1. Vedanta Darsana Hindi Commentary Sriram Sharma Acharya
Page 1
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
वेदान्त दर्शन
सम्पादक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य माता भगवती देवी शर्मा
प्रकाशक
युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि, मथुरा (उ० प्र०)
वसंत पर्व संवत् २०६१ मूल्य : ९०.०० रुपये
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 2
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
-
प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि, मथुरा (उ० प्र०)
-
सम्पादक पं० श्रीराम शर्मा आचार्य माता भगवती देवी शर्मा
-
सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन
-
प्रथम आवृत्ति (संशोधित-परिवर्धित संस्करण) वसंत पर्व संवत् २०६१
-
मूल्य : ९०.०० रुपये
-
मुद्रक : युग निर्माण योजना प्रेस गायत्री तपोभूमि, मथुरा (उ० प्र०)
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 3
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
भूमिका
भारतीय चिन्तन धारा में जिन दर्शनों की वेद का अन्त या सिद्धान्त। तात्पर्य यह है- 'वह परिगणना विद्यमान है, उनमें शीर्ष स्थानीय दर्शन शास्त्र जिसके लिए उपनिषद् ही प्रमाण है। वेदान्त कौन सा है? ऐसी जिज्ञासा होने पर एक ही नाम में जितनी बातों का उल्लेख है, उन सब का मूल उभरता है, वह है-वेदान्त। यह भारतीय दर्शन के उपनिषद् है। इसलिए वेदान्त शास्त्र के वे ही मंदिर का जगमगाता स्वर्णकलश है- दर्शनाकाश सिद्धान्त माननीय हैं, जिनके साधक उपनिषद् के का देदीप्यमान सूर्य है। वेदान्त की विषय वस्तु, वाक्य हैं। इन्हीं उपनिषदों को आधार बनाकर इसके उद्देश्य, साहित्य और आचार्य परम्परा आदि बादरायण मुनि ने ब्रह्मसूत्रों की रचना की।' इन पर गहन चिन्तन करें, इससे पूर्व आइये, वेदान्त सूत्रों का मूल उपनिषदों में है। जैसा पूर्व में शब्द का अर्थ समझें। कहा गया है- उपनिषद् में सभी दर्शनों के मूल वेदान्त का अर्थ- वेदान्त का अर्थ है- सिद्धान्त हैं।
वेदान्त का साहित्य
ब्रह्मसूत्र- उपरिवर्णित विवेचन से स्पष्ट इस प्रकार पूर्व मीमांसा षोडश अध्यायों में सम्पन्न है कि वेदान्त का मूल ग्रन्थ उपनिषद् ही है। अतः हुआ है। उसी सिलसिले में चार अध्यायों में उत्तर यदा-कदा वेदान्त शब्द उपनिषद् का वाचक बनता मीमांसा या ब्रह्म-सूत्र का सृजन हुआ। इन दोनों दृष्टिगोचर होता है। उपनिषदीय मूल वाक्यों के ग्रन्थों में अनेक आचार्यों का नामोल्लेख हुआ है। आधार पर ही बादरायण द्वारा अद्वैत वेदान्त के इससे ऐसा अनुमान होता है कि इन बीस अध्यायों प्रतिपादन हेतु ब्रह्मसूत्र सृजित किया गया। महर्षि के रचनाकार कोई एक व्यक्ति थे, चाहे वे महर्षि पाणिनि द्वारा अष्टाध्यायी में उल्लेखित 'भिक्षुसूत्र' जैमिनि हों अथवा बादरायण अथवा बादरि। पूर्व ही वस्तुतः ब्रह्मसूत्र है। संन्यासी, भिक्षु कहलाते हैं मीमांसा में कर्मकाण्ड एवं उत्तर मीमांसा में एवं उन्हीं के अध्ययन योग्य उपनिषदों पर आधारित ज्ञानकाण्ड विवेचित है। उन दिनों विद्यमान पाराशर्य (पराशर पुत्र व्यास) द्वारा विरचित ब्रह्म समस्त आचार्य पूर्व एवं उत्तर मीमांसा के समान सूत्र है, जो कि बहुत प्राचीन है। यही वेदान्त दर्शन रूपेण विद्वान् थे। इसी कारण जिनके नामों का उत्तर मीमांसा के नाम से प्रख्यात है। महर्षि जैमिनि उल्लेख जैमिनीय सूत्र में है, उन्हीं का ब्रह्मसूत्र में का मीमांसा दर्शन पूर्व मीमांसा कहलाता है, जो भी है। वेदान्त सम्बन्धी साहित्य प्रचुर मात्रा में कि द्वादश अध्यायों में आबद्ध है। कहा जाता है विद्यमान है, जिसका उल्लेख अग्रिम पृष्ठों पर कि जैमिनि द्वारा इन द्वादश अध्यायों के पश्चात् 'वेदान्त का अन्य साहित्य और आचार्य परम्परा' चार अध्यायों में संकर्षण काण्ड (देवता काण्ड) शीर्षक में आचार्यों के नामों सहित विवेचित किया का सृजन किया गया था। जो अब अनुपलब्ध है, गया है।
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 4
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
६/भूमिका/वेदान्त दर्शन वेदान्त दर्शन का स्वरूप और प्रतिपाद्य-विषय 'वेदों' के सर्वमान्य, सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्त ही किया गया है। 'वेदान्त' का प्रतिपाद्य हैं। उपनिषदों में ही ये सिद्धान्त २- द्वितीय अध्याय का विषय 'अविरोध' है। मुख्यतः प्रतिपादित हुए हैं, इसलिए वे ही 'वेदान्त' इसके अन्तर्गत श्रुतियों की जो परस्पर विरोधी के पर्याय माने जाते हैं। परमात्मा का परम गुह्य सम्मतियाँ हैं, उनका मूल आशय प्रकट करके ज्ञान वेदान्त के रूप में सर्वप्रथम उपनिषदों में ही उनके द्वारा अद्वैत सिद्धान्त की सिद्धि की गयी है। प्रकट हुआ है। इसके साथ ही वैदिक मतों (सांख्य, वैशेषिक, 'वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः ..... पाशुपत आदि) एवं अवैदिक सिद्धान्तों (जैन, बौद्ध (मुण्डक० ३.२.६)। 'वेदान्ते परमं गुह्यम् आदि) के दोषों एवं उनकी अयथार्थता को दर्शाया पुराकल्पे प्रचोदितम्' (श्वेताश्वतर० ६.२२)।'यो गया है। आगे चलकर लिङ्ग शरीर प्राण एवं इन्द्रियों वेदादौ स्वरः प्रोक्तो वेदान्ते च प्रतिष्ठितः' के स्वरूप दिग्दर्शन के साथ पंचभूत एवं जीव से (महानारायण० १०.८) इत्यादि श्रुतिवचन उसी सम्बद्ध शंकाओं का निराकरण भी किया गया है। तथ्य का डिंडिम घोष करते हैं। इन श्रुति वचनों ३- तृतीय अध्याय की विषय वस्तु साधन है। का सारांश इतना ही है कि संसार में जो कुछ भी इसके अन्तर्गत प्रथमतः स्वर्गादि प्राप्ति के साधनों दृश्यमान है और जहाँ तक हमारी बुद्धि अनुमान के दोष दिखाकर ज्ञान एवं विद्या के वास्तविक कर सकती है, उन सबका मूल स्रोत एकमात्र स्रोत परमात्मा की उपासना प्रतिपादित की गयी 'परब्रह्म' ही है। है, जिसके द्वारा जीव ब्रह्म की प्राप्ति कर सकता इस प्रकार ब्रह्मसूत्र प्रमुखतया ब्रह्म के है। इस उद्देश्य की पूर्ति में कर्मकाण्ड सिद्धान्त के स्वरूप को विवेचित करता है एवं इसी के सम्बन्ध से उसमें जीव एवं प्रकृति के सम्बन्ध में भी विचार अनुसार मात्र अग्निहोत्र आदि पर्याप्त नहीं, वरन् ज्ञान एवं भक्ति द्वारा ही आत्मा और परमात्मा का प्रकट किया गया है। यह दर्शन चार अध्यायों एवं सान्निध्य सम्भव है। सोलह पादों में विभक्त है। इनका प्रतिपाद्य क्रमशः ४- चतुर्थ अध्याय साधना का परिणाम होने से निम्नवत् है- फलाध्याय है। इसके अन्तर्गत वायु, विद्युत् एवं १- प्रथम अध्याय में वेदान्त से सम्बन्धित समस्त वरुण लोक से उच्च लोक-ब्रह्मलोक तक पहुँचने वाक्यों का मुख्य आशय प्रकट करके उन समस्त विचारों को समन्वित किया गया है, जो बाहर से का वर्णन है, साथ ही जीव की मुक्ति, जीवन्मुक्त
देखने पर परस्पर भिन्न एवं अनेक स्थलों पर तो की मृत्यु एवं परलोक में उसकी गति आदि भी वर्णित है। अन्त में यह भी वर्णित हैं कि ब्रह्म की विरोधी भी प्रतीत होते हैं। प्रथम पाद में वे वाक्य दिये गये हैं, जिनमें ब्रह्म का स्पष्टतया कथन है, प्राप्ति होने से आत्मा की स्थिति किस प्रकार की होती है, जिससे वह पुनः संसार में आगमन नहीं द्वितीय में वे वाक्य हैं, जिनमें ब्रह्म का स्पष्ट कथन नहीं है एवं अभिप्राय उसकी उपासना से है। तृतीय करती। मुक्ति और निर्वाण की अवस्था यही है।
में वे वाक्य समाविष्ट हैं, जिनमें ज्ञान रूप में ब्रह्म इस प्रकार वेदान्त दर्शन में ईश्वर, प्रकृति, जीव,
का वर्णन है। चतुर्थ पाद में विविध प्रकार के मरणोत्तर दशाएँ, पुनर्जन्म, ज्ञान, कर्म, उपासना, बन्धन एवं मोक्ष इन दस विषयों का प्रमुखरूपेण विचारों एवं संदिग्ध भावों से पूर्ण वाक्यों पर विचार विवेचन किया गया है।
Disclalmer / Warning: All Iiterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 5
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
७ /भूमिका/वेदान्त दर्शन
वेदान्त का अन्य साहित्य और आचार्य परम्परा ब्रह्मसूत्र के अतिरिक्त वेदान्त दर्शन का 'संक्षेप-शारीरक' नाम से प्रसिद्ध है। और भी साहित्य प्रचुर मात्रा में संप्राप्त होता है, जो ४- अद्वैतानन्द- विभिन्न आचार्यों ने विविध प्रकारेण ब्रह्म-सूत्र ये रामानन्द तीर्थ के शिष्य थे, इन्होंने आदि ग्रन्थों पर भाष्य, वृत्तियाँ, टीकाएँ आदि लिखी शंकराचार्य के शारीरक भाष्य पर 'ब्रह्मविद्याभरण' हैं। यद्यपि प्राचीन आचार्यों में बादरि, आश्मरथ्य, नामक श्रेष्ठ व्याख्या लिखी है। आत्रेय, काशकृत्स्न, औडुलोमि एवं कार्ष्णाजिनि ५-वाचस्पति मिश्र- आदि के मतों का भी वर्णन प्राप्त होता है; किन्तु वाचस्पति मिश्र ने भी शांकर-भाष्य पर इनके ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हैं। आइये जो ग्रन्थ उपलब्ध 'भामती' नामक उत्तम व्याख्या ग्रन्थ लिखा है। हैं, उनका व उनके आचार्यों का संक्षिप्त परिचय 'ब्रह्मतत्त्व समीक्षा' नामक वेदान्त ग्रन्थ भी इन्हीं प्राप्त करें- का है। १- आद्य शंकराचार्य- ६- चित्सुखाचार्य- ब्रह्म-सूत्र पर सर्वप्राचीन एवं प्रामाणिक तेरहवी सदी के चित्सुखाचार्य ने वेदान्त भाष्य आद्य शंकराचार्य का उपलब्ध होता है। यह का प्रसिद्ध ग्रन्थ 'तत्त्व-दीपिका' नाम से लिखा, शाङ्करभाष्य के नाम से प्रख्यात है। विश्व में भारतीय जिसने उन्हीं के नाम से 'चित्सुखी' के रूप में दर्शन ने शंकराचार्य के नाम से जितनी ख्याति प्राप्त विशेष प्रसिद्धि प्राप्त की। की है, उतनी न किसी आचार्य ने प्राप्त की और न ७- विद्यारण्य स्वामी- ग्रन्थ ने। शंकराचार्य का जन्म ७८८ ई० में तथा शृंगेरी पीठ के प्रतिष्ठित यति श्री विद्यारण्य निर्वाण ८२० ई० में हुआ बताया जाता है, इनके स्वामी ने वेदान्त विषयक कई ग्रन्थ लिखे, जिनमें गुरु गोविन्दपाद तथा परम गुरु गौड़पादाचार्य थे। 'पंचदशी' का विशेष स्थान है। इनके अन्य ग्रन्थ इनके ग्रन्थों में ब्रह्मसूत्र-भाष्य (शारीरक भाष्य), हैं- जीवन्मुक्ति विवेक, विवरण प्रमेय संग्रह, दशोपनिषद् भाष्य, गीता-भाष्य, माण्डूक्यकारिका बृहदारण्यक वार्तिक सार आदि। भाष्य, विवेकचूड़ामणि, उपदेश-साहस्त्री आदि ८-प्रकाशात्मा- प्रमुख हैं। इन्होंने पद्मपादकृत पञ्चपादिका पर २-भास्कराचार्य- 'विवरण' नाम की व्याख्या का सृजन किया है। आचार्य शंकर के समकालीन भास्कराचार्य त्रिदण्डीमत के वेदान्ती थे। ये ज्ञान एवं कर्म दोनों इसी के आधार पर 'भामती प्रस्थान' से पृथक् 'विवरण प्रस्थान' निर्मित हुआ है। से मोक्ष स्वीकार करते हैं। इनके अनुसार ब्रह्म के ९-अमलानन्द- शक्ति-विक्षेप से ही सृष्टि और स्थिति व्यापार अमलानन्द (जो अनुभवानन्द के शिष्य अनवरत चलता है। इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर एक लघु थे) ने भामती पर 'कल्पतरु' नामक व्याख्या एवं भाष्य लिखा है। ३-सर्वज्ञात्म मुनि- ब्रह्मसूत्र पर एक वृत्ति भी लिखी है। इनका अपर नाम 'व्यासाश्रम' था। ये सुरेश्वराचार्य के शिष्य थे, जिन्होंने १०-अखण्डानन्द- ब्रह्मसूत्र पर एक पद्यात्मक व्याख्या लिखी है, जो आनन्दगिरि के शिष्य अखण्डानन्द ने
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 6
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
८/भूमिका/वेदान्त दर्शन 'पञ्चपादिका विवरण' पर 'तत्त्वदीपन' नामक स्वरूपाचार्य, नृसिंहाश्रम, नृसिंह सरस्वती, गीर्वाणेन्द्र व्याख्या लिखी है। सरस्वती, सदानन्द यति, अप्पय्य दीक्षित, ११- प्रकाशानन्द- धर्मराजाध्वरीन्द्र आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्होंने 'वेदान्त सिद्धान्त मुक्तावली' जिनके ग्रन्थों से वेदान्त परक साहित्य का भण्डार नामक ग्रन्थ का सृजन किया, जिसमें 'दृष्टि- भरा हुआ है। सृष्टिवाद' का वर्णन है। इस प्रकार वेदान्त के विभिन्न ग्रन्थों में १२-मधुसूदन सरस्वती- अद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र ही सबका मुकुटमणि सिद्ध इन्होंने सिद्धान्तबिन्दु, अद्वैतसिद्धि, होता है। इस पर अनेक आचार्यों ने भाष्य लिखे अद्वैतरत्नलक्षण एवं वेदान्त कल्पलतिका आदि हैं। जिनके नाम व काल का विवरण इस प्रकार है- ग्रन्थों का प्रणयन किया। १. शांकर भाष्य (नवीं सदी), २. भास्कर १३- सदानन्द मुनि भाष्य (नवीं सदी), ३. रामानुज भाष्य (बारहवीं इन्होंने वेदान्त के छात्रों के लिए अद्वैत सदी), ४. निम्बार्क भाष्य (तेरहवीं सदी), ५. वेदान्त के तत्त्वों का सरल शब्दों में विवेचन करने माध्व भाष्य (तेरहवीं सदी), ६. श्रीकण्ठ भाष्य वाला ग्रन्थ 'वेदान्त सार' लिखा है, जो बालमति (तेरहवीं सदी), ७. श्रीकर भाष्य (चौदहवीं जिज्ञासुओं के लिए सरल पाठ्य-ग्रन्थ का काम सदी), ८. वल्लभ भाष्य (पन्द्रहवीं सदी), ९. करता है। विज्ञान भिक्षु भाष्य (सोलहवीं सदी), १०. बलदेव इन आचार्यों के अतिरिक्त अन्य भी भाष्य (अठारहवीं सदी) तथा ११. शक्ति भाष्य अनेक वेदान्त के आचार्य हुए हैं, जिनमें प्रत्यक् (बीसवीं सदी)।
वेदान्त की तत्त्व मीमांसा वेदान्त दर्शन पारमार्थिक दृष्ट्या एकमात्र प्रकाश में सर्प ज्ञान बाधित हो जाता है, अतः तत्त्व ब्रह्म या आत्मा को मानता है। इससे भिन्न प्रातिभासिकी सत्ता त्रिकाल में अबाधित नहीं है। जो कुछ भी दृश्यमान है, वह सभी अतत्त्व है। तीसरी सत्ता व्यावहारिकी है। सांसारिक दशा में इसे अज्ञान, माया, अवस्तु भी कहा जाता है। तत्त्व व जिसके अस्तित्व को व्यवहार-मात्र के लिए सत्य के ज्ञान के लिए अतत्त्व का ज्ञान अनिवार्य है। मानते हैं, वह व्यावहारिकी सत्ता है। ब्रह्मज्ञान होने सत्ता का स्वरूप- शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त पर ही इस सत्य भावना का विनाश होता है, किसी में पारमार्थिकी, प्रातिभासिकी एवं व्यावहारिकी और प्रकार से नहीं हो सकता। भेद से सत्ता के तीन स्वरूप वर्णित हैं। जिस वस्तु विवर्त्तवाद- तत्त्व में अतत्त्वों के भान को विवर्त्त का अस्तित्व तीनों कालों में अबाधित (शाश्वत) कहा जाता है -- अतत्त्वतोऽन्यथोप्रथा 'विवर्त्त' हो, वह पारमार्थिक सत् है और ऐसी सत्ता केवल इत्युदाहृतः। जैसे- रस्सी में सर्प का आभास होने ब्रह्म की ही है। जिस वस्तु के अस्तित्व का प्रतिभास का मूल कारण अज्ञान है। यहाँ वस्तु रस्सी है और (आभास) मात्र हो, उसकी सत्ता प्रातिभासिकी अवस्तु सर्प। अतः सर्प रस्सी का परिणाम न होकर कहलाती है। जैसे- अँधेरे में रस्सी को देखकर विवर्त्त है। माया (अज्ञान) के कारण ब्रह्म में जगत् सर्प प्रतिभासित होना; किन्तु दीपक जलने पर का आरोप होता है, अतः सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म का
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 7
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
९ /भूमिका/वेदान्त दर्शन विवर्त है। यह भ्रम तत्त्वज्ञान के द्वारा बाधित अध्यास है। रज्जु में सर्प की प्रतीति अध्यास का होता है। उदाहरण है। इसी प्रकार शरीर, इन्द्रियादिकों में अध्यास- अद्वैत वेदान्त में अनात्मा में आत्मा आत्मा की प्रतीति होना अध्यास है। ब्रह्म निर्विशेष और आत्मा में अनात्मा की प्रतीति अध्यास तत्त्व है, सर्वव्यापी और चेतन है, स्वतः सिद्ध है, कहलाती है। आचार्य शंकर ने अध्यास की उसकी सिद्धि के लिए किसी प्रमाण की परिभाषा देते हुए लिखा है- स्मृति रूप: परत्र आवश्यकता नहीं है, तथापि अज्ञान से उत्पन्न पूर्व दृष्टावभास: अर्थात् किसी स्थान पर पूर्व में भ्रान्ति के कारण जीव उसे समझ नहीं पाता। इसी देखे हुए की प्रतीति (स्मृति के आधार पर) ही भ्रान्ति को दूर करना वेदान्त का लक्ष्य है।
अविद्या एवं माया
भ्रान्ति ही वेदान्त की भाषा में अविद्या है। आवरण शक्ति के द्वारा माया व्यक्ति की बुद्धि और माया है। आचार्य शंकर ने तो दोनों को एक को आच्छादित कर देती है, जिसके कारण वह ही कहा है; पर परवर्ती आचार्यों विद्यारण्य आदि वास्तविक विराट् तत्त्व को देख नहीं पाता। (जैसे- ने इन्हें पृथक्-पृथक् माना है। उनके अनुसार रज, बादल के छोटे से टुकड़े के आवरण से विराट् तम की मलीनता से रहित शुद्ध सत्त्व प्रधाना प्रकृति सूर्य दृश्यमान नहीं होता।) और विक्षेप शक्ति के ही माया तथा मलिन सत्व प्रधाना शक्ति (प्रकृति) द्वारा वह उस वस्तु में दूसरी वस्तु (अवस्तु) की ही अविद्या है। माया अपनी दो शक्तियों, आवरण कल्पना करने लगता है। (जैसे-रज्जु में सर्प की और विक्षेप के द्वारा वस्तु में भ्रान्ति उत्पन्न करती कल्पना करना) ।
ब्रह्म और उसका लक्षण
अद्वैत वेदान्त में 'ब्रह्म' परम-सत्ता के विनाश नहीं होता। २-इसी प्रकार 'अयमात्माब्रह्म' रूप में विवेचित है, वही समस्त जगत् का मूल कारण है। स्वरूप और तटस्थ भेद से उसके (ब्रह्म (बृहदारण्यको० २.५.१९) के अनुसार यह आत्मा ही ब्रह्म है। इस श्रुति से आत्मा और ब्रह्म के ऐक्य के) लक्षण दो प्रकार के बताये गये हैं। स्वरूप का बोध होता है। इनमें ब्रह्म के स्वरूप का लक्षण लक्षण में जहाँ वस्तु के तात्त्विक रूप का परिचय होने से ये स्वरूप-लक्षण के उदाहरण हैं। ३- प्राप्त होता है, कि वह किस प्रकार की है व किस यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि स्वभाव की है, वहीं तटस्थ लक्षण में किसी विशिष्ट जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद् गुण के आधार पर वस्तु का विवेचन होता है। विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्म। (तैत्तिरीयो० ३.१.१) श्रुतियों में ब्रह्म का स्वरूप और तटस्थ लक्षण- अर्थात् जिससे ये प्राणी प्रादुर्भूत होते हैं, जीवित परक उल्लेख अनेकश: मिलता है। जैसे- रहते हैं एवं अन्त में उसी में प्रवेश करते हैं, वह १- सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तैत्तिरीयो० २.२.१) ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्म को जगत् की उत्पत्ति, के अनुसार ब्रह्म सत्य है मृषा नहीं, ज्ञान-स्वरूप स्थिति एवं लय का कारण स्वीकार करना उसका है न कि जड़। वह अनन्त है, जिसका कभी तटस्थ लक्षण कहलायेगा।
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 8
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१० / भूमिका/वेदान्त दर्शन
आत्मा का स्वरूप
अद्वैत वेदान्त में आत्मा का स्वरूप अनेक होते हैं, वे निम्रवत् हैं- प्रकार से विवेचित हुआ है। तत्त्वबोध सूत्र-२१ में १-आत्मा स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों से भिन्न आत्मा का स्वरूप इस प्रकार का निर्दिष्ट है- होता है। स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों से भिन्न २- आत्मा पंच कोशों से अतीत होता है। पंचकोशातीत, अवस्थात्रय का साक्षी, चौबीस तत्त्वों ३- आत्मा अवस्थात्रय का साक्षी है। का आधार, अविद्या एवं माया से क्रमिक रूप से ४- आत्मा चौबीस तत्त्वों का आधार है। प्रतीयमान होने वाले जीव एवं ईश्वर से पृथक् जो ५- आत्मा या ब्रह्म जीव एवं ईश्वर से भिन्न है। सच्चिदानन्द स्वरूप वाला निवास करता है, वही ६- आत्मा या ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूप है। आत्मा है। इस प्रकार आत्मा के जो लक्षण सिद्ध
जगत् का स्वरूप और सृष्टि-प्रक्रिया माया से अवच्छिन्न चैतन्य ही जगत् का द्वारा स्थूल शरीर की उत्पत्ति होती है। अद्वैत वेदान्त कारण है। माया की दो शक्तियों-आवरण और विक्षेप के कारण ही जगत् की सृष्टि होती है। की स्थूल शरीर निर्माण की पंचीकरण प्रक्रिया प्रख्यात है, जिसके अनुसार पंचभूतों में प्रत्येक वस्तुतः माया के द्वारा ब्रह्म ही जगत् के रूप में स्थूल भूत का आधा और शेष चार भूतों का आधा प्रतिभासित हो रहा है, जो भाव-मात्र होने के कारण अर्थात् चारों का अष्टमांश-अष्टमांश सम्मिलित प्रतीयमान है। जगत् के द्वारा ब्रह्म के स्वरूप में रहता है। इसका स्पष्ट अनुपात इस प्रकार है- कोई अन्तर नहीं पड़ता। पृथ्वी- १/२पृथ्वी+१/८जल+१/८ तेज(अग्नि)+१/ अद्वैत वेदान्त के अनुसार जगत् सृष्टि की ८वायु+१/८आकाश। प्रक्रिया इस प्रकार है- तमः प्रधान विक्षेप शक्ति से अन्वित ईश्वर से सूक्ष्म-तन्मात्र-रूप आकाश जल= १/रजल+१/८पृथ्वी+१/८ तेज+१/८वायु+१/ ८आकाश। प्रादुर्भूत हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, तेज (अग्नि)= १/२तेज+१/८पृथ्वी+१/८जल+१/ अग्नि से जल तथा जल से पृथ्वी समुत्पन्न हुई। ८वायु+१/८आकाश। इन सूक्ष्म भूतों से सूक्ष्म शरीर उत्पन्न होता है, जिसमें सत्रह पदार्थों का समन्वय रहता है। ये हैं- वायु=१/२वायु+१/८पृथ्वी+१/८जल+१/८तेज+१/ ८आकाश। पंच-ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच-कर्मेन्द्रियाँ, पंच-प्राण, बुद्धि आकाश= १/२आकाश+१/८पृथ्वी+१/८जल+१/ एवं मन। इस सूक्ष्म शरीर से ही पंचीकृत भूतों ८तेज+१/८वायु। वेदान्त में मुक्ति का स्वरूप एवं साधन चतुष्टय
वेदान्त के अनुसार अज्ञान से निवृत्ति ही अपने को बद्ध अनुभव करता है। गुरु के उपदेश मुक्ति या मोक्ष है। जीव स्वभावतः शुद्ध, बुद्ध एवं से वह अपने वास्तविक स्वरूप को जानकर मुक्त मुक्त है; किन्तु अविद्या के आवरण के कारण वह हो जाता है। इस तथ्य को प्रकट करता वेदान्त का
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 9
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
११ /भूमिका/वेदान्त दर्शन यह वाक्य प्रख्यात है 'ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः' अर्थात् जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति प्राप्त होना विदेह ययार्थ ज्ञान के बिना मुक्ति सम्भव नहीं होती। मुक्ति कहलाती है। अद्वैत वेदान्त में अपने सच्चे मुक्ति के स्वरूप के स्पष्टीकरण हेतु वेदान्ती (सत्, चित्, आनन्द) स्वरूप में स्थित हो जाना एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण देते हैं, जिसके गले ही साधना का उद्देश्य है। वेदान्त में यह साधना ही में तो कीमती हार है; किन्तु वह अज्ञानतावश उसे साधन- चतुष्टय के नाम से जानी जाती है। जिनका खोजने के लिए इधर-उधर भटकता है, किसी संक्षिप् स्वरूप इस प्रकार है- विज्ञ पुरुष द्वारा वस्तुस्थिति का बोध कराये १- नित्यानित्यवस्तुविवेक (ब्रह्म- ही त्रिकाल- जाने पर वह सत्य को जान जाता है और उस सत्य एवं जगत् मिथ्या है, यह ज्ञान होना) हार को पाकर प्रसन्न हो जाता है। वेदान्त में मुक्ति भी यही है। अज्ञान के फल - स्वरूप उत्पन्न २- इहामुत्रफलभोगविराग (लोक- परलोक में मिलने वाले फल- भोग से वैराग्य) लोभ - मोह, अहंकार से ज्ञान द्वारा मुक्ति ही ३- शमादिषट्कसम्पत्ति (शम, दम, उपरति, वास्तविक मुक्ति है। तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान- इन छः सम्पदाओं मुक्ति के दो प्रकार हैं- जीवन्मुक्ति एवं को प्राप्त करना) विदेहमुक्ति। शरीर के रहते जो मुक्ति प्राप्त होती ४- मुमुक्षुत्व (संसार के दुःखों से निवृत्ति की है, वह जीवन्मुक्ति है और देहत्याग के पश्चात् तीव्र आकांक्षा)।
प्रमाण विमर्श
वेदान्त दर्शन में भी अन्य दर्शनों की तरह वेदान्त दर्शन में स्थान-स्थान पर मन्त्र, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आगम (शब्द), श्रुति, स्मृति का प्रमाणरूपेण उल्लेख हुआ है। अर्थापत्ति एवं अनुपलब्धि (अभाव)- ये छः प्रमाण मान्य हैं; किन्तु वेदान्त का प्रमुख विषय 'ब्रह्म' एक विद्वान् के अनुसार वेदान्त में शब्द प्रमाण के सन्दर्भ में मन्त्र से वेद, श्रुति से उपनिषद् और होने के कारण वह आगम (श्रुति या शब्द) प्रमाण स्मृति से गीता आदि अन्य प्रामाणिक ग्रन्थों का को ही सर्वाधिक महत्त्व देता है; क्योंकि ब्रह्म के अभिप्राय लिया गया है। बादरायण (व्यास) के विषय में श्रुति में जो कहा गया है, वही सबसे लिए यदि किसी विषय में श्रुति या शब्द का अधिक प्रामाणिक है। वेदान्त दर्शन के प्रथम प्रमाण उपलब्ध है, तो और अधिक विवेचन की अध्याय के प्रथम पाद के तृतीय सूत्र में ब्रह्म के आवश्यकता नहीं। इसीलिए किसी प्रकरण में जो अस्तित्व की सिद्धि के लिए शास्त्र (वेद) को ही कहना आवश्यक है, उसे कहने के पश्चात् वे कह प्रमाण माना गया है- 'शास्त्रयोनित्वात्' अर्थात् देते हैं कि ऐसा श्रुति अथवा स्मृति में देखा जाता शास्त्र के योनि- कारण अर्थात् प्रमाण होने से ब्रह्म है, इसलिए भी यह सत्य है। इस प्रकार वेदान्त में का अस्तित्व सिद्ध होता है। शब्द प्रमाण ही सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।
वेदान्त का उद्देश्य और उसकी उपयोगिता
समस्त दार्शनिक सिद्धान्तों का सारांश कारण ब्रह्म का अन्वेषण है एवं संसार की वेदान्त है। इसका उद्देश्य जगत् और इसके मूल वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त करना है। अभी तक
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 10
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१२/भूमिका/वेदान्त दर्शन अधिकांश जन सांसारिक वैभव, इन्द्रियजन्य सुखों अनेक लोग उसकी उपयोगिता पर शंका करते या धर्म-कर्म के माध्यम से स्वर्गिक सुखों की हुए कहते हैं कि वेदान्त सिद्धान्त को समझ लेने प्राप्ति को ही सर्वोत्कृष्ट पुरुषार्थ मानते हैं; परन्तु पर भी व्यक्ति को प्रकृति के उन्हीं नियमों का वेदान्त का मन्तव्य है कि ये समस्त सुख अस्थायी अनुगमन करना होता है, जिनका अनुगमन संसार हैं। यदि स्थायी सुख-शान्ति अभीष्ट है, तो वह के अन्य सामान्यजन किया करते हैं और उसी आध्यात्मिक ज्ञान अथवा ब्रह्म विद्या द्वारा ही संप्राप्य प्रकार कर्मफल भी भुगतना पड़ता है, जैसे अन्य है- ब्रह्मविद्या सर्वविद्या प्रतिष्ठाम्। लोगों को भुगतना पड़ता है, तब इसकी उपयोगिता अन्य मत-मतान्तर जहाँ एक-एक अङ्ग क्या है? इस सन्दर्भ में यह तथ्य ज्ञातव्य है कि की साधना करने पर बल देते हैं, वहीं वेदान्त वेदान्तानुगामी व्यक्ति बाह्य दृष्टि से देखने में तो मूल-तत्त्व के परिज्ञान पर जोर देता है, जिसके अपने समस्त सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन करते ज्ञान के पश्चात् कुछ और जानना शेष नहीं रह हुए वह सामान्य व्यक्तियों के समान ही प्रतीत जाता। इसी कारण जहाँ अन्य मत-मतान्तरों में होता है; परन्तु आन्तरिक रूप से वह इन सभी अपने मत की श्रेष्ठता के सम्बन्ध में विवाद होते हैं, बातों से अलिप्त रहता है। निःस्वार्थता के कारण वहाँ वेदान्त के सन्दर्भ में ऐसे विवादों के लिए सुख-दुःख, हानि-लाभ एवं सफलता-असफलता कोई स्थान नहीं है। शृंगेरी पीठ के शंकराचार्य का उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। स्वामी नरसिंह भारती ने अपने एक शिष्य को वेदान्तानुगामी होने के कारण वह अपने समस्त दिये तीन उपदेशों में कहा था- कर्त्तव्यों का परिपालन अधिक उत्तमता से करता १- वेदान्त समस्त प्राणियों के सुख की कामना है। अतः जो ऐसा सोचते हैं कि वेदान्तानुशीलन से एवं साधना करता है। कोई लाभ नहीं अथवा यह वैरागी-संन्यासियों के २- वेदान्त किसी धार्मिक या दार्शनिक सम्प्रदाय लिए ही उपयुक्त है, तो उनका यह सोचना उचित से विरोध नहीं करता। नहीं है। वस्तुतः वेदान्तानुशीलन मानव के समक्ष ३- वेदान्त तत्त्व के अन्तर्गत अन्यों से विवाद के जीवन एवं जगत् के मूल स्वरूप को प्रकट कर लिए कोई स्थान नहीं है। यह दुनिया के किसी देता है, जिसके कारण वह मिथ्या मोह एवं आसक्ति व्यक्ति अथवा विचार परम्परा पर विजय पाने की से विमुक्त हो जाता है। फलतः वह जो कुछ भी कोशिश नहीं करता, कारण यह है कि यह समस्त करता है, वह अपना धर्म अथवा कर्त्तव्य समझकर विचारों को अपना ही अंग-अवयव मानता है। सच्चे हृदय से ही करता है। इस प्रकार वेदान्तानुगामी वेदान्त की निरपेक्षता और व्यक्ति सामान्य व्यक्ति की तुलना में हर प्रकार से सर्वकल्याणप्रियता को स्वीकार कर लेने पर भी उत्तम और समाज के लिए भी हितकारी होता है।
वेदान्त का वैलक्षण्य
अनेक दृष्टियों से वेदान्त अन्य दर्शनों नहीं कहता। उसकी दृष्टि में मनुष्य-मात्र एक ही की अपेक्षा अद्भुत और विलक्षण है। उसकी ब्रह्म का अंश होने के कारण वह सबको आत्ममय विभिन्न विलक्षणता में एक यह है कि वह किसी देखता और किसी से विरोध नहीं करता है। इसी भारतीय अथवा विदेशी धर्म को दूसरे का धर्म कारण थोड़े-थोड़े सिद्धान्तान्तर से बने वेदान्त के
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 11
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१३ /भूमिका/वेदान्त दर्शन ही अवान्तर सम्प्रदाय सब इसी में समाविष्ट हो एक प्रकार से अभेद के साथ ही अन्य प्रकार से जाते हैं। ये हैं-१. शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त, भेद भी है। ब्रह्म कारण है एवं अनन्त शक्तियों २. रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत वेदान्त, ३. निम्बार्काचार्य का द्वैताद्वैत (भेदाभेद) वाला है। वह अपने स्वभाव से ही निज की चित्
वेदान्त, ४. मध्वाचार्य का द्वैत वेदान्त, ५. और अचित् शक्तियों का प्रसार करते हुए चित् और अचित् रूप जगत् के स्वरूप में स्वतः परिणत वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत वेदान्त, ६. चैतन्य हो जाता है और अपने वास्तविक रूप में निर्विकार का अचिन्त्य भेदाभेदवेदान्त। इन छः प्रमुख भी बना रहता है। इस प्रकार चित्-अचित् रूप वेदान्त मतों के अतिरिक्त विवेकानन्द का जगत् जो ब्रह्मरूप कारण का कार्य है, वह अपने व्यावहारिक वेदान्त भी प्रसिद्ध है। इन सभी का कारण (ब्रह्म) से भिन्न भी है और अभिन्न भी। संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- इस सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्म प्रत्येक स्थिति में १. अद्वैत वेदान्त- अद्वैत का अर्थ है-दूसरा नहीं। जीव का नियामक है, उसे सदैव उसी की इसके प्रतिपादक आद्य शंकराचार्य का मत है कि प्रेरणानुसार चलना पड़ता है। जीव का उद्धार इस जगत् में नेत्रों से दृश्यमान कुछ भी सत्य नहीं ईश्वरीय अनुग्रह पर ही निर्भर है। इस मत में भी है। इस समस्त जगत् प्रपञ्च में यदि कुछ सत्य है, ब्रह्म का सगुण रूप ही मान्य है। तो वह एकमात्र ब्रह्म की चैतन्य सत्ता है, जीव ४-द्वैत वेदान्त- मध्वाचार्य प्रवर्तित माध्व मत पृथक् नहीं, वह ब्रह्म ही है, इसलिए वे कहते हैं- द्वैत वेदान्त कहलाता है। इसके अनुसार सत्य ईश्वर 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रहमौव नापरः।' से उत्पन्न जगत् मिथ्या नहीं हो सकता। मध्व के इस जगत् की उत्पादिका और विनाशिका माया अनुसार श्रीहरि (विष्णु) ही परम तत्त्व एवं जगत् (अविद्या) है, जो अनिर्वचनीय है। सदा सत्य है। जीव एवं परमात्मा के मध्य का भेद २. विशिष्टाद्वैत वेदान्त- इसके प्रतिपादक वास्तविक है। उनकी दृष्टि में परमात्मा स्वामी है रामानुजाचार्य हैं। इनके अनुसार ब्रह्म के अतिरिक्त एवं जीव उसका सेवक है। शाश्वत सुख की जीव एवं जड़ जगत् अर्थात् चित् एवं अचित् भी अनुभूति ही मुक्ति एवं उस अनुभूति तक पहुँचने नित्य और स्वतन्त्र तत्त्व हैं। यह सत्य है कि ये भी का साधन ही भक्ति है। ब्रह्म के अंश हैं और ब्रह्म की विशेषता स्वरूप हैं, ५-शुद्धाद्वैत वेदान्त- इसके प्रतिपादक जो प्रलय के समय तो ब्रह्म के अन्दर सूक्ष्मरूपेण रहते हैं, किन्तु विश्व की उत्पत्ति के समय स्थूल वल्लभाचार्य माया को पूर्णतः अस्वीकार करके एकमात्र ब्रह्म को ही शुद्ध तत्त्व मानते हैं। जीव रूप में प्रकट हो जाते हैं। इसी कारण इसका नाम और जगत् का प्रादुर्भाव ब्रह्म से ही होता है। अपनी विशिष्टाद्वैत वेदान्त सिद्धान्त रखा गया है। इस इच्छानुसार ही ब्रह्म गुणों सहित ईश्वर के रूप में सिद्धान्त में एक विशिष्ट बात यह भी है कि इसका प्रकट होता है और इन्हीं गुणों से जीव और जगत् ब्रह्म सगुण है, वह निर्गुण हो ही नहीं सकता। इसी का सृजन करता है। यों तो ईश्वर सत्, चित् और कारण रामानुज शरणागति को ईश्वर प्राप्ति का आनन्दमय है, पर उसमें आनन्द तत्त्व का प्राधान्य प्रमुख साधन स्वीकार करते हैं। रहता है। ईश्वर सत् और चित् दो ही तत्त्वों से ३. द्वैताद्वैत (भेदाभेद) वेदान्त-निम्बार्काचार्य- जीव का सृजन करता है, इसलिए उसमें (जीव प्रतिपादित इस सिद्धान्त में ईश्वर और जीव में में) ये दो तत्त्व ही रहते हैं। जीव की सृष्टि के
Disclalmer / Warning: All literary and artistic malerial on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 12
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१४ / भूमिका/वेदान्त दर्शन समय वह आनन्द तत्त्व को तिरोहित कर देता है। द्वारा ही ऐसी स्थिति बनती है। इसी कारण इस ईश्वर सृष्टि की उत्पत्ति और संहार लीला के रूप वेदान्त मत का नाम अचिन्त्य-भेदाभेद वेदान्त रखा में करता है। ६- अचिन्त्य-भेदाभेद वेदान्त- इसके प्रवर्त्तक गया है। अस्तु इस मत में ब्रह्म अभिन्न निमित्तोपादान कारण है। अपनी सूक्ष्म शक्ति की स्थिति में कारण मध्वाचार्य के शिष्य चैतन्य महाप्रभु हैं। अन्य तथा स्थूल स्थिति में कार्य भी वही है। इसलिए वैष्णव-वेदान्त सम्प्रदायों के समान अचिन्त्य कार्य-कारण अनन्यत्ववाद ही मान्य है। इसमें एक भेदाभेद वेदान्त भी जगत् की वास्तविक सत्ता को विशेषता यह है कि उपास्य ब्रह्म एवं उसकी शक्ति स्वीकार करता है, साथ ही आचार्य शंकर के को लक्ष्मी-नारायण के ऐश्वर्य रूप के स्थल पर मायावाद का खण्डन भी करता है। इस मत के कृष्ण एवं राधा के माधुर्य-रूप को माना गया है। अनुसार चित् एवं अचित् इन दो शक्तियों से इसमें प्रेमरूपा भक्ति को ही मान्यता दी गयी है। समन्वित ब्रह्म कारण अवस्था में सूक्ष्म शक्ति वाला ब्रह्म की प्रथम शक्ति - चित् शक्ति, दूसरी जीव और कार्यावस्था में स्थूल शक्तिवाला कहलाता शक्ति तथा तीसरी माया शक्ति है, जिसे बहिरंग है। चित्-अचित् शक्तियाँ अपने शक्तिवान् ब्रह्म शक्ति भी कहा जाता है। से स्वरूपतः एक हैं, तथापि स्थूलावस्था में उससे इनके अतिरिक्त स्वामी विवेकानन्द द्वारा भिन्न भी हैं। यह भेद और अभेद अचिन्त्य है। प्रतिपादित व्यावहारिक वेदान्त भी है, जो जन- कारण यह है कि परमेश्वर की अचिन्त्य शक्ति सामान्य के लिए नितान्त उपयोगी है।
व्यावहारिक वेदान्त इस सिद्धान्त के प्रतिपादक स्वामी सत्ता तीनों कालों में अखण्डित नहीं रहती। अतः विवेकानन्द का मानना था कि अद्वैत वेदान्त केवल जगत् मिथ्या न होकर सत्य तो है, पर स्वतन्त्र रूप सिद्धान्त में-कथन मात्र में है। 'सबमें ईश्वर और से परम सत्य नहीं है। ब्रह्म पर आधारित होने से ईश्वर में सब कुछ' आदि मानने के लिए नहीं है, ही उसे सत्य माना जा सकता है। उनकी दृष्टि में वरन् जीवन में प्रयोग करने के लिए है। लाइफ माया शब्द का अर्थ जगत् को पूर्ण भ्रम निरूपित ऑफ विवेकानन्द पृ० २१९ पर रोम्याँ रोलॉ, करना नहीं, वरन् यह है कि जगत् अन्तर्विरोधों से विवेकानन्द का व्याख्यान उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि वेदान्त का ज्ञान दीर्घकाल से गुफाओं एवं युक्त है और इसी सीमा तक उसे अयथार्थ अथवा मिथ्या कहा जा सकता है। विवेकानन्द का वनों में छिपा रहा है। यह भार मेरे ऊपर पड़ा है व्यावहारिक वेदान्त कर्मवाद का समर्थक है। वे कि मैं उसे उसके अज्ञातवास से निकालूँ एवं उसे 'प्रेक्टिकल वेदान्त भाग-१' में कहते हैं- वेदान्त पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन में पहुँचाऊँ। ...... हमसे यह नहीं कहता कि हम अपने को अद्वैतवाद का ढोल सभी स्थानों में-बाजारों में, असहाय मानकर अत्याचारी के सामने घुटने टेक पर्वतों में एवं मैदानों में गूँजेगा। दें। वह कहता है अपना मस्तक ऊँचा करो। विवेकानन्द के अनुसार त्रिकाल बाधित तुममें से हर व्यक्ति के भीतर एक ईश्वर विद्यमान होने के कारण ब्रह्म परम सत्य है, पर जगत् ब्रह्म है। इस प्रकार विवेकानन्द का व्यावहारिक के समान निरपेक्ष सत्य नहीं है। कारण कि उसकी वेदान्त शंकर के अद्वैत वेदान्त का बुद्धिगम्य,
1154RI HII
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 13
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१५ /भूमिका/वेदान्त दर्शन
वैज्ञानिक, प्रेरणाप्रद और कर्मवादी स्वरूप है। है- इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स वेदान्त का धर्म विलक्षणरूपेण विश्व सुपर्णो गरु त्मान् धर्म है। कारण यह है कि यह मूलतः किसी एक मातरिश्वानमाहु: (ऋ० १.१६४.४६) इसी तथ्य व्यक्ति द्वारा संचालित नहीं है। (यह बात अलग को प्रकट करती ऋग्वेद की ही एक अन्य ऋचा है कि इसके अवान्तर भेदों का प्रवर्तन करने वाले द्रष्टव्य है- हंस: शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता आचार्यों के परिचय की दृष्टि से उनके नामों का वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृत सद्व्योम- उल्लेख किया जाता है, पर वे मूल वेदान्त के सदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम्। जनक नहीं हैं।) किसी धर्म के विश्व धर्म होने (ऋग्वेद ४.४०.५) अर्थात् यह हंस स्वरूप आत्मा का लक्षण यह है कि उसे 'अवैयक्तिक' होना ही सूर्य स्वरूप होकर द्युलोक में वास करता है। चाहिए अर्थात् वह किसी व्यक्ति द्वारा चलाया समस्त प्राणियों के निवास का साधन बनकर वायु हुआ नहीं होना चाहिए। जो धर्म किसी व्यक्ति रूप होकर अन्तरिक्ष में परिभ्रमण करता है, अग्नि द्वारा चलाया हुआ होता है, वह विश्व धर्म के के रूप में ही वेदी में स्थित होता है, सोमरस के लक्षणों से समन्वित नहीं हो सकता। जो धर्म किसी रूप में कलश में आपूरित किया जाता है। वही व्यक्ति द्वारा प्रवर्तित होता है, उसके समर्थक या आत्मा मनुष्यों, देवों एवं पक्षियों में विद्यमान है, अनुयायी उसके प्रवर्तक के व्यक्तित्व से बद्ध उसी का निवास जलचरों, वृक्षों और पर्वतादि में होकर, उसी को सर्वोपरि मानते हैं तथा किसी है। वस्तुतः वही आत्म तत्त्व, ऋतस्वरूप परमात्म- और धर्म का आदर नहीं करते। ईसाई, इस्लाम, तत्त्व है। ऋग्वेद के ही एक अन्य मन्त्र में ऋषि बौद्ध आदि इसी प्रकार के धर्म हैं, जो अपनी वामदेव विश्व की विभिन्न विभूतियों को अपना संकीर्णता के दायरे में बँधे रहकर युगानुकूल ही स्वरूप बताते हुए वेदान्त के अद्वैत तत्त्व का सिद्धान्तों को स्वीकार न करके बाबावाक्यं निरूपण करते हैं- प्रमाणम् का राग अलापते हैं, जब कि हमारे अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं कक्षीवाँ प्रातिभचक्षु ऋषियों ने अति प्राचीनकाल में ही ऋषिरस्मि विप्र:। अहं कुत्समार्जुनेयं न्यृञ्जेऽहं अपने चिन्तन वैराट्य का परिचय देते हुए यह कविरुशना पश्यता मा॥ (ऋ० ४.२६.१) घोषणा कर दी थी-एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति। वेदों में वर्णित वेदान्त की ज्ञान-धारा (ऋ० १.१६४.४६) अर्थात् सत्य एक ही है, उपनिषदों में भी प्रवाहित हुई। श्वेताश्वतर उपनिषद् ज्ञानीजन उसका अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं। १.१२-१६ में परमात्मा, जीव और प्रकृति को वेदान्त के प्रमुख आचार्य बादरायण एकमेव ब्रह्म ही निरूपित किया गया है। इसके (व्यास) माने जाते हैं; क्योंकि उन्होंने उसे एक अतिरिक्त इसी उपनिषद् में अन्यत्र तथा स्वतन्त्र दर्शन के रूप में सूत्र रूप में गढ़कर कठोपनिषद् में भी परमात्मा को इन आँखों द्वारा न व्यवस्थित ढंग से सजाया। वास्तव में वेदान्त तो देखे जाने एवं व्यक्ति के हृदय में निवास करने आदिकाल से चला आ रहा है। वेदों, वाला निरूपित किया गया है- उपनिषदों में अनेक स्थलों पर वेदान्त के न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा सिद्धान्तों का दर्शन किया जा सकता है। ऋग्वेद पश्यति कश्चनैनम्। हृदा हृदिस्थं मनसा य की यह ऋचा तो वेदान्त का आधार ही मानी गयी एनमेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति॥ (श्वेता० ४.२०,
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 14
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१६ /भूमिका/वेदान्त दर्शन कठ० ३.२.९) कठोपनिषद् की एक अन्य श्रुति विलक्षणताओं के कारण वेदान्त दर्शन जगत् में में परमात्मा को समस्त जीवों में निवास करने सिरमौर माना जाता है। वाला बताकर उनके (जीवों के) सुख-दुःख से इस प्रकार वेदान्त ऐसा शास्त्र है, जिसका अलिप्त रहने वाला बताया गया है- अनुगमन करके विश्व का कोई भी व्यक्ति सबमें सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षु- अपना आत्म दर्शन करते हुए सबके साथ र्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। मैत्रीपूर्वक और स्नेहपूर्ण व्यवहार करता रहकर, एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न केवल अपने इहलौकिक जीवन को आनन्दपूर्ण न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्य:॥। बना सकता है, वरन् पुरुषार्थ चतुष्टय के अंतिम (कठ० २.२.११) चरण मोक्ष को भी प्राप्त करके जीवन को धन्य इस प्रकार वेदान्त दर्शन का आदि स्रोत बना सकता है। वेद हैं, जहाँ से निःसृत होकर उसकी ज्ञान-धारा उपनिषदों, गीता, रामायर्ण आदि समस्त आर्ष अन्ततः मुण्डकोपनिषद् (३.२.६) के अनुसार यही कहा जा सकता है कि 'जो वेदान्त ग्रन्थों में प्रवाहित हुई है। वेदान्त दर्शन वैयक्तिक ज्ञान द्वारा परमेश्वर को जान चुके हैं और संन्यास और एकदेशीय नहीं है। वह समस्त धर्मों के तथा योग के द्वारा शुद्ध अन्तःकरण वाले हो चुके सार-तत्त्व को अपने में समेटे हुए है एवं उन्हें अपने निकट ही उचित आसन पर स्थान देता है, हैं, ऐसे साधक शरीर त्यागने पर ब्रह्मलोक को
उसमें संसार के सभी धर्मों तथा दार्शनिक मतों प्राप्त होते हैं और परम अमृतत्व का अनुभव करके मुक्तात्मा बन जाते हैं- का समावेश हो जाता है। पाश्चात्य देशों के प्लेटो, स्पिनोजा, काण्ट, हेगल, इमर्सन एवं वेदान्त -विज्ञान-सुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्वाः। स्पेन्सर आदि विद्वानों के दार्शनिक सिद्धान्तों का ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले समर्थन वेदान्त द्वारा करना शक्य है। इन्हीं सब परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 15
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
॥ अथ वेदान्तदर्शनम्॥ ॥ अथ प्रथमाध्याये प्रथम: पादः॥
महर्षि वेदव्यास प्रणीत वेदान्त दर्शन में लघुकाय सूत्रों (शब्दों) में सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड के नायक सर्वशक्तिमान् परब्रह्म के स्वरूप का शास्त्र-समन्वय एवं साङ्गोपाङ्ग प्रतिपादन किया गया है। इसी कारण इस शास्त्र का नाम ब्रह्मसूत्र पड़ा। वेद (ज्ञान) की चरमावस्था का बोध (साक्षात्कार-दर्शन) कराने के कारण इसे वेदान्त दर्शन भी कहा गया है। सूत्रकार ने इस शास्त्र को चार अध्यायों एवं सोलह पादों में निरूपित किया है। प्रथम अध्याय के अन्तर्गत आचार्य ने कहा है कि समस्त वेदान्त-सूत्रों का एकमात्र प्रतिपाद्य जगभ्रियन्ता है। भगवान् वेदव्यास जी ने उस परमात्म तत्त्व का साक्षात्-दर्शन कराने की इच्छा से इस शास्त्र का शुभारम्भ करते हुए जन समुदाय (अनुयायियों) के समक्ष प्रथम सूत्र प्रस्तुत किया- (१) अथातो ब्रह्म जिज्ञासा।।१।। सूत्रार्थ-अथ = अब (शास्त्रों के अध्ययन तथा पुण्यकर्मों के अनुष्ठान आदि से जिज्ञासु का अन्तःकरण शुद्ध हो जाने पर),अतः = यहाँ से, ब्रह्मजिज्ञासा = ब्रह्म को जानने की इच्छा का विवेचन किया जाता है। व्याख्या- मानव देह में आने के पश्चात् जीव को सांसारिक विषय भोगों की कामना स्वभावतः होती है। उन भोग प्राप्ति रूपी कर्मों (यज्ञ-यागादि अनुष्ठान) के बाद जब गुरुकृपा से मोह-ममता का आवरण हटता है, तब यह ज्ञात होता है कि ये समस्त मोह-ममता रूपी कर्मों के भोग-नाशवान् हैं। ऋषि कहते हैं कि तभी से ज्ञानी पुरुष ब्रह्म को जानने की इच्छा करते हुए कहता है कि ब्रह्म कौन है? इसका स्वरूप क्या है? वेदान्त में इस ब्रह्म जिज्ञासा सम्बन्धी तथ्यों की इस शास्त्र में विवेचन-समीक्षा (मीमांसा) प्रारम्भ की जाती है। उपर्युक्त सूत्र में जिस ब्रह्म को जानने की इच्छा व्यक्त की गई है, अब अगले सूत्र में उसी का लक्षण सूत्रकार बतलाते हैं- ( २ ) जन्माद्यस्ययतः ॥२। सूत्रार्थ- जन्मादि = जन्म आदि अर्थात् (उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय), अस्य = इस (जगत्) के, यतः = जिससे (होते हैं, वही ब्रह्म है)। व्याख्या-सर्वसाधारण के देखने, श्रवण करने और अनुभव में आने वाले इस जगत् के जन्म आदि अर्थात् उत्पत्ति- रचना, स्थिति एवं प्रलय जिनके द्वारा होती है तथा जो सर्वशक्तिमान् सत्ता प्रलय के अन्त में सम्पूर्ण विश्व को अपने में लीन कर लेती है, वही परमात्मा-ब्रह्म है। प्रस्तुत सूत्र का निर्देशन अदृश्य ब्रह्म के अस्तित्व को समझाने के लिए किया गया है। किसी के अस्तित्व को लक्षण एवं प्रमाण से ही पुष्ट किया जाता है। लक्षण के दो भेद होते हैं- प्रथम लक्षण का नाम तटस्थ और द्वितीय का नाम स्वरूप लक्षण। यहाँ सूत्र में ब्रह्म का तटस्थ लक्षण बतलाया गया है। यह जगत् उत्पन्न होने वाला पदार्थ है। प्रत्येक पदार्थ जिसका अस्तित्व है, उसका कोई न कोई उत्पत्ति-कर्त्ता निश्चित
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 16
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१८ वदान्त दशन होता है तथा वह चैतन्यमय भी अवश्य होगा। जैसे- घड़े का निर्माता कुम्भकार तथा कटक-कुण्डल आदि का निर्माता सुवर्णकार होता है। इस प्रकार से प्रादुर्भूत होने वाले इस विश्व ब्रह्माण्ड का उत्पत्ति-कर्त्ता अवश्य होना चाहिए। प्रादुर्भूत होने वाली वस्तु एक निश्चित समय के बाद नष्ट भी हो जाती है, अतः इस जगत्- की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय का जो नियामक चेतन तत्त्व है, वही बह्म है। ब्रह्म का यह लक्षण (सर्वशक्तिमत्ता, जगत् की सृष्टि, स्थिति, प्रलय का गुण आदि) तटस्थ लक्षण कहा जायेगा॥२॥ आर्ष ग्रन्थों में ब्रह्म को अकर्त्ता, अभोक्ता, अव्यक्त, अचिन्त्य आदि विशेषणों से युक्त कहा गया है। इसलिए यहाँ पर शङ्का होती है कि उसे इस जगत् की जन्मादि-उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कारण कैसे मान लिया गया? इसी सम्बन्ध में अगले सूत्र में ऋषि कहते हैं- ( ३ ) शास्त्रयोनित्वात् ॥३॥ सूत्रार्थ- शास्त्र = शास्त्र (वेद) में उस ब्रह्म को जगत् का, योनित्वात् = कारण कहा गया है। इसलिए ब्रह्म के अस्तित्व का बोध होने से उसे जगत् का कारण मानना ठीक है। व्याख्या- वेदादि आर्षग्रन्थों में उस ब्रह्म को जगत् का कारण बतलाया गया है; क्योंकि समस्त वेद-शास्त्र उस ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करते हैं। वेदार्थ का चिन्तन करने पर नश्वर एवं नित्यवस्तु का शनैः-शनैः सद्ज्ञान होने लगता है। सद्ज्ञान की प्राप्ति होने पर सांसारिक कर्मों एवं विषय भोगों से धीरे-धीरे विराग और ब्रह्म प्राप्ति में सन्निकटता होने लगती है। शास्त्रों में जिस ब्रह्म को सत्य, ज्ञान, अनन्त आदि विशेषणों से सम्बोधित किया गया है, उसे जगत् का सर्जन करने वाला भी कहा गया है। अतः वेद-शास्त्र ही ब्रह्म के लक्षण में सटीक प्रमाण हैं।।३।। मिट्टी आदि से घट आदि की सर्जना करने वाले कुम्भकार आदि की भाँति ब्रह्म को जगत् का निमित्त कारण बतलाना तो उचित है; किन्तु उसे उपादान कारण कैसे माना जा सकता है? इसका समाधान अगले सूत्र में करते हुए सूत्रकार कहते हैं- (४) तत्तु समन्वयात् ॥४॥। सूत्रार्थ- तत् = वह (ब्रह्म), तु = तो, समन्वयात् = शास्त्रों के समन्वय से सिद्ध है कि सम्पूर्ण विश्व में पूर्णरूप से संव्याप्त होने से उपादान भी है। व्याख्या-जिस प्रकार से अनुमान प्रमाण एवं ऋग्वेदादि शास्त्र प्रमाण के समन्वय से यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगत् एवं शास्त्रादि का कारण वह ब्रह्म ही है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है कि वह ब्रह्म ही इसका उपादान कारण भी है। इससे यह सिद्ध हुआ कि प्रत्येक अणु में भी वह ब्रह्म स्थित है; क्योंकि वह इस विश्व में पूरी तरह से अनुगत (संव्याप्त) है। प्रत्येक अणु उससे अलग नहीं है। अतः वह (ब्रह्म) इस जगत् का रचने वाला होने के साथ -साथ रचना करने का साधन भी है। गीताकार ने भी अ. १०/३९ एवं अ. ९/४ में कहा है कि चर या अचर, जड़ या चेतन दोनों में कोई भी ऐसा प्राणी नहीं है, जो मुझसे अलग हो अथवा मैं उसमें न होऊँ। यह सम्पूर्ण विश्व मुझसे व्याप्त है। उपनिषदों ने भी जगह-जगह पर कहा है कि वह ब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत् के कण-कण में संव्याप्त (तत् सृष्टवा तदेवानुप्राविशत्) है॥४॥ *यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि 'समन्वयात्' का सामान्य अर्थ शास्त्र-समन्वय से है; किन्तु अच्छा हो, इसे सृष्टि समन्वय से जुड़ा माना जाए। सृष्टि के विभिन्न उपादानों (जड़-चेतन, ग्रह-नक्षत्र इत्यादि) के बीच जो सन्तुलन- समन्वय बना हुआ है, वह ब्रह्म का ही प्रमाण है। व्यापि रूप हेतु से जगत् का उपादान कारण ब्रह्म को ही क्यों माना जाए? प्रकृति को क्यों न मानें ? इसी का समाधान अगले सूत्र में ऋषि करते हैं-
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 17
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० १ सूत्र ७ १९
(५) ईक्षतेर्नाशब्दम्॥५॥ सूत्रार्थ- ईक्षते: = ईक्षण क्रिया द्वारा, अशब्दम् = शब्द प्रमाणरहित प्रधान (त्रिगुणात्मिका जड़ प्रकृति), न = जगत् का कारण नहीं है। व्याख्या- ब्रह्म की ईक्षण-संकल्प क्रिया के द्वारा यह प्रमाणित होता है कि ईश्वर अशब्द-अप्रमाण नहीं है। उपनिषदों में सृष्टि-प्रसङ्ग के क्रम में 'ईक्ष' धातु के क्रिया प्रयोग मिलते हैं। छा.उ.६/२/३ में देखें- 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय।' अर्थात् उस सत् ने ईक्षण-संकल्प किया कि मैं बहुत हो जाऊँ। इसी तरह ऐतरेय उपनिषद् में देखें- 'स ईक्षत लोकान्रु सृजै' (ऐत. उ. १/१/१) अर्थात् उस (सत्) ने ईक्षण-संकल्प किया कि मैं लोकों की रचना करूँ; किन्तु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड़ है, उसमें ईक्षण या संकल्प शक्ति का अभाव है; क्योंकि वह ईक्षण चैतन्य तत्त्व का लक्षण है। अतः शब्द प्रमाण से रहित जड़ प्रकृति को जगत् का उपादान कारण नहीं माना जा सकता है। इस प्रकार उक्त औपनिषदिक प्रमाणों से यह सिद्ध हो जाता है कि वेद का कारण रूप ब्रह्म ईक्षण-संकल्पवान् है, शब्द रहित या जड़ नहीं है। अतः ब्रह्म का शब्द रूप होना पूर्ण रूपेण सिद्ध है॥५॥ यहाँ यह आशंका हो सकती है कि यदि गौण रूप से ईक्षण क्रिया जड़-प्रकृति के साथ हो सकती है, तो विश्व रचना वाले ब्रह्म को जड़ ही क्यों न मान लिया जाए? इसी आशंका का समाधान सूत्रकार दे रहे हैं- ( ६ ) गौणश्चेन्नात्मशब्दात्॥६॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि ऐसा कहें कि, गौण: = गौण वृत्ति से ईक्षण का प्रयोग (प्रकृति के लिए) हुआ है, न = तो यह उचित नहीं, आत्मशब्दात् = क्योंकि वहाँ 'आत्म' शब्द का प्रयोग हुआ है। व्याख्या- त्रिगुणात्मिका जड़-प्रकृति के साथ ईक्षण क्रिया (संकल्प) का प्रयोग मानना उचित नहीं है; क्योंकि आर्षग्रन्थों में ईक्षण क्रिया के साथ-साथ 'आत्म' शब्द भी प्रयुक्त हुआ है। प्रकृति को 'आत्मा' नहीं कहा जा सकता। उपर्युक्त पाँचवें सूत्र में उद्धृत् की हुई छान्दोग्य एवं ऐतरेय की श्रुति में ईक्षण का कर्त्ता आत्मा को कहा गया है। अतः गौण-वृत्ति से भी उसका संसर्ग प्रकृति के साथ कदापि संभव नहीं हो सकता। इस प्रकार प्रकृति को जगत् का कारण स्वीकार करना शास्त्रानुकूल संभव नहीं है। छान्दोग्य में उल्लेख मिलता है- 'तत्तेजोऽसृजत' अर्थात्- उस ब्रह्म ने तेज की सर्जना (रचना) की। आगे पुनः कहा है कि उस देव (ब्रह्म) ने इच्छा-विचार किया कि इन तीनों देवों (तेज, जल, अन्न) में इस जीवात्मा के सहित प्रवेश करके नाम एवं रूप को प्रकट करूँ। यदि प्रकृति के लिए ऐसा कहा गया होता, तो उसे अपने संकल्प का अनुभव ही नहीं होता। अतः ब्रह्म को जड़-प्रकृति नहीं माना जा सकता॥६॥ ब्रह्म के चित्-स्वरूप होने में सूत्रकार एक अन्य हेतु अगले सूत्र में सूत्रित कर रहे हैं- (७) तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात्।।७।। सूत्रार्थ- तत् = उस (ब्रह्म) में, निष्ठस्य = निष्ठा रखने वाले की, मोक्षोपदेशात् = मुक्ति प्राप्ति का उपदेश कहा गया है। व्याख्या-उस (ब्रह्म) में पूर्णरूपेण निष्ठा रखने वाले आत्मज्ञानी को ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रकार का उपदेश वेद-शास्त्रों में होने से ज्ञात होता है कि ब्रह्म चित्स्वरूप है। जो साधक उस अविनाशी ब्रह्म में अटूट निष्ठा रखता है, वही सच्चा मुक्ति प्राप्ति का अधिकारी होता है; क्योंकि प्रकृति में निष्ठा रखने वालों को मोक्ष-प्राप्ति असम्भव है। यदि ब्रह्म चेतना शून्य होता, तो उसके प्रति निष्ठा रखने वाले को मोक्ष का उपदेश कभी न दिया जाता। तैत्तिरीय उपनिषद् के अनुसार ब्रह्म में निष्ठा रखने वाले साधक की मुक्ति निश्चित है। यजुष् ३१/१८ में भी वर्णन मिलता है कि उस ब्रह्म पुरुष को जानकर ही
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the websle can be used for propagation with prior written consent.
Page 18
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
२० वेदान्त दर्शन मनुष्य जन्म-मृत्यु के बन्धन काटकर मुक्त हो जाता है। मोक्ष-प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त अन्य और कोई मार्ग नहीं है। जो उस ब्रह्म को जान लेता है,उसे मृत्यु का भय नहीं होता। अतः 'आत्मा' शब्द प्रकृति वाची नहीं है। इसी कारण प्रकृति जगत् का कारण नहीं, ब्रह्म ही जगत् का मूल कारण है।।9।। 'आत्मा' शब्द प्रकृति-वाची नहीं हो सकता। इसी की पुष्टि के लिए एक और हेतु सूत्रकार सूत्रित कर रहे हैं- (८) हेयत्वावचनाच्च।८।। सूत्रार्थ- हेयत्त्व = त्यागने योग्य के भाव से, च = भी, अवचनात् = नहीं कहा गया है। व्याख्या- यहाँ सूत्र में आत्मतत्त्व को हेय-त्यागने योग्य नहीं कहा गया है। जड़ रूप में अवस्थित सम्पूर्ण विश्व को हेय कहकर उससे अलग (परे) आत्मतत्त्व का ही निर्देशन किया गया है। इस कारण हेय जगत् से पृथक् ब्रह्म का चित् रूप होना स्पष्टतः सिद्ध होता है। यदि ब्रह्म गौण एवं अचेतन होता, तो मुक्ति का उपदेश करने वाले वेदान्त कथन उसे त्याज्य कहते और मुक्तिप्राप्ति की इच्छा वाले लोग उस बह्म की उपासना कभी नहीं करते। समस्त शास्त्र ब्रह्म से विपरीत विषयों का परित्याग करने का ही उपदेश देते हैं, किन्तु ब्रह्म का त्याग करने का कहीं भी निर्देश नहीं मिलता। इसलिए 'आत्मा' शब्द ब्रह्म का वाची है और वही इस जगत् का निमित्त एवं उपादान कारण भी है। यह प्रकृति वाची नहीं हो सकता॥८॥ 'आत्मा' की ही तरह से 'सत्' शब्द भी प्रकृति-वाची नहीं है। इसकी पुष्टि हेतु एक दूसरा कारण सूत्रकार सूत्रित कर रहे हैं- (९) स्वाप्ययात्॥९॥ सूत्रार्थ-स्व= स्वयं-अपने में, अप्ययात् - लीन होने के कारण ('सत्' शब्द भी जड़-प्रकृति वाची नहीं हो सकता)। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा स्वयं अपने-आप में ही लीन हो जाता है या फिर उसके द्वारा उद्भूत जगत् उसी में लय हो जाता है। यदि ब्रह्म सगुण होता, तो वह स्वयं लीन होने वाला नहीं कहा जा सकता। छान्दोग्य ६/ ८/१ के अनुसार- 'हे सोम्य! जिस अवस्था में यह जीवात्मा सोता है, उसी समय यह सत् (अपने कारण) से सम्पन्न होता है। सम्पन्न अर्थात् सुषुप्त जीव अपने कारण रूप ब्रह्म में लीन हो जाता है। सत् सम्पन्न जीव का लीन होना प्रकृति में संभव नहीं है। यह तो मात्र निर्गुण एवं पूर्ण ब्रह्म में ही संभव है। प्रस्तुत प्रसङ्ग में जिस सत् तत्त्व को सम्पूर्ण विश्व का कारण बतलाया गया है, उसी में जीवात्मा का विलीन होना भी बतलाया गया है तथा उस सत् को उसी का स्वरूप कहा गया है। इसलिए यहाँ 'सत्' नाम से कहा हुआ जगत् का कारण जड़वत्-प्रकृति नहीं हो सकता ॥।९॥ अगले सूत्र में आचार्य पुनः इस तथ्य का प्रतिपादन कर रहे हैं- (१० ) गतिसामान्यात्॥१०॥ सूत्रार्थ- गति = समस्त श्रुति-वाक्यों का प्रवाह, सामान्यात् = समान रूप से चेतन-ब्रह्म को ही जगत् का कारण बतलाने के पक्ष में है। (अतः जड़ प्रकृति को जगत् का कारण नहीं कहा जा सकता।) व्याख्या-समस्त वेद-वाक्य-समूह सम्यक् रूप से निर्गुण ब्रह्म को ही जगत् का कारण मानते हैं। यहाँ सूत्र में 'गति' शब्द का अर्थ मुक्ति भी कहा गया है। विज्ञानघन सर्वशक्तिमान् सत्-तत्त्व रूप जगत्कारण ब्रह्म ही उपासित होकर मुक्ति देता है। सभी आर्ष ग्रन्थ समान रूप से उस अविनाशी ब्रह्म को एक रस-रूप में स्वीकारते हैं। उपनिषद्कार इसी ब्रह्म के द्वारा ही प्राण का उद्भव बतलाते हैं। उसी अविनाशी चैतन्यतत्त्व के
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 19
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० १ सूत्र १२ २१ द्वारा ही मन के सहित सभी इन्द्रियों, आकाश, वायु, तेज, जल एवं पृथिवी आदि तत्त्वों का निर्माण होता है। ये समस्त कार्य जड़-प्रकृति के द्वारा किसी भी हालत में सम्पन्न नहीं किये जा सकते हैं। इस प्रकार से समस्त वेद-वाक्य (आर्ष प्रमाण) पूर्ण रूप से चेतन-ब्रह्म को ही जगत् का कारण मानते हैं। अतः त्रिगुणात्मिका- जड़-प्रकृति को जगत् का कारण नहीं माना जा सकता है॥१०। *'गति' का अर्थ श्रुति वाक्यों के प्रवाह के साथ-साथ 'दिशा' से लेना अधिक युक्तिसंगत प्रतीत होता है। ब्रह्म स्वयं में लीन होता है, यह उसकी गति है; प्रकृति स्वयं में लीन नहीं होती, वह अन्ततः ब्रह्म में ही लीन होती है। अतः गति सामान्य से वह जड़- प्रकृति सृष्टि का कारण नहीं हो सकती। अगले सूत्र में आचार्य पुनः इसी कथन को श्रुति के प्रमाणों द्वारा प्रतिपादित करते हुए उक्त प्रकरण को समाप्त करते हैं- (११ ) श्रुतत्वाच्च॥११॥ सूत्रार्थ- श्रुतत्वात् = श्रुतियों द्वारा यत्र-तत्र सर्वत्र यही तथ्य प्रतिपादित किया गया है; अतः, च = भी (ब्रह्म ही जगत् का कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या- श्रुतियों द्वारा स्थान-स्थान पर ब्रह्म को ही जगत् का कर्त्ता-धर्त्ता बतलाया गया है। इसके साथ ही ब्रह्म को सभी का परम कारण एवं समस्त कारणों का अधिपति कहा गया है। ब्रह्म अजन्मा है, अतः उनका कोई निर्माता (पिता) नहीं है; किन्तु प्रकृति का जन्मदाता वही अजन्मा ब्रह्म ही है। श्रुतियों ने ब्रह्म को निर्गुण बतलाया है, अतः वह कहने योग्य भी है। न कहने योग्य वस्तु श्रुतियों का मुख्य प्रतिपादक विषय कदापि नहीं हो सकती। श्वेताश्वतर उपनिषद् ६/९ के अनुसार वह ब्रह्म सभी तत्त्वों का परम कारण एवं समस्त कारणों के अधिष्ठाताओं का भी अधिपति है। कोई भी न तो इस ब्रह्म का जनक है और न ही स्वामी है (स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न पाधिपः)। इसी उपनिषद् के ६/१६ में ऋषि कहते हैं कि वह ब्रह्म सम्पूर्ण जगत् का स्रष्टा है (स विश्वकृत्)। मुण्डक उप० २/१/९ कहती है कि 'इस ब्रह्म से ही सभी समुद्र एवं पर्वत प्रकट हुए हैं (अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे)।' अतः श्रुति प्रमाण द्वारा स्पष्ट हो जाता है कि वह सर्वाधार ब्रह्म ही सम्पूर्ण विश्व का रचनाकार एवं उपादान कारण है, जड़-प्रकृति नहीं ॥११॥ सम्पूर्ण जगत् का मूल उपादान-कारण ब्रह्म को बतलाने के पश्चात् अब अगले सूत्र से उस ब्रह्म के आनन्दमय स्वरूप का वर्णन किया जा रहा है। यहाँ आनन्दमय नाम से उस सर्वशक्तिमान् ब्रह्म का ही प्रतिपादन सूत्रकार कर रहे हैं- ( १२ ) आनन्दमयोऽभ्यासात्॥१२। सूत्रार्थ- आनन्दमय: = आनन्दमय (ब्रह्म), अभ्यासात् = बारम्बार अभ्यास से ही साध्य है। व्याख्या-आनन्दमय ब्रह्म के बारम्बार संकीर्तन (अभ्यास) से सहज ही सिद्ध हो जाता है कि प्रकृति जगत् की कारणरूपा नहीं है। श्रुतियों ने 'आनन्द' शब्द का बारम्बार प्रयोग परब्रह्म के निमित्त ही किया है। ज्ञानीजन भी उसी ब्रह्म-सत्ता का निरन्तर अभ्यासपूर्वक ध्यान करते रहते हैं। इसी से उन्हें मोक्ष एवं ब्रह्म-पद की प्राप्ति संभव होती है। अतः ब्रह्म ही आनन्दमय है, प्रकृति नहीं। उपनिषदों में 'आनन्द' शब्द का ब्रह्म के अर्थ में बहुतायत से प्रयोग हुआ है। तैत्तिरीयोपनिषद् की ब्रह्मवल्ली के छठें व सातवें अनुवाक में आनन्दमय का उल्लेख मिलता है- वह ब्रह्म आनन्दमय रसस्वरूप है। यह जीवात्मा इस रस स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त कर आनन्दमय हो जाता है। यदि वह ब्रह्म आकाश के सदृश पूर्ण आनन्दमय न होता, तो कौन जीवित रह पाता। कौन प्राणों में गति कर पाता? वास्तव में यह ब्रह्म ही सबका आनन्द प्रदाता है। इसी उपनिषद् के २/८, २/९,
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 20
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
२२ वेदान्त दर्शन ३/६ और बृह. उप. ३/९/२८ में भी प्रचुरता से 'आनन्द' एवं 'आनन्दमय' शब्द परब्रह्म के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अतः 'आनन्दमय' नाम से यहाँ उस जगन्नियन्ता आत्मस्वरूप परब्रह्म का ही वर्णन श्रुतियों में मिलता है और अन्य किसी का या जड़-प्रकृति आदि का कदापि उल्लेख नहीं है।१२।। यहाँ आशंका होती है कि आनन्दमय शब्द में जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकार अर्थ का बोधक है और ब्रह्म विकार-रहित है। अतः जिस तरह से अन्नमय आदि शब्द ब्रह्म के वाची नहीं हैं, उसी तरह उन्हीं के साथ आया हुआ यह 'आनन्दमय' शब्द भी ब्रह्म का वाची नहीं होना चाहिए? उक्त आशंका का समाधान आचार्य इस अगले सूत्र में कर रहे हैं- (१३) विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात्॥१३।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि, विकारशब्दात् = आनन्दमय शब्द से विकारार्थक मयट् प्रत्यय का बोध होने से, इति = ऐसा कहे कि ब्रह्मविकार रहित है। न = तो यह कहना उचित नहीं (क्योंकि), प्राचुर्यात् = मयट् प्रत्यय का बोध यहाँ प्रचुरता के अर्थ में होता है। व्याख्या-व्याकरण के प्रणेता महर्षि पाणिनि के सूत्र- 'तत्प्रकृतवचने मयट्' (५/४/२१) के अनुसार 'मयट्' प्रत्यय विकारार्थक का बोधक नहीं; बल्कि प्रचुरता के अर्थ का बोध कराता है अर्थात् वह अविनाशी ब्रह्म आनन्दघन है। अतः यह कहना उचित नहीं, कि 'आनन्दमय' शब्द ब्रह्म का वाचक नहीं होता। परब्रह्म परमात्मा 'आनन्दघन' स्वरूप है, इसलिए उस अविनाशी ब्रह्म को 'आनन्दमय' कहा जाना सर्वथा न्यायोचित है। इसमें किसी भी तरह की आशंका नहीं करनी चाहिए॥१३।। यहाँ 'आनन्दमय' शब्द में 'मयट्' प्रत्यय प्रचुरता के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसी की पुष्टि हेतु आचार्य एक अन्य हेतु बतला रहे हैं- (१४) तद्देतुव्यपदेशाच्च॥१४॥ सूत्रार्थ- तद् = उपनिषदों में उस (ब्रह्म) को आनन्द का, हेतुः= हेतु (कारण), व्यपदेशात् = कहा जाने से, च = भी (यहाँ 'मयट्' प्रत्यय ब्रह्म का ही प्रतिपादक है, विकार अर्थ का बोधक नहीं)। व्याख्या- उपनिषदों में ब्रह्म को आनन्द का हेतु बतलाया गया है। तैत्ति.उप. २/७ में कहा है- 'एष ह्येवानन्दयाति।' जो सभी को आनन्द देता है, वह स्वयं ही आनन्दघन है। अतः आनन्दमय शब्द विकार का बोधक नहीं है। जो आनन्द का कारण होगा, उसी से आनन्द की प्राप्ति हो सकती है। इसलिए 'आनन्द' के साथ 'मय' यहाँ विकार का बोधक नहीं, प्रचुरता का बोध कराने वाला है। जो आनन्दमय है वही अन्यों को आनन्दमय बना सकता है। प्रायः लोक में देखने को मिलता है कि जो धन से दूसरों को धनवान् बना देता है, वह स्वयं ही प्रचुर धनवाला होता है। जो दूसरों को ब्रह्मज्ञान के द्वारा ब्रह्मज्ञानी बना देता है, वह निश्चित ही प्रचुर पूर्ण ज्ञानी होता है। ऐसे ही जीवात्माओं को आनन्द प्रदान करने वाला ब्रह्म भी अवश्य प्रचुर आनन्दवाला होना चाहिए। अतः 'आनन्दमय' पद में 'मयट्' प्रत्यय प्रचुर अर्थ में समझना चाहिए। इसलिए यह पद प्रस्तुत प्रकरण में ब्रह्म का बोधक है, जो ब्रह्म के आनन्दमय रूप को प्रकट करता है ॥१४॥ पाँचवें (आनन्दमय) कोश के रूप में वर्णित ब्रह्म को जो शास्त्रों में 'गुहाहित' कहा गया है, क्या ब्रह्म का ऐसा वर्णन वेद के अनुसार है? या वैदिक वर्णन से अतिरिक्त रूप में ब्रह्म का ऐसा वर्णन किया गया है? इसी आशंका का सूत्रकार समाधान कर रहे हैं- (१५) मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते॥१५॥ सूत्रार्थ- च = तथा, मान्त्रवर्णिकम् = मन्त्राक्षरों में जिस ब्रह्म का वर्णन किया गया है, एव = (उसका) ही, गीयते = (यहाँ) यशोगान हुआ है।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 21
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० १ सूत्र १७ २३ व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद् की ब्रह्मानन्दवल्ली (२/५) में पञ्चम कोश के रूप में सबसे भीतर गुहा में स्थित ब्रह्म का उल्लेख है, उसी का वर्णन वेदों में भी मिलता है। उसी (ब्रह्म) की महिमा का यशोगान उपनिषद् आदि समस्त श्रुतियों में किया गया है। वह परब्रह्म विशुद्ध आकाश स्वरूप परम धाम में रहते हुए ही सभी के हृदय में गुह्य रूप में अवस्थित है। जो उसे जान लेता है, वह सभी को अच्छी तरह से जानने वाले ब्रह्म के साथ समस्त भोगों का अनुभव करता है। यहाँ सूत्र में मन्त्र द्वारा वर्णित ब्रह्म को 'मान्त्रवर्णिक' कहा गया है। जिस प्रकार उक्त सूत्र में उस ब्रह्म को सभी का आत्मा कहा गया है, उसी प्रकार ब्राह्मण ग्रंथों में भी 'आनन्दमय' को सभी का आत्मा कहा गया है। इसलिए दोनों ग्रन्थों में वर्णित एकता के लिए यही मानना ठीक है कि 'आनन्दमय' शब्द यहाँ ब्रह्म का बोधक है। वह जीव का बोधक कदापि नहीं हो सकता॥१५॥ अब यह आशंका होती है कि 'आनन्दमय' शब्द को जीवात्मा का वाचक मान लिया जाए, तो क्या आपत्ति है? इसी का समाधान अगले सूत्र में किया जा रहा है- (१६ ) नेतरोऽनुपपत्तेः ॥१६॥ सूत्रार्थ- इतर: = ब्रह्म से अलग जो जीवात्मा है, वह, न = आनन्दमय नहीं हो सकता, अनुपपत्तेः = क्योंकि उक्त प्रकरण के वर्णन से यह बात प्रमाणित नहीं होती। व्याख्या- उपर्युक्त प्रमाणों से यह पुष्ट हो गया है कि 'आनन्दमय' ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई भी सिद्ध नहीं हो सकता। यदि जीवात्मा आनन्दस्वरूप होता, तो वह भिन्न-भिन्न योनियों में दुःख पाता हुआ क्यों भटकता फिरता? अतः यहाँ जीवात्मा को आनन्दमय कहना उचित नहीं है। तैत्ति. उप. २/६ में 'आनन्दमय' का वर्णन करने के पश्चात् यह कहा गया है- उस आनन्दमय ब्रह्म ने यह इच्छा की है कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, फिर उसने तप किया। तप के बाद शक्ति मिलने पर सम्पूर्ण जगत् की रचना की। यह कथन मात्र ब्रह्म के लिए ही है। जीवात्मा के अनुकूल नहीं; क्योंकि यह (जीव) अल्पज्ञ एवं अल्प शक्ति वाला है। इस विराट् जगत् की रचना जैसे महत् कार्य करने की शक्ति-सामर्थ्य इसमें नहीं है। इसलिए 'आनन्दमय' शब्द जीवात्मा का वाची कदापि नहीं हो सकता है॥१६।। अगले सूत्र में उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि के लिए आचार्य एक अन्य कारण बतला रहे हैं- (१७ ) भेदव्यपदेशाच्च ॥१७।। सूत्रार्थ- भेदव्यपदेशात् = जीवात्मा एवं परमात्मा में भेद कहे जाने से, च = भी ('आनन्दमय' शब्द जीवात्मा का वाचक नहीं कहा जा सकता)। व्याख्या- तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्मानन्दवल्ली के सातवें अनुवाक् में कहा है - 'रसो वै सः' अर्थात्- वह (ब्रह्म) आनन्दमय-रस स्वरूप है। वह असीम आनन्द का आश्रय एवं सार है। उस 'रस' को पाकर जीवात्मा आनन्दयुक्त होता है। सूत्र में जीवात्मा और आनन्दस्वरूप ब्रह्म को परस्पर पृथक् कहा गया है। उपनिषद्कार आगे कहते हैं- 'रस ह्येवायं लब्धवानन्दी भवति' अर्थात् जीवात्मा आनन्द प्राप्त करने वाला है और परमात्मा (ब्रह्म) आनन्द प्रदाता है। आनन्द लाभ प्राप्त करने वाला स्वयं आनन्द प्रदाता कभी नहीं हो सकता। इसके अलावा यदि जीवात्मा आनन्दमय होता, तो उसे फिर दूसरे से आनन्द का लाभ प्राप्त करने की जरूरत ही क्यों होती? अनुवाक में आगे आचार्य कहते हैं- 'एष ह्येवानन्दयाति' (तैत्ति. २/७), अर्थात् जो स्वयं आनन्दमय है, वही दूसरों को आनन्द दे सकता है। अतः आनन्द प्रदाता ब्रह्म स्वयं ही आनन्दमय है। वह जीवात्मा तो उस आनन्दमय ब्रह्म को पाकर उस ब्रह्म के अंशमात्र का ही उपभोग करने वाला है। इस प्रकार से दोनों का भेद सिद्ध होता है। अतः जीवात्मा को आनन्दमय कदापि नहीं कहा जा सकता।१७।।
Disclaimer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 22
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
२४ वदान्त दशन अगले सूत्र में आचार्य समाधान देते हुए कहते हैं कि 'आनन्दमय' शब्द से त्रिगुणात्मिका जड़-प्रकृति को स्वीकार नहीं किया जा सकता- ( १८) कामाच्च नानुमानापेक्षा॥१८॥ सूत्रार्थ- कामात् = कामना से, च = भी, अनुमानापेक्षा = अनुमान प्रमाण से जाने गये की अपेक्षा से, न = नहीं है। व्याख्या- श्रुति में आनन्दमय की प्राप्ति से जीवात्मा के समस्त कामनाओं के पूर्ण होने का वर्णन किया गया है। अतः शब्द द्वारा साक्षात् कहे गये अर्थ के समक्ष मात्र अनुमान प्रमाण के आधार पर आनन्दमय शब्द से त्रिगुणात्मिका-जड़ प्रकृति को स्वीकारने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यहाँ आनन्दमय में कामना भाव प्रदर्शित हुआ है। उपनिषदों में जहाँ भी 'आनन्दमय' का प्रसङ्ग आया है, वहाँ पर 'सोऽकामयत्' अर्थात् उसने इच्छा की, कि मैं सृष्टि की रचना करूँ। इस वाक्य-कथन के द्वारा आनन्दमय (ब्रह्म) में सृष्टि-रचना रूप कामना का होना कहा गया है, जो त्रिगुणात्मिका जड़-प्रकृति को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसमें आनन्द का आरोप करने की कामना भी अपेक्षित नहीं है॥१८॥ ब्रह्म के अतिरिक्त जड़-प्रकृति या जीवात्मा कोई भी 'आनन्दमय' शब्द से स्वीकृत नहीं हो सकता। इसी नथ्य की पुष्टि करते हुए आचार्य प्रकरण को समाप्त कर रहे हैं- (१९) अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति॥१९।। सूत्रार्थ-अस्मिन् = इस आनन्दमय ब्रह्म में, अस्य = इस (जीवात्मा) का, च = भी, तद्योगम् = उस (ब्रह्म) के साथ सम्बन्ध, शास्ति = शास्त्र बतलाते हैं अर्थात् आनन्दमय ब्रह्म में जीवात्मा का आनन्द प्रासि रूप से सम्बन्ध भी शास्त्रों ने कहा है। व्याख्या- शास्त्रों में ऐसा वर्णन प्राप्त होता है कि परमात्मा के आनन्दमय तत्त्व का ज्ञाता जीवात्मा उसी ब्रह्म में मिल जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद् २/८ में जीवात्मा की आनन्दमयादि सांसारिक अवस्था का वर्णन करते हुए ऋषि कहते हैं कि वह अन्त में मुक्तावस्था अर्थात् आनन्दमय ब्रह्म की प्राप्ति कर लेता है। ब्रह्म में अटूट विश्वास रखते हुए अभ्यासपूर्वक समाधि द्वारा जब जीवात्मा आत्मसाक्षात् कर लेता है, तब वह आनन्दमय ब्रह्म में मिल जाता है। यह जीवात्मा की उच्चतम अवस्था है। इसे ही मोक्ष कहा जाता है। बृहदारण्यक ४/४/६ में वर्णन है कि (निष्काम-आपकाम पुरुष) ब्रह्ममय होकर ब्रह्म में ही लीन होता है। श्रुति के इन प्रमाणों से स्वतः ही सिद्ध है कि जड़ प्रकृति या जीवात्मा को आनन्दमय नहीं कहा जा सकता; क्योंकि जीवात्मा का जड़ प्रकृति में या अपनी ही तरह के परतन्त्र किसी अन्य जीव में लय होते नहीं बन सकता। अतः एक मात्र ब्रह्म को ही 'आनन्दमय' शब्द से सम्मानित किया जा सकता है। वही समस्त विश्व का कारण है, अन्य कोई नहीं ॥१९॥ जिज्ञासा होती है कि श्रुति (तै.उ. एवं बृह.उ. ४/४/२२) में वर्णित विज्ञानमय शब्द जीवात्मा है या ब्रह्म? ऐसे ही सूर्य मण्डल के मध्य स्थित हिरण्मय पुरुष देवता है या ब्रह्म ? यहाँ सूत्र में इसी का समाधान करने के लिए सूत्रकार अन्तः पद निर्देश वाले प्रसङ्ग का आरम्भ करते हैं- (२०) अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्॥।२० ।। सूत्रार्थ- अन्तः = अन्तः करण (हृदय) में विद्यमान 'विज्ञानमय' एवं सूर्यमण्डल में स्थित 'जो हिरण्यमय पुरुष' है। तत् = उस (ब्रह्म) के, धर्मोपदेशात् = धर्म का उपेदश किया गया है। व्याख्या- यहाँ आचार्य कहते हैं कि हृदय के अन्तर्गत जो पुरुष है या सूर्य मण्डल के मध्य में जो स्थित है, वह ब्रह्म ही है। यजुष् अ. ३१ में संकेत मिलता है कि प्रजापति का धर्म इस जगत् का अन्तर्वर्ती होना है अर्थात् वह ब्रह्म जगत् का कर्त्ता तो है, साथ ही वह जगत् के अन्तः (अणु-अणु) में भी रहता है। यह धर्म-जड़
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this webelte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 23
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ. १ पाद० १ सूत्र २२ २५ प्रकृति का कभी नहीं हो सकता। छान्दोग्य. १/६/६-७ में भी कहा गया है 'वह समस्त पापों से ऊपर उठा हुआ है।' ये समस्त गुण उस अविनाशी ब्रह्म में ही हो सकते हैं, सामान्य देव या मानव में नहीं हो सकते। किसी भी स्थिति को प्राप्त देव, मनुष्य आदि योनियों में रहने वाले पुरुष के ये धर्म (लक्षण) नहीं हो सकते। अतः हृदय के अन्तस् में व सूर्य मण्डल के मध्य में स्थित पुरुष को जगन्नियन्ता ब्रह्म ही मानना उचित होगा, वह अन्य कोई नहीं, साक्षात् ब्रह्म ही है।।२०।। उपर्युक्त कथन की पुष्टि के लिए आचार्य इस सूत्र में दूसरा हेतु दे रहे हैं- ( २१ ) भेदव्यपदेशाच्चान्य:॥२१॥ सूत्रार्थ-च = तथा, भेद-व्यपदेशात् = भेद का कथन होने से, अन्यः = अभिन्न नहीं है अर्थात् आदित्य एवं अक्षि से यहाँ अन्तः पुरुष का भेद बतलाया है। अतः वह ब्रह्म इनसे भिन्न है, वही अन्तः में प्रतिष्ठित है। व्याख्या- श्रुति में जीवात्मा से ब्रह्म का भेद कथन कहे जाने से भी जीवात्मा एवं परमात्मा (ब्रह्म) दोनों पृथक्-पृथक् हैं। सर्वव्यापी परमात्मा भूत-प्राणियों में विद्यमान रहते हुए भी उनसे भिन्न है। छान्दोग्य के ये सन्दर्भ देखें 'य एषोऽन्तरादित्ये' अर्थात् जो सूर्य के अन्तः में है एवं 'य एषोऽन्तरक्षिणि' अर्थात् जो यह अक्षि के अन्दर है- इन दोनों सन्दर्भों से यह स्पष्ट है कि सूर्य और अक्षि (नेत्र) के अन्तः में विद्यमान पुरुष उन दोनों (सूर्य और अक्षि) अर्थात् देव या मानव से भिन्न है। अतः यह वर्णन सूर्य और अक्षि का नहीं हो सकता। इनमें अन्तर्यामी रूप से स्थित ब्रह्म ही उपास्य है। वही इसमें विद्यमान रहता है। बृहदारण्यक ने भी कहा है- 'य आदित्ये तिष्ठन् ............. आत्मान्तर्याम्यमृतः' अर्थात् 'जो सूर्य में रहने वाला सूर्य का अन्तर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य ही जिसकी देह है तथा जो अन्दर रहकर भी सूर्य का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा और अमृत है।' इस प्रकार आत्मा का आदित्य (सूर्य) से भिन्नत्व बोध होने से स्पष्ट हो जाता है कि वह 'आनन्दमय' बह्म ही उपास्य है।२१।। अभी तक के विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय का निमित्त और उपादान कारण एकमात्र ब्रह्म ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं। फिर भी जिज्ञासा होती है कि छा.उ. ३/१/१ में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का कारण आकाश को कहा गया है, फिर यह कैसे संभव है कि जिससे जगत् के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म ही है। इसी कथन का समाधान सूत्रकार यहाँ करते हैं- (२२ ) आकाशस्तल्लिङ्गात् ॥२२॥ सूत्रार्थ- आकाश: = आकाश (पद ब्रह्म का वाचक है), तत् = उस (ब्रह्म के), लिङ्गात् = लिङ्ग (चिह्न) से अर्थात् ब्रह्म का निश्चय कराने वाले लक्षण (चिह्न) उन सन्दर्भों में है, अतः वहाँ 'आकाश' शब्द ब्रह्म का वाचक है। व्याख्या- यहाँ सूत्र में ब्रह्म को आकाश ही बतलाया गया है। आचार्य छा. १/१/१ का उद्धरण देते हुए कहते हैं कि ये सभी भूत (प्राणि-समुदाय) आकाश से ही उद्भूत होते हैं और उसी में लय हो जाते हैं। आकाश सर्वाधिक बड़ा और सबका कारण है अर्थात् सभी आकाश के ही आश्रय में हैं। आकाश को जगत् का कारण रूप मानने से यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्म ही आकाश का वाच्य है; क्योंकि आकाश के लिए श्रुति में जो विशेषण प्रयुक्त हुए हैं, वे भूताकाश में असम्भव हैं। भूताकाश तो स्वयं ही भूतों के समूह में आ विराजता है। अतः उसे भूतों की उत्पत्ति होना-कहना उचित नहीं है। श्रुति में वर्णित विशेषण एकमात्र ब्रह्म में सुसंगत हो सकते हैं। वही सर्वसमर्थ है, सर्वोत्कृष्ट है। अतः यही प्रमाणित होता है कि उस (छा. १/१/१) में 'आकाश' नाम से परब्रह्म ही जगत् का कारण कहा गया है और ऐसी श्रुति भी है- ॐ खं ब्रह्म ॥२२॥ * यहाँ ध्यातव्य है कि 'आकाश' उसका (ब्रह्म का) प्रतीकात्मक स्वरूप (पहचान) है, उसे आकाश ही कहना
Disclalmer / Warning: All Iiterary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 24
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
२६ वेदान्त दर्शन उतना युक्तिसंगत नहीं। आकाश उसका प्रतीक है, वह आकाश भी है। यही तथ्य उसके (ब्रह्म के) प्राण,ज्योति आदि के सम्बन्ध में भी है। अगले सूत्र में आचार्य कहते हैं कि अनेक स्थलों में आकाश की भाँति 'प्राण' को भी ब्रह्म का वाचक कहा गया है, उसी का विवेचन यहाँ किया गया है- ( २३ ) अत एव प्राणः ॥२३।। सूत्रार्थ-अतः = इसलिए अर्थात् अनेक स्थलों में कहे हुए लक्षण ब्रह्म में, एव = ही (सम्भव हैं, इस कारण), प्राणः = प्राण (ही ब्रह्म है)। व्याख्या-उपर्युक्त सूत्र में प्रयुक्त 'तल्लिङ्ग' हेतु से ही यहाँ 'प्राण' पद ब्रह्म का वाचक सिद्ध होता है। छा. १/ ११/१५ में कहा है कि अवश्य ही ये समस्त प्राणी प्राण में ही लय होते हैं और प्राण से ही प्रकट (उद्भूत) होते हैं। ये लक्षण प्राण-वायु में नहीं घट सकते; क्योंकि समस्त भूतों के जन्मादि का कारण प्राणवायु नहीं हो सकता है। इसलिए यहाँ सूत्र में 'प्राण' नाम से ब्रह्म का ही प्रतिपादन हुआ है, इसे ही स्वीकारना चाहिए। अथर्ववेद ११/४/१५ में ब्रह्म रूप प्राण के सन्दर्भ में इस प्रकार कहा है- यह सम्पूर्ण जगत् जिसके वश में है, जो सदा उपस्थित रहता है और सबका ईशिता (शासक) है। जिसमें सब प्रतिष्ठित हैं, आश्रित हैं, उन प्राण रूप ब्रह्म के लिए नमस्कार है। अतीत, अनागत तथा दूसरे सभी प्राण रूप ब्रह्म में आश्रित हैं। बृह.उ. ४/४/१८ में भी कहा है-'प्राणस्य प्राणम्' अर्थात् वह प्राण का प्राण है। सम्पूर्ण विश्व के समस्त जीवन का प्रदाता है। यहाँ द्वितीय 'प्राण' पद ब्रह्म का ही वाचक है। इस प्रकार से उक्त प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि सूत्र में प्रयुक्त 'प्राण' पद ब्रह्म का वाचक है॥।२३।। अगले सूत्र में आचार्य स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि 'ज्योति' शब्द ब्रह्म का वाचक है- (२४ ) ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥२४॥ सूत्रार्थ- ज्योति: = 'ज्योति' (शब्द ब्रह्म का वाचक) है, चरणाभिधानात् = चरण-पद का कथन होने से अर्थात् विशेष सन्दर्भों में 'ज्योति' पद ब्रह्म वाची होता है। व्याख्या-श्रुति में ज्योति को ब्रह्म के नाम से संबोधित किया गया है। छा.उ. १/१३/७ के अनुसार जो परम ज्योति स्वर्गलोक से ऊपर, सभी प्राणियों एवं सम्पूर्ण विश्व के ऊपर, जिससे श्रेष्ठ अन्य कोई लोक नहीं, उस सर्वश्रेष्ठ परमधाम में प्रज्वलित हो रही है, वह निश्चय ही यही है, जो कि इस पुरुष में आन्तरिक ज्योति है। यहाँ उद्धृत 'ज्योति:' शब्द जड़ प्रकाश वाची नहीं है, यह तथ्य तो इसमें वर्णित लक्षणों से सिद्ध हो जाता है। फिर ज्योति: शब्द किसका वाचक है? ज्ञान का या जीवात्मा का या फिर ब्रह्म का? इसका समाधान नहीं होता। इसलिए आचार्य ने कहा कि यहाँ पर जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह ब्रह्म का ही वाचक है; क्योंकि इसके पहले छा.उ. (३/१२/६) में इस ज्योतिर्मय ब्रह्म के चार पादों का उल्लेख मिलता है। इन चार पादों में से एक पाद के अन्तर्गत समस्त प्राणि-समुदाय को और शेष तीन पादों को अमृत स्वरूप और परमधाम में अवस्थित कहा गया है। अतः इस सन्दर्भ में प्रयुक्त 'ज्योति' पद ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य किसी का वाचक नहीं हो सकता। ब्रह्म चेतनरूप होने से सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश में लाने का हेतु है। अतः ब्रह्म के लिए 'ज्योति' पद का प्रयोग सर्वथा उचित है। सूर्यादि सभी प्रकाशमान लोकों का निर्माता ब्रह्म ही है। इन लोकों का यह रूप ब्रह्म के द्वारा ही पूर्ण होता है। तैत्ति. ब्रा. ३/१२/९/६ कहता है- 'येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः' अर्थात् जिसके द्वारा तेज से प्रदीस हुआ सूर्य तप (प्रकाशित हो) रहा है, वह श्रेष्ठ तत्त्व ब्रह्म है। मुण्डक. २/२/१० में कहा गया है
Disclaimer / Warning: All literary and artistic malerial on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 25
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० १ सूत्र २६ २७ कि 'उसी के प्रकाश से यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित है।' बृह.उ. ४/४/१६ में वर्णन मिलता है कि ज्ञानीजन आयु पर्यन्त प्रकाशकों के भी प्रकाशक उस अमरणधर्मा ब्रह्म की ज्योति रूप में उपासना करते हैं। इस प्रकार से इन प्रमाणों से स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ सूत्र में प्रयुक्त 'ज्योति' शब्द ब्रह्म का ही वाचक है, अन्य किसी का नहीं ॥२४॥ अगले सूत्र में आचार्य समाधान करते हुए कहते हैं कि 'गायत्री' का उल्लेख छान्दोग्य. के ३/१२-१३ में छन्द के रूप में निरूपण न करके ब्रह्म के रूप में निरूपण किया गया है- (२५) छन्दोऽ्भिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात् तथा हि दर्शनम्॥२५॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहें कि, छन्दोऽभिधानात् =छन्द (गायत्री) का कथन होने से (उसी के चार पादों का उल्लेख है), न = (ब्रह्म के चार पादों क' नर्णन) नहीं है, इति न = तो यह उचित नहीं (क्योंकि), तथा- उस तरह के वर्णन से, चेतोऽर्पणनिगदात् = ब्रह्म में चित्त का समर्पण कहा गया है, तथा हि दर्शनम् = वैसा ही उ्लेख अन्यत्र भी देखा जाता है। व्याख्या- यदि ऐसा कहें कि छा.उं. ३/१२/१ में वर्णित गायत्री छन्द में उसी के चार पादों का उल्लेख है। उसमें ब्रह्म का वर्णन नहीं है, तो ऐसी मान्यता बना लेना उचित नहीं है; क्योंकि गायत्री नामक छन्द के लिए यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड़-चेतनमय सम्पूर्ण विश्व गायत्रीमय ही है। अतः यहाँ ऐसा मानना चाहिए कि सबके परम कारण सर्वात्मक परब्रह्म में चित्त-वृत्तियों का समर्पण कराने के लिए उस ब्रह्म का ही वर्णन है। इसी प्रकार अन्य स्थलों में भी उद्गीथ, प्रणव आदि के नामों से ब्रह्म का वर्णन देखने को मिलता है। अतः गायत्री छन्द से जड़-चेतन युक्त सम्पूर्ण विश्व के कारण रूप में वृत्तियों का समर्पण होने से गायत्री भी ब्रह्ममय ही है। 'गायत्री' पद द्वारा किया गया उल्लेख ब्रह्म का ही उल्लेख है, वर्ण रचना मात्र छन्द का नहीं। उस ब्रह्म की महत्ता को 'तावानस्य महिमा' आदि मन्त्र के द्वारा स्पष्ट किया है। पुरुष सूक्त में इस मन्त्र का भाव ब्रह्म के विवेचन में कहा गया है। यहाँ मन्त्र में 'पुरुष' पद ब्रह्म का निर्देश करता है, छन्द का नहीं। छान्दोग्य के इस अनुवाक में गायत्री के साथ जो उपासना पद्धति कही गई है, वह ब्रह्मज्ञान के लिए अति सुलभ साधन है। ब्रह्म का दर्शन इसी से होता है। अतः छा. उ. ३/१२-१३ में छन्द का उल्लेख न होकर 'गायत्री' पद के द्वारा ब्रह्म का ही विवेचन किया गया है,यही जानना चाहिए॥२५॥ उक्त प्रकरण में 'गायत्री' पद ब्रह्म का वाचक है, इस कथन की पुष्टि के लिए आचार्य यहाँ एक और समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- (२६ ) भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्वैवम्॥२६॥ सूत्रार्थ- भूतादिपादव्यपदेशोपपत्ते: = भूत आदि को पाद बतलाना युक्ति संगत हो सकता है, च = इसलिए भी, एवम् = ऐसा ही है। व्याख्या- गायत्री वा इदं सर्वम् अर्थात् यह सब कुछ गायत्री ही है। छा. ३/१२ के प्रकरण में गायत्री को भूत, पृथिवी, शरीर और हृदय रूप चार पादों से युक्त कहा गया है। तत्पश्चात् उसकी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए 'पुरुष' नाम से उल्लिखित परब्रह्म के साथ उसकी एकता करके समस्त प्राणियों को उसका एक पाद कहा गया है तथा अमृत स्वरूप तीन पादों को परम धाम में प्रतिष्ठित कहा गया है। इस प्रकरण की संगति तभी बैठती है, जब गायत्री रूप से उसे ब्रह्म ही मानें तथा यह उचित भी है; क्योंकि गायत्री को मात्र छन्द मानने से भूतादि प्राणियों को उसके चरण (पाद) नहीं माना जा सकता। यह संकेत तो एकमात्र ब्रह्म के लिए ही उपयुक्त है। अतः यहाँ 'गायत्री' और 'ब्रह्म' दोनों एक ही हैं-अभिन्न हैं। इनमें कोई भेद नहीं है॥।२६।।
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslle can be used for propagation with prior written consent.
Page 26
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
२८ वदान्त दशन ऊपर वर्णित सिद्धान्त की पुष्टि के लिए आचार्य स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान यहाँ सूत्र में कर रहे हैं-' (२७ ) उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात्।२७॥ सूत्रार्थ-उपदेशभेदात् = उपदेश का भेद होने से, चेत् = यदि, इति = ऐसा (कहो, तो), न = गायत्री-ब्रह्म का वाचक नहीं, न = (तो) यह उचित नहीं; क्योंकि, उभयस्मिन् = दो प्रकार के उपदेश होने पर, अपि = भी, अविरोधात् = पारस्परिक विरोध नहीं है। व्याख्या- यदि यह कहें कि 'त्रिपादस्यामृतं दिवि' ....... छा.उ. ३/१२/६ में वर्णित 'तीन पाद अमृत स्वरूप एवं दिव्यलोक में हैं,ऐसा कहकर दिव्यलोक को ब्रह्म के तीन चरणों से सम्पन्न (युक्त) बतलाया गया है तथा इसके उपरान्त, 'अथ यदतः परोदिव ज्योतिर्दीप्यते .... छा.उ. ३/१२/७ में 'ज्योति' नाम से प्रतिपाद्य ब्रह्म को दिव्य लोक से भी परे कहा है। इस प्रकार परस्पर भेद होने के कारण गायत्री को ब्रह्म का वाचक बतलाना संगत नहीं है, ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि दोनों स्थलों के प्रतिपादन की शैली में कुछ भी भेद न होने से यथार्थतः कोई विरोध नहीं है। दोनों स्थानों में वर्णित श्रुति का उद्देश्य 'गायत्री' शब्द एवं 'ज्योति' शब्द के वाचक ब्रह्म को ही सर्वोपरि परम धाम में अवस्थित बतलाना है। उस परम ब्रह्म को तो इस तरह जानना चाहिए कि वह दिव्य लोक पर्यन्त सम्पूर्ण जगत् के अन्दर-बाहर सर्वत्र विद्यमान रहता है। ऐसा ही प्रतिपादन ईशोप. १/५ में भी किया गया है। इस प्रकार से गायत्री भी ब्रह्म की उपासना में प्रयुक्त होने से वह ब्रह्मोत्तर प्रतीत होती है, किन्तु उसका निवास भी सर्वोपरि श्रेष्ठ धाम में होने से निश्चय ही वह ब्रह्ममय है। इस प्रकार 'गायत्री' और 'ज्योतिः' दोनों ही पद ब्रह्म के वाचक हैं, ऐसा छान्दोग्य के प्रकरण (३/१२-१३) से स्पष्ट हो जाता है॥२६। पूर्व सूत्र 'अत एव प्राणः' (१/१/२३) में स्पष्ट किया गया है कि श्रुति में वर्णित 'प्राण' नाम से 'ब्रह्म' का उल्लेख मिलता है, लेकिन कौषीतकि उप. (३/२) एवं ऐतरेय आरण्यक (२/२/३) में इन्द्र ने क्रमशः प्रतर्दन एवं विश्वामित्र से कहा है कि 'मैं ही ज्ञान स्वरूप प्राण हूँ'। अतः आशंका होती है कि यहाँ सूत्र में प्रयुक्त 'प्राण' शब्द किसका वाचक है? इन्द्र का? प्राण वायु का ? जवीात्मा का? या फिर ब्रह्म का? प्रस्तुत सूत्र में आचार्य इसी प्रकरण का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- ( २८) प्राणस्तथाऽनुगमात् ॥२८।। सूत्रार्थ- प्राणः = 'प्राण' शब्द (यहाँ भी ब्रह्म का वाचक है,) तथा = वैसा, अनुगमात् = अनुगत-संगत होने से अर्थात् उक्त प्रकरण के प्रसङ्ग पर विचार करने से ऐसा ही प्रतीत होता है कि 'प्राण' शब्द यहाँ ब्रह्म का वाचक है। व्याख्या-उपर्युक्त प्रसङ्ग पर अच्छी तरह से विचार करने पर यह सिद्ध हो जाता है कि 'प्राण' शब्द यहाँ पर एकमात्र ब्रह्म के ही निमित्त प्रयुक्त हुआ है। कौषी. उ.३/२ एवं ३/९ में प्रतर्दन ने इन्द्र से पुरुषार्थ रूप वर की याचना की है। उसके लिए परम हितकारी देवराज इन्द्र के उपदेश में व्यक्त हुआ 'प्राण' निश्चय ही 'ब्रह्म' होना चाहिए; क्योंकि ब्रह्मज्ञान से अधिक दूसरा कोई हितकारी उपदेश नहीं हो सकता। 'प्राण' को उक्त प्रसङ्ग में प्रज्ञान स्वरूप कहा गया है; जो स्वयं ही ब्रह्म के अनुरूप है और अन्त में उसे आनन्दमय अजर-अमर कहा गया है। इसी प्रकार से ऐतरेय आरण्यक २/२/३ में दिये आख्यान में इन्द्र ने ऋषि विश्वामित्र को वर देने के लिए कहा, विश्वामित्र ने वर माँगा कि मैं आपको पूर्णरूपेण जान-जाऊँ। इन्द्र ने कहा- 'प्राणो वा अहमस्मि ऋषे' अर्थात् हे ऋषे! मैं निश्चय ही 'प्राण' हूँ। आगे और कहा- 'प्राण तुम हो, प्राण समस्त भूत हैं; प्राण है यह, जो तप रहा है। वह, मैं इस रूप से समस्त दिशाओं को व्याप्त किए हूँ।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 27
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० १ सूत्र ३० २९ यहाँ इस प्रकरण में 'प्राण' की भावना से 'ब्रह्म' की ही उपासना की गई है। ऋग्वेद ३/५१/४, ६/३०/ १, १०/५४/१ एवं १०/१२०/१-३ की ऋचाओं में प्राण रूप से ब्रह्म का ही उल्लेख किया गया है। उपर्युक्त सभी तथ्य बह्म के लिए ही उपयुक्त हैं। प्रसिद्ध प्राण वायु, इन्द्र या जीवात्मा के लिए इस प्रकार कहना उपयुक्त नहीं हो सकता। अतः यहाँ 'प्राण' शब्द से ब्रह्म की ही विवेचना की गई है, ऐसा सिद्ध होता है॥२८।। यहाँ जिज्ञासा होती है कि उक्त सन्दर्भ में स्वयं इन्द्र ने अपने आप को 'प्राण' कहा है। अतः यहाँ 'प्राण' पद का वाचक ब्रह्म न होकर स्वयं इन्द्र को होना चाहिए। प्रस्तुत सूत्र में आचार्य इसी का समाधान करते हैं- ( २९ ) न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यास्मिन्॥।२९।। सूत्रार्थ-चेत् = यदि यह कहें कि, वक्तुः = वक्ता (इन्द्र) द्वारा, आत्मोपदेशात् = अपने आप (आत्मा) को ही 'प्राण' नाम से उपदेशित करने के कारण, न = 'प्राण' शब्द का वाचक नहीं है, इति = (तो) ऐसा कहना, न = उचित नहीं है, हि = क्योंकि, अध्यात्मसम्बन्धभूमा = अध्यात्म सम्बन्धी उपदेश की बहुलता ही, अस्मिन् = इस प्रकरण में है। व्याख्या- यदि यह कहें कि इस प्रकरण में इन्द्र ने स्पष्टतया स्वयं को ही 'प्राण' शब्द से निर्दिष्ट किया है, ऐसी दशा में 'प्राण' शब्द का बोध ब्रह्म के निमित्त न होकर जीव के निमित्त होना चाहिए, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि इस प्रकरण में अध्यात्म सम्बन्धी विषय की प्रचुरता है, आधिदैविक विषय की नहीं। अतः यहाँ 'प्राण' शब्द को जीवात्मा का नहीं; वरन् उपास्य रूप से इन्द्रलक्षण सम्पन्न ब्रह्म का ही वाचक मानना चाहिए। यहाँ सूत्र में वर्णित 'अध्यात्म' पद परब्रह्म का निर्देशन करता है। उक्त प्रकरण में इसी के सम्बन्ध की बहुलता देखी गई है। इन्द्र ने आत्मा में स्थित ब्रह्म की 'प्राण' रूप से उपासना का संकेत किया है। अथर्ववेद के प्राण सूत्र ११/४ में 'प्राण' रूप से ब्रह्म के प्रतिपादन के प्रमाण मिलते हैं। इस प्रकार उक्त विवेचनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'प्राण' शब्द एकमात्र ब्रह्म का ही वाचक है॥२९।। पुनः आशंका होती है कि यदि 'प्राण' शब्द इन्द्र का वाचक नहीं है, तो इन्द्र द्वारा कहा गया कथन-'मैं ही ज्ञान स्वरूप बह्म हूँ।''तू मेरी ही उपासना कर' यहाँ इन्द्र ने स्वयं अपने आपका इस रूप में उपदेश क्यों किया? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- ( ३०) शास्त्रदृष्टया तूपदेशो वामदेववत्।।३०।। सूत्रार्थ- शास्त्रदृष्ट्या = शास्त्र की दृष्टि से, तु = तो, वामदेववत् = वामदेव के सदृश, उपदेश := (यहाँ) इन्द्र ने उपदेश देते हुए स्वयं को 'प्राण' कहा है। व्याख्या- बृह.उप. १/४/१० में उल्लेख मिलता है कि उस ब्रह्म को देवों में जिसने जाना, वह ब्रह्ममय हो गया। ऐसे ही ऋषियों और मानवों में भी जिसने उस ब्रह्म को जाना, वह उस (ब्रह्म) के अनुरूप हो जाता है। उसे आत्मवत् देखते हुए ऋषि वामदेव ने जाना कि मनु एवं सूर्य भी मैं ही हूँ। इस प्रकरण से यह सिद्ध हुआ कि जो महान् पुरुष उस अविनाशी ब्रह्म को पा लेता है, वह उसके साथ एकत्व की अनुभूति करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है। अतः उन वामदेव ऋषि के सदृश इन्द्र का ब्रह्मभावापन्न अवस्था में शास्त्र की दृष्टि से यह कहना है कि मैं ही ज्ञानरूप प्राण अर्थात् ब्रह्म हूँ। तुम मुझ ब्रह्म की उपासना करो। इस प्रकार 'प्राण' शब्द को ब्रह्म का वाचक स्वीकार करने में किसी भी तरह की आपत्ति नहीं होनी चाहिए। ऐसे ही इन्द्र एवं वामदेव को भी ब्रह्म का वाचक मानना ही उचित होगा॥३०॥ अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से शङ्का उपस्थित करके उसके समाधान द्वारा 'प्राण' शब्द को ब्रह्म का वाचक सिद्ध करते हुए उक्त प्रकरण को समाप्त करते हैं-
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 28
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
३० वदान्त दशन
(३१ ) जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात्।।३१।। सूत्रार्थ- चेत् - यदि कहो कि, जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् - जीवात्मा एवं मुख्य प्राण के लक्षण पाये जाते हैं, न = (इसलिए) 'प्राण' शब्द ब्रह्म का वाचक नहीं है, इति न = तो ऐसा कहना उचित नहीं है, उपासात्रैविध्यात् = त्रिविध उपासना होने के कारण, आश्रित्वात् = समस्त लक्षण ब्रह्म के आश्रित हैं (तथा), इह तद्योगात् = इस प्रसङ्ग में ब्रह्म के उन लक्षणों को भी कहा गया है, अतः (यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्म का ही बोधक है)। व्याख्या- ऐतरेय आरण्यक व कौषी. उप. आदि श्रुतियों के उक्त प्रसङ्ग में जीव के लक्षणों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है 'न वाचं विजिज्ञासीत। वक्तारं विद्यात् (कौ.उ.३/८)' अर्थात् वाणी को जानने की अपेक्षा वक्ता को जानने का प्रयास करना चाहिए।' यहाँ इस कथन से वाणी आदि कार्य और कारण के अध्यक्ष जीवात्मा को जानने का लक्षण स्पष्ट हुआ। ऐसे ही 'प्राण' के लक्षण का भी उल्लेख प्राप्त होता है 'अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्यत्रोत्थापयति (कौषी.३/३) अर्थात् प्राण ही प्रज्ञा है। वही शरीर को ग्रहण करके उठाता है।' शरीर को धारण करना मुख्य प्राण का ही धर्म (लक्षण) है। अतः यह कहें कि 'प्राण' ब्रह्म का वाचक नहीं है, तो यह कहना उचित नहीं है; क्योंकि ब्रह्मोपासना के अतिरिक्त जीवात्मा एवं प्राण को भी उपास्य मानने से त्रिविध उपासना का प्रसङ्ग उपस्थित होगा, जो कि ठीक नहीं है। इसके अतिरिक्त जीव और प्राण आदि के लक्षणों का आश्रय भी ब्रह्म ही है। अतः ब्रह्म के वर्णन में उनके लक्षणों का आश्रय भी ब्रह्म ही है। अतः ब्रह्म के वर्णन में उनके लक्षणों का आना उचित ही है। यहाँ ब्रह्म के लोकपाल आदि लक्षणों का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वाणी भी यहाँ ब्रह्म के अर्थ में प्रयुक्त हुई है। इस प्रकार यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्म का ही वाचक है। इन्द्र, जीवात्मा या प्रसिद्ध प्राण का नहीं, यही मानना उचित होगा। जीव एवं प्राण आदि सभी ब्रह्म के ही आश्रित हैं। उनमें किसी भी तरह की भिन्नता नहीं है।३१।।
॥ इति प्रथमाध्यायस्य प्रथम: पादः॥
Disclalmer / Warning: All Iiterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 29
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
। अथ प्रथमाध्याये द्वितीयः पादः॥ प्रथम पाद में आचार्य ने यह कहा कि उपनिषद्-श्रुति आदि में जगत् के कारण और उपास्यदेव का उल्लेख 'आनन्दमय', 'आकाश', 'ज्योति' एवं 'प्राण' आदि के नाम से हुआ है, वह उल्लेख अविनाशी परब्रह्म का ही है। इन उपर्युक्त पदों का प्रयोग-वेद-लोक द्वारा अर्थान्तरों में भी किया जाता है। प्रसंगवश इन प्रतिपादनों में ब्रह्म के अलावा जीवात्मा, जगत् एवं उपासना आदि का भी ब्रह्म के रूप में उल्लेख हुआ है। उसी प्रसंग को आगे चलाते हुए द्वितीय पाद का शुभारंभ किया जा रहा है- (३२) सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्॥१।। सूत्रार्थ-सर्वत्र = समस्त वेदान्त वाक्य-समूह में, प्रसिद्धोपदेशात् = (जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के कारण रूप में) प्रसिद्ध ब्रह्म का ही उपास्य देवता के रूप में उपदेश किया गया है। व्याख्या- समस्त वेदान्त वाक्य-समूह (शास्त्रों) में एक मात्र ब्रह्म की उपासना का उपदेश किया गया है। छा.उ. ३/१४ के प्रारम्भ में ऋषि कहते हैं- यह सम्पूर्ण विश्व निश्चय ही ब्रह्म है; क्योंकि यह उसी ब्रह्म के द्वारा प्रकट हुआ है, स्थिति के समय उसी में चेष्टा करता है और अन्त में उसी ब्रह्म में विलीन हो जाता है। साधक को राग-द्वेष से परे शान्तचित्त होकर एकात्म भाव से ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए अर्थात् ऐसा ही दृढ़ निश्चयी भाव साधक को ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि मनुष्य श्रेष्ठ संकल्पों से युक्त है। साधक इस लोक में जिस तरह संकल्पमय होता है, परलोक में वह वैसा ही हो जाता है। अतः साधक को उक्त श्रेष्ठ संकल्प से युक्त होना चाहिए। यहाँ सूत्र में उसी ब्रह्म की उपासना करने के लिए कहा गया है, जिससे इस विश्व के जन्मादि होते हैं एवं जो सभी वेदान्त- वाक्य समूह में विश्व के महाकारण रूप से प्रख्यात है। अतः यहाँ उक्त प्रकरण में कहा हुआ उपास्य देव एकमात्र ब्रह्म ही है, अन्य और कुछ नहीं ॥१॥ छा.उ. के इस उक्त प्रकरण में एकमात्र ब्रह्म को उपास्यदेव के रूप में माना गया है। इसी प्रकरण के आधार पर यहाँ इस अगले सूत्र में आचार्य एक अन्य हेतु और दे रहे हैं- (३३ ) विवक्षितगुणोपपत्तेश्च॥२॥ सूत्रार्थ- च = और, विवक्षितगुणोपपत्तेः = श्रुति द्वारा वर्णित सत्य-संकल्पादि गुणों की संगति ब्रह्म में ही होती है। अतः उस प्रकरण में वर्णित उपास्य देव एकमात्र ब्रह्म ही है। व्याख्या-छान्दोग्य उपनिषद् (३/१४/२-४) में उपास्यदेव के स्वरूप का उल्लेख करते हुए आचार्य ने जो भी विशेषताएँ कही हैं, वे सभी एकमात्र सर्वव्यापी ब्रह्म में ही सुसंगत हो सकती हैं। ब्रह्म के ऐसे गुणों का यहाँ उल्लेख है, जिन्हें उपासना-काल में ध्यान में लाना अनिवार्य हो जाता है। वे समस्त गुण 'मनोमय' से लेकर 'वाक् रहित' एवं 'सम्भ्रमशून्य' तक उक्त अनुवाक में बतलाए गये हैं। ब्रह्म को 'मनोमय' एवं 'प्राणस्वरूप शरीर से सम्पन्न कहना उचित ही है; क्योंकि वही सर्वान्तर्यामी परमात्मा है। केनोपनिषद् १/२ में उस अविनाशी सत्ता ब्रह्म को मन का भी मन एवं प्राण का भी प्राण कहा गया है। अतः यहाँ उक्त प्रकरण में व्यक्त उपास्य देव एकमात्र ब्रह्म ही है; क्योंकि छा.उ. ३/१४/२-४ में प्रयुक्त विशेषण (लक्षण) ब्रह्म में ही हो सकते हैं। ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य किसी में इनकी संगति नहीं हो सकती। ये सभी लक्षण ब्रह्म में ही हो सकते हैं।।२॥ गुणों की उपपत्ति के पश्चात् अब जीवात्मा में उन गुणों की अनुपपत्ति कहकर पूर्वोक्त सिद्धान्त को इस सूत्र में आचार्य सिद्ध कर रहे हैं- (३४) अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥३ ।। सूत्रार्थ-तु=तो, अनुपपत्तेः = जीवात्मा में मनोमयादि गुणों की संगति न होने से, शारीर: = जीवात्मा, न = उपास्य नहीं है।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 30
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
३२ वेदान्त दर्शन व्याख्या- जीवात्मा में मनोमय आदि गुण घटित नहीं होते। उपासना के लिए उपनिषदों-श्रुतियों में जो सत्य- संकल्प, सर्वव्यापकत्व, सर्वात्मकत्व एवं सर्वशक्तिमत्व आदि गुणों का उल्लेख किया गया है, वे समस्त गुण ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य किसी में भी नहीं पाये जाते हैं। अतः इस प्रसङ्ग में वर्णित उपास्य-देव जीवात्मा नहीं है। यहाँ ब्रह्म को ही उपासना के योग्य मानना उचित होगा।३॥ अगले सूत्र में प्रकारान्तर से उपर्युक्त तथ्य की ही पुष्टि आचार्य ने की है- (३५) कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च॥।४।। सूत्रार्थ- कर्मकर्त्तृव्यपदेशात् = कर्म और कर्त्ता के कथन से, च = भी (जीवात्मा की उपास्यता पुष्ट नहीं होती)। व्याख्या- छान्दोग्य उपनिषद् के इस प्रसंग के प्रारम्भ का वाक्य-'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत' है। यहाँ शान्त उपासक (जीवात्मा) उपासना का कर्त्ता है और ब्रह्म कर्म है। 'उपासीत' क्रिया का कर्म होने के कारण ब्रह्म का उपास्य होना सम्भव है, किन्तु कर्त्ता जीवात्मा का नहीं। ऐसा ही छा.उ.३/१४/४ में भी कहा गया है कि 'सर्वकर्मा' आदि विशिष्ट गुणों से सम्पन्न ब्रह्म रूप आत्मा ही मेरे हृदय में निवास करता है। मृत्यु के पश्चात् यहाँ से गमन करते हुए परलोक में मैं इसी ब्रह्म रूप आत्मा को ही प्राप्त करूँगा। इस प्रकार से यहाँ पूर्वोक्त उपास्य देव को प्राप्त होने योग्य एवं जीवात्मा को उसे प्राप्त करने वाला बतलाया गया है। अतः यहाँ उपास्य देव ब्रह्म हैं और उपासक जीवात्मा। जीवात्मा उपास्य नहीं है। यही मानना उचित होगा। जीवात्मा ब्रह्म को पाने वाला-प्राप्ति क्रिया का कर्त्ता है एवं जिसको प्राप्त होता है, वह प्राप्ति का कर्म 'ब्रह्म' जीवात्मा से अलग है। जीवात्मा उपासना करने वाला और उसके फल स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त होने वाला होने से उपासक और प्रापक है अर्थात् उपासना एवं प्राप्ति का कर्त्ता है। अतः कर्म और कर्त्ता के रूप में उपास्य एवं उपासक को स्पष्ट रूप से यहाँ पृथक्-पृथक् कहा है। उपासक और प्राप्त कर्त्ता स्वयं उपास्य या प्राप्य नहीं हो सकता। अतः इस प्रकरण में विवेचित गुणों से सम्पन्न ब्रह्म को ही उपास्य मानना उचित है, अन्य किसी को नहीं॥४॥ अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से पुनः उक्त तथ्य की पुष्टि कर रहे हैं- (३६) शब्दविशेषात्॥५॥। सूत्रार्थ- शब्दविशेषात् = (उपास्य एवं उपासक के लिए) शब्द का भेद होने से भी (यह पुष्ट होता है कि यहाँ उपास्य-देव जीवात्मा नहीं है)। व्याख्या-उपासक एवं उपास्य के शब्द का भेद होने से भी जीवात्मा का उपास्यत्व पुष्ट नहीं होता। शतपथ ब्राह्मण में ऋषि कहते हैं कि 'आत्मा के अन्दर परमात्मा का निवास है।' इसी प्रकार छा. उ.३/१४/३-४ में उल्लेख मिलता है कि 'यह मेरे हृदय के अन्दर रहने वाला अन्तर्यामी आत्मा है। इसे ही ब्रह्म कहा गया है।' यहाँ 'एषः' (यह) 'आत्मा' एवं 'ब्रह्म' ये शुरू और अन्त के शब्द उपास्य देव के लिए प्रयुक्त किये गये हैं तथा 'में' अर्थात् 'मेरा' यह षष््यन्त पद पृथक् रूप से उपासक जीवात्मा के लिए प्रयुक्त किया गया है। इस प्रकार दोनों के लिए प्रयुक्त शब्दों में पृथक्ता होने के कारण उपास्य-देव जीवात्मा से पृथक् सिद्ध होता है। जीव रूप आत्मा एवं ब्रह्म रूपी परमात्मा में शब्द भेद होने से जीव ब्रह्म नहीं है; किन्तु वह ब्रह्म में संगति बिठाने से ब्रह्ममय हो जाता है। इस तरह से भी जीवात्मा और परमात्मा में अन्तर हो जाता है। अतः यहाँ पर जीवात्मा को उपास्य देव के रूप में मानना उचित नहीं है।५॥ इसके अतिरिक्त आचार्य अगले सूत्र में और भी पुष्ट प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं-
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 31
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० २ सूत्र ७ ३३
(३७ ) स्मृतेश्च॥६॥ सूत्रार्थ-स्मृते: = स्मृति-प्रमाण से, च = भी जीव और ब्रह्म (उपासक और उपास्य) का भेद सिद्ध होता है। व्याख्या- श्रीमद्भगवद्गीता एवं मनुस्मृति आदि ग्रन्थ स्मृतियों के अन्तर्गत माने जाते हैं। इनमें भी जीव और ब्रह्म की भिन्नता के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। गीताकार ने ईश्वर को समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित बतलाया है। उन्होंने कहा कि यहाँ भी उपास्य और उपासक का भेद स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है। अतः यहाँ उपास्यदेव एकमात्र ब्रह्म ही है, उससे पृथक् अन्य कोई नहीं। गीता के १२/८ में कहा गया है कि 'मुझ में ही मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा, तत्पश्चात् तू मुझ में ही निवास करेगा अर्थात् मुझ (ब्रह्म) को प्राप्त करेगा। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। इसी प्रकार मनुस्मृति ८/९१ में न्यायाधीश के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करने वाले के लिए कहा है कि 'हे भले मानस! जो तू अपने आपको यह जानता है कि अकेला मैं ही हूँ, मेरे किये जाने को अन्य कोई नहीं जानता अथवा देखता; ऐसा तुम मत समझो, अच्छाई-बुराई को देखने वाला वह सर्वद्रष्टा ब्रह्म सदैव तुम्हारे हृदय में स्थित रहता है। वह तुम्हारे सभी मनोगत भावों को जानता है। अतः उसके विपरीत कुछ भी न कहना और न करना। इस प्रकार उक्त प्रसंग के वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि उपास्यदेव एकमात्र ब्रह्म ही है, आत्मा या अन्य और कोई नहीं। यही मानना उचित है॥६॥ यहाँ जिज्ञासा होती है कि छा.उ. के उक्त ३/१४/३-४ प्रसंग में आत्मा (उपास्यदेव) को हृदय में स्थित एकदेशीय कहा है। यहाँ मन्त्र में उस (आत्मा) को धान, जौ (यव), सरसों एवं सावाँ से भी सूक्ष्म कहा गया है। ऐसी स्थिति में उसे ब्रह्म कैसे कहा जा सकता है? आचार्य अगले सूत्र में इसी जिज्ञासा का निर्देश पूर्वक समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- (३८) अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च।७॥ सूत्रार्थ- अर्भकौकस्त्वात् = सूक्ष्म (लघु) हृदय में निवास करने से, च = और, तद्व्यपदेशात् = उसका कथन किये जाने से, न = नहीं (हृदय प्रदेश में ब्रह्म का निवास नहीं हो सकता), इति चेत् = ऐसा यदि कहो (तो यह कथन), न = उचित नहीं है, निचाय्यत्वात्-एवं = क्योंकि वह हृदय में निवास करने से उपासनीय, च = और, व्योमवत् = आकाश की भाँति विशाल है। व्याख्या- यदि कोई यह कहे कि हृदय जैसे लघु (सूक्ष्म) स्थान में रहने वाला ब्रह्म भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म होगा; अतः वह सर्वत्र संव्याप्त नहीं हो सकता, ऐसा कथन करना उचित नहीं है; क्योंकि हृदय के परिमाण के अनुसार सर्वत्र संव्याप्त ब्रह्म का अणुत्वादि कहना मात्र औपचारिक ही है। यदि हृदय की आकाश से तुलना करें, तो उसमें सूक्ष्म होते हुए भी विशालता का आरोप किया जाता है। इसी तरह से आकाश भी सूक्ष्म एवं व्यापक है। वेद वाक्यों के अनुसार वह ब्रह्म सूक्ष्म (लघु) होते हुए भी सम्पूर्ण जगत् के अन्दर और बाहर सर्वत्र विद्यमान है। वह एक देशीय (क्षेत्रीय) नहीं है। उक्त प्रसंग में उस (आत्मा) को धान, जौ, सरसों एवं सावाँ से भी लघु कहा गया है, इससे श्रुति का उद्देश्य उसे लघु आकार का बतलाना नहीं है; वरन् अतिसूक्ष्म एवं इन्द्रियों के द्वारा अग्राह्य बतलाना है। इसी कारण उसी मन्त्र में यह भी कहा गया है कि वह पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समस्त लोकों से भी बड़ा है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि वह इतना सूक्ष्म होते हुए भी सम्पूर्ण लोकों के बाहर-भीतर संव्याप्त एवं उनसे भी परे है। सर्वत्र वही ब्रह्म स्थित है। अतः यहाँ उपास्यदेव ब्रह्म ही है, दूसरा और कोई नहीं॥9॥ परमात्मा समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित होकर भी उनके सुख-दुःख से प्रभावित नहीं होता। ब्रह्म की इसी विशेषता को आचार्य यहाँ सूत्र में बतला रहे हैं-
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 32
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
३४ वदान्त दशन
(३९ ) सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात्॥८॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो कि, सम्भोगप्राप्ति: = समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित होने से भोगादि भी प्राप्त होंगे, इति न = तो ऐसा कहना उचित नहीं है, वैशेष्यात् = क्योंकि जीव की अपेक्षा उस ब्रह्म में विशेष भाव है। व्याख्या-यदि कोई यह कहे कि आकाशवत् सर्वव्यापी ब्रह्म समस्त देहधारी प्राणियों के हृदय में स्थित होने के कारण उन प्राणियों के सुख-दुःखों का भोग भी भोगता ही होगा; क्योंकि वह आकाशवत् जड़ नहीं, चेतन है और चेतन में सुख-दुःख की अनुभूति सहज है, तो ऐसा कहना यहाँ उचित नहीं; क्योंकि ब्रह्म में कर्त्तापन का अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में रहता हुआ भी उनके गुण और दोषों से सर्वथा परे है। यही जीवों (प्राणियों) की अपेक्षा ब्रह्म में विशेषता कही गई है। जीव तो अज्ञान के कारण कर्त्ता और भोक्ता है; परन्तु ब्रह्म सर्वथा विकार रहित है। मुण्डक उ. ३/१/१ में ऋषि कहता है कि वह तो मात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं। इसी में ऋषि आगे और कहते हैं कि 'ब्रह्म तो बिना भोगों के ही होता है।' इस कथन में ब्रह्म में कर्त्ता और भोक्ता का आरोप नहीं होता। वह प्राणियों के हृदय में निवास करता हुआ भी प्राणियों के गुण -दोषों से पृथक् रहता है। जीवों (प्राणियों) की अपेक्षा ब्रह्म में यही विशेषता है॥८॥ उपर्युक्त प्रकरण में यह सिद्ध किया गया है कि समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित ब्रह्म अभोक्ता है; लेकिन कठ.उ.१/२/२५ में ओदन (भात) का उल्लेख होने से ब्रह्म को भोक्ता मानना चाहिए। इसी के साथ वेद (ऋ.१/ १६४/२०) में उसे 'अनश्रन्नन्योऽभिचाकशीति' कहकर स्पष्ट रूप से अभोक्ता कहा है। ऐसी स्थिति में इसका सामञ्जस्य किस प्रकार होगा? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान करते हुए आगे का प्रकरण प्रारम्भ करते हैं- (४० ) अत्ता चराचरग्रहणात्॥।९।। सूत्रार्थ- चराचर ग्रहणात् - चर और अचर सभी को ग्रहण करने के कारण, अत्ता= भक्षण करने वाला अर्थात् प्रलय के समय में सभी को अपने में लीन करने वाला परब्रह्म ही है। व्याख्या- इस प्रसङ्ग में यहाँ ब्रह्म में भोक्तापन का आरोप होने से शंका होती है कि वह जीव के समान कर्मफल रूप सुख-दुःख का भोक्ता तो नहीं है? वस्तुतः ब्रह्म को यज्ञ एवं तप का भोक्ता कहा गया है। कठ.उ.१/२/२५ के अनुसार भी ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि समस्त प्राणी जिस ब्रह्म के लिए भोजन बनते हैं तथा जो सभी का संहारक बनता है, वह ब्रह्म जहाँ और जैसा है, इसे कौन जानता है? इस कथन से यह सिद्ध होता है कि सृष्टि के संहार काल में सम्पूर्ण चराचर जगत् को अपने में लीन करने के कारण ही ब्रह्म को भोक्ता कहा गया है। श्रुति में जिस भोक्ता का उल्लेख है, वह कर्मफल रूप सुख-दुःख आदि का भोक्ता नहीं है; प्रलय काल में मृत्युसहित सम्पूर्ण चराचर जगत् को अपने में समाहित कर लेना ही यहाँ उसका उपभोग है। अतः ब्रह्म को जो यहाँ का अत्ता-भोक्ता कहा गया है, व्यापक अर्थों में है, सामान्य अर्थों में नहीं ॥।९॥ उपर्युक्त तथ्य को सिद्ध करने के लिए अगले सूत्र में आचार्य एक अन्य हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं- (४१) प्रकरणाच्च ॥१०।। सूत्रार्थ- प्रकरणात् = प्रकरण से, च = भी यही ज्ञात (सिद्ध) होता है कि उक्त सन्दर्भ में अत्ता पद से प्रलय कर्त्ता ब्रह्म का ही निर्देश है। व्याख्या- प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के बीसवें सूत्र से लेकर चौबीसवें सूत्र तक परब्रह्म का ही वर्णन हुआ है। उक्त प्रकरण भी ब्रह्म से ही सम्बन्धित है। यहाँ भी जीवात्मा अथवा अन्य किसी का वर्णन नहीं हुआ है। उक्त सूत्रों में भी ब्रह्म के प्रति की जाने वाली आशंकाओं का समाधान किया गया है। उसी ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करके उसे जानने का महत्त्व एवं उसकी कृपा को ही उसे जानने का एक मात्र उपाय बताया गया है। उपर्युक्त सूत्र में उस ब्रह्म को जानना अत्यन्त दुष्कर कहा गया है, जो कि पूर्व से चले आते हुए प्रकरण के
Disclaimer / Warning: All literary and artistic malerial on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 33
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० २ सूत्र १३ ३५ सदृश है। अतः पूर्वापर प्रसंगानुसार भी यह सिद्ध होता है कि यहाँ ब्रह्म के प्रति ही 'अत्ता' शब्द का प्रयोग हुआ है अर्थात् ब्रह्म को सब कुछ का अत्ता (भोजन करने वाला) भोक्ता कहा गया है ॥१०॥ शिष्य को अब यह जिज्ञासा होती है कि इसके बाद वाली श्रुति कठ. उ.१/३/१ में कर्मफल रूप 'ऋत' को पीने वाली छाया एवं धूप की भाँति दो भोक्ताओं का उल्लेख मिलता है। यदि ब्रह्म कर्मफल का भोक्ता नहीं है, तो उपर्युक्त दो कौन-कौन हैं? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान दे रहे हैं- ( ४२ ) गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात्॥११॥ सूत्रार्थ-गुहाम् = हृदय रूपी गुफा में, प्रविष्टौ = प्रविष्ट हुए दोनों, आत्मानौ = जीव और ब्रह्म, हि = ही हैं, तद्दर्शनात् = क्योंकि (दूसरे सूत्र में भी) इसी प्रकार देखा जाता है। व्याख्या- हृदय रूपी गुहा क्षेत्र में आत्मा एवं परमात्मा दोनों ही स्थित हैं। कठोप. (१/३/१) के अनुसार 'सुकृतों' द्वारा प्राप्त देह के भीतर हृदय क्षेत्र (गुफा) में दोनों निवास करते हैं। ब्रह्मज्ञानी जन कहते हैं कि वे दोनों (आत्मा-परमात्मा) छाया और धूप के सदृश विपरीत धर्म वाले हैं। ऐसा ही त्रिणाचिकेताग्नि का चयन करने वाले और पञ्चाग्रि विद्या के ज्ञाता भी कहते हैं। यहाँ सूत्र में कर्मफल भोक्ता जीवात्मा के संग जिस दूसरे व्यक्ति का वर्णन है, वही ब्रह्म है। छाया और धूप के सदृश इनके धर्म (गुण) विपरीत हैं। छाया में जो आलोक होता है, वह धूप के कारण ही होता है। अतः यहाँ जीव को छाया रूप से एवं परमात्मा को धूप के रूप में स्वीकारना चहए; क्योंकि जीव सांसारिक भोगों में आबद्ध होने से 'छाया' रूप है और ब्रह्म संसार से मुक्त (निर्लिप्त) होने से प्रकाश स्वरूप है। सर्वव्यापक ब्रह्म का साक्षात् करने के लिए एकमात्र योग्य स्थान हृदय रूपी गुहा ही है। अतः हृदय में ब्रह्म का वास होना अनुचित नहीं है। ब्रह्म की उपासना ही सर्वोत्तम है। उपासना से ही ब्रह्म की प्राप्ति होना सम्भव है। छाया एवं धूप के गुणों में पृथक्ता है,अतः जीव और ब्रह्म में उन धर्मों की पृथक्ता का आरोप भी उचित ही है। जीव अज्ञानी एवं विषय-भोगों में संलिप्त रहता है और ब्रह्म ज्ञानी एवं विषय भोगों से परे है। इस विशेषता के कारण दोनों की पृथक्ता स्पष्ट है। इन सभी तथ्यों से प्रमाणित हो जाता है कि सूत्र में वर्णित दोनों से अभिप्राय जीवात्मा और परमात्मा से ही है। सूत्र में वर्णित जीवात्मा के संग परमात्मा को सर्वोत्तम कर्मों के फल का भोक्ता कहा गया है, उसका अभिप्राय यही है कि परब्रह्म ही समस्त देवता आदि के रूप में प्रकारान्तर से सभी यज्ञ एवं तप रूपी श्रेष्ठ कर्मों के भोगने वाले हैं। फिर भी उनका भोक्तापन सर्वथा दोषरहित है, अतः वे भोक्ता होते हुए भी अभोक्ता ही हैं॥११॥ अगले सूत्र में उपर्युक्त कथन की पुष्टि के लिए आचार्य एक अन्य हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं- (४३) विशेषणाच्च॥१२॥ सूत्रार्थ- विशेषणात् - (आगे के सूत्रों में) दोनों (जीवात्मा-परमात्मा) के लिए अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, अतः; च = भी (उक्त दोनों भोक्ताओं को जीवात्मा-परमात्मा मानना उचित है)। व्याख्या-उपर्युक्त सूत्र में वर्णित दोनों भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं; क्योंकि यह बात दोनों के प्रति अलग-अलग विशेषणों से परिपुष्ट हो जाती है। उक्त सूत्र में जीव और ब्रह्म को अंशत्व बोधरूप छाया और धूप के रूप में संबोधित किया गया है। जीवात्मा मननकर्त्ता है और बह्म मनन करने के लिए है॥१२॥ यहाँ शिष्य जिज्ञासा करता है कि ब्रह्म की प्राप्ति हृदय में होती है, अतः हृदय में स्थित कहना तो ठीक है; किन्तु छा. ४/१५/१ में वर्णित नेत्र में स्थित पुरुष ब्रह्म ही है। यहाँ सूत्र में वर्णित नेत्र स्थित पुरुष कौन है? इसी का निर्णय करने के लिए आचार्य अगला प्रकरण प्रारम्भ कर रहे हैं- ( ४४) अन्तर उपपत्तेः॥१३॥ सूत्रार्थ-अन्तर: = जो अन्तर्यामी है अर्थात् जो नेत्र के अन्दर देखने की क्षमता के रूप में विद्यमान होता है,
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 34
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
३६ वेदान्त दर्शन वही ब्रह्म है। उपपत्तेः = उपपत्ति (ऐसा मानने) से ही उक्त प्रसंग की संगति मिलती है। व्याख्या-उपपत्ति-(युक्ति) से यह प्रमाणित हो जाता है कि स्थूल के अन्दर सूक्ष्म पदार्थ विद्यमान रहता है। समस्त चर-अचर प्राणियों के अन्तस् में निवास करने के कारण ही ब्रह्म को अन्तर्यामी कहा गया है। छा ४/ १५/१ के अनुसार- 'नेत्र के अन्दर जो पुरुष दृष्टिगोचर हो रहा है, वही आत्मा है, अमृत है, अभय है और वही ब्रह्म है। इसके पश्चात् उसी को 'संयद्वाम (सब कुछ प्राप्त)', 'वामनीः (कर्मफल दाता)' और 'भामनी:' (लोक-लोकान्तरों में प्रकाशित) कहकर अन्त में इन विद्याओं का फल अर्चिमार्ग से ब्रह्म को प्राप्त होना कहा गया है। मस्तिष्कगत हृदय में स्थित और योगीजनों के नेत्रों में परिलक्षित होने वाला निर्लेप पुरुष ब्रह्म के अतिरिक्त और दूसरा कोई नहीं हो सकता। इस प्रकार उक्त प्रकरण पर दृष्टिपात करने से यह ज्ञात होता है कि नेत्र के मध्य में दृष्टिगोचर होने वाला पुरुष एकमात्र ब्रह्म ही है। जीवात्मा या प्रतिच्छाया के लिए ऐसा कथन उचित नहीं है; क्योंकि ब्रह्मविद्या के. प्रसंग में उसका उल्लेख करके उसे आत्मा, अमृत और ब्रह्म कहा है। अतः इन विशेषणों की समीचीनता ब्रह्म में ही हो सकती है, अन्य दूसरों में नहीं ॥१३॥ अब यहाँ यह आशंका होती है कि ब्रह्म को नेत्र में दृष्टिगोचर होने वाला क्यों कहा गया है? वह किसी विशेष स्थान आदि में रहने वाला थोड़े ही है? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- (४५) स्थानादिव्यपदेशाच्च॥१४॥ सूत्रार्थ-स्थानादि = श्रुति में विभिन्न स्थलों पर ब्रह्म के लिए विशेष स्थान आदि का, व्यपदेशात् = कथन होने से, च = भी (नेत्र के मध्य में स्थित पुरुष ब्रह्म ही है)। व्याख्या-शास्त्रों में जगह-जगह पर ब्रह्म को समझाने के लिए उनके स्थान, नाम, रूप आदि का उल्लेख किया गया है। बृहदारण्यक उपनिषद् (१/७/३-२३) में ब्रह्म को पृथ्वी आदि विभिन्न स्थलों में विद्यमान कहा गया है। श्रुतियों में इसी तरह से जगह-जगह पर वर्णन मिलता है। ऐसे ही योगीजनों के द्वारा चक्षु में भी ब्रह्म उपासनीय भाव से दृष्टिगोचर होता है। अतः यहाँ ब्रह्म को चक्षु में दृष्टिगोचर होने वाला कहना अनुचित नहीं है; क्योंकि ब्रह्म निर्विकार है तथा चक्षु में दृष्टिगोचर होने वाला पुरुष भी चक्षु के दोषों से सर्वथा विकाररहित रहता है। इस समानता के द्वारा ब्रह्म का यथार्थ रूप बतलाने के लिए इस प्रकार कहना ठीक ही है॥१४॥ अगले सूत्र में आचार्य उक्त सिद्धान्त (कथन) को और अधिक स्पष्ट करने के लिए एक अन्य युक्ति प्रस्तुत करते हैं- ( ४६) सुखविशिष्टाभिधानादेव च॥१५॥ सूत्रार्थ- च = तथा, सुखविशिष्टाभिधानात् = (नेत्र के मध्य स्थित पुरुष को) आनन्दयुक्त कहा गया है, इसलिए; एव = ही (यह स्पष्ट है कि वह एकमात्र ब्रह्म ही है)। व्याख्या-छा.उ. १४/१५/१ में यह प्रसङ्ग आया है कि 'नेत्रान्तर्गत जो पुरुष परिलक्षित होता है, वही आत्मा है। इसके उपरान्त आगे 'ब्रह्म' पद निर्देशन के साथ ही उसे अमृत, अभय आदि कहकर एवं अन्य कुछ आधारों पर यह स्पष्ट किया कि यही ब्रह्म भी है।' इस कथन में निर्भयता और अमृतत्व-ये दोनों ही सुखानुभूति के द्योतक हैं। योगीजन नेत्रान्तर्गत स्थित ब्रह्म की उपासना करते हैं, यह कथन भी उचित है क्योंकि वह ब्रह्म सुखमय ही कहा गया है। श्रुति (छा.उ.४/१०/५) में जब अग्रियों के सदृश आचार्यों ने एकत्र होकर उपदेश दिया कि जो 'कं' अर्थात् सुख है, वही 'खं' अर्थात् आकाश है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि वह ब्रह्म आकाश के सदृश अतिसूक्ष्म, सर्वव्यापी एवं आनन्द स्वरूप है। प्राण ही ब्रह्म है, सुख ही ब्रह्म है, इस प्रकार से वह सुख विशिष्ट आनन्दमय नेत्रस्थित होने के कारण ब्रह्म ही है। उसे ब्रह्म ही समझना चाहिए॥१५॥
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 35
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० २ सूत्र १७ ३७ अगले सूत्र में आचार्य उपर्युक्त युक्ति के अतिरिक्त और भी कुछ समाधान दे रहे हैं- (४७) श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च॥१६॥ सूत्रार्थ- श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात् = उपनिषद् अर्थात् आत्मज्ञान (रहस्य-विज्ञान) के रहस्य को श्रवण कर लेने वाले ब्रह्मवेत्ता की जो गति कही गई है, वही गति इस पुरुष को जानने वाले की भी बतलायी गई है, इससे; च = भी (सिद्ध होता है कि चक्षु में परिलक्षित होने वाला पुरुष ब्रह्म ही है)। व्याख्या-उपनिषद् आदि आत्मज्ञान के रहस्य को श्रवण कर आत्मसात् कर लेने वाले ज्ञानी जनों(ब्रह्मवेत्ता) की जो गति कही गई है, वही गति नेत्रान्तर्गत स्थित पुरुष को जानने वाले की भी कही गई है। यही गति क्रम उपकोसल नामक ब्रह्मचारी के प्रति कहा गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि उपकोसल को ब्रह्म का ही उपदेश दिया गया है। अतः अक्षि में दृष्टिगोचर होने वाला पुरुष ब्रह्म ही है। प्र. उ. (१/१०) में इसका वर्णन इस प्रकार मिलता है-तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा एवं ज्ञान द्वारा आत्मा को जानकर उत्तरायण-मार्ग से गमन करता हुआ ज्ञानी सूर्यलोक को प्राप्त होता है। यही प्राणों का केन्द्र है। यह अमृत और अभय पद है। यही सर्वोत्कृष्ट गति है। इसे प्राप्त कर वह महानात्मा पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं फँसता। ठीक ऐसा ही कथन छा. ४/१५/५ में भी मिलता है। गीता ८/२४ में भी ब्रह्मवेत्ता की गति का ऐसा ही उल्लेख मिलता है। छान्दोग्य में नेत्र पुरुष के वेत्ता की यही गति उक्त प्रसंग द्वारा व्यक्त की गई है। इस प्रकार आत्मा के रहस्य को श्रवण करने वाले व्यक्ति की गति का यह कथन नेत्र पुरुष के ब्रह्म होने का स्पष्ट प्रमाण है। इस गति को देवयान मार्ग (देवपथ या ब्रह्मपथ) भी कहते हैं। देवों के द्वारा यह मार्ग प्राप्त किया जाता है, अतः यह 'देवपथ' तथा ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग होने से 'ब्रह्मपथ' है। इस रीति से जो ब्रह्म को पा लेता है अर्थात् मुक्त हो जाता है, वह पुनः इस जन्म-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। अतः यह मार्ग ब्रह्मवेत्ताओं का है। इससे भी सिद्ध होता है कि अक्षि-पुरुष ब्रह्म ही है॥१६। यदि नेत्र के मध्य (भीतर) स्थित प्रतिबिम्ब, नेत्रेन्द्रिय के प्रमुख देवता या जीवात्मा इन दो में से किसी एक को नेत्र का अन्तर्वर्ती पुरुष मान लें, तो क्या आपत्ति है? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान दे रहे हैं- ( ४८) अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॥१७॥ सूत्रार्थ- अनवस्थिते: = अन्य किसी के नेत्र में स्थित न रहने से, च = और, असम्भवात् = अन्य किसी में सम्भव न होने से, इतर: = परब्रह्म के सिवाय दूसरा कोई भी, न = नहीं है। व्याख्या- परब्रह्म के सिवाय अन्य दूसरा कोई भी किसी के चक्षु में विद्यमान नहीं रह सकता। अतः योगी- जनों के चक्षुओं में स्थित पुरुष ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। यदि आशंका करें कि चक्षु में किसी दूसरे का प्रतिबिम्ब हो सकता है, तो यह इस कारण उचित नहीं है कि नेत्रेन्द्रिय में प्रतिबिम्ब दृश्य बदलते रहते हैं। जिस क्षण जो दृश्य स्थित होता है, उस क्षण उसी का प्रतिबिम्ब चक्षु में प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है तथा उसके अलग होते ही अदृश्य हो जाता है। जीवात्मा भी मन के द्वारा समय-समय पर भिन्न-भिन्न विषयों को ग्रहण करता रहता है और सभी चक्षुओं में सतत समान दृश्य स्थित नहीं रह सकता। सतत दृष्टिगोचर होने वाला पुरुष तो एकमात्र परब्रह्म ही है। नेत्र में परिलक्षित होने वाले पुरुष के जो अमृतत्व और निर्भयत्व आदि गुण हैं, वे ब्रह्म के सिवाय अन्य किसी में असम्भव हैं। अतः उपर्युक्त तीनों में से किसी को नेत्र के मध्य स्थित पुरुष नहीं माना जा सकता। इसलिए परब्रह्म को ही यहाँ नेत्र में दृष्टिगोचर होने वाला पुरुष मानना ठीक होगा॥१७॥ उक्त प्रकरण में यह कहा गया है कि श्रुति में स्थान-स्थान पर ब्रह्म के लिए पृथक्-पृथक् स्थानादि का निर्देश किया गया है। अब अगले सूत्र से आचार्य अधिदैव, अधिभूत आदि में उस ब्रह्म की व्याप्ति कहकर उसी तथ्य का प्रतिपादन करने के लिए आगे का प्रकरण शुरू करते हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 36
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
३८ वदान्त दशन
(४९) अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात्॥१८॥ सूत्रार्थ- अधिदैवादिषु = अधिदैव, अधिभूत और अध्यात्म आदि समस्त प्रकरणों में, तद्धर्मव्यपदेशात् = उस (ब्रह्म) के धर्म का उपेदश होने से वह, अन्तर्यामी = अन्तर्यामी ब्रह्म ही है। व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद् ३/७ में प्रसंग आता है कि ऋषि उद्दालक जी ने याज्ञवल्क्य मुनि से सर्वप्रथम सूत्रात्मा के सन्दर्भ में पूछा और फिर उस अन्तर्यामी के विषय में पूछा कि जो इस लोक और परलोक को एवं समस्त प्राणियों को उनके अन्तस् में रहकर नियन्त्रण में रखता है, वह अन्तर्यामी कौन है? उक्त प्रकरण का उत्तर देते हुए ऋषि ने सूत्रात्मा तो वायु को बतलाया और अन्तर्यामी का विस्तारपूर्वक विवेचन करते हुए उसे जड़-चेतनात्मक समस्त प्राणियों, सभी इन्द्रियों एवं सम्पूर्ण जीवों का नियन्त्रक बतलाते हुए अन्त में ऐसा कहा - 'यह तुम्हारा अमृत स्वरूप दिखाई नहीं देता, किन्तु स्वयं ही सबको देखता है। वह सुनने में न आने $ 国 出 出 वाला है; किन्तु स्वयं सबकी सुनता है, मनन करने में न आने पर भी वह सबका मनन करने वाला है। वह विशेष रूप से किसी के जानने में न आने पर भी स्वयं सभी को भली भाँति जानता है। ऐसा यह अन्तर्यामी आत्मा अमृतमय है। इससे परे सभी कुछ नष्ट होने वाला है। यहाँ सूत्र में आये महत्त्व सूचक विशेषण एकमात्र ब्रह्म में ही समान रूप से लागू हो सकते हैं। जीव का अन्तर्यामी आत्मा (ब्रह्म) के अतिरिक्त अन्य और कोई नहीं हो सकता। अतः उक्त प्रतिपादनों से यह सिद्ध हुआ कि इस प्रसङ्ग में कहा जाने वाला अन्तर्यामी ब्रह्म ही है, यही मानना चाहिए।१८।। उक्त सूत्र में विधि-मुख से यह सिद्ध किया गया है कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है। अब अगले सूत्र में आचार्य सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड़-प्रकृति अन्तर्यामी नहीं हो सकती- (५०) न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात्॥१९॥ सूत्रार्थ- च = और, स्मार्तम् = सांख्य स्मृति द्वारा प्रतिपादित जड़-प्रकृति, न = अन्तर्यामी नहीं है, अतद्धर्माभिलापात् = क्योंकि इस प्रकरण में कहे हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृति या जीव में नहीं हो सकते। व्याख्या-सांख्य-स्मृति में जहाँ प्रतिपादित जड़-प्रकृति के धर्मों का उल्लेख मिलता है, वहाँ चैतन्य परब्रह्म के धर्म ही प्रतिपादित हुए हैं। इस कारण वे धर्म अन्तर्यामी ब्रह्म के कदापि नहीं हो सकते। जड़ प्रकृति के धर्मों का उल्लेख अन्तर्यामी के लिए नहीं, वरन् चेतन परब्रह्म के धर्मों का ही विस्तार से विवेचन किया गया है। इस प्रकार से वहाँ पर कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती। अतः यहाँ इस प्रकरण में यही सिद्ध होता है कि 'अन्तर्यामी' नामक शब्द से एकमात्र अमृत स्वरूप ब्रह्म का ही वर्णन हुआ मानना चाहिए॥१९॥ यह सही है कि जड़ होने से प्रकृति को अन्तर्यामी नहीं कह सकते; किन्तु जीवात्मा तो चेतन है और वह शरीर एवं इन्द्रियों के अन्दर रहने वाला तथा उनका नियमन करने वाला भी स्पष्ट है, अतः उसी को अन्तर्यामी मान लिया जाये, तो क्या आपत्ति है? अगले सूत्र में आचार्य इसी आशंका का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- (५१) शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥२०॥ सूत्रार्थ- शारीर: = देह में निवास करने वाला जीवात्मा, च = भी, (न = अन्तर्यामी नहीं है,) हि = क्योंकि, उभये = दोनों - माध्यन्दिनी और काण्व शाखा वाले, अपि = भी, एनम् = इस जीवात्मा को, भेदेन = भेद पूर्वक (अन्तर्यामी से अलग मानकर), अधीयते = अध्ययन करते हैं। व्याख्या- माध्यन्दिनी और काण्व-इन दोनों शाखा वाले विद्वज्जनों ने जीवात्मा और ब्रह्म का भेद स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है। ये दोनों अन्तर्यामी को पृथिवी आदि की भाँति जीवात्मा के अन्दर रहकर उसका नियमन करने वाला मानते हैं। इन्होंने जीवात्मा को नियम्य और अन्तर्यामी को नियन्ता कहा है। काण्व ने 'यो विज्ञाने तिष्ठन् ..... (बृ.उ. ३/७/११) सूत्र द्वारा कहा कि जो विज्ञान में निहित और विज्ञान का नियामक है तथा
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic malerial on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 37
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० २ सूत्र २२ ३९
माध्यन्दिनी शाखा वालों ने य आत्मनि तिष्ठन् ......... (शतपथ ब्राह्मण १४/५/३०) द्वारा बतलाया कि जो जीवात्मा में रहने वाला और उसका नियमन करने वाला है। इस प्रकार जीव और ब्रह्म-इन दोनों का अलग- अलग वर्णन होने से भेद स्वतः सिद्ध हो जाता है। विज्ञान या आत्मा का नियमन करने वाला ब्रह्म ही हो सकता है, जीवात्मा कभी भी नहीं हो सकता। अतः सिद्ध हो जाता है कि जीवात्मा और ब्रह्म का पृथक्-पृथक् विवेचन होने से वहाँ 'अन्तर्यामी' पद परब्रह्म का वाचक है, जीव का नहीं ॥२०॥ यहाँ जिज्ञासा उठती है कि उक्त सूत्र में कहा गया है कि शरीर अन्तर्यामी नहीं हो सकता; किन्तु अन्तर्यामी प्रसंग में ब्रह्म के शरीर का वर्णन मिलता है। पृथिव्यादि सभी लोक एवं जीवात्मा को उस अन्तर्यामी ब्रह्म का 'शरीर' बतलाया है। ऐसी स्थिति में तब ब्रह्म को 'शरीर' क्यों नहीं माना जाता? उक्त आ्शका का समाधान आचार्य इस सूत्र में करते हैं- (५२) अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः॥२१॥ सूत्रार्थ- अदृश्यत्वादि-गुणक: = अदृश्यत्व आदि गुणों से युक्त परब्रह्म ही है; धर्मोक्ते: = क्योंकि उस जगह उसी के सर्वज्ञता आदि धर्म कहे गये हैं। व्याख्या- ब्रह्म सदैव अदृश्यत्व आदि गुणों से युक्त धर्म वाला है। उपर्युक्त सूत्र में अन्तर्यामी के जिन पृथिवी आदि 'शरीरों' का वर्णन किया गया है, वह कल्पना के आधार पर एक रूपक मात्र है। सम्पूर्ण जगत् में संव्याप्त होकर उसके नियामकत्व का वह प्रतिपादन है। जीव के शरीर सदृश उस ब्रह्म के शरीर का कथन नहीं है। जीव अपने पुण्यापुण्य के अनुसार जिस तरह प्राकृत देह को प्राप्त हो, निरन्तर जन्म-मृत्यु के बन्धन में आरूढ़ रहता है, वैसी स्थिति ब्रह्म में सम्भव नहीं है। इस कारण 'शरीर' पद में उसका समावेश नहीं होता। वह (ब्रह्म) सतत अदृश्यत्व गुणों से सम्पन्न होता है। उस ब्रह्म के ऐसे धर्मों का अनेकों जगह वर्णन मिलता है। मु.उ. के प्रारम्भ में ब्रह्मा द्वारा अपने पुत्र अथर्व के लिए ब्रह्म विद्या के प्रवचन का उल्लेख प्राप्त होता है। ब्रह्मवेत्ता ऋषियों ने जानने योग्य दो विद्याएँ-परा और अपरा बतलायीं। उनमें से अपरा विद्या तो वेद-वेदाङ्ग है और परा वह है, जिससे उस अक्षर स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार किया जाता है। आगे इसी उपनिषद् के १/ १/६ में अक्षरत्व का वर्णन इस तरह मिलता है- जो अदृश्य है, अग्राह्य है, ज्ञानेन्द्रियों का अविषय है, अरूप है, अचक्षुष्य है, श्रोत्र, हस्त एवं पाद आदि से रहित है, सर्वत्र व्याप्त है, अति सूक्ष्म है, अव्यय- अपरिणामी है, जो समस्त भूतों का कारण है, ऐसे अक्षरतत्त्व को मनीषीगण देखते व जानते हैं। उक्त सभी गुण एक मात्र उस अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर में ही हो सकते हैं, उससे पृथक् अन्य किसी में नहीं हो सकते। प्रकृति एवं प्राकृत तत्त्वों को उसके शरीर रूप में उल्लेख किये जाने से ब्रह्म 'शरीर' नहीं हो सकता ॥२१।। उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि के लिए आचार्य इस सूत्र में एक अन्य हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं- (५३) विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥।२२॥ सूत्रार्थ- च = और, विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम् = ब्रह्मसूचक विशेषणों का कथन होने एवं जीव और प्रकृति से ब्रह्म का भेद कहे जाने के कारण, इतरौ = दूसरे जीव और प्रकृति, न = अदृश्यत्व आदि गुणों से सम्पन्न जगत् का कारण नहीं कहा जा सकता। व्याख्या- सूत्र में इस प्रकरण के सन्दर्भ में अदृश्यत्व आदि गुणों से युक्त जो विशेषण कहे गये हैं और जिसे समस्त भूत-प्राणियों एवं जगत् का कारण कहा गया है, वे ब्रह्म में ही घटित होते हैं। वे न तो जड़-प्रकृति के अनुकूल हो सकते हैं और न ही जीव के अनुकूल। मुण्डकोपनिषद्- ३/१/७ में इसका वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'वह देखने वालों के हृदय में निहित है' अर्थात् वह ब्रह्म हृदय रूपी गुफा में स्थित है। तदनुसार जीव एवं प्रकृति से ब्रह्म की पृथक्ता सहज ही स्पष्ट हो जाती है। मुण्डक ३/१/२ में भी उल्लेख देखने को मिलता है। इस प्रकार से प्रस्तुत सूत्र में प्रत्यक्ष रूप से शब्दों के माध्यम से ब्रह्म को जीव एवं प्रकृति से भिन्न"
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 38
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
४० वदान्त दशन कहा गया है। अतः यहाँ पर स्पष्ट हो जाता है कि जीव एवं प्रकृति -इन दोनों में से कोई भी अदृश्यत्व आदि गुणों से सम्पन्न जगत् का कारण नहीं कहा जा सकता।।२२।। अगले सूत्र में सूत्रकार उक्त प्रकरण की पुष्टि के लिए पुनः एक प्रमाण और दे रहे हैं- (५४) रूपोपन्यासाच्च॥२३॥ सूत्रार्थ- रूपोपन्यासात् = ब्रह्म के विराट् रूप का काल्पनिक कथन होने से, च = भी (ब्रह्म ही समस्त भूत-प्राणियों एवं जगत् का कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या-शास्त्रों-श्रुतियों में ब्रह्म का कल्पना के आधार पर विराट्-रूप में वर्णन मिलता है। काल्पनिक कथन औपन्यासिक शैली में होते हैं। यहाँ सूत्र में 'च' पद इस भाव को व्यक्त करता है, जो कि पूर्व सूत्र से जिस अर्थ के प्रतिपादन में हेतु दिया गया है, उसी अर्थ के प्रतिपादन में यह हेतु है। ..... इक्कीसवें सूत्र के 'अदृश्यत्वादिगुणकः' एक वचनान्त पद का द्विवचनान्तपद में विपरिणाम कर पूर्व सूत्र के 'नैतरौ' पदों के सहित अन्वय किया गया। सूत्र में इन दोनों पदों की इसी रूप में अनुवृत्ति प्रस्तुत की गई है। तदनुसार सूत्र का अर्थ हुआ-रूप का उपन्यास-कथन होने के कारण भी जीव और प्रकृति मु.उ. (१/१/६) के सन्दर्भ में पठित अदृश्यत्वादि गुणों से युक्त नहीं माने जा सकते। मुण्डकोपनिषद् (२/१/४) में अदृश्यत्व आदि गुणों से युक्त ब्रह्म के सर्वलोकमय विराट् स्वरूप का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-'इस ब्रह्म का सिर अग्नि है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं; दिशाएँ दोनों कान हैं तथा उत्पन्न हुए वेद उसकी वाणी है। वायु इसका प्राण एवं सम्पूर्ण विश्व हृदय है। इसके पैरों से पृथ्वी का जन्म हुआ। यही सभी भूतों का आत्मा है।' इस तरह से ब्रह्म के विराट् रूप का वर्णन करके उसे सबका आत्मा कहा गया है। अतः उक्त प्रकरण में भूतयोनि के नाम से परब्रह्म का ही वर्णन है, यही सत्य है। ऐसी कल्पना करना अथवा विराट् रूप का वर्णन करना परमात्मा के निमित्त ही होता है, अन्य किसी के प्रति कदापि नहीं हो सकता॥।२३।। अब आशंका यह होती है कि छा.उ. (५/१८/२) में 'वैश्वानर' के स्वरूप का अलेख करते हुए 'ुलोक' को उसका सिर कहा है। 'वैश्वानर' शब्द जठराग्रि वाची है। अतः उक्त उपनिषद् का यह वर्णन जठराग्रि के सन्दर्भ में है या फिर अन्य किसी के सन्दर्भ में? अगले सूत्र में आचार्य इसी आशंका का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- (५५) वैश्वानर: साधारणशब्दविशेषात्॥२४॥ सूत्रार्थ- वैश्वानर: = वैश्वानर नामक ब्रह्म का ही वर्णन है, साधारणशब्दविशेषात् = (क्योंकि) उस वर्णन में 'वैश्वानर और आत्मा' इन सामान्य शब्दों की अपेक्षा (ब्रह्म-बोधक) विशेष शब्दों का प्रयोग किया गया है। व्याख्या-सामान्य वैश्वानर की सङ्गति में असामान्य गुणों के वर्णन से सिद्ध होता है कि 'वैश्वानर' ब्रह्म के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। छान्दोग्योपनिषद् में ५/११/१ से प्रारम्भ होकर पाँचवें अध्याय की समाप्ति तक इसकी चर्चा इस प्रकार की गई है- 'प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन और बुडिल' - ये पाँचों ऋषि सद्गृहस्थ एवं महान् वेदवेत्ता थे, इन लोगों ने आपस में विचार किया कि - 'को नु आत्मा किं ब्रह्म,' अर्थात् 'हमारा आत्मा कौन है,''ब्रह्म क्या है?' जब ये पाँचों निर्णय न कर सके, तो निश्चय किया कि 'इस समय ऋषि उद्दालक वैश्वानर आत्मा के जानकार हैं, हम सब उन्हीं के पास चलें।' जब ये सभी उद्दालक जी के पास पहुँचे, तो उनने अनुमान किया कि ये लोग मुझसे कुछ न कुछ पूछेंगे, लेकिन मैं इन्हें सन्तुष्ट नहीं कर पाऊँगा। यह सोचकर वे उन समस्त ऋषियों को लेकर राजा अश्वपति के समक्ष उपस्थित हुए; क्योंकि उस समय वही एक मात्र इस वैश्वानर आत्मा के ज्ञाता थे। राजा ने उन सभी का सम्मान करते हुए अगले दिन यज्ञ में शामिल होने एवं प्रचुर धन देने को कहा। उन ऋषियों ने कहा कि 'हमें धन नहीं चाहिए, हम जिस उद्देश्य को लेकर
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 39
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० २ सूत्र २६ ४१ आये हैं, आप हमें वही प्रदान करें। हमें पता लगा है कि आप वैश्वानर आत्मा के साक्षात्कर्ता हैं, कृपया आप हम सभी के लिए उसी का उपदेश करें।' अश्वपति ने उन सबको अगले दिन बुलाया और क्रमशः प्रत्येक से पूछा कि 'इस विषय में आप क्या जानते हैं? उनमें से प्राचीनशाल ने कहा- 'मैं द्युलोक को आत्मा जानकर उपासना करता हूँ।' सत्ययज्ञ ने कहा- 'मैं सूर्य की उपासना आत्मा के रूप में करता हूँ।' इन्द्रद्युम्न ने कहा- 'मैं वायु की उपासना करता हूँ।' ऋषिजन ने आकाश की और बुडिल ने अपने आप को जल का उपासक कहा। तदनन्तर राजा ने कहा कि 'आप लोग वैश्वानर के एक-एक अंग की उपासना करते हैं; अतः यह सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है; क्योंकि उस विश्व के आत्मा वैश्वानर का मस्तक द्युलोक है, नेत्र सूर्य है, प्राण वायु है, देह का मध्य भाग आकाश है, जल बस्ति-स्थान है, धरती दोनों चरण हैं, वेदी वक्षस्थल है, लोम दर्भ है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है, अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है व मुख आहवनीय अग्नि है। इस प्रकार उक्त वर्णन से ज्ञात होता है कि विश्व का आत्मा सदृश विराट् पुरुष ब्रह्म को ही वैश्वानर कहा गया है। इस प्रकरण में जठराग्रि आदि के वाचक सामान्य शब्दों की अपेक्षा, ब्रह्म के वाची विशिष्ट शब्दों का सर्वाधिक स्थलों में प्रयोग किया गया है॥२४॥ आचार्य अगले सूत्र में उक्त तथ्य को दृढ़ करने हेतु दूसरा कारण बतला रहे हैं- (५६) स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति॥२५।। सूत्रार्थ-स्मर्यमाणम् = स्मृतियों में जो विराट् पुरुष का वर्णन हुआ है, अनुमानम् = वह यथार्थतः श्रुति के वचन का अनुमान कराता हुआ वैश्वानर के परब्रह्म होने का निश्चय करने वाला है, इति स्यात् = इस प्रकार यहाँ इस प्रकरण में यह सिद्ध होता है कि 'वैश्वानर' परब्रह्म परमात्मा ही है। व्याख्या- स्मृतियाँ भी वैश्वानर को ब्रह्म वाचक ही मानती हैं। मनुस्मृति में 'लोकानां तु विवृद्ध्यर्थ' द्वारा ब्रह्म के वैश्वानर रूप का वर्णन किया गया है। गीता में भी भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है- 'मैं वैश्वानर रूप से प्राणियों के देहाश्रित होकर अवस्थान करता हूँ। ब्रह्म के विराट् स्वरूप का ज्ञान वेदादि अन्य शास्त्रों के वर्णन से होता है। छा.उ.५/१८/२ के प्रसंग में वैश्वानर को परमात्मा के रूप में जाना जाता है। अथर्व. १०/७/३२-३४ में भी 'ब्रह्म' के उस विराट् स्वरूप का उल्लेख मिलता है। महा. के शान्तिपर्व (४७/७०) में इस प्रकार का वर्णन मिलता है- 'जिसका मुख अग्रि है, द्युलोक मस्तक है, आकाश नाभि है, पृथिवी दोनों चरण, सूर्य नेत्र हैं एवं दिशाएँ कर्ण हैं। ऐसे उस विराट् ब्रह्म को प्रणाम है। अतः यहाँ उस ब्रह्म के विराट् रूप को ही वैश्वानर कहा गया है, ऐसा स्मृति एवं श्रुति वचनों से भी प्रमाणित होता है। इसलिए जहाँ पर भी आत्मा या परमात्मा के वर्णन में 'वैश्वानर' शब्द मिले, वहाँ पर उसे ब्रह्म के विराट् रूप का ही वाचक जानना चाहिए।२५॥। अगले सूत्र में आचार्य उक्त तथ्य की सिद्धि के लिए स्वयं ही आशङ्का उपस्थित कर समाधान कर रहे हैं- (५७) शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्ट्युपदेशादसम्भवात्पुरुषमपि चैनमधीयते॥२६॥ सूत्रार्थ-शब्दादिभ्यः = शब्दादि हेतुओं के द्वारा (अर्थात् श्रुतियों में वैश्वानर शब्द अग्रि के अर्थ में विशिष्ट रूप से प्रयुक्त हुआ है और यहाँ इस सूत्र में गार्हपत्य आदि अग्रियों को वैश्वानर का अंग कहा गया है, इसलिए); च = और, अन्तः प्रतिष्ठानात् = (श्रुति में वैश्वानर को देह के) अन्तस् में स्थित होने से, चेत् = ही, इति = (यदि) ऐसा कहो कि, न = (ब्रह्म शब्द वैश्वानर का वाचक) नहीं है, न = (तो) ऐसा नहीं है; तथा दृष्ट्युपदेशात् = क्योंकि वहाँ वैश्वानर में ब्रह्मदृष्टि से दिये गये उपदेश द्वारा, असम्भवात् = जठराग्रि के लिए यह विशेषण संभव नहीं हो सकते, च = और, एनम् = इस वैश्वानर को, पुरुषम् = 'पुरुष' नाम से, अपि = भी, अधीयते = पढ़ते हैं (अतः उक्त प्रकरण में वैश्वानर शब्द ब्रह्म का ही वाचक है)।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 40
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
४२ वेदान्त दर्शन व्याख्या- यदि ऐसा कहा जाये कि वैश्वानर शरीरधारी के अन्दर स्थित जठराग्नि है, ऐसा ही शब्दादि के हेतु से सिद्ध होता है, तो ऐसा कहना नितान्त भ्रममूलक है; क्योंकि श्रुतियों में जो उपदेश दिये गये हैं, उन सबसे यही सारतत्त्व निकलता है कि वैश्वानर विराट् पुरुष रूप ब्रह्म के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। शतपथ ब्रा.१०/६/ १/११ में कहा गया है-'जो इस वैश्वानर अग्नि को पुरुष के आकार का एवं पुरुष के अन्तस् में स्थित जानता है।' इस तरह वैश्वानर शब्द अग्नि के विशेषण रूप से प्रयुक्त हुआ है। साथ ही जिस श्रुति पर विचार चल रहा है, उसमें भी गार्हपत्य आदि तीनों अग्नियों को वैश्वानर का अङ्ग कहा गया है। इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता (१५/१४) में भी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- 'मैं ही वैश्वानर रूप से सभी भूत-प्राणियों के देह में स्थित होकर चार प्रकार के अन्नों को पचाता हूँ। इस प्रकार इन सभी कारणों से स्पष्ट हो जाता है कि इस प्रकरण में कहा हुआ 'वैश्वानर' भी ब्रह्म ही है। जठराग्रि या अन्य कोई नहीं ॥२६॥ इस प्रसङ्ग के अन्तर्गत अलग-अलग उपास्य रूप से आये हुए 'दिव', 'आदित्य"वायु', 'आकाश', 'जल' एवं 'पृथिवी' भी वैश्वानर नहीं हैं, सूत्रकार अगले सूत्र में यही सिद्ध कर रहे हैं- (५८) अत एव न देवता भूतं च ।।२७।। सूत्रार्थ-अतः = उक्त कारणों से इस प्रकरण में, एव = ही (यही सिद्ध होता है कि), देवता = द्यौ, सूर्य, अग्नि आदि लोकों के अधिष्ठाता देवगण, च = और, भूतम् = आकाशादि भूत समूह, न = वैश्वानर नहीं है। व्याख्या- उपर्युक्त किसी भी कारण से यहाँ इस प्रकरण में वैश्वानर का जठराग्रि या पञ्चभौतिक पदार्थ होना सिद्ध नहीं होता। यहाँ सूत्र में 'द्यौ'सूर्य', 'अग्नि' आदि लोकों को भी एवं आकाश, वायु आदि भूत समूह की अपने आत्मा-रूप में उपासना करने का प्रसङ्ग आया है। अतः आचार्य स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि गत सूत्र में कहे हुए कारणों से यह भी जान लेना चाहिए कि उन-उन लोकों के अभिमानी देवों एवं आकाश आदि भूतों का भी 'वैश्वानर' शब्द से ग्रहण नहीं है; क्योंकि सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड को वैश्वानर का शरीर कहा गया है। यह कहना न तो देवों के लिए सम्भव है और न भूतों के लिए ही सम्भव है। अतः यही समझना चाहिए कि 'जो विश्वरूप भी है और पुरुष भी है, वही वैश्वानर है।' इस उत्पत्ति-रचना के अनुसार ब्रह्म ही वैश्वानर है, यही यहाँ सिद्ध होता है॥२६ । अब्र अगले सूत्र से सूत्रकार अन्य इतर आचार्यों के मतानुसार यह व्यक्त कर रहे हैं कि 'वैश्वानर' पद साक्षात् परब्रह्म का वाचक है, इसमें कोई विरोध नहीं। इसी आशय से सूत्रकार आचार्य जैमिनि का मत यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं- (५९) साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥२८।। सूत्रार्थ- जैमिनि: = आचार्य जैमिनि कहते हैं कि, साक्षात् = 'वैश्वानर' शब्द को साक्षात् ब्रह्म का वाचक मानने में, अपि = भी, अविरोधम् = किसी भी तरह का विरोध नहीं है। व्याख्या-आचार्य जैमिनि कहते हैं कि 'वैश्वानर' शब्द को साक्षात् विश्व रूप परब्रह्म का वाचक स्वीकार करने में कोई विरोध नहीं है। उनके मतानुसार ब्रह्म के नेतृत्व बोध से तथा सर्व कारण रूप ब्रह्म बोधक 'वैश्वानर' शब्द के सदृश नयनादि गुण की संगति होने से अग्नि को भी साक्षात् ब्रह्म मान लेना उचित होगा। इस प्रकार से भी 'वैश्वानर' शब्द ब्रह्म का वाचक ही सिद्ध होता है। यहाँ पर जठराग्नि को प्रतीक मानकर उसके रूप में ब्रह्म की उपासना मानने की किसी भी तरह की जरूरत नहीं है। यहाँ इस सूत्र में एवं आगे के सूत्रों में अन्य आचार्यों के नाम से सूत्रकार ने जो भाव व्यक्त किये हैं, उसका सूत्रकार के आशय के साथ इस विषय में कोई भेद नहीं है। आचार्य ने इस सन्दर्भ में प्रथम सूत्र से अपना जो आशय व्यक्त किया है, उसी को अंशतः अन्य आचार्यों के नाम से भी व्यक्त किया॥२८॥
Disclalmer / Warning: All Iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the websle can be used for propagation with prior written consent.
Page 41
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० २ सूत्र ३१ ४३ इस प्रकार २९ से ३१ सूत्र तक विभिन्न आच्चार्यों के मत प्रस्तुत करते हुए ३२ वें सूत्र में अपना मत बतलाकर आचार्य इस द्वितीयपाद को समाप्त करते हैं। अब अगले सूत्र में सूत्रकार आचार्य आश्मरध्य का मत बतला रहे हैं- (६० ) अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः॥२९॥ सूत्रार्थ-आश्मरथ्यः = आचार्य आश्मरथ्य का, इति = यह कथन है कि, अभिव्यक्ते: - (भक्तजनों पर अनुग्रह करने के लिए) ब्रह्म का अवतरण होता है। (अविरोधः = इसलिए कोई विरोध नहीं है)। व्याख्या-आचार्य आश्मरथ्य ने ब्रह्म का प्रादेश रूप से साकार होना माना है। उनका कथन है कि भक्तों पर कृपापूर्वक दर्शन देने के लिए भगवान् समय-समय पर उनकी श्रद्धानुसार विभिन्न रूपों में अवतरित होते हैं। अपने भक्तजनों को दर्शन, स्पर्श एवं प्रेम आदि के द्वारा आनन्दानुभूति कराने, उनका उद्धार करने और संसार में अपनी कीर्ति प्रसारित करके कधन-मनन से भक्तों को लाभान्वित करने के लिए मानव आदि के रूप में समय-समय पर अवतार लेते हैं। यह कथन केनोपनिषद् ३/२ और श्रीमद्भगवद्गीता ४/६-९ में तथा अन्य दूसरे आर्षग्रन्थों में देखने को मिलता है। इस प्रकार विराट् रूप में उस ब्रह्म को सगुण-साकार एवं देश-विशेष से सम्बन्धित स्वीकारने में किसी भी तरह का विरोध नहीं है। वह अविनाशी सत्ता जिस तरह निर्गुण- निराकार है, उसी तरह सगुण-साकार भी है। इसी तथ्य को माण्डूक्योपनिषद् में ब्रह्म के चार पादों का विवेचन करके सम्यक् रूप से कहने का प्रयास ऋषि ने किया है॥२९।। अगले सूत्र में आचार्य उक्त विषय के सन्दर्भ में आचार्य बादरि का मत प्रस्तुत करते हैं- ( ६१ ) अनुस्मृतेर्बादरि: ॥३० ।। सूत्रार्थ- बादरि: = आचार्य बादरि का कथन है कि, अनुस्मृतेः = अनुस्मरण-चिन्तन प्रादेश मात्र अर्थात् हृदय प्रदेश में उपासना काल में उस वैश्वानर ब्रह्म का स्मरण करने के लिए तथा उसको देश-विशेष से सम्बद्ध बतलाने में (कोई विरोध नहीं है)। व्याख्या- आचार्य बादरि का कथन है कि, वैश्वानर आत्मा (ब्रह्म) का अनुस्मरण अर्थात् चिन्तन-मनन प्रादेश मात्र (हृदय प्रदेश) में किया जाता है। इसीलिए आचार्य बादरि के विचार से वैश्वानर (ब्रह्म) को प्रादेश मात्र कहा है। परब्रह्म यद्यपि देश, काल व पात्र से परे है, तब भी उनका सतत ध्यान और स्मरण करने हेतु उन्हें देश-विशेष में प्रतिष्ठित विराट् रूप मानने, कहने एवं जानने में कोई विरोध नहीं है; क्योंकि ब्रह्म तो सर्वसमर्थ हैं। जो भी भक्त-साधक उन परम प्रभु का जिस-जिस रूप में ध्यान-पूजन करते हैं, उनकी मुक्ति हेतु वे उनको तदनुरूप प्राप्त होते हैं। आचार्य आश्मरथ्य के मत से हृदय-क्षेत्र में ब्रह्म की अभिव्यक्ति के कारण 'प्रादेशमात्र' कथन है; किन्तु आचार्य बादरि ऐसे कथन का कारण उस क्षेत्र में स्थित ब्रह्म की उपासना होना बतलाते हैं। इन दोनों आचार्यों के मत में कोई विशेष अन्तर नहीं है। दोनों का कथन उचित है; क्योंकि ब्रह्म की उपासना उसी प्रदेश (क्षेत्र) में की जाती है तथा उसका साक्षात् भी वड़ीं होता है। यह तो मात्र एक अर्थ को प्रतिपादित करने की अलग-अलग रीतियाँ मात्र हैं। सूत्रकार को अर्थ की इस तरह की उपपत्ति में कोई आपत्ति नहीं है॥३० ॥ अगले सूत्र में सूत्रकार उक्त विषय के सन्दर्भ में आचार्य जैमिनि का मत प्रस्तुत करते हैं- ( ६२ ) सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति॥३१॥ सूत्रार्थ-जैमिनि: = आचार्य जैमिनि का कथन, इति = इस प्रकार है कि, सम्पत्ते: = ब्रह्म अनन्त ऐश्वर्यों से सम्पन्न है। अतः (उसे देश-विशेष से सम्बन्ध रखने वाला मानने में कोई विरोध नहीं है), हि = क्योंकि, तथा ऐसा ही भाव, दर्शयति = श्रुतियाँ भी दिखलाती (प्रकट करती) हैं।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 42
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
४४ वदान्त दशन
व्याख्या-आचार्य जैमिनि का कथन इस प्रकार है कि परब्रह्म परमात्मा अनन्त गुणों-ऐश्वर्यों से युक्त है। इसलिए उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत ब्रह्म को सगुण, साकार एवं किसी देश-विशेष से सम्बन्ध रखने वाला मान लेने में किसी भी तरह का विरोध नहीं है; क्योंकि दूसरी अन्य श्रुतियाँ ठीक इसी तरह का भाव प्रकट करती हैं। मुण्डकोपनिषद् २/१/४ में भी ऋषि ने ऐसा ही भाव व्यक्त किया है। ऐश्वर्यवान् होने के कारण प्रादेशमात्रत्व भी उनकी अचिन्त्य शक्ति की परिचायक है; क्योंकि ब्रह्म विश्व-वसुधा के समस्त प्रदेशों-क्षेत्रों में अवस्थित रहता है। 'द्यु' से लेकर 'पृथिवी' पर्यन्त सभी लोकों का वैश्वानर के अंग रूप का उल्लेख मिलता है। यह उल्लेख जीव-देह के मस्तक (सिर) से चिबुक (ठोड़ी) तक सीमित है। देहांगों के साथ 'द्यु' आदि के इस सन्तुलन को यहाँ सूत्र में 'संपति' पद से अभिप्रेरित किया गया है। वैश्वानर का 'द्यु' से लेकर पृथिवी तक संव्याप्त होना, देह के अंगों में मस्तक से ठोड़ी तक व्याप्त कहा जाता है। ठोड़ी से मस्तक तक यह एक बालिश्त का प्रदेश कहा गया है। इस कारण सर्वत्र संव्याप्त वैश्वानर को प्रादेश मात्र कहा गया है। ऐसा ही उल्लेख शतपथ ब्रा. के उक्त प्रसंग (१०/६/१/१०-११) में भी दर्शाया गया है। ब्रह्म को 'प्रादेशमात्र' कहे जाने की तरह से कुछ स्थलों में इसे 'अंगुष्ठमात्र' भी कहा गया है। ऐसा वर्णन कठोपनिषद्-(२/१/१२- १३) के सन्दर्भ में देखने को मिलता है। यहाँ जीव के मध्य में 'अंगुष्ठमात्र' कहकर ब्रह्म के अस्तित्व को बतलाया गया है। उस क्षेत्र में चिन्तन-मनन ही ब्रह्म के लिए इस 'अंगुष्ठमात्र' के प्रयोग का कारण कहा गया है।। ३१ ॥ अब अगले सूत्र में आचार्य इन सभी प्रासंगिक उपदेशों (चर्चा-कथन) का निगमन करते (निष्कर्ष बताते) हुए प्रकरण को समाप्त कर इस द्वितीयपाद का उपसंहार करते हैं- (६३ ) आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥३२॥ सूत्रार्थ- अस्मिन् = इस सैद्धान्तिक प्रकरण में, एनम् = इस ब्रह्म को, च = ही, आमनन्ति = मानते हैं। अर्थात् वैश्वानर आत्मा की उपासना के सन्दर्भ में आत्मज्ञान की इस विधि को अनेक प्रसंगों में बारम्बार उल्लेख करते हैं। व्याख्या- इस सैद्धान्तिक प्रकरण में सर्वव्यापी, प्रादेशमात्र में स्थित, सर्वशक्तिमान्, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमात्मा के विषय में ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते हैं। यथार्थतः ब्रह्म के स्वरूप-प्रतिपादन में तर्क नहीं चलता; क्योंकि स्मृति आदि श्रुति-वचनों में भी ब्रह्म को तर्क बुद्धि से परे तथा अचिन्त्य कहा गया है। वह ब्रह्म सगुण, निर्गुण, साकार एवं निराकार, सविशेष- निर्विशेष आदि सभी कुछ है। अतः साधक को उसके स्मरण, चिन्तन-मनन में संलग्न हो जाना चाहिए। वह सर्वत्र संव्याप्त रहने वाली भगवद्सत्ता सभी देशों-प्रदेशों में सर्वदा उपस्थित रहती है। अतः उसको किसी भी देश-विशेष से संयुक्त रूप से मानना विपरीत नहीं है और वह सभी देशों-क्षेत्रों से सर्वदा ही निर्लिप्त रहता है। इसलिए उसको देश-काल व पात्र से परे मानते हुए चिन्तन-मनन में लग जाना चाहिए। वह वैश्वानर रूप ब्रह्म सभी रूपों में स्थित है, ऐसा मान लेना ही कल्याणप्रद सिद्ध होगा। अतः उपर्युक्त सूत्रों में वर्णित सभी आचार्यों की मान्यता सर्वदा उचित ही है।३२॥
।। इति प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
Disclalmer / Warning: All iterary and artistic materlal on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 43
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
॥। अथ प्रथमाध्याये तृतीयः पादः ॥ पूर्व के दोनों पाद में सर्वनियन्ता परब्रह्म परमेश्वर के व्यापक स्वरूप का सम्यक् रूप से प्रतिपादन किया गया। अब उसी अविनाशी ब्रह्म को सभी का आधार बतलाते हुए तृतीय पाद का शुभारम्भ किया जा रहा है- ( ६४ ) द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात्।१।। सूत्रार्थ- द्युभ्वाद्यायतनम् = आर्षग्रन्थों-श्रुतियों में जिसे स्वर्ग एवं पृथिवी आदि का आयतन अर्थात् आधार कहा गया है (वह ब्रह्म ही है); स्वशब्दात् = क्योंकि वहाँ 'आत्मा' शब्द उस ब्रह्म (परमात्मा) के लिए प्रयुक्त है। व्याख्या- यहाँ परब्रह्म परमेश्वर को स्वर्गादि का आश्रय रूप तथा 'आत्मा' कहा गया है। श्रुति में इसे 'आत्मस्वरूप' एवं 'अमृत सेतु' आदि विशेषणों से युक्त बतलाया है। मंत्र में जिस आत्मा को सम्पूर्ण जगत् का आश्रय-आधार माना है, वह अविनाशी ब्रह्म का ही वाचक है। मुण्डकोपनिषद् के अन्तर्गत 'यस्मिन् दयौः पृथिवी ...... (२/२/५) में उल्लेख है कि 'जिसमें स्वर्ग, पृथिवी तथा उसके मध्य का आकाश एवं सम्पूर्ण प्राणों के सहित मन बँधा हुआ है, ऐसे ही उस एक मात्र सबके आत्मस्वरूप अविनाशी ब्रह्म को जानना चाहिए और अन्य सभी तरह की बातों-विचारों को हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए। यही अमृत का सेतु है।' यहाँ जिस एक आत्मा को उपर्युक्त ऊर्ध्व से ऊर्ध्व स्वर्ग एवं अधः पृथिवी आदि सम्पूर्ण विश्व का आश्रय स्थल कहा है, वह एकमात्र परमेश्वर ही है, जीव या प्रकृति नहीं; क्योंकि उसमें प्रयुक्त 'आत्मा' शब्द ब्रह्म का बोध कराने वाला है।।१। अगले सूत्र में आचार्य उपर्युक्त तथ्य की प्रामाणिकता के लिए एक अन्य युक्ति प्रस्तुत करते हैं- (६५) मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच्च ।।२।। सूत्रार्थ-मुक्त = (उस ब्रह्म को) मुक्त पुरुषों के लिए, उपसृप्य = प्राप्तव्य, व्यपदेशात् = कहा गया है, (अतः वह जीवात्मा नहीं हो सकता)। व्याख्या- मुण्डकोपनिषद् ३/२/८ के अनुसार 'जैसे प्रवाहित होती हुई सभी नदियाँ अपने नाम-रूप का परित्याग कर सागर में समाहित हो जाती हैं; वैसे ही आत्मज्ञानी, मनीषी, महात्मा अपने नाम-रूप से परे होकर श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम दिव्य परम पुरुष साक्षात् परमेश्वर (ब्रह्म) को प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार श्रुति ने ब्रह्म को मुक्त (ज्ञानवान्) मनीषियों के लिए प्राप्तव्य कहा है। मुण्डक, २/२/५ में भी ऋषि कहते हैं कि- 'द्युलोक और 'पृथिवी' आदि के आश्रयरूप से जिस 'आत्मा' का उल्लेख मिलता है, वह 'जीवात्मा' नहीं; वरन् वह तो साक्षात् ब्रह्म ही है। इसी उपनिषद् के पूर्ववर्ती चतुर्थ मन्त्र में भी ब्रह्म को जीवात्मा का प्राप्य कहा है, यथा- प्रणव तो धनुष है और जीव बाण के सदृश है। ब्रह्म उसका लक्ष्य है। प्रमाद रहित मानव के द्वारा वह लक्ष्य बींधा जाने योग्य है, अतः उपासक को यही उचित है कि उस लक्ष्य का बेधन कर बाण के सदृश उसमें लीन हो जाये अर्थात् बन्धनों से मुक्त होकर सदैव परब्रह्म के चिन्तन में तत्पर रहता हुआ तदनुरूप हो जाना चाहिए। इससे यह सिद्ध हुआ कि प्रस्तुत प्रसङ्ग में स्थान-स्थान पर ब्रह्म को जीव का प्राप्य कहे जाने के कारण उक्त श्रुतियों में वर्णित द्युलोक, पृथिवी आदि का आश्रयभूत वह (आत्मा) ब्रह्म ही हो सकता है, दूसरा अन्य नहीं। इस प्रकार उक्त आप्त वचनों से यह सिद्ध हुआ कि मुक्त पुरुषों के लिए ब्रह्म ही प्राप्तव्य है।।२॥ अब् यहाँ आशङ्का यह उठती है कि पृथिवी आदि सम्पूर्ण भूत-प्रपञ्च, जड़-प्रकृति का कार्य है, कार्य का आयतन (आधार) कारण ही होता है; अतः जड़ प्रकृति को ही सभी का आश्रय माना जाये, तो क्या आपत्ति है? इसी का समाधान आचार्य आगे के सूत्र में कर रहे हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 44
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
४६ वेदान्त दर्शन
( ६६ ) नानुमानमतच्छब्दात्॥३।। सूत्रार्थ-अनुमानम् = अनुमान-कल्पना से (जड़-प्रकृति प्रधान), न - पृथिवी और स्वर्ग आदि का आधार नहीं हो सकता, अतच्छब्दात् = क्योंकि उसका प्रतिपादन गब्द द्वारा (इस प्रकरण में) नहीं हुआ है। व्याख्या- प्रधान अर्थात् जड़-प्रकृति को पृथिवी एवं स्वर्ग आदि का आधार-अवलम्बन बतलाने वाला ऐसा किसी भी तरह का कोई भी शब्द इस प्रकरण में प्रयोग में नहीं लाया गया। इस कारण से उसे (प्रकृति को) इन (पृथिवी-स्वर्गादि का) आधार नहीं मानना चाहिए। रह इस जगत् का मूल उपादान कारण नहीं है; यह बात तो पहले ही प्रतिपादित की जा चुकी है। इसलिए उसे कारण कहकर इनका अवलम्ब मानने की किसी भी तरह की आशा नहीं करनी चाहिए। अतः उक्त प्रकरण में पृथिवी एवं स्वर्ग (द्यु) आदि का आश्रय प्रकृति (प्रधान) को नहीं; वरन् 'ब्रह्म' को माना जाना चाहिए, यही उचित होगा॥३। प्रकृति-वाची शब्द उक्त प्रकरण में नहीं है, यह तो सही है; किन्तु जीवात्मा-वाची 'आत्मा' शब्द वहाँ तो है ही, इसलिए उसी को द्यु, पृथिवी आदि का यदि आश्रय मान लें, तो क्या आपत्ति है? शिष्य की उक्त आशंका का समाधान आचार्य आगे के सूत्र में करते हैं- (६७ ) प्राणभृच्च॥४॥ सूत्रार्थ- प्राणभृत् = प्राण को धारण करने वाला अर्थात् जीवात्मा, च = भी, (न = द्युलोक आदि का अवलम्बन नहीं हो सकता।) व्याख्या- जिस प्रकार प्रधान-(जड़-प्रकृति) को द्यु और पृथिवी आदि का अवलम्बन-आश्रय मानने के पक्ष में कोई शब्द नहीं प्राप्त होता, उसी प्रकार से प्राणधारी जीवात्मा को भी आश्रय मानने के लिए भी कोई शब्द उपलब्ध नहीं है। इसलिए द्यु, पृथिवी आदि का आयतन (आधार) एक मात्र 'ब्रह्म' ही है, दूसरा और कोई शब्द उपलब्ध नहीं है। 'आत्मा' शब्द अन्यत्र प्राणधारी (जीवात्मा) के अर्थ में प्रयुक्त होने पर भी यही इस प्रकरण में वह प्राणधारी का वाचक नहीं है; क्योंकि मु०उ०(२/२/७) में इसके लिए 'आनन्दमय' और 'अमृत' विशेषण प्रयुक्त किये गये हैं, ये विशेषण मात्र परब्रह्म के ही अनुरूप हैं। अतः जीवात्मा को पृथिवी और स्वर्गादि का अवलम्ब नहीं मानना चाहिए।४॥
एक अन्य जीवात्मा स्वर्गादि का आयतन (आधार) नहीं है, इस कारण अगले सूत्र में आचार्य उक्त तथ्य के प्रतिपादनार्थ एक अन्य कारण प्रस्तुत करते हैं- (६८) भेदव्यपदेशात्॥५॥। सूत्रार्थ- भेदव्यपदेशात् = (उक्त प्रकरण में) आत्मा और जीवात्मा में भेद कहे जाने के कारण (प्राणधारी- जीवात्मा सबका आश्रय नहीं है)। व्याख्या- आत्मा और जीव में भिन्नता कहे जाने से भी जवात्मा द्यु, पृथिवी आदि लोकों का आश्रय नहीं हो सकता। सांसारिक मोह-माया में आबद्ध हुआ जीव लोभ-मोह आदि के वश में होता है; किन्तु जब वह परब्रह्म का साक्षात् कर लेता है, तो उसके लोभ आदि विकार समाप्त हो जाते हैं। इस प्रकार से जीव और ब्रह्म का भेद स्पष्ट हो जाता है। इससे सिद्ध हो जाता है कि पृथिवी आदि का आश्रय जीव या प्रकृति नहीं; वरन् एकमात्र परब्रह्म ही संभव है। मुण्डकोपनिषद् २/२/५ में मृषि ने कहा है- 'उस आत्मा को जानने का प्रयास करो।' इस प्रकार ज्ञातव्य आत्मा से उसकी जानकारी रखने वाला पृथक् ही होगा। ऐसे ही इसी उपनिषद् के ३/१/७ में उक्त आत्मा को द्रष्टा, जीवों की हृदय रूपी गुह में स्थित कहा गया है।' इस कथन से भी ज्ञातव्य आत्मा की पृथक्ता पुष्ट होती है। अतः इस प्रकरण में वर्णि पृथिवी स्वर्गादि लोकों का आश्रयदाता परमात्मा- ब्रह्म ही है; जीवात्मा कदापि नहीं॥५॥
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this webslte is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 45
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ३ सूत्र ८ ४७
जीवात्मा और जड़ प्रकृति- ये दोनों ही स्वर्गादि के अवलम्ब नहीं हैं, अगले सूत्र में आचार्य पुनः एक अन्य कारण प्रस्तुत कर रहे हैं- (६९ ) प्रकरणात्॥६॥ सूत्रार्थ- प्रकरणात् = प्रकरण से अर्थात् यहाँ ब्रह्म का प्रकरण है, (अतः यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा और जड़ प्रकृति द्यु और पृथिवी आदि के आश्रय नहीं हैं)। व्याख्या- इस प्रकरण में पूर्वापर सभी मन्त्रों में उस परब्रह्म का ही विवेचन किया गया है। इस कारण यहाँ अन्य किसी के विवेचन का प्रश्न ही नहीं उठता। मु.उ. १/१/३ में वर्णन मिलता है कि महाशाल शौनक ने अंगिरस् से पूछा- 'भगवन्! किसके जान लेने से यह सब जाना हुआ हो जाता है? अंगिरस् जी ने- अपरा और परा विद्या का वर्णन कर 'यत्तदद्रेश्यं' इत्यादि सन्दर्भ से उस तत्त्व का उपदेश किया। वह श्रेष्ठ तत्त्व नित्य, सर्वशक्तिमान्, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, अपरिणामी, सम्पूर्ण विश्व का उद्भव कर्त्ता एकमात्र ब्रह्म ही है। उसी के जान लेने से अन्य के जानने की आवश्यकता नहीं रहती। आगे इसी में उस तत्त्व को स्वर्गादि का आश्रय बतलाया है, अतः जीव या जड़-प्रकृति को ऐसा आश्रय आयतन नहीं माना जा सकता। सबका एकमात्र आधार ब्रह्म ही है ।।६। इसके अतिरिक्त अगले सूत्र में आचार्य और भी एक हेतु देकर समाधान करते हैं- (७० ) स्थित्यदनाभ्यां च।।७। सूत्रार्थ-स्थित्यदनाभ्याम् = स्थिति और भोग द्वारा, च = भी (जीव) और ब्रह्म का भेद स्पष्ट होता है। व्याख्या- एक ही देह में साक्षी रूप से स्थिति (विद्यमानता) और दूसरे के द्वारा सुख-दुःखमय अदन अर्थात् विषयों के भोग का उल्लेख किया गया है, उससे जीवात्मा और परमात्मा का भेद स्पष्टतया दृष्टिगोचर होता है। मुण्डकोपनिषद् ३/१/१ में और श्वेताश्वतरोपनिषद् ४/६ में इसका वर्णन इस प्रकार मिलता है-'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥' अर्थात्- 'एक साथ सखा भाव से परस्पर रहने वाले दो पक्षी मित्र (जीव और ब्रह्म) एक ही देह रूपी वृक्ष का आश्रय पाकर रहते हैं। उनमें से एक (जीव) तो उस वृक्ष के भोक्तव्य कर्मफल रूप सुख-दुःख आदि को आसक्तिपूर्वक भोगता है और दूसरा (ब्रह्म) बिना भोगे ही केवल साक्षी रूप में अवस्थित होकर द्रष्टा बना रहता है।' सूत्रानुसार कर्म फलादि का भोक्ता जीव है और बिना भोगे ही स्थित रहने वाला ब्रह्म है। इससे दोनों का भेद स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अतः इस प्रकरण में द्यु आदि का जड़- प्रकृति आधार नहीं हो सकता॥७॥ अब आशंका यह होती है कि छा. उ. के ७ वें अध्याय में देवर्षि नारद के द्वारा आत्मा का स्वरूप पूछे जाने पर सनत्कुमार जी ने क्रमशः नाम, वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज, आकाश, स्मरण एवं आशा को एक से बढ़कर एक कहा है। तदुपरान्त प्राण को इन सभी की अपेक्षा बड़ा कहकर उसी की उपासना करने को कहा है। यह सभी कुछ सुनने के पश्चात् नारद जी ने पुनः कोई प्रश्न नहीं किया है। उक्त वर्णन के अनुसार यदि इस प्रकरण का सर्वाधिक बड़ा प्राण है और उसे ही 'भूमा' और 'आत्मा' भी कहते हैं, तो फिर इससे पहले के प्रकरण में भी सभी का आश्रय प्राण शब्द वाची जीवात्मा को ही मानना चाहिए? अगले सूत्र में आचार्य इसी के समाधान हेतु आगे का प्रकरण शुरू करते हैं- (७१) भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात्॥८॥ सूत्रार्थ- भूमा = (उक्त प्रकरण में प्रयुक्त हुआ) सर्वाधिक बड़ा 'भूमा' ब्रह्म ही है, सम्प्रसादात् = क्योंकि उसे (भूमा को) प्राण वाचक होने से जीवात्मा से भी, अधि = ऊपर (बड़ा), उपदेशात् = कहा गया है।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 46
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
४८ वदान्त दशन व्याख्या- जीवात्मा से सर्वाधिक बड़ा होने से 'भूमा' को परब्रह्म कहा गया है। बहु शब्द से 'भूमा' शब्द विनिर्मित हुआ। इसे बहुत्व या वैपुल्यार्थक मानना चाहिए। यद्यपि वैपुल्य शब्द से गुणों के उत्कर्ष मात्र का ग्रहण होता है; किन्तु अल्प शब्द के समक्ष इसका अर्थ विपुलता-अधिकता का महत्त्व प्रतिपादित करता है। छा.उ.७/१५/१ में सनत्कुमार जी ने प्राण को सर्वाधिक बड़ा बतलाया है। इस प्रकरण में यह ज्ञात होता है कि यहाँ प्राण के नाम से जीवात्मा का वर्णन है; क्योंकि सूत्रकार ने यहाँ उस प्राण का दूसरा नाम 'सम्प्रसाद' रखा है तथा 'सम्प्रसाद' जीव का नाम है। यह तथ्य छा.उ. ८/३/४ में और भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। प्राण शब्द वाचक 'जीव' के सन्दर्भ में आगे यह भी कहा है कि 'यह सभी कुछ प्राण ही है। जो इस तरह का चिन्तन करने वाला, देखने वाला और जानने वाला है, वह अतिवादी होता है।' अतः यहाँ यह धारणा होनी सहज ही है कि इस प्रकरण में प्राण शब्द वाची जीव को ही सर्वाधिक बड़ा कहा गया है; क्योंकि इस कथन को सुनकर नारद जी ने फिर कोई प्रश्न नहीं पूछा। शायद उन्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया; किन्तु सनत्कुमार जी तो जानते थे कि इससे आगे की बात बतलाये बिना इसका ज्ञान अपूर्ण रह जाएगा। अतः उन्होंने नारद जी के बिना पूछे ही सत्य शब्द द्वारा ब्रह्म का प्रकरण उठाया अर्थात् 'तु' शब्द का प्रयोग करके यह स्पष्ट किया है कि 'वास्तविक अतिवादी तो वह है, जो सत्य को जानने के बाद उसके बल पर प्रतिवाद करता है।' ऋषि ने इस उपदेश से नारद जी के मन में सत्य तत्त्व की जिज्ञासा जाग्रत् करके उसे जानने के साधन रूप विज्ञान, मनन, श्रद्धा, निष्ठा और क्रिया को बतलाया। तदनन्तर सुख रूप 'भूमा' अर्थात् सर्वाधिक महान् ब्रह्म को समझाकर प्रकरण का समापन किया। इस प्रकार प्राण शब्द वाची जीव से बड़ा भूमा को बतलाने के कारण यहाँ इस प्रकरण में 'भूमा' शब्द ब्रह्म के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। यह ब्रह्म का वाचक है- प्राण, जीव या प्रकृति का वाचक नहीं है।८।। उपर्युक्त कथन की सिद्धि के लिए आचार्य अगले सूत्र में एक अन्य हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं- (७२ ) धर्मोपपत्तेश्च ॥।९॥ सूत्रार्थ- धर्मोपपत्तेः = उक्त प्रकरण में प्रयुक्त भूमा के जो धर्म (लक्षण हैं), वे भी ब्रह्म में ही सुसंगत हो सकते हैं, इसलिए; च = भी (यहाँ 'भूमा' ब्रह्म ही है)। व्याख्या- उक्त प्रकरण में भूमा के अन्तर्गत जिन धर्मों (लक्षणों) का होना बतलाया गया है, उनकी संगति ब्रह्म से ही मिलती है। अतः 'भूमा' शब्द को ब्रह्म वाच्य ही मानना चाहिए। छा.उ. ७/२३,२४.१-१ के अनुसार जिसके देख लेने पर 'जो अन्य किसी को न देखता है, न श्रवण करता है और न ही जानता है, वही 'भूमा' कहलाता है। अन्य को देखने, श्रवण करने व जानने वाला अल्पज्ञ है। भूमा अमृत है और अल्पज्ञ (अल्प) नश्वर है। नारद जी ने पूछा कि 'भूमा कहाँ अवस्थित रहता है? इसके उत्तर में सनत्कुमार जी कहते हैं कि वह अपनी ही महिमा में अवस्थित रहता है।' इस प्रकार से भूमा का स्वाश्रयत्व प्रतिपादित होता है, जो कि एकमात्र ब्रह्म में संभव है, जीवात्मा या प्रकृति में संभव नहीं है। इसलिए भूमा को ब्रह्म वाच्य ही मानना चाहिए, उक्त प्रकरण में वर्णित समस्त धर्मों (लक्षणों) की संगति उसी में लग सकती है, अतः वही यहाँ इस प्रकरण में 'भूमा' के नाम से संबोधित किया गया है।।९॥ उपर्युक्त प्रकरण में 'भूमा' के जो धर्म कहे गये हैं, वे ही बु.उ. ३/८/७ में भी 'अक्षर' के धर्म कहे गये हैं। अक्षर शब्द प्रणवरूपी वर्ण का भी वाचक है। अतः यहाँ पर 'अक्षर' शब्द किसका वाचक है? अब अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान करते हुए अगला प्रकरण शुरू करते हैं- (७३) अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥१०॥ सूत्रार्थ- अक्षरम् = (उक्त प्रकरण में) अक्षर- (क्षरित न होने वाला) शब्द अविनाशी ब्रह्म का ही वाचक
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this webslte is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 47
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ३ सूत्र १२ ४१
है, अम्बरान्तधृते: = क्योंकि उसे आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाला कहा गया है। व्याख्या- वह अक्षर स्वरूप ब्रह्म आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् को धारण करने वाला है। अक्षर शब्द यहाँ ब्रह्म का ही वाचक है। बृहदारण्यकोपनिषद् के ३/८/६,७ व ८ में इस प्रकरण का उल्लेख इस प्रकार मिलता है- गार्गी ने याज्ञवल्क्य से पूछा- जो द्ुलोक से भी ऊपर है, पृथिवी से भी नीचे तथा इन दोनों के मध्य में भी है और जो यह पृथिवी लोक एवं द्युलोक है, ये सब एवं जिसको भूत, वर्तमान और भविष्यत् कहते हैं, वे समस्त काल किसमें ओत-प्रोत हैं? याज्ञवल्क्य जी ने कहा- 'हे गार्गि! ये सभी कुछ आकाश में ओत-प्रोत हैं। इस पर गार्गी ने पूछा-वह आकाश किसमें ओत-प्रोत है? तब याज्ञवल्वय जी ने कहा-हे गार्गि! उस श्रेष्ठ तत्त्व को तो ब्रह्मज्ञ लोग 'अक्षर' कहते हैं। वह न स्थूल है, न सूक्ष्म है, न छोटा है, न बड़ा, न लाल है और न ही पीला। इस प्रकार के रूप की विशेषता ब्रह्म के सिवाय अन्य किसी में नहीं हो सकती। अतः यहाँ पर 'अक्षर' नाम से एकमात्र उसी ब्रह्म का ही वर्णन हुआ है॥१०।। कारण अपने कार्य का वरण करता है, यह सभी को ज्ञात है। जिनके मतानुसार प्रकृति ही जगत् का कारण है, वे उसे ही आकाशपर्यन्त सभी भूतों को ग्रहण करने वाली स्वीकार कर सकते हैं। अतः उनके मत के अनुसार यहाँ 'अक्षर' शब्द प्रकृतिवाच्य ही हो सकता है। इस आशंका का समाधान आचार्य इस सूत्र में कर रहे हैं- (७४ ) सा च प्रशासनात्॥११।। सूत्रार्थ-च = और, सा = वह अर्थात् आकाशपर्यन्त समस्त भूतों को धारण करने वाला परमात्मा ही है, प्रशासनात् = क्योंकि उस अक्षर रूप ब्रह्म को सभी पर सम्यक् रूप से शासन करने वाला कहा गया है। व्याख्या- अक्षर रूप ब्रह्म का प्रशासन सम्पूर्ण चराचर जगत् पर रहता है। सभी चर-अचर भूत-प्राणी उसकी इच्छामात्र से स्व-स्व कर्त्तव्य-धर्मों का पालन करते हैं। इस प्रकरण के अन्तर्गत आगे चलकर बृ.उ. ३/८/९ में याज्ञवल्क्य जी कहते हैं- 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः। एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत' ..... अर्थात् हे गार्गि! इस अक्षर के प्रशासन में सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए स्थित रहते हैं। द्यु, पृथिवी, निमेष, मुहूर्त्त, दिन-रात आदि नामों से इंगित होने वाला काल आदि सभी विशेष रूप से धारण किये हुए स्थित रहते हैं। सूर्य-चन्द्रमा यहाँ समस्त जगत् का उपलक्षण है। जो स्थिति यहाँ पर सूर्य-चन्द्र नाम लेकर व्यक्त की गई है, वह समस्त जगत् की है। 'प्रशासन' का अर्थ नियन्त्रण व व्यवस्था में चलाना है। यह चैतन्य तत्त्व का धर्म है। प्रशासन का कार्य जड़ तत्त्व के द्वारा करना संभव नहीं है। अतः उक्त प्रसंग में पृथिवी आदि आकाशपर्यन्त लोकों का धारण करना उसके प्रशासक व संचालक का बोधक है। यह जगत् के उपादानकारण जड़ प्रकृति में असंभव है। इससे ज्ञात होता है कि बृहदारण्यक के इस प्रसंग में विश्व को धारण करना उपादानकारण की भावना से नहीं, वरन् प्रशासन की भावना को व्यक्त किया गया है। यह स्थिति एकमात्र ब्रह्म में ही संभव है, अन्य किसी में नहीं। अतः इस प्रसंग में 'अक्षर' के लिए 'प्रशासन' का स्पष्ट वर्णन होने से 'अक्षर' पद एकमात्र ब्रह्म का ही वाचक है। यह कार्य जड़ प्रकृति का कदापि नहीं हो सकता ॥११ ।। इसके अतिरिक्त अगले सूत्र में आचार्य उक्त अर्थ की पुष्टि के लिए और भी स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हैं- (७५) अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥१२॥ सूत्रार्थ- अन्यभावव्यावृत्ते: = यहाँ अक्षर में अन्य (प्रकृति आदि) के धर्मों का निषेध कर देने से, च = भी (अक्षर) शब्द ब्रह्म का ही वाचक है। व्याख्या- यहाँ अन्य-दूसरे पदार्थ, प्रकृति-जीव आदि भाव का निषेध कर देने के कारण भी 'अक्षर' रूप में ब्रह्म का ही प्रतिपादन हुआ है। उक्त प्रसंग के अन्तर्गत बृ.उ. के ३/८/११ में अक्षर रूप में ब्रह्म के सन्दर्भ
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 48
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
५० वेदान्त दर्शन का ही इस प्रकार वर्णन मिलता है- 'वह 'अक्षर' अदृश्य रहकर सभी को देखता है, अश्रुत होकर भी स्वयं सभी को सुनने वाला है, मनन करने में न आने वाला होकर भी स्वयं सभी का मनन करने वाला है, जानने में न आने वाला होकर भी स्वयं सभी को अच्छी तरह से जानने वाला है आदि।' इस श्रुति के वाक्यानुसार यह सामर्थ्य एकमात्र ब्रह्म में ही हो सकती है। यहाँ उस 'अक्षर' में दृश्य, श्रवण, मनन और जानने में आने वाले जड़ प्रकृति आदि के धर्मों का निषेध किया गया है। इस कारण भी 'अक्षर' शब्द विनाशशील जीव, जड़प्रकृति का वाची नहीं हो सकता। जीव या प्रकृति की यह सामर्थ्य नहीं कि वह स्वयं अप्रकट रहकर सबको देख, सुन व मनन कर सके। अतः यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'अक्षर' नाम से ब्रह्म का ही प्रतिपादन हुआ है॥।१२।। उक्त प्रकरण में 'अक्षर' शब्द को ब्रह्म का वाचक बतलाया गया है; परन्तु प्रश्नोपनिषद् ५/२-७ में ॐ अक्षर को परब्रह्म एवं अपरब्रह्म दोनों का प्रतीक कहा गया है। इस कारण वहाँ पर अक्षर को अपरब्रह्म भी स्वीकारा जा सकता है। अब अगले सूत्र में आचार्य इसी आशंका के निवारणार्थ अपना मत प्रस्तुत कर रहे हैं- (७६) ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः॥१३॥ सूत्रार्थ- ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् = यहाँ परम पुरुष को 'ईक्षते' क्रिया का कर्म-उपदेश द्वारा व्यक्त किये जाने से भी, सः = वह परब्रह्म ही है। (उसे त्रिमात्रासम्पन्न 'ओ३म्' इस अक्षर से चिन्तन-मनन के योग्य कहा है।) व्याख्या- यहाँ इस सूत्र में जिस मंत्र पर चिन्तन (विचार) शुरू है, वह प्रश्नोपनिषद् ५/५ में इस प्रकार वर्णित है- 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण ....... स एतस्माज्जीवधनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते' अर्थात् 'जो तीन मात्राओं से सम्पन्न 'ओ३म' रूपी इस अक्षर से ही परम पुरुष का सतत चिन्तन-मनन करता है, वह प्रकाश स्वरूप सूर्य लोक में गमन करता है। जिस प्रकार सर्प केचुली को त्याग देता है, वैसे ही वह सर्वथा पापों को त्यागकर मुक्त हो जाता है। तदनन्तर वह सामवेद की श्रुतियों के द्वारा गायन करते हुए ऊर्ध्व-ब्रह्मलोक में ले जाया जाता है। वह इन उपासना करने वाले जीव-समुदाय रूप परतत्त्व से श्रेष्ठ अन्तर्यामी परम पुरुष का साक्षात्कार (दर्शन) कर लेता है।' प्रश्नोपनिषद् के मंत्र में जिसे त्रिमात्रा से युक्त ॐ कार के द्वारा ध्येय कहा गया है, वह पूर्ण पुरुष परब्रह्म ही है, अपरब्रह्म नहीं; क्योंकि उस ध्येय को जीव-समुदाय के नाम से वर्णित हिरण्यगर्भमय अपरब्रह्म से भी अधिक उत्तम कहकर 'ईक्षते' क्रिया का कर्म कहा है अर्थात् जिसके दर्शन किये जाते हैं, वह ब्रह्म ही है। जीव परमधाम में गमन करके उस ब्रह्म का साक्षात् (दर्शन) करता है॥१३।। उक्त प्रकरण में मानव देह रूप पुर में शयन करने वाले पुरुष को परब्रह्म कहकर पुष्टि प्रदान की गई है; लेकिन छा. उ.८/१/१ में ब्रह्मपुर अन्तर्गत 'दहर' (सूक्ष्म) आकाश को उल्लेखित कर उसमें अवस्थित वस्तु को ज्ञात करने के लिए बतलाया गया है, वह एकदेशीय (क्षेत्रीय) वर्णन होने से जीवपरक संभव है, अतः यहाँ पर आशंका होती है कि उपर्युक्त प्रकरण में 'दहर' नाम से व्यक्त किया गया तत्त्व क्या है? आचार्य अगले सूत्र में इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- (७७) दहर उत्तरेभ्यः॥१४। सूत्रार्थ- दहर: = उक्त प्रकरण में 'दहर' अर्थात् अल्प-स्थान में वर्णित जिस ज्ञेय तत्त्व का उल्लेख किया गया है, वह तत्त्व ब्रह्म ही है; उत्तरेभ्यः= क्योंकि उसके बाद आये वचनों-हेतुओं से यही सिद्ध होता है। व्याख्या- 'दहर' के सन्दर्भ में छा.उ. ८/१/१ में इस प्रकार वर्णन मिलता है- 'अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म' ............. अर्थात् 'इस ब्रह्मपुर रूप मानव देह में कमल के सदृश आकार वाला एक गृह (हृदय) है, उसके भीतर जो चैतन्य तत्त्व है, उसे जानने की अभिलाषा रखनी चाहिए।' यहाँ पर जिसे
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 49
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ३ सूत्र १६ ५१ जानने की अभिलाषा की गई है, वैह 'दहर' शब्द का लक्ष्य परब्रह्म ही है; क्योंकि इसी के आगे (छा० ८/१/ ५) के वर्णन-विवेचन में इसी के अन्दर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को स्थित कहा गया है और उसके सन्दर्भ में यह भी बताया गया है कि 'यह आत्मा, सम्पूर्ण पापों से रहित, जन्म-मृत्यु से परे, क्षुधा-पिपासा से रहित, सत्यकाम एवं सत्यसंकल्प युक्त है। इसके अनन्तर आगे (छा.उ. ८/३/४ में) वर्णन मिलता है कि यही आत्मा अमृत अभय एवं ब्रह्म है। इसे ही सत्य नाम से जाना जाता है। इस प्रकार से यहाँ 'दहर' शब्द ब्रह्म के अर्थ में ही प्रयुक्त मानना उचित है। उक्त प्रकरण के विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ प्रयुक्त 'दहर' शब्द ब्रह्म का ही बोध कराने वाला है॥१४।। अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से उपर्युक्त तथ्य को सिद्ध कर रहे हैं- (७८) गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च ॥१५।। सूत्रार्थ- गतिशब्दाभ्याम् = गति वाचक शब्द में ब्रह्म का निर्देश होने से, लिंगम् = इस प्रसङ्ग में ब्रह्म के लक्षण हैं, च = और, तथा = ऐसा वर्णन, हि = ही, दृष्टम् = श्रुतियों में भी प्रायः देखा जाता है। अतः यहाँ 'दहर' नाम से ब्रह्म का ही वर्णन हुआ है। व्याख्या-दहर की सुषुप्ति का स्थान एवं ब्रह्मलोक का होना श्रुतियों ने भी व्यक्त किया है। सुषुपि के समय 'दहर' में जाने की बात कहने के कारण उसे ब्रह्मलोक बताया गया है। छा.उ. ८/३/२ के अनुसार 'जो भूत- प्राणिसमुदाय प्रत्येक दिन सुषुप्ति काल के अन्तर्गत इस ब्रह्मलोक को पाते हैं अर्थात् गमन करते हैं; किन्तु असत्य से आवृत होने से उसे नहीं जानते हैं। यहाँ मंत्र में प्रत्येक दिन ब्रह्मलोक में गमन हेतु कहना तो गति का ही उल्लेख है और उस 'दहर' को ब्रह्मलोक कहना उसका वाचक शब्द है। उक्त दोनों तथ्यों से सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द ब्रह्म का बोध कराने वाला है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र इसी उपनिषद् (६/८/१) में भी ऐसा उल्लेख प्राप्त है, यथा-'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति' अर्थात्- हे सोम्य! उस सुषुप्ति काल में जीव 'सत्' नाम से संबोधित किये जाने वाले परब्रह्म से संयुक्त होता है।' इसके पश्चात् आगे कहे गये अमृत, अभय आदि विशेषण (लक्षण) भी ब्रह्म में ही प्रयुक्त होते हैं। इन दोनों कारणों से भी पुष्ट होता है कि यहाँ 'दहर' नाम से ब्रह्म का ही प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार से 'दहर' ब्रह्म का वाचक होने से भी ब्रह्म का ही द्योतक है॥१५।। अब अगले सूत्र में आचार्य उपर्युक्त तथ्यों-कथनों की सिद्धि हेतु एक अन्य कारण प्रस्तुत कर रहे हैं- (७९) धृतेश्च महिप्रोऽस्यास्मित्रुपलब्धे: ॥१६॥ सूत्रार्थ-धृते: = इस 'दहर' में सभी लोकों के धारण करने की सामर्थ्य होने से, च = भी (यह ब्रह्म का ही वाचक है; क्योंकि), अस्य = इस (ब्रह्म) की, महिम्र: = (सभी लोकों को धारण करने की सामर्थ्य रूप) महिमा का, अस्मिन् = इस ब्रह्म में होना, उपलब्धे: = अन्य श्रुतियों में भी प्राप्त होता है, अतः यहाँ पर 'दहर' नाम से ब्रह्म का वर्णन मानना उचित ही है। व्याख्या-छा.उ. ८/४/१ में वर्णन मिलता है कि - 'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानाम्' अर्थात् यह आत्मा सभी लोकों को धारण करने वाला सेतु है। इस प्रकार यहाँ 'दहर' शब्द वाच्य आत्मा में सभी लोकों को धारण करने की सामर्थ्य का उल्लेख होने से 'दहर' ब्रह्म का ही वाची है; क्योंकि अन्य श्रुतियों में भी ब्रह्म में ऐसी महिमा होने का उल्लेख प्राप्त होता है। बृह. उ.३/८/९ में ऋषि गार्गी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं- 'हे गार्गि! इस अक्षर रूप ब्रह्म के ही शासन में रहकर सूर्य एवं चन्द्रमा अच्छी तरह से धारण किये हुए स्थित हैं। इसके अतिरिक्त बृह.उ. ४/४/२२ में यह भी कहा है-'यह सभी ईश्वर का है, यह समस्त भूतों
Disclaimer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 50
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
५२ वेदान्त दर्शन का स्वामी है। सभी प्राणियों का पालन-पोषण करने वाला है और यह इन सभी लोकों को विनष्ट होने से बचाने हेतु उनको ग्रहण करने वाला सेतु है।' ब्रह्म के अलावा अन्य कोई भी इन सभी लोकों को धारण करने में सक्षम नहीं हो सकता। अतः यहाँ 'दहर' नाम से ब्रह्म को ही प्रयोजनीय मानना उचित होगा। जीव या प्रकृति में ऐसी सामर्थ्य कदापि संभव नहीं हो सकती॥१६॥ अगले सूत्र में आचार्य दूसरा हेतु प्रस्तुत कर उपर्युक्त तथ्य की पुष्टि कर रहे हैं- ( ८० ) प्रसिद्धेश्च ॥१७॥ सूत्रार्थ- प्रसिद्धे: = यह प्रसिद्ध है कि आकाश शब्द ब्रह्म का वाचक है, इसलिए; च = भी 'दहर' नाम ब्रह्म का ही है। व्याख्या- 'आकाश' शब्द ब्रह्मार्थ है। श्रुति में 'दहराकाश' शब्द प्रयुक्त हुआ है। इस सन्दर्भ में तैत्तिरीयोपनिषद् २/७/१ में ऋषि कहते हैं- 'को ह्योवान्यात् कः प्राण्याद्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्' अर्थात् 'यदि यह आनन्दमय आकाश (सभी को आकाश प्रदान करने वाला ब्रह्म) न होता, तो फिर कौन जीवित रह सकता है? कौन प्राणों की क्रिया सम्पन्न कर सकता है? ऐसा ही उल्लेख छान्दोग्योपनिषद् १/९/१ में भी मिलता है। यथा-'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' अर्थात् 'निश्चय ही ये समस्त भूत-प्राणी आकाश से ही उद्भूत होते हैं।' आगे इसी उपनिषद् छा.उ. ८/४/१ में भी ऋषि कहते हैं कि - 'आकाशो वै नाम रूपयोनिर्वहिता ..... ' अर्थात् आकाश ही नाम रूपों का निर्वाहक है और श्रुति में 'दहराकाश' नाम का वर्णन होने के कारण 'दहर' शब्द की प्रसिद्धि 'परब्रह्म' वाच्य होने के कारण है। अतः इस कारण भी 'दहर' शब्द यहाँ पर परब्रह्म का ही वाचक है॥१७।। 'दहर' शब्द से जीवात्मा का ही ग्रहण क्यों न किया जाये ? अगले सूत्र में आचार्य यही आशंका उपस्थित कर समाधान प्रस्तुत करते हैं- (८१) इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासम्भवात्॥१८॥ सूत्रार्थ-चेत् = यदि, इति = ऐसा कहो कि, इतरपरामर्शात् = अन्य अर्थात् जीवात्मा का संकेत (अर्थग्रहण) होने से, सः = वह जीवात्मा 'दहर' नाम से कहा गया है, इति न = तो यह कहना ठीक नहीं है, असम्भवात् = क्योंकि वहाँ कहे गये लक्षणों का जीवात्मा में होना असम्भव है। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् (८/१/५) में आचार्य कहते हैं कि 'इस (देह) की जरावस्था से यह जर्जर नहीं होता। वध होने से मरता नहीं। यह ब्रह्मपुर पूर्ण सत्य है। कामादि समस्त विषय इसमें अच्छी तरह से अवस्थित रहते हैं। यह आत्मा पाप-पुण्य से परे, जरा-मरण से रहित, शोक से परे, क्षुधा-पिपासा से दूर सत्य काम और सत्य सङ्कल्पमय है। जिस प्रकार इस संसार में प्रजा यदि राजा की आज्ञा मानती है, तो वह जिस- जिस पदार्थ (वस्तु) की कामना एवं क्षेत्र के भोग की इच्छा करती है, उसी प्रकार वह इच्छित वस्तु को प्राप्त कर सुखपूर्वक जीवन धारण करती है।' यहाँ श्रुति में 'देह की जरावस्था से यह जीर्ण-शीर्ण नहीं होता तथा इसके वध से इसका नाश नहीं होता।' इस वाक्यांश से जीव को लक्ष्य कराने वाला संकेत प्राप्त होता है; क्योंकि इसके आगे वाले मंत्र में कर्मफल की अनित्यता कही गई है और कर्मफल-भोग का सम्बन्ध जीव से ही है। इस प्रकार जीवात्मा को लक्ष्य कराने वाला संकेत होने से यहाँ 'दहर' नाम से 'जीवात्मा' का ही उल्लेख मिलता है, ऐसा कहें तो यह उचित नहीं; क्योंकि उपर्युक्त मंत्र में ही जो सत्य संकल्प आदि लक्षण कहे गये हैं, उनका जीवात्मा में होना कदापि सम्भव नहीं है। अतः यहाँ 'दहर' शब्द से एकमात्र परब्रह्म का ही वर्णन किया गया है, यही मानना ठीक होगा॥१८॥
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 51
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ३ सूत्र २१ ५३ अगले सूत्र में उक्त उपदेश की सिद्धि के लिए पुनः शङ्का व्यक्त कर उसका समाधान प्रस्तुत है- (८२) उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥१ ९ ॥। सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो कि, उत्तरात् = उसके बाद अगले विवरण से भी 'दहर' शब्द से जीवात्मा का ग्रहण होना सिद्ध होता है, तु= तो, यह कथन उचित नहीं है, (क्योंकि), आविर्भूतस्वरूप = ब्रह्म को प्राप्त हुआ आत्मा है। व्याख्या- यहाँ यह आशंका उठ सकती है कि ब्रह्म को प्राप्त कर लेने के बाद जीवात्मा भी सत्यकाम और सत्यसंकल्पमय हो सकता है। आचार्य छा.उ. ८/३/४ का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि यह जो सम्प्रसाद रूप जीवात्मा है, वह इस देह को त्यागकर परम ज्योति को प्राप्त हो अपने शुद्ध स्वरूप से सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा, अमृत और अभय है तथा यही ब्रह्म भी है। उस ब्रह्म का नाम ही सत्य है। यहाँ मंत्र में 'सम्प्रसाद' नाम से जीवात्मा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है तथा उसके लिए वे ही अमृत, अभय आदि विशेषण प्रयुक्त हुए हैं; जो अन्य स्थलों में ब्रह्म के लिए प्रयुक्त होते हैं। अतः इन लक्षणों का जीवात्मा में होना संभव है। इसलिए 'दहर' शब्द को 'जीवात्मा' का वाच्य मानने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए, यहाँ यदि ऐसी आशंका व्यक्त की जाये, तो उचित नहीं है; क्योंकि उपर्युक्त मंत्र में अपने शुद्ध स्वरूप को पाये हुए जीव के लिए वैसे ही विशेषण प्रयुक्त हुए हैं। अतः उसके आधार पर 'दहर' शब्द को जीव का वाची न मानकर ब्रह्मवाची ही मानना उचित होगा। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि 'दहर' शब्द ब्रह्मवाची ही है॥१९॥ अब जिज्ञासा होती है कि यहाँ जीवात्मा को लक्ष्य कराने वाले शब्दों का प्रयोग क्यों किया गया है- (८३) अन्यार्थश्च परामर्शः ॥२०॥ सूत्रार्थ- च = और, अन्यार्थ: = दूसरे अर्थात् जीवात्मा के निमित्त, परामर्श: = (उक्त प्रकरण में) परामर्श किया है। व्याख्या- यहाँ उक्त प्रकरण में जीव-परामर्श ब्रह्मज्ञान के अर्थ में किया गया है। इस ब्रह्म को पाने वाला जीव अष्टगुण सम्पन्न स्वरूप में अवस्थित होता है। ब्रह्मज्ञान पाने के बाद जीवात्मा भी स्वयं अपने में ब्रह्म के विभिन्न गुणों को प्राप्त कर लेता है और तभी उसे ब्रह्म के सन्निकट सर्वाधिक गुण सम्पन्न स्वरूप का बोध होता है। अपने स्वयं के रूप का ज्ञान भी ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति में सहयोगी होता है; किन्तु उस (ब्रह्म ज्ञान) की प्राप्ति से भी जीवात्मा ब्रह्म नहीं हो जाता। उस ब्रह्म का ज्ञान (साक्षात्कार) हो जाने से अत्यधिक श्रेष्ठ व दिव्य गुण जीवात्मा में आ जाते हैं; लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं, कि वह स्वयं ब्रह्ममय हो गया है। यही कथन गीता के अ०१४ के द्वितीय श्लोक में भी है। अतः उक्त प्रकरण में जीवात्मा का वर्णन आ जाने मात्र से यह नहीं प्रमाणित हो जाता कि वह 'दहर' शब्द जीवात्मा वाची है अर्थात् 'दहर' शब्द ब्रह्मवाची ही है जीवात्मा वाची नहीं ॥२०॥ (८४) अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम्।।२१ ।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि, इति = यह कहो कि, अल्पश्रुतेः = 'दहर' शब्द को बहुत छोटा सुनो गया है (इसलिए 'दहर' को जीववाची माना गया है), तदुक्तम् = तो इसके सम्बन्ध में पूर्व में ही उत्तर दिया जा चुका है। व्याख्या- 'दहरोऽ्स्मिन्नतराकाशः' (छा. उ. ८/१/१) में दहराकाश को अत्यन्त अल्प (लघु) बतलाया है। अत्यल्प सुनने के कारण भी उसके जीव वाची होने की आशंका होती है; किन्तु ऐसी आशंका करना उचित नहीं है; क्योंकि इसका (समाधान) उत्तर पूर्व (सूत्र १/२/७) में ही कहा जा चुका है। यह सत्य है कि जीव का निवास मस्तिष्कगत हृदय नामक अति लघु क्षेत्र में है। जीव निरन्तर ब्रह्म को जानने का प्रयास करता
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 52
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
५४ वदान्त दशन है। वह जहाँ रहता है, वहीं पर उसकी प्राप्ति व जानने के लिए प्रयास सम्भव है। अतः ब्रह्म की जिज्ञासा वाले जीव के लिए जिज्ञास्य बह्म का निर्देश उसी अति लघु क्षेत्र में किया जा सकता है। उपासना ध्यान आदि के सन्दर्भ में सूत्रकार ने स्वयं (सूत्र १/२/७ में) पहले ही बतला दिया है। यहाँ पर सूत्र में उसी का 'तदुक्तम्' पद से निर्देश किया गया है॥।२१।। उपर्युक्त सूत्र में व्यक्त की गई आशंका का समाधान आचार्य अगले सूत्र में प्रकारान्तर से दे रहे हैं- (८५) अनुकृतेस्तस्य च ॥।२२।। सूत्रार्थ- तस्य = उस जीवात्मा का, अनुकृते: = अनुकरण करने के कारण, च = भी (परब्रह्म को अल्प परिमाण वाला कहना ही ठीक है)। व्याख्या- मानव के मस्तिष्कगत हृदय क्षेत्र का परिमाप अङ्गष्ठ के बराबर कहा गया है। उसी में जीवात्मा के साथ ही परमात्मा के प्रवेश की बात उपनिषदों में कही गयी है। तै०उ० २/६ में इसका उल्लेख इस प्रकार मिलता है- 'परमात्मा उस जड़ चैतन्यमय समस्त विश्व की संरचना करके स्वयं भी जीवात्मा के साथ उसमें प्रवेश कर स्थित हो गया।' छा.उ. ३/३ में भी ऐसा ही वर्णन किया गया है, देखें- 'उस परमात्मा ने त्रिविध तत्त्वरूप देवता अर्थात् उनके कार्यरूप में मानव देह में जीवात्मा के सहित प्रवेश करके अपने नाम व रूप का प्रसार किया।' कठोपनिषद् १/३/१ में भी ऋषि कहते हैं कि 'शुभ कर्मों के फलस्वरूप मानव-देह में ब्रह्म के निवास स्थल रूप हृदयाकाश के अन्तर्गत बुद्धिरूप गुफा में छिपे हुए सत्य का साक्षात् करने वाले एक मात्र दोनों जीवात्मा और परमात्मा ही हैं।' इस तरह से उस परमात्मा को जीवात्मा का अनुकरण करने वाला कहा जाने से भी उसे अल्प परिमाण वाला बतलाना सर्वथा ठीक ही है। इसी भाव से वेद-शास्त्रों में अनेकों जगह उस परमात्मा के स्वरूप को अणोरणीयान्-महतो महीयान् अर्थात् लघु से लघु और महान् से भी महान् कहा गया है।।२२।। आचार्य अगले सूत्र में उक्त विषय के सन्दर्भ में स्मृति का भी प्रमाण प्रस्तुत करते हैं- ( ८६) अपि च स्मर्यते ॥२३॥ सूत्रार्थ- च = और, इसके अतिरिक्त, अपि = यही बात (तथ्य), स्मर्यते = स्मृतियों में भी कही गई है। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा समस्त भूत-प्राणियों के हृदय में स्थित रहते हैं। वे अल्प से अल्पतम और महान् से महानतम है। मस्तिष्कगत हृदय प्रदेश में स्थित होने की बात समस्त स्मृतियाँ एक स्वर में स्वीकारती हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अ. १४/२ में इसका उल्लेख इस प्रकार से मिलता है- 'इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेडपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।' अर्थात्- 'इस ज्ञान को आश्रय प्राप्त कर अर्थात् धारण करके जो मेरे स्वरूप को प्राप्त हो गये हैं, वे सभी सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न न होने और प्रलयकाल में भी परेशान नहीं होते।' इससे मुक्त हुए जीवात्मा का ब्रह्मसाधर्म्य तो लक्षित होता है। इससे जीवात्मा और परमात्मा का भेद स्पष्ट हो जाता है। इससे सिद्ध होता है कि 'दहर' शब्द ब्रह्म का ही कथन है, जीव का नहीं। ऐसा ही वर्णन मनुस्मृति ८/९१ में मिलता है- एकोऽहमस्मीत्यात्मानं ......... मुनिः। अर्थात् - 'हे भद्र! जो तू यह जानता है कि इस देश में जीव रूप मैं एकाकी ही स्थित हूँ, ऐसा कदापि मत जान; क्योंकि सबके पुण्य और पापों का द्रष्टा यह सर्वज्ञ ब्रह्म सदा तेरे हृदय में स्थित रहता है।' ब्रह्म को अन्यत्र अणु से भी अणु कहा गया है। जो कि उसके हृदय देश की स्थिति को प्रकट करता है, यथा-मनु० १२/१२२ में इसी कारण 'अणीयांसमणोरपि' कहा है। कठ. १/२/२० और श्वे. ६/१२ में उस ब्रह्म को अणोरणीयान् महती महीयान् एवं 'आत्मस्थं' बतलाया है। उक्त समस्त उदाहरणों से सर्वव्यापक ब्रह्म के हृदय में स्थित होने का
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 53
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ३ सूत्र २६ ५५ स्पष्टीकरण हो जाता है। अतः दहर का हृदय प्रदेश में ब्रह्म का कथन सर्वथा उचित ही है।।२३।। उपर्युक्त विवेचन के पश्चात् यह आशङ्का होती है कि कठ.उ. (२/१/१२,१३ एवं २/३/१७) में जिसे अंगुष्ठ के परिमाण वाला कहा गया है, वह जीवात्मा है या परमात्मा ? इसी के निस्तारण हेतु अगले सूत्र से आचार्य नया प्रकरण शुरू करते हैं- (८७) शब्दादेव प्रमितः ॥२४।। सूत्रार्थ- शब्दात् = (उपर्युक्त प्रकरण में आये हुए) शब्द से (यह सिद्ध होता है कि), प्रमित: = अंगुष्ठ मात्र परिमाप वाला पुरुष, एव = (ब्रह्म) ही है। व्याख्या-कठोपनिषद् (२/१/१२,१३) में ऋषि कहते हैं कि 'अंगुष्ठमात्र: पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति।' तथा 'अंगुष्ठमात्र: ज्योतिरिवाधूमकः। ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः' अर्थात् अंगुष्ठ के बराबर परिमाप वाला परम पुरुष शरीर के मध्य भाग (हृदय) में अवस्थित है।' तथा 'अंगुष्ठ के बराबर परिमाप वाला पुरुष धुएँ से रहित ज्योति के सदृश एक रस है। वह भूत, भविष्य एवं वर्तमान पर राज्य करने वाला है। वह आज भी है और कल भी रहेगा अर्थात् वह नित्य-शाश्वत है।' इस प्रकरण में जिसे अंगुष्ठ के बराबर परिमाप वाला पुरुष-ईश्वर कहा गया है। वह एकमात्र ब्रह्म ही है। यह तथ्य उन्हीं मन्त्रों में कहे हुए शब्दों से प्रमाणित होता है; क्योंकि कठ. २/३/१७ में उस पुरुष को भूत, भविष्य और वर्तमान में होने वाली सम्पूर्ण प्रजा पर राज्य करने वाला, धुएँ से रहित अग्नि की भाँति एक रस और सदा रहने वाला कहा गया है और आगे चलकर उसी को विशुद्ध अमृत स्वरूप बतलाया गया है॥२४। यहाँ आशंका होती है उस परमात्मा को अंगुष्ठ के बराबर परिमाप वाला क्यों कहा गया है? अगले सूत्र में इसी का समाधान किया जा रहा है- ( ८८) हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात्।२५।। सूत्रार्थ-तु= उस ब्रह्म को अँगूठे के परिमाप वाला कहना तो, हृदि = हृदय में अवस्थित कहे जाने की, अपेक्षया = अपेक्षा से है, मनुष्याधिकारत्वात् = क्योंकि इस (ब्रह्मविद्या) का अधिकार एकमात्र मनुष्य को ही प्राप्त है। व्याख्या-उपनिषदों में वर्णित ब्रह्मविद्या के द्वारा ब्रह्म को जानने व प्राप्त करने का अधिकार एकमात्र मानव को ही मिला हुआ है। इतर प्राणी पशु-पक्षी आदि अन्य योनियों में उद्भूत जीव आत्माएँ उस परब्रह्म परमेश्वर को नहीं जान सकतीं; क्योंकि मनुष्य के हृदय का परिमाण अँगूठे के बराबर परिमाण वाला बतलाया गया है। इस कारण से यहाँ मानव- हृदय के परिमाप की अपेक्षा से उस अविनाशी ब्रह्म को 'अंगुष्ठमात्र पुरुष' ही कहा गया है। यहाँ सूत्र में वर्णित 'तु' पद इस अर्थ का बोध कराने वाला है कि सर्वव्यापक ब्रह्म का ऐसा विवेचन स्वतंत्र रूप से नहीं किया जा सकता। शास्त्र में एकमात्र मानव का अधिकार होने से मानव-हृदय की अपेक्षा से ही वैसा वर्णन किया गया है; यहाँ पर यही प्रमाणित होता है॥२५॥ अब जिज्ञासा यह होती है कि ब्रह्मविद्या का अधिकार मनुष्य को छोड़कर क्या अन्य किसी को भी नहीं है? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान देते हुए कहते हैं- ( ८१) तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात्॥२६॥ सूत्रार्थ-बादरायण: = बादरायण आचार्य का मत है कि, तदुपरि = इन मनुष्यों से ऊपर जो देव-समाज है; अपि = उसको भी, सम्भवात् = जान लेना सम्भव है। व्याख्या-मानव योनि से नीचे की योनियों में तो ब्रह्मविद्या को पढ़ने और उसके द्वारा दिव्य ज्ञान प्राप्त करने की सामर्थ्य ही नहीं है। इस कारण से उनका अधिकार बताना तो उचित ही नहीं है; किन्तु देव आदि योनियाँ
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 54
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
५६ वेदान्त दर्शन तो मानवयोनि से ऊपर हैं; उन्हें ही देवादि योनि सुगमता से मिलती है। इसलिए उनमें पूर्वजन्म के अभ्यास द्वारा ब्रह्मविद्या के ज्ञान की सामर्थ्य प्राप्त होती है। अतः साधना की पराकाष्ठा होने पर उन्हें ब्रह्म का साक्षात् होना संभव है। इसलिए आचार्य बादरायण जी का मत है कि मानव से ऊपर वाली योनियों को भी ब्रह्मज्ञान पाने का पूर्ण अधिकार है॥।२६।। उपर्युक्त बात के प्रतिपादनार्थ ही आचार्य स्वयं आशंका प्रकट करके समाधान प्रस्तुत करते हैं- (९० ) विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॥२७। सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो (कि देव आदि को देहधारी मान लेने पर), कर्मणि = (यज्ञादि) कर्म में, विरोधः = विरोध है तो, इति न = तो यह कथन उचित नहीं है, अनेकप्रतिपत्तेः = क्योंकि वे एक ही काल में विभिन्न रूपों को धारण करने वाले हैं, दर्शनात् - शास्त्रों में ऐसा ही देखा गया है। व्याख्या- यदि देवताओं आदि को भी मनुष्यों की भाँति आकार-प्रकार से युक्त देहधारी मान लें, तो उन्हें एक स्थल (देश-क्षेत्र विशेष) पर निवास करने वाला मानना पड़ेगा। यदि ऐसा माना जाता है, तो एक ही समय में अनेकानेक यज्ञों में प्रदान की जाने वाली आहुतियों को वे किस तरह स्वीकारेंगे; क्योंकि देहधारी होने के कारण वे एक समय में एक ही यज्ञ स्थल पर पहुँच सकते हैं। अतः एक काल में ही अलग-अलग यज्ञों में एक ही देव की आहुति समर्पित करने का विरोध-विधान प्रकट होगा। इस विरोध का सामना तभी होगा, जब देवों को एक स्थल वाला न मानकर सर्वत्र सभी स्थलों पर रहने वाला स्वीकारा जाये। इस आशङ्का का समाधान यह है कि देवगण एक ही काल में अनेक रूप ग्रहण करने की सामर्थ्य-शक्ति रखते हैं। अतः वे एक काल में ही अनेक स्थानों में समर्पित की जाने वाली आहुतियों को स्वीकार कर सकते हैं। बृह.उ. ३/९/ १-२ में शाकल्य एवं याज्ञवल्क्य के संवाद के अन्तर्गत एक प्रसंग आता है- 'शाकल्य जी पूछते हैं कि देवता कितने हैं?' याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि -'तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र।' तदुपरान्त पुनः पूछा कि 'कितने देवता हैं?' उन्होंने उत्तर दिया 'तैंतीस।' बारम्बार प्रश्नोत्तर होने पर अन्त में याज्ञवल्क्य जी ने कहा- 'यह सभी तो इनकी महिमा है अर्थात् ये देवगण एक-एक होते हुए भी अनेक हो जाते हैं। यथार्थतः इनकी संख्या मात्र तैंतीस ही है, आदि। इस तरह से श्रुति ने देवों में विभिन्न रूप ग्रहण करने की सामर्थ्य का उल्लेख किया है। योगी साधकों में भी ऐसी शक्ति देखने को मिलती है, अतः इसमें किसी भी तरह का विरोध नहीं है।।२७।। देवों को देहधारी स्वीकारने से फिर उन्हें विनाशशील स्वीकारना होगा; ऐसी स्थिति में वेद में जिन-जिन देवगणों का उल्लेख मिलता है; उनकी नित्यता नहीं पुष्ट होगी। इस कारण वेद को भी नित्य और प्रमाणभूत मानना अनुचित होगा; अतः इस विरोध का परिहार किस तरह से हो? अगले सूत्र में इसी आशङ्का का आचार्य समाधान प्रस्तुत करते हैं- (९१) शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्॥२८॥ सूत्रार्थ-चेत् = यदि कहो कि, शब्दे= (देव को देहधारी स्वीकारने पर) वैदिक शब्द में विरोध आता है तो, इति न = ऐसा कहना उचित नहीं है, प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् = क्योंकि यह तथ्य प्रत्यक्ष (वेद) और अनुमान (स्मृति) दोनों ही प्रमाणों से परिपुष्ट होता है, अतः प्रभवात् - इसलिए वेदोक्त शब्द द्वारा ही देव आदि जगत् का उद्भव होता है। व्याख्या- 'देवों में अनेक देह धारण करने की सामर्थ्य (शक्ति) में विरोध नहीं आता। यह तो उचित है; क्योंकि देहधारी होने से देवों को भी जन्म-मृत्यु वाले स्वीकारना होगा। ऐसी स्थिति में वे अनित्य होंगे और नित्य वैदिक शब्दों के साथ उनके नाम व रूप का नित्य सम्बन्ध भी नहीं रह पायेगा।' ऐसी आशङ्का यहाँ पर
Disclalmer / Warning: All iterary and artistic materlal on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 55
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ३ सूत्र ३० ५७ करना उचित नहीं है; क्योंकि जहाँ पर कल्पादि में देवादिकों की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है, वहाँ यह कहा गया है कि' किस रूप और ऐश्वर्य से युक्त देवता का क्या नाम होगा।' इस तरह से वेदोक्त शब्द से ही उनके नाम, रूप एवं ऐश्वर्यादि की कल्पना की जाती है। इससे यह प्रकट होता है कि कल्पान्तर में देवादि के जीव तो बदल जाते हैं; किन्तु नाम-रूप पूर्वकल्पानुसार ही रहते हैं। यह तथ्य प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण द्वारा भी प्रमाणित है। उपर्युक्त कथन का उल्लेख तैत्ति० ब्रा० २/२/४/२ में इस प्रकार मिलता है-'सभूरिति व्याहरत् ...... सोऽन्तरिक्षमसृजत' अर्थात्- 'उसने, मन में ही' 'भू' शब्द का उच्चारण किया और फिर भूमि की संरचना की। 'पुनः उसने मन में 'भुवः' का उच्चारण किया, तदनन्तर अन्तरिक्ष की रचना की। इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रजापति ने पहले वाचक शब्द का स्मरण करके उसके अर्थभूत की संरचना की। मनु० १/२१ में भी ऐसा ही प्रकरण आया है- सर्वेषां तु .............. 'संस्थाश्चनिर्ममे, अर्थात् 'उन सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर ने सर्वप्रथम सृष्टि के आरम्भ में सबके नाम और अलग-अलग कर्म तथा उन सभी की अलग- अलग व्यवस्थाएँ भी वैदिक शब्दानुसार ही विनिर्मित कीं ॥२८॥ अगले सूत्र में उक्त कथनोपदेश को ही वेद की नित्यता में हेतु कहा गया है- (९२ ) अतएव च नित्यत्वम् ।।२९।। सूत्रार्थ-अतः = इससे, एव = ही, नित्यत्वम् - वेद की नित्यता या अखण्डता, च = भी सिद्ध होती है। व्याख्या-ऋग्वेद (१०/७१/३) में उल्लेख है कि 'वेद द्वारा ही सृष्टि का उद्भव एवं विकास होता है। सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा वैदिक शब्दानुसार ही सम्पूर्ण जगत् की संरचना करते हैं। इसी से वेदों की नित्यता स्वयमेव सिद्ध हो जाती है; क्योंकि हर कल्प में परब्रह्म द्वारा वेदों की भी नवीन सर्जना की जाती है; यह कथन अन्यत्र कहीं पर भी देखने को नहीं मिलता। श्वेताश्वतर उपनिषद् ६/१८ में ऋषि कहते हैं-'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै' अर्थात्- जो ब्रह्मा को सर्वप्रथम उत्पन्न करता और उसके लिए वेदों का प्रदाता है। आगे और भी कहते हैं- आदि सर्गकाल में स्वयम्भुव परंब्रह्म, आदि-अन्त रहित, नित्य, दिव्य वेदमयी वाणी का कथन करता है। इसी दिव्य कथन से जगत् की सभी सामाजिक प्रवृत्तियाँ सक्रिय होती हैं। भगवान् वेद व्यास भी कहते हैं- 'युग के समाप्ति काल में इतिहास एवं वेद विलीन हो गये थे, पुनः उन्हें ब्रह्मा जी की आज्ञा द्वारा सृष्टि के प्रारम्भिक काल में ऋषियों ने तप के पश्चात् पाया।' इनके द्वारा भी वेदों का नश्वर होना प्रमाणित नहीं होता ।२९।। अब यहाँ आशंका यह होती है कि हर एक कल्प में देवों के नाम-रूप परिवर्तित हो जाने से वैदिक शब्दों के शाश्वत होने में विरोध कैसे नहीं आयेगा? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान करते हैं- (९३ ) समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च॥३० ॥ सूत्रार्थ- च = और, समाननामरूपत्वात् = (कल्पान्तर में उत्पन्न होने वाले देवादिकों के) नाम-रूप पूर्व की ही भाँति होने के कारण, आवृत्तौ= सृष्टि के पुनः उत्पन्न होने पर, अपि = भी, अविरोधः = वैसा ही नाम- रूप होने में किसी भी तरह का विरोध नहीं है, दर्शनात् = क्योंकि (वेद-श्रुति) में भी ऐसा ही वर्णन देखने को मिलता है और, स्मृते: = स्मृति से भी यही बात सिद्ध होती है। व्याख्या-महाप्रलय के समय में सृष्टि के विलय होने से पूर्व जो नाम, रूप होते हैं, वही प्रलय के बाद पुनः प्रादुर्भूत होने वाली सृष्टि में भी होते हैं। यहाँ तक कि वेद भी परब्रह्म में एकीभूत हो जाते हैं तथा नव संरचित सृष्टि में पुनः स्व-प्रकाशित हो जाते हैं। 'वेद' प्रतिपादित जो-जो आकार-प्रकार पूर्वकाल में थे, उन्हें देखते हुए, उन्हीं आकार-प्रकारों में उनकी संरचना पुनः होती है। ऋग्वेद १०/१९०/३ में वर्णन मिलता है- 'सूर्या-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 56
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
५८ वेदान्त दर्शन चन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्' अर्थात् 'जगत्-स्रष्टा परब्रह्म ने सूर्य, चन्द्रमा आदि सभी को पूर्वकाल की भाँति ही विनिर्मित किया है। इसी प्रकार का वर्णन श्वेताश्वतरोपनिषद् (६/१८) में भी प्राप्त होता है, देखें- 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यौ वै वेदाःश्च प्रहिणोति तस्मै। तः ह देवतात्म बुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुवै शरणमहं प्रपद्मे।' जो परमात्मा निश्चय ही सृष्टिकाल में सबसे पूर्व ब्रह्मा को प्रकट करता है तथा उन्हें सभी वेदों का उपदेश देता है, उस आत्मज्ञान विषय से सम्बन्धित बुद्धि को उत्पन्न करने वाले प्रसिद्ध देव परब्रह्म की मैं मुमुक्षुभाव से शरण प्राप्त करता हूँ। ऐसा ही कुछ स्मृतियों (महाभारत) में भी देखने को मिलता है 'तेषां ये यानि कर्माणि ....... सृज्यमाना: पुनः पुनः' अर्थात् पूर्वकल्प की सृष्टि-सरंचनाकाल में जिन लोगों ने जिन-जिन कर्मों को स्वीकार किया था, वे ही बाद की सृष्टि-संरचना काल में प्रायः बारम्बार उन्हीं कर्मों को प्राप्त करते रहते हैं। अतः उनकी बारम्बार पुनरावृत्ति होते रहने के कारण भी वेद की नित्यता एवं परिपुष्टता में किसी भी तरह के विरोध की स्थिति नहीं बनती।३०॥ २६ वें सूत्र में प्रसङ्गवश यह कहा गया है कि ब्रह्मविद्या के अवगाहन में देवादि का अधिकार है, ऐसी भगवान् वेदव्यास जी की मान्यता है। उसी की प्रमाण-पुष्टि ३० वें सूत्र तक की गई। अब अगले सूत्र से आचार्य जैमिनि के अनुसार यह कहा जा रहा है कि ब्रह्मविद्या के अवगाहन का देवों आदि को अधिकार नहीं है, देखें आचार्य जैमिनि के विचार- (९४) मध्वादिष्वसम्भवादनधिकारं जैमिनि: ॥।३१॥ सूत्रार्थ- मध्वादिषु = मधु-विद्या आदि में, अनधिकारम् = देवताओं आदि का अधिकार न होने की बात, जैमिनि: = आचार्य जैमिनि बतलाते हैं, असम्भवात् = क्योंकि ऐसा सम्भव नहीं है। व्याख्या- यहाँ आचार्य जैमिनि का कथन अनुचित नहीं है; क्योंकि जो स्वयं ही उपास्य है, वह उपासक कैसे हो सकता है? देवों ने मधु-विद्या का फल रूप वसुत्व प्राप्त किया है, पुनः उन्हें वसुत्व प्राप्ति हेतु कोशिश करने की आवश्यकता नहीं है। छा०उ० के तृतीय अध्याय के अन्तर्गत प्रथम से लेकर एकादश खण्ड तक मधुविद्या का वर्णन प्राप्त होता है। वहाँ सूर्य को देवों का मधु चक्र रूप और अन्तरिक्ष को उस मधु चक्र की धुरी (केन्द्र) बतलाया गया है। सूर्य का देवों के लिए मधुमय होना एवं रश्मियों को छिद्र रूप होना कहा गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्यों के लिए साधना द्वारा प्राप्त होने वाली वस्तु देवताओं को स्वतः प्राप्त है, इस कारण देवताओं के लिए 'मधु विद्या' की प्राप्ति हेतु प्रयास निरर्थक होगा। अतः इस कारण आचार्य जैमिनि ने ब्रह्मविद्या आदि में उनके अधिकार न होने का निर्देश प्रदान किया है।।३१।। अगले सूत्र में उपर्युक्त कथन की पुष्टि हेतु आचार्य जैमिनि की एक दूसरी युक्ति सूत्रकार दे रहे हैं- (९५) ज्योतिषि भावाच्च ।।३२।। सूत्रार्थ- ज्योतिषि = ज्योर्तिमय-प्रकाशमय लोकों में, भावात् = देवों की स्थिति होने से, च = भी (उनका यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्मविद्या के अवगाहन का अधिकार नहीं है)। व्याख्या- वे समस्त देवतादि स्वभावतः प्रकाशमय दिव्य लोकों में निवास करते हैं। वहाँ पर उन्हें स्वभाववश ही सभी तरह के अवसर प्राप्त होते रहते हैं। नवीन कर्मों के द्वारा किसी भी प्रकार नूतन ऐश्वर्य समृद्धि पाने का उद्देश्य नहीं है। अतः उन समस्त लोकों की प्राप्ति हेतु बतलाये गये कर्मों में उनकी प्रवृत्ति- असम्भव है। 'तद्देवां ज्योतिषां ज्योतिः' के आधार पर वे देवगण ज्योतिर्मय पदार्थों के प्रकाशक कहे गये हैं। इसलिए वे ज्योति स्वरूप परब्रह्म के उपासक होने के कारण उनका अन्य विद्या या भिन्न-भिन्न उपासनाओं में अधिकार न होना सहज ही है। उन्हें जिस प्रकार वेद-विहित अन्य विद्याओं का अधिकार नहीं है, वैसे ही ब्रह्मविद्या में भी अधिकार नहीं है।३२।।
Disclalmer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 57
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ३ सूत्र ३४ ५९ अगले सूत्र में आचार्य सूत्रकार उक्त पूर्वपक्ष का समाधान करते हुए देवादि के अधिकार सम्बन्धी प्रकरण का समापन करते हैं- (९६) भावं तु बादरायणोऽ्स्ति हि॥३३ ॥ सूत्रार्थ-बादरायण: - बादरायण आचार्य, तु - तो (यज्ञादि कर्म एवं ब्रह्म विद्या में), भावाम् =देवादि के अधिकार का भाव मानते हैं, हि = क्योंकि, अस्ति = श्रुति में इसी अधिकार का उल्लेख है। व्याख्या- आचार्य जैमिनि के द्वारा देवों का मधु-विद्या में अधिकार न होने की बात कहने के बावजूद भी आचार्य बादरायण उनका अधिकार स्वीकार करते हैं। सूत्र में 'तु' पद के द्वारा यह बतलाते हैं कि पूर्वपक्षी का मत शब्द प्रमाण से रहित होने से अमान्य है। अवश्य ही यज्ञादि कर्म एवं ब्रह्मविद्या में देवों का पूर्ण अधिकार है; क्योंकि श्रुति (वेद) में भी उनका यह अधिकार सूचित करने वाले प्रमाण मिलते हैं। तैत्ति० ब्रा० में (२/१/ २/८) में देखें- 'प्रजापतिरकामयत प्रजायेयेति स एतदग्निहोत्रं मिथुनमपश्यत्। तदुदिते सूर्येऽजुहोत्' अर्थात् प्रजापति ने उत्पन्न होने की इच्छा की। उन्होंने अग्निहोत्ररूप मिथुन पर दृष्टिपात किया और सूर्य के उदय होने पर उसका हवन किया। तैत्ति० सं० २/३/३ में भी देवों के कर्म करने का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है- 'देवो वै सत्रमासत' अर्थात् निश्चय ही देवों ने यज्ञ का अनुष्ठान शुरू किया। उपर्युक्त कथन से देवों का कर्माधिकार सूचित होता है। ऐसे ही ब्रह्मविद्या में देवों का अधिकार बतलाने वाले कथन बृह०उ० (१/४/ १०) में देखने को मिलते हैं- 'देवों में से जिसने उस ब्रह्म को जान लिया, वही ब्रह्ममय हो गया। छा०उ० ८/ ७/२ से ८/१२/६ तक में भी ऐसा ही उल्लेख मिलता है- 'इन्द्र और विरोचन ने ब्रह्माजी की सेवा में रहकर दीर्घावधि तक ब्रह्मचर्य का पालन करने के बाद ब्रह्मविद्या को प्राप्त किया। अतः उक्त सभी प्रमाणों से यही प्रमाणित होता है कि देवादि को यज्ञादि कर्म करने व ब्रह्मविद्या की प्राप्ति का पूर्ण अधिकार है।३३।। अब आशंका होती है कि क्या सभी वर्णों (जातियों) के लोगों को वेद विद्या की प्राप्ति का अधिकार है? क्योंकि छा.उ. में उल्लेख मिलता है कि रैक्व ने राजा जानश्रुति को शूद्र कहते हुए भी उन्हें ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया। इससे तो यही प्रमाणित होता है कि शूद्र को भी ब्रह्मविद्या पाने का अधिकार है। अतः सूत्रकार इसका समाधान करने के लिए अगले सूत्र से नया प्रकरण शुरू करते हैं- (१७) शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥३४॥ सूत्रार्थ- अस्य = जानश्रुति पौत्रायण नामक राजा के मन में, तदनादरश्रवणात् = उन हंसों के मुख से अपना अनादर श्रवण करने के बाद, शुक् = शोक का जन्म हुआ, तत् = तत्पश्चात्, आद्रवणात् = (जिनकी अपेक्षा अपनी तुच्छता (निन्दा) सुनकर शोक हुआ था) उन रैक्वमुनि के पास वह ब्रह्मज्ञान-प्राप्ति की इच्छा से गया था (इसलिए उस रैक्व ने उसे शूद्र कहकर बुलाया), हि = क्योंकि (इससे), सूच्यते = (रैक्वमुनि की सर्वज्ञता) सूचित होती है। व्याख्या- यहाँ सूत्र में राजा जानश्रुति पौत्रायण को रैक्व ने जो शूद्र कहकर पुकारा, इसका यह भाव नहीं है कि वह जाति से शूद्र था, इसलिए शूद्र कहा। 'शुचम् आद्रवति इति शूद्रः' अर्थात् जो शोक के पीछे दौड़ता है, वही शूद्र है। इस व्युत्पति के आधार पर यहाँ शूद्र शब्द को किसी जाति विशेष का वाचक नहीं मानना चाहिए। रैक्व का ऐसा आशय कदापि नहीं था। यही बात छा० ४/१/१ से ४ तक के प्रकरण से स्पष्ट हो जाता है। वह प्रकरण इस प्रकार है- जानश्रुति पौत्रायण नामक एक धर्मशील और अन्न-धन दान देने वाला राजा था। एक दिन हंस रूप में दो ऋषि कुमार आपस में विवाद करते हुए जानश्रुति की निन्दा और रैक्वमुनि की प्रशंसा करते उड़ते हुए आकाश में जा रहे थे। राजा को ऐसा सुनने के पश्चात् बहुत दुःख हुआ और वह रैक्व का पता लगाकर सैकड़ों गाय व एक रथ भेंट लेकर रैक्व के पास गये। रैक्व शकट के नीचे बैठे थे। उन्होंने
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an excluse intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 58
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
६० वदान्त दशन राजा जानश्रुति से कहा- हे शूद्र! मैं इस धन का क्या करूँगा? तुम ही अपने पास रखो। तब दुःखित जानश्रुति ने घर वापस जाकर अपनी पुत्री को साथ लेकर पुनः रैक्व मुनि के पास जाकर उसका विवाह कर दिया। तब रैक्व ने उसे दिव्य ब्रह्मज्ञान प्रदान किया। इस प्रकार रैक्व जानश्रुति के मन में जन्मे ईर्ष्या भाव को दूर करके उसमें श्रद्धा-भाव प्रकट करने का मन बनाया और अपनी सर्वज्ञता सूचित कर उसे सावधान करते हुए 'शूद्र' कहकर बुलाया। यह जानते हुए कि जानश्रुति क्षत्रिय हैं, शूद्र नहीं। रैक्व मुनि ने उसे 'शूद्र' कहकर इसलिए बुलाया, क्योंकि वह शोक के वशीभूत होकर मेरे पास आया था। इस कारण से यह नहीं सिद्ध होता कि वेदविद्या की प्राप्ति में शूद्र का अधिकार है॥३४॥ * यह व्याख्या पारम्परिक है, तत्त्वतः जो शोकानुगामी है, वह शूद्र है; जो वैभवानुगामी है, वह वैश्य है; जो क्षत्र (संरक्षण) उन्मुख है, वह क्षत्रिय एवं जो ब्रह्मोन्मुख है, वह ब्राह्मण है-ऐसी स्थिति में जन्मना जाति के आधार पर अधिकारी का निर्धारण कहाँ तक उचित है? राजा जानश्रुति का क्षत्रिय होना किस प्रकार सिद्ध होता है? इस आशंका का समाधान सूत्रकार अब अगले सूत्र में करते हैं- (१८) क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात्।३५।। सूत्रार्थ- क्षत्रियत्वावगते: = प्रकरण में आये हुए लक्षण से, जानश्रुति का क्षत्रिय होना जाना जाता है इससे, च = तथा, उत्तरात्र = बाद में बताये हुए, चैत्ररथेन = चैत्ररथ के सम्बन्ध से, लिङ्गात् = क्षत्रियत्व सूचक प्रमाण द्वारा भी (जानश्रुति का क्षत्रिय होना सिद्ध होता है)। व्याख्या- जानश्रुति को क्षत्रिय मानने के सन्दर्भ में एक और कथा मिलती है- इस कथांश में जानश्रुति को श्रद्धापूर्वक बहुत अन्न-धन-वस्त्रादि दान-दाता एवं अतिथियों के लिए ही बन्गकर रखी हुई रसोई से प्रत्येक दिन स्वागत-सत्कार करने वाला बतलाया गया है। उसके राजोचित ऐश्वर्य का भी उल्लेख मिलता है, इसके साथ यह भी बतलाया गया है कि राजकन्या को रैक्व ने पत्नी के रूप में स्वीकार किया है। इन सभी कथामकों से सिद्ध होता है कि वह शूद्र नहीं क्षत्रिय था। इससे यही प्रमाणित होता है कि वेद-विद्या (ब्रह्मज्ञान की प्रासि) में शूद्र-जाति का अधिकार नहीं है। इसके अतिरिक्त रैक्व ने अपनी आख्यायिका में कहा है कि शौनक अभिप्रतारि चैत्ररथ-इन दोनों के लिए भोजन परोसने के समय एक भिखारी ने भिक्षा माँगी। इन दोनों के भिक्षा न देने पर उसने कहा कि 'यह अन्न-धन जिसके लिए है, उसे आपने क्यों नहीं प्रदान किया? अन्त में उसे भिक्षा दी गई। इसके साथ ही गाय, रथ, द्रव्य, कन्यादि का दान और अन्नदान आदि कर्म भी क्षत्रिय के ही हैं। उक्त समस्त कथानकों से सिद्ध होता है कि राजा जानश्रुति शूद्र नहीं क्षत्रिय थे। वे दोनों ही शूद्र के यहाँ भोजन कदापि नहीं ग्रहण कर सकते थे। अतः यहाँ यही सिद्ध होता है कि शूद्र-जाति का वेद ज्ञान (ब्रह्मविद्या) की प्राप्ति में अधिकार नहीं है॥३५।। उपर्युक्त कथन की सिद्धि के लिए आचार्य अगले सूत्र में एक दूसरा हेतु दे रहे हैं- (९९ ) संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ।३६।। सूत्रार्थ- च = और, संस्कारपरामर्शात् = वेद (श्रुति) में ब्रह्म-विद्या ग्रहण करने के लिए सर्वप्रथम उपनयन आदि संस्कारों के लिए परामर्श होना अनिवार्य कहा गया है, तदभावाभिलापात् = इस कारण शूद्र के लिए उन संस्कारों का अभाव बतलाया गया है, इसलिए भी शूद्र का ब्रह्म विद्या प्राप्ति का अधिकार नहीं है। व्याख्या- शूद्र के उपनयन आदि संस्कार सम्पन्न नहीं कराये जाते। इस कारण भी उसे वेद (ब्रह्म-विद्या) की प्राप्ति का अधिकार नहीं है; क्योंकि ब्रह्म-विद्या की प्राप्ति में संस्कार का होना अति आवश्यक बतलाया
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 59
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ३ सूत्र ३८ ६१ गया है। आर्षग्रन्थों में यत्र-तत्र वेदविद्या से सम्बन्धित प्रसङ्ग देखने को मिल जाते हैं। वहाँ पर सर्वत्र यह देखा जाता है कि आचार्य सर्वप्रथम शिष्य का उपनयनादि संस्कार करते हैं। तदुपरान्त उसे ब्रह्म-विद्या का उपदेश प्रदान करते हैं। इस सम्बन्ध में मु०उ० (३/२/२०) में ऋषि कहते हैं- 'तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यै चीर्णम्' अर्थात्- 'इस ब्रह्मविद्या का उपदेश उनको ही देना चाहिए, जिन्होंने संस्कार सम्पन्न कराकर ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन पूर्ण निष्ठा से किया हो।' छा०उ० में भी ऋषि कहते हैं- 'उपत्वा नेष्ये' (छा०उ० ४/४/५)। अर्थात् 'तुम्हारा उपनयन संस्कार करूँगा।' शतपथ ब्राह्मण भी निर्देश करता है- 'तः होपनिन्ये' (श.ब्रा. ११/५/३/१३) अर्थात् 'उसका उपनयन संस्कार संपन्न किया' आदि। इस प्रकार से ब्रह्मविद्या की प्राप्ति में उपनयन आदि संस्कारों का होना अति आवश्यक है और शूद्रों के लिए उन संस्कारों का कोई विधान नहीं बनाया गया है। अतः उक्त दृष्टान्तों से सिद्ध हो जाता है कि शूद्रों को वेद-विद्या का प्रासि का अधिकार नहीं है।३६ ।। अगले सूत्र में आचार्य उक्त कथन को दृढ़ करने के लिए एक और कारण बतला रहे हैं- (१०० ) तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्ते: ॥३७।। सूत्रार्थ- तदभावनिर्धारणे = शिष्य में उस शूद्रत्व का भाव न रहे, यह निश्चित करने के लिए, प्रवृत्ते :- आचार्यों की ऐसी प्रवृत्ति होती है (इससे), च = भी (यही सिद्ध होता है कि शूद्र को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है)। व्याख्या- आचार्यों की प्रायः इस तरह की इच्छा रहती है कि उनका प्रत्येक शिष्य शूद्रत्व के भाव वाला न हो। इस हेतु अपना शिष्य बनाने से पूर्व ही वे उसके सम्बन्ध में पूर्ण जानकारी करना आवश्यक मानते हैं। छान्दोग्योपनिषद् (४/४/३-५) में जानश्रुति एवं रैक्व की कथा के पश्चात् सत्यकाम जाबाल का प्रसंग इस प्रकार से प्राप्त होता है-'जाबाल के पुत्र सत्यकाम ने महर्षि गौतम के आश्रम में ब्रह्मज्ञान प्राप्ति की इच्छा से प्रवेश किया और उन्हें प्रणाम कर अपना शिष्य बना लेने की प्रार्थना की। तदनन्तर महर्षि गौतम ने जाति का निश्चय करने के लिए उससे पूछा- 'तेरा गोत्र क्या है' उसने स्पष्ट रूप से कहा-'भगवन्! मैं अपना गोत्र नहीं जानता। मैंने अपनी माँ से गोत्र पूछा था, तो उसने कहा कि 'मुझे गोत्र नहीं ज्ञात है, मेरा नाम जबाला है और तुम्हारा नाम सत्यकाम है।' अतः मैं तो इतना ही बतला सकता हूँ कि मैं जबाला का पुत्र सत्यकाम हूँ।' तत्पश्चात् महर्षि ने कहा- 'इस प्रकार से स्पष्ट और सत्यवचन एकमात्र ब्राह्मण ही कर सकता है अन्य और क्रोई नहीं।' अतः सत्य वचन रूप से यह निश्चय करके कि सत्यकाम ब्राह्मण है, शूद्र नहीं। उसे महर्षि गौतम ने समित्पाणि होकर आने का आदेश प्रदान किया। तदनन्तर उसका उपनयन संस्कार भी सम्पन्न किया। इससे यही सिद्ध होता है कि शूद्र का वेद-विद्या की प्राप्ति में अधिकार नहीं है।३७।।
करते हैं- अब अगले सूत्र में आचार्य प्रमाण द्वारा शूद्र के वेद-विद्या (ब्रह्म-विद्या) की प्रापि के अधिकार का निषेध
(१०१ ) श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च॥३८ ॥ सूत्रार्थ-श्रवण = (अनधिकारी के लिए) वेदादि के श्रवण, अध्ययनार्थ = अध्ययन एवं अर्थ ज्ञान का भी, प्रतिषेधात् = प्रतिषेध किया गया है इससे, च = तथा, स्मृते: = स्मृति के प्रमाण से भी सिद्ध होता है कि वेद- विद्या की प्राप्ति का अधिकार शूद्र को नहीं है। व्याख्या- स्मृतियों में वेदादि का पठन-पाठन, श्रवण-मनन एवं अर्थ-सार तत्त्व निकालना, आदि भी शूद्र को निषिद्ध बतलाया गया है। मनुस्मृति ४/८० में कहा गया है-'न शूद्राय मतिं दद्यात्' अर्थात् शूद्र के लिए
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 60
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
६२ वेदान्त दर्शन विद्यादान निषिद्ध है। इसी सन्दर्भ में पराशर स्मृति का वचन भी अनुकरणीय है-'वेदाक्षरविचारेण शूद्रः पतति तत्क्षणं' (प०स्मृ०-१/७३) अर्थात्- वेदाक्षरों का अर्थ जानने के लिए विचार करने पर शूद्र तत्क्षण गिर जाता है। ऐसे ही अनेकों स्मृतियों में यत्र-तत्र शूद्र के लिए वेद के सुनने, पढ़ने व अर्थ ज्ञान का प्रतिषेध किये जाने का वर्णन मिलता है। अतः उक्त कथन से यही ज्ञात होता है कि वेदविद्या की प्राप्ति का अधिकार शूद्र को नहीं है। इतिहास में जो विदुर आदि शूद्र जाति वाले महान् पुरुषों को ज्ञान पाने की बात मिलती है, उसका अभिप्राय यही समझना चाहिए कि इतिहास-पुराणों को श्रवण करने और अध्ययन में सभी वर्णों का बराबर का अधिकार है। पुराण आदि श्रेष्ठ साहित्य के द्वारा शूद्र भी परम ज्ञान प्राप्त कर सकता है। उसे भी भक्ति एवं ज्ञान मिल सकता है। गीता ९/३२ में भी गीताकार कहते हैं कि फल-प्राप्ति में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि भगवान् की भक्ति द्वारा परम गति (मोक्ष) प्राप्त करने में समस्त मानव-जाति का अधिकार है। सभी श्रेष्ठ गति के समान रूप से अधिकारी हैं, इस प्रकार शूद्राधिकरण का प्रकरण यहीं सम्पन्न होता है।३८।। अब अगले सूत्र में आचार्य पुनः पूर्वोक्त अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष के स्वरूप पर विचार करते हैं- (१०२ ) प्राणः कम्पनात् ॥३१॥ सूत्रार्थ-कम्पनात् = कम्पन से (अर्थात् पूर्वोक्त अङ्गष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है, इसलिए उसी में सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है और उस (ब्रह्म) के भय से कम्पित होता है। व्याख्या- कठोपनिषद् के द्वितीय अध्याय में प्रथम वल्ली से लेकर तृतीय वल्ली के अन्तर्गत (२/१/१२- १३) एवं (२/३/१७) में अङ्गष्ठ मात्र पुरुष का प्रकरण देखने को मिलता है। कठ०उ० २/३/२,३ में अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष के रूप में विवेचित उस परम पुरुष-परब्रह्म के प्रभाव का उल्लेख करते हुए यह तथ्य स्पष्ट रूप से प्रकट किया गया है, देखें- 'यदिदं किं च ............ भवन्ति' अर्थात्- 'उस परब्रह्म से प्रकट हुआ यह जो कुछ भी सम्पूर्ण जगत् है, वह उस प्राण स्वरूप परब्रह्म में ही चेष्टा करता है। उस उठे हुए बज्र के सदृश श्रेष्ठ- विशाल, भयानक, सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मा को जो जानते हैं, वे अमरत्व को प्राप्त हो जाते हैं, (कठ २/ ३/२) । अगले श्लोक में और भी स्पष्ट संकेत मिलता है'- 'भयादस्याग्निस्तपति .......... मृत्युर्धावति पञ्चम:' (कठ० २/३/३) अर्थात्-इसी (ब्रह्म) के भय से अग्नि तपता है, इसी के भय से सूर्य तपता है, इसी के भय से इन्द्र, वायु एवं पाँचवें मृत्यु के देवता- ये सभी अपने निज-निज कार्यों में संलग्न रहकर दौड़ रहे हैं। उपर्युक्त विश्लेषण से यह प्रमाणित हो जाता है कि अङ्गष्ठ मात्र पुरुष ब्रह्म ही है; क्योंकि समस्त विश्व जिसमें चेष्टा करता है या जिसके भय से कम्पायमान होकर समस्त देवगण स्व-स्व कार्यों में रत रहते हैं, वह न तो प्राणवायु हो सकता है और न ही इन्द्र। वायु और इन्द्र स्वयमेव उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए भयभीत रहते हैं। अतः यहाँ अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष ब्रह्म ही है, इसमें कदापि संशय नहीं करना चाहिए।३९॥ अब अगले सूत्र से आचार्य दहराकाश प्रकरण के अन्तर्गत ज्योतिपद विषयक छूटे हुए विषय पर पुनः विवेचन आरम्भ करते हैं- (१०३) ज्योतिर्दर्शनात्॥४० ॥ सूत्रार्थ- दर्शनात् = दर्शन (देखने) से (वह), ज्योतिः = ज्योति स्वरूप ब्रह्म है। अर्थात् 'ज्योतिः' पद ब्रह्म का वाचक है; क्योंकि वह सभी का प्रकाशन-दर्शन करने वाला है तथा उसी का अन्तिम रूप से दर्शन ज्ञान आवश्यक होता है। व्याख्या- 'ज्योतिः' पद की ब्रह्मवाचकता के प्रसंग में मुण्डकोपनिषद् २/२/९ में इस प्रकार वर्णन मिलता है- 'विशिष्ट ज्ञान को प्रकट करने वाले हिरण्मय सूक्ष्मातिसूक्ष्म कोश में दोषरहित निरवयव ब्रह्म के दर्शन होते
.-
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 61
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ३ सूत्र ४२ ६३ हैं। वह शुभ्र प्रकाश स्वरूप व ज्योतियों का ज्योति अर्थात् परम ज्योति है, आत्मज्ञानीजन उसे जानते हैं। वह ज्योतियों का ज्योति किस प्रकार है? इसी का रहस्य ऋषि अगले मंत्र २/२/१० में स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि 'न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम् .... अर्थात् यद्यपि सूर्य अन्य सभी जड़ जगत् का प्रकाशक है; किन्तु वह ब्रह्म के प्रकाशन में सर्वथा असमर्थ है। इसी तरह वह (ब्रह्म) चाँद, तारे, विद्युत् एवं अग्नि से प्रकाशित नहीं होता, वरन् उसके प्रकाश से ही ये सभी प्रकाशमान होते हैं। इन सभी का अस्तित्व ब्रह्म की प्रेरणा द्वारा ही मिलता है, अतः इनका प्रकाशित होना ब्रह्म के अस्तित्व पर निर्भर करता है। उसके प्रकाशन से ये सभी प्रकाशित हैं। इसलिए वह ज्योतियों का ज्योति अर्थात् 'परम ज्योति' है। छा०उ० ८/३/४ में इस प्रकरण से सम्बन्धित प्रसंग इस प्रकार है- 'यह जो सम्प्रसाद (जीव) है, वह देह से निकलकर 'परम ज्योति' को पाकर निज स्वरूप से युक्त हो जाता है। यहाँ जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह परब्रह्म का ही वाचक है; क्योंकि उपनिषद् में अनेकों स्थानों पर ब्रह्म के अर्थ में 'ज्योतिः' शब्द देखने को मिलता है। उदाहरणार्थ यह मंत्र देखें- 'अथ यदत: परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते' (छा०उ० ३/१३/७) अर्थात् इस अन्तरिक्ष लोक से परे जो 'परम ज्योति' प्रकाशमान है। यहाँ ज्योतिः पद ब्रह्म के अर्थ में ही प्रयुक्त है। उपनिषदों के उक्त सन्दर्भों में 'ज्योतिः' पद से उसी ब्रह्म का वर्णन हुआ है। उन सन्दर्भों में 'ज्योतिः' को निरवयव, निर्दोष, अमृत, उत्तमपुरुष, अन्तिम दर्शनीय ध्येय कहा है। ये सभी स्थितियाँ एकमात्र ब्रह्म में ही संभव हैं। इसलिए उक्त प्रसंगों में 'ज्योतिः' पद ब्रह्म का ही वाच्य है।४०। अब आशंका यह होती है कि 'दहराकाश' के प्रकरण में आया हुआ 'आकाश' शब्द ब्रह्म का वाचक है; किन्तु छा०उ०८/१४/१ में जो 'आकाश' शब्द प्रयुक्त हुआ है, वह किस शब्द के अर्थ में है? आचार्य अगले सूत्र में इसी के निर्णय हेतु समाधान प्रस्तुत करते हैं- (१०४) आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात्।४१।। सूत्रार्थ- अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् = नाम-रूपमय जगत् से पृथक् कहे जाने के कारण, आकाश: = 'आकाश' शब्द ब्रह्म का ही वाचक है। व्याख्या- इसका वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् (८/१४/१) में इस प्रकार किया गया है- 'आकाशो वै नाम नामरूपयोनिर्वहिता ते यदन्तरा तद् बह्म तद्मृतः स आत्मा' अर्थात् जो नाम और रूप का निर्वहन करने वाला 'आकाश' नामक प्रसिद्ध तत्त्व है, तथा वे (नाम और रूप) दोनों जिसके मध्य में स्थित हैं, वही तत्त्व ब्रह्म है, अमृत और आत्मा भी वही है। इस प्रकरण में 'आकाश' को नाम-रूप से पृथक् एवं नामरूपात्मक विश्व को ग्रहण करने वाला कहा गया है। इसलिए वह भूताकाश या जीव का वाची नहीं हो सकता; क्योंकि वह भूताकाश सहित सम्पूर्ण जड़-चेतनात्मक विश्व को अपने में ही ग्रहण करने वाला है। वह ब्रह्म ही यहाँ 'आकाश' नाम से संबोधित किया गया है। पूर्व में जो ब्रह्म, अमृत और आत्मा आदि विशेषण दिये गये हैं, वे भी भूताकाश या जीवात्मा के अनुकूल नहीं हैं। इस कारण उनसे पृथक् 'ब्रह्म' नाम से वहाँ 'आकाश शब्द' का ही उल्लेख किया गया है॥।४१।। अब आशंका यह होती है कि जीवात्मा जब मोक्ष के पश्चात् ब्रह्म को पा लेता है, तब उस समय उसमें ब्रह्म के समस्त लक्षण आ जाते हैं। इसलिए उसी को यहाँ 'आकाश' नाम से कहा गया है। यदि ऐसा मान लिया जाये, तो क्या आपत्ति है? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान करते हैं- (१०५ ) सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥४२॥ सूत्रार्थ- सुषुप्त्युक्रान्त्योः = सुषुत्ति और मरणकाल में भी, भेदेन = (जीव और बह्म का) भेदपूर्वक
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 62
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
६४ वेदान्त दर्शन
वर्णन है, अतः 'आकाश' शब्द यहाँ ब्रह्म का ही वाचक है। व्याख्या-उपनिषद्कार (छा० ६/८/१ में) सुषुप्तिकाल के सन्दर्भ में कहते हैं कि 'जिस अवस्था में यह पुरुष शयन करता है, उस समय यह सत् अर्थात् अपने कारण से सम्पन्न (संयुक्त) होता है। इस दशा का उल्लेख १/१/९ में विस्तार पूर्वक किया जा चुका है। यह वर्णन सुषुप्तावस्था का है।' यहाँ जीव का 'पुरुष' नाम से और कारणभूत ब्रह्म का 'सत्' नाम से भेद पूर्वक उल्लेख प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्क्रान्ति का भी उल्लेख (छा०उ० ८/३/४ में) मिलता है- 'यह जीव इस देह से निकलकर परम ज्योतिमय परब्रह्म को प्राप्त कर अपने शुभ्र ज्योतिरूप से संयुक्त हो जाता है।' यहाँ पर भी सम्प्रसाद नाम से जीव का और परम ज्योति के नाम से ब्रह्म का भेद पूर्वक वर्णन किया गया है। इस तरह से सुषुप्ति काल और उत्क्रान्तिकाल में भी जीव और ब्रह्म का भेद पूर्वक उल्लेख होने के कारण उक्त 'आकाश' शब्द मुक्तात्मा वाची नहीं हो सकता; क्योंकि मुक्तात्मा में ब्रह्म की भाँति कुछ सद्गुणों का प्रकटीकरण होने से भी उसमें नाम और रूपमय जगत् को ग्रहण करने की शक्ति नहीं प्राप्त होती। यहाँ पर भी सर्वज्ञ आत्मा एकमात्र 'ब्रह्म' के लिए प्रयुक्त है॥४२॥ अगले सूत्र में उक्त कथन के प्रमाण हेतु एक अन्य कारण आचार्य प्रस्तुत करते हैं- (१०६ ) पत्यादिशब्देभ्यश्च॥४३॥ सूत्रार्थ- पत्यादिशब्देभ्यः = श्रुति में ब्रह्म के लिए पति, अधिपति, परमपति, परमपिता, महेश्वर आदि शब्दों का प्रयोग होने के कारण भी जीव और ब्रह्म का भेद स्पष्ट सिद्ध होता है। व्याख्या- ब्रह्म को जिन पृथक्-पृथक् विभिन्न विशेषणों से संबोधित किया जाता है, वे विशेषण जीवात्मा के लिए कदापि सम्भव नहीं हैं। 'एष सर्वेश्वरः', 'एष भूताधिपतिरेष भूतपाल:'(बृह०उ०४/४/२२)। यह मंत्र एकमात्र ब्रह्म के निमित्त ही प्रयुक्त हो सकता है। जीव अपनी मुक्तावस्था में सर्वेश्वर या समस्त भूत- प्राणियों का अधिपति नहीं हो सकता है; क्योंकि एकमात्र ब्रह्म ही जीवों के हृदय में रहकर उन पर शासन करता है। बृहदारण्यक का उक्त मंत्र यहाँ ब्रह्म के सर्व सामर्थ्य युक्त भाव को प्रकट करता है। श्वेताश्वतरोपनिषद् ६/७/ में भी परब्रह्म के स्वरूप का उल्लेख इस प्रकार से मिलता है, देखें- तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्॥ (श्वे०उ० ६/७) अर्थात्-'समस्त ईश्वरों के भी परम महेश्वर, देवों के भी परमदेव एवं पतियों के भी परमपति, अखिल विश्व ब्रह्माण्ड के स्वामी और स्तवन करने योग्य उस प्रकाश स्वरूप परब्रह्म को हम सभी लोग सबसे परे मानते हैं।' उपर्युक्त मंत्र में देव आदि की श्रेणी में जीव है तथा परम देवता, परम अधिपति आदि के नाम से परब्रह्म का ही उल्लेख किया गया है। इससे भी यही निश्चय होता है कि जीव और ब्रह्म में भेद है। अतः इस कारण से भी 'आकाश' शब्द ब्रह्म का वाची है, मोक्ष को प्राप्त किये हुए जीवात्मा का नहीं॥४३॥
। इति प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic materlal on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 63
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
॥ अथ प्रथमाध्याये चतुर्थः पादः॥ उपर्युक्त तीन पादों में परब्रह्म को जगत् के जन्मादि का कारण कहकर श्रुतिवचनों के द्वारा वे तथ्य प्रतिपादित किये गये हैं। उपनिषदों में जिस-जिस स्थल पर संदेह होता था, उस-उस पर विचार कर उसके संदेह का निदान किया गया। आनन्दमय, आकाश, प्राण, ज्योति आदि जो भी शब्द ब्रह्ममय नहीं प्रतीत होते थे, जीव या जड़ प्रकृति के बोधक प्रतीत होते थे, उन सभी को ब्रह्म का वाची प्रमाणित किया गया। अब आशंका होती है कि वेद-श्रुति में प्रकृति का उल्लेख कहीं पर हुआ है अथवा नहीं। यदि उल्लेख है, तो उसका स्वरूप क्या है? इन्हीं समस्त ज्ञातव्य विषयों पर विचार करने के लिए यह चौथा पाद शुरू किया जाता है। कठ०उ० में जो 'अव्यक्त' नाम आया है; वहाँ 'अव्यक्तम्' पद प्रकृति वाची है या अन्य किसी का वाचक है। इसी आशंका का समाधान आचार्य इस अगले सूत्र में करते हैं- (१०७) आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेर्दर्शयति च ।।१।। सूत्रार्थ- एकेषाम् = एक शाखा वालों के मत में वेद-प्रतिपादित, आनुमानिकम् = अनुमान कल्पित जड़- प्रकृति को, अपि = भी (जगत् की उत्पत्ति का कारण कहा गया), इति न = तो ऐसा कहना उचित नहीं है, शरीररूपकविन्यस्तगृहीते: = क्योंकि शरीर ही यहाँ रथ के रूपक में 'अव्यक्त' शब्द से ग्रहण होता है, च = और यही तथ्य, दर्शयति = श्रुति भी प्रकट करती है। व्याख्या- यदि यह कहें कि कठ०उ० १/३/११ में जो 'अव्यक्तम्' पद प्रयुक्त हुआ है, वह अनुमान पर आधारित जड़ प्रकृति वाची है, तो ऐसा कहना यहाँ उचित नहीं प्रतीत होता है। इसका कारण है कि आत्मा, शरीर, बुद्धि, मन, इन्द्रिय एवं विषयादि की जो रथ, रथी और सारथि आदि के रूप में कल्पना की गई है, उसी के अन्तर्गत रथ के स्थान पर देह को रखा गया है। उसी का नाम यहाँ पर 'अव्यक्त' रखा गया है। यही तथ्य उक्त प्रकरण में उद्भासित हुआ है। कठ०उ० के इस रूपक-प्रकरण में आत्मा को रथी, देह को रथ, बुद्धि को सारथि, मन को लगाम, इन्द्रियों को अश्व और विषय वासनाओं को उन अश्वों का भोजन कहा गया है। इनके द्वारा परमपद स्वरूप ब्रह्म को ही पाने योग्य कहा है। इस प्रकरण में सात पदार्थों की कल्पना की गई है। उन्हीं सातों का उल्लेख एक दूसरे को शक्तिशाली बनाने में भी होना चाहिए; किन्तु वहाँ इन्द्रियों की अपेक्षा विषयों को शक्ति सम्पन्न कहा गया है। जिस तरह भोजन (चारा-दाना) देखकर अश्व हठात् उस ओर आकर्षित होते हैं, उसी तरह इन्द्रियाँ भी बलपूर्वक विषयों की तरफ खिंच जाती हैं। विषयों से परे मन की स्थिति बताई गयी है; क्योंकि सारथि यदि लगाम को सतर्कतापूर्वक खींचे रहे, तो अश्व अपने भोजन की तरफ बलात् नहीं जा सकते। उसके बाद मन से परे बुद्धि को कहा गया है, वही सारथि है। लगाम की अपेक्षा सारथि को श्रेष्ठ कहना ठीक ही है; क्योंकि लगाम सारथि के पास रहती है। बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा है। इसी को 'रथी' के रूप में कहा हुआ जीवात्मा ही मानना चाहिए। यहाँ यदि 'आत्मा' का अर्थ महत्त्त्व मान लें, तो इस प्रकरण (रूपक) में दो दोष दिखाई देते हैं। प्रथम तो बुद्धि रूपी सारथि के मालिक रथी आत्मा का त्याग और दूसरा जिसका रूपक में उल्लेख नहीं है, उस महत् तत्त्व की व्यर्थ कल्पना करना। अतः यहाँ रथी के रूप में वर्णित महान् आत्मा ही जीवात्मा है और फिर महान् आत्मा से श्रेष्ठ जो 'अव्यक्त' कहा गया है, वही भगवत्सत्ता की शक्ति रूपा प्रकृति है। उसी का अंश कारण-शरीर। उसे ही इस प्रकरण में रथ का रूप प्रदान किया गया है। इसलिए कारण शरीर भगवान् की प्रकृति का अंश होने के कारण
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 64
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
६६ वदान्त दशन
ही यहाँ पर 'अव्यक्त' के नाम से संबोधित किया गया है।१॥ अब आशंका यह उठती है कि शरीर को 'अव्यक्त' कहना किस प्रकार उचित होगा; क्योंकि वह तो प्रत्यक्ष ही व्यक्त है। अगले सूत्र में आचार्य यही स्पष्ट करते हैं- (१०८) सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात्॥।२ ॥ सूत्रार्थ-तु=किन्तु, सूक्ष्मम् = यहाँ पर 'शरीर' शब्द से सूक्ष्म शरीर का ग्रहण होता है, तदर्हत्वात् = क्योंकि परमधाम की यात्रा में रथ के स्थान पर उसे ही मानना ठीक है। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा की प्रकृति अति सूक्ष्म कही गई है। वह दर्शन और विवेचन से परे है। उसी का अंश ही कारण-शरीर है, इसलिए उसे अव्यक्त मानना उचित ही है। इसके अतिरिक्त जीवात्मा के परमधाम में पदार्पण के समय व्यक्त (प्रकट) शरीर तो यहीं (मृत्युलोक में) रह जाता है। वहाँ तो मात्र अव्यक्त अर्थात् सूक्ष्म शरीर ही रथ के रूप में गमन करता है। इस कारण से भी सूक्ष्म का 'अव्यक्त' मानना उचित है। सृष्टि के प्रलयकाल के समय में इस दृष्टिगोचर होने वाले सम्पूर्ण जगत् के सूक्ष्म भाव को स्वीकार करने के विवरण भी श्रुतियों में प्राप्त होते हैं। इस कारण से भी देह का सूक्ष्म भाव से प्रकट न होना अर्थात् 'अव्यक्त' होना सिद्ध होता है। इस उक्त विषय का विस्तार इसी शास्त्र के अन्तर्गत सूत्र ४/२/५ से ४/२/११ में किया गया है॥२॥ अब आशंका यह होती है कि जब प्रकृति के अंश को 'अव्यक्त' के रूप में मान लिया, तब फिर सांख्य में वर्णित प्रधान को मानने में क्या आपत्ति है? सांख्य भी तो भूतों के कारण रूप सूक्ष्म तत्त्व को ही 'प्रकृति' कहता है। इसी का समाधान आचार्य अगले सूत्र में प्रतिपादित करते हैं- (१०९ ) तदधीनत्वादर्थवत्।३।। सूत्रार्थ- तदधीनत्वात् = उस परम कारणभूत परब्रह्म के होने से भी, अर्थवत् = वह (शक्तिरूपा प्रकृति) इस अर्थ में ग्रहणीय है। व्याख्या-सांख्य के अनुसार प्रकृति को स्वतन्त्र और जगत् का मूल कारण बतलाया गया है; किन्तु वेद (श्रुति) में ऐसा प्रतिपादन नहीं है। वहाँ (वेद में) तो परब्रह्म को ही सम्पूर्ण जगत् का मूल कारण माना गया है और प्रकृति को परब्रह्म के अधीन रहकर सृष्टि आदि कार्यों के सम्पन्न करने में ही उसकी सार्थकता कही गई है। वेद में प्रकृति ब्रह्म की शक्ति कहा गया है। शक्ति शक्तिमान् से पृथक् नहीं होती। इसलिए उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं स्वीकार किया जाता। इस प्रकार परमेश्वर के अधीन उसी की एक शक्ति होने से उसकी सार्थकता है; क्योंकि शक्ति होने से ही शक्तिमान् ब्रह्म के द्वारा विश्व की सृष्टि आदि कार्यों का सम्पन्न होना सम्भव है। यदि ब्रह्म को शक्ति रहित मान लें, तो वह इस जड़-चेतनमय सम्पूर्ण विश्व का कर्त्ता-धर्त्ता और संहर्त्ता किस तरह हो सकता है और फिर उसे शक्तिमान् भी कैसे माना जा सकता है? इसका स्पष्ट उल्लेख श्वेता०उ० १/३ में इस प्रकार मिलता है-'योगियों ने ध्यानयोग में आरूढ़ होकर उस परमदेव की स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्ति का यथार्थ बोध किया, जो स्वयं अपने निज के गुणों से आवृत है। आगे यह भी वर्णन मिलता है कि उस परब्रह्म की स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रिया रूप शक्तियाँ विभिन्न तरह की सुनने को मिलती हैं। सूत्र में ब्रह्म की शक्ति के नाम से ही प्रकृति का वर्णन किया गया है। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि प्रकृति को स्वतन्त्र इकाई के रूप में नहीं स्वीकार किया जा सकता है।३।।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic materal on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 65
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ४ सूत्र ५ ६७ श्रुति में वर्णित प्रकृति सांख्योक्त प्रधान नहीं है। आचार्य अगले सूत्र में इसी तथ्य को दृढ़ करने हेतु एक अन्य कारण बतलाते हैं- (११० ) ज्ञेयत्वावचनाच्च॥४॥ सूत्रार्थ-ज्ञेयत्व = अव्यक्त, निश्चय ही ज्ञेय है, ऐसा; अवचनात् = वेद में वर्णित (वचन) न होने से, च = भी ब्रह्म को ही ज्ञेय मानना चाहिए। (यह सांख्योक्त प्रधान नहीं है)। व्याख्या- सांख्य शास्त्र के अनुयायी प्रकृति को ही ज्ञेय (जानने योग्य) मानते हैं। उनका कथन है- 'गुणपुरुषान्तर ज्ञानात् कैवल्यम्' अर्थात्- 'गुण-संयुक्ता प्रकृति और पुरुष की भिन्नता जान लेने से कैवल्य अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।' प्रकृति के स्वरूप को सम्यक् रूप से जाने बिना उससे पुरुष का पृथक्त्व (भेद) किस प्रकार ज्ञात होगा? अतः उनके मतानुसार प्रकृति भी ज्ञेय है। दोनों की पृथक्ता को जानने के लिए सर्वप्रथम प्रकृति को जानना होगा; किन्तु वेद (श्रुति) में प्रकृति को ज्ञेय अथवा उपास्य कहीं पर भी नहीं कहा गया है। वेद में तो एकमात्र ब्रह्म को ही जानने योग्य एवं उपासना के योग्य होने का वर्णन प्राप्त होता है। श्वेताश्वतरोपनिषद् में प्रकृति को माया और उसके अधिपति परमेश्वर को 'मायी' कहा गया है। यह 'मायी' पुरुष अपनी माया से ही विश्व की संरचना करता है। इससे यह सिद्ध होता है, कि सांख्य में वर्णित 'प्रधान' को ज्ञेय कहना उचित नहीं, एकमात्र 'ब्रह्म' ही ज्ञेय है। वेद में वर्णित प्रकृति सांख्य में वर्णित प्रकृति (प्रधान) तत्त्व से पृथक है॥४॥। अगले सूत्र में आचार्य अपने मत की प्रामाणिकता के प्रति स्वयं ही आशंका व्यक्त कर उसका समाधान प्रस्तुत करते हैं- (१११ ) वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥५॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहें कि, वद्ति = (श्रुति प्रकृति को भी) ज्ञेय बतलाती है, इति न = ऐसा कहना उचित नहीं है, हि = क्योंकि, प्राज्ञ: = (वहाँ ज्ञेय तत्त्व) ब्रह्म ही है (उसे ही जानना चाहिए), प्रकरणात्- प्रकरण से (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या-कठोपनिषद् में जहाँ पर 'अव्यक्त' शब्द का प्रसङ्ग आया है, उसी प्रकरण में कठ० १/३/१५ में यह वर्णन मिलता है कि 'जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धादि से रहित अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त, महत् से परे श्रेष्ठ और अचल है। ऐसे उस श्रेष्ठ तत्त्व को जानने के पश्चात् प्राणी मृत्यु के मुख से छूट जाता है अर्थत् अमर हो जाता है। 'यहाँ सूत्र में ज्ञेय तत्त्व के जो भी लक्षण कहे गये हैं, वे सभी सांख्योक्त प्रधान से मेल खाते हैं, अतः यहाँ पर प्रधान को ही 'ज्ञेय' कहना सिद्ध होता है।' ऐसा यदि कोई कहे, तो उसका यह कथन उचित नहीं; क्योंकि यहाँ परब्रह्म के स्वरूप वर्णन का ही प्रकरण है। यत्र-तत्र सर्वत्र उसी को जानने एवं प्राप्त करने योग्य कहा गया है। उक्त सूत्र जो यहाँ पर उद्धृत किया गया है, उसमें व्यक्त सभी लक्षण ब्रह्म में ही यथार्थतः मेल खाते हैं। इसलिए उसमें भी ब्रह्म के ही स्वरूप का प्रतिपादन एवं उसके ज्ञेयत्व का वर्णन किया गया है। अतः इस उक्त प्रकरण से यह सिद्ध होता है कि वेद में ब्रह्म को ही ज्ञेय (जानने योग्य) कहा गया है और उसी को जानने का परिणाम ही मृत्यु के मुख से छूटना अर्थात् अमरत्व की प्राप्ति कहा गया है॥५॥ कठ०उ० में यम-नचिकेता संवाद के अन्तर्गत अग्नि, जीवात्मा और ब्रह्म-इन तीन का ही प्रकरण मिलता है। इसी तरह चौथे 'प्रधान' तत्त्व का भी प्रकरण मान लें, तो क्या आपत्ति है? इसी को आचार्य अगले सूत्र में स्पष्ट करते हैं-
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 66
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
६८ वदान्त दशन
(११२ ) त्रयाणामेव चैवमुपन्यास: प्रश्नश्च॥।६॥ सूत्रार्थ- त्रयाणाम् = (कठोपनिषद् में) तीन का, एव = ही, एवम् = इस प्रकार ज्ञेयत्व का, उपन्यास: = उल्लेख किया गया है, च = तथा (उन्हीं उक्त तीनों के सन्दर्भ में), प्रश्न: = प्रश्न भी (किये गये) हैं। व्याख्या- कठोपनिषद् में यम-नचिकेता संवाद के अन्तर्गत अग्नि, जीवात्मा और ब्रह्म- इन्हीं तीनों को जानने के प्रकरण में प्रश्नोत्तर किये गये हैं। अग्नि के सम्बन्ध में कठ०उ० १/१/१३ में इस प्रकार प्रश्न मिलता है- 'हे यमराज! आप स्वर्ग प्राप्ति के साधन रूप अग्नि के ज्ञाता हैं, अतः मेरे लिए वह अग्निविद्या विधिवत समझायें।' इसके बाद जीव-सम्बंधी प्रश्न कठ.उ. १/१/२० में इस प्रकार किये गये हैं- 'मृत्यु को प्राप्त हुए प्राणी के सम्बन्ध में कोई तो यह कहता है कि वह मृत्यु के बाद रहता है और कोई कहता है 'नहीं रहता।' अतः इस आशङ्का का निर्णय मैं आपके द्वारा उपदेश प्राप्त कर जानने की इच्छा रखता हूँ।' तदनन्तर आगे ब्रह्म के सन्दर्भ में कठ०उ० १/२/१४ में इस तरह का प्रश्न देखने को मिलता है- 'जो धर्माधर्म दोनों से कार्य- कारण रूप समस्त विश्व से एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्-इन तीनों भेदों वाले काल से तथा तत्सम्बन्धी सभी पदार्थों से परे है, ऐसे जिस तत्त्व को आप जानते हैं, उसी का उपेदश करें।' इस प्रकार से उक्त तीनों सम्बन्ध में नचिकेता के प्रश्न और यम के उत्तर (समाधान) भी हैं। अग्नि सम्बन्धी प्रश्न का समाधान क्रमशः १/१/१४ से १९ तक के मन्त्रों में दिया गया है। जीव विषयक प्रश्न का उत्तर १/२/१८,१९ में और फिर २/२/७ में दिया गया है। ब्रह्म के सम्बन्ध में प्रश्नोत्तर १/२/२० से लेकर उपनिषद् की समाप्ति तक किया गया है। यत्र-तत्र जीव के सन्दर्भ में भी उल्लेख मिलता है, किन्तु 'प्रधान' (प्रकृति) के विषय में न तो कोई प्रश्न है और न ही उत्तर मिलता है। इससे यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपर्युक्त तीनों के अतिरिक्त चौथे 'प्रधान' का प्रसङ्ग ही नहीं प्राप्त होता है।६॥ अब आशंका यह होती है कि जब प्रधान का वाचक 'अव्यक्त' शब्द उक्त प्रकरण में पड़ा है, तो फिर उसे दूसरे अर्थ में कैसे प्रयुक्त किया जा सकता है? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (११३ ) महद्वच्च ।I७।। सूत्रार्थ- च = और, महद्वत् = 'महत्' शब्द की भाँति इसको भी दूसरे अर्थ में मानना उचित है। व्याख्या-शास्त्रों व श्रुतियों में 'महत्' पद का प्रयोग अनेक अर्थों में हुआ है। यजुष् ३१/१८ में महत् पद का प्रयोग ब्रह्म के लिए हुआ है। कठ० १/२/२० में इसका प्रयोग लोक-लोकान्तरों के लिए किया गया है। कठ० २/३/२ में 'महत्' पद 'अधिक' अर्थ को प्रकट करता है। सांख्य में 'महत्' को महत्तत्त्व का वाचक न होकर आत्मा के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। कठ० १/३/१० में महत् शब्द का प्रयोग जीवात्मा के अर्थ में इस प्रकार आया है- 'बुद्धि से महान् (पृथक्) आत्मा परे है।' यहाँ आत्मा को बुद्धि से परे कहा गया है; किन्तु सांख्यवादी महत्तत्त्व को बुद्धि का वाचक ही मानते हैं। इस प्रकार से यहाँ पर 'अव्यक्त' शब्द का अर्थ सांख्यमत वालों से पृथक् मानना ही उचित है। यहाँ 'महत्' शब्द जीवात्मा का वाचक है। इस प्रकार श्रुति में जगह-जगह 'महत्' शब्द का प्रयोग सांख्य मत के विपरीत देखा जाता है, वैसे ही 'अव्यक्त' शब्द का अर्थ सांख्यमत से भिन्न मानना ही ठीक है।।9।। श्वेताश्वतर उपनिषद् १/९ और ४/५ में 'अजा' शब्द से अनादि प्रकृति का उल्लेख मिलता है। वहाँ उसे श्वेत, लाल और काला इन तीन वर्णों वाला बताया गया है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सांख्य मतोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृति को ही वेद में जगत् का कारण माना गया है। यहाँ ऐसी आशंका होने पर आचार्य अगले सूत्र में समाधान प्रस्तुत करते हैं-
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 67
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ४ सूत्र १ ६१
(११४) चमसवदविशेषात्।८।। सूत्रार्थ- ('अजा' शब्द वहाँ सांख्य मतोक्त प्रकृति वाची है, ऐसा सिद्ध नहीं होता; क्योंकि) अविशेषात् = किसी प्रकार की विशेषता न बतलाने से, चमसवत् = चमस के समान (उसे दूसरे अर्थ में भी लिया जा सकता है)। व्याख्या-श्वेता०उप० १/९ एवं ४/५ में वर्णित 'अजा' शब्द प्रकृति का वाचक माना गया है; किन्तु वह सांख्यमतानुयायी प्रकृति है, ऐसा कोई प्रमाण नहीं प्राप्त होता। यहाँ पर 'अजा' शब्द 'स्वरूपभूता' वह पुरुष सृष्टि कारिणी शब्द का विशेषण होने के कारण प्रकृति का साक्षात्कार होता हो, सो ऐसा भी नहीं है। श्रुति में जिस 'अजा' नामक शब्द का उल्लेख मिलता है, उसका नाम चाहे जो भी कुछ रख लिया जाये, किन्तु यथार्थतः वह परब्रह्म की अधीनस्थ अचिन्त्य शक्ति है। वह उस अविनाशी ब्रह्म से पृथक् नहीं है। श्रुति में स्पष्ट किया गया है- 'जगत् का कारण कौन है?' इस पर चिन्तन करने वाले ऋषियों ने ध्यान योग स्थित होकर उस ब्रह्म की स्वरूपभूता अपने ही गुणों से गुह्य हुई अचिन्त्य शक्ति को ही कारण रूप में देखा और यह धारणा बनाई कि जो ब्रह्म अकेला ही काल, स्वभाव आदि से लेकर आत्मा पर्यन्त सभी तत्त्वों का केन्द्रक है, जिसके द्वारा वे ही सब निज-निज स्थल में कारण होते हैं, वह ब्रह्म इस जगत् का कारण है। इस प्रकार से यह सिद्ध हुआ कि वेद में 'अजा' नाम से जिस प्रकृति का उल्लेख किया गया है, वह प्रभु के अधीन-आश्रित उन्हीं की अभिन्न रूपा अचिन्त्य शक्ति है, सांख्यमतानुयायी कथित स्वतन्त्र प्रकृति नहीं। इसी तथ्य को प्रकट करने हेतु सूत्र में कहा गया है कि जिस तरह 'चमस' शब्द रूढ़ि से सोमपान के लिए विनिर्मित पात्र विशेष का वाची होने पर भी बृह०उ० २/२/३ में आये हुए 'अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्रः' इत्यादि मंत्र में वह 'शिर' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। ठीक वैसे ही यहाँ पर 'अजा' शब्द भगवत्सत्ता की स्वरूपभूता अनादि अचिन्त्य शक्ति के अर्थ में प्रयोग किया गया है। ऐसा मानने में कोई भी आपत्ति नहीं है; क्योंकि यहाँ पर ऐसा कोई विशेष कारण नहीं दिखाई पड़ता, जिससे कि 'अजा' शब्द से सांख्यमतोक्त स्वतन्त्र प्रकृति को स्वीकार किया जाये अर्थात् सांख्य मत के द्वारा प्रतिपादित प्रकृति का ग्रहण नहीं होता।८ ॥ अब जिज्ञासा यह उठती है कि 'अजा' शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त है, उसे न ग्रहण कर यहाँ पर दूसरा कौन सा अर्थ ग्रहण किया गया है? इसी का समाधान किया जा रहा है- (११५ ) ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके ॥।९॥ सूत्रार्थ- तु - अवश्य ही, ज्योतिरुपक्रमा = यहाँ 'अजा' शब्द तेज आदि त्रिविध तत्त्वों की कारणभूता ब्रह्म की शक्ति का वाची है अर्थात् ब्रह्म से ही उद्भूत है, हि = क्योंकि, एके = एक शाखा वाले, तथा = ऐसे ही, अधीयते = अध्ययन करते हैं। व्याख्या- वेदों में वर्णित 'अजा' शब्द ब्रह्म के द्वारा ही उद्भूत है। स्वतंत्र रूप से उसकी सत्ता प्रतिपादित नहीं है। उसे 'ज्योति' शब्द से भी संबोधित करना ठीक ही है; क्योंकि उसका प्रकाशक ब्रह्म ही है। ज्योति शब्द से उपक्रम होने से 'अजा' शब्द को ब्रह्म की शक्ति बतलाना उचित ही है। छा०उ० ६/२/३,४ में ब्रह्म से उत्पन्न तेज आदि तत्त्वों से जगत् के विस्तार का उल्लेख मिलता है। अतः यही मानना ठीक है कि उनकी कारणभूता ब्रह्मशक्ति को ही 'अजा' कहा गया है। छा०उ० ६/४/१ से ७ तक में इसका वर्णन इस प्रकार है- 'उस ब्रह्म ने विचार किया कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ।' फिर उसने तेज की रचना की, तदुपरान्त तेज से जल और जल से अन्न की उत्पत्ति बतलाई। इसके पश्चात् इनके तीन रूपों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है- अग्नि का लाल रंग ही तेज है, सफेद रंग जल का है और काला रंग अन्न (पृथिवी) का है। इस तरह से
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 68
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
७० वेदान्त दर्शन हर वस्तु में उक्त तेज आदि तीनों तत्त्वों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार श्वे०उ० में भी जो 'अजा' के तीन रंग कहे गये हैं, वे भी तेज आदि में प्राप्त होते हैं। अतः निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते कि यहाँ अजा के नाम से प्रकृति का ही वर्णन है। यदि प्रकृति का वर्णन मान भी लें, तो भी यही मानना पड़ेगा कि वह उस ब्रह्म के आश्रित रहने वाली उसी की अभिन्न शक्ति है, जो उपर्युक्त तेज आदि तीनों तत्त्वों का भी कारण है। सांख्य मतोक्त प्रकृति का वहाँ उल्लेख नहीं है; क्योंकि; श्वे०उ० १/१० में जहाँ उसका 'प्रधान' के नाम से उल्लेख किया गया है, वहाँ भी उसे स्वतन्त्र स्वीकार नहीं किया गया। वहाँ क्षर-प्रधान अर्थात् अपरा प्रकृति और अक्षर जीवात्मा अर्थात् परा-प्रकृति इन दोनों पर शासन करने वाला उस ब्रह्म को ही बतलाया गया है। आगे स्पष्ट करते हुए ऋषि कहते हैं कि भोक्ता, भोग्य और उन दोनों का प्रेरक ईश्वर- इन तीनों रूपों में ब्रह्म ही वर्णित है। इसलिए यहाँ पर 'अजा' शब्द का पर्याय 'प्रधान' होने पर भी वह सांख्य मतोक्त 'प्रधान' नहीं है; वरन् परब्रह्म के आश्रित रहने वाली उसी की अभिन्न-अचिन्त्य एक शक्ति है॥९॥ अब जिज्ञासा यह होती है कि यहाँ अनादि परब्रह्म की शक्ति को 'अजा' कहा गया है। यह बात कैसे मानी जाये; क्योंकि वह रूपादि से परे है और यहाँ पर अजा के तीन वर्ण-लाल, सफेद और काला कहे गये हैं? इसका समाधान आचार्य अगले सूत्र में करते हैं- (११६ ) कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः॥१०॥ सूत्रार्थ-कल्पनोपदेशात् =यहाँ 'अजा' को रूपक मानकर उसके त्रिविध रूप की कल्पना पूर्वक उपदेश किये जाने से, च = भी, मध्वादिवत् = मधु आदि के कल्पित उपदेव की भाँति, अविरोध: = किसी भी तरह का विरोध नहीं है। व्याख्या-जिस प्रकार छान्दोग्योपनिषद् (३/१/१) में रूपक की कल्पना करते हुए जो यथार्थतः मधु नहीं है, उस सूर्य में मधु की कल्पना की गई है। बृहदारण्यकोपनिषद् (५/८/१) में वाणी को धेनु न होने पर भी; वहाँ धेनु की कल्पना की गई है। इसी प्रकार से यहाँ पर भी रूपक की कल्पना की भाँति ब्रह्म की शक्तिभूता प्रकृति को 'अजा' नाम प्रदान कर उसके लाल, श्वेत और काले ये तीन रंग बतलाये गये हैं। इसलिए भी यहाँ कोई विरोध नहीं है; क्योंकि अजा का अर्थ अजन्मा ही किया गया है। प्रकृति कारणब्रह्म होने के कारण उसे अजन्मा कहा जाये, तब भी उचित नहीं है। यहाँ पर जिज्ञासु को आश्वस्त करने के लिए रूपक की कल्पना करके उल्लेख करना ठीक ही है। उक्त प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि 'अजा' नाम से प्रकृति का वर्णन होने के कारण वह ब्रह्म की आश्रित है। उसका यहाँ स्वतन्त्र होना प्रमाणित नहीं होता है॥१०॥ उक्त प्रकरण में यह स्पष्ट किया गया है कि श्रुति में आया 'अजा' शब्द सांख्य मतोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृति वाची नहीं, वरन् ब्रह्म की स्वरूप भूता अनादि शक्ति का वाची है; लेकिन अन्यश्रुति में 'पञ्चापञ्च' यह संख्यावाची शब्द मिलता है। इससे यह धारणा होती है कि यहाँ सांख्योक्त पचीस तत्त्वों का ही समर्थन मिलता है। ऐसी अवस्था में 'अजा' शब्द भी सांख्य सम्मत मूल प्रकृति का वाची क्यों न मान लिया जाये ?' इसी आशंका का आचार्य अगले सूत्र में समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- (११७) न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च॥११॥ सूत्रार्थ- नानाभावात् = (क्योंकि) वह संख्या दूसरे-दूसरे अनेक भाव व्यक्त करने से, संख्योपसंग्रहात्- (श्रुति में) संख्या का ग्रहण होने से, अपि = भी, न= (वह सांख्यमतोक्त तत्त्वों की गणना) ठीक नहीं है, च = तथा, अतिरेकात् = (वहाँ) उससे अधिक का भी उल्लेख मिलता है। व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (४/४/१७) में उक्त प्ररकण से सम्बन्धित वर्णन इस प्रकार मिलता है-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 69
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ४ सूत्र १३ ७१
'जिसमें पाँच पञ्चजन और आकाश भी स्थित है, उसी आत्मा को मृत्यु से परे मैं विद्वान् अमृत स्वरूप मानता हूँ।' सांख्य मतानुयायी 'पञ्चजन' का अर्थ पाँच का पाँच से गुणा करके पच्चीस जन से पच्चीस तत्त्व को ग्रहणीय मानते हैं; किन्तु ५x५ से पच्चीस मान लें, तो भी आकाश और आत्मा सहित- ये सत्ताईस तत्त्व हो जाते हैं। सांख्य के पच्चीस तत्त्वों में मूल प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्राएँ और पुरुष बतलाये गये हैं; किन्तु पञ्च संख्या के विशेषण से जो पञ्चजन यहाँ बतलाये गये हैं, वे संख्या में प्रतिपादित तत्त्वों से पृथक् हैं। तदनन्तर पञ्चजन कहलाने वाली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और आकाश आदि भूत जिस परब्रह्म में स्थित हैं, वे आत्मा और ब्रह्म से परे कुछ भी नहीं हैं। यहाँ सूत्र में संख्यावाची जो पञ्चपञ्च प्रयुक्त हुए हैं, इनको लेकर पच्चीस तत्त्वों की कल्पना करना ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ पर वे संख्यावाची शब्द दूसरे-दूसरे भाव को प्रकट करने वाले हैं। इसके अतिरिक्त 'पञ्च-पञ्च' से पच्चीस संख्या मान लेने पर भी उक्त मंत्र (बृह०उप० ४/४/१७) में प्रयुक्त आकाश और आत्मा को लेकर सत्ताईस तत्त्व हो जाते हैं, जो सांख्यमत के अनुसार निश्चित गणना से अधिक हो जाते हैं। अतः यहाँ यही मानना उचित है कि वेद में न तो सांख्य सम्मत स्वतन्त्र 'प्रकृति' का उल्लेख है और न ही पच्चीस तत्त्वों का। जिस तरह श्वे०उ० ४/५ में 'अजा' शब्द से उस ब्रह्म की अनादि शक्ति का उल्लेख किया गया है, वैसे ही यहाँ 'पञ्च-पञ्चजनाः' पदों के द्वारा ब्रह्म की पृथक् कार्य- शक्तियों का उल्लेख प्राप्त होता है॥११॥ उक्त प्रकरण में 'पञ्च-पञ्चजना:' पदों से किसका ग्रहण होता है? अगले सूत्र में सूत्रकार इसी जिज्ञासा का समाधान करते हैं- (११८) प्राणादयो वाक्यशेषात्॥१२॥ सूत्रार्थ- वाक्यशेषात् = बाद वाले मन्त्र में कहे हुए वाक्य से (यह प्रतीत होता है कि पञ्चजन प्राणादिक ही), प्राणादयः = प्राण और इन्द्रियाँ हैं, जो ग्रहणीय हैं। व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् ४/४/१७ के पीछे कहे गये मन्त्र के बाद बृ०उ० ४/४/१८ में ऋषि कहते हैं कि जो विद्वान् उस प्राण के प्राण, चक्षु के चक्षु, श्रोत्र के श्रोत्र एवम् मन के भी मन को जानने वाले हैं। वे विद्वज्जन उस आदि पुराण-पुरुष परब्रह्म को जानते हैं। यहाँ मन्त्र के इस वर्णन से यह प्रमाणित होता है कि पूर्व मन्त्र में 'पञ्च-पञ्चजनाः' पदों से पञ्च प्राण, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्च कर्मेन्द्रिय, मन एवं बुद्धि आदि परब्रह्म की कार्यशक्तियों का ही उल्लेख प्राप्त होता है; क्योंकि उस ब्रह्म को ही उपर्युक्त (बृ०उ० ४/४/१८) मंत्र में प्राण का प्राण, चक्षु का चक्षु, श्रोत्र का श्रोत्र एवं मन का भी मन बतलाया गया है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि उस ब्रह्म के सम्बन्ध से ही प्राण आदि अपना-अपना कार्य करने में सक्षम होते हैं। अतः यहाँ सूत्र में उसी की शक्ति विशेष का विस्तार से विवेचन किया गया है॥१२॥ अब जिज्ञासा यह उठती है कि माध्यन्दिन शाखा वालों के पाठानुसार 'पञ्चजन' पद वाच्य प्राण आदि पाँच संभव हैं, परन्तु इस प्रकरण में काण्व शाखा वालों के मन्त्र में 'अन्न' पद का वर्णन नहीं है। वहाँ प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन- इन चार का वर्णन है; तब उस शाखानुसार 'पञ्चजनाः' की क्या संगति होगी? यहाँ पर तो 'पञ्चजन' चार ही हैं, पाँच नहीं। अतः वहाँ उस ब्रह्म की पञ्चविध कार्यशक्तियों की संख्या कैसे पूर्ण होगी? इसी का समाधान आचार्य यहाँ कर रहे हैं- (११९) ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॥१३॥ सूत्रार्थ- एकेषाम् - एकशाखा वालों के पाठ में, अन्ने = अन्न का वर्णन, असति = न होने पर, ज्योतिषा = पूर्व वर्णित 'ज्योति के द्वारा संख्या पूर्ण की जा सकती है।'
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 70
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
७२ वेदान्त दर्शन व्याख्या- 'माध्यन्दिनी' शाखा वालों के पाठ्यक्रमानुसार यहाँ इस सूत्र में परब्रह्म परमेश्वर को 'प्राणस्य प्राणः' अर्थात् प्राण का प्राण आदि कहते हुए 'अन्न का अन्न' भी बतलाया गया है। इस कारण से अनेक पाठानुसार यहाँ पर पाँच की संख्या पूरी हो जाती है; लेकिन काण्व शाखा वालों के पाठ में 'अन्न का अन्न' का ग्रहण नहीं हुआ है। इस कारण उनके अनुसार चार का ही उल्लेख होने से पाँच की संख्या- पूर्ति में एक की कमी रह जाती है। इसलिए आचार्य कहते हैं कि काण्वशाखा के पाठ में अन्न का ग्रहण न होने से जो एक संख्या की कमी रह जाती है, उसकी पूर्ति बृ०उ० ४/४/१६ के मंत्र में वर्णित 'ज्योति' से प्राप्त करनी चाहिए। वहाँ पर उस ब्रह्म को 'ज्योति' की भी ज्योति बतलाया है। १७ वें मन्त्र का उल्लेख तो संकेतमात्र है, अतः उसमें पाँच संख्या की पूर्ति करना अनिवार्य नहीं है, तब भी सूत्रकार ने किसी भी तरह प्रसङ्गवश उठने वाली आशंका का निवारण करने हेतु यह सूत्र प्रतिपादित किया है॥१३।। अब आशंका यह होती है कि 'श्रुति' में जगत् के कारण का विभिन्न प्रकार से उल्लेख मिलता है। कहीं सत् से और कहीं असत् से सृष्टि बतलाई गई है। जगत् की उत्पत्ति के क्रम में भी भेद मिलता है। कहीं पर आकाश का उद्भव पहले तो कहीं तेज का, कहीं प्राण का तो कहीं अन्य किसी का वर्णन पहले मिलता है। इस प्रकार से वर्णन में भेद होने के कारण श्रुति वचनों से यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि जगत् का कारण एक मात्र ब्रह्म ही है और सृष्टि क्रम अमुक तरह का ही है। इसी का समाधान अगले सूत्र में किया जा रहा है- (१२० ) कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्ते: ॥।१४।। सूत्रार्थ- च = और, आकाशादिषु = आकाश आदि किसी भी क्रम से संरचित किये जाने वाले पदार्थों में, कारणत्वेन = कारण रूप से, यथाव्यपदिष्टोक्तेः = सर्वत्र एक ही ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है। (अतः ब्रह्म ही एकमात्र जगत् का कारण है)। व्याख्या- श्रुति में जगत् के कारण का उल्लेख भिन्न-भिन्न तरह से देखने को मिलता है तथा जगत् की उत्पत्ति का क्रम भी विभिन्न प्रकार से प्रतिपादित किया गया है; फिर भी एकमात्र ब्रह्म को ही जगत् का कारण स्वीकारने में किसी भी तरह का दोष नहीं है; क्योंकि जगत् के अन्य कारण जो आकाशादि बतलाये गये हैं, उनका भी परम कारण ब्रह्म को ही कहा गया है। इस प्रतिपादन से ब्रह्म की कारणता पुष्ट होती है और अन्य किसी कारण से नहीं। जगत् की उत्पत्ति में क्रमिक जो भेद आता है, वह निम्रवत् है- कहीं पर 'आत्मनः आकाश: सम्भूतः' (तैत्ति०उ० २/१) श्रुति के द्वारा आकाश आदि के क्रम से सृष्टि का उद्भव विकास कहा गया है। तो कहीं छा० उ० ६/२/३ के तत्तेजोऽसृजत ..... मन्त्र के द्वारा तेज आदि के क्रम से सृष्टि का वर्णन मिलता है। कहीं प्र०उ० ६/४ के 'स प्राणमसृजत' ...... के द्वारा प्राण आदि के क्रम से सृष्टि का उल्लेख प्राप्त होता है तथा कहीं पर ऐ०उ० १/१/२ के 'स इमॉल्लोकानसृजत' ...... वाक्यों के द्वारा बिना किसी सुव्यवस्थित क्रम के ही सृष्टि का प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार से सृष्टि के क्रमिक वर्णन में भेद होने से किसी भी तरह के दोष की बात नहीं है; वरन् इस तरह से विचित्र रचना के वर्णन में तो ब्रह्म का महत्त्व ही प्रतिपादित होता है। कल्प भेद से ऐसा होना उचित भी है। इस कारण से एक मात्र ब्रह्म को ही जगत् का कारण मानना उचित है॥१४॥ अब आशङ्का यह उठती है कि उपनिषदों अर्थात् तै०उ० २/७ में कहीं पर तो यह वर्णन मिलता है कि 'सर्वप्रथम एकमात्र असत् ही था, कहीं अर्थात् छा०उ० ६/२/१ में यह वर्णन मिलता है कि 'सर्वप्रथम एकमात्र सत् ही था' और कहीं बृह० उप० १/४/७ में 'सर्वप्रथम अव्याकृत था' ऐसा वर्णन मिलता है। उक्त 'असत्' आदि शब्द ब्रह्मवाची कैसे हो सकते हैं? इसी का समाधान अगले सूत्र में आचार्य करते हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 71
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ४ सूत्र १६ ७३
(१२१ ) समाकर्षात्॥१५॥ सूत्रार्थ- समाकर्षात् - आगे-पीछे कहे हुए वाक्य का सम्यक रूप से आकर्षण करके या मन्थन करके सम्बन्ध स्थापित कर लेने से ( 'असत्') आदि शब्द भी ब्रह्म के ही वाचक सिद्ध होते हैं। व्याख्या-तैत्ति०उ० २/७ में वर्णन आता है कि 'पहले यह(ब्रह्म) असत् ही था, इसी से सत् का उद्भव हुआ।' यहाँ 'असत्' शब्द अभाव या मिथ्यावाची नहीं है; क्योंकि तैत्तिरीयोपनिषद् के प्रथम अनुवाक में ब्रह्म का स्वरूप कहते हुए ऋषि ने उस (ब्रह्म) को सत्य, ज्ञान एवं अनन्त कहकर संबोधित किया है। पुनः उसी से आकाश आदि के क्रम से सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति बतलायी है। तत्पश्चात् तैत्ति० के ६ वें अनुवाक में 'सोऽकामयत्' के 'स' पद से उसी पूर्वानुवाक में वर्णित ब्रह्म का आकर्षण किया है। अन्त में कहा है कि 'यह जो कुछ है', वही सत्य स्वरूप ब्रह्म है। इसके बाद इसी विषय में सातवें अनुवाक में 'असद् व इदमग्र आसीत्' अर्थात्- सृष्टि संरचना से पूर्व यह जगत् 'असत्' अर्थात् अव्यक्त नाम-रूप वाला ब्रह्म ही था। इस प्रकार पूर्वापर प्रसङ्ग को देखते हुए इस मन्त्र में वर्णित 'असत्' शब्द मिथ्या या अभाववाची सिद्ध नहीं होता। वहाँ पर 'असत्' का अर्थ अप्रकट 'ब्रह्म' एवं उससे होने वाले 'सत्' का अर्थ जगत् रूप में 'प्रकट ब्रह्म' ही होगा। अतः यहाँ अर्थान्तर की कल्पना आवश्यक नहीं है। छा० उ० ३/१९/१ में कहा गया है- 'आदित्य ब्रह्म है, यह उपदेश है, उसी का विस्तार है। पहले यह असत् ही था, आदि। यहाँ पर भी तैत्तिरीय की भाँति 'असत्' शब्द अप्रकट ब्रह्म का ही वाची है; क्योंकि इसी मंत्र के अगले वाक्य में 'तत्सदासीत्' कहकर 'सत्' नाम से भी उल्लेख मिलता है। बृह०उ० १/४/७ में स्पष्ट रूप से ही 'असत्' की जगह 'अव्याकृत' शब्द का उल्लेख मिलता है, जो कि (अप्रकट) का ही पर्याय है। अतः सभी स्थलों में पूर्वापर के प्रसङ्ग में वर्णित शब्दों या वाक्यों का आकर्षण या मन्थन करके अन्वय करने पर यही निश्चय होता है कि जगत् के कारण रूप में अलग-अलग नामों से उस ब्रह्म का ही उल्लेख किया गया है और अन्य किसी का नहीं। उक्त प्रमाणों से यही सिद्ध होता है कि 'सत्' और 'असत्' दोनों ही ब्रह्म के वाचक हैं और वही ब्रह्म इस जगत् की उत्पत्ति का परम कारण है॥१५॥ ब्रह्म ही जगत् का उपादान कारण है, जड़ प्रकृति जगत् का कारण कदापि नहीं हो सकती। यही प्रतिपादित करने के लिए आचार्य कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् के प्रसङ्ग पर चर्चा करते हुए समाधान कर रहे हैं- ( १२२ ) जगद्वाचित्वात् ॥१६॥ सूत्रार्थ- जगद्वाचित्वात् = जड़ - चेतनात्मक जगत् का वाची होने के कारण ब्रह्म ही जगत् का कर्त्ता है,
व्याख्या- कौषीतकि ब्रा०उ० में राजा अजातशत्रु और बालाकि के संवाद का वर्णन आता है। वहाँ जड़ प्रकृति नहीं।
(कौ०ब्रा० उ०४/२) बालाकि कहते हैं- 'जो आदित्य में यह पुरुष स्थित है, मैं उसकी उपासना करता हूँ।' अन्त में ४/१७ में कहते हैं- 'जो यह बायी आँख में पुरुष स्थित है, उसकी मैं उपासना करता हूँ।' यहाँ तक क्रमानुसार सोलह पुरुषों की उपासना करने वाला अपने को कहा है; किन्तु उसकी हर बात को अजातशत्रु ने काट दिया। तदनन्तर वह मौन हो गया। पुनः अजातशत्रु ने कहा- हे बालाके! तुम ब्रह्म को नहीं जानते हो, अतः हम तुम्हें उस ब्रह्म का उपदेश देते हैं। तुम्हारे द्वारा कहे हुए सोलह पुरुषों का जो कर्त्ता है, जिसके ये सभी कर्म हैं, वही जानने योग्य है। इस प्रकार से वहाँ पुरुषवाची जीव और उनके अधिष्ठानभूत जड़ शरीर दोनों को ही ब्रह्म का कर्म कहा गया है; अतः कर्म अथवा कार्य शब्द से जानी जाने वाली जड़ प्रकृति इस जगत् का कारण नहीं हो सकती। एकमात्र ब्रह्म ही इस जगत् का उपादान कारण है॥१६।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 72
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
७४ वेदान्त दर्शन उक्त प्रकरण में 'ज्ञेय' रूप में प्रतिपादित तत्त्व प्राण अथवा जीव नहीं;वरन् वह एकमात्र ब्रह्म ही है। इसी की पुष्टि हेतु आचार्य अगले सूत्र में अपने विचार प्रस्तुत करते हैं- (१२३ ) जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेत्तद् व्याख्यातम्॥१७।। सूत्रार्थ- चेत् इति = यदि ऐसा कहा जाये कि, जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् = जीवन और मुख्य प्राण का बोध कराने वाले लक्षण भी (उस प्रसंग में) मिलते हैं अतः, न = (ब्रह्म वहाँ जानने योग्य) नहीं है, तद् व्याख्यातम् = (तो) इसका समाधान पूर्व में ही किया जा चुका है। व्याख्या- यदि यह कहा जाये कि 'यहाँ जीव और मुख्य प्राण के सूचक लक्षणों का स्पष्ट रूप से वर्णन होने के कारण प्राणों के सहित उसका अधिष्ठाता जीव ही जगत् का कर्त्ता एवं जानने योग्य बतलाया गया है, ब्रह्म कर्त्ता व जानने योग्य नहीं है।' तो यहाँ ऐसा कहना सर्वथा अनुचित है; क्योंकि इस आशङ्का का समाधान पहले ही (सूत्र क्र० १/१/३ में) किया जा चुका है। वहाँ पर यह स्पष्ट कर दिया गया है कि ब्रह्म समस्त धर्मों का आश्रय है। इसलिए जीव एवं प्राण के धर्मों (लक्षणों) की संगति नहीं हो सकती। यदि जीव आदि को जानने योग्य तत्त्व मान भी लें, तो त्रिविध उपासना का प्रसङ्ग उपस्थित हो सकता है, जो सर्वथा अनुचित है॥१७।। उक्त प्रकरण के सन्दर्भ में सूत्रकार अगले सूत्र में आचार्य की सम्मति बतला रहे हैं- (१२४) अन्यार्थं तु जैमिनि: प्रश्नव्याख्यानाभ्यामपि चैवमेके ॥१८ ॥। सूत्रार्थ-जैमिनि: = आचार्य जैमिनि, तु = तो, अन्यार्थम् = (इस प्रकरण में) जीव और मुख्य प्राण का वर्णन होना दूसरे ही प्रयोजन से स्वीकारते हैं, प्रश्नव्याख्यानाभ्याम् =क्योंकि प्रश्न और उसके उत्तर (समाधान) से यही पुष्ट होता है; च = तथा, एके = एक (काण्व) शाखा वाले, अपि = भी, एवम् = ऐसा ही कहते हैं। व्याख्या-उक्त प्रकरण में आचार्य जैमिनि जीव और मुख्य प्राण को जगत् का उपादान कारण सिद्ध करने वाला नहीं स्वीकारते। वे इस वर्णन का दूसरा ही प्रयोजन बतलाते हुए जीव और मुख्य प्राण का परब्रह्म परमात्मा में विलय होना कहकर जगत् का कारण परब्रह्म को ही पुष्ट करना स्वीकारते हैं; क्योंकि सुषुप्ति काल में सभी का परब्रह्म में विलीन होना तथा सृष्टि रचनाकाल में पुनः उसी परब्रह्म से उत्पन्न होना, ब्रह्म को ही जगत् का उपादान कारण सिद्ध करता है। इसके अतिरिक्त एक (काण्व) शाखा वालों ने तो इस प्रकरण को और भी अधिक स्पष्ट कर दिया है। बृह० उ० २/१/१७ के अन्तर्गत अजातशत्रु ने कहा है कि 'यह विज्ञानमय पुरुष (जीव) जब सुषुसि- काल में अवस्थित था, तब इस बुद्धि के साथ प्रमुख प्राणों एवं समस्त इन्द्रियों के स्वभाव को लेकर उस आकाश में शयन कर रहा था, जो मस्तिष्कगत हृदय के मध्य स्थित है। उस समय उसे 'स्वपिति' के नाम से जाना जाता है। यहाँ इस प्रसङ्ग में आया हुआ 'आकाश' शब्द परब्रह्म का वाचक है। इसलिए यहाँ यह पुष्ट होता है कि सुषुप्ति के उदाहरण से यह तथ्य बतलाया गया है कि जिस प्रकार यह जीव निद्राकाल में मुख्य प्राण के साथ ब्रह्म में लय-सा हो जाता है, वैसे ही प्रलय काल में यह जड़चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म में लय हो जाता है और सर्गकाल में पुनः जाग्रत् के सदृश उत्पन्न हो जाता है॥१८॥ अगले सूत्र में आचार्य जैमिनि अपने मत की पुष्टि के लिए एक अन्य हेतु प्रस्तुत करते हैं- ( १२५ ) वाक्यान्वयात्॥११॥ सूत्रार्थ- वाक्यान्वयात् = पूर्वापर वाक्यों के अन्वय से अर्थात् विशेषण से (सिद्ध होता है कि उक्त प्रकरण में आये हुए जीव और मुख्य प्राण के लक्षणों का प्रयोग दूसरे ही प्रयोजन से कहे गये हैं)। व्याख्या- उपर्युक्त प्रकरण के आरम्भ में कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् ४/१८ में परब्रह्म परमात्मा को जानने
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webste can be used for propagation with prior written consent.
Page 73
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ४ सूत्र २१ योग्य बतलाकर अन्त में कौ०ब्रा०उ० ४/२० में उसी ब्रह्म के ज्ञाता की महान् महिमा का उल्लेख प्रतिपादित किया गया है। बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य जी मैत्रेयी को उपदेश प्रदान करते हुए कहते हैं कि 'सभी के कार्य हेतु सभी लोग प्रिय नहीं होते; लेकिन आत्मा के लिए सभी समान रूप से प्रिय होते हैं। अतः उसी आत्मा के श्रवण, मनन, एवं निदिध्यासन का सतत अभ्यास करते रहना चाहिए।' यहाँ सूत्र में 'आत्मा' शब्द ब्रह्म के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है या जीव के अर्थ में प्रयुक्त हुआ? इस आशंका का समाधान करते हुए आचार्य यह कहते हैं कि पूर्व में कहे हुए की संगति एवं विशेषण से यहाँ सूत्र में सभी शब्दों का समन्वय ब्रह्म में होता है, जीवात्मा और मुख्य प्राण में नहीं अर्थात् पूर्वापर के वाक्यों का समन्वय करने से यही पुष्ट होता है कि बीच में आया हुआ जीव और मुख्य प्राण का वर्णन भी उस परब्रह्म को ही जगत् का उपादान कारण सिद्ध करने के लिए ही है॥१९॥ अगले सूत्र में आचार्य इसी विषय के सम्बन्ध में आचार्य आश्मरथ्य का विचार प्रस्तुत करते हैं- (१२६ ) प्रतिज्ञासिद्धेलिङ्गमित्याश्मरथ्यः ॥।२०।। सूत्रार्थ-लिङ्गम् = उपर्युक्त प्रकरण में जीव और मुख्य प्राण के लक्षणों का समन्वय ब्रह्म को ही जगत् का कारण सिद्ध करने के लिए हुआ है, पतिज्ञासिद्धे: = क्योंकि ऐसा मानने से पूर्व की हुई प्रतिज्ञा की सिद्धि होती है, इति = ऐसा, आश्मरथ्यः = आश्मरथ्य आचार्य कहते हैं। व्याख्या- आचार्य आश्मरथ्य का कथन है कि अजातशत्रु ने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' अर्थात् - 'तुम्हें ब्रह्म का स्वरूप बतलाऊँगा।' उसकी पुष्टि ब्रह्म को ही जगत् का उपादान कारण स्वीकार करने से हो सकती है। अतः उक्त प्रकरण में जो जीव एवं मुख्य प्राण के लक्षण का उल्लेख मिलता है। वह इसी तथ्य को प्रमाणित करने के लिए है कि परब्रह्म ही जगत् का उपादान कारण है। मुण्डकोपनिषद् (२/१/ १) में वर्णन मिलता है- 'यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुल्लिंगाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः। तथाऽक्षराद्विविधा: सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति' अर्थात्- जिस प्रकार अग्नि के समान सहस्रों चिनगारियाँ प्रकट होती हैं, वैसे ही उस अक्षर रूप ब्रह्म से अनेक प्रकार के भाव प्रकट होते हैं, और उसमें ही विलीन भी हो जाते हैं। इससे भी जगत् का उपादान कारण ब्रह्म ही सिद्ध होता है। 'आत्म-विज्ञान' से सर्व विज्ञान की सिद्धि आत्मतत्त्व का परमात्मतत्त्व में सिद्ध होने का ही धर्म (लक्षण) है। मैत्रेयी जब मोक्ष का उपाय जानना चाहती हैं, तब ऋषि ने उसे क्या जीव का उपदेश दिया होगा? जीव के उपदेश से मुक्ति मिलना असंभव है, वह तो ब्रह्म के ज्ञान से ही सम्भव है। अतः आश्मरथ्य भी ब्रह्म को ही जगत् का कारण मानते हैं॥।२०।।
(१२७) अगले सूत्र में इसी विषय के सम्बंध में सूत्रकार आचार्य औडुलोमि का मत प्रस्तुत करते हैं- उत्क्रमिष्यत एवं भावादित्यौडुलोमि: ॥२१॥ सूत्रार्थ- उत्क्रमिष्यतः = देह का परित्याग कर परलोक में गमन करने वाले ब्रह्मज्ञानी का, एवं = इस प्रकार, भावात् - परमात्म भाव होने अर्थात् परमात्मा में विलय होना (जैसा कि अन्य श्रुतियों में भी कहा गया) है इसलिए, (यहाँ पर जीव और मुख्य प्राण का वर्णन, परमात्मा को ही जगत् का कारण बतलाने के लिए है), इति = ऐसा ही, औडुलोमि: = आचार्य औडुलोमि का मत है। व्याख्या- ब्रह्मज्ञानी मनुष्य देह परित्याग के पश्चात् जब परलोक के लिए प्रस्थान करता है और वहाँ पहुँचकर परमात्मवत् हो जाता है, तब उस अवस्था में 'जीव' वाची शब्द से परमात्मा का ही ग्रहण होता है, ऐसा आचार्य औडुलोमि का कथन है। ऐसे ही देह का त्याग कर ब्रह्मलोक में गमन करने वाले ब्रह्मज्ञानी की
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 74
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
७६ वदान्त दशन गति का उल्लेख मुण्डक उपनिषद् (३/२/७-८) में इस प्रकार मिलता है- 'जब ब्रह्मज्ञानी देह का त्याग करता है, तब पन्द्रह कलाएँ और समस्त देवगण अपने-अपने कारणभूत देवों में अवस्थित हो जाते हैं, तदनन्तर सभी कर्म एवं विज्ञानमय जीवात्मा ये सभी परम अविनाशी ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। जिस तरह प्रवाहित नदियाँ अपने नाम-रूप का त्यागकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी तरह विद्वान, ज्ञानी, महात्मा नाम-रूप से परे रहकर सर्वश्रेष्ठ दिव्य परम पुरुष ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार से यह सिद्ध हुआ कि उक्त प्रकरण में जीव और प्रमुख प्राण का वर्णन हुआ है, वह समस्त जगत् के उद्भव और प्रलय का कारण एकमात्र ब्रह्म को बतलाने के लिए ही है, ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं॥२१॥ अब अगले सूत्र में सूत्रकार आचार्य काशकृत्स्न का मत प्रस्तुत करते हैं- (१२८ ) अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ॥२२॥ सूत्रार्थ- अवस्थिते: = प्रलय के समय में सम्पूर्ण जगत् की स्थिति उस ब्रह्म में ही होती है, अतः (उक्त प्रकरण में जीव और मुख्य प्राण का वर्णन ब्रह्म को जगत् का कारण सिद्ध करने के लिए ही है।), इति = ऐसा ही, काशकृत्स्न: = काशकृत्स्न आचार्य का कथन है। व्याख्या- आचार्य काशकृत्स्न का कथन है कि प्रलयकाल के समय समस्त जगत् की स्थिति परब्रह्म परमात्मा में ही अवस्थित कही गयी है। प्र०उ० ४/११ में भी कहा गया है - 'विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य! स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति। 'जिस अविनाशी ब्रह्म में सभी देवगण, सभी प्राण और सभी भूत सम्यक् रूप से अवस्थित होते हैं, उसे जानने वाला सर्वज्ञाता भी उसी ब्रह्म में लय हो जाता है', इससे भी पुष्ट होता है कि उक्त प्रकरण में जो सुषुप्ति काल में प्राण और जीव का ब्रह्म में विलय होना कहा गया है, वह यह सिद्ध करने के लिए कि एक- मात्र ब्रह्म ही इस सम्पूर्ण जगत् का उपादान-कारण है और अन्त में यह सृष्टि- जीव और प्रमुख प्राणी उसी अविनाशी ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। जीव और ब्रह्म की सह-स्थिति निश्चित है। ये दोनों ही तत्त्व नित्य हैं, आत्म तत्त्व दोनों में एक जैसा है। ऐसी स्थिति के कारण शरीर में ब्रह्म प्रवेश का उल्लेख ऐ०उ०(१/३/११) के प्रसंग में हुआ है। अतः ब्रह्म को जीव का लक्षण नहीं समझना चाहिए, यही काशकृत्स्न का कथन है।।२२।। वेदों-श्रुतियों में 'शक्ति', 'अजा', 'माया' एवं 'प्रधान' आदि नामों से जिसका उल्लेख किया गया है, उसी को ब्रह्म की अध्यक्षता में जगत् का कारण कहा गया है। गीता आदि स्मृति-ग्रन्थों में भी ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि जगत् का कारण अर्थात् नियामक, रचयिता, अधिष्ठाता, संचालक तो निश्चित ही ब्रह्म है; किन्तु उपादान कारण 'प्रकृति' और 'माया' नाम से कहा हुआ 'प्रधान' ही है। यदि ऐसा मानें, तो क्या आपत्ति है? अगले सूत्र में इसे स्पष्ट किया गया है- (१२९ ) प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ॥२३॥ सूत्रार्थ- प्रकृति: = उपादान कारण, च = और (निमित्त कारण ब्रह्म ही है), प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् = क्योंकि ऐसा मानने से श्रुति प्रतिपादित 'प्रतिज्ञा' और 'दृष्टान्त' के अनुरोध से ब्रह्म ही उपादान और निमित्त कारण सिद्ध होता है। व्याख्या-छा०उ० ६/१/२-३ के अन्तर्गत श्वेतकेतु के उपाख्यान में उनके पिता ने उनसे पूछा कि 'क्या तुमने अपने गुरु से उस श्रेष्ठ तत्त्व के उपदेश की भी जिज्ञासा की है, जिसके जानने से अनसुना सुना हुआ हो
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 75
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ४ सूत्र २५ ७७
जाता है, बिना मनन किया हुआ मनन किया हुआ हो जाता है और बिना जाना हुआ जाना हुआ हो जाता है, यह सुनकर श्वेतकेतु ने पूछा- भगवन्! वह उपदेश कैसा है, तदनन्तर उनके पिता ने दृष्टान्त देते हुए छा०उ० (६/ १/४) में कहा- 'जिस तरह मिट्टी के ढेले का तत्त्व जान लेने पर मिट्टी से निर्मित सभी वस्तुएँ जानी हुई हो जाती हैं, कि"'यह सब मिट्टी है।' तत्पश्चात् आरुणि ने इसी तरह स्वर्ण और लोहे का भी दृष्टान्त दिया है। यहाँ पर पहले जो प्रश्न किया गया, वह तो प्रतिज्ञा-वाक्य है और मिट्टी आदि का जो उदाहरण कहा गया, वह दृष्टान्त वाक्य है। यदि परब्रह्म से पृथक् 'प्रधान' को यहाँ उपादान कारण मान लें, तो उसके एक अंश को जानने पर 'प्रधान' की ही जानकारी होगी, ब्रह्म की नहीं, किन्तु वहाँ पर ब्रह्म की जानकारी कराना आवश्यक है, अतः प्रतिज्ञा और दृष्टान्त की सार्थकता भी जगत् का निमित्त कारण ब्रह्म को स्वाकरने से ही हो सकता है। मुण्डको० (१/१/२ एवं १/१/७), बृह०उ० (४/५/६,८) श्वेता०उ० ६/८ में भी ऐसा ही 'प्रतिज्ञा और दृष्टान्त के वाक्य प्राप्त होते हैं। उक्त सभी स्थलों में भी उनकी सार्थकता पूर्ववत् ब्रह्म को जगत् का कारण मानने से ही हो सकती है, यही मान लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त गीता में गीताकार ने अ० ९/१० में जड़-प्रकृति को सांख्य की भाँति जगत् का कारण नहीं माना; वरन् अपनी अध्यक्षता में अपनी ही स्वरूप भूता प्रकृति को चराचर जगत् की सर्जना करने वाली कहा है।''जड़-प्रकृति जड़ और चेतन दोनों का निमित्त कारण किसी भी तरह नहीं हो सकता। अतः इस क्रम में प्रकृति को प्रभु की स्वरूप भूता शक्ति ही माननी चाहिए। इसके अलावा ७ वें अध्याय के चौथे से लेकर सातवें तक के शोक में यह कहा है- 'परा और अपरा दो प्रकृतियों का वर्णन कर अपने को समस्त जड़-चेतनात्मक जगत् का प्रभाव और प्रलय बतलाते हुए सभी को महाकारण कहा है। अतः श्रुति और स्मृति के उक्त प्रमाणों से यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म ही जगत् का उपादान एवं निमित्त कारण है।।२३।। उक्त तथ्य को स्पष्ट करने के लिए अगले सूत्र में सूत्रकार पुनः और भी कारण देते हुए कहते हैं कि- (१३० ) अभिध्योपदेशाच्च ।।२४।। सूत्रार्थ-अभिध्योपदेशात् = अभिध्य-चिन्तन अर्थात् संकल्प पूर्वक सृष्टि-रचना का श्रुति में उपदेश होने से, च = भी (जगत् का) उपादान और निमित्त कारण परब्रह्म ही सिद्ध होता है। व्याख्या- श्रुतियों-वेदों में जहाँ-जहाँ भी सृष्टि-सर्जना के संकल्प का वर्णन आता है, वहाँ पर परमात्मा के एक से अनेक होने के प्रमाण स्पष्ट रूप से प्राप्त होते हैं- तैत्ति०उप० के २/६' में ऐसा ही वर्णन इस प्रकार मिलता है-'सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय' अर्थात्- उसने संकल्प किया कि मैं एक से बहुत (अनेक) हो जाऊँ। ऐसा ही उल्लेख छान्दोग्योपनिषद् ६/२/३ में भी मिलता है, देखें- 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' अर्थात्- उसने संकल्प इच्छा की, कि मैं बहुत हो जाऊँ, विभिन्न रूपों में प्रकट हो जाऊँ। इस प्रकार से स्वयं को ही विभिन्न रूपों में प्रकट करने का संकल्प लेकर सृष्टि सृजेता परब्रह्म की सृष्टि सर्जना में संलग्न रहने का उल्लेख वेदों में मिलता है। इससे भी यही पुष्ट होता है कि परब्रह्म ही जगत् का निमित्त एवं उपादान कारण है। इसके अतिरिक्त छा०उ० ३/१४/२ में यह भी वर्णन मिलता है-'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।' अर्थात्- 'अवश्य ही यह सब कुछ ब्रह्म है, क्योंकि उसी से उद्भव होता है, उसी में अवस्थित रहता है और अन्त में उसी में विलय हो जाता है। इस प्रकार शान्त चित्त होकर उपासना अर्थात् चिन्तन-मनन करे।' इन प्रमाणों से भी स्पष्ट हो जाता है कि जगत् का उपादान और निमित्त कारण एकमात्र ब्रह्म ही है॥२४॥ उपर्युक्त मत की पुष्टि के लिए अगले सूत्र में आचार्य और भी स्पष्ट करते हैं- (१३१ ) साक्षाच्चोभयाम्नानात्॥२५॥।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 76
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
७८ वेदान्त दर्शन सूत्रार्थ-साक्षात् = श्रुति साक्षात् अपने वचनों से, च = भी, उभयाम्रानात् = ब्रह्म के उभय-दोनों (उपादान और निमित्त) कारण होने की बात कही गई है। इससे भी (ब्रह्म ही उपादान कारण सिद्ध होता है, प्रकृति नहीं)। व्याख्या-श्वेताश्वतरोपनिषद् (१/१-२) में ऐसा उल्लेख मिलता है- एक बार कुछ महर्षिगण विचार-विमर्श करने हेतु एकत्रित हुए कि इस जगत् का कारण कौन है? हम किसके द्वारा प्रादुर्भूत हुए हैं? किसके द्वारा जीवनयापन हो रहा है? हमारी स्थिति कहाँ है? हमारा एक मात्र रक्षक कौन है? हममें नियम पूर्वक सुख- दुःख में कौन नियुक्त करता है? उन समस्त ऋषियों ने आपस में विचार करते हुए सोचा। उनमें से किसी ने काल को, किसी ने वृत्ति को, किसी ने कर्म को, किसी ने होनहार को, किसी ने पञ्च महाभूतों को और किसी ने उनके समुदाय को कारण माना। इनमें से उचित कारण कौन है, ऐसा आपस में निश्चय करने लगे। तदनन्तर उन सभी के मन में यह विचार आया कि इनमें से एक अथवा इनका समूह जगत् का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि वह सुख-दुःख का भोक्ता और पराधीन है। इसके अनन्तर उन्होंने ध्यान में स्थित होकर अपने गुणों से गुह्य उस अविनाशी ब्रह्म की आधारभूता शक्ति का 'कारण रूप में' दर्शन किया, जो ब्रह्म एकाकी ही पूर्वोक्त काल से लेकर आत्मा तक सभी कारणों पर शासन करता है। उपर्युक्त उद्धरण में स्पष्ट रूप से उस अविनाशी ब्रह्म को ही सबका उपादान और निमित्त कारण कहा है। इसके अतिरिक्त श्रेता० २/१६ में तथा दूसरे अन्य श्रुतियों-उपनिषदों में भी यत्र-तत्र स्थान-स्थान पर उस ब्रह्म को ही सर्वरूप बतलाया है। इससे भी प्रमाणित हो जाता है कि वह परब्रह्म ही इस जगत् का उपादान और निमित्त कारण है॥२५॥ अब अगले सूत्र में उक्त तथ्य की सिद्धि हेतु आचार्य एक अन्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं- (१३२ ) आत्मकृतेः ॥२६ ॥ सूत्रार्थ-आत्मकृतेः = अपने को स्वयं के द्वारा जगत् रूप में प्रकट करने का वर्णन होने से यह सिद्ध होता है कि ब्रह्म को किसी ने प्रकट नहीं किया, वही सबका (जगत् का) कारण है। व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद् की द्वितीय (ब्रह्मानन्द) वल्ली के सातवें अनुवाक के प्रारम्भ में ब्रह्म के स्वयं प्रकट होने का उल्लेख इस प्रकार मिलता है- 'असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानः स्वयमकुरुत' .... (तैत्ति०२/७) अर्थात्- प्रकट होने से पर्व यह सम्पूर्ण जगत् असत् (अव्यक्त) रूप में था। उससे ही यह दृश्यमान जगत् प्रकट हुआ है। उस परब्रह्म परमात्मा ने स्वयं ही अपने को जगद्रूप में प्रकट किया है।' इस प्रकार से कर्त्ता और कर्म के रूप में उस एक ही परब्रह्म का उल्लेख होने से स्पष्ट रूप से उपनिषद् का यह कथन सिद्ध हो जाता है कि परब्रह्म ही इस जगत् का एकमात्र निमित्त और उपादान कारण है। कुछ व्याख्याकार तैत्ति० २/७ के 'तदात्मान* स्वयमकुरुत' इस वाक्य में 'आत्मा' पद का अर्थ 'शरीर' बतलाते हैं। लौकिक कोष में 'आत्मा' पद का यह अर्थ देखने को मिलता है। प्रकृति को ब्रह्म के देह रूप में कल्पित किया गया है। तदनुसार उक्त वाक्यांश का अर्थ इस प्रकार किया है- वह ब्रह्म देह रूप से कल्पित प्रकृति के बिना किसी अन्य कर्त्ता के सहयोग से जगत् रूप में परिणत करता है। इसी भाव को प्रस्तुत सूत्र द्वारा भी व्यक्त किया गया है अतः जिसका परिणाम होता है, वह उपादान कारण निश्चित है, जो परिणत करने वाला है, वह ब्रह्म निमित्त कारण होगा॥२६॥ यहाँ जिज्ञासा उठती है कि परमात्मा तो पूर्व से ही नित्य कर्त्ता रूप में अवस्थित है, वह कर्म कैसे हो सकता है? आचार्य अगले सूत्र में इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत करते हैं-
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 77
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० १ पाद० ४ सूत्र २८ ७९
(१३३ ) परिणामात् *।२७।। सूत्रार्थ- परिणामात् = वेद में उसके जगत् रूप में परिणत होने का उल्लेख होने से यही मानें कि वह ब्रह्म ही इस जगत् का कर्ता है और स्वयमेव इस रूप में परिणत हुआ है। व्याख्या- ब्रह्म के समस्त रूपों में परिणत होने का उल्लेख तैत्तिरीयोपनिषद् २/६ में इस प्रकार मिलता है- उस जगत् की सर्जना करने के बाद वह ब्रह्म स्वयं उस जीव के साथ-साथ समाहित हो गया। उसमें समाहित होकर वह स्वयं ही मूर्त्त और अमूर्त भी हो गया। कहने में आने वाले और न आने वाले,आश्रय देने वाले और न देने वाले तथा चेतन और जड़, सत्य और असत्य-इन सभी के रूप में सत्यस्वरूप ब्रह्म ही हो गया। जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है और जो अनुभव में आता है, वह सत्यरूप ब्रह्म ही है, ऐसा मनीषियों का कथन है। इस प्रकार से उक्त श्रुति में ब्रह्म के ही समस्त रूपों में परिणत होने का विवेचन किया गया है। अतः वह(ब्रह्म) ही इस जगत् का उपादान एवं निमित्त कारण है। परिणाम को यहाँ विकार के अर्थ में नहीं लिया गया है। जिस प्रकार सूर्यदेव अपनी अनन्त रश्मियों का चतुर्दिक् प्रसारण करते हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मा भी अपनी अनन्त, अचिन्त्य, विकाररहित शक्तियों का निक्षेपण करते हैं, उनके इस शक्ति निक्षेपण से ही विचित्र जगत् का उद्भव स्वयमेव होने लगता है। अतः यहाँ पर यही मानना चाहिए कि निर्विकार एक रस ब्रह्म अपने स्वरूप से अच्युत और अविकृत रहते हुए ही अपनी अचिन्त्य शक्तियों से जगत् के रूप में उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए उनका कर्त्ता और कर्म अर्थात् उपादान और निमित्त कारण होना सर्वथा उपयुक्त है।।२७।। उपर्युक्त तथ्य के समर्थन में अगले सूत्र में आचार्य एक अन्य हेतु प्रस्तुत कर रहे हैं- (१३४) योनिश्च हि गीयते ॥२८॥ सूत्रार्थ- हि= क्योंकि, योनि: = (वेदान्त में ब्रह्म को) योनि, च = भी, गीयते = कहा गया है॥ (अतः ब्रह्म ही एकमात्र निमित्त और उपादान कारण है।) व्याख्या- श्रुति में 'योनि' का अर्थ उपादान कारण बतलाया गया है। उपनिषदों के अन्तर्गत यत्र-तत्र अनेकों स्थलों पर ब्रह्म को ही 'योनि' के नाम से सम्बोधित किया गया है। उदाहरण के लिए मुण्डकोपनिषद् ३/१/३ का उद्धरण देखें- 'कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्' अर्थात् 'जो समस्त प्राणियों का कर्त्ता, शासक और ब्रह्मा जी की भी योनि अर्थात् उपादान कारण स्वरूप परम पुरुष को देखता है'। ऐसा ही उल्लेख मुण्ड० १/१/६ में मिलता है- 'यद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः' अर्थात् 'उन समस्त प्राणियों की योनि (उपादान कारण) को ज्ञानीजन सर्वत्र सम्यक् रूप से देखते हैं। यहाँ ब्रह्म (परम पुरुष) को ही कर्त्ता और योनि रूप से संबोधित किया गया है। जो 'कारण' (जैसे मिट्टी) 'कार्य' (जैसे घट) रूप में परिणत होता है, वह उपादान कारण तथा जिस कार्य (घट निर्माण) में जो चैतन्य स्वरूप स्थिति में साधन (जैसे कुम्भकार) होता है, वह निमित्त कारण कहा जाता है। यहाँ ब्रह्म ने स्वयं ही अपने को जगत् रूप में परिणत किया। अतः उपादान कारक और निमित्त कारक दोनों ही कारण वही (ब्रह्म) सिद्ध होता है, प्रकृति या माया नहीं। व्यास जी ने भी 'शास्त्रयोनित्वात्' कहकर ब्रह्म को ही शास्त्र का उत्पत्तिकर्त्ता (योनि) संबोधित किया है॥२८॥ अपने मत की प्रतिष्ठा एवं अपने से विपरीत मतों का खण्डन करने के बाद इस अध्याय और प्रकरण का उपसंहार कर अन्तिम सूत्र में आचार्य कहते हैं कि समस्त वादियों का समाधान कर दिया गया है-
- वेदान्त के कई ग्रन्थों में इस सूत्र को इसके पूर्व सूत्र 'आत्मकृतेः' के साथ जोड़ कर छापा गया है, परन्तु तथ्य की स्पष्टता के लिए कई ग्रन्थों में इसे अलग सूत्र माना गया है। यहाँ भी इसे इसी रूप में (अलग रूप में) स्वीकार किया गया है।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 78
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
८० वदान्त दशन (१३५ ) एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याता: ।।२९।। सूत्रार्थ- एतेन = इस प्रकार विवेचन करने से, सर्वे = सभी, व्याख्याताः = प्रतिवादियों की जिज्ञासा का प्रतिपादन कर समाधान कर दिया गया, व्याख्याताः = समाधान कर दिया गया। व्याख्या- इस प्रकार विवेचन पूर्वक यह प्रतिपादित कर दिया गया कि एकमात्र 'ब्रह्म ही जगत् का उपादान कारण है, सांख्यमत प्रतिपादित प्रधान-जड़ प्रकृति नहीं।' सम्पूर्ण जगत् का उपादान और निमित्त कारण ब्रह्म ही है, उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। इस विवेचन के द्वारा परमाणु कारण वादी नैयायिक आदि के मतों का भी निस्तारण कर दिया गया है। ऐसा आचार्य स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हैं। सूत्र में 'व्याख्याता' शब्द का दो बार प्रयोग अध्याय समाप्ति का सूचक है। साथ ही यह भी अभिप्राय है कि अब अधिक प्रतिपादन की आवश्यकता नहीं रही ॥२९॥
।। इति प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the inforation (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 79
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
॥ अथ द्वितीयाध्याये प्रथमः पादः॥ ग्रन्थ के शुभारम्भ में ब्रह्म की जिज्ञासा का कथन कर प्रथम अध्याय में अनेक धर्म शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर ब्रह्म के स्वरूप को स्पष्ट करने हेतु यह कहा गया कि जगत् की उत्पत्ति का आदि कारण ब्रह्म ही है, जिस प्रकार चित्र का कारण चित्रकार तथा घट का कारण कुम्भकार होता है। ब्रह्म ही इस सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत् का नियन्ता है। जगत् की स्थिति एवं समयानुसार उसके उपादान कारण में लय का निमित्त कारण भी वही है, इस बात को लेकर श्रुतियों में कोई मतभेद नहीं है। अब इस 'अविरोध' नामक दूसरे अध्याय का आरम्भ यह सिद्ध करने के लिए किया जा रहा है कि श्रुतियों का न तो स्मृतियों से कोई विरोध है और न ही आपस में एक श्रुति का दूसरी श्रुति से विरोध है। सर्वप्रथम स्मृति विषयक शंका उपस्थित करके सूत्रकार उसका समाधान करते हैं- (१३६) स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात्।।१ ।। सूत्रार्थ- चेत् इति = यदि ऐसा कहो कि, स्मृत्यनवकाश-दोष प्रसङ्गः = जड़ प्रकृति को जगत् का कारण न मानने से सांख्य स्मृति को अमान्य करने का दोष उपस्थित होगा, न = यह कहना उपयुक्त नहीं; क्योंकि, अन्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसंगात् = उसको मान लेने पर दूसरी स्मृतियों को न मानने का दोष उपस्थित होगा। व्याख्या- इस सूत्र पर विचार करने से पूर्व सांख्यस्मृति को समझ लेना आवश्यक है। कपिल मुनि ने वेदोक्त कर्मकाण्डों को पूर्णतः स्वीकार किया है और ज्ञान-काण्ड के विवेचन 'सांख्य स्मृति (शास्त्र)' की उन्होंने रचना की है। सांख्य में जगत् के जन्मादि का कारण उन्होंने जड़ प्रकृति को बताया है। जबकि ऐसा मानना उचित नहीं है; क्योंकि इस मत को स्वीकार करने पर दूसरे महर्षियों द्वारा रचित स्मृतियों-शास्त्रों को न मानने का दोष उपस्थित हो जायेगा। अन्य सभी स्मृतियों ने चूँकि जगत् का परम कारण ब्रह्म को ही कहा है, इसलिए वेदानुकूल स्मृतियों-शास्त्रों को ही प्रमाण मानना उचित है न कि वेद के प्रतिकूल सम्मति रखने वाली स्मृति को; क्योंकि वेद ईश्वरीय ज्ञान होने से स्वतः प्रमाण है॥१॥ सांख्यदर्शन के अनुसार 'प्रकृति' को जगत् का कारण न मानने में कोई दोष नहीं है, इस बात की पुष्टि के लिए सूत्रकार अगला कारण बतलाते हैं- (१३७) इतरेषां चानुपलब्धे: ॥।२ ॥ सूत्रार्थ- इतरेषाम् = अन्य स्मृतिकारों के (मत में), च = भी, अनुपलब्धेः = प्रधान कारणवाद की उपलब्धि नहीं होती, इसलिए भी सांख्य स्मृति का मत मानना उचित नहीं। व्याख्या- सांख्यकार की मान्यता है कि 'पुरुष और जीवात्माएँ विभु एवं चिन्मात्र हैं, उनका बन्ध एवं मोक्ष प्रकृति ही करती है। सांख्य दर्शन के अनुसार सर्वेश्वर रूप से कोई विशिष्ट पुरुष नहीं है, बन्धन और मोक्ष दोनों ही प्राकृत हैं, आदि।' अन्य स्मृतियों एवं वेद विरुद्ध होने के कारण सांख्य स्मृति की इस मान्यता को प्रमाण मानना उचित नहीं है।।२।। योग शास्त्र के रचयिता पतञ्जलि भी सांख्य की सृष्टि प्रक्रिया को मानते हैं, अतः उसको मान्यता क्यों न दी जाये ? इस पर सूत्रकार कहते हैं- (१३८) एतेन योगः प्रत्युक्त: ।३।। सूत्रार्थ- एतेन = इस पूर्वोक्त विवेचन से, योग: = योगशास्त्र की भी (जो वेद विरुद्ध बातें हैं, उनका), प्रत्युक्त: = प्रत्युत्तर हो गया। व्याख्या- योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतञ्जलि ने अपने ग्रन्थ में दृश्यमान जड़ प्रकृति को जगत् का स्वतंत्र कारण बतलाया है। यद्यपि ऋषि ने उसमें ब्रह्म को स्वीकार अवश्य किया है; परन्तु उस स्वीकारोक्ति में स्पष्टता नहीं है। अन्य विषयों में योग का सांख्य के साथ मतभेद होने पर भी जड़ प्रकृति को जगत् का कारण मानने
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 80
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
८२ वेदान्त दर्शन में चूँकि दोनों एकमत हैं, अतः पूर्वसूत्रों में बताये गये कारणों के आधार पर सांख्य की ही तरह योगशास्त्र की भी उपर्युक्त मान्यता का निराकरण हो जाता है।३॥ अब ब्रह्म को उपादान कारण मानने वाले वादी के पक्ष में कार्य-कारण भाव की अनुपपत्ति कथन करते हैं- ( १३९ ) न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात्॥४॥ सूत्रार्थ- अस्य = इस जगत् का उपादानकारण ब्रह्म, विलक्षणत्वात् = विलक्षण होने से, न = नहीं हो सकता, च = और, तथात्वम् = उसका जड़ होना, शब्दात् = शब्द (वेद) प्रमाण से सिद्ध है। व्याख्या-विलक्षण होने से जगत् और ब्रह्म का कोई कारण भाव नहीं अर्थात् यह जगत् ब्रह्म से विलक्षण (भिन्न रूप वाला) होने से ब्रह्म का उत्पादन होना सिद्ध नहीं है; क्योंकि कार्य-कारण भाव समान लक्षण में ही होता है, विपरीत लक्षणों में नहीं। जैसा कि मिट्टी से घट, धागों से कपड़ा इत्यादि कार्य समान धर्म वाले द्रव्य से ही उत्पन्न होते हैं और जड़-चेतन की विलक्षणता शब्द (वेद) प्रमाण से भी पाई जाती है। चूँकि जगत् के लक्षण ब्रह्म के समान नहीं हैं; ब्रह्म शुद्ध है, परन्तु जगत् शुद्ध नहीं, इसलिए चेतन परब्रह्म परमात्मा को अचेतन जगत् का उपादान कारण नहीं मानना चाहिए॥४। वादी के पक्ष में उक्त तर्क प्रस्तुत कर सूत्रकार ने अगला सूत्र कहा- ( १४० ) अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम्॥।५॥ सूत्रार्थ-तु = वहाँ तो, अभिमानिव्यपदेशः = तत्त्वाभिमानी देवताओं का वर्णन है, विशेषानुगतिभ्याम् = (यह बात) विशेष विवरण से सिद्ध है। व्याख्या- छान्दोग्य उपनिषद् (६/२/३) में कहा गया है- तत्तेजऐक्षत बहुस्यामः अर्थात् तेज ने इच्छा की, कि मैं बहुत हो जाऊँ, तब उसने जल को रचा और जल ने भूमि को। इस प्रकार तेज, जल और अन्न (भूमि) इन तीनों की उत्पत्ति का वर्णन करने के बाद इन्हें 'देवता' कहा गया है। छा.उ. (६/३/२) तथा ऐतरेयोपनिषद् (१/२/४) के अनुसार अग्नि वाणी बनकर मुख में प्रविष्ट हुआ, वायु प्राण बनकर नासिका में प्रविष्ट हुआ। इस प्रकार उनकी अनुगति का उल्लेख होने से भी उन तत्त्वों के अभिमानी देवताओं का ही वर्णन सिद्ध होता है। इसलिए चेतन ब्रह्म को इस जड़-जगत् का उपादान कारण मानना युक्ति संगत नहीं है।।५।। ग्रन्थकार अब उपर्युक्त शङ्का का उत्तर देते हैं- (१४१) दृश्यते तु॥६ ॥ सूत्रार्थ-तु= तो, दृश्यते = देखी जाती है (शास्त्र व लोक में भी सूक्ष्म आदि कारण से स्थूल की उत्पत्ति)। व्याख्या- यह कहना ठीक है कि उपादान से उत्पन्न होने वाला कार्य उससे विलक्षण हो सकता है; क्योंकि मनुष्य आदि चेतन जीवों से नख-लोम आदि जड़ वस्तुओं की उत्पत्ति का वर्णन शास्त्र में भी देखने में आता है। उदाहरणार्थ- 'यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वमे' (मु.उ. १/१/७) अर्थात् जिस प्रकार जीवित मनुष्य से केश और रोएँ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी-चेतन परब्रह्म से यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है। अतः ब्रह्म को जगत् का कारण मानना युक्तिसंगत तथा शास्त्र सम्मत है।।६॥ अब इस सन्दर्भ में सूत्रकार असत्कारणवाद का आक्षेपपूर्वक समाधान करते हैं- (१४२) असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात्।७॥ सूत्रार्थ-असत् = सत्ता रहित, न दिखाई पड़ने वाली वस्तुओं की उत्पत्ति का प्रसङ्ग आने पर, चेत् = यदि, इति = ऐसा कहा जाये तो, न = ठीक नहीं, प्रतिषेधमात्रत्वात् = क्योंकि वहाँ 'असत्' शब्द प्रतिषेध मात्र का बोधक है।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 81
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० १ सूत्र १० ८३ व्याख्या- यदि यह कहा जाये कि अवयव रहित चेतन ब्रह्म से सावयव वर्ग का प्रादुर्भाव मानने पर जो वस्तु पहले नहीं थी, उसकी उत्पत्ति मानने का दोष उपस्थित होगा, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि 'दृश्यते तु' (२.१.६) सूत्र में कार्य और कारण की समानता का निषेध पाये जाने पर भी कारणभूत ब्रह्म अपने से विलक्षण जगत् के रूप में प्रकट होता है, इस बात का निषेध नहीं किया गया है। यहाँ 'असत्' पद प्रतिषेध मात्र का बोधक है। अतः असत् से सत् का प्रादुर्भाव होना संभव नहीं; क्योंकि अभाव कभी भाव रूप में परिणत नहीं होता; किन्तु सत् स्वरूप सर्वशक्तिमान् परमात्मा में जो जड़-चेतन जगत् शक्ति रूप से विद्यमान होते हुए भी अप्रकट रहता है, उसी का उसके संकल्प से प्रकट होना उत्पत्ति है। अस्तु, परब्रह्म परमात्मा से जगत् की उत्पत्ति मानना असत् से सत् की उत्पत्ति मानना नहीं है।।७।। अब पुनः पूर्वपक्षी के द्वारा व्यक्त की गई आशंका को आचार्य सूत्रकार सूत्रबद्ध करते हैं- (१४३) अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम्।८॥। सूत्रार्थ- अपीतौ = प्रलयकाल में, तद्वत् = दोषयुक्त कार्य को उचित मानने का, प्रसङ्गात् = प्रसङ्ग उपस्थित होगा, असमञ्जसम् = उपर्युक्त मान्यता युक्ति-सङ्गत नहीं है। व्याख्या- यदि प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत् का उस सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मा में विद्यमान रहना माना जाएगा, तब तो ब्रह्म में भी जड़ प्रकृति के जड़त्व तथा प्राणियों के सुख-दुःख आदि का दोष मानने का प्रसङ्ग आ जायेगा तथा ब्रह्म को सत्य सङ्कल्प आदि गुण वाला और निर्विकार तथा सर्वथा विशुद्ध-दोष रहित मानने वाली श्रुतियों पर मिथ्यात्व का दोष लगेगा, जो किसी को भी मान्य नहीं है। अतः उपर्युक्त मान्यता को अनुपयुक्त मानते हुए श्रुतियों द्वारा कथित ब्रह्म के लक्षण (निर्विकार, सर्वथा विशुद्ध आदि) को ही ठीक मानना चाहिए।।८ ।। अब सूत्रकार उक्त शङ्का का समाधान करते हैं- (१४४ ) न तु दृष्टान्तभावात् ।।९।। सूत्रार्थ-तु= (पूर्व सूत्र में बताई गई असमंजसता) तो, न = नहीं है, दृष्टान्त-भावात् = यह दृष्टान्तों से सिद्ध है। व्याख्या- पूर्व सूत्र में की गई शंका निराधार है; क्योंकि कार्य के अपने कारण में विलीन हो जाने पर उसके धर्म कारण में रहते हैं, ऐसा नियम नहीं है, अपितु इसके विपरीत अनेक दृष्टान्त देखे जाते हैं अर्थात् जब कार्य अपने कारण में विलीन होता है, तब कार्य के धर्म भी कारण में विलीन हो जाते हैं। जैसे-स्वर्ण से निर्मित आभूषण जब अपने कारण में विलीन हो जाते हैं, तब उन आभूषणों के धर्म (लक्षण) सुवर्ण में नहीं देखे जाते तथा मिट्टी से बने हुए घट आदि पात्रों के अपने कारण मृत्तिका में विलीन होने पर उनके लक्षण मृत्तिका में दिखाई नहीं देते। इससे यही सिद्ध होता है कि प्रलय अथवा सृष्टिकाल किसी भी अवस्था में कारण अपने कार्य के धर्मों से लिप्त नहीं होता॥।९॥ उपर्युक्त सूत्र में वादी की शङ्का को निर्मूल करने के बाद सूत्रकार अब उसके द्वारा उद्धत दोषों की उसी के मत में व्याप्ति बताकर अपने सिद्धान्त को निर्दोष सिद्ध करते हैं- (१४५) स्वपक्षदोषाच्च ॥१० ।। सूत्रार्थ-स्वपक्षदोषात् - (वादी के) अपने पक्ष में दोष होने से, च = भी (प्रधान को जगत् का कारण मानना ठीक नहीं)। व्याख्या-सांख्यवादी स्वयं भी जगत् के कारण रूप प्रधान को अवयवरहित, अव्यक्त, अग्राह्य मानते हैं।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, anmation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 82
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
८४ वदान्त दशन उनके द्वारा साकार, व्यक्त एवं देखने-सुनने में आने वाले संसार का उद्भव मानना तो कारण से विलक्षण कार्य की उत्पत्ति मानने का दोष स्वीकार करना है। फिर उत्पत्ति के पूर्व कार्य के शब्द-स्पर्शादि लक्षण 'प्रधान' में नहीं रहते और बाद में कार्य में आ जाते हैं। इसके अलावा, प्रलयकाल में समस्त कार्यों के 'प्रधान' में लय होने पर कार्य के शब्द, स्पर्शादि लक्षण प्रधान में नहीं रहते। इन मान्यताओं के आधार पर वादी के मतानुसार भी कारण में कार्य के लक्षण आ जाने की शङ्का पूर्ववत् बनी रहती है, चूँकि 'प्रधान' को कारण मानने में वादी के द्वारा उपस्थित किये गये तीनों दोष सम्मिलित हैं। अतः उपर्युक्त कारणों के आधार पर जगत् का कारण 'प्रधान' को मानना उचित नहीं है॥१०।। अब उपर्युक्त कथन पर वादी द्वारा सम्भावित आक्षेप को स्वयं सामने लाकर सूत्रकार उसका समाधान प्रस्तुत करते हैं- ( १४६ ) तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्ष प्रसङ्ग: ॥११॥ सूत्रार्थ- तर्काप्रतिष्ठानात् = तर्कों के स्थिर न रहने से, अपि = भी, अन्यथा = अन्य प्रकार से, अनुमेयं = अनुमान के द्वारा कारण का निश्चय करना चाहिए, चेत् = यदि, इति = ऐसा कहो, एवम् अपि = तो ऐसी स्थिति में भी, अनिर्मोक्षप्रसङ्ग: = मोक्ष न होने का प्रसङ्ग आ जायेगा। व्याख्या- परस्पर भिन्न मतावलम्बी एक दूसरे के तर्क को दोषपूर्ण बताते हुए अपनी मान्यता को सही सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार तर्कों की शृंखला कभी समाप्त नहीं होती अर्थात् उनकी कोई स्थिरता नहीं होती। चूँकि लोगों की बुद्धि वृत्ति में भी परस्पर अन्तर पाया जाता है। अतः उनके अनुमानों में भी भिन्नता स्वाभाविक है। तथापि अर्थ की दृष्टि से तर्कों को ठीक मान लिया जाये, तो भी ब्रह्म में तर्क की अपेक्षा नहीं रहती अर्थात् तर्क बुद्धि से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति नहीं होती और तत्त्वज्ञान के बिना मोक्ष नहीं हो सकता। अतः सांख्य मत में मोक्ष प्राप्त न होने का दोष आ जायेगा, इसलिए ब्रह्म के विषय में श्रुति ही प्रमाण है॥११। अब सूत्रकार कहते हैं कि जिस प्रकार प्रधान कारणवाद निरस्त होता है, उन्हीं युक्तियों से अन्य वेदविरुद्ध मतों का भी निराकरण हो जाता है- (१४७ ) एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याता: ॥१२।। सूत्रार्थ- एतेन = इस पूर्व निरूपित सिद्धान्त से, शिष्टापरिग्रहाः = शिष्ट पुरुषों द्वारा अमान्य मतों का, अपि = भी, व्याख्याता: = विवेचन (प्रतिवाद) कर दिया गया। व्याख्या- पाँचवें से ग्यारहवें सूत्र तक सांख्य मत वालों द्वारा उपस्थित तर्कों का निराकरण करने से अन्य शिष्ट पुरुषों द्वारा जिन मतों का आदर नहीं किया गया- जो वेद के प्रतिकूल तथा सांख्य मत से मिलते-जुलते हैं, उनका भी खण्डन हो गया। इन सबसे यह सिद्ध हुआ कि वेद द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त ही ब्रह्म के विषय में यथार्थ ज्ञान कराने वाला है, इसलिए वेद के प्रतिकूल मत मान्य नहीं हो सकते ॥१२॥ पूर्व प्रकरण में प्रधानकारणवाद का प्रतिवाद किया गया। अब ब्रह्म कारणबाद में अन्य प्रकार के दोषों की आशंका करके आचार्य द्वारा उनका निराकरण किया जाता है- (१४८) भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ॥१३।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो; भोक्त्रापत्ते: = ब्रह्म को जगत् का कारण मानने से उसमें भोक्तापन का दोष आ जायेगा, अविभाग: = इसलिए जीव और ब्रह्म की भिन्नता सिद्ध नहीं होगी, तो भोग जड़ और भोक्ता चेतन की भिन्नता, लोकवत् = लोकदृष्ट की भाँति, स्यात् = हो सकती है। व्याख्या- यदि यह शंका हो कि ब्रह्म को जगत् का कारण मान लेने पर जीव द्वारा कर्मफल रूप भोगों का भोक्तापन ब्रह्म में भी आ जायेगा, इससे जीव और ईश्वर का विभाग तो सम्भव नहीं रहेगा, साथ ही जड़ में
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 83
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० १ सूत्र १५ ८५ भोक्तापन का आरोप होने से भोग्य (जड़ वर्ग) और भोक्ता (जीव) की भिन्नता भी न हो सकेगी। परन्तु ऐसी शंका निर्मूल है; क्योंकि संसार में एक कारण से उत्पन्न हुई वस्तुओं में इस प्रकार की भिन्नता प्रत्यक्ष दिखाई देती है। पिता का अंशभूत बालक गर्भस्थ पीड़ा को स्वयं भोगता है, पिता नहीं भोगता तथा उस बालक और पिता की पृथक्ता भी प्रत्यक्ष है। इसी प्रकार ब्रह्म में भोक्तापन का आरोप नहीं हो सकता तथा जीव और ब्रह्म की भिन्नता भी नष्ट नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार एक ही पिता से उत्पन्न कई लड़के आपस में एक-दूसरे के सुख-दुःख के भोक्ता नहीं होते, उसी प्रकार विभिन्न जीव अपने कर्मानुसार अपने-अपने हिस्से का सुख-दुःख स्वतः भोगते हैं, एक दूसरे का नहीं। इसी तरह यह भी देखने में आता है कि एक ही पृथ्वी-तत्त्व के अनेक कार्य घट, पट, कपाट आदि में परस्पर अलग-अलग नाम, रूप और प्रयोग व्यवहार जगत् में देखे जाते हैं- उसी प्रकार एक ही ब्रह्म के असंख्य कार्य होने पर भी उनके विभाग को अमान्य नहीं किया जा सकता ॥१३ ।। उपर्युक्त बातों से कारण और कार्य में अभेद की शङ्का उत्पन्न होने पर सूत्रकार समाधान करते हैं- ( १४९ ) तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥१४।। सूत्रार्थ- तदनन्यत्वम् = उस कारणभूत ब्रह्म की जगत् से अनन्यता सिद्ध होती है। आरम्भणशब्दादिभ्यः - आरम्भण शब्द आदि के द्वारा भी सिद्ध है। व्याख्या- छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है 'यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्' (छा.उ.६१/४) अर्थात् 'जैसे मिट्टी के एक ढेले का तत्त्व जान लेने पर मिट्टी से उत्पन्न सभी कार्य जान लिए जाते हैं। नाम और आकृति के भेद तो वाणी से कहने के लिए होते हैं, यथार्थ में तो वह सब मिट्टी ही है।' इसी प्रकार कार्य रूप स्थित यह जगत् भी ब्रह्म से उत्पन्न होने के कारण ब्रह्ममय९८ ही है। इस प्रकार ब्रह्म की जगत् से अनन्यता सिद्ध होती है। जिस प्रकार सुवर्ण के हार, कुण्डल आदि उत्पत्ति के पूर्व तथा विलय के पश्चात् अपने कारण रूप स्वर्ण में शक्ति रूप में विद्यमान रहते हैं (शक्ति, शक्तिमान् में अभेद होने के कारण उनकी अनन्यता में किसी प्रकार का दोष नहीं आता), उसी प्रकार यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उत्पत्ति से पूर्व एवं प्रलय के बाद परब्रह्म परमात्मा में शक्ति के रूप में अव्यक्त रहता है। अतः जगत् और ब्रह्म की अनन्यता निर्बाध है। गीताकार स्वयं कहते हैं कि यह अष्टभेदी प्रकृति तो मेरी अपरा प्रकृति रूपा शक्ति है और जीव रूपी चैतन्य समूह मेरी परा प्रकृति है तथा ये दोनों समस्त प्राणियों के कारण हैं और मैं सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति एवं प्रलय रूप महाकारण हूँ। (गीता-७/५-६) उपर्युक्त कथन में भगवान् ने अपनी प्रकृतियों के साथ अनन्यता सिद्ध की है॥१४॥ प्रादुर्भाव से पूर्व कार्य कारण रूप में विद्यमान रहता है, इस बात को सिद्ध करने के लिए सूत्रकार अन्य हेतु का निर्देश करते हैं- (१५० ) भावे चोपलब्धे: ॥१५।। सूत्रार्थ- भावे = (कारण में) कार्य की सत्ता होने पर, च = ही, उपलब्धे: = उसकी उपलब्धि सम्भव है। व्याख्या- कार्य और कारण में एक नियम देखा जाता है कि जब कार्य अपने कारण में निहित रहता है, तभी उसकी उपलब्धि होती है। न केवल शब्द प्रमाण से अपितु प्रत्यक्ष उदाहरण में भी देखा जाता है कि घड़ा मिट्टी का ही एक आकार विशेष है, कपड़ा धागों का ताना-बाना मात्र है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि घड़ा मिट्टी का तथा कपड़ा धागों का ही एक रूप है। अतः यह स्पष्ट है कि कारणभूत द्रव्य केवल अपने रूप को बदल देता है, परन्तु उसका मूल अस्तित्व उससे अलग नहीं होता। इससे कार्य और कारण की अनन्यता सिद्ध होती है॥१५ ।।
Disclalimer / Warning: All lterary and artistic materal on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 84
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
८६ वेदान्त दर्शन इसी विषय को प्रकारान्तर से अन्य हेतु उपस्थित करते हुए सूत्रकार पुनः सिद्ध करते हैं- (१५१) सत्त्वाच्चावरस्य ॥१६।। सूत्रार्थ-अवरस्य = कार्य का कारण में, सत्त्वात् = सत्ता पाये जाने से, च = भी (कार्य और कारण की अभिन्नता सिद्ध है।) व्याख्या- उत्पत्ति से पूर्व यह जगत् कारण रूप से सत् (विद्यमान) रहता है। शास्त्र में इसका स्पष्ट उल्लेख है- 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' (छा.उ. ६/२/१) अर्थात् 'हे सोम्य! यह उत्पत्ति के पहले भी सत्य था तथा 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकेतमासीत्' (बृह.उ. १/४/७) अर्थात्- उस समय यह अप्रकट था।' इन दृष्टान्तों से यह सिद्ध है कि स्थूल रूप से प्रकट होने से पूर्व यह सम्पूर्ण जगत् अपने कारण में शक्ति रूप में विद्यमान रहता है और वही सृष्टिकाल में प्रकट होता है॥१६ ॥ असदेवेमग्र आसीत् (छा.उ. ३/१९/१)सृष्टि से पहले यह (कार्य) असत् था, फिर इसको कारण रूप से सत् कैसे कहा जाता है। शिष्य द्वारा ऐसी आशंका करने पर आचार्य ने समाधान किया- (१५२ ) असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात्॥१७।। सूत्रार्थ-चेत् = यदि कहो, असद्-व्यपदेशात् = उत्पत्ति के पहले जगत् को असत् बतलाने से, न = कार्य का कारण में पहले से ही विद्यमान होना सिद्ध नहीं होता, इति न = तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि, धर्मान्तरेण = वैसा लक्षणों में विभिन्नता होने के कारण कहा गया है, वाक्यशेषात् = यह बात अन्तिम वाक्य से सिद्ध होती है। व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद् (२/७) में कहा गया है कि 'असद् वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत' अर्थात् यह सब पहले 'असत्' ही था, उसी से 'सत्' उत्पन्न हुआ। यहाँ 'पहले असत् ही था' का तात्पर्य यह नहीं है कि यह जगत् प्राकट्य से पूर्व नहीं था; क्योंकि बाद के आसीत् में उसका होना कहा गया है। अभिप्राय यह है कि उद्भव से पहले यह जगत् असत् अर्थात् अप्रकट था, फिर उससे सत् की उत्पत्ति हुई-अर्थात् अप्रकट जगत् प्रकट स्वरूप में आया। इसी प्रकार छान्दोग्य (६/२/१) में कहा गया है-'तद्दैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत' अर्थात् 'कोई-कोई कहते हैं, यह जगत् पहले असत् था। एक मात्र वही था, अन्य नहीं। फिर उस 'असत्' से 'सत्' प्रकट हुआ। इस प्रकार जगत् के लिए 'असत्' कहा जाने से कारण में कार्य का अस्तित्व नहीं दिखाई देता, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि छान्दोग्य (६/२/ २) स्वयं ही इस अभाव के भ्रम का निवारण करते हुए कहती है- 'कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति' अर्थात्- हे सोम्य! ऐसा होना कैसे सम्भव है? असत् से सत् कैसे प्रकट हो सकता है। इसका उत्तर भी वहीं मिलता है- 'सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीत्' अर्थात्- पहले यह सब सत् ही था, पहले अव्याकृत अर्थात् अप्रकट था, बाद में नाम रूप युक्त होकर प्रकट हो गया ॥१७॥ पूर्वोक्त कथन को पुष्ट करने के लिए सूत्रकार अन्य हेतु प्रस्तुत करते हैं- (१५३) युक्त्ते: शब्दान्तराच्च॥१८॥ सूत्रार्थ- युक्ते: = युक्ति से, च = और, शब्दान्तरात् = अन्य शब्द प्रमाण से भी (उक्त अर्थ की सिद्धि होती है।) व्याख्या- युक्ति से भी उपादान कारण और कार्य की अनन्यता सिद्ध होती है। युक्ति का अभिप्राय यह है कि जिस कारण में कार्य का भाव होता है, उसी से उस कार्य का प्रादुर्भाव होता है, अन्य से नहीं। जैसे वस्त्र के उत्पादन हेतु उसके उपादान तत्त्व के रूप में कपास या सूत की आवश्यकता होती है, मिट्टी या अन्य
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 85
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० १ सूत्र २१ ८७७ पदार्थों की नहीं। इसी प्रकार घट के निर्माण हेतु मिट्टी उपादान का संग्रह होता है, न कि अन्य सूतादि का। इस युक्ति से यह बात सिद्ध होती है कि वस्त्र की सत्ता उत्पत्ति से पूर्व सूत्र-तन्तुओं में तथा घड़े की सत्ता मिट्टी में विद्यमान रहती है, अन्यथा उनके प्रादुर्भाव के लिए उन्हीं नियत उपादानों का संग्रह करना निरर्थक होता। इस युक्ति के अतिरिक्त अन्य शास्त्र वचनों से सत्कार्यवाद पुष्ट होता है। बृहदारण्यक आदि में जो उसके लिए अव्याकृत आदि शब्द प्रयुक्त हैं, उनसे भी यह सिद्ध होता है कि यह जगत् उत्पन्न होने से पहले अपने सद् रूप में ही था॥१८॥ अब अन्य कतिपय उदाहरणों के माध्यम से उक्त अर्थ को पुष्ट करते हुए सूत्रकार अगला सूत्र कहते हैं- (१५४) पटवच्च ॥१९ ।। सूत्रार्थ- पटवत् = (सूत में) वस्त्र की भाँति, च = भी (ब्रह्म में जगत् पहले से ही स्थित है)। व्याख्या- वस्त्र सूत से बनता है। जब तक वह तन्तु (सूत) के रूप में रहता है, वस्त्र नहीं कहलाता; परन्तु ताने-बाने के रूप में व्यवस्थित कर दिये गये तन्तुओं की विशेष अवस्था को ही वस्त्र की संज्ञा प्राप्त हो जाती है। यह अपने कारण तन्तुओं से अतिरिक्त कुछ नहीं है। बुनने से पूर्व तथा बुना जाने पर दोनों ही अवस्थाओं में 'वस्त्र' अपने ही कारण में स्थित रहता है। सूत से वस्त्र का रूप भिन्न होने पर भी वह सूत से अभिन्न है। इसी प्रकार जगत् को भी समझना चाहिए। इससे सिद्ध हुआ कि उपादान कारण और कार्य में अनन्यता है, भिन्नता नहीं। जैसे लपेटे हुए वस्त्र की लम्बाई- चौड़ाई का पता नहीं लगता, परत खोल देने पर उसका पता लग जाता है। वस्त्र की यह दो अवस्था मात्र है, वस्त्र भेद नहीं। इसी प्रकार यह जगत् कारण अवस्था में समवेष्टित पट की तरह था तथा कार्यावस्था में विस्तारित पट के समान रूपान्तर को प्राप्त हो गया है। अतः कार्य-कारण का अभेद सिद्ध है।।१९।। उक्त दृष्टान्त को सूत्रकार प्राण आदि के दृष्टान्त से समझाते हैं- (१५५) यथा च प्राणादि॥२० ।। सूत्रार्थ-च = और, यथा = जैसे, प्राणादि = प्राण और इन्द्रियाँ हैं। व्याख्या- जिस प्रकार देह त्याग के समय प्राण और इन्द्रियाँ जीवात्मा के साथ शरीर से बाहर अन्यत्र चले जाते हैं, तब उनका स्वरूप अप्रकट होने पर भी उनका अस्तित्व अवश्य रहता है। उसी प्रकार प्रलय काल में सृष्टि के विलीन हो जाने पर भी जगत् का अस्तित्व कारण रूप में अवश्य रहता है। इससे भी कार्य जगत् की कारणावस्था में सत्ता प्रमाणित होती है।।२०।। कार्य -कारण का अभेद मानने में शिष्य द्वारा दूसरे प्रकार की शङ्का उठाकर उसका निराकरण करने के लिए अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- ( १५६ ) इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्ति: ॥२१॥ सूत्रार्थ- इतरव्यपदेशात् = ब्रह्म ही जीव रूप से उत्पन्न होता है, ऐसा कहने से; हिताकरणादिदोषप्रसक्ति: = ब्रह्म द्वारा प्रतिकूल सृष्टि रचने का दोष-प्रसंग उपस्थित होगा। व्याख्या-बृह.उप. (२/५/१९) में कहा है-"अयमात्मा ब्रह्म' यह आत्मा ब्रह्म है तथा छा.उ. (६/३/३) में 'सेयं देवतेमास्तिस्त्रो देवता अनेनैव जीवनेनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत्' अर्थात् इस देवता (ब्रह्म) ने तेज आदि तत्त्व से बने देह में जीव रूप से प्रविष्ट होकर नाम-रूपों को प्रकट किया। इसके अतिरिक्त श्वेताश्वतर (४/३) में कहा है 'त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी' अर्थात् तू स्त्री है, तू पुरुष है,
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 86
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
८८ वदान्त दशन तू ही कुमार और कुमारी है'। इन वर्णनों में ब्रह्म के स्वयं ही जीव रूप से उत्पन्न होने की पुष्टि हुई है। इससे ब्रह्म द्वारा प्रतिकूल सृष्टि रचकर अपना अहित करने का दोष आता है, जो उचित नहीं है; क्योंकि जगत् में उत्पन्न होने वाला प्रत्येक जीव दुःखादि भोगों को भोगेगा ही, तो जो दुःख भोगों का वरण करने के लिए जन्म-मरण के चक्र में स्वयं फँसे, वह ब्रह्म सर्वज्ञ एवं दूरदर्शी नहीं हो सकता; परन्तु यह शंका उचित नहीं है। ब्रह्म और जीव में भिन्नता है, अतः ब्रह्म दुःख भोग आदि में संलिप नहीं होता, यह बात अगले सूत्र में स्पष्ट करते हैं।२१।। उक्त जिज्ञासा के आधारभूत भ्रम का निराकरण करने हेतु सूत्रकार कहते हैं- (१५७) अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥२२॥ सूत्रार्थ-तु= परन्तु, अधिकम् = (ब्रह्म जीव से) अधिक है, भेदनिर्देशात् = क्योंकि श्रुति ने जीव और ब्रह्म का भेद बताया है। व्याख्या- ब्रह्म स्वयं ही जीव रूप से इस संसार में भोक्ता बनकर आता है, आशंका के इस आधार का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि ब्रह्म स्वयं भोक्ता नहीं है, बल्कि भोक्ता जीवात्मा तथा जगत् स्रष्टा ब्रह्म दोनों भिन्न तत्त्व हैं। जीव अल्पज्ञ है, अल्प शक्ति है, परिमित है तथा ब्रह्म सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान् है, सर्वान्तर्यामी है। इन दोनों का विभेद वास्तविक है, आपत्तिक नहीं है। ऋग्वेद (१/१६४/२०) में वर्णन है- 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वन्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा इन दोनों में से एक जीवात्मा संसार में स्वादु फलों को भोगता है तथा दूसरा परमात्मा न भोगता हुआ साक्षी बना रहता है। य आत्मनि तिष्ठन्नात्मानमन्तरा' (श०प० १४/५/३०) अर्थात् जो जीवात्मा के अन्तर्गत है, परन्तु जिसका देह है, वह जीवात्मा उसे नहीं जानता, जो जीव का प्रवृत्ति-निवृत्ति रूप नियमन करता है, वह अन्तर्यामी ब्रह्म है। बृह.उप. (४/३/३५) में जीव के मरणकाल की स्थिति का निरूपण करते हुए बताया है कि 'उस परब्रह्म से अधिष्ठित हुआ यह एक दूसरे देह में अवस्थान करता है।' इस वर्णन से जीव और ब्रह्म का भेद स्पष्ट हो जाता है। परम शक्तिशाली परमात्मा अपने संकल्प शक्ति के द्वारा जगत् की रचना कर उसमें प्रवेश कर लीला करते हैं तथा जीर्ण हो जाने पर मकड़ी के जाले के समान वे इस जगत् का संहार कर देते हैं। अतः यह सिद्ध है कि ब्रह्म जीव से भिन्न है, वह स्वयं संसार में जीवात्मरूप से भोक्ता बनकर नहीं आता। ब्रह्म नित्यमुक्त है तथा जगत् का निमित्त कारण है, फलतः अपना अहित करने आवागमन के चक्र में अपने को डाले रहने आदि का दोष उस पर नहीं आता ।।२२।। अब इसी बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए आचार्य दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं- (१५८) अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥२३॥ सूत्रार्थ- च = और, अश्मादिवत् = पत्थर आदि के समान, तदनुपपत्तिः = जीवात्मा का ब्रह्मरूप होना अनुपपन्न (अयुक्त) है। व्याख्या- विभिन्न पदार्थों को किसी एक गुणधर्म की समानता के आधार पर एक नहीं माना जा सकता। साधारण पत्थर, मध्य स्तर की मणियाँ तथा हीरा- तीनों में पार्थिव समानधर्म पाये जाने पर भी इन्हें एक नहीं कहा जा सकता। हीरा अत्यधिक मूल्यवान् होता है, अनेक मणियाँ मध्य स्तर के मूल्य की होती हैं तथा सामान्य पत्थर अल्प मूल्य का ही होता है अर्थात् एक सामान्य पत्थर कभी मणि अथवा हीरा नहीं बन सकता। इसी प्रकार जीव और ब्रह्म में चैतन्य समानधर्म होने पर भी जीव का ब्रह्म रूप होना अनुपपन्न (अयुक्त) है; क्योंकि ब्रह्म चेतन और आनन्दमय होने के साथ-साथ जीव और जगत् की रचना करके कारण रूप से सबमें
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 87
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० १ सूत्र २६ ८९ अनुगत रहता है। इस प्रकार जीव के अन्तर में प्रविष्ट होकर वह उसका नियमन करता है, अतः जीव से अभिन्न रहकर भी वह उससे भिन्न है; क्योंकि जीव अल्पज्ञ और सुख-दुःख आदि का भोक्ता है; किन्तु ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वाधार, सर्वनियन्ता तथा सुख-दुःख आदि भोगों से परे है, उसे जगत् के भोग स्पर्श नहीं करते, वह हित-अहित दोनों से परे है। इस प्रकार जीव और ब्रह्म का भेद सिद्ध है।।२३।। शिष्य आशंका करता है कि लोक में प्रत्येक निर्माता अपनी रचना के लिए उपादान तत्त्व के अतिरिक्त अन्य अनेक सहायक वस्तुओं को एकत्रित करता है; किन्तु जगन्नियन्ता ब्रह्म के सन्दर्भ में यह नहीं देखा जाता कि वह जगन्निर्माण के लिए किन्हीं साधन तत्त्वों का संग्रह करता हो। इससे सन्देह होता है कि जगत् निर्माण में वह (ब्रह्म) कारण है भी या नहीं? सूत्रकार आचार्य समाधान करते हैं- (१५९ ) उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि॥२४॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो, उपसंहार दर्शनात् = (घट आदि निर्माण के लिए लोक में) साधन-सामग्री का संग्रह देखा जाता है,(किन्तु ब्रह्म के पास कोई साधन नहीं) इसलिए, न = ब्रह्म जगत् का कारण नहीं है, इति न = तो, ऐसा कहना ठीक नहीं है, हि = क्योंकि, क्षीरवत् = दूध के समान ही (ब्रह्म को अन्य साधनों की अपेक्षा नहीं है)। व्याख्या- यदि यह शंका करो कि लोक में घड़ा, वस्त्र आदि के निर्माण हेतु सक्रिय कर्त्ता का होना तथा मिट्टी, चाक, डण्डा, डोरा, पानी तथा सूत, करघा आदि अनेक साधनों का संग्रह अनिवार्यतः देखा जाता है; परन्तु ब्रह्म को अकेला, निराकार, निष्क्रिय आदि कहा गया है किसी प्रकार की साधन सामग्री भी उसके पास नहीं है, इसलिए वह इस अद्भुत एवं विराट् जगत् की सृष्टि का कार्य नहीं कर सकता, तो ऐसा मानना उपयुक्त नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार दूध-अन्य बाह्य साधन की अपेक्षा के बिना अपनी स्वाभाविक शक्ति से स्वतः दही रूप में परिणत हो जाता है, उसी प्रकार परमात्मा भी अपनी स्वाभाविक संकल्प शक्ति से जगत् का स्वरूप धारण कर लेता है। शास्त्र कहता है- 'स ईक्षत लोकान्रु सृजा इति। स इमाँल्लोकानसृजत' (ऐतरेयो- पनिषद् १/१-२) अर्थात् उसने देखा अथवा संकल्प किया, लोकों को बनाऊँ, वह इन लोकों को बना देता है। मकड़ी भी अपनी शक्ति से जाला बुन डालती है, उसी प्रकार ब्रह्म भी अपनी अचिन्त्य शक्ति से ही सृष्टि की रचना करता है। ब्रह्म की अचिन्त्य शक्ति के बारे में श्रुति (श्वेता० ६/८) कहती है- उस परमात्मा को किसी साधन की आवश्यकता नहीं है, उसके समान और उससे बढ़कर भी कोई नहीं देखा जाता है। उसकी ज्ञान, बल और क्रिया रूप स्वाभाविक पराशक्ति नाना प्रकार की ही सुनी जाती है॥२४॥ अन्य साधनों के बिना संकल्प मात्र से ब्रह्म द्वारा जगत् की रचना किए जाने के सन्दर्भ में सूत्रकार अन्य उदाहरण प्रस्तुत करते हैं- (१६० ) देवादिवदपि लोके ॥।२५ ॥। सूत्रार्थ- लोके = लोक में, देवादिवत् = देव आदि के समान, अपि = भी। व्याख्या- जैसे लोक में देवता अथवा योगी आदि सिद्धगण बिना किसी साधन-सामग्री अथवा बिना किसी उपकरण आदि की सहायता के अपनी अद्भुत संकल्प शक्ति द्वारा ही बहुत से शरीर आदि की रचना कर लेते हैं, मनोवा्छित वस्तुओं-पदार्थों को प्रकट कर लेते हैं, वैसे ही ब्रह्म भी अपनी इच्छा मात्र से यदि जड़- चेतनात्मक जगत् की रचना कर दे या स्वयं उस रूप में प्रकट हो जाये, तो क्या आश्चर्य है?॥२५॥ अब मायावादियों के मत में ब्रह्मकारणवाद की अनुपपत्ति का कथन करते हैं- (१६१ ) कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा॥२६॥। सूत्रार्थ-कृत्स्नप्रसक्ति: = (ब्रह्म को इस जगत् का कारण मान लेने पर) ब्रह्म पूर्णतया जगत् रूप में परिणत
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 88
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१० वदान्त दशन हो गया (ऐसा दोष उपस्थित होगा), वा = अथवा, निरवयवत्वशब्दकोपः = उसको निरवयव बताने वाले श्रुति शब्दों से विरोध होगा। व्याख्या- ब्रह्म को जगत् का कारण मानने पर उसमें दो दोष आयेंगे। प्रथमतः ब्रह्म को अवयव रहित मानने पर अपने सम्पूर्ण रूप से जगत् के आकार में परिणत होने का दोष उस पर लगेगा, साथ ही जगत् से भिन्न ब्रह्म नाम की कोई वस्तु शेष नहीं रहेगी और यदि उसे सावयव मानें, तो उस पर दोष आयेगा कि उसके शरीर का एक अंश विकृत होकर जगत् के रूप में प्रकट हो गया और शेष अंश ब्रह्म रूप में ही स्थित है, परन्तु वह अवयवयुक्त तो है नहीं; क्योंकि श्रुति उसे निष्क्रिय, निष्कल, शान्त, निरवद्य और निरञ्जन बताती है (श्रेता. ६/१९)। अन्यत्र उसे दिव्य, अमृत आदि विशेषणों से विभूषित किया गया है (मु.उ. २/१/२)। इस स्थिति में उसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन आदि का उपदेश व्यर्थ होगा। इस दोष से बचने के लिए यदि उसे सावयव मान लिया जाये, तो उसे 'अवयवरहित, अजन्मा' आदि बताने वाले श्रुति शब्दों का विरोधी अर्थात् मरणशील मानना होगा। इसलिए ब्रह्म को जगत् का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है॥।२६।। अब शंका का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं- ( १६२ ) श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्॥२७॥ सूत्रार्थ-तु= किन्तु, श्रुतेः = श्रुति ने (ब्रह्म का स्वरूप), शब्दमूलत्वात् = अपने शब्दों में प्रमाण रूप कहा she व्याख्या- उपर्युक्त सूत्र में पूर्वपक्षी द्वारा ब्रह्म के सम्बन्ध में जिस दोष की शङ्का की गई है, वह निरर्थक है; क्योंकि ब्रह्म के बारे में विचार श्रुति पर आधारित है। श्रुति ने जिस प्रकार ब्रह्म से जगत् की उत्पत्ति बताई है, उसी प्रकार निर्विकार रूप से ब्रह्म की स्थिति का भी प्रतिपादन किया है। श्वेताश्वतर- (६/१६/१९) श्रुति ने ब्रह्म को निर्विकार, नित्य, निष्क्रिय बताने के साथ ही अभिन्न रूप से जगत् का निमित्त एवं उपादान कारण कहा है। वेद ने उस परब्रह्म को अवयवरहित बताने के साथ ही सम्पूर्ण रूप से जगत् के आकार में परिणत होना नहीं कहा है। छान्दोग्य उपनिषद् (३/१२/६) 'तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुष: पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' के अनुसार यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म के एक पाद में स्थित है, शेष अमृत स्वरूप तीन पाद परमधाम में स्थित हैं। अतः ब्रह्म को जगत् का कारण मानने में पूर्वोक्त दोष नहीं प्राप्त होते हैं।२७।। इसी प्रसङ्ग को आचार्य युक्ति से भी पुष्ट करते हैं- (१६३ ) आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि॥२८॥ सूत्रार्थ- च = और, हि = क्योंकि, आत्मनि = जीवात्मा में, च = भी, एवम् = ऐसी, विचित्राः = विचित्र सृष्टियाँ (देखी जाती हैं)। व्याख्या- पूर्व सूत्र में ब्रह्म के विषय में केवल श्रुति प्रमाण उपस्थित किये गये, उसके सिवा अन्य प्रमाणों से भी बात समझी जा सकती है कि निरवयव परब्रह्म से इस अद्भुत सृष्टि का उद्भव असंगत नहीं है; क्योंकि स्वप्नावस्था में भी अवयवरहित इस निर्विकार जीवात्मा द्वारा अनेक प्रकार की विचित्र रचना होती देखी जाती है। योगीजन भी अपनी योग शक्ति के बल पर अनेक प्रकार की रचनाएँ करते हुए देखे गये हैं। प्रबल इच्छाशक्ति के आधार पर बहुत से आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न होते देखे जाते हैं। प्राचीन ऋषियों-विश्वामित्र, च्यवन, भरद्वाज, वसिष्ठ तथा उनकी नंदिनी नामक धेनु आदि में अद्भुत सृष्टि निर्माण की शक्ति का वर्णन पुराण ग्रन्थों में पाया जाता है। ऋषियों-तपस्वियों ने अपने शाप-वरदान के बल पर बहुतों को भस्म एवं जीवित कर दिया। इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि जब ऋषि-मुनि आदि विशिष्ट जीव कोटि के लोगों में अपने
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 89
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० १ सूत्र ३१ ९१ अविकृत स्वरूप में विचित्र सृष्टि-सर्जना की सामर्थ्य हो सकती है, तब परमात्मा में ऐसी शक्ति का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है अर्थात् ब्रह्म की रचना-शक्ति का जो वर्णन श्रुति ने किया है, वह यथार्थ है।।२८।। सांख्यवादियों के मतानुसार भी अवयव रहित वस्तु से सावयव जगत् की सृष्टि पायी जाती है। अतः- (१६४ ) स्वपक्षदोषाच्च॥२९॥ सूत्रार्थ-स्वपक्षदोषात् = अपने पक्ष में दोष से, च = भी (ब्रह्म को ही जगत् का कारण मानना ठीक है)। व्याख्या-सांख्यमतानुसार यदि प्रधान को जगत् का कारण मान लिया जाये, तो उसमें भी कई दोष मिलेंगे; क्योंकि वह श्रुति से तो प्रमाणित है ही नहीं; युक्ति से भी नहीं है। निरवयव जड़ प्रधान से सावयव सजीव जगत् की उत्पत्ति की मान्यता विरोधाभासी है; क्योंकि सांख्यवादी भी ब्रह्म की भाँति प्रधान को भी सीमित या सावयव नहीं मानते। अतः जिन दोषों का आरोपण वे ब्रह्म में करते हैं, उन सभी दोषों से प्रधान भी मुक्त नहीं है। अस्तु, श्रुति द्वारा प्रमाणित ब्रह्म ही जगत् का अभिन्न, निमित्त एवं उपादान कारण है।।२९।। सांख्यवादियों की मान्यता को त्रुटिपूर्ण बताने के बाद अब अपने सिद्धान्त की निर्दोषता सिद्ध करने हेतु सूत्रकार कहते हैं- (१६५ ) सर्वोपेता च तद्दर्शनात् ॥३० ।। सूत्रार्थ- च = और, वह (परब्रह्म परमेश्वर), सर्वोपेता = सब शक्तियों से युक्त है, तद्दर्शनात् = क्योंकि श्रुति में ऐसा ही देखा जाता है। व्याख्या- वह ब्रह्म सम्पूर्ण शक्तियों से परिपूर्ण है, ऐसा वेद में जगह-जगह कहा गया है। छान्दोग्य (३/१४/ २) में कहा गया है- 'सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा ...... ' अर्थात् 'वह ब्रह्म सत्यसंकल्प, आकाशस्वरूप, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, समस्त जगत् को सब ओर से व्याप्त करने वाला, वाणी रहित और मानरहित है।' मुण्डकोपनिषद् (१/१/९) कहती है- 'यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः' अर्थात् 'जो सर्वज्ञ, सबको जानने वाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उसी परब्रह्म से यह विराट् रूप जगत् और नाम, रूप तथा अन्न उत्पन्न होते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् (२/१/१) के 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस वाक्य ने ब्रह्म को सत्य, ज्ञान और अनन्त कहकर उसे महान् शक्तिशाली सिद्ध किया है। इस प्रकार अनेक महत् शक्तियों से सम्पन्न उस परब्रह्म परमात्मा से इस विचित्र जगत् का उद्भव अयुक्त नहीं है।३०। अब उक्त अर्थ में शंका उठाकर सूत्रकार उसका निराकरण करते हैं- (१६६ ) विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम्॥३१॥ सूत्रार्थ-विकरणत्वात् = वह ब्रह्म मन, इन्द्रिय आदि करणों से रहित है, न = इसलिए (वह) जगत् का कारण नहीं है, चेत् = यदि, इति = ऐसा कहो, तदुक्तम् = तो उसका उत्तर दिया जा चुका है। व्याख्या-श्वेताश्वतर (६/८) के अनुसार यदि कहो कि ब्रह्म शरीर, बुद्धि, मन, इन्द्रिय आदि करणों से रहित होने के कारण जगत् की रचना करने में समर्थ नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि इसका उत्तर पहले के सूत्र 'सर्वोपेता च तद्दर्शनात्' में दे दिया गया है। शास्त्र में जहाँ ब्रह्म को चक्षु आदि इन्द्रियों से रहित कहा गया है, वहीं उसे समस्त शक्तियों से युक्त एवं समस्त अर्थों का नियन्ता, प्रेरयिता व जगत्कर्त्ता कहा गया है। श्रुति इस सम्बन्ध में स्पष्ट कहती है- 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः' अर्थात् उसके हाथ-पैर तो नहीं हैं, पर इनके बिना भी वह सर्वत्र प्राप्त है, सबको धारण किये है। उसके चक्षु नहीं हैं, पर सबको देखता है, श्रोत्र नहीं, पर सबको सुनता है। बृहदारण्यक (३/८/११) में कहा- समस्त इन्द्रियाँ मिलकर भी उसे जानने-समझने में असमर्थ हैं, पर वह सबका द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, विज्ञाता है। केनोपनिषद् (१/१-८) के अनुसार समस्त इन्द्रिय आदि में विविध शक्ति का संचारकर्त्ता वही ब्रह्म है। वह
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 90
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
९२ वदान्त दशन अनन्त शक्ति का भण्डार है। इसलिए ब्रह्म ही जगत् का कारण सिद्ध होता है।३१।। अब यहाँ जिज्ञासु शिष्य के मन में दूसरे प्रकार की आशंका उपस्थित होने पर सूत्रकार उसे सूत्रबद्ध करते हैं- (१६७) न प्रयोजनवत्त्वात् ॥३२।। सूत्रार्थ-न = (ब्रह्म जगत् का कारण) नहीं, प्रयोजनवत्त्वात् = प्रयोजन युक्त होने से। व्याख्या-लोक में जीव की समस्त प्रवृत्तियाँ प्रयोजन से युक्त दिखाई पड़ती हैं। प्रयोजन अपना और पराया दो तरह का हो सकता है, किन्तु ब्रह्म का इस जगत् की रचना में अपना कोई प्रयोजन दिखाई नहीं देता; क्योंकि शास्त्र उसे आप्तकाम, अकाम और आनन्दस्वरूप बताता है। ऐसे ब्रह्म का जगत् रचना में अपना कोई स्वार्थ सम्भव नहीं। यदि जीवों पर अनुग्रह की भावना से इस जगत् की रचना ब्रह्म द्वारा किया जाना माना जाये, तो वह संसार को सुखमय बनाता अन्यथा अनुग्रह कैसा? परन्तु दुःखमय संसार में जीवों को कोई सुख मिलता हो, ऐसी बात भी दिखाई नहीं देती। अतः जगत् रचना में ब्रह्म का कोई प्रयोजन दिखाई न देने के कारण उसकी प्रवृत्ति सम्भव नहीं लगती, फलतः ब्रह्म को जगत् का कारण नहीं मानना चाहिए।३२।। पूर्वोक्त जिज्ञासा का आचार्य सूत्रकार ने समाधान किया- (१६८) लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्।।३३।। सूत्रार्थ-तु=तो, लोकवत् = लोक में (आप्तकाम पुरुषों के समान), लीला कैवल्यम् (सृष्टि रचना का उद्देश्य) केवल लीला ही है। व्याख्या-जिस प्रकार लोक में देखा जाता है कि आसकाम, वीतराग महापुरुष जो कि परमात्मतत्त्व को प्राप्त हो चुके होते हैं, जिनका कर्म करने या न करने से कोई प्रयोजन नहीं होता, फिर भी निःस्वार्थ भाव से फल की आकांक्षा के बिना जगत् के कल्याण हेतु स्वभावतः कर्म करते हैं। उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मा के स्वयं में परिपूर्ण होने पर भी सृष्टि रचना में उसकी प्रवृत्ति केवल लीला मात्र है। यद्यपि संसारी जीवों की दृष्टि में यह सृष्टि सृजन का कार्य बड़ा ही गुरुतर एवं दुष्कर है, तथापि सर्वसमर्थ परमात्मा के लिए जो कि अपनी अनंत शक्तियों द्वारा कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों का सृजन एवं संहार करने में समर्थ हैं, यह लीला मात्र है। अतः बिना प्रयोजन ब्रह्म द्वारा सृष्टि सृजन का कार्य होना उचित ही है॥३३ अब शिष्य आशंका करता है कि ब्रह्म द्वारा जगत् की रचना में विषमता तथा निर्दयता का दोष दिखाई देता है, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि लाखों प्रकार की योनियों में उत्पन्न की गई आत्माओं में से वह देवता आदि को अधिक सुखी स्थिति में, मनुष्यों को सुख-दुःख से परिपूर्ण मध्यम स्थिति में तथा मनुष्येतर प्राणियों को अत्यन्त कष्टपूर्ण परिस्थितियों में डाल देता है। अतः सुखी बनाने वालों के प्रति उसका राग या पक्षपात का भाव दिखता है तथा दुःखी बनाने वालों के प्रति उसकी द्वेष-बुद्धि या निर्दयता दिखती है। इस दोष का निराकरण करने के लिए सूत्रकार कहते हैं- (१६९ ) वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति॥३४॥ सूत्रार्थ- वैषम्यनैर्घृण्ये - विषमता और निर्दयता का दोष (ब्रह्म को), न = नहीं लगता, सापेक्षत्वात् = (क्योंकि वह) जीवों के शुभाशुभ कर्मों की अपेक्षा से सृष्टि रचना करता है, तथा हि = ऐसा ही, दर्शयति = श्रुति दिखलाती है। व्याख्या- ब्रह्म पर विषमता एवं निर्दयता आदि दोषों के निराकरण में श्रुति कहती है, 'पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पाप: पापेन' (बृह०उ० ३/२/१३) अर्थात् यह जीव पुण्य कार्य से पुण्यवान् और पाप करने से पापी होता है, तो पाप कर्म करने वाले का दुःख भोगना स्वाभाविक है, इसमें निर्दयता कैसी? यदि पापी व्यक्ति स्वर्ग का सुख प्राप्त करे, तो पुण्य कर्म कोई नहीं करेगा? क्योंकि लोगों की प्रवृत्ति पुण्य कर्मों की अपेक्षा पाप कर्मों में सहज होती है। इसी उत्तर से विषमता के आरोप का भी निराकरण हो जाता है; क्योंकि
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 91
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० १ सूत्र ३६ ९३ अच्छे कर्म करने वाले का सुखी एवं सदाचारी कुल में जन्म पाना स्वाभाविक और न्याय सङ्गत है। यदि बुरे कर्म करने वालों को उच्च योनि तथा अच्छा कर्म करने वालों को अधम योनि प्राप्त होने लगे, तो ब्रह्म पर अन्यायी होने का दोष लगेगा। इससे सिद्ध हुआ कि जीव अपने कर्मानुसार ही श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट योनि को प्राप्त करता है और उसी के अनुरूप सुख-दुःख आदि फल भोगों को भोगता है। स्मृतियों में भी जगह-जगह जीवों को अपने शुभाशुभ कर्मों के अनुसार सुख-दुःख प्राप्त होने की बात कही गई है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है- 'कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्' अर्थात् 'पुण्यकर्म का फल सात्त्विक एवं निर्मल है।' इन प्रमाणों से ब्रह्म में उक्त दोषों का अभाव सिद्ध होता है।३४।। उपर्युक्त सूत्र में कही गई बात पर आशंका प्रकट कर आचार्य उसका निराकरण प्रस्तुत करते हैं- ( १७० ) न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात्॥३५॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो, कर्माविभागात् = (जगत् की उत्पत्ति से पहले) जीव और उसके कर्मों का ब्रह्म से अविभाग था, न = इसलिए परमात्मा कर्मों की अपेक्षा से सृष्टि करता है, यह कहना ठीक नहीं है, इति न = ऐसा नहीं है, अनादित्वात् = क्योंकि जीव और उनके कर्म अनादि हैं। व्याख्या-उपनिषद् (छा० ६/२/१) में कहा गया है कि जगत् की उत्पत्ति से पहले तो एक मात्र सत् स्वरूप ब्रह्म ही था। इससे यह सिद्ध होता है कि उस समय भिन्न-भिन्न जीवों और उनके कर्मों का कोई विभाग नहीं था। ऐसी दशा में यह कहना कि ब्रह्म जगत् की विषम रचना में जीवात्माओं के शुभाशुभ कर्मों की अपेक्षा करता है, असंगत है; क्योंकि उत्पत्ति के पूर्व जब कर्मों का अस्तित्व ही नहीं, तो जगत् रचना में उनकी अपेक्षा कैसी? अतः ऐसे वैषम्य जगत् का कारण सर्वज्ञ ब्रह्म को नहीं कहा जा सकता। सूत्रकार इसका निराकरण करते हुए कहते हैं कि ब्रह्म के सन्दर्भ में ऐसी आशंका अयोग्य है; क्योंकि गत सूत्रानुसार विषम जगत् की ब्रह्म द्वारा रचना का आधार जीवों के शुभाशुभ कर्म ही हैं। यह मानना कि सृष्टि रचना के पूर्व जीवात्माओं के कर्म असंभव हैं, सर्वथा असंगत है। कारण यह है कि जीवात्मा का स्वरूप और उसके कर्म अनादि हैं। पुराने कर्मों का भोगा जाना और नये कर्मों का किया जाना, यह क्रम अनादि काल से जारी है। जिन कर्मों का फल भोग लिया जाता है, उनका तो क्षय हो जाता. है, शेष संस्कार रूप से जीवात्माओं में अवस्थित रहते हैं। कर्मों का यह प्रवाह अनादि होने से अनवस्था दोष नहीं लगता। ऋग्वेद (१०/१९०/३) कहता है- 'सूर्यचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्' अर्थात् ब्रह्म ने पूर्व कल्प के समान ही सृष्टि रचना की। इससे सिद्ध होता है कि जीवों के संचित संस्कारों के अनुसार ही ब्रह्म उन्हें कर्मों में प्रेरित करता है। वह जीवों के स्वभाव एवं रूपादि को परिवर्तित नहीं करता। अस्तु, ब्रह्म में किसी प्रकार का दोषारोपण सिद्ध नहीं होता।३५। अब शिष्य जिज्ञासा प्रकट करता है कि जीव और उसके कर्म अनादि हैं, इसमें प्रमाण क्या है? सूत्रकार इसका समाधान करते हैं- ( १७१ ) उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥३६॥ सूत्रार्थ-च = तथा, उपपद्मते = (जीव और उनके कर्मों का अनादि होना) युक्ति प्रमाण से सिद्ध है, च = और, उपलभ्यते अपि - श्रुति में भी ऐसा ही पाया जाता है। व्याख्या- जीवात्मा स्वरूप से अनादि है। युक्ति एवं तर्क के आधार पर जीवात्मा के कर्म और उसका कार्य क्षेत्र- यह संसार अनादि सिद्ध होता है; क्योंकि यदि इनको अनादि नहीं माना जायेगा, तो जगत् की विषम रचना और जीवों को विविध सुख-दुःख की प्राप्ति बिना कारण के माननी होगी, जो सर्वथा असंगत है। इससे
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 92
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
९४ वेदान्त दर्शन कार्य-कारण की व्यवस्था तथा सम्पूर्ण जगत् का व्यवहार प्रभावित होगा अथवा प्रलयकाल में ब्रह्म को प्राप्त हुए जीवों के पुनरागमन मानने का दोष या सभी जीवों के स्वयं मुक्त हो जाने का दोष स्वीकार करना होगा। इससे शास्त्र में वर्णित सभी साधन व्यर्थ सिद्ध होंगे, जो कि सर्वथा अनुचित है। जीव और उसके कर्मों के अनादि होने का संकेत शास्त्र में भी उपलब्ध होता है। 'अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे' (कठोपनिषद् १/२/१८) अर्थात् यह जीवात्मा नित्य, शाश्वत और पुरातन है तथा देह के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होता। उक्त कथन के अनुसार यदि जीव अनादि है, तो उसके कर्म भी अनादि होने में क्या सन्देह है?॥३६।। स्वपक्ष में अविरोध प्रमाणित करने के लिए आरम्भ किये हुए इस प्रथम पाद का उपसंहार करते हुए सूत्रकार ने अंतिम सूत्र कहा- (१७२) सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥३७॥ सूत्रार्थ- सर्वधर्मोपपत्तेः = सभी धर्मों की ब्रह्म में सङ्गति होने से, च = भी (यह मत ठीक है)। व्याख्या- द्वितीय अध्याय के इस प्रथम पाद में स्मृति एवं तर्क निमित्तक उन विरोधों का समाधान किया गया, जो जगत् की रचना में अपेक्षित कारणों के विषय में प्रस्तुत किये गये। इस प्रकार यह प्रकरण सृष्टि रचना में अपेक्षित कारणों का निश्चय करता है। चेतन ब्रह्म इस जगत् का निमित्त कारण, नियन्ता व अधिष्ठाता है। परब्रह्म परमात्मा में सभी धर्मों की संगति है; क्योंकि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वधर्मा, सर्वाधार और सब कुछ बनाने में समर्थ है। इसलिए वह सगुण भी है और निर्गुण भी, सम्पूर्ण जगत् व्यापार से रहित होकर भी वह सब कुछ करने वाला है। वह व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। इस प्रकार विवेचन से यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्म को जगत् का कारण मानने में कोई भी दोष अथवा विरोध नहीं है। इस पाद के अन्त में आचार्य ने जीव और उनके कर्मों को अनादि बतलाकर इस जगत् की अनादि सत्ता एवं सत्कार्यवाद की सिद्धि की है। अतः स्पष्ट हो जाता है कि ग्रन्थकार ब्रह्म को मात्र निर्गुण, निराकार और निर्विशेष ही नहीं मानते, अपितु सर्वज्ञता आदि सब धर्मों (लक्षणों) से सम्पन्न भी मानते हैं।३७॥
॥ इति द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
Disclaimer / Warning: All Iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 93
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
॥ अथ द्वितीयाध्याये द्वितीयः पादः॥ प्रथम पाद में सूत्रकार द्वारा मुख्य रूप से अपने पक्ष में प्रतीत होने वाले सम्पूर्ण दोषों का निराकरण करके यह सुनिश्चित कर दिया गया कि इस जगत् का निमित्त और उपादान कारण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिशाली, सर्वान्तर्यामी, सर्वनियन्ता ब्रह्म ही है। अब अन्य लोगों के द्वारा बताये गये जगत् कारणों को स्वीकारने में जो-जो दोष आते हैं; उनका प्रकटीकरण करते हुए अपने सिद्धान्त की पुष्टि के लिए दूसरा पाद आरम्भ किया जाता है कि सांख्योक्त 'प्रधान' को जगत् का कारण मानना तर्क संगत नहीं है- (१७३) रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम्॥१।। सूत्रार्थ-च = और, अनुमानम् = जो केवल अनुमान है, वह प्रधान; न = जगत् का कारण सिद्ध नहीं हो सकता; रचनानुपपत्तेः - क्योंकि उसके द्वारा नाना प्रकार की रचना सम्भव नहीं है। व्याख्या-सांख्य मत वालों के द्वारा वर्णित 'प्रधान' या 'प्रकृति' को जगत् का कारण नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि वह चेतन नहीं, जड़ है। जड़ प्रकृति में रचना करने का अथवा सुव्यवस्था का ज्ञान नहीं होता। कब, कहाँ, किस वस्तु की आवश्यकता है, इस बात का विचार जड़ प्रकृति नहीं कर सकती, अतः उसके माध्यम से ऐसी विशिष्ट रचना नहीं प्रस्तुत की जा सकती, जिससे किसी की आवश्यकता पूर्ण हो सके। चेतनकर्त्ता की प्रेरणा के बिना जड़ वस्तु स्वयं कुछ करने में समर्थ भी नहीं है। जैसे जड़ रूप ईंट किसी भवन के निर्माण में दीवार में लगाई तो जाती है, पर वह ईंट चिनाई का कार्य नहीं कर सकती, वह कार्य तो चेतन रूप बुद्धियुक्त कुशल कारीगर ही कर सकता है। अथवा जैसे काष्ठ के घोड़े को सुख-दुःख आदि व्याप्त नहीं होता; क्योंकि सुख-दुःख का व्याप्त होना तो अनुभूति का विषय है और वह अनुभूति तो केवल चेतन जीव को ही हो सकती है। इस प्रकार मिट्टी, पत्थर, काष्ठादि जड़ पदार्थों में अपने-आप रचना करने की कोई शक्ति नहीं देखी जाती और न ही संवेदनात्मक अनुभूति पायी जाती है। अतः यह सिद्ध नहीं होता कि जड़ प्रधान इस विचित्र जगत् की सृष्टि का कारण है॥१। सूत्रकार अब दूसरी युक्ति से प्रधान कारणवाद का खण्डन करते हैं- ( १७४ ) प्रवृत्तेश्च ॥।२।। सूत्रार्थ- प्रवृत्ते: = सृष्टि रचना में जड़ प्रकृति का प्रवृत्त होना, च = भी (सिद्ध नहीं होता)। व्याख्या- चेतन द्वारा ही जड़ वस्तु को किसी कार्य में प्रवृत्त किया जा सकता है, अन्यथा किसी प्रकार की रचना करना तो दूर, रचना कार्य के लिए जड़ प्रकृति में किसी चेतन की सहायता के बिना प्रवृत्ति भी सम्भव नहीं दिखती। यहाँ रथ और सारथि का उदाहरण उपयुक्त बैठता है; क्योंकि रथ जड़ है और सारथि चेतन। चेतन सारथि ही जड़ रथ को चलाने में प्रवृत्त करता है। अतः यह सिद्ध होता है कि जड़ 'प्रधान' द्वारा जगत् रचना का कार्य कदापि सम्भव नहीं है।।२।। यहाँ पूर्वपक्षी द्वारा आशंका प्रकट की जाती है कि लोक में अनेक जड़ पदार्थों में स्वतः प्रवृत्ति होती है। बछड़े के लिए गाय के थनों में दूध स्वतः प्रवृत्त हो जाता है, जल स्वतः प्रवहमान रहता है। अतः जड़ में ऐसी ही प्रवृत्ति मानी जा सकती है। सूत्रकार उक्त दृष्टान्तों में भी चेतन का सहयोग दिखलाकर अपना पक्ष सिद्ध करते हैं- (१७५) पयोऽम्बुवच्चेत्तत्रापि।३।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो, पयोऽम्बुवत् = दूध और जल की तरह (जड़ प्रधान द्वारा जगत् रचना के लिए प्रवृत्त होना सम्भव है, तो), तत्रापि = उसमें भी (चेतन की ही प्रवृत्ति है)। व्याख्या-दूध और जल आदि अचेतन वस्तुएँ चेतन की प्रेरणा से ही प्रेरित होकर अपने कार्य में प्रवृत्त होती हैं। यदि यह शङ्का करो कि अचेतन जल लोगों के उपकार के लिए स्वयं ही नदी-निर्झर आदि के रूप में
Disclalmer / Warning: All iterary and artistic material on this webelte is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 94
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
९६ वदान्त दशन बहता रहता है अथवा अचेतन दूध बछड़े की पुष्टि के लिए स्वयं ही गाय के थन में उतर आता है, तो यह शङ्का व्यर्थ है; क्योंकि इन दृष्टान्त स्थलों में भी चेतन का सहयोग है। स्तनों में दूध की प्रवृत्ति, देह में चेतन आत्मा के रहने पर ही सम्भव है। माता के मृत देह से क्षीरपायी शिशु कभी दूध नहीं पा सकता। कुछ समय पूर्व दूध पिलाकर अचानक मर जाने वाली गाय के थनों में दूध की मात्रा रहने पर भी बच्चे के लिए उसके स्तनों में दूध उतरता नहीं देखा जाता। इससे यह प्रमाणित होता है कि दुग्ध स्नाव में चेतन की प्रेरणा ही प्रवृत्त करती है। इसी प्रकार जल तथा अन्य द्रव्य पदार्थ स्वभावतः निम्नानुगामी होते हैं। पदार्थों का ऐसा विशिष्ट स्वभाव, विश्व का संचालन, लोक-गति का नियंत्रण अव्यक्त चेतन ब्रह्म की प्रेरणा द्वारा ही होता है। बृहदारण्यक (३/७/४) में कहा गया है- 'अपोऽन्तरो यमयति' अर्थात् जो जल के अन्दर रहने वाला है और उसके भीतर रहकर उसका नियमन करता है, ऐसा वह ब्रह्म है। आगे कहा- 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि! प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दते (बृ०उ० ३/८/९) अर्थात् हे गार्गि! इस अविनाशी चेतन तत्त्व ब्रह्म के प्रशासन में ही पूर्ववाहिनी तथा अन्य नदियाँ निरन्तर बह रही हैं। इन श्रुति वाक्यों से सिद्ध होता है कि समस्त जड़ वस्तुओं का संचालक चेतन ब्रह्म ही है। गाय के अयन में दूध उतरना, चेतन गौ के वात्सल्य और बछड़े के चूसने के कारण होता है। इसी प्रकार निचली सतह की ओर स्वभावतः बहने वाला जल लोगों के उपकार के लिए स्वयं उठकर ऊँची भूमि पर नहीं चला जाता; परन्तु चेतन ज्ञानवान् मनुष्य अपने प्रयत्न से जल प्रवाह को जिधर चाहें मोड़ सकते हैं। अस्तु, प्रत्येक प्रवृत्ति में चेतन की अपेक्षा सर्वत्र देखी जाती है, अतः किसी भी युक्ति से जड़ प्रधान का स्वतः सृष्टि रचना में प्रवृत्ति सिद्ध नहीं होती।३।। आचार्य प्रकारान्तर से प्रधानकारणवाद का खण्डन करते हैं- (१७६ ) व्यतिरेकानवस्थितेश्च अनपेक्षत्वात् ॥४॥ सूत्रार्थ- व्धतिरेकानवस्थितेः = प्रकृति के विपरीत भाव में अवस्थित न होने से, च = और, अनपेक्षत्वात् = प्रधान के अपेक्षा रहित होने से भी। व्याख्या- जड़ प्रकृति का नियामक पृथक् न मानने से सांख्यमतावलम्बियों के अनुसार त्रिगुणात्मक 'प्रधान' के सिवा जगत् का कोई दूसरा कारण, प्रेरक या प्रवर्तक नहीं है। पुरुष उदासीन है, वह न तो 'प्रधान' का प्रवर्तक है, न निवर्तक। ऐसी अवस्था में जड़ प्रकृति कभी तो महत्तत्त्वादि विकारों के रूप में परिणत होता है, कभी नहीं होता है, यह कैसे युक्ति संगत होगा। यदि उसका स्वभाव जगत् की उत्पत्ति करना है, तो सुषुप्ति अथवा प्रलय कार्य में वह प्रवृत्त कैसे होगा? इस प्रकार जड़ प्रकृति रूप प्रधान जगत् का कर्त्ता, धर्त्ता नहीं हो सकता। यह कार्य तो केवल परब्रह्म परमात्मा का ही है॥४॥ घास से दूध बनने की तरह जड़ तत्त्व स्वतः जगत् रूप में परिणत हो सकता है, शिष्य के इस कथन को असंगत सिद्ध करते हुए सूत्रकार कहते हैं- (१७७) अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥५।। सूत्रार्थ- अन्यत्र = दूसरी जगह, अभावात् = वैसे परिणाम का अभाव होने के कारण, च = भी, न = नहीं सिद्ध होता, तृण्पादिवत् = तृण आदि के समान (प्रधान का जगत् के रूप में परिणत होना)। व्याख्या- गौ द्वारा खाया गया तिनका, घास, पानी आदि खाद्य यदि बिना किसी अन्य निमित्त की अपेक्षा के स्वतः दूध बन जाता है, तो बैल आदि नर पशुओं में भी वैसा ही परिणाम दृष्टिगोचर होना चाहिए; पर ऐसा नहीं होता। अतः मानना होगा कि वहाँ कोई विशेष निमित्त अवश्य है, जिस कारण गौ, भैंस, बकरी आदि के पेट में गये हुए तृण आदि से ही दूध बनता है, बैल, भैंसा, बकरा आदि के पेट में गये तृण से नहीं। मादा पशुओं
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 95
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० २ सूत्र ७ ९७ में भी सदैव ऐसा नहीं होता, केवल प्रसूता मादा में ही ऐसा देखा जाता है, इससे सुनिश्चित होता है कि इसका निमित्त कोई विशिष्ट चेतन अवश्य है। अतः यह सिद्ध होता है कि विशिष्ट चेतन के सहयोग के बिना जड़ पदार्थ का रूप परिवर्तन सम्भव नहीं हो सकता। इस प्रकार जड़ प्रकृति का जगत् के रूप में परिणत न हो सकना स्पष्ट है।।५॥ जड़ प्रधान में जगत् रचना की स्वाभाविक प्रवृत्ति का प्रकारान्तर से सूत्रकार समाधान करते हैं- ( १७८ ) अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात्॥६॥। सूत्रार्थ- अभ्युपगमे - स्वीकार कर लेने पर, अपि = भी, अर्थाभावात् = कोई प्रयोजन न होने से (यह मान्यता निरर्थक ही होगी)। व्याख्या- यद्यपि चेतन की प्रेरणा के बिना जड़ प्रकृति द्वारा सृष्टि की रचना आदि कार्य में प्रवृत्त होना कदापि सम्भव नहीं है, तथापि यदि ऐसा मान भी लें, कि स्वभावतः 'प्रधान' जगत् की रचना के कार्य में प्रवृत्त हो सकता है, तो इसके लिए कोई प्रयोजन नहीं दिखता; क्योंकि 'पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य' (सांख्य का० २१) में माना गया है कि पुरुष के दर्शन और मोक्ष के लिए प्रधान की प्रवृत्ति है, परन्तु उन्हीं की मान्यता के अनुसार पुरुष असङ्ग, चैतन्यमात्र, निष्क्रिय, निर्विकार, उदासीन, निर्मल तथा नित्य शुद्ध-बुद्ध मुक्तस्वभाव है। अतः उसके लिए दर्शन रूप भोग तथा उससे विमुक्ति रूप अपवर्ग दोनों की क्या आवश्यकता है? फलतः सांख्य का मान्य प्रयोजन व्यर्थ ही है। इस प्रकार जड़ प्रधान की जगद्रचना के कार्य में स्वतः प्रवृत्ति की बात मानना निरर्थक है॥६॥ आचार्य प्रकारान्तर से सांख्यमत की मान्यता को दोषयुक्त सिद्ध करते हैं- (१७९ ) पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि।।७।। सूत्रार्थ- पुरुषाश्मवत् = अंधे और पंगु पुरुषों तथा लोहे और चुम्बक के संयोग की भाँति (प्रकृति-पुरुष के संयोग से जड़ प्रकृति प्रवृत्त होती है), चेत् = यदि, इति = ऐसा कहो, तथापि = तो भी (सांख्यमत की सिद्धि नहीं होती)। व्याख्या-जैसे पंगु और अंधे परस्पर मिलकर चल सकते हैं और गन्तव्य तक पहुँच सकते हैं; क्योंकि पंगु देख सकता है और अंधा चल सकता है। इस प्रकार पंगु अंधे के कंधे पर बैठकर मार्गदर्शन करता हुआ अभीष्ट स्थान पर ले जा सकता है, अथवा जैसे लोहे और चुम्बक का संयोग होने पर लोहे में क्रिया शक्ति आ जाती है, वैसे ही पुरुष और प्रकृति मिलकर सृष्टि रचना का कार्य करते हैं। यदि सांख्यवादियों की इस बात को मान भी लिया जाये, तो यह कहना अभीष्ट है कि पंगु और अंधे दोनों चेतन हैं। एक गमन शक्ति से रहित होने पर भी देखने की शक्ति रखता है तथा बुद्धियुक्त है, दूसरा देखने की शक्ति से हीन होने पर भी गमन शक्ति एवं बौद्धिक शक्ति से सम्पन्न है। एक का प्रेरणा संकेत समझकर दूसरा उसके अनुसार गतिमान् होता है, तभी गन्तव्य तक पहुँचता है, अतः यहाँ चेतन का सहयोग स्पष्ट ही है। इसी प्रकार लोहे और चुम्बक को नजदीक लाने का कार्य चेतन पुरुष ही करेगा। चेतन पुरुष के सहयोग के बिना प्रथम तो लोहे को चुम्बक की समीपता प्राप्त नहीं होती, समीपता प्राप्त होने पर भी दोनों के एक दूसरे से सट जाने के कारण लोहे में अभीष्ट क्रियाशक्ति उत्पन्न नहीं होती, उक्त दोनों ही कार्यों में चेतन पुरुष का बौद्धिक व क्रियात्मक सहयोग अपेक्षित होता है। अतः इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि चेतन की प्रेरणा होने से ही अचेतन प्रकृति सृष्टि कार्य में प्रवृत्त हो सकती है, अन्यथा नहीं॥9॥ अगले सूत्र में सूत्रकार प्रधान कारणवाद को निरस्त करने के लिए दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं-
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 96
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१८ वदान्त दशन
सूत्रार्थ- अङ्गित्वानुपपत्तेः = (सत्त्व, रज, तम गुणों के उत्कर्ष और अपकर्ष रूप) अंग और अंगी भाव सिद्ध न होने से, च = भी (प्रधान को जगत् का कारण नहीं मान सकते)। व्याख्या- सांख्यमत में तीनों गुणों की साम्यावस्था का नाम ही 'प्रधान' है। यदि गुणों की समान अवस्था को स्वाभाविक माना जाये, तब तो कोई गुण किसी गुण का अंगी नहीं होगा। अतएव गुणों में विषमता न होने के कारण अंग और अंगी के भाव की सिद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि गुणों में ह्रास होने पर घटे हुए गुण को अंग और गुणों में वृद्धि से बढ़े हुए गुण को अंगी मानते हैं। इस प्रकार यदि गुणों की विषमता को ही स्वाभाविक माना जाये, तब तो सदैव जगत् की सृष्टि का ही क्रम चलता रहेगा, प्रलय कभी होगा ही नहीं। यदि पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति के गुणों में क्षोभ मान लें, तब तो पुरुष को असङ्ग और निष्क्रिय मानना नहीं बन सकेगा। यदि परमात्मा को प्रेरक माना जाये, तो यह ब्रह्म कारणवाद को ही स्वीकार करना पड़ेगा। इस प्रकार सांख्यमत के अनुसार गुणों की विषमता को सृष्टि का कारण नहीं मान सकते। अतः प्रधान को जगत् का कारण मानना असङ्गत है।।८।। शिष्य जिज्ञासा करता है कि यदि अन्य तरीकों से गुणों की साम्यावस्था भंग होकर प्रकृति के द्वारा जगत् की उत्पत्ति होती है, ऐसा मान लिया जाये, तो क्या हानि है? आचार्य ने समाधान किया- (१८१ ) अन्यथाऽनुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात्॥।९।। सूत्रार्थ- अन्यथा = अन्य प्रकार से, अनुमितौ = अनुमान करने पर, च = भी, ज्ञशक्ति वियोगात् = प्रधान में ज्ञान-शक्ति के अभाव के कारण (रचना कार्य सम्भव नहीं है)। व्याख्या- यदि गुणों की विषमता का होना काल आदि अन्य कारणों से भी मान लिया जाये, तो भी प्रधान में ज्ञान शक्ति का अभाव तो है ही। इसलिए उसके द्वारा बुद्धिपूर्वक कोई रचना नहीं हो सकती; क्योंकि ज्ञान शक्ति के बिना किसी प्रकार की रचना या निर्माण कार्य असम्भव होता है। जिस प्रकार घर, वस्त्र एवं घट आदि जड़ वस्तुओं का निर्माण कोई बुद्धिमान् चेतन कर्त्ता ही कर सकता है, उसी प्रकार अनन्त-असीम ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत कोटि-कोटि जीव समूहों के विविध शरीर एवं वृक्ष-वनस्पतियों-अन्नादि की बुद्धिपूर्वक होने वाली रचना जड़-प्रकृति के द्वारा सम्भव नहीं है। ऐसी विशाल, सर्वाङ्ग सुन्दर एवं सर्वोत्कृष्ट रचना तो सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ एवं सनातन परब्रह्म की सत्ता द्वारा ही शक्य है। अतः जड़ प्रधान को जगत् का कारण मानना नितान्त असङ्गत है।।९। सांख्य दर्शन की असमीचीनता बताते हुए सूत्रकार अब प्रकरण का उपसंहार करते हुए कहते हैं- (१८२ ) विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ॥१०॥ सूत्रार्थ- विप्रतिषेधात् = परस्पर के विरोधी कथन से, च = भी, असमञ्जसम् = सांख्यदर्शन समीचीन नहीं
व्याख्या- सांख्य शास्त्र के अनेक स्थलों में परस्पर विरोधी बातों का वर्णन मिलता है। जैसे- 'असङ्गोऽयं पुरुष इति' (सां०सू० १/१५) अर्थात् 'पुरुष असङ्ग है' और 'निष्क्रियस्य तदसम्भवात्' (१/४९) में उसे निष्क्रिय कहा है। फिर 'दृष्टत्वादिरात्मनः' (२/२९) और 'भोक्तुभावात्' (१/१४३) कहकर उसी को प्रकृति का द्रष्टा और भोक्ता बतलाया 'तदयोगस्तद्योगादृते' (१/१९) अर्थात् प्रकृति के साथ उसका संयोग तथा 'पुरुषस्य दर्शनार्थ कैवल्यार्थे तथा प्रधानस्य' (सांख्यकारिका २१) पुरुष के लिए भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली प्रकृति ही है, ऐसा कहा, फिर प्रकृति और पुरुष के नित्य पार्थक्य के ज्ञान से दुःख का
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 97
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० २ सूत्र ११ ११ अभाव ही मोक्ष है। [विवेकान्निःशेषदुःखनिवृत्तौ (सां०सू० ३/८४)], ऐसा मुक्ति का स्वरूप मानना, इत्यादि कई परस्पर विरुद्ध बातों के कारण सांख्यदर्शन समीचीन (निर्दोष) नहीं माना जा सकता है ॥१० । उपर्युक्त दस सूत्रों में सांख्यशास्त्र की मान्यता को असंगत सिद्ध करने के अनन्तर अब वैशेषिकों के परमाणुवाद का निराकरण करने एवं तत्सम्बन्धी मान्यता को अनुपयुक्त सिद्ध करने के उद्देश्य से सूत्रकार दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं- (१८३ ) महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम्॥११॥ सूत्रार्थ- ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् = ह्रस्व (द्वयणुक) और परिमण्डल (परमाणु) से, महद्दीर्घवत् =महत् एवं दीर्घ (त्र्यणुक) की उत्पत्ति बताने के समान, वा = ही (वैशेषिकों की सब बातें असङ्गत) हैं। व्याख्या- परमाणुकारणवादी वैशेषिकों की मान्यता है कि चेतन ब्रह्म को जगत् का कारण मानने से परब्रह्म में विद्यमान चैतन्य गुण का सृष्टि में समवाय सम्बन्ध से रहना आवश्यक है (क्योंकि एक द्रव्य सजातीय दूसरे द्रव्य को और एक गुण सजातीय दूसरे गुण को उत्पन्न करता है) परन्तु सम्पूर्ण सृष्टि में चैतन्य गुण नहीं पाया जाता, अतः चेतन ब्रह्म जगत् का कारण नहीं हो सकता। परमाणु ही जगत् के कारण हो सकते हैं। समाधान से पूर्व परमाणुवाद की प्रक्रिया का उल्लेख यहाँ उचित होगा। परमाणु के चार भेद हैं- पार्थिव परमाणु, जलीय परमाणु, तेजस परमाणु तथा वायवीय परमाणु। ये परमाणु नित्य, निरवयव तथा रूपादि गुणों से युक्त हैं। इनके परिमाण (माप) को परिमाण्डल्य कहते हैं। प्रलयकाल में सम्पूर्ण परमाणु पृथक्-पृथक् एवं क्रियाहीन स्थिति में रहते हैं। अदृष्ट या ईश्वर की इच्छा तथा पाप-पुण्यमय जीवों की संगति से परमाणु में आरंभ के अनुकूल क्रिया होने से विभाग होता है। सृष्टि काल में कार्य सिद्धि के लिए परमाणु तो समवायिकारण बनते हैं, उनका परस्पर संयोग असमवायिकारण होता है और अदृष्ट की इच्छा आदि उसमें निमित्त कारण बनते हैं। उस समय ईश्वर की इच्छा से प्रथम कर्म वायवीय परमाणुओं में प्रकट होता है, फिर उनका एक दूसरे से संयोग होता है। तब दो परमाणु संयुक्त होकर एक द्वयणुक, तीन द्वयणुक मिलकर त्र्यणुक और चार त्र्यणुक मिलकर चतुरणुक की उत्पत्ति होती है। इस क्रम से परमाणुओं का संयोग होते-होते वायवीय परमाणुओं से वायु तत्त्व प्रकट होता है और वह आकाश में गमनशील हो जाता है। इसी प्रकार तैजस परमाणुओं से अग्नि की उत्पत्ति होती है और वह प्रज्वलित होने लगता है। जलीय परमाणुओं से जल का महासागर प्रकट होकर उत्ताल लहरों से युक्त दिखाई देता है तथा पार्थिव परमाणुओं से इस विशाल पृथिवी की उत्पत्ति होती है, मिट्टी और प्रस्तर से युक्त इसका स्वरूप है। इस प्रकार कारण के गुणों से ही कार्य के गुण वस्त्र में वैसे ही गुण प्रकट होते हैं। जैसे रंगों के काले, पीले, नीले आदि गुण वस्त्र में वैसे ही गुण प्रकट करते हैं, वैसे ही परमाणुओं के शुक्ल आदि गुणों से ही द्वयणुकगत शुक्ल आदि गुण उत्पन्न होते हैं। द्वयणुक के उत्पादक दो परमाणु उसमें अणुत्व और ह्रस्वत्व इन दो परिमाणान्तरों का आरम्भ करती है; परन्तु विभिन्न परमाणुओं का पृथक्-पृथक् परिमाण द्वयणुक में दूसरे परिमाण्डल्य को प्रकट नहीं करता; क्योंकि वैसा करने पर वह कार्य पहले से भी अत्यन्त सूक्ष्म होने लगेगा। इसी प्रकार प्रलयकाल में ईश्वर की इच्छा से परमाणुओं में कर्म आरम्भ होता है, इस कारण उनके पारस्परिक संयोग का नाश होता है, फिर द्वयणुक आदि का नाश होते-होते पृथिवी आदि का भी नाश हो जाता है। वैशेषिकों की प्रक्रिया का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि यदि कारण के ही गुण कार्य में प्रकट होते हैं, तब तो परमाणु का परिमण्डल अर्थात् अति सूक्ष्मता का गुण द्वयणुक में भी प्रकट होना उचित है, पर ऐसा नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि परमाणुवाद से जगत् की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। वैशेषिकों के कथनानुसार दो परमाणु से ह्रस्व गुण विशिष्ट द्वयणुक की उत्पत्ति होती है और ह्रस्व द्वयणुकों से महत्
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 98
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१०० वदान्त दशन दीर्घ परिमाणवाले त्र्यणुक की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार ऊपर बतायी हुई तथा अन्य कही जाने वाली अवैशेषिकों की मान्यताएँ असङ्गत हैं।११।। गत सूत्र में परमाणु तथा द्वयणुक से यथाक्रम द्वयणुक और त्र्यणुक की उत्पत्ति का उल्लेख किया गया, पर यह उत्पत्ति किस प्रकार होती है तथा इसमें क्या दोष हैं, इसे स्पष्ट करते हुए सूत्रकार आगे कहते हैं- (१८४) उभयथाऽपि न कर्मातस्तदभावः ॥१२।। सूत्रार्थ- उभयथा = दोनों प्रकार से, अपि = भी, कर्म = परमाणुओं में कर्म का होना, न = सिद्ध नहीं होता, अतः = इसलिए, तदभाव: = परमाणु संयोग से जगत् का उत्पन्न होना संभव नहीं है। व्याख्या- परमाणुवादियों का कथन कि सृष्टि के पूर्व परमाणु निश्चल रहते हैं, उनमें कर्म उत्पन्न होकर परमाणुओं का संयोग होता है, जिससे सृष्टि की उत्पत्ति होती है, उपयुक्त नहीं है। इस प्रकार सूत्रकार कहते हैं कि परमाणुओं में किसी निमित्त के बिना कर्म का संचार स्वयं ही हो जाता है, ऐसा मान लें, तो यह असम्भव है; क्योंकि वैशेषिकों के मत में प्रलयकाल में परमाणु निश्चल माने गये हैं। यदि इस प्रकार मानें कि जीवों के अदृष्ट कर्म-संस्कारों से परमाणुओं में कर्म का संचार हो जाता है, तो यह भी संभव नहीं है; क्योंकि जीवों का अदृष्ट तो परमाणुओं में न होकर स्वयं उन्हीं में रहता है, अतः वह परमाणुओं में कर्म का संचार नहीं कर सकता। इससे सिद्ध होता है कि उक्त दोनों प्रकार से ही परमाणुगत प्रारम्भिक कर्म एवं उनके संयोग से जगत् की उत्पत्ति नहीं हो सकती ॥१२॥ अब आचार्य परमाणुकारणवाद के निराकरण हेतु अन्य युक्ति प्रस्तुत करते हैं- (१८५) समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः॥१३॥ सूत्रार्थ- समवायाभ्युपगमात् = परमाणुवाद में समवाय सम्बन्ध को स्वीकार किया गया है, इसलिए; च = भी (परमाणु कारणवाद सिद्ध नहीं हो सकता); साम्यात् - कारण और कार्य की भिन्नता के समान समवाय और समवायी में भी भिन्नता है, इसलिए; अनवस्थितेः = अनवस्था दोष के प्राप्त हो जाने पर समवाय की अवस्था न रहेगी। व्याख्या- परमाणुवादियों की मान्यता है कि अलग-अलग रह सकने वाली वस्तुओं में परस्पर संयोग सम्बन्ध होता है और अलग-अलग न रह सकने वाली वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध होता है। जैसे रस्सी और घट अलग-अलग रहकर भी संयोग-सम्बन्ध स्थापित करते हैं, उसी प्रकार तन्तु और वस्त्र एक होकर भी अलग-अलग दिखाई देते हैं, अतः इनमें समवाय-सम्बन्ध ही स्थापित हो सकता है। यद्यपि कारण से कार्य अत्यधिक पृथक् है, तो भी वैशेषिकों के अनुसार समवायिकारण और कार्य का पारस्परिक सम्बन्ध 'समवाय' बताया गया है। इसके अनुसार दो अणुओं से उत्पन्न द्वयणुक कार्य उन अणुओं से भिन्न होने पर भी समवाय- सम्बन्ध के द्वारा उनसे जुड़ाव होता है, ऐसा मान लेने पर जिस तरह द्वयणुक उन-उन अणुओं से पृथक् होता है, उसी तरह 'समवाय' भी समवायी से पृथक् है। भेद की दृष्टि से दोनों में समानता है। अतः जिस प्रकार द्वयणुक समवाय सम्बन्ध के द्वारा उन दो अणुओं से जुड़ा माना गया है, उसी प्रकार समवाय भी अपने समवायी के साथ नये समवाय सम्बन्ध द्वारा जुड़ा माना जा सकता है। इस प्रकार शृंखलाबद्ध समवाय सम्बन्ध चलता रहेगा और एक अंतहीन परम्परा चलते रहने के कारण अनवस्था का दोष उपस्थित होगा। इस प्रकार समवाय सम्बन्ध सिद्ध न हो सकने के कारण परमाणुओं द्वारा जगत् की सृष्टि का होना कदापि सम्भव नहीं है ।।१ ३ ।। शिष्य जिज्ञासा करता है कि क्यों न यह मान लें कि सृष्टि एवं प्रलय के निमित्त परमाणुओं में क्रिया स्वभावतः होती है। इस प्रकार सूत्रकार समाधान देते हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 99
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० २ सूत्र १७ १०१
(१८६ ) नित्यमेव च भावात् ॥१४।। सूत्रार्थ- च = तथा (परमाणुओं में प्रवृत्ति या निवृत्ति का कार्य स्वाभाविक मानने पर), नित्यम् = सदा, एव = ही, भावात् = सृष्टि या प्रलय की सत्ता बनी रहेगी। व्याख्या- परमाणुवादी परमाणु को नित्य मानते हैं, अतः उनका जैसा भी स्वभाव मानें, वह नित्य अर्थात् सदा रहने वाला होगा। यदि उन्हें प्रवृत्तिमूलक मानें, तब तो सतत सृष्टि होती रहेगी, कभी भी प्रलय नहीं होगा। यदि निवृत्तिमूलक स्वभाव मानें, तब तो सदा संहार ही बना रहेगा, सृष्टि नहीं होगी और यदि दोनों ही धर्म उनमें स्वाभाविक मानें जायें, तो यह किसी प्रकार संगत नहीं जान पड़ता; क्योंकि एक ही तत्त्व में परस्पर विरोधी दो स्वभाव नहीं रह सकते। इस प्रकार यह परमाणु कारणवाद सर्वथा अयुक्त सिद्ध होता है॥१४॥ अब आचार्य परमाणुओं की नित्यता पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए परमाणुकारणवाद को व्यर्थ सिद्ध करते हैं- (१८७) रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात् ॥१५।। सूत्रार्थ- च = और, रूपादिमत्त्वात् = परमाणु को रूप, रस आदि गुणों वाला मानने से, विपर्ययः = उनमें नित्यत्व के विपरीत अनित्यव का दोष, दर्शनात् = देखा जाता है। व्याख्या- परमाणुवादियों के मत में परमाणु नित्य होने के साथ-साथ रूप, रस आदि गुणों से युक्त भी माने गये हैं, परन्तु रूपादि गुणों से युक्त वस्तुएँ नित्य नहीं हो सकतीं; क्योंकि रूप आदि गुण वाली घट, पट इत्यादि सभी वस्तुएँ नाशवान् हैं, उनकी अनित्यता प्रत्यक्ष देखी जाती है। इस प्रकार रूप, रसादि के कारण परमाणुओं में नित्यता के विपरीत अनित्यता का दोष आरोपित होता है। यदि उन्हें रूप, रस आदि से रहित मानें, तो उनके कार्य में रूपादि गुण नहीं होने चाहिए। इसके विपरीत 'रूपादिमन्तो नित्याश्च' की सिद्धि नहीं होगी। इस प्रकार परमाणुवाद की निरर्थकता स्पष्ट सिद्ध होती है॥१५।। परमाणु की नित्यता में अन्य दोष दिखाते हुए आचार्य गत सूत्र में प्रतिपादित अर्थ की पुष्टि करते हैं- ( १८८) उभयथा च दोषात्॥१६॥ सूत्रार्थ- उभयथा = दोनों प्रकार से (न्यूनाधिक गुणों से युक्त अथवा गुणरहित मानें) च = ही, दोषात् = दोष आता है, अतः (परमाणुवाद सिद्ध नहीं होता)। व्याख्या- पृथिवी आदि भूतों में से किसी में अधिक और किसी में कम गुण विद्यमान होते हैं। यथा पृथिवी में गन्ध, रस, रूप व स्पर्श अर्थात् चारों गुण रहते हैं। जल में गन्ध को छोड़कर शेष तीन, तेज में रूप व स्पर्श तथा वायु में केवल स्पर्श गुण रहता है। इस आधार पर उनके आरम्भिक परमाणुओं में भी न्यूनाधिक गुणों की स्थिति माननी होगी। ऐसी अवस्था में यदि परमाणुओं को अधिक गुणों से युक्त माना जाये, तो सभी कार्यों में उनके समान गुण प्रकट होने से भी द्रव्य अपने-अपने धर्मों को छोड़ देंगे। उस अवस्था में जल में भी गन्ध और तेज में भी गन्ध एवं रस उत्पन्न हो सकता है। अधिक गुण वाली पृथिवी में स्थूलता का गुण देखा जाता है, यही गुण कारणभूत परमाणु में मानना पड़ेगा। यदि परमाणु में न्यूनतम अर्थात् एक-एक गुण ही मानें, तब तो सभी स्थूल भूतों में एक-एक गुण ही उत्पन्न होना चाहिए। उस दशा में स्पर्श धर्म वाली वस्तुएँ स्पर्शहीन हो जायेंगी, उनमें रूप, रस आदि गुण भी नहीं रहेंगे; क्योंकि उनके परमाणुओं में एक से अधिक गुण का अभाव है। यदि परमाणुओं में गुणों का सर्वथा अभाव मानें, तो उनके कार्यों में भी गुणहीनता होगी। इस प्रकार परमाणुवाद की सार्थकता किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होती है॥१६।। अब आचार्य परमाणुवाद को अग्राह्य बताते हुए इस प्रकरण का उपसंहार करते हैं- (१८९ ) अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा।१७।।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 100
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१० वेदान्त दर्शन सूत्रार्थ-अपरिग्रहात् = किसी भी मत द्वारा परमाणुवाद को ग्रहण नहीं किया गया है, इसलिए; च = भी, अत्यन्तम् = सर्वथा, अनपेक्षा = उपेक्षा के योग्य है। व्याख्या-प्रधानकारणवाद की कुछ बातों को अनेक शिष्ट विद्वानों ने अंश रूप में स्वीकार किया है; क्योंकि उसमें अंशतः सत्कार्यवाद का निरूपण किया गया है; परन्तु परमाणु-कारणवाद के वेद-विरुद्ध होने के कारण किसी भी सत्पुरुष ने इसे स्वीकार नहीं किया है। इस कारण भी यह सर्वथा उपेक्षणीय है॥१७॥ विगत सात सूत्रों में परमाणुवाद की निरर्थकता सिद्ध करने के पश्चात् अब बौद्धों के क्षणिकवाद का निराकरण करने के उद्देश्य से सूत्रकार द्वारा यह प्रकरण आरम्भ किया जा रहा है- (१९० ) समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्ति: ।।१८ ।। सूत्रार्थ- उभयहेतुके = दोनों प्रकार के (परमाणुहेतुक बाह्य समुदाय तथा स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर समुदाय), समुदाये = समुदायों में, अपि = भी, तदप्राप्ति: = उसकी सिद्धि नहीं होती है। व्याख्या- बौद्ध मत के चार अनुयायी - वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार और माध्यमिक परस्पर किञ्चित् बुद्धि भेद के कारण चार वर्गों में बँट गये हैं। इनमें से वैभाषिक और सौत्रान्तिक ये दोनों ही बाह्य पदार्थों की सत्ता स्वीकारते हैं, अन्तर केवल इतना है कि वैभाषिक प्रत्यक्ष दीखने वाले बाह्य पदार्थों का अस्तित्व मानते हैं और सौत्रान्तिक विज्ञान से अनुमित बाह्य पदार्थों की सत्ता को स्वीकारते हैं। योगाचार के मत में वस्तु मात्र असत् है, बाह्य पदार्थ स्वप्र में दिखाई देने वाली वस्तुओं की तरह मिथ्या है, एक मात्र विज्ञान ही सत् है। माध्यमिक मानते हैं कि सब कुछ शून्य है। उनकी मान्यता के अनुसार दीपक की लौ की तरह संस्कारवश क्षणिक विज्ञान की धारा ही बाह्य पदार्थों के रूप में दिखाई देती है। जैसे दीपशिखा के हर क्षण नष्ट होने के बावजूद एक धारा-सी बनी रहने के कारण उसकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार दृश्यमान पदार्थ सतत नष्ट हो रहे हैं; परन्तु उनकी विज्ञान धारा मात्र प्रतिभाषित होती है। तेल के खत्म हो जाने पर जिस प्रकार दीपशिखा बुझ जाती है, उसी प्रकार संस्कार नष्ट हो जाने पर विज्ञान धारा भी समाप्त हो जाती है। योगाचार मत के अनुसार इस प्रकार शून्यता की प्राप्ति ही अपवर्ग या मुक्ति कहलाता है। बौद्धमत के लोग इन चारों के समन्वय को भावना चतुष्टय कहते हैं। रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा तथा संस्कार-ये पाँच स्कन्ध हैं। पृथिवी आदि चार भूत तथा शरीर, इन्द्रिय और विषय- ये 'रूप स्कन्ध' कहलाते हैं। पृथिवी के परमाणु रूप, रस, गंध और स्पर्श इन चार गुणों से संयुक्त तथा कठोर स्वभाव से युक्त होते हैं। जलीय परमाणु गंध के अतिरिक्त अन्य तीन गुणों से युक्त तथा स्निग्ध या मृदु स्वभाव वाले होते हैं। अग्रि के परमाणु रूप और स्पर्श गुणों से युक्त व उष्ण स्वभाव वाले तथा वायु के स्पर्श गुण से युक्त एवं गमनशील होते हैं। उक्त सभी भूतों के परमाणु अपने-अपने गुणों के अनुरूप संगठित होकर पृथिवी, जल, अग्नि एवं वायु का आकार ग्रहण करते हैं। पुनः ये चारों शरीर, इन्द्रिय और विषय के रूप में केन्द्रीभूत होते हैं। इस प्रकार ये चार प्रकार के क्षणभंगुर परमाणु भूत-भौतिक संघात के कारण बनते हैं। यही 'रूप स्कन्ध' या बाह्य समुदाय के रूप में जाना जाता है। 'विज्ञानस्कन्ध' आभ्यन्तरिक विज्ञान के प्रवाह को कहते हैं। इसी से 'मैं' की प्रतीति होती है तथा सम्पूर्ण लोक व्यवहार का आधार भी यही है। इसी को कर्ता, भोक्ता और आत्मा कहते हैं। सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों की अनुभूति 'वेदनास्कन्ध' कहलाती है। उपलक्षण से जो वस्तुओं की प्रतीति कराई जाती है, उसी का नाम 'संज्ञा स्कन्ध' है। जैसे ध्वज से गृह की और दण्ड से पुरुष की आदि। राग, द्वेष, मोह, मद, मात्सर्य, भय, शोक, विषाद आदि चित्त के जो संस्कार हैं, उन्हें 'संस्कार स्कन्ध' कहते हैं। सभी प्रकार के व्यवहारों का आश्रय बनकर अंतःकरण में संगठित यह चतुःस्कन्ध समुदाय या चित्त-चैत्तिक वर्ग ही 'आभ्यन्तर समुदाय' कहलाता है। विज्ञान स्कन्धरूप चित्त का नाम ही
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 101
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० २ सूत्र २० १०३ आत्मा है; शेष तीन स्कन्ध 'चैत्य' अथवा 'चैत्तिक' हैं। भूत भौतिक तथा चित्त और चैत्य की संगति से संसार यात्रा का निर्वाह होता है। इन दोनों समुदायों के अतिरिक्त आकाश, आत्मा आदि किसी भिन्न वस्तु की सत्ता ही नहीं है। ये दोनों समुदाय ही समस्त लोक-व्यवहार के निर्वाहक हैं। इनसे ही समस्त क्रिया-कलाप चल जाता है, अतः नित्य 'आत्मा' को मानने की आवश्यकता ही नहीं है। यदि इस प्रकरण का विवेचन करें, तो बौद्धों के उक्त जगदात्मक समुदाय की सत्ता सिद्ध नहीं होती; क्योंकि समुदाय के अन्तर्गत जो वस्तुएँ हैं, वे सब अचेतन एवं पारस्परिक अपेक्षा से शून्य हैं। अतः उनके द्वारा संघात नहीं बन सकता। परमाणु आदि सभी वस्तुएँ बौद्धों की ही मान्यतानुसार क्षणिक हैं, तो फिर प्रतिक्षण परिवर्तनशील परमाणु और पृथिवी आदि भूत इस समुदाय या संघात के रूप में संगठित कैसे हो सकते हैं, किस प्रकार उनका संघात बनना संभव हो सकता है अर्थात् किसी प्रकार और कभी भी सम्भव नहीं। इसलिए बौद्धों की कल्पना सर्वथा युक्ति विरुद्ध होने के कारण मानने योग्य नहीं है॥१८।। पूर्वपक्षी की तरफ से प्रस्तुत संभावित समाधान का स्वतः उल्लेख करते हुए सूत्रकार उसका प्रतिवाद करते हैं- (१९१) इतरेतरप्रत्ययत्वादिति चेन्नोत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात्॥१९।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो; इतरेतरप्रत्ययत्वात् = परस्पर एक दूसरे का कारण होने से, अविद्या, संस्कार, विज्ञान आदि से समुदाय की सिद्धि हो सकती है, इति न - तो यह कहना ठीक नहीं है, उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् = क्योंकि ये अविद्या आदि उत्तरोत्तर की उत्पत्तिमात्र में ही निमित्त माने गये हैं (समुदाय या संघात में नहीं)। व्याख्या- बौद्ध मत के अनुसार क्षणिक वस्तुओं में नित्यता और स्थिरता का जो भ्रम है, वही 'अविद्या' कहलाता है। यह अविद्या ही सांसारिक विषयों में राग आदि 'संस्कार' उत्पन्न करने का हेतु बनती है। संस्कार द्वारा गर्भस्थ शिशु में 'आलय' नामक विज्ञान उत्पन्न होता है। उस आलय-विज्ञान से शरीर एवं समुदाय के कारण भूत पृथिवी आदि चार भूत होते हैं। नाम का आश्रय होने से वही 'नाम' भी कहलाता है। पृथिवी आदि चार भूत, नाम, रूप, शरीर, विज्ञान और धातु - ये छः जिनके आश्रय हैं, उन इन्द्रियों के समूह को 'षडायतन' कहा जाता है। नाम, रूप और इन्द्रियों के आपसी सम्बन्ध को 'स्पर्श' कहते हैं। उससे सुख-दुःख आदि वेदना की उत्पत्ति होती है। और फिर क्रमशः तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा, मरण, शोक, परिवेदना तथा दुर्मनस्ता (मन की उद्विग्नता) आदि भी इसी तरह से उपजते हैं। इसके पश्चात् फिर अविद्या आदि के क्रम से पूर्वोक्त सभी बातों का प्रकटीकरण होता रहता है। घटीयन्त्र (रहट) की भाँति यह चक्र निरन्तर घूमता रहता है, इससे समुदाय सिद्धि की बात कहना पूर्णतया भ्रमात्मक है। परिवर्तनशील को स्थिर मानने वाली युक्ति उचित नहीं मालूम पड़ती। अतः अविद्या एवं उससे उत्पन्न रागादि के उद्भव से संघातपूर्वक सृष्टि की कल्पना किसी तरह सिद्ध नहीं होती॥१९॥ पूर्व सूत्र में अविद्या आदि को संस्कार आदि की उत्पत्ति का निमित्त मानते हुए, उनसे समुदाय की असिद्धि बतायी गई। अब यह सिद्ध किया जाता है कि अविद्या आदि हेतु संस्कार आदि भावों के उद्भव में भी निमित्त नहीं हो सकते- (१९२ ) उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॥२०। सूत्रार्थ- च = और, उत्तरोत्पादे = बाद में होने वाले भाव के उद्भव काल में, पूर्वनिरोधात् = पूर्वक्षण में उपस्थित कारण का नाश हो जाता है, इसलिए (पूर्वोक्त अविद्या आदि हेतु, संस्कार आदि उत्तरोत्तर भावों के उद्भव में हेतु नहीं हो सकते)। व्याख्या- तन्तु से पट और मिट्टी से घट उत्पन्न होते ही तन्तु और मिट्टी नष्ट होते नहीं देखे जाते, अपितु तन्तु और मिट्टी का अन्वय पट और घट में प्रत्यक्ष देखा जाता है। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक कार्य अपने
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 102
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१०४ वदान्त दशन कारण से सम्बद्ध रहता हुआ ही उत्पन्न होता है; किन्तु बौद्ध मत में समस्त पदार्थों को प्रतिक्षण नाशवान् माना गया है, अतः इस मत से कार्य में कारण की सम्बद्धता सिद्ध नहीं होगी। जिस क्षण कार्य की उत्पत्ति होगी, उसी क्षण कारण का नाश हो जायेगा। इस प्रकार कार्य-कारण भाव की सिद्धि न होने से भी संघात द्वारा जगत् की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती॥२० ।। शिष्य जिज्ञासा करता है कि यदि कारण के न रहने पर भी कार्य की उत्पत्ति मान ली जाती है, तो क्या आपत्ति है? सूत्रकार इसी जिज्ञासा का समाधान यहाँ करते हैं- (१९३ ) असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा।।२१।। सूत्रार्थ- असति = कारण के न रहने पर (भी कार्य की उत्पत्ति मानने से), प्रतिज्ञोपरोधः = प्रतिज्ञा भङ्ग होगी, अन्यथा = नहीं तो, यौगपद्यम् = कारण-कार्य दोनों की एक ही काल में सत्ता माननी होगी। व्याख्या- बौद्ध मत में चार प्रकार से विज्ञान की उत्पत्ति स्वीकार की गई है। इन चारों के 'प्रत्यय' युक्त नाम इस प्रकार हैं- अधिपति, सहकारि, समनन्तर और आलम्बन। ये क्रमशः इन्द्रिय, प्रकाश, मनोयोग और विषय के पर्याय माने गये हैं। इन चारों हेतुओं की संगति से ही विज्ञान का उत्पन्न होना कहा गया है। यदि बिना कारण के कार्य का उत्पन्न होना माना जाये, तो स्कन्ध रूप कारण से समुदाय की उत्पत्ति होने वाली प्रतिज्ञा भङ्ग होती है और यदि ऐसा नहीं मानते हैं, तो कारण और कार्य दोनों की सत्ता एक ही काल में माननी होगी, जो सम्भव नहीं। अतः बौद्धमत किसी प्रकार भी समीचीन अथवा ग्रहणीय नहीं है।।२१।। बौद्ध मतावलम्बियों के अनुसार प्रतिसंख्या-निरोध, अप्रतिसंख्या-निरोध तथा आकाश-इनके अलावा सभी वस्तुएँ क्षणिक हैं। निरोध और आकाश तो कोई वस्तु हैं ही नहीं, ये अभाव मात्र हैं। विनाश का बोधक होने की वजह से निरोध तो अभाव है ही, आकाश भी आवरण का अभाव मात्र ही है, जिसका निराकरण २४ वें सूत्र में होगा। यहाँ आचार्य बौद्धों द्वारा मान्य दोनों प्रकार के निरोधों का निराकरण करने के उद्देश्य से कहते हैं- (१९४) प्रतिसंख्या ऽप्रतिसंख्यानिरोधाप्रापिरविच्छेदात् ।।२२ ।। सूत्रार्थ- प्रतिसंख्याSप्रतिसंख्या निरोधाप्राप्तिः प्रतिसंख्या निरोध और अप्रतिसंख्या निरोध की प्राप्ति नहीं हो सकती, अविच्छेदात् - क्योंकि प्रवाह का विच्छेद नहीं होता। व्याख्या- बौद्धों में किसी भाव के प्रतिकूल बुद्धि 'प्रतिसंख्या' तथा ऐसी बुद्धि से जो भाव (वस्तु) का विनाश होता है, वह 'प्रतिसंख्या-निरोध' है। इसके विपरीत भावों का जो बिना किसी निमित्त के स्वाभाविक विनाश होता रहता है, उसका नाम अप्रतिसंख्या-निरोध है। अविच्छेद के कारण उपर्युक्त दोनों निरोध असम्भव हैं; क्योंकि वे समस्त पदार्थों को प्रतिक्षण नाशवान् मानते हैं और असत् कारणों से 'सत्' कार्य की उत्पत्ति भी प्रतिक्षण स्वीकार करते हैं। इस प्रकार विनाश और उत्पत्ति का क्रम निरन्तर चलते रहने से किसी भी निरोध की सिद्धि नहीं होगी। फिर 'सत्' वस्तु के शून्य रूप से होने को विनाश कहा जाये, तो प्रत्येक क्षण शून्य ही दिखाई दे; परन्तु ऐसा कभी नहीं देखा जाता। अतः बौद्धमत किसी भी प्रकार उपादेय सिद्ध नहीं होता ॥।२२ ।। बौद्ध मतावलम्बियों के अनुसार सभी पदार्थ क्षणिक एवं असत्य होते हुए भी भ्रान्तिरूप अज्ञान के कारण स्थिर एवं सत्य जान पड़ते हैं। ज्ञान के द्वारा अज्ञान का अभाव होने के कारण सबका अभाव हो जाता है। इस प्रकार प्रतिसंख्या-निरोध की सिद्धि होती है। इस बात का निराकरण करने हेतु आचार्य अग्रिम सूत्र कहते हैं- (१९५) उभयथा च दोषात् ।।२३।। सूत्रार्थ- उभयथा = दोनों प्रकार से, च = भी, दोषात् = दोष उपस्थित होता है, इसलिए (उनकी मान्यता सिद्ध नहीं होती)।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 103
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० २ सूत्र २५ १०५ व्याख्या- बौद्धों के अनुसार जगत् के कारण रूप अविद्या आदि के निरोध का नाम ही मोक्ष है। इस पर दो शंकाएँ प्रकट होती हैं- १. मोक्ष तत्त्व ज्ञान से होता है अथवा २. स्वयमेव हो जाता है। यदि यह माना जाये कि अविद्या के कारण भ्रान्तिरूप दिखने वाला यह जगत् तत्त्व ज्ञान अथवा पूर्ण ज्ञान से अविद्या का नाश होने के साथ नष्ट हो जाता, किन्तु तत्त्वज्ञान से मोक्ष होना इसलिए संभव नहीं है; क्योंकि ऐसा होने पर बिना कारण अपने आप विनाश अर्थात् पदार्थों का अभाव मानना होगा, इससे अप्रतिसंख्या निरोध की मान्यता में विरोध आयेगा और यदि बिना पूर्ण ज्ञान के अपने-आप ही मोक्ष माना जाये, तो भी संगति नहीं बैठती; क्योंकि तब ज्ञान और उसके साधन का उपदेश व्यर्थ सिद्ध होगा। अतः दोनों प्रकार से ही बौद्धों का मत अनुपयुक्त सिद्ध होता है।।२३ ।। समुदायवाद की कल्पना में आकाश कोई पदार्थ (भाव) नहीं; किन्तु आवरण का अभाव मात्र है। सूत्रकार इसका समाधान करते हैं- (१९६ ) आकाशे चाविशेषात् ॥२४।। सूत्रार्थ- आकाशे = आकाश के विषय में, च = भी (उनका मत उचित नहीं; क्योंकि), अविशेषात् = अन्य भाव-पदार्थों से उसमें कोई विशेषता नहीं है। व्याख्या- पृथिवी, जल आदि के चार तरह के परमाणु और उनसे निर्मित समुदाय एक आवरण की तरह है, उसी प्रकार आकाश भी भाव रूप है, उसकी सत्ता का भी सबको बोध होता है। आकाश को आवरण का अभाव मात्र समझना ठीक नहीं है। जिस प्रकार पृथिवी गन्ध का, जल रस का, तेज रूप का तथा वायु स्पर्श का आश्रय है, उसी प्रकार शब्द का आश्रय आकाश भाव पदार्थ है। आकाश में ही ध्वनि तरंगों का श्रवण सम्भव होता है, यदि आकाश माध्यम न हो, तो यह शब्दों का श्रवण सम्भव नहीं। आधुनिक विज्ञान ने ध्वनि (शब्द) का विद्युत् से सम्बन्ध स्थापित कर उसकी तरंग गति को अत्यधिक बढ़ा दिया है। रेडियो, टेलीविजन आदि में इस व्यवस्था के अन्तर्गत ध्वनि तरंग का वहन विद्युत् द्वारा सीधे ईथर (आकाश) तत्त्व में होता है, जो सर्वव्यापक तत्त्व है। वैदिक शास्त्र में भी आकाश की उत्पत्ति स्पष्ट शब्दों में स्वीकार की गई है- 'आत्मन: आकाशः सम्भूत: (तै०उ०२/१)। आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसी तत्त्व को 'ईथर' संज्ञा से व्यवहत किया है। इस प्रकार युक्ति एवं प्रमाण से भी आकाश की सत्ता सिद्ध है, कोई ऐसा विशेष प्रमाण नहीं है कि आकाश को भाव रूप में न स्वीकारा जा सके। अतः किसी प्रकार भी आकाश की अभाव रूपता सिद्ध न होने के कारण बौद्धों की मान्यता स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है॥२४।। बौद्ध मत में 'आत्मा' को भी नित्य वस्तु न मानकर क्षणिक ही माना गया है। सूत्रकार उनकी इस मान्यता का खण्डन करते हैं- (१९७ ) अनुस्मृतेश्च ॥।२५।। सूत्रार्थ- अनुस्मृते: = पूर्व प्रसङ्गों का बारम्बार स्मरण होता है, (अतः अनुभव करने वाला आत्मा क्षणिक नहीं है) इस युक्ति से; च = भी (बौद्धमत असङ्ग सिद्ध होता है)। व्याख्या- सभी मनुष्यों को उपलब्धि अथवा अनुभव होने के अनन्तर उस विषय का जो बारम्बार स्मरण होता है, उसे 'अनुस्मृति' कहते हैं। यह तभी हो सकता है, जबकि अनुभव करने वाला आत्मा नित्य माना जाये। उसे क्षणिक मानने से यह स्मरण नहीं बन सकता; क्योंकि एक क्षण पहले जो अनुभव करने वाला था, वह अगले क्षण नहीं रहता। उदाहरण स्वरूप अपने घर से बाहर परदेश गये हुए यज्ञदत्त नामक व्यक्ति को कालान्तर में निमित्तवश अपने घर का स्मरण हो आता है। यदि प्रत्येक भाव को क्षणिक माना जाये, तब तो
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 104
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१०६ वेदान्त दर्शन घर से चलने वाला यज्ञदत्त वह रहा ही नहीं। क्षणिक होने के कारण घर का स्मरण करने वाला यज्ञदत्त नष्ट हो गया। परदेश स्थित इस अन्य यज्ञदत्त को घर का स्मरण नहीं होना चाहिए। पर ऐसा स्मरण प्रत्येक (व्यक्ति) आत्मा को होता है, यह सुनिश्चित है। इससे सिद्ध होता है कि अपने अनुभव का स्वतः स्मरण करने वाला आत्मा क्षणिक नहीं हो सकता, घर और परदेस में रहने वाला यज्ञदत्त एक स्थायी व्यक्ति है। इस प्रकार आत्मा का अविनाशी होना सिद्ध होता है। अतः बौद्धों का क्षणिकवाद सर्वथा अनुपपन्न है।।२५।। 'बीज नष्ट होता है, तभी अङ्कर उत्पन्न होता है। दूध मिटकर दही बनता है। इसी प्रकार कारण स्वयं नष्ट होकर ही कार्य उत्पन्न करता है।' बौद्धों की उक्त मान्यता का समाधान करने के लिए सूत्रकार कहते हैं- (१९८) नासतोऽदृष्टत्वात्॥२६॥ सूत्रार्थ- असतः = असत् से (कार्य की उत्पत्ति), न - नहीं हो सकती, अदृष्टत्वात् = क्योंकि ऐसा देखा नहीं जाता। व्याख्या-असत् पदार्थों से किसी कार्य की उत्पत्ति या सिद्धि नहीं देखी जाती। जैसे आकाश में नीलापन न होते हुए भी ऐसा प्रतीत होता है कि आकाश नीला है। आकाश में पुष्प नहीं होता फिर भी वाणी द्वारा आकाश- कुसुम बोला जाता है। इसके विपरीत मिट्टी, जल आदि दिखाई देने वाले सत् पदार्थों से घट और बर्फ आदि कार्यों की उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। इससे यही सिद्ध होता है कि जो वस्तु वास्तव में नहीं है, उसकी प्रतीति मात्र है अथवा कथन मात्र है, उससे कार्य की उत्पत्ति संभव नहीं। बीज और दूध का अभाव नहीं होता, अपितु रूपान्तर मात्र होता है। अतः जगत् का कारण सत् है और वह शाश्वत सत्य है। अतः बौद्धमत की अनुपादेयता सिद्ध है॥२६ ।। सूत्रकार बौद्धों की उपर्युक्त मान्यता का अब दूसरी युक्ति से खण्डन करते हैं- (१९९ ) उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ।।२७ ।। सूत्रार्थ- च = और, एवम् = इस प्रकार (कर्त्ता के बिना कार्य की उत्पत्ति) मानने पर, उदासीनानाम् = उदासीन (कार्य सिद्धि के लिए प्रयत्न न करने वाले) पुरुषों का, अपि = भी, सिद्धि: = कार्य सिद्ध हो सकता है। व्याख्या- यदि चेतन कर्त्ता के बिना स्वतः कार्य की उत्पत्ति होना सम्भव माना जाये, तो किसी कार्य की सिद्धि के लिए कोई व्यक्ति प्रयत्न क्यों करे? तब पुरुषार्थी मनुष्यों की तरह निकम्मे लोग भी अपने मनोवाञ्छित कार्यों में अनायास सफलता प्राप्त कर लिया करें अथवा कार्य-सिद्धि के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति, यह सोचकर कि कार्य स्वतः सिद्ध हो जाएगा, प्रयत्न करना ही छोड़ देंगे। फिर भोजन, वस्त्र और अन्य जीवनोपयोगी आवश्यक सामग्री के लिए सारे प्रयत्न व्यर्थ होंगे। इस प्रकार निष्क्रियत्व का दोष आयेगा और कार्य स्वतः सिद्ध हो जाये, ऐसा देखा भी नहीं जाता। अतः सारहीन बौद्धमत सर्वथा असंगत सिद्ध होता है।।२७ ।। यहाँ तक बौद्धों के क्षणिकवाद का निराकरण करने के अनन्तर अब विज्ञानवाद का प्रकरण आरम्भ किया जाता है। विज्ञानवादी बौद्ध (योगाचार) प्रत्यक्ष पदार्थ जगत् को स्वप्रवत् बुद्धि की कल्पना मात्र मानते हैं। जिसका समाधान आगे के प्रकरण में सूत्रकार करते हैं- (२०० ) नाभाव उपलब्धे: ॥२८ ॥ सूत्रार्थ- अभाव: = बाह्य पदार्थों का अभाव, न = नहीं है, उपलब्धे: = क्योंकि उनकी उपलब्धि होती है। व्याख्या- जानने में आने वाले बाह्य पदार्थ (जगत्) को भ्रममात्र अथवा अभाव समझना ठीक नहीं; क्योंकि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से उनकी उपलब्धि होती है। वे कारणरूप में तथा कार्यरूप में भी सदैव ही
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 105
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० २ सूत्र ३२ १०७ सत्य हैं। यदि वे स्वप्रगत पदार्थों तथा आकाश में दिखाई पड़ने वाली नीलिमा आदि की तरह सर्वथा भ्रम होते, तो इनकी प्राप्ति नहीं होती।२८॥ शिष्य आशंका करता है कि जगत् में स्वप्रादि अवस्थाओं में वस्तु की अविद्यमानता होते हुए भी उनकी प्रतीति हो जाती है। इसी प्रकार बाजीगर द्वारा उपस्थित पदार्थ यद्यपि सत्य नहीं होते, तो भी इनकी उपलब्धि देखी जाती है, इस पर आचार्य समाधान प्रस्तुत करते हैं- (२०१ ) वैधर्म्याच्च न स्वप्रादिवत् ॥२९। सूत्रार्थ- वैधर्म्यात् = जाग्रत् अवस्था में उपलब्ध ज्ञान और स्वप्र में प्रतीत ज्ञान के धर्म-भेद से, च = भी (जाग्रत् में उपलब्ध पदार्थ), स्वप्रादिवत् = स्वप्न आदि में उपलब्ध पदार्थों की तरह, न = मिथ्या नहीं। व्याख्या- स्वप्र की अवस्था में दिखलाई देने या अनुभव में आने वाले पदार्थ एवं दृश्य, पूर्व के देखे, सुने और अनुभव किये हुए ही होते हैं, वे जागने पर उपलब्ध नहीं होते। एक व्यक्ति के स्वप्र की घटना दूसरे को नहीं दिखाई देती। उसी प्रकार बाजीगर द्वारा कल्पित पदार्थ भी थोड़ी देर के बाद उपलब्ध नहीं होते। इसके विपरीत जाग्रत् अवस्था में प्रत्यक्ष दिखने वाली वस्तुओं के विषय में ऐसी बात नहीं है। वे एक ही काल में अनेकों को एक समान रूप से उपलब्ध होती हैं और कुछ काल बाद भी उनकी उपलब्धि देखी जाती है। इस प्रकार स्वप्न और जाग्रत् दोनों अवस्थाओं के पदार्थ परस्पर विपरीत धर्म के हैं। इसलिए स्वप्र आदि के उदाहरणों के आधार पर यह कहना उचित नहीं है कि उपलब्धि मात्र से पदार्थ की सत्ता सिद्ध नहीं होती ॥२९॥ विज्ञानवादी के इस कथन का, कि बाह्य पदार्थ के अनुपलब्ध होने की स्थिति में भी पूर्व वासना के कारण बुद्धि द्वारा उन विलक्षण पदार्थों की उपलब्धि सम्भव है, सूत्रकार खण्डन करते हैं- ( २०२ ) न भावोऽनुपलब्धे: ॥।३० ।। सूत्रार्थ- भाव: = विज्ञानवादियों द्वारा कल्पित वासना की सत्ता, न = सिद्ध नहीं होता, अनुपलब्धे: = क्योंकि वे बाह्य पदार्थों की उपलब्धि नहीं मानते। व्याख्या- पहले उपलब्ध वस्तु के संस्कार ही वासना रूप में बुद्धि में जमते एवं प्रकट होते हैं। पदार्थों की सत्ता स्वीकार न करने पर उनकी उपलब्धि नहीं होगी और इस प्रकार वासना का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं होगा। अतः विज्ञानवादियों का मत निरर्थक है। बाह्य पदार्थों को सत्य स्वीकार करना युक्तिसङ्गत है॥ ३०॥ वासना का खण्डन करने के लिए आचार्य यहाँ अन्य हेतु प्रस्तुत करते हैं- ( २०३ ) क्षणिकत्वाच्च॥३१॥ सूत्रार्थ- क्षणिकत्वात् = बौद्धमतानुसार वासना की आश्रयभूता बुद्धि भी क्षणिक है, इसलिए; च = भी (वासना की सत्ता सिद्ध नहीं होती)। व्याख्या- बुद्धि ही वासना का आधार है और उसे भी विज्ञानवादी क्षणिक मानते हैं। यदि उनका कथन सत्य मानें, तो बुद्धि की स्थिर सत्ता न होने से निराधार वासना भी अस्तित्वहीन हो जायेगी। इसलिए भी बौद्धमत उपादेय सिद्ध नहीं होता।३१।। सब प्रकार की अनुपपत्ति होने के कारण बौद्धमत की अनुपयोगिता की ओर इंगित करते हुए प्रस्तुत प्रकरण का आचार्य द्वारा अब उपसंहार किया जाता है- ( २०४ ) सर्वथाऽनुपपत्तेश्च ॥३२। सूत्रार्थ- सर्वथा = सब प्रकार से, अनुपपत्तेः = असङ्गति दिखाई देती है, इसलिए; च = भी (बौद्धमत की
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 106
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
०८ वदान्त दशन
उपादेयता सिद्ध नहीं होती) व्याख्या- बौद्ध मत की मान्यताओं पर जितनी गहराई से विचार किया जाता है, उतना ही उनकी प्रत्येक बातों में असंगति दिखाई देती है। उनकी प्रत्येक बातें युक्ति विरुद्ध लगती हैं। बौद्धों की सभी मान्यताओं का युक्तियों द्वारा खण्डन हो जाता है, इसलिए वह कदापि उपादेय नहीं जान पड़ता। प्रस्तुत प्रकरण का उपसंहार करते हुए सूत्रकार ने यहाँ माध्यमिक बौद्धों के सर्वशून्यवाद का भी खण्डन कर दिया है, ऐसा समझना चाहिए। तात्पर्य यह है कि जिन युक्तियों से क्षणिकवाद और विज्ञानवाद का निराकरण किया गया, उन्हीं के द्वारा सर्वशून्यवाद का भी निराकरण हो गया, ऐसा मानना चाहिए।।३२।। अभी तक के प्रकरण में बौद्धमत का खण्डन करने के पश्चात् अब जैन मत का खण्डन करने के उद्देश्य से नया प्रकरण आरम्भ किया जाता है। जैन मतावलम्बी सप्तभङ्गी न्याय के आधार पर एक ही पदार्थ की सत्ता और असत्ता दोनों स्वीकार करते हैं। सूत्रकार जैनियों की ऐसी मान्यता का निराकरण करने हेतु कहते हैं- (२०५ ) नैकस्मिन्नसम्भवात् ।।३३।। सूत्रार्थ- एकस्मिन् = एक पदार्थ में, न = परस्पर विरुद्ध कई धर्म नहीं रह सकते, असम्भवात् = क्योंकि, यह असम्भव है। व्याख्या-जैन मत में सात पदार्थ (जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जन, बन्ध और मोक्ष) और पाँच आस्तिकाय (जीवास्तिकाय, फुदगलास्तिकक्, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय तथा आकास्तिकाय) माने जाते हैं, साथ ही सप्त भंगी न्याय को मानने वाले हैं। उनके सप्तभङ्गी न्याय का स्वरूप इस प्रकार है- १. स्यादस्ति (पदार्थ की सत्ता का होना), २. स्यान्नास्ति (प्रकारान्तर से पदार्थ की सत्ता नहीं है), ३. स्यादस्ति च नास्ति च (पदार्थ की सत्ता का होना या न होना), ४. स्यादवक्तव्यः (सम्भव है, वस्तु का स्वरूप वर्णन करने योग्य न हो), ५. स्यादस्ति चावक्तव्यश्च (वस्तु की सत्ता का होना; परन्तु वर्णन योग्य न होना), ६. स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तु की सत्ता भी न हो और वह वर्णन करने योग्य भी न हो) तथा ७. स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तु की सत्ता हो, न भी हो और वह वर्णन करने योग्य भी न हो)। इस तरह सभी पदार्थों में उनके द्वारा विकल्प होना सिद्ध होता है। सूत्र के द्वारा इसी का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि सत् पदार्थ में प्रकार भेद तो सम्भव है; परन्तु उसमें विरोधी धर्म का होना सम्भव नहीं है। जो वस्तु है, उसका अभाव नहीं हो सकता अथवा जो वस्तु नहीं है, उसकी विद्यमानता कहाँ से होगी? इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि नित्य पदार्थ, नित्य ही रहेगा, अनित्य नहीं हो सकता तथा अनित्य पदार्थ, अनित्य ही रहेगा नित्य नहीं हो सकता। अतः जैन मतावलम्बियों का प्रत्येक वस्तु को विरुद्ध धर्मों से युक्त मानना युक्ति सङ्गत नहीं लगता, इससे उनके मत की निरर्थकता ही सिद्ध होती है॥३३॥ आत्मा की माप शरीर के बराबर होती है, जैनियों की इस दूसरी मान्यता को भी दोषपूर्ण बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं- (२०६ ) एवं चात्माकार्त्स्यम्।।३४।। सूत्रार्थ- एवं च = इसी प्रकार, आत्माकात्स्नर्यम् · आत्मा को अपूर्ण- एकदेशीय अर्थात् शरीर के बराबर माप वाला मानना भी मिथ्या है। व्याख्या- पदार्थों में विरुद्ध धर्मों की मान्यता की तरह आत्मा को एकदेशीय अर्थात् शरीर के समान परिमाप वाला मानना भी युक्तिसङ्गत नहीं है; क्योंकि किसी मनुष्य शरीरधारी आत्मा को यदि कभी उसके कर्मानुसार चींटी का शरीर प्राप्त हो, तो वह उसमें कैसे प्रविष्ट होगा? इसी प्रकार हाथी का शरीर प्राप्त होने पर उसका माप हाथी के समान कैसे हो जायेगा? इसके अतिरिक्त मनुष्य का शरीर बाल्यावस्था में छोटा तथा किशोरावस्था
Disclalimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 107
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० २ सूत्र ३७ १०९ एवं युवावस्था में बहुत बड़ा हो जाता है, तो आत्मा का माप किस अवस्था के शरीर के बराबर मानेंगे? किसी के शरीर का हाथ-पैर आदि कोई भाग कट जाने से आत्मा नहीं कट जाता। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा को एकदेशीय अथवा शरीर के बराबर मानने की बात भी सर्वथा दोषपूर्ण और अव्यावहारिक प्रतीत होता है।।३४ ।। अपनी मान्यता को निर्दोष सिद्ध करने के लिए जैनी लोगों के यह तर्क देने पर कि आत्मा छोटे शरीर में छोटा तथा बड़े शरीर में बड़ा हो जाता है, आचार्य सूत्रकार इसके उत्तर में कहते हैं- (२०७) न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥३५॥। सूत्रार्थ- च = और, पर्यायात् = आत्मा को घटने-बढ़ने वाला मान लेने से, अपि = भी, अविरोधः = विरोध का निवारण, न = नहीं हो सकता, विकारादिभ्यः = क्योंकि ऐसा मानने पर आत्मा में विकार आदि दोष प्राप्त होंगे। व्याख्या-यदि यह मान लिया जाये कि आत्मा शरीर के परिमाण के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है, तो भी वह निर्दोष नहीं सिद्ध होता; क्योंकि ऐसा मान लेने पर उसे विकारी अवयवयुक्त तथा अनित्य आदि कई दोषों से युक्त माना जायेगा। घटने-बढ़ने वाला पदार्थ अवयवयुक्त तथा अनित्य होता है, जबकि आत्मा को निरावयव एवं नित्य माना गया है। घटना और बढ़ना विकार है, जो कि निर्विकार आत्मा में सम्भव नहीं है; क्योंकि ऐसा मानने से अनेक दोष आत्मा में प्राप्त हो सकते हैं। अतः जैनियों की उपर्युक्त मान्यता निरर्थक है।।३५ ।। सूत्रकार आत्मा को शरीर के समान माप वाला मानने की असङ्गतता को प्रकारान्तर से सिद्ध करते हैं- (२०८) अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषः ॥३६ ।। सूत्रार्थ- च = और, अन्त्यावस्थिते: = मरणकाल में जीव का जो परिमाण (माप) है, उसकी नित्य स्थिति मानी गई है, इसलिए, उभयनित्यत्वात् = आदि और मध्य अवस्था में जो उसका परिमाप रहा है, उसको भी नित्य मानना हो जाता है, अविशेष: = अतः कोई विशेषता नहीं रह जाती (सब शरीरों में उसका माप एक- सा सिद्ध हो जाता है)। व्याख्या-मोक्षावस्था में जीव का जो परिमाप है, उसकी नित्य स्थिति का प्रतिपादन जैनियों ने किया है अर्थात् उनका एक-सा रहना बतलाया है। इस कारण आदि और मध्य की अवस्था में भी जो उसका परिमाण है, उसको भी उसी प्रकार नित्य मानना हो जाता है। वह बीच में घटता-बढ़ता नहीं, सदा एक-सा ही रहता है तथा छोटी या बड़ी किसी भी योनि में जाने पर उन सबमें समान परिमाण ही रहता है। योनि के आधार पर किसी प्रकार की माप सम्बन्धी विशेषता का मानना युक्तिसङ्गत नहीं होगा। इस प्रकार परस्पर विरुद्ध मान्यताएँ होने के कारण जैन-सिद्धान्त मानने योग्य नहीं है॥३६ ।। इस प्रकार जैन मतवादियों की मान्यता को निरस्त करने के पश्चात् पाशुपत सिद्धान्त वालों की मान्यता का निराकरण करने के लिए अब आचार्य अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं- (२०९ ) पत्युरसामञ्जस्यात् ॥३७।। सूत्रार्थ- पत्युः = पशुपति का मत भी, असामञ्जस्यात् - परस्पर विरोधी मान्यताओं के कारण युक्तिसंगत नहीं है। व्याख्या- पशुपति मत में तत्त्वों की कल्पना एवं मुक्ति के साधन वेद-विरुद्ध हैं। इस मत में छः मुद्राएँ- कण्ठी, रुचिका, कुण्डल, जटा, भस्म और यज्ञोपवीत हैं। उनका कथन है कि जो इनके द्वारा अपने देह को
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 108
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
११० वदान्त दशन मुद्रित (चिह्नित) कर लेता है, उसे पुनः जन्म धारण नहीं करना होता। उनकी मान्यता है कि हाथ में रुद्राक्ष का कंकण पहनने, मस्तक पर जटा धारण करने, मुर्दे की खोपड़ी लिए रहने तथा शरीर पर भस्म लगाने जैसे चिह्नों को धारण करने मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त वे शंकर को निमित्त कारण तथा प्रधान को उपादान कारण मानते हैं, परन्तु उक्त सभी बातें परस्पर विरुद्ध धर्म वाली तथा वेद-विरुद्ध हैं तथा यह मत मानने योग्य नहीं है।३७ ।। अब आचार्य पाशुपतों के निमित्त कारणवाद सिद्धान्त का निराकरण करते हैं- ( २१० ) सम्बन्धानुपपत्तेश्च॥३८।। सूत्रार्थ- सम्बन्धानुपपत्ते: = सम्बन्ध की सिद्धि न होने से, च = भी (यह मत असङ्गत है)। व्याख्या- पाशुपतों की मान्यतानुसार यदि ब्रह्म को मात्र निमित्त कारण माना जाये, तो उपादान के साथ उसका किस प्रकार सम्बन्ध स्थापित होगा, यह जानना आवश्यक है। व्यवहार में देखा जाता है कि शरीरधारी कुम्भकार आदि घट आदि कार्यों के निमित्त मृत्तिका आदि साधनों से अपना संयोग संबन्ध स्थापित करते हैं; किन्तु ब्रह्म के निराकार होने की वजह से उसका जड़ प्रकृति के साथ संयोग रूप सम्बन्ध नहीं होता, अतएव वह सृष्टि रचना भी नहीं कर सकता। जो लोग वेदों को प्रमाण मानते हैं उनके लिए युक्ति का कोई मूल्य नहीं है; क्योंकि वे वेद के कथनानुसार ईश्वर को सर्वशक्तिमान् मानते हैं। अतः ईश्वर स्वयं ही निमित्त और उपादान कारण है। पाशुपतों की उपर्युक्त मान्यता वेद और तर्क दोनों से ही सिद्ध नहीं होने के कारण सर्वथा अमान्य और अनुपादेय है।३८।। उक्त मत में अब आचार्य अन्य अनुपपत्ति दर्शाते हैं- (२११ ) अधिष्ठानानुपपत्तेश्च।।३९।। सूत्रार्थ- अधिष्ठानानुपपत्ते: = अधिष्ठान की उपपत्ति न होने के कारण, च = भी (ईश्वर को केवल निमित्त कारण नहीं कह सकते)। व्याख्या-वे मानते हैं कि जिस प्रकार मिट्टी आदि साधन सामग्री का अधिष्ठाता होकर कुम्भकार घट आदि का कार्य करता है, उसी प्रकार प्रधान आदि साधनों का अधिष्ठाता होने पर सृष्टिकर्ता ईश्वर भी रचना कार्य कर सकेगा, परन्तु ऐसा मानना ठीक नहीं है; क्योंकि न तो ईश्वर कुम्भकार जैसा शरीरधारी है और न प्रधान ही मिट्टी आदि की तरह साकार है, अतः निराकार ईश्वर रूपादि से रहित प्रधान का अधिष्ठाता कैसे हो सकता है? इसलिए युक्ति विरुद्ध मान्यताओं वाला पाशुपत मत मान्य नहीं हो सकता॥३९॥ ऐसी स्थिति में पाशुपतों द्वारा ब्रह्म को शरीर और इन्द्रियों से युक्त मान लेने की बात कहने पर सूत्रकार कहते हैं- ( २१२ ) करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः॥४०॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि, करणवत् · (ईश्वर को) शरीर, इन्द्रिय आदि करणों से युक्त मान लें तो, न = ऐसा ठीक नहीं है, भोगादिभ्यः क्योंकि ऐसा मानने पर वह भोगादि का भोक्ता सिद्ध हो जायेगा। व्याख्या- यदि यह कहा जाये कि ब्रह्म अपने संकल्प से ही मन, बुद्धि, इन्द्रियादि सहित शरीर धारण करके निमित्त कारण बन जाता है, तो यह कहना भ्रममूलक है; क्योंकि शरीरधारी होने पर सामान्य जीवों की तरह उसके शुभाशुभ कर्मों एवं सुख-दुःख आदि भोगों को मानने का प्रसङ्ग आ जायेगा। ऐसी अवस्था में उसका ईश्वरत्व भी सिद्ध नहीं होगा। अतः ब्रह्म को केवल निमित्तकारण मानना युक्तिसङ्गत नहीं है॥४०॥ पाशुपतों की उपर्युक्त मान्यता में आचार्य अन्य दोष उपस्थित करते हुए कहते हैं-
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 109
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० २ सूत्र ४३ १११
(२१३) अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॥४१॥ सूत्रार्थ- अन्तवत्त्वम् = ईश्वर के विनाशवाला होने का, वा = अथवा, असर्वज्ञता = सर्वज्ञ न होने का दोष उपस्थित होता है। व्याख्या- पाशुपत सिद्धान्त के अनुसार उपर्युक्त प्रकार मानने से ईश्वर को मरणधर्मा मानना होगा और तब उसके सर्वज्ञ न होने का दोष उपस्थित होगा; क्योंकि जो शरीर से सम्बद्ध है, वह कभी न कभी उसका परित्याग भी अवश्य करता है। शरीर के ग्रहण और परित्याग का नाम ही विनाश है, सूत्र में 'अंत' पद का संकेत उसी ओर है। यदि प्रधान एवं जीवों का अधिष्ठाता ईश्वर शरीरी होगा, तो निश्चय ही वह जीवों की तरह कभी शरीर का ग्रहण करने वाला एवं कभी परित्याग करने वाला होगा। ऐसी अवस्था में उसे अन्तवाला (विनाशी) एवं अल्पज्ञ मानना होगा, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, अविनाशी परब्रह्म नहीं। इस प्रकार पशुपति मत के अनुसार परब्रह्म परमात्मा को शरीरी मानना सर्वथा निस्सार एवं वेद-विरुद्ध है॥४१॥ यहाँ तक वेद के प्रतिकूल मतों का निराकरण किया गया है। अब आगे वेद प्रमाण पर आधारित पाञ्चरात्र आगम में आंशिक अनुपपत्ति की शङ्का का समाधान करने के उद्देश्य से अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। भागवत्- शास्त्र एवं पाञ्चरात्र के अनुसार जगत् के कारण परब्रह्म स्वरूप 'वासुदेव' से 'संकर्षण' नामक जीव की; संकर्षण से 'प्रद्युम्न' संज्ञक मन की एवं प्रद्युम्न से 'अनिरुद्ध' नामक अहंकार की उत्पत्ति होती है। इस प्रकरण में दोष दिखाते हुए पूर्वपक्षी का कथन है- (२१४) उत्पत्त्यसम्भवात्॥।४२।। सूत्रार्थ- उत्पत्त्यसम्भवात् = जीव की उत्पत्ति सम्भव न होने से (वासुदेव से संकर्षण की उत्पत्ति मानना वेद-विरुद्ध है)। व्याख्या- भागवत्-शास्त्र अथवा पाञ्चरात्र आगम की यह मान्यता है कि 'जगत् के परम कारण परबह्म श्री 'वासुदेव' हैं और वे ही इसके निमित्त एवं उपादान कारण भी हैं; श्रुति सङ्गत है, परन्तु वासुदेव से 'संकर्षण' नामक जीव की उत्पत्ति का कथन वेद-विरुद्ध है; क्योंकि श्रुति में जीव को जन्म-मरण रहित एवं नित्य कहा गया है। उत्पन्न होने वाली वस्तु कभी नित्य नहीं हो सकती, उसका मरण निश्चित है। इस प्रकार वेद-शास्त्रों में उसकी बद्ध-मुक्त अवस्था का विवेचन है, वह निरर्थक होगा। इसके अतिरिक्त जन्म-मृत्यु रूप बंधन से मुक्ति एवं ब्रह्म की प्राप्ति के वेदोक्त साधन भी व्यर्थ सिद्ध होंगे। अतः जीव की उत्पत्ति की बात उचित नहीं है।४२ । अब पूर्वपक्षी की अन्य शंका का वर्णन किया जाता है- (२१५ ) न च कर्तु: करणम् ॥४३॥ सूत्रार्थ-च = तथा, कर्त्तुः = कर्त्ता (जीवात्मा) से, करणम् - करण (मन और मन से अहंकार) की उत्पत्ति भी, न = सम्भव नहीं है। व्याख्या- जिस प्रकार परब्रह्म वासुदेव से जीव की उत्पत्ति नहीं हो सकती, उसी प्रकार संकर्षण नाम से कहे जाने वाले जीव से प्रद्युम्न नामक मन की और उससे अनिरुद्ध नामक अहंकार की उत्पत्ति भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीव कर्त्ता और चेतन है, मन करण है। कर्त्ता से करण की उत्पत्ति होना नितान्त असम्भव है, अतः यह मान्यता भी असंगत है॥४३।। पाञ्चरात्र आगम में अन्य सब मान्यताएँ वेदानुकूल होने पर भी उपर्युक्त स्थलों में दर्शाये गये श्रुति विरोध का अगले दो सूत्रों द्वारा समाधान किया जा रहा है-
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 110
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
११२ वेदान्त दर्शन
( २१६ ) विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः॥४४॥ सूत्रार्थ- वा = अथवा; विज्ञानादिभावे = ईश्वर में सर्वविज्ञान और सर्वव्यापक आदि भाव मान लें तो, तदप्रतिषेध: = उसकी उत्पत्ति का वेद में निषेध नहीं है। व्याख्या- पूर्वपक्षी के इस कथन में कि 'श्रुति में जीव की उत्पत्ति का विरोध है तथा कर्त्ता से करण की उत्पत्ति नहीं हो सकती, प्रत्युत्तर में सिद्धान्त पक्ष का मत है कि पाञ्चरात्र शास्त्र में जीवात्मा की उत्पत्ति अथवा कर्त्ता से करण की उत्पत्ति नहीं बताई गई है; बल्कि संकर्षण जीव तत्त्व के, प्रद्युम्न मनस्तत्त्व के और अनिरुद्ध अहंकार तत्त्व के अधिष्ठाता बताये गये हैं, जो भगवान् वासुदेव के ही अङ्गभूत हैं; क्योंकि वहाँ संकर्षण को ईश का प्राण, प्रद्युम्न को मन और अनिरुद्ध को अहंकार माना गया है। इस प्रकार के गुण से युक्त 'वासुदेव' ब्रह्म ही हैं। अतः इनकी उत्पत्ति का जो वर्णन है, वह भगवान् के ही अंशों का उन-उन रूपों में प्राकट्य बतलाने वाला है। 'अजायमानो बहुधा विजायते।' (यजु० ३१/१९) इस श्रुति वाक्य में अजन्मा भगवान् के विविध रूपों में प्राकट्य का वर्णन मिलता है। अतः संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध आदि उन परब्रह्म वासुदेव से भिन्न तत्त्व नहीं हैं। अतः इनकी उत्पत्ति का वर्णन वेद-विरुद्ध नहीं है॥४४॥ उक्त प्रकरण का उपसंहार करते हुए आचार्य सूत्रकार कहते हैं- ( २१७ ) विप्रतिषेधाच्च॥४५। सूत्रार्थ- विप्रतिषेधात् = इस शास्त्र में जीव की उत्पत्ति का निषेध किया गया है, इसलिए; च = भी (यह वेद के प्रतिकूल नहीं है)। व्याख्या- पाञ्चरात्र आगम में जीव को अनादि, नित्य, चेतन, अविनाशी माना गया है तथा उसके जन्म- मरण का निषेध किया गया है। इससे भी वैदिक प्रक्रिया का अविरोध सिद्ध होता है। उक्त शास्त्र का यह कथन कि 'शाण्डिल्य मुनि ने वेद-वेदाङ्गों में निश्चल स्थिति को न पाकर इस भक्तिशास्त्र का अध्ययन किया', वेदों की निन्दा या प्रतिषेध नहीं है, अपितु इस वाक्य द्वारा भक्तिशास्त्र की महिमा का बखान किया गया है। अतः पाञ्चरात्र आगम सर्वथा निर्दोष एवं वेदानुकूल है॥४५।।
॥ इति द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्तः ॥
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 111
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
॥ अथ द्वितीयाध्याये तृतीयः पादः॥
ग्रन्थ के आरम्भ में शास्त्रीय वाक्यों के समन्वय द्वारा यह सिद्ध किया गया कि सृष्टि के सृजन का प्रमुख कारण ब्रह्म है। इस समन्वय में उपस्थित विरोधों का निराकरण स्मृति एवं तर्क के आधार पर द्वितीय अध्याय के पूर्व पादों में किया गया। अब उस समन्वय (परब्रह्म को समस्त सृष्टि का अभिन्न निमित्त एवं उपादान कारण मानने) में शास्त्र के विभिन्न वाक्यों के अन्तर्गत जो विरोध प्रतीत होता है, उसके समाधान तथा जीवात्मा के स्वरूप का विवेचन करने के उद्देश्य से यह पाद आरम्भ किया जाता है। श्रुतियों में कहीं तो कहा गया है कि जगत् की उत्पत्ति में परमात्मा ने सर्वप्रथम तेज की रचना की, फिर तेज से जल एवं जल से अन्न की तथा कहीं पर कहा है कि प्रथमतः आकाश की सर्जना हुई, फिर उससे वायु आदि के क्रम से जगत् का निर्माण हुआ। जगदुत्पत्ति के सन्दर्भ में इस प्रकार विरोध की एकता करके समाधान करने के लिए सूत्रकार विवेचनपूर्वक पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते हैं- (२१८ ) न वियदश्रुते: ॥।१ ॥ सूत्रार्थ- वियत् = आकाश, न = उत्पन्न नहीं होता, अश्रुते: = क्योंकि (छान्दोग्य के सृष्टि प्रकरण में) उसकी उत्पत्ति नहीं सुनी गयी है। व्याख्या-छान्दोग्य उपनिषद् (६/२/३-४, ६/३/२-४) के सर्ग रचना में जहाँ जगत् की उत्पत्ति का वर्णन आया है, वहाँ सर्वप्रथम तेज के उत्पत्ति की बात कही गई है; फिर तेज, जल और अन्न इन तीनों के सम्मिलन से जगत् की उत्पत्ति का वर्णन है, वहाँ आकाश की उत्पत्ति का कोई उल्लेख नहीं है। गीता में (१३/३२) आकाश को विभु (व्यापक) माना गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि आकाश उत्पन्न नहीं होता, बल्कि वह नित्य है ॥१॥ ( २१९ ) अस्ति तु ॥२ ॥ सूत्रार्थ-तु= किन्तु, अस्ति = आकाश की उत्पत्ति का उल्लेख भी दूसरी श्रुति में है। व्याख्या- तैत्तिरीय उपनिषद् (२/१/१) में कहा गया है- 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' निश्चित ही उस व्यापक तत्त्व से आकाश उत्पन्न होता है। यहाँ ब्रह्म को सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त बताकर उसी से आकाश की उत्पत्ति बताई गई है। 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी' (मुण्डकोपनिषद् २/१/३) के अनुसार उस अविनाशी तत्त्व से प्राण, मन, सब इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल और पृथिवी उत्पन्न होते हैं। उक्त कथन में भी आकाश की उत्पत्ति का स्पष्ट उल्लेख है। अतः यह कहना समीचीन नहीं है कि वेदों में आकाश की उत्पत्ति का वर्णन नहीं है।।२।। तत्त्वविवेचन के उद्देश्य से पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते हुए सूत्रकार कहते हैं- (२२० ) गौण्यसम्भवात्॥३।। सूत्रार्थ-असम्भवात् = आकाश की उत्पत्ति सम्भव न होने के कारण, गौणी = यह श्रुति गौण है। व्याख्या- निरवयव तथा व्यापक होने के कारण आकाश का उत्पन्न होना नहीं हो सकता; क्योंकि उत्पन्न होने वाला पदार्थ हमेशा सावयव होता है। प्रलयकाल में जो आकाश मूल उपादान तत्त्वों से भरा हुआ था, सर्गकाल में उसके जगत् रूप में परिणत हो जाने से प्रकट जैसा हो जाता है। सम्भव है कि इस अवस्था को ही तैत्तिरीय व मुण्डकोपनिषद् में उत्पन्न होना कह दिया गया हो। अतः उस कथन को गौण समझना चाहिए॥३॥ पूर्वपक्ष की ओर से स्वपक्ष को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से सूत्रकार अन्य हेतु उपस्थित करते हैं-
Disclalmer / Warning: All literary and artistic materal on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 112
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
११४ वदान्त दशन
( २२१ ) शब्दाच्च॥४॥ सूत्रार्थ- शब्दात् = शब्द प्रमाण से, च = भी (आकाश का उत्पन्न न होना सिद्ध होता है)। व्याख्या- बृहदारण्यक उ. (२/३/३) में कहा गया है- 'वायुश्चान्तरिक्षंचैतदमृतम्' - वायु और आकाश दोनों अमृत हैं, अमरणधर्मा हैं। उत्पन्न होने वाले की मृत्यु सुनिश्चित है। श्रुति में आकाश की अमरता का स्पष्ट संकेत है, इससे सिद्ध होता है कि वह उत्पन्न होने वाला पदार्थ नहीं है। अतः जहाँ कहीं आकाश की उत्पत्ति का वर्णन है, उसे उक्त आधारों पर गौण समझना चाहिए। इसी तरह तैत्तिरीय उपनिषद् (१/६/२) में 'आकाशशरीरं ब्रह्म' कहकर आकाश को ब्रह्म का शरीर होना बताया गया है। इस प्रकार उक्त श्रुति वाक्यों से आकाश की अमरता व अनन्तता सिद्ध होती है, इसलिए भी उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती॥४॥ यहाँ शिष्य जिज्ञासा प्रकट करता है कि श्रुति के सर्ग प्रकरण में प्रयुक्त 'जायते' एवं 'सम्भूतः' पदों का आकाश के सन्दर्भ में गौण प्रयोग समझा जाये तथा वायु, अग्नि आदि के विषय में मुख्य प्रयोग, यह किस प्रकार सम्भव हो सकता है? आचार्य ने पूर्वपक्ष की दढ़ता के लिए समाधान प्रस्तुत किया- ( २२२ ) स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॥५ ॥ सूत्रार्थ- च = और, ब्रह्मशब्दवत् = ब्रह्म शब्द के समान, एकस्य = किसी एक शाखा के वर्णन में, स्यात् =गौण रूप से भी आकाश की उत्पत्ति कही जा सकती है। व्याख्या- 'तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रह्मेति' (तै.उ. ३/२) अर्थात् तप द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा कर, तप ब्रह्म है। इस वाक्य में एक ही ब्रह्म पद का प्रथम प्रयोग मुख्य अर्थ में है, जबकि दूसरा गौण अर्थ में, अर्थात् जो ब्रह्मज्ञान का साधन है, उस तप को ब्रह्म कह दिया गया है। इसी प्रकार मुण्डकोपनिषद् (१/१/९) में 'तस्मादेतद् ब्रह्म' कहकर 'ब्रह्म' को गौण अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। किसी-किसी विद्वान् द्वारा गौण अर्थ में आकाश को उत्पत्तिशील बताया गया हो सकता है।५॥ इस प्रकार पूर्वपक्ष प्रस्तुत करने के पश्चात् अब आगामी दो सूत्रों द्वारा आचार्य सूत्रकार उक्त प्रकरण का समाधान करते हैं- (२२३ ) प्रतिज्ञाऽ्हानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥६॥ सूत्रार्थ- अव्यतिरेकात् = ब्रह्म के कार्य से आकाश को अलग न मानने से ही, प्रतिज्ञाहानिः = प्रतिज्ञा की हानि न होगी, शब्देभ्यः = श्रुति शब्दों से यही सिद्ध होता है। व्याख्या- छान्दोग्य उपनिषद् (३/१/१-६) में जो एक को जानने से सबका ज्ञान हो जाने की प्रतिज्ञा की गई है तथा उस प्रसङ्ग में कार्य-कारण के उदाहरणों की अविरोध सिद्धि आकाश को ब्रह्म के कार्य से पृथक् न मानने पर ही हो सकती है, अन्यथा नहीं; क्योंकि वहाँ मृत्तिका और स्वर्ण आदि का उदाहरण देकर उनके किसी एक कार्य के ज्ञान से कारण का ज्ञान होने पर सबका ज्ञान होना बताया गया है। अतः यदि आकाश को ब्रह्म से भिन्न मानेंगे, तो इससे प्रतिज्ञा की हानि होगी। इसके अतिरिक्त 'यह सब निःसन्देह ब्रह्म ही है; क्योंकि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय उसी में होता है' (छा.उ.३/१४/१), 'यह सब ब्रह्म ही है' (मु.उ. २/२/११) आदि श्रुति कथनों से आकाश ब्रह्म का ही कार्य होना सिद्ध होता है॥६॥ ( २२४ ) यावद्विकारं तु विभागो लोकवत्।७।। सूत्रार्थ- तु = किन्तु, लोकवत् = लौकिक व्यवहार की तरह, यावद्विकारम् = जहाँ तक विकार है, विभाग: = ब्रह्म की ही रचना है। व्याख्या- जिस प्रकार लोक में किसी के पुत्रों को इंगित करके कह दिया जाता है कि ये अमुक के पुत्र हैं और उनमें से किसी एक की उत्पत्ति बता देने से ही सबकी उत्पत्ति उसी प्रकार हुई होगी यह समझ लिया
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 113
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ३ सूत्र १० ११५ जाता है, उसी प्रकार जब सम्पूर्ण विकारात्मक जगत् को उस ब्रह्म का कार्य बता दिया गया, तब आकाश उससे अलग कैसे रह सकता है। अतः जिसकी उत्पत्ति कह दी गई, उन्हीं की तरह न कहे जाने वालों की उत्पत्ति भी समझ लेनी चाहिए। तेज आदि की सृष्टि की तरह ही वायु और आकाश का भी ब्रह्म से सृजन तथा उनका अमर होना कहा गया है।।७।। आकाश का उत्पन्न होना सिद्ध होने के बाद वायु के सन्दर्भ में निर्णय के भाव से शिष्य द्वारा जिज्ञासा प्रकट करने पर सूत्रकार कहते हैं- (२२५ ) एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः।।८ ।। सूत्रार्थ- एतेन = इस उपर्युक्त कथन से, मातरिश्वा = वायु का उत्पन्न होना भी, व्याख्यातः = बता दिया गया। व्याख्या-बृहदारण्यक (२/३/३) में वायु को 'अमृत' कहा है; परन्तु मुण्डक (२/१/३) और तैत्तिरीय (२/१) में वायु की उत्पत्ति का स्पष्ट उल्लेख है। शास्त्र कथनों में पाये जाने वाले इस विरोध से सन्देह होता है कि वायु को उत्पन्न तत्त्व माना जाये अथवा अनुत्पन्न? आचार्य ने निर्णय दिया कि जिन युक्तियों और प्रमाणों से आकाश का उत्पन्न होना निश्चित किया गया, उन्हीं प्रमाणों से वायु का उत्पन्न होना भी सिद्ध हो गया, अतः उसके सम्बन्धों में अलग से कुछ कहने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।८॥ इस प्रकार आकाश और वायु की उत्पत्ति सिद्धि के बाद लोक में जिन तत्त्वों को अन्य मतावलम्बी नित्य मानते हैं एवं जिनकी उत्पत्ति का श्रुति में स्पष्ट कथन नहीं है, उन सबको भी उत्पत्तिशील सिद्ध करने के उद्देश्य से सूत्रकार आगे कहते हैं- (२२६ ) असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्ते: ।।९ ।। सूत्रार्थ-सतः = 'सत्' शब्दवाच्य ब्रह्म के सिवा (किसी अन्य से उत्पन्न न होना), तु = तो, असम्भवः = सम्भव नहीं है; क्योंकि, अनुपपत्ते: = यह युक्ति और प्रमाण द्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या- श्रुति में सत् नाम से वर्णित परब्रह्म परमात्मा, जिसे इस जड़-चेतन जगत् का परम कारण माना गया है, के सिवा अन्य कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो इस जगत् में उत्पत्तिशील न हो। बुद्धि, अहंकार, काल, गुण और परमाणु आदि सभी तो उत्पत्तिशील हैं; क्योंकि ऋग्वेद के प्रलयदशा वर्णन में कहा है- 'आनीदवातं स्वधया तदेकं' (ऋ. १०/१२९/२) अर्थात् प्रलयदशा में जब कार्यजगत् का कोई पदार्थ विद्यमान नहीं रहता, तब स्वधा-प्रकृति के साथ एक मात्र शुद्ध चेतन तत्त्व ब्रह्मस्वरूप में अवस्थित रहता है। अतः श्रुतियों के प्रमाण एवं युक्तियों से यही बात सिद्ध होती है कि ब्रह्म ही अजन्मा एवं नित्य है, उसके सिवाय कोई भी ऐसा नहीं है, जो जन्म-मरण के चक्र में बँधा न हो अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त सभी उत्पत्तिशील हैं।।९॥ छान्दोग्यो० (६/२/३-४) का कथन है कि 'उस ब्रह्म ने तेज को रचा' जबकि तैत्तिरीय (२/१) के अनुसार ब्रह्म से आकाश उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु और वायु से तेज।'अतः यहाँ शिष्य जिज्ञासा करता है कि तेज को ब्रह्म से उत्पन्न हुआ माना जाये अथवा वायु से? सूत्रकार समाधान करते हैं- (२२७ ) तेजोऽतस्तथा ह्याह ॥१० ॥ सूत्रार्थ-तेज: = तेज, अतः = इस (वायु) से, तथा हि = ऐसा ही, आह = अन्यत्र कहा है। व्याख्या- 'वायोरग्निः' (तै.उ. २/१) इस श्रुति वाक्य से, 'तेज तत्त्व वायु से उत्पन्न हुआ है' यही सिद्ध होता है। भाव यह है कि ब्रह्म ने वायु से तेज को उत्पन्न किया अर्थात् आकाश और वायु उत्पन्न करने के पश्चात् वायु से तेज की रचना की, ऐसा मान लेने पर दोनों श्रुतियों की वाक्यैक्यता हो जायेगी ॥१०॥ जगत् रचना क्रम में आचार्य ने आगे बताया-
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 114
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
११६ वदान्त दशन
(२२८ ) आपः ॥११॥ सूत्रार्थ-आपः = जल (तेज से उत्पन्न हुआ)। व्याख्या- तेज के अनन्तर जल उत्पन्न होता है, ऐसा उल्लेख शास्त्रों में प्राप्त होता है। 'अग्नेरापः' (तै.उ.२/ १/१) के अनुसार अग्नि से जल का उद्भव बताया गया है। इस प्रकार तेज के द्वारा जल का उत्पन्न होना सिद्ध होता है॥११॥ जल के बाद आचार्य ने पृथिवी की उत्पत्ति के विषय में कहा- (२२९ ) पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥१२।। सूत्रार्थ- पृथिवी = पृथिवी की उत्पत्ति कही गयी है, अधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः = अधिकार से, रूप से तथा शब्द के अन्तर से। व्याख्या- मुण्डक (२/१/३) में जल की उत्पत्ति के बाद पृथिवी की रचना का स्पष्ट उल्लेख है। छान्दोग्य (६/२/४) में जल के अनन्तर 'अन्न' की उत्पत्ति का वर्णन है, पृथ्वी का नहीं। 'अधिकार रूप शब्दान्तरेभ्यः' हेतुओं का आधार पर इस शंका का समाधान करने के लिए यहाँ सूत्रकार अन्न को पृथ्वी मानने के तीन कारण प्रस्तुत करते हैं- अधिकार का अर्थ है प्रकरण। इस प्रकरण में अन्न शब्द को पृथिवी शब्द का ही बोधक मानना उपयुक्त है; क्योंकि यह तत्त्वों की उत्पत्ति का प्रकरण है और पृथिवी पंच तत्त्वों में से एक है। दूसरा जो अन्न का रूप कृष्ण बताया गया है, वह भी पृथिवी के साथ अधिक सामञ्जस्य रखता है। धान, चना, गेहूँ आदि अन्नों के कृष्ण रूप होने का कोई नियम नहीं है। यद्यपि पृथ्वी भी कहीं-कहीं लाल, पीले, सफेद आदि रूपों में देखी जाती है, पर प्रायः उसका कृष्ण रूप ही देखा जाता है। अब शब्दान्तर पर कहते हैं- 'अद्भ्यः पृथिवी' (तै.उ. २/१) में जहाँ इस क्रम का उल्लेख है, वहाँ भी जल से पृथिवी का उत्पन्न होना बताया गया है, उसके पश्चात् पृथिवी से ओषधि और ओषधि से अन्न की उत्पत्ति की बात कही गई है, जल से सीधे अन्न उत्पन्न होने की बात नहीं कही गई है। इन उदाहरणों से सिद्ध है कि यहाँ 'अन्न' शब्द से 'पृथिवी' ही कही गई है॥१२ ।। प्रस्तुत प्रसंग में आकाश की उत्पत्ति स्वयं ब्रह्म से तथा शेष तत्त्वों की क्रमशः एक दूसरे से उत्पत्ति कही गई है। अतः शिष्य जिज्ञासा करता है कि एक तत्त्व के अनन्तर दूसरे तत्त्व की रचना स्वयं ब्रह्म करता है अथवा एक तत्त्व स्वतः दूसरे तत्त्व को उत्पन्न करता है। सूत्रकार समाधान करते हैं- (२३० ) तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्स: ॥१३।। सूत्रार्थ- तदभिध्यानात् = तत्त्व सृष्टि के भलीभाँति चिन्तन पूर्वक कथन से, एव = ही, तु = तो (यह सिद्ध होता है कि), सः = वह परमात्मा ही सबकी रचना करता है, तल्लिङ्गात् = क्योंकि उक्त लक्षण उसी के अनुरूप हैं। व्याख्या- यहाँ सूत्र के 'अभिध्यान' पद का अर्थ है- संकल्पपूर्वक चिन्तन। प्रलय के पश्चात् परब्रह्म का सृष्टि सृजन के लिए संकल्प होता है। वह कारण एवं कार्य की व्यवस्था के विषय में चिन्तन करता है। यहाँ यह विचारणीय है कि चिन्तन रूप कर्म जड़ तत्त्व में कैसे सम्भव हो सकता है अर्थात् चेतन परब्रह्म परमात्मा में ही चिन्तन और संकल्पपूर्वक सृजन सम्भव हो सकता है, अतः यही सिद्ध होता है कि ब्रह्म स्वयं ही उत्पन्न किए हुए एक तत्त्व से दूसरे तत्त्व को उत्पन्न करता है। इसी उद्देश्य से एक तत्त्व से दूसरे तत्त्व के उत्पत्ति की बात उत्पत्ति क्रम में कही गई है। स्वतंत्र रूप से कोई तत्त्व कारण नहीं बताया गया है। इसलिए स्पष्ट रूप से यही समझना चाहिए कि मुख्यतया सबका उत्पादक एक मात्र परब्रह्म परमेश्वर ही है, अन्य कोई नहीं॥१३॥ इस प्रकार तत्त्वों के उत्पत्तिक्रम के विषय में निश्चय किये जाने के पश्चात् प्रलय आने पर-तत्चों के प्रलय का
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 115
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ३ सूत्र १६ ११७ क्या क्रम रहता है? शिष्य की इस जिज्ञासा का सूत्रकार समाधान करते हैं- (२३१ ) विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥१४॥। सूत्रार्थ-तु= परन्तु, अतः = इस प्रकार उत्पत्ति क्रम से, क्रमः = प्रलय-क्रम, विपर्ययेण =विपरीत होता है, च - तथा (स्मृति में भी ऐसा ही कथन है), उपपद्यते - ऐसा ही होना युक्तिसङ्गत है। व्याख्या- जगत् की उत्पत्ति का जो क्रम उपनिषदों में बताया गया है, इसका उलट क्रम प्रलयकाल में होता है। पृथिवी से लेकर आकाश तक पिछला पूर्व में लीन होता जाता है। पृथिवी जल में, जल अग्नि में, अग्नि वायु में, वायु आकाश में तथा आकाश ब्रह्म में विलीन होता जाता है। इस कथन का सत्य यह है कि जिस प्रकार उत्पत्ति के समय कारण से कार्य का उद्भव होता है, उसी प्रकार प्रलयकाल में कार्य अपने कारण में विलीन हो जाता है। कारण से कार्य का होना 'सर्ग' तथा कार्य का कारण में लीन होना 'प्रतिसर्ग' कहलाता है। सूत्र से भी यही भाव स्पष्ट होता है कि उत्पत्तिक्रम को उलट देने से प्रलयक्रम उत्पन्न होता है। युक्ति से भी यही क्रम उपयुक्त लगता है जैसे जल से बर्फ बनता है और बर्फ पुनः अपने कारण जल में लय हो जाता है। स्मृतियों में भी ऐसा ही कथन देखा जाता है।।१४॥ महाभूतों की उत्पत्ति एवं प्रलय का क्रम जान लेने के पश्चात् अब शिष्य मन, बुद्धि और इन्द्रियों की उत्पत्ति के विषय में जिज्ञासा प्रकट करता है कि इनकी उत्पत्ति भूतों से होती है या फिर ब्रह्म से। यदि ब्रह्म से, तो भूतों से पूर्व अथवा बाद में ? अतः इस जिज्ञासा का समाधान करने के उद्देश्य से आचार्य कहते हैं- ( २३२ ) अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात्॥१५॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो, विज्ञानमनसी = इन्द्रियाँ और मन, क्रमेण = उत्पत्ति क्रम से, अन्तरा = ब्रह्म और आकाश आदि भूतों के मध्य में होना चाहिए, तल्लिङ्गात्= क्योंकि (श्रुति में) ऐसा ही प्रमाण प्राप्त होता है, इति न = तो, ऐसा कथन ठीक नहीं है, क्योंकि; अविशेषात् = श्रुति में किसी क्रम विशेष का वर्णन नहीं मिलता। व्याख्या- मुण्डकोपनिषद् (२/१/३) में कहा गया है- 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिराप: पृथिवी विश्वस्य धारिणी' अर्थात् इसी अविनाशी ब्रह्म से प्राण, मन एवं समस्त इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। इसी से आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं विश्व को धारण करने वाली पृथिवी उत्पन्न होती है। इस वर्णन में ब्रह्म से प्राण, मन और इन्द्रियों के पश्चात् आकाश आदि पंचभूतों की क्रमशः उत्पत्ति कही गई है। अतः ब्रह्म और आकाश के मध्य मन-इन्द्रियों का स्थान उपर्युक्त श्रुति के आधार पर निश्चित होता है। परन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि इस वर्णन में किसी क्रम विशेष का उल्लेख नहीं है; क्योंकि उक्त श्रुति के सम्पूर्ण प्रकरण को देखने से यह बात सिद्ध होती है कि प्राण, मन सहित इन्द्रियों की उत्पत्ति भी परमेश्वर से ही होती है तथा यह भी स्पष्ट होता है कि श्रुति का उद्देश्य किसी प्रकार से क्रम का प्रतिपादन करना नहीं है, बल्कि भिन्न-भिन्न कल्पों में विभिन्न क्रम से सृष्टि रचना का वर्णन ही श्रुतियों में पाया जाता है, इसलिए भी किसी एक क्रम विशेष को निश्चित नहीं माना जा सकता ॥१५॥ अभी तक के वर्णन में ब्रह्म को समस्त जड़-चेतन जगत् का प्रमुख कारण सिद्ध किया गया, जिससे ऐसा लगता है कि उस परमेश्वर से ही अन्य तत्त्वों की तरह जीवों की भी उत्पत्ति होती है। ऐसी स्थिति में शिष्य के मन में यह जिज्ञासा उठती है ब्रह्म का ही अंश होने के कारण जीवात्मा को जन्म-मरण से रहित, अविनाशी तथा नित्य माना गया है, तो फिर उसकी उत्पत्ति कैसे होती है? सूत्रकार समाधान करते हैं- ( २३३ ) चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात्तद्व्यपदेशो भाक्तस्तद्भावभावित्वात् ॥१६॥ सूत्रार्थ- तु = किन्तु, चराचरव्यपाश्रयः = चर और अचर देह के सहारे, तद्व्यपदेशः = वह जन्म-मरण आदि का कथन, भाक्त: = गौण, स्यात् - हो सकता है; क्योंकि, तद्भावभावित्वात् = वह उन-उन शरीरों
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 116
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
११८ वेदान्त दर्शन के भाव से भावित रहता है। व्याख्या- जीवात्मा वस्तुतः सर्वथा शुद्ध परब्रह्म का अंश, जन्म-मरण से रहित, नित्य एवं अविनाशी है, यह बात असंदिग्ध है, परन्तु यह जीव अपने परम्परागत कर्मों के अनुसार प्राप्त स्थावर और जंगम शरीरों के आश्रित है, इस कारण श्रुतियों में उन-उन शरीरों के देह धारण एवं मरण को गौण रूप से जीवात्मा का उत्पन्न होना और विनष्ट होना कहा गया है। सृष्टि के आरम्भ में इस जड़-चेतनात्मक जगत् का प्रकट होना ही उस परब्रह्म परमात्मा से इसका उत्पन्न होना और प्रलय के समय उस ब्रह्म में विलीन हो जाना ही विनाश होना है। (गीता ९/७-१०) के अनुसार जीवात्मा अजर-अमर है, वह न कभी जन्मता है, न मरता है। जीवात्मा में जन्म-मरण का प्रत्यक्षीकरण देह के संयोग-वियोग के आधार पर होता है। 'स वा अयं पुरुषो जायमान: शरीरमभिसम्पद्य मानः स उत्क्रामन् ब्रियमाणः' (बृ.उ. ४/३/८)' अर्थात् जब यह (जीवात्मा) पुरुष शरीर से युक्त होता है, तब जन्मा हुआ कहा जाता है और जब शरीर से उत्क्रमण कर जाता है, तब इसे मरा हुआ कहते हैं, वस्तुतः न यह कभी जन्मता है, न मरता है॥१६॥ इस तथ्य को पुष्ट करने के उद्देश्य से सूत्रकार आगे कहते हैं- (२३४) नात्माऽश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः॥१७।। सूत्रार्थ-आत्मा= जीवात्मा, न = वास्तव में उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि, अश्रुतेः = श्रुति में भी ऐसा कथन नहीं मिलता, च = तथा, ताभ्यः = उन श्रुतियों से ही, नित्यत्वात् = इसकी नित्यता सिद्ध की गई है। व्याख्या- श्रुतियों में कहीं भी जीवात्मा के उत्पत्ति-प्रलय के विषय में कोई बात नहीं मिलती, बल्कि वे जीवात्मा के नित्यत्व का प्रतिपादन करती हैं। कठोपनिषद् (१/२/१८) के अनुसार, 'न जायते प्रियते वा विपश्चित् ...... अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे' अर्थात् यह चेतन आत्मा न जन्मता है, न मरता है, यह अजन्मा, नित्य, सदा रहने वाला पुराण पुरुष है, शरीर के नाश होने पर इसका नाश नहीं होता। छान्दोग्योपनिषद् (६/११/३) में श्वेतकेतु को समझाते हुए उसके पिता ने कहा 'जीवापेतं वाव किलेदं प्रियते न जीवो म्रियते' अर्थात् जीव से रहित हुआ यह शरीर ही मरता है, जीवात्मा नहीं मरता। बृहदारण्यक (४/५/१४) में याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा- 'अविनाशी वा अरे अयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा' अरे यह आत्मा अविनाशी है, इसका उच्छेद कभी नहीं होता। इस प्रकार जीवात्मा का नित्यत्व शब्द प्रमाण के आधार पर सिद्ध होता है।।१७।। जीवात्मा की नित्यता को दृढ़ करने तथा उसके स्वरूप का प्रतिपादन करने हेतु आचार्य पुनः कहते हैं- (२३५ ) ज्ञोऽत एव ॥१८॥ सूत्रार्थ-अतः (वह नित्य है) इसलिए, एव - ही, ज्ञः = ज्ञाता है- चेतन स्वरूप है। व्याख्या- जीवात्मा के जन्म-मरण का निषेध करते हुए उसका नित्यत्व पूर्व सूत्रों में बताया गया, जिसके आधार पर यहाँ उसे चेतन स्वरूप एवं ज्ञाता सिद्ध किया। यहाँ सूत्रकार का आशय यह है कि जीवात्मा यदि जन्म-मरण से युक्त और अनित्य होता, तो ज्ञाता नहीं हो सकता। हर जीवात्मा पूर्व-काया का त्याग कर जब नया देह धारण करता है, तब पूर्व संस्कार एवं स्मृति के अनुसार स्तन-पानादि में स्वतः प्रवृत्त हो जाता है। पशु-पक्षियों को भी सन्तानोत्पादन का ज्ञान पूर्व के अनुभवजन्य स्मृति के आधार पर हो जाता है। इसी तरह बाल्यावस्था एवं युवावस्था की घटनाएँ एवं जानकारियाँ जिनकी स्मृति में रहती हैं, वह नहीं बदलतीं, यह अनुभव सभी का है। यदि आत्मा परिवर्तनशील होता, तो ज्ञाता कैसे हो सकता है। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा नित्य, अविनाशी होने के कारण ज्ञाता भी है॥१८।।
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 117
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ३ सूत्र २१ ११९ परिवर्तनशील काया में अपरिवर्तनशील नित्य जीवात्मा की बात को आचार्य प्रकारान्तर से पुनः सिद्ध करते thc ( २३६ ) उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्॥१९।। सूत्रार्थ- उत्क्रान्ति-गति-आगतीनाम् = (एक ही जीवात्मा के) शरीर से निकलने, अन्य देह (परलोक) में जाने तथा पुनः लौटकर आने का श्रुतियों में वर्णन है। व्याख्या- श्रुतियों में जीवात्मा के शरीर त्याग के पश्चात् परलोक में जाने तथा वहाँ से पुनः लौटकर आने का वर्णन है। शरीर त्याग तो प्रत्यक्ष देखा जाता है। कठोपनिषद् (२/२/७) में वर्णन आता है- 'योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिन:' अर्थात् मरने के बाद जीवात्माएँ अपने-अपने कर्मानुसार कुछ तो वृक्षादि अचल शरीर को तथा कुछ देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जङ्गम शरीरों को धारण कर लेते हैं। जीव के सत्कर्म वश ऊर्ध्व लोकों में जाने या मोक्ष होने अथवा उन लोकों से लौटने का भी वर्णन है। प्रश्नोपनिषद् (५/४) में कहा है-'स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते' अर्थात् स्वर्ग में नाना प्रकार के ऐश्वर्यों का भोग करके जीव पुनः मृत्युलोक में लौट आता है। इससे यही प्रमाणित होता है कि शरीर के नाश से अविनाशी जीवात्मा का नाश नहीं होता, वह नित्य और अपरिवर्तनशील है॥१९।। पूर्व कथन के आधार पर ही आचार्य पुनः आत्मा का नित्यत्व सिद्ध करते हैं- (२३७ ) स्वात्मना चोत्तरयोः ॥२० ॥ सूत्रार्थ- उत्तरयो: = आवागमन के रूप में कही गई दोनों क्रियाओं की सिद्धि, स्वात्मना = अपने स्वरूप से,च = ही होती है। (इसलिए भी आत्मा नित्य है।) व्याख्या- उत्क्रान्ति अर्थात् देह का वियोग। ऐसा तो आत्मा को अनित्य मानने पर भी होगा ही, किन्तु बाद के कथन गति और आगति अर्थात् परलोक में जाने और वहाँ से लौटकर आने -आवागमन रूप दोनों क्रियाएँ अपने स्वरूप से ही सिद्ध होती हैं। जो परलोक में जायेगा, वही स्वयं लौटकर आयेगा, अन्य नहीं। इससे सिद्ध होता है कि शरीर नाशवान् है, आत्मा अविनाशी है अर्थात् शरीर के नष्ट होने से आत्मा नष्ट नहीं होती ।।२०।। अभी तक श्रुति प्रमाण के आधार पर आत्मा का नित्यत्व सिद्ध किये जाने के साथ ही जीवात्मा को गमनागमनशील बताया गया। इस बात की सत्यता के आधार पर तो आत्मा को विभु न मानकर उसे एक देशीय मानना पड़ेगा, अतः उसका नित्यत्व भी गौण होगा। पूर्वपक्ष की ओर से उठाई गई इस आशंका के निराकरण के लिए अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- (२३८ ) नाणुरतच्छ्रतेरिति चेन्नेतराधिकारात् ॥२१ ।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो कि, अणुः = जीवात्मा अणु, न = नहीं है, अतच्छुतेः = क्योंकि श्रुति में उसको अणु न कहकर विभु बताया गया है, इति न = तो यह कहना ठीक नहीं, इतराधिकारात् · क्योंकि वहाँ आत्मा से भिन्न अर्थात् परमात्मा का प्रकरण है। व्याख्या-बृहदारण्यक उपनिषद् (४/४/२२) का कथन है- 'सवा एष महाजन आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु' अर्थात् जो यह प्राणों से आवृत विज्ञानमय आत्मा है, यह महान् व अजन्मा है। तथा मुण्डक उपनिषद् (३/१/९) के अनुसार 'यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा' जिसके विशुद्ध हो जाने पर यह आत्मा विभु जाना जाता है अर्थात् चित्त के शुद्ध हो जाने पर आत्मा की विभुता का पता लग जाता है। इस प्रकार श्रुति वर्णनों को लेकर यदि यह कहें कि जीवात्मा अणु नहीं, व्यापक है, तो ऐसा कहना युक्तिसङ्गत नहीं हैं; क्योंकि श्रुति का जो प्रसङ्ग 'आत्मा' को महान् कहकर उसकी विभुता को सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत किया गया है- वहाँ 'आत्मा' शब्द जीवात्मा का वाचक न होकर परमात्मा के प्रकरण का है।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 118
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१२० वदान्त दशन
अब जीव की अणुता में शब्दप्रमाण का कथन करते हैं- (२३९ ) स्वशब्दानुमानाभ्यां च॥२२।। सूत्रार्थ-च = भी, स्वशब्दानुमानाभ्याम् - श्रुति में स्वशब्द तथा अनुमान अर्थात् परिमाण बोधक वाक्यों से उक्त अर्थ की सिद्धि होती है। व्याख्या- मुण्डकोपनिषद् (३/१/९) में - 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः' कहकर अणु परिमाण वाले आत्मा को चित्त से जानने योग्य कहा है तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् (५/९) में कहा- 'बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः' अर्थात् जिस प्रकार बाल के अग्रभाग का सौंवा भाग करके फिर उसका सौंवा भाग करने से वह जितना सूक्ष्म होता है, इसी प्रकार जीव का सूक्ष्म रूप जानना चाहिए।' अतः ये दोनों बातें आत्मा के अणु परिमाण को सिद्ध करती हैं।।२२। शिष्य आशंका करता है कि यदि जीवात्मा अणु है, तो शरीर के एकदेश में स्थित रहकर समस्त शरीर को चेतनता कैसे दे सकता है? अथवा दुःख-सुख आदि का अनुभव कैसे कर सकता है? सूत्रकार ने समाधान प्रस्तुत किया- (२४० ) अविरोधश्चन्दनवत् ॥२३॥ सूत्रार्थ- चन्दनवत् = चन्दन की तरह, अविरोध: = जीव के अणुवाद में कोई विरोध नहीं है। व्याख्या-जीवात्मा को अणु मान लेने पर समस्त शरीर में उसको होने वाले सुख-दुःख आदि की अनुभूति होना असंगत प्रतीत होता है, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए; क्योंकि जिस तरह से शरीर के किसी एक अंग में लगाये गये चंदन बिन्दु से उसके गंधरूप गुण से सर्वाङ्ग में आह्लाद का संचार होता है, जिसका आधार समस्त देह में फैली हुई ज्ञानवाही तंत्रिकाएँ होती हैं, उसी प्रकार देह के एक देश-मस्तिष्कगत हृदयदेश में स्थित आत्मा समस्त शरीर में फैले अपने विज्ञानरूप गुण के आधार पर सर्वाङ्ग में चेतनता का संचार एवं सुख- दुःख आदि की अनुभूति किया करता है, इसमें कोई विरोध नहीं। अतः जीवात्मा के अणु-परिमाण में इससे कोई व्यवधान नहीं आता ।।२३।। आत्मा की स्थिति देह में एक देशीय है, सूत्रकार आक्षेपपूर्वक इसकी सिद्धि के उद्देश्य से आगे कहते हैं- ( २४१ ) अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि ॥२४॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो, अवस्थिति-वैशेष्यात् = चंदन और आत्मा की स्थिति में भेद है, इसलिए (चंदन का दृष्टान्त असङ्गत है), इति न = तो ऐसा नहीं है, हि = क्योंकि निस्सन्देह, हृदि = हृदयदेश में, अभ्युपगमात् = उसकी स्थिति मानी गई है। व्याख्या- यदि यह कहा जाये कि देह के किसी एक देश में चन्दन की स्थिति प्रत्यक्ष है; परन्तु आत्मा का एक देशवर्ती होना अप्रत्यक्ष है, इसलिए चन्दन का दृष्टान्त उपयुक्त नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि शास्त्र द्वारा हृदय में आत्मा की स्थिति को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है। प्रश्नोपनिषद् (३/६) में कहा गया है- 'हृद्येष आत्मा' अर्थात् 'निश्चित रूप से यह आत्मा हृदयदेश में निवास करता है। छान्दो० (८/३/३) में कहा गया है - 'स वा एष आत्मा हृदि' अर्थात् निश्चय करके वह यह आत्मा हृदयदेश में विराजमान है। इसी प्रकार बृह० उप० (४/३/७) में बताया- 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः'आत्मा कौन है, यह पूछने पर कहा-'जो यह ज्ञाता प्राणों के बीच घिरा हुआ हृदयदेश के अन्दर विज्ञानमय ज्योति स्वरूप पुरुष है'। उपनिषद् के प्रस्तुत अनेक प्रसङ्गों में आत्मा का अणुत्व एवं हृदयदेश में निवास निश्चित होने पर पूर्वसूत्र में उद्धृत चन्दन दृष्टान्त में कोई वैषम्य नहीं है॥२४॥ प्रकारान्तर से आचार्य उपर्युक्त कथन को आगे कहते हैं-
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 119
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ३ सूत्र २८ १२१
(२४२ ) गुणाद्वा लोकवत्॥।२५।। सूत्रार्थ- वा= अथवा (अणु परिमाण वाले आत्मा का), गुणात् = चेतनता रूप गुण से समस्त शरीर को सम्पन्न कर देना सम्भव है, लोकवत् = क्योंकि लोक में ऐसा देखा जाता है। व्याख्या- सूत्रकार का कथन है कि जिस प्रकार लोक में यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि भवन के किसी एक देश में स्थित दीपक अपने प्रकाश रूप गुण के द्वारा सम्पूर्ण भवन को प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार देह के एक देश में स्थित अुणमाप वाला आत्मा चेतनता रूप अपने गुण से सम्पूर्ण काया को चैतन्य कर देता है। इसी आशय को स्पष्ट करते हुए गीता (१३/३३) में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया है- 'यथा प्रकाशयत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रविः'। क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत' अर्थात् जिस प्रकार एक सूर्य अपनी रश्मियों द्वारा सारे संसार को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार क्षेत्रज्ञ-जीवात्मा सब क्षेत्र को अर्थात् शरीर को प्रकाशित करता है। इस प्रकार जीवात्मा का एक देशीय अणुमाप वाला होना सिद्ध होता है।।२५।। गुण अपने गुणी से अलग किस प्रकार हो सकता है? शिष्य की इस जिज्ञासा का आचार्य समाधान करते हुए कहते हैं- (२४३ ) व्यतिरेको गन्धवत् ॥२६।। सूत्रार्थ- गन्धवत् = गन्ध के समान, व्यतिरेक: = गुण का गुणी से पृथक् होना सम्भव है। व्याख्या- यहाँ यह समझना ठीक नहीं कि गुण तो गुणी के साथ ही रहता है, वह गुणी से पृथक् होकर कोई कार्य किस प्रकार कर सकता है, क्योंकि जिस प्रकार पुष्प का गन्ध-गुण अपने गुणी से पृथक् दूर भी प्रतीत होता है, उसी प्रकार जीवात्मा का चेतनत्व गुण भी आत्मा से पृथक् होकर देह के समस्त अवयवों में व्याप्त हो जाता है। इस प्रकार गुण का अपने गुणी से पृथक्ता में कोई विरोध नहीं है॥२६॥ इस बात को पुष्ट करने हेतु आचार्य उपयुक्त श्रुति प्रमाण प्रस्तुत करते हैं- (२४४ ) तथा च दर्शयति॥२७॥ सूत्रार्थ- तथा = ऐसा, च = ही, दर्शयति = श्रुति भी दिखलाती है। व्याख्या- केवल युक्ति से ही नहीं, श्रुति से भी यह बात सिद्ध होती है कि आत्मा एक जगह स्थित रहकर अपने गुण के द्वारा समस्त शरीर में व्याप्त रहता है। छान्दोग्य (८/८/१) 'सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति' के अनुसार इन्द्र और विरोचन जलपात्रों में अपनी आकृति देखते हुए प्रजापति द्वारा पूछे जाने पर कह रहे हैं- हे भगवन्! इस सम्पूर्ण लोम-नख पर्यन्त आत्मा को हम देख रहे हैं। इस प्रकार 'प्रज्ञया शरीरं समारूह्य शरीरेण सुख-दुःखे आप्नोति '(कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्- ३/६) के अनुसार यह आत्मा अपने ज्ञान साधनों के सहित देह में स्थित होकर शरीर से सुख-दुःख को प्राप्त करता है। इन विवेचनों के आधार पर भी यह सिद्ध होता है कि आत्मा अणु परिमाण वाला है।।२७।। अब सूत्रकार जीवात्मा और उसके ज्ञान-गुण का पृथक्-पृथक् उपदेश-कथन आरम्भ करते हैं- (२४५ ) पृथगुपदेशात् ॥२८ ।। सूत्रार्थ- पृथक् = ज्ञाता से अलग, उपदेशात् - उपदेश होने से भी जीव का नित्यज्ञान सिद्ध है। व्याख्या- गत सूत्र में उद्धत कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (३/६) के वाक्य से स्पष्ट है कि देह में समारूढ़ कर्त्ता-भोक्ता-चेतन आत्मा तथा अचेतन बुद्धि आदि ज्ञान के साधन पृथक् हैं, अतः बुद्धि और आत्मा को एक नहीं माना जा सकता। कठोपनिषद् (१/३/३-४) में भी प्रकारान्तर से इन तत्त्वों का पृथक् उपदेश किया गया
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an excluse intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 120
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१२२ वेदान्त दर्शन है- 'आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च' अर्थात् यह शरीर एक रथ के समान है, इसमें बैठने वाला स्वामी आत्मा रथी है। इस रथ में इन्द्रियाँ घोड़े के समान हैं, मन उनकी लगाम और बुद्धि (ज्ञान) सारथि है। विचारशील विद्वानों ने इन साधनों से संयुक्त आत्मा को भोक्ता कहा है। इस प्रकार स्पष्ट है कि चेतन-ज्ञाता आत्मा पृथक तत्त्व है, तथा उसके साधन रूप अचेतन-बुद्धि आदि पृथक् हैं। बुद्धि के ब्रह्म से विमुख रहने के कारण ज्ञान अप्रकट रहता है और ब्रह्म का चिंतन करने से अज्ञान का आवरण हट जाने से नित्य ज्ञान प्रकट हो जाता है। इससे सिद्ध होता है कि ज्ञाता-आत्मा का ज्ञान- गुण उससे पृथक् है।।२८।। शिष्य को यह जिज्ञासा होती है कि उपनिषदों में आत्मा को अङ्गप्ठमात्र कहा है, तो फिर वह अणुपरिमाण वाला कैसे कहा जा सकता है? सूत्रकार समाधान करते हैं- (२४६) तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेश: प्राज्ञवत् ॥२९॥ सूत्रार्थ- तद्व्यपदेश: = वह अङ्गुष्ठमात्र का कथन, तु = तो, तद्गुणसारत्वात् = उसके गुणों की प्रधानता को लेकर है, प्राज्ञवत् = जैसे ब्रह्म को प्राज्ञ कहा गया है। व्याख्या-आत्मा का निवास स्थान मस्तिष्क के हृदय देश में माना गया है, जिसकी रचना अंगुष्ठों के मिश्रित पृष्ठभाग की तरह होने के कारण ही श्रुति में उसे अंगुष्ठ संज्ञा प्रदान की गई है। 'अंगुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकार समन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः' (श्वेता.उ. ५/८) अर्थात्- जो अङ्गष्ठ मात्र परिमाण वाला, सूर्य के समान प्रकाश स्वरूप तथा संकल्प व अहंकार से युक्त है, वह बुद्धि और शरीर के गुणों से ही आरे (लकड़ी काटने का यन्त्र) की नोंक जैसे सूक्ष्म आकार वाला है- ऐसा परमात्मा से भिन्न जीवात्मा भी निःसंदेह ज्ञानियों द्वारा देखा गया है।' इसी प्रकार कठोपनिषद् (२/१/१२) कहता है- 'अंगुष्ठमात्र: पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ईशानो भूतभव्यस्य' अर्थात् जो समस्त अतीत, अनागत, चर-अचर जगत् का नियन्ता है, वह अंगुष्ठ मात्र परमात्मा मध्य आत्मा में स्थित है। यहाँ औपचारिक रूप से जीवात्मा या परमात्मा के लिए अंगुष्ठ मात्र पद का प्रयोग इसलिए किया गया है; क्योंकि सर्वव्यापक परमात्मा का साक्षात्कार जीवात्मा को अपने निवास स्थान हृदयदेश में होता है,जिसकी रचना अंगुष्ठ के समान होती है।।२९।। शिष्य जिज्ञासा प्रकट करता है कि जीवात्मा को बुद्धि आदि करणों तथा उत्तम शरीर रचना के द्वारा ज्ञानादि की प्राप्ति हो जाती है,यह ठीक है; परन्तु मृत्यु काल अथवा प्रलयकाल में देह के छूट जाने पर अनित्य बुद्धि आदि का सम्बन्ध भी आत्मा से नहीं रहने पर जीवों की मुक्ति हो जायेगी। अतः प्रलय के पश्चात् सृष्टि भी नहीं हो सकेगी। यदि मुक्त जीवों का पुनर्जन्म होना मान लिया जाये, तो मोक्ष के अभाव का दोष उपस्थित होगा। सूत्रकार समाधान करते हैं- (२४७) यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात्॥३० ।। सूत्रार्थ- यावदात्मभावित्वात् = जब तक आत्मा संसारी है, तब तक वह शरीर के अनुरूप रहता है, इसलिए, च = भी, दोष: = उक्त दोष, न = नहीं है, तद्दर्शनात् = श्रुति भी यही दर्शाती है। व्याख्या- श्रुति कहती है कि आत्मा की संसारी अवस्था में, देहत्याग अथवा देहान्तर दशाओं में भी बुद्धि आदि करणों का नाश नहीं होता, उसका सम्बन्ध सूक्ष्म शरीर से हमेशा बना रहता है। बृहदारण्यक उपनिषद् (४/३/७) में कहा है- 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः, स समान: सन्नुभौ लोकावनुसञ्चरति ध्यायतीव लेलायतीव' जनक ने पूछा आत्मा कौन है? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- जो यह प्राणों में चित्तवृत्तियों के भीतर स्थित विज्ञानमय ज्योति पुरुष आत्मा है, वह बुद्धि आदि करणों सहित समान रूप से दोनों लोकों (इहलोक और परलोक) में संचरित होता है। इस उपनिषद् सन्दर्भ में
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 121
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ३ सूत्र ३२ १२३ 'विज्ञान' पद का अर्थ 'बुद्धि' है। इस प्रकार जीवात्मा अपनी संसारी अवस्था में हमेशा बुद्धि आदि करणों से परिवेष्टित बना रहता है तथा सुषुप्ति व प्रलयकाल में भी कर्म संस्कारों के सहित काया से जीवात्मा का सम्बन्ध रहता है और यह अवस्था तब तक रहती है, जब तक कि उसे अपने स्वरूप का बोध नहीं हो जाता। इसलिए सुषुसति और प्रलयकाल में समस्त जीवात्माओं के मुक्त होने तथा मुक्त पुरुषों के पुनर्जन्म आदि का कोई दोष नहीं उपस्थित होता॥३० ।। शिष्य के मन में जिज्ञासा होती है कि प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत् के ब्रह्म में विलीन होने पर बुद्धि आदि की ब्रह्म से अभिन्नता की स्थिति में उनका जीवात्मा के साथ सम्बन्ध कैसे रह सकता है? और यदि उस समय सम्बन्ध नहीं रहता, तो सर्गकाल में कैसे हो जाता है? सूत्रकार समाधान करते हैं- (२४८ ) पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात्।।३१।। सूत्रार्थ- पुंस्त्वादिवत् · पुरुषत्व आदि की तरह, सतः = पहले से विद्यमान, अस्य = इसका, तु = तो, अभिव्यक्तियोगात् = अभिव्यक्ति के साथ सम्बन्ध होने से (कोई दोष नहीं है)। व्याख्या- यद्यपि प्रलयकाल में बुद्धि आदि सभी तत्त्व अपने कारण रूप परब्रह्म में विलीन हो जाते हैं, तथापि वे सब उसी ब्रह्म की अचिन्त्य शक्ति के रूप में अव्यक्त रूप से वहाँ विद्यमान रहते हैं। प्रश्नोपनिषद् (४/११) कहता है- 'विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य! स सर्वज्ञ: सर्वमेवाविवेशेति।' हे सोम्य! जिस अविनाशी परब्रह्म में समस्त देवगण, समस्त प्राण और समस्त भूत भली प्रकार प्रतिष्ठित होते हैं, उसे जानने वाला सर्वज्ञाता भी उसी (परमात्मा) में प्रविष्ट हो जाता है। श्रुति के इस कथन का आशय यह है कि समस्त जीवात्माएँ स्व-स्व कर्मानुसार संस्कार ग्रहण करके सूक्ष्म एवं कारण शरीरों के साथ अव्यक्त रूप से उस ब्राह्मी सत्ता में प्रतिष्ठित रहती हैं, उनके सम्बन्धों का पूर्णतया नाश नहीं होता है तथा बाल्यावस्था से ही बीज रूप में पुरुष में विद्यमान पुंस्त्व जिस प्रकार तरुणावस्था में शक्ति-संयोग से अभिव्यक्त हो जाती है, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मा में कारण अथवा बीज रूप में प्रतिष्ठित समस्त जीवात्माएँ सर्ग-रचना काल में परमात्मा के संकल्प से सूक्ष्म और स्थूल रूपों में प्रकट हो जाती हैं। साधना की तपःशक्ति से पवित्र हुए साधक का अंतःकरण शुद्ध और व्यापक हो जाता है, जिसके कारण उसमें दूरदर्शन एवं दूरश्रवण की शक्ति आ जाती है; क्योंकि पूर्व से ही सर्वत्र संव्याप्त आत्मा अंतःकरण और स्थूल काया के साथ जुड़ाव से ही उसके अनुरूप आकार के रूप में देखा जाता है।।३१।। शिष्य की इस जिज्ञासा पर कि स्वयं प्रकाशवान् जीवात्मा को मन, बुद्धि आदि के संयोग से वस्तु एवं विषयों का ज्ञान होता है, ऐसा मानने की आवश्यकता क्या है? इस पर आचार्य कहते हैं- (२४९ ) नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा।३२। सूत्रार्थ- अन्यथा = जीवात्मा को अन्तःकरण के संयोग से विषय ज्ञान होता है, ऐसा न मानने पर, नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्ग := उसे सदैव विषयों के अनुभव होने का या कभी न होने का प्रसङ्ग उपस्थित होगा, वा = अथवा, अन्यतरनियम: = आत्मा की ग्राहक-शक्ति अथवा विषय की ग्राह्यशक्ति के नियमन की कोई अन्य कल्पना करनी पड़ेगी। व्याख्या- यदि ऐसा न माना जाये कि यह जीवात्मा अंतःकरण के संयोग से सभी विषयों का अनुभव करता है, तो प्रत्यक्ष में जो यह देखा जाता है कि कभी जीवात्मा विषय का अनुभव करता है, कभी नहीं करता। कभी किसी दृश्य को देखता है, कभी नहीं देखता। उपर्युक्त प्रत्यक्ष बात को मिथ्या माननी पड़ेगी; क्योंकि प्रकाश स्वरूपा होने के कारण जीवात्मा को स्वतः अनुभव करने वाला मानेंगे, तब तो इसे हमेशा एक साथ सभी विषयों का ज्ञान रहता है, ऐसा मानना पड़ेगा। जानने की शक्ति स्वाभाविक न मानने की स्थिति में कभी किसी
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 122
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१२४ वदान्त दशन भी काल में न मानने का प्रसङ्ग आ जायेगा या दोनों में से किसी एक शक्ति अर्थात् जीवात्मा की ग्राहक शक्ति अथवा विषय की ग्राह्य शक्ति का प्रतिबन्ध मानना पड़ेगा। ऐसा होने पर ग्राह्य के नियन्त्रित होने पर विषय की प्राप्ति नहीं होती और नियन्त्रण हट जाने पर विषयोपलब्धि होती है। अतः अंतःकरण के सम्बन्ध को ही मानना उपयुक्त है; क्योंकि 'मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति' (बृह.उ. १/५/३) अर्थात् मन से ही देखता है, मन से ही सुनता है, इत्यादि श्रुति कथन की भी ऐसी ही स्वीकृति है। अंतःकरण से सम्बन्ध रहते हुए भी जीवात्मा कभी कार्य रूप में प्रत्यक्ष रहता है, कभी कारण रूप में अप्रत्यक्ष। अब जड़ प्रकृति अथवा जीवात्मा में से कर्त्ता कौन है, इसका निर्धारण करने के लिए सूत्रकार द्वारा अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- ( २५० ) कर्त्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्॥३३॥ सूत्रार्थ- शास्त्रार्थवत्त्वात् = शास्त्र में बताए गये अर्थ वाला होने से, कर्त्ता = जीवात्मा कर्त्ता है। व्याख्या- शास्त्रों में जीवात्मा के उद्देश्य से कर्त्तव्य कर्मों का विधान तथा अकर्त्तव्य का निषेध किया गया है। शास्त्र में बार-बार जो यह कथन आता है कि अमुक कार्य करणीय है, अमुक अकरणीय है, अमुक शुभ कर्म से कर्त्ता को अमुक श्रेष्ठ फल मिलता है, अमुक पाप कर्म से कर्त्ता को अमुक कष्ट भोगना पड़ता है; इत्यादि, इन समस्त निर्देशों का संकेत जीवात्मा को ही कर्त्ता मानने के उद्देश्य से ठीक जान पड़ता है। प्रश्नोपनिषद् (४/९) स्पष्ट शब्दों में जीवात्मा को कर्त्ता बतलाता है- 'एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः' अर्थात् यह विज्ञानात्मा पुरुष ही द्रष्टा (देखने वाला), स्प्रष्टा (स्पर्श करने वाला), श्रोता (सुनने वाला), घ्राता (सूँघने वाला), रसयिता (रस लेने वाला), मन्ता (मनन करने वाला), बोद्धा (जानने वाला) तथा कर्त्ता (कर्म करने वाला) है। इसी प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद् (५/ ७) के अनुसार 'गुणान्वयो यः फलकर्मकर्त्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता' अर्थात्' जो गुणों से युक्त, फलप्राप्ति के उद्देश्य से कर्म करने वाला और अपने किये गये कर्म के फल का उपभोग करने वाला जीवात्मा है, इन सब वर्णनों से जीवात्मा का कर्त्ता होना निश्चित होता है।३३।। जीवात्मा के कर्त्ता होने के इसी विषय में सूत्रकार अन्य हेतु प्रस्तुत करते हैं- ( २५१ ) विहारोपदेशात्॥३४॥ सूत्रार्थ-विहारोपदेशात् = श्रुतियों के (स्वप्न में स्वेच्छा से) विहार के उपदेश से भी (जीवात्मा का कर्त्ता होना सिद्ध होता है)। व्याख्या- 'विहार' अर्थात् स्वेच्छापूर्वक भ्रमण या आचरण करना। 'स यत्रेतत्स्वप्न्ययाचरति ............. स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते' (बृह. उ.२/१/१८) के अनुसार जब यह जीवात्मा स्वप्नवृत्ति अथवा स्वप्नावस्था में होता है, तब उसके लोक अर्थात् कृत कर्मों के प्रतिफल उदित होते हैं। उस समय वह विभिन्न प्रकार की स्थितियों को प्राप्त करता हुआ कभी महाराज, कभी महाब्राह्मण, कभी उच्चावस्था और कभी निम्नावस्था को प्राप्त होता है। वह जीवात्मा प्रजा के साथ गमन करने के समान ही प्राणेन्द्रियों को लेकर शरीर में यथेच्छ स्थलों पर भ्रमण करता है। इसी प्रकार (बृह.उ. ४/३/१२) में कहा- 'प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं ......... पुरुष एकहथसः' अर्थात् वह अनश्वर और हिरण्मय जीवात्म पुरुष अपने शरीर रूपी घोसले की रक्षा करता हुआ, इस शरीर को परित्यक्त करके बर्हिगमन करता है। वह अमृत पुरुष जहाँ कामना (वासना) होती है, वहीं चला जाता है, अर्थात् उन विषयों का अनुभव करता है। इन प्रसंगों से जीवात्मा का कर्त्ता होना सिद्ध होता है, क्योंकि जड़ प्रकृति में स्वेच्छापूर्वक कर्म की प्रवृत्ति नहीं होती॥३४॥
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 123
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ३ सूत्र ३७ १२५ इसी विषय में सूत्रकार तीसरा कारण प्रस्तुत करते हैं- ( २५२ ) उपादानात् ॥३५।। सूत्रार्थ-उपादानात् = इन्द्रियों के ग्रहण से भी (आत्मा को कर्त्ता मानना सिद्ध होता है)। व्याख्या- यहाँ 'उपादान' शब्द 'ग्रहण' रूप क्रिया का बोधक है। उपनिषद्कार कहते हैं- 'य एष विज्ञानमयः ..... श्रोत्रं गृहीतं मनः' (बृह.उ. २/१/१७) अर्थात् जब वह '(जीवात्मा) विज्ञानमय पुरुष प्रसुप्तावस्था में था, तब अपनी विज्ञान की शक्ति से समस्त इन्द्रियों की शक्ति को अपने में एकत्र कर लिया था। सुप्त स्थिति में जीवात्मा हृदयाकाश में स्थित रहकर इन्द्रियों को ग्रहण करता है। उस समय इसे 'स्वपिति' कहते हैं। उस समय प्राण, नेत्र, श्रोत्र और मन सभी गृहीत स्थिति में होते हैं। यहाँ जीवात्मा को इन्द्रियों की विषयशक्ति का आदाता कहा है, आदाता कभी अकर्त्ता नहीं हो सकता। आगे भी प्राणान् गृहीत्वा (बृह.उ.२/ १/१८) के अनुसार भी उसे (जीवात्मा को) प्राणो का गृहीता कहा गया है। अतः आत्मा ही उपादान क्रिया के आधार पर कर्त्ता प्रमाणित होता है।३५।। सूत्रकार प्रकारान्तर से आत्मा के कर्त्तापन को प्रमाणित करते हैं- (२५३ ) व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देशविपर्ययः ॥३६॥ सूत्रार्थ-क्रियायाम् = क्रिया करने में, व्यपदेशात् - जीवात्मा का कर्त्ता होना श्रुति में कहा गया है, इसलिए, च = भी (जीव कर्त्ता है), चेत् = यदि, न = आत्मा को कर्त्ता बताना अभीष्ट न होता, तो; निर्देशविपर्ययः = श्रुति की मान्यता का विरोध होता। व्याख्या-तैत्तिरीय उपनिषद् (२/५/१) में कहा गया है- 'विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च' विज्ञान (विज्ञानवान् पुरुष) अर्थात् यह जीवात्मा ही यज्ञ का विस्तार करता है और उस हेतु लौकिक कर्मों को करता है। यहाँ 'विज्ञान' पद जीवात्मा का बोधक है और उसे स्पष्टतया वैदिक एवं लौकिक कर्मों का विस्तार करने वाला बताकर उसके कर्त्तापन को सिद्ध किया गया है। यदि 'विज्ञान' पद को जीव का वाचक न मानकर बुद्धि का वाचक मानें, तो यह श्रुति प्रसङ्ग के विपरीत होगा; क्योंकि वहाँ जीवात्मा का ही प्रकरण है। यदि 'विज्ञान' शब्द से बुद्धि को ग्रहण करना अभीष्ट रहा होता, तो करण द्योतक तृतीया विभक्ति का प्रयोग करके 'विज्ञानेन' शब्द कहा जाता। इससे सिद्ध होता है कि यहाँ 'विज्ञान' पद को आत्मा का बोधक बताकर कर्त्तारूप में उसका वर्णन किया गया है॥३६॥ यहाँ शिष्य के मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि यदि जीवात्मा स्वतंत्र कर्त्ता है, तो उसे अपने हित का ही सम्पादन करना चाहिए, जबकि उसकी प्रवृत्ति इसके विपरीत भी देखी जाती है, अतः उसे कर्त्ता नहीं माना जाना चाहिए। समाधान करते हुए सूत्रकार कहते हैं- (२५४ ) उपलब्धिवदनियम: ॥३७॥ सूत्रार्थ- उपलब्धिवत् = सुख-दुःखादि भोगों की उपलब्धि के समान, अनियम: = कर्म करने में भी नियम नहीं है। व्याख्या- जिस तरह जीवात्मा को सुख-दुःख आदि भोगों की उपलब्धि होती रहती है, कोई ऐसा सुनिश्चित नियम व व्यवस्था नहीं है कि उसे केवल प्रिय की प्राप्ति हो अप्रिय की न हो, उसी प्रकार कर्म करने में भी कोई नियम नहीं है। वह शुभ अथवा अशुभ, हितकारक अथवा अहितकारक कैसा भी कर्म करने में स्वतंत्र है। अतः जीवात्मा का कर्त्ता होना सिद्ध होता है। आशय यह है, कि जीव को प्रिय-अप्रिय की प्रासि उसके कर्मों के अनुसार है, वे कर्म स्वतन्त्रतापूर्वक किये हुए हैं, जिनका भोग प्रारब्ध के अनुसार ईश्वर
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelle can be used for propagation with prior written consent.
Page 124
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१२६ वदान्त दशन निर्धारित करता है। वैसे ही अनादिकाल से संचित कर्मानुसार बने स्वभाव-संस्कार के वशीभूत होकर जीव शुभ अथवा अशुभ कर्म करने के लिए भी बाधित होता है। प्रभु समर्पित जीवन में विवेक का आश्रय लेकर प्रमाद से दूर रहते हुए जीव अपने स्वभाव का परिष्कार कर अशुभ कर्मों से निवृत्ति एवं शुभ कर्मों में प्रवृत्ति की ओर बढ़ सकता है।३७।। इस कथन की पुष्टि के लिए सूत्रकार अन्य हेतु प्रस्तुत करते हैं- (२५५ ) शक्तिविपर्ययात् ॥३८।। सूत्रार्थ- शक्तिविपर्ययात् = शक्ति के विपरीत होने के कारण भी (उसके द्वारा स्वहित के कर्मों का आचरण होने का नियम नहीं हो सकता।) व्याख्या- जीवात्मा का कर्त्तापन उसके अनादि कर्म संस्कारों तथा इन्द्रिय-देहादि से सम्बन्ध के कारण है, स्वरूप से नहीं है। अतः वह निरन्तर अपने हित का आचरण नहीं कर सकता, क्योंकि कोई भी कर्म करने में सहकारी कारणों एवं बाहरी साधनों की आवश्यकता पड़ती है, इन सबकी प्राप्ति में यह पूर्णतया परतन्त्र है तथा अंतःकरण, इन्द्रियों एवं शरीरादि की शक्ति भी अनुकूल हो, यह आवश्यक नहीं। अतः प्रतिकूल साधनों की उपलब्धि पर अहितकर कार्यों का सम्पादन भी सम्भव होता है। इस प्रकार शक्ति के विपरीत आचरण में भी इच्छित फल की प्राप्ति सम्भव नहीं है।३८।। शिष्य जिज्ञासा करता है कि स्वरूप से ही जीवात्मा का कर्त्तापन मान लेने में क्या हानि है? आचार्य समाधान करते हैं- (२५६ ) समाध्यभावाच्च॥३९॥ सूत्रार्थ-समाध्यभावात् = समाधि की अवस्था का अभाव प्राप्त होने से, च भी (जीव का कर्त्तापन स्वाभाविक नहीं मानना चाहिए)। व्याख्या- समाधि की अवस्था में कर्मों का नितान्त अभाव पाया जाता है। कर्त्तापन को जीव का स्वाभाविक धर्म मान लेने पर तो समाधि अवस्था की असिद्धि होगी; क्योंकि चेतनता जिस प्रकार जीव का स्वाभाविक धर्म है, कर्म को भी उसी प्रकार स्वाभाविक धर्म मान लिये जाने पर जीव कभी निष्क्रिय अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकेगा, जबकि शास्त्र में जीवात्मा के स्वरूप को निष्क्रिय बताया गया है। श्वेताश्वतरोपनिषद् (६/१२) में कहा है- 'एको वशी निष्क्रियाणां ...... नेतरेषाम्' अर्थात् अद्वितीय परमात्मा सबका अधीश्वर है, जो बहुत से निष्क्रिय जीवों के एक बीज को अनेक रूपों में परिणत कर देता है, उस हृदय गुहा में अवस्थित परमेश्वर को जो धीर पुरुष (अनुभूतिजन्य दृष्टि से) देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत सुख प्राप्त होता है, दूसरों को नहीं। अतः जीव का कर्त्तापन स्वरूपगत नहीं, बल्कि वह अनादिसिद्ध अन्तःकरण के सम्बन्ध से है॥३९॥ उपर्युक्त कथन की पुष्टि के लिए आचार्य कहते हैं- (२५७ ) यथा च तक्षोभयथा॥।४० सूत्रार्थ- च = और, यथा = जैसे, तक्षा = शिल्पी, उभयथा = (कभी कर्म करता है, कभी नहीं करता) इस तरह दो प्रकार की स्थिति में रहता है, वैसे ही जीवात्मा भी दोनों स्थितियों में रहता है। व्याख्या-जिस प्रकार अपने विविध औजारों से नाना प्रकार की वस्तुओं की रचना करने वाला शिल्पी जब तक शिल्प कार्य में लगा रहता है, तब तक वह उस कार्य का कर्त्ता होता है और जब उस शिल्प कार्य से अलग हो जाता है, तब उसका कर्त्ता नहीं होता है। इसी प्रकार जीवात्मा भी जब अपने अन्तःकरण-इन्द्रियादि साधनों का स्वामी होकर उनके द्वारा कार्य करता है, तब वह कार्य का कर्त्ता होता है तथा इन्द्रियादि से सम्बन्ध
Disclalimer / Warning: All mterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 125
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ३ सूत्र ४२ १२७
विच्छेद हो जाने पर वह कर्त्ता नहीं रहता है। अतः जीवात्मा का कर्त्तापन स्वभाव सिद्ध नहीं है॥४०॥ उपर्युक्त सूत्रों के माध्यम से यह निश्चित किया गया कि प्रकृति स्वतंत्र कर्त्ता नहीं है और जीव का कर्त्तापन भी स्वरूपगत नहीं। मन, बुद्धि, इन्द्रियादि के सम्बन्ध से है। अतः यहाँ शिष्य के मन में यह जिज्ञासा होती है कि जीवात्मा का कर्त्तापन स्वाधीन है अथवा पराधीन। समाधान करते हुए आचार्य कहते हैं- (२५८ ) परात्तु तच्छुते: ॥४१ ॥ सूत्रार्थ- तत् = उस जीव का कर्त्तापन, परात् = परमेश्वर से, तु= ही है, श्रुतेः = श्रुतियों का ऐसा ही कथन है। व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (३/७/२२) में कहा गया है- 'यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः' अर्थात् 'जो विज्ञान में रहकर ही उसका नियन्त्रण करता है, किन्तु विज्ञान उससे अपरिचित है, वह अन्तरात्मा ही अविनाशी और अन्तर्यामी है' तथा छान्दोग्योपनिषद् (६/३/२) में बतलाया गया है- 'तिस्त्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नाम रूपे व्याकरवाणीति' अर्थात् 'मैं इस जीवात्म रूप से इन तीनों देवता (तेज, अप् एवं पृथ्वी) में अनुप्रवेश कर उसके नाम एवं रूप को प्रकट करूँगा।' इसी प्रकार केनोपनिषद् (३/१-१०) में यक्ष की आख्यायिका के अंतर्गत भी यही सिद्ध किया गया है कि 'अग्नि और वायु आदि देवताओं में स्वयं कार्य करने की स्वतंत्र शक्ति नहीं है, बल्कि उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म से शक्ति प्राप्त कर ही वे अपने-अपने कार्य-सम्पादन में समर्थ होते हैं।' गीता में भी जीव का कर्त्तापन ईश्वराधीन बतलाया गया है- 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया' (१८/६१) अर्थात् 'हे अर्जुन! शरीर रूपी यंत्र में आरूढ़ हुए समस्त जीवों को अपनी माया से कर्मानुसार चलाता हुआ, ईश्वर सबके हृदय में निवास करता है।' इस प्रकार शास्त्रोक्तियाँ यह सिद्ध करती हैं कि जीवात्मा परब्रह्म के शक्ति एवं सहयोग से ही कुछ भी करने में समर्थ होता है, स्वतंत्रतापूर्वक नहीं ॥४१। शिष्य जिज्ञासा प्रकट करता है कि यदि जीवात्मा का कर्त्तापन ईश्वर के अधीन है, तो शास्त्र का विधि-निषेश व्यर्थ है; क्योंकि ईश्वर की प्रेरणा से सब कुछ हो जाने पर उनका कोई प्रयोजन नहीं रहता। फिर ऐसा मानने पर कि ईश्वर पहले तो जीवों से शुभाशुभ कर्म करवाता है और फिर कर्मफल का भोग करवाता है, ब्रह्म में विषमता और निष्ठरता का जो दोष लगेगा उसका निराकरण किस प्रकार होगा। इस पर सूत्रकार कहते हैं- (२५९ ) कृतप्रयत्न्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः ॥।४२॥ सूत्रार्थ- तु = किन्तु, कृतप्रयत्नापेक्ष: = जीव के परम्परागत कर्मसंस्कारों की अपेक्षा रखते हुए उसको नवीन कर्म करने की शक्ति और साधन ब्रह्म ही प्रदान करता है तथा, विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः = विधि-निषेध शास्त्र की सार्थकता आदि हेतुओं से भी ब्रह्म सर्वथा निर्दोष है। व्याख्या- परमात्मा द्वारा जीव को नवीन कर्म करने के लिए जो साधन और शक्ति दी जाती है, वह जीव के जन्म-जन्मान्तर के संचित कर्म और संस्कारों की अपेक्षा से ही दी जाती है। साथ ही उस शक्ति और साधनों का सदुपयोग करने हेतु विवेक भी सुहृद परम प्रभु द्वारा मनुष्य को प्रदान किया जाता है तथा विवेक को विकसित करने के लिए शास्त्रों में शुभ कर्मों का विधान एवं अशुभ अर्थात् बुरे कर्मों का निषेध भी किया गया है। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि ईश्वर ने मनुष्य को अपने स्वभाव के सुधार की स्वतंत्रता प्रदान की है, अतः परमात्मा सर्वथा दोष रहित है। तात्पर्य यह है कि मनुष्य का हर कर्म ईश्वर की प्रेरणा एवं सहयोग पर अवलम्बित है, किन्तु उससे प्राप्त शक्ति एवं साधन का सदुपयोग अथवा दुरुपयोग करने की स्वतंत्रता है। अतः शुभ-अशुभ कर्मों के परिणाम का दायित्व जीव पर ही है। इस स्वतंत्रता को भी यदि जीव ईश्वरार्पण करके पूर्णतया उन्हीं पर निर्भर हो जाये, तो कर्म के बन्धन से सहज ही मुक्त हो सकता है॥४२॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 126
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१२८ वदान्त दशन पूर्व प्रकरण में जीवात्मा को कर्त्ता एवं परब्रह्म परमात्मा को जीव के कर्मों का नियोजक सिद्ध किया गया है। इससे जीव और ब्रह्म का भेद प्रमाणित होता है। उपनिषदों में जीव और ब्रह्म के भेद तथा अभेद दोनों का प्रतिपादन है। अतः सूत्रकार द्वारा उक्त विरोध का निराकरण करने के उद्देश्य से अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- (२६० ) अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके॥।४३॥ सूत्राथ -- नानाव्यपदेशात् = श्रुतियों में जीवों को अलग-अलग बताया गया है इसलिए, च = तथा, अन्यथा = अन्य प्रकार से, अपि = भी, अंश: = जीव ब्रह्म का अंश है, एके = क्योंकि एक शाखा वाले आचार्य, दाशकितवादित्वम् = ब्रह्म को दाश (केवट) और कितव (जुवारी) आदि रूप कहकर, अधीयते = अध्ययन करते हैं। व्याख्या- श्रुतियों में कहा गया है कि जीवात्मा और परमात्मा पृथक्-पृथक् हैं। कारण यह है कि जीव अल्पज्ञ है, जबकि ब्रह्म सर्वज्ञ है। जीव परमात्मा के नियम में आबद्ध है और परमात्मा जीव का नियामक है; किन्तु परमात्मा और जीवात्मा का ऐक्य प्रतिपादित होने से जीवात्मा ईश्वर का ही अंश है। सुबाल श्रुति में जीव के माता, पिता, भाई, आवास, शरण, सुहृद, गति आदि सभी कुछ नारायण ही निर्दिष्ट हैं। इस तथ्य से जीवात्मा-परमात्मा का सम्बन्ध विभुरूप सिद्ध होता है। एक शाखा (अथर्ववेद के ब्रह्मसूक्त में- 'ब्रह्म दाशा ब्रह्मदासा ब्रह्मैवेमे कितवाः' ये केवट ब्रह्म हैं, दास ब्रह्म हैं तथा ये जुआरी ब्रह्म हैं- ऐसा कहा गया है।) के अनुसार जीवों का बहुत्व एवं उसकी ब्रह्मरूपता सिद्ध होती है। इस तथ्य से भी जीवात्मा-परमात्मा के सम्बन्ध में अंश-अंशी का भाव सिद्ध होता है, किन्तु वह भाव कार्य-कारण रूप में है, न कि वस्तु के टुकड़ों के रूप में; क्योंकि परमात्मा को अवयव रहित अखण्ड कहा गया है, उसका खण्ड नहीं हो सकता है॥४३॥ जीव और ब्रह्म के अंश-अंशी भाव में सूत्रकार वेद प्रमाण देते हुए हेतु प्रस्तुत करते हैं- (२६१ ) मन्त्रवर्णाच्च॥४४॥ सूत्रार्थ- मन्त्रवर्णात् = मन्त्र के वर्णों से, च = भी यही तथ्य सिद्ध होता है। व्याख्या- वेद मंत्र के वर्णों से भी यही बात सिद्ध होती है कि जीव ईश्वर का अंश है। ऋ. १०.९०.३ तथा यजु. ३१.३ में वर्णित मंत्र ..... 'पादोस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' में समस्त भूतों के उस ब्रह्म के एक पाद (अंश) में ही स्थित होने तथा तीन पाद उसके अविनाशी स्वरूप में विद्यमान होने के वर्णन से ब्रह्म- जीव का अंश-अंशी भाव स्पष्ट है॥४४ I अब इसी तथ्य को स्मृति प्रमाण से सिद्ध करते हैं- ( २६२ ) अपि च स्मर्यते॥४५ ॥। सूत्रार्थ- च = तथा, अपि = भी, स्मर्यते = स्मरण किया गया (प्रस्थानत्रयी के स्मृति ग्रन्थ भगवद्गीता आदि द्वारा)। व्याख्या- यह तथ्य केवल मंत्र में ही नहीं, वरन् स्मृति में भी वर्णित हुआ है कि जीव ईश्वर का ही अंश है। प्रस्थानत्रयी के स्मृति ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय के सातवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है- 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः' अर्थात् जीवलोक (संसार) में जितने भी जीव भूतादि सनातन हैं, वे सब मेरे ही अंश हैं। यहाँ उल्लेख मिलता है कि इसमें प्रयुक्त सनातन शब्द जीव की विभुता के लिए नहीं, वरन् जीव के ब्रह्मांश होने का द्योतक है। स्मृति में जीव-स्वरूप का वर्णन करते हुए उसे ज्ञानाश्रय, ज्ञानगुण, चेतन प्रकृति से परे, अजन्मा एवं शरीर और रूप के वैशिष्टय वाला निरूपित किया गया है, इससे जीव का ब्रह्म का अंश होना सिद्ध होता है।।४५॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 127
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ३ सूत्र ४८ १२९ यहाँ शिष्य के यह आशंका करने पर कि यदि जीव ब्रह्म का अंश है, तो जीव के सुख-दुःख भोगने पर, ब्रह्म (सर्वव्यापक होने से) भी सुख-दुःखादि का भोक्ता होता होगा, सूत्रकार कहते हैं- (२६३ ) प्रकाशादिवन्नैवं परः ॥४६ ॥ सूत्रार्थ- पर: = परमात्मा, एवम् = इस प्रकार जीवात्मा के सुख-दुःखादि भोगों से, न = सम्बद्ध नहीं होता, प्रकाशादिवत् = जिस प्रकार प्रकाश आदि अपने अंश के दोषों से अलिप्त रहते हैं। व्याख्या- जिस प्रकार प्रकाश सूर्य आदि अपने अंश रूप किरणों के दोष से लिप्त नहीं होते। तात्पर्य है कि प्रकाश की किरणें अच्छे-बुरे सभी स्थानों में पड़ती हैं तथा वहाँ के वातावरण का कोई प्रभाव उन पर नहीं पड़ता। ठीक उसी प्रकार परब्रह्म परमेश्वर भी अपने अंश रूप जीवात्माओं के कर्म-दोषों, सुख-दुःखादि से प्रभावित नहीं होता। कठोपनिषद् (२/१/११) में उल्लेख है- जैसे समस्त लोकों के नेत्र रूप सूर्यदेव (व्यक्तियों के) नेत्रों के दोष से लिप नहीं होते, वैसे ही समस्त जीवों के एकमात्र अन्तरात्मा परमेश्वर भी लोकों के दुःखों से लिप् नहीं होते॥४६॥ इसी तथ्य को अब स्मृति प्रमाण द्वारा भी सिद्ध करते हैं- ( २६४ ) स्मरन्ति च ॥४७॥ सूत्रार्थ- च = तथा, स्मरन्ति = स्मृतियों में भी यही तथ्य निर्दिष्ट है। व्याख्या-इसी तथ्य को कि जीवात्मा के अन्तस्तल में रहते हुए परमात्मा उसके गुण-दोषों, सुख-दुःख से प्रभावित नहीं होता, स्मृतियों में भी पुष्ट किया गया है। गीता १३.३१ में उल्लेख है- 'अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' अर्थात् भगवान् कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे कौन्तेय! परमात्मा अविनाशी, अनादि तथा गुणातीत है, अतः वह शरीर में रहते हुए भी न स्वयं कर्त्ता है और न ही सुख-दुःखादि द्वन्द्वों का भोक्ता है, न ही उनसे लिप् होता है। जैसे कमल पत्र जल में रहते हुए भी जल में डूबकर उससे लिप् नहीं होता, वैसे ही परमात्मा जीव के शरीर में रहते हुए उसके कर्मफलादि से लिप्त नहीं होता। ऋ. १.१६४.२० के 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' में भी जीवात्मा को दो साथी बताकर उनकी स्थिति को स्पष्ट करते हुए यही तथ्य दर्शाया गया है।४७।। जब यह स्पष्ट हो गया है कि ब्रह्म और जीव का अंश और अंशी सम्बन्ध है, अर्थात् सभी जीवों में परमात्मा का निवास है, तब कुछ शास्त्रों में निर्दिष्ट विधि निषेध क्यों है अर्थात् किन्हीं के लिए कोई कर्म करने की आज्ञा और किन्हीं के लिए कोई कर्म करने का निषेध क्यों किया गया है। इसी का समाधान करते हुए आचार्य कहते हैं- (२६५ ) अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरादिवत्।।४८।। सूत्रार्थ- अनुज्ञापरिहारौ = विधि और निषेध, ज्योतिरादिवत् = ज्योति आदि के समान, देहसम्बन्धात् = शरीर के सम्बन्ध से है। व्याख्या- शरीर वैभिन्य के कारण जीवात्मा का सम्बन्ध पृथक्-पृथक् शरीरों के साथ पृथक्-पृथक् किया गया है, वह उचित ही है। जिस प्रकार श्मशान आदि की अग्नि त्याज्य तथा यज्ञादि की अग्नि ग्रहणीय होती है, उसी प्रकार शरीरों के भेद से विधि-निषेध भी निश्चित होती है। जैसे-ब्राह्मण के लिए सेवा वृत्ति का निषेध तथा शूद्र के लिए सेवा वृत्ति की अनुज्ञा दी गई है, इसी प्रकार क्षत्रिय के लिए रक्षा के दायित्व तथा वैश्य के लिए पोषण के दायित्व के सम्बन्ध में समझा जा सकता है।४८।। अब शिष्य के यह जिज्ञासा करने पर कि उपर्युक्त प्रकार से अनुज्ञा और निषेध की व्यवस्था होने पर भी जीवात्माओं को विराट् मान लेने से उन आत्माओं तथा उनके कर्मों का पृथक्-पृथक् विभाग कैसे होता होगा? आचार्य सूत्रकार कहते हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 128
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१३० वेदान्त दर्शन
(२६६ ) असंततेश्चाव्यतिकरः ॥४९॥ सूत्रार्थ- च = तथा, असन्तते: = एक आत्मा की व्याप्त अन्य शरीरों तक न होने के कारण, अव्यतिकर: = उनका एवं उनके कर्मों का मिश्रण नहीं होता अर्थात् एक के कर्म दूसरे को व्याप्त नहीं करते। व्याख्या- एक आत्मा का निवास एक ही शरीर में रहता है, इसलिए उससे सम्बद्ध सुख-दुःखादि का वह ही भोग करती है। चूँकि वह अन्य शरीरों में व्याप्त नहीं होती, अतः अन्य शरीरों के सुख-दुःखादि भोगों से भी वह सम्पृक्त नहीं होती। जिस प्रकार आकाश में संव्याप्त अनेक शब्द परस्पर मिश्रित न रहकर पृथक्-पृथक् विभक्त रहते हैं और एक ही समय में विभिन्न स्थलों में सुने जाते हैं, उसी प्रकार शरीर से सम्बद्ध आत्माओं के कर्म और कर्मफल अलग-अलग ही रहते हैं, अर्थात् एक शरीर से सम्बद्ध आत्मा अपने किये का फल स्वयं भोगती है, दूसरे शरीर से सम्बद्ध आत्मा के कर्मफल पहली वाली आत्मा को नहीं भोगने पड़ते ॥४९॥ यहाँ तक जीवात्मा-परमात्मा के अंशाशिभाव तथा जीवात्माओं के कर्मफल असांकर्य भाव को श्रुति- स्मृति आदि विविध प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया गया है। अब कहते हैं कि इनके अतिरिक्त जो जीवात्मा के स्वरूप के सम्बन्ध में अलग मत हैं, वे आभास मात्र हैं, प्रमाण रूप नहीं हैं- (२६७ ) आभासा एव च I K० ।। सूत्रार्थ- च = तथा, आभासा: = इस सन्दर्भ में दी गई अन्य मान्यताएँ आभास मात्र, एव = ही हैं। व्याख्या- विगत सूत्रों में जीवात्मा को परमात्मा का अंश सिद्ध करने के निमित्त जो शास्त्र सम्मत तर्क, तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत किये गये हैं, वे ही प्रामाणिक हैं। लोग जीवात्मा को परमात्मा का अंश न मानकर उन्हें स्वतंत्र मानते हैं एवं इसके लिए विविध तर्क देते हैं, वे वस्तुतः आभास मात्र हैं। उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता ।०॥ शिष्य के यह कहने पर कि परमात्मा को शास्त्रों में अखण्ड एवं निरवयव कहा गया है, अस्तु उसके खण्ड होने सम्भव नहीं हैं, तथापि जीवों को परमेश्वर का अंश कहते हैं, वह अंश और अंशीभाव अवास्तविक है, वह घटाकाश की भाँति औपाधिक निमित्त से प्रतीत होता है, आचार्य समाधान करते हैं- ( २६८ ) अदृष्टानियमात्॥५१॥ सूत्रार्थ-अदृष्ट = अन्य जन्मों में किये गये कर्मफल भोग की व्यवस्था का, अनियमात् = कोई प्रत्यक्ष नियम न होने से (औपाधिक निमित्त से जीवों को परमात्मा का अंश मानना उचित नहीं है।)। व्याख्या- पूर्व जन्मों के कर्मफल भोग का प्रत्यक्ष नियम न होने से जीवों की कर्म समानता स्वीकार नहीं की जा सकती। वस्तुतः सभी जीव समान हैं भी नहीं, तब उनके कर्म एक जैसे कैसे हो सकते हैं? एक ही योनि के जीवों के विभिन्न कर्म एक समान नहीं होते हैं, तब उनके फल भी एक समान कैसे हो सकते हैं? यदि उन्हें स्वतंत्र मान लिया जाये तब उनके अदृष्ट (पूर्व जन्म में किये गये कर्म) का फल भोग कौन करायेगा? यदि यह कहा जाये कि स्वतः ही वे अपने कर्मों का फल भोग लेंगे, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि कर्म जड़ हैं, वे अपने फल भोग की व्यवस्था स्वयं कैसे कर सकते हैं। यदि यह माना जाये कि एक ही परमात्मा घटाकाशवत् उपाधि के निमित्त से विविध जीवों के रूप में प्रतीत हो रहा है, तो भी यह सम्भव नहीं है कि उन जीवों के कर्मफल भोग की व्यवस्था हो सके। कारण यह है कि इस मान्यता के अनुरूप जीवात्मा-परमात्मा का भेद-अवास्तविक होगा, तब समस्त जीवों के कर्मों और उनके भोक्ताओं का विभाग करना तथा परमात्मा को उन सभी से पृथक् रहकर उनके कर्मफल की व्यवस्था बनाने वाला मानना सम्भव नहीं हो सकता। अस्तु, यही मानना उचित है कि सभी जीव परमात्मा के ही अंश हैं, उसी से प्रकट होते हैं, और वही (परमात्मा) सबकी यथोचित कर्मफल व्यवस्था करता है॥१।
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an excluse intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 129
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ३ सूत्र ५३ १३१ अब यह दर्शाते हैं कि केवल कर्मफलभोग में ही नहीं, संकल्प आदि में भी वही दोष उत्पन्न होगा- ( २६९ ) अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम्॥५२॥ सूत्रार्थ-च = और (इसके अतिरिक्त), एवम् = इसी प्रकार, अभिसन्ध्यादिषु = संकल्प आदि में, अपि = भी (यही अव्यवस्था उत्पन्न होगी)। व्याख्या- जिस प्रकार पूर्व सूत्र में वर्णित तथ्य कि ईश्वर और जीवों का अशांशि-भाव वास्तविक न होकर घटाकाशवत् प्रतीति मात्र होने से जीवों के कर्मफल भोग की नियमित व्यवस्था नहीं हो सकती, ठीक इसी प्रकार ऐसा (ऊपर की पंक्तियों में वर्णित तथ्य) मानने पर जीवों के संकल्प और इच्छा आदि के विभाजन की भी नियमित व्यवस्था नहीं हो सकेगी। कारण यह है कि सभी जीवों के संकल्प आदि आपस में पृथक् न रह सकेंगे, साथ ही परमेश्वर के संकल्प आदि से भी उनका पार्थक्य सिद्ध नहीं हो पायेगा। अस्तु, शास्त्रों में जो परमात्मा के द्वारा संकल्पपूर्वक सृष्ट्रयुत्पत्ति का वर्णन है, उसकी भी संगति बिठा पाना कठिन होगा ।२॥ अब उपाधियों में देशभेद से भी इस व्यवस्था के न हो पाने का तथ्य दर्शाते हैं- ( २७० ) प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात्॥५३॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहें कि, प्रदेशात् = उपाधियों में परस्पर देशभेद होने से (कर्मफलादि व्यवस्था का नियमन हो जायेगा), इति न = तो यह भी नहीं कह सकते, अन्तर्भावात् = (क्योंकि समस्त देशों का उपाधि में एवं उपाधियों का समस्त देशों में) अन्तर्भाव हो जाता है। व्याख्या- यदि यह कहा जाये कि उपाधियों में देशभेद होने से समस्त जीवों का पृथक्-पृथक् विभाजन हो जायेगा एवं उसी के द्वारा कर्मफल भोग एवं संकल्प आदि की व्यवस्था भलीभाँति हो जायेगी, तो यह भी सम्भव नहीं; क्योंकि परमात्मा सर्वव्यापी होने के कारण समस्त उपाधियों में संव्याप्त है। यदि उपाधियों के देश में भेद है, तो उससे परमात्मा के देश में भेद नहीं हो सकता। प्रत्येक उपाधि का सम्बन्ध सभी देशों से सम्भव है। कारण यह है कि घट आदि उपाधि के स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करने से वहाँ स्थित आकाश गमन नहीं करता, वरन् जहाँ वह (उपाधि) जाती है, वहाँ स्थित आकाश उसमें आ जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि समस्त आकाश देश का अन्तर्भाव समस्त उपाधियों में होता है। ठीक इसी प्रकार समस्त उपाधियों का भी अन्तर्भाव आकाश में होता है। ऐसी स्थिति में किसी प्रकार भी कर्मफलादि का विभाग सिद्ध नहीं हो पायेगा। अस्तु, जीवात्मा और परमात्मा का अशांशि-भाव घटाकाश की तरह उपाधि निमित्तक होना सम्भव नहीं है॥५३॥
॥ इति द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्त:॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 130
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
॥ अथ द्वितीयाध्याये चतुर्थः पादः॥ तृतीय पाद में पंचभूतों एवं अन्तःकरणादि की उत्पत्ति प्रतिपादित की गई है। जीवात्मा की उत्पत्ति और स्वरूप भी गौण रूप से निरूपित किया गया है। इन्द्रियों एवं प्राण की उत्पत्ति प्रतिपादित न होने से अब चतुर्थ पाद में इनके प्रतिपादन तथा इनसे सम्बन्धित विरोधों का परिहार किया जा रहा है- (२७१ ) तथा प्राणाः ॥१॥ सूत्रार्थ- तथा = उसी तरह, प्राणाः = प्राण शब्द वाच्य इन्द्रियों का भी (ब्रह्म से ही प्रादुर्भाव होता है)। व्याख्या-जिस तरह आकाश आदि पंचभूत परब्रह्म से प्रादुर्भूत होते हैं; उसी तरह समस्त इन्द्रियों का प्रादुर्भाव भी उसी परब्रह्म से होता है। कारण यह है कि आकाशादि पंचभूतों और इन्द्रियों की उत्पत्ति में किसी भी प्रकार का भेद नहीं है। मुण्डक उपनिषद् (२.१.३) में स्पष्ट है कि परब्रह्म परमात्मा से ही प्राण, मन, समस्त इन्द्रियाँ तथा पृथ्वी, जल, वायु, ज्योति (अग्नि) एवं आकाश की उत्पत्ति होती है। 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुरज्योंतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी' (मुण्डक. २/१/३)। इस प्रकार इस श्रुति वाक्य से यह तथ्य स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रियों का आविर्भाव भी उसी परब्रह्म से हुआ है, जिससे पंचभूत तथा अन्य सभी प्रकट हुए हैं।।१।। पूर्व में वर्णन किया जा चुका है कि वाणी से तेज उत्पन्न हुआ है, इसलिए तेज से ही ओत-प्रोत है। इससे तो समस्त इन्द्रियों की उत्पत्ति पंचभूतों से ही हुई सिद्ध होती है। अन्य मतों में भी ऐसा ही माना गया है। तब उस श्रुति वचन कि ब्रह्म से ही इन्द्रियाँ उत्पन्न हुई हैं व इस तथ्य में समानता कैसे होगी? इसी जिज्ञासा पर आधारित अगला सूत्र है- ( २७२ ) गौण्यसम्भवात्॥२॥ सूत्रार्थ- असम्भवात् = सम्भव न होने के कारण (वह श्रुति), गौणी = गौण है (अर्थात् तत्सम्बन्धी श्रुति कथन प्रमुख न होकर गौण है)। व्याख्या-छा. उ.६/६/४ की श्रुति में उल्लेख है कि भक्षित तेज का सूक्ष्मांश ही एकीकृत होकर वाणी बनता है। इससे यह आशय निकलता है कि तैजस पदार्थ का सूक्ष्मांश वाणी को बल सम्पन्न बनाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इन्द्रिय का प्रादुर्भाव तैजस तत्त्व से पूर्व ही हुआ है। ठीक इसी प्रकार अन्य श्रुतिवचनों में भी उल्लेख है कि भक्षित अन्न से मन की तथा पिये हुए जल से प्राण की उत्पत्ति हुई है। अब प्रश्न यह है कि जब अन्न खाया, तब मन उत्पन्न हुआ, तब क्या उससे पहले मन था ही नहीं? इसी प्रकार पानी पीने से प्राण बनने के सन्दर्भ में प्रश्न यह है कि प्राणों के बिना जल पीना संभव कैसे हो सकता है? जब यह सम्भव ही नहीं तब जल से प्राणों की उत्पत्ति कैसे हो सकती है। अस्तु, कहा जा सकता है कि जल पर जीवन आधारित होने के कारण गौण रूप से जल से प्राण की उत्पत्ति निरूपित की गई है, न कि मुख्य रूप से। इसी प्रकार वागिन्द्रिय की उत्पत्ति तैजस पदार्थ से होना श्रुति का गौण कथन ही है। ऐसा मान लेने पर श्रुतियों में जो परस्पर विरोध प्रतीत होता है, वह समाप्त हो जायेगा॥२॥ अब दूसरे प्रकार से श्रुति का गौणत्व सिद्ध किया जा रहा है- (२७३ ) तत्प्राक्श्रुतेश्च॥३॥ सूत्रार्थ- तत्प्राक्तेः = श्रुति के द्वारा उत्पन्न उन पंचतत्त्वों (आकाश आदि) से पूर्व इन्द्रियों का उत्पन्न
निरूपण गौण है)। होना कहा गया है, च = भी (इससे भी यही सिद्ध होता है कि तेज से वाक् आदि की उत्पत्ति का श्रुति
व्याख्या-ब्राह्मणों, उपनिषदों में इन्द्रियों की उत्पत्ति पंचतत्त्वों से पूर्व में हुई वर्णित की गई है, शत. ब्रा.
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 131
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ४ सूत्र ६ १३३ ६/१/१, मुण्डक २/१/३ में भी यही तथ्य ध्वनित होता है कि इन्द्रियों की उत्पत्ति पंचभूतों से पहले हुई है, आकाशादि तत्त्वों से इन्द्रियों की उत्पत्ति नहीं हुई है, किन्तु जो ऐसा उल्लेख मिलता है, वह गौण कथन है न कि प्रमुख। अस्तु विगत सूत्र में जो तेज आदि से वाक् आदि इन्द्रियों की उत्पत्ति का श्रुति कथन व्याख्यायित है, वह गौण ही है।।३। अब दूसरे तर्क द्वारा इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं- (२७४) तत्पूर्वकत्वाद् वाच: ॥।४।। सूत्रार्थ- वाच: = वाणी की उत्पत्ति वर्णित है, तत्पूर्वकत्वात् = ब्रह्म के तीनों तत्त्वों में प्रविष्ट होने के पश्चात् (अस्तु, तेज से वाक् उत्पन्न होने से सम्बन्धित श्रुति गौण है)। व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद् (६.३.१-३) में वर्णन है कि उन तत्त्वरूपी तीन देवताओं (तेज, अप् एवं पृथिवी) में ब्रह्म जीवात्मा रूप से प्रविष्ट हो गया और उसी ने नाम रूप वाले जगत् की सृष्टि की। इस प्रकार जब जगत् की उत्पत्ति ब्रह्म के (उन तत्त्वों में) प्रवेशपूर्वक वर्णित है, तब इन्द्रियों की उत्पत्ति उन तत्त्वों से न मानकर ब्रह्म से ही मानी जायेगी। अस्तु स्पष्ट है कि तेज तत्त्व से वाणी की उत्पत्ति का कथन गौण है, प्रधान नहीं ॥४॥ यह सिद्ध किया गया कि इन्द्रियों की उत्पत्ति ब्रह्म द्वारा ही होती है, जो पंचतत्त्वों से पूर्व ही हो जाती है। अब यह बताते हैं कि कहीं इन्द्रियों की संख्या सात तथा कहीं ग्यारह वर्णित है, उनमें से कौन सा प्रतिपादन अधिक सही है- (२७५ ) सप्त गतेर्विशेषितत्वाच्च।५॥ सूत्रार्थ- सप्त = इन्द्रियाँ सात बतायी गई हैं, गते: =क्योंकि सात ही ज्ञात होती हैं, च = और, विशेषितत्वात् = श्रुति में सप्त-प्राण कहकर इन्द्रियों के लिए ही विशेष रूप से संकेत किया है। व्याख्या- श्रुति में वर्णन मिलता है कि इन्द्रियाँ प्रमुखतः सात ही हैं। इन्हें ही सात प्राण कहा गया है। सात प्राणों के रूप में कही गई ये सात इन्द्रियाँ आँख, कान, नाक, रसना, त्वचा, वाक् एवं मन हैं। कहीं दो नेत्र, दो घ्राण, दो श्रवण और जिह्वा को मिलाकर सात प्राण माने गये हैं, ये सप्त प्राण सात लोकों में विचरण करते हैं, इसका वर्णन मुण्डकोपनिषद् में किया गया है- सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः। सप्त इमे लोकायेषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिता: सप्त सप्त (२/१/८) अर्थात् उस पुरुष से ही सात प्राण (दो नेत्र, दो श्रवण, दो घ्राण और एक जिह्वा) उत्पन्न हुए। उसी से अग्नि की सात ज्वालाएँ, सात समिधाएँ (सात विषय) तथा सात यज्ञ उत्पन्न हुए। उसी से ये सप्त लोक प्रकट हुए, जिनमें सप्त प्राण विचरण करते हैं। प्रत्येक प्राणी रूप गुहा में आश्रित- सन्निहित ये सात-सात पदार्थ उसी से प्रकट होते हैं। इस प्रकार इन्द्रियों का सात होना ही सिद्ध होता है।५॥ अब ग्यारह इन्द्रियों के विषय में प्राप्त होने वाले प्रतिपादन को प्रस्तुत करते हैं- (२७६ ) हस्तादयस्तु स्थितेऽतो नैवम्॥६ ॥ सूत्रार्थ-तु = किन्तु, हस्तादयः = हाथ-पैर आदि अन्य इन्द्रियाँ भी हैं, अतः = इसलिए, स्थिते - इस अवस्था में, एवम् न = ऐसा नहीं कहना चाहिए (कि इन्द्रियाँ सात ही हैं।) व्याख्या-शरीर में हाथ आदि (हाथ, पैर, उपस्थ एवं गुदा) अन्य इन्द्रियाँ भी हैं, जिनका स्पष्ट रूपेण वर्णन अन्य श्रुतियों में मिलता है। बृहदारण्यकोपनिषद् ३/९/४ में उल्लेख है कि पुरुष में स्थित दस प्राण अर्थात् दस इन्द्रियाँ और ग्यारहवाँ मन है। इस प्रकार एकादश इन्द्रियाँ हैं- दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशः। मनुष्यों के कार्यों में हाथ, पैर आदि इन्द्रियों का भी करण रूप से प्रयोग होता है, जो प्रत्यक्षतः भी देखा जाता है। इस
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelle can be used for propagation with prior written consent.
Page 132
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१३४ वेदान्त दर्शन प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ- नेत्र, श्रोत्र, त्वचा, रसना और घ्राण तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ- हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ एवं वाक् और एक ग्यारहवीं आन्तरिक अदृश्य इन्द्रिय मन है। अतः यह कहना उचित नहीं कि ७ इन्द्रियाँ ही हैं। यदि किसी कारणवश उन्हें ७ माना जाता है, तो ऊपर वर्णित ४ इन्द्रियों को भी मानना चाहिए।६॥ इस प्रकार इन्द्रियों की संख्या के सम्बन्ध में उत्पन्न आशंका का निराकरण करते हुए उनकी संख्या ग्यारह है यह सिद्ध किया गया है। अब प्राण अथवा इन्द्रियों को अणुरूप सिद्ध किया जा रहा है- (२७७ ) अणवश्च।।७। सूत्रार्थ- च = तथा, अणवः = प्राण अथवा इन्द्रियाँ अणुरूप अर्थात् सूक्ष्म हैं। व्याख्या- ये सभी प्राण अथवा इन्द्रियाँ अणुरूप अर्थात् सूक्ष्म हैं। प्रत्यक्षतः आँख, नाक, श्रोत्र आदि जो इन्द्रियाँ दिखाई पड़ती हैं, वे वस्तुतः उन इन्द्रियों के गोलक हैं। उनके अन्दर जो प्राण विद्यमान है, वे ही इन्द्रियाँ हैं, क्योंकि मृत्यु के पश्चात् इन्द्रियों के गोलक तो बने रहते हैं, पर वे कार्य नहीं करते। यदि इन्द्रियाँ स्थूल हों, तो वे मृत्यु के समय निकलती दिखाई दें, पर ऐसा नहीं होता। अतः सिद्ध है कि इन्द्रियाँ अणु परिमाण अर्थात् सूक्ष्म होती हैं।।७।।
है? आचार्य समाधान करते हैं- अब शिष्य की इस जिज्ञासा पर कि जब सभी प्राण समान हैं, तब उनमें मुख्य प्राण को विशिष्ट क्यों माना जाता
(२७८) श्रेष्ठश्च।। ।। सूत्रार्थ- श्रेष्ठः = श्रेष्ठ है (बुद्धि रूप मुख्य प्राण), च = और इसलिए उसे विशिष्टता दी जाती है। व्याख्या- मुख्य प्राण बुद्धि रूप है। औपनिषद् वर्णनों में मुख्य प्राण को श्रेष्ठ माना गया है (छा.उ.५/१/१, प्रश्नो. २/३)। चूँकि इसकी उत्पत्ति अन्य प्राणों में सबसे पहले हुई है, इस दृष्टि से मुख्य प्राण रूप बुद्धि को श्रेष्ठ माना जाना- उसे विशिष्टता दिया जाना उचित ही है।।८।। अब प्राण का स्वरूप निर्धारित करने के निमित्त नया प्रकरण प्रारम्भ कर रहे हैं- (२७९ ) न वायुक्रिये पृथगुपदेशात्।।९।। सूत्रार्थ- वायुक्रिये = मुख्य प्राण वायु अथवा उसकी क्रिया (स्पन्दन), न = नहीं है, पृथगुपदेशात् = श्रुतियों में पृथक् से वायु और उसकी क्रिया का वर्णन मिलने से। व्याख्या- श्रुतियों में जहाँ प्राण तत्त्व की उत्पत्ति वर्णित है- वहाँ वायुतत्त्व और उसकी क्रिया का पृथक् से उल्लेख मिलता है (मु.उ. २/१/३)। इससे स्पष्ट होता है कि मुख्य प्राण न तो वायु है और न उसका स्पन्दन है। यह इन दोनों से अलग है।।९।। अब शिष्य की इस जिज्ञासा पर कि यदि वायु तत्त्व प्राण नहीं है, तब क्या वह जीवात्मा के समान कोई स्वतन्त्र पदार्थ है? सूत्रकार समाधान करते हैं- ( २८० ) चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः॥१०॥ सूत्रार्थ-तु - किन्तु, चक्षुरादिवत् = प्राण भी नेत्र आदि इन्द्रियों के समान (जीवात्मा का उपकरण) हैं, क्योंकि श्रुति में, तत्सह-शिष्टयादिभ्यः = उन्हीं इन्द्रियों के साथ इसका (प्राण का) भी वर्णन हुआ है। व्याख्या- जिस प्रकार चक्षु आदि इन्द्रियाँ जीव के उपकरण हैं, उसी प्रकार प्राण भी जीव का उपकरण है। छान्दोग्य श्रुति में प्राण का वर्णन इस तथ्य की पुष्टि करता है कि प्राण (मुख्य प्राण) जीवात्मा के अधीन है न कि उसी की तरह स्वतन्त्र है। छा.उ.५/१/६-१२ में वर्णन है कि एक बार प्राण और सभी इन्द्रियों ने अपनी श्रेष्ठता निर्धारित करने के लिए ब्रह्मा जी के समक्ष प्रस्ताव रखा। ब्रह्माजी ने कहा कि तुम सबमें से जिसके निकलने से शरीर मृतक हो जाये, वही सर्वश्रेष्ठ है। तत्पश्चात् वाक्,चक्षु, श्रोत्र आदि क्रमशः शरीर से बाहर
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 133
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ४ सूत्र १३ १३५ निकले, पर फिर भी किसी न किसी प्रकार शरीर का कार्य चलता रहा। अन्ततः प्राण के बाहर निकलने को समुद्यत होने पर सभी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गईं और कहने लगीं, हे प्राण! आप बाहर मत जाइये, आप ही सबसे श्रेष्ठ हैं? इस प्रकरण से इन्द्रियों के साथ प्राण के वर्णन से यह सिद्ध हो गया कि वह भी जीवात्मा का उपकरण मात्र जड़ पदार्थ है।१०।। आचार्य द्वारा यह बताये जाने पर कि मुख्य प्राण चक्षुरादि इन्द्रियों की तरह ही जीवात्मा का एक करण है, शिष्य जिज्ञासा करता है कि यदि मुख्य प्राण करण है, तो नेत्र आदि अन्य करणों के विषयों की भाँति इसका भी कोई विषय होना चाहिए? इसका समाधान आचार्य अगले सूत्र में करते हुए कहते हैं- ( २८१ ) अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति॥११।। सूत्रार्थ- च = तथा, अकरणत्वात् = (इन्द्रियों के समान) विषयोपभोग में करण रूप न होने से, न दोष: = दोष नहीं है, हि = क्योंकि, तथा दर्शयति = श्रुति स्वयं ही वैसा दिखाती है। व्याख्या- यह सत्य है कि जैसे नेत्र आदि इन्द्रियाँ रूप आदि विषयों का ज्ञान कराने में करण की भूमिका निभाती हैं, उसी प्रकार प्राण तो प्रत्यक्षतः विषयोपभोग में जीवात्मा के करण की भूमिका नहीं निभाता तथापि उसे जीवात्मा का करण मानने में कोई दोष नहीं है, कारण यह है कि समस्त इन्द्रियों का धारणकर्त्ता और शरीर का पोषणकर्त्ता प्राण ही है, प्राण-संयोग से ही जीवात्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में गमन करता है। प्राण के रहते ही यह शरीर अस्तित्ववान् रहता है, प्राण न हो तो शरीर स्पृश्य तक नहीं रहता। इस प्रकार श्रुति ने अनेक स्थलों पर इस तथ्य की पुष्टि की है (छान्दो. ५/१/६ से प्रारम्भ होने वाला पूरा प्रकरण, प्रश्नो. ३/१-१२)। अतः प्राण को जीवात्मा का करण मानना दोषपूर्ण नहीं है ॥११। अब प्राण को जीवात्मा के करण माने जाने के सन्दर्भ में अन्य युक्तियाँ व प्रमाण देते हैं- (२८२ ) पञ्चवृत्तिर्मनोवद् व्यपदिश्यते ॥१२ ।। सूत्रार्थ-मनोवत् = मन के समान ही, पंचवृत्ति: = (प्राण की भी) पाँच वृत्तियाँ, व्यपदिश्यते (श्रुति द्वारा) बताई गई हैं। व्याख्या-जिस प्रकार श्रोत्र आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियों के रूप में मन की पाँच वृत्तियाँ वर्णित हैं, उसी प्रकार मुख्य प्राण को भी श्रुति पाँच वृत्तियों वाला मानती है। ये पाँच वृत्तियाँ हैं- प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान। उन्हीं वृत्तियों वाले प्राण हृदयादि पाँच स्थानों पर रहकर विविध-विध जीवात्मा के उपयोग में आते हैं। श्रुतियों में इनका विस्तार से वर्णन है (प्रश्नो. ३/४-७)। योग शास्त्र में भी मन व प्राण की पंचवृत्तियाँ निर्दिष्ट हैं।१२ ।। यह सिद्ध हो जाने पर कि प्राण जीवात्मा और वायु से भिन्न है तथा जीवात्मा का उपकरण है, प्राण के स्वरूप का वर्णन करते हैं- ( २८३ ) अणुश्च ॥१३॥ सूत्रार्थ-अणुः = यह प्राण अणु स्वरूप (सूक्ष्म), च = भी है। व्याख्या- पाँच वृत्तियों वाले इस प्राण का स्वरूप सूक्ष्म है। सूक्ष्म से अभिप्राय उसके छोटे आकार से ही न होकर उसकी व्यापकता से है। देखने में भी आता है कि समस्त प्राणधारियों का अस्तित्व प्राण से ही है। प्राण न रहने पर शरीर का मरण हो जाता है। मृत्युकाल में प्राण के उत्क्रमण करते समय किसी सूक्ष्मदर्शी यन्त्र द्वारा भी प्राण को नहीं देखा जा सकता। इससे भी इसका अणु स्वरूप होना सिद्ध होता है॥१३। प्राण सम्बन्धी प्रकरण यहाँ समाप्त करके अब यह बताते हुए नया प्रकरण आरम्भ करते हैं कि छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित तेज आदि तीन तत्त्वों, जिन्हें सृष्टि उत्पत्ति का निमित्त माना गया है, उनका अधिष्ठाता कौन है ?-
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 134
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१३६ वदान्त दशन
(२८४) ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥१४।। सूत्रार्थ- ज्योतिराद्यधिष्ठानम् = ज्योति आदि तत्त्व जिसके अधिष्ठान बताये जाते हैं, वह (अधिष्ठाता), तु= तो ब्रह्म ही है, तदामननात् - क्योंकि श्रुतियों में उसी के अधिष्ठाता होने का वर्णन है। व्याख्या- ज्योति आदि तत्त्वों का अधिष्ठाता कौन है? इसका उत्तर है- ब्रह्म ही है, क्योंकि बह्म की एकोऽहं बहुस्याम् की आकांक्षा ही संकल्प बनी और इसी ने तेज की रचना की। तत्पश्चात् तेज ने विचार किया आदि, जिसका वर्णन छान्दोग्य श्रुति ६/२/३-४ में है। इस विवेचन में तेज तत्त्व द्वारा विचार करने का कथन वस्तुतः ब्रह्म के लिए है; क्योंकि तेज आदि जड़ तत्त्व विचार कैसे कर सकते हैं? उसके अन्दर प्रविष्ट उसके अधिष्ठाता ब्रह्म ने ही विचार किया। तैत्ति. उ.२/६ के अनुसार जगत् की रचना करके ब्रह्म उसमें जीवात्मा सहित प्रवेश कर गया। इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि तेज आदि तत्त्वों में परमात्मा ने ही प्रवेश करके उनका अधिष्ठाता होकर विचार किया॥१४॥ अब शिष्य की इस जिज्ञासा पर कि यदि परमात्मा ही आकाशादि तत्त्वों का अधिष्ठाता है, तब तो प्रत्येक शरीर का भी अधिष्ठाता होगा। तब जीवात्मा को शरीर का अधिष्ठाता कैसे माना जा सकता है? आचार्य समाधान करते हैं- ( २८५ ) प्राणवता शब्दात् ॥१५।। सूत्रार्थ- प्राणवता=(ब्रह्म द्वारा) प्राणधारी जीवात्मा के साथ प्रवेश करने का, शब्दात् = श्रुति वर्णन होने से यह (जीवात्मा को शरीर का अधिष्ठाता कहना) दोषपूर्ण नहीं है। व्याख्या- जैसा कि पूर्व सूत्र की व्याख्या में संकेत किया जा चुका है तथा श्रुति में भी निर्दिष्ट है कि तेज आदि तीन तत्त्वों का सृजन करने के पश्चात् ब्रह्म ने विचार किया- अब मैं जीवात्मा सहित इन तीनों तत्त्वों में प्रविष्ट होकर विविध नाम-रूपों को प्रकट करूँ (छान्दो. ६/३/२)। ऐतरेय उपनिषद् में भी सृष्टि उत्पत्ति के वर्णन में जगत्कर्त्ता परमेश्वर द्वारा जीवात्मा को सहयोग देने के उद्देश्य से शरीर में सजीव प्रवेश करने का उल्लेख है। कठोपनिषद् (१/३/१) में जीवात्मा और परमात्मा दोनों के हृदय गुहा में साथ-साथ निवास करने का वर्णन है। अतः जीवात्मा को शरीर का अधिष्ठाता मानने में कोई दोष नहीं है॥१५।। अब शिष्य यह जिज्ञासा करता है कि श्रुति में तत्त्वों की उत्पत्ति के पूर्व या पश्चात् भी कहीं जीवात्मा की उत्पत्ति का प्रकरण नहीं आया, तब ब्रह्म ने यह विचार कैसे कर लिया कि मैं जीवात्मा सहित इन तत्त्वों में प्रविष्ट होऊँ? इसी का समाधान करते हुए आचार्य अगले सूत्र में कहते हैं- २८६ ) तस्य च नित्यत्वात् ॥१६ ।। सूत्रार्थ- तस्य - उस (जीवात्मा) के ; नित्यत्वात् = नित्य होने की प्रसिद्धि के कारण, च = भी (उसकी उत्पत्ति का वर्णन दोषपूर्ण नहीं है)। व्याख्या- जीवात्मा के सन्दर्भ में यह प्रसिद्ध है कि वह नित्य अर्थात् अविनाशी है। तथापि शरीर के साथ उसकी उत्पत्ति गौण रूप से ही निर्दिष्ट है। वस्तुतः उसकी उत्पत्ति स्वीकार नहीं की गई (सूत्र २/३/१६-१७)। इसी कारण पञ्चतत्त्वों की उत्पत्ति के पूर्व या पश्चात् जीवात्मा की उत्पत्ति न बतलाकर जीवात्मा समेत ब्रह्म के शरीर में प्रविष्ट होने का वर्णन औचित्यपूर्ण ही है। इस तथ्य में कोई दोष नहीं है॥१६ ।। शिष्य की यह आशङ्का है कि प्राण के नाम से श्रुतियों में जो इन्द्रियों का वर्णन है, उससे यह प्रतीत होता है कि इन्द्रियाँ मुख्य प्राण की कार्य रूपा हैं अथवा उसी की वृत्तियाँ। यह भी सम्भव है कि नेत्र आदि इन्द्रियों की तरह मुख्य प्राण भी एक इन्द्रिय हो या उन्हीं के समान कोई अन्य तत्त्व। इस भ्रमपूर्ण स्थिति के समाधान के लिए आचार्य अगला प्रकरण प्रारम्भ करते हैं- (२८७) त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥१७।।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 135
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
अ० २ पाद० ४ सूत्र २० १३७ सूत्रार्थ-ते = वे मन इत्यादि, इन्द्रियाणि = इन्द्रियाँ,श्रेष्ठात् = मुख्य प्राण से भिन्न हैं, अन्यत्र तद्व्यपदेशात् = क्योंकि श्रुतियों में अन्यत्र उसका वर्णन भिन्नतापूर्वक किया गया है। व्याख्या- अन्य श्रुतियों में मुख्य प्राण को इन्द्रियों से भिन्न निरूपित किया गया है। वहाँ इन्द्रियों का वर्णन प्राण के नाम से नहीं किया गया है। मुण्डक उपनिषद् २/१/३ में इसका स्पष्ट उल्लेख है। अस्तु, इन्द्रियाँ एवं मन प्राण से सर्वथा भिन्न हैं। न इन्द्रियाँ मुख्य प्राण की कार्य रूपा हैं और न प्राण इन्द्रिय है। शरीर में समस्त इन्द्रियों की अवस्था मुख्य प्राण के आधिपत्य में है, इसी कारण श्रुति में गौण रूपेण इन्द्रियों को प्राण नाम से अभिहित किया गया है, मुख्यतः नहीं ॥१७॥ अब मुख्य प्राण का इन्द्रयों से वैभिन्न्य सिद्ध करने हेतु अन्य तर्क दे रहे हैं- ( २८८) भेदश्रुतेः॥१८॥ सूत्रार्थ- भेदश्रुतेः = श्रुतियों में इन्द्रियों का मुख्य प्राण से पार्थक्य निरूपित किया गया है (इसलिए भी उनका भिन्न होना सिद्ध होता है)। व्याख्या- श्रुतियों में जहाँ प्राण नाम से इन्द्रियों का प्रतिपादन किया गया है, वहाँ भी वह प्रतिपादन इस प्रकार किया गया है कि मुख्य प्राण से उनका भेद स्पष्ट झलके (मुण्डको. २/१/३; बृहदारण्यको. १/३/३)। अन्यत्र मुख्य प्राण की श्रेष्ठता निरूपित करते हुए, उसे सभी तत्त्वों तथा इन्द्रियों से पृथक् वर्णित किया गया है (प्रश्नो. २/२/३)। इस भेद वर्णन से स्पष्ट है कि मुख्य प्राण इन्द्रियों से भिन्न है॥१८॥ अब एक अन्य तथ्य द्वारा इन्द्रियों की मुख्य प्राण से भिन्नता सिद्ध करते हैं- ( २८९ ) वैलक्षण्याच्च॥१९॥ सूत्रार्थ- वैलक्षण्यात् = परस्पर विलक्षणता होने से, च = भी यही सिद्ध होता है (कि इन्द्रियों और मुख्य प्राण में अन्तर है)। व्याख्या- सुषुप्तावस्था में जबकि इन्द्रियाँ और अन्तःकरण विलीन होकर निश्चेष्ट हो जाते हैं, उस अवस्था में भी मुख्य प्राण जाग्रत् रहता है, वह निष्क्रिय नहीं होता। चूँकि वह इन्द्रियों और शरीर का धारण कर्त्ता है, यदि वह सो जायेगा, तो उसी क्षण शरीरादि विनष्ट हो जायेंगे। अतः इन्द्रियों और प्राण के इसी लक्षण वैभिन्न्य के कारण सिद्ध है कि मुख्य प्राण और इन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न हैं। न तो इन्द्रियाँ प्राण का कार्य हैं और न प्राण इन्द्रिय ही है।१९।। विगत सूत्रों की व्याख्या में यह वर्णन आ चुका है कि तेज आदि तत्त्वत्रय की रचना के उपरान्त परमात्मा जीव सहित उनमें प्रविष्ट हुआ और नामरूपात्मक संसार का सृजन किया। इस सन्दर्भ में शिष्य की यह आशङ्का है कि यह नामरूपात्मक जगत् का रचयिता स्वयं परमात्मा ही है अथवा कोई जीव विशेष। इसी के निराकरण हेतु नया प्रकरण आरम्भ किया जा रहा है- (२९० ) संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥२० ।। सूत्रार्थ- संज्ञामूर्तिक्लृसिः = नाम-रूप की रचना, तु = तो, त्रिवृत्कुर्वतः = तीन तत्त्वों (तेज, आपः, पृथिवी) का परस्पर सम्मिश्रण करने वाले की ही है; उपदेशात् = क्योंकि श्रुति में इसी प्रकार का वर्णन मिलता है। व्याख्या- सम्पूर्ण नाम रूप से युक्त जगत् का सृजन करना परमेश्वर का ही कार्य है, जीवात्मा का नहीं। श्रुति में जो तेज आदि तत्त्वों में जीवात्मा समेत परमेश्वर के प्रविष्ट होने का तथ्य निरूपित किया गया है, उसका प्रयोजन जीवात्मा के कर्त्तापन में परमेश्वर के कर्त्तव्य का प्राधान्य प्रदर्शित करना है, न कि जीवात्मा को सृष्टि- रचयिता बताना। स्पष्ट है कि जगत् का स्रष्टा वह ब्रह्म ही है, जीव नहीं; क्योंकि सृष्टि रचना उसी का कार्य है, जीव का नहीं ॥२०॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 136
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedant Darshan1-136
१३८ वेदान्त दर्शन चूँकि यह स्पष्ट हो चुका है कि ब्रह्म ने ही तीन तत्त्वों तेज, जल और पृथिवी का सृजन करके उनमें जीवात्मा सहित प्रवेश करके उन तीनों का परस्पर सम्मिश्रण करके सृष्टि का सृजन किया है। अब शिष्य की नई जिज्ञासा कि किस तत्त्व से कौन पदार्थ उत्पन्न हुआ, उसके विभाग कैसे बने आदि का समाधान करते हुए आचार्य कहते हैं- (२९१ ) मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च॥२१॥ सूत्रार्थ-भौमम् = पृथिवी के कार्य, मांसादि = मांस आदि (मांस, पुरीष, मन) हैं, च = उसी प्रकार, इतरयो: =अन्य तत्त्वों (जल, तेज आदि) के कार्य भी, यथाशब्दम् = श्रुति में निर्दिष्ट वर्णन के अनुसार समझ लेना चाहिए। व्याख्या- पृथिवी के अर्थात् भूमिरूप अन्न के तीन कार्य मांस, पुरीष (विष्ठा) और मन श्रुति में निर्दिष्ट हैं (छान्दोग्यो. ६/५/१ -अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः')। उसी प्रकार उस प्रकरण में अन्य तत्त्वों (तेज, जल आदि) के सम्बन्ध में वर्णित श्रुति शब्दों को समझना चाहिए, (उल्लेखनीय है कि छान्दोग्य श्रुति में ६/५/१-३ तक उपर्युक्त तीनों तत्त्वों के कार्य वर्णित हैं, जिनमें पृथिवी का स्थूल भाग मांस, मध्य भाग पुरीष तथा सूक्ष्म भाग मन के रूप में परिणत होता है। तेज का स्थूल भाग अस्थि, मध्य भाग मज्जा तथा सूक्ष्म अंश वाक् में परिणत होता है, इसी प्रकार जल का स्थूल भाग मूत्र, मध्य भाग रक्त तथा सूक्ष्म भाग प्राण में परिणत हो जाता है।) ये ही इन तत्त्वों के कार्य हैं।२१॥ शिष्य यह आशंका करता है कि जब श्रुति के अनुसार तीनों तत्त्वों के मिश्रण से सृष्टि प्रादुर्भूत हुई, तब किसी एक तत्त्व से कोई एक पदार्थ निर्मित हुआ, यह कैसे कहा जा सकता है? इसी का समाधान आचार्य अगले सूत्र में कर रहे हैं- ( २९२ ) वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥२२॥ सूत्रार्थ- तद्वादः = वह कथन (मांस आदि को भौम अर्थात् भूमि से उत्पन्न कहना), तु = तो, वैशेष्यात् = (भूमितत्त्व की) विशेषता या अधिकता के कारण है, तद्वादः = यह तद्वादः शब्द का पुनर्कथन अध्याय की समाप्ति का संकेतक है। व्यख्या- तत्त्वों के सम्मिश्रण में भी तीन तत्त्वों में से किसी एक की अधिकता रहती है और अन्य तत्त्वों की न्यूनता। अतः विशिष्टता के कारण अधिकता वाले तत्त्व का ही कथन कर दिया जाता है। अस्तु उक्त तथ्य में कोई विरोध नहीं है। तद्वादः पद का पुनर्कथन अध्याय की समाप्ति का संकेत करने के लिए किया गया है।।२२ ।। उपर्युक्त प्ररकण में भूतों के संसर्ग के कारण इन्द्रियों, प्राण और मन आदि को भूतों से उत्पन्न होने वाला गौण रूप से कह दिया गया है। वस्तुतः ये भूतों के कार्य नहीं हैं, भूतों से भिन्न हैं, जिसकी सिद्धि पहले २/४/२ में की जा चुकी है। इस प्रकार यह अध्याय समाप्त होता है।
। इति द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 137
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
।। अथ तृतीयाध्याये प्रथम: पादः॥ पूर्व के दोनों अध्यायों में ब्रह्म और जीव के स्वरूप का विवेचन किया गया है। अब तृतीय अध्याय का शुभारम्भ उस परब्रह्म की प्राप्ति का उपाय बतलाने के लिए किया जा रहा है। इसलिए इस अध्याय को साधनाध्याय या उपासनाध्याय कहा गया है। ब्रह्मप्राप्ति के साधनों में सर्वप्रथम विषयों से वैराग्य की जरूरत होती है तथा वह उसके लिए तभी से प्रयासरत हो जाता है। अतः वैराग्य प्रकट हो, इसके लिए बारम्बार जन्म-मरण एवं गर्भादि के दुःखों का दिग्दर्शन कराने हेतु तृतीय अध्याय के अन्तर्गत यह प्रथम पाद शुरू किया जा रहा है। वर्तमान जगत् में जीव के देहों (शरीरों) का जो परिवर्तन होता रहता है, उसके सन्दर्भ में वेद ने जैसा प्रतिपादन किया है, उसी प्रकरण के सन्दर्भ में यहाँ विचार किया जा रहा है। प्रकरण का विषय है कि जब यह जीव देह को त्यागकर अन्य देह में जाता है, तब वह एकाकी ही गमन करता है या फिर और भी कोई (कुछ) उसके साथ जाता है? इसी विषय के समाधान हेतु आचार्य प्रथम सूत्र प्रारम्भ कर रहे हैं- ( २९३ ) तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम्॥१॥ सूत्रार्थ- तदन्तरप्रतिपत्तौ = पूर्व देह का परित्याग कर नवीन देह की प्राप्ति के समय (यह जीव), सम्परिष्वक्तः - देह के बीज रूप सूक्ष्म तत्त्वों (भूतों) से संयुक्त होकर, रंहति = गमन करता है, प्रश्ननिरूपणाभ्याम् (यह तथ्य) प्रश्न और उसके निरूपण (समाधान) से सिद्ध होता है। व्याख्या- वेद (श्रुति) में यह विषय कई स्थलों में प्रयुक्त हुआ है, उनमें से जिस स्थल का वर्णन स्पष्ट है, वह तो अपने आप जानकारी में आ जाता है, किन्तु जहाँ का वर्णन कुछ अस्पष्ट है, उसे स्पष्ट करने हेतु छा. उ.(५/३/१ से ५/९/२ तक) के प्रकरण में विचार किया गया है। छा. उ. में यह विषय-प्रकरण ऋषिकुमार श्वेतकेतु और राजा प्रवाहण के बीच संवाद प्रसङ्ग का है। उसमें वर्णन मिलता है कि पाञ्चाल देश के राजा प्रवाहण ने श्रेतकेतु नामक ऋषिकुमार से पाँच प्रश्न किये, जो निम्रवत् हैं- १. यहाँ से मरकर यह जीव कहाँ जाता है? २. पुनः वहाँ से लौटकर कैसे आता है? ३. यहाँ से गये हुए लोगों से वहाँ का लोक भर क्यों नहीं जाता? ४. देवयान और पितृयान-मार्ग का क्या अन्तर है? और ५. पाँचवीं आहुति में, यह जल पुरुष रूप हो जाता है, ऐसा होने का क्या कारण है? इन पाँचों प्रश्नों का उत्तर न दे पाने के कारण श्वेतकेतु लज्जित होकर अपने पिता के पास गये और सब बातें कहने के बाद पूछे गये प्रश्न किये, पिताजी ने कहा- 'मैं स्वयं ही' इन प्रश्नों का उत्तर नहीं जानता? तत्पश्चात् पुत्र सहित वह राजा के पास पहुँचे। राजा ने ब्राह्मण को सम्मानित कर धन आदि देना चाहा, किन्तु ब्राह्मण ने दान आदि न ग्रहण कर उन्हीं पाँच प्रश्नों के उत्तर बतलाने का अनुरोध किया। राजा ने आश्वस्त कर उत्तर दिया- इस जगत् में स्वर्ग, मेघ, पृथिवी, पुरुष और स्त्री यह पाँच अग्नियाँ हैं। श्रद्धा, सोम, वृष्टि, अन्न और वीर्य- ये पाँचों उक्त अग्नियों की आहुति हैं, तदनन्तर राजा प्रवाहण उक्त प्रश्नों का समाधान करते हुए कहते हैं- स्वर्ग लोक रूपी अग्नि में श्रद्धा की प्रथम आहुति से सोम का उद्भव हुआ। पुनः मेघ रूप अग्नि में सोम की आहुति देने से वृष्टि (वर्षा) की उत्पत्ति कही गई है, तदुपरान्त पृथिवी रूपी अग्नि में वृष्टि (वर्षा) की आहुति देने से अन्न का उद्भव बतलाया है। चौथी आहुति पुरुष रूपी अग्रि में अन्न की आहुति देने से वीर्य का उद्भव कहा गया है और स्त्री रूपी पाँचवीं अग्रि में वीर्य की आहुति देने से गर्भ का उद्भव बतलाकर कहा है कि इस प्रकार से यह जल पञ्चम आहुति में 'पुरुष' संज्ञक होता है। इस तरह जन्म लेने वाला व्यक्ति जब तक आयु होती है, तभी तक वह यहाँ जीवन प्राप्त करता है। उक्त प्रकरण में जल के नाम से बीज रूप सभी तत्त्वों के समूह सूक्ष्म शरीर सहित वीर्य में अवस्थित जीव कहा गया है, इसलिए प्रश्नोत्तरपूर्वक विवेचना से यह पुष्ट होता है कि जीव जब एक देह से दूसरे देह में गमन करता है, तब बीज रूप में स्थित सभी तत्त्वों से संयुक्त होकर ही उत्क्रमण करता है॥१।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 138
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१४० वदान्त दशन
उपर्युक्त प्रकरण में एकमात्र जल का ही पुरुष रूप हो जाना कहा गया है, तब फिर उसमें समस्त सूक्ष्म तत्त्वों का भी होना किस प्रकार जाना जायेगा? यदि श्रुति को यही बतलाना आवश्यक था, तो मात्र जल का ही नाम क्यों लिया? उक्त आशंका का समाधान आचार्य अगले सूत्र में प्रस्तुत करते हैं- (२९४ ) त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ।२।। सूत्रार्थ- त्र्यात्मकत्वात् = (यह देह) तीनों तत्त्वों के सम्मिश्रण से निर्मित हुआ है, इस कारण (जल तत्त्व के कथन से अन्य सभी तत्त्वों का ग्रहण हो जाता है), तु = तथा, भूयस्त्वात् = वीर्य में जलांश के सर्वाधिक होने से भी (जल के नाम से उसका विवेचन किया गया है)। व्याख्या-जगत् की उत्पत्ति के सन्दर्भ में छान्दोग्योपनिषद् (६/३/३) में वर्णन मिलता है कि तीनों तत्त्वों के सम्मिश्रण के उपरान्त परब्रह्म ने जगत् के नाम और रूप को प्रकट किया। श्रुति में तीन तत्त्वों का वर्णन भी उपलक्षण है, उसमें सभी तत्त्वों का मिश्रण मान लेना चाहिए। वीर्य में समस्त भौतिक तत्त्वों के विद्यमान रहने के बावजूद भी जलांश अधिक रहता है। अतः जल से ही पुरुष का उद्भव करवा दिया गया, वस्तुतः शरीर के बीज भूत समस्त तत्त्वों का ग्रहण उसी के द्वारा ही हो जाता है। श्रुति में प्राण को भी जल बतलाया गया है और देह के बदलने के समय जीव का प्राण में अवस्थित होकर जाना कहा है। इस कारण भी जल का पुरुष रूप में परिवर्तित होना बतलाना उचित है। इसके अतिरिक्त स्त्री के गर्भ में जिस वीर्य को स्थापित किया जाता है, उसमें सभी तत्त्व स्थित रहते हैं; फिर भी जल की प्रचुरता होने से वहाँ उसी के नाम से उसका वर्णन किया गया है। यद्यपि श्रुति वचन देह के बीज भूत सभी तत्त्वों को लक्ष्य कराने वाला है। एक देह से दूसरे देह में गमन करते समय जीव प्राण में अवस्थित होकर जाता है और प्राण को जल रूप कहा गया है, अतः उस दृष्टि से भी वहाँ जल को ही पुरुष रूप में परिवर्तित होना बतलाना सर्वथा उचित है। इस प्रकार से सिद्ध होता है कि जीव सूक्ष्म तत्त्वों से सम्पन्न होकर ही एक देह से दूसरे देह में गमन करता है॥।२॥ अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से पुनः उक्त प्रकरण को पुष्ट करते हैं- (२९५ ) प्राणगतेश्च॥३॥ सूत्रार्थ- प्राणगते: = जीव के साथ प्राणों के गमन का विवेचन होने से, च = भी (उक्त प्रकरण पुष्ट होता है)। व्याख्या- प्राण की गति से ही जीवात्मा की गति सम्भव है, प्राण जब निकलते हैं, तभी मृत्यु होती है और जब तक प्राण उत्क्रमण नहीं करते, तब तक जीव की भी मृत्यु नहीं होती। इसका उल्लेख बृहदारण्यकोपनिषद् (४/४/२) में इस प्रकार मिलता है- जीव जब देह से बाहर उत्क्रमण करता है, तो मनुष्य का प्राण भी उसका अनुगमन करता है और उस प्राण के साथ सभी इन्द्रियाँ भी चलना शुरू कर देती हैं, ऐसा ही वर्णन प्रश्नोपनिषद् (३/१ से ३/१०) में भी प्राप्त होता है, प्रश्नोपनिषद् में आश्चलायन मुनि पिप्पलाद जी से प्राण के सन्दर्भ में प्रश्न करते हैं, उनमें से एक प्रश्न यह है कि यह (प्राण) एक देह को त्यागकर जब दूसरी देह में गमन करता है, तब पहले देह से किस तरह उत्क्रमण करता है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए पिप्पलाद जी कहते हैं- 'जब इस देह से उदान वायु उत्क्रमण करता है, तब यह देह ठण्डा पड़ जाता है, उस समय जीव मन में विलीन हुई सभी इन्द्रियों एवं उदान वायु के सहित दूसरे देह में गमन कर जाता है, उस समय जीव का जैसा संकल्प होता है, वैसे संकल्प और मन के सहित सभी इन्द्रियों के सहित यह प्राण में अवस्थित हो जाता है। वह प्राण उदान के साथ जीव को उनके संकल्प के अनुसार विभिन्न लोकों, योनियों में ले जाता है। इस प्रकार जीव के सहित प्राण और मन, इन्द्रिय आदि के गमन का उल्लेख होने से भी यह सिद्ध होता है कि बीज रूप सभी सूक्ष्म तत्त्वों
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 139
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० १ सूत्र ५ १४१
से परिवेष्टित होकर यह जीव एक देह से दूसरे देह की प्राप्ति हेतु गमन कर जाता है।।३।। अगले सूत्र में आचार्य दूसरी तरह का विरोध उपस्थित करके उसका समाधान प्रस्तुत करते हैं- (२९६ ) अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात्॥४।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहें कि, अग्न्यादिगतिश्रुतेः = अग्नि आदि में जाने (प्रवेश) की बात अन्य श्रुतियाँ भी कहती हैं, अतः (यह सिद्ध नहीं होता), इति न = तो ऐसा उचित नहीं है, भाक्तत्वात् = क्योंकि उसे श्रुतिभेद विषयक होने के कारण गौण ही समझना चाहिए। व्याख्या- यदि ऐसा कहें कि सभी तत्त्वों का विलय अपने-अपने कारण में हो जाता है, क्योंकि बृहदारण्यकोपनिषद् (३/२/१३) के मुनि आर्तभाग और याज्ञवल्क्य के संवाद के अन्तर्गत ऐसा उल्लेख मिलता है कि वाणी अग्नि में लीन हो जाती है, प्राण वायु में लीन हो जाते हैं, चक्षु आदित्य में लीन हो जाते हैं। मन चन्द्रमा में, श्रोत्र दिशाओं में, देह धरती में, आत्मा आकाश में, लोम ओषधियों में, केश वनस्पतियों में और रक्त वीर्य में लीन हो जाते हैं। यहाँ ऐसी बात नहीं है; क्योंकि श्रुति में आर्तभाग ने प्रश्न में यह बात तो कही है, किन्तु याज्ञवल्क्य ने उत्तर में इसे ग्रहण नहीं किया, वरन् अपनी गोष्ठी सभागार से बाहर आकर उसे गुप्त रूप से वही पाँच आहुतियों वाली बात प्रश्नकर्त्ता को बतलाई, ऐसा अनुमान प्रमाण से लगता है, क्योंकि तदुपरान्त श्रुति कहती है कि उन्होंने जो कुछ भी उल्लेखित किया, वह निस्संदेह कर्म का ही उल्लेख था 'मनुष्य सत्कार्यों से श्रेष्ठ और असत् कार्यों से निकृष्ट होता है।' छान्दो. में भी ऐसा ही उल्लेख मिलता है, अतः विवेचनाओं में कोई भेद नहीं है। उक्त श्रुति प्रश्न से सम्बन्धित होने से गौण है, उत्तर की बात ही उचित है। इसी कारण उत्तर गुप्त रखा गया, क्योंकि सभागार के मध्य गर्भाधान आदि का उल्लेख करना उचित नहीं था, वहाँ पर सभी बच्चे भी उपस्थित थे॥४॥ अगले सूत्र में आचार्य फिर से विरोध प्रस्तुत करके उस शंका का समाधान करते हैं- (२९७ ) प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॥।५।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहें कि, प्रथमे = प्रथम आहुति के वर्णन में, अश्रवणात् = (जल का कथन) न सुना जाने से (जल का पुरुष संज्ञक होना ठीक नहीं) तो, इति न = ऐसा नहीं है, हि= क्योंकि, उपपत्तेः = पूर्वापर प्रसङ्ग से (यही सिद्ध होता है कि); ताः एव = वहाँ 'श्रद्धा' शब्द से उस जल का ही वर्णन किया गया है। व्याख्या- यदि यह कहा जाये कि छा.उ. (५/३/१ से ५/९/२) में सर्वप्रथम श्रद्धा को हवनीय द्रव्य का रूप प्रदान किया गया है, अतः सब उसी के परिणाम हैं। ऐसी स्थिति में यह कहना कि पुरुष संज्ञक जल नहीं हो सकता, क्योंकि इन सभी का कारण श्रद्धा ही है। ऐसी आशंका करना यहाँ व्यर्थ है; क्योंकि श्रद्धा के द्वारा संकल्प में स्थित सभी सूक्ष्म तत्त्वों का ग्रहण हो जाता है और पाँचवीं आहुति के क्रम में उसी (श्रद्धा) को जल नाम से कथन किया गया है, इस कारण कोई विरोध नहीं है। यहाँ इसका अभिप्राय यह हुआ कि जीव की गति को उसके अंतिम संकल्प एवं प्राण के द्वारा होने वाली कहा गया है। श्रुति में प्राण को ही जलमय कहा गया है। अतः संकल्पानुसार जिन सूक्ष्म तत्त्वों का समूह प्राण में अवस्थित होता है, उसे ही वहाँ श्रद्धा के नाम से कहा गया है। उक्त कथन गति में संकल्प की प्रमुखता दिखलाने के लिए है। सूत्र में सर्वप्रथम जो बात श्रद्धा के नाम से बतलाई गई है, उसी को ही अन्तिम वाक्य में जल के नाम से निरूपित किया गया है। अतः पूर्व और अपर दोनों प्रसङ्गों में किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है।५॥ अगले सूत्र में आचार्य पूर्व की तरह से दूसरे विरोध का उत्थापन करके उसका निस्तारण (समाधान) प्रस्तुत करते हैं-
Disclaimer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the websle can be used for propagation with prior written consent.
Page 140
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१४२ वेदान्त दर्शन (२९८ ) अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीते: ॥६॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहें कि, अश्रुतत्वात् = श्रुति में तत्त्वों के सहित जीवात्मा के गमन का वर्णन सुना नहीं जाता, अतः (उनके सहित जीवात्मा गमन करती है, यह कहना उचित नहीं), इति न = तो ऐसा कहना ठीक नहीं है, इष्टादिकारिणाम् = क्योंकि उसी सन्दर्भ में शुभाशुभ कर्म करने वालों का वर्णन है, प्रतीते: - इसलिए इस श्रुति में उस शुभ-अशुभकारी जीवात्माओं के उल्लेख की प्रतीति स्पष्ट है, अतः उक्त विरोध यहाँ उचित नहीं है। व्याख्या- यदि यह कहें कि उक्त प्रकरण में जीवात्मा उन तत्त्वों को अपने साथ लेकर देह त्यागने के बाद गमन करता है, तो ऐसा उस प्रकरण में नहीं कहा गया है। वहाँ तो मात्र जल के नाम से तत्त्वों का ही पुरुष रूप में परिणत हो जाना कहा गया है। अतः यह कहना उचित नहीं है, कि तत्त्वों से संयुक्त होकर जीव एक देह से दूसरे देह में गमन करता है, क्योंकि उसी प्रकरण (छा.उ. ५/१०/७) में बताया गया है- जो शुभ-श्रेष्ठ कर्म करने वाले होते हैं, वे श्रेष्ठ योनि को पाते हैं और जो निम्न-अशुभ कर्म करने वाले होते हैं, वे निम्न (अधम) योनि को प्राप्त करते हैं। यहाँ इस वर्णन से शुभाशुभ कर्म करने वाले जीवों का उन तत्त्वों के सहित एक देह से दूसरे देह को गमन करना प्रमाणित होता है, अतः यहाँ किसी भी प्रकार का कोई भेद (विरोध) नहीं है, सभी तत्त्वों के सहित जीवात्मा को स्व-स्व कर्मानुसार ही एक देह से देहान्तर में गमन करना होता है।६॥ अब जिज्ञासा यह उठती है कि बृ.उ. ६/२/१६ में शुभाशुभ आदि कर्म करने वाले लोगों को धूममार्ग से स्वर्गलोक में पहुँचने पर उसे 'देवों का अन्न' कहा गया है, देवगण उसका भक्षण करते हैं, ऐसी स्थिति में उन्हें कर्मफल भोग की प्राप्ति होती है, यह कैसे कहा जा सकता है? अगले सूत्र में इसी का समाधान प्रस्तुत किया जा रहा है- (२९९ ) भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात्तथा हि दर्शयति॥७॥। सूत्रार्थ- अनात्मवित्त्वात् = आत्मज्ञानी न होने के कारण, वा = ही, भाक्तम् = उन्हें देवों का अन्न बतलाने वाली श्रुति गौण है (अर्थात् देवों का उपकरण-भोज्य बताना उचित नहीं), हि = क्योंकि, तथा = उस (उक्त) प्रकरण से भी, दर्शयति = श्रुति दर्शन कराती है। व्याख्या- सकाम भावना से श्रेष्ठ कर्म करने वाले मनुष्य आत्मज्ञानी नहीं होते। इसलिए आत्मज्ञान की प्रार्थना करने हेतु गौण रूप से उन्हें देवों का अन्न एवं देवों के द्वारा उनका भक्षण करना कहा गया है, यद्यपि छा.उ. ३/६/१ में श्रुति कहती है कि देवगण न खाते हैं और न कुछ पान ही करते हैं, इस अमृत को देखने मात्र से ही तृप्त हो जाते हैं। उक्त उदाहरण से श्रुति का गौण भाव स्पष्ट है। उन श्रेष्ठ मनुष्यों को देवों का भोजन न मानकर मात्र सेवक ही मानना चाहिए। ऐसे ही भाव बृ.उ. १/४/१० में भी देखने को मिलते हैं- 'जो उस परब्रह्म को न जानकर दूसरे इतर देवों की उपासना में लगा रहता है, वह जैसे यहाँ लोगों के घरों में पशु होते हैं, उसी तरह ही वह देवों का पशु होता है, आत्मज्ञान की स्तुति हेतु ऐसा कहना सर्वथा उचित ही है।' इसके अतिरिक्त वे शुभ कर्म करने वाले लोग देवों के साथ आनन्द का भोग करते हैं, इसका वर्णन बृह.उ. ४/३/३३ में इस प्रकार किया गया है-'पितृलोक पर विजय प्राप्त करने वालों की अपेक्षा सैकड़ों गुना आनन्द कर्मों से देवभाव को पाने वालों को होता है।'उक्त श्रुति वचनों से यह प्रमाणित होता है कि उनको देवों का अन्न कहा जाना वहाँ गौण रूप से है, यथार्थतः वहाँ जाकर वे अपने कर्मों का ही फल भोगते हैं और पुनः वहाँ से वापस लौट आते हैं, अतः जीव का एक शरीर से दूसरे शरीर में सूक्ष्म तत्त्वों के साथ जाना सर्वथा उचित है; क्योंकि इसमें किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है।।।। उपर्युक्त कथन में वर्णन आया है कि 'जब तक प्राणी के कर्मों का क्षय नहीं हो जाता, तब तक प्राणी (जीव) वहीं विद्यमान रहता है और पुनः वहाँ से इस लोक में वापस आ जाता है। अब जिज्ञासा होती है कि उसके समस्त कर्म पूर्ण
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 141
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० १ सूत्र १० १४३ रूपेण समाप्त हो जाते हैं या कुछ कर्म शेष रहते हैं, जिन्हें साथ लेकर वह वापस होता है।' अगले सूत्र में आचार्य ने इसी का समाधान किया है- (३००) कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवं च॥८ ॥ सूत्रार्थ- कृतात्यये = किये गये शुभ कर्मों के क्षीण होने पर, अनुशयवान् = शेष कर्म संस्कारों से सम्पन्न जीव, यथेतम् = जिस मार्ग से गया था उसी से, च = अथवा, अनेवम् = इससे पृथक् किसी दूसरे मार्ग से वापस होता है, दृष्टस्मृतिभ्याम् = श्रुति-स्मृतियों में भी ऐसा देखा जाता है। व्याख्या- जीव (प्राणी) अपने द्वारा किये गये श्रेष्ठ कर्मों के पूर्णरूपेण क्षीण (समाप्त) हो जाने के उपरान्त वह स्वर्ग में स्थित जीवात्मा अनुशय अर्थात् शेष कर्म-संस्कारों से सम्पन्न होकर जिस मार्ग से गमन किया था, उसी मार्ग से या फिर किसी अन्य मार्ग से पुनः संसार में वापस आ जाता है। उसी अनुशय के भेद द्वारा ही जगत् में उसे विभिन्न योनियाँ प्राप्त होती हैं। श्रेष्ठ-पुण्य कर्म होने से श्रेष्ठ योनि और बुरे-अशुभ कर्म होने से निकृष्ट योनि का प्राप्त होना निश्चित मानना चाहिए। ऐसा ही वर्णन छा. उ. के ५/१०/७ में इस प्रकार से मिलता है-श्रेष्ठ-शुभ आचरण वाले श्रेष्ठ योनि को और बुरे-निकृष्ट आचरण वाले (प्राणी) बुरी योनियों को प्राप्त करते हैं। यहाँ इस उद्धरण से यही स्पष्ट होता है और श्रुति-स्मृति आदि में भी जो यह वर्णन मिलता है कि जो वर्णाश्रमी मनुष्य अपने कर्मों में प्रतिष्ठित रहने वाले हैं, वे यहाँ से श्रेष्ठ-उत्कृष्ट स्वर्गादि लोकों में गमन कर वहाँ अच्छे-बुरे कर्मों का फल उपभोग कर अवशेष कर्मों के अनुसार श्रेष्ठ जन्म, कुल, रूप आदि को प्राप्त करते हैं। यही तथ्य गौतम स्मृति के अध्याय ११ के प्रथम सूत्र में भी स्पष्ट किया गया है। अतः प्राणी अपने-अपने कर्मानुसार फल उपभोग के पश्चात् पुनः संसार में अपने अवशेष कर्मों के सहित जन्म ग्रहण करते हैं।।८ ।। अगले सूत्र में सूत्रकार प्रकारान्तर से विरोध का उत्थापन करके उसका निदान प्रस्तुत करते हैं- (३०१ ) चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनि: ।।९।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि ऐसा कहा जाय कि, चरणात् = चरण शब्द के प्रयोग से (शेष कर्म संस्कारों के सहित वापस आने की बात उचित नहीं है), इति न = तो ऐसी बात नहीं है, उपलक्षणार्थ = क्योंकि वह कथन अनुशय (शेष कर्म संस्कारों) के उपलक्षण के निमित्त है, इति = ऐसा कथन, कार्ष्णाजिनिः = आचार्य 'कार्ष्णाजिनि' का है, अतः कोई विरोध नहीं है। व्याख्या- उक्त जिज्ञासा का समाधान सूत्रकार अपनी तरफ से न करके आचार्य कार्ष्णाजिनि का कथन प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि छा.उ. ५/१०/ में वर्णित 'तद्य इह रमणीयचरणाः ..... श्रुति में" 'चरण' शब्द प्रयुक्त हुआ है, वह कर्म संस्कार के निमित्त प्रयोग में नहीं आता है। अतः इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि स्वर्गलोक से वापस लौटते समय अनुशय सहित अर्थात् भोगने से बचे (अवशेष) कर्म-संस्कारों के साथ ही लौटता है, तो यहाँ यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि वहाँ जो 'चरण' शब्द आया है, वह अनुशय (शेष कर्म संस्कार) का उपलक्षण कराने वाला है अर्थात् यह प्रकट करता है कि प्राणी-जीवात्मा भोगने से बचे अवशेष कर्म-संस्कारों सहित ही वापस आता है। अतः आचार्य कार्ष्णाजिनि के कथनानुसार यहाँ कोई दोष नहीं है। यहाँ चरण (आचरण) और अनुशय (शेष कर्म संस्कार) दोनों एक ही अर्थ के बोधक हैं, यही मानना चाहिए।।९ ।। अगले सूत्र में आचार्य उपर्युक्त प्रकरण में पुनः जिज्ञासा प्रकट कर उसका समाधन दे रहे हैं- (३०२ ) आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॥१०॥ सूत्रार्थ-चेत् = यदि यह कहो कि, आनर्थक्यम् = (बिना किसी कारण के उपलक्षण के रूप में यहाँ पर चरण शब्द प्रयोग) सार्थक नहीं है, इति न = तो ऐसा कहना ठीक नहीं है,
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 142
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१४४ वदान्त दशन तदपेक्षत्वात् = क्योंकि कर्म आचरण से ही अपेक्षित है। व्याख्या- आचार्य कहते हैं कि यदि यह कहो कि यहाँ 'चरण' शब्द को बिना किसी कारण के कर्म संस्कार का उपलक्षण स्वीकार कर लेना सार्थक नहीं है, अतः उपर्युक्त समाधान यहाँ उचित नहीं है, सो ऐसी बात नहीं है। उपर्युक्त समाधान सर्वथा उचित है; क्योंकि कर्म संस्कार रूप अनुशय (भुक्त अवशेष कर्म) पूर्वकृत शुभाशुभ आचरणों से ही विनिर्मित होते हैं। इसलिए कर्माशय के लिए आचरण आवश्यक है। अतः यहाँ 'चरण' शब्द का प्रयोग सार्थक है, निरर्थक नहीं है। कर्म से आचरण अपेक्षणीय है। सूत्रान्तर्गत 'तद्- अपेक्षत्वात्' में 'तत्' पद 'चरण' का परामर्श करता है। पूर्व सूत्र में 'अनुशय' को जन्म का कारण बतलाने पर छा.उ. ५/१०/७ में 'चरण' को जन्म का कारण कहना अनुचित नहीं है; क्योंकि अनुशय आचरण की अपेक्षा करता है। आचरण या कर्मानुष्ठान दोनों एक ही हैं। 'अनुशय' अदृष्ट (धर्माधर्म) और अवशेष कर्म संस्कारों का नाम है। आचरण के अभाव में अनुशय का होना असंभव है। शुभाशुभ कर्मानुष्ठान से धर्माधर्म रूप अनुशय निर्मित होता है। अतः अनुशय को जन्म का कारण बतलाने पर आचरण को कारण बतलाना सार्थक है। आत्मा के देह संयोग रूपी जन्म के समय यद्यपि अनुशय का अस्तित्व है, आचरण का नहीं; लेकिन आचरण के अभाव में अनुशय निर्मित नहीं हो सकता। अतः छा.उ. में जन्म के कारण रूप से 'चरण' का निर्देशन सार्थक ही है, निरर्थक नहीं ॥१०॥ अगले सूत्र में सूत्रकार उक्त विषय के सन्दर्भ में समाधान हेतु आचार्य बादरि का मत प्रस्तुत करते हैं- (३०३ ) सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरि: ॥१ १ ।। सूत्रार्थ-बादरि: = आचार्य बादरि, तु = तो, इति = ऐसा (कहते हैं कि), सुकृतदुष्कृते = यहाँ इस प्रकरण में शुभ और अशुभ कर्म, एव = ही 'चरण' के नाम से संबोधित किये गये हैं। व्याख्या-आचार्य बादरि का कथन है कि यहाँ वर्णित 'चरण' शब्द सुकृत एवं दुष्कृत-इन दोनों के लिए प्रयुक्त किया गया है। आचार्य कहते हैं कि यहाँ उपलक्षण मानने की कोई जरूरत नहीं है। गत सूत्र में प्रयुक्त 'रमणीय चरण' शब्द पुण्य कर्मों और 'कपूयचरण' शब्द पाप कर्मवाची है। अतः यहाँ यही मानना चाहिए कि जो रमणीय चरण हैं, वे शुभ कर्माशय वाले हैं तथा जो कपूयचरण हैं, वे पाप कर्माशय वाले हैं, इससे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा (प्राणी) अवशेष कर्म संस्कारों को साथ लिए हुए ही वापस लौटता है। लौकिक एवं वैदिक सभी तरह के कर्म जीवात्मा में जो संस्कार अथवा धर्माधर्म की स्थिति को विनिर्मित करते हैं, वे ही अगला जन्म ग्रहण करने के निमित्त बनते हैं। 'चरण' पद से इन सभी की अभिव्यक्ति होती है॥११॥ अगले सूत्र में शिष्य पुनः जिज्ञासा प्रकट करता है- ( २०४ ) अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॥१२॥ सूत्रार्थ- च = किन्तु (और), अनिष्टादिकारिणाम् = अनिष्ट अर्थात् बुरे-अशुभ आदि कर्म करने वाले लोगों का, अपि = भी (चन्द्रलोक में गमन करना), श्रुतम् = श्रुति में सुना जाता है। व्याख्या- जिज्ञासु आशंका व्यक्त करते हुए कहता है कि श्रुति में अनिष्टादि कर्म करने वालों का भी चन्द्रलोक में गमन करने का वर्णन प्रायः सुना जाता है। कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् के प्रथम अध्याय के द्वितीय मंत्र में स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार मिलता है- 'ये वैके चास्माल्लोकात् प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति' (कौ.ब्रा. उ.१/२) अर्थात् जो भी कोई प्राणी इस लोक से गमन करते हैं, वे सभी चन्द्र को ही प्राप्त करते हैं। इस तरह से यहाँ उक्त प्रकरण में कोई विशेषण न प्रदान कर सभी का चन्द्रलोक में जाना बतलाया गया है। इससे तो अशुभ कर्म करने वाले प्राणियों का भी स्वर्ग लोक में गमन करना सिद्ध होता है। अतः श्रुति में जो
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 143
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० १ सूत्र १४ १४५ यह वर्णन मिलता है कि इष्टापूर्त और दान आदि श्रेष्ठ कर्म करने वाले धूम-मार्ग से चन्द्रलोक में गमन करते हैं, उसके साथ उक्त श्रुति का विरोध प्रतीत होता है; अतः उसका निस्तारण फिर किस प्रकार होगा? इसी जिज्ञासा का समाधान अगले सूत्र में आचार्य करते हैं।।१२।। उपर्युक्त सूत्र में व्यक्त की गई जिज्ञासा का समाधान आचार्य अगले सूत्र में करते हैं- (३०५) संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गतिदर्शनात्॥१३।। सूत्रार्थ-तु= तो (किन्तु), इतरेषाम् = शुभ कर्मियों से इतर-दूसरे अर्थात् पापकर्म में रत रहने वालों का, संयमने = यमलोक में, अनुभूय = पाप कर्मों का फल भोग लेने के उपरान्त, आरोहावरोहौ = चढ़ना और उतरना होता है, तद्गतिदर्शनात् = क्योंकि उनकी गति श्रुति में वैसी ही देखी जाती है। व्याख्या- उक्त प्रकरण में पापकर्म में सन्नद्ध लोगों का चन्द्रलोक में गमन करना नहीं बतलाया गया है; क्योंकि श्रेष्ठ-शुभकर्मों के फलोपभोग हेतु ही स्वर्गलोक में प्राणी को गमन करना होता है। चन्द्रलोक में अशुभकर्मों के फलोपभोग की व्यवस्था नहीं होती; अतः यही मानना चाहिए कि श्रेष्ठ कर्म में रत-संलग्न लोग ही चन्द्रलोक में जाते हैं। उनसे भिन्न असत् कर्म में संलग्न जो पापी जन हैं, वे अपने असत् कर्मों के फलोपभोग हेतु यमलोक (नरक) में जाते हैं, वहाँ असत् कर्मों का फल भोगने के उपरान्त पुनः उनका निजकृत कर्मानुसार आना-जाना अर्थात् नरक से मृत्युलोक में आना और पुनः नवीन कर्मों के अनुसार स्वर्ग या नरक में जाना अर्थात् ऊर्ध्व या अधोगति को प्राप्त होना रहता है। उक्त लोगों की गति का ऐसा ही उल्लेख कठ.उ. १/२/६ में यमराज द्वारा इस प्रकार मिलता है- 'न साम्परायः ....... पुनर्वशमापद्यते मे' अर्थात् सम्पत्ति के अभिमान से आसक्त हुए सतत प्रमाद में रत अज्ञानी को परलोक नहीं दिखाई पड़ता। वह मानता है कि यह प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला लोक ही सत्य है, इतर अन्य कोई लोक नहीं, अतः ऐसा मानने वाला प्राणी (जीवात्मा) बारम्बार मेरे वशीभूत होता है। इस श्रुति प्रमाण से यही पुष्ट होता है कि श्रेष्ठ कर्म कर्त्ता ही पितृयान मार्ग से या फिर अन्य किसी मार्ग से स्वर्गलोक में जाता है और पापकर्म करने वाले प्राणी यमलोक (नरक) में जाते हैं। कौ.ब्रा.उ.१/२ में जिनके चन्द्रलोक में गमन के लिए कहा गया है, वे सभी श्रेष्ठ-शुभकर्म करने वाले लोग ही हैं; क्योंकि उक्त श्रुति में चन्द्रलोक से वापस आने की गति कर्म के अनुसार ही कही गई है। अतः उक्त दोनों श्रुतियों में किसी भी तरह का विरोधाभास नहीं है॥१३॥ उक्त तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट करने हेतु सूत्रकार अगले सूत्र में स्मृति का प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं- (३०६ ) स्मरन्ति च ॥१४॥ सूत्रार्थ- च = और, स्मरन्ति = स्मृतियों में भी उक्त तथ्य का समर्थन किया गया है। व्याख्या- स्मृतियाँ भी असत् कर्म करने वालों के लिए फल भोगने की व्यवस्था यमसदन में ही बतलाती हैं। म.स्मृ. के बारहवें अध्याय के शुरू के इक्यासी शरोकों में भिन्न-भिन्न पाप गतियों का संक्षिप् उल्लेख मिलता है। उसके बाद उन कर्मों का वर्णन है, जो अभ्युदय और निःश्रेयस के साधन हैं। ऐसे श्रेष्ठ कर्मों के ज्ञान व अनुष्ठान हेतु वेद को वहाँ श्रेष्ठतम प्रमाण कहा गया है। अतः अभ्युदय आदि की प्राप्ति हेतु शास्त्र वर्णित मार्ग का अनुगमन सर्वोत्तम है। जो उस मार्ग का अनुगमन नहीं करते, वे अन्धकारमय योनियों में दुःख भोगते हैं। इसी प्रकार से श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १६ के ७ से १५ तक के श्लोकों में आसुरी स्वभाव वाले पापियों के लक्षणों का विस्तृत वर्णन करने के उपरान्त गीताकार १६ वें श्लोक में स्पष्ट करते हैं- 'वे पापी (जीवात्माएँ) विभिन्न तरह के विचारों से भ्रमित हुए मोह रूपी जाल में आबद्ध हुए एवं भोगों के उपभोग में रत हुए मूढ़जन कुम्भीपाक आदि अशुभ नरकों में गिरते हैं।' इस तरह से स्मृतियों के उल्लेख से भी उक्त तथ्य का
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this webslte is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 144
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१४६ वेदान्त दर्शन समर्थन प्राप्त होता है, अतः पापी (जीवात्माओं) प्राणियों का नरक में गमन होता है, स्वर्ग में नहीं, यही मानना उचित है॥१४॥ अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से उक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करते हैं- (३०७) अपि च सप्त ।।१५।। सूत्रार्थ- च = और (इसके अतिरिक्त), सप्त = पापकर्मों का फल भोगने के लिए प्रमुख रूप से सात प्रकार के नरकों का, अपि = भी वर्णन मिलता है। व्याख्या- उपर्युक्त सूत्र में व्यक्त किये गये प्रतिपादनों के अतिरिक्त पापकर्मों का फलोपभोग के लिए पौराणिक साहित्य में प्रमुख रूप से रौरव आदि सात प्रकार के नरकों का वर्णन मिलता है। ये नरक निम्नवत् हैं- रौरव, महारौरव, वह्नि, वैतरणी, कुम्भीपाक। ये पाँच नरक अनित्य नामक नरक के नाम से जाने जाते हैं और तामिस्र, अन्धतामिस्र नामक दो नित्य नरक कहलाते हैं। इनमें से अन्धतामिस्त्र नरक तामिस्र नरक से अधिक यातना वाला कहा गया है। इस प्रकार पापियों के फल भोगने के लिए इन्हीं सात प्रकार के नरकों का उल्लेख प्राप्त होता है। इस प्रकार पाप कर्मियों के स्वर्ग गमन की सम्भावना नहीं ही की जानी चाहिए॥१५॥ नरकों में चित्रगुप्त आदि अन्य अधिकारी कहे गये हैं, तब फिर पापी लोग यमराज के अधिकार में दण्ड के भागी होते हैं, यह कैसे? अगले सूत्र में इसी का समाधान किया जा रहा है- (३०८ ) तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॥१६।। सूत्रार्थ- च = और, तत्र = उन यातनास्थलों (नरकों) में, अपि = भी, तद्व्यापारात् = उस यमराज के अनुकूल, आज्ञानुसार कार्य होने से, अविरोध: = किसी भी तरह का विरोध नहीं है। व्याख्या-कर्मफल के अन्तर्गत यातना-कष्ट भोगने के लिए जो रौरव आदि सप्त नरक उक्त सूत्र में कहे गये हैं और उन नरकों के चित्रगुप्त आदि अन्य अधिकारी निवास करते हैं, वे सभी यमराज के अनुकूल, आज्ञानुसार ही सभी कार्य करते हैं। इसलिए उन अधिकारियों के द्वारा किये गये कार्य भी यमराज के ही कार्य हैं। अतः यमराज के अधिकार में पापी प्राणियों के दण्ड भोगने हेतु जो भी बात कही गयी है, उसमें किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है॥१६।। इष्ट (यज्ञ) आदि शुभ कर्म न करने वाले लोग चन्द्रलोक को प्राप्त नहीं होते? अगले सूत्र में आचार्य इसी विषय की अन्य प्रकार से सिद्धि बतलाते हैं- (३०९ ) विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥१७॥ सूत्रार्थ- विद्याकर्मणो: = विद्या और शुभ कर्म-इन दोनों का, तु = तो ही, प्रकृतत्वात् = प्रकरण होने से, इति = ऐसा कहना ही उचित है। व्याख्या- सूत्र में वर्णित 'विद्या' पद का अभिप्राय 'उपासना' है तथा इष्ट-यज्ञ आदि के लिए 'कर्म' पद का प्रयोग किया गया है। विद्या और श्रेष्ठ कर्म का जो लोग अनुष्ठान करते हैं, उनकी गति के दो मार्ग-देवयान और पितृयान श्रुति में कहे गये हैं। जिस तरह छान्दोग्योपनिषद् ५/१०/१ में विद्या और श्रेष्ठ कर्मों का फल बतलाने का प्रसङ्ग शुरू करके देवयान और पितृयान मार्ग का कथन किया गया है, उसी तरह से कौषीतकि ब्रा.उ. में भी विद्या (ज्ञान) एवं शुभ कर्मों का फल बतलाने के प्रकरण में ही उपर्युक्त कथन कहा गया है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो श्रेष्ठ कर्म करने वाले सत्पात्र अधिकारी जीव इस लोक से गमन करते हैं, वे सभी प्राणी चन्द्रलोक गमन के लिए ही अधिकृत होते हैं, असत् कर्म करने वाले नहीं; क्योंकि श्रुति में कहीं पर भी उनका उल्लेख नहीं प्राप्त होता है। अतः श्रेष्ठ कर्मा ही चन्द्रलोक गमन के अधिकारी हैं, असत्कर्मा नहीं ॥१७॥ अब आशङ्का यह होती है कि कठ. उप. में जो पापियों के लिए यमलोक गमन की बात बतलायी गई है, वह
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 145
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० १ सूत्र २० १४७ छा.उ. में वर्णित तृतीय गति के अन्तर्गत है या फिर उससे पृथक्? इसी का समाधान यहाँ प्रस्तुत है- (३१० ) न तृतीये तथोपलब्धे: ॥।१८।। सूत्रार्थ- तृतीये = वहाँ वर्णित तृतीय गति में, न = (यमलोक गमन वाली गति का) अन्तर्भाव नहीं होता; तथा उपलब्धे: - क्योंकि उस उपलब्धि में ऐसा ही वर्णन मिलता है। व्याख्या- विद्या एवं श्रेष्ठ कर्म करने वाले सत्पात्र लोगों के अलावा तीसरी श्रेणी के प्राणी अर्थात् असत् कर्म करने वालों के लिए अन्य किसी भी गति का नियम नहीं है। छान्दोग्योपनिषद् ५/१०/८ में यह वर्णन मिलता है- 'अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व प्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम्' अर्थात् देवयान और पितृयान मार्गों में से किसी भी मार्ग द्वारा जो ऊर्ध्व के लोकों में गमन नहीं करते, वे क्षुद्र व बारम्बार जन्म लेने व मरने वाले जीव होते हैं, बार-बार 'उत्पन्न होओ और मृत्यु को प्राप्त होओ'- यह मृत्युलोक ही उन प्राणियों का तृतीय स्थान है। इस वर्णन से यहाँ यह स्पष्ट होता है कि उनका किसी भी परलोक में गमन नहीं होता, वे इसी मृत्युलोक में ही बारम्बार जन्मते व मरते रहते हैं। तृतीय स्थान वाले प्राणी स्वर्ग में गमन नहीं करते। अतः इस तीसरी गति में यम-यातना रूपी नरकलोक वाली गति का अन्तर्भाव नहीं है। इस उक्त विवरण से यह सिद्ध हो जाता है कि असत्कर्मा पापियों के लिए चन्द्रलोक में गमन करना असंभव है।।२८ ।। उपर्युक्त तीन गतियों के अतिरिक्त चौथी गति, जिसके अन्तर्गत नरक यातना आदि का भोग भोगना पड़ता है और जो ऊपर वर्णित तीसरी गति से भी अधम गति कहलाती है, उस गति का उल्लेख कहाँ मिलता है? इसी का समाधान आचार्य अगले सूत्र में करते हैं- (३१० ) स्मर्यतेऽ्रपि च लोके ॥१९॥। सूत्रार्थ-लोके-लोक में, च= और, स्मर्यते = स्मृतियों में, अपि=भी उक्त तथ्यों का ही समर्थन किया गया है। व्याख्या- पापी प्राणियों के निमित्त यम की दण्ड-व्यवस्था लोक समाज में कही जाती है, इसके साथ ही श्रुति-स्मृतियों में भी इसका उल्लेख मिलता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १४ के १६ वें शोक में इसका वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'सतोगुण में स्थित रहकर मृत्यु को प्राप्त होने वाले लोग ऊर्ध्व अर्थात् स्वर्गादि लोकों में गमन करते हैं। देवयान और पितृयान-ये दोनों मार्ग इसी में आते हैं। रजोगुण से युक्त प्राणी मध्य में अर्थात् मनुष्य लोक में जन्मते और मरते हैं, (यही बात छा.उ.५/१०/८ में कही हुई तृतीय गति के अन्तर्गत आयी है।)' तमोगुण की वृत्ति से आवृत जीव नीचे के लोकों में जाते हैं। उक्त सूत्र में वर्णित तृतीय गति से जाने वाले अधम इस यम-यातना रूप गति को प्राप्त होते हैं। इसको गीता के अध्याय १६ के बीसवें श्लोक में इस तरह वर्णित किया गया है- 'हे अर्जुन! वे अज्ञानी मुझे न प्राप्त कर प्रत्येक जन्म में आसुरी योनि को पाते हैं; पुनः उससे भी अति निम्न गति अर्थात् घोर नारकीय यातनाओं में गिरते हैं।' इस तरह से यम यातनारूप अधोगति का उल्लेख स्मृति ग्रन्थों में मिलता है और यही मत लोक में भी प्रचलित है। पौराणिक उपाख्यानों में भी इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। इसे ही अधोगति कहा गया है, अतः वहाँ से जो नारकीय प्राणियों का पुनः मृत्युलोक में आना है, वह पूर्वकथनानुसार ऊपर उठना है और पुनः नरक में जाना ही नीचे पतित होनना है। जघन्य पापी जीव इन्हीं नारकीय लोकों को प्राप्त होते हैं॥१९॥ अगले सूत्र में आचार्य एक अन्य प्रमाण देकर पुनः उक्त तथ्य का प्रतिपादन करते हैं- ( ३१२ ) दर्शनाच्च ॥२० ॥ सूत्रार्थ- दर्शनात् = श्रुति में भी ऐसा ही उल्लेख देखने को मिलता है, च = इसलिए भी (यह मान्यता उचित है कि उक्त प्रकरण में कही हुई तीसरी गति में यम-यातना का अन्तर्भाव नहीं है।)
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 146
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१४८ वेदान्त दर्शन व्याख्या- श्रुतियों के अन्तर्गत भी प्राणी की अधम गति का उल्लेख प्राप्त होता है। ईशावास्योपनिषद्-३ के अनुसार- 'जो असुरों के प्रख्यात् लोक हैं, वे सभी अज्ञान एवं दुःख-क्लेश रूप महान् अन्धकार से आवृत हैं, जो भी कोई अपनी आत्मा की हत्या करने वाले प्राणी हैं, वे मरने के उपरान्त उन्हीं भयानक लोकों को बारम्बार प्राप्त करते हैं।' इसी प्रकार अन्य उपनिषदों में भी उन नरकादि लोकों की प्राप्ति रूप गति का उल्लेख किया गया है। इस कारण भी यही प्रमाणित होता है कि उक्त सूत्र में व्यक्त की गई तीसरी गति में यम-यातना रूप गति का अन्तर्भाव नहीं है॥२०॥ अब आशङ्का यह होती है कि छा.उ.६/३/१ में भूतों की तीन श्रेणियाँ-अण्डज (अण्डे से उत्पन्न), जरायुज (जेर से उत्पन्न) और उद्धिज्ज (धरती फोड़कर उत्पन्न होने वाले) कही गयी है; किन्तु अन्यन्र इनके चार भेद सुने जाते हैं। यहाँ चौथी स्वेदज (पसीने से उत्पन्न होने वाली श्रेणी) को क्यों नहीं कहा गया? अगले सूत्र में इसी का समाधान आचार्य दे रहे हैं- (३१३ ) तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ।२१।। सूत्रार्थ- तृतीयशब्दावरोध: = तृतीय शब्द से अर्थात् तीसरे नाम वाली उद्भिज्ज जाति में संग्रह, संशोकजस्य = पसीने से उत्पन्न होने वाले (स्वेदज) भूतों-प्राणियों का (मानना चाहिए)। व्याख्या-छा.उ. ६/३/१ में प्राणियों के तीन ही बीज-मौलिक वर्गों-अण्डज, जरायुज एवं उद्भिज्ज का उल्लेख प्राप्त होता है, किन्तु यहाँ स्वेदज अर्थात् पसीने से उत्पन्न होने वाले प्राणियों का वर्णन नहीं हुआ। सूत्रकार इसी का समाधान करते हुए कहते हैं कि यहाँ के तृतीय शब्द-उद्भिज्ज से ही स्वेदज का संग्रह हो जाता है। यह पद दोनों वर्गों का बोधक है, उसी एक समानता के आधार पर जिसको ऊपर कहा गया है। ये दोनों वर्ग सामान्यतः अयोनिज होते हैं। स्वेदज का यहाँ पर (श्रुति में) तृतीय नाम से कही हुई उद्भिज्ज जाति में अन्तर्भाव मानना चाहिए; क्योंकि उद्भिज्ज और स्वेदज-ये दोनों ही पृथिवी और जल के संयोग से प्रादुर्भूत होते हैं। यद्यपि अन्यत्र श्रुतियों में चारों श्रेणियों का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। ऐतरेयोपनिषद् ३/३ में इसका इस प्रकार वर्णन किया गया है- 'बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चत्र .... ।' इसके अतिरिक्त यहाँ सूत्र में आया 'संशोकजस्य' पद स्वेदज का बोधक है। पसीने से प्रकट होने से स्वेदज कहा गया है। ये दोनों पृथिवी और जल के संयोग से प्रकट होते हैं। इस प्रकार इन दोनों में पूर्ण रूपेण समानता है। उद्भिज्ज को स्थावर एवं स्वेदज को जंगम भी कहा जाता है॥२१।। अब स्वर्गलोक से पुनः वापस आने की गति पर चिन्तन करने के लिए आगे का प्रकरण शुरू करते हैं। छा.उ.५/१०/५,६ में वर्णन मिलता है कि स्वर्ग से वापस लौटने वाले प्राणी सर्वप्रथम आकाश को पाते हैं, आकाश से वायु, धूम, मेघ आदि के क्रम से उद्भूत होते हैं। अब यहाँ आशङ्का यह होती है कि प्राणी उन-उन आकाशादि के रूप में स्वयं परिणत होते हैं या फिर उनेके सदृश हो जाते हैं? इसी विषय का समाधान यहाँ प्रस्तुत है- (३१४ ) तत्साभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॥२२।। सूत्रार्थ- तत्साभाव्यापत्ति: = उनके सदृश भाव (दशा) की प्राप्ति होती है, उपपत्तेः = क्योंकि यही बात युक्तिसंगत है। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् ५/१०/६ में प्राणी (जीवात्मा) को जो आकाश, वायु आदि बनकर पुनः वापस लौटने का प्रकरण आया है, इससे जीवात्मा का उन-उन तत्त्वों के रूप में परिणत होना युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि आकाशादि पूर्व से स्थित हैं तथा जीवात्मा जब एक के पश्चात् दूसरे भाव (स्थिति) को प्राप्त हो जाते हैं, तब उसके उपरान्त भी वे आकाशादि पदार्थ रहते ही हैं। अतः यही मानना न्यायोचित है कि वे उन आकाशादि
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 147
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० १ सूत्र २५ १४९ पदार्थों के सदृश बनकर वापस लौटते हैं। उनका आकाश के सदृश सूक्ष्मवत् हो जाना ही आकाश को प्राप्त करना है। ऐसे ही वायु आदि पदार्थों के सन्दर्भ में भी मान लेना चाहिए।२२।। अब आशङ्का यह होती है कि वे प्राणी उन-उन तत्त्वों के आकार में ज्यादा समय तक विद्यमान रहते हैं अथवा तक्क्षण ही क्रमिक गति से नीचे उतरते जाते हैं? इसी का समाधान अगले सूत्र में आचार्य कर रहे हैं- (३१५) नातिचिरेण विशेषात् ॥२३।। सूत्रार्थ-विशेषात् = ऊपर जाने की अपेक्षा नीचे उतरने की दशा में भेद होने से, नातिचरेण = जीवात्मा उन आकाशादि के रूप में दीर्घकाल तक ऊपर न रहकर क्रमशः नीचे उतर आते हैं। व्याख्या- स्वर्गादि ऊपर के लोक में जाने का जो उल्लेख मिलता है, वह कर्मों के फलोपभोग से सम्बन्धित है। अतः मध्य में आये हुए पितर आदि लोकों में विलम्ब होना भी स्वाभाविक है,किन्तु पुनः वापस लौटते समय कर्म भोग तो समाप्त ही हो जाते हैं। इसलिए मध्य (बीच) में कहीं पर विलम्ब होने का कारण नहीं रहता। इसके अतिरिक्त ऊपर जाने में गति का अवरोध रहने के कारण विलम्ब हो सकता है; परन्तु नीचे आने में गति की विशेषता से यही सिद्ध होता है कि लौटते समय मार्ग में विलम्ब नहीं होता॥।२३।। अब आशङ्का यह उठती है कि परलोक से वापस आने वाले उस प्राणी का जो जौ, तिल, धान एवं उड़द आदि के रूप में होना कहा गया है, यहाँ इसका क्या अभिप्राय है? क्या वह (प्राणी) स्वयं तदनुरूप हो जाता है या फिर उस योनि का उपभोग करने वाला कोई अन्य प्राणी होता है, जिसके साथ में यह प्राणी भी बना रहता है? इसी का समाधान यहाँ प्रस्तुत सूत्र में किया जा रहा है- ( ३१६ ) अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात्॥२४।। सूत्रार्थ- पूर्ववत् = पूर्व की ही भाँति, अभिलापात् = यह कथन कहा गया है इसलिए, अन्याधिष्ठितेषु = अन्य प्राणी अपने कर्मफल उपभोग के लिए जिन जौ, धान आदि में स्थित हैं; उनमें केवल सन्निधिमात्र से जीवात्मा (प्राणी) का निवास है। व्याख्या- जिस प्रकार से पूर्व सूत्र में यह कहा गया है कि वह पुनः वापस आने वाला जीवात्मा(प्राणी) आकाश आदि के रूप में परिणत नहीं होता, उनके अनुरूप होकर ही उन आकाशादि से संयुक्त होता है, वैसे ही यहाँ सूत्र में धान, जौ आदि के सन्दर्भ में भी जानना चाहिए; क्योंकि यह कथन पूर्ववत् ही है। अतः उक्त प्रतिपादन से यह प्रमाणित होता है कि उन धान, तिल, उड़द आदि में अपने कर्मों का फल प्राप्त करने हेतु जो दूसरे प्राणी पूर्व से ही विद्यमान हैं, उनके रहते हुए ही यह चन्द्र (स्वर्गलोक) से वापस लौटने वाला प्राणी उसके साथ-साथ पुरुष के उदर में प्रविष्ट हो जाते हैं। वह (प्राणी) धान, तिल, जौ आदि स्थावर जड़ योनियों को नहीं प्राप्त करता है।।२४।। अगले सूत्र में आचार्य उक्त प्रकरण में आशङ्का व्यक्त करके पुनः उसका निस्तारण करते हैं (३१७ ) अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्॥२५ ।। सूत्रार्थ-चेत् = यदि यह कहें कि, अशुद्धम् = (प्राणी का धान आदि में निवास होने से उसे पकाना आदि तो) अशुद्ध-पापकर्म होगा, इति न = तो ऐसी बात नहीं है, शब्दात् = श्रुति वचन के द्वारा इसकी निर्दोषिता प्रमाणित होती है। व्याख्या- यदि यह आशङ्का करें कि अनाज के हर दाने में जीवात्मा का निवास बना रहता है, तो इस मान्यता के अनुसार अन्न को कूटना, पीसना, पकाना और ग्रहण करना (खाना) तो बड़ा अशुद्ध-पाप कर्म होगा, क्योंकि उसमें अनेकों प्राणियों की हिंसा करने पर कम से कम एक प्राणी की क्षुधा पूर्ति होगी, तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस प्रकरण के अन्तर्गत छान्दोग्योपनिषद् ३६/६/२ में पुरुष को 'अग्नि' बतलाकर उसमें
Disclalmer / Warning: All literary and artistic malerial on this website is copyrght protected and constitutes an exclusle intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 148
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१५० वदान्त दर्शन अन्न का यजन करना कहा गया है। इसके साथ ही श्रुति में जगह-जगह पर अन्न के ग्रहण करने का उल्लेख मिलता है। इसलिए श्रुति का विधि-विधान होने से उसमें हिंसा नहीं होती और उन प्राणियों की उस अवधि में सुप्तावस्था बनी रहती है। जब वे धरती एवं जल के सम्बन्ध से उगते (उत्पन्न होते) हैं, तब उनमें चेतना आती है और तभी सुख-दुःख का ज्ञान होता है, इससे पहले नहीं होता। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि अन्न ग्रहण करने में हिंसा नहीं है।२५।। 'अन्न से संयुक्त होने के पश्चात् वह किस तरह से कर्मफल भोग के लिए देह धारण करता है? अगले सूत्र में आचार्य इसी तथ्य को प्रतिपादित कर रहे हैं- (३१८ ) रेत: सिग्योगोऽथ॥२६॥ सूत्रार्थ- अथ = उसके पश्चात्, रेतः सिग्योगः = वीर्य का सेचन करने वाले पुरुष के साथ उसकी संङ्गति होती है। व्यख्या- उसके उपरान्त वह प्राणी अन्न के सहित 'पुरुष' के उदर में जाकर उसके वीर्य में समाहित होकर उस 'पुरुष' से संयुक्त होता है। यहाँ इस प्रकरण से यह प्रमाणित हो जाता है कि आकाशादि से लेकर अन्न तक सभी जगह मात्र संयोग से ही उसका आकारवत् होना बतलाया गया है, स्वरूप से नहीं। छान्दोग्योपनिषद् ५/१०/६ के अन्तर्गत कहा गया है कि 'जो-जो अन्न खाता है, जो वीर्य सेचन करता है, वही रूप अनुशयी (कर्मफल भोक्ता) आत्मा का हो जाता है।' श्रुति में वर्णित 'तद्भूय एव भवति' का यह भाव नहीं कि अद्यमान (खाये जाते हुए) अन्न के सहित संपृक्त अनुशयी आत्मा रेतः सेक्ता का स्वरूप बन जाता है। यद्यपि रेतः सेक्ता पृथक् आत्मा है और अनुशयी पृथक्। एक आत्मा अन्य आत्मा नहीं बन सकता। अतः वाक्यांश का यही भाव है कि अनुशयी आत्मा अद्यमान अन्न के सहित जिस योनि (जाति) के रेतः सेक्ता से संयुक्त होकर पुरुष के उदर में प्रविष्ट हो जाता है और उसी योनि का शरीर प्राणी धारण करता है। अतः जैसे अनुशयी आत्माओं का ब्रीह्मादि भाव ब्रीहि आदि के साथ संपर्क मात्र है। इसी तरह 'रेतः सिग्भाव' रेतः सेक्ता के साथ मात्र संपर्क ही मानना चाहिए। अगले सूत्र में पुनः आचार्य उपर्युक्त प्रकरण के बाद का क्रम प्रस्तुत करते हैं- (३११ ) योने: शरीरम् ॥२ ७ ॥ सूत्रार्थ-योने: = योनि में प्रविष्ट होने के पश्चात्, शरीरम् - (वह प्राणी कर्मफल भोग के अनुरूप) देह की प्राप्ति करता है। व्याख्या- इस प्रकार वह जीवात्मा स्वर्ग से पुनः वापस आने वाला सर्वप्रथम पुरुष के वीर्य में समाहित हो जाता है। इसके उपरान्त इस पुरुष के द्वारा गर्भाधान काल में स्त्री की योनि में वीर्य के सहित प्रवेश करा दिया जाता है। वहाँ गर्भक्षेत्र से सम्बद्ध होकर जीवात्मा अपने कर्मफल के अनुसार नवीन देह को प्राप्त करता है और यहीं से उसके कर्मों के फल का भोग प्रारम्भ हो जाता है। इससे पूर्व स्वर्ग से नीचे उतरकर वीर्य में समाहित होने तक उस (प्राणी) का कोई जन्म अथवा देह धारण करना नहीं होता है। केवल उसे उन-उन आकाश, वायु आदि के अवलम्बन में रहना ही बतलाया गया है। उन धान, जौ आदि शरीरों के अधिष्ठाता कोई अन्य प्राणी (जीवात्मा) ही हैं॥२७।।
॥ इति तृतीयाध्यायस्य प्रथम: पादः ॥
Disclaimer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webste can be used for propagation with prior written consent.
Page 149
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
।। अथ तृतीयाध्याये द्वितीयः पादः॥ द्वितीय पाद के अन्तर्गत वर्तमान देह की अलग-अलग विभिन्न अवस्थाओं पर विचार करके इस जन्म-मृत्यु रूप सांसारिक-बन्धनों से मुक्ति हेतु परब्रह्म का ध्यान रूप उपाय बतलाया गया है। अतः सर्वप्रथम स्वप्रावस्था पर विचार शुरू करते हुए नीचे के दो सूत्रों में आचार्य पूर्वपक्ष की उत्थापना प्रस्तुत करते हैं- (३२० ) संध्ये सृष्टिराह हि॥१ ॥ सूत्रार्थ- संध्ये = स्वप्न में भी जाग्रत् की तरह, सृष्टिः = सांसारिक कार्यों-पदार्थों की सृष्टि होती है, हि = क्योंकि, आह = श्रुति का कथन ऐसा ही है। व्याख्या-स्वप्रावस्था में जीवात्मा के द्वारा लोक और परलोक दोनों के देखने का प्रकरण श्रुति में आया है। बृहदारण्यकोपनिषद् ४/३/९ में वर्णन मिलता है कि 'स्वप्रावस्था में यह जीव लोक-परलोक दोनों का दर्शन करता है। वहाँ दुःख और आनन्द दोनों का उपभोग करता है। वह इस स्थूल देह को स्वयमेव अचेत करके वासना युक्त नवीन देह की संरचना करके इस जगत् का दर्शन करता है। इसी उपनिषद् के अगले सूत्र (४/३/१०) में ऋषि कहते हैं- 'उस अवस्था में वास्तव में न होते हुए भी रथ, रथ को ले जाने वाले वाहन एवं उसके मार्ग की, आनन्द, आमोद-प्रमोद की, कुण्ड, सरोवर और नदियों की संरचना कर लेता है। ऐसे ही अन्य श्रुतियों (प्र.उ.४/५ व बृह.उ. २/१/१८) में भी स्वप्रकाल में सृष्टि की सर्जना होना बतलाया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि जाग्रत् के समान स्वप्नकाल में भी जीव संरचना कार्य करता है। जाग्रत्-अवस्था में जिन साधन-सुविधाओं की आवश्यकता होती है, स्वप्नावस्था में उनकी आवश्यकता नहीं होती॥१॥ अगले सूत्र में आचार्य उपर्युक्त विषय में एक अन्य हेतु का निर्देश प्रस्तुत करते हैं- (३२१ ) निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ॥२।। सूत्रार्थ- च = और, एके = एक शाखा वाले विद्वान्, निर्मातारम् = जीवात्मा (पुरुष) को इच्छित कार्यों का निर्माता मानते हैं, च = तथा, पुत्रादयः = पुत्र आदि ही 'काम' अर्थात् कामना के विषय हैं। व्याख्या- एक शाखा वाले विद्वान् जीवात्मा-पुरुष को काम-वासना आदि का निर्माण करने वाला स्वीकारते हैं। कठोपनिषद् २/२/८ में ऋषि कहते हैं- 'य एष सुप्ेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः' अर्थात् 'यह विभिन्न प्रकार के भोगों की संरचना करने वाला पुरुष अन्य सभी के सो जाने पर स्वयं ही जाग्रत् अवस्था में रहता है।' इस कथन में पुरुष को कामनाओं का निर्माता बतलाया गया है। क.उ. १/१/२३-२४ में वर्णन मिलता है कि पुत्र-पौत्र आदि ही 'काम' अर्थात् कामना के विषय हैं। इस प्रकार उक्त उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि स्वप्रावस्था में भी सृष्टि है॥२॥ उपर्युक्त दोनों सूत्रों में पूर्वपक्षी के द्वारा स्वप्न की सृष्टि को सत्य सिद्ध करने का प्रयास किया गया है और उसे जीवात्मा के द्वारा किया हुआ कहा गया है। अब अगले सूत्र में आचार्य सिद्धान्त पक्ष की ओर से समाधान करते हैं- ( ३२२ ) मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात्।३।। सूत्रार्थ-तु = परन्तु, कार्त्स्न्येन = पूरी तरह से, अनभिव्यक्तस्वरूपत्वात् - उसके स्वरूप की अभिव्यक्ति (प्रकटीकरण) न होने से, मायामात्रम् = वह एकमात्र माया ही है। व्याख्या- जीवात्मा स्वप्रावस्था में जिन-जिन पदार्थों की संरचना करता है अथवा देखता व श्रवण करता है, उसमें स्थायित्व न होने के कारण उन-उन पदार्थों या दृश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि स्वप्न तो संकल्पों की अभिव्यक्ति मात्र है। अतः उसे केवल माया कहना ही उचित प्रतीत होता है। प्रश्नोपनिषद् में तो स्पष्ट वर्णन मिलता है कि जाग्रत् अवस्था में सुनी हुई, देखी हुई तथा अनुभव की हुई वस्तुएँ स्वप्रावस्था में
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 150
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१५२ वदान्त दशन विचित्र ढङ्ग से दृष्टिगोचर होती हैं। स्वप्रकाल में न देखी, न सुनी अथवा अनुभव न की हुई वस्तुओं-पदार्थों को भी वह देखता है। इन सभी कारणों से भी स्वप्र की सृष्टि का माया मात्र होना ही प्रमाणित होता है, जाग्रत् की तरह से सत्य नहीं। यही कारण है कि स्वप्रकाल में किये हुए शुभाशुभ कर्मों के फल प्राणी को नहीं भोगने पड़ते। उपर्युक्त सूत्र में जीवात्मा को कामेच्छाओं का निर्माता माना गया है, सो यह मान्यता उचित नहीं है; क्योंकि वहाँ सूत्र में स्वप्रावस्था का उल्लेख नहीं मिलता। वहाँ तो यह विशेषण जीवात्मा के लिए न प्रयुक्त होकर एकमात्र सर्वनियन्ता परब्रह्म के लिए प्रयुक्त हुआ है।।३। उपर्युक्त कधानक से प्रमाणित होता है कि स्वप्र सर्वथा व्यर्थ है, उसकी कोई सार्थकता नहीं है। अगले सूत्र में आचार्य इस कथन पर एक अन्य हेतु प्रस्तुत करते हैं- (३२३ ) सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ।।४।। सूत्रार्थ- सूचकः = स्वप्न भविष्य के शुभाशुभ परिणाम का सूचक, च = भी है, हि = क्योंकि, श्रुतेः = श्रुति भी यही कहती है, च = और, तद्विदः = स्वप्र विषयक शास्त्र के ज्ञाता, आचक्षते = भी ऐसा ही कहते हैं। व्याख्या- भविष्यत्काल में घटित होने वाले शुभाशुभ कर्मफल की जानकारी भी स्वप्रावस्था में प्राप्त हो जाती है; क्योंकि स्वप्र को भविष्य-सूचक कहा गया है और स्वप्न-विषयक निष्णात विद्वज्जन भी ऐसा ही कहते हैं। छान्दोग्योपनिषद् ५/२/९ में वर्णन मिलता है- 'यदाकर्मसु ......... स्वप्ननिदर्शने' अर्थात् जब स्वप्न काल में काम्य कर्म का अनुष्ठाता किसी सौभाग्यवती स्त्री को देखे, तो ऐसे स्वप्न देखने का परिणाम यह मानना चाहिए कि उस कृत कर्म में सम्यक् रूपेण अभ्युदय होने वाला है। कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में इसका वर्णन इस प्रकार है- 'जो स्वप्रकाल में किसी काले रंग व काले दाँत से युक्त पुरुष को देखता है, वह उसके द्वारा मृत्यु को प्राप्त करता है। स्वप्न विद्या के निष्णात मनीषीगण स्वप्नावस्था में हाथी पर सवार होना शुभ और गधे पर सवार होने को अशुभ मानते हैं। ऐतरेय आरण्यक ३/२/४/१४ आदि श्रुति वचनों के प्रमाण द्वारा प्रमाणित होता है कि स्वप्न सदैव व्यर्थ नहीं होते, वह आगामी फलों के सूचक भी होते हैं। उक्त प्रमाणों से यह भी सिद्ध होता है कि स्वप्र की घटना जीवात्मा की स्वतन्त्र संरचना नहीं है, वह तो निमित्त मात्र है। वस्तुतः सभी कुछ जीवात्मा के कर्मानुसार उस परब्रह्म की शक्ति के द्वारा ही सम्पन्न होता है। इस प्रकार स्वप्रकाल में देखे हुए दृश्यों का शुभाशुभ सूचक होना सिद्ध होता है॥।४॥ जीवात्मा भी तो परमात्मसत्ता का अंश है, अतः इसमें परब्रह्म के ज्ञान और ऐश्वर्य आदि गुण भी आंशिक रूप से विद्यमान होंगे ही। तब फिर यदि ऐसा मान लिया जाये कि स्वप्र की संरचना जीव स्वयं करता है तो क्या आपत्ति है? अगले सूत्र में आचार्य इसी को स्पष्ट करते हैं- (३२४ ) पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॥५॥ सूत्रार्थ-तु= किन्तु, तिरोहितम् = (जीवात्मा में ईश्वर के सदृश गुण) छिपे हुए (आवृत) हैं, पराभिध्यानात् = अतः परब्रह्म का सतत ध्यान करने से (वे गुण प्रकट हो जाते हैं); हि = क्योंकि; ततः = उस ब्रह्म के द्वारा ही, अस्य = इसका (जीव का), बन्धविपर्ययौ = बन्धन और उसके विपरीत अर्थात् मुक्ति है। व्याख्या- जीवात्मा परब्रह्म ईश्वर का अंश है, अतः यह भी ईश्वर के समान गुणों से युक्त है। इसमें किसी भी तरह का संशय नहीं है; किन्तु जीवात्मा स्वकर्मानुसार और इस सांसारिक जगत् में स्थित माया के चक्र में भ्रमित होकर उन गुणों को भूला रहता है तथा उसके वे उत्तम गुण छिपे रहते हैं। इसलिए उनका उपयोग देखने को नहीं मिलता। जब यह जीव उस परब्रह्म का सतत ध्यान आदि सत्कार्यों को करता रहता है, तब उसमें छिपे हुए गुण स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं। श्वेताश्वतर १/११ एवं ६/१६ के अनुसार उन गुणों का प्राकट्य ईश्वर का ध्यान करने से ही सम्भव है। परब्रह्म की आराधना के अभाव में अपने-आप उन गुणों का प्रकट होना
Disclalmer / Warning: All iterary and artistic material on this webelte is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 151
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०२ सूत्र ७ १५३ असंभव है, क्योंकि इस जीवात्मा का अनादि सिद्ध बन्धन एवं उससे मुक्ति को प्राप्त करना उस जगन्नियन्ता परब्रह्म के ही द्वारा सम्भव है। अतः वह (जीव) स्वयं स्वप्न की सृष्टि संरचना आदि कुछ भी करने में सर्वथा समर्थ नहीं हो सकता।५॥ अब जिज्ञासा यह उठती है कि जीव के जो वास्तविक ईश्वर सम्बन्धी गुण हैं, वे छिपे हुए क्यों हैं? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३२५ ) देहयोगाद्वा सोऽपि॥६ ॥ सूत्रार्थ-सः= वह तिरोभाव अर्थात् गुणों को आवृत करना, अपि = भी, देहयोगात् = देह के सम्बन्ध से, वा = ही है। व्याख्या- जीवात्मा जब देह के साथ अपनी एकात्मता स्थापित कर लेता है, तब वह परब्रह्म परमेश्वर के तत्त्वों से विस्मृत हो जाता है। इसी कारण उसके छिपे हुए गुण प्रकट नहीं हो पाते। जब तक जीवात्मा इस माया के आवरण से अलग नहीं हो जाता, तब तक उसके गुण छिपे ही रहते हैं। इससे उस जीवात्मा को बारम्बार कर्म-बन्धन में पड़कर जीवन-मृत्यु के चक्र में भ्रमण करना पड़ता है और वह तरह-तरह के सुख- दुःख आदि द्वन्द्वों का उपभोग करता रहता है॥६॥ सूत्र क्र. छः तक जीवात्मा की स्वप्रावस्था का निरूपण किया गया। प्रसङ्गवश बन्धन और मुक्ति के उपाय का भी संक्षिप् वर्णन किया गया। अब अगले सूत्र से जीवात्मा की सुषुप्तावस्था पर विचार करते हैं। सामान्यतः सुषुप्तावस्था में जीव का ब्रह्म से संयोग होता है, इससे यह भ्रान्ति हो सकती है कि सुषुप्ति भी समाधि की भाँति कोई सुखप्रद स्थिति है? इसी भ्रम का निवारण आचार्य यहाँ प्रस्तुत करते हैं- ( ३२६ ) तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च॥७॥ सूत्रार्थ- तदभावः (सुप्तावस्था में) उस स्वप्न-दृश्य का अभाव हो जाता है (और उस समय जीव), नाडीषु = नाड़ियों में (अवस्थित हो जाता है), च = और, आत्मनि = आत्मा में भी उसकी स्थिति बनी रहती है, तच्छ्ुतेः - क्योंकि श्रुति का भी वैसा ही कथन है। व्याख्या-उपर्युक्त सूत्रों में जो स्वप्रावस्था का उल्लेख किया गया है, उसमें जीवात्मा के जागने, सोने एवं स्वप्रावस्था में बने रहने आदि की बात बतलाई गई है। बृह.उ. (४/३/१० से १८ तक) में जीवात्मा की इसी अवस्था का वर्णन मिलता है। इस तरह से स्वप्रगत मानसिक सुख-दुःखों का उपभोग करते-करते कभी सुषुप्तावस्था की प्राप्ति हो जाने पर स्वप्न दृश्यों का अभाव हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि वे माया मात्र ही हैं; क्योंकि बाह्य जगत् का अभाव नहीं होता। उसका कार्य यथावत् चलता रहता है और जीव का शरीर भी सुरक्षित रहता है,अतः उसका यहाँ सत् होना सिद्ध होता है। उस समय जीव को इस प्रपञ्च के उपभोग से आराम मिलता है तथा देह एवं इन्द्रियों की थकावट दूर होती है। सुषुसावस्था के आने पर जीव की स्थिति कैसी और कहाँ रहती है, इस सन्दर्भ में बृह.उ.२/१/१९ में ऋषि कहते हैं- 'जब जीव सुषुप्तावस्था को प्राप्त होता है, तब वह कुछ भी नहीं जानता। इसके शरीर में जो बहत्तर हजार नाड़ियाँ हृदय से निकलकर सम्पूर्ण देह में व्याप्त हो रही हैं, उनमें फैलकर यह समस्त शरीर में व्याप्त हुआ शयन करता है। छान्दोग्योपनिषद् ८/६/ १० में भी ऐसा ही वर्णन मिलता है- 'जब जीवात्मा शयन करता हुआ किसी तरह का स्वप्न नहीं देखता, सभी तरह से सुखी होकर नाड़ियों में संव्याप्त हो जाता है। उस अवधि में उसे कोई पाप स्पर्श नहीं कर सकते।' इसका अभिप्राय यह हुआ कि उस समय अज्ञात में इसके शरीर की क्रिया द्वारा किसी जीव आदि की हिंसादि पापकर्म हो जाये, तो वह पाप उसे नहीं लगता। उक्त उदाहरणों से ज्ञात होता है कि नाड़ियों का मूल और इस जीवात्मा एवं परब्रह्म का निवास स्थान
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 152
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१५४ वदान्त दशन हृदय है, उसी जगह सुषुप्ति में जीव सोता है। अतः उसकी स्थिति हृदय में स्थित नाड़ियों में और परब्रह्म में भी कही जा सकती है। इसमें कोई विरोध नहीं है। स्थान की एकात्मता के कारण ही कहीं उसको ब्रह्म की प्राप्ति, तो कहीं प्रलय की भाँति परब्रह्म के साथ संयुक्त होना आदि कहा गया है; किन्तु इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि यह भी समाधि की तरह मोक्ष प्राप्ति में सहयोगी होगा। अतः शरीर रक्षा के लिए कम से कम आवश्यक समय तक ही शयन करना चाहिए, श्रेष्ठ सुख की बुद्धि से नहीं। प्र.उ. ४/६ में ऋषि कहते हैं- 'वह मन जब तेज (उदानवायु) से दब जाता है अर्थात् उदानवायु इन्द्रियों के सहित मन को हृदय में ले जाकर मोहित कर देता है, तब जीव की सुषुप्तावस्था होती है। उस समय जीव स्वप्न को नहीं देखता। इस देह में जीव को यह सुषुप्तिजनित सुख प्राप्त होता है॥9।।
का प्रतिपादन करते हैं- सुषुपावस्था के समय परब्रह्म के साथ हृदय क्षेत्र में जीव की जो दशा कही गयी है, आचार्य अगले सूत्र में उसी
(३२७ ) अतः प्रबोधोऽस्मात्॥८॥ सूत्रार्थ- अतः = इसलिए, अस्मात् = यहाँ (इस आत्मस्वरूप से), प्रबोध: = जीवात्मा का जाग्रत् होना - जागना (श्रुति में बतलाया गया है)। व्याख्या- श्रुति में वर्णन मिलता है कि सुषुप्तावस्था में जीवात्मा हृदय में प्रतिष्ठित रहता है। जो वस्तु या पदार्थ जिसमें विलीन हो जाता है, उसका वहीं से उद्भव भी निश्चित होता है। इस न्याय से जीव सुषुपि की अवस्था समाप्त होने पर जब जाग्रत् होता है, तब वहाँ से अर्थात् परब्रह्म के वास-स्थल हृदय से ही जाग्रत् होता है, अतः उसके विलय होने का स्थल भी वही है। ऐसा स्वतः ही प्रमाणित हो जाता है। यहाँ जगना (जाग्रत् होना) उस परब्रह्म की व्यवस्था से होता है। जितने काल तक उसके प्रारब्ध के अनुसार सुषुप्ति का सुख भोग होना चाहिए, उतने समय के पूर्ण होने के पश्चात् उस परब्रह्म की नियम-व्यवस्था से जीव जाग्रत् हो जाता है। यही भाव यहाँ भी मानना चाहिए।८।। अब आशंका यह होती है कि जो जीवात्मा सुषुमि-काल में विलय को प्राप्त होता है और वही जाग्रत् होकर वापस आता है अथवा देह के किसी अङ्ग में पड़ा हुआ कोई अन्य जीव ही जाग्रत् होता है? अगले सूत्र में इसी आशंका का समाधान किया जा रहा है- (३२८ ) स एव तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्य: ।।१।। सूत्रार्थ-तु = तो निस्संदेह, स एव = वह जीवात्मा ही (जागता है); क्योंकि, कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः = कर्म, अनुस्मृति, शब्द-वेद प्रमाण कर्म करने की सिद्धि तभी संभव होगी, अतः यही मानना उचित है। व्याख्या-जो जीव शयन करता है, वही जागता है। शयन दूसरा करता है और जागता दूसरा है, ऐसा मान लेने में विभिन्न तरह के प्रचुर परिमाण में दोष आते हैं। अतः वैसा नहीं स्वीकारा जा सकता; क्योंकि प्रायः यह देखा जाता है कि व्यक्ति पहले दिन जिस कार्य को शुरू करता है,उसके अवशेष की पूर्ति दो-तीन दिनों तक यथावत् करता रहता है। आधा कार्य दूसरे ने किया हो और शेष आधे कार्य को अपने द्वारा ही छोड़ा हुआ मानकर उसे पूर्ण करे, यह असम्भव है और जागने के पश्चात् पूर्व की सभी बातों की स्मृति के साथ-साथ यह याददाश्त भी स्वतः होती ही है कि जो अब तक शयन कर रहा था, वही मैं अब जाग्रत् हुआ हूँ। अन्य जीव की कल्पना करने से किसी भी तरह इसकी समानता नहीं हो सकती। बृ.उ. ४/३/१६ में भी यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जो शयन करता है, वही जाग्रत् होता है। इसके साथ ही वेदों में जो कर्म करने का आदेश दिया गया है, उसकी सार्थकता भी जो शयन करता है, उसी के जगने से होगी; क्योंकि एक को दिये हुए आदेश का दूसरा कैसे पालन कर सकेगा। उपर्युक्त समस्त प्रतिपादनों से यही प्रमाणित होता है कि जो जीव सुषुप्ति-काल
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 153
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०१ सूत्र ११ १५५ में सोता है (शयन करता है), वही जागता है।।९। व्यक्ति जब किसी औषध आदि के सेवन से बेहोश-मूर्छित हो जाता है या अन्य किन्हीं बीमारी आदि कारणों से अचेत हो जाता है, तब उस अवधि में उसे न तो बाह्य जगत् का ज्ञान रहता है, न स्वप्र देखता है, और न ही सुख का अनुभव करता है, वह कौन सी अवस्था है? अगले सूत्र में आचार्य इसी आशंका का समाधान करते हैं- (३२९ ) मुग्धेउर्द्धसम्पत्ति: परिशेषात् ॥१० ।। सूत्रार्थ- मुग्धे: = मूर्छित अवस्था में, अर्द्धसम्पत्तिः = सुषुप्ति की आधी-अधूरी अवस्था माननी चाहिए; क्योंकि, परिशेषात् = यही शेष अवस्था है; अन्य कोई अवस्था शेष नहीं है। व्याख्या- जीवात्मा की जन्म के पश्चात् एवं मृत्यु के पूर्व तीन प्रमुख अवस्थाएँ-जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति बतलाई गयी हैं। यह मुग्धावस्था कभी-कभी किन्हीं विशेष कारणों से ही किसी को प्राप्त होती है। इस अवस्था के लक्षण सुषुप्ति की तरह के होते हैं। इसमें आधी सुषुपति और आधी जाग्रत् जैसी अवस्था होती है। उस काल में प्रसन्न मुख, उन्मीलित नेत्र; किन्तु चेहरा विवर्ण दिखलाई देने से उसे सोता-जागता कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इसलिए इसे अधूरी सुषुप्ति मानना ही उचित होगा; क्योंकि उस अवस्था में सुषुपति का कोई सुख-लाभ नहीं प्राप्त होता। एकमात्र अज्ञान में ही सुषुप्ति से इसकी समानता मिलती है; अतः इस मुग्धावस्था को पूरी तरह से सुषुप्ति न कहकर अर्ध-सुषुप्ति कहा गया है॥१०।। ईश्वर का क्या स्वरूप है? इसके निर्णय हेतु अगला प्रकरण शुरू किया जाता है। यहाँ जिज्ञासा यह होती है कि श्रुति में कहीं परब्रह्म को सर्वथा निर्विशेष निर्गुण कहा गया है। कहीं उसे सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी एवं सभी प्राणियों की उत्पत्ति एवं प्रलय का कारण बतलाया गया है। कहीं उसे सर्वव्यापी और कहीं अङ्गष्व मात्र कहा गया है? तथा हृदय आदि जिन-जिन स्थानों में ईश्वर की स्थिति कही गई है, उनके दोषों से वह लिप्त होता है या नहीं ? इन्हीं आशंकाओं का समाधान इस सूत्र में प्रस्तुत किया जा रहा है- (३३०) न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि ॥११॥। सूत्रार्थ-स्थानत: = स्थान के सम्बन्ध से, अपि = भी, परस्य = परब्रह्म परमेश्वर का, न = किसी भी तरह के दोष से संसर्ग नहीं होता, हि = क्योंकि, सर्वत्र = सभी श्रुति-वाक्यों में उस परब्रह्म को, उभयलिङ्गम् = दोनों प्रकार के लक्षणों से सम्पन्न कहा गया है। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा को श्रुतियों ने दो लक्षणों से युक्त बतलाया है। श्वेताश्वतरोपनिषद् के ३/१९ में जहाँ ईश्वर को निर्विशेष कहा है; वहीं उसी प्रकरण में उसे विभिन्न प्रकार के दिव्य गुणों से सम्पन्न कहा है। इसके जो भी दिव्य गुण कहे गये हैं, वे जीव और प्रकृति-दोनों से विलक्षण हैं। कठ.उ. १/२/२०-२१ में ईश्वर के स्वरूप का वर्णन इस प्रकार किया गया है- 'इस जीवात्मा के हृदय रूपी गुहा में रहने वाला ईश्वर अणु से अणुतम और महान से महानतम है।' 'वह ब्रह्म स्थिर रहते हुए भी गतिशील है, सोता हुआ भी चतुर्दिक् गमनशील है। कठ. उ. १/३/१ में उसे 'सभी धर्मों से परे कहा गया है' और कठ.उ. १/३/१५ में उसे 'भूत- भविष्यत् का शासक कहा गया है।' इस प्रकार उक्त उदाहरणों से 'परब्रह्म दोनों ही लक्षणों से-स्वरूपों से सम्पन्न है, यह स्पष्ट हो जाता है तथा यह कहना भी युक्तिसंगत ही है; क्योंकि सर्वसमर्थ सत्ता के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। वह प्राणियों के हृदय रूपी संस्थान में रहते हुए भी उसके दोषों से निर्लिप्त रहता है और परस्पर विरोधी लक्षणों का उसमें होना किसी भी तरह की अतिशयोक्ति की बात नहीं है। अतः वेद ने उस ईश्वर को दोनों तरह के लक्षणों से सम्पन्न बतलाकर उसकी अनिर्वचनीय महिमा का साक्षात्कार कराने का पुरुषार्थ किया है॥११॥ अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से आशङ्का व्यक्त करके पुनः उसी का निस्तारण करते हुए उक्त सूत्र में प्रतिपादित तथ्यों को और भी दृढ़ कर रहे हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 154
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१५६ वदान्त दशन
(३३१ ) न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात्॥१२॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो कि, भेदात् = गुणभेद से अर्थात् सगुण और निर्गुण- ये ब्रह्म के अलग-अलग दो भेद माने गये हैं, (वह एक ही ब्रह्म दोनों भेदों वाला), न = नहीं हो सकता, इति न = तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि, प्रत्येकम् अतद्वचनात् - प्रत्येक श्रुति में इसके विपरीत एक परब्रह्म को ही दोनों लक्षणों से सम्पन्न कहा गया है। व्याख्या- यदि कोई यह कहे कि 'एक ओर जहाँ परमेश्वर को सर्वश्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न कहा गया है, वहीं दूसरी ओर उसे माया विशिष्ट अपरब्रह्म कहा है तथा एक ओर जहाँ उसके निर्विशेष स्वरूप का उल्लेख हुआ है, वहीं दूसरी ओर उसे परब्रह्म भी कहा गया है। इस प्रकार दोनों के अलग-अलग वर्णन होने से दोनों लक्षण एक में नहीं हो सकते हैं, अतः उस ब्रह्म का उभयलिंगत्व सिद्ध नहीं होता।' तो ऐसा मानना उचित नहीं है; क्योंकि श्रुतियों ने उसके ऐसे लक्षणों को मान्यता प्रदान की है। किसी-किसी श्रुति ने वैसा प्रतिपादन नहीं किया है; किन्तु अधिकांश श्रुतियाँ उस परब्रह्म के निर्गुण और सगुण दोनों लक्षणों का प्रतिपादन करती हैं। बृह.उ. ३/७/३ से २२ तक एवं माण्डूक्योपनिषद् ६ और ७ में एक ही परमेश्वर का उल्लेख करते हुए उसे समस्त श्रेष्ठ गुणों से युक्त और सर्वथा निर्विशेष कहा गया है। श्वेताश्वतरोपनिषद् ३/१,२ में उस ईश्वर को सूर्य के सदृश स्वयं प्रकाश और माया से सदैव अतीत बतलाया गया है। पुनः उससे श्रेष्ठ एवं सूक्ष्म अन्य कोई नहीं है। ऐसा कहकर उसे सर्वत्र परिपूर्ण प्रतिपादित किया है। श्वेता.उप. ३/११,१२ में उसे सभी पर शासन करने वाला, सबका प्रेरक, ज्ञानस्वरूप व निर्मल कहा है। उसे समस्त स्थलों में सिर, मुख व अन्य अंगों से युक्त बतलाया गया है। इस प्रकार अनेक स्थलों पर श्रुतियों ने ब्रह्म को दोनों लक्षणों वाला बतलाया है॥१२॥ अगले सूत्र में आचार्य एक अन्य श्रुति के प्रमाण द्वारा पुनः उसकी एकता को प्रतिष्ठित करते हैं- ( ३३२ ) अपि चैवमेके॥।१३ ॥ सूत्रार्थ-च = और, एके = (किसी) एक शाखावाले (विशेष रूप से); अपि = भी, एवम् = इसी तरह का प्रतिपादन करते हैं। व्याख्या- एक शाखा वाले विद्वज्जन तो विशेष रूप से ऊपर के सूत्र में वर्णित सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं। तैत्ति.उप. (२/१) में उस परब्रह्म को सत्य, ज्ञान एवं अन्तरहित कहकर उसी से सम्पूर्ण विश्व का उद्भव बतलाया है। इसी उपनिषद् के २/७ में यह भी कहा गया है कि 'उसने स्वयमेव अपने आप को ही इस रूप में विनिर्मित किया है' तथा उसे रस स्वरूप एवं समस्त प्राणियों को आनन्द प्रदान करने वाला बताया गया है। तदनन्तर तैत्ति. २/८ में उस ब्रह्म की स्तुति करते हुए ऋषि कहते हैं-'इसी के भय से वायु गतिशील है, सूर्य उदय होते हैं, अग्नि, इन्द्र और पंचम देव मृत्यु अपने-अपने कार्यों में संलग्न रहते हैं। इस तरह से एक विशेष (तैत्तिरीय) शाखा के सूत्रों द्वारा भी उस एक ही ब्रह्म के दोनों तरह के स्वरूपों का वर्णन होने से भी एक परब्रह्म का निराकार व साकार होना प्रमाणित होता है। अतः उस अविनाशी परमेश्वर को दो स्वरूपों से युक्त मानना ही युक्तिसंगत प्रतीत होता है॥।१३।। अगले सूत्र में आचार्य पुनः उपर्युक्त तथ्य को सिद्ध करने के लिए दूसरा कारण दे रहे हैं- (३३३ ) अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥१४॥ सूत्रार्थ- हि = क्योंकि, अरूपवत् - रूप-रहित निर्विशेष लक्षणों के सदृश, एव = ही, तत्प्रधानत्वात् = उन साकार रूप के लक्षणों की भी प्रमुखता है, अतः (यही प्रमाणित होता है कि परब्रह्म दोनों लक्षणों से युक्त है)। व्याख्या- जिस प्रकार से श्रुतियों ने परब्रह्म परमेश्वर को लक्षण-विहीन बतलाया है, उसी प्रकार से श्रुतियाँ
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic malerial on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 155
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० १ सूत्र १६ १५७ उस ब्रह्म के साकार-रूप का भी प्रतिपादन करती हैं। जैसे उस परमपिता परमात्मा को निराकार बतलाने वाले वेदवाक्य प्रमुख हैं, ठीक वैसे ही उसे साकार स्वरूप, सर्वदिव्यगुण सम्पन्न बताने वाले वेद वाक्य भी अनेकशः हैं, उनमें से किसी एक को प्रमुख और दूसरे को गौण नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि एक ही प्रकरण में तथा एक ही सूत्र में एक ही ब्रह्म के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए उसे दोनों लक्षणों से सम्पन्न कहा गया है। श्वेताश्वतरोप. ६/११ के 'एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा' के अनुसार वही एक परब्रह्म दोनों स्वरूपों से युक्त है। उससे ही ब्रह्म का निर्गुण निराकार और सगुण-साकार रूप दोनों ही सिद्ध होता है॥।४।। अगले सूत्र में एक अन्य दृष्टान्त के द्वारा उक्त तथ्य को सिद्ध किया जा रहा है- (३३४) प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात्॥१५।। सूत्रार्थ-च = और, प्रकाशवत् - प्रकाश के सदृश, अवैयर्थ्यात् = वेद वाक्यों के व्यर्थ न होने से ब्रह्म के ही लक्षण मानना उचित है। व्याख्या-जिस तरह अग्नि एवं विद्युत् आदि समस्त ज्योतियों के दो स्वरूप माने गये हैं, यथा- एक प्रत्यक्ष और दूसरा अप्रत्यक्ष-छिपा हुआ। इन दोनों रूपों में से कोई भी व्यर्थ नहीं है; दोनों उचित हैं, उसी तरह उस परब्रह्म के भी दोनों रूप उचित हैं, व्यर्थ नहीं; क्योंकि ऐसा स्वीकारने से ही उसकी साधना-उपासना आदि की सार्थकता होगी। दोनों में से किसी एक को प्रमुख और दूसरे को निम्न अथवा अनावश्यक मानेंगे, तो उसकी निरर्थकता ही होगी। श्रुति में उसके दोनों रूपों का उल्लेख मिलता है, श्रुति के वचन कभी बेकार नहीं हो सकते; क्योंकि वे स्वयं ही प्रमाण हैं। इसलिए उन वेद-श्रुति वाक्यों की सार्थकता के लिए भी ब्रह्म को सविशेष-साकार और निर्विशेष-निराकार दोनों तरह के लक्षणों से सम्पन्न मानना ही ठीक होगा; ऐसा वेद- वाक्यों से स्वतः सिद्ध हो जाता है॥१५। अब अगले दो सूत्रों के द्वारा श्रुति में दिखाई पड़ने वाले विरोध का आचार्य समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३३५ ) आह च तन्मात्रम् ।१६।। सूत्रार्थ- तन्मात्रम् = (श्रुति ब्रह्म को) केवल चेतन, सत्य, ज्ञान और अनन्त मात्र, च = ही, आह = कहती है। यहाँ सूत्र में सगुण-वाची शब्दों का प्रयोग नहीं है। व्याख्या- परब्रह्म परमेश्वर को साकार स्वरूप वाला बतलाना मिथ्या है; क्योंकि श्रुति तैत्तिरीयोपनिषद् (२/ १) में कहा गया है- 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है।' यहाँ इस सूत्र में परमात्मा को एकमात्र ज्ञान स्वरूप ही कहा गया है। सूत्र में प्रयुक्त 'तत्' पद प्रकाश-ज्ञान का भाव प्रकट करता है, जो परमात्मा के चैतन्य भाव का बोधक है। ऋग्वेद ६/९/५ में कहा गया है- 'जन्म-मृत्यु के प्रवाह में प्रवाहित प्राणियों के हृदय में वह निश्चल ज्योति सर्वत्र व्यापक चैतन्य तत्त्व-ब्रह्म है।' यहाँ ब्रह्म को ज्योतिः स्वरूप कहना, उसके चैतन्य भाव का बोधक है। बृह. उ. ४/५/१३ में उल्लेख मिलता है- 'जैसे नमक की डली केवल नमक ही नमक है, वैसे ही यह ब्रह्म बाहर-भीतर की स्थिति से परे चेतनमय ही है। बृह. उ.(३/ ९/२८), तैत्ति.(३/६) और मुं. २/२/७ में उस जगन्नियन्ता को एकमात्र आनन्दमय ही कहा गया है। ब्रह्म का यथार्थ रूप एकमात्र ऐसा ही है। उसके स्वरूप को व्यक्त करने के लिए श्रुति में उक्त उल्लेख प्राप्त होते हैं। उसे सत्य संकल्पत्व आदि गुणों से सम्पन्न नहीं बतलाया है। अतः यहाँ उस परब्रह्म को दोनों लक्षणों से युक्त मानना उचित नहीं प्रतीत होता है॥१६। अगले सूत्र में उक्त प्रतिपादनार्थ अन्य श्रुति-स्मृतियों के प्रमाण देकर आचार्य उक्त अर्थ की पुष्टि करते हैं-
Disclalimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 156
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१५८ वदान्त दशन
(३३६) दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॥१७॥ सूत्रार्थ-अथो = उपर्युक्त कथन के बाद, दर्शयति = श्रुति उस (ब्रह्म) को अनेक रूपों वाला भी दिखलाती है, च = और, स्मर्यते = स्मृति में, अपि = भी उसे सगुण रूप वाला कहा गया है। व्याख्या-उपर्युक्त सूत्र में प्रतिपादित 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' (तैत्ति.२/१) के मंत्र में उस परमेश्वर को सभी के हृदय में अवस्थित कहा है और उसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत् के उद्भव-विकास का वर्णन भी मिलता है। ब्रह्म के विभिन्न रूपों का श्रुतियों एवं स्मृतियों में उल्लेख होने से उसके साकार रूप को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। गोपालतापनीयोपनिषद् में इस प्रकार कहा गया है- 'सत्पुण्डरीक नेत्र, मेघवर्ण, विद्युत् रूप वस्त्रधारी दो भुजा वाले, मौनमुद्रा युक्त एवं वनमाला धारी को ईश्वर कहते हैं। तैत्तिरीयोपनिषद् २/७,८ में उसे रसस्वरूप, आनन्दप्रदाता एवं सबका संचालक कहा गया है। इस कारण उस श्रुति को एकमात्र निराकार मानना उचित नहीं है। ऐसे ही स्मृति में भी अनेकों स्थलों में उसके स्वरूप का उल्लेख दोनों प्रकार से प्राप्त होता है। यथा श्रीमद्भगवद्गीता के (१०/३) में गीताकार कहते हैं- 'जो मुझको अजन्मा, अनादि एवं लोक महेश्वर के रूप में जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानी है तथा वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। गीता के (५/२९) में कहा है- 'जो मनुष्य मुझे सभी यज्ञ और तप का भोक्ता, सभी लोकों का महान् ईश्वर और समस्त भूतों का शुभाषी जानता है, उसे शान्ति मिलती है।' गीता के ११/५४ में भगवान् कहते हैं कि 'ऐसे सगुण स्वरूप वाला मैं एकमात्र अनन्य भक्ति से ही देखा जा सकता हूँ, तत्त्व से जानने में आ सकता हूँ तथा मेरे भक्त मुझमें प्रवेश भी कर सकते हैं। इस प्रकार के अनेकों दृष्टान्त श्रुति-स्मृतियों में देखने को मिलते हैं, जिससे परब्रह्म का दोनों लक्षणों से सम्पन्न होना प्रमाणित होता है॥।१७।। परब्रह्म का साकार-रूप उपाधि भेद से नहीं; बल्कि सहज-स्वाभाविक है, अगले सूत्र में इसी तथ्य की पुष्टि हेतु आचार्य एक अन्य प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं- (३३७ ) अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्॥।१८।। सूत्रार्थ- च = तथा, अतएव = इसीलिए (उस परब्रह्म का उभयरूप स्वाभाविक है, यही पुष्ट करने हेतु ही), सूर्यकादिवत् - सूर्यादि की प्रतिच्छाया की भाँति, उपमा = उपमा प्रदान की गई है। व्याख्या- ब्रह्मबिन्दूपनिषद् १२ में उल्लेख मिलता है कि 'समस्त प्राणियों का आत्मा परब्रह्म एक होते हुए भी वह पृथक्-पृथक् प्राणियों (भूतों) में अवस्थित रहता है। इसीलिए वह ब्रह्म जल में प्रतिबिम्बित सूर्य-चन्द्र की तरह एक और अनेकों रूपों में दृष्टिगोचर होता है'। उक्त दृष्टान्त से यह भाव प्रदर्शित किया गया है कि सर्वव्यापक ब्रह्म सगुण, निर्गुण के भेद से अलग-अलग नहीं; वरन् वह एक ही है। जैसे-सूर्य-चन्द्रमा आदि में सहज-स्वाभाविक गुण हैं, वैसे ही ब्रह्म के सर्वव्यापकत्व, सत्यसंकल्पत्व एवं सर्वज्ञता आदि सहज गुण हैं, उपाधि से नहीं। उक्त तथ्य में जो प्रतिच्छाया का उल्लेख हुआ है, उसमें यह स्वीकारना चाहिए कि अभिन्न वस्तु में कभी बिम्ब- प्रतिबिम्ब का भाव नहीं होता। जो ब्रह्म विभाव रहित यानी अविभक्त है, वह निराकार होते हुए भी समस्त भूत-प्राणियों में विभक्त की भाँति स्थित रहता हुआ भी एक ही है तथा उन सब में रहता हुआ भी उन-उन के गुण-दोषों से परे रहता है, ऐसा ही वेद वाक्यों में कहा गया है ॥१८॥ उक्त सूत्र के प्रतिपादनार्थ प्रतिबिम्ब का दृष्टान्त दिये जाने से यह आशंका हो सकती है कि ब्रह्म का सभी भूतों में स्थित रहना प्रतिबिम्बवत् मिथ्या ही है, यथार्थतः नहीं। अतः इसी आशंका के निवारणार्थ अगला सूत्र प्रस्तुत किया जा रहा है- (३३८ ) अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम् ॥१९॥ सूत्रार्थ-तु= किन्तु, अम्बुवत् = जल में विद्यमान चन्द्रमा के समान, अग्रहणात् = परब्रह्म का ग्रहण न होने
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 157
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०२ सूत्र २१ १५१ के कारण (उस ईश्वर को), तथात्वम् = निरन्तर उसी तरह का, न = नहीं स्वीकारना चाहिए। व्याख्या- उपर्युक्त सूत्र में परब्रह्म परमात्मा को समस्त भूत-प्राणियों में अवस्थित बतलाते हुए जल में दृष्टिगोचर होने वाले चन्द्रमा का उदाहरण दिया गया है; किन्तु वह उदाहरण पूरी तरह से परब्रह्म में नहीं घटता है; क्योंकि चन्द्रमा वस्तुतः जल नहीं है, जल में तो केवल उसका प्रतिबिम्ब ही परिलक्षित होता है। चन्द्रमा की तरह सभी प्राणियों के अन्तःकरण में परब्रह्म की छाया नहीं रहती, बल्कि स्वयं ब्रह्म ही अनेक रूपों में अवस्थित रहता है। गीता के १८/६१ में इसका उल्लेख इस प्रकार किया गया है- परमात्मा तो स्वयं ही समस्त भूतों के हृदय में सचमुच अवस्थित रहता है और उन-उन प्राणियों के कर्मानुसार उनको अपनी शक्ति के माध्यम से संसार-चक्र में भ्रमण कराता रहता है। अतः चन्द्रमा की प्रतिच्छाया के सदृश परमात्मा की स्थिति नहीं है। यहाँ इस दृष्टान्त से यही मानना चाहिए कि चन्द्रमा अपनी प्रतिच्छाया द्वारा एक से अनेक रूपों में दिखलाई देता है, ब्रह्म तो समस्त भूतों के हृदय में एक रूप से स्थित होकर विभिन्न रूपों में दृष्टिगोचर होता है।।१ ९ ।। यदि चन्द्रमा की प्रतिच्छाया की भाँति ब्रह्म की स्थिति नहीं है, तो फिर प्रतिबिम्ब का उदाहरण क्यों दिया गया? इस जिज्ञासा का समाधान अगले सूत्र में किया जा रहा है- (३३९ ) वृद्धिह्वासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम्।।२०।। सूत्रार्थ-अन्तर्भावात् = अन्तःकरण में स्थित होने के कारण, वृद्धिह्वासभाक्त्वम् = शरीर के माप के अनुसार ब्रह्म के बढ़ने-घटने वाला होने की सम्भावना होती है, अतः (उसके निषेध में), उभयसामञ्जस्यात् - ब्रह्म और चन्द्र प्रतिबिम्ब-इन दोनों की समानता है, एवम् = (अतः) इस प्रकार की उपमा दी गई है। व्याख्या- उपमा और उपमेय वस्तु के किसी एक अंश की समानता को रखकर दी जाती है। यदि इन दोनों की पूरी तरह से एकता हो जाये, तो वह उपमा ही नहीं कही जायेगी; वरन् वास्तविक वर्णन हो जायेगा; अतः यहाँ जैसे चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब जल में विद्यमान रहता हुआ भी जल के बढ़ने-घटने आदि के विकारों से सम्बद्ध नहीं होता, वैसे ही परमात्मा समस्त भूतों में निवास करता हुआ भी विकार-रहित रहता है। उन (शरीर) के घटने-बढ़ने आदि किसी भी विकार से वह संलिप्त नहीं होता। यदि यहाँ यह आशंका करें कि शरीर में स्थित रहने से वह (ब्रह्म) उस (शरीर) के अनुपात से घटता-बढ़ता भी होगा, तो ब्रह्म शरीर के किसी भी विकार में लिप नहीं होता अर्थात् शरीर के घटने-बढ़ने का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह (ब्रह्म) समस्त प्राणियों के हृदय में समान भाव से स्थित रहता है।।२०।। अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से पुनः ब्रह्म के (निराकार-साकार रूप) भ्रम का निवारण करते हैं- ( ३४० ) दर्शनाच्च॥२१॥ सूत्रार्थ- दर्शनात् = श्रुति में दूसरे अन्य दृष्टान्त देखे जाते हैं, च = इसलिए भी (यह मान्यता उचित है कि ब्रह्म की स्थिति प्रतिबिम्ब की भाँति अवास्तविक नहीं है)। व्याख्या- सूर्य एवं चन्द्रमा के प्रतिबिम्बों के जल में होने से भी जल के गुण उन्हें व्याप्त नहीं कर पाते। इसी प्रकार आकाश का घट या सकोरे में रहकर भी उनके गुणों से सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार परब्रह्म का भी विभिन्न शरीरों में रहते हुए उनके गुणों से सम्बन्ध नहीं रहता। इसलिए उसे विकार रहित कहा गया है। कठोपनिषद् (२/२/९) में इसके सम्बन्ध में इस प्रकार उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि विभिन्न रूपों में हर एक के रूपवाला-सा प्रतीत हो रहा है और उनके बाहर भी है। क.उ. २/२/११-१२ में भी ब्रह्म की निर्लिप्तता सिद्ध करते हुए कहा गया है- 'अग्नि के ही समान वहाँ वायु
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 158
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६० वदान्त दशन और सूर्य के दृष्टान्त से भी परब्रह्म की वस्तुगत गुण-दोष से निर्लेपता सिद्ध होती है। इस तरह प्रतिबिम्ब के अलावा दूसरे अन्य दृष्टान्त भी, जो उस ब्रह्म की स्थिति की सत्यता का प्रतिपादन करने वाले हैं, श्रुति में देखने को मिलते हैं। इसलिए भी प्राणियों में और प्रत्येक पदार्थ में उस परब्रह्म की स्थिति प्रतिबिम्बि की तरह आभास मात्र ही नहीं; वास्तविक है। इस प्रकार के अनेकों वर्णन वेद में देखने को मिलते हैं, जिनसे ब्रह्म की निर्लेपता सिद्ध होती है। अतः वह ब्रह्म साकार और निराकार दोनों ही लक्षणों से सम्पन्न है, ऐसा ही मानना समीचीन होगा ॥२१॥ अभी तक यह प्रमाणित किया गया कि परब्रह्म परमात्मा साकार-निराकार दोनों लक्षणों वाला है। अब आशंका यह उठती है कि वेद में उस (ब्रह्म) को नेति-नेति अर्थात् ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है- कहा गया है, तो इन निषेधात्मक श्रुतियों का क्या तात्पर्य है? आचार्य अगले सूत्र से इसी का निर्णय करने हेतु नया प्रकरण प्रारम्भ करते हैं- (३४१) प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूय: ॥२२॥ सूत्रार्थ- प्रकृतैतावत्त्वम् = उक्त प्रकरण में ब्रह्म के जो लक्षण कहे गये हैं, उनकी इयत्ता का अर्थात् वह इतना ही है, प्रतिषेधति = नेति-नेति श्रुति निषेध करती है, हि = क्योंकि, ततः = उसके पश्चात्, भूयः = पुनः , च = भी, ब्रवीति = कहती है। व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (२/३/१ से ६ तक) में ब्रह्म के मूर्त और अमूर्त दो रूप बतला कर प्रकरण की शुरुआत की गई है। वहाँ भौतिक जगत् में तो जल, पृथ्वी और तेज को कार्य सहित मूर्त और वायु, आकाश को अमूर्त बतलाया है। ऐसे ही आध्यात्मिक जगत् में प्राण और हृदयाकाश को अमूर्त एवं उससे पृथक् शरीर और इन्द्रियगोलकादि को मूर्त कहा है। जिन्हें मूर्त्त बताया, उन्हें क्षणभंगुर अर्थात् रूपान्तरित होने वाले, किन्तु प्रत्यक्ष प्राप्त होने से 'सत्' कहा और वैसे ही अमूर्त को अमृत अर्थात् शाश्वत कहा है। इस प्रकार से उन जड़ तत्त्वों की विवेचना करते समय ही आधिभौतिक जगत् में सूर्यमण्डल को और आध्यात्मिक जगत् में नेत्र को मूर्त का सार कहा है। ऐसे ही आधिदैविक जगत् में सूर्यमण्डल के मध्य में स्थित पुरुष को और आध्यात्मिक जगत् में नेत्र में स्थित पुरुष को अमूर्त का सार बतलाया है। इस प्रकार सगुण परब्रह्म के साकार और निराकार-दोनों रूपों का उल्लेख कुरके पुनः कहा गया है कि 'नेति-नेति' अर्थात् इतना ही नहीं, इतना ही नहीं। इससे अधिक अन्य कोई सदुपदेश नहीं है। इसके उपरान्त यह भी कहा गया है कि- उस परम तत्त्व का नाम सत्य का सत्य है, यह प्राण अर्थात् जीवात्मा सत्य है तथा उसका भी सत्य वह परमपिता परमात्मा ही है।' इस प्रकार उस परब्रह्म के साकार रूप का वर्णन करके यह भाव प्रदर्शित किया गया है कि इनमें जो जड़ पदार्थ है, वह तो उसकी अपरा प्रकृति का विस्तार है और जो चेतन है, वह जीव रूपी उसकी परा प्रकृति है तथा इन दोनों सत्यों का आश्रयभूत वह परब्रह्म परमात्मा इनसे भी परे अर्थात् सर्वोत्कृष्ट है। अतः यहाँ 'नेति- नेति' कहकर सत्य के सत्य परब्रह्म का होना सिद्ध किया है। अतः परब्रह्म परमात्मा एक मात्र निर्गुण निराकार ही है, सगुण-साकार नहीं, ऐसा नहीं मानना चाहिए।।२२।। उस परमात्मा के साकार और निराकार दोनों ही स्वरूप यथार्थतः प्राकृत मन-बुद्धि और इन्द्रियों से परे हैं। अगले सूत्र में इसी भाव को स्पष्ट करने के लिए आचार्य अपना मत प्रस्तुत करते हैं- ( ३४२ ) तदव्यक्तमाह हि।२३॥ सूत्रार्थ-हि = क्योंकि, तत् = उस (ब्रह्म) के सगुण रूप को, अव्यक्ततम् - इन्द्रियों द्वारा ग्रहण न किये जाने वाला, आह = (श्रुति) कहती है। व्याख्या- श्रुतियों में उस परब्रह्म को इन्द्रियों द्वारा अग्राह्य बतलाया गया है। निराकार रूप से ही वह अव्यक्त है, मात्र इतना ही नहीं; वरन् ऐसे ही उसका साकार रूप भी इन प्राकृत मन और इन्द्रिय आदि का विषय नहीं
Disclaimer / Warning: All Iiterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 159
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० २ सूत्र २४ १६ है; क्योंकि श्रुति स्मृतियों में उसे भी अव्यक्त कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् (३/१/३) में परब्रह्म साकार- स्वरूप का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-'जब यह जीवात्मा सबके शासक,ब्रह्मा के भी आदि कारण, सम्पूर्ण जगत् के सृजेता, दिव्य- प्रकाशस्वरूप परम पुरुष परमात्मा का साक्षात् कर लेता है, उस समय पाप-पुण्य दोनों को सम्यक् रूप से धो-बहाकर मलरहित हुआ ज्ञानी सर्वश्रेष्ठ समता को पा लेता है।' तदुपरान्त इसी उपनिषद् (३/१/४ से ७ तक) में सत्य, तप और ज्ञान आदि को उसकी प्राप्ति का माध्यम बतलाया गया है। पुनः अनेकों विशेषणों के द्वारा उस परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करके अगले मन्त्र (३/१/८) में उसके निराकार का वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'वह परब्रह्म न तो नेत्रों से, न वाणी से, न अन्य इन्द्रिय अथवा मन से, न तप से और न ही कर्मों के द्वारा देखा जा सकता है।' ऐसा ही उल्लेख अनेकानेक श्रुति-स्मृतियों में भी देखने को मिलता है। अतः परमपुरुष परमात्मा का साकार-निराकार (मूर्त-अमूर्त) दोनों रूप कहने का उद्देश्य यही है कि जगत् रूप रचना द्वारा क्रमशः उसके वास्तविक स्वरूप का बोध विधिपूर्वक सम्पन्न करवाया जा सके ।।२३।। उक्त सूत्र में प्रतिपादित कथन से यह नहीं मान लेना चाहिए कि परब्रह्म परमात्मा का किसी भी अवस्था में प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता। अगले सूत्र में आचार्य श्रुति-स्मृति दोनों के दृष्टान्तों द्वारा परमेश्वर के साक्षात्कार का वर्णन करते हैं- अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्॥२४॥। सूत्रार्थ-अपि च = इस प्रकार अव्यक्त होने पर भी, संराधने = सम्यक् रूप से आराधना करने पर (साधक अपने इष्ट परब्रह्म का प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त करते हैं,) प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् = यह बात वेद और स्मृति (प्रत्यक्ष और अनुमान) दोनों के ही कथन द्वारा भी सिद्ध होती है। व्याख्या- वेदों एवं स्मृतियों में जहाँ साकार और निराकार रूप परब्रह्म को इन्द्रिय आदि के द्वारा देखने में न आने वाला कहा गया है वहाँ यह भी कहा गया है कि वह परब्रह्म मंत्र-जप, स्मरण, ध्यान आदि आराधना के द्वारा प्रत्यक्ष-साक्षात् होने वाला भी है। परब्रह्म परमेश्वर का यह महान् अनुग्रह है, जब जीवात्मा उसके स्वरूप का साक्षात् दर्शन करता है। श्रुति-स्मृतियों ने इस तथ्य को विस्तार से प्रतिपादित किया है। परब्रह्म के दोनों स्वरूपों का उल्लेख श्रुति के अन्तर्गत कठोपनिषद् (१/२/२३) में कहा गया है- 'जिस पर ब्रह्म का अनुग्रह है, वह इसे प्राप्त कर लेता है, ब्रह्म अपने स्वरूप को उसके लिए प्रकाशित कर देता है।' मुण्डकोपनिषद्- (३/ १/८) में कहा है- 'आत्मा की शुद्ध, शान्त स्थिति से विशुद्ध अन्तःकरण वाला व्यक्ति ब्रह्म का ध्यान करता हुआ, उसे साक्षात् कर लेता है।' श्रेताश्वतर (२/५) में वर्णन मिलता है- 'योगी आत्मतत्त्व द्वारा ब्रह्मतत्त्व को ऐसे देख लेता है, जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक प्रज्वलित कर लिया जाता है। इसी प्रकार स्मृतियों के अन्तर्गत मनुस्मृति (६/६५) में कहा गया है- 'योग समाधि द्वारा ब्रह्म की सूक्ष्मता का दर्शन करे।' वेद और स्मृतियों के इन वचनों में उस साकार-निराकार रूप ब्रह्म को आराधना के द्वारा प्रत्यक्ष होने वाला कहा गया है। अतः यह सिद्ध होता है कि उसके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। गीता के अध्याय ११ के ५४ वें शोक में भगवान् ने कहा है कि 'हे अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा ही मुझे तत्त्वतः जाना जा सकता है। मेरा दर्शन हो सकता है और मुझमें ही प्रवेश किया जा सकता है।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म निश्चित ही साकार-निराकार दोनों ही स्वरूपों से युक्त है॥।२४।। उक्त सूत्र के प्रतिपादनार्थ कहा गया है कि उस परब्रह्म का स्वरूप आराधना द्वारा जानने में आता है, अन्यथा नहीं। इस कथन से तो यह प्रमाणित होता है कि यथार्थतः परब्रह्य निर्विशेष ही है। वह तो एकमात्र भक्त के लिए आराधना काल में साकार रूप में प्रकट होता है। अगले सूत्र में आचार्य इसी आशंका का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 160
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६२ वदान्त दशन
( ३४४ ) प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात्॥२५॥ सूत्रार्थ- प्रकाशादिवत् = प्रकाशादि गुणों के समान, च = ही, अवैशेष्यम् = (ब्रह्म में भी) विशिष्टता न होने से, प्रकाश: = प्रकाश, च = भी, कर्मणि = कर्म में, अभ्यासात् = अभ्यास करने से ही सिद्ध होता है। व्याख्या- जिस प्रकार अग्नि एवं विद्युत् आदि तत्त्व अपने प्रकट रूप में प्रकाश और उष्णता प्रधान गुणों से सम्पन्न रहते हैं और अप्रकट रूप अर्थात् प्रकट न हो-छिपा हो, उस अवधि में भी वे अपने गुणों से युक्त रहते हैं। व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही अवस्थाओं में उन स्वाभाविक गुणों से सम्पन्न होने में किसी भी तरह का कोई अन्तर नहीं आता। उसी प्रकार से वह परब्रह्म उपासना द्वारा साकार-प्रत्यक्ष होने के समय जिस प्रकार समस्त कल्याणकारी विशेष परिष्कृत दिव्य गुणों से युक्त हो जाता है, वैसे ही उसे अप्रकट रूप में भी समझना चाहिए। अव्यक्त ब्रह्म के गुणों में भी किसी भी तरह की भिन्नता नहीं होती अर्थात् जो स्वभाव निर्गुण ब्रह्म का है, वही प्रकृति साकार रूप ब्रह्म की होती है। उसमें कोई भेद उपस्थित नहीं होता। जैसे- अग्नि आदि प्रकाश का प्रकट होना, उनके साधन और कर्म पर निर्भर है, उसी प्रकार ब्रह्म से साक्षात्कार करने के लिए भी उनकी आराधना आदि कर्मों का अभ्यास करना अत्यावश्यक है, क्योंकि अभ्यास द्वारा ही कर्म की सिद्धि संभव है और कर्म-सिद्धि हो जाने पर ही ब्रह्म के प्रत्यक्ष रूप में दर्शन किये जा सकते हैं॥२५॥
हैं- आचार्य अगले सूत्र में उभयलिङ्ग वाले प्रकरण को समाप्त करते हुए अन्त में ब्रह्म का अनन्त होना बतलाते
(३४५ ) अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम्॥२६ ।। सूत्रार्थ- अतः - ऊपर कहे हुए इन कारणों से यही सिद्ध हुआ कि, अनन्तेन = (वह ब्रह्म) अनन्त दिव्य कल्याणकारी गुणों से सम्पन्न है, हि = क्योंकि, तथा = वैसे ही, लिङ्गम् = लक्षण प्राप्त होता है। व्याख्या-उपर्युक्त सूत्रों में दिये गये दृष्टान्तों-प्रतिपादनों से ब्रह्म का अनन्त होना सिद्ध होता है; क्योंकि ब्रह्म में अनन्त रूप होने के लक्षण उपलब्ध हैं। पूर्वोक्त कारणों से स्पष्ट हो जाता है कि वह परब्रह्म परमात्मा सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्ता, पतितपावनता, सौहार्द, आनन्द, विज्ञान, असङ्गता एवं निर्विकारिता आदि असंख्य कल्याणकारी गुण-समूहों से युक्त और निर्विशेष अर्थात् सभी गुणों से विहीन भी है; क्योंकि वेद और स्मृतियों में ऐसे ही लक्षण प्राप्त होते हैं। श्रुतियों एवं स्मृतियों ने उन विराट् परमपुरुष परमेश्वर के विभिन्न नाम व स्वरूप का जगह-जगह पर उल्लेख करके उनके अनन्त गुण-समुदाय की विवेचना की है ॥२६ ॥ अब अगले सूत्र में आचार्य परम पुरुष एवं उसकी प्रकृति भिन्न है या अभिन्न? इसी की विवेचना के लिए नया प्रकरण शुरू करते हैं। सर्वप्रथम शक्ति और शक्तिमान् में किस प्रकार अभेद है? यहाँ स्पष्ट करते हैं- ( ३४६ ) उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत्॥२७। सूत्रार्थ- उभयव्यपदेशात् = दोनों प्रकार (साकार-निराकार) का कथन उल्लिखित होने से, अहिकुण्डलवत् = सर्प के कुण्डलाकार होने के सदृश, तु = ही (उसका भाव जानना चाहिए)। व्याख्या- जैसे सर्प कभी अपने शरीर को संकुचित करके कुण्डलाकारवत् बैठता है और कभी अपनी सहज-स्वाभाविक दशा में रहता है; किन्तु दोनों ही स्थितियों में अलग-अलग तरह से दृष्टिगोचर होने पर भी वह सर्प एक ही है। यहाँ सहज स्थिति में रहना उसका कारण भाव है, उस क्षण उसकी कुण्डलादिभाव में प्रकट होने की शक्ति अप्रकट है; फिर भी वह उसमें स्थित रहते हुए भी उससे पृथक् रहता है। ऐसे ही कुण्डलादि रूप में स्थित होना उसका कार्यभाव है, यही उसकी पूर्वोक्त अप्रकट शक्ति का प्रकट होना है। वैसे ही वह ब्रह्म जब कारण भाव में रहता है, उस क्षण उसकी अपरा एवं परा प्रकृतिरूप दोनों शक्तियाँ सृष्टि से पूर्व उसमें अभिन्न रूप से समाहित रहती हुई भी अप्रकट रहती हैं; किन्तु जब वह कार्य रूप में स्थित होता है, तब
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 161
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०२ सूत्र ३० १६३ उसकी उक्त दोनों शक्तियाँ पृथक्-पृथक् नाम रूपों में प्रकट हो जाती हैं। अतः वेद में जो ब्रह्म को निराकार कहा गया है, वह उसकी कारण अवस्था को लेकर है और जो उसे अपनी शक्तियों से युक्त एवं साकार कहा है, वह उसकी कार्य-अवस्था को लेकर है। इस प्रकार श्रुति-स्मृति दोनों में उसके कारण और कार्य दोनों स्वरूपों का विवेचन मिलता है। अतः यह स्पष्ट होता है कि परमात्मा में उसकी शक्ति सदैव अभिन्न रूप से स्थित रहती है। दोनों ही अवस्थाओं में ब्रह्म का अभिन्नत्व उपस्थित रहता है।।२७।। अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से पुनः उक्त तथ्य को प्रतिपादित करते हैं- (३४७) प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥२८॥। सूत्रार्थ- वा = अथवा, प्रकाशाश्रयवत् = प्रकाश और उसके आश्रय के सदृश उनका अभिन्नत्व है, क्योंकि; तेजस्त्वात् - तेज की दृष्टि से दोनों को भेद रहित अर्थात् एक ही माना है। व्याख्या- जिस प्रकार प्रकाश और उसके आश्रय रूप अग्नि, सूर्य आदि दोनों ही तेज तत्त्वात्मक होने के कारण अभिन्न हैं; फिर भी वे (प्रकाश और सूर्य-अग्नि) दोनों पृथक् माने जाते हैं। प्रकाश और प्रकाशक (सूर्यादि) स्वयं प्रकाशरूप हैं, किन्तु जब वह प्रकाश किसी अन्य वस्तु पर पड़ता है, तो वह प्रकाशक कहलाता है। 'प्रकाश' या 'प्रकाशक' पदों से सम्बोधित किया जाने वाला तत्त्व एकमात्र तेज ही है; फिर भी वह प्रकाश्य वस्तु से अलग है। वह वस्तु प्रकाशित होने पर स्वयमेव प्रकाश स्वरूप नहीं होती। इसी प्रकार ब्रह्म आनन्दस्वरूप है, उस आनन्द से मुक्तावस्था में प्राणी आनन्दित होता है, तब आनन्द रूप परब्रह्म आनन्द प्रदाता कहलाता है। इतने मात्र से उसके आनन्दमय रूप में कोई अन्तर नहीं आता; इसी आधार पर तेज (प्रकाश और सूर्य) के दृष्टान्त से ब्रह्म और उसकी प्रकृति का अभेदत्व सिद्ध होता है॥।२८।। अगले सूत्र में आचार्य पुनः उक्त तथ्य को स्पष्ट करते हुए पूर्वोक्त कथन को प्रस्तुत कर रहे हैं- (३४८) पूर्ववद्वा ॥।२१ ॥ सूत्रार्थ- वा = अथवा; पूर्ववत् = जैसे पूर्व के सूत्र में स्पष्ट किया जा चुका है, वैसे ही दोनों का अभेदत्व समझना चाहिए। व्याख्या- अथवा पूर्व में वर्णित सूत्र (२/३/४३) में जिस प्रकार परब्रह्म परमात्मा का अपने अंशभूत प्राणि- समुदाय से अभेदत्व सिद्ध किया जा चुका है, उसी प्रकार से यहाँ शक्ति एवं शक्तिमान् अर्थात् प्रकृति और ब्रह्म का अभेदत्व समझना चाहिए। पूर्व के सूत्रों में दोनों (ब्रह्म एवं प्रकृति) की अभिन्नता के दृष्टान्त-प्रमाण भी प्रतिपादित किये गये हैं। अतः यहाँ पर दोनों का अभेदत्व ही सिद्ध होता है॥२९॥। अब अगले सूत्र में आचार्य शक्ति एवं शक्तिमान् के अभेदत्व का प्रमुख कारण बतलाते हैं- (३४९ ) प्रतिषेधाच्च॥३० ।। सूत्रार्थ- प्रतिषेधात् = दूसरे किसी अन्य का निषेध होने से, च = भी (अभेदत्व ही सिद्ध होता है)। व्याख्या- ऐतरेयोपनिषद् (१/१/१) में वर्णन मिलता है कि 'इस जगत् का उद्भव होने से पूर्व एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही था, उसके अतिरिक्त अन्य कोई भी चेष्टा करने वाला उपस्थित नहीं था।' यहाँ इस कथन में किसी अन्य का निषेध होने से भी यही मान्यता प्रतिपादित होती है कि जगत् की उत्पत्ति के पूर्व प्रलयकाल में उस परमात्मसत्ता की दोनों प्रकृतियाँ उसी में समाहित होकर स्थित रहती हैं। अतः उनमें किसी भी तरह के भेद की प्रतीति नहीं होती। इसी कारण उनका अभेदत्व बतलाया गया है।३०।। अभी तक परब्रह्म परमात्मा का अपनी दोनों प्रकृतियों से अभेदत्व कैसा है? स्पष्ट किया गया है। अब अगले सूत्र से आचार्य उन दोनों (प्रकृतियों) से उसकी विलक्षणता एवं श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 162
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६४ वेदान्त दर्शन
(३५० ) परमत: सेतून्मानसम्बन्ध्भेदव्यपदेशेभ्यः।३१॥ सूत्रार्थ-अतः= इस जड़-चेतनमय प्रकृतियों के समुदाय से, परम्- (वह परब्रह्म) अति श्रेष्ठ है, सेतून्मानसम्बन्ध = क्योंकि श्रुति में सेतु, उन्मान, सम्बन्ध और, भेदव्यपदेशेभ्यः = भेद का वर्णन करने से यही सिद्ध होता है। व्याख्या- इस जड़-चेतनमय सम्पूर्ण जगत् की कारणभूता जो भगवान् की प्रकृतियाँ हैं, उन्हें गीता के ७/ ४५ में परा-अपरा नाम से कहा गया है। श्वेताश्वतरोपनिषद् (१/१०) में इन प्रकृतियों का 'क्षर' और 'अक्षर' के नाम से उल्लेख मिलता है। गीता में कहीं (१३/१ में) क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के नाम से, तो कहीं (१३/९ में) प्रकृति और पुरुष के नाम से जिन प्रकृतियों का वर्णन किया गया है, गीता के (१५/७) में उन दोनों प्रकृतियों से तथा उन्हीं के विस्तार रूप इस दृश्य जगत् से वह परमात्मा सर्वथा विलक्षण एवं सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि वेद में उसकी सर्वोत्कृष्टता को सिद्ध करने वाले चार हेतु मिलते हैं; जो निम्नवत् हैं- १. सेतु २. उन्मान ३. सम्बन्ध और ४. भेद का वर्णन। सेतु का वर्णन छा.उ. ८/४/१ में इस प्रकार मिलता है- 'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिः' अर्थात् यह जो आत्मा (परमात्मा) है, यही सबको धारण करने वाला सेतु है। बृह. उ. ४/४/२२ भी कहता है कि 'सेतु ही सबको धारण करने वाला है। अब द्वितीय हेतु है उन्मान। उन्मान का अर्थ है- सबसे बड़ा माप अर्थात् महत् परिणाम। छा.उ. ३/१२/६ में परब्रह्म के सर्वाधिक महान् होने का वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'उतनी उसकी महिमा है, वह परम पुरुष इससे भी श्रेष्ठ है। समस्त प्राणी इस विराट् पुरुष का एकपाद हैं और शेष तीन अमृतमय पाद अप्राकृत परमधाम में हैं। तृतीय हेतु है सम्बन्ध का प्रतिपादन। ब्रह्म को उक्त प्रकृतियों का स्वामी, शासक और संचालक कहकर श्रुति ने इनमें शास्य-शासक भाव एवं स्वामि-सेवक भाव रूप सम्बन्ध का प्रतिपादन किया है। श्वेता.उ.६/७ में इसका उल्लेख इस प्रकार है- 'ईश्वरों के भी परम ईश्वर, देवों के भी परम देव, पतियों के भी परमपति, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रचयिता एवं स्तुत्य उस ज्ञान-स्वरूप परब्रह्म को हम जानते हैं।' चतुर्थ हेतु है भेद का प्रतिपादन। उस परमात्मा को इन दोनों प्रकृतियों का अन्तर्यामी एवं भरण- पोषण कर्त्ता कहकर और अन्य तरह से भी वेद ने इनसे उसकी पृथक्ता का निरूपण किया। उक्त सभी कारणों-दृष्टान्तों से यह प्रमाणित होता है कि वह सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वाधार परमात्मा अपनी दोनों प्रकृतियों से अति विलक्षण एवं सर्वोत्कृष्ट है; क्योंकि श्रुति में वर्णित उस परब्रह्म का स्वरूप दिव्य, अलौकिक और उपाधि से परे है। उसके साक्षात्कार का फल परम शान्ति की उपलब्धि, सभी तरह के बन्धनों से परे और अमृतत्त्व की प्राप्ति ही कहा गया है।।३१।। अभी तक यह स्पष्ट किया गया कि उस परमात्मा का अपनी अपरा एवं परा नामक प्रकृति के साथ भेद और अभेद दोनों ही हैं। अब जिज्ञासा यह होती है कि इन दोनों में से श्रेष्ठ कौन है- अभेदपक्ष या भेद पक्ष ? अगले सूत्र में इसी का समाधान प्रस्तुत है- (३५१) सामान्यात्तु॥३२॥ सूत्रार्थ-सामान्यात् = श्रुति में भेद और अभेद का वर्णन-दोनों ही समान भाव से है, तु = इससे तो यही निश्चय होता है कि भेद और अभेद दोनों पक्षों की मान्यता सिद्ध होती है। व्याख्या- श्रुतियों ने परब्रह्म परमात्मा को जीवात्मा (प्रकृति) से भेद और अभेद दोनों ही पक्षों में मान्यता प्रदान की है। श्रुति में भेद और अभेद दोनों का वर्णन समान भाव से किया गया है। परमात्मा को सबका प्रेरक, ईश्वर, अधिपति, शासक और अन्तर्यामी माना गया है। बृह.उ. ४/४/२२ में इसका प्रमाण इस प्रकार है- 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिः' अर्थात् यह परमात्मा ही सबका ईश्वर और समस्त भूत-प्राणियों का अधिपति है। मा.उ.६ में भी इसे 'एष सर्वेश्वरः' अर्थात् सबका ईश्वर कहा गया है। बृह.उप. ३/७/३ में भी इसके अन्तर्यामी
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 163
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०२ सूत्र ३५ १६५ होने का उल्लेख मिलता है- 'एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः' अर्थात् वह ब्रह्म समस्त प्राणियों का अन्तर्यामी है। इस प्रकार से भेद प्रतिपादक ऐसे अनेकों श्रुतिवचन देखने को मिलते हैं। इसी प्रकार अभेद की प्रतिपादक श्रुतियाँ भी देखने को मिलती हैं। यथा 'तत्त्वमसि' अर्थात् वह ब्रह्म तू है, (छा.उप. ६/८ वें से १६ वें खण्ड तक) में वर्णन मिलता है। बृह.उ. २/५/१९ में भी ऐसा ही संकेत मिलता है- 'अयमात्मा ब्रह्म' अर्थात् 'यह आत्मा ब्रह्म है।' इस प्रकार से भेद और अभेद-दोनों की प्रामाणिकता में कुछ भी अन्तर नहीं है। अतः किसी एक पक्ष को विशेष और किसी एक को अविशेष कहना कभी भी संभव नहीं है। परमात्मा के दोनों पक्षों का समान भाव से श्रुतियों में उल्लेख किया गया है, इसलिए यहाँ दोनों पक्षों की मान्यता सिद्ध होती है।३२॥। अब जिज्ञासा यह उठती है कि कहीं भेद-भाव से और कहीं अभेद भाव से उपासना के लिए आदेश देने का क्या अभिप्राय है? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं- ( ३५२ ) बुद्धयर्थः पादवत्॥३३॥ सूत्रार्थ- पादवत् = अंग विहीन परब्रह्म के चार पाद बतलाये जाने के समान ही, बुद्ध्यर्थः =चिन्तन-मनन आदि उपासना के लिए वैसा उपदेश किया गया है। व्याख्या- माण्डूक्य उपनिषद्-२ में वर्णन मिलता है कि जिस प्रकार से अंगरहित, रसस्वरूप परब्रह्म परमात्मा के तत्त्वज्ञान का विवेचन करने के लिए चार पादों की कल्पना करके श्रुति में उसके स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है, उसी प्रकार से भेद या अभेद भाव से उपासना का उपदेश उस परब्रह्म के तत्त्व का साक्षात्कार करने के लिए ही किया गया है; क्योंकि साधकों की प्रकृति अलग-अलग होती है। कोई साधक भेद उपासना को, तो कोई अभेद उपासना को स्वीकार करते हैं। किसी भी भाव से उपासना की जाये, साधक अपने एक निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करता है। दोनों तरह की उपासना पद्धति से प्राप्त होने वाला तत्त्वज्ञान और भगवत् प्राप्ति रूप फल एक ही है। अतः परब्रह्म के तत्त्वज्ञान का साक्षात् कराने के लिए साधक की प्रकृति, पात्रता और विश्वास के अनुसार वेद में भेद या अभेद नामक उपासना का उल्लेख प्रायः ठीक ही है। उन्हें एकमात्र ब्रह्म की ही उपासना माननी चाहिए।३३।। अब आशंका यह होती है कि यदि ब्रह्म और उसकी दोनों प्रकृतियों में भेद नहीं है, तो ब्रह्म की परा प्रकृति रूप जो प्राणि-समुदाय हैं, उनमें भी आपस में भेद सिद्ध नहीं होगा। ऐसा सिद्ध होने से वेद में जो नानात्व का प्रतिपादन है, उसकी सङ्गति किस प्रकार होगी? आचार्य अगले सूत्र में इसी का समाधान करते हैं- (३५३) स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत्॥३४॥ सूत्रार्थ-प्रकाशादिवत् = प्रकाश आदि के सदृश, स्थानविशेषात् = शरीर रूप स्थान की विशेषता होने से भिन्न होना असंगत नहीं है। व्याख्या- जिस तरह से समस्त प्रकाशमान पदार्थ प्रकाश-जाति की दृष्टि से समान तत्त्व वाले होने से एक ही हैं, किन्तु उनमें ग्रह, नक्षत्र, तारे, दीपक, अग्नि, सूर्य और चन्द्र आदि में स्थान और शक्ति-रूपादि का भेद होने से उक्त इन सभी में परस्पर भिन्नता दिखलाई देती है, उसी प्रकार भगवान् की परा-प्रकृति अर्थात् जड़ चेतन रूपात्मक सभी प्राणि-समुदाय अपने फल प्राप्ति रूप से विभिन्न प्रकार के दिखलाई देते हैं। फिर भी प्राणियों के अनादि कर्म-संस्कारों का जो समूह है, उसके अनुसार फल रूप में मिले हुए शरीर, बुद्धि और शक्ति आदि के तादात्म्य से उनमें आपस में भेद होना असङ्गत नहीं है। वे ब्रह्म की दोनों प्रकृतियों के सम्बन्ध से एक ही प्रकार के हैं।।३४ ।। अगले सूत्र में आचार्य पुनः उक्त तथ्य को दृढ़ करने के लिए कहते हैं कि- (३५४) उपपत्तेश्च॥३५।।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 164
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६६ वेदान्त दर्शन सूत्रार्थ-उपपत्ते: = श्रुति की विवेचना से, च = भी (यही बात प्रमाणित होती है)। व्याख्या-वेद (श्रुति) में इस संसार के उद्भव से पूर्व एकमात्र अविनाशी परब्रह्म की ही सत्ता विवेचित की गई है। तदुपरान्त उसी ब्रह्म के द्वारा समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का विवेचन करके उसे सबका अभिन्न- निमित्त-उपादान कारण प्रमाणित किया गया है। तत्पश्चात् 'तत्त्वमसि' आदि वचनों के द्वारा उस ब्रह्म को स्वयं से अभिन्न मानते हुए उसकी उपासना का उपदेश प्रदान किया गया है। पुनः उसी को भोक्ता, भोग्य आदि से सम्पन्न इस विचित्र जड़-चेतनमय जगत् का स्रष्टा, संचालक एवं जीवों के कर्मफल भोग और बन्ध-मोक्ष की व्यवस्था बनाने वाला बताया गया है। प्राणि-समुदाय एवं उनके कर्म-संस्कारों को अनादि कहकर उनके उद्भव का निषेध किया गया है। उपर्युक्त सभी तथ्यों पर विचार करने से यह प्रमाणित होता है कि प्राणि- समुदाय चैतन्यता के कारण तो आपस में एक या अभिन्न हैं; किन्तु विभिन्न कर्म-संस्कारजनित सीमित व्यक्तित्व के कारण पृथक्-पृथक् हैं। प्रलय की स्थिति में समस्त प्राणी ब्रह्म में लय हो जाते हैं, सृष्टि काल में पुनः उसी ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्म की ही परा प्रकृति के अन्तर्गत होने से उसी के अंश होते हैं। इसलिए भी वे ब्रह्म से अभिन्न कहे जाते हैं। ब्रह्म उनका नियामक होता है और सभी प्राणी उसके नियम्य होते हैं। इसलिए वे उस ब्रह्म से भी पृथक् हैं और परस्पर भी। यही मानना उचित होगा॥३५॥ अगले सूत्र में आचार्य पुनः उक्त तथ्य को दृढ़ कर रहे हैं- (३५५) तथाऽन्यप्रतिषेधात् ॥३६॥ सूत्रार्थ- तथा = और वैसे ही, अन्यप्रतिषेधात् - अन्य का निषेध होने से भी यही मान्यता उचित है। व्याख्या- परब्रह्म से पृथक् अन्य किसी की सत्ता को श्रुति (वेद) ने नहीं स्वीकार किया है। यह बात ऊपर के सूत्रों में अनेक बार प्रतिपादित की जा चुकी है। कठोपनिषद् २/१/११ में भी परब्रह्म परमात्मा से भिन्न किसी दूसरी वस्तु की सत्ता का प्रतिषेध किया गया है। इससे भी यही प्रमाणित होता है कि परा और अपरा दोनों शक्तियों से युक्त वह परमात्मा ही विभिन्न रूपों में प्रकट होकर परिलक्षित हो रहा है। परब्रह्म की दोनों (परा, अपरा) प्रकृतियों में नानात्व होते हुए भी उस परब्रह्म में किसी भी तरह का कोई भेद नहीं है। वह परमात्मा सर्वथा विकाररहित, असङ्ग, अभेद और अखण्ड है। जब किसी दूसरे का अस्तित्व है ही नहीं, तब एकमात्र परब्रह्म परमात्मा का ही विभिन्न रूपों में उत्पन्न (प्रकट) होना स्वीकारने में किसी भी तरह का विरोध नहीं होना चाहिए। अतः यहाँ पर उक्त सूत्रों में विवेचित मान्यता ही उपयुक्त प्रमाणित होती है॥३६॥ उपर्युक्त सूत्रों में विवेचित तथ्य को ही सिद्ध करने हेतु आचार्य अगले सूत्र में एक दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं- (३५६) अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः ।।३७।। सूत्रार्थ- अनेन = इस प्रकार भेद और अभेद के विवेचन द्वारा, आयामशब्दादिभ्यः= और श्रुति में जो ब्रह्म के व्यापकत्व सूचक शब्द आदि हेतु हैं; वनसे भी, सर्वगतत्वम् = उस (ब्रह्म) का सर्वत्र संव्याप्त होना सिद्ध होता है। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा के सर्वत्र संव्याप्त होने के अनेक प्रमाण श्रुतियों में मिलते हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद् ३/९ एवं ईशोप.१ में वर्णन मिलता है कि 'उस सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम से यह समस्त जगत् संव्याप्त हो रहा है।' इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय के २२ वें शोक में कहा गया है कि 'परमपुरुष वह है, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व संव्याप्त हो रहा है।' इस प्रकार श्रुति-स्मृति दोनों के वचनों में जो परब्रह्म के सर्वत्र व्याप्त होने को सूचित करने वाले 'सर्वगत' आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उनसे और उपर्युक्त सूत्रों के विवेचन द्वारा भी यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म सर्वत्र संव्याप्त है। सर्वथा अभेद मानने से भी इस व्याप्य-व्यापक भाव की सिद्धि नहीं
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 165
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० २ सूत्र ४० १६७ होगी। अतः यही निश्चय हुआ कि परबह्म परमात्मा अपनी दोनों- (परा-अपरा) प्रकृतियों से पृथक् भी है और अपृथक् भी; क्योंकि वे दोनों ही उनकी शक्तियाँ हैं। शक्ति एवं शक्तिमान् में भेद नहीं होता, इसलिए भी और उन प्रकृतियों के अभिन्न निमित्त-उपादानकारण होने के कारण भी वे उनसे अभिन्न हैं तथा इस प्रकार अभिन्न होते हुए भी उनके पालक होने से वे उनसे सतत विशेष लक्षणों से युक्त और सर्वोत्तम भी हैं॥३७॥ इस प्रकार उस परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करने के पश्चात् अब इस तथ्य का समाधान करने के लिए प्राणियों के कर्मों का कर्मानुसार फल देने वाला कौन है? आचार्य अगले सूत्र से इसी प्रकरण का शुभारम्भ करते हैं- (३५७) फलमत उपपत्तेः॥३८।। सूत्रार्थ- फलम् = प्राणियों के कर्मों का फल, अतः = इस परब्रह्म परमात्मा से ही मिलता है, उपपत्तेः = क्योंकि ऐसा मानना ही उपयुक्त है। व्याख्या- समस्त प्राणी परब्रह्म परमात्मा के आश्रय में ही अपने कर्म-फल रूपी भोगों को भोगते हैं; क्योंकि कर्मों का ज्ञाता एवं सर्वशक्तिमान् होने के कारण परब्रह्म ही ऐसी सामर्थ्य रख सकता है। परब्रह्म के अतिरिक्त न तो जड़-प्रकृति ही कर्मों को जानने एवं उनके फल की व्यवस्था करने में समर्थ है और न स्वयं जीवात्मा ही समर्थ है; क्योंकि वे दोनों ही अल्पज्ञ और अल्पशक्ति वाले हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के ७/२२ में कहा गया है कि 'कहीं-कहीं जो देवता आदि को कर्मों का फल-प्रदाता बतलाया है, वह भी भगवान् के विधान को लेकर बताया गया है, भगवान् ही उनको अपना निमित्त बनाकर कर्मकृत-फल प्रदान करते हैं। यहाँ इस प्रतिपादन से यह प्रमाणित होता है कि प्राणियों के कर्मफल-भोग विधि-व्यवस्था बनाने वाला एकमात्र वह परब्रह्म परमात्मा ही है, अन्य कोई नहीं हो सकता ।३८॥ अब जिज्ञासा होती है कि क्या केवल युक्ति से ही यह बात सिद्ध होती है या फिर इसमें श्रुति आदि प्रमाण भी हैं? सूत्रकार अगले सूत्र में इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३५८) श्रुतत्वाच्च॥३१॥ सूत्रार्थ-श्रुतत्वात् = श्रुति में ऐसा ही कथन होने से, च = भी (यही मानना उचित है कि कर्मफल की प्राप्ति परब्रह्म परमात्मा से ही होती है)। व्याख्या- यह बात वेदों में जगह-जगह पर बारम्बार देखने को मिलती है कि प्राणियों के कर्मफल का द्रष्टा व प्रदाता एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही है। तैत्तिरीय उपनिषद् में भी परब्रह्म को ही 'महान् अज आत्मा कर्मफल प्रदाता' कहा गया है। अन्य श्रुतियाँ भी ऐसा ही बतलाती हैं, देखें- कठोपनिषद् २/२/८ में ऋषि इस प्रकार कहते हैं- 'य एष सुप्रेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते' अर्थात् जो यह प्राणियों के कर्मानुसार विभिन्न तरह के भोगों का निर्माण करने वाला परम पुरुष परब्रह्म प्रलय काल में सबके सो जाने पर भी जागता रहता है, वही परम पवित्र है, वही ब्रह्म है और उसे ही अमृत कहा जाता है। ऐसा ही उल्लेख श्वेताश्वतरोपनिषद् ६/१३ में किया गया है, देखें- 'नित्यो नित्यानाम् चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्' अर्थात् 'जो एक, नित्य, परमचेतन, परब्रह्म बहुत से नित्य, चेतन आत्माओं के कर्मफल-भोग के विधान का नियम बनाता है।' इस प्रकार से इन श्रुति-दृष्टान्तों से यही सिद्ध होता है कि प्राणियों के कर्मफल की व्यवस्था बनाने वाला एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही है, अन्य और कोई नहीं ।३९॥ उक्त विषय के सन्दर्भ में सूत्रकार अगले सूत्र में आचार्य जैमिनि का मत प्रस्तुत करते हैं- (३५९ ) धर्मं जैमिनिरत एव ॥।४० ॥। सूत्रार्थ- अत एव = अतः पूर्वोक्त कारणों से ही, जैमिनि: = आचार्य जैमिनि, धर्मम् = धर्म (कर्म) को ही फल-प्रदाता बतलाते हैं।
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 166
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६८ वदान्त दशन व्याख्या- आचार्य जैमिनि की मान्यता है कि युक्तियों और वैदिक प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि धर्म अर्थात् कर्म स्वयं ही फल-प्रदाता है; क्योंकि यह प्रत्यक्ष रूप से प्रायः देखा जाता है कि कृषि आदि कर्म करने का अन्न की उत्पत्ति स्वरूप फल होता है। ऐसे ही श्रुति में भी 'अमुक फल की इच्छा हो, तो अमुक कार्य करना चाहिए।' इस प्रकार विधि-कथन होने से यही प्रमाणित होता है कि कर्म स्वयमेव फल-प्रदाता है। उससे पृथक् किसी कर्मफल-प्रदाता की कल्पना करना अनिवार्य नहीं है। जिस कर्म के द्वारा फल का उद्भव होता है, वह कर्म परब्रह्म से ही प्रकट होता है। धर्म, कर्म का ही पर्याय है। आचार्य जैमिनि के मतानुसार कर्म ही फल का देने वाला है। अतः श्रेष्ठ कर्म से श्रेष्ठ फल की प्राप्ति और निकृष्ट कर्म से निकृष्ट फल की प्राप्ति होना प्रमाणित होता है॥४०॥ अगले सूत्र में सूत्रकार आचार्य जैमिनि के उपर्युक्त कथन को अयुक्त सिद्ध करते हुए अपने मत की ही उपादेयता बतलाते हैं- (३६० ) पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात्॥।४१।। सूत्रार्थ-तु= किन्तु, बादरायण := आचार्य वेदव्यास, पूर्वम् = पूर्वोक्त परब्रह्म को ही कर्मफल प्रदाता मानते हैं, हेतुव्यपदेशात् = क्योंकि श्रुति में उस ब्रह्म को सबका कारण कहा गया है, (अतः यहाँ पर आचार्य जैमिनि का कथन उचित है, ऐसा प्रतीत नहीं होता)। व्याख्या-आचार्य वेदव्यास जी आचार्य जैमिनि के विचार से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि आचार्य जैमिनि जो कर्म को ही फल-प्रदाता कहते हैं, वह उचित नहीं है; क्योंकि कर्म तो निमित्त-मात्र होता है। वह जड़, परिवर्तनशील एवं क्षणभंगुर होने से फल की व्यवस्था करने में समर्थ नहीं हो पाता। अतः जैसा कि पूर्व के सूत्रों में बतलाया गया है कि एकमात्र वह परब्रह्म परमात्मा ही जीवों-प्राणियों के कर्मानुसार फल प्रदाता है। श्रुति (वेद) भी परब्रह्म परमात्मा को ही समस्त प्राणियों का हेतु (कारण) बतलाती है।४१।।
॥ इति तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्तः ॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic malerial on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 167
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
।। अथ तृतीयाध्याये तृतीयः पादः॥ द्वितीय पाद के अन्तर्गत जीव की स्वप्र और सुषुप्ति का विवेचन करने के उपरान्त परब्रह्म के स्वरूप के सन्दर्भ में यह स्पष्ट किया गया कि वह साकार-निराकार दोनों लक्षणों से युक्त है। तदुपरान्त उस ब्रह्म का अपनी शक्ति स्वरूपा परा और अपरा प्रकृतियों से किस तरह भेद और अभेद है, यह भी स्पष्ट किया गया और अन्त में यह भी स्पष्ट किया गया कि प्राणियों के कर्मफल की व्यवस्था बनाने वाला एक मात्र वह परम-आत्मा ही है। अब वेदान्त वचनों में जो एक ही आत्मविद्या का अनेक प्रकार से उल्लेख किया गया है, उसकी एकता बतलाने एवं विभिन्न जगहों में आये हुए भगवत् प्राप्ति सम्बन्धी भिन्न-भिन्न वाक्यों के विरोध हटाकर उनके एकत्व को बतलाने के लिए तृतीय पाद का शुभारम्भ करते हैं- (३६१ ) सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात्॥१॥ सूत्रार्थ-सर्ववेदान्तप्रत्ययम् - समस्त श्रुतियों (वेद-उपनिषदों) में एक ही अध्यात्मविद्या का विवेचन होने से, वह (विद्या) अभिन्न है, चोदनाद्यविशेषात् = क्योंकि आज्ञार्थक-विधायक शब्दादि में भेद नहीं होता। व्याख्या- वेद-उपनिषद् आदि सभी श्रुतियों में जो विभिन्न तरह की अध्यात्म-विद्याओं का प्रतिपादन किया गया है, उन सबमें विधि-वचनों (शब्दादि) की समानता है। उन सबमें एकमात्र उस अविनाशी परब्रह्म के साक्षात्कार की ही चर्चा की गई है और सभी का अभीष्ट उसी को बतलाया गया है, अतः उन सभी की समानता है। एक ओर तो छा.उ. १/४/१ में 'ओमित्येतदक्षरमुद्रीथमुपासीत' अर्थात् 'ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, ऐसी उपासना करे'। इस तरह के विभिन्न वाक्यांशों में प्रतीकोपासना का वर्णन करके उसके द्वारा ब्रह्म को लक्ष्य कराया गया है, तो अन्यत्र (तै.२/१ में) उसे 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' अर्थात् ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अन्तरहित है। मा.उ .- ६ में उसे सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, सभी भूतों की उत्पत्ति और प्रलय का केन्द्रक कहा गया है। इस तरह विधि मुख से उसके कल्याणकारी दिव्य रूपों से उसे निरूपित किया गया और कहीं पर अर्थात् कठोपनिषद् १/३/१५ में उसे शब्द से परे, अस्पर्श, अरूप, नीरस, गन्धरहित एवं शाश्वत, नित्य, अनादि, अनन्त कहा गया है। इस तरह से सभी जड़ और चेतन से पृथक् कहकर उस ब्रह्म का लक्ष्य (बोध) कराया गया है और बाद में यह भी कहा गया कि उसे प्राप्त कर साधक जन्म-मृत्यु से भी मुक्त हो जाता है। उक्त सभी दृष्टान्तों का एक मात्र उद्देश्य उस ब्रह्म को लक्ष्य कराकर उसे पा लेना है। सर्वत्र प्रकार भेद से उस ब्रह्म का ही चिन्तन करना बतलाया गया है। अतः विधि एवं साध्य की समानता से साधन रूप विद्याओं में यथार्थ भेद नहीं है, अधिकारी के भेद से प्रकार भेद देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त जो अन्य शाखाओं के द्वारा विवेचित एक ही तरह की विद्याओं में आंशिक भेद दिखाई देता है, उसके द्वारा भी विद्याओं में अभेद ही मानना चाहिए, क्योंकि उनमें सभी जगह विधि वचन और फल की समानता है, अतः उनमें कोई यथार्थतः भेद नहीं होता है॥१॥ दृष्टान्तों के प्रतिपादन-शैली में कुछ भेद होने पर भी अध्यात्म-विद्या में भेद नहीं मानना चाहिए। आचार्य अगले सूत्र में इसी की विवेचना प्रस्तुत करते हैं- (३६२ ) भेदान्नेति चेन्नैकस्यामपि॥२॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि ऐसा कहो कि, भेदात् = वहाँ उन स्थलों में प्रतिपादन करने की शैली का भेद है, अतः, न = समानता सिद्ध नहीं होती, इति न = तो, ऐसा कहना उचित नहीं है, क्योंकि, एकस्याम् = एक विद्या में, अपि = भी (इस तरह के प्रतिपादन का भेद होना उचित ही है, अनुचित नहीं)। व्याख्या- उस अविनाशी परब्रह्म को श्रुतियों में कहीं सत्, कहीं सर्वज्ञ, कहीं विज्ञान-आनन्दमय, कहीं सर्वव्यापक, तो कहीं साकार ब्रह्म आदि कहकर उपासना विधि भी उसके अनुरूप कही गई है। यहाँ इस
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 168
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७० वदान्त दशन प्रकार के भेदपूर्ण वर्णन से श्रुति- वाक्यों की एकता-समानता प्रमाणित नहीं होती। यदि ऐसा कहा जाय; तो यह अनुचित है; क्योंकि समस्त श्रुति-स्मृतियों ने जगत् के उत्पन्न होने के पूर्व एकमात्र अविनाशी सत् तत्त्व ब्रह्म को ही कारण रूप में स्थित कहा है। उसे ही 'आत्मा, प्रजापति, आनन्दमय और अव्याकृत' नाम से श्रुति वाक्यों में विवेचित किया गया है। वे समस्त श्रुतियाँ उस ब्रह्म की उपासना के उद्देश्य से ही कर्म-विधि का निर्देशन करती हैं; किन्तु शैली-भाव और प्रतिपादन के अनुसार उनके विधान में अन्तर हो सकता है। इससे स्पष्ट हुआ कि विभिन्न तरह से उपासना-विधि बतलाकर भी एक ही परब्रह्म की उपलब्धि का उद्देश्य इन श्रुति वाक्यों में समाहित है। इस प्रकार से एक ही सत् तत्त्व का प्रतिपादन करने वाली एक ही अध्यात्म विद्या में वर्णन का भेद होना ठीक नहीं है। उद्देश्य एवं परिणाम एक होने से उन सभी की समानता ही है ॥।२॥ मुण्डकोपनिषद् ३/२/१० में वर्णन मिलता है कि 'जिसने शिरोव्रत अर्थात् सिर पर जटा धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का नियमतः पालन किया हो, उसे ही इस अध्यात्म विद्या का उपदेश देना चाहिए।' लेकिन अन्य शाखा वालों ने ऐसा नहीं बतलाया। अतः यहाँ इस शाखा में वर्णित अध्यात्म विद्या का अन्य शाखाओं में वर्णित अध्यात्मविद्या से निश्चय ही भेद होना चाहिए। इस आशंका का समाधान आचार्य अगले सूत्र में बतला रहे हैं- (३६३ ) स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च सववच्च तन्नियमः ॥३॥ सूत्रार्थ- स्वाध्यायस्य = (शिरोव्रत का पालन) अध्ययन का (अङ्ग है), हि = क्योंकि, समाचारे = आथर्वणिक शाखा के उपदेश में, तथात्वेन = अध्ययन के अङ्गरूप से ही उसका नियम है, च = और, अधिकारात् = उस व्रत का पालन निभाने वाले का ही अध्यात्मविद्या के अध्ययन में अधिकार होने से, च= भी, सववत् = 'सव' होम की तरह, तन्नियम: = वह शिरोव्रत वाला नियम आथर्वणिकों के लिए ही है। व्याख्या- अथर्वण शाखा की मुण्डकोपनिषद् ३/२/१० में कहा गया है कि 'उन्हीं को इस अध्यात्म विद्या का उपदेश देना चाहिए, जिसने विधिपूर्वक शिरोव्रत का पालन किया है।' उपर्युक्त शाखा वालों के लिए जो शिरोव्रत के पालन का नियम निर्धारित किया गया है, वह विद्या के भेद से नहीं, बल्कि उन शाखा वालों के पठन सम्बन्धी परम्परागत आचरण में ही यह नियम दीर्घकाल से चला आ रहा है कि जो शिरोव्रत के नियम को निभाता हो, उसे ही उपर्युक्त अध्यात्म विद्या का उपदेश प्रदान करना चाहिए। एकमात्र उसे ही उस ब्रह्मविद्या की प्राप्ति में अधिकार है। जिसने शिरोव्रत को नहीं निभाया, उसका उस ब्रह्मविद्या के अध्ययन में अधिकार नहीं है। जैसे 'सव' (यज्ञ) में मन्त्रों के स्मरण का विधान उन्हीं की शाखा वालों के लिए है, वैसे ही इस शिरोव्रत के निभाने का विधान भी उन्हीं (स्वाध्याय करने वाले) लोगों के लिए है। अतः यह नियम एकमात्र पठन-पाठन से सम्बन्धित होने से इससे ब्रह्म विद्या की समानता (एकता) में किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है।।३।। सभी उपनिषदों में एक ही परब्रह्म के स्वरूप को व्यक्त करने के लिए ही प्रकार भेद से अध्यात्म (ब्रह्म) विद्या का उल्लेख मिलता है। आचार्य अगले सूत्र में इसी तथ्य को वेद प्रमाण से भी प्रमाणित करते हैं- (३६४ ) दर्शयति च ॥४॥। सूत्रार्थ-च = तथा, दर्शयति = श्रुति (भी) ऐसा ही दिखलाती है। व्याख्या-वेदों- श्रुतियों में भी अध्यात्म (ब्रह्म) विद्या की अभिन्नता प्रतिपादित की गई है। कठोपनिषद् १/ २/१५ में वर्णन किया गया है कि 'सर्वेवेदायत्पदमामनन्ति' अर्थात् सभी वेद (श्रुतियों ने) जिस (उस) परम प्राप्य परब्रह्म ॐ का प्रतिपादन करते हैं। ऐसा ही प्रतिपादन अन्यान्य श्रुतियों में भी किया गया है। श्वेताश्वतरोपनिषद् ६/११ में स्पष्ट संकेत दिया गया है- 'एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः' अर्थात् एक ही देव सम्पूर्ण प्राणियों में छिपा है। तैत्ति. २/७/१ में कहा गया है कि 'ब्रह्म ही एकमात्र तत्त्व है, उसके नानात्व व अनेकता की श्रुतियों
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 169
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ६ १७१ (उपनिषदों) में निन्दा की गई है। ऋग्वेद १/५२/१ में भी एकमात्र ब्रह्म की अभिन्नता व उपासना का स्पष्ट वर्णन मिलता है- 'एक ही परब्रह्म ने अपने से अतिरिक्त इस समस्त विश्व को अपने नियन्त्रण में किया हुआ है। उसी की उपासना वरणीय है।' गीता के अ.५/१५ में भी भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है-'वेदैश्च सर्वैरहमेववेद्यः' अर्थात् 'सभी वेदों के द्वारा एकमात्र मैं (परमेश्वर)ही जानने योग्य हूँ।' इस प्रकार श्रुति- स्मृति में एकमात्र एक ही परमेश्वर की अभिन्नता दृष्टिगोचर होती है। अतः उक्त दृष्टान्तों-पुष्ट वचनों से यही सिद्ध होता है कि ब्रह्म (अध्यात्म) विद्या अलग-अलग नहीं, एक ही है॥४॥ परब्रह्म की अभिन्नता के प्रतिपादन में एक स्थान की अपेक्षा दूसरी जगह कुछ बातें अधिक और कहीं कम बातें कही गई हैं। ऐसी स्थिति में विभिन्न प्रकरणों के वर्णन की समानता कैसे होगी? इसी का समाधान सूत्रकार अगले सूत्र में करते हैं- (३६५ ) उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधिशेषवत्समाने च॥५॥ सूत्रार्थ-समाने · एक ही तरह की विद्या में, च = ही, अर्थाभेदात् = अर्थ (प्रयोजन) में भेद न होने से, उपसंहार: = एक स्थान पर कहे हुए गुणों का दूसरे स्थान पर उपसंहार कर लेने, विधिशेषवत् = विधिशेष की भाँति (ठीक ही है)। व्याख्या- जिस तरह कर्मकाण्ड में प्रयोजन (अर्थ) का भेद न होने से एक शाखा में कहे हुए अग्रिहोत्रादि के विधिशेषरूप यज्ञादि धर्मों का अन्यत्र (अन्य शाखा वालों द्वारा) भी उपसंहार रूप से स्वीकार कर लिया जाता है, उसी तरह से विभिन्न प्रकरणों के द्वारा व्यक्त हुई ब्रह्मविद्या के प्रतिपादन में भी प्रयोजन भेद न होने से एक स्थान पर व्यक्त की हुई बातों का अन्यत्र अर्थात् अन्य शाखा वाले उपसंहार (स्वीकार) कर लेते हैं, यही उचित भी है॥५॥ श्रुति में जितनी भी ब्रह्मविद्याएँ विवेचित हैं, उनमें कहीं शब्दभेद, तो कहीं नाम भेद और कहीं प्रकरण भेद से भिन्नता दिखाई देती है; अतः इसकी समानता का वर्णन करने हेतु अगले सूत्र में स्वयं सूत्रकार शङ्का उत्पन्न करके समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३६६) अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ॥६॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहें कि, शब्दात् = कहे हुए शब्द द्वारा, अन्यथात्वम् = दोनों विद्याओं की भिन्नता प्रतीत होती है, अतः एकता प्रमाणित नहीं होती, इति न = तो ऐसा नहीं है, अविशेषात् = क्योंकि विधि और फल आदि में भेद (विशेषता) न होने से (दोनों विद्याओं में समानता है)। व्याख्या- यदि यह कहें कि दोनों तरह से ब्रह्मविद्या का वर्णन होने से वे दोनों विद्याएँ अलग-अलग हैं, क्योंकि छा.उ. ८/१/१ और ८/७/१ में दहर विद्या और प्राजापत्य विद्या नामक दो तरह की विद्याओं का उल्लेख प्राप्त होता है। ये दोनों विद्याएँ परब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग बतलाने वाली हैं, इस कारण से इनकी समानता मानी जाती है। इसमें आशंका होती है कि दोनों विद्याओं में शब्द का अन्तर है अर्थात् छा.उ.८/ १/१ में दहरविद्या के प्रकरण में मनुष्य देहरूप ब्रह्मपुर में हृदय रूप घर में जो आन्तरिक आकाश है तथा उसके भीतर जो वस्तु है, उसे जानना चाहिए।' ऐसे ही छा. उ. ८/७/१ में प्राजापत्यविद्या के प्रकरण में 'अपहतपाप्मा' आदि विशेषणों से सम्पन्न आत्मा को जानने के योग्य बतलाया गया है। इस प्रकार दोनों विद्याओं के भिन्नत्व से वे एक नहीं हैं। इसके उत्तर में आचार्य कहते हैं कि यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि दहरविद्या में जिसे जानने योग्य बतलाया गया है, उसे (ब्रह्म को) प्राजापत्य विद्या में आत्मा रूप से उस परमात्मा को सबका आश्रय कहने के लिए पहले उसके अन्दर की वस्तुओं को जानने के लिए कहा गया है। इस प्रकार दोनों विद्याओं में यथार्थतः कोई भेद न होने से भिन्न प्रकार से विवेचन होने पर
Disclaimer / Warning: All literary and artistic malerial on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 170
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७२ वेदान्त दर्शन भी उनमें एकता (समानता) ही होती है। ऐसे ही अन्यत्र दूसरी विद्याओं में भी समानता स्वीकारनी चाहिए।६॥ अब सूत्रकार अगले सूत्र में विद्याओं की समानता को सिद्ध करने के लिए अन्य असमान विद्याओं से उनकी विशिष्टता का विवेचन करते हैं- (३६७ ) न वा प्रकरणभेदात्परोऽवरीयस्त्वादिवत्।।७।। सूत्रार्थ-वा= अथवा, परोऽवरीयस्त्वादिवत् · परम श्रेष्ठ अथवा सामान्य आदि गुणों से युक्त अन्य विद्याओं के सदृश, प्रकरणभेदात् - प्रकरण के भेद से (उक्त दोनों विद्याएँ), न = भिन्न सिद्ध नहीं हो सकतीं। व्याख्या- छान्दोग्य और बृहदारण्यक दोनों उपनिषदों में उद्गीथ-विद्या का उल्लेख मिलता है। छा.उ. १/१ के पूर्व खण्ड में जो उद्गीथ-विद्या विवेचित है, वह अतिश्रेष्ठ है; क्योंकि वहाँ पर उद्गीथ की 'ॐ' कार के साथ एकत्व स्थापित करके उसका महत्त्व प्रवर्द्धित किया गया है। इसलिए (छा.उ. १/९/१ से ४ तक में) उसका फल भी अत्यधिक श्रेष्ठतम विवेचित किया गया है, किन्तु (बृह०उ० १/३/१ से २७ तक में) उद्गीथ विद्या एकमात्र प्राणों का श्रेष्ठत्व सम्पादन करने हेतु एवं यज्ञादि में उद्गीथ गान की अवधि में स्वर की विशिष्टता दिखलाने के लिए है। अतः वहाँ पर उसका फल भी वैसा नहीं कहा गया है। दोनों उपनिषदों में केवल देवासुर-संवाद सम्बन्धी एकता है; किन्तु उसमें भी उपासना की विधि में भिन्नता है। अतः किञ्चित्मात्र एकता के कारण दोनों की एकता नहीं हो सकती। एकता के लिए उद्देश्य, कारण विधेय एवं फल की एकता चाहिए, जो कि उन उपनिषदों में नहीं है। इसलिए उनमें भिन्नता होना ठीक है; किन्तु ऊपर विवेचित दहर और प्राजापत्य विद्या में ऐसा नहीं है, मात्र विवेचन की भिन्नता है। अतः विवेचन मात्र की भिन्नता होने से उत्तम और मध्यम आदि की भिन्नता से सम्पन्न उद्गीथ विद्या के सदृश ऊपर वर्णित दहर और प्राजापत्य विद्या में भिन्नता सिद्ध नहीं हो सकती; क्योंकि दोनों के उद्देश्य, विधेय एवं फल में पृथक्ता नहीं है। अतः यहाँ पर दोनों विद्याओं का भिन्नत्व सिद्ध नहीं होता।७। अगले सूत्र में आचार्य अन्य तरह की आशङ्का का उत्तर देकर दोनों विद्याओं की समानता को पुष्ट करते हैं- (३६८ ) संज्ञातश्चेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि।८ ॥ सूत्रार्थ-चेत् = यदि यह कहो कि, संज्ञातः = परस्पर संज्ञात्मक भिन्नता होने के कारण (समानता सिद्ध नहीं हो सकती) तो, तदुक्तम् = उसका उत्तर (सूत्र ३/१/१ में) दिया जा चुका है, तु = तथा, तदपि = वह (संज्ञात्मक भिन्नता से होने वाली विद्याविषयक विषमता) भी, अस्ति = अन्यत्र वर्णित है। व्याख्या- यदि ऐसा कहें कि उसमें संज्ञात्मक अर्थात् नाम का भेद है, उस विद्या का नाम दहर और दूसरी का नाम प्राजापत्य विद्या है। अतः दोनों की समानता नहीं हो सकती, ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं; तो इसका उत्तर पहले ही सूत्र ३/३/१ में दिया जा चुका है। वहाँ कहा जा चुका है कि सभी उपनिषदों में पृथक्-पृथक् नामों से जिन अध्यात्म (ब्रह्म) विद्याओं का उल्लेख किया गया है, उन सभी में विधिवाक्य, फल एवं उद्देश्य-विधेय आदि की समानता होने के कारण सभी ब्रह्म विद्याओं में समानता है। अतः यहाँ संज्ञात्मक नाम-भेद से किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है। इसके अतिरिक्त छा.उ. ३/१८/१ और ३/१९/१ में कहा गया है कि जिनमें उद्देश्य, विधेय और फल आदि की एकता नहीं है, उन विद्याओं में संज्ञात्मक नाम आदि से भेद होता है तथा वैसी ही विद्याओं का उल्लेख भी उपनिषदों में ही मिलता है; किन्तु उन विद्याओं से ब्रह्मविद्या का किसी भी तरह का सम्बन्ध नहीं है।।८ ।। संज्ञात्मक नाम का भेद होने से भी विद्या में समानता हो सकती है, इस बात को सिद्ध करने हेतु आचार्य अगले सूत्र में एक अन्य कारण बतलाते हैं- (३६९ ) व्याप्ेश्च समञ्जसम् ॥९।।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 171
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ११ १७३ सूत्रार्थ- व्याप्ते: = ब्रह्म सर्वत्र संव्याप्त है, इस कारण; च = भी, समञ्जसम् = ब्रह्म विद्याओं के विवेचन में समानता है। व्याख्या- परब्रह्म की व्यापकता सर्वत्र प्रसिद्ध है। श्रुतियों-स्मृतियों में एकमात्र परब्रह्म के सर्वव्यापकत्व का ही प्रतिपादन किया गया है। परमात्मा सर्वव्यापक होने के साथ-साथ सर्वशक्तिमान् एवं सर्वज्ञ भी है। इसी कारण ब्रह्म-सम्बन्धी विद्या के पृथक्-पृथक् नाम एवं प्रकरण के आने पर भी उनकी समानता (एकता) होना ठीक ही है; क्योंकि उन ब्रह्म सम्बन्धी समस्त आध्यात्मिक विद्याओं का उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म के स्वरूप को ही भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रस्तुत करना है। इसलिए बह्मविद्याओं का विभिन्न प्रकार से विवेचन होने से भी वे सब एक ही हैं तथा समस्त विद्याओं का उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म की प्राप्ति ही प्रमाणित होता है।।९।। अब जिज्ञासा उठती है कि विद्याओं की समानता एवं भिन्नता के निर्णय हेतु प्रकरण, संज्ञा एवं विवेचन की समानता और भेद की अपेक्षा है या नहीं? सूत्रकार अगले सूत्र में इसी का समाधान दे रहे हैं- (३७० ) सर्वाभेदादन्यत्रेमे॥१०॥ सूत्रार्थ-सर्वाभेदात् = सर्वस्वरूप परब्रह्म सम्बन्धी समस्त विद्याओं के अभेद से, अन्यत्र = अन्य स्थल पर दूसरी विद्या के सम्बन्ध में, इमे = इन पूर्व सूत्रों में कहे हुए सभी हेतुओं का उपयोग हुआ है। व्याख्या- विभिन्न स्थलों में विभिन्न तरह से विवेचित ब्रह्म से सम्बन्धित अन्य विद्याओं में भी भेद नहीं होता; क्योंकि अन्य जगहों में विवेचित समस्त हेतु परब्रह्म की प्राप्ति के लिए ही कहे गये हैं। इससे प्रमाणित होता है कि परब्रह्म से सम्बन्धित समस्त विद्याएँ अभिन्न हैं। परमात्मा सबसे अभिन्न एवं सर्वस्वरूप है। इसलिए उसके तत्त्वज्ञान का प्रतिपादन करने वाली आध्यात्मिक विद्याओं में कोई भेद नहीं रहता। अतः संज्ञा, प्रकरण एवं शब्दों से इन विद्याओं की भिन्नता प्रमाणित नहीं की जा सकती; क्योंकि ब्रह्म के लिए सभी संज्ञाएँ हो सकती हैं। हर प्रकरण में ब्रह्मविद्या की बात आ सकती है और उसकी विवेचना भी पृथक्-पृथक् सभी शब्दों से की जा सकती है; किन्तु ब्रह्मविद्या के अलावा जो अन्य विद्याएँ हैं, जिनका उद्देश्य ब्रह्म का विवेचन करना नहीं है; उनकी एक दूसरे से पृथक्ता या अपृथक्ता को जानने के लिए पूर्व सूत्रों में कहे हुए प्रकरण, संज्ञा एवं शब्द नामक तीनों हेतुओं का प्रयोग किया जा सकता है। अतः उपर्युक्त प्रतिपादनों से प्रमाणित हो जाता है कि परब्रह्म के विवेचन के सन्दर्भ में समस्त विद्याएँ एक हैं, अन्य नहीं ॥१०॥ अगले सूत्र में शिष्य जिज्ञासा करता है कि वे कौन से गुण हैं, जिनका वर्णन एक स्थान पर होकर अन्यन्र भी उनका सम्बन्ध हो जाता है? सूत्रकार इसी का समाधान दे रहे हैं- (३७१ ) आनन्दादयः प्रधानस्य॥११॥ सूत्रार्थ-आनन्दादय: = आनन्द आदि, प्रधानस्य = प्रधान अर्थात् परब्रह्म परमात्मा के धर्म (गुण) हैं। (उन समस्त आनन्दादि गुणों का अन्यत्र भी ब्रह्म के वर्णन में अध्याहार किया जा सकता है)। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा के जिन आनन्दादि गुणों (धर्मों) का वर्णन श्रुति में एक स्थल पर किया गया है, उन्हीं गुणों का उपसंहार (अध्याहार) अन्य स्थलों पर भी कर लिया जाता है। इस कारण जिन विशेष गुणों की विशिष्टता पूर्व में व्यक्त करने से रह गई है, वह अन्यत्र प्रतिपादित की जा चुकी है या कर देनी चाहिए। सूत्रकार ने यहाँ पर 'प्रधान' पद को ब्रह्म का बोधक बतलाया है; वह (ब्रह्म) सभी चेतन-अचेतन जगत् का संचालक जीवनदाता है। सूत्र के 'आदि' पद से सत्य, ज्ञान एवं उसकी व्यापकता आदि का ग्रहण (बोध) होता है। परमात्मा के आनन्द, सत्य, तत्त्वज्ञान आदि ऐसे गुण हैं, जिनको सभी उपासनाओं में सम्मिलित होना मानना चाहिए, चाहे वहाँ इनकी विवेचना भले ही न की गई हो। इसका तात्पर्य यह है कि सभी उपासनाओं में उपास्य एकमात्र ब्रह्म ही है। ये सभी गुण ब्रह्म के यथार्थ रूप को प्रकट करते हैं। तैत्तिरीयोपनिषद् में इन
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 172
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७४ वदान्त दशन गुणों का जैसा स्पष्ट व विस्तृत उल्लेख किया गया है, अन्यत्र नहीं देखने को मिलता। अतः अन्यत्र विवेचित उपासनाओं में जिज्ञासु को परब्रह्म के ऐसे दिव्य स्वरूप का चिन्तन-मनन करना अनिवार्य होने से यहाँ इन श्रेष्ठ गुणों का सम्बन्ध मान लेना चाहिए॥११।। अब आशंका होती है कि तैत्ति. उप. में ब्रह्म के 'प्रियशिरस्त्व' अर्थात् प्रिय ही उसका सिर है आदि गुणों (धर्मों) का वर्णन है। क्या उनका भी सर्वत्र ब्रह्मविद्या में संग्रह हो सकता है? इसी का अगले सूत्र में आचार्य समाधान करते हैं- ( ३७२ ) प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥१२॥ सूत्रार्थ- प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः = 'प्रियशिरस्त्व' अर्थात् 'प्रियरूप सिर का होना' आदि लक्षणों की प्राप्ति अन्यत्र ब्रह्मविद्या के प्रकरण में नहीं होती है; हि = क्योंकि, भेदे = इस प्रकार सिर आदि अङ्गों का भेद मानने पर, उपचयापचयौ = परबह्म में वृद्धि और ह्रास का दोष -प्रसङ्ग उपस्थित होगा। व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद् के ब्रह्मानन्दवल्ली के पाँचवे अनुवाक के प्रथम सूत्र में वर्णिन आता है- तस्य प्रियमेव शिरः। मोदो दक्षिणपक्षः। प्रमोदः उत्तरपक्षः। आनन्द आत्मा का 'प्रेम' सिर है, मोद दाहिना पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष (अर्थात् दायें-बाएँ हाथ) हैं। आनन्द उस आत्मा रूप देह का मध्य भाग है और ब्रह्म ही उसका पुच्छ एवं आधार है। इस प्रकार पक्षी का रूपक प्रदान करके उपनिषद्कार ने जो अङ्गों की कल्पना की है, यह ब्रह्म का स्वरूपगत धर्म नहीं प्रतीत होती है। इस कारण इसका संग्रह अन्यत्र ब्रह्मविद्या के अन्तर्गत करना उचित नहीं लगता; क्योंकि इस प्रकार अङ्ग-प्रत्यङ्गों के भेद से ब्रह्म में भेद मान लेने पर उसमें वृद्धि और ह्रास के दोषों की आशङ्का उत्पन्न होगी। अतः परब्रह्म के जो सहज (धर्म) लक्षण न हों, जो किसी रूपक को लक्ष्य मानकर कहे गये हों, उन्हें अन्यत्र प्रयोग में नहीं लेना चाहिए॥१२।। उक्त प्रकरण में जो आनन्द एवं ब्रह्म शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उनको अन्यत्र लेना चाहिए अथवा नहीं? सूत्रकार इस जिज्ञासा का समाधान यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं- (३७३ ) इतरे त्वर्थसामान्यात्॥१३॥ सूत्रार्थ-तु= परन्तु, इतरे = अन्य जो आनन्द आदि धर्म (गुण) हैं, वे (ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करने हेतु श्रुति में कहे गये हैं, अतः अन्यत्र ब्रह्मविद्या के सन्दर्भ में उन्हें स्वीकार किया जा सकता है), अर्थसामान्यात् - क्योंकि वे सभी अर्थ की समानता के उद्देश्य से व्यक्त किये गये हैं। व्याख्या-अंग-अवयवों की कल्पना से सम्पन्न जो 'प्रियशिरस्त्व' आदि धर्म (गुण) हैं, वे तो रूपक मात्र ही हैं। उक्त गुणों से पृथक् दूसरे-अन्य 'आनन्द' आदि स्वरूपगत धर्म हैं, वे परब्रह्म के सहज-स्वाभाविक गुण हैं, उनका अर्थ भी गुणवत् ही है। अतः उन आनन्दादि गुणों का विवेचन ही युक्तिसंगत है। उन श्रेष्ठ गुणों का संग्रह हर एक ब्रह्मविद्या के प्रसङ्ग-प्रकरण में विवेचित किया जा सकता है; क्योंकि उनमें अर्थ की एकता है अर्थात् उन समस्त गुणों के द्वारा प्रतिपाद्य परब्रह्म मात्र एक ही है।।१३।। उपर्युक्त सूत्र में रूपक की कल्पना क्यों की गई है? इसी का समाधान सूत्रकार अगले सूत्र में करते हैं- (३७४ ) आध्यानाय प्रयोजनाभावात्॥१४॥ सूत्रार्थ- प्रयोजनाभावात् = अन्य किसी भी तरह के उद्देश्य का अभाव होने से (यही ज्ञात होता है कि), आध्यानाय = उस परब्रह्म का सम्यक् रूप से ध्यान करने के लिए ही उसका तत्त्व लक्षणों-रूपकों के द्वारा बतलाया गया है। व्याख्या- तैत्तिरीयोपनिषद् २/१ के अनुसार इस रूपक का अन्य कोई उद्देश्य दृष्टिगोचर नहीं होता, अतः यही जानना चाहिए कि सर्वप्रथम जिस परब्रह्म का सत्य, ज्ञान एवं अनन्त के नाम द्वारा उल्लेख कर उसे (ब्रह्म
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 173
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र १७ १७५ को) सभी भूतों के हृदय में विद्यमान कहा गया है तथा उसके मिलने की महत्ता का भी उल्लेख किया गया है। यहाँ इस रूपक में अंगों-अवयवों का उल्लेख करने से किसी अन्य उद्देश्य की सिद्धि नहीं होती; परन्तु ऐसा लगता है कि ब्रह्म का अच्छी तरह से चिन्तन-मनन हो सके, इसी हेतु ऐसा उल्लेख किया गया है। जो ब्रह्म किसी भी इन्द्रिय से ग्रहणीय नहीं होता तथा जो हृदय रूपी गुहा में बुद्धि से स्थित रहता है, उसे सद्ज्ञान, सद्बुद्धि व गुरुकृपा द्वारा ही जाना जा सकना संभव है। रूपक के अन्तर्गत पुरुष के अवयवों का पक्षी द्वारा तुलनात्मक प्रतिपादन करके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय व आनन्दमय पुरुष का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि सूक्ष्म तत्त्व के विश्रेषण से एक ही परमात्मतत्त्व (अन्तरात्मा) को लक्षित किया गया है।।१४ ॥ यहाँ आनन्दमय से अन्तरात्मा को ही लक्षित किया गया है, अन्य किसी तत्त्व को नहीं, यह कैसे निश्चय किया जा सकता है? अगले सूत्र में इसी का समाधान करते हैं- (३७५ ) आत्मशब्दाच्च ॥१५॥ सूत्रार्थ-आत्मशब्दात् = आत्मा शब्द का प्रयोग होने से, च = भी (ऐसा ही सिद्ध हो जाता है)। व्याख्या- पूर्व सूत्र में सूत्रकार द्वारा कहे हुए कारण के अतिरिक्त यहाँ इस कथन में भी बारम्बार (आनन्दमय को) सभी की अन्तरात्मा बतलाते हुए आनन्दमय को ही विज्ञानमय की अन्तरात्मा बतलाते हैं। उसके पश्चात् अन्तरात्मा अन्य किसी दूसरे को नहीं कहा गया है। इससे भी सिद्ध हो जाता है कि यहाँ समस्त प्राणियों की अन्तरात्मा रूप आनन्दमय ही एकमात्र परब्रह्म है॥१५।। 'आत्मा' शब्द का प्रयोग तो अधिकांशतः 'जीवात्मा' का ही वाची होता है। फिर यह कैसे निश्चित हुआ कि यहाँ 'आत्मा' शब्द 'ब्रह्म' का ही वाची है। इसी पर अगले सूत्र में आचार्य अपना मत प्रस्तुत करते हैं- (३७६) आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात्॥१६ ।। सूत्रार्थ-आत्मगृहीति: = 'आत्म' शब्द से परब्रह्म का ग्रहण होना, इतरवत् = अन्य श्रुतियों के सदृश, उत्तरात् = उसके बाद के वर्णन से भी (प्रतिपादित होता है)। व्याख्या-सूत्रकार कहते हैं कि जिस प्रकार ऐतरेयोपनिषद् १/१ में वर्णन आता है- 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चनमिषत् स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति' अर्थात् 'पूर्व में यह एक आत्मा ही था, उसने इच्छा की, कि मैं लोकों की सर्जना करूँ।' यहाँ पर इस श्रुति में प्रजा की सृष्टि-संरचना के प्रकरण को माध्यम बनाकर 'आत्मा' शब्द का प्रयोग हुआ है। अतः यहाँ आत्मा शब्द को ही परब्रह्म का वाची स्वीकार किया गया है। ऐसे ही तैत्तिरीयोपनिषद् में भी आनन्दमय का उल्लेख करने के तुरन्त बाद ही 'सोऽकामयत बहुस्याम्' अर्थात् उसने इच्छा की, कि मैं बहुत हो जाऊँ' इत्यादि वचनों से उस आनन्दमय आत्मा से सम्पूर्ण जगत् के उद्भव-विकास का विवेचन किया गया है। अतः बाद में आये हुए इस वर्णन से भी यह प्रमाणित हो जाता है कि यहाँ 'आत्मा' शब्द परब्रह्म का वाची है तथा 'आनन्दमय' नाम भी यहाँ उस एकमात्र परब्रह्म का ही है॥१६ ।। उपर्युक्त कथन में पुनः आशङ्का उत्पन्न करके सूत्रकार अगले सूत्र में उसका समाधान प्रस्तुत करते हुए पूर्वोक्त सिद्धान्त को और भी अधिक दृढ़ कर रहे हैं- (३७७) अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात्॥१७।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहो कि, अन्वयात् = प्रत्येक वाक्य में 'आत्म' शब्द का अन्वय होने से यह सिद्ध नहीं होता कि आनन्दमय ब्रह्म है, इति = तो इसका उत्तर यह है कि, अवधारणात् = निर्धारित किये जाने से, स्यात् = (आनन्दमय ही ब्रह्म है) यह कथन सिद्ध हो सकता है।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 174
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७६ वेदान्त दर्शन व्याख्या- यदि यह कहें कि तैत्ति. उप. की ब्रह्मानन्दवल्ली में 'आत्मा' शब्द तो समस्त वाक्यों के बाद में प्रयुक्त हुआ है। तो फिर मात्र आत्मा-शब्द के प्रयोग से 'आनन्दमय' को ही परब्रह्म कैसे मान लें? तो इसके समाधान में सूत्रकार कहते हैं कि जिस 'आत्मा' शब्द की सभी वाक्यों में व्यापत है, वह ब्रह्मवाची नहीं है। अन्नमय, प्राणमय आदि आत्माओं को ब्रह्म का शरीर और ब्रह्म को उनकी अन्तरात्मा कहने के उद्देश्य से वहाँ सबके साथ 'आत्मा' शब्द का प्रयोग किया गया है। अतः अन्नमय का अन्तरात्मा उससे पृथक् प्राणमय को कहा गया है। पुनः प्राणमय का अन्तरात्मा उससे पृथक् मनोमय को कहा और मनोमय का अन्तरात्मा विज्ञानमय को एवं विज्ञानमय का अन्तरात्मा आनन्दमय को कहा है। तदुपरान्त आनन्दमय का अन्तरात्मा दूसरे अन्य किसी को नहीं कहा है तथा अन्त में यह निश्चित कर दिया कि इसका देह सम्बन्धी आत्मा यह स्वयमेव है, जो कि पूर्व में कहे हुए अन्य सभी पुरुषों का भी आत्मा है। ऐसा बतलाकर उसी से जगत् के उद्भव का विवेचन किया है। इस तरह से यहाँ आनन्दमय को पूरी तरह से परब्रह्म निर्धारित कर दिया गया है। इसी से प्रमाणित होता है कि 'आनन्दमय' शब्द परब्रह्म वाची है।।१७।। 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त रूप है) इस कथन द्वारा कहा हुआ ब्रह्म ही यहाँ अन्नरसमय पुरुष है या फिर उससे पृथक् अन्य कोई है? अगले सूत्र में आचार्य इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३७८) कार्याख्यानादपूर्वम्॥१८।। सूत्रार्थ-कार्याख्यानात् = परब्रह्म का कार्य कहा जाने के कारण यह पुरुष, अपूर्वम् = वह पूर्वोक्त ब्रह्म नहीं हो सकता। व्याख्या-यहाँ इस प्रकरण के अन्तर्गत जिस अन्नमय पुरुष का उल्लेख किया गया है, वह पूर्वोक्त ब्रह्म नहीं हो सकता; बल्कि अन्न का परिणामभूत यह चैतन्यमय मानव-देह ही यहाँ अन्नरस से युक्त पुरुष के नाम से बताया गया है; क्योंकि इस पुरुष को उस उपर्युक्त परब्रह्म का आकाश आदि के क्रमानुसार कार्य बताया गया है। साथ ही इसकी अन्तरात्मा प्राणमय आदि के क्रमानुसार विज्ञानमय जीवात्मा को कहा है और विज्ञानमय का आत्मा ब्रह्म को कहकर बाद में आनन्द के साथ उस ब्रह्म की समानता व्यक्त की गई है। अतः जिसके 'सत्य' 'प्राण' एवं 'अनन्त' ये धर्म कहे गये हैं और जो 'आत्मा' एवं 'आनन्दमय' नाम से जगत् का कारण कहा गया है, ब्रह्म इस अन्नरस से युक्त पुरुष से पृथक् (परे) समस्त भूतों का अन्तरात्मा है॥१८॥ सूत्र सं. ११ से १८ तक 'आनन्द' नामक प्रकरण का शुभारम्भ कर उसे पूर्ण कर दिया गया। अब अगले सूत्र में सूत्रकार पूर्व में प्रारम्भ किये हुए प्रकरण पर अन्य श्रुतियों के विषय में बतलाते हैं- (३७१ ) समान एवं चाभेदात्॥१९।। सूत्रार्थ-एवम् = इसी प्रकार, च = भी, समान := (एक शाखा में ब्रह्मविद्या की) समानता समझनी चाहिए, अभेदात् = क्योंकि शाखा के दोनों स्थलों पर उपास्य-ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। व्याख्या-वाजसनेयी शाखा के अन्तर्गत (शतपथ ब्राह्मण १०/६/३/२) में अग्नि रहस्य विद्या (जिसे शाण्डिल्य विद्या भी कहा जाता है) का वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'सत्य ही ब्रह्म है, ऐसा जानकर उपासना करनी चाहिए। निश्चय ही यह पुरुष श्रेष्ठ संकल्पों से युक्त है। वह जितने संकल्पों से युक्त होकर इस लोक से प्रस्थान करता है, परलोक गमन करने पर वैसे ही संकल्पों से युक्त होकर प्रकट होता है, वह मनोमय प्राण-देह वाले आकाश-स्वरूप आत्मा की उपासना करे। इसी वाजसनेयी शाखा के अन्तर्गत बृहदारण्यकोपनिषद् ५/६/१ में भी ऋषि ने कहा है कि 'प्रकाश ही जिसका सत्य स्वरूप है, ऐसा वह पुरुष मनोमय है। वह धान और जौ आदि की भाँति सूक्ष्म आकार वाला है। वह उस हृदयाकाश में अवस्थित है, वह सबका स्वामी व अधिष्ठाता है तथा यह जो भी कुछ है, सभी का श्रेष्ठ शासक है। ' इस प्रकार से इन दोनों पुस्तकों में विवेचित इन विद्याओं
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webelte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 175
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र २२ १७७ में भेद है या अभेद? यह आशंका उत्पन्न होने पर आचार्य बतलाते हैं कि जिस प्रकार भिन्न शाखाओं में ब्रह्मविद्या की समानता एवं उसके गुणों का उपसंहार ठीक माना गया है, वैसे ही एक शाखा में व्यक्त हुई विद्याओं में भी समानता माननी चाहिए; क्योंकि वहाँ पर उपास्य-इष्ट में अभेद है। दोनों स्थलों में एक ही ब्रह्म उपास्य बतलाया गया है॥११॥ उपास्य के सन्दर्भ में किस जगह विद्या की एकता स्वीकार करनी चाहिए और किस जगह नहीं? इसका समाधान करने के लिए अब यहाँ अगले सूत्र में पूर्वपक्ष का मत प्रस्तुत किया जाता है- ( ३८० ) सम्बन्धादेवमन्यत्रापि॥२०।। सूत्रार्थ- एवम् = इस प्रकार, सम्बन्धात् = उपास्य के सम्बन्ध से, अन्यत्र = अन्य स्थलों में, अपि = भी (क्या ब्रह्मविद्या की एकता मान लेनी चाहिए?)। व्याख्या- अन्यत्र कई स्थलों में एक ही उपास्य-उपासक का सम्बन्ध दिखलाते हुए ब्रह्म विषयक विद्या का उल्लेख किया गया है। एक ऐसा ही वर्णन बृहदारण्यकोपनिषद् ५/५/१ में देखने को मिलता है- 'यह सर्वप्रथम बतलाया गया है कि सत्य ही ब्रह्म है, इत्यादि। पुनः इसी उपनिषद् के ५/५/२ में इसी सत्य की सूर्य मण्डल में अवस्थित पुरुष के साथ और आँख में स्थित पुरुष के साथ एकत्व स्थापित किया गया है। तत्पश्चात् दोनों का रहस्यमय नाम क्रमशः 'अहर्' और 'अहम्' कहा है। यहाँ इस कथानक में एक ही उपास्य का सम्बन्ध होने से भी स्थान भेद से पृथक्-पृथक् दो उपासना पद्धतियाँ कही गई हैं। अतः इनमें भेद मानें या अभेद ?॥२०॥ उपर्युक्त सूत्र में व्यक्त की गई आशङ्का का समाधान सूत्रकार अगले सूत्र में दे रहे हैं- (३८१ ) न वा विशेषात्॥२१।। सूत्रार्थ-न वा= इन दोनों की एकता यहाँ सिद्ध नहीं होती, विशेषात् = क्योंकि इन दोनों पुरुषों के नाम एवं स्थान में भिन्नता है। व्याख्या- उपर्युक्त सूत्र में वर्णित इन दोनों उपासनाओं के स्थान और नाम पूर्वपक्ष द्वारा अलग-अलग बतलाये गये हैं। सूर्य मण्डल के मध्य में अवस्थित सत् पुरुष का तो रहस्यात्मक नाम 'अहर्' कहा है तथा आँख में अवस्थित पुरुष का नाम 'अहम्' कहा गया है। इस तरह से नाम एवं स्थान की भिन्नता होने से इन वर्णित उपासनाओं की समानता नहीं स्वीकार की जा सकती है। अतः एक के नाम एवं गुणों का उपसंहार अन्य दूसरे पुरुष में नहीं करना चाहिए। इससे प्रमाणित होता है कि इन ब्रह्म-अध्यात्म विद्याओं में उपास्य एवं उपासना की एकता नहीं हो सकती॥२१॥ उपर्युक्त तथ्य को सूत्रकार अगले सूत्र में श्रुति के प्रमाण द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं- (३८२) दर्शयति च ॥२२ ॥ सूत्रार्थ- च = और, दर्शयति = श्रुति में (भी) यही देखा जाता है। व्याख्या- जहाँ पर ऐसे नाम एवं स्थान की भिन्नता हो, वहाँ एक स्थल पर कहे हुए गुण अन्यत्र दूसरे स्थल पर नहीं लिये जाते; यह कथन श्रुति द्वारा इस प्रकार प्रतिपादित की गई है। छान्दोग्योपनिषद् १/ ७/५ में आधिदैविक साम के प्रसंग में सूर्य में स्थित पुरुष का वर्णन करके पुनः आध्यात्मिक साम के प्रसंग में आँख में स्थित पुरुष का विवेचन किया गया है। वहाँ पर सूर्य में स्थित पुरुष के नाम-रूप आदि का आँख में अवस्थित पुरुष में भी श्रुति ने स्वयमेव विधान करके दोनों की एकता स्थापित की है। इससे यह ज्ञात होता है कि ऐसी जगहों में विद्या की समानता मानकर एक के गुणों का दूसरी जगह उपसंहार करना सामान्य नियम नहीं है। जहाँ ब्रह्मविद्या की एकता मानकर गुणों का उपसंहार करना अभीष्ट होता है, उस सन्दर्भ में श्रुति स्वयं उसका नियम-विधान बना देती है, जैसे कि उक्त प्रसंग में सूर्य में अवस्थित
Disclaimer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 176
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७८ वेदान्त दर्शन पुरुष के गुणों का नेत्र में स्थित पुरुष में नियम-विधान किया गया है।।२२।। सूर्यमण्डलवर्ती एवं नेत्रवर्ती आदि पुरुषों में ब्रह्म के कौन-कौन से गुणों का उपसंहार नहीं किया जा सकता? इसके निर्णय हेतु सूत्रकार अगले सूत्र में अपने विचार व्यक्त करते हैं- (३८३) सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ॥।२३।। सूत्रार्थ- च = और, अतः = इस प्रकार विद्या की एकता न होने से, सम्भृतिद्युव्याप्ती = लोकों को धारण करना एवं द्युलोक आदि अखिल ब्रह्माण्ड को व्याप्त करके स्थित होना (ये दोनों ब्रह्म सम्बन्धी गुण), अपि = भी अन्यत्र (नेत्रान्तर्वर्ती आदि पुरुषों में) नहीं लेने चाहिए। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा जगत् का कारण होने के साथ ही द्युलोकादि समस्त लोकों का पालनकर्त्ता और जड़-चेतनमय सम्पूर्ण विश्व में संव्याप्त है। ये गुण नेत्र में रहने वाले या सूर्य के मध्य में अवस्थित पुरुष के नहीं हो सकते। यहाँ अक्षर रूप ब्रह्म के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए दो बातें प्रमुख रूप से कही गई हैं, उनमें प्रथम तो यह है कि वह द्युलोक से ऊपर और पृथिवी के नीचे तक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है और द्वितीय बात यह है कि वही समस्त प्राणियों को धारण करने वाला है। इन दोनों गुणों का नेत्रान्तर्वर्ती एवं सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषों में उपसंहार नहीं हो सकता है; क्योंकि प्रतीक उपासना के लिए सीमित स्थलों में स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापी होते हैं और न ही सभी को धारण करने वाले ही हो सकते हैं। ऐसे ही अन्य स्थलों में भी जहाँ पूर्ण परब्रह्म का उल्लेख नहीं है, उन प्रतीकों में इन गुणों का उपसंहार नहीं हो सकता है, ऐसा ही सम्यक् रूप से मान लेना चाहिए। ऊपर वर्णित विद्याओं की एकता का प्रमाणित न होना और इन गुणों का उन पुरुषों में न हो सकना, यह दोनों बातें उक्त पुरुषों में ब्रह्म के गुणों का उपसंहार न होना प्रमाणित करती हैं।।२३।। ऊपर वर्णित पुरुषों में ब्रह्म के गुणों में अध्याहार न हो, यह तो उचित है; किन्तु पुरुष विद्याओं में पुरुष के जो गुण कहे गये हैं, उनका अध्याहार तो दूसरी जगह-जहाँ-जहाँ पुरुषों का उल्लेख हो, वहाँ उन सबमें तो होना ही उचित है। इस प्रकार की आशंका का समाधान सूत्रकार अगले सूत्र में प्रस्तुत करते हैं- (३८४) पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥२४॥ सूत्रार्थ- पुरुषविद्यायाम् = पुरुषविद्या में बतलाये हुए गुणों के, इव = समान, च = भी, इतरेषाम् = अन्य पुरुषों के (गुण) नहीं हो सकते, अनाम्नानात् - क्योंकि श्रुति ने वैसे गुण कहीं नहीं बतलाये हैं। व्याख्या- पुरुष विद्या के प्रकरण में ब्रह्मरूप पुरुष के जो दिव्य गुण बतलाये गये हैं, उनका भी नेत्रान्तर्वर्ती एवं सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषों में और जहाँ-जहाँ स्थूल, सूक्ष्म या कारण शरीर का वर्णन पुरुष के नाम से किया गया है, उन पुरुषों में अध्याहार नहीं किया जा सकता है; क्योंकि श्रुति में कहीं भी उनके लिए वैसे गुणों का उल्लेख नहीं किया गया है। उन प्रकरणों में उन पुरुषों की आत्मा परम पुरुष को लक्ष्य कराने के लिए उन्हें पुरुष नाम से जाना गया है। मुण्डकोपनिषद् में २/१/१ से लेकर २/१/१० तक पुरुष नाम से जिस अक्षर रूप ब्रह्म का उल्लेख किया गया है, वहाँ सर्वप्रथम अक्षर ब्रह्म के द्वारा सभी की उत्पत्ति और पुनः उसी में सभी का लय होना कहा गया है। तदुपरान्त उसी को दिव्य अमूर्त पुरुष के नाम से संबोधित किया गया है और पुनः मु.उ. २/१/३ से २/१/९ तक उसी से समस्त प्राण, इन्द्रिय, पञ्चभूत, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वेद, देवता, मानव, अन्न, समुद्र और पर्वत आदि जगत् की उत्पत्ति कही गयी है। मु.उ. २/१/१० में उसे ही तप, कर्म और परम अमृतमय ब्रह्म के रूप में प्रतिपादित किया गया है। अतः इस प्रकार के श्रेष्ठ दिव्य गुण परब्रह्म के अतिरिक्त किसी सामान्य पुरुष के नहीं हो सकते ॥२८॥ अब आशंका यह होती है कि क्या ब्रह्म की उपासनाओं में वेध (बींधना) आदि गुणों का उपसंहार मान्य होना चाहिए या नहीं? सूत्रकार अगले सूत्र में इसी का समाधान दे रहे हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 177
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६० वदान्त दशन और सूर्य के दृष्टान्त से भी परब्रह्म की वस्तुगत गुण-दोष से निर्लेपता सिद्ध होती है। इस तरह प्रतिबिम्ब के अलावा दूसरे अन्य दृष्टान्त भी, जो उस ब्रह्म की स्थिति की सत्यता का प्रतिपादन करने वाले हैं, श्रुति में देखने को मिलते हैं। इसलिए भी प्राणियों में और प्रत्येक पदार्थ में उस परब्रह्म की स्थिति प्रतिबिम्बि की तरह आभास मात्र ही नहीं; वास्तविक है। इस प्रकार के अनेकों वर्णन वेद में देखने को मिलते हैं, जिनसे ब्रह्म की निर्लेपता सिद्ध होती है। अतः वह ब्रह्म साकार और निराकार दोनों ही लक्षणों से सम्पन्न है, ऐसा ही मानना समीचीन होगा ॥२१॥ अभी तक यह प्रमाणित किया गया कि परब्रह्म परमात्मा साकार-निराकार दोनों लक्षणों वाला है। अब आशंका यह उठती है कि वेद में उस (ब्रह्म) को नेति-नेति अर्थात् ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है- कहा गया है, तो इन निषेधात्मक श्रुतियों का क्या तात्पर्य है? आचार्य अगले सूत्र से इसी का निर्णय करने हेतु नया प्रकरण प्रारम्भ करते हैं- (३४१) प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूय: ॥२२॥ सूत्रार्थ- प्रकृतैतावत्त्वम् = उक्त प्रकरण में ब्रह्म के जो लक्षण कहे गये हैं, उनकी इयत्ता का अर्थात् वह इतना ही है, प्रतिषेधति = नेति-नेति श्रुति निषेध करती है, हि = क्योंकि, ततः = उसके पश्चात्, भूयः = पुनः , च = भी, ब्रवीति = कहती है। व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (२/३/१ से ६ तक) में ब्रह्म के मूर्त और अमूर्त दो रूप बतला कर प्रकरण की शुरुआत की गई है। वहाँ भौतिक जगत् में तो जल, पृथ्वी और तेज को कार्य सहित मूर्त और वायु, आकाश को अमूर्त बतलाया है। ऐसे ही आध्यात्मिक जगत् में प्राण और हृदयाकाश को अमूर्त एवं उससे पृथक् शरीर और इन्द्रियगोलकादि को मूर्त कहा है। जिन्हें मूर्त्त बताया, उन्हें क्षणभंगुर अर्थात् रूपान्तरित होने वाले, किन्तु प्रत्यक्ष प्राप्त होने से 'सत्' कहा और वैसे ही अमूर्त को अमृत अर्थात् शाश्वत कहा है। इस प्रकार से उन जड़ तत्त्वों की विवेचना करते समय ही आधिभौतिक जगत् में सूर्यमण्डल को और आध्यात्मिक जगत् में नेत्र को मूर्त का सार कहा है। ऐसे ही आधिदैविक जगत् में सूर्यमण्डल के मध्य में स्थित पुरुष को और आध्यात्मिक जगत् में नेत्र में स्थित पुरुष को अमूर्त का सार बतलाया है। इस प्रकार सगुण परब्रह्म के साकार और निराकार-दोनों रूपों का उल्लेख कुरके पुनः कहा गया है कि 'नेति-नेति' अर्थात् इतना ही नहीं, इतना ही नहीं। इससे अधिक अन्य कोई सदुपदेश नहीं है। इसके उपरान्त यह भी कहा गया है कि- उस परम तत्त्व का नाम सत्य का सत्य है, यह प्राण अर्थात् जीवात्मा सत्य है तथा उसका भी सत्य वह परमपिता परमात्मा ही है।' इस प्रकार उस परब्रह्म के साकार रूप का वर्णन करके यह भाव प्रदर्शित किया गया है कि इनमें जो जड़ पदार्थ है, वह तो उसकी अपरा प्रकृति का विस्तार है और जो चेतन है, वह जीव रूपी उसकी परा प्रकृति है तथा इन दोनों सत्यों का आश्रयभूत वह परब्रह्म परमात्मा इनसे भी परे अर्थात् सर्वोत्कृष्ट है। अतः यहाँ 'नेति- नेति' कहकर सत्य के सत्य परब्रह्म का होना सिद्ध किया है। अतः परब्रह्म परमात्मा एक मात्र निर्गुण निराकार ही है, सगुण-साकार नहीं, ऐसा नहीं मानना चाहिए।।२२।। उस परमात्मा के साकार और निराकार दोनों ही स्वरूप यथार्थतः प्राकृत मन-बुद्धि और इन्द्रियों से परे हैं। अगले सूत्र में इसी भाव को स्पष्ट करने के लिए आचार्य अपना मत प्रस्तुत करते हैं- ( ३४२ ) तदव्यक्तमाह हि।२३॥ सूत्रार्थ-हि = क्योंकि, तत् = उस (ब्रह्म) के सगुण रूप को, अव्यक्ततम् - इन्द्रियों द्वारा ग्रहण न किये जाने वाला, आह = (श्रुति) कहती है। व्याख्या- श्रुतियों में उस परब्रह्म को इन्द्रियों द्वारा अग्राह्य बतलाया गया है। निराकार रूप से ही वह अव्यक्त है, मात्र इतना ही नहीं; वरन् ऐसे ही उसका साकार रूप भी इन प्राकृत मन और इन्द्रिय आदि का विषय नहीं
Disclaimer / Warning: All Iiterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 178
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० २ सूत्र २४ १६ है; क्योंकि श्रुति स्मृतियों में उसे भी अव्यक्त कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् (३/१/३) में परब्रह्म साकार- स्वरूप का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-'जब यह जीवात्मा सबके शासक,ब्रह्मा के भी आदि कारण, सम्पूर्ण जगत् के सृजेता, दिव्य- प्रकाशस्वरूप परम पुरुष परमात्मा का साक्षात् कर लेता है, उस समय पाप-पुण्य दोनों को सम्यक् रूप से धो-बहाकर मलरहित हुआ ज्ञानी सर्वश्रेष्ठ समता को पा लेता है।' तदुपरान्त इसी उपनिषद् (३/१/४ से ७ तक) में सत्य, तप और ज्ञान आदि को उसकी प्राप्ति का माध्यम बतलाया गया है। पुनः अनेकों विशेषणों के द्वारा उस परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करके अगले मन्त्र (३/१/८) में उसके निराकार का वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'वह परब्रह्म न तो नेत्रों से, न वाणी से, न अन्य इन्द्रिय अथवा मन से, न तप से और न ही कर्मों के द्वारा देखा जा सकता है।' ऐसा ही उल्लेख अनेकानेक श्रुति-स्मृतियों में भी देखने को मिलता है। अतः परमपुरुष परमात्मा का साकार-निराकार (मूर्त-अमूर्त) दोनों रूप कहने का उद्देश्य यही है कि जगत् रूप रचना द्वारा क्रमशः उसके वास्तविक स्वरूप का बोध विधिपूर्वक सम्पन्न करवाया जा सके ।।२३।। उक्त सूत्र में प्रतिपादित कथन से यह नहीं मान लेना चाहिए कि परब्रह्म परमात्मा का किसी भी अवस्था में प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता। अगले सूत्र में आचार्य श्रुति-स्मृति दोनों के दृष्टान्तों द्वारा परमेश्वर के साक्षात्कार का वर्णन करते हैं- अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्॥२४॥। सूत्रार्थ-अपि च = इस प्रकार अव्यक्त होने पर भी, संराधने = सम्यक् रूप से आराधना करने पर (साधक अपने इष्ट परब्रह्म का प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त करते हैं,) प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् = यह बात वेद और स्मृति (प्रत्यक्ष और अनुमान) दोनों के ही कथन द्वारा भी सिद्ध होती है। व्याख्या- वेदों एवं स्मृतियों में जहाँ साकार और निराकार रूप परब्रह्म को इन्द्रिय आदि के द्वारा देखने में न आने वाला कहा गया है वहाँ यह भी कहा गया है कि वह परब्रह्म मंत्र-जप, स्मरण, ध्यान आदि आराधना के द्वारा प्रत्यक्ष-साक्षात् होने वाला भी है। परब्रह्म परमेश्वर का यह महान् अनुग्रह है, जब जीवात्मा उसके स्वरूप का साक्षात् दर्शन करता है। श्रुति-स्मृतियों ने इस तथ्य को विस्तार से प्रतिपादित किया है। परब्रह्म के दोनों स्वरूपों का उल्लेख श्रुति के अन्तर्गत कठोपनिषद् (१/२/२३) में कहा गया है- 'जिस पर ब्रह्म का अनुग्रह है, वह इसे प्राप्त कर लेता है, ब्रह्म अपने स्वरूप को उसके लिए प्रकाशित कर देता है।' मुण्डकोपनिषद्- (३/ १/८) में कहा है- 'आत्मा की शुद्ध, शान्त स्थिति से विशुद्ध अन्तःकरण वाला व्यक्ति ब्रह्म का ध्यान करता हुआ, उसे साक्षात् कर लेता है।' श्रेताश्वतर (२/५) में वर्णन मिलता है- 'योगी आत्मतत्त्व द्वारा ब्रह्मतत्त्व को ऐसे देख लेता है, जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक प्रज्वलित कर लिया जाता है। इसी प्रकार स्मृतियों के अन्तर्गत मनुस्मृति (६/६५) में कहा गया है- 'योग समाधि द्वारा ब्रह्म की सूक्ष्मता का दर्शन करे।' वेद और स्मृतियों के इन वचनों में उस साकार-निराकार रूप ब्रह्म को आराधना के द्वारा प्रत्यक्ष होने वाला कहा गया है। अतः यह सिद्ध होता है कि उसके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। गीता के अध्याय ११ के ५४ वें शोक में भगवान् ने कहा है कि 'हे अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा ही मुझे तत्त्वतः जाना जा सकता है। मेरा दर्शन हो सकता है और मुझमें ही प्रवेश किया जा सकता है।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म निश्चित ही साकार-निराकार दोनों ही स्वरूपों से युक्त है॥।२४।। उक्त सूत्र के प्रतिपादनार्थ कहा गया है कि उस परब्रह्म का स्वरूप आराधना द्वारा जानने में आता है, अन्यथा नहीं। इस कथन से तो यह प्रमाणित होता है कि यथार्थतः परब्रह्य निर्विशेष ही है। वह तो एकमात्र भक्त के लिए आराधना काल में साकार रूप में प्रकट होता है। अगले सूत्र में आचार्य इसी आशंका का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 179
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०२ सूत्र २१ १५१ के कारण (उस ईश्वर को), तथात्वम् = निरन्तर उसी तरह का, न = नहीं स्वीकारना चाहिए। व्याख्या- उपर्युक्त सूत्र में परब्रह्म परमात्मा को समस्त भूत-प्राणियों में अवस्थित बतलाते हुए जल में दृष्टिगोचर होने वाले चन्द्रमा का उदाहरण दिया गया है; किन्तु वह उदाहरण पूरी तरह से परब्रह्म में नहीं घटता है; क्योंकि चन्द्रमा वस्तुतः जल नहीं है, जल में तो केवल उसका प्रतिबिम्ब ही परिलक्षित होता है। चन्द्रमा की तरह सभी प्राणियों के अन्तःकरण में परब्रह्म की छाया नहीं रहती, बल्कि स्वयं ब्रह्म ही अनेक रूपों में अवस्थित रहता है। गीता के १८/६१ में इसका उल्लेख इस प्रकार किया गया है- परमात्मा तो स्वयं ही समस्त भूतों के हृदय में सचमुच अवस्थित रहता है और उन-उन प्राणियों के कर्मानुसार उनको अपनी शक्ति के माध्यम से संसार-चक्र में भ्रमण कराता रहता है। अतः चन्द्रमा की प्रतिच्छाया के सदृश परमात्मा की स्थिति नहीं है। यहाँ इस दृष्टान्त से यही मानना चाहिए कि चन्द्रमा अपनी प्रतिच्छाया द्वारा एक से अनेक रूपों में दिखलाई देता है, ब्रह्म तो समस्त भूतों के हृदय में एक रूप से स्थित होकर विभिन्न रूपों में दृष्टिगोचर होता है।।१ ९ ।। यदि चन्द्रमा की प्रतिच्छाया की भाँति ब्रह्म की स्थिति नहीं है, तो फिर प्रतिबिम्ब का उदाहरण क्यों दिया गया? इस जिज्ञासा का समाधान अगले सूत्र में किया जा रहा है- (३३९ ) वृद्धिह्वासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम्।।२०।। सूत्रार्थ-अन्तर्भावात् = अन्तःकरण में स्थित होने के कारण, वृद्धिह्वासभाक्त्वम् = शरीर के माप के अनुसार ब्रह्म के बढ़ने-घटने वाला होने की सम्भावना होती है, अतः (उसके निषेध में), उभयसामञ्जस्यात् - ब्रह्म और चन्द्र प्रतिबिम्ब-इन दोनों की समानता है, एवम् = (अतः) इस प्रकार की उपमा दी गई है। व्याख्या- उपमा और उपमेय वस्तु के किसी एक अंश की समानता को रखकर दी जाती है। यदि इन दोनों की पूरी तरह से एकता हो जाये, तो वह उपमा ही नहीं कही जायेगी; वरन् वास्तविक वर्णन हो जायेगा; अतः यहाँ जैसे चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब जल में विद्यमान रहता हुआ भी जल के बढ़ने-घटने आदि के विकारों से सम्बद्ध नहीं होता, वैसे ही परमात्मा समस्त भूतों में निवास करता हुआ भी विकार-रहित रहता है। उन (शरीर) के घटने-बढ़ने आदि किसी भी विकार से वह संलिप्त नहीं होता। यदि यहाँ यह आशंका करें कि शरीर में स्थित रहने से वह (ब्रह्म) उस (शरीर) के अनुपात से घटता-बढ़ता भी होगा, तो ब्रह्म शरीर के किसी भी विकार में लिप नहीं होता अर्थात् शरीर के घटने-बढ़ने का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह (ब्रह्म) समस्त प्राणियों के हृदय में समान भाव से स्थित रहता है।।२०।। अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से पुनः ब्रह्म के (निराकार-साकार रूप) भ्रम का निवारण करते हैं- ( ३४० ) दर्शनाच्च॥२१॥ सूत्रार्थ- दर्शनात् = श्रुति में दूसरे अन्य दृष्टान्त देखे जाते हैं, च = इसलिए भी (यह मान्यता उचित है कि ब्रह्म की स्थिति प्रतिबिम्ब की भाँति अवास्तविक नहीं है)। व्याख्या- सूर्य एवं चन्द्रमा के प्रतिबिम्बों के जल में होने से भी जल के गुण उन्हें व्याप्त नहीं कर पाते। इसी प्रकार आकाश का घट या सकोरे में रहकर भी उनके गुणों से सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार परब्रह्म का भी विभिन्न शरीरों में रहते हुए उनके गुणों से सम्बन्ध नहीं रहता। इसलिए उसे विकार रहित कहा गया है। कठोपनिषद् (२/२/९) में इसके सम्बन्ध में इस प्रकार उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि विभिन्न रूपों में हर एक के रूपवाला-सा प्रतीत हो रहा है और उनके बाहर भी है। क.उ. २/२/११-१२ में भी ब्रह्म की निर्लिप्तता सिद्ध करते हुए कहा गया है- 'अग्नि के ही समान वहाँ वायु
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 180
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६२ वदान्त दशन
( ३४४ ) प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात्॥२५॥ सूत्रार्थ- प्रकाशादिवत् = प्रकाशादि गुणों के समान, च = ही, अवैशेष्यम् = (ब्रह्म में भी) विशिष्टता न होने से, प्रकाश: = प्रकाश, च = भी, कर्मणि = कर्म में, अभ्यासात् = अभ्यास करने से ही सिद्ध होता है। व्याख्या- जिस प्रकार अग्नि एवं विद्युत् आदि तत्त्व अपने प्रकट रूप में प्रकाश और उष्णता प्रधान गुणों से सम्पन्न रहते हैं और अप्रकट रूप अर्थात् प्रकट न हो-छिपा हो, उस अवधि में भी वे अपने गुणों से युक्त रहते हैं। व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही अवस्थाओं में उन स्वाभाविक गुणों से सम्पन्न होने में किसी भी तरह का कोई अन्तर नहीं आता। उसी प्रकार से वह परब्रह्म उपासना द्वारा साकार-प्रत्यक्ष होने के समय जिस प्रकार समस्त कल्याणकारी विशेष परिष्कृत दिव्य गुणों से युक्त हो जाता है, वैसे ही उसे अप्रकट रूप में भी समझना चाहिए। अव्यक्त ब्रह्म के गुणों में भी किसी भी तरह की भिन्नता नहीं होती अर्थात् जो स्वभाव निर्गुण ब्रह्म का है, वही प्रकृति साकार रूप ब्रह्म की होती है। उसमें कोई भेद उपस्थित नहीं होता। जैसे- अग्नि आदि प्रकाश का प्रकट होना, उनके साधन और कर्म पर निर्भर है, उसी प्रकार ब्रह्म से साक्षात्कार करने के लिए भी उनकी आराधना आदि कर्मों का अभ्यास करना अत्यावश्यक है, क्योंकि अभ्यास द्वारा ही कर्म की सिद्धि संभव है और कर्म-सिद्धि हो जाने पर ही ब्रह्म के प्रत्यक्ष रूप में दर्शन किये जा सकते हैं॥२५॥
हैं- आचार्य अगले सूत्र में उभयलिङ्ग वाले प्रकरण को समाप्त करते हुए अन्त में ब्रह्म का अनन्त होना बतलाते
(३४५ ) अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम्॥२६ ।। सूत्रार्थ- अतः - ऊपर कहे हुए इन कारणों से यही सिद्ध हुआ कि, अनन्तेन = (वह ब्रह्म) अनन्त दिव्य कल्याणकारी गुणों से सम्पन्न है, हि = क्योंकि, तथा = वैसे ही, लिङ्गम् = लक्षण प्राप्त होता है। व्याख्या-उपर्युक्त सूत्रों में दिये गये दृष्टान्तों-प्रतिपादनों से ब्रह्म का अनन्त होना सिद्ध होता है; क्योंकि ब्रह्म में अनन्त रूप होने के लक्षण उपलब्ध हैं। पूर्वोक्त कारणों से स्पष्ट हो जाता है कि वह परब्रह्म परमात्मा सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्ता, पतितपावनता, सौहार्द, आनन्द, विज्ञान, असङ्गता एवं निर्विकारिता आदि असंख्य कल्याणकारी गुण-समूहों से युक्त और निर्विशेष अर्थात् सभी गुणों से विहीन भी है; क्योंकि वेद और स्मृतियों में ऐसे ही लक्षण प्राप्त होते हैं। श्रुतियों एवं स्मृतियों ने उन विराट् परमपुरुष परमेश्वर के विभिन्न नाम व स्वरूप का जगह-जगह पर उल्लेख करके उनके अनन्त गुण-समुदाय की विवेचना की है ॥२६ ॥ अब अगले सूत्र में आचार्य परम पुरुष एवं उसकी प्रकृति भिन्न है या अभिन्न? इसी की विवेचना के लिए नया प्रकरण शुरू करते हैं। सर्वप्रथम शक्ति और शक्तिमान् में किस प्रकार अभेद है? यहाँ स्पष्ट करते हैं- ( ३४६ ) उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत्॥२७। सूत्रार्थ- उभयव्यपदेशात् = दोनों प्रकार (साकार-निराकार) का कथन उल्लिखित होने से, अहिकुण्डलवत् = सर्प के कुण्डलाकार होने के सदृश, तु = ही (उसका भाव जानना चाहिए)। व्याख्या- जैसे सर्प कभी अपने शरीर को संकुचित करके कुण्डलाकारवत् बैठता है और कभी अपनी सहज-स्वाभाविक दशा में रहता है; किन्तु दोनों ही स्थितियों में अलग-अलग तरह से दृष्टिगोचर होने पर भी वह सर्प एक ही है। यहाँ सहज स्थिति में रहना उसका कारण भाव है, उस क्षण उसकी कुण्डलादिभाव में प्रकट होने की शक्ति अप्रकट है; फिर भी वह उसमें स्थित रहते हुए भी उससे पृथक् रहता है। ऐसे ही कुण्डलादि रूप में स्थित होना उसका कार्यभाव है, यही उसकी पूर्वोक्त अप्रकट शक्ति का प्रकट होना है। वैसे ही वह ब्रह्म जब कारण भाव में रहता है, उस क्षण उसकी अपरा एवं परा प्रकृतिरूप दोनों शक्तियाँ सृष्टि से पूर्व उसमें अभिन्न रूप से समाहित रहती हुई भी अप्रकट रहती हैं; किन्तु जब वह कार्य रूप में स्थित होता है, तब
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 181
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०२ सूत्र ३० १६३ उसकी उक्त दोनों शक्तियाँ पृथक्-पृथक् नाम रूपों में प्रकट हो जाती हैं। अतः वेद में जो ब्रह्म को निराकार कहा गया है, वह उसकी कारण अवस्था को लेकर है और जो उसे अपनी शक्तियों से युक्त एवं साकार कहा है, वह उसकी कार्य-अवस्था को लेकर है। इस प्रकार श्रुति-स्मृति दोनों में उसके कारण और कार्य दोनों स्वरूपों का विवेचन मिलता है। अतः यह स्पष्ट होता है कि परमात्मा में उसकी शक्ति सदैव अभिन्न रूप से स्थित रहती है। दोनों ही अवस्थाओं में ब्रह्म का अभिन्नत्व उपस्थित रहता है।।२७।। अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से पुनः उक्त तथ्य को प्रतिपादित करते हैं- (३४७) प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥२८॥। सूत्रार्थ- वा = अथवा, प्रकाशाश्रयवत् = प्रकाश और उसके आश्रय के सदृश उनका अभिन्नत्व है, क्योंकि; तेजस्त्वात् - तेज की दृष्टि से दोनों को भेद रहित अर्थात् एक ही माना है। व्याख्या- जिस प्रकार प्रकाश और उसके आश्रय रूप अग्नि, सूर्य आदि दोनों ही तेज तत्त्वात्मक होने के कारण अभिन्न हैं; फिर भी वे (प्रकाश और सूर्य-अग्नि) दोनों पृथक् माने जाते हैं। प्रकाश और प्रकाशक (सूर्यादि) स्वयं प्रकाशरूप हैं, किन्तु जब वह प्रकाश किसी अन्य वस्तु पर पड़ता है, तो वह प्रकाशक कहलाता है। 'प्रकाश' या 'प्रकाशक' पदों से सम्बोधित किया जाने वाला तत्त्व एकमात्र तेज ही है; फिर भी वह प्रकाश्य वस्तु से अलग है। वह वस्तु प्रकाशित होने पर स्वयमेव प्रकाश स्वरूप नहीं होती। इसी प्रकार ब्रह्म आनन्दस्वरूप है, उस आनन्द से मुक्तावस्था में प्राणी आनन्दित होता है, तब आनन्द रूप परब्रह्म आनन्द प्रदाता कहलाता है। इतने मात्र से उसके आनन्दमय रूप में कोई अन्तर नहीं आता; इसी आधार पर तेज (प्रकाश और सूर्य) के दृष्टान्त से ब्रह्म और उसकी प्रकृति का अभेदत्व सिद्ध होता है॥।२८।। अगले सूत्र में आचार्य पुनः उक्त तथ्य को स्पष्ट करते हुए पूर्वोक्त कथन को प्रस्तुत कर रहे हैं- (३४८) पूर्ववद्वा ॥।२१ ॥ सूत्रार्थ- वा = अथवा; पूर्ववत् = जैसे पूर्व के सूत्र में स्पष्ट किया जा चुका है, वैसे ही दोनों का अभेदत्व समझना चाहिए। व्याख्या- अथवा पूर्व में वर्णित सूत्र (२/३/४३) में जिस प्रकार परब्रह्म परमात्मा का अपने अंशभूत प्राणि- समुदाय से अभेदत्व सिद्ध किया जा चुका है, उसी प्रकार से यहाँ शक्ति एवं शक्तिमान् अर्थात् प्रकृति और ब्रह्म का अभेदत्व समझना चाहिए। पूर्व के सूत्रों में दोनों (ब्रह्म एवं प्रकृति) की अभिन्नता के दृष्टान्त-प्रमाण भी प्रतिपादित किये गये हैं। अतः यहाँ पर दोनों का अभेदत्व ही सिद्ध होता है॥२९॥। अब अगले सूत्र में आचार्य शक्ति एवं शक्तिमान् के अभेदत्व का प्रमुख कारण बतलाते हैं- (३४९ ) प्रतिषेधाच्च॥३० ।। सूत्रार्थ- प्रतिषेधात् = दूसरे किसी अन्य का निषेध होने से, च = भी (अभेदत्व ही सिद्ध होता है)। व्याख्या- ऐतरेयोपनिषद् (१/१/१) में वर्णन मिलता है कि 'इस जगत् का उद्भव होने से पूर्व एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही था, उसके अतिरिक्त अन्य कोई भी चेष्टा करने वाला उपस्थित नहीं था।' यहाँ इस कथन में किसी अन्य का निषेध होने से भी यही मान्यता प्रतिपादित होती है कि जगत् की उत्पत्ति के पूर्व प्रलयकाल में उस परमात्मसत्ता की दोनों प्रकृतियाँ उसी में समाहित होकर स्थित रहती हैं। अतः उनमें किसी भी तरह के भेद की प्रतीति नहीं होती। इसी कारण उनका अभेदत्व बतलाया गया है।३०।। अभी तक परब्रह्म परमात्मा का अपनी दोनों प्रकृतियों से अभेदत्व कैसा है? स्पष्ट किया गया है। अब अगले सूत्र से आचार्य उन दोनों (प्रकृतियों) से उसकी विलक्षणता एवं श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 182
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६४ वेदान्त दर्शन
(३५० ) परमत: सेतून्मानसम्बन्ध्भेदव्यपदेशेभ्यः।३१॥ सूत्रार्थ-अतः= इस जड़-चेतनमय प्रकृतियों के समुदाय से, परम्- (वह परब्रह्म) अति श्रेष्ठ है, सेतून्मानसम्बन्ध = क्योंकि श्रुति में सेतु, उन्मान, सम्बन्ध और, भेदव्यपदेशेभ्यः = भेद का वर्णन करने से यही सिद्ध होता है। व्याख्या- इस जड़-चेतनमय सम्पूर्ण जगत् की कारणभूता जो भगवान् की प्रकृतियाँ हैं, उन्हें गीता के ७/ ४५ में परा-अपरा नाम से कहा गया है। श्वेताश्वतरोपनिषद् (१/१०) में इन प्रकृतियों का 'क्षर' और 'अक्षर' के नाम से उल्लेख मिलता है। गीता में कहीं (१३/१ में) क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के नाम से, तो कहीं (१३/९ में) प्रकृति और पुरुष के नाम से जिन प्रकृतियों का वर्णन किया गया है, गीता के (१५/७) में उन दोनों प्रकृतियों से तथा उन्हीं के विस्तार रूप इस दृश्य जगत् से वह परमात्मा सर्वथा विलक्षण एवं सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि वेद में उसकी सर्वोत्कृष्टता को सिद्ध करने वाले चार हेतु मिलते हैं; जो निम्नवत् हैं- १. सेतु २. उन्मान ३. सम्बन्ध और ४. भेद का वर्णन। सेतु का वर्णन छा.उ. ८/४/१ में इस प्रकार मिलता है- 'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिः' अर्थात् यह जो आत्मा (परमात्मा) है, यही सबको धारण करने वाला सेतु है। बृह. उ. ४/४/२२ भी कहता है कि 'सेतु ही सबको धारण करने वाला है। अब द्वितीय हेतु है उन्मान। उन्मान का अर्थ है- सबसे बड़ा माप अर्थात् महत् परिणाम। छा.उ. ३/१२/६ में परब्रह्म के सर्वाधिक महान् होने का वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'उतनी उसकी महिमा है, वह परम पुरुष इससे भी श्रेष्ठ है। समस्त प्राणी इस विराट् पुरुष का एकपाद हैं और शेष तीन अमृतमय पाद अप्राकृत परमधाम में हैं। तृतीय हेतु है सम्बन्ध का प्रतिपादन। ब्रह्म को उक्त प्रकृतियों का स्वामी, शासक और संचालक कहकर श्रुति ने इनमें शास्य-शासक भाव एवं स्वामि-सेवक भाव रूप सम्बन्ध का प्रतिपादन किया है। श्वेता.उ.६/७ में इसका उल्लेख इस प्रकार है- 'ईश्वरों के भी परम ईश्वर, देवों के भी परम देव, पतियों के भी परमपति, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रचयिता एवं स्तुत्य उस ज्ञान-स्वरूप परब्रह्म को हम जानते हैं।' चतुर्थ हेतु है भेद का प्रतिपादन। उस परमात्मा को इन दोनों प्रकृतियों का अन्तर्यामी एवं भरण- पोषण कर्त्ता कहकर और अन्य तरह से भी वेद ने इनसे उसकी पृथक्ता का निरूपण किया। उक्त सभी कारणों-दृष्टान्तों से यह प्रमाणित होता है कि वह सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वाधार परमात्मा अपनी दोनों प्रकृतियों से अति विलक्षण एवं सर्वोत्कृष्ट है; क्योंकि श्रुति में वर्णित उस परब्रह्म का स्वरूप दिव्य, अलौकिक और उपाधि से परे है। उसके साक्षात्कार का फल परम शान्ति की उपलब्धि, सभी तरह के बन्धनों से परे और अमृतत्त्व की प्राप्ति ही कहा गया है।।३१।। अभी तक यह स्पष्ट किया गया कि उस परमात्मा का अपनी अपरा एवं परा नामक प्रकृति के साथ भेद और अभेद दोनों ही हैं। अब जिज्ञासा यह होती है कि इन दोनों में से श्रेष्ठ कौन है- अभेदपक्ष या भेद पक्ष ? अगले सूत्र में इसी का समाधान प्रस्तुत है- (३५१) सामान्यात्तु॥३२॥ सूत्रार्थ-सामान्यात् = श्रुति में भेद और अभेद का वर्णन-दोनों ही समान भाव से है, तु = इससे तो यही निश्चय होता है कि भेद और अभेद दोनों पक्षों की मान्यता सिद्ध होती है। व्याख्या- श्रुतियों ने परब्रह्म परमात्मा को जीवात्मा (प्रकृति) से भेद और अभेद दोनों ही पक्षों में मान्यता प्रदान की है। श्रुति में भेद और अभेद दोनों का वर्णन समान भाव से किया गया है। परमात्मा को सबका प्रेरक, ईश्वर, अधिपति, शासक और अन्तर्यामी माना गया है। बृह.उ. ४/४/२२ में इसका प्रमाण इस प्रकार है- 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिः' अर्थात् यह परमात्मा ही सबका ईश्वर और समस्त भूत-प्राणियों का अधिपति है। मा.उ.६ में भी इसे 'एष सर्वेश्वरः' अर्थात् सबका ईश्वर कहा गया है। बृह.उप. ३/७/३ में भी इसके अन्तर्यामी
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 183
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०२ सूत्र ३५ १६५ होने का उल्लेख मिलता है- 'एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः' अर्थात् वह ब्रह्म समस्त प्राणियों का अन्तर्यामी है। इस प्रकार से भेद प्रतिपादक ऐसे अनेकों श्रुतिवचन देखने को मिलते हैं। इसी प्रकार अभेद की प्रतिपादक श्रुतियाँ भी देखने को मिलती हैं। यथा 'तत्त्वमसि' अर्थात् वह ब्रह्म तू है, (छा.उप. ६/८ वें से १६ वें खण्ड तक) में वर्णन मिलता है। बृह.उ. २/५/१९ में भी ऐसा ही संकेत मिलता है- 'अयमात्मा ब्रह्म' अर्थात् 'यह आत्मा ब्रह्म है।' इस प्रकार से भेद और अभेद-दोनों की प्रामाणिकता में कुछ भी अन्तर नहीं है। अतः किसी एक पक्ष को विशेष और किसी एक को अविशेष कहना कभी भी संभव नहीं है। परमात्मा के दोनों पक्षों का समान भाव से श्रुतियों में उल्लेख किया गया है, इसलिए यहाँ दोनों पक्षों की मान्यता सिद्ध होती है।३२॥। अब जिज्ञासा यह उठती है कि कहीं भेद-भाव से और कहीं अभेद भाव से उपासना के लिए आदेश देने का क्या अभिप्राय है? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं- ( ३५२ ) बुद्धयर्थः पादवत्॥३३॥ सूत्रार्थ- पादवत् = अंग विहीन परब्रह्म के चार पाद बतलाये जाने के समान ही, बुद्ध्यर्थः =चिन्तन-मनन आदि उपासना के लिए वैसा उपदेश किया गया है। व्याख्या- माण्डूक्य उपनिषद्-२ में वर्णन मिलता है कि जिस प्रकार से अंगरहित, रसस्वरूप परब्रह्म परमात्मा के तत्त्वज्ञान का विवेचन करने के लिए चार पादों की कल्पना करके श्रुति में उसके स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है, उसी प्रकार से भेद या अभेद भाव से उपासना का उपदेश उस परब्रह्म के तत्त्व का साक्षात्कार करने के लिए ही किया गया है; क्योंकि साधकों की प्रकृति अलग-अलग होती है। कोई साधक भेद उपासना को, तो कोई अभेद उपासना को स्वीकार करते हैं। किसी भी भाव से उपासना की जाये, साधक अपने एक निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करता है। दोनों तरह की उपासना पद्धति से प्राप्त होने वाला तत्त्वज्ञान और भगवत् प्राप्ति रूप फल एक ही है। अतः परब्रह्म के तत्त्वज्ञान का साक्षात् कराने के लिए साधक की प्रकृति, पात्रता और विश्वास के अनुसार वेद में भेद या अभेद नामक उपासना का उल्लेख प्रायः ठीक ही है। उन्हें एकमात्र ब्रह्म की ही उपासना माननी चाहिए।३३।। अब आशंका यह होती है कि यदि ब्रह्म और उसकी दोनों प्रकृतियों में भेद नहीं है, तो ब्रह्म की परा प्रकृति रूप जो प्राणि-समुदाय हैं, उनमें भी आपस में भेद सिद्ध नहीं होगा। ऐसा सिद्ध होने से वेद में जो नानात्व का प्रतिपादन है, उसकी सङ्गति किस प्रकार होगी? आचार्य अगले सूत्र में इसी का समाधान करते हैं- (३५३) स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत्॥३४॥ सूत्रार्थ-प्रकाशादिवत् = प्रकाश आदि के सदृश, स्थानविशेषात् = शरीर रूप स्थान की विशेषता होने से भिन्न होना असंगत नहीं है। व्याख्या- जिस तरह से समस्त प्रकाशमान पदार्थ प्रकाश-जाति की दृष्टि से समान तत्त्व वाले होने से एक ही हैं, किन्तु उनमें ग्रह, नक्षत्र, तारे, दीपक, अग्नि, सूर्य और चन्द्र आदि में स्थान और शक्ति-रूपादि का भेद होने से उक्त इन सभी में परस्पर भिन्नता दिखलाई देती है, उसी प्रकार भगवान् की परा-प्रकृति अर्थात् जड़ चेतन रूपात्मक सभी प्राणि-समुदाय अपने फल प्राप्ति रूप से विभिन्न प्रकार के दिखलाई देते हैं। फिर भी प्राणियों के अनादि कर्म-संस्कारों का जो समूह है, उसके अनुसार फल रूप में मिले हुए शरीर, बुद्धि और शक्ति आदि के तादात्म्य से उनमें आपस में भेद होना असङ्गत नहीं है। वे ब्रह्म की दोनों प्रकृतियों के सम्बन्ध से एक ही प्रकार के हैं।।३४ ।। अगले सूत्र में आचार्य पुनः उक्त तथ्य को दृढ़ करने के लिए कहते हैं कि- (३५४) उपपत्तेश्च॥३५।।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 184
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६६ वेदान्त दर्शन सूत्रार्थ-उपपत्ते: = श्रुति की विवेचना से, च = भी (यही बात प्रमाणित होती है)। व्याख्या-वेद (श्रुति) में इस संसार के उद्भव से पूर्व एकमात्र अविनाशी परब्रह्म की ही सत्ता विवेचित की गई है। तदुपरान्त उसी ब्रह्म के द्वारा समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का विवेचन करके उसे सबका अभिन्न- निमित्त-उपादान कारण प्रमाणित किया गया है। तत्पश्चात् 'तत्त्वमसि' आदि वचनों के द्वारा उस ब्रह्म को स्वयं से अभिन्न मानते हुए उसकी उपासना का उपदेश प्रदान किया गया है। पुनः उसी को भोक्ता, भोग्य आदि से सम्पन्न इस विचित्र जड़-चेतनमय जगत् का स्रष्टा, संचालक एवं जीवों के कर्मफल भोग और बन्ध-मोक्ष की व्यवस्था बनाने वाला बताया गया है। प्राणि-समुदाय एवं उनके कर्म-संस्कारों को अनादि कहकर उनके उद्भव का निषेध किया गया है। उपर्युक्त सभी तथ्यों पर विचार करने से यह प्रमाणित होता है कि प्राणि- समुदाय चैतन्यता के कारण तो आपस में एक या अभिन्न हैं; किन्तु विभिन्न कर्म-संस्कारजनित सीमित व्यक्तित्व के कारण पृथक्-पृथक् हैं। प्रलय की स्थिति में समस्त प्राणी ब्रह्म में लय हो जाते हैं, सृष्टि काल में पुनः उसी ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्म की ही परा प्रकृति के अन्तर्गत होने से उसी के अंश होते हैं। इसलिए भी वे ब्रह्म से अभिन्न कहे जाते हैं। ब्रह्म उनका नियामक होता है और सभी प्राणी उसके नियम्य होते हैं। इसलिए वे उस ब्रह्म से भी पृथक् हैं और परस्पर भी। यही मानना उचित होगा॥३५॥ अगले सूत्र में आचार्य पुनः उक्त तथ्य को दृढ़ कर रहे हैं- (३५५) तथाऽन्यप्रतिषेधात् ॥३६॥ सूत्रार्थ- तथा = और वैसे ही, अन्यप्रतिषेधात् - अन्य का निषेध होने से भी यही मान्यता उचित है। व्याख्या- परब्रह्म से पृथक् अन्य किसी की सत्ता को श्रुति (वेद) ने नहीं स्वीकार किया है। यह बात ऊपर के सूत्रों में अनेक बार प्रतिपादित की जा चुकी है। कठोपनिषद् २/१/११ में भी परब्रह्म परमात्मा से भिन्न किसी दूसरी वस्तु की सत्ता का प्रतिषेध किया गया है। इससे भी यही प्रमाणित होता है कि परा और अपरा दोनों शक्तियों से युक्त वह परमात्मा ही विभिन्न रूपों में प्रकट होकर परिलक्षित हो रहा है। परब्रह्म की दोनों (परा, अपरा) प्रकृतियों में नानात्व होते हुए भी उस परब्रह्म में किसी भी तरह का कोई भेद नहीं है। वह परमात्मा सर्वथा विकाररहित, असङ्ग, अभेद और अखण्ड है। जब किसी दूसरे का अस्तित्व है ही नहीं, तब एकमात्र परब्रह्म परमात्मा का ही विभिन्न रूपों में उत्पन्न (प्रकट) होना स्वीकारने में किसी भी तरह का विरोध नहीं होना चाहिए। अतः यहाँ पर उक्त सूत्रों में विवेचित मान्यता ही उपयुक्त प्रमाणित होती है॥३६॥ उपर्युक्त सूत्रों में विवेचित तथ्य को ही सिद्ध करने हेतु आचार्य अगले सूत्र में एक दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं- (३५६) अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः ।।३७।। सूत्रार्थ- अनेन = इस प्रकार भेद और अभेद के विवेचन द्वारा, आयामशब्दादिभ्यः= और श्रुति में जो ब्रह्म के व्यापकत्व सूचक शब्द आदि हेतु हैं; वनसे भी, सर्वगतत्वम् = उस (ब्रह्म) का सर्वत्र संव्याप्त होना सिद्ध होता है। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा के सर्वत्र संव्याप्त होने के अनेक प्रमाण श्रुतियों में मिलते हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद् ३/९ एवं ईशोप.१ में वर्णन मिलता है कि 'उस सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम से यह समस्त जगत् संव्याप्त हो रहा है।' इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय के २२ वें शोक में कहा गया है कि 'परमपुरुष वह है, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व संव्याप्त हो रहा है।' इस प्रकार श्रुति-स्मृति दोनों के वचनों में जो परब्रह्म के सर्वत्र व्याप्त होने को सूचित करने वाले 'सर्वगत' आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उनसे और उपर्युक्त सूत्रों के विवेचन द्वारा भी यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म सर्वत्र संव्याप्त है। सर्वथा अभेद मानने से भी इस व्याप्य-व्यापक भाव की सिद्धि नहीं
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 185
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० २ सूत्र ४० १६७ होगी। अतः यही निश्चय हुआ कि परबह्म परमात्मा अपनी दोनों- (परा-अपरा) प्रकृतियों से पृथक् भी है और अपृथक् भी; क्योंकि वे दोनों ही उनकी शक्तियाँ हैं। शक्ति एवं शक्तिमान् में भेद नहीं होता, इसलिए भी और उन प्रकृतियों के अभिन्न निमित्त-उपादानकारण होने के कारण भी वे उनसे अभिन्न हैं तथा इस प्रकार अभिन्न होते हुए भी उनके पालक होने से वे उनसे सतत विशेष लक्षणों से युक्त और सर्वोत्तम भी हैं॥३७॥ इस प्रकार उस परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करने के पश्चात् अब इस तथ्य का समाधान करने के लिए प्राणियों के कर्मों का कर्मानुसार फल देने वाला कौन है? आचार्य अगले सूत्र से इसी प्रकरण का शुभारम्भ करते हैं- (३५७) फलमत उपपत्तेः॥३८।। सूत्रार्थ- फलम् = प्राणियों के कर्मों का फल, अतः = इस परब्रह्म परमात्मा से ही मिलता है, उपपत्तेः = क्योंकि ऐसा मानना ही उपयुक्त है। व्याख्या- समस्त प्राणी परब्रह्म परमात्मा के आश्रय में ही अपने कर्म-फल रूपी भोगों को भोगते हैं; क्योंकि कर्मों का ज्ञाता एवं सर्वशक्तिमान् होने के कारण परब्रह्म ही ऐसी सामर्थ्य रख सकता है। परब्रह्म के अतिरिक्त न तो जड़-प्रकृति ही कर्मों को जानने एवं उनके फल की व्यवस्था करने में समर्थ है और न स्वयं जीवात्मा ही समर्थ है; क्योंकि वे दोनों ही अल्पज्ञ और अल्पशक्ति वाले हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के ७/२२ में कहा गया है कि 'कहीं-कहीं जो देवता आदि को कर्मों का फल-प्रदाता बतलाया है, वह भी भगवान् के विधान को लेकर बताया गया है, भगवान् ही उनको अपना निमित्त बनाकर कर्मकृत-फल प्रदान करते हैं। यहाँ इस प्रतिपादन से यह प्रमाणित होता है कि प्राणियों के कर्मफल-भोग विधि-व्यवस्था बनाने वाला एकमात्र वह परब्रह्म परमात्मा ही है, अन्य कोई नहीं हो सकता ।३८॥ अब जिज्ञासा होती है कि क्या केवल युक्ति से ही यह बात सिद्ध होती है या फिर इसमें श्रुति आदि प्रमाण भी हैं? सूत्रकार अगले सूत्र में इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३५८) श्रुतत्वाच्च॥३१॥ सूत्रार्थ-श्रुतत्वात् = श्रुति में ऐसा ही कथन होने से, च = भी (यही मानना उचित है कि कर्मफल की प्राप्ति परब्रह्म परमात्मा से ही होती है)। व्याख्या- यह बात वेदों में जगह-जगह पर बारम्बार देखने को मिलती है कि प्राणियों के कर्मफल का द्रष्टा व प्रदाता एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही है। तैत्तिरीय उपनिषद् में भी परब्रह्म को ही 'महान् अज आत्मा कर्मफल प्रदाता' कहा गया है। अन्य श्रुतियाँ भी ऐसा ही बतलाती हैं, देखें- कठोपनिषद् २/२/८ में ऋषि इस प्रकार कहते हैं- 'य एष सुप्रेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते' अर्थात् जो यह प्राणियों के कर्मानुसार विभिन्न तरह के भोगों का निर्माण करने वाला परम पुरुष परब्रह्म प्रलय काल में सबके सो जाने पर भी जागता रहता है, वही परम पवित्र है, वही ब्रह्म है और उसे ही अमृत कहा जाता है। ऐसा ही उल्लेख श्वेताश्वतरोपनिषद् ६/१३ में किया गया है, देखें- 'नित्यो नित्यानाम् चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्' अर्थात् 'जो एक, नित्य, परमचेतन, परब्रह्म बहुत से नित्य, चेतन आत्माओं के कर्मफल-भोग के विधान का नियम बनाता है।' इस प्रकार से इन श्रुति-दृष्टान्तों से यही सिद्ध होता है कि प्राणियों के कर्मफल की व्यवस्था बनाने वाला एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही है, अन्य और कोई नहीं ।३९॥ उक्त विषय के सन्दर्भ में सूत्रकार अगले सूत्र में आचार्य जैमिनि का मत प्रस्तुत करते हैं- (३५९ ) धर्मं जैमिनिरत एव ॥।४० ॥। सूत्रार्थ- अत एव = अतः पूर्वोक्त कारणों से ही, जैमिनि: = आचार्य जैमिनि, धर्मम् = धर्म (कर्म) को ही फल-प्रदाता बतलाते हैं।
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 186
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१६८ वदान्त दशन व्याख्या- आचार्य जैमिनि की मान्यता है कि युक्तियों और वैदिक प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि धर्म अर्थात् कर्म स्वयं ही फल-प्रदाता है; क्योंकि यह प्रत्यक्ष रूप से प्रायः देखा जाता है कि कृषि आदि कर्म करने का अन्न की उत्पत्ति स्वरूप फल होता है। ऐसे ही श्रुति में भी 'अमुक फल की इच्छा हो, तो अमुक कार्य करना चाहिए।' इस प्रकार विधि-कथन होने से यही प्रमाणित होता है कि कर्म स्वयमेव फल-प्रदाता है। उससे पृथक् किसी कर्मफल-प्रदाता की कल्पना करना अनिवार्य नहीं है। जिस कर्म के द्वारा फल का उद्भव होता है, वह कर्म परब्रह्म से ही प्रकट होता है। धर्म, कर्म का ही पर्याय है। आचार्य जैमिनि के मतानुसार कर्म ही फल का देने वाला है। अतः श्रेष्ठ कर्म से श्रेष्ठ फल की प्राप्ति और निकृष्ट कर्म से निकृष्ट फल की प्राप्ति होना प्रमाणित होता है॥४०॥ अगले सूत्र में सूत्रकार आचार्य जैमिनि के उपर्युक्त कथन को अयुक्त सिद्ध करते हुए अपने मत की ही उपादेयता बतलाते हैं- (३६० ) पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात्॥।४१।। सूत्रार्थ-तु= किन्तु, बादरायण := आचार्य वेदव्यास, पूर्वम् = पूर्वोक्त परब्रह्म को ही कर्मफल प्रदाता मानते हैं, हेतुव्यपदेशात् = क्योंकि श्रुति में उस ब्रह्म को सबका कारण कहा गया है, (अतः यहाँ पर आचार्य जैमिनि का कथन उचित है, ऐसा प्रतीत नहीं होता)। व्याख्या-आचार्य वेदव्यास जी आचार्य जैमिनि के विचार से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि आचार्य जैमिनि जो कर्म को ही फल-प्रदाता कहते हैं, वह उचित नहीं है; क्योंकि कर्म तो निमित्त-मात्र होता है। वह जड़, परिवर्तनशील एवं क्षणभंगुर होने से फल की व्यवस्था करने में समर्थ नहीं हो पाता। अतः जैसा कि पूर्व के सूत्रों में बतलाया गया है कि एकमात्र वह परब्रह्म परमात्मा ही जीवों-प्राणियों के कर्मानुसार फल प्रदाता है। श्रुति (वेद) भी परब्रह्म परमात्मा को ही समस्त प्राणियों का हेतु (कारण) बतलाती है।४१।।
॥ इति तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्तः ॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic malerial on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 187
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
।। अथ तृतीयाध्याये तृतीयः पादः॥ द्वितीय पाद के अन्तर्गत जीव की स्वप्र और सुषुप्ति का विवेचन करने के उपरान्त परब्रह्म के स्वरूप के सन्दर्भ में यह स्पष्ट किया गया कि वह साकार-निराकार दोनों लक्षणों से युक्त है। तदुपरान्त उस ब्रह्म का अपनी शक्ति स्वरूपा परा और अपरा प्रकृतियों से किस तरह भेद और अभेद है, यह भी स्पष्ट किया गया और अन्त में यह भी स्पष्ट किया गया कि प्राणियों के कर्मफल की व्यवस्था बनाने वाला एक मात्र वह परम-आत्मा ही है। अब वेदान्त वचनों में जो एक ही आत्मविद्या का अनेक प्रकार से उल्लेख किया गया है, उसकी एकता बतलाने एवं विभिन्न जगहों में आये हुए भगवत् प्राप्ति सम्बन्धी भिन्न-भिन्न वाक्यों के विरोध हटाकर उनके एकत्व को बतलाने के लिए तृतीय पाद का शुभारम्भ करते हैं- (३६१ ) सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात्॥१॥ सूत्रार्थ-सर्ववेदान्तप्रत्ययम् - समस्त श्रुतियों (वेद-उपनिषदों) में एक ही अध्यात्मविद्या का विवेचन होने से, वह (विद्या) अभिन्न है, चोदनाद्यविशेषात् = क्योंकि आज्ञार्थक-विधायक शब्दादि में भेद नहीं होता। व्याख्या- वेद-उपनिषद् आदि सभी श्रुतियों में जो विभिन्न तरह की अध्यात्म-विद्याओं का प्रतिपादन किया गया है, उन सबमें विधि-वचनों (शब्दादि) की समानता है। उन सबमें एकमात्र उस अविनाशी परब्रह्म के साक्षात्कार की ही चर्चा की गई है और सभी का अभीष्ट उसी को बतलाया गया है, अतः उन सभी की समानता है। एक ओर तो छा.उ. १/४/१ में 'ओमित्येतदक्षरमुद्रीथमुपासीत' अर्थात् 'ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, ऐसी उपासना करे'। इस तरह के विभिन्न वाक्यांशों में प्रतीकोपासना का वर्णन करके उसके द्वारा ब्रह्म को लक्ष्य कराया गया है, तो अन्यत्र (तै.२/१ में) उसे 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' अर्थात् ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अन्तरहित है। मा.उ .- ६ में उसे सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, सभी भूतों की उत्पत्ति और प्रलय का केन्द्रक कहा गया है। इस तरह विधि मुख से उसके कल्याणकारी दिव्य रूपों से उसे निरूपित किया गया और कहीं पर अर्थात् कठोपनिषद् १/३/१५ में उसे शब्द से परे, अस्पर्श, अरूप, नीरस, गन्धरहित एवं शाश्वत, नित्य, अनादि, अनन्त कहा गया है। इस तरह से सभी जड़ और चेतन से पृथक् कहकर उस ब्रह्म का लक्ष्य (बोध) कराया गया है और बाद में यह भी कहा गया कि उसे प्राप्त कर साधक जन्म-मृत्यु से भी मुक्त हो जाता है। उक्त सभी दृष्टान्तों का एक मात्र उद्देश्य उस ब्रह्म को लक्ष्य कराकर उसे पा लेना है। सर्वत्र प्रकार भेद से उस ब्रह्म का ही चिन्तन करना बतलाया गया है। अतः विधि एवं साध्य की समानता से साधन रूप विद्याओं में यथार्थ भेद नहीं है, अधिकारी के भेद से प्रकार भेद देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त जो अन्य शाखाओं के द्वारा विवेचित एक ही तरह की विद्याओं में आंशिक भेद दिखाई देता है, उसके द्वारा भी विद्याओं में अभेद ही मानना चाहिए, क्योंकि उनमें सभी जगह विधि वचन और फल की समानता है, अतः उनमें कोई यथार्थतः भेद नहीं होता है॥१॥ दृष्टान्तों के प्रतिपादन-शैली में कुछ भेद होने पर भी अध्यात्म-विद्या में भेद नहीं मानना चाहिए। आचार्य अगले सूत्र में इसी की विवेचना प्रस्तुत करते हैं- (३६२ ) भेदान्नेति चेन्नैकस्यामपि॥२॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि ऐसा कहो कि, भेदात् = वहाँ उन स्थलों में प्रतिपादन करने की शैली का भेद है, अतः, न = समानता सिद्ध नहीं होती, इति न = तो, ऐसा कहना उचित नहीं है, क्योंकि, एकस्याम् = एक विद्या में, अपि = भी (इस तरह के प्रतिपादन का भेद होना उचित ही है, अनुचित नहीं)। व्याख्या- उस अविनाशी परब्रह्म को श्रुतियों में कहीं सत्, कहीं सर्वज्ञ, कहीं विज्ञान-आनन्दमय, कहीं सर्वव्यापक, तो कहीं साकार ब्रह्म आदि कहकर उपासना विधि भी उसके अनुरूप कही गई है। यहाँ इस
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 188
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७० वदान्त दशन प्रकार के भेदपूर्ण वर्णन से श्रुति- वाक्यों की एकता-समानता प्रमाणित नहीं होती। यदि ऐसा कहा जाय; तो यह अनुचित है; क्योंकि समस्त श्रुति-स्मृतियों ने जगत् के उत्पन्न होने के पूर्व एकमात्र अविनाशी सत् तत्त्व ब्रह्म को ही कारण रूप में स्थित कहा है। उसे ही 'आत्मा, प्रजापति, आनन्दमय और अव्याकृत' नाम से श्रुति वाक्यों में विवेचित किया गया है। वे समस्त श्रुतियाँ उस ब्रह्म की उपासना के उद्देश्य से ही कर्म-विधि का निर्देशन करती हैं; किन्तु शैली-भाव और प्रतिपादन के अनुसार उनके विधान में अन्तर हो सकता है। इससे स्पष्ट हुआ कि विभिन्न तरह से उपासना-विधि बतलाकर भी एक ही परब्रह्म की उपलब्धि का उद्देश्य इन श्रुति वाक्यों में समाहित है। इस प्रकार से एक ही सत् तत्त्व का प्रतिपादन करने वाली एक ही अध्यात्म विद्या में वर्णन का भेद होना ठीक नहीं है। उद्देश्य एवं परिणाम एक होने से उन सभी की समानता ही है ॥।२॥ मुण्डकोपनिषद् ३/२/१० में वर्णन मिलता है कि 'जिसने शिरोव्रत अर्थात् सिर पर जटा धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का नियमतः पालन किया हो, उसे ही इस अध्यात्म विद्या का उपदेश देना चाहिए।' लेकिन अन्य शाखा वालों ने ऐसा नहीं बतलाया। अतः यहाँ इस शाखा में वर्णित अध्यात्म विद्या का अन्य शाखाओं में वर्णित अध्यात्मविद्या से निश्चय ही भेद होना चाहिए। इस आशंका का समाधान आचार्य अगले सूत्र में बतला रहे हैं- (३६३ ) स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च सववच्च तन्नियमः ॥३॥ सूत्रार्थ- स्वाध्यायस्य = (शिरोव्रत का पालन) अध्ययन का (अङ्ग है), हि = क्योंकि, समाचारे = आथर्वणिक शाखा के उपदेश में, तथात्वेन = अध्ययन के अङ्गरूप से ही उसका नियम है, च = और, अधिकारात् = उस व्रत का पालन निभाने वाले का ही अध्यात्मविद्या के अध्ययन में अधिकार होने से, च= भी, सववत् = 'सव' होम की तरह, तन्नियम: = वह शिरोव्रत वाला नियम आथर्वणिकों के लिए ही है। व्याख्या- अथर्वण शाखा की मुण्डकोपनिषद् ३/२/१० में कहा गया है कि 'उन्हीं को इस अध्यात्म विद्या का उपदेश देना चाहिए, जिसने विधिपूर्वक शिरोव्रत का पालन किया है।' उपर्युक्त शाखा वालों के लिए जो शिरोव्रत के पालन का नियम निर्धारित किया गया है, वह विद्या के भेद से नहीं, बल्कि उन शाखा वालों के पठन सम्बन्धी परम्परागत आचरण में ही यह नियम दीर्घकाल से चला आ रहा है कि जो शिरोव्रत के नियम को निभाता हो, उसे ही उपर्युक्त अध्यात्म विद्या का उपदेश प्रदान करना चाहिए। एकमात्र उसे ही उस ब्रह्मविद्या की प्राप्ति में अधिकार है। जिसने शिरोव्रत को नहीं निभाया, उसका उस ब्रह्मविद्या के अध्ययन में अधिकार नहीं है। जैसे 'सव' (यज्ञ) में मन्त्रों के स्मरण का विधान उन्हीं की शाखा वालों के लिए है, वैसे ही इस शिरोव्रत के निभाने का विधान भी उन्हीं (स्वाध्याय करने वाले) लोगों के लिए है। अतः यह नियम एकमात्र पठन-पाठन से सम्बन्धित होने से इससे ब्रह्म विद्या की समानता (एकता) में किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है।।३।। सभी उपनिषदों में एक ही परब्रह्म के स्वरूप को व्यक्त करने के लिए ही प्रकार भेद से अध्यात्म (ब्रह्म) विद्या का उल्लेख मिलता है। आचार्य अगले सूत्र में इसी तथ्य को वेद प्रमाण से भी प्रमाणित करते हैं- (३६४ ) दर्शयति च ॥४॥। सूत्रार्थ-च = तथा, दर्शयति = श्रुति (भी) ऐसा ही दिखलाती है। व्याख्या-वेदों- श्रुतियों में भी अध्यात्म (ब्रह्म) विद्या की अभिन्नता प्रतिपादित की गई है। कठोपनिषद् १/ २/१५ में वर्णन किया गया है कि 'सर्वेवेदायत्पदमामनन्ति' अर्थात् सभी वेद (श्रुतियों ने) जिस (उस) परम प्राप्य परब्रह्म ॐ का प्रतिपादन करते हैं। ऐसा ही प्रतिपादन अन्यान्य श्रुतियों में भी किया गया है। श्वेताश्वतरोपनिषद् ६/११ में स्पष्ट संकेत दिया गया है- 'एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः' अर्थात् एक ही देव सम्पूर्ण प्राणियों में छिपा है। तैत्ति. २/७/१ में कहा गया है कि 'ब्रह्म ही एकमात्र तत्त्व है, उसके नानात्व व अनेकता की श्रुतियों
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 189
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ६ १७१ (उपनिषदों) में निन्दा की गई है। ऋग्वेद १/५२/१ में भी एकमात्र ब्रह्म की अभिन्नता व उपासना का स्पष्ट वर्णन मिलता है- 'एक ही परब्रह्म ने अपने से अतिरिक्त इस समस्त विश्व को अपने नियन्त्रण में किया हुआ है। उसी की उपासना वरणीय है।' गीता के अ.५/१५ में भी भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है-'वेदैश्च सर्वैरहमेववेद्यः' अर्थात् 'सभी वेदों के द्वारा एकमात्र मैं (परमेश्वर)ही जानने योग्य हूँ।' इस प्रकार श्रुति- स्मृति में एकमात्र एक ही परमेश्वर की अभिन्नता दृष्टिगोचर होती है। अतः उक्त दृष्टान्तों-पुष्ट वचनों से यही सिद्ध होता है कि ब्रह्म (अध्यात्म) विद्या अलग-अलग नहीं, एक ही है॥४॥ परब्रह्म की अभिन्नता के प्रतिपादन में एक स्थान की अपेक्षा दूसरी जगह कुछ बातें अधिक और कहीं कम बातें कही गई हैं। ऐसी स्थिति में विभिन्न प्रकरणों के वर्णन की समानता कैसे होगी? इसी का समाधान सूत्रकार अगले सूत्र में करते हैं- (३६५ ) उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधिशेषवत्समाने च॥५॥ सूत्रार्थ-समाने · एक ही तरह की विद्या में, च = ही, अर्थाभेदात् = अर्थ (प्रयोजन) में भेद न होने से, उपसंहार: = एक स्थान पर कहे हुए गुणों का दूसरे स्थान पर उपसंहार कर लेने, विधिशेषवत् = विधिशेष की भाँति (ठीक ही है)। व्याख्या- जिस तरह कर्मकाण्ड में प्रयोजन (अर्थ) का भेद न होने से एक शाखा में कहे हुए अग्रिहोत्रादि के विधिशेषरूप यज्ञादि धर्मों का अन्यत्र (अन्य शाखा वालों द्वारा) भी उपसंहार रूप से स्वीकार कर लिया जाता है, उसी तरह से विभिन्न प्रकरणों के द्वारा व्यक्त हुई ब्रह्मविद्या के प्रतिपादन में भी प्रयोजन भेद न होने से एक स्थान पर व्यक्त की हुई बातों का अन्यत्र अर्थात् अन्य शाखा वाले उपसंहार (स्वीकार) कर लेते हैं, यही उचित भी है॥५॥ श्रुति में जितनी भी ब्रह्मविद्याएँ विवेचित हैं, उनमें कहीं शब्दभेद, तो कहीं नाम भेद और कहीं प्रकरण भेद से भिन्नता दिखाई देती है; अतः इसकी समानता का वर्णन करने हेतु अगले सूत्र में स्वयं सूत्रकार शङ्का उत्पन्न करके समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३६६) अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ॥६॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहें कि, शब्दात् = कहे हुए शब्द द्वारा, अन्यथात्वम् = दोनों विद्याओं की भिन्नता प्रतीत होती है, अतः एकता प्रमाणित नहीं होती, इति न = तो ऐसा नहीं है, अविशेषात् = क्योंकि विधि और फल आदि में भेद (विशेषता) न होने से (दोनों विद्याओं में समानता है)। व्याख्या- यदि यह कहें कि दोनों तरह से ब्रह्मविद्या का वर्णन होने से वे दोनों विद्याएँ अलग-अलग हैं, क्योंकि छा.उ. ८/१/१ और ८/७/१ में दहर विद्या और प्राजापत्य विद्या नामक दो तरह की विद्याओं का उल्लेख प्राप्त होता है। ये दोनों विद्याएँ परब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग बतलाने वाली हैं, इस कारण से इनकी समानता मानी जाती है। इसमें आशंका होती है कि दोनों विद्याओं में शब्द का अन्तर है अर्थात् छा.उ.८/ १/१ में दहरविद्या के प्रकरण में मनुष्य देहरूप ब्रह्मपुर में हृदय रूप घर में जो आन्तरिक आकाश है तथा उसके भीतर जो वस्तु है, उसे जानना चाहिए।' ऐसे ही छा. उ. ८/७/१ में प्राजापत्यविद्या के प्रकरण में 'अपहतपाप्मा' आदि विशेषणों से सम्पन्न आत्मा को जानने के योग्य बतलाया गया है। इस प्रकार दोनों विद्याओं के भिन्नत्व से वे एक नहीं हैं। इसके उत्तर में आचार्य कहते हैं कि यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि दहरविद्या में जिसे जानने योग्य बतलाया गया है, उसे (ब्रह्म को) प्राजापत्य विद्या में आत्मा रूप से उस परमात्मा को सबका आश्रय कहने के लिए पहले उसके अन्दर की वस्तुओं को जानने के लिए कहा गया है। इस प्रकार दोनों विद्याओं में यथार्थतः कोई भेद न होने से भिन्न प्रकार से विवेचन होने पर
Disclaimer / Warning: All literary and artistic malerial on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 190
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७२ वेदान्त दर्शन भी उनमें एकता (समानता) ही होती है। ऐसे ही अन्यत्र दूसरी विद्याओं में भी समानता स्वीकारनी चाहिए।६॥ अब सूत्रकार अगले सूत्र में विद्याओं की समानता को सिद्ध करने के लिए अन्य असमान विद्याओं से उनकी विशिष्टता का विवेचन करते हैं- (३६७ ) न वा प्रकरणभेदात्परोऽवरीयस्त्वादिवत्।।७।। सूत्रार्थ-वा= अथवा, परोऽवरीयस्त्वादिवत् · परम श्रेष्ठ अथवा सामान्य आदि गुणों से युक्त अन्य विद्याओं के सदृश, प्रकरणभेदात् - प्रकरण के भेद से (उक्त दोनों विद्याएँ), न = भिन्न सिद्ध नहीं हो सकतीं। व्याख्या- छान्दोग्य और बृहदारण्यक दोनों उपनिषदों में उद्गीथ-विद्या का उल्लेख मिलता है। छा.उ. १/१ के पूर्व खण्ड में जो उद्गीथ-विद्या विवेचित है, वह अतिश्रेष्ठ है; क्योंकि वहाँ पर उद्गीथ की 'ॐ' कार के साथ एकत्व स्थापित करके उसका महत्त्व प्रवर्द्धित किया गया है। इसलिए (छा.उ. १/९/१ से ४ तक में) उसका फल भी अत्यधिक श्रेष्ठतम विवेचित किया गया है, किन्तु (बृह०उ० १/३/१ से २७ तक में) उद्गीथ विद्या एकमात्र प्राणों का श्रेष्ठत्व सम्पादन करने हेतु एवं यज्ञादि में उद्गीथ गान की अवधि में स्वर की विशिष्टता दिखलाने के लिए है। अतः वहाँ पर उसका फल भी वैसा नहीं कहा गया है। दोनों उपनिषदों में केवल देवासुर-संवाद सम्बन्धी एकता है; किन्तु उसमें भी उपासना की विधि में भिन्नता है। अतः किञ्चित्मात्र एकता के कारण दोनों की एकता नहीं हो सकती। एकता के लिए उद्देश्य, कारण विधेय एवं फल की एकता चाहिए, जो कि उन उपनिषदों में नहीं है। इसलिए उनमें भिन्नता होना ठीक है; किन्तु ऊपर विवेचित दहर और प्राजापत्य विद्या में ऐसा नहीं है, मात्र विवेचन की भिन्नता है। अतः विवेचन मात्र की भिन्नता होने से उत्तम और मध्यम आदि की भिन्नता से सम्पन्न उद्गीथ विद्या के सदृश ऊपर वर्णित दहर और प्राजापत्य विद्या में भिन्नता सिद्ध नहीं हो सकती; क्योंकि दोनों के उद्देश्य, विधेय एवं फल में पृथक्ता नहीं है। अतः यहाँ पर दोनों विद्याओं का भिन्नत्व सिद्ध नहीं होता।७। अगले सूत्र में आचार्य अन्य तरह की आशङ्का का उत्तर देकर दोनों विद्याओं की समानता को पुष्ट करते हैं- (३६८ ) संज्ञातश्चेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि।८ ॥ सूत्रार्थ-चेत् = यदि यह कहो कि, संज्ञातः = परस्पर संज्ञात्मक भिन्नता होने के कारण (समानता सिद्ध नहीं हो सकती) तो, तदुक्तम् = उसका उत्तर (सूत्र ३/१/१ में) दिया जा चुका है, तु = तथा, तदपि = वह (संज्ञात्मक भिन्नता से होने वाली विद्याविषयक विषमता) भी, अस्ति = अन्यत्र वर्णित है। व्याख्या- यदि ऐसा कहें कि उसमें संज्ञात्मक अर्थात् नाम का भेद है, उस विद्या का नाम दहर और दूसरी का नाम प्राजापत्य विद्या है। अतः दोनों की समानता नहीं हो सकती, ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं; तो इसका उत्तर पहले ही सूत्र ३/३/१ में दिया जा चुका है। वहाँ कहा जा चुका है कि सभी उपनिषदों में पृथक्-पृथक् नामों से जिन अध्यात्म (ब्रह्म) विद्याओं का उल्लेख किया गया है, उन सभी में विधिवाक्य, फल एवं उद्देश्य-विधेय आदि की समानता होने के कारण सभी ब्रह्म विद्याओं में समानता है। अतः यहाँ संज्ञात्मक नाम-भेद से किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है। इसके अतिरिक्त छा.उ. ३/१८/१ और ३/१९/१ में कहा गया है कि जिनमें उद्देश्य, विधेय और फल आदि की एकता नहीं है, उन विद्याओं में संज्ञात्मक नाम आदि से भेद होता है तथा वैसी ही विद्याओं का उल्लेख भी उपनिषदों में ही मिलता है; किन्तु उन विद्याओं से ब्रह्मविद्या का किसी भी तरह का सम्बन्ध नहीं है।।८ ।। संज्ञात्मक नाम का भेद होने से भी विद्या में समानता हो सकती है, इस बात को सिद्ध करने हेतु आचार्य अगले सूत्र में एक अन्य कारण बतलाते हैं- (३६९ ) व्याप्ेश्च समञ्जसम् ॥९।।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 191
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ११ १७३ सूत्रार्थ- व्याप्ते: = ब्रह्म सर्वत्र संव्याप्त है, इस कारण; च = भी, समञ्जसम् = ब्रह्म विद्याओं के विवेचन में समानता है। व्याख्या- परब्रह्म की व्यापकता सर्वत्र प्रसिद्ध है। श्रुतियों-स्मृतियों में एकमात्र परब्रह्म के सर्वव्यापकत्व का ही प्रतिपादन किया गया है। परमात्मा सर्वव्यापक होने के साथ-साथ सर्वशक्तिमान् एवं सर्वज्ञ भी है। इसी कारण ब्रह्म-सम्बन्धी विद्या के पृथक्-पृथक् नाम एवं प्रकरण के आने पर भी उनकी समानता (एकता) होना ठीक ही है; क्योंकि उन ब्रह्म सम्बन्धी समस्त आध्यात्मिक विद्याओं का उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म के स्वरूप को ही भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रस्तुत करना है। इसलिए बह्मविद्याओं का विभिन्न प्रकार से विवेचन होने से भी वे सब एक ही हैं तथा समस्त विद्याओं का उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म की प्राप्ति ही प्रमाणित होता है।।९।। अब जिज्ञासा उठती है कि विद्याओं की समानता एवं भिन्नता के निर्णय हेतु प्रकरण, संज्ञा एवं विवेचन की समानता और भेद की अपेक्षा है या नहीं? सूत्रकार अगले सूत्र में इसी का समाधान दे रहे हैं- (३७० ) सर्वाभेदादन्यत्रेमे॥१०॥ सूत्रार्थ-सर्वाभेदात् = सर्वस्वरूप परब्रह्म सम्बन्धी समस्त विद्याओं के अभेद से, अन्यत्र = अन्य स्थल पर दूसरी विद्या के सम्बन्ध में, इमे = इन पूर्व सूत्रों में कहे हुए सभी हेतुओं का उपयोग हुआ है। व्याख्या- विभिन्न स्थलों में विभिन्न तरह से विवेचित ब्रह्म से सम्बन्धित अन्य विद्याओं में भी भेद नहीं होता; क्योंकि अन्य जगहों में विवेचित समस्त हेतु परब्रह्म की प्राप्ति के लिए ही कहे गये हैं। इससे प्रमाणित होता है कि परब्रह्म से सम्बन्धित समस्त विद्याएँ अभिन्न हैं। परमात्मा सबसे अभिन्न एवं सर्वस्वरूप है। इसलिए उसके तत्त्वज्ञान का प्रतिपादन करने वाली आध्यात्मिक विद्याओं में कोई भेद नहीं रहता। अतः संज्ञा, प्रकरण एवं शब्दों से इन विद्याओं की भिन्नता प्रमाणित नहीं की जा सकती; क्योंकि ब्रह्म के लिए सभी संज्ञाएँ हो सकती हैं। हर प्रकरण में ब्रह्मविद्या की बात आ सकती है और उसकी विवेचना भी पृथक्-पृथक् सभी शब्दों से की जा सकती है; किन्तु ब्रह्मविद्या के अलावा जो अन्य विद्याएँ हैं, जिनका उद्देश्य ब्रह्म का विवेचन करना नहीं है; उनकी एक दूसरे से पृथक्ता या अपृथक्ता को जानने के लिए पूर्व सूत्रों में कहे हुए प्रकरण, संज्ञा एवं शब्द नामक तीनों हेतुओं का प्रयोग किया जा सकता है। अतः उपर्युक्त प्रतिपादनों से प्रमाणित हो जाता है कि परब्रह्म के विवेचन के सन्दर्भ में समस्त विद्याएँ एक हैं, अन्य नहीं ॥१०॥ अगले सूत्र में शिष्य जिज्ञासा करता है कि वे कौन से गुण हैं, जिनका वर्णन एक स्थान पर होकर अन्यन्र भी उनका सम्बन्ध हो जाता है? सूत्रकार इसी का समाधान दे रहे हैं- (३७१ ) आनन्दादयः प्रधानस्य॥११॥ सूत्रार्थ-आनन्दादय: = आनन्द आदि, प्रधानस्य = प्रधान अर्थात् परब्रह्म परमात्मा के धर्म (गुण) हैं। (उन समस्त आनन्दादि गुणों का अन्यत्र भी ब्रह्म के वर्णन में अध्याहार किया जा सकता है)। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा के जिन आनन्दादि गुणों (धर्मों) का वर्णन श्रुति में एक स्थल पर किया गया है, उन्हीं गुणों का उपसंहार (अध्याहार) अन्य स्थलों पर भी कर लिया जाता है। इस कारण जिन विशेष गुणों की विशिष्टता पूर्व में व्यक्त करने से रह गई है, वह अन्यत्र प्रतिपादित की जा चुकी है या कर देनी चाहिए। सूत्रकार ने यहाँ पर 'प्रधान' पद को ब्रह्म का बोधक बतलाया है; वह (ब्रह्म) सभी चेतन-अचेतन जगत् का संचालक जीवनदाता है। सूत्र के 'आदि' पद से सत्य, ज्ञान एवं उसकी व्यापकता आदि का ग्रहण (बोध) होता है। परमात्मा के आनन्द, सत्य, तत्त्वज्ञान आदि ऐसे गुण हैं, जिनको सभी उपासनाओं में सम्मिलित होना मानना चाहिए, चाहे वहाँ इनकी विवेचना भले ही न की गई हो। इसका तात्पर्य यह है कि सभी उपासनाओं में उपास्य एकमात्र ब्रह्म ही है। ये सभी गुण ब्रह्म के यथार्थ रूप को प्रकट करते हैं। तैत्तिरीयोपनिषद् में इन
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 192
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७४ वदान्त दशन गुणों का जैसा स्पष्ट व विस्तृत उल्लेख किया गया है, अन्यत्र नहीं देखने को मिलता। अतः अन्यत्र विवेचित उपासनाओं में जिज्ञासु को परब्रह्म के ऐसे दिव्य स्वरूप का चिन्तन-मनन करना अनिवार्य होने से यहाँ इन श्रेष्ठ गुणों का सम्बन्ध मान लेना चाहिए॥११।। अब आशंका होती है कि तैत्ति. उप. में ब्रह्म के 'प्रियशिरस्त्व' अर्थात् प्रिय ही उसका सिर है आदि गुणों (धर्मों) का वर्णन है। क्या उनका भी सर्वत्र ब्रह्मविद्या में संग्रह हो सकता है? इसी का अगले सूत्र में आचार्य समाधान करते हैं- ( ३७२ ) प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥१२॥ सूत्रार्थ- प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः = 'प्रियशिरस्त्व' अर्थात् 'प्रियरूप सिर का होना' आदि लक्षणों की प्राप्ति अन्यत्र ब्रह्मविद्या के प्रकरण में नहीं होती है; हि = क्योंकि, भेदे = इस प्रकार सिर आदि अङ्गों का भेद मानने पर, उपचयापचयौ = परबह्म में वृद्धि और ह्रास का दोष -प्रसङ्ग उपस्थित होगा। व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद् के ब्रह्मानन्दवल्ली के पाँचवे अनुवाक के प्रथम सूत्र में वर्णिन आता है- तस्य प्रियमेव शिरः। मोदो दक्षिणपक्षः। प्रमोदः उत्तरपक्षः। आनन्द आत्मा का 'प्रेम' सिर है, मोद दाहिना पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष (अर्थात् दायें-बाएँ हाथ) हैं। आनन्द उस आत्मा रूप देह का मध्य भाग है और ब्रह्म ही उसका पुच्छ एवं आधार है। इस प्रकार पक्षी का रूपक प्रदान करके उपनिषद्कार ने जो अङ्गों की कल्पना की है, यह ब्रह्म का स्वरूपगत धर्म नहीं प्रतीत होती है। इस कारण इसका संग्रह अन्यत्र ब्रह्मविद्या के अन्तर्गत करना उचित नहीं लगता; क्योंकि इस प्रकार अङ्ग-प्रत्यङ्गों के भेद से ब्रह्म में भेद मान लेने पर उसमें वृद्धि और ह्रास के दोषों की आशङ्का उत्पन्न होगी। अतः परब्रह्म के जो सहज (धर्म) लक्षण न हों, जो किसी रूपक को लक्ष्य मानकर कहे गये हों, उन्हें अन्यत्र प्रयोग में नहीं लेना चाहिए॥१२।। उक्त प्रकरण में जो आनन्द एवं ब्रह्म शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उनको अन्यत्र लेना चाहिए अथवा नहीं? सूत्रकार इस जिज्ञासा का समाधान यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं- (३७३ ) इतरे त्वर्थसामान्यात्॥१३॥ सूत्रार्थ-तु= परन्तु, इतरे = अन्य जो आनन्द आदि धर्म (गुण) हैं, वे (ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करने हेतु श्रुति में कहे गये हैं, अतः अन्यत्र ब्रह्मविद्या के सन्दर्भ में उन्हें स्वीकार किया जा सकता है), अर्थसामान्यात् - क्योंकि वे सभी अर्थ की समानता के उद्देश्य से व्यक्त किये गये हैं। व्याख्या-अंग-अवयवों की कल्पना से सम्पन्न जो 'प्रियशिरस्त्व' आदि धर्म (गुण) हैं, वे तो रूपक मात्र ही हैं। उक्त गुणों से पृथक् दूसरे-अन्य 'आनन्द' आदि स्वरूपगत धर्म हैं, वे परब्रह्म के सहज-स्वाभाविक गुण हैं, उनका अर्थ भी गुणवत् ही है। अतः उन आनन्दादि गुणों का विवेचन ही युक्तिसंगत है। उन श्रेष्ठ गुणों का संग्रह हर एक ब्रह्मविद्या के प्रसङ्ग-प्रकरण में विवेचित किया जा सकता है; क्योंकि उनमें अर्थ की एकता है अर्थात् उन समस्त गुणों के द्वारा प्रतिपाद्य परब्रह्म मात्र एक ही है।।१३।। उपर्युक्त सूत्र में रूपक की कल्पना क्यों की गई है? इसी का समाधान सूत्रकार अगले सूत्र में करते हैं- (३७४ ) आध्यानाय प्रयोजनाभावात्॥१४॥ सूत्रार्थ- प्रयोजनाभावात् = अन्य किसी भी तरह के उद्देश्य का अभाव होने से (यही ज्ञात होता है कि), आध्यानाय = उस परब्रह्म का सम्यक् रूप से ध्यान करने के लिए ही उसका तत्त्व लक्षणों-रूपकों के द्वारा बतलाया गया है। व्याख्या- तैत्तिरीयोपनिषद् २/१ के अनुसार इस रूपक का अन्य कोई उद्देश्य दृष्टिगोचर नहीं होता, अतः यही जानना चाहिए कि सर्वप्रथम जिस परब्रह्म का सत्य, ज्ञान एवं अनन्त के नाम द्वारा उल्लेख कर उसे (ब्रह्म
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 193
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र १७ १७५ को) सभी भूतों के हृदय में विद्यमान कहा गया है तथा उसके मिलने की महत्ता का भी उल्लेख किया गया है। यहाँ इस रूपक में अंगों-अवयवों का उल्लेख करने से किसी अन्य उद्देश्य की सिद्धि नहीं होती; परन्तु ऐसा लगता है कि ब्रह्म का अच्छी तरह से चिन्तन-मनन हो सके, इसी हेतु ऐसा उल्लेख किया गया है। जो ब्रह्म किसी भी इन्द्रिय से ग्रहणीय नहीं होता तथा जो हृदय रूपी गुहा में बुद्धि से स्थित रहता है, उसे सद्ज्ञान, सद्बुद्धि व गुरुकृपा द्वारा ही जाना जा सकना संभव है। रूपक के अन्तर्गत पुरुष के अवयवों का पक्षी द्वारा तुलनात्मक प्रतिपादन करके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय व आनन्दमय पुरुष का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि सूक्ष्म तत्त्व के विश्रेषण से एक ही परमात्मतत्त्व (अन्तरात्मा) को लक्षित किया गया है।।१४ ॥ यहाँ आनन्दमय से अन्तरात्मा को ही लक्षित किया गया है, अन्य किसी तत्त्व को नहीं, यह कैसे निश्चय किया जा सकता है? अगले सूत्र में इसी का समाधान करते हैं- (३७५ ) आत्मशब्दाच्च ॥१५॥ सूत्रार्थ-आत्मशब्दात् = आत्मा शब्द का प्रयोग होने से, च = भी (ऐसा ही सिद्ध हो जाता है)। व्याख्या- पूर्व सूत्र में सूत्रकार द्वारा कहे हुए कारण के अतिरिक्त यहाँ इस कथन में भी बारम्बार (आनन्दमय को) सभी की अन्तरात्मा बतलाते हुए आनन्दमय को ही विज्ञानमय की अन्तरात्मा बतलाते हैं। उसके पश्चात् अन्तरात्मा अन्य किसी दूसरे को नहीं कहा गया है। इससे भी सिद्ध हो जाता है कि यहाँ समस्त प्राणियों की अन्तरात्मा रूप आनन्दमय ही एकमात्र परब्रह्म है॥१५।। 'आत्मा' शब्द का प्रयोग तो अधिकांशतः 'जीवात्मा' का ही वाची होता है। फिर यह कैसे निश्चित हुआ कि यहाँ 'आत्मा' शब्द 'ब्रह्म' का ही वाची है। इसी पर अगले सूत्र में आचार्य अपना मत प्रस्तुत करते हैं- (३७६) आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात्॥१६ ।। सूत्रार्थ-आत्मगृहीति: = 'आत्म' शब्द से परब्रह्म का ग्रहण होना, इतरवत् = अन्य श्रुतियों के सदृश, उत्तरात् = उसके बाद के वर्णन से भी (प्रतिपादित होता है)। व्याख्या-सूत्रकार कहते हैं कि जिस प्रकार ऐतरेयोपनिषद् १/१ में वर्णन आता है- 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चनमिषत् स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति' अर्थात् 'पूर्व में यह एक आत्मा ही था, उसने इच्छा की, कि मैं लोकों की सर्जना करूँ।' यहाँ पर इस श्रुति में प्रजा की सृष्टि-संरचना के प्रकरण को माध्यम बनाकर 'आत्मा' शब्द का प्रयोग हुआ है। अतः यहाँ आत्मा शब्द को ही परब्रह्म का वाची स्वीकार किया गया है। ऐसे ही तैत्तिरीयोपनिषद् में भी आनन्दमय का उल्लेख करने के तुरन्त बाद ही 'सोऽकामयत बहुस्याम्' अर्थात् उसने इच्छा की, कि मैं बहुत हो जाऊँ' इत्यादि वचनों से उस आनन्दमय आत्मा से सम्पूर्ण जगत् के उद्भव-विकास का विवेचन किया गया है। अतः बाद में आये हुए इस वर्णन से भी यह प्रमाणित हो जाता है कि यहाँ 'आत्मा' शब्द परब्रह्म का वाची है तथा 'आनन्दमय' नाम भी यहाँ उस एकमात्र परब्रह्म का ही है॥१६ ।। उपर्युक्त कथन में पुनः आशङ्का उत्पन्न करके सूत्रकार अगले सूत्र में उसका समाधान प्रस्तुत करते हुए पूर्वोक्त सिद्धान्त को और भी अधिक दृढ़ कर रहे हैं- (३७७) अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात्॥१७।। सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहो कि, अन्वयात् = प्रत्येक वाक्य में 'आत्म' शब्द का अन्वय होने से यह सिद्ध नहीं होता कि आनन्दमय ब्रह्म है, इति = तो इसका उत्तर यह है कि, अवधारणात् = निर्धारित किये जाने से, स्यात् = (आनन्दमय ही ब्रह्म है) यह कथन सिद्ध हो सकता है।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 194
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७६ वेदान्त दर्शन व्याख्या- यदि यह कहें कि तैत्ति. उप. की ब्रह्मानन्दवल्ली में 'आत्मा' शब्द तो समस्त वाक्यों के बाद में प्रयुक्त हुआ है। तो फिर मात्र आत्मा-शब्द के प्रयोग से 'आनन्दमय' को ही परब्रह्म कैसे मान लें? तो इसके समाधान में सूत्रकार कहते हैं कि जिस 'आत्मा' शब्द की सभी वाक्यों में व्यापत है, वह ब्रह्मवाची नहीं है। अन्नमय, प्राणमय आदि आत्माओं को ब्रह्म का शरीर और ब्रह्म को उनकी अन्तरात्मा कहने के उद्देश्य से वहाँ सबके साथ 'आत्मा' शब्द का प्रयोग किया गया है। अतः अन्नमय का अन्तरात्मा उससे पृथक् प्राणमय को कहा गया है। पुनः प्राणमय का अन्तरात्मा उससे पृथक् मनोमय को कहा और मनोमय का अन्तरात्मा विज्ञानमय को एवं विज्ञानमय का अन्तरात्मा आनन्दमय को कहा है। तदुपरान्त आनन्दमय का अन्तरात्मा दूसरे अन्य किसी को नहीं कहा है तथा अन्त में यह निश्चित कर दिया कि इसका देह सम्बन्धी आत्मा यह स्वयमेव है, जो कि पूर्व में कहे हुए अन्य सभी पुरुषों का भी आत्मा है। ऐसा बतलाकर उसी से जगत् के उद्भव का विवेचन किया है। इस तरह से यहाँ आनन्दमय को पूरी तरह से परब्रह्म निर्धारित कर दिया गया है। इसी से प्रमाणित होता है कि 'आनन्दमय' शब्द परब्रह्म वाची है।।१७।। 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त रूप है) इस कथन द्वारा कहा हुआ ब्रह्म ही यहाँ अन्नरसमय पुरुष है या फिर उससे पृथक् अन्य कोई है? अगले सूत्र में आचार्य इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३७८) कार्याख्यानादपूर्वम्॥१८।। सूत्रार्थ-कार्याख्यानात् = परब्रह्म का कार्य कहा जाने के कारण यह पुरुष, अपूर्वम् = वह पूर्वोक्त ब्रह्म नहीं हो सकता। व्याख्या-यहाँ इस प्रकरण के अन्तर्गत जिस अन्नमय पुरुष का उल्लेख किया गया है, वह पूर्वोक्त ब्रह्म नहीं हो सकता; बल्कि अन्न का परिणामभूत यह चैतन्यमय मानव-देह ही यहाँ अन्नरस से युक्त पुरुष के नाम से बताया गया है; क्योंकि इस पुरुष को उस उपर्युक्त परब्रह्म का आकाश आदि के क्रमानुसार कार्य बताया गया है। साथ ही इसकी अन्तरात्मा प्राणमय आदि के क्रमानुसार विज्ञानमय जीवात्मा को कहा है और विज्ञानमय का आत्मा ब्रह्म को कहकर बाद में आनन्द के साथ उस ब्रह्म की समानता व्यक्त की गई है। अतः जिसके 'सत्य' 'प्राण' एवं 'अनन्त' ये धर्म कहे गये हैं और जो 'आत्मा' एवं 'आनन्दमय' नाम से जगत् का कारण कहा गया है, ब्रह्म इस अन्नरस से युक्त पुरुष से पृथक् (परे) समस्त भूतों का अन्तरात्मा है॥१८॥ सूत्र सं. ११ से १८ तक 'आनन्द' नामक प्रकरण का शुभारम्भ कर उसे पूर्ण कर दिया गया। अब अगले सूत्र में सूत्रकार पूर्व में प्रारम्भ किये हुए प्रकरण पर अन्य श्रुतियों के विषय में बतलाते हैं- (३७१ ) समान एवं चाभेदात्॥१९।। सूत्रार्थ-एवम् = इसी प्रकार, च = भी, समान := (एक शाखा में ब्रह्मविद्या की) समानता समझनी चाहिए, अभेदात् = क्योंकि शाखा के दोनों स्थलों पर उपास्य-ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। व्याख्या-वाजसनेयी शाखा के अन्तर्गत (शतपथ ब्राह्मण १०/६/३/२) में अग्नि रहस्य विद्या (जिसे शाण्डिल्य विद्या भी कहा जाता है) का वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'सत्य ही ब्रह्म है, ऐसा जानकर उपासना करनी चाहिए। निश्चय ही यह पुरुष श्रेष्ठ संकल्पों से युक्त है। वह जितने संकल्पों से युक्त होकर इस लोक से प्रस्थान करता है, परलोक गमन करने पर वैसे ही संकल्पों से युक्त होकर प्रकट होता है, वह मनोमय प्राण-देह वाले आकाश-स्वरूप आत्मा की उपासना करे। इसी वाजसनेयी शाखा के अन्तर्गत बृहदारण्यकोपनिषद् ५/६/१ में भी ऋषि ने कहा है कि 'प्रकाश ही जिसका सत्य स्वरूप है, ऐसा वह पुरुष मनोमय है। वह धान और जौ आदि की भाँति सूक्ष्म आकार वाला है। वह उस हृदयाकाश में अवस्थित है, वह सबका स्वामी व अधिष्ठाता है तथा यह जो भी कुछ है, सभी का श्रेष्ठ शासक है। ' इस प्रकार से इन दोनों पुस्तकों में विवेचित इन विद्याओं
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webelte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 195
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र २२ १७७ में भेद है या अभेद? यह आशंका उत्पन्न होने पर आचार्य बतलाते हैं कि जिस प्रकार भिन्न शाखाओं में ब्रह्मविद्या की समानता एवं उसके गुणों का उपसंहार ठीक माना गया है, वैसे ही एक शाखा में व्यक्त हुई विद्याओं में भी समानता माननी चाहिए; क्योंकि वहाँ पर उपास्य-इष्ट में अभेद है। दोनों स्थलों में एक ही ब्रह्म उपास्य बतलाया गया है॥११॥ उपास्य के सन्दर्भ में किस जगह विद्या की एकता स्वीकार करनी चाहिए और किस जगह नहीं? इसका समाधान करने के लिए अब यहाँ अगले सूत्र में पूर्वपक्ष का मत प्रस्तुत किया जाता है- ( ३८० ) सम्बन्धादेवमन्यत्रापि॥२०।। सूत्रार्थ- एवम् = इस प्रकार, सम्बन्धात् = उपास्य के सम्बन्ध से, अन्यत्र = अन्य स्थलों में, अपि = भी (क्या ब्रह्मविद्या की एकता मान लेनी चाहिए?)। व्याख्या- अन्यत्र कई स्थलों में एक ही उपास्य-उपासक का सम्बन्ध दिखलाते हुए ब्रह्म विषयक विद्या का उल्लेख किया गया है। एक ऐसा ही वर्णन बृहदारण्यकोपनिषद् ५/५/१ में देखने को मिलता है- 'यह सर्वप्रथम बतलाया गया है कि सत्य ही ब्रह्म है, इत्यादि। पुनः इसी उपनिषद् के ५/५/२ में इसी सत्य की सूर्य मण्डल में अवस्थित पुरुष के साथ और आँख में स्थित पुरुष के साथ एकत्व स्थापित किया गया है। तत्पश्चात् दोनों का रहस्यमय नाम क्रमशः 'अहर्' और 'अहम्' कहा है। यहाँ इस कथानक में एक ही उपास्य का सम्बन्ध होने से भी स्थान भेद से पृथक्-पृथक् दो उपासना पद्धतियाँ कही गई हैं। अतः इनमें भेद मानें या अभेद ?॥२०॥ उपर्युक्त सूत्र में व्यक्त की गई आशङ्का का समाधान सूत्रकार अगले सूत्र में दे रहे हैं- (३८१ ) न वा विशेषात्॥२१।। सूत्रार्थ-न वा= इन दोनों की एकता यहाँ सिद्ध नहीं होती, विशेषात् = क्योंकि इन दोनों पुरुषों के नाम एवं स्थान में भिन्नता है। व्याख्या- उपर्युक्त सूत्र में वर्णित इन दोनों उपासनाओं के स्थान और नाम पूर्वपक्ष द्वारा अलग-अलग बतलाये गये हैं। सूर्य मण्डल के मध्य में अवस्थित सत् पुरुष का तो रहस्यात्मक नाम 'अहर्' कहा है तथा आँख में अवस्थित पुरुष का नाम 'अहम्' कहा गया है। इस तरह से नाम एवं स्थान की भिन्नता होने से इन वर्णित उपासनाओं की समानता नहीं स्वीकार की जा सकती है। अतः एक के नाम एवं गुणों का उपसंहार अन्य दूसरे पुरुष में नहीं करना चाहिए। इससे प्रमाणित होता है कि इन ब्रह्म-अध्यात्म विद्याओं में उपास्य एवं उपासना की एकता नहीं हो सकती॥२१॥ उपर्युक्त तथ्य को सूत्रकार अगले सूत्र में श्रुति के प्रमाण द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं- (३८२) दर्शयति च ॥२२ ॥ सूत्रार्थ- च = और, दर्शयति = श्रुति में (भी) यही देखा जाता है। व्याख्या- जहाँ पर ऐसे नाम एवं स्थान की भिन्नता हो, वहाँ एक स्थल पर कहे हुए गुण अन्यत्र दूसरे स्थल पर नहीं लिये जाते; यह कथन श्रुति द्वारा इस प्रकार प्रतिपादित की गई है। छान्दोग्योपनिषद् १/ ७/५ में आधिदैविक साम के प्रसंग में सूर्य में स्थित पुरुष का वर्णन करके पुनः आध्यात्मिक साम के प्रसंग में आँख में स्थित पुरुष का विवेचन किया गया है। वहाँ पर सूर्य में स्थित पुरुष के नाम-रूप आदि का आँख में अवस्थित पुरुष में भी श्रुति ने स्वयमेव विधान करके दोनों की एकता स्थापित की है। इससे यह ज्ञात होता है कि ऐसी जगहों में विद्या की समानता मानकर एक के गुणों का दूसरी जगह उपसंहार करना सामान्य नियम नहीं है। जहाँ ब्रह्मविद्या की एकता मानकर गुणों का उपसंहार करना अभीष्ट होता है, उस सन्दर्भ में श्रुति स्वयं उसका नियम-विधान बना देती है, जैसे कि उक्त प्रसंग में सूर्य में अवस्थित
Disclaimer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 196
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१७८ वेदान्त दर्शन पुरुष के गुणों का नेत्र में स्थित पुरुष में नियम-विधान किया गया है।।२२।। सूर्यमण्डलवर्ती एवं नेत्रवर्ती आदि पुरुषों में ब्रह्म के कौन-कौन से गुणों का उपसंहार नहीं किया जा सकता? इसके निर्णय हेतु सूत्रकार अगले सूत्र में अपने विचार व्यक्त करते हैं- (३८३) सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि चातः ॥।२३।। सूत्रार्थ- च = और, अतः = इस प्रकार विद्या की एकता न होने से, सम्भृतिद्युव्याप्ती = लोकों को धारण करना एवं द्युलोक आदि अखिल ब्रह्माण्ड को व्याप्त करके स्थित होना (ये दोनों ब्रह्म सम्बन्धी गुण), अपि = भी अन्यत्र (नेत्रान्तर्वर्ती आदि पुरुषों में) नहीं लेने चाहिए। व्याख्या- परब्रह्म परमात्मा जगत् का कारण होने के साथ ही द्युलोकादि समस्त लोकों का पालनकर्त्ता और जड़-चेतनमय सम्पूर्ण विश्व में संव्याप्त है। ये गुण नेत्र में रहने वाले या सूर्य के मध्य में अवस्थित पुरुष के नहीं हो सकते। यहाँ अक्षर रूप ब्रह्म के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए दो बातें प्रमुख रूप से कही गई हैं, उनमें प्रथम तो यह है कि वह द्युलोक से ऊपर और पृथिवी के नीचे तक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है और द्वितीय बात यह है कि वही समस्त प्राणियों को धारण करने वाला है। इन दोनों गुणों का नेत्रान्तर्वर्ती एवं सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषों में उपसंहार नहीं हो सकता है; क्योंकि प्रतीक उपासना के लिए सीमित स्थलों में स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापी होते हैं और न ही सभी को धारण करने वाले ही हो सकते हैं। ऐसे ही अन्य स्थलों में भी जहाँ पूर्ण परब्रह्म का उल्लेख नहीं है, उन प्रतीकों में इन गुणों का उपसंहार नहीं हो सकता है, ऐसा ही सम्यक् रूप से मान लेना चाहिए। ऊपर वर्णित विद्याओं की एकता का प्रमाणित न होना और इन गुणों का उन पुरुषों में न हो सकना, यह दोनों बातें उक्त पुरुषों में ब्रह्म के गुणों का उपसंहार न होना प्रमाणित करती हैं।।२३।। ऊपर वर्णित पुरुषों में ब्रह्म के गुणों में अध्याहार न हो, यह तो उचित है; किन्तु पुरुष विद्याओं में पुरुष के जो गुण कहे गये हैं, उनका अध्याहार तो दूसरी जगह-जहाँ-जहाँ पुरुषों का उल्लेख हो, वहाँ उन सबमें तो होना ही उचित है। इस प्रकार की आशंका का समाधान सूत्रकार अगले सूत्र में प्रस्तुत करते हैं- (३८४) पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥२४॥ सूत्रार्थ- पुरुषविद्यायाम् = पुरुषविद्या में बतलाये हुए गुणों के, इव = समान, च = भी, इतरेषाम् = अन्य पुरुषों के (गुण) नहीं हो सकते, अनाम्नानात् - क्योंकि श्रुति ने वैसे गुण कहीं नहीं बतलाये हैं। व्याख्या- पुरुष विद्या के प्रकरण में ब्रह्मरूप पुरुष के जो दिव्य गुण बतलाये गये हैं, उनका भी नेत्रान्तर्वर्ती एवं सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषों में और जहाँ-जहाँ स्थूल, सूक्ष्म या कारण शरीर का वर्णन पुरुष के नाम से किया गया है, उन पुरुषों में अध्याहार नहीं किया जा सकता है; क्योंकि श्रुति में कहीं भी उनके लिए वैसे गुणों का उल्लेख नहीं किया गया है। उन प्रकरणों में उन पुरुषों की आत्मा परम पुरुष को लक्ष्य कराने के लिए उन्हें पुरुष नाम से जाना गया है। मुण्डकोपनिषद् में २/१/१ से लेकर २/१/१० तक पुरुष नाम से जिस अक्षर रूप ब्रह्म का उल्लेख किया गया है, वहाँ सर्वप्रथम अक्षर ब्रह्म के द्वारा सभी की उत्पत्ति और पुनः उसी में सभी का लय होना कहा गया है। तदुपरान्त उसी को दिव्य अमूर्त पुरुष के नाम से संबोधित किया गया है और पुनः मु.उ. २/१/३ से २/१/९ तक उसी से समस्त प्राण, इन्द्रिय, पञ्चभूत, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वेद, देवता, मानव, अन्न, समुद्र और पर्वत आदि जगत् की उत्पत्ति कही गयी है। मु.उ. २/१/१० में उसे ही तप, कर्म और परम अमृतमय ब्रह्म के रूप में प्रतिपादित किया गया है। अतः इस प्रकार के श्रेष्ठ दिव्य गुण परब्रह्म के अतिरिक्त किसी सामान्य पुरुष के नहीं हो सकते ॥२८॥ अब आशंका यह होती है कि क्या ब्रह्म की उपासनाओं में वेध (बींधना) आदि गुणों का उपसंहार मान्य होना चाहिए या नहीं? सूत्रकार अगले सूत्र में इसी का समाधान दे रहे हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 197
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०३ सूत्र २६ १७९
(३८५) वेधाद्यर्थभेदात्॥२५॥ सूत्रार्थ- वेधादि = बींधना आदि गुणों का, अर्थभेदात् = अर्थ के भेद से उपसंहार नहीं होता। व्याख्या- यहाँ सूत्र में सूत्रकार ने ब्रह्म को 'प्रणव' रूपी बाण से बींधने योग्य बतलाया है। मुण्डकोप. २/ २/३ में इसका उल्लेख इस प्रकार मिलता है- 'हे सोम्य! उपनिषद् में उल्लिखित प्रणव रूप महान् धनुष पर उपासना के द्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण संधान करना चाहिए। तदुपरान्त भावनामय चित्त के द्वारा उस बाण को खींचकर परम अक्षर रूप ब्रह्म को ही लक्ष्य करके उसे बींध दो।' इस वर्णन के उपरान्त द्वितीय मन्त्र में आत्मा को ही बाण का रूप प्रदान किया गया है। इस तरह से यहाँ पर जो ब्रह्म को आत्मा रूप बाण द्वारा बींधने योग्य कहा है। उसके इस तरह से बींधने आदि गुणों का और ॐ कार रूप धनुर्भाव तथा आत्मा रूप बाण का भी जहाँ ॐकार से ब्रह्म की उपासना करने का वर्णन है, उन बह्मविद्याओं में उपसंहार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यहाँ पर चिन्तन-मनन में एकाग्रता का स्वरूप बतलाने के लिए तदनुकूल रूपक ग्रहण किया गया है। इस प्रकार रूपक की कल्पना द्वारा जो भी विशेष कथन कहा जाए, वे अन्य किसी प्रकरण में उपयुक्त न होने से ग्रहण करने योग्य नहीं हैं। यहाँ अर्थ के भेद द्वारा अन्य कोई कल्पना नहीं करनी चाहिए।।२५।। अब अगले सूत्र में सूत्रकार 'ब्रह्मविद्या के फल में भेद है या नहीं' जिज्ञासा का समाधान करते हैं- (३८६ ) हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत्तदुक्तम् ।।२६।। सूत्रार्थ- हानौ = जिस श्रुति में दुःख, शोक, पुण्य, पाप आदि कर्मों के नष्ट होने का ही उल्लेख है उसमें, तु = तो, उपायनशब्दशेषत्वात् = लाभ रूप परमधाम की प्राप्ति आदि फल का भी अध्याहार कर लेना चाहिए; क्योंकि वह वाक्य का शेष भाग है, कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत् = यह कथन कुशा, छन्द, स्तुति और उपगान की भाँति समझना चाहिए, तदुक्तम् = ऐसा पूर्व में कहा जा चुका है। व्याख्या- सूत्रकार कहते हैं कि श्रुतियों-उपनिषदों में यत्र-तत्र ब्रह्मविद्या का फल पुण्य, पाप और विविध प्रकार के विकारों का विनाश बताया गया है। उन मन्त्रों में ब्रह्म या अविनाशी पद की या फिर परमधाम की उपलब्धि नहीं कही गई है। अतः सूत्रकार संकेत करते हैं कि ऐसी जगहों में जहाँ मात्र दुःख, बन्धन एवं कर्मों के त्याग या विनाश की बातें कही गई हैं, उसके वाक्य शेष के रूप में अन्यत्र कहे हुए उपलब्धि रूप फल का भी अध्याहार कर लेना चाहिए। जहाँ पर केवल हानौ अर्थात् पाप, शोक, दुःख आदि का उल्लेख है, वहाँ-वहाँ ब्रह्मानन्द या ब्रह्मलोक आदि की उपलब्धि वाक्य शेष है तथा जहाँ केवल उपायन अर्थात् ब्रह्म धाम की उपलब्धि आदि का उल्लेख है, वहाँ ऊपर वर्णित हानौ (दुःख नाश आदि) ही वाक्य शेष है। अतः हर समान विद्या में उसका अध्याहार कर लेना चाहिए; ताकि किसी भी तरह का फल भेद न रहे। वाक्य शेष ग्रहण करने के दृष्टान्त का हवाला देते हुए आचार्य कहते हैं कि - जैसे कौषीतकि शाखा वाले केवल वनस्पति की कुशा लेने को कहते हैं; किन्तु शाट्यायनी कुश के स्थान पर 'औदुम्बरा: कुशाः' अर्थात् गूलर के काठ की बनी कुशा लेने के लिए बोलते हैं। अतः उनका वह विशेष वचन कौषीतकि के वचन का वाक्य शेष माना जाता है और दोनों शाखा वाले उसे एकमत से स्वीकारते हैं। ऐसे ही एक शाखा वाले 'छन्दोभि: स्तुवीत' अर्थात्- छन्दों द्वारा स्तुति करें, इस तरह समान भाव से कहते हैं, किन्तु पैङ्गी शाखा वाले- 'देवच्छंदासि' अर्थात् 'देवों के छन्द पहले कहने चाहिए'। इस तरह से विशेषतया क्रम निश्चित कर देते हैं, तब उस क्रम को पूर्ण कथन का वाक्य शेष मानकर सभी स्वीकारते हैं। किसी शाखा में 'षोडशिन: स्तोत्र मुपाकरोति' अर्थात् षोडशी का स्तवन करे, ऐसा वचन प्राप्त होता है; किन्तु तैत्तिरीय शाखा वाले इस कर्म को ऐसे क्षणों में अपना कर्त्तव्य कहते हैं, जैसे ब्रह्मवेला में तारे छिप गये हों और सूर्य का उदय न हुआ
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 198
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१८० वेदान्त दर्शन हो। अतः यह काल विशेष का नियम पूर्व वर्णित वाक्य का शेष होकर सभी को स्वीकार होता है। एक अन्य शाखा वाले कहते हैं कि-'ऋत्विज उपगायन्ति' अर्थात् 'ऋत्विग्गण स्तोत्र का गायन करें।' किन्तु दूसरी शाखा वाले यह नियम बतलाते हैं कि 'नाध्वर्युरुपगायति' अर्थात् अध्वर्यु को स्तोत्रगान नहीं करना चाहिए। अतः इसे भी वाक्य-शेष मानकर सभी स्वीकारते हैं कि अध्वर्यु को छोड़कर अन्य ऋत्विजों द्वारा स्तोत्रों का गायन होना चाहिए। इस प्रकार से उक्त सभी दृष्टान्तों से यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्मनाश उपलब्धि रूप फल को भी वाक्य शेष के रूप में ही ग्रहण कर लेना ही सर्वथा उचित है।।२६।। अब जिज्ञासा होती है कि देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक में गमन करने वाले पुरुष के पाप कर्म विनष्ट हो जाते हैं, किन्तु पुण्यकर्म तो बचे रहते होंगे, नहीं तो फिर उसका ब्रह्मलोक में जाना कैसे सम्भव होगा? क्योंकि ऊर्ध्वलोकों में गमन करना श्रेष्ठ कर्मों का ही फल है। अगले सूत्र में आचार्य इसे ही स्पष्ट करते हैं- (३८७) साम्पराये तर्तव्याभावात्तथा ह्यन्ये॥२७। सूत्रार्थ- साम्पराये = ज्ञानियों के लिए परलोक गमन में, तर्तव्याभावात् = भोग द्वारा पार करने योग्य कोई कर्मफल नहीं बचता, इसलिए (उसके श्रेष्ठ कर्म भी यहाँ समाप्त हो जाते हैं) हि = क्योंकि, तथा = ऐसा ही, अन्ये = अन्य शाखा वाले भी मानते हैं। व्याख्या- मोक्ष को प्राप्त हुए ज्ञानियों के समस्त श्रेष्ठ कर्म विनष्ट हो जाते हैं, ऐसा श्रुतियों से ज्ञात होता है। बृहदारण्यकोपनिषद् ४/४/२२ में यह कथन स्पष्ट रूप से वर्णित है- 'उभे उ हैवैष एते तरति' अर्थात् 'निश्चित ही ज्ञानी पाप और पुण्य दोनों को यहीं पार कर जाता है।' इस दृष्टान्त से स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञानी पुरुष देह का परित्याग करने के पश्चात् शुभ-अशुभ हर तरह के कर्मों से कोई सम्बन्ध नहीं रखता। उसे (प्राणी को) जिस नित्यधाम (ब्रह्मलोक) की प्राप्ति होती है, वह किसी कर्म के फल रूप में नहीं; वरन् ब्रह्मज्ञान की शक्ति से मिल जाता है। अतः उसके लिए परलोक में जाकर भोग के द्वारा पार करने लायक कोई भी कर्मफल अवशेष नहीं बचता; इस कारण भी उसके समस्त पुण्य कर्म यहीं पर ही पूर्ण (समाप्त) हो जाते हैं। मुण्डकोपनिषद् ३/१/३ में भी इस तथ्य का समर्थन करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि ज्ञानी के संचित सभी कर्मों का पूर्णरूपेण विनाश हो जाता है, यह वर्णन इस प्रकार है- 'उस समय ज्ञानी पुण्य और पाप दोनों को अपने से अलग हटाकर मलरहित हो सर्वश्रेष्ठ साम्य रूप ब्रह्म को पा लेता है।' इस प्रकार उक्त उद्धरणों से सिद्ध हो जाता है कि परलोक में गमन करते समय भोग के द्वारा पाप कराने वाला कोई भी कर्मफल शेष नहीं बचता ।२७।। अब आशंका होती है कि जब 'सभी कर्मों का विनाश एवं परब्रह्म की प्राप्ति रूप फल तो ब्रह्म-ज्ञान से यहीं तुरन्त मिल जाता है, तो फिर देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्म को पाने की बात क्यों कही गई? सूत्रकार इसी सन्दर्भ में कहते हैं- (३८८ ) छन्दत उभयथाविरोधात् ॥२८ ॥। सूत्रार्थ- छन्दत: = मुमुक्षु पुरुषों के सङ्कल्पानुसार, उभयथा = दोनों तरह की गति का (भी), अविरोधात्· श्रुति में विरोध नहीं है, (अतः ब्रह्मलोक गमन का विधान है)। व्याख्या-मुमुक्षु पुरुष जिस तरह का संकल्प अपनाता है, उसी तरह की गति उसे मिलती है। छान्दोग्योपनिषद् (३/१४/१) में वर्णन है कि 'अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथा क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति' अर्थात् अवश्य ही यह पुरुष श्रेष्ठ संकल्पों वाला है। इस लोक में पुरुष जैसे संकल्पों से युक्त होता है, वैसे ही शरीर त्यागने के बाद यहाँ से परलोक गमन पर भी होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जो ज्ञानीजन किसी लोक में गमन करने की आकांक्षा न करके यहीं पर मुक्त होने का संकल्प रखता है, ब्रह्मज्ञान हेतु साधन
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 199
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ३० १८१ में संलग्न होते समय भी जिसकी ऐसी ही प्रबल भावना बनी रहती है, वह ज्ञानी तो तत्क्षण यहीं ब्रह्म-सायुज्य को पा जाता है, किन्तु जो ब्रह्मलोक-दर्शन की इच्छा लेकर साधन में सन्नद्ध हुआ था और जिसका वहाँ जाने का संकल्प है, वह देवयान मार्ग से वहाँ जाकर ही ब्रह्म को पाता है। इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि दोनों तरह की गति होना शास्त्र-सम्मत है, अतः इन्हें मान लेने में किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है।२८।। यदि ब्रह्मलोक में गमन किये बिना यहाँ ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाना मान लें, तो क्या आपत्ति है? इसी का समाधान अगले सूत्र में किया जा रहा है- (३८९ ) गतेरर्थवत्त्वमुभयथाऽन्यथा हि विरोधः ॥२९॥ सूत्रार्थ-गतेः =गतिबोधक श्रुति की, अर्थवत्त्वम् = सार्थकता, उभयथा = दोनों प्रकार से ब्रह्म की प्राप्ति मानने पर ही होगी; हि = क्योंकि, अन्यथा = इससे अन्य-अलग मानें तो, विरोधः = श्रुति में विरोध उत्पन्न होगा। व्याख्या- मुमुक्षु-साधक की गति संकल्पानुसार मान लेने पर मुक्ति के दोनों भेद मान्य हैं। प्रथम तो यह कि साधक ब्रह्मदर्शन की लालसा से साधना में संलग्न हो, तो वह कर्म का परित्याग करके परलोक गमन करेगा तथा ब्रह्म दर्शन की कामना के सिवाय मात्र मुक्ति की कामना करे, तो उस साधक को मृत्यूपरान्त तत्क्षण मुक्ति की प्राप्ति हो सकेगी। यदि ऐसा न माना जाये, तो दोनों प्रकार से वर्णन करने वाली श्रुतियों में विरोध का प्रसंग उपस्थित हो जायेगा। अतः यही मानना उचित होगा कि साधक के संकल्पानुसार दोनों तरह से ब्रह्म की प्राप्ति होना संभव हो सकती है। ऐसा मान लेने से ही देवयान-मार्ग से गति का उल्लेख करने वाली श्रुति की सार्थकता होगी और श्रुतियों का आपस में विरोध भी दूर हो जायेगा ॥२९॥ अगले सूत्र में सूत्रकार पुनः उपर्युक्त कथन को सिद्ध करते हैं- (३९० ) उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ॥३० ॥ सूत्रार्थ- तल्लक्षणार्थोपलब्धे: = उस देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक गमन के अनुकूल सूक्ष्म शरीरादि की उपलब्धि का कथन होने से, उपपन्नः = उनके लिए दोनों प्रकार की गति संभव है, लोकवत् = लोक में ऐसा ही देखने को मिलता है। व्याख्या- जहाँ श्रुतियों में साधक के लिए देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक में गमन करने की बात बताई गई है, वहीं पर उस प्रकरण में उसके उपयोगी उपकरणों का भी उल्लेख मिलता है। प्रश्नोपनिषद् ३/१० में वर्णन आता है कि 'जीवात्मा जिस संकल्प वाला होता है, उस संकल्प से साधक मुख्य प्राण में अवस्थित हो जाता है। मुख्य प्राण उदान वायु में स्थित होकर मन-इन्द्रियों के सहित जीवात्मा को संकल्पगत लोक में ले जाता है।' बृहदारण्यकोपनिषद् ४/४/६ में एक अन्य तरह की गति का उल्लेख इस प्रकार मिलता है- 'जो अकाम, निष्काम, पूर्णकाम और केवल परमात्मा को ही चाहने वाला है, उसके प्राण ऊर्ध्व लोकों में नहीं जाते। वह ब्रह्ममय होकर ही यहीं ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है अर्थात् ब्रह्ममय हो जाता है।' उक्त दोनों उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि साधक की संकल्प शक्ति से दोनों तरह की गति से ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है। लोक मान्यता है कि जिसे अपने स्थान से कहीं अन्यत्र गमन करना होता है, तो उसे अपने साथ यात्रा के समय आवश्यक साधन-सामग्री भी लेनी पड़ती है। वैसे ही उपयुक्त साधक योगी पुरुष के लिए ब्रह्मलोक गमन हेतु दिव्य- सूक्ष्म शरीर भी आवश्यक है। अतः साधक का इस लोक से ब्रह्मलोक गमन का श्रुति कथन युक्तिसंगत मानना ही उचित है।३० ।। अब आशङ्का उठती है कि 'ब्रह्मलोक में जाने वाले सभी ब्रह्मज्ञ देवयान-मार्ग से ही जाते हैं या जहाँ-जहाँ विद्याओं के वर्णन में देवयान मार्ग का उल्लेख है, उन्हीं के अनुसार साधक उस मार्ग से जाते हैं? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान दे रहे हैं-
Disclalmer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 200
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१८२ वेदान्त दर्शन
(३९१ ) अनियम: सर्वेषामविरोधः शब्दानुमानाभ्याम्।३१॥ सूत्रार्थ- अनियम: = उन विद्याओं के अनुसार उपासना करने वालों को ही देवयान मार्ग से जाने का ऐसा कोई नियम नहीं है, सर्वेषाम् = किन्तु ब्रह्मलोक में गमन करने वाले सभी साधकों की गति उसी मार्ग से होती है, शब्दानुमानाभ्याम् = यही तथ्य शब्द अर्थात् श्रुति और अनुमान अर्थात् स्मृतियों दोनों तरह से मान्य है, अविरोध: = अतः इसमें कोई विरोध नहीं है। व्याख्या-साधना करने वाले योगी साधकों को भिन्न-भिन्न सिद्धियों के द्वारा ब्रह्मलोक तथा परमधाम की प्राप्ति श्रुतियों में जगह-जगह पर कही गई है, परन्तु उन सब में देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक पहुँचने की बात का उल्लेख नहीं मिलता। ऐसे ही गीता आदि स्मृतियों में भी सर्वत्र उस मार्ग का उल्लेख नहीं किया गया है। इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि जहाँ पर देवयान मार्ग का उल्लेख नहीं किया गया है, वहाँ उस साधना द्वारा बिना देवयान मार्ग के सीधे ही ब्रह्मलोक गमन का नियम है; किन्तु बात ऐसी नहीं है। फल प्राप्ति रूप ब्रह्मलोक प्रस्थान हेतु सभी तरह की साधनाओं में देवयान मार्ग से ही पहुँचा जा सकता है। ऐसा मान लेने से श्रुति के कथन में किसी भी तरह का विरोध नहीं होगा। यहाँ पर यह भी ध्यातव्य है कि जो यहीं परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं, वे ब्रह्मलोक में नहीं गमन करते। सूत्रकार कहते हैं कि श्रुति एवं स्मृति (शब्द और अनुमान) दोनों से ही इसका विरोध न होने से यही समीचीन है।३१। वशिष्ठ एवं व्यास आदि जो विशिष्ट अधिकार प्राप्त महान पुरुष हैं, उन सभी की अर्चिमार्ग से गति होती है या फिर वे इसी देह से ब्रह्मलोक गमन कर सकते हैं? इसका समाधान आचार्य अगले सूत्र में देते हैं- (३९२ ) यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम्।।३२।। सूत्रार्थ-आधिकारिकाणाम् - जो मोक्ष के अधिकार-प्राप्त हुए महान् पुरुष हैं, उनकी, यावदधिकारम् = जब तक अधिकार की समाप्ति नहीं होती तब तक, अवस्थितिः = अपनी इच्छानुसार स्थिति बनी रहती है। व्याख्या- जो मोक्ष के अधिकार को प्राप्त हुए महान् पुरुष हैं, वे व्यास, वशिष्ठ आदि महान् अधिकारी पुरुष परम पिता की आज्ञानुसार ही जगत् का भला करने हेतु आते हैं। उन महान् पुरुषों का न तो सामान्य जीवों की भाँति आना-जाना होता है और न ही उनकी जन्म व मृत्यु ही होती है। उनकी सभी क्रियाएँ सामान्य लोगों से विलक्षण और दिव्य होती हैं। वे इच्छानुसार देह त्यागने व नवीन देह पाने में समर्थ होते हैं, अतः उनके लिए अर्चि आदि मार्गों की आवश्यकता नहीं पड़ती। जब तक उनका अधिकार रहता है, तभी तक वे इस संसार में इच्छानुसार सभी लोकों में सहजता से आ-जा सकते हैं और अन्त में परब्रह्म में अपने को विलीन कर लेते हैं। अतः अन्य योगी साधक उनकी भाँति अपने को नहीं बना सकते। वे इस जगत् में ही अमुक्त अवस्था में सभी तरह के भोगों को भोगते रह सकते हैं।।३२।। अब सूत्रकार यहाँ से ब्रह्म और जीवात्मा के स्वरूप का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियों पर विचार करने हेतु नया प्रकरण प्रारम्भ करते हैं- (३९३ ) अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम् ।३३।। सूत्रार्थ- अक्षरधियाम् = अक्षर अर्थात् ब्रह्म के निर्गुण-निराकार अविनाशी लक्षणों का, तु = तो, अवरोध: - सर्वत्र अध्याहार करना (चाहिए) क्योंकि; सामान्यतद्भावाभ्याम् = ब्रह्म के सभी लक्षण समान होने से उसी के स्वरूप को बतलाने वाले हैं; औपसदवत् = इसलिए 'उपसत्' कर्म सम्बन्धी मन्त्रों के सदृश, तदुक्तम् = उनका अध्याहार (उपसंहार) कर लेना ही ठीक है, यही बतलाया गया है- व्याख्या- बृह.उ. ३/८/८ में ब्रह्म के स्वरूप का प्रतिपादन ऋषि इस प्रकार करते हैं- याज्ञवल्क्य जी कहते
Disclaimer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 201
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ३५ १८३ हैं कि 'हे गार्गि! जिसे तुम पूछती हो, उस अविनाशी तत्त्व को ब्रह्मज्ञजन अक्षर अर्थात् निराकार-अविनाशी ब्रह्म कहते हैं। वह न छोटा है, न बड़ा, न मोटा है, न पतला है।' यहाँ पर ब्रह्म को इन सभी पदार्थों, इन्द्रियों और देहधारी प्राणियों से अत्यन्त विलक्षण बताया गया है। इसी तरह मुण्डक उपनिषद् १/१/५,६ में भी वर्णन मिलता है, देखें- 'अंगिरा ऋषि शौनक जी से कहते हैं- 'वह पराविद्या है, जिससे उस अक्षर रूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है, जो समझने और पकड़ने से परे है; जो गोत्र, वर्ण, नेत्र, कर्ण, हाथ, पैर आदि से विहीन है; परन्तु सर्वव्यापी, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, अविनाशी एवं सभी प्राणियों का एक मात्र कारण है, उसे ज्ञानीजन सभी तरफ से देखते हैं।' इस प्रकार श्रुति में उस अक्षर रूपी ब्रह्म के जो विशेषण कहे गये हैं, उन्हें ब्रह्म के उल्लेख में सर्वत्र मान लेना चाहिए; क्योंकि ब्रह्म के साकार और निराकार सभी विशेषण समान हैं और सभी उस ब्रह्म के ही भाव हैं। उस ब्रह्म के स्वरूप का लक्ष्य बोध कराने के लिए ही कहे हुए भाव हैं; अतः 'उपसत्' कर्मवत् मंत्रों के सदृश उनका अध्याहार कर लेना ही ठीक है। यही बात युक्तिसंगत प्रतीत होती है।३३।। मुण्डकोपनिषद् (३/१/१) एवं श्वेता. उ. (४/६) में पक्षी के उदाहरण द्वारा ईश्वर और जीवात्मा को मानव के हृदय में अवस्थित कहा गया है। इसके साथ ही कठ.उप. में छाया और धूप के सद्श ईश्वर और जीव को व्यक्ति के हृदय में अवस्थित कहा है। इन श्रुतियों में जिस ब्रह्मविद्या या विज्ञान का उल्लेख किया गया है, वह एक दूसरे से भिन्न है या अभिन्न ? सूत्रकार अगले सूत्र में इसी का समाधान दे रहे हैं- (३९४ ) इयदामननात्॥३४॥। सूत्रार्थ- (ऊपर टिप्पणी में तीनों श्रुति मन्त्रों में एक ही ब्रह्मविद्या का उल्लेख मिलता है) इयदामननात् - क्योंकि सर्वत्र इयत्ता (अर्थात् इतनापन) का वर्णन समान है। व्याख्या-मुण्डक श्रुति (१/३/७) में कहा गया है- 'एक साथ रहते हुए परस्पर मित्रभाव रखने वाले दो पक्षी-जीव और ब्रह्म एक ही देह रूपी वृक्ष का आश्रय ग्रहण कर रहते हैं, उन दोनों में से एक तो कर्मफल रूपी सुख-दुःखों का उपभोग करता है और दूसरा न उपयोग करता हुआ मात्र अवलोकन करता है। इसी प्रकार श्वेता. १/२/२२ में भी देखें- 'यह जीव देह की आसक्ति में रत रहकर असमर्थता के कारण मोहित होकर चिन्ता करता रहता है। यदि यह भक्तों से सेवित अपने पास रहने वाले सखा परब्रह्म को और उसकी विचित्र महिमा को देख ले, तो तत्क्षण ही शोक से मुक्त हो जाये। ऐसे ही कठ.उप. १/३/१ में ऋषि कहते हैं कि मानव देह में परब्रह्म के श्रेष्ठ वासस्थल हृदय रूपी गुहा में छिपे हुए और अपने सत्यस्वरूप का साक्षात् करने वाले (जीव और ब्रह्म) दोनों ही हैं, जो कि छाया और धूप के सदृश भिन्न प्रकृति वाले हैं। उक्त तीनों मन्त्रों में द्विवचनान्त शब्दों का प्रयोग करके जीव और ब्रह्म को हृदय में स्थित कहा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि तीनों मन्त्रों में विवेचित ब्रह्मविद्या एक ही है। ऐसे ही यत्र-तत्र उस अविनाशी ब्रह्म को प्राणियों के हृदय में स्थित बतलाया गया है, उन सभी स्थलों में विवेचित विद्या की भी एकता माननी चाहिए।३४॥ अब्र अगले सूत्र में सूत्रकार परब्रह्म को सर्वान्तर्यामी कहने वाली श्रुतियों पर विचार करते हैं- (३९५ ) अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः ॥३५।। सूत्रार्थ- भूतग्रामवत् = भूत-समूह के समान (वह परब्रह्म), स्वात्मन: = साधक का अपनी आत्मा का भी, अन्तरा - अन्तरात्मा (वह ब्रह्म अन्तर्यामी है, क्योंकि यही बात अन्य श्रुति-मन्त्रों में बतलायी गई है)। व्याख्या- परब्रह्म के सर्वान्तर्यामी होने का वर्णन बृहदारण्यकोपनिषद् ३/४/१-२ में राजा जनक की चक्रायणक पुत्र उषस्त और याज्ञवल्क्य संवाद में इस प्रकार मिलता है- 'उषस्त के पूछने पर याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि जो तुम्हारी अन्तरात्मा है, वही समस्त प्राणियों की है।' पुनः जिज्ञासा करने पर ऋषि कहते हैं कि
Disclaimer / Warning: All literary and artistic malerial on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 202
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१८४ वदान्त दशन 'जो प्राण के द्वारा सबको प्राण क्रिया सम्पन्न करता है।' तदुपरान्त उषस्त के पुनः पूछने पर कहा कि 'दृष्टि के द्रष्टा को देखा नहीं जा सकता, श्रुति-मन्त्र के श्रोता को सुना नहीं जा सकता, मति के मन्ता का मनन नहीं हो सकता, विज्ञाति के विज्ञाता को ज्ञात नहीं किया जा सकता, यह तुम्हारी अन्तरात्मा ही सबकी अन्तरात्मा है। बृ.उ. ३/५/१ में कहोल नामक ऋषि के पूछने पर भी याज्ञवल्कय जी बतलाते हैं-' जो तेरी अन्तरात्मा है, वही सबकी अन्तरात्मा है। जो भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा और मरण सभी से अतीत है, वही अन्तरात्मा है। अब प्रश्न यह उठता है कि उक्त दोनों दृष्टान्तों में जिसे अन्तरात्मा कहा गया है, वह जीव है या ब्रह्म है? यदि ब्रह्म है, तो कैसे? इसका समाधान सूत्रकार इस प्रकार देते हैं 'जैसे भूत समूह में पृथिवी की अन्तरात्मा जल है, जल का तेज, तेज का वायु और वायु का भी आकाश है। अतः सभी की अन्तरात्मा आकाश है। वैसे ही सभी जड़-तत्त्वों की अन्तरात्मा जीवात्मा है तथा जो अपने आपकी भी अन्तरात्मा है, वही सभी प्राणियों की अन्तरात्मा है, यही श्रुति में कहा गया है। बृह.उ. के सातवें ब्राह्मण में उद्दालक-याज्ञवल्क्य संवाद में भी वर्णन आता है, उस परब्रह्म को पृथिवी आदि सभी भूत समूहों का अन्तर्यामी कहते हुए अन्त में विज्ञानात्मा अर्थात् जीव का भी अन्तर्यामी उसी अन्तरात्मा को बताया है और प्रत्येक वाक्य के अन्त में कहा है कि यही तेरा अन्तर्यामी अमृतमय आत्मा है। श्वेता. उ. ६/११ में भी ऐसा ही उल्लेख किया गया है, समस्त भूतों में छिपा हुआ वह एक देव ही सर्वव्यापी एवं समस्त प्राणियों की अन्तरात्मा है। वही सभी के कर्मों का अधिष्ठाता, सभी का निवासस्थल, साक्षी, सर्वथा विशुद्ध एवं गुणों से परे है। इस प्रकार उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि सबकी अन्तरात्मा वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीव नहीं॥३५॥ अगले सूत्र में आचार्य उक्त प्रकरण में कही हुई बात में आशङ्का उत्पन्न करके समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३९६ ) अन्यथाभेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशान्तरवत्॥३६॥। सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहो कि, अन्यथा = अन्य प्रकार से, अभेदानुपपत्तिः = अभेद की सिद्धि नहीं होगी, अतः (ऊपर कहे हुए प्रकरण में जीव और ब्रह्म का अभेद मानना ही ठीक है), इति न = तो यह उचित नहीं; उपदेशान्तरवत् = क्योंकि दूसरे उपदेश की तरह से अभेद की सिद्धि हो जायेगी। व्याख्या- यदि यह कहो कि उपर्युक्त वर्णन के अनुसार जीव और ब्रह्म के भेद को उपाधिकृत न मानकर यथार्थतः मान लें, तो अभेद का होना सिद्ध नहीं होगा; किन्तु ऐसा मानना उचित नहीं होगा; क्योंकि अन्यत्र के उपदेश की तरह उपदेश कहने से यहाँ भी अभेद सिद्ध हो जायेगा अर्थात् जैसे अन्यत्र कार्य-कारण भाव के अभिप्राय से परब्रह्म परमात्मा की जड़-प्रपञ्च एवं जीव के साथ एकत्व स्थापित करके उपदेश किया गया है, वैसे ही प्रत्येक स्थल में अभेद सिद्ध हो जायेगा। छा.उ. (६/८/१ से ६/१६/३ तक) में सद्विद्या के प्रकरण में श्वेतकेतु को उनके पिता ने मिट्टी, लोहा और स्वर्ण के अंश से कार्य-कारण की एकता बतलायी है। तदुपरान्त नौ बार अलग-अलग उद्धरण देकर हर एक के अन्त में यह बात कही है कि यह जो अणिका यानी अति सूक्ष्म ब्रह्म है; इसी का रूप यह सम्पूर्ण जगत् है, वही सत्य है, वही आत्मा है एवं वह तू अर्थात् कार्य और कारण के सदृश तेरी और उसकी एकता है। वैसे ही सर्वत्र जानना चाहिए॥३६॥ यदि जीव और ब्रह्म का उपाधिकृत भेद और यथार्थ अभेद मान लें, तो क्या आपत्ति है? इसी आशङ्का का सूत्रकार अगले सूत्र में समाधान प्रस्तुत करते हैं- (३९७ ) व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत्।३७।। सूत्रार्थ- व्यतिहार: = परस्पर व्यत्यय (एक-रूपता) करके अभेद का वर्णन है; अतः उपाधिकृत भेद स्पष्ट
Disclaimer / Warning: All Iiterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 203
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ३९ १८५
नहीं होता, हि = क्योंकि, इतरवत् = अन्य श्रुतियों के समान सभी श्रुतियाँ, विशिंषन्ति = विशेषता बतलाकर वर्णन करती हैं। व्याख्या- एक दूसरे के धर्मों की परस्पर एकरूपता की प्रतीति होना ही व्यतिहार है। जब उपासक उपासना करते-करते उपास्य के साथ अपनी एकरूपता का अनुभव करने लगता है, तब उस अवस्था को उपासना की चरम स्थिति माननी चाहिए। इसी को ब्रह्म साक्षात्कार कहते हैं। उपासक द्वारा ब्रह्मानन्द की अनुभूति उपासक की उपास्य के साथ एकरूपता की प्रतीति है। ऐसी स्थिति आ जाने पर उपासना का लक्ष्य पूर्ण हो जाता है। ऐतरेय आरण्यक २/२/४/६ में इसका उल्लेख इस प्रकार है 'योऽहं सोऽसौ, योऽसौ, सोजहम्' अर्थात् जो मैं हूँ, वह- वह है; जो वह है, वह मैं हूँ। उपासना की चरमावस्था को प्राप्त कर लेने पर उपासक की आत्मा इस प्रकार ब्रह्म के साथ एकरूपता की अनुभूति करता है। ब्रह्म आनन्द स्वरूप है, उपासना की चरमावस्था पर वह अपने आपको उपासक के लिए प्रकट कर देता है। मुण्डको. ३/२/३-४ में इसका वर्णन इस प्रकार मिलता है- तब उस अवस्था में आत्मा उस आनन्द सागर में तल्लीन रहता है, अतः उपासना की उत्कर्ष स्थिति व्यतिहार अर्थात् एक दूसरे (उपास्य-उपासक) की एकरूपता की अनुभूति होना है। इस प्रकार से यहाँ पर यही मानना चाहिए कि जीव और ब्रह्म की भिन्नता न मानने के लिए ऐसा बतलाया गया है। यदि यहाँ उपाधिकृत भेद बताया गया होता, तो ऐसा वर्णन नहीं होता।३७। अगले सूत्र में आचार्य पुनः प्रकारान्तर से औपाधिक भेद की मान्यता का निस्तारण प्रस्तुत करते हैं- (३९८) सैव हि सत्यादयः ॥३८॥ सूत्रार्थ-सा = वह, एव = ही, हि = क्योंकि, सत्यादयः = (ब्रह्म के) सत्य-संकल्प आदि लक्षण (जीव के नहीं हो सकते)। व्याख्या- जिस प्रकार उपर्युक्त सूत्र में यह अनुपपत्ति बतलायी गई है कि जीव और ब्रह्म में सर्वाधिक अभेद होने से श्रुति के व्यतिहार-वाक्य से दोनों (जीव और ब्रह्म) का एकत्व स्थापन सुसंगत नहीं हो सकता, उसी प्रकार की अनुपपत्ति इस सूत्र में भी प्रकारान्तर से प्रकट की जाती है। सूत्रकार का कथन है कि परब्रह्म के स्वरूप का जहाँ वर्णन किया गया है, वहाँ उसे सत्यकाम, सर्वज्ञ, सत्यसङ्कल्प, अविनाशी, अजर-अमर सबका परम कारण और सर्वाधार आदि कहा गया है। ये समस्त विशेषण परब्रह्म के अतिरिक्त जीव आदि किसी में नहीं हो सकते। जीवात्मा में इनका पूरी तरह से होना असंभव है। जब जीव और ब्रह्म दोनों में धर्म की एकरूपता नहीं है, तब उनका अत्यन्त अभेद किस तरह सिद्ध हो सकता है। अतः परब्रह्म और जीव का भेद उपाधिकृत है, ऐसा मानना सङ्गत नहीं है।३८।। यदि यह कहें कि 'परब्रह्म में जो सत्यसंकल्पत्व' आदि दिव्य गुण श्रुति द्वारा कहे गये हैं, वे सहज नहीं है; परन्तु वे उपाधि के सम्बन्ध से हैं; यथार्थतः ब्रह्म का स्वरूप तो निर्विशेष है। इसलिए इन दिव्य गुणों को लेकर जीव से उसकी पृथक्ता नहीं कही जा सकती है, तो यह कथन उचित नहीं है। आचार्य अगले सूत्र में इसी का समाधान दे रहे हैं- (३९९ ) कामादीतरत्र तत्र चायतनादिभ्यः॥३१॥ सूत्रार्थ- इतरत्र = (उस ब्रह्म के) अन्यत्र (कहे गये), कामादि = सत्यसंकल्पादि दिव्य गुण, तत्र च = जहाँ निर्विशेष स्वरूप का वर्णन है, वहाँ भी हैं, आयतनादिभ्यः = क्योंकि वहाँ उसके सर्वाधार आदि गुणों का उल्लेख मिलता है। व्याख्या- उस अविनाशी ब्रह्म के जो सत्यसंकल्पत्वादि दिव्य गुण (धर्म) विभिन्न श्रुतियों में कहे गये हैं, वे सभी जहाँ निर्विशेष ब्रह्म का उल्लेख है, वहाँ भी हैं; क्योंकि निर्विशेष स्वरूप का वर्णन करने वाली श्रुतियों में
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 204
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१८६ वदान्त दशन भी ब्रह्म के सर्वाधार आदि सविशेष दिव्य गुणों का उल्लेख मिलता है। अतः वैसे अन्य गुणों का भी वहाँ उपसंहार (अध्याहार) कर लेना ठीक है। बृहदारण्यकोपनिषद् (३/८/८-९) के गार्गी-याज्ञवल्क्य संवाद में उस अविनाशी परम अक्षर रूप परब्रह्म का वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'सर्वप्रथम' वहाँ 'अस्थूलमनणु' अर्थात् 'न स्थूल और न ही सूक्ष्म है' इत्यादि प्रकार से निर्विशेष स्वरूप के धर्मों का उल्लेख के पश्चात् कहा है कि 'इस अक्षर के ही प्रशासन में सूर्य, चन्द्र, द्युलोक, पृथ्वी आदि स्थित हैं।' याज्ञवल्क्य जी ने यहाँ उस अक्षर रूप ब्रह्म को सम्पूर्ण जगत् का आश्रय कहा है। ऐसे ही मु.उ.१/१/६ में भी उल्लेख मिलता है- जानने में न आने वाला, पकड़ने में न आने वाला आदि निर्विशेष स्वरूप के गुणों का उल्लेख करने के बाद उसे नित्य, सर्वगत, विभु, सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं सभी भूतों का कारण कहकर उसे सविशेष गुणों से युक्त भी बतलाया गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि 'वह परब्रह्म दोनों तरह के गुणों (लक्षणों) वाला है। अतः अन्यत्र कहे हुए सत्यसंकल्पत्वादि जितने भी ब्रह्म के दिव्य गुण (धर्म) हैं, वे उनमें सहज ही हैं, उपाधिकृत नहीं। इस कारण जहाँ जिन गुणों का उल्लेख नहीं है, वहाँ उनका उपसंहार (अध्याहार) कर लेना ठीक है। इस तरह से जीव और ब्रह्म में समान गुण (लक्षण) न होने से उनमें कभी भी अभेद नहीं मानना चाहिए।३९।। यदि जीव और ब्रह्म का भेद उपाधिकृत नहीं माना जायेगा, तो फिर अन्य द्रष्टाओं की सत्ता सिद्ध हो जायेगी। ऐसी स्थिति में श्रुति द्वारा जो यह वर्णन मिलता है कि 'इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है' आदि उसकी व्यवस्था किस तरह होगी? इसी का समाधान दिया जा रहा है- ( ४०० ) आदरादलोप: ॥l ४० ।। सूत्रार्थ-आदरात् = उक्त कथन परब्रह्म के प्रति आदरपूर्वक होने से, अलोप: = उसमें अन्य द्रष्टा का लोप (निषेध) नहीं हुआ है। व्याख्या- उस परब्रह्म को सर्वोत्कृष्ट सिद्ध करने के लिए वहाँ आदर की दृष्टि से दूसरे-अन्य द्रष्टा का निषेध किया गया है, सो ऐसी बात नहीं है। सूत्रकार कहते हैं कि इसका अभिप्राय यह है कि वह सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म ऐसा द्रष्टा है, ऐसा श्रेष्ठ ज्ञाता है कि उसकी तुलना में दूसरे-अन्य सभी जीव द्रष्टा होते हुए भी न होने के समान हैं; क्योंकि ब्रह्म पूर्ण द्रष्टा है और जीव अपूर्ण है। सृष्टि के प्रलयकाल में जड़-तत्त्वों के सदृश जीवों-प्राणियों को किसी भी तरह का विशेष ज्ञान नहीं रह जाता, उनके सभी दिव्य गुणों-धर्मों का ब्रह्म में लय हो जाता है और स्थिति के समय भी उनके सभी गुण-धर्म और कार्य ब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशित होने से सीमित ही समझना चाहिए। वर्तमान समय में भी जो प्राणियों का जानना, देखना, श्रवण करना आदि है, वह सीमित ही है और उस ब्रह्म के ही प्रकाश से है। ऐ.उ.(१/३/११) और प्र.उ. (४/१) में संकेत मिलता है कि वही ब्रह्म ही इसका प्रेरक है, अतः यह (जीव) स्वतन्त्र नहीं है। इससे यही स्पष्ट होता है कि श्रुति का वह कथन ब्रह्म की उत्कृष्टता प्रदर्शित करने के लिए है, यथार्थतः अन्य द्रष्टा का निषेध करने के लिए नहीं है। यहाँ द्रष्टा का लोप नहीं; बल्कि परब्रह्म की उत्कृष्टता का ही प्रतिपादन किया गया है॥४०।। उपर्युक्त सूत्र से व्यक्त हुआ कथन परब्रह्म के प्रति आदर ज्ञापित करने के लिए है। पुनः उक्त तथ्य को प्रकारान्तर से आचार्य अगले सूत्र में सिद्ध करते हैं- (४०१ ) उपस्थितेऽतस्तद्वचनात्॥४१॥ सूत्रार्थ- उपस्थिते = उपर्युक्त कथन से किसी प्रकार अन्य चेतन का निषेध उपस्थित होने पर भी, अतः = इस ब्रह्म की अपेक्षा दूसरे द्रष्टा का निषेध बतलाने के कारण वह कथन आदर सूचक ही है, तद्वचनात् = क्योंकि उन वाक्यों के साथ बारम्बार 'अतः' शब्द ही प्रयुक्त हुआ है। व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् ३/७/२३ के अन्तर्गत जहाँ उस परब्रह्म के अतिरिक्त अन्य द्रष्टा, श्रोता आदि
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 205
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०३ सूत्र ४३ १८७ का निषेध किया गया है, वहाँ उस वर्णन में बारम्बार 'अतः' भी प्रयुक्त हुआ है। इससे यही सिद्ध होता है कि इसकी अपेक्षा अथवा इससे ज्यादा अन्य कोई द्रष्टा, श्रोता नहीं है। यदि द्रष्टा का सर्वथा निषेध करना अभीष्ट होता, तो फिर 'अतः' शब्द की आवश्यकता नहीं पड़ती। जैसे यह कहें, इससे अन्य कोई धार्मिक नहीं है, तो इस वाक्यांश से अन्य धार्मिकों से उसकी उत्कृष्टता बतलाना ही उचित है, न कि अन्य समस्त धार्मिकों का अभाव बतलाना। वैसे ही वहाँ जो यह कहा गया है कि 'इस परब्रह्म से अन्य और कोई द्रष्टा आदि नहीं है' उस वाक्यांश का भी यही अभिप्राय है कि इससे ज्यादा कोई अन्य द्रष्टापन आदि गुणों से सम्पन्न पुरुष नहीं है, यह ब्रह्म ही श्रेष्ठ द्रष्टा है; क्योंकि उसी वर्णन के क्रम में बृह.उ.३/७/२२ में परब्रह्म को ही जीव का अन्तर्यामी और जीव को उसकी देह बतलाकर दोनों के भेद का उल्लेख मिलता है। यदि 'नान्योऽतो द्रष्टा' आदि वाक्यांशों से अन्य द्रष्टा (जीव) का निषेध बताना मानें, तो उक्त वर्णन से विरोध आ जायेगा। अतः वहाँ पर अन्य द्रष्टा के निषेध का अभिप्राय ब्रह्म को सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा बतलाकर उसके प्रति आदर प्रकट करना ही मानना चाहिए॥४१॥ फलविषयक श्रुतियों का विरोधाभास दूर करने के उपरान्त सिद्धान्त-निर्णय करने हेतु अगला प्रकरण शुरू करते हैं। छा.उ. (८/२/१ से १० तक) के अन्तर्गत दहरविद्या में एवं प्रजापति इन्द्र संवाद में जिस ब्रह्मविद्या का उल्लेख है, उसके फल में इच्छा के अनुसार नाना प्रकार के भोगों को भोगने का वर्णन है; किन्तु अन्यत्र वैसी बात नहीं कही गयी है। अतः जिज्ञासा उठती है कि ब्रह्मलोक को पाने वाले सभी साधकों के लिए यह नियम है अथवा उसमें विकल्प है? अगले सूत्र में आचार्य इसी का समाधान दे रहे हैं- ( ४०२ ) तन्निर्धारणानियमस्तद्दृष्टेः पृथग्ह्यप्रतिबन्धः फलम्॥४२॥ सूत्रार्थ- तन्निर्धारणानियम: = उन भोगों के भोगने का कोई निर्धारित नियम नहीं है; तद्दृष्टे: = क्योंकि यह बात उस प्रकरण में बारम्बार 'यदि' शब्द के प्रयोग से देखी गई है, हि = तथा दूसरा कारण यह भी है कि, पृथक् = विषयों से भिन्न संकल्प वाले के लिए, अप्रतिबन्धः = जन्म-मृत्यु के सांसारिक बन्धनों से मुक्त होना ही, फलम् = फल कहा है। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् (८/२/१ से लेकर १० तक) में उक्त कथन के सन्दर्भ में इस प्रकार वर्णन मिलता है- ब्रह्मलोक में गमन करने वाले समस्त योगी-साधकों को उस लोक के दिव्य भोगों का भोग भोगना पड़े, ऐसा कोई निर्धारित नियम नहीं है; क्योंकि जिस-जिस स्थान पर ब्रह्मविद्या का उल्लेख किया गया है, उस-उस स्थान पर भोगों के उपभोग की बात नहीं बतलाई गई है और जहाँ कहीं है भी वहाँ 'यदि' शब्द का प्रयोग करने के उपरान्त साधक की इच्छा के अनुसार उसका विकल्प दिखला दिया गया है। इस उद्धरण से यह सिद्ध हो जाता है कि जो साधक ब्रह्मलोक या अन्य किसी भी दिव्य लोक के भोगों का उपभोग करने की आशा रखता है, वे उसी को प्राप्त होते हैं। ब्रह्म के साक्षात्कार में तो ये भोग विलम्ब करने वाले अवरोध ही हैं, अतः साधकों को इन भोगों की भी इच्छा नहीं ही करनी चाहिए। इस कारण जिनके मन में भोग के उपभोग का संकल्प नहीं उत्पन्न हुआ है, उनके लिए जन्म-मृत्यु रूप सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर तुरन्त परब्रह्म को प्राप्त हो जाना ही उसका अभीष्ट फल कहा गया है॥४२।। यदि ब्रह्मलोक के भोग भी उस अविनाशी ब्रह्म के साक्षात्कार में देरी करने वाले हैं, तो फिर श्रुति ने ऐसे फलों का उल्लेख किसलिए किया? अगले सूत्र में आचार्य इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत करते हैं- ( ४०३) प्रदानवदेव तदुक्तम्॥४३। सूत्रार्थ- तदुक्तम् = वह कहा हुआ कथन, प्रदानवत् = वरदान के समान, एव = ही है। व्याख्या- भोग का निर्धारित नियम न होने का कथन बतलाकर भोगों की उपेक्षा का उपदेश करना योगी- साधक के लिए वरदान के समान ही मानना चाहिए; क्योंकि दिव्य भोगों की कामना, परब्रह्म से साक्षात्कार
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this webelte is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 206
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१८८ वदान्त दशन करने में विघ्न स्वरूप है। जहाँ पर ब्रह्म के प्राप्त करने का लक्ष्य हो, वहाँ पर भोगों को तुच्छ मान लेने का उपदेश यथार्थतः वरदान स्वरूप ही सिद्ध होगा। जैसे ईश्वर अथवा अन्य कोई शक्ति-सामर्थ्य से सम्पन्न महान् पुरुष किसी श्रद्धावान् शिष्य को उसकी श्रद्धा एवं रुचि प्रवर्द्धित करने के लिए वरदान दे देते हैं, वैसे ही स्वर्गलोक के भोगों में आसक्ति रखने वाले, कामना की इच्छा से कर्म करने वाले श्रद्धावान् शिष्यों-व्यक्तियों की ब्रह्मविद्या में श्रद्धा बढ़ाकर उसमें उन्हें सन्नद्ध करने हेतु और कर्मों के प्रतिफल स्वरूप स्वर्ग में स्थित भोगों की तुच्छता बतलाने के लिए भी श्रुति का वह कथन वरदान सदृश ही है।४३॥ अगले सूत्र में सूत्रकार उपर्युक्त सिद्धान्त की पुष्टि हेतु एक अन्य युक्ति दे रहे हैं- (४०४ ) लिङ्गभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि॥४४॥ सूत्रार्थ-लिङ्गभूयास्त्वात् = जन्म-मृत्यु रूप जगत् से हमेशा के लिए मुक्त होकर उस परब्रह्म को प्राप्त हो जाना रूप फल बतलाने वाले लक्षणों की अधिकता होने से, तद्बलीयः= वही फल बलशाली (प्रमुख) है, हि= क्योंकि, तदपि = अन्य फलों का वह कथन भी प्रमुख फल का महत्त्व प्रदर्शित करने के लिए ही है। व्याख्या- वेदान्त में ब्रह्मज्ञान के फल का उल्लेख जहाँ-जहाँ मिलता है, वहाँ-वहाँ इस जन्म-मरण रूप सांसारिक बन्धनों से हमेशा के लिए मुक्त होकर उस अविनाशी परब्रह्म को प्राप्त हो जाना रूप फल का ही प्रचुरता से उल्लेख मिलता है। अतः वही बलवान् (प्रधान) फल है, यही समझना चाहिए। ब्रह्मप्राप्ति से पृथक् अर्थात् दिव्य भोगों की प्राप्ति रूप फल का जहाँ कहीं पर भी उल्लेख किया गया है, वह ब्रह्म प्राप्ति रूप प्रधान फल का महत्त्व प्रदर्शित करने वाला है, क्योंकि वैसे फलों का रूप उल्लेख सभी स्थानों (समस्त प्रकरणों) पर नहीं हुआ है, परन्तु उपर्युक्त प्रधान फल का उल्लेख तो सभी स्थानों पर मिलता है॥४४॥ ब्रह्मज्ञान ही इस जन्म-मरणरूप सांसारिक बन्धनों से मुक्त होने का निश्चित उपाय है, यही तथ्य सिद्ध करने के लिए सूत्रकार द्वारा अगले सूत्र में पूर्वपक्ष की स्थापना की जा रही है- (४०५) पूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्यात् क्रियामानसवत्॥४५॥ सूत्रार्थ- क्रियामानसवत् = देह और मन की क्रियाओं में निहित विकल्प की भाँति; पूर्वविकल्पः = पूर्व में वर्णित अग्निविद्या भी विकल्प से मुक्ति की हेतु; स्यात् = हो सकती है, प्रकरणात् = यह कथन प्रकरण से स्पष्ट होता है। व्याख्या-उपासना सम्बन्धी शारीरिक क्रियाओं के सदृश मानसिक क्रियाओं के द्वारा भी फल प्राप्त होते हैं, जो फल यज्ञ आदि सत्कर्मों से प्राप्त होते हैं, वैसे ही फल जप और भजन से भी मिलने सम्भव हैं। गीता में भजन के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए गीताकार निष्काम कर्म का उपदेश इस प्रकार देते हैं- भगवान् में मन को लगाना ही भजन है। भजन में ही शक्ति शब्द केन्द्रित है। 'भगवान् स्वयं ही भक्त की महत्ता बतलाते हुए १२/ ५ में कहते हैं- 'निराकार ब्रह्म में चित्त स्थित करने वाले सम्पूर्ण साधन में क्लेश अर्थात् अधिक श्रम बतलाकर कहा कि उस गति की प्रास्ति दुःसाध्य है। तदुपरान्त १२/७ में 'तेषामहं समुद्धर्त्ता' इत्यादि वाक्य-कथन से भजन करने वाले भक्तों का मृत्युरूप संसार समुद्र से शीघ्र ही उद्धार बतलाया है। इससे दैहिक और मानसिक दोनों क्रियाओं से मोक्ष का प्राप्त होना सिद्ध होता है। ऐसे ही कठोपनिषद् में 'यम-नचिकेता संवाद के अन्तर्गत उल्लेख है कि- अग्रिहोत्र के तीन अनुष्ठानों के द्वारा जन्म-मृत्यु से परे साधक को अत्यन्त शान्ति की अनुभूति प्राप्त होती है' ।।४५। अगले सूत्र में आचार्य पुनः उपर्युक्त सूत्र में कहे हुए कथन को और दृढ़ करते हैं- ( ४०६) अतिदेशाच्च ॥४६॥।
Disclalmer / Warning: All Iiterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 207
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ४८ १८१ सूत्रार्थ-अतिदेशात् = अतिदेश से अर्थात् विद्या की भाँति तीनों कर्मों को मोक्ष में हेतु बतलाये जाने से, च = भी (ऊपर कहा हुआ कथन उचित है)। व्याख्या- एक मात्र प्रकरण के बलबूते ही 'कर्म' मोक्ष में हेतु सिद्ध होता है; सो ऐसा नहीं है। श्रुति (वेद) ने विद्या की भाँति ही कर्म का भी फल बतलाया है। कठोपनिषद् १/१/१७ में तीनों प्रकार के कर्मों को सम्पन्न करने वाले का जन्म-मरण से मुक्त होने का उल्लेख इस प्रकार किया गया है, यथा- 'त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू' अर्थात् 'यज्ञ', 'दान' एवं 'तप' रूप तीन प्रकार के कर्मों को सम्पन्न करने वाला मनुष्य जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है।' इस प्रकार उक्त उद्धरण से भी कर्मों का मुक्ति में हेतु होना सिद्ध होता है॥४६॥ अब अगले सूत्र में सूत्रकार उपर्युक्त दोनों सूत्रों में उठाये हुए पूर्वपक्ष का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (४०७) विद्यैव तु निर्धारणात्॥४७।। सूत्रार्थ- निर्धारणात् - श्रुतियों द्वारा निर्धारित रूप में कह दिये जाने से, तु = तो, विद्या = एकमात्र ब्रह्मविद्या, एव = ही मोक्ष में कारण है (कर्म नहीं) यही मानना चाहिए। व्याख्या- श्रुतियों में एकमात्र ब्रह्मविद्या को ही ब्रह्म-प्राप्ति का साधन एवं मोक्ष-दायिनी बतलाया गया है। इस कारण से अन्य विद्याओं या कर्मों से वैसा फल मिलने पर भी ब्रह्मविद्या ही मुख्य है। अन्य विद्याओं के सन्दर्भ में किसी को भी निश्चित रूप से ब्रह्म को प्राप्त कराने वाली नहीं कहा गया है। इस सन्दर्भ में श्वेताश्वतरोपनिषद् ३/८ में इस प्रकार वर्णन मिलता है- उस ब्रह्म को जानकर ही मानव जन्म-मृत्यु को पार कर जाता है। मोक्ष- प्रासि हेतु अन्य कोई मार्ग नहीं है। इस प्रकार से यहाँ पर एकमात्र ब्रह्म-ज्ञान को मुक्ति का कारण कहा गया है, अतः ब्रह्मविद्या ही मोक्ष-प्राप्ति का हेतु है, कर्म नहीं। ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हुए कठोपनिषद् २/२/१२ में यम-नचिकेता संवाद के अन्तर्गत इस प्रकार कहा गया है-'जो प्राणियों का अन्तर्यामी, एक, अद्वितीय एवं सभी को अपने वश में रखने वाला है, जो अपने एक ही रूप को भिन्न-भिन्न रूपों में परिणत कर लेता है, उस अपने ही हृदय में अवस्थित परब्रह्म को जो ज्ञानीजन देखते हैं, उन्हीं को सदैव रहने वाला शाश्वत आनन्द मिलता है, अन्य को नहीं। अतः सर्वप्रथम अग्निविद्या के प्रकरण में जो जन्म-मरण से मुक्त होना एवं अत्यधिक शान्ति की प्राप्ति रूप फल कहा है, वह कथन स्वर्ग लोक की प्रार्थना करने हेतु गौण रूप से है, ऐसा ही मानना चाहिए। आचार्य अगले सूत्र में पुनः उसी कथन को दृढ़तापूर्वक प्रतिपादित करते हैं- (४०८) दर्शनाच्च॥४८॥ सूत्रार्थ-दर्शनात् = श्रुति में अनेकों स्थलों पर ऐसा वर्णन देखे जाने के कारण, च = भी (यह निश्चित होता है)। व्याख्या- वेद एवं अन्य दूसरे वैदिक वाड्मय में इस तरह के निर्देश प्रचुरता से यत्र-तत्र देखे जाते हैं। इससे उक्त तथ्य (कथन) प्रमाणित हो जाते हैं, कि मुक्ति का एकमात्र साधन ज्ञान ही है, अन्य कोई स्वतन्त्र साधन मुक्ति का नहीं हो सकता। श्रुतियों में तीनों प्रकार के कर्मों के फल स्वरूप ब्रह्मलोक में गमन के उपरान्त पुनः वापस होना बतलाया गया है; लेकिन इससे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती; ऐसा कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् १/ २/९,१० में ऋषि कहते हैं कि 'यज्ञ', 'दान' एवं 'तप' रूप कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग लोक में जाकर पुनः वापस आना पड़ता है। इसी उपनिषद् के ३/२/५,६ में वर्णन आता है कि 'ब्रह्मज्ञान का फल जन्म-मृत्यु से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त हो जाना कहा गया है।'ब्रह्मज्ञानी के लिए श्रुतियाँ ही परम मुक्ति का विधान बनाती हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि एकमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्ति का प्रमुख कारण है, यज्ञादि तीनों कर्म नहीं।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 208
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१९० वेदान्त दर्शन उपर्युक्त कथन से भी ब्रह्मविद्या की श्रेष्ठता सिद्ध होती है।।४८।। अगले सूत्र में सूत्रकार प्रकारान्तर से पूर्वपक्ष का उत्तर देते हुए इस प्रकरण को समाप्त करते हैं- ( ४०९) श्रुत्यादिबलीयस्त्वाच्च न बाध:॥४९।। सूत्रार्थ-श्रुत्यादिबलीयस्त्वात् = प्रकरण की अपेक्षा श्रुति के प्रमाण और लक्षण आदि बलवान् (पुष्ट) होने से, च = भी, बाधः = प्रकरण से सिद्धान्त में बाधा, न = नहीं हो सकती। व्याख्या-वेद के अर्थ एवं भाव का निर्णय करने में प्रकरण की अपेक्षा श्रुति के वचन और लक्षण आदि को अत्यधिक पुष्ट-प्रामाणिक माना जाता है। इसलिए प्रकरण द्वारा पुष्ट होने वाली बात का निस्तारण करने वाले अधिकाधिक श्रुति प्रमाण हों और उसके विपरीत लक्षण (भेद) भी मिलें, तो एकमात्र प्रकरण की यह सामर्थ्य नहीं है कि वह सिद्धान्त में किसी भी तरह का अवरोध (बाधा) उत्पन्न कर सके। इससे यही प्रमाणित होता है कि परब्रह्म परमेश्वर का साक्षात्कार करने के लिए कहे हुए उपासना आदि साधन अर्थात् ब्रह्मविद्या ही परब्रह्म की प्राप्ति एवं जन्म-मृत्यु से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है; कामनायुक्त यज्ञ आदि तीनों कर्म (यज्ञ, दान और तप) ब्रह्म प्राप्ति के आधार नहीं हो सकते॥४९॥ अब अगले सूत्र से आचार्य श्रुति में वर्णित ब्रह्मविद्या के फल भेद के निर्णय हेतु नया प्रकरण प्रारम्भ करते हैं। ब्रह्मविद्याओं का उद्देश्य परब्रह्म का साक्षात् कराना और जीव को सदा के लिए समस्त दुःखों से मुक्ति दिलाना है। किसी विद्या का फल ब्रह्मलोकादि की प्राप्ति है और किसी विद्या का फल इस देह में रहते हुए ही ब्रह्ममय हो जाना है। इस तरह से फल में भेद क्यों किया गया है? इसी जिज्ञासा का समाधान यहाँ प्रस्तुत है- (४१०) अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववद् दृष्टश्च तदुक्तम्॥५०॥ सूत्रार्थ- अनुबन्धादिभ्यः = अनुबन्ध आदि के भेद से, प्रज्ञान्तरपृथक्त्ववत् = उद्देश्य भेद से की जाने वाली अन्य उपासनाओं के भेद की भाँति, च = इसकी भी भिन्नता है, दृष्टः = ऐसा उन प्रकरणों में देखा गया है, तदुक्तम् = तथा यह पूर्व में भी कह चुके हैं। व्याख्या- जिस प्रकार उद्देश्य भेद से की गई विभिन्न प्रकार की उपासनाओं से विभिन्न फलों की प्राप्ति होती है और वह उपासना अपने साध्य और साधक के अनुरूप ही फल प्रदात्री है। उसी प्रकार एक ही ब्रह्म-विद्या में साधक की पृथक्-पृथक् भावनाओं के अनुसार प्रकार और फल में पृथक्ता होना स्वाभाविक है। इसे इस प्रकार समझना चाहिए कि यदि ब्रह्मविद्या के फलों में ब्रह्मलोक के दिव्य भोगों का संकल्प भाव हो, तो फिर उसमें ब्रह्म की प्राप्ति किस तरह सम्भव है? उस साधक को तो ब्रह्मलोक के दिव्य भोग ही फलरूप में प्राप्त होंगे। जो साधक भोगों को तुच्छ मानकर ब्रह्म को ही प्राप्तव्य मानते हैं, वही उनके दर्शन के सच्चे अधिकारी हैं। जो साधक भोगों से सर्वथा विमुख होकर उस अविनाशी परब्रह्म का साक्षात् करने हेतु प्रयत्नशील हैं, उन्हें अपने आराध्य की प्राप्ति में विलम्ब होना कदापि संभव नहीं है। इसी देह के रहते-रहते यहीं पर ही परब्रह्म का साक्षात् हो जाता है। अतः भावना के भेद द्वारा पृथक्-पृथक् अधिकारियों को प्राप्त होने वाले फल में भेद रहना ठीक ही है।।५० ।। अगले सूत्र में सूत्रकार प्रकारान्तर से उसी सिद्धान्त को पुनः दृढ़ करते हैं- (४११ ) न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥५१॥ सूत्रार्थ-सामान्यात् = यद्यपि सभी ब्रह्मविद्याएँ समान भाव से मोक्ष में हेतु हैं, अपि = फिर भी, न = बीच में होने वाले फल भेद का निषेध नहीं होता है; हि = क्योंकि, उपलब्धे: = ब्रह्म का साक्षात् हो जाने पर, मृत्युवत् = मरने के बाद देह से सम्बन्ध न रहने की भाँति, लोकापत्ति := किसी भी लोक की प्राप्ति, न= नहीं हो सकती।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webste can be used for propagation with prior written consent.
Page 209
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ५३ १९१ व्याख्या- समस्त ब्रह्मविद्याएँ अन्त में मोक्ष-प्रदात्री हैं। इस सन्दर्भ में सभी विद्याओं में समानता है, फिर भी किसी साधक का ब्रह्मलोक में गमन करना और किसी का ब्रह्मलोक में न गमन कर यहीं पर, इसी देह में रहते हुए ब्रह्म को प्राप्त हो जाना एवं वहाँ (उच्च लोकों में) जाकर भी किसी का प्रलयकाल तक भोगों का सुख-अनुभव करना तथा किसी का तत्क्षण ब्रह्ममय हो जाना आदि रूप से जो फलों के भेद हैं; वे उन साधकों की भावना से सम्बन्ध रखते हैं, अतः यहाँ पर इस भेद का निषेध नहीं होता। बृहदारण्यकोपनिषद् ४/४/६ एवं कठोपनिषद् २/३/१४ में वर्णन आता है कि जिस साधक को मृत्यु के पूर्व कभी भी ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है, जो उस परब्रह्म के तत्त्व को सम्यक् रूप से जान लेता है, जिसकी ब्रह्मलोक तक किसी भी लोक के सुख-भोग में किञ्चिन्मात्र भी वासना नहीं रहती, वह किसी भी लोक विशेष में नहीं गमन करता। वह तो तत्क्षण ही उस ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। मुण्डक ३/२/७ में भी ऐसा उल्लेख मिलता है- 'प्रारब्ध भोग के उपरान्त उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के तत्त्व उसी प्रकार अपने-अपने कारण तत्त्वों में मिल जाते हैं, जैसे मृत्यु के उपरान्त प्रत्येक मानव के स्थूल शरीर के तत्त्व पञ्चभूतों में समाहित हो जाते हैं। वह पुनः किसी लोक में जाने के उपरान्त वापस नहीं होता।५१। अब जिज्ञासा होती है कि ऐसा होने में प्रमाण क्या है? सूत्रकार अगले सूत्र में इसी का समाधान दे रहे हैं- ( ४१२) परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्त्वनुबन्धः ॥५२॥ सूत्रार्थ- परेण = अगले मन्त्रों से, च = भी (सिद्ध होता है कि), शब्दस्य = उसमें कहे हुए शब्द समूह का, ताद्विध्यम् - वैसा ही भाव है, तु = किन्तु अन्य साधकों के, भूयस्त्वात् = अन्य भावों की प्रचुरता से, अनुबन्ध: - सूक्ष्म एवं कारण शरीर से सम्बन्ध बना रहता है, इसलिए वे ब्रह्मलोक में गमन करते हैं। व्याख्या- परब्रह्म की परिकल्पना करने वाले साधकों का दैहिक सम्बन्ध छूटता है। इस सन्दर्भ में मुण्डकोपनिषद् ३/२/६ में सर्वप्रथम तो यह कहा कि 'वेदान्त के ज्ञान से जिनने वेदान्त के अर्थभूत परब्रह्म परमात्मा के स्वरूप की अवधारणा कर लिया है, कर्मफल रूप सभी भोगों को त्यागरूप योग के द्वारा जिनका अंतःकरण परिष्कृत हो गया है, वे सभी साधक मृत्यु के समय में ब्रह्म लोकों में जाकर परम अमृतमय होकर मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। इसके पश्चात् इसी उपनिषद् के ३/२/७ में जिन्हें इस देह का नाश होने से पूर्व ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है, उनके सन्दर्भ में यह कहा गया है कि 'पन्द्रह कलाएँ अर्थात् प्राणों के सहित समस्त इन्द्रियाँ अपने-अपने देवों में विलीन हो जाती हैं, जीव और उसके सभी कर्म-संस्कार आदि परब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। तदुपरान्त मु. ३/२/८ में नदी और सागर का दृष्टान्त देकर यह कहा गया है कि-'वह ब्रह्मज्ञाता विद्वान् नाम-रूप को यहीं त्याग कर परब्रह्म में विलीन हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध अन्तस् वाले साधकों के लिए ब्रह्मलोक की प्राप्ति बताने के पश्चात् साक्षात् ब्रह्म को जानने वाले विद्वान् का यहीं नाम-रूप से मुक्त होकर ब्रह्म में विलय होना बतलाने वाले शब्द समूह पूर्व सूत्र में कही हुई बात को स्पष्ट करते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि जिनके अन्तस् में ब्रह्मलोक के महत्त्व का भाव है, वहाँ जाने के सङ्कल्प से जिनका सूक्ष्म और कारण देह से सम्बन्ध अलग नहीं हुआ है; ऐसे ही साधक ब्रह्मलोक में जाते हैं और जिन्हें यहीं सशरीर ब्रह्मसाक्षात् हो जाता है, वे नहीं जाते। यह अवान्तर फल-भेद होना ठीक ही है॥५२॥ मोक्ष सम्बन्धी फल भेद के प्रकरण को पूर्ण करके अब शरीर पात के पश्चात् आत्मा की सत्ता एवं कर्मफल का भोग न स्वीकारने वाले नास्तिकों के मत का खण्डन करने हेतु अगला प्रकरण प्रारंभ करते हैं- (४१३) एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥५३॥ सूत्रार्थ- एके = कई एक आचार्यगण कहते हैं कि, आत्मनः = आत्मा का, शरीरे = शरीर होने पर ही,
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 210
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१९२ वेदान्त दर्शन भावात् = भाव होने से (शरीर से पृथक् आत्मा की सत्ता नहीं है)। व्याख्या-नास्तिक विचारधारा को मानने वाले आचार्यगण, शरीर के साथ ही आत्मा का सम्बन्ध स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि जब तक यह देह है; तभी तक इसमें चैतन्य आत्मा की प्रतीति होती है; शरीर के अभाव में आत्मा का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता अर्थात् उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शरीर से पृथक् आत्मा का अस्तित्व नहीं है। अतः मृत्यूपरान्त आत्मा परलोक में जाकर कर्मों का फल भोगता है, अथवा ब्रह्मलोक में जाकर मोक्ष को प्रास्त हो जाता है। ये सभी तथ्य असंगत सा प्रतीत होते हैं।५३ । अगले सूत्र में सूत्रकार उपर्युक्त तथ्यों का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (४१४) व्यतिरेकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥५४॥ सूत्रार्थ- व्यतिरेक: = शरीर से आत्मा पृथक् है, तद्भावाभावित्वात् = क्योंकि देह के रहते हुए भी उसमें आत्मा नहीं रहता, न = इसलिए आत्मा शरीर नहीं है, तु- किन्तु, उपलब्धिवत् = ज्ञातापन की प्राप्ति के समान (यह सिद्ध होता है कि आत्मा देह से पृथक् है)। व्याख्या- शरीर और आत्मा- दोनों एक ही हैं; यह कहना ठीक नहीं; किन्तु शरीर से अलग सभी प्राणियों और उनके कार्यों का ज्ञाता आत्मा अवश्य है; क्योंकि मृत्यु की अवधि में देह हमारे समक्ष पड़ा रहता है; तब भी उसमें समस्त पदार्थों का ज्ञाता चेतन आत्मा नहीं रहता। अतः जिस तरह यह प्रत्यक्ष है कि देह के रहते हुए भी उसमें जीव नहीं रहता, वैसे ही यह भी मान लेना चाहिए कि देह के न रहने पर भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। वह इस स्थूल देह में नहीं, तो अन्य सूक्ष्म-कारण देहों में अवश्य रहता है; किन्तु आत्मा का अभाव नहीं होता। इसलिए यह कहना सदैव युक्ति के विपरीत है कि इस स्थूल देह से पृथक् आत्मा नहीं है। यदि इस देह से पृथक् चेतन आत्मा नहीं होता, तो वह अपने और दूसरों के देह को नहीं जान सकता; क्योंकि घट आदि जड़ पदार्थों में एक-दूसरे को अथवा स्वयं को जानने की सामर्थ्य नहीं है। जिस तरह सभी का ज्ञाता होने से ज्ञाता रूप में आत्मा की प्राप्ति प्रत्यक्ष है; वैसे ही देह का ज्ञाता होने से इस ज्ञेय देह से उसका पृथक् होना भी प्रत्यक्ष ही है। इस प्रकार से यह स्पष्ट होता है कि आत्मा और देह दोनों एक नहीं हैं।।४।। नास्तिकवाद का संक्षिप्त खण्डन करने के बाद अब पुनः भिन्न-भिन्न श्रुतियों पर विचार करने हेतु आगे का प्रकरण प्रारम्भ करते हैं। अब जिज्ञासा यह उठती है कि भिन्न-भिन्न शाखाओं में यज्ञों के उद्गीथ आदि अङ्गों में भेद है, अतः यज्ञादि के अंगों द्वारा सम्बन्ध रखने वाली उपासना एक शाखा में कहे हुए प्रकार से अन्य शाखा वालों को करनी चाहिए अथवा नहीं ? इसी का यहाँ समाधान करते हैं- (४१५) अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ।।५५।। सूत्रार्थ- अङ्गावबद्धाः = यज्ञ के उद्गीथ आदि अङ्गों से सम्बद्ध उपासनाएँ, शाखासु हि = जिस शाखा में कही गयी हों, उसी में करने योग्य हैं; न = ऐसी बात नहीं है, तु = किन्तु; प्रतिवेदम् = प्रत्येक वेद की शाखा वाले उसका अनुष्ठान सम्पन्न कर सकते हैं। व्याख्या-यज्ञ के उद्ीथ आदि अङ्गों से सम्बन्धित उपासना का जिन शाखा वालों ने उल्लेख किया है, वही उसकी उपासना कर सकते हों, सो ऐसी बात नहीं है; बल्कि सभी वेदों की शाखा वाले उसका अनुष्ठान (उपासना) कर सकते हैं। छान्दोग्योपनिषद् १/१/१ में इसका उल्लेख निम्रवत् है- 'ओमित्येतदक्षरमुद्रीथमुपासीत' अर्थात्- 'ॐ' इस एक अक्षर की उद्गीथ के रूप में उपासना करनी चाहिए। इसी उपनिषद् के २/२/१ में वर्णन आता है- 'लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत्' अर्थात् पाँच प्रकार के साम की लोकों के साथ सम्बन्ध स्थापित कर उपासना करनी चाहिए। इस प्रकार से यज्ञादि के अङ्गरूप उद्गीथ से सम्बन्ध रखने वाली जो
Disclaimer / Warning: All Iiterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 211
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ५७ १९३ प्रतीक उपासना कही गयी है, उसका जिस शाखा में उल्लेख है, उसी शाखा वालों को उसका अनुष्ठान करना चाहिए, इससे इतर शाखा वालों को अनुष्ठान नहीं करना चाहिए, सो ऐसा नहीं है; बल्कि प्रत्येक वेद की शाखा को मानने वाले उसका अनुष्ठान सम्पन्न कर सकते हैं।५५॥ सूत्रकार उक्त तथ्य को अगले सूत्र में उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं- ( ४१६) मन्त्रादिवद्वाविरोधः ॥५६॥ सूत्राथ-वा= अथवा इस प्रकार समझें कि, मन्त्रादिवत् = मन्त्र के सदृश, अविरोधः = इसमें किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है। व्याख्या- जिस तरह एक शाखा द्वारा बतलाये गये मन्त्र और यज्ञोपयोगी साधनों का दूसरी शाखा वाले अपनी आवश्यकता के अनुरूप उपयोग कर लेते हैं, उसमें किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है; उसी तरह उपर्युक्त सूत्र में बतलाई हुई उद्गीथ आदि यज्ञाङ्गों से सम्बन्ध रखने वाली उपासनाओं का सभी शाखा वाले उपयोग कर सकते हैं। इसमें कुछ भी विरोध नहीं है। सूत्र में 'आदि' पद द्वारा कर्म और गुण का संग्रह होता है। एक शाखा से अन्य शाखा में गुणोपसंहार के कई प्रसङ्ग पूर्व में आ चुके हैं। कर्म का अनुवर्त्तन भी एक शाखा से अन्य शाखा में देखा जाता है। जिन शाखाओं में समित् आदि प्रयाजों को नहीं पढ़ा गया है; उनमें भी गुणविधि से प्रयाजों के अनुवर्त्तन का संकेत मैत्रायणी संहिता १/४/१२ में कहा है- 'ऋतवो वै प्रयाजाः समानत्र होतव्या ऋतूनां प्रतिष्ठित्यै' अर्थात् विशेष ऋतुओं में किये जाने वाले प्रयाज समान देश में अनुष्ठित होने चाहिए, इससे ऋतुओं की उचित स्थिति बनी रहती है। इस प्रकार से यज्ञाङ्गों की उपासनाओं के अनुवर्त्तन में कोई विरोध नहीं होना चाहिए। जैसे सभी मंत्रों के आदि में 'ओम्' का उच्चारण होने से शाखा भेद के आधार पर कोई आपत्ति नहीं होती, वैसे ही उद्रीथ आदि उपासना के शाखान्तर में अनुवर्त्तन से कोई आपत्ति नहीं होगी। अतः आश्रयभूत कर्माङ्गों के अनुवर्त्तन की भाँति आश्रित उपासना विधियों का शाखान्तरों में अनुवर्त्तन स्वीकार करना उचित ही है, अनुचित नहीं ॥५६ ॥ जैसे शास्त्रों में वैश्वानर विद्या के एक-एक अंग की उपासना का अलग-अलग उल्लेख आता है, वैसे ही और भी अनेकों स्थलों में अलग-अलग वर्णन देखने को मिलते हैं, तो ऐसी उपासनाओं में उनके प्रत्येक अङ्ग की अलग- अलग उपासना करनी चाहिए अथवा सभी अङ्गों का समुच्चय करके एक साथ सभी की उपासना करनी चाहिए? अगले सूत्र में सूत्रकार द्वारा इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत किया जा रहा है- (४१७) भूम्न: क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा हि दर्शयति ॥५७॥ सूत्रार्थ- क्रतुवत् = अङ्ग-उपाङ्गों से परिपूरित यज्ञ के समान, भूम्रः = पूर्ण उपासना की, ज्यायस्त्वम् = प्रामाणिकता है, हि = क्योंकि, तथा = वैसा ही, दर्शयति = श्रुति दृष्टिगोचर कराती है। व्याख्या-जिस प्रकार यज्ञ का सर्वाङ्गपूर्ण अनुष्ठान किया जाना ही सर्वोत्तम है, उसी प्रकार वैश्वानर आदि विद्याओं में कही हुई उपासना का अनुष्ठान भी सर्वाङ्गपूर्ण करना ही श्रेष्ठ है; उसके एक अङ्ग का करना नहीं। वैश्वानर-विद्या के समान अन्यत्र सभी जगह भी यही बात माननी चाहिए, क्योंकि श्रुति ने वैसा ही भाव वैश्वानर-विद्या के वर्णन में प्रदर्शित किया है। छान्दोग्योपनिषद् ५/११ से १७ तक के खण्ड में इस विद्या के सन्दर्भ में इस प्रकार वर्णन मिलता है- राजा अश्रपति ने प्राचीनशाल आदि ऋषियों से अलग-अलग पूछा कि 'तुम वैश्वानर की उपासना कैसे करते हो?' उन ऋषियों ने अपनी-अपनी बात बतलायी। राजा ने पुनः एक- एक करके सभी को बतलाया कि- 'तुम अमुक अङ्ग की उपासना करते हो।' इसी के साथ ही राजा ने उस एकाङ्ग उपासना का सामान्य फल बतलाया तथा सभी को डराते हुए कहा- 'यदि तुम मेरे पास न आते, तो
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 212
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१९४ वेदान्त दर्शन तुम्हारा सिर धड़ से अलग हो जाता, तुम अंधे हो जाते' आदि। इसके बाद छा.उ. ५/१८/१ में बतलाया कि 'तुम सभी लोग उस वैश्वानर ब्रह्म के एक-एक अङ्ग की उपासना करते हो, जो इस तथ्य को जानकर आत्मा रूप से इस विद्या की उपासना करता है, वह सभी लोकों में, सभी भूतों में तथा समस्त आत्माओं में अन्न ग्रहण करने वाला हो जाता है। इस प्रकार से वहाँ सर्वाङ्गपूर्ण उपासना का अधिक महत्त्व बतलाया गया है। अतः यहाँ यही स्पष्ट होता है कि एक-एक अङ्ग की उपासना की अपेक्षा सर्वाङ्गपूर्ण उपासना सर्वोत्तम है। इसलिए साधक को सर्वाङ्ग उपासना का ही अनुष्ठान सम्पन्न करना चाहिए।७।। विविध रूपों से कही हुई ब्रह्मविद्या अलग-अलग है या एक ही है? इसी जिज्ञासा का समाधान अगले सूत्र में किया जा रहा है- (४१८) नाना शब्दादिभेदात् ॥५८॥ सूत्रार्थ- शब्दादि = शब्द आदि का, भेदात् = भेद होने से, नाना = समस्त विद्याएँ अलग-अलग हैं। व्याख्या- श्रुतियों में विविध विद्याओं का उल्लेख प्राप्त होता है। वे विद्याएँ निम्रवत् हैं-सद्-विद्या, भूमा- विद्या, दहर-विद्या, उपकोशल विद्या, शाण्डिल्य- विद्या, वैश्वानर-विद्या, आनन्दमयी-विद्या, अक्षर-विद्या आदि। अलग-अलग नामों एवं विविध-विध विधान वाली इन विद्याओं में नाम, प्रकार और साधन आदि का भेद है। किसी साधक को एक विद्या उचित लगती है, तो दूसरे के लिए अन्य कोई विद्या उचित प्रतीत होती है। वह उसी की प्राप्ति में लग जाता है। अतः समस्त विद्याओं का फल एक ब्रह्म की प्राप्ति होने पर भी एक नहीं है, पृथक्-पृथक् है। विद्याओं में भेद होने से उसके फल प्राप्ति में भी भेद होना स्वाभाबिक है॥५८॥ अब जिज्ञासा यह होती है कि इन सभी विद्याओं को मिलाकर अनुष्ठान करना चाहिए या फिर एक-एक का अलग-अलग करें? अगले सूत्र में इसी आशंका का समाधान सूत्रकार करते हैं- (४१९) विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥५९॥ सूत्रार्थ-अविशिष्टफलत्वात् = समस्त विद्याओं का फल एक ही ब्रह्म की प्राप्ति है, इसमें कोई भेद नहीं है, विकल्प: = अतः जो जिस उपासना को कर रहा है, उसी को करे, वही उचित है; क्योंकि वे (उपासनाएँ) विकल्प रूप में ही मानी गई हैं। व्याख्या- जो साधक जिस विद्या के अनुरूप उपासना सम्पन्न कर रहा है, उसे अपनी उपासना में किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं करना चाहिए; क्योंकि समस्त विद्याओं का एकमात्र लक्ष्य परब्रह्म की प्राप्ति ही है, जिसे वह किसी भी उपासना पद्धति से प्राप्त कर सकता है। श्रेष्ठ स्वर्गादि की प्राप्ति के साधनभूत अलग- अलग यज्ञ-यागादि बतलाये गये हैं, जबकि स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए यज्ञ यागादि के समूह (समुच्चय) की आवश्यकता होती है, क्योंकि स्वर्गीय सुख-सुविधाएँ अनेक हैं, उनके लिए अनेक साधन (यज्ञ-यागादि) अपनाने होते हैं। उपर्युक्त वर्णित विद्याओं का ब्रह्म साक्षात्कार रूप एक ही फल की प्राप्ति होने से उसके समुच्चय की जरूरत नहीं रहती। अतः यह सिद्ध हुआ कि साधक अपनी इच्छा के अनुसार किसी एक विद्या के द्वारा ही साधना करके अभीष्ट लक्ष्य (ब्रह्मसाक्षात्कार) प्राप्त कर सकता है॥५९। अब जिज्ञासा यह होती है कि जो कामनायुक्त उपासनाएँ अलग-अलग फलों के लिए कही गई हैं,उनका अनुष्ठान कैसे करना चाहिए? अगले सूत्र में सूत्रकार इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं- (४२०) काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ।६० ।। सूत्रार्थ- काम्याः = कामनायुक्त उपासनाओं का अनुष्ठान, तु = तो. यथाकामम् = जैसी कामना हो तदनुसार, समुच्चीयेरन् = समुच्चय करके करनी चाहिए; वा अथवा, न = समुच्चय न करें, तो अलग-अलग करें, पूर्वहेत्वभावात् = क्योंकि इनमें पूर्वोक्त फल की समानता का अभाव है।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 213
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ३ सूत्र ६३ १९५ व्याख्या- कामनायुक्त (सकाम) उपासनाओं में सभी का एक जैसा फल नहीं कहा गया है। अलग-अलग उपासनाओं के अलग-अलग फल बतलाये गये हैं। इस तरह से उपर्युक्त हेतु (एक मात्र ब्रह्म की प्राप्ति) न होने से सकाम उपासना का अनुष्ठान साधक अपनी-अपनी इच्छा-कामना के अनुरूप जैसा उचित समझे वैसा कर सकता है। अतः एक उपासना के द्वारा समस्त इच्छा-कामनाओं की सिद्धि नहीं हो सकती। साधक की जैसी कामना हो, तदनुरूप उपासना करे या फिर यदि अधिक भोगों की इच्छा हो, तो उन-उन भोगों को प्रदान करने वाली उपासनाओं का समुच्चय करके भी कर सकता है। अधिक भोगों की इच्छा वाला साधक, उन- उन उपासनाओं को पृथक्-पृथक् करे, तो भी ठीक है। यह सब उसकी इच्छा, शक्ति और सामर्थ्य पर निर्भर करता है। इसमें किसी भी तरह का कोई अवरोध नहीं होता ।६०॥ अब अगले सूत्र से उद्रीथ आदि अङ्गों में की जाने वाली उपासना के सन्दर्भ में विचार करने हेतु सूत्रकार अगला प्रकरण प्रारम्भ करते हैं। सर्वप्रथम चार सूत्रों द्वारा पूर्वपक्ष की उत्थापना की जा रही है- ( ४२१ ) अङ्गेषु यथाश्रयभावः॥६१॥ सूत्रार्थ- अङ्गेषु = उद्गीथ आदि भिन्न-भिन्न यज्ञाङ्गों में (की जाने वाली उपासनाओं का), यथाश्रयभावः = आश्रय के अनुसार ही भाव समझ लेना चाहिए॥ व्याख्या- उद्गीथ आदि भिन्न-भिन्न यज्ञाङ्गों में जो 'ॐ' कार आदि की उपासनाएँ की जाती हैं, इनका वर्णन उपर्युक्त इसी पाद के ५५ वें सूत्र में किया जा चुका है। उनमें से जो उपासना जिस यज्ञाङ्ग के आश्रित है, उसकी उसी अंग के आश्रयानुसार व्यवस्था करनी चाहिए। इससे यह सिद्ध होता है कि जिन-जिन कर्मों के द्वारा अङ्गों का समुच्चय संभव हो सकता है, उन-उन अङ्गों से सम्बन्धित की जाने वाली उपासनाओं का भी उन कर्मों के द्वारा समुच्चय स्थापित किया जा सकता है। इस प्रकार से अंग-उपासनाओं के अनुष्ठान में समुच्चय का माना जाना युक्तिसंगत ही है॥६१॥ उक्त प्रतिपादन के अतिरिक्त अगले सूत्र में पुनः उसी बात को कहा जा रहा है- (४२२ ) शिष्टेश्च ॥६२॥ सूत्रार्थ- शिष्टेः = श्रुति के शासन (विधान) से; च = भी (यही मानना उचित है)। व्याख्या- यज्ञीय कर्म के अङ्गभूत उद्गीथ आदि स्तोत्रों के समुच्चय का श्रुति में विधान होने के कारण उनकी आश्रित उपासनाओं का समुच्चय भी स्वयमेव सिद्ध हो जाता है। जिस प्रकार उद्गीथ आदि यज्ञाङ्गों के स्तोत्रों के समुच्चय का शासन (विधान) है, उसी प्रकार से उनके आश्रित उपासनाओं के समुच्चय का शासन भी उनके साथ ही संल्लग्न हो जाता है। इस प्रकार की अङ्गाश्रित उपासनाओं का विधान छान्दोग्योपनिषद् (१/१/१) में देखने को मिलता है। 'ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत्' अर्थात् 'ओम्' इस अक्षर उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए। जब आश्रय के अनुसार विधान है, तब अनुष्ठान उसी के सदृश होना चाहिए। इससे स्पष्ट हो जाता है कि कर्मों के अङ्गानुसार उनके आश्रित रहने वाली उपासनाओं का समुच्चय हो सकता है॥ ६२॥ अगले सूत्र में सूत्रकार इसी प्रसङ्ग के अन्तर्गत एक अन्य हेतु और प्रतिपादित करते हैं- ( ४२३) समाहारात्॥६३।। सूत्रार्थ- समाहारात् = कर्मों का समाहार अर्थात् कर्म को पूर्ण करने को कहा गया है, अतः उनके आश्रित उपासनाओं का भी समाहार (समुच्चय) उचित ही है अथवा कर्म में हुई कमी को पूर्ण करने से अंग उपासनाओं में यथाश्रय भाव की जानकारी प्राप्त होती है। व्याख्या- श्रुतियों ने कर्मों के द्वारा समाहार (कमी को पूर्ण करने) का निर्देशन किया है। इससे उनके आश्रित
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 214
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
१९६ वदान्त दशन उपासनाओं का समाहार करने से भी समुच्चय होना सिद्ध होता है। इस सन्दर्भ में छा.उ. (१/५/५) में इस प्रकार कहा गया है- 'य उद्रीथः स प्रणवः ..... स उद्गीथः' अर्थात् जो उद्गीथ है, वही प्रणव है, वही उद्रीथ है। इस प्रकार प्रणव और उद्गीथ की एकता की उपासना का विधान कर उसके फल का कथन इस प्रकार किया है- 'होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनु समाहरति' (छा. १/५/५) अर्थात् प्रणव और उद्गीथ की एकता को जानने वाला उद्गाता सामगान की अशुद्धि को होता के आसन पर बैठे हुए ही ॐ उच्चारण करके संशोधित कर देता है। कर्म की कमी को पूर्ण कर देना ही समाहार है। इस समाहार से भी अङ्गाश्रित उपासना का समुच्चय मानना प्रमाणित होता है॥६३ ।। अगले सूत्र में सूत्रकार ने उपर्युक्त अर्थ की सिद्धि के लिए एक अन्य हेतु बतलाया है- (४२४) गुणसाधारण्यश्रुतेश्च॥६४॥ सूत्रार्थ- गुणसाधारण्यश्रुतेः = गुणों की साधारणता बतलाने वाली श्रुति से, च = भी (यही बात सिद्ध होती है)। अर्थात् अङ्ग उपासनाओं के अनुष्ठान में समुच्चय इस कारण भी मान लेना चहए; क्योंकि गुण अर्थात् कर्माङ्गों के उपासना सहित 'ॐ कार' का सभी कर्मों में समानरूप से होना श्रुति बतलाती है। व्याख्या- ॐकार जो उपासना का गुण है, उसका प्रयोग तीनों वेदों में समान भाव से किया गया है। 'ॐ' द्वारा ही त्रयी-विद्या की प्रवृत्ति बतलाई गई है। इसका उल्लेख छान्दोग्योपनिषद् (१/१/९) में इस प्रकार मिलता है- 'तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते, ओमित्या श्रावयति, ओमिति शंसति, ओमित्युद्गायति' अर्थात् उस 'ओम्' से यह ऋक् यजुः साम रूपी त्रयीविद्या प्रवृत्त होती है। 'ॐ' कहकर अध्वर्यु सुनाता है (कर्म करता है), 'ॐ' कहकर होता स्तुति (कथन) करता है और उद्गाता 'ॐ' कहकर स्तोत्र-गान करता है। यहाँ पर त्रयी- विद्या के संग ओम् का समान सम्बन्ध कहा गया है, जो कर्म के अंगभूत उद्गीथ आदि उपासनाओं के अनुष्ठान में समुच्चय का सूचक है। कर्म के साथ उद्गीथ गान आवश्यक है और उसके साथ उपासना भी जरूरी है। इस प्रकार कर्म के साथ उपासना का निश्चित समुच्चय मिलता है। अतः इस कारण से भी उपासनाओं का उनके आश्रयभूत कर्माङ्गों के साथ समुच्चय होना उचित सिद्ध होता है। उपर्युक्त चार सूत्रों द्वारा इसी भाव को पूर्वपक्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है।६४॥ उपर्युक्त चार सूत्रों द्वारा पूर्वपक्ष की उत्थापना करने के उपरान्त आगे के दोनों सूत्रों में आचार्य उत्तर (समाधान) देकर इस तृतीय पाद का समापन करते हैं- (४२५) न वा तत्सहभावाश्रुते: ।६५॥ सूत्रार्थ-वा = किन्तु, न = ऐसा नहीं है, तत्सहभावाश्रुतेः = क्योंकि उन-उन उपासनाओं का समुच्चय कोई भी श्रुति नहीं बतलाती, अतः उपासनाओं का समुच्चय सिद्ध नहीं हो सकता है। व्याख्या- जिन उपासनाओं के जो आश्रयभूत उद्गीथ आदि अङ्ग हैं, उन अङ्गों के समाहार के समान उनके साथ उपासनाओं का समाहार बतलाने वाली कोई भी श्रुति उपलब्ध नहीं है। अतः उन-उन आश्रयों का समुच्चय के समान ही उपासनाओं का समुच्चय सिद्ध नहीं होता; क्योंकि उपासनाओं का उद्देश्य अलग-अलग है। जिस उद्देश्य से जिस फल हेतु यज्ञादि कर्म सम्पन्न किये जाते हैं, उनके अङ्गों में की जाने वाली उपासना उनसे पृथक् उद्देश्य से सम्पन्न की जाती है, अतः अङ्गों के साथ उपासना के समुच्चय सम्बन्ध नहीं हैं, इसलिए आश्रयों के समुच्चय की भाँति उपासनाओं का समुच्चय होना सिद्ध नहीं हो सकता। अतः उपासनाओं का अनुष्ठान पृथक्-पृथक् ही करना उचित है।।६५। अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से पुनः उक्त सिद्धान्त को पुष्ट कर रहे हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 215
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद०३ सूत्र ६६ १९७
( ४२६) दर्शनाच्च॥६६॥ सूत्रार्थ- च = और, दर्शनात् = श्रुति में उपासनाओं का समाहार न करना दिखलाया गया है, इस कारण से भी (उनका समाहार सिद्ध नहीं होता)। व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद् (४/१७/१०) में वर्णन आता है कि- 'एवंविद् ह वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति' अर्थात् 'पूर्वोक्त प्रकार से इस रहस्य को जानने वाला ब्रह्मा निश्चय ही यज्ञ की, यजमान की तथा अन्य ऋत्विजों की रक्षा करता है।' यहाँ इस श्रुति में ब्रह्मविद्या की महिमा का प्रतिपादन करते हुए ऋषि ने यह प्रदर्शित किया है कि इन उपासनाओं का कर्म के साथ समुच्चय नहीं किया जा सकता है; क्योंकि यदि उपासनाओं का समाहार होता, तो दूसरे ऋत्विक् भी उस तत्त्व के ज्ञाता होते एवं स्वयं ही अपनी रक्षा करते, ब्रह्मा को उनकी रक्षा करने की जरूरत नहीं होती। इससे यही प्रमाणित होता है कि उपासनाएँ उनके आश्रयभूत यज्ञाङ्गों के अधीन नहीं हैं; स्वतंत्र हैं। अतः समुच्चय न करके उनका अलग ही अनुष्ठान सम्पन्न करना चाहिए।६६ ।।
॥। इति तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 216
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
॥ अथ तृतीयाध्याये चतुर्थः पादः॥ तृतीय पाद के अन्तर्गत परब्रह्म की प्राप्ति हेतु अलग-अलग विद्याओं के सन्दर्भ में प्रतीत होने वाले विरोध को हटाया गया और उन विद्याओं में से किस विद्या के कौन से गुण अन्य विद्या में लिये जा सकते हैं और कौन से नहीं लिये जा सकते हैं? इन विद्याओं का पृथक्-पृथक् अनुष्ठान करना ठीक है या इनमें से कुछ एक का समुच्चय भी हो सकता है? इस प्रकार से अन्य कई विषयों पर गम्भीरता से विचार करके सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया। अब चतुर्थ पाद में परब्रह्म के मिलन का स्वतन्त्र साधन है या नहीं ? उसके अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग में कौन सा साधन है? इन सभी प्रश्नों का विचार करके सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जा रहा है। सर्वप्रथम ब्रह्म की प्राप्ति स्वरूप पुरुषार्थ की सिद्धि मात्र ज्ञान से ही होती है या कर्म आदि के समुच्चय से ? इसी पर विचार शुरू करने हेतु सूत्रकार अपना मत प्रस्तुत करते हैं- (४२७) पुरुषार्थोऽतःशब्दादिति बादरायण: ।।१।। सूत्रार्थ- पुरुषार्थः = परब्रह्म प्राप्ति रूप पुरुषार्थ की सिद्धि, अतः = इस (ब्रह्मज्ञान) से होती है, शब्दात् = क्योंकि शब्द अर्थात् श्रुति वचन से यही प्रमाणित होता है, इति = ऐसा, बादरायणः = बादरायण जी कहते हैं। व्याख्या-आचार्य बादरायण जी कहते हैं कि ब्रह्मविद्या की सिद्धि से ही मोक्ष रूपी पुरुषार्थ की सिद्धि सम्भव है। यह तथ्य श्रुति सम्मत है। इसके सन्दर्भ में आचार्य वेदव्यास जी अपने मतानुसार छा.उ. ७/१/३ का उल्लेख प्रस्तुत करते हैं- 'तरति शोकमात्मवित्' अर्थात् आत्मज्ञानी शोक-मोह से तर (पार हो) जाता है। मुण्डकोपनिषद् ३/२/८ में भी ऐसा वर्णन मिलता है- 'तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।' अर्थात् ज्ञानी पुरुष नाम-रूप से मुक्त होने पर परात्पर पुरुष (ब्रह्म) को प्राप्त हो जाता है। श्वेताश्वतरोपनिषद् ५/ १३ में भी ऐसा वर्णन किया गया है- 'ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः' अर्थात् (साधक) उस अविनाशी देव को जानकर सभी तरह के बन्धनों से मुक्त हो जाता है'। इस प्रकार श्रुति-वचनों से यह सिद्ध होता है कि ब्रह्म की प्राप्ति रूप पुरुषार्थ की सिद्धि इस परम ब्रह्मज्ञान से ही सम्भव हो सकती है॥१॥
(४२८) अगले सूत्र में आचार्य उपर्युक्त सिद्धान्त द्वारा जैमिनि ऋषि का मतभेद प्रकट करते हुए कहते हैं- शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथाऽन्येष्विति जैमिनिः ॥२॥ सूत्रार्थ- शेषत्वात् = कर्म का शेष (अङ्ग) होने से, पुरुषार्थवादः = ब्रह्मविद्या को पुरुषार्थ का हेतु बतलाना, अर्थ की सिद्धि मात्र ही है, यथा = जैसे, अन्येषु = यज्ञ के अन्य उपाङ्गों में फलश्रुति अर्थ की सिद्धि ही मानी जाती है, इति = ऐसा ही, जैमिनि: = आचार्य जैमिनि का कथन है। व्याख्या- आचार्य जैमिनि का कथन है कि आत्मा कर्म का कर्त्ता होने से उसके स्वरूप का ज्ञान-बोध कराने वाली विद्या भी कर्म का अङ्ग है। अतः उसे पुरुषार्थ का साधन बतलाना तो उसकी प्रशंसा मात्र ही करना है। पुरुषार्थ का साधन तो यर्थाथतः एक मात्र कर्म ही है। जैसे कर्म के द्वारा अङ्गों की फलश्रुति उनकी प्रशंसा मात्र समझी जाती है, उसी प्रकार से इसे भी जानना चाहिए।।२।। 'विद्या कर्म का अङ्ग है।' इस कथन को सिद्ध करने के लिए आचार्य अगले सूत्र में इसका हेतु बतला रहे हैं- (४२९ ) आचारदर्शनात् ॥३॥ सूत्रार्थ-आचार = महान् पुरुषों का आचरण, दर्शनात् = देखने से भी ऐसा ही सिद्ध होता है कि विद्या कर्म का ही अङ्ग है। व्याख्या- मात्र विद्या के द्वारा ही पुरुषार्थ सिद्ध न होने के पक्ष में महान् पुरुषों का उत्तम आचरण भी प्रमाण है। इस विषय में बृह.उ. ३/१/१ में कहा गया है कि 'एक बार राजा जनक ने प्रचुर दक्षिणा वाला यज्ञ किया, उसमें कुरु और पाञ्चाल देश के बहुत से ब्राह्मण एकत्रित हुए थे।' छान्दोग्य ५/११/५ में भी ऐसा ही कुछ
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 217
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ३ पाद० ४ सूत्र ५२ २१ उक्त ब्रह्मविद्या का मोक्षरूपी फल कोई अवरोध न होने से जिस साधक पुरुष को इसी जन्म में मिलता है, उसे यहीं मर्त्यलोक में ही प्राप्त हो जाता है या लोकान्तर में? इसी जिज्ञासा का समाधान आचार्य अगले सूत्र में देते हुए चतुर्थपाद के सहित तीसरा अध्याय पूर्ण करते हैं- (४७८) एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्थावधृतेस्तदवस्थावधृतेः ॥५२॥ सूत्रार्थ- एवम् = इस प्रकार, मुक्तिफलनियमः, = किसी एक ही लोक में मोक्ष रूपी फल प्राप्त होने का प्राविधान नहीं है, तदवस्थावधृतेः = क्योंकि उसकी अवस्था सुनिश्चित की गई है, तदवस्थावधृतेः = उसकी अवस्था सुनिश्चित की गई है। ('तद्वस्थावधृतेः' पद की पुनरावृत्ति अध्याय समाप्ति का सूचक है)। व्याख्या- ब्रह्मविद्या द्वारा प्राप्त होने वाले मोक्षरूपी फल के सन्दर्भ में जैसे यह प्राविधान नहीं है कि वह इसी जन्म में मिल जाता है अथवा मृत्यूपरान्त अगले जन्म में मिलता है। वैसे ही उस सन्दर्भ में यह भी कोई प्राविधान नहीं है कि वह इस लोक में प्राप्त होता है अथवा ब्रह्मलोक में प्राप्त होता है? इस विषय में कठोपनिषद् (२/३/१४) में कहा गया है- जब इस (साधक) के हृदय में अवस्थित सभी तरह की कामनाओं का पूर्णरूपेण अभाव हो जाता है तथा इस स्थिति (अवस्था) में पहुँचा हुआ साधक परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार के वचनों द्वारा श्रुतियों में मोक्ष की स्थिति का स्वरूप निरूपित किया गया है। जिसे इस प्रकार की ब्राह्मी-स्थिति देह के रहते-रहते प्राप्त हो जाती है, वह तो इसी देह के रहते हुए यहीं पर परमात्मामय हो जाता है और जिस साधक को उक्त स्थिति नहीं मिल पाती, वह अगले जन्म में ब्रह्मलोक में गमन कर परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।५२॥
।। इति तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्त: ॥
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 218
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
।। अथ चतुथाध्याय प्रथम: पादः ॥ विगत (तृतीय) अध्याय में ईश्वर प्राप्ति के साधनों का दिग्दर्शन कराने वाली श्रुतियों पर विचार किया गया। अब इस अध्याय में यह निरूपित किया जा रहा है कि उपासनाओं का क्या-क्या प्रतिफल होता है। यहाँ यह जिज्ञासा स्वाभाविक ही है कि वे उपासनाएँ मात्र अध्ययन से फल प्रदायक होंगी अथवा उनके अभ्यास की आवश्यकता है। इसी समाधान के लिए आचार्य द्वारा अगला प्रकरण आरम्भ किया जा रहा है- ( ४७९ ) आवृत्तिरसकृदुपदेशात्॥१॥ सूत्रार्थ-आवृत्तिः = उपासना की आवृत्ति अर्थात् अभ्यास बारम्बार करना चाहिए, क्योंकि; असकृदुपदेशात् = श्रुतियों में इसके लिए बार-बार उपदेश किया गया है। व्याख्या- श्रुतियों में अनेकशः ब्रह्मज्ञान सम्बन्धी उपदेश दिया गया है। इससे संकेत मिलता है कि अध्येता साधक को निर्दिष्ट ब्रह्मज्ञान को न केवल पढ़ना, सुनना; वरन् उस पर चिन्तन-मनन करके उसे धारण करना चाहिए। बृह. उ. ४/५/६ के 'आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' में यही सन्देश ध्वनित होता है। इसी प्रकार मुण्डकोपनिषद् ३/१/८ एवं ३/२/१ में ब्रह्म प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्न करने का वर्णन है। प्रह्लाद द्वारा वर्णित ईश्वरोपासना के नौ अंग-श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, पूजन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म निवेदन निर्दिष्ट हैं- श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥। -श्रीमद्भागवत ७.५.२३ इस सबसे तात्पर्य उपासना की अनेक विध आवृत्ति से है। अतः साधक को आत्मज्ञान अथवा ईश प्राप्ति हेतु बारम्बार प्रयत्न करना चाहिए।१। अब एक अन्य तर्क से उपासना की आवृत्ति का तथ्य निरूपित करते हैं- ( ४८० ) लिङ्गाच्च ।।२।। सूत्रार्थ- लिङ्गात् = स्मृति कथन रूप लिङ्ग (प्रमाण) से, च = भी (उपासना की बारम्बारता बनाये रखने की मान्यता सिद्ध होती है)। व्याख्या- अन्यत्र भी यह तथ्य निर्दिष्ट है कि उपासना की बारम्बारता बनाये रखनी चाहिए, तभी वाञ्छित सिद्धि मिलती है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा कहा गया है कि सभी समय में मेरा स्मरण भी कर और युद्ध भी (गी. ८/७ सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च), इसी प्रकार- जो मेरा अनन्य भक्त मेरा नित्य स्मरण करता है, उसके लिए मैं सदा सुलभ हूँ (गीता ८/१४)। बारम्बार चिन्तन करने वाला साधक परम पुरुष को प्राप्त कर लेता है। (परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् -गी. ८/८)। उपर्युक्त उदाहरणों से परमात्मा की बारम्बार स्मृति के कथन से यही सिद्ध होता है कि निरन्तर उपासना से ही ब्रह्म प्राप्ति सम्भव है। अन्य स्मृति ग्रन्थों में इसकी पुष्टि की गई है।।२।।
हैं- अब शिष्य की इस जिज्ञासा पर कि परमात्मा का निरन्तर चिन्तन किस भाव से करना चाहिए, आचार्य कहते
( ४८१ ) आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ॥३ ॥ सूत्रार्थ-आत्मा = (वह मेरा) आत्मा है, इति = इस भाव से, तु= तो, उपगच्छन्ति = (ज्ञानीजन) उसे प्राप्त करते हैं, च = और, ग्राह्यन्ति = अन्यों को ग्रहण कराते हैं। व्याख्या- उपासक को चाहिए कि वह आत्मभाव से ब्रह्म की उपासना किया करे। तात्पर्य यह है कि वह ब्रह्म को अपनी आत्मा समझे। श्रुति वाक्यों में यह तथ्य इस प्रकार है कि 'जीवात्मा उस ब्रह्म का शरीर है।'
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 219
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० १ सूत्र ६ २२१ (यस्यात्मा शरीरम्)' या 'वह मेरा आत्मा अन्तर्यामी है।' इस प्रकार के वाक्यों से ब्रह्म को अपनी आत्मा मानने का अभ्यास करें। इस भाव से ब्रह्म की उपासना करने से ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है। इसी प्रकार जिन्हें ब्रह्मज्ञान का उपदेश करें, उन्हें भी यही समझायें कि सबके अन्तः में रहने वाला तेरी आत्मा ही अन्तर्यामी है (बृह.उ. ३/४/१, गी. १८/६१, तै.उ. २/१)। इस प्रकार अन्यों को भी ब्रह्म की प्राप्ति कराये।।३। शिष्य जिज्ञासा करता है कि क्या प्रतीकों में भी आत्म-भाव करके प्रतीकोपासना करनी चाहिए? इसी के समाधान हेतु आचार्य अगले सूत्र में कहते हैं- ( ४८२ ) न प्रतीके न हि सः॥४॥ सूत्रार्थ- प्रतीके = प्रतीक में, न = आत्मभाव करना उचित नहीं है, हि= क्योंकि, सः = वह (प्रतीक), न = उपासक की आत्मा नहीं है। व्याख्या- श्रुतियों में प्रतीकोपासना का भी विधान है। छान्दोग्योपनिषद् में मन, आकाश, आदित्य आदि को भी ब्रह्म कहा गया है (छा.उ.३/१८/१,३/१९/१)। ये सभी ब्रह्म के प्रतीक हैं, स्वयं ब्रह्म नहीं। मन इन्द्रिय है, अतः उसमें आत्म-भाव नहीं हो सकता। स्मृतियों में भी अग्नि, आकाश, जल, पृथिवी, जीव, दिशा, समुद्र, नदी एवं वृक्ष आदि को ब्रह्म का शरीर निर्दिष्ट किया गया है। ये सभी प्रतीक रूप से ब्रह्म हैं, पर आत्मभाव किये जाने योग्य नहीं। जैसे- मूर्ति आदि में ईश्वर की भावना करके उपासना तो की जाती है, पर आत्मभाव नहीं किया जाता, उसी प्रकार इन पूर्व वर्णित मन आदि में प्रतीकोपासना करें, पर आत्मभाव से नहीं ॥४ ॥ अब शिष्य की इस जिज्ञासा पर कि क्या प्रतीक में ब्रह्मभाव करके उपासना करनी चाहिए अथवा ब्रह्म में प्रतीक का भाव करना चाहिए? आचार्य कहते हैं- (४८३) ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात्॥५।। सूत्रार्थ- उत्कर्षात् = ब्रह्म के उत्कृष्ट होने से, ब्रह्मदृष्टिः = प्रतीक में ब्रह्म की भावना की जानी चाहिए; (क्योंकि निकृष्ट वस्तु में उत्कृष्ट की भावना की जाती है)। व्याख्या- जब वास्तविक उपास्य सहजता से उपलब्ध नहीं होता, तब उसके प्रतीक को उपास्य बनाकर उसमें उपास्य की भावना करके उपासना की जाती है। चूँकि प्रतीक सदैव वास्तविक उपास्य से निकृष्ट होता है, अतः निकृष्ट में ही उत्कृष्ट की भावना की जाती है, न कि उत्कृष्ट में निकृष्ट की। इसलिए ब्रह्म में प्रतीक का आरोप नहीं हो सकता; वरन् प्रतीक में ब्रह्म का आरोप करके उपासना की जाती है। प्राण, मन, सूर्य, चन्द्रमा आदि किसी भी पदार्थ को ब्रह्म का प्रतीक मानकर उसमें ब्रह्म भाव रखकर उपासना करनी चाहिए, क्योंकि वही (ब्रह्म) सर्वश्रेष्ठ है एवं निकृष्ट में ही श्रेष्ठ की भावना की जाती है, श्रेष्ठ में निकृष्ट का भाव नहीं किया जाता। इस प्रकार प्रतीकों द्वारा भी ब्रह्म सान्निध्य प्राप्त किया जा सकता॥५॥ अब उद्गीथ आदि, जो कर्म के अङ्गभूत हैं, के विषय में कहते हैं- (४८४ ) आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः ॥६॥ सूत्रार्थ- च = तथा, अङ्गे = यज्ञ के अङ्गभूत उद्गीथ आदि में, आदित्यादिमतयः = आदित्य आदि की बुद्धि (भावना) करनी चाहिए, उपपत्ते: = क्योंकि यही युक्तिसंगत है। ऐसा करने से कर्म समृद्धि रूप फल प्राप्त होता है। व्याख्या- आचार्य प्रतीकोपासना के सम्बन्ध में एक अन्य युक्ति देते हुए कहते हैं कि उपनिषद् ग्रन्थों में भी प्रतीकोपासना (कनिष्ठ में श्रेष्ठ की भावना) वर्णित है। छान्दोग्योपनिषद् (१/३/१) में 'य एवासौ तपति
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the websile can be used for propagation with prior written consent.
Page 220
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२२२ वेदान्त दर्शन तमुद्गीथमुपासीत् ........ ' आदि मंत्र के अनुसार तपःशील आदित्य के रूप में उद्गीथ (यज्ञकर्म में सामगान के रूप में गाया जाने वाला) की उपासना का निर्देश है। इसके मूल में भी कनिष्ठ में वरिष्ठ की भावना करने का तथ्य छिपा है। उद्गीथ की आदित्य के रूप में उपासना का दूसरा अभिप्राय कर्म समृद्धि रूप फल की सिद्धि से भी है। इस प्रकार कनिष्ठ में वरिष्ठ की भावना करना ही दूसरे शब्दों में प्रतीकोपासना है ।६॥ अब जिज्ञासु की इस जिज्ञासा पर कि क्या उपासना बैठकर करनी चाहिए अथवा चलते-फिरते किसी भी स्थिति में कर लेनी चाहिए, आचार्य समाधान करते हैं- ( ४८५ ) आसीनः सम्भवात्॥७॥ सूत्रार्थ-आसीन: = आसीन होकर (अर्थात् स्थित-अचल होकर बैठकर) ही, सम्भवात् = उपासना करना सम्भव होने से अर्थात् बैठकर ही उपासना करनी चाहिए। व्याख्या- श्रुति-स्मृति के अनुसार परमात्मा का जैसा स्वरूप समझ में आता है, उसके अनुसार उसका तैल धारावत् निरन्तर चिन्तन करने को ही उपासना कहते हैं। यह उपासना चलते-फिरते अथवा अन्य कोई कार्य करते रहकर सम्भव नहीं है। कारण यह है कि उन स्थितियों में मन उन कामों में लगा होने से ईश्वर में नहीं लग पाता। लेटकर करने में भी निद्रा आदि विघ्र आने की सम्भावना रहती है। अस्तु, बैठकर उपासना करने से वह निर्विघ्न रूप से सम्पन्न हो सकती है। अतः बैठकर ही उपासना करनी चाहिए किसी और प्रकार से नहीं।।७॥ इसकी पुष्टि हेतु अब अन्य तथ्य प्रस्तुत करते हैं- ( ४८६) ध्यानाच्च ।८।। सूत्रार्थ-ध्यानात् = (उपासना का स्वरूप) ध्यान होने से, च = भी (यही स्पष्ट होता है कि आसीन होकर ही उपासना करे)। व्याख्या-उपासना का स्वरूप (इष्टदेव का) ध्यान ही है, ऐसा मुण्डकोपनिषद् ३/१/८ में भी उल्लेख है- न चक्षुषा गृह्यते ......... तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः। ध्यान चित्त के एकाग्र हुए बिना नहीं हो सकता और चित्त बैठकर प्रयत्न करने से ही एकाग्र होता है। अतः बैठकर ही उपासना करनी चाहिए। इसे चलते-फिरते रहकर या अन्य किसी प्रकार नहीं किया जा सकता॥८॥ इसी को और पुष्ट करने के लिए अन्य तर्क देते हैं- (४८७ ) अचलत्वं चापेक्ष्य ।।९।। सूत्रार्थ- च = तथा, अचलत्वम् = अचल रहना ही, अपेक्ष्य = आवश्यक बताया गया है। व्याख्या- उपासक को चाहिए कि वह निश्चल रहकर उपासना करे, क्योंकि श्रुति आदि में उपासना के लिए अचल रहना आवश्यक बताया गया है। श्वेताश्वतरोपनिषद् २/८ में उल्लेख है कि सिर, गरदन और वक्षस्थल को उठाकर, स्थिर बैठकर, इन्द्रियों और मन को हृदय में एकाग्र करके ओंकार का जप-ध्यान करे। इस प्रकार श्रुति निर्देश से उपासना के समय अचलत्व की पुष्टि होने से यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है ॥९॥ अब इसी तथ्य को स्मृति के प्रमाण से पुष्ट कर रहे हैं- (४८८) स्मरन्ति च ॥१० ॥ सूत्रार्थ-च = और, स्मरन्ति = इसी प्रकार स्मरण करते हैं (स्मृतियों में भी यही तथ्य निर्दिष्ट है)। व्याख्या-बैठकर अचल होकर एकाग्रचित्त भाव से उपासना करने का तथ्य स्मृतियों में भी वर्णित है।
P:
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 221
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० १ सूत्र १३ २२३ प्रस्थानत्रयी के स्मृतिग्रन्थ गीता में भी उल्लेख है कि शरीर, सिर एवं ग्रीवा प्रदेश को सम एवं निश्चल करके स्थिर होकर नासिकाग्र पर दृष्टि जमाकर इधर-उधर न देखता हुआ निर्भय और निश्चिन्त होकर शान्तभाव से अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उपासना के लिए बैठे (गी. ६/१३-१४)। इस प्रकार स्मृति प्रमाण से भी यह बात सिद्ध हो जाती है कि ध्यान-चिन्तन-उपासना का अभ्यास बैठकर ही करना उचित है॥१०॥ अब इस जिज्ञासा पर कि 'उपासना कैसे स्थान में करना चाहिए?' आचार्य समाधान करते हुए कहते हैं- ( ४८९) यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात्॥११।। सूत्रार्थ- अविशेषात् = (ध्यान, उपासना हेतु) किसी स्थान विशेष का विधान न होने से, यत्र = जहाँ, एकाग्रता = चित्त की एकाग्रता सध सके, तत्र = वहीं बैठकर उपासना करनी चाहिए। व्याख्या- श्रुतियों में उल्लेख है कि जहाँ मन एकाग्र हो सके, ऐसा स्थान ही योग के अनुकूल है। श्वेताश्वतर उपनिषद् की श्रुति (२/२०) कहती है कि जो स्थान सभी प्रकार शुद्ध, अग्नि, बालू और कंकड़ से रहित, समतल, जल, शब्द एवं आश्रय की दृष्टि से सुविधाजनक, नेत्रों को कष्ट देने वाले दृश्यों से रहित, वायु के तेज झोंकों से निर्विघ्न हो, ऐसे गुफा आदि में आश्रय ग्रहण करके ध्यान आदि का अभ्यास करना चाहिए। उपर्युक्त श्रुति वर्णन में उपासना हेतु किसी दिशा-स्थान विशेष का निर्देश नहीं है, वरन् साधक की सुविधा का ध्यान रखकर 'मनोनुकूले' कहकर उसी की आकांक्षा पर छोड़ दिया है। पर एकाग्रता सध सके ऐसा स्थान आवश्यक बताया है। अस्तु, सहज प्राप्य निर्विघ्न और अनुकूल स्थान में उपासना करनी चाहिए।।११।। इस विधि से उचित स्थान पर उपासना कब तक करे, इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य कह रहे हैं- (४९० ) आ प्रायणात्तत्रापि हि दृष्टम्॥१२।। सूत्रार्थ-आ प्रायणात् = प्रयाण करने तक (अर्थात् मरण पर्यन्त उपासना करते रहना चाहिए), हि = क्योंकि, तत्रापि = उस समय (मरणकाल) तक भी, दृष्टम् = इससे (उपासना से) सम्बन्धित विधान देखा जाता है। व्याख्या-साधक को चाहिए कि वह आजीवन उपासना करता रहे। ऐसा करने से वह निस्सन्देह ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लेता है। यह वर्णन छान्दोग्योपनिषद् ८/१५/१ (स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभि- सम्पद्यते) में संप्राप्य है। श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर मरण पर्यन्त साधना करते रहने का उल्लेख है। (गी. ८/५ से १३ तक, जैसे- अन्तकाले च मामेव, स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः । प्रयाणकाले मनसाऽचलेन, भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥) इसका कारण यह है कि मृत्यु के समय जिस-जिस भाव का स्मरण किया जाता है, वही स्थिति प्राप्त होती है। अतः साधक को चाहिए कि वह आजीवन उपासना करे ॥१२ ॥ विगत सूत्र तक उपासना सम्बन्धी विषय पर प्रकाश डाला गया। अब ईश्वर प्राप्ति के निमित्त की जाने वाली उपासना-साधना के प्रतिफल पर विचार करते हैं। उपासना आदि के प्रतिफल स्वरूप जब ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है, तब पूर्वार्जित और पश्चात् कर्त्तव्य कर्मों का क्या होता है, इसी जिज्ञासा का समाधान अगले सूत्र में कर रहे हैं- (४९१ ) तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्रेषविनाशौ तद्व्यपदेशात्॥१३॥ सूत्रार्थ- तदधिगमे- उस उपासना के प्रतिफल स्वरूप ईश्वर की प्राप्ति हो जाने पर, उत्तरपूर्वाघयोः= पूर्व अर्जित और बाद में किये जाने वाले पाप कर्मों का, अश्लेषविनाशौ = क्रमशः अलगाव और विनाश होता
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 222
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२२४ वेदान्त दर्शन है; क्योंकि, तद्व्यपदेशात् = श्रुति में यही तथ्य अनेकशः निर्दिष्ट है। व्याख्या- श्रुति में ऐसा वर्णन प्राप्त होता है कि जिस प्रकार कमल पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी प्रकार परब्रह्म को जान लेने वाले में पाप आदि कर्म लिप नहीं हो सकते। (छान्दो. ४/१४/३ 'यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत')। छान्दोग्य उपनिषद् में ही एक अन्य स्थल पर उल्लेख है कि जिस प्रकार सरकण्डे की सौंक के अग्रभाग में रहने वाली तूल (रुई जैसा अत्यधिक हलका सरकंडे का फूल), अग्नि के सम्पर्क मात्र से भस्म हो जाता है,उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी के समस्त पाप अतिशीघ्र विनष्ट हो जाते हैं। (छान्दो. ५/२४/३ तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवः हास्य सर्वे पाप्मान: प्रदूयन्ते ..... )। गीता ४/३७, मुण्डको. २/२/८ में भी यही तथ्य वर्णित है। इस प्रकार उपर्युक्त श्रुति निर्देश से यही तथ्य उद्घाटित होता है कि परमात्मा की प्राप्ति के बाद पूर्वकृत पापों का क्षय हो जाता है, साथ ही भविष्य में होने वाले पाप कर्मों से भी उसका संश्लेष (सम्बन्ध) नहीं होता॥१३।। जब ईश्वर प्राप्त हो जाता है और साधक के पापक्षय हो जाते हैं, तब उसके पुण्य कर्मों का क्या होता है, इस जिज्ञासा के समाधान स्वरूप आचार्य कहते हैं- ( ४९२ ) इतरस्याप्येवमसंश्रेषः पाते तु ॥१४॥ सूत्रार्थ- इतरस्य = पुण्य कर्म समूह का, अपि = भी, एवम् = इसी प्रकार, असंश्लेष: = सम्बन्ध न होना और विनष्ट हो जाना समझना चाहिए, पाते तु = शरीर पात हो जाने पर तो (कोई भाव न रहने पर तो) वह ईश्वर को ही प्राप्त हो जाता है। व्याख्या- इससे पूर्व के सूत्र में जिस प्रकार उपासना के प्रतिफल स्वरूप पापकर्मों के क्षय हो जाने का तथ्य निर्दिष्ट है, उसी प्रकार ईश प्राप्ति हो जाने पर पुण्य कर्मों के विनष्ट हो जाने के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता में ज्ञानाग्नि द्वारा (पाप-पुण्य) सभी कर्मों के दग्ध हो जाने का तथ्य निर्दिष्ट है- यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा (गी. ४/३७)। बृहदारण्यक उपनिषद् में भी आत्मज्ञानी के लिए पुण्य और पाप दोनों से ही तर जाने का वर्णन संप्राप्य है- स वा एष ........ स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर ...... तरति नैनं कृताकृते तपतः (बृह. उ. ४/४/२२)। तात्पर्य यह है कि ज्ञान हो जाने पर अथवा ईश्वर की प्राप्ति हो जाने पर जिस प्रकार पाप कर्म विनष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार पूर्व में किये हुए अथवा भावी पुण्य कर्मों से भी जीवन्मुक्ति की स्थिति में साधक का कोई सम्बन्ध नहीं रहता। साथ ही शरीर पात (शरीर की मृत्यु) हो जाने पर तो उसे ईश्वर की प्राप्ति हो ही जाती है॥ १४॥ अब प्रश्न यह है कि यदि पूर्व ज्ञान हो जाने पर साधक के पूर्वकृत व भावी पाप-पुण्य समाप्त हो जाते हैं तथा उनसे साधक का कोई सम्बन्ध नहीं रहता, तब उसका शरीर जीवित कैसे रह पाता है? जबकि शरीर मिलता तो कर्म फल भोग के लिए ही है? इसी शंका का समाधान आचार्य अगले सूत्र में कर रहे हैं- (४९३) अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधे: ॥१५॥ सूत्रार्थ-तु = किन्तु, अनारब्धकार्ये = जिनका कर्मफल भोग रूपी कार्य प्रारम्भ नहीं हुआ है, ऐसे, पूर्वे = पूर्व में किये गये पुण्य एवं पाप, एव = ही विनष्ट होते हैं, तदवधे: = (क्योंकि) श्रुति में वर्णन है कि प्रारब्ध कर्म रहने तक ही शरीर की अवधि निर्धारित होती है। व्याख्या- श्रुति में (ज्ञान हो जाने पर) कर्मों के विनष्ट हो जाने का तथ्य वर्णित है, वह मात्र उन पाप-पुण्य रूप कर्मों के लिए है, जिनका भोगना अभी प्रारम्भ नहीं हुआ है अथवा जो अभी संचित अवस्था में हैं तथा
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 223
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० १ सूत्र १८ २२५ फल देने के लिए प्रस्तुत नहीं हुए हैं। चूँकि प्रारब्ध भोगने के लिए ही शरीर मिलता है, अतः वे भोग लेने पर ही शरीर का पात होता है। जब प्रारब्ध समाप्त हो जाते हैं, तभी साधक ईश्वर प्राप्ति कर मुक्तावस्था प्राप्त करता है। छान्दोग्य श्रुति में यह तथ्य इन शब्दों में वर्णित है- तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथसंपत्स्य इति (छा.उ.६/१४/२) अर्थात् उसके लिए तभी तक देर है, जब तक प्रारब्ध विनष्ट होकर देहपात नहीं हो जाता। तत्पश्चात् वह परमात्मा में लीन हो जाता है। इस प्रकार श्रुतियों में प्रारब्ध क्षय हो जाने तक शरीर की स्थिति निर्दिष्ट हुई है॥१५ । अब शिष्य जिज्ञासा करता है कि यदि पूर्ण ज्ञानी हो जाने पर साधक का कर्मों से सम्बन्ध नहीं रहता, तो श्रुतियों में जो जीवन भर अग्निहोत्र आदि कर्म करने का विधान है, वह क्यों है? आचार्य इसी का समाधान करते हुए कहते हैं- (४९४) अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्॥१६ ॥। सूत्रार्थ-अग्निहोत्रादि = अग्निहोत्र (यज्ञ) आदि विहित कर्म, तु = तो, तत्कार्याय = उन-विहित कर्मों की रक्षा हेतु, एव = ही है, तद्दर्शनात् = श्रुति-स्मृति में ऐसा देखा गया है। व्याख्या-अग्निहोत्रादि जैसे कार्य तो नित्य कर्म हैं, इन्हें तो आजीवन करने के लिए इनका विधान दर्शन आदि ग्रन्थों में किया गया है और इसका उद्देश्य उन कर्मों की रक्षा है। अस्तु, उचित है कि जन सामान्य कर्मों का त्याग न करे, अपितु श्रद्धापूर्वक अपने कर्मों में निरत रहे। ब्रह्मसूत्र ३/४/३२ में निर्दिष्ट इस तथ्य का वर्णन गीता. ३/२२-२४ में भी है, जिसमें भगवान् कृष्ण ने कहा है कि मेरे लिए कोई कर्म शेष नहीं है, तो भी मैं लोक संग्रह के लिए श्रेष्ठ कर्म करता हूँ, ताकि लोग उसका अनुकरण करके सत्कर्म-निरत हों। (न मे पार्थास्ति कर्तव्यं ..... उपहन्यामिमा: प्रजाः)। अतः जन सामान्य को सत्कर्मों का परित्याग नहीं करना चाहिए॥१६। अब शिष्य जिज्ञासा करता है कि यज्ञादि विहित नित्य कर्मों के अतिरिक्त क्या अन्य उससे जुड़े कर्म करने चाहिए या नहीं, इसका समाधान करते हुए आचार्य कहते हैं- (४९५ ) अतोऽन्यापि ह्येकेषामुभयो: ॥१७॥ सूत्रार्थ- अतः = इन कर्मों से, अन्यापि = अतिरिक्त अन्य कर्म भी, उभयो: = दोनों (ज्ञानी और साधक) के लिए, हि = ही, एकेषाम् = एक शाखा वालों के विचार से उचित है। व्याख्या- यज्ञादि कर्म तो विद्या के सहायक ही हैं, तथापि इनसे भिन्न अन्य श्रेष्ठ कर्म भी हैं, जिन्हें सम्पन्न करना एक शाखा विशेष के लोग ब्रह्मज्ञानी और साधक दोनों के लिए आवश्यक मानते हैं। श्रुति (ईशावास्योपनिषद् २ एवं ११) में वर्णन है कि आजीवन शास्त्र विहित कर्मों को सम्पन्न करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करना चाहिए। इसी प्रकार कर्म और ज्ञान दोनों मार्गों का अवलम्बन लेकर कर्म द्वारा मृत्यु से पार होकर और ज्ञान द्वारा अमृतत्व को प्राप्त करने का वर्णन भी है। अस्तु, कर्त्तापन के अहंकार और कर्म के प्रति आसक्ति से रहित होकर निर्लिप्त भाव से सभी श्रेष्ठ कर्मों में निरत रहना चाहिए ।।१७।। अब शिष्य की इस जिज्ञासा पर कि क्या विद्या एवं कर्म के समुच्चय का भी श्रुति में विधान है, आचार्य कहते हैं- (४९६) यदेव विद्ययेति हि ॥१८॥ सूत्रार्थ- यत् = जो, एव = भी (कर्म), विद्यया = विद्या (ज्ञान) सहित सम्पन्न किया जाता है, इति=वह सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा श्रुति कथन होने से, हि = निश्चित रूप से विद्या और कर्म का समुच्चय हो सकता है। व्याख्या-छान्दोग्य श्रुति (१/१/१०) में उल्लेख है कि जो कर्म ज्ञान और श्रद्धा से युक्त होकर किया जाता है, वह अपेक्षाकृत अधिक बलशाली होता है। इससे यह स्पष्ट है कि ज्ञान के अभाव में कर्म महत्त्वहीन है,
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 224
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२२६ वदान्त दशन जबकि ज्ञान के साथ किये जाने वाले कर्म शक्तिशाली होने के कारण श्रेष्ठ हैं ।१८। अब शिष्य यह जिज्ञासा करता है कि ज्ञानी के प्रारब्ध किस प्रकार विनष्ट होते हैं, आचार्य समाधान करते हैं- (४९७) भोगेन त्वितरे क्षपयित्वा सम्पद्यते ॥१९॥ सूत्रार्थ- इतरे = अन्य कर्मों (क्रियमाण और संचित के अतिरिक्त प्रारब्ध कर्मों) को, तु = तो, भोगेन = भोग के द्वारा, क्षपयित्वा = क्षीण (नष्ट) करके, सम्पद्यते = (वह ज्ञानी) परमात्मा या मोक्ष पद को प्राप्त करता है व्याख्या- विगत सूत्रों में वर्णन किया जा चुका है कि ज्ञानी के संचित कर्म तो भस्मसात् हो जाते हैं एवं क्रियमाण कर्मों से उसका सम्बन्ध ही नहीं रहता; किन्तु जिन कर्मों ने प्रारब्ध बनकर फल देना प्रारम्भ कर दिया है, उन्हें तो भोगना ही पड़ता है। अतः प्रारब्ध कर्मों को भोग के द्वारा विनष्ट करके साधक (ज्ञानी साधक) परमपद अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है। दूसरे शब्दों में वह ईश्वर को प्राप्त हो जाता है॥१९॥
। इति चतुर्थाध्यायस्य प्रथम: पादः समाप्तः॥
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 225
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
।। अथ चतुर्थाध्याये द्वितीयः पादः॥ इस अध्याय के प्रथम पाद में उपासना सम्बन्धी निर्णय करके यह बताया गया है कि ब्रह्मज्ञानियों की क्या गति होती है, उन्हें परमात्म-प्राप्ति किस प्रकार होती है। अब इस पाद में यह उपन्यस्त करने जा रहे हैं कि ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं, तब उनकी क्या गति होती है। सामान्य व्यक्तियों तथा ब्रह्मज्ञानियों की गति में क्या समानताएँ व अन्तर हैं। इसे ही स्पष्ट करने के लिए पहले सामान्य व्यक्तियों की साधारण गति निरूपित करने हेतु यह प्रथम सूत्र प्रस्तुत है- ( ४९८) वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च॥१॥ सूत्रार्थ-वाक् = वाणी, मनसि = मन में स्थित हो जाती है, दर्शनात् = प्रत्यक्ष दर्शन करने से, च = और, शब्दात् = श्रुति शब्दों या वेद वाणी से यही बात सिद्ध होती है। व्याख्या- श्रुति (छा.उ.६/८/६) में वर्णन आया है कि जब यह शरीर मृत्यु को प्राप्त होने वाला होता है, तब उस मरणासन्न अवस्था में वाणी मन में समाविष्ट हो जाती है, मन प्राण में स्थित हो जाता है, प्राण तेज में तथा (मरने के बाद) तेज पर-देवता में स्थित हो जाता है अर्थात् तेज ब्रह्म में लीन हो जाता है- अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाड्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् । प्रत्यक्ष में भी देखा जाता है कि बहुधा मरते समय मन के रहते भी वाणी का कार्य बन्द हो जाता है अर्थात् बोलने की शक्ति जाती रहती है ॥१।। उपर्युक्त प्रसंग पर शिष्य यह जिज्ञासा करता है कि वाणी के मन में तथा मन के प्राण में समाविष्ट होने की बात तो कही गई है, पर अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा गया, उनके सम्बन्ध में क्या है? इसी का समाधान आचार्य अगले सूत्र में कर रहे हैं- (४९९ ) अत एव च सर्वाण्यनु ।।२।। सूत्रार्थ- अतएव = इसी प्रकार, च = यह भी समझना चाहिए कि, अनु = इसके (वाणी के) साथ ही सर्वाणि = सभी इन्द्रियाँ मन में लीन हो जाती हैं। व्याख्या- श्रुति में निर्दिष्ट है कि मरणोपरान्त मन में स्थित इन्द्रियों के सहित जीव पुनर्जन्म धारण करता है- तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि संपद्यमानैः (प्रश्नो. ३/९)। तात्पर्य यह है कि श्रुति में वर्णित इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि मन में केवल वाणी ही नहीं, अन्य सभी इन्द्रियाँ भी समाविष्ट हो जाती हैं, तभी तो सभी इन्द्रियों सहित जीवात्मा पुनर्जन्म धारण करता है। मरण काल में वाक् इन्द्रिय के अतिरिक्त अन्य इन्द्रियों के कार्यों का अवरुद्ध हो जाना भी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वाक् के साथ- साथ अन्य इन्द्रियाँ भी मन में लीन हो जाती हैं। अतः यह सिद्ध हो जाता है कि श्रुति में केवल वाक् का ही नहीं, वरन् समस्त इन्द्रियों का विलीन होना वर्णित है और तथ्यतः भी ऐसा ही है ॥२॥ अब शिष्य की जिज्ञासा पर आचार्य यह बताते हैं कि उससे आगे क्या होता है- (५००) तन्मनः प्राण उत्तरात् ॥३॥ सूत्रार्थ-उत्तरात् - उसके पश्चात् के कथन से, तत् मनः = वह इन्द्रिय समाहित मन, प्राणे = प्राण में स्थित हो जाता है। व्याख्या- सूत्र क्रमांक १ की व्याख्या में वर्णित श्रुति (छा.उ. ६/८/६) में (मनः प्राणे इत्यादि से) मन की
Disclaimer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 226
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२२८ वदान्त दशन स्थिति के विषय में स्पष्ट है कि मन भी (इन्द्रियों के साथ) प्राण में लीन हो जाता है। तत्पश्चात् क्या होता है, यह बताते हुए आचार्य कहते हैं- (५०१) सोऽ्ध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः॥४।। सूत्रार्थ- तदुपगमादिभ्यः = उस (जीव के) उपगम आदि (गमन आदि) के वर्णन से स्पष्ट होता है कि, सः = वह (प्राण, मन इन्द्रियादि सहित), अध्यक्षे = अपने अध्यक्ष (स्वामी) जीवात्मा में अवस्थित हो जाता है। व्याख्या- श्रुति में निर्दिष्ट जीवात्मा के उपगम (गमनादि) प्रकरण से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि मरने के समय वह प्राण, मन और इन्द्रियों सहित अपने स्वामी जीवात्मा में स्थित होकर बहिर्गमन कर जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद् ४/४/२ में उल्लेख है- 'एकी भवति न पश्यतीत्याहुरेकी भवति ......... प्राणोऽनूत्क्रामति ........ समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च' अर्थात् (मरणकाल में) शरीरस्थ प्राण जीवात्मा में समाहित एकीकृत हो जाने पर जीव देखना बन्द कर देता है। इसी प्रकार घ्राण, वाक्, रसना, कर्ण, त्वचा, मन और बुद्धि स्थित चेतना उस जीवात्मा से एकीकृत हो बहिर्गमन कर जाती है। वह प्राण शरीर के नेत्र, मस्तिष्क (ब्रह्मरन्ध्र) अथवा शरीर के अन्य किसी भाग से निकलता है। बृह.उप. ४/३/३८ में भी इसी प्रकार का वर्णन है, जिससे सिद्ध होता है कि प्राण-मन, इन्द्रियादि सहित जीवात्मा में समाहित होता है॥।४॥ इसके बाद क्या होता है, इस जिज्ञासा का समाधान आचार्य अगले सूत्र में कर रहे हैं- (५०२) भूतेषु तच्छ्रते: ॥५॥ सूत्रार्थ- तच्छुते: = इससे सम्बन्धित श्रुति प्रमाण से, भूतेषु = प्राण और मन- इन्द्रियों के सहित जीव भूतों (पंचभूतों) में स्थित हो जाता है। व्याख्या- श्रुति में वर्णित है कि जीवात्मा- पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और तेजोमय है- स वा अयमात्मा ....... पृथिवीमय आपोमयो वायुमय ........ (बृह.उप. ४/४/५)। इससे भी यह सिद्ध है कि प्राणादि सहित शरीर से बहिर्गमन करने के बाद यह जीव पंचभूतों में स्थित हो जाता है।।५॥ यहाँ शिष्य यह जिज्ञासा करता है कि पूर्वश्रुति में प्राण का केवल तेज में ही स्थित होना कहा गया है, तो यदि प्राण का समस्त भूतों में स्थित होना न स्वीकार कर मात्र प्राण में ही स्थित होना स्वीकार कर लिया जाये? आचार्य इसी का समाधान अगले सूत्र में कर रहे हैं- (५०३) नैकस्मिन्दर्शयतो हि॥६॥ सूत्रार्थ- एकस्मिन् - केवल तेजस् तत्त्व में ही (प्राण का) स्थित होना, न = नहीं माना जा सकता, हि क्योंकि, दर्शयतः = श्रुति-स्मृति आदि ग्रन्थ जीवात्मा का पंचभूत में स्थित होना ही दिखलाते हैं। व्याख्या-छान्दोग्य. श्रुति ६/८/६ में वर्णित ' ........... प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम्' से मृत्यूपरान्त प्राण का तेज में अवस्थित होना निर्दिष्ट है, इससे शिष्य की यह शंका है कि प्राण को तेज में स्थित ही क्यों न मान लिया जाये। इसका समाधान यह है कि प्राण के तेज में स्थित हो जाने सम्बन्धी वर्णन तो सांकेतिक हैं, वस्तुतः वह समस्त भूतों में ही स्थित होता है। पूर्व सूत्र (३/१/२) में इसका निर्णय कर दिया गया है। यह शरीर तो पंचभौतिक है, किन्तु जहाँ जिस तत्त्व की प्रधानता होती है, वहाँ मात्र उसी का कथन कर दिया जाता है। जैसे वीर्य में सभी तत्त्व समाहित रहते हैं, पर उसमें जल की अधिकता होने से वही कह दिया जाता है। बृह.उप. ४/४/५ में जीव को पृथ्वीमय, आपोमय, वायुमय आदि कहे जाने से यही सिद्ध होता है कि यह मात्र तेजस्तत्त्व में समाहित नहीं होता, वरन् पंचभूतों में सूक्ष्मतः स्थित होता है॥६॥ उपर्युक्त शंका का समाधान हो जाने के पश्चात् शिष्य यह जिज्ञासा करता है कि मृत्युकाल की गति का यह
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 227
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० २ सूत्र ९ २२९ वर्णन सामान्य पुरुषों से सम्बन्धित है अथवा ब्रह्मज्ञानी तत्त्ववेत्ताओं से सम्बन्धित है? इसका यहाँ आचार्य निराकरण करते हैं- (५०४) समाना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य।७।। सूत्रार्थ- आसृत्युपक्रमात् = गमन से उपक्रम तक अर्थात् देवयान मार्ग द्वारा ब्रह्मलोक में गमन का क्रम प्रारम्भ होने तक, समाना = दोनों (सामान्य जन और ब्रह्मज्ञानी) की गति समान, च = ही है, च = क्योंकि, अनुपोष्य = सूक्ष्म शरीर को अनुपोषित (सुरक्षित) रखकर ही, अमृतत्वम् = ब्रह्मलोक में अमृतत्व(मोक्ष) लाभ प्राप्त होना (ब्रह्मविद्या का फल) कहा गया है। व्याख्या- मोक्ष के योग्य ज्ञानीजनों एवं सामान्यजनों-दोनों को ही शरीर त्याग कर सूक्ष्म शरीर में जाने तक की मरणोत्तर गति एक जैसी ही है। कारण यह है कि ब्रह्मलोक में जाने और अन्यलोकों व अन्य शरीरों में जाने के लिए सूक्ष्म शरीर की आवश्यकता होती है। अतः स्थूल शरीर में से निकलकर सूक्ष्म शरीर में जाने तक दोनों की गति समान रहती है। इस प्रकार उपर्युक्त स्थिति तक सूक्ष्म शरीर का सुरक्षित रहना आवश्यक होता है, क्योंकि उसी से अमृतत्व (मोक्ष) की प्राप्ति व अन्य लोकों में गमन एवं पुनर्जन्म सम्भव है।।।। अब शिष्य जिज्ञासा करता है कि पूर्व (प्रथम सूत्र की व्याख्या) में जो यह कहा है कि वह तेज-जीवात्मा, मन, इन्द्रियों के सहित पर-देवता में स्थित हो जाता है, तो यह सभी की जीवात्माओं के लिए कैसे सम्भव है, क्योंकि यह सामान्य मनुष्यों की मरणोत्तर गति का प्रसङ्ग है। सभी प्रकार की जीवात्माएँ परदेवता अर्थात् परमात्मा को प्राप्त हो जाएँ, यह असम्भव है, अतः स्पष्ट करें। आचार्य इसी का समाधान करते हुए कहते हैं- (५०५) तदाऽपीतेः संसारव्यपदेशात्॥८॥ सूत्रार्थ-संसारव्यपदेशात् सामान्य जीवों का मृत्यु के पश्चात् बारम्बार जन्म धारण करने का कथन होने से, तत् = उनका वह (सूक्ष्म) शरीर, अपीतेः = मुक्तावस्था या ब्रह्म प्रापति तक रहता है (अतः नया शरीर मिलने तक परमात्मा में अवस्थित रहना प्रलयकाल जैसा है)। व्याख्या- विगत प्रकरण (सूत्र क्रमांक १) में एक शरीर की मृत्यु के पश्चात् दूसरे शरीर में जाने वाले जीवात्मा का परदेवता में स्थित होना वर्णित है, वह वस्तुतः उस प्रकार का है, जैसे- प्रलयकाल में कर्म संस्कार और सूक्ष्म शरीर सहित जीव अज्ञानतापूर्वक परमात्मा में स्थित रहता है; किन्तु इस स्थिति को परमात्मा की प्राप्ति नहीं कह सकते। यह स्थिति तब तक बनी रहती है, जब तक जीवात्मा को उसके कर्मफल भोग के लिए उपयुक्त शरीर नहीं मिल जाता। श्रुति में भी यह तथ्य- निर्दिष्ट है। 'योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिन: 'इत्यादि श्रुति वचन (कठो. २/२/७) से जीवात्मा के पुनर्जन्म की पुष्टि होती है। तात्पर्य यह है कि जब तक जीवात्मा को दूसरा शरीर नहीं मिलता अथवा जब तक उसे मोक्ष नहीं मिलता, तब तक उसका सूक्ष्म शरीर से सम्बन्ध बना रहता है।८ ।। विगत सूत्रों में मरणोपरान्त जीवात्मा का जिन भूतों में स्थित होना कहा गया है, वे वस्तुतः सूक्ष्मभूत हैं, पर वहाँ स्पष्ट नहीं है, अतः यहाँ इसे स्पष्ट करते हैं- (५०६ ) सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धे:।।९॥ सूत्रार्थ- प्रमाणतः = श्रुति प्रमाण से, च = तथा, तथोपलब्धे: = उस प्रकार की उपलब्धि होने से भी यही सिद्ध होता है कि, सूक्ष्मम् = भूत समुदाय सूक्ष्म है। व्याख्या-विगत सूत्रों में मरणकाल व इसके उपरान्त पृथ्वी, आकाश, जल, तेज और वायु नामक भूतों में जीवात्मा का स्थित होना कहा गया है, पर वास्तव में वे सूक्ष्मभूत हैं, स्थूल नहीं। श्रुति प्रमाण से भी यही तथ्य सिद्ध होता है। श्रुति में जीवात्मा के परलोक गमन के प्रकरण में उल्लेख है कि जीवात्मा के हृदय में एक सौ
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 228
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२३० वदान्त दशन एक नाड़ियाँ हैं। जिनमें से एक (सुषुम्ना) के द्वारा निकलने वाले जीवात्मा को अमृतत्व प्राप्त होने का तथ्य निर्दिष्ट है (शतं चैका च हृदयस्य ...... ..... उत्क्रमणे भवन्ति (कठो. २/३/१६) अन्य नाड़ियों में से निकलने वाला प्राण (जीवात्मा) कामनाओं के अनुसार जन्म धारण करता है। उपर्युक्त प्रसङ्ग में जो नाड़ियों द्वारा जीवात्मा के निकलने की बात है, वह सूक्ष्म भूतों द्वारा ही सम्भव है, स्थूल भूतों द्वारा नहीं। दूसरी बात यह है कि मरणासन्न व्यक्ति के प्राण निकलते हुए किसी को दिखते भी नहीं। इससे भी उन भूतों के सूक्ष्म होने की पुष्टि होती है। अस्तु, श्रुति व प्रत्यक्ष दोनों ही प्रमाणों से जीवात्मा का सूक्ष्म भूतों में ही स्थित होना सिद्ध होता है।।९॥ उसी बात को अब अन्य प्रकार से स्पष्ट करते हैं- (५०७) नोपमर्देनातः॥१०॥ सूत्रार्थ- अतः = ये पंचभूत सूक्ष्म होते हैं, इसी कारण, उपमर्देन = इस शरीर के उत्पीड़न (दाह क्रिया, तोड़ने, डुबोने आदि) से, न = (सूक्ष्म शरीर) विनष्ट नहीं होता। व्याख्या- मरणकाल में जीवात्मा जिन भूतों में स्थित होता है, वे सूक्ष्म हैं। इसी कारण तो (मरणोपरान्त) इस स्थूल शरीर को जलाने, डुबोने आदि से सूक्ष्म शरीर का कुछ भी नुकसान नहीं होता और न ही कोई कष्ट होता है। सूक्ष्म शरीर में स्थित होकर जीवात्मा इस स्थूल शरीर का परित्याग कर देता है। इससे स्पष्ट है कि मरणकाल में जीवात्मा जिन आकाशादि पंचभूतों में स्थित होता है, वे सूक्ष्म ही हैं, स्थूल नहीं ॥१०॥ अब इसी कथन की पुष्टि करते हुए आगे कहते हैं- (५०८) अस्यैव चोपपत्तेरेष ऊष्मा ॥११॥ सूत्रार्थ- एषः = यह, ऊष्मा = गर्मी (जो जीवित शरीर में होती है), अस्य = इसी सूक्ष्म शरीर की, एव = ही है, च = और, उपपत्ते: = युक्ति से भी (यही सिद्ध होता है; क्योंकि सूक्ष्म शरीर के बहिर्गमन कर जाने पर स्थूल शरीर शीतल हो जाता है)। व्याख्या- जब जीवात्मा सूक्ष्म शरीर के साथ स्थूल शरीर से बहिर्गमन कर जाती है, तब स्थूल शरीर में गर्मी नहीं रहती। यद्यपि वह ज्यों का त्यों दिखता रहता है, तथापि वह शीतल हो जाता है। इस युक्ति से इस बात को भली-भाँति समझा जा सकता है कि जीवित शरीर में जो गर्मी होती है, वह सूक्ष्म शरीर की ही होती है। इसी कारण सूक्ष्म शरीर के निकल जाने पर शरीर में गर्मी नहीं रहती और शरीर ठंडा हो जाता है॥।११ ।। अब शिष्य जिज्ञासा करता है कि ऐसे महापुरुष जिनके सभी संकल्प, सभी कामनाएँ, सभी वासनाएँ समाप्त हो चुकी हैं, जिन्हें इसी जीवन में ब्रह्म की प्राप्ति हो चुकी है, उनकी मरणोत्तर गति क्या होती है, क्योंकि श्रुति में ऐसे पुरुषों के गमन का निषेध निर्दिष्ट है। आचार्य समाधान करते हैं- (५०९ ) प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात्॥१२॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि कहो कि, प्रतिषेधात् = प्राण के उत्क्रमण का निषेध होने से (उसका गमन नहीं होता), इति न = तो यह कहना उचित नहीं है, शारीरात्, = क्योंकि, उस निषेध वचन से जीवात्मा से प्राणों के पृथक् होने का प्रतिषेध किया गया है। व्याख्या- श्रुति (बृह.उप. ४/४/६) उद्धरण पूर्वक शिष्य अपना पक्ष रखता है कि जो पुरुष कामना रहित, वासना रहित एवं जीवन्मुक्त हो जाते हैं, ऐसे पुरुषों के प्राण उत्क्रमण नहीं करते। उपर्युक्त श्रुति में पूर्णकामी महापुरुष की गति का अभाव निर्दिष्ट होने से यही सिद्ध होता है कि वे ब्रह्मलोक में भी नहीं जाते, फिर उनकी मरणोत्तर गति क्या होती है? इसका निराकरण करते हुए आचार्य उस श्रुति का आशय स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि आपका (शिष्य का) यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि उस श्रुति में जीवात्मा का प्राण से पृथक् होने
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 229
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० २ सूत्र १५ २३१ का निषेध निर्दिष्ट है, न कि शरीर से प्राण के उत्क्रमण का निषेध। अस्तु, उपर्युक्त श्रुति प्रसङ्ग से गमन का निषेध पुष्ट नहीं होता, वरन् जीवात्मा के प्राणों सहित ब्रह्मलोक में गमन की पुष्टि होती है॥१२॥ अब शिष्य अपना पक्ष पुनः रखते हुए कहता है- (५१०) स्पष्टो ह्येकेषाम्॥१३॥ सूत्रार्थ- एकेषाम् = एक शाखा वालों की श्रुति में, स्पष्टः = स्पष्ट रूप से शरीर से प्राणों के निष्क्रमण न करने की बात कही है, हि = इसलिए (सिद्ध होता है कि उसका गमन नहीं होता)। व्याख्या- अन्य शाखा के उपनिषदों (नृसिंह.उप. ५ तथा बृह.उप. ४/४/७) में स्पष्ट उल्लेख है कि आप्तकाम महापुरुष के प्राण उत्क्रमण नहीं करते। वे (प्राण) वहीं ब्रह्म में विलय हो जाते हैं और वह (जीवात्मा) ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार 'वह यहीं ब्रह्म की प्राप्ति कर लेता है' आदि। बृहदारण्यकोपनिषद् में अन्यत्र यह उल्लेख है कि याज्ञवल्क्य से इस प्रश्न का, कि मरने वाले (मोक्षाधिकारी) के प्राण पृथक् होते हैं कि नहीं, यह उत्तर मिला कि 'नहीं'। इसका अभिप्राय यही निकलता है कि मोक्षाधिकारी के प्राण उत्क्रमण का विधान नहीं है। वह इसी जगत् में ब्रह्म की प्राप्ति कर लेता है। अस्तु, जीवन्मुक्त महापुरुष के गमन का निषेध सिद्ध होता है॥१३॥ अब स्मृति के प्रमाण से भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं- (५११) स्मर्यते च ॥१४॥ सूत्रार्थ- च = तथा, स्मर्यते = स्मृति से भी (इसी तथ्य की पुष्टि होती है)। व्याख्या-अनेक स्मृति प्रमाणों से भी यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मज्ञानी को इसी जीवन में ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव है। प्रस्थानत्रयी के स्मृतिग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता में अनेकशः इस तथ्य का उल्लेख हुआ है। जैसे- जो मोह को नष्ट कर चुके हैं, जो न प्रिय को पाकर हर्षित होते हैं और न अप्रिय को पाकर उद्विग्न ही होते हैं, ऐसे ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म में ही स्थित होते हैं, इसी प्रकार सर्वभूतहितरत तथा नष्टपाप, संशयहीन पुरुष, जितेन्द्रिय महापुरुष शान्त ब्रह्म को प्राप्त हैं आदि (गी. ५/२०,२६)। स्मृति में स्थान-स्थान पर महापुरुषों द्वारा जीवनकाल में ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेने का तथ्य उपन्यस्त है। गमन के प्रकरण में भी शरीर से सूक्ष्म तत्त्वों सहित प्रस्थान का वर्णन है(गी. १५/७-८)। इससे यही सिद्ध होता है कि ब्रह्म को प्राप्त पुरुषों का किसी परलोक में गमन नहीं होता। वे सदा ब्रह्ममय ही रहते हैं॥१४॥ अब शिष्य जिज्ञासा करता है कि जो परमात्मा को प्राप्त हैं, उनका यदि परलोक में गमन नहीं होता, तब शरीर विनष्ट होने के समय वे कहाँ निवास करते हैं? आचार्य अगले सूत्र में समाधान कर रहे हैं- (५१२ ) तानि परे तथा ह्याह॥१५॥ सूत्रार्थ-तानि = वे सब (प्राण, पाँच सूक्ष्मभूत, अन्तःकरण एवं इन्द्रियाँ आदि), परे = परब्रह्म में (विलीन हो जाते हैं), हि = क्योंकि, तथा = ऐसा, आह = कहा गया है(श्रुति में निर्दिष्ट है)। व्याख्या-जिस महापुरुष ने जीवनकाल में ही परब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, वह सदा परमात्मा में ही स्थित रहता है, उससे कभी पृथक् होता ही नहीं। तथापि लौकिक दृष्टि से शरीर में रहते हुए सभी कार्य करता है, किन्तु जब उसका प्रारब्ध पूरा हो जाता है, तब शरीर मरण को प्राप्त हो जाता है। मृत्यु के समय वह (जीवात्मा) समस्त कलाओं, इन्द्रियों और अन्तःकरण सहित परब्रह्म में विलीन हो जाता है। मुण्डक. ३/२/ ७ में उल्लेख है कि शरीरपात के समय कलाएँ, मन एवं इन्द्रियों के देवता- अपने-अपने अधिष्ठातृ देवता में समा जाते हैं, उनसे जीवन्मुक्त का कोई सम्बन्ध नहीं रहता। तत्पश्चात् विज्ञानमय जीव अपने समस्त कर्मों और इन्द्रियों के अभिमानी देवताओं सहित परब्रह्म में ही समाहित हो जाता है॥१५।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 230
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२३ वेदान्त दर्शन अब शिष्य की इस जिज्ञासा पर कि शरीर सम्बन्धी विभिन्न तत्त्वों सहित ब्रह्मज्ञानी महापुरुष ब्रह्म में किस प्रकार स्थित होता है, आचार्य कहते हैं- (५१३) अविभागो वचनात्॥१६ ॥ सूत्रार्थ- वचनात् = श्रुति वचन से भी (यही सिद्ध होता है कि), अविभाग: = (परमात्मा में स्थित होने पर महापुरुषों के शरीर सम्बन्धी तत्त्वों का) विभाग नहीं रहता। व्याख्या- श्रुति वचन में यह तथ्य निर्दिष्ट है कि महापुरुष शरीर के मरणोपरान्त परम दिव्य पुरुष परमात्मा में शरीर संबंधी समस्त तत्त्वों सहित, विभाग रहित होकर उसी प्रकार विलीन हो जाते हैं जिस प्रकार प्रवहमान नदियाँ अपना नाम रूप त्यागकर समुद्र में मिल जातीं और समुद्र रूप हो जाती हैं। प्रश्नोपनिषद् ६/५ में इससे सम्बन्धित मंत्र इस प्रकार है- स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते। एवमेवास्य ....... पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति ...... तदेषश्लोकः। इसी प्रकार मुण्डक उपनिषद् ३/२/८ (यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। ....... पुरुषमुपैति दिव्यम्।) में भी यही तथ्य उपन्यस्त है। अतः यही सिद्ध होता है कि महापुरुष मृत्यूपरान्त विभाग रहित होकर परमात्मा में एकाकार हो जाते हैं॥१६ । विगत सूत्र में उन महापुरुषों की गति का वर्णन किया गया, जिन्हें इसी जीवन में ब्रह्म साक्षात्कार हो जाता है और वे शरीरपात के पश्चात् यहीं ब्रह्म में लीन हो जाते हैं, अब पुनः ब्रह्मलोक में जाने वाले महापुरुषों की गति पर विचार करते हैं- (५१४) तदोकोऽग्रज्चलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ॥१७।। सूत्रार्थ- तदोकोऽग्रज्वलनम् = उस जीव का (मरण काल में) हृदय का अग्रभाग प्रकाशित हो जाता है, तत्प्रकाशितद्वार: = उस प्रकाश से जिसका निर्गमद्वार प्रकाशित हो गया है, ऐसा वह ब्रह्मज्ञानी, विद्या सामर्थ्यात् = ब्रह्म विद्या की सामर्थ्य से, च = तथा, तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगात् = उस विद्या का अवशिष्ट अंग जिसे ब्रह्मलोक में जाना है, उस गमन विषयक संस्कार की स्मृति के योग द्वारा, हार्दानुगृहीतः = हृदय स्थित परमेश्वर के अनुग्रह से अनुगृहीत हुआ, शताधिकया = सौ नाड़ियों से अधिक अर्थात् एक सौ एकवीं नाड़ी (सुषुम्रा) के द्वारा (ब्रह्मरन्ध्र से) गमन करता है। व्याख्या- बृहदारण्यक श्रुति ४/४/२ (एकी भवति न पश्यतीत्याहु .......... पूर्व प्रज्ञा च) में वर्णन है कि मरणासन्न मनुष्य की इन्द्रियाँ, प्राण और अन्तःकरण लिङ्ग शरीर में एकीकृत हो जाने पर हृदय के अग्रभाग में एक प्रकाश उत्पन्न होता है। उस प्रकाश से जीवात्मा के निर्गम द्वार के प्रकाशित होने तथा उसमें से ब्रह्मलोक गमन का तथ्य भी निर्दिष्ट है। उल्लेख है कि स्तर के अनुरूप जीवात्मा के शरीर में से निकलने के मार्ग पृथक् - पृथक् हैं। छान्दोग्य श्रुति ८/६/६ में हृदय में एक सौ एक नाड़ियाँ होने व उनमें से सौ में से होकर जाने वाले जीवात्मा के विभिन्न योनियों में जाकर शरीर धारण करने तथा एक जो ऊपर को जाती है (सुषुम्रा नाड़ी) उसमें से जाने वाले जीवात्मा द्वारा अमृतत्व प्राप्त करने का तथ्य उपन्यस्त है। इन श्रुति वचनों से यह सिद्ध होता है कि वह ब्रह्मज्ञानी महापुरुष हृदयाग्र में प्रकाशित प्रकाश से उज्जवल ब्रह्मरन्ध्र मार्ग से गमन करता है एवं ब्रह्मविद्या की सामर्थ्य के फलस्वरूप ब्रह्मलोक प्राप्ति के संस्कार के स्मरण से सम्पन्न होकर हृदय में विद्यमान परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से अनुगृहीत हुआ (सूर्य की किरणों में) गमन कर जाता है॥१७।
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 231
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० २ सूत्र २० २३३ तत्पश्चात् क्या होता है? इस जिज्ञासा के समाधान हेतु आगे कहते हैं- (५१५) रश्म्यनुसारी॥१८।। सूत्रार्थ- रश्म्यनुसारी = सूर्य रश्मियों (में स्थित होकर उन) का अवलम्बन लेकर (विद्वान् पुरुष) गमन कर जाता है (अर्थात् सूर्य लोक के द्वार से ब्रह्मलोक में पहुँच जाता है)। व्याख्या- विद्वान् पुरुष की जीवात्मा मूर्धन्यनाड़ी से ऊर्ध्वगमन करके सूर्य रश्मियों (किरणों) में स्थित होकर उनके द्वारा ऊपर को चढ़ता हुआ मन की गति से पहले सूर्यलोक में जाती है, तत्पश्चात् ब्रह्मलोक में पहुँच जाती है। छान्दोग्य श्रुति ८/६/५ के अनुसार ब्रह्मलोक जाने का यह सूर्य लोक का द्वार मात्र विद्वानों (ब्रह्मज्ञानियों) के लिए खुलता है; जबकि अज्ञानियों के लिए यह द्वार बन्द रहता है और वे अधोगति को प्राप्त होते अर्थात् निम्न लोकों में जाते हैं ॥१८॥ अब शिष्य के यह प्रश्न करने पर कि यदि विद्वान् के शरीर का पात रात्रि में होता है, तब उसकी क्या गति होती है, क्योंकि रात्रि के समय तो सूर्य की किरणें नहीं रहतीं, आचार्य समाधान करते हैं- (५१६) निशि नेति चेन्न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वाद्दर्शयति च ॥१९॥ सूत्रार्थ- चेत् = यदि यह कहो कि, निशि = रात्रि में, न = सूर्य की किरणें नहीं होतीं (और उनका सम्बन्ध नाड़ियों से नहीं होता होगा), इति न = तो इस प्रकार कहना ठीक नहीं, हि = क्योंकि, सम्बन्धस्य=नाड़ी एवं सूर्य किरणों के सम्बन्ध की, यावद्देहभावित्वात् = शरीर रहने तक, सत्ता बनी रहती है (अर्थात् दिन हो या रात हर समय सूर्य किरणों और नाड़ियों का सम्बन्ध बना रहता है), दर्शयति च = यही बात देखी जाती है या श्रुति भी दिखाती है। व्याख्या- यदि कोई कहे कि विद्वान् व्यक्ति का रात्रि में शरीरपात होने पर तो (रात्रि में सूर्य रश्मियों के न होने से)सूर्य लोक और ब्रह्मलोक में गमन नहीं होता होगा, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुति (छान्दोग्योपनिषद् ८/६/२) में निर्दिष्ट है कि सूर्यलोक से निकलती हुई किरणें मानवदेह की नाड़ियों में भी व्याप्त हैं और वहाँ से निकलती हुई सूर्यलोक तक विस्तृत हैं या यों कहें कि सूर्य रश्मियाँ इस लोक और सूर्यलोक दोनों में निरन्तर गमन करती रहती हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि सूर्य की किरणों का सूर्यलोक और शरीर की नाड़ियों से निरन्तर सम्पर्क बना रहने से किसी भी समय (रात्रि हो या दिन) मृत्यु होने पर ब्रह्मज्ञानी सूर्यलोक और तत्पश्चात् ब्रह्मलोक में चला जाता है। उसके ब्रह्मलोक गमन में दिन या रात्रि की कोई बाधा नहीं है॥१९॥ अब शिष्य जिज्ञासा करता है कि सूर्य के दक्षिणायन होने पर भी क्या विद्वान् ब्रह्मलोक में गमन कर पाता है? आचार्य समाधान करते हैं- (५१७) अतश्चायनेऽ्रपि दक्षिणे॥२०॥ सूत्रार्थ-अतः = इस पूर्व वर्णित कारण से, च = ही, दक्षिणे = दक्षिण, अयने = अयन (गति) में, अपि = भी (विद्वान् व्यक्ति के मृत होने पर ब्रह्मलोक जाने में कोई बाधा नहीं है)। व्याख्या- पूर्व सूत्र में जिस प्रकार सूर्य की रश्मियों का रात्रिकाल में भी नाड़ी समूह से सम्बद्ध रहना निर्दिष्ट है, उसी के अनुसार दक्षिणायन काल में भी सूर्य रश्मियों के उपलब्ध होने में कोई बाधा न होने से विद्वान् सूर्यलोक के मार्ग से ब्रह्मलोक को गमन कर सकता है। अस्तु, यह स्पष्ट है कि दक्षिणायन काल में मृत्यु को प्राप्त होने वाला विद्वान् ब्रह्मविद्या की सामर्थ्य से सूर्यद्वार से ब्रह्मलोक में चला जाता है॥२०॥ अब शिष्य की इस जिज्ञासा पर कि स्मृतिग्रन्थों, गीता आदि में उत्तरायण और दक्षिणायन नामक जो दो काल बताये गये हैं, उनमें उत्तरायण को अपुनरावृत्ति कारक तथा दक्षिणायन को पुनरावृत्ति कारक कहा गया है, फिर यह कैसे
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 232
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२३४ वदान्त दशन मान लिया जाय कि दिन हो या रात्रि, उत्तरायणकाल हो या दक्षिणायनकाल किसी भी स्थिति में ब्रह्मज्ञानी शरीर त्याग करने पर ब्रह्मलोक को ही प्राप्त होता है। इसी के समाधान स्वरूप आचार्य कहते हैं- (५१८) योगिनः प्रति च स्मर्यते स्मार्ते चैते॥२१॥ सूत्रार्थ-च = इसके अतिरिक्त, योगिन: = योगी के, प्रति = लिए, स्मर्यते = स्मृतियों में कहा गया है, च= तथा, एते = ये दोनों गतियाँ (पुनरावृत्ति और अपुनरावृत्ति वाले दोनों मार्ग), स्मार्ते = स्मार्त हैं। व्याख्या- प्रस्थानत्रयी के स्मृति ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता में ८/२३-२६ तक उत्तरायण और दक्षिणायन काल का वर्णन करते हुए इनमें शरीर त्याग करने वालों को देवयान और पितृयान मार्गों द्वारा देवलोक और पितृलोक में जाने का उल्लेख किया गया है। भीष्म पितामह के भी दक्षिणायन काल में शरशय्यासीन होने की स्थिति में मृत्यु का वरण करने के लिए योगबल पर उत्तरायणकाल की प्रतीक्षा का उल्लेख महाभारत में है। वास्तव में ये दोनों गतियाँ योगियों के लिए स्मृतियों में वर्णित हैं; परन्तु ब्रह्मज्ञान का माहात्म्य तो अपार है, उसके द्वारा साधक को ब्रह्मलोक में जाने के लिए उत्तरायण काल या दक्षिणायन काल की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती अथवा यों कहें कि ये काल ब्रह्मज्ञानी साधक के ब्रह्मलोक जाने के मार्ग में कोई बाधा उपस्थित नहीं कर सकते। भीष्म पितामह का उदाहरण तो उनके लिए माना जाना चाहिए, जो उत्तरायण-दक्षिणायन जैसे काल विशेष को महत्त्वपूर्ण मानते हैं अथवा भीष्म पितामह आदि महापुरुषों के उत्तरायण की प्रतीक्षा का यह अभिप्राय भी हो सकता है की भीष्म अष्ट वसुओं में से एक थे। चूँकि उन्हें देवलोक में पहुँचना था और दक्षिणायन के समय देवलोक में रात्रि रहने के कारण उत्तरायण काल में ही जाना उन्हें अभीष्ट था। अतः योगबल से उन्होंने वह काल आने की प्रतीक्षा की थी। इन काल विशेषों में गमन का वर्णन स्मृतियों में होने से यह प्रतिपादन स्मार्तों के लिए है, जो श्रुति मार्ग से भिन्न है।।२१।।
॥। इति चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्तः ॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 233
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
॥ अथ चतुर्थाध्याये तृतीयः पादः॥ द्वितीय पाद में सूत्रकार ने स्पष्ट किया कि ब्रह्मलोक गमन हेतु मार्ग के शुरू होने से पूर्व तक की गति (वाणी का मन में विलीन होना इत्यादि) ज्ञानी एवं अज्ञानी दोनों के लिए एक जैसी ही है। अज्ञानी अपने कर्म के अनुसार पुनः नवीन देह ग्रहण करता है और ज्ञानीजन ज्ञान से विभूषित मोक्ष-नाड़ी-द्वार का आश्रय प्राप्त कर सूर्य-रश्मियों के सहयोग से सूर्यलोक में होते हुए ब्रह्मलोक में पहुँच जाते हैं। ब्रह्मलोक में जाने का जो मार्ग है, उसका उल्लेख कहीं अर्चिमार्ग, कहीं उत्तरायण और कहीं देवयान मार्ग के नाम से मिलता है। अतः जिज्ञासा यह होती है कि उपासना एवं अधिकारी के भेद से ये सभी मार्ग पृथक्-पृथक् हैं अथवा एक ही मार्ग के ये सभी नाम हैं? इसके अलावा मार्ग में कहीं पर तो विविध देवों के लोकों का उल्लेख आता है, तो कहीं दिन, पक्ष, माह, अयन एवं संवत्सर आदि का और कहीं मात्र सूर्य रश्मियों द्वारा सूर्यलोक का उल्लेख मिलता है। यह उल्लेख-भेद एक मार्ग मान लेने से कैसे सुसंगत होगा? अतः इसी विषय के समाधान हेतु आचार्य तृतीय पाद का शुभारम्भ करते हैं- (५१९) अर्चिरादिना तत्प्रथिते:॥१॥ सूत्रार्थ-अर्चिरादिना = अर्चि आदि से शुरू होने वाले एक ही मार्ग से (ज्ञानीजन ब्रह्मलोक को प्रस्थान करते हैं), तत्प्रथिते: = क्योंकि ज्ञानीजनों के लिए यह एक ही मार्ग (भिन्न-भिन्न नामों से) प्रख्यात है। व्याख्या- श्रुति में ब्रह्मज्ञानियों के लिए ब्रह्मलोक में गमन हेतु जिन विभिन्न (अर्चि, देवयान, उत्तरायण आदि) नामों से मार्गों का उल्लेख मिलता है, वह एक ही मार्ग है, अनेक नहीं। उस मार्ग का प्रख्यात नाम अर्चि: आदि है, क्योंकि वह अर्चि से ही शुरू होने वाला मार्ग है। इस मार्ग से ही ब्रह्मलोक गमन करने वाले साधक प्रस्थान करते हैं। इसी मार्ग का देवयान, उत्तरयण आदि नामों से श्रुतियों में उल्लेख किया गया है। मार्ग में आने वाले लोकों का जो उल्लेख मिलता है, वह कहीं कम व कहीं अधिक हुआ है। उन स्थलों में जहाँ जिस लोक का वर्णन नहीं है, वहाँ उसका अन्यत्र के वर्णन से अध्याहार कर लेना चाहिए। छा.उ.(५/ १०/१-२) में 'अर्चि' पद का अर्थ किरण- 'सूर्यरश्मि' किया गया है। यहाँ वर्णन आया है कि अर्चि से लेकर विद्युत् पर्यन्त मार्ग के संकेत हैं। इन्हीं का अनुगमन करता हुआ उपासक ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। 'रश्म्यनुसारी' (वेदान्त ४/२/२८) सूत्र में ज्ञानी की जिस गति का वर्णन है, उसी का यहाँ पर सूत्रकार ने विस्तार किया है। बृह.उ. ६/२/१५, छान्दोग्य. ४/१५/४-५ में और कौ.उ. १-३ में भी देवयान मार्ग का उल्लेख मिलता है। इससे श्रुतियों में ज्ञानियों की गति के इस एक ही मार्ग की प्रसिद्धि का पता चलता है। उक्त सभी प्रमाणों से ब्रह्मज्ञानी का अर्चिरादि मार्ग द्वारा ब्रह्मलोक गमन करना सिद्ध होता है॥१॥ एक स्थल पर वर्णित लोकों का अन्यत्र किस तरह अध्याहार करना चाहिए? अगले सूत्र में सूत्रकार इसी जिज्ञासा का समाधान करते हैं- (५२०) वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम्॥२॥ सूत्रार्थ- वायुम् = वायुलोक को, अब्दात् = स्वत्सर के पश्चात् (और सूर्य के पहले समझें) अविशेषविशेषाभ्याम् = क्योंकि वायु का उल्लेख कहीं सामान्यभाव से और कहीं पर विशेषभाव से हुआ है। व्याख्या- वायुलोक का उल्लेख प्रमुखतः दो श्रुतियों में मिलता है। कौषीतकि उपनिषद् (१.३) में तो मात्र लोकों का नाम ही आया है, सविशेष क्रमिक स्पष्टीकरण नहीं किया गया है, यथा- वह (प्राणी) देवयान मार्ग से अग्निलोक में, पुनः वायु, सूर्य, वरुण, इन्द्र एवं प्रजापति लोकों में होता हुआ ब्रह्मलोक में पहुँचता है; परन्तु बृह.उ.५/१०/१ में वायुलोक से सूर्यलोक में जाने का स्पष्ट उल्लेख हुआ है, देखें- 'प्राणी इस लोक से ब्रह्मलोक को जाता है और तभी वह वायुलोक को प्राप्त करता है, वायु उसे रथ-चक्र के छिद्रवत् मार्ग देता है। उस पथ से उत्क्रमण करता हुआ पुनः सूर्य को प्राप्त होता है। वहाँ उसे सूर्य 'लम्बर' नामक वाद्य में रहने वाले
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 234
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२३६ वेदान्त दर्शन छिद्र की भाँति मार्ग प्रदान करता है, उस मार्ग से ऊर्ध्व में जाकर चन्द्रमा को प्राप्त होता है। चन्द्रमा उसे नगारे के छिद्र की भाँति मार्ग दे देता है। उस मार्ग से ऊपर उठकर वह ब्रह्म को पा लेता है, वहाँ वह अनन्तकाल तक वास करता है।' छान्दोग्योपनिषद् ५/१०/१-२ में अग्नि की जगह तो अर्चि कहा गया है, किन्तु वहाँ वायुलोक का उल्लेख नहीं है, देखें- 'ब्रह्मविद्या के रहस्य को जानते हुए जो वन में रहते हुए सत्य की उपासना करते हैं, वे अर्चि (ज्योति, अग्नि या सूर्य-रश्मि) को पाते हैं। अर्चि से दिन को, दिन से शुक्लपक्ष को, शुक्लपक्ष से उत्तरायण के छः मास को, छः माह से संवत्सर को, संवत्सर से सूर्य को, सूर्य से चन्द्रमा को एवं चन्द्रमा से बिजली को और फिर वहाँ से अमानव पुरुष इन्हें ब्रह्म के पास पहुँचा देता है। यही देवयान मार्ग है। यहाँ श्रुति में वायुलोक के प्राप्त होने का कहीं पर भी उल्लेख नहीं हुआ है, किन्तु बृहदारण्यक उप. ५/१०/१ में सूर्यलोक की प्राप्ति से पहले वायुलोक का प्राप्त होना कहा गया है। अतः यह सिद्ध होता है कि वायुलोक को संवत्सर के बाद एवं सूर्यलोक से पहले ही प्राप्त होता है, यही समझना उचित प्रतीत होता है।।२। 'अर्चि' आदि मार्ग में वरुण, इन्द्र एवं प्रजापति आदि लोकों का उल्लेख नहीं मिलता। इन्हें किस लोक के बाद मानना चाहिए? अगले सूत्र में आचार्य इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (५२१) तडितोऽधि वरुणः सम्बन्धात् ॥३॥ सूत्रार्थ-तडित: = विद्युत् से, अधि = ऊपर, वरुणः = वरुण लोक को जानें, सम्बन्धात् = क्योंकि उन दोनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् ४/१५/५ में वर्णन आता है कि आदित्य से चन्द्रमा एवं चन्द्रमा से विद्युत् की प्राप्ति होती है। विद्युत् से वरुण का घनिष्ठ सम्बन्ध है, क्योंकि वरुण जल का स्वामी है और विद्युत् का जल से सर्वाधिक निकटतम सम्बन्ध है। जल से विद्युत् की और विद्युत् से जल का उद्भव भी प्रसिद्ध है। जब विद्युत् प्रचण्ड गर्जन कर जल को मथती है, तभी वर्षा होती है और वर्षा के जल का स्वामी वरुण है, इससे भी विद्युत् और वरुण (जल) का निकटतम सम्बन्ध सिद्ध होता है। अतः विद्युत् के ऊपर वरुणलोक का होना ही उचित है। वरुण के पश्चात् इन्द्र एवं प्रजापति आदि लोकों की स्थिति भी उक्त श्रुति में कहे हुए क्रम के अनुसार मान लेनी चाहिए। इससे सभी श्रुतियों की समानता हो जाएगी तथा एक मार्ग को मान लेने में किसी भी तरह का कोई अवरोध भी नहीं होगा॥३॥ अब जिज्ञासा यह होती है कि अर्चि आदि मार्ग में जो अर्चि, अहः, पक्ष, अयन, संवत्सर, वायु एवं विद्युत् आदि कहे गये हैं, वे सभी जड़ हैं या चेतन? सूत्रकार अगले सूत्र में इसी का समाधान दे रहे हैं- (५२२ ) आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात्॥।४।। सूत्रार्थ-आतिवाहिका: = वे सभी साधक (प्राणी) को एक स्थल से दूसरे स्थल तक पहुँचाने वाले उन- उन लोकों के अभिमानी मानव हैं, तल्लिङ्गात् = क्योंकि श्रुति में वैसा ही स्वरूप (लक्षण) पाया जाता है। व्याख्या-अर्चि, अहः, पक्ष, अयन, संवत्सर आदि शब्दों के द्वारा प्रतिपादित होने वाले ये सभी उन-उन नाम एवं लोकों के अभिमानी देव अथवा मानव आकृति वाले अमानव पुरुष हैं। इन अमानव पुरुषों का कार्य ब्रह्मलोक में गमन करने वाले साधकों को एक स्थल से दूसरे स्थल तक पहुँचा देना ही है। छा.उ. ४/१५/५ में भी वर्णन आता है कि 'चन्द्रमा से विद्युत् आदि तथा वहाँ से ब्रह्म को प्राप्त कराने वाला अमानव (मानव से परे) पुरुष है'। इसी कारण से इन्हें आतिवाहिक कहते हैं। विद्युत् लोक में जाने के पश्चात् अमानव पुरुष उस साधक को ब्रह्म को प्राप्त करा देता है। उस अभिमानी देव के लिए जो अमानव विशेषण दिया गया है, उससे सिद्ध होता है कि उसके पहले जो अर्चि आदि को प्राप्त करना बतलाया गया है, वे उन लोकों के अभिमानी देव (मानवाकार पुरुष) हैं। वे हैं तो दिव्य, फिर भी उनका आकार-प्रकार मनुष्यों जैसा ही है। उक्त श्रुति में
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 235
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० ३ सूत्र ७ २३७ वर्णित 'गमयति' शब्द से प्राप्त करना या चलना समझना चाहिए। इससे स्पष्ट हो जाता है कि 'अर्चिरादि' से गमन कराने वाले उनके अभिमानी देव हैं, जो उत्क्रमण करते हुए ज्ञानी साधक के गमन में सहयोग प्रदान करते हैं॥४॥ अब जिज्ञासा होती है कि अभिमानी देवता मानने की क्या जरूरत है? अगले सूत्र में आचार्य इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (५२३) उभयव्यामोहात्तत्सिद्धे: ॥५॥ सूत्रार्थ-उभयव्यामोहात् = आतिवाहिक और मुमुक्षु दोनों के मोहयुक्त होने का वर्णन आता है, तत्सिद्धे: = अतः उनको (आतिवाहिक) को अभिमानी देवता मानने से ही उनके द्वारा ब्रह्मलोक तक गमन का कार्य सिद्ध होता है, (इसलिए वैसा ही समझना चाहिए)। व्याख्या- यदि अर्चि आदि शब्दों के द्वारा उन्हें अभिमानी देवता न मानकर मात्र उन्हें ज्योति एवं जड़ पदार्थ मानें, तो दोनों के ही मोहयुक्त अर्थात् मार्ग ज्ञान रहित होने से ब्रह्मलोक तक पहुँचकर ब्रह्मसामीप्य असम्भव हो जाएगा, क्योंकि जाने वाला जीवात्मा तो वहाँ के मार्ग से अपरिचित है। उसे आगे ले जाने वाले अर्चि आदि भी यदि जड़ हों, तो मार्ग का ज्ञाता कोई न होने से देवयान एवं पितृयान मार्ग की जानकारी होनी संभव नहीं होगी। अतः अर्चि आदि शब्दों द्वारा उन-उन के अभिमानी देवों का वर्णन स्वीकारना जरूरी है और तभी उन देवों के द्वारा ब्रह्मलोक तक जाने का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। इसलिए मार्ग में जिन-जिन लोकों का उल्लेख मिलता है, उनसे उन-उन लोकों के स्वामी देवता को ही मानना चाहिए। अपने लोक से अगले लोक में ले जाना ही उनका प्रमुख कार्य है॥।५॥ छा. उ. ५/१०/१ में वर्णन आता है कि वह अमानव महापुरुष विद्युत्-लोक के पश्चात् ज्ञानी को ब्रह्म का सामीप्य करा देता है, तो फिर बीच में आने वाले अन्य वरुण, इन्द्र एवं प्रजापति आदि लोकों के अभिमानी देवों का क्या काम होगा? इसी आशंका का निवारण आचार्य अगले सूत्र में करते हैं- (५२४) वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रतेः ॥६॥ सूत्रार्थ- ततः = वहाँ से, वैद्युतेन = विद्युत्-लोक में प्रकट हुए अमानव पुरुष द्वारा, एव = ही(वे ज्ञानी साधक ब्रह्मलोक तक पहुँचाये जाते हैं), तच्छ्रतेः = क्योंकि वैसा ही वर्णन श्रुति में मिलता है। व्याख्या-छा. उ.५/१०/१-२ में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि 'चन्द्रलोक से ज्ञानी साधक चलकर विद्युत् लोक में पहुँचता है, फिर वहाँ से प्रकट हुआ अमानव महापुरुष उसे ब्रह्म के समीप पहुँचा देता है।' इस प्रकार श्रुति में स्पष्ट वर्णन मिलने से यह सिद्ध हो जाता है कि विद्युत् लोक से आगे ब्रह्मलोक तक वही विद्युत्-लोक में उत्पन्न अतीन्द्रिय सामर्थ्य युक्त पुरुष ही उन्हें (ज्ञानी को) पहुँचाता है तथा बीच के जो अन्य अभिमानी देव हैं, उनका तो मात्र इतना ही कार्य है कि वे सभी अपने लोकों में से होकर जाने का मार्ग प्रदान कर दें एवं जो अपेक्षित हो, वह सहयोग प्रदान कर दें॥ ६॥ ब्रह्मविद्या का अधिकारी साधक ब्रह्मलोक में जिसे प्राप्त करता है, वह परब्रह्म है या सर्वप्रथम जन्म लेने वाला ब्रह्मा ? इसी जिज्ञासा के निस्तारण हेतु अगला प्रकरण शुरू करते हैं। अगले सूत्र क्र० ७ से ११ तक आचार्य बादरि की तरफ से पूर्वपक्ष का मत प्रस्तुत किया जा रहा है- (५२५) कार्यं बादरिरस्य गत्युपपत्तेः।७॥ सूत्रार्थ-बादरि := आचार्य बादरि की मान्यता है कि, कार्यम् = कार्य-ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भ को प्राप्त होते हैं, गत्युपपत्ते: = क्योंकि गमन करने की उपपत्ति का वर्णन, अस्य = इस कार्य-ब्रह्म रूपी हिरण्यगर्भ के लिए ही है।
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 236
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२३८ वदान्त दशन व्याख्या-आचार्य बादरि की मान्यता है कि श्रुति में जो लोकान्तर-गमन का वर्णन आता है, वह परब्रह्म की प्राप्ति हेतु उचित नहीं है; क्योंकि परब्रह्म तो सर्वत्र विद्यमान है, उसे प्राप्त करने के लिए लोकान्तर में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उनके उपासकों को कहीं ी जाना श्रेयस्कर नहीं है। वे तो अज्ञान के समाप्त होते ही तत्क्षण ब्रह्म को प्राप्त हो जाते हैं। इससे यह स्पष्ट हुःन कि इन ब्रह्मतिद्याओं की साधना करने वालों के लिए जो प्राप्त होने वाला ब्रह्म है, वह परब्रह्म नहीं, वर कार्यब्रह्म ही है; क्योंकि इस कार्यब्रह्म की प्राप्ति हेतु लोकान्तर में जाकर उसे पाने का वर्णन सर्वथा उचित प्रतीत होता है। ७॥ अगले सूत्र में आचार्य प्रकारान्तर से अपने पक्ष को दृढ़ कर रहे हैं -- (५२६ ) विशेषितत्वाच्च।।८।। सूत्रार्थ- च = और, विशेषितत्वात् = विशेषण देकर स्पष्ट किया गया है, इस कारण से भी कार्य-ब्रह्म को प्राप्त होना मान लेना उचित है। व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् ६/२/१५ में वर्णन आता है कि 'अमानव पुरुष इन (ज्ञानी-साधकों) को ब्रह्मलोकों में ले जाता है'। यहाँ पर इस श्रुति में ब्रह्मलोक में बहुवचन का प्रयोग हुआ है और ब्रह्मलोकों में गमन कराने की बात बतलाई गई है, ब्रह्म-प्राप्ति की बात नहीं बताई गई है। इस तरह से विशिष्ट रूप से स्पष्ट बतलाए जाने से भी यही सिद्ध होता है कि कार्य-ब्रह्म को ही ज्ञानी साधक प्राप्त होता है। इसका कारण यह है कि वह लोकों का अधिष्ठाता है। इसलिए सूत्रकार कहते हैं कि भोग्य भूमि होने से लोकों के साथ बहुवचन का प्रयोग सर्वथा युक्ति संगत है।।८।। श्रुति में यह वर्णन आया है कि वह अमानव पुरुष इन (ज्ञानी साधकों) को ब्रह्म के पास ले जाता है। यह वर्णन कार्यब्रह्म मानने से उपयुक्त नहीं प्रतीत होता; क्योंकि श्रुति का उद्देश्य यदि कार्यब्रह्म की प्राप्ति बतलाना होता, तो वह ब्रह्मा के पास पहुँचा देता है, ऐसा वर्णन (कथन) होना चाहिए था। इसी के समाधान हेतु आचार्य कहते हैं- (५२७ ) सामीप्यात्तु तद्व्यपदेश: ।।९ ।। सूत्रार्थ- तद्व्यपदेश: = वह कथन (वर्णन), तु = तो, सामीप्यात् = ब्रह्म की समीपता होने से भी ब्रह्मा के लिए हो सकता है। व्याख्या-उपर्युक्त सूत्र में विशेषण के सहित स्पष्ट करने का जो कथन (वर्णन) आया है, उसमें ब्रह्म के अतिसमीप स्थित ब्रह्मा का भी कथन हो सकता है। इस सन्दर्भ में श्वेताश्वतरोपनिषद् ६/१८ में कहा गया है- 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदाँऽश्च प्रहिणोति तस्मै। तः ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुवै शरणमहं प्रपद्ये' अर्थात् जो सर्वप्रथम ब्रह्मा की सर्जना करता है और जो उसे समस्त वेदों का ज्ञान देता है। परमात्म ज्ञान विषयक बुद्धि को प्रकट करने वाले उस प्रसिद्ध परब्रह्म परमात्मा की मैं मुमुक्षु साधक शरण में जाता हूँ। इस उपर्युक्त श्रुति कथन के अनुसार ब्रह्मा उस परब्रह्म की पहली कृति (संरचना) होने से ब्रह्मा को ही 'ब्रह्म' मान लिया गया है, ऐसा समझना ही युक्तिसंगत लगता है। उक्त वर्णन से ब्रह्मा ही ब्रह्म का अति निकटस्थ सिद्ध होता है। इस प्रकार से ब्रह्मा को ब्रह्म और उसके लोक को ही ब्रह्मलोक कहना सम्भव प्रतीत होता है।।९।। श्रीमद्भगवद्गीता के अ.८/१६ में वर्णन आता है कि ब्रह्मा के लोक तक समस्त लोक पुनः आवृत्ति (गमनागमन) वाले हैं। इस प्रसङ्ग में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ब्रह्मा की आयु पूर्ण हो जाने के पश्चात् वहाँ पहुँचने वालों का पुनः वापस होना जरूरी है तथा श्रुति में देवयान मार्ग से गमन करने वालों का वापस न होना बतलाया गया है। अतः कार्यब्रह्म की प्राप्ति न मानकर परब्रह्म की प्राप्ति मान लेना ही उचित लगता है। इस पर आचार्य अगले सूत्र में पूर्व पक्ष की ओर से ही प्रतिपादन करते हैं-
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 237
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० ३ सूत्र १२ २३९
(५२८) कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात्॥१०॥ सूत्रार्थ-कार्य = कार्य-रूप ब्रह्मलोक का, अत्यये = नाश होने पर, तदध्यक्षेण = उसके अधिष्ठाता ब्रह्मा के, सह = सहित, अतः = इससे, परम् = श्रेष्ठ परब्रह्म को, अभिधानात् = प्राप्त होने का वर्णन है, अतः (पुनः आवृत्ति नहीं होगी)। व्याख्या- जिन ज्ञानी साधकों ने उपनिषदों के विज्ञान द्वारा उनके अर्थभूत परमात्मा का सम्यक् रूप से निश्चय कर लिया है और कर्मफल एवं आसक्ति के त्याग रूपी योग से जिन साधकों का अन्तःकरण पवित्र हो गया है, वे सभी ब्रह्मलोक में पहुँचकर अमृतमय ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। इस सन्दर्भ में मुण्डकोपनिषद् ३/२/६ में उपनिषद्कार कहते हैं- 'ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे' अर्थात् वे समस्त साधक (जो वैराग्य और योग द्वारा शुद्ध अन्तःकरण को प्राप्त कर चुके हैं) शरीर का परित्याग करके ब्रह्मलोक में प्रविष्ट हो जाते हैं। वे सभी तरफ से मुक्त होकर श्रेष्ठ अमृतत्व को प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार श्रुति में सभी साधकों की मुक्ति का वर्णन होने से यह स्पष्ट होता है कि प्रलय काल में ब्रह्मलोक का विनाश होने से उसके स्वामी ब्रह्मा के सहित वहाँ गये हुए ब्रह्मविद्या के साधक भी अविनाशी ब्रह्म को पाकर मुक्त हो जाते हैं। इस कारण उनका पुनरागमन नहीं होता ॥१०। अगले सूत्र में सूत्रकार स्मृति-प्रमाण द्वारा पूर्वपक्ष को पुनः स्पष्ट करते हैं- (५२९) स्मृतेश्च॥११॥ सूत्रार्थ-स्मृते: = स्मृति-प्रमाण होने से, च = भी (उक्त कथन की सिद्धि होती है)। व्याख्या- शुद्ध अन्तःकरण वाले साधकों का प्रलयकाल की स्थिति में परब्रह्म में विलीन होकर मुक्त होने का उल्लेख स्मृति ग्रन्थ कूर्मपुराण पूर्व खण्ड के १२/२६९ में इस प्रकार मिलता है, देखें- 'ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम्' अर्थात् वे सभी शुद्धान्तःकरण वाले ज्ञानी साधक पुरुष प्रलयकाल की स्थिति आ जाने पर सम्पूर्ण विश्व के अन्त में ब्रह्मा के सहित उस परमात्मतत्त्व में प्रविष्ट होकर मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि स्मृतियों में भी यही भाव प्रतिपादित किया गया है। इसीलिए ज्ञानी को कार्यब्रह्म की प्राप्ति होती है, यही मानना सर्वथा उचित है॥११।। अब सूत्रकार उपर्युक्त सूत्र तक पूर्वपक्ष के मत का प्रतिपादन करने के बाद उसके उत्तर में आचार्य जैमिनि का मत अगले सूत्र से प्रस्तुत करते हैं- (५३०) परं जैमिनिर्मुख्यत्वात्॥१२॥ सूत्रार्थ-जैमिनि: = आचार्य जैमिनि का मत है कि, मुख्यत्वात् = ब्रह्मशब्द का मुख्य वाच्यार्थ होने से, परम् = परब्रह्म को प्राप्त होता है (यही समझना उचित होगा)। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् ५/१०/१ में जो वर्णन आता है कि 'अमानव पुरुष इन ज्ञानी साधकों को ब्रह्म के समीप पहुँचा देता है।' श्रुति के इस कथन में कहा हुआ 'ब्रह्म' शब्द मुख्य रूप से परब्रह्म परमात्मा का ही वाचक है, अतः अर्चि आदि मार्ग से गमन करने वाले उस अविनाशी परब्रह्म को ही प्राप्त करते हैं, कार्य-ब्रह्म को नहीं। आचार्य जैमिनि का भी यही मन्तव्य है। जहाँ पर मुख्य अर्थ की उपयोगिता नहीं होती, वहीं पर गौण अर्थ की कल्पना हो सकती है। मुख्य अर्थ की उपयोगिता रहते हुए गौण अर्थ की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। वह परमात्मा सर्वत्र पूर्ण होने पर भी उसके परम धाम का प्रतिपादन एवं वहाँ ज्ञानी साधकों के गमन का उल्लेख श्रुतियों में (कठ.उ. १/३/९, प्र.उ. १/१०) एवं स्मृति ग्रन्थ के अन्तर्गत गीता के (अ. १५/६) में अनेकों जगह मिलता है। अतः उसके लोक विशेष में जाने के लिए कहना कार्यब्रह्म का प्रतीक
Disclaimer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 238
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२४० वेदान्त दर्शन नहीं है। बहुवचनान्त प्रयोग भी आदरार्थ करना सम्भव है और उस परब्रह्म के स्वयं के लिए रचे हुए अनेक लोकों का होना भी कोई असम्भव नहीं है। अतः यही स्पष्ट होता है कि वे (साधक) उसी के परम धाम में जाकर उस परब्रह्म को ही पाते हैं, कार्य-ब्रह्म को नहीं। यही अभिमत आचार्य जैमिनि का भी है॥।१२।। अगले सूत्र में सूत्रकार प्रकारान्तर से पुनः आचार्य जैमिनि के मत को दृढ़ करते हैं- (५३१) दर्शनाच्च॥१३॥ सूत्रार्थ- दर्शनात् = श्रुति में सर्वत्र गतिपूर्वक परब्रह्म का प्राप्त होना ही दृष्टिगोचर होता है, च = इससे भी सिद्ध होता है कि कार्यब्रह्म की प्राप्ति नहीं है। व्याख्या- श्रुति में यत्र-तत्र पर्याप्त स्थलों में परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति का उल्लेख दृष्टिगोचर होता है। छान्दोग्योपनिषद् ८/६/६ में वर्णन मिलता है कि 'उनमें से सुषुम्ना नाड़ी द्वारा उत्क्रमण कर अमृतत्व को प्राप्त होता है।' कठ.उ. १/३/९ में कहा गया है कि 'वह संसार मार्ग के उस पार उन भगवान् विष्णु के परम पद को पाता है।' कठ. उ. २/३/१६ में पुनः 'सुषुम्ना नाड़ी द्वारा शरीर से बाहर निकलकर गमन करने का उल्लेख हुआ है।' इस प्रकार उक्त उद्धरणों से स्पष्ट होता है कि देवयान मार्ग द्वारा गमन करने वाले- ब्रह्मविद्या की साधना करने वाले ज्ञानी साधक उस अविनाशी परब्रह्म को ही प्राप्त होते हैं, कार्यब्रह्म को नहीं ॥१३॥ पुनः अगले सूत्र में सूत्रकार प्रकारान्तर से आचार्य जैमिनि के मत को और दृढ़ कर रहे हैं- (५३२) न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धि: ॥१४॥ सूत्रार्थ- च = तथा इसके अतिरिक्त, प्रतिपत्त्यभिसन्धिः = उन ब्रह्मविद्या के उपासकों का प्राप्ति विषयक संकल्प भी, कार्ये = कार्य ब्रह्म के लिए, न = नहीं है। व्याख्या- इसके अतिरिक्त उन ब्रह्मविद्या के साधकों का जो प्राप्ति-सम्बन्धी संकल्प है, वह कार्यब्रह्म के लिए नहीं, बल्कि परब्रह्म को पाने हेतु ही उनकी साधना में अभिरुचि देखी गई है। इस कारण से भी उन साधकों को कार्य-ब्रह्म की प्राप्ति न होकर परब्रह्म की ही प्राप्ति होती है। श्रुतियों के अन्तर्गत छा.उ.८/१४/१ में वर्णन आता है- 'प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये ....... ' अर्थात् (वे) साधक प्रजापति के सभागृह को प्राप्त होते हैं। यहाँ पर इस प्रसङ्ग में भी साधक का लक्ष्य प्रजापति के लोक में निवास करना नहीं, वरन् परब्रह्म के परमधाम में गमन करना ही है, क्योंकि वहाँ पर जिस यशों के यश अर्थात् महायश का उल्लेख मिलता है, यह ब्रह्म का ही नाम है। यही तथ्य श्रुति में अन्यत्र भी देखने को मिलता है। श्वेताश्वतरोपनिषद् ४/१९ एवं छा.उ. ८/१३/१ के प्रसङ्ग से भी स्पष्ट हो जाता है कि वहाँ साधक का लक्ष्य परब्रह्म का प्राप्त होना ही है। छा.उ.८/ १३/१ में कहा गया है कि - 'अश्व इव रोमाणि विधूय पापम् ....... ' अर्थात् जिस तरह अश्व अपने रोमों को झाड़कर स्वच्छ एवं मलरहित हो जाता है, वैसे ही साधक अपने पापों से निवृत्त होकर राहु के मुख से प्रकट हुए चन्द्रमा की भाँति (ग्रहण के उपरान्त निर्मल होकर) शरीर का त्याग कर ब्रह्म-लोक प्राप्ति की कामना कार्य-ब्रह्म की प्राप्ति के लिए कदापि नहीं हो सकती॥१४॥ पूर्वपक्ष एवं उसके उत्तर पक्ष की स्थापना करने के उपरान्त अब अगले सूत्र में सूत्रकार अपने मत को प्रकट करते हुए सिद्धान्त पक्ष का उल्लेख करते हैं- (५३३) अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथादोषात्तत्क्रतुश्च॥१५॥ सूत्रार्थ- अप्रतीकालम्बनात् = प्रतीक की उपासना करने वालों के अतिरिक्त अन्य सभी उपासकों को, नयति = (अर्चि आदि देवगण देवयान मार्ग से) ले जाते हैं, उभयथा = (अतः) दोनों प्रकार की मान्यता में, अदोषात् = कोई दोष न होने से, तत्क्रतुः = उनके संकल्प रूपी ब्रह्म को, च = और (कार्यब्रह्म को प्राप्त होना
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 239
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० ३ सूत्र १६ २४ सिद्ध होता है,) इति = ऐसी, बादरायण: = आचार्य बादरायण (वेदव्यास) जी की मान्यता है। व्याख्या- आचार्य वेदव्यास (बादरायण) जी की मान्यता है कि जिन प्रतीक उपासनाओं का श्रुति में उल्लेख मिलता है, उनसे भिन्न उपासना वाले जो सर्वज्ञ अविनाशी परब्रह्म के उपासक हैं, उन दोनों प्रकार के उपासकों-साधकों के संकल्पों के अनुसार वे अमानव अर्चि आदि देवगण परब्रह्म या कार्य-ब्रह्म की प्राप्ति करा देते हैं। साधकों का संकल्प इस प्राप्ति में विशिष्ट महत्त्व रखता है, अतः दोनों तरह की मान्यताओं में से किसी भी तरह का कोई दोष नहीं है तथा परब्रह्म के परमधाम में गमन का मार्ग भी प्रजापति बह्मा के लोक में से ही होकर गया है। श्रुति के अन्तर्गत कौ.उ. १/३ में इसका स्पष्ट वर्णन मिलता है, देखें- जिनको परब्रह्म के परमधाम में पहुँचाते हैं, उनका मार्ग भी प्रजापति ब्रह्मा के लोक में से होकर ही जाता है। अतः दोनों प्रकार के साधकों का ब्रह्मा के लोक में पहुँचना तो अनिवार्य है ही, फिर भी जिनकी साधना का संकल्प ब्रह्म-प्राप्ति के स्तर का है, उनको ब्रह्म के परमधाम में पहुँचा देना भी उचित ही है॥१५॥ प्रतीक उपासना वाले साधकों को अर्चि-मार्ग से न ले जाने का क्या कारण है? आचार्य इस जिज्ञासा का समाधान अगले सूत्र में करते हैं- (५३४) विशेषं च दर्शयति॥१६॥ सूत्रार्थ- विशेषम् = इसका विशिष्ट कारण, च = भी, दर्शयति = श्रुति दर्शन कराती है। व्याख्या-विभिन्न तरह की प्रतीक उपासनाओं के फलों की विभिन्नता श्रुतियों में स्पष्ट रूप से बतलाई गई है और उपासक की गति उसके सङ्कल्प के अनुसार होनी कही गई है। छान्दोग्योपनिषद् (७/२/२) में वर्णन आता है- 'वाणी आदि प्रतीकोपासना वाले साधकों को देवयान मार्ग के अधिकारी क्यों नहीं ले जाते, इसका विशेष कारण उन-उन साधनाओं के विविध फलों का वर्णन करते हुए श्रुति स्वयं ही दृष्टिगोचर कराती है, वाणी में प्रतीकोपासना का फल जहाँ तक वाणी की गति होती है, वहाँ तक स्वेच्छापूर्वक विचरण करने की शक्ति बतलाया गया है।' श्रुति के अन्तर्गत इसी उपनिषद् में अन्यत्र भी ऐसा ही वर्णन देखने को मिलता है- सनत्कुमार जी ने वाणी को मन से श्रेष्ठ कहा है और मन से संकल्प को। ऐसे ही चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न,जल आदि का उल्लेख करते हुए अन्त में कहा है कि- 'यो वै भूमा तत्सुखं ..... ' अर्थात् जो भूमा (व्यापक ब्रह्म) है, वही सुख है, अल्प पदार्थों में सुख नहीं है, भूमा सुख स्वरूप है, भूमा ही जानने योग्य है। इस प्रकार भूमा अर्थात् ब्रह्म ही जानने योग्य है। जो ब्रह्म को जान लेते हैं, वही मुक्त होते हैं। इस प्रकार प्रतीकोपासना करने वाले वे साधक देवयान मार्ग से न तो कार्यब्रह्म के लोक में ही जाने के पात्र (अधिकारी) हैं और न परब्रह्म के परमधाम में ही जाने के पात्र (अधिकारी) हैं। अतः उस मार्ग के सत्पात्र 'अधिकारी' देवों का अर्िमार्ग से उनको न ले जाना ही उचित प्रतीत होता है॥१६।।
।। इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 240
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
।। अथ चतुर्थाध्याये चतुर्थः पादः॥ तृतीय पाद के अन्तर्गत अर्चि आदि मार्ग द्वारा परब्रह्म एवं कार्यब्रह्म के लोक में गमन करने वालों की गति के सन्दर्भ में विचार किया गया। अब ज्ञानी-साधकों के संकल्पानुसार ब्रह्मलोक में पहुँचने के पश्चात् जो उनकी अवस्था का भेद होता है, उसके निस्तारण हेतु चतुर्थ पाद का शुभारम्भ करते हैं। इसमें सर्वप्रथम उन साधकों के विषय में समाधान करते हैं, जिनका लक्ष्य परब्रह्म की प्राप्ति है तथा जो उस अविनाशी परब्रह्म के अप्राकृत दिव्य परमधाम में गमन करते हैं। उपर्युक्त विषय के प्रतिपादनार्थ सूत्रकार अगले सूत्र में अपना विचार प्रस्तुत करते हैं- (५३५ ) सम्पद्याविर्भावः स्वेन शब्दात्॥१॥ सूत्रार्थ-सम्पद्य = परमपद को प्राप्त करके (इस जीवात्मा का), स्वेन = अपने यथार्थ रूप से, आविर्भावः = उद्भव होता है, शब्दात् - क्योंकि श्रुतियों में ऐसा उल्लेख मिलता है। व्याख्या- श्रुतियों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि परमपद को प्राप्त हो जाने के पश्चात् ही ज्ञानी- साधक का (जीव को) अपना यथार्थ रूप प्रकट होता है। छा.उ. ८/३/४ में प्रस्तुत विषय में कहा गया है कि जो ज्ञानी-साधक इस शरीर से ऊपर उत्क्रमण करके परम ज्ञानस्वरूप परमधाम को प्राप्त होता है, वह वहाँ अपने वास्तविक स्वरूप से परिपूर्ण हो जाता है। यह आत्मा है, यह (उसको प्राप्त होने वाला है) अमृत है, अभय है तथा यही ब्रह्म है। निश्चित ही उस परब्रह्म का नाम सत्य है,ऐसा आचार्य ने कहा। ऐसा ही वर्णन छा.उ. ८/१/५, ८/२/१ से १०, ८/३/३-४ एवं ८/१/६ में भी मिलता है। इन उद्धरणों से यह सिद्ध होता है कि मोक्ष की अवस्था में जीवात्मा का शुद्ध चिन्मय स्वरूप प्रकट हो जाता है और वह परब्रह्म से एकाकार हो जाता है।।१ । परमात्मा के परमधाम में जो वह साधक अपने यथार्थ से परिपूर्ण होता है, उसमें पहले की अपेक्षा क्या विशिष्टता होती है? अगले सूत्र में इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत है- (५३६ ) मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॥२ ॥। सूत्रार्थ- प्रतिज्ञानात् = प्रतिज्ञा किये जाने के कारण यह सिद्ध होता है कि, मुक्त: = (वह स्वरूप जो पूर्व में था) सभी तरह के बन्धनों से मुक्त होता है। व्याख्या- श्रुति में अनेक जगहों पर जीवात्मा के बन्धनमुक्त होने का उल्लेख प्राप्त होता है। छा.उ.८/१२/ १ में कहा गया है कि 'शरीर से मुक्त हुए को सुख-दुःख स्पर्श नहीं करते हैं' अथवा यह कहें कि यह जीवात्मा पाप-रहित है, इस कारण उसका सभी बन्धनों से मुक्त होना सिद्ध होता है। मुण्डकोपनिषद् ३/२/६ में इसका उल्लेख इस प्रकार मिलता है-'उस परमात्मा के लोक को प्राप्त कर लेने के पश्चात् ज्ञानी-साधक सदैव के लिए सभी तरह के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि अपने यथार्थ स्वरूप से पूर्ण होने पर साधक सभी तरह के बन्धनों से रहित सर्वथा शुद्ध, दिव्य, विभु एवं विज्ञानमय होता है। उसमें किसी भी तरह का कोई विकार नहीं होता। पूर्णरूपेण सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है॥२॥ अब जिज्ञासा यह उठती है कि यह कैसे निश्चय होता है कि उस समय साधक समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है? इसी का समाधान आचार्य अगले सूत्र में करते हैं- (५३७) आत्मा प्रकरणात्॥३॥। सूत्रार्थ- प्रकरणात् =प्ररकण से, आत्मा = आत्मा का ही विशुद्धात्मा होना सिद्ध होता है। व्याख्या- आत्मा बन्धन से परे होकर विशुद्ध दिव्य रूप में हो जाता है, ऐसा प्रकरण-प्रसङ्ग आदि से भी स्पष्ट हो जाता है। उपर्युक्त प्रकरण में जो प्रसंग आया है, उसका स्पष्ट वर्णन छा.उ. ८/३/४ में इस प्रकार मिलता है- 'वह ब्रह्मलोक में प्राप्त होने वाला स्वरूप आत्मा है।' इसलिए उस प्रकरण से यह स्पष्ट हो जाता
Disclalmer / Warning: All literary and artistic malerial on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 241
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० ४ सूत्र ६ २४३
है कि उस समय वह सभी तरह के बन्धनों से मुक्त होकर परब्रह्म के सदृश परम दिव्य शुद्ध स्वरूप से सम्पन्न हो जाता है। इसका उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता के अ. १४/२ एवं मु.उ. ३/१/३ में भी मिलता है।।३। अब आशंका यह होती है कि ब्रह्मलोक में जाने के बाद उस ज्ञानी-साधक की परब्रह्म से अलग स्थिति रहती है या वह उन्हीं में विलीन हो जाता है। इसके समाधान हेतु सूत्रकार अगला प्रकरण शुरू करते हैं। सर्वप्रथम क्रमशः तीन तरह के मत प्रस्तुत करते हैं- (५३८) अविभागेन दृषटत्वात्॥४॥ सूत्रार्थ- अविभागेन = मुक्त हुए जीव की स्थिति उस अविनाशी ब्रह्म में अविभक्त रूप से होती है, दृष्टत्वात् - क्योंकि ऐसा ही वर्णन श्रुति में प्रायः देखने को मिलता है। व्याख्या-कठोपनिषद् (२/१/१५) नामक श्रुति में वर्णन आया है, 'यथोदकं शुद्धे ........ भवति गौतम' अर्थात् 'जैसे पवित्र जल में गिरा (मिला) हुआ पवित्र जल वैसा ही (तदनुरूप) हो जाता है, उसी प्रकार परब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म में मिलकर वैसा ही एक रूप हो जाता है।' मुण्डकोपनिषद् ३/२/८ में ऐसा ही उल्लेख मिलता है- 'जैसे प्रवाहित नदियाँ नाम-रूप को छोड़कर समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही परब्रह्म को जानने वाला विद्वान् नाम-रूप से मुक्त होकर परात्पर, दिव्य परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।' उक्त दोनों श्रुतियों के वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुक्त हुआ प्राणी उस परब्रह्म में अविभक्त रूप से ही अवस्थित हो जाता है।।४ ।। अगले सूत्र में सूत्रकार उक्त विषय के सन्दर्भ में आचार्य जैमिनि का मत बतलाते हैं- (५३९) ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ॥५॥ सूत्रार्थ-जैमिनि: = आचार्य जैमिनि की मान्यता है कि, ब्राह्मेण = ब्रह्म के समान रूप से स्थित होता है, उपन्यासादिभ्यः = क्योंकि श्रुति में जो उसके स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है, उसे देखने एवं स्मृति-प्रमाण से भी ऐसा वर्णन मिलता है। व्याख्या- सूत्रकार कहते हैं कि आचार्य जैमिनि की मान्यता है कि मुक्तावस्था में वह जीवात्मा ब्रह्म के समान अर्थात् ब्रह्मवत् हो जाता है। इस विषय में श्रुति के अन्तर्गत मुण्डकोपनिषद् ३/१/३ में वर्णन आता है कि 'वह ज्ञानी-साधक निर्मल-पवित्र होकर परम समानता को प्राप्त होता है, यह वर्णन जीव एवं ब्रह्म का सात्म्य भाव सिद्ध करता है। छा.उ. ८/७/१ में कहा गया है कि मुक्त हुआ पुरुष सत्यकाम, सत्य-संकल्पमय होता है, यही लक्षण ब्रह्म के बतलाये गये हैं। स्मृतियों के अन्तर्गत गीता के अ. १४/२ में कहा गया है- 'इस ज्ञान का आश्रय प्राप्त कर मेरे दिव्य गुणों की समानता को प्राप्त हुए महापुरुष सृष्टि के समय में प्रादुर्भूत एवं प्रलय के समय में व्यथित नहीं होते।' इस प्रकार उपर्युक्त उद्धरणों से यह सिद्ध हो जाता है कि वह ज्ञानी-साधक उस परब्रह्म के सदृश दिव्य स्वरूप से युक्त हो जाता है॥५॥ अब सूत्रकार अगले सूत्र में आचार्य औड्डुलोमि के मत का प्रतिपादन करते हैं- (५४० ) चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमि: ॥६ ॥ सूत्रार्थ- चितितन्मात्रेण - आत्मा चेतन स्वरूप वाला है(वह) उसी रूप में अवस्थित रहता है, तदात्मकत्वात् = क्योंकि उस (आत्मा) का यथार्थ रूप वैसा ही है, इति = ऐसा, औडुलोमि: = आचार्य औडुलोमि का कथन है। व्याख्या- परम दिव्यधाम में पहुँचा हुआ मुक्तात्मा अपने चैतन्यमय यथार्थ स्वरूप में अवस्थित रहता है, क्योंकि श्रुति में उस मुक्तात्मा का वैसा ही स्वरूप कहा गया है। उक्त विषय के सन्दर्भ में उपनिषद्कार बृह.उ. ४/५/१३ में कहते हैं कि 'स यथा सैन्धव ......... प्रज्ञानघन एव' अर्थात् 'जिस प्रकार नमक का
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic materlal on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 242
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२४४ वदान्त दशन टुकड़ा (खण्ड) बाहर-भीतर से रहित पूरा का पूरा रस स्वरूप है, उसी प्रकार से यह मुक्तात्मा बाहर-भीतर के भेद से परे सम्पूर्ण रूप से प्रज्ञानघन मय ही है। अतः उस जीवात्मा का अपने स्वरूप से युक्त होना चैतन्यमय रूप में ही अवस्थित होना है, यही आचार्य औडुलोमि की मान्यता है ।।६॥ उपर्युक्त विषय के सन्दर्भ में आचार्य जैमिनि व औडुलोमि के पश्चात् स्वयं सूत्रकार आचार्य बादरायण अगले सूत्र में अपना सिद्धान्त प्रस्तुत कर रहे हैं- (५४१ ) एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः॥७॥ सूत्रार्थ- एवम् = इस प्रकार चैतन्य रूप में अवस्थित मान लेने पर, उपन्यासात् = उस मुक्तात्मा का श्रुति में स्वरूप उल्लेख होने से (और), पूर्वभावात् = पहले (उपर्युक्त चौथे) सूत्र में कहे गये भाव से, अपि = भी, अविरोधात् = आत्मा के सत्य-काम, सत्य-संकल्प आदि गुणों (सिद्धान्त) में कोई विरोध नहीं होता, बादरायण: = ऐसा आचार्य बादरायण का अभिमत है। व्याख्या-आचार्य जैमिनि की मान्यता के अनुसार मुक्तात्मा का स्वरूप परब्रह्म के समान दिव्य गुणों से युक्त होता है। यह मत श्रुति-स्मृतियों दोनों में बतलाया गया है। दूसरे आचार्य औडुलोमि के मतानुसार भी जीवात्मा के चैतन्यमय स्वरूप से अवस्थित होने का उल्लेख प्राप्त होता है। इसी तरह उपर्युक्त सूत्र क्र. ४ में जैसा वर्णित हुआ है, उसके अनुसार परब्रह्म में अपृथक् रूप से अवस्थित होने का भी उल्लेख किया गया है। सूत्रकार कहते हैं कि इसलिए यही मानना उचित है कि उस मुक्तात्मा के अभिप्रायानुसार उसकी तीनों ही तरह से स्थिति हो सकती है। इस अभिमत में किसी भी तरह का कोई विरोध नहीं है।9।। परमधाम में गमन करने वाले साधकों के सन्दर्भ में निर्णय के बाद अब जो साधक प्रजापति ब्रह्मा के लोक को जाते हैं, उनके विषय में निस्तारण हेतु अगला प्रकरण शुरू करते हैं- यहाँ प्रश्न उठता है कि उन साधकों को ब्रह्मलोकों के भोगों की प्राप्ति किस प्रकार होती है? इसी का समाधान अगले सूत्र में किया जा रहा है- (५४२ ) संकल्पादेव तु तच्छुते: ॥८ ॥ सूत्रार्थ-तु= किन्तु (उन भोगों की प्राप्ति तो), संकल्पात् = संकल्प से, एवं = ही होती है, तच्छ्रुतेः = क्योंकि श्रुति में भी ऐसा ही उल्लेख मिलता है। व्याख्या-उन (ब्रह्मलोकों के) भोगों की प्राप्ति मन के द्वारा संकल्प से ही संभव होने के कारण मुक्तात्मा को सत्यसंकल्पमय कहा है। 'यह मुक्तात्मा मन रूपी दिव्य नेत्रों से ब्रह्मलोक के सभी तरह के भोगों को देखता हुआ रमण करता है।' श्रुति के अन्तर्गत यह बात छा.उ. ८/१२/५,६ में सविस्तार बतलाई गई है। छा.उप. ८/२/१० में भी कहा गया है- 'यं काम कामयते ...... महीयते' अर्थात् जो साधक जिस कामना को करता है, वह कामना इस मुक्तात्मा के संकल्प से ही पूर्ण होती है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि मानसिक संकल्प के द्वारा संकल्प मात्र से ही साधक को उस लोक के दिव्य भोगों की प्राप्ति होती है।८ ॥ अब्ब आचार्य युक्तिपूर्वक पुनः उक्त विषय को अगले सूत्र में पुष्ट करते हैं- (५४३ ) अत एव चानन्याधिपति:।।९।। सूत्रार्थ- च = और, अतएव = इसीलिए, अनन्याधिपतिः = (उस मुक्तात्मा को) ब्रह्मा के अतिरिक्त अन्य स्वामी से रहित कहा गया है अर्थात् वह स्वयं ही अपना अधिपति (स्वामी) होता है। व्याख्या- मुक्तात्मा पुरुष के सत्य-संकल्पयुक्त होने के कारण ही उसका अन्य और कोई अधिपति (स्वामी) नहीं होता। वह स्वयं ही अपना अधिपति होता है। यदि उसका अधिपति और कोई होता, तो वह स्वयं सत्य-संकल्पमय नहीं हो सकता। श्रुति में स्पष्ट उल्लेख मिलता है- 'स स्वराट् भवति' अर्थात् वह स्वयं ही अपना अधिपति होता है। तैत्ति. उ.१/६ में भी कहा गया है- 'वह स्वयं अपने राज्य को पा लेता है,
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 243
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० ४ सूत्र १२ २४५ मन के स्वामी हिरण्यगर्भ को प्राप्त हो जाता है। अतः वह स्वयं बुद्धि, मन, वाणी, नेत्र एवं श्रोत्र- सभी का स्वामी हो जाता है। यहाँ इसका अभिप्राय यह हुआ कि एक ब्रह्मा जी के अतिरिक्त अन्य किसी का भी उस पर आधिपत्य लागू नहीं होता। इस कारण उक्त सूत्र क्र. ८ में सूत्रकार ने बतलाया है कि वह मन से संकल्प करने मात्र से ही सभी दिव्य भोगों को पा लेता है॥९॥ उस मुक्त हुए को संकल्प-मात्र से ही जो दिव्य भोग मिलते हैं, उन भोगों के लिए वह देह भी ग्रहण करता है अथवा नहीं? अगले सूत्र में आचार्य बादरि का मत प्रस्तुत है- (५४४) अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥१० ॥ सूत्रार्थ- बादरि: = आचार्य बादरि का कथन है कि, अभावम् = मुक्त पुरुष के देह व इन्द्रियाँ नहीं होतीं, उनका अभाव रहता है, हि = क्योंकि, एवम् = ऐसा ही (यही), आह = श्रुति भी कहती है। व्याख्या-आचार्य बादरि की मान्यता है कि मुक्त हुए पुरुष के देह एवं इन्द्रियाँ नहीं होतीं। उस दिव्य लोक में स्थूल देह आदि पदार्थों का अभाव रहता है, अतः मुक्त हुआ पुरुष देह के अभाव में केवल मन के सङ्कल्प से ही उन भोगों को प्राप्त करता है। इसका वर्णन श्रुतियों में जगह-जगह पर मिलता है। छा.उ.८/१२/ १-२ में कहा गया है कि 'अशरीर. .... स्पृशतः' अर्थात् देह त्याग के पश्चात् उस मुक्त हुए प्राणी का सुख-दुःख से कभी भी स्पर्श नहीं होता। वह अपने दिव्य-स्वरूप से सम्पृक्त (संयुक्त) होता है। इसी उपनिषद् में अन्यत्र एक वर्णन मिलता है कि जीवात्मा का देह से उत्क्रमण होने पर वह ब्रह्मलोक में पहुँचकर ब्रह्म प्राप्ति के बाद अपने स्वरूप में प्रकट होता है। छा.उ. ८/१२/५-६ में कहा गया है कि 'स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते। य एते ब्रह्मलोके' अर्थात् अवश्य ही वह यह मुक्तात्मा इस दिव्य नेत्र 'मन' के द्वारा जो ये ब्रह्मलोक के भोग हैं, उनका दर्शन करता हुआ, उन्हें भोगता है। छा.उ.८/१३/ १ में भी वर्णन आया है कि वह दिव्य रूपधारी स्थूल देह के बन्धन से मुक्त हो जाता है। इस कारण कार्य- ब्रह्म के लोक में गये हुए जीवात्मा के स्थूल देह का अभाव समझना ही ठीक है॥१० । अगले सूत्र में सूत्रकार उक्त विषय के संदर्भ में आचार्य जैमिनि का मत प्रस्तुत करते हैं- (५४५) भावं जैमिनिर्विकल्पामननात्॥११॥ सूत्रार्थ-जैमिनि: = आचार्य जैमिनि, भावम् = मुक्त जीवात्मा के शरीर का अस्तित्व स्वीकारते हैं, विकल्पामननात् = क्योंकि बिना देह के देह का विकल्प असम्भव है अर्थात् श्रुति में विभिन्न तरह से स्थित होने का वर्णन मिलता है। व्याख्या- आचार्य जैमिनि मुक्तात्मा का शरीर होना स्वीकारते हैं; क्योंकि देह के विकल्पों का उल्लेख श्रुति में मिलता है। छान्दोग्योपनिषद् ७/२६/२ में कहा गया है कि 'एकधा भवति त्रिधा भवति, पञ्चधा, सप्तधा, नवधा चैव ..... ' आदि के संकल्पानुसार मुक्तात्मा एक, तीन, पाँच, सात, नौ, ग्यारह, सौ, हजार आदि इस प्रकार अनेक शरीर धारण कर सकता है। यहाँ पर शरीर से स्थूल देह का भाव होना ही सुसंगत है। इस प्रकार श्रुति में देह को विभिन्न भावों से सम्पन्न होना बतलाया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वह स्थूल शरीर से युक्त होता है, अन्यथा इस तरह से श्रुति का कहना उचित नहीं हो सकता॥११। अगले सूत्र में आचार्य बादरायण उक्त विषय के सन्दर्भ में अपना मत प्रस्तुत करते हैं- (५४६ ) द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥१२॥ सूत्रार्थ- बादरायण: = आचार्य बादरायण (वेदव्यासजी) का कथन है कि, अतः = उपर्युक्त दोनों आचार्यों के मतों से, द्वादशाहवत् = द्वादशाह यज्ञ की 'सत्र' एवं 'अहीन' के सदृश, उभयविधम् = दोनों तरह की विधियाँ (मान्यताएँ) उचित हैं।
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 244
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२४६ वदान्त दशन व्याख्या- उक्त सन्दर्भ में वेदव्यास जी का कथन है कि उपर्युक्त दोनों (बादरि एवं जैमिनि) आचार्यों का मत (प्रतिपादन) प्रमाणयुक्त है। अतः मुक्तात्मा के संकल्प के अनुसार देह का होना या न होना, दोनों ही स्थितियाँ सम्भव हैं। जिस प्रकार द्वादशाह-यज्ञश्रुति में कहीं अनेक कर्तृक होने पर 'सत्र' और नियत कर्तृक होने पर 'अहीन' माना गया है, उसी प्रकार यहाँ पर भी श्रुति में दोनों तरह का कथन होने से ज्ञानी साधक का स्थूल देह से सम्पन्न होकर दिव्य भोगों का उपभोग एवं बिना देह के मात्र मन के द्वारा ही उन दिव्य भोगों को भोगना भी सम्भव है। मुक्त पुरुष की वे दोनों ही विधियाँ (अवस्थाएँ) उचित हैं। इसमें किसी भी तरह का कोई भेद (विरोध) नहीं है॥१२॥ मुक्तात्मा अशरीरी होकर केवल मन के द्वारा भोगों का कैसे उपभोग करता है? इसी आशंका को आचार्य अगले सूत्र में प्रतिपादित करते हैं- (५४७) तन्वभावे संध्यवदुपपत्तेः॥१३॥ सूत्रार्थ- तन्वभावे = देह के अभाव में, संध्यवत् = स्वप्न के सदृश (भोगों को भोगा जाता है), उपपत्तेः- क्योंकि यही मान लेना युक्ति संगत है। व्याख्या- जिस प्रकार स्वप्नावस्था में स्थूल देह के अभाव में मानसिक संकल्पों के द्वारा सभी तरह के भोगों का उपभोग (प्राप्ति) जाग्रत्-अवस्था से भी अधिक विलक्षण स्थिति में होता है और जीवात्मा मन से ही भोग का उपभोग करता रहता है, उसी प्रकार से मुक्तात्मा को मुक्त अवस्था में ब्रह्मलोक में भी देह के अभाव में सभी प्रकार के दिव्य भोगों का उपभोग (प्राप्ति) होना संभव है। इसीलिए भगवान् वेदव्यास का यह अभिमत सर्वथा युक्तिसंगत ही है॥१३ ।। अब आशंका होती है कि जीवात्मा देह में रहते हुए शरीर द्वारा कैसे भोगों का उपभोग करता है? इसी का समाधान आचार्य अगले सूत्र में करते हैं- (५४८) भावे जाग्रद्वत्॥१४। सूत्रार्थ- भावे = इन्द्रियों से युक्त देह होने पर, जाग्रद्वत् = जाग्रत्-अवस्था के सदृश (भोगों का उपभोग होना युक्तिसंगत है)। व्याख्या-आचार्य जैमिनि की मान्यता के अनुसार जिस मुक्त हुए पुरुष को देह की प्राप्ति होती है, वह उस मानव देह के द्वारा वैसे ही उन भोगों का उपभोग करता है, जैसे यहाँ पर जाग्रत्-अवस्था में सामान्य मनुष्य विषयों की अनुभूति करता है। ब्रह्मलोक में ऐसा होना भी संभव है, अतः दोनों तरह की स्थिति को स्वीकारने में किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है॥१४॥ अब जिज्ञासा यह होती है जैमिनि ने जिस श्रुति-प्रमाण द्वारा मुक्तात्मा के अनेक देह होने की बात कही है, वे अनेक देह निरात्मक (जीवात्मा रहित) होते हैं या उनका स्वामी इससे पृथक् होता है? अगले सूत्र में आचार्य इसी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत करते हैं- (५४९) प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति ॥१५ ।। सूत्रार्थ- प्रदीपवत् = दीपक के सदृश, आवेशः = समस्त देह में मुक्तात्मा का प्रवेश होता है, हि = क्योंकि, तथा दर्शयति = ऐसा ही श्रुति में देखा जाता है। व्याख्या-जिस प्रकार से अनेक दीपकों में एक ही ज्योति आलोकित होती है अथवा एक ही जगह पर रखा हुआ दीपक का प्रकाश दूर-दूर तक अनेक स्थलों को प्रकाशित करता रहता है। जैसे- अनेक विद्युत् बल्बों में विद्युत् की एक ही शक्तिधारा प्रवाहित होकर उन सभी बल्बों को प्रकाशित करती रहती है, उसी प्रकार एक ही मुक्त हुआ आत्मा अपने संकल्प के द्वारा रचित समस्त देहों (शरीरों) में संव्याप्त होकर दिव्य लोक
Disclalimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushve intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 245
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० ४ सूत्र १७ २४७ के भोगों को भोगता रहता है; क्योंकि ऐसा ही श्रुति के अन्तर्गत छा.उ. ७/२६/२ में उस एक आत्मा को ही विभिन्न रूपों में होना दिखलाया गया है॥१५।। यह तो पहले ही कह चुके हैं कि सागर में नदियों के सदृश नाम-रूप से परे होकर मुक्तात्मा उस परब्रह्म में मिल जाता है। इसके अतिरिक्त श्रुति में अन्यत्र स्थलों में भी ऐसा ही उल्लेख प्राप्त होता है। फिर यहाँ उस मुक्तात्मा के विविध देह धरने एवं यथेच्छ भोग-भूमियों में विचरने की बात कैसे कही गई? इसी का समाधान अगले सूत्र में आचार्य करते हैं- (५५०) स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि॥१६ ॥ सूत्रार्थ- स्वाप्ययसम्पत्यो: = सुषुपति और मोक्ष-अर्थात् परब्रह्म की प्राप्ति (इन दोनों में से), अन्यतरापेक्षम् = किसी एक की अपेक्षा से (वे वचन) कहे हुए हैं, हि = क्योंकि, आविष्कृतम् = श्रुतियों में स्पष्ट किया गया है कि ऐश्वर्य-प्राप्ति संभव है। व्याख्या- सुषुप्ति और मोक्ष (परब्रह्म की प्राप्ति)-इन दोनों में से किसी एक अवस्था की अपेक्षा द्वारा ही ऐश्वर्य का प्राकट्य होना बतलाया गया है, क्योंकि सुषुप्तावस्था में आनन्द का वास्तविक भोग नहीं होता, किन्तु मोक्ष की स्थिति में संकल्प मात्र से ही ऐश्वर्य की प्राप्ति हो जाती है। इस अवस्था में सर्वज्ञता का उद्भव जीवात्मा की विशेष स्थिति होती है; क्योंकि सुषुप्ति की दशा में ज्ञान का सर्वथा अभाव बना रहता है। छा.उ.(६/८/१) एवं प्रश्नोप. (४/७/८) इन दोनों श्रुतियों में जो किसी भी तरह का ज्ञान न होने की एवं समुद्र में नदी की तरह से उस अविनाशी परब्रह्म में मिलने की बात कही गई है, वह कार्यब्रह्म के लोकों को प्राप्त होने वाले अधिकारी सत्पात्रों के लिए नहीं, वरन् लय-अवस्था को लेकर वैसा कथन किया गया है। (प्रलय काल में भी प्राणी की स्थति सुषुप्तिवत् ही होती है,अतः ऐसा लगता है कि उसका उल्लेख अलग सूत्रों में नहीं मिलता)। ऐसा ही वर्णन मु.उ. ३/२/८ एवं बृह. २/४/१२ में मोक्ष अर्थात् परब्रह्म की प्राप्ति को लेकर किया गया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि लय-अवस्था एवं मोक्ष प्राप्ति इन दोनों में से किसी एक के उद्देश्य से वैसा कथन किया गया है, क्योंकि ब्रह्मलोकों में गमनार्थ सत्पात्रों के लिए तो स्पष्ट शब्दों में वहाँ के दिव्य भोगों के भोग की, विभिन्न देह धरने एवं इच्छानुसार लोकों में भ्रमण की बात श्रुति के उन स्थलों में वर्णित है। अतः किसी भी तरह का विरोध नहीं है॥१६॥ अब जिज्ञासा होती है कि जब ब्रह्मलोक में गये हुए प्राणियों में इस तरह से अपने अनेक देह धारण कर भोगों को भोगने की शक्ति है,तब तो उनमें परब्रह्म की तरह से जगत् सर्जना आदि की भी शक्ति आ जाती होगी? इसी का समाधान सूत्रकार अगले सूत्र में करते हैं- (५५१) जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ॥१७॥ सूत्रार्थ- जगद्व्यापारवर्जम् = जगत् की संरचना आदि व्यापार को छोड़कर और अन्य बातों में ही उन प्राणियों की शक्ति (सामर्थ्य) होती है, प्रकरणात् = क्योंकि प्रकरण से यही सिद्ध होता है, च = और, असन्निहितत्वात् = जगत् की संरचना आदि कार्य में इन प्राणियों का निकटस्थ सम्बन्ध नहीं दर्शाया गया है (इसलिए भी उक्त कथन की सिद्धि होती है)। व्याख्या- श्रुतियों में मुक्तात्मा में परब्रह्म के सदृश व्यापकता न होने के कारण जगत् की संरचना आदि कार्यों को सम्पन्न करने की शक्ति-सामर्थ्य नहीं बतलायी गई है। श्रुति में जहाँ-जहाँ भी जगत् के उद्भव आदि का उल्लेख किया गया है, उस प्रकरण में यह सभी कार्य एकमात्र ब्रह्म के ही बतलाये गये हैं, मुक्तात्मा के नहीं। श्रुतियों में जहाँ-जहाँ पर इस जड़-चेतनात्मक सम्पूर्ण विश्व के उद्भव,संचालन एवं प्रलय का प्रकरण आया है, वे निम्रवत् हैं- छा.उ. ६/२/१ से ३,ऐ.उ. १/१, बृह.उ. ३/७/३ से २३ तक, तै.उ. ३/१,
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 246
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२४८ वदान्त दशन शत.ब्रा. १४/३/५/७ से ३१ में सर्वत्र उक्त कार्य को सम्पादित करने की सामर्थ्य एकमात्र परब्रह्म में ही कही गयी है। ब्रह्मलोक में गये मुक्त प्राणियों का सृष्टि-रचना आदि कार्य से सम्बन्ध कहीं पर भी नहीं मिलता है। इस प्रकार उक्त उद्धरणों (प्रमाणों) से यह सिद्ध हो जाता है कि जड़-चेतन सम्पूर्ण जगत् की रचना, उसकी गतिशीलता एवं प्रलय आदि जितने भी कार्य हैं, उनमें उन मुक्त प्राणियों की कुछ भी सामर्थ्य नहीं है, वे तो मात्र वहाँ के दिव्य भोगों को ही भोगने में समर्थ होते हैं॥१७॥ अब उक्त विषय पर पूर्वपक्ष उठाकर उसका समाधान करते हैं- (५५२) प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डलस्थोक्ते: ॥१८॥ सूत्रार्थ- चेत् - यदि कहो कि, प्रत्यक्षोपदेशात् = वहाँ जीवात्मा का प्रत्यक्ष रूप से पहुँचकर इच्छानुसार कार्य करने का (लोकों में विचरण करने का) उपदेश होने से सामर्थ्य होना सिद्ध होता है, इति न = तो ऐसी बात नहीं है, आधिकारिकमण्डलस्थ = क्योंकि अधिकारियों के लोकों में स्थित भोगों को भोगने के लिए ही, उक्ते: = कहा गया है। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् ७/२५/२ के अनुसार यदि यह आशंका करें कि वह स्वराट् हो जाता है, उसकी सभी लोकों में इच्छानुसार गमन की शक्ति-सामर्थ्य सिद्ध हो जाती है। तै.उ. १/६/२ भी कहता है कि 'वह जीवात्मा स्वाराज्य को प्राप्त हो जाता है'। इन श्रुति वचनों में उस जीवत्मा को स्पष्ट शब्दों में स्वराट् एवं स्वाराज्य को प्राप्त होना कहा गया है तथा इच्छानुसार समस्त लोकों में विचरण की सामर्थ्य से युक्त कहा गया है। इससे यह ज्ञात होता है कि उसका जगत् संरचना आदि कार्यों में भी अधिकार है, तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वहाँ (तै.उ. १/६/२ में) यह भी कहा गया है कि 'वह सबके मन के स्वामी को प्राप्त हो जाता है'। अतः उसकी सामर्थ्य उस ब्रह्मलोक की प्राप्ति के प्रभाव से है और वह ब्रह्मा के अधीन है। इसी कारण जगत् के कार्य में हस्तक्षेप करने की सामर्थ्य उसमें नहीं होती। उसे जो-जो शक्ति एवं अधिकार प्रदान किये गये हैं, वे मात्र उन-उन सत्पात्रों के लोकों में अवस्थित भोगों को भोगने की स्वतन्त्रता के लिए ही हैं। अतः उनकी स्वतन्त्रता सामर्थ्य मात्र दिव्य भोगों को भोगने तक ही सीमित है, सृष्टि संरचना आदि के कार्यों को सम्पन्न करने की नहीं ॥ १८ ॥ अब आशंका यह होती है कि यदि इस तरह के उन-उन लोकों के विकारमय भोगों को भोगने के लिए ही वे सब देह, सामर्थ्य एवं अधिकार आदि उसे प्राप्त हैं, तब तो दिव्य लोकों को पाने वाले कर्माधिकारियों की भाँति ही ब्रह्मविद्या का भी फल हुआ, तो फिर इसमें क्या विशिष्टता हुई? इसी का समाधान अगले सूत्र में आचार्य करते हैं- (५५३) विकारावर्ति च तथा हि स्थितिमाह॥१९॥ सूत्रार्थ- च = इसके अतिरिक्त, विकारावर्ति = वह मुक्तात्मा जन्म-मृत्यु आदि के विकारों से परे ब्रह्मरूप फल का अनुभव करता है, हि = क्योंकि, तथा = उसकी वैसी, स्थितिम् = स्थिति, आह - श्रुति बतलाती है। व्याख्या- मुक्तात्मा तो जन्म, जरा-मरण आदि के विकारों से परे होकर निरन्तर ब्रह्म की ही अनुभूति करता रहता है। तैत्तिरीय उपनिषद् (२.७.१) - ('रसौ वै सः। रसं हेवायं लब्ध्वाऽनन्दी भवति') के अनुसार 'वह ब्रह्म रसस्वरूप है, उसे पाकर जीवात्मा आनन्दमय हो जाता है।' इस प्रकार ब्रह्मविद्या की उपयोगिता परब्रह्म की उपलब्धि में ही सार्थक सिद्ध होती है। छा.उ. ८/१/५ में ब्रह्मविद्या का प्रमुख फल ब्रह्म-प्राप्ति ही कहा गया है- 'जो जन्म, जरा-मरण आदि विकारों से रहित, अजर-अमर, समस्त पापों से परे एवं कल्याणमय दिव्य गुणों से युक्त है।' इस श्रुति वचन से यह स्पष्ट होता है कि उसको मिलने वाला फल कर्मफल की तरह से विकार युक्त नहीं होता। ब्रह्मलोक के भोग तो मात्र आनुषङ्गिक फल हैं। ब्रह्मविद्या की सार्थकता तो एकमात्र ब्रह्म को पाने में ही है। तै.उ. २/७/१ में मुक्तात्मा की ऐसी अवस्था कही गई है- 'यदाह्येवैष
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this webelte is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslle can be used for propagation with prior written consent.
Page 247
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
अ० ४ पाद० ४ सूत्र २१ २४९ ....... गतो भवति' अर्थात् जब यह मुक्तात्मा इस देखने में न आने वाले देह से रहित, व्यक्त करने में न आने वाले एवं अन्य किसी का आश्रय न लेने वाले परब्रह्म में निमग्न होकर आनन्द लाभ लेता है और तभी वह उस निर्भय पद को प्राप्त कर लेता है, उसी में समाहित हो जाता है॥१९॥ अगले सूत्र में आचार्य पूर्व में कहे हुए सिद्धान्त को प्रमाण द्वारा और दृढ़ करते हैं- (५५४) दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने॥ २०॥ सूत्रार्थ-च = और (भी), एवम् = इसी प्रकार (वह शक्ति-सामर्थ्य से युक्त नहीं होता), प्रत्यक्षानुमाने = श्रुति और स्मृतियों में, दर्शयतः = देखने को मिलता है। व्याख्या- मुक्तात्मा सृष्टि का निर्धारण कर्त्ता नहीं हो सकता। यह कथन श्रुति- स्मृतियों के प्रमाणों द्वारा सिद्ध है। श्रुति में ब्रह्म का निर्गुणत्व प्रतिपादित किया गया है- न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं ...... । (कठ. २/ २/१५) 'सूर्य भी उस ब्रह्म के समक्ष प्रकाशित नहीं होता, तो फिर वहाँ चन्द्रमा, तारागण एवं अग्नि के प्रकाशित होने की बात ही नहीं उठती, इससे उस परम दिव्य ज्योति में विकार न होना सिद्ध होता है। छा. उ. ८/३/४ नामक श्रुति में स्पष्ट रूप से कहा गया है- 'वह परम ज्योति को प्राप्त हो अपने यथार्थ स्वरूप में युक्त हो जाता है'। यह आत्मा है, यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है।' आगे पुनः छा.उ.(८/४/१ एवं ८/१३/ १) में कहा गया है कि 'ब्रह्मलोक अन्य लोकों की तरह से विकार युक्त नहीं है।' श्रुति में उसे नित्य एवं समस्त पापों से रहित बतलाया गया है। ब्रह्म के धर्म से सम्पन्न ब्रह्मलोक में अवस्थित होकर जीव वहाँ के भोगों का ही अधिकारी सिद्ध होता है। वह ब्रह्म के कर्म से सम्पन्न नहीं होता; क्योंकि ब्रह्म ही सर्वेश्वर है। स्मृतियों के अन्तर्गत गीता (अ. १४/२) में कहा गया है कि 'इस ज्ञान की उपासना करके मेरे सदृश धर्मों को अर्थात् निर्लेपता आदि दिव्य कल्याणमय भावों को प्राप्त होते हैं, अतः वे (प्राणी) न तो जगत् की रचना काल में प्रकट होते हैं तथा न प्रलय काल में मरण का दुःख ही भोगते हैं।' इस प्रकार श्रुति एवं स्मृतियों में मुक्तात्मा की वैसी ही स्थिति प्रदर्शित की गई है। स्मृति में भी ब्रह्म को ही सृष्टि का नियामक कहा गया है। अल्प सामर्थ्य वाला महान् सामर्थ्य वाले को प्राप्त होकर उसके आश्रय से गुण-सम्पन्न हो सकता है, इसे स्वीकारने में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं होगा ॥२०॥ ब्रह्मलोक में गमन करने वाले मुक्त प्राणियों का जगत् के उद्भव आदि में अधिकार या शक्ति-सामर्थ्य नहीं है, इस पूर्वोक्त कथन को इस प्रकरण के समापन पर पुनः अगले सूत्र में आचार्य प्रमाणित करते हैं- (५५५ ) भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च।।२१।। सूत्रार्थ- भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् = ब्रह्मवत् अनुभव समता रूप भोग मात्र लक्षण से, च = भी (यही प्रमाणित होता है कि जीव-जगत् की संरचना आदि में उस (मुक्तात्मा) का अधिकार नहीं हो सकता)। व्याख्या- जिस तरह से वह ब्रह्मा सभी तरह के दिव्य कल्याणकारी भोगों को भोगता हुआ भी उन पदार्थों में संलिप्त नहीं होता, उसी तरह यह मुक्त प्राणी भी उस ब्रह्मलोक में निवास करते समय उपासना की अवधि में की हुई भावना के द्वारा प्राप्त हुए वहाँ के दिव्य भोगों का बिना देह के स्वप्नवत् एकमात्र संकल्प द्वारा या अन्य देह धारण पूर्वक जाग्रत् की भाँति भोगते हुए भी उनसे संलिप्त नहीं होता। इस प्रकार भोग मात्र में उस ब्रह्मा के साथ उसकी समानता है। इस समता रूप लक्षणों से भी यही प्रमाणित होता है कि जगत्-संरचना आदि कार्यों में उस मुक्तात्मा का ब्रह्मा के सदृश किसी भी अंश में अधिकार अथवा शक्ति-सामर्थ्य नहीं है।।२१ । यदि ब्रह्मलोक के निवासी मुक्तात्मा की शक्ति सीमित है, परब्रह्म के सदृश असीम नहीं है, तब तो फिर उसके भोग भोगने की अवधि पूरी होने पर उसका पुनः जन्म भी हो सकता है? इसी जिज्ञासा का समाधान करते हुए
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 248
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२५० वेदान्त दर्शन आचार्य अब इस पाद व अध्याय के सहित इस शास्त्र को पूर्णता प्रदान करते हैं- (५५६) अनावृत्तिः शब्दादनावृत्ति: शब्दात् ॥२२ ।। सूत्रार्थ- अनावृत्ति: = ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए मुक्तात्मा का पुनः आगमन (पुनर्जन्म) नहीं होता है, शब्दात्- यह बात श्रुति-वचनों द्वारा प्रमाणित हो चुकी है। अनावृत्तिः = पुनः आगमन नहीं होता, शब्दात् = यह बात श्रुति-वचन से पुष्ट होती है। ('अनावृत्ति शब्दात्' का दो बार प्रयुक्त होना समापन का संकेत है)। व्याख्या- जो भी मुक्तात्मा परब्रह्म में समाहित होकर दिव्य ब्रह्मलोक में अवस्थित हो जाता है। संसार में उसका पुनरागमन नहीं होता। वह इस संसार के आवागमन (जन्म-मरण) के चक्र से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है। बृह.उ. (६/२/१५), प्रश्नोप. (१/१०), छा.उ.(८/६/६,४/१५/६ एवं ८/१५/१) इत्यादि श्रुतियों में बारम्बार उपर्युक्त कथन विवेचित हुआ है कि दिव्य ब्रह्मलोक में गया हुआ ज्ञानी-साधक पुनः मृत्यु लोक में वापस नहीं आता। इस प्रकार शब्द-प्रमाण से स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि ब्रह्मलोक को पाने वाला अधिकारी वहाँ से पुनः इस मानवलोक में नहीं आता। दो बार 'शब्द-आवृत्ति' प्रयुक्त होने से सूत्रकार अध्याय के समापन का संकेत देते हैं॥२२॥
।। इति चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 249
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
परिशिष्ट-क
वेदान्तदर्शन-शब्दानुक्रमणिका
शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण अंश २.३.४३ ४.४.१ अन्तस्तल २.३.४७
अंशत्व १.२.१२ अधिष्ठाता ४.३.८ अन्धतामिस्त्र ३.१.१५
अंशभूत ३.२.२९ अधिष्ठात ४.२.१५ अन्नाभाव ३.४.२८ अंशांशि २.३.५२ अधिष्ठान-भूत १.४.१६ अन्वय २.२.२०
अंशी २.३.४३ अधोगति ३.१.१३,१९ अन्वाहार्यपचन १.२.२४ अक्षर १.३.१२ अध्याहार ३.३.११.२४ अपरब्रह्म ३.२.१२
अक्षि-पुरुष १.२.१६ अध्येता ४.१.१ अपरा १.२.२१
अखण्ड २.३.४३ अनन्त २.३.२ अपरिणामी १.३.६
अग्निविद्या ३.३.४७ अनन्यता २.१.१४ अपरिवर्तनशील २.३.११
अग्निहोत्र ३.४.३ अनवस्था २.२.१३ अपवर्ग २.२.१८
अग्निहोत्रादि ४.१.१६ अनश्वर २.३.३४ अपहतपाप्मा 3.3.6
अग्राह २.१.१० अनादिसिद्ध २.३.३९ अपूर्व ३.४.२१ अङ्र ३.४.५ अनिर्वचनीय ३.२.११ अपेक्षणीय ३.१.१०
अङ्ग भूत ३.४.२२ अनिष्टादि ३.१.१२ अपेक्षाकृत ४.१.१८
अङ्गाश्रित ३.३.६२ अनुगति २.१.५ अप्रकट २.१.१६
अचलत्व ४.१.९ अनुगृहीत ४.२.१७ अभय १.३.१९ अचिन्त्य २.१.२४ अनुज्ञा २.३.४८ अभिध्यान २.३.१३
अजन्मा १.१११ अनुत्पन्न २.३.८ अभिन्नत्व ३.२.२७
अजा १.४.८ अनुपपत्ति ३.३.३८ अभिप्रतारि १.३.३५
अजातशत्रु १.४.१६ अनुपादेयता R.R.R4 अभिप्राय २.४.१३
अणु २.३.२१ अनुप्रवेश २.३.४१ अभिप्रायानुसार ४.४७
अणुत्व १.२.७ अनुभव-जन्य २.३.१८ अभिप्रेरित १.२.३१
अण्डज ३.१.२१ अनुभूति ३.३.४५ अभिमत ४.३.१२ अतिमानवीय ३.४.३९ अनुवर्त्तन ३.३.५६ अभिरुचि ४.३.१४ अतिशयोक्ति ३.२.११ अनुवाक १.१.१२ अभिवर्द्धन ३.४.३२
अत्ता १.२.९ अनुशय ३.१.८ अभिव्यक्ति ३.१.११
अत्याज्य ३.४.२६ अनुष्ठान ३.४.७ अभीष्ट ३.३.२२ अथर्वण ३.३.३ अनुस्मृति २.२.२५ अभेदत्व ३.२.२८
अदृश्य २.४.६ अनेकश: ४.२१४ अभ्यर्थना ३.४.४४
अदृश्यत्व १.२.२२ अन्तरिक्ष १.३.४० अभ्युदय ३.१.१४
अदृष्ट २.२.१२ अन्तर्भाव २.३.५३,३.१.१८ अमरणधर्मा १.१.२४,२.३.४
अधिकार २.३.१२ अन्तर्यामी ४.१.३ अमानव-पुरुष ४.३.४ अधिपति २.२२१३.२.३२ अन्तर्वर्ती १.१.२० अमानव-महापुरुष ४.३.६
Disclalmer / Warning: All literary and artistic materlal on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 250
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२५२/ परिशिष्ट/ वेदान्त दर्शन शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण
अमुक्त ३.३.३२ आख्यायिका १.३.३५,२.३.४१ आश्मरथ्य १.२.२९१.४२० अमूर्त ३.२.२२ आख्यायित २.४.३ आश्रय १.३.५ अमृतत्त्व ४.१.१७ आगम २.२.४५ आश्रयभूत ३.२.२२,३.३.६५ अमृतसेतु १.३.१ आतिवाहिक ४.३.४ आश्वलायन ३.१.३
अरणि ३.४.३६ आत्मज्ञान ३.१.७ आश्वस्त १.४.१० अर्चि ४.३.१ आत्मनिवेदन ३.४,३८,४.१.१ आस्नव २.२.३३ अर्थभूत ४.३.१० आत्म-भाव ४.१.३ आहाद २.३.२३ अर्थान्तर १.४.१५ आत्म-विज्ञान १.४.२० आहवनीय १.२.२४
अवधारण ३.३.५२ आत्म-साक्षात् १.१.१९ इच्छित २.३.३८
अवयवयुक्त २.२.३५ आत्मसात् ३.४.२४ इतर ३.३.५५
अवयवरहित २.१.१० आत्मा ३.३.१६,४.४.३ इन्द्रियगोलकादि ३.२.२२
अवरोध ३.१.२३,३.३.६०, आत्रेय ३.४.४४ इष्टयज्ञ ३.१.१७
४.३.३ आदाता २.३.३५ इष्टापूर्त ३.१.१२
अवलम्बन १.३.३,३.१.२७, आधिदैविक १.१.२९.३.२.२२ ईक्षण १.१.५ ४.१.१७ आधिपत्य २.४.१७,४.४.१ ईथर २.२.२४ अवशेष ३.१.८ आधिभौतिक ३.२.२२ ईशिता १.१.२३
अवस्थान १.२.२५ आनन्दमय ३.३.१५ ईश्वरार्पण २.३.४२
अवस्थित ४.२.६ आनुषङ्गिक ४.४.१९ उक्त ३.३.४६
अवान्तर ३.३.५२ आपात् काल ३.४.२९ उच्चाश्रम ३.४.४०
अविनाशी ३.४.१,४.३.१० आस १.३.२ उच्छिष्ट ३.४.२८ अविभक्त ४.४.४ आप्तकाम ४.२.१३ उच्छेद २.३.१७ अविरोध २.३.६ आभास २.३.५० उच्छेदन ३.४.१८
अव्यक्त १.४.१ आभ्यन्तरिक २.२.१८ उत्क्रमण ३.१.१,४.२.१२
अव्यय १.२.२१ आयतन १.३.४ उत्क्रान्ति २.३.२०
अव्याकृत १.४.१५२१.१७, आरण्यक ३.२.४ उत्क्रान्तिकाल १.३.४२ ३.३.२ आरम्भक २.२.१६ उत्कृष्टता ३.३.४०
अष्टगुण १.३.२० आराध्य ३.३.५० उत्तरायण १.२.१६,४.२.२१, अष्टभेदी २.१.१४ आरोपण २.१.२९ ४.३.२
असत्कर्मा ३.१.१७ आर्तभाग ३.१.४ उत्ताल २.२.११ असीम २.२.९ आर्ष १.१.३ उत्पत्तिशील २.३.५ अस्तित्व २.४.११ आलम्बन २.२.२१ उदान ३.१.३
अहम् ३.३.२१ आलोकित ४.४.१५ उदासीन २.२.४ अहीन ४.४.१२ आवरण १.११२.२.२४, उद्गीथ ३.४१०,३.४.११ आंशिक ३.३.१ २.३.२८ ४.१.६
आकांक्षा २.४.१४ आवागमन २.३.२० उद्धरण ४.३.१३
आकाश १.३.४१ आवृत्ति ४.४.२२ उद्धृत २३.२४३.४.२५
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 251
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२५३/परिशिष्ट/ वेदान्त दर्शन शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण
उद्भव २.१.३०,२.३.११. ऊर्ध्वरेता ३.४.१८ काशकृत्स्न १.४.२१
३.२.१७,४.३.३ ऋत्विक् ३.४.४६ किञ्चिन्मात्र ३.३.५१
उद्भासित १.४.१ ऋत्विज् ३.४.३ कुण्डलाकारवत् ३.२.२७
उद्भिज्ज ३.१.२१ एकदेशीय २.२.३४,३.४.१० कुण्डलादिभाव ३.२.२७
उद्विग्न ४.२.१४ एकाग्र ४.१.८ कुम्भकार २.२.३९
उन्मान ३.२.३१ एकात्मता ३.२.६ कुम्भीपाक ३.१.१४
उन्मीलित ३.२.१० एकात्म १.२.१ केन्द्रक १.४.८
उपकरण २.१.२५ एकीकृत ४.२.४ कौषीतकि ३.३.२६ उपकोशलविद्या ३.३.५८ ऐक्य २.३.४३ क्रमिक १.४.१४
उपक्रम १.४.९ ऐतरेय १.१.६,३.२.४ क्रियमाण ४.१.१९
उपगम ४.२.४ ओंकार .१.९ क्षणभंगुर २.२.१८,३.२.४१
उपनयन १.३.३६ ओत-प्रोत १.३.१० क्षणिकवाद २.२.२५
उपनिषद् ४.१.११ औडुलोमि ४.४.६ क्षीरपायी २.२.३
उपन्यस्त ४.२.१४ औपनिषद् २.४.८ क्षुधापूर्ति ३.४.३०
उपपातकी ३.४.४२ औपनिषदिक १.१.५ क्षेत्र १.३.२७ उपभोग ४.४.१४ औपन्यासिक १.२.२३ क्षेत्रज्ञ २.३.२५ उपमेय ३.२.२० कं १.२.१५ खं १.२.१५
उपरत ३.४.४७ कटक-कुण्डल १.१.२ गन्तव्य २.२.७
उपलक्षण ३.१.२ कठोपनिषद् ४.३.१३ गर्भक्षेत्र ३.१.२७
उपसंहार ३.३.५,३.३.३९ कपूयचरण ३.१.११ गायत्री १.१.२५
उपाख्यान ३.४.२३ कम्पायमान १.३.३९ गार्हपत्य १.२.२४
उपादान २.१.१८ कर्तृक ४.४.१२ गुणातीत २.३.४७
उपादान-कारक १.४.२८ कर्मकृत ३.२.३८ गुणानुवाद ३.४.३४
उपादान-कारण १.३.११,३.२.३७ कर्माङ्ग ३.४.१४ गुरुतर २.१.३३ उपादेय २.२.२२ कर्मानुष्ठान ३.१.१० गोलक २.४.७ उपाधि २.३.५३ कर्माशय ३.१.११ गोत्र १.३.३७
उपाधिकृत ३.३.३६ कल्प २.३.१५ गौण २४४,४३.१२
उपासक ३.३.२० कल्पभेद १.४.१४ घटाकाश २.३.५१
उपासना १.४.१७ कल्पान्तर १.३.२८ घटीयन्त्र २.२.१९ उपास्य १.१.२१,३.३.२०, काण्व १.२.२० घ्राता २.३.३३
४.१.५ काण्व-शाखा १.४.१३ चक्षु १.२.१४
उपास्यत्व १.२.५ काम्यकर्म ३.२.४ चतुष्टय २.२.१८ उपेक्षणीय २.२.१७ कारणभूत २.१.१५ चमस १.४.८
उभयलिङ्गत्व ३.२.१२ कारण-शरीर १.४.१ चरमावस्था ३.३.३७ ऊर्ध्व १.३.१ कार्यब्रह्म ४.३.११ चित्त ४.१.८ ऊर्ध्वगमन ४.२.१८ कार्ष्णाजिनि ३.१.९ चित्रगुस ३.१.१६.
Disclalmer / Warning: All literary and artistic material on this webelte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the website can be used for propagation with prior written consent.
Page 252
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२५४ / परिशिष्ट/ वेदान्त दर्शन शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण
चिन्मय ४.४.१ तल्लिङ्ग १.१.२३ नानात्व ३.२.३६ चिन्मात्र २.१.२ तल्लीन ३.४.५१ नास्तिक ३.३.५३ चेतनकर्त्ता २.२.१ तादात्म्य ३.२.३४ नि:श्रेयस ३.१.१४ चेतनात्मक ४.४.१७ तितिक्षु ३.४.२७ निःसृत ३.४.२७ चैतन्य ३.२.१६ तृतीयान्त ३.४.४ निकटस्थ ४.३.९ चैतन्य तत्त्व १.१.१० तैत्तिरीय ३.२.३९ निकृष्ट २१.३४,३.२.४० चैतन्यमय ३.३.१८,४.४.५ त्रयीविद्या ३.३.६४ निक्षेपण १.४.२७ छान्दोग्य ४.१.१५ त्रिगुणात्मिका १.१.६ नित्य २.३.१ जंगम २.३.१६ त्रिणाचिकेताग्नि १.२.११ नित्यमुक्त २.१.२२ जगत्कर्म २.४.१५ त्र्यणुक २.२.११ निदिध्यासन १.४१९२१२६ जगद्रचना २.२.६ दक्षिणायन ४.२.२० ३.४.१२ जगन्नियन्ता ३.२.५ दहर १३.१४,३.३.७ निमित्तक २.१.३७ जठराग्नि १.२.२६ दहराकाश १.३.१७ निमित्त-कारक १.४.२८ जड़-चेतनात्मक १.४.२३ दिव्यधाम ४.४.५ निम्नानुगामी २.२.३ जड़-प्रकृति १.२.१९ दिव्यलोक १.१.२७ नियमन ११.२१२१२३ जरायुज ३.१.१२ दीर्घावधि १.३.३३ नियम्य ३.२.३५
जाग्रत् २.२.२९,४.४.१३ दुःसाध्य ३.३.४५ नियामक ११.२२२.४ जिज्ञासा १.१.१ दुष्कृत ३.१.११ ४.४.२० जीर्ण-शीर्ण १.३.१८ दूरश्रवण २.३.३१ निरवद्य २.१.२६ जीवन्मुक्त ४.२.१२ देवभाव ३.१.७ निरवयव २.१.२८ जीवन्मुक्ति ४.१.१४ देवयान ४.३.१ निरूपित २.४.१८,३.१.५ ज्ञाता ३.३.६६ देशकालातीत १.२.३१ निरोध २.२.२३ ज्ञानाग्नि ४.१.१४ देहपात ४.१.१५ निर्गुणत्व ४.४.२०
ज्ञानाश्रय २.३.४५ देहाश्रित १.२.२५ निर्दिष्ट २.४.१६ ज्ञेय ३.३.५४ दयु १.३.७ निर्भयत्व १.२.१७ ज्योतिर्मय १.३.३२ द्युलोक १.२.७,३.३.२३ निर्लिप्त ४.१.१७
तटस्थ १.१.२ द्योतक २.३.३६ निर्लिसता ३.२.२१ तत्त्वत: ३.२.२४ द्रष्टापन ३.३.४१ निर्लेंपता ४.४.२० तत्त्वमसि ३.२.३५ द्वन्द्व २.२.४७ निर्वहन ३.४७
तत्त्वात्मक ३.२.२८ द्वयणुक २.२.११ निर्वाह ३.४.१
तथ्यतः ४.२.२ द्वादशाह ४.४.१२ निर्विकार १.२.१४२१.२७
तदुक्तम् १.३.२१ धनुर्भाव ३.३.२५ निर्विशेष १.२.३२,
तन्तु २.१.१९ धर्माधर्म १.४.६ ३.२.११.१५
तन्मय ३.४.३३ ध्यातव्य ३.३.३१ निवर्तक २२४
तन्मात्रा १.४.११ ध्वनित २.४.३ निवृत्तिमूलक २.२१४
तर्क २.३.५० नश्व १.१.३ निश्चेष्ट २.४.१९
Disclalmer / Warning: All iterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 253
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२५५/ परिशिष्ट/ वेदान्त दर्शन शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण
निष्कल २.१.२६ परिमाण १.३.२५,३.२.९ प्रतिपादन २.२.३६,३.१.२४ निष्क्रियत्व २.२.२७ परिमाण्डल्य २.२.११ ४.३.१२ निष्णात ३.२.४ परिमाप १.३.२२,२.२.३४ प्रतिबिम्ब १.२.१७,३.२.२० निस्तारण १.४.२९,३.१.१२, परिलक्षित ३.२.१९ प्रतिबिम्बित ३.२.१८
३.३.४९ परिवेष्टित २.३.३०,३.१.३ प्रतिभाषित २.२.१८ निस्सार २.२.४१ परिष्कार २.३.३ प्रतिवाद ३.४.१८ निषिद्ध १.३.३८ परिष्कृत ३.२.२५ प्रतिसंख्या २.२.२२ नीलिमा २.२.२८ पाञ्चरात्र २.२.४२ प्रतिसर्ग २.३.१४ नेत्रान्तर्वती ३.३.२३ पाण्डित्य ३.४.४७ प्रत्यक्षीकरण २.३.१६
न्यूनतम २.२.१६ पारिप्लव ३.४.२३ प्रत्यय १.१.१३ पंचप्राण १.४.१२ पार्थक्य २.२.१० प्रतीकोपासना ३.३.१,४.१.४ पंचभूत ३.३.२४,४.२.५ पाशुपत २.२.३८ ४.३.१६ पंचभौतिक ४.२.६ पितृयान ४.३.५,४.२.२१ प्रतीति ३.२.३० पंचवृत्तियाँ २.४.१२ पिप्पलाद ३.१.३ प्रथमतः २.१.२६ पतितपावनता ३.२.२६ पुंसत्व २.३.३१ प्रदाता १.१.१७ पदच्युत ३.४.४३ पुण्यापुण्य १.२.२१ प्रद्युम् २.२.४३ पदार्थ २.२.३० पुत्रैषणा ३.४.४८ प्रमाणित ३.१.६
पदार्पण १.४.२ पुनरागमन २.१.३६,४.४.२२ प्रयुक्त १.२.२५ परदेवता ४.२.८ पुनर्कधन २.४.२२ प्रयोक्ता ३.४.१८
परब्रह्म १.१.२६,३.२.१९ पुनर्जन्म २.३.३०,४.२.२ प्रयोजन २.१.३२
४.१.१३,४.२.१५ पूर्वपक्ष ३.४.१३ प्रयोजनीय १.३.१६ परमगति ३.४.३७ पूर्वानुवाक १.४.१५ प्रलय १.१.२ परमाणु २.२.११ पूर्वापर १.२.१० प्रलयकाल ४.२.८ परमाणुवाद २.२.१५ पृथक्ता २.३.२६ प्रलयदशा २.३.९ परमात्मतत्त्व ४.३.११ प्रकृति १.१.११ प्रवर्तक २.२.४
परमात्मवत् १.४.२१ प्रख्यात ३.१.२० प्रवर्द्धित ३.३.४३
परमात्मामय ३.४.५२ प्रचुर ३.२.९,३.४.३ प्रवहमान ४.२.१६
परा १.२.२१ प्रजापति ४.३.३ प्रवाहण ३.१.१.
पराकाष्ठा १.३.२६ प्रज्ञान १.१.२८ प्रवृत्तिमूलक २.२.१४
परात्पर ३.४.१४.४.४ प्रज्ञानघन ४.४.६ प्रव्रज्या ३.४.२० पराप्रकृति ३.२.३४ प्रणव १.१.२५,३.४.३६ प्रसङ्ग १.१.१८ पराशक्ति २.१.२४ प्रणेता २.१.३ प्रसूता २.२.५ परिकल्पना ४.३.१२ प्रतर्दन १.१.२८ प्रस्थानत्रयी २३.४५.४११० परिणत २.१.७,३.१.६ प्रतिच्छाया ३.२.२९ प्राकट्य ३.२.५,४.४.१६ परिपक्वता ३.४.४७ प्रतिज्ञा-वाक्य १.४.२३ प्राकृत ३.२.२३ परिपुष्टता १.३.३० प्रतिपादक ३.२.३२ प्राजापत्य ३.३.६
Disclaimer / Warning: All literary and artistic materlal on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 254
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२५६/परिशिष्ट/ वेदान्त दर्शन शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण
प्राणमय ३.३.१८ ब्रह्म-सान्निध्य ४.१.५ मिथ्यात्व २.१.८ प्राणिसमुदाय १.३.१५ ब्रह्म सामीप्य ४.३.५ मिश्रित २.३.४९ प्रादुर्भाव २.१.१८,३.४.५० ब्रह्म-सायुज्य ३.३.२८ मीमांसा १.१.१
२.४.१ ब्रह्माण्ड १.१.२ मुक्तात्मा ४.४.८,२१ प्रादुर्भत ३.१.२१,४.४.५ ब्रह्मानन्दवल्ली ३.३.१२ मुक्तावस्था १.३.४३,३.२.२८ प्रादेश १.२.२ ब्राह्मी २.३.३१ ४.४.५
प्राधान्य २.४.२० ब्रीह्मादि ३.१.२६ मुक्ति ३.३.२९
प्रापक १२.४ भक्तवत्सलता ३.४.३८ मुग्धावस्था ३.२.१०
प्राप्तव्य १.३.२ भक्ष्याभक्ष्य ३.४.२८ मुमुक्षु ३.३.२८,४.३.९ प्रायश्चित्त ३.४.४१ भस्मसात् ३.४१६,४.१.१९ मूर्धन्यनाड़ी ४.२.१८
प्रारब्ध २.३.३७,४.१.१५ भामनी: १.२.१३ मृत्तिका २.१.१ प्रियशिरस्त्व ३.३.१३ भूताकाश १.१.२२ मैत्रायणी ३.३.५६ प्रेरयिता २.१.३१ भूमा १.३.९,४.३.१६ मोक्ष ४.२७,४४१ फलश्रुति ३.४.२ भोक्तापन १.२८.२.१.१३ यजमान ३.४.४५ फलोपभोग ३.१.१३ भ्रममूलक २.२.४० यजुष १.१.७ बहिर्गमन ४.२.४,४.२.११ भ्रमात्मक २.२.१९ यज्ञश्रुति ४.४.१२
बहिष्कृत ३.४.४३ मधुविद्या १.३.३१ यज्ञाङ्ग ३.३.६१
बहुवचनान्त ४.३.१२ मनस्तत्त्व २.२.४४ यथार्थ ४.४.१
बादरायण ४.३.१५ मनोगत १.२.६ यथोचित २.३.५१ बादरि १.२.३० मनोनुकूले ४.१.११ याज्ञवल्क्य ३.१.४,४.२१३
बाल्यभाव ३.४.४७ मनोमय १.२.२,३.३.१७ युक्तिसङ्गत २१.६,३.३.६१ बृहदारण्यक ३.३.७ मन्तव्य ४.३.१२ ४.४.१३ बोद्धा २.३.३३ मन्ता २.३.३३ रथी २.३.२८
ब्रह्म १.१.२.३.२.१४ मयट् १.१.१४ रश्म्यनुसारी ४.३.१
ब्रह्मकारणवाद २.२.८ मरण-धर्मा २.२.४१ रसयिता २.३.३३
ब्रह्मज्ञ 3.3.33 मरणोत्तर ४.२७ रुचिका २.२.३७
ब्रह्मज्ञान ४.१.१ महत् १.४.५.७ रूपस्कन्ध २.२.१८
ब्रह्मज्ञानी ४.१.१३,४.२.१९ महत्तत्व १.८.७ रौरव ३.१.१५ ब्रह्मभावापन्न १.१.३० महाप्रलय १.३.३० लम्बर ४.३.२
ब्रहमरन्त्र ४.२.४ महाब्राह्मण २३.३४ लिङ्गशरीर ४.२.१७ ब्रह्मलोक ४.२.७ महायश ४.३.१४ लिस २.३.४६
ब्रह्मवत् ४.४.५ माण्डक्य ३.२.३३ लीन ४.२.३ ब्रह्मविद्या ३.४.३,४.३.७ माध्यन्दिनि १.२.२० लोकपाल १.१.३१
ब्रह्मवेत्ता ३.४.२७,३.४.४९ मानवाकार 6.3.४ लोकसंग्रह ३.४.९,४११६
ब्रह्मसाक्षात्कार ३.३.५९ मान्त्रवर्णिक १.१.१५ लोम २.३.२७
ब्रह्म-साधम्य १.३.२३ मायी १.४.४ वर्णाश्रम ३.४.२६
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 255
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२५७/ परिशिष्ट/ वेदान्त दर्शन शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण
वर्णाश्रमी ३.१.८ वीतराग २.१.३३ षडायतन २.२.११ वर्णित २.३.४४ वीर्यवाहिनी ३.४.१७ षोडशी ३.३.२६
वसुत्व १.३.३१ वेदनास्कन्ध २.२.१८ संकर्षण २.२.४२
वाक्यांश १.४.२६,३.१.२६ वेदाध्ययन ३.४.६ संकल्पगत ३.३.३०
३.३.४१ वेदानुकूल २.१.१ संगति १.२.२८ वाक्यैक्यता २.३.१० वेदान्त ३.३.४४ संघात २.२.१८ वागिन्द्रिय .४.२ वैतरणी ३.१.१५ संज्ञात्मक ३.३.८
वाङ्मय ३.३.४८ वैपुल्यार्थक १.३.८ संधान ३.३.२५
वाच्य १.१.२२ वैभाषिक २.२.१८ संप्राप्य ४.१.१२ वाञ्छित ४.१.२ वैभिन्न्य २.४.१९ संयद्गाम १.२.१३ वानप्रस्थी ३.४.१७ वैशेषिक २.२.११ संरचना १.३.२९.३.२.१, वामनी: १.२.१३ वैश्वानर १.२.२४,३.३.५६ ४.४.१८ वायवीय २.२.११ वैषम्य २.१.३५,२.३.२४ संलग्न १.२.३२ विकल्प ३.३.४२,४.४.११ व्यतिक्रम ३.४.४० संलिस ३.४११४४२१
विकारात्मक १.३.७ व्यतिहार ३.३.३७ संवत्सर ४.३.२ विचरण २.४.५ व्याख्याता १.४.२९ संवर २.२.३३ विज्ञाता ३.३.३५ शकट १.३.३४ संवेदनात्मक २.२.१ विज्ञाति ३.३.३५ शब्द ३.३.१० संव्यासत ३.२.३७,४४.१५ विज्ञानमय ३.३.१७,४.२.१५ शमन ३.४,१६ संश्लेषण ४.१.१३ ४.४.२ शरणागति ३.४.३७ संस्कार २.२.१९ विज्ञानवादी २.२.३१ शरशय्यासीन ४.२.२१ संहर्त्ता १.४.३ विज्ञानस्कन्ध २.२.१८ शाकल्य ३.४.२५ संहारक १.२.९ विद्वज्जन ३.२.१३ शाखान्तर ३.३.५६ सकाम ३.३.६० विधिशेष ३.३.५ शाण्डिल्यविद्या ३.३.१९,५८ सञ्चित ३.४.३६ विभु २.१.२,२.३.२१, शाश्वत १.३.२४,३.३.३९ सत् १.१.९ ४.४.२ शिरोव्रत ३.३.३ सत्कार्यवाद २.१.३७ विरक्त ३.४.९ शिल्पी २.३.४७ सत्पात्र ४.३.१६ विरोधाभास ३.१.१३ शिष्ट २.१.१२ सत्पुण्डरीक ३.२.१७ विलक्षण २.१.४ शुद्धान्त:करण ४.३.११ सत्यकाम १.३.३६ विलय ३.२.८ शूद्राधिकरण १.३.३८ सत्यसंकल्पत्व ३.२.१८ विवेचित ३.३.३४ श्रवणीय ३.४.२३ सत्यसंकल्पमय ४.४.८ विशेषण १.२.१८ श्रुति-स्मृति ३.१.८,४.१.७ सत्र ४.४.१२ विश्लेषण १.३.३९,३.३.१४ श्रेय ३.४.८ सन्तति ३.४.१८ विश्वरूप १.२.२७ श्रेयस्कर ४.३. सन्नद्ध ३.३.४३ विषयोपलब्धि २.३.३२ श्वेताम्बर ३.२.५,३.२.२४, समनन्तर २.२.२१ विस्मृत ३.२.६ ४.१.११ समन्वय १.१.४,३.४.६
Disclalmer / Warning: All lterary and artistic material on this webslte is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 256
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२५८/ परिशिष्ट/ वेदान्त दर्शन शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण शब्द सूत्रविवरण
समरूपता ३.४.२९ सर्वाङ्ग २.२.९ सृष्ट्युत्पत्ति २.३.५२ समवाय २.२.११ सर्वाङ्गपूर्ण ३.३.५७ सौत्रान्तिक २.२.१८ समवायिकारण २.२.१३ सर्वात्मकत्व १.२.३ सौहार्द ३.२.२६ समवेष्टित २.१.१९ सर्वाधार ३.२.३१ स्तवन ३.३.२६ समाधि २.३.३९,३.२.२४ सर्वान्तर्यामी ३.४.३६ स्थायित्व ३.२.३
समावर्तन ३.४.६ सर्वेश्वर ४.४२० स्थावर २.३.१६,३.१.२१ समाविष्ट ४.२.१ सर्वोत्कृष्टता ३.२.३१ स्थिति १.१.२ समाहार ३.३.६३ सविशेष १.२.३२,३.२.१५ स्थूल २.४.२१४.२.१० समीक्षा १.१.१ सहकारि २.२.२१ ४.४.१० समीचीन ३.२.२१ सहजप्राप्य ४.१.११ स्नातक ३.४.१२ समुच्चय ३.४.८ सांकेतिक ४.२.६ स्पन्दन २.४.९ समुदाय १.४,२५ सांख्य २.१.११ स्प्रष्ट २.३.३३ समुद्यत २.४.१० सांख्यस्मृति २.१.१ स्मृतिग्रन्थ ४.१.१० सम्पादनार्थ ३.४.४ साक्षात्कार ३.४.३५ स्मृति प्रमाण ४.१.१०
सम्पृक्त २.३.४९,४.४.१० सात्विक २.१.३४ स्रष्टा २१.२२२.४२०
सम्प्रदाय ३.४.४३ साधक १.२.१ ३.२.३५
सम्प्रसाद १.३.८ सामर्थ्य १.१.१६ सुग्दण्ड ३.४.२० सम्भ्रमशून्य १.२.२ साम्य ३.३.२७ सुवा ३.४.२५ सम्मतिमात्र ३.४,१४ साम्यावस्था २.२.८ स्वकर्मानुसार ३.२५ सम्मिश्रण २४.२२३.१.२ सारथि २.२.२,२.३.२८ स्वपिति २.३.३५ सम्यक् १.४.२२,३.४.३१ सावयव २.१.७ स्वप्नगत ३.२.७७ सर्ग २.३.१४ सूक्ष्म २.३.२२,४.२१० स्वप्नवृत्ति २.३.३४ सर्गकाल १.४.१८,२.३.३ सूक्ष्मभूत ४.२९ स्वप्नावस्था ४.४.१३ सर्जना ४.३.९ सूक्ष्मांश २.४.२ स्वाध्याय ३.४.६ सर्वज्ञ २.१.२१ सूक्ष्मातिसूक्ष्म ३.३.३३ स्वाश्रयत्व १.३.९
सर्वज्ञता ४.४.१६ सूत्रात्मा १.२.१८ स्वेच्छाचारिता ३.४.५० सर्वज्ञत्व ३.२.२६ सूर्यद्वार ४.२.२० स्वदेज ३.१.२१ सर्वज्ञाता २.३.३१ सूर्यमण्डलवर्ती ३.३.२३ हवनीय ३.१.५ सर्वधर्मा २१.३७ सुकृत ३.१.११ हस्तक्षेप ४.४.१८ सर्वनियन्ता ३.२.३ सुप्तावस्था ३.१.२५ हिरण्यगर्भ १.३.१३,४.४.९ सर्वभूतहितरत ४.२.१४ सुषुसावस्था ४.४.१६ हिरण्यमय २.३.३४ सर्वव्यापक ३.३.२ सुषुम्ना ४.२.९ हृदयदेश २.३.२९ सर्वव्यापकत्व १.२.३,३.२.१८ सुसंगत ४.४.११ हेय १.१.८
३.३.९ सृजेता ३.२.२३ ह्रस्व २२.११ सर्वशक्तिमत्त्व १.२.३ सृष्टि २.१.२०.३.२.२ सर्वशून्यवाद २.२.३२ सृष्टि-सर्जना १.४.२४
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 257
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
परिशिष्ट-ख वेदान्तदर्शन-सूत्रानुक्रमणिका
सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण
अंशो नानाव्य २.३.४३ अनवस्थितेरसम्भवाच्च १.२.१७ अपि च स्मर्यते २.३.४५ दर्शयति २.४.११ अनारब्धकार्ये एव तु ४.१.१५ ३.४.३० अक्षरधियां ३.३.३३ अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ३.४.५० ३.४.३७
अक्षरमम्बरान्तधुते: १.३.१० अनावृत्ति: शब्दाद ४.४.२२ अपि च संराधने ३.२.२४
अग्रिहोत्रादि ४.१.१६ अनियम: सर्वेषाम ३.३.३१ अपि चैवमेके ३.२.१३ अग्न्यादि ३.१.४ अनिष्टादिकारिणामपि ३.१.१२ अपीतौ तद्वत् प्रसङ्गा २.१.८
अङ्गावबद्धास्तु ३.३.५५ अनुकृतेस्तस्य च १.३.२२ अप्रतीकालम्बना ४.३.१५ २.२.८ अनुज्ञापरिहारौ २.३.४८ अबाधाच्च ३.४.२९ अङ्गेषु यथाश्रयभावः ३.३.६१ अनुपपत्तेस्तु न १.२.३ अभावं बादरिराह ४.४.१० अचलत्वं चापेक्ष्य ४.१.९ अनुबन्धादिभ्यः ३.३.५० अभिध्योपदेशाच्च १.४.२४
अणवक्ञ २.४.७ अनुष्ठेयं बादरायण ३.४.१९ अभिमानिव्यपदेश २.१.५ अणुश्च २.४.१३ अनुस्मृतेर्बादरि: १.२.३० अभिव्यक्तेरित्या १.२.२९ अत एव च नित्यत्वम् १.३.२९ अनुस्मृतेश्च २.२.२५ अभिसन्ध्यादिष्वपि २.३.५२ अत एव च सर्वाण्यनु ४.२.२ अनेन सर्वगतत्वमाया ३.२.३७ अभ्युपगमेऽप्यर्था २.२.६ अत एव चाग्री ३.४.२५ अन्तर उपपत्ते १.२.१३ अम्बुवदग्रहणात्तु न ३.२.१९ अत एव चानन्या ४.४.९ अन्तरा चापि तु ३.४.३६ अरूपवदेव हि ३.२.१४
अत एव चोपमा ३.२.१८ अन्तरा भूतग्राम ३.३.३५ अर्चिरादिना तत्प्रथिते: ४.३.१ अत एव न देवता १.२.२७ अन्तरा विज्ञानमनसी २.३.१५ अर्भकौकस्त्वात्तद् १.२.७
अत एव प्राण: १.१.२३ अन्तर्याम्यधिदैवादिषु १.२.१८ अल्पश्रुतेरिति १.३.२१ अतः प्रबोधोऽस्मात् ३.२.८ अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा २.२.४१ अवस्थितिवैशेष्यादिति २.३.२४ अतश्चायनेऽपि ४.२.२० अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् १.१.२० अवस्थितेरिति काश १.४.२२ अतस्त्वितर ३.४.३९ अन्त्यावस्थितेश्चो २.२.३६ अविभागेन दृष्टत्वात् ४.४.४ अतिदेशाच्च ३.३.४६ अन्यत्राभावाच्च न २.२.५ अविभागो वचनात् ४.२.१६ अतोऽनन्तेन ३.२.२६ अन्यथात्वं शब्दादिति ३.३.६ अविरोधश्चन्दनवत् २.३.२३ अतोऽन्यापि ४.१.१७ अन्यथानुमितौ च २.२.९ अशुद्धमिति चेन्न शब्द ३.१.२५ अत्ता चराचरग्रहणात् १.२.९ अन्यथाभेदानुप ३.३.३६ अश्मादिवच्च २.१.२३ अथातो ब्रह्मजिज्ञासा १.१.१ अन्यभावव्यावृत्तेश्च १.३.१२ अश्रुतत्वादिति ३.१.६ अदृश्यत्वादि १.२.२१ अन्याधिष्ठितेषु ३.१.२४ असति प्रतिज्ञोपरोधो २.२.२१ अदृष्टानियमात् २.३.५१ अन्यार्थ तु जैमिनि: १.४.१८ असदिति चेन्न प्रतिषेध २.१.७ अधिकं तु भेद २.१.२२ अन्यार्थश्च परामर्श: १.३.२० असद्वयपदेशान्नेति २.१.१७ अधिकोपदेशात्तु ३.४.८ अन्वयादिति ३.३.१७ असंतते श्चाव्यतिकर: २.३.४९ अधिष्ठानानु २.२.३९ अपरिग्रहाच्चात्यन्त २.२.१७ असम्भवस्तु सतोऽ २.३.९
अध्ययनमात्रवतः ३.४.१२ अपि च सस ३.१.१५ असार्वत्रिकी ३.४.१० अनभिभवं च दर्शयति ३.४.३५ अपि च स्मर्यते १.३.२३ अस्ति तु २.३.२
Disclaimer / Warning: All lterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.
Page 258
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२६०/परिशिष्ट-ख/वेदान्त दर्शन
सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण
अस्मित्नस्य च तद्योगं १.१.१९ उत्क्रान्तिगत्या २.३.१९ कामादीतरत्र तत्र ३.३.३९ अस्यैव चोपपत्तेरेष ४.२.११ उत्तराच्चेदाविर्भू १.३.१९ काम्यास्तु यथाकामं ३.३.६० आकाशस्तल्लङ्गात् १.१.२२ उत्तरोत्पादे २.२.२० कारणत्वेन १.४.१४ आकाशे चाविशेषात् २.२.२४ उत्पत्त्यसम्भवात् २.२.४२ कार्यं बादरिरस्य ४.३.७ आकाशोर्थाऽन्तर १.३.४१ उदासीनानामपि २.२.२७ कार्याख्यानादपूर्वम् ३.३.१८ आचारदर्शनात् ३.४.३ उपदेशभेदान्नेति १.१.२७ कार्यात्यये तदध्यक्षेण ४.३.१० आतिवाहिकास्त ४.३.४ उपपत्तैश्च ३.२.३५ कृत्प्रयत्नापेक्षस्तु २.३.४२ आत्मकृते:परिणामात् १.४.२६ उपपद्यते २.१.३६ कृतात्ययेऽनु ३.१.८ आत्मगृहीति ३.३.१६ उपपन्नस्त ३.३.३० कृत्स्नभावातु ३.४.४८ आत्मनि चैवं विचित्रा २.१.२८ उपपूर्वमपि त्वेके ३.४.४२ कृत्स्नप्रसक्ति २.१.२६ आत्मशब्दाच्च ३.३.१५ उपमर्द च ३.४.१६ क्षणिकत्वाच्च २.२.३१ आत्मा प्रकरणात् ४.४.३ उपलब्धिवदनियम: २.३.३७ क्षत्रियत्वावगते श्रो १.३.३५ आत्मेति तूपगच्छन्ति ४.१.३ उपसंहारदर्श २.१.२४ गतिशब्दाभ्यां १.३.१५ आदरादलोप: ३.३.४० उपसंहारोऽर्था ३.३.५ गतिसामान्यात् १.१.१० आदित्यादिमतयश्चाङ्ग ४.१. उपस्थितेऽतस्त ३.३.४१ गतेरर्थवत्त्व ३.३.२९ आध्यानाय ३.३.१४ उपादानात् २.३.३५ गुणसाधारण्य ३.३.६४ आनन्दमयो १.१.१२ उभयथा च दोषात् २.२१६ गुणाद्वा लोकवत् २.३.२५
आनन्दादय: ३.३.११ उभयाथा च दोषात् २.२.२३ गुहां प्रविष्टावात्मानौ १.२.११ आनर्थक्यमिति ३.१.१० उभयथापि न कर्मा २.२.१२ गौणश्चेन्नात्मशब्दात् १.१.६ आनुमानिकम १.४.१ उभयव्यपदेशात्व ३.२.२७ गौण्यसम्भवात् २.३.३
आपः ... २.३.११ उभयव्यामोहा ४.३.५ गौण्यसम्भवात् २.४.२ आ प्रायणात्तत्रापि ४.१.१२ ऊर्ध्वरेतस्सु च ३.४.१७ चक्षुरादिवत्तु २.४.१० आभासा एव च २.३.५० एक आत्मनः शरीरे ३.३.५३ चमसवदविशेषात् १.४.८ आमनन्ति १.२.३२ एतेन मातरिश्वा २.३.८ चरणादिति ३.१. आ्त्विज्यमित्यौ ३.४.४५ एतेन योग: प्रयुक्ता: २.१.३ चराचरव्यपाश्रयस्तु २.३.१६ आवृत्तिरसकृदु ४.१.१ एतेन शिष्टापरिग्रहा २.१.१२ चितितन्मान्नेण ४.४.६ आसीन: सम्भवात् ४.१.७ ऐतेन सर्वे व्याख्याता १.४.२९ छन्दत उभयथा ३.३.२८ आह च तन्मात्रम् ३.२.१६ एवं चात्मा २.२.३४ छन्दोऽभिधानान्नेति १.१.२५ इतरपरामर्शात्स १.३.१८ एवं मुक्तिफला ३.४.५२ जगद्वाचित्वात् १.४.१६ इतरव्यपदेशा २.१.२१ एवमप्युपन्यासा ४.४.७ जगद्व्यापारवर्ज ४.४.१७ इतरस्याप्येव ४.१.१४ ऐहिकमप्यप्रस्तुत ३.४.५१ जन्माद्यस्य यतः १.१.२
इतरेतरप्रत्य २.२.१९ कम्पनात् १.३.३९ जीवमुख्य १.४.१७ इतरेत्वर्थसामान्यात् ३.३.१३ करणवच्चेन्न २.२.४० जीवमुख्यप्राणलिङ्गा १.१.३१ इतरेषां चानुपलब्धे: २.१.२ कर्त्ताशास्त्रार्थवत्त्वात् २.३.३३ ज्ञेयत्वावचनाच्च १.४.४ इयदामननात् ३.३.३४ कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च १.२.४ ज्ञोऽत एव २.३.१८ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् १.३.१३ कल्पनोपदेशाच्च १.४.१० ज्योतिराद्यधिष्ठानं २.४.१४ ईक्षतेर्नाशब्दम् १.१.५ कामकारेण चैके ३.४.१५ ज्योतिरुपक्रमा तु १.४.९ उत्क्रमिष्यत १.४.२१ कामाच्च नानुमाना १.१.१८ ज्योतिर्दर्शनात् १.३.४०
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webalte can be used for propagation with prior written consent.
Page 259
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२६१/परिशिष्ट-ख/वेदान्त दर्शन
सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण
ज्योतिश्चरणाभि १.१.२४ तृतीयशब्दावरोध ३.१.२१ न वायुक्रिये पृथगु २.४.१ ज्योतिषि भावाच्च १.३.३२ तेजोऽतस्तथा २.३.१० न वा विशेषात् ३.३.२१ ज्योतिषैकेषामसत्यत्ने १.४.१३ त्रयाणामेव १.४.६ न वियदश्रुते: २.३.१ त इन्द्रियाणि २.४.१७ त्रयात्मकत्वात्तु ३.१.२ न विलक्षणत्वादस्य २.१.४ तच्छते: ३.४.४ दर्शनाच्च ३.१.२० न संख्योपसंग्रहादपि १.४.११ तडितोऽधि वरुण: ४.३.३ ३.२.२१ न सामान्यादप्यु ३.३.५१ तत्तु समन्वयात् १.१.४ ३.३.४८ न स्थानतोऽपि ३.२११ तत्पूर्वकत्वाद्वाच: २.४.४ ३.३.६६ नाणुरतच्छृतेरिति २.३.२१ तत्प्राक्छ तेच्श्च २.४.३ ४.३.१३ नातिचिरेण विशेषात् ३.१.२३ तत्रापि च तद्व्यापारा ३.१.१६ दर्शयतश्षैवं ४.४,२० नात्माश्रुतेर्नित्यत्वाच्च २.३.१७ तत्साभाव्यापत्ति ३.१.२२ दर्शयति च ३.३.४ नाना शब्दादिभेदात् ३.३.५८ तथा च दर्शयति २.३.२७ 11 ३.३.२२ नानुमानमतच्छब्दात् १.३.३ तथा चैकवाक्यतोप ३.४.२४ दर्शयति चाथो ३.२.१७ नाभाव उपलब्धे: २.२.२८ तथान्यप्रतिषेधात् ३.२.३६ दहर उत्तरेभ्यः १.३.१४ नाविशेषात् ३.४.१३
तथा प्राणाः २.४.१ दृश्यते तु २.१.६ नासतोऽदृष्टत्वात् २.२.२६ तदधिगम ४.१.१३ देवादिवदपि लोके २.१.२५ नित्यमेव च भावात् २.२१४ तदधीनत्वादर्थवत् १.४.३ देहयोगाद्वासोऽपि ३.२.६ नित्योपलब्ध्यनु २.३.३२
तदनन्यत्वमारम्भण २.१.१४ द्युभ्वाद्यायतनं १.३.१ नियमाच्च ३.४.७ तदन्तरप्रतिपत्तौ ३.१.१ द्वादशाहवदु ४.४.१२ निर्मातारं चैके ३.२.२ तदभावनिर्धारणे १.३.३७ धर्म जैमिनिरत एव ३.२.४० निशि नेति चेन्न ४.२.१९ तदभिध्यानादेव २.३.१३ धर्मोपपत्तेश्च १.३.९ नेतरोऽनुपपत्ते: १.१.१६ तदभावो नाडीषु ३.२.७ धृतेश्च महिम्रोऽस्या १.३.१६ नैकस्मिन्दर्शयतोहि ४.२.६ तदव्यक्तमाह हि ३.२.२३ ध्यानाच्च ४.१.८ नैकस्मिन्नसम्भवात् २.२.३३ तदापीते: संसारव्यप ४.२.८ न कर्माविभागादिति २.१.३५ नोपमर्देनातः ४.२.१० तदुपर्यपि बादरायण: १.३.२६ न च कर्तु: २.२.४३ पञ्चवृत्तिर्मनो २.४.१२ तदोकोग्रज्वलनं ४.२.१७ न च कार्ये ४.३.१४ पटवच्च २.१.१९ तद्गुणसारत्वातु २.३.२९ न च पर्यायादप्य २.२.३५ पत्यादिशब्देभ्यः १.३.४३ तद्धेतुव्यपदेशाच्च १.१.१४ न च स्मार्तमतद्ध १.२.१९ पत्युरसामञ्जस्यात् २.२.३७ तब्दुतस्य तु नातभावो ३.४.४० न चाधिकारिकमपि ३.४.४१ २.२.३ तद्वतो विधानात् ३.४.६ न तु दृष्टान्त २.१.१ परं जैमिनिर्मुख्यत्वात् ४.३.१२ तन्निर्धारणानियम ३.३.४२ न तृतीये तथोपलब्धे: ३.१.१८ परमतः सेतून्मान ३.२.३१ तत्निष्ठस्य १.१.७ न प्रतीके न हि सः ४.१.४ परातु तच्छ्रते: २.३.४१ तन्मनः प्राण उत्तरात् ४.२.३ न प्रयोजनवत्त्वात २.१.३२ पराभिध्यानान्न ३.२.५ तन्वभावे संध्यवदु ४.४.१३ न भावोऽनुपलब्धे २.२.३० परामर्शं जैमिनि ३.४,१८ तर्काप्रतिष्ठानादप्य २.१.११ न भेदादिति चेन्न ३.२.१२ परेण च शब्दस्य ३.३.५२ तस्य च नित्यत्वात् २.४.१६ न वक्तुरात्मोप १.१.२९ पारिपल्वार्था इति ३.४.२३ तानि परे तथा ह्याह ४.२.१५ न वा तत्सहभावा ३.३.६५ पुंस्त्वादिवत्त्वस्य २.३.३१ तुल्यं तु दर्शनम् ३.४.९ न वा प्रकरणभेदा ३.३.७ पुरुषविद्यायामिव ३.३.२४
Disclaimer / Warning: All Iiterary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclushe intellectual property of the owner of the website. Any attempt to intringe upon the owners copyrights or any other form of intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 260
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२६२/ परिशिष्ट-ख/ वेदान्त दर्शन
सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण
पुरुषार्थोऽतश्शब्दा ३.४.१ भाक्तं वा नात्मवित्वा ३.१.७ योगिन: प्रति च ४.२.२१ पुरुषाश्मवदिति २.२.७ भावं जैमिनिर्विकल्पा ४.४.११ योनिश्च हि गीयते १.४.२८ पूर्ववद्धा ३.२.२९ भावं तु बादरायणो १.३.३३ योने: शरीरम् ३.१.२७ पूर्वविकल्पः प्रकरणा ३.३.४५ भाव शब्दाच्च ३.४.२२ रचनानुपपत्तेश्च २.२.१ पूर्व तु बादरायणो ३.२.४१ भावे चोपलब्धे: २.१.१५ रश्म्यनुसारी ४.२.१८ पृथगुपदेशात् २.३.२८ भावेजाग्रद्वत् ४.४.१४ रूपादिमत्त्वाच्च २.२.१५ पृथिव्यधिकाररूप २.३.१२ भूतादिपादव्यपदेशोप १.१.२६ रूपोपन्यासाच्च १.२.२३ प्रकरणाच्च १.२.१० भूतेषु तच्छुते: ४.२.५ रेत: सिग्योगोऽथ ३.१.२६ प्रकरणात् १.३.६ भूमा सम्प्रसादादध्यु १.३.८ लिङ्गभूयस्त्वात्तद्धि ३.३.४४ प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात् ३.२.१५ भूम्र: क्रतुव ३.३.५७ लिङ्गाच्च ४.१.२ प्रकाशादिवच्चावै ३.२.२५ भेदव्यपदेशाच्च १.१.१७ लोकवत्तु लीला २.१.३३ प्रकाशादिवन्नैवं पर: २.३.४६ भेदव्यपदेशाच्चान्यः १.१.२१ वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि १.४.५
प्रकाशाश्रयवद्वा ३.२.२८ भेदव्यपदेशात् १.३.५ वाक्यान्वयात् १.४.१९ प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टा १.४.२३ भेदश्रुतेः २.४.१८ वाङ्मनसि दर्शनाच्छ ४.२.१ प्रकृतैतावत्त्वं हि ३.२.२२ भेदान्नेति ३.३.२ वायुमब्दादविशेष ४.३.२ प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्ग १.४.२० भोक्त्रापत्तेरविभाग २.१.१३ विकरणत्वान्नेति २.१.३१ प्रतिज्ञाहानिरव्य २.३.६ भोगमात्रसाम्य ४.४.२१ विकल्पोऽविशिष्ट ३.३.५९ प्रतिषेधाच्च ३.२.३० भोगेन त्वितरे ४.१.१९ विकारावर्ति च ४.४.१९ प्रतिषेधादिति चेत्र ४.२.१२ मध्वादिष्वसम्भवाद १.३.३१ विकारशब्दान्नेति १.१.१३ प्रतिसंख्याप्रति २.२.२२ मन्त्रवर्णाच्च २.३.४४ विज्ञानादिभावे वा २२४४ प्रत्यक्षोपदेशादिति ४.४.१८ मन्त्रादिवद्वाविरोधः ३.३.५६ विद्याकर्मणोरिति ३.१.१७ प्रथमेऽश्रवणादिति ३.१.५ महद्दीर्घवद्वा ह्रस्व २.२.११ विद्यैव तु निर्धारणात् ३.३.४७ प्रदानवदेव तदुक्तम् ३.३.४३ महद्वच्च १.४.७ विधिर्वा धारणवत् ३.४.२० प्रदीपवदावेशस्तथा ४.४.१५ मांसादि भौमं २.४.२१ विपर्ययेण तु क्रमोऽत २.३.१४ प्रदेशादिति २.३.५३ मान्त्रवर्णिकमेव १.११५ विप्रतिषेधाच्च २.२.४५ प्रवृत्तेश्व २.२. मायामान्रं तु ३.२.३ विप्रतिषेधाच्चासमञ्ज २.२.१० प्रसिद्धेश्च १.३.१७ मुक्तप्रतिज्ञानात् ४.४.२ विभाग: शतवत् ३.४.११ प्राणगतेश्च ३.१.३ मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् १.३.२ विरोध: कर्मणीति १.३.२७ प्राणभृच्च १.३.४ मुग्धेउर्द्धसम्पत्ति: ३.२.१० बिवक्षितगुणो १.२.२ प्राणवता शब्दात् २.४.१५ मौनवदितरेषामप्यु ३.४.४९ विशेषं च दर्शयति ४.३.१६
प्राणस्तथानुगमा १.१.२८ यत्रैकाग्रता तत्राविशे ४.१.११ विशेषणभेदव्य १.२.२२ प्राणादयो वाक्यशेषात् १.४.१२ यथा च तक्षोभयथा २.३.४० विशेषणाच्च १.२.१२ प्रियशिरस्त्वाद्य ३.३.१२ यथा च प्राणादि २.१.२० विशेषानुग्रहश्च ३.४.३८ फलमत उपपत्ते: ३.२.३८ यदेव विद्ययेति हि ४.१.१८ विशेषितत्वाच्च. ४.३.८ बहिस्तूभयथापि ३.४.४३ यावदधिकारमवस्थि ३.३.३२ विहारोपदेशात् २.३.३४ बुद्धयर्थ: पादवत् ३.२.३३ यावदात्मभावित्वा २.३.३० विहितत्वाच्चाश्रम ३.४.३२ ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ४.१.५ यावद्विकार तु २.३.७ ३.२.२० ब्राह्मेण जैमिनिरुप ४.४.५ युक्ते: शब्दान्तराच्च २.१.१८ वेधाद्यर्थभेदात् ३.३.२५
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyrght protected and constitutes an exclusive intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectuall property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webelte can be used for propagation with prior written consent.
Page 261
www.akhandjyoti.org | www.awgp.org Vedanta Darshan B1-88
२६३/परिशिष्ट-ख/ वेदान्त दर्शन
सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण सूत्र सूत्रविवरण
वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रुते: ४.३.६ संध्येसृष्टिराह हि ३.२.१ साम्पराये कर्त्तव्याभावा ३.३.२७ वैध्म्याच्च न स्वप्ना २.२.२९ संयमने त्वनुभूये ३.१.१३ सुकृतदुष्कृते एवेति तु ३.१.११ वैलक्षण्याच्च २.४.११ संस्कारपरामर्शा १.३.३६ सुखविशिष्टाभिधानादेव १.२.१५ वैशेष्यात्तु २.४.२२ स एव तु कर्मानु ३.२.९ सुषुप्त्युत्क्रान्तयोर्भेंदेन १.३.४२ वैश्वानर: १.२.२४ सत्त्वाच्चावरस्य २.१.१६ सूक्ष्मं तु यदर्हत्वात् १.४.२ वैषम्यनैर्घृण्ये २१.३४ सप्तगतेर्विशेषितत्वा २.४.५ सूक्ष्मं प्रमाणतश्च ४.२.९ व्यतिरेकस्तद्भावा ३.३.५४ समन्वारम्भणात् ३.४.५ सूचकश्च हि श्रुते ३.२.४ व्यतिरेकानवस्थितेश्च २.२.४ समवायाभ्युपगमाच्च २.२.१३ सैव हि सत्यादय: ३.३.३८ व्यतिरेको गन्धवत् २.३.२६ समाकर्षात् १.४.१५ सोऽध्यक्षे तदुपग ४.२.४ व्यतिहारो विशिंषन्ति ३.३.३७ समाध्यभावाच्च २.३.३९ स्तुतयेऽनुमतिर्वा ३.४.१४ व्यपदेशाच्च क्रियायां २.३.३६ समान एव चाभेदात् ३.३.१९ स्तुतिमात्रमुपादनादि ३.४.२१ व्याप्ेश्व समञ्जसम् ३.३.९ समाननामरूपत्वाच्चा १.३.३० स्थानविशेषात्प्रकाशा ३.२.३४ शक्तिविपर्ययात् २.३.३८ समाना चासृत्युपक्रमाद ४.२.७ स्थानादिव्यपदेशाच्च १.२.१४ शब्द इति चेन्नातः १.३.२८ समाहारात् ३.३.६३ स्थित्यदनाभ्यां १.३.७ शब्दविशेषात् १.२.५ समुदाय उभयहेतुके २.२.१८ स्पष्टो ह्योकेषाम् ४.२.१३ शब्दश्चातो5कामकारे ३.४.३१ सम्पत्तेरिति १.२.३१ स्मरन्ति च २.३.४७ शब्दाच्च २.३.४ सम्पद्याविर्भावः ४.४.१ ३.१.१४ शब्दादिभ्योऽन्त: १.२.२६ सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ३.३.२० ४.१.१० शब्दादेव प्रमित: १.३.२४ सम्बन्धानु २.२.३८ स्मर्यते च ४.२.१४ शमदमाद्युपेत: ३.४.२७ सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि ३.३.२३ स्मर्यतेऽपि च लोके ३.१.१९ शारीरश्षोभयेऽपि हि १.२.२० सम्भोगप्राप्तिरिति १.२.८ स्मर्यमाणमनुमानं १.२.२५ शास्त्रदृष्ट्या १.१.३० सवंत्र प्रसिद्धो १.२.१ स्मृतेश्च १.२.६ शास्त्रयोनित्वात् १.१.३ सर्वथानुपपत्तेश्च २.२.३२ ४.३.११ शिष्टेश्च ३.३.६२ सर्वथापि त एवोभय ३.४,३४ स्मृत्यनवकाश २.१.१ शुगस्य तदनादरश्रवण १.३.३४ सर्वधर्मोपपत्तेश्ष २.१.३७ स्याच्चैकस्य २.३.५ शेषत्वात्पुरुषार्थवादो ३.४.२ सर्ववेदान्तप्रत्ययं ३.३.१ स्वपक्षदोषाच्च २.१.१० श्रवणाध्ययनार्थ १.३.३८ सर्वान्नानुमतिश्च ३.४.२८ २.१.२९ श्रुतत्वाच्च १.१.११ सर्वापेक्षा च यज्ञादि ३.४,२६ स्वशब्दानुमानाभ्यां २.३.२२ 11 ३.२.३९ सर्वाभेदादन्यत्रेमे ३.३.१० स्वात्मना चोत्तरयो: २.३.२० श्रुतेश्च ३.४,४६ सर्वोपेता च २.१३० स्वाध्यायस्य 3.3.3 श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् २.१.२७ सहकारित्वेन च ३.४.३३ स्वाप्ययसम्पत्त्यो ४.४.१६ श्रुतोपनिषत्कगत्य १.२.१६ सहकार्यन्तरविधि: ३.४.४७ स्वाप्ययात् १.१.९ श्रुत्यादिबलीय ३.३.४९ साक्षाच्चोभयाम्रानात् १.४.२५ स्वामिन: ३.४.४४ श्रेष्ठ श्ष २.४.८ साक्षादुप्यविरोधं १.२.२८ हस्तादयस्तु २.४.६ संकल्पादेव तु ४.४.८ सा च प्रशासनात् १.३.११ हानौ तूपायनशब्द ३.३.२६ ३.३.८ सामान्यात्तु हद्यपेक्षया तु १.३.२५ संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु २.४.२० सामीप्यातु तद्व्यपदेशः ४.३.९ हेयत्वावचनाच्च १.१.८
।। इति वेदान्तदर्शन-सूत्रानुक्रमणिका समाप्ता॥
Disclaimer / Warning: All literary and artistic material on this website is copyright protected and constitutes an exclusie intellectual property of the owner of the website. Any attempt to infringe upon the owners copyrights or any other form of Intellectual property rights over the work would be legally dealt with. Though any of the information (text, image, animation, audio and video) present on the webslte can be used for propagation with prior written consent.