुलीभिरिव मरोघिभि इत्यादि में विद्यमान ] उपमा आदि का। [रसवत्व रहित] केवल के [उपमाद्ि] प्रस्तुत [ उत्प्रेक्षा रूप रसववलद्धार के ] के परिपोष के लिए ही विद्यमान होने से।

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फांरिका १६ ] तृतीयोन्मेप [ ३८६

ऐन्द्रं धनुः पाएड्टृपयोधरेण शरद्धानार्द्रनसक्षताभम्। प्रसादयन्ती सकलङ्गमिन्टु' तापं रवेरम्गधिक चकार।६०।। 'प्रसादयन्ती, रवेरभ्यधिकं तापं शुरच्चकार' इति समयसम्भवः पदार्थ- स्वभावस्तद्वाचक 'वारिद" शब्दाभिधानं चिना प्रतीयमानोतेन्नालक्षणोन रसचद- लङ्गारेख कचिना कामपि कमनीयतामधिरोपित. । प्रतीत्यन्तरमनोहारिखा' सकलङ्काटीनां वाचकानामुपनिवन्धनात् 'पाएडुपचोवरेसार्द्रनखक्षताभ- मैन्द्र धनुर्द्धाना' इति श्लेपोपमयोश्च तटानुगुरयेन विनिवेशनात्। एव

गौरवर्सं [स्तनो के समान ] शुभ्र पयोधर [मेघो ] पर ताजे नसक्षत के समान इन्द्र-धनुष को धारण दिए हुए [ पराङ्मनोपभोग के चिन्ह रूप] फलड्कू से युक्त चन्द्रमा को प्रसन्न [ निर्मल, स्वच्छ ] करती हुई शरत् [रूप नाषिका ] ने सूर्य [रूप नायक] के सन्ताप फो प्रौर भी नढा दिया ॥६०॥। परद ऋतु में बादल सफेद हो जाते है। चन्द्रमा का प्रकाश साफ हो जाता है। और गर्मी बढ जाती है। इस सव स्वाभाविक वस्तु का कवि ने इन ढग से वर्णन किया है कि शरत् मानो एक नायिका है और नूर्य नायक है। और चद्र मानो प्रतिनायक है। पयोघर शब्द के अर्थ मेघ और स्तन दोनो हो सकते हैं। गरत् के सफेद पयोघरो अर्थात मेघो में इन्द्र-चनुष निकल रहा है। वह मानो नायिका के गौर वर्स स्तनो के ऊपर उसका भोग करने वाले किसी पतिनायक के द्वारा अ्वित किए हुए ताज़े नखक्षत हो। और वह दरत् रूप नायिवा, प्रतिनायक रूय चन्द्र रो प्रमन्न कर रही है या मना रही है। रत् के पाण्ड पयोधरो पर शद्र नसक्षत के समान दिसलाई देने वाले इन्द्र-धनुप को देखकर स्य रूप नायक का नन्ताप और भी वट गया है। मानो यह मेरी नायिका मुभ को छोटकर एम कलडी वदनाम चन्द्रमा की खुगामद कर रही है। यह उस श्लोक का अभिप्राय है। [चन्द्र को] 'प्रसन्न फरती हुई शर्त ने सूर्य के ताप को बढा दिया'। यह [शरत् फाल के] समय में होने वाला स्वभाव उसके वाचक 'वारिद' या मेघ शब्द के कहे बिना भी प्रतीयमान उत्प्रेक्षा रप रसवदलद्वार से मवि ने दिनी अपूर्व सुन्दरता पर चटा दिया है। अन्य [ नायक नायिक आदि ] मी प्रतीनि[ के होने के कारण] से मनोहर सफ्तद्वु पदि शब्दी के प्रयोग से 'नफेद। या गौर] पयोघरो [मेघो तथा स्तनो ] पर ताजे नसक्षत के नमान रन्द्रनधनुप का धारत किए हुए, इन इलेप तथा उपमा पे, उम [ प्रतीयमानोत्वेक्षा रव रमनदसन्ध्ार) ये अरनुसूल रूप से सन्निवेश मे[ भी उत्पेक्षा ने काव्य मे सौन्दर्यं यो स्रत्यात उन्दर्ष दुर्त पर १ ननदाप्णि।- माचपादीना। ये रोगी पाठ समुन पे।

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३६० ] वत्रोक्तिजी वितम् [ फारिका १६

सकलङ्कगमपि प्रसादयन्ती शरत् परस्याभ्यविकं तापं चकार इति रूपकालद्वार- निवन्धन प्रकटाङ्गनावृत्तान्तसमारोप सुनरा समन्वयमासादितवान्। श्ररत्रापि प्रतीयमानवृत्ते रसवदलङ्कारस्य प्राधान्य तदह्ृत्वमुपमादीनामिति पूर्ववदेव सङ्गति । लग्नद्विरेफाञ्जनभक्तिचित्रं मुखे मधुश्रीतिलक प्रकाश्य। रागेण बालारुणकोमलेन चूतप्रवालोप्टमलघ्कार ।।६१॥ अ्रयं रसवता सर्वालद्वाराण चूडामखिरियाभाति। एवं नीरसाना पदार्थाना सरसता समुल्लासयितुं रसवदलद्वार समासा- दितवान् ॥ १६ ॥

दिया है ] । इस प्रकार सकलद्ध [बदनाम चन्द्र ] को प्रसन्न करती हुई शरत् [ नायिका ] ने दूसरे [ नायक रूप सूर्य] के सन्ताप को और श्रधिक बढ़ा दिया यह रूपकालङ्कार मूलक [प्रकटाङ्गना ] वेश्या के व्यवहार का समारोप सुन्दर रूप से समन्वय फो प्राप्त हो रहा है। इसमे भी प्रतीयमान रूप से स्थित [ प्रतीयमा- नोत्प्रेक्षा रूप ] रसवदलद्धार का प्राधान्य है और उपमा [तथा रूपक] आ्प्रदि उसके श्र्द्ग है। इस प्रकार [अगुलीभि इत्यादि] पूर्व [उदाहरण] के समान सङ्गति होगी। इसी प्रकार कुमारसम्मव ३ ३० के निम्न श्लोक में भी प्रतीयमानो त्प्रेक्षा रूप रसवदलद्वार का प्राधान्य और रूपकादि की प्रङ्गता है। वसन्तलक्ष्मी ने अपने मुख [प्रारम्भ में अ्र्रथवा मुख] पर, भ्रमर रूप कज्जल की रघना से विचित्र 'तिलक'[तिलक नामक वृक्ष जिस पर भौंरों के बैठे होने से सुन्दर लग रहा है। अथवा मस्तक पर लगाने वाला टीका] को प्रकाशित कर प्रात काल के सूर्य के प्रकाश के समान सुन्दर राग [ लालिमा ] से श्राम के किसलर [ नवीन पत्तों ] रूप [अपने ] श्ष्ठ को अलकृत किया ॥६१।। यहाँ भी प्रतीयमान उत्प्रेक्षा का प्राधान्य है और रूपक आदि उसके श्रङ्ग हे प्रतीयमान उत्प्रेक्षा यहाँ रसवदलद्वार है और रूपकादि उसके भ्ङ्ग हे इसलिए इस रसवदलद्दार के साथ रूपकादि का प्रङ्गाङ्गिभाव सन्कर है। यह [रसवदलद्धार] समस्त अ्रलद्धारों का चूडामणि-सा [ सर्वोत्तम अल द्वार ] प्रतीत होता हैँ। इस प्रकार नीरस [अ्रचेतन, जड ] पदार्थो की सरसता को प्रकाशित करने के लिए[ मैने और मेरे द्वारा सत्कवियो ने हमारे मत के अनुसार यह अपूर् शोभाधायक ] रसवदलद्धार प्राप्त कर लिया है।

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फारिका १७ ] तृतीयोन्मेपः [ ३६१

इठानी म्वरूपमात्रेाव्थिताना वम्तूनां कमप्यतिशयमुद्ीपयितुं द्रीपकालङ्कारमुपक्रमते। तन्र पूर्वाचार्यरादिदीपक मव्यदीपरुमन्तीपकमिति द्रीप्यमानपढ़ापेक्षया वाक्यस्याठी मध्ये चान्ते च व्यवस्थितमिति क्रियापदमेव

मदो जनयति प्रीति सानन मानभंगुरम्। स प्रियासन्गमोत्कएठा सासह्या मनस.शुचम् ॥६२॥ ६. दीपकालङ्कार का विवेचन- परव फेवल स्वरूप मात्र से स्थित वत्तुओो के किसी अपूर्व अतिशय को प्रका- शित करने के लिए [ दीपक के समान ] 'दीपकातङ्गान' को प्रस्तुत करते है। पूर्व- फाल के [ भामह आदि] आ्रचार्यों ने आ्दिदीपक, मध्यदीपक और अ्न्तदीपक इस प्रकार से दीप्यमान पदो की अपेक्षा से वायय के आदि में, मध्य में या श्रन्त मे स्यित है इस कारण से क्रियापद को हो दापकालन्जार कहा है। यहाँ कुन्तक ने पूर्वाचार्य मे मुख्य रूप से भामह की ओर सकेत किया है। कयोकि आागे जो प्लोक उदाहरण रूप में प्रम्तुत किए है वे भामह के काव्यानद्वार के ही श्लोक है। भामह ने इन के पूर्व दो श्लोक और भी लिसे है- आदिमध्यान्तविपय यरिया दीपकमिप्यते। एकस्यंव त्र्यवन्धत्वादिति च तनदिद्यते विधा॥ अमूनि कर्वतेऽन्वर्यामस्यारयामवंदीपनान्। त्रिभिर्निदर्शनंश्चेद मिया निदिश्यते यथा॥२। २५. २६। अरयत् आदि मध्य और अ्रन्त [दीपक] तीन प्रकार का दीपकालद्वार प्ट है। एक ही [घरिया] की [स्यान-भेद ने ] तीन प्रवस्था होने से वह तीन प्रकार का हो जाता है। ये [तीनो] अर्य के प्रकाशफ होने से इनके नाम को [अ्न्वयं] सार्थक फग्ते *। औौर तीन उदाहरणो द्वाग हम उनवो तीन प्रकार से दिसलाते हैं। जैसे- मद श्रानन्द को उत्पन्न करता है, वह [आानन्द या प्रीति] मान से नम् हेने वाले पाम फो, यह [पाम] प्रिया के सङ्गम की उत्कण्ठा को, घर वह [उत्क्ष्ठा प्रिया मे न मिलने तक] मन ने श्रसह दुस को उत्पन्न करती है।६२।। १. यहाँ तक 'रसवदनद्वार' का वर्णन नमाप्त हो गया। प्ररगे दीपपानद्वार का वन प्रारम्भ होता है। दीपकालदुार' का लक्षसा करने वानी कारिका भगे पृष्ठ:६७ पर दी है। उसके पूर्व वहा से भामह पे अनिमत दीपक के लक्षग् का नण्डन भारम्भकर रहे है। ६ दुष्ठ के इस लम्बे वर्रेन के लिए एक कारिया होनी नाहिए सी परन्नु इस भाग में ऐने पद भी उपलव्ध नहीं है निनर्क आधार पर कारिया का निर्माल हो। विषय वा नम्बन्ध दोपवालर हे नाय होने से ए भाग को ईज्यी पाक्किा की भवनरसिका मान परइदर बारिया गालना प्रारम्भ कर दिया है।

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३६३ ] वक्ोफ्तिजीवितम् [ कारिका १७

मालिनीरशुकभृतः स्त्रियोऽलंकुरुते मधुः । हारीतशुकवाचश्च भूधराणामुपत्यका ।।६३।। चीरीमतीररएयानीः सरित शुप्यदम्भसः । प्रवासिना च चेतासि शुचिरन्तं निनीपति ॥६४।। अत्र क्रियापदानां दीपकत्वम प्रकाशकत्वम। यस्मात् क्रियाप प्रकाश्यन्ते स्वसम्वन्धितया स्थाप्यन्ते।

मालाश्री श्रर [सुन्दर ] वस्त्रो से युक्त स्त्रियो को वसन्त शोभित करता हैं, और हरियल [ पक्षी विशेष ] तथा तोतो की वाणगी पर्वतो फी उपत्यकाओ फो [अलकृत] शोभित करती है ।६३।। चीड़ के जङ्गलो को, सूखते हुए पानी वाली नदियों को, श्रर प्रवासियो [वियोगियो] के चित्त को ग्रीप्म काल [शुचि.] समाप्त करना चाहता है॥६४।। ये तीनो उदाहरण भामह ने क्रमश आदिदीपक, मध्यदीपक तथा अन्तदीपक के दिए है। इनमें से पहिले श्लोक में 'जनयति' यह क्रियापद 'दीपक-पद' है। वह श्लोक के शेष तीनो पादो में अन्वित होकर उनके अरथो का प्रकाशित करता है। इसलिए उसी क्रिया पद को 'दीपक-पद' कहा जाता है। और वह इस श्लोक के आदि चरण में आाया है इसलिए यह श्लोक 'आदि दीपक' का उदाहरण है। इसी प्रकार दूसरे श्लोक में 'अलकुरुते' यह क्रिया पद अगले उत्तरार्द के साथ भी अन्वित होकर उसके भर्थ को भी प्रकाशित करता है। इसलिए यह क्रियापद ही 'दीपक-पद' है और उसका प्रयोग श्लोक के द्वितीय चरण मे अर्थात् मध्य मे हुआ है इसलिए यह मध्य-दीपक का उदाहरण है। इसी प्रकार तीसरे श्लोक में 'अन्त निनीषति' यह क्रियापद दीपकपद कहा जा सकता है। वह अन्त में आया है और तीनो चरसो के अर्थ को प्रकाशित करता है अ्रत 'अन्तदीपक' का उदाहरण है। यहाँ [ इन तीनों भामह के कहे हुए उदाहरणों में ] त्रियापदो का [ही] दीपकत्व [अर्थात] प्रकाशकत्व है। कयोंकि [अन्य पदार्थ जनयति, अलकुरुते और अन्त निनीषति आदि] क्रियापदो के द्वारा ही [अन्य पदार्थ] प्रकाशित होते हें अर्थात् अ्रपने से सम्बन्धित रूप से स्थापित होते है।[ इसलिए मुख्य रूप से क्रियापद ही दीपकपद होते है। अर्थात् भामह के अनुसार त्रियापदों की ही आदि, मध्य तथा अन्त में स्थिति होने से तीन प्रकार के वीपकालद्धार माने गए हैं ]।

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फारिका १७ ] तृतीयोन्मेपः [ ३६३

तटेवं सर्वस्य कस्यचिट् दीपकव्यतिरेकिणोऽपि क्रियापदत्यैकरूपत्वाद् दीपकाद् द्वैत प्रसज्यते । 7 कुन्तक इस सिद्धान्त से सहमत नही है कि केवल शियापद ही दीपकपद हो सकते है। उनका कहना है कि मरियापदो के समान अन्य पद भी दीपकपद हो सकते है। केवल इतने ही मतभेद के कारस कुन्तक यहाँ भामह के अभिमत दीपकालद्वार का खण्डन करते है। परन्तु पीछे वह अपने मत के अनुसार दीपक का लक्षण भी करेंगे जिसमें क्रियापदो के अतिरिक्त अन्य पदो को भी दीपकपद मानेंगे। यही बात उन्होने रसवदलद्वार के विषय में की थी। पहिले बडे सरम्भ के साथ रसवदलद्वार की अलङ्कारता का खण्डन किया। परन्तु पीछे पूर्व आचार्यो की व्य.स्या से धोडा अन्तर कर्के अपनी व्यास्या के अनुसार रतवदलद्गार की मत्ता भी मान ली। और जिन श्लोको में पहिले रसवदलद्वार का खण्डन किया या उन्ही उदाहरणों में भपनी व्यास्या के अनुसार भी रसवदलद्वार ही माना। इस प्रकार कन्तक के इन प्रकरणो में सण्डन का विस्तार उसके महत्व की अपेक्षा बहुत अधिक हो गया है। जिममें उन्होने कई पृष्ठ भरे हे वह खण्डन तो तभी शोभा देता यदि फिरि स्वय उम अलद्दार को न मानते। जब स्वय उस भलद्वार को मानना ही है तो फिर लक्षणा के विषय में थोडा- मा मतभेद ही रह जाता है जिसका खण्डन करना था। उसको थोडे-मे परिमित दाव्दो में दस-पाँच पवितयो में भी त्र्यवत किया जा सकता था। इतना विस्तार करने की प्ावदवकता नही थी। भामह ने केवल एक परियापद को ही दीपकपद माना है इससे कुन्तक सहमत नही है। उनके मतानुसार प्रियापद को छोडकर अन्य पद भी दीपक पद हो सकते है। इसलिए वह भामह के केवल तरियापद को दीपक मानने मे निम्न प्रकार के आठ दोप दिखसाते है- १ मापने यह यहा है कि कियापदो के द्वारा हो अन्य पद प्रकानित होते हैं पषात् करिया से सम्बप्ध रूप में स्थित होते है। इनलिए पियापद ही दीपक पद होता है। रसके विषय में हमारा-वुन्तक का-कहना यह है कि प्रत्येक वावय न वर्ता, नर्मं आादि और उनके विशेपण आदि वा उम वाक्य के अन्तर्गत घई हुई किया के साथ तथा उन तब पदों का परम्पर सम्बन्ध स्रवम्य होना है। एनलिए जिस प्रकार दीपवा- लद्वार के सल में दीपक रूप नियापद के नाथ सम्बन्ध होने मे अन्य पदार्थ प्रकानित होते हं- इस प्रकार [तो दीपक पद से भिन्न] मभी त्रियापदो की दीपक [ स्वरप क्यापद] के माच [अन्य पदाचों के नाथ सन्वन्य रूप] समानता होने से [वे सब हो शियापद दीपफपद या दोपफालकार के उदाहरए हो जायेंगे इमलिए। दोपवालक्वार का भ्नेपत्व [दवंत अ्नेषत्व, ध्ानन्य] हो जायगा।

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  • ३६४ ] वकोपितिजीवितम् फारिका १७

किं च शोभाकारित्वस्य युक्तिशून्यत्वाटलक्वारणत्वानुपपत्ति । अरन्यच्च, श्रप्रास्ता तावत् क्रिया, "व यम्य कम्यचिद्वाक्यवर्तिनः पटस्य सम्वन्धितया पदान्तरद्योतन स्वभाव गव। परम्परान्वयसम्बन्वनिवन्चनाद्वा- क्यार्थस्वरूपस्येति पुनरपि दीपकद्वैतमायातम। आरदौ मध्ये चान्ते वा व्यवस्थित क्रियापदमतिशयमासाठयति, येनालद्वारता प्रतिपद्यते । इति चत्' तेपा वाक्यादीना परस्पर तथाविध: कः स्वरूपातिरेक सम्भवति। २ [भामह के लक्षण में दूसरा दोष यह हैं नियापदों के आदि मध्य या अ्रन्त में रख देने से भी उनमें ] शोभाकारित्व के युक्ति शून्य [अर्थात युक्तियुक्त कारण का अ्रभाव] होने से उसको प्रलङ्गार नहीं कहा जा सकता है। इसका भाव यह है कि क्रियापद को आदि-मध्य या श्रन्त मे रस देने से अन्य क्रियापदो से उनमें कौन सी अधिक विशेषता था जाती है जिससे उसी को दीपका- ल्वार कहा जावे। अन्य क्रियापदो को दीपक न माना जावे। इसकी कोई समाधान कारक युक्ति भागह ने नही दी है। इसलिए या तो सारे त्रियापद दीपक कहलावेंगे पन्यथा आदि, मध्य या अन्त मे रखे हुए क्रियापद भी दीपकालद्वार रूप नही हो सकते हैं। क्योकि सभी क्रियापदो को एक-सी स्थिति है। ३ [ भामह के लक्षण के विषय में कुन्तक को तीसरी वात यह फहनी है कि ] क्रियापद की बात छोडिए। इस प्रकार वाक्य के अन्तर्गत सभी पदो का सम्बन्धित होने से दूसरे पद को प्रकाशित करना स्वभाव ही है। वाक्यार्थ के परस्पर अन्वयमूलक होने से। इसलिए फिर भी दीपक [ पदो ] का [ द्वँत, अनेकत्व ] श्रानन्त्य आ्रा जाता है। अर्थात् दीपक रूप क्रियापदो की विशेपता यह बतलाई थी कि वह अ्न्य पदो को प्रकाशित अपर्ात् अपने से सम्बद्ध रूप में स्थापित करते है। परन्तु यह विशेपता तो वाक्य के हर एक पद में होती है। कर्ता, कर्म, करण, उनके विशेपण आदि जितने पद वाक्य में होते है वे सब ही परस्पर एक दूसरे से सम्बद्ध होते है। इसलिए जिस प्रकार का दीपकत्व आरप केवल कियापदो में मानना चाहते हे उस प्रकार का दीपकत्व सभी पदो मे रहता है। इसलिए फिर भी दीपकालद्वार का आ्नन्त्य हो1 जायगा। अर्थात् सभी प्रकार के पद दीपक पद ही सकते हैं। ४ [यदि यह कहो कि] भावि, मध्य अथवा अन्त में स्थित क्रियापव में विशेषता हो जाती है जिससे [ वह क्रियापव] अलद्धार हो जाते है। तो [कृपया यह १. इति चेत् यह पाठ पूर्व सस्करण में नही था।

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फारिका १७] तृतीयोन्मेप. [ ३६५

क्रियापट प्रकारभेट निवन्धनं वाक्यस्य यदाठिमध्यान्तं तदेव तनर्थवाचके- व्वपि सम्भवतीत्येवमपि दीपकप्रकारान्त्यप्रसङ्ग. । दीपकालद्वारविहितवाक्यान्तरवर्तिनः क्रियापटम्य भ्वािव्य तरिक्त- मेव काव्यान्तरव्यपदेश. । यदि वा समानविभक्तीना बहूना 'कारकानामेकं क्रियाप प्रकाशकं दीपकमित्युच्यते, तत्रापि काव्यच्छायातिशयकारिताया, किं निवन्धनमिति वक्तव्यमेव। बतलाने का कप्ट करे कि] उन [करियापदो] के और वाक्यादि [ के अ्त्य पदी ] के स्वरूप में उस प्रकार का ऐसा कौन सा विशेष भ्न्तर भा जाता है। [अर्यात् आरप ऐसी कोई विशेषता नहीं वतला सकते हैं जो अन्य त्रियापदों में या वाक्य के अन्य पदों में न हो। ऐसी अ्वस्था में सभी प्रकार के पदों फो दीपकपद कहा जा सकता *। केवल क्रियापदो को ही नहीं ]। ५ [यदि आ्रराप तियापदो का कोई ऐसा भेद करना चाहते हैं कि ] किया पद के प्रकार भेद के कारण जो उनकी आदि, मध्य या श्रन्त में स्थिति है तो उसी प्रकार के अर्थ के वाचक अन्य [त्रियापदो] मे भी [जो कि आदि, मध्य या भ्रन्त में नहीं ह] वह स्थिति हो सकती है। इसलिए इम प्रकार से भी दीपकालद्वार [या वीपक पदो] का आ्रनन्त्य हो जाता है अर्थात् भादि, मध्य या अ्र्पन्त में थाने वाले ही नहीं अप्रपितु सभी क्रियापद दीपकपद हो जाते हैं। छठी बात कुन्तक यह कहते है कि क्रिपापदो की स्थिति सव की एक-्नी है। उनमें जो भेद घाज तक किया गया है वह भ्वादिगण प्रदादिगण आदि की पिवाओों के न्वर्प भेद के आधार पर किया गया है। अन्यथा सब वि्यापदी का अरयंवोधकत्वादि तब वुछ समान ही है। इमलिए जिस कियापद को प्रप दोपकपद कहते है उनकी और जो पियापद दीपकपद नही है उन दोनों की स्थिति एक समान है। यदि आाप इन प्रवार के किसी भेद की कत्पना करते है तो- ६ दीपफालद्धारवर्ती प्रियापद में भ्वादि [गण की मरिया है, या श्रदादिगए फो प्रिया है इस प्रमिद्ध भेद] के प्र्प्रतिरियत कुष औ्रौर ही नेद काव्य में किया जायगा। [ जो कि उचित नहीं प्रतीन होता है] ७ [फिर सातवों बात यह हुं कि] त्रपपवा यदि ममान विभविन वाले बहुत से फारफो के प्रकाशक एक प्रियापद फो दीपकु कहते है तो उसमे भी शोभा के पतिदाय जनवत्व पा पया पारत है यह तो वतलाना हो होा। [परन्तु भामह ने इम प्रफार या बोई वान्सा नहीं चतलाया है। इसलिए उनका पेचन परिया पद्ो पो ही दीपनपद मानना दुकतिसस्ृत प्रतीत नहीं होना है]। १ नमान निनयनाना नान्साना दाठ मगुद्ध था।

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३६६ J वक्रोफितिजीवितम् [ फारिका १७

तच्च नान्यत् किञ्व्िदित्यभियुक्ततरेः प्रतिपादितमेव। चंकमन्ति करीन्दा दिसागत्रमन्न्गन्धहारित्र्हित्र्भ्ना। 41

दुक्सं वरो च कइएो भरिइविसममहाकइमग्गे ॥६५।। [चक्रम्यन्ते करीन्द्रा टिग्गजमदगन्वहारितहृदया। दुखे वने च कवयो भणितिविपममहाकविमार्ग॥ इतिच्छाया] ८. और वह अप्रस्तुत और प्रप्रस्तुत फा वाच्य त्प [ विधि-सामथ्यं ] से श्रप्राप्त अतएव प्रतीयमान साम्य ही [दीपक-स्थल में वाक्य सौन्दर्य का श्रतिशय हेतु] हे अन्य कुछ नहों, यह [ उनकी अरपेक्षा ] अ्रधिक प्रामासिक[ उनके व्यासयाकार भट्टोन्हूट ] ने प्रतिपादन कर ही दिया है- भामह ने जो दीपकालद्वार के उदाहरण दिए हे उनमे केवल इतना ही निकलता था कि वाक्य के आदि, मध्य या श्रन्त में स्थित प्रियापद दीपकालद्वार कहलाते है। परन्तु इतना कहना पर्याप्त नही है। उनके शोभा जनकत्व का कोई हेतु देना चाहिए था। परन्तु भामह ने उस प्रकार कोई हेतु नही दिया है। उनकी अपेक्षा उनके व्याख्याकार भट्टोन्भट का विवेचन अ्रघिक प्रामाणिक है। उङ्ट ने दीपकालद्वार का लक्षण इस प्रकार किया है- श्रादि - मध्यान्त - विषया प्राधान्येतरयोगिन । अन्तर्गतोपमाधर्मा यत्र तद्दीपक विदु ॥ १, २८ ।। अर्थात् प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत पदार्थों में 'अन्तर्गतोपमा पपरथात्' प्रतीयमान सादृश्य वाले 'धर्मो' का सम्बन्ध जहॉँ व्गित होता है उसको दीपकालद्वार कहने है। कुन्तक यहाँ 'अभियुक्ततर प्रतिपादितमेव' यह लिख कर उङ्भट के इसी लक्षणा की ओर सक्केत कर रहे है। आगे उसका उदाहरण देते हे- विग्गजो के मद की गन्ध से [ हरे गए हृदय वाले ] भयभीत होकर दुख पूर्वक हाथी वन मे मारे-मारे फिरते है और वक्रोषित से विषम महाकवियों के मार्ग में। [ उसकी तुलना प्राप्त करने में उत्साह-हीन निराश से ] कवि-गए [ दुख- पूर्वक ] चघकर लगाते फिरते है ॥६५॥। इस उदाहरण में दिग्गजो के मद की गन्ध से [हरे हुए हृदय वाले ] उत्साह- हीन हाथियो के समान महाकवियो की बयोक्ति विशिष्ट रचनाओ से हरे हुए हृदय वाले कवि, इन दोनो का साधर्म्य, और वन तथा महाकवियो का साधम्यं, १ तच्च के स्थान पर पाठ लोप सूचका चित्ह था।

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कारिका १७ ] तृतीयोन्मेष [३६७

अत्र प्रस्तुताप्रस्तुतयोः प्रतीयमानवृत्तिसाम्यमेव प्रन्तर्गतोपमाधर्म.॥ तढिदानीं दीपकमलङ्गारान्तरकारएं कलयन कामपि काव्यकमनी- न्वतां कल्पयितुं प्रकारान्तरेख प्रक्रमते- औचित्यावहमम्लानं तदिदाहादकारणम्। अशक्तं धर्ममर्थानां दीपयद् वस्तु दीपकम् ॥१७॥ 'शचित्यावह्म' इत्यादि। वस्तुदीपकं सिद्धरुपमलङ्गरणं 'भवतीति' सम्बन्धः। क्रियान्तराश्रवसात्। तटेवं सर्वस्य कस्यचिद् वस्तुनः तद्भावापत्तिरित्याह, 'दीपयत', प्रकाशयद्लद्दरणं सम्पद्यते। प्रतीयमान है। इसलिए यह भ्रन्तर्गतोपमाधर्म या प्रतीयमान साम्य के होने से दीपका- तद्ार का उदाहरण है। 'चनम्यन्ते' पद का दोनों के साथ सम्बन्ध होता है। इसलिए यह दीपकपद है। आगे का पाठ भग्न है उसमें ने तीन शब्द स्पष्ट प्रतीत हो रहे हैं वे इस प्रकार इस उदाहरण में लक्षण के समन्वय के सूचक है। यहां प्रस्तुत औौर श्र्प्रस्तुत की प्रतीयमान समानता ही [ उद्धट फृत लक्षण में कहा हुआ] 'अन्तगतोपमा धर्म' का अर्थ [प्रस्तुत तथा अ्रप्रस्तुत का प्रतीयमान साधम्यं] हं। इस प्रकार यहां तक 'भामह' के दीपकालद्वार के नक्षण का खण्डन करफे श्रव कुन्तक अपना श्रभिमत दीपकालद्वार का नक्षणा स्वय करते है- अब दीपकालद्वार को दूसरे प्रकार फी शोभा का कारण समकर [उस से] फुछ अपूर्व फाव्य की कमनीयता की फल्पना करने के लिए भ्रन्य प्रफार से [भामह के लक्षण से भिन्न दीपक का लक्षण] प्रारम्भ फरते हं- श्रौचित्य के अनुरप सुन्दर और सहृदयों के श्राह्हादकारक [प्रस्तुन तथा सप्रस्तुत] पदार्थों के [अशपत अर्थात् वाच्य से भिन्न] प्रतीयमान धर्म को प्रकाशित फरने वाली चस्तु दीपक [अलद्धार] है। 'श्ोचित्यायह' इत्यादि [फारिका पा प्रतीफ है]। वस्तु दीपक होती है पपर्ात् [फेवल पियापद हो नहीं अपितु ] सिद्ध वस्तु मसङ्ग्स 'होती है' यह नम्बन्ध हैं। धन्य किसी त्रिया के [फारिफा में] मुनाई न बेने से ['भवति' इस सामान्य त्रिया था अध्याहार होता है]। इस प्रफार सभी वस्तुओो का दीपका नन्तारत्व [तद्द्राव] हो जायगा। इस दोप के लिए निवान्स पहते है 'दीप्त करता हुआ' प्रकाशित परसा हमा [दीपफ] असक़ार होता है। किमने, किसपी।प्ररानित परना हुआ दोपक होता है] यह घरने है-'धर्म' सर्चात् म्वभाव विशेष थो। "दाथों सर्यान् वहानीय कयों के। पुष्याद्ित स्पतो पर पाठ लोप मूचक निन्ह थे।

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घफ्रोितिजीवितम् [ कारिका १८

किं कस्येत्यभिधत्ते, 'धर्म' परिम्पन्दविशेषम, 'अ्रर्थाना' वर्मानीयानाम। कीहशम, 'अप्रशक्तम्' अ्र्प्रप्रकटम्, तेनैन प्रकाश्यमानत्वान। कि स्वरूप च, 'श्र्परीचित्यावहम' शचित्यमौदार्यमावहति य. स तथोक्त। त्र््प्यच्च किंविधम, 'अ्रम्लान' प्रत्य- ग्रम्, अनालीढमिति यावत। एवं स्वरूपत्वात् 'तद्विदाह्वानकारएम' काव्यविदा- नन्टनिमित्तम ॥१७।। एक प्रकाशकं सन्ति भूयांमि भूयसां क्वचित्। केवलं पंक्तिसंस्थं वा द्विविधं परिदृश्यते॥१८॥ अर्प्रस्यैव प्रकारान निरुपयति। 'द्विविध परिदश्यते', द्विप्रकारमवलोक्यते लक्ष्ये विभाव्यते। कचम 'केवलम्' असाहाय, 'पक्तिसस्थं वा' पक्ती व्यवस्थित तत्तुल्यकन्ताया सह्ायान्तरोपरचितायां वर्तमानम। कथम, 'एक' बहूना पदार्था- नामेक प्रकाशक दीपक केवलमित्युच्यते। कैसे [ घर्मं ] को-'अशक्त' [जो शकि्ति शरर्यात् प्रभिधा से उपस्थित न हो] श्रप्रफट, उसी [ दीपकपद से] प्रतीयमान होने से[अन्य शब्दो से अप्रकट धर्म को प्रकाशित करता हुआ]। और किस प्रकार के-'शचित्य युवत'। श्चित्य अर्थात् उदारता को जो - घारस करता है वह उस प्रकार का [श्रचित्यावहम् ] हुआ। और किस प्रकार के [धर्म को]-'अम्लान' त्र्पर्थात नवीन [सुनदर] जिसफा पहिले आ्स्वाद नहीं किया है। इस प्रकार का होने से तद्विदाह्ल्वादकारक अर्थात् काव्यज्ञो के आ्रनन्द का कारण [दीपकालद्धार होता है] ।१७।। इस प्रकार कुन्तक दीपकालद्वार का अपपना अ्रभिमत लक्षणा करने के वाद अब उसके भेद अगली कारिका में दिखलाते हे। कुन्तक के अनुसार दीपक के दो भेद होते हे एक 'केवल दीपक', और दूसरा 'पक्तिसस्थ' या माला-दीपक। अन्य आचार्यो ने भी इन भेदो को 'केवल-दीपक' और 'माला'-दीपक कहा है। कहीं एक [ पद ] अ्रनेको [ के प्रतीयमान साधर्म्य ] का प्रकाशक [ होता है औरौर वह 'फेवल दीपक' कहलाता है] और कहीं बहुत से [पद] बहुतों के [प्रतीयमान साधर्म्य के] प्रकाशक होते हैं। [इसलिए] 'केवल' औरर 'पकितिसस्थ' [माला रूप से] दो प्रकार का [वीपफालद्वार] दिखलाई देता हैँ। इस [दीपक] के ही प्रकारों को दिखलाते है। दो प्रकार का पाया जाता है। दो प्रकार का [दीपकालद्धार] दिखलाई देता है। कैसे-[ कि एक ] 'केवल' या असहाय [ीपक] और [दूसरा] पक्तिसस्थ अ्रत्य सहायको [वीपकों] की बनी हुई तुल्य [अ्नेक दीपक पवों की] श्रेरी में वर्तमान, पक्ति मे स्थित [माला वीकक]। कैसे-[ ये वो भंव होते है कि ] बहुत-से पदार्थों[ के प्रतीयमान धर्म] का प्रकाशक एफ [पद] 'फेवल वीपक' कहा जाता हैं।

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करिका १८ ] तृतीयोन्मेप· [ ३६६

यथा- प्रसारं संसारम् ॥६६॥। इत्याि। त्र्प्रत्र 'विधातुं व्यवसितः' कर्ता समाराठीनाममारत्वप्रभृतीन् धर्मानुद्योतयद् दीपकालक्वारतामाप्तवान्। 'पंक्तिमंस्थम', 'भूयांसि' वहनि वम्ननि दीपकानि 'भूयसां' प्रभूतानां वर्णानीयानां 'सन्ति वा क्वचिट्' भवन्ति वा कर्म्मिश्चिद् विपये- कड़केसरी वत्रणाण मोत्तिश्रतणाण श्रराडवेश्रटिक:। ठासाटाएं जाएड कसुमाण अ जीएमालारो ।६७।। [कविकेसरो वचनाना मौक्तिकरत्नाना श्ररदिवेकटिकः । स्थानास्थानं जानाति कुसुमाना च जीर्णमालाकारः । इतिच्छाया ] चन्दमऊहि खिसा एलिनी कमलेहि कुमुमगुच्छेहि लभ्षा। हसेहि सरत्नसोहा कव्नकहा सज्जनेहि करड गरुइ ॥६८॥। [चन्द्रमयेनिशा, नलिनी कमलै., कुयुमगुच्छैर्लता। हमे.शारदशोभा, काव्यकथा सज्जने. कियते गुवी।। इतिच्छाया] जसे [पहिले उदाहरण म० १, २१ पर उद़त ]- प्रसार मसार इत्यादि। [ मालती माघव ५,३०] यहाँ 'विधात्ं व्यवमित' इस गिया पद का कर्ता [कर्तृ-बद ] ससार श्रराति के ससारत्व आदि धर्म को प्रफाशित करता हुआ[ एक का अ्रनेक के साय सम्बन्ध होने से] दीपफालद्धारत्व को प्राप्त होता है। [यह फेवल दीपक अररथात् दोपका- लद्ार का प्रयम भेद है ]। [दोपकालद्वार का दूमरा भेद ] 'पवितमंस्थ' [माला दीपक यहाँ होता हं जहां] बहुत-सी चस्तुएं बह्टत-मे बणंनीयों को दीपक होती है। फहीं किसी विषय मे सन्ति' अर्यार्त् 'नवन्ति' होती है। महाकि [उत्तम फवि] शब्दो के, पुराना जौहरी मौपित रन्नों के श्रौर वूदा माली फूलो के स्थान और प्रस्थान [श्र्तिय, अनचित्य प्रथवा गुसवनुख ] को जानता है।।६७।। वहाँ श्लोक के तीन नरखों में कहे गए अनेक पटार्थों प्रकाण करने वाले तृततीय चरण के म्याणास्यान जानाति' रूप भनंक पद है। दमनिए वह द्विनीय प्रकार ने पदिन नम्य या माला दीपन का उदाहरसा है। इमीका एग और उदाहरगा देते हैं- चन्त्रमा की फिस्लों से दात्रि पा, पमल पुष्पों मे पमलिनी नता था, फूनों के शुक्ों मे बेनों फा, हमों मे शरव का मौन्दर्य श्रर महदयो से काव्य-घर्ना का महत्त्व चहता हैँ ॥Stll

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[फारिका १८

कि कस्येत्यभिधत्ते, 'धर्मे' परिम्पन्टविशेषम, 'अपर्ाना' वर्णनीयानाम। कीहशम, 'अ्र्प्रशक्तम्' अ्र्प्रप्रकटम्, तेनैत्र प्रकाश्यमानत्वात। किं स्वरूप च, 'श्र्ीचित्यावहम्' औचित्यमौदार्यमावहृति य. स तथोक्त। त्र्प्र्यच्च किंविधम्, 'अरम्लान' प्रत्ये- ग्रम्, अनालीढ़मिति यावत्। एव स्वरूपत्वात् 'तद्विदाह्नाटकारएम' काव्यविदा- नन्टनिमित्तम् ।।१७।। एक प्रकाशकं सन्ति भूयांसि भूयसां कवचित्। केवलं पंक्तिसंस्थं वा द्विविधं परिदृश्यते ॥१८॥ अस्यैव प्रकारान् निरूपयति। 'द्विविध परिदृश्यते', द्विग्रकारमवलोक्यते लक्ष्ये विभाव्यते। कथम 'केवलम्' असाहाय, 'पक्िसस्थ वा' पक्ती व्यवस्थित तत्तुल्यकत्ताया सहायान्तरोपरचिताया वर्तमानम। कथम, 'एक' बहूना पदार्था- नामेक प्रकाशक दीपक केवलमित्युच्यते। कसे [ धर्म ] को-'अशक्त' [जो शकि्ति अर्थात् अ्ररभिधा से उपस्थित न हो] भ्रप्रफट, उसी [दीपकपद से] प्रतीयमान होने से[अन्य शब्दो से अप्रकट धर्म को प्रकाशित करता हुआ]। और किस प्रकार के-'शचित्य युक्त'। औचित्य अर्थात् उदारता को जो -- धारस करता है वह उस प्रकार का [ शौचित्यावहम् ] हुआ। औ्रर किस प्रकार के [धर्म को]-'अम्लान' अ्रर्थात नवीन [सुन्दर] जिसका पहिले आस्वाद नहीं किया है। इस प्रकार का होने से तह्विदाह्न्ादकारक अर्थात् काव्यज्ञो के प्ानन्द फा कारए [दीपकालद्धार होता है] ।१७।। इस प्रकार कुन्तक दीपकालद्वार का अपना अभिमत लक्षण करने के बाद अब उसके भेद अगली कारिका में दिखलाते है। कुन्तक के अनुसार दीपक के दो भेद होते हे एक 'केवल दीपक', और दूसरा 'पक्तिसस्थ' या माला-दीपक। अन्य आाचार्यो ने भी इन भेदो को 'केवल-दीपक' और 'माला'-दीपक कहा है। कहीं एक [ पद ] अ्रनेको [ के प्रतीयमान साधर्म्य ] का प्रकाशक [होता है औौर वह 'ेवल दीपक' कहलाता है] और कहीं बहुत से [पद] बहुतो के [प्रतीयमान साधर्म्य के] प्रकाशक होते हैं। [इसलिए] 'फेवल' और 'पक्तिसस्थ' [माला रूप से] वो प्रकार का [दीपकालद्धार] दिखलाई देता है। इस [दीपक] के ही प्रकारों को दिखलाते है। दो प्रकार का पाया जाता है दो प्रकार का [वीपकालद्धार] दिखलाई देता है। कैसे-[ कि एक ] 'केवल' या झसहाय [दीपक] और [दूसरा] पवितसस्थ अन्य सहायकों [दीपको] की बनी हुई तुल्य [अनेक दीपक पदों की] श्रेरी मे वर्तमान, पक्ति में स्थित [माला दीपक]। कैसे-[ ये वो भेंद होते हैं कि ] बहुत-से पदार्थों [ के प्रतीयमान धर्म] का प्रकाशक एफ [पद] 'फेवल वीपक' कहा जाता है।

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कारिका १= ] तृतीयोन्मेप: [ ३६६

यथा- अ्रसारं संसारम् ॥६६॥। इत्यादि। अत्र 'विधातं व्यवसितः' कर्ता संसारादीनामसारत्वप्रभृतीन् धर्मानुद्योतयद् दीपकालङ्कारतामाप्नवान्। 'पंत्तिसंस्थम्', 'भूयांसि' वहूनि वस्तृनि दीपकानि 'भूयसां' प्रभूतानां वर्णनीयानां 'सन्ति वा क्वचिट्' भवन्ति वा कम्मिश्चिद् विषये- कडकेसरी वत्रणाण मोत्तिश्ररअाएा आ्रडवेश्रटिक:। ठासाठाएं जाएड कसुमाण अर जीएमालारो।६७।। [कविकेसरी वचनाना मौक्तिकरत्नाना आर्ररादिवेकटिक: । स्थानास्थान जानाति कुसुमाना च जीर्णमालाकारः ॥ इतिच्छाया ] चन्दमऊहि खिसा रालिनी कमलेहि कुसुमगुच्चेहि लआ। हंसेहि सरतसोहा कन्नकहा सज्जनेहि करइ गरुइ ॥६८॥। [चन्द्रमयूखैनिशा, नलिनी कमलै, कुसुमगुच्छेर्लता। हसे शारदशोभा, काव्यकथा सज्जनै कियते गुवी।। इतिच्छाया] जैसे [पहिले रदाहरस सं० १, २१ पर उद्धृत ]- अ्रसार ससार इत्यादि। [ मालती माधव ५,३० ] यहाँ 'विधातुं व्यर्वसित.' इस त्रिया पद का कर्ता [ कर्तृ-पद ] ससार श्रत्ति के पसारत्व आदि धर्मे को प्रफाशित करता हुआ [ एक का अ्रनेक के साथ सम्बन्ध होने से ] दीपकालद्भारत्व को प्राप्त होता है । [ यह केवल दीपक अर्यात् दीपका- लङ्कार का प्रथम भेद है ]। [दीपकालङ्कार का दूसरा भेद ] 'पक्तिसंस्थ' [माला वीपक वहाँ होता ह जहां ] बहुत-सी वस्तुएँ बहुत-से वर्णनीयो की दीपक होती है। कहीं किसी विषय में सन्ति' अर्थात् 'भवन्ति' होती है। महाकवि [उत्तम कदि ] शब्द्रो के, पुराना जौहरी मौकिति रत्नों के औ्रर बूढ़ा माली फूलों के स्थान और अस्यान [ शचित्य, अ्नौचित्य प्रथवा गुावगुण] को जानता है।। ६७।। यहाँ श्लोक के तीन चरणों में कहे गए अनेक पदार्थों का प्रकाश करने वाले तृतीय चरसा के 'स्यानास्थान जानाति' रूप अ्र्परनेक पद है। इसलिए यह द्वितीय प्रकार के पक्ति सस् या माला दीपक का उदाहरसा है। इसीका एक और उदाहरण देते है- चन्द्रमा की किरणों से रात्रि का, कमल पुष्पों से कमलिनी लता का, फूलों के गुच्छों से बेलो का, हंमों से शरद का सौन्दर्य और सहृदयों से काव्य-चर्चा का महत्व

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४०० ] [कारिका १म

यदपर पंक्तिसम्थ नाम तत कारगत्रेविध्यात् त्रिप्रकारम। त्रयः प्रकारा प्रभेदा यस्येति विग्रहः। तत्र प्रथमस्तावदनन्तरोक्तो 'मूयासि भूयसां क्वचिद् भवन्ति' इति। द्वितीयो 'दीपक दीपयत्यन्यत्नान्यत् इति अर्प्रन्यम्यातिशयोत्पाठकत्वेन- दीपकम्। यद्दीपित तत्कर्मभूतमन्यत्, कर्तृ भूत दीपयति प्रकाशयति तदप्यन्य- द्दीपयतीतिदीपकढीपकम् । द्वितीयदीपकप्रकारो यथा- क्षोणीमएडलमएडन नुपतयस्तेपा श्रियो भूपरम् ताः शोभा गमयत्यचापलमिद त्रागल्भ्यतो राजते। तद् भूध्यं नयवतर्मनस्तदपि च शौर्यक्रियालकृतं विभ्राण यदियत्तया त्रिभुवन छेत्तुं व्यवस्येदपि ।६६।। यहाँ 'प्नियते गुर्वो' ये अ्र्परनेक पद [अनेक के साथ सम्ब्रद्ध होकर]अ्रनेक के प्रकाशक है इसलिए यह भी दीपक के द्वितीय मेद अर्थात् माला दीपक का उदाहरण होता है। यह जो दूसरा पक्तिसस्थ माला-दीपक है वह तीन प्रकार के फारण होने से तीन प्रकार का होता है। तीन प्रकार या भेद जिसके है वह त्रिप्रकार यह विग्रह होता है।, उनमें से पहिला भेद अ्रभी कहा हुआ अर्थात् फहीं बहुत-से [ अर्थों के प्रकाशक ] बहुत-से [ वस्तु या पद होते ह। वह पक्तिसस्य दीपक का प्रथम भेद होता है ]। दूसरा जो अन्य [ वस्तु ], किसी अन्य को प्रकाशित करती है वह अन्य के शोभातिशय का उत्पादक होने से दीपक [कहलाता] है। जो [ वस्तु ] प्रकाशित होती है उस कर्मभूत अन्य वस्तु को कर्सृ भूत अन्य वस्तु प्रकाशित करती और उस [क्तृ'भूत दीपक वस्तु] को भी अ्रन्य कोई प्रकाशित करती हैं। इसलिए वह 'दीपक- दीपक' कहा जाता है] [इस 'दीपक-दोपक' रूप] द्वितीय प्रकार का उदाहरण जैसे- पृर्थिवी मण्डल के अलद्धार भूत राजा हैं, उन [राजाओ्] का अलङ्कार लक्ष्मा है, उस [लक्ष्मी] को अचापल्य शोभित करता है, और वह [अचापत्य] प्रगल्भता से शोभित होता है, वह [ प्रगल्भता ] नीति माग से शोभित होती है, और वह [नीति मार्ग] पराक्रम से अलकृत होता है जिस [पराक्रम युक्त नीतिमार्ग] को धारस करने वाले [राजा] को [अपि ] क्या [त्रिभुवन फर्तृ पद है] तीनों लोक [ सारा ससार, इयत्तया] इस राजा की इतनी शक्ति है इस प्रकार से निश्चय कर सकता है। [नहीं कभी नहीं। पराक्रम से अ्ल्मकृत नीति मार्ग का अ्र््रबलम्बन करने वाले राज की शकि्ति भ्रपरिमित होती हैं]। १. केवल 'कारणात्' पाठ सुसङ्गत नही था। २ कौर्य।

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कारिका १८ ] तृतीयोन्मेष. [४०१

अ्त्रोत्तरोत्तराणि पूर्वपूर्वपद्दीपकानि मालायां कविनोपनिवद्धानीति। यथा वा- शुचि भूषयति श्रुतं वपुः प्रशमस्तस्य भवत्यलंक्रिया। प्रशमाभरणं पराक्रम. स नयापादितसिद्धिमूपणः॥७0। यथा च- ३ चारुता वपुरमूषयदासाम्॥।७१।। इत्यादि। तृवीयप्रकारोऽत्रैव श्लोकार्द्धे दीपकस्थाने दीपितमिति पाठान्तरं विधाय व्याख्येयः। तद्यमत्रार्थ., यदन्येन केनचिदुत्पादितातिशयं सम्पादित वस्तु तत्कतृ भूतमन्यद्दीपयत्युत्तेजयति3।

यह पक्तिसंस्थ दीपक या माला दीपक के दूसरे भेद अर्थात् 'दीपक-दीपक' का उदाहरण है। इसमें एक पदार्थ दूसरे का दीपक होता है और स्वयं भी धन्य से प्रकाशित होता है। इसलिए 'यद्दीपित तत्कर्मभूत' जो दीपित होता है वह कमंभूत है उसको क्तृ रूप भ्रन्य पदार्थ प्रकाशित करता हं। और वह स्वयं भी अ्न्य को प्रकाशित करता है। यह पक्तिसस्थ दीपक के द्वितीय भेद का उदाहरया हुआ। इसमें उत्तर उत्तर [वाद वाद के] पदार्थ पूर्व पूर्व के पदार्थों के प्रकाशक रूप में कवि ने एक माला में ग्रथित किए है। अथवा [इसी द्वितीय भेद 'दीपक-वीपक' का दूसरा उदाहर] जैसे- शृद्ध ज्ञान [श्रुत ] शरीर को भूषित करता है, जितेन्द्रियता या शान्ति उस [ ज्ञान, ध्रुतं ] का अलद्धार होती हैं। उस प्रशम-शान्ति का आभूपण पराक्रम होता है और वह [पराक्म] नीति से प्राप्त सिद्धि से भूषित होता है॥७०।। औौर जैसे [पहिले उदाहरण सं० १, २४ पर उद्धृत ]- सौन्दर्य ने उनके शरीर को अलकृत किया। इत्यादि ॥७१॥ [पवितसस्थ अ्रथवा माला दोपक का] तीसरा प्रकार इसी [शचि भूषयति] श्लोक के उत्तरार्द्ध में [दीपक दीपक इस द्वितीय भेद के नाम में से प्रथम ] 'दीपक' [पद] के स्थान पर 'दीपित' [पद रखकर 'दीपितदीपक'] इस प्रकार का [नाम का] पाठान्तर करके समझना चाहिए। इसका यहाँ यह अ्रभिप्राय हुआ कि-जो दीपित प्रकाशित अर्यात् किसी अन्य वस्तु के दवारा जिसमें अतिशय उत्पन्न किया जा चुका हैं वह वस्तु कर्तृ रूप से फिर किसी दूसरी वस्तु को शोभित करता है। [वहाँ पक्तिसंस्थ या मालादीपक का 'दोपितदीपक' नामक तृतीय भेद होता है ]। १ किराता २, ३३। २. माघ १०, ३३। ३. दीपपदुतेजयति ।

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४०२ ] वकोविति नीवितम् [फारिका १८

यथा- १मदो जनयति ग्रीतिमित्यादि॥७२।। ननु पर्वाचार्यश्चेतवेव पूर्वमुदाह्तम। तवेव प्रथमं प्रत्याग्यायेदानी समाहित मित्यभिप्रायो व्याख्यातव्य । सत्यमुक्तम। तदय व्याख्यायते। क्रियापनमेक्मेव टीपकमिति तेपा

इसका उदाहरण 'शुचि भूपयति' इत्यादि च्लोक के अ्न्त में बतलाया है। 'स नयपादितसिद्विभपण' यह इस र्लोक का अ्रन्तिम पद इम 'दीपितदीपक' का उदाहरस है। वह अर्ात परानम 'नयापादितसिद्धिभृपण' है। इसमें पराकम का प्राभृपण नय अपरथात् नीति है। पश्न्तु वह नय वंमा कि 'ग्रापादितमिद्धि' सिद्धि को प्राप्त कराने वाला नय पराक्रम का भूपसा है। यहाँ सिद्धि को प्राप्त हुआ््र, सिद्धि से अलकृत नय पराक्रम का भूपण होता है। इसलिए नय पहिले स्वय सिद्धि से दीपित होता है और वह परात्रम को दीपित करता हू इसलिए यह 'दीपितदीपक' रूप तृतीय भेद का उदाहरण होता है। जसे- मद प्रीति [आ्र्ानन्द ] को उत्पन्न करता है वह [प्रीति या आ्र््रानन्द मान को भङ्ग करने वाले काम को उत्पन्न करती है। वह काम प्रिया के समागम की उत्कर को उत्पन्न करती है और वह प्रिया के समागम की उत्कण्ठा प्रियतमा के उस समय उपस्थित न होने से मन के असह्य दुख को उत्पन्न करती है]॥७२॥ इस क्लोक के द्वितीय चरण ई 'सानङ्ग मानभगुरम' में वह प्रीति काम वासना उत्पन्न करती है। परन्तु उत अ्नद्ग के साथ विशेपण लगा हुआ मानभगुरम् वह अर्थात अ्नः्ध या काम वासना मान से भगूर है। काम प्रिया के सङ्भ की उत्कण्ठा को उत्पन्न करता है। परन्तु उसके पूव वह म्वय मानभगुरम् विशेपण से दीपित इसलिए यह भी 'दीपितदीपक' रप माला दीपक का तीसरे भेद का उदाहरण हैं। [ प्रश्न ] पूर्व आचार्य [ भामह] ने यही [ मदो जनयति प्रीति इत्यादि दीपकालद्वार का ] उदाहरण दिया था उसका पहिले खण्डन करके श्रव [उसी का] समर्थन कर रहे है। इसका अ्प्रभिप्राय वतलाना चाहिए। [ पहिले खण्डन करके अ्व उसी में दीपकालद्वार का समर्थन ही करना था तो पहिले खण्डन क्यो किया]। A

[उत्तर]ठीक है[आपका प्रश्न उचित है] इसलिए उस [शभिप्राय] की व्याख्या करते है। [हमने जो पहिले भामह के उदाहरणो का खण्डन किया था वह इस बात को दिखलाने के लिए किया था कि उनके मत मे] केवल एक क्रियापद ही दीपक [पद] १ भामह काव्यालद्वार २, २७ ।

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कारिका-१६-] तृतीयोन्मेष: [ ४०३

तात्पर्यम् । अस्मा्क पुन कर्तृ पदादिनिबन्धनानि दीपकानि बहूनि सम्भ- वन्तीति ॥v८॥। यथायोगि क्रियापदं मनः संवादि तद्विदाम्। वर्णनीयस्य विच्छित्ते: कारणं वस्तुदीपकम् ॥१६॥। इढानीमेतदेवोपसंहरति, यथायोगि क्रियापदमित्यादि। यथा येन प्रका- प्रकारेण युज्यते इति 'यथायोगि' क्रियापदं यस्य तत्तथोक्तम्। येन यथासम्बन्ध- मनुभवितु शक्नोति तथा दीपके क्रिया। अन्यच्च कि रुपम्-'मनः सवादि तद्विदाम्'। तद्विदा काव्यज्ञानां मनसि संवदृति चेतसि प्रतिफलति यत् तत् तथोक्तम्।

हो सकता है यह उन [पूर्वाचार्य भामह] का मत है। और हमारे मत में कर्त पदादि निमित्तक बहुत प्रकार के दीपक [पद] हो सकते है ॥१८॥ अ्रन्त में इम दीपक प्रकरण का उपसहार करते हुए कुन्तक अगली कारिका लिखते है। इस उन्मेष की प्राय सभी कारिकाएँ वृत्ति भाग में आए हुए प्रतीक पदो को जोडकर अनुमान से बनाई गई हैं। मूल-ग्रन्थ में उपलब्ध नही हो रही है। काव्य मर्मज्ञो के हृदय में बैठ जाने वाले, वर्णनीय चस्तु के सौन्दर्य का आधायक यथोचित क्रियापद [भी ] वस्तु [वर्णनीय पदार्थ] का दीपक [प्रकाशक] होता हैं ॥१६॥ अ्परव इसी [दीपकालड्गार]का उपसहार करते हे। 'यथायोगि क्रियापद' इत्यादि [कारिका में ]-जिस प्रकार [जिसके साथ ] जुड़ता है [ वह यथायोगि हुआ ]। यथायोगि कियापद है जिसका वह उस प्रकार की [ यथायोगि क्रियापद वस्तु ] हुई। इसलिए जैसा सम्वन्ध सम्भव हो सकता है उस प्रकार की क्रिया दीपकालङ्कार में होती हैँ। और किस प्रकार का कि-'मन सवादि तद्विदाम्' । काव्य मर्मज्ञो के हृदय में बैठने वाला [अच्छा लगने वाला] 'तद्विदाम्' अपर्रात् काव्यमर्मज्ञो के मन में मिलता हुआ चित्त में अरद्धित हो जाने वाला जो वह उस प्रकार का [ मन सवावि ] हुआ। १. अ्रयच्च कि रूपम्-मन सवदि तद्विदाम्'। इतना पाठ पूर्व सस्करण में प्रमादवश रूपक की व्याख्या में पृ० ४०६ के अ्रन्त में दिए हुए पाठ के साथ छाप दिया था. इमने उसको यहा उचित स्थान पर कर दिया है।

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४०४ ] वक्ोपितजीवितम् [कारिफा १६

१अन्यच्च कीहशम्-'वर्णनीयस्य विच्छिने. कारणम्' । वर्णनीयस्य, प्रस्तावाधिकृ तस्य पदार्थस्य विच्छित्तेस्पशोभाया कारण निमित्तभूतम्२।१६।।

औ्रर किस प्रकार फा-'वर्णनीय [पदार्थ] के सौन्दर्य का कारस'। वसनीय न्नर्थात् प्रकरण में प्रतिपाद्य पदार्थ की विच्छिति उपशोभा का कारए भूत। [इस प्रकार के विशेषरो से युक्त औ्रर ययोचित निया युक्त जो वस्तु है वह भी दीपक होती हैँ]। भामह और कुन्तक के अ्रभिमत दीपकालक्वारों में यह श्रन्तर है कि भामह केवल त्रिया पदो को ही दीपकालद्वार का प्रयोजक मानते है और कुन्तक किया पदो के अतिरिवत त्न्य कारक आदि पदो को भी दीपक का प्रयोजक मानते है। वामन ने भी 'उपमानोमेयप्वेका तिया दीपकम्' ४, ३, १८ सूत्र में केवल प्रिया दीपक ही माना उन्धट ने आ्ादिमध्यान्तविपया प्राधान्यतरयोगिन। अन्तर्गतोपमा धर्मा यत्र तद्दीपक विद्ु. ॥१, २८।। यह दीपक का लक्षण किया है। इनकी वृत्ति में 'वर्मा नियादिर्पा' लिखा है। इससे प्रतीत होता है कि वे भी त्रिया के अतिरिक्त कारक पदो को दीपक का प्रयोजक मानते हैं। उत्तरवर्ती विश्वनाथ आदि आ्रचार्य भी कारक दीपक मानते है- प्रस्तुताप्रस्तुयोर्दीपकन्तु निगद्यते। अ्रथ कारकमक स्यादनेकासु त्रियानु चेत् ॥सा० दपर १०, १६ ।१६।।

१ पूर्व संस्करण में निम्नाद्कित पाठ जो वस्तुत. रूपक से सम्बन्ध रखता है इसके पूर्व छाप दिया गया घा- तस्मादेव सहृदयहदयसवादमाहात्म्यात् 'मुखूमिन्दु' इत्यादी न केवल रूपक इति यावत्- कि तारुण्यतरो ॥७३।। डत्येवमाद्यपि। तम्मावेव च नूक्ष्मव्यतिरिवत वा न किचिदुपमानात् साम्य तस्य निमित्तमिति सचेतस प्रमारम्। अब पृ० ४०७ पर दी गई है। २ रूपक से ही नम्वन्व रखने वाली निम्न पक्तियाँ प्रमादवश पूर्व सस्करण में इसके वाद छाप दी गई थी-औौर त्रव पृ० ४०६ पर दी गई। न पुनर्जन्यत्वप्रमेयत्त्वादिमामान्यम् यस्मात् पूर्वोक्तलक्षरोन साम्येन वरांनीयँ तहृदयहारितामवतरति।

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कारिका १६ ] तृतीयोन्मेष: [ ४०५

६. रूपकालद्धार का विवेचन- -3 इस प्रकार दीपकालङ्कार की विवेचना करके अव ग्रन्थकार रूपकालक्वार की विवेचना प्रारम्भ करते है। रूपकालद्वार के विषय में भामह ने इस प्रकार लिखा है- उपमानेन यत् तत्त्वमुपमेयस्य रूप्यते । गुराना समता दृप्ट्वा रूपक नाम तद्विदु ।।२१।। समस्तवस्तुविषय मेकदेश विर्वर्तति च। द्विधा रूपकमुद्दिष्टमेतत् तच्चोच्यते यथा ॥२२॥ शीकराम्भोदसृजस्तुङ्गा जलददन्तिन. । निर्यान्ता मण्डयन्तीमे शक्रकार्मुककाननम् ॥२३॥ तडिद्वलयकक्ष्यारगा वलाकामालभारिणाम्। पयोमुचा ध्वनिर्धीरा दुनोति मम ता प्रियाम् ॥२४।। -भामह काव्यालद्वार २। २१-२४ । अर्थात् उपमान के साथ समानता को देखकर उपमेय में जो उपमान का आरोप किया जाता है उसको रूपक अलद्दार कहते है। यह रूपक समस्त वस्तु विपय तथा एकदेशविवर्ति भेद से दो प्रकार का कैहा गया है। उसको [ उदाहरण द्वारा ] कहते हे। जैसे- बूंदो के जल रूप मद को बरसाने वाले ये मेघ रूप हाथी निकलते हुए, इन्द्रधनुप रूप वन को सुशोभित कर रहे है। विद्युद्वलय की पेटी वाँघे, वलाका रूप माला को धारण करने वाले, मेघो की ध्वनि मेरी उस प्रिया को दुख देती है। इनमें से संख्या २३ वाले श्लोक में 'समस्तवस्तु विषय' रूपक का उदाहरण दिया गया है। और २४वें श्लोक में 'एकदेशविवर्ति' रूपक का उदाहरण दिया गया है। पहिले श्लोक में बादलों पर हाथियो का, वूंदो के पानी पर मद का, और इन्द्र- धनुषो के समूह पर वन का, आरोप किया गया है। यह तीनो का आरोप मिलकर एक पूर्ण वस्तु सामने आ जाती है इसलिए यह 'समस्तवस्तु विषयक' रूपक का उदा- हरणा है। दूसरे श्लोक में 'विद्युद्वलय' पर 'कक्ष्या या पेटी' का और 'बलाका' पर 'माला' का आरोप तो हुआ परन्तु मेधो पर हाथी का आरोप न होने से वह रूपक पूसं तही हुआ अधूरा ही रह गया है इसलिए वह 'एकदेश विव्त' रूपक का उदाहरण है। ये भामह के धनुसार रूपक के लक्षण तथा उदाहरण हुए।

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४०६ ] वगोपितिजीचित म् [कारिका २०

उपचारैकसर्वस्वं यत्र [वस्तु] तत् साम्यमुद्रहृत्। यदर्पयति रूपं स्वं चस्तु तद् रूपकं विट: ।।२०।। रूपक विचिनकिकि, उपनारल्ादि। वम्तु तद् रूपक विदु, तद्वस्तु पदार्थ- स्वरूपं रूपका्यमलदार बिदु, जना इति शेप । कीहशम-'यटपयतीत्यादि'। यत् कर्तृ भूतमपयति विन्यस्यति। किम-स्वमात्मीय रूपम, वाक्यम्य वाच- कात्मकं परिरपन्दग। गलारमस्तावादलव्वारत्व ्वसम्नन्वित्वात्। कि वुर्न- 'साम्यमुद्धहत्', रामत्व नारयत्। न पुनर्जन्यत्वप्रमेयत्वादि सामान्यम्। चम्मात् पूर्वाक्तलक्षणोन साम्येन वणनीय तहव्यहदयहारिताभवतरति। उपचारेक- सवत्वं' उपचारस्तलाध्यागेपन्तस्ैक सर्वम्व केवलमेव जीवितम। तन्निबनधन- त्वादुपचार प्रवृत्ते। कुन्तक प्रपे मता -- रूपक का लक्षणा इस प्रकार करते है- [ पूर्व प्रदन्त जी "] उपचारवकता ही जिसकी जान [मर्जत्व] है इस प्रकार की [ उपमेन के तथ। समानता को धारण करती हुई [ उपमान] वन्तु जो [उपमेय रप रस्तु को ] पना स्वरूप अपित कर देती है [उपमेय प" रवमान का जहाँ आरोप हो जाता (] उसको रूपक [अलद्धार] कहते हं। रूपक की विवेवना करते हैं। 'उपचार' इत्यादि [लरिजा मे]। उस वस्तु फो रूपक कहते हैं उत वत्तु को पर्थात् पदार्थ के स्वरूप को लोग रूपक नामकु अरलद्धार कहते हैं। फॅसी 'ो-'यदर्पयति' इत्यादि। जो कर्न नूत् [ वस्तु ] भरपित करती है। साधान करती है। क्या [पाधान करती है ]-प्रपने निनी रूप को' वाक्य के वाचक रप त्वभाव को। प्रलद्धार का प्तत हैने से [यहा स्व पड से] झलड्गार का ही तम्बन्ध होने से [ प्रलद्धार भूत गरोदमारा वस्तु अपने स्वरप को उपमेय को प्रदान करती है]। क्या करते हुए र-'सान्य को घारण करते हुए' [सर्थात् उपमेय के साय] सादृश्य को धारल र ए । न कि जन्यत्व प्रमेयत्व आादि सामान्य को [ यह साम्य' शब्द क ए नाभता नहीं चाहिए]। क्योकि पूर्वोकत प्रकार के [सादृश्य रप] तान्य त -ती [रस्तु] सहदयों के लिए हृदयहारि हो जाती है। किसि प्रकार के सादृस् न. न-उपचार नर्जात् [ उपमेय में सादृश्य लक्षसामूतक उपमान के ] तस्ट का -रोद[ जो रपनतङ्गार मे किया जाता ह है ] उतका एक सर्वस्व जीवन गरमू! जो सान्य हू उतको धारण करते हुए।। उस [ साम्य] के धौपवा रेज व्यवहार ना मूल के होने से। से लेक दय हितानमनरनि तम का पाठ पूर्व सस्करण मे ननद ही करिका की व्यारण चन्त्र मे अर्थात् वर्तमान ल शोषन कर यहा मथास्यान हापा है।

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कारिका २१ ] तृतीयोन्मेष: [४०७

यस्मादुपचारवक्रताजीवितमेतढलङ्करण प्रथममेव व्याख्यातम्- १यन्मूला रसोल्लेखा रूपकादिरलंकृति:।७४।। इति। तस्मादेव सहद्यहृदयसंवादमाहात्म्यात् 'मुखमिन्दुः' इत्यादौ न केवलं रूपकम्। यावत् 'कि तारुस्यतरो.' इत्याद्यपि। तस्मादेव च सूच्षममति- रिक्तं वा न किध्व्िदुपमानात् साम्यं तस्य निमित्तमिति सचेतस प्रमाणम् ॥२०॥ एवस्ज रूपकादि सामान्यलक्षणमुल्लिख्य प्रकारपर्यालोचनेन तमेवो- न्मीलयति- समस्तवस्तुविषयमेकदेशविवति च ॥२१।। समस्त वस्तु विपयो यस्य तत्तथोक्तम्। तवयमत्रार्थः यत् सर्वाएयेव प्राधान्येन वाच्यतया सकलवाक्योपारुढानि अ्रभिधेयान्यलङ्कार्यतया सुन्तरस्वरूपप रिस्पन्दसमर्पणेन रूपान्तरापाटनं गोचरो यस्येति।

क्योंकि इस [रूपक] अलद्धार की जान उपचार वकता ही है यह बात पहिले ही [२, १४ कारिका में जो नीचे उद्ध, त है] कह चुके हैं- जिस [ उपचारवत्रता] के कारण रूपकादि अलद्धार सरता को प्राप्त करते है ।।७४।। उसी सहुदयो के हृदय में बैठ जाने के माहात्म्य से न केवल 'मुख-मिन्दु.' इत्यादि में ही अपितु 'कि तारुण्य तरो' इत्यादि [ उदाहरण स० १, ६२ ] में भी रूपकालद्धार है। इसीलिए [ उपचार के प्तिरिषत ] सूक्ष्म अथवा उपमान से कोई अतिरिक्त समानता उस [रूपकालद्वार] का मूल नहों है। इस विषय में सहृवय हो प्रमाण है ॥२०॥ इस प्रकार रूपक का सामान्य लक्षणा लिखकर उसके भेदो की विवेचना कर उसी [ रूपक लक्षण ] को स्पष्ट करते है, [खोलते है]- [ वह रूपकालङ्ार ] 'समस्तवस्तु-विषय' तथा 'एकदेशविर्वात' [ भेद से दो प्रकार का ] होता हैं। समस्त वस्तु जिसका विषय है वह उस प्रकार का [ समस्तवस्तुविषयम् ] हुआा। इसका यहाँ यह अभिप्राय हुआ कि प्रधान रूप से वाच्यतया स्थित सम्पूर्र पदार्थो को, अलङ्धारय होने से [ उपमेय द्वारा ] अपने सुन्दर स्वरूप के समपंण द्वारा [जिसमें ] रूपान्तर [अरर्थात् उपमान के साथ अ्रभेद ] प्राप्त कराया जाता है वह [रूपर] जिसका विषय है। वह समस्तवस्तु विषय [रूपक] हुआ। १. वक्रोक्तिजीवित २, १४।

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वकोमितजीवितम् [कारिका २१

यथा- मृदुतनुलतावसन्त. सुन्दरवदनेन्दुविम्सितपक्ष'। मन्मथमातङ्गमदो जयत्यहो तरुणतारम्भ.॥७II श्रत्र पूर्वाचार्यैर्व्याख्यातम, यथा यटेकटेशेन विवर्तते विघटते, विशे- पेा वा वर्तते तत् तथोक्तम। इत्युभयथाऽप्येतन युक्त भवति। यद्वाक्यस्य यत् कस्मिश्चिदेव स्थाने स्वपरिस्पन्टसमपखात्म करूपणमादधाति क्वचिदेवेति तदेक- देशविवर्ति रूपकम्।

[उसका उवाहरण देते है] जसे-

शरीर रूपिी कोमल लता के [ विफसित सुशोभित करने वाले ] वसन्त रूप, सुन्दर मुख चन्द्र के [प्रकाशित करने वाला ] शुक्ल पक्ष रूप, और कामदेव रूप हाथी फे मद स्वरूप नवयौवन का आ्रम्भ सर्वोत्कर्ष युक्त है॥७५।।

[ समस्त वस्तु विषय रूपक का निरूपण रने के वाद भव एक देश विवतत रूपक का निरुपण करते हुए पूर्वाचार्य अर्थात् भामह के मत की आलोचना करते है। यद्यपि भामह ने दोनो प्रकार के रूपको के केवल उदाहरए दिए है और किसी प्रकार की विशेष व्याख्या नहीं की है। परन्तु उनके उदाहरण के आधार पर उनके व्याख्याकारों ने जो व्याख्या की है उसी को 'पूर्वाचार्य की व्यास्या' कहकर कुन्तफ उसकी आलोचना करते है]।

यहाँ [ एकदेशविर्व्ति रूपक के विषय में] पूर्व आचार्य ने इस प्रकार व्याख्या की है कि जो एक देश से [ विवर्तते ] विर्घटित [अर्थात् न्यून कम ] होता है अथवा विशेष [अरधिक] होता है वह उस प्रकार का [एकदेशविवति रूपक] होता है। ये दोनो ही [ अर्थात् कमी या अ्रधिकता बतलाना ] अ्रनुचित है। [बल्कि न्यूनता या अधिकता के भाव को छोडकर उस एकदेशविवर्ति शब्द की व्याख्या : रा इस प्रकार करनी चाहिए कि ] जो [ क्लोफ रूप ] वाष्य के किसी एफ भ्रश में ही अपने [ उपमान भूत अध्यारोप्यमाण वस्तु ] स्वभाव [ या तादात्म्य ] के सेमर्पर रूप 'रूपण' का प्रधान कहीं [ किसी एक वेश में] ही करता है वह एकदेशविवति रूपक होता है।

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कारिका २१ ] तृतीयोन्मेष [४०ह

यथा- 'तड़िद्वलयकच्याणा वलाकामालभारिणाम्। पयोमुचा ध्वनिर्धीरो दुनोति मम तां प्रियाम् ॥७६।। अत्र विद्युद्वलयस्य कत्यात्वेन वलाकानां तन्मालात्वेन रूपएं विद्यते। पयोमुचां पुनर्दन्तिभावो नास्तीत्येकटेशविवर्तिरूपकमलङ्कार.। तदत्यथयुक्ति- युक्तम्। यस्माटलक्करणास्यालद्कार्यशोभातिशयोत्पाद नमेव प्रयोजनं नान्यत किव्वित्। यदुक्तम्-रूपकापेक्षया किध्विद्विलक्षणमेतेन यदि सम्पाद्यते तदेतस्य रूपकप्रकारान्तरोपपत्तिः स्यात्। तदेतदास्तां तावत्। प्रत्युत कद्यादिनिमित्त- रूपणोचितमु ख्यवस्तु विपये विघटमानत्वादलङ्कारदोपत्व दुर्निवारतामवलम्बते।

जैसे- विद्युद्वलय रूप पेटी को बाँव, [बलाका] वकरपक्ति रूप माला को घारण किए हुए, मेघों की गम्भीर ध्वनि मेरी उस प्रियतमा को दुख दे रही है॥७६॥ यहाँ विद्युद्वलय का [ कक्ष्यात्वेन ] पेटी रूप से और वलाकाओ का माला रूप से आरोप किया गया है। परन्तु मेघो पर हाथी का आरोप नहीं किया गया है इसलिए यह 'एकदेशविर्वात रूपकालङ्गार है। यह [हमारी की हुई व्याख्या] अ्र्प्रत्यन्त युक्तियुक्त है। दयोंकि अलद्धार का प्रयोजन अलङ्धार्य की शोभा को उत्पन्न करना ही है और कुछ नहीं। और जो [ भामह विवरण में उ्धट ने भामह के 'विवतंते' पद की व्यास्या करते हुए उसकी 'यदेकदेशन विवर्तते विघटते' और 'विशेषेण वा वर्तते' अर्थात् 'कम' या 'अधिक' हो जाता है इस प्रकार से दो तरह की व्यास्या की है और उसका उपपादन करने के लिए] यह कहा है कि-यदि इस [विशेषेण वर्तते इस व्याख्या] से [साधारस] रूपक की अपेक्षा कुछ विलक्षणता आ जाती है तो वह रूपक का और प्रकार वन जावेगा। सो इस [विशेष प्रकार वाली वात] को तो जाने दो, बल्कि [ 'विघटते' कम हो जाता है। इस पक्ष में ] कक्ष्या [ हाथी की भूल को बाँधने के ,'लिए जो पेटी बाँधी जाती हं उसको कक्ष्या कहते हैं] आदि निमित्त के आरोप के योग्य [हाथी रूप ] मुस्य वस्तु के विषय में विघटमानता [अर्थात् मुख्य वस्तु हाथी का आरोप न होने के कारण न्यूनता] होने से अलद्धार दोष शवश्य दुनिवार हो जायगा। [सो चौवे जी छब्बे फी जगह दुवे ही रह जायेगे ]। १ भामह काव्यालक्कार २, २४ ।

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४१० ] वकोक्तिजीवितम् । कारिफा २१

तस्मादन्यच्चैवेतटस्मात् समावीयते। रूपकालक्वारस्य परमार्थम्तावदय यत- प्रसिद्वसौन्दर्यातिशयपार्थसोकुमायनिवन्धन वर्णानायम्य नस्तुन साम्यसमु- ल्लिखितं स्वरूपसमर्पणम्रहणामामवर्यमविमवाि। तन 'मुखमिन्दु.' इत्यन्र मुखमेवेन्दु.१ सम्पाद्यते तेन रूपस विवतते।

हिमा चल सुतावल्लिगाटा लिद्ि तमृर्तये। ससारमरुमार्गककल्पवृक्षाय ते नमः॥ज७। यथा वा- उपोढ़रागेए। इति॥७=॥

उस लिए, औरर [विशेष रूप से] इसनिर भी[जो बात आ्ररागे कह रहे हूं] इसका समाधान किया जाता है। रूपकालङ्कार का साराश यह है कि- प्रसिद्ध है सौन्दर्यातिशय जिसका इस प्रकार के पदार्थ के सौकुमार्य के कारण वर्णनीय वस्तु [ उपमेय] के सादृश्य से युक्त अपने स्वरूप के [ उपमान के द्वारा] सम्पण तथा [ उपमेय के द्वारा उस समर्पित उपमान के स्वरूप के ] प्रहण की सामर्थ्य अविसवादि [अ्ररविपरीत, अनुकूल, यथार्थ ] हो। उस [ सामर्य्य की अनुरूपता के कारण ] से 'मुखचन्द्र' यहाँ मुख [ रूप उपमेय ] को चन्द्र बना दिया जाता है। [ मुख पर चन्द्रमा का आ्र्प्रारोप किया जाता है। अर्यात् उपमेय मुख ] उस [उपमान भूत चन्द्र के] के रूप में पारिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार का यह अलङ्गार [निन्न श्लोक में पाया जाता] है।

पार्वती रूप लता से जोर से प्रालिद्गित स्वरूप वाले, ससार रूप मरुभूमि के अरद्वितीय कल्पयृक्ष रूप शरपको नमस्कार है।

पथवा जसे [ पहिले उदाहरण स० ३, पर उद्धृत ] 'उपोढ रागेण' आर्रदि में ॥७८॥

१ पूर्व सस्करण में 'मुखमेव दुसम्पाद्यते [ ? ]' इस प्रकार का पाठ छापा था। यहाँ 'दु नम्पाद्यते' इस पाठ की सङ्गति उस सस्करण के सम्पादक श्री एस के हे महोदय की भी समभ में नही आई। इसलिए उन्होने उसके आगे प्रश्न वाचक चिन्ह लगा दिया था। परन्तु वस्तुत वह भ्रष्ट पाठ था। हमने उसका सशोधन करके 'मुखमेवेन्दु सम्पाद्यते' यह पाठ रखा है जो सुसङ्गत हो जाता है:

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रिका ₹१ ] तृतायान्मेष. [ ४११

प्रतीयमानरूपकं यधा- लावयकान्तिपरिपूरितदिड् मुखेडस्मिन् स्मेरेडघुना तव सुखे सरसायताक्ि। क्षोमं यदति न मनागपि तेन सन्ये सुव्यवतमेत्र जलराशिरय पयोधि: ७हाा

प्रतीयमान रूपक [का उदाहरण] जसे-

[यह श्लोक आनन्दवर्घनाचार्य का है औप्रौर उन्होने उसको अपना श्लोक कह कर, ही ध्वन्यालोक पृष्ठ १६४ पर उद्ृत किया है।] हे चञ्चल औौर बडी-बडी आँखों वालो [ प्रियतमे ] श्नव [कोध के शान्त होने के बाद ] लावण्य और कान्ति से दिगदिगत्तर को भर देने वाले तुम्हारे मुख के मुस्कराहट युक्त होने पर [ भी ] इस समुद्र में तनिक भी चञ्चलता नहीं दिखलाई देती है इससे यह प्रतीत होता है कि यह समुद्र [ निरा जडराशि प्नर्थात् ] जडता का पुञ्ज [ श्रर्थात् महामूर्ख शायवा जलसमूहमात्र] है।।७६।। यहां मुख पर चन्द्रमा का आरोप साक्षात् नही किया है परन्तु वह प्रतीयमान है। क्योकि इस ग्लोक का अभिप्राय है कि यदि यह समुद्र निरा जड राशि न होता तो जैसे चन्द्रमा को देखकर समुद्र में ज्वार उठने लगता है इसी प्रकार तुम्हारे मुख चन्द्र को देखकर भी इसमें ज्वार उठना चाहिए था। इस प्रकार यहाँ मुख में चन्द्रमा का आरोप प्रतीयमान होने से यह प्रतीयमान रूपक का उदाहरण है। 'जलराशि' पद में 'डलयोरभेद' इस नियम के अनुसार 'जल' पद में से 'त' को 'ड' मानकर समुद्र को जड राशि कहा है। औौर उसकी जडता का उपपादन इस आधार पर किया है कि वह अपनी कान्ति से समस्त दिशाओ तभा उपदिशाओ को भर देने वाले तुम्हारे मुस्कराहट भरे मुख को देखकर भी क्षुव्ध नहीं हो रहा है। शान्त है। इस कथन-शेली से मुख पर चन्द्रमा का आरोप प्रतीत होता है। अत पद प्रतीयमान रूपक का उदाहरण है। इसे कवि निवद्ध दवतृ प्रोढोक्ति सिद्ध श्लेपालद्वार से व्यग्य- रूपकालद्वार का उदाहरणा कहा जा मकता है। इसीलिए ध्वन्यालोककार ने इसमें रूपक ध्वनि माना है॥२१।।

१ ध्वन्यालोक में पृ० १६४ पर उद्धत ।

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४१२ ] वक्रोपितिजीवितम । कारिका २२

तदेव विच्छित्यन्तरेण विशिनष्टि- नयन्ति कवयः काञ्चिद् वक्रभावरहस्यताम्। अलद्कारान्तरोल्लेखस हायं ग्रतिभावशात् ॥२२॥ एतदेव रुपकाख्यमलद्धरणा कान्िदलोकिका वक्रभावरहस्यतां वक्रत्व- परमार्थता नयन्ति प्रापयन्ति। तथोपनिवष्नन्ति यथा वक्रताविच्छित्तिरुठि- रमणीयतया तदेव तत्व पर प्रतिभासते। कीटशम-'अलद्धारान्तरो ल्लेखसहायम्'। अलद्धारान्तरस्यान्यस्य ससन्देहोलेन्ताप्रभृते' उल्लेख ममुद्भेद. सहाय. काव्यशोभातिशयोपाठने सहकारी यस्य तत् तयोक्तम। कस्मान्नयन्ति 'प्रतिभावशात' स्वशक्तेरायतत्वात्। तथाविधे'लोकातिक्रान्तगोचरे विपये तस्योपनिबन्धो विधीयते। यत्र तथा प्रसिद्धयुभावात् सिद्वव्यवहारावतरएं साहसिकमिवावभासते, विभूपणान्तरसहायस्य पुनरुल्लेखत्वेन विधीयमानत्वात सहृदयहदयसवादसुन्दरी परा प्रौढिरुत्पद्यते।

इसी [रूपक अलद्धार] को श्र््रन्य प्रकार के सौन्दर्य से विशिष्ट करते हैं- कवि लोग अपनी प्रतिभा की सामर्थ्य से अन्य अलद्धारों का उल्लेस जिसका सहायक है ऐसे [शरर्थात् उत्प्रेक्षादि अ्र्न्य अ्र्प्रलद्धारो से व्यङ्जय इसी रुपकालद्वार को] किसी वकता के [ अपूर्व ] रहस्य को प्राप्त कराते हे। इसी रूप नामक अलद्धार को किसी झलौकिक वकभाव की रमरोयता अर्थात् यथार्थ सौन्दय की प्राप्ति कराते हैं। [ अर्थात् ] इस प्रकार से वर्णन करते हैं जिससे वकता के सौन्दर्य की चरम सीमा को प्राप्त रमणीयता के कारण वही परम तत्व प्रतीत होता है। किस 5 कार के कि-अन्य अलद्धार का उल्लेख जिसका सहकारी है'। अलद्धारान्तर अर्थात् ससन्देह इन्यादि अन्य अलद्धार का उल्लेख समुद्भेद, काव्य को शोभा की वृद्धि के लिए जिसका सहायक है वह उस प्रकार का [अ्ररलङ्धारान्तरो- ल्लेखसहाय हुआ]। किससे प्राप्त कराते है कि-'प्रतिभा के वश से' अर्ात् अपनी शक्ति के आधीन होने से। उस प्रकार के अलौकिक विषय मे उस [रूपक] की रचना करते है। जहां उस प्रकार की प्रसिद्धि न होने से [आरोपित अर्थ का] सिद्ध पदार्थ के समान व्यवहार वर्णन करना साहसिक कार्य-सा प्रतीत होता है। परन्तु अन्य अलङ्धार के [रूपक के प्रति] सहायक रूप में उपनिबद्ध किए जाने से, सहृदयो के हृदय के अनुकूल सुन्दर होने से [ रूपक में ] परम रमणीयता उत्पन्न हो जाती हैं। १ लोककान्तिकान्तिगोचरे यह पाठ श्रशुद्ध था।

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कारिका २३] तृतीयोन्मेष. [ ४१३

यथा- किं तारुएयतरोः। इति॥८०॥ एवं रुपकं विचार्य तद्दर्शनसम्पन्निवन्धनां अर्प्रप्रस्तुतप्रशंसां प्रस्तौति- अप्रस्तुतोऽपि विच्छिचि प्रस्तुतस्यावतारयन्। यत्र तत्साम्यमाश्रित्य सन्वन्घान्तरमेव वा ॥२३॥ वाक्यार्थोऽसत्यभूतो वा प्राप्यते वर्शानीयताम्। अप्रस्तुतप्रशंसेति कथितासावलंकृतिः ।।२४।। 'अप्रस्तुतोऽपीत्यादि' । 'अ्रप्नस्तुतप्रशंसेति कथिताऽसावलंकृतिः' । अप्रस्तुतप्रशंसेति नाम्ना सा कथिता अलङ्धारविद्धिरलंकृति.। कीदृशो यत्र

जैसे- [उदाहरण सं० १, ६२ पर उद्धृत] किं तारुण्यतरो। इत्यादि ॥८०॥। इसके आग एक उदाहर और दिया गया है। परन्तु पाण्डलिपि के अत्यन्त प्रस्पप्ट होने से वह विल्कुल भी पढने में नही आया है ॥२२॥ ७-अप्रस्तुतप्रशंसा अलद्धार का विवेचन- यहाँ तक रूपक का विचार करके कुन्तक अप्रस्तुतप्रशसा अलद्कार का अपना अ्रभिमत लक्षण तथा विवेचन आगे दो कारिकाओ में करते है- इस प्रकार रूपक का विचार करके उस [रूपक ] के ज्ञान की पूर्णता निमित्तक [दर्शनसम्पत्तिमूलक ] अर्प्रप्रस्तुतप्रशसा को [ विचार के लिए ] उपस्थित करते हं- जहाँ उस [रूपकोपयोगि] साम्य का अवलम्वन करफे, अरथवा[ कार्यकारण भावादि ] अ्रन्य सम्बन्ध से, प्रस्तुत [ वर्ण्यमान ] के सौन्दर्य को उत्पन्न करने वाला असत्यभूत अप्रस्तुत वाक्यार्थ भी [ वर्णनीयता को प्राप्त कराया ] वर्णन किया जाता नहै वह अलद्धार अ्रपप्रस्तुत प्रशसा नाम से कहा जाता है ।२२,२३। 'अप्रस्तुतोपि' इत्यादि वह अलद्भार अप्रस्तुत प्रशसा कहा जाता है। वह अलङ्धार, अलद्धार के पण्डितो द्वारा 'अप्रस्तुतप्रशसा' इस नाम से कहा जाता है। किस प्रकार का-जहाँ जिसमें अप्रस्तुत अर्थात् अविवक्षित पदार्थ भी वर्णनीयता को प्राप्त होता है, वर्रना का विषय वनाया जाता है। क्या करते हुए कि-प्रस्तुत

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४१४ ] वकोवितजीवितम् [ कारिका २३

यस्याम प्रस्तुतोऽयविवचित पदार्थो वर्णनीयता प्रति प्रा्पते वर्गानाचिषय सम्पादयते। कि कुर्वत-प्रस्तुनम्य विवनितार्थम्य विन्दिनिमुपशोभामवतारयन समुल्लासयन। द्विविवो हि प्रम्तुत पदार्य सम्भवनि वाक्यान्तर्भतपढ- मात्रसिद्ध, सकलवाक्यव्यापककार्यो विविवम्वपरिस्पन्ठातिशयविशिष्ट- प्राधान्येन वतेमानश्च। तदुभयरूपमपि प्रम्तुत प्रतीयमानतया चतमि विधाय पदार्थान्तरमप्रस्तुत तवविच्छित्तिसम्पत्तये वर्णानीयतामम्यामलकृती कवय प्रापयन्ति। किं कृ्वा-'तत्माम्यमान्नित्य'। नन्तरोक्त रूपकालद्धारोपकारि साम्य समत्व निमित्तीकृन्य। 'सग्वन्वान्तरमेव वा' निमित्तभावादि सशित्य।

भूत. । साम्य सम्वन्धान्तर वा समाश्नित्याप्रस्तुत प्रस्तुतशाभाये वर्गोनीयता यत्र नयन्तीति।

अर्थात् विवक्षित अर्थ के सौन्दर्य, उपशोभा, को उत्पन्न करते हुए। प्रस्तुत पदार्थ दो प्रकार का हो सकता है। एक वाक्य के अ्रन्तर्गत पद मात्र से सिद्ध, दूसरा [ जिसका] सारे वाक्य में व्यापक [कार्य रूप] प्रभाव हो, और नाना प्रकार के अपने स्वाभाविक सौन्दर्य से विशिष्ट प्रधान रूप से वर्तमान हो। उन दोनो प्रकार के प्रस्तुत को प्रतीयमान रूप से मन में रखकर उसके सौन्दर्य के सम्पादन के लिए अन्य अप्रस्तुत पदार्थ को इस शलद्धार से कवि लोग वणंनीय बना लेते हैं। क्या फरके कि-'उस सादृश्य का अवलम्वन करके'। उस शाभी कहे हुए रूपका- लङ्कार के उपयोगी साम्य अर्थात सादृश्य को कारस चनाकर। अथवा ग्रन्य कार्यकारए भावादि सम्बन्ध का अ्ररवलम्वन करके।[ जहां प्रप्रस्तुत पदार्थ को वर्णन का विषय बना लेते हे वहाँ अप्रस्तुतप्रशसा नामक अलद्धार होता है ]। 'प्रथदा शसत्य भृत वाक्यार्थ' अर्थात् परस्पर श्रन्वित पद समुदाय रूप वाक्यार्थ प्ररसत्यभूद [कल्पित ]। साम्य प्रथवा अ्रन्य [कार्यकारभावादि ] सम्बन्ध का अवलम्बन करके प्रस्तुत पदार्थ की शोभा के लिए अप्रस्तुत पदार्थ को जहाँ वर्ण-र नीयता को प्राप्त कराते है। [वहाँ अप्रस्तुतप्रशसा नामक अरलद्धार होता है]। उड्धट ने अप्रस्तुतप्रशसा का लक्षण निम्न प्रकार किया है- अघिकारादपतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः। भप्रस्तुत प्रशसेय प्रस्तुतार्थ निवन्धिनी ॥५, १४॥।

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कारिका २३ ] तृतीयोन्मेष [४१५

साम्यसमाश्रयणात् वाक्यान्तर्भूतप्रस्तुतपदार्थप्रशसा। यथा- लावरायसिन्धुरपरैव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह सम्प्लवन्ते। उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलिकाएडमृणालदएडाः।८२/' साम्याश्रयणात् सकलवाक्यव्यापकप्रस्तुतपदार्थप्रशसा। यथा- छायानात्मन एव या कथमसावन्यस्य सुप्रगहा ग्रीष्मोष्मापदि शीतलस्तल सुवि स्पर्शोडनिलादे: कुतः। वार्ता वर्पशते गते किल फल भावीति वार्तेव सा द्राघिम्ण मुषिताः कियच्चिरमहो तालेन वाला वयम् ॥८३।3

साम्य के आश्रय से वाक्यार्थ के अन्तर्भूत प्रस्तुत पदार्थ की प्रशसा [रूप अर्प्रप्रस्तुतप्रशसा अलद्धार का उदाहरणा ]जसे- [ नदी के किनारे स्नानार्थ आाई हुई किसी तरुरी को देखकर किसी रसिक जन की यह उषित है। इसमें युवती का स्वय नदी रूप में वर्णन किया है] यहाँ [इस नदी तट पर] यह नई कौन-सी लावण्य की नदी आ गई है जिसमें चन्द्रमा के साथ कमल तरते है, जिसमें हाथी की गण्डस्थली [सिर] उभर रही हैं और जहां कुछ और ही प्रकार के [लोकोत्तर] क्दली काण्ड औ्रर मृसाल दण्ड दिखलाई देते है ॥८२॥ इसमें प्रस्तुत तर्णी के सौन्दर्यातिरेक के आधान के लिए मुख और चन्द्रमा, नितम्ब शग हाथी की गण्डग्थली, नेत्र और कमल, आदि के सादृश्य का आश्रय लेकर अप्रस्तुत शशी, उत्पल, हाथी के गण्डस्थल आदि की प्रशसा की गई है। परन्तु उससे प्रस्तुत तरुणी के मख, नेत्र, नितम्व आदि श्रङ्गों की शोभा का अ्तिशय प्रतीत होता है। इसलिए यह अप्रस्तुतप्रशसा का उदाहरण है। साम्य के आश्रय से सकल वाक्य में व्यापक प्रस्तुत पदार्थ की प्रशसा [रूप अप्रस्तुतप्रशसा अलद्धार का उदाहरण ] जैसे- [ कोई व्यक्ति] अ्नपनी ही छाया को नहीं पकड सकता है [अपनी ही छाया में आदमी नहीं बैठ सकता हैं] तो फिर दूसरे [अर्थात मेरी ताड के पेड] की छाया कँसे पकड़ी जा सकती हँ। ग्रीरम के सन्ताप रूप आपत्ति में नीचे की जमीन में वायु आदि का स्पर्श कैसे हो सकता है। सौ वर्ष बीत जाने पर [इस ताड के वृक्ष में] फल आवेंगे यह बात [जो सुनी जाती हं वह] कोरी वात ही हैं। श्रहो इस ताड के वृक्ष ने अपनी ऊँचाई से [अभिभूत, प्रभावित हुए] हम भोले-भाले लोगो को कितने दिन तक धोखा दिया, [ठगा] ।८३।। १ ध्वन्यालोक पृ० ३६० पर उद्धृत। २ वर्पशतैरनेक्लवल पाठ अ्र्प्रशुद्ध था। ३. सुभापितावली ८२१।

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४१६ ] वक्रोपितिजीवितम् [फारिफा २३

यह श्लोक सुभापितावली का ८२१वां श्लोक है। उसका तृतीय चरगा हमने यहां सुभापितापली के मल पाठ के अनुसार दिया है। वक्रोविनजीवित के प्रथक सस्करण में उसका पाठ इस प्रकार है-

वार्ता वर्पशतैरनेकलवल भावीति वातंव सा।

इस पाठ में 'अनेकलवल' शब्दो को प्रवृत अ्रप्र्थ के अ्र्प्रनुकल को व्याग्या मङ्भत नही होती है। इसलिए वह प्रमाद पाठ है। सुभापितावली का पाठ ही ठोक है अ्रत हमने मूल में उसी को रखा है।

यह श्लोक अन्योक्ति रूप है। कोरई व्या्ति अ्नायाम अपने समाज के अ्न्य लोगो से अघिक ऊँचा है। लोग उससे कुछ सहायता की आ्रशा रखते है। परन्तु जो कोई किसी कार्य को लेकर उसके पास जाता है उसको किसी न फिनी बहाने से टरका देता है। किसी का कोई भी काम करके नही देता है। यो ही लम्बी-चोडी वातें बनाकर सबको घोखा देता रहता है। ऐसे व्यक्ति का वगन करने के लिए कवि ने सादृष्य को लेकर ताड के वृक्ष को वणांनीय वना लिया है। ताड के वृक्ष से जब कोई कहता है कि तुम्हारे पास बैठने को छाया भी नही मिलती है तो कह देता है कि किसी की अपनी ही छाया उसको बैठने का सहारा नही देती है तो फिर दूसरे की छाया से यह आशा कैसे की जा सकती है। फिर कभी कोई पूछता कि अरे भाई तुम इतने बडे हो शर हम तुम्हारे नीचे बैठे हुए गर्मी के मारे मरे जा रहे है। तनिक हवा तो कर दो कि शान्ति मिले। तो उसको उत्तर देता है कि तुम कहाँ पाताल में बैठे हो, वहाँ हवा कहाँ पहुँच सकती है। जब उससे किसी का काम वनता नही दिखाई दिया तो लोगो ने उसकी उपेक्षा करना चाही। पर उसने फिर अपना जाल फेका कि ज़रा देखो तो, मभे सी वर्ष का होने दो, फिर फल ही फल लेना। पर अब लोग उसकी लम्बी-चौड़ी बातो से तग आ चुके थे। उन्होने समझ लिया यह भी एक चकमा देने की बात है। किसने सौ वर्प देखे है। इस प्रकार यह ताड का लम्बा वृक्ष अपनी लम्बाई से कितने दिन तक हम भोले-भाले लोगो को ठगता रहा है। यह इस वाक्य का अर्थ है जो सारे वाक्य में व्यापक है। इसलिए यह बाक्य में व्यापव सादृश्यमूल प्रस्तुत अर्थ की प्रशसा रूप अप्रस्तुतप्रशसा अलद्कार का उदाहरण है।

सादृश्यमूलक अप्रस्तुतप्रशसा के दो उदाहरणा देने के बाद अव कार्यकारण- भावादि रूप सम्बन्धान्तरमूलक अप्रस्तुतप्रशसा के दो उदाहरण देते है। इनमें से एक में वाक्यान्तर्भूतपदार्थ की और दूसरे में सकलवावयव्यापक वाक्यार्थ का वर्णन है।

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कारिका २१ ] तृतीयोन्मेषः [४१७

सम्वन्धान्तराश्रयणो वाक्यान्तभूतप्रस्तुतप्रदार्थप्रशंसा यथा- इन्दुलिप्त इवाब्जनेन जड़िता दृष्टिमृ गीणगामिव प्रम्लानारुणिमेव विद्रमलता श्यामेव हेमप्रमा। कार्कश्यं कलया च कोकिलवधूकराठे्विव प्रस्तुतं सीतायाः पुरतश्च हन्त शिखिनां वर्हाः सगर्हा इव ॥८४'

[सादुश्य से भिन्न] श्रन्य सम्बन्ध के होने पर वाक्य के श्रन्तर्गत प्रस्तुत पदार्थ की प्रशंसा जैसे-

यह श्लोक राजशेखरकृत वालरामायण नाटक १, ४२ का है। सीता स्वयम्बर मे सम्मिलित होने के लिए आया हुआ रावण सीता को देखकर उनके सौन्दर्य की प्रशसा करता हुआ कह रहा है कि-

[इसके सौन्दर्य के सामने] चन्द्रमा सानों कालिस पोता हुआ-सा हो रहा है, हरिसियो की दृष्टि जड़-सी [अचल] हो रही है, मूंगे की लता की अरुशिमा उड़ गई- सी जान पड़ती है और सोने की कान्ति काली सी जान पड़ती है। कोफिलवघुओं के गले में कठोरता-सी आ गई प्रनीत है और इस सीता के [केशपाश] के सामने मोरों के पंख भी रद्दी-से लगते है॥८४।।

इसमें प्रस्तुत सीता के अ्रङ्गो के अ्तिशय सौन्दर्य को सूचित करने के लिए चन्द्रिका की कालिमा से मुख का अत्यन्त सौन्दर्य, हरिसिया की दृष्टि की जडता से सीता के नेत्रो का अतिशाय चाञन्वल्य, विद्रुम लता के आरुण्य के उड जाने से सीता के अघर का रागाधिक्य, सोने की कान्ति की श्यामता से सीता की देह प्रभा के गौरत्वातिशय, कोकिलवघुओो के कण्ठ की क्ठोरता से सीता के कण्ठस्वर की मघुरता ) का अतिशाय और मोरो के पखों की निन्दा से सीता के केशो के सौन्दर्यातिरेक की प्रतीति होती है। इन सब में प्राय सादृश्य के स्थान पर विपरीत लक्षणा से ही प्रतीति होती है। इसलिए इसको सम्वन्धान्तरमूलक वाक्यान्तर्भूत प्रस्तुत पदार्थ की प्रशसा रूप अप्रस्तुतप्रशसा अलद्कार के उदाहरस रूप में प्रस्तुत किया गया है।

१. बाल रामायण १,४२।

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४१= ] वकोपितजीवितम् [फारिका २३

सम्बन्धान्तराश्रयण सक्लवाक्यव्यापक्कप्रस्तुतप्रशसा यथा- परामृशति सायक क्षिपति लोचनं कार्मुके विलोकयति वल्लभा स्मित मुधार्द्ेवनत्र स्मरः। मधो किमपि भापते भुवननिर्जयाग्यावनि गतोऽहमिति हपित स्पृशति गात्रलेखामहो ॥८५॥ त्न्राप्रस्तुतो मन्मथचेप्टातिशयः। प्रम्तुतस्तरुणीतारुययावतारः । असत्यभूताक्यार्थतात्पर्याप्रस्तुतप्रशसा यथा- न्नयम तदेवमप्रस्तुतप्रशसाव्यवहार कवीनामतिविततप्रपञच, परिदृश्यते । तस्मात् सहृदैयश्च स्वयमेवोत्मेक्षणीय.। प्रशंसाशव्दोत्र, अर्थप्रकाशाढिवद् विपरीतलक्षणाया वर्तते ॥।२३।।

सम्वन्धान्तरनिमित्तिक समस्त वाक्य में व्यापक प्रस्तुत को प्रशसा [रूप अ्र्प्रस्तुतप्रशसा का उदाहरण] जसे- [किसी नवयौवना तरुणी के यौवन के उभार को देखकर] कामदेव [कभी] अपने वाण को टटोलता है, कभी धनुप पर नजर डालता है, फिर [तनिक मुस्करा कर] स्मित की सुधा से, मुख को द्रवित कर के [तनिक मुस्फराता हुआ््रा] अ्रपनी प्रियतमा [रति] का और देखता है औरर कभी [अपने सहायक या मित्र] वसन्त से कुछ कहता है, और ससार के विजय के लिए में मैदान में आगया हूँ यह सौच कर प्रसन्न हुआ्रा कामदेव [उस नवयौवना के] श्रङ्गों का स्पर्श करता है॥८५॥ इसमें कामदेव की चेष्टाओ का वर्णन प्रप्रस्तुत है [ उसके वर्णंन से ] तर्सी के तारुण्य के अवतार [रूप] प्रस्तुत [पदार्थ का अतिशय सौन्वर्य सूचित होता] है। इसमें सादृश्य सम्वन्ध न होकर कार्य कारण भाव सम्बन्ध है। इसलिए यह सम्बन्धान्तर-निर्मित्तक सकल वाक्य में व्यापक प्रस्तुत पदार्थ का प्रशसा रूप भ्प्रस्तुत प्रशसा अलद्धार का उदाहरएा है। ग्रन्थकार ने यहां अ्र्प्रसत्यभूत वाक्यार्थ तात्पर्याप्रस्तुतप्रशसा का प्राकृत भाषा की गाया रूप में एक उदाहरण और भी दिया है। परन्तु मूल प्रति में बिल्कुल भी पढने में नही आता है। इसलिए उसको यहाँ नही दिया जा सका है। इस प्रकार पप्रस्तुतप्रसा का व्यवहार कवियो मे श्र्रत्यन्त विस्तृत रूप में दिखलाई पडता है। इसलिए सहृदय उसको स्वय ही समझ सकते है। यहाँ [अप्रस्तुत प्रशसा नाम में] प्रशसा शब्द अर्थप्रकाशादि के समान विपरीत लक्षणा से प्रयुक्त होता है।।

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फारिका २४ ] तृतीयोन्मेष: [४१६

एवमप्रस्तुतप्रशंसां विचार्य विवच्ितार्थप्रतिपादनाय प्रकारान्तराभिधान- त्वादनयैव समानप्राय पर्यायोक्तं विचारयति-

यद्वाक्यान्तरवक्तव्यं तदन्येन समर्थ्यते। येनोपशोभानिष्पत्ये पर्यायोक्तं तदुच्यते ॥२४॥

यद्वाक्यान्तरेत्यादि। पर्यायोक्तं तदुच्यते पर्यायोक्ताभिघानमलङ्करणं तदभिधीयते।

इसका अभिप्राय यह है दाशनिक सिद्धान्त में घट आदि पदार्थ भ्चेतन होने से अप्रकाश स्वरूप हे। ज्ञाता आत्मा ही प्रकाश स्वरूप हू। परन्तु ज्ञान के समय प्रात्मा के साथ सम्बद्ध होने से भर्थ प्रकाशित होता है ऐसा कहा जाता है। इसी प्रकार अप्रस्तुतप्रशसा के उदाहरणो में वास्तव में तो वह अप्रस्तुत की प्रशसा न होकर उसकी निन्दा ही होती है और प्रशसा तो प्रस्तुत की होती है। इसलिए कुन्तक कहते -) है कि अप्रस्तुतप्रशसा अलद्दार के नाम में प्रशसा शब्द विपरीत लक्षणा से प्रयुक्त होता है। इसके उपपादन के लिए 'अर्थप्रकाशादिवत्' यह दृप्टान्त दिया हैं ॥२२-२३॥।

5 पर्यामोक्त अलद्धार-

अप्रस्तुत प्रशसा के निरूपण कर चुकने के बाद ग्रन्यकार ने 'पर्यायोक्त' अलद्कार का वर्णन प्रारम्भ किया है। मूल कारिका ग्रन्थ में नही दी है। वृत्ति के आाधार से उसकी रचना इस प्रकार की गई है जो ऊपर दो है।

इस प्रकार अप्रस्तुत प्रशंसा का विचार करने के बाद विवक्षित अर्थ के प्रति- पादन के लिए, प्रकारान्तर से कथन रूप होने के कारस लगभग इस [अप्रस्तुतप्रशंसा] के ही तुल्य 'पर्यायोक्त' [ अलद्धार ] का विचार [प्रारम्भ] करते है।

जो अन्य वाक्य से [ अन्य प्रकार से वाच्य रूप से-] कहने योग्य वस्तु सौन्वर्य के उत्पावन के लिए उससे भिन्न जिस अन्य प्रकार से [व्यङ्ग्य रूप से]-कही जाती हैं उसको पर्यायोक्त [भलङ्धार] कहते है-

'यद्ाक्यान्तर' इत्यादि [कारिका का प्रतीक देकर उसकी व्यास्या करते है]। बह् 'पर्यामोक्स' कहा जाता है अर्थात् वह 'पर्यायोक्त' नामक अलद्धार कहलाता है।

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४२० ] घग्तोपितिजी चितम् [फारिका २४

कीटशम्-'यद्वाक्यान्तरवक्तव्य' वस्तु वाक्यार्थलन्षगा पदसमुदाया- न्तराभिधेयं तदन्येन वाक्यान्तरेग येन समर्ध््यते प्रतिपाद्ते। किमर्थेम्- 'उपशाभानिप्पत्यै' विच्छितिसम्पत्तये। तन पर्यायोक्तमित्यर्थ.। तदेवं पर्यायवक्रत्वात किमत्रातिरिच्यते। पर्यायवक्वस्य पदार्थमार्त्र वाच्यतया विपयः, पर्यायोक्तग्य वाक्यार्योयङ्गत्यति तस्मात् पृथग- भिघीयते। उदाहरया यथा- चक्राभिधातप्रसभाज्ञयैव वकार यो राहुवधजनस्य। श्र्रलिङ्गनोद्दामविलासचन्ध्यं रतोत्सवं चुम्बनमात्रशेपम् ।।८६।।'

कैसा कि-जो अन्य वाक्य से [वाच्य रूप से श्रन्य प्रकार से] फहने योग्य वस्तु प्रर्थात् दूसरे [ वाचक] पद समुदाय से कहने योग्य वाक्यार्थ रूप वस्तु, उससे भिन्न अन्य जिस वाक्य से [व्यङ्गय रूप ] समर्यित पर्ात् प्रतिपादित की जाती है। किस लिए कि-उपशोभा [ मुख्य शोभा तो पदार्य के अपने स्वरूप से ही होती है। अलङ्धारो के द्वारा जो शोभा होती है वह कृत्रिम शोभा है इसलिए कुन्तक उसको उपशोभा शब्द से ही प्राय कहते है ] की सिद्धि के लिए अर्थात् सौन्दर्य के उत्पावन के लिए। वह 'पर्यायोक्त' [शलद्धार ] होता है यह अभिप्राय है। [ प्रश्न ] इस प्रकार [ पूर्व फहे हुए ] 'पर्याय-वऋ्र्व से इस [ पर्यायोक्त अलद्धार ] में कया विशेषता [ क्या भेद ] है? [उत्तर] 'पर्याय-वत्रता' में वाच्य रूप से पदार्थ-मात्र हो विषप होता है। और पर्यायोक्त [अरलङ्धार ] में [ केवल पदार्य नहीं अपितु ] वाक्यार्थ भी श्रद्ग रूप से विषय होता है इसलिए [ दोनों में भेद होने से यहाँ 'पर्यायोक्त' अलद्धार को] अलग से कहा गया है। [पर्यायोकत का ] उदाहरण जैसे- जिस [ विप्स] ने चम के प्रहार रूप [ अ्नपनी ] अरनुल्लघनीय आाज्ञा से ही राहु की पत्नियो के सुरतोत्सव को[ राहु के आ्लिङ्गन आदि अ्र्प्रन्य क्रियाओरं में उपयोगी घड भाग फो काटकर अलग कर देने के द्वारा] आ्लिङ्गन प्रधान [ सुरत सम्भोग के अन्य [ समस्त ] विलासो से रहित [ केवल मुख मात्र के शेष रह जाने से] चुम्बन मात्रावशेष कर दिया ॥८६॥। १ ध्वन्यालोक पृ० १५२, पर उद्धृत।

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कारिका २४ ] तृतोयोन्मेप: [४२१

... अन्न प्रन्थपातः ।

यथा- भूमारोद्वहनाय शेषशिरसा सार्थेन सन्नहते विश्वस्य स्थितये स्वयं स भगवान् जागति देवो हरिः । अद्याऽप्यत्र च नाभिमानमसमं राजस्त्वया तन्व्रता विश्रान्तिः क्षणामेकमेव न तयोर्जतिति कोडयं क्म ॥८७

इसमें विष्णु ने राहु के शिर को धड से अलग कर दिया यह वात अ्न्य वाक्य के द्वारा वाच्य रूप से कहनी थी। परन्तु त्ररथ के सौन्दर्य के लिए कवि ने सीधे रूप से अभिषा से इस बात को न कहकर इस प्रकार से कहा है कि उसने राहु की पत्नियो के सुरतोत्सव सम्भोगानन्द को केवल चुम्वन मात्र शेप कर दिया। धर्थात् राहु का केवल मुख मात्र शेप रह गया है इसलिए वह अपनी पत्नियो का चुम्वन तो कर सकती है। परन्तु धड के न होने से सम्भोग सम्बन्धी अ्रन्य कार्यो का सम्पादन नही कर सकता है। इस प्रकार वण्यं वस्तु को प्रकारान्तर से कहने के कारण यहाँ 'पर्यायोक्त' अ्लद्ार होता है।

इसके बाद ग्रन्थ का कुछ भाग लुप्त हो गया है इसको सूचित करने के लिए ग्रन्थ की प्रतिलिपि करने वाले लेखक ने यहा 'अन् ग्रन्थपात' लिख दिया है। जिसका अर्थ यह है कि 'यहाँ ग्रन्थ का कुछ भाग नही मिलता है'। यह भाग 'व्याजस्तुति' अलक्कार लक्षण आदि से सम्वन्व रखता है। क्योकि आगे दिए हुए उदाहरण व्याज- स्तुति के उदाहरण हे। इस 'अन्र ग्रन्थपात' के वाद मूल प्रतिलिपि मे कुछ रूपक का अपश आ गया है जिसे हम पहिले दे चुके है। उसके वाद 'भृभारोद्वहनाय' आरदि व्याजस्तुति के उदाहरस दिए गए हैं। जिनका अरथ इस प्रकार है- हे राजन् आपके [मं पृथिची को धारण करता हूँ इस प्रकार के] प्रसाधारण * प्रभिमान करने पर भी शेषनाग के शिरों का समूह आज भी यहाँ [ससार में] पृर्थिवी के भार को उठाने के लिए तैंयार हो रहा है, और ससार की स्यिति रखने के लिए स्वय विष्णुभगवान् सावधान बैठे हुए है। उन दोनो को एक क्षरा के लिए भी विश्राम यहीं मिला यह क्या बात है।८७।।

यह तथा इसके आगे दिए हुए तीनो उदाहरण व्याजस्तुति अलक्कार के उदाहरसा हैं।

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४२२ ] वन्रोपितिजीचितम् [ फारिका २५

यथा वा- इन्दोर्लेक्षम त्रिपुरजयिन।' इत्यादि।८=॥ यथा वा- हे हेलाजितबोघिसत्व।२ इत्यादि ।८६। यथा वा- नामाप्यन्यतरो ।8 इत्यादि॥६०।। सम्भावना ऽनुमानेन सादृश्येनोभयेन वा।

अथवा जसे- [३, ४६ पर पूर्व उदधृत] इन्दोर्लक्ष्म। इत्यादि ॥८5।। अ्रथवा जैसे- [१, ६० पर पूर्वोद्धृत] हे हेलाजित। इत्यादि ॥८६॥। [१, ६१ पर उद्घृत] नामाप्यन्यतरोः इत्यादि ॥है०॥। का० २४॥ ६, उत्प्रेक्षा अलद्धार- ये तीनो उदाहरण व्याजस्तुति अलद्धार के हे। इस प्रकार यहाँ तक 'व्याजस्तुति' अलद्कार का वर्णन करके आपरगे 'उत्प्रेक्षालद्ार' का वर्णन करते है। पूर्व अलद्धारो के समान उत्प्रेक्षालद्वार की लक्षणापरक कारिकाएँ मूल प्रति में नही पाई जाती है। वृत्तिभाग में दिए हुए प्रतीको के आधार पर उनकी जो रचना की गई है वह ऊपर दी हैं। इस भाग में जो कारिकाएँ नहीं मिलती है उसका कारण यह नही है कि वे बीच-बीच में से लुप्त हो गई है। अपितु ऐसा प्रतीत होता है कि मूल कारिकाएँ पहिले अलग लिख ली गई थी। और यहां दुवारा उनके लिखने के प्रयास को बचाने के विचार से लेखक ने दुबाश उनको न लिखकर केवल उनके आवश्यक प्रतीक देकर व्याख्या करने का ही क्रम रखा है। इसलिए इस भाग में सभी कारिकाओो की रचना अनुमान से करनी होती है। 'उत्प्रेक्षालद्वार' का लक्षण करने वाली कारिकाओ लर स्वरूप ऊपर दिया है। अरथ इस प्रकार ह- सम्भावना से अनुभान द्वारा अथवा सावृश्य से अथवा उन धोनों से वरसंनीय वस्तु के अतिशयोब्रेक के प्रतिपावन की इच्छा से-।।२५॥ १ उदाहरण सख्या ३,४६ पर उद्घृत। २. उदाहरण सख्या १, ६० पर पूर्व उद्धृत। ३ उदाहरण सख्या १, ६१ पर उघुत।

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कारिका २६-२७] तृतीयोन्मेष. [४२३

तदिवेति तदेवेति वादिभिर्वाचकं बिना ॥२६।। समुल्लिखित वाक्यार्थव्यतिरिक्तार्थयोजनम्। उत्प्रेक्षा ।।२७।। 'सम्भावनेत्यादि' 'समुल्लिखित वाक्यार्थव्यतिरिक्तार्थयोजनम् उत्प्रेक्षा ।' समुल्लिखितः सम्यगुल्लिखित. स्वाभाविकत्वेन समर्पयितुं प्रस्तावितो वाक्यार्थः पदसमुदायाऽभिधेयं वस्तु। तस्माद् व्यतिरिक्तस्यार्थस्य वाक्यान्तर-

विगृह्यते।

वाच्य [अ्र्थ ] तथा वाचक [ शब्दो ] की सामर्थ्य से आक्षिप्त अर्थ वाले इवादि [ अर्थात् प्रतीयमान इवादि ] से, जो 'उस [ उपमान ] के समान', 'अयवा वह [ उपमान रूप ] ही [उपमेय ] है इसका प्रतिपादन करने वाले इवादि के द्वारा वाचक [वाच्य-वाचकल रूप सम्बन्ध] के विना[ अरर्थात् द्योतकत्व सम्बन्ध से। अर्यात इवादि पद उत्प्रेक्षावाचक नहीं अपितु उतप्रेक्षा का द्योतक है मन्ये शके ध्रुवम् प्रायो नून आदि शब्दो को उत्प्रेक्षा का द्योतक शन्द माना गया है। उन्हीं शब्दों में 'इव' शब्द का भी पाठ है। इन मन्ये, शड् आदि शव्वो का वाच्यार्य तो, ऐसा मानता हूँ, ऐसा शङ्धा करता हूँ, आदि होते है। परन्तु उनसे उत्प्रेक्षा द्योतित होती है। इस ही अभिप्राय को मन मे रखकर यहाँ कुन्तक ने 'वाचकं बिना' यह लिखा नान पड़ता है ]-॥।२६।। [ समुल्लिखित ] वशिगत अ्रर्थ से प्रतिरिक्त [श्रतिशय युक्त ] अ्रन्य अर्थ की योजना 'उत्प्रेक्षा' [ कहलाती ] है।।२७।। 'सम्भावनत्यादि' [ कारिका की प्रतीक देकर व्यात्या श्रारम्भ करते है] वगिगत पदार्थ से अ्तिरिष्त [अतिशय युक्त ] अन्य अरर्थं की योजना करना उत्प्रेक्षा ) है। समुल्लिखित अरथात् श्रच्छी तरह से वगिगत अर्थात् स्वाभाविक रूप से प्रतिपादन करने के लिए प्रस्तुत किया हुआ, पद समुदाय से अभिधेय वस्तु रूप वाक्यार्थ, उससे प्रतिरिक्त अर्थात् अरन्य वाक्य के तात्पयं विघयी भूत अर्थ की योजना अर्थात् उपपपादन 'उत्प्रेक्षा' नामक प्रलद्धार होता है। उत्-प्रेक्ष [प्रतिपादित अर्थ से

होना हूं। अघिक अर्थ का वेखना] 'सत्प्रेक्षा' है यह [ उत्प्रेक्षा शब्द का ] विग्रह [ व्युत्पति ]

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वकोवितिजीवितम् [फारिका २५-२७

कि साधनेनेत्याह-'सम्भावनाऽनुमानेन'। सम्भावनया यदनुमानं भाव्यमानस्य तेन। प्रकारन्तरेशाप्येपा सम्भवतीत्याह-'साहश्येनेति' । टश्येन साम्येनापि हेतुना समुल्लिखितवाक्यार्थव्यतिरिक्तार्थ- ननमुत्प्रेक्षैव। द्विविध सादृश्य सम्भवति वास्तविक काल्पनिक च । तन्न सतवमुपमादिविपयम्। काल्पनिकमिहाश्रीयते। प्रकारान्तरमस्या प्रतिपादयति 'उभयेन वा'। सम्भावनाऽनुमानेन हश्यलक्षणोनोभयेन वा कारणद्वितयन सवलितवृत्तिना प्रस्तुतव्यतिरिक्तार्था-

र्वएयातिशयं। द्रेकप्रतिपाठनवाहया'। वर्णनीयोत्कत्कर्पोन्मेपसमर्पणाकाक्षया। थम्-'तदिवेति तदेवेति वा' द्वाम्या प्रकाराभ्याम् । तदिव अ्र्प्रप्रस्तुतमिच,

किस साधन से [ उत्-प्रेक्षण ] यह कहते हैं-'सम्भावना द्वारा अनुमान । सम्भावना के कारण, सम्भाव्यमान का जो अनुमान उससे। २-यह [ उत्प्रेक्षा ] र प्रकार से भी हो सकती हे यह कहते ह-'सादृश्येन'। सादृश्य अर्ात् समानता प हेतु से भी समुल्लिखित अर्थ से अ्तिरिक्त अ्रर्थ की योजना 'उत्प्रेक्षा' ही होती हैं। वृश्य दो प्रकार का होता है। एक वास्तविक सादृश्य औप्रौर दूसरा फाल्पनिक सादृश्य। नमे से वास्तविक [सादृश्य ] उपमा आदि [अलङ्धारों ] में होता हूँ और्प्रौर जल्पनिक [सावश्य ] यहां [ उत्पेक्षा अलद्धार में ] लिया जाता है।

श्रब इसके तीसरे प्रकार का प्रतिपादन करते है-'अथवा [सम्भावनानुमान गैर सावृश्य] दोनो से'। अर्थात् 'सम्भावनानुमान' और 'सादृश्य' रूप दोनो कारणों के मिलित रूप से प्रस्तुत [वरिगत] अ्रर्थ से श्रतिरियत अर्थ की योजना [भी उत्प्रेक्षा होती है।। उत्प्रेक्षा के इन तीनो प्रकारो का भी अवलम्वन किस अभिप्राय से किया जाता यह कहते है-'वर्णनीय वस्तु के अर्प्रतिशयोब्रेक के प्रतिपादन करने की इच्छा से। । यहां ग्रन्थकार ने 'प्रतिपाद्य' अर्थ में 'निर्वर्ण्य' शब्द ा प्रयोग किया है परन्तु अन्य तरन्थों में इस शब्द का प्रयोग प्राय' 'दृष्टवा' देख कर इस अर्थ में होता है]। किस प्रकार वे [प्रतिपाद्य विषय के अतिशयोव्रेक के प्रतिपावन की इच्छा से कि]-उस [अप्रस्तुत उपमान ] के समान [ तदिव ] अथवा [ तवेव ] वह ही [ अप्रस्तुत उपमान रूप ] हो [ यह उपमेय है ] इन दोनो प्रकारो से[ अतिशयोब्रेक के प्रतिपादन की इच्छा से ] 'तविव' का अ्पर्थ अप्रस्तुत [ उपमान कमल ] के समान उस [ वर्ण्य-प्रस्तुत-

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कारिका २५-२७] तृतीयोन्मेषः [४२५

तदतिशयप्रतिपादनाय प्रस्तुतसादृश्योपनिबन्धः । तदेवेत्यप्रस्तुतमेवेति तत्स्वरूप- प्रसारखपूवकं प्रस्तुतस्वरूपसमारोपः। प्रस्तुतोत्कर्षधाराधिरोह्प्रतिपत्तये तात्पर्या - रन्तरयोजनम्। कैर्वाक्येरुत्प्रेक्षा प्रकाश्यते इत्याह-'इवादिभिः' । इव- प्रभृतिभि: शव्दैर्यथायोगं प्रयुज्यमानैरित्यर्थः । न चेढिति पक्ान्तरमभिधत्ते- 'वाच्यवाचकसामर्थ्यान्तिप्तरवार्थै.' तैरेव प्रयुज्यमानैः, प्रतीयमानवृत्तिभिर्वा।

तत्र सम्भावनानुमानोत्प्रेक्षा यथा- आपीडलोभाटुपकर्रामेत्य प्रत्याहितः पाशुयुतैद्धिरेफै: । १तरमर्षणनेव महीपतीना सम्मोहमन्त्रो मकरध्वजेन ॥६१।।

उपमेय] का अर्प्रतिशय उत्कर्ष प्रतिपादन करने के लिए सावृश्य का प्रवर्शन किया जाता है। और वह उपमान ही है [ तदेव ] इससे, उस [ अ्प्रस्तुत उपमान-कमल ] के स्वरूप को व्यापक बनाकर प्रस्तुत के स्वरूप पर समारोप किया जाता है। प्रस्तुत [वर्ण्यमान उपमेय वस्तु] के उत्कर्ष की परम सीमा पर स्थित होने का प्रतिपादन करने के लिए [उसके उपमान सदृश या उपमान रूप होने के] इस शन्य तात्पर्य की योजना है। किन वाक्यो [ पर्थात् वाचक शब्दों ] से उत्प्रेक्षा प्रकाशित [ ध्ोतित ] हाती है, यह कहते है-'इव आदि से'। अर्थात यथोचित रूप से प्रस्तुत हुए 'इव' आदि शब्दों से [ उत्प्रेक्षा द्योतित होती है ] यह अभिप्राय है। और यवि [ इचादि शब्द का प्रयोग न हो तो दूसरा विकल्प बतलाते है कि [ वाच्य वाचक ] शब्द तथा अर्थ के सामर्थ्य से जिन [ इवादि] के अपने अर्थ को प्क्षेप करवा लिया जाता है उन [ प्रतीयमान इवादि ] से। प्रयुज्यमान अ्थवा प्रतीयमान उन [ इवादि पदों ] से [उत्प्रेक्षा प्रकाशित अर्थथात् द्योतित होती है ]। १ सम्भावनानुमान से उत्प्रेक्षा [ का उदाहरण] जैसे-

राजाओ के शिर पर धार की हुई पुप्पमालाश्रो [आ्पीड ] के लालच से [ उनके ] फानो के समीप आकर पुष्प-परागयुक्त भौरों के द्वारा ब्रुद्ध हुए फामदेव ने राजाश्ो के ऊपर सम्मोहन-मन्त्र चलाया ॥६१।

यहाँ 'अ्मर्षणेनेव' में सम्भाव्यमान 'अमर्ष' क्रोध की सम्भावना का अनुमान करके उत्प्रेक्षा की गई है। और उत्प्रेक्षा का द्योतक 'इव' शब्द विद्यमान है। इसलिए यह वाच्या सम्भावनानुमानोत्प्रेक्षा का उदाहरण है।

१. अस्यास्यानेव यह पाठ अ्शुद्ध था।

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४२६ ] वक्रोक्तिजीवितम् [ फारिका २५-२७

काल्पनिकसा दश्योदाहरण यथा- राशीभूतः प्रतिदिनमिव त्र्यम्बकस्याट्टहास: ॥६२/" यथा वा- निर्मोकमुकितिरिच या गगनोरगस्य। इत्यादि ॥६३।।

यथा R- उत्फुल्ल चारुकु मुम मस्तब केन नम्रा येयं धुता रुचिरचृतलता मृगाचया । शंके न वा विरहिणीमृ दुमर्दनस्य मारस्य तजितमिदं प्रतिपुप्पचापम् ॥।६४।।

काल्पनिक सादृश्य का उवाहरण जैसे- प्रतिदिन इकट्ठे हुए शिव के अट्रहास के समान [शुभ्र-वर्ण का कैलाश पर्वत है ] हैं ।।६२। यहां शिव के भट्टहास का राशीकरण इकट्ठा होना ही काल्पनिक है इस- लिए उसका कैलाश पर्वत के साथ सादृश्य भी काल्पनिक है। प्रथवा [इसी काल्पनिक सादृश्य का दूसरा उदाहरण] जैसे- जो आ्रकाश रूप सांप की छोडी हुई केचुली के समान है ॥६३।। इत्यादि। वास्तव-सादृश्य का उदाहरण जैसे- खिले हुए सुन्वर पुष्प मञ्जरियो से भुकी हुई इस श्ाम की लता को इस मुगनयनी ने जो हिलाया है वह मानो विरहिगियो का [ वसन्त के आ्ररम्भ में ] मृदुता से मर्दन करने वाले कामदेव का [ उनके उग्र सन्ताप के लिए ] अपने पुष्प घाप के उठाने की घमकी दिखलाना तो कहीं नहीं है ऐसा प्रतीत होता है। [अर्थात् अभी वसन्त का आरम्भ होने से कामदेव विरहिणियों को उतना सन्तापदायक नहीं हुआ था परन्तु पब जो यह श्राम की मञजरी खिल उठी है सो जान पढता है कि कामवे अपना पुष्प-चाप उठाने की धमकी दे रहा है]।।६४।। १. मेघदूत ५८। २ यहाँ वास्तव सादृश्य के उदाहरण रूप में कुन्तक एक प्राकृत भाषा का पद्य उद्धृत किया हैं परन्तु अ्स्पष्ट होने से वह पढने में नही आता है। अत मूल मँ भी नही दिया गया है। उसी वास्तव-सादृश्य का दूसरा उदाहरख रूप में यह सस्कृत पद्य दिया है। उसका अर्थ ऊपर किया है।

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कारिका २७ ] तृतीयोन्मेष: [४२७

उभयोदाहरणम् यथा'- ... 'तदेव' इत्यत्र वादिभिर्विनोदाहरएं यथा- चन्दनासक्तभुजगनिःश्वासानलमूर्छितः । सूर्छयत्येष पथिकान् मघौ मलयमारुतः॥६५।। यथा वा- देवि त्वन्मुखपङ्गजेन। इत्यादि ।६६118 यथा वा- त्वं रक्षसा भीरु यतोडपनीता । इत्यादि ॥६७|। 'तदेव' इत्यत्र वाचक विनोदाहरएं यथा- एकैकं दलमुन्नमय्य गमयन् वासाम्वुजं कोषताम् धाता संवरणाकुलश्चिरमभूत् स्वाध्यायबद्धाननः॥६घ।।२७

तदेव [वह ही] इस अर्थ में [द्योतक ] इवादि के बिना [ अर्थात् प्रतीयमान उत्प्रेक्षा का ] उवाहर नैसे- चन्दन वृक्ष में लिपटे हुए सांपो के निश्वास वायु से बढ़ा हुआ [मूर्छित यह] मलयानिल वसन्त ऋतु में पथिकों को मू्छित करता है॥६५॥ यहाँ उत्प्रेक्षा के वाचक इवादि शब्दो का प्रयोग नही है। इसलिए यह 'प्रतीयमाना उत्प्रेक्षा' का उदाहरण है। यह श्लोक ध्वन्यालोक में भी पृष्ठ २०० पर उत्प्रेक्षा ध्वनि के उदाहरण के रूप में दिया गया है। प्रथवा जसे- [उदाहरण स० २,४४ पर पूर्व उद्धृत] वेवि त्वन्मुखपङ्गजेन इत्यादि ।६६।। प्रथवा जैसे- [उदाहरण स० २, ८० पर उदृत ] 'त्व रक्षसा भीर' इत्यादि ॥६७।। वह ही [ तवेध ] हैं इस श्रर्थ में वाचक [इवादि] के बिना [ उत्प्रेक्षा का ] उवाहरण जैसे- [उदाहरण स० १, १०२ पर उद्धृत 'यत्सेनारजसामुदञ्चति चये' इत्यादि श्लोक का उत्तरार्द्ध रूप] 'एककं दलमुन्नमय्य' इत्यादि ॥६८॥।२७।।

१ यहा सम्भावनानुमान औ्परौर सादृश्य दोनो के सम्मिलित उदाहरण के रूप में एक प्राकृत गाथा दी गई थो पर लेख की अस्पष्टता के कारण पढ़ने में नही भाई।

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४२६] वकोक्तिजीचितम् [ फारिफा २८

प्रतिभासात्तथा वोद्ध : स्वस्पन्दमहिमाचितम् । वस्तुनो निष्क्रियस्यापि क्रियायां कर्त तार्पशाम् २८।। तदिदमुत्प्रेक्षायाः प्रकारान्तर परिहश्यते, प्रतिभासादित्यादि। 'क्रियायां' साध्यस्वरूपाया "कतृ तापेगा' स्वतन्रत्वममारपगम्। कन्य, 'वस्तुन' पदार्थस्य निष्क्रियस्य क्रियाविरहितस्यापि। कीटशम-'स्वस्पन्दमिमोचितम'। तस्य पदार्थस्य य स्वस्पन्द्रमहिमा स्वभावे्किपेरतस्योचितमनुरपम्।कम्मात- बाद्धुरनुभवितुस्तथा तेन प्रकारण प्रतिभासादववोधान। निवेएर्यातिशयोट्रेक- प्रतिपादनवाव्छया' 'तिवेति तदेवति' 'वादिभिर्वाचक विना' इति पूर्ववदि- हापि सम्बन्धनीये। उदाहरशा यथा- लिम्पतीव तमोऽ्द्गानि वर्पतीवान्जन नभः।६६॥२ इसके वाद ग्रन्थकार उत्प्रेक्षा का एक और भेद दिरालाते है। उसके लक्षण की कारिका प्रतोको के आधार पर ऊपर लिखी गई है। अर्थ इस प्रकार हैं- क्रिया-रहित वस्तु में भी उसके स्वाभाविक सौन्दर्य के थनुरूप औ्र्रौर देसने वाले को उस प्रकार की प्रतीति होने के कारण किसी िया के प्रति कर्तृ त्व का प्रदर्शन [भी उत्प्रेक्षा अलङ्गार का चौथा भेद] है ॥२८॥ 'प्रतिभासात्' इत्यादि [ कारिका में दिखलाया हुन्र] यह 'उत्प्रेक्षा' का [ चौथा] अन्य प्रकार पाया जाता है-[ जो ] साध्यस्वरूप किया में फतु ता का आरोप अर्थात् [स्वतन्त्र. कर्ता इस फर्ता के लक्षण के अनसार] स्वतन्त्रता का आरोप करना। किसका-'वस्तु अर्थात् पदार्थ का'। निष्क्रिय-अर्थात् क्रियारहित पदार्य का भी। किस प्रकार का-'अपने स्वाभाविक उत्कर्ष के योग्य'। उस पदार्थ का जो स्वस्पन्वमहिमा पर्थात् स्वभाव का उत्कर्ष उसके योग्य। किस कारण से कि- 'बोद्धा' अर्यात् अनुभव करने वाले को उस प्रकार के प्रतिभास अर्थात् ज्ञान होने से। 'निर्वण्य' अर्थात् प्रतिपाद वस्तु के अतिशयोद्रेक के प्रतिपावन करने की इच्छा से'। 'उस [अप्रस्तुत] के समान' या 'वह [अप्रस्तुत स्वरूप] ही' इसको कहने वाले वाचक [इवादि] के बिना ये दोनो पहिले के समान यहाँ जोड लेना चाहिए। [इस वस्तुत जड होने से क्रियारहित पदार्थ में स्वतन्त्र फर्तृता के आरोप का] उदाहरण जंसे- अ्न्धकार शरीर को लीप सा रहा है और आकाश काजल-सा बरसा रहा है। [यह श्लोफ 'दण्डी' के 'काध्यादर्श' २,२२६ से लिया गया *]।।६६। १ कर्तू तारोपणम् । २ काव्यादर्श २, २२६ ।

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कारिका २६ ] तृतीयोन्मेषः [ ४२६

यथा वा- तरन्तीवाङ्गानि स्खलदमललावरायजलघौ ॥१ ००॥' अत्र टरिडना विहितनिति न पुनविधीयते।

उत्प्रेक्षा प्रथमोल्लेखरजीवितत्वेन जृम्मते।।१०१।। इत्यन्तरश्लोक: ॥२८॥ एवमुत्प्रेक्षां न्याख्याय सातिशयत्वसादृश्यसमुल्लसितावसरामति- शायोक्तिं प्रस्तीति- यस्यामतिशयः कोऽपि विच्छित्या प्रतिपाद्यते। वर्शानीयस्य धर्माणां तद्विदाह्वाददायिनाम् ॥२६।। पथवा जैसे- [ उदाहरण स० २, ६१ पर पूर्व उब्धृत ] 'तरन्तीवाङ्गानि स्खलदमललावण्य- जलघो'। इत्यावि ॥१००॥ इन [उवाहरणो] में दण्णी ने [ विशेष विवेचन ] कर दिया है भतः यहा डुवारा उसको नहों करते है। इसके पू्वं यथा वा-लिखकर तीसरा उदाहरण भी दिया गया है परन्तु वह ढन में नही आाता है। आागे इसके विपय में कुन्तक कहते हैं कि- [जहां उत्प्रेक्षा के साथ अन्य अलद्धारो का सडूर होता है वहां ] अन्य स्रलद्धारों के सौन्दर्य का अपहरण करके [ अर्थात् उनको दवाकर ] सबसे पहिले [काव्य के] जीवित रूप से 'उत्प्रेक्षा' ही प्रकाशित होती है॥१०१॥ यह 'अन्तरश्लोक' है ।।२८॥ १० पतिशयोकिति श्रलद्धार- यहाँ तक 'उत्प्रेक्षा' अलद्धार का वणंन करने के बाद अव आगे 'अतिशयोवित' अलद्दार का निरूपण प्रारम्भ करते हे। उसके लक्षण की यह कारिका भी प्रतीको के सहारे अनुमान से बनाई गई है। इस प्रकार 'उत्प्रेक्षा' [ अलद्धार ] की व्यास्या करके [ उत्प्रेक्षा के साथ अतिशयोषिति का] सातिशयत्व रूप सादृश्य होने से अवसर प्राप्त अतिशयोवित [अलद्धार ] को प्रस्तुत करते हे- जिसमें वर्सनीय [पदार्थ] के सहृदयो को शह्लाद देने वाले धर्मों का कोई अपूर्व श्रतिशय सुन्दरतापूर्वक प्रकाशित किया जाता है [ उसफो अ्र्प्ररतिशयोषित अलद्धार कहते है] ।२६। १. सदुक्तिकर्णामृत २, ११ राजशेखरस्य।

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४३० ] वक्रोपितिजोवितम [फारिका २६

'यस्यामित्याटि'। सा त्र्प्रतिशयोक्तिरलकृतिरभिधीयते। कीदशी 'यस्यामतिशय.' प्रकर्पकाष्ठाविरोह 'कोऽपि', अ्र्परतिक्रान्तप्रसिद्धव्यवहार- सरणि, विच्छित्या प्रतिपाद्यते वैदग्व्यभङ्गपा समार्यते । कम्य-'वर्णनीयस्य, धर्मााम', प्रस्तावाधिकृतस्य वस्तुन स्वभावानुसम्बन्धिना परिस्पन्दानाम्। कीदशानाम्-'तद्विदाह्वादटायिनाम् काव्याविदानन्दरकारिगाम। यस्मात् सहृदयहदयाह्नाटकारि स्वस्पन्दसुन्दरत्वमेव वाक्यार्थ, ततस्तवतिशयपरिपोपि- कायामतिशयोक्तावलद्धारकृत कृतादराः । यथा- स्वपुप्पच्छविहारियया चन्द्रभासा' तिरोहिताः । अन्वमीयन्त मृङ्गालिवाचा सप्तच्छदद्रमाः ॥१०२॥

'यत्याम्' इत्यादि [ कारिका का प्रतीफ देकर उसकी व्यास्या करते है-] वह 'प्रतिशयोषित' अरलद्धार कहलाता है कैसा-जिसमें 'कोई पप्र्थात् प्रसिद्ध लोकव्यव- हार की श्रेणी को अ्रतिक्रमण कर जाने वाला लोकोत्तर-प्ररतिशय श्र्र्थात् उत्कर्ष की तीमा पर पहुँचा हुआ उत्कर्ष, 'विच्छित्ति' अर्थात् सौन्दर्य से प्रतिपादन किया जाता है अर्थात् चातुर्यपूर्ण शैंली से अररभिव्यवत किया जाता हैं। किसका [श्रतिशय व्यव्त किया जाता है कि]-वर्सनीय [पदार्थ] के धर्मो का अर्थात् प्रकरण में मुख्य रूप से वगिगत वस्तु के स्वभाव से सम्बन्ध रखने वाली विशेषताओ का। कँसी [विशेषताओं का] कि-'काव्यमर्मज्ञों को आ्र््रानन्द देने वाली' काव्यज्ञो को प्रानन्द प्रदान करने वाली [ विशेषताओं] का। क्योकि सहृदयो के हृदय को श्ाह्नादित करने वाली [ पदार्थों की ] अपने स्वभाव की सुन्दरता ही काव्य का प्रयोजन है[वाक्यार्थ का अपर्थ काव्यार्थ काव्य का प्रयोजन करना चाहिए ]। इसलिए उस [स्वभाव सौन्दर्य] के अ्तिशय की परिपोषिका '्र्रतिशयोषित' में, अलद्धार- शास्त्र के निर्माताओं का अत्यन्त आग्रह है। [अतिशयोषित का उदाहरण] जैसे - अपने फूलों की छवि के समान मनोहर चन्द्रमा की चांदनी से आच्छादित [ दिखलाई न देने वाली ] सप्तच्छद की लताएं [ उन पर गूँजते हुए] भौरो की प्रावाज् से अ्रनुमान द्वारा जानी जाती थी॥१०२॥

१ हारिण्यश्चन्द्रहासा पाठ ठोक नही था। २. भामह काव्यालद्कार २, ८२।

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कारिका २६] तृतीयोन्मेष: [४३१

यथावा- शक्यमोषधिपतेर्नवोदयाः कर्णपूरचनाकृते तव। त्ररप्रगत्भ यवसूचिकोमलाश्छेत्तुमयनखसम्पुटैः कराः ॥१०३॥' यथा वा- यस्य प्रोच्छयति प्रतापतपने तेजस्वितामेत्यलं लोकालोकघराधरावतियशःशीताशुविम्बे तथा।3

सूर्याचन्द्रमसौ स्वयन्तु कुशलच्छाया समारोहतः ॥१०४॥

अतिशयोकित के उदाहरस सप में ग्रन्थकार ने पाच पद्य उद्घुत किए है। परन्तु इनमें से केवल तीन ही पद्य पढने में आते है। शेष द्वितीय तथा चतुर्थ पद्य लेख के अत्यन्त अस्पष्ट होने से बिल्कुल भी पढ़ने में नही आए। इसलिए मूल पाठ में उन्हें विवश होकर छोड देना पडा।

[हे प्रिये] नई-नई जौ की सूचियों [ जो की बालियों में जो नोकें-सी निकली रहती हैं वह 'यव-सूची' कहलाती है ] के समान कोमल [ नवीन उदय हुए ] चन्द्रमा की नई-नई निकलती हुई किरसों तुम्हारे कर्णपूर की रचना करने के लिए नाखूनों की नोक से खोंटी जा सकती है॥१०३। प्रथवा जसे-

जिस [राजा] के प्रताप रूप सूर्य के पत्यन्त उग्र रूप से तपने पर, और फीरति रूप चन्द्रमा के प्रकाशित होने पर, सारे ससार को प्रकाशित तथा पुथिवी को धारण करने वाले और म्रैलोक्य में प्रसिद्ध चरित्र महिमा वाले [ सूर्यवशी तथा चन्द्रवशी ] राजाओं का उद्धव [उत्पत्ति] जिनसे हुई है ऐसे सूर्य तथा चन्द्रमा दोनो मौज करने लगे हैं। अर्ात् उस राजा के प्रताप से सूर्य का, और यश से चन्द्रमा का कार्य हो जाता है इसलिए अव उन सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों को अपना कार्य करने की आावश्यकता नहीं रही है। वे दोनो मौज करने लगे है]।१०४॥

१ कुमारसम्भव ८, ६२। २ तेजस्विनीमेत्यल। ३ प्रथा।

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४३२ ] चकोवितिजीवितम् [फारिका ३०-३१

वस्तुनः केनचित् साम्यं तढत्कर्पचतोपमा ॥३०॥ तां साधारणधमोक्तों वाक्यार्थ वा तदन्वयात्। इवादिरपि विच्छित्या यत्र वक्ति क्रियापदम् ॥३१॥

इन तीनो उदाहरणो में बगंनीय 'सप्तच्छददुम', 'कर्णोत्पल' तथा 'राजा- विशेप' के धर्मो अर्थात् शुभ्नता, कोमलत्व तथा प्रताप तथा यश का प्रधिक्य बहे सुन्दर ढग से प्रतिपादित किया गया है। इन तीना उदाहरगो में से पहिला उदाहरए 'भामह' के 'काव्यालङ्वार' से लिया गया है। भामह ने अतिशायोक्ति का लक्षण इस प्रकार किया है- १ निमित्ततो वचो यत्तु लोकातिकान्तगोचरम्। मन्यन्तेऽतिशयोक्ति तामलङ्कारतया यथा॥ २ स्वपुष्पच्छविहारिण्या चन्द्रभासा तिरोहिता । अन्वमीयन्त भृङ्गालिवाचा सप्तच्उदद्रुमा।। 'वक्कोकतिजीवित' के प्रथम सस्करण में 'भामह' वाल श्लोक में चन्द्रभासा के स्थान पर 'चन्द्रहासा' छपा है। वह ठीक नही है। भामह का पाठ 'चन्द्रभासा' ही है। प्रथमान्त चन्द्रहासा पाठ का अथं भी नही लगता है। वहां तृतीयान्त 'चन्द्रभासा' पाठ ही होना चाहिए ।२६।। ११ उपमा अलद्धार- इस प्रकार अरतिशयोकति का निरूपण कर चुकने के बाद कुन्तक ने उपमा- लक्क्ार का निरूपण किया है। परन्तु इस प्रकरण को पाठ की त्रूटि के कारण प्रतीको के आधार पर कारिकाओो का आ्रनुमानिक निर्माण भी कठिन है। फिर भी जो बन सकता है वह ऊपर दिया गया है। वर्णनीय पदार्थ के स्वभाव की सुन्दरता की सिद्धि के लिए, उस [ सौन्दर्य] के उत्फर्ष से युक्ष्त किसी वस्तु के साथ साम्य [ प्रदर्शन करना ] उपमा [अलद्धार कहा जाता ] है।३०।। उस [ उपमा] को साधारख धर्म का कयन होने पर अथवा[ साधार धर्म के लोप या श्रभाव में आक्षिप्त रूप से] वाक्यार्थ में उसका अन्वय होने से इवादि पद तथा जहाँ क्रियापद भा सुन्दरता के साथ उस [ साम्य ] को कहते हैं [ वह भी उपमा होती है]।।३१।।

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कारिका ३१ ] तृतीयोन्मेष. [४३३ इदानीं साम्यसमुद्धासिनो विभूपएवर्गस्य विन्यासविच्छितति विचार- यति- 'विवच्षितेत्यादि'। 'यत्र' यस्यां 'वस्तुनः' प्रस्तावाधिकृतस्य केनचिद्प्रस्तु- तेन पदार्थान्तरेश 'साम्यं' सादृश्यं 'सोपमा' उपमालकृतिरित्युच्यते। किमर्थमप्रस्तुतेन विवच्षितो वक्तुमभिप्रेतो योऽसौ परिस्पन्द कश्चिदेव धर्मविशेषरतस्य मनोहारित्वं हृदयरन्जकत्वं तस्य सिद्धिर्निष्पत्तिस्तदर्थम्। कीदशेन पदार्था- न्वरेण-'तदुत्कर्षवता'। तदिति मनोहारित्वं परामृश्यते। तस्योत्कर्षः सातिशयत्व नाम 'तदुत्कर्षः', स विद्यते यस्य स तथोक्तस्तेन तदुत्कर्षवता। तदिदमन्र तात्पर्यम्-वर्णानीयस्य विवच्ितधर्मसौन्दर्यसिद्धयर्थ प्रस्तुदपदार्थस्य- धर्मिगो वा साम्यं युक्तियुक्ततामहति। धर्मेगोति नोक्तं केवलस्य तस्यासम्भवात्। तदेवमयं धर्मद्वारको धर्मिगोरुपमानोपमेयलक्षएायोः फलतः साम्यसमुच्चयः पर्यवस्यति।

अव 'विवक्षित इत्यादि' [कारिकाओरो से आागे] सादृश्य-मूलक [ साम्यसमु- ड्ासिन. ] अलद्धार समूह की रचना-सौन्दर्य का विचार करते है। 'जहां'जिस [अलङ्धार]मॅ, प्रकरण में प्रतिपाद्य वस्तु[उपमेय]का किसी अप्रस्तुत अन्य पदार्थ [उपमान ] के साथ 'साम्य' अर्थात् सादृश्य [वगिगत] होता है वह 'उपमा' अर्थात् उपमा नामक अलद्धार कहलाता है। अप्रस्तुत [ उपमान ] के साथ किस लिए साम्य [दिखलाया जाता है] यह कहते है-'विवक्षित धर्म के मनोहरता की सिद्धि के लिए'। विवक्षित अर्थात् वर्णनीय जो परिस्पन्व अर्थात् कोई धर्मविशेष, उसका जो मनोहारित्व अर्थात हृदयरञ्जफत्व उसकी सिद्धि के लिए। किस प्रकार के अ्न्य पदार्थ के साथ कि-'उस [ सुन्दरता ] के उत्कर्ष से युक्त' [ पदार्थ ] के साथ। 'तत्' [ इस सर्वनाम पद ] से मनोहारित्व का ग्रहणा होता है। उसका उत्कर्ष अ्र्प्र्रात् सातिशयत्व, 'तदुत्कर्ष' हुआ। यह जिसमें विद्यमान हो उस सौन्दर्य के अतिशय से युक्त पदार्थ के साथ। इसका यहाँ अभिप्राय हुआ कि-वर्णनीय [ पदार्थ ] के विवक्षित [ वक्तुं इप्ट ] धर्म के सौन्दर्य की सिद्धि के लिए, प्रस्तुत पदार्थ अरथवा धर्मो का सावृश्य युक्तियुवत हो सकता है। केवल धर्मके साथ सादृश्य के असम्भव होने से 'धर्म के साथ' [धर्मेर] यह [कारिका में] नहीं कहा है। इस प्रकार धर्म के द्वारा घर्मी रूप उपमान और उपमेय का इकट्ठा सादृश्य फलतः निकलता है।

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४३४ ] वकोपितिजीवितम [कारिफा ३१

एवंविधामुपमां क प्रतिपादयनीत्याह-'क्रियापदम' इत्यादि। क्रिया- पद धात्वर्थ। वान्यवाचकसामान्यमात्रनत्नाभिप्रेतम न पुनरास्यातपदमेव । यस्मादमुख्यभावेनापि यत्र क्रिया वर्तते तदा्युपमावाचकमेव। तदेवमुभय- रूपोडपि क्रियापरिस्पन्दस्तामुपमां वक्त्यभिवत्ते। कथम्-'विच्छित्त्या' वैदग्व्य- भद्ग या। विच्छित्तिविर हेणाभिधानेन तहिदाहाटाक्त्व न सम्भवतीति भाव:। न तावत् क्रियापद केवल ता वक्ति यावद् 'इवादि' डवप्रभृतिरपि । तत्समर्पणासामर्थ्यसमन्वितो, य कश्चिदेव शब्दविशेष, प्रत्ययोऽपि, समासो बहुव्रीह्यादिरपिट विच्छित्या ता वक्ति। 'अपि' समुच्चये। कस्मिन सति-'साधारणधर्मोक्तो', साधारण समानो य उपमानोपमेययोरुभयो- रनुयायिनोर्धर्मः । कुत्र 'वाक्यार्थे वा'। परस्परान्वयसम्बन्घेन पटसमूहो वाक्यम्। तदभिधेयं वस्तु विभूष्यत्वेन विपयो गोचर तस्या.। कथम्-'तदन्वयात्'

इस प्रकार की उपमा का प्रतिपादन कौन फरता है यह 'क्रियापद' इत्यादि [प्रतीक से ] कहते है। क्रियापद [ का शर्य ]'धात्वर्थ' है। [क्रियापद से ] यहाँ वाच्य वाचक [धातु तथा धात्वर्थ] मात्र अप्रभिप्रेत है आ्र्प्रारयात पद [श्ररभिप्रेत] नहीं हैं। क्योंकि जहां गौए रूप से भी किया रहती है वह भी उपमावाचक ही होता है। इस प्रकार [मुख्य और गौए ] दोनो तरह की क्रिया का वैशिष्ट्य उस उपमा का प्रतिपावक होता है। कैसे-'विच्छित्ति अरथ्त् चतुरतापूर्ण शैली से'। सुन्दर शंली से कहे बिना सहृदयो के लिए आनन्वदायक नहीं हो सकता है यह अ्भिप्राय है। केवल क्रियापद ही उस [उपमा] का प्रतिपादक नहीं होता है बल्कि इवादि [ पव ] भी उस [उपमा] के वाचक होते है। उस [ उपमा ] के बोधन की सामर्थ्य से युक्त जो फोई भी विशेष शब्द, प्रत्यय रूप भी औ््प्रौर बहुव्रीहि आ्प्रादि समास भी सुन्दरता के साथ उस [ उपमा ] का वाचक हो सकता है। [ कारिका में आ्र्राया हुशर््रा ]'भपि' शब्द समुच्चय [शर्थ] मे है। किलके होने पर कि-'साधारण धर्म का कथन होने पर'। साधारण प्रर्थात् समान जो उपमान तथा उपमेय दोनो अनुयायियों का धर्म। [ उसके कथन होने पर ]। कहाँ कि-'अथवा वाक्यार्थ मे' [ इसका समन्वय होने से ]। परस्पर अ्न्वय रूप सम्बन्ध से युक्त पद-समूह वाक्य [फहलाता] है। उससे अभिधय वस्तु अलङ्धार्य रूप से उस [ उपमा ] का विषय है। कँसे कि-'उसके साथ अन्वय होने से'। 'तत्' पद से पदार्थ का ग्रहण होता है। उन १ अस्या पाठ अघिक था। पुष्पाद्ित स्थलो पर पाठ लोपसूचक चिन्ह थे। २ साध्योपमानोपमेययो पाठ सुसङ्गत नही था।

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रिका ३१ ] तृतीयोन्मेष: [४३५

देति पदार्थपरामर्शः। तेषां पदार्थानां समन्वयाद् अन्योन्यमभिसम्वन्धात्। क्ये वहवः पदार्थाः सम्भवन्ति तन्न परस्पराभिसम्वन्वमाहात्म्यात्। श्र्पमुख्य क्रियापदपदार्थोपमा यथा- पूर्ेन्दोस्तव संवादि वदनं वनजेक्षरो। पुष्णाति पुष्पचापस्य जगत्त्रयजिगीषुताम् ।।१०५।।

दार्थों का समन्वय होने से अर्थात् एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध होने से। वाक्य में हुत से पदार्थ होते है। उन सब के परस्पर सम्वन्ध के माहात्म्य से। [इवादि मद जसके वाचक होते है, उपमान और उपमेय का वह सावूश्य या साम्य उपमालद्धार हलाता है]। कुन्तक ने इन दो कारिकाओ में उपमा का निरूपण किया है। इनमें से पहिली जरिका तो बहुत सुगठित और ठीक कारिका है। उसमें उपमा का लक्षणा हो जाता । परन्तु दूसरी कारिका वैसी सुगठित एव सुसङ्गत नहीं जान पडती है। इस उन्मेष की अन्य कारिकाओं के समान वृत्ति भाग में आए हुए प्रतीको को जोडकर ही उसकी चना की गई है। इसलिए उसके पूर्वार्द्ध में 'वा' तथा उत्तरार्द्ध में 'यत्र' का समावेश कवल पाद पूर्ति के लिए ही करना पडा है। उसकी जो व्याख्या वृत्ति भाग में पाई ताती है वह भी अच्छी नही जान पडती है। यह कारिका और उसकी व्याख्या दोनो से भरती की सी चीज जान पडती है। अ्रमुख्य त्रियापव पदार्थ उपमा [का उदाहरण] जैसे- हे कमलनयने ! पूर्ण चन्द्रमा के समान तुम्हारा मुख कामदेव की तीनो लोको को जीतने की इच्छा को पुष्ट करता है॥१०५॥ यहा 'पूर्णेन्दो सवादि तब वदन' 'तुम्हारा मुख पूर्णा चन्द्रमा से मिलता हुआ है यह उपमालद्वार है। इसमे 'सवादि' मिलता हुआ यह अमुख्य क्रिया पद है, उसके द्वारा 'वदन' की समानता दिखलाई गई है। अत. यह 'अमुख्य क्रियापद पदार्थोपमा' का उदाहरणा है।

१. पूर्व सस्करण में निम्नलिखित पाँच पकितिया यहा अधिक दी गई थी- तदेव तुल्येऽस्मिन् वस्तुसाम्ये सति उपमोत्प्रेक्षावस्तुनो पृथक्त्वभित्याह- उत्प्रेक्षा वस्तुसाम्येऽपि तात्पर्यंगोचरो मत ॥ तात्पर्यं पदार्यव्यतिरिक्तवृत्ति वाक्यार्थजीवितभूत वस्त्वन्तरमव गोचरा विषयरत द्विदान्त। इनका सम्बन्ध उत्प्रेक्षालद्कार के साथ प्रतीत होता है और इनका पाठ भी दूषित है। अरत हमने टिप्पणी में रख दिया है।

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४३६ ] वनोवितिजीवितम् [फारिका ३१

इवादि प्रतिपाद्यपटार्थोपमोटाहरसम्। यथा- 'चुम्बन् कपोलतलमुत्पुलक प्रियायाः

मित्रस्पृशास्त मितमुत्पल मृत्पलिन्गा ॥१०६।। तथाविधवाक्योपमोदाहरणं थथा- पाएड्योऽयमंसापितलम्वहारः ।१०७/

ततोऽरुणपरिस्पन्द। इत्यादि॥१०८।।

[इवादि] से प्रतिपाद्य पदार्थोपमा का उदाहरण जैसे- [अरविन्द-मित्र अ्रर्थात् ] सूर्य के स्पर्श से [ वन्द होते हुए ] कमलिनी के [नेत्र स्थानीय] कमल के समान [नायक ने ] प्रियतमा के पुलकित फपोल तल को चुम्बन करके स्पर्श से आनन्दमग्न उसके नेत्रो को मधुर निद्रा से अभिभूत-सा करके मुकुलित [आ्ानन्दातिरेक से बन्द-सा ] कर दिया ॥१०६।। उसी प्रकार की [इवादि से प्रतिपाद्य] वाक्योपमा का उदाहरण जैसे- [लाल चन्दन का अङ्गराग लगाए और]कन्धे पर लम्बा हार डाले हुए पाण्डय वेश का यह राजा [प्रभातकालीन सूर्य की किररो से लाल शिखर वाले औौर भरनो के प्रवाह से युक्त हिमालय के समान शोभित हुआ॥१०७॥ यह श्लोक रघुवश ६,६० से लिया गया हे। पूरा श्लोक इस प्रकार है- पाण्ड्योऽयममार्पितलम्वहार क्लृप्ताङ्गरागो हरिचन्दनेन। आभाति बालातपरक्तसान सनिर्भरोद्गार इवाद्रिराज ॥। पूर्व सस्करण मे इन दोनो श्लोको को इवादि अप्रतिपाद्य पदार्थोपमा के उदाहरण के स्थान पर रखा गया था। परन्तु उसमे इव का प्रयोग स्पष्ट ही पाया जाता है। अत अशद्ध था। पाण्डुलिदि की अस्पष्टता से यह भूल हो गई थी। आ्राख्यात-पद से प्रतिपाद्य पदार्थोपमा का उदाहरण जैसे- [उदाहरण स० १, १६ पर पूर्वोद्धृत] ततोऽरुसपरिस्पन्द। इत्यादि ॥११८॥ इसमे 'दध्रे' इस आख्यात पद से साम्य का वर्णन किया गया है अत आख्यात प्रतिपाद्य पदार्थोपमा का उदाहरणा हँ। १. 'चुम्बत्कपील' पाठ अ्रगुद्ध था।

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कारिका ३१ ] तृतीयोन्मेष. i४३७

मुखेन सा केत कपत्रपाएडुना कशाह्रयष्टिः परिमेयभूषणा। स्थिताल्पतारा तरुणोन्दुमएडला विभातकल्पा रजनीं व्यडम्बयत् ।१०६/। इत्यादि।

निपीयमानस्तबका शिलीमुखैः। इत्यादि ॥११०॥ आदिग्र हणात् इवादिव्यतिरिक्तेनापि 'यथादिशव्दान्तरेणोपमा प्रतीति- र्भवतीत्याह। यथा- पूर्रोन्दुकान्तिवदना नीलोत्पलविलोचना ।१११।

उसी प्रकार की [अर्थात् आाख्यात-पद-प्रतिपाद्य] वाक्यार्थोपमा का उदाहरस जसे- दुबली देह वाली और परिमित आभूषसो को धारण करते हुए, केतकी के पत्रों के समान श्वेत वर्ग के मुख से युक्त वह, पूर्णिमा के चन्द्रमण्डल से युक्त अल्प तारों वाली प्रभातकालीन रात्रि का अनुकरण कर रही थी॥१०६॥ [इवादि से] अ्प्रतिपाद्य पवार्थोपमा का उदाहरण- [ उदाहरस स० १, ११६ पर पूर्वोध्धत ] निपीयमास्तवका शिलीमुखं.। इत्यादि। यहा 'व्यडम्वयत्' इस करिया पद के द्वारा वाक्योपमा बनती है। उसमें उपमा- वाचक इव आदि किसी पद का प्रपोग नही है। अत इव आदि से अ्प्रतिपाद्य पदार्थोपमा का उदाहरण है। इस श्लोक पर निम्नलिखित श्लोक की प्रतिच्छाया स्पष्ट दिखलाई दे रही है। शरीरसादादसमग्रभूषरणा मुखेन सालक्ष्यत लोध्रपाण्डना। तनुप्रकाशेन विचेयतारका प्रभातकल्पा शशिनेव शर्वरी॥ रघुवश ३,२। 'आ्ादि' शब्द से यह सूचित किया*कि इवादि शब्द के बिना भी, [ वाचक सुप्ता अथवा समास प्रत्यय आदि द्वारा ] और 'यथा' आदि अ्रन्य शन्दों के द्वारा भी '[आर्थी] उपमा की प्रतीति हो सकती है। जैसे- पूर्णचन्द्र के समान मुख वाली, और नीलकमल के समान नेत्र घाली॥१११॥ [इन दोनों में इवादि शब्दों के बिना उपमा प्रतीत होती है। यह समासगत उपमा के उदाहरण है ]।

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४३८ ] वग्ेपितिजी चितम् [कारिफा ३१

यान्त्या मुहुर्वलितकन्धरमाननम् [मालती माघव १,२६]।।११२।। मान्जिष्ठीकृतपट्टसूत्रसद्ृश [वालरामायण ३. १०]।।११३।। 1 रामेण मुग्धमनसा वृपभव्नजस्य [वा० रा० २े, ८०] ।।११४।। महीमृत. पुत्रवतोऽपि दृष्टि [कुमारसम्भव १, २७]।।११५।। तपर्थान्तरन्यासभ्रान्तिः।

यान्त्या मुहुर्वलितकन्धरमानन ॥११२॥। उसके बाद वालरामायण से निम्न श्लोक उद्ध त किया है- मान्जिप्ठीकृतपट्टसूत्रसहर पादानय पुज्जयन् यात्यस्ताचलचुम्विनी परिणार्ति स्वैर ग्रहग्रामणी । क्षण क्षीणाव्योतिरितोऽप्यय स भगवानर्ोनिघी मज्जति ॥११३॥ इस में 'माज्जिष्ठीकृतपट्टसूत्रसहृश' मे समासगत उपमा है। 'मजीठ के रग में रगे हुए पट्टवस्त्र के समान सूर्य यह उसका अ्र्थ है'। वकोक्तिजीवित के पूर्व सस्करण में 'माञ्जिप्ठीकृत' के स्थान पर 'माच्छिष्ठीकृत' पाठ था जो ठीक नही था। इसके बाद वालरामायण के ३,८० श्लोक को दिया है। पूरा श्लोक निम्न प्रकार है- रामेण मुग्धमनसा वृपलाञ्छनस्य यज्जर्जर धनुरभाजि मृणालभज्जम्। तेनामुना त्रिजगदर्पितकीर्तिभारो रक्ष पतिनंनु मनाड् न विडम्वितोभूत् ॥११४। इसमें 'मृसालभञ्ज अभाजि' यह अश उपमा का उदाहरण है। नवीन आचार्यो ने इसे कर्मगत 'समुल-प्रत्यय-मूलक' उपमा माना है। इसके वाद कुन्तक ने कुमारसम्भव १ २७ श्लोक दिया है। पूरा श्लोक इस प्रकार है- महीभृत पुत्रवतोऽपि दृप्टिस्तस्मिन्नपत्ये न जगाम तृप्तिम्। अ्नन्तपुष्पस्य मधोहि चते द्विरेफमाला सविशेपसङ्गा ॥११५॥ इस अन्तिम श्लोक में साधारत 'अर्थान्तरन्यास' अलद्दार प्रतीत होता हैं। परन्तु कुन्तक उसको 'अर्थान्तरन्यास' को भ्रान्ति कहते है। इसको भ्रान्ति सिद्ध करने के लिए उन्होने क्या हेतु दिया है यह नही कहा जा सकता है। क्योकि यहाँ का पाठ लुप्त है। केवल 'मर्थान्तरन्यासभ्रान्ति', इतना पढने में आया है। जिससे यह प्रतीत होता है कि कुन्तक ने इसमे अर्थान्तिरन्यास मानने वालो के मत का खण्डन कर उसको भ्रान्तिमात्र सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। इसके आगे दो उदाहरण और #पाठ लोपसूचक चिन्ह।

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कारिका ३१ ] तृतोयोन्मेषः [४३६

$इत्याकर्सितकाल नेमिवचनो- #इतीदमाकएय तपस्विकन्या- समानवस्तुन्यासोपनिबन्धना' प्रतिवस्तूपमापि न पृथक् वक्तव्यता- मर्हति, पूर्वोदाहरयोनैव समानयोगक्षेमत्वात्। "समानवस्तुन्यासेन प्रतिवस्तूपमोच्यते। 1 यथेवानभिघानेऽपि गुएसाम्यप्रतीतितः ॥११६।।

दिए हैं। ये सभी उदाहरण ग्रन्थकार ने केवल प्रतीकमात्र से उद्धृत किए हैं। त्र्परौर उनका समन्वय आदि भी नहीं किया है। इत्याकर्शितकालने मिवचनो इतीदमाकर्ण्य तपस्विकन्या

१२ प्रतिवस्तुपमा अल्वार-

उपमालद्वार के प्रारम्भ में कुन्तक ने कहा था कि 'इदानी साम्यसमुद्भासिनो विभूषणवर्गस्य विन्यासविच्छित्ति विचारयति' अर्थात् सादृश्यमूलक अलङ्कारो की रचना 1 शली का विचार करते हे। इस कथन से यह ध्वनि निकलती है कि कुन्तक सादृव्य मूलक सब अलङ्कारो को अलग-अलग मानने का आवश्यकता नही समभते है भपितु उनमें से अविकाश का उपमा में ही अन्तर्भाव करने के पक्ष में है। इसलिए उपमा का विवेचन करने के वाद अ वह सादृश्य-मूलक 'प्रतिवस्तूपमा' का विचार प्रारम्भ करते है। उसको अलग अलद्कार न मानकर उपमा के अन्तर्गत करते है।

समान वस्तु का विन्यास करने वाली 'प्रतिवस्तुपमा' भी लग [ अलङ्धार ] कहने योग्य नहीं है। पूर्वं उदाहरणो के समान योगक्षेम होने से।

उसके बाद कुन्तक ने 'प्रतिवस्तूपमा' के भामह-कथित लक्षण भौर उदाहरण प्रस्तुत कर उनकी विवेचना की है जो निम्न प्रकार है-

समान वस्तु के रख देने पर 'यथा' 'हव' आदि [उपमावाचक शब्दों] के कहें बिना भी गुखों का साम्य प्रतीत हो जाने से 'प्रतिवस्तूपमा' कहलाती है ॥११६॥ कपाठ लोप। १ निवन्धन। २ भामह काव्यालड्वार २,३४ ।

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४४० ] बनोक्तिजीवितम [कारिका ३१

साधुसाधारणत्वादिर्गु सोडन व्यतिरिच्यते। स साम्यमापादयति विराधे्पि तयार्यथा ॥११७।। कियन्त. सन्ति गुशिन साधुमाधारणाश्रियः। स्वादुपाकफलानत्रा. कियन्ता वाञ्यशासिन'॥११८॥। अत्र समानविलससिता ना मुयम पिििष'विरलत्-लक् साम्यव्यतिरेकि न किख्जिन्यन्मनाहारि जीवितमतिरिच्यमानमुपलभ्यते ॥३१॥ तेव प्रतिवस्तूपमाचाः प्रतीयमानोपमायामन्तर्भावापपत्ती सत्यामिदानी उपमेयोपमादेरुपमायामन्तर्भावा विचार्यते- यहाँ [ प्रतिवस्तूपमा में अ्नगल उदाहरण म प्रद्शित] साधुत्व या माधारणश्री [अर्थात् सज्जन पुर्ष भी जिस सम्पत्ति का भोग कर सके] आ्रादि गुए विशेष रूप से प्रतीत होता है औ्रौर वह [फूली से भुके हुए वृक्ष तथा गुणी पुरुप दोनों का चेतन और श्रचेतद रूप ] विरोध होने पर भी उनके [ साघु-साधारण-लक्ष्मीकत्व रूप] समानता का सम्पादन करता है॥११७॥ जैसे- अन्य सज्जन पुरुष भी जिससे लाभ उठा सकें इस प्रकार की लक्ष्मी वाले धनिक पुरुष [गुशिन. ] इस ससार में कितने है। अ्रथवा स्वादिष्ट परिपाक वाले फलो से [ लदे होने के कारण] भुके हुए [ अरर्थात् जिनके स्वादिष्ट फलो को तोडकर सब लोग खा सके ऐसे ] रास्ते के किनारे स्थित वुक्ष कितने हैं। [बहुत विरले] ॥११८॥ यहाँ समान सौन्दर्य वाले [साधु साधारणश्रिय गुशिन तथा स्वादुफलानम्रा शाखिन। इन दोनो के कविविवक्षित 'विरलत्व' रूप 'साम्य' के अर्प्रतिरिक्त औ्रौर कोई प्राशभूत मनोहर तत्व प्रतीत नहीं होता है ॥३१॥ १३ उपमेयोपमा शलद्धार- इसलिए कुन्तक इस 'साम्य-मूलक' 'प्रतिवस्तूपमा' को अरलग अलद्धार न मानकर 'उपमा का ही भेद सिद्ध करना चाहते है। बास्तव में तो उनका सूक्ष्म भेद सहृदय सवेद्य है तभी अन्य आचार्या ने उनको अलग-अलग माना है। परन्तु कुन्तक समानता के आधार पर साम्यमूलक अनेक अ्र्पलद्धारो का उपमा के भीतर ही अन्तर्भाव करने के पक्ष में हूं। इसलिए आगे वे उपमेयोपमा और तुल्ययोगिता का भी उपमा मे ही अन्तर्भाव दिखलाते हैं। इस प्रकार 'प्रतिवस्तूपमा' का प्रतीयमान उपमा में अ्रन्तर्भाव सिद्ध हो जाने पर अब 'उपमेयोपमा' आररदि के भी उपमा में अन्तर्भाव का विचार करते है। १ भामह का० अ्० २, ३५-३६।

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कारिका ३२ ] तृतीयोन्मेषः [४४१

सामान्या न व्यतिरिक्ता लक्षणानन्यथास्थितेः । '[उपमेयोपमा नाम साभ्यमात्रावलम्बिनी] । तत्स्वरूपाभिधानं लक्षण तस्यानन्यथास्थिते. अतिरिक्तभावेनान- वस्थानात्। तथैव तुल्ययोगिता सा भवत्युपमा स्फुटा॥।३२॥। 3जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्यभूतामभिनन्द्यसत्वौ।

[सादृश्यमात्र का अवलम्वन करने वाली 'उपमेयोपमा' भी 'उपमा' के ] समान ही है अलग नहीं है। लक्षण के भिन्न न होने से। उसके स्वरूप का कथन करना लक्षणा है। उसके भिन्न रूप से स्थित न होने से[ अर्ात् उपमा के समान सादृश्यमात्र पर अरवलम्वित होने से 'उपमेयोपमा' अरलग अलद्कार नहीं है] अपितु वह उपमा [के ही अन्तर्गत] हैं। 'उपमेयोपमा' का लक्षण 'भामह' ने इस प्रकार किया है- उपमानोपमेयत्व यत्र पर्यायतो भवेत्। उपमेयोपमा नाम ब्रुवते ता यथोदिताम ॥३७॥ सुगन्धि नयनानन्दि मदिरामदपाटलम् । अम्भोजमिव वक्त्र ते त्वदास्यमिव पङ्नञ्जनम् ॥३८॥ का० ३, ३७, ३८। इसमें इन्ही उपमान तथा उपमेय का पर्याय से उपमेय उपमान भाव हो जाता है। जैसे 'तुम्हारा मुख कमल के समान है' और 'कमल तुम्हारे मुख के समान है'। इनमें पहिले स्थान पर कमल उपमान है औौर दूसरे स्थान पर वही उपमेय बन जाता है। यह भेद केवल नाम-मात्र का भेद है इसलिए कुन्तक 'उपमेयोपमा' को अलग अलद्कार न मानकर उपमा के ही अन्तर्गत मानते है। १४ तुल्ययोगिता अलङ्धार- इसके वाद 'तुल्ययोगिता' का विचार प्रारम्म किया है। 'तुल्ययोगिता' [ की स्थिति ] भी उसी प्रकार की है। और वह स्पष्ट रूप से उपमा ही होती है। जैसे- पयोध्यावासी लोगों ने, गुरु को देने वाले घन से अधिक की इच्छा न करने वाले याचक [ कौत्स मुनि ] तथा याचक की इच्छा से भी अधिक प्रदान करने वाले राजा [रघु ] दोनों ही की उदारता की प्रशंसा की ॥११८॥ १ कोष्ठगत पाठ हमने बढाया है। २ 'साभवत्युपमिति स्फुटम्' पाठ एक भ्रक्षर अधिक हो जाने के कारण प्शुद्ध था। ३ रघुवश ५, ३१।

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४४२ ] वक्ोफ्तिजीवितम् [कारिका ३२

१श्न्न साम्यातिरेक्युभयमपि वर्णनीयतया मुग्य वस्तु। ३ न्यूनस्यापि विशिप्टेन गुएसाम्यविवक्षया। तुल्यकार्यक्रियायोगादित्युक्ता नल्ययागिता॥?२०॥ शेपो हिमगिरिस्त्व च महान्तो गुरव स्थिरा। यदलद्वितमर्यादाश्च लन्ती विभृय क्षितिम ॥१२१।

यहाँ [अरभिनन्दनीयत्व रूप] अत्यधिक समानता से युफ्त [ रघु तथा फौत्स] दोनो ही वर्णनीय होने से मुख्य वस्तु ह। [उनमे 'अपरभिनन्द्यसत्व' रप एक धर्म का सम्बन्ध होने से तुल्ययोगिता अलद्धार है]। इसके बाद तुल्ययोगिता के भामहकृत लक्षण तथा उदाहरणो को कुन्तक ने इस प्रकार उद्धृत किया हं- [ न्यून ] कम गु वाले [ उपमेय ] का [विशिष्ट] श्रधिक गुए वाले [ उपमान ] के साथ गुणो का साम्य प्रतिपादन करने की इच्छा से [ उन वोनों में] वुल्य कार्य या तुल्य क्रिया के योग से तुल्ययोगिता [ नामक अलद्धार ] होती : ।१२०॥ जैसे - शेषनाग, हिमालय और तुम [ राजा ] महान् [ विपुल आकार वाले तथा महत्त्वशाली ] गुरु [ भूमारोदवहनसमर्थ और प्रतिष्ठित ] एव स्थिर [ प्रचल और दृढ़प्रतिज्ञ ] हैं। क्योंकि मर्यादा का प्रतिकमर्ण न करते हुए चलायमान [ फम्पाय- मान और सामाजिक मर्यादा में चपुत होती हुई] सूथिवी को धारण [ धारण तथा पालन ] करते है ॥१२१।। तुल्ययोगिता के ये लक्षण तथा उदाहरण भामह के काव्यालद्वार से उद्दृत किए गए है। शेष हिमगिरि इत्यादि उदाहरण का यह श्लोक ध्वन्यालोक पृष्ट ४६० पर भी उद्धत हुआ है।

र्भाव हो सकता है। [ तुल्ययोगिता का ] उक्त लक्षण होने पर तुल्ययोगिता का उपमा में अ्रन्त-

१ पूर्वसस्करण में इसके पूर्व निम्न इलोक और दिया है परन्तु वह,- श्रतिशयोक्ति का उदाहरण होने से यहा असङ्गत है- उमौ यदि व्योनिम्न पृथक्-प्रवाहावाकाशङ्गापयस पतेताम्। तेनोपमीयेत तमालनीलमामुक्तालतमस्य वक्ष ॥११६॥ २. भामह का काव्यालद्वार २, २७-२८ ३ तावदुपमान्तर्भावस्तुल्ययोगिताया ।

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गरिका ३२ ] तृतीयोन्मेषः [४४३

यै र्वा दृष्टा न वा हष्टा मुषिताः सममेव ते। हृतं हृदयमेतेषामन्येषा चन्तुष फलम्॥१२२॥ *यत्काव्यार्थनिरूपणं प्रियकथालापा रहोऽ्वस्थिति कठान्तं मुदुगीतमादृतसुहृद्द :खान्तरावेदनमुध ।१२३। एवमनन्वय :- यत्र तेनैव तस्य स्यादुपमानोपमेयता

जिन्होंने [ उस सुन्दरी को ] देखा और जिन्होंने नहीं देखा वे दोनों तमान रूप से ठगे गए। [ जिन्होने देखा ] उनका तो [ उसने हृवय छीन लिया [और जिन्होंने नहीं देखा उन ] दूसरों के नेत्रों का फल [ हरस कर लिया या] ॥१२२॥ यहाँ रमणी का सौन्दर्य ही प्रस्तुत है उसको देखने-न देखने वाले दोनों नप्रस्तुत है। उनमें 'मुपितत्व' रूप एक धर्म का सम्बन्ध होने से तुल्ययोगिता नलङ्कार है। जो काव्य के अथों का निरूपण करना, प्रिय के से कथावार्ता करना, एकान्त मे बैठना, गले तक [ही रहने वाला जिसे और कोई न सुन सके ऐसा ] सुन्दर गीत का गुनगुनाना ] अ्रथवा किसी प्रिय [आवृत ] मित्र से अपने दुःख की कहानी कहना ॥१२३।। श्लोक अपूर्ण है इसलिए आगे उसके शेष भाग का क्या अर्य है यह नहीं कहा जा सकता है। वह कदाचित तुल्ययोगिता का ही उदाहरण होगा। इसलिए कुन्तक ने नहां उद्धृत किया है। १५ अनन्वय अलङ्कार- इसी प्रकार 'अनन्वय' [भी उपमा के अन्तगत ही] हैं। इसके वाद कुन्तक ने अनत्वयालद्धार का निरूपण किया है। भामह के अनन्वय के लक्षण तथा उदाहरण को यहाँ कुन्तक ने उद्धृत किया है जो इस प्रकार है- जहाँ उसके सदृश और कोई नहीं है इसको कहने के लिए उसी के साथ उसकी उपमानता और उपमेयता दोनों हो जावे [ श्रर्थात् वह स्वय ही अपना उपमान हो और वही उपमेय हो ] उसको अनन्वय [अलद्धार ] कहते है ॥१२४॥ पाठ लोप सूचक चिन्ह। 'इसके पूर्व 'निर्दनमप्येव प्रायमेव' यह पाठ पूर्व सस्करण में दिया था। परन्तु निदर्शना का वर्णन भागे पृ० ४४६ पर किया है इसलिए यहा यह पाठ प्रसङ्गत था।

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४४४] [फारिका ३२

नाम्बरूलरागवलय स्फूरद्दशनदीघिति। इन्दीवराभनयन तवेव वदन तन ॥१२५।। भामह का०३, ४५,४६। छत द्वल्गुना युगपदुन्मिपितेन तावत् सघ परस्परतुलामधिरोहता है। प्रस्पन्दमानपरुपेतरतारमन्तश्चतुस्तव प्रर्चलतभ्मर च पत्रम ॥१२६।। ·हेलावभग्नहर कामु क एव साडपि ।।१२७।। ककल्पितापमानम्।- तत्पूर्वानुभव भवन्ति लववा भावा शशाकादय तद्वक्त्रोपमिते परं परिणमच्चेती रसायाम्तुजात्। एव निश्चिनुते मनस्तव मुस सौन्दर्यसारावधि बष्नाति व्यवसायमेतुमुपमोत्कर्प स्वका-त्या स्वयम ॥१२८।। पानो को लाली से युक्त, चमकते हुए दातो की किरशो से शोभित, कमल के से नेत्रो वाला तुम्हारा मुख तुम्हारे मुख के ही समान है ॥१२५॥ [ प्रात काल के समय ] सुन्दर औ्रर एक साथ सुलने से कोमल कनीनिफा [आंख की पुतली ] जिसके भीतर इधर-उधर धूम रही है इस प्रकार के तुम्हारे [ रघु के ] नेत्र औरर मँडराते हुए भौरे से युक्त कमल का फूल दोनो तुरन्त एक 1

दूसरे फे तुल्य प्रतीत हो रहे है ॥१२६।। प्रतायास शिव-धनुष को तोड डालने वाला यह वह [ राम ] भी॥१२७॥ ये दोनो ब्लोक 'अनन्वय' के उदाहरण नही है। सम्भवत कुछ विशेष विवेचना करने के लिए उन्हें यहा उद्ृत किया गया है। परन्तु वह विवेचन ग्रन्थकार ने नही किया है। अत उद्धृत किए जाने का प्रयोजन स्पष्ट नही होता है। भनन्वय ] कल्पितौपमान [उपमारूय] हैं। तुम्हारे मख को पहली बार देखने पर [ उसके सामने ] चन्द्रमा आ्रदि [उप- मानभूत समस्त सुन्दर पदार्थ] हलके पड जाते है [अ्रर्थात सौन्दर्य के विषय में तुम्हारे मुख को बराबरी करने योग्य प्रतीत नहीं होते हैं ] उसके बाद रस के [ विषय में समानता के] लिए कमल से उसकी तुलना फरने के बाद [ इस सरसता के विषय में भी कमल आदि कोई अन्य उपमान तुम्हारे मुख की बरावरी नहीं कर सकता है। इस प्रकार का पक्का निश्चय हो जाने से ] परिपक्व [हुआ मेरा] चित्त इस निश्चय पर पहुँचता है कि-सौन्दर्य-तत्व की चरम सीमा रूप तुम्हारा मुख अपने सौन्दर्य की समानता के उत्कर्ष को स्वय ही प्राप्त कर सकता है। [अर्थात् चन्द्रमा या कमल आदि तुम्हारे मुख की बराबरी न सौन्दर्य मे और न रसादि में कर सकते हैं। तुम्हारे मुख की वराबरी फेवल तुम्हारा मुख ही कर सकता है।] ॥१२८॥ कपाठ लोपसूचक चिन्ह। १ रघुवश ५, ६८ ।

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कारिका ३३ ] तृतीयोन्मेष·

तदेवमभिधावैचित्र्यप्रकाराणामेव विधं वैश्वरूप्यम्, न पुनर्लक्षर नाम् ।।३२।। परिवृत्तिरप्यनेन न्यायेन पृथड नास्तीति निरुष्यते। विनिर्वत नमेकस्य यत् तदन्यस्य वर्तनम्। न परिवर्तमानत्वादुभयोरत्र पूर्ववत् ॥३३।। तदेव परिवृत्तेरलङ्करत्वमयुक्तमित्याह 'विनिवर्तनमित्यादि'। य स्य पदार्थस्य विनिवर्तनं आरकारण तदन्यस्य तद्व्यतिरिक्तस्य परस्य व तदुपनिबन्धन तद्लक्करसं न भवति। 'कस्मात्, उभयो. परिवर्तमानत्व मुख्यत्वेनाभिधीयमानत्वात्। कथम्, 'पूर्ववत्', यथापूर्वम्।

इस प्रकार के अनन्वयलक्गार को कुन्तक कल्पितोपमान उपमा मानते हैं। तो वस्तुत उपमेय है। उपमान नही पर उसके समान कोई अन्य उपमान न मिल मुस् में ही उपमानना की कल्पना कर ली जाती है। इसलिए कुन्तक 'अनन्वय' कल्पितोपमान-उपमा' रप ही मानते है। अलग अलद्कार नहीं मानते है। इस प्रकार [ इन साद्श्यमूलक अलद्धारों में ] कथन शैली के भेद के क हो भेद माना जा सकता है लक्षणा के भेद से नहीं [क्योंकि उनका मुख्य ल 'सादृश्य' सब जगह तुल्य हैं। इस लिए उस सादृश्य की दृष्टि से सादृश्य मूलक सर अलद्धार उपमा के ही अरन्तगत मानने चाहिए फलग नहीं] ॥३२॥ १६ परिवृत्ति प्रल्धार- इसी युक्तित्रम से 'परिवृत्ति भी अलग नहीं है [ उपमा के ही अरन्तर्गत। इसका प्रतिपादन करते है- जो एक [वस्तु]को लौटा देना [वापिस वुला लेना]उससे भिन्न दूसरी[व को ले लेना है[वह परिवृत्ि अलद्धार कहलाता है। परन्तु वह[उपमेयोपमा अन आदि ] पूर्व [कहे अलङ्धारों ] के समान दोनो का [ सादृश्य मूलक ] परिद मात्र होने से [पृथक अलद्धार] नहीं है। इस प्रकार परिवृत्ति का [ पृथक्] अलद्धार मानना उचित नहीं है कहते है। 'विनिवर्तन' इत्यादि [कारिका में]। जो एक पदार्थ को हटा देना वा 'बुला लेना' और उसके भिन्न अन्य के 'ग्रहण करने' का वर्णन करना है वह। अलङ्कार नहीं होता है। क्योंकि दोनो के परिवर्तमान अर्ात् मुस्यत्वेन अ्रभिघीय होने से। कसे कि-'पूर्व के समान' पहिले [ उपमेयोपमा आदि] के समा कपाठ लोपसूचक चिन्ह ।!

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४४६ ] चघोपितिजी वितम् [ फारिका ३३

प्रत्येक प्राधान्यात नियमानिश्चितेन्च न क्वचिन कम्यचिटलक्वरगाम। तद्वदिहापि। न च तावन्मान्नस्पतया तथो परम्परविभृषगभाव प्राधान्य- निवर्तनप्रसङ्गात। रुपान्तरनिराधेपु पुन मान्यमद्भावे भवत्युपमितिरेपा : चालंकृति. समुचिता उपमा पूर्ववढेव। यथा- सदय वभुजे महाभुजः सहसोद्व गमियं वजेदिति। ऋरप्रचिरोपनता स मेदिनी नवपािग्रहणा वर्वमच ।।१२६।। [परिवृति के अलङ्गार न होने का दूसरा कारण यह भी है कि परिवर्तमान दोनों में से] प्रत्येक का प्राधान्य होने से और [गुए प्रधान भाव फा] नियम निश्चित न होने से [ उसके विना] कोई कहीं किनी का अलद्धार नहीं होता है। [अर्यात् जहां गण प्रधान-भाव निस्चित होता है वहीं एक को अ्रलद्धार्य या अ्तद्धार छहा जा सकता है]। इसी प्रकार यहाँ भी [ समझना चाहिए ]। केवल उनके स्वरूप के कथन मात्र से दोनो परस्पर अलद्धार भाव नहीं होता है। [ध्योकि अलङ्धार्य अ्रलद्धार भाव मान लेने पर अलद्धार की गौएता हो जाने से उन दोनो का] प्राधान्य नहीं रहेगा। और [उन दोनों के भेवक] अ्रन्य धर्मो के दब जाने पर समानता के होने से पूर्व [उपमेयोपमादि ] के समान ही यह अलद्धार भी उपमा ही हो जाता हैं। जैसे- [हठात् भोग करने से] सहसा घवडा न जाय इसलिए उस महावाहु [भज] ने नवीन प्राप्त की हुई पृथिवी [ के राज्य] को नवविवाहिता पत्नी के समान दया पूर्वक [शन शनं.] भोग किया था॥१२६॥ कुन्तक की दृष्टि से यह परिवृत्ति अलद्वार का उदाहरण नही अरपितु उपमा का उदाहरणा है। यहा से उद्धृत करने का प्रयोजन उसमें उपमा का प्रतिपादन करना ही है। भामह ने परिवृत्ति के लक्षणा तथा उदाहरण इस प्रकार दिखलाए हैं- विशिष्टस्य यदादानमन्यापोहेन वस्तुना। अर्थान्तरन्यासवती परिवृत्तिरसौ यथा ॥४१। प्रदाय वित्तमर्थथिभ्य स यशोधनमादित । सता विश्वजनीनामिदमस्खलित व्रतम् ॥४२॥ - भामह० ३, ४१, ४२। १ यह श्लोक रघुवश के अष्टम सग का सातवाँ श्लोक है। पर्व सस्करण में पाठ अशुद्ध दिया था। 'सदय भीमभुर्ज महीभुजा' यह प्रथम चरण का पाठ दिया था इसमें एक अ्क्षर अ्रधिक हो जाता है। तृतीय चरण को 'अभिरोपयति स्म मेदिनी' यह पाठ था। वह भी अशुद्ध था। हमने रघुवश के अनुसार शुद्ध पाठ दिया है।

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कारिका ३३] तृतीयोन्मेष [४४७

तच्च विषयान्तरपरिवर्तनं धर्मान्तरपरिवर्तनं चेति द्विविधम्।8

स्वल्पं जल्प वृहस्पते सुरगुरो नैषा सभा वज्िएा ।१३०।

१विसृष्टरागादघरान्निवतित स्तनाङ्गरागारुणिताच्च कन्दुकात्। कुशाकुरादानपरिक्षतांगुलिः कृतोऽक्षसूत्रप्ररायी तया करः ॥१३7॥ त्रत्र गौर्या: कर कमललक्षणो धर्म: परिवर्तितः।

कुन्तक ने परिवृत्ि के 'विषयान्तरपरिवर्तन' तथा 'धर्मान्तरपरिवर्तन' रूप दो भेद भी किए जान पडते है। उनमें से पहिले अर्थात् विषयान्तर परिवर्तन का निम्न उदाहरणा दिया है। और वह १ विषयान्तर परिवर्तन तथा २ धर्मान्तर परिवर्तन रूप इस प्रकार दो तरह की होती है। विषयान्तर परिवर्तन का उदाहरण जैसे- कपरे देवताओ के गुरु बुहस्पति [ बहुत वकवाद न करो] थोड़ा वोलो, यह इन्द्र की सभा नहीं [जहां तुम हो सबसे बड़े पण्डित समभे जाओ] ॥१३०॥ यहाँ सभा रूप विषय का परिवर्तन होने से ही काचित् इसको विषयान्तर- परिवर्तन का उदाहरण कहा है। धर्मान्तर परिवर्तन का उदाहरण जैसे- पार्वती ने [ तपस्या के लिए बठकर] अपने राग रहित अधर से और स्तनों के अ्रङ्गराग से लाल हो जाने वाली [खेलने की] गॅद से हटाकर [तपस्या काल में] कुशांकुरों के लाने के कारण घायल अंगुलियों वाले अपने हाथ को जपमाला का प्रेमो वना दिया॥१३१॥ यहाँ पार्ववी का करकमल रूप धर्म परिवर्तित हो गया है। जो हाथ पहिले शैशव में अधिकतर अपने होठो पर पीछे गेंद खेलते समय गेंद पर रहता था वह हाथ अब तपस्या के समय जपमाला का प्रेमी हो गया है। इस प्रकार का परिवर्तन हाथ में होने से यह वर्मान्तर परिवर्तन का उदाहरण है। *इस स्थान पर पाठलोप चिन्ह पूर्व सस्फरण में दिए थे। आगे दो भेदो के उदाहरण दिए गए। अ्रत प्रसङ्गानुसार 'तच्च चेति द्विविषम्' यह पंक्ति हमने जोड़ दी है। १. कुमारसम्भव ५, १६ ।

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४४८ ] [फारिका :

क्वचिदेकस्यैव धर्मिर समुचितस्वमवेठिधर्मावकाशे धर्मान्त परिवर्तते। यथा- १धृरतं त्वया वार्घकशोभि वल्कलम् ॥१३२॥। क्वचिद् बहूनामपि धर्मिणा परस्परस्पर्विना पूर्वोक्ता सर्व विपरि वर्तन्ते। तथा च लक्षणकारेणात्रैवोदाहरण दर्शितम्। यथा- · शस्त्रप्रहारं ददना भुजेन तव भूभुजाम्। चिराजितं हतं तेषा यश कुमुदपाएडुरम् ॥१३३॥

कहीं एक ही धर्मी का [ किसी समय विशेष में] उचित औ्रर स्वय अ्र्प्रनुभू धर्म के हट जाने पर [ उसके स्थान पर ] दूसरा घर्म बदल [ कर झ्ा ] जाता है जैसे- पूरा श्लोक इस प्रकार है- किमित्यपास्याभरणानि यौवने धृत त्वया वार्धकशोभि वल्कलम्। वद प्रदोपे स्फुटचन्द्रतारका विभावरी यद्यरुणाय कल्पते।। [हे पार्वती ' तुमने यौवन में ही आभूषणों को छोडकर] वृद्धावस्था में शोभ देने वाला यह वल्कल वस्त्र [कंसे-क्यो] धारण कर लिया ? [ वताओनो यदि कर सन्ध्याकाल में खिले हुए चन्द्रमा तथा तारो से शोभित रात्रि उष काल के रूप पर्वतित हो जाय तो क्या हो। ] ॥१३२॥ कहीं एक दूसरे से स्पर्धा करने वाले अनेक धर्मियो के पूर्वोक्त [ धर्म, विष आादि] सब परिवर्तित हो जाते हे । जैंसा कि लक्षसकार ने [ यहां लक्षणका से वण्डी का ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि आगे जो उदाहरस दिया गया है वह दण्डं के काव्यावर्श २,३५६ से ही दिया गया है। इस विषय मे उदाहरण दिया है। जंसे- [ हे राजन् ] तुम्हारे बाहु ने [शत्रु ] राजाओ् को प्रहार देकर [अर्थ्ात उनके ऊपर प्रहार करके] उनके बहुत दिनो के उपाजित कुमुद के समान उज्ज्वत यश का अपहरण कर लिया है ।१३३॥ १. कुमारसम्भव ४, ४४ । २ दण्डी काव्यादर्श २, ३५६।

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कारिका ३४ ] तृतीयोन्मेष [४४६

निदिष्टां कुलपतिना स पर्णशालामध्यास्य प्रयतपरिगहद्वितीयः। तच्छिष्याध्ययननिवेदितावसाना संविष्ट कुशशयने निशा निनाय॥१३४॥ त्र्पन्न परिवर्तनीयपदार्थानां प्रतीयमानत्वम्। निदर्शनाप्येवं प्रायैव- क्रिययैव विशिष्टस्य तदर्थस्योपदर्शनात्। ज्ञेया निदर्शना नाम यथेववतिभिविना।१३५॥। रयं मन्दद तिर्भास्वानस्तं प्रति गच्छति। उदयः पतनायेति श्रीमतो बोधयन् नरान्३॥१३६ ।। कुलपति [ वसिष ] के द्वारा वतलाई हुई कुटिया में केवल अपनी पत्नी के साथ कुशों के विस्तर पर सोकर उन के शिष्यो के अध्ययन से जिसकी समाप्ति विदित हुई ऐसी रात्रि को [ राजा दलीप ने ] बिता दिया ॥१३४।। यहां [राजवैभव को छोडकर तापस व्रत के ग्रहण रूप ] परिवर्तनीय पदार्थों को प्रतीयमानता [प्रतीयमान परिवृति अरलद्धार] है। १७ निदर्शना अलद्धार का विवेचन- 'निदर्शना' भी लगभग ऐसी [उपमा के अ्रन्तर्गत] ही है। 'यथा', 'इव', 'वति' आदि के बिना' क्रिया के द्वारा ही उसके विशेष प्रयोजन का प्रदर्शन करा देने से निदर्शना [अलद्धार] होता है॥१३५॥ जैसे- उदय, श्रस्त के लिए ही होता ह यह बात वँभवशाली पुरुषों को समझाता हुआ यह सूर्य क्षीणा कान्ति होकर अस्ताचल की ओ्र जा रहा है॥१३६। १८. इ्लेपालद्धार का विवेचन- आगे का पाठ वढा भ्रष्ट है। जो कुछ श्लोक पढने में आ सके हैं। उनसे प्रतीत होता है कि इस प्रकरण में भामह के आधार पर इलेपालद्वार का विवेचन किया जारहा है। भामह ने श्लेष का लक्षण करते हुए लिखा है- उपमानेन यत्तात्वमुपमेयस्य साध्यते। गुएक्रियाभ्या नाम्ना च रलिप्ट तर्दाभघीयते ॥३, १४॥ १ गुख २ क्रिया और ३ नाम [प्रातिपविक] के द्वारा उपमान के साथ उप मेय का जो [ तत्त्व ] अ्भेद सिद्ध किया जाता है उसको श्लिष्ट कहते हैं। अगले पृतीन श्लोको में से पहिले में 'उद्धरिप्यन्' यह क्रिया श्लेश है। दूसरे इ्लोक में 'वन्हिकणावदाता' में 'अवदात' रूप गुण शलेष है तथा तीसरे में १. रघुवश २, ६५। २ पूर्वसम्करण में यह पक्ति प्रमाद वश पृ० ४४३ पर उ०स० १२२ के पूर्व दे दी थी। वहाँ अ्रसङ्गत होने से हमने हटा कर यहाँ रखी है। ३ भामह काव्यालद्वार ३, ३३-३४। ६पाठ लोपसूचक चिन्ह।

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४५० ] वकोक्तिजीवितम् [ कारिफा ३

ृततः प्रतस्थे कोवेरी भाम्वानिव रघुदिशम्। शरैरुस्र रिवोदीच्यानुद्धरिप्यन् रसानिन"॥?३७॥। · निर्याय विद्याथ दिनादिरम्याढ विम्वादिवार्कस्य मुसान्महपः । पार्थाननं वन्हिकण।वदाता दीप्तिः स्फुरत्पद्यभिवाभिपेदे।।१३८।। स्वाभिपायसमर्पणमवएया माधुर्यमुद्राङ्वया विच्छित्या हृदयेऽभिजातमनसामन्तः किमप्युल्लिसत्। आरूढ रसवासनापरिणते काप्ठा कवीना पर कान्ताना च विलोकितं विजयते वैदग्ध्यवक्र वचः ॥१३६॥।

'कान्ताना विलोकित' तथा 'कवीना वच' ये दोनो 'विजयते' क्रिया के कतृपद है। औ्रर सारे विशेषण उन दोनो पक्षो में लगते है इस तिए वहां नाम-श्नेप है। भामह के इन भेदो की दृष्टि से कुन्तक ने ये तीनो उदाहरण दिए हे ऐसा प्रतीत होता है। इन श्लोको के अर्थ निम्न प्रकार ह- उसके बाद, सूर्य जैसे अपनी फिररों से रसो को खौंचता है इस प्रकार अपने वाशो से उत्तर देश के राजाओ्ं का उत्मूलन करने के लिए रघु उत्तर दिशा की ओ्रर चला ॥१३७॥ प्रात.काल के रमसीय सूर्य विम्ब के समान महर्षि [व्यास] के मुख से निकल कर अग्नि के करगो के समान चमकती हुई दीप्ति-सी विद्या, खिले हुए कमल-सदुश अर्जुंग के मुख में प्रविष्ट हो गई ॥१३८॥ अपने अभिप्राय को प्रकट करने में निपुण, माधुर्य की मुद्रा से अद्ित, सुन्दर शैली से सहृदय रसिक जनो के हृदय में कुछ अपूर्व भाव प्र्प्रद्ित करती हुई और रस- भावना के परिपाक की चरम सीमा को पहुंची हुई स्त्रियो की विदग्धता से सुन्दर नजर और कवियो की वारणी सर्वोत्कर्ष से युक्त होती है ॥१३६॥ भामह ने उपर्युक्त तीन भेदो के अ््रतिरिक्त श्लेप के सहोकिति, उपमा और हेतु- निर्देश-मूलक तीन भेद और किए है। 'सहोक्त्युपमाहेतु निर्देशात् क्रमशो यथा'॥ ३, १७। भागे जो तीन श्लोक उद्दृत किए है वे क्लोक के इन्ही तीन भेदो की दृष्टि से प्रस्तुत किए गए प्रतीत होते हैं। इनमें से प्रथम [स० १४० ] भें माधव विप्ण तथा उमाघव शिव का एक साथ कथन होने से सहोकितिमूलक, दूसरे [ स० १४१ ] में कामरिपु तथा कामस्त्री की मूर्तियो में उपमानोपमेय भाव विवक्षित होने से उपमा मूलक, तथा तीसरे [ स० १४२ ] मे गोपराग के पतन के प्रति हेतु होने से हेतु निर्देश मूलक श्लेष पाया जाता है। १. रघु ४, ६६ । २ किरात ३,२५। 8 पाठ लोपसूचक चिन्ह।

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कारिका ३४] तृतीयोन्मेष: [४५१

यथा वा- येनध्वस्तमनोभवेन वलिजित्कायः पुरास्त्री कृतः यश्चोद् वृत्तभुजङ्गहारवलयोडगङ्गा च योऽधारयत्। यस्याहु: शशिमच्छिरोहर इति स्तुत्यं च नामामराः पायात्स स्वयमन्धकक्षयकरस्त्वा सर्वदो माधवः ॥१४०।।

येनध्वस्त० इत्यादि श्लोक में भामहोक्त सहोक्ति प्रथम प्रकार का श्लेष है। श्लेषवश शिव तथा विष्णु दोनो अथों की प्रतीति होती है। सारे विशेषण दोनो पक्षो में लगते हैं। विष्ण पक्ष में अररथ इस प्रकार होगा-

'येन श्र्भचेन' जिस अ्रजन्मा विष्णु ने 'अनः ध्वस्तम्' वाल्यावस्था में 'अ्रनः' अर्थात् शकट वच्चो की गाउी श्थवा शकटासुर को नष्ट कर डाला, पुरा पहिले अर्थात् अ्मुत-हरस के समय वलिजित् वलि नामक राजा को अथवा वलवान् वैत्यों को जीतने वाले अपने शरीर को [ मोहिनी रूप घारण कर ] स्त्री वना डाला। औरर जो मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले कालियानाग को मारने वाले है तथा जिनमें र अर्थात् वेद का लय होता है, जिन्होंने श्रग अर्थात् गोवर्धन पर्वत को और गौ अर्यात् बराहावतार के समय पृथ्वी को धारस किया। जो 'शशि मथ्नातीति शशिमथ् राहु.' उसके शिर को काटने वाले होने से देवता लोग जिनका 'शशिमच्छिरोहर' यह प्रशस- नीय नाम लेते है। अ्न्धक अर्थात् यादवों का, द्वारिका में क्षय अर्ात् निवास-स्थान बनाने वाले अथवा मौसल पर्व की कथा के अनुसार उनका नाश कराने वाले और सब कामनाओं को पूर्ण करने वाले माघव विष्णु भगधान् तुम्हारी रक्षा करें।

शिव पक्ष में इसी ब्लोक का अर्थ इस प्रकार हो जाता है कि-

'ध्वस्तः मनोभव काम. येन स ध्वस्तमनोभव, कामदेव का नाश करने वाले जन शङ्बर ने पुरा पहिले त्रिपुर दाह के समय वलिजित्काय विष्णु के शरीर को, प्रस्त्रीकृत. वासा बनाया। जो महा भयानक भुजङ्गों सापों को हार तथा वलय के [ खडशरा ] के रूप में धारण करते हैं, जो गङ्गा को धारण किए हुए है, जिनका रस्तक शिर 'शशिमत्' चन्द्रमा से युक्त है, और देवता लोग जिनका हर यह प्रशसनीय गाम कहते हैं, अन्यकासुर का विनाश करने वाले वे 'उमा-घव' पार्वती के पति, गौरी- रति श्धर सदेव तुम्हारी रक्षा फरें॥१४०॥

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४५२ ] बफोवितजीचितम् [ फारिका ३४

यथा वा- मालामुत्पलकन्दलै: प्रतिकचं स्वायोजिता विभ्रती नेत्रेणासमदृष्टिपातसुभगेनोद्दीपयन्ती स्मरम्। काञ्चीदारमनिवद्धभन्न दघती व्याल विना वाससा सूर्ति· कामरिपोः सिताम्वरधरा पायाच्च कामस्त्रिय ॥१४१॥

कामरिप शर्थात शिव के समान कामस्त्री अर्थात् रति की मूति तुम्हारी रक्षा करे। यह इस श्लोक का मस्य वाव्य है। शेष सब विशेपण पद है और वे शिव और कामस्त्री पर्थात् रति दोनो के पक्ष में लगते है। इसलिए इस श्लोक में भामहोक्त उपमा-मूलक क्लेष है। सिताम्वरधारा का धर्थ रति के पक्ष में सित शुभ्र वस्त्रो को धारख किए हुए होता है। और शिव के पक्ष में उसके सिता तथा अम्वरधारा ये दो शलग अलग विशेषण होते है। सिता का अ्रर्यं अर्थात् भस्म लपेटने के कारण सफेव और 'अ्रम्वर घरा' का अर्य दिगम्बर नग्न यह होता है।

तीसरे चरस का शिव के पक्ष में 'वाससा विना' शर्थात् धोती शरदि रूप वस्त्र के बिना ही काञ्ची के समान वाँधे हुए 'व्याल' अर्थात् सर्प को घारए किए हुए शिव की मूर्ति यह धर्थ होता है। रति के पक्ष में 'व्यालम्बिना' यह एक पद हो जाता है। 'व्यालम्तिना वाससा' अर्थात् लम्वे लटकते हुए वस्त्र से निवद्ध- भद्दि विचित्र शैली से बधे हुए काञ्चीदाम तगडी को धारण करती हुई रति को मूति यह अर्थ हुश्र्ना । दूसरे चरस में 'उद्दीपयन्ती' का घर्थ शिव के पक्ष में प्रज्वलित या भस्म करती हुई और रति के पक्ष मे बढाती हुई होता है। इसलिए अ्सम-विषम- दृष्टि के पात से सुन्दर तृतीय नेत्र से स्मर अर्थात् कामदेव को 'उद्दीपयन्ती' भस्म करती हुई शिव की मूर्ति तथा असम अर्थात् श्दितीय अनुपम दृष्टिपात से मनोहर अपने कटाक्ष से कामदेव को प्रबुद्ध करती हुई रति की मूर्ति तुम्हारी रक्षा करे। प्रथम चरण का अर्थ कमल के कन्दलो से भली प्रकार बनाई हुई माला को केशों में धारण करती हुई यही अर्थ दोनो जगह लगता है। परन्तु शिव पक्ष में सुन्दर नहीं मालूम होता है। इस प्रकार उक्त विशेपणो से विशिष्ट कामरिपु शिव तथा कामस्त्री रति की सूति तुम्हारी रक्षा करे। यह इस इ्लोक का श्रर्थं होता है।१४१॥

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कारिका ३४ ] तुतीयोन्मेष: [४५३

यथा वा- दृष्ट्या केशवगोपरागहृतया किञ्चन्न हृष्टं मया तेनैव स्खलितास्मि नाथ पतिता किन्नाम नालम्वसे । एकस्त्वं विषमेपुखिन्नमनसा सर्वावलाना गति- र्गोप्यैवं गदित सलेशमवताद् गोष्ठे हरिर्वश्चिरम्॥१४२।।३४।।

इसी प्रकार क्लेष का तीसरा उदाहरस अगला इ्लोक दिया है। इसमें भामहोक्त हेतु निर्देश मूलक श्लेष माना जा सकता है। उसका अर्थ निम्न प्रकार है-

हे केशव [कृष्ण] ! गौग्ो की [ उड़ाई हुई ] धूलि से दृष्टि हर हो जाने से [ रास्ते की विषमता आदि] कुछ नहीं देख सकी इसी से [ ठोकर खाकर ] गिर पडी हूँ। हे नाय । गिरी हुई [ मुझ ] को [उठाने के सिए आप अपने हाथ से] पकड़ते क्यों नहीं है। [हाथ का सहारा देकर उठाने में सकोच क्यों करते हैं] विषम स्थलों [ ऊवड़-खावड़ रास्तों ] में घवड़ा जाने वाले [ न चल सकने वाले वाल, वृद्ध, वनिता आदि ] निर्वल जनों के [ अ्रत्यन्त शक्तिशाली ] केवल भ्राप ही एकमात्र सहारा हो सकते है। गोष्ठ [गौशाला ] में दो अप्र्य वाले [श्लिष्ट] शन्दो से गोपी द्वारा इस प्रकार कहे गए कृष्ए तुम्हारी रक्षा करें।

[ इसमें आए हुए 'सलेश' पद की सामर्थ्य से श्लोक का दूसरा शर्थ भी प्रतीत होता है जो इस प्रकार है ] इस पक्ष में 'केशवगोपरागहृतया' की व्यास्या दो प्रकार से हो सकती है। एक प्रकार में तो केशव तथा गोप दोनो सम्बोधन पद है। गोप का अर्थ रक्षक, स्वामी है। हे स्वामिन् ! केशव ! आपके श्र्प्रमुराग-प्रेम से अ्रन्धी होकर मेंने कुछ नहीं देखा-भाला। अथवा [ केशवग य. उपराग, तेन हृतया मूगधया ] केशव विषयक अनुराग से मुग्ध हुई मेने कुछ देखा-भाला नहीं, सोचा-विचारा नहीं। इसलिए [ अपने पतिव्रत घर्म से ] भ्रष्ट हो गई हूँ। हे नाथ । [अब्र आप मेरे प्रति] पतिभाव क्यों ग्रहल नहीं करते [ मुझे पत्नी रूप में स्वीकार कर मेरे साथ पतिवद् व्यवहार सम्भोगादि क्यो नहीं करते है ] ? क्योंकि काम [ वासना ] से सन्तप्त मन घाली [ विषमेषुः पञ्चवास' काम, ] समस्त श्रवलापों [गोपियो] की एकमात्र आप ही गति [ ईर्ष्यादि रहित तृप्तिसाघन ] हो। इस प्रकार गौशाला में गोपी द्वारा कहे गए कृष्ण तुम्हारी रक्षा करें ॥१४२॥३४॥

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४५४ ] वक्रोपितजीवितम [कारिका ३५

श्लेपमभिधाय साम्यैवनिवन्धन वात् ववतम्पम्लपकारण व्यतिरेकमभिधत्ते सतीत्यादि- 11 सति तच्छब्दवाच्यत्वे धर्मसाम्येऽन्यथास्थितेः । व्यतिरेचनमन्यस्माद् शाव्द: प्रतीयमानो वा व्यतिरेकोऽभिधीयते॥३५॥ 'तच्छव्दवाच्यत्वे', स चासौ शब्दश्चेति विगृह, तच्छच्दशक्त्या श्लेपनिमित्तभूत शब्द परामृग्यते। तस्य वाच्यत्वेऽभिधेयत्वे 'सति' विद्यमाने। 'धर्मसाम्ये' सत्यपि परस्परस्पन्टसादृये विद्माने।8 तथाविधशब्दवान्यत्वस्य धर्मसाभ्यस्य चोभयनिष्ठत्वादुभयोः प्रकृतत्वात् । प्रस्तुताप्रस्तुतयोरेव तयो- धर्मादेकस्य यथारुचि केनापि विवा्तपदार्थान्तरेण 'अरन्यथास्थिते.' अरतथा-

१६ व्यतिरेक प्रलद्धार- इसके वाद कुन्तक ने 'व्यतिरेकालद्वार' का निरुपण किया है। व्यतिरेक के लक्षण रूप में उन्होने जो कारिका लिखी है वृत्ति के आधार पर अ्रनुमानत उसका पुनरुद्वार किया गया है जो ऊपर दिया हुआ है। अयं इस प्रकार होता है- इस प्रकार क्लेष को कहकर साम्य मात्र निमित्तक होने से उमत रूप श्लेष- मूलक व्यतिरेक [अलद्धार] को कहते है-'सति' इत्यादि। इ्लेषनिमित्तक शब्द से वाच्य होने पर तथा धर्म की समानता होने पर प्रस्तुत पदार्थ के उत्कर्ष की सिद्धि के लिए अन्यथा अ्रर्थात् भिन्न प्रकार से स्थित दो पदार्थो मे से श्रन्य [अ्रर्थात अप्रस्तुत ] से [प्रस्तुत का] जो शान्द अ्थवा प्रतीयमान [ध्यतिरेचन] आधिषय प्रदर्शन करना है वह व्यतिरेकालद्कार कहलाता हँ। उस शब्द से वाच्य होने पर। वह जो शब्द इस प्रकार का विग्रह फरके 'तत्' इस शब्द की सामर्थ्य से इलेष का निमित्तभूत शब्द [तच्छन्द से ] लिया जाता है। उससे वाच्य अर्थात अभिधेय होने पर। और धर्म का साम्य भी होने पर अर्थात् परस्पर स्वभाव का सादृश्य विद्यमान होने पर, उस प्रकार के [अर्थात् श्लेष के निमित्तभूत ] शब्द से वाच्य होने से और धर्मसाम्य के उन दोनो में रहने वाला होने से उन दोनो के प्रकृत होने से। प्रस्तुत अथवा अप्रस्तुत उन दोनो ही के धर्म से अपनी इच्छा-विवक्षा-के अनुसार किसी एक पदार्थ का विवक्षित किसी दूसरे इसके पूर्व पाठ लोपसूचक चिन्ह पाण्डुलिपि में दिया है।

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कारिका ३५ ] तृतोयोन्मेर [४५५

भावेनावस्थिते: 'व्यतिरेचनं' पृथक्करसम्। कस्मात् 'अ्रन्यस्मात्' उपमेयस्यो- पमानादु पमानस्य वा तस्मात्। स व्यतिरेकनामलक्कारोऽभिधीयते। किमथेम्- 'प्रस्तुतोत्कर्पसिद्धये'। प्रस्तुतस्य वर््यमानस्य वृत्तेश्छायातिशयनिष्पत्तये। सच द्विविध: सम्भवति 'शाब्द. प्रतीयमानो वा'। 'शाब्द,' कविप्रवाहप्रसिद्धः, तत्समर्पासमर्थाभिधानेनाभिघीयमानः। 'प्रतीयमानो' वाक्याथसामर्थ्यमात्राव- बोध्य: यथा- कप्राप्तश्रीरेष कस्मात् पुनरपि मयि तं मन्थखेद विदध्यात् निद्रामप्यस्य पूर्वामनलसमनसो नैव सम्भावयामि। सेतु' वष्नाति भूयः किमिति च सकलद्वीपनाथानुयात- स्त्वय्यायाते वितर्कानिति दघत इवाभाति कम्प' पयोधेः'॥१४३॥

पदार्य से अन्यथा अर्थात अतथाभाव से भिन्न रूप से [लोकोत्तर सौन्दर्य शाली रूप से] स्थित ह ने से व्यतिरेचन अर्थात् पुथवकरण। किसके कि अन्य से अर्थात् उपमेय से उपमान का अथवा उपमान से उपमेय का। वह व्यतिरेक नामक अलद्धार कहा जाता हैं। किसलिए, 'प्रस्तुत के उत्कर्ष की सिद्धि के लिए'। प्रस्तुत अ्रर्थात् वर्ण्यमान के सौन्दर्यातिशय के सम्पादन के लिए। वह [व्यतिरेकालद्ार] दो प्रकार का हो सकता है, एक शाब्द और दूसरा प्रतीयमान। शान्द कवि परम्परा में प्रसिद्ध, उसका प्रतिपादन करने में समर्थ वाचक शब्द से कहा हुआ [ होता है ] और प्रतीयमान वाक्यार्थ की सामर्थ्यमात्र से बोधित होता है। जैसे- इसके आगे तीन उदाहरस दिए हुए हैं जिनमें से एक प्राकृत भाषा का और दो सस्कृत के श्लोक है। उनमें से दो पढ़ने में नहीं आए। तीसरा उदाहरण भी इस प्रति में पढने में नहीं आाता है परन्तु इतना प्रतीत हो जाता है कि वह ध्वन्यालोक का प्राप्तश्री इत्यादि श्लोक है। उसी से ऊपर ध्वन्यालोक के अनुसार उसका पाठ दे दिया है। अर्थं इस प्रकार है- इसको [ तो पहिले ही ] लक्ष्मी प्राप्त है फिर यह मुझे पूर्वानुभूत मन्थन -[जन्य ] दुःख क्यों देगा। [ इस समय ] श्रलस्य रहित होने के कारण इसकी पहिले जैसे [ वीर्घकालीन ] निद्रा की भी कोई सम्भावना नहीं जान पडती है। सारे द्वीपो के राजा तो इसके साथ हे फिर यह दुबारा सेतुवन्धन क्यों करेंगे? हे राजन् ! तुम्हारे [समुद्र तट पर] आाने पर मानो इस प्रकार के सन्देहो के कारण समुद्र [भय से] कांप रहा है।।१४३।। पाठ लोप। १ ध्वन्यालोक प० १६३।

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४५६ j वनोक्तिजीवितम् [कारिका ३५

पूर्वसूरिभिराम्नातम्। छप्रतीयमानव्यतिरेकव 'तत्वाध्यरोपणात्' प्रतीयमानतया रूपकमेव

यत्रार्थ. शब्दो वा तमयसुपमर्जनीकृतरवार्या। व्यडक्तः काव्यविशेप स ध्वनिरिति सूरिभि कवित ॥१४४।। श्लेपव्यतिरेक. यथा- *शलाष्याशेपतनु सुदर्शनकर. सर्वाद्गलीलाजित- त्रैलोक्या चररारविन्दर्ललिनेनाकान्तलोको हरि.। विभ्राणा मुखमिन्दुरूपमसिलं चन्द्रात्मचततुर्दधत् स्थाने या स्वतनोरपश्यदधिका सा रुविमणी वोऽवतात् ॥१४५।।३५॥। कुन्तक इसमें प्रतीपमान व्यतिरेक नानते है। परन्तु ध्वन्यालोक में जहां उद्धृत हुआ है इसको रूपकध्वनि का उदाहरस कहा है। उसी फी से यह ओ्रोर सफेत करते हुए कन्तक कहते है कि- व्यतिरेक के प्रतीयमान होने पर[यहाँ राजा में वासुदेव विष्णु के तत्वारोपण] प्प्रमेदारोपण से प्रतीयमान रूपक ही पूर्व प्राचार्यो [श्रानन्दवर्धन ] ने कहा है। * प्रतीयमान या ध्वनि का लक्ष ध्वनिकार ने इस प्रकार किया है इस बात को दिखलाने के लिए आगे कुन्तक ने ध्वन्यालोक की १,१३ फारिका को उद्धत किया है। जिसका अर्थ इस प्रकार है- जहाँ शरर्थ अपने को [ स्व] शथवा शब्द अपने अर्थ को गुणोभूत करके उस [प्रतीयमान ] अर्थ को अ्र्प्रभिव्यक्त करते हे, उस काव्य विशेष को विद्वान् लोग धर्वनि [काव्य ] कहते है ॥१४४॥ [आगे] श्लेष व्यतिरेक [का उदाहरण देते हैं] जैसे- [सुदर्शनकर ] जिनका केवल हाथ ही सुन्दर है[ श्रथवा सुदर्शनचक युक्त होने से सुदर्शन कर विष्ण ] जिन्होने केवल चरसारविन्द के सौन्दर्य से [ अथवा पाव विक्षेप से] तीनो लोको को आकरान्त कर लिया है, और जो चन्द्ररूप [ में केवल ] नेत्र को धारण करते है। अर्थात् जिनका केवल एक नेन्न ही चन्द्र रूप है] ऐसे विष्ण ने अखिल देहव्यापिसौन्दर्यशालिनी, सर्वाद्ध सौन्दर्य से त्रॅलोक्य फो विजय करने वाली और चन्द्रसदृश सम्पूर्ण मुख को धारण करने वाली जिन [रुष्मिसी देवी] को उचित रूप से हो अपने शरीर से उत्कृष्ट रूप में देखा, वे रुविमणी देवी तुम सबकी रक्षा करें॥१४५॥३५॥ कपाठ लोपसूचक चिन्ह। १. ध्वन्यालोक १, १३। २ धवन्यालोक पृ० १६६ ।

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कारिका ३६ ] तृतीयोन्मेष: [४५७

अस्यैव प्रकारान्तरमोह, 'लोकप्रसिद्ध' इत्यादि। लोकप्रसिद्धसामान्यपरिस्पन्दाद्विशेषतः । व्यतिरेको यदेकस्य स परस्तद्विवक्षया ॥३६॥ परोऽन्यः स व्यतिरेकालङ्कारः कीहशः-'यद्ेकस्य' वस्तुन. कस्यापि 'व्यतिरेकः' पृथक्कररम्। कस्मात्-'लोकप्रसिद्धसामान्यपरिस्पन्दात्'। 'लोक- प्रसिद्धो' जगत्प्रतीतः 'सामान्यभूतः' सवसाधारणो यः 'परिस्पन्दः' व्यापारस्त- स्मात् । कुतो हेतो :- 'विशेषतः' कुतश्चिदतिशयात् । कथम्-'तद्विवक्षया'। तदित्युपमादीनां परमार्थः, तेपां विवन्तया। तद्विवत्षितत्वेन विहितः । यथा- इस प्रकार शाब्द और प्रतीयमान दो प्रकार के व्यतिरेको का निरूपण करने के बाद कुन्तक ने एक तीसरे प्रकार के व्यतिरेकालद्वार का और वर्णन किया है-I इसकी वृत्ति के आधार पर पुनरुद्वार की हुई कारिका ऊपर दी गई है। वह [ व्यतिरेकालद्धार ] का ही दूसरा प्रकार कहते हे लोकप्रसिद्ध इत्यादि [ कारिका में ]- [ किसी वस्तु के उत्कर्ष का प्रतिपादन करने के लिए ] लोकप्रसिद्ध साधा- रख स्वभाव से अ्रतिशय होने के कारण जो [ उपमान और उपमेय में से ] एक का [व्यतिरेक भेद या] आ्र्ाधिक्य [व्णन करना] हं वह अन्य प्रकार का [तीसरे प्रकार का] व्यतिरेकालद्वार है। वह 'पर' अर्थात् अन्य [ तीसरे प्रकार का ] व्यतिरेकालद्वार है। कैसा कि जो किसी एक वस्तु का व्यतिरेक अर्थात् अलग करना है। किससे [ अलग करना कि] 'लोकप्रसिद्ध साधारण स्वभाव से'। लोकप्रसिद्ध अर्यात् सर्वजनप्रसिद्ध सामान्य रूप अर्यात् साधारण जो परिस्पन्द अ्र्यात् व्यापार उससे [ अलग करना ]। किस कारण से कि, 'विशेषता से' अर्थात् किसी अतिशय विशेष के कारण से। क्यों [अलग करना कि-] 'उस [अतिशय अ्रथवा विशेषता] के कहने के अभिप्राय से'। 'तत्' इस पद से उपमा आदि का सार भूत जो अतिशय उसके कहने की इच्छा से। अर्यात् उस प्रतिशय का प्रतिपादन करने के लिए किया हुआ [ जो व्यतिरेक पृथ- षकरण उसको व्यतिरेकालद्वार कहते हैं। इसका भावार्थ यह हुआ कि जो वस्तु लोक में साधारखत. जिस रूप में पाई जाती है उससे भिन्न किसी विलक्षण रूप से उसी पदार्थ का वर्णन करना यह भी व्यतिरेकालद्गार का भेद है। इसी का उवाहरस देते है]।

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४५८ ] वक्रोकि्तिजीवितम [ फारिका ३६

चाप पुप्पितभूतलं सुरचिता मौर्वी द्विरेफावलि

शस्त्राएयु्पलकेत की सुमनसी योग्यात्मन कामिना त्रैलोक्ये मदनस्य सोडनि ललिताल्लेगे जिगीपाग्रह ॥१४६।। १ननु च भूतलादीना चापा दिरु पणाद्रपक व्यतिरेक एवायम्। नैतदस्ति। रूपकव्यतिरेके हि रूपक विधाय तस्मावेव व्यतिरेचन विधीयते। एतस्मिन पुन सकललोकप्रसिद्धात् सामान्य-व्यवहारतात्पर्याद् व्यतिरेचनम् । भूतलादीना चापादिरूपण विशेपान्नरनिमित्तमान्रमवधार्यताम ॥३६॥। [ कामदेव का] चाप खिले हुए पुष्पो वाला भूतल । प्रर्यात भूतल पर खिले हुए पुष्प] है, भ्रमरो की पषित [उस चाप की] प्रत्यञ्चा ह, पूर्ण चन्द्र के उदय का समय चढ़ाई करने का समय है पुप्पकार वसन्त ऋतु [आ्रा समन्तात् सरतीति आसर अग्रेसर] आ्रागे चलने वाला प्रथवा साथ चलने वाला सहायरु है, कमल और केतकी आदि के पुष्प वा है और कामियो के [मारने का अ्भ्यास] अपनी योग्यता है। इस प्रकार कामदेव का त्रैलोक्य विजय करने का बडा सुन्दर आग्रह [ शौक] है ।१४६।। [प्रश्न] भूतल आरादि पर चाप प्र्प्रादि का आप्रारोप होने से यह रूपक व्यतिरेक ही है। [अर्थात् रूपक तथा व्यतिरेक का सकर या ससृष्टि रूप भेद है। फेवल व्यतिरेक नहीं है। इसका उत्तर देते हैं] ग्रन्थकार ने व्यतिरेक के तीसरे भेद का यह उदाहरसा दिया है। परन्तु इस पर यह शङ्का होती है कि यह तो रूपक व्यतिरेक है नया भेद नही। इसका समा धान आगे करते है- [ उत्तर ] यह [ कहना ] ठीक नहीं है। रूपक व्यतिरेक में पहिले आरोप फरके फिर उसी में से भेद दिखलाया जाता है। और यहाँ सकल लोक प्रसिद्ध सामान्य व्यवहार के अभिप्राय से [प्रधान रूप से] व्यतिरेचन किया जाता है [अर्थात् कामदेव का जगद्विजय का अ्रपूर्व व्यापार है इसके दिखलाने में ही कवि का तात्पर्य है]। औरर भूतल आदि पर चाप आदि के आरोप को उसका सहायक विशेष निमित्तमात्र समभना चाहिए। [ भूतल आदि पर चापादि के आरोपण में विशेष रूप से कवि का तात्पर्य नहीं है। इसलिए यहाँ रूपक व्यतिरेक नहीं अपितु केवल व्यतिरेक कलद्वार ही है]। १ इस उदाहरण के समन्वय करने के लिए निम्नाद्ित पाठ यहाँ पाय। जाता है। परन्तु यह पाठ अ्त्यन्त भ्रष्ट है। उससे कोई पूणं अभिप्राय नही निकलता है। अत हमने उसे हटा कर यहा टिप्पणी में दे दिया है- अश्न सकललोक प्रसिद्धशस्त्राद्युपकरणकलापात् जिगीषाव्यवहारान्मन्मथ सुकुमारोपकारण त्वाज्जिगीषा ।

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कारिका ३६ ] तृतीयोन्मेष: [४५e

यत्रोक्ते गम्यतेऽन्योर्थस्तत्समानविशेषणाः। सा समासोवितरुद्दिष्टा संक्षिप्तार्थतया यथा॥१४७।। स्कन्धवानृजुरव्यालः स्थिरोऽनेकमहाफलः । जातस्तरुरय चोच्चैः पातितश्च नभस्वता ॥१४८।। २० समासोक्ति अलद्धार- व्यतिरेक के बाद कुन्तक ने समासोक्ति अलद्कार का विचार किया है। परन्तु इस स्थल का पाठ भी खण्डित होने से पूरा अभिप्राय स्पष्ट नहीं होता है। इतना स्पश्ट है कि वे उसको अलग स्वतन्त्र अलङ्कार मानने योग्य नही समझते हैं। वे 'इलेषामिसंभिन्नत्वात्' श्लेष युक्त होने से श्लेषालद्दार के भीतर ही समासोक्ति का अन्तर्भाव मानते है। उन्होने अपना लक्षण न करके भामह के समासोित के लक्षण तथा उदाहरणो को उद्ध त कर उनकी आलोचना की है। और समासोक्ति के अलग अतद्कार माने जाने का खण्डन किया है। श्लेष से पत्यन्त मिली होने से और अलग अलद्धार रूप में शोभा रहित होने से [समासोकिति अलग अलद्धार नहीं हैँ ]। [भामह ने समासोित का जो विवेचन किया है वह इस प्रकार है] जिसके कहे जाने पर उसके समान विशेषण वाला अन्य अर्थ प्रतीत हो जाता है, यह सक्षिप्त अर्थ वाली होने से समासोवित कहलाती हूँ॥१४७॥ जैसे- [ऊचे कन्धों वाला वृषस्कन्ध, महास्कन्ध वाला महापुरुष और ] गुद्दों वाला सीधा, सर्पादि से रहित स्थिर और बड़े-बड़े अनेक बहुत-से फलो वाला यह वृक्ष ऊँचा पहुँचा ही था कि वायु ने उसको गिरा विया ॥१४८॥ इसमें वृक्ष का वरंन किया हुआ है परन्तु उससे महापुरुष रूप अन्य अरथ की प्रतीति भी होती है। महापुरुष के लक्षण में उसका वृषस्कन्ध ऊंचे कन्घे वाला होना भी एक सुलक्षण हैं। इस प्रकार के महास्कन्घ रूप सुलक्षण से यक्त सरल, छलछिद्र आदि से रहित स्थिर बुद्धि और अ्रनेक महाफलो को सम्पादन करने वाला कोई महापुरुप प्रभी ऊपर किसी ऊंचे पद पर पहुँचा ही था कि किसी प्रबल शक्तिशाली प्रुतिस्पर्धी ने उसको नीचे गिरा दिया। यह अरथ भी इम श्लोक में प्रतीत होता है। इस प्रकार सक्षेप से दोनो अर्थो का प्रतिपादन करने से यहाँ समासोवित अलद्धार होता है। परन्तु कुन्तक उसको क्लेष का ही भेद मानते हैं। क्योकि शलेष रूप से दूसरे अर्थ की प्रतीति ही उसकी जान है। यदि दूसरे अर्य की प्रतीति न हो तो उसमें कोई चमत्कार नही है। इसी को कुन्तक इस उदाहरण में दिखलाते है।

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४६० ] वक्रोकितिजीवितम् [कारिका ३

श्रन्न तरोरमहापुरुपस्य च द्वयोरपि मुख्यत्वे महापुरुपपन्े विशेषर्ण सन्तीति विशेष्यविधायकं पदान्तरमभिचातव्यम्। यदि वा विशेपणोडन्यथ। नुपपत्या प्रतीयमानतया विशेष्य परिकलयते। तदेवविवम्य कन्पनस्य स्कुरि न किञ्चिदिति स्फुटमेव शोभाशून्यता। अनुरागवती सन्ध्या दिवसस्तपुर.सर । प्रहो देवगति. कीहकू न तथापि समागम ।१४६।।

यहाँ [ इस भामह के दिए हुए उदाहरर के श्लोक में] वृक्ष तया महापुरुट दोनो के मुख्य [रूप से वण्य ] होने पर महापुरुष पक्ष में [ लगने वाले ] विशेषए तो विद्यमान [श्रयमाण] हैं ही इसलिए विशेष्य का विवान करने वाला [महापुरुष] पद भी कहना चाहिए। और यदि विशेषलो की अ्रत्यथा [परर्थात् विशेष्य पद पे बिना] अनुपपत्ति होने से प्रतीयमान रूप से विशेष्य फी कल्पना करते है ते इस प्रकार की कल्पना में कोई चमत्कार, जीवन, नहीं रहता है इसलिए स्पष्ड ही शोभा रहित मालूम होने लगता है। [ इसलिए समासोवित अलग अलद्धार नहीं है अपितु वह श्लेष के ही अन्तर्गत हैं ]। इसके बाद ध्वन्यालोक पृष्ठ ६० पर उद्धृत अनुरागवती सन्ध्या आदि को उद्धत किया है। इस इलोक का श्रपर्थ निम्न प्रकार है- सन्ध्या [रूपिणी प्रथवा नामक नायिका]अ्रनुराग [अर्ात् सन्ध्याकालीन लालिमा और पक्षान्तर में प्रेम ] से युक्त है, और दिवस [रूपी अथवा नामक नायक ] उसके सामने [ स्थित ही नहीं अ्पितु पुर सरति गच्छति इति पुर सर ] बढ रहा है [ सामने से आ रहा ह] म्रहो दैव की गति कैसी विचित्र है कि फिर भी उन दोनो का समागम नहीं हो पाता है।।१४६॥ इसमें धवन्यालोक के टीकाकार अ्रभिनवगप्न ने भामह के मत से समासोक्ति तथा वामन के मत से आक्षेप अलद्धार वतलाया है। परन्तु भामह के अपने ग्रन्थ में इस श्लोक की कोई चर्चा नहीं हुई है। कुन्तक ने भी यहाँ इस श्लोक की कोई विवेचना नही की है ।३६।। २१ सहोकिति श्रलद्धार- समासोक्ति के बाद कुन्तक ने सहोक्ति अलद्धार का विनेचन किया है। इसमें उन्होने पहिले भामहकृत सहोक्ति अलद्कार के लक्षण तथा उदाहग्ण को उद्धत कर उनकी आलोचना की है। उस आलोचना का अभिप्राय यह ह कि भामह के अनुसार जो सहोक्ति का लक्षण और उदाहरण दिया गया है वह तो वस्तुत उपमा ही

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कारिका ३७ ] सृतीयोन्मेष. [४६१

$तुल्यकाले क्रिये यत्र वस्तुद्धयसमाश्रये। पदेनैकेन कथ्येते सहोक्तिः सा मता यथा॥१५०॥ हिमपाताविलदिशो गाढ़ालिङ्गनहेतवः। वृद्धिमायान्ति यामिन्यः कामिना प्रीतिभिः सह॥१५१।। अत्र परस्परसाम्यसमन्वयो मनोहारित्वनिबन्धनमित्युपमैव ॥३६॥ य त्रैकनैव वाक्येन वर्णानीयार्थसिद्धये। अर्थानां युगपदुक्तिः सा सहोक्तिः सतां मता॥३७॥

है। उस रूप मे सहोकिति को उपमा से अलग अलद्धार मानने की आवश्यकता नहीं है। अत भामह का किया हुआ सहोवित अलद्धार का लक्षणा ठीक नही है। इस प्रकार भामह के लक्षणा का खण्डन करने के लिए कन्तक पहिले भामहकृत सहोत्रित अलद्दार का लक्षण तथा उदाहरण उद्धृत करते है- जहां दो वस्तुओ में रहने वाली और एक साथ होने वाली दो क्रियाएँ एक ही पद के द्वारा [एक साथ ] कहीं जाय वह सहोविति [नामक अलङ्ग ति विशेष] कहलाती है।१५०।। नैसे- [शीत ऋतु में कुहरा या] बर्फ गिरने से घुघली हुई दिशाओ से युक्त [पति पत्नियों के ] गाढ़ आर्लिगन की हेतुभूत रात्रिया कामी जनों की प्रतियो के साथ बढ़ती जाती है॥१५१॥ [ इस पर कुन्तक की टिप्पणी यह हं कि] यहाँ परस्पर [अर्रयात् यामिनियों और फामियों की, प्रीति का बढ़ना रूप ] साम्य का सम्बन्ध ही मनोहारित्व का कारण है। इसलिए [ साम्य पर आश्रित होने से भामह की श्र्परभीष्ट सहोकिति ] उपमा ही है। [ अलग अलद्धार नहीं है] ॥३६।। इस प्रकार भामह के अभिमत सहोक्ति अलद्धार का खण्डन करके कन्तफ अपना अभिमत सहोषिति अरलद्धार का लक्षण करते है- जहां वर्णनीय अर्थ की सिद्धि के लिए एक ही वाकय से [ अनेक ] अथो का एफ साथ कथन [ युगपदुषितः ] किया जाता है वह सहोपित [अलंद्धार ] सहृदयों ने [अलग] माना है। 88पाठ लोप सूचक चिन्ह। १ मामह काव्यालक्कार ३, ३६-४०। २. मनोहारिनिबन्घनम ।

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४६२ ] वकोपिति जीवितम् [ फारिफा ३७

प्रमाणोपपन्नमभिधत्ते तन्र सहोक्तेस्तावत 'यत्रेत्यादि'। सा सहोक्तिर- लंकृतिर्मता प्रतिभाता। 'सतां' तद्विदाम् समाम्नातेत्यर्थः । कीशी-'यत्र' यस्या एकेनैव वाक्येन अभिन्नेनैव पद्समृहदेन 'अर्थाना', वाक्यार्थतात्वर्यभूताक वस्तूना 'युगपत्' तुल्यकालमुक्तिरभिहिति । किमर्थम-'वर्णनीयार्थसिद्धये। वर्णनीयस्य प्राधान्येन विवचितस्यार्थस्य वस्तुन सम्पत्तये। तठिदमुक्त भवति- यत्र वाक्यान्तरवक्तव्यमपि वस्तु प्रम्तुतार्थनिष्पत्तये विच्दित्त्या तेनैव वाक्येनाभिवीयते। यथा- हे हस्त दक्षिण मृतस्य शिशोर्द्विजस्य जीवातवे विसृज शूद्रमुनो कृपाणम्। रामस्य पाशिरसि निर्भरगभेखिन्न- सीताविवासनपटो करुणा कुतस्ते ॥१५२॥

[ भामहकृत सहोकिति का लक्षणा ठीक न हाने से] प्रमाणसङ्गत, सहोषित के [स्वरूप ] को फहते हे 'यत्र' इत्यादि [ कारिका ] से। 'वह सहोकिति अभिमत' अर्थात ज्ञात है। 'सज्जनों को' अर्थात् उसको जानने कालों को [अभिमत हैं। अर्थात् उन्होंने] कही है यह अभिप्राय है। फँसी 'जहाँ' जिस [ अलकृति ] में 'एक ही वाक्य से' अर्थात् पदसमुदाय से 'अर्यो का' अर्थात् वाक्य को तात्पर्यभूत वस्तुओं फा 'युगपत्' अर्यात् एक साथ कथन किया जाता हैं। किसलिए कि 'वर्णनीय अर्य की सिद्धि के लिए'। वर्णनीय अर्थात् प्रधानत्वेन विवक्षित अर्थ अर्ात् वस्तु के सम्पादन के लिए। इसका यह अभिप्राय हुआ कि जहां ग्रन्थ वाक्य के द्वारा कहे जाने वाले अर्थ का भी प्रस्तुत अर्थ की सिद्धि के लिए सुन्दरता के साथ उसी वाक्य के द्वारा कथन कर दिया जाता है [ वह सहोषित नामक अलद्धार होता है ]। जसे- अरे वाहिने हाथ, मरे हुए ब्राह्मस के बालक के पुनरुज्जीवित करने के लिए शूव्र मुनि [तपस्या करने वाले शम्बूक] के ऊपर तलवार छोड। तू परिपूर्ण [नौ माह- के ] ग्भ से चलने आवि में असमर्थ सीता को निकाल देने में समर्थ [ निर्दयो] रामचन्द्र का हाथ है तुभे दया कहाँ से आ सफती है। [इसलिए निर्दयतापूर्वक एफ ही हाथ में इस तपस्या करने वाले शूद्र मुनि शम्बूक का गला काट वे] ॥१५२॥ १. उत्तररामचरित २, १०।

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कारिका ३७ ] तृतीयोन्मेष. [ ४६३

यथा वा- उच्यता स वचनीयमशेष नेश्वरे परुषता सखि साध्बी। 1 त्नयैनमनुनीय कर्थ वा विप्रियाणि जनयन्नुनेयः ॥१५३॥

कुन्तक के लक्षण के अनुसार यहाँ वर्णनीय अथ शम्बूक वध की सिद्धि के लिए मेने या रामचन्द्र ने नौ मास के पूरे गर्भ वाली सीता को भी निदयतापूर्वक घर से निकाल दिया इस अर्थ को एक ही वावय अर्थात श्लोक में कहू दिया हैं। अर्थात् वास्तव में इस बात के यहाँ कहने की कोई आवश्यकता नही थी, वह एक अलग विपय था और अलग वाक्य से उसको कहना चाहिए था। परन्तु इस समय जिस रूप में उसको इस एक ही वाक्य में कहा गया है उससे शम्बूक वघ रूप प्रकृत कार्य की सिद्धि और शधिक सरलता से हो जाती है। इसलिए प्रकृत अर्थ की सिद्धि के लिए ही वाक्यान्तर से वक्तव्य उस अर्थ को एक साथ कहा गया है। इसलिए इस प्रकार के वर्णन को कुन्तक सहोक्ति अलद्भार मानते है। कुन्तक ने भामह के सहोक्ति-लक्षण काखण्डन करके जो अपना लक्षण प्रस्तुत किया ह वह एकदम नया दृष्टिकोण है। अन्य किसी भाचार्य ने इस दृष्टिकोण से सहोक्ति का लक्षण नही किया है। उङ्ट ने भी भामह के ही लक्षण को ज्यो का त्यो अपना लिया है। उन्होंने सहोविति रदाहरण निम्न प्रकार दिया है- घुजनो मृत्युना साधे यस्याजी तारकामये। चक्रे चक्रमिधानेन प्रेयेशाप्तमनोरथ ।।५, ३० । अ्रन्यो के लक्षण-उदाहरण भी ऐसे ही है। कुन्तक की व्यास्या सवसे विलक्षर हैं। कुन्तक अपने लक्षण के अनुसार महोक्ति के दो उदाहरण और देते है- प्रथवा जसे- [हे सखि] वह [धूर्त नायक] जो चाहे सब कुछ कहें [ चाहे कितनी ही निन्दा करे पर में उमके पास कभी नहीं जा सकती]। इस पर नाथिका की सखी उससे कहती है कि] है सखि अपो स्वामी के प्रति कठोरता [फठोर व्यवहार करना] :अच्छी वात नहीं है जाओ उसको मना कर ले आओ [ इस प्रकार नायिका, समझाने वाली सखी से फिर कहती है] अप्रिय काम करते हुए उसको मनाया कैसे जा सकता हैं? [अर्थात वे जो चाहें करते रहें और में उनकी खशामव करती फिरूँ यह नहीं हो सकता है] ॥१५३।

१ किरात ६, ३६।

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४६४ ] घक्रोपिति जीवितम [कारिफा ३७

कि गतेन न हि युक्तमुपैतु' कः प्रिये सुभगमानिनि मानः । योपितामिति कथासु समेतैः कामिभिर्वहुग्सा घृतिर्हे॥१५४॥ I1 2 सर्वक्षितिभृता नाथ दप्टा सर्वानसुन्दरी। रामा रम्ये वनोद्देशे मया चिरहिता लया॥ १५५॥

निवद्धम्। [याथिका फहती है कि उसके पास] जाने मे प्या साभ हू। [ऐसे के पास] जाना उचित नहीं है। [इस पर ससी कहती है] अगे सपने को बटी सुन्दर ममभने वाली प्रिय से मान करना क्या उचित है। ददम प्रकार की स्त्रियो की बातनीत के अ्रवसर पर उन्हें सुनने के लिए इकटठे हुए कामियो को उन बानो में [ भिन्न-भिन्न व्यक्तियो कों अपनी-अरपनी भावना के अनुसार ] अ्रनेक प्रकार का श्रानन्द या धैर्यं प्राप्त हुआ॥१५४॥ इन दोनो श्लोको में विप्रलम्भ गद्गार की पुष्टि के लिए मान करने की और मान छोडने की दोनो प्रकार की वातें एक साथ कहो गई है। इमलिए कुन्तक इसमें सहोविति मानना चाहते है। सहोकिति के विषय में कुन्तक ने यह नया दृष्टिकोए प्रस्तुत किया है। इसी प्रकार का तीसरा उदाहरण विक्रमोर्वशीय का दिया है। जिसमें उर्वशी के वियोग में उन्मत्त हुए राजा पुरुरवा नदी पहाड आदि से अपनी प्रियतमा का पता पूछते हुए घूम रहे हैं। सामने हिमालय को देखकर वह उससे पूछते है कि- हे सारे पर्वतों के स्वामी कया आपने मुझ से वियुक्त हुई सर्वाङ्ग सुन्दरी स्त्री [उवंशी] को इस सुन्दर वन प्रदेश में हीं देखा है ॥१५५॥ यहाँ प्रधानभत विप्रलम्भ शृङ्गार रस के परिपोषण को सिद्धि के लिए वो प्रकार के वाक्यों की रचना [ एक साथ] की गई है। [श्रत यहा सहोषित अलद्धार है ]। इसके बाद कुन्तक ने यह प्रश्न उठाया है कि सहोक्ति में यदि एक ही वाक्य से अ्र्परनेक अर्थ कहे जाते है तो फिर उसमें श्लेष का अ्र्नुप्रवेश क्यो न मान लिया जाय अर्थात् जसे भामह के सहोक्ति के लक्षण को आपने उपमा के अन्तर्गत कर दिया है।" इसी प्रकार आपका सहोवित का लक्षण यदि माना जाय तो उसमें एक ही वावय से भनेक अरथो का कथन होने से उसे श्लेष के अन्त्गत कर लेना उचित होगा। इस प्रश्न को उठाकर आागे कुन्तक ने इसका समाधान करने का प्रयत्न किया है। यद्यपि यह १ किरात ६, ४० । २ विक्रमोवंशीय।

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कारिका ३७ ] तृतीयोन्मेष [४६५

ननु चानेकार्थसम्भचेSत्र श्लेपानुप्रवेश कर्थ न सम्भवति। अभिधीयते तत्र यस्माद् द्वयोरेकतरस्य वा मुख्यभावे श्लेप तस्मिन् सुनस्तथाविधाभावात, वहूना द्वयोरवा सर्वेषामेव गुएभाव प्रधानार्थे- परत्वेनावसानात्। अन्यच्च तस्मिन्नेकेनैव शव्देन युगपत्प्रदीपप्रकाशवदर्थद्वयप्रकाशनं शब्दार्थद्वयप्रकाशनं वेति शब्दस्तन्न सामान्याय विजम्भते। सहोक्तेः पुनस्तथाविधस्वाद्गाभावादेकेनैव वाक्येन पुनः चस्त्वन्तरप्रकाशन विधीयते पुनरावर्तमानतया तस्मादावृत्तिरत्रशब्वन्यायतां प्रतिपद्यते -

प्रकरण भी पाठ की खराबी के कारण अस्पप्ट है फिर भी कुन्तक का मुख्य अभिप्राय उससे मालूम हो सकता है। कुन्तक लिखते है- [प्रश्न ] एक ही वाक्य से अ्रनेक अ्र्र्थ सम्भव होने पर यहां [ सहोषित में ] इ्लेप का अ्नुप्रवेश किस प्रकार सम्भव नहीं होता है। [उत्तर ] यह कहते है। क्योंकि वहाँ [ श्लेष स्थल में ] दोनों अथवा किसी एक के मुख्य भाव होने पर श्लेष होता है। और उस [सहोकिति] में उस प्रकार के न होने से। बहुतो का अथवा दो का [ जितने भी प्रतिपाद्य है] उन सब ही का प्रधान परत्वेन पर्यवसान होने से गोखता ही है।[ श्लेष तथा सहोषिति में प्रथम भेद यह हैं कि श्लेष में कहीं दोनो का मुख्यभाव रहता है और कहीं एक का, परन्तु सहोषित में किसी का भी मुस्यभाव नहीं रहता है। सहोकिति के रूप में कहे जाने वाले दोनों का गुए भाव होता है। प्रधानता उसकी होती है जिसकी सिद्धि के लिए गौणों का सहभाव वशिगत होता है]। दूसरी बात यह है कि और उस [ श्लेष ] में एक ही शब्द से प्रदीप के समान एक ही साथ दो अथो अथवा शब्द और अर्थ दोनों का प्रकाशन होता है। इसलिए उममें शब्द [ उन दोनो प्रथों के बोधन में ] सामान्य हो जाता है। सहोषित में उस प्रकार [ वाक्य के अवयवभूत शब्दो के समान ] अपने - शङ्ग न होने से एक ही वाक्य बार-बार आवृत्त होकर दोनों अर्थो को प्रफाशित करता है। इसलिए यहां [ सहोकिति में वाक्य की पुनः पुनः ] आ्वृत्ति [ श्लेष के ] शब्द -के [न्याय] स्थान को प्राप्त करती है। [अर्थात् जैसे एक दीपक एक साथ भ्रनेक अ्रर्थों को प्रकाशित करता है। इसी प्रकार श्लिष्ट शन्द एक साथ अ्ननेक अ्र्र्यो को प्रकाशित करता है। परन्तु सहोषिति में सारा वाक्य आवृत्ति द्वारा दूसरे अर्य को प्रकाशित करता है। यह श्ले तथा सहोकि्ति का दवूसरा भेद है]। 0पाठ लोप।

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४६६ ] वत्नोदितजीवितम् फारिका २७

'सर्वत्तितियृता नाथ' इत्यत्र वाक्येरुढेशे श्लेपानुप्रवेश. सम्भनति। उच्यते तत्र वाक्येकदेशे ग्लेगम्यान्वत्वम, मुख्यभाव पुन सहोक्तेरेव। तदेवमावृत्य वस्त्वन्तरावगतो सहोक्ते परिहाणि प्रसज्येत। नैतटस्तीति। यस्मान् सहोक्तिरित्युक्तम, न पुन महप्रतिपत्तिरिति तेनात्यन्तसहाभिधानमेव प्रतिपन्नोत्कर्पावगतिरिति न कि्चिदसम्बद्वम। कैश्चिदेपा समासोवित सहोवित कश्चिदुच्यते। अर्थान्वयाच्च विदृटद्धिरन्येरन्यत्वमेतयो: ॥१५६।।

[प्रशन] 'सर्वक्षितिभृता नाथ' इस वाक्य के एकदेश में[क्षितिभृत् का अरयं राजा तथा पर्वत दोनो होने से। श्लेप का प्रनुप्रचेश हो सकता है। [उत्तर] कहते है। [अर्थात इसका समाधान फरते है ]। यहां वाक्य के एक वेश में [ जो श्लेष है उस] का अ्रङ्गभाव [गौसत्व] हैं और मुखयता सहोषित की ही है।[परर्थात् यहां इलेष गौसा हे औीर सहोकिति मुख्य है उन दोनों का अ्रङ्गाद्गिभाव सङ्र है ]। [प्रशन-आपने प्नभी यह कहा था कि सहोिति में वाक्य की आरवृत्ति द्वारा दूसरे अर्थ की प्रतीति होती है। यदि ऐसा है तो इस प्रकार वाव्य की] आवृत्ति करके अ्रत्य पार्थ की प्रतीति होने पर सहोक्ति [शब्द] के सहभाव [रूप] अर्थ के अ्रव्वय में हानि होगी। [अ्रर्थात् दोनो पदार्थो की एक साथ प्रतीति न होने से सहभाव न होने से उसको सहोवित कसे कहा जायगा] ? [उत्तर] यह [कहना] ठीक नहीं है। क्योकि [सहोषित शब्द में] साथ कथन • करना कहा है साथ प्रतीति होना नहीं। अत [ एक शब्द से ] अत्यन्त एक साथ कथन करना ही यहाँ स्वीकृत उत्कर्ष की प्रतीति कहलाती है इमलिए[ वाक्य की श्रावृत्ति से अन्य अर्थ की प्रतीति मानने पर भी। कोई दोष नही है। कुछ लोग इस को समासोषित और कुछ लोग इसको सहोषित कहते हैं। श अ्रन्य तिद्वान् ['समासेन सक्षेपेण उकित समासोचित। तथा सह उकति सहोकिति' इस प्रकार दोनों के] अर्थ के अन्वय से इन दोनों को अलग-अलग [अलद्धार] मानते है। [इनमे से कुन्तक, भामह की समासोषित तथा सहोषित दोनों का खण्डन कर आए हे इसलिए उन दोनो के स्थान पर वह इसको ही मानते है ] ॥१५६॥३७॥

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परिका ३८ ] तृतीयोन्मेषः [ ४६७

दृष्टान्तं तावदभिघत्ते वस्तुसाम्येत्यादि- चस्तुसाम्यं समाश्रित्य यदन्यस्य प्रदर्शनम्।

'यदन्यस्य' वसर्यमानप्रस्तुताद् व्यतिरिक्तवृतेः पदार्थान्तरस्य प्रदर्शनमुप- निवन्धन स दृष्टान्तनामालद्वारोऽभिधीयते। कथम्-'वस्तुसाम्यं समाश्रित्य' नस्तुन पदार्थयोर्दष्टान्तदा्ष्टान्तिकयो' साम्यं सादृश्य, समाश्रित्य निमित्ती- कृत्य। लिङ्गसख्याविभक्तिस्वरूपसाम्यजितमिति वस्तुग्रहराम्।

यथा-

२२ दृष्टान्त पप्रलङ्धार- इसके बाद कुन्तक ने सक्षेप में दृष्टान्तालद्वार का विवेचन किया है। इसके लक्षण की कारिका का पुनरुद्वार करके ऊपर अद्धित कर दिया गया है। वृत्ति ग्रन्थ से भी उसके चतुर्थ चरस का अनुमान नही किया जा सका है। वृष्टान्त [अरलद्धार ] को कहते हैं। 'वस्तु साम्य इत्यादि'- वस्तु की समानता को देखकर जो [प्रस्तुत वस्तु के साथ] अ्रन्य [अप्रस्तुत वस्तु] का प्रदर्शन करना है [उसको दृष्टान्तालङ्कार कहते है] ॥३६॥ जो अरन्य का अर्थात् वर्ण्यमान रूप प्रस्तुत पदार्थ से भिन्न अ्रन्य [ श्रप्रस्तुत ] पदार्थ का प्रदर्शन अर्थात् [काव्य में ] व्णन करना है वह दृष्टान्त नामक अलद्धार कहा जाता है। कैसे कि, 'वस्तु की समानता को अ्वलम्बन करके'। वस्तु अर्थात् दृप्टान्त तथा दाष्टान्तक रूप दोनो पदार्यो के साम्य अर्थात् सादृश्य को अवलम्वन कर अर्थात् कारण मानकर। [जो अरन्य वस्तु का प्रदर्शन करना हैं वह दृष्टान्त नामक अलद्धार कहा जाता है। ] वस्तु [पद ] का ग्रहण इसलिए किया है कि [केवल] लिद्ग, सख्या, या विभक्ति स्वरूप साम्य को छोडकर [यथार्थ वस्तु के साम्य में ही यह वृष्टान्तालद्धार होता है। यह अभिप्राय है। इसके उदाहरण रूप में शकुन्तला नाटक का १, २० श्लोक के तीन चरण उद्ृत करते हैं]। जसे-

१ 'सोऽयमत्रामिधीयते' यह पाठ हुमने बढाया है।

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४६८ ] [ कारिका ३६

'सरसिजमनुविद्ध' शेवलेनापि रम्य मलिनमपि हिमाशोर्लक्षम लद्षमी तनाति। इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिव हि मधुराणा मएडन नाऊतीनाम ।।१५७।। पादत्रयमेवोदाहरएं, चतुर्थे भूपखान्तरसम्भवात ।।२८॥। अर्थान्तरन्यासमभिघत्ते वाक्यार्थेत्यादि। वाक्यार्थान्तरविन्यासो मृख्यतात्पर्यसाम्यतः । ज्ञेयः सोर्ऽर्थान्तरन्यासः यः समर्पक्तयाहितः ॥३६॥ 'ज्ञेयः सोऽर्थान्तरन्याम' थर्थान्तरन्यासनामालद्वारो नेय परिज्ञा- तव्य.। क-'य वाक्यार्थान्तरविन्यास' परम्परान्वितपदएमुदायाभिधेय वस्तु

शैवाल [ सिवार नामक जल की घास] से घिरा हुआ भी कमल रमसीय लगता है। चन्द्रमा का काला कलङ्ू भी सौन्दर्य को प्रकाशित करता है, इसी प्रकार यह तन्वी शकुन्तला वल्कल वस्त्र घारस किए हुए भी अत्यन्त सु.दर लग रही है।१५७॥ [ इस श्लोक के यह ] तीन चरस हो [ इस दृष्टान्तालद्गार के ] उदाहरण है। चौथे चरस में [ अ्रर्थान्तरन्यास नामक]दूसरा अ्रलद्धार सम्भव होने से। [ उस चौय चरण को आ्रगे अर्था्तिरन्यास अ्रलद्धार के उदाहरण के रूप में उद्धत किया है] ।३८ ।। २३. परर्थान्तरत्यास अ्रलङ्गार- [इस प्रकार दृष्टान्तालङ्गार के विवेचन के वाद] अर्थान्तरन्यास अलङ्धार को 'वाक्यार्थ' इत्यादि [कारिका] मे कहते है। [उसकी पुनरुद्धार की हुई कारिका, ऊपर दी गई हं, का अर्थ इस प्रकार हैं]- मुख्य तात्पर्य के साथ समानता होने से [ विचक्षित श्रर्थ के ] समर्पक रूप में निबद्ध किया हुआ दूसरे वापयार्थ का विन्यास अर्थान्तरन्यास [अ्रलङ्धार] कहलाता है। उसे अर्थान्तरत्यास समभना चाहिए, अथात् अर्थात्तरन्यास नामक अलङ्गार उसको जानना चाहिए। कौन सा, कि जो दूसरे वाक्यार्थ का विन्यास है। परस्पर एक दूसरे से अन्वित पद समुदाय के द्वारा प्रतिपादित वस्तु 'वाक्यार्थ' होता हैं। १. अभिज्ञान शाकुन्तल १, २०।

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का ३६] तृतीयोन्मेष यार्थः । तस्मादन्यत् प्रकृतत्वात् प्रस्तुतव्यतिरेकि 'वाक्यार्थान्तरम्'। 'विन्यासो' विशिष्टं न्यसन तदविदाह्वादकारितयोपनिव्व। कस्मात् रणात्-'मुख्यतात्पर्यसाम्यत"। 'मुख्य' प्रस्तावाधिकृतत्वात् प्रधान वस्तु स्य 'तात्पर्ये' यत्परत्वेन तदुपात्तम् ।9 तस्य साम्यत सादृश्यात्। कथम, समर्पकतयाहितः' समर्पकत्वेनोपनिबद्ध।तदुपपत्तियोजनेनेति यावत्। यथा- १ किमिव हि मधुरारणां मएडन नाकतीनाम् ।१५८॥। यथा वा- २सप्रसशय क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यमस्याममिलाषि मे मनः । 1 सता हि सन्देहपदेपु वस्तुषु प्रमाण मन्तःकरएप्रवृत्तय:॥१५६३६॥। प्रकृत [वर्ण्यमान ] होने से [ वाक्यार्थ प्रस्तुत हुआ्प्रा औ्र्प्रौर वाक्यार्यात्तर अथवा दूसरा वाक्यार्थ उस ] प्रस्तुत से भिन्न अर्थ या दूसरा वाकयार्थ हुआ। उस [अ्प्रस्तुत 'वाक्यायं] का विन्यास अर्थात् विशेष प्रकार का न्यास अर्थात् सहृदयहृदयाल्हादकारितया उपनिबन्ध [अर्थान्तरन्यास नामक अलद्धार होता है]। किस कारण से कि, 'मुख्य के तात्पर्य की समानता से'। मुख्य अर्थात् प्रकरण में प्रतिपाद्य होने से प्रधान भूत वस्तु उसका जो तात्पर्य अर्थात् जिसके बोधन के लिए उसको प्रहण किया गया है उसकी समानता से सावृश्य से। कैसे कि, समर्पक रूप से रखा हुआ, प्रतिपादक रूप से निबद्ध किया हुआ उसके उपपादन की योजना से। [ उपनिबद्ध ] यह अभिप्राय हुआर्प्रा। [अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक के जिस 'सरसिजमनुविद्ध शंवलेनापि रम्य' आदि श्लोट के तीन चरस ऊपर वृष्टान्तालद्गार के उदाहरण रूप में दिए जा चुके हैं उसी। अवशिष्ट चौया चरण इस अर्थान्तरन्यास अलद्धार का उदाहरण है ]। जैसे- [मधुर] सुन्दर आकृति वालो के लिए क्या आभूषण नहीं होता है॥१५ अथवा जैसे-[अभिज्ञान शाकुन्तल का उसी प्रफरण का दूसरा श्लोक] क्योंकि मेरा [आर्य] श्रेष्ठ मन इस [शकुन्तला] को [प्राप्त करना] है, इसलिए यह अवश्य ही क्षत्रिय के लिए [ पत्नी रूप में ] ग्रहण करने ये क्योंकि सन्दिग्ध वस्तुओ [ की उपादेयता या अनुपादेयता ] के विषय में स अन्तःकरण की वृत्ति ही प्रमाण होती है॥१५६॥ १ 'यत्परत्वेन तदमत्त' इति भ्रष्ट पाठ। अ्नभिज्ञान शाकुन्तलम् १, २०। ३ अ्रभि० शाकु० १, २२

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४७०] वकोकितिजी वितम् [ फारिफा ४०

आरप्राक्षेपम भिधत्ते निषेवन्छाययेत्यादि। निपेधच्छाययाऽन्तेपः कान्तिं प्रथयितुं पराम्। त्राक्षेप इति स ज्ञेयः प्रस्तुतस्येव वस्तुनः ॥४०।। 'आन्तेप इति स ज्ञेय" सोडयमानेपालक्वारो नातव्य.। स कीहशः- 'प्रस्तुतस्यैव वस्तुन' प्रकृतस्यैवार्यस्य 'आ्र्प्रत्तेपः' चेपकृत्। त्र्प्रभिप्रेतस्यापि निव- तनमिति। कथम्-'निपचच्छायया', प्रतिपेधविच्छित्या। किमर्थम्-'कान्तिं प्रथयितु पराम्', उपशोभा प्रकटयितु प्रकृष्टाम् ॥8।।४?।।

[सुन्दर आकृति बालो का क्या साभूपण नही होता है सब ही कुछ अलद्धार स्वरूप होता है इस सामान्य नियम को कहकर वल्कलघारिणी शकुन्तला के सौन्दय की पुष्टि की गई है। यह दृष्टान्त 'समर्पकतया श्राहित हुग है' अतएव यहां दृष्टान्तालङ्कार है। इसी प्रकार 'सन्दिग्ध वस्तुओ की उपादेयता के विपय में सज्जनो के अन्त करण की प्रवृत्ति ही प्रमाण होनी है' इस सामान्य नियम से शकुन्तला के ग्रहण की योग्यता का समर्थन किया गया है। इसलिए नत्रीन आचार्य इसको सामान्य से विशेप के समर्यन रूप से अर्थान्तरन्यास अलद्कार मानते है] ॥३६॥ २४ पक्षप अलद्धार- [अर्ान्तरन्यास अलद्धार के वाद कुन्तक ] निषेधच्छायया इत्यादि [कारिका में] आ्रक्षेप [नामक अलद्धार] को कहते है। उसका लक्षण निम्न प्रकार है- प्रस्तुत वस्तु का ही सौन्वर्य की अत्याधिक वृद्धि के लिए निषेधाभास रूप से आाक्षेप [निन्दा] आ्रक्षेप अलद्धार कहलाता है। 'उसको आक्षेप समभना चाहिए' अर्यात् वह आ्रक्षेप नामक अलद्धार कहा जाता है। वह किस प्रकार का कि, प्रस्तुत वस्तु का ही अर्थात् प्रकृत अर्थ का ही आ्रक्षेप अर्थात् निषेध करने वाला। अभिप्रेत इष्ट वस्तु का भी निषेध करना। किस प्रकार कि, 'निषेध की छाया' अर्थात् प्रतिपेध द्वारा सौन्दर्य से। फिस लिए 'अत्यन्त कान्ति का विस्तार करने के लिए' अर्थात उत्तम उपशोभा को प्रकट करने के लिए। इसके उदाहरण रूप मे एक प्राकृत पद्य दिया है। परन्तु उसका लेख अत्यन्त भस्पष्ट है अत पढने में न आ सकने से नही दिया जा सका है॥४०॥ २५ विभावना अलङ्धार- इस प्रकार आक्षेपालद्दार के निरूपण के बाद कुन्तक ने विभावनालद्कार का निरूपण किया है। पुनरुद्धार की गई कारिका के अनुसार उसका लक्षण इस प्रकार हं- कपाठ लोप।

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कारिका ४१ ] तृतोयोन्मेष [४७१

कारण- प्रतिषेधोत्तेजिता तिशयमभिघत्ते स्वकारणोत्यादि - वर्णानीयस्य केनापि विशेषेण विभावना। स्वकारसपरित्यागपूर्वकं कान्तिसिद्ये ।।४ १।। 'वर्सनीयस्य' प्रस्तुवस्यार्थस्य 'विशेपेण' केनाप्यलौकिकेन रूपान्तरेख विभावनेत्यलंकृतिरभिधीयते । कथम्-'स्वकारणपरित्यागपूर्वकम्'। तस्य विशेषस्य स्वमात्मीयं कारण यन्निमित्त तस्य परित्याग प्रहाणं पूर्व प्रथम यत्र। तत्कृत्वेत्यर्थ. । किमर्थ-'कान्तिसिद्धये' शोभानिष्पत्तये। तदिदमुक्तं भवति-यया लोकोत्तरविशेषविशिष्टता वर्णनीयता नीयते। यथा- उरसम्भृत मडनमन्ग यष्टेरनासवाख्यं करणा मदस्य । कामस्य पुप्पव्यतिरिक्तमस्त्र बाल्यात्परं साथ वयः प्रपेदे॥१६०।। इस प्रकार स्वरूप के प्रतिषेध से जिसमें वैचित्रय का अ्तिशय होता है इस प्रकार के [आ्रक्षेप नामक पूर्वोक्त ] अलङ्गार को कहकर अव कारण के प्रतिषेध से परतिशययुक्त [विभावना नामक अलङ्धार ] को 'स्वकारण' इत्यादि [कारिका] से फहते हैं- किसी विशेषता के फारस, सौन्दर्य की सिद्धि के लिए वर्णनीय [पदार्थ रूप कार्य] का अपने कारण के बिना ही वर्गन करना विभावना अलद्धार होता है। 'वर्णनीय' अर्यात् प्रस्तुत अर्थ की 'विशेषता' से किसी अलौकिक रुपान्तर से [प्रदर्शित करना ]विभावना [नामक] अलद्धार कहा जाता है। कैसे कि 'अपने कारण के परित्यागपूर्वक' अर्ात् उस विशेष का जो अपना कारण उम कारण का परित्याग पूर्व अर्थात् प्रथम जिस में हं। अर्थात् उस [ कारण के परित्याग ] को करके। किस लिए कि 'कान्ति की सिद्धि के लिए' अर्थात् शोभा के सम्पादन के लिए। इसका अभिप्राय यह हुआ कि जिससे [वस्तु की] लोकोत्तर विशेष युक्तता वर्णनीयता को प्राप्त कराई जाती है। [अर्थात् वर्णनीय वस्तु के शोभातिशय के लिए बिना कारण के कार्य का वर्णन विभावना अलद्धार कहलाता है ]। जैसे- शरीर के, बिना धारण किया हुए आभूषण, बिना आसब [ मदिरा ] के मद को उत्पन्न करने वाले, और काम के पुष्प से भिन्न वास रूप वाल्यावस्था के बाद की [यौवन] अवस्था को वह [ पावंती ] प्राप्त हुई ॥१६०॥ १. एवं स्वरूप । २ कुमारसम्भव १, ३१ ।

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४७२ ] वफ्रोपितिजीवितम् [कारिफा ४२

म्म्रन्न कृत्रिमकारणपरित्यागपूर्वकं लोकोत्तरसहजविशेपविशिष्टता कवेरभिप्रेता।४१।। तटेवमसम्भाव्यकारणलादविभाव्यमानस्वभावता विचार्य विचार -- गोचरस्वरुपतया म्वरूपमन्देहममर्पितातिशयमभिवत्ते, ग्स्मिन्नित्यादि। यस्मिन्नुत्प्रेचितं रूपं मन्दहमेति वस्तुनः । उत्ग्रेक्षान्तरसद्भावात् विच्छित्त्य 'सन्देहां मतः ॥४२॥ यस्मिन्नलद्वरणे सम्भावनानुमानात् साम्यसमन्वयाच्च स्वरूपान्तर- समारोपट्ठारे 'उत्प्रेक्ित'प्रतिभालिखित 'रूप' पदार्थपरिस्पन्दलत्तण 'मन्हेहमेति' संशयमारोहति। कम्मात् कारखात्-'उत्प्रेक्षान्तरसद्भावात्'। उत्मेक्षाप्रकर्ष- परस्यापरस्यापि तद्विपयस्य सद्भावात् । किमर्थ 'विच्छित्य' शोभायै। तटेवंविधमभिधावैचित्र्य सन्देहाभिधान वदन्ति। यहाँ कृत्रिम कारसो का परित्याग करके लोफोतर सहज सीनवर्य [विशेष] विशिष्टता [का वर्णन] कवि को अ्ररभिप्रेत है ॥४१॥ २६ सन्देह अलद्धार- इस प्रकार विभावना का निरुपण करने के बाद कुन्तक ने सन्देहालद्वार का निरूपण किया है। उसके लक्षण की कारिका का उद्धार कर ऊपर देने का प्रयत्न किया है। कुन्तक ने सन्देह का वणन इस प्रकार किया है। इस प्रकार [विभावनालङ्गार में] कारण के अ्सम्भाव्य होने से [ कार्य की] असम्भाव्यमान स्वभावता का विचार करके [विचार योग्य स्वर्प होने से ] अपने स्वरूप के सन्देह से अतिशय को समर्पित करने वाले [सन्देह अलद्धार को ] को 'यस्मिन्' इत्यादि [ कारिका से ] कहते हैं- जिसमें सौन्दर्य विशेष के आधान करने के लिए वस्तु का उत्प्रेक्षित स्वरूप दूसरे की उत्प्रेक्षा के भी सम्भव हीने से सदेह पड जाता है वहाँ सन्देहालद्वार होता है। जिस अलद्गार में सम्भावना द्वारा अ्रनुमान से और सादृश्य के मेल से भ्न्य स्वरूप के समारोपण द्वारा 'उत्प्रेक्षित' अर्थात् प्रतिभोल्लिखित रूप अर्थात् पदार्थो का स्वभाव सन्देह में पड जाता है [ उसको सन्देहालद्धार कहते हैं ]। किस कारण से [ स्वरूप सन्वेह में पड जाता है कि ] 'अन्य [पकार की] उत क्षा सम्भव होने से'।M उत्प्रेक्षा के प्रकर्षपरक अ्रन्य के भी उस विषय के होने से। किसलिए कि-'विच्छित्ति' अर्थात् शोभा के लिए। इस प्रकार के कथन शैली के वैचित्य को सन्देह नामक [अरलङ्गार ] कहते है। १. 'सन्देहो मत' ये शब्द वृत्ति में नही है। हमने जोडे है। २. 'परस्यापि' इतना ही पाठ था 'परस्यापरस्यापि' हमने बनाया है।

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क्रारिका ४२ ] तृतीयोन्मेष [४७३

यथा-

रब्जिता नु विविधास्तरुशैला नामितं नु गगनं स्थगितं नु। पूरिता नु विषमेपु धरित्री संहृता नु ककुभास्तिमिरेण ।।१६१।। यथा वा- निमीलदाकेकरलोल चन्तुपा प्रियोपकरटं कृतगात्रवेपथुः । निमज्जतीना श्वसितोद्धतस्तन. श्रमो नु तासा मदनो नु पप्रथे।।१६२।।

जैसे- [किरातार्जुनीय में सन्ध्याकाल के वर्णन के प्रसङ्ग में यह श्लोक आाया हैँ। जो सन्ध्याकाल के उतरते हुए अ्न्घकार का वर्णन इस सुन्दर रूप में कर रहा हैँ। अन्धकार के हो जाने से वृक्षादि काले-काले मालूम पछते है उनको देखकर कवि कह रहा हैँ कि ] क्या नाना प्रकार के वृक्ष तथा पर्वत आदि आदि [ कज्जल से ] रग दिए गए है [ जो सब काले-फाले ही लगते है ] अथवा क्या [किसी ने] नीले आकाश को नीचे भुका लिया है अथवा [ उस आकाश ] को भर दिया है [जो सामने आकाश में कालिमा ही कालिमा दिखलाई दे रही है] क्या पृथिवी के गढ़े किसी ने भर दिए है [जिससे कि सारी पृथ्वी एक-सी दिखलाई देती है। ऊंचे नीचे का कहीं फोई ज्ञान नहीं होता है] अथवा अन्धकार ने दिशाओ को इकट्ठा कर विया है॥१६१।। अथवा जसे [दूसरा उदाहरण]- [नदी में स्नान के समय अपने] प्रिय के समीप ही नहाती हुई [ उन नायिकाओ की प्ाँखो में पानी पड जाने से ] तनिक लाल और चचल नेत्रों वाली उन [स्त्रियों] के शरीर में कम्प को उत्पन्न करने वाला और साँस के फूलने से या जोर से चलने से स्तनो को हिला देने वाला श्रम [ थकावट उनके शरीर में ] फैली अथवा कामदेव व्याप्त हुआ। [ क्योकि ये चिन्ह दोनों ही अ्रवस्थाओों में हो सकते हैं] ।१६२।

[इसके बाद दो उदाहरण इसी सन्देह अरलद्गार के औौर दिए हं परन्तु उनमें से एक जो प्राकृत भाषा में है वह पढने में नहीं आया *। दूसरा जो संस्कृत का है वह आगे दिया जा रहा है]- १. किरात ६, १५। २ किरात र, ५३।

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४७४ j वक्रोपितजी वितम् [ कारिफा ४३

यथा वा- कि सोन्दर्यमहार्थसञ्चितजगत्काश करतन विधे: कि श्रृद्गारसरःसरोरुहमिदं स्यात् सौकुमार्यावधि। कि लावययपयानिधेरमिनव बिम्व सुधादीधिते- र्वक्तुं कान्ततमानन तव मया साम्य न निश्चीयते ॥१६३।।

एव स्वरूपसन्देहसुन्दर ससन्नेहमभिवाय स्वरूपापन्हुतिरमणीयाम- पन्हुतिमभिधत्ते 'अन्यदित्यादि'- अन्यदर्पीयेतु रूपं चर्शनीयस्य वस्तुनः । स्वरूपापन्हवो यस्यामसाचपन्ह्ुतिर्मेता ॥४३॥

प्रथवा जैसे- [ हे प्रिये तुम्हारा यह मुख ] क्या सौन्दर्य रूप परम तत्त्व का सञ्चित विघाता का सारे जगत् का जो एक ही कोष है उसका प्रद्वितीय [सब से बहुमूल्य ]रत्न हैं, अथवा क्या सुन्दरता की पराकाष्ठा रूप यह शृद्गार रूप तालाब का कमल हं, अथवा क्या लावण्य के सागर का [ उससे निकला हुआ ] चन्द्रमा का नया विम्ब है [ इस प्रकार सन्देह मे पड जाने के कारण ] तुम्हारे अ्त्यन्त सुन्दर मुख का वर्णन करने के लिए कोई उपमा [साम्य] निश्चय नहीं हो पा रही है ॥१८३॥ कुछ लोगो ने सन्देह के शुद्ध सन्देह, निश्चयगर्भ सन्देह या निश्चयान्त सन्देह आदि रूप से भनेक भेद किए है। परन्तु कुन्तक उसका एक ही प्रकार बतलाते हैं- सन्देह का [ सब ही भेदो के ] उत्प्रेक्षामूलक होने से एक ही प्रकार है। [अर्थात् उसके अ्रवान्तर भेद करना उचित नहीं ]॥४२॥ २७ अपन्हुति अलङ्धार- इस प्रकार अपने रूप में सन्देह से सुन्दर, सन्देह' अलद्धार को फहकर श्ब अपने स्वरूप की अपन्हृति से रमणीय अ्रपन्हुति [अलद्धार ] को 'श्रन्यद्' इत्यादि [कारिका] से कहते है- जिसमें वर्णनीय वस्तु को अ्र्न्य [ अप्रस्तुत ] स्वरूप प्रदान करने के लिए उसके अपने स्त्ररूप को छिपा दिया जाता है वह अपन्हृति अलद्धार माना जाता है। कपाठ लोप।

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कारिका ४३ ] तृतीयोन्मेष. [४७५

पूववदुत्प्रेक्षामूलत्वमेव जीवितमस्याः । सम्भावनानुमानात् सादृश्याच्च 'वर्णनीयस्य वस्तुन" प्रस्तुतस्यार्थस्य 'अ्रन्यत्' किमप्यपूर्व 'रुपमर्पयितु' रूपान्तर 'विधातुं 'स्वरूणपन्हवः' स्वभावापलापः सम्भवति यस्यामसौ तथाविधभखिति- रेवापन्हुतिर्मता प्रतिभाता तद्विदाम्। यथा- 8पूर्णोन्दोः परिपोषकान्तवपुषः स्फार प्रभाभासुर नेद मएडलमभ्युदेति गगने भासोज्जिहीर्षोर्जगत्। मारस्योच्छितमातपत्रमघुना पारादुप्रदोषश्रियो मानो वन्घुजनाभिलाषदलनोऽद्योच्छिद्यते कि न ते ॥१६४॥। २४वें आ्र्प्राक्षेप अलद्धार में वस्तु के स्वरूप का निषेध था। २५वे विभावना अरलद्कार में उनके कारण का निपेध सौन्दर्यजनक था। २६वे सन्देह अलद्कार में वस्तु के स्वरूप में सन्देह के कारण रमणीयता थी। यहाँ २७वें अपन्हुति अलद्दार में उस स्वरूप सन्देह से एक कदम और आगे बढकर उसके स्वरूप का अपहव ही हो जाता है। इसलिए सन्देह के वाद अपन्हुति का वणंन करते है। यह उनकी सङ्गति का अरभिप्राय है जो वहुत सुन्दर है। इसी प्रकार पिछले अलद्कारो में भी उनकी सगति-योजना सुन्दर बनी है। पूर्ववत् [ सन्देह के समान ] उत्प्रेक्षामूलकत्व ही इस [ अपन्हुति ] की जान है। सम्भावना के द्वारा प्रनुमान से औ्र्प्रौर सावृश्य से वर्णनीय वस्तु का अर्ात् प्रस्तुत अ्रर्थ को कुछ और अपूर्व सौन्दर्य प्रदान करने के लिए, उसका रूपान्तर करने के लिए अपने रूप का अपन्हव अर्यात् अपने स्वभाव का निषेध जिसमें हो सकता है उस प्रकार की कथन शैली ही 'अपन्हुति' मानी जाती है। अर्थात् विद्वानों को प्रतीत होती है। इसके वाद इस 'अपन्हुति' के तीन उदाहरण कुन्तक ने दिए है। जिनमें से केवल एक पढा जा सका है। जो ऊपर दिया गया है। शेष दो पढने में नही आते। जँसे- अपनी कान्ति से जगत् का [अन्वकार से] उद्धार करने के इच्छक और 'परिपुष्ट हो जाने से सुन्दर स्वरूप वाले पूर्ण चन्द्र का यह मण्डल आकाश में उदय नहीं हो रहा है पपितु पाण्डु वर्स सन्ध्या को लक्ष्मी के ऊपर यह कामदेव का छत्र उठ रहा [दीखता] है, वन्युध्नो की इच्छा को नप्ट कर डालने वाला तेरा मान क्या श्रव भी नहीं मिटेगा ॥१६४॥

कपाठ लोप।

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४७६ ] [फारिका ४३

'तव कुसुमशरत्व शीतरश्मितमिन्दोर्द् यमिदमययार्ग हज्यते मदिधेपु। विसृजति हिमगर्भरग्निमन्तर्मयृग्स्त्वमपि कुसुमवारान बज्रसारीकरोपि ॥१६४। ससृप्टिर्यथा- आश्लिप्टो नवकु कुमारुणरनिव्यालोकितगश्रितो लम्वान्ताम्वरया समेत्य भुवन ध्यानान्तरे मन्यया। चन्द्राशूत्कर को र का कुलमति र्वान्तद्टिरे फोडघुना देव्या स्थापितदोहंद कुरबके भाति प्रदोपागम ॥१६६।। इसमें चन्द्रमा के अपने स्वत्प का म्रपन्हव कर उम को काम के छय के रूप में प्रस्तुत किया गया है अ्र्प्रत अ्पन्हुति अलक्वार है। [हे कामदेव लोग तुमको 'कुसुमशर' कहते हं अ्रर्ात् तुम्हारे वाए फूलो के हं। और चन्द्रमा को शीतरश्मि कहते हं अ्र्यात् उसकी किरसें शीतलता प्रदान फरती है। रन्तु वास्तव में ] मेरे जैसे [ वियोगियो] के लिए तो तुम्हारा 'कुसुमशरत्व' और दब्ब्रमा का 'शीत रश्मित्व' ये दोनो ही वाते मिथ्या जान पडती है। क्योकि चन्द्रमा पपनी [उन तथाकथित ] हिमगर्भ [शीसल] किरणों से [ मेरे जैसो के लिए ] आाग बतलाता है और तुम्हारे [तथाकथित] पुष्पवाए वञ्र वन रहे है॥१६५॥ २८ ससृष्टि प्रल्धार- इस प्रकार अपन्हुति अलद्दार का निरुपण करने के बाद कुन्तक ने ससष्टि की विवेचना की है। परन्तु उनकी वृत्ति भी पढने में नही आई इसलिए उसकी कारिका का भी पुनरुद्धार नही किया जा सका है। केवल कुछ उदाहरण पढे जा सके है जो ऊपर दिए गए है। भामह ने ससृप्टि का लक्षण निम्न प्रकार किया है- वरा विभूपा ससृष्टिर्वहनङ्कारयोगत। रचिता रत्नमालेव सा चैवमुदिता यया ॥३,४६॥ अ्र्पनेक प्रलङ्गारो की निग्पेक्ष रूप से एक जगह स्थिति होने पर ससृष्टि अलद्कार होता है। ससूष्टि [का उदाहरण] जसे- देवी [ रानी] ने जिसमें दोहद [ वृक्षो के जल्दी फूलने-फलने के लिए किया गया उपाय विशेष] दिया है इस प्रकार के इस कुरबक के ऊपर सन््याकाल का आगमन शोभित हो रहा है। [किस प्रकार का 'प्रदोषागम' शोभित हो रहा है यह कहते हैं कि] नव कुकुम के समान अरुण वर्णा सूर्य की किररों [ वृष्टि ] से आश्लिष्ट [घर्थात् लाल लाल हुआ] और ध्यान के बीच [ध्यान में मग्न ] ससार में आकर लम्बे वस्त्र पथवा आकाश वाली सध्या से पश्रित, और चन्द्रकिरसो के सनूह रूप कलिओ्नों [ को देखने ] से व्याकुल मति हो रहा है अ्रन्धकार रूप भ्रमर जिस में इस प्रकार का प्रदोष [सध्याकाल] का आगमन शोभित हो रहा है ॥१६६।। १ अभिज्ञान शाकुन्तलम् ३, ५५।

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कारिका ४ ३ ] तृतीयोन्मेष

यथा वा- म्लानि वान्तविषानलेन नयनव्यापारलव्धात्मना नीता राजसुजङ्ग पल्लवमृदुर्नू नं लतेयं तथा। श्रस्मिन्नीश्वरशेखरेन्दुकिर ए स्मेरस्थ लीलान्छिते कैलासोपवने यथा सुगहने नैति प्ररोहं पुनः ॥१६७॥ यथा वा- रूढा जालेर्जटानामुरगपतिगएौस्तत्र पाताल कुक्षौ प्रोद्यद्दालाकुरश्री दिशि दिशि दशनैरेभिराशागजानास्। श्रस्मिन्नकाशदेशे विकसितकुसुमा राशिभिस्तारकाणण नाथ त्वत्कीर्तिवल्ली फलति फलमिदं विम्बमिन्दोः सुराद्रेः॥१६७॥ यथा वा- निर्मोकमुक्तिरिव या गगनोरगस्य ॥१६६॥। यथा वा- अस्या सर्गविधौ प्रजापतिरभूद् । इत्यादि ।।१७०॥।४३।।

भ्रथवा जसे- हे भुजङ्गराज अपनी आांखों के व्यापार [ अर्थात् दृष्टि ] से उत्पन्न उगले हुए विष की अग्नि से तुमने पल्लवों से कोमल इस लता को इस प्रकार से सुखा डाला है कि शिव जी शिर पर स्थित चन्त्रमा की किरणो से सुशोभित स्थली से युक्त इस विस्तृत कलास के उपवन में वह फिर कभी नहीं डगेगी ॥१६७॥ प्रथवा जैसे- हे स्वामिन्। उस [सुदूरवर्ती] पाताल देश में सर्पराज के द्वारा अपनी जटाओं के रूप में सगी हुई, और इन दिग्गजों के फैले हुए दाँतों के रूप में जिसके [ बालाकुर] में नवीन श्रकुर की शोभा सब दिशाओ प्रकट हो रही है। इस आकाश देश में तारों के समूह रूप में खिले हुए फूलो वाली आपकी वह कीतिलता सुमेरु पर्वत पर इस चन्द्र-विम्ब रूप फल को दे रही है ॥१६८॥ अ्रथवा जैसे-[उदाहरण स० ३, ६३ पर दिया हुआ। निर्मोकमुकतिरिव या गगनोरगस्य ॥१६६।। अ्रथवा जैसे-[उदाहरणा स० ३, १२ पर पूर्वोद्धृत] सस्या, सर्गविघी प्रजापतिरभत इत्यादि ॥१७०॥ *

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४७८ ] वनोपितिजीवितम फारिका ४४

एवं यथोपपत्यालक्वरान लनयित्वा नेपान्चदलन्तितत्ाल्लक्णा व्याप्तिदोपं परिहर्तुमुपक्रमते, भूपगेत्यादि- भृपणान्तरभावन शोभाशन्यतया तथा। अलद्कारास्तु ये केचिन्नालद्वारतया मनाक।४४॥ ये पूर्वोक्तव्य्तिरिक्ता मनाड त विभूपएत्वेनाभ्युपगता 1 केन हेतुना-'भूपणन्तरभावन' 1

ये दो श्लोक और इस सदरालद्वार के उदाहरण मप में कुन्तक ने दिए है। उनका अथं पहिले किया जा चुका है। श्रत यहां दुवारा नही दिया है ॥४३॥ अवशिष्ट अलद्धार श्रमान्य हैं- इस प्रकार कुन्तक ने मृरय-मुरय अलद्वारो का विवेचन समाप्त कर दिया। कुछ ऐसे अलद्वार बच रहे है जिनका भामह आ्रादि ने लक्षण किया है परन्तु कन्तर ने लक्षण नही। उनके विपय में कुन्तक का यह कहना है कि उनको वास्नव में भलद्वार नही कहा जा सकता है। कयोकि उनमें से जो अलद्गार कइलाने योग्य है उनका तो कहे हुए अन्य अलद्धारो मे अन्तर्भाव हो जाता है इसलिए उनके अलग निरूपण करने की कोई आवश्यकता नही है। और बहुत से ऐसे ही अलद्वार कह दिए 'गए है कि जिनमें वास्तव गे कोई चमत्कार नही है। इसलिए गोभाशून्य होने से इस प्रकार के अलद्धारो का निरूपण करना व्यर्थ है। अत एव हमने जो अलद्कारो का निरुष्ण किया वह पूर्ण है। उसके अतिरिक्त अन्य अ्लद्दारो के बगांन की आवश्यकत नही है। यही बात अगली कारिका मे कहते हे- इस प्रकार युक्ति के अनुसार [ सिद्ध हो सकने वाले ] अलद्धारो का लक्षण [आादि ] करके [ अ्रवशिष्ट ] किन्हीं [अलद्धारों] के लक्षण न करने के कारस लक्षण में [ सम्भावित रूप से आने वाले ] श्रव्याप्ति दोष के परिहार करने के लिए भूषण इत्यादि [ कारिका ] कहते हे- [अ्रवशिष्ट अलद्धारों में से कुछ के ] अ्रन्य [ कहे हुए ] अलङ्गार रूप होन से और [ कुछ के ] शोभा रहित [ चमत्कारहीन ] होने से जो कोई [ अ्रन्यों षे अभिमत ] अ्नलङ्धार हे वे तनिक भी अ्लद्धार रूप नहीं हो सकते है।४५॥ पूर्वकथित [अलङ्धारो ] के अतिरिकत जो अलङ्धार [ भामह आ्र्प्रादि के माने हुए ] है उनको हमने अलदार रूप ने तनिक भी नहीं माना है। किस कारण से कि 'अन्य अलद्धार रूप होने से' उन [ न कहे हुए शेष अलङ्धारो ]

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कारिका ४४ ] तृतीयोन्मेषः तेभ्यो व्यनिरिक्तमन्यद् भूपएं 'भूपणान्तरम्' तत्स्वभावत्वेन । पूर्वोक्ता- नामेवान्यतमत्वेनेत्यर्थ । 'शोभाशून्यतया तथा', शोभा कान्तिस्तया शून्यं रहितं, शोभाशून्यं, तस्य भाव शोभाशून्यता, तया हेतुभूतया, तेपामलक्करण त्वमनुपपन्नम् ।४४।।६ *भूयसामुपदिष्टानमर्थानामसघर्मणाम्। कमशो योऽनुनिर्देशो यथार्संर्य तट्ुच्यते ॥१७१।। पद्मेन्दुभृद्गमातङ्गपुं स्कोकिल कलापिन. । वक्त्रकान्तीक्षए गतिवाणीवालेस्त्या जिताः॥१७२॥

से भिन्न [जो कहे हुए ] अरल्धार भूपरान्तर हुए। तद्रूप ततत्स्वभाव अ्रर्थथात् पूर्वोक्त [अलद्धारों ] में से ही कोई [ न कोई ] एक होने से [ अर्थात् पूर्वोक्त अलङ्धारों के ही अन्तर्गत हो जाने से शेष अलद्धारों को अलग मानने की आवश्यकता नहीं है] और [जो अलद्धार इन पूर्वोक्त अलद्धारों में अ्रन्तर्भूत नहीं होते है फिर भी हमने कुन्तक ने उनका वर्णन नहीं किया है उसके लिए कहते है कि] शोभारहित होने से वे भी अलद्धार नहीं है। शोभा अर्यात् कान्ति उससे शून्य अर्थात् रहित शोभाशन्य हुआ। उसका भाव शोभाशून्यता। उसके कारण उन [अवशिष्ट तथाकथित अलङ्गारो] का अलङ्धारत्व युक्तिसदृत नहीं है॥३६। २६ यथासखय अलङ्गार- इस प्रकार उदाहरण रूप में कुन्तक ने भामह द्वारा माने हुए यथाससय अलद्धार को लिया है। उसका भामहोक्त लक्षण तथा उवाहरण देकर उसकी आलोचना की है। और शोभारहित, उकतिर्वचित्र्य से शून्य होने से अलग अलङ्धार मानने का खण्डन किया है। समान धर्म वाले पहिले कहे हुए बहुत से पदार्थों का जो बाद में [उसी क्रम से] निर्देश करना है वह यथासस्य अलङ्धार कहलाता है। [ यह भामह ने यथासंख्य अलङ्गार का लक्षता किया है] ॥१७१॥ जैसे- [ हे सुन्दरी ] कमल, चन्द्रमा, भौरे, हाथी, कोकिल और मोर का तुमने [कमश, अपने] मुख, कान्ति, नेत्र, गति, वाणी तथा वालो से जीत लिया है॥१७२॥ पाठ लोप। १ भामह काव्यालद्ार २, ८ह-६०।

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४८० ] चकोदितिजीचितम् [ फारिका ४४

8पूर्वैराम्नातः। #भितिवै चिन्नयर हान्न काचि कान्िर्िद्यते आशिपो लक्षणोदाहरणानि नेह पठ्चन्ते। तेपु चाशमनीयम्यैवार्थस्य मुख्यतया वर्सनीयत्वादलक्वार्यत्वमिति प्रेयोडलद्वारोक्तानि दपणान्या- पतन्ति। विशेपोक्तेरलद्वारान्तरभावेनालद्ायेतया च भूपएत्वानुपपत्ति । एकदेशस्प बिगमे या गुरान्तर सस्यितिः। विशेपप्रप्रथायासो विशेपोवितर्मता यथा ॥:७३॥। स एक स्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुध। हरतापि तनु यस्य शम्भुना न हतं चलम॥१७४॥। अत्र सकललोकप्रसिद्वजयित्व व्यतिरेकि कन्टर्पस्वभावमात्रमेव वाक्यार्थ:

पूर्व [भामह ] ने [ यथासख्य को अ्लद्धार ] कहा है [ परन्तु वास्तव में उसमें किसी प्रकार] उकत का चमत्कार न होने से किसी प्रकार का सौन्दर्य नहीं है। [इसलिए उसको अलग अलद्धार मानने की आर्रावश्यकता नहीं है]। ३० आशी अलद्धार- [भामह कथित] आाशीः [नामक अलद्गार ] के लक्षणा औ्रर उदाहरण यहां नहीं दिए जा रहे है। उनमें आशसनीय अर्थ के ही मुख्य रूप से वणनीय होने से [उसकी ] 'अलड्गार्यता' होती है इसलिए [उसको अ्रलद्धार मानने मे पूर्वकयित] 'प्रेयोलद्धार' में कहे हुए दोष आा जाते है । [अ्रत वह भी अलग अलद्धार नहीं है]। ३१. विशेषोक्ति अलङ्गार- विशेषोकिति के [कहं] अ्न्य अलद्धार में घ्रन्तर्भत हो जाने से अ्रथवा [कहीं] अलद्धार्य हो जाने से [ उसको ] अ्रलद्धार मानना युक्तिसङ्गत नहीं है। विशेषता के वोधन [कराने] के लिए एकदेश की न्यूनता होने पर दूसरे गु फी स्थिति [का वर्णन] है वह विशेषोकिति [शलद्वार कहलाता] है। जैसे-॥१७३॥ जिसके शरीर का हरण करके भी शिवजी ने उसके शक्ति का हरए नहीं किया वह कामवेव अकेला तीनों लोकों को जीत सकता है॥१७४॥ [ विशेषोकिति के इस भामहोकत उदाहरण में ] सकल ससार में प्रसिद्ध विजयत्व से भिन्न कामदेव के स्वभाव का ही वर्णन है। [ वह अलङ्धार्य है अलद्धार नहीं ]। 8पाठ लोप। १. भामह काव्यालक्वार ३, २३-२४।

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कारिका ४५] तृतोयोन्मेष. [४८१

१हेतुश्च सूक्ष्मो लेशोऽय नालङ्कारतया मतः । समुदायाभिघानस्य वक्रोक्त्यनभिघानत. ॥१७३।। सकेतकालमनसं विट जात्वा विद्ग्धया। हसन्नेत्रापिताकूतं लीलापद्म निमीलितम् ॥१७४।। राजकन्यानुरक्तं मा ॥१७५| अयमान्दोलितप्रौढ़ ।१७६।। स्वभावमात्रमेव रमणीयम् तच्च अ्रल्लह्कार्यम्। केचिदुपमारूपकाणामलङ्करणत्वं मन्यन्ते, तद्युक्तम्, अरनुपपद्य- मानत्वात्। समगगगनायाममानदराडो रथाङ्िनः।

हेतु सूक्ष्म तथा लेश अलङ्गार- [इसके बाद कुन्तक ने भामह का इलोक उद्धत किया है। उसका अ्र्रभिप्राय यह है कि] हेतु सूक्ष्म लेश आदि अलद्धार नहीं होते है क्योकि उनमें समुदाय रूप से कोई वक [मनोहर] उचित नहीं होती है। [ इसलिए शोभाशून्य होने से अलङ्गार नहीं है] ।१७३।। [ हेतु का उदाहरस ] विट [ सम्भोगहीनसम्पद् विटस्तु घूर्तः कलेकदेशन्ञ । देशोपचारकुशल मधुरोडय बहुमतो गोष्ठ्याम् ] की सकेत काल [नायक नायिका के मिलने के समय ] की जिज्ञासा को समझ कर चतुरा [नयिका] ने नेत्रों से [अपना] श्रभिप्राय व्यक्त करते हुए, हँसते हुए लीलाकमल को वन्द कर दिया॥१७४॥ [ इसके बाद सूक्ष्म का ] राजकन्या ने अनुरक्त सुभको ॥१७५॥ [तथा तीसरे लेश का] यह आन्दोलित प्रौढ़ इत्यादि ॥१७६॥ [उदाहरस प्रतीकमात्र से दिए हैं। उनके सम्वन्ध में टिप्पणी करते हुए लिखा है कि-]

[अलद्धार नहीं]। [ इन तीनो में ] स्वभाव मात्र ही रमणीय है औ्रर 'वह अलङ्धार्य है'

कोई [भामह के पूर्व वर्ती ] उपमा रूपक को [अलग ] अ्लङ्धार मानते है वह [भी] अनुपपन्न होने से प्युक्त है। समस्त आकाश के विस्तार को नापने वाला विष्णु का पैर सिद्ध स्त्रियों के मुख रूप चन्द्रमा का दर्पशा हैं। [ यह उपमारूपक का उदाहरण भामह ने दिया है वह चमत्कार रहित होने से उचित नहीं है] १७७।४५॥ १ भामह काव्यालद्वार २, ८६।

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४८२ ] वशोषितजीवितम् [फारिका ४६

विच्छित्या रचितविसृपसासरेग्ल्पर्मनोहारिणी। 4

अत्यर्थ' रसवत्तयार्ठहृदया [भावरुदाराभिधा चाग् वश्यं कुरुते जनम्य हृदयं नित्य] चथा नायिका ॥४६।। इति श्रीकुन्तकविरचिते चकोवितजीचिते तृतीयोन्मेप. समाप्त ।

प्रथन उन्मेप की १८वी कारिका मे वक्ता के ६ भेदो का प्रतिपादन किया गया था। इनमे से १ वणं विन्यास वनना, पद पूर्वा्द्ध वनता, ३ प्रत्यय वमता इन तीन भेदो का वगंन द्वितीय उमेप तक हो गया था। तृतीय उन्मेप मे 'वाक्य- वक्रता' नामक वक्रता के चतुथ भेद का निरुपण किया गया है। इस वाकय वतना के भीतर ही कुन्तक ने समस्त अलद्धारो का अन्तर्भाव माना है इसलिए इसी प्रसद्ग में यहाँ समस्त अलद्कारो का निर्पण किया गया है। इस उन्मेप का उपमहार करते है। इस श्लोक का कुछ भाग पढा नही जा सका अत श्लोक खण्डित रह गया है। पूर्व सस्करण में 'वाक्' 'मनोहर्तु यथा नायिका' यह चतुर्थ चरण का खण्डित पाठ था। तृतीय तथा चतुर्थी दोनो चरुणो में कोप्ठान्तर्गत पाठ हमने वन। कर दिया हूं। लावण्य आदि गुरो से उज्ज्वल, प्रत्येक पद [ शब्द तथा पग ] के रखने मे हाव भाव पूर्ण, सुन्दरता पूर्वक धारस किए थोडे अजङ्गारो से मनोहर लगने वाली, प्रत्यन्त [रसभरी होने से ]आ्ार्द् हृदय वाली, उदार [ अ्रभिघा ] वचन वाली [ सत्कवियो की विरचित काव्य रूप] वासी [ सौन्दर्य आदि गुणो से उज्ज्वल, प्रत्येक पण रखते समय हाव भाव से युक्त, सुन्दरता पूर्वक धारण किए हुए थोडे परिमित आ्ाभूषरो से अलफृत औरर ग्रपत्यन्त प्रेम यक्त होने से श्रारद्रंहृदया] नायिका के समान [सहृदय] लोगो के मन को सदैव वश में कर लेती है ॥४६॥ इति श्री कुन्तक विरचित वक्रोक्तिजीवित में तृतीय उन्मेप समाप्त हुआ। इति श्रीमदाचार्य विश्नेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचिताया वक्रोक्तिदीपिकाया हिन्दीव्याख्याया तृतीयोन्मेष समाप्त।

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चतुर्थोन्मेषः

५-एवं सकलसाहित्यसवस्वकल्प-वाक्यवक्रता-प्रकाशनानन्तरमवसर- प्राप्ता 'प्रकरणवक्रतां' अरवतारयति-

चतुर्थ उन्मेष प्रथम उन्मेष की १८वी कारिका में प्रतिपादित छ प्रकार की वकरताभोंमें से १ वर्ण-विन्यास-वक्रता, २ पदपूर्वार्द्ध-वक्रता, ३ प्रत्यय-वक्र्ता और ४ वाक्य-वक्र्ता इन चार प्रकार की वक्रताओ के निरूपण के वाद अव इस चतुर्थ उन्मेष में पांचवी 'प्रकरणवत्रता' का निरूपण प्रारम्भ करते है। इस प्रकार समस्त साहित्य की सर्वस्वभूत 'वाषय-वत्रता' के प्रतिपादन के वाद अवसर प्राप्त 'प्रकरण-वकता' का निरूपण [इस चतुर्य उन्मेष में] प्रारम्भ करते हैं- ग्रन्थकार ने इस चतुर्थ उन्मेप में 'प्रकरण-वक्रता' के मुख्य रूप से ६ प्रकार दिख- लाए है। १. जहाँ व्यवहरताओ के अदम्य उत्साहातिरेक के कारण उनके वार्तालाप रूप प्रकरण में कुछ अरद्भुत चमत्कार उत्पन्न हो गया है। वह प्रथम प्रकार की 'प्रकरण- वकता' है। उसका वर्णन ग्रन्थकार ने १, २ कारिकाओ में किया है और उसके उदाहरण 'अभिजात-जानकी' नामक नाटक के तृतीय भद्ध से सेनापति नील और वानरो के सवाद में से तथा रघुवश के पञ्चम सर्ग के रघु तथा कोत्स के सवाद में से उद्धृत किए हैं। २ दूसरे प्रकार की 'प्रकरण-वफ्रता' वह है जिसमें कवि इतिहास प्रसिद्ध किसी घटना में अपनी प्रतिभा से कुछ हलका सा परिवर्तन कर आ्स्यान वस्तु को सजीव और उदात्त बनाकर काव्य या नाटक में चमत्कार उत्पन्न कर देता है। इस द्वितीय प्रकार की 'प्रकरण-वक्रता' का वर्णन ग्रन्थकार ने ३-४ कारिकाओ में किया है और उस के लिए महाकवि कालिदास के शकुन्तला नाटक में दुर्वासा के शाप की कल्पना द्वारा जो चमत्कार एव निसितिल नाटक व्यापी प्रभाव एव सौन्दर्य उत्पन्न किया गया है उसे उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया है। ३. तीसरे प्रकार की 'प्रकरण-वक्रता' वह है जहां नाटक का कोई एकदेश उसी नाटक में किसी दूसरे स्थान पर अपना प्रभाव डाल कर कुछ पपूर्व चमत्कार उत्पन्न कर देता है। इस तृतीय 'प्रकरण-वत्रता' का वर्णन ग्रन्थकार ने ५-६ कारिकाओो में

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४८४ ] वकोकितिजीवितम् [कारिफा १

व्यवृत्तिर्व्यवहर्त् सां स्वाशयोल्लेखशालिनी॥१।

किया है। महाकवि भवभूति के 'उत्तर रामचरित' नामक नाटक के प्रथम भ्रभ् में वित्र-दर्शन के स्रवसर पर मानसिक सवत्व रूप से सीता के भावी पुवरो को दिए हुए जृम्भकास्तों का प्रभाव पञ्चम त्र्क्क में लत औ्रप्रर नन्द्रोतु के युद्ध मे दिमनाई देता है। और उसने आगे चल कर लव के सोता-पुन के रूप मे परिचय कराने में जो प्रभाव डाला है वह इस तृतीय प्कार की 'प्रकरग-वत्रता' का उदाहरण है।

४ एक ही पदार्थ का बार-वार वर्णन होने पर भी कवि की प्रतिभा से उसकी इस प्रकार योजना की जाय कि उसमे कही पुनरुकति प्रतीत न हो अपितु हर जगह कुछ नवीन चमत्कार अ्र्प्रनुभव मे आ्प्रावे, वह चतुर्य प्रकार की 'प्रकरण-वक्र्कता' कहलाती है। इसका वर्णगन ग्रनथकार ने ७-८ कारिकाओ मे किया है। भौर उसके उदाहरण 'तापस वत्सराज-चरित' तथा रघुवश के नवम सर्ग से उद्धृत किए हैं।

५. जहां जल-क्र्रीडा आदि किसी श्रङ्ग विशेप के वर्णन से कथा में वचित्र्य आ जाता है वह पाँचवें प्रकार की 'प्रकरण-वकता' कही जाती है। इसका व्णन ग्रन्थ- कार ने नवम कारिका में किया है। और उसके उदाहरण रूप मे रघुवश के १६वे सर्ग से राजा कुश की जल-फ्र्ीडा का वणंन प्रस्तुत किया है।

६. 'प्रकरण-वक्रता' का छठा भेद वह होता है जहाँ काव्य या नाटक का कोई विशेष प्रकरण प्रधान रस की अभिव्यवित का ऐसा परीक्षा-निकष बन जाता है कि वैसा चमत्कार आगे या पीछे के प्रकरणो में नही दीख पडता है। कारिका १० में उसका वर्णन है। उसके उदाहरण रूप में विक्रमोवशीयम् नाटक का 'उन्मत्ता"' नामक चतुर्थ श्रद्ध तथा किरातार्जुनीय का बाहुयुद्ध प्रस्तुत किया है।

सातवी प्रकरण-वकता कारिका ११ मे, आ्ठवी कारिका १२-१- में ता नवम प्रकार की प्रकरण-वक्रता कारिका १४-१५ मे व्खित है।

१. जहां अपने अभिप्राय को अ्र्प्रभिव्यक्त करने वाली और अपरिमिन उन्साह के स्यापार से शोभायमान कवियों [ व्यवहर्ताओं] की प्रवृत्ति [व्या्वृति] होती हैं-

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फारिका २ ] चतुर्थोन्मेष:

अव्यामूलादनाशंक्यसमुस्थाने मनोरथे। काप्युन्मीलति निःसीमा सा प्रकरणे1 वक्रता ॥२॥ 'वक्रता' वक्रभावो भवतीति सम्वन्ध । कीदशी-'नि'सीमा' निरवधिः। 'यत्र' यस्या 'व्यवहत 'गां' तद्व्यापारपरित्रहव्यग्रागां 'व्यावृत्ति.' प्रवृत्तिः काप्यलौकिकी 'उन्मीलति' उ्धिद्यते । कि विशिष्टा-'निर्यन्न्नणोत्साहपरिस्पन्दोप- शोभिनी', निरर्गलव्यवसायस्फुरितस्फारविच्छित्ति.। अतएव 'स्वशयोल्लेख- शालिनी' निरुपमनिजहृद्योल्लासितालकृति। कस्मिन् सति-'अव्यामूलाद- नाशक्यसमुच्थाने मनोरथे', कन्दात्प्रभृत्यसम्भाव्यसमुद्भेदे समीहिते।२

सेनापतेर्वचनम्- तद्यथा सेतुवन्वाख्ये 'अभिजातजानकी'-तृतीयेऽङ्के तत्र नीलस्य

प्रारम्भ से ही निशद्ध रूप से उठने [या उठाने] की इच्छा होने पर [अर्थात् प्रारम्म से ही निर्भय हो कर अपने अ्यवा अपनी रचना को उठाने की अदम्य इच्छा होने पर कवि को रचना में ] प्रकरण में वह कुछ अपूर्व वकता असीम रूप से प्रकाशित हो उठती है [वह प्रकरण वक्रता होती है]। 'वकता' अर्यात् वक्रभाव [ वाँकपन, सौन्दर्य] होता है यह सम्बन्ध होता है। किस प्रकार की 'नि सीम' अर्यात् अ्नन्त। जहां जिस [ रचना ] में व्यवहार करने वाले अर्थात् उस [ वकता] के व्यापार को प्राप्त करने के लिए समुत्सुक [कवियों] की 'व्यावृत्ति' अर्ात् प्रवृत्ति कुछ अ्रलौकिक रूप से प्रकाशित होती है। किस प्रकार की-'अपरिमित उत्साह युक्त' व्यापार से शोभायमान, अप्रतिहत प्रयत्न से अभिव्यक्त प्रचुर सौन्दर्यशालिनी। इसलिए [ कवि के ] अपने हृदय को प्रकाशित करने वाली अर्थात् अपने अनुपम हृदय [ अरर्थात् हृदयगत भावो ] से शोभा को उत्पन्न करने वाली [ प्रवृत्ति होती है ]। किसके होने पर-[ इस प्रकार की प्रवृत्ति होती हं कि-] प्रारम्भ से ही निर्भय होकर उठने अथवा उठाने की प्रबल इच्छा होने पर [अरव्यामूलात् प्रर्थात् कन्द ] जड [ प्रारम्भ ] से लेकर [साधारण पुरुषो के द्वारा] जिसकी आशा या सम्भावना नहीं की जा सकती है इस प्रकार के समुत्यान के लिए प्रवल इच्छा होने पर [ ही इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है। और उसी से प्रकरण की वकता असीम रूप से प्रकाशित होती है ]। जैसे कि 'अभिजातजानकी' [नामक नाटक ] के सेतुबन्ध नामक तृतीय श्रद्ध में [ प्रकरसवकता पाई जाती है ]। वहां सेनापति नील का [निम्न] वचन [और उसके उत्तर में वानरो के वाक्यादि 'प्रकरणवकता' के उदाहृरय है]- १ 'सा प्रवन्घस्य वकता' यह पाठ पशुद्ध था। २ 'तदयमत्रार्थ' यह खण्डित पाठ अर्रधिक था।

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४८६ ] वकोदितिजीवितम् [फारिफा १-२

शेला सन्ति सहस्त्रशः प्रतिदिश वल्मीककल्पा इमे दोर्दगडाश्च कठोरविक्रमरसकीडासमृत्कसिठता.'। कर्रास्वादित कुम्भसम्भवकवा फिन्नाम कल्लीलिनः पायो गोप्पदपूरणेऽपि कपय कोतृहल नास्ति न ।।१।। वानरासमुत्तरवाक्य नेपथ्ये कलकलानन्तरम्- आन्दोल्यन्ते कति न गिरय कन्टुकानन्टमुद्रा व्यातन्वाना करपरिसरे कौतुकोत्कर्पहर्षे।

नोडावेश पवनतनयोच्छप्टसस्पर्शनन ।।२।। कवरामेण पर्यनुयुक्त् जाम्ववतोि वाक्यम्

चारों दिशाओरो में वाबी [ दोमको द्वारा निर्मित विशेष प्रकार के मिटटी के ढेर] के समान हजारों पर्वत फैले हुए हैं [ इस लिए समुद्र पाटने के लिए 'कहाँ से पत्थर श्रादि लावें' यह प्रश्न नहीं उठता है] औौर कठोर पराक्रम रस के सेल खेलने के लिए तुम्हारे सुजदण्ड भी उत्सुफ हो रहे है। [ फिर भी उन पहाड़ो को उलाड कर लाने में इतना विलम्ब हो रहा हं। फुम्भ-सम्भव ] श्रगस्तमुनि [के समुद्र पान] की कथा [अपने] कानो से सुन चुफने वाले हे वानरो समुद्र के पाटने की बात तो दूर रही तुम्हारे भीतर तो गाय के खूर के वराबर जरा से गढ़े को भी भरने का उत्साह नहीं मालूम होता है ।१।। [ इसको सुन कर ] नेपथ्य में [ पत्थरो के उसाडने के ] कोलाहल के बाद वानरों का उत्तर वाक्य [ निम्न रूप से है ]- उत्साह के अतिरेक औोर आनन्द में हमने हाथ में गेंद [ उछालने ] के समान आनन्द देते हुए न जाने कितने पर्वत हिला डाले। [हम लोपामुद्रा के पति [भ्रगस्तमुनि ] की [ समुद्र पी जाने की] कथा से भी परिचित है। [ फिर भी इन पर्वतो को उठा कर लाने में हमको थोडा सा सङ्कोच इसलिए हो रहा है कि] पवनपुत्र [हनुमान ] के उच्छिष्ट को छूने में लज्जा का अनुभव होता है। [यह सवाव 'प्रकरण-वक्रता' का उदाहरण है] ।।२। रामचन्द्र के पूछने पर जाम्बवान का [निम्न] वाक्य भी [इस 'प्रकरण-वक्र्ता का उदाहर है ]- १ 'समुत्कण्ठका' पाठ अशुद्ध था। क पाठ लोप ।

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कारिका १-२] चतुर्थोन्मेष [४८७

  • कृतिनस्तुल्यसंरम्भमारभन्ते जयन्ति च ।।३।। एवं विधमपरमपि। तत एव विभावनीचमभिनवाद्भुतं भोगभङ्गी- सुभगं सुभापितसर्वस्वम्।

जहाँ [साधारण पुरुषों के] असीम मनोरथों का अ्रकुर भी नहीं निकलता है [अर्थात् जो सर्वसाधारण के लिए सवथा मनोरथ के भी श्रविषय है ] ऐसे कठिन का्यों में भी उत्साही [चतुर व्यक्ति ताघारण अन्य कार्यों] के समान उत्साह से कार्य का आ्रम्भ करते हें और उसमें सफलता प्राप्त करते हैं ।।३।। [ ये सब 'प्रकरण-वक्रना' के उदाहरण है]। इस प्रकार के और भी ['प्रकरण-वक्रता' के उदाहरण हो सकते है]। उनके ही रसास्वाद से सुन्दर [ भोग- भङ्गी सुभगं ] अ्रभिनव तथा अद्भुत सुभाषित [काव्य] का सर्वस्व [ सारभूत सौन्दर्य प्रतीत ] होता हैं यह समभना चाहिए। इसके वाद कुन्तक ने 'प्रकरण-वक्रता' के अन्य उदाहरण के रूप में रघुवश के पञ्चम मर्ग में से रघु और कौत्स के सवाद की चर्चा की है। उसमें वरतन्तु मुनि के शिष्य 'कोत्स' गुरुदक्षिणा देने के लिए रघु से १४ कोटि रुपए मांगने आए हैं। परन्तु उसके पूर्व ही रघु 'विश्वजित्' नामक यज्ञ सम्पादन कर चुके हैं। जिसके अन्त में उन्होने अपना सारा घन दान कर किया था। और उनके पास केवल मिट्टी के पात्र मात्र शेप रह गए थे। 'मृत्पात्रशेषामकरोद्विभूतिम्'। कौत्स मुनि को राजधानी में आकर जब यह मालूम हुआ तो वह राजा को आशीर्वाद दे कर जाने लगे। उस समय रघु ने उनको रोक कर पूछा कि महाराज आपको कितना धन या क्या वस्तु कितनी गुरुजी को देनी है। उसका विवरण मालूम होने पर रघु ने कुबेर के यहाँ से लाकर धन देने का विचार किया। दूसरे दिन वह कुबर पर चढ़ाई करने की सोच ही रहे थे कि रातो रात कुवेर के यहाँ से आवश्यकता से कही अधिक घनराशि आ जाती है। और रघु सव कोत्स को दे देना चाहते हैं। परन्तु कौत्स भी जितना घन गुरुदक्षिरा में देना है उससे अधिक नही लेना चाहते है। इसी सवका सुन्दर विवरण रघुवश के पञ्चम सर्ग में आया है। यह सब विषय स्वय ही सुन्दर ह फिर महाकवि कालिदास की प्रतिभा ने उसमें और भी अपूर्व चमत्कार उत्पन्न कर दिया 1

हैं जिससे वह सारा का मारा प्रकरण सजीव सा हो उठा है। उसका असली आनन्द तो उस सारे सर्ग को पटने पर ही मिलता है,। परन्तु सारा का सारा सर्ग तो उदाहरण रूप से उद्धृत नहीं किया जा सकता है। इमलिए यहा कुन्तक ने उस प्रकरण के थोडे-योडे अन्तर के चार श्लोक उदाहरण रूप में दिए हैं।

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वक्रोमितजीवितम् [फारिफा १-२

यथा- 'एताबदुक्तया प्रतिगातुकामं शिष्य महर्पर्नृपतिर्निपिय। कि वस्तु विट्टन् गुरवे प्रदेय रया कियद्वेति तमन्वयु क्त ।।४।। गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृश्वा ग्घोः सकाशादनवाग्य कामम्। गतो वदान्यान्तरमित्यय मा मृत् परीवाद-नवावतारः॥५। त भूपतिर्भासुरहमराशि लव्घ कुवगदभियास्यमानात। दिदेश कौत्साय समस्तमेव पाद सुमेरोरिव वर्ज्ताभिन्नम् ॥६।। जनस्य साकेतनिवासिनस्तो द्वावप्यभूतामभिनन्यसत्वो। गुरुप्रदेयाधिकनि स्पृहोऽर्थी नृपोडथिकामादधिकमदश्च ।।७।।

जसे कि- कौत्स मुनि जब रघु के पास पहुँचे तो उन्होन मिट्टी के पात्र मे अध्यं रखकर उनका स्वागत किया। इसी से कौत्स को राजा की स्थिति का ज्ञान हो गया इमलिए उन्होने राजा से कुछ माँगना उचित न समझा और सामान्य कुशल वार्ता के बाद जाने लगे तो- इतना कह कर जाने के लिए उद्यत [वरतन्तु] महर्षि के शिप्य [कौत्स] को रोक कर राजा [रघु] ने हे विद्वन् ! आ्रापको [गुरदक्षिा रूप में] गुरु जी को क्या वस्तु और कितनी [मात्रा में] देनी है यह उनसे पूछा ॥।४॥ वेदो का पारङत [ एक विद्वान् ] गुरुदक्षिरा के लिए धन का याचक होकर आया, औरर रघु के पास से इच्छा का पूर्ति न हो सकने से किसी दूसरे दानी के पास गया इस प्रकार की मेरी अपकीति जो आज तक कभी नहीं हुई थी, न होने पावे ।।५।। जिस पर [रघु] आक्रमण करने वाले थे उस कुबेर के पास से [बिना आक्र मए किए हुए ही ] प्राप्त हुई वन्त्र द्वारा काटे गए सुमेर पर्वत के शिखर के समान चमकती हुई सारी स्वर्ण की राशि को राजा रघु ने कौत्स को दे दिया॥६।। अयोध्यावासी लोगो के लिए गुरु को देने वाले धन से अधिक धन की इच्छा न करने वाला याचक [कौत्स], और याचक की इच्छा से भी अधिक देने वाला राजा, [ रघु ] दोनो ही प्रशसनीय स्वभाव वाले प्रतीत होते थे॥७॥। इस सवाद में से थोडे-योडे अन्तर के ये चार श्लोक यहाँ उद्ध त किए है। जिनसे उस प्रकरण की वत्ता का कुछ श्भास मिल सकता है। १ रघुवश पञ्चम सर्ग १८, २४, ३०, ३१।

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कारिका-३ ] चतुर्थोन्मेष:

कुवेरं प्रति सामन्तसम्भावनया जयाध्यवसायः कामपि सहदयहृदय- हारितां प्रतिपद्यते। अन्यच्च 'जनस्य साकेत' इत्यादि, अन्रापि गुरुप्रदेय- :- दक्षिणातिरिक्तकार्तस्वरमप्रतिगृद्तः कौत्सस्य, रघोरषि प्रार्थितशतगुएं सहस्र- गुगं वा प्रयच्छतो निरवधिनिस्पृहतौदार्यसम्पत्, साकेतनिवासिनमाश्ित्या- पूर्वा कामपि महोत्सवमुद्रामाततान । एवमेषा महाकविप्रचन्धेपु प्रकरणवक्रता- विच्छित्तिः रसनि स्यन्टिनी सहदयैः स्वयमुळेक्षणीया ॥१-२। २-इमामेव प्रकारान्तरे एा प्रकाशयति- इतिवृत्तप्रयुक्तेऽपि कथावैचित्र्यवर्त्मनि । उत्पाद्यलवलावसयादन्या भवति वक्रता ॥३॥

यह सारा का सारा प्रकरण 'प्रकरण-वक्रता' का सुन्दर उदाहरण है। उसी प्रकरण में जो यह आयाूं कि जब राजा रघु को ससार में अन्य किसी राजा के पास कौत्स की इच्छा पूर्ति के लिए पर्याप्त घन दिसलाई नही दिया तो उसने कुवेर पर आक्रम कर उसके कोष से धन लाने का निश्चय कर लिया। मानो कुवेर कोई साधारण सामन्त राजा हो जो यो ही घन दे देगा। या जिसे यों ही जीत लिया जायगा। कुघेर के प्रति [ एक साघारण ] सामन्त की सम्भावना से [ अर्थात साधारस सामन्त राजा समझ कर रघु ने ] जो विजय करने का निश्चय किया है वह [ रघु की अलौकिक सामर्थ्य एव आ्रत्मविश्वास को सूचित करता हुआ] कुछ अ्रपूर्व सहृदय-हृवय-हारिता को प्राप्त हो रहा है। और 'जनस्य साकेतवासिन.' इत्यादि जो कहा है यहाँ भी गुरु को देने वाली दक्षिरण से अघिक सोना लेना स्वीकार न करने वाले कोत्स की तथा माँगे हुए धन से सौगना अयवा सहस्रगुसा देने वाले रघु की [क्मश] अ्सीम नि.स्पृहता [ कौत्स की ] श्रर अ्रसीम उवारता [ रघु की] की सम्पत्ति ने [अयोध्यावासियो का आश्रय लेकर अरथात् ] अ्र्रयोध्यावासियों के हृदय में कुछ अलोकिक शनन्द को प्रकाशित कर दिया है। इस प्रकार इन महाकवियों के काय्यों [ प्रबन्धों ] में इन [इस प्रकार के प्रकरणों] की रस को प्रवाहित करने वाली 'प्रकरण-वफता' की शोभा सहुदयों को स्वय ही समझ लेनी चाहिए ॥१-२।। २ इसी [ प्रकरण-वक्रता ] को दूसरी तरह से दिखलाते है- इतिहास में वशित कथा के वैचित्र्य के मार्ग में [अर्था्त् इतिहास प्रसिद्ध कथा में भी वैचित्र्म या सौन्वर्य के उत्पादन के लिए] तनिक से फल्पना प्रसूत अ्रंश के सौन्चर्य से [ उत्पाद्य-लव-लावण्याद् ] कुछ औौर ही अपूर्व चमत्कार हो जाता है।

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४६०] वश्रोपितजीचितम [ फारिका ४

तथा, यथा प्रबन्धम्य मरुलम्यापि जीवितम् । भाति प्रकरसं काष्ठाधिम्दरमनिर्भग्म्॥४॥ 'नथा उत्पाद्यलवलावसयादन्या सवति वक्रता' तेन प्रकारेग कृत्रिम- वक्रमावमती समुज्ज़म्भते, महृदयाना- वर्जगनीति यावत्। क्व-कयाचचितयवर्त्मननि", काव्यम्य वैचित्यभावमार्गे। किनिशिप्टे-'इतिवृत्तप्रयुक्तऽपि' टांतहासपरिग्रह पि। तवेति यथाप्रयोगम- पेक्षत इत्याह 'यथा प्रवन्धम्य सकलम्यापि जीवित भाति प्रकरम'। येन पकारेख मर्गवन्धाने समग्रस्यापि प्राणप्रतिमह्गम् कीनग्भूतम-'काप्टाविम्ढ- रसनिर्भरम्' प्रथमवाराध्यासित द्गाराटिपरिपूणोम।

[उम तनिक से परिवर्तन से ] इतना [सौन्दर्य काव्य में श्रा जाता हैं ] जि से वह प्रकरण चरम सीना को पहुँचे हुए रस से परिपूणं हो कर सारे[ काव्यर नाटफ ] प्रवन्ध का प्रास सा प्रतीत होने लगता है। कवि के कल्पना प्रसूत उस तनिक से कथा परिवर्तन से उत्पन्न सौन्दर्य [उत्पा लव लावण्य ] से कुछ और ही प्रकार की सुन्दरता[ काव्य या नाटक आप्ररदि मे आजाती है। अर्यात् उस प्रकार की कत्पित कथा [ के नाम मात्र के परिवर्तन ] मनोहर कुछ भ्ररपूर्व 'वक्ता' उत्पन्न हो जाती है औ्र्ौर सहृदयो को श्रराकर्षित कर ले है। कहाँ कि 'कथा के वचित्र्य के मार्ग में' अर्ात् काव्य के विचित्र भाव के मार्ग में किस प्रकार के कि-'इतिवृत्त में प्रयुक्त होने पर' भी। 'तथा' यह शब्द यथा' शब्द प्रयोग की अपेक्षा करता है इस लिए कहते हैं कि-जिस प्रकार से वह प्रकरण सा प्रबन्ध का प्राण सा प्रतीत होने लगता है। जिस प्रकार से सर्गबन्ध [महाकाव्य आदि सभी का भूत-सा वह ब्रङ्ग बन जाता है। किस प्रकार का कि-'चरमोत्क को प्राप्त रस से परिपूर्स' अर्थात् सर्वोच्च कोटि को प्राप्त शृङ्गार आदि रस परिपूर्स [वह प्रकरण सारे काव्य का प्राण भूत सा प्रतीत होने लगता है]। यहाँ कुन्तक यह कह रहे है कि कभी कभी इतिहास प्रसिद्ध कथा में तनिक रु परिवर्तन करके कवि उस कथा में ऐसा चमत्कार उत्पन्न कर देता है जिससे वह परि- वर्तन उस कथानक में जान सी डाल देता है। इस प्रकार के परिवर्तन का उदाहरण देने के लिए कुन्तक ने 'अभिज्ञान शाकुन्तल' के उपाख्यान को प्रस्तुत किया है। महाकवि कालिदास ने अपने विश्वविख्यात इस 'अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक का श्रख्यान-भाग मारभारत से लिया है। परन्तु उस महाभारत की कथा में और 'अभिज्ञान शाकुन्तल' १ सविधानकमनीयकालोकिकी।

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कारिका ३-४ ] चतुर्थोन्मेष· [४६१

की आस्यान-वस्तु की रमणीयता में आकाश पाताल का अन्तर हो गया है। महाभारत का दुप्यन्त एक लम्पट राजा हैं। वह मोरे के समान नई नई कलियो का रसास्वादन करता फिरता है। कण्व मुनि की अनुपस्थिति में मृगया के प्रसङ्ग से उनके आ्ाश्रम में पहुँच कर उसने कण्व की पोष्य पुत्री शकुन्तला को अपने चङ्ग ल में फंसा लिया और उसका रसास्वादन कर प्रपनी रानी बनाने का आश्वासन देकर अपने स्वभाव के अनुसार उसको मी छोड कर चला गया। इस लम्पट राजा दुष्यन्त को कालिदास ने अपने नाटक का नायक बनाया है। तब भारतीय नाट्य शास्त्र की मर्यादा के अनुसार उसे एक उदात्त आदर्श नायक के रूप में प्रस्नुत करना उनके लिए अनिवार्य हो गया है। औ्रर उन्होने अपनी प्रतिभा से उस नारकीय कीडे को सचमुच दव कोटि में लाकर बैठा दिया है। दुष्यन्त के इस कायाकल्प में सव से मुख्य भाग दुर्वासा के शाप का है। लम्पट दुष्यन्त जब शकुन्तला का रसास्वादन करके परिणाम स्वरूप अंगूठी रूप दृश्यमान चिह्न के साथ साथ श्रदृश्य चिह्न भी शकुन्तला को देकर और- एकंकमत्र दिवसे दिवसे मदीय नामाक्षर गएय गच्छसि यावदन्तम्। तावत्प्रिये मदवरोघनिदेशवर्ती नेता जनस्तव समीपमुपैष्यतीति॥ तुम मेरी इस अँगूठी पर खुदे हुए मेरे नाम के अक्षरो से एक एक दिन की गिनती करना। जब तक तुम मेरे नाम के इन चार अक्षरो को गिन भी न पाओोगी तब तक अर्थात् चार दिन के पहिले ही मेरे यहाँ से कोई आदमी आकर तुमको लिवा जायगा। विचारी शकुन्तला दुप्यन्त की उन सुखद प्राय-स्मृतियो में निमग्न एकान्त में बैठी हुई उसी का ध्यान कर रही है। उसी समय आश्रम में दुर्वासा मुनि का आगमन होता है। कण्व ऋषि आ्राश्रम में नही हैं। अतिथि के सत्कार का भार शकुन्तला के ही ऊपर है। पर शकुन्तला तो अपने स्वर्गिगम कल्पना लोक में खोई हुई है। उसने दुर्वासा को देखा ही नही। दुर्वासा अपने इस अपमान को कैसे सह सकते थे। कोधावेश में शाप दे कर चले गए- विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोनिषिं वेत्सि न मामुपस्थितम्। स्मरिष्यति त्वान स वोघितोजिपि सन् कथा प्रमत प्रथम कृतामिव ।। यह दुर्यासा का शाप कालिदास की अपनी कल्पना है। महाभारत की मूल कथा में उसका अस्तित्व नही है। इस शाप की कल्पना से कालिदास ने अपने दुष्यन्त को

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४६२ ] [ कारिका ३-४

तद्यया अभिज्ञानशाकुन्तले- १विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपानिधि चेतिसि न मामुपस्यितम्। रमरिप्यति त्वा न स वोधिताउपि सन कथा ग्रमत्त प्रथम कृतामिय ।/=।। रम्याणि वीच्षय मधुगश्च निशम्य शब्दान पर्युतमुकी भर्वान यत्मुसितजपि जन्तु । तच्चेतसा स्मरति नृनमचो वपूच भावस्थिराणि जननान्त सौहदानि ॥६।। सागे के सारे दोषो ग बचा लिया है। ग्रर कयानर मे एक नई जान दाल दा है। प्रागे का सारा कथानक उस कल्पना क स्र्पानोक से स्र्पानाकिन हो रहा है। इमीनिए कुन्तक ने इतिहारा प्रमिद्ध कथा मे परिवतन कर उत्पाद्यलापण्य के उदाहग्ण न्य में इस प्रसद्ध वे उपस्थित किया है। और इसी मे से कुछ इलोक ग्रागे उद्दृत किए है। जिनमें से पहिला श्लोक दुर्वामा का शाप रप ही है। उसका मर्थ उम प्रकार है- [ हे शकुन्तले ] प्यनन्य भाव से [ तन्मय हो कर इस समम ] तू जिसका ध्यान कर रही ह औ्रप्रर [आ्रश्रम के अ्रतिथि रूप में] उपस्थित मुक तपोनिधि [दुर्वासा] को नहीं देख पा रही हैं। वह याद दिलाने पर भी तुभको नहीं पहचानेगा जैसे प्रमत्त व्यक्ति पहिले कही हुई कथा को [ याद दिलाने पर भी नहीं समझ पाता है] ॥८॥

रही है- पञ्चम श्रह्द के आ्ररभ्भ में हमपदिका गाने का अभ्यास करती हुई गा

अभिनवमधुलोलुपो भवास्तथा परिचुम्व्य चूतमञ्जरीम् । कमलवसतिमायनिवृतो मधुकर विस्मृतोऽम्येना कथम् ।। इसको सुन कर राजा दुष्यन्त के मन मे एक प्रकार की उत्कण्ठा-सी उत्पन्न हो जाती है। वह व्याकुल हो जाता है और कहना हूं- सुन्दर वस्तुओ को देख कर या मधुर शब्दों को सुन कर कभी सुखी प्रासी भी उत्कण्ठा युक्त, किसी से मिलने के लिए व्याकुल, हो जाता। सो जान पडता है कि वह अ्ज्ञात रूप से मन में स्थित पूर्वजन्म के प्रेम सम्वन्वो को मन में याद करता हूँ। और उसी से व्याकुल हो जाता है। सुन्दर वस्तुओ को देख कर या मधुर शब्दी को सुन कर कभी सुखी प्रारगी भी [उत्कण्ठित ] किसी से मिलने के लिए व्याकुल हो जाता है। सो जान पडता है कि यह स्ज्ञात रूप से मन में स्थित पूर्वजन्म के प्रेम सम्बन्धो को याद करता है [औरर उसी से व्याकुल हो जाता है] ।।६।l १ अ्रभिज्ञान शाकुन्तलम् ४, १। २ अ० शा० ५, ₹।

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कारिका ३-४ ] चतुर्थोन्मेष. [४६३,

विभ्रत्काञ्नमेकमेव वलय श्वासोपरवताघर। चिन्ताजागरणप्रतान्तनयनस्तेजोगुणादात्मन. संस्कारोल्लिखितो महामणिरिव क्षीणोडपि नालच्यते ॥१०।

हँमपदिका के गीत को सुन कर उस मधुकर के दृष्टान्त से किसी के साथ राजा दुप्यन्त को श्रव्यक्त रूप किए हुए प्रेम की स्मृति सी तो आ रही है परन्तु वह शकुन्तला के प्रेम से सम्बन्ध रखती है यह बात स्पप्ट रूप से स्मरण नही रही हं और मानो किसी पूर्वजन्म की घटना से सम्बन् रखने वाली हो ऐसा प्रतीत हो रहा है। यहाँ, दुष्यन्त की स्मृति पर प्रमाद जन्य विस्मरण का एक सुन्दर हलका सा पर्दा डाल कर कवि ने उसमें एक अपूर्व सौन्दर्य उत्पन्न कर दिया है। यह सब दुर्वासा के शाप का ही प्रभाव है। इसके वाद इसी अव्यक्त प्रणाय स्मृति से राजा व्याकुल रहने लगते है। उनको रात को नीद नही आती, शभुषण आदि सब छोड दिए है। छठे अद्ध के प्रारम्भ में छठे श्लोक में कञ्चुकी ने राजा की इस अवस्था का वर्न इस प्रकार किया है- [राजा ने] विशेष रूप से आ्रभूषणों का धारस करना छोड दिया ह इस लिए बाई कलाई में [दुर्बलता के कारण] ढीला [ पडा हुआ ] केवल एक सुबर्स का कडा पहने हुए हं। उप्स निश्वासों ने उनके प्रघर की लालिमा को नष्ट कर दिया है। चिन्ता में रात्रि को जागते रहने से आँखें चढ़ी हुई है [और दुबले हो गए है] फिर भी सान पर रखने से क्षीण हुई मणि के समान दुवसे होने पर भी अपने [स्वाभाविक] तेन के कारण क्षीण नहीं मालूम पडते है ॥१०॥ कुन्तक ने इसी 'प्रकरण-वक्रता' के दिखलाने के लिए पगला उदाहरए शकुन्तला के छठे अङ्क में से लिया है। शकुन्तला का रसास्त्रादन करके दुष्यन्त के आश्रम से चले जाने के वाद कण्व मुनि जब आश्रम मे आए तो समय पर उन्हे दुष्यन्त और शकुन्तला के गन्घर्व-विवाह का समाचार ज्ञात हुआ। और कण्व मुनि ने अपने दो शिष्यों के साथ शकुन्तला को पतिगृह मे पहुँचाने की व्यवस्था की। आश्रम से शकुन्तला के विदा होने का प्रसङ्ग बडा मर्म-स्पर्शी है। आश्रम के जिन वृक्षो, लताओ और्प्रर पश- पक्षियों के साथ शकुन्तला का अव तक का जीवन व्यतीत हुग था उनसे विदा लेते हुए अपने उन सगे-सम्वन्चियो के प्रति शकुन्तला के नैसगिक स्नेह की उद्दाम धारा नेत्र मार्ग से प्रवाहित होने लगती हैं। और स्वय कण्व मुनि तत्वज्ञानी होने पर भी पुत्री

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[फारिका ३-४

तक्लिप्टवालतरुपल्लवलोभनीय पीत मया सदयमेव रतोत्सवेपु । चिम्बाघर दशसि चेत् भ्रमर प्रियाया- स्त्वा कारयामि कमलोदरवन्धनस्थम्॥११।

की विदार्ड के इस अवसर पर साघारए गृहस्थियों के ममान विकल हो जाते है। इम सारे प्रसङ्ग को महाकवि कालिदास ने वडे सुन्दर और सजीव रूप में चित्रित किया है। इसीलिए शकुन्तला नाटक का चतुर्थ शद्ध सवसे सुन्दर श्ङ्ध माना जाता है। कण्ब मुनि की व्यवम्था के अनुसार दोनो ऋृपि कुमार अ्रपनी बहिन शकुन्तला को लेकर दुग्यन्त के यहाँ उपस्थित होते है तो शाप के प्रभाव मे सब प्रकार मे स्मरस दिलाने पर भी दुप्यन्त वो स्मरस नही आता है कि इसके साथ मेशा कभी कोई नम्बन्ध रहा है। इस स्थिति में शकुन्तला को ग्रहण कर 'परस्नीस्पर्शपामुन' होने की अपेक्षा वे 'दार-त्यागी' होना पमन्द करेंगे ऐसा कह कर गकुन्तला का ग्रहण करना अस्वीकार कर देते है। दुर्वासा-गाप की छाया में घटित उस शकुन्तला-प्रत्यास्यान की घटना ने महाभारत के लम्पट दुष्यन्त को आदर्श चरित्र और उद्दात्त नायक बना दिय। है। इस प्रकार महाभारत के एक सामान्य उपास्यान में दुर्वासा-शाप की सामान्य कल्पना द्वारा महाकवि कालिदास की अलौकिक प्रतिभा मे नई जान सी डाल दी है। आह्के हुई शकुन्तला का भी प्रत्याख्यान कर देने के वाद जव मत्स्यावतार पर शकुन्तला की अंगुली से निकल कर गिरी हुई अँगूठी किसी मछली के पेट से मिलती है ग्ार गजा के पास पहुंचती है तो उसको देख कर राजा को सारी घटना का स्मरस ह। आता हं और वह शकुन्तला के लिए एक बार फिर पागल हो उठते है। उसी उत्माद के आवेश में चित्र में शकुन्तला के समीप मँडराते हुए भ्रमर को देख कर कह रहे हें- किसी बिना छुए हुए नवकिसलय के समान ललचाने वाले [ सुन्दर ] प्रियतमा [ शफुन्तला ] के जिस अधर विम्व को मेने सुरतोत्सव के समय [ निर्दयता पूर्वक नहीं अपितु ] दया पूर्वक [ बहुत धीरे से ] ही पान किया था, हे भ्रमर । यदि तू उस अघर बिम्ब को काटने का प्रयत्न करेगा तो तुभे कमल के भीतर कैदखानं में डलवा दूंगा।११॥ इस प्रकार सारे नाटक में फैली हुई कथा पर उस दुर्वासा के शाप का जे प्रभाव दिखलाई दे रहा है मानो वह ही इस सारे उपाख्यान भाग की जान है इसलिए कुन्तक ने इस प्रकरण को द्वितीय प्रकार की 'प्रकरण-वक्रता' के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

9 पसिज्ञान गाकन्तल ६

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कारिका ३-४ ] चतुर्योन्मेष [४६५

'उत्पाद्य-लव-लावययात्' इति द्विधा व्याख्येयम्। क्वचिदसदेवोत्ाद १ .- अथवा आरहतम् । क्वचिदौचित्यत्यक्त सदप्यन्यथासम्पाद्यम् सहृदयहद- याल्हादनाय। यथोदात्तराघवे मारीचवध. । तच्च प्रागेव [पृष्ठे ६८-६१] व्याख्यातम्। एवमन्यदप्यस्या वक्रताविच्छित्तरुदाहरएं महाकविप्रवन्धेपु

निरन्तरसरसोद्वारगर्भसन्दर्भनिर्भर। गिरः कवीना जीवन्ति न कथामात्रमाश्रिताः॥११॥

इत्यन्तरश्लोक।।४।।

[कारिका में दिए हुए पद] 'उत्पाद्यलवलावण्य' इसकी दो प्रकार की न्यास्या करना चाहिए। फहीं [ मूल कथा में ] अ्विद्यमान [अर्य जव कवि कल्पना से जोड लिया जाता है तो वह] ही उत्पाद्य अथवा अध्याहृत [ कहलाता ] है [ जैसे यहीं दुर्धासा के शाप की घटना महाभारत में आए हुए दुष्यन्त-शकुन्तला के मूल उपास्यान नें नहीं आ्राई है। केधल कवि की कल्पना से ही मूल कथा में जोड दी गई है। इसलिए यह प्रथम प्रकार का 'उत्पाद्य' भाग हुआ। दूसरा उत्पाद्य प्रकार वह होता है जिसमें] कहीं [ मूल कथा में ] विद्यमान होने पर भी औचित्य रहित अर्थ का सहृदयों के हृदय के आल्हाद के लिए, अन्म प्रकार से परिवर्तन कर दिया जाय जैसे उदात्त राघव में मरीच वघ। उमकी व्याख्या पहिले ही [पृष्ठ ६०-६१ पर ] कर चुके है। इसी प्रकार 'प्रकरण-वक्रता के और भी उदाहर महाकवियों के प्रबन्धों में स्वय समभ लेने चाहिएं। जंसे उत्तररामचरित के तृतीय श्रद्द मे छाया सीता की कल्पना भवभूति की अपनी प्रतिभा से समुद्भूत कल्पना है। भवभूति उसी छाया सीता की कल्पना के सहारे अपने करुण रस को चरम सीमा पर पहुँचाने में सफल हुए है। इसलिए- निरन्तर रस को प्रवाहित करने वाले सन्दर्भो से परिपूर्ण महाकवियों की वारी केवल [ इतिहास में प्रसिद्ध ] कथा मात्र के आश्रय से ही नहीं जीवित रहती है। [अवितु उसके साथ कवि की प्रतिभा का योग होने पर ही कथा में चमत्कार उत्पन्न होता हैं और वह महाकवि की रचना में चिरकाल तक जीवित रहती है]।११॥ यह अ्न्तर-श्लोफ' है॥३-४॥

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४६६ ] वकोपितिजीवितम् [कारिका ५-६

३-अपरमपि प्रकरणवक्रताप्नकारमाविर्भावयति-

प्रवन्ध स्येकदेशारना फलवन्धानुबन्धवान्। उपकार्योपकतृ त्वपरिस्पन्दः परिम्फुरन् ॥५॥ तरसामान्यसमुल्लेख प्रतिभा-प्रतिभासिनः । सूते नृतनवक्रत्वगहस्यं कस्यचित् कबेः ॥६॥

'सूते' समुन्मीलयति। किम्-'नृतनवक्रत्रहस्यम्', अ्रभिनववक्रभावो- पनिपदम्। 'कस्यचित्' न सर्वस्य 'कवे' प्रस्तुतीचित्यचारु-रचनाविचन्तण- स्येति यावत्। क :- 'उपकार्योपकत त्वपरिस्पन्द', अ्र्प्रनुग्राह्यानुग्राहकत्वमहिमा। किं कुर्वन्-'परिस्फुरन्', समुन्मीलन्। किविशिष्ट .- 'अरसामान्य-

३-प्रकरण-वक्र्ता के अ्रन्य [तृतीय ] प्रकार का भी प्रतिपादन करते हैं-

[ फलबन्ध ] प्रधान कार्य का [अनुबन्धवान् ] अ्रनुसन्धान फरने वाला प्रदन्ध के एक देश [अर्थात् प्रकरर्णो] का [उपकार्योपकारकभाव] अ्रङ्ग प्रधान-भाव परिस्फुरित होता हुआ।[काव्य में नए प्रकार की प्रकरण-वक्रता को उत्पन्न कर देता हैँ]।।५।

अ्साधारण सूभ [ समुल्लेख ] वाली प्रतिभा से प्रतिभासित किसी [ विशेष] कवि के [काव्यादि में ] अ्ररभिनव सौन्दर्य के तत्व को उत्पन्न कर देता है। [अरर्थात् विशेष प्रकार से निबद्ध पदार्थों के गुए प्रधान भाव से भी काव्य में नवीन चमत्कार उत्पन्न हो सफता है। यह भी इसी प्रकरण-वक्रता के भेदो में आता है] ।६॥

उत्पन्न करता है अर्थात् प्रकट करता है। किसको कि-नवीन सौन्दर्य के तत्व के अभिनव वक्रभाव के रहस्म [उपनिषद्] को। [किसी [विशेष] कवि के [ ही काव्य में ] सबके नहीं । अर्थात् प्रस्तुत [ वर्ष्य-अर्थ] के औ्ररचित्य से मनोहर रचना में निपुस [विशेष कवि ] के [ काव्यादिक ने नूतन सौन्दर्य के रहस्य को उत्पन्न करता है]। कौन [ उस सौन्दर्यतत्व को प्रकट करता है कि ] 'उपकार्य उपकारक भाव का वैशिष्ट्य' अर्थात् अनुग्राह्य अनुग्राहक भाव का महत्व । 'क्या करते हुए कि' 'परिस्फुरित होते हुए'। प्रकट होते हुए। किस प्रकार का-'फलबन्ध

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फारिका ५-६ ] चतुर्थोन्मेष: [४६७

समुल्लेरप्रतिभो-प्रतिभासिनः' निरुपमोन्मीलित-शक्तिविभवभ्राजिष्णोः । केपाम्-'प्रबन्धस्यैकदेशानाम्' प्रकरणानाम्। तदिदमुक्त भवति सन्निवेशशोभिनां प्रबन्धावयवानां प्रधानकार्य- सम्बन्धनिवन्धानुप्राह्यमाहकभावः स्वभावसुभगप्रतिभा-प्रकाश्यमानः कस्य- चिद्विचक्सास्य वक्रताचमत्कारिण. कवेरलौकिकं वक्रतोल्लेखलावएयं समुल्लासयति। यथा 'पुष्पदूतिके' द्वितीयेडङ्के।

[अर्थात् काव्य के फल रूप ] प्रधान कार्य से [अनुवन्धवान् ] सम्बन्ध रखने वाला अर्थात् प्रधान कार्य का अ्रनुसन्वान करने वाला, कार्य के अनुसन्धान में समर्थ निपुण। किसका इस प्रकार का [ वक्रभाव होता है कि] अ्रसाघारण स्वरूप वाली प्रतिभा से युक्त अर्थात् अनुपम रूप से प्रकाशित प्रतिभा के वैभव से दीप्यमान [फवि] के [ काव्यो मे इस प्रकार की वक्रता प्रतीत होती है ]। किन के-[ उपकायोवकारक भाव से कि ] प्रबन्ध के एक देशो के अर्थात् प्रकरखों के।

1 इसका अभिप्राय यह हुआ कि-सन्निवेश [कम ] से शोभित प्रबन्ध के अव- यवों [ प्रकरणो] का प्रधान कार्य के सम्बन्ध के अनुसार अनुग्राह्य-प्रनुग्राहक भाव, स्वभावतः सुन्दर [ कवि की ] प्रतिभा से प्रकाशित होकर वक्रता के चमत्कार से युक्त किसी विशेष कवि के [ काव्यादिको में ] वकभाव के किसी अ्रपूर्व सौन्दर्य को अभिव्यक्त करता हैं। जैसे 'पुष्पद्वतिक' [प्रकरण ] के द्वितीय शरङ्ध में । यह पुष्पदूतिकम् नामक 'प्रकरण' [नाटक का भेद ] जिसका उद्वरण ग्रन्थकार ने आगे दिया है सम्प्रति मुद्रित अ्रमुद्रित किसी रूप में उपलब्ध नही है। परन्तु उसकी चर्चा 'दशरूपक' की टीका 'दशरूपककावलोक'३,४२ में भी आई है और साहित्यदपण- कार ने भी ६, २२५ में 'पुष्पभूषित' नाम से उसका उल्लेख किया है। जान पडता है कि विश्वनाथ के समय में भी वह उपलब्ध नही था। इसी लिए उन्होंने 'पुप्पभूतिष' नाम से इसका उल्लेख किया है। इसके रचयिता के नाम का भी पता नही है। कुन्तक ने इमी चतुर्थ उन्मेष में 'प्रकरण-वक्र्ता' के तीसरे तथा नवम भेद में दो जगह 'पुष्पदूतिक' नामक 'प्रकरण' की चर्चा की है। दोनो जगह का पाठ बहुत 'खण्डित है। फिर भी उन दोनो स्थलो को मिला कर हमने उसकी आ्स्यान-वस्तु या कथा-भाग को निकालने का प्रयत्न किया है जो इस प्रकार है-

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४६८ ] बकोपितिजीवितम् [कारिका ५-६

'पुष्पदूतिक' वा नायक सार्धवाह सागरदत्त का पुथ्र गमुद्रदत्त है। उमका विवाह नयदत्त की पुत्री के साथ हुगा था। सार्यवाह व्यापारियो का वर्ग है जो समुद्र- मार्ग या स्थल-मार्ग से दूर देशो मे माल का यातायात कग्ते थे। मुद्रदत्त का भी, यही कार्य था। विवाह के बाद गीघ्र ही उमे समुद्र पार किमी दूर देश की यया पर जाने का अवमर उपस्थित हुआ। इच्छा न रहने हुए भी पिता की आज्ञा से अपनी नव- विवाहिता पत्नी को छोड कर उसे यात्रा पर जाना ही पत। वह घर से चना। बहुत दिनो के स्थल मार्ग की पैदल यात्रा के वाद वह समुद्र तट पर पहुंचा जहा से उसकी मुख्य विदेश-यात्रा प्रारम्भ होती थी। परन्तु यहाँ जीवन को सङ्ट में डालने वाली समुद्र-यात्रा प्रारम्भ करने के पूर्व उसका मन अपनी नव-परिणीता पत्नी मे मिलने के लिए विकल हो उठा और वह उल्टे पांव घर को लौट पडा। घर पहुच कर घर वालो से छिप कर उसने अपनी पत्नी से भेंट करने का प्रयत्न किया। घर के द्वारपाल को अपपनी अंगूठी ूंस में देकर वह कुमुम-वाटिका मे रात को अपनी पत्नी मे मिलकर और शायद हो चार दिन गुप्त रूप में उसके साथ रहकर फिर यात्रा पर चला गया। समय पर जब इस गुप्त-सहवास के चिह्न प्रकट हुए तो उसके पिता सागरदत्त ने अपनी पुत्रवधू को कुल-कल्धिनी समभ कर घर मे निकाल दिया। दुर्भाग्य से उम समय उस विचारी की ओर से सफाई दे सकने वाला द्वारपाल कुवलय भी किसी कार्यवश मथरा चला गया था। इसलिए उसके पति समुद्रदत के आने की बात पर कोई विश्वास नही कर सका। और समुद्रदत्त की निरपराध पत्नी को कुलटा समझ कर घर से निकाल दिया गया। उसके बाद जब द्वारपाल कुवलय मथुरा से वापिस आया तो उसने बतलाया कि समुद्रदत्त इस प्रकार यात्रा में से वीच से लौटकर साया था। ओर रात्रि में अपनी पत्नी के पास रहा था। इस बात को छिपाने के लिए मुझे यह अँगूठी घूंस में दे गया था त्र कह गया था कि मेरे आने की बात किसी से मत कहना। इसी लिए मेने अब तक यह बात किसी से न कही थी। जब समुद्रदत्त के पिता सार्थवाह सागरदत्त को यह पता चला कि मैंने अपनी गर्भवती सच्चरित्र पुत्रवधू को निरपराध होने पर भी कलङ्ग लगाकर घर से निकाल दिया है तब उसे अपने इस कृत्य पर वडा पश्चात्ताप हुआ। अपने इस कार्य का प्रायश्चित्त करने के लिए वह भी तीथ-याधा के लिए घर से निकल पडा। इघर समृद्रदत्त भी अपनी यात्रा पूर्ण करके घर को लौट रहा था। घटना क्रम से समुद्रदत्त, उसकी पत्नी, उसके पिता सार्थवाह सागरदत्त, और उसके पत्नी के पिता नयदत्त आदि सबकी मार्ग में एक जगह हो भेंट हो जाती है। समुद्रदत्त अपनी पत्नी को लेकर घर आ जाते है और उसके पिता तीर्थ-यात्रा पर चले जाते हैं।

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कारिफा ५-६] चतुर्थोन्मेषः [reE

इस कथानक को लेकर सम्भवत छ अ्रङ्को में इस 'पुष्पदूतिक' नामक 'प्रकरणरूप' नाटक के विशेष भेद की रचना की गई थी। प्रकरण में आस्यान-वस्तु इतिहास प्रसिद्ध नहीं कवि-कल्पित होती है। उसका नायक विप्र अमात्य या बणिक होता हूं। 'प्रकरस' का लक्षण इस प्रकार किया गया है- भवेत् प्रकरणे वृत्त लौकिक कवि-कल्पितम्। पृङ्गारोडङ्गी नायकस्तु विप्रोऽमात्योऽथवा वणिक॥ सापाय - धर्म-कामार्थ - परो धीर-प्रशान्तक। नायिका कुलजा क्वापि वेश्या क्वापि द्वय क्वचित्॥ तेन भदास्त्रयस्तस्य तत्र भेदस्तृतीयक कितवद्यूतकारादि - विट - चेटक 11 कुलस्त्री पुष्पभृषिते सङ्कल वेश्या तु रङ्गवृत्ते। - हे अपि मृच्छकटिके। अस्य नाटक प्रकृतित्वाच्छेप नाटकवत्। प्रकरण के इस लक्षण के अनुसार कवि ने वशिक समुद्रदत्त को नायक और उसकी पत्नी को 'कुलजा' नायिका बनाकर उनकी पृङ्ग्ार प्रधान इस प्रेम कथा की कल्पना कर उसके आधार पर इस 'पुष्पदूतिकम्' प्रकरण की रचना की है। कुन्तक ने इस इस कथानक का जो विवरण दिया है उसके अनुसार इसमें छ श्रद्द रहे होगे, यह अनुमान होता है। छहो भ्रङ्को का सार कुन्तक ने इस प्रकार दिखलाया है- प्रथम अङ्ध-नव परिणीता पत्नी की अति दारुण विरह वेदना से खिन्न समुद्रदत्त के समुद्र तट पर पहुँचने पर अपनी पत्नी से मिलने की असाधारण उत्कण्ठा का चित्रण। द्वितीय अ्रद्द-यात्रा के वीच में हो लौट कर घर के द्वारपाल 'कुवलय' को घूस में पलद्कार आदि देकर कुसुम वाटिका में अपनी पत्नी के पास रहना। तृतीय अ्रङ्ग-इस सहवास के परिसाम-स्वरूप गर्भ-चिन्हो के प्रकट होने पर समुद्रदत्त की पत्नी द्वारा अपनी निरपरावता-सिद्धि का असफल प्रयत्न और उसको कुलटा समझ कर पिता द्वारा उसका निर्वासन। चतुर्थ श्रद्ध-द्वारपाल 'कुवलयदत्त' के मथुरा से लौटने पर उसके द्वारा समुद्र- दत्त के छिपकर आने का समाचार और उसके समर्थन में समुद्रदत्त की अँगूठी को देख कर निरपराध और गर्भवती पुत्रवधू के निवासन को महा-पातक मानकर पिता सागर- दत्त की प्रायश्चित्तार्थ यात्रा को प्रस्थान। पञ्चम शङ्क-यात्रा से लौटते हुए समुद्रदत्त का समाचार आदि।

१ साहित्यदर्पण। ६, २२४-२२६ ।

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५00] वकायितिजीवितम् [फारिका ५-६

प्रस्थानान् प्रतिनिवृत्य अ्र्मन्दमटनोन्मादमुद्रेग समुद्रदत्तेन निजमहिमा- केतन१ प्रविशता प्रकम्पावेगविकलालसकायनिपात निहित निद्नम्य द्वारदेशशायिन कुवलस्योत्कोचकारएं स्वकरान्निक्राम्य प्रद्गलीयकदान यत्कृत तच्चतुर्येडक मथुराप्रतिनिवृत्तेन तेनेव समावेदितममुद्दत्तवृत्तान्तेन कुलकलद्गातक्क- कटथ्यमानस्य सार्थवाहसागरवत्तम्य स्वतनयम्य म्पर्शमान· जीलशुद्वि- सुन्नीलयत् तदुपकाराय कल्पते।

पप्ठ अङ्-घटना-क्रम से समुद्रदत्त, उसकी पत्नी और उन दोनों के पिता, सबकी एकत भेट होकर सुखान्त रूप में 'प्रकरण' को समाग्ति।

इस कथानक में द्वितीय अङ्ग मे समुद्रदत्त ने घूंस रूप मे द्वारपाल कुवलय को जो त्ंगूठी दी थी उसी को देखकर चतुर्य श्रद्क में सागरदत्त को अपनी पुथ-वधू की सच्च- रित्रता पर विश्वास हुआ। इम प्रकार प्रबन्ध के इन दो स्थलो या एकदेशो के परस्पर उपकार्य-उपकारक भाव को देखकर ही कन्तक ने इसे तीमरे प्रकार की 'प्रकरण- वक्रता' के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है। इस वात को समभ लेने पर इस अप्राप्य प्रकरण की इन त्रुटित और अ्र्प्रस्पप्ट पवितयो का भाव ठीक प्रकार से समझा जा सबता है। जो निम्न पकार है-

यात्रा से लौट कर, प्रवल मदनोन्माद की मुद्रा से युक्त समुद्रदत्त ने [अपनी पत्नी से मिलने के लिए गुप्त रूप से अपने [महिमा केतन] वैभव शाली घर में घुसते हुए [डर के कारण होते वाले] प्रकम्पन के आरवेग से विकल औ्रौर शिथिल [अपने] शरीर को [हारपाल कुवलय के ऊपर] गिराकर [अर्थात् श्रँधेरे में उसके ऊपर गिर पडने से] जिसको जगा दिया है ऐसे दरवाजे पर लेटे हुए [ द्वारपाल ] फुवलय बसत को घूँस के लिए अपने हाथ से निकाल कर जो अ्ँंगूठी दी है वही मथुरा से लौटने पर उसी [ द्वारपाल कुवलयदत्त] के द्वारा समुद्रदत्त के गुप्त रूप से अपनी पत्नी के पास आने के वृत्तान्त को वतलाते हुए फुल कलड्ग के भय से दु.खी हुए सार्थवाह सागरवत्त के समक्ष अपने पुत्र के [ससर्ग से गृहीत गर्भा पुत्र वघू के]चरित्र की शुद्धि को प्रकाशित करती हुई उन [ समुद्रदत्त, उसकी पत्नी और उसके पिता तीनों ] की उपकारक हो जाती हुँ।

१ इसके बाद 'तुल्यदिवसमानन्दयन्ती' यह पाठ श्रधिक था।

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कारिका ५-६] चतुर्थोन्मेषः [५०१

यथा च 'उत्तररामचरिते' प्रथुगर्भभरखेदितदेहाया विदेहराजदुहितु- -१विनोदाय दाशरथिना चिरन्तनराजचरितचित्ररुचि दर्शयता निर्व्याजविजयि- विजम्भमाणजम्भ कास्त्राएयदविश्य- 9सर्वथेदानीं त्वत्प्रसूतिमुपस्थास्यन्ति। इति यदभिहितं तत्पञ्चमेऽक्केप्रवीरचर्यातुचरेण चन्द्रकेतुना क्षएं समर- केलिमाकांकता तदन्तरायकलितकलकलाडम्वराणा वरुथिनीनां सहजजयो- त्कएठाभ्राजिष्णोर्जानकीनन्दनस्य जम्भकास्त्रव्यापारेख कमप्युपकारमुत्पाद्यति। तथा च तत्र- 2लव .- भवतु जम्भकास्त्रेर तावत्सैन्यानि संस्तम्भयामि इति। सुमन्त्र :- [ससम्भ्रम्] वत्स कुमारेानेन जम्भकास्त्रमभिमन्त्रितम्। चन्द्रकेतु :- आर्य कः सन्देहः-

और जैसे 'उत्तररामचरित' में परिपूर्ण [नवमासिक ] गर्भ के भार से खिन्न वेह वाली [ विवेहराज की कन्या ] सीता के मनोरञ्जन के लिए प्राचीन राजाओ्रों [अथवा अपने विगत जीवन] के चित्रो से रुचि दिखलाते हुए रामचन्द्र ने स्वभावत विजयशील [ अप्रतिहत प्रभाव ] जुम्भकास्त्रो को लक्ष्य में रखकर- 'सब ये पूरए रूप से तुम्हारी सन्तान को प्राप्त होंगे।' यह जो कहा है वह पञ्चम श्द्ध में वीर व्यवहार में चतुर चन्द्रकेतु के साथ तनिक देर के लिए युद्ध-क्ोडा की इच्छा करते हुए [परन्तु] उसमें विघ्न डालने वाली औौर शोर मचाने वाली सेनाओ को पराभूत करने की इच्छा से उद्दीप्त जानका-नन्दन [लब] के [द्वारा प्रयुक्ष्त किए गए ] जुम्भकास्त्र के व्यापार से कुछ अ्रनिर्वचनीय उपकार कर रहा है। जैसे कि वहां [इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है] कि- लव-शच्छा ठहरो, जुम्भकास्त्र से इन सेनाओं को निर्व्यापार किए देता हूँ। सुमन्त्र- [ भयभीत होकर ]- बेटा-[ चन्द्रकेतु देखो तो ] इस कुमार [ लव ] ने जुम्भफास्त्र फा प्रयोग किया है। चन्द्रकेतु-भायं [ इसमें ] क्या सन्देह है? [देखो न]। १. उत्तररामचरित व पञ्चमाङ्ट,।

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५०२] वक्रोफ्तिजीवितम् [फारिका ५-६

'व्यतिकर इव भीमो वेद्य तस्तामसरच मणिहितमपि चत्तुर्यस्तमुक्त हिनरिति । त्ररमिलिखत िवेतवसैन्यमस्पन्दमास्त नियतमजितवीर्ये जम्भते जम्भकास्त्रम् ॥१२।। आश्चर्यम्- पातालोदर कुज्जपुज्िजिततमःश्यामे नभो जम्भके- रन्तः-प्रस्फुरदार कूटकपिल प्योतिर्ज्ज्वलद्दीप्तिमिः। कल्पाक्षेप-कठोरभैरवमरुद्व्यस्तरवस्तीर्यते नीलाम्भोदतडित्कडार कुहुरै-विन्ध्याद्रिकूटेरि ।।१३।।

बिजली [की चमक] का और अ्न्घकार का भयद्धर सम्बन्ध ध्यानपूर्वफ जमाई हुई दृष्टि को भी [वार-वार ] पकड कर औरर छोड कर व्यर्थ कर देता है। [प्रर्थात जिस प्रकार कभी जोर से विजली चमक जाय और तुरन्त भ्रन्धकार हो जाय तो आंर्खों में चकाचौंघ पैदा हो जाने से कुछ भी दिखलाई नहीं देता है। आंखे प्रन्घी-सी हो जाती हे। इस समय जुम्भकास्त्र के प्रयोग के कारण इसी प्रकार की स्थिति हो रही हैं। और यह सेना भी चित्रलिखित-सी [ व्यापारशून्य चेष्टाविहीन ] हो गई है। [ इससे प्रतीत होता है कि ] निश्चय ही अप्रहित प्रभाव वाला जुम्भकास्त्र अपना काम कर रहा हं॥१२॥

घडा आश्चयं है।

[कभी तो ] पाताल के भीतर की [ भी] कुञ्जो में एकत्रित अन्घकार के समान काले-काले और [ कभी ] खूब गरम किए हुए [ तपाए हुए ] चमकते पीतल के ममान पीली ज्योति से प्रज्वलित, दीप्ति से युक्त, जुम्भकास्त्रो ने प्रलयकालीन भयड्गर वायु से इधर-उधर उडाए गए हुए नीले मेघो के बीच चमकती हुई विजली से पीली गुफाओो वाले विन्ध्याचल पर्वत के शिखरों से मानो आ्काश को भर दिया है॥१३ ।।

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फारिका ७-८ ] चतुर्थोन्मेषः

इत्यादि।' 'एकदेशानाम्' इबिहुवचनमत्र द्व योरपि। बहूनामुपकार्योपकारकत्व स्वयमुत्प्रेक्षसीयम् ॥५-६।। ४-अस्या एव प्रकारान्तरं प्रकाशयति- प्रतिप्रकरणं प्रौढ़प्रतिभाभोगयोजितः । एक एवाभिधेयात्मा वध्यमान: पुनः पुनः।७॥

वघ्नातीति अ्र्प्रत्र निविड़यतीति यावत्। काम्-'वक्रतोद्भेदभङ्गीम्', वक्रभावाविर्भावात् शोभाम्। कि विशिष्टाम्-'उत्पादिताद्भूताम्' 'कन्दलित- कुतूहलाम्'। क :- 'एक एवाभिधेयात्मा' तदेव वस्तुस्वरूपम्। कि क्रियमाणम्-

इत्यादि। [ कारिका में जो ] एकदेशानाम् यह बहुवचन [ प्रयुक्त हुआ] है वह [ केवल बहुतो को ही नहीं अपितु ] वो का भी वाचक है। [दो अ्रशो के उपकार्य उपकारक भाव के उदाहरण ऊपर दिए है ] बहुतों के भी उपकार्योपकारक भाव [ के उदाहरण ] स्वय समझ लेना चाहिए ॥५-६।। ४-इसी [प्रकरण-वक्रता] के अ्रन्य [ चतुर्य ] प्रकार का प्रतिपादन करते हैं- प्रत्येक प्रकरण में [कवि की] प्रौढ़ प्रतिभा के प्रभाव से आयोजित एक ही अर्य बार-बार निबद् होता हुआ भी [सर्वया नवीन चमत्कार को उत्पन्न करता है ]। [ हर जगह ] बिल्कुल नए रस औ्रर अ्रलद्धारो [ के सौन्वय ] से मनोहर प्रतीत होता हुआ प्रश्चर्यंजनक वक्रता शैली को उत्पन्न करता है। [वह 'प्रकरण- वक्ता' का चौथा प्रकार होता है ]। यहाँ 'वघ्नाति' का अरथ 'दृढ करता है' यह है। किसको [ दृढ़ करता हू कि] कन्तक्रभाव के श्र्रविर्भाव से उत्पन्न शोभा को। किस प्रकार की [शोभा ] को 'आराश्चर्य को उत्पन्न करने वाली' अर्यात् कोतूहलजनक [ शोभा को पुष्ट करता है] कौन [ पुष्ट करता है कि] एक ही 'प्रतिपाद्य पदार्थ', पर्थात् वही वस्तु का स्वरूप [आ्रशचर्य जनक शोभा को पुष्ट करता है]। यया किए जाने से कि 'निवध्यमान' अपर्यात् प्रस्तुत [ प्रकरण] के अनुरूप सुन्दर रचना का विषय बनकर। कैसे [ निवद्ध होकर कि ] १. 'तत एक एवायम्' इतना पाठ यहा अषिक था।

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५०४ ] वक्रोकितिजीवितम् [कारिफा ७-८-

'वध्यमानम्', प्रस्तुनौचित्यचारुरचनागोचरनामापाद्यमानम । कथम्-'पुनः पुन.' चार वारम्। क्व-'प्रतिप्रकरणम', प्ररणे प्रकरसे म्थाने स्थाने उति -1 यावत्। नन्वेवं पुनरुक्तपात्रतामसौ समासनयतीत्याह- 'अन्यूननूत नोल्लेखरसालद्वरणोज्जल', श्र्रविकलाभिनवोल्लासशद्गार- रूपकाढिपरिस्पन्दभ्रजिष्णु। यम्मात् 'प्रोढप्रतिभाभोगयोजित' प्रगल्भतर- प्रज्ञाप्रकरप्रकाशित. । अयमस्य परमार्थ-तदेव सकलचन्द्रोदगप्रकरणप्रकारपु प्रस्तुत- कथासंविधानकानुरोधात् मुहर्मुहुरुपनिवध्यमान यदि परिपूर्णापूर्वविलक्षणरुप- काद्यलङ्काररामणीयक-निर्भर भवति तदा कामपि रामणीयकमर्यादा वक्रता- मवतारर्यांति।

'पुन. पुन' बार बार। कहाँ कि-'प्रति प्रकरण में' अर्थात हर एक प्रकरण प्रकरण में अर्थात स्थान रथान पर [ बार वार यह अ्रभिप्राय हुआा]। [प्रश्न] ऐसे तो [एक ही अ्र्य के बार वार वर्गन करने पर] वहे पुनरुषित [दोष] का पात्र हो जायगा [यह शङ्ा हो सकती है]। [शक्का] के [निवारण] लिए कहते हे कि- [उत्तर वह जो बार वार एक ही पदार्य नफावर्ण है वह फसा होना चाहिए कि हर जगह एक दम नया-सा प्रतीत हो। 'क्षणे क्षणे यन्नवतामपति तदेव रूप रमणीयताया.'] एक दम [पूर्ण रूप से] अ्रभिनव प्रतीत होने वाले रस तथा प्रलङ्गार आदि से उज्ज्वल अरपर्थात् पूर्णतया नवीन रूप में उल्लसित शृङ्गार भादि [रस ] और रूपक प्रादि [अ्रलद्धार ] के व्यापार से प्रकाशनान[ वह पुन पुन वशित होना चाहिए। ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ही पदार्थ का वर्णन हर जगह नया नया-ता प्रतीत हो इसके लिए कहते है कि] क्योकि [वह महाकवि की] प्रौढ-प्रतिभा के प्रभाव से आयोजित होता है अर्थात् अत्यन्त प्रगल्भ प्रतिभा से प्रकाशित-सा होता हैं[ इसलिए एक ही अर्थ वार वार दुहराये जाने पर भी पुनरुक्त-सा प्रतीत नहीं होता है अपितु हर जगह एक दम नया नया-सा प्रतीत होता है ]। इसका साराश यह हुआ कि-पूर्णचन्द्रमा के उदय आदि के [ वर्शनपरक ] प्रकरणों के सदृश प्रकररो में कथा की रचना के अनुसार यदि वही वस्तु बार बार वगिगत होने पर भी पूर्णतया पहिले-वगिगत रूपकादि अलद्धारो से विलक्षण अलद्धारो के- सौन्दर्य से परिपूर्ण होती है तो वह रमशीयता की चरम तीमा को प्राप्त' किसी अपूर्व 'वकरता' को प्रकाशित करती है।

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कारिका ७-८-] चतुर्थोन्मेष:

यथा हर्षचरिते। यथा वा तापसवत्सराजचरिते। कुरवकतरुर्गाढाश्लेपं मुखासवलालना वकुलविटपो रवताशोकस्तथा चरणाहतिम् ॥१४॥ घरावेश्म विलोक्य दीनवदनो भ्रान्त्ा च लीला गृहान्- निःश्वस्पायतमाशु केशरलतावीथीपु कृत्वा हशः । कि मे पार्श्वमुपैषि पुत्रक कतैः किं चाटुभिः क्ररया मात्रा त्वं परिवर्जित सह मया यान्त्यातिदीर्घी सुवम्॥१५॥

जंसे हर्षचरित में [यहाँ हर्षचरित के किस प्रकरण का निर्वेश कुन्तक कर रहे है इसका स्पप्ट उल्लेख नहीं किया गया है ]। अ्रथवा जैसे 'तापसवत्सराजचरित' [नामक सम्प्रति अलम्य नाटक] में- इस 'तापस-वत्सराज चरितम्' नाटक की रचना 'कथासरित्-सागर' आदि में वरित औरर असिद्ध उदयन तथा वासवदत्ता की कथा के आधार पर हुई थी, यह बात उसके नाम से ही स्पष्ट प्रतीत होती है। परन्तु वह नाटक भी पूर्वोद्ध त 'असिजात- जानकी'-नाटक के समान आज तक मुद्रित नही हुआ है। 'कुरबक' इत्यादि जो ध्लोक कुन्तक ने यहाँ उदृत किया है उसकी लिखावट बडी अस्पष्ट है। इसलिए उसके केवल दो ही पाद स्पप्ट पढने में आ सके शेप दो पाद पढने में नही आए। तापस-वत्सराज नाटक के इस समय उपलब्ब न होने के कारण श्लोक पूरा नही किया जा सका है। आधे श्लोक का अर्थ यह है कि- कुरवक का वृक्ष [दोहद के रूप में उस नायिका के ] गाढ आ्लिङ्गन को, मौलश्री का वृक्ष [उसी दोहद के रूप में ] मुख की मदिरा के सम्मान को, औ्रर रवत-अशोक [का वृक्ष उसी दोहद के रूप में उस नायिका के ] पाद प्रहार को प्राप्त फर सौभाग्यशाली है॥१४॥ इस श्लोक में वासवदत्ता की मृत्यु का समाचार सुनकर उदयन उसके वियोग में विलाप कर रहे है। उदयन का यह विलाप आगे उदृत २१वे श्लोक तक चल रहा हैं। परन्तु एक ही बात वार-वार व्शित होने पर भी उसमें बरावर नूतनता प्रतीत हो रही है इसलिए यह सारा प्रकरण इस 'प्रकरण-वत्रता' का उदाहरण है। 'घारा वेश्म विलोक्य' इत्यादि[का अर्थ उदाहरण सं० ३, २७ पर देखो] ।१५।

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५०६] वक्रोफतिजीवितम् [फारिफा ७-

कर्णणान्तस्थितपद्मरागकलिका भूय समानपंता चञ्च्ा दाडिमवीजमित्यमिहता पाटन गएडम्थली। येनासौ तव तस्य नर्भसुहदा खेदान्मृहु: क्न्दतः निःशङ्क न शुकस्य कि प्रतिवचो देवि तया दीयते ॥१६॥। सास्रम्- सर्वत्र ज्वलितेपु वेश्मसु भयादालीजनन विद्र ते घरासोत्कम्पविहस्तया प्रतिपद देव्या पतन्त्या तदा। हा नाथेति मुहु. प्रलापपरया दग्घ वराकया तथा शान्तेनापि वयन्तु तेन दहननाद्यापि दह्यामहे॥२७।। विरोधालङ्कार, । करुणरस।

'कर्शान्तस्थितपद्मराग' इत्यादिका अर् उ० स० ३, २६ पर देसो] ॥१६। उदयन का राज्य शत्रुओ ने छीन लिया था। ज्योतिपियो का कहना था हि जब इनका दूसरा विवाह सागरिका के साथ हो जायगा तव इनको राज्य की भी पुन प्राप्ति हो जावेगी। उदयन अपनी स्त्री वासवदत्ता को बहुत प्यार करते ये अत दूसर विवाह करने को तैयार नही थे। यह देख कर उनके मन्त्री यीगन्वरायण ने वासवदत्त की सहमति से वासवदत्ता को दूसरी जगह छिपा कर रख दिया और उदयन को या प्रतीत करा दिया कि घर मे आग लग जाने से वासवदत्ता उसम जलकर मर गई है इसी दुघंटना का स्मरण कर उदयन रोते हुए कह रहे हें कि- रोते हुए [उदयन कहते हं कि]- सारे घरो में चारो ओर आाग लगी हुई होने पर [ अत्यन्न भयभीत ] औौर भय के कारण [अपने प्रास बचाने के लिए ] सखियो के भाग जाने पर [किस दूसरे की सहायता न मिल सकने के कारण निराश होकर स्वय भागने का प्रयत्न कर पर] भय और [उससे उत्पन्न] कम्प से हाथ-पैर फूल जाने से पग पग पर गिरती पडती [ और उस घबराहट में अपने एक मात्र सहारे पति के रूप में मुभको स्मरस कर] हा नाथ ! हा नाथ ! इस प्रकार बार बार चिल्लाती [और मुझको पुकारती] · हुई, वह विचारी [ वासवदत्ता ] ऐसी जली [ जल कर मरी ] कि [ आ्राज ] उस अग्नि के बुझ् जाने पर भी हम तो आ्राज भी उस अ्ग्नि से जले जा रहे हैं॥१७॥ [ इस श्लोक के चतुर्य चरण में उस अग्नि के बुझ जाने पर भी हम उससे जले जा रहे है यह जो कथन हैं वह ] विरोधालद्वार [का सुन्दर उदाहरण है] [और उसके भीतर] करुण रस है।

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फारिका ७-८ ] चतुर्योन्मेषः

चतुर्थेडङ्के राजा सकरुएमात्मगतम्- चचतुर्यस्यं तवाननादपगत नाभूत् क्वचिन्निर्वतं येनैषा सततं तवदेकशयनं वत्तःस्थली कल्पिता । येनोद्भासितया बिना बत जगच्छून्यं क्षणज्जायते सोऽयं दम्मधृतन्नतः प्रियतमे कर्तु किमप्युद्यतः ॥१८।।

इस प्रकार पहिले उद्धृत १८,१५,१६ श्लोको में कवि ने वासवदत्ता के वियोग में राजा उदयन के विलाप का वर्णन किया है। उसके वाद 'सर्वत्र ज्वलितेषु' आदि १७वे श्लोक में भी उदयन के उसी विलाप का वर्णन किया है। परन्तु वह पुनरुक्त नही प्रतीत होता है। अपितु एक ही पदार्थ का नई नई शैलियों से पुन पुन किया गया वर्णन भी नया ही नया प्रतीत होता है। इस लिए वह इस चौथे प्रकार की 'प्रकरण-वक्रता' का उदाहरण है। इसके बाद चतुर्थ अ्रद्ध में भी वासवदत्ता के वियोग में राजा उदयन विलाप करते हुए दिखलाई देते है। परन्तु उसमें भी वर्णन शैली की विशेषता के कारण न्यूनता ही प्रतीत होती है। इसी को दिखलाने के लिए कुन्तक ने इस चतुर्थ प्रकार की प्रकरण-वक्रता' के उदाहरण के रूप में उसको प्रस्तुत किया है। चौथे शद्ध में राना [करुरगा पूर्स रूप में ] रोते हुए अपने मन में [ कह रहे हैं कि]- जिसकी [ अर्यात् मेरी ] आंलें कभी तुम्हारे मुख पर से नहीं हटीं, औ्ौर जिसको [ तुम्हारे अनाव में ] कहीं भी चैन नहीं पडता था, जिसने अपनी इस छाती को सदा तुम्हारे केवल तुम्हारे सोने के लिए [ शय्या रूप ] वनाया [ अर्थात् जो तुमको सदव अपनी छाती पर सुलाता था ] जिसके प्रकाश के बिना [ तुम्हारे लिए भी ] यह सारा जगत शून्य-सा हो जाता था [अर्थात् में तुम्हारे बिना और तुम मेरे बिना तनिक देर को भी नहीं रह सकती थीं हमारा तुम्हारा इतना घनिष्ट प्रेम था। -वस दशा में में दूसरा विवाह करने का कभी विचार करूंगा, इस प्रकार की कल्पना भी कोई नहों कर सकता था। परन्तु आ्ज अपने उस एक पत्नी ] व्रत की मिथ्या डींग मारने वाला वह मे, हे प्रियतमे [ दूसरे विवाह के लिए स्वीकृति देकर ] न जाने क्या [ कँसा घोर अनर्थ भीषण पाप ] करने पर उत्तर आया हूँ ॥१८॥ 'तापसवत्सराजचरितम के पञ्चम अ्द्ध में फिर राजा उदयन, वासवदत्ता के लिए उसी प्रकार विलाप करते हुए दिखलाई देते हैं-

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५०८-j वकोवितिजीवितम् [फारिका ७-६

म्र भन्ग' रुचिरे ललाटफल के तार समारोषय न वाप्पाम्वुप्लुतपीतपत्ररचना कुर्यात्कपोलस्थलीम।

तिप्ठेत् कि कृत कोपभारकरुणोराश्वासयेना प्रियाम ॥१६॥। उन्माटावस्था करु रस। किं माणा न मया तगनुगमन कर्तु समुत्साहिताः वद्वा कि न जटा, न वा प्ररुदित भ्रान्त वने निर्जने। त्वत्सम्प्राप्तिविलोभनेन पुनरप्यनेन पापेन किं कि कृत्वा कुपिता यदद न वचस्त्व मे ददासि प्रिये ॥२०॥ 'इति रोदिति', इत्यनेन मनागुन्माद मुद्राप्युन्मीलिता। तमेच- [ उन्मत्त की उक्ति होने स इस इलोक का पाठ कुछ अ्रटपटा सा हैं, श्रर्थ का सम्बन्ध ठीक नहीं वैठता है] क्या भौहो को सुन्दर ललाट के ऊपर सूच ऊँचे चढाकर [अर्थात् अ्रत्यन्त नाराज होकर] श्र्रांसुश्रो के प्रवाह से गालो की पत्रलता [गालो पर बनाई गई रेखा] बहा देना उचित हैं अथवा लज्जा से भुकी हुई उसको आग्रह तथा खुशामद के साथ मुड मुड कर देख कर इम प्रिया को ग्राश्वासन वा व्ययं के इस क्ोध के भार से उत्पन्न करुण [ अर्थात तुम्हारे नाराज होने से वह दुखी होती है रोती हैं ऐसे करुण रस] से क्या लाभ, उसे रहने दो [ और आग्रहपूर्वक सुशामद करके उसको मना लो। यही उचित है। उसे रलाना अच्छा नही हैं ।१६॥] यहाँ उन्माद की अ्रवस्था तथा करुण रस [ वशित ] है। इस कलोक में राजा को उन्मादावस्था का वर्शन किया है। इसीलिए उसके वाक्य सुसम्बद्ध नही है। और अर्थ भी ठीक-ठीक समझ में नहीं आाता है। आरगे फिर राजा की उसी प्रकार की शवस्था का वर्णन आता है। [ हे प्रियतमे ] क्या मेने तुम्हारे पीछे [ स्वर्गलोक] जाने केलिए अपने प्रारों को उत्साहित नहीं किया, अयवा [ तुम्हारे विद्रोग मे फकीरों के समान ] क्या मेने जटाएँ नहीं वाँधी, और क्या रोता हुआ निर्जन वन में मारा मारा नहीं फिंरा, [ पर दुर्भाग्य से अब जीवित हूँ वह केवल ] तुम्हारी फिर प्राप्ति के लोभ से। ['जीवित हूँ ] यह [ लोभ मेरा ] छोटा सा पाप अ्रवश्य है [ पर ] उस से क्या ? [ वह कोई वडा पाप नहीं है] फिर तुम मझ से कयो नाराज हो कि आज मेरी बात का उत्तर भी नहीं देती ही॥२०॥ यहा से ले कर 'रोदिति' 'रोने लगता है' यहाँ तक [पूर्वोक्त करु रस के साथ] थोड़ी सी उन्माद की अवस्था भी प्रफाशित हो रही हैं।

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कारिका ७-८ ] चतुर्योन्मेष [r५oe

तमेव प्रोद्दीपयति पष्ठेऽक्क। राजा-हा देवि। त्वत्सम्प्राप्तिविलोमनेन सचिवै. प्राण मया धारिता तन्मत्वा त्यजतः शरीरकमिद नैवास्ति नि.स्नेहता। तासन्नोऽवसरस्तवानुगमने जाता घृतिः किन्त्यं खेदो यच्छतघा गतं न हृदय तद्त् क्षणो दारुणे ।।२१।। यथा वा रघुवंशे मृगयाप्रकरणम्। प्रमाद्यता दशरथेन राज्ञा स्थविरान्धतपस्विवालवधो व्यधीयतेति एकवाक्यशक्यप्रतिपाटन पुनरप्ययमर्थ परमार्थसरससरस्वतीसर्वस्वाय-

उसी [करुण रस] को छठे श्रद्ध में, [फिर] उद्दीप्त करते हं- राजा [उदयन विलाप करते हुए फिर कहते है। ] हा देवी ! तुम्हारी पुन प्राप्ति के लालच से मत्रियो ने मेरे प्राणों की रक्षा- कराई [अर्ात तुम्हारी फिर प्राप्ति हो समेगी ऐसी शशा मत्रियो ने दिलाई है इसी से मैं आज तक प्रास घारस कर रहा हूँ। अन्यथा न जाने कब का मर गया होता। परन्तु वह आशा भाज तक भी पूरी नहीं हुई। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि वह उनका केवल भूठा आश्वासन था] यह सम में आाने पर [तुरन्त ही] इस पापी शरीर को छोडते हुए [ मेरी तुम्हारे प्रति यह ] स्नेहहीनता नहीं [ कही जा सकती ] हैं-। [भव प्राज सौभाग्य से ] तुम्हारे अनुगमन का श्रवसर शीघ्र ही मिल गया है इससे धर्य हुआ है, किन्तु इस बात का खेद है उसी दारस वेला [ तुम्हारी मृत्यु के समय] में ही मेरा हृदय टुकड़े टुकड़े क्यों नहीं हो गया था ॥२१॥ इस सारे प्रकरण में यह दिखलाया गया है कि 'तापस-वत्सराज' चरित में उदयन की वियोगावस्था का अ्रनेक जगह वार वार वर्न किया गया हैं। परन्तुकवि की प्रौढ़ प्रतिभा से आयोजित होने के कारण वह हर जगह एक दम नया प्रतीत होता है। उसमें कही पुनरुवित की गन्घ भी नही आररने पाई है इसलिए वह इस चतुर्थ प्रकार की 'प्रकरसव पता' का उदाहरण है। इसी चतुर्थ प्रकार की 'प्रकरण-वत्रता' का दूसरा सदाहरण रघुवश के नवम सर्ग में दशरथ की मृगया के वणन से उद्धत कन्ते है- अथवा जैसे रघुवश में मृगया का प्रकरस। प्रमादवश राजा दशरथ ने वूढे और अ्रन्धे तपस्वी के वालक [श्रवसकुमार] का वघ कर दिया यह एक वाक्य में प्रतिपादन करने योग्य अ्यं वार वार वस्तुत.

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वक्रोकितिजी वितम [कारिफा ७-६ نسا

म्रभङ्ग' रुचिरे ललाटफलके तार समारोषय न्

व्यावृत्तेर्विनिवन्धर्चाटुम हिमामालानय लज्जानता तिप्ठेत् कि कृत कोपभारकरुण राश्वासर्यना प्रियाम ॥१६।। उन्मादावस्था करुण रस। कि माणा न मया तनानुगमन कर्तु समुत्साहिताः वद्दा कि न जटा. न वा प्ररुदित भ्रान्तं वने निर्जेने। त्वत्सम्प्राप्तिविलोभनेन पुनरप्यनन पापेन कि कि कृत्वा कुपिता यददय न वचस्त्व मे ददासि प्रिये ॥२०॥ 'इति रोदिति', इत्यनेन मनागुन्मादमुद्राप्युन्मीलिता। तमेव- [ उन्मत् की उवित होने स इस शलोक का पाठ कुछ अटपटा सा है, भ्यं का सम्बन्ध ठीक नहीं बैठता है] क्या भौहो को सुन्दर ललाट के ऊपर सूव ऊँचे चढ़ाफर [अर्थात् अ्रत्यन्त नाराज होकर ] प्र्रांसग्रो के प्रवाह से गालो की पत्रलता [गालो पर वनाई गई रेखा] वहा देना उचित है प्रथवा लज्जा से भुकी हुई उसको आ्ग्रह तथा खुशामद के साथ मुड मुड कर देख कर इम प्रिया को आश्वासन वा व्यर्य के इस क्रोध के भार से उत्पन्न करुण [ श्रर्थात तुम्हारे नाराज होने से वह दुखी होती हैं रोती है ऐसे करण रस] से क्या लाभ, उसे रहने दो [ और आग्रहपूर्वक सुशामद करके उसको मना लो। यही उचित है। उसे रुलाना प्रच्छा नहीं है ॥१६॥] यहाँ उत्माद की अवस्था तथा करुण रस [ वसित ] हैं। इस श्लोक में राजा की उत्मादावस्या का वर्णन किया है। इसीलिए उसके वाक्य सुसम्बद्ध नहों है। औरौर अ्पर्थ भी ठोक-ठीक समभ में नहीं आता है। आगे फिर राजा की उसी प्रकार की अवस्था का वर्णन आाता है। [ हे प्रियतमे ] कया मैने तुम्हारे पीछे [ स्वर्गलोक] जाने केलिए अरपने प्राशो को उत्साहित नहीं किया, अथवा [ तुम्हारे विदोग में फकीरों के समान ] क्या मेंने जटाएँ नहीं वाँधीं, और क्या रोता हुआ निर्जन वन में मारा मारा नहीं फिंरा, [ पर दुर्भाग्य से अरब जीवित हूँ वह केवल ] तुम्हारी फिर प्राप्ति के लोभ से [जीवित हूँ ] यह [ लोभ मेरा ] छोटा सा पाप अ्रवश्य है [ पर ] उस से क्या? [ वह कोई बडा पाप नहीं है ] फिर तुम मुझ से क्यों नाराज हो कि आज मेरी बात का उत्तर भी नहीं देती ही ॥२०॥ महा से ले कर 'शोदिति' 'रोने लगता है' यहाँ तक [ पूर्वोक्त करुण रस के साथ] थोडी सी उन्माद की अवस्था भी प्रकाशित हो रही है।

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कारिका ७०८ ] चतुर्योन्मेष

तमेव श्रोद्दीपयति पष्ठेडक्क। राजा-हा ढेवि। त्वत्सम्प्राप्तिविलोमनेन सचिवैः प्राणा मया धारिता तन्मत्वा त्यजतः शरीरकमिद नैवास्ति निःस्नेहता। त्ररासन्नोऽवसरस्तवानुगमने जाता घृतिः किन्त्वयं खेदो यच्छतधा गतं न हृदयं तद्वत् क्षणो दारुणे ।।२१।। यथा वा रघुवंशे मृगयाप्रकरगम्। प्रमाद्यता दशरथेन राज्ञा स्थविरान्धतपस्विवालवधो व्यघीयतेति एकवाक्यशक्यप्रतिपादन. पुनरष्ययमर्थ. परमार्थसरससरस्व्रतीसर्वस्वाय-

उसी [करुणा रस] को छठे श्रद्ध में, [फिर] उद्दीप्त करते हैं- राजा [ उदयन विलाप करते हुए फिर कहते है। ] हा देवी ! तुम्हारी पुन प्राप्ति के लालच से मत्रियों ने मेरे प्राणों की रक्षा- कराई [अरथात् तुम्हारी फिर प्राग्ति हो सकेगी ऐसी प्रशा मन्रियों ने दिलाई है इसी से मैं भाज तक प्राण धारस कर रहा हूँ। अग्यथा न जाने कब का मर गया होता। परन्तु वह आशा प्राज तक भी पूरी नहीं हुई। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि वह उनका केवल भूठा आश्वासन था] यह समझ में आने पर [तुरन्त ही] इस पापी शरीर को छोड़ते हुए [ मेरी तुम्हारे प्रति यह ] स्नेहहीनता नहीं [ कही जा सकती ] है:। [अब आ्राज सौभाग्य से] तुम्हारे अ्रनुगमन का अ्रवसर शोध्र ही मिल गया है इससे घैर्य हुआ है, किन्तु इस बात का खेद है उसी वारस वेला [ तुम्हारी मृत्यु के समय ] में ही मेरा हृदय टुकडे टुकड़े क्यो नहीं हो गया था॥२१॥ इस सारे प्रकरण में यह दिखलाया गया हूं कि 'तापत-वत्सराज' चरित में उदयन की वियोगावस्था का अनेक जगह वार बार वर्णन किया गया है। परन्तुकवि की प्रौढ प्रतिभा से आयोजित होने के कारण वह हर जगह एक दम नया प्रतीत होता है। उसमें कही पुनरुक्त की गन्व भी नही घाने पाई है इसलिए वह इस चतुर्थ प्रकार की 'प्रकरणव कता' का उदाहरए है। इसी चतुर्थ प्रकार की 'प्रकरण-वमता' न दूसरा उदाहरण रघुवश के नवम सर्ग में दशरथ की मृगया के वर्णन से उद्ध त करते है- पथवा जसे रघुवश में मृगया का प्रकरस। ; " प्रमाववश राजा वशरथ ने वूढे और भ्रन्धे तपस्वी के वालक [श्रवणकुमार] का वघ कर दिया यह एक वाक्य में प्रतिपादन करने योग्य प्रयं बार वार वस्तुत.

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५१० ] वक्रोपितिजीवितम् [फारिका ७-८

मानप्रतिभाविधानकलेशेन ताहर्या विच्छित्या विस्कुरितश्चतनचमत्कार- करणतामधितिष्ठति।

'न्याघ्रानभीरभिमुखोत्पतितान् गुहाभ्य फुल्लासनाय्विटपानिव वायुरुग्णान् । शिक्षाविशेपल घुहस्तया निमेपात् तूएीचकार शरपूरितवकत्ररन्ध्रान् ।।२२।।

सरस सरस्वती के स्व स्वरूप [महाकवि कालिदास की] प्रतिभा के तनिक से प्रयोग से [ रघुवश में ] उस प्रकार की [अपूर्व] सुन्दरता से प्रफाशित होकर सहृदयो के चमत्कार का कारण होता है।

इसके वाद इस प्रकरण की विवेचना कन्तक ने विस्तार के साथ की जान पडती हे परन्तु मूल, प्रति के प्रतीकात्मक स्वरूप के कारण वह विवेचना उपलब्ध नही हो सकी इस प्रकरण मे से चार - पाच श्लोक अ्रवश्य उद्धृत किए गए है। परन्तु वे रघुवश के श्रम से नही दिए गए है। अपित भिन्न प्रकार के क्रम से दिए है।

[ सबसे पहिले नवम सर्ग का ६३वा श्लोक दिया है] निर्भय [दशरथ] ने गुफाओ से उछल कर [ अपन ] सामने आ्राते हुए, वायु से टट कर गिरे हुए सिले असन [ नामक वृक्ष विशेषों] के समान [ पीतवर्ण ] सिंहो को [ वा चलाने के ] विशेष अभ्यास तथा फुर्ती के द्वारा क्षण भर में वारगो से उसका मुँह भर कर तूरीर बना दिया॥२२॥

इस श्लोक मे राजा दशरथ की मृगया का वर्णन किया गया है। इसके बाद इसी सर्ग का ६वा श्लोक उद्धृत किया है। उसमे भी मृगया का वर्णन है। परन्तु- एक ही विषय होने पर भी उसमें पुनरुवित प्रतीत नही होती है। अपितु नूतन वक्रता ही प्रतीत होती है।

१. रधुवश ६, ६२।

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कारिका ७-८ ] चतुर्थोन्मेषः [ ५११

अपि तुरगसमीपा दुत्पतन्तं मयूर न स रुचिरकलाप वाणलच्यीचकार।

रतिविगलितबन्धे केशपाशे प्रियाया. ॥२३। लक्ष्ीकृतस्य हृग्णिस्य हरिप्रभावः प्रेच्ष्य स्थिता सहचरी व्यवधाय देहम्। आरकर्रकृष्टमपि कामितया स धन्वी वाएं कपामृदुमना: प्रतिसज्जहार ॥२४॥ घोड़े के पास से ही उड़कर जाते हुए सुन्दर पखो वाले मोर को भी [ उसके पखों को देख कर] नाना प्रकार की विचित्र मालाओ से गुंथे हुए और रतिकाल में खुल गए [ अपनी ] प्रियतमा के केश पाश का ध्यान आ जाने से उसने वाण का लक्ष्प नहीं बनाया।[अर्थात् मोर के सुन्दर पसों को देख कर वशरथ को अपनी प्रियतमा के मालाओं से गूंथे हुए परन्तु रतिकाल में खुले हुए केशों का स्मरण हो आया और हृदय में दिया आ जाने से उसने मोर पर वास नहीं चलाया] ॥२३॥ इसके वाद ग्रन्थकार ने इसी सर्ग का ५७वा श्लोक उद्धृत किया है। पूव श्लोक के समान इस श्लोक में भी राजा दशरथ की मृगया का ही वर्णन किया गया है। परन्तु उसमें पुनरुवित नही अपितु अ्र्प्रनूठा चमत्कार प्रतीत हो रहा है। पिछले श्लोक में मयूर के सुन्दर पखो ने रग विरगे फूलो से सजे हुए पर रति क्रीडा में खुले हुए प्रियतमा के वेशपाश का स्मरण दिला कर राजा को मोर के ऊपर वाण चलाने से शेक दिया था। इस अगले श्लोक में राजा दशरथ के बाण का लक्ष्य एक हरिण था। पर जब उसकी सहचरी हरिी ने देखा कि दशरथ उसके प्रियतम हरिएा को वाण का लक्ष्य बनाना चाहता है तो उसकी प्राण रक्षा के लिए वह स्वय हरिा के शरीर को ढक कर राजा के सामने खडी हो गई। उनके इस प्रेम को देख कर राजा के हृदय में दया का उदय हुआ और उन्होने कान तक खीचे हुए अपने धनुप को ढीला कर दिया। यह एक दम नवीन-चमर्कार युक्त उचित है। कवि कहता है- हरि अर्थात् इन्द्र या विष्णु के समान शक्तिशाली [राजा दशरय ] ने [वास के] लक्ष्य वने हुए हरिण के शरीर को आच्छादित कर खडी हुई सहचरी [हरिसी] को देखकर कामुकता के कारसा दयाद्र चित्त हो कर कान तक खींचे हुए घनुष को शियिल कर दिया॥२४॥

१ रघुवश ६, ६७ । २ रघवश ६, ५७।

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'५१२] वकोपितिजीवितम् [ कारिका ७-८

स ललितकुसुमप्रवालशय्या ज्वलितमहौपधिदीपिकासनाथम् । नरपतिरतिवा हयम्तभूव वर्वचदसमेतपरिच्छदस्त्रियामाम् ।।२५।। २ इूति विस्मृतान्यकरणीयमात्मन सचिवावलम्न्रितधुर धराधिपम्।

मुगया जहार चतुरेव कामिनी ॥२६। अ्थ जातु रुरोगरहीतवर्त्मा विपिन पाश्वचरेरलदयमारः। श्रमफेनमुचा तपस्विगाढा तमसा प्राप नदीं तुरने मण ।।२७।।

इसके बाद ग्रन्थकार ने फिर इसी सग के ७०वें श्लोक को उद्धत किया हूं जिसमें मृगया-प्रसङ्ग मे अप्रपने साथियो के छूट जाने के कारण राजा को जनल कही अकेले ही रात्रि वितानी पडी है उसका वर्णन करते हुए कवि ने लिसा है ि- अपने [ परिच्छेद ] सेवक तथा सामान आदि से रहित [ मृगया के प्रसन्ग में बिछुडे हुए ] उस राजा ने [ कभी अकेले ही ] वन की [ रात्रि में ] चमकर वाली प्रौषघियो से प्रकाशित और सुन्दर फूलो तथा कोमल पत्रो की शय्या से युषत रात्रि को विताया ।।२५।। फिर इसी सर्ग के ६६वें श्लोक को उद्ध त कर यह दिखलाया है कि चतुर कामिनी के समान मृगया ने निरन्तर सेवा द्वारा अ्नुरक्त कर राजा को अपने वश। कर लिया-

इस प्रकार अपने [ राज्य कार्य के ] भार को मन्रियो को सौपे हुए भ्ौ 'अपने अन्य सव कामो को भूले हुए, निरन्तर सेवा के कारस श्त्यन्त अनुराग युक्त हू राजा [दशरथ ] को चतुरा कामिनी के समान मृगया ने अपने वश में क लिया ॥२६॥ आगे उद्धृत किए हुए ७२वे श्लोक में राजा दशरथ के तमसा नदी के तट प पहुँचने का वर्णन करते हुए लिखा है- इसके बाद कभी वन में हरिस का पीछा करते हुए पार्श्ववर्ती सेवको से अल हो कर [बहुत तेज दौड़ने के कारण] मुंह से भाग डालते हुए घोडे पर चढे हुए राज [वशरथ]तपस्वी जिस में स्नान करते है, ऐसी तमसा नदी के किनारे पर पहुंचे॥२७॥

१ रघुवश ६, २०। २ रघुवश ६, ६६। ३. रघुवश ६, ७२।

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कारिका ६] चतुर्थोन्मेष. [५१३

सानुयहो भगवता मयि पातितोऽयम्। कुष्यां दहन्नपि खतु क्षितिमिन्धनेद्दो चीजप्ररोहजननी ज्वलनः करोति ॥।२=।। प्रसन्गेनास्या एव भेदान्तरमुन्मीलयति- कथावेैचित्रयपात्रं तद् वक्रिमाएं प्रपद्यते। . यदङ्गं सर्गचन्धादेः सौन्दर्याय निवध्यते।।ह।। "वक्माण' कि विशिष्टिम्'-कथावैचित्रयपात्रम्' प्रस्तुतसविधानकभङ्गीभाजनम्।

तमसा नदी के किनारे अपने अन्धे माता पिता के एक-मात्र सहारे श्रवर- कुमार का राजा दशरथ के हाथ प्रमाद वश बघ हो जाने पर उसके फल स्वरूप शाप प्राप्त होने पर राजा वशरथ कहते हे कि- जिसने अभी तक पुत्र के मुख कमल को देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं किया ऐसे मेरे लिए आपने [ तू भी अपने पुत्र के वियोग के डुख में मरेगा] यह शाप भी अनुग्रह रूप में दिया है [ इस शाप के प्रभाव से मुझे कम से क्षम पुत्र का ुख तो देखने को मिलेगा] जैसे इन्धन से प्रज्वलित अ्रग्नि कृषि योग्य भूमि को जला कर भी [ प्रचुर मात्रा में ] वीजांकुरों को उत्पन्न करने वाली बनाता है ॥२=॥ इत्यादि श्लोको में राजा की मृगया का अनेक प्रकार से वर्गन तरिया गया है। परन्तु उसमें पुनरुक्ति प्रतीत नही होती है कवि की प्रौढ प्रतिभा के याग से उसमें सर्वत्र एक दम नूतनता ही प्रतीत होनी है। इसलिए यह स 'प्रकरण-वक्र्ता' के चतुर्थ भेद के उदाहरण है। इम प्रकार यह चौथी प्रकार की 'प्रकरण-वक्ना' का वर्गन सम,प्त हुआ ॥७॥ ५-प्रकरानुसार [आगे] इसी [ 'पकरण-वक्रता'] का श्रत्य [पाँचदf] प्रकार दिखलाते हे- सर्गबन् [महाकाव्य नाटक ] आादि के कथा वैचित्र्य का सम्पादक -जो [जल कीडा आ्रादि ] श्रङ्ग [काव्य के ] तौन्दय के लिए वन किया जाता है वह भी उस 'प्रकरण वत्ता' को प्राप्त करता है [प्रकरण-वमता' नाम से क्हा जाता き 】 nEn 'वश्ता को' किस प्रकार की [ वक्रना ] को कि-'कथा के वैचितय का सम्पादन करने वाली प्रस्तुत कथा की सुन्दर शैली के योग्य। वह कौन निवद्ध होता हैँ

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५१४ ] वषोपित जी वितम् [फारिका ६

किं तत्-यदङ्ग सर्गवन्वादे सौन्दर्याय निवध्यते। यज्जलक्रीडादि प्रकरस महाकाव्यप्रभृत्तेरुपशोभानिप्परगै निवेश्यते । अयमम्य परमार्थ :- प्रवन्धेपु जलकेलिकुमुमावचयप्रभृति प्रकरए प्रकान्तसविधानका नुबन्धि निवध्यमान निवानमव कमनीयसम्पठ सम्पद्यते। यथा रघुवशे जलक्रीडा वर्णनम- १अरथोमिलोलोन्मदराजहंसे रोधोलतापुप्पवहे सरग्ः । विहृर्तु मिच्छा वनितासखस्य तस्याम्भसि ग्रोप्ममुसे चभूय ॥।२६।। ३त्र्रवमि कार्यान्तरमानुपस्य विष्णो: सुतास्यासपरा तनुं लाम्। सोऽह कथं नाम तवाचरयमाराघनीयस्य घृतेविंघातम् ॥।३=।। कि-जो श्रद्ग सर्गबन्ध [महाकाव्य नाटक] आदि के सौन्दर्य के लिए उपनिवद्ध किया जाता है। जो जल-कीडा आदि प्रकरण महाकाव्य आादि की उपशोभा के सम्पादन के लिए निवद्ध किया जाता है। इसका साराश यह हुआ कि प्रबन्ध काव्यो में जल-कीडा, फुसुमाचचय इत्यादि प्रकरस प्रकृत कथा के अनुस्प वणिगत होकर सौन्दर्य सम्पति के कोष वन जाते है। इसके बाद कन्तक ने रघुवश के १६वें सर्ग से राजा कुश की जल-फीडा का वर्रन उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया है। उसमे से कुछ श्लोक भी उद्दृन किए है जिनका अर्थ निम्न प्रकार है- इसके वाद [जिसकी] लहरो में [रमस के लिए सतृष्ण औ्रर] उन्मत राज हस विचर रहे हे औौर किनारो की लताओ के पुष्प जिसमें तैर रहे है, ऐसे सरयू नदी के ग्रीष्मकाल में सुख देने वाले जल में, स्त्रियों के साथ विहार [ जल-कीडा ] फरने को उस [राजा कुश] की इच्छा हुई ॥२६॥ सरयू नदी में जल-फीडा करते हुए कुश का दिव्य आभरण जल में गिर गया जिसे जल मे रहने वाले कुमुद' नामक नाग ने छिपा लिया और नदी में ढूढने पर भी नही मिला। जब उस 'कुमद' नाग को दण्ड देने के लिए कुश ने धनुप उठाया तो वह 'कुमुद' नाग भयभीत हो कर सामने आया, और राजा कुश से बोला कि- में कार्यान्तर से मानुष [अर्थात रावण-बध रूप विशेष कार्य के सम्पादन के लिए मनुष्य रूप धारण करने वासे ] विष्णु [ रामचन्द्र ] के पुत्र रूप दूसरे शरीर- भूत आापको जानता हूँ। [अर्थात, में यह जानता हूँ कि रावण के बध के लिए राम चन्द्र जी के रूप में विष्णु ने ही मानव रूप धारण किया था और आप उन्ही रामचन्द्र जी के पुत्र है इसलिए वस्तुत विष्णु के ही दूसरे स्वरूप है ]। सो में श्राधना करने योग्य आ्रप को नाराज कैसे कर सकता हूँ॥३०॥ १ रघवश १६, ५४। २ रघवश १६ ८२ ।

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कारिका ६] चतुर्थोन्मेषः [५१५

·कराभिघ्रातोस्थित कन्दुकेयमालोक्य वालातिकुतूहलेन। हृदात्पनज्ज्योतिरिवान्तरिक्षादादत्त जैत्राभरणं लदीयम् ।।३१।। तदेतदाज नुविलम्त्रिना ते ज्याघातरेखाकिएलाग्छनेन। भुजेन रक्षापरिघेए भूमेरुपैतु योगं पुनरसलेन ।।३२।। इमां स्व्रसार च यतीयसी मे कुमुद्द्ती नार्हसि नानुमन्तुम्। आत्मापराध नुदती चिराय शुश्रूपया पार्थिव पादयोसने।।३३।।

मैने आपका यह आभूपण नही लिया था। वात यह थी कि मेरी छोटी बहिन 'कुमुद्वती' अपनी गेंद से खेल रही थी। उसकी गद उसके हाथ से टकरा कर उपर चली गई-मानो आज की रवड की गेद हो-इसी बीच में गेंद के बजाय ऊपर से गिरता हुआ यह आभपण नीचे गया तो इमने सेलने के लिए इसको ले लिया। जो आपकी सेवा में प्रस्तुत है। यह इम दूमरे श्लोक का भाव है। अर्थ इस प्रकार है-

हाथ से टकराकर जिसकी गेंद ऊपर चली गई ऐसी इस बालिका [कुमुद्वती] ने आकाश से टूटते हुए तारे के समान नदी [ तालाव ] से [ पाताल लोक में ] गिरते हुए तुम्हारे इस विजय-शील आभूषण को ले लिया॥३१॥ यह [आभूषण ] पृथ्वी के रक्षा करने वाले परिध [नाम अस्त्र विशेष] के समान, प्रत्यञ्चा के आघात के चिन्ह-भूत रेखा से पद्धित और अ्रजानु-लम्वी आररपके पुप्ट हाथ के साथ फिर सयोग को प्राप्त करें। [परर्थात् अव इस भराभूषण को स्वीकार करके फिर से अपने हाथ में घारण कीजिए] ॥३२

और मेरी इस छोटी बहिन 'कुमुद्ती' को सदा के लिए अपने चरणो की सेवा द्वारा अपने [इस आभूषणापहरण रूप] अपराध का प्रायश्चित करने का अ्रवसर [अनुमति] प्रदान कीजिए ।।२३।। इस प्रसङ्ग में कथा का वैचित्र्य उत्पादन करने के लिए ही कथा के अनुसार यहां गजा कुग की जल-कीडा का वर्णन किया गया है। इस प्रकार के वथवैचित्र्य सम्पादक प्रकरणो की अ्रवतारणा भी 'प्रकरग-वयना' के पञ्चम प्रकार के अ्रन्तर्गत समनी चाहिए ।६।।

१ रघुवश १६, ८३-८४ -= ५ ।

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५१६] घक्रोपितिजीवितम् [फारिका १ पुनरप्यस्याः प्रभेदमुद्भावयति -- यत्राङ्गिरसनिष्यन्दनिकपः कोऽपि लच्यते। पूर्वोत्तर रसस्पाद्य: सा्ा े ाि करता ॥ ०॥ 'साङ्गाटे' कापि वक्रता' प्रकएस्य सा का ्यलीकिकी वक्रता वक्रभावे भवतीति सम्बन्ध । 'यत्राङ्गिरसनिप्यन्दनिकप कोऽपि लक्ष्यते'। यत्र यम्यामन्ग रसो य प्रासरुप, तस्य निप्यन्द, प्रवाह, तम्य काडचनस्यंव 'निकप परीक्षापद विपयो विशेष 'कोऽपि' निरुपमो लच्यते। किं विशिष्ट -'पूर्वोत्तरै रसम्पाद्य' प्राक परवृतैरव्वाये सम्पादयितुमशक्य। यथा विक्रमो वश्यामुन्मत्ताड्क यत्र विप्रलम्भशृद्गारो श्रङ्गी रस. । तथा च तदुपक्रम एव- राजा -- [ससम्भ्रम् ]ग्र््रा: दुरात्मन् तिष्ठ तिष्ठ, वव नु खलु प्रियतमामादार गच्छसि। [ विलोक्य ] कथ शैलशिखराद् गगनमुतलुत्य वाएैर्मामभिवर्पति [ विभाव्य सवाप्प ] कथं विपलव्धोडस्मि- ६-फिर भी इस ['प्रकरण-वतता'] का औ्रर [छठा] भेद दिसलाते हैं- जहां [ जिस प्रकरर में] पूर्व तथा उत्तर [श्रन्य सब भ्रङ्गो या प्रकरणो से असम्पाद्य [ न पाई जाने वाली ] प्रधान रस के प्रवाह की परीक्षा की फोई अपू कसौटी पाई जाती है वह श्रङ्ग आदि की कुछ अलोकिक वतता [ भी 'प्रकरण-वक््ता कहलाती है। अ्रद्ध आदि की कोई अरलोकिक वक्रता वह भी प्रकरण की कोई अ्प्रलौकिष वक्रता अर्थात् सुन्दरता होती है यह [ भवति किया का अध्याहार करके] सम्बन्ध होता है। 'जहां प्रधान रस के प्रवाह की कोई कसौटी दिखलाई देती है'। जहां जिसमें, जो [ काव्य या नाटक का ] प्रारभूत प्रधान-रस है उसका निष्यन्द अर्थात प्रवाह उसका, स्वर्ण की कसौटी के समान, ोई परीक्षा का कोई अनुपम हेतु दिखाई देता है। किस प्रकार का कि-पूर्व तथा उत्तर [अर्थात् सभी श्रङ्गो ] से जो सिद्ध नहीं हो सकता है, अर्थात पहिले [वगित ] तथा पीछे [वशित श्रङ्ग आदि] से जिसका सम्पदन करना अमम्भव है। जैसे 'विक्रमोर्वशीय' [ नाटक ] में 'उत्मताङ्ग' [नाम से प्रसिद्ध चतुर्थ अङ्ध]। जिसमें विप्रलम्भ-शृङ्गार प्रधान-रस है। जैसे कि उस [ 'उन्मत्ताङ्क'] के प्रारम्भ में ही- राजा-[ भयभीत होकर ] परे दुष्ट ठहर, ठहर, प्रियतमा [ उर्वशो ] को लेकर तू कहाँ जाता है ? [ देखकर ] अच्छा पर्वत फी चोटी से आ्रकाश में कूद कर मेरे ऊपर बारो की वर्षा कर रहा है। [ भली प्रकार देखकर रोते हुए ] अरे धोखा हो गया-

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कारिका १० ] चतुर्थोन्मेप· [५१७

नवजलघरः सन्नद्धोऽयं न हप्तनिशाचरः सुरधनुरिदं दूराकृष्टं न नाम शरासनम्। ऋररयमपि पटुधारासारो न वाणपरम्परा कनकनिकषस्निग्धा विद्य त् प्रिया न ममोर्वेशी ॥३४।। १पद्धया न्पृशेद्वसुमतीं यदि सा सुगात्री मेघाभिवृष्ट सिकतासु वनस्थलीपु। पश्चान्नता गुरुनितम्वरतया ततोडस्या हश्येत चारु पदपंक्तिरलक्तकाङ्का ॥३५॥ *तरह्वम्र भङ्गा क्षुमित-विहग-श्रेणि-रशना विकर्पन्ती फेन वसनमिव संरम्भशिथिलम्। यथा विद्ध याति स्खलितमभिसन्धाय बहुशो नदीभावेनेय न्र वमसहना सा परिणता ॥३६।।

यह तो उमडता हुआ नया [ नीला नीला जल भरा ] बादल हं अ्रभिमानी दुष्ट राक्षस नहीं है। औ्र यह इन्द्र धनुप है, दूर [कान ] तक सोंचा हुग्र्रा वास्तविक धनुष नहीं है। यह तेज वर्षा की बौछार है वाो का समूह नहीं है। और यह भी कसौटी पर वनो तोने की रेखा के समान चमकती हुई बिजली है मेरी प्रिया उर्वशी नहीं है ।।३४।।

यह उद्धरस 'विक्रमोर्वशीय' के 'उन्मताङ्क' नाम से प्रमिद्ध चनुर्य अ्ङ्क मे ने लिया गया है। परन्तु कुछ पाठ भेद है। इस समय उपलब्ध विधोरवशीय में 'नवजल- घर' के पहिले हित्स्ाहित्र' इत्यादि एक प्राकृत पद्य और पाया जाना है और उसके पहिले गद्य भाग 'अभिवर्षति' तक ही है। 'कथ विप्रलब्बोऽस्मि' यह अश वात्रे सक्कृन सीरीज़ के प्रकाशित सस्करण में नहीं मिलता है। परन्तु यह पाठ भेद विशेष महत्त्व पूर्र नहीं है। इसी प्रसद्भ में कुन्तक ने दो पद्य और भी उद्धत किए है। उनकी व्याख्या पहिले की जा चुकी है।

पद्भ्याम् स्पृशेद् वसुमतीं इत्यादि का श्रर्य उदा० स० ३, २६ पर देखें ॥३४॥ तरगभ्रूभङ्गा इत्यादि का अ्पर्य ३, ४१ पर देखें ॥३६॥

१ विक्मोर्वशीयम् ४, ६।२ विनमोरवशीय ४, २८ ।

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५१८ ] वक्रोपितजीवितम् [फारिफा

यथा वा किरातार्जु नीये वाहुयुद्धप्रकरगम ॥१०।। पुनरिमामेवान्यथा प्रथयति- वस्त्वन्तरविचित्रता । यत्रोल्लसति सोल्लेखा सापगऽप्यस्य वक्रता ॥११॥ 'अपरापि त्र््रस्य' प्रकरसास्य 'वक्रता' वक्रभावो भवतीति सम्ब्न्ध। 'यत्रोल्लसति' उन्मीलति 'सोल्लेखा' अभिनवोद्ग दभन्गीमुभगा। ६ तिस्प- मितर द्वस्तु [वस्वन्तर] तस्य 'विचित्रता' वचित्र्य नतनचमलार पति यावन। किमर्थम्-'प्रधानवस्तुनिष्यत्यै'। प्रधानमविकृत 'प्रकरणम कमपि वक्रिमाग माक्रामति।

प्रथवा जैसे किरातार्जनीय में वाहुयुद्ध का प्रकरण। जसे 'वित्रमोर्वशीय' के इस उन्मत्ताद्ट' नामक चतुर्य अरद्व मे विप्रलम्भ- शृङ्गार अप्रपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया है। इसी प्रकार 'किरातार्जनीय' में 'वाहु-युद्ध' वाले सरग में वीर-रस परम उत्कर्ष को प्राप्त हो गया है। इतना उत्कर्ष अन्य भागो में नही हुआ है। इस प्रकरणों में प्रधान रसो का परम उत्कर्प होने के कारण गन्थकार ने उन्हे 'प्रकरण-वक्रता' के इम भेद को उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया है ॥१०॥ फिर इसी [ प्रकरण-वक्रता] की अ्रन्य [सातवें ] प्रकार से व्यास्या परते है- जहाँ प्रधान वस्तु की सिद्धि के लिए अरन्य [ अ्रप्रधान ] वस्तु की उल्लेख योग्य [ विशेष महत्व की ] विचिन्रता प्रतीत होती है वह भी इस [ प्रकरण] की ही शन्य [सातवें] प्रकार की वक्ता होती है। अन्य प्रकार की भी [सातवीं ] इस प्रकरण की वक्रता वक्रभाव होती है यह [ भवति क्रिरया के अध्याहार से ] सम्बन्ध होता है। यहां 'उल्लसति' अर्यात् प्रकट होता है, 'सोल्लेखा' अर्थात् अभिनव प्रकाशन शैली से मनोहर। [प्रकृत के] समान जो अन्य वस्तु [वह 'वस्त्वन्तर' हुई ] उसकी विचित्रता वैचित्र अर्यात् अ्रपूर्वता [ प्रतीत होती ह] किस लिए कि, 'प्रधान वस्तु की सिद्धि के लिए'। [ जिसके द्वारा ] प्रधान अ्रधिकृत प्रकरण किसी अपूर्व सौन्वर्य को प्राप्त हो जाता है। १. प्रधानमवि कृत प्रकरणमिति पाठान्तरम। रम। उपाठलोप।

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कारिका ११ ] चतुर्योन्मेष· [५१६

यथा मुद्राराक्षसे पष्ठाक्के- ततः प्रविशति रज्जुहस्तः पुरुपः पुरुष :- छग्गुरासं जोत दढा उवायपरिवाडिदपासमही। चाएवकणीदिरज्जू रिउस जमराज्ुआ्रा जन्न्दि।।३७।। [पडगुएसयोगदढ़ा उपायपरिपाटी घटितपाशमुखी। चाएकयनीतिरज्जू रिपुसयमनतजुका जयति॥ इतिछाया] एष स आयेचाणक्यस्योन्दुरकेण चरेए कथित. प्रदेशः यत्र मया आर्य चाणक्यस्याज्ञप्त्या अ्ररमात्यराक्षमः प्रेतितव्य। कर्थ एप खल्वमात्यराक्षसः कृत- शीर्षावगुएठन इत एवागच्छति। तदेभिर्जीर्णोद्यानपादपेरपवारितशरीरः प्रेक्षे कुत्रासनपरिग्रहं करोतीति। [ इति तथा परिक्रम्य स्थित' ]। ततः प्रविशति यथानिर्दिष्ट सशस्त्रो राजस।

जैसे मुद्राराक्षस के छठे शड्ध, में- [तब रस्सी हाथ में लिए हुए पुरुष प्रवेश करता हैं]। पुरुष- [ सन्धि, विग्रह यान, श्रासन, सअय और बवंधीभाव रूप ] छ गुखो के योग [रस्सी पक्ष में छ लड़ो को मिला कर बटने] से मजबूत तथा [साम, दाम, दण्ड, भेद, रूप ] उपायों [ रस्सी पक्ष में उसके बनाने के विविध उपाथों] की परिपाटी से बने हुए पाश रूप मुख वाली और शत्रु को बांधने में समर्य रस्सी के समान आर्य चासाक्य की [अमात्य राक्षस को फेंसाने के लिए इस समय प्रयुक्त की जा रही] नीति सर्वोत्कर्ष युक्त है। [ इस रस्सी का प्रयोग ही अभी आ्र्प्रागे चलकर अ्रमात्य राक्षस को चाशक्य के चगुल मे फँंसा देगा इस लिए यहाँ उसकी प्रशसा की गई है]।३७ ।। [आगे बढ़ कर औप्रर देख कर ] उन्दुरक [नामक ] गुप्तचर के द्वारा आार्य चासक्य को सूचित किया हुआ यही वह स्थान हं जहाँ आय चाराक्य की आज्ञा से मुभे अ्मात्य राक्षस से मिलना है। अच्छा यह तो अमात्यराक्षस शिर को ढके हुए इघर ही आ रहे है। इस लिए तनिक इन पुराने बाग के वृक्षो की श्ाड में छिप कर देखूं कि यह कहाँ बैठते है। [ उस प्रफार से छिप कर खड़ा हो जाता है ]। [तब पूर्वोक्त रूप से शिर ढके हुए राक्षस का प्रवेश होता है] उद्धरस बहुत लम्बा हो जाने के भय मे यहा बीच का बहुत सा भाग छोड दिया गया है।

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५२० ] वफ्रोवितिजोवितम् [फारिका ११

पुरुप .- आसीनोऽयम्। तद्याववार्यचाणक्यग्यान्ञ्ति सम्पाव्वामि [राक्षसमपश्यन्निव] तस्याग्रतो रज्जुपाशन कएठमुद्गब्नाति। राक्षस-[विलोक्य म्वागनम् ] अ्रये कयमयमात्मानमुनन्नानि।- नन्वयमहमिव दु खितस्तपस्वी। भवतु पृच्छाम्यनम्। मद्र भद्र किमिनमनुष्ठी- चते। पुरुपः-आर्य यत् प्रियवयस्यविनाशटु खितोडम्माटशो मन्वभाग्यो जनोऽनुतिष्ठति। राक्षस-भद्र अथाऽग्निप्रवेशे तब सुहट को हेतु ? किमीपधपथातिगैरुपहतो महाव्याधिभि । पुरुप-आर्य नहि नहि। राक्षस -किमग्निविपकल्पया नरपतेर्निरम्त क्रुध । पुरुप-शान्त पापं शान्त पापम। चन्द्रगुप्तस्व जनपटेऽनृशसा प्रतिपत्तिः । रान्तस -नलभ्यमनुरक्तवान् किमयमन्यनारीजनम्। पुरष-अच्छा यह बँठ गए। अव आर्य चाशक्य की प्राज्ञा का पालन करुँ। 4 [मानो राक्षस को देसा ही नहीं है इस प्रकार का प्रदर्शन करते हुए ] उसके सामने रस्सी के फेंदे में अपना गला फेसाता है। राक्षस-[ देख कर ] अरे यह तो अपने गले में फाँसी लगा रहा है। जान पडता है यह वेचारा भी मेरे समान कोई दुसिया है। अच्छा इससे पूछूं तो [ समीप जाकर जोर से ] अरे भाई यह क्या कर रहे हो। पुरुष-आर्य जो अपने प्रिय मित्र की मृत्यु से दुखी हमारा जंसा अभागा व्यक्ति कर सकता है वही में कर रहा हूँ। राक्षस-धच्छा भाई तुम्हारे मित्र के अग्नि में जलने का क्या कारण है ? कया वह भौषध से न ठीक हो सफने वाले किन्हीं महारोगो से ग्रस्त है? पुरुष-आार्य नहीं नहीं [ यह बात नहीं है ]। राक्षस-तव क्या अग्नि और विष के समान भयड्र राजा के क्रोध से सताया हुआ है? पुरुष-[शान्त पाप शान्त पापम्] तोवा तोवा चन्द्रगुप्त के राज्य में निष्ठुर व्यवहार नहीं होता है। राक्षस-तो क्या प्राप्त न हो सकने वाली किसी अन्य पुरुष की स्त्री पर मोहित हो गया है?

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कारिका १२] चतुर्थोन्मेष [ ५२१

पुरुष -आर्य शान्त पापं शान्तं पापम्। अररभूमि खल्वेप विनय- निधानस्य वसिग्जनस्य विशेपतो जिष्सुदासस्य। राकस :- किमस्य भवृतो यथा सुहृद एव नाशो विपम ॥३=॥ पुरुप :- अथ किं आर्य त्रथ किम ॥११॥ म-पुनर्मेङ्गयन्तरेण व्याचष्टे- सामाजिकजनाह्वादनिर्माखनिपुरानेटैः। तद्द् मिक्तां समास्थाय निर्वतितनठान्तरम् ॥१२॥

पुरुष-शान्त पाप श्ास्त पापम् [ तोवा तोवा ] सदाचारी वैश्यो और विशेष रूप से जिप्सदास के लिए यह सम्भव नहीं है। राक्षस-तो क्या फिर तुम्हारी तरह इस के लिए मी उसके मित्र का विनाश ही चिष हो रहा है? पुरुष-जी हाँ और क्या? मुद्राराक्षत में यह वडा लम्वा करणा है। इन सबका साराश यह है कि इस पुरुप के द्वारा चाक्य ने अमात्य राक्षस पर यह प्रभाव डाला है कि त्मात्य राक्षस के परिवार के लोगो को चाावय पकडना चाहता है। अमात्य राक्षस अपने परम मित्र चन्दनदास के पास अपने परिवार जनो को छोड कर चला गया था। चाएवय ने चन्दन दास मे उनको राज्य सौंप देने के लिए कहा है। परन्तु चन्दनदास इस पर राजी नही होता हूँ, तो चाणक्य ने चन्दनदास को मार डालने की माज्ञा दे दी है। उसकी मृत्यु का समाचार सुनने के पहिले ही चन्दनदास का मित्र जिप्णुदास जो इस पुरुप का भी मित्र है अ्ग्नि में जलकर मर जाने के लिए तैयार होकर नगर से बाहर चला गया है। और उसी मित्र शोक में यह पुरुष भी अपने गले में फाँसी लगा रहा है। वस्तुत यह सब बनावटी जाल है। पर चारत्रय का उसके प्रयोग में डतना ही अभिप्राय है कि जब राक्षस को यह मालूम होगा कि उसके कारण उमका मित्र चन्दनदास मारा जा रहा है तो वह स्वय आत्म-समर्पण कर देगा। और वही होता भी है। यहाँ चारक्य का मुरय उद्देग्य राक्षस को जीवित रूप में अपने वश में करना है। उसी प्रधान उद्देश्य की सिद्धि के लिए इस सुन्दर श्रद्म की अ्ररवतारणा हुई है। *इसलिए यह सातवें प्रकार की प्रकरण-वक्रता का ही उदाहरण है ॥११॥ 5-फिर अन्य प्रकार से [प्रकरण-वघ्रता के आठवें ] भेद को दिखलाते हैं- सामाजिक जनो के शानन्द प्रदान करने में निपुण नटो के द्वारा स्वय सामा- जिक के स्वरूप को धारण कर [ तद्भूमिकां समास्थाय ] औ्र [ श्रन्य ] दूसरे नटो को बना कर-

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५२२] वक्रोपितिजीवितम् [कारिफा १३

क्वचित् प्रकरसस्यान्तः स्मृतं प्रकरणान्तरम्। सर्वप्रवन्धसर्वस्वकलां पुप्णाति वक्रताम् ॥१३। 'सर्वप्रवन्वसर्वस्वकला पुप्णति वक्रताम', समुल्लासयति वक्रिमाणम। 'क्वचित् प्रकरशम्यान्त म्मृत प्रकरणन्तरम्' कस्मिश्चिद् क विकौशलोनमेपशालिनि नाटके, न सर्वत एकन्य मध्पवति श्र न्तरगर्भीकृत इति यावत । कि विशिष्टम्-'निर्वर्तितनटान्तरम् विभाविता- न्यनर्तकम् । 'नटै' कीनशै-'सामाजिकजनाह्वाटनिर्मामनिपुर' सह्दय परिपत्परितोपणनिष्णाते। 'त भूमिका समाम्याय' सामानिकीभूय। इदमत्र तात्पर्थम्-कुन्नचिदेव निरकुशकौशला कृशीलवा स्वीयभूमिका- परिश्रहेण रङ्ग मलकुर्वाणा. नर्तकान्तरप्रयुज्यमाने प्रकृतार्थ जीवित उव गर्भवतिनि अरङ्कान्तरे तरङ्गितवक्रतामहि्नि सामाजिकीभवन्तो विविधाभिर्भावनाभन्गीभि साक्षात्सामाजिकाना किमपि चमत्कारवैचित्र्यमासृत्रयन्ति।

कहीं एक नाटक [प्रकरण ] के भीतर दूसरा [प्रकरण] नाटक प्रयुक्त होता है वह सारे प्रबन्धो की सर्वस्व-भूत अर्प्रलौकिक वकता को पृष्ड करता हैं। 'सारे प्रबन्ध [नाटक ] की सर्वस्व-भूत वकता को पुप्ट करता है'। अर्थात सारे रूपको के प्राए भूत सौन्दर्य को प्रकाशित करता है। 'कहीं नाटक के भीतर दिखलाया हुआ दूसरा नाटक'। किसी कवि कोशल को प्दशित करने वाले [विशेष] नाटक में ही [ यह सम्भव हो सकता है] सब में नहीं। अरयात एक [ नाटक] के भीतर आए हुए। अ्रद्ध के अ्न्तगंत [ दूसरा नाटफ दिखलाया जाता है]। किस प्रकार के-'अन्य नट बना कर' अन्य को नट रूप देकर। किस प्रकार के नटो के द्वारा कि-'सामाजिक जनो के शह्लाद के निर्माण में निपुण' अर्यात सहृदय समुदाय को सन्तुष्ट करने में समर्थ [ नटो के द्वारा ]। उन [सामाजिको की भूमिका [ स्वरूप ] को लेकर अर्थात सामाजिक वन कर [ नाटक के भीतर जो दूसरे नाटक का अभिनय करना है-। वह भी प्रकरण-वत्ता का ही एक विशेष आाठवाँ प्रकार है ]। इसका यहाँ यह असिप्राय हुआ कि-कहीं [किसी विशेष नाटक में] ही श्रपरि- मित कौशल वाले नट अपनी भूमिका [वेश] को धारण करने के द्वारा रङ्गमञ्च को अलकृत करते हुए दूसरे नटो के द्वारा अरभिनीत प्रस्तुत नाटक के प्राण-स्वरूप वक्रता की महिमा को प्रसारित करने वाले मध्यवर्ती दूसरे नाटक [ अ्रङ्ग ] मे सामाजिक बनकर नाना प्रकार की भाव भङ्गियो से साक्षात सामाजिको के लिए किसी अरपूर्व चमत्कार वचित्र्य को उत्पन्न करते हैं। [ वह प्रकरण-वक्ता का ही आठवां भेद है]।

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कारिका १३ ] चतुर्थोन्मेषः [५२३

यथा वालरामायणे चतुर्थेडक्के लक्केश्वरानुकारी नटःपहस्तानुकारिणा नटेनानुवर्त्यमान.। कर्पूर इव दग्घोऽपि शक्तिमान् यो जने जने। नम शृङ्गारवीजाय तरमे कुसुमधन्वने ॥।?८।। चथा वा उत्तररामचरिते सप्तमाङ्क 'हा कुमार, हा लन्मण' इत्यादि ॥१२-१३॥ जसे 'बालरामायण' [नाटक] के चतुर्थ प्रङ्ग में प्रहरत का अनुकरण करने वाले नट से अनुवर्त्यमान लड्डश्वर रावस का अनुकर्ण करने वाला नट, [ कोहलादि द्वारा अभिनीत 'गर्भ नाटक' को देखता है ]। वालरामायण के चतुर्य अङ्क में सीता-स्वयम्बर नाम का 'गर्भाङ्क' उपनिवद्ध किया गया है। उससे नाटक का सौन्दर्य बहुत बढ गया हूँ। उसी की ओर यहाँ सवेत किया गया है। नाटक के अन्तर्गत नाटक का अभिनय जहाँ से प्रारम्भ हुआा है उसका प्रथम 'नान्दी' इ्लोक 'कर्पूर इव' आदि दिया गया है। इसके पहिले की भापा इस प्रकार है। प्रहस्त [नेपथ्याभिमुखमवलोक्य] भो भो भरतपुत्रा। प्रेक्षणवकृते कृतक्षणा क्षणदाचरचक्रवर्ती। तत्प्रस्तूयताम्। [ प्रविश्य कोहल ] अथत् क्षणदाचर-चक्र्वर्ती रावण, नाटक को देखने के लिए प्रस्तुत है इस लिए अव नाटक का अभिनय प्रारम्भ करो। इस प्रकार प्रहस्त के द्वारा आज्ञा दिये जाने पर कोहल नाम नट सूत्रधार के रूप में प्रचिप्ट हो कर इस 'गर्भनाटक' के नान्दी पाठ के रूप में इस श्लोक को पढता है। जो कपूर के समान जल कर भी प्रत्येक व्यक्ति में त्रधिक शक्तिशाली हो गया हं भङ्गार के वीजभूत पुष्पघन्वा उस [ कामदेव ] को नमस्कार है॥३=॥ परथवा जैसे उत्तररामचरित के सप्तम श्रद्ध में [ सीता परित्याग के बाद गर्भाड्क में सीता को गङ्गा में कूदते हुए देख कर रामचन्द्र का] हा कुमार, हा तक्ष्मण [आ्रादि चिल्लाकर ]। 'उत्तररामचरित' के सप्तम श्रङ्ध मे रामचन्द्र जी को वाल्मीकि विरचित नाटक का अप्सराओ द्वारा अमिनय दिखलाने का आयोजन किया गया है। उमकी और यह नकेत कुन्तक ने किया है ॥१२-१३॥ नाटक की रचना में पञन्च-सन्धियों का महत्व-पूर्ण स्थान है। वे पाँच सन्धिया कमश १ मुख-सन्वि, २ प्रतिमुख-सन्घि, 2 गर्भ-सन्धि ४ विमर्न सन्धि, ५ उपमहुति- मवि, कहलाती है। इन पातो प्रकार की सन्घियों के ययोचित सन्निवेश से भी

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५२४] वक्रोपितजीयितम् [ कारिका १४-१५

ह-अपरमपि प्रकरणवक्रताया प्रकारमविष्करोनि- मुखा भिसन्धिसन्ध्या दिसं विधानकबन्धुगम्। पूर्वोत्त रादिसङ्गत्या अ्रद्धानां मन्निवेशनम् ॥१४।।

चक्रतोल्लेसलाचरयमुल्लासयति नृतनम् ॥१५॥ कस्मात्-'पूर्वोत्तरादि सन्नत्या' पूर्वस्य पूर्वस्य उत्तरेगोत्तरेण यसानत्य ऋतिशयितसौगस्य उपजीव्योपजीवकभावलक्षसां तस्मात। इदमुक्त भर्वत- प्रबन्धेपु पूर्व-पूर्वप्रकरण परस्य परस्य प्रकरणन्तरस्य सरममम्पादितमन्धि-

नाटक में कुछ अपूर्व सौन्दर्य उत्पन्न हो जाता है। उस सन्ि-चगना को भी पप्रक्रस- वकता' का नवम भेद वतलाते हुए आगे लिसते है।- ह-प्रकरण-वक्रता का औ्रर भी [ नवम ] प्रकार दिसलाते है- मुख, प्रतिमुख सन्धि आदि के [ ययोचित ] सन्निवेश [श्रागे पीछे रचना ] से मनोहर पूर्व तथा उत्तर की सङ्गति से भ्रङ्गो का [ उचित रूप से] सन्निवेश [भी प्रकरण-वकता का नवम प्रकार होता है।। [अमार्ग] अनुचित मार्ग के ग्रहणरूप ग्रह से ग्रस्त होने के फारण निन्दित [बुरे] रूप में अङ्गो का सन्निवेश न हो तो वह विन्यास वकता के उल्लेख से नवीन सौन्दर्य को प्रकाशित करता है। इन कारिकाओो का और उनकी वृत्ति का पाठ मूल प्रति में बहुन ग्रस्त-व्यस्त और दूषित है। इसलिए उसका बहुत मा अश ठोक तरह पढने में नही आया। किससे कि पूर्व और उत्तर आदि [श्रङ्गों] की सङ्गति से अर्यात पूर्व-पूर्व फी उत्तर-उत्तर के साथ जो जों सङ्गति या उपजीव्य-उपजीधक भाव रूप अत्यन्त सुगमता उससे [अ्रद्धो का विन्यास ]। इसका यह अभिप्राय हआ कि-प्रबन्ध [काव्य या नाटक] में आप्रगे आ्र्प्रागे के प्रकरण उत्तर उत्तर के प्रकरणो के साथ सरलतापूर्वक सन्धि सम्बन्ध को प्राप्त होने से अर्थात उल्लेख से युक्त उत्तर प्रकरणो के साथ ठीक मेल बैठ जाने से कथा की रचना में सौन्दर्य का समावेश फर [कवि की] प्रतिभा को प्रौढता से उन्धावित वकता, के उल्लेख से [सहृदयो को ] श्राह्हादित करता है। १ अरपस्यात् परस्य ।8पाठलोप।

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फारिका १४-१५] चतुर्थोन्मेष [ ५२५

यथा 'पुष्पदूतिके' प्रथमं प्रकरणम् निरानन्दस्य समागतस्य समुद्रतीरे समुद्रदृत्तस्योत्कएठान्नकारप्रकाशनम्। द्वितीयमपि प्रस्थानात् प्रतिनिवृतस्य निशीथिन्यासुत्कोचालक्वारदानमूकी- कृतकुवलयस्य कुसुमवाटिकायामनाकलितमेव तस्य सदचरीसङ्गनम्। तृतीयमपि-सम्भावितो दुर्विनयो, नयदत्तनन्दिनीनिर्वासनव्यसन- तत्समाधाननिबन्धनम्।

विमलसम्पदः कठोरतर गर्भभारखिन्नाया स्तुपायां निप्कारणनिष्कासनादनाहित- चतुर्थमपि

प्रवृत्तेर्महापातकिनमात्मानं मन्यमानस्य सार्थवाइसागरदत्तस्य तीर्थयात्रा- प्रवतनम् । पञ्चममपि वनान्त:समुद्रद त्तकुशलोदन्तकथनम् ।

जैसे 'पुष्पदूतिक' [नामक अरप्राप्य 'प्रकरण'] में प्रथम प्रकरण। [नव-परिखीता पत्नी के वियोग के] श्त्यन्त भयङ्कर अननुभूतचर दुख से दुःखी और समुद्र के किनारे पराए हुए [ नायक ] 'समुद्रवत्त' की उत्कण्ठा के प्रकार का प्रकाशन। [उसके बाद फिर] दूसरा प्रकरण भा प्रस्थान से अ्रर्ात यात्रा पर से [बीच में ही ] लौटे हुए उस [ समुद्रदत्त ] का रात्रि में [ अ्ँगठी रूप ] आभूषण की घुस [ उत्कोच ] देकर [ वाटिका के पहरेदार ] 'कुवलय' को चुप करके वाटिका में ही उम [समुद्रदत्त ] का अपनी [पत्नी] सहचरी के साथ समागम [ का वर्गन ]। तृतीय [अ्रद्ध] में [गर्भ चिन्हों के प्रकट होने पर समुद्रदत्त को पत्नी के] दुराचार की सम्भावना, नयदत्त की पुत्रो के निर्वासन का सङ्ड और उसके समाधान [का वर्णन]। चतुर्थ अद्ध में भी मथुरा से लौटे हुए कुवलय [नामक पहरेदार]के द्वारा[पहिते EMEE समुद्रवत्त द्वारा घूस रूप में दी हुई] भ्रूठी के दिखलाने से जिसको [ पुत्रवघू के ] विमल चरित्र [ सम्पत्ति] का परिचय प्राप्त हो रहा है ऐसे औरर परिपूर्ण [नौ मस के] गर्भ के भार से खिन्न पुत्र-बधू के निष्काग्ण निर्वासन रूप अशुभाचरण से अपने आप को महापातकी समभने वाले सार्थवाह [सौदागर ] सागरदत्त फा [ प्रायश्चितस्वरूप ] तीर्थ यात्रा पर चले जाना। पाँचवे [शद्धू में ] भी वन के बीच में समुद्रदत्त के कुशल समाचार का कहना।

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५२६] वक्रोक्तिजीवितम् [फारिका १४-१५

पष्ठमपि, सर्पेपां विचित्रमंख्यासमागमाम्युपायसम्पादनमिति। एव- मेतेपां रसनिष्यन्दतत्पराणं तत्परिपाटि: कामपि कामनीयरुमम्पदमुद्गावयति। यथा वा कुमारसम्भवे-पार्वत्याः प्रथमतारुस्यावतारवर्णनम। *हरशुश्रपा। 3दुस्तरतारकपराभवपारावारोत्तरणाकारण इति अरनिन्तसृते- रुपदेश. । 'कुसुमाकरसुहृद कन्दर्पस्य पुरन्दरोदेशाद गौर्या सौन्दर्यवलाद्

छठे [शद्ध में ] भी सभी का विचित्र [सरया] सकतो मे ममागम के उपाय का निकालना आदि। इन सब रस को प्रवाहित करने वाले उन [इम प्रकार अद्भो] की परम्परा [ पुष्पदूतिक नामक नाटफ में] कुछ श्रपूर्य सौन्दर्य को उत्पन्न कर देती है। प्रथवा जैसे कुमार सम्भव में-'पार्वती के प्रयम तारण्य अर्यात नवयोवन के आगमन का वर्शन [२पार्वती के द्वारा ] शिव जी की सेवा। 3तारकासुर द्वारा उत्पादित [ देवताओो के ] दुस्तर पराभव पारावार के पार पहुंचने [उद्धारपाने] का उपाय [शिवजी के पुत्र का सेनापतित्व ही हु] इम प्रकार ब्रह्मा का उपदेश । इन्द्र के कथन से वसन्त के सखा [कामदेव] का पार्वती के सौन्दर्य की शक्ति से [जञिव पर प्रहार करते हुए शिव के नेत्र की विचित्र श्ग्नि से फामदेव के भस्म हो जाने पर उसके डु खावेश से विवश हो कर रति का विलाप [ चतुर्थ सर्ग में ]। [ पञ्चम सर्ग में] १. असम्भन मण्डनमङ्गयण्टेरनामवाख्त करसा मदस्व। कामस्य पुष्पव्यतिरिक्तमस्त्र वाल्यात्पर साथ वय प्रपेदे ॥१, ३१॥ २. अवचितवलिपुष्पा वे दिसमार्गदक्षा नियमविविजलाना वहिपा चोपनेथ्ी। गिरिशमुपचचार प्रत्यह सा सुकेशी नियमितपरिखेदा तच्छिरश्चन्द्रपार्द ॥१, ६०॥ ३. सयुगे सायुगीन तमुद्यत प्रसहेत क। प्शादृते निषिक्तस्य नीललोहितचक्षुप ॥।२, ५७॥ उमामुखेन ते यूय सयमस्तिमित मन । शम्भोर्यतध्वमाक्र्कमष्टुमयम्कान्तेन लोहवत् ॥२, २६॥। तस्यात्मा शितिकण्ठस्य संनापत्यमुपेत्य व । मोक्ष्यते सुखवदीना वेरगीवीर्यविभूतिभि ॥२,६१।। ४ क्रोध प्रभो सहर सहरेति यावद्गिर खें मरुता चरन्ति। तावत्स वह्निरभवनेत्रजन्मा भस्मावशेष मदन चकार ॥३, ७२।।

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कारिका १४-१५] चतुर्थोन्मेप· [५२७

विप्रहरतो हरविलोचनविचित्रभानुना भस्मीकरखदु खावेशविवशायाः रत्या चिलपनम् । "विचशताविकलमनसो मेनात्मकजायास्तप चरणम्। १~ निरर्गलप्राग्भारपरिमृष्टचेतसा विचित्रशिखसिडभिः शिखरिनाथेन वारणम्, पाशिपीडनम्। इति प्रकरणानि पौर्वापर्यपर्यवसितसुन्दरसविधानवन्धुराखि रामणीयकधारामधिरोहन्ति। एवमन्येष्वपि महाकविप्रचन्धेपु प्रकरणवक्रतावैचित्र्यमेव विवेचनीयम्। यथ। वेणीसंहारे प्रतिमुखसन्ध्यङ्ग भागिनि द्वितीयेडङ्क।।१४-१५।।

"विवशता से खिन्न मन पार्वती की 'तपश्चर्या का वर्णन ]। ['पावती के] अ्ररबाघ [यौवन के ] उभार से प्रभावित [मोहित] चित्त वाले विचित्र जटाओ [शिखण्ड] से उपलक्षित कैलाशपति [ शिव] के द्वारा [ ब्रह्मचारी वेश धारण करके युकतियों से पार्वती को शिव की प्राप्ति के लिए ] निषेध करना। [अन्त में पार्वती की दृढता को देख उनके साथ ] विवाह करना। ये सब प्रकरण पौर्वापर्य से ग्रथित सुन्दर रचना से मनोहर होकर सौन्दर्य की पराकाप्टा पर पहुँच जाते है। इसी प्रकार अन्य महाकवियो के [ काव्य नाटक रूप] प्रबन्षों में भी प्रकरणों को वक्रता के चमत्कार की विवेचना करनी चाहिए। जैसे, वेरीसहार के प्रतिमुख सन्धि के श्रङ्गो से युक्त द्वितीय श्रङ्ग में ॥१४-१५॥

५ अथ सा पुनरेव विह्हला वसुघलिङ्गनघूसरस्तनी। विललाप विकीर्णमूर्धजा समदु खामिव कुवती स्थलीम् ।।४,३।। ६. तथा समक्ष दहता मनोभवं पिनकिना भग्नमनोरथा सती। निनिन्द रूप हृदयेन पार्वती प्रियेपु सौभाग्यफला हि चारुता ॥५,१।। इयेष सा कर्तुमवन्व्यरूपता समाघिमास्थाय तपोभिरात्मन । अवाप्यते वा कथमन्यथा द्वय तथाविध प्रेम पतिश्च तादृश ॥५, २॥ ७ अथाजिनापाढघर प्रगत्भवाग् ज्वलन्निव ब्रह्ममयेन तेजसा । निवेश कश्चिज्जटिलस्तपोवन गरीरवद्ध प्रथमाश्रमो यथा ॥५, ३०॥ निवर्तयास्मादसदीप्सितान्मन क्व तद्विघस्त्व क्व च पुण्यलक्षणा। भपेक्ष्यते साधुजनन वैदिकी शमशानशूलस्य न यूपसत्किया ॥५, ७३॥ ८ अथोषधीनार्मावपम्य वृद्धी तिथी च जामित्रगुणान्वतायाम् । समेतवन्धुहिमवान् सुताया विवाहदीक्षाविधमन्वतिप्ठत् ।।७, १।। पुप्पाद्वित स्थानो पर पाठोप सूचक चिन्ह थे।

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५२६] वक्रोकितिजीघित म् [कारिका १४-१५

पष्ठमपि, सर्नेपा विचित्रमख्याममागमाभ्युपायसम्पाटनमिति। एव- मेतेपा रसनिष्यन्टतत्पराणा तत्परिपाटि कामपि कामनीयरुमम्पदमुद्धावयति।

१हरशुश्पा। दुस्तरतारकपराभवपारानारीत्तरसकरण इति अरविन्दमृते- रुपदेश। कुसुमाकरमुहृद कन्दपम्य पुरन्दरोह शाद् गौर्या सौन्द्यवलाद

छठे [अ्रद्ध में ] भी सभी का विचिन [सरया] सकेतो मे समागम के उपाय का निकालना आदि। इन सब रस को प्रवाहित करने वाले उन [इम प्रकार भ्रङ्गो] की परम्परा [ पुष्वदूतिक नामक नाटक में कुछ अ्रपूर्य सौन्दर्य फो उत्पन्न फर देती है। अ्रथवा जैसे कुमार सम्भव में-'पार्वती के प्रथम तारुण्य अ्रर्यात् नवयोवन के आगमन का वर्शन [श्वार्वती के द्वारा ] शिव जी की सेवा। 3तारकासुर द्वारा उत्पादित [ देवताओो के ] दुस्तर पराभव पारावार के पार पहुंचने [उद्धारपान] का उपाय [शिवजी के पुत्र का सेनापतित्व ही है ] इम प्रकार ब्रह्मा का उपदेश । इन्द्र के कथन से वसन्त के सखा [कामदेव] का पार्वती के सौन्दर्य की शक्ति से [शिव पर 4 प्रहार करते हुए शिव के नेत्र की विचित्र अ्नि से कामदेव के भस्म हो जाने पर उसके दु खावेश से विवश हो कर रति का विलाप [ चतुर्य तर्ग में ]। [ पञ्चम सर्ग में] १ ग्रसम्भन मण्डनमङ्गयष्टेरनासवाख्न करगा मदस्य। कामस्य पुप्पव्यतिरिक्तमस्त्र वाल्यात्पर साथ वय प्रपेदे ॥१, ३१॥ २ अवचितवतिपुष्पा वेदिसमागंदक्षा नियमविधिजलाना चहिपा चोपनेत्री। गिरिशमुपचचार प्रत्यह सा सुकेशी नियमितपरिखेदा तच्छिरश्चन्द्रपादे ॥१, ६०। ३ सयुगे सायुगीन तमुद्यत प्रमहेत क। पशादृते निषिक्तस्य नीललोहितचक्षुप ॥।२, ५७।। उमामुखेन ते यूय सयमस्तिमित मन । शम्भोर्यतध्वमाक्र्मष्टुमयस्कान्तेन लोहवत् ॥२, २६।। तस्यात्मा शितिकण्ठस्य सनापत्यमुपेत्य व । मोक्ष्यते सुस्रवदीना वेरणीवीर्यविभूतिभिः ॥२,६१।। ४ क्रोध प्रभो सहर सहरेति यावद्गिर खे मरुता चरन्ति। तावत्स वह्निरभंवनेश्रजन्मा भस्मावशेष मदन चकार ॥३, ७२।।

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कारिका १४-१५] चतुर्थोन्मेष. [५२७

विप्रहरतो हरविलोचनविचित्रभानुना भस्मीकरणदु खावेशविवशाया. रत्या विलपनम् । ५विवशताविकलमनसो मेनात्मक्जायास्तपचरणम् । निरर्गलप्राग्भारपरिमृष्ठचेतसा विचित्रशिखसिडभिः शिखरिनाथेन वारसम्, पाशिपीडनम्। इति प्रकरणानि पौर्वापर्यपर्यवमितसुन्दरसंविधानयन्धुरासि रामणीयकधारामधिरोहन्ति। एवमन्येष्वपि महाकविप्रबन्धेपु प्रकरणवक्रतावैचित्र्यमेव विवेचनीयम्। यथा वेगीसंहारे प्रतिमुखसन्ध्यक् भागिनि द्वितीयेडक्क ॥१४-१५॥

"विवशता से खिन्न मन पार्वती को 'तपश्चर्या [का वर्न ]। [पार्वती के] श्रबाघ [योवन के ] उभार से प्रभावित [मोहित] चित्त वाले विचिन्न जटाओं [शिखण्ड] से उपलक्षित फॅलाशपति [शिव] के द्वारा [ब्रह्मचारी वेश धारण करके युक्तियों से पार्वती को शिव की प्राप्ति के लिए ] निषेध करना। [अ्रन्त में पावती की दृढता को देख उनके साथ ] विवाह करना। ये सब प्रकरण पौर्वापर्य से ग्रथित सुन्दर रचना से मनोहर होकर सौन्दर्य की पराकास्टा पर पहुंच जाते है। इसी प्रकार अन्य महाकवियो के [ काव्य नाटक रूप ] प्रबन्धो में भी प्रकरखों की वक्ता के चमत्कार की विवेचना करनी चाहिए। जैसे, वेसीसहार के प्रतिमुख सन्धि के श्रङ्गों से युक्त द्वितीय शद्ध में ॥१४-१५॥

५ अथ सा पुनरेव विह्हला वमुघ लिङ्गनघूसरस्तनी। विललाप विकीर्णमूर्धजा समदु खामिव कुर्वती स्थलीम् ।।४,३।। ६. तथा समक्ष दहता मनोभव पिनकिना भग्नमनोरया सती। निनिन्द रूप हृदयेन पार्वती प्रियेपु सौभाग्यफला हि चारुता ।।५,१।। इयेप सा कर्तुमवन्ध्यरूपता समाधिमास्थाय तपोभिरात्मन । प्वाप्पते वा क्थमन्यया द्वय तथाविध प्रेम पतिश्च तादृन ।।V, २। ७ अथाजिनापाठघर प्रगल्भवाग् ज्वलन्निव ब्रह्ममयेन तेजसा । निवेश कश्चिज्जटिलस्तपोवन शरीरवद्ध प्रथमाश्रमो यथा ॥५, ३०॥। निवर्तयास्मादसदीप्मितान्मन क्व तद्विघस्त्व क्व च पुण्यलक्षणा। अपेक्ष्यते साधुजनन वैंदिकी शमशानूलस्य न यूपसत्कि्या ॥५, ७३॥ ८ अयोपधीनामवपस्य वृद्ी तिथो च जामित्रगुरान्वतायाम्। समेतवन्धहिमवान् सुताया विवाहदीक्षाविवमन्वतिप्ठत् ॥७, १।। पुप्पाद्धित स्थानो पर पाठनोप नूचक चिन्ह थे।

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५२८] वगोपितिजीवितम् [फारिका १६-१७

अथ प्रवन्धवक्रनामवतारयति-

रसान्तरेस रग्येस यत्र निर्वहणं सघेत् ॥१६।। तस्या एव कथासूर्तेगमूलोन्मीलितश्रियः । विनेयानन्दनिष्पत्ये सा प्रबन्धस्य वक्कता ॥१७।।

इसके बाद उस प्रकरण की समाग्ति मे अ्पन्तर श्लोक दिए गए है। परन्तु :तिलिपि में पढने मे नहीं आ सके है। मलिए यहाँ नही दिए गए है।

६-प्रबन्ध-वपता का प्रथम भेद-

प्रथम उन्मेप की १८वी कारिका मे ग्रन्थ के गुरुय प्रतिपाद्य विषय का 'उद्देश' या निर्देश करते हुए ग्रन्थकार ने ६ प्रकार की 'वकना' का प्रतिपादन किया था। 'वकता' के इन्ही ६ भेदो का नित्पण शेप ग्रन्थ में किया गया है। नमे पहिले तीन भेदो का द्वितीय उन्मेद में विस्तार के साथ विनेचन किया गया है। तृतीय उन्मेष में वकता के चतुर्थ भेद का विवेचन हुआ है। और शेप दो भेदो का विस्तृत विवेचन इस चतुर्थ उत्मेप में किया गया हे। उनमे से १-१५ कारिका तक वयना के पाँचवें भेद 'प्रकरण-वक्रता' के आठ प्रकार के स्वरपो का यहाँ तक प्रतिपादन किया है। अब इसके 'प्रबन्ध-वक्र्ता' नामक वकता के छटे प्रकार का आगे ग्रन्य की समाप्ति तक करेंगे। जैसा कि आगे स्पष्ट होगा। इस 'प्रवन्व-वक्रता' के ग्रन्थकार ने सात भेद वर्णन किए हे इन्ही सातो भेदो का नमग, विवेचन प्रारभ्भ करते है-

इतिहास में [शर्थात् नाटक आदि की मूल कथा जिस ऐतिहासिक आ्रराधार पर ली गई है उस में] अन्य प्रकार से दिखलाए हुए रस की सम्पत्ति की उपेक्षा कर के जहां किसी अ्रन्य सुन्दर रस से [ कथा की] समाप्ति को जाय। प्रारम्भ से ही रचना सौन्दर्य को प्रकाशित करने वाले उसी [ इतिहास प्रसिद्ध ] कथा शरीर की[ जिन राजा या पाठक आरादि की शिक्षा के लिए नाटकादि को रचना की गई है उन ] विनेयों के आनन्द सम्पादन के लिए [ जहाँ इतिहास में अन्य प्रकार से निरूपण किए हुए रस की उपेक्षा कर अन्य रस से कथा की समाप्ति हो, यह पूर्व कारिका से सम्बन्ध हं] वह प्रबन्ध की वक्रता होती है।

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कारिका १६-१७] चतुर्योन्मेष: [ ५२६

'सा प्रवन्धस्य' नाटकसर्गवन्धाने. 'वक्रता' वक्रभावो भवतीति सम्बन्ध'। 'यत्र निर्वहणं भवेत्' यस्यामुपसंहरए स्यात्। 'रसान्तरेख' इतरेख रम्येण -रसेन रामणीयकविधिना। कया-'इतिवृत्तान्यथावृत्तरससम्पदुपेक्षया'। इति- वृत्तमितिहासः अन्यथा परेण प्रकारेण वृत्ता निर्व्यूढ़ा या रससम्पत् शृङ्गाराटि- भङ्गी तदुपेक्षया' तदनाढरेण तां परित्यव्येति यावत्। कस्या .- 'तस्या एव कथा मूर्ते:' तस्यैव काव्यशरीरस्य। कि भूताया .- 'आमूलोन्मीलितश्रिय' आरामूल प्रारम्भादुन्मीलिता 'श्री.' वाच्य-वाचरुर चनासम्पद् यस्वास्तयोकता तस्था. ।

वेसीसंहारोत्तररामचरितयोः। रामायणमहाभारितयोश्च पूर्वसूरिभिरेव निरूपितम ॥१६-१७।।

वह 'प्रवन्ध' प्रर्थात् महाकाव्य [सगबन्ध] अ्रथवा नाटक श्ादि की 'वक्कता' वक्रभाव रूप होती है यह [ भवति त्रिया का अ्रध्याहार करके वाकय का] सम्बन्ध होता है। 'जहाँ निर्वहण अर्यात् समाप्ति हो' जिसमें उपसहार किया जाय। [ मूल एतिहासिक कथा में दिए हुए रस से भिन्न ] दूसरे [अधिक ] सुन्दर रस से सुन्दरता के साथ [कथा की समाप्ति की जाय वहाँ 'प्रवन्व-वक्रता' होती है]। कसे-इतिहास में अन्य प्रकार से वशित रस सम्पत्ति की उपेक्षा करके [ श्रन्य रस में कथा का उपसहार किया जाय वह 'प्रबन्ध-वक्रता' होती है]। 'इतिवृत्त' का अनर्य इतिहाम हैं। [ उसमें ] 'अपन्यथा' अपर्यात् अ्रन्य प्रकार से परिपु्ट की हुई जो रस-सम्पत्ति अ्र्ात शृङ्गारादि की पद्धति, 'उसकी उपेक्षा से' अरथात् उसका अनादर करके अर्यात् उसको छोड़ कर [अन्य रस में कथा का उपसहार किया जाय ]। किसका [उपसहार कि] उसी [इतिहास प्रसिद्ध मूल] कथा के स्वरूप का अरपर्थात् उस ही काव्य की शरीर भूत [मूल कथा ] का। किस प्रकार की कथा का कि-प्रामूल अ्र्थात् प्रारम्भ से जिसकी रचना का सौन्दर्य प्रकट हो रहा है। आमूल अर्थात् प्रारम्भ से उन्मीलित प्रकाशित हो रही है श्री अर्थात् वाच्य वाचक [ शब्द तथा अर्थ] की रचना सम्पत्ति जिसकी इस प्रकार की उस कथा का [ रसान्तर से उपसंहार किया जावे]। किसलिए कि 'विनयों के आनन्द सम्पादन के लिए' अर्थात् [जिनकी शिक्षा के लिए काव्य या नाटक की रचना की नई है उन प्रतिपाद्य ] शिक्षा योग्य राजा आदि के आनन्द गम्पादन के लिए। जैमे-उत्तररामचरित और वेणीसहार में। रामायण तथा महाभारत का [अ्रङ्गो रम ] प्रधान रस शान्त-रम है यह वात पूर्व विद्वान् [श्रानन्दवर्वनाचार्य ध्वन्यालोक ४, ५ में ] ही दिखला चुके है। [अत वेणीसहारादि में 'प्रब्रन्ध रस परिवर्तन वकना' है ]।

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५३० ] वक्रोपितिजी वितम् [ फारिका १८-१६

प्रबन्धवक्रताया प्रकारान्तरं दर्शयति- त्रैलोक्याभिनवोल्लेखनाय कोत्कर्पपोपिणा । इतिहासैंकदेशेन प्रवन्धस्य समापनम् ॥१८॥ तदु चरकथाव्तिविरसत्वजिहासया। कुर्धीत यत्र सुकविः सा विचित्रास्य वक्रता ॥१६॥

उत्तर रामचरित की रचना रामायण के सावार पर औ्रर वेणीमहार' की रचना महाभारत के आवार पर हुई है। आ्रनन्दवर्वन आदि प्राचीन आ्चार्यों का मत यह है कि इन महाकाव्यों का प्रधान रस शान्त रस ही है। यद्यपि उनमें वोर आ्रदि अन्य रसो का भी निम्पण पाया जाता है फिर भी उनका प्रधान रस शान्त रस हीहै। परन्तु उन्ही रामायण ता महाभारत के आधार पर लिसे गए 'उत्तररामचरित' तथा 'वेसीसहार' में कस्सा एव वीररस का प्राधान्य है। इमलिए इन नाटको के मूल इतिहास मे अर्यया प्रसिद्ध रससम्पति की उपेक्षा करके विनेय लोगो के लिए प्रारम्भ से ही मूल शान्त रस से भिन्न वरुण तथा वीर रस को प्रधानता देते हुए इन नाटको की रचना को गई है। इसलिए ये इस 'प्रवन्व-वकता' के उदाहरण है ॥१६-१७।

२-'प्रबन्ध-वक्र्ता' का दूसरा भेद [समापन वकता]-

इसी प्रकार 'प्रवन्ध-वत्नता' के अन्य प्रकार का निरुपण करते हैं-

सारे ससार में प्रद्भुत चमत्कार जनक नायक के [ चरित्र फे ] उत्कर्षं का पोष करने वाले इतिहास के एक देश से ही [ उत्तरवर्ती कथा के विरस भाग को छोडने के लिए ] काव्य या नाटक आदि [ प्रबन्ध ] को समाप्त फर देना [ भी 'प्रवन्ध-वऋरता' का ही दूसरा प्रकार है]।

[ इतिहास प्रसिद्ध कथा के बीच में जहां पर प्रवन्ध काव्य नाटक श्रदि को" कवि ने समाप्त किया है] उसके आगे की कथा में होने वाली नीरसता के बचाने के लिए [ सारी कथा का वर्गन न करके नायक के उत्कर्ष को चरम सीमा पर पहुचाने वाले भाग पर ही बीच मे जव कथा की समाप्ति ] कवि फर देता है वह इस [ प्रबन्ध ] की विचित्र प्रद्भुत [आनन्दवायक] चक्रता होती है।

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कारिका १८-१६] चतुर्थोन्मेषः [५३१

'सा विचित्रा' विविधभङ्गीभ्राजिप्णुः 'अरस्य' प्रवन्धस्य'वक्रता' वक्रभावो 'भवतीति' सम्वन्ध । 'कुर्वीत यत्र सुकवि.''कुर्वीत'विदधीत'यत्र' यस्यां 'सुकवि.' औचित्यपद्धतिप्रभेदचतुर'। 'प्रवन्धस्य समापन'प्रबन्धस्य सर्गचन्धादेः'समापनं' उपसंहरं समर्थनमिति यावत् । 'इतिहासैकदेशेन' इतिवृत्तस्यावयवेन। किं भूतेन-'त्रैलोक्याभिनवोल्लेखनायकोत्कर्पपोषिण' जगदसाधारएस्फुरितनेत- प्रकर्षप्रकाशकेन। किमर्थम्-'तदुत्तरकथावर्तिचिरसत्वजिहासया'। तस्मादुत्तरा या कथा तद्वर्ति वदन्तर्गत यद्विरसत्वं वैरस्यमनार्जव तस्य जिहासया परिजिहीपया। इदमुक्त भवति-इतिहासोदाहतां कश्चन महाकविः सकलां कथां प्रारभ्यापि तद्वयवेन त्रैलोक्यचमत्कारकारण-निरुपमाननायक-यशसमुत्कर्षो- त्कर्पोदयदायिना तदग्रिमग्नन्थप्रसरसम्भावितनीरसभावहरयोच्छया उपसहिय- माणस्य प्रबन्धस्य कामनीयकनिकेतनायमानं वक्रिमाएमादधाति।

'वह विचित्र' अर्थात् नाना प्रकार से शोभाजनक इस प्रवन्ध [रूप नाटक प्रथवा महाकाव्य ] की 'वक्रता' अर्ात् सुन्दरता होती है यह [ भवति इस क्रिया का अध्याहार करके वाक्य का ] सम्बन्ध होता है। जहाँ सुकवि [ नायक के चरित्र के चरमोत्कर्ष पर पहुँचते ही आगे आने वाली कथा की नीरसता को बचाने के लिए कथा को समाप्त ] करदे। 'जहाँ' जिस [ रचना ] में सुकवि अ्रर्ात् औ्रचित्य मार्ग के भेदो का जानने वाला [ सुकवि ]। प्रबन्ध की समाप्ति [ करे ] प्रब्न्ध अर्यात् [ सर्गबन्ध ] महाकाव्य आदि का समापन अ्र्यात् उपसहार प्न्र्ात समर्थन [ कवि करे ]। इतिहास के एक देश से अर्थात [सारी कथा का निरुपण न करके अपने नायक के चरमोत्कर्ष पर्यन्त ] इतिहास के एक भाग से [कथा को समाप्त कर दे]। किस प्रकार के [एकदेश] से कि-संसार में अ्र्प्रद्वितीय अ्र्प्रनुपम प्रतीत होने वाले नायक के उत्कर्ष को प्रकाशित करने वाले [ एकदेश से कथा को समाप्त कर दे]। किस लिए कि-उसके आगे की कथा में आने वाली नीरसता के बचाने के लिए। [ जहां कवि अपनी कथा को समाप्त कर रहा है ] उसके बाद की जो कथा उसमें होने वाली नीरसता को बचाने के लिए [ नायक के प्रलौकिक उत्कर्ष के प्रकाशक अ्रत्यन्त सरस , भाग पर कथा को समाप्त कर देना यह भी 'प्रबन्ध-वत्रता का दूमरा प्रकार हैँ]। इसका यह अभिप्राय हुआ कि-कोई महाकवि किसी इतिहास प्रसिद्ध सम्पूर्ण कथा को प्रारम्भ करके, भी उसके सारे ससार को आश्चर्य डालने वाले नायक के अनु- पम यश को प्रदशित करने वाले किसी एक देश से, आगे बढने से ग्रन्य में आ्र्राने वाली नीरसता को बचाने के लिए [बीच में ही ] समाप्त किए जाने वाले काव्य में सौन्दर्य को आघारभूत वकत्ता का आधान कर देता है।

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५३२ ] वफ्रोपितजावितम् [ फारिका १६

यथा किरातार्जुनीये सर्गबन्धे- द्विपा विघाताय विधातुमिच्छतो रहस्यनुज्ञामधिगम्य भूभृतः ॥२६॥। रिपुतिमिरमुदस्योदीयमानं दिनादो दिनकरमिव लद्मीस्त्वा समभ्यंतु भृयः ॥४0॥ एते दुरापं समावाप्य चीर्य- मुनमूलितारः कपिकेतनेन ।।४?।। इत्याटिना दुर्योधननिवनान्ता धर्मराजाम्युटयदायिनी मकलामपि कथामुपक्रम्य कविना निवध्यमानत्वान। दूरीभूतविभूते, प्रभूतद्रुपदात्मजनिकार- निरतिशयोद्दीपितमन्यो कृष्णाद्वैपायनोपदिष्टविद्यामयोगसम्पट, पाशुपतादि- दिव्यास्त्रप्राप्तये तपस्यतो, गाएडीवसुहद, पाएडुनन्दनस्यान्तरा किरातराज-

जैसे-फिरातार्जुनीय महाकाव्य में- एकान्त में शन्नप्रो के विनाश करने की इच्छा रसने वाले राजा युविष्ठिर को प्रप्रनुमति प्राप्त कर। [ वह वनेचर बोला ] [ किरात १,३ ]। शत्रु रूप अन्धकार को दूर करके प्रातःकाल उदय होने वाले सूर्य के समान तुमको [ अ्रपनी राज्य ] लक्ष्मी फिर प्राप्त हो। [ कि० १, ४६ ]। दुर्लभ शक्ति [ पाशुपत श्रस्त्र ] को प्राप्त करने पर अर्जुन [ कपिकेतन इन सका नाश कर देगा। [कि० ३, २२ ]। इत्यादि [श्लोको] से [यह प्रतीत होता हुं कि] दुर्योधन की मृत्यु पर्यन्त और युधिष्ठिर को अभ्युदय प्राप्त कराने वाली सारी कथा को वर्णन करने का उपक्रम कर [पर्थात् प्रारम्भ से दुर्योधन के नाश पर्यन्त सारी कथा का वर्णन करने के अभिप्राय से इस महाकाव्य का आ्रम्भ हुआहै। परन्तु वास्तव में सारी कथा का वर्णन इसमे नहीं है अ्रवितु किरात वेषधारी शिवजी के साथ अर्जुन के युद्ध और उसके फलस्वरूष् शिवजी द्वारा पाशुपतास्त्र प्रदान तक की कथा का ही उसमें उल्लेख किया है। इस वगिगत कथा के भी मुख्य भाग इस प्रकार है। राज्य के अपहरण हो जाने पर] राज्यवैभव से विहीन, द्रौपदी के अपमान से अत्यन्त कुद्ध हुए, कृष्सद्वपायन के द्वारा उपदिष्ट विद्यासयोग से युक्त, पाशुपत शदि दिव्यास्त्रो के लिए तपस्या करते हए, गाण्डीवधारी पाण्डु-पुत्र [अर्जुन ] के बीच में शिव के साथ युद्ध से

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कारिका २०-२१ ] चतुर्थोन्मेष. [ ५३३

सन्प्रहरणात् समुन्मीलितानुपमविक्रमोल्लेखं कमप्यभिप्राचं प्रकाशयति ।।१६।। भूयोऽपि भेदान्तरमस्याः सम्भावयति-

कार्यान्तरान्तरायेण विच्छिन्नविरसा कथा ॥२०॥ तत्रैव तस्य निष्पत्तेः निर्निवन्धरसोज्ज्वलाम्। प्रवन्धस्यानुवघ्नाति नवां कामपि वक्रताम् ।।२१।। 'प्रवन्धस्य' सर्गवन्वादे. 'अनुवन्नाति' दृढ़यति 'नवां' त्रपूर्वोल्लखा 'कामपि' सहदयानुभूयमानां न पुनरभिधानगोचरचसककाराम्-'वक्रतां' वक्रिमाणम्। काडसौ 'कार्यान्तरान्तरायेण विच्छिन्नविरसा कथा''कार्यान्तरानत- रायेशा' अपरकृत्यप्रत्यूहेन 'विच्छिन्नविरसा', विच्छिन्ना चाSसी विरता च

[अर्जुन के] अ्नुपम पराक्रम को प्रकाशित करने के द्वारा [कवि] अ्पूर्व किसी [महत्त्व- पूर्स] अभिप्राय को प्रकाशित कर रहा है। [इम प्रकार महाकवि भारवि ने जो कथा को वीच में ही समाप्त कर दिया है यह भी 'प्रबन्ध-वक्रता' का 'समापन वक्ना' नामक एक स्वरूप कहा जा सकता हैँ] ॥१८-१६॥ ३-प्रबन्ध-वक्रता का तीमरा भेद [कथा विच्छेद वकता]- फिर भी इस [प्रबन्ध-वक्रता] का अन्य भेद हो सकता है यह कहते हं- प्रधान [ मुख्य वर्णानीय ] वस्तु के सम्वन्ध को तिरोहित कर देने वाले [ शिशुपाल वघ आदि रूप ] किसी अन्य कार्य के व्यवधान से विच्छिन्न हो जाने से विरस हुई कथा- वहां [ कार्यान्तर से विच्छेद स्थल पर ] ही उस [ प्रधान कार्य ] की मानों सिद्धि हो जाने से अबाघ रस से उज्ज्वल, प्रबन्ध [ काव्य] की किसी प्रनिर्वचनीय वक्रता को उत्पन्न [ या पुष्ट ] करती है। 'प्रबन्ध' अर्थात् महाकाव्य आदि की 'अभिनव, अरपूर्व सहृदयों के द्वारा अनुभूयमान 'किसी' अर्प्रनिर्वचनीय वषता अर्थात् सौन्दर्य को 'अ्र्नुवध्नाति' परर्थात् पुप्ट करती है। जिसका सौन्दर्य श्भिधा का विषय नहीं हो सकता हैं। यह कौन [ पुष्ट करती है कि ] अन्य कार्य के अन्तराय से विच्छिन्न होने से विरस कथा 'कार्यान्तर के अन्तराय से' अर्ात् शान्य कार्य के विघ्न से 'विच्छिन्न विरसा' अर्यात वीच में टूट जाने से [ मानो ] प्रकर्ष विहीन सी। किस प्रकार के [विघ्न] से [विच्छिन्न होने

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५३४ ] वक्नोक्तिजी वितम् [फारिका २०-२१

तिरोधानविधायिना' शर्रधिकारिकफलसिद्धयुपायतिरोधानकरिगा। कुन 'तत्रैव तस्य निष्पत्ते' तत्रैव कार्यान्तरानुष्ठान एतंस्याविकारिकस्य निष्पत्त. संमिद्धेः।

अयमस्य परमार्थः-या किलाविकारिककथा निषेधिकार्यान्तरव्यवधानाद् भगिति विघटमाना अप्रलव्वावकाशापि विकाश्यमाना सा प्रस्तुतेतरवर्यापारादेव

वाली कि प्रधान वस्तु के साथ सम्बन्ध का तिरोधान करने वाले अर्थात् अ्रघिफारिक [मुख्य ]फल सिद्धि के उपाय का तिरोधान कर देने वाले[कार्यान्तर रूप श्रन्तराय] से [ विच्छिन्न अतएव विरस-सी प्रतीत होने वाली कथा काव्य में किसी प्रपूर्व चमत्कार को उत्पन्न कर देती है। विच्छिन्न और विरस कथा चमत्कार को कैसे उत्पन्न कर सकती है इसके समाधानार्थ कहते हैं विच्छित्नविरसा कथा ] कैसे [ वपता को पुष्ट करती है कि ] उस [ प्रधान कार्य] की [ मानो ] वहीं सिद्धि हो जाने से। वहा ही अर्थात [उस प्रधान वस्तु सम्बन्ध तिरोधान विधायी] कार्यान्तर के पूणं होते हो इस [आ्रधिकारिक] प्रधान वस्तु को सिद्धि हो जाने से। औ्रर इसी से अ्रवाघ रस के प्रवाह से उज्ज्वल अर्थात् निर्विघ्न रूप से प्रवाहित प्रधान रस मे शोभायमान [प्रबन्ध फी वक्ता को पुष्ट करती हैं]।

जैसे शिशुपाल वध महाभारत की कथा का एक भाग है। महाभारत की कथा का उद्देश्य दुर्योधन का पराजय करना है। परन्तु शिशुपालवध वाले कथा भाग का उद्देश्य युधिप्ठिर के राजसूय यज्ञ का सम्पादन करना है। शिशुपालवध की घटना बीच श्र्रा जाने से दुर्योधन की पराजय का प्रकरण अधूरा रह जाता है। इसलिए विच्छिन्न हो जाने से मूल कथा में नीरसता आना स्वाभाविक है। वस्तुत देखा जाय तो शिशुपाल के वघ से दुर्योघन की पराजय का कार्य मानो अपने आ्रप ही पूरा हो जाता है। इस प्रकार महाभारत की कथा के प्रसङ्ग में शिशुपाल वध की कथा से ही मानो प्रधान कर्म की सिद्धि हो जाती है। इसलिए शिशुपालवध महाकाव्य में यह घटना उसकी विरसता का कारण नही अपितु 'प्रबन्ध-वफ्रता' का ही एक प्रकार है।

इसका साराश यह हुआ कि-जो मुख्य कथा [ धपने ] वाधक [ से प्रतीत होने वाले ] अरन्य कार्य के व्यवधान से तुरन्त टूषट जाने के कारण [साधारणतः] समाप्तप्राय [अ्रलब्धावकाश] होने पर भी [ वास्तव मे स्वय ही] आागे बढ़ जाती है वह इस प्रकार के [ शिशृपालवध आदि रूप ] श्र््रप्रस्तुत कार्य से [ वस्तुतः

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कारिका २२-२३ ] चतुर्थोन्मेष. [५३५

प्रस्तुत निष्पन्नेन्दीवरसितरस निर्भरा प्रबन्धस्य रामणीयकमनोहरं वक्रिमासमा- दधाति। यथा शिशुपालवधे।।२०-२१।। यत्रैक फलसम्पचिसमुद्युक्तोऽपि नायकः । फलान्तरेध्वनन्तेषु तत्तुल्यप्रतिपचतिषु ।।२२।। धत्ते निमित्ततां स्कारयशःसम्भारभाजनम्। स्वमाहात्म्यचमत्कारात् सापरा चास्य वक्रता ॥२३॥ सा अपरापि अन्यापि न प्गुक्ता, 'अस्य' रूपकादेरवक्रता वक्रभावो भवतीति सम्बन्धः । 'यत्रैकफलसम्पत्तिसमुद्युक्तोऽपि नायकः'-यत्र यस्या एक

विच्छिन्न न हो कर उसके प्रकृत कार्य में सहायक होने से ] प्रस्तुत [ कार्य ] की पूर्णता के कारण कमल के उज्ज्वल रस से भरी हुई सी रमसीयता से मनोहर फाय्य [प्रबन्ध] की वष्नता को उत्पन्न करती है। [ वह भी 'प्रबन्ध-वक्रता' का ही 'कथा विच्छेद वक्रता' नामक तीसरा प्रकार है ] जसे शिशपाल वव में- शिशुपाल वध को यदि ऊपर देखा जाय तो वह युघिप्ठिर के राजसूय यज्ञ और महाभारत की मुस्य कथा का वाघक प्रतीत होता है क्योकि उसके विनेप श्रकर्पक होने से सबका ध्यान उसकी ओर चला जाता है और भागे की कथा नीरस हो उठती हैं। परन्तु वास्तविक दृष्टि से देखा जाय तो वह महाभारत की मुख्य कथा या राजसूय यज्ञ का वाधक नही अपितु साघक है। उसके हुए बिना राजसूय यज्ञ का पूरा होना सम्भव नही था। इसलिए इस प्रकार की कथा काव्य की वै रस्यतापादक नही होती है अपितु वत्रता की आाधायक होती है यह कुन्तक का अभिप्राय है॥२०-२१। ४-प्रबन्ध-चक्रता का चतुर्थ प्रकार [धानुषद्गिक फल वकता] एक ही [ विशेष कार्य के ] फल का प्राप्ति के लिए उद्यत हुआ भा नायक उसी के समान आदर योग्य श्न्य अ्नन्त फलों में- अपने प्रभाव के चमत्कार से प्राप्त होने वाले अत्यन्त यश का भाजन हो कर कारख बनता है। [ इसलिए यह भी 'प्रवन्ध-वक्रता' का ['आनुपङ्गिक फलवक्रता' नामक] एक विशेष प्रकार होता है। वह दूसरो भी, पहिले कही हुई ही नहीं [ अपितु उससे भिन्न ] इस रूपक नाटक आदि की वक्ता अर्थात् सुन्दरता होती है यह [भवति इस क्रिया के अध्याहार द्वारा वाक्य का] सम्चन्ध होता है। 'जहाँ एक फल की प्राप्ति के लिए उद्यत नायक १. 'प्रस्तुत निप्यन्ने' गह पाठ अ्शुद्ध था।

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५३६ ] वक्रोषितजीवितम् [फारिका २४

रेष्वनन्तेपु तत्तुल्यप्रतिपत्तिपु धत्ते निमित्तताम' फलान्तरेपु साध्यरूपेपु वम्तुपु अनन्तेपु अरगसाना नीतेपु तत्तु्यप्रतिपत्तिपु प्प्राबिकारिकफलसमानोपपत्तिपु प्रस्तुतार्थसिद्धेरेवाधिगतसिद्विप्विति यथा नागानन्दे। तत्र दुर्निवारचैग वैनतेयान्तकात सकलका रुणिक चूडामगि शद्चृड जीमृनवाहनो देहदाना दभिरक्षन् न केवल तत्कुलम् ॥२२-२३॥ आस्तां वस्तुपु वैदग्ध्यं काव्ये कामपि वक्रताम्। प्रधानसंविधानाङ्गनाम्नापि कुरुते कविः ।।२४।। 'आस्ता वस्तुपु वैदग्व्यम्'-'आ्स्ता' दूर्त एव वर्तमानम। 'वम्तुपु अभिधेयेपु प्रकरगोपु प्रतिपाद्येपु, 'वैदग्व्य' विन्छित्ति । 'काव्ये कामपि वक्रता कुरुते कवि'। 'काव्ये' नाटके सर्गवन्वादो कामपि वकता कुरुते चिदवाति। भी' जहां जिसमें एक फल की प्राप्ति के लिए उद्युक्त [अर्यात अपर श्रन्य के लिए नहीं केवल उस] एक अपर्थात् प्रभिमत वस्तु की सिद्धि मे लगा हुआ नायक भी उसी के समान स्पुहसीय अन्य प्रनन्त फलो की सिद्धि का कान्ण बनता है। श्र्न्य फलो अर्थात साध्य वस्तुओ में। अ्रनन्त अरर्थात् अ्रसस्य जिनकी गिनती न हो सके ऐसे [साध्य फलो में]। 'ततुल्यप्रतिपत्तिप' अर्थात् प्राधिकारिक [मुरय] फल के समान स्पृहणीय औररौर प्रस्तुत की सिद्धि से ही सिद्ध होने वाले [ घ्रनन्त फलो का फार होता हैं]। जैसे नागानन्द [नाटक] में। वहा दुर्निवार वर वाले गरुउ रप [शखुचूड के मारने वाले ] यम से, अपने शरीर को देकर शङ्चूड की रक्षा करते हुए जीमूतवाहन ने न केवल उसके कुल की [ रक्षा की अपितु उसके द्वारा अन्य श्रनन्त फलो की सिद्धि की है]।।२ २ - २३।। ५-प्रबन्ध-वकता का पञ्चम प्रकार [नामकरण वकता]- वस्तुओ [ कथाभाग आदि ] के वैचित्र्य की बात जाने दो प्रधान कथा के [ द्योतक ] चिन्ह रूप नाम से भी कवि फाव्य मे कुछ अपूर्व सौन्दर्य उत्पन्न कर देता है। [और वह भी प्रबन्ध-चकरता का पञ्चम भेद कहा जाता है]। वस्तुओ [ कथाभाग आदि] की [ रचना में ] विदग्धता की बात जाने दें। 'प्रास्ता' अरर्थात् दूर रहे [ उसका विचार न करें तो भी ] वस्तुओ अपर्ात् प्रकरण प्रतिपाद्य भ्र्भिधेय पदार्थो [अर्थात् कथाभाग श्रादि ] में वैवग्ध्य अररथात् सुन्दरता [ की बात को दूर छोड दो तो भी ] कवि काव्य में अर्थात् नाटक में श्र्प्रथवा [ सर्ग- बन्धादि ] महाकाव्य में कुछ अपूर्व वमता सौन्दर्य कर देता अर्थात् उत्पन्न कर 8पाठ लोप।

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कारिका २४ ] चतुर्थोन्मेष

कविरित्यद् मुत प्रतिभा प्रसार प्रकाश:। केन-'संविधानाङ्नाम्नाSपि' ! प्रधान प्रवन्वप्राणागतप्राय यत्संविधान कथायोजन तदङ्गश्चिन्हमुपलक्षणं यस्य तत्तथोक्तम्। तच्चतन्नाम। 'अ्रपि' शब्दो विस्मयमुद्योतयति। यथा अभिज्ञान-

दूपितकादीनि। न पुनः हयग्रीववध-शिशुपालवंध-पाएडवाभ्युदय-रामानन्द- रामचरितप्रायाखि ॥२४॥।

देता है। कवि [अरथात् प्रत्यक कवि नहीं अपितु] अद्भुत प्रतिभा के प्रसार से प्रकाशित। [कवि काव्य में वस्तु सौन्दर्य को छोड कर अन्य अन्य प्रकार से भी अ्र्प्रपूर्व सौन्दर्य उत्पन्न कर सकता है]। किससे कि-'कथा के द्ोतक नाम से भी'। प्रधान काव्य का प्रा स्वरूप जो सविधान अर्थात् मुख्य कथायोजना वह जिस [नाम] का श्रद्ध या चिन्ह या उपलक्षण है वह उस प्रकार का जो उस [नाटक आदि]का नाम। [उस अपने नाटक आदि के नामकरण करने में भी कवि अपूर्व वकता उत्पन्न कर देता है जिससे नाम को सुनते ही उस काव्य या नाटक की प्रासभूत जो कथा है उसका पता चल जाता है। कारिका मे 'नाम्नापि' में आया हुआ] 'अपि' शब्द विस्मय का धोतक है [अर्थात् बडे आश्चर्य की बात है कि नाम-करण मात्र से भी कवि अपने काव्य या नाटक में ुछ अपूर्व सौन्दर्य उत्पन्न कर सकता है]। जैसे अभिज्ञानशाकुन्तल, मुद्राराक्षस, प्रतिमा- निरुद्ध, मायापुष्पक, कृत्यारावण, छलितराम, पुष्पदूतिक आदि [नाम इसी प्रकार के अपूर्व चमत्कार के द्योतक है ] परन्तु हृयग्रीववध, शिशुपालवध, पाण्डवाभ्युदय, रामानन्द, रामचरित आदि [ नाम विल्फुल साधारण नाम है उनमें इस प्रकार का चमत्कार ] नहीं है। 'अभिज्ञान' अपर्थात् दुप्यन्त की चिन्ह स्वरूप जो अँगूठी उसके द्वारा शकुन्तला का ज्ञान जिसमें दुप्यन्त को हुआ है वह 'अभिज्ञानशाकुन्तल' है यह इस शन्द का अर्थ होता है। और शकुन्तला नाटक की जान यही घटना है। इसलिए इस नामकरण करने 'में ही कवि ने अपने नाटक में कुछ अपूर्व चमत्कार पंदा कर दिया है। इसी प्रकार मुद्रा- राक्षस शब्द का अरथ 'मुद्रया परिगृहीतो राक्षसो यत्र' यह है। अर्थात जिसमें अपनी मुद्रा अर्थात् अँगूठी के द्वारा राक्षस पकडा गया है। मुद्राराक्षस नाटक की जान भी वस्तुत यह मरंगूठी वाला कथा भाग ही है। इसलिए इन नामकरणो में ही कवि ने कुछ अपूर्व कौशल दिखला कर अपने नाटको में अपूर्व चमत्कार उत्पन्न कर दिया है। यह कुन्तक का अभिप्राय है। वह इसको भी 'प्रवन्ध-वतता' का 'नामकरण वत्रता' नामक एक विशेष प्रकार मानते है॥२४॥

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५४० ] यफ्ोवितिजीवितम् [फारिफा २६

नृतनोपाय निष्पन्ननयचर्त्मोपदेशिनाम्। महाकविग्रवन्धानां सर्वेपामस्ति वकता ॥२६॥

'महाकविप्रवन्धाना' नवनिर्मारनपुगयनि रुपमानकविप्र का एडाना प्रवन्धाना 'सर्वेपा' सकलानामस्ति 'वक्रता' वक्रभावचिच्छित्तिः। कीदशाना- 'नूतनोपायनिष्पन्ननयवर्त्मोपदेशिनाम्' नतना प्रत्यग्रा उपाया, सामादि- प्रयोगप्रकारास्तद्विदां गोचरा ये तैनिप्पन्न सिद्व नयवर्त्म नीनिमार्ग तदुपदि- शन्ति शिक्षयन्ति ये ते तथोक्तास्तेपाम।

इदमुक्त भवति-सकलेप्वपि सत्कविप्रवन्धेपु अ्रप्परभिनवभङ्गीनिवेश- पेशलि नीत्या १ किमपि फलमुपपद्यमान प्रतिपाद्योपदेशद्वारे उपलम्यत एव।

नए नए उपायो से सिद्ध नीति मार्ग का उपदेश करने वाले, महाकवियो के सभी प्रबन्धो काव्य नाटक आरादि ] ग्रत्थो में [ अपना-भ्रपना कुछ श्र्रपूर्व] सौन्वयं [ वक्रभाव ] रहता ही है।

'महाकवियो' के ग्रन्थों में अ््र्थात् श्रभिनव निर्माण के नैपुण्य में अ्रनुपम महा- कवियों के सभी ग्रन्थों में वकरता अर्थात् 'वत्रभाव' सौन्दर्य रहता ही है। किस प्रकार के [ प्रबन्धों में] नए उपायों से सिद्ध नीतिमागं का उपदेश देने वालो में। नूतन अर्थात् नए, एक-दम ताजे उपाय अर्थात् साम आदि के प्रयोग के प्रकार, जो उन [ सामादि के प्रयोग प्रकारों ] को जानते है उनके विषय भूत [अर्यात् नीतिज्ञों के परिज्ञात जो उपाय] उनसे सिद्ध जो नीतिमार्ग उसका उपदेश अर्ात् शिक्षा देने वाले वह उस प्रकार के 'नूतनोपायनिष्पन्ननयर्वत्मोपदेशी' हुए उनके [ सभी ग्रन्यों मे वक्रता रहती हूँ ]।

इसका अभिप्राय यह हुआ कि-सत्कवियों के सभी प्रबन्धो[ काव्य नाटक आवि ग्रन्थों ] में अप्रपने अ्र्प्रभिनव शैली के सन्निवेश से मनोहर प्रतिपाद्य [ विनेय] के उपदेश द्वारा नीति का कोई उत्पन्न होने वाला फल उपलब्ध होता ही हैँ।

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कारिका २६ ] चतुर्थोन्मेष:

यथा मुद्रारान्से। तन्र हि प्रवरपज्ञाप्रभावप्रपञ्चितविचित्रनीतिव्यापारा प्रगल्मन्त एव। तापसवत्सराज उद्देश एव व्याख्यातः। एवमन्यद्प्यु- न्प्ेक्षणीयम्। वक्तोल्लेखवैकल्य न समान्येऽवलोकयते। प्रबन्धपु कवीन्द्राणां कीतिकनदेपु कि पुनः॥४३।। इत्यन्तरश्लोक: ॥२६।।२

जैसे-मुद्राराक्षस नाटक में। वहाँ [उस मुद्राराक्षस में राक्षस तथा चासकय दोनों की] तीव्र वुद्धि के प्रभाव से प्रपञ्चित नीति के नाना प्रकार के व्यापार दिखलाई देते ही है। [उन नीति व्यापारों के कारण उसमें भी एक विशेष प्रकार की 'प्रवन्ध- वक्रता' पाई जाती है। तापस वत्सराज [ में भी इसी प्रकार नाना प्रकार के नीति व्यापार और उनसे उत्पन्न वकता दिखलाई देती है। उस ] की व्याख्या पहिले ही कर चुके है। इसी प्रकार अन्य उदाहरण भी स्वयं निकाल लेने चाहिएँ। वक्रता के उल्लेख का अभाव साघारस [कवियों] में भी नहीं दिखलाई देता है फिर महाकवियों की कीति के मूलभूत प्रबन्धों [काव्य नाटक आदि] में तो कहना हो क्या। यह अन्तर-श्लोक है॥२६॥। इस चतुर्थोन्मेष के अन्त में ग्रन्थ या उन्मेप की समाप्ति की सूचक कोई पुप्पिका नही दो थी। इसके विपरीत 'असमाप्तोऽय' गन्थ लिखा हुआ था। इंसलिए यह ग्रन्थ अपूर्ण माना जाता है। परन्तु इसका अवशिष्ट भाग कितना रह गया है यह एक विचारणीय प्रश्न है। जहा तक ग्रन्थ के प्रतिपाद्य विषय का सम्वन्व है उस दृष्टि से १ 'न सामान्येऽव' इतना पाठ खण्डित था हमने उसकी पूर्ति की हैं।-

हुई हैं- २. वक्रोक्तिजीवित के पिछले सस्करण में इसके बाद निम्न पक्तिरयां और दी

यथा नागानन्दे तत्र दुनिवारवरादपि वैनतेयांन्तकादेक .. . सकलकारुणिक चूडामरिग शखचूर्ड जीमूतवाहनो देहदानादभिरक्षन् न केवलं तत्कुल इन पवितयो की यहां कोई मङ्गति नहीं है। उनका सम्बन्ध २३वी कारिका के वृत्ति भाग के अन्त में जुड सकता है। इमलिए हमने उनको यहाँ से हटा कर पृ० ५३६ पर यथा स्थान दे दिया है। मूल प्रति में येहाँ लेखक के प्रमाद मे ही उनको लिख दिया गया है ऐसा जान पड़ता है।

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५४२ ] घक्रोपितिजी वितम् [ फारिका २६

यह कहा जा सकता है कि यह ग्रन्थ प्पूर्णा नही अपितु पूर्गं है। प्रथमोन्मेप की १८वी कारिका में ग्रन्यकार ने छः प्रकार की वकना का प्रतिपादन किया है- -: कवि व्यापारवमतत्वप्रकारा सम्भवन्ति पड्। प्रत्येक वहवो भेदास्तिषा विच्छिन्तिशोभिन ॥१,१=।। वकता के ये मुख्य छ भेद अगली तीन पर्थात् १६, २०, २१वी कारिकाश्री में इस प्रकार में गिनाए हैं- १. वरंविन्यास-वक्नता [ यमक आादि इसके स्वरप है ]। २. पदपूर्वाद्वं वफ्रता [प्रातिपदिक तथा धातु की वकना]। प्रत्यय वक्रना [ इसको पद उत्तराद्वं-वकता कहा जा सकता है ]। ४ वाक्य-वक्रना [ इसमें सारे त्रलद्धारों का त्रन्तर्भाव होता हे]। ५. प्रकरण-वक्रता। ६ प्रवन्व-वकता । इन छ प्रकार की वकताओ का प्रतिपादन ही इम ग्रन्थ का मुख्य प्रतिपाद्य विषय हैं। अन्थकार ने प्रथम उन्मेप में इनकी एक साधारण रूपरेखा दे दी है। फिर शेप ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक इनका विचार किया है। उनमे से पहिली तीन भर्यात् वएं- विन्यास-वक्ता, पदपूर्वार्द्ध-वप्रता ओर पदउत्तराद्व-वक्तता अर्थात् प्रत्यय-वक्रना का विस्तृत निरूपण द्वितीय उन्मेष में किया है। उसके वाद वाक्य-वमता का विस्तार पूर्वक विवेचन तीसरे उन्मेप में किया है। इस 'वाक्य-वक्रता' के विषय में प्रथम उन्मेष में ही ग्रन्थकार ने लिखा था कि- वाक्यस्य वक्रभावोऽन्यो भिद्यते य सहस्त्रधा।

अर्थात् इस 'वाक्य-वत्रता' के भीतर कुन्तक ने सारे अलद्दार-वर्ग का अन्तर्भाव कर लिया है। इसलिए तृतीय उन्मेष में जो इस ग्रन्थ का सबसे वडा जन्मेप है केवल इस 'वावय-वकरता' का विचार किया गया है। शेप दो प्रकार की वक्रता और रह जाती है। एक 'प्रकरण-वक्र्ता' और दूसरी 'प्रवन्ध-वक्रा'। इन दोनो का विस्तारपूर्षक विचार चतुर्थ उन्मेष में किया गया है। १५ कारिकाओ में नौ प्रकार की 'प्रकरण- वकता' तथा १० कारिकाओ में छ. प्रकार की 'प्रबन्ध-वक्ता' का विवेचन चतुर्थ उन्मेष में किया गया है। ग्रन्थ के प्रतिपाद्य विषय का अन्तिम भाग जो प्रबन्ध-वक्रता है औौर उसका भी यहो १६ से लेकर २५ तक १० कारिकाओ में विस्तारपूर्वक विवेचन हो जाने से भब प्रतिपाद्य विषय का कोई भी भंश शेष नही रह जाता है।

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कारिका २६ ] चतुर्योन्मेष: [५४३

इति श्रीमव्राजानककुन्तकविरचिते वक्रोक्तिजीविते चतुर्थ उन्मेषः समाप्त: समाप्तर्चायं प्रन्य. ।

इसीलिए २६वी कारिका में ग्रन्थ का उपसहार भी कर दिया गया है। इस प्रकार विषय की दृष्टि से कुन्तक को जो कुछ कहना था वह सब वतमान उपलब्ध ग्रन्थ में आरा गया है। इसलिए विषय की दृष्टि से ग्रन्थ अपूर्ण नही अपपितु पूर्णं है। हा वीच-ब्रीच में ग्रन्थ का पाठ खण्डित पाया जाता है इसलिए ग्रन्थ को अपूर्ण या खण्डित भले ही कहा जाय परन्तु उसको 'असमाप्त नही कहा जा सकता' है। क्योकि विषय की दृष्टि से ग्रन्थ समाप्त हो गया है। इसलिए हम 'असमप्तोऽय ग्रन्थ' के स्थान पर ग्रन्थ समाप्ति सूचक 'पुष्पिका' दे रहे हैं। श्रीमद्राजानक कुन्तक विरचित वक्रोक्तिजीवित में चतुर्थ उन्मेष समाप्त हुआ। और यह ग्रन्थ भी समाप्त हुआ।

द्वाभ्या वंशाखमासाम्या द्विसहस्त्र दशोत्तरे। वक्रोक्तिजीवितस्येय मया व्याख्या प्रपूरिता।

उत्तरप्रदेशस्थ पीलीभीत मण्डलान्तगंत मकतुल ग्रामनिवासिना श्री शिवलालवख्शीमहोदयाना तनुजनुपा, वृन्दावनस्थगुरुकुलविश्वविद्यालयाधीतविद्येन तत्रत्याचार्यपदमधितिष्ठता एम० ए० इत्यपपदधारिणा श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोगिना विरचिताया वकोक्तिदीपिकाया हिन्दीव्यास्याया चतुर्थोन्मेष समाप्त समाप्तरचायं ग्रन्थ

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प्रथम परिशिष्ट

त्र्प्रकारादि क्रम से कारिका-सूची-

अलकृतिरलड्वार्य० १५/ आरास्ता वस्तुषु वैदग्ध्य० ५३६ अलकारकृता येषा० ५२' इत्युपादेय वगेडस्मिन० १६० अम्लान प्रतिभोद्धिन्न० १०४ इतिवृत्तप्रयुक्तेऽपि० अविभावितसस्थान० १०४ इतिवृ त्तान्यथावृत्त० ५२८ असमस्तमनोहारि० ११४ ५१ ११५ उदारस्वपरिस्पन्द २६३ अलकारस्य कवयो० १२४ उपचारै कसर्वस्व यत्र० ४०६ प्रसमस्तपदन्यास० ऊर्जस्व्युदा ताभिघान० ३७३ अन्नालुप्त विसर्गन्त ० १४७ 328 एतत्त्रिष्वपि मार्गेपु० १६३ अघारोचकिन केचित्० १५२ एको द्वो वहवो वर्णा० १६६ अ्रभिधेयान्तरतम ० २०३ एक प्रकाशक सन्ति० ३६८ अलका रोपसस्कार० २०३ श्रचित्यान्तरतम्येन० २७० २४८ ३६७ अपरा सहजाहारय० ३०५ कविव्यापारवऋत्व० ६४ अलकारो न रसवत्० ३३८ १७६ अप्रस्तुतोऽपि विच्छिति० ४१३ कर्तु रत्यन्तरङ्वत्न० २६० अन्यदर्पयितु रूप० ४७४ कर्मादिसवृति पञ्च० २६० प्व्यामूलादना शक्य० ४८३ कुर्वन्ति काव्यवचित्र्प० २७७ अ्रसामान्यसमुल्लख० ४६६ कश्चिदेपा समासोक्ति० ४६६ अन्यननूतनोल्लेख० ५०३ कटुकोषघवच्छास्त्र० (अ्र०श्लो०) १३ अप्येककक्ष्यया वद्धा o ५३८ कथावचित्र्यपाय तद्० ५१३ -* प्ाञ्जसेन स्वभावस्य० १५६ क्वचित् प्रकरणस्यान्त ० ५२२ प्रागमादिपरिस्पन्द० २४५ गमकानि निवध्यन्ते० १४७ आयत्याञ्च तदात्वे च० (अ०इलो०) १४ चतुरवगफलास्वाद० आभिजात्यप्रभृतय ० (अ्र०रलो०) १२ १५१ तत्रंवंतस्य निष्पत्ते ५३३

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५४६ व क्रोषिति जी घितम्

तत्र पूर्व प्रकाराभ्यां० ३२३ भावानामपरिम्लानo :२२ तदुत्तरकथाव्तत० ५३० भृपणान्तरभावेन० ८७८ तथा समाहितस्यापि० ३८१ माघुर्यारिगुसाग्रामो० १५१ ता साधारणधर्मोकतौ० ४३२ मार्गोडमी मध्यमो नामo १५२ तथा यथा प्रबन्घस्य० ४६० मार्गाा त्रितय तदेतत्० १६८ तस्या एव कथामूर्ते ० ५२८ ११४ त्रैलोक्याभिनवोल्लेख० ५३० मनोजफनकोल्लेख o ३१४ धर्मादिसाधनोपाय ० मुस्यम विलप्टरत्या दि० ३२४ धर्मादिसाधनोपाय परिस्पन्द० ३३५ मुख्ाभिसन्विसन्व्यादि० ५२४ घत्ते निमित्तता० ५३५ । यत् किञ्चनापि वैनिश््य० १०५ नातिनिर्वन्धविहिता० १८४ यम तद्वदलक्वार ० १२४ नयन्ति कवय काचित्० ४१२ यदप्यनूतनोल्लेख० १२५ निषेधच्छाययाऽक्षेप ० ४७० यन्रान्ययाभवन् मर्व० १२५ निरन्तरसरसोदार० (अ०श्लो०) ४६५ यन्नाति कोमलच्छाय० १५० नूतनोपायनिप्पन्न ५४० यत्र वक्तु प्रमातुर्वा० १५८ नत्वमार्गग्रहप्रस्तग्रह० ५२४ यमक नाम कोऽप्यस्या ० १८६ ५३३ यत्र रूढेरसम्भाव्य० १६२ प्रतिभाप्रथमोन्द्ग द० १२४ यत्र दूरान्तरेऽन्यस्मात्० २२३ प्रतीयमानता यत्र० १२५ यन्मूला सरसोल्लेखा० २२३ प्रस्तुतौचित्य विच्छतति० २४४ यत्र सव्रियते वस्तु० २३७ परिपोषयितु काचित्० २७४ यन्र कारकसामान्य० २७४ प्रत्यक्तापरभावरच० ₹50 यथा स रसवन्नाम० ३८३ पदयोरुभयोरेक० २८२ यथायोगि क्रियापद० ४०३ परस्परस्य शोभाय० २८६ यद्वाक्यान्तर वक्तव्य ४१६ प्रतिभासात्तया वोद्ध o ४२८ यस्यामतिशय कोऽपि० ४२६ प्रबन्धस्ये कदेशाना० ४६६ यत्रकेनेव वार्क्येन० ४६१ प्रतिप्रकर प्रोठ० ५०३ यत्रैकफलसम्पत्ति ५३५ प्रधानवस्तुनिष्पत्यै० ५१८ यस्मिन्नुत्प्रेक्षित रूप ४७२ भूषणत्वे स्वभावस्य० ५६ यत्र निर्यन्त्रणोत्साह० ४८३ भावस्वभावप्राधान्य० १०४ ५१६ २५३ रत्नरश्मिच्छटोत्सेक० १२४

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प्रथम परिशिष्ट ५४७

रसादिद्योतन यस्या० २८५ वस्तुसाम्य समाश्रित्य० ४६७ रसोद्दीपनसामथ्य० ३३२ वाक्यार्थान्तरविन्यासो० ४६८ सेस्सेन वर्तते तुल्य ३८३ वर्णनीयस्य केनापि० ४७१ लोकोत्तरच मत्कार० ७

लोकोत्तरतिरस्कार० १६२ वाचो विषयनैयत्य० (अ०इलो)

लोकप्रसिद्धसामान्य० ४५७ शब्दार्थी सहितौ० १८

लावण्यादिगुणोज्वाला० ४८२ शन्दो विवक्षितार्थेक० ३८

वन्दे कवीन्द्रवक्त्रेन्दु० शरीर चेदलक्वार ० ४ ५५

वहारपरिस्पन्दसोन्दयं ११ शब्दार्थी सहितावेव० ५ू८

वाच्योरऽर्योवाचक शन्द ० ३७ शरो रमिदमथंस्य ३३४

वर्णविन्यासवऋत्व ० ६५ श्रुतिपेशलताशालि० ११६

वाक्यस्य वक्र्कभावो० स्वभावव्यतिरेकेस० ५४

वक्रभाव प्रकरण० ६० स्पष्टे सवंत्र ससृष्टि० ५६

वाच्यवाचकसौभाग्य० साहित्यमनयो शोभा० ६० वाच्यवाचकवक्रोक्ति ० ६६ सम्प्रति तत्र ये मार्गा ० वर्णविन्यासविच्छत्ति० ११७ सुकुमारामिघ सोऽय १०५ विचित्रो यत्र वक्रोक्ति० १२५ स्वभाव सरसाकूतो० १२५ वैदग्ध्यस्यन्दि माुर्य० १४५ सोऽतिदु सञ्चरो येन० १२५ वैचित्र्य सौकुमायं च० १५१ सर्वसम्पद् परिस्पन्द० १६१ वर्गान्तयोगिन स्पर्शा ० १७३ समानवर्णमन्यार्थ० १८६ १८६ स्वय विशेषणोनापि० २०३ विशेषरास्य माहात्म्यात्० २३३ साध्यतामप्यनादृत्य० २५१ विशिष्ट योज्यते लिद्ध ० २५६ सति लिङ्गान्तरे यत्० २५५ विहित प्रत्ययादन्य'० २८३ समस्तवस्तुविषय० ४०७ वाग्वल्लया पदपल्लवा० २६० सम्भावनानुमानेन० ४२२ ४१३ समुल्लिखितवाक्यार्थ० ४२३ वाच्यवाचकसामर्थ्य० ४२३ सामान्या न व्यतिरिक्ता० ४४१ विवक्षितपरिस्पन्द० ४३२ सति तच्छन्दवाच्यत्वे० ४५४ विनिर्वतनमेकस्य० ४४५ ५२१

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द्वितीय परिशिष्ट

त्र्रकारादि क्रम से उदाहरणो की सूची उदाहरस प्रतीक प्रृष्ठ उदाहरसा प्रतीक प्रृष्ठ पकठोरवारणवघ् ३०३ अ्रभिव्यनिन तावद्वहि २४८ प्न्क्लिप्टवालतरु [शाकु ६,२०] ४६४ प्नय जन प्राटुमना [कुमार] ८५ प्रक्ष्णो स्फुटाश्रुकलुपो ३८२ अयमान्दोलिन प्रोट さ =? अगराज सेनापते [वेरी. ४६] ७० अयमेकुपदे तथा वियोग [विक्मो ]२८७ अगुलीभिरिवकेशमचय ३८८ अरय मन्दद्य तिर्भाम्वान् अरण लडहतण अ्र [गाथास ६६६] १३६ [भामह ३, ३४]४ पतिगुरवो राजमापा २३० अयि पिवत नगोरा [बाल ५, ७३] १८१ -- अ्रथेकधनोरपराध [रघु २ , ४ ६ ] १६४ अ्रल महीपाल तब [ग्घ २, ३४ ] २१७ पथ जातु रुरोगृ हीत [गघु ६,७२] ५१२ प्रवमि कार्यान्तरमानुपस्प अथोर्मिलोलोन्मद [रघु १६,५४] ५१४ [रघु १६,८२] ५१४ अ्रधिकर तलतल्प [काव्य अव्युत्पन्नमनोभवा ३०० प्रकाश ३४२] १५० शसम्भृत मण्डनमङ्गयष्टे अनकुरतानि सीम ४८७ [कुमार १,३१ ] ४७१ अ्रनर्ध कोऽप्यन्तस्तव २३२ प्रसार समार परिमुपिन अ्रनुरणन् मणिमेखल [रुद्रट काव्या.] १६ [मालती ५,३०] ३० अनुरगवती सध्या [ध्वनया ६०] ४६० 1 असशय क्षत्रपरिगहक्षमा प्रनेन सार्ध विहराम्तुराशे [रघु [शाकु १,२२] ४६६ ६,५३] ११७ अस्मद भाग्यविपर्ययाद् [वालरामा ] ६७ अनौचित्यादते नान्यव[ध्वन्या २५६]३७६ अस्या सगविधी [विक्र १,८]३०७, ३१६ अपहर्ताहमस्मीति ३७४ प्राज्ञा शकशिखामरि [वालरामा०] १६६ अपर्यालोचितेऽप्यर्थे ६३ आत्मनमावत्मना वेन्सि अपारे काव्यससारे [अग्निपुराण] ३०७ [कुमार १,१०] ३६ह अलकारस्य कवयो [वकोकिति १,३५]१८३ आात्मव नात्मन स्कन्ध ३७१ अ्पागगततारका १४६ आभिजात्यप्रभृतय १५१ अर््रपि तुरगसमीपाद् [रघु ६,६७] ५११ आायोज्य मालामृतुभि २५४

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द्वितीय परिशिष्ट ५४६

आन्दोल्यन्ते कति न गिरय उपोढरागेण विलील ३८५

[वालरामा. ] उमौ यदि व्योम्नि ४४२

प्रापीडलोभा दुपकर्ण मेत्य एकाकामपिकालविप्रुष [वा.रा]७१,३२१ आयंस्याजिमहोत्सव [वालरामा ] १३३ एकोडर्यस्तु महानय [सुभा ६४८] १३६ आ्लम्व्य लम्वा सरसा १५४ एकंक दलमुन्नमय्य ४२७

आश्लिष्टो नवककुमारुण ४७६ आस्व्लोकादुरननगर [सुभापिता ] ४४६ एतावदुक्ता प्रतियानुकामम् प ससार कई पुगवेहि [ का मी.५२]३१७ [ रघु ५, १८] ४८८ इतीदमार्कण्य तपस्वि ४३६ एता पश्य पुरस्तटीम् ७८ १८५

इति विस्मृतान्य ५१२ एते दुरप समावाप्य [किरात ३,२२]५३२

इत्यय पूर्वपादार्घ [त्रश्लो.] २७० ऐन्द्र धनु पाण्डुपयोधरेर

इत्य जढे जगति २०६,७६ कईकेसरिवअ्रणाण ३६६

इत्यमुत्सुकयति ताडव २१४ कदलीम्तम्वताम्वल १७६

इत्याकणिगतकालनेमि ४३६ कतम प्रविजृम्भितविरहव्यथ

इत्युरगते शशिनि [काव्य मीमासा] २६४ [हर्पचरित ४०] १३४

इत्यसत्तर्क ४ कथ च शक्योऽनुनयो [रघ् २२] १६५ इदमसुलभवस्तुप्रार्थना ३३३ कथोन्मेप समानेऽपि ५३६ इन्दुलिप्त इवाञ्जनेन [बाल १,४२]४१७ कदाचिदेतेन च पारियात्र ३३१ इमा स्वसारं [रघ् १६,८५] ५१५ कपोले पत्राली २७८ इन्दोर्लक्ष्म त्रिपुरजयिन ३७१ कण्णुप्पलदलमिल ८० -- उच्यता स वर्चनीयमशेपम कर्णान्तस्थितपद्मराग ३२६५०६ [किरात ६, ३६ ] उत्फुल्लचारुकुसुम ४२६ ४६३' करतलकलिताक्षमाल [तापस ३,८४]१५७ कराभिघातोत्थित [रघु १८,८३] उत्ताम्य-तालवश्च करान्तरकालीनकपोल २३५,२३६ [कवीन्द्र वचनामृत ६३] १७८ कपूर इव दग्घोऽपि ५२३ उद्देशोडय सरसकदली [का. प्र. ११ ] १३७ कल्लोलवे ल्लितद्पत्परुप उद्मेदामिमखाकुरा ३३४ [भल्लट गतक ६२]३८ उन्निद्रकोकनद [गार्ङ्ग घ ३७३६] १७६ कत्स्व ज्ञास्यमि भो स्मर २०५ उत्प्रेक्षातिशयान्विता ३१३ कस्त्व भो दिवि मालिक ३१० उपगिरि पुरहूतस्यैष १५७ उपस्थिता पूर्वमपास्य [रघु १४,६०]८८/ कानि च पुण्यभाज्जि [हर्प ४०] १३५ कान्त्योन्मीलिति सिहली २५०

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५५० वक्रोपितिजीवितम्

कामेकपत्नीव्रतदु ख [कुमार ३, ७] १६६ ग्रीवाभगाभिराम [शाकु] कियन्त सन्ति गुणिनो [भामह-] ४८० चकार वाणंरमुरागनानाम् कुसुमसमययुग [हर्प-चरित] २१२ कोऽलद्कारोऽनया विना [भामह.] ३१३ चघाभिघातप्रसभा [धवन्या १v=] ४२० किं गतेन नहि युक्तम्पेतुम चक्षुयम्यतवाननादपगत [किरात ६,४०] ४६४ चक्रमन्ति करीन्दा ३६६ कि तारुण्यतरोरिय चकितचातके मेच कित १८२ [सुमापिता ] १३१,१४५ चन्दनमऊएहि ३६६ किं प्राणा न मया तव [तापस] ५०८ चन्दनामक्तभृजग किं वस्तु विद्वान्गूरवे[रघु ५, १८] ४८८ चरित च महात्मनाम् [उन्भट कि शोभिता हमनयेति का० ४, १७ ] [कुमार ११५, ३ ३३ ] २८६ कि सौन्दयमहार्थ २६२ चलापागा दृष्टिम् [गाकु] ४७४ चापाचार्य स्त्रिपुर विजयी किं हास्येन न मे प्रयास्यसि ३६ चाप पुष्पितभूतल ४५८ किमिव हि मघुराणा [शाकु १,२०]४६६ चारुता वपुरभूपयदासा कोऽय भाति प्रकारस्तव १२७ [माघ १०,३३] ३३ कौशाम्वी परिभूय २८१ चोरीमतीररण्यनी क्रमादेक द्वित्रि २४ [भामह २,२६] ३६२,४०१ क्रिययैक विशिष्टस्य ४४६ चुम्बन् कपोलतल ४३६ क्रोडारसेन रहसि ११५ चूठारत्न निपण्णादुवह २६१ क्रीडासु वालकुसमायुध १४३ चूताङ्क रास्वाद ३३३ कुरवकतरु र्गाढाश्लेष छग्गुएस जोअदिढा ५१६ क्षिप्तो हस्तावलग्न अगरुक ] ३५८ छाया नात्मन एव [सुभापिता ८२१]४१५ क्षोणीमण्डलमण्डन ४०० जनस्य साकेत [रघु ५, ३१] ४४१ गभ्णा च मत्तमेह धारा जगत त्रितय २ [गौडवहो ४०६] २२८ जाने सख्यास्तव मयि [मेघ ६0] २४६ गच्छन्तीना रमणवसति ज्योतिलर्खोवलयि [मेघ ४४] [मेघ ३७] २२८ १२१ ₹ एमह दसाण्णसरह गर्मग्रन्थिष वीरुधा १८६ तत प्रहस्याह पुन पुरन्दर [रघु ] १६म [विद्वशालभज्जिका १,१३] ३०१ गुर्वरथंमर्थी [रघु ५, २४] २०१, ४८८ तत प्रतस्थे कौबेरी[रघु ४, ६६] ४४६ ततोऽरुणपरिस्पन्द ४३६

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द्वितीय परिशिष्ट ५५१

तन्द्ावहेतुभावो २१ त्िष्ठेत् कोपवशात् [विक्रमो ४,२] ३२५ तदेतदाजानुविलम्विना [रघु १६] ८४ तुल्यकाले करिये यत्र ४६१ तद्वाक्त्रेन्दुविलोकनेन तेषां गोपवघूविलास [ध्वन्या १२६] ३२० [ता १, ६५] ३२, १५४ स्व रक्षसा भीरू यतो तद्वल्गुना युगपदुन्मिषितेन [रघु १३, २४] २५७ [रघु ५,६८] ४४४ दत्वा वामकर नितम्ब ६५ तत् पूर्वानुभवे भवन्ति ४४४ दर्पणं च परिभोग [कुमार] २४० तत्पितर्यथ परिग्रहलिप्सौ २३८ दृष्ट्रया केशव गोपरागधृतया ४५३ त भूपतिर्भासुर हेम [रघु ५, ३०] ४८८ दाहोम्भ [विद्वशा. २,२१] ७२, २४६ तडिद्विलयकक्ष्याणां [भामह २, २४]४०६ दुर्वच तदथ [किरात० १३,४६] तदेतहु सौशव्द [भामह. १, १५] २५ दूर्वाकाण्डमिव श्यामा ३१८ तन्वो मेघजलार्द्रपल्लव [विक्रमो ] ३४६ देवि त्वन्मुखपंकजेन तरगभ्रूमगा क्षुभित [विक्रर्मोर्वशीय ४,२८] ५१७, ३५० [रत्नावली १,२५] २२२,४२७ दोर्मूलावधिसूत्रित १६२, ३०० तरन्तीवागानि[सदुक्ति२, ११]२६६, २६० दष्ट्रापिष्टेषृ सद्य [वराहविहिर] ४५ तव कुसुमशरत्व [शाकु. ३,५५] ४२६ द्वन्द्वानि भावं क्रियया विवदु तस्य स्तनप्रणायिभि [रघु ६,५] १०६ [कुमार. ३,३५ ] ११० तस्यापरेष्वपि मृगेषृ [रघु ६,५८] २८३ द्वय गत सम्प्रति शोचनीयता तह रुण कन्ह २४० [कुमार ५,७१] ४० त्वत्संप्राप्तिविलोभनेन ५०६ द्विपा विघाताय विधातुमिच्छतो ताम्बूलरागवलयं ४४४ [किरात. १,३५] ३२ ता प्राङ्मुखी तत्र निवेश्य घम्मिल्लो विनिवेशिताल्प १७१ [कुमार ७, १३ ] २६८ घुत त्वया वार्घक [कुमार ४,४४]४४८ तान्यक्षराणि हृदये ८१,२४१ घारावेष्म विलोक्य ताप स्वात्मनि सश्रित १३८ [तापसवत्स ] ३२६,५०५ ताम्यगच्छद [रघु १४,७०] -* / ताम्वलीनद्धमुग्घक्रमुक ४६ घूस्तरसरिति १८२ घौताञ्जने च नयने ३०२ [वाल० १,६३] १८० नभस्वता लासितकल्प तालवालो १७२, १८३ [वाल. ७,६६ ] २५४ ताला जाग्रति गुणा [विषय नवजलघरः सन्नद्धोऽय [वित्रमो] ५१७ वासलीला] १६६ न्यू नस्यापि विशिष्टेन ४४२

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५५२ वक्रामितिजीवितम्

नामियोवतुमनृत त्वमिष्यमे [किरात.]२०४ पूर्णेन्दो परिपोपक नामाप्यन्यतरो १२१, १४७, ४४२ पूर्वानुभृत ग्मग्ता च [रघु १३, १८]१११ निर्दिष्टा कुलपतिना [रघ] ४४६ प्रकाशम्वाभाव्य विद्र्वतत २० निद्रानिमीलित दृश [चौरपचाशिका ] ७४। प्रतीयमान पुनरन्यदेव [कवन्या. १,८]१२२ निमीलदाकेकरलोलचक्षुपा ४७३ प्रत्यादिष्ट [शाकु ६, ६] निपीयमानस्तव का प्रथममरुसच्छाय ६५,१७७ [किरात ८, ५३] १५६,४:७ प्रधानेऽन्यन्न वाक्यार्थें निर्मो कमुक्तिरिव ४२६, ४७७ [ध्वन्या २,५] निर्याय विद्याथ दिनादि प्रपन्नात्तिच्छिदो नमा [व्वन्या १,१]२६४ [किरात. ८, ६ ] ४५० प्रमाणवत्वादायात २१६ निरन्तर सरसोद्गार ४६५ प्रयुज्य मामाचरित [किरात १८] ६२ निवार्यतामालि [कुमार ५,८३] २४२ प्रवृत्ततापो दिवसो [रघु १६,४५] १०६ निष्कारण निकारकणिका ७० प्राप्तश्रीरेप कस्मात्[ध्वन्या, १६३]४५५ निष्पर्याय निवेशपेशल प्रेय प्रियतराम्यानम् [भामह] [वालरामा १,५०] २७६ प्रयोगृहागत [भामह ३, ५] नृत्तारम्भाद्विरतरभस २६६ फुल्लेन्दवरकाननानि नेत्रान्तरे मघुरमर्पयन्तीव २६६ [दण्डी काव्यादर्श ५, २७] २७६ नैकत्र शक्तिविरति ववचिदस्ति २६३ वद्धस्पघस्तव परशुना [वाल] २७६ पद्मेन्दुभृङ्गमातङ्ग [भामह २, ६०] ४७६ भग्न नावल्लरीका १७२ प्द्रया स्पृशेद् वसुमती भण तररि रमण [विक्रमोर्वशीय ४,०६] ५१७ [रुद्रट काव्या २,२२] १८,१८४ पमादो एसोखलु [ताममवत्स० ] ३२८' भतुमित्र प्रियमविधवे परामशति सायक ४१८ [मेघदूत ५६] ४६ पश्यामीत्यभिधाय २०६ भूतानु कम्पा तव चेदिय पाण्डिम्नि मग्न वपु ७२, ७६ [रघ २,४८] २१८ गतालोदरकुञ्ज ५०२ भूभङ्ग रुचिरे ५०८ पाय पाय कलाचो २४७ भू भारोद्वहनाय ४२१ ५- पाण्ड्योय ४३६ पुर निषादाघिपते [रघु.१३,५६] १६४ भूयसा मुपदिष्टाना [भामह २,८६] ४७६ मदो जनयाते प्रीति पूर्णेन्दुकन्तिवदना ४३७ पूर्णोन्दस्तत्र सवादि [भामह का. २,२७] ३६१,४०२ - ४३५ मध्यडकुर पल्लवा [विद्वशाल १ २३]७६

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द्वितीय परिशिष्ट ५५३

मन्मथ किमपि तेन २४१ यावत्किञन्चिदपूर्वमार्द्र २७२ मम सर्वगुणी सन्तौ २६ यान्त्या मृहुर्बलित [मालती १,२६] ४३८ मजिष्ठीकृत [वाल ३,१०] ४३८ येन द्वितयमज्येतत् ४ मार्गानुगण्यसुभगो ६१ येन ध्वस्तमनोभवेन ४५१ मानिनी जनविलोचनपातान् येन श्याम वपुरतितरा [मेघदूत१५]२८८ [किरात ६,२६] २४ मैर्वा दृष्टा न वा दुप्टा ४४३ मालाम त्पल कन्दलै ४५२ यो लीलातालवृन्तो रहसि २२१ मालिनीरशुकभृत [भामह २,२८] ३६२ रइकेलिहिश्रणि असण मुखेन सालक््यत [रघु ] ४३७ [गाथा सप्त ४५५] ७८ मुहुरगु लिसवृताघरोष्ठ [शाकु] २८८ रजिता नु विविधास्तरुशैला मृग्यशच दर्भाङ् र [रघू १३,२५] २५८ [किरात ६,१५] ४७३ मृतेति प्रेत्य सगन्तुम् ३४३ रम्याणि वीक्ष्य [शाकु. ५,२] ४६२ मृदुतनुलतावसन्त ४०८ रसपेशल [उन्ट का ४,१४ ] ३४६ म्लानि वान्तविपानलेन ४७० रसभावतदाभास [उङ्भट ४, १४] ३८१ मैथिली तस्य दारा रसवद् रससश्रयाद् [वाल ३,२७ ] ७७, ८२ [दण्डी काव्यादर्श] ३४५ यत्काव्यार्थ निरूपण ४४३ रसवद् दशित [भामह ३, ६] ३३६ यत्से नारजसा मुदञ्चति १४४ रसस्वभावालकारा. ३२२ यन्मूलारसोल्लेखा [वक्रो २, १४] ४०७ राजकन्यानुरुक्त मा यथय ग्रीष्मोप्मव्यतिकरवती २५५ राजीव जीवितेश्वरे १८२ यस्य प्रोच्छयति ४३१ रामेण मुग्धमनसा ४३८ यस्यारोपणकमरापि [बाल.] २५३ रामोऽसौ भुवनेषु [राघवानन्द ६,७]२०१ यस्मात् किमपि सौभाग्य ६४ राशीभूत प्रतिदिनमिव यत्र तेनव तस्य ४४३ ४२६ यत्रार्थं शन्दो वा [ध्वन्या १,१३] [मेघ ५=] ४५६ रुडस्स तइ प्रणा्रण २६२ यथा तत्व ३ रुद्राद्रेस्तुलनं [वाल १, ५१] ३१ यत्रान्नुल्लिखितास्यमेव [क, प्र, ३६४]४३ रामोऽस्मि सर्व सहे यन्नोवते गम्यतेऽन्योथे[भामह २,७६]४५६ [महानाटक ५, ७] याञ्चार्दैन्य परिग्रह रुढा जालजटाना ४७७ [महानाटक ४,७८] २७५ रिपुतिमिरमुदस्योदीयमान याते द्वारेवतीं तदा २३६ [किशत १,४६] ५३२

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५५४ वक्रोपितिजीचितम्

रूप कादिलङ्कार [भामह १, १६] २५ वत्तेडम्मिन महाप्नलये [हर्ष चगत] २१३ 14 रूपकादिलद्दार [भामह १, १५] २४ वेलानिर नम् दुभि लग्नद्विरेफाञ्जन ३६० [पाद ताडतिक भाग ४५ ] १५३ लक्ष्यीकृतस्य हरिणास्य [रघु ६,५७]५११ वेल्लदलाका [महानाटक] १६७,२८४ लावण्यकान्तिपरिपूरित वदेही तु कय भविग्यति [महानाटक]२८६ [ध्वन्या १६४] ४११ गरीर माश्रेणा नरेन्द्रतिप्ठन लीन वस्तुनि येन २८४, ३०६ [ रघु ५,५] १५६

लिम्पतीव तमोऽङ्गानि शनयमौपधि [कुमार र, ६२] ४३१

[काव्यादर्श २, २२६] ४२८ शरीर जोवितेन लीलाई कुवलग्र कुवलश्न २८ अशिन शोभातिर्म्कारिणा २०२, २३६ लोको याहशमाह साहसधन ३२० शस्त्रप्रहार ददना [काव्यादसं ३५६]८८८ वक्रतोल्लेख वकल्य ५४१ इलाघ्याशेपतनु सुद्शनकर वक्त्रेन्दो नें हरन्ति [का प्र.१,२०]१४२ [ध्वत्या १६६] ४५६

वक्रताय प्रकाराणामेको २८६, ३२१ दास्त्रारि चक्षुर्नव [बाल] २७६ वय तत्त्वान्वेपान्मधुकर [शाकु] २७८ शापोऽप्यहृप्टतनया [रघु १०,८० ]५१३ वृत्यौचित्यमनोहारि ६२ वाक्यस्य वक्रभावोऽन्यो [१,२०] ३१६ [सूयंगतक ६] १८४ व्याघ्रानभी [रघु ६,६२] ५१० शुचि भपयति श्रुत वपु वाच्यावबोघनिष्पत्तो ६३ [किरात २ ३३] ४०१ वाजिवारणलोहाना शुचिशीतल चन्द्रिका २३५ [तत्राख्यायिका १,४०] ३६ शोपो हिमगिरिस्त्व वापीतटे कुडुगा १६० [भामह ३, २८ ] ४४२ वाम कज्जलवद्विलोचन १७६,६६ शैला सन्ति सहस्रश ४८६ वालेन्दुवभाष्य प्रृगेण च स्पर्श [कुमार. ३,३६] ११० [कुमार ३,२६] १०८ ११७ श्रमजलसेकजनित २३४ व्यतिकर इव भीमो इ्वासायासमलीमसाघररुचे [उत्तर रामचरित] ५०२ विचिन्तयन्ती यम [शाक १,४१] ४६२ विशति यदि नो किञ्चित्काल [कवीन्द्र वचनामृत ४५०]१४८ १३६ षडगुए सयोगदृढा [मुद्राराक्षस] ५१६ व्रीडायोगान्नतवदनया सज्जेई सुरहिमासो [धवन्या २२०] ३०१ गार्डघर एवति द्ति 3XEY] 163 सतपवीचिकगा n

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द्वितीय परिशिप्ट ५५५

स एक स्त्रीणि [भामह ३,२४] ४८० स्वन्धवानृजुरयाल [भामह २८२] ४५६ सत्स्वेव कालश्रवणगोत्पलेपु २३१ स्तनद्वन्द मन्द स्नपयति ८३,२७६ सदर्य बुभुजे [रघु. ८,७] स दहतु दुरित शाम्भवो 322 [रघु १६,५०] ११८ [अमरुक २] ७६, २६४ स्वस्था सन्तु वसन्त १८२ सद्य.पुरी परिसरेऽपि स्वेच्छा केसरिण [ध्वन्या ३] ७६ [वाल. ४,३४] ४६ स्व महिम्ना विधीयन्ते समविसमणिविसेसा २३६

[गाथा सप्त ६७५] स्वशन्दस्थायि ३४३ २७१ स्वरूपादतिरिवतस्य ३७० समग्र गगनायाम ४८२ म्वपुप्पाच्छवि [भामह ८,८२] ४३० सकान्तागुलिपर्व १५४ सम्वन्धी रघुभूभुजा[वाल १०,४१]२०७ स्वाभिप्रायसमर्पण ४५० स्वल्प जल्प वृहस्पते ४४७ सरम्भ करिकीटमेभ ४२ स्निग्घश्यामलकान्ति सभूतिद्रं हिणान्वये [वाल १,३६]२०० समानवस्तुन्यासेन [महानाटक ५, ७] १६७,२२७ ४३६। स्निह्यत्कटाक्षे हशो सर्वक्षितिभृता नाथ [विक्रमो ] ४६४ 1 २४४

सर्वत्र ज्वलितेपु वेश्मसु स्मित किञन्चिन्मुग्घ

[तापस वत्सराज चरितम्] ५०६ [घ्वन्या. ४५५] २६६ हस्तापचेय यश सरलत रलता १८१ १८६

सरसिजमन् विद्ध [शाकु ] हसाना निनदेपु ४६८ ६७, १५०, ३०१

सरस्वतीहृदयारविन्द १७६ हिमपाताविल ४६१

सस्मार वारसपति हिमव्यापायद्विशदाधराणा

[समुद्र बन्ध पृ ६] २३५ [कुमार ३,३=] हिमाचलसतावल्लि ४१० सा काप्यवस्थिति ६२ हेतुश्च सूक्ष्मो लेशोऽय साधुसाधारणत्वादि ४८१ [भामह २, ३५] [भामह २,८६] ४४० सिढिलअचाओ हे नागराज बहुषाम्य २६३ [काव्य मीमासा ८5] १५८ सुधाविसरनिष्यन्द ७६। हेलावभग्न हरकार्मुक [बाल ] ४४४ सुस्निग्वदुग्वधवलोरुदृश २१३ सोडय दम्भघृतव्रत हे हस्त दक्षिणमृतस्य गिशो ७४,८६ ४६२ सौन्दर्यघुर्य स्मितम् [१११] [उत्तर राम.] १७७ हे हेलाजित १२६, ४२२

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तृतीय परिशिप्ट वक्रोितजीवित मे विशरेष रप से नामनिर्देश दुरवय उत्ल्त दन्थो एव ग्रन्यकारो की सूची

प्रभिजातजानकी ८८५ मायापुप्पर v३७,५३६ सभिज्ञानशाकुन्तल मायुगज १५५

उत्तररामचरित ५२६ मानृगप्त १५५

उदात्तराघव ५१,५३६ मुद्रारक्षग ३७ कालिदास १०५,१५५ मेघदूत

किरातार्जुनीय दृ६१ मञ्जीर १५५

कुमारसम्भव ११०, १६६ रघुवश १०६, १११.१६४, १६१

कृत्यारावण ५३७,५३६ राजशंसर १५६

छलितराम ५३७ गमचरित ५३७

त।पसवत्सराजचरित ३२७ रामानन्द ५२७

घ्व निकार १६६ गमाम्युदय ५३६

नागानन्द ५३६ रामायण ६०५२६

पाण्डवाभ्युदय ५३७ लक्षगाकार ४४८

पुष्पदूतिक ५३७ विक्रमोवशीय ३२५ पूर्व, पूर्वाचार्य पूर्वसूरि वोरचरिन ५३६

प्रतिमानिरुद्ध ५३७ वेणी सहार ५२६ बाणभट्ट १५६, शिशुपालवघ १६१.५३७ बालरामायण ५३६, सर्वसेन १५५ भवभूति १५६। हयग्रीववध ५३७ महाभारत ५२६, हर्पचरित १५६

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चतुर्थ परिशिष्ट

उत्तरवर्ती ग्रन्थों में वक्रोवितिजीवित का उल्लेख

वप्र कितिविवेकु पृ० १४३ [महिम भट्ट] सरमभ सिंहस्य य सर्वम्यव स जातिमात्रनियनो हेवाकलेश किल। इत्याशाद्विरदक्षयाम्बुदघटा योऽमो कुत्र चपत्कृतेरतिशय यात्वम्विकाकेसरी॥ [वकोक्ति प ४२] अय श्लोको वकोकिति जीविते वितत्य व्यास्यात इति तत एवावघाय। [व्यक्तिविवेक व्याख्यान प १५३] व्यक्ति विवेक पृ० २४३-[महिम भट्ट] काव्यकाञ्चनकशाइममनिना कुन्तकेन निज काव्यलक्ष मणि। यस्य सर्वनिरवद्यतीदिता।। श्लोक एप स निदगितो मया ॥ व्यक्ति विवेक पृ० ३०१-[महिम भट्ट] एवमुपमारूपकेऽपि इब शव्दप्रयोग पुनरुक्तोऽवगन्तव्य यघा- निर्मो कमक्तिरिव गगनोरगस्य लीलाललाटिकामिवत्रिविष्टप विटस्य। उपम रूपने त्यादिन'- कचयो [वक्रोवित पृ. ४२६, ४७७] अलङ्धारस्य प्रसन्तुष्टा निवध्ना्न हागदेर्मशिगवन्ववत्।। [वकरोक्ति का १,३५] इति वोवितजी वितकृतोत अनद्धारष्ठपातिनमलद्कार दूपयति। [व्यक्तिविवेक व्यास्यान पृ ३०१-१०२] एकावली पृ० ५१-[विद्याघर] एतेन यत्र कुन्तकेनन्तर्भाविनो व्वनिस्तदपि प्रत्य स्यातम्।

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अलङ्धारसर्वस्व पृ० ८ [रुय्यक ] उपचारवकनादिभि समग्नो ननिप्रपना ग्वीउन।। सभुद्रवन्ध पृ० ८-६-[अ्रलङ्गार सवंस्व टीका] शव्दार्थो महिती वक्रानित्ापारणानिनि। वन्धे व्यवस्थिती काव्ये तदिदाह्ञााहारिगि।

वाकयम्य वक्भावोज्यो मियते स उहाषा। यवाल द्वारवरगाडनी [वलेशिति स० :,२०] जयरय पृ० द-[कृत अलक्कार सवेस्वटीका] व होनितरेव वंदग्न्यभज्गीनगितिर्च्यते। [वसेनित पा० १,१] यन्यूला सरमोत्सेवासपकदिरलसुनि। उपचागप्नवानाडमो वघ्नना कानिदुन्यते। [वफोवित का० २,१३] 'गगन च मत्तमेघ' यन मदनिरह क्वारत्ने श्रपचारिके इति उपचारवमनादीन।मपि ग्रहसाम्। सोमेश्वरकृत काव्यप्रकाश टीका। अन्नालप्तविमर्गान्त परद पोते परस्परम। हृ्त्वं सवोगपूर्वेश्च लावण्ययमतिरिच्यत।। [वकोक्ति फा० १,४७ ] माशिक्यचन्द्र फृत काव्यप्रफाश टीका [सद्गेत] पृ० ४०-४१ तरन्तीवाङ्गानि स्खलदमललावण्यजलघी। इत्यत्र सादृश्योपचारमूचे। यथा च सादृश्योपचारस्तथा वकोकितिजीवित- ग्रन्थाज्ज्ेय । [बकोक्ति पृ० २६६] साहित्यदर्पण-[विश्वनाथ] एतेन 'वक्रोक्ति काव्यजीवितम्' इति वकोक्तिजीवितका रोक्तमपि परास्तम्।