1. Vedanta Ratnakara Swami Vishnu Devananada Giri Hindi Trans Chatanya Giri
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यीमती तुलछे जीवार वोरंस ****** ********
- श्रीअभिनवचन्द्रेश्वरो विजयतेतमाम् क
श्रीकैलासविद्यालोकस्य त्रयश्वत्वारिशः सोपानः
वेदान्तरत्नाकर:
प्रगोत1
श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यमहामण्डलेश्वर विद्यावाचस्पति अ्नस्तश्री-
स्वामी विष्णदेवानन्दगिरिजीमहाराजः
सानुवादव्याख्याकार:
श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्री- स्वामी चंतन्यगिरिजी (शास्त्रीजी) महाराजः
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॥ ॐ ॥ क श्रीअभिनवचन्द्रेश्वरो विजयतेतमाम क
श्रीकैलासविद्यालोकस्य त्रयश्वत्वारिंशः सोपानः
वेदान्तरत्नाकर:
प्रणेता : श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यमहामण्डलेश्वर- विद्यावाचस्पति अ्रनन्तश्री- स्थामी विष्णदेवानन्दगिरिजीमहाराजः
सानुवादव्याख्याकार: श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्री- स्वामी चैतन्यगिरिजी (शास्त्रीजी) महाराजः
सम्पादक: सर्वदर्शनशास्त्री, वेदान्ताचार्यः ब्रह्मचारी रामानन्दः
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प्रकाशक : कैलास विद्या प्रकाशन
सर्वाधिकार: प्रकाशकाधीनः
प्रथमावृतिः - १००० द्वितीयावृति: - १२०० तृतीयावृतिः - २००० चतुर्थावृतिः - ३००० विक्रमी सम्वत् २०४२ (सन् १६८५) मूल्य : ८ रुपये
ग्रन्थप्राप्ति स्थान- श्री कैलास आश्रम, मुनिकीरेती, ऋषिकेश-२४६२०१ श्री दशनाम संन्यःस आ म, सूपतवाला, हरिद्वार-२४६४०१ श्री केलास आश्रम, उजेली, उत्तरकाशी-२४१११३ श्री राम आश्रम, सामानामण्डी, पटियाल-१४७१०१ श्री कैलास आश्रम, कैनास आश्रम मार्ग, माडल टाउन, रोहतक। ५३/१७ श्री राधाकृष्ण मन्दिर, पुराना राजेन्द्रनगर, नई दिल्ली-११००६०
मुद्रक :- कलास विद्या प्रेस, ब्रह्मानन्द आ्श्रम मुनिकीरेती, ऋषिकेश (उ०प्र०)
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ॐ
प्रस्तावना
दिशन्तु शं मे गुरुपादपांसव:
परमात्मा के निर्विशेष एवं सविशेष दो रूप हैं। इनमें निर्विशेष रूप माया एवं उसके समस्त कार्य अ्खिल भूमण्डलमें सत्तास्फूति प्रदान करते हुए सबको उज्जीवित कर रहा है। नहाँ कहीं भी अस्ति, भाति, प्रिय, अंश प्रतीत होते हैं वे सबके सब निर्विशेष ब्रह्म के ही सत्ता, चिद्रूपता एवं आनन्दरूपता उ्ासित हो रही है; क्योंकि माया और उसके कार्यमें अपनी सत्तादि नहीं है। इस प्रकार निर्विशेष ब्रह्म माया एवं उसके कार्यमें म्रनुगत प्रतीत होता है। किन्तु उससे विशेष कार्य नहीं हो सकता। विशेष कार्य तो सविशेष ब्रह्मसे ही होता है। इनमें निर्विशेष ब्रह्मका निरूपण "नेति नेति" वाक्य द्वारा श्रुतिने किया है। किन्तु सविशेष ब्रह्मका निरूपण उसकी विशेष विभूतियों के प्रतिपादन द्वारा श्रुतिने किया है। सविशेष ब्रह्म की विभूति की इयत्ता नहीं है। अतएव गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने प्रधानरूपसे कुछ विभूतियोंका वर्णन कर अन्तमें "यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीनदूजितमेव वा। तत्तदेवावगच्छत्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ।" इस वाक्यसे अपनो विभूतियोंकी अनन्तताका ही निरूपण किया है। तदनुसार देव, दानव एवं मानवमें जो कुछ भी विभूति एवं ऐश्वय भासते हैं वे सब परमेश्वर के ही हैं किसी-किसी व्यक्तिमें परमेश्वरकी विशेष विभूतिका अवतरण उनकी कृपासे ही होता है और परमेश्वर
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( ख ) कृपाका असाधारणकारण उसकी आराधना है, जिसके फल- स्वरूप अनुकम्पित हो परमात्मा उसमें अपनी विशेष विभूतियोंका अवतरण करा देता है। शारीरसौष्ठव, धनादि ऐश्वयं, बुद्धि- प्रावण्य इत्यादि मनुष्य जीवनमें ऐश्वर्य माने जाते हैं, जो कहीं- कहीं पर विशेष रूपसे दिखाई पड़ते हैं। सृष्टिके आरम्भ से लेकर अद्यावधि अबाधित रूपसे उपर्युक्त विभूति अवतरण क्रम दीख पड़ता है। नारायणसे लेकर आद्यशंकराचार्य पर्यन्त ज्ञान, वंराग्य, ऐश्वर्य, परोपकारनिरतत्व चरम सीमापर दिखाई पड़ते हैं। इन सबका समग्र जीवन लोकोपकारके लिए ही रहा है। इसी परम्परामें उत्तराखण्ड हिमालयके उपत्यका ऋषिकेशमें केलास आश्रमकी स्थापना हुई। इसके संस्थापक आचार्य महामण्डलेश्वर अनन्तश्री स्वामी धनराज गिरिजी महाराजसे लेकर सभी आचार्य उसी शाङ्करी परम्परा से अनुप्राशित रहे हैं। ग्रन्थकारका संक्षिप्त परिचय ब्रह्मविद्यापीठ कैनास आश्रमकी आचार्य परम्परामें विद्यावाचसपति आचार्य महामण्डलेश्वर अनन्तश्री स्वामी विष्णुदेवानन्द गिरिजी महाराज षष्ठ पीठाचार्य हो गये हैं, जिन्हें लोग श्रीबड़े महाराज जो नामसे सम्बोधित किया करते थे। सौराष्ट्रके वैष्णव ब्राह्मणा परिवारमें आपका प्रादुर्भाव हुआ। बाल्यावस्थासे ही भजन, संकीर्तन एवं शास्त्र चिन्तनमें आपकी अत्यधिक रुचि थी। पूर्वाश्रममें आपका नाम विष्णुदास हरियाणी था। पिता जी एव ज्येष्ठ भ्राताकी अनुमतिसे आप अध्ययन निमित्तको लेकर बड़ौदा गए और वहाँसे सुरभारती की क्रीड़ास्थली वाराएसी पहुँचे; जहाँ पर व्याकरण, साहित्य एवं दर्शन विषयसे तीन बार आपने संपूर्ण मध्यमा परीक्षा
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( ग)
दे डाली; जिससे प्रारम्भिक ज्ञान सुदृढ़ हो गया। इन विषयोंके विशेष अध्ययन अभिलाषाको लेकर आरप ऋकेशस्थ कलास आश्रम में पहुँचे। उस समय वहाँके आचार्य पीठ पर महामण्डले- श्वरत्ननन्तश्री स्वामी जनार्दन गिरिजी महाराज विराजमान थे। कैलास आश्रममें दीक्षित हो आपने लघुप्रस्थानत्रयी का अध्ययन श्री स्वामी गोविन्दानन्द गिरि जी महाराज से तथा बृहत्-प्रस्थानत्रयी का अध्ययन विद्यानिधि श्री स्वामी प्रकाशानन्द पुरी जी महाराज से किया। इन दोनों गुरुजनों ने अपने जीवन के संजोये समग्र विद्याधन का उत्तराधिकारी आपको ही समझा। इसके फलस्वरूप आप अपने समय के असाधारण विद्वान् माने जाने लगे। स्वामी गोविन्दानन्द गिरिजी महाराज ने आपकी असाधारण प्रतिभा को देखकर विद्यावाचस्पति नाम से आपको सम्बोधित करने लगे। निःसन्देह आजके विश्वविद्यालयसे प्राप्त विद्यावाचस्पतित्व उपाधि की अपेक्षा कहीं अधिक शास्त्र में गति आपकी रही, जिसे तत्कालीन सभी विद्वज्जन मानते थे। अध्यापन एवं प्रवचन क्षेत्र में भी आपकी क्षमता अ्रसाधारण देखी गयी। इसके अतिरिक्त संगीतशास्त्र, कर्कश तर्क-शास्त्र और काव्य- रचना में भी आप सक्षम रहे। प्रायशः इन सभी विषया का समावेश एकत्र नहीं दीखता है। संगीत-शास्त्रका विद्वान् तर्क शास्त्रमें निपुण नहीं होता और तर्क-शास्त्रका विद्वान् संगीत से अनभिज्ञ पाया जाता है। किन्तु सरस्वतीके वरद-पुत्र आपमें इन सभीका समावेश निर्वाधरूपसे दीखता है। इनके अतिरित्त वैराग्य एवं ब्रह्मनिष्ठा भी आपमें उत्कृष्ट दिखायी पड़ते हैं। कैलास आश्रमसे सम्बन्धित आपके जीवनको चार भागोंमें विभक्त कर देखा जा सकता है। (१) विद्यार्थी जीवन
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( घ )
(२) प्रौढ विद्वान् जीवन (३) पीठाचार्य जीवन (४) पीठके दायित्वको छोड़कर जीवन्मुक्त दशा। इन सभी अवस्थाग्रोंमें आप अनुपम रहे हैं। पोठाचार्य पदभारको छोड़कर १२ वर्ष पर्यन्न उत्तरकाशीस्थ कैलास आश्रममें रहकर जीवन्मुक्तिके विलक्षण आनन्दका रसास्वादन आपने किया। फलतः आपकी जीवनके अन्तिम दिनोंमें जिस सौभाग्यशाली व्यक्तिने आपका दर्शन किया है, वह धन्यवादका पात्र है। हमें तो ऐसे प्रतीत होते थे कि मानो आप ब्रह्मनिष्ठुाके विग्रहवान् मूर्ति हैं। वेदान्तका श्रवर, मनन, निदिध्यासनके पश्चात् तत्त्वसाक्षात्कार होता है एवं तदनन्तर भूमिका परिपक्व होती है, जिसके फलस्वरूप उस तत्त्वनिष्ठ महापुरुषके मुखमण्डल पर उसकी निष्ठा की प्रतिमा स्पष्ट उद्धासित होती है। अन्तिम दिनों आपके दर्शकों ने इसी रूपमें आपको देखा। आपसे ब्रह्मविद्या प्राप्तकर अ्रनेकों यति एवं सद्-गृहस्थ जनोंने अपने जीवनको ही धन्य नहीं वनाया अपितु ब्रह्मविद्याके संरक्षण एवं प्रचारमें उनकी अनुपम भूमिका देखी गयी। उनमेंसे बहुतोंने महामण्डलेश्वर एवं आचायपद को भी सुशोभित किया। आपने अपने गुरुजनोंसे जो कुछ भी ज्ञान प्राप्त किया था, उसे मुक्त भावसे आजीवन वितरित करते रहे, इतना ही महों अपने चिन्तनोंसे वेदान्त जगत् को एक नयी दिशा भी दी है, जो आपकी अधीत पुस्तकों को देखने पर स्पष्ट प्रतीत होता है। दशोपनिषद्-शांकरभाष्य-आ्रानन्द गिरि टीका के ऊपर आपकी लिखी हुई टिप्पणिगयाँ इसके उदाहरण हैं, जिनका प्रकाशन कैलास आश्रम शताब्दी प्रसंग पर हो चुका है। छन्दोवद्ध अ्रनेकों रचनायें भी आ्रपके हैं, जिनमें अन्यतम रचना वेदान्तरत्नाकर है। जिसपर श्रद्धेय महामण्डलेश्वर श्री स्वामी
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( ङ ) चंतन्य गिरि जी महाराज की हिन्दी व्याख्या भी है। इससे पूर्व इस वेदान्तरत्नाकर की तीन आवृत्तियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। कैलास आश्रम ब्रह्मविद्या-पीठ पर जब हमें अभिषिक्त किया जा रहा था, तब आप शीने अपने आशीर्वचनोंमें कैलास आश्रम का सक्षिप्त परिचय एवं आवश्यता का दिग्-दशन कराया था, आपने कहा कि "कलास आश्रम प्राचीन संस्था है, जिसे लगभग ६0 वर्ष होने जा रहे हैं। कोई भी प्राचीन संस्था हो उसका जीर्णोद्धार होना ही चाहिए", बस इतना कहकर आप चुप हो गये। हमने आपके उपर्युक्त सूत्रवाक्यों की व्याख्या करना अपने समग्र कार्यकालमें निश्चित कर लिया। जिसके फलस्वरूप कैलास आश्रम एवं इसके शाखा आश्रमोंका जीर्णोद्धार, पुननिर्माण, सम्बर्धन, साहित्य प्रकाशन एवं विद्वानोंका निर्माणकार्य सम्मिलित हो गये। उसी समय केनास आश्रमकी शताब्दीके साथ आपकी जन्म शताब्दी मनानेका भाव भी मेरे मनमें उत्पन्न हुआ था पर कुछ ही वर्षों के बाद जब आप ब्रह्मलीन हो गए तो आपकी जन्म शताब्दीका संकल्प हमारे मनमें अवरुद्ध हो गया और केवल कैलास आशम की शताब्दी मनानेका संकल्प उद्बुद्ध हुआ। फलतः सन् १६८० ई० में राष्ट्रीय-स्तर पर कंलास आश्रमका शताब्दी समारोह सानन्द सकुशल सम्पन्न हुआ, जिसे कंलास आश्रम शताब्दी स्मारिका को पढ़कर एवं उसकी मूवी फिल्मको देखकर आज भी लोग स्मरण कर सकते हैं। तत्पश्चात् विद्वानोंको तैयार करना ही हमारा मुख्य कार्यक्रम होना चाहिए था, किन्तु कैलास आश्रमके हितचिन्तक कुछ सहृदय सन्तों एवं भक्तोंने आपकी जन्म शताब्दी मनानेके लिए हमारे
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( च ) मनमें सुषुप्त संकल्पको जगादिया। फलतः आपके जन्म-शताब्दी महोत्सव मनानेका निर्णय लेना पड़ा, किन्तु इस महोत्सवको भी आपके उपर्युक्त सूत्र-वाक्यकी व्याख्याके रूप में ही हमने मनानेका निश्चय किया। कैलास आश्रमकी स्थापनासे लेकर कलास आश्रममें हमारे आने तक जो कुछ भी निर्मार एवं विकास कार्य हुए थे, उनमें भक्तोंके लिए पर्याप्त सौविध्य मिल चुका था, किन्तु सन्तों एवं भविष्णु साधु-छात्रोंके लिए पूर्वकी भाँति स्थिति बनी रही, जिसे आपके नन्म-शताब्दी प्रसङ्गको लेकर कुछ पूर्र करने का संकल्प हमारे मनमें उत्पन्न हुआ। फलतः आप श्रीकी पुण्यस्मृतिमें ऋषिकेशस्थ कैलास आश्रमके अन्तर्गत विष्खुधाम- का निर्माण हुआ जो अध्ययनशील भविष्णु साधु-छात्रोंका छात्रावास माना जाता है। जिसके कुछ नियम अपने आपमें अपूर्व ही होंगे। इस नवनिर्मित विष्णुधाममें आपकी दिव्य प्रतिमाकी स्थापना हो चुकी है। आशा है इसमें निवास करने वाले साधु-छात्र आपके पदचिह्नों पर चलकर एवं आशीर्वाद प्राप्त कर आपके समान ही वैराग्य तथा ब्रह्मनिष्ठासे सम्पन्न होकर अपने जीवन को कृतार्थ करेंगे। प्रस्तुत वेदान्तरत्नाकर ग्रन्थमें वैराग्य, ज्ञान एवं भक्तिका अनुपम संमिश्रण पाया जाता है, जिसकी चतुर्थ आवृत्ति आापके जन्म-शताब्दी प्रसंग पर प्रकाशित होने जा रही है। जब भी वेदान्तरत्नाकरका स्वाध्याय एवं प्रवचन हमने किया, तो इसकी अनुपम रचनाको देख और सुनकर पाठकों और ओोताओं की ओर से अत्यधिक माँग आने लगी, जिसके फलस्वरूप यह चतुर्थ संस्करण पाठकोंके समक्ष प्रस्तुत करते हुए हमें अररपार हर्ष हो रहा है। पूर्व संस्करसोंकी अपेक्षा इस संस्करएमें
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(छ) प्रस्तावना व्याज से वेदान्तरत्नाकरके रचयिताका संक्षिप्त बाब्दी परिचय, कैलास आश्रम ब्रह्मविद्यापीठका संक्षिप्त परिचय और वको इसके भावी कार्यक्रमका भी संक्षिप्त उल्लेख किया गया है, हमने जिस आगामी कार्यकरमकी सफलता कैलास आश्रमके अधिष्ठातृ देव अभिनवचन्द्रेश्वर भगवान्की असीमानुकम्पा एवं आरप- मारे पूर्वाचार्योंके अनेक आशीर्वाद पर आधारित है। हमें पूर्ण उनमें विश्वास है कि अन्य कार्योंकी भाँति शेष कार्य भी पूज्य श्रीबड़े नन्तों महाराजजी के उपर्युक्त सूत्र-वाक्य की व्याख्याके रूपमें पूर्ण बनी होकर रहेगा। इसी विश्वासको लेकर हम अपनी प्रस्तावना पूर्ण लेखनीको विराम दे रहे हैं। िकी इस चतुर्थ आवृत्तिके सम्पादनमें परमोत्साही, व्यवहार- राम- कुशल वेदान्ताचार्य ब्रह्मचारी श्री रामानन्द जी शास्त्री ने ोंका पमें अथक परिश्रम किया है, जिसके फलस्वरूप अतिशीघ्र यह संस्करण पाठकोंके समक्ष हम उपस्थित कर पायें हैं। एतदर्थ दव्य ब्रह्मचारी रामानन्द जी शास्त्री एवं इनके सहयोगियोंकी हम रने भूरिशः मंगलकामना करते हैं। इत्यों शम्। र्ादि पन्न
का मिथुन संक्रान्ति भगवत्पादीयः महामण्डलेश्वर - पके भी वि० संवत् २०४२ स्वामौ विद्यानन्द गिरि
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जटाधूतोत्तुङ्गतर ङ्गगङ्गं सद्ः कृतानङ्गपतङ्गभङ्गम् । भुजङ्गसङ्गं श्रितशैलशृङ्गं सदाशिवं नौमि सदाशिवाङ्गम् ।१। त्रि विधतापविघातसुधासर: प्रबलमोहतमोहृदहस्करः । स्वजनचित्तचकोर निशाकरो जयत देशिकराजधुरन्धरः ॥२॥ नानातर्कसमुच्छलन्मगिगगरव्याप्तो गभीरो महान् क्वायं प्रौढमतिप्रपोतसुतरो वेदान्तरत्नाकरः ॥ स्वल्पग्रन्थसरोऽवगाहनविधावप्याकुला सन्ततं सच्छिद्राऽल्पतरीनिसर्गतरला क्वेयं मनीषा मम ॥३॥ तथापि सम्प्राप्य गुरो: प्रसादं भवामि शक्तो विवृतावमुष्य।। न सूर्यकान्तो रवितेजसेद्धो न दारुवारं प्रदहेददाहः ।४।।
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वैराग्यपश्चकम् शिलं किमनलं भवेदनलमौदरं बाधितुम्। पयः प्रसृतिपूरकं किमु न धारकं सारसम् ॥ अयत्नमलमल्पकं पथि पटच्चरं कज्चरम्। भजन्ति विबुधा मुधा अहह कुक्षितः कुक्षितः ॥१॥ दुरीश्वरद्वारबहिवितदिका- दुरासिकायैरचितोऽयमञ्जलिः॥ यदञ्जनाभं निरपायमस्ति नो धनंजयस्यन्दनभूषएं धनम् ॥२॥ काचाय नीचं कमनोयवाचा मोचाफलस्वादमुचा न याचे।। दयाकुचेले धनदत्कुचेले स्थिते कुचेले श्रितमाकुचेले ॥३॥ क्षोणोकोएशतांशपालनख ल द् दुर्वारगर्वानल- क्षुभ्यत्क्षुद्रनरेन्द्रचाटुरचनां धन्यां न मन्यामहे। देवं सेवितुमेव निश्चिनुमहे योऽसौ दयालुः पुरा धानामुष्टिमुचे कुचेलमुनये धत्ते स्म वित्तेशताम् ।।४।। शरीरपतनावधि प्रभुनिषेवणापादना- दबिन्धनधनञ्जयप्रशमदं धनं दन्धनम् ॥ धनञ्ञयविवर्धनं धनमुदूढगोवर्धनं सुसाधनमबाधनं सुमनसां समाराधनम् ।५।
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गुरुषट्कम् यत्पादाम्भोजसेवासुरसिकमनसो नातिकालेन शिष्या: संख्यातीता: समेत्यानुपमसुखमयं शाश्वतं ब्रह्मतत्त्वम्। याता: पारं भवाब्धेर्जनिमृतिरहितं, श्रीडचभिक्ष्वीशविष्णु देवानन्दं नुमस्तं कलिमलहतये ज्ञानसौख्येकमूर्तिम् । १॥ दृष्टा तापत्रयातान् करुरिगतहृदयः प्राखिनः करन्दमानान् त्रातुं तान् दुःखदावान्निर वधिसुखदब्रह्मविद्योपदेशैः। योडयं भातीव शंभुधृ तमनुजतनुः श्रीडयभिक्ष्वीशविष्णु- देवानन्दं नुमस्तं कलिमलहतये ज्ञानसौख्पैकमूर्तिम् ।।२।। यद्ध्वान्तं वासरेशोऽपरिमितकिरण: प्राभवन्नो विहन्तुं हत्स्थं मोहेति वित्तं यदुदितवचनैस्तूर्णमुन्मूलितं तत्। द्वैतीभव्रातपाते मृगपतिरिव यः श्रोडयभिक्ष्वीशविष्णु- देवानन्दं नुमस्तं कलिमलहतये ज्ञानसौख्येकमूतिम् ॥३॥ शान्तिक्षान्तिप्रमुख्यान् श्रतिगदितगुरगानेकदेहे मनुष्या: द्रष्डु शक्ता: यथा स्युः सफलयितुमितीमां समोहां विरिश्विः। दध्े यां मानवीयां तनुमतनुगुणां श्रीडचभिक्ष्वीशविष्णु- देवानन्देति वित्तां जनिमृतिहतये भक्तिपूर्व नुमस्ताम् ॥४॥ यत्पादाम्बुरुहाश्रय श्रितवतां धूनोति तापत्रिकं आद्यन्तप्रतिवरजितं सुखमथो स्वान्ते निधत्तेबलात। पज्ञानोन्मददन्तिदारणपटुः कण्ठीरवो यत्सदा तद्भक्तया गुरुनामकं परतरं ज्योतिर्नमस्कुर्महे ॥X॥ यत्कारुण्यतरों प्रपद्य कृतिभिलंभ्यामलभ्यां परः तोर्खा मोहमहाब्धिमन्तविधुरं मोदामहे सन्ततम् । सोडयं ज्ञानसुखक सूतिरखिलान् स्वीयान्तिकेवासिन:
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वेदान्तरत्नाकर प्रगोता
म.मं. श्रीमत्स्वामी विष्णुदेवानन्द गिरिजी महाराज
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सानुवादव्याख्याकार
म.मं. श्रीमत्स्वामी चैतन्य गिरिजी महाराज
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॥। ॐ ।
वेदान्तरत्नाकर
सानुवाद-व्याख्या
संसारोरुकरज्जकाननभुवं चेतोडम्बुदा गोचरा बोधाकं स्वपिधाय सन्ततममी सिश्दन्ति रागाम्बुभिः। जीवोडयं चिरमत्र घोरगहने भ्राम्यन्नहो ताम्यति, त्राता कोऽस्य पशोऋ ते पश्चुपतेः संसारकान्तारतः ।१
यह संसार एक अत्यन्त गहन करञ्जवन है, जो चित्तरूपी पृथ्वीमें उत्पन्न होता और फलता-फूलता है। उस चित्तभूमिमें विषयात्मक मेघ ज्ञानसूयंको ढककर रागरूपी जल बरसाते हैं, जिससे संसार-वनकी पुष्टि होती है। यह जीव अनादि कालसे इस घोर जंगलमें भटकता-भटकता बहुत दुःखी हो रहा है। इस
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( २ ) संसार-काननसे जीवकी रक्षा परमेश्वरके अतिरिक्त और कोई नहीं कर सकता। तात्पर्य यह है कि संसारका प्रत्येक पदार्थ दुःखमय ही है। किसी-किसी पदार्थ में जो सुखका भान होता है, वह केवल प्रतीति- मात्र है है। यदि वह पदार्थ सुखमय होता तो कालान्तर, देशान्तर तथा अवस्थान्तरमें उसमें ग्लानि नहीं होनी चाहिये थी, परन्तु ग्लानि होती देखनेमें आती है। इसलिए धनादि पदार्थोंमें सुखदत्व बुद्धि केवल भ्रम है और ऐसा भ्रम होनेका कारण अन्य पदार्थोंमें अधिक दुःखमयत्वकी प्रतीति है। अधिक दुःखकी अपेक्षा स्वल्प दुःख सुख्रूप ही होता है। जैसे ज्वरसे पीड़ित अ्रथवा मार्ग चलनेसे थके हुए पुरुषके पैरों को दबाया जाय, तो उसे वह सुखरूप प्रतीत होता है, वैसी ही बात यह भी है। ऐसे इस दुःखमय संसारसे बचनेका उपाय जन्मसे छुटकारा पाना है, क्योंकि शरीर धारण करनेपर कोई दुःखसे नहीं बच सकता। जन्मसे छुटकारा पाना आत्मतत्त्वके साक्षात्कारके विना असम्भव है। श्रुति कहती है 'तरति शोकमात्मवित्' औरर आत्मज्ञानका कारण ईश्वरभक्ति है। 'मोक्षकारणसामग्रयां भक्तिरेव गरीयसी' इसलिए संसार दुःखसे बचनेकी कामना वाले पुरुषका कर्तव्य है कि वह परमात्माका ध्यान तथा भजन करता हुआ उसकी शरण में रहे। यही बात भगबान्ने गीतामें अ्रजुनसे कही है- सर्वधर्मान् परित्यज्य भामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।।१।।
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( ३ )
कोई ऊपरके श्लोकमें भगवद्दक्तिको दुःखनिवृत्तिका साधन कहा, परन्तु जिस प्रकार कोई विद्यार्थी खेल-कूदमें आसक्ति रखता हुआ ोहै। विद्याजन करना चाहे तो वह सर्वथा असम्भव है। उसको
नीति- यदि सच्चा विद्यार्थी बनना हो तो खेद-कूदको तिलाञ्जलि होदेनी
गनतर पड़ेगी। इसी प्रकार जो पुरुष सच्चा भगवद्धक्त एवं मुमुक्षु वनना
परन्तु चाहे, उसे भी सांसारिक विषयोंमें रागका सर्वथा त्याग ही करना
र्थोंमें होगा। अन्यथा वह अपने लक्ष्यको हम्तगत करनेमें कदापि सफल
अ्रन्य न होगा। यही अगले श्लोकमें प्रतिपादन किया जायेगा।
खकी यावद्रागस्य रेखा विलसति हृदये प्रेयसि क्वापि जन्तो- ड़ित , तो र्मन्तोस्तावन्न मुक्त: प्रभवति भवितु' कोऽपि संसारहेतोः।
ऐसे चेतोऽस्वस्थं च तावद्विषयविषरसोल्लासवैषम्यभावाद
है, दावात्तस्माद् भवाभादवितुमभिलषनत्स्यादवावाडनुरक्त : ता। जबतक मनुष्यके हृदयमें किसी भी प्रिय वस्तुविषयक अनुराग भव का बिन्दु भी है तबतक सांसारिक दुःखोंके मूल कारण अज्ञानरूप नका सी' अपराधसे मुक्त नहीं हो सकता और तभीतक विषयोपभोग की
य है इच्छाके तारतम्यसे उसका चित्त अस्थिर रहेगा। इसलिए इस
रख दावानलके सदश सन्तापजनक संसारसे अपनी रक्षा चाहनेवाले पुरुषको सबसे पहले विषयानुरागको दूर करना चाहिये। रागका अभाब होनेसे चित्त संसारसे हटकर निरन्तर ईश्वरपरायण होता हुआ ज्ञानप्राप्त करके परमपदका अधिकारी होगा, जहाँ से फिर लौटनेका भय नहीं है ।२।हबीमो नाग रक मि
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(४ ) जैसे किसी सरोवरमें नलद्वारा रात-दिन जल गिरता रहता हो और उससे वह तड़ाग सर्वदा जलसे भरा रहता हो तो यदि हम उसे जलसे खाली करना चाहें तो हमें दो कार्य करने होंगे। प्रथम तो जल डालनेवाले नलको बन्द करना होगा। फिर किसी पात्रद्वारा तालाबका जल बाहिर फेंकना होगा, तब वह जलसे खाली हो सकेगा। ठीक यही प्रक्रिया चित्तरूपी तड़ागको खाली करने की है। इस चित्त-सरोवरमें अनादि कालसे राग, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, लोभकी दुर्वासनारूप जल भरा हुआा है तथा भविष्य- में भी कुसङ्गरूप नलद्वारा इसमें जल आता रहता है। यदि हमें इसे दुर्वामनारूप जलसे खाली करना हो तो पहिले कुसङ्गरूप नलको बन्द करना होगा, फिर विषय-द.षदशन और चित्तप्रबोधन आदि पात्रों द्वारा दुर्वासनारूप जलको बाहिर निकालना पड़ेगा। तब कहीं चित्त निमल होकर भगवद्क्तिमें लगेगा, जिससे इस को परमगतिका लाभ होगा। अब अगले श्लोकमें राग क्यों दूर करना चाहिये, यह विषय पूर्वार्द्धमें कहकर उत्तरार्द्धमें राग - निवृत्तिका प्रथम साधन सङ्गत्याग, जो कि नलबन्द करनेके समान है, कहा जायेगा- रागान्धो नैव पश्येदचिरमुपनमद्दुःखदावौघसङ्गां- स्तत्रायं को वराक: स्फुरितुमलमहो दीपकाभो विवेक:। तस्माद्रागोरुपाशे पतनपरबज्ञत्वात्त पूर्व यतध्वं सङ्त्यागे त्वमीषामयिविबुधवराः शक्यते चेन्नराणाम्।
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(५)
हता जब कि रागान्ध पुरुष शीघ्रप्राप्त होनेवाले दुःखरूपी दावा- यदि नलके समूहोंको भी नहीं देख सकता तब उसके चित्त में दीप ोंगे। शिखाके समान अतिदुर्बल विवेकको प्रवकाश कैसे मिल सकता कसी है अर्थात् विवेकोत्पत्तिमें राग-प्रतिबन्धक है और प्रतिबन्धकहींन लसे साधनानुष्ठान कार्यसिद्धिका हेतु होता है, इसलिए विवेको- हली त्पत्तिके साधनका विधान करनेसे पहले प्रतिबन्धकीभूत रागका ाम, परिहार करनेकी आवश्यकता है। अब वह राग कैसे दूर हो ष्य- यह बात श्लोकके उत्तराद्धसे कहते हैं; क्योंकि रागके होते हुए यदि विवेककी प्राप्ति असम्भव है। इसलिए हे बुद्धिमान् पुरुषो ! रूप इस रागात्मक विशाल जालमें फँसनेसे पूर्व इन रागान्ध पुरुषोंके धन सङ्गत्यागकेलिए प्रयत्न करो ॥३॥ पहले चित्त-सरको खाली करनेके दो उपाय बतलाये गये थे- इस एक नलबन्द करनेके सदश कुसङ्गत्याग और दूसरा पात्रसे क्यों बाहिर जल फेंकनेके समान विषयदोषदर्शन आदि। उन दोनोंमें ग- नेके कुसङ्गत्यागरूप साधन गत श्लोकमें कह चुके हैं। अब यद्यपि दूसरा साधन कहनेका अवसर था, परन्तु उसे न कहकर उससे पहले साधकों को तिरस्कार-वचन सुनाकर उत्तेजत करना अच्छा है, जिससे कि वे आगे बताये जाने वाले साधनके अनुष्ठान में अत्यन्त उत्साहके साथ प्रवृत्त हों। जिस प्रकार लाठी या पत्थर के आघातसे सर्प उत्त जित होकर फन उठाता है, वैसे ही अपने लिये अयोग्य वाक्य सुनकर साधकों का प्रोत्साहित होना अत्यन्त सम्भव है।
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६ ) जानन्नप्येष जन्तुरविषयपरिणति नीरसां भूरिदुःखां हानं नैषामभीप्सत्यहह परिचिते: प्राणनत्राएगतोऽपि। वाच्यं कि पामराणासधिगतपरमार्थष्वनेकेषु सत्सु, सेयं देदीप्यमाना जगति विजयते वैष्णवी मोहमाया॥४ यह प्राणगी विषयभोंगके परिशामको अत्यन्त फीका और दुःखमय जानता हुआ भी विषयोंमें इतना अनुरक्त है कि उन्हें भोगते-भोगते प्राणण त्याग करनेको भी तैयार रहता है, परन्तु उन्हें छोड़ना नहीं चाहता। यह दशा अपठित मूर्ख पुरुषोंकी ही नहीं है, प्रत्युत जो शास्त्रज्ञ और अपनेको पण्डित मानने वाले हैं वे भी इसी मोह-जालमें फसे हुए देखे जाते हैं। भाव यह है कि पतङ्ग दीपशिखामें गिरकर भस्म हो जाता है, परन्तु गिरनेसे पूर्व उसे इस बातका ज्ञान नहीं होता कि दीपक उसे भस्म कर देगा। इसी प्रकार मत्स्य मांस खाकर अपने आप- को जालमें फँसा लेता है, परन्तु वह भी इस बातको नहीं जानता कि मांसभक्षण उसके जालमें फंसनेका हेतु है। ये दोनों प्राणगी अ्रज्ञानके कारण ही मृत्युके मुखमें प्रवेश करते हैं, परन्तु यह मनुष्य ऐसा विचित्र जीव है, जो जानता हुआ भी दु.खसे बचने का यत्न नहीं करता, उलटा उसमें गिरनेको तैयार रहता है। इसलिए यह मत्स्य और पतङ्गादिकी अपेक्षा भी अत्यन्त निकृष्ट है। धिक्कार है इसके मनुष्यत्वको और न्यक्कार है इसकी बुद्धि को ॥।४।।
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(७) इस प्रकार तिरस्कार-वचन सुनकर जब साधक लात खाये हुए सर्पके समान प्रोत्साहित होकर साधनानुष्ठानके लिए प्रस्तुत हुआ तो उसके प्रति अग्रिम श्लोकसे चित्त प्रबोधन-रूप साधन का उपदेश करते हैं :- ४ क्वायं हन्ताभिलाषोऽचलदमृतपदे सर्ववैराग्यसाध्ये
हें क्वेदं चात्यन्तगह्य® विषयविषरसे पानलौल्यं मनस्ते।
हैं कस्मादेवं विरोधे सति समधिगते चेष्टमानं सदा त्वं
हीं मन्दाक्षं मन्द नायास्यधमपथमिहाश्रित्य यायात् क उच्चं: वे ऐ मेरे चित्त ! बड़े खेदका विषय है कि इच्छा तो तुम उस अचल और अमृत पदकी रखते हो जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके विषयों में वैराग्य होनेसे प्राप्त हो सकता है और प्रवृत्ति तुम्हारी अत्यन्त
क निन्दनोय विषयरूपी विषमय रसके पीनेमें हो रही है। इस प्रकारका विरोध जानते हुए भी ऐसी विपरीत चेष्टा करनेमें
हीं तुमको लज्जा नहीं आती ? क्या तुम नहीं जानते कि अधम मार्गमें चलनेसे किसीको उच्च स्थानकी प्राप्ति नही हो सकती।
तु इसलिए निकृष्ट चेष्टा छोड़कर विषय-त्याग-रूप सत्पथका
से आश्रय लो, जिससे तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो।।५।। संखिया खानेसे मनुष्य दो प्रकार हट सकता है। एक तो त संखिया खाने वाले पुरुषकी दुर्दशाको अपने नेत्रोंसे देखने पर है दूसरे किसी अत्यन्त श्रद्धेय आ्राप्तपुरुषके वचनों द्वारा संखियामें अनिष्टकरत्वबुद्धि होने से। इसी प्रकार विषयोंसे निवृत्तिके भी दो
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(=) ही उपाय हैं। पहला भोगलिप्सु जनोंकी दुर्दशाका दर्शन और दूसरा विषयभोगमें अनर्थकरत्व निश्चय। उन दोनोंमें से पहले अगले श्लोकसे भोगी पुरुषोंकी दुर्दशा वर्णन की जाती है :- कामान् वामानवास्तु सततमभिलषन्नति चेतोऽपि तोषं शोषं कायोऽप्ययासीदहह परितपन् भोगयोग्यत्वमौज्भत् सोडयं हन्तान्तराले विलुलित उडुपे वायुवेगेन सिन्धा- वासीनो यद्वदवं करुणामभिलपन् वेपते भोगलिप्सुः ।६। एक ओर तो चित्त विषयभोगकी कामनाको नहीं छोड़ता और दूसरी ओर भोगका साधनीभूत शरीर रोगोंसे कृश होकर भोग करनेमें असमर्थ हो गया। इस प्रकार द्विविधामें फंसा हुआा भोगी दीनतापूर्वक रोदन करता हुआ ऐसे दुखी होता है जैसे समुद्रके मध्यभागमें फँसी हुई तथा वायुके वेगसे डूबनेको तैयार हुई एक छोटीसी नौकामें बैठा हुआ कोई पथिक दुःखसे कातर हो जाता है ।।६।। इस प्रकार विषयी पुरुषोंकी दुरदशा कहकर अब आमेके चार इ्लोकोंसे अनिष्टसाधनत्वरूप दूसरा उपाय कहा जाता है- हा ह। हन्तोरुरागो दहति वपुरिदं प्रेयसो विप्रयोगे, संयोगे त्वागमोत्थामपि विमलदृशं कम्पयॅल्लुम्पतीव। एवं दुःखकहेतोरयि शुभधिषणाः काम भोगोरुरागा- श्रागादस्म।ददम्योत्कटगरलमयात् त्रस्यत स्वास्थ्यहेतोः
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(8) यह राग केवल दुःखका ही हेतु है, क्योंकि विषय न मिलनेपर यह शोक और चिन्तादि उत्पन्न करके शरीरको नष्ट कर देता है और विषय प्राप्त होनेपर शास्त्रप्रर्यालोचनसे उत्पन्न हुई विवेक- दृष्टि को लुप्तप्राय कर डालता है। इसलिए हे निर्मल बुद्धियुक्त मुमुक्षु पुरुषों ! तुम अपने कल्याणके लिए दुःखमात्रके हेतुभूत अचिकित्स्य और भयंकर विषसे भरे हुए इस विषयभोगासक्ति- रूप सपसे सदा बचते ही रहो।।७।। यत्पूर्व त्वमृतेन तुल्यमभवत्प्रेयोऽद्भुतं वस्तु मे, कस्मात्तत्वगतेऽपि दीर्घसमये क्ष्वेडायते सम्प्रति। स्वप्नोऽयं किमिवेन्द्रजालमथवा मोहोऽथवा मामको, ज्ञातं भो ननु मायिकस्य जगतो रूपं चलं न स्थिरम् ।८।
जो वस्तु पहले मुझे अमृतके समान प्रिय थी, वही कुछ ही समयमें न जाने विषके समान क्यों प्रतीत होने लगी है। क्या स्वप्न है अथवा इन्द्रजाल है या मेरा ही भ्रम है। नहीं, यह सब कुछ नहीं है। किन्तु इस मायिक संसारका स्वरूप ही चंचल है; स्थिर नहीं है, यहाँ प्रत्येक वस्तु कुछ कालतक सुख देकर अन्तमें नष्ट होने वाली ही है; अर्थात् जिस प्रकार देवदत्त नामक कोई पुरुष विदेशमें जानसे पूर्व अपना कोई बहुमूल्य रत्न यज्ञदत्तके पास धरोहर रखकर चला जाय तो यज्ञदत्तको उस रत्नमें कोई राग नहीं होता, क्योंकि उसे निश्चय है कि देवदत्तके आने पर यह रत्न देना पड़ेगा। यदि देवदत्त अपना अधिकार सर्वथा त्यागकर
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(٥!) वह रत्न यज्ञदत्तको दान कर जाता तो अवश्य यज्ञदत्त का उसमें राग हो जाता; क्योंकि तब उसका यह निश्चय होता कि रत्न अब उसके पास से नहीं जायगा। इसी प्रकार यदि इस संसारके विषय तुम्हारे पास रहने वाले होते तो उनमें राग करना किसी प्रकार उचित भी हो सकता था परन्तु जब वे अवश्य नष्ट हो ही जावेंगे तो उनमें कदापि राग नहीं रखना चाहिए। जिस प्रकार कोई पुरुष नीमके पत्ते चबाकर फिर गुड़ अथवा कोई दूसरी मीठी चीज खाय तो उसे पहले उन गुड़ आदि का माधुर्य प्रतीत नहीं होता। इसी प्रकार राग यद्यपि दुःखदायी होता है तथापि प्राथमिक सुख संस्कारोंके कारण वह दुःख पूर्ण- तया भान नहीं होता। जिस प्रकार कटुता के संस्कार माधुर्यकी प्रतीतिमें प्रतिबन्धक थे उसी प्रकार यहाँ समभना चाहिए। इस- लिए ऐसे सर्वदा दुःखकारी रागसे दूर रहना प्रत्येक कल्याण- कामी पुरुषका धम है, यही बात अग्रिम श्लोकमें कही जाती है :- रागो रागत्वयुक्त: सुखयति हृदयं कालमत्राल्पमेव, क्लिश्नात्यङ्ग तु तत्राप्यथ न सुखवशान्मन्यते क्लेश एष: द्वेषत्वं प्राप्य सोडयं सपदि पुनरहो कृन्ततिस्वान्तखण्डं, की हा हा चण्डं तथापि त्यजति न तमहो पापमेतन्मनो मे ६ क्र राग रागरूपसे थोड़े ही समय हृदयको सुखी करता है। अ परन्तु उस कालमें भी शरीरको तो दु.ख पहुँचाता ही है; तथापि सुखके संस्कारोंके कारण वह क्लेश प्रतीत नहीं होता है। फिर
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( ११ ) वह शीघ्र ही द्वेषका रूप धारण करके हृदयका छेदन करता है। ऐसे ही दुष्टको समझ कर भी मेरा पापी मन उसका त्याग नहीं करता। तात्पर्य यह है कि रागका तो त्याग ही करना चाहिए।६। जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने प्रिय पुत्र अथवा स्त्रीके मर जानेसे अत्यन्त विह्वल होकर रोने लगता है और स्वयं भी मरने के लिए उद्यत हो जाता है तथा उसके दूसरे ज्ञातिवर्गके मनुष्य एकत्रित होकर उसको संसारकी असारता दिखलाते हुए वैराग्य उत्पन्न करने वाले वाक्योंसे आश्वासन देते हैं। इसी प्रकार निषय सम्बन्धके नष्ट हो जानेपर जब इन्द्रियाँ बिह्वल हो जाती हैं तो उन्हें भी विवेक-वैराग्य द्वारा ही शान्त किया जाता है। इसलिए प्रत्येक पुरुषको विषम समयमें सहायता करने वाले सच्चे मित्र के समान विवेक और वैराग्यका सम्पादन करना चाहिए। यह उपदेश अगले पद्यमें किया जाता है :- संयोग: प्रेयसो मे मरणमुपगतः कामभूरमि इमशानं, कृत्वा रागे चिताग्नौ ज्वलति मम पुरस्ताद्रदन्तोन्द्रियाणि कस्त्राता स्यादमीषां विधिरपि विमुखो रागिरां रक्षरोऽद्य सद्यो भ्रातर्विवेकाव्रज विरतिवचोभिः समाश्वासयैतान् विषयके साथ जो संयोग था वह आरज मृत्यु को प्राप्त हो गया और अरन्तःकरणरूप रमशानभूमिमें रागात्मक चिन्ताग्नि प्रज्वलित होने लगी। यह देखकर इन्द्रियाँ विह्वल होकर रोने लगीं। इनकी रक्षा अब कौन कर सकता है। रागियोंकी रक्षा करनेसे तो
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( १२ ) परमात्मा भी विमुख है। इसलिए भाई विचेक ! तुम ही शीघ्र आकर वैराग्यपूर्ण वचनों से इनको धैर्य प्रदान करो ॥१०॥ जैसा किसी घरमें आग लग जानेपर उसे जल आदि डालकर बुझाना आरम्भ करते हैं परन्तु प्रायः ऐसा देखने को आता है कि ऊपर से अग्नि शान्त जैसी दिखाई पड़ने पर भी नीचे जलता ही रहता है और यह तब जान पड़ता है जब ऊपर फेंका हुआ जल हवा लगकर सूख जानेसे अग्नि की ज्वालायें ऊपर दिखलाई पड़ने लगें। इसी प्रकार यहाँ भी जब चित्तरूपी प्रासाद में रागानल धधकने लगता है तो उसे चित्त प्रबोधन, विषयदोष- दर्शन एतं रागिदुर्दशानिरीक्षण रूप जलप्रक्षेप से शान्त करना आरम्भ करने पर वह ऊपर से शान्त-सा प्रतीत होनेपर भी भीतर ही भीतर सुलगता रहता है। यह बात तब मालूम होती है जबकि विषयसंयोग होनेपर वह राग अपना विकराल रूप धारणकर बाहिर प्रकट होता है। इसलिए ऐसी अवस्थामें मुमुक्षु को चाहिये कि वह रागकी निवृत्तिके भ्रम से पूर्वोक्त साधनोंके अनुष्ठानका त्याग न करे, किन्तु जबतक रागाग्नि सवथा बुझ न जाय तबतक उनका अनुष्ठान निरालस्य होकर पूर्ववत् करता ही रहे। यही बात अग्रिम दो श्चोकों से कही जाती है :- पूर्व यः सुप्त आसीन्मम हृदयबिले रागनामा भुजङ्ग: सोध्यं सदयो व्यजागविषमयः प्रयसः संप्रयोगे। हा हा दष्टोऽस्मि दष्टः पतति वपुरिदं घूर्णते मानसं मे कष्टं भो: सर्वमेतत्सपदि सम भवच्छून्यमन्तवियोगे ११
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( १३ ) विषम विष से भरा हुआ राग नामका सर्प जो पहले मेरे हृदयरूप बिल में सोया पड़ा था अब विषय प्राप्तिरूप पादाघात से भट जाग पड़ा है। इसके काटनेसे मेरा शरीर गिरा ही जाता है और चित्त में भी बेचनी बढ़ने लगी है, परन्तु आश्चर्य है कि विषय का वियोग होते ही ये सब बातें स्वप्नमें देखे हुये पदार्थोंकी तरह भीतरसे सारहीन हो गयी हैं ॥११॥
ज्ञात्वा सत्यं च सारं पुनरपि यदहो चेष्टसेऽसारहेतोः चेतोऽद: कि तवाभूदहह कथय मे वच्चितं केन बन्धो।
सिन्धोः सन्तारणो मे व्यवसितमधुना मध्यमानीय तूएं चूरं वाञ्छस्यकस्माच्छमविरतिमुखायाःकिमेतत्सुनावः। रे चित्त ! इस संसार में सत्य और बार वस्तुको जानकर भी तुम असार और मिथ्या वस्तुओंके लिए ही चेष्टा करते हो। तुमको क्या हो गया है ? क्या किसीने तुम्हें ठग लिया है। तुम पहले मुझे संसार-सागरसे पार करनेके लिए तैयार होकर फिर इस सागरके मध्यमें लाकर क्या अकस्मात् ही इस शमदम- वैराग्यादिरूप सुन्दर नौकाको चूर्ण करना चाहते हो ? तात्पर्य यह है कि ऐसा उचित नहीं है। हमें धैर्य धारणकर इस समुद्र से पार होने दो, नहीं तो हम और तुम दोनों ही जलमग्न होकर नष्ट हो जायेंगे ॥१२।। अनादि कालसे संसार की ओर ही प्रवृत्त रहने के कारण
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( १४ ) चित्तमें विषयों का राग उसके स्वभावभूत ध्मके समान दुर्निवार्य हो गया है यही बात अगले श्लाकमें कही जाती है-
हा हा श्रान्तोऽस्मि चेतस्तव विविधवचोभि: समाश्वासनेऽस्मिन, क्षाम: कण्ठो मदोयश्चिरमभिलपनात्कुण्ठितं प्रज्ञयाऽपि। त्वं तु स्वीयं न शाठ्य त्यजसि कथमपि प्रमतो बोध्यमानं केनेत्थं पाठितं भो अपि हितवचने नैव विश्वासमेषि ॥१३
हे चित्त ! नाना प्रकारके उपदेशोंद्वारा तुम्हारे समझाने में मैं तो थक गया हूँ। बहुत समयतक बोलनेके कारण मेरा कण्ठ भी थकने लगा है और अब बुद्धि भो कुण्ठित होगयी है। परन्तु तुम तो प्रेमपूर्वक समझानेसे भो किसी प्रकार अपनी शठता नहीं छोड़ते हो। न जाने किसने तुमको ऐसी शिक्षा दी है, जिसके कारण तुम हिनकर वचनों में भी विश्वास नहीं कस्ते हो। भाव यह है कि जैसे गङ्गाजी का प्रवाह अनादि कालसे समुद्र की ओर ही बहता चला आ रहा है और इसीसे वह इस प्रकार स्वभावभूत हो गया है कि उसका परिवर्तन करना असम्भव सा हो रहा है; फिरभी यदि ठीक बुक्ति और पूर्ण परिश्रमसे कार्य किया जाय तो उस प्रवाहका परिवर्तन होना एक साधारण विषय हो जाता है। बड़ी बड़ी नदियोंका नहरोंके रूपमें श जाना इसी बालको प्रमाशित करता है। इसी प्रकार दीर्घ-काल की स्थिति के
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( १५ ) प्मान है- कारण विषयोन्मुख प्रवृत्ति यद्यपि चित्त का स्वभावभूत धर्म ही होगया है, तथापि सही मार्गसे पूर्णपरिश्रम के साथ चलनेपर उस प्रवृत्ति को बदला जा सकता है। इसलिए मुमुक्षुको कभी
स्मन्, भी हताश नहीं होना चाहिये। प्रत्युत पूर्ण उत्साह के साथ उद्योग
पि। करते रहना चाहिये ॥१३।।
मानं यदि कोई कहे कि ऐसे ढीठ चित्तको समझानेसे क्या लाभ है जो समझाने से भी अपनी शठताको नहीं त्यागता तो इसका ।१३ उत्तर आणे के पद्य में देते हैं-
ने में कण्ठे कलङ्डवलितो यदि नीलकण्ठो कण्ठ वकुण्ठवत्समपि गुण्ठति चेत् कलङ्ग:। रन्तु नहीं प्रत्यक्ष एव सकलङ्गतया शशाङ्क:
इसके शङ्के कलङ्गविकलस्तु न कोऽपि रङ्कू:।।१४।। भगवान् शङ्करके कण्ठमें विषपान को सूचना देनेवाला नीला- चिह्न है। भगवान् विष्णुके भी वक्षस्थलमें श्रीवत्स नामक अङ्क मुद्र है। चन्द्रमामें तो प्रत्यक्ष ही कलंक दिखायी देता है। इसलिए कार यह बात निश्चित है कि कलङ्क रहित वस्तु संसार में कोई सा नहीं है। कार्य तात्पर्य यह है कि जैसे मल-मूत्रादि से लिथड़े हुए रत्न का, षय शशुद्धत्व दोषयुक्त होने पर भी, कोई त्याग नहीं करता, क्योंकि इसी उससे प्राप्त द्रव्यके द्वारा अनेकों सांसारिक कार्योंकी सिद्धि होती के है, इसी प्रकार शिव और विष्ुका भी कोई त्याग नहीं करता
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( १६ ) भले ही वे दोषयुक्त भी हैं, क्योंकि उनकी उपासना करनेसे पुरुष जन्मजरामरादि सन्तापों से मुक्त होकर परमानन्दको प्राप्त कर लेता है, तथा कलङ्कयुक्त होते हुए भी सन्तापशान्ति का हेतु होनेके कारण चन्द्रमाका कोई त्याग नहीं करता। इसी प्रकार यद्यपि चित्त अत्यन्त शठ है, वह सामान्यतया समझाने से अपनी पुरानी दुष्प्रवृत्तिका परित्याग भी नहीं करता, तथापि उसकी अवहेलना करना उचित नहीं है, क्योंकि उसीके शोधनसे जीव की मुक्ति हो सकती है। यदि हम विषयासक्त चिसका तिरस्कार कर उनको विषयोंसे विरक्त नहीं करेंगे तो सर्वदा जन्म-मरणा की शृङ्गलामें बंधे ही रहेंगे। इसलिए दोषयुक्त होनेपर भी हम को चित्तकी उपेक्षा न करके उसके दोषकी निवृत्तिका उपाय करते रहना चाहिये।।१४॥ अस्तु अब ऐसी जिज्ञासा होनेपर कि चित्तके दोषको दूर करनेका क्या उपाय है पूर्वोक्त विषय दोषदर्शन आदि साधनों का अग्रिम श्ोक से स्मरण कराले हैं- यैयरत्राभिषङ्गो जगति कृतचर: पामरैर्भोगलिप्सै- स्तस्तैः पश्चादतापि प्रचुरमिहशिरो धून्यन्द्रिश्चिराय। साक्षात्कृत्याऽप्यसारं विषयमलमिदं भोक्तुमेवेच्छसि त्वं हा हा चित्रंत्वदीयं चरितमिदमहो चित्त ते कि ब्रवाशि जिस जिस भोगलिप्सु मनुष्यने इन सासारिक विषयों में आसक्ति की, उसी-उसी को पीछे सिर पटक-पटक कर रोना
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( १७ )
रुष पड़ा। हे चित्त ! विषयों को इस प्रकार साररहित जानते हुए
कर भी यदि तुम उनके भोगकी इच्छा करते हो तो तुम अति नीच
हेतु हो। इससे अधिक तुम को और क्या कहा जाय ?
कर भाव यह है कि साम, दान, भेद और दण्ड इन चार उपायों- नी द्वारा हो कोई बात किसी पुरुषको अङ्गीकार करायी जासकती है।
की जो पुरुष साम, दान और भेद इन तीन उपायों से अपना कथन िव अङ्गीकार न करे उस को फिर दण्ड नामक चतुर्थ उपायसे ही समझाया जाता है। दण्ड का प्रयोग भी यदि विफल हो जाय तो फिर वह पुरुष हेय हो जाता है, क्यांकि फिर उसे किसी भी
हम प्रकार नहीं समझाया जा सकता सो गतशोकों में भी यद्यपि
य चित्तप्रबोधन ही किया गया है, परन्तु वह साम नामक प्रथम उपाय द्वारा ही किया है। इस शोकमें 'तुम्हारा चरित विचित्र है अर्थात अतितुच्छ है जो वस्तु का दोष देखते हुए भी उसका त्याग नहीं करते हो', इस कटु वाक्यरूप वाग्दण्डका प्रयोग किया का गया, जिससे चित्त अवश्य समक सकता है। बार-बार उन्हीं उपायों का कथन करना सिद्ध करता है कि रागनिवृत्ति के लिए पूर्वोक्त साधनोंसे भिन्न कोई और साधन नहीं है। इसलिए मुमुक्षुको उत्साहपूर्वक उन्हींका अनुष्ठान करना चाहिए ।।१५।। वं जिस प्रकार आन्तर और बाह्य भेदसे मल दो प्रकार का है इसी प्रकार आन्तर मल भी सूक्ष्म और स्थूल भेदसे दो प्रकारका है। स्थूल वह है, जिसकी निवृत्ति का उपाय पहले कहा गया है। में सूक्ष्मका वर्रगन आगामी शोक में किया जाता है :-
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( १८ ) मोघास्ते ते क्रियौधाः सपदि शममगुः स्वान्तराज्यान्यमूनि शून्यान्यासन्त्समन्तात्तदपि तदुदिता लेशका ये मनस्थाः । चेतस्तेऽस्वस्थयन्ति प्रति घटिकमहो कोऽपराधोऽस्य जन्तोः सन्तोऽत्र स्युःप्रमाएं किमिह बहुविदां वक्तुमर्हाम एते॥१६
तूने सुखकी प्राप्तिके लिए जिन-जिन क्रियाओंका आरम्भ किया था वे सब विफल रहीं। चित्तके मनोरथ भी सब निष्फल हो गये। परन्तु चित्तमें पड़े हुए उनके संस्कार प्रतिक्षण उसे खिन्न किया करते हैं। यह प्राणियोंके किस अपराधका फल है? इस में विद्व समुदाय ही प्रमाण है। पण्डितोंके सामने हम बहुत क्या कहें ?
यदि किसी घड़े को घृत से भरकर अधिक समय तक रक्खा जाय तो पीछे उसमें से वृत निकाल लेने पर भी सूक्ष्मरूप से कुछ लगा रह ही जाता है। इसी तरह दीर्घकाल तक विषयभोग करनेसे चित्तमें रागांशा बहुत बढ़ जाता है और फिर चित्तप्रबोधनादि उपायोंद्वारा स्थूल राग के निवृत्त हो जाने पर भी सूक्ष्म राग तो शेष रह ही जाता है। इसलिए साधकों को उचित है कि केवल स्थूल रागकी निवृत्तिमात्रसे अपने को कृतकृत्य न मान बैठें, किन्तु रागके संस्कारोंकी निवृत्ति होने तक प्रयत्न करते रहें॥१६॥
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( १६) यमूनि आगे के दो श्लोकोंसे सूक्ष्म रागकी निवृत्तिका उपायभूत थाः। आत्मज्ञान कहा जाता है :-
जन्तोः कस्माद्रौषोत्थमन्तस्त्वमसि सममिदं न त्वदम्यत्तुर्किचित ने॥ १६ त्वं चानन्दैकसीमा तव लवमुपयाल्ञन्दितं भूतजातम्। पशप त्वं वैभवं स्वं चितिविमलतनुः सर्वभूतेश्वरोऽसि Tरम्भ रोदिष्यद्य।पि कस्माद्विभुरभवमृतिः किं तवानाप्तमस्ति॥ ष्फल उसे हे जिज्ञासुवर्ग ! तुम अपने चित्तमें इतने दुःखी क्यों हो ? है? क्योंकि यह सारा संसार तुम्हारा ही स्वरूप है, तुम से भिन्न यह बहुत कोई वस्तु नहीं है। निःसीम आ्रानन्द ही तुम्हारा स्वरूप,है। तुम्हारे स्वरूपानन्दके ही एक-एक बिन्दु को लेकर समस्त प्राणी अपने को आानन्दित मान रहे हैं। तुम अपने स्वरूप को अनुभव करो ! क्खा शुद्ध चैतन्य ही तुम्हारा रूप है। तुम ही सम्पूर्ण प्राणिगवर्ग के प से नियन्ता भी हो। रोते क्यों हो ? तुम विभु और जन्म-मरणसे भोग रहित हो और आप्तकाम होने के कारणा कोई भी वस्तु तुम फिर को अप्राप्त नहीं है ॥१७। पर को शुद्धं शान्तं स्वरूपं तव गगननिभं कोमलं कोमलाना को तेज: पुञ्जोरुतेजो व्यवधिरसमयं सर्ववतः सम्प्रसक्षम्। तक मुक्त्वा कि वल्गसीहाजरममरसिदं दुःखभ्यिष्ठलोके शोके कस्मान्निमग्नोऽस्ययि सकलज़गढ् भावमानन्द्ररुपम
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(र०) आ्काशके समान शुद्ध तथा शान्त, सबसे कोमल, तेजोमय, ज्वालेयं
सूर्यादिकों का प्रकाशन करने वाला, अनन्त आनन्दमय, अविद्या- यावद्वर्ष कामक्रोधादि सकल मलसे रहित तथा मृत्यु आदि संसारधमों से रहित जो अपना स्वरूप है उसे छोड़कर इस दुःखमय संसारमें मुमुक्ष पज्ञानना क्यों आसक्त हो और किस कारणसे शोकमें डूबे हुए हो। सम्पूर्रं हृदयाका जगत्को आनन्दमय और आत्मस्वरूप समझकर सुखपूर्वक और राग
विचरो। है सो ज तब तक भाव यह है कि जैसे सहस्र रूपयोंकी अभिलाषा रखने वाला हो जाने पुरुष अपनी अच्छाका त्याग तब ही कर सकता है जब कि उसे लाख रुपये मिल जायँ अ्रथवा मिलने की आशा हो जाय इसी भाव
प्रकार वैषगिक सुखोपभोग में राग की निर्वृत्त तभो हो सकती मण्डल में
है जब पृरुषको वैषयिक सुख की अपेक्षा अधिक सुख प्राप्त हो आवृत्त है अथवा प्राप्त होने का दृढ़ निश्चय हो जाय, सो परमानन्दको आत्मा जब आत्मासे अभिन्न कहा तो अब उसकी प्राप्तिमें कुछ सन्देह नहीं रह सकता, क्योंकि आत्मा किसी को अप्राप्त नही है। इस- भी जिस
लिए आत्मासे अभिन्न निरतिशय सुख भी किसीको अप्राप्त नहीं है उसे
हो सकता ॥१८।। साधनोंचे
यदि आत्मा निरतिशय आनन्दस्वरूप हैं और वह सदा प्राप्त परमान
ही हो तो जीव अपनेकों सर्वदा आनन्दयुक्त प्रतीत क्यों नहीं आनन्द
करता, इस प्रश्न का उत्तर आमे के पद्य से देते हैं :- का अनु अ्ज्ञानरु सदो बुध्यस्व बन्धो हृदि वियत तबाऽडयादुदग्राभ्रमाला अ्रब मोहाख्या श्यामलाडलाबियमहह बलाद्भानुमन्तं विवेकम्। अग्रिम
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( २१ )
गोमल, तेजोमय, ज्वालेयं वैद्युलोह स्फुरति सुनिशिता रायनाम्नी चिशाला दमय, अविद्या- यावद्वर्षेन्न हालाहलमियमधुना क्रोधकामाद्यनन्तम्।।१६।। दि संसारधमों :खमय संसारमें मुमुक्षुओ ! देखो तुम्हारे हृदयरूपी आकाशमें महाभयङ्कर अज्ञाननामकी काली घटा छा गयी है, जिस के कारण से हुए हो। सम्पूर्र हृदयाकाश में देदीप्यमान विवेकरूप सूर्य लुप्तप्राय हो गया है कर सुखपूर्वक और राग नामवालो अत्यन्त तीक्ष्णा विद्युत्को ज्वाला चमक रही है सो जबलक यह काम-क्रोध आदि दुर्जर विष की वर्षा न करे तब तक ही तुम सचेत हो जाओ, क्योंकि हालाहल की वृष्टि षा रखने वाला हो जाने पर तो फिर जगना असम्भव है। है जब कि उसे हो जाय इसी भाव यह है कि जिस प्रकार मध्याह्वकालीन सूर्य आकाश-
तभो हो सकती मण्डलमें देदीप्यमान होता हुआ भी जिस पुरुष के नेत्र धनावलिसे कसुख प्राप्त हो आवृत है उसे दिख्वलाई नहीं पड़ता इसी प्रकार परमानन्दस्वरूप े परमानन्दको में कुछ सन्देह आत्मा जीवका स्वरूपभूत होने के कारण सर्वदा प्राप्त होने पर
नही है। इस- भी जिस पुरुष की बुद्धि रूपी दृष्टि अज्ञानान्धकार से आच्छादित
को अप्राप्त नहीं है उसे प्रतीत नहीं होता। जिन अधिकारियोने गुरूपदिष्ट साधनोंके अनुष्ठानसे उस मोहपटलको हटा दिया है वे ही उस
वह सदा प्राप्त परमानन्दके सागरमें अहर्निश निमग्न रहते हुए जीवन्मुक्ति का
तीत क्यों नहीं आनन्द अनुभव कर रहे हैं। इसलिये आत्मा के निरतिशयानन्द-
:- का अनुभव करनेके लिए बुद्धिरूप दृष्टि को आवृत करने वाले अज्ञानरूप आवरणको हटाना चाहिये ।१६।। दग्राभ्रमाला अब जिस प्रकार उस आवरण का भङ्ग हो सकता है उसे न्तं विवेकम्। अग्रिम श्रोक में कहले हैं :-
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(२₹) हा हा पीयूषपूरानघिहृदयनदि ज्ञानवैराग्यरूपान् अपने अन्त संशोष्य क्षारकूपानयि खनसि कुतो मारमुख्यानमुत्र । द्वारा वह पश्यायं मूध्निमृत्युर्ललति कतिपयरदिंतु त्वां निमेषः चित्त सुप्तः कि मूढ जन्तो ब्रज विमलपथे मङ्गले मा प्रमाद्ये:२०॥ प्रबोधन त
जिज्ञासुओं! तुम हृदयरूप नदीमें परिपूर्ण रूपसे वर्तमाना इसलिए
ज्ञानवैराग्यादि अमृतके समान शीतल और सुमधुर जलके बात शराग
प्रवाहको सुखाकर उसकी जगह काम-क्रोध आदि खारे जलसे चेतच्चेत भरे हुए कुतंको क्यों खोदते हो ? देखो, तुम को शीघ्र ही नष्ट नायास्य करने के लिए यह मृत्यु तुम्हारे शिर के ऊपर चक्कर लमा रहा है। ऐसे संकटमय समयमें भी तुम क्यों निद्राक्रान्त होकर सोये स्वस्तिस
पड़े हो। इसलिए उठो,- आलस्य और प्रमादको छोड़कर यत्र त्वं
कल्याणकासी मोक्षमार्ग के पथिक बनो।" हे चि तात्पर्य यह है किं मनुष्य कल्यासाके साधन ज्ञान और वैराग्या मेरे वचन को त्याग कर काम-क्रोधादिकोंको अपने अन्तःकरणमें बसा अ्रति उग्र लेंता है, जिनके कारण उसे पद-पदपर आपत्तियों का ही अनुभव रहो हम करना पड़ता है ! यदि इसके विपरीत वह काम-क्रोधकी उपेक्षा अनात्मस् कर उनके स्थानमें ज्ञान-वैरायिप्रभृति देवी सम्पत्तिका सम्पादन विश्वव्या करले तो उसे इसे जीवनकालमें भी किसी प्रकारका शोक अ्रथवा उपेक्षा क मोह नहीं घेर सकता और उसके परलोक-सुधारमें तो कोईं तथापि य सन्देह है ही नहीं। इसलिए श्रेयकी इच्छा वाले प्रत्येक व्यक्ति का प्रकार पि कर्तव्य यही है कि पहले वह काम-क्रोधादिकी तिरस्कार करके जायँ श्ररौ
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( २३ ) ग्य रूपान् अपने अन्तःकरण में विवेक-वैराग्यादिको सञ्चित करे, जिनके मुख्यानमुत्र । द्वारा वह परमात्मदर्शनका अधिकारी बन सके ॥२०॥ त्वां निभेषँः मा प्रमाद्ये:२० चित्तमेंसे रागद्वेषादिको हटानेका उपाय पूर्वोक्त चित्त- प्रबोधन तथा विषयदोषदर्शनके अतिरिक्त और कोई नहीं है, ग्रूपसे वर्तमाना इसलिए पूर्ण उत्साहसे उन्हीं का साधन करना चाहिये। यह र सुमधुर जलके बात आगामी श्ोक में स्पष्ट की जायगी :-
गदि खारे जलसे चेतच्चेत्त्वं हि चेतो जडमिव वचनर्मामकीनैः प्रबोधं को शीघ्र ही नष्ट नायास्यद्यापि नूनं तव किमपि महत्पापमुद्भूतमस्ति । चक्कर लगा रहा न्त होकर सोये स्वस्तिस्तात् ते व्रजामो वयमथ विपुलां भूमिकां काज्चिदेतां मादको छोड़कर यत्र त्वं नो न चेत्यं परमतिविशदं ज्योतिरेकं समन्तात्।२१। हे चित्त ! यदि तुम चेतन होते हुए भी जड़ की तरह शभी ज्ान और वैराग्या मेरे वचनोंद्वारा नही समझोगे तो जान लेना कि तुम्हारा कोई तःकरणमें बसा अति उग्र पाप उदय हो रहा है। अरस्तु, तुम अपनी इच्छानुकूल ों का ही अनुभव रहो हम भी उस स्थानपर जाते हैं जहाँ तुम तथा कोई अन्य -क्रोधकी उपेक्षा अनात्मस्वरूप दृश्य भी नहीं है, किन्तु एक अत्यन्न निर्मल एवं पत्तिका सम्पादन विश्वव्यापी आरात्मस्वरूप प्रकाश विद्यमान है। यद्यपि चित्त की रंका शोक अ्थवा घारमें तो कोईं उपेक्षा करके उस भूमिकापर आरूढ़ होना सर्वथा असम्भव है तथापि यहाँ चित्त की उपेक्षा में तात्पर्य नहीं है। किन्तु जिस त्येक व्यक्ति का प्रकार पिता-पुत्र दोनों ही किसी खेल या अन्य तमाशे को देखने तिरस्कार करकें जायँ और वहाँ पुत्र उस खेल को देखने में इतना दत्तचित्त हो
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( २४ ) जाय कि घर को लौटना भी न चाहे तो उसका पिता यह जान- ग्र कर कि पुत्र अकेला नहीं रह सकता उससे कहे कि बेटा ! यदि तुम्हें घर नहीं चलना है तो यहीं तमाशा देखते रहो मैं तो जाता हूँ, तो वह पुत्र अकेला रहने के भय से तुरन्त ही खेलमें आसक्ति छोड़ देता है। इसी प्रकार चित्त को छोड़कर चले जानेसे यही अभिप्राय है कि शायद वह इसी भयसे संसारके विषयोंमें रागका त्याग कर दे, क्योंकि रागके रहते हुए कभी भी कृत्यकृत्यता नहीं हो सकती ॥२१। अभीतक चित्तप्रबोधन, विषयदोषदर्शन तथा विषयि-दशा- निरीक्षण ये तीन उपाय ही चित्तसरोवरसे रागरूप जलको बाहिर फेंकनेके लिए पूर्वोक्त पात्र स्थानीय होनेसे विस्ताररूपमें कहे गये हैं। अब दूसरे उपाय भी कहते हैं :- चेतः शूण्वेतदन्ते परमहितमहं श्रावये सङ्ग्रहेर सौख्यं यास्यस्यवश्यं पृथु सपदि सखे केवलं तद्ग्रहेए। त्यवत्वाऽनात्माभिमानानतिविशदधिया वीक्ष्य चात्मानमेकं, पश्यच्चंवैनमन्तर्बहिरपि च जगत्स्वप्नभावेन जह्याः ।२२। हे चित्त ! साबधान होकर सुनो, मैं तुमको संक्षेपसे परम हितकर वाक्य सुनाता हूँ, जिसका पालन करनेसे तुम शीघ्र ही परमानन्दको प्राप्त हो जाओगे। वह यह, कि तुम देह-गेह आदि में अहतत्व-ममत्वरूप अनात्माभिमानोंको त्यागकर तथा निर्मल
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(२५ )
यह जान- और सूक्ष्म बुद्धिसे एक अद्वितीय आत्माका साक्षात्कार करके फिर बेटा ! यदि उसी को बाहर-भीतर परिपूर्ण रूपसे अनुभव वरते हुए इस तो जाता जगत् को स्वाप्निक पदार्थों के समान समभकर छोड़ दो। में आसक्ति अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार कोई छोटे मुँहवाला पात्र जानेसे यही पृथिवी में जड़ा हुआ हो और उसमें जल भरा हो तो उसे खाली ोमें रागका करनेके लिए हम न तो उसको उलटा कर सकते हैं और न छोटा
त्यता नहीं मुख होनेके कारण किसी दूसरे पात्रसे ही उसका जल बाहिर निकाल सकते हैं; परन्तु यदि उस घटमें पत्थरके छोटे-छोटे टुकड़े भर दिये जायँ तो जल स्वयं ही बाहिर आ जायगा। इसी
षयि-दशा- प्रकार प्रकृतमें अनात्म-वासनारूप जल से भरे हुए मनोघटको
प जलको ख ली करने के लिए उससे विपरोत आत्म-वासनारूप पत्थर
स्ताररूप में के टुकड़ों को भर दा। ऐसा करनेसे उसके भीतर भरा हुग जल स्वयं ही बाहिर हो जायेगा। फिर उसे खलने के लिए तुम्हें और कुछ भी नहीं करना पड़ेगा ॥२२। बहुत से पुरुषोंका निश्चय है कि प्रत्येक काय प्रारब्घके इग्रहेण। प्रधीन है, बिना प्रारब्धके किसी कार्यकी सिद्धि नहीं हो त्मानमेकं, सकती। इसलिए जब मुक्तिके अनुकूल प्रारब्धका उदय होगा
ग: ।२२। तो मोक्ष स्वयं हो जायगा। उससे पहले हजार प्रयत्न करनेपर भी कुछ फल नहीं होगा-इत्यादि। दूसरे लोग कहते हैं कि हम पसे परम शीघ्र ही श्रेयःसाधनोंका अनुष्ठान करना तो चाहते हैं, परन्तु हमको
गेह आदि सांसारिक व्यवहारोंसे अवकाश ही नहीं मिलता जिसमें हम अपना मनोरथ सिद्ध कर सकें। उनके प्रति आगेके तीन श्लोकोंसे या निर्मल उपाय कहा जाता है :-
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( २६ ) चेतः कि खिद्यसे त्वं लिखितमिह पुरा यद्भवेत्तेविधात्रा पुन भाव्यं तेनैव नूनं शुभमशुभमथो भुङ्क्ष्व भृत्वा प्रसन्नम्। घट
मायामेतां समस्तामपि विदितवतस्ते न शोकोचितत्वं, सां
सत्त्वं भूयिष्ठमङ्गीकुरु विहर सदा स्वीयकर्मानुसारम्।। मृ · चित्त !तुम इतने खिन्न क्यों होते हो। परमात्माने जो कुछ मं शुभ अथवा अशुभ तुम्हारे भाग्यमें लिख दिया है वही होगा स उसे तुम प्रसन्न होकर भोगो और इस सकल संसारको क मायामय समभनेवाले पुरुषको शोक अथवा खेद करना उचित भी नहीं है। इसलिए धैर्य धारणकर सदा अपने भाग्यानुसार स प्राप्त पदार्थसे प्रसन्न रहते हुए विचरण कसे ॥२३॥ दुःखान्यायान्ति सद्यो जगति तनुभृतां यान्त्यकस्मात्सुखानि तेषामन्ते सुखानि प्रकटमुपनमन्ते पुनर्दुःखवन्ति। इ
जायन्ते:चाथ मृत्वा मरणसुपलभन्ते जनित्वा तथाडमी एवं संसार वृत्तं चलमधिगतवान् खेदमोदौ भजेत्कः ॥२४ इस संसारमें प्रत्येक प्राणीको कभी तो दुःख घेर लेते हैं, कभी अकस्मात् ही वह बड़े सुखका भोक्ता बन जाता है। तदनन्तर फिर हठात् दुःखोंसे घिरकर वह अनन्तसुखमय जीवन का अनुभव करता है। इसी प्रकार वह कभी तो जन्म धारकर मृत्युको प्राप्त होता है और कभी मरसके पश्चात्
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(२७ )
विधात्रा पुनः उत्पन्न होता है। इस प्रकार इस संसारको अहर्निश सन्नम्। घटीयन्त्रके समान घूमनेवाला समभकर कौन बुद्धिमान्
चितत्वं, सांसारिक पदार्थोंमें हर्ष अथवा शोकको प्राप्त होगा ॥२४॥
रम्। मृत्योमति भयं भूदिति रहसि मनो बोधयाम्येतदेक
जो कुछ मन्येथा मुक्तरेकं यदि सपदि वियायुः समेऽप्याधयस्ते।
होगा सत्यं प्रत्यश्च्मेकं प्रतिभुवनभवं भावयात्मानमन्तस्त्य- सारको वत्वा तुच्छाभमन्यद्धितमहित मिवो ्द्ासमानं समन्तात् २५ उचित * हे चित्त ! मैं तुमको एक उपय बतलाता हूँ। यदि तुम उसे नुसार सन्देह और भ्रम छोड़कर स्वीकार कर लोगे तो तुम्हें कभी भी जन्म-मरणका भय व्याप्त नहीं होगा, भले ही सारी आपत्तियाँ तुम पर ही आक्रमण कर दें। वह उपाय यह है कि ुखानि जो हितकर से प्रतीत होने पर भी वस्तुतः अनर्थकर हैं, ऐसे इन तुच्छ अनाँत्मपदार्थोंका राग छोड़कर तुम सत्य सर्वव्यापी एवं सबके साक्षिभूत अपने प्रत्यगात्माकाःहो मनन, चिन्तन मी और ध्यान किया करो।
।२४ T तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार किसी पुरुषके पास सहस्र
ते हैं, रुपया है और मरनेके समय अपने उस धनको उसनेअपने पुत्र
है। को, जो कि अभी शैशवावस्थामें ही है, अपण कर दिया है। अब वह पुत्र युवा होनेपर यदि पैतृक सम्पत्तिके बलपर अपना मय जन्म जीवन व्यतीत करना ठीक समभकर उस सम्पत्ति के भरोसे और नयीं धने पैदो करनेका कुंछ उद्ोग न करे तो परिणाम यह वातू होगा कि दश-या-बीस वर्षके अनन्तर अथवा उससे भी पहले वह
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(२८) भूखा मरने लगेगा। यदि वही पुरुष पैतृक धन भोगते समय अपने भावी जीवनके लिए अन्य सम्पत्ति उपार्जन कर लेता तो उसे कभी आपत्तियोंका मुँह न देखना पड़ता। इसी प्रकार प्रकृतमें भी प्रारन्ध तो पैतृक सम्पत्तिके समान अवश्य भोगनेके लिए हमारे पास विद्यमान है ही, परन्तु हमारा कर्तव्य यही है कि प्रारब्धको भोगते हुए भी भविष्यमें सुखपूर्वक रहनेके लिए अन्य उपाय भी करते रहें। नहीं तो मनुष्यशररको देने वाले प्रारब्धकी समाप्ति हो जाने पर हमको पश्चादि शरीरमें जाना पड़ेगा जहाँ हम कुछ नहीं कर सकेंगे। इसीलिए श्रुति भगवती उच्च स्व्ररसे कहती है "इह चेदवेथोदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः"अर्थात् यदि इस मनुष्य शरीरमें कुछ सुखप्राप्तिका उपाय कर लिया तब तो ठीक है, नहीं तो फिर अनर्थ परम्परामें ही भ्रमण करना पड़ेगा। 'अवसर नहीं मिलता' यह कहना उचित नहीं क्योंकि सारा समय व्यवहारमें ही व्यतीत नहीं होता किन्तु अ्नर्थ और व्यर्थ कार्यों में ही बहुत-सा समय नष्ट किया जाता है। सिनेमा थियेटर प्रभृति अनर्थके मूलभूत तमाशोंको देखनेके लिए और ताश-शनरञ्ज प्रभृति व्यर्थ खेलोंके लिए जब हम समय प्राप्त कर सकते हैं तब कोई कारण नहीं कि परमार्थ साधनोंके अनुष्ठानके लिए हमें समय न मिले । केवल उत्साहकी कमी है। उत्साह हो तो क्यवहारके समयमें से भी समय निकाला जा सकता है। इसलिए बर्तमान शरीरोपयोगी व्यवहारसे अधिक व्यवहार न बढ़ाकर परमार्थ-पथमें ही प्रत्येक पुरुषको अग्रसर होना चाहिए।।२५।।
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( २ ) समय ता तो मुक्तिके द्वार पर पहुँचने तक मनुष्यों पर विघ्नोंका आक्रमण
प्रकार होता है। इसलिए प्रत्येक साधकको पूणं उत्साह रखना चाहिए, नवश्य जिससे विध्न उसे लक्ष्य से च्युत न कर सकें। यह बात अग्रिम कर्तव्य हनेके शोकमें कही जायगी :-
ो देने रीर में हा गत्वाध्वानमर्द्ध कथमनि च पुरोदृश्यमानेऽपि धाम्ति
श्रुति चेतः कि मोक्षनाम्नि प्रयदभिवलसे मन्द पश्चादकस्मात्।
त न भुक्त्वा भोगानिहत्यान्मधुगरलयुतान्नोपमान्व्यस्मरः किं रमें याह्यूद्ध्वं मागमोऽधो न यदि कृतधियां हास्यतां वास्यसीह हतो नहीं हे चित्त ! परमार्थका आधा मार्ग तय कर लेने पर और
रमें मोक्षनामक परमधामके दृष्टिगोचर होनेपर भी तुम क्यों पीछे ही संसारकी ओर चलने लगे ? क्या मधु और विष मिले हुए श्रन्न
गति के समान भोगकालमें मधुर और परिणाममें अनिष्ट करनेवाले
ञ्ज सांसारिक विषयोंको अनुभव करके भी उनके स्वरूपको भूल
तब गये ? चलो, उन्नतिकी ओर बढ़ो। अवनतिकी ओर जाना
हमें उचित नहीं है। यदि ऐसा नहीं करोगे तो बुद्धिमान् पुरुषोंमें
तो तुम्हारा उपहास होमा।
ए भाव यह है कि जिस प्रकार कोई पुरुष फल अथवा पुष्प तोड़ने के लिए वृक्षपर चढ़े और ऊपर पहुँचनेपर तत्काल ही नीचे 14 गिर जाय तो उसका ऊपर चढ़ना व्यर्थ ही हो जाता है, यदि वह
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(३०) वृक्षपर चढ़ जाता तो उसके फल फूल प्राप्त करके अपना परिश्रम सफल कर लेता है। इसी प्रकार चित्त भी यदि किसी भूमिका- विशेष को प्राप्त करके उसमें स्थित न हो तो वह अपने परम प्रयोजन आत्यन्तिक कृतकृत्यताका अनुभव नहीं कर सकता। इसलिए प्रत्येक साधकको अपनी अवस्था का परिपाक होने तक प्रयत्नशील रहना चाहिए ।।२६।।
अस्तु, अपने चित्तकी अवस्थाको परिपक्व बनाने का क्या उपाय है, इसका उत्तर आगामी तीन पद्यों में देते हैं :-
एते प्रेयोऽभिलापा अहह कथममी कोमलाङ्गषु सङ्गा, रूपं हा पाटलाभं मधु मधुरमिदं चाधरोपान्तलग्नम्। प्रोत्सृप्ता लोभयन्ते मुखकमलपुटादुत्कटामोदधारा हाहैवं मोहवन्तो जगति जडधियो ग्रासतां यन्तिमृत्योः । प्रियतमाके वे मधुर आलाप कैसे आनन्दप्रद थे ? कोमल अ्ङ्गोंका स्पर्श कैसा लोकोत्तर सुखकी वर्षा करनेवाला था ? गुलाबके फूलोंको भी तिरस्कृत करनेवाला कैसा रमसीय रूप था ? अधरोष्ठमें अतीव मधुर मधु लगा हुआ था तथा मुखकमलसे बहनेवाली उत्कट गन्धकी धाराएँ मनको किस प्रकार लुभाने- वाली थीं ? इसी प्रकार मोहजालमें फँसे हुए विषयी पुरुष मृत्युके मुखमें प्रविष्ट हो जाते हैं। इसलिए मृत्युसे मुक्त होनेकी इच्छा- बाले पुरुषको सर्वथा विषयोंका त्याग करना चाहिए ।।२७।।
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( ३१ )
रश्रम ज्यायस्येका बुभुक्षा चिरतदनुजनुः सा द्वितीया मुमुक्षा पका- द्वे अप्येते भगिन्यौ मम च दुहितरावेत्य चेतोडङ्गणो मे। परम ता। वैरायेते तदाद्या करणगणयुबैकाकिनी सा कनिष्ठा
तक पक्षे याम्यन्ति मायास्तदिह लघुतरं दुर्बलात्वात्प्रियत्वात्
बुभुक्षा और मुमुक्षा नामकी दो बहिने मेरी पुत्रियाँ हैं, जिनमें क्या बुभुक्षा बड़ी है और मुमुक्षा छोटी। ये दोनों मेरे चित्त रूप आँगन में आकर आपसमें लड़ती हैं. बुभुक्षा इन्द्रियों के सहित होनेके कारण बलवती है और मुमुक्षा छोटी तथा अकेली होने के कारण दुर्बल है। इसलिए मैं मुमुक्षा की ही सहायता करूँगा क्योंकि वह दुर्बल और छोटी होने के कारण मुझे प्रिय है। भाव यह है कि अपने कल्याणकी कामना वाले पुरुष को भोगेच्छा (बुभुक्षा) का त्याग करके मोक्षेच्छा (मुमुक्षा) को ही बढ़ाना
ल चाहिए।२८।
? मोहान्धप्रविवेकचक्षुष इमे रज्यन्ति कामाकुला लोका हा विषयेषु मामकमिदं प्रेयः सदा स्थास्यति। से इत्येवं दृढ़बद्धमुग्धमतयो हृष्यन्ति कांश्िवत्क्षणगान् ने- के दह्यन्तेऽरमनल्पशोकदहने हा कस्य को विद्यते ॥२६॥
T- अज्ञानसे विधेकरूप नेत्रके अन्धे हो जानेपर काम और रागादि से आक्रान्त पुरुष ये हमारे प्रिय पदार्थ सदा रहेंगे' इस
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( ३२ ) भ्रमके वशीभूत होकर विषयोंमें आसक्त हो जाते हैं, परन्तु स कुछ ही क्षण हर्ष मानकर फिर शीघ्र ही प्रबल शोकानलसे सन्तप्त होने लगते हैं। इस संसार में कौन किसकी रक्षा कर सकता है? अर्थात् आप ही अपनी रक्षा करनेमें समर्थ है, इसलिए दूसरोंकी सहायताका भरोसा छोड़कर स्वयं पुरुषार्थ करना चाहिए। इन तीनों श्लोकोंका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अन्धकारकी निवृत्ति प्रकाशके द्वारा ही की जा सकती है और गर्मीको ठंडके द्वारा हो दूर कर सकते हैं, क्योंकि उनका ही परस्पर विरोध है, इसी प्रकार विषयोंसे चित्त हटाके के लिए पहले तो यह जानना आवश्यक है कि विषयोंमें चित्त की प्रवृत्ति- का कारस क्या है। जब कारण मालूम हो जाए तो उस का विरोधी साधन ढूढना चाहिए और तत्परतापूर्वक उसीका अनुष्ठान करना चाहिए। फिर तो चित्तको विषयोंसे हटाना एक साधारण-सी बात होगी। चित्त जब विषयोंमें प्रवृत्त होता है तो पहले उसे हितकर ही समझता है, अहितकर नहीं समझता, क्योंकि जिन पदर्थोंमें इसे अनिष्टहेतुताका निश्चय है उनमें इसकी प्रवृत्ति कदापि नहीं होगी। भला, जान-बूझकर विषयोंमें कौन प्रवृत्त होता है ? इसी प्रकार जहाँ इसे अरनर्थजन- कताका पूरा निश्चय नहीं होता वहाँ इसकी प्रवृत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है, जैसे पुत्र, स्त्री और घन आदिमें। इस अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा हम यह निश्चय कर सकते हैं कि विषयों में चित्तकी प्रवृत्तिका बीज विषयोंमें इष्टसाधनता बुद्धि होना अथवा अनिष्ट-
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( ३३ )
ते हैं, परन्तु साधनता बुद्धिका न होना है। इसलिए उसकी प्रवृत्ति रोकनेका नलसे सन्तप्त सकता है? उपाय विषयोंमें अपरनर्थकरत्वबुद्धि ही हो सकती है, क्यों कि यही
नए दूसरोंकी बुद्धि पूर्वोक्त प्रवृत्तियोंको पैदा करनेवाली बुद्धियोंकी विरोषिनी
गहिए। है। उसका उपाय विषयी पुरुषों की दुर्दशाको देखना है, जिसका
जिस प्रकार ऊपरके श्लोकोंमें स्पष्टतया वर्रन किया गया है। इसी बातको
ती है और योगसूत्रोंके रचयिता भगवान् पतञ्जलिने भी अपने एक सूत्रमें
उनका ही कहा है; यथा-'वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्' अरथात् जब
के के लिए साधनके विपक्षी हिंसा, राग-द्वेषादि साधकके चित्तमें बाधा
की प्रवृत्ति- उत्पन्न करें, जब उसका चित्त विषयोपभोगकी ओर खिचने लगे
तो उस का तो उस समय पतनसे बचनेके लिए तत्प्रतिपक्षीभूत पदार्थोंमें
क उसीका अनर्थजनकताकी भावना करे। ऐसा करनेसे उसका चित्त
पोंसे हटाना विषयोपभोगसे विमुख होकर निःशेयसके मार्गमें प्रवृत्त हो
प्रवृत्त होता जायगा। पूर्वोक्त श्लोकमें इस उपायकी ही पूर्ण रूपसे व्याख्या
तकर नहीं की गयी है। इसलिए प्रत्येक साधकको उपर्युक्त उपायोंसे अपने
निश्चय है कल्याण मार्गके विरोधी विघ्नोंका निराकरण कर अपने परम
न-बूभकर लक्ष्यको प्राप्त करनेमें तत्पर रहना चाहिए और उसके साधनों
अनर्थजन- के अनुष्ठानमें पूरा उत्साह रखना चाहिए ।।२७।।
त्यक्ष देखी राग-द्वेषरूप प्रतिबन्धकोंके रहते हुए मोक्षका हेतुभूत
-व्यनिरेक आत्मदर्शन होना सम्भव नहीं था अतः सबसे पहले हमें अनेकों
चित्तकी उपायों द्वारा उनकी निवृत्तिका व्याख्यान करना पड़ा। अब अग्रिम श्लोकोंसे ज्ञानोत्पत्तिकी मुख्य सामग्री तत्वविचारका वा अनिष्ट- उपदेश किया जायगा :-
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( ३४ )
किमिमा मयि दीनतामगाः, अपनेव प्रथमानोरुमहत्त्वभागपि। समभ समधीहि निजं तु वैभवं, स्व्र रूप
सुखसिन्धुस्त्वमवाप्तसन्नसि ॥३०॥ परम
अयि मुमुक्षुवर्ग ! तुम स्वयं प्रकाशमान और निरतिशय महत्त्व सम्पन्न होते हुए भी क्यों इस प्रकार दीनताको प्राप्त हो देव
रहे हो ? अपने स्वरूपका स्मरण ता करो। देखो, तुम परम दार्ष्टा
आनन्दके समुद्र और जो कुछ पाना था उसे प्राप्त किये हुए हो। उत्त
भाव यह है कि जैसे, देव और श्याम नामक दो व्यापारियों मम
के अमूल्य रत्नोंसे पूर्ण दो जहाज पृथक्-पृथक् महासागरोंमें यात्रा कर रहे हैं। उनमें श्यामका जहाज दुर्भाग्यवश समुद्रमें तव डूब गया। परन्तु सूचना देने वालेने भ्रमवश देवको समाचार दिया कि तुम्हारा जहाज डूब गया है। यह सुनकर देव अपनेको निधन हुआ समभककर, वस्तुतः वैसा न होने पर भी, अत्यन्त बीनहोकर व्याकुल हो जाता है। परन्तु कुछ काल पश्चात् देवके सेवकों का समाचार मिलता है कि उसका व्यापार अच्छी तरह तुम
चल रहा है और पहलेकी अपेक्षा दूना-तिगुना लाभ हुआ है तो बि
यह सुनकर देव अपने पूर्वसिद्ध धनित्वका निश्चयकर दीनभाव देव
को छड़कर पुनः आनन्दित हो जाता है। इसी प्रकार जीव भी कय
परमार्थतः सुखस्वरूप तथा सब प्रकारके शोकोंसे रहित होने पर य
भी किसी कारणसे अपने पारमार्थिक स्वरूपको भूलकर य
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(३५ ) अपनेको शोक, मोह, जन्म, जरा, मरण आदि धर्मोंका आश्रय समभककर अत्यन्न दुःखी होने लगा है। यदि वह फिर भी अपने स्वरूपका स्मरण करे तो समस्त आधिव्याधियोंसे रहित होकर ।३०॥ परमधामको प्राप्त हो जायगा ॥३०॥
निरतिशय अब प्रश्न होता है कि दष्टान्तमें तो सूचकके वाक्योंद्वारा ो प्राप्त हो देव को वास्तविक परिस्थितिका अज्ञान हुपरा था परन्तु तुम परम दार्ध्टान्तिकमें स्वरूपके विस्मरण में क्या कारण है। इस का ये हुए हो। उत्तर देनेके लिए आगे का पद्म प्रवृत्त होता है :-
व्यापारियों ममतामभिमुन्ध भिन्नता- हासागरोंमें मपि केचित् क्षणमेकमीशते। वश समुद्रमें तव सोढुमये न संविद:, समाचार किमहन्तामनयेन पश्यसि ॥३१॥ व अपनेको ो, अत्यन्त देह-गेह प्रभृतिमें ममताका त्याग करो। शरीर एवं इन्द्रिय ध्वात् देवके आदिमें अहन्त्व बुद्धि रखना भी अन्याय्य है, क्योंकि ज्ञानस्वरूप च्छी तरह तुम्हारेमें भेद सर्वथा असम्भव है तथा अहन्ता और ममता हुआा है तो बिना भेदके हो नहीं सकती। तात्पर्य्य यह है कि यदि चोर दीनभाव देवदत्त की गौचुरा ले तो यज्ञदत्तको कोई क्लेश नहीं होता जीव भी क्योंकि यज्ञदत्तका उस गौमें ममत्व नहीं है परन्तु यदि देवदत्त होने पर यज्ञदत्तको वह गौ दान करदे और फिर चोर चुरा ले तो अवश्य भूलकर यज्ञदत्त को दुःख होगा, क्योंकि अब उस गौमें उसकी ममता हो
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( ३६ ) गयी है। इस अन्वय-व्यतिरेकके बलसे ममत्व ही दुःख का बीज सिद्ध होता है। देहादिमें अ्रहन्ताबुद्धि ही ममताका हेतु है, क्योंकि ही प्र सुषुप्तिके समय अहन्ताका अभाव हो जानेसे ममताका अभाव गत, भी देखा जाता है। अन्वय-व्यतिरेकके उन दोनोंका मूल अनात्म पदार्थोंकी प्रतीति ही सिद्ध होती है। जैसे घटाभ।वनिश्चयके ही है
समय घटबुद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि उनका परस्पर विरोध है। उदा इसी प्रकार देह-गेहप्रभृति अनात्मपदार्थोंमें अ्र्हन्त्व और ममत्व- बुद्धि होनेके समय भी आत्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता, क्योंकि रहन सुखप्रद औौर दुःखप्रद होनेके कारण उनका भी आपसमें विरोध घट है। इससे सिद्ध होता है कि अहन्त्व-ममत्वनिश्चय ही आत्मस्वरूप 'घट का आवरण करने वाला है॥३१॥ स्थ
जब अनात्म पदार्थोंमें अहन्ता और ममता होना ही आत्म- न पर साक्षात्कारका प्रतिबन्धक है तो आत्मदर्शनकी इच्छ वाले पुरुषको इस अनात्म पदार्थोंकी उपेक्षा करके सर्वत्र परिपूर्ण परमात्माका साक्षात्कार करनेके लिए प्रयत्न करना चाहिए। यह बात अ्र्प्रग्रिम ब श्लोक में कहते हैं :- स
अवलोकय सर्वमेकया, मधुमत्या समुदारया हशा। निजरूपमनाविलं महद्, भ्रमभातेषु कथं विमुह्यसि ॥३२॥ जिनका वास्तवमें कोई स्वरूप नहीं है, किन्तु भ्रमसे 3
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का बीज (३७ )
, क्योंकि अभाव ही प्रतीत होते हैं उन अनात्म वस्तुओ्रंमें मोह त्यागकर जो सर्व- गत, अविद्या काम-क्रोधादि दोषोंसे रहित और अपना स्वरूप अनात्म निश्चय के ही है, उस परब्रह्म परमात्मा को ही अरपन आनन्दामृतवर्षिणी रोध है। उदार दृष्टिद्वारा सम्पूर्ण रूपोंमें देखा करो। ममत्व- क्योंकि भाव यह है कि जिस प्रकार घटव्यक्तिबोंका आपसमें भेद
ें विरोध रहनेपर भी, घटजाति विवक्षित होनेपर और परस्पर व्यावृत्त घटव्यक्तियोंकी विवक्षा न होनेपर भिन्न-भिन्न घट-व्यक्ति भी 'घट' मस्वरूप 'घट' इस एकाकार प्रतीतिकी विषय हो जाती हैं इसी प्रकार स्थावर जङ्गमरूप सारा विश्व भी शपाधिक वैलक्षण्यकी विवक्षा
आत्म- न होनेपर भी उसके अधिष्ठान और सद्रूपमें भासमान एक
पुरुषको परमात्माकी विवक्षासे ऐक्यप्रतीतिका विषय बन सकता है। इसमें किसी प्रकारकी भी आपत्ति नहीं है ।३२॥ त्माका अ्रग्रिम उक्त ज्ञान ही निरतिशय सुखकी प्राप्तिका साधन है, इस बात को सिद्ध करनेके लिए आगे का छोक कहा जाता है :-
सकलं निजरूपमित्यव, त्यज भेदभ्रममीहसे सुखम्। यदि भूरिभयं द्वितीयतः, श्रुतिरप्याह सनातनी तव ।३३।। दि तुम भयकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति चाहते हो तो भ्रमसे भ्रमात्मक प्रतीतिके विषयभूत द्वैतप्रपञ्चकी उपेक्षा करो और सम्पूर्ण चराचरात्मक विश्वको अपना ही स्वरूप समझो; क्योंकि
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( ३८ ) 'उदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति', 'मृत्यो: सः मृत्युमाप्नोति दर्श य इह नानेव पश्यति' इत्यादि श्रुतियाँ द्वितीय-दर्शनसे हो भयका प्राह्ति प्रतिपादन कर रही हैं; अर्थात् द्वितीय दर्शनके त्यागसे ही भय की निवृत्ति होती है-इसीमें उक्त श्रुतियोंका तात्पर्य है, तथा 'ब्रह्मवित्परमाप्नोति', 'तरति शोकमात्मवित्', 'विद्वान् नामरूपा- ब्र ह द्विमुक्तः' इत्यादि श्रुतियाँ स्पष्ट ही ब्रह्मज्ञानसे शोकोपलक्षित नाम- भी
रूपात्मक प्रपञ्चकी निवृत्ति और परमानन्दकी प्राप्तिका प्रति- पादन कर रही हैं। त्य
भाव यह है, 'यन्निन्द्यते तत्प्रतिसिद्धयते,यत्स्तूयते तद्विधीयते' f
अर्थात् शाम्त जिसकी निन्दा करे, उसके निषेधमें और जिसकी स्तुति करे उसके विधान में उसका तात्पर्य होता है। जैसे 'असत्रं वा एतददच्छन्दोमम्' अर्थात् वह सत्र असत्र है जिसमें छन्द ne A हु और ॐ न हों। यहाँ छन्द और ॐ शून्य सत्रकी निन्दा करनेसे अच्छन्दोम सत्रका अनुष्ठान करना निषिद्ध है, ऐसा समझना त्र चाहिए। इसी प्रकार 'वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता' अर्थात् वायु अतीब 5्र शीघ्र-गामी देवता है। इस वायुकी स्तुतिसे वायुदेवता विषयक यज्ञका विधान किया गया है। इसी प्रकार 'उदरमन्तर कुरुते', 'मृत्यो: स मृत्युम्' इत्यादि भेदकी निन्दा करने वाले वचनोंसे यह सूचित होता है कि शास्त्र भेद-दर्शनको हेय मानता है और 'तरति शोकमात्मवित्', 'विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः', 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इत्यादि आत्मज्ञानकी स्तुति देखी जानेसे श्रुतिका अभि- प्राय आत्मबोघकी उपादेयतामें जान पड़ता है। इसलिए आत्म-
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(३६) सः मृत्युमाप्नोति निसे ही भयका दर्शनसे सम्पूर्ण शोक की निवृत्ति और निरतिशय आनन्दकी
त्यागसे ही भय प्राप्ति बताना अप्रामाशिक नहीं है॥३३।
त्पर्य है, तथा सकल क्लेशोंकी निवृत्ति और असीम आनन्दकी प्राप्तिमें द्वान् नामरूपा- ब्रह्मबोधकी कारणता केवल प्रमाण सिद्ध ही नहीं, युक्तिसंगत पलक्षित नाम- भी है। यही बात अग्रिम श्रोकमें कहते हैं :- प्राप्तिका प्रति- त्यज सङ्गमनात्मभावन।- कृतमङ्गीकुरु सर्वतः शुभाम् । पते तद्विधीयते' प्रियतामवलोकयन्न हं और जिसकी प्रविराजेऽखिलदेहकेष्विति ।३४॥ ह। जैसे 'असत्रं 'सकल शरीरोंमें उनकी समस्त अवस्थाओंका प्रकाशन करता जिसमें छन्द हुआ मैं स्वयं साक्षीरूपसे विराजमान है' इस निश्चयका निन्दा करनेसे अवलम्बन लेकर अनात्मभावनासे हुई विषयासक्तिको त्याग दो सा समभना और सर्वत्र प्रियभावको स्वीकार करो। तात्पर्य यह है कि जिस त् वायु अतीब प्रकार सूर्यके प्रकाशमें पापी पुरुष पाप करते हैं और पुण्यात्मा वता विषयक मन्तरं कुरुते' मनुष्य शुभ कर्मोंमें तत्पर रहते हैं, परन्तु सूयके लिए तो वे दोनों समान ही हैं। उसे न तो पापीसे घृरगा है और न सुकृतीका पक्ष- वचनोंसे यह पात है। इसीसे वह पापीको प्रकाश देनेमें उपेक्षा नहीं करता और 'तरति और पुण्यात्माको प्रकाशसम्पन्न करनेमें हर्ष नहीं मानता, क्योंकि वेद ब्रह्मैव वह केवल अपनेको प्रकाश ही मानता है, उन दोनोंके सुकृत- तिका अ्र्प्रभि- दुष्कृतसे होनेवाले फलोंका भागी नहीं समभता; इसी प्रकार जो लिए आत्म- पुरुष अपने आपको देह और इन्द्रियादिके व्यापारोंका कर्त्ता न
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(४० ) जानकर केवल साक्षी ही समभेगा उसे कभी किसीके साथ राग- परम द्वेषका अवसर नहीं आ्रपरवेगा औरर इसी कारण वह सारे कलेशों से जि छूटकर परमानन्दका अनुभव करेगा ।३४।। पुरु अब 'अपने-आपको साक्षिस्वरूप माननेका क्या उपाय है' यह को बात अगले श्लोकसे बतायी जाती है :- 'उप
विजहीहि दुरात्मसङ्गति, गुरू
कुरु शीलान्वितचेतसाममूम। श्रव जय काममुखानिमानरी- चा नवधायात्मनि मानसं मुहुः ॥३५॥ रूप
दुष्ट पुरुषोंकी सङ्गतिका त्याग करके सर्वदा सुशील और प आात्मनिष्ठ पुरुषोंका ही सङ्ग करो तथा उनकी बताई हुई युक्तियों से मनकी आत्माकार वृत्तियोंका प्रवाह चलाकर काम-क्रोधादि 10 आन्तरिक शत्रुओंका नाश कर डालो।
भाव यह है कि जिस प्रकार लौकिक व्यवहारमें वकालत अथवा डाक्टरी की परीक्षा पासकर लेने पर भी मनुष्य स्वतन्त्र- रूप से अपनी जीविकाका निर्वाह नहीं कर सकता, किन्तु उसे पहले उन कार्योंमें सिद्धहस्त पुरुषोंकी ही संगति करनी पड़ती है, दु
उसके बाद ही वह अपना कार्य करनेके लिए सरकारी प्रमाणपत्र के
प्राप्त करके कार्य करनेका अधिकारी माना जाता है, इसी प्रकास अणोरणीयान् और अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धिसे ग्रहणाकी जाने योम्य
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( ४१ ) के साथ राग- सारे कलेशों से परमात्म वस्तुको प्राप्त करनेका भी एक यही उपाय है कि जिन्होंने परमात्मस्वरूपका साक्षात्कार कर लिया हो ऐसे महा- पुरुषोंको सङ्गति करके उनके उपदेश किये हुए उपाय द्वारा अपने उपाय है' यह को साक्षिरूपसे निर्णाय करे। इसीलिए 'प्राप्य वरान्निबोधत' 'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः' इत्यादि श्रुति स्मृतियाँ गुरूपसत्तिका विधान करती हैं।३५॥
गुरूपसदन के पश्चात् विवेक-वैराग्यादि साधनसम्पन्न होकर श्रवण, मनन और निदिध्यासनका वारंवार अनुष्ठान करना चाहिए। यह कहनेके लिए आगामी दो श्रोकोंसे पहले उपलक्षण रूपसे वैराग्यका विधान करते हैं :-
पुशील और परिभावय भङ्गुराविमान् हुई युक्तियों म-क्रोधादि भवभोगानतिदारुणानये। व्यथसे किमितीह बालिश
में वकालत प्रसभं त्रोटय मोहबन्धनम् ॥३६॥
य स्वतन्त्र- किन्तु उसे इन सांसारिक विषयोंको क्षणाभंगुर होनेके कारण अत्यन्त
पड़ती है, दुःखके हेतु समभो और उनके रागसे होनेवाले दुःखोंकी निवृत्ति
प्रमाएपत्र के लिए उनमें पहलेसे उत्पन्न हुए मोह नामक बन्धनको काटकर
सी प्रकास बिरक्तिका सम्पादन करो ॥३६॥ नाने योम्य अग्रिम श्ोकसे वैराग्यको आवश्यकता दिखलाते हैं :-
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( ४२ )
अवधीरय वीर तानरीन्, स्वशशीरं नगरीव यैः कृतम्। शफरीव विनीरतीरगा, यदधीरं परिवर्तते मनः ॥३७॥
हे वीर! उन रागद्वेषादि शत्रुओंका बहिष्कार करो, जिन्होंने तुम्हारे शरीरको ही अपनी नगरी बना रक्खा है और जिनके पराध न होकर तुम्हाराचित्त जलहीन तलैयामें पड़ी हुई मछली की तरह तड़फता रहता है।
तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार तृप्ति होनेपर उसके साधनी- भूत भोजन और उसे सिद्ध करनेवाली सामग्रीका त्याग कर दिया जाता है उसी प्रकार श्रवरगादिके पश्चात् वैराग्यादि साधनोंका त्याग नहीं करना चाहिए, कयोंकि उनका त्याग तो तभी हो सकता था जब कि वे केवल श्रवरगादिके ही साधन होते, परन्तु ऐसा है नहीं। वैराग्यादि जिस प्रकार श्रवरादिमें उपयोगी हैं उसी प्रकार ज्ञानपरिपाकके हेतु भी वे ही हैं। इसलिए ज्ञानपरि- पाक होनेतक उनका त्याग नहीं करना चाहिए। उसके पश्चात् यद्यपि उनका कोई फल नहीं है परन्तु फिर भी वे विद्वान्के स्वभावभूत हो जानेके कारण स्व्ररूपसे बने ही रहते हैं, तब ज्ञानीको उनके लिए प्रयत्नकी अपेक्षा नहीं रहती तथा बाधक न होनेके कारण उपेक्षा भी नहीं होती। इसलिए श्रवरगादिसे पूर्व तो उनमें उपयोगी होने के कारण वैराग्यादिकी अपेक्षा है और उनके बाद ज्ञानपरिपाकके लिए वे अपेक्षित हैं। इस प्रकार
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( ४३ ) वैराग्यादिका त्याग कभी नहीं हो सकता। इसीसे बार-बार उनका वर्सान किया गया है॥३७॥ इस प्रकार श्रवरादिकोंमें उपयोगी वैराग्योपलक्षित साधन- चतुष्टयका विधान करके अब आत्मसाक्षात्कारका साक्षात् साधन कहते हैं :-
जिन्होंने परिशोलय लीनचेतसा
जिनके सततं शास्त्रमिहात्मगोचरम् ।
मछली अचिरादनुलप्स्यसे सुखं, निजपूर्रत्वमधीत्य तत्त्वतः ॥३८॥
धनी- एकाग्रचित्त होकर निरन्तर उपनिषदादि अध्यात्म शास्त्रोंका र दिया चिन्तन किया करो, जिससे तुम अपनेआपको पूर्णब्रह्मस्वरूप वरनोंका निश्चित करके शीघ्र ही परमानन्दमें मग्न हो जाओगे। भी हो परन्तु भाव यह है कि प्रमाका साक्षात् जनक प्रमाण ही हो सकता ोगी हैं है, क्योंकि नेत्रादिके बिना घटादिविषयक प्रमाका उदय होना न्परि लोकमें नहीं देखा जाता। इसी प्रकार ब्रह्मविषयिणी प्रमा भी श्चात् द्वान्के प्रमाणजन्य होने पर ही प्रमापदवाच्य हो सकती है किन्तु ब्रह्म
.तब रूपरसादि सकल धर्मोंसे रहित होनेके कारण किसी भी लौकिक
धक न प्रमाणका विषय नहीं हो सकता। इसलिए शब्दप्रमाणरूप से पूर्व उपनिषच्छास्त्रको ही ब्रह्मप्रमाका जनक मानना होगा। और 'तं त्वौपनिषदं पुरुषम्' इत्यादि श्रुतियोंमें ब्रह्मको औपनिषद पकार कह कर भी इसी बात को पुष्ट किया गया है। यद्यषि तार्किका-
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(४४)
दिकोंके सिद्धान्तमें शब्दजन्य ज्ञान अपरोक्ष नहीं माना जाता, कोई अन्यथा स्वर्गादिविषयक शब्दबोध भी प्रत्यक्ष मानना पड़ेगा, प्रती
सथापि ब्रह्मप्रमामें किसी अन्य प्रमाणसे अपरोक्षत्व न हो सकनेके कतृ
कारण शब्द में ही अपरोक्षप्रमोत्पादकत्व मानना अनिवार्य होगा, अ्न्त भी क्योंकि अपरोक्षरूपसे अनुभवमें आने वाली अविद्याकी निवृत्ति परोक्ष विद्या से नहीं हो सकती। शुक्तिरजतादि स्थलोंमें भी ऐसा नहीं देखा गया। अतः अपरोक्ष अविद्याकी निवृत्ति करने स्व
वाली आत्मविद्या अपरोक्ष ही माननी होगी और नेत्रादिको स्फ
उसके जनक न मानकर पूर्वोक्त युक्ति से तत्त्वमस्यादि शास्त्रको वह
ही मानना होगा। इसलिए तार्किकको भी विवश होकर शब्दमें भो
ही प्रत्यक्ष ज्ञानजनकता अङ्गोकार करनी पड़ेगी ॥३८॥ भो
सा यद्यपि घटादिप्रमा नेत्रादि प्रमाणजन्य ही है तथापि पित्तादि दोष होनेपर 'पीतः शङ्ग:' इत्यादि भ्रमात्मक ज्ञान भी नेत्रादि से ही होता है। इस प्रकार निरपवादरूपसे प्रमाणमें प्रमाकी उत्पादकता नहीं है। इस आशङ्काका समाधान करने के लिए श्रु अग्रिम दो श्चोकोंसे श्रवणके सहकारी मननका विधान किया नि जाता है।
तब नैव कदापि कल्मषं, धिय एषा गुणदोषकल्पना । करएं यदि चेष्टते शुभे, त्वशुभे वाऽप्यथ किं ततस्तव ॥३६।।
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(४५ ) मुमुक्षुगर ! साक्षिस्वरूप तुम्हारेमें कर्तृ त्व-भोक्तृत्वादि ा जाता, कोई भी दोष नहीं है और 'मैं करता हूँ' 'मैं भोगता हूँ' इत्बादि पड़ेगा, प्रतीति तो साक्षिके उपाधिस्वरूप अन्तःकरण में जमें हुए सकनेके कर्तृ त्व-भोक्तृत्व के कारण हो रही है। तुमसे सर्वथा पृथक् र्य होगा, अन्तःकरण यदि किसी शुभ अथवा अशुभकर्ममें प्रवृत्त भी हो फिर
निवृत्ति भी तुम्हारा इसमें किसी प्रकारका हानि-लाभ नहीं होता है।
नोंमें भी भाव यह है कि जिस प्रकार जपाकुसुमकी सन्निधिके कारण
त्त करने स्वभावतः श्वेत होनेपर भी, सांसिद्धिकधबल स्फटिक में 'अरुण:
त्रादिको स्फटिकः' इस प्रकार अरुणताका भ्रम होता है किन्तु परमार्थतः
शास्त्र को वह लालिमाके संसर्गसे शून्य ही रहता है, इसी प्रकार कर्तृ त्व-
शब्दमें भोवतृत्व धर्मयुक्त अन्तःकरणकी सन्निधिके कारण 'अहं कर्त्ता भोक्ता, इस प्रकार कर्तृ त्व-भोक्तृ त्वविशिष्ट प्रतीत होनेपर भी
पित्तादि साक्षिचैतन्य वस्तुतः उन धर्मोंसे रहित ही रहता है ॥३६॥
त्रादि से प्रमाकी वस्तुतः आत्माको कतृ त्वादिधर्मविशिष्ट माननेवालोंके मतमें अन्तःकरण अथवा इन्द्रियगण ही आत्मा हैं। ऐसा माननेमें के लिए श्रुति से विरोध आता है। अतः आगेका श्लोक उनके मतका किया निराकरण करता है :-
न खलु त्वमसीह शेमुषी, न गरस्त्वं करसात्मनामपि । अपि तु प्रभुरद्भुतः सदाऽ- स्त्यदसीयः परिभासको भवान्॥४०।
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( ४६ ) तुम्हारा स्वरूपभूत साक्षिचैतन्य बुद्धिसे भिन्न है। 'हं बुद्धया उद विजानामि' (मैं बुद्धसे जानता हूँ) इस प्रतीतिके कारण बुद्धि है
विज्ञानक्रियाके प्रति करणरूपसे सिद्ध होती है और आत्मा उस की
क्रियाके प्रति कर्ताूपसे सिद्ध होता है, तथा करण कभी कर्त्ता धर्म
नही हो सकता। जैसे कि दण्ड कभी कुलालरूप नहीं हो सकता। यदि बुद्धिको ही आत्मा माना जाय तो उसके लिए किसी चष
अन्य करणकी कल्पना करनी होगी। इसके सिवा आत्मामें अ्रनि- त्यता आदि दोष भी अवश्य मानने पड़ेंगे। इसी तरह इन्द्रियाँ ब्रह उ भी आत्मा नहीं हो सकतीं, क्योंकि इसमें तो कोई विशेष युक्ति दी प नहीं जा सकती कि अमुक इन्द्रियको ही आत्मा माना जाय और ब्र अन्य इन्द्रियोको आररात्मा न मानें। इसलिए लाचार होकर सभी श इन्द्रियोंको आरपरात्मा मानना होगा। ऐसा मानने पर भी उनकी गौणता और प्रधानतामें कोई प्रमाण न होनेसे सबको स्वयं प्रधान ही मानना पड़ेगा। ऐसो स्थितिमें यदि एक इन्द्रिय की इच्छा जाने त्
की हुई और उसी समय दूसरीकी इच्छा ठहरनेके लिए हुई तो ऐसे समय में शरीरको या तो दोनोंसे विरोधके कारण पीड़ित प्र होना होगा या अक्रिय रहना पड़गा और देखनेवालों तथा स्पश करनेवालोंमें भेद रहनेके कारण 'योऽहमद्राक्ष स एवाहमिदानीं स्पृशामि' इत्यादि सर्वलोक प्रसिद्ध प्रतीतियोंको भी भ्रमरूप मानना पड़ेगा और इस पक्षमें पूर्वोक्त अनित्यतादि दोष भी श्र्प्रा ही जायेँगे। इसलिए इन्द्रियाँ भी आत्मा नहीं हैं, किन्तु सदा एकरस रहनेवाला तथा मन-बुद्धि आदिका प्रेरक और उनके
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(४७ ) 'अहं बुद्धया उदय एवं अस्तको प्रकाशित करनेवाली जो चैतन्यघन मात्र वस्तु कारण बुद्धि है वही आत्मा है और उसमें कर्तृ त्वादि धर्म बुद्धि आदि उपाधियों आत्मा उस की सन्निधिके कारण प्रतीत होते हैं। वस्तुतः उसमें किसी भी
कभी कर्त्ता धर्म का गन्ध तक नहीं है।
हो सकता। भाव यह है कि जिस प्रकार कोई नेत्रदोष न होनेपर केवल लिए किसी चक्षु ही से घटादिगोचर प्रमा उत्पन्न हो सकती है। अतः त्मामें अ्रनि- असम्भावनादि दोषोंका उदय न होनेपर केवल श्रुतिका शब्द ही रह इन्द्रियाँ ब्रह्मविषयिरी प्रमा उत्पन्न कर देगा। दोषका साथ रहनेपर जसे
ष युक्ति दी उसके निवारणके लिए दृष्टान्तमें दूसरे प्रयत्नका आलम्बन करना पड़ता है। इसी प्रकार दार्ष्टान्तिकमें भी पूर्वोक्त युक्तियोंसे पहले जाय और ब्रह्मात्मैक्यके विषयमें अ्परसम्भावनादि दोषोंका निराकरण करके होकर सभी शब्दसे प्रमा उत्पन्न होगी ॥४०॥ भी उनकी स्वयं प्रधान इस प्रकार मननके सहित श्रवर अथवा केवल श्रवरसे ब्रह्मा- इच्छा जाने त्मैक्र्य विषयके यथार्थ बोधका प्रतिपादन किया गया। परन्तु जो नए हुई तो अधिकारी बुद्धिकी स्थूलता अथवा विक्षेपकी अधिकताके कारण
ण पीड़ित श्रवण-मननका यथावत् अनुष्ठान न कर सकें उनको पहले उस
तथा स्पश प्रतिबन्धकको दूर करनेके लिए निदिध्यासनका विधान करनेके लिए आगेके दो श्रोक कहे जाते हैं :- हमिदानी ो भ्रमरूप अवहेलय भेदकल्पना-
ष भी तररा मवलोकस्व समस्तमात्मनि।
कन्तु सदा सकले च निबोध निष्कलं परौर उनके सुखचैतन्यमनन्तवैभवम् ।।४१।।
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(४८ ) भेदबुद्धिका त्याग करके सम्पूर्ण संसारको अपने आ्र्प्रात्मामें ही अधिष्ठित समझो तथा सुखचैतन्यैकरस, दिक्कालवस्तुपरिच्छेद- शून्य एवं अविद्या और उसके कार्यसे रहित आत्माको अधिष्ठान रूपसे सर्वत्र विद्यमान देवो।
'मैं सर्वस्वरूप हू और सारा जगत् मेरेमें ही स्थित है' इस प्रकारके अनुभवका नाम आत्मसाक्षात्कार है। साक्षात्कार होनेसे पूर्व अपने प्रयत्न द्वारा वैसी वृत्ति करनेकी चेष्टा करना निदिध्या- सन है। इस प्रकार दीर्घकाल नैरन्तर्य और सत्कारपूर्वक निदि- ध्यासनकी आवृत्ति करनेसे अन्तःकरणा वैसी शाब्दवृत्तिके उदयके योग्य हो जायेगा। तब पहले सुना हुआ शब्द ही प्रमाका जनक हो जायगा॥४१॥
महिमा तव चैष शाश्वतो नहि पुण्ये सति वर्द्धते मनाक्। हरसते वृजिने न पूर्ववत्, प्रथते तत्कृतकृत्यको भवान् ॥४२।
आत्माकी विशेषता यही है कि न तो पुण्यकर्मसे उसमें कोई उत्कर्ष होता है और न पापकर्मसे किसी अपकर्मकी ही प्राप्ति होती है, किन्तु दोनों ही अवस्थाओंमें पूर्ववत् अपने स्वरूपमें स्थित रहकर समस्त जड़वर्गको प्रकाशित करता रहता है। हे जिज्ञासुवर्ग ! इस प्रकार तुम अपने आत्माकी भावना करते हुए एक दिन अवश्य उस आत्मदेवका साक्षात्कार करलोगे और फिर
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त्मामें ही (४) रिच्छेद तुमको कोई कर्तव्य शेष न रहमेके कारण सर्वदा परमानन्दका प्रधिष्ठान अनुभव होता रहेगा। ४२॥। जिनका चित्त निदिध्यासनमें आसक्त न हो उनको निराकार है' इस चिन्तन करना हितकर है। यह कहनेके लिए अग्रिम छ्लोक र होनेसे है :- दिध्या- प्रतिघस्त्रमधोष्व शान्तये कनिदि- उदयके ननु शान्तोरनुवेदमुद्गताः। जनक रहसि प्ररिपचिन्तयस्व च, प्रशवं तत्प्रवोन चेतसा ।।४३। साधकवर्ग ! अपने चित्तको निदिध्यासन के योग्य बनानेके लिए तुम अलग-अलग वेदामें आये हुए शान्ति-पाठका प्रतिदिन पाठ करो और निर्जन स्थान में तत्पर होकर प्रणब का अभ्यास करो तात्पर्य यह है कि अनादिकालसे चित्तको नाम-रूपके चिन्तन का अभ्यास पड़ा हुआ है। इसी कारससे बह नामरूपसंसर्महीन में कोई प्राप्ति निरालम्बाबस्थारूप निदिध्यासनका सहसा अनुष्ठान नहीं कर वरुप में सकता। यहाँ तक कि अधिकांश जिज्ञासु तो यह समझ भी नहीं है। हे सकते कि चित्तका निरालम्ब रहना क्या है। इसलिए उनको पहले ते हुए नामरूपमेंसे रूपांशको छोड़कर केवल नामात्मक प्रणवकाचिन्तन फिर करना चाहिए। जब चित्त रूपांशको त्यागकर केवल नामांशके आलम्बनसे स्थिरता ग्रहण करने लगे तो फिर शनैः शनैः नामांश
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( ५० ) को भी त्यागकर निरालम्बावस्थारूप निदिध्यासनका अभ्यास करनेसे अभिलषित लक्ष्यकी प्राप्ति हो जायगी।।४३। और परन्तु जिनका चित्त नाम और रूप दोनों अंशोंमें से एकको लम्ब
भी न त्याग सके उनको चाहिए कि सबसे पहले नाम रूपका ही है :-
चिन्तन करें। वे लौकिक नामोंके स्थानमें भगवन्नामका और लौकिक रूपोंके स्थानमें भगवदरूपका चिन्तन करें। यह बात 1 आगेके दो पद्योंसे कही जायगी :- त्त शयि चिन्तय चेतसा चिरं चि
य सकलेन्दुसमाभवक्त्रकं ्त मधुरं श्रीवनमालिनं मुदा॥४४॥ कु अयि साधकगण ! यदि तुम्हारा चित्त नागरूपचिन्तनका ही इस रसिक है तो तुम निरन्तर मन ही मन श्री कृष्णाचन्द्रकी घनश्याम होकररि एवं पूर्गाचन्द्र के समान मुखवाली, मनोहर मूर्तिका ही चिन्तन सुना हु किया करो तथा भगवान्के नामोंका ही स्मरण करो। अपरोक्ष भाव यह है कि जिस प्रकार धनुर्वेदका विद्यार्थी पहले स्थूल पार्थ ज्ञान लक्ष्वका वेधन करता है और उसके पश्चात् कालान्तरमें सूक्ष्म, समामि क सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम, इस क्रमसे वह इतना सिद्धहस्त हो जाता है कि चलते-फिरते लक्ष्योंका वेधन करना भी उसे आसान प्रतीत बहुध पुरुष शिव होने लगता है, इसी प्रकार प्राथमिक साधकको भी सबसे पहिले चाले विष् स्थूल पाञचभौतिक भगवत्स्वरूपका ही चिन्तन करना चाहिए अन्यान्य चित्त से ऐर
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अभ्यास (५१) और उसके पश्चात् निराकार चिन्तन करते हुए चित्तको निरा- े एकको लम्ब स्थितिमें ले जाना चाहिए। यही विषय पुराणमें कहा पका ही है :- का और ह बात चिन्तयेत्तन्मयो योगी समाधायात्ममानसम् ॥ १॥ त्ततः शङ्गगदाचक्रश्ञार्ङ्गादिरहितं बुधः । चिन्तयेद् भगवद्रूपं प्रशान्तं साक्षसूत्रकम्॥। २ ॥ यदा च धारणा तस्मिन्नवस्थानवती भवेत्। तदैकावयवं देवे सोऽहं चेति पुनर्बुधः॥३॥ कुर्यात्ततो ह्यहमिति प्रशिधानपरो भबेत् ॥' नका ही इस प्रकार स्थूलादि ध्यानके क्रमसे जब चित्त निरालम्ब नश्याम होकर स्थिर रहने लगे तब निदिध्यासनद्वारा पहले मननपूर्वक चिन्तन सुना हुआ महावाक्य अप्रतिबद्धरूपसे करामलकवत् ब्रह्मका अपरोक्ष बोध उत्पन्न कर देता है, जहाँ जाकर 'सर्वं कर्माखिल स्थूल पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते' इस वाक्यसे भगवान् ने समस्त कर्मोंकी सूक्ष्म, समामि कही है॥४४॥ सा है प्रतीत बहुधा देखा जाता है कि अपनेको विष्शुभक्त माननेवाले पुरुष शिवकी निन्दा किया करते हैं और शिवका अभिमान रखने पहिले चाले विष्शुको प्रशाम करना पाप समझते हैं। ऐसी ही दशा वाहिए अन्यान्य देवताओंकी आराधना करनेवालों की भी है। उनके चित्तसे ऐसे कुसंस्कारोंके हटाने केलिए आगेका पद्य है :-
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(५२ ) अपि भावय भूधरोपमे, सूत्रोंके रचयि वृषभे रूढमगूढविग्रहम । 'यथाभिमतध्य
भसितेन विभूषितं जटा- कि अपने को चित्तको स्थिर स्खलदम्भ: पृथुपूरमीश्वरम् ।४५।। सब देवोंमें सम इष्टदेवका ध्य यदि आपका चित्त भगवान् कृष्णकी मनोहर मूर्तिके ध्यानमें बहुत लो रुचि नहीं रखता तो भगवान् शङ्करके सच्चिदानन्द स्वरूपका ध्यान करो जो पर्वतके समान विशाल बैलपर चढ़े हुए हैं जिनकी किसी भी क
जटाओंसे मगवती भागीरथीका प्रवाह बड़े वेगसे बह रहा है और दुःखोंकी निव्ृ जिनका देह भस्मसे धवलित हो रहा है। यदि उसमें भी चित्तकी है। परन्तु जि प्रवृत्ति नहीं है तो किसी अन्य इष्टदेवके विग्रहका चिन्तन करो। पुष्कल बल है तात्पर्य यह है कि मार्गमें चलनेवाले पुरुषको सहारिके लिए भगवद्-भजन लाठीकी आवश्यकता होती है। वह लाठी चाहे काठकी हो चाहे आक्षेपका सम किसी धातुकी उसका और कोई प्रयोजन नहीं होता, उसे जैसा दुधुवु सहारा काठकी लाठीसे मिल सकता है, उससे अधिक धातुकीसे भी नहीं निल सकता। इसी प्रकार चित्तको स्थिर करनेके लिए हमें किसी आलम्बनकी आवश्यकता है। वह चाहे कृष्णा प्रतिमा इह हो अथवा शिवमूर्ति-इसमें आग्रहकी आरवध्यकता नही है। जिस का चित्त जिस विग्रहमें अधिक प्रेम रखता हो उसे उसी विग्रहक जिनके ध्यान श्रेयस्कर होगा, क्योंकि चित्तकी रिथरता होनेपर तो उसक शक्ति रखनेव त्याग ही करना पड़ेगा। इसलिए किसी देवविग्रह में तारतम के गालमें च रुकभना अरविवेक है, उससे सपलता नहीं मिल सकती। योग लोगोंकी तो
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(५३ )
सूत्रोंके रचयिता भगवान् पतञ्जलिजी ने भी इसी अभिप्रायसे 'यथाभिमतध्यानाद्वा' इस सूत्र का निर्माण किया है, जिसका अरथहै कि अपने को अभोष्ट किसी भी देवताके स्वरूप का ध्यान करनेसे चित्तको स्थिर किया जा सकता है। इसलिए हमको चाहिए कि ।४५॥ सब देवोंमें समान भाव रखकर अपने लक्ष्यका ध्यान रखते हुए इष्टदेवका ध्यान करें॥४५॥ मूर्त्तिके ध्यानमें बहुत लोग कहते हैं कि जो लोग दुःखी हैं, निधन हैं और नन्द स्वरूपका हुए हैं जिनकी किसी भी कार्यको करनेमें समर्थ नहीं हैं उन्हींको अपनी ह रहा है और दुःखोंकी निवृत्तिके लिए ईश्वर का भजन करनेकी आवश्यकता में भी चित्तकी है। परन्तु जिनके पास पहिलेसे ही पर्याप्त ऐश्वर्य हैं, शरीरमें चिन्तन करो। पुष्कल बल है और जिनका आधिपत्य भी अप्रतिहत है उनको सहारिके लिए भगवद्-भजनकी कोई आवश्यकता नहीं है-इत्यादि। इस ठकी हो चाहे आ्क्षेपका समाधान अगले श्लोकसे करते हैं :- ता, उसे जैसा धक धातुकीसे दुधुवुर्गमनेन मेदिनी-
र करनेके लिए मपि ये रावसतत्सुतादयः ।
कृष्ण प्रतिमा इह तेऽपि यमेन चर्विताः ।
नही है। जिस वव वयं कीटपतङ्गसन्निभाः ।४६॥। उसी विग्रहका नेपर तो उसका जिनके चलनेसे ही पृथ्वी कांपने लगती थी ऐसी शारीरिक ठप शक्ति रखनेवाले भी रावण और उसके पुत्र-पौत्रादि अन्तमें काल परह में तारतम्य के गालमें चले गये, फिर मच्छर और मविखयोंके समान हम सकती। योग लोगोंकी तो बात ही कया है।
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(५४) तात्पर्य यह है कि अतुलित ऐश्वर्यवान् और त्रिलोकविजयी सवसादिके समान आधुनिक प्रजामें न तो बल है और न धना ही है। वे भी जब नष्ट हो गये तब हमारे नाशमें तो संदेह ही क्या है ? इसलिए हमको उस महाबलसाली कालसे अपनी रक्षा करने के लिए 'भयादस्याग्निस्तवति भयात्तपति सूर्यः' उससे भी बली 'भयादिन्द्रश्च वायुश्र मृत्युर्धावति पञ्चमः' इसा श्रुतिके अनुसार भगवान् की शरण लेनी चाहिए। सांसारिक सुखोंकी प्राप्ति उसका फल नहीं है। हाँ, वह उसका आनुसङङ्गिक फल हो सकता है। इसलिए प्रत्येक पुरुषको कालके गालमें प्रवेश करनेसे बचनेके लिए भगवद्भजन का अलम्बन लेना चाहिए ॥४६।। किन्हींका कथन है कि भगवद्भजन करना तो अवश्या चाहिए, परन्तु हम उसे सांसारिकसुख भोमनेके अनन्तर वृद्धावस्थामें कर लेंगे इसका उत्तर अगामी पद्मसे देते हैं- तदुदेधि वतस्व सत्वरं निजनिःश्रेयसहेतवे स्फुटम् । विगते सति मानवे वपु- व्यभिलव्यनपि कि करिव्यसि ।।४७।। यदि मृत्युसे बचनेका उपाय केवल भगवद्गजन ही है तो उठों और शीघ्र ही अपने कल्याणके साधनका अनुष्ठान करो, क्योंकि सर्व साधनोंके करनेमें समर्थ मनुष्यशरोस्का नाशा ह्ोनेपर तुम चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकोगे।
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नयी ( ५५ ) धना ही भाव यह है कि जो पुरुष सर्व प्रकारकी औषधियोंसे भरे
नी हुए औषधालयमें रहकर भी अपने रोगोंकी चिकित्सा नहीं कर पः' सका वह औषधहीन स्थानमें जाकर कर लेगा यह कभी सम्भव इसा नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो कि मृत्युरूप व्याधिका रक चिकित्सास्थल है, उस मानव शरीरके रहते हुए जब हम क: में जरामृत्युरूपरोंगकी निवृत्ति नहीं कर सके तब इसके अयोग्य
ना अन्य शरीरोंको पाकर कर लेंगे यह कैसे सम्भव हो सकता है ? अतः प्रत्येक मुमुक्षुको उचित है कि जबतक उसका शरीर नीरोग
या है तभी तक अपने श्रेयके लिए उसे जो कुछ करना हो करले, क्योंकि रोगाक्रान्त होने पर कुछ नहीं किया जा सकता। इसी अभिप्राय को किसी कवि ने भी-
'न व्याधयो न वा मृत्युः श्रेय.प्राप्ति प्रतीक्षते। यावदेव भवेत्कालस्तावच्छर यः समाचरेत् ।' इस श्ोक में स्पष्टतया प्रतिपादित किया है ॥४७॥
यावज्जीवन साकारोपासना करना ही श्रेयस्कर नहीं है, किन्तु जब ध्यानके बलसे चित्त सूक्ष्मतम वस्तुको ग्रहण करने में समर्थ हो जाय तब किसी ब्रह्मनिष्ठ गुरुकी शरणमें जाकर निर्गु ब्रह्मके साक्षात्कारके लिए चेष्ठा करनो चाहिए। यह विषय अग्रिम श्रोकसे कहते हैं :-
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( ५६) नात्यन्तं कुरु सहसा जनैरबोध- रासङ्गं व्रज विदतां समोपमाशु। उत्कषरथ धिषरणा निजाममीषा- मीशानैरपवदितुं वचोभिरान्ध्यम् ।।४८।। अज्ञानी पुरुषोंके सहवासमें ही आयु को बिताते रहना उचित नहीं है शीघ्र ही श्रोत्रिय औरर ब्रह्मनिष्ठ गुरुत्ोंकी सेवामें उपसस्थित हो जाओ तथा उनके प्रामाशिक और उपपत्तिपूर्ण वचनों का अवलम्बन लेकर अपने हृदयपटलमें फैले हुये मोहतिमिरको दूर करनेके लिए अपनी बुद्धिमें सामथ्यी सम्पादन करो। तात्पर्य यह है कि जिस पुरुषने कभी सिंह नहीं देखा वह यदि वनमें जाकर उसे अपने नेत्रों से देख भी ले तो भी कोई जब तक दूसरा पुरुष 'यह सिंह है' ऐसा न बतादे तबतक उसे सिंहका पूर्ण निश्चय नहीं होता। इसी प्रकार साकारचिन्तनसे जब अन्तःकरणा आत्मदर्शन में समर्थ हो जाय तो अवश्य ुरुके समीप जाना चाहिए, नहीं तो तुम्हें परमात्माका पूर्णा निश्चय महीं हो सकेगा ॥४८॥ यदि श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुकी प्राप्ति न हो तो निर्गु ए आत्माकी उपासना करनी भी हितकर है-यह कहने के लिए आामेका पद्य है :-
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(५७ )
वीताशो भवविमलाशयः समस्मिन् । स्फीताशः स्थिरसुखदे पदे नितान्तम्। प्रध्यायेरथ विशदं विशोकमेकं, स्वात्मानं विभुमखिलान्तरात्मभूतम् ।।४६।।
ना सांसारिक विषयोंसे सुखप्राप्तिकी दुराशा छोड़कर शुद्धान्त :- करणा हो सर्वात्मभावस्वरूप नित्यनिरतिशयसुखप्रद पदकी तीब्र आकाड्क्षा रखते हुए स्वयंप्रकाश, सकलदूषणरहित, एक विभु ये और समस्त प्राशियोंके अन्तरात्मस्वरूप अपने प्रत्यगात्मा का यी निरन्तर ध्यान किया करो। इस निर्गुणोपासनासे भी निर्गुण- तत्त्वका साक्षात्कार हो जायगा। ह तात्पर्य यह है कि यद्यपि उपासना कोई प्रमाण नहीं है इसलिए उससे होने वाला ज्ञान प्रमारूप नहीं हो सकता तथापि से जिस प्रकार कोई पुरुष रात्रिमें खद्योतको मणि समभकर से लेने के लिए जाय और वहाँ जाने पर खद्योत तो उड़ जाय, किन्तु पास ही पड़ा हु मणि मिल जाय तो इस संवादिभ्रम- की तरह उपासनाजन्यज्ञान स्वयं भ्रमरूप होता हुआ भी ब्रह्मप्रमाका प्रयोजक हो सकता है॥४६॥
बहुतसे लोग कहा करते हैं कि 'मोक्ष में क्या रक्खा है जैसे पत्थर निष्क्रिय, कूटस्थ और शीतोष्ण की प्राप्तिमें एकरस रहता है उसी प्रकारका ब्रह्मभावात्मक मोक्ष है। इसलिए उसके लिए उद्योग करना पूरा अविबेक ही है'-इत्यादि। जो कुछ उन
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( ५८ ) से भी अधिक पण्डितम्मन्य हैं उनका कथन है कि भले ही ब्रह्म आनन्दस्वरूप है परन्तु जैसे मिश्रीका आनन्द तो उससे भिन्न उसका आस्वादन करने वाला ही ले सकता है मिश्रीस्वरूप होने पर वह आनन्द नहीं मिल सकता इसी प्रकार ब्रह्म से पृथक् रह कर ही उसका आनन्द लिया जा सकता है, यदि ब्रह्मस्वरूप ही हो गये तो क्या आनन्द का अनुभव होगा इसलिये मुक्तिके लिए सारे प्रयत्न निरर्थक ही हैं। इन दोनों मतवादियों का अग्रिम दो पद्यों से समाधान करते हैं :- पश्येदं जगदखिलं निजात्मनि त्वं मिथ्याभं मरुकिरणोष्विवोत्थमम्भः । संरम्भं त्यज तदिह स्वयंप्रकाशो भासि त्वं ननु बहुधा किमीहसे भोः ॥५०॥
तुम इस सकल संसार को, मरुप्रदेश में पड़ी हुई सूर्यकी किरणों में दिखाई देने वाले जलके समान, आत्मामें कल्पित समझरो और संसारके मिथ्यापदार्थों के भोगने में जो तुम्हारी प्रवृत्ति है उसे त्याग दो, देखो तुम्हारा स्वरूपभूत चैतन्य स्वयंप्रकाश होनेके कारण निरन्तर भासमान रहता है। उसे त्यागकर तुम और क्या चाहते हो ? ॥५०।। यदि कहो कि हमें आनन्दकी आवश्यकता है। आत्मा स्वयंप्रकाश है तो रहे, आनन्दहीनके कारण वह भी हेय है। तो उसका उत्तर देते हैं :-
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(५६)
ही ब्रह्म कल्याएं तव विमलं महत्स्वरूपं
भिन्न ध्यायन्ति स्फुटमनिशं मुनीशमुख्याः। प होने पुण्याघे त्वयि नतरामपि प्रथेते क् रह माऽहन्तामिह जडतावति प्रसषीः ॥५१। प ही मुक्तिके तुम्हारा स्वरूपभूत आत्मा लेशमात्र दुःखके संसर्गसे शून्य में का और निरतिशय आानन्दरूप है। इसी से नित्य और निरतिशय आनन्द माननेकी इच्छावाले प्राचीन ऋषि-मुनियोंने भी ध्यान और चिन्तनआदिके द्वारा उसीका साक्षात्कार करके अपनेको कृतकृत्य माना था। उस तुम्हारे स्वरूपमें पुण्य-पापका लेप भी नहीं होता, किन्तु इस जड़-शरीरमें अहन्त्वका अध्यास होने से उस में इन सब विरोधी गुरगोंकी प्रतीति होती है। इसलिए सब अनर्थोंके मूल इस देहात्मत्वनिश्चयका त्याग करो।
तात्फर्य यह है कि यद्यपि धर्म, अरथ, काम, मोक्ष ये चारों ही पूर्य की पुरुषार्थ पदके वाच्य माने जाते हैं तथापि यदि सूक्ष्मदृष्टिसे ल्पित विचार किया जाय तो सिद्ध होता है कि वस्तुतः पुरुषार्थ म्हारी पदसे कहे जाने योग्य कैवल्य ही है। उससे भिन्नोंमें इस शब्दकी वैतन्य उसे प्रवृत्ति बालकमें अग्नि शब्दकी प्रवृत्तिकी तरह गौणी वृत्तिसे है, क्योंकि पुरुषोंकी निरुपाधिक इच्छाका विषयभूत पदार्थ ही पुरुषार्थपदका मुख्य अर्थ हो सकता है और वह केवल मोक्ष ही है गत्मा कारण कि एक तो वह प्राणिमात्रको अभिलषित है दूसरे उसमें है। जो इच्छा है वह किसी अन्य निमित्त से नहीं है। अतः
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(६० ) प्राणीमात्रका अभीष्ट होनेके कारण तथा अपनेसे भिन्न किसी अन्य इच्छाके अधीन न रहनेवाली इच्छाका विषय होनेके कारण मोक्ष ही वास्तविक पुरुषार्थ है। यदि कहें कि 'पशु-पक्ष्यादि तथा नास्तिकलोग मोक्ष नहीं चाहते, यदि चाहते तो उसके लिए प्रयत्न भी करते इसलिए मोक्षमें प्राशिमात्रःकी इच्छाकी विषयता नहीं है' इत्यादि तो इस पर हम कह सकते हैं कि मोक्षके यथार्थ स्वरूपको न जाननेके कारण ही ऐसी शंका होती है। उसका यथार्थ स्वरूप समझ लेने पर इस शंकाके लिए स्वयं ही अवकाश नहीं रहेगा। मोक्ष स्वर्गादिके समान कोई लोकान्तर नहीं है किन्तु नित्य निरतिशय- आनन्द और सकल दुःखोंकी आत्यन्तिकनिवृत्ति ही मोक्ष कहलाती है। अब बताइये ऐसा कौन प्राणी है जो इसे नहीं चाहता। किसी दुःखाक्रान्तको यदि उसका दुःख दूर करनेके लिए हम औषध देनेसे पूर्व यह कह दें कि 'इस औषधसे तुम्हारा रोग एक सप्ताहके लिए हट जायगा किन्तु सप्ताहके पश्चात् वह तुमको फिर दबा लेगा और इस दूसरी औषधिके सेवनसे तुम्हें यह रोग आाजन्म नहीं होगा, परन्तु इसका मूल्य बहुत है अब बताओ तुम्हें कौन-सी औषध दी जाय' तो निःसन्देह वह पुरुष दूसरी औषधि ही लेगा। इससे सिद्ध है कि आध्यात्मिकादि तीनों तापों की आत्यन्तिकी निवृत्ति ही सबको अभीष्ट है। इसी प्रकार सबकी यही इच्छा रहती है कि हमको सबकी अपेक्षा अधिक सुख हो और वह सर्वदा बना रहे। इससे यह स्पष्ट है कि सबको नित्य-
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( ६१ )
पी निरतिशय सुख ही अभीष्ट है और यही दो मोक्षके स्वरूप हैं। ण अतः यह निर्विवाद सिद्धान्त है कि मोक्षकी अभिलाषा सबको है, तथा उसकी इच्छा भी अन्य इच्छाके अधीन न होनेके हीं कारण निरुपाधिरु है, अतः सबको अभिलषित और निरुपाधिक ए इच्छाका विषय होनेके कारण मोक्षको ही पुरुषार्थ शब्दका स मुख्य अर्थ मानना सर्वथा उपपन्न है। उससे भिन्न फलोंमें तो के 'फलेच्छा उपायमुपसंक्रामति' इस नियमके अनुसार सुखेच्छाके ने कारण ही जीवोंकी इच्छा है। इसलिए वह सोपाधिक या गौए इच्छा है। इतर पदार्थ प्राशिमात्रको अभिलषित भी नहीं हैं। - किन्तु जिसकी जिसमें सुवसाधनत्वबुद्धि है उसी पुरुषकी उस में इच्छा है, दूसरेकी नहीं। अर्थ और धर्मको मनुष्य चाहता है, परन्तु पशु-पक्षी नहीं चाहते। इसी प्रकार कामको अत्यन्त वृद्ध अथवा शिशु नहीं चाहते, युवा चाहते हैं तथा पुत्र-कलत्रादि १दार्थों में भी समा्त प्राणियोंकी इच्छा नहीं होती। इससे स्पष्ट है कि मोक्षेतर पदार्थोंमें गौण इच्छा है और वह सर्वाभष्ट भी नहीं है। : इसलिए उन्हें पुरुषार्थ शब्दके मुख्यार्थ न समभकर गौणार्थ ही मानना चाहिए। मोक्षको परम पुरुषार्थ कहना और धर्मादियोंको केवल पुरुषार्थ कहना इसी बातका समर्थक है। वह परमपुरुषार्थ भूत मंक्ष ब्रह्मस्वरूप है, क्योंकि शास्त्रोंमें ब्रह्मको आत्यन्तिक दुःख निवृत्तिसे उपलक्षित नित्यनिरतिशय आ्र््रानन्दस्वरूप ही माना है। अतः ब्रह्मप्राप्ति और मोक्षप्राप्ति एक ही चीज है। परन्तु यदि वह ब्रह्मस्वरूप मोक्ष अज्ञांत रहे तब भी वह
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( ६२ ) पुरुषार्थ नहीं होगा। इसीलिए उसे शास्त्रोंमें अपने आत्मासे अ्भिन्न रूपसे प्रतिपादित किया है, क्योंकि आत्मा कभी किसीको अज्ञात नहीं रहता, सभी अपने आपको जानते हैं। अतः उससे अभिन्न ब्रह्मस्वरूप मोक्ष भी सदा अपरोक्ष रहनेके कारण पाषाणगप्राप्तिके तुल्य नहीं हो सकता, उसके साधनोंमें मतभेद होनेके कारण ही पुरुषोंकी भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ हो रही हैं। जैसे दो पुरुष किसी उग्र पापके कारण अपने नगरमें कलङ्कित हो जायँ औरर उस कलङ्कसे बचनेके लिए एकतो विषभक्षरणादिके द्वारा अपना देहान्त करले और दूसरा देशत्यागकर ही अपना पीछा छुड़ाले तो वहाँ फल तो अपनी अपकीर्ति न सुननारूप एक ही है तथापि मरण और देशत्यागरूप साधन भिन्न-भिन्न हैं। इसी प्रकार मोक्ष- रूप एक ही फलके लिए वादियोंने अनेकों उपायोंकी कल्पना की है। परन्तु जिस प्रकार दष्टान्तस्थलमें मरण अथवा देशत्याग पापनिवृत्तिका साधन नहीं है किन्तु गास्त्रोपदिष्ट प्रायश्चित्तादि ही उसका यथार्थ साधन है उसी प्रकार दार्ष्टान्तिकस्थलमें भी वैदिक साधन ही मोक्ष प्राप्तिके यथार्थ साधन हैं। उनसे भिन्न और सब साधनाभास हैं। इसलिए मुमुक्षु को उचित है कि अन्य वादियोंके कल्पना किए हुए साधनाभासों को छोड़कर वैदिक साधनोंके अनुष्ठानमें ही तत्पर रहे ॥५१॥ पूर्व ग्रन्थमें मोक्षका यथार्थ स्वरूप वर्णन करनेसे ज्ञात हुआ कि वह सबको अभीष्ट तथा स्वयंप्रकाश और निरतिशय सुखस्वरूप ददार्थ है। इसलिए 'मोक्षकी कामना करना पत्थर बननेकीकामना
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( ६३ )
भिन्न करनेके समान है तथा मिश्री बनकर जैसे मिश्रीका स्वाद नहीं लिया जा सकता उसी प्रकार ब्रह्म बनकर ब्रह्मानन्द का अ्रनुभव ज्ञात भिन्न करना सर्वथा गगनकुमुमके समान है' इत्यादि सब आक्षेपोंका
पिके इससे समाधान हो गया, क्योंकि दष्टान्तस्थलमें मिश्री जड़ होनेके
ही कारण माधुर्यका अनुभव नहीं करती। परन्तु मोक्ष स्वयं प्रकाश
कसी सुखरूप होनेसे कभी अज्ञात नहीं रह सकता। इसलिये उसके प्रधान साधन आत्मसाक्षात्कारके लिए प्रत्येक मुमुक्षुको विवेक उस वैराग्यादि साधनचतुष्टयका सम्पादन करना चाहिये। यह कहने ना ले के लिए आगेका छोक प्रवृत्त होता है :-
पि वैराग्यं पृथु बिभृहि स्मराविलं भो क्ष- दुःखाढय क्षणविरसं चलं च दृश्यम्। की स्पृश्यन्तामिह विषया यथौषधं स्यान् ग ही नैराश्यं श्रय नितरामुदास्स्व नित्यम् ।।५२।। अयि मुमुक्षुवर्ग ! समस्त दृशयको क्षणाभंगुर, विरस और दुःखपूर्ण देखते हुए परवैराग्यको धारण करो। शरीरस्थितिके प्रयोजक आहार-विहारादि को भी क्षुधा-पिपासा रूप रोगके निवारणके लिए शषधरूपसे सेवन करो और सम्पूर्ण सांसारिक विषयोंसे सुखप्राप्तिकी आशा छोड़कर प्रारब्धवश इृष्टया अ्र्परनिष्ट प्राप्त होनेपर भी उदासीन वृत्ति धारण करो। भाव यह है कि जैसे बिना सीढ़ियोंके महलकी छत पर
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( ६४ ) चढ़ने के लिए पहले चढ़नेके साधनस्वरूप सीढ़ियोंको बनानेकी आवश्यकता है, बिना उसे बनाये चढ़नेका प्रयत्न करना व्यर्थ समय खोना ही है इसी प्रकार मोक्षकी प्राप्ति के लिए उसके साधनोंका अनुष्ठान करना ही श्रेयस्कर है, साधनानुष्ठान न करके किसी अन्य प्रकारसे उसे पानेकी चेष्टा करना व्यर्थ ही है। इसीसे बार-बार साधनोंका उपदेश किया गया है। अतः प्रत्येक मुमुक्षुको व्यर्थकालक्षेप न करके साधनानुष्ठानमें तत्पर हो जाना चाहिये ॥५२। जिस प्रकार रथ और घोड़े सारथिके अधीन रहते हैं, रथीके नहीं, रथी यदि किसो अभीष्ट स्थल पर रथको पहुँचाना चाहे तो वह सारथिकी प्रसन्नता से ही ऐसा कर सकता है यदि सारथि अप्रसन्न हो तो उसको किसी गढे अथवा जंगलमें ले जा सकता है। इसी प्रकार जीवरूप रथीके पास इन्द्रियरूप घोड़े हैं, उनके चालक परमात्माकी शक्ति इन्द्रियोंके अघिष्ठाता सूर्यादिक देवगण सारथि हैं। अब हम यदि अपने घोड़ोंको कैवल्यपथपर चलाना चाहें तो हमको आवश्यक है कि उन देवरूप सारथियोंकी प्रसन्नता सम्पादन करें। उन प्रत्येककी प्रसन्नता का उपाय परमे- श्वरकी प्रसन्नता है, क्योंकि 'एतस्यैव सा विसृष्टिः' इस श्रुतिके अनुसार सब देवग परमेश्वररूप वृक्षकी ही शाखायें हैं और मूलके तृप्त होनेसे शाखाओंका तृप्त होना लोकमें प्रसिद्ध ही है। अतः आगेके दो पद्योंसे परमेश्वर की प्रसन्नताके साधनका निरूपण करते हैं :-
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( ६५)
ो बनानेकी वात्सल्यं यदि सतलं प्रवर्तयेथा रना व्यर्थ लए उसके भूतानामिह करुरणाविशारदः सन्1
नुष्ठान न निःसङ्गो हृदि नितरामपि स्वशकत्या,
व्यर्थ ही लोकानामुपकृतये घटस्व विद्वन् ।।५३।। है। अतः नमें तत्पर यदि करुणापूर्ण हृदयके कारण तुम प्रािगयोंपर दया रखते हो तो विवेक-वैराग्यादिके बल से सदा निःसङ्ग रहकर लोगोंका उपकार करो ॥५३॥।
रहते हैं, क्योंकि-
पहुँचाना नैतस्मादधिकमिहास्ति विद्वदहँ Tहै यदि में ले जा विद्याभिर्य उ जनतातमोनिवर्हः।
घोड़े हैं, विलिश्यन्ते ननु जगतां कृते महान्तो सूर्यादिक ल्यपथपर दृष्टान्तोऽमृतकिरादयस्तवामी ।।५४।।
रथियोंकी विद्याके द्वारा जनताके हृदयाकाशमें फैले हुए अन्धकारको य परमे- दूर करनेसे बढ़कर विद्वानोंके लिए कोई और कर्त्तव्य नहीं है। श्रुतिके देखो, सूर्य-चन्द्रमा आदि संसारके कारण ही राहु प्रभृतियोंसे हैं और पीड़ित होते हैं। ही है। साधनका भाव यह है कि जैसे यज्ञदत्तके कार्यमें देवदत्त सहायता करे तो वह यज्ञदत्तका प्रिय बनजाता है इसी प्रकारदीन-दुःखीपुरुषोंकी
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( ६६ ) काम-काज और धनादिके द्वारा यथाशक्ति रक्षा करनेवाला पुरुष चित्त परमेश्वरका प्रिय हो सकता है, कनोंकि दीनरक्षा ईश्वरका कर्तव्य डरते हो है और ईश्वर कर्तृ क कारयके सम्पादनमें उसकी सहायता करता शीघ्र ही है, दूसरा कारण यह भी है कि जिस प्रकार किसी राजसभाका सदस्य निर्वाचित होनेके लिए प्रार्थो को समतियोंकी सख्या बढ़ाने एक
के लिए धनदानादि नाना प्रकारसे जनताको प्रसन्न करना पड़ता सदा ए
है। इसा प्रकार परमेश्वरकी सभाके सभ्य बननेके लिए हमको सिद्धि न
भी अधिक सम्मतियाँ प्राप्त करनेके लिए जनता की यथाशक्ति ही सिड्धि
सेवा करनी चाहिए। तीसरे हेतु यह है कि जीवसमष्टिके अ्रभि- मानीका नाम परमेश्वर है, जब हम समष्टि जनताकी सेवा करेंगे तो अवश्य उसके अभिमानी ईश्वर हमारे ऊपर प्रसन्न होंगे, जसे कि पुत्र की रक्षा करनेसे उसमें पुत्रत्वाभिमान रखनेवाला पिता प्रसन्न होता है। इसलिए भगवत्कृपाकी इच्छा रखनेवाले पुरुषों को परोपकारमें तत्पर रहना चाहिए ।।५४।। वे परन्तु जो पुरुष किन्हीं कारणोंसे इस साधनका अनुष्ठान न श्रृतिर कर सकें उनके प्रति आगेके दो शोकोंसे साधनान्तरका उपदेश साधन
करते हैं :- करते
भीतश्चेदसि जनतासमागमेभ्यो रागादेर्लघुमनसि प्रवर्तकेभ्यः । वृद्धि त्यवत्वाऽरं जनसमिति तदा विविक्तं सेवस्वामलधिषरो जहत्समस्तम् ॥५५।। उपयो
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(६७)
ला पुरुष चित्तमें रागद्वेषादिके उत्पन्न करने वाले सङ्गसे यदि तुम कर्तव्य डरते हो तो जनसमाज तथा वित्तपुत्रादिके संगका त्याग करके करता शीघ्र ही निर्मलचित्त हो एकान्त प्रदेशका सेवन करो ॥५५॥ सभाका बढ़ाने एकान्तप्रदेशमें रहनेसे ही कोई सिद्धि नहीं हो सकती क्योंकि
पड़ता सदा एकान्तमें ही रहने वाले सिंहब्याघ्रादि अ्न्य जीवोंमें कोई
ए हमको सिद्धि नहीं देखी जाती। किन्तु एकान्तमें रहकर साधन करना
थाशक्ति ही सिद्धिका जनक है, यह बात अग्रिम छ्ोकमें कही जाती है :-
के अभि- अद्वैतामृतमनिशं श्रुतिप्रपाभ्यो वा करेंगे ोंगे, जसे निःशङ्कं प्रणिगपिबर्ता प्रमोदवन्ति।
ना पिता शान्तानामथ सततं समाधिभाजा ले पुरुषों धन्यानामिह विजने वियन्त्यहानि ॥५६॥
तुष्ठान न वे पुरुष धन्य हैं जो प्रतिदिन निःशङ्कमनसे शान्तिपूर्वक
उपदेश श्रुतिरूप प्याऊसे अद्वैतामृतका पान करते हुए ध्यानसमाघिके साधनद्वारा एकान्तदेशमें आप्रनन्दपूर्वक अपना काल व्यतीत करते हैं।
भाव यह है कि जिस प्रकार व्यायाम करनेसे अवश्य शक्तिकी वृद्धि होती है, परन्तु वही व्यायाम अत्यन्त दुर्बल पुरुषको मृत्युकी ओर ले जाता है। इसी प्रकार परोपकार भी उन्हीं पुरुषोंको उपयोगी हो सकता है जिनके चित्तमें सङ्गजन्य दोषोंका सचार
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( ६८ ) स्वातन्त्र्य हो न हो सके, परन्तु जिन अधिकारियोंके हृदय अतीव कोमल होनेके कारण संगदोषसे दूषित हो सकते हैं उनके लिए परोपकार जगत्को भय।
लाभप्रद नहीं होगा। इसलिए ऐसे पुरुषोंको एकान्त प्रदेशमें ही नहीं कर सक
रहकर साधनानुष्ठन करना उचित है। ५६॥ जगत्का रहस्
जब दोर्घकाल तक एकान्तमें रहकर भगवत्स्मरणपूर्वक करके यथेच्छ
श्रवणमननादिका यथावत् अ्रपरनुष्ठान किया जायगा तब अवश्य प्रारब्धक्षयके
आत्मस क्षात्कार होगा और फिर पुरुषको परमस्वातन्त्रयका लाभ परमस्वातन्त्रय होगा तथा किसी भी साधनानुष्ठानके लिए बाधित नहीं होना होना चाहिए पड़ेगा-यह कहनेके लिए अगले श्लाककी प्रवृत्ति है :- यद्यपि 'तर
निर्भोको मतिदृढताबलाद्यदि त्वं श्रृति प्रामाण्यसे और परमान स्वच्छन्दं तदु विहर स्वरूपभूतम् । मुमुक्षुओंकी निःशेषं परिकलयन्निहाधिरोपा- दोनों बातेंवि आरम्भ किय दुद्भातं तव किमिदं प्रदूषयेत ।।५७।। प्रधान काररा
यदि तुम चित्त दृढ़ होनेके कारण जनसंगसे निर्भय हो तो राग:क्वावरि सम्पूर्ण विश्वको अपना ही स्वरूप देखते हुए स्वतन्त्रतापूर्वक या त्वेषा र यथेच्छ विवरो। अज्ञानजन्य भ्रमप्रतोतिसे भासनेवाला यह मिथ्या जगत् तुम्हारा क्या बिगाड़ सकता है? साडभ्रामे स्व
तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार नख और दाढ़ोंसे रहित बूढ़े कोद्रिक्ति: क
सिंहोंसे भरे हुए वनमें विचरनेसे पुरुष तभीतक भयभीत रहता आकाश के है जबतक कि उसे इस रहस्यका पूर्सा परिचय न हो, परन्तु राग किस प्रक जब वह इस भेदको जान लेता है तब उसे अरण्य भ्रमरमें
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कोमल स्वातन्त्र्य हो जाता है। इसी प्रकार आत्मबोधसे पहले पुरुष जगत्को भयानक समभ्ता हुआ उसमें स्वतन्त्रतापूर्वक विहार रोपकार देशमें ही नहीं कर सकता, परन्तु आत्मसाक्षात्कारके अनन्तर जब उसे जगत्का रहस्य विदित हो जाता है तब वह परम स्वातन्त्र्य लाभ
एपूर्वक करके यथेच्छ संसारविहारसे होने वाले सुखका अनुभव कर प्रारब्धक्षयके पश्चात् कैवल्यपदको प्राप्त करता है। इसलिए ऐसे
का लाभ परमस्वातन्त्रयजनक आत्मबोधके लिए प्रत्येक पुरुष को यत्नशील हीं होना होना चाहिए।५७।। यद्यपि 'तरति शोकमात्मवित्' 'ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति' इत्यादि श्रतिप्रामाण्यसे आरत्मज्ञान निश्िितरूपसे सम्पूर्ण दुखोंकी निवृत्ति और परमानन्दकी अभिव्यक्ति करने वाला होता है, तथापि मुमुक्षुओंकी श्रद्धा बढ़ानेके लिए यह कहनेके उद्देश्यसे किये दोनों बातें विद्वान्के अनुभवसे भी सिद्ध हैं, आगेके ग्रन्थका आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले छोकसे सारे अनर्थोंके ७। प्रधान कारण रागके अभावका वर्णन किया जाता है :-
य हो तो राग:क्वावस्थितःस्यान्मयि विमलतमश्रीनभःसन्निभेऽस्मिन् त्तापूर्वक या त्वेषा रागरेखा स्फुरित परितता शक्रकोदण्डतुल्या। बाला यह साऽभ्रामे स्वान्तखण्डे विलसतु सुतरां मेघसंसर्गशून्ये
रहित बूढ़े कोद्रिक्ति: कापरिक्तिर्गगन इव मयि स्वान्ततोऽत्यन्तदूरे।
गीत रहता आक्काशके समान अत्यन्त निर्मल और सर्वदा असंग मुझमें हो, परन्तु राग किस प्रकार रह सकता है जो बिजलीकी चमकके समान य भ्र म ए में
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(७० ) रागकी रेखा दिखाई पड़ती है वह मेघरूप अन्तःकरणमें ही स्थित चेष्टन्ते है सो उसका धर्म होनेसे सदा उसीमें रहे, परन्तु मेवके सम्पर्कसे चेष्टन्तां सर्वथा शून्य आकाशके समान अन्तःकरणासे सवथा असम्बद्ध चेष्टेरन्नो मुझमें किसी प्रकारका उत्कर्षापकर्ष नहीं हो सकता। भिन्नश्रा
भाव यह है कि जिस प्रकार मेघमण्डलमें चमकने वाली यदि बिजलीकी रेखा अविवेकियोंको आकाशमें ही स्थित जान पड़ती ओर प्रवृत्त है, क्योंकि उनको आकाशकी असंगताका ज्ञान नहीं होता, किन्तु आत्मचैतन वही विवेकियोंको दृष्टिसे मेघमें स्थित है उसी प्रकार 'कामः परन्तु उन सङ्कल्पो विचिकित्सा ......... इत्येतत्सवं मन एव' इस श्रुतिके होने वाले अनुसार अन्तःकरणमें रहने वाले भी रागादि अज्ञानियोंको क्योंकि व आत्मामें जान पड़ते हैं और वे ही 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्' समान स् 'नण्वह्नस्वमदीर्घम्' इत्यादि श्रुतियोंद्वारा निर्गुए और असंग देहादिकों आत्माके स्वरूपका निश्चय होने पर ज्ञानीको अन्तःकरणमें स्थित दिखाई देते हैं। इसलिए ज्ञानी अपनेमें रागादिका भावय निश्चल न अभाव अनुभव कर सकता है॥५८॥ भी चुम्ब यहाँ यह शंका हो सकती है कि यदि ज्ञानीमें रागादि नहीं किया जा हैं तो देह और इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति भी नहीं होनो चाहिए, क्योंकि की चेष्टा 'यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्' इत्यादि स्मृतिके अ्र्प्रनु- प्रयोजक सार उनकी प्रवृत्ति भी काम या रागके कारण ही होती है, परन्तु उनके भी देहादिकोंकी चेष्टा तो प्रत्यक्ष देखी जाती है इसलिए क्योंकि
उसके प्रयोजक रागका अस्तित्व भी ज्ञानीमें अवश्य मानना पराकत्वह
चाहिए। इस शङ्ाकी निवृत्ति करनेके लिए आ्रपरागामी श्लोक है :- रागका
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(७१ )
स्थित मपर्क से चेष्टन्ते चेदिमानि प्रतिनियतगुएं चक्षुरादीनि नित्यं चेष्टन्तां काममस्मिन् मयि सकलजगच्चेष्टमानत्वहेतौ। सम्बद्ध चेष्टेरन्नो कुतोऽयस्यचलइव चलत्यस्म्ययस्कान्त एव भिन्नश्वात्यन्तमेभ्यस्तदिह मयि कथं पुण्यपापावलेहः ।५६। वाली यदि देह तथा चक्षु आदि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंकी पड़ती ओर प्रवृत्त होती हैं तो हों। सम्पूर्ण जगत्की चेष्टाके हेतुभूत किन्तु आत्मचैतन्यकी सन्निधिमें जड़वर्गकी चेष्टा होना उपन्न ही है। 'कामः परन्तु उनकी प्रवृत्तिसे आत्मामें रागद्वेषादि तथा उनके कारण श्रुतिके होने वाले पुण्यपापकी प्राप्तिको आर्प्रशंका नहीं की जा सकती, नयोंको क्योंकि वह लोहके चलने पर भी अचल रहनेवाले चुम्बकके व्ययम् समान स्वयं सब प्रकारके विकारोंसे रहित है और बाह्य रअसंग क रणमें देहादिकों से अत्यन्त विलक्षण अर्थात् प्रत्यक् है। भाव यह है कि जिस प्रकार चुम्बककी सन्निधि होनेपर लोहा ादिका निश्चल नहीं रह सकता, उसकी चेष्टा अनिवार्य हो जाती है, फिर भी चुम्बकमें उसकी प्रवृत्तिके प्रयोजक रागादिका आरोप नहीं दि नहीं किया जा सकता उसी प्रकार आत्मचैनन्यकी सन्निधिमें देहादिकों क्योंकि की चेष्टा होना आवश्यक तथा युक्त ही है फिर भी उनकी चेष्टाके के अनु- प्रयोजक रागादिका आत्मामें अ्रङ्गोकार नहीं किया जा सकता, , परन्तु क्योंकि ऐसा माननेपर आत्मामें प्रत्यक्त्वकी हानि होकरा इसलिए मानना पराकत्वदृश्यत्वादि अ्रनिष्ट धर्मोंका प्रसङ्ग होगा। अतः ज्ञानीमें
क है :- रागका अभाव मानना उपपन्न ही है।।५६।।
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(७२) पहले जो चुम्बकके दृष्टान्तसे आत्मचतन्यमें सब विकारोंके अभावका प्रतिपादन किया है यह उपपन्न नहीं है, क्योंकि चुम्बक तो एक पत्थर ही है इसलिए उसमें रागादि का ना होना उपपन्न ही है। परन्तु आत्मामें इस दृष्टान्तसे रागादिका अभाव मानना सङ्गत नहीं है। दूसरे 'यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्' इस विद्वानोंकी उक्तिको अविद्वद्विषयक बताकर इसका अकारर ही तंकोच करना भी न्यायसङ्गत नहीं है, इसलिए ज्ञानीमें भी राग होना आवश्यक है, इसका समाधान अग्रिम क्लोकसे कहते हैं :- योऽयं रागोऽस्मदीयों न खलु स मुहिराणामिवा नात्मद्ृष्ट्या किन्त्वात्मैवेदमम्भोगतमिह सलिलं फेनमुख्यं यथैवम्। आत्मन्यध्यस्तभावादिति निपुराधिया पश्यतो रज्जना मे कवात्मप्रेमाणमेनं यदि तु जडधियो रागमाहुस्ततः किम् ॥६०।। ज्ञानीका राग अज्ञानियोंके समान अनात्मदृष्टिमूलक नहीं होता, क्योंकि उसकी दृष्टिमें सम्पूर्ण जगत् आत्मा कल्पित होने के कारण आत्मस्वरूप ही हैं, जिस प्रकार कि तरंगफेनादि जलमें कल्पित होनेके कारण जलसे अभिन्न हैं इस तरह सबको आत्म- दृष्टिसे देखनेवाले ज्ञानीको किसमें राग हो सकता है और जो प्रवृत्तिका प्रयोजक थोड़ा-सा रागाभास दिखायी देता है, वह भी राग नहीं किन्तु आत्मप्रेम ही है, यदि उसीको अविवेकी पुरुषा शग करते हैं तो कहें, इससे ज्ञानी रागी नहीं बन सकता।
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( ७३ ) भाव यह है कि जिस प्रकार अपराध करनेपर पिता पुत्रको दण्ड देता है किन्तु इससे पुत्रके प्रति पितामें द्वेषकी कल्पना नहीं की जा सकती और यदि दूध पीनेवाला बालक दोपकलिकाको पकड़नेके लिए हाथ बढ़ाता है तो इसमें भी राग नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार ज्ञानीमें भी प्रवृत्ति-निवृत्तिका निमित्तभूत राग अथवा द्वेष नहीं हो सकता। परन्तु जैसे धोये हुए लशुनके पात्रमें भी उसकी गन्ध बनी रहती है, वैसे ही ज्ञानीके अन्तः- करणमें भी रागद्वेषादिकी एक बासना बनी रहती है, जिसे रागाभास कहते हैं, क्योंकि वह वस्तुतः राग नहीं है परन्तु रागके समान प्रतीत होती है। उसी रागाभासको लेकर विद्वान्की प्रवृत्ति बन सकती है और प्रवृत्तिमात्रमें कामप्रयुक्तत्वप्रतिपादक वाक्य भी चरितार्थ हो सकता है॥६०॥ ज्ञानीमें भी रागद्वेषकी वासना रहती है-ऐसा सुनकर आशङ्का हो सकती है कि फिर तो ज्ञानीमें भी कालान्तर में राग- द्वेष उत्पन्न होकर जन्म-मरणादि सब प्रकारका अनर्थ उत्पन्न करदेंगे, क्योंकि बालकमें रागद्वेषके संस्कार विद्यमान रहते हैं इसीसे युवावस्थामें उसको सारे दोष घेर लेते हैं, अतः ब्रह्मात्मै- क्यबोध भी आत्यन्तिक पुरुषार्थका साधन नहीं है। इसका समाधान अगले पद्यसे करते हैं :- नाहं मूर्खो न विद्वान् न च जरठतनुर्नेत्र बालो युवा वा, नैव स्त्री नो पुमान्वा सततमथ मयि क्लीबभावोऽपि नास्ति
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(७४ ) किन्त्वेषामेक आर्रात्मा विगतगुणगणो दोषलेशैश्र्वशून्यो नित्यानन्दश्विदात्मा तदिह मयि कुतस्त्यागरागौ भवेताम् ॥६१॥ मैं न तो मूख हूँ और न विद्वान् ही हूँ, क्योंकि मूर्खत्व और विद्वत्त्व दोनों बुद्धिके धर्म हैं और मैं बुद्धिसे सर्वथा भिन्न हूँ। वृद्ध, बाल, युवा भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि वृद्धावस्था, शशव और यौवन देहके धर्भ हैं और मेरा देहसे कोई सम्पर्क नहीं है। मैं स्त्री, पुरुष या नपुंसक भी नहीं हूँ, क्योंकि ये इन्द्रियोंके धर्म हैं औ्ौर मैं इन्द्रियोंसे पृथक् हूँ. तथा देह, इन्द्रिय और बुद्धि इन सबका प्रेरक एवं सब प्रकारके गुणदोषसे शून्य सच्चिदानन्द स्वरूप हूँ। तब मुझमें रागद्वेषादि कैसे रह सकते हैं ? तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार तपे हुए लोहपिण्डमें जो दाहकता है उसमें लोहे और अग्निका तादात्म्याध्यास ही कारण है, यदि लोहपिण्डसे अ्रग्निको पृथक् कर दिया जाय तो फिर उसको दाहक नहीं कह सकेंगे, इसी प्रकार आत्मामें भी रागद्वेषादि और उनके कारण होनेवाले समपूर्ण अनर्थोंकी प्राप्तिका कारण देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिके साथ आत्माका तादात्म्याध्यास ही है। आत्मज्ञानाग्निसे जब अध्यास और उसका कार्य भुन जाता है तब वह भस्मीभूत होकर विद्यमान रहता हुआभीअनर्थ पैदा करनेव्राला नहीं हो सकता और स्वरूपसे वर्तमान रहनेके कारण देहस्थितिके लिए आरवश्यक प्रवृत्तिको करनेवाला भी हो सकता है, जैसे भुना हुआ चना अंकुरकी उत्पत्तिमें अपरसमर्थ होनेपर भी खानेके काममें तो आर ही
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(७५) सकता है। शिशुका दृष्टान्त भी ठीक नहीं है, क्योंकि उसमें मूल कारण अध्यासको निवृत्ति नहीं होती। इसलिए भस्मसे ढकी हुई अग्निके समान कालान्तरमें उसमें सभी दोष उत्पन्न हो सकते हैं। इसके विपरीत ज्ञानीमें सारे अ्नर्थों का प्रधान कारण अध्यास नष्ट हो जाता है इसलिए उसमें कालान्तरमें भी कोई दोष उत्पन्न नहीं होता, वह सर्वथा परमानन्दमें ही मग्न रहता है। अतः ज्ञान परमार्थका साधन है, इसमें असुमात्र भी दोष नहीं दिया जा सकता ॥।६१॥ पीछे यह बात कही गयी है कि आत्मा आकाशके समान असङ्ग है, इसलिए वह आसक्तिके कारण होनेवाला राग-द्वेषका अधि- करण नहीं बन सकता अब अगले श्लोकसे यह कहा जाता है कि आप्तकाम होनेके कारण भी उसमें इच्छादि नहीं हो सकते :- मट्यानन्दैकसिन्धौ कथमवतरतु प्रेप्सयाऽSनन्दबिन्दु- बिन्दुःको रत्नपुञ्जान भवति मतियुतः काममिच्छुर्वराटम्। नाटन्तोह त्विमास्ता जलधिमधिजलं नापगा भूरिपूरा: शूरा:के तत्र वक्तुं जलनिधिमभिलाषेशयुक्तं तथाऽत्र।६२ केवल एक अनन्त आनन्दके समुद्र मुझमें वैषयिक आनन्दकी बूंदोंको पानेकी इच्छा किस प्रकार हो सकती है। कौन बुद्धिमान् महान् रत्नराशिको पाकर फिर कौड़ीके लिए लालायित होगा ? फिर भी यदि प्रारब्ध के करण मेरेमें विषयप्राप्ति प्रतीत हो रहो है तो इतने ही से मुझमें काम की कल्पना नहीं की जा सकती,
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( ७६ ) क्योंकि यद्यपि समुद्रमें रात-दिन अनन्तजलपूर्णा नदियोंका प्रवेश हो रहा है फिर भी उसे नदीप्रवेशका अभिलाषी कहनेमें कौन समर्थ है ? तात्पर्य यह है कि इच्छा सर्वदा अप्राप्त आनन्दके लिए ही हुआ करती है जो पदार्थ प्राप्त न होने पर भी आनन्दरूप नहीं होता उसकी भी इच्छा नहीं होती तथा आनन्दरूप होने पर भी यदि प्राप्त होता है तो भी वह इच्छाका विषय नहीं होता। अतः यह निर्विवाद सिद्ध है कि इच्छा अप्राप्त आनन्दके लिए हो होती है आत्मासे भिन्न सारे पदार्थ आगे कहे जानेवरालो युक्ति और श्रुतिके अनुसार दुःवरूप हैं अतः आत्मा ही परमानन्द- स्वरूप है। वह आत्मा, आत्मा होनेके कारण ही सदाप्राप्त है, क्योंकि अनात्म वस्तुएँ ही अप्राप्त हो सकती हैं, पाने वालेका स्वरूप होनेके कारण आत्मा कभी अप्राप्त नहीं हो सकता। इस लिए ज्ञान द्वारा नित्य-निरतिशयसुखस्वरूप आत्मा की प्राप्ति होनेपर विद्वान्में कोई इच्छा उत्पन्न नहीं हो सकती ॥६२॥। आत्मा यदि परमानन्दस्वरूप हो तो उसका ज्ञान होनेके पश्चात् वेत्तामें सम्पूर्ण कामनाओंका अभाव किसी प्रकार सम्भव हो भी सकता है परन्तु यदि उसकी आनन्दरूपता ही सिद्ध न हो सके तो परमावन्दरूपता तो असम्भव माननी ही होगी। प्राशिमात्रकी विषयोन्मुख प्रवृत्तिको देखकर हम कहते हैं कि आत्मा सुखस्वरूप नहीं है। यदि वस्तुतः वह सुखरूप है तो सदा प्राप्त होनेके कारण उसका स्वरूपभूत सुख भी प्राप्त ही है,
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(७७ ) अतः प्राणियोंकी विषयाभिमुखी प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए थी। परन्तु उनकी ऐसी प्रवृत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। इसलिए आ्रत्मा सुखरूप नहीं है। अतः आत्मज्ञानसे विद्वान्की सारी अभिलाषाओं का विलय हो जाना शशशृङ्गके समान असम्भव है। इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिए आ्रपरागेका श्लोक है :- प्रेयानात्मा समस्मादिति विदितमिदं सर्वलोके च वेदे सर्वं चाप्येतदात्मा गमितमिदमपि श्रौतवाक्यैः सहस्रः । तस्मात्प्रेमास्तु यत्र क्वचिदपि मम स ब्रह्मरूपो न रागो नागस्तस्मान्मदीये निजविमलतनौ प्रेमणि प्रापरगीयम्।६३। समस्त अनात्म पदार्थोंकी अर्प्रपेक्षा आ्रत्मा ही परमप्रिय है। यह सब वेदोंमें और लोकमें भी प्रसिद्ध है। और यह सम्पूर्ण दृश्यमान विश्व आत्मस्वरूष है यह भी सेकड़ों सहस्रों वेदवाक्यों से निराय हो चुका है। इसलिए जिस किसी भी वस्तुमें मेरा प्रेम है वह ब्रह्मस्वरूप ही है, राग नहीं है। ऐसे अत्यन्त निर्मल और स्वस्बरूपभूत प्रेममें किसी भी दोषकी प्राप्ति नहीं हो सकती। भाव यह है कि प्रेमका विषय आनन्द ही होता है, जिस वस्तुको हम दुःखरूप समभते हैं उसमें कदापि हमारा प्रेम नहीं हो सकता। आत्मा सबके प्रेमका आश्रय है यह बात बालकसे लेकर बूढ़े तक सभीके अनुभवसे सिद्ध है क्योंकि सभी आत्माका अ्स्तित्व चाहते हैं, कोई नहीं चाहता कि 'मैं नष्ट हो जाऊँ' परन्तु स्वभावतः सबकी ऐसी ही इच्छा देखी जाती है कि मैं सदैव
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( ७८ ) जोवित रहूँ। सब लोग अपने प्रिय पदार्थका ही अस्तित्व चाहा करते हैं, अप्रिपका अस्तित्व किसी भी प्रारगीको अभीष्ट नहीं होता, इसलिए सब प्राणिगयोंको अप्रपना अ्र्प्रस्तित्व अ्र्प्रभिलषित होनेके कारण आत्मा सर्वप्रिय है और इसीसे वह आनन्दरूप भी सिद्ध होता है। पुत्र, स्त्री, धन आदि जितने भी प्रिय पदार्थ हैं वे सब आत्मानुकूल होनेके कारण ही प्रिय हैं। अपनेसे प्रतिकूल होने पर पुत्रादि भी प्रत्येक प्रारगीके लिए द्वेष्य होकर हेय हो जाते हैं। आत्मामें प्रेम स्वतःसिद्ध है किसी अन्य पदार्थकी अनुकूलताके कारण नहीं है। अतः वह परमप्रेमका विषय होनेके कारण ही परमा- नन्दस्वरूप है इसलिए उसका ज्ञान होने पर इच्छा, काम, रागादि सभीका अभाव हो जाना सर्वथा न्याय्य है ॥६३। साधक सहज ही में समझ सकें-इस उद्देश्यसे अगले श्लोक में समस्त साधनोंका क्रम निरूपण किया जाता है :- जातं चेतो मदीयं वियदमलमुदैत् पूर्ण इन्दुरविचार- स्तत्वालोक: ममन्ताद् व्यसरदरमथो शान्तिरातन्यतेयम्। पापस्तापो विलोनोऽमृतमिव परितः स्यन्दतेऽमन्दमेतद् धन्या कल्यारगरात्रि: परमवसितवान् वासरोऽसौ प्रपश्वः।। मेरा चित्तरूपी आकाश निर्मल होगया, विचाररूप पूर्णचन्द्र- का उदय हुआ और चारों ओर तत्त्वज्ञानरूप प्रकाश फैल गया। उसके पश्चात् दुःखप्रद तापका अभाव होकर परमशान्तिका लाभ हुआ और चारों ओर अनन्त अमृतका प्रताह बहने लगा। अब
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प्रपञ वरून प्रवण्ड दिनका अवसान होनेसे सब ओर अत्यन्त तीब्र पुण्योंसे प्राप्त होने वालो कल्यारणच्प रात्रि विराजमान है। तात्पर्य यह है कि जिसको कि शास्त्रमें परमपद नामसे कहा है और जिसे पानेकी प्राणिमात्रको इच्छा है उस तापत्रितयके आत्यन्तिक विलय तथा नित्यनिरतिशयानन्द के आविर्भाव का प्रधान साधन यद्यपि श्रवगा, मनन, निदिध्यासनका बार-बार अभ्यास करना ही है, तथापि अन्तरायोंके रहते हुए साधन फलजनक नहीं होता, जिस प्रकार कि दाहका कारण होने पर भी अग्नि मशिमन्त्र और औषधादि प्रतिबन्धक रहनेके समय दाह नहीं कर सकता। इसी प्रकार तबतक साधकके अन्तःकरणमें रागद्वेषोत्पादक पापरूप मल तथा विषयप्रवणणतारूप विक्षेप वर्तमान है तबतक प्रथम तो श्रवणादि होना ही असम्भव है और यदि किसी प्रकार हो भी गया तो उससे कोई फल होना सम्भव नहीं है। अतः प्रत्येक साधकको मलविक्षेप रूप अन्तरायकी निवृत्तिके लिए सबसे पहले अथवा श्रवणादि साधनोंके साथ परोपकार एवं ईश्वराराधनादि पुण्यकर्मोंका आलम्बन अवश्य रखना चाहिए। ऐसा करनेसे ही उसके श्रवरगादि तत्त्वबोधको पैदा करनेमें समथ हो सकेंगे। ऐसा होनेपर फिर साधकको परमपद प्राप्तिमें कोई विलम्ब नहीं रहेगा ॥६४। शास्त्रीय साधनोंके अनुष्ठानसे परमकृतकृत्यताकी प्राप्ति अवश्य होती है यह दिखानेके लिए अगले श्लोकसे अनर्थनिवृत्ति और परमानन्दानुभवरूप धन्यताका उल्लेख करते हैं :-
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( ८० ) लीन: सोडयं प्रपश्चो यदधि मम पुराऽसून्महत्कौतु कित्वं
उद्वेगा: सर्व एते विलयमुपगताः शीतमासीन्मनो मे धन्योऽस्म्येकं समन्तात्स्फुरति मम मह- ज्ज्योतिरानन्दभूतम् ।।६५।।
जिस प्रपञ्चके विषयमें मैं सोचता था कि 'यह सत्य है या मिथ्या' यदि सत्य है तो इसकी निवृत्तिके लिए चेष्टा करना व्यर्थ है, क्योंकि सत्य वस्तुकी कभी निवृत्ति नहीं हो सकती और यदि मिथ्या है तो ज्ञानके अनन्तर प्रतीत नहीं होना चाहिए क्योंकि रज्जुका साक्षात्कार हो जानेपर फिर सर्प प्रतीत नहीं होता। यदि कहें कि निरुपाधिक भ्रममें ही ज्ञानके पश्चात् अप्रतीतिका नियम है सोपाधिक भ्रमका विषय होनेके कारण प्रमाके पश्चात् भी प्रपञ्चकी प्रतीति हो सकती है, तो उपाधिके रहते हुए तो ब्रह्मसाक्षात्कार होना ही असम्भव है, क्योंकि जपाकुसुमके रहते हुए 'श्वेतः स्फटिकः' ऐसी प्रत्यक्षप्रमा कभी नहीं देखी जाती और उपाधिकी निवृत्ति ब्रह्मसाक्षात्कारके बिना नहीं होगी, इसलिए परस्पराश्रयत्वरूप दोषयुक्त होनेके कारस ब्रह्मज्ञान होना सर्वथा असम्भव है, वह मेरा महान् आश्च्र्य अब लीन हो गया, तथा जिन इच्छाओंकी पूर्तिके लिए मैं सर्वथा अस्थिर तथा उद्विग्न रहा करता था वे इच्छाएँ और उद्वेग भी
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(८१) ुकित्वं सबके सब एक साथ विलीन हो गये और मेरा चित्त परम शान्त तोऽहम्। हो गया। अब चारों ओर मुझे स्वयंप्रकाज आनन्द हो प्रतीत
मनो मे हो रहा है, इसलिए कृतकृत्य तथा ज्ञातज्ञेय होनेके कारर मैं परम धन्य हूँ। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मदिरोन्मत पुरुष नशेमें मत- ।।६५॥ वाला रहनेके समय सहस्रों युक्तिपोंसे भी मदिराके स्वरूपको नहीं समझ सकता और नशा उतरने पर बिना किसी तकके ही उसे त्य है या स्वयं ही उसके स्वरूपका निश्चय हो जाता है, उसी प्रकार आत्म T करना साक्षात्कार होनेसे पहले केवल युक्तिद्वारा माया और उसके कार्य कती और चाहिए का स्वरूप निश्चित नहीं हो सकता परन्तु आत्मज्ञान हो जाने पर
तीत नहीं इस संसारका स्वरूप करामलकवत् भासने लगता है। इसलिए
के पश्चात् श्रुति कहती है कि 'छिद्यन्ते सर्वसंशयास्तस्मिन् दृष्टे परावरे'
के कारण अर्थात् परमात्माका साक्षात्कार हो जाने पर सारे संशयोंका
उपाधिके शभाव हो जाता है। अनःप्र:येक प्राणगोको कुतर्कका तिरस्कार
, क्योंकि कर आत्मज्ञानके साधनोंके अनुश्नमें तत्पर हो जाना
मा कभी चाहिए ॥६४॥
रके बिना पूर्व ग्रन्थमें यह बात कही गयी हैं कि अधिक आनन्द होने
के कारस पर अल् आनन्दमें राग नहीं हो सकता। अगले श्रोकमें यह
न् आश्चर्य कहते हैं कि विषय न रहने पर उसमें राग भी नहीं रहता :-
मैं सर्वथा काम: वव स्थानमदीयो जगदखिलमिदं ज्ञातमत्यन्त तुच्छ र उद्वेग भी कामाभवेतुकोप:कथमिव विभवेरकारएंसोऽस्य यरमात।
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लोभ: सत्यत्वमूलो जगति च वितये सत्यताभ्रान्तिरूपा मोहोभ्रान्तेनिदानंसकल मिदमगाव्वोतशोक: शिवोऽहम्।६६। जात जगत्को अत्यन्त अमार समझ लेनेपर मुझे किस विषयमें बात काम हो सकता है ? क्योंकि आकाशकुसुमरूप अत्यन्त तुच्छ पदार्थोंमें किसी की इच्छा नहीं देखी जाती। कामका अभाव हो शा
जानेपर क्रोध भी नहीं हो सकता क्योंकि अपनी कामनाके विषय तूर को अपने अधीन कर लेने वालेके प्रति क्रोध होता है; काम्य नष्ट वस्तुके न रहने पर क्रोधका भी कोई विषय नहीं रहता। लोभका सत्य कारण पदार्थोंमें सत्यता बुद्धि करना है, वह असत् जगत्में सत्यता पर गम्भीर विचार करनेसे भ्रमरूप सिद्ध होती है औ्रर भ्रमका हेत अधिष्ठानभूत आत्माका अज्ञान है। जब आत्मप्रमासे शान्त
मोहकी निवृत्ति हो गयी तो उसके कारण होनेवाली भ्रान्ति भी हो
जाती रही और भ्रान्तिके दूर होने पर उसका कार्य लोभ भी जाने
कभी नहीं ठदर सकना। अतः मैं सकलदोषरहित होकर शोक शिवस्वरूपसे ही स्थित हैँ। केव
भाव यह है कि जिप प्रकार इन्धनका प्रभाव होनेपर अ्रग्नि प्रती
स्वयं शान्त हो जाता है उसी प्रकार आत्मबोधके अनन्तर शेष
जगत्का अभाव हो जानेपर निर्विषय कामक्रोधादि स्वयं ही ब्रह्म जड़कटे हुए वृक्षके समान नष्ट हो जाते हैं। अतः सारे अनर्थोंके ब्रह्म निवर्त्तक आत्मबोधके लिए प्रत्येक पुरुषकों प्रयत्न करना चाहिए ॥६६।। नि वत
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( ८३ ) पा ६६। काम-क्रोघकी निवृत्ति होनेपर स्वयं ही आत्माका भान हो जाता है इसके लिए साधकको अपेक्षा नहीं करनी पड़ती यह य में बात आगेके दो पद्योंसे कही जायगी :- ुच्छ हो शान्ते चेतस्यकस्मादुदगमदमितं ज्योतिरानन्दपूर्रं
षय तूर्सं मोहान्धकारो व्यगलदथ सुधौघाः समन्तात्स्रवन्ति। ाम्य नष्टाःशोकादयोऽमो विकलितमनसो नान्यदालोकयाम: मका सत्यं चाद्यन्तहीनं प्रविततमतुलं केवलं ब्रह्म भाति॥६७। नुमें नौर कामक्रोधादि विक्षेपके हेतुओंका अभाव होनेपर जब चित्त
गसे शान्त हुआ तो उसमें आनन्दरूप ज्योतिका स्वयं ही आविर्भाव
भी हो गया जिसके कारस अज्ञानरूप अन्धकारकी निवृत्ति हो भी जानेसे चारों ओर आनन्दामृतका प्रवाह बहने लगा है तथा
कर शोकमोहादि चारोंका दल व्याकुल होकर नष्ट हो गया है। अब केवल सत्य, आद्यन्तरहित, सर्वव्यापी अद्वितीय ब्रह्म ही सर्वत्र प्रतीत हो रहा, उससे भिन्न दूसरी वस्तुका तो कहीं नाम भी शेष नहीं है।।६७।। नर ही ब्रह्म वोद्ध्व तथाधः प्रसृतमथ पुरस्ताज्च पश्चादपीदं कि ब्रह्म वोदक्तथाऽवाग्दिशि विदिशि समं व्याप्तमेकं सदेतत्। ना नित्यानन्दोरुतेजोभृत विविधवपुर्त्राजते माययाऽदो वतोद्धूतं यथाडम्भो बहुविधवपुषा नान्यदस्तीह तत्त्वम्।६८
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(८४ ) सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर सारी दिशा-विदिशाओंमें एकरस होकर पूर्ण है। वही ब्रह्म परमार्थदृष्टिसे एक होने पर भी मायाके कारण नाना रूपोंमें प्रतीत होता है। जिस प्रकार एक ही जल वायुके कारण तरङ्गफेन-बुद्बुदादि अ्रनेकों आकारोंमें भासने लगता है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मलिन जलमें पड़ो हुई बहुत बड़ी शिला भी प्रतोत नहों होनी किन्तु वही जलके निर्मल होने पर स्वयं दीखने लग जाती है उसो प्रकार सबसे बड़ा और स्वयं- प्रकाश ब्रह्म अन्तःकरणमें रहते हुए भी उसके मलिन होनेके कारगा प्रनोत नहीं होता। रागद्वेषादि मलांकी निवृत्ति द्वारा चित्त निर्मल हो जाने पर उपकी प्रतोति स्वयं होने लगेगो। यह मल मायाकल्पित है। इसलिए इसका उच्छेद होना सम्भव है हो उसमें सत्यत्वबुद्धि केवल अ्विवेकके कारण है, अतः प्रत्येक साधरको पहले अन्तःकरणको शुद्ध करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए ।।६८॥। पूर्वोक्त आत्माकी असङ्गनाका उपपादन करनेके लिए अग्रिम दो श्लोकोंसे प्रतोयमान जगत्के मिथ्यात्वका वर्णन करते हैं :- गडौघाधो निमग्ना दृढपृथुलशिला क्लिद्यते नो यथान्त- नेषद्वाप्युच्चलेत्सा सति वहति महास्त्रोतसि स्वोपरिष्टात्। तद्रत्संसारपूरे सति महति सदा स्यन्दमानेऽतिघोरे निदुःखा निश्चलाङ्गा श्रुतिसमधिगता पीवरी चिच्छिलाऽहम् ॥६६॥
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(८५) जिस प्रकार गङ्गाके प्रवाहमें डूबी हुयी विशाल शिला अपने ऊपर सर्वदा गङ्गाका महाप्रवाह बहते रहनेपर भी नहीं भीगती और न अपने स्थानसे विचलित ही होती है उसी प्रकार अत्यन्त घोर और महान् संसारनदका प्रवाह निरन्तर अपने ऊपर बहते रहनेपर भी यह श्रुतिसिद्ध आत्मनामको भारी शिला भी दुःख- हीन और निश्वलरूपमें ही रहती है। ६६। इसी बातको दूसरी तरह कहते हैं :-
घूयन्ता रागवातैरनिशमिह मनश्चीनवासोध्तजान्ताः शान्ता:सन्तोऽथवास्ते जहतु कथमपि स्वरीयमालौल्यमेते। के ते गाढं निखातं सकलजडभुवि प्रत्यगात्मानमुच्चैः। स्वस्थं कान्ताभमान्दोलयितुमपि मनाग् वाज्र- मुदण्डदण्डम् ॥७०॥ रागरूप वायुके वेगसे मनरूप ध्वजाके अस्तिम भाग चाहे रतदिन हिलते रहें अथवा शान्त होकर अन्तमें अपनी चपलता को छोड़ दें, तथापि उनके कारण जड़प्रपञ्चरूप भूमिमें ढढ़तासे गड़ा हुआ अत्यन्त ऊँचा और कूटस्थ आत्मारूप वज्चदण्ड तनिक भी इधर-उधर नहीं हो सकता।
भाव यह है कि जिस प्रकार मरुमरीचिकाके कल्पित जलसे मरुस्थलमें कीचड़ नहीं हो सकता तथा भ्रमवश अग्नि मानी हुई गुञ्जाओंको ढेरी दाह या प्रकाश नहीं कर सकती उसी प्रकार पनादि और अनिर्वचनीय मायाआरोपित कर्तृ त्वभोतृत्वादि प्रपञ्च आ्त्मामें अ्र्प्रशुमात्र भी दोष पैदा नहीं कर सकता ।।७०।।
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( ८६) यदि कल्पित द्वैतसे आत्मामें कोई विकार नहीं हो सकता तो ज्ञानी होकर भी बहुतसे लोग दुःखी क्यों देखे जाते हैं, इसका उत्तर अग्रिम पद्यसे देते हैं :-
क्षणमहह मनो मे नन्दति स्वं समस्तं परिकलयदनन्तं ब्रह्मशान्तं नितान्तम्। क्षशामथ तु दुराशावायुनोद्धूयमानं विशदहह विभेदं खेदमङ्गौकरोति ॥७१॥ कभी तो मेरा मन अपनेको अतिशान्त और अनन्त ब्रह्म- स्वरूप अनुभव करता हुआ अत्यन्त आनन्दित होता है और कभी दुर्वासनारूप वायुसे विचलित होकर द्वैतोन्मुख प्रवृत्तिके कारण खिन्न होने लगता है। सारांश यह है कि जिस प्रकार जपाकुसुमकी लालिमाका स्फटिकमें अध्यारोप होनेसे 'लोहितः स्फटिकः' ऐसा व्यवहार होता है फिरभी स्फटिक लौहित्यसे रहित ही है इसी प्रकार अन्त:करणमें रहने वाले कतृत्वभोक्तृत्व एवं सुख-दुःखादि धर्मोंका आत्मामें अध्यारोप होनेके कारण मैं कर्ता, भोक्ता, सुखी, अथवा दुःखी हूँ ऐसे व्यवहार होते रहते हैं और आत्मा इस समय भी सब दोषोंसे रहित तथा एकमात्र सुख और ज्ञानस्वरूप ही है, इसलिए ज्ञानीको कभी भी आत्मामें सुखित्वादिका भ्रम नहीं हो सकता ॥७१॥
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(८७) आश्नाको सदा ही सुख-दुःखादिसे रहित सुनकर शङ्का हो सकती है कि यदि वह सर्वदा मुक्त ही है तो ज्ञानी और अज्ञानी में कोई भेद नहीं होना चाहिए। इसलिए ज्ञानके लिए प्रयत्न करना व्यर्थ ही है। इसका उत्तर आागे के दो पद्मोंसे देते हैं :-
मनः शान्तद्वतं पिबतु परमानन्दममृतं भ्रमद्वाऽस्मिन्दवते दुरतिगमदुःखानि सहताम्। अर्हं त्वस्यास्वस्थामविरतमवस्थामविकलो विलोके निःशोके निजमहिमनि स्थास्तुरचलन् ॥७२।। मन द्वैतसे उपरत होंकर चाहे परमानन्दस्बरूप अमृतका पान करे अथवा द्वैतरूप गहन वनमें विचरता हुआ दुःसह दुःखों का अनुभव करे। दोनों हो अबस्थाओंमें मैं अपने सकलशोक- रहित (स्वरूपमें) अविकृत और अचल रूपसे स्थित रहकर चित्तकी अबस्थाओंको देखता रहता हूँ॥ ७२॥ न मे प्रलोपः सति सर्वसंप्लवे न चोद्भवोऽभुदितरस्य तूदये। उभावपीमाववलोकयन्नहं जगद्गतावस्मि सदैकसम्प्रथः ॥७३।। सकल प्रपञ्चका नाश होनेपर भी मेरा नाश नहीं होता और
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( ८८) उदय होनेपर मेरा जन्म नहीं हो सकता, मैं तो जगत्के उत्पत्ति और प्रलयका प्रकाश करता हुआ सदा एकरस ही रहता हूँ।
तात्पर्य यह है कि जैसे अपने घरमें अनन्त सुवर्णराशि गड़ी रहने पर भी अज्ञात रहनेके कारण दारिद्रयका दुःख भोगना ही पड़ता है और जब दैवज्ञोंके द्वारा उस निधिका ठीक-ठीक पता लग जाता है तो सारे क्लेशोंका अन्त हो जाता है। इसी प्रकार परमानन्दस्वरूप आात्मा नित्य प्राप्त होनेपर भी अज्ञांत रहनेके कारण अप्राप्त-सा रहता है और इसीसे अज्ञानी जीवको जन्म-जरादि अनर्थोंका अनुभव करना पड़ता है, परन्तु जब शास्त्र, गुरु और परमेश्वरकी कृपासे जीवको अपने स्वरूपका यथावत् बोध हो जाता है तो इसके सारे दुःख समूल नष्ट हो जाते हैं और परमानन्दकी उपलब्धि होने लगती है। अतः ज्ञानके लिए उद्यम करना निष्फल नहीं है, ज्ञानी और अज्ञानीका इसके सिवा ज्ञान और अज्ञानके कारण भेद तो अत्यन्त स्पष्ट ही है, इसलिए उसके लिए कुछ विशेष कहनेकी आवश्यकता महीं है॥७३ ॥ अब शङ्का होती है कि जिस प्रकार तार्किकादि सुख-दुःखादि- को आत्माका धर्म मानते हैं उसी प्रकार यदि मान लें तो क्या आपत्ति है। इसमें तो 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार आत्माके धर्मरूपसे सुख-दुःखका ग्रहण करमें वाला प्रत्यक्षप्रमाण भी है। इसका समाधान अग्रिम दो पद्योंसे करते हैं :-
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(=ह)
जगत्कर्थ मय्यथ सच्चिदात्मनि स्थिति लभतेदमसज्जडात्मकम्। तथापि भात्येव विभातु कि भवे- न्नभस्तले चेन्नगरीव विभ्रमात् ॥७४।। सच्चिदानन्वस्वरूप मुझ्में यह असत् और जड़रूप जगत् कैसे स्थित रह सकता है ? तथापि आकाशमें नगरके समान यदि इसका भ्रमसे मेरेमें भान होता है तो हो। इसमें मेरी कोई हामि नहीं है॥ ७४॥ अहं जगत्यत्र न मय्यदस्तथा बृथा विकल्पस्तु विजुम्भतै यथा। न दाम भोगिन्यथ न स्रजि त्वसा- वथापि सत्यानृतमेलनं मुधा ॥७५॥ यद्यपि न तो मैं इस जगत्में हूँ और न यह जगत् ही मेरेमैं है, तथापि अविवेकके कारण दानोंमें आरराधाराधेयभाव प्रतीत होता है। जिस प्रकार न तो सपमें रज्जु है और न रज्जुमें सप ही है फिर भी रज्जुतत्वके अज्ञानके कारण सत्य और मिथ्याका परस्पर तादात्म्य प्रतीत हो ही जाता है। भाव यह है कि जिस प्रकार नेत्रोंसे एक बिलस्त प्रतीत होने पर भी ज्योतिषश सत्रके आधारसे चन्द्रमण्डलका परिमासा अनेकों योजन मानना पड़ता है, उसी प्रकार प्रत्यक्षसे सुख, दुःख एवं
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(६०) कर्तृ त्वभोक्तृत्वादि धर्मोंसे युक्त प्रतीत होनेपर भी आ्रत्माको 'तत्तमसि', 'अयमात्मा ब्रह्म', 'अस्थूलमनण्वह्रस्वम्', 'अशब्द- मस्पर्शमरूपमव्ययम्', इत्यादि शास्त्रके कारण सकल धर्मोंसे रहित मानना भी उचित है। ताकिकोंकी स्वतन्त्र कल्पना अपौरुषेय श्रुतिसे विरुद्ध होनेके कारण मानने योग्य नहीं है। यदि प्रत्यक्ष को ही प्रबलतम प्रमाण मान लिया जाय तो 'मैं चलता हूँ, बूढ़ा हूँ. मोटा हू, ब्राह्मण हूँ' इस प्रत्यक्ष अनुभवके कारण आरात्मामें क्रिया, वृद्धता, स्थूलता, ब्राह्मणत्व आदि धर्मोंको भी मानना चाहिए। इस प्रत्यक्ष अपुभवको भ्रम मानना और ऐसे ही 'मैं कर्ता हूँ, भोक्ता हूँ' इत्यादिको प्रमाण मानना कहाँ तक संगत हो सकता है-इसका विवेचनकुशल और विज्ञजन स्वयं विचार द्वारा निरप कर सकते हैं, हम इस विषयमें अधिक कहना आवश्यक नहीं सम भते। अतः श्रौत सिद्धान्तके अनुसार आ्र्प्रात्मा- को सम्पूर्ण धर्मोंसे रहित, कूटस्थ और असङ्ग मानना ही जिज्ञासुओोंके लिए हितकर है॥ ७४॥ आत्मसाक्षात्कार होनेपर भी मनोनाशके बिना पूर्णतया जीवन्मुक्तिका आानन्द अप्रनुभव नहीं हो सकता, इसलिए योगारूढ़ होनेके लिए प्रत्येक साध रको मनोनाश करना आवश्यक है। यह कहनेके लिए अगले श्लोकसे प्रपश्चको मनोमूलक बताया जाता है :- मनः स्फुरद् भाति जगत्तयाऽन्यथा स्वत त्वबोधादृत एव केवलम् ।
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(६१) अवाप्य बोधं प्रचकास्ति भासुर मनो भवद् ब्रह्म निरामयाभयम् ॥७६।। आत्मतर्वके बोधसे पूर्व केवल चित्त ही जगदरूपसे स्फुरित् होकर अन्यथा प्रतीत हुआ करता है तथा ब्रह्म और आत्माके एकत्वका साक्षारकार हो जानेपर वही मन शुद्धसच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्मसे अभेदरूपसे प्रकाशित होने लगता है। भाव यह है कि जिस प्रकार 'अग्नि रहनेपर धूआँ भी रहता है और अग्नि न रहनेपर धूगँ नहीं रहता' इस अन्वय व्यतिरेकके द्वारा धूएँकी स्थिति अग्निके कारण निश्चित होती है, उसी प्रकार 'मनके रहनेपर ही जगत्की प्रतीति होती है मन न रहनेपर जगत् की प्रतीति भी नहीं रहती' इस अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा जगत्प्रतीतिमें भी मनकी कारणता निश्चित होती है। भ्रम और प्रमा दोनों अन्तःकरसामें ही रहनेवाली होनेसे उनका बाध्य-बाधक भाव उचित ही है-यह भी इस श्लोकका तात्पर्य हो सकता है॥ ७६॥ जब मन ही जगत्का कारण है तो मुमुक्षुको सबसे पहले मनोनाशके लिए ही प्रयत्न करना चाहिए, यह बात उपर्युक्त कथनका अनुवाद करते हुए आगामी पद्यसे कहते हैं :-
जगत्प्रलोपं जगुरुन्मनस्कर्ता मनोऽवशेषं दृढमस्य मूलकम्।
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( ह२) ततो मुमुक्षु: प्रयतेत सागमं द्वारा मनः प्रलोपेऽन्यदुपेक्ष्य साधनम् ।।७७।। नन्द क्योंकि चित्तका अभाव ही जगत्का अभाव करनेवाला है नहीं और चिसका अस्तित्व ही उसका मूल है इसलिए मुमुक्षुको अन्य का साधनोंकी उपेक्षा करके सबसे पहले शास्त्रोक्त उपायोंसे मनका नाश करनेके लिए उद्यत होना चाहिए। नि तात्पर्य यह है कि जिस वृक्षका मूल पृथिवीमें है, वह श्रस कालान्तर में पुनः अंकुरित हो जाता है और जिसका मूल नष्ट हो के चुका हो उसके पुनः अंकुरित होनेका भय नहीं रहता। इसी स्व प्रकार इस जगत्का भी आत्यन्तिक अरभाव करनेके लिए इसके सा मूलभूत चित्त को नष्ट कर देना चाहिए। चित्तके रहते हुए जगत्की पुनरुत्पत्ति का भय बना ही रहता है॥ ७७॥। का इसी बानको प्रामाणिक मानते हुए चित्तशोधनका उपाय प्रत बतानेके लिए आगामी श्लोक कहा जाता है :- ततः प्रयत्नैः परिशोधनीयता-
भयुष्य पूर्वे बभरगुर्महाधियः । न जातु जातं जगदस्ति सविचिती त्यसंशयं भावनमाहुरामृजाम् ॥७८॥ क्योंकि संसारका कारण चित्त ही है इसीलिए पूर्वाचार्योंने 'चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नाच्चिकित्स्यताम्' इत्यादि वाक्यों प है
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( ६३ ) द्वारा प्रयत्नपूर्वक चित्तशोधनका हो उपदेश किया है। सच्चिदा- 11 नन्दस्वरूप आ्रात्मामें अ्र्प्रसत् जड़ औरप्रौर दु खरूप जगत् तीनों कालमें ना है नहीं हो सकता, ऐसा संशय और विपर्ययशून्य चिन्तन ही चित्त अन्य का शोधन करनेवाला है। नका भाव यह है कि राग-द्वेष ही चित्तके मल हैं और वे कभी निरविषय नहीं हो सवते। अतः उक्त चिन्तनद्वारा जब जगत्में वह अ्सस्तबुद्धि स्थिर हो जायगी तो राग-द्वेषका कोई विषय न रहने हो के कारण वे प्रबल पवनद्वारा छिन्न-भिन्न किए बादलोंके समान इसी स्वयं ही नष्ट हो जायँगे और चित्त निर्मल होकर परमात्म- सके साक्षातकारके योग्य हो जायगा॥ ७८ । हुए शुद्ध मन जगत्का कारण है और वही शुद्ध होनेपर मुक्ति का निमित बनता है, यह बात केवल शास्त्गम्य ही नहीं किन्तु प्रत्यक्ष अनुभव से भी सिद्ध है-यह ग्र्प्रग्रिम पद्यसे कहते हैं :- मनः सरागं मलमूत्रभाजनं वपुः पवित्रं मनुतेऽमृतादपि। तदेव वैराग्यविशारदं भव- द्विरण्यगर्भ न तृशाय मन्यते ॥७६।।
ननि कामएवं रागादिसे आक्रान्ल चित्त मलमूत्रादि अपवित्र
वों पदार्थों से परिपूर्ण शरीरको अ्रमृतसे भी अधिक पवित्र समभरता है और वहो वैराग्यरूप शुद्धिसे युक्त होनेपर हिरण्यगभ तवको
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( ह४) तिनके के समान भी नहीं समझता। अतः पहले जो जगत्की सत्तामें मन की कारशता बतायी जाती है वह अनुपपन्न नहीं है, किन्तु अपने अनुभवसे सिद्ध होनेके कारण प्रामाशिक ही है॥७६॥ यदि अनुभव और शास्त्रके द्वारा जगत् मनोमूलक ही सिद्ध होता है तो फिर मुमुक्षुको मनोनिरोधके लिए योगाभ्यास ही करना चाहिए, ज्ञानके लिए श्रवण, मनन, निदिध्यासनका अनुष्ठान तो क्षुधानिवृत्तिके लिए स्नान करनेके समान है-इस शंकाका उत्तर आगामी दो श्रोकोंसे देते हैं :- अरहो सदानन्दमयः सदोदितो विभुश्विदात्माऽप्यज एकलो ध्रुवः। अनायि सर्वेश्वर एव सन्नसन्- मनःपिशाचैर्ननु दीनतामिव ।८०।। यह आत्मा सर्वदा आनन्दमय, नित्य, विभु, स्वयंप्रकाश, अविक्रिय, अद्वितीय, कूटस्थ और सर्वेश्वर होकर भी मन आदि पिशाचोंके सम्पकसे दीन-जैसे बना हुआ है ॥ ८0 ॥ प्रहो अहो अद्भुतमेकमीक्षितं गजोऽपि वन्यः खलु तन्तुना सितः । इदं तथा चापरमद्भुतं महद् घटे भृतः सागर एव केनचित् ॥८१।।
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( ६x) बड़े आश्च्वर्यकी बात है कि जंगली हाथीको एक तन्तुसे बाँध लिया और इससे भी बढ़कर आश्चर्य यह है कि किसीने महा- सागर को घड़ेमें भर दिया।
भाव यह है कि जिस प्रकार गजको तन्तुमे बाँधना और समुद्रको घड़ेमें भर देना ये दोनों बातें असम्भव हैं वैसे हो नित्य त्रिभु स्वयंप्रकाश आत्माका अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित होना अथवा उससे अवच्छिन्न होकर जन्म-मरणादि सांसारिक धर्मोंका आश्रय बनना भी सर्वथा असम्भव है; परन्तु 'मैं दुःखी हू' वृद्ध हूँ, रोगी हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभवसे ऐसा भान अ्र्रवश्य होता है। अनः असम्भव होनेपर भी प्रतीत होनेके कारण रज्जु-सर्पके समान आत्मामें आश्रित जगत् मिथ्या है और मिथ्याकी निवृ त बिना अधिष्ठान के ज्ञान हुए नहीं हो सकती, क्योंकि रज्जुमें कल्पित सर्प रज्जुज्ञानके बिना मनोनिरोध आदि सहस्रों उपायोंसे भी कभी निवृत्त नहीं हो सकता। अतः अनर्थकी निवृत्तिके लिए आत्माके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान ही आवश्यक है। ८१ ॥ यदि बन्धनकी निवृत्तिके लिए आत्मज्ञान ही पर्य्याप्त है तो फिर 'ततो मुमुक्षु: प्रयतेत सागमं मनः प्रलोपेऽन्यदुपेक्ष्य साधनम्' इत्यादि ग्रन्थसे मनोनिरोधका उपदेश करना व्यर्थ ही है। इसका उत्तर आगामी तीन पद्योंसे देते हैं :-
मनः प्रचारो विषयेषु मास्म भू- दिति स्वरूपे मुहुर्प्यतामिदम् ।
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(٤٤)
विना तथा ध्यानसमाधिसन्तति मनोजयो नेत्यगदन्महर्षयः ॥८२॥
मनकी प्रवृत्ति विषयोंमें न हो, इसलिए उसे बार-बार प्रपने स्वरूपमें स्थित करना चाहिए। परन्तु दीर्घकाल तक ध्यान और समाधि के अभ्यासके बिना स्वरूपमें चित्तकी स्थिति हो नहीं सकती-यह प्राचीन महर्षिगण सिद्ध कर चुके हैं। अतः इसके लिए ध्यान और समाधिकी भो आवश्यकता है।। ८२॥
मनोजयश्चेन्न कृतो न वासना: क्षयं च नीता यदि मूलतीऽखिलाः । स्थितिस्तथा तश्वपदं न लम्भिता तृथा प्रलापाय तदाऽगना अ्रभी॥८३।
यदि मनका जय नहीं किया, सम्पूर्ण वासनाओंका समूल नाश नहीं किया और आत्मतत्त्वमें चित्तको पूर्ण स्थिति नहीं की, तो श्रवण-मननादिका अनुश्न सब व्यर्थ प्रलापमात्र ही है।८३।
मनः सदा खेलति वासनाऽडविलं पराचि नित्यं प्रवसं तथेन्द्रियम् । अथाषि चेद् ब्रह्म वदन्ति निर्भया श्रहो जनानां परिशोघनीयता ॥८४।।
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(ह७) वासनाओंसे बसा हुआ चित्त सदा विषयोंही में खेल रहा है और इन्द्रियगण सर्वदा अनात्मवस्तुमें ही तत्पर रहता है फिरभी निर्भय होकर ब्रह्मोपदेश कर रहे हैं-हाय ! जीवोंकी कैसी शोचनीय दशा है ? तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार भोजन करनेपर भी यदि शरीरमें शक्तिका अनुभव न हो तो भोजन करना ही व्यर्थ ही है, क्योंकि केवल तृप्तिके लिए ही भोजन नहीं होता, अपितु शरीरकी पुष्टि भी उसका प्रयोजन होती है। इसी प्रकार केवल दुःखकी निवृत्तिही अभीष्ट नहीं है, परमानन्दका भी अनुभव होना चाहिए और वह चित्तनिरोधक बिना हो नहीं सकता, इसलिए चित्तनिरोध भी आवश्यक है ॥८४।। यदि चित्तनिरोधकी उपेक्षा करनी भी उचित नहीं है और आत्मज्ञान भी आवश्यक है तो क्या दोनोंको ही स्वीकार करना चाहिये ? इस आशंकाको इष्ट मानकर शान्त करनेके लिए आगामी छ्लोक कहा जाता है :- ततः परागर्थपराक्षवर्गक निरुद्ध्य यत्नेन मुमुक्षुरादितः । मनः समाधाय च मानतो मिते विलोकयेत्स्वं गुरुदिष्ट्या दिशा ।।८५।। आत्मबोध और मनोनिरोध दोनों ही आवश्यक होनेके कारण पहले मुमुक्षु अनात्मकी ओर जाने वाली इन्द्रियों को
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(६८) यत्नपूर्वक रोककर शास्त्र प्रमाणसे निश्चित वस्तुमैं चित्तको निरुद्ध करे और गुरूपदिष्ट मार्गसे आत्माका साक्षात्कार करे। भाव यह है कि जिस प्रकार केवल जलसे कोई यन्त्र नहीं चलता और न केवल अग्निसे ही चलता है किन्तु जल और अ्रग्नि दोनों मिलकर ही यन्त्रक्रियाके कारण बनते हैं, उसी प्रकार पूर्णकृतकृत्यताका निमित्त न केवल ज्ञान है और न केवल चित्तनिरोध, किन्तु दोनों मिलकर ही उसके प्रयोजक हैं। अतः प्रत्येक साधकको दोनों ही के अनुष्ठानमें तत्पर रहना चाहिए॥८५। अब शङ्का होती है कि पहले आत्मज्ञानसे जो अनर्थकी निवृत्ति कही गयी है, वह कैसे हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक प्राी अपने आपको जानता हुआ भी अनेकों अनर्थोंसे व्याप्नही दिखायी देता है। यदि आत्मज्ञानसे अनर्थकी निवृत्ति हो सकती तो सभी प्राणी सुखी हो जाते। यह भी कहा नहीं जा सकता कि उन्हें आत्मज्ञान नहीं है, क्योंकि सब जीव अपने आपको जानते ही हैं और अपना-आप ही आत्मा है; अतः वे सभी आत्मज्ञानी हैं और दुःखी भी हैं। इसलिए आत्मज्ञान अनर्थका निवर्तक नहीं हो सकता। इसका समाधान आगेके दो श्ोकों द्वारा करते हैं :-
मनोविलासानवलोकयन्विभु- विराजतेऽयं हृदि सङ्गवजितः ।
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( ह६)
न दुःखदीनो न च सौख्यवधितो भवत्ययं चित्तदशा: प्रकाशयन् ॥८६।। सर्वब्यापी परमात्मा मनोवृत्तियोंका साक्षी बनकर हृदयमें विराजमान है और चितके सुख दु खोंको प्रकाशित करते हुए भी असङ्ग होनेके कारण उसके दु खसे दुःखी और सुखसे सुखी नहीं होता, किन्तु सदा एक रस ही रहता है ॥ ८६ ॥ स्वान्ते विभान्तं प्रतिबोधमन्त- धर्वान्तं नितान्तं प्रविदारयन्तम्। शान्तं न विन्देत जनो यदीमं नान्तं व्रजेज्जन्मजरामृतीनाम् ।।८७।1 अपने अन्तःकरणमें उसकी वृत्तियोंको साक्षीरूपसे प्रकाश- मान और हृदयके अन्धकारको समूल नष्ट करनेमें समर्थ शान्त- स्वरूप परमात्माको जबतक पुरुष प्राप्त नहीं करेगा तबतक चह जन्म-जरा मृत्युस्वरूप अनर्थमय संसारसे मुक्त नहीं हो सकेगा । अभिप्राय यह है कि 'तरति शोकमात्मवित्' विद्वान्नाम- रूपाद्विमुक्तः, 'ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशः' मात्वा 'घीरो हर्षशोकौ जहाति' निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति' इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि आत्मज्ञानसे अनर्थकी निवृत्ति होती है और प्रत्येक प्रारणी अपने आ्पकों
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(१०० ) जानता है यह भी निर्विवाद है। इसलिए दोनों बातोंके प्रामाण्यकी रक्षाके लिए कुछ व्यवस्था करना आवश्यक है, जिससे कि दोनों प्रमारमोंमें विरोध न रहे। अतः यों मानना चाहिये कि आत्माका सामान्यांशरूप चंतन्य प्रत्येक प्रारणी को ज्ञात है और शास्त्र जिस आरत्माके ज्ञानसे सकलत्नर्थोंकी निवृत्ति कहता है वह अपरिच्चिन्नत्व आनन्दरूपत्व आदि विशेषणों वाला आत्माका विशेष स्वरूप है, जिसका उल्लेख साक्षी, ब्रह्म, परमात्मा आदि सव अ्रनेकों शब्दोंसे भी किया जाता है। ऐसा मानना ही न्याय्य है, क्योंकि यह देखा ही जाता है कि सामान्यरूपसे अग्नि सवत्र इस b,
वर्तमान रहते हुए भी वह दाहप्रकाशरूप प्रयोजन की पूर्ति नहीं हा कर सकता वही अग्नि जब विशेषरूप में आविर्भूत होता है तो नि दाह भी करता है और प्रकाश भी। इसी प्रकार आत्मा सामान्य रूपसे ज्ञात हुआ भी अनर्थनिवृत्त्यादि प्रयोजनका साधक नहीं है। वही जब आनन्दरूप और अपरिच्छिन्नत्वादि विशेषरूपसे क
ज्ञात होगा तब अवश्य शास्ख्रोक्त फलकी प्राप्ति करनेवाला होगा। इसीको शास्त्र ब्रह्मज्ञान आत्मसाक्षात्कार आदि अनेकोंनामोंसे कथन करता है। अतः आत्मज्ञान के लिए प्रयत्नशील रहना प्रत्येक मुमुक्षु का कर्तव्य है ॥८७॥ आस्तु, यदि परमात्माकी प्राप्ति और आत्मप्राप्ति एक ही चीज है तो आत्मा सदा प्राप्त होनेके कारण ईश्वर भी नित्य प्राप्त ही है। तो भी उसके लिए चेष्टा करना व्यर्थ है। इसका उत्तर आगे प्र के दो पद्योंसे देते हैं :- हं
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(१०१ )
तोंके आत्मा च नामाथ च लम्भनीयो नससे ेकि जजुर्बुधा विप्रतिषिद्धमेतत् ।
और तस्मादसौ लब्धतयव लभ्यः
है कण्ठस्थचामीकरसंनिकाश: ।८८।।
माका यद्यपि नित्यप्राप्त होने के कारण आत्मा को प्राप्तव्य कहना नदि सर्वथा विरुद्ध है तथापि आत्मा प्राप्तव्यः' इसका अर्थ है कि है, 'प्राप्तत्वेन रूपेौवात्मा निश्चेतव्यः' अरपर्थात् आ्र्प्रात्मा नित्यप्राप्त है- वंत्र नहीं इस प्रकार ही निश्चय करना, जिस प्रकार कि गले में पड़े हुए हार की विस्मृति होने पर 'हार मेरे कण्ठ में है' इस प्रकार का तो निश्चप होना ही उसकी प्राप्ति है।८८॥ ॥न्य नहीं प्राप्त वस्तु में भी औ्र्रपचारिक अ्परप्राप्तत्व हो सकता है, यह
पसे कहनेके लिए आगे का श्लोक है :-
गा। अमुं निधि गाढमहो जनानां मोंसे निगूढमन्तहृ दि दीप्यमानम् । हना न जानते मोहशिलाऽडवृतत्वा-
बीज दमी ततो दीनदशामवापुः ॥८६।।
ही मनुष्योंके हृदयके गम्भीर स्थलमें छििपे हुए उस देदीप्यमान प्रागे आत्मनिधिको, अज्ञान-शिलासे आवृत होनेके कारण, न जानकर ही सब लोग दुःखका अनुभव कर रहे हैं।
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(१०२ ) भाव यह है कि यदि सचमुच ही गलेका हार किसी कारण से गलेसे निकलकर अज्ञात रूपसे गिर जाय तो उस आभूषण- वाले पुरुषको बड़ा ही दुख होता है और फिर खोज करनेपर ईश्वरके अनुग्रहमे यदि वह खोया हुआ सोनेका आभूषणा मिल जाय तो उस व्यक्तिके शोक-दुःखादि सब दूर हो जाते हैं। इसी प्रकार हारके गलेमें रहते हुए ही यदि 'हार कहाँ गिर गया' ऐसा विपरीत निश्चय होजाय तो भी पहले जैसा दुःख ही होता देखा जाता है और जब किसीके कहने से अथवा स्वयं ही उसके गलेमें होने का निश्चय हो जाता है तो वे शोक-दुःखादि सब दूर हो जाते हैं। इसलिए औपचारिक रूपसे दु.खजनकत्व रूप धर्मको लेकर विपरीत निश्चय को अप्राप्ति तथा दुःखनिवतकत्वरूप धर्म की दृष्टि से यथार्थ निश्चय को प्राप्ति कहा जा सकता है। अतः आत्माका अज्ञान ही सारे दुःखों का कारसा होने से आत्मा की अप्राप्ति है और सम्पूर्ण अनर्थों का निवर्तक होने से उसका यथाथी ज्ञान ही उसकी प्राप्ति है। इसलिए जहाँ आत्माकी प्राप्ति कही जाय वहाँ उसका अर्थ आत्म ज्ञान ही समझना चाहिए। इसलिए 'लब्घतयैच लभ्यः' यह उक्ति बहुन ठीक है ॥८ह॥ क्योंकि परमानन्दरूप आत्मा की उपलन्धि उसके ज्ञान में ही मानी जाती है इसलिए :- विद्यादतस्तूर्णमिमं विवित्सु- वर्यपार्वधि मोदमनन्तलोके ।
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( १०३ ) त्यक्त्वेतरत्कर्म वृथा वितानं विधूय कामान् मृगतृष्णिकाभान् ॥६०।। निरवधि सुखको प्राप्त करनेकी इच्छावाला पुरुष व्यर्थ आडम्बरवाले कर्मोंको और उनसे प्राप्त होनेवाले मरुमरीचिका के जल सदश स्वर्गादि विषयोंको छोड़कर अपनी हृदयकन्दरामें सर्वदा भासमान परमात्माका साक्षात्कार करे। तभी संसारका बीजभूत आज्ञान नष्ट होगा और तभी इसको अचल पदकी प्राप्ति होगी ॥६०।।
बहुतसे पुरुषोंका आक्षेप है कि जिसप्रकार कर्म अथवा उपासनारूप वैदिक साधनोंसे प्राप्त होनेवाला स्वर्ग सुखादि फल लोकान्तरोंमें ही जाकर भोगा जाता है उसी प्रकार ज्ञानरूप वैदिकसाधनसे मिलनेवाला मोक्षरूप फल भी लोकान्तरमें ही भोगा जाना चाहिए। ऐसी स्थितिमें कर्मफल के समान मुक्ति भी अनित्य होनेके कारण प्राप्त नहीं हो सकती। इस आक्षेपका उत्तर देने के लिए आगामी श्लोक है :-
किमिह मयाऽनुपलब्धमस्ति लोके। सति जडजगतां मयि प्रचेष्ट तदहमहो जगदन्तरात्मभूतः ॥६१।
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(१०४ ) मैं सारे जगत्के स्वामी चिदात्मासे अभिन्न हूँ;अतः संसारमें मुझे कौन वस्तु अप्राप्त हो सकती है ? सम्पूर्ण जड़ जगत् की चेष्टा मेरी ही सत्तासे होती है, इसलिए जगत्का अन्तर्यामी और प्रेरक मैं ही हूँ। भाव यह है कि 'तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सवंमभवत्' इस श्रुतिके अनुसार सर्वात्मभाव ही मोक्ष है और विद्वानको इसका अपने जीवनकालमें ही अनुभव हो जाता है; इसललिए यह लोकान्तरमें भोगनेयोग्य नहीं हो सकता। वैदिक साधनजन्य स्वर्गादि यद्यपि लोकान्तरमें भोगने योग्य होते हैं तथापि कारीरीयागादि साधनोंसे होनैवाले वृष्टि आदि फल इसीलोकमें उपभोग्य देखे गये हैं। इसललिए ऊपर जो हेतु दिया गया है वह व्यभिचारी है और इस लोकमें भोगकी अयोग्यतारूप उपाधिके कारण सोपाधिक भी है। अतः इस हेतुसे मुक्तिमें परलोकभोग्यत्व और अनित्यत्वादि सिद्ध नहीं किए जा सकते। तथा 'न स पुनरावतंते' इत्यादि श्रुतिके अनुसार जिसे नित्यरूपसे निश्चय किया है वह मोक्ष अनुषादेय नहीं हो सकता ॥ ६१ ।। जिस प्रकार विद्वान्को यहीं पर सर्वात्माका अनुभव होता है वैसे ही भयदुःखादिकी निवृत्ति भी उसे यहीं अनुभूत होती है यह बात आगेके दो पद्योंसे कहते हैं :-
जगदिदमखिल मयि प्रभात न मदतिरिक्तमतोऽण्वपि प्रलोके। व्यपगतमभवद् भयं समस्तं भयमितरभ्रमभासितं यदूचु: ॥६२।
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(१०५ ) यह सम्पूर्ण जगत् अघिष्ठानभूत मेरेमें ही प्रतीत होता है। इसलिए मुझसे भिन्न संसारमें अुमात्र भी नहीं है। अतः द्वैतभ्रमसे प्राप्त हुआ सारा भय आज नष्ट हो गया। भाव यह है कि 'उदरमन्तर कुरुते अथ तस्य भयं भवति' 'द्वितीयाद्व भयं भवति' इत्यादि श्रुतियोंसे तथा प्रत्यक्षसे भयका हेतु द्वैत दर्शन ही है क्योंकि जागरित कालमें द्वैतदर्शनसे भय औ्ौर सुषुप्तिके समय द्वंतदर्शनाभावसे भयका अरभाव सभीको अ्र्पनुभव- सिद्ध है। अतः अद्वितीय आरात्मतत्वके ज्ञानसे मिथ्याद्वतदर्शनका अभाव होनेपर उससे होनेवाले भयका अभाव होना सर्वथा उपपन्न ही है ॥ ६२ ।। भयाभावका प्रतिपादन करके दुःखाभावका प्रतिपादन करने के लिए आगेका शोक कहा जाता है :-
सुखमनन्तमिदं जगतामहं मयि तु दुःखलवोऽपि कथं भवेत्। न खलु लोकविलोकनके रवा- वनुपधानतमः समदर्शकि ॥६ ३।।
जब मैं समस्त जगत्को आ्रनन्दिन करनेवाला और त्रनन्त सुखस्वरूप हूँ तब मेरेमें दुःखका बिन्दु भी कैसे सम्भव हो सकता है। अपने प्रकाशसे सारे संसारको प्रकाशित करनेवाले सूर्यमें क्या कभी किसीने वास्तविक अन्धकार देखा है?
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( १०६ ) भाव यह है कि जिस प्रकार प्रकाशस्वरूप सूर्यमें उसके विरुद्ध अन्धकार सत्य नहीं हो सकता। हाँ अज्ञान दशामें अन्त :- करणमें रहनेवाले दुःखका आत्मामें आरोष हो सकता है, परन्तु ज्ञानकालमें वह भी सम्भव नहीं है। इसलिए ज्ञानी सर्वदा सुख का ही अनुभव करता है। ६३ ॥ अ्रस्तु. इस जन्ममें भले ही भय और दुख न हों तथापि जन्मान्तरमें तो हो ही सकते हैं; इसलिए ज्ञान परम पुरुषार्थ का हेतु नहीं हो सकता इस शकाका समाधान आगामी श्रोकसे कहते हैं :-
कामपाशपरिणद्धमानस जन्तुरेष जगतीह जायते। शारदाभ्रपरिशुद्धचेतसो ब्रह्मणश्च मम जन्म कीदृशम् ॥६४॥ कामरूपी पाशमें चित्तके बँधमेपर ही जीवको संसारमें जन्म लेना पड़ता है। शरत्कालीन मेघोंके समान निर्मलचित्त होनेके कारण ब्रह्मस्वरूप मेरा जन्म नहीं हो सकता। भाव यह है कि जन्मका कारण काम है 'स कामभिर्जायते तत्रतत्र' इति श्रुतेः। और कामका कारण विषयोंमें सत्यत्वभ्रम है। आत्मबोध होनेपर विषयोंमें मिथ्यात्वनिश्चय हो जानेसे काम न होनेके कारण विद्वान्का जन्म होना सम्भव नहीं है।
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(१०७ )
अतः दुःखका समूल ध्वंस करनेके कारण आत्मज्ञान परम- पुरुषाथ निर्बाध साधन है॥ ६४ ॥
अब शङ्ा होती है कि यदि जन्मका कारण काम हो तभी तो उसकी निवृत्तिसे जन्मकी निवृत्ति हो सकली है, परन्तु जन्मका कारण तो वामनाएँ हैं। अतः कामनिवृत्ति मात्रसे जन्मका अभाव नहीं हो सकता। इसका उत्तर अगले श्रोकसे दिया जाता है :-
या बिभतति जगदेतवद्भुतं
वासना वितथभोगभासुरा। जीवलोकमृगवागुराधुना सावबोधबलतो व्यशीर्यत ।।६५।
जो मिथ्या विषयोंके द्वारा पुष्ट होनेवाली और जीवगणा रूप मृगोंको बाँधनेके लिए जालके समान तथा इस जगत्की स्थितिमें प्रधान कारण हैं वे वासनाएँ भी आत्मज्ञानका उदय होनेसे नष्ट हो गयीं।
भाव यह है कि वासनाका मूल विषयोंमें रम्यत्वबुद्धि है, आत्मज्ञानसे विषयोंमें तुच्छत्वबुद्धि हो जानेपर उनमें रमसीयता का निश्चय नष्ट हो जानेसे उससे होनेवाली वासनाएँ भी स्वयं नष्ट हो जाती हैं। इसलिए यदि जन्मको वासनामूलक भी मामा जाय तब भी ज्ञानीका जन्म होना असम्भव है, क्योंकि उसके
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(१०८ ) जन्मकी हेतुभूत वासनाएँ ज्ञानाग्निसे भस्म हो जाती हैं। इसलिए ज्ञानकी परमपुरुषार्थसाधनता पूर्ववत् बनी ही रहती है ।६५।।
मुमुक्षु अवस्थामें साधनोंके अनुष्ठानसे अनेकों क्लेश भी उठाने पड़ते हैं; परन्तु ज्ञान होनेपर विद्वान् को उन सबका अभाव अनुभव होता हैं-यह बात अग्रिम दो पद्योंसे कही जाती है :-
वीतशोकमतिलोकमेककं ज्योतिरेव जगदन्तरोक्ष्यते । न स्म भाति न च भाति वस्तुनो भास्यतीदमिह विश्वडम्बरम् ।६६।। शोक-मोहादि समस्त संसार धर्मोंसे रहित एक अलौकिक चैतन्यज्योति ही जगत्के अन्दर अनुस्यूत दिखायी देती है और इसीसे इस जगदाडम्बरका त्रैकालिक अत्यन्ताभाव हो गया है ।।६६॥। उदगादयं प्रचुरबोधमयो रविरस्तमायदखिलं च तमः । मिहिका व्यलास्तवितथप्रतिभा व्यशदायताथ चिदनन्तनभः ।६७।। संशय-विपर्ययशून्य सुदृढ़ बोधरूप सूर्यका उदय होनेसे अज्ञान
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(१०६) रूप अन्धकार नष्ट हो गया और मिथ्या-प्रतीतिरूप कुहिरा दूर होकर चैतन्यरूप आकाश अत्यन्त निर्मल हो गया। भाव यह है कि पाकक्रिया हो जानेपर जैसे उसके साधन अरग्नि और इंधन आदिका त्याग हो जाता है वैसे ही अन्तःकरण स्वच्छ होकर ज्ञान हो जानेपर फिर उसके लिए साधनोंके अनुश्ठानकी भी अपेक्षा नहीं रहती। इसलिए विद्वान्में साधन- जनित क्लेश भी नहीं रहते ॥ ६७।। शोक मोहादिके अभावके समान विद्वान्को ब्रह्मानन्द भी अपरोक्ष रहता है। यह बात अग्रिम तीन पद्योंसे कहते हैं :-
न जुगुप्सतेऽथ हृदयं तु मना- गभिनन्दतीह न च किश्चिदपि। प्रतिपित्सते न किमपि स्वपरं रमतेऽनपेक्षमपसोमसुखे ॥६८॥ मेरा हृदय न तो किसी पदार्थसे घृरणा करता है और न किसी में प्रेम रखता है तथा आत्मा वा अनात्मा किसी भी वस्तुकी प्राप्तिकी इच्छा नहीं रखता, किन्तु सर्वदा निरवधिक आनन्द ही में मग्न रहता है॥ ६८ ॥
प्रकटत्वमापदियमन्तरहो परितृप्तिरन्तविधुराविषया।
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( ११० ) अविलोलमेतदिह हन्त मनो लवणस्य भित्तमिव लीनमभूत् ।६६। अ्रनन्त तथा निर्विषय आ्न्तर शान्तिका आ्रविर्भाव हुआ और यह मन निश्चल होकर जलमें लवणपिण्डके समान उसीमें लीन होगया ॥। ६६॥
प्रपञचपरिचर्चया विगतमेव दुर्धर्षया व्यभासि परहर्षयाऽमितसुधाऽभिसंवर्षया गभीरमवगाढया किमपि तत्त्वमाबाढया विलीय मिलितं धिया सपदि तत्र संपित्पया।१००।।
प्रपञ्चके विषयमें जो अत्यन्त दुर्दम्य सङ्कल्प थे वे शान्त हो गये, अनन्त हर्ष प्रदान करनेवाली परमामृतकी वृष्टिका आरम्भ हो गया और वह किसी अकथनीय तन्वमें दढताके साथ जटिल होकर उसीमें मिलनेकी इच्छासे बुद्धि भी विलीन होकर उसीके साथ एकरस होगयी।
तात्पर्य यह है कि जिस सुखको पुरुष सदैव चाहता है वह इसका स्वरूप ही है, क्योंकि सब महान् पुरुषोंका यही अनुभव है। उसकी अप्रतीतिमें केवल चित्तकी बहिर्मुखता ही कारण हैं। यदि अधिकारी शास्त्रोक्त साधनोंके अनुष्ठानसे अपने चित्तको अ्न्तर्मुख करले तो वह शीघ्र ही आत्मसुखका अनुभव
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( १११ ) कर सकता है। अन्धकारसे भरे हुए घरमें रखी हुई वस्तुओंकी प्रतीति केवल अन्धकारको हटानेसे ही हो जाती है। इसी प्रकार अन्तर्मुख चित्त इसी शरीरमें परमानन्दका अनुभव कर लेता है, कहीं लोकान्तर या देहान्तरमें जाने की आवश्यकता नहीं होती। अतः मुमुक्षुवर्मको शास्त्रीय साधनोंके अनुष्ठानमें ही दत्तचित्त रहना चाहिए ॥।१००।। यद्यपि शास्त्रमें अनेकों साधनोंका उपदेश किया गया है, तथापि अभ्यास और वैराग्यमें सबका अन्तर्भाव हो जाता है। अतः साधकोंको सुगमतासे समझानेके लिए उक्त साधनोंके अनुष्ठानकी आरवश्यकता आमेके छ पद्योंसे कही जाती है। उस में पहले आगामि पद्मसे वैराग्यकी उपयोगिता कहते हैं :-
परिहरन्नखिलं लभते पुमा- नभिलषन्न च विन्दति किञ्चन। यदमृतत्वमवादिषुरागमा- स्त्यजनतः सकलस्य समस्तताम् ॥१०१॥
इच्छा करनेसे पुरुषको कुछ भी नहीं मिलता और त्याग करनेसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है, क्योंकि परम दुर्लभ सर्वा- त्मभावरूप मोक्षनामक अमृतत्व भी सबके त्यागसे ही प्राप्त होता है। इसमें 'त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः' यह शास्त्र प्रमाण है॥ १०१ ॥
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( ११२) इस प्रकार वैराग्यकी आवश्यकता बताकर चित्तनिरोधके लिए अभ्यासका प्रतिपादन करनेके विचारसे पहले तीन श्चोकों द्वारा पूर्वपक्षीकी शंका का अनुवाद करते हैं :-
बहुशः परिचिन्तिता श्रुति- र्ननुगीता न न वा विचारिता। मनसे तु तदेव रोचते यदमुत्रानिशवर्ज्यमीरितम् ॥१०२॥ श्रुतिका भी बहुत मनन किया तथा गीताके विचारमें भी कोई कमी नहीं रक्खी, तो भी मनकी तो उन्हीं पदार्थोंमें रुचि है जिनका कि शास्त्रोंमें निषेध है॥ १०२॥
मनः क्षणं धावति चन्द्रमण्डलं क्षां विशत्येतदहो रसातलम्। क्षणेन पर्यटय दिगन्तचक्रकं द्रुतं समक्ष्शोति समग्रभूतलम् ॥१०३॥ कभी तो मन स्वर्ग प्राप्तिके लिए पुण्यकर्मोंकी ओर दौड़ता है और कभी नरकमें डालनेवाले पापोंकी ओर जाता है तथा कभी मनुष्यलोकमें ही उन्नति करनेके लिए साधारण कर्म करने लगता है। इस प्रकार थोड़े ही समयमें यह सारे ब्रह्माण्डमें फैल जाता है॥ १०३॥
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अदो मनो जय्यमगासिषुर्बुधर मुधा प्रलापानितरान्न कि जगु: । वियद् गदाभि: परिचूर्ण्य सर्वतो महोदधौ क्षेप्यमहो जना इति ॥१०४॥ पूर्व ऋषियोंने जो चञ्चल चित्तको भी जय होनेके योग्य कहा है तो इसी प्रकारके 'गदाओंसे आकाश का चूरा करके समुद्रमें फैंक दो' किन्हीं अन्य व्यर्थ प्रलापोंका उल्लेख क्यों नहीं किया ? भाव यह है कि जिस प्रकार आकाशको गदासे चूर्ण करके समुद्रमें फेंकना एक असम्भव विषय है। इसी प्रकार स्वभावसे चञ्चल और अनादि कालसे विषयोन्मुख रहनेवाले चित्तको अपने वशमें रखना भी सर्वथा असम्भव है। अतः ऐसा कहनेवाले ऋषि-मुनियोंके वाक्य प्रमाण नहीं हो सकते ॥ १०४॥ उक्त आ्रक्षेपका समाधान करनेके लिए आयेके दो पद्य हैं :-
किमत्र चित्रं यदि वासमग्रके सति प्रयत्ने पुरुषस्य दुर्दमे। प्रसत्तिमासेदुषि सर्वयन्तरि प्रभौ नभः कि कतमद्दुरासदम् ॥१०५॥ इसमें कोई आश्र्र्य नहीं कि यदि पुरुष पूरी सरह प्रबल प्रयत्न करे तो परमात्माको प्रसन्न करके चित्तको जय करा सकता है, क्योंकि परमेश्वर की सहायता से आकाश को चूर्णित
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( ११४ ) करना क्या, इससे भी दुष्कर कार्य सरलता से किये जा सकते हैं। १०५ ॥ ततो न हेया धृतिरुत्तमा मना- गनादिदुर्वासनयाऽपि दूषितम्। मनः पुरा शुध्यति पुंस्प्रपत्नतो निदर्शनं स्पर्शमयश्च पश्यत ॥१०६। इसलिए पुरुषको चाहिए कि धैर्यका त्याग न करे, क्योंकि अनादि दुर्वासनाओंसे दूषित मन भी पुरुषप्रयत्नसे शुद्ध हो सकता है। इसमें लोह और स्पर्शमणिगका दृष्टान्त प्रसिद्ध है। भाव यह है कि जैसे लोहा अनादि काल से श्यामतादि दोषोंसे युक्त होनेपर भी स्पर्शमणि (पारस) की सहायतासे क्षणाभरमें सारे दोषोंसे शून्य होकर सुवर्ण बन जाता है इसी प्रकार अनादि कालसे रागद्वेषादि दोषोंसे दूषित भी अन्तःकर परमात्माकी सहायतासे बहुत शोघ्र शुद्ध होकर आत्मज्ञानोपयोगी हो सकता है॥ १०६॥ अब ग्रन्थकी समाप्तिमें पूर्वोक्त अर्थका उपसंहार करनेके लिए आगेके दो पद्य कहे जाते हैं :- अहो दुराशारशनाभिपाशितो- डस्म्यहं सदा मर्कटवत्प्रनतितः। त्वया विभो हे जगदीश सम्प्रति प्रमुञ्च मां त्वा प्रसमामि भूरिश: ।१०७। हे.विभो !हे जगदीश्वर ! तुमने दुराशारूप रस्सीमें
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(११५ ) बाँधकर बन्दरके समान मुझसे तरह-तरहके पुण्यपापोंका अनुष्ठान रूप नृत्य कराया है। अब मेरी यही प्रार्थना है कि मुझ इस बन्धनसे मुक्त करदो ॥१०७॥ पतिः पशूनामसि वेदघोषितः कुतः पशुं मामपि नैव पासि भोः । न शक्यते चेत्पतिभावमुत्सृजे- रहं पशुत्वं विजहामि ते विभो ॥१०८॥
भगवन् ! आपको वेदों में पशुपति कहा है, जिसका अर्थ है पशुका पालन करने वाला, तो फिर आप पशुरूप मेरी रक्षा क्यों नहीं करते ! यदि मेरी रक्षा नहीं कर सकते तो अपने पशुपति नाम को त्याग दो और मैं भी आपके प्रति अपना पशुनाम त्यागता हूँ। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार दुर्जय शत्रु को पराजित करने के लिए प्रबल पुरुषकी सहायता की अपेक्षा होती है उसी प्रकार संसाररूपी दुर्जय शत्रुको जय करने के लिए सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की प्रसन्नताका सम्पादन करना आवश्यक है। अतः प्रत्येक मोक्षार्थो को भगवत्परायणा होना चाहिए ।१०८।
सकाम पुरुष भगवद्भक्ति का पूरा फल प्राप्त नहीं कर सकता। अतः मोक्षकी इच्छासे ही भगवद्भक्ति फलदायिनी होती है। यह बात अन्तिम श्लोकसे कहते हैं :-
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( ११६ ) अलं फलेनेह सुपर्वसम्पदा कृतं विरिञ्चेः पदवीक्षयाऽपि मे। न विष्सु धिष्ण्यं न च भर्गभूमिका- मथाद्रिये ब्रह्म भवामि निर्भयम्॥१०६॥ देवलोक स्वर्गकी प्राप्तिसे मुझे कुछ प्रयोजन नहीं है, ब्रह्मलोक की भी मैं इच्छा नहीं रखता, विष्णुलोक तथा शिवलोक में भी मेरी श्रद्धा नहीं है। परन्तु 'निर्भय ब्रह्मपद मुझे प्राप्त हो' यही मेरो सदा कामना रहती है। इस प्रकार निष्काम होकर जो पुरुष भगवान्का भजन करता है वह अन्तःकरणकी शुद्धि द्वारा आत्मसाक्षात्कार प्राप्तकर परमपदका अधिकारो हो जाता है। इसलिए भगवद्भक्ति ही मोक्षका सर्वोत्तम साधन है। अतः सबको इसका आश्रय लेना चालिए। यही सारे वेद- शास्त्र तथा इस ग्रन्थका तात्पर्य है ॥१०६।। ये स्युर्गुरगा: कतिचिदत्र गुरोरिमे स्यु- र्दोषा ममैव सकला न तु ते गुरूराम्। अम्भोदमुक्तभुजगास्यगते विषत्वं- नीरे यदेतदुरगस्य न वारिदस्य ।।१।। ॐ शान्ति ! शन्ति !! शान्ति !!! ॥ इति श्रीवेदान्तरत्नाकरः सव्याख्यः समाप्तः ॥