1. Vichara Sagara of Sadhu Nichaldasji Hindi Tika Vritti Ratna Valli of Pitambara1917
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ॐ श्री सद्गुरू परमात्मने नमः॥
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॥ श्रीविचारसागर ॥
साधु-श्रीनिशलदासजीकृत
तथा
व्रह्मनिष्ठ-पंडित-श्रीपीताम्बरजीकृत
५५४ टिप्पण । अरु
श्रीवृत्तिरत्नावली
ॐ
श्रीपंचद-शास्त्रीकासभापागत श्रीनाटकदीप इत्यादिसहित ।
॥ नवीनसहितयुक्त पंचमावृत्ति ॥
सत्यंसमुज्ज्वलुनके द्वितार्थे
श्री. व्रजवल्लभ हरिप्रसादजी
इन्होंने
छपाईके प्रकट कीन्ही ।
॥ दोहा ॥
प्रथमरूप अहि ब्रह्मवित, ताकी वानी वेद ।
माया अध्यवा संस्कृत, कवित सुद्रसम लैद ॥ १ ॥
( वि. सा. तृ. त. )
॥ सुंवईमें मनोरंजन छापखानैमें छापी॥.
शाके १८३९, विक्रमसंवत् १९७५, प्रेस्वीशन १९१७.
[ ई. स. १९८२ के २५ वें कायदेशानुसार यह ग्रंथ प्रकटकर्त्तोंने रेजिष्टर करिके सर्व हक स्वाधीन रखे हैं ॥ ]
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॥ दोहा ॥
आस्ति-भाति-प्रिय-सिंधुमैं,
नामरूप जंजाल ॥
लिखि तिहिं आत्मस्वरूप निज,
वहै तत्काल निहार ॥ ९ ॥
(वृ. प्र.)
साधु श्रीनिश्वल्दासकृत विचारसागर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्रीपीताम्बररचितटीकासहित,
यह पुस्तक शरीफ साले महंमद इन्होंके पुत्र दाऊद भाई और सज्जादीनभाई
इनके पाससे सब रजिस्टरीकृतसहित हमने ले लियाहै.
प्राचीन पुस्तकालयाध्यक्ष
ब्रजवल्लभ हरिप्रसाद
कालबादेवीरोड, मुंबई.
Printed by K. R. Mitra, at the Manoranjan Press, 3 Sandhurst Rd, Girgnon, & Published by Vrajwallabh Hariprasad, at Ramwadi, K. Devi, Bombay.
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शरीफ सालेमहंमद.
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यह् आवृत्ति सुज्ञ श्री शरीफ़ सालेमहम्मदके प्रसिद्ध किये हुये आवृत्ती उपरसे छपी है.
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॥ ॐँ गुरुपरमात्मने नमः ॥
॥ श्रीविचारसागर ॥
॥ प्रथमावृत्तिकी प्रस्तावना ॥
प्राणिमात्र केवलसुखकं चाहतेँ हैं औ दुःखकी अत्यंतनिवृत्तिकूं इच्छैहैं, परंतु ऐसी सर्वकी इच्छा पूर्ण नहीं होवैहै । अनेक पुरुप सुखके निमित्त धन-पुत्र-स्त्री आदिक पदार्थनकी प्राप्ति प्रयत्न करेंहैं औ दुःखकी निवृत्तिअर्थ दान-तप-योग-औपध-मंत्र-आदिकका आश्रय लैवैहैं, परंतु दीनके दीनही रहैहैं । कहैंतें ? सुखप्राप्ति औ दुःखनिवृत्तिके हेतु उत्तमपदार्थ नहीं हैं । तिन पदार्थनकारिके उलटी दुःखकी प्राप्ति औ सुखकी न्यूनता होवैहै । जैसैं कोई पुरुप अफीममदिरादिकके अधिक अधिक ग्रहणकरिके सुख मानैहैं, परंतु तिनकारिके दुःखकूंही अनुभव करैहैं, तैसैं जे जे पुरुप सुखप्राप्ति औ दुःखनिवृत्तिअर्थ देहआसक्तिकरिके जगत्के तुच्छ-पदार्थरूप मदीरादिक व्यसनका आश्रय करेंहैं । वे दुःखकं अनुभवकरिके जन्मैहैं औ मरैहैं ।
केवलसुखकी प्राप्ति औ दुःखकी अत्यंतनिवृत्तिअर्थ पुरुप, विचित्रपंथ औ तिनके आचार्यनका आश्रय लैवैहैं । तिसकारि भी तिनोंकी इच्छा पूर्ण नहीं होवैहै । किंतु यथाकथंचित् दुःखकूंही अनुभव करैहैं ॥
केवलसुखकी प्राप्ति औ दुःखकी अत्यंतनिवृत्तिअर्थ केह न्यायादिक अनेकपंथमतकू आश्रय करेंहैं तथापि तिनोंकारि भी पुरुषनकी इच्छा पूर्ण नहीं होवैहै । यातैं — केवलसुखकी प्राप्ति औ दुःखकी अत्यंतनिवृत्तिअर्थ आत्मज्ञान ( आपका ज्ञान ) ही उपयोगी है । अन्य नहीं । जैसैं मृग अपनी अन्नजल आदिककी अपेक्षा रहैहै, तैसैं
कस्तूरीकी सुगंधवका अनुभवकरिके औरठौर कस्तूरी ढूंढ़ैहैं औ दुःखकूं अनुभव करैहैं, तैसैं पुरुप वांछितविपयके लामरूप निमित्ततैं अंतर्मुखदशातैं स्वरूपआनंदके प्रतिबिंबकूं अनुभवकरिके विपयमें आनंदरूप ढूंढ़ैहै । तिसकारि पवनका वेग, अनेक यंत्र, तारोंकी गति, इत्यादिककी शोध करैहै । परंतु आपके ज्ञानकी शोध नहीं करैहैं औ जैसैं और इंद्रियहित प्राणी आपके जानैविना आहार, निद्रा, भय औ मैथुनका अनुभवकरिके मरेहै तैसैं यह बुद्धिसहित मनुष्यप्राणी भी मरैहै ॥
आत्मज्ञान (आपका ज्ञान ) अद्वितीयके प्रतिपादक बहुतसंस्कृतग्रंथनैं गुरुद्वारा पुरुषकूं प्राप्त होवैहै ॥ तैसैं फारसी, अरबी, इंग्लिश आदिक भापमैंँ वी कोई कोई आत्मज्ञानके बोधक ग्रंथ हैं । परंतु संस्कृतमैं जैसैं विस्तीर्ण-ग्रंथ हैं, तैसैं औरभापाविपैं नहीं हैं । हिंदु-स्थानीभापमैंँ वी आत्मज्ञानके बोधक ग्रंथ हैं, परंतु आत्मज्ञानमैं उपयोगी इस जैसा संपूर्णप्रक्रियाग्रंथ दूसरा नहीं है । श्रीनिश्वलदासजीनेँ भापावालोंपर बडी कृपा करिके स्थूलबुद्धिवालोंको वी उपयोगी होवै, ऐसा यह श्रीविचारसागर ग्रंथ रच्याहै ॥
आत्मज्ञानके अर्थ औरपदार्थनका ज्ञान अपेक्षित है । जैसैं भोजनकी सिद्धिअर्थ अन्नजल आदिककी अपेक्षा रहैहै, तैसैं
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॥ प्रथमावृत्तिकी प्रस्तावनां ॥
आत्मज्ञानअर्थ जीवईश्वर औ जगतकू ज्ञान अपेक्षित है औ तिनकी सिद्विअर्थ औरपदार्थेनका ज्ञान अपेक्षित है ॥ सो ज्ञान, ग्रंथ औ गुरुकारि औ अपने विचारकरि प्राप्त होवैहै । यातैं प्रक्रियाके ज्ञानविना आत्मज्ञानकी हृदयत होवै नहीं । यद्यपि इस ग्रंथमैं केवलमहावाक्यके श्रवणसही ज्ञान होवैहै । एतावत अंक २३ पर्यंत प्रतिपादन कियाहै । तथापि तहां कथाहै:-असंभावना औ विपरीतभावनारहित जिसकी बुद्धि होवै तिस उत्तम अधिकारीकूंही केवल महावाक्यक श्रवण करि ज्ञान होवैहै । सर्वकूं नहीं । एैसे उत्तम अधिकारी जगतमैं कचित्वही होवैहैं । यातैं जिसकूं महावाक्यक श्रवणसैं असंभावना औ विपरीतभावनासहित बोध हुबाहै, तिसकूं तिनकी निश्चयतिअर्थ अनेकयुक्तिसहित पदपदार्थ श्रवणकरिके विचारै चहिये ॥
देखिके आत्मज्ञानके तरफ आलसी होवैके शंकासहित रहैहैं ॥ एसी औरकी अनेकशंका होवैहैं, सो सब इस ग्रंथके विचारनैकरि दूरी होवैहैं ॥
विचार(का) सागर इस ग्रंथका नाम होवेंतें इसके प्रकरणके नाम तरंग ( मौज ) राखेहैं । इसमें सर्वसमिलिके समतरंग हैं । तिनमैं— १ प्रथमतरंगमैं अनुवंध (ग्रंथका अधिकारी संबंध विपय औ प्रयोजन )का वर्णन है । दूसरतरंगमैं अनुवंधकका विशेषकरिके वर्णन है । जैसे कोई अपनी जमीनपर घर रचै, तहां दूसरा पुरुप आऐके घरके धनीसूं जमीनका दानवा करै औ रचेहुए घरकूं पायेंस उखाड़ी डाले । तब घरका धनी अपनी जमीनका धनीपना सिद्वकरिके फेर घरकूं रचलेवै । तथ निःशंक होवैहै ॥
तैसैं इस ग्रंथके प्रथमतरंगमैं अनुवंध दिखायेहैं औ तिसकां— २ दूसरें तरंगमैं पूर्वपक्ष (वादीका पक्ष) करिके खंडन कियाहै । फेर सर्वशंकाका क्रमसैं समाधान करिके अनुवंधका मंडन किया है ॥
३ तीसरे तरंगमैं शिष्यकूं शिक्षाअर्थ गुरुके औ शिष्यके लक्षण औ गुरुक भक्तिका प्रकार औ फल दिखायाहै॥
४ चौथेतरंगमैं उत्तमअधिकारीकूं उपदेशका प्रकार दिखायाहै ॥
५ पांचवें तरंगमैं मध्यमअधिकारीकूं उपदेशका प्रकार दिखायाहै । तिसकूं अहंभावउपासनाकी विधि कहीहै ॥
६ छठे तरंगमैं कनिष्ठ-(कुरकचुद्धि ) अधिकरिवकूं उपदेशका प्रकार दिखाया है ॥
इस ग्रंथमैं द्वेषकरिके कोई पंथकी निंदा नहीं है औ पक्षकरिके कोई पंथकी स्तुति नहीं है ॥ तैसैं न इसमें कोई पंथ वा धर्मका प्रतिपादन है । किंतु यामैं केवलआत्मज्ञान ( आपका ज्ञान ) जो सर्वका निजधर्म है, तिसका प्रकारही अनेकयुक्तिकरि दिखायाहै ।
कहैं पुरुप उपासनामैं, कई सिद्धिंमै, कई वेधमैं औ कई औरकिसीमैं अटकै रहैहैं औ आपमैं अथवा औरमैं तिनकी प्राप्ति नहीं
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७ सातवें तरंगमें जीवनमुक्त औ विदेहमुक्तके व्यवहारका प्रकार दिखायाहै ॥ सातों तरंगोंका विशेषभावार्थ "मार्गदर्शेक अनुक्रमणिका" करि जान्या जावैगा ॥ औरग्रंथकार जैसे वेदआदिके प्रमाणकरि ग्रंथकूं पूर्या करेंहैं तैसा इसमें नहीं है । किंतु श्रुतिके अर्थकूं निर्णय करनेवाली युक्तियां इस ग्रंथमें प्रधान हैं । युक्तिकरि सर्वप्रकारके अधिकारीकूं सुखसैं बोध होवैहै । एकदो- ठौरपर आवश्यक्ता धारिके श्रुति राखीहै ॥
इस ग्रंथके समान मुख्यकूं उपयोगी भापा- ग्रंथ आधुनिक समयमें अद्देतमतविप नहीं हैं । संस्कृतमें वी ऐसें संपूर्ण वेदांतकी प्रक्रियावके ग्रंथ अल्पही हैं । ग्रंथकर्त्ता श्रीनिवासदासजीने दूसेरे औ तीसरे अंकमें ग्रंथकी महिमा कहीहै । आत्मवोधविपै उप- योगी कोईवि प्रक्रिया इसमें नहीं है ऐसा नहीं है औ सो वी कहूं वेदविरुद्ध नहीं है ॥
बहुतकारिके वेदांतप्रक्रियाके ऊपर भापा पढ़नेवालोंकी रुचि इस ग्रंथकी उत्पत्तिसैं अनंतरही हुईहै । इस ग्रंथकी उत्पत्तिसैं पूर्व भापा जाननेवाले अनेकगृहस्थ औ साधुआदिक सत्संगभी वेदांतप्रक्रियाकूं यथाश्रित नहीं जानतेथे । इसके अनंतर अव बहुतपुरुष प्रक्रियाकूं जानिके निःसंदेह तृप्ति पावते हुयेहैं । "व्युत्प्रभाकर" जो इस ग्रंथके कर्त्तानै कियाहै, तिसका जिस जिस पुरुपने सम्यक् अभ्यास कियाहै, सो मानों पंडितही भयैहैं औ तैसैं पुरुपनके साथि संस्कृतके वेत्थे जव शास्त्रार्थ करतैहैं, तथै आश्रर्यंकू पावतेहैं औ कहतैहैं;-अहो ! क्या इन भापा जाननेवालोंकी बुद्धि है !
इस ग्रंथमैं अनुवंधनिरूपण है । ऐस अनुवंधकका सुंदरनिरूपण संस्कृतग्रंथनविपै वी मिलना कठिन है ॥ जैसे जेवरीविपै सर्प अध्यासरूपकै प्रतीत होवैहै, तैसे परमात्मा विपै सर्वव्यावहारिकसंसारप्रपंच अध्यासरूप जीवकूं प्रतीत होवैहै । ऐसा वेदांतका सिद्धांत है । जेवरीविपै सर्पभ्रममें अध्यासकी सामग्री कहि- है परंतु जगताध्यासमें तो कोईंही सामग्री नहीं है । सामग्रीविनाही प्रतीत होवैहै । ऐसा इस ग्रंथमें प्रौढिवादकरि सिद्ध कियाहै ॥ इस- प्रकारका अध्यासनिरूपण कोई संस्कृतग्रंथविपै वी बहुतकारि नहीं देखियैहैं । और वी अनेक उपयोगी सिद्धांताविरुद्ध स्वतन्त्र अद्भुतविचार ग्रंथकर्त्तानै इसमें राखैहैं ॥
ग्रंथके कर्त्तानै इसकी भापा बहुतसरल करीहै औ जैसे औरग्रंथकार अधीसंस्कृतमिश्र भापांस ग्रंथकूं रचिके कठिन करि देवैहैं । ऐसा इसमें नहीं, कियाहै । बहुत ठिकानें कठिन प्रसंगनकूं वारंवार लिखैहैं । जिसकारि स्थूल- बुद्धिमान वी समझिसके । जहां जहां कठिन संस्कृतशब्द राखैहैं, तहां तहां तिन शब्दनके अर्थ खोलैहैं । ऐसा या ग्रंथकूं सरल कियाहै । तथापि इस ग्रंथका श्रवण औ अभ्यास अनेकपुरुपनकूं कठिन प्रतीत होवैहै । सो कठिनता इस ग्रंथकूं प्रक्रियाकारि पूर्ण होनेतैं औ विचाररूप होनैतैं है औ इसका विषय वी दुरोंध है । परंतु इस नवनिरूपिसैं अंकितग्रंथकूं विचारनेसैं इसका श्रवण औ अभ्यास अत्यंत- सुगम होवैगा ॥
एकही यह ग्रंथ ऐसां उत्तम है जो इसकूं मुख्यकूं भलिप्रकार विचारै तौ शीघ्र अपने स्वरूपकूं जानै औ आत्मज्ञानके निमित्त और- कोईवि दूसेरे ग्रंथके देखनैकी अपेक्षा रहै नहीं; परंतु इतना है जो इस ग्रंथकूं गुरुद्वाराही देखना- चाहिये । कहैंतैं ? आत्मज्ञान वरकारि अथवा बहुत पढ़नैकारि अथवा औरकिसी स्वतन्त्रउपाय-
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करि प्राप्त नहीं होवैहै । ऐसा वेदांतका सिद्धांत । श्रमतैं अवगाहन किये, निश्शलदास सवेद ॥ ११२ ॥
॥ दोहा ॥ "पेखि चारिअनुवंध युत, पढै सुनै यह ग्रंथ ॥ ज्ञानसहित गुरुसै जु नर, लहै मोच्छको पंथ ॥ ? ॥"
ऐसैं अभ्यासवान् पुरुष आधुनिक समयमैं कचितवही देखनैमैं आवैंहैं ॥
इस ग्रंथकरि श्रीनिश्शलदाजीकी अद्भुत- निष्ठाका अनुमान होवैहै ! कहैंते ? जो इसमैं
सिद्धांतकी वातैं कोईठौरमैं कछु ही छुपाइके नहीं कहीहै औ गूढ़तरू निष्ठा करावनेकै
प्रकार सम्यकरीतिसैं इसमैं राखेहैं । थौं तत्त्वोंका व्यवहार ही अतिउत्तम औ निःशंक
था । जैसैं कोई ज्ञानपनेका अभिमान धारिकै देहाभिमान आदिकवैंप गिडररहतेंहैं, तैसैं यह
महात्मारुप नहिं थें । महाविरक्तदशावालें औ वडे ब्रह्मनिष्ट थें । ग्रंथाकारदशिकी
स्थितिमैही सदा मग्र रहतथ्ये ॥
औ इसके अंक ९७ मैं वीक कहाहै:- "विन गुरुभक्ति प्रवीनहू, लहै न आतमज्ञान ॥" यातैं जिज्ञासुनकूं ऐसी विनती है, जो इस ग्रंथकूं गुरुद्वारा विचारना ॥
इस ग्रंथके कर्त्ता श्रीनिश्शलदासजीका संपूर्ण- जन्मचरित इसकै साथै लिखनेकै मेरा विचार
था, परंतु ऐसैं साधनकी अप्राप्ति होतेंहैं जो थो तीव्रबुद्धिका वेदांतमैं वडी उपयोग है !
कछुक मेरे श्रवणमैं आयाहै, सो यहां लिखूंहूं ॥ तथा अपि तिनका वहुतअध्ययन अनात्मप्र (द्रैत) की
तर्फ बुद्धिकूं जोडहूं औ मतिकूं मलिन
करिदारहैं । ऐसा कहहैं जो न्यायसैं एकश्रत- गुन वेदांत विचारैं, तय न्यायकरि दूपित हूई
बुद्धि शांतिकूं पावहै ॥ श्रीनिश्शलदासजी
विद्याअभ्यासमैंही काल व्यतीत कियो ॥ इस ग्रंथके ५२६ वें अंकमैं तिनके अभ्यासका यह
कछुक वर्णन है:-
॥ दोहा ॥ "सांख्य न्यायमैं श्रम कियो; पढि न्यायकरन असेप ॥ पढै ग्रंथ अद्देतके, रह्यो न एकहु सेप ॥ ११८ ॥
कठिन जु और निर्वंध हैं, जिनमैं मतके भेद ॥
न्यायव्याकरनादिक वदिकूं तीव्र करैहैं
तिसकूं नहीं पढावतेथे औ कहतेथे जे प्रभातमैं अनात्मा (द्रैत) के प्रतिपादकग्रंथनकूं हम
नहीं पढावैंगे ॥
इस दर्यांतकैरी श्रीनिश्शलदासजी अद्भुत- निष्ठावान् थें । ऐसा सिद्ध होवैहै ॥
श्रीनिश्शलदासजीका पांडित्य तिनके अभ्यासकरिही वडा अद्भुतथा ऐसा सिद्ध होवैहै ।
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तिनका "वृत्तिप्रभाकर" ग्रंथ देखिके घडेरेवडे विद्वान् वी श्रीनिश्वलदासजीके पंडित्यनूं सराहतेहैं। अधिक क्या कहैं? तिनोंके समयमैं औ अज वी साधुपुरुपनविपै श्रीनिश्वलदासजीके समान कोऊवी परिपक्वविचारवाला पंडित नहीं है ॥
श्रीनिश्वलदासजी पृथ्वीपर जहां विचरतेथे तहां वेदांतशास्त्रकी प्रतिदिन कथा करतेथे। इसग्रंथकी औ वृत्तिप्रभाकरकी वी आपनै बहुतवेर कथा करीहै। जहां जहां आप श्रवण करावतेथे, तहां .तहां अनेकसाधुनिकी सभा श्रवणवासते मिलतीथी औ अतिरसिकभापण मुनिके आनदंवान् होतीथी॥
बहुतकरि श्रीनिश्वलदासजी श्रीकाशीजिविपैही रहतेथे ॥ तहां आप वी कहूं श्रवणमैं जातेथे। एकसमय श्रीकाशीजिमैं भापारामायणक कर्त्ता श्रीमतमा श्रीतुलसीदासजी कंथा करतेथे। तहां आप गयेथे। प्रसंगमैं श्रीतुलसीदासजीनै कहा, जो:-"ईश्वरविपै आवरणशक्ति नहीं है। विशेषशक्ति है"
यह मुनिके श्रीनिश्वलदासजीनै कहा, कि, "ईश्वरविपै दोऊं नहीं है;" इस वातपर थोडाशास्त्रार्थ हुवा। इस पीछे आप तिस महात्माकी कथामैं गये नहीं। कारण जो अपनै वचनोंकरि कहूं किसीं खेद .होवै तो भला नहीं। ऐसा विचारिके गये नहीं ॥
वी ग्रंथकी सहायता नहीं लढैहै। जैसैं कोइ सहज पत्र लिखैहै तैसैं इसकूं रचि गयेहैं। "श्रीवृत्तिप्रभाकर" रच्या तवं औरग्रंथोंकूं देखतेथे, परंतु सो आपनै ग्रंथकूं निर्दोष करनैकूं देखतेथे। औ "श्रीवृत्तिप्रभाकर"मैं अनेक प्रामाणिक ग्रंथनके प्रमाण दिखायेहैं औ तिसमैं अनेकग्रंथनके दोप वी स्पष्ट दिखायेहैं॥
अव कई संस्कृतके वेत्ते पंडित "श्रीवृत्तिप्रभाकर"कूं छुपाइकें चांचैहैं। कहैंहैं? जो संस्कृतके वेत्ते होइकें भाप्यग्रंथकी सहायता लेनैहूं तिनकूं लज्जा होवहै। परंतु अतिउत्कृष्ट होनतैं तिसकी सहायता लेतहैं ॥
"श्रीवृत्तिप्रभाकर"मैं न्यायआदिक अनेकपंडित्यमत भलिभकार दिखाथै-हैं। यांतें तिसका पढना कठिन भयाहै॥। अंतके प्रकरणमैं सर्वमतका खंडनकरिके वेदांतमतका प्रतिपादन कियाहै ॥
हिंदुस्थानमैं गुणदोष वी रामसिहराराजनै श्रीनिश्वलदासजीकूं घडे आदरसहित आपनै पास रखेथे औ राजानी दोऊं तिनोंमैं गुरुभाव रखतेथे। श्रीनिश्वलदासजीकी संगतिमैं सो राजा पंडितकी पदवीकूं प्राप्तभया॥
राजानै एकसमय घडेरेवडे पंडितनकी सभा करीथी, तिसमैं शास्त्रार्थ हुआथा। तिसकी राजानै यथास्थित परीक्षा करी। तिस दिनमैं सर्वपंडितजनोंनै तिस राजाका नाम "विद्वान" करिके रखा। इस राजानै श्रीनिश्वलदासजीकूं विनति करी। जो हिंदुस्थानवी भापामैं पंडितनकूं उपयोगी होवै ऐसा वेदांतग्रंथ कोई नहीं है,
सो आप करोगे तो सहजही उनपर उपकार होवैगा। इस प्रेरणाकरि औ भापाके जाननैवालों-पर दयाद्रष्टिकरि आपनैं "श्रीवृत्तिप्रभाकर" घनायाहै ॥
श्रीकाशीजिमैं रहिके श्रीनिश्वलदासजीनै विद्या के २७ लक्ष .संस्कृतश्लोकनका संग्रह इस ग्रंथकूं रचनेमैं श्रीनिश्वलदासीनै कोई
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कियाथा। आप संस्कृतके बड़े धुरंधर वेत्से थे। तथापि भाषा पड़नेवालोंपर बड़ी दयाकरि दो उत्तमग्रंथनकूं प्रगट किये। इस ग्रंथके अंक '५२६' में कह्याहै:—
॥ दोहा ॥
"दिन यहै भाषा पोश कियप, रंच न उपजी लाज ।। तामैं यह इक हेतु है, दया धर्म सिरताज ।।१।९।३।।"
श्रीनिश्वलदासजीने श्रीकठवल्लोपीपनिषदपर संस्कृतमें व्याख्यान कियाहै और वैद्यकशास्त्रका भी एकग्रंथ रच्याहै, ऐेसा सुन्याहै । काव्यशास्त्रमैं भी आप कुशल थे । ऐेसा इस ग्रंथकी कविता निर्दोष है । तिसकरि जान्या—
जावैहै ।
श्रीघुंदरदास जिनका "श्रीघुंदरविलास" प्रसिद्ध है, तिनोंनै और श्रीनिश्वलदासजीने मिलिके श्रीदादूजीके पंथकूं अतिविस्तार प्रकाशित कियाहै ।
श्रीनिश्वलदासजींक पंथका अभिमान नहीं' था । बड़े निरभिमान थे । शाल्यावस्थासैं आप साधुदशामेंही रहेथे और तिसमें बड़ विद्या—
अभ्यास किया और पीछे बहुतकारिके ब्रह्म—चिंतनवैैठही मग्न रहतेथे । संवत १९३० की सालमें श्रीदिल्लीशहरमें इनोंका देह पड्याहै। तिनोंका श्रीकिहडौलीमें जहां यह ग्रंथ समाप्त भयाहै, तहांं गुरूघ्वारा' भी है और अच्यापि तहां तिनोंके शिष्य वी हैं ।
श्रीनिश्वलदासजीका जो ऊपर हव्वांत लिख्याहै, सो बहुतअपूर्ण हैं । कोई कुपा—करिके इस महात्माऽपुष्यक संसिस्सरद्यांत मेरैकूं
लिख भेजैंगे तो तिसका और कोई दूसरे—समयपर उपयोग करनैकी मेरी बड़ी इच्छा है । जिस समयमैं यह ग्रंथ संपूर्ण भया, तिस समयमैं अनेक पुरुष इसकूं लिखाइकै रखतेथे । और तिसका अभ्यास करतेथे ।। तिस पीछे यह ग्रंथ कलकत्ता, लाहोर, मुंवई आदिक—स्थानोंमैं छपाइकै ओ मराठी भापामैं इसकामापांतर भयाहै ।। वंगालिभापामैं भी इसकाभांपातर हुवा है ऐेसा सुन्याहै ।।
जहां जहां यह ग्रंथ हिंदुस्थानीभापामैं छपा—है, तहां तहां विभिन्न्यंतप्रदच्छेदरहित और विचारनैमें कठिनतरिके छपेहैं और कहूं कहूं
तौ निऋषट्कागंद और छापेकरि ग्रंथकूं असुचि—कर करीदियाहै ।।
मेरैकूं इसका अभ्यास कठिन प्रतीत भया ! तब मैंनै कष्टसैं खुद अभ्यासके अर्थ अनुक्रमणिका रची ।। पीछे बहुतसत्संगीनै मेरैकूं सुझना करी ।
जो इस ग्रंथकूं अनुक्रमणिका सहित छपाना—चाहिये और तिसकरि सर्वेसुमुखनकूं इसका अभ्यास बहुत सुगम होवैगा ।। तब मैंनै—
इसमें ५२७ अंक कियेहैं । जिसकरि अनेकप्रक्रिया और अंतरगतप्रक्रियारूपी रत्न
विचार (रुपी) सागरमैं मिष्र मिष्र दृष्ट आवैहैं । या ग्रंथकी कविता बड़े अक्षरमैं और टीका लघुअक्षरमैं रचिहै । कहतहैं ? इस रुपीके ग्रंथमैं
सर्वेअक्षर बड़े लिखैहैं तो इसका पर तीन वा चारगिना होइजावै ।। इसके पद्य और गद्यके सर्वशब्द विमकष्यंत पदच्छेदकरिकै रखेहहैं ।।
और कविताके चरण वी मिष्र मिष्र रखेहैं । इसकरि इसका पढना अतिशयसुगम होवैगा ।।
इस ग्रंथके आरंभमैं मंगलाचरणके अत्युत्तम पंचदोहे हैं, तिनका अर्थ बहुतगंभीर है ।। इनकी टीका कहूं नहीं है परंतु श्रीनिश्वल—
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दासजीने वहुतसाधु पुरुपके पास इन दोहेका युक्तिपूर्वेक न्यासद्यान कियाथा । सो न्यास्यान स्वामी श्रीतिलोकरामजीसैं एक-महात्मापुरुपने श्रवण कियाथा औ तिनसैं मैने श्रवण कियाहै । इन मंगलाचरणके दोहेकी टीका अतिलघयोगी जानतहै नवीन रीतिसे अनुसर इस ग्रंथके आरंभमें छापीके रखी है ॥
१ महात्मा श्रीमद्रामगुरु अखण्डानन्दसरस्वतीके प्रशिष्य षप षौ पूष्यपाद श्रीमद्वापुरसरस्वतीके शिष्य, ब्रह्मानिष्ठपंडित श्रीपीतांबरजी महाराज । इस महात्माने श्रीपंचदशीकी विस्तृत षौ अतिउत्कृष्ट तत्वप्रकाशिकानामक हिंदुस्थानोमें टीका करीहैं षौ वेदान्तक इश्वरादिनामक अष्ट उपनिपदूनकी संपूर्ण सटीक शंकरभाष्यके अनुसर
जिस महात्मा ब्रह्मानिष्ठ पुरुपसैं मैने मंगलाचरणकी टीका औ इस ग्रंथका श्रवण किया है, तिस महात्मा पुरुपका मेरे ऊपर अतिवड़ा उपकार भैयाहै औ ग्रंथके आरंभमें अर्पणपत्र रख्याहै । सो इसीही महात्मापुरुपके वास्ते रख्याहै ॥ ॥ विक्रमसंवत १९७४ ॥
—प्रसिद्धकर्ता।
हिंदुस्थानोमें टीका करीहै षौ श्रीसुंदरविलासके विप-येंहि अंग्रेजी टीका, श्रीविवारचंद्रोदय अरु इतरस्नावलिआदिक अनेक वेदांतके ग्रंथ रचेहैं, सो भापावालोंपर परमअनुगयह कियाहै । ऐसे उत्तमविद्दान् दयालु उपदेशकुराल औ ज्ञानवैराग्यभादिक अनेकउत्तमगुणगणमणिमंडित ये महात्मा थे ॥
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॥ श्रीगुरुवित्सदुरुभ्यो नमः ॥
॥ श्रीविचारसागर ॥
पृष्ठ-९
॥ पंचमावृत्तिकी प्रस्तावना ॥
॥ उपोद्घात ॥
संस्कृतभाषाविपै वेदांतार्थविपषक अनेक-उच्चग्रंथ विद्वान हैं । परंतू स्वतंत्रभावप्राग्रंथोंमें साधु श्रीनिश्वलदासजींकृत श्रीविचारसागर ग्रंथ उत्तमोत्तम औ अद्वितीय है । 'अखिलभापाग्रं-थोंके समूहमें इसग्रंथसमान अन्य ग्रंथ नहीं हैं' ऐसैं कहनमें किंचित् थी अतिशयोक्ति नहीं है । वेदांतके सर्वप्रकारके अधिकारियोंों इस ग्रंथसैं सम्यग्ज्ञानकी प्राप्ति होवैहै । कहैंत ? इसविपै अद्वैतसिद्धांतकी सर्वप्रकरियां समाविष्ट हुइहैं । इतनही नहीं, किन्तु व सप्रपंचप्रकरियां वेदके महत्वसिद्धांतसैं अविरुद्ध हैं । यह ग्रंथ मुमुक्षुजनोंकूं कैसा प्रिय औ उपयोगी है, सो वार्त्ता याकी यह पंचमावृत्ति भीहै इसकरिकेही सिद्ध होवैहै ॥ प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ औ यह पंचम ऐसें इस ग्रंथकी पांच आवृत्तियोंकूं उतरोत्तर देखनैसैं ज्ञात होवैगा, कि अभ्यासकी ड़गमताअर्थ प्रत्ये-
| आवृत्तिमैं हमनैं नवीनता करीईहै तथापि कहूं वि ग्रंथकर्त्ताके शब्दोंविपै अधिकता वा न्यूनता नहीं करीईहै । जैसी इसं ग्रंथके अर्थकी-उत्तमता है, तैसीही उत्तमता मुद्रणशैलीकी रचना औ शृंगारविपै करनैनिरित्त इस पंचमावृत्तिविपै जे नवीनता करीईहै, वे नीचे दर्शावतेहैं:-
श्रीत्रिततरलावली ।
श्रीत्रित्तरभावरनामकग्रंथ वी साधु श्रीनिश्वल-दासजीने कियाहै और सो गहन होनेतैं पंडित-गम्य तथा अनेकअकारके तर्कवितर्कोसे भरपूर है । इस ग्रंथका वेदांतोपयोगी सारांश ग्रथनिष्ठ पंडित श्रीपीतांबरजी महाराजनै निष्कर्षकारिके तिसका नाम "श्रीत्रितरलावली" रक्याहै ॥ यह ग्रंथिरलावलिग्रंथ इस श्रीविचारसागरकी तृतीयावृत्तिविपै छाप्याथा सोईही महाराजश्रीनै दयाकरिके पुनः संशोधन करिदिया । सो इस आवृत्तिविपै छान्याहै ॥
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॥ पंचमदृष्टिकी प्रस्तावना ॥
श्रीपंचदशीस्टीकाासभापा द्वितीयादृष्टिगत श्रीनाटकदीप ।
जैसे भापाग्रंथोंमें श्रीविवारसागर रत्नरूप है, तैसे संस्कृतग्रंथोंमें श्रीमद्विद्यारण्यस्वामिकृत श्रीपंचदशी रत्नरूप है । श्रीविवारसागर औ श्रीपंचदशोका लक्षणपूर्वक अवलोकन करनेंस श्रीविवारसागरविऐ श्रीपंचदशोकी अनेकप्रकारिया दृष्टि होती हैं । यातें ऐसा अनुमान होवैहैं, कि, साधु श्रीनिश्वलदासजीने श्रीपंचदशोप्रंथका दृढ़अभ्यास औ रटनकरिके तिसके सारार्थकूं अपने चित्तरूपी जठरमें अत्यंतपाचन कियाहोवैगा । उक्त श्रीपंचदशोकी अलौकिकलयुक्त द्वितीयादृष्टि हमनें छापीहै औ तिसका विस्तार इस ग्रंथके प्रथमके परणाम जैसे १००० सें . अधिकग्रंथका है । तिसविैं ४६७८ अंक करीकै संपूर्णसंस्कृत मूल तथा अन्वययुक्त टीका औ नितनैही अकथित तिनकी संपूर्णभापा औ ८३५ टिप्पण समाविष्ट कियेहैं ॥
वैसी अन्य कोइवी भापाके टीकाकारोंकी टीकाविपैं देखनैं आवती नहीं । सो गंभीरता उक्त नवलनरत्नसैं ग्रंथके छापनेतैं स्पष्ट भईहै । इतनाही नहीं, परंतू ऐसी सुलटिके लिये अभ्यासकी अत्यंतसुगमता भईहै । इस ग्रंथके अंतमें श्रीपंचदशीस्टीकाासभापाका नामक दशमप्रकरण धरयाहै । तिसकरी सारेपंचदशोप्रंथकी मुद्रणैलै ज्ञात होवैगी ॥ इस ग्रंथमें नाटककै रुपकसैं वेदांतसिद्धांतकी उत्तमप्रक्रिया राखीहैं, सो वीं ग्रमभक्तजनोंकूं अत्युयोगी होवैगी ॥ इसके मुख्यग्रंथउपरि अनुख्रमणिका धरीहै । सो तहां देखनैं तद्गत विपय ज्ञात होवेंगै ॥
॥ पददर्शनसारदर्शीकपत्रकम् ॥
उक्त श्रीनाटकदीपके आरंभमें ग्रंथनिर्मातापंडित श्रीपीतांवरजीकृत अत्युपयोगी पददर्शनसारदर्शक पत्रक दियाहै । जिसविपैं पूर्वमीमांसा,
उत्तरमीमांसा ( ब्रह्मसूत्ररूप वेदांत ) न्याय, वैशेषिक, सांख्य औ योग, इन पददर्शीलोकें मतानुयायीओंने जीव, जगत्, बंध, मोक्ष आदिक १७ मुख्यविपयोंके कैसे भिन्नभिन्न लक्षण कियेहैं, सो संक्षेपसैं स्फुट दर्शोयेहैं । प्रत्येकदर्शनसंवंधी अनेकग्रंथोंके श्रमपूर्वक अवलोकनंस जे उपयोगीदार्थ जाने जावैहैं, जे इस लघुपत्रके अवलोकनसैं प्राप्त होवेंहैं, इस पत्रककी स्पष्टताके लिये श्रीपददर्शनसारावलिनामक ग्रंथ महाराजश्रीनें तैयार किया है ॥
॥ स्वप्नबोध औ महावाक्यविचेक ॥
साधु श्रीहंडरदासजीकृत अत्यंत रुचिकर श्रीहंडरविलासादिद्वैप स्वप्नबोधनामक अति-रासिक औ कंठ करनैं सुगम ग्रंथ है । सो इस ग्रंथधरयाहै ॥ तेसही श्रीपंचदशोगत श्रीमहावाक्यविचेक, जिसपै चारिवेदके महावाक्यनका सम्यक्विरोध कियाह, सो वीं अथयुक्त इस प्रस्तावनाके अंतमें धरयाहै ॥
॥ अनुक्रमणिका ॥
जैसे मंदप्रकाशयुक्त गृहगत अनेकपदार्थोंमेंसैं कौनसा पदार्थ कहांहैं, सो जाननेनिमित्त दीपककी आवश्यक्ता है । तैसे ग्रंथविपैं रहे मिल्रमिन्न पदार्थोंकी प्राप्तिमें अनुक्रमणिका मानीं एक दीपकके समान है । इसग्रंथमें प्रसंगदर्शक औ विपयदर्शक ऐसे दोप्रकारकी १ अनुक्रमणिका छापीहै ॥
१ प्रसंगदर्शकानुक्रमणिका ग्रंथारंभमें धरीहै । तिसतैं कोइ वीं वांछितप्रसंगका अंक औ कितनैं अंकपयत् तिस प्रसंगका विस्तार है । सो निमेपमात्रसैं ज्ञात होवैगा ॥
२ ताके पीछें विपयदर्शकानुक्रमणिका धरीहै सो अत्यंतउपयोगी है । कहैंतैं ? तिस-रत्नावलिगत सर्वी ज्ञातव्य विपयोंकूं श्रमपूर्वक प्रवेश कियेहैं । इतनाही नहीं । परंतू ये सर्व आकारादिअनुक्रमसैं ग्रथित कियेहोनैं कोइ
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वी वांछितविपयका अंक सीघ्र प्राप्त होवैहै ॥ सर्वविपय दृष्टिपातमात्रसैं ज्ञात होवैहैं ॥
( १ ) उत्तअंकनमें जे चिन्हरहित हैं, वे श्रीविचारसागरके अंक हैं ॥ जैसैं कि:-२१ वे पृष्ठोपरि दुःखका विचेजन कियाहै ॥ वे दुःख कितनै प्रकारके हैं सो अंक १-२-३ वाले तीन पेरेग्राफउपर दृष्टि करनैसही ज्ञात होवैहै कि दुःख तीनप्रकारका है । तदुपरि प्रत्येकप्रकारके दुःखका वर्णन मिनमिन्न पेरेग्राफमें करिके तद्गत अध्यात्म-
दुःख, अधिभूतदुःख औ अधिदैवदुःखआदिक प्रधान शब्दनकूं स्थूलकरिके स्पष्टता करीीहै । तैसैंही पृष्ट ३२२ ऊपर “ईश्वर व्यापक औ नित्य है” ऐसैं विपय चलताहै, तिसमें ईश्वरकूं व्यापक औ नित्य नहीं माननैंमें भिन्न प्रकारके पददोप किसरीतिसैं प्राप्त होवैं-
हैं । तदूगत चक्रिकानामक तृतीयदोप, किसप्रकार चक्राकार भ्रमण होवैहै । चतुर्थ अन्योन्याश्रयदोप किस अनु क्रमसैं प्राप्त होवै-
है, इस आदिक समग्रवाच्यां भिन्नभिन्न पेरेग्राफ अथवा तिसके आरंभमें दिखलुहु एकही अंकरपर दृष्टिका पतन होतही तत्काल ज्ञात होवैहै ॥
इस रीतिसैं उत्तक नवीनरूढिके लिये ग्रंथगत भिन्नभिन्नविपय, तिनोंका संवंध, समान-
समानपना, उत्तरोत्तरकम, शंका, समाधान, तिनोंका आरंभ तथा अंत, हृ्ट्यांत, सिद्ध्यांत
औ चिकलपआदिक श्रमसैं विना बुद्धिमैं प्रवेश करैंगी ॥
॥ टिप्पण ॥
इस आध्यत्तिमें टिप्पणोंकी मुद्रणशैली वी
प्रयोजनानुकूलं अनुसारीकै रखीहै । इतनाही नहीं, परन्तु तत्तत सारसूत शब्दकूं
स्थूलतयुक्त धरेकै स्फुटता करीीहै । तदू-
परि इस आध्यत्तिके लिये महानिष्टपंडित श्री-
पितांबर जीमहाराजनें कृपाकरिके श्रमपूर्वेक उत्त-
टिप्पणोंका पुनः संशोधन कियाहै औ तिसमें कितनेक स्थलमें तौ प्रसंगवशात न्यूनाधिकता
करिके वी अर्थकूं विशेष स्पष्ट कियाहै ॥
छापनैकी रीढे ॥
इस आध्यत्तिमें अंकयुक्त पेरेग्राफकी ( विमा-
गनकी ) नवीनमुद्रणशैली प्रवृष्ट करीीहै ।
तिसतैं इसग्रंथके अभ्यासी जननकूं श्रवणमनन-
रूप अभ्यासमें अत्यंतसुलभता होवैगी ऐसैं
स्वानुभवसैं निश्चय होवैहै ॥ एकही पेरेग्राफमें
एकही विपयका अनेकप्रकारसैं विवेचन किया-
वान अनेकविषय संलभतासैं आते होवैं, तथ
उक्तविपयका कितनैप्रकारसैं विवेचन हुवा है ।
किंवा तिसपेरेग्राफमें कितनें विषयका समावेश
हुवाहै औ तिनोंका परस्परसंबंध किसप्रकारका
है; सो संपूर्ण पेरेग्राफ नितांतपूर्वक आरंभसैं
अंतपर्यंत पठण किये बिना ज्ञात होता नहीं ॥
अंकयुक्त पेरेग्राफनकी जो नवीनरूढी इस-
आध्यत्तिविपै प्रवेश करीीहै तिसके योगतैं उत्त-
इतरातिसैं “पंचकला” औ “केशपंच” ऐसैं
दो स्थलमें एकही विपयके अंक मिल सकैंहैं ॥
कहूं तौ एकही पदार्थ अवकाशानुसार तीन-
स्थलविषै वी धराहै ॥
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व्रजमनिष्ठपंडित श्रीपीतांबरजी पुरुषोत्तमजीकी यथार्थवृत्तिरन्वितमूर्ति ।
परमख्यात औ पूज्यपाद इन महात्माका जन्म संवत् १९०३ में कच्छदेशर्गत श्रीमज्जलग्रमाविपै हुआ । परमपूज्यपाद श्रीमद्रामगुरुके प्रशिष्य औ श्रीमद्राममहाराजके शिष्य होवें । इनोंका स्वभाव अत्यंतशांत दयालु औ परमोपकारी था । इनोंका जीवनचरित्र ४६ पृष्ठोंमें विस्तासैं श्रीविचारचंद्रोदयकी पंचमावृत्तिके आरंभविपै हमनै छाप्याहे । इन महात्मानैं जे ग्रंथ स्वतंत्र रचेहैं तथा जिन ग्रंथोंकूं टिप्पण कियेहैं औ संस्कृतभापाविपै अज्ञनोके लिये जिन ग्रंथ-तककी भापा करीहै, वे नीचे दिखावैहैंः-
१ जे स्वतंत्रग्रंथादिक रचेहैं औ जे छापेगयेहैं, वे ये हैंः-
(१) श्रीविनयवचनचंद्रिका । इसकी पंचमावृत्ति अंकयुक्त पेराग्राफनकी लुटिसहित हैँ।
(२) श्रीवालयोगसटीक सटीप्पण द्वितीयावृत्ति ।
(३) श्रीसुंदरविलासके विप्रययनामक २० वें अंगकी रहस्यार्थदीपिका नामक टीका ।
(४) श्रीष्टतिग्रभाकरका सारभूत वृत्तिरलावलिग्रंथ। सो इस ग्रंथके साथही छाप्याहै।
(५) श्रुतिपड्लिंगसंग्रह संस्कृत तथा भापायुक्त । श्रीईशाद्यष्टोपनिपत औ श्रीवृहदारण्यकोपनिपत्के अंगमें छाप्याहें ।
(६) श्रीसर्वोतभावप्रदीप । स्वामी श्रीत्रिलोकरामजीकृत श्रीमनोहरमालाके साथ छाप्याहै ।
(७) श्रीवेदस्तुतिकी टीका ।
(८) श्रीविचारसागरके मंगलाचरणके पंच-दोहाकी टीका । । यह इसी ग्रंथमै छाप्या है ।
(९) श्रीपड्दर्शनसारदर्शीकपत्रकम् ।
[यहही इस ग्रंथके अन्तमें छाप्या है.] २ जिन ग्रंथनके उपरि स्वतंत्र टिप्पण रचेहैं, वे ये हैंः-
(१) श्रीविचारसागरपर टिप्पण ५५३×४५ ।
(२) श्रीपंचदशीसटीकासभापापर टिप्पण ८३५×१५।
(३) श्रीसुंदरविलासपर टिप्पण १०५ ।
(४) श्रीविचारचंद्रोदयपर टिप्पण १८१ ।
(५) श्रीवालयोगसटीकपर टिप्पण २१० ।
(६) श्रीमनोहर मालापर् टिप्पण ४५२ ।
(७) श्रीसर्वोतभावप्रदीपपर टिप्पण १०५ ।
३ जिन ग्रंथनके भापांतरआदिक कियेहैं औ जे छापेगयेहैं । वे ये हैंः-
(१) श्रीपंचदशी मूल औ टीकाकी भापा ।
(२) श्रीआववत्कगीताके मूलकी भापा ।
(३) श्री ईशा, केन, कठ, प्रश्न, मुंड, मांडूक्य, तैत्तिरीय औ ऐतरेय । ये ८ उपनिपद् औ तत्त्वंधी श्रीशंकर-भाष्य तथा आनन्दगिरिकृत टीकाका भापांतर प्रसिद्ध है । याकी द्वितीयआवृत्ति भईहै।
(४) श्रीछांदोग्योपनिपद् औ तत्त्वंधी श्रीशंकरभाष्य तथा आनन्दगिरिकृत टीकाका भापांतररूप टिप्पण ।
(५) श्रीवृददारण्यकोपनिपद् औ तत्त्वंधी श्रीशंकरभाष्य तथा आनन्दगिरिकृत टीकाका भापांतररूप टिप्पण ।
(६) श्रीवेदस्तुतिकी भापांतर ।
(७) श्रीपदार्थमंजूषा श्रीमूलचंद्रज्ञानीकृत शोधन करिके छपवायाहै ।
३ और भी इनोंनें श्रीवेदांतकोशादि तेरह ग्रंथ रचे हैं ।
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इसरीतिसैं इस महात्मानै अनेकग्रंथकी रचना करिके सकल मुमुक्षुजननौके उपरि महानअनुग्रह औ दया करीहै । तिनौंकौ दरशेनमात्रसैं कृतार्थे करनेहारी यथास्थितिचित्रितमूर्ति बहुत दृव्यवृययसैं विलायतसैं मंगवाई हुई चतुर्थोऽधिके ग्रंधारंभमें स्थापित करी थी । अबौं पंचमावृत्तिमैं भो वसौकौ वसाहौ ग्रंथारंभमें राखौ है ।
इस चित्रितमूर्तिंकै नीचे जे अक्षर हैं, वे पूज्यपादमहाराजश्रीके हस्ताक्षर हैं ॥ निर्गुणउपासना चक्र ॥ ९९२३ ॥
*अनु भूतेरमावेजपि ब्रह्मास्मीत्येव चिंत्यताम् । अभ्यस्यतामापते ध्यानाखिल्यां ब्रह्म किं पुनः:१५५ जैसे उक्त महाराजश्रीकी मूर्ति दरशनद्वारा हितकारी है, तैसे इस निर्गुणउपासनाचक्रका दरशनमात्र स्मृतिद्वारा स्वरूपस्थितिके हेतु अभ्यासमें हितकारी है ॥ यह निर्ग्रेणउपासना-चक्र वस्तुनिर्देशरूप मंगलकी टीकाके अन्तमें उपरोक्त श्लोकसहित लिखदिया है। "प्रधानपुरुषशक्ति ब्रह्मचेतनैं मिल्र्र नाहीं" ऐसैं श्रीविचारसागरके
- उत्कृष्टलौकीक संस्कृत तथा भाषाटीका श्रीपंचदशीसटीकासभापमैैं नीचे रखीहै ॥ ३९३२ ज्ञानेऽसमर्थेस्य ध्यानेऽधिकार इत्यत्र वाक्यांतरं पठति—
३४] अनु भूते: अभावे अपि “ब्रह्मास्मि” इति एवं चिंत्यताम् ।
३५ ध्यानादौ ब्रह्ममात्रौ कैमुतिकिन्यायमाह ( अपीति )—
३६ ] असत् अपि ध्यानात् प्राप्यते । पुनः नित्यासं ब्रह्म किस् ।
३७ ) उपासकस्य पूर्वमविद्यमानमपि देवत्वादिकं ध्यानात् प्राप्यते किल । स्वरूपत्वेन नित्यप्रासं सर्वोत्तमकं ब्रह्म ध्यानात् प्राप्यते इति किश्चिद्वक्तव्यमित्यर्थ: ॥ १५५ ॥
२७९ के अंकमें लयचिंतनप्रसंगमें कहाहै । तैसे अज्ञानातेक उपाधि औ अन्य जितने नाम उपासनाचक्रवैपै देखिवैहैं, तिनौंका अभेदचिंतनतनरूप लयचिंतन वी इस चक्रकारिके होइ सकैहै । लयचिंतनका विस्तृतवर्णन श्रीविचारसागरके २७७-२८० अंकनवैपै है ।
निर्गुणउपासना की रीत जेसौ उपनिषदादिक वैंपै है, तैसे विस्तरसैं श्रीविचारसागरके अंक २८१—३०२ पर्यंत देखनैमें आवेगी औ उपासनाचक्रवैपै ईश्वरादिकका प्राज्ञादिक तथा मकारादिकके साथि अभेद, आकारतिनकी समीपताकरि दिखायाहै । सो श्रीविचारसागरमें उक्तअंकनवैपै अतिस्पष्टही है ॥ यद्यपि उक्तचक्रवैपै अंआदि अक्षर हैं तिनका कोरकागजैं भेद नहीं । तथापि स्थाहीरूप उपाधिसैही भेद भासता है । यह वातां टिप्पणकारनै श्रीविचारसागरके द्वितीयतरंगके ४८ वें टिप्पणवैपै जनाईहै । तिस दृष्टांतकी वी इस चक्रके दरशनैं स्मृति होवैहै । यातैं मुमुक्षुजननौकौं यह चक्र वी कल्याणकारीही होवैगा ॥
३९३२ ज्ञानवैपै असमर्थेस्यपुरस्क्रों ध्यानवैपै अधिकार है । इस अन्यवाक्यद्वारौं पठन करैहैं—
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॥ ग्रंथकी जिल्द ॥
इस ग्रंथकी चतुर्थोऽध्यायिकी जिल्द देखनेसैंही निश्चय होताथा कि श्रीपंचदसीटीकासभापा द्वितीयोऽध्यायिकी जिल्दकी न्योई वह जिल्द वी महासुंदर चित्ताकर्षक औ उत्तमारथवान् करनैमें अत्यंतद्रव्यखर्ची औ परिश्रम कियाथा ॥ परंतु खेद है कि अबकी बार हमैं इस ग्रंथकी पंचमाध्यायिकी जिल्द बहुतही परिश्रम और खर्च भारी द्रव्य खर्चे करनैपर भी वैसी न बना सके, जैसी कि चतुर्थोऽध्यायिकीमें बनाई थी; क्योंकि कागज, स्याही, रंग, कपडा, कारीगर आदि जिल्दकी महासुंदर और नयनमनोहर वनानेकी साधन जैसे चाहिये वैसै इसवक्त नहीं मिल सके. इसलिये हम आग्रह करते हैं कि पाठकगण सिर्फ जिल्दकी थोडीसी भुटिकों देखकर नाराज न होंगे किन्तु क्षमा्ही करके पहिले जैसा्ही उदार मनसे अभिग्रह देंगे.
'पदार्थंगत सुंदरता तिस पदार्थविपै प्रीतिकूं उत्पन्न करैहै औ जहां प्रीति होवै तहां प्रृत्ति होवैहै' यह सामान्य नियम है । सुंदरता चित्ताकर्षणकी हेतु है औ 'जहां प्रीति सहित चित्ताकर्षण होवैहै तहां प्रवृत्तिकी पुनरावृत्ति होवैहै' यह बी नियम है । जहां वारंवार प्रवृत्ति होवै तहां अधिकद्धता वी होवैहै । इसरीतिसैं सुंदरताका उपयोग रूपकी सुंदरताके साथि कोई उत्तमारथकूं जोडनेमैं आवै तौ सुंदरतानिमित्त चित्तकी प्रवृत्ति होतेही तिसके साथि अनुस्यूत किये हुये उत्तमारथकूं मनुष्यकी बुद्धि अनायाससैं ग्रहण करिलेवै यह स्वाभाविक है । इस हेतुकै लक्षणमैं राखिके हमारे ग्रंथोंकी जिल्द ऊपर छापेहुवे चित्र मात्रसुंदरतासंपादनार्थ नहीं परंतु सुंदरताके साथि अतिगंभीर औ उत्तमारथकै स्मारक होवें इस हेतुसै दियेजातेहैं ॥
इस ग्रंथकी जिल्द ऊपर जे चित्र हैं तिनविपै जो अर्थकी कल्पना करीहैं, सो नीचे दर्शावतेहैं:- ॥ गजेन्द्र मोक्षका चित्र ॥ यह चित्र देखनेसैं जान्माजावैगा कि सरोवरविपै गजराजकूं एक ग्राहनै बहुतकालपूर्वक ग्रहण कियाथै औ सो गजराज ग्रासनसैं मुक्त होनैअर्थ अत्यंतवल करताहै, इतनाही नहीं । परंतु गजराजका कुटुंबपरिवार आपआपकी झुंडादडसैं तिस गजराजकूं चाहिर खींच लेनैमैं अत्यंतपरिश्रम करताभया । ऐसैं दीनप्रयत्नसैं वी अपना मुक्त होना असमय देखिके सो गजराज सरोवरविपै उत्पन्न हुये अंबुजोंमैंसैं एककूं तोडिके छुंडसैं मस्तकउपरि धरिके, जब भक्तिभावपूर्वक श्रीविष्णुकै प्रार्थना करताभया, तव स्तुतिसैं प्रसन्न हुआहै अंतःकरण जिसकै औ परमदयालु है स्वभाव जिसका, ऐसैं श्रीविष्णुभगवान् आपके चक्रसैं तत्काल गजेन्द्रका ग्राहतें उद्धार करतेभये ॥
इस कथाभूतसरूपकविपै जो उत्तमसारार्थ गूढ राखाहै सो यह है:- गजराजकूं तौ अज्ञानी जीव, ग्राहकूं तौ महामोहरुप माया औ सरोवरकूं तौ अपार दुःस्तर संसार समजना । जैसैं सरोवरविपै रमण करताहुया गजेन्द्र ग्राहसैं ग्रस्त भयाहै, तैसैं संसारविपै रमण करताहुया यह अज्ञानीजीव प्रवृत्तिप्रधानमहामोहरुप मायासैं ग्रस्त होवैहै ॥ जैसैं गजराज आपके औ अन्यहस्तिनके वलसैं वी छूटनैकूं असमर्थ भयाहै । तैसैं यह अज्ञानी जीव वी केवल अपनी बुद्धिके वलसैं वा मंत्रकर्महटयोगादिक वाद्योपचारसैं मुक्त होनैकूं असमर्थ होवैहै । परंतु जैसैं गजराज हरिस्वस्तिसैं श्रीहरिकूं प्रसन्न करिके तिनोंके फेंकेहुये चक्रकी सहायतासैं मुक्त हुवा । तैसैं यह अज्ञानीजीव
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श्री परमात्मनिष्ठगुरु जो गोविंद (हरी) सैं अमित्र है, तिसकूं श्रद्धापूर्वक तन मन धन अर्पणरूप सेवापूर्वक स्तुतिसैं प्रसन्न करै तौ तिसके दिये हुए 'ज्ञानोपदेशरुप चक्रकी सहायतासैं तत्काल मुक्त होवै । यह निःसंशय है ॥
इसरीतिसैं यह उत्तमचित्र दर्शनमात्रसैंही उद्धारेसहिततांकूं स्मरण करावनैदार दर्शनमात्रसैंही कूं महाकल्याणका साधन होवैगा ।
सागरका चित्र ।
[चतुर्थोऽवृत्तिमैं इस ग्रंथकी जिल्द पर गजेन्द्रमोक्षके ऊपर सागरका चित्र दिया था जिसका तात्पर्यार्थ भवसागरके रूपकसे नीचे दर्शाया है वह इस वक्त इस ग्रंथकी प्रस्तुतचित्रिमैंउसकी वनावटकी सामिप्रिके न होनैसैं न देस्के इस लिये मी पाठकोंको क्षमाही करनी चाहिये ]
न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया ।
श्रात्मैकत्ववोधेन मोक्षः सिद्धयति नान्यथा ॥
यह मोक्षमाप्तिका उपायदर्शक श्रीमच्छंकराचार्यकृत विवेकचूडामणिका ५८ वां श्लोक है ॥ अब भवसागरके सिद्धांतरूप सारार्थकूं प्रकट करैहैं:-
यह संसार एक निँकट औ दुस्तर सागरकी उपमा कूं सर्व प्रकारसैं योग्य है ॥ तिसविपैं ईश्वरनैमै अत्यंतशक्तिमान ऐसे रागद्वेष सुखदुःख आदिक इंद्रनके अनेक महानंतरंग उछल रहैं ॥ जे जन गुरु उपासैं उक्ततरंगनकौं उछलंघन करिके समुद्रके पारैं पावैंहैं । केवल वेदही मात्र मुक्त होवैंहैं । अन्य सर्व तिन तरंगनविपय होइकै "पुनरपि जननं पुनरपि मरणं"रूप महादुःखकषायघटमालिमैं चक्रकी न्यायी भ्रमण करैहैं ॥ सागरकूं तरनेवास्ते सर्वथा नौकाकी आवश्यकता है ॥ अब इस दुसतर-भवसागरके उछल्घनार्थे शिभिन्न शिभिन्न नौकाकी कल्पना करी है । तिसमें
"कर्म" "उपासना" औ "ज्ञान" रूप तीन नौका प्रधान हैं ॥
इस जगतविचै कर्म, उपासना औ ज्ञान इन तीनोंमै ज्ञानके अधिकाधिक संख्याकी अति अल्प देखियेहै । कहैतैं ? ज्ञानमार्गमै प्रवेश करने अर्थ अनेक सद्गुण औ विचक्षण तथा निर्मल बुद्धिकी आवश्यक्ता है औ तैसी बुद्धि सर्वथा सर्वकूं प्राप्त नहिं होती, किंतु अल्पजनोंकूं ही प्राप्त होवैहै । यह अर्थ विवादरहित है ॥ उक्तचित्रकूं देखनैसैं ही ज्ञात होवैगा कि कर्म औ उपासना रूप नौका मचुध्यजनोंसैं भरीपूरी है । तथ ज्ञानरुप अभिनौकाके प्रति जानिके प्रयत्न मात्र थोडेजन करतेंहुऐ तिनमें कोई वीरपुरुप अभिनौकामैं स्थिति करैहै ॥
१ मचुध्यस मूदायमै अधिकसंख्यायुक्त वर्ग तौ ऐसा है कि जो इस असार मिथ्या औ अनित्य भवसागरदृश्य नित्य भांतिके श्रांतिप्रस्ते होइकै तिसविपै प्रीति होतें सुखदुःखनमैही कृतार्थतां जानताहैं औ उत्तमपुरुपार्थकौं परित्याग करिके केवल विपयप्राप्तिका प्रयत्न करैहै ॥
ऐसैं पुरुपनकूं इस ग्रंथविपै पामर कहैहैं ॥
२ उक्तपामरजनोंसैं न्यूनसंख्या ऐसैं मचुध्योंकी है कि जो यद्यपि स्वर्गोद्दिक उत्तमलोकके भोग इस संसारके भोगनके तुल्यही हैं तदपि अधिक होनैतैं तिनकी प्रासिकूंही मोक्ष मानैहैं ॥ ऐसैं पुरुप कर्म औ उपासनाकूं प्रवृत्त होइकै "कर्मसैं उत्पद्यते हि फलं नच्चित्तं नित्यं भवै नहिं" ऐसैं सामान्यन्यायसैं विचरैमैं वी असमर्थ हैं ॥
इनकूं शास्त्रनिवपै विपयी कहैहैं ॥
३ इनतैं न्यूनसंख्यावाले जन ऐसैं हैं कि जो कर्म औ उपासनासैं प्राप्त होनैहारे इसलोक औ परलोकके सर्वभोगनकौं अनित्य मानिके
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नित्यानिरतिशय जो मोक्षसुख तिसकी प्रासिकाही सर्वेदा विचार करैहैं। औ गुरुनूं गोविन्दरूप जानिके तिसके उपदेशारूप मार्गेद्वारा नित्यानिरतिशयसुखरूप पारकूं पहुंचावनैहारी ज्ञानरूप अधिगोटमैं स्थिति करैहैं। ऐसैं मनुष्यनकूं इस ग्रंथविचैपि मुख्य कहैहैं॥
४ मुख्यसुखनैं न्यूनसंवैया। मुख्यादिककी क्रुपा-प्रतिपादक महावाक्यनके अर्थमैं परम आस्तिक हुये ज्ञानरूप "अभिगोट"मैं स्थिती करिके अथ्लूप (मोक्षरूप) पारकूं प्राप्त भये ज्ञानिनकी है॥ तिनोंकूं इसलोक वा परलोक वा मोक्षसंपदनार्थे कछु वी कर्तव्य अवशेष रहा नहीं, यातें वे कृतकृत्य औ प्राप्तप्राप्त्य हैं॥ ऐसैं ज्ञानि पुरुष अज्ञाननकी दार्तिनैं भवसागर इन उभयविचैपि पथेच्छे वर्चतेहुवे दृढयमान होवैहैं! परंतु जैसैं ध्रुकपक्षी प्रकाशकूं नहीं जानैहैं तैसैं अज्ञानी पुरुष ज्ञानिनकी अंहुजवत् निलेपस्थितिकूं नहीं जानैहैं॥
इसजगतूविचै पामरनतैं विपयिनकी विपधि-नतैं मुख्यसुखनकी औ मुख्यसुखनतैं मुक्तनकी संख्या उत्तरौत्तर न्यून होवैहै ऐसैं ऊपर कहा सो श्रीमद्भगवद्रीतागत भगवान् श्रीकृष्णके नीचे लिखेहे वचनसैं स्पष्ट होवैहै॥
॥ श्लोक ॥ मनुय्याणां सहस्रेपु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्नो वेत्ति तत्त्वतः ७३ अर्थः—अनेकसहस्र मनुष्यनविचैपि कोईएकही मुख्यसुख ज्ञानकी उत्पत्ति अर्थे प्रयल करैहै। औ तिन प्रयलकरनैहारे अनेक सहस्र मुख्यसुखनविचैपि वि कोईएकही मुख परमात्माकूं तत्वतैं कहिये वास्तव-रूपसैं जानैहैं॥७३॥
जे पुरुप कर्मे वा उपासनारूप नौकाफा आश्रय लैहैं वे मोक्षरूप पारकूं नहीं पावैहैं किंतु स्वर्गादिलोककूं पावैहैं, कर्मे औ उपासनाके मताजुयाथी केवलकर्म औ केवलउपासनाद्वाराही मोक्षकी सिद्दिका वाद करैहैं। परंतु वेदांतशास्त्रके महानसिद्धांतसैं वे वाद केवल-विपरीत हैं॥ वेदांतमतमैं कर्म औ उपासनाकूं मलाविक्षेपवान् चित्तोंकी शुद्धि औ शक्तता करनैहारे गिनिके मात्र तितनै अंशमैं ज्ञानप्राप्तिवैंपे सहायकारी मानैहैं। परंतु तिनसैंविना मोक्ष न होवै अथवा वे मोक्षके साक्षात् साधन हैं ऐसैं माना नहीं है॥ मोक्षका साक्षात्-साधन तो मात्र एकही संभवैहै औ सो ब्रह्म-ज्ञान है॥सर्वत्र ऐसैं नियम है कि विरोधी-पदार्थके नाश करनैकूं तिसका साक्षात्विरोधी पदार्थही समर्प्य होवैहै। जैसैं शीतलता केवल उष्णतासैं दूरी होवैहै। अन्यथा होवै नहीं। तैसैं अंधकार केवल प्रकाशके सद्भावसैं दूरि होवैहै। परंतु तहां तप चोलीदिन किंचित् अवशेष रहैहैं नहीं। कहतहैं? अंधकारका साक्षात्विरोधी मात्र एक प्रकाश है॥ अंधकी प्राप्ति अज्ञानसैं यातैं तिस अज्ञानका विरोधी जो ज्ञान है। केवल तिसतैही यंध नष्ट होनैकूं योग्य है, परंतु कर्मे वा उपासनासैं अंधनिवृत्ति कदाचित् वी होवै नहीं औ संभवै नहीं॥ श्रुतिमैं वी कछा "तमेव विदित्वाडिमृत्युमेति नान्यः पंथा विद्यते डयनाय" ।
अर्थः—तिस प्रत्यक्ष औ अप्रत्यक्ष ज्ञानिके संसाररूप मृत्युकूं उल्ंघन करिके जाताहै, मोक्षके प्रति गमन अर्थ अन्यमार्गे नहीं हैं॥
इसी अर्थकूं वेदांतशास्त्रोंविचैपि अनेकश्लोकमैं विस्तारसैं कथन कियाहै यातैं इस अर्थकी अति समासतिर्य श्रीमच्छंकराचार्यनैत नीचे देतैहैं॥
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५८
॥ श्लोकः ॥
न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया ।
ब्रह्मात्नैकत्वबोधेन मोक्षः सिद्ध्यति नान्यथा ५८
अर्थः—योग, सांख्य, कर्म, औ विद्याकरी
मोक्ष नहीं होवैहै । किन्तु मोक्ष तौ केवल ब्रह्मा-
त्माकी एकताके ज्ञानकरिही सिद्ध होवैहै ॥५८॥
इस प्रमाणरूप श्लोकसैं बी उक्तसिद्धांत
स्थापित है ॥
इसरीतिसैं मुमुक्षुजनोंकूं यह चित्र दर्शन्-
मात्रसैं वेदांतके, महानुसिद्धांतकूं सदा सरण
करावैगै ॥
॥ श्रांतिचित्र ॥
ग्रंथकी पीठिंगत एक चित्र औ जिल्दके पृष्ठ-
भागगत सात चित्र, ऐसैं सर्वमिलिके आठ-
चित्र हैं ये साररूप भासनैहारे जगत्की असार
रूपताके दृष्टांतनिमित्त धरैहैं । तिनका विस्त-
तविवेचन अव करैहैं:-
१ प्रथम चित्र:-ग्रंथकी पीठऊपरि द्वित्रि-
कोणाकारके नीचे प्रथम औ द्वितीयआकृतिके
समान दोचित्र रखैहैं ॥
उभयचित्रोंकी दोनूं सीधी मध्यरेखा यद्यपि
समानपरिमाणकी हैं, तथापि तिनके अथ
भागवैषै धरीहुइँ तिर्येकरैपालु उपाधिके
मलैं श्रांतिद्वारा वामचित्रकी मध्यरेखा दक्षिण-
चित्र मध्यरेखासैं बडी प्रतीत होवैहै ॥
(जिल्दके पृष्ठभागगत सातचित्र:-)
२ द्वितीय चित्र:-ऊपरेके भागमें दो स्थूल
हरितवर्णरेपाओंके मध्यमैं जो चित्र है, ति-
क
ख
प्रथम आकृति.
प्रतीयमान होवैहै । कहिये आदि अंतमैं दोनूंदीर्घरे-
पाका ‘क’ ‘क’ भाग संकोचित तथा मध्यका
‘ख’ भाग विकसित दृट आवताहै । यातैं वे
रेपा वाङ्मनस्ककार प्रतीत होवैहैं । परंतु तैसी
चदृश्ट्रुप प्रत्यक्षप्रमाणसैं सिद्धि करैहैं:-
जैसेñ कोई वागू छोड़ैनकै समयपर वाणकूं
लक्ष्यके साथी सांथताहै । तैसेñ उक्त उपरनीचेकी
दो रेखाओंके आदिके साथी अंतरकूं लक्ष्यकरिके
देखनैैं के दोनूं रेखा नीचेकी चतुर्थेआकृति-
समान सीधीही हैं छट आवेंगी ॥
चतुर्थ आकृति
यातैं ‘क’ ‘क’ भाग संकोचित औ ‘ख’
भाग विकसित छट आवताहै । सो मात्रश्रांति-
करिकेही दृट आवताहै । प्रत्येक दोर्घरेपाके
उपरि तथा नीचे जे अनुमानसैं २८ छोटी टेढ़ी-
रेपा हैं वे उपाधिही इस श्रांतिका कारण है ॥
३ तृतीय चित्र:-‘क’ औ ‘ख’ अक्षरयुक्त
नीचेकी पंचमआकृतिसमान दो चित्र एक दूसरके
क
ख
पंचम आकृति
उपारि धरैहैं । ये उभयचित्र यद्यपि सर्वप्रकारसैं
परिमाणमैं समान हैं । तथापि ‘ख’ चित्र ‘क’
चित्रसैं बडा भासताहै ॥
इस असत्यप्रतीतिकां इतनाही कारण है कि ‘ख’
चित्रकूं शक्तिचतुं बहिर निकसतां दिखाशाहै॥
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८ चतुर्थ चित्र:-उक्तचित्रकी दक्षिणदिशापरंतु वास्तविक तो नीचेकी अष्टमआकृतिकी
विपै 'ख' अक्षरयुक्त स्थूलरेपाके उपरि 'क' अक्षरयुक्त सूक्ष्मरेपा खड़ी करीईहै । तिसमें सूक्ष्मरेपा 'क', स्थूलरेपा 'ख' सैं किंचितलघु है तौ वी दीर्घ भासतीहै ॥
यह आंति स्थूलसूक्ष्मताके संयोगसैं औ सूक्ष्मरेपाकूं खड़ी करी होनेतैं उत्पन्न होवैहै ॥
९ पंचम चित्र:-घरावर मध्यमैं पदचक्रयुक्त एकआकृति है तिसका उपयोग ऐसैं है कि:- ग्रंथहूं सन्मुख दक्षिणहस्तविपै धरिके वामसैं दक्षिणकी तरफ त्वरासैं लघुचक्राकार फेरनैकरि वेँ पदचक्र दक्षिणकी तरफ फिरते हुऐ पड़ेंगे औ तिसी आकृतिके मध्यमैं १२ दंतयुक्त जो रक्तचक्र है, सो 'पदचक्रनसैं विपरीत कहिये वामकी तरफ फिरता देखनैं आवैगा ॥
प्रज्वलितअग्निवाले कार्कैं उष्ण करतेंसैं अलातका चक्र प्रतीत होवैहै । तिसमें तीनवेध यामैं वी वेगही प्रधानकारणभूत है । तैसैं यामैं वी वेगही प्रधान-
कारण है ॥
६ षष्ट चित्र:-'क' 'ख' औ 'ग' रेपावाली नीचेकी पष्टआकृतिसमान चित्रमैं प्रथमदृष्टिसैं
तथापि वेँ सर्वरेपा नीचेकी एकादशमआकृतिकी न्याईं क्रमशः उपर नीचे संकोचित-
पष्ट आकृति.
'क' रेपा 'ख' रेपाके साथि नीचेकी सप्तमआकृतिकी न्याईं संधिके योग्य दिखतीहै ।
नवीं 'ग' रेपाके साथिही संधिकूं ग्रास है ॥ इस भांतिके उत्पन्न होनेमैं मध्यका क्यामविभाग दूजिं रोकनेद्वारा कारणभूत है ॥
७ सप्तम चित्र:-उक्तचित्रके दक्षिणविपै नीचेकी नवमआकृतिसदृशा ससरेपावाला एक
चतुष्कोणचित्र है । वेँ सातही रेपाँ औ तीनोंकै अंतरालमैं प्रतीत रक्तवद्रूप सर्वरक्तरेपा
यद्यपि नीचेकी दशमआकृतिसमान सीधीही हैं ।
दशम आकृति.
एकादशम आकृति.
विकासित हुई भासतीहै ॥ यह निपरीतदर्शन छोटी टेढ़ीरेपाल्प उपाधिके अनुसंधानसैं होवैहै ॥
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८ अष्टस्मचित्रः--सर्वसैं नीचे दो स्थूल हरितवर्णरिपाके मध्यमैं द्वितीयचित्रके सदृश आकृति रहतीहै । तिसकी दोऊँ दीर्घरिपा यद्यपि सीधीही हैं, तथापि नीचेकी द्वादशमाआकृति-
क र व क
द्वादशं आकृति.
सदृश द्वितीयचित्रसैं विपरीतवक्राकार कहिये आंतरिकाकार प्रतीत होवैहै ॥
या भांतिका कारण द्वितीयचित्रकी भांतिके कारण समानही होवेंतै इहां लिख्यते नाहीं ॥
उक्तसर्वेभ्रांतिनिवै मुख्यकारण तौ यह है कि उपाधिके प्रतिबिंबसैं प्रकाशके किरणोंका चक्षुग्रि यथास्थित ग्रहण नहीं होवैहै ॥
प्रकाश औ दर्पणकी आभुनिकविद्या (Optics) के अनेकग्रंथ इंग्रेजीसापमैं हैं । तिससैं तौ ऐसा सिद्ध होवैहै कि चक्षु चावपदार्थोंमैं वाध्यस्थित देखती नहीं है, परंतु पदार्थके मात्र प्रतिबिंबकूं ग्रहण करतीहै । अर्थात पदार्थोंकूं यथास्थित देखना नहीं है, तौ पदार्थके मात्र भांतिकरिही भासतैहै ॥
इसवातोंकूं स्पष्ट करनैनिमित्त एक पाश्चात्यनिद्यावनिकी उक्तिमैंसैं कलकत्ते नीचें धरैहैं:- "पुष्पका रंग, पुष्पीका शब्द औ अनलका खाद, ऐसैं वे गुण पदार्थमैं नहीं हैं वे गुण पदार्थोंमैं मासिके जनसमूह कथन करैहैं । परंतु वे गुण मनोमार अवकाशाधिपै पदार्थोंकी स्थिति जैसैं प्रतीत होवैतैहैं, तैसैं अपने देखते नाहीं है । इस वातोंकूं मानना यद्यपि हृदयसैं तथापि इतना तौ निर्विवाद स्थितिहै, कि परिमाण शनकाश औ अंतर (दूरपनां) इन तीनोंकी कल्पनां वात्यावस्थामैं किरीदेवे मानसिकप्रयास औ शारीरिक प्रयत्नका परिणाम है ॥ जब किसी जन्मपत्री पुरुक औ स्त्रीकूं प्राप्त होतिसै, तव तिसकूं वो 'दृष्टांतरेस पदार्थोंका परस्परांतर ज्ञात होता नाहीं । किंतु समीप होइ दूर सियर्सवंपदार्थ तिसकी चक्षुकूं समीपसमीपतावाले भासतैंहैं ॥"
( लेनार्ड ता० ९९ डिसेम्बर ८८९९ पृ० ९५४८ )
इन सर्वेभ्रांतिचित्रोंका सारार्थः-- सर्वमतशिरोमणि वेदांतसिद्धांतमैं सत्यकी न्याईं मासनेवाले इस जगत्कूं स्वप्नके नगरीकी, रज्जुके सर्पकी औ उपरभूमिविपै द्रयमाण मिथ्याजलकी उपमा देवैंहैं ॥
स्वप्नविपै देखे नगरका औ रज्जुवैपै माने सर्पका तौ अनेक पुरुषोंने अनुभव होवैहै; परंतु मिथ्याजलका अनुभव बहुतजनोंकूं नाहीं है । कहैंतैं? तिस भांतिके कारणपरूप उपरभूमिवेदांतादि ग्रंथमैं यह मिथ्याजलका दृषांत असततप्रायः असत्कल्पक औ समानसंबंधवाला है । कारण कि जैसे उपरभूमिविपै वास्तविक जलका लेश नाहीं है तौ भी जल प्रतीत होवैहै । औ "सो मिथ्याजल है" ऐसा निश्चयज्ञान हुये पीछे वी सो जलकी प्रतीति दूर होती नाहीं । तैसे ब्रह्मरूप अधिष्ठानविपै वास्तविक जगतका लेश नाहीं है तौ भी जगत् प्रतीत होवैहै । औ "यह मिथ्याजगत् है" ऐसा दृढ़निश्चय हुये पीछे वी सो जगतभ्रांति दूर होती नाहीं;
परंतु जैसैं उपरभूमिके जलका मिथ्याज्ञानविपै हुये पीछे सो जल पान करनैकी इच्छा उत्पन्न होती नाहीं, तैसे ब्रह्मरूप अधिष्ठानमैं जो जगत् प्रतीत होताहै, सो "मिथ्या है" ऐसा ज्ञान औ श्रुतिकुपसैं दृढ़निश्यरूप वाध होजयै । तौ इस मिथ्याजगत्विपै अहंता-ममता-दिक दुःखके कारणभूत दृढ़आसक्तियां कचित वी उत्पन्न होवें नाहीं ॥
ये भांतिचित्र वी लघुरूपसैं दीर्घ, सीधी-रेपाकूं वक्र औ स्थिरतावाले चक्रांक गतिमान्, ऐसैं विपरीत दिखावैंहैं । इतनाही नाहीं, परंतु यथार्थवातोंकै ज्ञान हुये पीछे वी सो पूर्वकी न्याईंही विपरीतदर्शन देवैंहैं । यातैं मृक्षलके जलके यथोचित चित्रितदृष्टांतमय हैं । औ तिसद्वारा इस जगद्दृश्यकी असारताकै सारक हैं ॥
उपरिम्रदर्शित किये वर्णनसैं वाचकचूंदकूं निश्चय होवैगा कि श्रीविचारसागरकी यह पंचमभ्रांतिरु उद्धृतोक्तम भईहै औ सो उत्तम मता संपादन करनैवास्ते केवल श्रुतिष्कजननोंका हितही लक्ष्यमैं राखिके दृव्य औ श्रमकी किंचित वी गणना नाहीं करीहै ॥
—प्रकाशक.
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॥ श्रीविचारसागर ॥
पंचमावृत्ति
॥ प्रसंगदर्शकानुक्रमणिका ॥
॥ प्रथमस्तरंग: ॥ १ ॥
॥ अनुबंध सामान्य निरूपण ॥
॥ १ ॥ वस्तुनिदेशरूप मंगल ॥
॥ २-३ ॥ ग्रंथमाहिमा ॥
॥ ४ ॥ अनुबंधनान ॥
॥ ५-२३ ॥ अधिकारीवर्णन ॥
५-१४ विचेक । वैराग । समादिपट्क । सुमुक्षता-१५-१६ अंतरंग वहिरंग साधन-१८ श्रवण । मनन । निदिध्यासन-१९ वेदांतके एकदेशीका मत ॥
॥ २४ ॥ संंयंधवर्णन ॥
॥ २५ ॥ विषयवर्णन ॥
॥ २६-३२ ॥ प्रयोजनवर्णन ॥
२७-३२ प्रयोजनमै संकासमाधान ॥
॥ द्वितीयस्तरंग: ॥१-२ ॥
॥ अनुबंधविशेषणिरूपण ॥
॥ ३३-६० ॥ अनुबंधखंडन ( पूर्वपक्ष )
॥ ३३-३८ अधिकारी खंडन ॥
- ३३-३६ कारणसहित जगतनिरस्थितिरूप मोक्षके प्रथमअंशकी इच्छा वने नहीं-३७ ब्रह्मप्राप्तिरूप मोक्षके द्वितीयअंशकी इच्छा काहटुं वने नहीं-३८ वैराग्यादिक यी वने नहीं ॥
॥ ३९-५४ विषय खंडन ॥
३९-५४ जीव ब्रह्मकी एकता वने नहीं
( ५१-५४ साक्षीका नातापनना )
॥ ५५-५९ प्रयोजनखंडन ॥
५५ मिथ्यावंधकी सामग्री नहीं है-५६-५० अध्यास सामग्री ( ५७-५८ सत्यवस्तुके ज्ञान-जन्य संस्कार नहीं हैं-५९ प्रामाणादिक दोपकी असिद्धि-५० ब्रह्माका 'नित्योपलब्धस्वभावी ज्ञान वने नहीं )-५१ केवल कर्ममेंही मोक्षकी सिद्धि ( एक-भविष्यवाद )-५९ वंधनिवृत्ति ज्ञानद्वारा प्रेयका प्रयोजन नहीं ॥
॥ ६० ॥ संंयंध खंडन ॥
॥ ६१-९२ ॥ अनुयंधन मंडन, ( कर्मतैं उत्तर )
॥ ६०-७१ ॥ अधिकारीमंडन ॥
-६१-६३ मोक्षके प्रथमअंशकी इच्छा वनेहि-६४-६५ मोक्षके द्वितीयअंशकी इच्छा वनेहि-६६-६८ ग्रंथके आरंभकी सफलता- ६९ पारमार्थिक विद्या-७० ग्रंथमै जिहासकी प्रवृत्ति ॥
॥ ७२-७६ ॥ विषयमंडन ॥
॥ ७७-९२ ॥ प्रयोजनमंडन ॥
-७७-८४ कार्याध्यास ( ७८-८३ सत्यवस्तु-ज्ञानके संस्कारका खंडन-८४ प्रामाता औ प्रमाण दोषका खंडन )-८५-८६ कारणाध्यास ( अधिष्ठानके विशेष-रूपसै अध्यासका खंडन )-८७-९२ एकअधिक वादका खंडन ॥
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॥ ९२ ॥ संभंधमंडन ॥
॥ तृतीयस्तरंगः ॥३॥
श्रीगुरुरिष्यलक्षण गुरुभक्तिफल- प्रकारनिरूपण ॥
॥ ९४-९६ ॥ गुरुरिष्यलक्षण ॥ ९४ मंधारंमुकी प्रतिज्ञा-९५ गुरुलक्षण-९६ शिष्य- लक्षण ॥
॥ ९७-१०८ ॥ गुरुभक्तिफलप्रकार ॥ ९७ गुरुभक्तिफल- ९८ ज्ञानीगुरुसैं वैदिकर्थंपटन- श्रवणकी योग्यता- ९९ वसाम्रेथसैं बी ज्ञान होवै ९- १०० जिहासकूं सेवाकी कर्तव्यता- १०१-१०५ आचार्यसेवाप्रकार ( १०२ तनअर्पण- १०३ मन- अ.न- १०४ घनअर्पण- १०५ वाणीअर्पण )- १०६-१०८ शिष्यका गुरुसंवंधमैं ब्यवहार ॥
॥ चतुर्थस्तरंगः ॥ ८ ॥ ॥ उत्तमाधिकारीउपदेशनिरूपण ॥
॥ १०९-१११ ॥ गुरुसंततिराजा औ ताके तीनि पुत्रोंकी गाथा ॥
॥ ११२ ॥ तीनि पुत्रोंका ग्रहसैं निकसना औ गुरुसैं मेटना ॥
॥ ११३ ॥ तत्वबधिकारी प्रश्न करनकूं आज्ञाका मांगना औ गुरुकरि आज्ञाका देना ॥
॥ ११५ ॥ तत्त्वबधिकारी मोक्षरुच्छासूं विनति ॥
॥ ११५ गुरुका उत्तर:- ( मोक्षरुच्छाकी शांतिजन्यतापूर्वेक महावाक्यका उपदेश ) ॥
॥ ११६ ॥ प्रश्न:- "मेरा आत्मा आनंदरूप होवै तौ विपयसंवंधसैं आनंदका आत्मा- विपै भान नहीं इवाचाहिये " ॥
॥ ११७ ॥ उत्तर:- आत्मविमुखकूं अंतमुख- वृत्तिमैं आनंदका भान । विपयमैं आनंद नहीं ॥
॥ ११८ ॥ प्रश्न:- "ज्ञानीकूं विषयकी इच्छा औ ताके संवंधसैं पूर्वरीतिसैं सुखका भान होवैहै अथवा नहीं ?"
॥ ११९ ॥ उत्तर:- द्विविध आत्मचिमुख हैं । विषयानंद स्वरूपानंदसैं न्यारा नहीं ॥
॥ १२० ॥ प्रश्न:- "जन्मादिक दुःख कौनविध है ?"
॥ १२१ ॥ उत्तर:- जन्मादिक दुःख कहूं नहीं ॥
॥ १२२ ॥ प्रश्न:- "दुःख कहूं नहीं तौ प्रत्यक्ष प्रतीत क्यूं होवैहै ?"
॥ १२३ ॥ उत्तर:- आत्माके अज्ञानसैं प्रतीति रज्जुसर्पकै द्रग्रांत ॥
॥ १२४-१३० ॥ प्रश्न:- "रज्जुमैं सर्प कैसें भाससैहै ?"
१२४-१३० प्रश्न अभिप्राय ( १२६ भसततद्ययाति- १२७ भास्मद्ययाति- १२८-१२९ अन्यथाद्रव्याति- १३० अध्याति । उक्त तीनि ख्यातिका खंडन ) ॥
॥ १३१-१४६ ॥ उत्तर:- १३१-१३२ अध्यातिखंडन ॥ १३३-१४६ अनिर्वचनीय ख्याति ॥
१३४ भ्रमस्थलमैं सर्पादिक विपय औ तिनका ज्ञान एकही समय उत्पन्न होवैहैं । सो साक्षीभास्य है- १३५ रज्जुमैं सर्प औ ताका ज्ञान अध्यियाका परिणाम औ चेतनका विवर्तें है- १३६ रज्जु औ अंतःकरणउपहितचेतन अधिष्ठान है । रज्जु नहीं ॥ दोंफा:- रज्जुज्ञानसैं सर्पनिवृत्ति वैनै नहीं- समाधान:- रज्जुज्ञानहै सर्पअधिष्ठानका ज्ञान है- १३७ रज्जुज्ञानतैं सर्पज्ञानकी निवृत्ति वैनै नहीं- १३८ सर्पभात्रवत्तैं सर्पज्ञानकी निवृत्ति वैनै नहीं-
समाधान:- सर्पज्ञानसमय साक्षीका भान होवैहै- १४३ रज्जुज्ञानसमय साक्षीका भान होवैहै- १४४ सर्वत्रिपुटीज्ञानमैं साक्षीका ज्ञान होवैहै- १४५-१४६ सर्प औ ताके ज्ञानका अधिष्ठान साक्षी है ॥
॥ १४७ ॥ प्रश्न:- "उपारमिथ्याजगत्का आधार औ अधिष्ठान कौन है ? "
॥ १४८-१४९ ॥ उत्तर:- १४८ मिथ्याजगत्का आधार औ अधिष्ठान तूं है ॥ १४९ आत्माका सामान्यरूप आधार औ विशेषरूप अधिष्ठान है ॥
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॥ ९५० ॥ प्रश्न:-- "जगतद्रष्टा आत्मासैं मिल्यो कछू चहिये " ॥
॥ ६७१-६८३ ॥ उत्तर:-- ९७९ सत्ताअवस्था-- ९७७.९७८ आभासकी सम्प्रअवस्था-- ९७९ अज्ञान थैं भावरनसहित-- ९८० शांतिस्थ-- ९८१ परोक्ष औँ अपरोक्षज्ञान-- ९८२ शांतिनाश-- ९८३ हंमसखलप ॥
॥ ६८४ ॥ प्रश्न:-- "ग्रह्मसैं मिल्यो आभासकूं मैं ग्रह्म" यह ज्ञान मिल्यो होवैगो (अंक ९७६ गतप्रश्नका गूढअभिप्राय ॥
॥ ६८५ ॥ उत्तर:-- "अहं" शब्दके दोअर्थ । तिनमें कूटस्थका मुख्यसमानाधिकरण्य औँ आभासका वाध्यसमानाधिकरण्य ॥
॥ ६८६ ॥ प्रश्न:-- "अहंवृत्तिचियें कूटस्थ औ आभासका भान क्रमसैं अथवा क्रमविना होवैहै?"
॥ ९८७-२०५ ॥ उत्तर:-- ९८७ पेकही समय साक्षीका औ आभासका भान होवैहै ॥
९८७ शंका:--अज्ञानका आधार औ विषय चेतन है-- ९८९-९९० समाधान--वहिरके पदार्थसिव ग्रंथि सौं आभासकूं नयोवै है । तिसवियँ अज्ञानआवृतपटकां उदाहरन-- ९९१-९९६ प्रमाण प्रमान-- ९९१ प्रकृतप्रमाण-- ९९२ भतुमान-प्रमान-- ९९३ शद्वप्रमाण-- ९९४ उदमानप्रमाण-९९५ अर्थापत्तिप्रमाण-- ९९६ अनुवल्चनचिप्रमाण ) - ९९७ प्रमाण थैं प्रमाताका लक्शन-- ९९८-९९९ स्मृतिज्ञान औ पदप्रमाे विचारपूर्वक करणका लक्शन-- २०० प्रमाता, प्रमाण, प्रमिति थैं प्रमेय चेतन-- २०१ ग्रह्म अखंडवादकी रीतीसैं प्रमाता भी साक्षीसहित विशोपण थीं उपाधिका लक्शन-- २०२ आभासवादकी रीतीसैं जीव औँ सांख्यअदिकका लक्शन-- २०३ आभासवादकी श्रेष्ठता-- २०४ अंत:-- करणमें विविध प्रकार है । यांतँ सोधि प्रमाता है । अन्य नाहीं-- २०५ प्रमाताअदिक चारि चेतनका स्वरूप ॥
॥ २०६-२१० ॥ प्रश्न:-- २०६ "इंद्रियसंवंध-चिन्ना 'अहंदृग्रह' यह ज्ञान प्रस्यक्ष केहसैं बने ?--"
२०७ ग्रह्मकूं मेत्रकी भमिष्यता ( रामकृष्णादिकलके धरीर ग्रह्म नाहीं)-- २०८ ग्रह्मकूं स्वचाछंद्रियकी भवियष्यता-- २०९ ग्रह्मकूं रसना प्राण थीं श्रोत्र-इंद्रियकी भवियष्यता-- २१० ग्रह्मकूं कर्मेहेद्रियकी
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॥ २११-२१२ ॥ उत्तर:- ( शंक २०६-२१० गतप्रश्नका )— २११ “इंद्रियसंवंधविना प्रत्यक्षज्ञान होवै नहीं” यह नियम नहींं ॥ २११ शुक्तिदुःखकी साक्षीभास्यता— २१२ ग्राहकका ज्ञान प्रत्यक्ष संमवैहै ॥ तत्त्वदृष्टिहुँ मेदग्रमका अंत ॥
पंचमस्तरंग: ॥ ५ ॥
॥ श्रीगुरुवेदादिव्यावहारिकप्रतिपादन
॥ २१३—२७६ ॥
॥ मध्यमाधिकारि साधननिरूपण
॥ २७७—३०३ ॥
॥ २१३ ॥ अध्दिका ‘प्रश्न:- “वेदगुरु सत्य होवें वा मिथ्या होवें दोनूं पेतिसैं वेदगुरुतें अद्वैतज्ञान वनै नहीं” ॥
॥ २१४—२३६ ॥ उत्तर- २१४ शंकरमतकी प्रमाणता— २१५ मेदवादकी अप्रमाणता—२१६ मेदवादका-तिरस्कार— २१७— २१८ राजाके मंत्री भंडूकी कया ( २१७ भंडूका तपस्वी होना— २१८ नारिंद— २१९ भंडूके वैराग्यका कवन—२२० राजसैं लेके ब्रह्मापर्यंत सर्वसृष्ट एकांतमें होवैहै—२२१ युक्तिसंगसैं दुःख २२२ युक्तिसंगसैं धनविगार—२२३ युक्तिसंगसैं धर्मविगार- २२४ युक्तिसंगसैं विंदुनाश—२२५ पुत्रसंगसैं दुःख—२२६ धनसंगसैं दुःख- २२७ राजकूं माहरूं प्रेतयुदि, होनी थौ राजाका भागना— २२८ अंक २२७ उक्त दर्शांतकूं सिदांतकूं जोदना ॥ मेदवादकी धिक्कारपूर्वक ख्यायज्यता )—२२९ मिथ्या-दुःखका मिथ्यासैं नाश । एकपक्षकूं हानकी प्रापित । तिसकूं गादरीकारि दुःखका होना और मिथ्याहैवैं मिटना—२३० अंक २२९ उक्त प्रसंगकी टीका—२३१ मस्तकके जल और प्यासमें सताका मेद— २३२ मसस्थळके जल और प्यासमें सताका मेद— २३३—२३५ समसताकी आपसमैं साधकबादकता- २३४ व्यावहारिकसत्ता— २३५ पार-मार्तिकसत्ता )—२३६ वेदगुर थौ संसारडुःखकी व्यावहारिकसत्ता.है ।— यातैं तिसके सदुःखका नाश वनैहै ॥
॥ २३७ ॥ शंका:- “ युक्तिस्वरूपादिकका ब्रह्म-ज्ञानविनाहि साध और संसारडुःखका ब्रह्म-
ज्ञानसैं अंतर वाध । यह मेद कौन हेतुसैं राखौहो ? "
॥ २३८ ॥ समाधान:-जाके ज्ञानसैं जो उपजै तिसका ताके ज्ञानसैं वाध होवैहै ।
॥ २३९ ॥ प्रश्र:-“ग्राहके अज्ञानसैं संसार कौन क्रमतें उपजैहै ?"
॥ २४०—२५७ ॥ उत्तर:- २४० ग्रहप्रसमान विनाक्रमतैं जगतका आासना- २४१ सूत्रकारआष्यककारका मृत्युवचनसैं जगत्-वस्तुति कथनका अभिप्राय—२४२ प्रसंगसैं मायाख-रूपप्रतिपादन— २४३ अज्ञानकी स्वाध्य्यता और स्व-विषयत—२४४ उक्तअर्थसैं वाचस्पतिका मत—२४५ वाचस्पतिके मतकी थसभीचीनता और अज्ञानकी २४६ स्वाध्ययस्वविययपक्षका अंगीकार- २४७ एकज्ञानपक्षमें वंधमोक्षकी व्यवस्ता ॥ सर्वप्रक्रियाकी श्रेष्ठापत्तिंवेक मायाका स्वरुप— २४८ प्रसंगसैं ईश्वरका स्वरुप ॥ द्विविध-कारणका लक्षण- २४९ जगतका उपादान थौ निमित्तकारण ईश्वर है— २५० जीवका स्वरुप— २५१ ईश्वरमें विषमदृष्टि और कू्रता नहीं—२५२ जीवनके भोगनिमित्त ईश्वरकूं जगतके उपजावनेकै इच्छा-
२५३—२५७ सूक्ष्मडष्टिनिरुपण ( २५३ पंचभूत औ तिनके गुणनकी उत्पत्ति- २५४ अंतःकरणकी चारिमेदसहित उत्पत्ति- २५५ प्राणकी पंचमेद-सहित उत्पत्ति- २५६ ज्ञानेंद्रिय औ कर्मेंद्रिय-की उत्पत्ति ) — २५८—२५९ पंचीकरण ( २५८ पंची-करणप्रकार- २५९ स्थूलबांडादिककी उत्पत्ति )— २६०—२७१ स्थावरविवेक अथवा पंचकोशविवेक ( २६० पंचकोश औ तिनकरि आत्माका आच्छादन करना—२६१ विरोचनका सिद्धांत— २६२ इंद्रिय-आत्मवादका मत [ इंद्रियाआत्मा ]—२६३ हिरण्य-गर्भक उपादानका मत [ प्राज्ञात्मा ]— २६४ मरण-पश्चात् आत्मवादका मत [ प्राज्ञात्मा ]— २६५ विज्ञान-वादीबौद्धका मत [ बुद्धिआत्मा ]— २६६ भाट्टका मत [ शुद्धिआत्मा ]— २६७ सांध्यमिक-वौद्धका मत [ आानंदमयकोशआत्मा ]— २६८ प्राभाकर औ नैैयायिकका मत [ आानंदमयकोश-आत्मा ]— २६९ जीवका पंचकोषकी न्याईं ईश्वरके कोशविवेकका प्रकार— २७० पंच-कोशविवेकका प्रयार्— २७१ महान्वाक्यके अर्थकां
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॥ २७२ ॥ प्रश्न:-- आत्मा पुण्यपाप करेंहै । सुखदुःख भोगेहैं । यांतें ताकी बुद्धिसैं एकता वने नहीं ॥
॥ २७३--३७५ ॥ उत्तर:-- २७३ अकर्ताओंभोक्ता औ निलमुज्झभात्राका सद्ा तदारों अमेद । २७४ जीवनसुचका नियम । चेदांत-प्रसणका फल । २७५ हान्नी औ भह्ञाननका निर् ( शक्ततांव औ कत्तव्य ) २७६ गोप्यतरसका उपदेश । २७७--२८ लयाचिन्तन ( २७७ सयँप्रपंचकी इेभररहतता । २७८ सारीसूसुमि्त्रकी अपंचीकरण-भतुरलपता । २७९ सर्वशनात्मपदार्थनका करणयं ग्रादाविपे लयाचितन । २८० ध्यान औ दानाका मेद ॥ ) २८१--३०१ प्रणवकी उपासना ( २८१ प्रणवका अथंग्रहध्यान । २८२ निर्गुण औ सगुणप्रणवकी उपासानाका फलसहित करण । २८३ निर्गुणहुप प्रणवउपासनाके प्रकारका प्रारंभ । २८४ शोंकार औ नादका अमेद । २८" नादि- पादनके कथनपूर्वक आभासका निरासें औ विश्का विराटसैं अमेद । विराटभचेके सासंग औ अनीस । मूल । २८६ चतुरंगश्रिपुटी । २८७ विराडू औ शक्ताका भेदरहित । २८८ श्रीप औ तज्ज- सिकी विलक्षणता । २८९ तेजत हिरण्यगर्भमें औ उकारका अभेदचिन्तन । २९० प्राज्ञ इेभर औ मकारका अमेद ॥ ) प्राथके विवरण । २९१ वास्तव्य-विशभादिक तीनुंकी एकता ॥ तुरीयका इेभरसाक्षिरें अमेद । २९२ दोसहुपवाले ओंकार औ आत्माका मात्र औ पादकरसें अमेदचिन्तन । २९३ लयचिन्तनका अनुसाद ( एकेकमात्रारुप विशभादिककी अन्यमात्रारुपता ) । २९४ ओंकार/चिन्तनमें परमदंसका अधिकार । २९५--२९६ शोकारके ध्यान-वालेेकूं फल । २९७ षड्वलोकके मार्गका कम । २९८ सायुज्यमोक्षका वर्णन । २९९ ओंकारके षडहंमत् पानतं षड्वलोककी प्राप्ति नियम । ३०० उत्तराः- यजनांगेंत प्रद्िालोकसैं नेती सेती असारिका गर्भवारोंकूं असंगलिंकारलरुप आत्माका भान होवेंहै । तामें कारण । ३०१ उ" ओं महावाक्यके अर्थकी एकता । ३०३ निर्गुणउपासनाके धनधिकारीकूं कर्तव्य ) ॥
॥ ३०२ ॥ उपोद्घात ॥
॥ ३०५--३०६ ॥ तर्केष्टिके प्रश्न:-- ३०५ स्वप्र-तग्रांतसैं जागृतपदार्थ मिथ्या संभवै नहीं । ३०६ स्वप्न मिथ्या नहीं ॥
॥ ३०७--३२८ ॥ उत्तर:-- ३०७ जागृतके पदार्थनकी स्वाप्मे स्मृति नहीं । ३०८ स्वप्रमें विलगजरूप वाहिर जायकै जागृतके पदार्थन देसता नहीं । ३०९--३२८ सिद्धांत:-- ( ३०९ साराथिप्रुटी जायतसुषप्रकी तुल्यता ॥ ३१० मांक:--जागृतकी न्यांई उतपतिसाले होंतैं स्वप्रके पदार्थ सत्य हुये- नाहीये । ३११ समाधान:--स्वप्रपदार्थ सामप्रेिवना उपजैं तांतें मिथ्या है । ३१२--३१८ त्रिविधसत्-पदार्थन विलक्षण जायतसुषप्रकी दोसताके मैनतें सविलक्षणता । [ उक्तअर्थ्यनें शोकासमाधान ॥ दो- प्रकारकी निष्टिता ॥ तीनप्रकारकी सत्ता । ] ३१९--३२२ तादृकी कारणता देसाकालमें प्रस्तीत होवेंहैं । इत्यादिस्थलमें भन्यथासिद्धयातिका अंगीकार [ उक्त-अर्थमें सांकारसामधान । ] ३२२ जागृतप्रपंच सामप्रे- चिन्हां होवेंहैं । यांतें स्वप्रसमान मिथ्या है । ३२३--३२४ जागृतके पदाथैं ज्ञानके साथिही उत्पन्न होवेंहैं । यांतें द्वरीयजागृतमें रंदें नहीं [ वेदका गूढ़ सिद्धांत । ] ३२५--३२७ जागृतके पदार्थनका परसरकारणभाव नहीं [ सृष्टिप्रतिपादनमें शुक्तिका अभिप्राय नहीं । ] ३२८ रद्वैतश्रिवादका अंगीकार ) ॥
॥ ३२९ ॥ प्रश्न:--स्वपकी न्याईं स्वपकाल-स्थायी संसार छोइै तो अनादिकालका वंध नहीं छोवैहैं ॥ वेदानृ्तिरुप मोक्षके निमित्त श्रवणादिक साधन निष्फल होवैंगे ॥
॥ अग्रृदेवक स्वप्म ॥ ३३०--४५२ ॥
॥ ३३०--३३८ उत्तर:-- ३३०--३३१ अग्रृदेवकूं स्वप्रकी प्रतीति । ३३२ अग्रृदेवक स्वप्मैं गुरुसैं मिलाप । ३३३--३३८ मिथ्याश्रावार्यकं सिम्थ्याशिष्यकूं सिम्थ्यासं्कतगं्रभहैं उपदेशादि ( ३३५ निर्गुणवस्तुनिदेंशारुपादिमंगल । ३३६--३३८ वेदांतशास्र्कर्तोश्रावार्यनमस्कार [ प्रथृति-निवृ्तिस्थरुप वेदवाक्यमें सूत्रजाल पुष्ट षौं द्वक्षणसैं रुषक ) ] ॥
॥ पष्टसतरंगः ॥ ६ ॥
॥ श्रीगुरुवेदादिसाधनमिथ्यावर्णनम् ॥
दि. सा. ४
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॥ ३३९ ॥ अगृधदेवके प्रश्नः-
१ "मैं कौन हूँ ?"
२ "संसारका कर्ता कौन है ?"
३ "मुक्तिका हेतु ज्ञान है अथवा कर्म है अथवा उपासना है अथवा दो हैं ?"
॥ ३४०--३६९ ॥ १ " मैं कौन हूँ " याका उत्तर:-
३४० भासमा संशातका वासी है. ३४१--३५४ आत्मा सुखदुःखादि धर्मसैं रहित व्यापक एक है सांख्यमतका औ त्रिविध न्यायमतका कथन श्लो खंडन. ३५५ आत्मा सद् है. ३५६--३५९ आत्मा चित् है. ३६०--३६३ आत्मा भानंदरूप है. ३६४-३६५ सबिदानंद परस्पर मिल्न नहीं. ३६६--३६८ ब्रह्मरूप आत्मा अजन्मा है. ३६९ आत्मा असंग है ॥
॥ ३७०--३७४ ॥ " संसारका कर्ता कौन है ?" याका उत्तर:-
३७० जगतका कर्ता ईश्वर है. ३७१--३७२ ईश्वर सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान औ स्वंतत्र है. ३७३ ईश्वर व्यापक लिंग निख है. ३७४ ईश्वर औ जीवका सरूपसैं भेद नहीं ॥
॥ ३७५-४०६ ॥ ३ "मुक्तिका हेतु कौन ?" थाका उत्तर:-
३७५ मुक्तिका हेतु ज्ञान है. ३७६--३७९ कर्म औ उपासना मुक्तिके हेतु नहीं. ३८०--३८३ आक्षेप- कर्म औ उपासना ज्ञानके औ मोक्षके हेतु हैं. ३८४--३८६ कर्मउपासना सैं ज्ञानका विरोध है. ३८७--३९० ज्ञानमै कर्मउपासनाकी अपेक्षा नहीं. ३९१ कर्मउपासनातैं ज्ञानकी रक्षा होवै नहीं. ३९२--३९३ ज्ञानकूं पाप औ पुण्य संचलताफे अभावतैं कर्म औ उपासनाको उपयोग नहीं. ३९४ शोकिमक प्राप्तिकी चिलक्षणता कौ तिमकी जीवन्मुक्ति है. ३९५--३९६ हठ- अर्हतज्ञानि औ उत्समंदर्जिह्नाश्रित कर्मउपासनामैं अधि- कार .नहीं. ३९७--३९९ दृढबोधकै कर्मउपास- सना विरोधी नहीं ! परंतु मंदबोधके विरोधी हैं. ४०० उत्त्कर्ष सर्वचेदका सार है. ४०१- ४०३ उत्त्कर्षयका संग्रह. ४०४-- ४०६ धन्यप्रकारसैं मोक्षका साधन ज्ञान है । यह कथन ॥
॥ ४०७-४०९ ॥ लक्षणा तीनिप्रकारकी हैं ॥
॥ ४१०--४२७ ॥ शक्तिनिरूपण ॥
४१० न्यायरीतिसैं शक्तिविलक्षण. ४११ अथ स्वरोति- शक्तिलक्षण. ४१२ प्रश्नः--वर्णेसमुदायसैं जूदी शक्ती नाहीं । यातैं ईश्वरद्वच्छा शक्ति है. ४१३--४२७ गत- प्रश्नका उत्तर ( ४१३--४१८ सिद्धांतरीतिसैं अभि- प्रायिकमै दाहरिकायकी सामर्थ्यरूप शक्तिका प्रतिपादन ४१९ अन्यमतकी सांप्रत शक्तिनिरूपण [ ४१६ वैयाकरणरीतिशफिलक्षण. ४१७--४१८ वैयाकरणरीतिकी शक्तिका खंडन ] ४१९--४२१ भट्ट- रीतिसैं शक्तिलक्षण. ४२२--४२७ भट्टमतकी शक्तिका खंडन ] )
॥ ४२८ ॥ शाक्यकाका लक्षण ॥.
॥ ४२९ ॥ लक्षणअर्थे औ लक्षणाका सामानय- रूप ॥
॥ ४३०--४३२ ॥ जहति अजहति औ भाग- स्थगलक्षणाका लक्षण ॥
॥ ४३३--४४९ ॥ महावाक्यनमें लक्षणा ॥
४३३ "तत्" पदका वाच्यअर्थ. ४३४ "त्वं" पद- वाच्यनिरूपण. ४३५ वाच्यअभयेस एकताका विरोध औ लक्षणाकी कर्तव्यता. ४३६ महावाक्यमै जहतिका असंभव. ४३७ महावाक्यमै अजहतिका असंभव. ४३८ महावाक्यमै भागस्यागका अंगीकार. तथा विवरणकारादिक मत ( आभास प्रतिषिंब औ सच्चिदानंदवाद. ) ४४९ उक्तर्षयसंग्रह. ४४५ प्रश्नः--दोउंपदनमें लक्षणा मानना निष्फल है. ४४६--४४७ गतप्रश्नका उत्तर. ( ४४६--दोउंपदनमें लक्षणा सफल है.४४७ ईश्वाराचकपदनै लक्षणा है । याका उत्तर. ४४८ जीवाचकपदनै लक्षणा है । याका उत्तर. ४४९ दोउंपदनमै लक्षणा. औ श्रोत- प्रोतभाव. )
॥ ४५० ॥ जैसें ३४३ उक्त ग्रंथकी समाप्ति ॥
॥ ४५१ ॥ प्रश्नः--अथेसहित ग्रंथ पढ़ा तौ वो मन दुःखका मूल भास्ताहै ॥
॥ ४५२ ॥ वनका नाशक हेतु यही (उक्त ) है ॥
॥ ४५३ ॥ मिथ्यागुरुदेवतैं अज्ञानजन्य मिथ्या- जगतका परिहार होवैहै ॥
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॥ ससमसततंगः ॥७॥
॥ जीवन्मुक्तिविदेहमुक्तिवर्णनम् ॥
॥ ४५३ ॥ ज्ञानीके व्यवहार्मे नियम नहींं ॥
॥ ४५५-४७३ ॥ आक्षेप:-ज्ञानीके व्यवहार्मे नियम हैं ॥
४५५-४५८ ज्ञानीहूं समाधि औ धारीरनिवृत्तौ अधिकधप्रस्तुतिके नियमका आक्षेप:-४५९-४७३ समाधिके अथंग-प्रकार ( ४५९-४६५ समाधिके अथंग-प्रकार ४६६ शुचिसें निर्विकल्पसमाधिके नेद. ४६७ निर्विकल्पसमाधि दोप्रकारकी. ४६८ अद्धेतावस्सान. ४६९ रूप समाधिसें शुचिसिका नेद. ४६९-४७२ निर्विकल्पसमाधिके लय विकल्प क्लपाय जो रसास्वाद ये चारी विग्र. ४७३ ज्ञानवानकी मायाप्रस्तुतिके हसंधवके झाशेषकी समासि ) ॥
॥ ४७५-४७८ ॥ समाधान:-ऐंक गत आक्षेपका समाधान ॥
४७८-ज्ञानी निरंकुस हैं. प्रारुपमें व्यवहार्दृष्टि. ४७५ ज्ञानीके विदेहमोक्षलाग चो परलोककी इंच्छा जोवें नहींं. ४७६ ज्ञानीकी मंदागारुध्दसें जीवन्मुक्तिहुसककी विरोधि प्रस्तुति. ४७७-४७८ ज्ञानीके व्यवहारका अनियम ॥
॥ ४७९-४८० ॥ तत्वदृष्टिका देशादिअपेक्षा-रहित देखपात ॥
॥ ४८१ ॥ अदृष्टिका देशादिअपेक्षासदित देखपात ॥
॥ ४८२-४९८ ॥ तर्कदृष्टिका निश्र्चय ॥ विद्याके अष्टादशप्रस्थान ॥
४८२ सर्वपंथालकूं मदामानकी हेतुतता. ४८३ विधाके अष्टादशप्रस्थान ४८४ चारविदेकका घेष्टानें आगमालोकप्रस्थान ४८५ चारिवेदके पद्यंगनलका अर्थेसहित ज्ञानमें तालपये. ४८६ चारिवेदनके पद्यंगनलका अर्थेसहित प्रमानमें तालपये. ४८७ अष्टादशपुराण तथा उपपुरानका अर्थे. ४८८ न्याय औ वैशेषिकसूत्रका फल-४८९ धर्म-मीमांसा औ ब्रह्ममीमांसा मेदतें दोमीमांसा
श्री संकपंणकांका फल. ४९० स्मृतिथादिक्रमथनके कत्तां औ प्रयोजन. ४९१ सांध्यसालाफा फल. ४९२ योगथारकका फल औ शारीरकफिसें भविरोध. ४९३ पांचरात्न औ पाझुपततंत्रभादिकका फल. ४९४ श्रवयंधादिकनका फल औ वादमागें. ४९५ नास्तिकमत. ४९६ साहिस्थादिकफे तालपर्य-पूरेंक सकंडष्टिका सारप्राहीनिदर्शय. ४९७ सकंडष्टिका एकविद्यांनरूं मिलाप. ४९८ ज्ञानीहूं इंच्छाका संशय औ इच्टाचे झभावका अभिप्राय ॥
॥ ४९२-५०८ ॥ शुमसंततिराजाका प्रसंग ॥
५०० शुमसंततिके पंडितोंसें प्रश्र:-“ऐसा कौन देव हैं, जो तोयें नहींं, किंतु जागतहै ? ” ५०१ विथ्युपासकका उत्तर. ५०२ शिसेवकका उत्तर. ५०३ गणेशपुजकका उत्तर. ५०४ देवीभक्त-का उत्तर. ५०५ सूरयभक्तका उत्तर. ५०६ उक्ममतके अनुयादपुर्वेक सातेंमत- ५०७ पंडाशनकी पर-स्परविरुद्धता. ५०८ तर्कदृष्टिका पितासें मिलाप ॥
॥ ५०९-५२४ ॥ तर्कदृष्टिका पिताम्रति उपदेश ॥
५०९ कारणहिकी उपासता औ कार्यहुपको निकलता. ५१० पुराणडफस्तुति औ निंदाके करनैमें व्यासका अभिप्राय. ५११ पांचदेवनके उपासनकूं सम ( प्रदालोक ) फलप्राप्ति. ५१२ एकपरमात्मामें नानानागरुप संभवैदें. ५१३-५१४ सार्दे पुराणका कारण औ कार्यें ग्रंथाके उपासनाकी कमतें उपादेयता औ देततातें तालप्यें. ५१५-५१६ मूर्तिप्रतिपादनका अमिप्राय. ५१७ आकारमें आभ्रद्वालें शैव-दिककूं वेदकी प्रामाणता. ५१८-५२० उतरमीमांसाकी प्रामानता औरतकी अग्रमानता. ५२१-५२२ अन्य शालवनकी खाज्यतामें हठांत औ हेठ. ५२३-५२४ राजाका मृत्यु औ ब्रह्मालोककी प्राप्ति ॥
॥ ५२५ ॥ तर्कदृष्टिका देखपात औ परमात्मासैं अभेद ॥
॥ ५२६ ॥ इस भाष्यग्रंधके रचनेका प्रयोजन ॥
॥ ५२७ ॥ मंगलाचरणपुर्वेक ग्रंधकी समासि ॥
॥ इति श्रीविचारसागरकी प्रसंगदर्शीक अनुक्रमणिका ॥
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मंगलाचरणम्
[ अनुष्टुप् छंदः ]
चैतन्यं शाश्वतं शांतं व्योमातीतं निरंजनम् । नादबिंदुकलातीतं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १
सर्वश्रुतिशिरोरलंविराजितपदांबुजसम् । वेदांतांबुजमार्तंडदस्तसमं श्रीगुरवे नमः ॥ २
अज्ञानतिमिरांधस्य ज्ञानांजनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ३
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्वीष्णुर्गुरुदेवो महेश्वरः । गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ४
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरोः पदम् । मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥ ५
अखण्डमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ६
न गुरोरधिकं तत्वं न गुरोरधिकं परम् । गुरोः परतरं नास्ति तस्मात् संपूज्यते गुरुः ॥ ७
अखण्डानन्दबोधाय शुष्यसंतानपहारिणे । सच्चिदानन्दरूपाय रामाय गुरवे नमः ॥ ८
अज्ञानमलहरणं ज्ञानमार्गनिवारणम् । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं गुरुपादोदकं पिबेत् ॥ ९
[ मंदाक्रांता छंदः ]
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् । एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधी साक्षिभूतं, भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥ १०
॥ इति गुरुस्वस्ति: ॥
ॐ
॥ श्रीवृत्तिरत्नावली ॥
अर्थात्
श्रीवृत्तिप्रभाकरसार ।
॥ प्रसंगदर्शकानुक्रमणिका ॥
॥ प्रथमरत्न ॥ ९ ॥
सकारणसमेत वृत्तिस्वरूपनिरूपण ॥ १—२८ ॥
१ वृत्तिके सामान्यलक्षणका निर्णय ... ... ... ... ... ९-९
२ वृत्तिके भेदका निरूपण ... ... ... ... ... ... ९०-९५
३ प्रमा ओं छप्रमा की संज्ञा सह कारण ... ... ... ... ९६-९७
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॥ ९ ॥ प्रत्यक्षप्रमाणनिरूपण ॥ २५–१०८ ॥
४ पदप्रमाोंके नाम लक्षण औ मतभेदों स्वीकार ... ... ... ... ... २५-३०
५ प्रत्यक्षप्रमाण घो प्रमाणों स्वरूपका निर्णय ... ... ... ... ... २८-३४
६ शांकासमाधानपूर्वक प्रत्यक्षप्रमाणका निरूपण ... ... ... ... ... ३६-४३
७ आँतरप्रत्यक्षप्रमाणके भेदका निर्देश ... ... ... ... ... ४८-५९
८ बाह्यप्रत्यक्षप्रमाणके भेदके कथनपूर्वक श्रौतमप्रमा का निर्देश ... ... ... ... ६३-७९
९ बाह्यप्रत्यक्षप्रमाणके भेद १ सादृश्य प्रमाणका निर्देश ... ... ... ... ७२-७८
१० बाह्यप्रत्यक्षप्रमाणके भेद २ चाक्षुपप्रमाणका निर्देश ... ... ... ... ७९-८९
११ बाह्यप्रत्यक्षप्रमाणके भेद ३ रासणप्रमाणका निर्देश ... ... ... ... ८३-८४
१२ बाह्यप्रत्यक्षप्रमाणके भेद ४ घाणजप्रमाणका निर्देश घो सांगर्योके अनुवादसहित... ... ८५-८८
प्रत्यक्ष प्रमाणा उपसंहार ... ... ... ... ... ८८-८८
॥ द्वितीयरत्न ॥ २ ॥
॥ २ ॥ अनुमानप्रमाणनिरूपण ॥ ८९–१०८ ॥
१३ सामप्रीसहित अतुमितिप्रमाणका निर्देश ... ... ... ... ... ८९-९५
१४ वेदांतसिंप उपगोगी अनुमानका निर्देश ... ... ... ... ... ९५-१०९
१५ न्याय ग्रंथों वेदांतके तात्पर्य अनुमानके स्वीकारका निर्णय ... ... ... ... १०२-१०८
॥ चतुर्थे्ररत्न ॥ ४ ॥
॥ ३ ॥ उपमानप्रमाणनिरूपण ॥ १०५–११८ ॥
१६ व्याप्तादारचयी उपगोगी उपमिति घौं उपमानका सारसंसहित स्वरूप ... ... ... १०५-१०७
१७ जिज्ञासुके अनुग्र हेतु उपमानका स्वरूप ... ... ... ... ... १०८-११८
॥ पंचमरत्न ॥ ५ ॥
॥ ४ ॥ शाब्दप्रमाणनिरूपण ॥ ११५–१३९ ॥
१८ शाब्दीप्रमाणके भेद ... ... ... ... ... ... ... ११५-११८
१९ शाब्दकी दृष्टिके भेद १ श्रुत्युक्तिका मिलष्पण ... ... ... ... ... ११९-१२८
२० शाब्दकी दृष्टिके भेद २ लिंगनुमितिका निरूपण ... ... ... ... ... १२८-१३५
२१ शाब्दबोधके आकारसादिक वारी सहकारिका निरूपण ... ... ... ... ... १३८-१३९
॥ षष्टतरत्न ॥ ६ ॥
॥ ५ ॥ अर्थापत्तिप्रमाणनिरूपण ॥ १५२–१६२ ॥
२२ अर्थापत्तिप्रमाण औ प्रमाणके स्वरूपका निर्देश ... ... ... ... ... १५२-१५७
२३ अर्थापत्तिप्रमाणके भेद ... ... ... ... ... ... ... १५८-१५९
२४ अर्थापत्तिप्रमाणका जिज्ञासुकूं उपयोग ... ... ... ... ... ... १५८-१६२
॥ सप्तमरत्न ॥ ७ ॥
॥ ६ ॥ अनुपलब्धिप्रमाणनिरूपणम् ॥ १६२–१८१ ॥
२५ न्यायशास्त्रकी रीतिसं भभावके स्वरूपका निर्देश ... ... ... ... ... १६३-१६५
२६ उक्तशास्त्रोंके स्वरूपमें वेदांतसं विरुद्ध औशंका प्रदर्शान ... ... ... ... १७०-१७८
२७ सामग्रीसहित अभावप्रमाण औ ताके जिज्ञासुकूं उपयोगके कथनपूर्वक प्रमाणृृिका उपसंहार ... ... ... ... ... १७९-१६९
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३० . ॥ पंचमावृत्तिकी प्रसंगदर्शेकअनुक्रमणिका ॥ [ विचारसागर, ]
॥ अष्टमरत्न ॥ ८ ॥
॥ १ ॥ अप्रमाआरूत्तिके मेद । अनिर्वचनीयअध्यायातिनिरूपण ॥ १८२-२२२ ॥
२८ यथार्थअप्रमाके मेदका कथन ... ... ... ... ... १८२-१८६
२९ अयथार्थअर्थअप्रमाके मेद । संदेह और भ्रमका निर्देश ... ... ... ... १८७-१९७
३० अयथार्थअर्थअप्रमाके मेदनिरूपणपूर्वक अमज्ञानका निर्देश ... ... ... ... १९८-२०७
३१ प्रसंगप्राप्त बंकासमासादिक अर्थका कथन ... ... ... ... २०८-२१८
३२ सिद्धांतमें स्वीकृत भनिवचनीयअख्यातिका निर्देश ... ... ... ... २१९-२२२
॥ नवमरत्न ॥ ९ ॥
॥ २ ॥ अप्रमाआरूत्तिकेमेद । सतख्यातियातिप्रदर्शनपूर्वेक खंडन ॥ २२३-२३० ॥
३३ सिद्धांतसै भित्र शकलयातिनिके नामसहित सतख्यातियातिवादके कथनपूर्वेक ताके निराकरणकी योग्यता ... ... ... ... ... २२३-२३४
३४ सतख्यातियातिवादका खंडन ... ... ... ... ... ... २२५-२३०
॥ दसमरत्न ॥ १० ॥
॥ ३ ॥ अप्रमाआरूत्तिसेमेद । असतख्यातियातिप्रदर्शन खंडन ॥ २३१-२३४ ॥
३५ द्विविधअसतख्यातियातिवादके कथनपूर्वेक असतख्यातियातिवादके प्रति प्रक्ष ... ... २३१-२३२
३६ असतख्यातियातिवादका खंडन ... ... ... ... ... ... २३३-२३४
॥ एकादसमरत्न ॥ ११ ॥
॥ ४ ॥ अप्रमाआरूत्तिसेमेद । आत्मख्यातियातिप्रदर्शनपूर्वेकखंडन ॥ २३५-२४० ॥
३७ आत्मख्यातियातिवादका खंडनपूर्वेक खंडन ... ... ... ... २३५-२३६
३८ भतिवैचनीयरख्यातिकी रीतिपूर्वेक भदेतवादीकूं अनिर्वचनीयपदार्थकी प्रतिद्रि ... ... ... ... ... २३९-२४०
॥ द्वादसमरत्न ॥ १२ ॥
॥ ५ ॥ अप्रमाआरूत्तिचेमेद । अन्यथाख्यातियातिप्रदर्शनोत्तरपूर्वेक खंडन ॥ २४१-२४८ ॥
३९ अन्यथाख्यातियातिवादका कथनपूर्वेक खंडन ... ... ... ... ... २४१-२४२
॥ त्रयोदसमरत्न ॥ १३ ॥
॥ ६ ॥ अप्रमाआरूत्तिसेमेद । अख्यातिप्रदर्शनोत्तरपूर्वेक खंडन ॥ २४३-२४८ ॥
४० भद्यतिवादका भदुकादपूर्वेक खंडन ... ... ... ... २४३-२४४
४१ तकग्रंथके निरूपणपूर्वेक ख्यातिनिरूपण श्री खंडनके उपरिहार सहित चतुर्दशहानोकी कथन ... ... ... ... ... २४५-२४८
॥ चतुर्दसमरत्न ॥ १४ ॥
॥ ७ ॥ वृत्तिफलनिरूपण ॥ २४९-२५७ ॥
४२ अवस्थाका निरूपण ... ... ... ... ... ... २४९-२५४
४३ वृत्तिके प्रयोजनका कथन ... ... ... ... ... ... २५५-२५७
॥ इति श्रीवृत्तिरनवाळखिकी प्रसंगदर्शेकअनुक्रमणिका ॥
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॥ विचारसागर सटीप्पण ॥
तथा
॥ वृत्तिरत्नावालि ॥
॥ पंचमावृत्तिकी आकारादिअनुक्रमाणिका ॥
घृः— श्रीवृत्तिरत्नावालिके अंकनकूं म्रचन करेहें ।
टि:— श्रीविचारसागरके टिप्पणांकनकूं म्रचन करेहें ।
अन्यसर्वांक श्रीविचारसागरके अंकनकूं म्रचन करेहें ।
अ अंकार
अंद
दो शांतिमं ३५७
द्वितीय मोक्षकथा ६८
पांच पदारथनमें ३६८
प्रथम मोक्षकथा ६३
अकर्तापणा प्रगीक्षा ३३३ टि
अकार
का लष्षण ३०२
का निषेध ३०१ । ३०२
अकृतोपासन ५१—५६ टि
अकर्ताति १३०
मतसंधन १३१ । १३२
वादसंधन २५३ । २५४
अरंभमप्राणागम '४६३
अभि
फी भाहुतीरूप उपासना ४२३
रूप उपासना ४२३
लघुधेव
का गुडअर्थ ३५९ टि
का स्वरुप ३३०—४५२
फे स्वरुपी समासि ४५२
गंक ३३७
अंग
भट समाधिके ४५९—४६५
येदके ४८६
पद चारिवेदके ४८६
अंकार
शरसंय भांगा ९८ च
हत्प्रतिपादशं ३२८
अचल ४०८
भजनम ३६८
भांगा ३५६
भजतनिरूपण ४३७
के रमतें ७५८ टि
अजातनाद ३५६ टि
कलिय अभिकारी संडन ३४
मानयोगम ५८
पुरा ७८०
मंडन ६१—७१
अभिकृत ४
अभिप्राय २८६ । २९९ । ६३ टि
दुःख ३४
अभिभूत २८६ । २९० । ६३ टि
दुःख ३४ । ६३ टि
अभिग्यान ७४९ । ७०३ च
शुभमारंडन ७०३ टि
अनुभासिद्धा सिद्धांत ३५०
अतीतसोद ९५
भरंतनिवृत्ति ६२ । ७४८ । १७४
आनार्य ५४
भरंताभास ९८९ च
अध्यस्त ३५८
का अंगीकार ७८८ च
अद्वैतनिरुपमा अभिध्या ९८ च
अरत ९९ । ८८
अरतपल ३८७
अध्यास ७५ । ८११३७५१२९१ च
का हेतु १००
७५ टि ३८५ टि
अद्वैतभावनाहरूप निविकल्पसमाधि ४६७
कारणनिरूपण ८५ । १९२
अद्वैतात्पादका मुल्लासिद्धांत १३८ च
कार्यनिरूपण ७७—८४
अद्वैतावस्थानहरूप निविकल्पसमाधि ४६७
मी साममी ४५
अद्वैतावस्थारूप समाधि ओ उपसिका
दोपप्रतिपादन ११८ टि
मेद ४६८
सामग्रीनिरूपण ४६
अरंभपमें ७९
अभिकार मनुष्यमात्रकूं ९९ टि
अधिकारी ३३७१
निउग्रति निलसिद्ध ७४९ टि
कनिष्ठ ३०८
निउग्रसिवै दोपक ५९ टि
अनंत ९८५ टि
अनर्ध ३६
Page 35
भनवस्थादोष ३७३
भनास्म ३०८
„ गोचर भययार्थस्युति १८८ वृ
„ गोचर आांतरप्रलक्ष्यप्रमा९ वृ
„ स्मृति यथार्थे १८३ वृ
भनादि २४२
„ भनंत ११२ टि
„ प्रवाहरूपतें ८२
.. छट्पदार्थे १७३ वृ
„ घटसृष्टि ८२
„ सात ११२ टि
„ सातता धन्योन्म्याशावकी १७३ वृ
„ सातिता प्रमाणकी ११३ टि
„ सरूपपें ८२ ११२ टि
भतिक्ष ३७१ ३६८
भनियमनव्यवहार ज्ञानकीका ५०६ टि
भनिवृत्तीनं १३३ १ २४२ १ २०७ वृ
„ ख्याति १३३ १ १८६ १ २०९
„ ख्यातिका निर्ंधार २२०—२२२
„ ख्यातिमिरुपण १८२—१८६वृ
„ तादात्म्यसंबंध ४५५ टि
„ पदार्थ १६६ टि
„ सेता ३०३वृ
भतुकुल ७०
भतुदात ५५५ टि
भतुबूत ४७१ ८५ वृ
भतुपलबिध १९६ १ ९७ वृ
„ प्रमाण १९६ २६ वृ १ ९६३ वृ
„ प्रमाणनिरुपण १६३ १ ८९ वृ
भतुपलंब १९७ वृ
भतुवंध ८
„ विशेाषका रूपक ६० टि
„ विशेाषनिरुपण ३३—९३
„ सामान्निनिरुपण १—३२
भतुमल ३७ १ ८९ वृ
भतुमान
.. अन्वयि १०३ वृ
„ अन्वयव्यातिरेकि १०३ वृ
„ प्रमाण ११२ २६ वृ ८५ वृ
„ प्रमाणरूप युक्तियां ३० टि
भतुमिति ८५ वृ
भतुविद्ध ४६५
अंतःकरण
„ की पांचभुमिका ४७१
„ के परिनाम ४९८
„ मैं द्विविधस्पकाश २०४
„ निपै तीनदोय ५
अनंतःप्रज्ञ २९०
अंतरंगा ९६
„ आाठसाधन ९५
„ बहिरंगसाधन ९५—९६
„ साधन ९५७०३ १ २३३ टि
अन्त्योमंी १९१
अनघोगोल्युन्याय ५२२
अत्ममयकोष २६० १ २७०
भन्यत्तम २२३ वृ
अन्यथा १२८ १ १२९
„ ख्याति १२८ १ १२९ १ ३९८
„ ख्यातिमंडन २४१—२४२ वृ
अन्यप्रयोगसंवंधका कथम ५३ टि
भन्यमतसकिफखंडन ४९५
भन्योन्म्याध्यास २०५ वृ
भन्योन्म्याशाव १९५ वृ
„ की अनादिसांतता १७३ वृ
अन्योंन्यास्यथादोप ३७३
अन्वय ४७२ टि
भन्वधि
„ भनुमान १०३ वृ
„ ब्यतिरेकि भनुमान १०३ वृ
अपकर्ष ३६८
अपमान ३२३
अपरोक्ष २१०
„ का लकषण ४९ वृ
„ दोप्रकारका ४६९ टि
„ ज्ञान २० १ ८९१ ९८० १ २३२टि
अपान २५५
अपरिवार ८०३
अपूपे ७९ १ ९५७ वृ
अपूप्यता १८६ वृ १ २९ टि
अपपयवीचिक्त ५०४ टि
भप्रमा ११
भप्रमााणता मेवाबादकी २९५
अभानात्पादक्यक्ति १७९
अभान १६३ वृ
„ प्रमा १९७ वृ
अभिप्राय वेदप्रवृत्तिद्वाकका ५१२ टि
अभिमानी भज्ञानका १८८
अभिहितालुपपत्तिप्रकृत्यार्थपत्ति १९७ टि
भंवेदकी साधकयुकियां ३० टि
भमोक्तापना ज्ञानकीका ३१३ टि
भम्यास १८५ वृ
भमाग २९२
भमुष्क ८८५
भयं ८४३
„ भास्मा ब्रह्मा ४६८ टि
भयथार्थ
„ भ्रममा १२ वृ
„ भ्रममाके मेव १८७—१९७ वृ
„ स्मृति १८८ वृ
„ स्मृति भनास्मगोचर १८८ वृ
„ स्मृति आातमगोचर १८८ वृ
भयोग्य ६३ वृ
अविभागं ४५८ टि
अर्थ
„ उँ अक्षरका ४२०
„ प्रमाणचौदका ३७ टि
„ वाद १८७ वृ २९ टि
अपत्यध्यास २१७ वृ २ २५
अयोपत्ति १९३ वृ
„ प्रमा १९३ वृ
„ प्रमाण १९५ १ २६ वृ १ ९२ वृ
अर्पेन
„ धनका दूसररे प्रकारका १०४
„ प्रकार तनका ९०३
„ प्रकार धनका ९०४
„ प्रकार सतका ९०३
„ वाणीक ९०५
अवच्छेदक २०३
अवच्छेदवाद ८५ १ ८४२
„ का मत २०१
भवधिपरम उपासानकी ५०४
अभवास २०१ वृ
अवचयन
„ तीन ३३ वृ
„ शाकि १३९ वृ
अवस्था ४७१ १ २४९—२५५ वृ
„ भज्ञान २८५ टि
„ त्रय निरुपण २४९—२५५ वृ
„ सत आाभासकी १७७—१७८
अवांतर
„ प्रयोजन २६
„ चाक्य २० १ ८४ वृ १ ९१८ वृ
Page 36
सविकल्प १९३ । २४०१२४९ । ९६ टि
अज्ञान भासता २८९, टि
का अज्ञानमहिमा २९८ न
का अभिमानी ९८८
का परिनाम ३२८
का अधिरोधिपना १२७ टि
कारणहप ६६ टि
का आधार्य ७८८ । २९२ टि
कार्यस्प ६६ टि
का विरोधि ८५
सविकल्पाभासहप सेपंर ८९ न
का विपय ९८८
अधिरोध ज्ञाननिवर्हकारका १३२ टि
ती साक्षि १७०.
अधिरोधिपना ज्ञाननका १२७ न
ती पाछि सोप्रकारकी ११७.
कोभितेक ३२८
की वृत्तिसंकोचवृत्तिता २१२
अन्यवृत्तित १७
निरूपकत्वसमनापत्ति २२ टि
सप्रभासंमानानि युक्ति '४,५' टि
वृत्ति १९०
प्रसादप्रमा ज्ञानासंगोचर ६१ न
सप्रपंचांग समाभिके '४,५'-४८'.
राग ८५ टि
सप्रपंच उपेधरमें ३२३
आ
आशांता १४० न
अषादासपुराण ८५
निरुपाधिकता ७७२
असंशयक्षमा ३५९
पदका लक्य ४८३
असक्त २४८ । १८५ । ३८४ । १८८ टि
पदका वाच्य ४८३
ह्यालति १२७ । १२४७ न
भुक २९०
ह्यालतियादर्शनन २३७-२३८ न
मय द्वेप २६० । १८६ । २७०
असद्वयता प्रपंचवृत्ति ३४९
रूप भात्मा ३८ न
असद्यापादितदोषफ ११९
असद्विलक्षण २३५ न
रूपता पद्मनकी १८६ टि
असंभावना १८
विपयमें नहिं १३७
पेद्रांतवाक्यमती ८८
सोपाधिक ४७२
असाधारण
अभितीनिद ९५
कारण ११९ । २. ७
हरुपका १११
प्रामाणित ५५
की मेया ११०
आत्म
सेवामकार १०१
आपेक्षिकन्यायापता १९२
असति ४३४
दयाति १२७
आपेक्षिकतत्तव ३२६ टि
दयालतियादर्शनन २३५-२३८ न
छाभास ११७
गोचरअगोचरभेदस्मृति १८८ न
शो प्रतिदिवका नेद ४८१
अस्ति ३६८
की सस्तभवृत्ति १७७-१७८
प्रतिदिव्य आ अवच्छेदवाद ४८१-
अस्तिता ६७ टि
४८२
असत ४८५
में संसारकभाव १८० टि
रूप कर्म ३८
असह १७५ । १८८
याद ८५ । ४३९
अहंकृतार १८५
विनेक २६०-२७१
यादकी सेति २०२
सामान्य ६७ टि
यादकी श्रेष्ठता २०३
अहंमुख ज्ञान २८० । २१९
वादविवाद ४५५ टि
तें मोहप्रपंच ३२३ टि
आत्मा ८५ । १२७ । १३६ । १५२५
प्राणपका ३८१
अभिमानदका वाच्य १८३
भाधिकारीके चारिमेद ८८५
अंजनग ३६६ । ३६८
नारिप्रकारके ८८५
असंग ३६९
आनंदरह ३६०-३६३
बाधितपतित ३५६
'अहंमुख' यह ज्ञान किसकूं होवेक
११७६
चारोप २४६ न
अहंवादृष्ट
चारोपित ६६३ टि
का लक्य १६७
आलयविद्यानभारा ३६५
का वाच्य १६७
आवरण ५ । ६८ । १३८।१७५ । १८९
का संगांप्याय २१७ न
सहपपर्वणन १७९
का सामान्पहप ८५
कामृत्ति ३९६
का खरूप ३५८
वाशारुप राग ४५७ टि
भाक्षान ५ । १८५ । ११७३ । १८९ ।
२४७ । २५० । २७९
के चारिपाद २८५
वि. सा. ५
Page 37
॥ पंचमाध्यायतीकां अकारादिदानुरूपरमणिकां ॥
आशीर्वादरूप मंगल ३३३ आश्रय अज्ञानका १८८१८९२ टि आसक्ति ९५० द्र आसन चौरासी ४६२ द्र
इच्छा २८० इंद्रंगंध सामान्य ३६७ इदंता २२७ द्र इंद्रिय ,, आत्मवादिका खंडन ३०४ टि ,, आत्मवादिका मत २६२ इंद्रियतके विपय ४९ द्र
ईशा ३९९।४३९टि ,, वर्णन १७१ ईश्वर १७१।२४८।३७०।३७१।३७४।४३८।४३९।४६२ टि ,, अध्यात्ममा १९ द्र ,, इच्छादिककी निल्यता २९९ टि ,, का कारणशरीर २६० ,, का यथार्थस्वरूप २९९ ,, का सूक्ष्मशरीर २६० ,, का स्थूलशरीर २६० ,, का खरूप २४८ ,, की इच्छाका निमित्त २९९ टि ,, के तीनशरीर ३०२ टि ,, के पंचकोष ३०२ टि ,, मैं श्रष्टृगुण ३४३ ,, शब्दका स्वभाव १७९ ,, सर्वमत भविद्रद ३३५ टि ,, साक्षी ३६५ ,, सृष्टि २३३।३१६ द्र
उकारका लक्ष्य ३०२ उकारका वाच्य ३०१।३०२ उत्तम ,, अंग ९०९ ,, अधिकारीदृपदेशानिल्पण १०९-२१२ ,, जिज्ञासु ३९५ । ३९६ । ९० टि २८९ टि ,, पामर ९७ टि ,, विषयी ९८ टि
उत्तर ३९८ ,, गणेशापूजकका ५०३ ,, देवीभक्तका ५०४ ,, पूर्तपक्षींकूं कमतैं ९१ ,, मीमांसा ४८९
उत्तर मीमांसाका मत ५०७ ,, मीमांसाकी प्रमाणता ५१८-५२० उत्तरायणमग्गे ३०० उतेजक ४९३ उत्पत्ति जगतकी २८० उदक १६३ उदधि ९७ उदात ५१८ टि उदान २५५ उदासीनक्रिया ८० टि उदाहरण ५६ टि ,, धर्मीध्यासका २९८ द्र ,, वाक्य ९४ द्र उदूत ४७९ । ९५ द्र उसूक्तराग ४९७ टि उपक्रम १९८ द्र। १२९ टि उपक्रमोपसंहार १९८ द्र उपदेश ,, गोपीतत्त्वका २७६ ,, निल्हणि उत्तमाधिकारीकूं १०९-२१२
उपनिषद् ९५ टि उपपत्ति १९८ द्र उपपादक १९५३ द्र उपपाथ १७२ द्र उपपुराण ४८७ उपमान ४०३ । १०५ द्र। १०९ द्र ,, प्रमाण १९४ । १२६ द्र । १०५ द्र ,, प्रमाणरूप मुक्तियॉं ३० टि उपमिति १०५ द्र । १०९ द्र ,, उपमानका स्वरूप १०५ द्र
उपमेय ४०३ उपयोग २७९ ,, विकाररूप २७९ उपरति ९५ टि उपराम लक्षण १२ । १९५ टि उपलक्षण ५१६ उपलब्धि १९५ द्र उपलंभ १९५ द्र उपवर्ग ४८५ उपसंहार २९ टि उपसंहारक १९८ द्र । उपस्थ २५६ उपहित ७२ । २०९ । ३५३ उपादानकारण २४८ । ३० द्र । ३९ द्र । २९४टि ,, का लक्षण २९४ टि उपोदेस्यता विधिनानंदकी ४०८ टि उपाधि ७२ । २०९ ,, का स्वभाव ३५३ ,, जीवपनकै १७०।१८९ टि ,, तैजसकी २९१
ओम् ॐ अक्षरका अर्थ ४२० ॐ आ महावाक्यिककै यत्का एकताई २०२ ॐकार २८२ । २८४ ,, ॐ ब्रह्मका अभेद २८४ ,, का निर्गुणोपासम २९२ ,, का लक्ष्य २०१ । २०२ ,, का वाच्य ३०२ ,, के दोखरूप २९२ ,, के ध्यानवालेकूं फल २९५-२९६ ,, स्वरूप २८३ ओतप्रोतभाव ,, कर्तव्यता ४७३ टि ,, की रीति ४७९
क कणमुख १९५ टि कथन अन्वयप्रतियोगनिरूपणसंवंधका ४२ टि कथा ,, महँकी २१७ ,, महाभारतमगत २३६ टि ,, सुंदरनिसुंदरदेवतकी २३६ टि ,, शुद्धसंततिके तीनिमुप्त्रनकी १०९-१११
कनिष्ठ ,, अधिकारी ३०४ ,, जिज्ञासु ९०९ टि ,, पामर ९७ टि ,, विषयी ९८ टि
Page 38
करण १९९ । ०१२४३१८२९ ३०८ टि
, का लक्षण २०५ टि
, प्रकारभेद १९९
करणेधिन्याम ३३८ टि
कर्तृ ८१ ३९५
, सभावमें प्रमाण ४३३ टि
, सरुनउपास्नादि ३३८ टि
कर्तृता श्रोतृप्रितभापकी ४३ ८ टि
कर्ता २४३८न
। में करणमें वाजप्रकारका उपयोगादि २३८ टि
, मोक्षता २०९
, पदत्राजनकफे ११४
वर्हिगतोत्र्यभासेवेध २८
कर्म ४२१ ०१२४३६८१३७८३१३"
, शागमें ४३ टि
, भावासलुप ३९८
, इंद्रिय २४ः
, उपायासों सामका विरोध ३८५-
३८५
, काम्य ४३
, फी नित्सितमें हेतु १२३ टि
, तीनप्रकारके ४५४
, नित्य ४३
, निपिद्ध ४३
, नैमित्तिक ४२
, पोनप्रकारके ४३
, प्रायधित ४३
, मिस्रितका फल ७०
, विहित ४३
, विहित नारप्रकारके ४३
कल्पसहव्याद्याम ४३५ टि
कल्पसूत्र ४८६
कर्माय ४७१
, मिथि हटातों ४८८ टि
कार्यकरं ४३
कार्यलुप प्रायधिस ४६
कार्यलुप योग्सिका ४८
कारण ३० ३ २०६ टि
, अभ्यास ११९ टि
, अध्यासनिरुपण ८११२
, असाधारण ११९
, उपायादान २४८
, जगत्का १५६
, निमित्ता ३४८
, मदा ५१७
, महाकी उपासना ५१६
, शांतिनित्यश्रिका ४६४ टि
, में लयलुप नित्यस्ति १४२
, रुप अभिध्या ६६ टि
मारण विपभासांदृका ७० ६ टि
, वीर इंद्रफका ३६०
, वीर जीवफा ३८।
, सामान्य १९९
कारीरियाम ८३ टि
कार्य ३५६८२ ७
, अभ्यास १०९ टि
, भज्ञानिरुपण ७७-८४
, कारणमें नैदान्तमत ४५४ टि
वीत
, मद्धा ३५७ १ ४५
, रुप अभिध्या ६६ टि
कुभक ४६३
फूट १६८
कुतर्स्य १६४ १ १६६ १ १६८
, तण्णन १९६
हतोपासन ४९१ ९६ टि
फल्यादिक : १७०
, केवटलप्रायधित ४९
फेसललक्षणा ३३० ७
, केवटल व्यतिरेकींगसुमान १०३ ७
कोविद ९८ टि
घोता २२५ १ २६० १ २६५
, फनासुमनककी मालस्ता ४५ ८ टि
किरिया ४२१ १ ६८ ७
किरियास्न ६८ ७
महेसापंच ३९
स्त
, भम्यातितमतका १३१-१३३६
, भमिकारील ३८
, भसुआत्माका ४।३ टि
, धननगाल्यादिका २४१-२४२ ७
, धन्यमतकी मालिफा ४१४
, भाफादाकी निस्यताका ३५३ टि
, भारामके मेदका ३५१ टि
, इंद्रिया भारमादिका ४३१ टि
, प्रंध ३४३ टि
, नामाभासा व्यापकफका ४०१ टि
, न्यायफेदेसो शोनिका ३५५ टि
, न्यायपददर्शिफा ४५१ टि
, न्यायमत जडताका ३५८ टि
, न्यायमत द्रानका ३५४ टि
, न्यायमत मननका ३५२ टि
, प्रयोजनका ४५१-४५
, भरमतका ४२२-४२७
, भनकी निस्यताका ३५३ टि
, विरोधनसिदांतका ३०३ टि
, विषयका ३१-४४
रोंडन संयमफका ६०
, सांत्यमतका ३९० टि
दिनरीसुद्रा ३५९ टि
फलादि १३६-१३३ १ १३३ १ १४६
मा
गणेशपुजकका उत्तर ४०३
गंध १९ः
सरदान ४५१ टि
वीत
, जोगिम्राय ढलवारिगम तीनश्लोकनका
फे पंचमक्षयादिकफे ३३३ टि
शामिम्राय ३३३ टि
मूडिज्ज्ञान्याम ३३८१३३९ टि
मुन ४३१६८२ ७
, घट इशरमें ३४३
, नत्रदंश जीयस्य भारमाचिपं ३४३
, पात २५३
पुर्णी ४३१ ६८२ ७
मुसासन ४६२
मूड़ ९७
, गनिफलप्रकारनिरुपण ९७-१०८
, भनिफलसंवण्णन ९७
, भाफिलदिय धुतिप्रमाण १३० टि
, लक्षण
, नेदादिस्स्याद्वारिकप्रतिपादन
२१३-२७६
, नेदादिस्साभनसिध्यार्णन३ ८४-८५३
, दिव्यलक्षण ९४-९६
, सेपाके दोफल १०८
गुहागरें असप्रभदेवका ३५९ टि
गोप्यसत्चका उपदेश्र ३७६
प्रंध
, शारंगकी प्रतिहा ९४
, का विषय २५
, फी समासि ४५०१५३७
, गदिमा २-३
प्रयफकारका शोल्य ३५९ टि
भआहतां फनासुमनककी ४२८
पटाकाला १६० १ १७४ टि
, सगणन १९०
घन २९०
च
चिकिकादोप ३७३
चरुध्स्तरेंगा: १०९-२१२
नत्रदंशानिटुटी ३८६
चतुदंशालोक ३५९
चतुदंशाहवकभन २४५-२४८ नू
Page 39
चतुर्थ १९३ टि
चित्त २५४१३५६१३६४१८०५ टि
आत्मा ३५६
चित्त २५४
की पाँचभूमिका ४७१
संयोगन ४८१
विदामास १७८ टि
की सातअवस्था ४७ टि
चितन लयका २७९—२८०
चितामणिकारका मत १३९१९६१ टि
विन्ह ज्ञानी चौ भज्ञानिका २७५
चेतन
का विसत्तें ३२८४
के चारभेद १५५१९००
वियय २००
चैतन्य
विरोध ८५
सामान्य ८५
चौरासीआसन ४६२
वारी
आकाश १५९
उपवेद ४८५
चेतन १५९
प्रकारके आयुष ४८५
महावाक्य ४८३
महावाक्यमै भाग्यागमप्रदर्शन ४८३
वेद ४८४
वेदका ब्रह्मह्मानमै सातपर्थ ४८४
साधन ६
छत्र ४०८
छाया १९११९७४
जगत्
उत्पत्तिकथनका अभिप्राय २४१
का अभिमाननिमित्तोपादानकारण २९८ टि
का कारण १५६
की उत्पत्ति २४०
जड़ ३५६१३५७
जन्मादिकदुःख कौनविषे है १२०
जन्यजनकमावससंवंध २४१३८ टि
जलकाक १९१
वर्णन १६१
जहहति अजहहति चौ भागस्यागलक्षणाका लक्षण ४३०—४३२
महहतिाभजहहति चेष्टा ४३२
जहतिभासंमसवप्रतिपादन ४३६
जहतिलक्षणा ४३०
के हर्दांत ४५७ टि
जागृतअवस्था २५० वृ
फल २८५
जोप्रत्सप्रकी तुल्यता ३०९—३२८
जांत ४३१६८ वृ। १९४ टि
जायख्यदियक्षमार्ग ५४८ टि
जिज्ञास ७०
उत्तम ३९५१३९६१९०१ टि
कनिष्ठ ९०१ टि
का लक्षण ७०
मध्यम ९०१ टि
मंद ३९६ । ९०१ टि
जीव १६५१९००१९०२१९२५०१३७२ । ३७८१८१९३९१७४२१९१६२ टि
१७८ टि।८१९ टि।८६३ टि
आस्थितप्रमा १५ वृ
ईशकी मानिकता १९६
का औरस्वरुप १९०
का कारणशरीर २६०
का सूक्ष्मशरीर २६०
का स्वरुप २५
त ३७२
निविंघ ३४९ टि
पदका लक्ष्य ७६
पना ३३४
पनैकी उपाधि ८१९ टि
परमार्थक ३४९
प्रातिभासिक ३४९
ब्रह्ममै लक्षणा ४५९ टि
रूप आत्माविषे चतुदेशायुर्गुण ३४३
वर्णन १६६
व्यावहारिक ३४९ टि
साखी १६३१३६५
दृष्टि ३१६
जीवन ९०६
तक ६५५
सुदा १८४४ टि
तकडसिका निष्य ८४२—८४१
पितासैं मिलाप ५०८
तासपर्थ १४२ वृ
चारिवेदका ब्रह्मह्मानमै ४८४ टि
शुलिमाताका ३८९ टि
पटलिंग १४३ वृ
तादात्म्य ४३१८४५५ टि ।
संवंश ४१५ । ८४५५ टि
संवंश अनिवेशनरी '४५५ टि
तिरस्कार मेदवादका २१६
तिथेकु ७०
तीन
अवयव ९३ वृ
दोष ४६
दोष अंतःकरणविपै ५
प्रकारका पामर ९० टि
प्रकारका विषयी ८ टि
शरीर ईश्वरके ३०२ टि
तीनिदुःख ३८
तीमतत्मारुथ ५०५ टि
का फल ५०५ टि
तीनम्रारुथ ५०५ टि
फा फल ५०५ टि
तुम्हें ३६७५७ टि
तत्- पदका वाच्यभथे ४३३
पदार्थगोचरसंदाय १९३ वृ
तत्व ३४२
अतत्ववेत्ताका मेद ४१६ टि
विस्मरण ज्ञानचानकुं १५१ टि
ज्ञान ३४३
''तत्वमसि'' ४६१ टि
का वाच्यअर्थ ४३५
महावाक्यमै लक्षणा ४३३
तनथपंणप्रकार ९०२ ।
तम १५५१४०३
तमोगुण
का खभाव ८१९
प्रधान ३०० टि ।
तरंग
चतुर्थ ९०९—२१२
तृतीय ९४८—९०८
द्वितीय ३३—९३
पंचम २१३—३०३
प्रथम १—३२३
षष्ट ३०४—४५२
सप्तम ४२४—'५२७
अष्टम ५२८—६३७
द्वंद्वोरा वेदका ००१८४७
तत् '' ४२५
पदका लक्ष्य १९११३६५
पदका वाच्य १९११३२८१४७३
Page 40
सागरादि॥ पंचमाध्यायस्य अकांरादिंअनुस्वतमान्तमंडल॥ २७
तुरीयतुंगोऽ ४९० टि
तुरीय २८२१३?
तृतीयाविधा ६५ टि। २८५ टि
तुरीयसतरंगः ९४-९०८
तृमिनिर्कुंडा ९८० टि
तंजस
„ की उपाधि ३२९
„ के वनीस मुरत २८८
„ के सात भेद २८८
लयोन्मत्त समाधिमुखान्ती ४९० टि
„ चतुर्दशा २८६
„ प्राणाख्ये भोगपदी २५०
त्रिविध
„ जीव ३८५ टि
„ प्रतिबंध ९
„ शमथुक ०६ वु
"त्वं" ४८५
„ पदका लक्षणा ९६७ । ३८१ । ३८६
„ पदका वाच्य ६८।२७८।२७३ वु
„ पदवाच्यान्तरारण ४८४ । „ पदांगमोपरसंदराय ९९२ वु
द
दृशि
„ नामापराध ४७८ टि
„ मुख्यउपनिबद ९५ टि
दृशामुख्यकका सद्यांत गंअ लिद्वांत ४५ टि । दृशांत ५६
दुःखत
„ दुःखीस न्यायमतं ३८२
„ का साधन ६३
„ का हेतु ७०
„ तिनि ३८
„ नादविंय ६९ टि
„ पुण्यसंगका २९८ टि
„ युपतिसंगवर्णन ३२९
दुर्जनतोपन्याय ४३८ टि
दृक २७४
दृढ
„ विरागमें गीताभिग्राय ४३७ टि
„ ज्ञान ९५३
दृढ़
„ फल ३८७
„ फलका हेतु ९००
„ फलका हेतु ३८८
दृढमदा ३९८
दृढ़ांत ५६ टि। ९३ वु
„ भगद्विसदृशांकं ४५८ टि
दृशान्त कमयपिं ४९८ टि
„ जहतिलक्षणांक ४५० टि
„ वृत्तिप्रति विशेषा ९५०
„ मलीनमत्सुगुणपिं ९८७ टि
„ लालपुरूषा ऋऋटिकरा ९६०
„ शुद्धसत्वसुगुणपिं ९८३
„ दृश्योपत्ति ९४७ वु
दृशिस्वरूपादि ८३।३२८।९३० टि। ३५४ टि
„ की संकोच ३२८
„ का निषेध ३५७ टि
„ प्रतिषादन ३५९ टि
हरय ३७४
देव
„ मार्ग ३२०
„ मुक्त २३
„ वसीर ७०
देवतानमां ४७८ टि
देवीभक्तका उत्तर ९४०८
देशकालकी असिद्धि ३५३ टि
देशतीर्थकवन्याग ९७४
देशत्रासना ४५७ टि
देशिक ९६९०३
दोषक्ष
„ सोनभानुसुतोदय ४९ टि
„ विपयानंदं ७०९ टि
दोषप्रकार
„ का अपरोक्ष ८६९ टि
„ का ज्ञान ३९३
„ की समापि ४६५
„ की सांकल्पसमापि ४६५
„ के प्रायचित्त ४५
„ के संस्कार ३७०
दोप ३७३
„ धनवस्या ३७३
„ अन्योन्यसाध्या ३७३
„ आहाराभ्यास ३७३
„ नचिका ३७३
„ तीन ४६
„ नाशितकनकफे पद्मसेद ४९५
„ टटि ४०६
„ प्राश्लेप ३७३
„ विनिगमनवितदर ३७३
„ गलके ९४५ टि
„ वाणीके ९४५ टि
„ धारीके ९४५ टि
द्रव्य ६८ वु
द्रुति ८३
द्वितीयसतरंगः ३२-९३
द्विविधभेदमविमर्श ९९९
द्विपज्ञानवर्पण ९८३
धन ३७४
„ अर्पण मूर्तरे प्रकारका ९०८
„ अर्पणप्रकार ९०८
„ विगार युक्तिसंर्गदं ३२३
„ संगदुःखसंभन ३२६
धरो
„ शरर्म ७९
„ विगार युक्तिसंर्गदें ३२३
„ भीमांसा ४५० टि
„ द्वार ८९०
धर्मंप्यसका वदादरज ३९८ वु
धारणा ४६८
धारा
„ शाल्यविच्छान ३८५
„ प्रवृत्तिविज्ञान ३८५
पीर ४८ टि
धूममार्ग ४७८ टि
ध्यान ३०१८६८
„ अहंमह ३०१२९९
„ प्रत्यक ३०१२९९
„ सानका नेद ३०१३९९ टि
धेय ५०५
धैर्य ९१३४८?
न
„ नतु ४७२१४७३ टि
नभ ९६३
नमहाकार ३८५ टि
„ लप मंगल ९३५
नवयुव ७७ वु
„ नमानआहारमाव्यापकरांस्तन ४०९ टि
नानाप्यना साक्षीका ४९-४८
नाम ३८३
„ नामापराधी ४५२ टि
„ नारीकी निंदा ३२८
„ नाशितकनकफे पद्मसेद ४९५
निजमेव ९००
निजरूप ९६५
निय ३९९ टि
„ फर्म ५३
„ निवृत्ती निवृत्ति ४७ टि
„ प्राप्तकी प्राप्ति ८८ टि
„ मुक्त ९९९
„ सिद्ध धनधनियुक्ति ४७८ टि
„ सिद्धपरमानंदप्राप्ति ४९५ टि
Page 41
निःशङ्कता ईश्वरेच्छादिककी ३९९ टि
निदान १५५
निदिध्यासन ८१, ३३८ टि
निमित्त ३० वू
" ईश्वरकी इच्छाका ३९९ टि
" कारण ३४८,१९५ टि
नियमपाँच ४६९
निर्बीजसमाधिति १८७ टि
निरीपेक्षिकन्यापकता १७२
निरुक्त २८६
निरुपादानमता मायाविशिष्टकी २९०टि
निरुपाधिक आनन्द ४७२
निश्चितलक्षणा १३२ वू
निहपण
" अभिविधचननीयघ्यातिका१८३-१८६वू
" अनुवेलव्धिप्रमाणका १६२-१८१वू
निरोध ४७१
निर्गुणउपासन
" ओंकारकी २९३
" की रीति २६३
निर्गुणस्तुतिन्देशरूप मङ्गल ३३५
निदेशवचनक ५५० टि
निर्देश वसुका ३३३
निर्धोर ४९१
" अभिविधचननीयघ्यातिका २२०-२२९वू
निर्विकल्पसमाधि ४६१,१३३ टि
" श्रद्धामावनारूप ४६७
" अद्वैतावस्थारूप ४६७
" का दृष्टिसैं मेद ४६१
" दोप्रकारकी ४६७
" में चारिविद्या ४६९-४७२
निर्वेद १०७
" यथार्थी ४९९
नियुक्ति १५२
" अन्त ६२,१४२,१३,१९८
" श्रद्धभावासनाकी ५०५ टि
" मेधानकी १०० टि
" लयरूप ३१८
" लयरूप कारणसैं १४२
निक्षय १९८ वू
निधिदकरमं ५२
निष्कर्षे दृष्टिव्यतिसादका ३५७ टि
नैसर्गिककमं ५३
नैयायिकका मत ११८
वैष्कम्सिद्धिकारका वचन २९३ टि
न्याय ५१७
" अङ्गोगोलाङ्गुल ५२२
" एकदेशी ज्ञानखण्डन ३९५ टि
" करणलेढि ३२८ टि
न्याय का सिद्धांत ३४३,१३४
" के एकदेशीका मत ३४८
" गुढ़जिहा ३३८,१३९ टि
" दुर्जनतोष ४२८ टि
" पदाशक्तिसंघटन ४५९ टि
" मत ३४३,१५०७
" मतका मनन ३९२ टि
" मत जड़ता खण्डन ३९६ टि
" मत ज्ञानखण्डन ३९४ टि
" मत मननखण्डन ३९२ टि
" मतमें इक्रिसदुःख ३४३
" मतमें मोक्ष ३४३
" मतमें व्यवहारका लक्षण ३४५,
" द्वाल्सासारमेय ५१७
प
पंचकोष २६०
" ईश्वरके ३०२ टि
पंच
" केश ३९
" प्रकारके कर्म ५३
" प्रकारके मेध ९५
" प्राण २५७
" माया ९ टि
" मूत २५३
" मेधखण्डनकी युक्तियाँ ११२५ टि
पंचमस्लरंग: २१३-३०३
पंचीकरण २५८-२५९
" का दूसरा प्रकार ६०१ टि
" दोभांतिका २५८
पंचीकृत २५८
पतञ्जलि ४९२
पदकृति साक्षिके लक्षणकी १०४ टि
" स्वातिकी८८ वू
पदार्थे
" अनिर्वेचनीय १६६ टि
" मैं पंचभंश ३६८
परोक्ष २८२
" पदाथोंभिमति ९६ वू
" वसुप्राद्वारैयका मतसैं २८५ टि
" परज्ञा २८२
परमशब्दवधि योगका ४९० टि
परमप्रयोजन २६
" दृष्टिका २५६ वू
परमशब्द ३८३
परमानन्दमाप्ति नित्यसिद्ध ४१५ टि
परमार्थसत्ता ३३५,१३१६
परम्परासंबंध ४८० टि
परस्परसहकारिता शमादिकनकी १९टि
परार्थकुमान ९२ वू
परिच्छिन्न ३५६
परिच्छेद २०१
परिणाम १३५,१२३० वू ४३८ टि
" अन्तःकरणके ४९८
" अभिव्याका ३२४
परिमापा ११२ वू
परिमाण मध्यम ३४९
परिरोश ४०८ टि
परिसङ्ख्याविधि ५१२ टि
परोक्ष ४३९,१४३,४३४३ वू
" ज्ञान २०१,८१९,१०१,२१२
पचोय २१ टि
पचू ७०
पद
" व्यवहारका ४५५ टि
" शास्त्रयस्वविषय २४३
पध्री ८०
पंच
" अन्तःकरण (भूमिकासहित) ४७१
" अन्तःकरणकी भूमिका ४७१
" गुण २५३
" नियम ४६९
" प्रकारके कर्त्तंकृ कमैं उपयोग३७७
" यम ४६०
" विकार ३६८
पाद २८५
" चरि आत्मके २८५
" चारिरूश्रके २८५
" परम तीनप्रकारका ९१ टि
परमार्थिंकजीव ३८९ टि
परवार ४०३
पातक १०१
पिढल ४८६
पितृयानसैं ४४८ टि
पुख्यकमं ४५५
पुण्यपाप ७९
पुरुष ३१८
पुरुषेपदुःख ३२५,१२६८ टि
पुराणप्रष्टादस ४८०
पुराणका असिप्राय ५१७
पुरुषअधिकारी ४८०
पुरुषार्थे ३६,१४५
पुरुष ४६३
पुली ३१८
पक्षोमतैं उत्तर६९१
" सीमांसा ४८९
" सीमांसाका मत ५०७
Page 42
प्रकरणग्रंथ ४२ टि
प्रकार दूसरा पंचीकरणका ३०९ टि
प्रकाश ८५
प्रक्रियाकी अवस्था २९३ टि
प्रकृति २७९८४२८१९५ टि
प्रणव २८९
उपासनाकी रीती २०२
का अहंप्रत्ययान २८९
की उपासना २८९-३०२
प्रतिकूल ७०
प्रतिछा
प्रथारंभकी ९४
वाक्य ९४ वू
प्रतिपाक २४
प्रतिपादन
आध्यासदोपका ११८ टि
हृदयग्रंथि आदिका ३५९ टि
प्रतियाथ २४
प्रतिपादकभावसंबंध २४
प्रतिबंध ४९२
प्रतिबंधक ४९२
ज्ञानके ९९ ८४७ १३८ टि
प्रतिंबिंब १६७८४९
अभासका मेद ४८९
वाचिकासिद्धांत ४८९
प्रतिभास ३२५
सत्ता २३४
प्रतिक्षणान २९० १२९ १३२९ टि
प्रसक्त ८५ १९५
प्रसक्ष ३०७ १४३४
अभिक्षा ३०७
प्रथाभिधा ३०७ १३४ टि
प्रमा ३१ वू
प्रमाके करण १९९
प्रमाण १९१९९२१२६वू८२ वू
इप ज्ञान ८५
ज्ञान १९० १२९० १२९१ १२९२ टि
ज्ञानका लक्षण ३२२ टि
ज्ञानका हेतु ३०९
प्रथाभ्रांप्रत्यक्ष ३०७ १३३ वू
प्रथाभिज्ञाप्रत्यक्षका लक्षण ३४३ टि
प्रसाधार ४६७
प्रथमसतरंग ९-३२
प्रदर्शन वेदांतसिद्ध विरुद्धअभावका १९०-१८९ वू
प्रधान २७९ १२४२
प्रपंचसाभावकी सादिसांतता १८९ वू
प्रपंच १९७ टि
का मिथ्यापन १९७ टि
प्रपंच की अनादिसांतता ११३ टि
की असलत्ता ३५२ टि
की भसिद्धि ३५२ टि
प्रभाकर
भी नैयायिकमत २६८
का मत ( भग्यातिसिद्धि ) ३२०
प्रमा १९७१९८१२०० १२०५ १९१ वू
नेति ३२०
प्रमाण १९७ १२००१२०४१२८ वू ३७ टि
अनुपलब्धिधि:१९६ १२६ वू १९६ वू
अनुमान १९२ १२६ वू ८९ वू
अध्यांपत्ति १९५ १२६ वू
उपमान १९४ १२६ वू
कर्तव्याभावमें ४३० टि
के पटमेद २५
गत असंभावना ९८० वू
गत संशय ३७ टि
गत संशयका स्वरूप १७३ टि
चेतन २०० १ २०५
ता उत्तरमीमांसकी ५१८-५३०
ता शंकरमतकी २९४
दोप ११८ टि
निह्नयण १९१
प्रसक्ष १९३ १ १९९
शब्द १९३ १ ३६ वू
शब्दका अर्थ ३७ टि
संशय ९० वू
प्रमाता २०० १ २०१ १ २०४
आदि-चेतन-वर्णन २००
चेतन २००
दोप ११८ टि
प्रमाद ८१ टि
प्रमा वट १९९
प्रमाण
प्रमाणान
श्रुतिसिध ९८ वू
का लक्षण १९७
प्रयोग ३९ नि ३८ वि
की असंभावना ६६
गत संशयका स्वरूप १७३ टि
चेतन २००
दोप ७८ १ ११८ टि
वेदांतका ६६
संशय १९३ वू
प्रयोग
अवांतर २६
खंडन ४५ १ ५९
प्रयोजन परम २६
मंडन ७७-९२
वतीलक्षणा १३२ वू
वर्णन २६
वृत्तिका २५६
प्रवाहरूप
तें भनादि ८२
तें भनादिमत ११२ टि
प्रवृत्ति
की सामग्रां २४३ वू
विज्ञानधारा २६५
प्रसिद्धअनुमान ९०३ वू
प्रस्थान ५१० टि
भ्रांति अद्वैत विद्वांके ४८३ १ ५१० टि
तीन वेदांतके २९५
प्रज्ञान
घन २९० १ ३३३ टि
पदका वाच्य ४५३
प्रज्ञानमानंदं ब्रह्मा ४७१ टि
प्रकृतिसिद्ध २९४
प्रभाव ४२६ १ १९६ वू
प्रागलोपदोष ३७३
प्रण २५५
पंच २५५
मय भेद २६०
प्रणायाम ४६३
भगर्मे ४६२
सगर्मे ४६२
प्रातिभासिक १३३ १ ३१५
जीव ३४५ टि
सत्ता ३१६। २०२ वू
प्राक्भाव ४९३
प्रक २४
प्राक्ति निल्यप्रामासकी ४८ टि
प्राण्यआपकभावसंबंध २४
प्रादुर्भावित
असाधारण ४५
कर्म ५३
काम्यरूप ५६
केवल ५६
दोपकारके ५५
साधारण ५५
प्रारध्य ४५५ १ ४५६
पुरुषार्थकी सफलत ५०५ टि
मंद ४९८
प्राहु ९७०
की उपाधि २९१
के भोगकी त्रिपुटी ३९०
Page 43
श्रिय ३६८
प्रोधि ४५८ टि
, वाद ९०७ टि ४५८ टि
फल ९८७ व
,, द्वीपप्रारंधका ९०५ टि
, दो गुरुकी सेवाके ९०८
, नयविव्याका ३८८
, स्थित कर्मका ८०
, योगका ४५२
, रूप ज्ञान वेदांतका ३९१
, वर्णन गुरुभक्तिका ९७
, विवेकादिकनका २७ टि
, श्रवणादिकनका ३८ टि
, ध्यांध्यशास्त्रका ४५१
व
बहिरंग ९६
, साधन ९६।९०३
बहिरप्रगट २९०
बहिसुवक ३५६
बाध २३३
बाषक २३२
, युक्तियां सेदकी ३९ टि ३९३ टि
बाध्यसामानाधिकरण ९८५।९८९ टि
बाधिताजुद्विति ४६५ टि
बाध्य
, निर्विकलपसमाधि ३३ टि
, राग ४५९।४७९ टि
, वृत्ति २८५
विगार
, धनको युक्तिसंगतैं २३२
, धर्मको युक्तिसंगतैं २३३
बिंदुनाश युक्तिसंगतैं २३४
विव ९५७
विवप्रतिविव
, दृष्टांत ९६७
, वाद ९६७।४७४ टि
, वादवणेन ४६५ टि
विलयावलका दृष्टांत ५४८ टि
बुद्ध ५२०
बुद्धि २५४।२६५।३४६
बोध
, की समनता ५०० टि
, मंद ३९९
, बोधव्य २८६
ज्ञा ९७२ ।। ३६४ । ३६५
, की भांतरुपता ९८६ टि
, के चारी पाद २८५
ब्रह्म चेतन ४३६
, पदका वाच्य ४८३
,, द्वैतकवाक्य ९९८ व
, मीमांसा ५२९ टि
, मीमांसाके भाष्य ५२९ टि
, रूपता वाक्यकी ६९७ टि
, लोक २९७
, लोकके मार्गका क्रम २९७
भूमिका पांच अंतःकरणकी ४५१
नेद ९८५
, अध्यार्यशप्रमाके ९८७-९९७ व
, आमास थी प्रतिबंधका ४५९
, की वाघकयुक्तियां ३९ टि ३९१ टि
, चारी ठाकाशके ९५९
, चारी आयुध अधिकारिके ४८५
, चारी चेतनके ९५९।२००
, तत्त्वशतस्ववेताका ४५६ टि
, दो मीमांसाके ४८९
, ध्यानज्ञानका २८०।३३९ टि
, पंचप्रकारके ९५
, वाधकसुक्ति ३९१ टि
, युक्ति ३९७
, वादका तिरस्कार २९६
, वादकी अप्रामाणता २९५
, वादकी चिकितारपरीक्षैक स्वाज्यता
२३८
, घटनास्लिकनके ४९५
, विजातीय ३४५
, सजातीय ३४५
, समाभिशुप्तिका ४८८ टि
, स्वगत ३४५
, ज्ञांकी चिद्वृत्ति ९०० टि
, वेदामेद ४५९
भोका ३४२
, सूत्रका २८८
, स्थूलका २८५। २८८
मोग २८८
, सूक्ष्म २८८
, स्थूल २८८
भ्रम ९३० । ९५१ । ३०९ । ४०६ ।
९९८ व
, मति ४०५
वृति ९८० । ९८९।९६०टि९६९ टि
९८५ टि
, नाशवर्णन ९८२
, निवृत्तिका कारण ४७३ टि
, वर्णन ९८०
, मैं दोखंड ३६७
, ज्ञान ९८।९३५ टि
भाग
१४२ टि
भगवति
, का विशेषरूप ५०४
, का सामान्तरूप ५०४
, के दोरूप ५०४
भट ४५६ टि
, का मत २६६
, मतखंडन ४३२-४२७ । ३०८ टि
, रीतिश्रिकिलक्षण ४९५-४२१
भद्रामुद्रा ९४७ टि
भरतराजा ४८३ टि
भर्हूकी कथा २९७
भाजित ४९७
भरद्वहरी ४३२ टि
अभितनय २७५
भविष्यरक्षमें ४७८ टि
भागत्यागलकषणा ४३२।४३८।४५९ टि
, प्रकार ४३८
भागवत दो ४८७
भति ३६८
मान ३९०
भामतिनिबंध ९३५ टि
भाविप्रतिबंध ३१८ टि
भाषा
, की सप्रदाय ४०९
, प्रथसै ज्ञान होवैहै ९९।९२८ टि
भाष्य ६ टि,
, ग्रंथमीमांसाके ५२९ टि
शुवत सात २५९
भूत
, पंच २५६
, प्रतिबंध ३१८ टि
भूमा ६३१८६ टि
Page 44
मकार ३९०
क का वाच्य ३०१।३०२
मंगल
आदिवंदारूप ३३३
तीनप्रकारका ३३३
नमस्काररूप ३३४
तिर्यंच वस्तु निर्देशरूप ३३५
वस्तुनिर्देशका १
विधि १७८ टि
वैदान्तशास्त्रक्तसांभावार्यका नम- स्कारूप ३३६
सगुणवस्तुनिर्देश ३३५
स्वद्रव्यचित्र प्रायेनलास्प आदिवंद३३५
मंडन
अभिप्रायिका ६१-७१
प्रयोजनका ७७-९२
संवंधका ९३
मत
अवच्छेदवादका २०१
इंद्रियास्मवादवीका २६३
उत्तर मीमांसाका ४०७
चारि भंगतके ४९५
चितामणिकारका १२९
पद्मनंदिप्राभीका १२८५ टि
नास्तिक ४९५
नैयायिकका १३८
न्याय ३४३।५०७
न्यायके एकदेशीका ३८४
पूर्वमीमांसा ४०७
प्रभाकर श्री नैयायिकका २६८
प्रभाकरका (अध्यात्मवादि) ९३०
मटक २६६
मधुसूदनसांगीका ३९८ टि
योग ४०७
वाचस्पतिका २८४
विश्वनाथवादिका १२७
वैशेषिकका १२८।१०७
वैष्णवका ४०६
शंकरवार्त्तिका १२८६
शैव ४०६
वटेश्वरणका ४०७
सर्वज्ञ ३८२।५०७
स्वाति ४०६
मेत्र ८८५
मंद ४०३
जिज्ञासु ३९६।१०१ टि
प्रारंभ ४८६।१५०३।१५०५ टि
बुद्धि ४५२ टि
मंद वोघ ३९८
ज्ञान ३९२
मधुसूदनसांगीका मत ३९८ टि
मध्यम
जिज्ञासु १०१ टि
परिणाम ३४७
पामर १० टि
विपयी ९८'टि
मध्यमाधिकारी सापन निरूपण २१३-२७६
मन २५८
अर्पणप्रकार १०३
की निलत्तास्वंदन ३९३ टि
के दोष१७५ टि
मनन १८
न्यायमतका ३९३ टि
मनुस्मातरू अधिकार ९९ टि
मनोमय ३१६
कोष २६०
मरण २६२
मयोदा शास्तकी ९९ टि
मल ४६८।१३५०
मलिनसत्सगुण १९१।२५०
विप हरण १८५ टि
महाकथा १६३
वर्णन १६३
महादेवकी समवुधि ५३२ टि
महावाक्य २०१।४७२ ११८ वृ
के अर्थका वपदेश २०१
चारि ४३
तर्कवमसिरिमें लक्षणा ४३३
नमे हूतार्थपत्ति १५९ वृ
में जदतीका भसंशव ४३६
में भागस्यागका अंगीकार ४३८
में लक्षणा ४३३-४३९
माध्यमिक्षोेदका मत २६७
मालसविपयांल ३४२ टि
माया १९१।२४७।१२७।१३७०
सिथ्या १८४।१३४२।१३९१।१३९७। ३५२ टि
उत्तर मीमांसा
के दो मेव ४८९
पूने ४८९
सुफ ७०१।९८४। ८८५
सुफासुफ ८८५
सुपासन ८५२
सुखि
का हेतु कौन ? याका उत्तर ३७५-४०६
हेतु ज्ञान है ३७५
सामिष्य ३३६ टि
सायुज्य ३३६ टि
साल्य ३३६ टि
साति ३३६ टि
बुद्धि
अंतरंगसाधन १८
अर्थ ४५६ टि
देव २२०
दशावपनिपद ९५ टि
सामानाधिकरण १८५।१८९ टि
सिद्धांत अद्वैतवसदका २३८ वृ
सिथ्यावृत्ति ४३९ टि
मुनी ३९८
वरभुप २० टि
सुपश्रुता ३३
लक्षण १८
मुति(स्रतिपादनका अभिप्राय ५१५-५१६
मूलभविया ६२।६५ टि
सुवावारि ७०३
मेघाकादा १९२
वर्णन १६३
में १८४।१८५
कौन हूँ? याका उत्तर ३४०-३६१
मोक्ष २६।१३१।१३६। १३१।१३७०
२४६ वृ
का द्वितीयशंष ६३
का प्रथम भंश ६३
का साधन १९५।१९५८
का स्वरुप ३६
का हेतु ३७५
न्यायमतमें ३४३
प्रति अहंमहह्यान्तें ३३३ टि
मार्ग ४५८ टि
विवेह ४५४
सायुज्य ३९८।१३३५ टि
Page 45
४२९
॥ पंचमाध्यायिको आकारादिख्यानुक्रमणीका ॥
य
यथार्थे ,, अनात्मस्स्यति १८३ वृ ,, अप्रमाण १३२ वृ १८३ वृ ,, आत्मस्स्यति १८३ वृ ,, निर्वेद ४९९ ,, स्मृति १८८ वृ ,, शान्त २०४१९८५ वृ यज्ञयुक्त ४८५ यमपांच ४६० यज्ञादिक कर्मका हेतु २६ टि याग १५७ वृ युक्तयोगी ५१९ युक्ति मेदवाधिक ३९९ टि युक्तियां पंच मेदसंभंकी १३२ टि युजानयोगी ५१९ सुवातिसंग ,, दुःखवर्णन २२१ ,, धननिगार २२२ ,, धर्मनिगार २२३ ,, बिंदुनाश २२४ योग १२१ वृ ,, का परमार्थवधि ४९० टि ,, का फल ४९२ ,, निरपेक्ष ५४३ टि ,, मत ५०७ ,, रूढ उभयलुप शक्ति १२३ वृ ,, रूढ उभयस्स्यति ४३९ टि ,, हठ ३०८ योगादिस्स्यति ४३९ टि योगी ,, का कायव्यूह ४८१८८ टि ,, युक्त ५१९ ,, युंजान ५१९ योग्यता १४९१ वृ योग्यप्रमाण ४३ वृ यौगिकसब्द १२१ वृ
ल लक्षण ,, उपरामका १२ ,, उपादानकारणकां २९४ टि ,, करणका २०६ टि ,, गुरुके ९५ ,, जिज्ञासुका ७० ,, तितिक्षका १३ ,, दमका ९० ,, प्रसंमिज्ञाप्रसक्षका ३४२ टि ,, प्रसक्षज्ञानका २१२ टि ,, प्रभोक्त्रिका ९५७ ,, मुसुसुताका ९८ ,, विचेकका ७ ,, वैरागका ८ ,, श्रद्धासंआधानका ९९ ,, शक्तिका ४९० ,, शाब्यका ४२८ ,, शामदका ९० ,, सिद्धयके ९६ ,, समाधानका ९९ ,, सृष्टिका ३४८ टि ,, स्वरीतिले शक्तिका ४९९ लक्षणा ४३० । ११२७ वृ ,, अजहती ४३१ ,, का स्वरुप ४३९ ,, जहती ४३० ,, जहतीअजहती ४३२ ,, जीवव्रह्ममें ४५९ टि ,, तत्त्वमतिमद्वादाक्षमें ४३२ ,, तीनिप्रकारकी ७०७-७०९ ,, भागलाग ४३८१४३९ ,, महावाक्यनमें ४३३-४४९ ,, लक्षित १३० वृ ,, वृत्ति ४७० टि छस्ततलक्षणा १३० वृ लक्ष्यार्थ ३९१४४० टि
ल लय २९३१४६५ ,, चिंतन २७७-२८०१३१५ टि ,, चिंतनका सहुवाद २९३ ,, रुप नियत्ति ३१४ ,, रुप निवृत्ति कारणमें १४२ लिंग ८५ वृ । १४३२ वृ ,, ज्ञान ८५ वृ लोक ,, शतलोद्दिस्सत २५९ ,, पूरोदिस्सत २५९ ,, वासना ४५३ टि लोकायत १९३ टि लोपसुत्रा १४४ टि लौकिकवाक्य ११६ वृ
व वचन ,, वैचक्रम्येसिद्धिकारकां २९३ टि ,, सारामही पंडितका ५३० टि वजासन ४६२ वर्णन ,, अज्ञानस्वरुपका १७९ ,, आवरणस्वरुपका १७९ ,, कूटस्थका १६५ ,, घटाकाराशका . १६०१ ,, जलाकाराशका १६१ ,, प्रयोजनका २६ ,, महाकाराशका १६२ ,, मेघाकाराशका १६३ ,, विषयका २५ ,, संबंधका २८ ,, साधुज्यमोक्षका २९८ वणे प्रणव ४२३ वस्तु ३३३ ,, निर्देश ३३३ ,, निर्देशाशुप मंगाल ९
लाछि ११२२ वृ ,, वृति ११२२ वृ ४३९ टि ,, शांफि ११२२ वृ रूप ३६८ ,, सत्प्रकारका ७९ वृ रुपक ,, अंतरंगसाधनसंबंधी २५ टि ,, विचारसागरका ९ टि ,, संसारबृक्षका ४५६ टि रेचक ४६२ रैदिकसब्द ११२२ वृ लक्ष्यार्थ धकारका ३०२ ,, अहंसावदका ९६० ,, आत्मपदका ९६५ ,, आनन्दपदका ७४३ ,, ओंकारका ३०१९३०२ ,, थी लक्षणाका सामान्यरुप ४२९ ,, उकारका ३०२ ,, जीवपदका ७६ ,, तत्पदका ९७९१६५ ,, त्वंपदका ९६७६४१४८ ,, महावाक्यका १७९, ,, सत्साधनका ७४३ लंबका २५९ टि
र रस ८२ वृ रसास्वाद ४७२ रहस्य ४२३ राग ४०३१६८ टि ,, अंतर ४७१ ,, चाह ४७१ रागादिकके उपाय ४३४ टि राजयोग ३०८ रामकुंडलादिक २०९
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वस्तु-पृथ् अनादि ६३ वाक्य ,, अध्यंतर २० ,, महत् ३० वाचक ४२८ वाच्यरतिका मत ५८ वाच्य ,, आकारका ३०११३०२ ,, अर्थ ४२८१३२९१३० मु ,, अर्थ तत्पदका ४३३ ,, अर्थ तत्वमतिका ४३५ ,, अहंपदका ४८३ ,, आत्मपदका ४८३ ,, आनंदपदका ४८३ ,, आकारका ३०१ १३०२ ,, आकारका २४२ ,, तत्पदका १११४३२१४८२ ,, संपदका १८३४३२१४३२१४८२ ,, प्रज्ञानपदका ४८३ ,, मतपदका ४८३ ,, महावाक्तका १७२ ,, सकारका ३०११३०२ ,, सख्पदका ४८३ ,, ज्ञानपदका ४८३ वाणी ,, शरपेण १०४ ,, की न्याय्यता ४५० टि ,, के दोप १७५ टि वाद ४५१ टि ,, अवक्च्छेद ८५१४८२ ,, अभास ८५१३९९ ,, एकजीवका ४५८ ,, इष्टिसृष्टि ८६१३२९१३५६ टि ,, विमतिप्रतिपय १६७१४८४ टि ,, समुचय ३८३ ,, वामदेव ४८१ टि वाममागॅ ४५४ वार्तिक ७ टि वासनारूप राग ४९१ टि विकल्प ३६१३७०१४७८ टि ,, रूप उपयोग ३७९ ,, पाँच ३६८ विकल्पा ४१८ टि विकृति ३८२ विधि ३३३१४७२ ,, चारि निविकल्पवसमाधिमें ४९९
विसार ,, तस्म्पादार्थका ४३१-४८९ ,, सागरका रूपक १ टि विजातीय ,, भेद ३८५ ,, सैं संयंध ३८९ विदेद्रमोस ४५५ वियाके शास्तादाप्रस्थान ४८३ विदानेंदकी उपादेयता ४०८ विचारण्यासागिका भसिप्राय ५०२ टि विदानोंका निधार ४०० टि विधि २८० विनिगमनविरह ३७३ विपरीत ,, भावना १८१९१३१५ टि ,, मान ३५ टि विपर्यय ३५ टि विपयोसमानस ३४२ टि विप्रजं १९ विशेषलिस्सा ४२० विशु ३२१३२०१४३२११८५ टि विराट २८५ ,, रूप विश्के सातशंग ३८५ ,, विश्के उदयोस्मुला २८५ विरोचनसिंधांत ३९१ ,, सन्धन ३०३ टि विरोधि भासिताका ८५ विलक्षणप्रारुप ४८२ टि वियषे १३२१३० मु ,, चेतनका ३२४ विवेक ३०१३४२१३१२ टि ,, लक्षण ७ विवेकादिकनका फल २७ टि विशिष्ट १३२१३०१३४२ विविश्टात्मगोचरप्रसक्षप्रमा ६० मु द्वितोप २०१
चिपमस्ता साधकवाभक २८४ टि चिदय २९१८८१९१३२४३ ,, भज्ञानका १८८ ,, भानंद ११७ ,, आनंदका कारण ४०६ टि ,, आनंदकी हैयता ४०८ टि ,, आनंदमें दोपक्ष ४०९ टि ,, इत्रियनके ४१ ,, रागन ३९-५४ ,, प्रथक २५ ,, चेतन २०० ,, वर्णन २५; ,, में श्ञानंद नहीं ११७ ,, रूप नित्यत्ति ५५ टि विपयी ४८१९ ,, तीनप्रकारका १८ टि व्यूडुपासकका उत्तर ५०१ दिवितकर्म ५३ ,, चारप्रकारके ५३ विशेष ६१८१४५१९१९८५ ,, विश ३२४ विज्ञान ११७ ,, मय कोध २६० ,, वादिका मत ११७ ,, वादी चौदेका मत २६५ ,, गुरूत्ते १०७१९८०१३५४१४९१४३८ टि ९ त्र ११९ मु ,, का परमप्रयोंजं २५६ मु ,, का प्रयोजन २५६ मु ,, का लय ४९१ टि ,, दोप्रकारकी ४०९ ,, प्रयोजनकथन २५६-२५७ मु ,, फलतिलुपण २५४-२५५ मु ,, साक्ष २८५ ,, व्यास्ति भद्राविपे ३१४ टि ,, ज्ञान २०० वेद
,, अनुबंधनिलुपण ३३-९३ ,, अंश २२० मु ,, का गूढसिद्धांत ३२४ ,, का खंडोरा ७०१४५७१४८० टि ,, का सिद्धांत ६६१४९१ ,, गुरुंकी सवयता २८६ टि ,, चारि ४८४ ,, प्रष्टिबाक्यका्याभिप्राय ५१२ टि चेतांत ६६१३६६ टि ,, उपयोगीअनुमान ९७-९०१ मु ,, का प्रमेय ६६ ,, का कलहप ज्ञान ३९१
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वेदांत-का सिद्धांत ८९१८८८२९१३
का हेतु ४३६
के तीनप्रस्थान २१५
मत कार्यकारणमें ८५८ टि
वाक्यककी अर्थभावना ६६
शाब्द ३८३ टि
शाब्दकर्तां आचार्यनमस्कार ३३६
भवत्कारक फल २७८
से विरुद्ध अभभावका प्रदर्शन
१९०-१८१ टि
वैदिकवाक्य ११६ टि
वैयाकरणरीतिसाफ्कि
का खंडन ४१७-४१८
लक्षण ४१६
वैराग्यलक्षण ८
वैराग्यिकमत १२८८१५०७
वैष्णवमत ५०६
व्यक्ति ४२११६८ टि
व्यतिहार ४७२ टि
व्यमिचारी ३६८
व्यवधान ८६ टि
व्यवस्था प्रक्रियाकी ३९३ टि
व्यवहार २०२
पक्ष ४६५ टि
सत्ता २३३१३१६
व्यवहित ७९१४६ टि
कालकृत ४६ टि
देशांत ४६ टि
व्यष्टि
अज्ञान १७०
प्रतिबिंब ४६५ टि
व्याकरण ८८६
रीति शौफिलक्षण ४१६
व्याख्यान
कल्पतसका ५३५ टि
रूप ग्रंथ ५२१ टि
ज्ञान २५५
व्यापक ८६७१६८८१८९ टि। ४९५ टि
का न्यायमतमें लक्षण ३८५
व्याप्ति
आपेक्षिक १७२
निरपेक्षिक १७२
व्यापार ३० टि
हीन कारण ३० टि
व्यासि ८९ टि । ८५० टि
व्यास्य ८९ टि
व्यावर्त्त २०१
न्यायतैक २०१
न्यावर्त्तये २०१
न्यावहारिक ३१३१३१५
अर्थ ११७ टि
जीव ३८५ टि
सत्ता २०२ टि
मोक्ष १०८
शांकरमतकी प्रमाणता २१४
शांकरभाष्यांमी ४७३ टि
ध्वकि १७९१४९१०४९१९१४६६१४९
१२० टि
अन्यमतका खंडन ४९५
अभमानापादक १७९
भसत्पापादक १७९
भज्ञानकी १७९
अज्ञानकी दोप्रकारकी १७९
की महाप्रकता ३१७ टि
खंडने अन्यमतकी ४९५
लक्षण न्यायरीतिसें ४९०
लक्षण महदरीतिसें ४९५
लक्षण वैयाकरणरीतिसें ४१६
लक्षण खरोरीतिसें ४९१
शक्य ४२९
अर्थ ४२८१३२० टि । ४८० टि
का लक्षण ४२८
शाठ ४८ टि
शब्द
प्रमाण १९३१२६ टि
शक्ति ४३९ टि
शब्दानुविदस्समाधि ४८५
शब्दानुवितसमाधि ४८५
शब्दलक्षण ९०
शामादि ९
कनकी परस्परसहकारिता ९१ टि
वासुतंत्र ५३५ टि
परिच्चेके दोष १८५ टि
शान्त ४८५
वोध १३९ टि
सामग्री १९० टि
शान्त ५००
की मर्योदा ९९ टि
वासना ४८५ टि
शिक्षा ८८६
शिव १७३१५०२
सेवकका उत्तर ५०२
शिवावल २६६ टि
निःष्य
के लक्षण ९६
मांछितप्रार्थनाहुप आशीर्वोचद-मंगल ३२५
श्रुत्सत्सगुण १७११२५०
विप दुःखांत १८३ टि
ध्रुवासना नित्यत्ति ५०५ टि
ध्रुमसततक तीनयुप्त्रनकी गाथा १०९-१११
श्रध्य २६७
वादीका मत १२६
शैवमत ५०६
शौक ८०१८८४ टि । १८५ टि
नाश १८२
शौण ४३१
स्थाल ५१७
सारमेयन्याय ४९७
श्रद्धा
लक्षण ९९
समाघानलक्षण ९९
श्रवण ८८१९२९ टि । ९३ टि
दोषप्रकारका ६६६
श्रवणादिक १८
की सफलता ४९ टि
श्रवणादिकल ३८ टि
श्रव्धेश्मिथ्यात्वार्थ २१६ टि
श्रुतार्थोपत्ति १५५ टि
प्रमा १५५ टि
प्रमाण १५५ टि
महावाक्यनमें १५९
श्रुति
प्रमाण शुतभफिवदै १३० टि
माताका तात्पर्य ३८९ टि
सूत्रप्रमाण शृद्रिथें ३८४ टि
श्रुति ७२१०१३१४६
पदार्थ अनादि १७४ टि
प्रकाशका रस ८२ टि
प्रमा १५९
वस्तु अनादि ८३
विकार ३६८
शामादि ९
शांजकका मत ५०७
शांजककी परस्पर विरदता
शांजकके कर्त्तो ५१९
संपत्ति ९११३
वच्क्सारंगः ३०४-८५३
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स
सर्गभे प्राणायाम ४६३
सगुण
" ईशा ३३९ टि
" उपासनादिकत्सग्य ३३८ टि
" वस्तुनिंदादिमंगल ३३५
सेंग ३६९
सुषिदानंद परंपर मित्र नहिं ३८४-४५
संशित ४०;
सजातीय
" नेद ३४
" तैं सवेंध ३६९
शस्त्र २४,३५,१३६,१६६ टि
" आत्मा ३५
" व्यातिपादरचन २२६-२३० ग्रु
" व्यातिपादोका सिद्धांत २२४ ग्रु
हस्ता २२,४,६,८,१९ टि
" अनिर्वचनीय २०७ टि
" परमात्मे ३३,३१६
" प्रतिमास ३३,३१६
" वयवहार २३,३१९
सल
" आत्मा ३५
" ता चेतनशक्ति २८६ टि
" पदका लय्य ४४३
" पदका वाच्य ४४३
" धम ८०५
सत्व २५४
सत्वगुण
" मलिन १२,१२५,०
" शुद्ध १२,१२५,०
सदसदिलक्षण २१५ ग्रु
सदृशलक्षण २१५ ग्रु
सार
" अवस्था शाभासकी ११,१-११८
" प्रकारका रूप ७९ ग्रु
समरसतरंग ९८-१२७
सफलता
" प्रारब्धपुरुषार्थकी ५०५ टि
" श्रवणादिककी ४९ टि
समवुद्धि महादेवशकी ५३२ टि
समवाय ४५१ टि
समाधि
" आख्यान १७०
" प्रतिबिंध ४६५ टि
समसत्ता
" कें भापसमैं साधकमाधरुता २३२
समसत्ता--साधकयाभक २८४ टि
समसुमय ४२४ टि
" चीं लाज्यता ३२४ टि
समाधानलक्षण ११
समाधि १,१२,५,११,३२
" कें शस्त्र भंग ४,१९-४६५
" दोप्रकारवी ४६५
" निर्विकल्प दोप्रकारकी ४५०
" निश्चलतमें चारिरिच्छा ४६१-४७२
" शान्तासुविंद ४६५
" वासनासुविंद ४६५
" सविकल्प ४६५
" अथिकल्प दोप्रकारकी ४६५
" साधककारल ३३ टि
" शुपुसिका मेद ८०८ टि
समाध्यान २५५
समनानता
" योष्की ५०० टि
" सद्वेतानोकी ५०० टि
समनानाघरण १८९ टि
" याम १८५,१८९ टि
" सुष्या १८५,१८९ टि
समाप्तिमेंकी ४५०-४५७
संसघयवाद ३८२
संपत्ति वेद ९१३
संप्रदाय भापाकी ७०१
संयप ४३८ टि
" कफन भान्प्रगोजनका ४३ टि
" कतुंगरेल्यभाव ३४
" रेंड ६०
" अन्यजनकभाव ३४
" तादात्म्य ४१९
" प्रतिपायप्रतिबादकभाव ३४
" प्राप्यप्रापकभाव ३४
" मंथन ९३
" लह्यालसकभाव ४३८ टि
" वरणेन २४
सरंवदा ईश्वरभापकी कतन्य्यता १११ टि
सर्वंपंचकी ईश्वरहस्पता २७०
सर्वमतअभिरूढ ईश्वर ३२५ टि
सर्वेशकी ४३३
सर्वैश्वर्यनकूं मद्दानाकी रेुता ४८३
" नाम ३७१
हवैदेव १,१२,१२,१४३
संप्रनोकी समनानता ५०० टि
संपादिकीसांतति ३२३ टि
हविकल्पसमाथि
" दोप्रकारको ४६५
सविचेक १३
सेदाय १९० ग्रु ३३८ टि
" त्पदाओंभोचर १९३ ग्रु
" प्रमाणगत ३७ टि
संसगंध्यात २०५ टि
" भात्माका २ ३७ टि
संसार
" अभाव आभासमें १८० टि
" के तीनमार्ग ४७८ टि
" मृथका रूपक ४३६ वि
सेसारी ७२,१७,१७,२०२
संगोती ३३,४००
संकार ८०,१३७९
" दोप्रकारके ३७०
रांदय
" फा मत ३४,१५०७
" मतसंघटन ३५०
" धाराका फल ४५१
रांतभनादि ११३ टि
सक्षात्कार २१२ टि
" रुप समाधिं ३३ टि
सासारसंयंध ४३९ टि
साधी ७२,१७,१७,३,२०२
२७,३२४
" का नानअपना ४१-४४
" के लक्षणकी पडकति १०४ टि
" चेतन ४३६
" नामकी सिद्धी १०७ टि
" माश्ट्र १३४
साध्म्य २७,१,४०६
सातत
" अवस्था चिदाभासकी ४७ टि
" युवत २५९
सादिसांतता प्रपंचसाभावकी १९१ ग्रु
सादिरूप १९६ ग्रु
" दोप ७८ टि
साधक २३२
" सर्वे खानविदं मद्या " दस श्रुतिमें जहदती ओी भामसागलक्षणा ४५७ टि
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|| पंचमाध्यायकी आकारादिगुणक्रमणिका ||
साध्यवाधक विषमसत्ता २८४ टि
, याधक समसत्ता २८४ टि
, युक्तियाँ अश्वमेधकी ३० टि
साधन
, अंतरंग १५१ ४०३ । ३३ टि
, अंतरंगवहिरंग १५-१६
, अंतरंग मुख्य ९८
, शुद्ध ज्ञानके १५
, आठ अंतरंग १५
, चारि ६
, दुःखका ६३
, वहिरंग ३६ । ४०३
, मोक्षका १५४ । १५७
, ज्ञानके ३३ । ४०३
साधारणकारण १९९।३० वृ । २०७ टि
, प्रायश्चित्त ५५
साध्य ८९ वृ
, साधनभावसंबंध ५९ टि
सांत
सांतताका श्रानादि अन्योन्याभावकी १७३ वृ
सामग्री ७७ टि
, अध्यासकी ४६
, प्रवृत्तिकी २४३ वृ
सामयिकभाव १६८ वृ
सामानाधिकरण्य १८६ टि
सामान्य
, अभयर्धननिरूपण ९
, बंध २२० वृ
, अहंकार ६७ टि
, हृदयांश ३६७
, चैतन्य ८५
, रूप ८६ १८९
, रूप आत्माका ८६
, रूप भगवत्कीका ५०४
, रूप लक्षणाका ४२९
, ज्ञान ३६७
सामिप्यमुक्ति ३३६ टि
सायुज्यमोक्ष २९८ १ ३३६ टि
, का वर्णन २९८
सारमहीपिंडितवचन ५३० टि
सारमेय ५१७
सारूप्यमुक्ति ३३६ टि
सालोक्यसुक्ति ३३६ टि
सार्तांगप्रणाम १२५ टि
सार्धसुक्ति ३३६ टि
सिद्धांत ५६ टि
, धुनुवादिका २२४; वृ
, न्यायकका ३४३ । ३५४
, प्रतिबिंबवादका ४८४
, विरोधनका २६१
, वेदका ६६ । ४९१
, वेदका गूढ़ ३२४
, वेदांतका ८९ । १८० । ४२७ । १३ वृ
, सत्व्यादिवादका २२४ वृ
सिद्धासन ४६२
सिद्धि साक्षी नामकी १०७ टि
सुगत १९६ टि
, के चारि मत ४५५
सुज्ञान ९८
सुंदनिसुंदरदेवकी कथा २३६ टि
सुरचण्णी ३
श्रुति
, अवस्था २५२ वृ
, औ अद्वैतावस्थानुरूप समाधिकां मेध ४६८
, का ज्ञान ८५
, सै निर्विकल्पसमाधिकां मेध ४६६
सुश्रद्ध ३३७
सूक्ष्मका बोधका २८८
भूत २५३
मोग २८८
, शरीर २६०
, शरीर ईश्वरका ३६०
, शरीर जीवका ३६०
, श्रुतिनिरूपण २५३-२५९
सूर्य ५ टि
सूर्यके दोप ५०५
सृष्टि ३१९
, ईश्वरकी २३३ । ३९६
, में श्रुतिसूत्रप्रमाण ३८४ टि
, सूक्ष्म २५७
सेवा
, अवधूतकी १००
, आचार्यक्के प्रकार १०५
, प्रमेयगत संशयके १७३
, प्रमेयगत संशयकके १७३
सो ४३२
सोपाधिक भानंद ४७२
'सो यह है' इसमें लक्षणा ४५९ टि
स्थूल
, का मोक्षा २८५ । २८८
, भूत २५३
, मोग २८८
, शरीर २५९
, शरीर ईश्वरका ३६०
स्वल्पाध्यास २०५ वृ
स्वर्ग १५७
स्ववंछितप्राप्त्यनुरूप आधिवोऽदंमंगल ३३५
खस्तिकाका ज्ञान ५१६ टि
स्वार्थचिंतमान ९१ वृ
सात्त्वि
उपासना ५०९
, मत ५०६
सात्त्वि्य ४३८
, सार्वजनिकभावसंबंध ४३८
सारक ४३८
सात्त्वि ३०७ । ४५० । १८० वृ
, का लक्षण ३५४ टि
, की पदकृति १८८ वृ
, रूप ज्ञान २२१
, ज्ञान ३०७
सुगत ३६१
, मेध ३४५
, सै संबंघ ३६१ वृ
स्वतंत्र ३७१ । ४३३
स्वप्र
, समघदेवका ३३०-४५२
, अवस्था २५१ वृ
, का मचिंतान पदका अर्थ ८४ वृ
स्वभाव
, ईश्वरशब्दका १०२
, उपाधिका ३५३
, तमोगुणका १८१
, वह्हशब्दका १७२
, विशेषणका ३५३
, ज्ञानका ४५
स्वरीतिशफिलक्षण ४११
स्वरुप
, आत्माका ३५७
, आत्माका दोप्रकारका २९२
, आनन्द ११९
, ईश्वरका २४८
, उपमितियुपमानका १०५ वृ
, जीवका २५०
, दो प्रकारके आत्माका २९२
, दो घोकारका २९२
सो ४३२
, सै जनादि ८२ । ११२ टि
, ज्ञानका ४५४
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खार्थांचुमिति ११ टि सार्थास्वविषयपक्ष २४३ ,, का संगतीकार २४६ टि हुठप्रदीपिका मंध ८०७ टि हुठयोग ३०८ हरिक्री कारिका ४१६ । ४५६ टि. हिरण्यगर्भे ३९७ ,, में उपासकका मत २६३ हर्प १८३ ,, सस्वपवर्णन १८३ देखु ,, भ्रष्ट फलका १०० ,, जीवनमुिकिके विलक्षण भानंदक ३३ टि ,, ता ४१२ ,, दष्टफलका १०० ,, दष्टफलकी ३८८ ,, दु:खका ७० ,, नित्यतिमें १२३ टि ,, प्रकाशज्ञानका ३०९ ,, मुंहप्रसन्नताका ३१४ टि ,, मोक्ष्का ३७९ ,, यज्ञादिक कर्मका २६ टि ,, वाक्य ८४ टु ,, ज्ञानका १९ हैयतात्विपयभानंदकी ८०८ टि
लिस अंतःकरण ४७१ सेत्रह २८६ लेप ४७१ शोम २२० टु ज्ञान ६०१८४१ १९५ । १९५८ । १९५६ । २२८ । १४०५ । ४८ टु ,, अपरोक्ष २०१८९१९५०१२१२ टि ,, इंद्रिय २५६ ,, का विरोध कम्मेंदुपासनासें २८४—३८६ ,, का खभाव ४५ ,, का खरूप ४०४ ,, के प्रतिबंधक १९ । ४५७ ,, के साधन २३ । ४०३ ,, के हेतु १९ ,, तत्व २४३ ,, दृढ ३९३ ,, दोप्रकारका ३९३ ,, द्विविधवर्णन १८९१ ,, पदका वाच्य ४५३ ,, पदका लक्य ४५३ ,, परोक्ष २० १ ८९१ १९०१ २१२ ,, प्रलक्ष ९९०१९०१२१९१९२१९२१२२ टि ,, मलक्षरूप ८५ ,, फलरूप वेदांतका ३९१
ज्ञान-भ्रांति १९८ ,, मेद ३९३ ,, मुद्रा १९५८ टि ,, यथार्थ २०४ ,, योग्य अभिकारी ६८ ,, वानकुं तत्वविसरण १९५१ ,, न्यायवहारका अभिरोध ४३२ टि ,, समकालमुिके ५०८ टि ,, सामानय ३६७ ,, खुप्तिका ८५ ,, स्वरति ३०७ ,, स्वरतिहप २११ ज्ञानाध्यास २१६ टु ३५ टि ७६ टि ज्ञानी २७५ । ४३१ टि ,, वां आभाननिका चिन्ह २७५ ,, का अकर्त्तीपना ३१३ टि ,, का अनियमन्यवहार ५०६ टि ,, का अभोक्तीपना ३३३ टि ,, कूं शुद्धद्मादप्राप्ति ५९१ टि ,, के व्यवहारका अनियम ४७७—४७८ ,, के व्यवहारमें नियम नहीं ४५४ ,, निरंकुस है ४७४ हैप ५०५ ,, वेदांतका ४३६
॥ इति श्रीविचारसागरे सटीपण तथा वृत्तिरनाघलिक्यो आकारादेभनुक्रमणिका ॥
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श्रीपंचदशीसटीकासभाषा द्वितीयावृत्तिमें
श्रीमहावाक्यविवेकके मूल औ अर्थमात्र ।
येनेऽक्षते षुणोतीदं जिघ्रति व्याकरोटि च । स्वादस्वादौ विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥ १ ॥
अर्थ:— जिस चैतन्यकारी पुरुष इस रूपादिक- कूं देखताहै औ शब्दकूं सुनताहै औ गंधकूं सूंघताहै औ शब्दकूं बोलताहै औ स्वादअस्वाद- रसकूं जानताहै । सो वृत्तिउपलक्षितचैतन्य प्रज्ञान कछाहै ॥ १ ॥
चतुर्दशेन्द्रदेवेऽपि महुष्याश्वगवादिषु । चैतन्यमेकं ब्रह्मात: प्रज्ञानं ब्रह्म मद्यपि ॥ २
अर्थ:— ब्रह्मा इन्द्रआदिदेवताओंपै औ मनुष्य- अश्व गौ आदिकनविपै जो एक चैतन्य है सो ब्रह्म है ॥ यातैं मेरेपै बी स्थित प्रज्ञान ब्रह्म है ॥ २ ॥
परिपूर्णे परात्माऽऽड्मिन्द्रहेहि विद्याऽऽधिकारिणि । बुद्धे: साक्षितया स्थित्या स्फुरताहमितीर्यते ॥ ३ ॥
अर्थ:—परिपूर्णपरमात्मा । विद्या जो' ज्ञान ताके अधिकाररी इस देहविपै बुद्धिका साक्षी होनेकारि स्थित होयके जो स्फुरताहै, सो 'अहं' इस पदकरि कहियेहै ॥ ३ ॥
स्वत: पूर्ण: परात्माडन्र ब्रह्मशब्देन वर्णित: । अस्मीत्यैक्यपरामर्शोऽस्तेन ब्रह्म भवाम्यहम् ॥ ४ ॥
अर्थ:— स्वत: पूर्णपरमात्मा जो है सो इहां 'ब्रह्म' शब्दकरि वर्णन कियाहै ॥ 'अस्मि' इस पद एकताका संरण करावनेहारो है ॥ तिस हेतुकारि 'मैं ब्रह्मही हौं' ॥ ४ ॥
पक्षमेवाऽऽत्मीयं स्त्रह्मरूपविवर्जितम् । श्रुते: पुराSघुनाप्यस्य तादृकत्वं तदितीर्यते ॥ ५ ॥
अर्थ:— स्मृतितें पूर्वै एकही अद्वितीय नाम- रूपपरर्हित जो सत था । इस सतक्का अव सृष्टिके पीढ़े बी टैसैपनां 'तत्' कहियेसो । ऐसें कहियेहै ॥ ५ ॥
श्रोतुद्देहेन्द्रियात्तीयं वस्त्वत्र त्वमपेक्षितम् । पकता प्राह्यतेsस्स्विति तदैवस्यमहभूयताम् ॥ ६ ॥
अर्थ:— श्रोतके देहइन्द्रियतैं अतीत जो वस्तु कहीत सतरूप भासो है, सो इहां 'त्वं' पदकरि कहियेहै । 'असि' इस पदकरि एकता ग्रहण कराईथैहै, यातैं तिनकी एकता अनुभव करना ॥ ६ ॥
स्वप्रकाशापरोक्षत्वममियुक्तितो मतम् । अहंकारादिदेहान्तत्मल्यगास्तेति गीयते ॥ ७ ॥
अर्थ:— 'अयं' इस उक्तिकरि आत्माका स्वप्रकाशापनैकरि युक्त अपरोक्षपनां मान्य है ॥ अहंकारसै आदिलेकै देहपर्यंत जो संघात है । तिसतैं जो अंतर है, सो 'आत्मा' ऐसें कहियेहै ॥ ७ ॥
हृदयमानस्य सर्वस्य जगतस्तत्त्वममीयते । ब्रह्मशब्देन तद्रह्म स्वप्रकाशआत्मरूपकम् ॥ ८ ॥
अर्थ:— हृदयमान सर्वजगतका जो तत्त्व है, सो 'ब्रह्म' शब्दकरि कहियेहै । सो ब्रह्म स्वप्रकाश- आत्मस्वरूप है ॥ ८ ॥
इति श्रीमहावाक्यविवेक:
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|| श्रीगणेशाय नमः ||
|| श्रीविचारसागर ||
|| वस्तुनिदेशारूप मंगलकी टीका ||
|| दोहा ||
जो सुख नित्य प्रकाश विभु, नाम रूप आधार | मति न लखै जिन्हिं मति लखै; सो मैं शुद्ध अपार || १ ||
टीका:- 'सो मैं हूं' यह अन्वय है ||
५ जो 'नामरूपका आधार' है || फेर सो ( ब्रह्म ) कैसा है ?
६ 'मति न लखै जिन्हिं मति लखै' || (१) इसका यह अर्थ है:- बुद्धि जिस ( ब्रह्म ) कूं प्रकाशै नहीं औ जो ( ब्रह्म ) बुद्धिकूं प्रकाशै || (२) दूसरा यह बी अर्थ है:- शब्दकी शक्तिकरिैं मति जिस ( ब्रह्म ) कूं जानै नहीं | शब्दकी लैक्षणादिकरिैं मति जिस ( ब्रह्म )कूं जानै|| (३) और यह बी अर्थ है:- मालिनैमति जिस ( ब्रह्म )कूं जानै नहीं | शुद्धैमति जिस ( ब्रह्म )कूं जानै || इस अर्थसैं यह जानना:- जो शुद्धमति बी फैलच्यासिैं जिस ( ब्रह्म )कूं नहीं जानैहै | किंतु
|| १ || निर्गुणवस्तु ||
|| २ || विशेषवस्तुसके अनूकूळ न्यापार ||
|| ३ || संवेग ||
|| ४ || देखो अंक || ४५३ ||
|| ५ || अंतर (आत्मा) ||
|| ६ || आनंद | देखो अंक || ३६४ ||
|| ७ || सत्य | देखो अंक २५२ । ३५५ ||
|| ८ || चित् | चैतन्य | ज्ञानस्वरूप ||
|| ९ || ध्यापक | देखोअंकवस्तुस्वरुपि अंतरंत रहित | देखो अंक || ३६४ ||
वि. सा. ७
|| १० || अधिष्ठान । निवर्तउपादानकारण । देखो अंक १४९ ||
|| ११ || देखो अंक ४०९ ||
|| १२ || भागलक्षणासैं । देखो अंक ४०९ । ४३२।४३८ ||
|| १३ || मलविक्षेपदोषसहित बुद्धि ||
|| १४ || मलविक्षेपदोपरहित बुद्धि । चारिसाधन- सहित ||
|| १५ || चिदाभासकी विषयतासकरि । देखो अंक २०५ ||
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वृत्तिन्योमिसैं जानिहै, सो वृत्ति बी (२) नैयायिक आत्माका आनन्द गुण मानहैं । सो बी अनित्य मानहैं ।
जैसे दीपक अन्यपदार्थोंकूं अकाशरताहै, यहां ब्रह्म "सुख" औ "नित्य" कहाहै । यातैं तैंसैं ब्रह्मकूं प्रकाशनैमैं समर्थ नहीं हैं । पर्तु जैसे पात्रसैं ढांपी हुई। तीनोंमैं अतिच्याप्ति नहीं ॥ ३ जो केवलब्रह्म "नित्य" है, ऐसे कहैं तौ नैयायमतमैं आकाशकालआदिक नित्य माने-हैं, तिनमैं अतिच्याप्ति होवै, तिसके निवारण-अर्थे ब्रह्मके लक्षणमैं "नित्य"के साथि "प्रकाश" कहाहै ॥
नैयायिक आकाश-दिककूं नित्य मानहैं । पर्तु प्रकाशरूप नहीं जड मानहैं ॥ इहां ब्रह्म "नित्य" औ "प्रकाश" कहाहै । यातैं तिसके मतमैं अतिच्याप्ति नहीं । ३ जो केवलब्रह्म "प्रकाश" है, ऐसे कहैं तौ
(१) सूर्योदिक प्रकाशनमैं अतिच्याप्ति होवै, (२) वा नैयायमतमैं आत्माका आनन्द गुण मानहैं तिसमैं अतिच्याप्ति होवै ॥ (३) वा क्षणिककैविज्ञानवादिके मतमैं आत्मा क्षानिकविज्ञानरूप मानहैं । तिसमैं अतिच्याप्ति होवै ॥
तिसके निवारणअर्थे ब्रह्मके लक्षणमैं "प्रकाशके" साथि "विभु" कहाहै । (१) सूर्योदिकप्रकाश व्यापक नहीं हैं । किंतु परिच्छिन्न हैं । औ- (२) नैयायिक आत्माके ज्ञानगुणकूं व्यापक नहीं मानहैं । किंतु परिछिन्न मानहैं ।
॥१६॥ केबलवृत्तिकी विषयताकरी देखो अंक २०५ ॥१७॥ देखो अंक १७९ ॥ ॥१८॥ माया औ ताके कार्यरूप मलसैं रहित ॥१९॥ देखाकैवल्यस्तुकारि संतते रहित ॥२०॥ परिक्षाकूं ॥२१॥ देखो अंक ३४३ । ३६३ ॥
॥२२॥ जिसकौं लक्षण करीये तिसमैं वत्तिके तिसतैं औरपदार्थमैं बी लक्षणका वच्चेना ॥२३॥ गुण होवै सो जनिलह्दी होवैहै । ऐसा नियम है ॥ ॥२४॥ देखो अंक ३४३ ॥२५॥ देखो अंक ३४३ । ३५७ । ॥२६॥ देखो अंक १२७ ॥
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(२) तैसैं क्षणिकविज्ञानवादी क्षणिकविज्ञानकूं व्यापक नहींं मानेंहैं । किंतु परिच्छिन्न मानेंहैं ॥ यहां ब्रह्म "प्रकाश" औ "विषु" कह्याहै । यातैं तिनोंमैं अतिव्याप्ति नहींं ॥ ४ जो केवलब्रह्म "विषु" है । ऐसे कहैं तौ (१) आकाशादिक भी व्यापक हैं । तिनमैं अतिव्याप्ति होवै । औ—
(२) नैयैयिकप्रभाकर आत्माकूं विषु मानेंहैं तिसमैं अतिव्याप्ति होवै । वा— (३) सांख्यमतमैं प्रकृतिकूं व्यापक मानेंहैं । तिनमैं अतिव्याप्ति होवै ॥ तिसके निवारणअर्थ ब्रह्मके लक्षणमैं "विषु" के साथि "नामरूपका आधार" कह्याहै ।
(१) ऐंाकाशादिक विषु तौ हैं । परंतु नामरूपक आधार नहींं ह्वै ॥ (२) तैसैं नैयायिक औ प्रभाकर आत्माकूं विषु मानेंहैं । परंतु नामरूपका आधार नहींं मानेंहैं । औ—
(३) सांख्यमतमैं प्रकृतिकूं व्यापक मानेंहैं । परंतु नामरूपका आधार नहींं मानेंहैं । यहां ब्रह्म "विषु" औ "नामरूपका आधार" कह्याहै । यातैं तिनमैं अतिव्याप्ति नहींं ॥ ५ जो केवलब्रह्म "नामरूपका आधार" है, ऐसे कहैं तौ शांतिभासिक सर्पादिकनके नाम औ रूपके आधार रज्जुआदिक हैं ।
तिनमैं अतिव्याप्ति होवै, तिसके निवारणअर्थ ब्रह्मके लक्षणमैं "नामरूपका आधार"के साथि "मति न लखै जिहिं मति लखै" ( स्वयंप्रकाश ) कह्याहै ॥ यथापि "नामरूपका आधार" इस एकविशेषणसैहीं किसीमतके कोईपदार्थमैं ब्रह्मके लक्षणकी अतिव्याप्ति नहींं होवैहै औ चेतनांतमैं रज्जूआदिक स्थूलमैं कल्पितसर्पादिकनके नामरूपका आधार रज्जुप्रतिहितचेतनही अंगीकार कियाहै । रज्जु-
आदिककूं नामरूपकी आधारता कदिके अतिव्याप्ति निवारण करीहै सो स्थूल-
६ जो केवलब्रह्म "स्वयंप्रकाश" है, ऐसे कहैं तौ— (१) कोई उपासकोंने मतमैं आत्मा स्वयंप्रकाशेही मानहै । तिसमैं अतिव्याप्ति होवै ॥ तिसके निवारणअर्थ ब्रह्मके लक्षणमैं "स्वयंप्रकाश"के - साथि "शुद्ध" कह्याहै ॥
(२) उपासकोंने मतमैं आत्मा स्वयंप्रकाश औ अविद्यादिमलसहित मान्याहै ॥ यहां ब्रह्म "स्वयंप्रकाश" औ "शुद्ध" कह्याहै । यातैं तिनमैं अतिव्याप्ति नहींं ॥
७ जो केवलब्रह्म "शुद्ध" है ऐसे कहैं तौ सांख्यंमतमैं आत्मा शुद्ध मानेंहैं, तिसमैं अतिव्याप्ति होवै ॥ तिसके निवारणअर्थ ब्रह्मके लक्षणमैं "शुद्ध"के साथि "अपार" कियाहै ॥
॥३०॥ प्रथमपृष्टपर, स्वयंप्रकाश अर्थ सिद्ध
॥३१॥ देखो अंक १३६ ॥
॥३२॥ देखो अंक ३४३ ॥
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कदाहै ॥ सांख्यमतमें आत्मा शुद्ध तौ मानैहैं, परंतु अपार नहीं मानैहैं ॥ यद्यपि सांख्यमतमें आत्मा देशकालकरि अंतवाला नहीं, तथापि वस्तुकरि अंतवाला है । यातैं सर्वथा अपार नहीं औ इहाँ ब्रह्म "शुद्ध" औ "अपर" ( देशकालवस्तुकरि अंत रहित ) कदाहै । यातैं इसमें अत्यन्यासी नहीं ॥ यद्यपि "सुख नित्य" वा "नित्य प्रकाश" इसरीतिसैं दोदोविशेषण जो ऊपर दिखायेहैं, तिन दोदोविशेषणकरिही अत्यन्यासी तौ दूरी होवैहै, तथापि अधिक विशेषण जो कहेहैं, सो जिज्ञासुको तिन विशेषपोंका बोध होवै । इस निमित्त कहेहैं ॥ किंवा अनेकरीतिसैं ब्रह्मके लक्षणका ज्ञान होवै । इस निमित्त कहेहैं ॥
उक्तविशेषणोंकरि युक्त जो ब्रह्म "सो मैं हूँ" ऐसा यह दोहेका भावार्थ है । ॥ ९ ॥ शंका:—विष्णुशिवादिक देवनका शरणरूप मंगल कियांचाहिये । तिन देवनकों छोडिके अपना शरणरूप मंगल करना उचित नहीं है । याके समाधानका—
॥ दोहा ॥ अब्धि अपार स्वरूप ममं, लहरी विष्णु महेश ।
॥ ३३ ॥ यद्यपि समुद्रका तौ नौकाकरि पार आवैहै । यातैं समुद्रकी उपमा उपमेय ( स्वरूप ) के समान नहीं है । औ उपमा समानवस्तुकीही होवैहै । तथापि हस्तपादादिअंगकी क्रियाकरि समुद्रका पार आवै नहीं । तातैं समुद्रके समान स्वरूप कदाहै ॥ इहाँ समुद्रकी पूर्णउपमा नहीं है । किंतु छुसडउपमा है ॥
॥ ३४ ॥ शिव ॥
विधि रवि चंदा वरुन यम, शक्ति धनेस गनेस ॥ २ ॥ टीका:—मेरा (प्रत्यक्षआत्माका) स्वरूप समुद्रकी न्यायी अपार है । तिस मेरे स्वरूपभूत समुद्रकी विष्णु, महेशौं, विधि³, रवि, चंद्र, वरुण, यम, शक्ति³, धनेशौं, गपोेशौं, इसकरि उपलक्षित सर्वदेव लहरी हैं ॥ स्वस्वरूपवत् समुद्रमैं सवेंदेवता लहरी होनेतैं । अपनेअनुचित नहीं ॥ २ ॥
शंका:—विष्णुशिवादिक देव ईश्वरकी लहरी संभवैहैं । तुम्हारे स्वरूप ( प्रत्यक्षआत्मा ) की लहरी संभवै नहीं । यातैं ईश्वरका मंगल करना चाहिये । जैसे वृक्षके मूलमैं जलसेचनकै स्कंधादिककी औ प्राणके अहारतैं इंद्रियनकी दृप्ति होवै है । तैसे ईश्वरका मंगल किये सैं सर्वदेवताके मंगलककी सिद्धि, होवै है । हमारे (प्रत्यक्षआत्माके) मंगलसैं सर्वदेइवताके मंगलककी सिद्धि नहीं होवैहै । याके समाधानका—
॥ दोहा ॥ जा कृपाल सर्वज्ञको, हिय धरत मुनि ध्यान ।
॥३५॥ ब्रह्मा॥ वेदमतसैं विष्णु, शिव ईश्वरकोटीमें होनैतैं तिनका प्रथम ग्रहण है औ ब्रह्मा जीवकोटीमें होनैतैं तिसका पीछे ग्रहण है ॥
॥३६॥ जलकका अभिमानी देवता ॥
॥३७॥ धर्मराजा ॥
॥३८॥ देवी ॥
॥३९॥ कुबेर ॥
॥४०॥ गणपति ॥
॥४१॥ देखो ग्रंथ ५१६ ॥
॥४२॥ मायाविदिष्टचेतनकी ॥
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ताको होत उपाधितें, मोमैं. मिथ्या भान ॥ ३ ॥
टीका:— जिस कृपालु सर्वज्ञ ( ईश्वर ) का मुनि हृदयमें ध्यान धरैहैं, तिस ईश्वरका मायाउपाधिसैं जैसैं रज्जुमैं सर्पौदि औ स्वप्नमैं नगरादि भान होवैहैं, तैसैं मेरे स्वरूप ( प्रत्यगात्मा ) बिपै ( ईश्वर ) मिथ्याही भान होवैहै । कहैंतैं ? जो वस्तु जोकिपै कल्पित होवै सो तिसका रूपही होवैहै । ऐसा नियम है यातैं मेराही मंगल उचित है ॥ ३ ॥
शंका:— ईश्वर तौ शुद्धब्रह्ममैं अधिष्ठित है । तुम्हारे स्वरूप ( प्रत्यगात्मा ) मैं नहीं । यातैं निर्गुणब्रह्मका मंगल करना चाहिये । तिसके मंगलसैं सर्वके मंगलकी सिद्धि होवैगी । तुम्हारे मंगलकरनि नहीं । याके समाधानकाँ—
॥ दोहा ॥ नहै जिंहिं जानै बिन जगत, मनहु जेवरी साप। नसैं भुजग जग जिन्हिं लहै, सोज्हैं आपे आप ॥ ४ ॥
टीका:— जैसैं जेवरिौं जानै बिना सर्प प्रतीत होवैहै । तैसैं जिस ( ब्रह्म )कौं जानै बिना यह जगत् प्रतीत होवैहै ॥ औ जेवरिके जाननैसैं जैसैं सर्प नाश होवैहै । तैसैं तिस ( ब्रह्म )कौं जाननैसैं यह जगत निद्धत्त होवैहै । सो अधिष्ठानरूप शुद्धब्रह्म मैं आपे आप हूं ॥ "आपे आप" कहनैकै अर्थ:— अंशांश्रीभाव, वा विकारविकारीभाव, वा उपासकउपास्यभाव-
॥४३॥ कल्पित ॥ ॥४४॥ कारणेकी अधीनता, प्रकाशककी अधी-
आदिक कोई बी रीतिसैं मेरा औ ब्रह्मका किंचित् भेद नहीं । यह सूचन किया, औ भेदके अभावतैं कार्यतारूप, प्रकाश्यतारूप, औ आधेयतारूप जे तीनैंप्रकारकी परतंत्रता हैं, तिनतैं मैं रहित हूं । यह बी सूचन किया ॥ यातैं मेरा ( प्रत्यगात्माका ) मंगलही शुद्ध-ब्रह्मका मंगल है ॥ ४ ॥
शंका:— तुम्हारे परम्परागुरु दौंढ़ीजीके सम्प्रदायकै इष्टदेव श्रीरामजीका तौ नमस्काररूप मंगल करना चाहिये । याके समाधानकाँ—
॥ दोहा ॥ वोध चाहि जाको सुकृति, भजत राम निष्काम । सो मेरो है आत्मा, काकूं करूं प्रणाम ॥ ५ ॥
टीका:— जिस रामजीको बोधकी चाहना करिके सुकृति निष्काम भजैहैं । सो रामजी मेरो आत्मा ( स्वरूप ) है ( दादूदयालजीके सम्प्रदायमैं रामजी निर्गुणब्रह्मसरूप होतैं ) यातैं मैं किसकौं प्रणाम करूं ? मेरैतैं भिन्न और-वस्तुकै अभावतैं किसीहूँ की प्रणाम नहीं करूं । यह भाव है । अथवा जिस ( परब्रह्म )के बोधकी चाहना-करि सुकृतिपुरप रामजीकौं निष्काम भजैहैं, सो परब्रह्म मेरो आत्मा ( स्वरूप ) है । ( सोई रामजी है ) यातैं सर्वको अधिष्ठान मैं किसकूं प्रणाम करूं ? मेरैतैं भिन्न औरकोई वस्तु हैही नहीं । जाको मैं प्रणाम करूं । यह भाव है ॥
इति श्रीविचारसागरके मंगलके पंचदोहेकी टीका संपूर्णे ॥
नता औ आधारकी अधीनता, ये तीन परतंत्रता ॥ ॥४५॥ दादूपंथी । रामके नामकी धून लगातेहैं ॥
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|| सवैयाछंद ||
ध्यान आंगग्रह प्रनचऱपको। कह्यो सुरेश्वऱ शुति अनुसार'।। अछर प्रनच ब्रह्म ममरूप धु। यूं अहुलच निजमति गति धार।।
ध्यानसमान आन नहीं याके। पंचीकरनप्रकार विचारे।। जो यह करत उपासन् सो मुनी। तुर्त नै संसार झपात।। १६८ ।।
( श्रीविचारसागर अंक || ३८१ || )
|| सवैयाछंद ||
जो यह निर्गुनध्यान न वहे तो। सगुनईस करि मनको धाम।। सगुनउपासन्हूं नहिंं वहे तो। करि निष्कामकर्म भजि राम।।
जो निष्कामकर्महू नहिंं वहे। तो करिये शुमकर्म सकाम।। जो सकामकर्महू नहीं होवै। तो सठ वारवार मरि जाम ।। १६९ ।।
( श्रीविचारसागर अंक || ३०३ || )
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॥ श्रीविचारसागर ॥
॥ प्रथमस्तरंग: ॥ १ ॥
॥ अथ अनुवन्धसामान्यनिरूपणम् ॥
॥ ९ ॥ अथ वस्तुनिर्देशारूप मंगल ॥
॥ दोहा ॥ जो सुख नित्य प्रकाश विभु, नाम रूप आधार ॥ मति न लखै जिंहि मति लखै, सो मैं सुद्ध अपार ॥ १ ॥ अबिधि अपार स्वरूप मम, लहरी विष्णुमहेस । विधि रवि चंदा वरुन यम, सक्ति धनेस गनेस ॥ २ ॥ जा कृपालुं सर्वज्ञको, हिय धरत मुनि ध्यान ॥ ताको होत उपाधितें, प्रतिबादी सौं सिकांतकरिके वा गुरु- शिष्यकरिके कियो जो जड़चेतनभाधिक पदार्थनका विवेचन कहिये निर्णय, सो विचार कहियेहै ॥ इहां विचारशब्दसैं अजहत्साक्षणाकारेके प्रतिबादीभाधिक- करि निश्चित अर्थरूप विचारके विषयका नीं ग्रहण है ॥ सो विचारका विषयरूप निश्चितअर्थही सिद्धांत है ॥ यांतें
१ प्रतिबादी वा शिष्यरूप पवनकरिके प्रेरित जो सिद्धांती वा गुरु रूप मेघ ।
मोमैं मिथ्या भान ॥ ३ ॥ नहै जिंहि जानै विन जगत, मनहु जेरी साप ॥ नसै भुजग जग जिंहि लहै । सोजहं आपे आप ॥ ४ ॥ बोध चाहि जाकौं सुकृति, भजत राम निष्काम ॥ सो मेरो है आतमा, काकूं करूं प्रणाम ॥ ५ ॥ ॥ २ ॥ ग्रंथमहिमा ॥ २—३ ॥ भन्यो वेद सिद्धांतजल, जामैं अतिगंभीर ॥ अस विचारसागर कहूं, २ तिसकरि भई जो विचाररुप जलक्री वर्णीहै । ३ तासहित ताकौं विषयरूप वेदका सिद्धांत जल है ।
४ ताकौं सागरकी 'न्याई विस्तीर्ण' होनेकरि सागररुप यह ग्रंथ है । यांतें सो विचारसागर कहियेहै ॥
१ धाकीं आदितैं लेके अंतपर्यंतके वर्णोंकी समष्टि- रूप भूमिका है । २ तामैं उक्त वेदका सिद्धांतरुप जलं भरा है ।
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पेखि मुंदित रहै धीरैँ ॥ ६ ॥ सूत्र भाष्य वार्तिक प्रभृति, ग्रंथ बहुत सुरबानि ॥ तथापि मैं भाषा करूं, लेखि मतिमंद अजानि ॥ ७ ॥
टीका:-यथापि सूत्रभाष्यवार्तिकसंप्रदायेन ३ याके ससप्रकरणरूप तरंग कहिये लहरियां हैं । ४ यामैं अनेकछंदरूप स्वल्प जलजंतु हैं औ ५ कठिनप्रसंगरूप मकर हैं औ ६ उत्तमछंदरूप सीपियां हैं । ७ तिनमैं वर्णनैैयैपीआदिक मौक्तिक हैं । औ ८ यामैं शुद्धस्वरूपके निरणयरूप मणि- माणिक्यआदिक हैं । औ ९ विवेकादिसाधनरूप चतुर्दशा रत्न हैं । १० याके उल्हंचन करनेकूं बुद्धिसुकी बिंदुरूप नौका है । औ ११ अध्याससरूप खुबपवन है । औ १२ ब्रह्मानिष्ठगुरुवरूप कर्णधार नाम केवट है । १३ याका संसाररूप कुदेशसैं संबंधी अज्ञान- रूप अवारस्तीर है । औ १४ मोक्षरूप सुदेशसैं संबंधी ज्ञानरूप पार- तीर है । १५ याके श्रद्धापूर्वक पढनेलुप उल्हंचन करनका मोक्षरूप सुदेशकी प्राप्ति फल है । ऐसा यह विचारसागरनामा ग्रंथ है ॥
॥ २ ॥ पेखि कहिये गुरुमुखद्वारा श्रद्धाभक्तिपूर्वक याके श्रवणमनननकरूप विचारकरिके ॥ ॥ ३ ॥ मुंदित कहिये स्वल्पके साक्षात्काररूप अपरोक्षज्ञानद्वारा अविव्यातत्कार्येलुप अनर्थेकी निवृत्ति- पूर्वक परमानंदकूं प्राप्त होवैहै ॥ ॥ ४ ॥ "धीः" जो बुद्धि । ताकूं "र" कहिये ऋषिमतते रक्षा करै । ऐसा जो ब्रह्मचर्यआदिक साधन- करि संपन्न अधिकारी, सो इहां "धीः" कहियेहै ॥ ॥ ५ ॥ स्वल्पमात्रोंवाला, असंदिगध कहिये
काहिये आदिलेके, सुरबानि कहिये संस्कृतग्रंथ बहुत हैं । तथापि संस्कृतग्रंथनसैं मंदबुद्धिपुरुषन- कूं बोध होवै नहीं औ मापाग्रंथनसैं मंदबुद्धि- पुरुषनकूं बी बोध होवैहै । यातैं मापाग्रंथका आरंभ निष्फल नहीं । किंतु संस्कृतग्रंथनके विचारनैविचै जिनकी बुद्धि समर्थ नहीं है, तिनके लिये ग्रंथका आरंभ सफल है ॥ ७ ॥ निःसंदेहेसारवाला, सर्वओर प्रवृत्त होनेवाला, किसी- करि वी रोकनैकों अशक्य औ निर्दोष जो वाक्य सो सूत्र कहियेहै ॥ ऐसैं सूत्रनके समुदायरूप षट्- शास्त्रआदिक अनेकग्रंथ हैं । तिनमैं इहां वेदव्यासरचित १५ ब्रह्मसूत्ररूप उत्तरमीमांसाशास्त्रका "सूत्र" शब्दकारिके ग्रहण है । औ उपनिषद् औ गीता- आदिकअन्यग्रंथनका "प्रभृति" शब्दकारिके ग्रहण है ॥
॥ ६ ॥ सूत्रादिरूप मूलग्रंथागत पदकूं लेके ताके पर्यायरूप स्वपदोंकूं कहिके फेर मूलग्रंथ पदनकूं अनुसारी पदकारिके, जो स्वपदोंकूं विवरण कहिये विशेषकारिके वर्णन सो "भाष्य" कहिये है । ऐसें भाष्य अनेक हैं । तिनमैंसैं इहां श्रीशंकर- चार्यिकृत भाष्यका ग्रहण है ॥ ७ ॥ मूलग्रंथकारकि उक्त अनुुक्त औ विरुद्ध उक्तअर्थका चिंतन जो विचार सो जिसविषै होवै, ऐसा जो श्लोकबद्धव्याख्यान, सो "वार्तिक" कहियेहै । तैसें वार्तिक बी अनेक हैं । तिनमैंसैं इहां श्रीशंकराचार्यके शिष्य श्रीसुरेश्वराचार्य ( मंडनमिश्र ) कृत वार्तिकका ग्रहण है ॥
॥ ८ ॥ मतिमंद कहिये संस्कृतग्रंथनके विचारने विषै जिनकी अल्पबुद्धि है औ अज्ञान कहिये स्वरूप- के अज्ञानी हैं, ऐसैं पुरुषनकूं उल्हि कहिये जानिके मैं भाषाग्रंथकूं करताहूं ॥ इस कथनकरि "संस्कृततैं अल्पमतिवालों औ स्वरूपका अज्ञानी या भाषां- ग्रंथका अधिकारी" कव्या ॥ १ भाषां । औ संस्कृत दोंनूंविषै स्वल्पमतिवाले अज्ञानी तौ अनेक पामर औ विषयी जीव हैं । वे
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॥ ३ ॥ . ॥ दोहा ॥ कविजनकृत भापा बहुत, ग्रंथ जगत विख्यात । विन विचारसागर लखै, नहीं संदेह नसान ॥१॥ टीका:-यद्यपि भापाग्रंथ बहुत हैं, तथापि विचारसागर विनां आरंभापाग्रंथनसैं आत्मवस्तुविषैं संदेह दूरि होवें नहीं । याकेविचैं यह हेतु है:- १ कितने तौ श्रवणकरिके भापाग्रंथ रचें हैं । जैसैं पंचभापा हैं ॥ तिनकी प्रक्रियाँ कहैंअंशमैं तौ शास्त्रके अनुसर है औ जो श्रवण किया अर्थ येंथार्थे ग्रहण नहीं हुवा तिस अंशमैं शास्त्रसैं विरुद्ध हैं । यांतैं श्रोताकृतग्रंथसैं संदेहरहित क्रोध होवें नहीं ॥ २ और कोई भापाग्रंथ चिंतचितशास्त्र पड़िके रचेंहैं । जैसैं औत्मखोध हैं । तिनसैं वी संदेहरहित क्रोध होवें नहीं । कहैंतैं तिनमैं वेदांतकी प्रक्रिया संपूर्ण नहीं हैं । औ विचारसागरग्रंथमैं संपूर्णी प्रक्रिया है औ वेदांतशास्त्रके अनुसर है । कहाष्टानमैं वी विरुद्ध नहीं है औ आत्मज्ञानमैं उपयोगी जो पदार्थ मूलैं होवेंतैं आपकूं अज्ञानी मानते नहीं किंतु ज्ञानी मानतेहैं । यांतैं जिज्ञासाके अभावतैं विवाहविषैं धनाधिकारी पंढपुरुषकी न्यायी वे ग्रंथविपैं अधिकारी नहीं । औ ३ संस्कृतविषैं अल्पमतिवाले तो केहक भापाके वेत्ता ज्ञानी वी हैं । वे भापाग्रंथविषैं अल्पमतिवाले नहीं । यांतैं जिज्ञासाके अभावतैं ग्रंथविपैं अधिकारी नहीं किंतु मुक्त हैं । औ ३ भज्ञानी तो केहक ( पामर वा विपयप्री वा जिज्ञासुरूप ) संस्कृतके वेत्ता वी हैं । वे अल्पमतिवाले नहीं । यांतैं भापाग्रंथविपैं अधिकार नाहीं ॥
हैं, तिनका निरूपण विस्तारसैं कियाहै । यांतैं आरंभापाग्रंथनके समान यह ग्रंथ नहीं है । किंतु सर्वेभापाग्रंथनसैं यह ग्रंथ उत्तम है ॥ ८ ॥ ॥ अनुवंधनान ॥ ॥ चौपाई ॥ नहीं अनुवंध पिछानै जोइ, वहै न प्रवीत्त सुगधरनर तौलौं ॥ जानि जिनै यह सुनै प्रवंधा, कहूं व यांतैं ते अनुवंधा ॥ ९ ॥ टीका:-अधिकारी, संबंध, विपय औ प्रयोजनका नाम अनुवंध है । अधिकराईआदिक ग्रंथके अनुवंध जानैं विनां सुगधर कहिये विवेकीपुरुषकी ग्रंथनमैं प्रवित्ति होवें नहीं । यांतैं जिन अनुवंधनकूं व कहिये अथ कहूं, ॥ सोरटा ॥ अधिकारी संबंध, विपय प्रयोजन मेलि चव ॥ कहत सुकवि अनुवंध, तिनमैं अधिकारी सुनहु ॥ १० ॥ यांतैं उपरि कहा जो लक्षण सो निदोंष है ॥ ॥ ९ ॥ पट्टप्रश्नो । रासप्रश्नो । ज्ञानमंजरी । ज्ञानचूर्ण । वेदांतसार । पंचीकरण । ये मनोहरदासकृत पट्टभाया ग्रंथ हैं तिनमैं पंचीकरण स्वल्प है, ताकूं छोड़िके पंचभापा कहिये हैं ॥ ॥ १० ॥ इंद्रिककी वा चित्तकी चंचलतासैं श्रवण किया अर्थ स्मृतके अभ्रिक मैं न्योंईं ज्यौंका त्यौं. धारण नहीं हुवा ॥ ॥ ११ ॥साधु श्रीमाणकदासजी कृत माणकवाध है। याहीकूं आत्मविचार वी कहतेंहें । जिसकै . ऊपर मूलचंद्रज्ञानैं सारोद्धरत्नामक व्याख्यान किया है.॥
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॥ ५ ॥ अधिकारीवर्णन ॥ ५-२३ ॥
॥ दोहा ॥ मलविच्छेप जाके नहीं, किंतु एक अज्ञान । लहै चव साधनसहित नर, सो अधिकृत मतिमान ॥ ११ ॥
टीका:-अंतःकरणविषै तीन दोष होवैहैं:- १ एक तौ मल होवैहै । २ दूसरा विक्षेप होवैहै औ ३ तीसरा आवरण होवैहै । (१)निष्कामकर्मसैं अंतःकरणका मलदोष दूरी होवैहै । ( २ ) उपासनासैं विक्षेपदोष दूरी होवैहै । ( ३ ) ज्ञानसैं आवरणदोष दूरी होवैहै ॥ जा पुरुषनै निष्कामकर्म औ उपासनाकरिके मल औ विक्षेपदोष दूरी कियेहैं औ एकअज्ञान कहिये अज्ञानका आवरण जाके चित्तविषै होवै औ च्यारिसाधनसंयुक्त होवै, सो पुरुष अधिकृत कहिये है ॥ ११ ॥
॥६॥ अथ च्यारिसाधन वर्णनन ॥६-१४॥
॥ दोहा ॥ प्रथम विवेक विराग पुनि;
॥ १२ ॥ इहाँ - यह शंका है:- (अन्योँकूँ जीतनेकी इच्छावाले ) जे पंडित हैं, तिनकूँ वि “आत्मा नित्य है” औ “आत्मासँ भिन्न देहादिप्रपंचरूप अनात्मा अनित्य है ” इस प्रकारवाला वेदज्ञानरूप विवेक होवैहै । सो विवेक वैराग्यतें आदिलेकै उत्तसाधनोंका हेतुहि कैसैं होता नहीं ? याका यह समाधान है:-उक्तविजिगीषु पंडितनकूँ यद्यपि शास्त्रके अभ्यासैं विवेकज्ञान होवैहै । तथापि सो निष्कामकर्मउपासनासैं शुद्धिरहित मलिन अंतःकरण-देशविषै उदय होवैहैं । यातैं १ अन्यदेशसैं उठाइकै जल्संबंधरहित उँषर-भूमिविषै गाडे हुये कदलीवृक्षकी न्यायँ वैराग्यादि-उत्तरसाधनरूप अन्यवृक्षोंकी परंपराका हेतु नहीं होवै-
शमादि षट्संपत्ति ॥ कही चतुर्थ मुुुच्ुछुतां, ये चव साधन सत्ति ॥ १२ ॥
॥ ७ ॥ ॥ ( १ ) अथ विवेकलक्षण ॥ ॥ दोहा ॥ अविनासी आत्म अचल, जग तैंतैं प्रतिकूल ॥ ऐसो ज्ञान विवेक है । सब साधनको मूल ॥ १३॥
टीका:- १ आत्मा अविनाशी कहिये नाशरहित है औ अचल कहिये क्रियारहित है । औ २ जगत् आत्मतैं प्रतिकूल कहिये विपरीत-स्वभाववाला है, विनाशी है औ चल है । या ज्ञानका नाम विवेक है ॥ यह विवेकही सर्वसाधनका मूल है । कहैंतैं? प्रथम विवेक होवै तौ वैराग्यसैं आदिलेकै उतरसाधन होवैहैं औ विवेक नहीं होवै तौ उतरसाधन होवै नहीं । यातैं वैराग्य शमादिपद-संपत्ति औ मुुुमुक्षुता इनका हेतु विवेक है ॥१३॥
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|| < ||(२) अथ वैराग्यलक्षण ||
|| दोहा || ब्रह्मलोक लौं भोग जोई, चहै सवनको त्याग || वेदअर्थ ज्ञाता मुनी, कहते ताहीं बिरागी || ९ ||
||(३) अथ समाधिपटटनाम ||९-१३||
|| दोहा || सम दम श्रद्धा तीसरी, समाधान उपराम || छठी तितिच्छा जानिये, भिन्न भिन्न यह नाम || १० ||
|| [१-२] अथ शामदमलक्षण ||
|| दोहा || मन विपयनतें रोकनौं, सम तिहीं कहत सुधीर || ११ ||
जैसैं रंग (कहिये) रहित काचमपियै मुखके देखेहुए नेत्रकी दृष्टि बाहर निकस जातीहै । तैसैं इंद्रियरूप द्वारके विपयनतें निरोधरूप दमचिना मनका निरोधरूप दाम सिद्ध होवै नहीं भौं लगामके पकड़ैविना अभ्यासी =यौंहि= मनके निरोधरूप शामचिना इंद्रियनका निरोधरूप दम सिद्ध होवै नहीं, यांतैं इन दामदमकी परस्पर अपेक्षा है । तैसैं सारी पट्संप्रत्तिकी परस्परअपेक्षा है । सो आगैं २० वें दोहाके टिप्पनमें कहैंगे || १२ ||
( १ ) सर्वसाधनोंकी संपत्तिरूप दक्षि-मथनकी सामग्रीचिपै श्रद्धारूप मथनपात्र है । ताके नाश व्यर्थता होवैहै || ( २ ) किंवा सर्वसाधनोंकी संपत्तिरूप वृक्षनका श्रद्धारूप फल है । ताके नाश भये सर्वसाधनोंकी व्यर्थता होवैहै । श्रद्धाके होते भन्य सर्वसाधनोंकी सफलता होवैहै ।
इंद्रियगनको रोकैनौं, दम भाखत बुधवीर || १६ ||
||[३-५]अथ श्रद्धासमाधांनलक्षणा||
|| दोहा || सत्य वेद गुरु वाक्य हैं, श्रद्धा अरु विश्वास || समाधान ताईं कहत, मन विशेषको नास || १७ ||
|| [५ ] अथ उपरामलक्षण ||
|| चौपाई || सौधनसहित कर्म सब त्यागै । लिखि विख सम विपयनतें भागै || हैगि नांहीं लखि वैहि ग्लानि । यह लच्छन उपराम वखाना || १८ ||
यांतैं ज्ञानके सर्वसाधनोंचिपै श्रद्धा जो है सो मुख्य-साधन है । ताका कुसंगभादिक नाशके निमित्ततैं रक्षण करना योग्य है ||
साधनसम्पत्तिरूप दक्षिमथनकी सामग्रीका रूपक हमनै श्रीचोभरनाकरके प्रथमरनविपै लिखया है भौं इसही साधनसमग्रूप वृक्षनका रूपक हमने श्रीबाल-बोधिनोटीकासहित बालबोधके प्रथम उपदेशाविषै विस्तारसैं लिख्याहै ||
|| १५ || त्या किये पीढ़े प्राम भये । विषयनकी इच्छाका अभाव उपराम कहियेहै । याहीकौं उपरत्ति बी कहैहैं || यहही फेर भोगनमें अदीनतारूप वैराग्यका फल है ||
|| १६ || र्ही धन जाति अभिमान आदि कर्मकी सामग्रीसहित ||
|| १७ || यच्यपि यहां " विषयनतें भागै " इस कथनकरि ह्री आदिक सर्वविपयनमें ग्लानि दिखाई । फेर बी नारीरूप विषयमें ग्लानिके कथनतैं पुनरुक्ति-
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॥ १३ ॥ ॥[६] अथ तितिक्षालक्षण ॥
॥ दोहा ॥
आतप सीत चुद्रा तृपा, इनको सहन स्वभाव ॥
ताहि तितिच्छा कहतहैं, कोविद मुनिवर राव ॥ १९ ॥
रूप दोष होवैहै । तथापि अनन्तजन्मविवेक किये नारीसंगके संस्कारकी तीव्रतातैं औ नारीविवै शब्द स्पष्टै रूप मुखचुम्बनादिक रस अतिर फुलेल आदि गंध औ मैथुन, इन घटविषयनके बहुत्तकारि लाभतैं नारी-रूप विषय अन्यसर्वविषयनतैं प्रबल है । यातैं विवेकहै अतिशयंगलनि करनी चाहिये । इस अभिप्राय-सैं ताका फेर कथन कियाहै । यातैं इहाँ पुनरुक्ति जो है सो दूषणरूप नहीं किंतु भूषणरूप है ॥
॥ १८ ॥ कोविद कहिये पंडित, ऐसैं मुनि जो संन्यासी, तिनमैं वर कहिये श्रेष्ठ जो विद्वत्संन्यासी, तिनके राव कहिये आचार्य ॥
॥ १९ ॥ जैसैं सुवर्णरचित अनेक मणकोंकी माला एक भूषणकरिके गिनियेहै । तैसैं परस्परसहकारी शमदमादिक घटसाधनोंकी प्राप्तिरूप घटसंप्रत्ति बी एकँ साधनकरिके गिनियेहै ॥शमादिष्टसाधनॉकी प्रसिद्धि है:-
१ ( १ ) मननिरोधरूप शमविना इन्द्रियनका निरोध होता नहीं । यातैं दमकूँ शमकी अपेक्षा है । औ
( २ ) मनके निरोधविना बहिरमुख ( वीपुत्रादिविषयविषै आसक्त ) भये मनकी वेदान्तशास्त्र औ सदृर्रविवै पूर्णश्रद्धा रहती नहीं । यातैं श्रद्धाकूँ बी शमकी अपेक्षा है । औ
( ३ ) मनके निरोधविना चित्तकी एकाग्रता होवै नहीं । यातैं समाधाककूँ बी शमकी अपेक्षा है । औ
( ४ ) जैसैं दुग्धादि उत्तम आहारसैं पालन किया अवद्रविल्क्ष मूषककूँ देखिके ठहरता नहीं । किंतु मूषाके ऊपर दौड़ता है । तैसैं विषयनतैं उपरामकूँ पाया जो
भाखत साधन एक ॥
इम नव नहिं साधन मने, किंतु च्यारि सविवेक ॥ २० ॥
टीका:-शमादिपदककी जो संप्रत्ति कहिये प्राप्ति, सो ऐंक्साधनकरिके गिनियेहै । यातैं नवसाधन नहीं किंतु सविवेक कहिये विवेकी-जन च्यारिसाधन कहेहै ॥ २० ॥
मन, सो निरोधरूप रसीसैं मुक्त ह्या ठहरता नहीं किंतु प्राप्तविषयकके ऊपर दौड़ताहै । यातैं उपरामकूँ बी शमकी अपेक्षा है । औ
( ५ ). अंतर्मुख भये मनसैं शीतउष्णादिद्वंद्वदका सहन होवैहै । वहिरमुख मनसैं नहीं । यातैं तितिक्ष-की बी शमकी अपेक्षा है ॥
इसीरीतिसैं शमादिकनकी सहकारिता है कहिये सहायकता है ॥
२ (१) तैसैं कथनविना काचविवै नेत्रवृत्तिकी नियांँ नहीं । यातैं रामकूँ दमकी अपेक्षा है । औ
( २ ) रूपादि विषयविवै तत्पर भये पुरुषकूँ सत्-शास्त्र औ सदुर्रविवै श्रद्धा रहती नहीं । यातैं श्रासाकूँ बी दमकी अपेक्षा है । औ
( ३ ) इन्द्रियके निरोधविना चंचल भये मनविवै एकाग्रता. ठहरती नहीं । यातैं समाधाककूँ बी दमकी अपेक्षा है । औ
( ४ ) इन्द्रियके रोकविना प्रत्यक्षानुभव किये अनूभवअविषयनविवै रागके उदयत्संस्कारद्वारा इच्छा होवैहै । यातैं उपरामकूँ बी दमकी अपेक्षा है । औ
( ५ ) इन्द्रियके निरोधविना विषयनके दर्शनकरि विक्षिप्त भये मनसैं द्वंद्वशमका सहन होता नहीं यातैं तितिक्षाकूँ बी दमकी अपेक्षा है ॥
इसीरीतिसैं दमकूँ शमआदिकनकी सहकारिता है ।
३. तैसैं सहहु जो संतशाखके वचननविषै विश्वास-
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॥ १४ ॥ ( ८ ) अथ मुस्खुतालक्षण ॥
॥ दोहा ॥ ब्रह्मप्राप्ति अरु बंधकी, हानि मोछको रूप ॥ ताकी चाह मुसुच्छता, भाखत मुनिवरभूप ॥ २१ ॥
टीका:-ब्रह्मकी प्राप्ति औ अनर्थकी निस्तृति मोक्षका स्वरूप है । ताकी इच्छाका नाम मुसुच्छता है ॥ मुसुखता औ मुसुखत्व पैर्योंय-शब्द हैं ॥ २१ ॥
॥ दोहा ॥ ये चव साधन ज्ञनेक, श्रवणादिकत्रय मेलि ॥
रूप श्रद्धाविना श्रवणमेंँ प्रकृष्टिकी इच्छाके अभावतें पतिके पास जानेविऱै उपयोगी श्रृंगारकूं विध्याकी न्हाई श्रवणविर्यै उपयोगी शमआदिक कोई वू साधनकूं पुरुप धारण करै नहीं भों श्रद्धाविना धारण किये सर्वसाधनोंकी विध्या करि किये श्रृंगारकी न्यायी व्यर्थता है । यातैं शमआदिक सर्वेसाधनकूं श्रद्धाकी अपेक्षा है । इसरीतिसें श्रद्धाकूं शमादिक सर्वसाधनकी सदकारिता रिता स्पष्ट है ॥
४ तैसैं चित्तकी एकाग्रताविना वू शमादिक साधन सिद्ध होते नहीं । यातैं शमादिकनकूं समाधानकी अपेक्षा है ॥ इसरीतिसें समाधानकूं शम-आदिकनकी सहकारिता है ॥
५ तैसैं विषयनतें चित्तके उपराम हयोविना शम-आदिक कोई वू साधन सिद्ध होता नाहीं । यातैं शमआदिकनकूं उपरामकी अपेक्षा हैँ ॥ इसरीतिसैं उपरामकूं शमआदिकनकी सहकारिता है ॥
६ तैसैं शीतउष्ण क्षुधातृषा हानि लाभ आदिक अनेक व्यावहारिक उपद्रवके सहनविना मननिरोध इंद्रिय-निरोध गुरुशाखवचनविमें आसक्तता चित्तेक-मता औ प्राप्त धनआदिक विषयनतैं उपरामता सिद्ध
तत्पद त्वंपद अर्थको, सोधन अष्टम मेलि ॥ २२ ॥
टीका:-विवेकादि च्यारी, श्रवण मनन निदिध्यासन ये तीनि, तत्पदके अर्थका औ त्वंपदके अर्थका शोधैं, ये अष्ट ज्ञानेक साधन हैं ॥ २२ ॥
॥१५ अंतरंग औ बहिरंगसाधन१५—१६॥ ॥ दोहा ॥ अंतरंग ये आठ हैं, यज्ञादिक बहिरंग ॥ अंतरंग धौरै तजै, वहिरंगको संग ॥ २३ ॥
होयें नहीं । यातैं शमादिकनकूं तितिक्षारूप तपकी अपेक्षाके होतें तितिक्षाकूं शमआदिकनकी सहकारिता है ॥ इसप्रकारसें शमादिकनकूं परस्परकी सहकारिता है । यातैं इन पट्कूं एकसाधनरुपता है ॥
॥ २० ॥ मुनि जो संयासी तिनविषें वर कहिये श्रेष्ठ ऐसे जो विद्वत्संन्यासी, तिनके भूप कहिये आचार्य ॥
॥ २१ ॥ एकअर्थवाले दोशब्द परस्पर पर्याय कहियेहैं ॥
॥ २२ ॥ चेतनका औ जडका क्रमेंत कार्यकारण-पना औ अधिष्ठानाध्यस्तपना औ दृष्टादृष्टपना औ साक्षीसाक्ष्यपना जो है, तिसकां शाब्दिक अनेक प्रक्रियाकारिके जो विचार करना कहिये हँस्पक्षी-करि क्षीरनीरके विभागकी न्यायी किया घृत औ तक ( मठा ) के विभागकी न्यायी किया मृत्तिका-पदाथेरोशधन कहिये है । वेदांतशास्त्र उत्त सर्व-प्रक्रियाका इसी अर्थके लखावनेविमें तात्पर्य है । जो यहही अर्थ महावाक्यके अर्थके ज्ञानविमें उपयोगी है । यातैं उत्तपदार्थशोधन मुसुखकंद्र सम्यक् कर्तव्य है ॥
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टीका:-९ पूर्ववदोदेहमें कहे विवेकादिक आठ अंतरंगैसाधन कहियेहैं औ २ यज्ञादिकर्म बहिरंग-साधन कहियेहै । तिनमें बहिरंगनकूं जिज्ञासु त्यागै औ अंतरंगकूं धारै ॥
९ जिनका श्रवणमें अथवा ज्ञानमें प्रत्यक्षफल होवै सो अंतरंगसाधन कहियेहै। विवेकादिक च्यारिका श्रवणमें उपयोग है । कहैंतैं ? (९) विवेकादिकविना बहिरंगकूं श्रवण बनै नहीं ॥
(२) तैसैं श्रवणमनननिदिध्यासनका ज्ञानमें उपयोग है । श्रवणादिकविना ज्ञान होवै नहीं ॥
॥ २३ ॥ जैसैं धनुषसैं छूटैया जो बाण सो लक्ष्य ( अमाज ) के वैधनेका समीपवर्ती हुया साधन है । यातैं सो ताका अंतरंगसाधन है ।
तैसैं विवेकादिक आठ ज्ञानके समीपवर्ती हुये साधन हैं । यातैं वे ज्ञानके अंतरंगसाधन कहिये हैं ॥
॥ २४ ॥ जैसैं धनुष जो है सो लक्ष्यके वैधनेका दूरवर्ती हुया बाणके छुट्टनैद्वारा साधन है । यातैं सो ताका बहिरंगसाधन है ॥
तैसैं यज्ञ औ सगुणउपासना आदिक कर्म बी ज्ञानका दूरवर्तिं हुया । पाप औ भौ विक्षेपरूप मलतककी यथायोग्य निवृत्तिरूप चित्तशुद्धिपूर्वक जिज्ञासाद्वारा साधन है ।
यातैं सो ज्ञानका बहिरंगसाधन कहिये है ॥
॥ २५ ॥ जैसैं क्रोधैं गिन्या पुरुष प्रवृत्त हइया भ्रष्टीका जड्यादिक आश्रयकूं पकड़ताहै । 'पीछे जब कोई दयालुपुरुष रस्सी मेरे तब उत्तआश्रयका त्याग करिके रस्सीकूं पकड़ताहैं । परंतु रस्सीकी प्रासिविना जो उत्तआश्रयका त्याग करै तो उभयभ्रष्ट होयके रूपमेंह इबताहै ॥
तैसैं जन्ममरणरूप जड़करिे युक्त संसाररूप गिन्या जो जीव . सो सत्संगादिकनिमित्त-
( ३ ) तैसैं तत्पदका अर्थ औ त्वंपदका अर्थ जानै बिना बी अभेदज्ञान होवै नहीं ॥
इसरीतिसैं विवेकादिक च्यारी साधनोंका श्रवणमें उपयोग है औ श्रवणादिक च्यारी साधनोंका ज्ञानमें उपयोग है ॥ यातैं आठ अंतरंगसाधन हैं ॥
॥ २६ ॥ २ जिनका ज्ञानमें अथवा श्रवणमें प्रत्यक्षफल होवै नहीं किंतु अंतःकरणकी शुद्धि जाका फल होवै सो ज्ञानका बहिरंगसाधन कहियेहै ॥ ऐसे यज्ञादिक कर्म हैं ॥
यद्यपि यज्ञादिक कर्म संसारके साधन हैं । तिनतैं अंतःकरणकी शुद्धि बी कहना संभवै नहीं । तथापि सकामपुरुषकूं संसारके
करि प्राप्त भई शुभवासनासैं कर्मउपासनाादिषै प्रवृत्त होवैहै । जब दयालुपुरुषकी कृपाकरिे चित्त-शुद्धिपूर्वक जिज्ञासादिक साधनकी प्राप्ति होवै ।
तब सो पुरुष जिज्ञासु हुया कर्मरूप बहिरंगसाधनका त्यागकारिके विवेकादिक अंतरंगसाधनकूं चित्तविषैै धारै । परंतु अंतरंगसाधनकी प्रासिविना जो बहिरंग-साधनका त्याग करै तो यह जीव उभयभ्रष्ट होयके संसाररूप कूपविषै इबताहै है ॥
॥ २६ ॥ जैसैं कोई रसायनका वेत्ता स्थानाधन-धारिसाश्रय था । सो अपने शिष्यकूं पास बिठायके प्रगटित ताम्रविषै वल्लीके रसकूं निचोड़िके रसायन बनायक दिखाया । फेर आप अनेकशेषपयत्न तीर्थ-स्नानादिकिे करै तब कहै कि " ताम्रविषैै इसरीह वल्लीके रस सूपेहाथसैं डालनेकारिे वा इसरीही वल्लीके मिलैहैनैं रसायन होताहैं औ उलटेहाथमैं वल्लीके रसके निचोड़नेकारिे वा भिन्नामिलैनैं रसायन होताहै औ दरिद्रतां निवृत्त होतीहै" तब तिसनैं तिसीप्रकार किया ॥
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हेतु हैं औ निष्कामकूं अंतःकरणकी शुद्धिके हेतु हैं। इसरीतिसैं निष्कामपुरुषके अंतःकरणकी शुद्धिद्वारा ज्ञानेके हेतु हैं। यातैं बहिरंग-साधन कहियेहैं। औ— विवेकादिक अंतरंगसाधन कहियेहैं॥ बहिरंग नाम दूरीका है औ अंतरंग नाम समीपका हैँ। यज्ञादिकमें औ तिनके साधन स्त्रीधनपुत्रादिकनकूं त्यागै सो ज्ञानका अधिकारी है। ज्ञानेके अधिकारमें यज्ञादिक संभवैं नहीं यातैं दूरी हैं॥ ॥१७॥ विवेकादिककी अंतरंगसाधनता ॥ विवेकादिक ज्ञानेके अधिकारमें संभवैं हैं यातैं समीप हैं। तीनमैं वी इतना भेद हैः- विवेकादिकनका श्रवणमें उपयोग है औ श्रवणादिकनका ज्ञानमें उपयोग है। यातैं विवेकादिकनकी अपेक्षातैं श्रवणादिक अंतरंग हैं। तिनकी अपेक्षातैं विवेकादिक बहिरंग है॥ घ्यापि विवेके- तैंसैं शाखरूप गुरुने जीवकूं चित्तशुद्धिरूप रसायनकी सिद्धिअर्थे योधन किया जो कर्म, सो कामनाकरि कियाहैया चित्तशुद्धिरूप रसायनका हेतु नहीं होवैहैं। किंतु संसाररूप दरिद्रताका हेतु होवैहैं औ यहही कर्म निष्कामताकारे कियाहैया चित्तशुद्धिरूप रसायनका हेतु होवैहै औ संसाररूप दरिद्रताकूं निवृत्त करैहै॥ इहाँ अश्वपानमदलैंसैं भौपधके गुणभेदका वी दृष्टांत है॥ ॥ २७ ॥ विवेकादिक चारि साधनविना बहिरमुखपुरुषकूं वेदांतशास्त्रका द्वैधीभावकाळ निरंतर भादरसहित होनेकैै निश्चिद्र श्रवण होतां नहीं औ श्रवणविना मनन औ निदिध्यासन होतां नहीं। यातैं मनन औ निदिध्यासनका हेतु जो श्रवण, तिसमें विवेकादिक चारि साधनका उपयोग कहियै पछै है॥ ॥ २८ ॥ श्रवणआदिक बिना दृढ़ज्ञान होवै नहीं। यातैं श्रवणआदिक चारिका ज्ञानमें उपयोग है॥ :||. २९ || . इहाँ 'युक्ति' 'शास्त्रकारके अभिप्रे निर्णायक धूसरहप डिंगकी न्याई वेदांत जो
कादिक वी ज्ञानेके अंतरंगसाधनही सर्वग्रंथनमें कहैंँ। यहिरंग नहीं कहे। तथापि विवेकादिकनका ज्ञानेके साधन श्रवणमें प्रत्यक्षफल है औ श्रवणादिकनकी न्याई विवेकादिक जिज्ञासककूं उपदेय हैं। यज्ञादिकनकी न्याई जिज्ञासककूं हेय नहीं। यातैं अंतरंग कहेहैं। औ यज्ञादिकनकी अपेक्षातैं वी अंतरंग हैं। यातैं वी अंतरंगसाधनोंमें कहेहैं॥ ॥ १८ ॥ ज्ञानेके मुख्य अंतरंगसाधन । ( महावाक्य ) ॥ श्रवण मनन औ निदिध्यासनके लक्षण ॥ औ विचारसैं देखिये तौ ज्ञानेके मुख्य अंतरंगसाधन "तत्त्वमसि" आदिकमहावाक्य हैं, श्रवणादिक वी नहीं। कहैंतैं? ९ गूंक्तिसैं वेदांतवाक्यनकूं तात्पर्यनिर्णय श्रवण कहियहै॥ उपनिषद् तिनका श्रद्धेतत्स्वरूप जो तात्पर्यअर्थ है ताके निर्णायक नाम निश्चायक जे पड़ौैिंग हैं, तिनका ग्रहण है॥ ये पड़ौैिंग ये हैं:- १ उपक्रम कहिये प्रकरणका आरंभ औ उपसंहार कहिये प्रकरणकी समाप्ति, तिनकी एकरूपता प्रथमलिंग है॥ २ अभ्यास जो अद्वैतरूप अभ्येकी वारंवार पठन सो द्वितीयलिंग है॥ ३ अपूर्वता नाम श्रुतिसैं भिन्न प्रमाणकी अविप्रतिपत्ति कहिये स्वप्रकाशतारूप अबाधितता; यह तृतीयलिंग है॥ ४ अंरैदतत्स्वरूप ज्ञानेके फलका प्रतिपादन चतुर्थलिंग है॥ ५ भेदज्ञानकी नींदा औ अभेदज्ञानकी श्रुतिरूप अर्थवाद पंचमलिंग है॥ ६ कार्यकारणके अभेदकी चोधकताकारे श्रद्धैतज्ञानेके अनुबन्धअर्थतरूप उपपत्ति वणालिंग है॥
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२ जीवब्रह्मके अभेदकी साधक औ मेदकी बाधक युक्तियाँ आदितीयब्रह्मका चिंतन मनन कहियेहैं । ३ अनात्माकारवृत्तिका व्यवधानरहित ब्रह्माकारवृत्तिकी स्थिति । निदिध्यासनकी अनुष्पत्ति के ज्ञानरूप अर्थोपत्तिरूप प्रमाणसैं जीवब्रह्मके अभेदका ज्ञानरूप अर्थोपत्ति प्रमाण होवैहै । इत्यादिक अर्थोपत्तिप्रमाणरूप युक्तियाँ हैं ॥
—इन षट्लिङ्गनकारी वेदांतशास्त्रका तात्पर्यका निश्चय होवैहै । सोई श्रवण कहियेहै औ वेदांतशास्त्रका अभ्यास तिसका साधन है । यातैं सो वी श्रवण कहिये है ॥ इन लिङ्गनका स्पष्टीकरण श्रुतिपादलिङ्गसंप्रहविषै हमनैं कियाहै ॥
॥ ३० ॥ जीवब्रह्मके अभेदकी साधक युक्तियां ये हैं:-
१ जीव है सो ब्रह्मैं अभिन्न है, सच्चिदानंदरूप होनेतैं; ईश्वरचेतनकी न्यायैं जो सच्चिदानंदरूप नहीं सो ब्रह्मतैं अभिन्न वी नहीं । जैसैं घट सच्चिदानंदरूप नहीं हैं । जातैं यह जीव ऐसा नहीं यातैं ब्रह्मसैं भिन्न वी नहीं । किंतु अभिन्न है ॥ यहां इत अनुमानमै--
( १ ) जीव पक्ष है । ( २ ) ताका ब्रह्मसैं अभेद साध्य है । ( ३ ) सच्चिदानंदरूपता हेतु है । औ— ( ४ ) ईश्वरचेतन तहां उदाहरण कहिये हेतुगांत हैं ।
इत्यादि अनुमानप्रमाणरूप युक्तियां हैं । औ— २ (१) जैसैं घटमठादिकूं दूरीकारिके घटाकाशमठाकाशका अभेद है । तैसैं बुद्धि औ मायादुपाधिकूं दूरीकारिके जीवब्रह्मका अभेद है । औ—
(२) जैसैं घटाकाश जलाकाश महाकाश औ मेघाकाश ये च्यारी आकाश हैं । तिनमें जलाकाश औ मेघाकाशका अभेद नहीं वी है । तथापि घटाकाश औ महाकाशका . नाममात्रसैं भेद है, परमार्थसैं नहीं ॥ तैसैं च्यारी जीव ब्रह्म औ ईश्वर, ये च्यारी चेतन हैं । तिनमें जीव औ ईश्वरका अभेद नहीं वी है । तथापि तिनके अधिष्ठान लक्ष्यार्थरूप कूटस्थ औ ब्रह्मका नाममात्रसैं भेद है । परमार्थसैं नहीं ।
इत्यादि उपमानप्रमाणरूप युक्तियां हैं । औ— ३ “नेह नानास्ति किञ्चन ” इत्यादिश्रुतिनमैं मेदका निषेध कियाहै, सो निषेध वास्तत्रभेद होवै तौ संभवै । तिसविना संभवै नहीं । यातैं मेदकै
तीनि प्रमाण अमेदकी साधक युक्तियां हैं ॥ ॥ ३१ ॥ मेदकी वाधक युक्तियां ये हैं:- १ जीवब्रह्मका मेद मिथ्या है, औपाधिक होनैतैं; जो मिथ्या नहीं द्शावै मेद है । सो औपाधिक वी नहीं, जातैं यह मेद ऐसा नहीं यातैं मिथ्या वी नहीं ऐसीं नहीं । किंतु मिथ्याही है ॥ यहां--
( १ ) मेद पक्ष है । ( २ ) मिथ्यात्व साध्य है । ( ३ ) औपाधिकता हेतु है । औ— ( ४ ) दो आकाशनका मेद औ घटपटका मेद उदाहरण हैं ।
इत्यादि अनुमानप्रमाणरूप युक्तियां हैं ॥ इहां आदिसंवादकारी “मुप्रक्षु:सर्ववस्तुसारसंग्रह” उक्त औ “वेदांतपदार्थमंजूषा” उक्त औ तृतीयतरंगंगत तृतीयचौपाईके टिप्पणविषै उक्त पंचमेदके निवर्तक पंचअनुमानसैं चारीभूतानुमानोंका ग्रहण है ॥
२ ( १ ) जैसैं देशप्रतिबिंबका मेद मिथ्या है, तैसैं जीवब्रह्मका मेद मिथ्या है ॥ ( २ ) जैसैं अनेक घटाकाशका परस्परमेद मिथ्या है, तैसैं जीवनका परस्पर्मेद मिथ्या है ॥
( ३ ) जैसैं स्वप्नके जीवनका औ स्वप्नके घटादिकका मेद मिथ्या है, तैसैं जीवजडका मेद मिथ्या है ॥ ( ४ ) जैसैं रज्जु औ कल्पितसर्पेका मेद । किंवा साक्षीचेतनका औ स्वप्नप्रपंचका मेद मिथ्या है । तैसैं जडजगत् औ ईश्वरका मेद मिथ्या है ॥
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ध्येयासन कहियेहैं॥ निदिध्यासनकी परिपाकअवस्था कुहीं समाधि कहैंहैं, यों समाधिका श्री साधन नहीं । किंतु बुद्धिके दोष जो असंभावना निदिध्यासनमें अंतभाव है । मुख्यसाधन नहीं ॥
( ४ ) जैसे रज्जुसर्पवत् कल्पित सर्पादिकदर्शनका किया साक्षात्कार्यनिरूपण परसरारमेद मिल्या है? तैसे इष्टपदार्थनका परतद्र मेद निध्या है ॥
इत्यादिक उपमानप्रमाणरूप युक्तियों हैं । जो १ मान २ शांतरमेदतें द्विविध है:- ३ महावाक्यतें करणा जो जीवब्रह्मका अभेद, सो प्रतीयमानभेदके मिल्याथ्चिन्ता न चनतार्था जीवकलके मेदके मिल्याथकूं मलतार्था है । इत्यादि अर्थापत्तिप्रमाणरूप युक्तियां हैं ॥
४ जैसे जाप्रत्स्वप्नजिं डराधिके होने जीव-प्रकका मेद नाशाताहै । तैसे मुक्तिसिं उपाधिके नष्ट होइ मेद नाशता नहिं । यांतें जीवन्मुक्ते परमार्थिकमेदका अभाव है यार निध्य होतहैं ।
इत्यादि अनुुपमद्युपप्रमाणरूप युक्तियों हैं ॥
॥ ३२ ॥ साक्षात्काररुपे अनामाकाररुपतिंके अंतरायें रहित मलाकाररुपतिंकी स्थिति जो है, सो नम्राकारकी न्याई अश्रयतें होवैहैं ॥ निदिध्यासनविंहे उत्कटप्रकारकी स्थिति जो है, मो हृ्स्तैं पकडिके नम्र फरारहुं उद्म्राकारकी न्याई प्रयत्नतें होवैहैं ॐ हृ्स्तैं पकाडनेलैप प्रयत्नके त्याग किये जेसैं उछनालाकी ममता रहती नार्हीं ।
तैसे निदिध्यासनविंहे प्रयत्नके त्याग किये उत्क-प्रकारकी स्थिति रहती नार्हीं ॥
किचा:-साक्षात्कार्यनूपूं व्यावहारिकार्विंहें कदाचित् चित्त् उत्कृष्टिकी स्थितिके अभाव हुये फर्लव्युदिति-करि पछात्ताप नहिं होवैहैं ॐ निदिध्यासनथानकूं व्यावहारिकार्विंहें कदाचित् उत्कृष्टिकी स्थितिके अभाव हुये कर्तव्यबुद्दिकरि पछात्ताप होवैहैं ॥
इतना साक्षात्कारतिं निदिध्यासनका मेद है ॥
॥ ३३ ॥ त्रिपुटीकें भावसहित जो सविकल्प-समाधि सोई निदिध्यासन है ॥ ताफ्की परिपाक- ये श्रवण मनन निदिध्यासन ज्ञानके साक्षान् न्याकंही समाधि करहैं । किंतु बुद्धिके दोष जो असंभावना
निदिध्यासमनसमाधि कहियेहैं । यांतें "निर्विकल्पनसमाधि " कहियेहैं । यांतें "समाधि " "धारणां " त्रिपुटीकें मार्नसें रहित द्रां "निर्विकल्पसमाधिका " म्रहण है, जो निर्विकल्पनसमाधि
मो यार्करनिंयकल्नसमाधि हैं । ॐ—
१ म्रदिस्थादिक साक्ष्यनकें चितनर्ते जो होवें, मो यार्करनिंयकल्नसमाधि हैं ॥
२ सनोर्तरहंदेतम्रदेकें चिंतनर्ते जो होवें, मो आंतरनिर्विकल्पनसमाधि हैं ॥
( १ ) साक्ष्याल्कार-मननआय्मके श्रवण-चिन्तनकारिंकं थी (९) साक्षात्कार-मननभात्रके श्रंद्रनम्रदेकें चिन्तनकारिंकं प्रमभाताकी एकतानकं अपरोक्मभानसहित होवें, मो साक्षात्कार-
रूप आंतर्गनिर्विकल्नसमाधि है । ॐ— असाद्कातकार्मप मेर्देतं द्विविध हैं:-
( २ ) विचारपूर्वंक श्रंद्रनम्रदेकें चिन्तनकारिंकं थी प्रसम्भानाकी एकतानकं अपरोक्मभानसहित होवें, मो साक्षात्कार-
असाद्कातकार्मप आंतरनिर्विकल्न-समाधि हैं ॥
( ९ ) तिनर्म साक्षात्काररूप जो हैं, मो साक्षा-त्काररुप समाधिकी साधन हैँ । यांतें ताका निदिध्यासनमें अंतरभाव हैं, पृथक् साधन नर्हीं ॥
(२) साक्षात्काररूप जो समाधि हैं, मो एक्कणत्रिंह उदय होवैहैं ॐ द्वितीयक्षणविंहें स्थित होवैकं आावरणकं नाशका प्रारंभ करैहैं ॐ तृतीयक्षणविंहें आावरणका नाश होवैहैं ।
तांतें जीवनमुक्ति होवैहैं ॥ प्रथम यह क्रणस्पायी हुवा थी आावरणका भंग करैहैं । यांत विद्वान्गिंहें भ्रतेभरायबुद्विआदिक सिद्दिके उदयव्की शंका
नर्हीं है ॥ जैसैं घटके साक्षात्कार हुये तटाक घटका आवरण भंग होवैहैं । ताके अर्थ पीछे बुद्धिके निरोध-
का प्रयोजन नहीं । तैसे श्राक्के आावरणके भंग
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१ संशौयं असंभावना कहैहैं । २ विपर्ययकूं विपरीतभावना कहैहैं ॥
॥ १९ ॥ श्रवणादिककूं परंपरासैं ज्ञानीकी हेतुता ॥ श्रवणसैं प्रमाणका संदेह दूरी होवैहै औ मननसैं प्रमेयका संदेह दूरी होवैहै ॥ १ वेदांतवाक्य अद्वितीयब्रह्मके प्रतिपादक हैं अथवा अन्यअर्थके प्रतिपादक हैं? ऐसा ग्रंथमैं संदेह होवै, सो श्रवणसैं दूरी होवैहैं ॥ औ २ जीवब्रह्मका अभेद सत्य है अथवा भेद सत्य है? ऐसा ग्रंथमैं संदेह होवैहै, सो मननसैं दूरी होवैहै ॥ भये पीछे हठकारिके वृत्तिके निरोधका प्रयोजन नहीं । ऐसैं हुये वी पीछे सप्तमभूमिकापर्यंत जो वृत्तिका निरोध करियेहै, सो निरोध वासनाक्षय औ मनोनाशद्वारा कहिये मनके स्थूलभावकी निवृत्तिद्वारा जीवनमुक्तिके विलक्षणआनंदका हेतु है; आवरणभंगका हेतु नहीं ॥ इसरितिसैं समाधिके निदिध्यासनमैं अंतरभाव है ॥
३ देहादिक सत्य हैं औ जीवब्रह्मका भेद सत्य है । ऐसैं ज्ञानीकूं विपरीतभावना कहैहैं, ताकूं निदिध्यासन दूरी करैहैं ॥ इसरितिसैं श्रवणादिक तीनूं, असंभावना-विपरीतभावनाके नाशक हैं औ असंभावना औ विपरीतभावनाके ज्ञानीके प्रतिबंधक है । यातैं ज्ञान-का जो प्रतिबंधक ताके नाशद्वारा श्रवणादिक ज्ञानीके हेतु कहिये हैं । साक्षात् हेतु नहीं ॥ ॥ २० ॥ अवांतरवाक्यकूं परोक्षज्ञानकी औ महावाक्यकूं अपरोक्षज्ञानकी हेतुता ॥ yथार्थानुमवरूप जो शाब्दीप्रमाण, ताका करणरूप जो उपनिषद्रूप शब्द सो प्रमाणशब्दका अर्थ है ॥ ताके स्वरूपमैं जो उत्तप्रकारका संशय होवै- सो प्रमाणगत संशय है ॥ विचारकरिके देखिये तौ जितने प्रमेयगत संशयके भेद शास्त्रविषै कहैहैं, उतनेही प्रमाणगत संशयके भेद सिद्ध होवैहैं ॥
॥ ३८ ॥ “पेस” कहिये इससैं भादिलैकैं अनेक-आकारवाला प्रमेयगत संशय है ॥ प्रमेयगत संशयके अनेकभेद हमने पंचदशीकी भाषाटीकाविषै तथा बालबोधकी बालबोधनीटीकाविषै लिखेहैं ॥ ॥ ३९ ॥ प्रमाणकरि वा ताके साधन प्रमाण-करि जाननेनै योग्य जो मोक्षआदिक पदार्थ, सो इहां प्रमेय कहियेहै ॥
॥ ४० ॥ इहां “विप्रयै” शब्दका अपभ्रंशरूप “विप्रजे” शब्द लिखय्याहै ॥
॥ ४१ ॥ जैसैं नेत्ररोगविवे डाक्या जो अंजन, सो नेत्ररोगकी निवृत्तिद्वारा सूर्यके दर्शनेकू साधन है । साक्षात् नहीं । सूर्यके दर्शनेक साक्षात्साधन नेत्र हैं । तैसैं श्रवणादिक ज्ञानीके प्रतिबंधकरूप रोगकी निवृत्तिद्वारा ज्ञानीके साधन हैं । ज्ञानीका साक्षात्साधन तौ श्रोतृसंवंधी वेदांतवाक्य है ॥
॥ ३४ ॥ “यह रज्जु है वा सर्प है?” इस रीतिसैं दोकोटी नाम दोपक्षकूं विषय करनैवाला ज्ञान संशय कहियेहै ॥
॥ ३५ ॥ “यह सर्प है,” इस रीतिंकै जो अवियाकी वृत्ति, सो भ्रांतिभान है । सोई विपर्यय औ विपरीतभावना कहियेहै । ताकूं ज्ञानाध्यास औ विपरीतज्ञान वी कहतैं ॥ ऐसैं इहां मिथ्याअनात्मारूप देहादिककी सत्यरूपता औ आत्मरूपताकारि जो ज्ञान है सो विपर्यय है ॥
॥ ३६ ॥ वेदका अंतभागरूप जे उपनिषद् किवा वेदका अंत कहिये निर्णय जिसविषै है, ऐसा सूत्रभाष्यरूप उत्तरमीमांसाशास्त्र, सो वेदांत कहिये- है ॥ इनके वाक्य कहिये पदसमुदाय ॥
॥ ३७ ॥ प्रमाणज्ञान जो करण सो प्रमाण कहियेहै ॥ इहां वेदप्रतिपादित मोक्षआदिक पदार्थनका
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वाक्य हैं ॥ सो वेदांतवाक्य दोप्रकारके हैं:-
१ एक अवांतरवाक्य है। २ एक महावाक्य है ॥
१ परमात्माके अथवा जीवके स्वरूपका बोधक जो वाक्य, सो अवांतरवाक्य कहिये है ॥
२ जीवपरमात्माकी ऐक्यबोधक वाक्य महावाक्य कहिये है।
१ अवांतरवाक्यसैं परोक्षज्ञान होवैहै ॥
२ महावाक्यसैं अपरोक्षज्ञान होवैहै ॥
१ "ब्रह्म है" इस ज्ञानकूं परोक्षज्ञान कहैंहैं ॥
२ "ब्रह्म मैं हूँ" इस ज्ञानकूं अपरोक्षज्ञान कहैंहैं ॥
"त्वं ब्रह्म" ऐसा आचार्यनें उच्चारण किया जो वाक्य, ताका श्रोताके कर्णसैं संबंध होतही "मैं ब्रह्म हूँ" ऐसा अपरोक्षज्ञान श्रोताकूं होवैहै औ श्रोताके कर्णसैं वाक्यकासंबंध हुयविना ज्ञान होवै नहीं; यातैं श्रोत्रसंबंधीवाक्यही ज्ञानका हेतु है ॥
१ श्रोत्रसंबंधिअवांतरवाक्य परोक्षज्ञानका हेतु है । औ-
२ श्रोत्रसंबंधि महावाक्य अपरोक्षज्ञानका हेतु है । महावाक्यसैं सर्वकूं अपरोक्षही ज्ञान होवैहै, परोक्ष नहीं होता ॥
॥ ४२ ॥ सिद्धांतके एकदेशीकूं आाश्रयकारिके स्वतंत्र अधिक अर्थका निरूपण जिनमें कियाहै, ऐसे जे पंचदशीआदिक वेदांतके प्रकरणग्रंथ हैं, तिनके कर्ता जे आचार्यैं, वे इहां एकदेशी कहियेहैं । भर्तृप्रपंचके अनुसारी नहीं
॥ ४३ ॥ केवलवाक्यतैं अपरोक्षज्ञानका वादी कहिये कहनेवाला जो सिद्धांती ताके मतमें ॥
॥ ४४ ॥ मंदबोधवालेकूं श्रवणआदिक साधनविषै
॥ २१ ॥ वेदांतके एकदेशीका मत ॥ ( केवलवाक्यसैं परोक्षज्ञान )
एंकदेशीका यह मत हैं:-
१ श्रवणमनननिदिध्यासनसहित वाक्यतैं अपरोक्षज्ञान होवैहै ॥
२ केवलवाक्यतैं परोक्षज्ञान होवैहै । अपरोक्ष नहीं ॥
जो केवलवाक्यतैहीं अपरोक्षज्ञान होवै तौ श्रवणमनननिदिध्यासन व्यर्थ होवैंगे । यद्यपि सिद्धांतमतमें केवलवाक्यतैं अपरोक्षज्ञान होवैहै औ श्रवणआदिकतैं असंभावना-विपरीतभावनाका नाश होवैहै । यातैं श्रवणादिक व्यर्थ नहीं । तथापि जा वस्तुका अपरोक्षज्ञान होवै ताके विपै असंभावनाविपरीतभावना काहूकूं वी होवै नहीं यातैं केवलवाक्यतैं ऐं परोक्षज्ञानवादीकै सिद्धांतमें "तत्वमसि" आदिकवाक्यनतैं ब्रह्मक अपरोक्षज्ञान हुयकतैं पीठे असंभावनाविपरीत-भावना संबवै नहीं । यातैं श्रवणआदिकसाधन व्यर्थ होवैंगे औ "केवलवाक्यतैं परोक्षज्ञान होवैहै" या मतमें श्रवणादिक व्यर्थ नहीं ।
ज्ञान होवैहै" या मतमें श्रवणादिक व्यर्थ नहीं । यह बहुतग्रंथकारोंकै मंत है । तथापि यह मत सैंमीचीन नहीं । कहैंतैं:-
आळस्य मति होवै इस अभिप्रायसैं यह उक्त-प्रकारका संक्षेप शारीरकसैं मिलि बहुत प्रकरणग्रंथनकें कर्ताोंका मत है ॥
॥ ४५ ॥ दृढबोधवानकूं वी श्रवणआदिकविषै कर्तव्यबुद्धिका उदय मति होवै इस अभिप्रायसैं केचलबाक्यसैं अपरोक्षज्ञानके कहनेवाले सिद्धांतिके अनुसार यह समाधान कहियेहैं ॥
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॥ २२ ॥ उत्त एकदेशीके मतकी असमीचीनता ॥ २२-२३ ॥
शब्दका यह् स्वभाव है:- १ जो वस्तु अन्यवहित होवै ताका शब्दसैं परोक्षही ज्ञान होवैहै । किसीप्रकारतैं व्यवहित-वस्तुका शब्दमें अपरोक्ज्ञान होवै नहीं ॥ जैसे व्यवहितस्वर्गका औ इंद्रादिक देवताका शाब्दलपी शब्दतैं परोक्षही ज्ञान होवैहै । औ-
२ जो वस्तु अन्यवहित होवै ताका शब्दसैं (१) अपरोक्ज्ञान औ (२) परोक्षज्ञान दोनूहोवैहैं ॥ (१) जहां अन्यवहितवस्तुकूं शब्द "अस्ति" रूपतैं बोधन करैं तहां अन्यवहितका वी परोक्ष-ज्ञान होवैहै ॥ जैसे "दशमपुरुष है" इसरीति- सैं "अस्ति" रूपतैं बोधन किया जो अन्यवहितद-शम ताका शब्दसैं परोक्षही ज्ञान हुवा है ॥ औ
विधिकेपा नाश भया । तातैं हर्षरूप वृत्ति भई ॥ तैसैं यह पुरुष जो जीव सो स्थूलशरीरसहित दशम-पुरुषलप नवपुरुषनके साथि मिलिके संसाररूप मृग-जलकी नदीविषै प्रवेसकूं पायके ताके मनुष्यदेहरू-तीरपर आयके वदाचित् जिज्ञासाकालविषै विचार करताहै, तब-
१ भापसैं मिल्क उत्त नव पुरुषनकूं जानताहै । परंतु तिनके ज्ञाता आपनै निजरूप ब्रह्मकूं जानता नहीं । यह अज्ञानअवस्था भई ।
२-३ तातैं "ब्रह्म है नहीं" औ "भासता नहीं"-यह द्विविध आवरण भया ।
४ तातैं रोदनादिरूप विशेषप भया ॥ ५ पीछे कोई श्यास्त्र नाम यथार्थवक्ता पुरुष आया । तिसैं "दशाम है" ऐसा अवांतरवाक्य कहा, ताकूं सुनिके तिस दशमपुरुषकूं स्वरुपसैंभूत दश-मका "दशाम है" ऐसा परोक्षही ज्ञान भयाहै ॥
६ पीछे "ब्रह्म कहूं है?" ऐसैं पूछतेहुए तिस आशापुरुषनैं "दशाम तूं है!" ऐसैं वचन कहा । तब "दशाम मैं हूं" ऐसैं अपरोक्ज्ञान भया ।
७ तातैं अज्ञानकृत आवरणसहित रोदनादि
इस विदाभासकी सातअवस्थाका वर्णन चाचा-चौकात उपदेशसहली तथा पंचदशी तथा विचारसागरके चतुर्थतरंगाविषै संक्षेपसैं लिख्याहै । इहां यह संक्षेपतैं
॥ ४६ ॥ देशकृत किन्वा कालकृत अंतरायंकूं व्यव-धान कहैंहैं ॥ व्यवधानवाले वस्तुकूं व्यवहित कहैंहैं ॥
१ जो वस्तु दूरदेसाविषै होवै सो देशसैं व्यवधित है यौ जो वस्तु भूत किन्वा भविष्यातकालविषै होवै सो कालकरि व्यवहित है । औ-
२ व्यवहिततैं मिल्क जो अंतरायसैं रहित वस्तु सो अन्यवहित काहिये ।
॥ ४७ ॥ इहां यह प्रसंग है:-ऐसैं कोई दचा बालक थे । वे इकहते हतेपके देशांतरविषै विनोदअर्थ जाते थे । तहां मार्गमें मृगजलकी नदी प्राप्त भई । ताकूं उल्हेधन करते भये । पीछे एक प्रमुखबालकनैं शन्य नव बालकनकी गणना करी औ आपकी गणना करी नहीं । तब कहने लगया: किं:-मेरे प्रियतम !
१ "दशमपुरुषकूं जानता नहीं " यह अज्ञान अवस्था भई ।
२-३ तातैं "दशाम है नहीं" औ "भासता नहीं"-यह द्विविध आवरण भया ॥
४ तातैं रोदनादिरूप विशेषप भया ॥ ५ पीछे "ब्रह्म कौन है?" ऐसैं प्रश्नके किये गुरुनैं "तूं ब्रह्म है" ऐसैं महावाक्य कहा । ताकूं सुनिके "तैंहि ब्रह्म हूं" ऐसैं अपरोक्ज्ञान होवैहै ।
७ तातैं अज्ञानकृत आवरणसहित द्विविधअध्या-सहरूप विशेषपका नाश होवैहै । तातैं अत्यंतहर्ष-रूप निरतिशयातृत्ति होवैहै ॥
रीतिमात्र जताईहै ॥
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( २ ) जहां अन्यवहित वस्तुकूं "यह है"इस-रीतिसैं शब्द बोधन करैं तहां अन्यवहितका शब्दसैं अपरोक्षज्ञानही होवैहै, परोक्ष नहीं । जैसैं "दशमा तू है" इसरीतिसैं शब्दनैं बोधन किया जो दशमा, ताका अपरोक्षज्ञानही हुयाहै ॥ विपरीतभावना होवें नहीं । यातैं श्रवणादिक विर्फल होवें" । सो शंका चले नहीं । कहैं जैसैं राजाकूं मेँडकनेत्रसैं अपरोक्षज्ञान हुयेतैं वी विपरीत-भावना दूरी हुई नहीं । तैसैं महावाक्यतैं ब्रह्मका अपरोक्षज्ञान होवैहै । परंतु जाकी बुद्धिमैं असंभावना विपरीतभावनादोप होवें ताका दोपरूप कलंकसहित ज्ञान फलका हेतु नहीं । सो दोपकी निःय्युक्ति श्रवणादिक करै । जाकी बुद्धिमैं दोप नहीं सो न करै ॥
( ९ ) तैसैं ब्रह्म सर्वका आत्मा होनेतैं अत्यंतअन्यवहित है, ताकूं अंतरवाक्य "अस्ति" रूपतैं बोधन करैहैं । यातैं अन्यवहितब्रह्मका वी अवांतरवाक्यतैं परोक्षज्ञान होवैहै ॥ औ ( २)"दशमा तूं है" इस वाक्यकी न्याय श्रोताका आत्मरूपकारिके ब्रह्मकूं महावाक्य बोधन करैहै । यातैं मँहावाक्यतैं अन्यवहितब्रह्मका परोक्षज्ञान संभवै नहीं । किंतु अपरोक्षज्ञानही होवैहै ॥ ॥ २८ ॥ और जो कथाहै:- "जा वस्तुका बोध है सो अधि-
कारी है सो अंगधिकारी है ॥ २९ ॥ ॥ ४८ ॥ इहां यह रहस्य है:-जैसैं दशमपुरुषकूं मन औ नेत्रकारिके प्रत्यक्ष करने योग्य संगताका मन औ नेत्ररूप सामग्रीके होते वी अपरोक्षबोध हुया नहीं । किंतु "दशमा तूं है" इस वाक्यतैहीं अपरोक्ष-बोध हुयाहै । यातैं दशमके अपरोक्षबोधरूप प्रमाणका शब्द करण है, तातैं सो प्रमाण है । ताका साधनकारिके संसक्त मन औ नेत्र सहकारी हैं ॥ तैसैं ब्रह्मके अपरोक्ष-बोधरूप प्रमाणका महावाक्यरूप शब्द है । यातैं शब्दका सहकारी हैं ॥ : ॥ ४९ ॥ "भरे मैत्रेयि ] आत्मा देखने योग्य है । श्रवण करने योग्य है । मनन करने योग्य है औं निदिध्यासन करनेकूं योग्य है " इत्यादिक शृतिकारि प्रतिपादित आत्मदर्शनके साधन श्रवणादिक विफल कहिये निष्फल होनकूंयोग्य नहीं । किंतु सफल होनकूं योग्य हैं ॥ कैसैं महावाक्यकारि अपरोक्षज्ञानके मानहुयें शृतियुक्त श्रवणादिकसाधन निवर्त्तनीयोग्यदोषके
विर्फल कहिये निष्फल होवेंगें । यह अभिप्राय है ॥ ॥ ५० ॥ भृगुनामक मंत्रिका सर्विस्वर वृत्तांत आगे पंचमततंगविषै कहियेगा । यातैं इहां ताका नाममात्र कहांहै ॥ ॥ ५१ ॥ ज्ञानतैं पूर्व सगुणनह्मके साक्षात्कारपर्यंत जाकी उपासना होवै ताकूं ऋतुपासन कहते-, हैं, ताकूं अकृतोपासन कहतेहैं, तितमै कृतोपासनके वैराग्यादिक साधन तीव्र हैं । यातैं अदृष्ट दोषतहै जो अकृतोपासनके साधन मंद हैं, यातैं प्रसिद्ध दिखाई देते नहीं किंतु गुप्त रहतैहैं । परंतु जैसैं वचकके एकपदहूके पकडैहूये सारा वच्य पकड्या जाता है । तैसैं च्यारिसाधनमैसैं एकसाधनके निःशयके मये सर्वसाधन गुप्त हैं । कहेहैं विवेकादिक च्यारी साधनकूं परस्परसहकारी होनतैं । परंतु जिसकिसप्रकार श्रद्धालु औ व्यसनी तीव्रबुद्धिमान पुरुषकूं बोध होवैह । यंह
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॥ २४ ॥ ॥ अथ संबंधवर्णन ॥ दोहा-- प्रतिपादक प्रतिपाद्यता, ग्रंथ ब्रह्म संबंध ॥ प्राप्य प्रापकता कहत, फल अधिकृतकों पद ॥ २४ ॥ टीका:- १ ग्रंथका औ विषयका प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव संबंध है । ग्रंथ प्रतिपादक है औ विषय प्रतिपाद्य है । जो प्रतिपादन करनैवाला होवै सो प्रतिपादक कहिये है ॥ जो प्रतिपादन करनैकूं योग्य होवै सो प्रतिपाद्य कहिये है ॥ २ अधिकारी औ फलका प्राप्त्यप्रापक-भाव संबंध है । फल प्राप्य है औ अधिकारी प्रापक है । जो वस्तुप्राप्त होवै सो प्राप्य कहिये है । जाकूं प्राप्त होवै सो प्रापक कहिये है ॥ ३ अधिकारी औ विचारका कर्त्तृकर्त्तव्य-भाव संबंध है । अधिकारी कर्त्ता है औ विचार करणीय है । जो करनैवाला होवै सो कर्त्ता कहिये है औ करनेयोग्य होवै सो कर्त्तव्य कहिये है ॥ ४ ग्रंथका औ ज्ञानका जन्यजनकभाव-संबंध है । विचारद्वारा ग्रंथ ज्ञानका जनक है । जो उत्पत्ति करनैवाला होवै
सो जनक कहिये है । जाकी उत्पत्ति होवै सो जन्य कहिये है ॥ इहसैं औदित्य लेके और बी संबंधैं जानि लेनैं ॥ २४ ॥ ॥ २५ ॥ ॥ अथ विषयवर्णन ॥ दोहा-- जीवब्रह्मकी एकता, कहत विषय जन बुधि ॥ तिनको जे अंतर लेहै, ते मतिमंद अबुधि ॥ २५ ॥ टीका:--जीवब्रह्मकी एकता या ग्रंथका विषय है । जो प्रतिपादन करिये सो विषय कहिये है । या ग्रंथविषै जीवब्रह्मकी एकता प्रतिपादन करिये है । यातैं सो एकता ग्रंथका विषय है । सो एकता श्रुति-स्मृतिके वचन प्रतिपादन करैहैं । यातैं जीवब्रह्मका भेद कहैंहैं ते पुरुष शठ हैं औ वेदके विरोधी हैं ॥ २५ ॥
॥ २६ ॥ अथ प्रयोजनवर्णन ॥ २६-३२ ॥ दोहा-- प्रमानंद स्वरूपकी, प्राप्ति प्रयोजन जानि ॥ जगत समूल अनर्थ पुनि, रहै ताकी अतिहानि ॥ २६ ॥ प्रमाणकरि तिनतिन पदर्थनकी योग्यताकी कल्पना-रूप अर्थोपत्ति-प्रमा होवैहै । इस हेतुतैं शास्त्रविषै संबंधका व्यवहार लिख्याहै । अन्यप्रयोजनअर्थ
॥ ५२ ॥ इहां ''आदि'' शद्बकरिके श्रवणादिक-साधनोंका औ ज्ञानका तथा विज्ञानका औ मोक्षका साध्यसाधनभाव आदिक संबंध जानि लेनें ॥ ॥ ५३ ॥ जल औ सिचनकी न्याई होनेकरि योग्यतावाले परस्परउपयोगी दो पदार्थनका संबंध सिद्ध होवैहै । निरुपयोगी पदार्थनका नहीं ॥ यातैं योग्यताविना संबंधके असंभावके ज्ञानरूप अर्थापत्ति-
वचन बोलतेहैं । औ अन्यठिकाने ताका बहुत अप्रिय कर डालतेहैं; वे शठ कहिये हैं ॥
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टीका:-प्रपंचका कारण जो अज्ञान औ ग्रपंच वह जन्ममरणरूपी दुःखका हेतु है। यातैं अनर्थ कहियेहै। ता अनर्थकी निवृत्ति औ परमानंदकी प्राप्ति मोक्ष कहियेहै। सो १ ग्रंथका परमप्रयोजन है औ २ अवांतरप्रयोजन ज्ञान है॥
१ जाकिपै पुरुषकी अभिलाषा होवै, सो परमप्रयोजन कहियेहैं औ ताकूं पुरुषार्थी कहियेहैं। सो अभिलापा दुःखकी निवृत्तिविपै औ सुखकी प्राप्तिविपै सर्वपुरुषनकी होवैहै। सोई मोक्षका स्वरूप है॥
यातैं परमप्रयोजन मोक्ष है औ ज्ञान नहीं है। कहैंतें? सुखकी प्राप्ति औ दुःखकी निवृत्तिका साधन तो ज्ञान है औ सुखकी प्राप्ति या दुःखकी निवृत्तिरूप ज्ञान नहीं है। यातैं अवांतरप्रयोजन ज्ञान है॥
२ जा वस्तुद्वारा परमप्रयोजनकी प्राप्ति होवै सो अवांतरप्रयोजन कहियेहै। ऐसा ज्ञान ग्रंथकारिके ज्ञानद्वारा मुक्तिरूप परमप्रयोजनकी प्राप्ति हावैहै। यातैं ज्ञान अवांतरप्रयोजन है॥ २६ ॥
॥ २७ ॥ ग्रंथके प्रयोजनमैं शंका औ ताका समाधान ॥ २७–३२ ॥
आगे जो अप्राप्तवस्तु ताकी प्राप्ति संभवत। नित्यप्राप्त वस्तुकी तौ प्राप्ति किम मानिये? ॥
ऐसी संकल लेस आनि कीजै न विश्वास हानि। गुरुकै प्रसादतैं कुतर्क भले भानिये ॥ करको कंचन खोयो ऐसो भ्रम भयो जिहिं। ज्ञानतैं मिलत इम प्राप्ति जानिये ॥ ॥ २८ ॥
टीका:—पूर्व कहा था "अनर्थकी निवृत्ति औ परमानंदकी प्राप्ति ग्रंथका प्रयोजन है" सो बनै नहीं। कहैंतें? सर्व्वेद जीवकूं परमानंदरूप वर्णन करैहैं औ तुम अंगीकार वी करोहो औ जो वस्तु अप्राप्त होवै ताकी प्राप्ति संसरैहै। सदा प्राप्तवस्तुकी प्राप्ति सर्वथा बनै नहीं। यातैं "सदापरमानंदस्वरूप आत्माकूं परमानंदकी प्राप्ति कहनां सर्वप्रकारकरिके असंभव है" ऐसी कोउ शंका करैहै॥
॥ २९ ॥ ता शंकाकूं सुनिके ग्रंथके प्रयोजन-मैं विश्वास दूरी न करनां। किंतु आत्मविद्याके उपदेश करनवाला जो गुरु है तिनकौं शंकारूपी जो कुतर्क हैं सो दृष्टांतसैं दूरी करिदेनां॥
सो दृष्टांत कहियेहै:-जैसे काहूके हाथमैँ
॥ ५५ ॥ "प्रज्ञानमानंदं ब्रह्म" कहिये प्रज्ञान जो जीव सो.आनंदरूप ब्रह्म है। इससैं आदिलेके चारि वेदनके वाक्य जीवकूं स्वभावसैं सिद्ध आनंदरूप कहैंहैं॥
वि. ३
॥ शंकापूर्वक उत्तरका कवित्त ॥ जीवको स्वरूप अति आनंद कहत के। ताकूं सुखभाप्तिको असंभव कषानिये ॥
॥ ५६ ॥ वादी प्रतिवादी दोनकूं संमत जो अर्थ सो दृष्टांत है। सोई उदाहरण है। दृष्टांतकरि सिद्धअर्थकूं दार्षांत कहतेहैं। ताहीकूं सिद्धांत वी कहतेहैं॥
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कंकन होवै । ताकूँ ऐसा अभम होइ जावै जो "मेरा हाथका कंकन खोया गयौ" । तव चाकूँ किसीके कहैं कंकनका ऐसा ज्ञान होवै जो "मेरा कंकन हाथमें है" । तथ वह ऐसै कहैहै:-"मेरा कंकन मिलगयाहै" ॥ इसरीतिसैं प्राप्ति जो कंकन है ताकी वी प्राप्ति कहिहै ॥
तैसैं परमानंदस्वरूप आत्माविपै अविचाके चलसैं ऐसी भ्रांति होवैहै:-" आत्मा परमानंद-स्वरूप नहीं है किंतु परमानंदस्वरूप ब्रह्म है ॥ ता ब्रह्मका औ मेरा वियोग होयगयाहै । उपासनाकारिके ता ब्रह्मकूँ मैं प्राप्त होड़ंगो" ॥
इस रीतिकी भ्रांति बहुतमूर्खप्राणियोंको होई रहैहै ॥ यद्यपि बहुतपंडित वि ऐसै कहैहैं तथापि वे मूर्खही हैं । कहैहैं ? जो जीवनब्रह्मका वियोग अंगीकार करैहैं ते मूर्ख कहियेहैं ॥
तिन पुरुषनकूँ उत्तमसंस्कारसैं जो कदाचित् ब्रह्मज्ञानि आचार्यसैं वेदांतग्रंथके श्रवणकी प्राप्ति होवैहै । तब सुने अर्थकूँ निश्चयकारिके कहैहैं:-"परमानंद हमारेकूँ ग्रंथ औ आचार्यककी प्राप्ति भयाहै" । यह उनका कहना का अभिप्राय है । आत्मा तौ परमानंदस्वरूप आगै वी था । परंतु "मेरा आत्मा परमानंदरूप है" । इसरीतिसैं भान नहीं होवैथा । यातैं अप्राप्तिकी न्याई था ॥ आचार्यद्वारा ग्रंथश्रवणसैं
परमानंदका बुद्धिविपै भान होवैहै । यातैं परमानंदकी प्राप्ति कहैहैं ॥ ॥ ३० ॥ जैसैं प्राप्तकी प्राप्ति ग्रंथका प्रयोजन है तैसैं नित्यनिवृत्तिकी निवृत्ति वी प्रयोजन संभवैहै ॥
दृष्टांत:-जेवरीविपै सर्प नित्यनिवृत्त है औ जेवरीके ज्ञानसैं निवृत्त होवैहै । तैसैं आत्माके ज्ञानसैं होवैहै । यातैं नित्यैंनिवृत्ति-औ नित्यप्राप्तकी प्राप्ति ग्रंथका प्रयोजन है ॥ ३१ ॥ शंका:-एक पदार्थे ( मोक्ष ) विषै भाव अभाव दोनूं बनैं नहीं ॥
"कारणसहित जगत्की निवृत्ति औ परमानंदकी प्राप्ति ग्रंथका प्रयोजन है" । यह पूर्व कहा सो संभवै नहीं । कहैंत ? निवृत्ति नाम ध्वंसका है । ध्वंस औ नाश दोनौं पर्याय-शब्द हैं । "सो नाश अभावरूप है । यातैं मोक्षविषै भावरूपता औ अभावरूपता दोनौं प्रतीत होवैहैं ॥
१ अनर्थकी निवृत्ति कहनैसैं अभावरूपता प्रतीत होवैहै । औ-
॥ ३७ ॥ नैयायिक किंव प्रातिभासिक प्रपंचके वर्तमानकालविपै भावके होते वी पारमार्थिक सत्ताकरी प्रपंचका तीनिकालविपै निषेधमुखस्वरुपी औ विध्यात्मक 'अनुभवकरी सिद्ध अत्यंताभाव है सोई ताकी नित्यनिवृत्ति है । याहीकूँ विपयरूप निवृत्ति वी कहतें हैं । उक्त नित्यनिवृत्तिवाला जो नित्यनिवृत्त नाम तुच्छ कहियेहै ॥ ता नित्यनिवृत्तप्रपंचककी निवृत्ति कहिये विद्या|मानपरमार्थ-सत्ताकरी त्रैकालिकअभावका शुति युक्ति औ तत्व-
श्रनिकारिके निश्चय जो विषयरूप निवृत्ति सो नित्यनिवृत्तकी निवृत्ति है ॥ ॥ ३८ ॥ जैसैं लग्रहविपै गाड़्याहुया निधि भज्ञान-साधनसैं निश्चयरूप ज्ञान सो नित्यप्राप्तकी प्राप्ति है ॥ तैसैं परमानंदरूप जो ब्रह्म सो सर्वका अपना-आप होतें निलप्राप्त है । तौ वी सो अज्ञानतैं अप्राप्तकी नाईं होवैहै । ताका तत्वज्ञानतैं "मैंही परमानंदरूप ब्रह्म हूँ" ऐसा निश्चयरूप जो ज्ञान सो नित्यप्राप्तकी प्राप्ति है ॥
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२ परमानंदकी प्राप्ति कहनेंमे भावरुपता प्रतीत होवैहै ॥ कलिप्तवस्तुकी निवृत्ति अधिष्ठानरूप होवैहै ॥
सो दोनौं एकपदार्थविचिपै यनें नहीं । कहैंतें ? भावरुपता औ अभावरुपता दोनौं आपसमें विरोधी हैं जो विगेधीधर्म होैं सो एककालमें एकवस्तुविपै रहें नहीं । यातें ग्रंथकै प्रयोजन संभवैं नहीं " ऐसी कोऊ शंका करैं है ॥ ॥ ३२ ॥ ता शंकाके उत्तरका दोहा ॥
अधिष्ठानतें भिन्न नहीं, जगत निवृत्ति वर्खान ॥ सर्पैनिवृत्ती रज्जु जिम, भये रज्जुको ज्ञान ॥ ३८ ॥
टीका:-कारणसहित जगतकी निश्चित्ति अधिष्ठानस्वरूप है । यातें पृथक नहीं ॥ जैसे सर्पकी निवृत्ति अधिष्ठानजैवरी रूप है ॥ "सार-
॥ ५९ ॥ कलिप्त अनर्थकी निवृत्तिविपै दोपक्ष है:-
९ " ज्ञातत्वधर्मकैरे उपलब्ध अधिष्ठानरूप कलिप्तकी निश्चित्ति है" । यह प्रथमपक्ष है । औ-
२ " कलिप्तकी निश्चित्ति कहिये अभाव, सो अधिष्ठान कहिये अधिकरणतें भिन्न अनिर्वचनीय है"। यह द्वितीयपक्ष है ॥
तिनमें प्रथमपक्ष भाघ्यकारका है औ द्वितीयपक्ष न्यायाचारस्पतिकार जो वाचस्पतिमिश्र ताका है ॥
३ जैसैं प्रथमपक्षविचै " पुरुप स्थाणु है " इस वाक्यकै " पुरुषकै अभाववाला स्थाणु है " ऐसा अर्थ होवैहै । तैसैं " सच्चै बंधविदं ब्रह्म" कहिये यह सर्वजगत्कै निश्चयकारिके ब्रह्म के प्रतिपादक श्रुतिवाक्यकै थी " इस प्रतिमान सर्व-जगत्का अभावरूप ब्रह्म है" ऐसा " सर्वे" औ " ब्रह्म" इन समानविमक्तिवाले नाम प्रथमाैविभक्तिवाले दो-पदनकै वाघसामानाधिकरण्यरूप संबंधकारिके अर्थ
होवैहै । यातें कलिप्त अनर्थकी निवृत्ति कहिये परमार्थ-सत्तासैं असंताभाव, ताकूँ ब्रह्मारूप होनेकरि मोक्ष-विधे भावरुपता औ अभावरुपताके अभावतैं शंका नाहीं है । औ-
२ द्वितीयपक्षविचै "पुरुष स्थाणु है" इस वाक्यकका "पुरुषके अभाववाला स्थाणु है " ऐसा अर्थ होवैहै औ " सर्वे खल्विदं ब्रह्म " इस श्रुतिवाक्यकै वी "इस प्रतिमान सर्वजगतके अभाववाला ब्रह्म है " । ऐसा अर्थ होवैह ।
उक्त अभावरूप निवृत्ति वी अनिर्वचनीय नाम मिथ्या है । जो वस्तु अनिर्वचनीय होवै सो वास्तव-अधिष्ठानतें भिन्न नहीं होवैहै किंतु अधिष्ठानरूप
होवैहै । यातें मोक्षविचै द्वैतापत्तिकी शंका नाहीं है ॥
ये कहै जे दोपक्ष, तिनमें प्रथम पक्षविचै लाघव है औ द्वितीयपक्षविचै गौरव है । यातें प्रथमपक्ष श्रेष्ठ है । दोनूरौतैं मोक्षविचै द्वैतापत्तिकी शंका नाहीं है ॥
दोहा- जो जन प्रथमतरंग यह, पढै ताहि तत्काल ॥ करहु मुक्त गुरुमूर्ति नहै, दादू दीनदयाल ॥ ३९ ॥
इति श्रीविचारसागरे अनुवंधसामान्य-निरुपणं नाम प्रथमस्तरंगः समाप्तः ॥ ९ ॥
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|| दोहा ||
याके प्रथमतरंगमें, किय अनुबंध विचार । कहूं व द्वितीयतरंगमें, तिनहीको विस्तार ।। १ ।।
|| ५ || कारणसहित जगतनिवृत्तिरूप मोक्षके प्रथमअंशकी इच्छा बने नहीं ।। ३३-३६ ।।
टीका:-च्यारिसाधनयुक्त अधिकारी कधा । तिन च्यारिसाधनमें शुद्धता गिनी है । मोक्षकी इच्छाका नाम शुद्धता है । कारणसहित जगतकी निवृत्ति और ब्रह्मकी प्राप्ति मोक्ष कहियेहै । ताकेकिपै कारणसहित जगतकी निवृत्तिरूप मोक्षका अंश, ताकूं कोऊ चाहै नहीं । यह वात्ता-
|| ६० || जैसैं काहू पुरुषनै गृहके रचनेक आरंभ कियौ होवै ताकूं दूसरा प्रतिपक्षीपुरुष रोक देय, तत्र वहूं फिरियादकारीके फेर नि:शंक होयके गृहकूं रचताहै । तैसैं ग्रंथकारनैं याके प्रथमतरंगविषै च्यारिअनुबंधनका सामान्यैं निरूपण कियो । सो मनों इस ग्रंथरूप गृहके रचनका व्यारंभ कियाहै । ताकूं द्वितीयतरंगके पूर्वार्धसैं पूर्वपक्षीनैं रोक दियो । तब सिद्धांती जो ग्रंथकार तिसनैं श्रुतिरूप
|| ३४ || पूर्वपक्षी प्रतिपादन करैहै ।।
||अथ अधिकारिखंडन(?)||३४-३८||
|| दोहा ||
मूलसहित जगध्वंसकी । कोऊ करत नाहीं आस । किंतु विवेकी चाहत हैं । त्रिविधिदुःखनको नास ।। २ ।।
टीका:-मूलअविद्यासहित जो जगतका ध्वंस कहिये निवृत्ति, ताकी आस कहिये इच्छा कोऊ पुरुष करै नहीं है । किंतु कहिये कहा' करैहै ? तिनिप्रकारके जे दुःख हैं, तिनका नाश विवेकीपुरुष चाहैहै ।। याका यह अभिप्राय है:-दुःख तिनिप्रकारके हैं:- ? एक
|| ६१ || जैसैं पुरुष मिश्रकौंके भयसैं अथनकै त्यागकौं इच्छता नहीं कोऊ यूकाकौं भयसैं वल्कलकै त्यागकौं इच्छता नाहीं कोउ पच्छुपक्षीनकै भयसैं क्षत्रकै
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द्वितीयस्तरंगः ९ ] ( पूर्वपक्ष ) ।। अधिकारीखंडन (९) ।। ३५-३८ ।।
तौ अध्यात्मदुःख है । २ दूसरा अधिभूतदुःख है औ ३ तीसरा अधिदैवदुःख है ॥
१ रोगशोकादिकनतैं जो दुःख होवै सो अध्यात्मदुःख कहियेहै ।
२ चोरव्याघ्रसर्पादिकनतैं जो दुःख होवै सो अधिभूतदुःख कहिये है ।
३ यक्षराक्षसप्रेतग्रहादिक औ शीतवातआतपतैं जो दुःख होवै सो अधिदैवदुःख कहियेहै ॥
इसरीतिसैं तीनप्रकारिके जे दुःख हैं, तिनके नाशकी सर्वप्रुपनकूं इच्छा है । दुःखहसे मित्र जो पदार्थ हैं, तिनके नाशकी विवेकीपुरुप इच्छा करैं नहीं, यातैं अज्ञानसहित सकल-जगतकी निवृत्तिकी काहूंकूं इच्छा बनै नहीं ।।३५।। जो सिद्धांती ऐसैं कहैं:-“यद्यपि सकलप्रपंच दुःखनिवृत्तिकी इच्छा करैहैं ।
तथापि अज्ञानसहितसर्वजगतकी निवृत्तिविना दुःखनकी निवृत्ति होवै नहीं । यातैं दुःखनिवृत्ति-के निमित्त अज्ञानसहित जगतकी निवृत्तिकूं वी चाहैहैं" ।।
।।३६।। सो बनैं नहीं । कहैंहैं ? जे आयुर्वेदमैं औपध कहैहैं तिनतैं रोगजन्य दुःखकी निवृत्ति होवैहैं औ भोजन्सैं शोकजन्य-दुःखकी निवृत्ति होवैहै ।
इसरीतिसैं अपने उपायनतैं सर्वदुःखनकी निवृत्ति होवैहै, यातैं अज्ञानसहित जगतकी निवृत्तिविना वी दुःखनकी निवृत्ति बनैहै । दुःखनकी निवृत्तिके निमित्त अज्ञानसहितजगतकी निवृत्तिकी चावना काहू नहीं ॥
“कारणसहित जगतकी निवृत्ति औ प्रपंचकी प्राप्ति मोक्ष करिये” ताके विपैं कारणसहित जगतकी निवृत्तिरूप मोक्षके अंशकी वी इच्छा काहूंकूं बनै नहीं, यह वार्ता प्रथमदोहोंमैं कही ॥
।। ३७ ।। ब्रह्मप्राप्तिरूप मोक्षके द्वितीय-अंशाकी वी इच्छा काहूंकूं बनै नहीं ।
यह वार्ती
पूर्वपक्षी कहैहै—
दोहा—
किय अनुबव जा वस्तुको, ताकी इच्छा होइ ।
ब्रह्म नहीं अनुभूत इम, चहै न ताकूं कोइ ॥ ३ ॥
टीका:-जा वस्तुका अनुभव कहिये ज्ञान होय, ता वस्तुकी प्रासिकी इच्छा होवैहै । जा
जो दुःख सो अधिभूतदुःख कहियेहै ॥
।। ६२ ।। स्वसंघाततैं मित्र होवै औ चक्षुरादिक-
का अभिषय होवै सो अधिभूत कहियेहै । तिसतैं जन्य जो दुःख सो अध्यात्मदुःख कहियेहै । ताहीकूं
आत्माकूं 'आश्रयकरिके' वर्त्तनैवाला जो स्थूलसूक्ष्मशरीर, सो अध्यात्म कहियेहै । तिससैं जन्य जो दुःख सो अध्यात्मदुःख कहियेहै ।
ताहीकूं अध्यात्मताप वी कहतेहैं ॥
।। ६३ ।। स्वसंघाततैं मित्र होवै औ चक्षुरादिक-
इंद्रिय-
का विषय होवै सो अधिभूत कहियेहै ।
।। ६५ ।। पूर्वी अनुभव किये वस्तुकी इच्छा होवै-
है । ब्रह्मरूप अधिष्ठानके ज्ञानसैं कारणसहित जगतकी निवृत्तिका अनुभव पूर्व कबी किया नहीं । यातैं
कारणसहित जगतकी निवृत्तिकी इच्छा काहूंकूं बनै नहीं । यह पूर्वपक्षीकी शंकाकूं उत्तेजन है ॥ याका समाधान आगें ९१ वैं टिप्पणविसैं कहियेगा ॥
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वी होवें नहीं। जैसे अन्यदेशके अनन्तपदार्थ अज्ञात हैं, तिनकी प्रास्मिकी इच्छा काहूंपुरकूं होवें नहीं औ अधिकारिपुरकूं ब्रह्मका ज्ञान है नहीं औ जाकूं ब्रह्मका ज्ञान है सो अधिकारी नहीं किंतु मुक्त है। ताकूं ब्रह्मप्रास्मिकी इच्छा बैनै नहीं, यातैं वेदांतश्रवणतैं पूर्व अज्ञात जो ब्रह्म, ताकी प्रास्मिकी इच्छा बैनै नहीं। इसरीतिसैं अज्ञानसहित जगत्की निवृत्ति औ ब्रह्मकी प्रासिरूप जो मोक्ष, ताकी इच्छा काहूं बैनै नहीं यातैं मुमुक्षु कोउ है नहीं ॥३८॥ मुमुक्षुता बैनै नहीं, यातैं वैराग्यादिक बी बैनै नहीं ॥ अन्यरीतिसैं अधिकारीका अभाव पूर्वपक्षी प्रतिपादन करैहै।
दोहा- चहंत विषयसुख सकल जन, नहीं मोच्छको पंथ ॥ अधिकारी यातैं नहीं, पढ़ै सुनै जो ग्रंथ ॥४८॥ टीका:-सर्वरूप विपयसुखकूं चाहैंहैं। और जो कोई सकलविपयनका त्यागकारिके तपबिपै आसढ़ है, सो बी परलोकके उत्तम-भोगनकी इच्छाकारिके नानाकलेश संहार है ॥
॥६८॥ जो विचारके कियेहुए होवें नहीं, सो अविद्या कोहि है। सो अविद्या १ मूल, २ तूल, भेदतैं दोप्रकारिकी है ॥ १ जो शुद्धचैतन्यकूं दापै सो मूलाऽविद्या है ॥ २ जो घटादिकपदार्थे चैतन्यकूं दापै सो तूल्यविद्या है। तिनमें मूलाऽविद्या बी (१) कार्य (२) कारण- भेदतैं दोप्रकारिकी है ॥ (१) अन्यविधि अन्यकी बुद्धिरूप प्रतिति. जो है सो कार्यरूप अविद्या है। औ-
यातैं इसलोकका अथवा परलोकका विपयसुख सर्व चाहैहैं। सो विपयसुख मोक्षविपे है नहीं, यातैं मोक्षका पंथ कहिये साधन, ताकूं कोई पुरुप चाहै नहीं। इसरीतिसैं मोक्षकी इच्छारूप मुमुक्षुता बैनै नहीं औ सकलपुरुपनकूं विपयसुखकी इच्छा होवेंहैं, यातैं वैराग्यशामदमउपरति बी काहूंपै बैनै नहीं। यातैं चतुप्रयसाधनसहित अधिकारीका अभाव होवेंतैं ग्रंथका आरंभ निष्फल है ॥४॥
॥ अथ. विषयरखंडन (२) ॥३९-४८॥ ॥ पूर्वपक्ष ॥ ॥३९॥ जीवब्रह्मकी एकता बैनै नहीं
दोहा- जीवब्रह्मकी एकता, कहोयो विषय सो कूर ॥ हैसरहित बिमु ब्रह्म एक, जीव केसरको मूर ॥५॥ टीका:-पूर्व कहा जो “जीवब्रह्मकी एकता” सो संभवे नहीं। कहैंतैं? १ ब्रह्म तो (१) [१] अविद्याँ। (२) आवरणनिविक्षेपशक्तिवाली अनादिभावरूप जो है सो कारणरूप अविद्या है। तिनमें कार्यरूप अविद्या बी- [१] अनात्मादेहादिकविषै आत्मबुद्धि औ- [२] अनित्यआकारादिकविषै नित्यबुद्धि औ- [३] दुःखरूप धनादिकविषै सुखबुद्धि औ- [४] अशुचि जो जीवपुत्रके मुखचुंबनआदिक तिसविषै शुचिबुद्धि ! -इसमेदतैं च्यारिप्रकारिकी है ॥ यहां पंचदशेके प्रसंगमैं उक्तच्यारिप्रकारकी कार्याऽविद्याकाही ग्रहण है ॥
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[२] आँस्मिता । [३] राग । [४] द्वेष । [५] आँभिनिवेश । इन पंचहेशानतें रहित है । औ (२) विभु कहिये व्यापक है । (३) एक है । सजातीयभेदरहित है । कहाँतें? ब्रह्मके सजातीय औ वही है नहिं । औ—
२ जीवचिपै (९) सर्वकेश हैं । औ (२) परिच्छिन्न है । औ (३) जीव नाना हैं । कहांतें? जितनें शरीर हैं उतनें जीव हैं । जो सर्वशरीरचिपै जीव एक होवै तौ एकशरीरमैं सुख अथवा दुःख होनेंतें सर्वशरीरचिपै सुख औ दुःख हुवा चाहिये ॥ औ—
॥ ४० ॥ जो वेदांती कहैंहैं:-“सुखसैं आदिलेकैं अंतःकरणके धर्म हैं, सो अंतःकरण नाना हैं, यातें एकेके सुखी दुःखी होनेंतैं सर्व सुखी दुःखी नहीं होवेंहैं औ साक्षी सुखदुःखैं रहित है, एक है औ सर्वकेशानतें रहित है औ ताकी ब्रह्मके साथ एकता वनेहैं” ॥
॥ ६७ ॥ बुद्धि औ आस्माकी एकताकी जो प्रतीति सो आस्मिता हैँ । याहीकूं सामान्यअहंकार बी कहतैहैं ॥
॥ ६८ ॥ अनकूलवस्तुकी वासनें जाकी सुखचि वृत्ति सो राग हैँ ॥
॥ ६९ ॥ प्रतिकूलवस्तुके ज्ञानसैं जन्य जो बुद्धिवृत्ति सो हैँप हैँ ॥
॥ ७० ॥ मरणके भयसैं शारीरकी रक्षाविपैं जो आग्रह सो आँभिनिवेश हैँ ॥
॥ ७१ ॥ इहाँ “ रूप ” शब्दकारिके रूपपत्वजातिका औ रूपपत्वके व्याव्य नाम अंगर्गत नीलख भादिक सप्तजातिनका बी ग्रहण हैँ ॥
॥ ४१ ॥ साक्षीका नानापनै ॥४१-४५ ॥ सो चातोँ चनै नाहीं । कहैंहैं?- जो कर्ताभोक्ता जीव हैँ तिसतैं भिन्न साक्षी वंध्यापुत्रकै समान हैँ । औ जो साक्षी अंगीकार बी करो सो बी एक चनै नाहीं । नानासाक्षी मानने होवेंहैं । कहैंहैं? यह वेदांतीका सिद्धांत हैँ:-
“अंतःकरण औ सुखदुःखैं आदिलेकैं अंतःकरणके धर्म, ये इंद्रिय औ अंतःकरणके विपय नहीं किंतु साक्षीके चिपय हैं । कहैंहैं ? इंद्रिय तौ पंचीकृतभूतनकै चिपय करैहैं । यामैं इतना भेद हैँ:- औ तिनके कार्य—
९ नेत्रइंद्रिय तौ रुपवान् जो वस्तु हैँ ताके रुपकूं औ रुपके आश्रयकूं दोनोंकूं चिपय करैहैं । जैसैं नीलपितादिक घटका रूप औ तिस रुपके आश्रय घटकूं नेत्रइंद्रिय चिपय करैहैं औ—
२ त्वचाइंद्रिय तौ स्पर्शकूं औ ताकी आश्रयकूं दोनोंकूं चिपय करैहैं । औ— ३-४-५ रस्सैना, प्राण, श्रवण, ये तीनि तौ रस गंध शब्दमात्रकूं चिपय करैहैं । तिनके आश्रयकूं चिपय करैं नाहीं । यातैं इन तीनूवासैं तौ अंतःकरणका ज्ञान चनै नाहीं । औ—
नेत्रसैं तथा त्वचासैं अंतःकरणका ज्ञान चनै । ॥ ७२ ॥ इहाँँ “ स्पर्श ” शब्दकारिके स्पर्शके आश्रय स्पर्शवजातिका औ स्पर्शतवके व्याव्य कठि-नत्व कोमलत्व आदिक' त्यारीजातिनका बी ग्रहण हैँ ॥
॥ ७३ ॥ इहाँँ रस गंध औ शब्दगुण, इन तीनों करिके कमतैं रसघटत्व अरु शब्दत्वम्, इन तीनजातिनका औ रसत्वके व्याव्य मधुरत्वआदिक पट्ट-जातिनका औ गंधत्वके व्याव्य सुगंधत्व अरु दुरगंधस्वरूप दो जातिनका औ शब्दस्वरूप व्यापक नाम अधिकदेशवर्ती जातिके व्याव्य कहिये न्यूनदेशवर्ती तारतम्य ( अधिकत्व अरु मंदत्व ) रूप दोजातिका ग्रहण हैँ । सो यथाथैं जानिलेनाँ ॥
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नहीं । कहतें ? पंशींकृतभूत अथवा पंचीकृतभूतनका कार्य जो रूपवान् अथवा स्पर्शवान् होवै सो नेत्र औ त्वचाका विपय होवैहै । अंतःकरण अपंचीकृतभूतनका कार्य है । यातें नेत्र औ त्वचाका वी विपय नहीं । इसीकरणतें अपंचीकृतभूतनका कार्य नेत्रेन्द्रिय वी नेत्रका विपय नहीं है । औ वाधवस्तु इंद्रियका विपय होवैहै । औ अंतःकरण इन्द्रियकी अपेक्षातें अंतर है यातें वी इंद्रियनका विपय नहीं औ—
॥ ४२ ॥ अंतःकरणकी वृत्तिका वी विषय नहीं । कहतें ? अंतःकरण वृत्तिका आश्रय है । यातें अंतःकरण अपनी वृत्तिका विपयै वनै नहीं ॥ जैसे अभि अपना दाहका आश्रय है सो दाहका विपय नहीं होवैहै, किंतु अभिसैं भिन्न जो काष्ठसैं आदिलेके वस्तु है, सो दाहका विपय होवैहै ।
तैसें अंतःकरणसैं भिन्न जो वस्तु हैं सो अंतःकरणजन्य वृत्तिके विपय हैं औ अंतःकरण नहीं ॥
॥ ४३ ॥ तैसें अंतःकरणके धर्म वी अंतःकरणकी वृत्तिके विषय नहीं । कहतें ? अंतःकरणकूं विपय करनै वास्तै जो अंतःकरणकी वृत्ति होवै तौ अंतःकरणके धर्म जो सुखादिक हैं तिनकूं वी विपय करै ॥ सो अंतःकरणकूं विपय करनैवाली वृत्ति तौ अंतःकरणके सन्मुख होवै नहीं, यातें अंतःकरणके धर्म वी अंतःकरणकी वृत्तिके विपय नहीं । औयह नियम है:—जो वृत्तिके आश्रयसैं किंचित् दूरवस्तु होवै सो वृत्तिका विपय होवै सो वृत्तिके आश्रयसैं अत्यंतसमीप
होवै सो वृत्तिका विपय होवै नहीं ॥ जैसे नेत्रकी वृत्तिका आश्रय जो नेत्र ताके अत्यंतसमीप अंजन नेत्रकी वृत्तिका विपय नहीं । तैसें अंतःकरणकी वृत्तिका आश्रय जो अंतःकरण ताके अत्यंतसमीप जो सुखसैं आदि—लेके धर्म . सो अंतःकरणकी वृत्तिके विपय वनै नहीं ॥ इसरीतिसैं धर्मसहिते अंतःफरणका इंद्रियतें अथवा अपनेतैं भिन्न वनै नहीं किंतु साक्षीके विपय हैं ॥
॥ ४४ ॥ सो साक्षी एक अंगीकार करें औ नेत्रद्रेसैं स्थित जो संतःकरण सो उत्तधर्मसहित नेत्रकूं प्रकाशताहै । तैसें अंतःकरण वी अपनेतैं भिन्न सर्व जड़वस्तुनकूं प्रकाशतहै । परंतु सुखादिधर्मसहित आपकूं आप प्रकाशता नहीं । किंतु साक्षासंभत:करणविपे आरूढ़ जो साक्षी सो धर्मसहित अंतःकरणकूं प्रकाशताहै ।
यातें साक्षासंभत:करण आपेक्षिकस्वयंप्रकाश है । निरपेक्षस्वयंप्रकाश नहीं । औ—साक्षी अपने प्रकाशविपैै अन्यप्रकाशकी अपेक्षा करता नहीं औ सर्वका प्रकाशक है । यातैं निरपेक्षस्वयंप्रकाश है ।
या मूलग्रंथउक्त शंकाकेा समाधान इसी अभिप्रायसैं आगे विषयमंडनके प्रसंगमैं कहियेगा । तातैं ग्रंथके विषयमैं भ्रम करना योग्य नहीं ॥
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तौ जैसे एक अंतःकरणके सुखदुःखका साक्षी स मान होवैहैं, तैसे सर्वके सुखदुःखका भान हुवा चाहिये । यातैं साक्षी नाना हैं, जव नानासाक्षी अंगीकार करिये तत्र दोष नहीं कहैं ? जा साक्षीकी उपाधि अंतःकरण है ता साक्षीमें अपनी उपाधिके धर्मका भान होवैहैं यातैं सर्वके सुखदुःखका भान होवै नहीं ॥ इसरीतिसैं नाना जो साक्षी तिनूकी एक ब्रह्मके साथ एकता वनै नहीं ॥ ५ ॥
अथ प्रयोजनखंडन (३) ४५-५९-॥ ॥ पूर्वपक्ष ॥ ॥ ४५ ॥ मिथ्याबंधकी सामग्री नहीं है ॥ यातैं तकी निवृत्ति वनै नहीं ॥ ॥ दोहा ॥ वंधनिवृत्ति ज्ञानतैं, वनै न विन अध्यास ॥ सामग्री तकी नहीं, तजो ज्ञानकी आस ॥ ६ ॥ टीका:-अहंकारसैं आदिलेके जो अनात्मवस्तु हैं, सो वंध करिहेहैं ॥ सो वंध
॥ ७६ ॥ स्वभावके अधिकरणमें जो अवभास नाम विपय औ ज्ञान, सो अध्यास कहिये है ॥ जैसे करिपतसरपके व्यावहारिक औ पारमार्थिक स्वभावके अधिकरण कहिये आश्रय रज्जुसर्पे प्रतिभासिक सरपका भवभास कहिये सर्प औ ताका ज्ञान है, सो अध्यास है ॥ अथवा अधिष्ठानतैं विपमसत्तावाल्हो जो अवभास सो अध्यास कहियेहे ॥ जैसे व्यावहारिक सत्तावाले रज्जुरूप अधिष्ठानतैं विपम कहिये प्रतिभासिकरूप विपरीतसत्तावाल्हो जो अवभास कहिये सर्प औ ताका ज्ञान है सो अध्यास है ॥ वि. ४
जो अध्यासरूप होवै तौ ज्ञानतैं निप्यत्त होवै औ अध्यासरूप नहीं होवै तौ ज्ञानतैं निप्यत्त होवै नहीं । कहैं ? ज्ञानका यह स्वभाव है है:- जा वस्तुका ज्ञान होवै ताकेविपै अध्यास औ अज्ञान तिनकूं दूरी करैहै ॥ जैसे जेवरीका ज्ञान जेवरिके अज्ञानकूं दूरी करैहै ॥ भांतिज्ञानका विपय जो मिथ्यावस्तु औ भांतिज्ञान ताका नाम अध्यास है ॥ जाकेविपै जो वस्तु मिथ्या नहीं है किंतु सत्य है, ताकी ज्ञानसैं निवृत्ति होवै नहीं ॥
तैसे आत्माविपै अहंकारसैं आदिलेके वंध जो अध्यास कहिये मिथ्या होवै तौ ज्ञानसैं निप्यत्ति होवै । आत्माविपै मिथ्यावंधकी सामग्री है नहीं औ वंध प्रतीति होवैहै । यातैं तय सत्य है । तौ मिथ्यावस्तुकै ज्ञानसैं निप्यत्तिकी आशा निष्फल है ॥ ६ ॥ ॥४६॥ अथ अध्याससामग्री निरूपणम् ॥ ॥ दोहा ॥ satyavastukesamjñān, sanskār ek jān ||
सो अध्यास ९ अर्थाध्यास औ २९ ज्ञानाध्यास- भेदतैं दोमांतिका है है ॥ १ भांतिज्ञानका विषय जो सर्वप्रथमिकमिथ्यावस्तु सो अर्थाध्यास है ॥ औ- २ भांतिज्ञान जो मिथ्यावस्तुका मिथ्याज्ञान सो ज्ञानाध्यास है ॥ tिनमैं ज्ञानाध्यास परोक्ष अपरोक्षभेदतैं दो- भांतिका है ॥ औ- अर्थाध्यास ९ केवलसंबंधाध्यास । २ संबंधसहित- संबंधीका अध्यास । ३ केवलधर्माध्यास । ४ धर्म सहित
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त्रिविधदोष अज्ञान पुनी, सांमथी पहिचान ॥ ७७ ॥
टीका:-१ सत्यवस्तुके ज्ञानजन्य संस्कार । औ तीनप्रकारके दोप । २ प्रमेयका दोप । ३ प्रमाताका दोष । ४ प्रमाणका दोष । औ ५ अधिष्ठानके विशेषरुपका अज्ञान । इतनी अध्यासकी सामग्री है । या बिना अध्यास होवै नहीं ॥
१ जैसे सीपीमैं रुपेका औ जेवरमैं सर्पका अध्यास होवैहै, सो जा पुरषनैं सत्यरुपेका औ सर्पेका ज्ञान नहीं, तौं होवैहै औ जाकूं सत्यरुपेका औ सर्पका ज्ञान नहीं तौं होवै नहीं । यातैं सत्यवस्तुके ज्ञानके संस्कार अध्यासके हेतु हैं ॥
२ सीपीमैं सर्पका औ जेवरमैं रुपेका अध्यास होवै नहीं । यातैं प्रमेयके सादृश्यदोष अध्यासका हेतु है ॥
धर्मीका अध्यास । ५ अन्योन्याध्यास औ ६ अन्यतराध्यासमेदतैं षटप्रकारका है ॥
अथवा संगरोध्यास औ स्वरुपाध्यासभेदतैं अर्धोध्यास दोप्रकारका है ॥
यहां निष्कर्ष यह है:- केवलसंबंधाध्यासही संगरोध्यास है औ संबंधसहित संबन्धीका अध्यासही संबंधसहित स्वरूपाध्यास है । सोई अन्योन्याध्यास है । सर्वत्र संगर्ग औ स्वरूप दोनोंका मिश्रभाव होवैहै औ दोनोंमैं एकका जो अध्यास सो अन्यतराध्यास कहियेहै सो मिथ्यावस्तुका स्वरूपाध्यासरूप कहियेहै । अरु सत्यवस्तुका संबंधाध्यासरूप कहियेहै ॥
किंवा केवलसंबंधाध्यासका पृथकूसंभावकारै कथन जो है सो आत्मा अरु अनात्माके अध्यासके भेदज्ञानअर्थे है, परन्तु सर्वेअर्थोध्यास अन्योन्याध्यासरूपही हैं ।
तातैं पृथक् नहीं ॥ सो अन्योन्याध्यास कहूं केवलधर्मका होवैहैं औ कहूं धर्मिसहितधर्मका होवैहै । यातैं उक्तभेदतैं अन्योन्याध्यास दोप्रकारकाही है ॥
३ इसरीतिसैं प्रमाताविपै लोभ भयसैं आदि लैके !
४ नेत्रादिकमाणविचै पित्तकामलसैं आदि-लेके जो दोष सो अध्यासके हेतु हैं ॥
औ-५ सीपीका "इहैं" रुपकारिके सामान्यज्ञान होवै औ "यह सीपी है" ऐसा विशेषज्ञान नहीं होवै । जब अध्यास होवैहै "सीपी है" ऐसा विशेषरुपकारिके ज्ञान होवै तव अध्यास होवै नहीं ॥
औ सामान्यरुपकारिके ज्ञान नहीं होवै तौ भी अध्यास होवै नहीं । यातैं अधिष्ठानका विशेषरुपकारिके अज्ञान औ सामान्यरुपकारिके ज्ञान अध्यासका हेतु है ॥
इतनी अध्यासकी सामग्री है । इनमैं कोईएक नहीं होवै तो भी अध्यास होवै नहीं ॥
जैसे कुलाल चक्र दंड मृतिका घटकी सामग्री है । कोईऐक नहीं होवै तो घट होवै नहीं । तैसे अध्यास वी सारी सामग्रीसैं होवैहै ॥ ७७ ॥
॥ ७७ ॥ कारणके समुदायको सामग्री कहैंहैं ॥
जैसे लकड़ी चुल्ही आदि कारण मिलिके पाक जो रसोई ताकी सामग्री कहियेहै । तैसे अध्यासके कारणोंका समुदायको सामग्री कहियेगा ॥
॥ ७८ ॥ प्रमाज्ञानका जो विषय सो प्रमेय कहियेहै ॥
कलिप्त सर्परजतआदिकका अधिष्ठान रज्जुशुक्ति आदि प्रमा ज्ञानका विषय है । यातैं सो प्रमेय है । ताकिवै जो सर्पादिकनकी तुल्यता है सो सादृश्यदोष है । याहीकूं प्रमेयदोष वी कहते हैं॥
रज्जुविथै भूमिस्पृष्टत्वदीर्घेलत्वत्रिलयाकारतारुप सर्पका सादृश्य है औ कृतिकिविथै चाकचिक्यतारुप रजतका सादृश्य है ॥
इसरीतिसैं अन्यथिखान वी अधिष्ठानका सादृश्य जानि लेना ॥
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|| ४७ || १ बंधके अध्यासमें सत्यवस्तुके ज्ञानसैं जन्य संस्कारकी असिद्धि || तैसैं बंधके अध्यासमें एक वी कारण है नहीं | बंध कहूं सत्य होवै तौ ताके ज्ञानजन्यसंस्कारतैं आत्माविपै सिध्यावंध प्रतीत होवै | सो सिद्धांतमें आत्मामैं भिन्न कोई सत्यवस्तु है नहीं | यातैं सत्यबंधके ज्ञानजन्यसंस्कारका अभाव होनेतैं आत्माविपै बंधका अध्यास बनै नहीं ||
तैसैं साक्ष्यके अभाव होनेतैं प्रत्यक्षविपयी जो आत्मा ताविपै पराकूविपयरूप बंधका अध्यास बनै नहीं || || ४८ || २ बंधके अध्यासमें प्रमेयके दोपकी असिद्धि || तैसैं आत्माका औ बंधका साक्ष्य वी है नहीं | उलटा तमप्रकाशकी विपरीतस्वभाव है ||
१ आत्मा प्रत्यक्ष है औ बंध परोक्ष है | प्रत्यक्ष नाम अंतरका है औ परोक्ष नाम बाह्यका है || २ आत्मा विपयी है औ बंध विपय है | जो प्रकाश करनैवाला होवै सो 'विपयी कहियेहै | जाका प्रकाश करिये सो विपय कहियेहै || १ प्रत्यक्षविपै परोक्षका तथा परोक्षविपै प्रत्यक्षका अध्यास होवै नहीं | जैसेैं पुत्रादिकनकी अपेक्षांतैं देह प्रत्यक्षु है | ताकेविपै पुत्रादिकनका औ पुत्रादिकनविपै देहका अध्यास होवै नहीं || औ- २ विपयमें विपयीका तथा विपयीमें विपयका अध्यास होवै नहीं | जैसेैं विपय जो घटादिक तिनविपै विपयी दीपकका औ दीपकविपै घटादिकनका अध्यास होवै नहीं ||
|| ४९ || ३-बंधके अध्यासमें प्रमातादिक दोपकी असिद्धि || तैसैं प्रमाताके दोपका औ प्रमाणके दोपका वी अभाव है | कहैंतैं ? "प्रमातैं आदिलेकै सर्वप्रपंच अध्यासरूप•है सोई बंध है !" यह वेदांतका सुनिश्चित है || इसरीतिसैं बंधके अध्यासमें पूर्व प्रमाताप्रमाणका स्वरूप असिद्ध है औ ताका दोप वी असिद्ध है | यातैं बंधका अध्यास बनै नहीं ||
|| ५० || ४ बंधके अधिष्ठान ग्रह्हका विशेषरूपसैं अज्ञान बनै नहीं || औ अधिष्ठानका विशेषपरूपकरिके अज्ञान वी बनै नहीं | कहैंतैं ? जो बंधका अधिष्ठान ब्रह्म है सो स्वयंप्रकाश ज्ञानरूप है | ता स्वयंप्रकाशज्ञानरूप ब्रह्माविपै सूर्यविपै तमकी न्याईं अज्ञान बनै नहीं || जैसेैं प्रकाशमान सूर्यैं तमका विरोध है तैसेैं चेतनप्रकाश औ तमरूप अज्ञानका परस्परविरोध है || औ----
अध्यासमानका अज्ञान अंगीकार करें तौ वी बंधका अध्यास बनै नहीं | कहैंतैं ? अत्यंतअज्ञातविपै तथा अत्यंतज्ञातविपै अध्यास होवै नहीं, किंतु विशेषपरूपसैं अज्ञात औ सामानयरूपसैं ज्ञातविपै होवैहै || औ ब्रह्म सामान्यविशेषभावसैं रहित है | निर्विशेष है | यह इंद्रियरूप प्रमाण हैं | यातैं वे वी अभ्यस्त हैं ||
|| ५९ || ब्रह्मचैतनysैं भिन्न अज्ञान औ ताका कार्य स्थूलसूक्ष्मप्रपंच यह सर्वे चेतनविपै अध्यस्त हैं | याहीके अंतरगत अंतःकरणरूप प्रमाता औ उपनिषदनका निश्चित अर्थरूप सिद्धांत है ||
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सिद्धांत है । यातैं विशेषरूपसैं अज्ञात औ सामान्यरूपसैं ज्ञात ब्रह्म बने नहीं ॥ औ-अध्यासके लोमैं ब्रह्मविषै सामान्यविशेष-भाव अंगीकार करैंगे तौ सिद्धांतका त्याग होवैगा ॥
इसरीतिसैं निर्विशेष जो प्रकाशरूप ब्रह्म ताका विशेषरूपसैं अज्ञान औ सामान्यरूपसैं ज्ञानका अभाव होनैतैं ताके विपै अध्यास बने नहीं । यातैं ब्रह्मविषै बंध अध्यासरूप है । यह कहना बने नहीं । किंतु बंध सत्य है ॥ ता सत्यबंधकी ज्ञानसैं निष्पत्तिका असंभव है । यातैं ज्ञानद्वारा मोक्षरूप ग्रंथका प्रयोजन बने नहीं । औ ज्ञानसैं मोक्षका प्रतिपादक जो सिद्धांत सो समीचीन नहीं, किंतु कर्मसैं मोक्ष होवैहै । यह वार्त्ता एकभाविकवादकी रीतिसैं प्रतिपादन करैहैं:-
|| ५१ || केवलकर्मसैं मोक्षकी सिद्धि ( एकभाविकवाद ) || ५१-५८ ||
|| दोहा || सत्यबंधकी ज्ञातैं, नहीं निवृत्ति सयुक्त्त ॥ नित्यकर्म संतत करै, भयो चहै जो मुक्त ॥ ८ ॥
|| ८० || जाका वेदविषै विधान औ निषेध किया नहीं, ऐसी जो रागद्वेषसैं रहित स्वाभाविक गमनशौचादिरूप किया सो उदासीनक्रिया है ॥
|| ८१ || अवश्य करनै योग्य कार्यका विस्मरण प्रमाद कहियेहै ।-वा शाखसैं करनैकौ योग्य होवै जो जाके करनैकी इच्छा वी होवै तिस कार्यका जो न करना, सो प्रमाद कहियेहै ॥ जैसैं यति संन्यासी ताकौँ द्रव्यका सग्रहण शाखनैंँ विधान
टीका:-सत्यबंधकी ज्ञानसैं निष्पत्ति मांननी सयुक्त कहिये युक्तिसहित नहीं । किंतु सतत कहिये निरंतर नित्यकर्म करै । याका यह अभिप्राय है:-
|| ५२ || कर्म दोप्रकारका है, १ एक विहित है औ २ एक निपिद्ध है ॥
१ पुरुषकी ग्रहृत्तिके निमित्त जाका स्वरूप वेदनै बोधन कियाहै सो विहितकर्म कहियेहै ॥ औ-२ पुरुषकी निवृत्तिके निमित्त जासों बोधन करीहै सो निषिद्धकर्म कहियेहै । औ-स्वभावसिद्ध जो क्रिया है सो कर्म नहीं । कहैंतैं ? जो वेदनै प्रवृत्ति अथवा निवृत्तिके निमित्त बोधन कियाहै सो कर्म कहियेहै ॥ उदासीनक्रिया कर्म नहीं । यातैं दोप्रकारका कर्म है । तीनप्रकारका नहीं ॥
|| ५३ || विहितकर्म चारप्रकारका है । १ एक प्रायश्चित्त है । २ काम्य है । ३ नैमित्तिक है औ ४ नित्य है ॥
१ पापनाशके निमित्त विधान कियो जो द्रव्यके ग्रहणजन्य जो यतिकों पाप ताके नाशके निमित्त द्रव्यका त्याग औ तीनि उपवास हैं ॥
२ फलके निमित्त विधान कियो जो कर्म सो काम्य कहियेहै ॥ जैसैंँ वृष्टिकामनासैं कार्तिक-मासैंँ अग्निहोत्रकी करनैकी इच्छा वी है । फेर ताका न करनौ ( द्रव्यका ग्रहण करना ) सो प्रमाद है ॥
|| ८२ || स्वदेशविषै वृष्टिकी कामनावाला राजा अपनी प्रजासैं धनका विभागरूप कर लैकै जो याग करताहै सो, किंवा वंशश्रृद्धिके धंकुर करीर हैं, तिनके होमकरि जो याग होवै सो कारीरियाग कहियेहै ॥
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योग है और स्वर्गकामकूं अग्निहोत्रसोमयागसैं आदिलैकैं हैं ॥ ३ जा कर्मकै नहिं कियेसैं पाप होवै औ कियेसैं पुन्यपापरुप फल होवै नहीं औ सदा जाका विधान नहीं, किंतु किसी निमित्तकूं लेके विधान कियै होवै, सो कर्म नैमित्तक कहियेहै ॥ जैसैं ग्रहणश्राद्ध है औ अवस्थावृद्ध, जातिवृद्ध, आश्रमवृद्ध, विद्यावृद्ध, धर्मवृद्ध ज्ञानवृद्ध पुरुषनके आगमनतैं उत्थानरुप कर्मै हैं । विद्याशब्दसैं शास्त्रज्ञानका ग्रहण है औ ज्ञान शब्दसैं अपरोक्षविद्याका ग्रहण है । पूर्व्वसैं उत्तर औ उत्तरसैं उत्तम है ॥ ४ जाके नहिं कियेसैं पाप होवै, कियेसैं फल होवै नहीं औ सदा जाका विधान होवै, सो
॥ ८३ ॥ याका यह अर्थ है:- १ अवस्थावृद्धतैं जातिवृद्ध कहिये वर्णवृद्ध उत्तम है ॥ औ २ केबल वर्णवृद्धतैं अवस्थावृद्ध औ वर्णवृद्ध उत्तम है ॥ औ ३ अवस्थावृद्ध वर्णवृद्ध दोनूंनैं आश्रमवृद्ध उत्तम है ॥ औ ४ केबल आश्रमवृद्धतैं अवस्थावृद्धआश्रमवृद्ध उत्तम है ॥ ५ अवस्थावृद्ध आश्रमवृद्ध वर्णवृद्ध इन तीनोंतैं विद्यावृद्ध उत्तम है ॥ औ ६ केबलविद्यावृद्धतैं अवस्थावृद्धविद्यावृद्ध उत्तम है ॥ औ ७ अवस्थावृद्धविद्यावृद्धतैं वर्णवृद्धविद्यावृद्ध उत्तम है ॥ औ ८ वर्णवृद्धविद्यावृद्धतैं आश्रमवृद्धविद्यावृद्ध उत्तम है ॥ ९ अवस्थावृद्ध वर्णवृद्ध आश्रमवृद्ध अरु विद्यावृद्धतैं धर्मवृद्ध उत्तम है ॥ औ १० अवस्थावृद्धधर्मवृद्धतैं वर्णवृद्धधर्मवृद्ध उत्तम है ॥ औ
नित्यकर्म कहियेहै । जैसैं स्वानसंध्यादिक है ॥ इसरीतिसैं चारप्रकारका विहित औ निषिद्ध मिलिके पांचप्रकारका कर्म है ॥ ॥ ५४ ॥ मोक्षकी इच्छावान् काम्य तौ निषिद्धकर्म करै नहीं । चाहैंतैं? काम्यकर्मसैं उछलकै जावहै औ निषिद्धसैं नीचेलिकै जावहैहै । यांतैं दोनूंको त्याग करैं औ नित्यकर्म सदा करै औ नैमित्तिकका जब निमित्त होवै तब नैमित्तिक बी करै । चाहैंतैं? नित्यनैमित्तिक कर्मै नहीं करै तौ पाप होवैगा, ता पापसैं नीचेयोनि हूं प्राप्त होवैगा, यांतैं आपके रोकनैवास्तै नित्यनैमित्तिककर्म करै । नित्य-नैमित्तिककर्मका औरफल नहीं । याही फल है:- ११ वर्णधर्मवृद्धतैं आश्रमवृद्धधर्मवृद्ध उत्तम है ॥ औ १२ आश्रमवृद्धधर्मवृद्धतैं विद्यावृद्धधर्मवृद्ध उत्तम है ॥ औ १३ अवस्थावृद्धतैं लेकै धर्मवृद्ध पर्यंत । इन सर्वतैं ज्ञानवृद्ध उत्तम है ॥ तिनमें बी
१४ केबलज्ञानवृद्धतैं अवस्थावृद्धज्ञानवृद्ध उत्तम है ॥ औ १५ अवस्थावृद्धज्ञानवृद्धतैं वर्णवृद्धज्ञानवृद्ध उत्तम है ॥ औ १६ वर्णवृद्धज्ञानवृद्धतैं आश्रमवृद्धज्ञानवृद्ध उत्तम है ॥ औ १७ आश्रमवृद्धज्ञानवृद्धतैं विद्यावृद्धज्ञानवृद्ध उत्तम है ॥ औ १८ विद्यावृद्धज्ञानवृद्धतैं धर्मवृद्धज्ञानवृद्ध उत्तम है ॥ इहां धर्मशब्दसैं शास्त्रोक्तअर्थकै अनुष्ठानका ग्रहण है औ विद्यावृद्धशब्दसैं अधिकशास्त्राभ्यासवानका ग्रहण है औ ज्ञानवृद्धशब्दसैं ज्ञाननिष्ठाविषै अधिक आसक्तका ग्रहण है ॥
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करनैसैं होवै नहीं। यातैं मुख्य मुख्य नित्यनैमित्तिक कर्म अवश्य करै॥ ॥५५॥ और जो कदाचित् प्रमादसैं निपिद्धकर्म होय जावै तौ ताका दोप दूरी करनैहूँ प्रायश्चित्त करै॥ जो निपिद्धकर्म नहीं कियाहोवै तौ बी जन्मांतरके जो पाप हैं तिनके दूरी करनैवास्तै प्रायश्चित्तकर्म करै॥ परंतु इतना भेद है:-प्रायश्चित्त दोप्रकारका है॥१ एक तौ असाधारण है औ २ एक साधारण है॥
१ जो किसी पापविद्येपके दूरी करनैवास्तै शास्त्रनै विधान कियाहोवै सो असाधारण प्रायश्चित्त कहियेहै। जैसैं पूर्वकथा उपवास है॥ औ— २ सर्वपापके दूरी करनैवास्तै शास्त्रनै जो विधान किया कर्म सो साधारणप्रायश्चित्त कहियेहै। जैसैं गंगास्नान औ ईश्वरके नामका उच्चारण है॥ इसतैं आदिलेकै और बी जानी लैनि॥
इसरीतिसैं दोप्रकारके प्रायश्चित्त हैं॥ १ जो ज्ञातपाप होवै तौ तिस पापका नाशक जो असाधारणप्रायश्चित्त शास्त्रनै बोधन किया है ताकूं करै॥ औ— २ जो जन्मांतरके अज्ञातपाप हैं तिनके दूरी करनैवास्तै साधारणप्रायश्चित्त करै॥ कहैंत? १ असाधारणप्रायश्चित्तका यह स्वभाव है:- जा पापका नाश करनैवास्तै शास्त्रनै जो प्रायश्चित्त विधान किया है सो पाप प्रायश्चित्तसैं दूरी होवैहै। और नहीं॥ औ— २ जन्मांतरके पापका ऐसा ज्ञान है नहीं, जो कौनसा पाप है, किस प्रायश्चित्तसैं दूरी होवैगा। यातैं साधारणप्रायश्चित्त करै॥
॥५६॥ साधारणप्रायश्चित्तसैं सर्वपाप दूरी होवैहैं॥ यद्यपि गंगास्नानसैं आदिलेकै जो साधारणप्रायश्चित्त कहे सो केवलप्रायश्चित्तरूप है
नहीं। किंतु १ काम्यरूप औ २ प्रायश्चित्तरूप हैं। कहैंत? (१) “गंगास्नानसैं उत्तमलोककी प्रापति” शास्त्रमैं कहीहै॥ तैसैं “ईश्वरके नामउच्चारणसैं बी उत्तमलोककी प्रापति” कहीहैं। यातैं प्रायश्चित्तरूप हैं। औ (२) पापके नाशक हैं। जैसैं अश्वमेध ब्रह्महत्यादिक पापका नाशक है औ स्वर्गकी प्राप्तिरूप फलका हेतु है। तैसैं गंगास्नानादिक हैं। केवलप्रायश्चित्त नहीं, यातैं गंगास्नानादिकनतैं उस्समलोककी प्राप्ति तथापि जाकूं उत्तमलोककी वांछा है नहीं। जाकूं गंगास्नानादिक पापनाशकारिके उत्तमलोककूं प्राप्त करैहै। जाकूं लोकक्री कामना नहीं है, ताके केवलपापहीके नाशक हैं। यातैं कामनासहित अनुष्ठान किये काम्यरूप प्रायश्चित्त हैं॥
इसरीतिसैं जन्मांतरके संपूर्णपापका ज्ञानसैं विनाही नाश होवैहै॥ ॥५७॥ तैसैं मुख्य मुख्य जन्मांतरके काम्यकर्म बी वंध्याके समान हैं। फलके हेतु नहीं। कहैंत? जैसैं कर्मके अनुुष्ठानकालविवै पुरुषकी इच्छा फलका हेतु वेदांतमतमैं अंगीकार करीहै। इच्छासहित अनुुष्ठान किये कर्म
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स्वर्गादिफलके हेतु हैं। आँ निष्फलम् अज्ञान किये स्वर्गादिफलके हेतु नहीं। यह वेदांतका सिद्धांत है॥ तैत्तिरीयकर्मकाण्ड मिद्धिर्य अनंतर यी पुरुषकी इच्छा फलकां हेतु हैं। मो पुरुषकी इच्छा फलका हेतु हैं जिस कारण पुरुष मुमुक्षु हुवा तव दोऊ होवें। यातैं जन्मांतरके काम्यकर्म यी फलके हेतु नहीं॥ जैसेँ किसी पुरुपनैं धनकी प्राप्तिकी इच्छातैं धर्मपुरुपका आराधन कियाहैं, नां धनके आराधन अनंतर यी जां धनकी इच्छा दूरी होयजायँ तां धनकी प्राप्तिरूप फल होवें नहीं। तैमे जन्मांतरके काम्यकर्मका यी मुमुक्षुं इच्छाके अभावत फल होवें नहीं॥ एकरितैं केवलकर्मसैं मोक्ष होवेंहैं॥
२ यद्यपि निय आँ नैमित्तिकही करै । प्रयोजनसिद्धि नहिं करै। कहतैं १ जो साचितनैपिद्धकर्म आँ काम्यकर्म सों मुमुक्षुं नाश होय जावैंहैं॥ जैसेँ ज्ञानवानके संचितकर्मका नाश वेदांतमतमें अंगीकार कियाहैं। तैमे निपिद्धवर्तमान जां मुमुक्षु नाश होवेंहैं॥ ३ यद्यपि संचित जां काम्य आँ निपिद्ध, मो आगे मिलिके एकजन्मका आरंभ करैहैं। यातैं मुमुक्षुं एकजन्म आँ होवेंहैं॥
४ यद्यपि योगसिद्धि काम्यकर्मकी नाश मुख्रही कारणसैं संचित अनंतगिरनका आरंभ करैहैं। तिनतैं मुमुक्षुत्तमजन्मतिप सर्वका फल योग लेवेंहैं॥ ५ यद्यपि नित्य आँ नैमित्तिककर्मकै अनुग्रानतैं जो कलेस है सो जन्मांतरके संचितनिपिद्धकर्मका फल है। यातैं जन्मांतरका संचितनिपिद्ध आरंभ करै नहीं॥ काम्य कर्मनका फल एकजन्मतिपि संबं नहीं। या शंकाके निवारणार्थ अनयपक्ष कंरहैं॥
८ अनंतवचनप्रारणजननांक कारण अनंतकर्मनका फल एकजन्मतिपि संबं नहीं। या शंकाके निवारणार्थ अन्यपक्ष कंरहैं॥ योगीके काय करिये धारणका व्यूह करिये समुह तार्ती यातैं एककाळमें यी अनंतप्रकारके जन्मकरि अनंतप्रकारके दुःख थी उत्तमजन्मतिपि योगनि पडेंगी। इस ययमें मुमुक्षुकी या मनमें अप्रप्रस्ति होवेंगी। या अविप्रायँ एकवाक्यवादाी उत्तरजन्मतिपि मुमुक्षु-केवलस्युवका मोग दितायँक स्वमतमें यीच उपजायँतैं॥
८६ साधारणप्रायश्चित्त थी अमाधारणप्रायश्चित्त करैसैथे वडुनश्रम नेंकिते मुमुक्षुं स्वमतमें धर्मनि होंवेंगी। या अर्थप्रायसैं एकवाक्यवादि अन्य सुरगप्रकार कंरहैं॥ "नाझुरं क्षीयते कर्म कयकोटिर्दशन- रपि। अवश्ररमेव भोक्लव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्" ॥ अर्थ-एकोटिकरांकारे कृत असुरनाका कर्म भोगिना नाश होंता नहिं। किंतु किया जां शुभअशुभकर्म भोगि विनाश होंय। याप है। जां मोक्षदिना कर्मंका नाश मानि तो नकदाचत्रचनका विरोध होंवै॥
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३२ ( पूर्वपक्षीमतै उत्तर ॥ ६१-६३ ॥ ) अधिकारीमंडन 〈१〉 ॥ ६१-७१ ॥ [ विचारसागर
जो संचित है, सो एकजन्म अथवा एककालमै अनंतशरीरनका आरंभ करैहै । यातैं भुसुक्षुं उत्तरजन्मविपै दुःखका लेश बी होवै नहीं । केवलसुखका भोग होवैहै । कहैं ? जन्मांतरके संचित जो विहितकर्म हैं तिनतैं शरीर हुवाहै औ संचित जो निषिद्ध हैं सो नित्यनैमित्तिकके अनुष्ठानके लेशतैं पूर्वजन्मविपै भोगे लिये ॥
इसरीतिसैं प्रायश्चित्तसैं बिना केवल नित्य औ नैमित्तिककर्मके अनुष्ठानतैं मोक्ष होवैहै । यातैं नैमित्तिककर्मके समय नैमित्तिक अनुष्ठान करै । औ नित्यकर्म संतत अनुष्ठान करै ॥ या मतकूं शास्त्रमै ऐकभविकवाद कहैहैं ॥ ५९ ॥ बंधनिवृत्ति ज्ञानद्वारा ग्रंथका प्रयोजन नहीं ॥
यातैं बी बंधकी निवृत्ति ज्ञानद्वारा ग्रंथका प्रयोजन नहीं । कहैं ? जो वस्तु औरसैं होवै नहीं सो मुख्यप्रयोजन होवैहै ॥ जैसैं रूपका ज्ञान नेत्रविना औरसैं होवै नहीं सो रूपज्ञान नेत्रका प्रयोजन है । औ बंधकी निवृत्ति ग्रंथसैं विना कर्मतैं होवैहै । यातैं बंधकी निवृत्तिग्रंथका प्रयोजन नहीं ॥
इसरीतिसैं ग्रंथके अधिकारी विपय प्रयोजन वैं नहीं ॥
॥ ६० ॥ ॥ संबंधखंडन ( ८ ) ॥
॥ पूर्वपक्ष ॥
अधिकारी आदिकौ अभावतैं संबंध बी वैं नहीं । कहैं ?
१ विपयके अभावतैं ग्रंथका औ विपयका प्रतिबाध्यप्रतिपादकभावसंबंध वैं नहीं ॥
२ अधिकारि औ फलके अभावतैं तिनका प्राप्यप्रापकभावसंबंध वैं नहीं ॥
३ अधिकारीके अभावतैं ताका औ विचारका कर्तृकृत्यभावसंबंध वैं नहीं ॥
४ ज्ञानकूं निष्फलता होतैंतैं ग्रंथका औ ज्ञानजनकभावसंबंध घनै नहीं ॥
सफलवस्तु जन्य होवैहै । पूर्व कही रीतिसैं ज्ञान सफल है नहीं ॥ औ-
५ ज्ञानके स्वरुपका बी अभाव है । यातैं कहैं ? जीवब्रह्मके अभेदनिश्चयका नाम सिद्धांतमै ज्ञान है ॥ सो अभेदनिश्चय वैं नहीं । कहैं ? जीवब्रह्मका अभेद है नहीं । यह वार्त्ता विपयके निराकरणमै पूर्व प्रतिपादन करीहै । यातैं अभेद-निश्चयरुप ज्ञान वैं नहीं ॥
इसरीतिसैं अधिकारि-आदिक अनुवंधनके अभावतैं ग्रंथका आरंभ वैं नहीं ॥
अथ पूर्वपक्षीमतै उत्तर ॥६१-६३॥ ॥ अधिकारीमंडन( १ ) ॥६१-७१॥ ॥ अंक ३४-३६ गत पूर्वपक्षका उत्तर
॥ ६१-६३ ॥
( मोक्षकी प्रथमअंशाकी इच्छा वैंहै ) पूर्वपक्षीते प्रथम कहा " जो मोक्षकी इच्छा काहूकूं वैं नहीं । कहैं ? मोक्षविपै दोअंश हैं :-
१ एक तौ कारणसहित जगत्की निवृत्ति मोक्षका अंश है । औ २ दूसरा अंश ग्रह्मकी प्राप्तिरुप है ॥ तिनविपै कारणसहित जगत्की निवृत्तिरुप मोक्षके प्रथमअंशकी इच्छा काहूकूं है नहीं । किंतु तीनप्रकारके दुःखकी निवृत्तिकी इच्छा सर्वपुरुषकूं है ॥ सो दुःखकी निवृत्ति अपने उपायनतैं होय जावैहै । यातैं मूलसहित-
सो एकभविकवाद शब्दका अरथ है ॥
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जगतकी नित्यत्की इच्छावाला मुमुक्षु अधिकारी बनै नहीं" । ताका--
॥ ६२ ॥ समाधान प्रथम कहैंहैं ॥
॥ दोहा ॥
मूलसहित जगजानि बिन,
न्है न त्रिविधदुःख ध्वंस
यातैं जन चाहत सकल,
प्रथम मोक्षको अंस ॥ ९ ॥
टीका:--मूल कहीये जगतका कारण जो
अज्ञान औ जगतके नाशविना तीनप्रकारके
दुःखका और उपायतैं ध्वंस कहीये नाश होवै
नहीं, औ मूलअविद्याके नाशतैं सर्वदुःख औ
दुःखके कारण रोगादिक औ रोगादिकनके
आश्रय शरीरादिकनको नाश होवैहैं । यातैं
त्रिविधदुःखके नाशके निमित्त कारणसहित
जगतकी नित्यतिरूप मोक्षके प्रथमअंशकौं सकल
पुरुष चाहैंहैं ।
तात्पर्य यह है:--जो सर्व औपधेआदिक
उपाय करनैवपै समर्थ हैं, तिनके वि दुःख
नियमकरी दूरि होवें नहीं ॥ काहूपुरुषका रोगादि
जन्यदुःख औपधआदिक उपायनतैं नाश होवैहै औ
काहूके दुःखका औपधआदिक उपायनतैं नाश
होवैं नहीं । यातैं औपधआदिक उपायनतैं रोग-
दिजन्य दुःखकी नियमकरिके निवृत्ति
नहीं । औ जाके औपधआदिक उपायनतैं दुःखकी
निवृत्ति होवैहै । ताके वि दुःखकी उत्पत्ति
फेरि होवैहै । यातैं औपधआदिक उपायनतैं
दुःखकी अत्यंतानिवृत्ति होवै नहीं । जाकी
निवृत्ति हुइहै ताकी फेरि उत्पत्ति नहीं होवै ।
सो अत्यंतानिवृत्ति कहिये है । औपधआदिक
उपायनतैं दुःखकी निवृत्ति नियमित होवै
नहीं औ निवृत्त जो दुःख ताकी फेरि वि
उत्पत्ति होवैहैं । यातैं अत्यंतानिवृत्ति वि
उपायनतैं होवै नहीं ॥ औ--
दुःखके सकलसाधनका नाश होवै तौ सकल-
दुःखकी नियमकरिके निवृत्ति होवै औ दुःखके
साधनका नाश हुइयैं फेरि दुःख होवै नहीं,
यातैं दुःखकी निवृत्तिके निमित्त दुःखके
साधनकी निवृत्तिकी इच्छा सर्वदा होवैहै ॥
॥ ६३ ॥ सो दुःखका साधन अज्ञान औ
ताका कार्य प्रपंच है । यह वातैं छांदोग्य-
उपनिषदैं भृमविद्यापै प्रसिद्ध है ॥ तहां यह
प्रसंग है:--"एकसमयै सनत्कुमारक पास नारद
प्राप्त हुए ॥ औ
नारदनै कहां:--" हे भगवन् ! जो आत्म-
ज्ञानी पुरुष है ताकूं शोक नहीं होवैहै औ मैं
शोकसहित हूं, यातैं मैं अज्ञानी हूं । मेरेकूं ऐसा
उपदेश करो जासैं मेरा अज्ञान दूरी होवै" ॥
तव सनत्कुमारनैं नारदकूं कह्या:--" हे
नारद ! भूमा शोकरहित है । सुखरूप है औ भूमा सैं
मित्र सकल तुच्छ है औ दुःखका साधन है " ॥
भूमा नाम ब्रह्मका है ॥
इसरातें स ब्रह्मतैं मित्र जो वस्तु, सो सकल-
दुःखका साधन कहैं । अज्ञान औ ताका कार्य
मब्रैं स मित्र है । यातैं दुःखका साधन है । ताकी
निवृत्ति हुइसैं सर्वदुःखकी नियमकरिके अत्यंत-
तैसैं दुःखके साधनकी निवृत्तिविना दुःखकी निवृत्ति
होवै नहीं । यातैं दुःखकी निवृत्तिका इच्छै पुरुष
"मैं शास्त्रगुरुसैं जाइके दुःखके साधनका त्याग
करूंगा" ऐसैं दुःखके साधनकी निवृत्तिकौं वि इच्छताहै ॥
॥ ९० ॥ जैसैं कफकारक पदार्थके त्यागविना
कफरोगकी निवृत्ति होवै नहीं, यातैं कफनित्यतिकी
इच्छै "मैं वैद्यसैं जानिके कफकारकपदार्थका त्याग
करूंगा " ऐसैं कफके साधनकी निवृत्तिकौं इच्छताहै।
वि. ५
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३४८ : (पूर्वपक्षींकमतैं उत्तर ॥ ६७-९३ ॥) अधिकारीमंडन (९) ॥ ६१-७१ ॥ (विचारसागर
निवृत्ति बनैहै । यातैं सकलदुःखकी निवृत्तिके निमित्त अज्ञानसहित प्रपंचकी निवृत्तिरूप मोक्षके प्रथमांशकी चाह बनैहै ॥ ९ ॥
॥ ६४ ॥ अंक ३७-३८ गत पूर्वपक्षका उत्तर ॥ ६४-६५ ॥
( मोक्षके द्वितीयांशकी इच्छा बनैहै ) और जो पूर्वपक्षींकैं (अंक ३७ में)कथ्या:- " जा वस्तुका अनुभव किया होवै, ताकी प्राप्तिकी इच्छा होवैहै । ब्रह्मका अनुभव काहून किया है नहीं । यातैं ब्रह्मकी प्राप्तिरूप मोक्षके द्वितीयांशकी इच्छा काहूंकूं होवै नहीं " । ताका—
सैमाधान कहैहैं ।
॥ दोहा ॥
किये अनुभव सुखकी सर्वहैं, ब्रह्म सुन्यो सुखरूप ॥
॥ ९१ ॥ इहां यह शंका है:-जा वस्तुका पूर्व अनुभव किया होवै ताकी इच्छा होवैहै । यह नियम है—ब्रह्मरूप अधिष्ठानके ज्ञानसैं अज्ञानसहित प्रपंचकी निवृत्तिका अनुभव सुखशुकूं पूर्व किसी काळविषै भया नहीं । यातैं ताकूं अज्ञानसहित प्रपंचकी निवृत्तिकी इच्छा बनै नहीं । यह ६५ वें टिप्पणउक्त शंकाका यह समाधान है:-अनुभव किये वस्तुकी इच्छा होवैहै ऐसा नियम नहीं । किंतु अनुभव किये वस्तुके सजातीयकी इच्छा होवैहै । यह नियम है ॥
जो अनुभव किये वस्तुकी इच्छा होवै तो मुक्त मोोजनविषै फेरी इच्छा हृईचाहिये भौ होती नहीं । किंतु तिसकै सजातीय ताकै तुष्ट्य वा तिसतैं विलक्षण अन्यमोजनकी इच्छा होवैहै ।। जैसेैं अज्ञानसहित प्रपंचका अधिष्ठान ब्रह्म है तैसेैं कल्पित सर्पादिकनके अधिष्ठान रज्जुस्यादिक हैं । यातैं वे अधिष्ठानताकारिके परस्पर सजातीय हैं । अथ सर्पादिकनकी निवृत्ति औ
ब्रह्मप्राप्ति या हेतुतैं, नहत विवेकीभूप ॥ १० ॥
टीका:-सर्वपुरुपैं' सुखका अनुभव क्रियाहै । यातैं सुखकी इच्छा सर्वकूं है औ " ब्रह्म नित्यसुखरूप है " ऐसा -सत्शास्त्रमैं सुन्याहै । यातैं विवेकीभूप कहिये उत्तमविवेकी सुखस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्तिकूं चाहैहै ॥ १० ॥
॥ ६५ ॥ ॥ दोहा ॥
केवलसुख सब जन चैहैं, नहीं विषयकी चाह ॥ अधिकारी यातैं बनै, वहै जु विवेकी नाह ॥ ११ ॥
टीका:-पूर्व (अंक ३८ में) कहा जो "सर्व पुरुप विपयजन्यसुख चाहैहैं, सो 'विपयजन्य- सुख मोक्षविषै प्राप्त होवै नहीं । किंतु जगतमैं प्राप्त
ज्ञानसहित प्रपंचकी निवृत्ति वी परस्पर सजातीय ज्ञातैं रज्जुस्यादिके ज्ञानसैं सर्पादिकनकी निवृत्ति मुसुकशुकूं अनुमूत है, तातैं तिनके सजातीय ब्रह्मके ज्ञानसैं अज्ञानसहित प्रपंचकी निवृत्तिकी इच्छा बैनैहै ॥ ९२ ॥ इहां यह रहस्य है:-जो अनुभव
किये वस्तुमात्रकी इच्छा होती होवै । तो अनुभव किये रोगादिनिमित्तसैं जन्य दुःख भौ ताके साधन रोगादि- रूप प्रतीकूल्यवस्तुकी वी इच्छा सर्वकूं हृईचाहिये भौ
होती नहीं । यातैं अनुभव किये सुख भौ सुखके साधनरूप अनुकूलवस्तुकी इच्छा होवैहै; तिनमैं वी अनुभव किये अनुकूलवस्तुके सजातीयकी इच्छा
होवैहै । यह नियम है ॥ जातेैं बुद्धिविषै ब्रह्मानंदके प्रतिबिंबरूप 'विषयसुखका' अनुभव सर्वैं कियाहै; ताका सजातीय विम्बमूत 'सुखरूप ब्रह्म' शास्त्रमैं सुन्याहै
यातैं ब्रह्मकी प्राप्तिकी इच्छा बनैहै ॥
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होवैहै। यातैं मोक्षकी इच्छावान् अधिकरीकै असमर्थतैं ग्रंथका आरंभ निष्फल है॥ ताकूं यह पूछैहैं:- १ जो कोई मुख्य नहीं है? २ अथवा मुख्य तो हैं परंतु तिनकी ग्रंथविपै प्रवृत्ति होवै नहीं? १ जो ऐसे कहै:- “मुख्य नहीं है”। सो चातैं नहीं। कहैंतैं? सर्वरूप सर्वदुःखका नाश औ नित्यसुखकी प्राप्ति चाहैंहैं। सो सर्वदुःखका नाश औ सुखकी प्राप्तिरूप मोक्ष है, यातैं सर्वरूप मुख्य हैं॥ और कथा जो “विपयजन्यसुख चाहैहै” सो नहीं। किंतु सुखमात्र चाहैंहैं। सो सुख विपयसैं होवै अथवा विपयविना होवै। जो विपयजन्य सुखकृंही चाहैहै तौ सुप्रतिकै सुखकी इच्छा नहीं हुई चाहिये। सुप्रतिकासुख विपयजन्य है नहीं; यातैं सुखमात्रकूं चाहैंहैं। केवल विपयजन्यकृंहीं नहीं। उलटा आत्मसुखकृं चाहैंहैं। विपयजन्यकूं नहीं चाहैंहैं। कहैंतैं? सर्वपुरुपनकूं नित्य अथवा अधिकविपयसुख प्राप्त वी हैं। परंतु ऐसी इच्छा सदा रहैहै:- “हमारेकूं ऐसा सुख प्राप्त होवै, जा सुखका नाश कदै होवै नहीं”। ऐसा सुख आत्मस्वरूप मोक्ष है। यातैं सर्वरूप मुख्य हैं। 'कोउ मुख्य नहीं' ऐसा कहना बनै नहीं ॥
॥ ६६ ॥ मुख्यकी सिद्विसैं ग्रंथके आरंभकी सफलता ॥ ६६-६८ ॥ २ और जो ऐसे कहै:-“मुख्य तो हैं, परंतु ग्रंथमैं प्रवृत्ति होवै नहीं। यातैं ग्रंथका आरंभ निष्फल है” ॥ तांकूं यह पूछैहैं:-(१) ग्रंथ मोक्षका साधन नहीं है यातैं ग्रंथविपै प्रवृत्ति होवै नहीं? (२) अथवा ग्रंथसैं और भी कोई साधन है। जाकैविपै प्रवृत्ति होनतैं ग्रंथविपै प्रवृत्ति होवै नहीं? (३) अथवा जिन समाधिकनतैं ग्रंथमैं अधिकार कधा, सो श्रमादिमान् ज्ञानी योग्य कोई अधिकारी नहीं है। यातैं ग्रंथमैं प्रवृत्ति होवै नहीं? (१) जो ऐसे कहै:-“ग्रंथ मोक्षका साधन नहीं”। सो चातैं नहीं। कहैंतैं? मोक्ष जानतैं नियमकै होवैहै। यह वेदक्ता सिद्धांत है ॥
सो ज्ञान श्रवणसैं होवैहै। श्रवण दोप्रकारका है— (१) एक तौ वेदांतवाक्यकका औ श्रोतका संयोगरूप है औ (२) दूसरा वेदांतवाक्यकका विचाररूप है। ज्ञानका हेतु प्रथम श्रवण है। दुसरा नहीं। कहैंतैं? शब्दजन्यज्ञानविपै हृदयके साथ शब्दका संयोगही सर्वत्र हेतु है। यातैं वेदांतवाक्यकका औ श्रोतका संयोगरूप श्रवण महाज्ञानका हेतु है। अवांतरवाक्यकका श्रवण परोक्षज्ञानका हेतु है औ महावाक्यकका श्रवण अपरोक्षज्ञानका हेतु है। यह वात्ती पूर्वप्रतिपादन करीहै ॥ जाकूं ज्ञान हुचैहैं वी असंभावना औ विषयभावना होवै। सो १ दूसरा श्रवण, २ मनन औ ३ निदिध्यासन करै। १ वेदांतवाक्यकका विचाररूप जो श्रवण, ताकूं वेदांतवाक्यविपै असंभावना दूरी होवैहै। “वेदांतवाक्य ब्रह्मके प्रतिपादक हैं?” ऐसा संशय वेदांतवाक्की असंभावना है। सो तिनके उपकार्यसैं दूरी होवैहै। औ—
सो अंग ( साधन ) श्रवण कहियेहै औ प्रथमश्रवण उपकार्य है। यातैं अंगी ( फल ) श्रवण कहियेहै ॥ ॥ ९३ ॥ अंगअंगीभेदतैं श्रवण दोप्रकारका है ॥ तिनमैं द्वितीयश्रवण प्रथमश्रवणका उपकारक है। यातैं
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२ मननसैं प्रमेयकी असंभावना दूरी होवैहै । जीवब्रह्मकी एकता वेदांतका प्रमेय कहियेहै । "सो एकता सत्य है अथवा जीवब्रह्मका भेद सत्य है ?" ऐसासो संशय, सो प्रमेयकी असंभावना कहियेहै । सो मननसैं दूरी होवैहै ॥
३ विपरीतभावना निदिध्यासनतैं दूरी होवैहै ॥
इसरीतिसैं प्रथमश्रवण तौ ज्ञानद्वारा मोक्षका हेतु है औ विचाररूप श्रवण औ मनन औ निदिध्यासन, ये असंभावना औ विपरीतभावनाकी निवृत्तिद्वारा मोक्षके हेतु हैं ॥
वेदांत नाम उपनिषद्का है, सो यद्यपि या ग्रंथतैं भिन्न है तथापि उनके समान अर्थवाले भाष्यग्रंथ या ग्रंथैं हैं, तिनके श्रवणतैं वी ज्ञान होवैहै । यह वार्ता आँगे प्रतिपादन करैंगे ॥
इसरीतिसैं ज्ञानद्वारा ग्रंथ मोक्षका हेतु है औ विचाररूप औ मननरूप यह ग्रंथ है । यातैं असंभावनादोषकी निवृत्तिद्वारा मोक्षका हेतु है । यातैं "ग्रंथसैं मोक्ष होवै नहीं" । यह केवल हठमात्र है ॥
॥ ६७ ॥ २ और जो ऐसै कहै:-"ग्रंथसैं मोक्ष तौ होवैहै, परंतु और साधनसैं वी मोक्ष होवैहै, यातैं ग्रंथका आरंभ निष्फल है" । ताकूँ यह पूँछहैं सो औरसाधन कौन हैं जातैं मोक्ष होवैहै ?
जो ऐसै कहै:-"उपनिषद् सूत्रभाष्यसैं
॥ ९४ ॥ भाषाग्रंथके श्रवणतैं वी ज्ञान होवैहै, यह वार्ता त्यागे । वृत्यादितरंगके दशमदोहीविपै प्रतिपादन करैंगे ॥
॥ ९५ ॥ वेदका अंतभागरूप जो वेदांत सो उपनिषद् कहियेहै ॥ ये उपनिषद् (१०८) हैं ॥ तिनमैं ईशा । केन । कठ । प्रश्न । मुंडक । मांउल्क्य ।
आदिलेके संस्कृतग्रंथ जीवब्रह्मकी एकताके प्रतिपादक बहुत हैं, तिनसैं वी ज्ञानद्वारा मोक्ष होवैहै । याकूँ मिलि अधिकारी नहीं । यातैं यह ग्रंथ निष्फल है" ॥
सो वार्ता यद्यपि सत्य है, तथापि तिनका अर्थ ग्रंथकरनैपर जोरै निति समरथैं नहीं है, ऐसाजो मुख्यकु तार्कूँ तिनसैं ज्ञान होवै नहीं । यातैं मंदबुद्धिसुमुख्यकी तिनविपै प्रीति होवै नहीं । या ग्रंथविपैहीं प्रीति होवैगी ॥
॥ ६८ ॥ ३ और जो ऐसै कहै:-"ग्रंथसैं मोक्ष वी होवैहै औ संस्कृतग्रंथनसैं मंदबुद्धिकूँ बोध वी होवै नहीं औ मुख्यकु वी है । तौ वी ग्रंथविपै प्रीति होवै नहीं । कहैंतैं ? जो विवेक-वैराग्यशमादिमान अधिकारी कद्द्या । सो दुलंभ है । यातैं आपनैवै साधनका अभ्यास देखिके ग्रंथमैं प्रीति होवै नाहीं" ॥ ताकूँ यह पूँछहैं-(१) बहुत अधिकारी नहीं ? (२) अथवा कोई वी नाहीं ?
(१) जो ऐसै कहै:-"बहुतअधिकारी नाहीं" । सो तौ हम वी अंगीकार करैहैं । औ-(२) जो ऐसै कहै:-"कोई वी ज्ञानके योग्य अधिकारी नहीं" । सो वार्ता बनै नाहीं । कहैंतैं ? ग्रंथ:करणविपै तीन दोष हैं:-(क) एक मल है । औ (ख) विशेष है औ (ग) स्वरूपका आवरण है ॥
तैत्तिरीय । ऐतरेय । छांदोग्य । बृहदारण्यक । ये दशोपनिषद् मुख्य हैं तिनके ऊपर श्रीशंकराचार्यस्वामीकृत भाष्य हैं ॥ इन १० उपनिषदनका हिंदीभाष्यका* लक्षण तौ पंचम थौ. षष्ट टिप्पणविपै लिख्याहै ॥
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॥ पामर विपथी औ जिज्ञासु पुरुषनके लक्षण ॥
(क) मल नाम पापका है। (ख) विक्षेप नाम चंचलताका है। औ (ग) आचरण नाम अज्ञानका है॥
(क) शुभकर्मतैं मलदोष दूरी होवैहै औ (ख) उपासनातैं विक्षेपदोष दूरी होवैहै। (ग) ज्ञानतैं आवरणदोष दूरी होवैहै॥
जिनके अंतःकरणविपै मल औ विक्षेपदोष हैं सो अधिकारी नहीं वी हैं। परंतु इसजन्मविपै अथवा पूर्वजन्मविपै शुभकर्म औ उपासना-के अनुछानतैं जिनके मल औ विक्षेपदोष नाश हुयेहैं। तैसे ज्ञानयोग के अधिकारी हैं, तिनकी ग्रंथमैं प्रवृत्ति चनैहै॥ ॥ ६९ ॥ पामर औ विपथी पुरुषनका लक्षण॥
पुरुष हैं:- १ पामर । २ विपथी । ३ जिज्ञासु । ४ मुक्त ॥ १ इसलोकके निपिद्ध औ विहितभोगनविपै आसक्त जो शास्त्रसंस्काररहित पुरुष, सो पामर कहियेहै।
२ शास्त्रके अनुसार विपयनतैं भोगतोंहू परलोकके अथवा इसलोकके भोगनके निमित्त जो कर्मे करै सो विपथ्यी कहियेहै। औ-॥ ७० ॥ जिज्ञासुका लक्षण ॥
३ ऐसा पुरुष जिज्ञासु कहियेहै:- जा पुरुषकूं उत्तमसंस्कारतैं सत्शास्त्रका श्रवण होवैहै ता उत्तमकूं ऐसा विवेक होवैहै:-
(१) विपयसुख अनित्य है। जितना काल विपयसुख होवैहै तव बी कोईदुःख अवश्य रहैहै औ परिणाममें विनाशीसुख दुःखका हेतु है औ वर्तमानकालमें वी दुःखके हेतु है। इसरीतिसैं विपयसुख दुःखतैं ग्रस्याहै, यातैं दुःखरूप है॥ औ-
२ जो अशास्त्रवेत्ता हुआ अन्यके सुखसैं श्रवण किये शास्त्रके अर्थविपै अविश्वासकारिके इसलोककेहीं भोगनविपै आसक्त है सो मध्यमपामर है॥ औ
३ जो सर्वथा शास्त्रसंस्काररहित होनेकरि इसलोक-केई भोगविपै आसक्त है, सो कनिष्ठपामर (अल्पपामर) है॥ ॥ ९८ ॥ १ उत्तम २ मध्यम औ ३ कनिष्ठभेदतैं विपयी तीनप्रकारका है॥
औ जो ऐसै पूर्व कछ्या:- ( अंक ३८ का माच ) "सर्वकूं विपयसुखमें अल्पबुद्धि है। नित्य सुखकूं कोई चाहहै नहीं।" कहैंतैं? चारिप्रकारके
॥ ९६ ॥ १ कृतोपासन औ २ अकृतोपासन-भेदतैं अधिकार दोप्रकारका है॥ तिनमें
१ सगुणब्रह्मकी संप्रूण ( चित्तकी एकाग्रतापर्यंत) उपासना जिस पुरुषनैं करीहै सो कृतोपास्न है॥ ताकेविपै शास्त्रोक्तसाधन सर्वप्रसिद्ध देखियेहैं॥
२ जाके ज्ञातैं पूर्व सगुणब्रह्मकी उपासना अपूण है सो पुरुष अकृतोपासन है। ताकेविपै सर्वसाधन प्रसिद्ध देखत नाहीं। किंतु कोई कोई साधन प्रसिद्ध दीखताहै। और औं ग रहतेहैं, यातैं ताकूं चित्तकी एकाग्रताके अभावतैं ज्ञानके उत्पन्न भये पीछे विपरीतभावना रहतीहै। ताके निवारणअर्थ निदिध्यासन करणव्य है॥
॥ ९७ ॥ १ उत्तम २ मध्यम औ ३ कनिष्ठभेदतैं पामर तीनप्रकारका है॥
१ जो शास्त्रवेत्ता हुआ वी इसलोककेहीं भोगन-विषै आसक्त है। सो उत्तमपामर है॥ औ-
१ जो वैकुंठ किं वा ब्रह्मलोकादिककी इच्छा करिके सकाम उपासनाविपै प्रवृत्त भयाहै, सो उत्तम-विपथी है॥ औ-
२ जो स्वर्गलोककी इच्छाकारिके सकामकर्मविपै प्रवृत्त भयाहै। सो मध्यमविपथी है॥ औ-
३ जो इसलोकमत राज्यादिभोगकी इच्छाकारिके पुण्यकर्मविपै प्रवृत्त भयाहै, सो कनिष्ठ-विपथी है॥
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३८ (पूर्वपक्षीक्षमतैं उत्तर ॥ ६१-६३ ॥) अधिकारीमंडन ( १ ) ॥ ६१-७१ ॥ [ विचारसागरे
(२) दुःखकी निवृत्ति लौकिकउपायतेैं होवै नहीं। चाहतेैं? जो उपाय करैहैं तिनके वी भी सारे दुःख निवृत्त होवें नहीं औ निवृत्त हुये वी फेरि होवैहैं ॥ औ—
(३) जितनै काल शरीर है तपर्यंत दुःखकी निवृत्ति संभवै वी नहीं । चाहतेैं? जो शरीर हैं सो सारे पुण्य औ पापसैं होवैहैं ॥
(१) मनुष्यशरीर तौ मिश्रितकर्मका फल प्रसिद्ध है । औ—
(२) देवशरीर वी मिश्रितकर्मकाही फल है ॥ जो केवलपुन्यका फल देवशरीर होवै तौ अपनेैं अधिक अन्यदेवकी विसूति देखिके जो देवनकूं ताप होवैहै सो नहीं हुवा-चाहिये ॥ सर्वदेवनमें प्रधान जो इंद्र ताकूं वी अनेक दैत्यदानवके भयजन्यदुःख शास्त्रमें कहाहै। जो देवशरीर केवलपुन्यकाही फल होवै तौ देवनकूं दुःख नहीं हुवा-चाहिये । यातैं देवशरीर वी पुन्यपाप दोनौंका फल है औ जो शास्तिमें कहाहै:- “देवता पापरहित हैं ” ताका यह अभिप्राय है:- कर्मका अधिकार केवल मनुष्यशरीरमें है औरमैं नहीं । यातैं देवशरीरमें किया जो शुभ अशुभ तिनका फल देवनकूं होवै नहीं औ देवशरीरसैं पूर्वशरीरमें किया जो शुभ औ अशुभ तिनका फल तौ देवशरीरमें वी होवैहै ॥ इसरीतिसैं देवशरीर मिश्रितकर्मका फल है ॥ औ
(३) तिर्यकपशुपक्षीका शरीर वी मिश्रित-कर्मका फल है । चाहतेैं? जो तिनकूं प्रसिद्ध दुःख है सो तौ पापका फल है औ मैथुनादिकनका सुख है सो पुन्यकका फल है ॥
॥ ९९ ॥ यामैं 'इतना- मेतद है:- परमेश्वरकी भक्ति दया सत्य औ ज्ञानभादिक शुभगुणनका तौ मनुष्यमात्रकूं अधिकार है । जो वर्णाश्रमके कर्मका तौ वर्णाश्रमवाले मनुष्यनकूंही यथायोग्य अधिकार है
(क) उदरसैं डो गमन करै सो तिर्यक् कहिये है ॥ (ख) पक्षसैं गमन करै सो पक्षी कहिये है ॥ (ग) च्यारिपादसैं गमन करै सो पशु कहिये है ॥ (घ) कधूं पृथुपक्षी वी तिर्यकृकही कहिये हैं॥
इसरीतिसैं सर्वशरीर पुण्य और पापसैं रचित हैं ॥
(१) कोई शरीर तौ न्यूनपाप औ अधिक-पुन्यतैं रचित हैं । जैसे देवशरीर हैं ॥ अपने-अपने जो पुण्य हैं, तिनहींैं सर्वदेवनविपै पाप न्यून है । यातैं न्यूनपापाधिकपुन्यतैं रचित देवशरीर कहिये हैं ॥ या अभिप्रायतेंही शास्त्रमैं केवलपुन्यका फल देवशरीर कहाहै । यातैं विरोध नहीं । जैसे वहुतग्रामणतैं ब्राह्मणग्राम कहिये है तैसैं अधिकपुन्यकका फल होनेतैं देवशरीर केवलपुन्यकका फल कहिये हैं । परंतु केवलपुन्यकका फल नहीं ॥
(२) तिर्यकपशुपक्षीका शरीर अधिकपाप-न्यूनपुन्यसैं रचित है ॥
(३) जो उत्तममनुष्य हैं तिनकी देवनके समान रीति है और नीचनकी सर्पादिकनके समान है ॥
इसरीतिसैं सर्वशरीर पुन्यपापरचित हैं ॥ औ पापका फल दुःख है । यातैं शरीर रहै तथ-पर्यंत दुःखकी निवृत्ति होवै नहीं ॥
(१) सो शरीर धर्म औ अधर्मका फल है । तिनकी निवृत्तिविना शरीरकी निवृत्ति होवै नहीं । चाहतेैं? वर्च्चमानशरीर दूरि हुये वी पुन्यपापतैं औरशरीर होवैगा । यातैं पुन्य-पापकी निवृत्तिविना शरीरकी निवृत्ति होवै नहीं ॥
है । यातैं देव औ तिर्यक् पशु पक्षींकूं ऋमतैं सर्व-इता औ अज्ञतारूप हेतुतैं ज्ञानी औ वालककी न्याईं वचतेंमानशरीरविधे किये शुभअशुभकर्मका फल अन्यजन्मविषै होतां नहीं । यह शास्त्रकी मर्यादा है ॥
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( २ ) सो पुण्यपापं रागद्वेषके नाशविना दूरी होवें नहीं । काहेंतें ? वर्तमानपुण्यपापकी भोगरैं निश्चिति हुयेसैं बी रागद्वेषपतैं औरपुण्यपाप होवैंगे यातैं रागद्वेषकी निश्चितिविना पुण्यपाप दूरी होवें नहीं ॥
( ३ ) सो रागद्वेष अनु्कूलज्ञान औ प्रतिकूल-ज्ञानसैं होवेंहैं ॥ (क) जाविपै अनु्कूलज्ञान होवें ताविपै राग होवैहैं । औ (ख) जाविपै प्रतिकूल-ज्ञान होवेंहैं ताविपै द्वेप होवेंहैं ।
यातैं अनु्कूलज्ञान औ प्रतिकूलज्ञानकी निश्चिति-चिना रागद्वेपकी निश्चिति होवें नहीं ॥
( ४ ) सो अनु्कूलज्ञान औ प्रतिकूलज्ञान भेद-ज्ञानसैं होवेंहैं । काहेंतें ? जा वस्तुकूं अपने स्वरूपते भिन्न् जानैं ताकै विपै अनु्कूलज्ञान अथवा प्रति-कूलज्ञान होवेंहैं । अपने स्वरूपमैं अनु्कूलज्ञान औ प्रतिकूलज्ञान होवें नहीं ॥ (क) सुखके साध-नका नाम अनु्कूल है औ (ख) दुःखके साधनका नाम प्रतिकूल है ॥
अपना स्वरूप सुखका अथवा दुःखका साधन नहीं । घटादि सुखरूप है तथापि सुखका साधन नहीं । यातैं स्वरूपसैं भिन्न् जो वस्तु जान्याहै ताविपै अनु्कूलज्ञान औ प्रतिकूलज्ञान होवेंहैं ॥ इसरीतिसैं पदार्थन-विपै अपनेसैं जो भेदज्ञान सो अनु्कूलज्ञान औ प्रतिकूलज्ञानका हेतु हैं । ता भेदज्ञानकी
निश्चिति हुयेसैं बी रागद्वेपकी निश्चिति होवें नहीं ॥
( ५ ) सो भेदज्ञान अविधाजन्य है । काहेंतें ? "संपूर्णप्रपंच औ ताका ज्ञान स्वरूपके अज्ञान-कालमैं हैं" । यह संपूर्णवेद औ शास्त्रका तात्पर्य है । इसरीतिसैं संपूर्णदुःखकी हेतु
स्वरूपका अज्ञान है ॥ सो स्वरूपका अज्ञान स्वरूपज्ञानविना दूरी होवै नहीं । काहेंतैं ? जा वस्तुका अज्ञान होवें सो ताके ज्ञानसैं दूरी होवैहै । जैसैं रज्जुकां अज्ञान रज्जुके ज्ञानसैं दूरी होवेंहैं । औरसैं नहीं । यातैं स्वरूपका ज्ञानही अज्ञानकी निश्चितिद्वारा दुःखकी निश्चितिका हेतु है । औ-
स्वरूपज्ञानसैं ब्रह्मकी प्राप्ति होवेंहै सो ब्रह्म नित्य है औ आनन्दस्वरूप है ! दुःखसंबंधसैं रहित हैं । यातैं स्वरूपज्ञानसैं नित्य औ दुःखते संबंधसैं रहिते जो ब्रह्मस्वरूप आनन्द ताकी प्राप्ति बी होवेंहै ॥
इसरीतिसैं दुःखकी निष्पत्ति औ परमानन्दकी प्राप्तिका हेतु स्वरूपज्ञान है । यातैं स्वरूप जाननेकूं योग्य हैं ॥
४ स्थूलसूक्ष्मकरणशरीरतैं भिन्न जो अपना स्वरूप ताका ब्रह्मरूपकारिके अपरोक्षज्ञान जाकूं होवें सो मुक्त कहीयेहै ॥
इसरीतिसैं चारिप्रकारके पुरुप हैं ॥ तिनविपै
॥ १०० ॥ अज्ञानरुप मूलके निवृत्त भये ज्ञानीकूं जीवईश्वरका भेद औ ताके अंतर्गतजीवजी-वका भेद, जीवजडका भेद, औ जडजडका भेद औ जडईश्वरका भेद । ये पांचभेद यथासय प्रतीत होते नहीं । किंतु कल्पित उपाधिकृत होतेंहैं कल्पित प्रतीत होवेंहैं । तातैं वाधितानुवृत्तिकरि दग्धधान्यकी न्याई अनु्कूलप्रतिकूलज्ञान रागद्वेप ( पंचकैष ) कौ शुभ-क्रिया प्रतीत होवेंहै । परंतू ताका फल भाविजन्म कौ सुखदुःख होवेंहै नहीं ॥
॥ १०१ ॥ १ उत्तम २ मध्यम ३ कनिष्ठभेदतैं जिद्रार्शु तिनप्रकारका है:-
१ तीव्रजिज्ञासावान् हुवै चारिसाधन अथवा मंदतिरोधकरि संपन्न उत्तमजिज्ञाश्रु है ॥
२ मंदजिज्ञासाकरिके वेदांतश्रवणविषैै प्रवृत्त होवै सो मध्यमजिज्ञाश्रु है ॥
३ मंदजिज्ञासाकरिके निष्कामकर्मउपासनाविषैै प्रवृत्त होवैहै सो कनिष्ठजिज्ञाश्रु है ॥
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॥ ७१ ॥ ग्रंथमैं जिज्ञासुकी प्रवृत्ति होवैहै । मुक्तादिक तीनकी नहीं ॥
१—२ पामर औ विषयींकूँ तौ यथापि विषयसुखमैं अलंबुद्धि है औ किसी विपयीकूँ परमसुखकी इच्छा वी होवै तौ वी ताके जो उपाय नहीं हैं । तिनमैं उपायबुद्धिकरिके प्रवृत्त होवैहै । कहैंहैं ? उपायका ज्ञान सत्संग औ सत्शास्त्रके श्रवणतैं होवैहै से ताके है नहीं । यातैं पामर औ विपयीकी सुखप्रासिके निमित्त ग्रंथमैं प्रवृत्ति होवै नहीं ॥ दुःखकी निवृत्तिके निमित्त वी दोनों अन्यउपायनमैं प्रवृत्त होवैहैं ! ताके निमित्त वी ग्रंथमैं प्रवृत्ति होवै नहीं । यातैं विषयी औ पामरकी ग्रंथमैं प्रवृत्ति होवै नहीं ॥
३ तथापि जिज्ञासु जो पुरुष है ताकूँ विपयसुखसैं अलंबुद्धि होवै नहीं । किंतु परमसुखकी ताकूँ इच्छा है औ दुःखकी अत्यंतकरिके निवृत्तिकी इच्छा है । सो “परमसुखकी प्राप्ति औ दुःखकी अत्यंतनिवृत्ति ज्ञानसैं बिना होवै नहीं ” ऐसां जाईं सत्संगसैं विवेक है ताकी ग्रंथमैं प्रवृत्ति बनैहै । औ-
४ मुक्तकी प्रवृत्ति वी होवै नहीं । कहैंहैं ? ज्ञानवान् मुक्त कहियेहैं । सो ज्ञानी कृतकृत्य है ताकूँ कछू कर्तव्य नहीं । यह वार्ता आगैं प्रतिपादन करैंगें ॥ औ लीलाकारिके मुक्त प्रवृत्त होवै तौ वी मुक्तकूँ ग्रंथमैं प्रवृत्तिसैं कोई प्रयोजन सिद्ध होवै नहीं । यातैं मुक्तके निमित्त वी ग्रंथ नहीं ॥
॥ १०२ ॥ यह वार्ता आगैं पंचमतर्गमैं २७५ के श्लोकविसै कहियेगी ॥ याके उपरि जो पामर औ विषयीकूँ विषयसुखमैं अलंबुद्धि नाहीं है ताका अर्थ संतोष नहीं । कहैंहैं ? विषयसुखके भोगकूँ अभिलाषै डारे द्रुतकी न्याईं अधिक भोगकी इच्छारूप तृष्णाका उद्रेक होतैं ताका अर्थ संतोष नहीं । किंतु “विपयसुखसैं विलक्षण नित्यनिरतिशयआत्मसुख वी है ”
इस ज्ञानके अभावतैं सेधसद्धिके मनोरथकी न्याई
इसरीतिसैं मोक्षकी इच्छावान् अधिकारी बनैहै ॥ ११ ॥
॥ ७२ ॥ ॥ विपयमंडन ( २ ) ॥
॥ ७२-७६ ॥
अंक ३९-४८ गत पूर्वपक्षका उत्तर ॥ दोहा—
साक्षी ब्रह्मसरूप इक, नहीं मेदको गंध ॥
रागद्वेष मतिके धरम, तामैं मानत अंध ॥ १२ ॥
टीका:-पूर्व कथ्या जो “ जीव रागादिक्लेशसहित है औ ब्रह्म क्लेशरहित है । यातैं जीवब्रह्मकी एकता ग्रंथका विपय बनै नहीं ” ॥
यह वार्ता यथापि सत्य है तथापि रागद्वेषपरहित जो साक्षी है ताकी ‘ब्रह्मसैं एकता बनैहै । और-
जो पूर्व कथा “कर्ताभोक्तासैं भिन्न साक्षी वंध्यापुत्रके समान असत् है” ॥
सो बनै नहीं । कहैंहैं ? कर्ताभोक्ता जो संसारी ताके विशेषभागका नाम साक्षी
विशेषभागका निपेध करें तो संसारी ताकाही निपेध होवैगा ॥
ऐकही चैतन्यकेविलै साक्षीसाक्ष्यकी अंतः-
मनोरयमात्र भावविषयसुखविषै हतार्थताकी बुद्धि उक्त अलंबुद्धिशब्दका अर्थ है ॥
॥ १०३ ॥ एकही शंतःकरण विवेकीकी दृष्टिसैं चेतनका उपाधि है औ अविवेकीकी दृष्टिसैं विशेष-
षण है । यातैं एकही चेतन विवेकीकूँ साक्षीरूप भासतहै औ अविवेकीकूँ जीवरूप भासतहै । यह वार्ता बालबोधविसै हमनैं स्पष्ट लिखीहै ॥
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करण उपाधि है औ कर्ताभोक्तापनैक विवोपण है ॥ विशेषणसहित विशेषष्ट कहियेहै ॥ उपाधिवाला उपहित कहिये है ॥ जो वस्तु . जितनै देशमैं आप होवै, उस देशमैं स्थितवस्तुं जनावै औ आप पृथक् रहै । सो उपाधि कहियेहै । जैसे नैयाायिकमतमैं करणगोलकवृत्ति आकार औ श्रोत्र कहियेहै । सो करणगोलक श्रोत्रकी उपाधि है । कहैंतें ? सो करणगोलक जितनै देशमैं आप है . उतनै देशमैं स्थित आकार औ श्रोत्रसुपकारिके जनावैहै औ आप पृथक् रहैहै । यातें करणगोलक श्रोत्रकी उपाधि है ॥
तैसैं अंतःकरण थी जितनै देशमैं आप है उतनै देशमैं स्थित चेतनरू साक्षीसंघ-कारिके जनावैहै । आप पृथक् रहैहै । यातें अंतःकरण साक्षीकी उपाधि है ।
यातें यह अर्थ सिद्ध हुवा:- अंतःकरणविपै वृत्ति जो चेतनमात्र सो साक्षी कहियेहै ।
॥ ७३ ॥ अपनेसहित वस्तुको जो जनावै सो विशेषण कहियेहै । जैसे "कुंडलवाला पुरुप आयाहै" या स्थानमैं पुरुपका कुंडल विशेषण है । कहैंतें ? अपनेसहित पुरुपका आगमन कुंडल जनावैहै । यातें विशेषण है ॥ "नीललुपवान् घटकूं मैं देखहूं" या स्थानमैं थी नीलरुप घटका विशेषण है । कहैंतें ?
विशेषण है ॥
॥ १०४ ॥ इहां इस साक्षीके लक्मणकी पद-वृति ( परीक्शा ) है:-
१ अंतःकरण तो आप थी है । परंतू सो साक्षि-विवै वृति कहिये घर्स्सनेवाला नाहीं ॥
२. चेतन तौ चिदाभास थी है । सो चेतनमात्र नहीं ॥
वि. ६
तैसैं अंतःकरण थी कर्ताभोक्ता जो जीवचेतन ताका विशेषण है । कहैंतैं अंतः-करणसहित वेतनरूं कर्ताभोक्तारुपकारिके जनावैहै । यातैं संसारीका अंतःकरण विशेषण है ॥
यातैं यह सिद्ध हुवा:- अंतःकरणविपै वृत्ति चेतन औ अंतःकरण संसारी कहियेहै । या अर्थकूं विस्तारसैं आंगे कहेंगे ॥
॥ ७४ ॥ रामोवादिक केशा संसारीविपै हैं, औ साक्षीविपै नहीं । संसारीका थी जो विशेषण अंतःकरण है ताकेविपै हैं । औ विशेष्य जो चैतन्य ताकेविपै नहीं । कहैंतें ? संसारीविपै विशेष्य जो चैतन्यभाग ताका साक्षीमैं भेद नहीं । कहैंतें ?
१ एकता चैतन्य अंतःकरणसहित संसारी है । औ-
२ अंतःफरर्णभाव त्यागिके साक्षी कहियेहै । यातैं साक्षीका औ संसारीकै विशेष्यभागका भेद नहीं । जो विशेष्यभागमैं केशा अंगीकार करें तव साक्षीमैं थी अंगीकार फरनेकै होवैंगे ॥ औ "साक्षी सर्वकेशानरहित है" । यह वेदका सिद्धांत है । यातैं संसारीकै विशेष्यभागमैं केशा नहीं । किंतु विशेषणमात्र अंतःकरणहै । इस अभिप्रायतें दोहेकै वृतीयपादमैं रागादिके शुद्धिके धर्म कहे औ जीवके नहीं कहे ॥
याकसैं अंतःकरणविशिष्टकी एकता नहीं थी घटमैं । परंतू अंतःकरणउपहित
३ नेत्रनमात्र तौ भास थी है । सो अंतःफरणविपै वृत्ति नाहीं ॥
यातैं ऊपर लिख्या साधीभका लक्षण निर्दोष है ॥
॥१०५॥ यह अर्थे चतुर्थरत्नांगमत २ ० १-३ ० २ के शांकविपै तथा पञ्चतंत्रंगविपै थी पतियैगा ॥
॥ १०६ ॥ जागै भाश्रिता होयकै विशेषण रहै सो विशेष्यभाग कहियेहै ॥
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४२ ( पूर्वपक्षीमतै उत्तर ॥ ९१-९३ ) प्रयोजनमंडन (३) ॥ ७५-९२ ॥ [ विचारसागरे
जो साक्षी ताकी ब्रह्मसैं एकता बनै नहीं ॥ और ॥ ७५ ॥ जो पूर्वे कद्बा:-" साक्षी नाना हैं औ ब्रह्म एक है, यातैं नाना- साक्षीकी एकब्रह्मसैं एकता बनै नहीं । औ जो व्यापक एकब्रह्मतैं साक्षीका अभेद अंगीकार करोगे तो साक्षी बी सर्वशरीरमैं व्यापक एकही होवैगा । यातैं सर्वशरीरके सुखदुःख मान हुवैचाहिये " ॥
सो शंका बनै नहीं । कहैंतैं? यद्यपि ईश्वरसाक्षी एक है औ जीवसाक्षी नाना हैं औ परिच्छिन्न हैं । तो बी व्यापकब्रह्मसैं मिन्न नहीं ॥ जैसे घटाकाश नाना हैं औ परिच्छिन्न हैं तौ बी महाकाशसैं मिन्न नहीं । किंतु महाकाशरूपही घटाकाश हैं॥ तैसे नाना जो परिच्छिन्नसाक्षी सो बी ब्रह्मरूपही है ॥ और-
॥ ७६ ॥ जो पूर्वे कद्बा:-" सुखदुःख अंतःकरणकी वृत्तिके विपय नहीं" ॥
सो असंगत है । कहैंतैं? यद्यपि सुख- दुःख साक्षीभास्य है सो साक्षी नाना हैं । तथापि जब अंतःकरणका परिणाम सुखरूप वा दुःखरूप होवै ताही समय अंतःकरणकी ज्ञानरूप वृत्ति सुखदुःखकूं विषय करनैवाली होवैहै ॥ ता वृत्तिमैं आरूढ साक्षी तिनकूं प्रकाशैहैं ॥
इसरीतिसैं ग्रंथकारोंनैं सुखदुःख साक्षीके विषय कहैहैं । वृत्तिविना केबलसाक्षीके विपय नहीं ॥ या स्थानौं-
यह रहस्य है:-जैसे आकाशमैं घटाकाश
॥ ९०७ ॥ जैसे कोरे कागजपर स्याही लगायके सांचे मध्य श्वेतअक्षर घन्या होवैहै तिस अक्षरका बी कोरे- कागजका जैसा कथनमात्र मेद है । तैसा साक्षीका औ शुद्धचैतन्यका मेद है । जैसे स्याहीरूप उपाधिकी दृष्टिविना अक्षरनाम नहीं । किंतु वह कोरों कागजहि है । तैसे बी अंतःकरणरूप उपाधिकी दृष्टिविना साक्षी-
नाम औ जलका आनयनरूप जो कार्य प्रीत होवैहै सो घटरूप उपाधिकी दृष्टिसैं प्रीत होवैहै । घटरूप उपाधिकी दृष्टिविना घटाकाश नाम औ जलका आनयनरूप कार्य प्रीत होवै नहीं । किंतु आकाशमात्रही प्रीत होवै । यातैं घटाकाश महाकाशरूप है ॥
तैसे चेतनविपै साक्षी नाम औ धर्मसहित अंतःकरणका प्रकाशरूप कार्य । अंतःकरणरूप उपाधिकी दृष्टिसैं प्रीत होवैहै । औ अंतः- करणरूप उपाधिकी दृष्टिविना साँक्षी नाम औ धर्मसहित अंतःकरणका प्रकाशरूप कार्य प्रीत होवै नहीं । किंतु चैतन्यमात्र ब्रह्मही प्रीत होवै । यातैं साक्षी ब्रह्मरूप है ॥
या अभिप्रायैं दोहेके प्रथमपादमैं साक्षी एक कद्बा । कहैतैं? उपाधिकी दृष्टिविना साक्षीमैं नानापन औ परिच्छिन्नपना प्रीत होवै नहीं । सो साक्षी जीवपदका लक्ष्य है । यह वार्ता आगे कहेंगे ॥
इसरीतिसैं जीवब्रह्मकी एकता ग्रंथका विषय वनैहै ॥ ९२ ॥
॥७७॥ प्रयोजनमंडन (३)॥७७-९३॥ ॥ अंक ४७ गत पूर्वपक्षका उत्तर ॥
॥अथ कार्याध्यासानिरूपणं ७७-८४
॥ कवित्व ॥
सजातीयज्ञान संस्कार- तैं अध्यास होत ।
नाम नहीं । किंतु वह शुद्धचैतन्यही है ॥
॥ ९०८ ॥ यह वार्ता आगे चतुर्थतरंगत २०१-२०२ के अंकविषै तथा षष्टतरंगत३८९ के अंकविषै कहिेयगी ॥
॥ ९०९ ॥ अज्ञानघृतस्तंभूलसूक्ष्मप्रपंचरूप जो भ्रम सो 'कार्यमध्यास्त है ॥
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सत्यज्ञानजन्य संस्कार-को न नेम है ॥ दोषको न हेतुता अध्यासविषै देखियत । परविषै हेतु जैसे तुरी तंतु नेम है ॥ आत्मा द्विजाति संख पीत सिता कटु भासै । सीपमैं विरागी रूप देखै बिन प्रेम है ॥ नभ नील रुपवान भासत कटाह तंबू । जिनके न कोउ पित्त प्रभृति अछेम हैं ॥
टीका:-पूर्वे कहा जो "बंध सत्य है तकी ज्ञानसैं निश्चिति होवै नहीं औ मिथ्या-वस्तुकी ज्ञानसैं निश्चिति . होवैहै ॥ आत्मामैं मिथ्याबंधकी सामग्री नहीं है, ताकी ज्ञानसैं निश्चिति होवै नहीं" ॥ सो वार्ता बनै नहीं । कहैंतैं? "बंध मिथ्या है, ताकी ज्ञानसैं निश्चिति बनैहै औ-
॥ ७८ ॥ अंक ४७-४८ गत पूर्वपक्षका उत्तर ॥ ७८-८२ ॥ पूर्व कहा जो "सत्यवस्तुका ज्ञान संस्कारद्वारा अध्यासका हेतु है । जेसैं सत्य-सर्पका ज्ञान संस्कारद्वारा सर्पाध्यासका हेतु है। तैसैं सत्यबंध होवै तो सत्यबंधका ज्ञान . होवैहै । सो सिद्धांतमैं अनात्मवस्तु कोई सत्य है नहीं । यातैं सत्यवस्तुका ज्ञान जो संस्कारद्वारा अध्यास-
की सामग्री ताका अभाव होतैं बंध अध्यास नहीं । किंतु सत्य है" ॥ ( ९ सत्यवस्तुन्य ज्ञानके संस्कारका खंडन ) सो शंका बने नहीं । कहैंतैं? अध्यास-विषै संस्कारद्वारा सत्यवस्तुका ज्ञान हेतु नहीं । किंतु वस्तुका ज्ञान हेतु है । सो वस्तु सत्य होवै अथवा मिथ्या होवै । जो सत्यवस्तुका ज्ञानही अध्यासविषै हेतु होवै
तौ जा पुरुषनैं सत्यछछ्हारेका वृक्ष नहीं देख्याहोवै औ वाजिगरका बनाया मिथ्या-छछ्हारेका वृक्ष बहुतवार देख्याहोवै औ बाजीगरसैं ऐसा सुन्याहोवै जो " यह छछ्हारेका वृक्ष है " औ खजूरका वृक्ष कदै देख्या सुन्या होवै नहीं । तौ तौ खजूरका वृक्ष देखिके छछ्हारेका अध्यास होवैहै सो नहीं हुवाचाहिये । कहैंतैं? सत्यछछ्हारेका तौ ज्ञान है नहीं ॥ औ हमारी रीतिसैं तौ वाजिगरका
देख्या जो मिथ्याछछ्हारा ताका ज्ञान है । यातैं अध्यास बनैहै । यातैं सजातीय वस्तुके ज्ञानजन्य संस्कारही अध्यासके हेतु हैं ॥ सो संस्कार जनक ज्ञान औ ताका विषय मिथ्या होवै अथवा सत्य होवै । संस्कार-द्वारा ज्ञान हेतु है ॥ औ-" ज्ञानजन्य संस्कार हेतु है " । या कहनेमैं अर्थको भेद नहीं । एकही अरथ है । कहैंतैं? "सं-स्कारद्वारा ज्ञान हेतु है" याका अरथ यह है:-ज्ञान
संस्कारका हेतु है औ संस्कार अध्यासका हेतु है । यातैं संस्कारद्वारा ज्ञानहू हेतुता कहनेतैं बी ज्ञानजन्य संस्कारही अध्यासविषै हेतुता सिद्ध होवैहै ॥ औ-॥७९॥ (सिद्धांती:-) केवलवस्तुके ज्ञानहूही अध्यासविषै हेतु कहै तौ बनै नहीं । कहैंतैं?
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४५ ( पूर्वपक्षीमतें उत्तर ॥ ६१-९२ ॥ ) प्रयोजनमंडन (३े) ॥ ९७-९२ ॥ [विचारसागरे
यह नियम है:- “जो हेतु होवै सो कार्यैं अन्यवहितपूर्वकालमें होवैहै” । जैसैं घटका हेतु दंड है सो घटसैं अन्यवहितपूर्वकालमें होवैहै तैसैं जो अध्यासका हेतु ज्ञान अंगीकार करें सो भी अध्यासतैं अन्यवहितपूर्वकालमें चाहिये॥
१ (पूर्वपक्षी:-) सो बनै नहीं । कहैंतैं जो पुख्खकूं सरपका ज्ञान होवै ताकूं ज्ञानसैं महीने पीछे भी रज्जुविपे सरपका अध्यास होवैहै । सो नहीं हुयाचाहिये । कहैंतैं जो रज्जुमैं सरपअध्यासका हेतु सरपका ज्ञान है ताका नाश होय गया । यांतैं अन्यवहितपूर्वकालमें ययपि पूर्वकालमें तौ है तथापि अन्यवहितपूर्वकालमें है नहीं ॥
(१)अंतरायरहितका नामअन्यवबहित हैऔ-(२)अंतरायसहितका नाम व्यवहित है ॥ औ २ जो ऐसें कहैं:-कायर्तैं पूर्वकालमें हेतु चाहिये । व्यवहितपूर्वकालमें होवै अथवा अन्यवहितपूर्वकालमें होवै ॥ औ “कार्यैंतैं अन्यवहितपूर्वकालमेंहीं हेतु होवैहै ” । ऐसैं नियम अंगीकार करें तौ “विहितकर्म स्वर्गप्रासिका हेतु है औ निपिद्धकर्म नरकप्रासिका हेतु है” । यह शास्रकी वातों अप्रमाण होय जावैगी । कहैंतैं? क्रियाकियकमानसक्रियाका नाम कर्म है । सो क्रिया अनुध्यानकालसैं अनंतरही नाश होय जावैहै औ स्वर्गनराक कालांतरमें होवेंहैं । यांतैं स्पर्शनराकप्रासिके अन्यपदार्थकालमें विहितकर्म औ निपिद्धकर्म है नहीं । जैसैं व्यवहितपूर्वकालके शुभकर्म औ अशुभकर्म स्वर्गप्रासि औ नरकप्रासिके हेतु हैं । तैसैं “व्यवहितपूर्वकालमें जो सरपका ज्ञान सो भी रज्जुमैं सरपअध्यासका हेतु है ॥”
१-२ (सिद्धांती:-) सो वात्ती बनै नहीं । कहैंतैं जैसैं नष्टज्ञान औ नष्टकर्मतैं अध्यास औ
स्वर्गनरककी प्रासि अंगीकार करी । तैसैं मृतकलाल औ नयदंडसैं वी घट हुयाचाहिये । कहैंतैं जैसैं रज्जुमैं सरपका अध्यास है औ स्वर्गनरककी प्रासितैं न्यवहितपूर्वकालमें शुभअशुभकर्म हैं । तैसैं घटतैं व्यवहितपूर्वकालमें नयदंड औ मृतकलाल वी हैं । तिनतैं वी घट हुयाचाहिये सो होवै नहीं । यांतैं व्यवहितपूर्वकालमें जो वस्तु होवै सो हेतु नहीं । किंतु अन्यवहितपूर्वकालमें जो वस्तु होवै सोई हेतु होवैहै ॥ औ-
शुभअशुभकर्म वी कालांतरभावी जो स्वर्गनरककी प्रासि ताके हेतु नहीं किंतु शुभकर्म अपनेतैं अन्यवहित उत्तरकालमें धर्मकी उत्पत्ति करैहै । अशुभकर्म अधर्मकी उत्पत्ति करैहै सो धर्मअधर्म अंतःकरणविपै रहैंहैं । तिनतैं कालांतरमें स्वर्ग औ नरककी प्रासि होवैहै । तैसैं अनंतर धर्मअधर्मका नाश होवैहै । इस अभिप्रायसेंहीं शास्रमें शुभकर्म औ अशुभकर्म अपूर्वद्वारा फलके हेतु कहैंहैं । साक्षात् नहीं ॥
अपूर्व नाम धर्मअधर्मका है औ अदृष्ट वी तिनकूंहीं कहैंहैं औ कहूं धर्मअधर्मकी जनक जो शुभअशुभक्रिया है तांकूं वी तिनकूंहीं कहैंहैं । जैसैं कोई शुभक्रिया करता होवै ताकूं लोक ऐसें कहैं:-“यह धर्म करैहै” औ अशुभक्रिया करैहैं सो “यह अधर्म करैहै” ॥ किंतु शुभअशुभक्रिया धर्मअधर्मकी जनक है । यांतैं क्रियाकूं धर्मअधर्म कहैंहैं ॥ जैसैं आयुका वर्षक जो धृत है ताकूं शास्रमें आयु कहैंहैं ॥
इसरीतिसैं अन्यवहितपूर्वकालमें हेतु होवैहै ॥
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॥ ८० ॥ रज्जुमें सर्पअध्यासतैं अन्यवाहित पूर्वकालमें सर्पका ज्ञान है नहीं जाते सर्पका ज्ञान रज्जुमें सर्पअध्यासका हेतु नहीं । किंतु सर्पज्ञानजन्य संस्कारही रज्जुमें सर्पअध्यासका हेतु है ॥ तैसैं सीपीमें रूपअध्यासका हेतु रूपज्ञानजन्यसंस्कार है ॥ इसरीतिसैं सार संस्कारही अध्यासके हेतु हैं ॥ औ— वस्तुका ज्ञान संस्कारका हेतु है ॥ जैसे शुभअशुभकर्मजन्य धर्मअधर्मे अंतःकरणमें रहहैं तैसे वस्तुके ज्ञानजन्य संस्कार थी अंतःकरणमें रहैंहैं ॥ जा पुरुषनें पूर्व सर्पका ज्ञान नहीं हुवा ताके थी औरवस्तुके ज्ञानजन्यसंस्कार तौ हैं परंतु रु रज्जुमें सर्पका अध्यास होवै नहीं ॥ जा वस्तुका अध्यास होवै । तैसे सजातीयवस्तुके ज्ञानका संस्कार अध्यासका हेतु है । विजातीयके ज्ञानके संस्कार हेतु नहीं ॥ सर्पके सजातीय सर्प होवैहै । और नहीं । सर्पका जाकूं पूर्वज्ञान नहीं । अन्यवस्तुका ज्ञान है । ताकूं सजातीयवस्तुके ज्ञानजन्य संस्कार नहीं । यातैं रज्जुमें सर्पका अध्यास होवै नहीं ॥ सूक्ष्मअवस्थाका नाम संस्कार है ॥ इस रीतिसैं अध्यासतैं पूर्व जो सजातीयवस्तुका ज्ञान ताके संस्कार अध्यासके हेतु हैं ॥ औ— "सत्यवस्तुके ज्ञानकेसंस्कारही अध्यासके हेतु हैं । मिथ्यावस्तुके ज्ञानके नहान" यह नियम हैं । यह वचन छलहारेके दृष्टांतसैं प्रतिपादन करीहै । यातैं मिथ्यावस्तुके ज्ञानजन्यसंस्कारभी अध्यासके हेतु हैं ॥
चैहै । कहैंहैं ? जो अहंकारसैं आदिलेके अनात्मवस्तु औ ताका ज्ञान बंध कहिये हैं ॥ "सो अनात्मवस्तु रज्जुके सर्पेकी न्यायीं जव प्रतीत होवै तवही है औ प्रतीत नहीं होवै तव नहीं" । यह हमारा वेदसंमतसिद्धांत है ॥ इस कारणतहां सुपुप्तावस्थ सर्वप्रपंचका अभाव प्रतिपादन किया है । सुपुप्तिमें कोई पदार्थ प्रतीत होवै नहीं । यातैं सचराचरपंचका सुपुप्तिमें लय होवैहै इसका नाम शास्त्रमें दृष्टिसृष्टिवाद कहैंहैं ॥ या अर्थकूं आगे प्रतिपादन करैंगे ॥ इसरीतिसैं अनंतअहंकारादिक औ तिनके ज्ञान उत्पन्न होवैहै औ लय होवैहै । अहंकारदिक औ तिनके ज्ञानकी साथही उत्पत्तिलय होवैहै । जव अहंकारादिकनकी प्रतीतिकी उत्पत्ति होवै तव अहंकारादिकनकी उत्पत्ति होवैहै औ अहंकारादिकनका लय होवैहै । अहंकारादिक औ तिनके ज्ञानका नाम अध्यास है । यह वाच्यो अनिर्वचनीय ख्यातिके प्रतिपादनमें कहैंगे ॥ यद्यपि अहंकार साक्षीभास्य है । यह वाच्चो विषयप्रतिपादनमें कहीहै । यातैं अहंकारकी प्रतीति साक्षी-रूप है । ताकी उत्पत्ति औ लय बने नहीं । तथापि अहंकाका वी वृत्तिसैहीं साक्षी प्रकाश करैहै । साक्षात् नहीं । ता वृत्तिकी उत्पत्तिलय होवैहैं । यातैं अहंकारकी प्रतीतिकी उत्पत्तिलय कहैहैं ॥
॥ ८२ ॥ जो एसें कहैं:-"उत्तर उत्तर अहंकारादिकनके अध्यासविपै तो यद्यपि किया है तापेक्षाकूं शास्त्रमें दृष्टिसृष्टिवाद कहतेहैं ॥ ॥ १९१ ॥ या अर्थकूं आगे पश्चतरंगर्गत ३१९-३२९ के अंकविषै प्रतिपादन करैंगे ॥
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४६ (पूर्वपक्षीमतैं उत्तर ॥ ६१-९३ ॥) प्रयोजनमंडन (२) ॥ ७७-९२ ॥ [ विचारसागरे
पूर्वपक्षीअध्यासके संस्कार हेतु घनैं नहींं । तथापि प्रथम उत्पत्ति जो अहंकार औ ताका ज्ञान ताके हेतु संस्कार घनैं नहींं । कहैं? जो ताके पूर्व औरअहंकार उत्पन्न हुवा होवै तो ताके ज्ञानके संस्कारबी होवें । सो प्रथमअहंकारसैं पूर्व और अहंकार हुवा नहींं ॥ तैसैं “सर्ववस्तुके प्रथमअध्यासके हेतु संस्कार घनैं नहींं” ॥
यह शंका वी सिद्धांतके अज्ञानसैं होवैहै। कहैं? यह वेदांतका सिद्धांत है:-एक ब्रह्म औ ईश्वर । जीव । अविद्या औ अविद्याका चैतन्यसैं संघं औ अनादि वस्तुका भेद । यह घटवस्तु स्वरूपसैं अनादि हैं ॥ जा वस्तुकी उत्पत्ति होवै नहींं सो वस्तु स्वरूपसैं अनादि है ॥
॥ ९१२ ॥ १ नाश अविद्याका अधिष्ठान है यांतैं ताकी अविद्या (मूलप्रकृति) तैं उत्पत्ति संभवै नहींं । जो ईश्वरजीवआदिकी सिद्धि तो नाशविना होवै नहींं । यांतैं तिन चारीतैं ब्रह्मकी उत्पत्ति संभवै नहींं । यांतैं ब्रह्म अनादि है ॥
२ ब्रह्म निर्विकार है यांतैं तिसतैं अविद्याकी उत्पत्ति नहींं औ ईश्वरआदिक चारीकी सिद्धि तो अविद्याकी सिद्धिके आधार है । यांतैं तिनतैं अविद्याकी उत्पत्ति संभवै नहींं तांतैं अविद्या अनादि है ॥
३-४ केयल्मात्रैं वा केवलमात्रतैं वा परस्परतैं जीवईश्वरकी उत्पत्ति संभवै नहींं थौ अविद्याचेतनके संघंचकी सिद्धिसैं ईश्वरजीवकी सिद्धि है । सो संघंध आप वी अनादि है । तिसतैं तिनकी उत्पत्ति नहींं । तांतैं ईश्वरजीव वी अनादि हैं ॥
५ ब्रह्म थौ अविद्या अनादि है । यांतैं तिनका तादात्म्यसंवंध वी अनादि है तिनतैं तिसकी उत्पत्ति नहींं । जो ईश्वरआदिक तीनकी सिद्धि, तौ संघंधकी सिद्धिके आधार है । यांतैं तिनतैं तिसकी उत्पत्ति नहींं । अविद्या औ चेतनका संघंध अनादि है ॥
६ इन पांचों वस्तुकी आपही आपतैं उत्पत्ति मानै
अनादि कहियेहैं ॥ इन पदकी उत्पत्ति होवै नहींं । यांतैं स्वरूपसैं अनादि हैं ॥ औ-अहंकारादिककी तौ शृतिमैं उत्पत्ति कही-दिक नहींं । तथापि प्रवाहरूपतैं सर्ववस्तु अनादि हैं ॥ सर्ववस्तुका प्रवाहदूजिहोवै नहींं॥
अनादिकालमैं ऐसा समय कोई घट होवै नहींं । यांतैं घटका प्रवाह अनादि है । इसरीतिसैं सर्ववस्तुका प्रवाह अनादि है । प्रलयकालमैं वी सुप्तसिक्री न्याईं सर्ववस्तु संस्काररूप होयके रहैंहैं ॥
यांतैं प्रपंचका प्रवाह अनादि होनैतैं प्रपंच अनादि कहियेहैं । ऐसा जाकूं ज्ञान नहींं है ।
तो आत्माश्रयदोष होवैगा । यांतैं इन पांच वस्तुनकी आपआपतैं वी उत्पत्ति नहींं ॥ जांतैं इन पांच वस्तुनकी उत्पत्ति नहींं । यांतैं तिन पांचवस्तुनका परस्परमेद है । ताकी वी उत्पत्ति घनै नहींं ॥
इसरीतिसैं इन पांचवस्तुनकी उत्पत्ति नहींं । यांतैं ये स्वरूपसैं अनादि है ॥ तिनमें—
( १ ) ब्रह्म त्रिकालवाध्य है । यांतैं अनादि-अनंत है ॥ औ—
( २ ) अविद्यआदिक पांच ज्ञानसैं वाधकूं पावते-हैं । यांतैं अनादिसांत है ॥
॥ ९१३ ॥ प्रपंच अनादि है । यांतैं बहुकाल-स्थायी होनैतैं सत्य होवैगा ? । या शंकाका—
यह समाधान है:-जैसैं रज्जुमैं सर्पका भ्रम होवैहै औ स्वप्न होवैहै । सो घटी प्रहर दोप्रहरपर्यंत पृथ्वीसिद्ध औ सांतिसिद्ध प्रतीत होवै-है । किंतु सर्पादिकम वर्षपर्यंत वी रहैहै । तौ वी रज्जुकै थौ जाम्रतके ज्ञान हुवै ताका त्रिकालसभाव-निश्चयरूप वाध होवैहै । यांतैं मिथ्या है ॥ तैसैं प्रपंच वी आरोपदशाविंहि अनादिसिद्ध भासतहै ।
तो वी अधिष्ठानके ज्ञान हुवै याकूा त्रिकाल-अभावनिश्चयरूप वाध होवैहै । यांतैं प्रपंच मिथ्या है । याहीतैं प्रवाहरूपसैं अनादिसांत कहियेहैं ॥
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ताकूं यह शंका होवेंहै:-"जो प्रथमअध्यासके हेतु संस्कार धनें नहीं" ॥ और सिद्धांतमें किसी अहंकारादिक वस्तुका अध्यास सर्वैं प्रथम हैं नहीं किंतु अपनेैं पूर्वपूर्वअध्यासतैं संपूर्ण उत्तर हैं, यातैं शंका वैन नहीं ॥
इसरीतिसैं सजातीयके पूर्व ज्ञानजन्य संस्कारैं अहंकारादिक बंधकका अध्यास धनैहैं । यह प्रथमपादका अर्थ है ॥ और-
॥ ८३ अंक ४९ गत पूर्वपक्षका उत्तर ॥ ८३-८४ ॥
( २ प्रमेयदोपका खंडन )
जो पूर्व कथ्या:-"तीनप्रकारका दोप अध्यासका हेतु है औ बंधके अध्यासमें कोई वी दोप वैन नहीं, यातैं बंध सत्य है"
सो शंका धनै नहीं । कहैंत? जो दोपतैं विना अध्यास होवें नहीं तौ अध्यासका हेतु दोप होवै । जैसे तुरी तंतु वेम होवें तौ पट होवैं औ नहीं होवें तौ पट होवैं नहीं, तैसे दोप अध्यासके हेतु नहीं । कहैंत? सादृश्यदोपविना आत्मामैं जातिका अध्यास होवेंहै ॥
आत्माका औ मूक्ष्मशरीरका धर्म जाति होवें । तौ उत्तर शरीरविपे औरजाति नहीं हुईचाहिये । यातैं आत्माका औ मूक्ष्मशरीरका धर्म जाति नहीं । किंतु स्थूलशरीरका धर्म है ॥ औ "मैं द्विजाति हूं" इसरीतिसैं द्रव्यत्व क्रियात्व चैतन्यजातिका आत्मामैं भान होवेंहैं । यातैं आत्मामैं जातिका अध्यास है ॥ जैसे रज्जुमैं सर्पके परमार्थसैं नहीं हैं औ भान होवेंहैं, यातैं रज्जुमैं सर्पका अध्यास हैं । तैसे आत्मामैं जाति नहीं हैं औ भान होवेंहै । यातैं आत्मामैं जातिका अध्यास है ॥ औ-
आत्माके साथ जातिका सादृश्य नहीं है । कहैंत?
१ आत्मा व्यापक है औ जाति परि-
छिन्न है ॥
२ आत्मा प्रकाश है औ जाति पराकू है ॥
३ आत्मा चिपयि है औ जाति विपय है ॥
इसरीतिसैं आत्मामैं विरोधीजातिका वी अध्यास होवेंहै ।
द्विजाति नाम त्रिवर्णका है ॥
जैसे आत्माविपै सादृश्यतैं विना जातिका अध्यास होवेंहैं तैसे सादृश्यविना अहंकारा-
दिक बंधका अध्यास वी आत्मामैं धनैहै ॥
सादृश्यदोप अध्यासका हेतु नहीं ॥ जो
ब्राक्षणत्वैं आदिलेके जो जाति हैं सो
स्थूलशरीरका धर्म है । आत्माका औ सूक्ष्म-
शरीरका धर्म नहीं । कहैंत? औरशरीरकूं प्राप्त
होवै तव आत्मा औ सूक्ष्मशरीर तौ जो पूर्व-
शरीरमें हैं सोई रहैहैं औ जाति और वी
होवैहै । यह नियम नहीं:-"जो पूर्व शरीरमें
जाति है सोई उत्तर शरीरमें होवेंहै " ॥
॥ १९४ ॥ न्यायमतमें " तिस्य एक औ अनेकधर्मी ( व्यक्ति ) नविभे धर्मजाति
कहियेहैं" ताका औ आत्माका सादृश्यसवरूप प्रमेयदोप
घनताहै । यातैं आत्मविपैं जातिका अध्यास होवेंहै ।
तातैं प्रमेयदोप अध्यासका हेतु है यह आशंका
मनमें त्योंके दूसरा शंकमें पीतताके अध्यासका
दूयंांत दियाहै ॥
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३ तिसरौमें कड़तताका अध्यास नहीं हुयाचाहिये ।
काहेैं? श्वेतता औ पीतताका विरोध है । साध्रय नहीं ॥ तैसैं मधुरता औ कड़तताका विरोध है । साध्रय नहीं ॥ यातैं अध्यासकका हेतु नहीं ॥
॥८५॥ ( ३ प्रमातादोषका खंडन ) तैसैं प्रमाताका लोभभयादिक दोप वी अध्यासका हेतु नहीं ।
काहेैं? जो लोभरहित वैराग्यवान पुरुप है ताकूं वी सीपमैं रूपेका अध्यास होवैहै सो नहीं हुयाचाहिये । यातैं प्रमाताका दोप वी अध्यासका हेतु नहीं ॥
औ— ( ४ प्रमाणदोषका खंडन ) प्रमाणका दोप वी अध्यासका हेतु नहीं ।
काहेैं? सर्वपुरुपनकूं रूपरहित जो आकाश है सो नीललुपवाला प्रतीत होवैहै औ कटाहके तथा तंबूके आकार प्रतीत होवैहै । यातैं सर्वकूं
॥ १९५ ॥ नहू शंखमैं पीतताका अध्यास नहीं ।
कितु कामलदोषयुक्त नेत्रमैं स्थित पीतरंग शंखमैं चिपटताहै । तातैं शंख पीत भासतहै । यह शंका भई ।
तदाँ कहेैं:-तैसैं घटविषै मल्या जो स्वर्ण सो स्वर्णेकारकूं औ अन्यपुरुपनकूं दीखताहै । तैसैं शंखका पीतरंग आपहीकूं दीखतहै अन्योंकूं नहीं ।
यातैं सो रंग नेत्रहै निकसिकै शंखमैं चिपट्या नहीं किंतु भ्रमरुप है ॥
नहू । जैसे भाकाशमैं उड़्या जो पक्षी सो जाकै नेत्रके समीप होयकै गयाहै । ताकूं तो दूरिदेश-पर्यंत दीखताहै अन्यौकूं नहीं । तैसैं यह पीतरंग की जाकै नेत्रसैं निकसिकै शंखमैं गयाहै ताहीकूं दिखताहै । अन्यौकूं नहीं । यातैं सो पीतरंग सत्य है । यह शंका भई ।
तदाँ कहेैं:-आकाशमैं उड़्या जो पक्षी सो जाकी दृष्टिके समीपसैं गयाहै । सो पुरुप संगुलिनिर्देश-
आकाशमैं नीललुपका कटाहका तथा तंबूकका अध्यास है ॥ औ सर्वके नेत्ररुप प्रमाणमैं दोप कहनां वनै नहीं । यातैं प्रमाणका दोप अध्यासका हेतु नहीं ॥
आकारामैं नीलादिकनकका जो अध्यास है ताकूपै एक प्रमाणदोपकाही अभाव नहीं है ।
कितु 'सर्वदोपनका अभाव है । साध्रय भी नहीं औ प्रमाताका दोप वी नहीं । जैसे सर्व-दोपके अभावतैं वी आकारामैं नीलादिकनका अध्यास होवैहै । तैसैं आत्माविपै वी वंधकका अध्यास दोपविनाही वनैहै ।
यातैं “दोपके अभावतैं वंध अध्यासरुप नहीं । यह शंका वनै नहीं ।
काहेैं? सर्वदोपका अभाव वी है तो वी आकाशमैं नीलादिकनका अध्यास सर्वपुरुपनकूं होवैहै ।
यातैं दोप अध्यासका हेतु नहीं ॥ कवित्तके चतुर्थपादका यह अर्थ है:-जिनके कोई पित्त प्रसृत्ति कहिये पित्तसैं आदिलेके अक्षैम कहिये दोप नहीं है ।
तिनहूं वी आकाश शरिरिके दिखलैहै तौ अन्यपुरुपकूं वी दीखताहै । तैसैं शंखका पीतरंग अन्यपुरुपकूं दीखता नहीं ।
यातैं सो सत्य नहीं किंतु भ्रमरुप है ॥ इसरितैं शंखमैं पीतताका अध्यास साध्रय-घानरुप विवादैं सिद्ध है ।
प्रत्यक्ष सिद्धरसतुपै विवाद होवै नहीं । यह आंशका मनमैं त्यांकै तैसैं मितरौम कहताहैं अध्यासिकता रक्षतैं कहहैं ।
॥ १९६ ॥ १ आकारामैं नीलादिकनेका जो अध्यास है, तामैं सर्वपुरुपनके नेत्रमैं तिमिरादिक दोपके अभावतैं प्रमाणदोपका अभाव है ।
२ नीलादिकनका अरु आकाराका साध्रय नहीं । यातैं प्रमेवदोयकका वी अभाव है ।
३ किसीकूं आकाराके नीलरंगका औ आकाराके कटाहका औ तंबूकका लोभ वी नहीं, यातैं प्रमातादोपका वी अभाव है ॥
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नीलरूपवान् औ कटाहाकार औ तंबूके आकार भासैहैं, यातैं प्रमाणदोप अध्यासका हेतु नहीं ॥ क्षेम नाम कुशलका है, ताका विरोधी जो प्रमाणदोप, सो अक्षेम कहियेहै । ज्ञानका साधन जो इंद्रिय सो प्रमाण कहियेहै ॥
इसरितैं दोष'' अध्यासके हेतु नहीं, यातैं
॥ ११७ ॥ याका यह अभिप्राय है:-सर्वदोष होवें तौ अध्यास होवै, यह नियम नहीं । किंतु कोई दोष होवै तौ अध्यास होवैहै ॥ यद्यपि यहां आकारादिकके नीलादिकनके अध्यासमें सर्वदोषनका समाव प्रतिपादन कियाहै, यातैं कोई वी दोष अध्यासका हेतु नहीं, तथौपि जहां कोई दोष नहीं तहां अविद्याही दोष है । सर्वदोषका अभाव होवें तौ अध्यास होवै नहीं । याहीतैं श्रीमधुसूदनसरस्वामैं अद्वैतसिद्धौ दोषजन्यता भ्रमका लक्षण कहाहै इहां सर्वदोषनके अभावते जो अध्यासका निरूपण किया है सो प्रौढिवाद है । प्रौढि कहिये अपनी उत्कृष्टताके लिये जो वाद कहिये कथन है सो प्रौढिवाद उत्कृष्टताके लिये जो वाद कहियेहै । यामैं
कोर्ं द्वैतवादी शंका करैहै कि:- विवादका विषय जो जगत् सो मिथ्या नहीं । कहैंतैं ? अधिष्ठानके समानसत्तावाले दोषकरि अजन्य होनेतैं । जो अधिष्ठानके समानसत्तावाले दोषकरि अजन्य हैं सो सो मिथ्या नहीं । जो अधिष्ठानके समानसत्तावाले दोषकरि अजन्य नहीं किं तु तैं दोषकरि जन्य है, सो वस्तु मिथ्या नहीं ऐसैं नहैं । किं तु मिथ्या है जैसैं रजुसर्पादिक हैं ॥ इस व्यतिरेकि''अनुमानकरी जगत्के अध्यासका अभाव है ॥
सो शंका चनै नहीं । कहैंतैं ? जो व्यावहारिक रजुसर्पादिक कलिप्त सर्पादिकनके अधिष्ठान होवें तो तिस दृष्टांतकरीके उत्त अनमानकी सिद्धि होवै ॥ विचारीकरि देखिये तौ सर्पादिकका अधिष्ठान रज्जु-धादि उपहितचेतन है वा वृत्ति-उपहितचेतन है । यह वार्ता चतुर्थतरंगाविषै अनिर्वचनीयाध्यातिके
वंधके अध्यासमें दोपकी अपेक्षा नहीं । औ-संक्षेपशारीरकमें वंधके अध्याससमय ''दोप वी प्रतिपादन किये हैं । विसतारके भयसैं हमनैं नहीं लिखे औ अध्यासके हेतु जो दोप होवें तौ दोप निस्लुपण करते, सो दोप अध्यासके हेतु नहीं हैं, यातैं वी दोपका निरूपण नहीं किया ॥ १३ ॥
निरूपणमैं कहियेगी। यातैं तिस चेतनकी परमार्थ सत्ताके होनेतैं ताके समानसत्तावाले दोषके दृष्टांतमें वी अभाव है ॥
किंवा मुख्यसिद्धांत ( दृशिसिद्धांत ) मैं तौ सर्वकारकी प्रतिभासिकसत्ता होनेकरि दृष्टांत रज्जु-सर्पौदि औ दार्षांत जगत्की विलक्षणताके अभावतैं एकही चेतन रज्जुसर्पौदिकका अधिष्ठान है । यातैं वी अधिष्ठानकी समसत्तावाले दोषका अभाव है । यातैं सर्वअध्यासनकौं अधिष्ठानतैं इसरीतिसैं हेतुदृष्टांतके अभावतैं उक्तव्यतिरेकि''अनुमानकी असिद्धि है, तातैं प्रपंच सत्य नहीं । किं तु मिथ्याही है ॥
॥ ११८ ॥ यहां यह अध्यासके हेतु दोषका कथन है:-
९ अंतःकरणदृशगत अज्ञानकी विशेषपहेतुशक्तिमैं स्थित जो शुभाशुभकर्मके संस्काररूप अदृष्ट, सो प्रमाणदोप है । औ-
२ चेतनविषै अन्यप्रमाणके अभावतैं अपना स्वरूपही प्रमाण है । तामैं स्थित जो अविद्या, सो प्रमाणदोप है । औ-
३ चेतनमैं निरपेक्षभांतरता है औ प्रपंचमैं सापेक्ष आंतरता है अरु चेतनमैं पारमार्थिकवस्तुता है औ प्रपंचमैं धानिवचनायवस्तुता है । यातैं आंतरता-कार औ वस्तुताकरी चेतनमैं प्रपंचका साधस्य है । सो प्रमाणदोप है ॥
इसरितिसैं संक्षेपशारीरकादिप्रथनमैं अध्यासके कारणरूप दोष प्रतिपादन कियेहैं ॥
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॥ अथ कारण अध्यासनिरुपणं ॥
॥ ८५-९२ ॥
॥ ८५ ॥ अंक ५० गत पूर्वपक्षका उत्तर ॥ ८५-८६ ॥
( ५ अधिष्ठानके विशेषरूपसे अज्ञानका स्वंडन )
॥ दोहा ॥
चित सामान्य प्रकारतैं, नहीं नसै अज्ञान ।
लहै प्रकाश सुखुषिमैं, चेतनतैं अज्ञान ॥ १४ ॥
टीका:—पूर्व कथ्या जो “विशेषरूपसैं अज्ञानवस्तुसैं अध्यास होवैहै औ आत्मा स्वयं- पकाश है, ताकेविषै अज्ञान बनै नहीं । कहैंतैं? तमका औ प्रकाशका परस्पर विरोध है । यातैं अत्यंतप्रकाशमैं स्थित रज्जुसैं सर्पेका अध्यास होवै नहीं । तैसैं स्वयंप्रकाशआत्मामैं बैधका अध्यास बनै नहीं ”
सो शंका दी बनै नहीं । कहैंतैं? यद्यपि आत्मा प्रकाशरूप है तथापि आत्माका स्वरूपप्रकाश अज्ञातका विरोधी
नहीं । जो आत्मस्वरूपप्रकाश अज्ञनाका विरोधी होवै तौ सुखुषिमैं अज्ञानकी प्रतीति नहीं हुइचाहिये । यातैं आत्मा प्रकाश- रूप तौ है परंतु आत्माका स्वरूप प्रकाश अज्ञातका विरोधी
॥ १२५ ॥ पांचवा कारण जो अधिष्ठानके विशेषरूपका अज्ञान है, ताका जो अध्यास सो कारणाध्यास कहियेहै । यद्यपि प्रपंचके अध्यासका कारण अज्ञान है औ अज्ञानके अध्यासका कारण अन्य कोई नहीं, यातैं अज्ञानका अध्यास बनै नहीं । तथापि दीपककी न्याई भौ सांख्याभिमत- स्प्रकाशआत्माकी न्याई भज्ञान सपरस्का निर्वाहक है । यातैं ताका अध्यास बनैहै ॥
नहीं । जो आत्मस्वरूपप्रकाश अज्ञानका विरोधी होवै तौ सुखुषिमैं अज्ञानकी प्रतीति होवैहै, जो आत्मस्वरूपप्रकाश अज्ञानका विरोधी नहीं है ।
॥ १२६ ॥ तैसैं अध्यास औ अज्ञाननादिकसैं- भूतनके गुण शब्द स्पर्श रस औ गंधकूं आवरण करता नहीं । किंतु तेजके गुणरूपकूंही आवरण करताहै, यातैं संघकार तेजके सामान्यस्वरूपके आाश्रित होइके रहता है औ ताकीं विषय करैहै ( दृश्य है ) ।
यातैं सामान्य तेज संघकारका विरोधी नहीं । वैसैं भज्ञान वी चेतनके सामान्यप्रकाशके आाश्रित होइके रहता है औ ताकीं विषय करैहै । यातैं सामान्य चेतन अज्ञानका विरोधि नहीं ॥
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अज्ञानका विरोधी नहीं । उलटा आत्माका स्वरूपप्रकाश अज्ञानका साधक है ॥ इस अभिप्रायतेही वेदांतशास्त्रमें कहाहै:- "सामान्यचैतन्य अज्ञानका विरोधी नहीं" किंतु विशेषचेतन्यही अज्ञानका विरोधी है । व्यापक जो चैतन्य है सो सामान्यचेतन्य कहियेहे औ वृत्तिमें स्थित जो चैतन्य सो विशेषचैतन्य कहियेहै ॥ जैसे काष्टमें स्थित जो सामान्यआग्नि है, सो अंधकारका विरोधी नहीं औ मथनसैं प्रगट किया जो अग्नि है, सो वत्तीमैं स्थित होयके अंधकारका विरोधी है । तैसे व्यापक चैतन्य अज्ञानका विरोधी नहीं है । परंतु वेदांतके विचारसैं अंतःकरणकी वृत्त्याकारस्थिति हुईहै, ताकेविषै स्थित चैतन्य अज्ञानका विरोधी है ॥ इसरीतिसैं केवलचैतन्य अज्ञानका विरोधी नहीं । किंतु— १ वृत्तिसहित चैतन्य अज्ञानका विरोधी है ? २ अथवा चैतन्यसहित वृत्ति अज्ञानकी विरोधी है ? १ प्रथम पक्षमें तौ अज्ञानके नाशका हेतु चैतन्य है औ वृत्ति सहायक है ॥ २ दूसरे पक्षमें अज्ञानके नाशका हेतु वृत्ति है औ चैतन्य सहायक है ॥ यह अवच्छेदवादकी रीति है ॥ औ आभासवादमै तौ सामान्यचैतन्यकी न्याईं विशेषचैतन्य थी अज्ञानका विरोधी नहीं ॥ १२१ ॥ अवच्छेदवादमै वृत्तिसहित चैतन्य वा विशेषचैतन्य ( कल्पितविशेषचैतन्य ) कहियेहै, सो अज्ञानका विरोधी है । दोनूंमें उत्तरपक्ष श्रेष्ठ है । कहैंतैं ? वृत्तिकूंही आवरणभंगकी हेतु होनैतैं ॥ १२२ ॥ पूर्वे कहाथा कि-नैयायिके अंधकारकी न्यांई स्वप्रकाशरूप आभासविषै अज्ञान संभवै नहीं ।
किंतु वृत्तिसहित आभास अथवा आभाससहित वृत्ति अज्ञानका विरोधी है ॥ इसरीतिसैं प्रकाशरूप चैतन्य अज्ञानका विरोधी नहीं, यातैं चैतन्यके आभ्रित अज्ञान है, तौ अज्ञानसैं आच्छादित जो आत्मा ताकेविषै अध्यास अध्यास बने है ॥ और पूर्व कहा जो "सामान्यरूपतैं ज्ञात औ विशेषप्रुपतैं अज्ञातवस्तुमैं अध्यास होवैहै औ आत्मामैं सामान्यविशेषसभाव है नहीं । यातैं निर्विशेषआत्मा ज्ञात औ अज्ञात बने नहीं । ताकेवैष अध्यासका असंभव है" सो वार्ता बोले नैं नहीं । कहैंतैं ? "आत्मा है" यह सर्वकूं प्रतीति होवैहै ॥ आत्मा नाम अपने स्वरूपका है ॥ "मैं नहीं हूं" यह प्रतीति सर्वकूं होवै नहीं, किंतु "मैं हूं" यह प्रतीति सर्वकूं होवैहै । यातैं सत्रूपकारिके आत्मा सर्वकूं भान होवैहै औ "चैतन्य आनंद व्यापक नित्यशुद्ध नित्यमुक्तरूप आत्मा है " यह सर्वकूं प्रंतीति होवै नहीं । यातैं चैतन्य आनंदादिक सो विशेषरूप है ॥ १ सर्वकूं प्रतीत जो होवैहै आत्माका सत्रूप सो तौ सामान्यरूप है । औ— २ केवलज्ञानिकूं जो प्रतीत होवै चेतनआनंदादिक सो विशेषरूप है ॥ सो शंका बने नहीं । कहैंतैं ? सूर्योदिक ज्योति महातेजका विशेषरूप है सामान्य नहीं औ आत्माका स्वरूप तौ सामान्यप्रकाश है, यातैं सो अज्ञानका विरोधी नहीं । तातैं दृष्टांत ( सूर्य ) औ सिद्धांत ( चेतन ) की विषमताकारिके उक्तशंकाका अवकाश नहीं ॥
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५२ (पूर्वपक्षीमतें उत्तरं ॥ ६७-९५ ॥ ) प्रयोजनमंडन ( ३ ) ॥ ७७-९२ ॥ (विचारसागरे
१ जो अधिककालमैं अधिकदेशमैं होवै सो सामान्यकप कहियेहै ॥ औ—२ न्यूनदेशमैं न्यूनकालमैं होवै सो विशेष-रूप कहियेहै ॥
यद्यपि आत्माका स्वरूपही चेतनआनंदादिक है, यातैं सत्की न्याय चेतनआनंदादिक सर्वत्रव्यापक है॥ सत्की अपेक्षातैं चेतनआनंदादिकनकी अपेक्षातैं सत्स्वरूपकूं अधिकदेशमैं कहना बनैं नहीं । यातैं सत्स्वरूप आत्माका सामान्यअंश है औ चेतनआनंदादिक विशेषअंश हैं। यह कहना भी बनैं नहीं ॥ तथापि सत्की प्रतीति सर्वथैं अविद्याकालमैं भी होवैहै औ "चेतनआनंदरूप आत्मा है " यह प्रतीति सर्वथैं अविद्याकालमैं होवै नहीं । केवलज्ञानकूंही होवैहै ॥ अविद्याकालमैं चेतन आनंद शुक्तितै व्रीहीतैं शुक्तित्व भी है । परंतु प्रतीति होवै नहीं । यातैं अनृतुयेकैं समान है इस अभिप्रायते—
१ चैतन्य आनंदादिक न्यूनकालवृत्ति कहियेहै । औ—२ सत्स्वरूप अधिककालवृत्ति कहियेहै ॥
इसरीतितैं सत्स्वरूपका औ चेतनआनंदादिकनका सामान्यविशेषभाव नहीं भी है । परंतु अल्पकाल औ अधिककालमैं प्रतीति होनैंतैं सामान्यविशेषभावकी न्यायीं है ।
१ आत्माका ' सत्स्वरूप' सामान्यअंश कहियेहै । औ—२ चेतनआनंदादिक विशेषअंश कहियेहै । औ— आत्मा निविशेष है या सिद्धांतकी हानि नहीं ॥ जो आत्मामैं सामान्य-विशेषभाव अंगीकार करें तौ " निविशेषआत्मा
है" या सिद्धांतकी हानि होवै ॥ सो सामान्य-विरोधभाव अंगीकार किया नहीं । किंतु अविद्याकैं सामान्यविशेषकी न्यायी प्रतीति होवैहै, यातैं सामान्यविशेषभाव कहैं हैं ॥
इसरीतितैं सत्स्वरूपकारिके ज्ञात औ चेतन आनंद नित्यशुद्ध नित्यमुक्त बह्मैकरिके अज्ञातआत्माहिपै बंधका अध्यास बनैहै । अध्यासरूप बंधकी ज्ञानसैं निष्पत्ति वी. बनैहै ॥८७॥अंक ५१-५८ गत पूर्वपक्षका उत्तर
॥ ८७-९२ ॥
(पूर्वपक्षी:-)पूर्वं कह्या जो " निपिद्धकाम्य-कर्मका त्यागकारिके नित्यनैमित्तिक प्रायश्चित्त कर्में करै। यातैं निपिद्धकर्मकैं अभावतैं नीचलोककूं प्राप्त होवै नहीं औ काम्यकर्मकै अभावतैं उत्तम-लोककूं प्राप्त होवै नहीं औ नित्यनैमित्तिक-कर्मकै नहीं करनैंतैं जो पाप होवै, सो तिनकै करनैतैं होवै नहीं औ इस जन्मविपैं तिनका साधारण औ असाधारणप्रायश्चित्तसैं नाश होवैहै ॥ औ पूर्व करे जो काम्यकर्म हैं तिनकै फलकी इच्छाकै अभावतैं शुभशुद्ध तिनका फल होवै नहीं । यातैं शुभशुद्ध ज्ञानसैं विनाही जन्मका अभावरूप मोक्ष होवैहै" ॥
( सिद्धांती:-) सो बनैं नहीं । कहतैं— नित्य-नैमित्तिककर्मका वी स्वर्गरूप फल है । यह वार्त्ता भाष्यकारने युक्ति औ प्रमाणसैं प्रतिपादन करीहै, यातैं नित्यनैमित्तिककर्मसैं उत्तमलोककूं प्राप्त होवैगा । जन्मका अभाव बनैं नहीं ॥ औ नित्यनैमित्तिककर्मका जो फल अंगीकार नहीं करै तौ नित्यनैमित्तिककर्मका बोधक जो वेद है सो निष्फल होवैगा । कहतैं— जो नित्यनैमित्तिक कर्मकै नहीं करनैंतैं पाप होवै तौ ता पापकी
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द्वितीयस्तरंगः २ ] ( एकभविकवादका खंडन ) ॥ ज्ञानविना कर्मफलका अभाव होवै नहीं ॥ ५॥
अनुत्पत्ति तिनका फल वनै, सो नित्यनैमित्तिककर्मके नहीं करैंतैं पाप होवै नहीं । कहैंतैं ? जो नित्यनैमित्तिक कर्मका नहीं करना सो अभावरूप है औ पाप भावरूप है । अभावतैं भावकी उत्पत्ति होवै नहीं । यातैं "नित्यनैमित्तिक कर्मके नहीं करनतैं पाप होवैहैं" यह कहनां वनै नहीं ॥ जो नित्यनैमित्तिककर्मके नहीं करैंतैं पापकी उत्पत्ति अंगीकार करें तौ "अभावतैं भावकी उत्पत्ति होवै नहीं" यह दूसरे अध्यायमें भगवाननैं कह्याहै तासैं विरोध होवैगा । यातैं नित्यनैमित्तिककर्मके अभावतैं पापकी उत्पत्ति वनै नहीं ॥ इसरीतिसैं नित्यनैमित्तिककर्मका पापकी अनुत्पत्ति फल नहीं । किंतु नित्यनैमित्तिक कर्मसैं विना वी पापकी अनु-
त्पत्ति सिद्ध है । यातैं नित्यनैमित्तिककर्मका जो स्वर्गरूप फल अंगीकार नहीं करै तौ कर्मे निष्फल होवैंगे औ निष्फल जो नित्यनैमित्तिक कर्म हैं, तिनका बोधक वेद वी निष्फल होवैगा । यातैं नित्यनैमित्तिककर्मसैं वी स्रगैफल होवैहै ॥ औ-
॥ ८४ ॥ पूर्वे कथ्यां जो "जन्मांतरके जो काम्यकर्म हैं तिनका इच्छाके अभावतैं फल होवै नहीं ।"
सो वातों वी वनै नहीं । कहैंतैं ? कर्मलपी बीजसैं दो अंकुर उत्पन्न होवैहैं ॥ एक तौ वासना औ दूसरां अदृष्ट ॥ धर्मअधर्मका नाम अदृष्ट है ॥ शुभकर्मसैं तौ शुभवासना औ धर्मलूप अंकुर होवैहै औ अशुभकर्मसैं अशुभवासना औ अधर्मरूप अंकुर होवैहैं । शुभवासनासैं तौ आगे शुभकर्मसैं प्रवृत्ति होवैहैं औ धर्मसैं सुखका भोग होवैहै इसरीतिसैं अशुभवासनासैं अशुभकर्मसैं प्रवृत्ति होवैहै औ अधर्मसैं दुःखकां होवैहै ॥ इसरीतिसैं
भोग होवैहैं ॥ इसरीतिसैं वासनारूप औ अदृष्टरूप अंकुर कर्मलपी बीजसैं होवैहैं । तिनविपै-
१ "वासनारूप अंकुरका तौ उपायसैं नाश होवैहै " औ-
२ "अदृष्ट अंकुरका फलकी उत्पत्तिसैं विना किसीप्रकारसैं वी नाश होवै नहीं" । यह शास्त्रका निर्णय है ॥
१ अशुभकर्मसैं उत्पन्न हुवा जो अशुभवासनारूप अंकुर है, ताका तौ सत्संगआदिक उपायतैं नाश होवैहै ॥ औ-
२ शुभकर्मसैं उत्पन्न जो हुई शुभवासना ताका कुशंग आदिकनतैं नाश होवैहै ॥ शास्त्रमैं जितना पुरुपार्थ कह्याहै तासैं प्रवृत्ति-
की हेतु जो वासना ताकाही नाश होवैहै । यातैं पुरुपार्थ वी सफल है औ भोगका हेतु जो अदृष्ट ताका नाश होवै नहीं । यातैं "फल दिये विना कर्मकी निवृत्ति होवै नहीं" यह वातैं जो शास्त्रमैं कहींहै तासैं वी विरोध नहीं ॥ इसरीतिसैं अज्ञानकीं फलभोगविना कर्मकी निवृत्ति वनै नहीं ॥ औ-
ज्ञानीकूं तौ भोगसैं विना वी कर्मकी निवृत्ति वनैहै । कहैंतैं ? कर्म औ कर्त्ता तथा फल परमार्थसैं तौ हैं नहीं । किंतु अविद्यासैं कलिप्त हैं ॥ ता अविद्याका ज्ञान विरोधी है । यातैं अविद्याकलिप्त जो कर्मादिक हैं तिनका वी ज्ञानसैं नाश होवैहैं ॥ जैसेँ स्वप्नविपै निद्रासैं जो पदार्थ प्रतीत होवैहैं । तिनका जाग्रतविपै निद्राकी निवृत्तिसैं अभाव होवैहै । तैसेँ अविद्यारूप निद्रासैं प्रतीत जो होवैहैं । कर्म कर्ता फल तिनका वी ज्ञानदशारूप जाग्रतविपै अविद्याकी निवृत्तितैं अभाव होवैहै । औ ज्ञान
विना अभाव होवै नहीं ॥ औ-
१ इच्छाके अभावतैं जो कर्मका फलभोग होवै नहीं तौ ईश्वरका संकल्प मिथ्या होवैगा ॥
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४८ ( पूर्वपक्षीमतै उत्तर ॥ ६१-९३ ॥ ) प्रयोजनमंडन [३] ॥ ४७-९२ ॥ [ विचारसागरे
काहेतैं ? "फलमोगविना अज्ञानौके कर्मकी नित्यत्ति होवै नहीं" यह ईश्वरका संकल्प है । जो इच्छाके अभावतैं करै कर्मका फल होवै नहीं तौ ईश्वरका संकल्प मिथ्याही होवैगौ । औ "सत्यसंकल्प ईश्वर है" यह वार्त्ता शास्त्रमैं प्रसिद्ध है । यातैं "इच्छाके अभावतैं पूर्व करै काम्यकर्मका फल होवै नहीं" यह वार्त्ता विरुद्ध है ।
२ जो इच्छाके अभावतैंही काम्यकर्मफल नहीं होवै तौ अग्निहोत्रकर्मका फल किसीूं बी नहीं हुवाचाहिये । काहेतैं ? अग्निहोत्रकर्मका फल दुःख है ताकी किसीूं बी इच्छा है नहीं । यातैं ज्ञानविना कर्मके फलका अभाव होवै नहीं ॥ और-
॥ ८९ ॥ जो पूर्व कछ्या "जैसैं कर्मके अनुष्टानकालमैं जो इच्छारहित पुरुष है ताकूं तौ कर्मका फल वेदांतमतमैं अंगीकार नहीं कछ्या । तैसैं कर्मके अनुच्टानमैं अंतर बी जो पुरुषकी इच्छा दूरी होयजावैं तौ कर्मका फल होवै नहीं" ।
सो वार्त्ता बी वेदांतमतकूं नहीं जानिके कहीहै । काहेतैं ? फलकी इच्छासहित जो कर्म करै अथवा फलकी इच्छारहित जो कर्म करैहैं तिनकूं कर्मका फलभोग तौ निश्चय होवैहै । परंतु इच्छारहित कर्मसैं अंतःकरण शुद्ध होवैहै । औ इच्छासहित जो कर्म करैहै ताकूं केवल भोग तौ होवैहै । परंतु अंतःकरण शुद्ध होवै नहीं ॥
९ "जो इच्छारहित कर्म करनैतैं शुद्ध अंतःकरण होयके श्रवणगतैं ज्ञान होय जावै ।
॥ ९२३ ॥ भोग प्रायश्चित्त बी ज्ञान इन तीनसैं कर्मकी नित्यत्ति होवैहै । याका चतुर्थकारण नहीं ॥
९ तिनमैं प्रारब्धकर्मकी भोगसैं नित्यत्ति होवैहै ॥ औ-
ताकूं तौ कर्मका फल होवै नहीं" औ- २ "जानै कर्म तौ फलकी इच्छारहित किये- हैं । परंतु श्रवणके अभावतैं अथवा किसी अन्यनिमित्ततैं ज्ञान होवै नहीं । ताकूं तौ इच्छारहित कर्मके फलका भोग दूरी होवै नहीं" यह वेदांतका सिद्धांत है । यातैं ज्ञानसी विना कर्मका फलभोग दूरी होवै नहीं ॥ और-
॥ ९० ॥ पूर्व कछ्या जो "प्रायश्चित्तसैं संपूर्ण अग्निहोत्रकर्मका नाश होवैहै " । सो वार्त्ता बी बनैं नहीं । काहेतैं ? अनंतकल्पके जो अग्निहोत्रकर्म हैं तिनका एक जन्मवै प्रायश्चित्त बनै नहीं औ गंगा-स्नान औ ईश्वरका नामउच्चा- रणसैं आदि लेके सर्वपापके नाशक जो साधन प्रायश्चित्त कहैंहै सो बी ज्ञानकेही साधन हैं । यातैं सर्वपापके नाशक कहैंहैं । यातैं ज्ञानसैही सर्वपापका नाश होवैहै ॥ और-
॥ ९१ ॥ पूर्वकछ्या जो नित्यनैमित्तिककर्मके करनैतैं जो केश होवैहै सो पूर्वसंचित निषिद्ध- कर्मका फल है । यातैं संचितनिषिद्धकर्मका फल और होवै नहीं ॥
सो वार्त्ता बी बनै नहीं । काहेतैं ? अनंतप्रकारके संचितनिषिद्ध जो कर्म हैं तिनका फल बी अनंतप्रकारका दुःख है । केवल- कर्मके अनुच्टानका केशही तिनका फल बनै नहीं ॥ और-
॥ ९२ ॥ पूर्व कछ्या जो "संपूर्ण संचित काम्यकर्मतैं एकही शरीर होवैहै"
२ क्रियमाणकर्मकी प्रायश्चित्तसैं औ ज्ञानसैं बी नित्यत्ति होवैहै । औ-
३ संचितकर्मकी किंचितनिवृत्ति साधारण- प्रायश्चित्तसैं होवैहै । संपूर्णनिवृत्ति ज्ञानसैं होवैहै ॥
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सो वार्ती थी वनै नहीं | कहैं? संचितकाम्यकर्मे अनंत हैं, तिनका एकजन्मविपै भोग वनै नहीं ॥ ॐ— एकपुरुपकूं एककालेमें नानाआरीरसैं जो भोग कधा सो वी सिद्धयोगीविना औरकूं वनै नहीं ॥ सिद्धयोगींकै वी और तौ संपूर्ण सामर्थ्य होवेंहै । परंतु ज्ञानविना मोक्ष तौ होवें नहीं " यह वेदका सिद्धांत है ॥ इसरीतिसैं काम्यकर्म औ निपिद्धकर्मकै त्यागिके जो केवलनित्यैंमितिककर्मे अज्ञानी करें ताकूं नित्यैंमितिककर्मका फल भोगनके वास्ते । औ पूर्व जो शुभअशुभकर्म करेंहैं तिनका फल भोगनके वास्ते अनंतशरीर होवेंगें । मोक्ष होवें नहीं । यातैं ज्ञानद्वारा वंधकी निष्पत्ति ग्रंथका प्रयोजन वनैहै ॥ जैसें स्वप्नविपैं जो मिथ्यापदार्थ प्रतीत होवेंहैं तिनकी जागृतविना निष्पत्ति होवें नहीं । तैसें ग्रंथ वी मिथ्या प्रतीत होवेंहैं ताकी वी ज्ञानरूप जागृतविना निष्पत्ति होवें नहीं ॥
॥ ९३ ॥ संबंधमंडन (४) ॥ ॥ ग्रंथका आरंभ वनैहै ॥ इसरीतिसैं ग्रंथके अधिकारी विपय प्रयोजन संबंधहैं औ अधिकारी आदिकनके संभवतैं संबंध वी संभवहैं, यातैं ग्रंथका आरंभ वनैहै ॥
॥ दोहा ॥ दादू दीनदयाल जु, सत सुरल परमप्रकाश ॥ जामैं मति की गति नहीं, सोई निश्चलदास ॥ ९४ ॥
इति श्रीविचारसागरे अनुबंधविशेषनिरूपणं नाम द्वितीयस्तरंगः समाप्तः ॥ २ ॥
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॥ ९४ ॥ ग्रंथारंभकी प्रतिज्ञा ॥
॥ दोहा ॥ पेखि च्यारि अनुवंध जुगति, पढै सुने यह ग्रंथ ॥ ज्ञानसहित गुरुसै जु नर, लहै मोच्छको पंथ ॥ ९ ॥
टीका:-चारिअनुवंधसहित ग्रंथकूं जानिके ज्ञानसहित गुरुसैं जो पुरुष पढै अथवा एकाग्रचित्तकारिके सुने सो पुरुष मोक्षका पंथ जो ज्ञान है ताहू प्राप्त होवै ॥ ९ ॥
करनैं श्रवणकौं बोध सुखसैं होवैहै इस कारनैं गुरुशिष्यके संवादसैं ग्रंथका आरंभ करियेहै ॥ २ ॥
॥ ९५ ॥ अथ श्रीगुरुलक्षण ॥
॥ चौपाई ॥ वेदअर्थकौं मलै पिछानै । आतम ब्रह्मरूप इक जानै ॥ भेद पंचकी बुद्धि नसावै । अद्वय अमल ब्रह्म दरसावै ॥ ३ ॥
भव मिथ्या मृगतृषा समाना । अनुलव इम भाखत नहीं आना॥ सो गुरु दे अज्ञानउपदेसा । छेदक सिखा न लूंचित केसा ॥४॥
टीका:-“ छेदकके अर्थकूं मलप्रकारसैं पिछानै ” यह कहनैसैं अधीतवेद आचार्य होवैहै यह कव्या ॥ औ जीवब्रह्मकी एकता निश्चयकारिके जानै; यातैं आत्मज्ञानवियै जाकी याबाद कहिये प्रकटित होवै ॥
॥ दोहा ॥ अनयासहि मति भूमिमैं, जो नैं चिमन आबाद ॥ लहै इहि कारण कहतहूं, गुरू-सिष्य-संवाद ॥ ३ ॥
टीका:-गुरुशिष्यके संवादसैं अर्थ निरुपण
॥ ९६ ॥ ज्ञानरूप चिमन काहिये बगीचा ।
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स्थिति होवें सो आचार्य होवेंहैं । यह कथा । जो वेद पढ़्या होवें औ ज्ञानविचिपं जाकी निष्ठा न होवें सो आचार्य नहीं हैं औ ज्ञानविचिपं जाकी निष्ठा होवें औ वेद नहीं पढ़्या सो वी आप तां मुक्त है परंतु उपदेश करनें योग्य आचार्य नहीं हैं । कहैंतैं ? जाकं जिनासक्ति शंका मेटनकी युक्ति नहीं आवैहैं ॥ जाके वित्तविचिपं शंका उठै नहीं ऐसा जो उत्तमसंस्कारवाला जिज्ञासु है ताके तां उपदेश करनैविपं समर्थ है वी । परंतु सर्वके उपदेश करनें योग्य नहीं, यांतैं आचार्य नहीं । किंतु—१ अधीतवेद होवें । औ—२ ज्ञानविचिपं जाकी निष्ठा होवें । सो आचार्य कहियेहैं ॥ औ—३ शिष्यकी बुद्धिमैं भान जो होवें पंचप्रकारका भेद ताकं नानायुक्तिसैं दरि करनैविपं समर्थ होवें ॥ जीवईशका भेद, जीवनका परस्परभेद, जीवजड़का भेद, ईशजड़का भेद, जड़जड़का भेद, यह पंचप्रकारका भेद हैं । ताकं खंडन करैं । कहैंतैं ? भेद भयका हेतु हैं । यांतैं भेदका निराकरण अवश्य कर्तव्य हैं ॥४ भेदका निराकरणकरिके अद्वय औ अमल कहिये अविद्यादिमलरहित जो ब्रह्म ताकं
दरसावैं कहियै आत्मरूपकरिके साक्षात्कार करावैं ॥ औ—५ सर्वसंस्कारूं मिथ्यारूपकरिके उपदेश करैं ॥सो अद्वुतउपदेश दैनैवाला आचार्य कहियेहैं ॥ औ केवल आप भ्रंडन कराइकै शिष्यकी शिक्षा छेदनमात्र करनैवाला अथवा और कोड़संप्रदायके चिन्हमात्रसैं अंकित करनैवाला आचार्य नहीं कहियेहैं ॥ ४ ॥ || दोहा || करत मोह भवग्राहतैं, दे असित निज उपदेश । सो दैसिक बुधजन कहत, नहीं कृत गैरिकवेष ॥ ५ ॥
|| ९६ || शिष्यकै लक्षण || || दोहा || दैसिकके लच्छन कहे, श्रुतिमुनि वच अनुसार ॥ सो लच्छन हैं शिष्यके, जिनतैं अधिकार ॥ ६ ॥ कारण औ निराभास नामरूपमय उपाधिछित होनेंतैं; स्वमते चरअचरकी न्याईं ॥ १ जीवईशका भेद कल्पित है, अविद्यावि-
मेदकी न्याईं ॥ २ जीवनका परस्पर भेद कल्पित हैं, साभास अंतःकरणरूप उपाधिछित होनेंतैं; नामा घटआदनके भेदकी न्याईं ॥ ३ जीवजड़का भेद कल्पित है । साभासअंतः-
वि. ६ ४ ईशजड़का भेद कल्पित है, साभासमायाअौं नामरूपमय उपाधिछित होनेंतैं; साक्षी औ स्वप्रपंचके भेदकी न्याईं ॥ ५ जड़जड़का भेद कल्पित है, नामरूपमय उपाधिछित होनेंतैं; रज्जुसर्पवैं कल्पित सर्पदंड-दिकैके भेदकी न्याईं ॥ ये पांचप्रकारकैं अनुमान पंचभेदके खंडनमें युक्तियां हैं ॥
|| १२५ || पंचभेदके खंडनकी युक्तियां यह हैं:-
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टीका:-शास्त्रके अनुसार दैशिक कहिये गुरु ताके लक्षण कहे और जिन साधनसैं ग्रंथमैं अधिकार होवै सो साधन शिष्यके लक्षण हैं ॥ याकै यह अभिप्राय है:- जो अधिकारीके लक्षण पूवें कहे सोई लक्षण शिष्यके जानि लेनैं ॥ ६ ॥
॥ ९७ ॥ अथ गुरुभक्तिका फलवर्णन ॥
॥ दोहा ॥ ईश्वरतैं गुरुमैं अधिक, धारै भक्ति सुजान । विन गुरुभक्ति प्रवीनहू, लहै न आत्मज्ञान ॥ ७ ॥
टीका:-सुजानपुरुप गुरुमैं ईश्वरसैं अधिक भक्ति करै । कहैंहैं: जो सर्फशक्तिमैं प्रवीण होवै सो वेदके अर्थकूं विचारैहै, सो मेदरूपी क्षारकूं अनुभकारिके जन्ममरणरूपी खेदकूं प्राप्त होवैहै ॥
इसकारणसैं रामानुज औ मध्वसैं आदिलेकै जो नानारुप हुपहैं तिनोंनै वेदके अर्थका विचार वौ कियाहै परंतु गुरुद्वारा नहीं किया । यातैं मेदविषै निधयकारिके जन्ममरणरुपी खेदकूंहीं प्राप्त भये । मुक्तिरुप आनंद उनकूं प्राप्त नहीं भया ॥
यद्यपि रामानुज आदि जो भयैहैं, तिनोंनैं वौ वेद अपने अपने गुरुसैंहीं पढिके विचार्याहै औ वि-चारिके न्यासव्यान कियाहै । तथापि जिनके पास उनकूं वेद पढ्या सो गुरु नहींहैं । कहैंहैं "जो जीव-ब्रह्मकी एकताकै उपदेश करै सो गुरु होवैहै " यह पूर्व गुरुलक्षणके प्रसंगमैं कहि आयेहौं औ उनके जो पाठक हुवैहैं सो जीवब्रह्मका मेद उपदेश देनवाले हुवैहैं, यातैं उनकैपै जो गुरुशिष्यका प्रयोग करैहैं, सो अहंतके समान करैहैं ॥
जैसे अहंतके शिष्य अहंतकूं गुरु कहैहैं । परंतु अहंत गुरुपदका विपयैं नहीं हैं । तैसे मेदवादी-पुरुपके जो शिष्य हैं सो अपने पाठकोंकूं गुरु कहैहैं परंतु सो गुरु नहीं हैं । यातैं रामानुजसैं आदिलेकै जो मेदवादी हुवैहैं, तिनोंनै गुरुद्वारा चिंचार नहीं किया । इसकारणतैं मेदमैं अभिनिवेशकारिके जन्ममरणरुपी केशकूंहीं प्राप्त भये ॥
॥ दोहा ॥ वेद उदधि विनगुरु लखै, लांगै लौन समान । वादर गुरुमुख द्वार तैं, अमृततैं अधिकौनै ॥ ८ ॥
टीका:-वेदरुपी उदधि कहिये जो सद्गुरु है, सो गुरुविना लौनके समान क्षार है ॥ जैसे क्षारसमुद्रमैं पैठिके चावै जलकूं जो पान करै सो केवल क्षारताकूं अनुभव करैहै औ तामैं केशकूं प्राप्त होवैहै । तैसे गुरुविना जो
॥ १२६ ॥ विवेकादिसाधनरुप सधिकारीके लक्षण हैं, सोई पूर्व प्रथमतरंगवै कहे ॥
वेदके अर्थकूं विचारेैह, सो मेदरुपी क्षारकूं अनुभकारिके जन्ममरणरुपी खेदकूं प्राप्त होवैहै ।
॥ १२७ ॥ विषय कहिये अर्थ नहीं है ॥
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वेदरूपी घनाविधुरके मुखद्वारा जो मुनिके विचारे ताहूँ अमृतसैं वी अधिक-आनन्दका हेतु वेद होवैहैं । जेसैं समुद्रका जल स्वरूपसैं क्षार है औ वेदरद्रासा मधुर होवैहैं तेसैं वेदका अर्थ ब्रह्मज्ञानी गुरुद्वारा आनन्दका हेतु हैँ ॥ ९८ ॥ ज्ञानी गुरुसैं वेदअर्थके पठन औ श्रवणकी योग्यता ॥
पूर्वेदोेहैं यह वात कही जो "गुरुसैं पढ्या जो वेदका अर्थ हैँ ताके विचारसैं मुक्तिलुपी फल प्राप्त होवैहैं । तासौं गुरु ज्ञानी होवें अथवा अज्ञानी होवें ऐसैं विेषेप नहीं कया, सो अव कहैंहैं:-"प्रत्यपि ज्ञानहीन गुरु नहीं" यह पूर्वी कही आँय । तथापि पूर्वी कही वार्ताकौं दृष्टांतसैं प्रतिपादन करैं हैं:-
॥ दोहा ॥ हृति पुट घट सम अज्ञान, मेघसमान सुज्ञान । पढै वेद इति हेतुतैं, ज्ञानीपैं तजि आन ॥ ९ ॥
टीका:- १ अज्ञ कहिये अज्ञानी जो जन हैं सो हृतिपुट कहिये मषक औ चरसादिक जो चर्मपात्र अथवा घटद्वारा ग्रहण किया जो समुद्रका जल सो विलक्षणस्वादका हेतु नहीं हैँ तैसैं अज्ञानी पुरुषद्वारा ग्रहण जो किया वेदरूपी समुद्रका अर्थरूपी जल सो विलक्षण आनन्दका हेतु नहीं । यांतैं अज्ञानपाठक चर्मपात्र औ घटके समान हैँ ॥ ओ- २ सुज्ञान कहिये ज्ञानी मेघके समान है । यह वार्ता पूर्वी प्रतिपादन करीहैं ॥
यांतैं चर्मपात्र औ घटके समान जो अज्ञानी-पाठक हैँ ताहूँ त्यागिके मेघसमान जो ज्ञानी ताहीमूँ वेदका अर्थ पढै पथवा सुनै ॥ ९ ॥ भापाग्रंथसैं वी ज्ञान होवैहैं ॥
यह शंका होवैहैं:-जो वेदकी श्रुति हैँ तिनहीद्वारा जीवब्रह्मका स्वरूप विचारनैं ज्ञान होवैहैं । अन्य संस्कृतग्रंथनसैं औ भापाग्रंथनसैं ज्ञान होवें नहीं, यांतैं भापाग्रंथका आरंभ निष्फल होवैगा । ताके-
समाधानका दोहा ॥ ब्रह्मरूप अहि रथावृत, ताकी वाणी वेद ॥ भापा अथवा संस्कृत, करत मेधभ्रम छेद ॥ १० ॥
टीका:-"ब्रह्मवेच्या जो पुरुप हैँ सो ब्रह्मरूप हैँ" यह वार्ता श्रुतिविपैं प्रसिद्ध है । यांतैं ताकी वाणी वेदरूप हैँ । सो भापारूप होवें अथवा संस्कृतरूप होवें । सर्वथा मेध-भ्रमका छेद करैहैं ॥ और-
जो कहैंहैं:-"वेदके वचनविना ज्ञान होवें नहीं" सो नियम नहींँ । जेसैं आयुर्वेदमैं कहे जो रोग औ तिनके निदान औ औपध तिन संपूर्णका अन्य संस्कृतग्रंथनसैं औ भापाफारसी-ग्रंथनसैं ज्ञान होय जाइहै । तेसैं सर्वका आत्मा जो ब्रह्म ताका ज्ञान वी भापादिकग्रंथनसैं होवैहै ॥
इसवासैं सर्वेज्ञ जो ऋषिपि औ मुनि हुयैहैं तिनोंनैं स्मृति औ पुराण औ इतिहासग्रंथनमैं ब्रह्मविद्याके प्रकरण कहैहैं ॥ जो वेदसैं बिना ज्ञान न होवै तौ वे संपूर्णप्रकरण निष्फल होय जाइँगे । यांतैं आत्माके स्वरूपका प्रतिपादक
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जो वाक्य है तासूं ज्ञान होवैहै। सो वेदका होवै अथवा अन्य होवै। यातैं भापाग्रंथसैं बी ज्ञान होवैहै यह वार्ता सिद्ध हुई॥ १० ॥ जिज्ञासुकूं ब्रह्मवेत्ता आचार्यके सेवाकी करतव्यता ॥
वानी जाकी वेद सम, कीजै ताकी सेव ॥
॥ दोहा ॥
॥ १२८ ॥ "भापाग्रंथसैं ज्ञान होवै नहीं" ऐसां आग्रह करै ताकूं पूछहै:- १ भापाग्रंथ वेदके अनुसारी नहीं यातैं तिनसैं ज्ञान होवै नहीं। २ अथवा वे भाषारूप हैं यातैं तिनसैं ज्ञान होवै नहीं। ३ वा भगतारकशरीर रचित नहीं यातैं तिनसैं ज्ञान होवै नहीं। ४ वा अशुद्ध हैं यातैं तिनसैं ज्ञान होवै नहीं? चारीअकारूप हैं। तिनमैं— १ "वेदके अनुसारी नहीं" यह प्रथमपक्ष कहै तौ ( १ ) वेदके पाठके अनुसारी नहीं। ( २ ) वेदके अर्थके अनुसारी नहीं? ( १ ) जो "पाठके अनुसारी नहीं" ऐसैं कहो तौ अन्यसंस्कृतग्रंथ बी वेदपाठके अनुसारी नहीं। यातैं तिनसैं बी ज्ञान न हुआचाहिये॥ ( २ ) "जो वेदके अर्थके अनुसारी भाषाग्रंथ नहीं" ऐसें कहोगे तौ सो बने नहीं। कहैंतैं? जैसे कोईक संस्कृतग्रंथ वेदकेअर्थके अनुसारी है। तैसैं कोईक प्राकृतग्रंथ बी वेदकेअर्थके अनुसारी हैं। यातैं जैसे श्रुति- वादीका ज्ञान होवैहै। तैसैं वेदकेअर्थके अनुसारी अन्यसंस्कृत औ प्राकृतग्रंथनसैं ज्ञान होवैहै। २ "जो भाषाग्रंथ भाषारूप हैं यातैं तिनसैं ज्ञान होवै नहीं" ऐसें कहोगे तौ जैसैं संस्कृतग्रंथ देव-पना दोनूंसैं तुल्य है। ३ जो "भाषाग्रंथ अवतारशरीररचित नहीं, यातैं तिनसैं ज्ञान होवै नहीं" ऐसें कहोगे तौ कैक
तैं ४०१ के शंकउत्तररिवसैं प्राकृतके नियमसैं संस्कृतग्रंथ अशुद्ध हैं। तैसैं संस्कृतके नियमसैं प्राकृतग्रंथ अशुद्ध हैं। शुद्धता दोनूंमैं तुल्य है ॥ इसरीतिसैं भापाग्रंथसैं ज्ञान होवै नहीं यह मानना हठमात्र है॥ जैसे नानक दादूजी रामदासस्वामी एकनाथस्वामी ज्ञानुवादिकअनेकमहात्मा पुरुषोंनैं प्राकृतवाणी रचीहै, सो जैसैं कल्याणकारक है। तैसैं व्याधुनिक ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंनैं जे प्राकृतग्रंथ कियेहैं, करैतहैं औ करियेंगें, वे सर्व संस्कृतके अभ्याससैं रहित अधिकारी पुरुषनके ज्ञानद्वारा कल्याणके हेतु हैं ॥ ध्रौ—अपभ्रंशितशब्दके उदाहरणकी निपेधक शुति प्रमाण देखे जो भाषाग्रंथनका निपेध कियाहै सो अपने पंडित्यकी प्रबलताके लिये क्रियाहै। कहैंतैं? श्रीन्यास-रचित सूत्रसंहिताविषै "संस्कृतप्राकृतकari गौ गच-पच अक्षरोंकरि धरु देशभाषाके अक्षरोंकरि जो बोध करै सो गुरु कहाहै?" इस अर्थवाले वाक्यकरि प्राकृत- व्यवहार औ शास्त्रन्यास्यान आदिक वैदिक व्यवहारका लोप होवैगा औ अनादिकालीन भाषाव्यवहारका सर्वथा निषेध बने नहीं। यातैं परिशेषतैं उक्त
जब सेवतैं, तव जानै निज भेव ॥ १९ ॥ टीका:-जा ब्रह्मवेत्ताकी वाणी कहिये वचन वेदके समान है, ता ब्रह्मवेत्ता आचार्यकी जिज्ञासु सेवा करै। कहैंतैं? सेवातैं जब आचार्य प्रसन्न होवैं तव निजभेव कहिये अपना स्वरूप जानै ॥ यातैं कहनैंतैं यह वार्ता जनाई:-जो आचार्यकी सेवा है सो ईश्वरकी सेवारैं बी अधिक है ॥ कहैंतैं? संस्कृतग्रंथ बी अवताररचित नहीं। तिनतैं बी ज्ञान न हुआचाहिये ॥
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॥ ततीयस्तरंगः २ ॥
॥ तन औ मनअर्पणका प्रकार ॥ ६१
१ जो ईश्वरकी सेवा है सो अष्टफलका हेतु है ॐ—
२ आचार्यकी सेवा है सो अष्टफल औ हष्टफल दोनूंका हेतु है ॥
(१) जो वस्तु धर्मअधर्मकी उत्पत्तिद्वारा फलका हेतु होवै, सो अष्टफलका हेतु कहियेहैं ॐ—
(२) जो वस्तु धर्मअधर्मकी उत्पत्तिसैं बिना साक्षात्फलका हेतु होवै सो हष्टफलका हेतु कहियेहैं ॥
१ ईश्वरकी जो सेवा है सो धर्मकी उत्पत्तिद्वारा अंतःकरणकी शुद्धिरूप फलका हेतु है, यातैं ईश्वरकी सेवा अष्टफलका हेतु है ॐ—
२ आचार्यकी सेवा धर्मकी अपेक्षाविना आचार्यकी प्रसन्नतारूप फलका हेतु है । यातैं हष्टफलका हेतु है औ धर्मकी उत्पत्तिद्वारा अंतःकरणकी शुद्धिरूप फलका हेतु है । यातैं अष्टफलका हि हेतु है ॥
इसरीतिसैं आचार्यकी सेवा ईश्वरकी सेवासैं श्री उत्तम है । यातैं जिज्ञासु सर्वप्रकारसैं वृद्धवेत्या आचार्यकी सेवा करै ॥ ११ ॥
॥ १०१ ॥ ॥ अथ आचार्यसेवामकार ॥
॥ सोरठा ॥
न्है जवही गुरुसंग;
श्रुतिका यइससंबंधी ब्यवहारलैपै अपभंशितशब्दनके उच्चारणका निषेध तालपयौर्थ है । यह शिष्टपुरुषनका अभिप्राय है ॥
॥ १२९ ॥ दोपद, दोजाउ, दोहस्त, हृदय
औ शिर, इन अपभ्रंगनकूं भूमिविेधै लगायके जो दंडकी न्याई दीर्घनमस्कार करियेहै, सो सादरांग-प्रणाम है ॥
करै दंड जिस दंडवत ॥
धारै उत्तमअंग, पावन पादसरोज रज ॥ १२ ॥
टीका:-जब गुरु प्राप्त होवै तथा दंडकी न्याई सादरांगप्रणाम करै औ पावन कहियै पवित्र जो हैं पादरूपी सरोजकमल, तिनकी रज जो भूरी, ताकूं उत्तमअंग कहियै मस्तक उपर धारै ॥ १२ ॥
॥ चौपाई ॥
गुरु समीप पुनि करिये वासा । जो अति उत्कट है जिज्ञासा ॥
तन मन धन वच अर्पै देवै । जो चाहै दिये वंधन छैवै ॥ १३ ॥
अर्थ स्पष्ट ॥ १३ ॥
॥ १०२ ॥ ॥ अथ तनअर्पणप्रकार ॥ (२)
तनकरि वहु सेवा विस्तारै । आज्ञा गुरुकी कबहूँ न टारै ॥
॥ १०३ ॥ ॥ अथ मनअर्पणप्रकार ॥ (२)
मनमें प्रेमैं रामसम राखै । न्है प्रसन्न गुरु हम अभिलाखै ॥ १४ ॥
॥ १३० ॥ प्रेम जो भक्ति सो राम कहियै
परमेश्वर ताके सम रहियें तूंस्य राखै ॥ अर्थ यह जो गुरुकूं परमेश्वररूप जानिके ताकी भक्ति करै ।
यामें यह श्रुतिप्रमाण है:-जिसकूं देवविेधै परमभक्ति है औ जैसै देवविेधै है तैसी गुरुविेधै बी परम-भक्ति है । तिस महासंबंध ये कहैं जो वेदभ्यासकी एकतारूप वेदके अर्थ, वे आपही प्रकाशतेहैं ॥
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दोषहष्टि सपने नहिं आनै । हरि हर ब्रह्मा गंग रवि जानै ॥ गुरू मूरतिको हियमें ध्याना । धारै जो चाहै कल्याना ॥ ९५ ॥
॥ १०४॥ ॥ अथ धनअर्पणप्रकार ॥ (७)
पत्नी पुत्र भूमि पशु दासी । दास द्रव्य ग्रह श्रीहि विनासी ॥ धनपद इन सबहिनकूं भाखै । नहै गुरुसरन दूरी तिहि नाखै ॥ ९६ ॥
॥ सोरठा ॥
धनअर्पनको भेव, एक कह्यो सुन दूसरो । नह गृहस्थ गुरुदेव, यज्ञवल्क्य सम देह तिहिं ॥ ९७॥
टीका:- १ पतिसैं आदिलेके ब्रीहि कहिये धान्यपर्यंत सारे धन कहियेहैं, तिन सर्वसौं त्यागिके त्यागी जो गुरू है ताके सरणै होवै । यह धनअर्पण कहियेहै । कहैंत? गुरू त्यागी है सो आप तौ अंगीकार करै नहीं परंतू तिन गुरूकी प्राप्ति वास्ते धनका त्याग करैहैं, यांतें ऐसाजो त्याग है सो बी गुरुकूंही अर्पण कहियेहै । औ- २ गृहस्थ जो गुरू होवैं तिनकूं समग्र चढाई
॥ १३१ ॥ इहां यह रहस्य है:- १ गुरू जब शिष्यके ऊपर वत्सलता करै, तब ताकूं हरिरूप कहिये विष्णुरूप जानै ॥ २ गुरू जब क्रोध करै तब ताकूं हररूप कहिये शिवरूप जानै ॥ ३ गुरू जब राजसींग्यवहारविधैँ तस्पर होवै तब ताकूं ब्रह्मारूप कहिये व्रक्षारूप जानै ॥
देवै । यह दूसरी प्रकारका धनअर्पण कहियेहै । यामैं- कोउ शंका करैहै:-जो ब्रह्मविद्याके आचार्य गृहस्थ नहीं होवैहै । सो शंका वनै नहीं । कहैंत? याज्ञवल्क्य औ उद्दालकसैं आदि लेके ब्रह्मविद्याके आचार्य गृहस्थही वेदविपैं घडुत सुनै जावैहैं । यातैं गृहस्थ बी आचार्यें संभवे हैं ॥ १०५ ॥
अथ वाणीअर्पणविषैँ छंद ॥ (८)
भाखत गुनगन गुरुकै बानी सुध्द । दोष न कबहू अपन करि इम बुद्ध ॥
॥ १०६ ॥ शिष्यका गुरुकै संबंधमैं व्यवहार
जो चाहै कल्याण, तन मन धन वच अरपि इम । वसै बहुत गुरुस्थान, भिच्छतैं जीवन करै ॥ ९८ ॥
टीका:-जो पृथप अपना कल्याण चाहै । सो पूर्वरीतिसैं तनआदि अर्पणकारिके आप बहुतकाल गुरू जहाँ होवै ता स्थानविपैं वा समीपमैं वास करै औ आप भिक्षांतैं जीवन कहिये प्राण धारण करै ॥ ९९ ॥
४ गुरू जब शांतिसिपै स्थित होवै तब ताकूं गंग-रूप कहिये मंगादेवीरूप जानै ॥ ५ गुरू जब घृणारूप किरणोंकरि भ्रमसंदेह-सहित अज्ञानकूं दूरी करै तब ताकूं रविरूप कहिये सूर्यरूप जानै ॥ इसरीतिसैं ब्रह्मवेत्ता गुरुविपैँ शिष्य सर्वेदा ईश्वरभाव राखै । स्वप्नविपै बी दोषहष्टि त्यावै नहीं ॥
॥ १३२ ॥ यह जो रीति कही सो, ब्रह्मचारी वा त्यागी शिष्यकी है । गृहस्थकी नहीं ॥
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|| १०७ || || चौपाई || सो भिच्छा धरै दैसिक आँगै, निज भोजनकूं नाहिं पुनी मागै || जो गुरु देइ तु जाइ अरु डारै, नाहिं दूजेदिन वृत्ति संभारे || २० || टीका:-जो भिच्छाका अन्न शिष्य ल्यावै सो आपही भोजन नाहीं करि लेय । किंतु जो गुरु हैं तिनके आगे धरि देय औ भिच्छा गुरुके आगे धरिके अपनै भोजनकूं गुरुसे माग नाहीं औ एकदिनमैं दूसरिवार भिच्छा ग्राममैं व्री माग नाहीं । किंतु गुरु जो कृपाकरिके देय तौ भोजन करै औ गुरु जो शिष्यकी श्रद्धाकी परीक्षाके निमित्त नाहीं देय तौ दूसरेधिन वृत्ति जो भिच्छा ताइ्रूं संभारे || २० ||
|| दोहा || पुनि गुरुके आगे धरै, भिच्छा सिष्य सुजान || निर्वेद न जियमैं करै, जो निज चहै कल्याण || २१ || टीका:-निर्वेद नाम ग्लानिका है । अन्यार्थ स्पष्ट || २१ ||
|| १०८ || || चौपाई || इम व्यवहार अवसर जब पेखै | मुख प्रसन्न गुरु सन्मुख लेखै || विनती करै देउ कर जोरी | गुरुआज्ञातेंं प्रभु वहोरी || २२ || टीका:-इसरीतिका न्यवहार करते जग गुरुकै अवकासा देखें औ प्रसन्नमुखसैं गुरु जव अपने सन्मुख देख तहा हाथ जोरिके गुरुकै स्तुति करै औ विनती करै;-हे भगवान् "मैँ पुछव्या चाहूँह"||तब गुरु आज्ञा करें तौ प्रश्न करै || औ--कदाचित् जन्मांतरके उत्तमकर्ममैंँ गुरु क्रृपाकरिके शिष्यनैं तनअर्पणादि सेवासैं विनही उपदेश करी देयँ तौ विशुद्ध अधिकारिका कल्याण होय जाइहै । कहैंतें? गुरूसेवाके दो-फल हैं:-एक तौ गुरूकी प्रसन्नता औ दूसरी अंत:करणकी शुद्धि । सो दोनूँँ वाके सिद्ध हैँ|| २२ ||
|| दोहा || तन मन धन वानी अरपि, जिहिं सेवत चित लाय || सकलरूप सो आप है, दादू सदाँ सहाय || २३ || || इति श्रीविचारसागरे गुरुशिष्यलक्षण गुरुभक्तिफलप्रकारनिरूपणं नाम तृतीयस्तरंग: समाप्त: || ३ ||
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॥ श्रीविचारसागर ॥ ॥ चतुर्थस्तरंग: ॥ ८ ॥ ॥ अथ उत्तमाधिकारीउपदेशानिरूपणं ॥
॥ दोहा ॥ गुरुशिषके संवादकी, कहूं व गाथ नवीनीं ॥ पेखि जाहि जिज्ञासु जन, होत विचारमवीन ॥ १ ॥ ॥१०९॥सुभसंतति राजा औ ताके तत्व- दृष्टि अदृष्टि औ तर्कदृष्टि नाम तीन- पुत्रोंकी गाथा ॥ १०९-१११ ॥ तीनि सहोदर बाल सुभ, चक्रवती संतान ॥ सुभसंततिपितु तिहिं नमै, स्वर्ग पताल जैहांन ॥ २ ॥ ॥ तीनौं बालनाम ॥ तत्वदृष्टि इक नाम आहिं, दूजो कहत अदृष्ट ॥
॥ १३२ ॥ नवीने कहिये अनादि वेदउक्त जनकयाज्ञवल्क्यकी गाथाकी नाम कथाकी न्याई यह गुरुशिष्यके संवादकी गाथ कहिये स्ववुद्धि- धारी कल्पित है । पुराणादिमग्रंथउक्त नहीं । तासूं व कहिये अब कहूं ॥ ॥ १३४ ॥ जहाँन कहिये मृख्लोक ॥
तर्कदृष्टि पुनि तिसरो, उत्तम मध्य कनिष्ठ ॥ ३ ॥ ॥ चौपाई ॥ बालपनो सब खेलत खोयो । तरुन पाय पुनि मदन बिगोयो । धन नारी गृह मोरि प्रकासी । भोग लहैं तिहूं सब सुखरासी ॥ ३॥ ॥ ११० ॥ स्वर्ग भूमि पातालके, भोगाहि सर्व सैंमौज ॥ सुभसंतति निज तेजबल, करत राजके काज ॥ ५॥ लहि अवसर इक तिहिं पिता, निजहिय रच्यो विचार ॥
॥ १३५ ॥ हृदके वास्ते अदृष्टिके स्थानमें अदृष्ट पड़्याहै ॥ ॥ १३६ ॥ मार कहिये कामदेव ॥ ॥ १३७ ॥ समाज कहिये भोगकी सामग्री ॥ पलटायके " निज हिय रच्यो विचार" यह पाठ "उपज्यो हिये विचार " ऐसा पाठ पीड़े
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॥ दोहा ॥ सुखस्वरूप अज आत्मा, तासौं भिन्न असार ।। ६ ।। इहिं कारन तजि राज यह, जानूं आत्मरूप ।। स्वर्ग भूमि पतिलोक, तिहूं पुत्रह करि भूप ।। ७ ।।
॥ चौपाई ॥ as विचार शुभसंतति कीना । मंत्रि पेखि तिहुँ पुत्र प्रवीन ।। देशइकंत समीप बुलाय । निज विरागके बचन सुनाय ।। ८ ।। भाष्यो पुनि यह राज संभारहु । एक पताल इक स्वर्ग सिधारहु ।। अपर बसहु काशीभुवि स्वामी । रहत जहाँ सिव अंतरजामी ।। ९ ।। जिहि मरताहि सुनि सिव उपदेसा । अनयासहि तिहिं लोक प्रवेसा ।। गंग अंग मनु कीर्तिं प्रकासै । उत्तरवाहिनि अधिक उजासै ।। १० ।। प्रेयकारनैहि धन्य्याहि ।। याका यह अर्थ है:-विचार कहिये विवेक, हिये कहिये अपने अंतःकरणमै, उपक्यो कहिये पूर्वकृतपुण्यपुंजके वलसैं सकस्मात उत्पनो मंयो ।। ॥ १३९॥ मंत्रि पेखि कहिये मंत्रीकूं नेत्रकी सैन- करिके ।। :·॥ १४० ॥ तिहि लोक प्रवेसा कहिये तिस शिवके लोक कैलासविषै प्रवेस करताहे । यह "काशी- वि. ९
करहु राज इम भिन्न तिहूँ, पालहु निज निज देस ।। विन विभाग भ्रातानको । भूमि काजै कहै कैसें ।। ११ ।।
॥ इंद्रव छंद ॥ राजसमाज तजौं सब मैं अब जानि हिये दुःख ताहि असारा ।। और तु लोक दुखी अपने दुख मैं भुगत्यो जग कैस अपारा ।। je भंगवान प्रधान अजान समान दरिद्रन ते जन सारा ।। हेतु विचार हिये जगके भंगें त्यागि लखूं निजरूप सुखारा ।। १२ ।।
॥१९१॥चौक्य अनंत कहे इम तात सुनै तिहूँभात शुभदिननिधाना ।। बैठि इकंत विचार अपार भनै पुनि आपसमांहि सुजाना ।। दे दुखमूल समाज हमें यह आप भयो चह ब्रह्म समाना ।। मरणान्मुक्ति:"कहिये काशीविषे मरणतैं मुक्ति होवैहै । इस श्लोकका अभिप्राय है ।। ॥ १४१ ॥ इस छंदके तृतीयपादका यह श्लोक्य- सहित अर्थ है:-जे पुरुष भगवान्प्रधान कहिये ऐश्वर्यवानोंके मध्य मुख्य हैं औ अजान कहिये अज्ञानी हैं ते साराजन दरिद्रनसमान कहिये वे सर्वजन दरिद्रीजनोंके तुल्य अंतरसैं दुःखी हैं ।। ॥ १४२ ॥ भग नाम ऐश्वर्यका है ।।
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सो जन नागर बुद्धिकसागर । आगर दु:ख तजै जु जहाना।।१३।। तीनि पुत्रोंका ग्रहसैं निकसना औ गुरुसैं भेटना ।। दोहा ।।
यातैं तजि दुखमूल यह, राज करौ निज काज ।। करि विचार इम गेहतैं, निकस्यो भ्रातसमाज ।। १४ ।। तिहुँ खोजत सद्दुर चले, धारि मोच्छ हिय काम ।। अर्थसहित किय तातको, सभसंतति यह नाम ।। १५ ।। खोजत खोजत देस बहु, सुरसरि तीर इकंत ।। तरु पल्लव साखा सघन, बैठैं तामैं इक संत ।। १६ ।। बैठ्यो बट बिटपाहिं तरै, भैंद्रमुद्रा धारी ।।
।। १४३ ।। १ तरुकी सघनता वनकी शोभा है । २ शाखाकी सघनता तरकी शोभा है और- ३ पल्लवकी सघनता शाखाकी शोभा है । यह वन तीनप्रकारकी सघनताकरि युक्त है यातैं अतिशयसुशोभित है ।। ।। १४४ ।। हस्तगत अंगुष्तरजनोंके संयोगतैं भद्रमुद्रा होवैहै । याहीनकूँ लोपामुद्रा तर्कमुद्रा औ मानसुद्रा बी कहतैंहैं ।। ।। १४५ ।। १ चोरी यारी औ हिंसा ये तीन वारीरके दोष हैं ।।
जीवन्मुक्ती एकता, उपदेशत गुन टारि ।। १७ ।। दोषरहित एकाग्रचित, सिष्यसंघ परिवार ।। लखि दैनिक उपदेस हिय, चहुधा करत विचार ।। १८ ।। मैं नहूं संशु कैलासमें, उपदेसत सनकादि ।। पेखि ताहि तिहिं लहि सरन, करी दंडवत आदि ।। १९ ।। कियो वास षड्मास पुनि, सिष्यरीति अनुसार ।। करी अधिक गुरुसेव तिहुं, मोच्छकाम हिय धार ।। २० ।। लहै प्रसन्न श्रीगुरु तबै, ते पूछै मृदुवानी ।।
२ निंदा झूठ कठोरता औ वाक्चालता ये चारि वाणीके दोष हैं ।। ३ तृष्णा चिंता औ बुद्धिसंदता ये तीन मनके दोष हैं ।। ये ऋषिसहितआपनीयउपनिषदुक्त दश दोष हैं । दिनतैं रहित ।। ।। १४६ ।। मानों कैलासमें दक्षिणामूर्तिस्वरूप- घारी शिवजी चारी सनकादिकनकूँ उपदेश करतहैं । यह अर्थ है ।।
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॥ ११५ ॥ तत्वदृष्टिकी मोक्षेच्छासूचक विनति ॥
॥ दोहा ॥
गुरुकí लखी दयालुता, सिष्य हिये मौं चैन ॥
काज सिद्ध निज मानि हिय, भाखे सविनय वैन ॥ २६ ॥
॥ तत्वदृष्टिरुवाच ॥ ॥ चौपाई ॥
भो भगवान तुम कृपानिधाना । होउ सर्वज्ञ महेस समानां ॥
हम अजानते कछू न जानैं । जन्मादिक संसृति भय मानैं ॥ २७ ॥
कर्मे उपासना कीने भारी । और अधिक जगपासí डारी ॥
आप उपाय कहौं गुरुदेवा । नहै जातें भवदुखको छेवा ॥ २८ ॥
पुनि चाहते हम परमानंदा । ताको कहो उपाय सुचंदा ॥
जव कृपा करि कहिं होउ ताता । तब नहै है हमारे कुशलाता ॥ २९ ॥
टीकां:-हे भगवान् ! आप कृपानिधान हो और सदाशिवके समान आप सर्वज्ञ हो ॥
तत्वदृष्टिनें तेईसवें दोहाविवै इन तीन प्रश्नोंमैंसे दितीय और तृतीय प्रश्नका उत्तर पहिले दियाहै और ताके अनंतर प्रथमप्रश्नका उत्तर दियाहै ॥
॥ १४८ ॥ पूर्व हमनैं सकामकर्म और उपासना बहुत किये । तिनतें मोक्षरुप इष्टफल प्राप्त भया नहीं । उलटा संसार वध्या । यह अभिप्राय है ॥
किंहिं कारन तुम तात तिहुं, वसहु कौन कह आनि ॥ २१ ॥
तत्वदृष्टि तव लखि हिये, निज अनुजनकी सैन ॥
कहै उभयकरि जोरि निज, अभिप्रायके वैन ॥ २२ ॥
॥ ११३ ॥ तत्वदृष्टिकरि प्रक्ष करनेइकूं गुरुकी आज्ञाका मागना औ गुरुकरि आज्ञाका देना ॥
॥ तत्वदृष्टिरुवाच ॥
भो भगवन हम प्रात तिहूं, सुभसंतति संतांन ॥
लखिया चहैं वंहु भव हिये, दीन नवीन अजांन ॥ २३ ॥
जो आज्ञा नहै रावरी, तौ नहै पूछि प्रवíन ॥
आप दयानिधि कलपतरु, हम अतिदुखित अधीन ॥ २४ ॥
॥ श्रीगुरुरुवाच ॥ ॥ सोरठा ॥
सुनहु सिष्य मम वात, जो पूछहु तुम सो कहूं ॥
लहो हिये कुशलात, संसय कोउ ना रहे ॥ २५ ॥
॥ १४७ ॥ हे तांत !
१ तुम तिहूं किंहिं कारन वसहु?यह प्रथमप्रश्न है
२ कौन कहिये तुम आपसमें क्या लगते हो? यह दितीयप्रश्न है ॥ धो—
३ कह आनि कहिये किसके पुत्र हो ? यह तृतीयप्रश्न है ॥
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हे भगवान् ! हम जन्ममरणसैं आदिलेके जो दु:खरूप संसार है तासैं डरैहैं । ताकी नित्यनिवृत्ति आप उपाय कहौ औ परमानंदकी प्राप्तिका उपाय कहौ ॥ औ—
हे गुरो ! उपासना औ कर्मके अनंत अनुष्ठान करे थी, परंतु उनसैं हमारेकूँ वांछितफल प्राप्त भया नाहीं औ उलटाँ संसार उनसैं बढ़ता गया, यातैं आप औरउपाय बतावौ, जाकरि हम ॠतार्थ होैं ॥ ३१ ॥
जन्मादिकदुख नास पुनि, भ्रांतिजन्य तिहिं मान ॥ ३१ ॥
परमानंद स्वरूप तूं, नहिं तोमैं दुख लेस ॥
अज अविनाशी ब्रह्मचित, जिन अंने हिय केस ॥ ३२ ॥
टीका:-हे शिष्य ! परमानंदकी प्राप्तिविपै औ जन्ममरणसैं आदिलेके जो दु:खरूप संसार है, ताकी नित्यनिवृत्तिविपै जो तेरीकूँ इच्छा मईहै, ता इच्छाकी भांतिसैं उत्पत्ति हुईहै । तूं ऐसैं जान । कहैं ?
१ तूं आप परमानंदस्वरूप है । यातैं ताकी प्राप्तिकी इच्छा करै नहीं ॥ जो वस्तु अप्राप्त होवै ताकी प्राप्तिकी इच्छा वनैहै औ अपना जो स्वरूप है सो सदाप्राप्त है । ताकी प्राप्तिविपै
जो इच्छा सो भांतिविना वनै नहीं ॥ औ—
२ जनमसैं आदिलेके जो संसार है, सो कदाचित् होवै तो वाकी नित्यनिवृत्तिविपै इच्छा घनै । सो जन्मादिकसंसरका लेइषा बी तेरिवपै नहीं है । यातैं अनहुये दु:खकी नित्यनिवृत्तिविपै बी इच्छा भांतिविना वनै नहीं ॥ औ—
हे शिष्य ! जन्म औ नाशकरिके रहित जो चेतनरूप ब्रह्म है सो तूं है । यातैं अपने हृदयविपै जन्मादिकवेद मति मान ॥ ३२ ॥
मोच्छकाम गुरु सिष्य लरिव, ताको साधन ज्ञान ॥
वेदउक्त भाषण लगे, जीवब्रह्म भिद भान ॥ ३० ॥
टीका:-दु:खकी नित्यनिवृत्ति औ परमानंदकी प्राप्तिकूँ मोक्ष कहैंहैं । ताकी कामना शिष्यके हृदयमें देखिके ताका साधन जो वेदउक्त ज्ञान है सो कहतेभये ॥
यद्यपि ज्ञानका स्वरूप अनेकशास्त्रनिविपै भिन्नभिन्न वर्णन किया है । तथापि जीवब्रह्मकी भिद कहिये भेद, ताकूँ दूरी करनैवाला जो ज्ञान है सोई वेदमैं मोक्षका कारण कह्याहै । यातैं ताहीकूँ कहैंहैं ॥ ३० ॥
प्रश्न- मेरा आत्मा आनंदरूप
विषयसंबंधसैं आनंदका आत्मविषै मान नहीं हुबाचाहिये ॥
तत्वदृष्टिरुवाच ॥
परमानंद मिलाप तूं, जो सिष चहै सुजान ॥
विषयसंग क्यूं मान रहै, जो मैं आनंदरूप ॥
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अथ उत्तर याको कहौं, श्रीगुरु मुनिवरभूप । ३३ ।
टीका:-हे भगवान् ! जो मेरा आत्मा आनंदरूप होवै तौ विपयके संबंधसैं आनंदका आत्माविषै भान नहीं हुवाचाहिये । यातैं आत्मा आनंदरूप नहीं किंतु विपयके संबंधसैं आत्माविषै आनंद होवैहें । ३३ ।
॥ ९ १७ ॥ उत्तर:-आत्मविषयकूँ अंतरमुखवृत्तिमैं आनंदका भान । विपयमैँ आनंद नहीं ॥
श्रीगुरुवाच ॥
चोपाई ।
आत्माविमुख बुद्धि जने जोई । इच्छा ताहि विपयकी होई ॥ तासूँ चंचल बुद्धि वखानी । सुख आभास होइ तहाँ हानी ॥ ३४ ॥
जव अभिलपित पदार्थ पावै । तव मति छन विच्छेप नसावै ॥ तैं नहै आनंदप्रतिविंवा । पुनि छनमैं वहु चाह विडंबौं ।।३५।।
तातैं नहै थिरताकी हानी । सो आनंदप्रतिविंव नसानी ॥ विपयसंग इम आनंद होई । बिन सतगुरु यह लखै न कोई ॥३६॥
॥ ९ ९ ॥ विडंबा कहिये आनंदके प्रतिबिंवकूँ ठगनेवाली, आकारूप आनंदके प्रतिबिंवकूँ अनु-भवकारिके पुरुषकूँ विपयमैँ भानंदकी भ्रांति कहिहोइहै ।
टीका:-हे शिष्य ! आत्मासैं विमुख है बुद्धि जाकी ऐसा जो पुरुष ताकूँ विपयकी इच्छा होवैहैं ।। या स्थानविषै जो भोगका साधन होवै सो विपय कहियेहैं । यातैं धन-पुत्रादिकनका ग्रहण करि लेनाँ ।
१ तौ विपयकौं इच्छातैं बुद्धि चंचल रहै । ता चंचलबुद्धिमैं आत्मस्वरूपआनंदका आभास कहिये प्रतिबिंव नहीं होवैहै ।। औ—
२ जिस विपयकी इच्छा हुईहोवै सो विपय प्राप्त होइ जाइ । तव या पुरुषकी बुद्धि क्षणमात्र स्थित होवैहैं । ता अंतर्युखबुद्धिकी वृत्ति होवैहै । ता आत्माका स्वरूप जो आनंद, ताका प्रतिबिंव होवैहै ।
तिस आत्मस्वरूप आनंदके प्रतिबिंवकूँ अनुभवकारिके पुरुषकूँ भ्रांति होवैहै जो "मेरैँ विपयसैं आनंदका लाभ हुवाहै । परंतू विपयमैँ आनंद है नहीं ।
१ जो कदाचित् विपयमैँ आनंद होवै तौ एकविपयसैं तृप्ति जो पुरुष ताकूँ जव दूरेरे-विपयकी इच्छा होवै । तव बी प्रथमविपयसैं आनंद हुवाचाहिये । सो होवै तौ नहीं है औ हमारी वृत्तिसैं स्वरूपआनंदका तौ भान चनै नहीं ! कहैंतें ? जो दूरेविपयकी इच्छाकारिके बुद्धि चंचल है । ताकैवै प्रतिबिंव वनै नहीं ।
२ किंवा । जो विपयमैँही आनंद होवै तौ जा पुरुषका प्रियपुत्र अथवा औरकोई अत्यंत-प्यारा जो अकस्मात् वहुतकाल पीछे मिलि जावै तव वाकूँ देखतही प्रथम जो आनंद होवै सो आनंद फेरि सदा नहीं होता । सो सदाही हुवाचाहिये । कहैंतें ? आनंदका हेतु जो पुरुष आस्वादनकारि स्थानकूँ हृदैमैँ रचिके भ्रांति होवैहै ताकी न्याई है ।
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७० ॥ प्रश्न:-ज्ञानकी विषयेच्छा औ संवंधसैं सुखका भान होवैहै वा नहीं ? ॥ [ विचारसागरे
है सो वाके समीप है औ हमारी रीतिसैं तौ प्रथमही आनंद बनैहै । सदा बनै नहीं । कहतैंहैं? एकबेरि प्यारेकूं देखिके वृत्ति स्थित होवैहै । फेरि वृत्ति औरपदार्थमें लगी जावैहै यातैं पदार्थमें आनंद नहीं ॥
३ किं वा । जो विषयमें आनंद होवै तौ समाधिकालविपै जो योगानंदका भान होवैहै सो न हुवाचाहिये ? कहतैंहैं ? समाधिमैं किसी विषयका संबंध नहीं है ॥
४ किं वा । जो विषयमेंही आनंद होवै तौ सुपुसिमैं आनंदका भान नहीं हुवाचाहिये ! कहतैं ? सुपुसिविपै वी किसी विषयका संगंध है नहीं ।
यातैं विषयमें आनंद नहीं किं तु आत्मस्वरूप आनंद सारे भान होवैहैं । इसवास्ते वेदमें लिख्याहै:-“आत्मस्वरूप आनंदकूं लेके सारे आनंदवाले होवैहैं” ॥ ३६ ॥
॥ दोहा ॥ विषय संगतैं नहैं प्रगट, आतम आनंदरूप ॥ सिष्य सुनायो तोहि मैं, यह सिद्धांत अनूप ॥ ३७ ॥
सो तूं मोहि व भाख, जो यामैं संका रही ॥ निज मतिमैं मति राख, मैं ताको उत्तर करूं ॥ ३८ ॥
॥ ९५० ॥ समाधिका दृष्टांत सर्वलोकनके अनउभवका विषय नहीं । इस अरुचितैं अन्यदृष्टांत
॥१९८॥ प्रश्न:-ज्ञानकूं विषयकी इच्छा औ ताके संबंधसैं पूर्वरीतिसैं सुखका भान होवैहै अथवा नहीं ? ॥ तत्वदृष्टिरुवाच ॥ ॥ चौपाई ॥
मो भगवन तुम दीनदयाला । मेध्यो मम संशय ततकाला ॥ यामैं कछुक रही आसंका । सो भाखूं अब हौं निर्वंका ॥ ३९ ॥
आत्मविसुख बुद्धि अज्ञानी । ताकी यह सब रीति बखानी ॥ ज्ञानीजनको कहौं विचारा । कोउ न तुम सम और उदारा॥४०॥
टीका:-हे भगवन् ! आपने पूर्वविषयक संवंधसैं आत्मानंदके भानकी जो रीति कही सो अज्ञानी पुरुषकी कही औ ज्ञानीकी नहीं कही । कहतैंहैं ? आत्मासैं विमुख है बुद्धि जाकी ताका आपने नाम लियाहै । सो आत्मासैं विमुखबुद्धि अज्ञानीकी होवैहै । ज्ञानीकी नहीं । यातैं आप अब ज्ञानीका विचार कहो । जो ज्ञानवानकूं विपयकी इच्छा औ ताके संबंधसैं पूर्वरीतिकरिके सुखका भान 'होवैहै । अथवैं नहीं ? यह वात्तीं आप कहो ॥ ४० ॥
॥१९९॥उत्तर:--नहिं,विध आत्मविमुख है ॥ विषयानंद खरूपानंदसैं न्यारा नहीं ॥ श्रीगुरुरुवाच ॥ ॥ दोहा ॥
सुनहु सिष्य इक बात मम, कहतैंहैं ॥
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सावधान मन कान ॥ हैं द्विविध आत्मविमुख ॥ अज्ञानी रु सुजान ॥ नहै विस्मृत व्यवहारमें, कबहुँकें ज्ञानीसंत ॥ अज्ञानी विमुखहि रहे, यह तूं जान सिद्धंत ॥ ४२ ॥ टीका:— हे शिष्य ! तूं चित्त औ श्रवणकूं सावधान करके सुन ॥ पूर्व जो हमनें आत्मविमुख कहांहै सो आत्म विमुख अज्ञानीही नहीं होवें । कितु ज्ञानवानकी बुद्धि जब व्यवहारमें आई जांव तव वह तत्त्वकूं भूलि जावहैं ॥ तिसकालमें ज्ञान- ॥ १४२ ॥ हैँस जव नामधारकहि होवें तव नहं स्वप्नाकाररुप्ति होवें नहीं जव स्वप्नाकाररुप्ति होवें नहीं, तैसेंहि ज्ञानवानकी बुद्धि बी जव आकार होवें तव अनाकार होवें नहीं औ जन अनाकार होवें तव आकार होवें नहीं ॥ यद्यपि एक अंत:करणभिपै एककालमें भिन्न-विपयाकार सामान्यविशेषरूप दो वृत्तियां होवेंहैं, तथापि दोनों विशेषप्रतियें होवें नहीं, यातें अन्यव्यवहारमें संलग्रपुरुषकूं जैसे संबुक नाम वेटमें जानबुजके रहैहैं धनकी विस्मृति होवेंहैं, फेर व्यवहारकी समाधिके हुये तां धनका स्मरण होवेंहैं, तैसेंहि ज्ञानयुक्ती बुद्धि व्यवहारमें विदोषसंकल्प होवेंहैं, फेर जव व्यवहारकूं तजिकें तत्त्वका विस्मरण होवेंहै, सैं उपराम होवेंहैं तव ताका ज़्यौंकारतैं स्मरण होवेंहै ॥ याहौंत भगवत्नें आधुनिकहैं शारीरकभाष्यके प्रथम अध्यायगतप्रथमपादमें कहांहैं:—“व्यवहारविषै ज्ञानघान् बी पशु नाम अभिवेेकीजनकी न्याईं व्यवहार करतेंहैं” यातैं ऊपर लिख्यो जो अर्थ सो घटित है ॥
वान् बी आत्मविमुखही होवेंहैं ॥ औ ज्ञानकी बुद्धि जो सदा आत्माकारही रहें तौ भोजनादिक व्यवहार न होवें । यातें आत्मविमुखबुद्धि दोनूंकी वृत्तिहें ॥ अज्ञानीकी तौ बुद्धि सदा आत्मविमुख हैं औ ज्ञानकी बुद्धि आत्मविमुख होवें तिसकालमें ज्ञानिकूं बी इच्छा औ विपयके संबंधसैं आत्मस्वरूप आनंदका भान अज्ञानीके समान हैं । परंतु इतनारू भेद है:- १ विपयके संबंधसैं जो आनंदका भान होवेंहैं ताकूं ज्ञानी तौ जानहैं 'जो यह आनंद है सो मेरे स्वरूपसैं न्यारा नहीं है । कितु ताकाही आभास हैं' यातैं ज्ञानिकूं विपयभोगमें बी संमाधिही है ॥ औ ज्ञानिकूं विपयभोगमें बी संमाधिही है ॥ १४२ ॥ यह जो समाधि कहांहै सो चित्तके रंग लिवे चोरसकी न्याईं विपयथैं दोपटटिहुप विवेकके जागरणकरि औ मिथ्यारुपबुद्धिरुप हटद्वैराज्यके निषेधान होनैकरि औ वृत्तिमुक्त महिपालकी न्याईं स्वल्पभोगसैं संतोषकरी औ वध करनसैंयोग्य पुत्रके भोगकी न्याई परिणामीमें भोगकी दुःखहेतुताके ज्ञानके होनैकरि हटराके अभावतैं औ विपयानंदके सरूपानंदसैं अभिन्नताके भानतैं कहिये आत्मानंदके प्रतिबिंबसैं अतिरिक्त विपयथैं सर्वथा आनंदके अभावके ज्ञातें खपके अनुसंधानरुप समाधिके गुणकी समताकरि “यह पुरुष सिंह है” याकी न्याई गुण (उपचारमात्र) है ॥ किछौं:- जैसे बालक स्वपादकें अंगुष्ठकूं धावताहैं औ दंतरहित दृढ़पुरुष अपने श्वेष्टमात्रका चर्वण करताहैं , सो अन्यविपयमोगकां भागी नाहीं, तैसैंहि ज्ञानी बी शाब्दरुपविरुद्धविपयभोगकूं करताहुवा स्वरूपके अनुसंधानतैं रागके अभावतैं ताकूं विषय भोगरुपी समाधि कहियेहै , सो विशेषयुक्त होनैहैं अतिराधम विपयसमाधि है, यातैं शांतरकी खुलदीमें
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२ अज्ञानौ नहीं जानैहै जो मेराही स्वरूप आनंद है ॥ औ— ३ दोनूंका स्वरूप आनंद है, विपयसैं केवल अज्ञानीकूं आंनि होवैहै ॥ ४१ ॥ ४२ ॥
.।। १२० ।। प्रश्नः--जन्मादिकदुःख कौनचिपै है ?
।। शिष्य उवाच ।। ।। चौपाई ।। हे प्रभु परमानंद बखान्यो । मेरो रूप सु मैं पहिचान्यो ॥ नहीं तो मैं भवबंधन लेसा । कद्यो आप पुनि यह उपदेसा ॥ ४३ ॥ यामैं संका मुहिं यह आवै । जातैं तब वच हियैं न सुहावै ॥ नहीं मोमैं यह बंध पसारो । कहौं कौन तौं आश्रय न्यारो ? ॥४४॥
टीका:--हे भगवान्! आपनै कहा "तूं परमैआनंदस्वरूप है" सो मैं भलीप्रकारसैं जान्या ॥ और— आपनै कहा जो "जन्ममरणसैं आदिलेकै संसाररूप दुःख तेरेईपै है नहीं। यातैं ताकी निवृत्ति बनै नहीं"। याकिपै मेरेकूं शंका है:- जो जन्मादिक दुःख मेरेईपै नहीं हैं तो जाविपै डारे दुःखकी न्याई याका विषय आदर करनै योग्य नहीं है , किंतु ज्ञानीकूं उपेक्ष्य है , क्षणिकविपयस्यानंद होनैतैं जो देहाभिमानरूप व्यवहारकै अभिमानतैं शुद्धचिन्मात्रवासनाकै सद्भावतैं ज्ञानीका मन जहाँ जाइ तहाँ पादत्राणसुक्त पुरुषकूं चर्मवेष्टितपृथिवीकी न्याई समाधि है , यह थै बालबोधकै नवमउपदेश-चिपै हमनै प्रमाणसहित लिख्याहै , जिष्कूं इच्छा
यह संसार है। सो मेरैसैं न्यारा। कहिये मिथ्या आश्रय आप कृपाकरिके बतावो, जाकैविपै संसारदुःख जानिके अपनैविपै नहीं मानूं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ ।। १२१ ।। उत्तरः--जन्मादिकदुःख कहूं नहीं ॥ ।। श्रीगुरुरुवाच ।। ।। सोरठा ।। सुनहु सिष्य मम वानी, जातैं तब संका मिटै ॥ है जगकी 'अंनि हानि, तो मोमैं नहीं औरमैं ॥ ४५ ॥ अर्थ स्पष्ट ॥ ४५ ॥
.।। १२२ ।। प्रश्नः--दुःख कहूं नहीं तो प्रत्यक्ष प्रतीत क्यौं होवैहै ? ।। तत्वहष्टिरुवाच ।। ।। दोहा ।। जो भगवान कहूं है नहीं, जन्ममरन जगखेद ॥ नहैं प्रत्यक्ष प्रतीति क्यौं, कहो आप यह भेद ॥ ४६ ॥
टीका:--हे भगवान्! जो जन्ममरणसैं होवै सो तहाँ देखै ॥ ।। १५३ ।। आत्मा आनंदरूप है , यह अर्थ आगे षट्तरंगगत ३६०-३६३ के अंकमैं कहियेगा ॥ ।। १५४ ।। जैसैं रज्जूसैं कल्पितसरपैका व्याव-हारिक सत्ताकारिकै अत्यंतअभाव है, तैसैं जड़कै कल्पित जगत्का परमार्थसत्ताकारिकै अत्यंतअभाव है , सोई जगत्की मिथ्यात्वनि कहिये मिलनिवृत्ति है ॥
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॥ प्रश्न ॥ रज्जुमें सर्पं कैसैं भासे है? ॥ ४७ ॥
आदिलेके संसारदुःख मेरोविपै तथा औरविपै कहूं कहीं नहीं है तौ भ्रांतिके प्रतीत क्यौंहोवै है? जो वस्तु नहीं होवै सो प्रतीत होवै नहीं । जैसे वंध्याका पुत्र औ आकाशविपै पुप्प नहीं है सो प्रतीत होवै नहीं, तैसैं संसार ची नहीं होवै तौ प्रतीत नहीं हुवैचाहिये औ जन्मादिकले संसार प्रतीत होवैहै, यांतैं "जन्मादिकसंसार-रूपी दुःख नहीं हैं" यह कहनां वैनैं नहीं ॥ ४६ ॥
॥ १२३ ॥ उत्तर:-आत्माके अज्ञानसैं प्रतीति । रज्जुसर्पका दृष्टांत ॥
॥ श्रीगुरुवाच ॥
॥ दोहा ॥
आत्मरूप अज्ञानतें, है मिथ्या परतीति । जगत स्वप्न नभ नीलता, रज्जुभुजगकी रीति ॥ ४७ ॥
टीका:-जन्मादिक जगत् परमार्थसैं नहीं है तौ भी आत्माका अज्ञानरूपकारिके अज्ञानतें मिथ्या प्रतीत होवैहै । जैसे स्वप्नके पदार्थ, आकाशमैं नीलता औ रज्जुमैं सर्पं परमार्थसैं नहीं हैं औ मिथ्या प्रतीत होवैहैं । तैसैं जन्मादिकजगत् परमार्थसैं नहीं हैं । मिथ्या प्रतीत होवैहै ॥ ४७ ॥
॥१२४॥ प्रश्न:-रज्जुमैं सर्पं कैसैं भासैहै ?
॥ तत्वहष्टिरुवाच ॥
॥.चौपाई ॥
मिथ्यासर्प रज्जुमैं जैसैं । भासयो भव आत्ममैँ तैसैं ॥
॥ १५५ ॥ दार्शान्तक कहिये सिद्धान्तका ॥
॥ १५६ व्यौरा कहिये श्रेष्ठ । 'यादिकूं नीका धी कहैहैं ॥
कैसैं सर्पं रज्जुमैं भासै । यह संशय मन बुधि विनासै ॥१४८॥ टीका:-जैसे रज्जुमैं सर्पं मिथ्या है तैसैं आत्मामैं भ्रदृश्य ख मिथ्या कह्या । वहाँ द्वैतके ज्ञानविना द्वैतनका ज्ञान होवै नहीं । यांतैं "रज्जुमैं सर्पं कैसैं भासै ?" यह दृष्टांतमैं प्रश्न है ॥ ४८ ॥
॥ १२५॥अथ प्रशनाभिप्राय ॥१२५-१३०॥
॥ चौपाई ॥
असतख्याति पुनि आत्मख्याती । ख्यातिअन्यथा अरु अख्याती । सुने चारिमत भ्रमकी ठौरा । मानूं कौन कहौं यह 'व्यौरा ॥ ४९ ॥
टीका:-जहाँ रज्जुमैं सर्पं औ सीपमैं रूपा इत्यादिक भ्रम हैं तहाँ चारिमत सुनेहैं:- १ शून्यवादी असतख्याति कहैंहैं ॥ २ क्षणिकविज्ञानवादी आत्मख्याति कहैंहैं ॥ ३ न्याय औ वैशेषिकमतमैं अन्यथा-ख्याति कहैंहैं ॥ ४ सांख्य औ प्रभाकर अख्याति कहैंहैं ॥
॥ १२६ ॥ १ असतख्याति ॥
तहाँ शून्यवादिकै यह अभिप्राय है:-जेवरीरदेशमैं सर्पं अत्यंत असत् है । तैसैं अन्यदेशमैं वी अत्यंत असत् है । ऐसैं अत्यंत असतुसर्पैकी जेवरी-देशमैं प्रतीति होवैहै, यांतैं असतख्याति कहैंहैं ॥अत्यंत असत्यसर्पकी ख्याति कहिये मान औ कथंचन है ॥
॥ १५७ ॥ असतख्यातिका विशेषकथन' औ खंडन द्रष्टिरत्नावलिके दशमरत्नमैं कियाहै औ दृष्टि-प्रभाकरके सप्तमप्रकारमैं कियाहै ।
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|| १२७ || २ || आत्मख्याति ||
विज्ञानवादौका यह अभिप्राय है:-जेवरौदेशमें तथा अन्यदेशमें बुद्धिके बाहिर कहे हुये सर्पे है नहीं | सारे पदार्थ बुद्धिसैं भिन्न नहीं किंतु सर्वपदार्थनके आकारकूँ बुद्धिही धारैहै | सो बुद्धि ज्ञानाकारविशेषरूप है | ज्ञानधर्ममें नाना औ उत्पत्ति प्राप्त होवैहै जो विज्ञान, सोई सर्वरूप प्रतीत होवैहै | याकूँ आत्मख्याति कहैंहैं || आत्मा कहिये क्षणिकविज्ञानरूप बुद्धि, ताकै सर्वरूपपसैं ख्याति कहिये मान औ कथन है ||
|| १२८ || ३ || अन्यथाख्याति ||१२८-१२९
न्यायिकका औ वैशेषिकका यह अभिप्राय है:-बंभीआदिक स्थानमें साँचा सर्प है तहांँ नेत्रसैं देखैंहैं औ नेत्रमें दोप है ताके वलतैं सनमुख समीप प्रतीत होवैहैं|| यद्यपि साँचा सर्प औ नेत्रके मध्य मित्तिआदिक अंतराय हैं तथापि दोपसहित नेत्रतैं अंतरायसहित वौ सर्प दिखैहै || औ यामैं--कोउ ऐसी शंका करै:-दोपतैं सामर्थ्ये वातपित्तकफदोपतैं घटैहै | घटै नहीं | जैसेँ 'जठराग्निमैं पाचन-सामर्थ्ये वातपित्तकफदोपतैं घटैहै तैसेँ नेत्रमें वौ तिमिरादिदोपतैं सामर्थ्ये घटीचाहिये औ बंभीआदिक स्थानमें स्थित सर्पका दोप-
सहित नेत्रतैं ज्ञान कह्या | तहांँ शुद्धनेत्रसैं तौ परदेशमैं स्थितका प्रत्यक्षज्ञान होवै नहीं औ दोपसहितसैं होवैहै | यातैं "दोपतैं नेत्रका सामर्थ्ये अधिक होवैहै" यह माननैं कोई दूषांत नहीं || सो शंका वनै नहीं | कहैं? किसकूँ पित्तदोपतैं 'ऐसौ रोग होवैहै जो चतुर्गुण-भोजन कियेतैं वौ तृप्ति होवै नहीं | जैसेँ पित्त-दोपतैं जठराग्निमैं पाचनसामर्थ्ये बढ़ैहै तैसेँ नेत्रमें वौ तिमिरादिदोपतैं परदेशमैं स्थित सर्पके प्रत्यक्ष करनेक सामर्थ्ये बढ़ैहै ||
इसीतिसैं बंभीआदिक देशमैं स्थित सर्पका अन्यथा कहिये औरप्रकारतैं सन्मुख जेवरौदेशमैं जो ख्याति कहिये मान औ कथन सो अन्यथाख्याति कहियेहै | औ--चिंतींमणिकारका यह मत है:-
|| १२९ ||
जो दोपसहित नेत्रतैं बंभीमें स्थित सर्पका ज्ञान होवै तौ बीचके औरपदार्थनका ज्ञान वौ हुँवाचाहिये | यातैं परदेशमैं स्थित वस्तुका नेत्रसैं ज्ञान होवै नहीं | किंतु दोपसहित नेत्रतैं जेवरौका निश्चयरूपतैं मान होवैहै | यातैं जेवरौकाही अन्यथा कहिये औरप्रकारतैं सर्पेलुपतैं मान होवैहै | यातैं जेवरौकाही ख्याति कहिये मान औ कथन सो अन्यथाख्याति कहियेहै ||
नवीन नैायिकका मत है यामैं अन्यवस्तुकी अन्यरूपपसैं प्रतीतिरूप ज्ञानाध्यासरूप वौ भ्रांति कहत-हैं या अन्यथाख्यातिका विशोपकथन औ खंडन चैतिरन्नावालिके द्वादशरत्नविभैषै .औ. द्वैतिप्रभाकरके सत्समप्रकाशविषै कियाहै |
|| १५८ || आत्मख्याति विशेषकथनपूर्वक खंडन द्वैतिरन्नावालिके एकादशरत्नमैं तथा द्वैत-प्रभाकरके सत्समप्रकाशमैं कियाहै||
|| १५९ || 'वंल्मीक' याकूँ कोई देशमैं राफड़ा वौ कहतैहैं ||
|| १६० || यह प्राचीन्मत है | या मतमैं अन्य-देशविपैं स्थित वस्तुकी अन्यदेशमैं प्रतीतिही भ्रांति कहियेहै | अर्थाध्यास कियौ ज्ञानाध्यासरूप वौ भ्रांति नहीं है ||
|| १६१ || यह चिंतामणिनामक ग्रंथके कर्त्तौ
|| १६२ || जहांँ सोनीके हृदमैं स्थित रजतका भ्रांति होवै तहांँ हृद जौ तामैं स्थित सर्वसामग्रीसहित सोनीकी वौ दोषके वलसैं प्रतीति हुँईचाहिये वौ होति नहीं ||
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॥ १३० ॥ ४ अस्य्यातीति ॥ औ उक्ततिनी-ख्यातिका खंडन ॥ औ अस्य्यावादौका यह अभिप्राय है:- १ जो असत्की प्रतीति होवै तौं गंध्यापुत्र औ शाश्वत्थगकी प्रतीति हुईचाहिये, यांतें असत्कख्याति असंगत है ॥ २ क्षणिकविज्ञानकाही आकार सर्पौदिक होवै तौं क्षणमात्रसैं अधिककालस्थिर प्रतीति नहीं हुईचाहिये, यांतें आत्मख्याति असंगत है ॥ औ- ३ अन्यथाख्यातिकी प्रथमरीति तौं चिंता- मणिके मतसैं दूषितहै । तैसैं चिंतामणिकी रीतिसैं वी अन्यथाख्यातिमत असंगत कहैंतें । "जैयके अनुसार ज्ञान होवैहै । "जेयरज्जु औ सर्पेका ज्ञान" यह कह्ना अयंतविरुद्ध है । यांतें यह रीति माननी योग्य नहीं है:- जहां रज्जुमैं सर्पेभ्रम है तहां रज्जुसैं नेत्रका अपनी दृष्टिच्छारा संवंध होयके रज्जुका इंद्रुलुप्तैं सामान्यज्ञान होवैहैं औ सर्पकी स्याति होवैहैं । "यह सर्प है" यामैं दोज्ञान हैं:- १ "यह" अंशा तौं रज्जुका सामान्य- प्रत्यक्षज्ञान है । औ- २ " सर्प है " ऐसैं सर्पेका स्मृतिरूप ज्ञान है ॥ इसरीतिसैं "यह सर्प है" इहां दोज्ञान हैं । परंतु भयादोप्रमातातैं औ तिमिरादोप्रमातैं ताके 'वलतैं पुरुपकूं ऐसा विवेक नहीं होता जो "मेरैकूं दो ज्ञान हुऐहैं ।" यद्यपि "यह" अंश रज्जुका सामान्यज्ञान यथार्थ है औ पूर्व देखे सर्पका स्मृतिज्ञान वी यथार्थही है । तौं वी "मेरैकूं दोज्ञान हुऐहैं, तिनमें रज्जुका सामान्यप्रत्यक्षज्ञान है औ सर्पका स्मृति- ज्ञान है" यह विवेक नहीं होवैहै । जिस दो- ज्ञानके अविवेककूंही सांव्यभाकरमतमें भ्रम कहैं । यही रीतिसैं सारेभ्रमस्थलमें जाननी ॥ "या रीतिसैं रज्ज्वादिकनमें सर्पौदिक भ्रम होवै तहां चारिमत सुनैहैं । तिनमें नीका मत होई सो कहो । ताहीकूं मैं मानूं" यह शिष्यका प्रश्न है ॥ ४९ ॥
अंक १३४-१३० गतैं प्रश्नका उत्तर ॥ १३१-१४६ ॥ ॥ १३१ ॥ अस्य्यातिमतखंडन ॥ १३१-१३२ ॥ ॥ श्रीरुरुवाच ॥ ॥ दोहा ॥ ख्यातिअनिर्वचनीय लखि, पंचम तिनितैं और ॥ युक्ति कहैं मतविचार ये, मानहु भ्रमकी ठौर ॥ ५० ॥ टीका:-हे शिष्य ! तिन चारि ख्यातिनतैं औरही भ्रमेकी टौर अनिर्वचनीय ख्याति पंचम लखि ॥ औ असत्कख्याति, आत्मख्याति, औ अन्यथाख्याति, औ अस्य्याती, ये चारिमत युक्तिहीन हैं ॥ जैसैं उत्तरउत्तरमतनिरूपणमैं तीनिमत असंगत कहे तैसैं अस्य्यातिमत वी असंगत कहैंतें । "यह सर्प है " या ज्ञानमैं १ प्रथम "यह" अंश तौं रज्जुका सामान्य ज्ञान प्रत्यक्ष है । औ- २ "सर्प है" इतना अंश पूर्वदृष्टसर्पका स्मरणज्ञान है । यह अस्य्यावादौका मत है । तहां पूर्वदृष्ट सर्पका स्मरणही मानैं औ सन्मुखरज्जु देशमैं सर्पका ज्ञान नहीं मानै तौं सन्मुखरज्जुतैं भय होयके उलटा भागैहै । सो भय
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औ भागना नहीं हुवाचाहिये । यातैं सन्मुख-रज्यूदेशमैंहीं सर्पकी भ्रान्ति होवैहै । पूर्ववदृष्ट-सर्पकी स्मृति नहीं ॥
॥ १३२ ॥ किंवा ।
१ रज्जुका विशेषपरूपतैं यथार्थज्ञान हुयेतैं अनंतर ऐसा वाध होवैहै:- "मेरेकूं रज्जुमैं सर्पकी भ्रान्ति मिथ्या होतीभई" गा साधनैं वी भ्रान्ति रज्जुमैंहीं सर्पकी प्रतीति होवैहै । पूर्ववदृष्टसर्पकी स्मृति नहीं ॥ औ-
२ "यह सर्पै है" इहाँ ज्ञान एकही प्रतीत होवैहै । दो नहीं ॥ औ-
३ एककालमैं अंतःकरणतैं स्मृतिरूप औ प्रत्यक्षरूप दो ज्ञान होवें वी नहीं । यातैं अज्ञानातिमत वी अत्यंतसंगत है ॥
इन चारुमतनका प्रतिपादन औ खंडन, विवरण औ स्वाराज्यसिद्धिविधायकसांध्यमैं विस्तारसैं लिख्याहै ॥ प्रतिपादन औ खंडनकी युक्ति कठिन है । यातैं संक्षेपतैं जिज्ञासुकूं रीति जनाईहै । विस्तार हमनैं लिख्या नहीं ॥
॥१३३ ॥५ सिद्धांतमैं अनिर्वचनীয়ख्याती है । ताकी रीति ॥
रीति है:- अंतःकरणकी वृत्ति नेत्रादिद्वारा निकसिके विषयके समान आकारकूं प्राप्त होवैहै तातैं विषयका आवरण भंग होयके ताकी प्रतीति होवैहै । तहाँ शुक्ति वी सहाय्यक होवैहै है, प्रकाशविना पदार्थकी प्रतीति होवै नहीं ॥
जहां रज्जुमैं सर्पभ्रम होवैहै तहां अंतःकरणकी वृत्ति नेत्रादि द्वारा निकसि वी औ रज्जुस ताकी संबंध वी होवै । परंतु तमिरादिकदोष प्रतिबंधक हैं । यातैं रज्जुके समानाकारवृत्तिका स्वरूप होवै नहीं, यातैं रज्जुका आवरण नाशै नहीं ॥
इसरीतिसैं आवरणभंगका निमित्त वृत्तिकां संबंध हुयेतैं वी जब रज्जुका आवरण भंग होवै नहीं तब रज्जुचेतनमैं स्थित अविद्यामैं क्षोभ होयके सो अविद्या सर्पाकारपरिणामकूं प्राप्त होवैहै ॥
१ सो अविद्याका कार्य सर्प सत् होवै तौ रज्जुके ठाममैं ताका वाध होवै नहीं औ वाध होवैहै । यातैं सत् नहीं ॥ औ
२ असत् होवै तौ वंध्यापुत्रकी न्याईं प्रतीति नहीं होवै औ प्रतीति 'होवैहै, यातैं असत् वी नहीं ॥ किंतु सतअसतसैं विलक्षण अनिर्वचनीय है ॥
मुक्ति आदिकनमैं रुपादिक वी याहि अध्यासके प्रसंगमैं कहीहैं । औ मंदबुद्धिकारमैं विशेष रुपका अज्ञान औ सामान्यरुपका ज्ञान । ये दोनूं बनतेहैं । यातैं नेत्रके विषयगत अध्यासविषै मंद-बुद्धंधकारकी अपेक्षाके होनेतैं ताकी वी ग्रहण है । औ नेत्रकी मंदतारूप तमिरदोषका वी ग्रहण है । दोनमैं-
सैं एक होवै जब धम होवैहै ॥ औ आदिशब्द-कारी कामलआदिक नेत्ररोगका ग्रहण है ॥
॥ १६६ ॥ इहाँ यह शंका है:-सतसैं विलक्षण असत् है, ताकूं असतसैं विलक्षण कहना विरुद्ध है औ सतससतसैं मिल
॥ १६३ ॥ याका विशेषकथन औ खंडन वृत्ति-रत्नावलि के त्रयोदशरत्नमैं औ वृत्तिप्रभाकरके सत्म-प्रकाशमैं कियाहै ।
॥ १६४ ॥ सूर्योंदयज्योति ॥
॥ १६५ ॥ तमिरशब्दसैं मंदसंधकारका वी ग्रहण है । कहैंतैं: निर्दोष नेत्रवालेकूं स्पष्टप्रकाशविशेषरुपका अज्ञान होवै नहीं औ गाढ़बुद्धंधकारविषै अधिष्ठानके सामान्यरुप
"इंदता"का ज्ञान होवै नहीं औ अधिष्ठानके विशेषरुपके अज्ञानविना औ सामान्यरुपके ज्ञानविना, भ्रमपास होवै नहीं । यह वार्ता पूर्वै द्वितीयतरंगाविषै
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रीतिसैं अनिर्वचनीय उत्पन्न होवेंहैं ॥ ता अनिर्वचनीयकी जो र्य्याति फहिये प्रतीति ओं कथन सो अनिर्वचनीयर्ध्याति फहियेहैं ॥ ॥ १३४ ॥ भ्रमस्थलमें अंतःकरणसैं भिन्न अवियाका परिणाम सर्पौदिक विपय औ तिनका ज्ञान एकही समय उत्पन्न होवेंहै औ लीन होवेंहै । सो साक्षीभास्य हैं ॥ जैसे सर्प अवियाका परिणाम है तैसे ताका ज्ञानरूप वृत्ति भी अवियाकाही परिणाम है । अंतःकरणका नहीं । कहैंत ? जैसे रज्जु- ज्ञानतैं सर्पका बाध होवेंहै तैसे ताके ज्ञानका भी बाध होवेंहै ॥ अंतःकरणका ज्ञान होवें तो बाध नहीं हुयाचाहिये । यांत ज्ञान भी सर्पकी न्याई अवियाका कार्य सतउसनैं विलक्षण अनिर्वचनीय है । परंतू-- १ रज्जुपहितचेतनमें स्थित तमोगुणप्रधानअवियाअंशका परिणाम सर्प है । औ- २ साक्षीचेतनमें स्थित अवियाके सत्व- गुणका परिणाम वृत्तिज्ञान है । रज्जुचेतनकी अवियाका जा समय सर्पाकारपरिणाम होवेंहै ताही समय साक्षीआश्रितअवियाका ज्ञानाकारपरिणाम होवेंहैं कहैंत ? रज्जुचेतन आश्रित अवियामैं क्षोभक जो निमित्त है ता निमित्तसैही साक्षी आश्रितअवियाअंशमें क्षोभ होवेंहै । यांतैं भ्रमस्थलमें सर्पौदिक विपय औ तिनका ज्ञान एकही समय उत्पन्न होवेंहैं ॥ औ रज्जुआदिक अधिष्ठानके तृतीयपदार्थेका अभाव है यांतैं अनिर्वचनीय शब्दके अर्थकी उपपत्ति बिधही नहीं है । या शंकाका-- यह समाधान हैः- १ त्रिकालअवाध्य सत् कहियेहै । तैसे विलक्षण कहनेकरि बाध्योग्यका ग्रहण है ओ-
ज्ञानतैं एकही समय लीन होवेंहैं ॥ या रीतिसैं १ सर्पौदिक भ्रमविपैं ( १ ) वाघअविद्याअंश सर्पौदिक विपयकका उपादानकारण है । ओ-- ( २ ) साक्षीचेतनआश्रितअंतरअविद्याअंश तिनके ज्ञानरूप वृत्तिका उपादानकारण है ॥ ओ-- २ स्वमें तौ ( १ ) साक्षीआश्रित अवियाकाही तमौगुणअंश विपयरूप परिणामकूं प्राप्त होवेंहैं॥ ( २ ) ता अवियामैं सत्उगुणअंश ज्ञानरूप परिणामकूं प्राप्त होवेंहैं । यांतैं स्वमें अंतरअविद्याही विपय औ ज्ञान दोनोंका उपादानकारण है ॥ याहीतैं वाघारज्जुसर्पौदिक औ अंतरस्वमपदार्थ साक्षीभास्य कहियेहैं ॥ अविद्याकी वृत्तिद्वारा जानूँ साक्षी भास्य कहियेहैं प्रकारौं । सो साक्षीभास्य कहियेहैं ॥ ॥ १३५ ॥ रज्जुमैं सर्प औ ताका ज्ञान अवियाका परिणाम औ चेतन- का विवर्त्त है ॥ रज्जुआदिकमें अनिर्वचनीय सर्पौदिक औ तिनका ज्ञान भ्रम कहियेहै औ अध्यास कहियेहै । सो भ्रम अवियाका परिणाम है औ चेतनका विवर्त्त है ॥ १ उपादानकारणके समानस्उभाववाला अन्यथास्वरूप परिणाम कहियेहै ॥ औ-- २ अधिष्ठानतैं विलक्षणस्उभाववाला अन्यथास्वरूप विवर्त्त कहियेहै ॥ २ स्वरूपहीन बंध्यापुत्रादिक असत् कहियेहै । तैसे विलक्षण कहनेकरि स्वरूपवान्का ग्रहण है । यांतैं वाध्योग्य स्वरूपवान् अनिर्वचनीयपदार्थ है । तैसा प्रपंच ऋजुसर्पौदिक है ताकी उपलब्धि नाम प्रतीति वेदांतनिपुण पंडितनकूं होवेंहै ॥
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१ उपादानकरण अविद्या सो अनिर्वच- नीय है। तैसैं रज्जुसर्पे औ ताका ज्ञान बी अनिर्वचनीय है, यातैं रज्जुसर्प औ ताका ज्ञान अविद्याके समनास्वभाववाला अन्यथास्वरूप कहिये अविद्यांतैं औरमकारका आकार है सो अविद्याका परिणाम है ॥
२ तैसैं रज्जुअवच्छिन्नअधिष्ठानचेतन सत् रूप है। सर्प औ ताका ज्ञान सत्सैं विलक्षण है। यातैं रज्जुसर्प औ ताका ज्ञान अधिष्ठान- चेतनतैं विपरीतस्वभाववाला अन्यथास्वरूप कहिये चेतनसैं औरमकारका आकार है ॥ १३६ ॥ रज्जु औ अंतःकरणउप- हितचेतन अधिष्ठान है। रज्जु नहीं ॥
१ मिथ्यासर्पेका अधिष्ठान रज्जुपहितचेतन है। रज्जु नहीं। कहैंतैं? सर्पेकी न्यांई रज्जु बी कल्पित है ॥ कल्पितवस्तु अन्यकल्पितका अधिष्ठान बनै नहीं यातैं रज्जुपहित- चेतनही अधिष्ठान है। रज्जु नहीं। औ
रज्जुविशिष्टकूं अधिष्ठान कहैं तौ भी रज्जु औ चेतन दोनों अधिष्ठान होवैंगें। तहां रज्जुभागमैं अधिष्ठानपना बाधित है। यातैं रज्जुधपहितचेतनही अधिष्ठान है। रज्जु- विशिष्टचेतन नहीं ॥
२ तैसैं सर्पके ज्ञानका साक्षीचेतन अधिष्ठान है ॥
या रीतिसैं भ्रमस्थानमैं चिपयका औ ताके ज्ञानका उपाधिभेदसैं अधिष्ठान मिलै है। एक नहीं ॥ औ—
१ विशेषरूपतैं रज्जुकी अप्रतीति। अविद्यामैं ॥ १६७ ॥ यह प्रक्रिया आगे इसी ही चतुर्थतरंग- 'क्षोभद्धारां दोऊंकी उत्पत्तिमैं निमित्त है ॥
२ तैसैं रज्जुका ज्ञान दोऊंकी नित्यत्तिमैं बी निमित्त कहीहै। याकविपै— ॥ १३७ ॥ शंकः:- रज्जुके ज्ञांतैं सर्पेकी निवृत्तिं बनै नहीं। ऐसी शंका होवैहै:- रज्जुके ज्ञांतैं सर्पेकी निवृत्ति बनै नहीं। कहैंतैं? “मिथ्या- वस्तुका जो अधिष्ठान होवै, ता, अधिष्ठानके ज्ञांतैं मिथ्याकी निवृत्ति होवैहै। यैह अद्वैत- वादका सिद्धांत है” ॥ औ मिथ्यासर्पका अधिष्ठान रज्जुपहित चेतन है। रज्जु नहीं। यातैं रज्जुके ज्ञांतैं सर्पेकी निवृत्ति बनै नहीं।
॥ १३८ ॥ समाधान:- रज्जुका ज्ञानही सर्पके अधिष्ठानका ज्ञान है ॥
यह समाधान है:- “रज्ज्वादिक जड़- पदार्थका ज्ञान अंतःकरणकी वृत्तिरूप होवै। तहां आवरणमैंग वृत्तिका प्रयोजन है। सो आवरण अज्ञानकी शक्तिं है। यातैं आवरण जड़के आश्रित है नहीं। किंतु जड़का अधिष्ठान जो चेतन ताके आश्रित है। यातैं—
१ रज्जुसमानाकार अंतःकरणकी वृत्तिं रज्जुअवच्छिन्न चेतनकाही आवरण- भंग होवैहै ॥
२ वृत्तिमैं जो चिदाभास है तातैं रज्जुका प्रकाश होवैहै ॥
३ चेतन स्वयंप्रकाश है तामैं आभासका उपयोग नहीं ”
यह प्रक्रिया संपूर्णी औंगे प्रतिपादन करैंगें॥ इसरीतिसैं—
गत १८७ के शंक मैं चारेंमकारिके निरूपण करैंगें ॥
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वतुर्थस्तरंगः ] ॥ रज्जुस्नानतैं सर्प औ ताके ज्ञानकी निवृत्तिमैं शंका-समाधान ॥ ७५ ॥
१ चिदाभाससहित अंतःकरणकी वृत्तिरूप ज्ञानमें जो वृत्तिभाग, ताका आधारभंगरूप फल चेतनमें होवेंहै । औ-२ चिदाभासभागका प्रकाशरूप फल रज्जुं होवेंहै । यातैं वृत्तिज्ञानका केवलज्ञानरज्जु विपय नहीं । किंतु अधिष्ठानचेतनसहित रज्जु साभासवृत्तिका विपय है । इसरीकारणतैं सिद्धांतग्रंथमें यह लिख्याहै:-“अंतःकरणजन्य वृत्तिज्ञान सारे ग्रंथरू विपय करैहैं” ॥ यों प्रकारसैं रज्जुज्ञानसैं निरावरण होयके सर्पका अधिष्ठान रज्जुअवच्छिन्नचेतनका वी निजप्रकाशतैं भान होवेंहै । यातैं रज्जुका ज्ञानही सर्पके अधिष्ठानका ज्ञान है, तातैं सर्पकी निवृत्ति संभवैहैं ॥
॥ १३९ ॥ शंका:-रज्जुज्ञानतैं सर्प-ज्ञानकी निवृत्ति यनै नहीं ॥ अन्यशंका:-यद्यपि या रीतिसैं सर्पकी निवृत्ति रज्जुके ज्ञानतैं संभवैहै तथापि सर्पके ज्ञानकी निवृत्ति संभवै नहीं । कहैंतैं सर्पका अधिष्ठान रज्जुअवच्छिन्नचेतन है औ सर्पके ज्ञानका अधिष्ठान साक्षीचेतन है । पूर्वउक्तप्रकार-रज्जुज्ञानसैं रज्जुअवच्छिन्नचेतनकाही भान होवेंहै । साक्षीचेतनका नहीं । यातैं रज्जुका ज्ञान हुयेतैं वी सर्पज्ञानका अधिष्ठान साक्षीचेतन अज्ञात है औ अज्ञातअधिष्ठानमें क्लिप्तकी निवृत्ति होवें नहीं । किंतु ज्ञातअधिष्ठानमेंही क्लिप्तकी निवृत्ति होवेंहै । यातैं रज्जुज्ञानतैं सर्पज्ञानकी निवृत्ति यनै नहीं । ताका-
॥ १४० ॥ समाधान:-सर्पके अभावतैं सर्पज्ञानकी निवृत्ति होवेंहै ॥ १४० ॥-१४२ ॥ समाधान यह है:-विपयके आधीन
ज्ञान होवेंहै । विपय जो सर्प ताकी निवृत्ति होतेंही सर्पके ज्ञानकी विपयके अभावतैं आपही निवृत्ति होवेंहै ॥
॥ १४१ ॥ जो ऐसैं कहै:-कल्पितकी निवृत्ति अधिष्ठानज्ञानविना होवें नहीं । औ सर्पका ज्ञान वी कलिप्त है, ताका अधिष्ठान साक्षीचेतन है । ताके ज्ञानविना कल्पितसर्पके दोषकारकी होवेंहै ।
९ एक तौ अत्यंतनिवृत्ति होवेंहै । औ-२ दूसरी कारणमें जो लय सो वी निवृत्ति कहियेहै ॥ कारणसहित कार्यकी निवृत्ति अत्यंत-निवृत्ति कहियेहै ॥ सारे कल्पितवस्तुका कारण अधिष्ठानके आर्थीत अज्ञान है ॥
१ तौ अज्ञानसहित कल्पितकार्यकी निवृत्ति तौ अधिष्ठानज्ञाननैहीं होवेंहै ! २ परंतु कारणमें लयरूप जो निवृत्ति सो अधिष्ठानज्ञानविना वी होवेंहै ॥ जैसे सुपुमि औ प्रलयमें सर्वेपदार्थनका अज्ञानमें लय अधिष्ठानज्ञानसैं बिना होवेंहै । तहां सर्वेपदार्थनके लयमें निमित्त भोगके सन्यास कर्मका अभाव है । तैसैं अधिष्ठानसाक्षीके ज्ञान-विनाही सर्पज्ञानका लय होवेंहै । तहां सर्प-
ज्ञानका विपय जो सर्प ताका अभाव सर्पज्ञानके लयमें निमित्त है ॥ या प्रकारसैं सर्पकी निवृत्ति रज्जुज्ञानतैं होवेंहै औ सर्पज्ञानका विपय जो सर्प ताके अभावतैं सर्पज्ञानका लय होवेंहै ॥
॥ १४३ ॥ रज्जुज्ञानसमय साक्षीका भान होवेंहै ॥ अथवा सर्प औ ताका ज्ञान । दोनूंक
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८६ ॥ अनिर्वचनीयख्याते ॥ १३६-१४६ ॥ [ विचारसागरे
निद्रोंचि रज्जुज्ञानतैहीं होवैहै । कहैंतैं ? जब रज्जुका प्रत्यक्षज्ञान होवै तब अंतःकरणकी वृत्ति नेत्रद्वारा निकसिके रज्जुदेशमैं प्राप्त होवैहै औ रज्जुके समान वृत्तिका आकार होवैहै, यातैं रज्जुके प्रत्यक्षसमय वृत्तिपाहितचेतन औ रज्जुपाहितचेतन दोनूं एक होवैंहैं तिनका भेद रहै नहीं । यामैं--यह हेतु है:-चेतनका खरूपसैं तौ भेद कदूँ भी नहीं । किंतु उपाधिके भेदसैं चेतनका भेद होवैहै ॥ वृत्तिपाहितचेतन औ रज्जुपाहितचेतनका भेदकउपाधि । वृत्ति औ रज्जु है ।
१ सो वृत्ति औ रज्जु भिन्नभिन्नदेशमैं स्थित होवैं जब तौ उपाधिवाले चेतनका भेद होवैहै औ- २ दोनूंउपाधि एकदेशमैं स्थित होवैं तब उपाधितचेतनका भेद नहै ॥ यह वार्ता वेदांतपरिभापादिक ग्रंथनमैं लिखीहै ॥ १ भिन्नदेशमैं स्थित उपाधितैहीं उपहितचेतनका भेद होवैहै ॥ २ एकदेशमैं जब दोनूंउपाधि स्थित होंवैं तब - दोनूंउपाधिसैं उपाधित चेतन एकही होवैहै ॥
या प्रकारतैं रज्जुके प्रत्यक्षज्ञानसमय रज्जुपाहितचेतन औ वृत्तिपाहितचेतन एक तहैं साक्षीचेतनही वृत्तिपाहितचेतन कहैंतैं ? अंतःकरण औ ताकी वृत्तिमैं स्थित जो तिनका प्रकाशक चेतनमात्र सो साक्षी कहियेहै ॥ इसरीतिसैं रज्जुज्ञानसमय साक्षीचेतन औ रज्जुपाहितचेतनका अभेद होवैहै ॥ औ- १ रज्जुपाहितचेतनका रज्जुज्ञानसैं भान होवैहै औ- २ रज्जुपाहितचेतनसैं अभिन्न साक्षीका वि रज्जुज्ञानसैं भान होवैहै ॥
या प्रकारतैं रज्जुज्ञानसमय अधिष्ठानसाक्षीका भान होवैतैं कल्पित सर्पज्ञानकी निवृत्ति संभवैहै ॥ ॥ १४६ ॥ सर्वत्रिपुटीयोंके ज्ञानमैं साक्षीका ज्ञान होवैहै ॥ किंचा कूटस्थमैं विद्यारण्यस्वामीनैं यह क्रिया कहीहैः- १ -"आभाससहित अंतःकरणकी वृत्ति इंद्रियद्वारा निकसिके घटादिक विपयकूं प्रकाशैहै ॥" २ घटादिकविपय औ तैसैं आभाससहित सहित अंतःकरणरूप ज्ञाता इन तीनिवोंकूं साक्षी प्रकाशैहै ॥" १ "यह घट है" इसरीतिसैं आभाससहित वृत्तिसैं घटमात्रक प्रकाश होवैहै ॥
२ "मैं घटकूं जानहू" या रीतिसैं (१) 'मैं' शब्दका अर्थ ज्ञाता औ- (२) ज्ञेय घट औ- (३) ताका ज्ञान । या त्रिपुटीका साक्षीसैं प्रकाश होवैहै ॥ या प्रकारतैं सर्वत्रिपुटीयोंका प्रकाशक साक्षी आप अज्ञात होवै तौ त्रिपुटीका ज्ञान साक्षीसैं भनै नहीं । यातैं सर्वत्रिपुटीयोंके ज्ञानमैं साक्षीका ज्ञान अवश्य होवैहै ॥ ता साक्षीज्ञानतैं सर्पज्ञानकी निवृत्ति संभवैहै । या पूर्वरीतिसैं सर्प औ ताके ज्ञानका अधिष्ठान भिन्नभिन्न कद्या । तामैं इतनैं शंकासमाधान हैं-- या पक्षमैं शंकासमाधानरूप विवाद और-
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॥ ९४५ ॥ सर्पे औ ताके ज्ञानका अधिष्ठान साक्षी है ॥ ९४५--९४६ ॥ 'सर्पे औ ताके ज्ञानका अधिष्ठान एकती है' यह पक्ष कहहैं:- ताकों वात जो रज्जुचेतन है ताकों सर्पे औ ताके ज्ञानका अधिष्ठान कहैं तो घनैं नहीं काहैं?-- १ जितनै ज्ञान होवेंहैं सो प्रमाता अथवा साक्षीके आश्रित होवेंहैं । चेतन जो रज्जुचुनैतन ताके आश्रित ज्ञान घनैं नहीं । २ तैसैं सर्पे औ सर्पके ज्ञानका अधिष्ठान अंतःकरणउपहित साक्षी चेतनकूं मानैं तो शरीर- के अन्तर अंतःकरणदैशमें सर्पकी प्रतीति चादिये । रज्जुदेशमें सर्पकी प्रतीति नहीं चादिये । अंतर उपजे सर्पकी वाहिर प्रतीति मायाके गलतें मानैं तो आत्मसिद्धिौपाधिकी सिद्धि होवैगी । इसरीतिसैं- १ रज्जूपहितचेतन प्रानका अधिष्ठान घनैं नहीं । औ-- २ अंतःकरणउपहित चेतन सर्पका अधिष्ठान घनैं नहीं । यांतैं सर्पे औ ताके ज्ञानका अधिष्ठान एक नहीं घनै । तथापि रज्जुके समीप प्रांस जो अंतःकरण- की इदमाकारवृत्ति, तामैं स्थित चेतनके आश्रित अविद्या सर्पाकार औ ज्ञानाकार- परिणामकूं प्राप्त होवेंहैं । १ दृष्टिुपहित चेतनमें स्थित अविद्याका तमो- गुणअंश सर्पका उपादानकारण है । २ ताहैंमें स्थित सत्वगुणऔंश सर्पके ज्ञानका उपादानकारण है ॥ सर्पे औ ताके ज्ञानका दृष्टिुपहित चेतन अधिष्ठान है ।
१ वृत्ति रज्जुदेशमें वाहिर महैं यांतँ वृत्ति- उपहित चेतन वी वाहिर है, यांतँ सर्पका आश्रय घनहैं ॥ २ जितना अंतःकरणका स्वरूप होवें, उतना ही साक्षीका स्वरूप होवेंहैं । यारिके अंतर स्थित जो अंतःकरण सोई अंतःकरणरूप परिणाम- कूं प्राप्त होवेंहैं, यांतँ वृत्तिप्रहित चेतन साक्षी रज्जुका साक्षातकार होवेंहैं, ताकी वृत्तिचेतनमँ रज्जुका जन साक्षातकार होवें तव रज्जु- चेतन औ वृत्तिचेतन दानौं एक होवेंहैं, यांतँ रज्जुके प्रांसै सर्पे औ ताके ज्ञानकी निवृत्ति वी घनैहै ॥ ॥ ९४६ ॥ जेतों एकरज्जुमैं दशपुरुपनकूं किसीं सर्प, किसीं दंड, किसीं माला, किसीं पृथिवीकी धार औ किसीं जलधारा, इसरीतिसैं भिन्न भिन्न प्रतीति होवें अथवा सर्वकूं सर्पकी प्रतीति होवें तहां जा पुरुषकूं रज्जुका साक्षातकार होवेंहैं, ताकी वृत्तिचेतनमँ कल्पितअध्यासकी निवृत्ति होवेंहैं । जा रज्जुज्ञान नहीं होवें ताके अध्यासकी निवृत्ति होवै नहीं, यांतँ वृत्तिचेतनही कल्पितका अधिष्ठान है । रज्ज्वादिकविपयउपहितचेतन नहीं ॥ जो रज्जूपहित चेतनकूं सर्पैदंडादिकनका अधिष्ठान मानैं तो दशपुरुपनकूं प्रतीत जो पुद्थादिक औ रीतिसैं तो जोकै वृत्ति- चेतनमें जो पदार्थ कल्पित है सो ताहीकूं प्रतीत होवै । अन्यकूं नहीं । इसरीतिसैं वाद्यस्पादिक औ तिनके ज्ञानका वृत्तिप्रहितसाक्षी अधिष्ठान है । खनकके पदार्थी औ तिनके ज्ञानका वी अंतःकरणउपहित साक्षीही अधिष्ठान है ॥
या प्रकारतैं विलक्षण जो पृ. ११
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८२ ॥ अंदर मिथ्याजगतका आधार अधिष्ठान कौन है? इस प्रश्नका उत्तर ॥ [ विचारसागरे
अनिर्वचनीय अविद्याका परिणाम अनिर्वचनीया संपादिक, तिनकी व्याति कहिये प्रतीति और कथन, सो अनिर्वचनीयव्याति कहिये-है ॥ ५० ॥
॥ १४७ ॥ प्रश्न:-अपारामिथ्याजगतका आधार औ अधिष्ठान कौन है? ॥ शिष्य उवाच ॥ ॥ दोहा ॥ यह मिथ्या परतीत है, जगत अपार ॥ सो भगवान मोऊं कहौं, को याको आधार ॥ ५१ ॥ अर्थ स्पष्ट ॥ ५१ ॥
॥ गतमश्नका उत्तर ॥ १४८-१४९ ॥ मिथ्याजगतका आधार औ अधिष्ठान तूं है ॥ ॥ श्रीगुरुुवाच ॥ ॥ दोहा ॥ tव निजरूप अज्ञानतैं, नहै मिथ्याजग भान ॥ अधिष्ठान आधार तूं, रज्जुभुजंग समान ॥ ५२ ॥ टीका:- हे शिष्य ! तेरा जो निजरूप कहिये प्रकरुपकारिके अज्ञान, तिसतैं मिथ्या-जगत् प्रतीत .होवैहै, यातैं जगतका आधार औ अधिष्ठान तूं है । जैसैं रज्जुकै अज्ञानतैं
॥ १६८ ॥ अनिर्वचनोयवातिका कहहुक कथन दृक्तिरसावलि के दृष्टिमात्र में कियाहै श्री याहिको मिथ्याख्युञ्जंग प्रतीत होवैहै । तहां मिथ्याख्युञ्जंगका आधार औ आधार रज्जु है । यध्यपि मिथ्यासर्पका अधिष्ठान मुख्य द्वितीयपक्षमैं वृत्तिपाहित चेतन है औ अथंपक्षमैं रज्जूपाहितचेतन है । किसी पक्षमैं रज्जु-अधिष्ठान नही । तथापि प्रथमपक्षमैं चेतनमैं अधिष्ठानपनैकी उपाधि रज्जु है, यातैं स्पूइद्वारसैं रज्जु अधिष्ठान कहियेहै । जैसैं मिथ्याख्युञ्जंगका अधिष्ठान तथा आधार रज्जु है; तैसैं मिथ्या-जगतका अधिष्ठान औ आधार तूं है ।
॥ १४९ ॥ आत्माका सामान्यरूप आधार औ विशेषरूप अधिष्ठान है । या स्थानमैं यह रहस्य है:-जैसैं जेवरिके दो स्वरूप हैं । १ एक तौ सामान्यरूप है औ २ एक तौ विरोपरूप है । १ सामान्यरूप "हिरण" है । २ विरोषरूप "रज्जु" है । १ "यह सर्व है" या रीतिसैं मिथ्यासर्पमैं अभिव होयके शांतिकालमैं बी प्रतीत होवै जो "इंद्रुलप" सो सामान्यरूप है ॥ औ- २ जो सर्पकी शांतिकालमैं प्रतीत न होवै; किंतु जाकी प्रतीति हुवेतैं सर्प शांति दूरी होवै सो रज्जुका विशेषरूप है ॥ तैसैं आत्माके बी दोस्वरूप हैं । १ एक सामान्यरूप । २ दूसरौ विशेषरूप । १ सतरूप सामान्यरूप है । औ- २ असंगता क्रू्टस्स्थता नित्यमुक्ततादिक विशेषरूप हैं ।
काहैं ? १ "स्थूलमृदःसंपात हैं" इसरीतिसैं स्थूलमृदूइ्म विस्तारसैं निरुपण दृक्तिप्रभाकरके सततमप्रकाशमैं कियाहै ।
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संघातकी आांतिसमय वी मिथ्यासंघातसैं अभिन्न होयके सतलूप प्रतीत होवहै; यातैं आत्माका सत्स्वरूप सामानग्रूप है । औ— २ स्थूलमूःमसंघातकी श्रांतिसमय आत्माका असंग कूटस्थ नित्यमुक्तस्वरूप प्रतीत होवै नहीं । किंतु असंगादिस्वरूप आत्माकी प्रतीति हुबैतैं संघातभ्रांति दूरी होवैहै । यातैं असंगता, कूटस्थता, नित्यमुक्तता औ व्यापकतादिक विश्रोपरूप हैं । ९ सर्वग्रांतिमैं सामान्यरूप आधार कहियेहै! औ— २ विशेषपरूप अधिष्ठान कहियेहैं ॥ ९ जैसैं सर्पेका आश्रय जो जेवररी ताका सामान्य 'हिरण्य' स्वरूप सर्पेका आधार है । औ— २ विशेषपरजुस्वरूप अधिष्ठान है ! ९ तैसैं मिथ्याप्रपंचका आश्रय जो आत्मा, ताका सामान्य सतलूप प्रपंचका आधार है । औ— २ असंगतादिक विशेषपरूप अधिष्ठान है । इसरीतिसैं आधार औ अधिष्ठानका सर्वज्ञोंत्सननाम ग्रंथिनैं किंचितमेद प्रतिपादन कियोहै ॥ ५२ ॥
|| १५० || प्रश्नः--जगददृष्टा आत्मासैं भिन्न कक्या चहियिये ॥
शिष्य उवाच ॥
दोहा ॥
भगवन मिथ्याजगतको, दृष्टा कहियिये कौन ॥
|| १६९ || संक्षेपशारीरकनाम ग्रंथके कर्त्ता श्रीशंकराचार्यके पौत्रशिष्य ॥
अधिष्ठान आधार जो, द्रष्टा होय न तौन ॥ ५३ ॥
अर्थ स्पष्ट । भाव यह हैं:--जगतका आधार औ अधिष्ठान आत्मा हैं; यातैं जगतका द्रष्टा आत्मामैं भिन्न कह्या चहिये । जैसौं सर्पेका आधार औ अधिष्ठान जो रज्जु ताकैं भिन्न पुरुप सर्पेका द्रष्टा हैं ॥ ५३ ॥
|| १५१ || साक्षेरे कल्पतका अधिष्ठानहि द्रष्टा है ॥
|| श्रीगुरुवाच ||
|| चौपाई ||
मिथ्यावस्तु जगतमें जे हैं, अधिष्ठानमें कल्पित ते हैं ॥
अधिष्ठान सो द्विविध पिछानहु, इक चेतन दूजो जड जानहु ॥ ५४ ॥
अधिष्ठान जडवस्तु जहां है, द्रष्टा तातैं भिन्न तहां है ॥ ५४ ॥
जहां होय चेतन आधारो, तहां न द्रष्टा होवै न्यारा ॥ ५५ ॥
अर्थ स्पष्ट । भाव यह है:— ९ जहां जड अधिष्ठान होवै, तहां अधिष्ठानसैं भिन्न द्रष्टा होवैहै ॥ २ जहां चेतन अधिष्ठान होवै, तहां अधिष्ठानही द्रष्टा होवैहै । भिन्न नहीं ॥ ५५ ॥
|| गतप्रश्नका उत्तर || १५१-१५२ ||
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॥ दोहा ॥ चेतन मिथ्यास्वपको, अधिष्ठान निर्धार ॥ सोई दृष्टा भिन्न नहिं, तैंसैं जगत विचार ॥ ५६ ॥
टीका:-जैसे स्वपका अधिष्ठान साक्षी-चेतन है सोई स्वपका दृष्टा आत्माही अधिष्ठान है सोई दृष्टा है । यह शंका औ समाधन स्थूलदृष्टिसैं जेवररीं सर्पका अधिष्ठान मानिके कहैं हैं औ सिद्धांतमतमैं तौ सर्पका अधिष्ठान साक्षीचेतन है सोई दृष्टा है; यातैं सारे कल्पितका अधिष्ठानही दृष्टा है । शंकासमाधान बने नहीं ॥ ५६ ॥
॥ १५२॥ मिथ्यासंसारके निवृत्तिकी चाह बनै नहीं ॥ ॥ दोहा ॥ इम मिथ्या संसारदुख, रहै तो मैं भ्रम भान ॥ ताकी कहा निःृत्ति तूं, चाहै सिष्य सुजान ॥ ५७ ॥
टीका:-हे शिष्य ! इसरीतिसैं तेरो पै संसाररूपा दुःख मिथ्याही प्रतीत होतहै, ता मिथ्याकी निवृत्तिकी चाह बनै नहीं ॥
हृष्टांत:-जैसे बाजीगरनै किसी पुरुषकूं मिथ्यारूप मंत्रके बलसैं दिखाया होवै, ताके मारनेपै वह पुरुष उद्योग नहीं करता । तैसे मिथ्यासंसारकी निवृत्तिकी चाह बनै नहीं ॥ ५७ ॥
॥ १५३॥ प्रश्न:-जन्मादिकसंसार दुःखका हेतु है । यातैं ताकी निवृत्तिका उपाय बतावौ ॥ ॥ शिष्य उवाच ॥ ॥ चौपाई ॥ जग यद्यपि मिथ्या गुरुदेवा । तथापि मैं चाहूं तिहि छैवा । स्वप्न भयानक जाकूं भासै । करि साधन जन जिम तिहि नासै॥५८॥
यातैं रहै जातैं जग हाना । सो उपाय भाखो भगवान् । तुम समान सतगुरु नहिं आना । श्रवण फूक देइ वचक नाना ॥ ५९ ॥
टीका:-हे भगवान् ! आपनै कथा जो "जगत तेरोवै पै मिथ्यारूपकरिके है औ सत्यरूप-कारिके नहीं" सो यद्यपि सत्य है, तथापि हे भगवान् ! सो मिथ्यारूपकरिके वा जा उपाय-करिके मरणादिकसंसार मेरेवै पै मान न होवै, सो उपाय आप कहो ॥ और— आपनै कहा था जो " मिथ्याकी निवृत्ति-वास्ते साधन चाहिये नहीं " सो वात्तो वी सत्य है । परंतू हे भगवान् ! जाकूं मिथ्यापदार्थ वी दुःखका हेतु होवै ताकोई यह मिथ्या वी साधनसैं दूरी करना योग्य है । जैसे किसी पुरुषकूं
प्रतिपादन भयानकस्वप्न आवते होवें, सो मिथ्या वी हैं परंतू तिनके वी दूरी करनैकूं जप औ पादप्रक्षालनादिक नानासाधन अच्युतज्ञान कहैहैं; तैसे यह संसार मिथ्या वी है परंतु जन्मादिक दुःखका हेतु मेरीकूं प्रतीत होवैहैं; यातैं
॥ १७० ॥ छंदैवाळा ।
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चतुर्थस्तरंगः ४ ] ॥ अंक ११२३ गतप्रश्नका उत्तर ॥ १५४-१५५ ॥
संसारकी निवृत्ति चाहूँदं। आप कृपाकरिके उपाय बतावैं ॥ ५८ ॥ ५९ ॥
॥ गतप्रश्नका उत्तर ॥ १५४-१५५ ॥
॥ १५४ ॥ आत्माके अज्ञानतें जगत्की प्रतीति होवैहै, ताकी निवृत्तिके उपाय ज्ञानका रूप है ॥
॥ श्रीगुरुवचन ॥
॥ सोरठा ॥
सो मैं कव्यों वखानि, जो साधन तें पूँछियौ ॥ निज हिय निश्वय आनि, रहै न रंचक खेद जग ॥ ६० ॥
टीका:-हे शिष्य ! जो तैं जगतनुमा दुःखकी निवृत्तिका साधन पूँछया सो हम तेरें प्रैंथेमही कहीदिया; तिसविपे तूँ दृढ़ निश्चय कर; तांतें जगतरूपी खेद रहें नाहीं ॥ ६० ॥
॥ दोहा ॥
निज आत्म अज्ञानतें, व्है प्रतीत जगखेद ॥ नसे सु ताके बोधतें, यह भाखत मुनि वेद ॥ ६१ ॥
जग मोम नाहिं ' ब्रह्म मैं ', 'अहं ब्रह्म ' यह ज्ञान ॥ सो तोकूँ सिप मैं कह्यो, नाहिं उपाय को आन ॥ ६२ ॥
टीका:-हे शिष्य ! जगत्का निदान कहिये उपादानकारण, तैम कहियै अज्ञान है । ता अज्ञानके नाशतें जगत्का आपही नाश होय जावैहै । कहैंत ? उपादानके नाश हुये पीछे कारज रहै नाहीं है ।
॥ दोहा ॥
कर्मे उपासनतें नाहिं, जगनिदान तम नास ॥ अंधकार जिम गेहेमै, नसे न विन परकास ॥ ६३ ॥
ता अज्ञानका नाश केवल ज्ञानकरिके है । कर्म औ उपासनकरिके नाश होवै नाहीं ।
॥ १७१ ॥ पूर्व इसीही तरंगत ११५ औ ११२३ के अंकगिमे कहिदिया । पैर सोई उपाय
दो दोहा करिके कहतहैं ॥
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काहैं? अज्ञानका विरोधी ज्ञान है। कर्मउपासना विरोधी नहीं ॥
हष्टांत:-जैसे गृहेके विपै जो अंधकार है सो काहू क्रियासूं दूरी होवै नहीं । केवल प्रकासैं दूरी होवैहै । तैसे अज्ञानरूपी जो अंधकार है सो ज्ञानरूपी प्रकासैं दूरी होवैहै । औरकाहू साधनसैं नहीं ॥ ६३ ॥
॥ दोहा ॥
भाख्यो सिष उपदेशमैं, जगभंजक हिय धारि ॥ जो यौंमें संसय रह्यो, सो तूं पूछ विचारि ॥ ६४ ॥
॥ प्रश्न ॥ १५६-१५८ ॥
॥ १५५ ॥ उत्कर्षशंके अनुवादपूर्वक वक्ष्यमाण शंकाका सूचन ॥
॥ शिष्य उवाच ॥
॥ चौपाई ॥
भो भगवान जो कछु तुम भाख्यो । सो सब सत्य जानि हिय राख्यो ॥ जगनिदान अज्ञान बखान्यो । ताको भंजक ज्ञान पिधान्यो ॥ ६५ ॥
ज्ञानरूप बर्णन पुनि कीना । जगमिथ्या सो मैं भल चीना॥ सुखस्वरूप आतम परकास्यो । दया तिहारी सो मुहिं भास्यो ॥६६॥
पुनि भाख्यो ‘ तूं ब्रह्म स्वरूपं । यह मैं लख्यो न भेद अनूपं ॥ यौंमें सुहिं संका इक आवै । जीव ब्रह्मको भेद जनावै ॥ ६७ ॥
टीका:- हे भगवन्! आपने जो कहा सो मैं आपके वचन सत्य जानहूं । आपने कहा जो “ जगत्का कारण अज्ञान है, ता अज्ञानके नाशकरिके जगत्का नित्यति ज्ञानकरिके होवैहै ” सो वार्ता मैं जानी ।
सो ज्ञानका स्वरूप आपने कहा:- “ जगत मिथ्या है औ जीव आनंदस्वरूप है, सो ब्रह्मसैं भिन्न नहीं किंतु ब्रह्मरूप है । ऐसे निश्चयका नाम ज्ञान है । तैसेवपै जगत मिथ्या है औ जीव आनंदस्वरूप है ” यह वार्ता मैं जानी ।
परंतु “ जीव ब्रह्म दोनूं एक हैं ” यह वार्ता नहीं जानी । काहैं? जीवब्रह्मके भेदकूं जनावनेवाली शंका मेरे हृदयमें फुरहै ॥१५७॥ ब्रह्म औ मेरा स्वरूप परस्पर विरुद्ध है, यातैं तिनसैं मेरी एकता बनै नहीं ॥
॥ अथ शंकाकी चौपाई ॥
पुन्यपापका हूँ मैं कर्त्ता । जन्ममरन औ सुखदुख धर्त्ता ॥ और अनेकभांति जग भासै । चहूँ ज्ञान अज्ञान जु नासै ॥ ६८ ॥
जो यातैं विपरीतस्वरूपा । ताकूं ब्रह्म कहत मुनि भूपा ॥ कहो एकता कैसे जानूं? । रूप विरुद्ध हिये पहिचानूं ॥ ६९ ॥
टीका:- हे भगवन्! १ मैं पुन्यपाप कर्त्ता हौं । औ-
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२ तिनका जो फल जन्ममरण औ सुख-दुःख तिनकूं धारण कहूंहैं । औ— ३ नानाप्रकारका जगत् मेरीविपै प्रतीत होवैहै ॥ औ— ४ जगतका कारण जो अज्ञान है ताके दूरी-करनेहैं मैं ज्ञान चाऊंहैं ॥ औ— १ ब्रह्मविपै न पुण्य है, न पाप है । २ न जन्म है, न मरण है, न सुख है, न दुःख है । और— ३ कोई केश ब्रह्मविपै नहीं । औ— ४ ज्ञानकी इच्छा नहीं है ॥ यातैं ब्रह्मका औ मेरा स्वरूप परस्पर विरुद्ध है; यातैं दोनूंकी एकता चनै नहीं ॥ यद्यपि मेरे विपै वी जन्मादिक संसार परमार्थकरिके है नहीं, तथापि मिथ्या जो जन्मादिक हैं सो मेरेकूं आभासैं प्रतीत होवैहैं औ ब्रह्ममें नहीं, यातैं इतना भेद है । ऐकता चनै नहीं ॥ ६८ ॥ ६९ ॥
|| १५८ || पंक्षीरूपतासैं विलक्षण जीव-ब्रह्मकी एकतासैं कर्मउपासना प्रति-पादक वेद निष्फल होवैगा । अन्यसंशायककी चौपाई ॥ सुनहु गुरू दूजो पुनि सेसै । जीवब्रह्म एकत्व ग्रनसै ।। एक वृक्षमें सम दो पचीसी । फल भोगै इक दूजो स्वच्छसी ॥ ७० ॥ भोगरहित परकास असंगा । वेदवचन यह कहत प्रसंगा ।। कर्मउपासन पुनि बहु भाखै । जीव ब्रह्म यातैं द्वै रावै ॥ ७१ ॥ || १७२ || यह प्रमेयगत संशयका स्वरूप है ॥
टीका:-हे गुरो ! मेरे एक और संशय है सो आप सुनौ । कैसा वह संशय है ?-जासौं जीवब्रह्मकी एकताका निश्चय प्रनसै कहीये दूरी होयजावै, सो संशय मैं आपकूं कहूंहैं । आप सुनिके तिस संशयकूं दूरी करौ । वेदविपै मैने इत देखीहै:-वेदक शुद्धस्वरुपा पुरुषमे दोपक्षी कहेहैं । सो दोनूं समान हैं ॥ तिनविप— १ एक तो कर्मके फलकूं भोगैहै । २ एक स्वच्छ कहीये शुद्ध है, भोगरहित प्रकाशैहै ॥ याकेविप— १ भोगनैवाला जीव प्रतीत होवैहै औ— २ दूसरा परमात्मा प्रतीत होवैहै । यातैं उनकी एकता चनै नहीं ॥ औ— वेदकविपै कर्म औ उपासना बहुतप्रकारक कहेहैं, सो जीवब्रह्मकी एकताविपै निष्फल होय जावैंगे । कहेहैं ? जो आप जीवब्रह्मकी एकता कहोहौ । १ सो ब्रह्मविपै जीवके स्वरूपकूं अंतरभाव कहोहो ? २ अथवा जीवविपै ब्रह्मके स्वरूपकूं अंतरभाव कहोहो ?
१ जो कदाचित् ब्रह्मविपै जीवके स्वरूपकूं अंतरभाव कहोगे तौ जीवकूं ब्रह्मरूप होनैंतैं अधिकारिका अभाव होवैगा; यातैं कर्म औ उपासना निष्फल होवैंगे ॥ औ— २ जो जीवविपै ब्रह्मकै स्वरूपकां अंतरभाव कहोगे तौ— १ ब्रह्मकूं जीवरूप होनैंतैं जाकी उपासना करियेहै ता उपास्यकका अभाव होवैगा; यातैं उपासना निष्फल होवैगी । औ— २ कर्मका फल देनैवाला जो परमात्मा ताका अभाव होवैगा; यातैं कर्म निष्फल होवैंगे ॥ औ—
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८८ ॥ ब्रह्मसैं मेरी पकतैं बनै नहीं । इससैंकारकैं उॅत्तर ॥ १५९-१७२ ॥ [ विचारसागरे
मीमांसक जो कहैंहैं “ कर्मही ईश्वर है । तिनसैंही फल होवैहैं” सो वार्त्ता समीचीन नहीं । काहैंतैं ? जो कर्मैं हैं सो जड़ हैं । तिनकूं फल देनैका सामर्थ्य बनैं नहीं; यातैं कर्मका फल ईश्वरही देवैहैं ॥
या रीतिसैं परमात्मा औ जीवकी ऐकता बनै नहीं ॥ ७० ॥ ७१ ॥
॥ अंक १५७ गतप्रश्नका उत्तर ॥
॥ १५९॥ चारि आकार औ चारि चेतन ॥
॥ श्रीगुरुवचन ॥
चौपाई ।
सुनहु सिष्य इक कहूं विचारा । नहै जातैं सका निस्तारा ।
घटाकास इक जलआकासा । मेघाकास महाआकासा ॥ ७२ ॥
चारिभेद ये नबके जानहु । पुनि चेतनके तथा पिछानहु ॥
इक कूटस्थ जीव पुनि कहियै । ईस ब्रह्म हिय जानै रहियै ॥ ७३ ॥
जब इनको तूं रूप पिछानै । निज सका तवहीं सब भानै ।
यातैं सुन इनकों अब बेदा । नसैं सुनत जन्मादिक खेदा ॥ ७४ ॥
टीका:- जो तेरेकूं शंका हुर्ईहैं तिनका
॥ १७३ ॥यह् प्रमाणागत संशयका स्वरूप है।
॥ १७४ ॥ इहां यह शंका है:-घटसैं बाहर जो आकार है सो महाकास है, तिसतैं भिन्न घटके भीतरका जो आकार है सो घटाकास है ।
निस्तार काहिये निराकरण जातैं होवै सो विचार मैं कहूं । तूं सुन:-
जैसे एक आकारमैं चारिभेद हैं-
१ एक घटाकास है । औ-
२ एक जलाकास है । औ-
३ मेघाकास है । औ-
४ महाकास है ।
तैसे एकचेतनके चारिभेद हैं:-
१ कूटस्थ है । औ-
२ जीव है । औ-
३ ईश्वर है । औ-
४ ब्रह्म है ॥
ये चारिमेद आकारकी न्याई चेतनविपै हैं
हे शिष्य ! जब इनके स्वरूपकूं तूं भली प्रकारसैं पिछानैगा तव अपनी शंकाका तूं आपही समाधान जानि लेवैगा । यातैं मैं इनका स्वरूप वर्णन करूं । तूं सुन । जाकूं सुनिके संशयरहितज्ञान होइकै जन्मादिकदुःखका नास होवैगा ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ ७४ ॥
॥ १९६० ॥ १ अथ घटाकासवर्णन ॥
॥ दोहा ॥
जलपूरीत घटकूं जु दे, जितनो नभ अवकास ।
युक्तिनिपुन पंडित कहै, ताकूं घट आकार ॥ ७५ ॥
टीका:-हे शिष्य ! जलसैं भरे घटकूं जितना आकार अवकास देवैहै । तितनैं आकारकूं पंडितजन घटाकास कहैहै ॥ ७५ ॥
यह घटाकासका लक्षण सुगम है; ताकूं छोड़िके “जल पूरितघटकूं महाकास जितना अवकास देवै तितना आकार घटाकास कहिये ” आकार घटाकास है ।” इसरीतिसैं लक्षण करनेकै क्या प्रयोजन है ? याकै-
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॥ १६१ ॥ ३ अथ जलाकाशवर्णन ॥
॥ दोहा ॥ जलपूंरित घटमैं जू पुनि, है नमको आभास ॥ घटाकासयुत विज्ञान, भाखत जलआकास ॥ ७६ ॥
टीका:--हे शिष्य ! जलसैं भन्या जो घट है ताकैपीं नखत्रादिसहित आकाशका प्रति- बिंव होतहै । सो आकाशकै 'प्रतिबिंव' औ घटाकाश, दोनूं मिलेहुये जलाकास कहिये- है ॥ ७६ ॥
याकैपीं-- कोई शंका करैहै:-- आकाशका प्रतिबिंव नहीं होवैहैं किंतु केवल नखग्रादिकनकाही प्रतिबिंव होवैहैं । काहैं? आकाश रूपकारिकै रहित है औ रूपवाले पदार्थका प्रतिबिंव होवैहैं, यातैं आकाशका प्रतिबिंव कहैं नाहीं । ऐसी शंका करेंहैं ताकै- समाधानका दोहा ॥ जो जलमैं आकासको, नहीं प्रतिबिंव लखाइ ॥ थोरैमैं गंभीरता, वहै प्रतीत किहिं भाइ ॥ ७७ ॥
यह समाधान है:-- घटाकाशका पूर्वउक्त लक्षण करैं तो घटकी जामैं स्थिति है, सो व्याकाश पांचवां कपाळाकास ( ठीकराकाश ) कहनां होवैगां । सो शास्त्रसैं विरुद्ध है, यातैं यह दितीयलक्षण करना उचित है ॥
॥ १७५ ॥ जलविना प्रतिबिंव होवै नहीं, यातैं यहां आकाशका प्रतिबिंब कहनेकै घटमैं स्थित जो जल, तासहित आकाशके प्रतिबिंबकौं ग्रहण है । वि. १२
यातैं जलमैं व्योमको, लखि आभास सुजान ॥ रूपरहित जिम सद्दतैं, नैहै प्रतिबिम्बकौं मान ॥ ७८ ॥
टीका:--जो जलकोपीं आकाशका प्रति- बिंव नहीं होवै तौ गोडेपरिमाण जलविैं मनुष्यपरिमाण गंभीरताकी जो प्रतीति होवैहै सो नहीं हुईचाहिये, यातैं आकाशका प्रति- बिंव अंगीकार करना योग्य है । और-- जो कहैहैं--" रूपरहितपदार्थका प्रतिबिंव नहीं होवैहैं " सो वी नियम नहीं है । काहैं? रूपरहित जो शब्द है, ताकी प्रतिबिं्वनि होवैहै सो शब्दका प्रतिबिंव है; यातैं रूपरहित जो आकाश है ताकी वी प्रतिबिंव वनेहै ॥ ७८ ॥
॥ १६२ ॥ ३ अथ मेघाकाशवर्णन ॥ ॥ दोहा ॥ जो मेघहि अवकास दे, पुनि तामैं आभास ॥ तिन दोनूं कौं कहत हैं, बुधजन मेघाकास ॥ ७९ ॥
टीका:--मेघ जो बादल, तिनकौं जो आकाश अवकाश देवैहै औ मेघके जलमैं जो ॥ १७६ ॥
गुणके आभ्रित गुण रहता नहीं कितु भाकाशादिक द्रव्यके आभ्रित गुण रहता है । इस नियमतैं नीलपीतादिरंगमय जो रूप है, सो रूपगुणका आश्रित होवैतैं रूपरहित है । ता रूप- रहित नीलपीतादिरंगका दर्पणादिक सच्छ उपाधित्रिपं प्रतिबिंव होवैहैं । ताकी न्हाई रूपरहित आकाशका औ रूपरहित चेतनका प्रतिबिंव वनेहै ॥
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आकाशका प्रतिबिंव है, तिन दोनों मेघकाया कहैंहैं ॥ ७९ ॥ याकोवैपै , कोई शंका करैहै:— जो मेघ तौ आकाशवैपै हैं; तिनमैं जल औ आकाशका प्रतिबिंव दिखाई विना कैसे जाने जावैहैं ? ताके—
वर्षत मेघ अनंतजल, उदकसहित इति हेत ॥ दक नहिं नभ आभास बिन, इम प्रतिबिंब समेत ॥ ८० ॥ टीका:—यद्यपि मेघविंै जल औ आकाशका प्रतिबिंब प्रत्यक्ष नहीं है, तथापि अज्ञानीकिरिके जानिेजावैहैं:— १ मेघ जो जलकी वृष्टि करैहै, यातैं ऐसा अनुमान होवैहै जो मेघोंवैपै जल है । जो मेघोंवैपै जल न होवै तौ जलकी वृष्टि मेघैं नहीं होवै । औ—
२ मेघोंवैपै जल है सो आकाशके प्रतिविंससहित है । कहैंतैं ? जो जल होवैहै सो आकाशके प्रतिबिंवविना न होवैहै, यातैं मेघोंवैपै जो जल है सो ही आकाशके प्रतिबिंववाला है ॥ इसरीतिसैं मेघविपै जल औ आकाशके प्रतिबिंवका अनुमान होवैहै । उदक औ दक में दोऊ जलके नाम हैं ॥ ८० ॥
|| १६३ || ४ अथ महाकाशवर्णन || दोहा || बाहिर भीतर एकरस, व्यापक जो नभरूप ॥
महाकास ताकूं कहैं, कोविद बुद्धि अनूप ॥ ८१ ॥ टीका:—बाहिर औ भीतर सारे एकरस व्यापक जो नम कहिये आकाशका स्वरूप है ताकूं अनूप कहिये . अद्वैतशुद्धिवाले 'पंडित महाकाशा कहैंहै । ८१ ॥
|| १६४ || वारिचेतनके वर्णनका उपोद्घात || दोहा || चतुर्भांति नभके कहे, लच्छन श्रुतिअनुसार ॥ अब चेतनके सिष्य सुन, जासूं लहै विचार ॥ ८२ ॥ टीका:—हे सिष्य ! चारिप्रकारके आकाशके लच्छण कहे । अब चारिभांतिके चेतनके लच्छण सुन । जाके सुनैतैं विचार कहिये विचारका फल ज्ञान प्राप्त होवै ॥ ८२ ॥
|| १६५ || १ अथ कूटस्थवर्णन || दोहा || मति वा न्यष्टिअज्ञानको, अधिष्ठान चैतन्य ॥ चेत्याकारम सम मानिये, सो कूटस्थ अजन्य ॥ ८३ ॥ टीका:—बुद्धि अथवा अथवा न्यष्टि अज्ञानका जो अधिष्ठान चेतन है सो कूटस्थ कहियेहै ।
१ जा पंथमें बुद्धिसहितचेतन जीव है, ता पंथमें बुद्धिका अधिष्ठान चैतन्य कहियेहै ॥ औ—
|| १७७ || ब्रह्मांडके बाहिर औ भीतर ||
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॥ चारिचेतन, कूटस्थ औ जीववर्णन ॥
२ जा पक्षमैंँ व्यष्टिअज्ञानसहित चेतन जीव कहियेहैं, ता पक्षमैंँ व्यष्टिअज्ञानका जो अधिष्ठान है सो कूटस्थ कहियेहैं ।
या स्थानविपे यद् सिद्धांत है:- जीवपनैका जो विशेषपण है ताके अधिष्ठानका नाम कूटस्थ कहियेहै । सो कूटस्थ अज्ञान्य है उत्पत्तिसैं रहित है । याका अभिमाय यह है:- जैसे न्यारा जैसे चिदाभास उत्पन्न होवेंहैं तैसे यह उत्पन्न नहीं हुवा किंतु ब्रह्मरूपही है । जैसे घटाकाशा महाकासैं न्यारा नहीं होयगया किंतु महाकाशरूप है ॥
यह जो कूटस्थ है सोई आत्मपदका लक्ष्यअल्श है औ याहीकूं प्रत्यक्ष कहेंहैं औ याहीकूं निजरूप कहेंहैं औ यही जीवसाक्षी है ॥ ८३ ॥
॥ १६६ ॥ २ अथ जीववर्णन॥
॥ १६६—१७० ॥
॥ दोहा ॥
काम कर्मयुत बुद्धिमैंँ,
जो चेतनप्रतिबिंव ॥
॥ १७८ ॥ यहाँ “चिदाभास” शब्दकरिके बुद्धिसहित चिदाभासका ग्रहण है । यह वार्ता आगे इसीद्दी तरंगके. ११६ में दोहाकी टीकाके आरंभमैंँ ग्रंथकारने लिखीहै औ पंचदशीमैंँ श्रीविद्यारण्यस्वामीनें भी “बुद्धि कौ तिसमैंँ स्थित चिदाभास कौ तीन द-
नूंका अधिष्ठान कूटस्थचैतन्य, इन तीनका समूह जीव कहियेहैं” ऐसें लिखाहै; यातैं बुद्धि वा अविद्या औ तामैं स्थित जो चिदाभास औ तिनका अधिष्ठान कूटस्थ ये तीन मिलिके जीव कहियेहै ॥
॥ १७९ ॥ कामना घो कर्मरूप जलसहित बुद्धिरूप घटमैंँ चेतनका प्रतिबिंव है । यातैं स्थूलदेहरूप घटमैंँ नखशिखपर्यंत भय्या बुद्धिरूप जल है । तामैंँ चेतनका प्रतिबिंव औ
जीव कहै है विद्वान तिहिं, जलनभ तुल्य सविंच ॥ ८४ ॥
टीका:- नानाकाम औ कर्मसहित जो बुद्धि है, तामैंँ जो चेतनका प्रतिबिंव है, ताकूं चिदानंद कहिये । ताही जीव कहैंहैं । सो केवल प्रतिबिंवमात्रहूं जीव नहीं कहैंहैं किंतु जैसे घटाकासहित आकाशके प्रतिबिंवकूं जलाकाश कहैंहैं, तैसे सविंच कहिये त्रिव जो कूटस्थ तासहित चिदाभासकूं जीव कहैंहैं । यातैं यह सिद्धांत हुवा:- बुद्धिमैंँ जो चिदाभास औ बुद्धिका अधिष्ठानचेतन दोहोंंका नाम जीव है ॥ ८४ ॥
॥ १६७ ॥
॥ दोहा ॥
अधिष्ठान कूटस्थसैं, न्है आभास वहाल ॥
रक्त पुष्प उपर धन्यो, स्फटिक होइ जिम लाल ॥ ८५ ॥
टीका:- पूर्वदोहेँविपैं विंव जो कूटस्थ ता सहित आभासकूं जीव कधा । यातैं— कूटस्थ दोनूंका नाम जीव है । यह रीति सुगम है ॥
१ इहाँ केवल बुद्धिसहित चिदाभासकूं खंपदका अर्थ जीव कहैं तौ तामैंँ भाग्यागरलक्षणा संभव नहीं किंतु सादे वाक्यप्रयोगकी न्यागरीहै जहतलक्षणा संशव । तैसे मानना आचार्यनकी युक्तिसैं विशद है ॥
२ अधिष्ठानसैं अभिन्न होवके वध्यिष्ठानकूं दॉंपै सो आरोप्य कहियेहै । अधिष्ठानतैं मिल्न होइ वाध्यस्थकी प्रतीति होवै नहीं ।
या अनुसवसैं चिरुद्ध है ॥
यातैं चिदाभाससहित बुद्धिविशिष्ट कूटचेतन जीव है, ऐसें मानना योग्य है ॥
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९२ ॥ ब्रह्मसैं मेरी पकता चनै नहीं । हस प्रश्नका उत्तर ॥ १७१-१७२ ॥ [ विचारसागरे
१ यह प्रतीति होवैहै:- जो बुद्धिमैं प्रतीबिंब है सो कूटस्थका है औ बाहिरके ब्रह्मचेतनका नहीं । कहैंतैं ? जाकै प्रतीबिंब होवै सो बिंब कहियेहै । सो कूटस्थैं बिंब कही यातैं ताका प्रतीबिंब है यह प्रतीति होवैहै । सो या दोहैं प्रतीपादन करैंहैं ।
जैसैं बड़े लालपुष्पके ऊपरि जो धँ्या सुपेद स्फटिक है ताकैवै फूलकी लालीकी दमक होवैहै, सो लालफूलका प्रतीबिंब है । तैसैं कूटस्थके आश्रित जो बुद्धि ताकैवै कूटस्थके प्रकाशकी दमक होवैहै । जैसैं स्फटिक अत्यंत उज्जवल है तैसैं बुद्धि वी अत्यंतशुद्ध है । कहैंतैं ? बुद्धि सत्अ्गुणका कार्य है । यातैं कूटस्थकी दमकका नाम प्रतीबिंब है ॥
२ अथवा ब्रह्मचेतनका प्रतीबिंब है । जैसैं महाकाशका घटके जलमैं प्रतीबिंब होवैहै औ मीतरके आकाशका नहीं । कहैंतैं ? जतनी गंभीरता जलवै प्रतीत होवैहै उतनी गंभीरता मीतरके आकाशमैं है नहीं । सो गंभीरता आकाशका प्रतीबिंब है, यातैं बाहिरके आकाशका प्रतीबिंब है ।
१ यह जो कहैंहैं:- "व्यापकचेतनका प्रतीबिंब बनै नहीं" सो आकाशके दृष्टांतसैं शंका दूरि होवैहै । कहैंतैं ? जो आकाश वी व्यापक है औ ताका प्रतीबिंब होवैहै । तैसैं व्यापकचेतनका वी प्रतीबिंब बनैहै ॥ और-
२ जो कहैंहैं:- "रूपवाले पदार्थका रूपवाले पदार्थमैं प्रतीबिंब होवैहै" सो वी नियम नहीं है । कहैंतैं ? "उपरहितशब्दका उपरहित आकाशमैं प्रतीबिंब होवैहै" यह पूर्व कहि आए । यातैं चेतनका प्रतीबिंब बनैहै ॥
इसरीतिसैं बुद्धिमैं आभास औ बुद्धिका अधिष्ठान चेतन दोनूंका नाम जीव है ।
१ सो जीव त्वंपदका वाच्य कहियेहै ॥ औ-
२ ताकैवै चिदाभासका त्यागकारिके केवल जो कूटस्थ है सो त्वंपदका लक्ष्य कहियेहै ॥ औ-
२ केवलकूटस्थ अहंशब्दका लक्ष्य है ॥ ॥ १६८ ॥
॥ दोहा ॥ बुद्धिमाहि आभासं जो, पुन्यपाप फलभोग ॥ गमन आगमन सो करै, नहीं चेतनमैं जो ॥ ८६ ॥
मिथ्या नभ घट संग ज्यूं, लहै क्रिया बहु भांति ॥ घटाकास क्रिय सदां, रहै एकरस सांति ॥ ८७ ॥
टीका:-"घटपि चिदाभास औ कूटस्थ दोनूंका नाम जीव है । तथापि जीवपनैके जो धर्म हैं सो सारे आभासविपै हैं । पुण्य औ पाप पुण्यपापके फल सुखदुःख औ लोकांतरविपै गमन औ यालोकविपै आगमन इसैं आदिलेकै सारे. आभाससहित बुद्धि करैहै औ कूटस्थ नहीं करैहै ॥ कूटस्थविपै केवलभ्रांतिसैं प्रतीति होवैहै ॥
सो भ्रांतिसं प्रतीती वी बुद्धिसहित आभासकूं होवैहै । कूटस्थकूं नहीं । कहैंतैं ?
१ कूट जो लुहारका अहर्न ताकी न्याईं निर्विकारलपसैं स्थित होवें सो कूटस्थ कहियेहै ॥
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२ अथवा कूट कहिये मिथ्या जो बुद्धि औ चिदाभास ताकेविषै असंगरूपसैं स्थित होवें सो कूटस्थ कहियेहैं । यांतें कूटस्थविषै आंतिआदिक घनैं नहीं किंतु चिदाभामैं घनैंहैं । औ--
१६९ ॥ अत्यंतअविद्यारिसँ दहियै तो पुण्य-पाप, सुखदुःख, लोकांतरमैं गमन औ आगमन, केवल बुद्धिमैं हैं ।औंभासमैं वी नहीं । बुद्धिके संयोगसैं आभासमैं है । जैसैं जलसहित जो घट है सो टेढ़ा होवेंहैं औ सीधा होवेंहैं औ जांतें आवैंहैं औ ताके संघंधसैं न्योमका आभास संपुर्णक्रिया करैंहैं औ स्वतंत्र कहूँ वी नहीं कहरैंहैं, तैसैं काम-करमलूपी जलसैं भन्याँ जो बुद्धिरुपी घटैं हैं सो पुण्यसैं आदिलेके संपुर्णविकार धारैंहैं औ ताके संघंधसैं चिदाभास धारैंहैं औ कूटस्थ सर्वविकारसैं रहित हैं ॥
जैसैं जलपूरितघटके विकारसैं रहित घटाकाछा है, ताकी न्याईँ कूटस्थौं जान । यांतें जीवपनैके धर्म चिदाभासमैं हैं तथापि कूटस्थमैं अज्ञानैं प्रतीत होवेंहैं । यांतें बुद्धिकेविषै कूटस्थ-सहित जो चिदाभास सो जीव कहियेहैं ॥ ८६ ॥ ८७ ॥
१७० ॥ यह जो जीवका स्वरूप वर्णन किया ताकेविषै प्राज्ञकी हानि होवेंहैं । कहैंतें ? जो सुप्रसिके अभिमानी जीवका नाम प्राज्ञ हैं ता सुप्रसिविपै बुद्धिका अभाव होवेंहैं ॥
१८० ॥ जैसैं लोहेकी कड़ाईमैं तपाया जो तैल तामैं आकारकाँ प्रतिबिंब होवेंहैं वह अमिका ताप तैलखूंधी है । तद्गंत आकारके प्रतिबिंबकूँ नहीं । तब तैलपूरित कड़ाईके अधिष्ठानरूप आकारकूँ कहाँसैं होवैगैं ? तैसैं पुण्यपापादिरुप जो संसार है सो केवल बुद्धिमैं है । आभासमैं वी भ्रांति बिना नहीं । तब तिनके अधिष्ठान कूटस्थमैं यांतें बुद्धिमैं आभास वी घनैं नहीं, यांतें प्राज्ञके स्वरूपका प्रतिपादक जो शास्त्र है ताका विरोध होवैगा । इसकारणतैं जीवका स्वरूप कहैं:-
दोहा । जो चेतन आाभास । अधिष्ठान कूटस्थयुत, कहै जीवपद तास ॥ ८८ ॥
टीका:- ९ अज्ञानके अंशका नाम अवप्टिअज्ञान कहियेहैं । औ-- २ संपुर्णअज्ञानका नाम समष्टिअज्ञान है । ता अज्ञानके अंशविषै जो चेतनका आाभास औ अज्ञानिक अशकका अधिष्ठान जो कूटस्थ है तिन दोऊंकौं जीवपद कहैंहैं । यांतें प्राज्ञका अभाव नहीं होवेंहैं । कहैंतें ? सुप्रसिविपै अज्ञान रहैहैं । जो सुप्रसिविपै चेतनके प्रतिबिं-सहित अज्ञानका अंश है, सोई बुद्धिरुपकौं प्राप्त होवेंहैं । औ चेतनका प्रतिबिंब साथही होवेंहैं ॥
ता चिदाभाससहित बुद्धिमैं पुण्यादिक संसार प्रतीत होवेंहैं । इस अभिप्रायसैं बुद्धिही कहूँ शास्त्रनिवपै जीवपनैकी उपाधि वर्णन करीहैं औ विचारदृष्टिसैं जीवपनैकी उपाधि अज्ञान हैं ॥ ८८ ॥
१८१ ॥ इहाँ बुद्धि किंवा बुद्धिका संस्कार-रुप घट है तौमैं व्यष्टि अज्ञानरुप जल भन्याहै । तौमैं चेतनका प्रतिबिंब है अथवा व्यष्टिभज्ञानरुप घट है । तौमैं मलिनसल-गुणरुप जल भन्याहै । तिसमैं चेतनका प्रतिबिंब है, सो अधिष्ठान कूटस्थसहित जीव कहियेहै ॥
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|| १७१ || || ३ अथ ईश्वरवर्णन ||
|| दोहा ||
चितछाया मायाविषै, अधिष्ठान संयुक्त । मेघन्योम सम ईस सो, अंतर्यामी मुक्त ॥ १८१ ॥
टीका:—मायाकेविपै जो चेतनकी छाया कहिये आभास औ मायाका अधिष्ठानचेतन, दोनूंकूं ईश्वर कहहैं, सो ईश्वर मेघाकाशके सम है ॥
१ सो ईश्वर अंतर्यामी है । कहहैं ? सर्वके अंतरश्रवण करैहै, यातैं अंतर्यामी है । औ—
२ सदा मुक्त है । कहहैं ? वादकूं अपने स्वरूपमैं आवरण नहीं, यातैं जन्ममरणादिक बंधनकी प्रतीति नाहीं । इस हेतुतैं ईश्वर नित्यमुक्त है ॥ औ—
३ सर्वज्ञ है । सर्वपदार्थके जाननैवाला है । याकेविपै यह हेतु है:— मायाविपै शुद्ध- सत्वगुण है ॥
तमोगुण औ रजोगुणसैं दव्या हुआ सत्व- गुण नहीं होवै, किंतु रजोगुण औ तमोगुणकूं आप दवावनैवाला होवै, तो शुद्धसत्वगुण कहियेहै ।
सत्वगुणसैं ज्ञानकी उत्पत्ति होवैहै, यातैं प्रकास्वरूपभाववाला सत्वगुण है । ऐसि सत्व- गुणवाली मायाकेविपै जो चेतनका आभास ताकूं
|| १८२ || इहां आभास शब्दकरिके मायासहित आभासका ग्रहण है ।
|| १८३ || जैसैं कोई ब्राह्मणजातिवाला राजा होवै सो क्षत्रिय औ शूद्रजातिवालै दोऊ मंत्रिनसैं आप दवाता नाहीं । किंतु तिन दोनूंकूं आप दवावताहै
तैसैं रजोगुणतमोगुणसैं दवता नाहीं । किंतु तिन दोनूं आप दवावताहै
स्वरूपविपै अथवा औरपदार्थविपै आवरण संभवै नाहीं, यातैं मुक्त है औ सर्वज्ञ है । अधिष्ठान जो चेतन है सो तौ जीव औ ईश्वर दोनूंविपै बंधमोक्षमेदसैं रहित है ।
आकाशकी न्याई एकरस है परंतु आभास अंश- मेघन्योम सम ईस सो, भ्रांतिपूर्वक है । अधिष्ठानविपै आभासकूं
भ्रांतिपूर्वक है । यातैं केवळआभासमैं बंधमोक्ष है । तिसविपै वी इतना भेद है:—
१ जा आभासमैं आवरण है ताकेविपै बंध है । २ जाविपै स्वरूपका आवरण नाहीं है सो मुक्त है ।
१ ईश्वरमैं आवरण नाहीं यातैं ईश्वर सदा- मुक्त है औ—
२ जीवविपै आवरण है सो बद्ध है । बद्ध कहियें बंध्या हुवै । कहहैं ? जा अविद्याके अंशमैं चेतनके आभासकूं जीव कह्या ता अविद्याकी आवरण करनिकी स्वभाव है । यद्यपि १ अविद्या औ २ अज्ञान औ ३ माया एकही वस्तुकूं कहहैं । तथापि—
१ शुद्ध सत्वगुणकी प्रधनातासैं माया कहियेहै ॥ औ—
२-३ मलिन सत्वगुणकी प्रधनातासैं अज्ञान औ अविद्या कहहैं ।
रजोगुण औ तमोगुणसैं दव्या जो सत्व- गुण है सो मलिनसत्वगुण कहियेहै ।
यातैं तमोगुण औ रजोगुणकी अधिकता होनैतैं अविद्यामैं जो जीवका आभाससंश ताईं अविद्या, स्वरूपका आवरण करैहै । यातैं जीवमैं बंधन है औ ईश्वरमैं नाहीं ।
दोनूंकूं आप दवावनैवाला होवै ऐसा जो सत्वगुण
सो शुद्धसत्वगुण है ॥
|| १८४ || जैसैं शूद्रजातिवालै दोऊ राजपुत्रनै ब्राह्मणजातिवाला एकमंत्री दमताहै तैसैं रजोगुण तमोगुणसैं दव्या जो सत्वगुण है सो मलिनसत्व- गुण है ॥
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१ अधिष्ठानचेतनसहित जो मायामैं आभासरूप ईश्वर है सो तत्पदका वाच्य कहियेहै। २ केवलअधिष्ठानचेतन तत्पदका लक्षण है। "जो ईश्वर है सोई जगत्की उत्पत्ति औ पालन औ संहार करैहै" यह सम्पूर्णशास्त्रमैं कहा है। ताका यह अभिप्राय है:- चेतनअंश तौ आकाशकी न्याईं असंग हैऔ आभास-अंश जगत्की उत्पत्तिआदि करैहै औ ताहौं विपै सर्वज्ञता है औ भक्तजनके उपरि अनुग्रह जो करैहै सो वी केवलआभासांश करैहै। और जो कछु ऐश्वर्य है सो केवल आभासमैं है औ चेतनअंश एकरस है। वाकेविपै सत्ता-स्पूर्ति देनैबिना औरऐश्वर्य वैनै नहीं ॥ ८९ ॥
॥ १७२ ॥ ४ अथ चतुर्थस्तरुपवर्णन ॥
॥ दोहा ॥ अंतर बाहर एकरस, जो चेतन भरपूर । विभुनभ सम सो ब्रह्म है, नहिं नेरे नहिं दूर ॥ ९० ॥ टीका:—ब्रक्षांडके अंतर कहिये भीतर औ बाहर जो महाकाशकी न्याईं भरपूरचेतन है सो ब्रह्म कहिये है। सो ब्रह्म नेरे नहीं औ दूरि नहीं। कहैंतैं जो वस्तु अपनेसैं भिन्न होवै औ देशरूप उपाधिवाला होवै सो नेरे औ दूरि कहि जावैहै। ब्रह्म भिन्न नहीं किंतु सर्वका आत्मा है औ देशादिक सर्वउपाधितैं रहित है, यातैं नेरे औ दूरी नहीं कहाजावै ॥ यद्यपि ब्रह्मशब्दका वाच्य वी सोपाधिक है। कहैंतैं? व्यापकत्वसूका नाम ब्रह्म है।
सो व्यापकता दोप्रकारकी है:- १ एक तौ आपेक्षिक व्यापकता है औ २ एक निरपेक्षिक व्यापकता है ॥ १ जो वस्तु किसी पदार्थकी अपेक्षासैं व्यापक होवै औ किसीकी अपेक्षासैं न होवै ताकेविपै आपेक्षिक व्यापकता कहियेहै। जैसे पृथ्वीआदिकी अपेक्षासैं माया व्यापक है औ चेतनकी अपेक्षासैं नहीं है। यातैं माया-विपै आपेक्षिक व्यापकता है। औ— २ जो वस्तु सर्वकी अपेक्षासैं व्यापक होवै ताकेविपै जो व्यापकता सो निरपेक्षिक व्यापकता कहियेहै। सो निरपेक्षिक व्यापकता कहैंत? चेतनके समान अथवा चेतनसैं अधिक औरकोई व्यापक है नहीं। किंतु चेतनही सर्वसैं व्यापक है, यातैं चेतनविपै निरपेक्षिक व्यापकता है। यह दोनों प्रकारकी व्यापकतासहित जो वस्तु है सो ब्रह्मशब्दका वाच्य है। सो दोनों-प्रकारकी व्यापकता मायाविशिष्टचेतनविपै है। कहैंत?— १ विशिष्टविपै जो मायाआंश है ताकेविपै तौ आपेक्षिक व्यापकता है। औ— २ चेतनअंशविपै निरपेक्षिक व्यापकता है। यद्यपि मायाविशिष्टचेतनविपै निरपेक्षिक व्यापकता वैनै नहीं। कहैंत? मायाचेतनके एकदेशविपै है। तौ मायाविशिष्टचेतनसैं शुद्ध चेतनकी व्यापकता अधिक है। यातैं शुद्धचेतन विपै निरपेक्षिक व्यापकता है। तथापि माया विशिष्ट जो चेतन है सो परमार्थदृष्टिरिके शुद्धसैं भिन्न नहीं किंतु शुद्धरूपही है। यातैं मायाविशिष्टमैं वी जो चेतन अंश है ताकेविपै निरपेक्षिकही व्यापकता है। इसरीतिसैं— १ मायाविशिष्टही ब्रह्मशब्दका वाच्य वैनहै। औ—
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६६ ॥ जीवब्रह्मकी एकतासैं वेद निष्फल होवैगै। इस प्रश्नका उत्तर ॥१७३-१७५॥ [ विचारसागरे
२ शुद्धचेतन ब्रह्मशब्दका लक्ष्य है। यातैं ईश्वरशब्द औ ब्रह्मशब्द दोनूंका समानही अर्थ प्रतीत होवैहै । भिन्न अर्थ नहीं ॥ तथा चि-
~ १ ब्रह्मशब्दका तौ यह स्वभाव है:- जो चेतनस्थानविपै लक्ष्यार्थकूं बोधन करैहै औ काहूस्थानविपै वाच्यार्थकूं कहैहै । औ-
२ ईश्वरशब्दका यह स्वभाव है:- जो चेतनस्थानमें वाच्यार्थका बोधन करैहै । इतना भेद है, यातैं लक्ष्यार्थकूं लेके ब्रह्मशब्दका अर्थ भिन्न निरूपण कियाहै ॥९०॥
॥ अंक १५८ गत प्रश्नका उत्तर ॥
॥ १७३-१७५ ॥
॥ १७३ ॥ कूटस्थ प्रकाशमान है औ आभास भोगैहै ॥ दोहा ॥
चतुर्भांति चेतन कह्यो, तामैं मिथ्या जीव ॥ पुन्यपाप फल भोगवै, चितकूटस्थ सु सीव ॥ ९१ ॥ टीका:- हे शिष्य ! चारप्रकारका चेतन कथा, तामैं-
१ जीवके स्वरूपमैं जो मिथ्या आभासअंश है सो पुण्यपाप करैहै औ तिनके फलहू मोगै है । औ-
२ कूटस्थ जो चेतन है सो सीव कहिये शिरूप है ॥ शिव नाम कल्याणका है । यातैं प्रथम जो शंका करीथी " जो शुद्धिरूपी वृक्षमैं दोपक्षी हैं । एक परमात्मा औ
जीव" ताका यह उत्तर कथा:- परमात्मा औ जीवका ग्रहण नहीं करना किंतु कूटस्थ तौ प्रकाशमान है औ आभास मोगैहै ॥ ९१ ॥ आभास कर्मी करैहै औ फल देवैहै । चेतन नहीं ॥
॥ दोहा ॥ कर्मी छाया देत फल, नहीं चेतनमें जोग ॥ सो असंग .इकरूप है, जानै भिन्न कुलोग ॥ ९२ ॥ टीका:-जीवके स्वरूपमैं जो चेतनकी छाया कहिये आभास अंश है । सो कर्मी कहिये कर्म करैहै । ता कर्म करनैवालेकूं छाया जो ईश्वरका आभास अंश है सो फल देवैहै ॥
देहलीदीपकन्यायकरिके पूर्वउत्तर दोनूं ओरकूं संबन्ध है । जैसैं देहलीके ऊपर धर्या जो दीपक है सो दोनूं-ओरकूं प्रकाशैहै । " छाया कर्मी" औ "छाया देत फल"
यातैं यह वार्ता सिद्ध हुई:- १ जीवके स्वरूपमैं जो आभासअंश है सो पुण्यपाप करैहै औ तिनका फल मोगैहै । औ-
२ ईश्वरमैं जो आभासअंश है सो कर्मका फल देवहै ॥ औ-
१ दोनूंविपै जो चेतनअंश है तिसविपै किसी वातका जोग नहीं ।
२ जीवमैं जो चेतनअंश है ताविपै तौ कर्म औ फलका जोग नहीं ।
३ ईश्वरमैं जो चेतनअंश है है तामैं फल- देनैका जोग नहीं है ॥
ता चेतनमैं जो कहैहै सो मूरख है ।
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काहैं? चेतन दोऊँसौंवैं असंग है औ एकरूप है। चेतनमें भेद नहीं। जीवचेतनकूं जो ईश्वरचेतनसैं अथवा ईश्वरचेतनकूं जो जीवचेतनसैं भिन्न कहीये न्यारा जानै, सो कुलोग कहीये निंदन करनेयोग्य लोक हैं॥
या कहनेंतैं दूसरा जो प्रश्न कियाथा जो "जीव औ परमात्माकी एकता अंगीकार करनैंतैं कर्म निष्फल होवैगा" ताका उत्तर कछ्या:- जो जीव औ ईश्वरमें चेतनभाग है, तिनका तौ अभेद है औ आभासका भेद है, यातैं दोऊँ प्रकारके वचन वनैंहैं॥ ९२ ॥
॥ १७५ ॥ जीवब्रह्मके लक्ष्य अर्थका अभेद है॥
॥ चौपाई ॥ अहो सिष्य तैं प्रश्न जु कीनै। तिनके ये उत्तर मैं दीनै॥ कहे जु तैं तरुमें ढैं पंछी। इक भोगै इक आहि अनिच्छी ॥ ९३ ॥
ते चैतन आभास लखायै। नभ छाया ज्यूं भिन्न बतायै। कह्यो भिन्न कर्मी फलदत्ता। मति माया छाया सो ताता ॥ ९४ ॥
जीव इसमें चेतनरूप। भेदगंधतैं रहित अनूपं॥ यातैं "अहं ब्रह्म" यह जानौ। "अहं" शब्द कूटस्थ पिछानौ ॥ ९५ ॥
"ब्रह्म" सब्दको अर्थ सु भाष्यो। महाकास सम लच्छ्य जु राख्यो ॥ "अहं ब्रह्म" नहिं जौलौं जानै। तौलौं दीन दुःखित भय मानै ॥ ९६ ॥
टीका:- हे सिष्य ! जो तैंनैं प्रश्न करे तिनकें मैं उत्तर कहैहैं। १ जो तैं कछ्याथा:- "एकवृक्षमें दोपक्षी हैं, एक ओछे हैं औ एक इछालतें रहित है, यातैं जीवब्रह्मकी एकता वनै नहीं" याकाहमैनैं उत्तर कछ्या:- जो "या स्थानमें जीवब्रह्मका ग्रहण नहीं करना, किंतु कूटस्थ औ बुद्धिमें जो आभास तिनका ग्रहण करना, सो आपसमें घटाकाश औ आकाशकी छायाकी न्यांई भिन्न है"। औ- २ जो तैं प्रश्न कियाथा:- "जीव तौ कर्मउपासना करनैवाला है औ परमात्मा फल दैनैवाला है, तिनकी एकता वनैनैहीं" याकावी हमनैं योंहि उत्तर कछ्या:- १ "जो कर्म करनैवाला जीव नहीं है औ फल दैनैवाला ईश्वर नहीं हैं; किंतु जीवमें जो आभास-अंश है सो करैहै। २ ईश्वरमें जो आभास अंश है सो फल दैहै औ- ३ जीवईश्वरमें जो चेतन-अंश है सो घटाकासमहाकासकी न्याई भेदका जो गंध कहिये लेश, तासैं रहित है।
इसरीतिसैं हे सिष्य ! जीव औ ब्रह्मकी एकता वनैहै, यातैं "अहं कहिये 'मैं' ब्रह्म हूँ" यैसैं तू जान। १ अहंशब्दका अर्थ तौ कूटस्थकूं पिछान। २ ब्रह्मशब्दका जो महाकाशके सम लक्ष्य अर्थ कछ्या है सो जान।
"अहं" शब्दका औ "ब्रह्म" शब्दका वाच्यअर्थका अभेद नहीं थी है; परंतु लक्ष्य अर्थका अभेद है। औ हे सिष्य ! -
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९८ ॥ "अहं ब्रह्म" यह ज्ञान किसकूं होवैहै? हस प्रश्नका उत्तर १७७-१८३ [ विचारसागरे
१ जवलगं तूं 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसैं नहीं जानैगा तवलगं तूं अपनैकूं दीन मानैगा औ दुःखी मानैगा। औ—
२ न्यारा जो परमात्मा जान्याहै, सो तेरेकूं भयका हेतु होवैगा! यातैं "मैं ब्रह्महूं" ऐसैं जानि॥ १७८-१७९॥
॥ १७९ ॥ प्रश्न:- "अहं ब्रह्म" यह ज्ञान किसकूं होवैहै?
॥ तत्वहष्टिरुवाच ॥
॥ दोहा ॥
कहो गुरु है कौनकूं, "अहं ब्रह्म" यह ज्ञान?। नाहिं जानूं मैं आपने, भाखै बिना सुजान ॥ ९७ ॥
टीका:- हे गुरू! आप कृपाकरिके कहौ। 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा ज्ञान किसकूं होवैहै? आपके कहैविना यह वार्ता मैं जानूं नहीं हूं।
शिष्यकै चित्तमैं यह गूढ अभिप्राय है:- १ "मैं ब्रह्म हूं" ऐसा ज्ञान कूटस्थविपै होवैहै? २ अथवा आभाससहित बुद्धिमैं होवैहै?
१ जो कूटस्थमैं कहौंगें तौ कूटस्थ विकारी होवैगा। औ—
२ आभाससहित बुद्धिमैं कहौंगें तौ वाक्यलूं "मैं ब्रह्म हूं" ऐसा ज्ञान आंतीलरूप होवैगा। कहैंतैं? आपनै ऐसैं पूर्वै कह्याजो "कूटस्थकी औ रक्षककी एकता है, औ आभास भिन्न है" यातैं कूटस्थ भिन्न जो आभास, ताका ब्रह्मरूप-करिके जो ज्ञान सो आंतिही होवैगा। जैसे रज्जुसर्पैं भिन्न जो रज्जु, ताका सरपूपकरिके ज्ञान भ्रांतिही होवैगा।
भ्रांति है। इसरीतिसैं आभाससहित बुद्धिलूं "मैं ब्रह्म हूं"यह ज्ञान यथार्थ नहीं होवैगा, किंतु आंतिरूप होवैगा। औ—
जो कदाचित् "अहं ब्रह्मास्मि" इस ज्ञानकूं भ्रांतिलूपही अंगीकार करौंगें तौ या ज्ञानतैं सिद्धान्तकी निवृत्ति नहीं होवैगी। किंतु यथार्थज्ञानसैं मिथ्याकी निवृत्ति होवैहै। जैसे रज्जूकै यथार्थज्ञानसैं मिथ्यारसर्पकी निवृत्ति होवैहै। इसरीतिसैं आभाससहित बुद्धिलूं "मैं ब्रह्म हूं" यह ज्ञान बनै नहीं ॥ ९७ ॥
॥ गतप्रश्नका उत्तर ॥ १७७-१८३ ॥
॥ १७७ ॥ आभासकी सप्तअवस्थाके नाम ॥ १७७-१७८ ॥
॥ श्रीगुरुवाच ॥
॥ सोरठा ॥
कहूं अवस्था सात, सुन सिष्य व आभासकी, नाहिं चेतनकी तात, तिनहीमैं यह ज्ञान है ॥ ९८ ॥
टीका:- हे शिष्य! अवं आभासकी सात-अवस्था मैं कहूं सो तू सुन:-
[ अवकी ठौर वकार पढ्याहै ]
तिन सात अवस्थामैं कोई वी चेतन जो कूटस्थ ताकी नहीं है औ "मैं ब्रह्म हूं" यह ज्ञान वी तिन सातकै भीतरही है ॥ ९८ ॥
॥ १७८ ॥ अथ सप्तअवस्था नाम ॥
॥ चौपाई ॥
इक अज्ञान आवरन सु जानौ। भ्रांति द्विविध पुनि ज्ञान पिछानौ ॥
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सोकनास अतिहर्ष अपारा । सप्त अवस्था इम निर्धारा ॥ ९९ ॥ अर्थ स्पष्ट ॥ ९९ ॥
॥ १७९ ॥ अथ १ अज्ञान औ २ आवरणस्वरूपवर्णन ॥
॥ दोहा ॥ "नहिं जानूं मैं ब्रह्मकूं," यादूं कहत अज्ञान ॥ "ब्रह्म है न नहिं भान है," यह आवरन सुजान ॥ १०० ॥ टीका:--हे शिष्य ! १ "मैं ब्रह्मकूं नहीं जानूं" यह जो पुरुप कहैं, या व्यवहारका हेतु अज्ञान है ।
२ "ब्रह्म है नहीं औ भान नहीं होवैहै" इस व्यवहारका हेतु आवरणहै । आवरणसैं यह व्यवहार होवैहै । कहैंतैं ? दो प्रकारकी अज्ञानकी शक्ति है:-( १ ) एक तौ असत्पापादक है; औ ( २ ) एक अभानापादक है । तिन दोनूंका आवरण कहैंहैं ।
(१) "वस्तु नहीं है" ऐसी प्रतीति करावनै- वाली जो शक्ति सो असत्पापादक कहियेहै । औ- (२)"वस्तुका भान नहीं होवैहै" ऐसी प्रतीति करावनैवाली जो अज्ञानकी शक्ति सो अभानापादक कहियेहैं ।
(१) इसरीतिसैं "ब्रह्म नहीं है" इस व्यवहा- रकी हेतु अज्ञानकी असत्पापादक- शक्ति है । औ-
॥ १८५ ॥ देह, प्राण, इंद्रिय औ अंत:करणसहित चिदाभास, इनके जन्मादिक संबंधविशिष्ट केवलधर्म- रूप संवंधिनकी वा संवंधविशिष्ट धर्मीसहित धर्मीरूप संवंधिकी भारमामैं अपनै विषयसहित प्रतीति औ
(२) "ब्रह्म भान नहीं होवैहै" इस व्यवहादारकी हेतु अज्ञानकी अभानापादकशक्ति है ।
॥१८०॥ अथ भांतिवर्णन ॥ ॥ दोहा ॥ जन्ममरन गमनागमन, पुन्यपाप सुखखेद । निजस्वरूपमैं भान नहै, भ्रांति वखानी वेद ॥ १०१ ॥
टीका:-जन्मसैं आदिलेके जो संसार है, ताकी जो निजस्वरूप कहिये कूटस्थमैं प्रतीति, सो वेदमैं 'भ्रांति' कहियेहै औ याहीकूं शोक कहैंहै ।
॥ १८१ ॥ ४-५ अथ द्विविधज्ञानवर्णन ॥ ( परोक्ष औ अपरोक्ष ) ॥ दोहा ॥ द्विविध ज्ञान वखानिये, इक परोक्ष अपरोक्ष । "अस्ति ब्रह्म" परोक्ष है, "अहं ब्रह्म" अपरोक्ष ॥ १०२ ॥
"नोहूं ब्रह्म" या अंसको, करै परोक्ष विनास । सकल अविद्याजालकूं, दूजो नसै प्रकास ॥ १०३ ॥
भात्माके तादात्म्यसंबंधकी वा सत्यादिक धर्मनके संबंधकी अनात्मामैं अपने विषयसहित प्रतीति, सो अध्यास कहियेहै । याहीकूं भ्रांति, विशेष औ शोक भी कहतहैं ।
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१०० ॥ "अहं ब्रह्म" यह ज्ञान किसको होवैहै ? इस प्रश्नका उत्तर १७७-१८३॥ [ विचारसागरे
नहीं सुखदुःखको लेस । किंतु अज्ञानकूटस्थ मैं, भांतिनाश यह वेस ॥ १०४॥
टीका:- १ मेरेधपै जन्म औ मरण नहीं, औ- २ सुखदुःखका लेश वो नहीं है । ३ और कोई भी संसारधर्ममें मेरेधपै नहीं है । किंतु- ४ अज्ञान कहिये जन्मसैं रहित जो कूटस्थ, "सो मैं हौं" हे शिष्य ! इसरीतिसैं सर्व अनर्थका जो निपेध यह भ्रांतिनाशका वेस कहिये स्वरूप है । अथवा यह भ्रांतिनाश वेस कहिये उत्तम है । या जगै कूटस्थमैं जन्मका निपेध करनैतैं सर्वका निपेध जानि लेना । कहैंतैं ? जन्मप्रतीतिसैं अनंतर और अनर्थ प्रतीत होवैहैं, यातैं जन्मके निपेधतैं सर्व अनर्थका निपेध है । यह जो भ्रांतिनाश है, याहीकूं शोकनाश भी कहैंहैं ॥ १०४ ॥
टीका:- १ "ब्रह्म नहीं हैं" या आवरणके अंशकूं "ब्रह्म है" ऐसा परोक्षज्ञान विरोधारहे । कहैंतैं ? "सत्यज्ञानअनंतरूप ब्रह्म है" ऐसा जो ज्ञान, ताका नाम परोक्षज्ञान है । सो "ब्रह्म नहीं हैं" ऐसी प्रतीति विरोधी है; औरका नहीं । ओ- २ "मैं ब्रह्म हौं" ऐसा जो अपरोक्षज्ञान, सो सकल अविद्याजालका विरोधी है । या कारणतैं- (१) "मैं ब्रह्महौं नहीं जानौंहूं" यह अज्ञान । औ- (२) "ब्रह्म नहीं है" और "मान नहीं होवैहै" यह आवरण । औ- (३) "मैं ब्रह्म नहीं हौं, किंतु पुण्यपापका कर्त्ता औ सुखदुःखका भोक्ता जीव हौं" यह भ्रांति । इतना जो अविद्याजाल है ताहकूं अपरोक्ष- ज्ञान नाश करैहै ॥ १०२-३ ॥ ॥ १८२ ॥ ६ अथ भ्रांतिनाशवर्णन ॥ दोहा ।। जन्ममरण मोमें नहीं,
॥ १८६ ॥ देखे काल औ वस्तुतैं जाका अंत कहिये परिच्छेद होवै नहीं, ऐसा जो सर्वदर्श सर्व- काल औ सर्ववस्तुविशेषै व्यापकवस्तु, सो अनंत कहियेहै । याहीकूं विशु औ भ्रूमा भी कहतेंहैं । १ ब्रह्म जातैं सर्वदेशाविशेषै व्यापक है यातैं ताका घटकी न्याई किसी देसतैं अंत नहीं । औ- २ ब्रह्म जातैं उत्पत्ति अरु नाशतैं रहित होनैक- र्ते नित्य है, यातैं ताका देहकी न्याई कालतैं अंत नहीं । औ- ३ ब्रह्म जातैं घटशरावादिकविर्षै भ्रुगत मृतिका- की न्याई अपने स्वरूपमैं अध्यस्त सर्वकार्य- का आत्मा है । यातैं ताका घटपटादिकके भेदककी न्याई किसी वस्तुतैं भेदरूप अंत नहीं । जातैं ब्रह्मदेशकालवस्तुकृतअंततैं रहित है, यातैं सो श्रुतिविशेषै अनंतरूप कह्याहै । इहां अनंतरूप कहनेकैरी "आनंदरूप ब्रह्म" है यह कथन अर्थतैं सिद्ध होवैहै । कहैंतैं ? छांदोग्य- उपनिषद् 'श्वैते केतवे' प्रसंगमैं नारदके प्रति सनकादिक गुरुनै कहाहै:- "जो भूमा ( परिपूर्ण ) है, सो सुखरूप है । अल्प (परिच्छिन्न) विषे सुख नहीं है" इसीरीतिसैं कह्याहै । "यांतैं जो अनंतरूप है सो भूमा है सो आनंदरूप है" यह जानना ।
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॥ १८३ ॥ ७ अथ हर्षस्वरूपवर्णन ॥
॥ दोहा ॥ ।। दोहा ।।
संसरयहित स्वरूपको, होइ जु अद्वयज्ञान । तव उपजे हिय मोद तव, सो तूं हर्षै पिछान ॥ १०५ ॥
टीका:-हे शिष्य ! जत तेरेकूं संसार- रहित अपने स्वरूपका ऐसा ज्ञान होवैगा, जो " मैं अद्वय ब्रह्मरूप हूं " तव तेरेकूं जो मोद होवैगा, ताह्रूं तूं 'हैपै पिछान ॥ १०५ ॥
॥ दोहा ॥
कही अवस्था सात मैं, तोकूं शिष्य सुजान । सो सगरी आभासकी, है तिनहींमैं ज्ञान ॥ १०६ ॥
"ज्ञान होत है कौनकूं ? " यह पूछी तैं वात । मैं ताको उत्तर कह्यो, चहै सु पूछ व तात ॥ १०७ ॥ अर्थ स्पष्ट है ॥ १०६ ॥ १०७ ॥
॥ १८४ ॥ ग्रंथ:-वहासैं भिन्न आभासकूं "मैं ब्रह्म" यह ज्ञान मिथ्या होवैगा । (अंक १७६ गतप्रकाशका गूढ अभिप्राय ।)
जा गूढ अभिप्रायैं प्रश्न किय्या था, ताह्रूं अब शिष्य प्रगट करैहै:-
॥ १८७ ॥ याही हर्षका श्रीविचारण्यस्वामीने पंचदशीके तृसिदीपविपै ' निरंकुशांचिन्ति ' ऐसा
भगवन है आभासकूं, "अहं ब्रह्म" यह ज्ञान । तुम भाष्यो सो मैं लख्यो, तुमि संका इक आन ॥ १०८ ॥ चौपाई ॥
है आभास ब्रह्मतैं न्यारा । अस तुम पूर्व कियो निधारा ॥ "अहं ब्रह्म" सो कैसे जानै ? । आपहि भिन्न ब्रह्मतैं मानै ॥ १०९ ॥
जो जानै तौ मिथ्याज्ञान । होई जेवरि भुजग समाना ॥ श्रीगुरु यह संदेह मिटाऊ । युक्तिसहित निजकक्ति सुनाऊ ॥११०॥
टीका:-हे भगवान् ! आपनेै यह पूर्व कथ्या जो:-"कूटस्थ औ ब्रह्म तौ दोनों एक हैं औ आभास ब्रह्मतैं न्यारा है " ता ब्रह्मसैं भिन्न आभासकूं "मैं ब्रह्म हूं" ऐसा ब्रह्मरूप- करिके ज्ञान चनै नाहीं ॥
१ "मेरा अधिष्ठान जो कूटस्थ सो ब्रह्मरूप है," ऐसा जो आभासकूं ज्ञान होवै तौ यथार्थज्ञान होवै । औ--
२ "अहं ब्रह्म" यह ज्ञान यथार्थ नाहीं चने । कहेतैं ? अहं नाम अपने स्वरूपका है । जानूं मैं कहिहैं सो आभासका स्वरूप मिथ्या है, यातैं मित्र है । यातैं ब्रह्मसैं भिन्न आभास- का जो स्वरूप वाकूं ब्रह्मरूपकरिके ज्ञान होवै तौ मिथ्याज्ञान होवै । जैसे सर्पसैं भिन्न
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१०२ ।। आभासकूं 'मैं ब्रह्म' यह ज्ञान मिथ्या होवैगै। इस प्रश्नका उत्तर [ विचारसागरे
जो जेवरी, ताका सर्परुपकरिके ज्ञान मिथ्या होवैहै। मिथ्या नाम आंतिका है। मो ब्रह्मज्ञानकूं आंतिरुप कहनां बने नहीं ॥१९०॥
उत्तर:-'अहं' शब्दके दो-अर्थ। तिनमें कूटस्थका ब्रह्मैं मुख्य-सामानाधिकरण्य, औ आभासका बाधसामानाधिकरण्य ।
।। दोहा ।।
'अहं' सब्दके अर्थको, सुन अब सिष्य विवेक। तव हियके जासूं नसै, संक कलंक अनेक ॥ १९१ ॥
वह यद्यपि आभासम, 'अहं ब्रह्म' यह ज्ञान । तथापि सो कूटस्थको,
।। ९८८ ।। इहां यह प्रश्नकर्ता शिष्यके प्रति प्रश्न है:-
१ 'ब्रह्मज्ञानका स्वरूप' मिथ्यांसंसरके अंतरगत मिथ्याचिदाभासके आाश्रित होवेंतें मिथ्या है, यातें 'मिथ्याज्ञानतें' मगजळकरि तृषाकी निवृत्तिकी नांई संसारकी निःःत्त्ति कैसैं होवैगी?' यह कहतें हो?²
२ 'अथवा तिस ज्ञानका विषय जो चिदाभास औ ब्रह्मकी एकता, सो सर्प औ जेवरीके एकताकी नांई मिथ्या है, यातें तिस विध्याविषयका ज्ञान वी मिथ्या है। यातें तिस मिथ्याज्ञानतें संसारकी निवृत्ति कैसैं होवैगी?' यह कहतें हो?
१ तिनमें 'ज्ञानका स्वरूप मिथ्या है' यह वार्तो हम वी अंगीकार करैहैं। परंतु तिस मिथ्याज्ञानसैं संसारकी निःःत्त्ति बनैहै। कहैंतें:-'जैसा यत्क तैसा मिथ्यासंसरार
लहै आप अभिमान ॥ १९२ ॥ ताको सदा अभेद है, विभुचेतनतें तात। बाध समै निजरुपहू, ब्रह्मरुप दरसात ॥ १९३ ॥
टीका:-हे सिष्य! यद्यपि 'मैं ब्रह्म हूं' ऐसा ज्ञान बुद्धिसहित आभासकूं होवैहै औ कूटस्थकूं नहीं, तथापि सो आभास कूटस्थकूं औ अपने स्वरुपकूं दोनूंचांकूं अपना आत्मा जानैहै। ता आत्माका 'मैं' शब्द-करिके ग्रहण होवैहै, सोई अहंरान्दका अर्थ है।
१ ता 'अहं' सब्दमें मान जो होवैहै कूटस्थ, ताका तौ ब्रह्मके साथ सदा अभेद है। जैसे घटाकाशका औ महाकाशका सदा अभेद है॥
इस्सीकारणतैं कूटस्थका ब्रसके साथ 'अभेद समानाधिकरण वेदांतशास्त्रमें कह्याहै॥
जा वस्तुका जा वस्तुके संग सदा अभेद होवै है, ताकी निवृत्तिर्य ज्ञान वी तैसा मिथ्याधी चाहिये ।
किंवा:-'समानसत्तावाले पदार्थ आपसमें साधक-बाधक हैं' इस नियमैं वी मिथ्याज्ञानतेंही मिथ्या-संसारकी निवृत्ति संभवैहै ।
मगजळकी औ तृषाकी समानसत्ता नहीं, किंतु त्रिमसत्ताकी यातें प्रातिभासिक मगजळसैं व्यवहारिक तृषाकी निवृत्ति संभवै नहीं। यह वार्ता आगें पंचमतरंगमें वी कहियेगी। औ—
२ 'चिदाभास अद्वै ब्रह्मकी एकतारुप ज्ञानका विषय मिथ्या है, यातें ताका ज्ञान वी मिथ्या है' यह द्वितीयपक्ष जो तुमनें प्रकट किया, सो संभवै नहीं ।
यह वार्ता अब १९८९ के अंकविपै प्रतिपादन करैहैं ॥ १८९ ॥
समानत्वभक्तिके वलकरि समान अधि करण कहियें अर्र्थरुप आाश्रय
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तां वस्तुकां ताके संग मुख्य समानाधिकरण कहियेहैं । जैसें घटाकाशका महाकाशके संग सदा अभेद हैँ । यांतें घटाकाश महाकाश है । इसरीतिसैं घटाकाशका महाकाशके साथ मुख्यसमानाधिकरण हैँ ॥
इसरीतिसैं कूटस्थका ब्रह्मके संग मुख्यसमानाधिकरण हैँ । कहैंतें? कूटस्थका ब्रह्मतैं सदा अभेद है, यांतें "मैं" शब्दमैं भान जो होवेंहैं कूटस्थ ताका तां ब्रह्मके संग सदा अभेद हैँ । औ—
२ "मैं" शब्दमैं भान जो होवेंहैं आभास ताका ब्रह्मसैं अपने स्वरूपकूं वाधिके अभेद होवेंहै । जैसें मुखका जो प्रतिबिंब ताका तिस-स्वरूप मुखके संग प्रतिबिंबस्वरूपकूं वाधिके अभेद होवेंहैं । इसीकारनतैं वेदांतशास्त्रमैं आभासका ब्रह्मके संग वाधसमानाधिकरण कहाहै ।
जो वस्तुका वाध होईके जाके संग अभेद होई तां वस्तुका ताके संग वाधसमानाधिकरण कहियेहैं ।
( १ ) जैसें मुखके प्रतिबिंबका वाध होयके मुखके साथ अभेद होवेंहैं, यांतें प्रतिबिंब मुखके साथ वाधसमानाधिकरण हैँ । न्यारा नाहीं । ऐसा प्रतिबिंबका मुखके साथ वाधसमानाधिकरण हैँ ।
जिनका, ऐसे जो दो शब्द, सो समानाधिकरण माहियेहैं, तिन दोनूं शब्दनका जो परस्परसंबंध सो सामानाधिकरण्य नाम एकअर्थवानपना कहियेहै ।
इहां 'समानाधिकरण्य' के स्थानमैं 'समानाधि-करण', पद्यहै, सो भापाके अभ्यासीजनोंकूं सुगमढवारअर्थ है ।
उक्तसामानाधिकरण्यरूप संबंध । जीवईश्वरकी एकताके बोधक एकविभक्तिवाले पदनकरि युक्त चारि वेदनके चारि महावाक्यनविपै तथा तिसप्रकारके अन्य लौकिक वैदिकवाक्यनविपै जानि लेना । तिनमैं
(२) किंवां जैसें—स्थाणुमैं पुरुपभ्रम होयके स्थाणुज्ञानसैं अनंतर "पुरुप स्थाणु हैँ" । इसरीतिसैं पुरुपका स्थाणुसैं वाधसमानाधिकरण होवेंहैं । तैसें आभासका वाध होईके ब्रह्म साथ अभेद होवेंहैं । यांतें "मैं" शब्दविपैं भान जो होवेंहैं आभास सो ब्रह्म हैँ । न्यारा नाहीं । ऐसा वाधसमानाधि-करण आभासका ब्रह्मके साथ होवेंहैं । इस-रीतिसैं हे शिष्य ! —
१ 'अहं' शब्दमैं भान जो होवेंहैं कूटस्थ, ताका तां मुख्य अभेद हैँ । औ— २ आभासका वाधकरिके अभेद हैँ ॥ १९२-१३ ॥
॥ १८६ ॥ प्रश्न:-—अहंवृत्तिविपै कूटस्थ औ आभासका भान कमसैं अथवा कम-विना होवेंहैं ? ॥
तत्वट्रिरुवाच ॥ दोहा ॥ अहंवृत्तिमैं भान न्है, साक्षी अरु आभास । सो कमतैं वा कम बिना, याको करहु प्रकास ॥ १९४ ॥
१ एकसत्ता गी एकस्वरूपवाले होनैकैरी वास्तवरूपकरहित दो अर्थनके बोधक वाक्यगत दो पदनका "मुख्यस्समानाधिकरण्य" कहियेहैं । जैसें घटाकाशपद अरु महाकाशपदका है श्रो कूटस्थपद अरु ब्रह्मपदका है ।
२ भिन्नसत्तावाले दो पदार्थनकी एकविभक्तिके बोधक वाक्यगत दो पदनका "वाधस्समानाधिकरण्य" कहियेहैं । जैसें स्थाणुपद अरु पुरुपपदका है, औ जगत् अरु ब्रह्मपदका है; औ शिंब अरु प्रतिबिंबपदका है ।
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१०४॥ "अहंच्चित्तिपै कूटस्थयामांसका भान कैसै होवैहै ?" इसका उक्तर॥१८७-२०५॥ विचारसागरे
टीका:- हे भगवन् ! आपनै कहा जो "अहंच्चित्तिमैं साक्षी अरु आभास दोनूंका भान होवैहै" याकैविपै मैं एक वार्ता नहीं जानूं । १ सो कूटस्थ औ आभासका भान अहंच्चित्तिविपै क्रमसैं होवैहै ? २ अथवा क्रमसैं बिना होवैहै ? याका अर्थ यह है:- १ क्रमसैं कहिये भूतभविष्य्कालमै भान होवैहै? २ अथवा दोनूंका एकही कालमै भान होवैहै ? याका आप मेरेदूँ प्रकाश कहिये बोध करो ॥ ११४ ॥
( गतप्रश्नका उत्तर'॥ १८७-२०५॥) ॥ १८७ ॥ एकही समय साक्षीका औ आभासका भान होवैहै ॥ श्रीगुरुरुवाच ॥ दोहा॥
सावधान व्है सिष्य सुन, भाखूं उत्तर सार । सुनत नसै अज्ञानतम, बोधभानु उजियार ॥११५॥ टीका:- हे सिष्य ! जो हैतैं प्रश्न किया मैं ताका सारभूत उत्तर कहूं । तूं सावधान हैकै सुन । कैसा उत्तर है ? याकै सुनतहूँ बोधरूपै सूर्यैका प्रकाश होयकै अज्ञानरूपी तमकूँ नाशै है ॥ ११५ ॥ ॥ दोहा ॥
एकसमयहि भान व्है, साक्षी अरु आभास ।
॥ १९० ॥ मूषा नाम लोहरचित वा वृत्तिका- दूजो चेतनको विषय, साक्षी स्वयंप्रकास ॥ ११६॥ टीका:- हे शिष्य ! एकही समय साक्षीका, औ आभासका अहंच्चित्तिविपै भान होवैहै । अंत:करणसहित आभासका ग्रहण करतैं । यातैं- १ दूजो कहिये अंत:करणहित जो आभास है, सो तौ चेतन जो साक्षी ताका विषय होवै है । औ- २ साक्षी स्वयंप्रकाशारूपकरिकै भान सहित वृत्ति, ताका विषय साक्षी नहीं । औ- घटादिक बाहिरकै पदार्थनविपै तौ ऐसी रीति है:- जब इंद्रियका औ घटका संयोग होवै, तब इंद्रियद्वारा अंत:करणकी वृत्ति निकसिकै घटके समान आकारकूँ प्राप्त होवैहै । जैसैं मृत्तिकामैं गढ़्या जो ताम्र, ताका मृत्तिकाके करणकी वृत्तिका भी घटके आकारके समान आकार होवैहै । सो वृत्ति आभासविना नहीं होवैहै, किंतु आभाससहित होवैहै । कहतैं ? वृत्ति अंत:करणका परिणाम है ।
जैसैं अंत:करण सत्वगुणका कार्ये होनैतैं स्वच्छ है, यातैं अंत:करणविपै चेतनका आभास होवैहै; तैसैं वृत्तिश्री स्वच्छ अंत:- करणका कार्ये है, यातैं वृत्तिविपै चेतनका आभास होवैहै औ वृत्ति जो उत्पन्न होवैहै सो रचित सांचे का है।
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वतुर्थस्तरंगः ४ ] ॥ पृथदी समय साक्षी औ आभासका भान होवैहै । इत्यादिक ॥ १०४
आभाससहित अंतःकरणसैं उत्पन्न होवेंहै । इस कारणतैं वी वृत्ति आभाससहितही होवेंहै । औ-
॥ १८८ ॥ अज्ञानका आश्रय औ विषय चेतन है ॥ विपय जो घट है सो तमोगुणका कार्य है, यातैं स्वरूपसैं जड़ है औ ताकैविपै अज्ञान औ ताका आवरण है । यामैं—
यह शंका होवैहै:-अज्ञान औ ताका आवरण विचारहैतसैं चेतनविपै है, घटविपै नहीं । कहैंतैं ? १ अज्ञान चेतनके आश्रित है औ २ चेतनहीकूं विषय करैहै । यह वेदांतका सिद्धांत है । औ—
१ सात अवस्थाके प्रसंगमैं जो अज्ञानका आभास कहा, सो आश्रय अंतःकरणसहित आभास कह्या, सो अज्ञानका अभिमानी है । "मैं अज्ञानी हूँ" ऐसा अभिमान अंतःकरणसहित आभासकूं होवैहै । इस कारणतैं अज्ञानका आश्रय कहिये औ मुख्य आश्रय चेतन है । आभाससहित अंतः-
करण नहीं । कहैंतैं ? आभाससहित अंतःकरण अज्ञानका कार्य है । जो ताका कार्य होवैहै, सो ताका आश्रय वनै नहीं । यातैं चेतनही अज्ञानका अधिष्ठानरूप आश्रय है । औ—
२ चेतनहीकूं अज्ञान विषय करैहै । सो अज्ञानकृत आवरण करणा विपय करना है । सो अज्ञानकृत आवरण जड़-वस्तुविपै वनै नहीं । कहैंतैं ? जड़वस्तु स्वरूपसैही आच्छादित है । ताकैविपै अज्ञानकृत आवरणका कुछ उपयोग नहीं ।
इसीतिसैं अज्ञानका आश्रय औ विपय चैतन्य है । जैसैं गृहके मध्य जो अंधकार है सो गृहके मध्यकूं आवरण करैहै, यातैं घटके
॥ १८९ ॥ जैसैं धनका मुख्य आश्रय कोष ( पेढीआदि धनका मंडारं ) है । जो "मैं घनी हूँ"-
ऐसा धनका अभिमानीरूप आश्रय पुरुष है । तैसैं
विपै अज्ञान औ ताका आवरण वनै नैं नहीं । ताका- ॥ १९० ॥ वाहरके पदार्थविपै वृत्ति औ आभास दोनूंकाका उपयोग है ।
तिसविपै अज्ञान-आवृत घटका उदाहरण है ॥ १९०-१९१ ॥
यह समाधान है:-जेसे चेतनके स्वरूपसैं भिन्न सत्-असत्सैं विलक्षण अज्ञान चेतनके आश्रित है, ता अज्ञानसैं चेतन आच्छादित होवैहै, तैसे घटके स्वरूपसैं भिन्न अज्ञान यदपि घटके आश्रित नहीं है, तथापि अज्ञाननै घटादिक स्वरूप रचेहैं, यातैं सदाही अंधके समान आच्छादित हैं । सो आच्छादितस्वभाव घटादिकनका अज्ञाननै
कियाहै । कहैंतैं ? तमोगुणप्रधान अज्ञानसैं भूतकी उपजिसैंतैं वेदांतिक उपजेह । सो तमोगुण आवरणस्वभाववाला है । यातैं घटादिक प्रकाश-
रहित अंधही होवेंहैं ।
इसीतिसैं अंधतारूप आवरण घटादिकमैं अज्ञानकृत स्वभावसिद्ध है औ घटादिकके अधिष्ठान-चेतन-आश्रित अज्ञान चेतनकूं आच्छा- दित करिके स्वभावसैं आच्छादित घटादिककूं वी
आच्छादित करैहै ।
यदपि स्वभावसैं आच्छादित पदार्थके आवरण- मैं प्रयोजन नहीं है), तथापि आवरणकर्ता पदार्थ प्रयोजनकी अपेक्षासैं विनाही निरावरण- की न्याय आवरणसहितमैं वी आवरण करैहै !
यह लोकमैं प्रसिद्ध है ।
तां अज्ञानसैं आच्छादित घटकूं व्याप जो होवैहै अंतःकरणकी आभाससहित घटाकारवृत्ति, तैं—
अज्ञानका मुख्य आश्रय चेतन है, औ अभिमानीरूप आश्रय आभास अंतःकरण है ॥
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१०६॥अहंवृत्तिविषै कूटस्थ औ आभासोंका भान कैसै होवैहै? इसका उत्तर १८७-२०५ [ विचारसागरे
१ वृत्तिभाग तौ घटके आवरणकूं दूरि करैहै । औ- २ वृत्तिमैं जो आभासभाग है सो घटका प्रकाश करैहै । इसरीतिसैं वाहिरके पदार्थविषै वृत्ति औ आभास दोनोंका उपयोग है ।
॥ १९० ॥ ॥ दृष्टांत-॥ जैसैं अंधकारमैं कुंडेसैं मृत्तिका अथवा लोहका पात्र ढकया धऽन्या होवै, तहां दंडेसैं कुंडेकूं फोडि वीर गैरे पीठे दीपकविना उस निरावरण पात्रका वीर प्रकाश होवै नहीं । किंतु दीपकसैं प्रकाश होवैहै । तैसैं अज्ञानसैं आच्छन्न जो घट, ताके आवरणकूं वृत्ति भंग वीर करैहैं । तथापि घटका प्रकाश होवै नहीं । काहेतैं ? घट तौ स्वरुपसैं जड है औ वृत्ति वीर जड है । ताकी आवरणभंगमैं प्रयोजन तैसैं प्रकाश होवै नहीं । यातैं घटका प्रकाशक आभास है ।
॥ १९२ ॥जहां श्रोत्रइंद्रियसैं शब्दविषयका प्रत्यक्ष होवै, तहां श्रोत्रद्वारा निकसी जो अंतःकरणकी वृत्ति सामासद्रवति, सो दूरदेसैवै घा समीपदेसैवै स्थित शब्के आकारके समान आकारकूं पावतिहै । तब वृत्तिसैं शब्का आवरण भंग होवैहै औ आभासभाग शब्का प्रकाश करैहै ।
२ जहां त्वकइंद्रियसैं स्पर्शगुण औ तिसके आश्रय घटादिकका प्रत्यक्ष होवै, तहां शरीररुप गोळककूं छोडिके वृत्ति वाहरि जाइ नहीं । किंतु शरीरकै क्रियासैं अथवा अन्यकी क्रियासैं शरीररुप गोळकके साथि संयोगकूं पाय जो घटादिकविषय ताकूं औ ताके आश्रित कठिनतादिरुप स्पर्शगुणकूं शरीररहूप गोळकमैंही स्थित हूई सामास्यंतःकरणकी वृत्ति विषय करैहै । ता इत्तिसैं आभाससहित स्पर्शका आवरण भंग होवैहै औ चिदाभास ताका प्रकाश करैहै ।
३ जहां रसनेहिंद्रियसैं रसविषयका प्रत्यक्ष होवै,
नेत्रका विपय जो वस्तु है, ताके प्रत्यक्ष-ज्ञानकी यह रीति कही औ श्रवणादिकका जो विपय है, ताके प्रत्यक्षकी वीर रीति ऐसैही जानी लेनौ ।
१ वृत्ति औ घट दोनों एकदेसमैं स्थित होतैं घटका ज्ञान प्रत्यक्ष कहियेहै । औ- २ अंतःकरणकी वृत्ति तौ घटाकार होवै औ घटके संग वृत्तिका संघटन न होवै; किंतु अंतरही वृत्ति होवै । सो घटका परोक्ष- ज्ञान कहियेहै ।
१ " यह घट है " ऐसा अपरोक्षज्ञानका आकार है । औ- २ " घट है " अथवा " सो घट है " ऐसा परोक्षज्ञानका आकार है । यद्यपि स्वातिज्ञान वीं परोक्षज्ञानही है, t तथापि स्वातिज्ञान तौ संस्कारजन्य है औ अनुमितिआदिक परोक्षज्ञान प्रमाणजन्य है । इतना भेद है । t तहां वी जिन्हारुप गोळकमूं छोडिके वृत्ति वाहरि जाइ नहीं । किंतु जिन्हारुप गोळकसैं जव रस- विषयका संयोग होवै, तब जिन्हाके अभिमंगवर्ती रसइंद्रियमैं स्थित सामासद्रवति रसकूं विपय करैहै । तहां वृत्तिसैं रसका आवरण भंग होवैहै औ चिदाभास मधुरादि रसका प्रकाश करैहै ।
४ जहां घ्राणइंद्रियसैं गंधका प्रत्यक्ष होवै, t तहां वी नासिकारुप गोळकसैं पृथ्वादिरुप गंधके आश्रयका घा तिसके सूक्ष्म अवयवनका जव संयोग होवै, तब नासिकाके अभप्रभागवर्ती घ्राणइंद्रियमैं स्थित सामास्यंतःकरणकी वृत्ति पृथ्वादिरुप गंधमात्रकूं ग्रहण नाम विषय करैहै । तहां इत्तिभागसैं गंधका आवरण भंग होवैहै औ वृत्तिमैं स्थित चिदाभासभाग गंधका प्रकाश करैहै । यह श्रोत्रादिकनका जो विषय है, ताके प्रत्यक्षकी रीति है ।
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॥ १९१ ॥ प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धिप्रमाण ॥ १०७
उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि-प्रमाणका कथन ॥ १९१-१९६ ॥ प्रमाणके प्रसंगैं हम प्रमाण निरूपण करैहैं:-
१ चार्वाक जो हैं, सो एक प्रत्यक्ष-प्रमाण अंगीकार करैहैं । औ—
॥ १९२ ॥ २ केणाद और सुगतमतके जो अनुसारी हैं, सो दूसरा अनुमान-प्रमाण वी अंगीकार करैंहैं । कहैंतें ? एक प्रत्यक्ष-ही प्रमाण अंगीकार करें तौ रसिके अर्थींकी भोजनविपैं प्रवृत्ति नहीं होवैगी । कहैंतें ? अशुक्त-भोजनविपैं रसिकी हेतुताक प्रत्यक्षप्रमाण-जन्य प्रत्यक्षज्ञान है नहीं । यातैं भुक्तभोजनमें जो करीहैं रसिकी हेतुता, सो अशुक्त-भोजनमें वी अनुमानतें जानिकै रेतिके अर्थींकी भोजनमें प्रवृत्ति होनतैं अनुमानप्रमाण वी अंगीकार करन्या चहिये । इसरीतिसैं केणाद और सुगतमतके अनुसारी प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण अंगीकार करैंहैं । औ—
॥ १९३ ॥ ३ सांख्यशास्त्रका कर्त्ता जो कपिल है, ताके मतके अनुसारी तीसरा शब्दप्रमाण वी अंगीकार करैंहैं । कहैंतें ? जो प्रत्यक्ष और अनुमान दोही प्रमाण अंगीकार
हैं पेसैं जो देहात्मवादी, वे लोकायत कहियेहैं । सिनैं विलक्षण जें व्याकाशविनां चारि भूतनकाही अंगीकार करैहैं, एसैं जें देहात्मवादी, वे चार्चाक कहियेहैं ।
॥ १९४ ॥ प्रत्यक्षप्रमाणका और प्रमाणका निरूपण वृत्तिरत्नावलिके द्वितीयरतनमैं शौ वृत्तिप्रभाकरके प्रथमप्रकाशमैं सविस्तर किया है ।
॥ १९५ ॥ वैशेषिक शास्त्रका कर्त्ता जाकूं कणसुकू वी कहतेंहैं ।
॥ १९६ ॥ बौद्धमतके ।
करैं तौ देशांतरविपै जाका पिता मरि गया होवैं, ताकूं कोई यथार्थवक्ता आनिके कहै "तैरा पिता मरि गया है" तथ श्रोताकूं पिताके मरनका निश्चय नहीं हुयाचाहिये । कहैंतें ? देशांतरविपै स्थित पिताके मरनका ज्ञान प्रत्यक्ष औ अनुमान करिकै यनैं नहीं । इसरीतिसैं कपिलमतके अनुसारी प्रत्यक्ष, औ अनुमान औ शब्द तैनी प्रमाण अंगीकार करैंहैं । औ—
॥ १९४ ॥ ४ न्यायशास्त्रका कर्त्ता जो गौतम है, ताके मतके अनुसारी उपमान वी चतुर्थप्रमाण अंगीकार करैंहैं । कहैंतें ? प्रत्यक्ष आदिक तीनिही प्रमाण अंगीकार करैं तौ जा पुग्वैं गैंवय नहीं देख्याहै औ वनवासीपुरुपैं ऐसा श्रवण कियाहै:-"गौके सदृश गवय होवैहैं" सो पुरुष जो वनमैं चल्याजावै औ गवयकूं देखि लैवै तथ चावकूं वनवासी पुरुपनैं कहै जो "गौके सदृश गवय होवैहैं" यह वाक्य, ताके अर्थका सरण होवैहै । ता स्मृतिसैं अनंतर पुरुपकूं एसैं ज्ञान होवैहै:-"यह पशु गवय है" । एसैं ज्ञान नहीं हुयाचाहिये । यातैं एसैं विलक्षणज्ञानका हेतु उपैंमानप्रमाण वी अंगीकार करैंहैं । औ——
॥ १९७ ॥ अर्थापत्तिप्रमाण शौ अनुमितिप्रमाका निरूपण वृत्तिरत्नावलिके द्वितीयरतनमैं शौ वृत्तिप्रभाकरके द्वितीयप्रकाशमैं कियाहै !
॥ १९८ ॥ शब्दप्रमाण शौ शाब्दीप्रमाका निरूपण वृत्तिरत्नावलिके पंचमरतनमैं शौ वृत्ति-प्रभाकरके तृतीयप्रकाशमैं कियाहै ।
॥ १९९ ॥ 'रोज' नामक पञ्चविशेष ।
॥ २०० ॥ उपमानप्रमाण शौ उपमितिप्रमाका निरूपण वृत्तिरत्नावलिके चतुर्थरतनमैं शौ वृत्तिप्रभाकरके पंचमप्रकाशमैं कियाहै ।
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१ ०८॥अथासंशयश्चित्से कुत्रस्थ औ भासकका भान कैसे होवैहै? इसका उत्तर ८७-२०५[विचारसागर
॥ १९५ ॥ ५ पूर्वमीमांसाका एकदेशी जो भट्का शिष्य प्रभाकर है, सो पंचम अर्थापत्तिप्रमाण वी अंगीकार करैहै। दिनमें भोजनत्यागी पुरुषकूं स्थूल देखिके ऐसा ज्ञान होवैहै:- “यह पुरुष रातिकूं भोजन करैहै ”। तहां रात्रीभोजनविना दिनमें भोजनत्यागीके विपै स्थूलता बने नहीं, यातैं रात्रीभोजनका स्थूलता संपाद्य है। रात्रीभोजन संपादक हेतु स्थूलताका ज्ञान अर्थापत्तिप्रमाण कहियेहै। औ-
करनैवाला ज्ञान है, सो प्रमा कहियेहै। स्मृतिज्ञान जो है सो प्रमा नहीं है। जो प्रमाण है सो प्रमा ताके आश्रित होवैहै औ स्मृति प्रमा ताके आश्रित नहीं। किंतु साक्षीके आश्रित अंगीकार करीहै औ भ्रांतिज्ञान औ संशय वी साक्षीके आश्रित अंगीकार कियेहैं। इसकारणतें स्मृतौ औ भ्रांति औ संशयज्ञान ये तीनूं आभाससहित अविद्याकी वृत्तिरूप हैं। अंतःकरणकी वृत्तिरूप नहीं। यातैं प्रमा ताके आश्रित नहीं, किंतु साक्षीके आश्रित हैं। जो अंतःकरणकी वृत्तिरूप ज्ञान होवैहै सो प्रमा ताके आश्रित होवैहै औ सोई प्रमा कहियेहै। स्मृतिज्ञान अंतःकरणकी वृत्ति नहीं, यातैं प्रमा ताके आश्रित नहीं; औ प्रमा वी नहीं, यातैं प्रमाके लक्षणविपै
अबाधितअर्थकूं विषय करनैवाला ज्ञान तौ स्मृतिज्ञान वी है, परंतु स्मृतिज्ञान स्मृतिसैं मिल्न नहीं है। यातैं अबाधित अर्थकूं विषय करनैवाला जो स्मृतिसैं मिल्न ज्ञान है, सो प्रैमा कहियेहै। या लक्षणविपै कोई दोष नहीं।
॥ १९८ ॥ स्मृतितज्ञान औ घटप्रमा के
विचारपूर्वक करणका लक्षण
॥ १९८-१९९ ॥
१ प्रमाणको जो करण है सो प्रमाण
कहियेहै।
२ स्मृतिसैं मिल्न जो अबाधित अर्थकूं विषय
करनैवाला ज्ञान हैं
तिनके मतमैं प्रमाके लक्षणविपै “स्मृतिसैं मिल्न” ऐसा नहीं कहनां। किंतु अबाधितअर्थकूं
॥ २०१ ॥ अथापत्तिप्रमाण औ प्रमाका निरूपण वृत्तिरन्वलिके षट्शास्त्रमैं औ वृत्तिप्रभाकरके पंचम-प्रकरणमैं कियाहैं। “इहां टीकाविपै दृष्टिदोषसैं संपाद्य
औ संपादक शब्दकां विपरीत लेख था सो वृत्तिप्रभाकर-के अनुसार हमनै यथास्थित घटायाहै। इहां संपाद्य
कार्य है औ संपादक कारण है।
॥ २०२ ॥ घटक अनुपलब्धिप्रमाण औ अनुपलब्धि-प्रमा का नाम अभावप्रमा का निरूपण वृत्तिरन्वलिके
समरस्नमैं औ वृत्तिप्रभाकरके षट्प्रकरणमैं कियाहै।
॥ २०३ ॥ वथार्थभतुमव प्रमा है। यह
प्रमाका लक्षण स्मृतिसैं व्यावृत्त नाम मिल्न है।
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विपय करनैवाला जो ज्ञान है सो प्रमा कहियेहै।
भ्रांतिज्ञान जो है सो अयथार्थकूं विपय नहीं करैहै, किंतु यथार्थकूं करैहै, यातें प्रमाका लक्षण भ्रांतिज्ञानमैं नहीं घटैहै।
जिनोंके मतमैं स्मृतिज्ञान विपैं भी प्रमाणव्यवहार है, तिनके मतमैं स्मृतिज्ञान अंतःकरणकी वृत्ति है। अविद्याकी वृत्ति नहीं। औ साक्षीके आश्रित व्दी नहीं; किंतु प्रमाताके आश्रित है। कहैंतैं ? अंतःकरणकी वृत्तिका आश्रय प्रमाताही बनैहै। साक्षी बनैं नहीं।
इसरीतिसैं स्मृतिज्ञान
१ किसीकै मतमैं तो अंतःकरणकी वृत्ति है। यातैं प्रमारूप है। औ—
२ किसीकै मतमैं अविद्याकी वृत्ति है। यातैं प्रमारूप नहीं है। औ—
आंतिज्ञान औ संशयज्ञान ये दोनों सर्वके मतमैं अविद्याकी वृत्ति है औ साक्षीके आश्रित हैं, यामैं कोई विवाद नहीं। औ—
॥ २०४ ॥ यथार्थज्ञान प्रमा है यह प्रमाका लक्षण व्दी स्मृतिसमाधारण है।
॥ २०५ ॥ इहां यह विशेष है:-
१ भ्रमरूप अनुबवके संस्कारसैं जन्य जो स्मृति है सो यथार्थकूं विपय करनैवाली होतैं अपयार्थ स्मृतिज्ञान है। याहितैं सो अविद्याकी वृत्ति है। अंतःकरणकी वृत्ति नहीं। औ साक्षीके आश्रित है; प्रमाताके आश्रित नहीं।
२ जो यथार्थ अनुभवके संस्कारसैं जन्य स्मृति-ज्ञान है सो अव्याधित अर्थकूं विपय करनैवाला होतैं यथार्थ ज्ञान है। याहितैं सो अंतःकरणकी वृत्ति है। अविद्याकी वृत्ति नहीं। औ प्रमाताके आश्रित है; साक्षीके आश्रित नहीं।
परंतु स्मृतिज्ञानमैं पूर्वोक्तरीतिसैं प्रमाणव्यवहार किया नहीं। यातैं दोनूंप्रकारकी स्मृति अप्रमा है। तिनमैं
विचारकरिके देखिये तो स्मृतिज्ञान व्दी अविद्याकी वृत्ति है औ साक्षीके आश्रित है। प्रमारूप नहीं। कहैंतैं ? जो वेदांतसंप्रदायके चेतता हैं तिनोंकूं प्रमात्वन पदप्रमाकरका कहाहै। ता पदप्रमाकरमैं स्मृतिज्ञान है नहीं। यातैं प्रमा नहीं। औ मतुपदंतसंनियोगिनि स्मृतिज्ञान साक्षीके आश्रिततही कहाहै।
॥ १९९ ॥ एक तौ प्रत्यक्षप्रमाण है;
दूसरी अनुमितिप्रमाण है; तीसरी उपमिति-प्रमाण है; चतुर्थी शब्दप्रमाण है;
पंचमी अर्थापत्तिप्रमाण है; औ पठ्ठी अभाव-प्रमाण है; ये पदप्रमाण हैं। औ—
पूर्व कहे जो प्रत्यक्षादिक पदप्रमाण हैं सो इनके कमतैं करण हैं।
प्रत्यक्षप्रमाका जो करण होवै सो प्रत्यक्ष-प्रमाण कहियेहै।
१ असाधारणकरण जो होवै, सो करण कहियेहै।
२ जो सर्वकार्यकै कारण होवै, सो सामान्यकरण कहियेहै।
॥ २०६ ॥ १ जो केतवल असाधारण करणकूं करण कहैं तो यहां दो असाधारण कारण होवें तहां कौनसा कारण करण है, यह निश्चय नहीं होवैगा।
२ जो कार्यकूं किसीद्वारा उपजावै सो व्यापार-करण कहियेहै। सोई करण है ॥ जैसे घटकूं जो है सो संयोगद्वारा घटकूं उपजावैहै। यातैं संयोग व्यापारवाला कारण है। सोई घटका करण व्दी है ॥
३ जो कार्यकूं किसीद्वारा उपजावै नहीं किंतु साक्षात् उपजावै सो केवळकरण है। करण नहीं ॥
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१ जैसे धर्मअधर्मादिक सर्वकार्यके कारण हैं, यातें साधारणकारण हैं ॥
२ सर्वकार्यका कारण न होवै । किंतु किसी कार्यका कारण होवै । सो असाधारण कारण कहियेहैं । जैसे दंड जो है सो सर्वकार्यका कारण नहीं । कित घटादिक जो कार्यविशेष हैं तिनका कारण है । यातें दंड असाधारणकारण कहियेहै और घटका करण भी कहियेहै ।
१ तैसे प्रत्यक्षप्रमाके ईश्वर औ ताकी इच्छासैं आदि लेके - तौ साधारणकारण हैं । ईश्वरसैं आदि लेके सर्वकार्यके कारण हैं, तिन बिना कोई कार्य होवै नहीं । यातैं ईश्वरादिक साधारणकारण हैं । औ-
२ नेत्रसैं आदिलेके जो इंद्रिय हैं सो प्रत्यक्षप्रमाके असाधारणकारण हैं । यातें नेत्रआदिक जो इंद्रिय हैं सो प्रत्यक्षप्रमाके करण हैं । इसरीतिसैं नेत्रआदिक जो इंद्रिय हैं सो प्रत्यक्षप्रमाण कहियेहैं ॥ २०० ॥ प्रमाता, प्रमाण, प्रमिति
औ प्रमेयचेतन ॥
यद्यपि इंद्रियैं वेदांतसिद्धांतविपै प्रमाज्ञानकी कारणता कहना यथै नहीं । कहैंतैं? चेतन के चारि भेद हैं:- १ एक तौ प्रमाताचेतन है औ २ दूसरा प्रमाणचेतन है औ ३ तीसरा
जैसे दो कपाळोंका संयोग घटकूं साक्षात् उपजावैहै, यातैं सो घटका केवळ कारण है । करण नहीं ।
यद्यपि उत्त करणका लक्षण. प्रत्यक्ष, अनुमान औ शब्द इन तीन प्रमाणनविषै घटततैहै तथापि उपमान, अर्थापत्ति, औ अनुपलब्धिष ये तीनप्रमाण उपमिति आदिक प्रमाणके निर्णयोपार कारण हैं । तिनमें उत्तकरणके लक्षणकी अवयाप्ति होवैगी यातैं
''व्यापारसैं मिल्न असाधारणकारण करण. कहियेहैं''
१ ताहीकूं प्रमितिचेतन है । ताहीकूं प्रमाचेतन थी कहैहैं औ ४ चौथा प्रमेयचेतन है । ताहीकूं विषयचेतन थी कहैहैं ॥ इसरीतिसैं प्रमा नाम चेतनका है सो नित्य है । इंद्रियजन्य नहीं । यातैं इंद्रिय ताका करण नहीं । तथापि चेतनमैं प्रमाणव्यवहारका संपादक वृत्ति वी प्रमा कहियेहै । ताके इंद्रिय करण हैं ॥
१ देहके मध्य जो अंतःकरण, ताकरिके अवच्छिन्न जो चेतन, सो प्रमाता कहियेहै ।
२ सोई अंतःकरण नेत्रादिक इंद्रियद्वारा निकसिके जितने दूरि घटादि विपय स्थित होवें उतना लंबापरिणाम अंतःकरणका होवैहै और आगे विपय जो घटादिक हैं, तिनसैं मिलिके जैसा घटादिकका आकार होवै तैसाही अंतःकरणका आकार होवैहै । जैसे कोठेमें रखा जो जल सो छिद्रद्वारा निकसिके लंबे नालेका आकार होयके केदारमैं जावैहै और
तिस आकारकूं जल प्राप्त होवैहै, तैसे अंतःकरण वी इंद्रियद्वारा निकसिके विपयरुपी केदारकूं जावैहै । तहां शरीर्सैं लेके घटादिक विपयपर्यंत जो अंतःकरणका नालेके समान परिणाम, ताकूं दृष्टिज्ञान कहैहैं ।
य करणका लक्षण निर्दोष है । कहैंतैं ? कहूं व्यापार है औ कहूं व्यापार नहीं है । दोनूं ठिकानैं व्यापारसैं मिल्नताके होवेंतैं ॥ २०७ ॥ यहां आदिदशब्दकारिके ईश्वरका ज्ञान,
ईश्वरका प्रयत्न, काल, दिशा, अदृष्ट, प्रागभाव औ प्रतिबंधकाभाव, इन सातका ग्रहण है । ये नव सर्व कार्यनके साधारणकारण हैं ॥
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३ वृत्तिज्ञानरूप जो अंतःकरणका परिणाम ताकूं प्रमाण कहैंहैं । जैसे केदारविपै जल जाइके केदारके समान आकार होवैहैं तैसैं घटादिक जो विपय हैं, तिनमें वृत्ति जाइके घटादिकके समान आकारकूं प्रात होवैहैं । ताकरिके अवच्छिन्न जो चेतन, सो प्रमाचेतन कहियेहैं ॥
४ ज्ञानके विपय जो घटादिक तिनकरिके अवच्छिन्न जो चेतन सो विपयचेतन कहियेहैं औ प्रमेयचेतन ही कहियेहैं ॥
यह वेदअर्थके जाननेंवाले जो आचार्य हैं तिनकी परिभापा है ॥
॥ २०१ ॥ अवच्छेदवादकी रीतिसैं प्रमाता औ साक्षीसहित विशेषण औ उपाधिका लक्षण ॥
यासैं इतना मेद है:-जो अवच्छेदवाद अंगीकार करैंहैं तिनके मतमें तौ--- १ अंतःकरणविशिष्ट जो चेतन है सो प्रमाता है औ सोई कर्त्ता भोक्ता है । औ- २ अंतःकरणउपहित साक्षी है ।
एकही अंतःकरण प्रमाताका तौ विशेषण है औ साक्षीकी उपाधि है ॥
नीलताका प्रवेश हैं औ पीतश्वेतादिकनसैं भिन्नताकरिके जनावैहैं । यांतैं न्यावर्तींक हैँ ॥
इसरीतिसैं नीलता घटका विशेषेपण है औ घट परिच्छेदक है । कहैंतैं ? पीतश्वेतादिकनतैं भिन्नता कहियै जुडाकरिके जनाइयैहैं ।
जो भिन्नताकरिके जनाइयै सो परिच्छेद्य कहियेहैं; न्यावलम्बी कहियेहैं; औ विशेष व्री कहियेहैं । औ "दंडी पुरुष है" या स्थानमैं वी पुरुषका दंड विशेषेपण हैँ ।
इसरीतिसैं प्रमाताका अंतःकरण विशेषेपण है । कहैंतैं ? प्रमाताके स्वरूपविपै अंतःकरणका प्रवेश है औ प्रमेय चेतनसैं भिन्नताकरिके प्रमाताके स्वरूपकूं जनावैंहैं । यांतैं न्यावर्तींक हैँ ।
जा वस्तुका स्वरूपविपै प्रवेश न होवैहैं औ न्यावर्तींक होवै सो उपाधि कहियेहैं ।
१ जैसैं न्यायशास्त्रके मतमैं करणशब्दुलीसैं अवच्छिन्न जो आकार है सो श्रोत्र कहियेहैं । या स्थानमैं करणशब्दुली श्रोत्रकी उपाधि है । कहैंतैं ? श्रोत्रके स्वरूपविपै तौ करण-शब्दुलीका प्रवेश है नहीं औ वाहिरके आकारतैं भिन्नताकरिके श्रोत्रकूं जनावैंहैं । यांतैं न्यावर्तींक हैँ । औ-
२ घटाकाश जो है सो मणपरिमाण अवकाश औ पदाथैंसैं भिन्नताकरिके वस्तुके स्वरूपकूं जो जनावैं सो न्यावर्तींक कहियेहैं ॥
जाइकूं भिन्नताकरिके जनावै सो न्यावर्त्त्य कहियेहै ।
जैसेँ "नीलघट" है या स्थानमैं घटका नीलता विशेषेपण है । कहैंतैं ? नीलघटकोविपै
॥ २०८ ॥ कार्यसैं संवंधी ॥
॥ २०९ ॥ आश्रयके . कार्यमैं असंबंधींपना
या स्थानमैं घटका प्रवेश है नहीं । घट पार्थिव है । ताकेवीप अवकाश देना वनै नहीं । यांतैं घटंकका स्वरूपमैं "अप्रवेश" कहियेहै ।
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६ १६२॥ आहचूंतसिवपै कूटस्थ औ आभासका भान कैसे होवैहै ?इसका उत्तर१८७-२०५ [विचारसागरे
करिके जनावैहै । यातैं मणउचकाकूँ अवचकाया देनैवाला जो आकाश ताकी घट उपाधि है ।
तैसैं अंतःकरणउपहित जो चेतन है सो साक्षी है । या स्थानमैं अंतःकरण साक्षीकी उपाधि है । कहैंतैं ? साक्षीके स्वरुपविपै तो अंतःकरणका प्रवेश है नहीं औ प्रमेयचेतनसैं साक्षीसूँ मिलिताकारिके जनावैहै । यातैं एकहा अंतःकरण साक्षीकी तो उपाधि है औ प्रमाता का विशेषण है । इसरीतिसैं—
१ अंतःकरणउपहित जो चेतन है सो तौ साक्षी है । औ—
२ अंकःकरणविशिष्टचेतन प्रमाता है ॥१—
१ जो उपाधिवाला होवै सो उपाहित कहियेहै । औ—
२ विशेषणवाला होवै सो विशिष्ट कहियेहै ।
जो अंतःकरणाविशिष्ट प्रमाता है मोहै कर्तामोक्ता मुखीदुःखी संसारी जीव है यह अवचछेदवादकी रीति है । औ—
॥ २०२ ॥ आभासवादकी रीतिसैं जीव औ साक्षीआदिकका लक्षण ॥
१ आभासवादमैं आभाससहित अंतःकरण जीवका विशेषण है! औ—
२ आभाससहित अंतःकरण साक्षीकी उपाधि है । यातैं—
१ साभास अंतःकरणविशिष्ट चेतन जीव है । औ—
२ साभास अंतःकरणउपहित चेतन साक्षी है ॥
यद्यपि दोनूंपक्षमैं विशेषणसहित चेतन जीव है, तथापि विशेष्यभाग जो चेतन है ताकैवपै तौ जन्ममरणसैं आदिलेके
॥ २१० ॥ अविवेकी जनौंकरि अंतःकरणरूप विशेषणके धर्मरुप संसारकाँ अज्ञानकृतत भौतिसैं
संसारका संमव है नहीं यातैं विशेषणमात्रमैं संसार है । सोई विशिष्टचेतनमैं प्रतीत होवैहै ।
१ कहूँ तौ विशेषणके धर्मका विशिष्टमैं व्यवहार होवैहै । औ--
२ कहूँ विशेष्यके धर्मका विशिष्टमैं व्यवहार होवैहै ।
२ कहूँ विशेषणाविशेष्य दानौंकै धर्मका विशिष्टमैं व्यवहार होवैहै ।
जैसैं दंडकरिके घटाकाशका नाश होवैहै । या स्थानमैं विशेषण जो घट है ताका दंड-
करिके नाश होवैहै, औ विशेष्य जो आकाश है ताका नाश bornै नहीं; तौ वी विशिष्ट जो घटाकाश है ताका नाश प्रतीत होवैहै । औ—
२ "कुंडलीपुरुप सोवैहै" या स्थानमैं कुंडल विशेषण है औ पुरुप विशेष्य है । किंतु विशेष्य जो पुरुप है ताकैवपै सोवना घनै नहीं ।
औ "कुंडलविशिष्ट सोवैहै" ऐसा विशिष्टमैं व्यवहार होवैहै । औ—
३ "शाखी पुरुप युद्रमैं गयाहै" या स्थानमैं विशेषण जो शाख औ विशेष्य पुरुष दोनूँ युद्रमैं गये हैं । यातैं दोनूँकै धर्मका विशिष्टमैं व्यवहार होवैहै ॥
या स्थानमैं १ अवचछेदवादमैं तौ अंतःकरण विशेषण है । औ—
२ आभासवादमैं साभासअंतःकरण विशेषण है । औ—
दोनूँ पक्षमैं चेतन विशेष्य है, ताकैवपै तौ जन्मादिसंसार बनै नहीं; किंतु विशेषण-
धर्म जो जन्मादिकसंसार ताका विशिष्टचेतनमैं व्यवहार करियेहै ॥
विशेषणसहित चेतनमैं प्रतीति जो कथनरुप व्यवहदार करियेहै ।
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व्यवहार नाम प्रतीति ओ कहनेकै है ॥ इस रीतिसैं आभासवाद औ अवच्छेदवादका भेद है ॥
॥ २०३ ॥ आभासवादकी श्रेष्ठता ॥ आभासवादमैं तौ अंतःकरण आभाससहित है औ अवच्छेदवादमैं अंतःकरण अवच्छेदसहित है । दोनूं पक्षमैं आभासवाद श्रेष्ठ है । कहैंतैं ?-
१ भाव्यकरणैं आभासवाद अंगीकार कियाहै ॥ ओँ— २ अवच्छेदवादमैं विद्याारणयस्वामीं दोप वी कथ्याहैं:-जो आभाससहित अंतःकरण अवच्छिन्नचेतनकूं प्रमतां मानैं तौ घट-अवच्छिन्नचेतन वी प्रमतां हुयाचाहिये । कहैंतैं ?
( १ ) जैसे अंतःकरण भूतनकै कार्य हैं तैसे घट वी भूतनकै कार्य हैं ॥ ओँ— ( २ ) जैसे अंतःकरण चेतनकै अवच्छेदक कहिये व्यवहारक है तैसे घट वी चेतनकै अवच्छेदक है । यांतैं अंतःकरणविशिष्टकी न्याई घटविशिष्ट वी प्रमतां हुयाचाहिये ॥ ओँ—
अंतःकरणमैं आभास अंगीकार कियेतैं यह दोप नहीं । कहैंतैं ? १ अंतःकरण तौ भूतनके सत्वगुणका कार्य हैं । यांतैं स्वच्छ है । ओँ— २ घटादिक भूतनके तमोगुणके कार्य हैं, यांतैं स्वच्छ नहीं ॥
१ जो स्वच्छ पदार्थ होवै सोई आभास-कै योग्य होवैहै । २ मलिन पदार्थ आभासके योग्य नहीं । जैसे काच औ ताका ढकना दोनूं प्रतिचि-के कार्य हैं । परंतु—
१ काच तौ स्वच्छ है, तामैं मुखका आभास होवैहै । वि. सा. १५.
२ ढकना स्वच्छ नहीं, यांतैं तामैं आभास होवै नहीं ॥ १ जैसे सतगुणका कार्य होनैं अंतःकरण स्वच्छ है । ताहीमैं चेतनका आभास होवैहै ।
२ शरीरादिक औ घटादिक तमोगुणके कार्य होनैं स्वच्छ नहीं । तिनमैं चेतनका आभास होवै नहीं ॥
॥ २०४ ॥ अंतःकरणमैं द्विविधप्रकाश है । यांतैं सोई प्रमतां है । अन्य नहीं ॥ इस रीतिसैं अंतःकरणमैं द्विविध प्रकाश हैं । एक तौ न्यापकचेतनका प्रकाश औ दूसर आभासका प्रकाश हैं ॥
शरीरादिक औ घटादिकनमैं एक व्याप्तचेतनका प्रकाश तौ है । दूसर आभासका प्रकाशा नहीं । यांतैं द्विविधप्रकाशसहित अंतःकरणविशिष्टही चेतन प्रमतां कहियेहै । एकप्रकाशसहित जो घटादिक तिन-मतमैं अंतःकरणमैं आभास नहीं । जिनकै मतमैं घटादिकनकी न्याई अंतःकरणमैं वी आभास-का दूसर प्रकाश तौ है नहीं ।
व्यापक चेतनका प्रकाश घटादिकनमैं है । यांतैं अंतः-करणविशिष्ट वा भीतविशिष्टचेतन वी प्रमतां हुवा-चाहिये ॥
इस रीतिसैं घटशरीरादिकनतैं अंतःकरणमैं यही विलक्षणतां है:- १ अंतःकरण सत्वगुणका कार्य है, यांतैं स्वच्छ होनेंतैं चेतनका आभास ग्रहण करनैकै योग्य है ।
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११४ अहंबुद्धिविपै कूटस्थ औ आभासका भान कैसै होवैहै ? इसका उत्तर १८७-२०५ [विचारसागरे
२ और पदार्थ स्वच्छ नहीं । यातैं आभास ग्रहण करनैके योग्य नहीं ॥
१ आभासग्रहणके भोग्य जो अंतःकरण ताकरिके संयुक्तही चेतन प्रमाता कहियेहै ।
३ घटादिक औ शरिरादिक आभासग्रहणके योग्य नहीं । यातैं तिनकरिके विशिष्टचेतन प्रमाता नहीं ॥ इस रीतिसैं आभासवादही उत्तम है । अवच्छेदवाद नहीं ॥
॥ २०५ ॥ प्रमातआदिक चारि चेतनका स्वरूप ॥
जैसे अंतःकरण आभाससहित है, तैसे अंतःकरणकी वृत्ति भी आभाससहितही होवैहै । साभासवृत्तिविशिष्ट चेतन प्रमाणचेतन कहियेहै ॥
अंतःकरणकी घटादिविपयाकार जो वृत्ति तामैं आरूढ चेतनकूं प्रमा औ यथार्थज्ञान कहैंहैं ॥
ताका साधन जो इंद्रिय सो प्रमाण कहिये है । कहैंहैं ? विपयाकारवृत्तिमैं आरूढचेतनकूं प्रमा कहैंहैं । तहां चेतन यथापि स्वरूपकारिके नित्य है । यातैं इंद्रियजन्यताके अभावतैं प्रमा चेतनका साधन इंद्रिय नहीं । तथापि निरुपाधिक चेतनमें तौ प्रमासंब्यवहार है नहीं । किंतु विपयाकारवृत्तियुपहित चेतनमें प्रमासंब्यवहार होवैहै । यातैं चेतनविपै प्रमासंबदकी प्रथितिमैं विपयाकारवृत्ति उपाधि है सो विपयाकार वृत्ति इंद्रियजन्य है । इंद्रिय ताका साधन है ।
॥ २११ ॥ यथापि आभासवादमें आभासकी कल्पना अधिक करनी होवैहै । अवच्छेदवादमें नहीं । यातैं आभासग्रादमैँ गौरव है । अवच्छेदवादमें लाघव है । तथापि मंदबुद्धिद्रालै जिज्ञासुकी बुद्धिमैं
प्रमापनैकी उपाधि जो वृत्ति ताको इंद्रिय जन्य होनै उपहित जो प्रमा सो वी इंद्रिय जन्य कहियेहै । यातैं इंद्रिय प्रमाका साधन कहियेहै । परंतु अंतःकरणका परिणाम सारा प्रमा नहीं कहियेहै । किंतु शरिरकै भीतर जो अंतःकरण ताको विपय घटादिकनेती करणका परिणाम । ताकूं प्रमा कहहै ॥
१ इस रीतिसैं वाहिरके पदार्थनका प्रत्यक्ष ज्ञान जहाँ होवै तहां अंतःकरणकी वृत्ति वाहिर जायकै विपय जो घटादिक तिनके समान आकाररूपकूं धारैहै । औ—
२ शरिरके भीतर जो आत्मा ताका प्रत्यक्ष होवै । तव अंतःकरणकी वृत्ति वाहिर जावै नहीं ।
१ ता वृत्तिसैं आत्माके आश्रित आवरण दूरी होवैहैं । औ—
२ आत्मा अपने प्रकाशतैं ता वृत्तिमैं प्रकाशहै !
इसी कारणतैं वृत्तिका विपय आत्मा कह्याहै औ चिदाभासरूप जो वृत्तिमैं फल ताका विपय आत्मा नहीं ।
या प्रकारतैं साक्षी आत्मा स्वयंप्रकाशरूप भान होवैहै, यह सिद्ध हुआ ॥ ११६ ॥
आभासवादका आरोप ठीक बैठताहै । या अभिप्राय सैं इहाँ आभासवादकी स्तुति करीहै । भाष्यकार आदिकनका वी यही तात्पर्य है ॥
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॥२०६॥ प्रश्नः-इंद्रियसंवंधविना “अहं ब्रह्म” यह ज्ञान प्रत्यक्ष कैसे बनै ? ॥ २०६-२१० ॥
॥ तत्वदष्टिरुवाच ॥ ॥ दोहा ॥
इंद्रियके संबंध बिन, “अहं ब्रह्म” यह ज्ञान । कैसे है प्रत्यच्छ प्रभु? मोकूं कहौ बखान ॥ १९७ ॥
टीका:-“ब्रह्मके अपरोक्षज्ञानतें सकल-अविद्याजालका नाश होवैहै । परोक्षज्ञानतें नहीं” यह पूर्वी कहा । ताके विपै शंका करैहै:- ब्रह्मका ज्ञान प्रत्यक्ष बनै नहीं । कहतहैं ? इंद्रिय-जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष होवैहै । ब्रह्मका ज्ञान इंद्रिय-जन्य बनै नहीं । कहतहैं ?
॥२०७॥ १ ब्रह्मकूं नेत्रककी अविषयता ॥ (रामकृष्णादिकनके शरीर ब्रह्म नहीं ॥) नेत्रइंद्रीतैं रुपवान्का अथवा नीलादिक रुपका ज्ञान होवैहै । ऐसा ब्रह्म नहीं । यातैं नेत्रइंद्रियजन्य ज्ञान ब्रह्मका बनै नहीं ॥
रामकृष्णादिकनकी जो मनुष्याकारमूर्ति है सो यद्यपि रुपवाली है तथापि सो मूर्ति मायारचित है । मिथ्या है । सो मूर्ति ब्रह्म नाहीं ॥ औ—
पुराणमैं रामकृष्णादिकनकूं ब्रह्मरुपता कहीहै सो तिनकी शरीररुप मूर्ति ब्रह्मरुप है, इस अभिप्रायतैं नहीं कही । किंतु तिनके शरीरका अधिष्ठानचेतन ब्रह्म है इस अभिप्रायतैं कहीहै । याके विपै—
ऐसी शंका होवैहै:-सर्वशरीरनका अधिष्ठानचेतन ब्रह्म है, यातैं अधिष्ठानचेतन- ब्रह्म है, यातैं अधिष्ठानचेतन ब्रह्म रामकृष्णादिकनकूं ब्रह्मरुपता कहीहोवै तौ सर्वशरीरनका अधिष्ठानचेतन ब्रह्म होवै तौ सर्वशरीरनकी ब्रह्मरुपता कहीहोवैगी ।
अभिप्रायतेैं रामकृष्णादिकनकूं ब्रह्मरुपता कही- होवै तौ सर्वशरीरनकी ब्रह्मरुपता होनैतैं मनुष्यपशुपक्षीआदिक सर्वही ब्रह्मारुप है । तिनके समानही रामकृष्णादिक होवेंगै । यातैं रामकृष्णादिकनकूं अधिष्ठानचेतन ब्रह्म है इस अभिप्रायतैं ब्रह्मरुपता नहीं कही । किंतु तिनकूं ओर जीवंततैं विशेषरुपताको सिद्ध-वास्ते तिनका शरीरही ब्रह्म है । ऐसा मानना योग्य है ॥
सो बनै नहीं । कहतहैं ? शरीरका बाध- करिके तिनके शरीरनकूं ब्रह्मरुपता मानै तौ— १ सर्वशरीरनका बाधकारिके सारेही शरीर ब्रह्मरुप हैं । औ—
२ बाध किये बिन तौ अन्य शरीरनकी न्याय हैं हेतुपादादिक अवयवसहित रुपवान क्रियावानुं शरीरका निरवयव निरुप अक्रिय ब्रह्मतै भेद बनै नहीं, यातैं रामकृष्णादिकनका शरीर ब्रह्म नहीं । परंतू
इतना भेद है:- १ जीवनके शरीर पुण्यपापके आधीन हैं । २ भूतनके कार्य हैं औ ३ जीवनकूं चेतनतैं अनात्म पदार्थनविपै अविद्या- वलतैं अहंअमध्यास है । आचार्यके उपदेशतैं ता अध्यासकी नृप्ति होवैहै । औ—
१ रामकृष्णादिकनके शरीर अपने पुण्य-पापतैं रचित नहीं । भूतनके कार्य नहीं । किंतु- (१) जैसैं सृष्टिके आदिमैं प्राणियोंके कर्म मागे देखतैं संभूख होतैं तव आपकाम ईश्वर- मैं वी प्राणियोंके कर्मके अनुसार “मैं जगतकी उत्पत्ति करलूं” ऐसा संकल्प होवैहै । ता संकल्पतैं जगतकी उत्पत्तिरुप सृष्टि होवैहै ।
(२) तैसैं सृष्टितैं अनंतर वी “मैं जगतका पालन करलूं” ऐसा ईश्वरका संकल्प होवैहै । ता संकल्पतैं जगतका पालन होवैहै ॥ कर्मनके अनुसार सुखदुःखका संबंध
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११६॥ प्रश्नः-इंद्रियसंवंधविना “अहं ब्रह्म” ज्ञान प्रत्यक्ष कैसे बने? ॥ २१०६-२१०॥ [ विचारसागरे
(३) ता पालनसंकल्पके मध्य उपासक पुर्षपन-की उपासनाके बलतैं ईश्वरकूं ऐेसा संकल्प होवैहैं:-“रामकृष्णादिकनैैसहित मूर्तिं सर्वकूं म्रतीत होवै” ता ईश्वरसंकल्पतैं विशेषणामरूप-रहित ईश्वरमैं रामकृष्णादिकनाम पीतांबरधरादि-स्यामसुंदरविग्रहरुपकी उत्पत्ति होवैहैं । सोे विग्रह केवलके अधीन नहीं ।
यद्यपि रामकृष्णादिक विग्रहतैं साधु औ दुष्टनकूं सुखदुःख होवैहैं । जो जाके सुख-दुःखका हेतु होवैहैं सो ताके पुण्यपापतैं रचित हो-वैहैं । यातैं पुण्यपापके आधीन कहि-रहेहैं । इसरीतिसैं-१ अवतारनके शरीर साधुपुरुषनकूं सुखके हेतु होनैं तैं साधुपुरुषनके पुण्यससुदाय-तैं रचित हैं ।
२ तैसैं असुरादिक असाधु पुरुषनकूं दुःखके हेतु होनैं तिनके पापतैं रचित हैं यातैं “अवतारनके शरीर पुण्यपापके आधीन नहीं” यह कहना नहींं संभव । तथापि जैसैं जीवने पूर्वशरीरमैं पुण्य-पापकर्म कियेहैं तिनका फल उत्तरशरीरमैं ता जीवकूं सुखदुःख होवैहैं । तहां शरीर-अभिमानी जीवके पूर्वशरीरके अपने पुण्य-पापके आधीन उत्तरशरीर कहिये है तैसैं रामकृष्णादिकनके शरीर यद्यपि साधुअसाधु-पुर्षनके पुण्यपापके आधीन हैं ओ तिनकूं सुखदुःखके हेतु हैं । परंतू रामकृष्णादिकके पुण्यपापतैं रचित अवतारशरीर नहीं औ तिनकूं अपने प्रारब्धतैं सुक्क्षमा तथा दुःखका योग होवै नहीं । यातैं रामकृष्णादिकनके शरीर अपने पुण्यपापके आधीन नहीं । यह संभवेैहैं ॥
२ तैसैं भूतनके परिणाम वी रामकृष्णा-दिकशरीर नहीं किंतु चेतनआश्रित मायाका परिणाम है ॥
( १ ) जो पंचीकृतभूतनके परिणाम होवै तो कृष्णशरीरविषे पञ्चकृत बंधनादिकनका अभान शास्त्रमैं कह्याहै, सो असंगत होवैगा ।
यद्यपि पंचभूतरचित सिद्धयोगीशरीरमैं वी बंधनादिक होवै नहीं तथापि योगीशरीरमैं प्रथम बंधनादिकनका संभव होवैहै । फेरि योगाभ्यासरूप पुरुषार्थतैं बंधनदाहादिकनकी योग्यता नाश होवै है ।
कृष्णादिकनके शरीरमैं योगकी न्याईं कछु पुरुषार्थतैं पंचभूतादिकनका अभान नहीं । किंतु तिनके शरीर सहजही बंधनादियोग्य नहीं ।
(२) मांडूक्यभाष्यकै टीकामैं आनंदगिरिनैं रामादिकशरीर भूतनके परिणाम कहैं हैं स्रूलदृष्टिसैं औरशरीरनके समान वे शरीर प्रतीत होवैंहैं इस अभिप्रायते कहैं । कहतैं ?
(३) भाष्यकारनैं गीताभाष्यमैं यह कह्याहै:-“जीवनके ऊपर अनुग्रहकरिके शरीरधारीकी न्याईं मायाके वलतैं परमात्मा कृष्णरूप प्रतीत होवैहैं । सो जन्मादिकरहित है । ताका वसुदेवद्वारा देहकीतैं जन्म घी मायातैं प्रतीत होवैहैं” इसरीतिसैं भाष्यकारनैं कृष्णशरीर मायाका कार्य कह्याहै ।
यातैं भूतनतैं अवतारशरीरनकी उत्पत्ति नहीं । किंतु तिनके शरीरनका उपादानकारण साक्षात माया है ॥
३ और जीवनकूं देहादिकनमैं आत्मभ्रांति रामकृष्णादिकनकूं नहीं । कहतैं ?
(१) जीवनकी उपाधि अविद्या मलिनसत्-गुणवाली है । रामकृष्णादिकनकी उपाधि माया शुद्धसत् गुणवाली है । यातैं जीवनकूं अविद्याकृत भ्रांति औ रामकृष्णादिकनकूं माया-कृत सर्वज्ञता होवैहै ॥
(२) जीवनकूं अज्ञानकृत आवरण औ उपदेशाजन्य ज्ञानकी अपेक्षा है । तैसैं रामकृष्णा-दिकनकूं आवरण औ भ्रांति नहीं । यातैं उपदेश-जन्य ज्ञानकी अपेक्षा नहीं । किंतु जीअंतःकरण-
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करणकी वृत्तिरूप ज्ञानकी नयाई ईश्वरकूं माया-की वृत्तिरूप आत्माका ज्ञान तौ उपदेशादिक विना वी होवैहैं । परंतु ता ज्ञांतैं कछू प्रयोजन तिनकूं सिद्ध होवै नाहीं । कहैंतैं ?
[ ९ ] जीवनकूं घटादिकनके ज्ञांतैं आवरण-मंग औ विपय जो घटादिक तिनका प्रकाश होवैहैं औ ब्रह्मरूपतैं आत्माकूं ज्ञाने जो जीवनकूं होवैहैं । तहैं—
( क ) ज्ञानका विपय जे आत्मा ताका आवरणमंग तौ ज्ञांतैं होवैहैं औ आत्माविपय स्वयंप्रकाश है ।
( ख ) यातैं आत्मज्ञानतैं विपयका प्रकाश होवै नाहीं । तैसैं ईश्वरकी मायाकी वृत्तिरूप जो 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा ज्ञान, ताका विपय ईश्वरका आत्मा सो आवरणरहित स्वयंप्रकाश है । यातैं आवरणमंग ता विपयका प्रकाश ईश्वरके ज्ञानका प्रयोजन नाहीं ।
[ २ ] जैसैं जीवनमुक्तविद्वानकूं निरावरण-आत्माकूं विपय करनैवाली अंतःकरणकी 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसी वृत्ति आवरणमंगादिक प्रयोजनविना मायाकी वृत्तिरूप 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा ज्ञान उपदेशादिकतैं विना होवैहैं ।
इसरीतिसैं रामकृष्णादिकनकूं जीवनतैं विलक्षणता ईश्वरता है तौ वी तिनका शरीर मायारचित है । यातैं ब्रह्म नाहीं किंतु मिथ्या है ।
मायानैं उत्पन्न कीया जो अवतारनका शरीर सो हस्तपादादिक अवयवसहित औ रूपसहित कियाहै । यातैं नेत्रइंद्रियका विपय तिनका शरीर होवैहैं । ब्रह्मकूं नेत्रइंद्रिय विपय करै नाहीं ।
॥ २०८ ॥ २ ब्रह्मकूं त्वचाइंद्रियकी अविषयता ॥
तैसैं त्वचाइंद्रिय वी स्पर्शकूं औ स्पर्शकै इंद्रिय बिन परतच्छ नहीं,
आश्रयकूं विपय करैहैं । ब्रह्म स्पर्शका आश्रय नहीं औ स्पर्श वी नाहीं । यातैं त्वचाइंद्रियका विपय नाहीं ॥
॥ २०९ ॥ ३-५ ब्रह्मकूं रसना प्राण औ श्रोत्रइंद्रियकी अविषयता ॥
रसनाइंद्रियनैं रसका ज्ञान, प्राणतैं गंधका ज्ञान औ श्रोत्रतैं शब्दका ज्ञान होवैहैं । रसगंध-शब्दतैं ब्रह्म विलक्षण है । यातैं रसना प्राण औ श्रोत्रतैं ब्रह्मका ज्ञान होवै नाहीं ।
॥ २१० ॥ ब्रह्मकूं कर्मइंद्रियनकी अविषयता ॥
कर्मइंद्रिय ज्ञानके साधन नाहीं किंतु वचनादिक्रियाके साधन हैं । यातैं तिनतैं तौ कसीका ज्ञान होवै नाहीं ।
इस रीतिसें कसीक इंद्रियनैं ब्रह्मका ज्ञान वनि नाहीं ।
औ इंद्रियनैं जो ज्ञान होवै सो ज्ञान प्रत्यक्ष कहिये है । अतःप्रत्यक्षकूंही अपरोक्ष कहैहैं ।
यातैं ब्रह्मका अपरोक्षज्ञान वनि नाहीं । किंतु शब्दसैं ब्रह्मका ज्ञान होवैहैं । जो शब्दसैं ज्ञान होवै सो परोक्ष होवैहैं । यातैं ब्रह्मका ज्ञान परोक्षही होवैहैं ।
( ॥ २०६-२१० गत प्रश्रका उत्तर ॥ २११-२१२ ॥ )
॥ २११ ॥ इंद्रियसंवंधविना प्रत्यक्षज्ञान होवै नाहीं । यह नियम नाहीं ॥
सुख-दुःखकी साक्षीभास्यता ॥
॥ श्रीगुरुरुवाच ॥
॥ दोहा ॥
इंद्रिय बिन परतच्छ नहीं,
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११८ ॥ इन्द्रियसंवन्धविना ' अहं ब्रह्म ' ज्ञान कैसैं होवै? इसका उत्तर २११-२१२ ॥ [ विचारसागरे
सिष्य यह् नियम न जान । जिन इंद्रिय प्रत्यच्छा है, जैसैं सुखदुःख ज्ञान ॥ ११८ ॥
टीका:-इन्द्रियसंवन्धविना प्रत्यक्षज्ञान होवै नहीं यह नियत नहीं । कहैंतै? जैसैं सुखकार दुःखका ज्ञान होवै सो किसौ त्रियत होवै नहीं । सो सुखदुःखका ज्ञान वी प्रत्यक्ष होवैहै । यातैं इन्द्रियसंवन्धतैं जो ज्ञान होवै सोई प्रत्यक्षज्ञान होवै यह नियम नहीं । किंतु विपय-वृत्तिका संवंध होवैकै विपयाकारवृत्ति जहाँ होवै तहां प्रत्यक्षज्ञान कहियेहै ॥
१ सो विपयतैं वृत्तिका संवंध कहूं इंद्रिय- द्वारा होवैहै । औ-
२ कहूं शब्दसैं होवैहै ॥ जैसैं “ दशम तूं है” इस शब्दतैं दशाम जो आप तातैं अंतःकरणकी वृत्तिका संवंध होवैहै । यातैं शब्दजन्य वी दशमका ज्ञान प्रत्यक्ष होवैहै ॥
॥ २१२ ॥ विषयचेतनका वृत्तिचेतनसैं अभेद- ही प्रत्यक्ष झ्ञानका लक्षण है । सो अभेद—
१ कहूं इंद्रियद्वारा होवैहै !
२ कहूं शब्दसैं होवैहै । औ-
३ कहूं इन्द्रियादिरूप वाधानिमित्तसैं विनाही शरीरके भीतर उपजी वृत्तिद्वारा होवैहै । तहां प्रत्यक्षज्ञान कहियेहै—
चेतनका स्वरुपसैं तो कहूं भेद है नहीं । किंतु विषय और वृत्तिरूप उपाधिका किया भेद है । सो उपाधि जब मिनदेसमें स्थित होवें । तब तिस उपाधि-वाले चेतनका भेद कहियेहै ।
जब-विषयाकारवृत्ति होवै तब दोनों उपाधि एक-देसाविषे स्थित होवैहै, यातैं तिस उपाधिवाले विषयचेतन औ वृत्तिचेतनका अभेद कहियेहै । सो विषयचेतनतैं वृत्तिचेतनका अभेदही प्रत्यक्षज्ञान
तैसैं प्रमाताकै सुखदुःख होवै तब सुखाकार अंतःकरणकी वृत्ति होवै । ता वृत्तिसैं सुखदुःखका संवंध होवैहै । यातैं सुख-दुःखका ज्ञान प्रत्यक्ष कहियेहै ॥
पूर्वंउत्पन्न सुखदुःख नष्ट हुये पीछे जहां लुप्तकै याद आवै तहां सुखाकार दुःखाकार अंतःकरणकी वृत्ति तो होवैहै । परंतु वृत्तिकै नष्ट हुये सुखदुःखतैं संवंध नहीं । यातैं सो ज्ञान स्मृतिरूप है, प्रत्यक्षरूप नहीं ॥
१ यद्यपि अंतःकरणके धर्म सुखदुःख साक्षीभास्य है, तथापि सुखाकार-दुःखाकार अंतःकरणकी वृत्तिद्वारा साक्षी सुखदुःखका प्रकाश करैहै ।
२ जो साक्षीभास्य पदार्थ हैं तिनकै वी साक्षी वृत्तिकी अपेक्षातैही प्रकाशैहै । जैसैं मुक्तिजनत साक्षीभास्य हैं तहां अविद्याकी वृत्तिकी अपेक्षाकरिकै साक्षी रजतकै प्रकाशैहै ।
१ परंतु सुखदुःखके प्रकाशमैं अंतःकरण- की वृत्ति साक्षीकी सहायक है । औ कहियेहै । याहीकूं अपरोक्षज्ञान औ साक्षात्कार वी कहतेंहैं ।
यह प्रत्यक्षज्ञानका लक्षण
१ इंद्रियजन्य चाक्षुषादिकके प्रत्यक्षज्ञानविषै अनुर्गत है । औ —
२ महावाक्यजन्य ब्रह्मके प्रत्यक्षज्ञानविषै अनुर्गत है । औ-
३ वाधानिमित्तसैं विन अंतर उपजे सुखदुःखके प्रत्यक्षज्ञानविपै अनुर्गत है । औ-
४ मायाकी वृत्तिरूप ईश्वरके ज्ञानविषै अनुर्गत है । औ--
५ अविद्याकी वृत्तिरूप रजजुसर्पादिकनके ज्ञान विषै अनुर्गत है ॥
प्रत्यक्षज्ञानके लक्षणका विशेष निर्णय दृृतीयतरंग-वलिके द्वितीयरत्नविषै कियाहै ॥
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२ मिथ्यार्जतादिकनके प्रकाशमैं अविद्या-की वृत्ति सहायक है । इस रीतिसैं साक्षीभास्य पदार्थके ज्ञानमैं वी वृत्तिकी अपेक्षा है ॥ १ सो वृत्ति जहां इंद्रियादिक वाव्यसाधनतें होवै ताका विपय साक्षीभास्य नहीं कहियेहै । सुखदुःखकूं विपय करनैवाली वृत्तिमैं वाव्यइंद्रियादिक हेतु नहीं । किंतु जव सुखादिक उत्पन्न होवें तिसी कालमैं अन्यसाधनकी अपेक्षाविना सुखाकारदुःखाकार अंतःकरणकी वृत्ति होवैहै । ता- वृत्तिमैं आरुढ साक्षी सुख-दुःखकूं प्रकाशैहै । यातैं सुखदुःख साक्षी-भास्य कहियेहैं ॥ औ— ॥ २१२ ॥ ब्रह्मका ज्ञान प्रत्यक्ष संभवेैहै ॥ तत्ववृत्तिकूं भेदब्रह्मका अंत ॥ वाध्य जो घटादिक हैं तिनसैं अंतःकरणकी
वृत्तिका संबंध नेत्रादिक इंद्रियद्वारा होवैहै । यातैं घटादिक साक्षीभास्य नहीं । तैसैं श्रुत्त्याकार अंतःकरणकी वृत्ति होवैहै सो अंतःकरणकी वृत्ति वाहिर नहीं जावैहै । किंतु शरीरके अंतरही होवैहै । ता वृत्तिसैं ब्रह्मका संबंध है । यातैं ब्रह्मका ज्ञान वी सुखदुःखके ज्ञानकी न्याई प्रत्यक्षरूप है । परंतु १ सुखाकारदुःखाकार वृत्तिमैं वाव्यसाधनकी अपेक्षा नहीं, यातैं सुखदुःख 'साक्षी-भास्य हैं ॥ औ— २ ब्रह्माकार जो अंतःकरणकी वृत्ति तामैं तौ गुरुद्वारा वेदवचनका श्रेत्रसैं संबंध वाध्य-साधन चाहियेहै । यातैं ब्रह्मैं साक्षी-भास्य नहीं । इस रीतिसैं जो विपयतैं वृत्तिका संबंध होवै, तहां प्रत्यक्षज्ञान कहियेहै ॥ "अहं ब्रह्मास्मि"
॥ २१३ ॥ जैसे:-१ चक्षुवृत्तै सूर्येकी अभेदता है तिसकूं अंगुल्यादिरूप स्तलपआावरणसैं आच्छादित भये ब्रांडवर्ती सूर्यका प्रकाश दीखता नहीं । औ—२ तिस आधारणके निवृत्त भये चक्षुगत अंतः-करणकी वृत्तिसैं ब्रांडवर्ती सूर्येकां प्रकाश दीखताहै । तैसैं:-१ साक्षीआमाविषै ब्रह्मकी अभेदता है तिसकूं अज्ञानांशरूप स्तलपआावरणसैं आच्छादित भये सर्वत्र परिपूर्णब्रह्म प्रकाश भासता नहीं । २ जब शरीरके भीतर उपजी ब्रह्मात्मकी अभेदताका आकार वृत्तिकरि उक्त आवरणका भंग होवै तव गृहगत साक्षीके असंगतादिकके ज्ञांकरी . महाकाशके असंगतादिके ज्ञानी
न्याईं सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्मका स्वप्रकाशताकारिके भान होवैहै ॥ ॥ २१४ ॥ जैसे ब्रह्म साक्षीभास्य नहीं तैसे ब्रह्म चिदाभाससहित अंतःकरणकी वृत्तिरूप प्रमााताप्रतिबिंब रहित केवलनेत्रके विपय दीपककी न्याईं अंतःकरण-वृत्तिका विपय ब्रह्म है । यातैं नकछ प्रमााताभास्य वी नहीं । किंतु अपने प्रकाशतैं अन्यप्रकाशककी अपेक्षा-रहित सर्वत्र प्रकाशक ऐसा स्वयंप्रकाशादारूप ब्रह्म है । वृत्ति की वलकेते मलकूं साबूनकी न्याईं ब्रह्मका आचरण भंग करैहै सोई ताका विपय करनाहै ।
औरप्रकारका विषय करनाहै वृत्तिका नहीं । औ—"अहं ब्रह्मास्मि " ऐसी वृतिरूप तत्ज्ञानकूं वाध्य-साधनकी अपेक्षाविना साक्षी प्रकाशताहै । यातैं सो तत्ज्ञान साक्षीभास्य है ।
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१२० ।। इन्द्रियसंवन्धाविना 'अहं ब्रह्म' कैसे वतै ? इसका उत्तर २११-२१२ ।। [ विचारसागरे
या वृत्तिका विषय जो ब्रह्म तासैं संवंध है । यातैं ब्रह्मका ज्ञान प्रत्यक्ष सींभवैहै । औ—
१ जहाँ भूमकूं देखिके अमिका ज्ञान होवैहै तहाँ भूमका ज्ञान तौ प्रत्यक्ष हैऔ अमिका ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं ! कहैतैं ? नेत्रद्वारा अंत:करणकी वृत्तिका धमैतैं संवंध है । यातैं भूमका ज्ञान प्रत्यक्ष कहिये है । औ—
२ अनुमानतैं अंत:करणकी वृत्ति शरीरके अंतर अधिके आकारकूं ग्रहण करनैवाली तौ हुइ । परंतू अमिसैं वृत्तिका संवंध नहैं । यातैं अमिका ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं ।
इसरीतिसैं जहाँ वृत्तिसैं विषयका संवंध होवै तहाँ प्रत्यक्षज्ञान कहियेहै ।
जहाँ वृत्तिसैं विषयका संवंध नहीं होवै, विषय वाहिर दूरी होवै अथवा भूत वा भविष्यात होतैं जो अनुमानतैं अध्यवसाय शब्दतैं विषयाकारवृत्ति अंतर होवै सो ज्ञान परोक्ष कहियेहै ।।
इंद्रियजन्य ज्ञानही प्रत्यक्ष होवैहै ! यह नियम नहीं । जैसैं सुखदु:खका ज्ञान इंद्रियजन्य नहीं
औ प्रत्यक्ष है । तैसैं दशमपुरुषका ज्ञान शब्द-जन्य है तौ भी प्रत्यक्ष होवैहै ।।
इस रीतिसैं श्रवण कियो जो महा-वाक्यरूप वेदशब्द तासैं उत्पन्न हुवै ब्रह्मज्ञान वौ प्रत्यक्षही संभवेहै ।। ११८ ।।
गुरुको अस उपदेश सुनी, तत्वदृष्टि बुद्धि मंत । ब्रह्मरूप लखि आत्मा, कियो भेदभ्रम अंत ।। ११९ ।।
'अहं ब्रह्म' या वृत्तिमैं, निरावरण है भान ।। दादू आदरूप सो, यूं हम लियो पिछान ।। १२० ।।
इति श्रीविचारसागरे उत्तमाधिकारी-उपदेशानिरूपणं नाम चतुर्थस्तरंग: समाप्त: ।। ४ ।।
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॥२१३॥ अष्टिका प्रश्न:-वेदगुरु सत्य होवै वा मिथ्या होवै ? दोऊरीतिसैं वेदगुरुतें अद्वैतज्ञान वने नहीं ॥
पूर्वतरंगमें यह कथा:-“गुरुमुखद्वारा श्रवण किये वेदवाक्यतें अद्वैतब्रह्मका साक्षात्कार होवैहैं ” ताकूं सुनिके अद्वैतनाम द्वितीयाशिष्य यह शंका करैहैं:-
१ वेदगुरु सत्य होवें तौ अद्वैतकी हानि । २ असत्य होवै तौ तिनतें पुरुषार्थकी प्राप्ति वने नहीं ।
दोऊरीतिसैं वेदगुरुतैं अद्वैतज्ञान वने नहीं ॥ चौपाई ॥
वेद रु गुरु जो मिथ्या कहिये । तिनतैं भवदुःख नस्यो न चहिये ॥ १ ॥ जैसैं मिथ्या मरुस्थलको जल । प्यासनासको नहिं तामैं बल ॥ सत्य वेद गुरु कहैं तु दैत भयो गयो सिद्धांत अद्वैत ॥
गूं संकरमत पेखि असुद्दा । तज्ज्यो सकल मध्यादि प्रबुद्धा ॥ २ ॥ [ "भयो" पदको प्रथमपादसैं अन्वय है ] यह संका भगवान् मुहि उपजै । उत्तर देहु दयाल न कुषिजै ॥
॥ २१४ ॥ शंकरमतकी प्रमाणता ॥ गुरु बोले सिपकी सुनि वानी । संकरको मत परम प्रमाणी ॥ ३ ॥ चारियार मध्वादिक जे'हैं । वेदविरुद्ध कहत सब ते हैं ॥
श्रौमें व्यासवचन सुनि लीजै । संकरमतहि प्रमाण करीजै ॥ ४ ॥ कलिमैं वेदअर्थं वहु करि है । श्रीसंकरसिव तब अवतरी है ॥ जैनबुद्धमत मूल उखारै । गंगातैं प्रभु मूर्ति निकारै ॥५॥
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जैसैं भानु उदय उजियारो । दूरि करै जगमैं अंधियारो ॥ सब वस्तुहि ज्यौंको त्यों भासै । संसैं और विपर्यय नासै ॥ ६ ॥
टीका:-सर्वप्रकरणका भाव यहां है:-व्यासभगवाननै पुराणमैं यह कहीहै:-“जब कलिमैं वेदके अर्थकूँ नानाभांति करेंगें तब कृपालु शिव श्रीशंकर नाम धारके अवतार लेके वेद्रिनाथकी मूर्तिका देवनदीमध्यतैं उद्धार, स्वस्थानमैं स्थापन, जैनबौद्धमतखंडण औ वेदका यथार्थव्याख्यान करेंगें” ।
वेदअर्थमैं त्यौं अज्ञानो । नसि है श्रीसंकरव्याख्याना ॥ करि है ते उपदेश यथार्थ । नासहि संसय अरु अयथार्थ ॥ ७ ॥
१ या नैँओंसचचनतैं श्रीशंकरमत प्रमाण है । २ औ मध्यादिकनका मेदमत अप्रमाणहै । और उपनिपद्, गीता व सूत्र ये तीनि जो वेदांतके प्रस्थान हैं, तिनके यथापि मध्यादिकननै किसीतैं खींचके स्वस्वमतके अनुसार व्याख्यान कियेहैं, तथापि व्यासवचनतैं श्रीशंकरकृत व्याख्यानही यथार्थ है।
और जु वेदअर्थकूँ करि है । ते सठ वृथा परिश्रम धरि हैं ॥ यूं पुरानमैं व्यास कही है । शंकरमतमैं मान यही है ॥ ८ ॥
आदिकवि वाल्मीकिरुद्ररमा-यण वासिष्ठनाम ग्रंथ कियो आहै, तहां अद्वैतमतमैं प्रधान जो दृष्टिसृष्टिवाद है सो अनेक इतिहासनसैं प्रतिपादन कियो है, यातैं वाल्मीकिवचनअनुसार अद्वैतमत प्रमाण है औ वाल्मीकिवचनविरुद्ध मेदमत अप्रमाण है ॥
मध्यादिको मत न प्रमाणी । यह हम व्यासवचनतैं जानी ॥ और प्रमाण कहूं सो सुनिये । वाल्मीकरिषि मुख्य जु गिनिये ॥९॥
इसरीतिसैं सर्वऋषिप्रनिवचनविरोधतैं मेदवाद अप्रमाण कही औ युक्तिसैं वी मेदवाद विरुद्ध है, यह खंडन आदिकग्रंथनमैं श्रीहर्ष-दिङ्ननै प्रतिपादन कियोहै । युक्ति कठिन हैं । यातैं मेदमतखंडनकी युक्ति नहीं लिखीं ॥
तिन मुनि कियो ग्रंथ वासिष्ठा । तामैं मत अद्वैत स्पष्टा ॥ श्रीसंकर अद्वैतहि मान्यो । तिनको मत यहं हेतु प्रमाण्यो ॥९०॥
वाल्मीकरिषि वचन विरुद्धं । मेदवाद लिखि सकल असुद्ध ॥ ९१ ॥
|| २१५ || मेदवादकी अप्रमाणता ||
|| २१६ || मेदवादका तिरस्कार ||
ऋषिप्रनिवचनमैं विरुद्ध मेदमतमैं जैनमतकी न्याईं अप्रमाणता निश्चय हुयेतैं युक्तिसैं खंडनकी आस्तिक अधिकारीकूं अपेक्षा वी नहीं । यह तीनि चौपाईसैं कहैहैं:-
|| २१५ || यां प्रकारके मायुपुराणकूर्म्मपुराण आदि-
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॥ चौपाई ॥
कियो ग्रंथ श्रीहर्ष जु खंडन । खंडनभेद एकतामंडन ॥ लिख्यो तहां यह बहु विस्तार । भेदवाद नहिं युक्ति सहारा ॥ १२ ॥ और भेदधिकार जु ग्रंथा । तहां भेदखंडनको पंथा ॥ कठिन दैर्ंहतरक है ते अति । नाहीं पैठहि सिप तिनमैं ते मति ॥१३॥ यौं कहि न ते तुहि उक्ति । करै जुं भेदहि खंडन युक्ती ॥ अप्रमान मत भेद लख्यो जग । खंडनमैं युक्ति न चहियत तब ॥१४॥
वेदवचनैं थी भेदमत विरुद्ध है, यह कहैं:— भेदप्रतीति महादुःखदाता । थैंमैं कठमैं यह टेरत ताता ॥ यौं भेदवाद चित त्यागहु । इक अद्वैतवाद अनुरागहु ॥ १५ ॥
॥ २१६ ॥ श्रीहर्षमिश्राचार्यनायक सरस्वतीकरि अनुगृहीत अद्वैतवादी पंडित भयेहैं । तिनोंनै छ कहिये जे, खंडन कहिये खंडनखंडख्यानामक ग्रंथ कियाहै, तैंमैं ।
॥ २१७ ॥ दुरुहतरक कहिये जिनकी दुःखसैं बुद्धिमैं कल्पना होवै ऐसी प्रतिवादिके अनिष्टके संपादनरूप तर्के नाम युक्तियां हैं ।
॥ १ ॥ "मांत्योः स मृत्युमाप्रोति', य इह नानेक परयति" इति श्रुते:।
॥ १ ॥ "द्वितीयाद्धै भयं भवति" । ॥ २ ॥ "अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेव स देवाना" इति हि श्रुति ॥
अर्थ:— जो द्वितीयकूं मतिमैं धारै । भय ताकूं यह वेद पुकारै ॥ जेय ध्येय मोतैं कछु औरा लखै सु पशु यह वेद ढँढोरा ॥ १६ ॥ सिष यौं मद्धादिकवानी । सुनी सु विसरह अति दुखदानी ॥ द्वैतवचन तब हियमैं जौंलों । नहै साछात अद्वैत न तौलौं ॥ १७ ॥ ( ॥ राजाके मंत्री भड्डुककी कथा ॥ २१७–२२८ ॥ )
॥ २१८ ॥ यम कहिये धर्मराजा, सो कठमैं कहिये कठवह्न्डोपनिषदमैं, यह वार्ता टेरत कहिये पुकारतेहैं ।
॥ २१९ ॥ अर्थ:—“जो पुरुष इस परमात्माविषै नानाकी न्यांई देखतहै, सो मृत्युतैं मृत्युकूं पावतहै” इति ॥
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पूर्वस्मृती साछात विनासत । सुन इक अस तुही कथा प्रकासत १८ राजाको इक भच्छू मंत्री । राज काज सब ताके तंत्री ॥ और मुसाहिब मंत्रो जते । करें ईरषा तासू तेते ॥ १९ ॥
[ तंत्री कहिये आधीन ] करि न सकत भच्छूकी हाना । महाराज निजजिय प्रिय जाना ॥ तब सब मिलि यह रच्यो उपायां । धौंरी दौर दंगा मचवाया ॥ २० ॥
सो सुनि राजाह करी कचहरी । लिये बुलाय मुसाहिब जहरी ॥ तिनसौं कह्यो बेग चढि जावहु । दौरतें धारि सु धूम नसावहु ॥२१॥
तब सब मिलि उत्तर यह दीना । सदा एक भच्छेहि तुम चीना । मरननलिए अब हमहिं पठावतु । भच्छू कहु क्यों न चढावतु ? ॥ २२ ॥
तब बोल्यो भच्छू कर जोरी । महाराज सुनु विनती मोरी ॥ ॥ २२० ॥ दौर घारि कहिये धाडाकरिके ।
॥ २२१ ॥ दौरत धारि कहिये धाडा करनै-वालेकी । घूम कहिये लडाईकूं । सु कहिये भस्सी-तरहसैं । नसावहु कहिये नाश करद॥ ।
॥ २२२ ॥ तुम्हारी । आज्ञा होय मोहि यह रौरी । मारूं सकल धारि जो दौरी ॥ २३ ॥
तब भच्छू बोल्यो राजा । तुम चढि जाहु समारहु काजा ॥ ते जाताहि भच्छू सब मारे । बैनक कृपीनलें किये सुखारे ॥ २४ ॥
भच्छू विजय सुन्यो तिन जही । राजापैं भार्यो यह तबही । " भच्छू मन्ज्यो न सुधन्यो काजा " । मिथ्यावचनं सुनतही राजा ॥ २५ ॥
औरप्रधान मुसाहिब कोनो । छत्र हू पीनसैं पंखा दीनो ॥ बंदोबस तिन कीने अपनहु । सुनै न राजा भच्छू सुननहु ॥ २६ ॥
सब वृत्तांत भच्छू तब सुनिके । रुप तपस्वि धन्यो यह गुनिके ॥ राजापैं मुहिं जान न दै हैं । गये द्वारलग प्रानहू लै हैं ॥ २७ ॥
अबलग सबहि पदारथ भोगैं । देह हू इंद्रिय रहे अरोगै ॥ ॥ २२३ ॥ चैत्र (धनिक) ॥
॥ २२४ ॥ खेती करनैवाले ॥ ॥ २२५ ॥ भौर मुसाहिब कहिये वजीर (डिप्टी-मंत्री ) कूं । प्रधान ( मुख्यमंत्री ) कीनो ।
॥ २२६ ॥ पलख्धी ।
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तियें जो चारि चंचुरपद सोहत । न्यारि फूल फल खग मन मोहत ।।२८।। नारीकी निंदा ।। "तिय" आदि "खग" अंत । ये दोपदके अर्थका दोहा ।।
करि कर उरु मृग खुरु पुरज, केहरिसी कटि मान ।। लोयन चपल तुरंगसै, बरनै पैरंमसुजान ।। २९ ।। चारिफूल ।।
कमलवदनं अलस्ती कुसुमं, चिबुकचिन्ह मतिधाम ।। २२७ ।। इहैं लेके ३४ छंदपर्यंत काव्यप्रंधनकी रीतिसैं जो छीके अंगनका वर्णनरूप आरोप 'कियाहै, सो दोषदूषितरूप अपवादर्थ है काहेतैं ? लक्ष्य जो अमाज तिस बिना बाणके प्रहारकी नांई आरोपविना अपवाद होवै नाहीं । यातैं प्रथम विषयासक्त पामर कविजनोंके कषनका अनुवादरुप आरोप कियांहै । पीढ़े या तरंगके ४५ में छंदसैं छीके रंगनमें दोषदूषित अपवाद कह्यौंगे । जाति पीढ़े अपवाद कियाहै, तातैं इहां छीके अंगनकी उपमाैं तास्पर्य नाहीं । किंतु तैसी उपमा देनैवाले विषयलंपट जनौके उपहासमैं तास्पर्य है । सर्व- काव्यप्रंधनका बी यही अभिप्राय है । उक्त छीके अंगनकी उपमााक यथास्थित खंडन हमनै रूपकादिर्शमें दृग्गारवैराग्यके प्रसंगमैं लिख्यौहै । तहां देख लेनां । ।। २२८ ।। चारी पगवाले पशुकी न्यांई ।
तिलभसूनसी नासिका, चंपक तनु अभिराम ।। ३० ।। चारिफल ।। चिंब अधर दारिम दसन, उरेज बिसलेसै धीर ।। कोहरसी एड़ी कहत, कोविद मति ग गंभीर ।। ३१ ।। चारिखग ।। है मैरालसी मंदगति, कंठ कैपोत सुढार ।। पिकसी बानी अति मधुर, मोरपुच्छसै वार ।। ३२ ।। चौपाई ।। गगन पयानिधि कहहु नं त्यागत । जाउं रसिकसु मन अनुरागत ।।
।। २२९ ।। करिकर कहियें हस्तीके सूंड जैसी । उरु कहियें साधर ( जांघूंसैं डपरकी अंग ) है । ।। २३० ।। काव्यप्रंधनमैं कुशल । ।। २३१ ।। तनु जो शरीर, ताका अभिराम कहियें भाकार । ।। २३२ ।। उरज कहियें पयोधर, बिसलेस कहिये बिषयफल जैसैं हैं जौ धीर कहिये सघन होनैंं स्थिर हैं । अथवा धीर कहिये हे धीर !। ।। २३३ ।। मूलके पत्ते जैसे पत्तेवाळा । तेसाही छोटाशाकका वृक्षविशेष है । ताका नाम कोहर हैं । याहीकूं हिंदीसमें फारसीशब्दमैं सलगम बी कहतेहैं । ताके मूलमैं प्याज जैसा खालरंगवाला गोल- फल होवैहै, ताका नाम कोहरफल है । तिस जैसी छीकी एड़ी कवि कहतेहैं ।
।। २३४ ।। हंसपदी जैसी । ।। २३५ ।। कोकिलानामक पक्षी जैसी
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विधि तिलोत्तमा अपर बनाई । हन्यो सुंद जिन सो न सुधाई ॥३२८॥ मिहिंदी जावक कर पद रागा । तिनको मैं किय निमिष न त्यागा । और भोग तिनके उपभोगना । भोगेँ सबै निकट भौं मरना ॥ ३४ ॥ अहो मूढ़ को मम सम जगमैं । भौं लंपट अबलग मैं भगमैं ॥ गीलो मलिन मूत्रतैं निसिदिन । सवत मांससमय रुधिर जु छलतैं बिनाइ॥३॥ चर्म लपेट्यो मांसमलीना ।
॥ २३६ ॥ जिन काहिये जिस नग्नाकी रची हुई तिलोत्तमामैं सुंद ह्वौ तिसकी उपभोग्य निसुंद- नामक दैत्य, हन्यो काहिये मरयोगहै । यातैं सो तिलोत्तमा हत्यारी होनैतैं न सोहाई काहिये अचछी नहीं ह्वौ मेरी झूठी हत्यारी नहीं । यातैं तिस नग्नदेव- रचित तिलोत्तमानामक अप्सरानैं बी उत्तम है । यह अभिप्राय है ॥
इहां यह महाभारतगत कथा है:-कोई सुंद- निसुंदनामक दोनौं दैत्य भाता थे । तिनोंनैं तप- करिके ब्रह्मदेवैं ऐसता वर लियौ कि:-“हम दोनूं भाता परस्परके हाथसैं लड मरेैं तो मेरै, परंतू दूसरे किसीके हाथसैं मरेैं नहीं।” ऐसौ वर पायके त्रिलोकीकौं दुःख देनै लगे । तब ब्रह्मदेवैं दोनूं भाताकी प्रीतिभंगके निमित्त सारे जगतकी लियानतैं भतिसुंदर ऐसी तिलोत्तमा नाम अप्सरा रचिके ब्रह्मलोकसैं पृथ्वीपर तिन दोनूं दैत्यनके पास भेजी । तातैं देखिके वे दैत्य प्रछा करनै लगे कि:-“तूं हम दोनूंनैं वरेगी?” तब तिसनैं कहौ कि:-“मैं एककौं वरौंगी । दोकूं नहीं” ॥ फेर सो तिन दोनूंकौं मिलि नैकांतमैं बुलायके कहत भई कि:- “तूं दूसरें माईकौं मार तो तुजकौं वरूंगी” इसरितैं दोनूंनैं न्यारा न्यारा मंत्र (सलाह )
उपरि वार असुद्ध अलीना ॥ इनमैं कौन पदार्थ सुंदर । अति अपवित्र गलानिको मंदिर ॥३५॥ तियकी जंध जघन्य सदाही । रंचा कमलिनि उपभोग्य जाही ॥ आंढ़े मृतको मनु पतनारो । रुधिर मांस त्वक् अस्थि पसारो ॥३७॥ लगत जु नीके सेँहू लनितंबा । तिनके मध्य मलिन मेँलेवंबा ॥ तट ताके ते अतिदुर्गंधा । वहै आसक्त तहाँ सो अंधा ॥ ३८ ॥
कियौ, तब वे दोनू भाता परस्पर लडि मरे ॥ इसरितैं वह तिलोत्तमा सुंद ह्वौ निसुंद देखिके मारनतैं निमित्त भई । यातैं सो हत्यारी है ॥
॥ २३७ ॥ और खानपानआदिक अन्यइंद्रियन- के विषयनके भोग तिनके ( झूठी भोगके ) उपकरण कहिये सामग्री है ॥
॥ २३८ ॥ इहांसै लेके ३८ वें छंदपर्यंत जो पाठ है, सो छीके पास पुरुषकौं चांचना योग्य नाहीं ॥
॥ २३९ ॥ म्लानादिककी चोटसैं जो शंग फटै । ता फटनैकौं छत ( क्षत ) कहतहैं, तिस बिना कतु- कालमैं झीकी योनितैं मांससमय रुधिर स्रवतहै, सो ' गलानिका स्थान है ॥
॥ २४० ॥ झीकी जंध काहिये ऊरु नाम साथर, सो सर्वकाळमैं जघन्य काहिये निकृष्ट है । जाकौं रंभा कहिये कदलीकौं शंभा ह्वौ करिकर कहिये हस्तिकी सुंड, तिनकारिके उपमित कहिये केइक विषयलंपट कवि उपमायुक्त करतहैं । सो जंध मनु काहिये मानौं गाद्रे ( गीले ) मृतको पतनारो कहिये वर्षाकाळमैं जिसतैं ग्रहके उपरका जल गिरै ऐसौ पतवारौ है ॥
॥ २४१ ॥ कटिपक्षातभाग ॥
॥ २४२ ॥ गुद ( मूलदार ) ॥
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॥ भद्रहृदके वैराग्यका कथन ॥ सर्वसुख पकांतमें हृदवैहै ॥
अधर जो थूक लारसैं भीजत । तजि ग्लानि निजमुखमैं दीजत ॥ दृष्टमद्रा नारी मदिरा भाजि । सुद्धअसुद्ध विवेक दियो तजि ॥३९॥
[ दृष्टमद्रा कहिये जाके देखतही मद चढ़ै ] कहत नारीके अंग जु नीके । करत विचार लगत यूं फीके ॥ कपट कूटतको आकर नारी । मैं जानी अव तजन विचारी ॥३०॥ ॥ भद्रहृदके वैराग्यका कथन ॥
कलाकंद दधि पायसैं पेरा । तंदुल घृत क्यंजलै वहुतेरा॥ और विविधभोजन जे कीने । तिन सवके रसना रस लीने ॥ ४१ ॥
अवलौं भई न तृप्ति जु याकूं । यातैं वृथा पोषिना ताकूं ॥ छुथा विनासहि वन फल कंदा । है क्यूं पराधीन यह बंदा ॥ ४२ ॥
गुहा महल वन बाग घनेरा । क्यूं राजाको है हौं चेरों ॥ सैजसिला अरु निजभुज तकिया । निद्धरजल कर पात्र न॑ रुकीया॥४३॥
॥ २४३ ॥ समूइको सौ तजन विचारी कहिये तजवेकूं विचारकी विषय करीहै ॥
॥ २४४ ॥ चावल औ दुर्गध सैं वनाया जावैहै ऐसा दुर्गधपाक ॥
॥ २४५ ॥ भोजन ॥
॥ २४६ ॥ किंकर कहिये चाकर ॥
वैठी इकंत होय सुछंदा । लहिये भद्रहृद परमानंदा ॥ विन एकांत न आनंद कबहू । मिलै अध्धलौं पृथ्वी सवहू ॥ ४४ ॥
॥३२० ॥राजासैं लेके ब्रह्मापर्यंत सर्वसुख एकांतमैं होवैहै ॥ दोहैं ॥
पृथ्वीपति निरोगा युव, दृढ़ स्थूल वलवंत ॥ विद्यायुत तिहिं भूपमैं, मानुप सुखको अंत ॥ ४५ ॥
॥ चौपाई ॥ जे मानव गंधर्व कहावत । ता नृपतैं सतगुन सुख पावत ॥ होत देव गंधर्व जु औरा । तिनतैं तहैं सोगुन सुख औरा ॥४६॥
सुख गंधर्व देवको जो है । तातैं सतगुन पितरनको है ॥ पुनि अजानदेवमैं तिनतैं । सोगुन कमदेवमैं जिनतैं ॥ ४७ ॥
मुख्यदेव जे हैं पुनि तिनमैं । कमदेवतैं सोगुन जिनमैं ॥
॥ २४७ ॥ न रम्यया कहिये मृत्तिकाका कूजा औ तिसकरे उपलक्षित छोटआदिक पात्र नहीं । कितु 'स्वतः:सिद्ध' करहरप पात्र है ॥
॥ २४८ ॥ इहांसै लेके ५१ वें छंदर्यंत जो अर्थ कहाहै, सो तैत्तिरीयोपनिषद्का है । सो:हमने ईशावास्योपनिषद्गत ता उपनिषद्की भाषाटीकामैं सविष्तार लिख्यो है ॥
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१२८ ॥ राजाके मंञ्री बहुधूकी कथा ॥२५७-२५८॥ [विचारसागरे
जो त्रिलोकपति इंद्र कहीजै । तामें पुनि सौरुन गिनती लीजै ॥ ४८ ॥ [ शूल्पदेव कहीजै ग्यारह रुद्र । बारआदित्य आठ घसु । ये इक्तीस ] sब्ददेवनको गुरू बृहस्पति । लहै इंद्रतैं सतगुन सुखगति ॥ जाको नाम प्रजापति भाखत । गुरुतैं सुख सौरुन सो राखत ॥ ४९ ॥ ताहिंतैं सौरुन ब्रह्महि सुख । लहै न रंचक सो कबहूँ दुख ॥ इतनैं या कमतैं सुख पावत । तैतरीयश्रुति यूं समुझावत ॥ ५० ॥ ॥ सोरठा ॥ राजातैं ब्रह्मात, कहो जु सुख सगरो लहै॥ रहत सदा एकांत, कामदग्ध जाको न हिय ॥ १५ ॥ ॥ चौपाई ॥ लहै एकांत देसमें अस सुख । युवति पुत्र धन संग सदा दुःख ॥ ॥ २५९ ॥ ॥ अथ युवतिसंगदुःखवर्णन ॥ युवति कुरूप कुबोलिनि जाकी । सदा सोक हिय ल्है यह ताके ॥५२॥
प्रभु पुरीषपिंडा यह रंडा । दिय मुहि कौन पापको दंडा ॥ बोलत बैन व्याल कागनिके । भेड भैसि न्योंरी नागनिके ॥ ५३ ॥ ओंहू भांति सुठनिको है । वोलं खरीको सुनि खर मोहैं ॥ रैनि जु उंचे स्वरहि उचारत । स्यार हजारन सुनत पुकारत ॥५४॥ nिरपराध तिय विन बैरागा । तजत न वनत पाप जिय लागा ॥ रहत दुखित यूं निसिदिन पिय मन ॥ तिय कुबोल सुनि लिखि कुरूप तन ५५
कामनि ल्है जु सुरूप सुबानी ! सो कुरूपतैं है दुखदानी ॥ चमकचामकी पियहि पियारी । अर्थ धर्म नसि मोछ विगारी ॥ ५६ ॥ ॥ २५२ ॥ अथ युवतिसंगसैं धनबिगार ॥ मीठे बैन जहरयुत लडवा । खाय गमाय बुद्धि ल्है भडवा ॥ और कछू डाइनहु नाहिं देखै । काम अंध इक कमानि लेखै ॥ ५७ ॥
तैं ईश्वरनैं रच्याहै । इसमें याकै वर्ममानअपराध नाहिं औ मेरे चित्तमैं बैराग्य भी नाहीं । तातैं निरपराध- ल्हीका बैराग्य बिना त्याग कियेतैं मुजक्रू पाप ल्हैगा । यातैं याकौ त्याग करनौ बनत नाहीं । किंतु " पाप जिय लागा " कहिये मेरे जीवदैँ पूर्वजन्ममैं किये पापका यह ल्हीकौ फळ प्राप भयाहै ॥
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धन कछु मिलै जु बाहर घरमैं । सो सब खरचै कामनि धरमैं ॥ भूषन बसन ताहि पहिरावै । गुरु पितु मात यादिहु न आवै ॥५८॥ पायस पान मिठाई मिर्वा । देय भक्तितैं तिय निजदेसा ॥ २५३
नेह-नाथ-नाथ्यो नहिं छुट्टै । तियहुँससान पियवैलहिं कूट्टै ॥ ॥ २५३ ॥ अथ युवतिसंगसैं धर्मबिगार ॥
ज्यूं सूवा पिंजरमैं बंधुवा । सिखयौ बोलत सुद्ध असुद्ध वा ॥ तैंसैं जो कछु नारि सिखावत । सो गुरु पित्त मातही सुनावत ॥ ६० ॥
जैसैं मोर मोरनी आगै । नाचि रिझाय आप अनुरागै ॥ तैंसैं विविधवेष करि तियको । मन रिझाय रिझत मन पियको ॥६१॥
जैसैं दुहूनको मन अनुराग्यो । तवहि मदन मदिरा मद जाग्यो ॥ भये बावरे वसनहु त्यागै । अतिउन्मत्त घूरन पुनि लागै ॥ ६२ ॥ प्रेतरूंप धरि नय आमंगल । भिरि फिरि भिरत मेष मन दंगल ॥
ज्यूं लोटत मद्य पि मतवारो । गिनत मलीनं गलीन न नारो ॥ ६३ ॥ त्यूं नरनारी मदन-मदअंधे । अतिगलीन अंगनमैं वंधे ॥
करत मदन मद भ्रम जे मनकू । लहै अचरज सुनि त्यागी जनकू ॥ ६४ ॥ नसै मदनमदतैं मति नरकी । लखत न ऊंच नीच परघरकी ॥
तयहुँ वावरी मदन वनाई । क्रियाडुखद जिहिं लहै सुखदाई ॥ ६५॥ प्रवल काममदिरा मद जागै । तब दिजातिय धींअनकतैं लागै ॥
पिये मदन मदिरा नरनारी । ऐसैं करत अनंतखुवारी ॥ ६६ ॥ कामदोष यूं नरहि विगोवत । सो प्रकट सुंदरी तिय जोवत ॥
यातैं अतिसुरूप तिय दुखदा । ताको त्याग कहत मुनि सुखदा ॥६७॥ जो सुरूप तियमैं अनुरागत । विषसम दुखद पेखि नहिं भागत ॥ .
उभयलोककी करत सु हानी । सुनिजन गुन सान सख बखानी॥६८॥ बैलकूं कूट्टै ॥ ॥ २५५ ॥ इहहसै लेउँ ६८ में छंदपर्यैंत जो पाठ है सो छीके पास पुरुषनैं बांचना न चाहिये ।
॥ २५६ ॥ धानकू नाम पारधीका वा मोयाका है ॥
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॥ २२४ ॥ युवतिसंगसैं बिंदुका नाश ॥
जो नानाविध भोजन खावै । रस ताको फल बिंदु उपावै ॥ जीवन बिंदु अधीन सबनको । नसै सोक बिंदुहीन मनको ॥ ६९ ॥
वहै जब जनको मन मलवासी ॥ करत सोक अति धरत उदासी ॥ रधिर निवास धरत मन जवहू । चंचल अधिक रजोगुन तबहू॥ ७० ॥
जब मन करत बिंदुहिं वासा । तैं सोक चंचलता नासा ॥ पुनि आपहि बलवत जन जानै । वहै प्रसन्न सुभ कारज ठानै ॥ ७१ ॥
बिंदु अधिक होवै जा जनमैं । सुंदरकांतिरूप ता तनमैं ॥ बिंदुहुको तनमैं उजियारो । नसै बिंदु तन मनु हतियारो ॥ ७२ ॥
जाको बिंदु न कबहू नासै । बलि न पलित तिहिं तन परकासै ॥ २५७ ॥ वलि नाम इष्टद्रव्यास्यामें शरीरकी लंचामें वलू ( सल ) पड़तेहैं तिसका है । याहीकूं जोगरी बौ पेटी बी कहतेहैं ॥
॥ २५८ ॥ पलित नाम केसा भ्रेत होवैहैं तिसका है ॥
॥ २५९ ॥ षण्मासके षभ्याससैं जिन्हाके मूळकी नाडीकरू २१ रोमपरिमित क्रमतेहैं छेदिके जिनहाकूं बढावतेहैं, ता जिन्हानकूं योगी वेलका कहैहैं ॥ दुर्ध्वगमनकारिके मूर्ध्निमें स्थित मये प्राण-
योगी करत खेचरीसुद्रा । तातै बिंदु राखि व है भद्रा ॥ ७३ ॥
अष्टसिद्धि जे धारत योगी । बिंदु खसै हारत ते भोगी । अस अति उत्तम बिंदु जु जगमैं । तिहिं तिय छीनि लेत निजभगमैं ७४
ज्यूं किसान वेलनमें उछाहि । पीरत लेत निचोरि पियूषहि ॥ वार वार वेलनमें धारहि । वहै असार द्रथ्या तव जारहि ॥७५॥
[ हलकी बांथ गंडेकी वंधी हुई वेलनमें देखै । ताका नाम द्रव्यता पांचवेंमें प्रसिद्ध है ]
त्यूं तिय भीचि भुजनमें पीहूं । भरत योनि-घट खीची अमीकूं ॥. पुनिपुनि करत क्रिया नित तौलौं । सेष बिंदुको बिंदु न जौलौं ॥ ७६ ॥
कियो असार नारी नरदेहा । खीच फुलेल फूल ज्यूं खेहा ॥ वायुके रोकनैषर्थ तालुके छिद्रमें ता लंबकाकूं लगावना, ताकूं खेचरीसुद्रा कहतेहैं । तातैं सारे शरीर- विषै कामादिदुष्टि सहित मनके प्रचारके अभावसैं बिंदु जो वीर्य ताको रक्षाकारिके भद्दा कहिये योगीका कल्याण होवैहै ॥
॥ २६० ॥ वेलन नाम कोड़का है । याहीकूं किसीदेशमैं छींचोड़ा बी कहतेहैं ॥
॥ २६१ ॥ गुडशकरकरकका उपादान ऐसा दृष्ट- दंड ( गदा ) याके टुकड़ेकूं गंड़ा कहतेहै ॥
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भौ अकाम सच ताहि जरावै। सूके वैन मुरारि लगावै।। ७७ ।। वहै जु सुरूप जोर धन भारी। ता नरपैँ नारी वलिहारी।। करि सुरूप धन वलवो अंता। कहत ताहि तूं काको कंता।। ७८ ।। तिहि पुनि मिलन चाहै जु अनारी। कर धरपैं धरतहु दै गारी।। नाक चढ़ाय आंखिहू मोरै। जाय न पति सैंजहुके धोरै।। ७९ ।। कोटिविद्र संघात जु करिये। सवको सार खींचि इक धरिये। तियके हिय सम सो न कठोरा। रिपु-मुनि-गन यह देत ढढोरा।। ८० ।। करत गुमान हटत तिय ज्यूं ज्यूं। चिपटत सट्ठ मति जन मन त्यूं त्यूं।। कबहुक ताको वांछित करिके। मरन अंत छोड़त न पकरिके।। ८१ ।। पढ्यो पुरान वेद स्मृति गीता। तर्कै निपुन पुनि किनहु न जीता।। करत अधीन ताहि तिय ऐसैं। वाजिगर बंदररू ऐसैं।। ८२ ।। सच कछु मन भावत करावत || २६२ || उल्मुक (अर्जलया काष्ठ) इहां आगे ७९ वीं चौपाईमें "अनारी (अनाड़ी)" याका ताकी इद्रपुरहि भरचि कूं नाहीं जाननैवाला मूर्ख। यह अर्थ है।। भौ "कर धरपैं धरतहुं" याका घर नाम धड़ जो शरीर तैपैं हस्त लगावतहि। यह अर्थ है।। भौ "धोरै" कहिये समीप।।
पढ़े-पसुहि भलभांति नचावत उक्ति युक्ति सच तवही विसेरै। जब पंडित पढि तियपै ढिसरै।। ८३ ।। जब कवहू कुमारत यह वेदा। तब तियैमैं मनत कछु खेदा।। तिहिं त्यागन की इच्छा धारै। पुनि तिय नै नैन सर सारै।। ८४ ।। जहरकट छै नैनसर वोरै। तानी कमान भौंह जुग जोरै।। मारत सारत हिय सच जनको। विझिहूं चचत न धन सठ गनको।। ८५ ।। [वि्ज्ञ कहिये विद्वानहु न वचत | सठगनको धन कहिये कहा चीज | ] भयौं न तिय मैं तौ त्रियोगा। यूं मतिमंद करत पुनि रागा।। करत विविध आज्ञा ज्यूं चाकर। हुकम करै बैठी मनु ठाकर।। ८६ ।। जे नर नारनयन सर वीधे। तिनके हिये होत नहिं सीधे।। भलो बुरो सुखदुख सच विसरत। ते कैसैं भवदुखतैं निसरत।। ८७ ।। नारी बरी वेस्या अरु परकी। तीजी नरकनिसानी घरकी।। || २६३ || इहां कान्यकाल्ज्ञउक्त सामान्या (वेश्या) परकीया (परकी) भौ स्वकीया (घरकी) इस भेदतैं तीनप्रकार की जे नायिकां हैं तिनका स्वाग वतायां है।।
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तजत विवेकी तिहूंमैं नेहा । करै नेह तिह सठमुख खेहा ॥ ८८ ॥
अर्थ धर्म अरु मोछकूं, नारी बिगारत पेइ । सब अनर्थको मूल लखै, तजै ताहि नहै चैन ॥ ८९ ॥
पुत्र सदां दुख देत यूं, बिन प्राप्ति दुख एक । गर्भसमय दुख जन्म दुख, मरै तु दुःख अनेक ॥ ९० ॥
गर्भ धरत जौलौं नाहिं नारी । दुख दंपति-मन तौलौं भारी ॥ नहै जु गर्भ यह चिंत न नासै । पुत्री होय कि पुत्र प्रकासै ? ॥ ९३ ॥
गर्भ गिरनके हेतु अनंता । तिनतैं डरत करत आतिचिंता ॥ नहै जु पूत नवमास बिहानै । जननी जनक आधिक दुख सानै ॥
नवग्रहमैं इक दै नाहिं बिगरै । अस जनको जन्म न न जग-सगरै ॥
बिगरै ग्राहकी निसिदिन चिंता । करत मातपितु बैठि इकंता ॥ ९३ ॥
सिसु उदास है जब तजी बोबा । तब दोऊ मिलि लागत रोबा ॥
यूं चिंतत कछु गये महिने । दांत पूतके निकसैं झीने ॥ ९४ ॥
मरत बाल बहु निकसत दंता । तब यह चिंता दुख तिय कंता ॥
जिये दूबरो दुखतैं वारो । देखि चुदारो धरत उतारो ॥ ९५ ॥
म्लेच्छ चमार चूहरे कोरी । तिनतैं झरावत दिज धोरी ॥
सहयद ख्वाजा पीर फकीरा । थोकत जोरत हाथ अधीरा ॥ ९६ ॥
जाकूं हिंदू कबहु नहिं मानै । पुत्रहेतु तिहि इष्ट पिछानै ॥
मैरो भूत मनावत नाना । धरत सिवबिल सूमिसाना ॥ ९७ ॥
धानैकको डमरू घरी बाजै । कर जोरत पूजन नहिं लाजै ॥
औरजंत्र तावाज घनेरे । लिखि मठवांय पूत-गर गैरै ॥ ९८ ॥
निजकुलमैं इक अच्युतपूजा । किनहु न सुनहु सुमन्यो दूजा ॥
डालिके चौबटमैं किकै ससानेमैं रखतेहैं । ताका नाम शिवबळ है ॥
धानककों कहिये पारधीको । डमरु वा मांसका बलिदान ठीकरेंमैं किचा पत्रावलीमैं
कहिये डाक घरमैं बाजताहै ॥
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सो कुल नेम पूताहित त्यागयो । व्यभिचारन ज्यूं जहँतहँ लागयो ॥९९॥ होत सीतलाको जब निकसन । नसत मातपितु मनको बिकसन ॥ स्नानक्रिया तजि रहति भलानी । परमदेव गदहाकूं कीनां ॥ १०० ॥ मोरी वाग बकसहु सिसु मोरा । गदहा मात चराऊं तोरा ॥ यूं कहि चना गोदमैं धौरै । बिनती करि गदहाकूं चौरै ॥१०१॥ अस अनंतदुखैंतं सिसु पारन । जुवा होत लौं औरैजारन ॥ उमार पूतकी नैं जो थोमी । मरि है करहु उपाय करोी ॥ १०२ ॥ मैरै मातपित कुटतींहिं माथा । मानि आपकूं दीन अनाथा ॥ हाय हाय करि निसदिन रोवैं । करि धिकधिक निजजनम विगोवैं॥१०३॥ पूत मरनको नहै दुख जैसो । लखत सपूत अपूत न तैसो ॥
जो जीवै तौ होतहि तरुना । लंगत नारिके पोषन भरना ॥१०४॥ सपूत कहिये जाका पूत जीवैहै औ अपूत कहिये जाके पूत नहीं हुआ ॥ जिन अनेकयतननि प्रतिपारै । तिनकूं जल पयावन है भारौँ ॥ रजनि-सैजपें सिखवै नारी । तव पितमात देहु मुहिं गारी ॥ १०५ ॥ नहै सुपूत तौ प्रातहि उठिके । नैवैं दूरतैं माथ न गठिके ॥ चहै मातपित आवैं नेरै । पूत न सन्मुख आंखिहु हेरै ॥ १०६ ॥ नहै कुपूत तौ उठतहि प्राता । वचन गारिसम बकि असुहाता ॥ जुडौ होय ले सब घरको धन । दे पितमातहि एक तिनको तना॥१०७॥ फेरि संभारत कबहु न तिनकूं । पोषत सबदिन तिय-निज-तिनकूं ॥ देखि लेत पितमात उसासा । याविधि पुत्र सदा दुखरासा ॥ १०८ ॥
५ फिर जुवाअवस्थापैंतक दुर्य्यसनमैं लौं होइ ती जै चिता होवैहै । ६ फेर तिसकी सादीके निमित्त बड़ि चिंता होवैहै । ७ फेर तिसके विवाहके निमित्त बी चिंता होवैहै । इससैं भादिलेके युवाअवस्थापर्यंत मातापिताकूं धनंतदुःख होवैहै । यह भान है ।
९ युवाअवस्थासैं पूर्व बालकताई खेलमैं रुचि विशेष होवैहै ताचकूं बखसैं प्रसन्नति करावनैंसैं प्रतिदिन दु:ख होवैहै । और— २ विद्याशालामैं अन्यप्यालकतबकूं मारि झाड़े किवा आप मारि खाई आवै तौ बी क़ैश होताहै । ३ फेर मेदसंस्कारतैं पढै नही तौ बी चिंता होवैहै औ ४ पढै अरु नयवहँरनिपुण न होवै तौ वी चिंता होवैहै ।
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॥ दोहा ॥ करी विचार यूं देखियें, पुत्र सदा दुखरूप ॥ सुख चाहत जे पूततैं, ते दूधनके भूप ॥ १०९ ॥
॥ २२६ ॥ धनसंगदुःखवर्णन ॥ तजि तिय पूत जु धन चहै, ताके मुखमें धूर ॥ धन जोरन रच्छा करन, खरच नास दुखमूल ॥ ११० ॥
॥ चौपाई ॥ जो चाहै माया बहु जोरी । करै अनर्थ जु लाख करोरी ॥ जातिधर्म कुलधर्म सु त्यागै । जो धनकूं जोरन जन लागि ॥१११॥
विना भाग तदपि न धन जुरी हैं । जुरै तु रच्छा करिकरि मरि हैं ॥ खरचत धन घटि है यह चिंता । नासै निसिदिन ताप अनंता ॥ ११२ ॥
सदा करत यूं दुख धन मनकूं । चहै ताहीं ठिक ठिक ताहिं जनकूं ॥ युवति पूत धन लखि दुखदाता । तज्यो भड़ैं ममताको नाता ॥ ११३ ॥
॥ २२७ ॥ राजाकूं भड़ूंमैं प्रेतबुद्धि होनी औ राजाका भागना ॥ ॥ कुंडलिया छंद ॥ भड़ूं बन एकांतमें । गयो कियो चित सांंत ॥ भयो नयो दीवान तिन । सुन्यो सकलवृत्तांत ॥ सुन्यो सै कलवृत्तांत । चिंत यह उपजी ताके ॥ जो रूप जीवित सुनै । मिलै वा काढू नोंके ॥ तौ झूठे हम होहिं । भूप दे सबकूं दंडा ॥ यातैं अब मिलि कहौं । भड़ूं भौ प्रेत प्रचंडा ॥ ११४ ॥
॥ दोहा ॥ करी सलाह यह परस्पर, गये कचहरी बीच ॥ सबहिंं कही यह भूपतैं, भड़ूं प्रेत मौ नीच ॥ ११५ ॥
राख लगाये देहमें, मिलै जाइ है वेतरात ॥ तिहि मारत सो नर बचत, जो तिहि देखि परात ॥ ११६ ॥
॥ २७० ॥ गतार्थ ( पूर्व हो गई वार्त्ता ) । ॥ २७१ ॥ वचकी गहड़ीयमें । ॥ २७२ ॥ बात करै ।
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|| भेदकै द्रगांतका सिद्धांतमैं जोडना ||
[ परात कहिये भाग जावै ]
|| दोहा || सुनि भूपह निश्वय कियो, भृंगी मरी भौ प्रेत । साच्छठ भूप न लखत, रहै जु प्रमाद अचेत ॥ १९७ ॥
कछु दिन बीते भूप तब, मारन गयो सिकार । पैठ्यो गिरि बनसघनमैं, जहँ मृगराज हजार ॥ १९८ ॥ तपत तहां इक तरु तरै, भृंगी निजदीवान । पेखति ताहि भ्रांति उलट, मानि प्रेत दुखदान ॥ १९९ ॥
|| २२८ || अंक २२७ उक्तदृष्टांतकूं सिद्धांतमैं जोडना। भेदवादकी धिकारपूर्वक त्याज्यता ।
|| इंद्रव छंद || भृंगी मच्यो जु परेत भयो यह । वाक्य असत्यहु सत्य पिछाना ॥ देखि लियो निज आंखिन जीवत । तौहु परेत हु मानि भगाना ॥ बंचकतैं सुनि द्वैत तथा मति- । मैं विश्वास करै जु अजाना ॥ ब्रह्म अद्वैत लखै परतच्छहु । तौहु न ताहि हिये ठहराना ॥१९२०॥
भेदवचन विश्वास करि, सुनत जु कोउ अजान । सो जन दुख भुगतै सदा, नहिं न ब्रह्मको ज्ञान ॥ १२१ ॥ यौं तैं सुनै जु भेदके, वचन लखै सु असत्य । तबहीं ताकूं ज्ञान है, महावाक्यतैं सत्य ॥ १२२ ॥
|| चौपाई || सिष तैं सुनी जु भेदकहानी । जानि छांटि ते नरकनिसानी ॥ जिनके कहनहिं पर सब छूटै । पुरुषारथ सुखतैं सठ रुठै ॥ १२३ ॥ तिनको संग न कबहू कीजै । जो कहूं सुनै जु सुनतहि त्यागहु । म्लेच्छ जैन वच सम लखि भागहु ॥१२४॥
|| मिथ्यादुःखका मिथ्यातैं नाश एक भूपकूं स्वपकी प्राप्ति । तिसकूं गादरीकारि दुःखका होना औ मिथ्यावैचैं मिटना ॥ १२९ ॥ जो मिथ्या है दैसिक वेदा । कैसे करहिं भवदुख छेदा ? ॥ याको अब उत्तर सुनि लीजै । मिथ्यादुख मिथ्यांतैं छीजै ॥ १२५ ॥
वेदडु गुरु सत्य जो होवै ।
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तौ मिथ्याभवदुख नहिं खोवै ॥ यामैं इक हष्तांत सुनाजैं । जातैं तब संदेह नसाजैं ॥ १२६ ॥ सुरपति इंद्र स्वर्गमें जैसो । प्रबलप्रताप भूप इक ऐसो ॥ भीम समान सूर बहुतैते । तिनके चहुधा डेरे गैरे ॥ १२७ ॥ जोधा ले निजनिज हथियारन । खरै रहे तिहि द्वार हजनारन ॥ अंदिर मंदर ब्यौढी ठाढ़े । लिये खडग कोसनतैं काढ़े ॥ १२८ ॥ [ कोस कहीये म्यान ] ऊंचो महल अतारी जामैं । फूलसेज साइव च्रप तामैं ॥ पंछी हू पावचन नहिं पावै । तहां और कैसे चलि जावै ॥ १२९ ॥ तहां भूप देख्यो अस सुपना । पकन्यो पैर गादरी अपना ॥ भूप छुटायो चाहत निजपग । तजत न गादरी पकरि जु पगरग १३० तब राजा यौं खरो पुकारै । है को अस जो गादरी मारै ॥ जोधा जो ठाढ़े निजद्वारा । तिन रंचकहु न दियो सहारा ॥ १३१ ॥ तब नृप दंड लियो निजकरमै ।
आपुहि मार्यो स्यारनि सिरमैं ॥ लगत दंड भौ ताको अंता । तब निसरै परागतैं दंता ॥ १३२ ॥ यूं लंगरात सु चालत मगमैं ॥ दांत लगै गाढ़ै नृप पगमैं । तब चाल्यो ले लाठी करमैं । पहुंच्यो धौंवरियाके घरमैं ॥ १३३ ॥ ताहि कह्यो फोहौं अस दीजै । घाव पावको तुरत भरीजै ॥ घावरिया चेपतैं यह भाख्यो । फोहा नहिं तयार धर राख्यो ॥१३४॥ जो तूं दै पैसा इक मोहूं । तौ तयार करि देहूं तोकूं ॥ तेहि उलटि कै नृप लाठी टको । नाहीं दैनकूं कौडिहु एका ॥ १३५ ॥ लाग्यो सोच करन टरि घरतैं । बूझै बात कौन बिन जेरतैं ॥ जो मैं होत धनी बड़भागा । आवतु घर घावरिया भागा ॥ १३६ ॥ मोहिं निकम्मा जानि कंगाला । घरतैं तुरत रोग ज्यौं टाला ॥ याहीकूं कछु दोष न दीजै । विनस्वार्थको किहि न पैंतीजै १३७ मातपिता बांधव सुत नारी । करत प्यार स्वारथतैं भारी ॥
॥ २७६ ॥ द्रन्थतैं । ॥ २७७ ॥ स्वार्थविना कोई किसकी न पतீजै काहिये प्रतीति ( विश्वास ) करता नहीं ।
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जो नाहीं स्वारथ सिद्धी पावै । तों इनकूं देख्योहूं न भावै ॥ १३८ ॥ जा बिन घरी एक नाहीं रहते । दुख अपार बिछुरे सब लहते ॥ जब देखैं आयौ घरे पोरी ॥ घरके मिलत भौंजि भरी कौरी॥१३९॥ विधि अधीन कोठी सो होवै। सब अंगनिमें पानी चोवै ॥ अरु जरि परी आंगुरी जाके । भिनभिनात मुख माखी ताके ॥ कहत ताहि ते घरके प्यारे । भरी पापी अब तौ हतियारे ॥ जिहि देखत अक्षियां न अघानी । तिहि लिखि ग्लानि वमन ज्यों आनी॥१४० जो तिय हिय लागलत पति प्यारो । किय न चहत पल उरतैं न्यारो ॥ ताकी पवन बचायो लैहै । भिरै जु बैसैन तु नाक सकौरै ॥१४२॥ जिहि पितुमात गोदमें लेते । सचुकत तिहि करते कछु देते ॥ मिलत भ्रात जो भरी भुज कोरी । सो वतरात बौचि दै डोरी ॥ १४३ ऐसैं जग स्वारथको सारो । बिन स्वारथको काको प्यारो ॥
मुहि स्वारथयोग्य न विधि कीनो । यातैं इन फोहा नाहीं दीनो ॥ १४४॥ यूं चिंतत इक मैंनि तिहिं भेष्यो । तिन दै जरि घावदुख मेष्ट्यो ॥ नितरैं जाम्यो नाप जबही । घाव दरद मुनि नासै तवही ॥ १४५॥ सिप यह तुही दृष्टांत प्रकाश्यो । लिखि मिथ्यातैं मिथ्या नास्यो ॥ मिथ्यादुख देख्यो जब राजा । साचसमाजन किय कछु काज।।१४६।।२३६।२२३ उक्त प्रसंगकी टीका ॥ टीका:—सर्वप्रकरणका अर्थ स्पष्ट ।
भाव यह है:—संसाररूप दुःख मिथ्या है, यातैं तिसके दूरि करनेके साधनै वैदगुरु मिथ्याही चाहियेहै । मिथ्याके नाशमें सत्य-साधनकी अपेक्षा नाहीं । औ—सत्यसाधन होवै तौ तिनतैं मिथ्याका नाश होवै नहीं ! जैसे राजाके समीप मिथ्यागादरी स्वमैँ पहुंची। किसी सत्यजोधासैं रुकी नाहीं औ राजा पुकार्यो जव कालुसैं वी मरी नाहीं औ राजाके पास अनेक साचे शुद्ध धरे रहे तौ वी मिथ्यादंडसैं मरी । औ राजाके मिथ्याघाव भया तव कोई वैद्यजराह साचा पाया नाहीं । मिथ्याजराहके पास गया । तौै पैसा माग्या । तै अनंतखजानै साचे धरेही रहे । एकपैसा वी राजाकूं मिल्या नाहीं । कोई वी सत्यसाधन राजाके दुःखके नाश करनेमें
॥ २७८ ॥ पगतिया ( सोपान ) । ॥ २७९ ॥ भाजि कहिये समुख दौरिके । कौरी भरी कहिये बाथ भराईके घरके आदमी मिलतहैं । ॥ २८० ॥ इष्टछै ।
॥ २८१ ॥ वध्या । ॥ २८२ ॥ संन्यासी । ॥ २८३ ॥ वैद्य किंशा जराह कहिये महँमपढ़ी मात्रका करनेधाला ।
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समर्थ हुआ नहीं । किंतु मिथ्याश्रुनितै मिथ्या-जरी देखे मिथ्यादुःखका नाश किया ।
इसीरीतके सब सर्वंकू अनुवमसिद्ध हैं । जाग्रत्पदार्थका स्वप्नमैं काहूंकू कदै बी उपयोग होवै नहीं तैसैं मिथ्या जो संसारदुःख, ताका नाश मिथ्यावेदगुरुकूं होवैहै । साखे वेद-गुरु अपेक्षित नहीं ॥
॥ २३१ ॥ मरुस्थलके जल औ प्यासमैं सत्ताका भेद ।
" जैसैं मरुस्थलके मिथ्याजलतैं तृपाका नाश होवै नहीं तैसैं मिथ्यावेदगुरुक्तै संसार-दुःखका नाश होवै नहीं औ मिथ्यावेदगुरु मानिके संसारदुःखका तिनकूं नाश अंगीकार करौंगे तो मरुभूमिके जलतैं बी ' तृपाका नाश हुवाचाहिये " यह शंका शिथिलतै करीथी ताका समाधान ॥
॥ चौपाई ॥ यद्यपि मिथ्या मरुस्थलपानी । तौतैं किनहु न प्यास बुझानी ॥
॥ २८४ ॥ इहाँ यद शंका है:-समसत्तावाले पदार्थही आपसमें साधक बाधक हैं । यह नियम घटित नहीं । किंतु विषमसत्तावाले पदार्थ बी कहौंक आप-समैं साधकबाधक होवैहैं । कहैंतैं ?
१ सर्वत्र आरोपकी अधिक्ष्यतैं विपमसत्ता है । ताकी साधकता अधिक्ष्यानमैं है । जैसैं कल्पित-रजतका अधिक्ष्यान शुक्ति है, ताकी व्यावहारिक सत्ता है । रजतकी प्रतिमांसत्ता है । तिस प्रतिमाससत्ता-वाले रजतकी साधकता ( कारणता ) शुक्तिमैं है ।
२ किंवा जगत्का अधिक्ष्यान ब्रह्म है, ताकी परमार्थसत्ता है जो जगत्की व्यावहारिकसत्ता है, तिस व्यावहारिक सत्तावाले जगत्की साधकता ब्रह्ममैं है । यांतैं विपमसत्तावाला बी साधक होवैहै ॥
तदपि विपमदृष्टांत सु तेरो । सत्ताभेद दुःखनमैं हेरो ॥ १४७ ॥
टीका:- यद्यपि मिथ्या जो मरुभूमिका पानी , तांतैं किसीनै प्यास नहीं बुझाई औ मिथ्यागुरुवेदतैं दुःखकै नाशकी न्याई मिथ्या-जलसैं प्यासका नाश हुवाचाहिये औ प्यास-नाश होवै नहीं । तैसैं मिथ्यागुरुवेदतैं संसार दुःखका नाश बने नहीं । तदपि कहिये तो बी तेरा दृष्टांत विपम है । कहैंतैं ? दुःखनमैं कहिये मरुस्थलका जल औ प्यास इन दोनोंमैं सत्ताका भेद है, ताकूं हेरो कहिये देखो ॥ १४७ ॥
॥ २३२ ॥ समसत्ताकी आपसमें साधकबाधकता ॥ ॥ चौपाई ॥
समसत्ता भवदुःख गुरुवेदा । यूं गुरुवेद करत भवछेदा ॥ आपसमें समसत्ता जिनकी । लखि साधकबाधकता तिनकी ॥१४८॥
३ अंतःकरणकी वृत्तिरूप चैतनिके यथार्थज्ञानसैं ज्ञानसहित रजतका बाध होवैहै । तहां ज्ञानसहित रजतकी प्रतिमासत्ता है जो चैतनिके ज्ञानकी न्यावहारिक सत्ता है । यांतैं विपमसत्तावाला बी बाधक होवैहै ।
यह समाधान है:-कैवल ( शुद्ध ) शुक्ति किंवा ब्रह्म कर्ता रजतकी औ जगत्की कल्पनाके अधिक्ष्यान नाम विवर्त उपादानकारण नहीं । किंतु तूलभ्रांतिया-सहिता शुक्ति रजतका अधिक्ष्यान है औ मूलअविद्या-सहिता ब्रह्मचेतन जगत्का अधिक्ष्यान है । कहूं विशेषनके धर्मका विवरणमैं व्यवहार होवैहै । इस नियममैं प्रतिभासिक तूलभ्रांतियासहित शुक्ति किंवा शुक्ति-
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टीका:—भवदृं ख औ गुरुवेदकी समसत्ता कहिये एकसत्ता है, यातैं गुरुवेदतैं भवदृंखका छेद होवैहै ॥ जिनकी आपसमें समसत्ता होवै तिनकी आपसमें साधकता औ वाधकता होवैहै । जैसे—१ स्वरुप औ घटकी समसत्ता है, यातैं स्वरुप घटका साधक है । १ , २ अंश औ काष्टकी समसत्ता है । वहां १ अंश साधक कहिये कारण औ—२ काष्ठका वाधक है ॥ १ साधक कहिये कारण औ—२ वाधक कहिये नाशक । मरुस्थलके जलकी औ प्यासकी समसत्ता नहीं । यातैं मरुस्थलका जल प्यासका वाधक नहीं ॥ या स्थानमें यह रहस्य है:—चेतनमें परमार्थसत्ता है औ चेतनसैं भिन्न जो मिथ्या-पदार्थ तिनमें दोप्रकारकी सत्ता है:—एक तों व्यवहारसत्ता है औ दूसरी प्रतिभाससत्ता है । अवच्छिन्नचेतन प्रातिभासिक कहियेहै औ व्यवहारिक मूलअविद्या|वच्छिन्न ब्रह्मचेतन बी व्यवहारिक कहियेहै ॥ यद्यपि इहाँ अविद्या उपाधि है । विशेषण नहीं । तथापि अविद्येकी जन्यको, दृश्टिसैं विशेषणकी न्यांई प्रतीत होवैहै । यातैं विशेषण कहियेहै । याहीतैं तीन अविद्याके धर्म प्रातिभासिकता थो व्यवहारिकताका अपने विशेषण ( आश्रय ) शक्ति औ ब्रह्ममें लावन होवैहै । यातैं इहाँ विमसत्तावाला साधक नहीं । किंतु समसत्तावालाही साधक है ॥ औ—पंचपादिकाकारकी रीतिसैं मूलअविद्यासैं भिन्न तूलअविद्या नहीं । यातैं ताकी निवृत्ति शुक्तिके , ज्ञानसैं होवै नहीं किंतु ब्रह्मज्ञानसैं होवैहै । परंतु व्यवहारिक अंत:करणकी वृतिरूप शुक्तिके यथार्थ ज्ञानसैं शुक्तिनिष्ठ तूलअविद्याका तिरस्कार होवैहै । तांतैं ताके कार्य ज्ञानसहित रजतका बी तिरस्कार होवैहै । यातैं इहाँ विषमसत्तावाला वाधक नहीं ।
|| २३३ || १ व्यवहारिक, २ प्रातिभासिक औ ३ पारमार्थिक सत्ता || २३३--२३५ || १ जा पदार्थका ब्रह्मज्ञानविना वाध होवै नहीं किंतु ब्रह्मज्ञानसैही वाध होवै ता पदार्थमें व्यवहारसत्ता कहिये है । सो व्यवहारसत्ता ईश्वरसृष्टिमें है । कहैंतैं ? देहइंद्रियादिक पंच जो ईश्वरसृष्टि ताका ब्रह्मज्ञानसैं विना वाध होवै नहीं । ब्रह्मज्ञानसैं ही वाध होवेंहैं ॥ यद्यपि ईश्वरसृष्टिके पदार्थेका ब्रह्मज्ञानसैं विना नाश तौ होवै बी है । परंतु ब्रह्मज्ञानसैं विना वाध होवै नहीं ॥
अपरोक्षसिद्ध्यानिश्चयका नाम वाध है । सो अपरोक्षसिद्ध्यानिश्चय ईश्वरसृष्टिके पदार्थेनमें ब्रह्मज्ञानसैं प्रथम किसीर्ं होवै नहीं, ब्रह्मज्ञानसैं अनंतरही होवेंहै । यातैं मूल-यह प्रसंगानुसारै समाधान है । औ—विचारदृष्टिसैं देखिये तौ अधिष्ठानरूप साधकमें नियम नहीं । किंतु—१ अधिष्ठानरूप साधक तौ विषमसत्तावालाही होवैहै । समसत्तावाला नहीं । औ—२ ज्ञानरूप वाधक तौ कहीं विषमसत्तावाला होवैहै । जैसैं युक्तिरजतका वाधक युक्ति-ज्ञान है औ स्वप्रजगत्का वाधक जाग्रत्का ज्ञान है । औ—३ कहीं समसत्तावाला बी होवैहै । जैसैं व्यवहारिक जगत्का वाधक ब्रह्मज्ञान है । परंतु—४ मिथ्याज्ञानही मिथ्यावस्तुका वाधक है । यह यांतैं इहाँ कहो जो नियम सो अधिष्ठानरूप साधक औ ज्ञानरूप वाधककूं छोड़िके अवनिष्ट रहे पदार्थनकूं विषय करनैहारा है ॥
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१४० ॥ श्लोक २१३ मत प्रश्नका उत्तर ॥ वेदगुरुत्तैं भ्रदुःखका नाशु चनैहै ॥ [ विचारसागरे
अविद्याके कार्य जो जाग्रतके पदार्थ ईश्वरसृष्टि तैंमैं व्यावहारिकसत्ता है ।
जन्म मरण बंध मोक्ष आदिक व्यवहारके सिद्ध करनैवाली जो सत्ता कहिये होना सो व्यावहारिकसत्ता कहियेहै । औ—
॥ २३४ ॥ २ ब्रह्मज्ञानसैं विनाही जिनका बाध होवै तिन पदार्थनमैं प्रतिभाससत्ता कहिये है । जैसैं ब्रह्मज्ञानसैं विनाही रज्जुसर्पलआदिकनके ज्ञानतैं रूपा सर्प जल-
आदिकनका बाध होवैहै, तिनमैं प्रतिभास-सत्ता है ।
प्रतिभास कहिये प्रतीतिमात्र जो सत्ता कहिये होना सो प्रतिभाससत्ता कहिये है । तूल्यअविद्याके कार्य रूपआदिक पदार्थनका
॥ २८५ ॥ घटादिजडपदार्थउपहित चेतनकूं आच्छादन करनैवाली ( ढांपनैवाली ) जो अविद्या सो तूल्यअविद्या कहियेहै । याहीकूं अवस्थ्यअज्ञान औ
स्वाविदोषवाली अविद्या वी कहतैंहैं ।
सो तूल्यअविद्या अंशमेदतैं नाना है औ मिल्न-पदार्थनकूं आावरण करैहै । जिस घटादिपदार्थी-कार अंतःकरणकी वृत्ति होवै तिस पदार्थका आच्छादक तूल्यअविद्याका अंश नष्ट होवैहै । फेर जब वृत्ति अन्यदेशनिधै जावै तव वहां औरअविद्याअंश
उपजैहै । इस तूल्यअविद्याके नाशनिमित्त ब्रह्मज्ञानकी अपेक्षा नहीं । किंतु ताकूं प्रतिभासिक सत्तावाली होनैतैं घटादिकके ज्ञानसैही ताका नाश होवैहै । औ-
पंचपादिकाके कर्ता पद्मपादाचार्यैं मूलअविद्या सोई तूल्यअविद्या है तिसते मिल्न नहीं है । ऐसे मानतैं-
हैं । इनके मतमैं जैसैं लोकसमूहकै मध्य बिजळी-
के पतनकरि सर्वलोक हट जातेैं फेर एकत्र होतैंहैं ।
तैसैं जिस पदार्थीकार अंतःकरणकी वृत्ति होवै तिस पदार्थीकार अविद्या तहैं तिरोधान ( तिरोधानकूं प्राप्त ) होवैहै । फेर जब वृत्ति अन्यदेशनमैं जावै
तव वह अविद्या फेर तहां प्रसरतैहै । परंतु ब्रह्मज्ञान-
विना ताका नाश होवै नहीं जो स्वप्न तथा कलिपत-
सर्पादिकनका अविद्याके नाशविना वी विरोध-
प्रतीतिमात्रही होना है, यातैं तिनकी प्रतिभाससत्ता है ॥
॥ २३५ ॥ ३ जाका तीनकालमैं बाध होवै नहीं ताकी परमार्थेसत्ता कहियेहै । चेतन-
की है ॥
॥ २३६ ॥ वेदगुरु औ संसारदुःखकी व्यावहारिक सत्ता है, यातैं तिनतैं भ्रदुःखका नाशु चनैहै ॥
इसरीतिसैं वेदगुरु औ संसारदुःख इनकी एक व्यावहारसत्ता होनैतैं आपसमैं समसत्ताक है । यातैं सिंध्या-वेदगुरुत्तैं मिथ्याभ्रदुःखका
नाशु चनैहै । औ—
पदार्थके ज्ञांतैं चा अविद्याके तिरोधानतैं अविद्याविषै लयरूप नाश चा तिरोधान होवैहै ।
यह प्रसंगमैं तूल्यअविद्याकी वर्णन किया ।
॥ २८६ ॥ यदपि मिथ्यावेदगुरुत्तैं मिथ्याभद-
दुःखका नाशु संभवैहै औ ऐसैं माननैंहैं सिद्धांतकी वी हानि नहीं तथापि—
१ वेदगुरुरूप इष्टकूं मिथ्या कहनां अयोग्य
है । औ—
२ जगत्सत्यवादिकनके उपहास्यकै विषय है । औ—
३ जिन्हासुनिकै विचित्तताका वी कारण है ।
यातैं इस उक्तिंका खंडनकरिकै सिद्धांतका भंग न होवै तैसैं अन्यप्रकारकी उक्ति निरूपण करैहैं:-
वेदगुरुकूं मिथ्या कहनैवालेके प्रति पूछनैहैं कि:-
१ शिष्यको दृष्टिसैं वेदगुरु मिथ्या है ?, २ क्या
गुरुकी दृष्टिसैं ? ।
१ जो शिष्यकी दृष्टिसैं कहैं तो (१) सो शिष्य
ज्ञानी है ?, (२) का अज्ञानी है ? ।
( १ ) 'सो शिष्य ज्ञानी है', ऐसैं कहैं तो ताकूं शिष्यपना संभवै नहीं । यदपि उपदेशा गुरुकै
अपेक्षातैं सर्वज्ञानीकूं शिष्यपना है तथापि
तिनकूं अधिकार होवैके शिक्षाके योग्य . शिष्यपना
नहीं है । औ—
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पंचमस्तरंग: ४ ] ॥ अंक २३७ गत प्रश्न औ ताका उत्तर ॥
कृधापिपासा प्राणके धर्म हैं । प्राण औ ताके दर्शंका ब्रह्मज्ञानसैं बिना बाध होतें नहीं । यातें पिपासाकी ब्यहारसत्ता है । मरस्थलके जलकै ब्रह्मज्ञानसैं विनाही मरस्थलके ज्ञातें बाध होतें मस्थलके जलकी प्रतिबिम्बसत्ता है । यातें प्यास औ मरस्थलके जलकी समसत्ता नहीं होतें ता जलतें प्यासका नाश होवै नहीं ।
१ यामप्रकारतें दार्शान्तविचें बाधकतैं वेदगुरु औ बाध्य संसारदुःख तिनकी सत्ता एक है औ—
२ दृश्यांतविप जल औ प्यास सत्ताके भेद है ।
यातें दृश्यांत विपम कदिये दार्शांतके सम नहीं ॥१४८॥
॥१३७॥ शंका:-शुक्तिरुपआदिकका ब्रह्मज्ञानविनाही बाध औ संसारदुःख ब्रह्मज्ञानसैं अनंतर बाध यह भेद कौन हेतुतें राखवहौं?
(२) सो शिष्म अज्ञानी हैं 'ऐसैं कहैं तो ताकी मिथ्या जानेहै वेदगुरुविपे शद्वापूर्वक प्रपंचकी अभास्यतें शोधकी प्राप्ति दुर्लभ है । किछौं अज्ञानी पुरुपकैं वेदांतश्रवणांतैं पूर्व किसी बी जगत्कै पदार्थप्रपंच मिथ्यात्वबुद्धि संभवे दी नाहीं ।
यातें शिष्यकी दृष्टितें वेदगुरु मिथ्या हैं । यह कथन बने नाहीं ॥ सो
२ जो गुरुकों दृष्टि वेदगुरु मिथ्या हैं । ऐसें कहैं तौं (१) गुरु अज्ञानी हैं (२) किआ ज्ञानी हैं?
(१) अज्ञान कहैं तौं तामैं गुरु कहनां वेदसैं विरुद्ध है । यद्यपि केईक अज्ञानी पुरुप बी जगत्विपै मूर्खनकी दृष्टितें गुरु केहलातेहैं तथापि वेदवेत्ताविद्वानकी दृष्टितें ये गुरुमद्वारकके विपय ( वाध्य ) नहीं । यह वार्तो वृतियतरंगमैं स्पष्ट निरुपण करिहै
यातें तिस अज्ञानकी दृष्टितें तौ वेदगुरु मिथ्या हैं ।
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मभिन्न मिथ्या सव भाखैौ ॥ तिनको भेद हेतु किहि राखैौ ॥ प्रभु ताकों अव कीजै छेहा । उपज्यो यह मीकों संदेहा ॥१४९॥
टीका:-हे प्रभु ! ब्रह्मसैं भिन्न आप सर्वेइं मिथ्या कहोर्हौं तिन मिथ्यापदार्थमैं—
१ शुक्तिरुपा रज्जुसर्प मरस्थलजलआदिकनका ब्रह्मज्ञानमैं विनाही बाध । औ—
२ संसारदुःखका ब्रह्मज्ञानसैं अनंतर बाध । यह भेद कान हेतुतें राखवहौं ?
॥२३८॥ उत्तर:-जाके ज्ञानसैं जो उपजे तिसका ताके ज्ञानसैं बाध होवैहै ॥
॥ चौपाई ॥
सकल अधियाकाकारज मिथ्या । सिप तामैं रंचकहु न तद्या ॥
यह कथन बने नाहीं । किहु वेदगुरुसहित सर्वजगत्सत्य है । यह कशन बनेहैं ।
(२) जो कहैं 'गुरु ज्ञानी है' तौं [१.] तिस ज्ञानिकों वेदगुरुसहित सर्वजगत्ब्रह्मैं भिन्न प्रतीत होवेंहैं? [२.] किआ अभिन्न प्रतीत होवेंहैं?
[१.] प्रथमपक्ष कहैं तौं तिस भेदवादीकों ज्ञानी किआ गुरु कहनां श्रयुक्त है । सो—
[२.] द्वितीयपक्ष कहैं तौं सर्वजगत औ आपकूं परमार्थसत्तामय ब्रह्मरुप जाननेवाले अद्वैतवादी गुरुक्की दृष्टितें 'वेदगुरु मिथ्या हैं' यह कथन बने नाहीं ।
किंतु अर्धदग्धकाष्ठभी न्हाई वेदांतश्रवणमनन करनैहारे अर्धप्रबुद्ध पुरुपकी किंतु वाध्यप्रपंचरत नहिंसुख—ज्ञानीकी हैं ।
इसरीतिसैं 'वेदगुरु सस्त हैं' यह चक्ति युक्तिसहित है ॥
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॥ संसार कौन कमतां उपजेई ? हसका उॅत्तर ॥ २६०-२७१ ॥
जा अज्ञानरें उपजत जोई । ताके ज्ञान वाढ तिहि होई ॥ १८० ॥ टीका:--हे शिष्य ! यथारिपु ग्रंथमैं भिन्न सकल अविधाका कार्य हैँ । यांतें मिथ्या है । तामें रंचक श्री तथ्या कहियें सत्य नाहीं । परंतु जोक अज्ञानमैं जो उपजै ताकी ज्ञानमैं तिसका वाढ होवैहै ।
१ शक्ति रजु मरुस्थल आदिकनके अज्ञानतें रूपा सर्पै जल आदि उपजैहैं, तिनका वाढ शक्ति रजु मरुस्थल आदिकनके ज्ञानतें होवैहैं । ओं---
२ ग्रंथके अज्ञानसें जो जन्ममरणादिक संसारदुःख उपजैहैं तथा वाढ वसज्ञानतें होवैहैं ॥ १८० ॥
॥ २३९ ॥ प्रश्न:--ग्रंथके अज्ञानसें संसार कौन कमतें उपजैहैं ? ॥
॥ शिष्य उवाच ॥
॥ दोहा ॥
भगवन् ब्रह्मअज्ञानतें, जो उपजै संसार । सो किहि कमतें होत है, कहौं मोहिं निरधार ॥ १५९ ॥
॥ गुरुमश्रका उॅत्तर ॥ २८०-२७१ ॥
॥ २८० ॥ स्वप्नसमान विनाकमतें जगत्का भासना ॥
॥ श्रीगुरुवाच ॥
॥ चौपाई ॥
जैसैं स्वप्न होत बिनु कमतें ।
त्मौं मिथ्याजग भासत भ्रमतें ॥ जो ताको कम जान्यों होइ । सो मिथ्याजल वेद्मन निचोइ ॥१५२॥ अर्थ स्पष्ट ॥ १५२ ॥
उपनिपदनमैं बहुत विधि, जगउत्पत्ति प्रचार । अभिप्राय, तिनको यही, चेतनभिन्न असार ॥ १५३ ॥ टीका:--ग्रंथि उपनिपदनमैं जगतकी उत्पत्ति अनेकप्रकारसें कहीहै ।
१ छांदोग्यमैं तो 'सत्रूप परमात्मातें अधि-जलपृथ्वी आदि कमतें उपजैहैं' यह कह्याहै । औ तैत्तिरीयमैं आकाश वायु अगि जल पृथ्वी कमतें होवैहैं । इसरीतिसैं पांचभूतकी उत्पत्ति कहीहै । औ---
२ कहूँ सर्वकी परमेश्वर उत्पत्ति करैहै । इस-रीतिसैं कमसैं विनाही उत्पत्ति कहीहै ।
ऐसैं जगत्की उत्पत्ति वेदमैं अनेकप्रकारसैं कहीहै ।
तहां वेद्का गूढ़ अभिप्राय है:--जगत् मिथ्या है । जो जगत् कछु पदार्थ होत तो ताकी उत्पत्ति अनेकप्रकारसें वेद नहीं कहता । अनेकप्रकारसें जगत्की उत्पत्ति कहीहै यांतें जगत्की उत्पत्तिप्रतिपादनमैं वेदका अभिप्राय नहीं । किंतु अग्रैतग्रंथ लखावनेकूं जगतके निपेध करनेइवास्ते मिथ्या जगत्का किसीरीतिसैं आरोप कियाहै ।
हष्टांत:--जैसैं विनोदके निमित्त दारूका ॥ २८८ ॥ इति ।
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हस्ती उड़ावनैहूँ वनावैहै, ताके कान पूछैहैं होैं तो सूथे करैनैवास्तै यत्न नाहीं करतै हैंसैं अद्वैतज्ञानके निमित्त प्रपंचके निपेधनहूँ प्रपंचका आरोप कियाहै । यातैं वेदनै प्रपंचकी उत्पत्ति-क्रम एकरूप कहनैमैं यत्न नाहीं कियाहै ॥ प्रपंचकी उत्पत्ति एकरूपसैं वेदन नाहीं कहैहैं यातैं यह जानैहैं:-वेदका अभिप्राय प्रपंचनिपेधनमैं है ताकी उत्पत्तिमैं अभिप्राय नाहीं । और
॥ २४१ ॥ सूत्रकारभाष्यकारका श्रुति-वचनसैं जगतउत्पत्तिकथनका अभिप्राय ॥
१ सूत्रकारभाष्यकारनै द्वितीयअध्यायमैं उत्पत्ति कहनैवालैं श्रुतिवचनका विरोध दूरी-करिके जो एकरूपसैं तैत्तिरीय श्रुतिके अनुसार उत्पत्तिमैं सर्वउपनिपदनका अभिप्राय कहाहै । सो मंदजिज्ञासुके निमित्त कहाहै । जो उत्पत्तिवाक्यनके पूर्व कहे अभिप्रायहूँ नाहीं जानै ता मंदजिज्ञासुहू उपनिपदनमैं नाना-प्रकारसैं जगतकी उत्पत्ति देखिके आपसमैं उपनिपदनका विरोध है । यह भ्रांति होय जावैगी । ताकेदू:रि करैनैहूँ सर्वउपनिपदनमैं एक-रूपसैं जगतकी उत्पत्तिप्रतिपादनका प्रकार कहाहै । औ—
॥ २८९ ॥ दृढसंसथियादिकी रीति सैं ब्रह्मविद्यै प्रपंचका आरोप करिके फेर ताके अपवादपूर्वक पंचमभूमीकामैं आरूढ होनैयोग्य जो उत्तमसंस्कारवान् जिज्ञासु हैं वे यहां उत्तमजिज्ञासु कहियेहैं ॥
॥ २९० ॥ यद्यपि जगतका विवर्तउपादानरूप अधिष्ठान मायाउपहितचेतन है, मायाविशिष्टचेतन नाहीं । तथापि 'मायाविशिष्टहूँ विवर्तउपादान कहिके तासैं जगतकी उत्पत्ति कहींहै । सो अविदेकी पुरुषकी दृष्टिके अनुसार है ॥
१. विवेकीपुरुषकी दृष्टि सैं तौ जगतकी २ जाकौं ब्रह्मविद्वारसैं यथार्थज्ञान नाहीं होवै ताकौं लयचिंतनके निमित्त थी उत्पत्तिक्रम कहाहै । जा क्रमतैं उत्पत्ति कहींहै तासैं विपरीत क्रमतैं लयचिंतन करै । ता लयचिंतनसैं अद्वैतमैं बुद्धि स्थित होवैहै । सो लयचिंतनका प्रकार पंचीकरणसैं पातिककार सुरेंद्रभाष्यमैं कहाहै ॥
३ यह ग्रंथ अंतमजिज्ञासुके निमित्त है । यातैं जगतकी उत्पत्ति औ लयका प्रकार नाहीं लिख्याहौ औ सर्गरूप है, यातैं संक्षेप-तैं दिखावैहैं:-शुद्धद्रव्यसैं जगतकी उत्पत्ति होवै नाहीं । कहैंतैं ? शुद्धद्रव्य असंग है औ अक्रिय है । किंतहूँ मायाविशिष्ट जो ईश्वर तासैं जगतकी उत्पत्ति होवैहै । यातैं माया औ ईश्वरका स्वरूप प्रतिपादन करैहैं ॥ १५२ ॥
॥ १५२ ॥ प्रसंगसैं मायास्वरूप-प्रतिपादन ॥
॥ कवित्व ॥ जीवईस भेदहीन चेतनस्वरूपमांहि । माया सो अनादि एक सांत ताहि मानिये ॥
परिणामिउपादानता विचर्चेउपादानता माया-( १ ) जगतकी परिणामिउपादानता केवल मायामैं है । औ— ( २ ) विवर्तेउपादानता मायाउपहितचेतनमैं है । २ अविदेकी जनोंकूं दोनूं धर्मनकी मायाविशिष्ट-चेतनमैं भ्रांतिसैं प्रतीति होवैहै ।
यातैं शास्त्रकारोंनै जैसैं अविदेकी जनोंकी दृष्टि अनुवादमात्र कियाहै ।
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॥ संसार कौन कमतैं उपजैहै, इसका उत्तर ॥ २४०-२९१ ॥
[ विचारसागर
सत औ असततैं विलच्छन स्वरुप ताको । ताहिकौं अविद्या औ अज्ञानहू बखानिये ॥ चेतनसों अन्य न विरोधी ताको साधक है । वृत्तिमैं आरूढ वा विरोधी वृत्ति जानिये ॥ मायामैं आभास अधि-ष्ठान अरु माया मिल । ईस सरबज्ञ जगहेतु पहिचानिये ॥ १५४ ॥
टीका:—जीवईश्वरमेदरहित जो शुद्धचेतन, ताके आश्रित माया है । सो माया अनादि कहिये आदिरहित है ॥ आदि नाम उत्पत्तिका है ।
१ जो मायाकी उत्पत्ति अंगीकार करें तौ मायाके कार्य प्रपंचसैं तो पुत्रसैं पिताकी न्योंई मायाकी उत्पत्ति बनैं नहीं । चेतनसैहीं मायाकी उत्पत्ति माननी होवैगी ॥ तहां—
२ जीवभाव औ ईश्वरभाव तो मायाके कार्य हैं । मायाकी सिद्धि इनविना जीवईश्वरका स्वरूप असिद्ध है । यातैं जीवचेतन वा ईश्वरचेतनसैं मायाकी उत्पत्ति कहना असंभव है । औ—
३ शुद्धचेतन असंग है; अक्रिय है; निर्विकार है; तातैं मायाकी उत्पत्ति मानै विकारी होवैगा । औ शुद्धचेतनसैं मायाकी उत्पत्ति होवै तौ मोक्षदशाविपै माया पैरि उपजैगी । यातैं मोक्षनिमित्तसाधन निष्फल होवैगें ॥
इसरीतिसैं माया १ उत्पत्तिरहित है, यातैं अनादि है । औ—२ एक है । ३ सात कहिये अंतवाली है । ज्ञातैं मायाका अंत होवैहै । औ—४ सतअसतसैं विलक्षण है ॥ (१) जाकी तीनकालमैंँ भाव होवै नहीं सो सत कहिये है । ऐसा चेतन है । (२) मायाका ज्ञातैं बाध होवैहै यातैं सतसैं विलक्षण है ॥ (३) जाकी तीनकालमैंँ प्रतीति होवै नहीं सो शशश्रृंग वंध्यापुत्र आकाशफूलआदिक असत कहिये हैं । (४) ज्ञानसैं पूर्व माया औ ताका कार्य प्रतीत होवैहै ॥
[१] जाग्रतविबै 'मैं अज्ञानी हूं । न जानूं' । इसरीतिसैं माया प्रतीत होवैहै । औ—
[२] स्वप्नकोविवै जो नानापदार्थ प्रतीत होवैंहैं । तिनका उपादानकारण माया है । औ—
[३] सुपुसिसैं अनंतर अज्ञानकी इसरीतिसैं स्मृति होवैहै:—'मैं सुखसैं सोया । कछु वी न जानतमया' सो स्मृति अज्ञान वस्तुकी होवै नहीं । यातैं सुपुसिमैं अज्ञानका भान होवैहै । सो अज्ञान औ माया एकही है । तिनका मेद नहीं । या प्रकारतैं तीनूं अवस्थाविषै मायाकी प्रतीति होवैहै । यातैं असतसैं विलक्षण है ॥ इसरीतिसैं सतअसतसैं विलक्षण जो माया ताका कार्य वी सतअसतसैं विलक्षण है ॥ sतअसतसैं विलक्षणकूही अद्वैतमतमैं मिथ्या कहहैं औ अनिर्वचनीय कहहैं ॥ yातैं माया औ ताके कार्यतैं द्वैतकी सिद्धि होवै नहीं । कहतैं ? जैसे चेतन सतुरूप है ।
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तैसैं माया औ ताका कार्य सत्रूप होवै तौ द्वैत होवै। सो माया औ ताका कार्य सत्असतसैं विलक्षण होनैं मिथ्या हैं। मिथ्या-पदार्थसैं द्वैत होवै नहीं। जैसैं स्वप्नके पदार्थ मिथ्या हैं तिनतैं द्वैत होवै नहीं॥ ॥ २४३ ॥ अज्ञानकी स्वाश्रयता औ स्वविषयता॥ १ जीव-ईश्वर-विसर्गरहित शुद्धचैतन्यकै आश्रित माया है। औ— २ शुद्धचैतन्यकैही आच्छादन करैहै। जैसैं गेहके आश्रित अंधकार गेहकूं आच्छादन करैहै। या पक्षकूं स्वाश्रयस्वविषयपक्ष कहैंहैं। १ स्व कहिये शुद्धचैतन्य आश्रय। औ— २ स्व कहिये शुद्धचैतन्य विषय कहिये मायानें आच्छादित है। अर्थ यह दृढ्याहै। संक्षेपशारीरक, विवरण, वेदांतमुक्तावली, अद्वैतसिद्धि, अद्वैतदीपिका आदिक ग्रंथकारोंनैं स्वाश्रयस्वविषयहि अज्ञान अंगीकार कियो है। औ— ॥ २४४ ॥ उत्तअर्थमें वाचस्पतिका मत ॥ vाचस्पतिका यह मत है:— १ "अज्ञान जीवके आश्रित हैऔ २ ब्रह्मकूं विषय करैहै।" १ 'मैं अज्ञानौँ ब्रह्मकूं नहीं जानूंँ'। या प्रतीतिसैं 'मैं' शब्दका अर्थ जीव 'अज्ञानौँ' कहनैंतैं अज्ञानका आश्रय मान होवैहै। औ— २ 'ब्रह्मकूं नहीं जानूंँ' यातैं अज्ञानका विषय ब्रह्म प्रतीत होवैहै।" इसरीतिसैं अज्ञान जीवके आश्रित औ ब्रह्मकूं विषय कहिये आच्छादन करैहै। वि. १९
"सो अज्ञान एक नहीं; किंतु अनंत हैं। कहैंत? १ जो एक अज्ञान मानैं तौ एक अज्ञानकी एककै ज्ञानौँ निवृत्ति हुइयैं औरनकूं अज्ञान औ ताका कार्य संसार प्रतीत नहिं होगा पाहिये। २ जो ऐसैं कहैं:-आजतौरी किसीकूं ज्ञान हुवा नहीं तौ आगे भी किसीकूं ज्ञान नहीं होवैगा। यातैं श्रवणादिक साधन निष्फल होवैगें। यातैं अनंतजीवकै आश्रित अज्ञान अनंत हैं। अनंतजीवनके अनंतअज्ञानकल्पित ईश्वर अनंत औ ब्रह्मांड अनंत हैं। जा जीवकूं ज्ञान होवै ताका अज्ञान ईश्वर ब्रह्मांडकै निष्पत्ति नहिं होवैतार्कूं बंध रहैहै"॥ ॥ २४५ ॥ वाचस्पतिके मतकी असमी-चीनता औ अज्ञानकी एकता ॥ १ "ईश्वर जीवके अज्ञानसैं कल्पित हैं"। यह कहनां 'श्रुतिस्मृतिपुराणतैं विरुद्ध है। २ "ईश्वर अनंत औ जीवजीवमें सृष्टिका भेद" यह कल्पना विरुद्ध है। यातैं नाना-अज्ञान माननैं असंगत है। औ-नाना-अज्ञान मानिके ईश्वर औ सृष्टि एक . मानैं तौ वनैं नहीं। कहैंत? जीव-ईश्वर-प्रपंच अज्ञानकल्पित हैं। अनंत-अज्ञान मानतैं एक-एक अज्ञानकल्पित जीवीकी नाईं ईश्वर औ प्रपंच भी अनंतही होवैंगे। याहिं वाचस्पतिनैं अनंत-ईश्वर औ अनंत-सृष्टि कहीहै। यातैं "अज्ञान एक है" यह मत समीचीन है॥
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॥ २४६ ॥ स्वाश्रयस्वविषयपक्षका अंगीकार ॥
सो ऐसैं अज्ञान बी जीवके आश्रित 'नहीं किंतु शुद्धब्रह्मके आश्रित है ! कहैंतैं ?
१ जीवभाव अज्ञानका कार्य है ! सो अज्ञान स्वतैं कदै बी रहै नहीं। यांतैं निराश्रय-अज्ञानसैं तौ जीवभाव बनै नहीं । प्रथम कीसीके आश्रित अज्ञान होवै तब अज्ञानका कार्य जीवभाव होवै।
२ जीवपनैकी न्याईं ईश्वरता बी अज्ञानका कार्य है ! ताके आश्रित बी अज्ञान नहीं ।
किंतु शुद्धब्रह्मके आश्रित अनादिअज्ञान है । अनादि जो चेतन औ अज्ञान तिनका संबंध बी अनादि चेतन अज्ञानके अनादि-संबंधसैं जीवभावईश्वरभाव बी अनादि हैं । यांतैं अज्ञानका कायै कदै यह अज्ञान 'मैं अज्ञानी हूं' इसरीतिसैं जीवके आश्रित अज्ञान प्रतीत होवैहै; तथापि शुद्धब्रह्मके आश्रित जो अज्ञान, ताका जीवकै 'मैं अज्ञानी हूं' यह अभिमान होवैहै । औ-१ जीव अज्ञानका कार्य है ! यांतैं अज्ञानका
॥ २४९ ॥ याका यह अभिप्राय है:-जैसैं अंशीरूप बंधकार एक है, तैसैं अंशरूप नाना-बंधकार प्रतिगृहविसै स्थित हैं ! जौ गृहमें दीपक होवै तौ गृहके बंध अंशरूप अंधकारका नाश होवैहै । तैसैं अंशीअज्ञान एक है, ताके अंशरूप नाना-अज्ञान नाना अंतःकरणदेसमें गत साक्षीचेतनविसै स्थित हैं। जौ अंतःकरणदेसमें ज्ञान होवै तौ अंतःकरण-देसगत अज्ञानांशका नाश होवैहै, यांतैं एकौं ज्ञान होवै तिसतैं सर्वकूं अज्ञानतत्कार्यकी निवृत्तिद्वारा मुक्ति प्रतीत होवै 'नहीं । इसरीतिसैं एकअज्ञानके अंगीकार दिये बी बंधमोक्षकी व्यवस्था बनैहै । औ जीवके अज्ञानसैं कल्पित ईश्वर बनैं हैं औ जीव-
अधिष्ठानरूप आश्रय जीव वन नहीं । किंतु शुद्धब्रह्मही अज्ञानका अधिष्ठानरूप आश्रय है ।
२ शुद्धब्रह्मअधिष्ठानके आश्रित जो अज्ञान सो तौ ब्रह्मरूही आच्छादन करैहै । तिसतैं अनंतर 'मैं अज्ञानी हूं' इसरीतिसैं अज्ञानका अभिमानीरूप आश्रय जीव होवैहै ! यांतैं स्वाश्रयस्वविषय अज्ञान है !
॥ २४७ ॥ एकअज्ञानपक्षमैं बंधमोक्षकी व्यवस्था । सर्वप्रक्रियाकी श्रेष्ठतापूर्वक मायाका नामभेदसैं स्वरूप ॥
सो अज्ञान यद्यपि एक है औ ज्ञांतैं निवृत्त होवैहै ! परंतु जौ अंतःकरणमैं ज्ञान होवै तौ अंतःकरणअवच्छिन्नचेतनमैं स्थित जो अज्ञानका अंश; तौकी निवृत्ति तौ ज्ञानसैं होवैहै ! जोरै अंतःकरणमैं ज्ञान नहीं होवै तहां अज्ञानका अंश रहैहै यांतैं एक अज्ञानपक्षमैं बंधमोक्षव्यवहार बनैहै । औ-कीसीऊ वाचस्पतिकी रीतिसैं नाना-अज्ञान वादही बुद्धिमैं प्रवेश होवै तौ वह बी अद्वैत-
जीवमैं सृष्टिका भेद है । इस श्रुतिस्मृतिपुराणंतै विरुद्धपक्षनतैं अंगीकार करना बी नहीं होवैहै । यांतैं यह पक्ष समीचीत है ॥
॥ २९२ ॥ 'मैं अज्ञानी हूं' इस अनुवादकै वाचस्पतिमिश्रनै अज्ञानका आश्रय जीव कथ्याहै । सो सुगमरीतिसैं मुमुक्षुकी बुद्धिमैं घटै इस निमित्त कहाहै । परंतु वाचस्पतिमिश्रका गूढअभिप्राय यह है:- 'मैं' शब्दका वाच्य जो अंतःकरणविसिष्टचेतन रूप जीव है, ताका विशेष्यभाग जो साक्षीचेतन सो ब्रह्म है । सो अज्ञानका आश्रय है । ताका ( विशेष्यके धर्मका ) विशेष्यमैं ब्यवहार होवैहै ।
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ज्ञानका उपाय है ताके खंडनमैं कछु आग्रह नहीं । जिसरीतिसैं जिज्ञासुकूं अद्वैतबोध होवै तैसैं बुद्धिकी स्थिति करै ॥ शुद्धसत्वके आश्रित जो माया तामैं अविद्या औ अज्ञान कहैहैं । १. अल्पशक्ति औ मृत्तिकाकूं नहीं सहारै, यातैं माया कहैहैं । २. विद्यातैं नाश होवैहैं, यातैं अविद्या कहैहैं । ३. स्वरूपका आच्छादन करैहै, यातैं अज्ञान कहैहैं ॥ १. जा चेतनके आश्रित है सो सामान्यचेतन ताका विरोधी नहीं । किंतु सामान्यचेतन मायांका साधक है । सत्तास्फुरण देवैहै ॥ औ— २. वृत्तिमैं आरूढ कहियैः स्थित सो चेतन अथवा चेतनसहित वृत्ति, ताकी विरोधी जानिये । कवित्वके तीनिपादनतैं मायाका स्वरूप कधौं । ॥ २५८ ॥ प्रसंगसैं ईश्वरका स्वरूप, द्विविधकारणका लक्षण, जगत्का उपादान औ निमित्तकारण ईश्वर है ॥ ॥ २५८--२५९ ॥
"मायामैं आभास" इत्यादि चतुर्थपादसैं ईश्वरका स्वरूप कहैहैंः— ॥ २५९ ॥ इहाँ यह नैष्कर्म्यसिद्धिकारका वचन हैः— " या या भवेत्पुंसां न्युप्तिः प्रयगरीमनि । सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साक्षी स्व व्यवस्थितिः" ॥१॥ अर्थः—पुरुषनकूं जिस जिस प्रक्रियाकरि प्रयगरीमविपै बोध होवै । सोई सोई प्रक्रिया इहाँ ( वेदांतसिद्धांतविषै ) श्रेष्ठ है जो सोई व्यवस्था है । सिद्धांतविषै ) श्रेष्ठ है जो सोई व्यवस्था है । १. शुद्धसत्वगुणसहित माया । औ— २. मायाका अधिष्ठान चेतन । ३. मायामैं आभास । तीनूं मिले ईश्वर कहियेहै ॥ सो ईश्वर सर्वज्ञ है । सोई जगत्का हेतु कहिये कारण है । कारण दोप्रकारक होवैहैः— १. एक तौ उपादानकारण होवैहै । २. एक निमित्तकारण होवैहै ॥ १(१) जाका कार्यके स्वरूपमैं प्रवेश होवै । औ (२) जा विना कार्यकी स्थिति होवै नहीं । सो उपादानकारण कहियेहै ॥ जैसैं मृत्तिका घटका उपादानकारण है । (१) घटके स्वरूपमैं ताका प्रवेश है । औ (२) मृत्तिकाविना घटकी स्थिति नहीं ॥ २(१) जाका स्वरूपमैं प्रवेश नहीं । किंतु (२) कार्यकरि मित्र स्थित होयके करै । औ (३) जाके नाशतैं कार्य बिगरै नहीं । सो निमित्तैकारण कहियेहै ॥ जैसैं घटके कुलालदंडचक्रआदिक निमित्तकारण हैं । (१) घटके स्वरूपमैं तिनका प्रवेश नहीं । (२) घटसैं मित्र कहिये किनारै स्थित होयके घटकी उत्पत्ति करैहै । औ (३) उत्पत्ति हुये पीछे कुलाल दंड चक्र आदिकनके नाशतैं घट बिगरै नहीं । इसीरितिसैं उपादान औ निमित्त दोप्रकारका कारण होवैहै । औ—
॥ २९४ ॥ इन तीनका जो कारण सो उपादानकारण कहियेहै । यह वी उपादानका लक्षण है ॥ ॥ २९५ ॥ कार्यकी उत्पत्तिमात्रका जो कारण सो निमित्तकारण कहियेहै । यह निमित्तकारण अनेकप्रकारका होवैहै ।
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|| २४९ || जगत्का उपादान औ निमित्त दोनूंकरतें ईश्वरही कारण है । जैसे एकही मॅकरी जाले- का उपादानकारण औ निमित्तकारण है ॥ औ जो ऐसे कहैं:- १ मकरीका जडशरीर जालेका उपादान- कारण है । औ- २ मकरीके शरीरमें जो चेतनभाग सो निमित्तकारण है । यातें एकईश्वरकूं निमित्तकारण औ उपादान- कारण माननमें कोई दृष्टांत नहीं । तौ मकरीकी न्यायी १ ईश्वरका शरीर जडमाया जगत्का उपादानकारण है । औ- २ चेतनभाग निमित्तकारण है । इसरीतिसैं एकही ईश्वर जगत्का उपादान औ निमित्तकारण है । तामें मकरीका दृष्टांत औ दृश्यदृष्ट्यग्रंथ स्वप्न है ॥
|| २५० || जीवका स्वरूप कहैंहैं:- मलिनसत्व अज्ञानमें, जो चेतनआभास । अधिष्ठानयुक्त जीव सो, करत कर्म फल आस ॥१५५॥ टीका:- १ रजोगुण औ तमोगुणकूं दावि लेबै, सो शुद्धसत्वगुण कहीयेहै ॥ औ- २ रजोगुणतमोगुणमैं आप दबै, सो मलिनसत्वगुण कहीयेहै ।
|| २४९ || १ जौं समय जीवनके कर्मे फल दैनैकूं सन्मुख नहीं होवै तव प्रलय होवैहै । औ २ जीवनके कर्म फल दैनैकूं सन्मुख होवें तव सृष्टि होवैहै । इसरीतिसैं जीवनकर्मेके आधीन सृष्टि है । यातैं
२ श्रीमद्भागवतमें जब ब्रह्माजीने वत्स औ वत्स- पाल हरण किये थे तव श्रीकृष्णपरमात्मा वत्स औ वत्स- पाल्यादिस्वरूप आपही बन्याहै । तहां वी श्रीकृष्ण - परमात्मा तिनका अभिन्ननिमित्तउपादानकरण है । औ- ३ सूर्य जो है१, सो षड्मासपर्यंत पृथ्वीके रसका शोषण करैहै । फेर ग्रीष्म औ वर्षार्तुके चारिमासपर्यंत जलकूं छोड़तहै । तिस जलका सूर्य- अभिन्ननिमित्तउपादानकरण है ॥ औ- ४ कोई कमंगर नखरूप कलममैं स्वशरीरपर चित्र लिखताहै । फेर ताकूं देखिके मुदित होत- है । फेर ताकूं नाश करतहै । तिस चित्रका वह कमंगर ( चित्रकार ) अभिन्ननिमित्तउपादानकरण है । औ- ५ जैसैं साक्षीचेतन स्वप्रपंचका अभिन्ननिमित्त- उपादानकरण है तैसैं ईश्वर जगत्का अभिन्न- निमित्तउपादानकरण है ॥
|| २९६ || मकरी नाम द्वतांतकूं है । याहीकूं उ०नामि वी कहतेहैं । || २९७ || १ जैसैं मकरीका शरीर जालेका उपादान- कारण है औ- २ अत:करणसहित चेतनभाग निमित्तकारणहै । १ तैसैं तम:प्रधानप्रकृतिरूप माया जगत्का उपादान है औ— २ शुद्धसत्वप्रधान मायासहित चेतनभाग जगत्का निमित्तकारण है । केवलचेतनभागमैं कारणता नहीं । यह अभिप्राय है ॥
|| २९८ || १ न्यायमतमैं घटके साथि ईश्वरके संयोगविशे- षै ईश्वरकूं अभिन्ननिमित्तउपादानकरण मान्याहै औ जीवात्मगत ज्ञानादिगुणविपै जीवात्माकूं अभिन्न- निमित्तउपादानकरण मान्यहै ।
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॥ पंचमस्तरंगः ५ ॥ दृश्यसैं वियमरष्टि औ फूरतां नाहीं ॥ जगतउत्पत्तिका हेतु ॥
१ तां मलिनसत्गुणसहित अज्ञानके अधरमें जो चेतनका आभासु । औ-- २ अज्ञान औ-- ३ ताका अधिष्ठान क्रूटस्थ । तीनूं मिले जीव कहियैहं । सो जीव कर्म करैहैं आं फलकी आशा करैहैं ॥ १५५ ॥
इच्छा होय जीव भोग जग उपजाईये ॥ नभ वायु तेज जल भूमि भूत रचै तहां । शब्द स्पर्शा रूप रस गंध गुन गाईये ॥
॥ २५१ ॥ ईश्वरमें विपमदृष्टि औ क्रूरता नाहीं ।
तां जीवके कर्मनके अनुसर ऊंचनीच- भोगके निमित्त ईश्वर सृष्टि रचैहैं । यांतें ईश्वरमें विपमदृष्टि औ क्रूरता नाहीं । और-- जो पेसै करैहैं:-सर्वसैं प्रथमसृष्टिमैं पूर्व कर्म नाहीं औ प्रथमसृष्टिमैं ऊंचनीचचारों ओ भोग ईश्वरनैं रचैहैं । यांतें ईश्वर विपमदृष्टि हैँ । कहैंतें ? संसार अनादि है । उत्तरउत्तरसृष्टिमैं पूर्वपूर्वसृष्टिके कर्म हेतु हैं । सर्वसैं प्रथम कोऊ सृष्टि नाहीं । यांतें ईश्वर- में दोप नाहीं ।
॥ २५२ जीवनके भोगनिमित्त ईश्वरकूं जगतकै उपजावनेकै इच्छा ॥ कवित्त ॥
जीवनके पूर्व सृष्टि कर्म अनुसार ईस ।
॥ ३५३ ॥ तहां यहां शंका है:- १ दुःख औ दुःखके साधनकी निवृत्तिके निमित्त कियौ सुख औ सुखके साधनकी प्राप्तिके निमित्त इच्छा होवैहै । अन्यथासतुकी इच्छा होवै नाहीं । यह नियम है ॥ ईश्वरकूं दुःख औ दुःखके साधनका अभाव है । यांतें ईश्वरकूं दुःख औ दुःखके साधनकी निवृत्तिके निमित्त इच्छा बनै नाहीं । औ-- २ जातें ईश्वर पूणकाम है यांतें ताकूं सुख
जो कहैहैं:-वास्तवकूं विनोदकी इच्छा होवैहै । ताकी नाईं ईश्वरकूं जगद्रचनारूप विनोदकी इच्छा निर्माण निमित्त वी होवैहै । सो कहनां वी यथै नाहीं । कहैंतें ? जैसैं बालककूं चित्तके आल्हादरूप सुखकी प्राप्तिके निमित्त इच्छा होवैहै तैसैं पूणकामईश्वरकूं आल्हादरूप सुखप्राप्तिकी इच्छा संभवै नाहीं ।
१ जय जीवनके कर्म भोग देणैंस उदासीन होवें तव प्रलयमें होवैहै । प्रलयमें सर्वपदार्थनके संस्कार मायामैं रहैहैं । यांतें जीवनके कर्म वी जो भावी रहैथे सो सूक्ष्म होयके मायामैं रहैहैं ।
२ जय कर्म भोग देणैकूं सन्मुख होवें तव ईश्वरकै यह इंच्छा होवैहै:- “जीवनके भोग- निंमित्त जगत् उपजाईये” सो मुखते सृष्टिकी प्रातिके निमित्त वी इच्छा बनै नाहीं ॥
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॥ संसार कौन कमतैं उपजैहै, इसका उत्तर ॥२५०-२५९॥
[विचारसागर
(॥सूक्ष्मसृष्टिनिरूपण ॥ २५३-२५७)
॥ २५३ ॥ पंचभूत औ तिनके गुणनकी उत्पत्ति ॥
ऐसी ईश्वरकी इच्छातैं मायातैं तमोगुणप्रधान होवैहै । ता तमोगुणप्रधान मायातैं सभू, वायू, तेज, जल, भूमि, ये पंचभूत रचिजावैहैं । तिन भूतनमें कमतैं शब्द, स्पर्शी, रूप, रस औ गंध, ये पांचगुण होवैहै ॥
१ मायातैं शब्दसहित आकाशकी उत्पत्ति । औ—
२ आकाशतैं वायुकी उत्पत्ति ।
(१) वायु आकाशका कार्य है । यातैं आकाशका शब्दगुण वायुमैं होवैहै ।
(२) अपना गुण स्पर्शी होवैहै ।
३ वायुतैं तेजकी उत्पत्ति । औ—
(१) तेजमैं आकाशका शब्द ।
(२) वायुका स्पर्शी होवैहै ।
(३) अपना रूप होवैहै ।
४ तेजतैं जलकी उत्पत्ति ।
(१) आकाशका शब्द ।
(२) वायुका स्पर्शी ।
(३) तेजका रूप ।
(४) जलका रस पृथिवीमैं होवैहै ।
(५) पृथिवीका गंध होवैहै ॥
५ जलसैं पृथवीकी उत्पत्ति औ—
(१) आकाशमैं प्रतिबिम्बनिरूप शब्द है ॥
२ वायुमैं
(१) सीसी शब्द । औ—
(२) उष्णा शीत कठिनतैं विलक्षण स्पर्शी है ॥
३ अग्निरूप तेजमै
(१) भुकभुक शब्द । औ—
(२) उष्णा स्पर्शी । औ—
(३) प्रकाश रूप है ।
४ जलमै
(१) चुलचुल शब्द ।
(२) शीत स्पर्शी ।
या शंकाका यह समाधान है:-जैसे कल्पवृक्ष अन्यपुरुषके संकल्पपरूप निमित्तसैं स्वभावकरि वांछितफळदूं देता है, तैसे ईश्वर बी फल देनैकूं सन्मुख भये जीवनके अघटघरूप निमित्तसैं स्वभावकरि फळ देता है, सो ईश्वरके इच्छादिककी एकअद्वैत व्यक्ती सृष्टिके आरंभकालमैं उपजैहै सौ प्रथमपर्यंत स्थायी है ।
यातैं नित्य कहियेहै । सौ भूतअविनाश्यत्वादिकमनकाल- गत संकल्पदायर्नकूं विषय करैहै । यातैं सदा सृष्टि किंवां प्रलय, शीत किंवां उष्ण किंवां वर्षा होवै नहीं । किंतु समयके अनुसारही होवैहै ॥
॥ २५७ ॥ जैसे स्वपतिके शुक्ररूप बीजकूं धारनेवाली औ क्रियाआदिक ज्ञानकाजंयुक्त पुत्ररूप
(२) वायुका स्पर्शी होवैहै । (३) अपना रस होवैहै ५ जलसैं पृथवीकी उत्पत्ति औ— (१) आकाशका शब्द । (२) वायका स्पर्शी । (३) तेजका रूप । (४) जलका रस पृथिवीमैं होवैहै । (५) पृथिवीका गंध होवैहै ॥ १ आकाशमैं प्रतिबिम्बनिरूप शब्द है ॥ २ वायुमैं (१) सीसी शब्द । औ— (२) उष्णा शीत कठिनतैं विलक्षण स्पर्शी है ॥ ३ अग्निरूप तेजमै (१) भुकभुक शब्द । औ— (२) उष्णा स्पर्शी । औ— (३) प्रकाश रूप है । ४ जलमै (१) चुलचुल शब्द । (२) शीत स्पर्शी ।
गर्भेवाली सर्गभी स्त्री प्रसवतैं पूर्व संततिके लाभ- रूप निमित्तसैं सदा प्रसन्न रहतीहै, यातैं सत्वगुण- प्रधानकी न्याईं है । पीछे प्रसवकालमैं वेदनारूप निमित्तसैं प्रसन्नताका तिरोधानकरिके दुःखयुक्तचित्तवाली होनैहैं तमोगुणप्रधानकी न्याईं होवैहै । सौ जैसे पूर्व श्वेतरंगवाला बादल है । सो वर्षाकालमैं द्याम- स्पांचाला होवैहै । तैसैं सृष्टितैं पूर्व ब्रह्मके प्रतिबिम्वरूप जगतके बीज (कारण) कूं धारनेवाली सौ अधि- योपाधिकास्यनन्तजीवयुक्त पंचरूप गर्भेवाली शुद्धसत्व- प्रधानमाया ( ईश्वरकी उपाधि ) है । सो सृष्टिके आरंभकालमैं शुद्धसत्वप्रधानस्वरूपका तिरोधान करिके सृष्टिके योग्य तमोगुणप्रधानप्रकृतिरूप होवैहै ॥
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( ३ ) शुक्र रूप । ( ४ ) मधुर रस है । औ क्षार तथा कडु पृथिवीके संवंधसैं जल प्रतीत होवैहै । जलका रस मधुरही है । सो मधुरता हरीतकीआदिक मधुरनिके जलपान किए प्रगट होवैहै ।
५ पृथिवीमैं ( ९ ) कटकट शब्द है । ( २ ) उष्णशीतसैं विलक्षण कठिण स्पर्शो है । ( ३ ) श्वेत नील पीत रक्त हरित आदि रूप हैं । ( ४ ) मधुर आम्ल क्षार कडु कपाय तिक्त रस हैं । ( ५ ) सुगंध औ दुर्गंध दोप्रकारका गंध हैँ । इसरीतिसैं- १ आकाशमैं एक । २ वायुमैं दोय । ३ तेजमैं तीन । ४ जलमैं चार । औ- ५ पृथिवीमैं पांच गुण हैँ ।
तिनमैं एकएक अपना है । अधिक कारणके सर्वका मूलकारण ईश्वर है । तामैं माया औ चेतन दोभाग हैं । १ मिथ्यापना मायाका भाग है । औ- २ सचिदानंद सच्चिदानंदस्वरूप चेतनका भाग है । कवित्वके दोपादका यह अर्थ है ॥
॥ २५४ ॥ अंतःकरणकी चारि भेदसहित उत्पत्ति ! पंचभूतनका सत्वगुण अंश मिलिके सत्व कहिये अंतःकरणऊ उपजवैहै । अंतःकरण ज्ञानका हेतु है औ ज्ञानकी उत्पत्ति सत्वगुणतैं अंगीकार करीहै; यातैं अंतःकरण भूतनके
सत्वगुणका कार्य है । औ पंचज्ञानइंद्रिय, तिन सत्वका सहायक हैं । यातैं पंचज्ञानइंद्रिय पंचभूतनके मिले सत्वगुणतैं अंतःकरणकी उत्पत्ति कहीहै ।
१ देहके अंदर कहिये भीतर है औ करण कहिये ज्ञानका साधन है, यातैं अंतःकरण कहीयेहै । औ- २ भूतनके सत्वगुणका कार्य है, यातैं अंतःकरणका सत्व भी नाम है ।
अंतःकरणका जो परिणाम ताकूं दृष्टि कहेहैं । सो अंतःकरणकी दृष्टि चारि हैं ॥ १ पदार्थके भलेहुरेस्वरूपकूं निश्चय करनेवाली दृष्टि वृद्धि कहीयेहै । २ संकल्पविकल्पदृष्टि मन कहीयेहै । ३ चिंताइदृष्टि चित्त कहीयेहै । ४ "अहं" पैसी अभिमानदृष्टि अहंकार कहीयेहैं ।
॥२५५॥ प्राणकी पंचभेदसहित उत्पत्ति । पंचभूतनके मिले रजोगुणके अंशतैं प्राणकी उत्पत्ति होवैहै । सो प्राण क्रियाभेदतैं औ स्थानभेदतैं पांचप्रकारका है ।
१ ( १ ) जाका हृदय स्थान है । औ- ( २ ) श्वासोच्छासा क्रिया हैँ । सो प्राण कहीयेहै । औ- २ ( १ ) जाका गुद स्थान है ( २ ) मूलमल अधोनयन क्रिया है सो अपान कहीये हैं ।
३ ( १ ) जाका नाभि स्थान । औ- ( २ ) मुक्तपीत अन्नजलकूं पाचनयोग्य सम करनीकी क्रिया है सो समान है । ४ ( ९ ) जाका कंठ स्थान हैँ । औ- ( २ ) स्वास क्रिया है सो उदान कहीये है ।
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५ ( १ ) जाका सर्वशरीरं स्थान है, ( २ ) रसनेलन क्रिया है; सो ध्यान कहिये है औ— कहूं नाग कूर्म कूकल देवदत्त औ धनंजय ये पंचप्राण अधिक कहेहैं । तिनकी उद्रार निमेप छीक जंभाई औ मतशरीरकलावन इस क्रमतैं क्रिया कहींहै । पृथिवी जल तेज वायु आकाश पंचनके रजोगुणअंशतैं एकएककी क्रमतैं उत्पत्ति कहीहै । औ अपान समान प्राण उदान व्यान इनकी बी पृथिवी आदिक एकएकके रजोगुण- अंशतैं उत्पत्ति कहीहै । सर्वके मिले रजोगुणअंशतैं नहीं । परंतु अद्वैतसिद्धांतमें यह क्रिया नहीं चाहतेैं ? विद्यारणयस्वामीने तथा पंचीकरणमें सां वार्तिककारने सूक्ष्मशरीरमें तौ पंचकोशनमें नागकूर्म आदिकनका ग्रहण किया नहीं औ तिननै अपान आदिक पंचप्राणकी उत्पत्ति बी अतनकै मिले रजोगुण अंशतैं कहीहै । यातैं— १ एकएकके रजोगुणअंशतैं अपान आदि- कनकी उत्पत्तिकथन असंगत । औ— २ सूक्ष्मशरीरमें नाग कूर्म आदिकनका ग्रहण असंगत । पंचप्राणकाही सूक्ष्मशरीरमें ग्रहण है ॥ प्राण विस्केपसरूप हैं औ विस्केपकै भाव रजोगुण का है यातैं भूतनके रजोगुण अंशतैं प्राणकी उत्पत्ति कहीहै । यह वृत्यिपादका अर्थ है ।
१ तेजके सत्वगुणअंशतैं नेत्र । २ रसनके सत्वगुणअंशतैं रसना औ— ४ जलके सत्वगुणअंशतैं घ्राण होवैहै । ५ पृथिवीके सत्वगुणतैं ये पंचेंद्रिय ज्ञानेके साधन हैं । यातैं ज्ञान- इंद्रिय कहिहैं ॥ औ— ज्ञान सत्वगुण होवैहै यातैं भूतकै सत्वगुणतैं उत्पत्ति कहीहै । श्रोत्रेंद्रिय आकाशके गुणतैं ग्रहण करैहै । यातैं श्रोत्रेंद्रियकी आकाशतैं उत्पत्ति कही । तैसैं जा भूतके गुणतैं जो इंद्रिय ग्रहण करै ता भूततैं इंद्रियकी उत्पत्ति कहीहै ॥ १ आकाशके रजोगुणअंशतैं वाक्इंद्रिय- की उत्पत्ति होवैहै । २ वायुके रजोगुणअंशतैं पाणिकी । ३ तेजके रजोगुणअंशतैं पादकी । ४ जलके रजोगुणअंशतैं उपस्थकी । ५ पृथिवीके रजोगुणअंशतैं गुदाकी उत्पत्ति होवैहै । छीकी योनि औ पुरुषके मेढ़में जो विषया- नंदका साधन इंद्रिय सो उपस्थ कहि- येहै । कर्मे नाम क्रियाका है ॥ ये पांचइंद्रिय क्रियाके साधन हैं । यातैं कर्मेंद्रिय कहिहैं ॥ क्रिया रजोगुणतैं होवैहै । यातैं भूतनके रजोगुणअंशतैं इनकी उत्पत्ति कहीहै ॥ १५६ ॥
॥ २५६ ॥ ज्ञानेंद्रिय औ कर्मेंद्रियकी उत्पत्ति ॥ १ एकएकभूतका सत्वगुणअंशा पंचज्ञान- इंद्रिय रचैहै । औ— २ एकएकका रजोगुणअंशा एकएककर्म- इंद्रिय रचैहै । १ आकाशके सत्वगुणतैं श्रोत्र । २ वायुके सत्वगुणअंशतैं त्वक् ।
॥ २५७ ॥ ॥ सवैयाछंद ॥ भूत अपंचीकृत औ कारज, इतनी सूक्ष्मसृष्टि पिछान ॥ पंचीकृत भूतनतैं उपज्यो, स्थूलपसारो सारो मान ॥
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कारन सूछम थूलदेह अरु । पंचकोस इनहींमैं जान ॥ करि विवेक लखि आतम न्यारो । मुंज इपीकातैं ज्यौं भान ॥ १५७ ॥ टीका:-अपंचीकृतभूत औँँ तिनका कार्य अंतःकरण, प्राण, कर्मइंद्रिय, औ ज्ञानइंद्रिय, इतनी स्थूलसृष्टि कहियेहै । सूक्ष्मसृष्टिका ज्ञान इंद्रियनैं होवै नहीं । नेत्रनासिकादिक गोलक तौ इंद्रियनके विपय हैं । परंतु तिन गोलकनमैं स्थित जो इंद्रिय सो वाहूके इंद्रियनकै विपय नहीं ॥ सूक्ष्मसृष्टिकी उत्पत्तिसैं अनंतर ईश्वरकी इच्छातैं स्थूलसृष्टिके निमित्त भूतनका पंचीकरण होताभया ॥
|| पंचीकरण || ३५८-३५९ ||
पंचीकरणप्रकार ॥ पंचीकरण दोप्रकारसैं कह्याहै:- १ एकएक भूतके दूधोभाग सम होयके एकएक भागके चारिचारि भाग भये । पांच- भूतनका आधाआधा भाग प्रथसम ज्यंकीज्यों रह्याहै। आधेआधे भागके जो चारिचारि भाग सो पृथक् रहे । बड़े अर्धभागनमैं अपने अपने भागबूँ छोडिके मिलेंतैं अर्धभागसभूूतनमैं अपना औ अर्धभाग अपनेतैर इतरे चारिभूतनका मिलिके पंचीकरण कहावैहै । २ दूसैरा यह प्रकार है:-एकएक भूतके दूदो- भाग भये सो सम नहीं । किंतु एकभाग चारि- भाग ज्यौंकीज्यों रह्याहै ।
|| ३०१ || पंचीकरणकी प्रथमरितिसैं सर्वभूतनमैं अर्धेअर्धेभाग आपआपका है ब्रह्म अर्धेभागजितने चारिभाग अन्य भूतनके मिलेहैं । यातैं अन्य भूतनके चारिभागतसैं आपआपके अर्धेअर्धेभागके तिरोधान- के होवेंतैं आकाशादिक प्रत्येक भूतका पृथक् पृथक् अंशाका औ पंचमांशाका एक भाग इस- रीतिसैं न्यूनअधिक दूधो भाग भये; तिनमैंँ सवके अधिकभाग ज्यंकीज्यों पृथक् स्थित रहे औ पंचभूतनके न्यून जो पंचभाग तिनके एकएक भागके पंचपंच भाग करिके पृथक्स्थित अधिक पंचभागनमैं एकएक भाग मिलिके पंचीकरण होवैहै । १ प्रथमपक्षमैं एकभागके चारिभाग पृथक् रहे । आधेआधे भागनमैं अपने भागबूँ छोडिके मिले । औ-- २ दूसरेभागके पंचभाग पृथक् रहे । अधिकपंचभागनमैं अपने भाग- सहितमैं मिले ॥औ-- १ प्रथमपक्षमैं पंचीकृत भूतनमैं अपना अंश अर्ध औ अर्धेअंश औरनका ॥ २ दूसरें पक्षमैं पंचीकरण कियेतैं अपने अंश इकीस, औरनके अंश चारि औ- दूसरे पक्षकी सुगमरीति यह है:- एकएक भूतके पचीस पचीस भाग होयँ ॥ इकीसीकीस भाग औ चारि चारिभाग पृथक् भये ॥ चारि भागनमैं एकएक भाग इकीसीभांगबूँ छोडिके । इसरीतिसैं दोप्रकारका पंचीकरण कह्याहै ॥ एकएक भूतमैं पांचपांच भूत मिलायकै करणकै नाम पंचीकरण है । जिनभूतनका पंचीकरण कियाहै तिनकूँ पंचीकृत कहैहैं ॥
भान न हुवाचादिये औ होवैहै । यातैं उत्त पंचीकरणकी रीति अवगतित है । ऐसौ शंका किसी मुमुक्षुके चित्तमैं होवै तौ ताके निवारणार्थै यह पंचीकरणका दूसरा प्रकार कहैहैं ॥
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॥ २५९ ॥ ॥ स्थूलब्रह्मांडादिक्की उत्पत्ति ॥
तिन पंचीकृत भूतनतैं १ इंद्रियनका विपय स्थूलब्रह्मांड होतभया ।
२ ता ब्रह्मांडकें अंतर भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक औ सतलोक, ये सातभुवन उपरके होतेभये ॥
३ अतल, सुतल, पाताल, वितल, रसातल, तलातल औ महातल ये सातलोक नीचेके होतेभये ।
४ तिन चतुर्दशलोकनमें जीवके भोगयोग्य अद्भुत औ मोहका स्थान देवनमुष्यपश्वादिस्थूलशरीर होतेभये ॥
यह संक्षेपतैं रचिका निलुपण किया औमायाके कार्यका विस्तारतैं निलुपण कियेतैं कोटिब्रह्माकी उमरतैं वी मायाकृतपदार्थनिरुपणका अंत होवै नहीं ।
यह वाल्मीकिनै अनेक इतिहासनतैं वासिष्ठमैं निलुपण कियाहै । ( यह सवैैैके दोपादनका अर्थ है )॥
( आत्मविवेक अथवा पंचकोशविवेक ॥ २५०—२७९ ॥ )
॥ २६० ॥ पंचकोश औ तिनकारी आत्माको आच्छादन करनो ॥
तृतीय पादका अर्थ यह है—इन्हीमें कहिये माया औ ताके कार्यमैं तीनि शरीर औ पंच कोश हैं ।
॥ २६२ ॥
१ समष्टिज्ञानरूप माया ईश्वरका कारणशरीर है ।
सो ईश्वरका आनंदमयकंच कोश है ।
२-४ जीवनके सूक्ष्मशरीरीकी समष्टिरूप हिरण्य-
१ ( १ ) शुद्धसत्गुणसहित माया ईश्वरका कारणशरीर है ।
औ— ( २ ) मछिनसत्गुणसहित अविद्याआंश जीवका कारणशरीर है ।
२ ( १ ) उत्तरशरीरके आरंभक पंचसूक्ष्मसूत मन बुद्धि चित्त अहंकार, पंचप्राण पंचकर्मइंद्रिय औ पंचज्ञानइंद्रिय,
यह जीवका सूक्ष्मशरीर है ॥
औ— २ सर्वजीवनके सूक्ष्मशरीरही मिलिके ईश्वरका सूक्ष्मशरीर है ॥
३ ( १ ) संपूर्णस्थूलब्रह्मांड ईश्वरका स्थूलशरीर है ॥
औ— ( २ ) जीवनके व्यष्टिस्थूलशरीर प्रसिद्ध हैं ॥
इन तीनि शरीरनमैंही पंचकोश हैं ॥
१ कारणशरीरकूं आनंदमयकोश कहैहैं ॥
२-४ विज्ञानमय, मनोमय, औ प्राणमय, ये तीनि कोश सूक्ष्मशरीरमैं हैं ॥
( १ ) पंचज्ञानेंद्रिय औ निश्चयरूप अंतःकरण की वृत्ति बुद्धि विज्ञानमयकोश कहियेहै ॥
( २ ) पंचज्ञानेंद्रिय औ संकल्पविकल्प अंतःकरणकी वृत्ति मन मनोमयकोश कहियेहै ।
( ३ ) पंचप्राण औ पंचकर्मेंद्रिय प्राणमयकोश है ।
५ स्थूलशरीरकूं अन्नमयकोश कहैहैं ।
इसरीतिसैं तीनिशरीरनमैंही पंचकोश हैं ॥
१ ईश्वरके शरीरमैं ईश्वरके कोश हैं ।
औ गमे ईश्वरका सूक्ष्मशरीर है ।
तामैं ( १ )विज्ञानमय ( २ ) मनोमय औ ( ३ ) प्राणमयरूप ईश्वरके तीनिकोश हैं ।
तिनमैं— ( १ ) दिक्पाल, वायु, सूर्य, वरुण, अष्ट, अभित्तिनी-
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२ जीवके शरीरनमें जीवके कोशा हैं । कोशा नाम स्यानका है । स्यानकी न्यांई पंचकोश आत्माके स्वरूपकूं आच्छादन करेंहें, यातें अनमयादिक कोश कहियेहें ॥ अनेक मंदमति-पुरुप पंचकोशनमें जो अनात्म-पदार्थ हैं; तिनमें किसी एककूं आत्मा मानिक मुख्यसाक्षी आत्मस्वरूपते विमुखही रहेंहें । यातें अनमयादिक आत्मस्वरूपकूं आच्छादन करेंहें । तहां— ॥ २६९ ॥ विरोचनका सिद्धांत ॥ ( अनमयकोश आत्मा ) कितने पामर विरोचनमतके अनुसारी स्थूलशरीररूप अनमयकोशकूंही आत्मा कहेंह आ यह युक्ति कहहें:— १ जामें अहंबुद्धि होवै सो आत्मा है । सो अहंबुद्धि स्थूलशरीरमें होवेंहें । (१) ‘मैं मुख्य हूं, मैं ब्राह्मण हूं’ ऐसी प्रतीति सर्वकूं होवेंहें । औ— कुमार, ये पांच ईश्वरकी ज्ञानइद्रिय औ समष्टि-बुद्धिमय महत्तत्त्वादिरूप या सर्व बुद्धिनका अभिमानी शरारूप ईश्वरकी बुद्धि मिलिके ईश्वरका चिदानमयकोशा है । औ— (२) उक्त श्रोत्रादिकके अधिष्ठाता देवतारूप पांच ईश्वरके ज्ञानइद्रिय औ समष्टिमन रूप अहंकामय 'वा सर्वकें मनका अभिमानी चंद्रामाय ईश्वरका मन मिलिके ईश्वरका मनोमयकोशा हैं । औ— (३) अगि, इंद्र, उपेंद्र, प्रजापति, असह मृत्यु (यम) ये पांच ईश्वरके कर्मइद्रिय औ समष्टि-प्राण वा वायुकां अभिमानी देवतारूप ईश्वरका प्राण मिलिके ईश्वरका प्राणमयकोशा हैं । औ— ५ समष्टिस्थूलसूक्ष्मरूप विराट ईश्वरका स्थूल-शरीर है सो ईश्वरका अन्नमयकोशा है ।
(२) मुख्यपन, नामपन, औ स्थूल-शरीरमही हैं । यांतें स्थूलशरीरही अहंबुद्धिका विषय होवेंहें आत्मा है ॥ २ किंतां जासमें मुख्यप्रीति होवें सो आत्मा हैं ॥ (१) व्री पुत्र धन पदु आदिक स्थूलशरीरके उपकारक होवेंहैं तां तिनमें प्रीति होवेंहैं । औ— (२) स्थूलशरीरके उपकारक नहीं होवें तां प्रीति होवें नहीं ॥ जाके निमित्त अन्यपदार्थमें प्रीति होवें तां स्थूलशरीरमही मुख्यप्रीति है । यांतें स्थूल-शरीरही आत्मा हैं ॥ यह असुरस्वामी विरोचनका सिंद्रांत है ॥ जैसे जीवके द्वारमें जीवके कोश हैं, वे कोशकार नाम कुंभी (कोड़े) के कंटकरचित गृहरूप कोशकी न्यांई जीवकी दृष्टिंमें ताके निजरूप प्रत्यगात्माके आच्छादक हैं; तैसें ईश्वरके शरीरनमें जो ईश्वरकी दृष्टिंमें ताके निजरूप ब्रह्मके आच्छादक नहीं । किंतु जीवकी दृष्टिंमें यांत जीवकूं वप्टिपंचकोशन-तत्त्वके आच्छादक हैं । यांतें जैसे प्रल्याग्निमें अविवेचन कर्तव्य है तैसें समष्टिपंचकोशनतें ब्रह्मका विवेचन व्दी जीवकूंही कर्तव्य है । ईश्वरकूं आवरणके अभावर्तें निस्यमुक्त होवेंकरि कहुं व्दी कर्तव्य नहीं है ॥
॥ ३०३ ॥ १ 'मैं देहलंहू' 'सुनहू' इत्यादि इंद्रियनन व्दी अहंबुद्धिके देखनतैं औ स्थूलदेहतें इंद्रियनविपै अधिक प्रीतिके देखनतैं स्थूलदेहविपै अहंबुद्धि औ मुख्यप्रीतिके ब्यभिचारतैं । औ—
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॥ २६२ ॥ इंद्रियआत्मवादीका मत ॥
( इंद्रियआत्म ) और कोऊ ऐसे कहैंहैं:-स्थूलशरीरहि जाके होनेतें जीवनव्यवहार होवैहै औ जाके न होनेतें मरणव्यवहार होवैहै सो आत्मा स्थूलशरीरहि भिन्न है । जीवन मरण इंद्रियनके आधीन है । जितने काल शरीरमैं इंद्रिय होवै उतने काल जीवन है औ कोऊ इंद्रिय न होवै तव मरण कहियेहै । औ- २ "मैं देखूं हूं", "मैं सुनूं हूं" ! "मैं बोलूंहूं" इसरीतिसैं अहंबुद्धि वी इंद्रियनमैं होवैहै ।
यांतैं 'द्रिही आत्मा है । औ- ॥ २६३ ॥ हिरण्यगर्भके उपासकका मत ॥
( प्राणआत्मा ) हिरण्यगर्भमैंके उपासी कहैंहैं । तामैं यह युक्ति कहैंहैं:- १ जब मरणसमय मुखों होवेंहै तव ताके संबंधी पुत्रादिक प्राण शेप होवें तौ जीवन जानैहै औ प्राण शेप न होवें तौ मरण जानैहैं ।
२ "मेरा देह है" औ "मुझकूं धिकार है" इसरीतिसैं स्थूलदेहकूं उलटा ममबुद्धि औ दृशकाविषय होनेंतैं ।
यह स्थूलदेह आत्मा नहीं है । इस देहात्मवादिके मतका विशेषकारिके खंडन हमने श्रीपंचदशीके चित्रदीपके ६१ में श्लोकके टिप्पणविषे लिख्याहै ।
२ किवा शरीरमैं नेत्रइंद्रिय नहीं होवें तौ अंधाशरीर रहैहै औत्रसैं विना वाधिर रहैहै । वाकुविना:मूक रहैहै । ऐसैं जो इंद्रिय नहीं होवै ताके व्यापारसैं विना वी शरीर स्थितहि रहै औ प्राणसैं विना तिसीक्षणमैं सज्ञानके समान अमंगल मथकर होतें निहै ॥ औ- ३ "मैं देखूंहूं" । "सुनूंहूं" या प्रतीतिसैं वी इंद्रियनतें भिन्नही आत्मा सिद्ध होवैहै । कहैंतैं ? "नेत्रस्वरूप मैं देखूंहूं । श्रवणस्वरूप मैं सुनूंहूं" । जो ऐसी प्रतीति होवै तो इंद्रियरूप आत्मा सिद्ध होवै । किंतु "मैं नेत्रवाला देखूंहूं" । "श्रोत्रवाला मैं सुनूंहूं" । ऐसी प्रतीति होवैहै ।
यांतैं इंद्रियनतें भिन्नही आत्मा है ॥ औ- ४ शुद्धतिमें सर्फइंद्रियनका अभाव है । तौ वी प्राणके होनेतैं जीवनव्यवहार होवैहै । यांतैं जीवनमरण वी इंद्रियनके आधीन नहीं । किंतु शुद्धात्मशरूप धर्मवाले प्राणविदै वी अहंबुद्धिके होनेतैं । चौ--
३ "मेरी चक्षु" "मेरी वाणी" ऐसैं इंद्रियनकूं ममबुद्धिके विषय होनेंतैं इंद्रियगत अहंबुद्धिका व्यभिचार है ।
यांतैं इंद्रिय आत्मा नहीं । इंद्रियआत्मवादीके मतका विशेषखंडन हमने श्रीपंचदशीके चित्रदीपके ६५ में श्लोकके टिप्पण- विदै लिख्याहै ॥
॥ ३०५ ॥ प्राण आत्मा नहीं है यह अर्थे पंचदशीके चित्रदीपके ६७ में श्लोकके टिप्पणविषे सविस्तर लिख्याहै ।
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॥ २६४ ॥ मनआत्मवादीका मत ॥ (मन आत्मा) और कोई ऐसैं कहैंहैं:- १ प्राण जड हैँ, यातैं घटकी न्याईं अनात्मा हैँ । औ- २ बंधमोक्ष मनके आधीन हैं । (१) विषयमैं आसक्त जो मन सो बंधनका हेतु हैँ । (२) विषयवासनारहित मन मोक्षका हेतु हैँ । औ- ३ मनके संबंधतैहीं इंद्रिय ज्ञानके हेतु हैं । मनके संबंधविना इंद्रियतैं ज्ञान होवै नहीं! यातैं सर्वज्ञयवहारका हेतु मन हैँ । सोई आत्मा हैँ । औ- ॥ २६५ ॥ विज्ञानवादी बौद्धका मत ॥ (बुद्धि आत्मा) क्षणिकविज्ञानवादी बौद्ध यह कहैंहैं:- मनका व्यापार बुद्धिके आधीन हैँ । कहैंतैं? बुद्धिकाही आकार मन होवैहै । यातैं क्षणिकविज्ञानरूप बुद्धिही आत्मा हैँ । मन नहीं ॥ यह तिनका अभिप्राय है:- १ संपूर्णपदार्थ विज्ञानकेही आकार हैं । २ सो विज्ञान प्रकाइरूप हैँ । औ- ३ क्षणक्षणमैं विज्ञानके उत्पत्तिनाश होवैहैं । पूर्वविज्ञानके समान अन्यविज्ञानकी उत्पत्ति हेतैं पूर्वविज्ञानका नाश होवैहै । तैसैं द्वितीयविज्ञानकी उत्पत्ति औ द्वितीयविज्ञानका नाश, तृतीयकाउत्पत्ति, तृतीयका नाश होवैहै । यार्तिसैं नदीकै प्रवाहकी न्याईं विज्ञानकी धारा
॥ ३०६ ॥ 'मन आत्मा नहीं हैँ', यह अर्थे पंचदशीकै चित्रदीपकै ६८ वैं श्लोककै टिप्पणविपै विस्तारसैं लिख्याहै । ॥ ३०७ ॥ क्षणिकविज्ञानरूप बुद्धिही आत्मा
घनी रहैंहैं । मो विज्ञानकी धारा दोप्रकारकी हैं । १ एक तौं आलयविज्ञानधारा है औ २ दूसरी प्रचृत्तिविज्ञानधारा हैं । १ "अहं अहं" ऐसैं विज्ञानधाराकूं आलयविज्ञानधारा कहैंहैं । ताहीकूं २ "यह घट हैँ, यह शरीर हैँ" ऐसैं विज्ञानधाराकूं प्रचृत्तिविज्ञानधारा कहैंहैं । आलयविज्ञानधारासैं प्रचृत्तिविज्ञानधाराकी उत्पत्ति होवैहैं । मनका स्वरूप श्री प्रचृत्ति- विज्ञानधारामैं हैँ । यातैं आलयविज्ञानधारारूप युदिधका कार्य हैँ । सो युदिधही आत्मा हैँ । आलयविज्ञानधारावैं प्रचृत्तिविज्ञानधाराका वाधचिंतनतैं नैर्विशेषक्षणिकविज्ञानधाराकी स्थितिही तिनके मतमैं मोक्ष हैँ । इसरीतिसैं विज्ञानवादी बुद्धिरूपही क्षणिक- रूप औ स्वयंप्रकाइरूप कल्पनाकरिके आत्मा कहैंहैं ॥ औ- ॥ २६६ ॥ भट्टका मत ॥ (आनंदमयकोश आत्मा) पूर्वमीमांसाकै चार्चिककारभट्ट यह कहैहैं:- १ जडस्वरूप आत्मा नहीं ! किंतु सिथरस्वरूप आत्मा १ जडस्वरूप औ २ चेतनरूप हैँ । यह तिनका अभिप्राय है:- १ सुप्रसैं जागिके पुरुप यह कहैहैं:- "मैं जड होयके सोवताभया" यातैं आत्मा जडरूप हैँ । औ-
ऐसैं माननेवाले क्षणिकविज्ञानवादीकै मतका प्रतिपादन औ खंडन चित्रदीपकै ७४ वैं श्लोककै टिप्पणचिपै हमने विस्तारसैं लिख्याहै ॥
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१५८ ॥ संसार कौन ऋमतें उपजैहै, इसका उत्तर (पंचकोशविवेक) ॥२४०—२७१॥ [ विचारसागरे
२ जागेऊँ स्यति होवैहै, अज्ञानकी स्यति होवै नहीं । आत्मस्वरुपसैं भिन्न ज्ञानके सुपुप्तिमें और साधन नहीं । यातैं स्मृतिका हेतु सुपुप्तिमें ज्ञान है । सो आत्माका स्वरुपही है । इसरीतिसैं ख्योतकी न्यांई आत्मा प्रकारा औ अपकाशरुप है ।
१ ज्ञानरुप है, यातैं प्रकारारुप है । औ- २ जड़ है, यातैं अपकाशरुप है । सो प्रकारारुप औ अपकाशरुप आनंदमय- कोश है । कहहैं? सुपुप्तिमें चेतनके आभाससहित जो अज्ञान, ताकूँ आनन्दमयकोश कहहैं । तहां आभास तौ प्रकारारुप औ अज्ञान अपकाशरुप है । यातैं भटके मतमें आनन्दमय- कोशही आत्मा है ॥
॥ २६७ ॥ माध्यमिक बौद्धका मत ॥ ( आनन्दमयकोश आत्मा ) शून्यवादी बौद्ध यह कहहैं:- आत्मा निरंध है, यातैं एक आत्माकूँ प्रकारारुप औ अपकाशरुप कहना बने नहीं औ ख्योतकी तौ एकअंश प्रकारारुप है औ दूसरा अंशा अपकाशरुप है । ताकी न्याईं अंशरहित आत्माविपै उभयरुप कहना असंगत है । यातैं-
१ उभयरुपकी सिद्धिवासतैं आत्मा अंश- सहितही मानना होवैगा । २ जो अंशवाले पदारथ घटादिक हैं सो उत्पत्ति औ नाशवाले होवहैं । तैसैं आत्मा भी अंशसहित होनैतैं उत्पत्ति- नाशवालाही मानना होवैगा । ३ जो उत्पत्तिनाशवाला पदार्थ होवै सो
उत्पत्तिसैं पूर्व औ नाशतैं अनंतर असत् होवैहै । जो आदिअंतमें असत् होवै सो मध्य भी सत् होवै नहीं । किंतु मध्य भी असतही होवैहै । यातैं आत्मा असत् रुप:है । तैसैं आत्मासैं भिन्न भी संपूर्णपदार्थ उत्पत्तिनाशवाले हैं यातैं असत् रुप हैं । इसरीतिसैं आत्मा औ अनात्मा समग्र- वस्तु असतरुप होनैतैं शून्यही परमतत्व है । यह शून्यवादी माध्यमिक बौद्धका मत है ॥
सो भी अज्ञानरुप आनन्दमयकोशकूँं प्रति- पादन करहैं । कहहैं? अज्ञान तीनिरुपसैं प्रतीत होवैहै ।
१ अद्वैतशास्त्रके संस्काररहित जो मूढ तिनकूँ तौ जगत् रुप परिणामकूँ प्राप् अज्ञान सत् प्रतीत होवैहै । औ— २ अद्वैतशास्त्रके अनुसार युक्तिनिपुण- पंडितनकूँ सतअसतकूँ विलक्षण-अनिर्व- चनीयरुप अज्ञान औ ताका कार्य जगत् प्रतीत होवैहै । ३ ज्ञाननिष्ठाकूँ प्राप् जो जीवन्मुक्तविद्वान् तिनकूँ कर्यसहित अज्ञान तुच्छरुप प्रतीत होवैहै ।
तुच्छ असत्, औ शून्य, ये तीनिशब्द एकही अर्थकै कहहैं ॥ इसरीतिसैं जीवन्मुक्तनकूँ तुच्छरुप जो प्रतीति होवै अज्ञान, ताकैविपै मोहित शून्य- वादी परमपुरुपार्थकूँ नहीं जानहैं । किंतु तुच्छ- रुप आनन्दमयकोशकूँही आत्मा कहहैं । औ
॥ २६८ ॥ शून्यवादी बौद्धके मतका खंडन । चित्रादिपके ९८ मेंँ खंडन चित्रादिपके ७६ वेंँ खोकके टिप्पणविधै हमनै लिख्याहै ॥ २६९ ॥ शून्यवादी माध्यमिकके मतका खंडन चित्रादिपके ७६ वेंँ खोकके टिप्पणविधै लिख्याहै ॥
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॥ २६८ ॥ प्रभाकर औ नैयायिकका मत ॥ ( आनन्दमयकोषा आत्मा ) पूर्वमीमांमाका एकदेशी प्रभाकर औ नैयायिक यह कहैं:—आत्मा ज्ञानरूप नहीं हैं । कहैंत ? जो ज्ञानरूप आत्मा मानें तौं यह पूछहैं:—१ आत्मरूपको तैंने अनुभव कियोह २ अथवा नहीं ? १ जो कहैं " ज्ञान्यक अनुभव कियाहै " तौं जानि ज्ञान्यक अनुभव कियाहै । सो आत्मा ज्ञान्यसैं विलक्षण सिद्ध होवैहै । २ जो ऐसे कहैं " ज्ञानरूपहा अनुभव नहीं किया " तौं ज्ञान्य नहीं हैं । यह सिद्ध हुवा ॥ इसरतीसैं ज्ञान्यंत विलक्षण आत्मा हैं । १ ताकौवैं मनकै संयोगतैं ज्ञान होवैहैं । २ तौं ज्ञानमात्रंत आत्मा चेतन कहिये हैं । औ ३ स्वरूपसैं आत्मा जड़ हैं । ४ तैंसैं मुख, दुःख, इच्छा, क्रेप, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, आदिक गुण आत्माविषैं हैं । तिनके मतमैं भी आनन्दमय कोषही आत्मा हैं । औ—— विद्ञानमयकोषमैं जो शुद्धि हैं सो आत्माका ज्ञानगुण कहैंहैं । कहैंत ? आनन्दमय- कोषमैं चेतन गूढ़ हैं । विचेचकहिंकै प्रवीत होवैहैं नहीं औ प्रभाकर तथा नैयायिक आत्मारूप- सुप्तिमैं ज्ञानहीन मानिके स्वरूपसैं जड़ करैंहैं । यांत गूढ़चेतन आनन्दमयकोषामैंही तिनकै- आत्मभ्रांति हैं । औ—— ॥ ३१० ॥ नैैयायिक औ प्रभाकरकै मतका परिपादन चित्रदीपकै ८८ सैं ९४ तैं लोकपर्यंत किया हैं तौ तिनके मतका खंडन चित्रदीपकै ९५ मैं
आत्मस्वरूप नित्यज्ञानरूप तौं जीवमैं भान्त नहिं किंतु अनित्यताकै मानेंहैं । जो अनित्य- ज्ञान सिद्धांतमैं अंत:करणकी शुक्ति शुद्धिरूप हैं । यार्तिसैं प्रभाकरनैयायिकमतमैं आनन्द- मयकोषा आन्मा हैं औ शुद्धि ताका गुण हैं ॥ तिनका मंत भी सुषुप्तीन नहीं । कहैंत ?— ॥ २६९ ॥ जीवका पंचकोषकी न्याईं ई- श्वरकै पंचकोषानसैं ताके स्वरूपका आनच्छादन ॥ १ ज्ञानसैं भिन्न जो जड़यस्तु घटादिक हैं सो अनित्य हैं । नैसैं आत्मा की ज्ञान- स्वरूप नहीं होवै तौं घटादिकनकी न्याईं जड़ होवैहैं अनित्य होवैगा । २ जो आत्मा अनित्य होवैं तौं मोक्षके अर्थ साधन निष्फल होवैगा । इमरतीसैं चेतनंत्वाद्यनमैं विश्वासहीन अनेकत्वभिमुख पंचकोषानमैंही किसी पदार्थकूं आत्मा मानहिं औ मूल्यआत्मस्वरूप साक्षीरूं नहीं जानहिं । यांत अज्ञानयादिक आत्माके आनच्छादक होनतैं कोश कहियें। जैसे जीवके पंचकोष जीवके यथार्थस्वरूप साक्षीहूंक आच्छादन करैंहैं नैसैं ईश्वरके समाधि- पंचकोष ईश्वरकै यथार्थस्वरूपहूं आच्छादन करहैं । कहैंत ? ईश्वरका यथार्थस्वरूप तौं तत्पद- पा लक्ष्य हैं ताहि ल्यागिके—— १ कोई तौं मायारूप आनन्दमयकोषाविशिष्ट जो अंतर्यामी तत्पदका वाच्य ताकूंही परमात्मच कहैंहैं ॥ २ तैसे हिरण्यगर्भ, घेशानर, विष्णु, शेषादि टिप्पणविषैँ चिह्नपाइहैं । इहाँ " गूढ़चेतन " या शाब्दिक गूढ़ हैं चेतन जिसतैं ऐसा ज्ञानदायक- कोष तौं यह अर्थ हैं
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२६० ॥ संसार कौन कमतैं उपजैहै, इसका उँत्तर(पंचकोशविवेक) २६०-२७१ ॥ [ विचारसागर ]
ब्रह्मा, शिव, विष्णु, देवी औ दैत्यसैं आदिलेके असि, कुदाल, पीपल, अर्क वंशपर्यंत पदार्थनमें परमात्माश्रांति करैहै यद्यपि सर्वपदार्थनमें लक्ष्यभाग परमात्मासैं मिल्न नहीं तथापि तिसतिस उपाधिसहितकूं जो परमात्मा मानैहैं सो तिनकूं श्रांति है । यार्तिसैं—
१ पंचकोशतैं आवृत्त जो जीवईश्वरका परमार्थस्वरूप, तासैं विमुख होइके देहादिकनमें आत्मश्रांतिकारिके पुण्यपापकर्म करै है । औ—
२ अंतर्योंमसैं आदिलेके वंशपर्यंतकूं ईश्वररूप मानिके आराधनकारिके सुख चाहैंहैं । जैसी उपाधिका आराधन करैंहैं, ताके अनुसारही तिनकूं फल होवैहै । कहैंहैं? कारणसूक्ष्मस्थूलग्रपंच सारा ईश्वरके तीनि शरीरके अंतर्भूत है । तासैं उपासनाके अनुसार फल बी सर्वसैही होवैहै ।
परंतु ब्रह्मज्ञानविना मोक्ष होवै नहीं । जो मोक्षकी इच्छा होवै तौ विवेकतैं जीवईश्वरके स्वरूपकूं पंचकोशनतैं पृथक् करै ॥ दृष्टांत:-जैसे मुंज औ इथीका 'कहिये' तृली मिली होवैहै तिनकूं तोरीके पृथक् करैहैं ।
तैसे विवेकतैं जीवईश्वरके स्वरूपकूं पंचकोशनतैं पृथक् जानै । यह सर्वैया का अर्थ है ॥ १५७ ॥
॥ २७९ ॥ सो पंचकोशविवेकका प्रकार दिखावैहैं:—
॥ सर्वैया ॥ स्थूलदेहको भान न होवै, स्वप्नमेंहि लखि आत्मज्ञान ।
॥ ३९१ ॥ मुंजानामक तृणविशेषके खैचे पणोंके मध्यमें गुथ्त होइके स्थित जो तूल (कपास)
सूक्ष्मज्ञान सुषुप्ति समै नहींं, सुखस्वरूप है आत्मं भान ॥ भासै भये समाधि अवस्था, निरावरणआतम न अज्ञान । ऐसे तीनिदेह व्यभिचारी । आत्म अनुगत न्यायरो जान १५८ टीका:—
१ स्वप्नअवस्थामाही स्थूलदेहका भान होवै नहीं औ आत्माका भान होवैहै ।
२ तैसे सुपुप्तअवस्थामैं सूक्ष्मशरीरका ज्ञान होवै नहीं औ सुखस्वरूप आत्मा स्वयंप्रकाशरूपतैं भान कहिये रँतीत होवैहै । सुखका ज्ञान सुपुप्तिमैं नहीं होवै तौ 'मैं सुखसैं सोवताभया' 'ऐसी स्मृति जागिके नहीं हुईचाहै । यातैं सुखका ज्ञाने सुपुप्तिमें होवैहै ।
सो सुख विपयजन्य तो सुपुप्तिमैं है नहीं, किंतु आत्मस्वरूपही है । सो आत्मा स्वयंप्रकाश है । यातैं सुखस्वरूप आत्मा स्वयंप्रकाशस्वरुपतैं सुपुप्तिमैं भासैहैं । औ—
३ निदिध्यासनके फल निर्विकल्पसमाधि-अवस्थामैं निरावरण कहिये अज्ञानकृत आवरण-रहित आत्मा भासैहै औ न अज्ञान कहिये कारणसहितअज्ञान नहीं भासैहै ।
१ ऐसे तीनिदेह व्यभिचारी हैं । एक अवस्थाकूं छोडिके दूसरोअवस्थामैं भासैं नहीं ।
२ आत्मा अनुगत है । सर्वअवस्थामैं भासैहै यातैं व्यभिचारी है ।
या विवेकतैं तीनि शरीरनतैं आत्मांकूं न्यारो जान ॥
करि वेष्टित लंबी साखका सो इथीका औ तूली कहियैहै । यह दृष्टांत वंदारनागत मुंजाटवीमें प्रसिद्ध है ।
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पंचमस्तरंगः ५ ] ॥ प्रश्नः:-आत्मा कर्ताभोक्ता होवेंतैं ताकी ब्रह्मसैं एकता वैनै नहीं ॥ १६१
१ स्थूलशरीर तौ अन्नमयकोश है । औ- २ कारणशरीर आनन्दमयकोश है । औ- ३-५ सूक्ष्मशरीरमें प्राणमय, मनोमय औ विज्ञानमय, ये तीनिकोश हैं । यांतैं तीनि शरीरके विवेकैं पंचकोशकाही विवेक होवैहै ।
जैसे जीवका स्वरूप पंचकोशतैं पृथक् है । तैसे ईश्वरका स्वरूप वी समष्टिपंचकोशनतैं पृथक् है । औ- चतुर्थेतरंगमैं चतुविधआकारके दृष्टांतसैं जीवईश्वरके लक्ष्यखरूपका विवेक विस्तारसैं करि आयेहैं औ उत्तरतरंगमैं अस्तिभातिप्रियरूपके निरूपणमैं तथा महावाक्यके अर्थनिरूपणमैं आत्माका परमार्थस्वरूप प्रतिपादन करेंगें । यांतैं इहाँ संक्षेपतैही आत्मविवेक कहाहै ।
॥ २७२ ॥ महावाक्यकै अर्थको उपदेश ।
इसरीतिसैं पंचकोशनतैं आत्माहूँ न्यारा जानैसैं वी कर्ताभोक्ता होवें नहीं । किंतु जीव- दृक्षके अमेदनिर्वयवास्तै फेरि वी विचार कर्तव्यकै अभावरूप कर्त- कलताकी सिद्धिवास्तै महावाक्यकका अर्थ उपदेश करेंहैं:-
टीका:- हे शिष्य ! पंचकोशतैं आत्माहूँ न्यारा जानिके तूं कहिये सो आत्मा निष्क- खरूप है । यह जानौ ॥ याकैऋषि- ॥ २७२ ॥ प्रश्नः-आत्मा पुण्यपाप करै- है, सुखदुःख भोगैहै, यांतैं ताकी महर्सैं एकता वैनै नहीं ॥
ऐसी शंका होवैहै:-आत्मा पुण्यपाप करैहैं । तांतैं स्वर्गनरक औ स्थूललोकमैं नाना- प्रकारके सुखदुःख भोगैहैं । ताकी ब्रह्मसैं एकता गैन्न नहीं !
( ॥ गत प्रश्नका उत्तर ॥ २७३--३०३॥) ॥२७३॥ अकत्ताँ अभोक्ता औ नित्य- मुक्त आत्माका सदैव ब्रह्मसैं अभेद ॥
ताका समाधान:-“ तांतैं मित्र जु देखै” इत्यादि तीनिपादनतैं कहैहैंः-
तथा न्क्षरूप आत्मासैं मित्र जो देखैहैं औ सुनियेहैं शास्त्रसैं, स्वर्गनरक पुण्यपाप, सो संपूर्ण मिथ्याभ्रम है । ऐसैं मानो । औ- मिथ्यावस्तु अधिष्ठानकूं बिगारै नहीं । जैसैं
१ स्वपकी मिथ्याभ्रम कहिये मिक्षा मागनतैं भूप दरिद्री नहीं होवैहै औ- २ मरुस्थलके मिथ्याजलतैं भूप गिली होवै नहीं ।
३ मिथ्यार्पितैं रज्जु विसपहित होवै नहीं । यातैं मकसें कर्त्ता कहिये संपूर्णमिथ्या- कर्म अशुभ क्रियाका कर्त्ता है । तौं कहिये तौ वी अकर्त्ता कहिये परमार्थसैं कर्त्ता नहीं । ऐसां तव कहिये तेरा अद्वुतआश्रयरूप अनूप कहिये उपमारहित है ॥
याका भाव यह हैः- १ ब्रह्मसैं अभिन्न तेरे स्वरूपविपै स्थूल- सूक्ष्मशरीर औ तिनकी शुभअशुभक्रिया
॥ सवैया ॥ पंचकोसतैं आतंम न्यारो, जानि सु जानहु ब्रह्मस्वरूप । तांतैं मित्र जु देखै सुनियै, सो मानहु मिथ्या भ्रमकूप ॥ मिथ्या अधिष्ठान न बिगारै, स्वपभीक न दरिद्री भूप । सब कछु कर्त्ता तजि अकर्त्ता, तब अस अद्भुतरूप अनूप ॥१५९॥
वि. सा. ३१
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१६२ ।। कर्तामौका होतैं आत्माकी ब्रह्मसैं एकता बनै नाहीं । इस प्रक्का उॅत्तर ।। [ विचारसागरै
औ ताका फल जन्ममरण स्वर्गनरकों सुखदुःख संपूर्णी अविद्यासैं क-लिपत है ।
२ ता कल्पित सामग्रीसैं तेरा ब्रह्मभाव बिगरै नाहीं । यातैं ज्ञातैं प्रथम वी आत्मा ब्रह्मस्वरूपही है ।
३ ताकेविषै तीनिकालमैं शरीर औ ताके धर्मनका संगंध नाहीं । किंतु आत्मा सदाही नित्यमुक्त है । ताका ब्रह्मसैं कदै वी भेद नाहीं । १५९ ।।
।। २७४ ।। जीवनमुक्तका निश्रय ।। वेदांतश्रवणका फल ।।
जो ऐसैं कहै:-आत्मा सदाही नित्यमुक्त ब्रह्मस्वरूप होवै तौ श्रवणादिक ज्ञानके साधन निष्फल होवैंगे ।
।। इंद्रव छंद ।। नाहिं खपुष्पसमान प्रपंच तु, ईस कहा करता जु कहावै । साछ्य नाहीं इस साछिस्वरूप न, हस्य नाहीं हक काहै. जनावै ।
बंधहु होइ तु मोछु बनै अरु, होय अज्ञान तु ज्ञान नसावै । जानि.यहां कर्तव्य तैजै सब, निश्शल होताहि निश्शल पावै १६०
टीका:-जीवनमुक्त विद्यानकी दृष्टिमैं अज्ञान औ ताका कार्य तुच्छ है । सो जीवनमुक्तका निश्रय बतावैहैं:- हे शिष्य !
१ यह प्रपंच खपुष्पसमान कहिये आकाश-कफूलकी न्याईं होनैतैं है नाहीं, यातैं ताका कर्त्ता ईश्वर वी नाहीं है ।
२ साक्षीका विषय अज्ञानादिक साक्ष्य काहियेहै । सो साध्य नाहीं । यातैं साक्षी वी नाहीं ।।
३ तैसैं दृश्यका प्रकाशक दृक कहियेहै औ प्रकाशनै योग्य दृश्य कहियेहै । सो देहादिक दृश्य है नाहीं । यातैं दृक वी नाहीं । यद्यपि कहनेकूं कूटस्थचैतनकृ साक्षी औ दृक कहैहैं, ताका निपेध बनै नाहीं, तथापि
साक्ष्यकी अपेक्षातैं साक्षी नाम औ दृश्यकी अपेक्षातैं दृक नाम है । 'साक्ष्य औ दृश्यका अभाव है । यातैं साक्षी औ दृक नोमका निपेध करैहैं । स्वरूपका नाहीं ।। औ-
४ बंध होवै तौ वंधनकी निद्धचिलरूप मोक्ष होवै । बंध नाहीं .यातैं मोक्ष वी नाहीं ।। औ
५ अज्ञान होवै तौ ताका ज्ञानसैं नाश होवै । अज्ञान है नाहीं । यातैं ताका नाशक ज्ञान वी नाहीं ।।
यह जानिके कर्तव्य तैजै कहिये "मेरैकूं यह करनैयोग्य है" या बुद्धि त्यागै । काहैं ?
१ यह लोक तथा परलोक तौ तुच्छ हैं । तिनके निमित्त कर्हू कर्तव्य नाहीं ।।
२ आत्मामैं बंध नाहीं । यातैं मोक्षके निमित्त वी कर्तव्य नाहीं ।।
यारीतिसैं आत्माकूं नित्यमुक्त ब्रह्मरूप जानि-के जौं निश्शल होवै, सब कर्तव्य त्यागै;
तब निश्शल कहिये अक्रियब्रह्मस्वरूप विदेह-मोक्षकूं प्राप्त होवै ।।
याका अभिप्राय यह है:-
युक्तब्रह्मस्वरूपही है । परंतु ज्ञानसैं पूर्व आत्म-कूं कर्तामौका मिथ्या मानिके सुखप्राप्ति औ दुःखकी निश्र्चिवास्तै अनेकसाधन करैहैं ।
तैसैं केशरूंद्दी माप्त होवैहै । जय उत्तमआचार्य मिलै तौ वेदांतवाक्यनका
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पंचमस्तरंगः ५ ] ॥ ज्ञानी औ अज्ञानीका चिह्न ॥ गोपीतत्त्वका उपदेश ॥
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उपदेश करेंहै ॥ तिन वेदांतवाक्यनके श्रवणतें ऐसा ज्ञान होवैहै:-" मैं कर्त्तामोक्ता नहीं । किंतु मैं ब्रह्मस्वरूप हूं । यातें मेरेकूं किंचित् वी कर्त्तव्य नहीं " ऐसा जानाही श्रवणादिकनका फल है औ ब्रह्मकी प्राप्ति वेदांतश्रवणका फल नहीं । कहैंतें ? जब अपना स्वरूप है । यातें नित्यप्राप्त है ॥ १६० ॥
॥ २७५ ॥ ज्ञानी औ अज्ञानीका चिह्न
( अकत्तव्य औ कर्तव्य )
॥ दोहा ॥
यही चिन्ह अज्ञानको, जो मानै कर्त्तव्य ।
सोई ज्ञानी सुधरनर, नहीं जाकूं भवितव्य ॥ १६१ ॥
टीका:- जो कर्त्तव्य मानै सो अज्ञानका चिन्ह है औ जाकूं भवितव्य नहीं कहिये अन्यरूप हुआ नहीं चाहहै सो नर ज्ञानी कहियेहै ॥ १६१ ॥
॥ २७६ ॥ गोपीतत्त्वका उपदेश ।
॥ इंदव छंद ॥
एक अखण्डित ब्रह्म असंग, अजन्म अदृश्य अरूप अनामें ।
मूलअज्ञान न सूक्ष्मथूल, समष्टि न व्यष्टिपनो नहिं तामें ॥
॥ ३१२ ॥ निःश्वल कहिये ब्रह्म, सो बुद्धिको प्रकाशक सिद्धांतमैं कहोहै । यातें क्षणिकविज्ञान- वादीके मतमैं अतीत्यास्ति नहीं । कहैंतें ? तिसके मतमैं
बुद्धिमैं भिन्न पदार्थ ( प्रकाशक ) के अभावतैं ।
।। ३१३ ।। इहां जिन गीताके पंचम अध्यायगत
ईस न सूत्र विराट न माझ न, तैजस तिस्वस्रूप न जामैं ।
भोग न जोग न वंध न मोछ, नहीं कुछ वामें रहै है सब वामें॥१६२॥
जागतमें जु पांचं प्रभासत, सो सब झुठिविलास वन्यो है ।
ज्यों सुपनेमें भोग्य न भोग, त्यों इक चित्र विचित्र जन्यो है ॥
लीन शुषुप्तितमें मति होतहि, भेद भगै इक रूप सुन्यो है ।
बुद्धि रच्यो जु मनोरथमात्र सु, निःशेष बुद्धि प्रकास भन्यो है॥१६३॥
॥ सवैया छंद ॥
जाके हिय ज्ञानउजियारो, तम अंधियारो खरो विनास ।
सदा असंग एकरस आतम, ब्रह्मरूप सो स्वयमप्रकास ॥
ना कछु भयो न है नहिं है है, जगत मनोरथ मात्र विळास ।
ताकी प्राप्ति नित्यृत्ति न चाहत, ज्यों ज्ञानीके कोउ न आस ॥१६४॥
देखै सुनै न सुनै न देखै, सब रस गहै रु लेत न स्वाद ।
७ से ९ पर्यंत श्लोकनका अभिप्राय लेके ग्रंथकर्त्तनें यह सवैयेका जुगळ लिख्यो है । तिन तीन श्लोकनकूं
सुमुखसुनकी बुद्धिमैं सम्यक्बोध ( अविपरीतबोध ) वास्ते अर्थसहित लिखेहैं:-
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१६४ ॥ कर्तृभोक्ता होनेएं आत्माकी प्रख्यातैं पकता घनै नहीं । इस प्रकरणका उत्तर ॥
[ विचारसागर
॥ श्लोक: ॥ योगयुक्तो विशुद्धात्मा जितात्मा जितेंद्रिय: ॥ sर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
अस्यार्थ:—
१ जो कर्महप योगकरि या ब्रह्मनिष्ठारूप संन्यासयोगकरि युक्त है और ताहीतैं शुद्ध (रागद्वेषादिरहित) है आत्मा (मन) जिस-
का । और—
२ ताहीतैं जीते (विषयकी प्रहणताईं विमुखताकूं प्राप्त किये)हैं दोनूं प्रकारके इंद्रिय जिसने।
३ ताहीतैं जीसैहै आत्मा वाह्यवासनारूप स्वभाव जिसने ।
४ ताहीतैं ब्रह्मसैं आदिलेकैं सांबपर्यंत सर्व-
भूतनकार आत्मसूत (शरीरूपसूत) भयहैहै प्रत्यकरूप आत्मा जिसका ।
एसा सर्वोत्तमभावकूं प्राप्त भया जो ब्रह्मवित्तम है सो शरीरकी यात्रा (निरोच)अर्थ कछुक विधिपूर्वक वा अविधिपूर्वक कर्मेकूं करताहुया वी तिस पुण्य वा अपुण्यरूप कर्मेकरि लिप्तकूं पावता नहीं कहिये कर्म- विषे अकर्त्तताकी दृष्टिकरि संबंघरूपकूं पावता नहीं ॥ ७ ॥
जब योगयुक्तताआदिक विद्वानके पांचचिह्नकरण- करि विशिष्ट औ आहारआदिकविषे प्राप्त भये
ब्रह्मवेत्ताकूं दर्शनआदिक इंद्रियनके व्यापारनविषे “मैं कर्त्ता नहीं” एैसी बुद्धिकरिके स्थित होना योग्य है ।
ऐसैं दो श्लोकनिके कहेहैं:—
॥ श्लोक ॥ नैव किंचिल्करोमीति मुक्तो मन्येत तत्ववित् । पश्यन् श्रृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्नश्नन् गच्छन् स्वपन् वसन् ॥ ८ ॥
प्रलपन् विशुजन गृह्लुन्मृदिमृशन्नपि । इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्त्ते इति धारयन् ॥ ९ ॥
अन्वयोऽर्थ:— आत्माके स्वभावकूं जाननैवाला जो तत्ववित् (ब्रह्मवित्) सो अपनी कृत्स्नता असंग-
ता औ अंतरबहिरपूर्णताके दर्शनरूप प्रज्ञाकरि युक्त हुया, आप नाहिर देखता हुया, सुनताहुया, स्पर्शो करताहुया, सूंघताहुया, खाताहुया, चलताहुया, निद्राकूं करताहुया,
उच्च्छ्वास अध निश्वासकूं करताहुया, बोलताहुया, मलत्यागकूं करताहुया, लेनदेन करताहुया, औ, निमेष अन उनमेषकूं करताहुया । वी “शब्दादिविषयरूप इंद्रियनके अर्थनविषै
इंद्रियही वर्त्ततेहैं । मैं द्रष्टा श्रोता स्प्रष्टा ज्ञाता (सूंघनैवाला) भोक्ता औ गंता नहीं हूं ।” इस पकारके अभ्यासकालही वृत्तिकं सवेंदा भासताहुया ।
“तिनतिन कर्मनकूं इंद्रियही करेंहैं । मैं तौ अविक्रिय कियाका साक्षी होनैकरि निष्क्रियहपसैं तृप्तीही
स्थित हूं” एैसैं मानै कछिये आपकूं तिसतिस क्रियाविषै निष्क्रियहैं देखै ॥
अर्थ यह जो देहइंद्रियनके व्यापारनविषै “मैं औ मेरा” इस भावनाकूं त्यागिके विद्वाननै तृप्ती स्थित होना
योग्य है ।(यह दोनूं श्लोकनका इकहा अर्थ है ) ॥८॥९॥
इहां यह रहस्य है:— जांतैं ज्ञानीकूं “मैं असंग औ निर्विकार (अक्रिय) ब्रह्मचेतन हूं” यह निश्चै
है । यांतैं ज्ञानोत्तरतैं कछु वी किया करता नहीं औ प्रारब्धके बलसैं ज्ञानोत्तर देहइंद्रियआदि
दर्शनादि व्यापाररूप किया होनैहै, सो प्रारब्धके फलका भोग है । परंतु तिस भोगविषै जो
राग इंद्रियनका किया नहीं होनैहै । काहेतैं ? इंद्रियनकूं दर्शनादिक्रियामात्रकरि
कृतार्थ होनैहैं । औ—
२ सो राग आत्माका किया दी नहीं होनैहै । काहेतैं ? आत्माकूं सैदा सर्वंका साधारण
निर्विकार प्रकाशक होनैहैं ।
३ परितोषतैं विषयनके गुणवोधक विचारक कारण मनकूंही अनुरागकूष्ताके ज्ञानसैं राग
होनैहै ।
४ सो राग ज्ञानोत्तर अंत:करणमैं होनै नहीं । काहेतैं ? ज्ञानोके अंत:करणकूं शांत (अंतमूर्छ)
होनैहैं यह वार्ता “राग अबोधका ठिंग है” इत्यादिरूप श्लोकके वाक्यनविषै स्पष्ट है ।
यचपि सर्वेधा रागके अभाव हुये भोजनादिरूप शरीरयात्राके हेतु व्यापारविषै वी प्रदृष्टिके अभावतैं
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ज्ञानीकूं प्रारब्धका भोग वी नहीं होवैगौ औ ईश्वर-संकल्पके विपय प्रारब्धके भोगधै अभाव ज्ञानीकूं वी संभवै नहीं ।
१ तथापि प्रारब्धफलकै भोगविदपै विचरतैं नियत नहीं होतैं योग्य ऐसा रोगादिकतै้ न्याई प्रारब्ध-जनित अशुद्ध ( अहंकार औ चिदात्माके भाग-तादात्म्यके अभावतैं आभासरूप ) राग ज्ञानीकूं वी होवैहैं । परंतु सो अशुद्धराग स्वाधीन होतैंतैं दग्धबीजकी न्याई निर्बल होतैंतैं देहनिर्वाहकै हेतु शाखवहिहितभोगकै हेतु है । व्यसनके उत्पादक शाल-निपिद्धभोगकै हेतु नहीं ।
२ किआँ:--ज्ञानीकूं विपयनिवृत्ती शांतिकै अभायर्तैं औ मिथ्यापनैकौ रुक्मिणीकै जन्य दृढ-चैराज्यकै सद्भावर्तैं वी दृढराग होवै नहीं । यह अर्थ आगे पष्टतरंगविपै प्रैथकारनैही निरुपण किया है ।
३ किआँ:--दौरपर खेल करनैवालेकै नटकै अथवा संन्यस्तचित्तकै न्याई । किआँ परस्पर वातालाप करनैवाला पनियारिकै बीडैमै संलग्नचित्तकै न्याई ज्ञानीकै अंतःकरणकूं आपाततकि विपयनिविपै प्रवृत्त होतैं औ चिरोप (मूलतया ) करि स्वरूप-विपयै संलग्न ( अंतर्मुख ) होतैंहैं ( चिदाभासरहित ) देह अथ इंद्रियनकूं रागसैं विनाही प्रारब्धके फलभूत दर्शनाादिकियाकरि कृतार्थ होतैं वी निष्प्रयुक्त सामासंतःकरणरूप ज्ञानीकूं विषयभोगविदपै दृढराग संभवै नहीं ।
४ यद्यपि किसी प्रष्टतिकै हेतु प्रारब्धवाले ज्ञानीका मनरुप हस्ती विपयनिविपै किंचितु निक्षिप्त (प्रबोधकूं प्राप्त ) होवैहैं । तथापि विवेक ( दोपदृष्टि औ मिथ्यात्वबुद्धि ) रूप कैसरी ( सिंह )कै जागरणतैं सो मनरुप हस्ती झाटिति प्रमादकूप विषेपीं छोडिकै शांत होवैहै ।
जांतैं ज्ञानीकै चित्तविपै दृढ राग नहीं । यातैं--१ भोगनै हेतु प्रारब्धके होते सो काकाक्षीदृश्टि न्याई औ गंगााम्भःप्रार्धकायची न्याई मुख्यतातकि स्वाधपसुखमैं रमताहै ।
२ अमुख्यताकार्ति चित्तग्रृहीतत्की न्याई क्लेशकूं पावताहुया तीत्नप्रारब्धके फलकूं भोगताहैं । औ--शिथिलप्रारब्धके फलरूप निपिद्धविपयकूं प्रयत्नसैं त्यागताहै । तौ वी तिस भोग किया त्यागविपैं विकल ( पागल ) पुरुषकै चित्तकै न्याई ज्ञानीकै चित्तकी अमुख्यताकै अभिप्रायतैं सौ ताकै जडइंद्रियकरिही भोग औ त्यागके करनकै अभिप्रायसैं उपर कहै गीताकै श्लोकमैं "इंद्रियनकै अर्थन्रिप्रे इंद्रिय वर्त्ततैंहैं" ऐसैं कहा ॥
औ--याकै १६६ वें संवैयमैं वी "त्यागहु विपय की भोगहु इंद्रिय" इस वचनकरि निपिद्ध किआ हृदोप । त्रिपपनकै शक्ता औ भतररागर्ते प्राप्त चिहितविपयंकै भोगतैं इंद्रियनकूं कहाहै । भंतःकरणकूं नहीं ।
याकै १६५ वें संवैयेकै चतुर्थपादविपै "भोगै युक्ति सदा संन्यासौ" ऐसैं कहाहै । ताका यह अभिप्राय है कि:--१ त्यागी ज्ञानीकै तौ स्वाभोगै प्राप्त वी नहीं तौ ताकूं शीमोगकै होते संन्यासकै निरुपणरूप निपेध-का संभव वी कहांहैं होवैगौ ? वी जो त्यागी (वमनभक्षक) पुरप त्यागी नहीं । किंतु त्यागीकै वेधकै धारनेवाले नटकी न्याई दंभी होतैंतैं गृहस्थतैं वी अधम है ! पुजाकि पात्र नहीं !
२ यांतै परिषेपतैं गृहस्थज्ञानीविपै शीमोग प्राप्त है । सो गृहस्थज्ञानी वी चरितमक्षणकै अभ्यासीकूं तैलमक्षणकी न्याई शास्त्ररितैं संततिकै निमित्त ऋतुस्नानादिकमैं परिणीत शीका संग करताहै । विषय-शक्तिकै 'नहीं । जो विपयविपै भासक्तिवान् वेदांत-वार्तानिपुणगृहस्थ होवैं तौ सो दृढरागरूप अज्ञान-के चिन्हकरि युक्त होतैं ज्ञानी नहीं । किंतु अज्ञानी है ।
यहां शीहिरूप विषयका जो विचार है सो अन्य सर्वविपयकै विचारकत वी उपलक्षण है । औ रागकी दृढताका अभाव जो कहाहै सो द्वेषभादिककै दृढताकै अभावकै वी उपलक्षण है ।
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१६६ कर्तासोक्तां होतैं हैं श्रात्माकी दृढतासैं पकता वैन नहीं, इस प्रकका उत्तर ॥ [ विचारसागरे
सूंधि परसि परसै न न सूंधै, बैन न बोलै करै विवाद ॥ ग्रहि न ग्रहै मल तजै न त्यागै, चलै नहीं अरु ध्यात पाद । भोगै युवति सदा संन्यासी, सिष लखि यह अद्भुतसंवाद॥१६५॥
याका अभिप्राय कहैंहैं:- निजविषयनमैं इंद्रिय वर्तें, तिनतैं मेरो नाहिं संग । मैं इंद्रिय नाहिं मम इंद्रिय नाहिं, मैं साछी कूटस्थ असंग ॥ त्यागहू विषय कि भोगहु इंद्रिय, मोकूं लागि न रंचक रंग । यह निश्चय ज्ञानको जातैं, कर्त्ता देखै करै न अंग ॥ १६६ ॥ हे अंग ! प्रिय ! ॥ अन्यार्थ स्पष्ट ॥१६६॥
( लयचिंतन ॥ २७७—२८० ॥ ) ॥ २७७ ॥ सर्वप्रपंचकी ईश्वररूपता ॥
इसरीतिसैं आचार्यनै शिष्यकूं गोप्यतत्वका उपदेश किया तौ भी शिष्यका मुख अत्यंत- प्रसन्न नहीं देखिके यह जान्यां:- शिष्य प्रसन्न नहीं देखिके यह जान्यां:- शिष्य कृतार्थ नहीं हुवा । जो कृतार्थ होता तौ याका ॥ ३१८ ॥ वांछितपदार्थींको प्राप्तिसैं चित्तकी चंचलतां हेतु इच्छारूप इष्टिकी नाशरूप निमित्ततैं सिथरदर्पणकी न्वाई अंतरमुख उदय भई सात्विकी दृष्टि- वृत्ति- स्वरूपभूत आनंदका प्रतिबिंब होवैहै । 'तां मानंदकूं अनुभवकारिके मुखकी प्रसन्नता होवैहै । शिष्यकूं ज्ञानद्वारा वांछित जो कार्यसहित अभियासी- की निष्टति औ परमानंदकी प्राप्तिसरूप मोक्ष सो सिद्ध भया नहीं । यातैं इच्छाकी निष्टति भई नहीं ।
मुखैं प्रसन्न होता । यातैं फेरि स्थूलरीतिसैं उपदेश करनैं— ॥ सर्वैयाछंद ॥
माटीको कारज घट जैसै, माटी ताके बाहिरि मोहै । जलतैं फैलै तरंग बुदबुदा, उपजत जलतैं जुड़े शु नाहिं ॥ ऐसैं जो जाको है कारज, कारणरूप पिछानहु ताहि । कारण ईस सकलकोँ "सो मैं", लयचिंतान जानहु विधि याहिं १६७ टीका:-जैसैं माटीके कारजके वाहिर- मोतीरी माटी है। यातैं माटीका सर्वकार्य माटी- स्वरूपही है । फैलादिक जलके कार्य जल- रूप हैं। येसैं जो जाका कार्य है सो ता कारणस्वरूपहै नित्य । किंतु कार्य कारण- स्वरूपही है । औ—
सकलप्रपंचका मूलकारण ईश्वर है, यातैं सर्वकार्यप्रपंच ईश्वरस्वरूपसैं भिन्न नहीं । किंतु सर्वप्रपंचका स्वरूप ईश्वरही है । "सो ईश्वर मैं हूँ" या रीतिसैं लयचिंतन जानिके तूं कर ॥
तातैं अंतरमुखवृत्तिसैं अनुदयतैं स्वरूपानंदके प्रतिबिंब- का अभाव है । याहीतैं तिस प्रतिबिंबगोचर अनुभवके अभावतैं मुखकी प्रसन्नता नहीं भई । तिस मुखकी असप्रसन्नतारूप लिंगसैं इष्टवस्तुकी अप्राप्ति- रूप अकृतार्थताकी अनुमिति होवैहै ॥
॥ ३१५ ॥ कार्यकूं कारणरूप जानिके जो चितन सो लयचिंतन कहियैहै ॥
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|| २७८ || सारोसूक्ष्मसृष्टिकी अपंचीकृतभूतरूपता ||
लयचिंतनका संक्षेपैं यह क्रम है:- १ स्थूलब्रह्मांड सारा पंचीकृतभूतनका कार्य है । तहां जो पृथिवीका कार्य सो प्रथवीसरूप औ जलका कार्य जलस्वरूप या रीतिसैं जा भूतनका जो कार्ये सो ताकाही स्वरूप है । इसरीतिसैं सारा स्थूलब्रह्मांड पंचीकृतभूतसरूप है । २ तैसैं पंचीकृतभूत भी अपंचीकृतभूत- के कार्य हैं । यातैं अपंचीकृतसरूपही पंचीकृतभूत हैं । भिन्न नहीं । औ ३ अंतःकरणआदिक सूक्ष्मसृष्टि भी अप- चीकृतभूतनका कार्य होनेतैं अपंचीकृत- भूतसरूप है । तामैं—
( १—२ ) अंतःकरण सारे भूतनके सत्व- गुणके कार्य हैं । यातैं सत्वगुण- स्वरूप हैं । औ— (३—७) भूतनके रजोगुणअंशाके कार्य प्राण रजोगुणसरूप हैं ॥ (८—९ ) गुदाइंद्रिय पृथवीके रजोगुण- अंशका कार्य सो पृथवीका रजो- गुणसरूप है ! प्राणइंद्रिय पृथवीके सत्वगुणका कार्य सो सत्वगुणसरूपहै ।
(१०—११) ऐसैं रसना औ उपस्थ जलके सत्वगुणरजोगुणसरूप । (१२—१३) नेत्र औ पाद तेजके सत्वगुण- रजोगुणसरूप ।
(१४—१५) त्वक् औ पाणि वायुके सत्व- गुणरजोगुणसरूप । (१६—१७) श्रोत्र औ वाक् आकाशके सत्वगुणरजोगुणसरूप । या रीतिसैं सारी सूक्ष्मसृष्टि अपंचीकृतभूत- स्वरूप है ।
||२७९|| सर्वअनात्मपदार्थेनका क्रमसैं ब्रह्मविष्टै लयचिंतन || यह चिंतनकरिके अपंचीकृतभूतनका भी लयचिंतन करै । १ पृथ्वी जलका कार्य है । यातैं जल- स्वरूप है । २ तेजका कार्य जल तेजसरूप है । ३ तेज वायुका कार्य होनेतैं वायुस्वरूप है । ४ आकाशका कार्य वायु आकाश- स्वरूप है ।
५ तमोगुणप्रधान प्रकृतिका कार्ये आकाश प्रकृतिस्वरूप है । औ— ६ मायाकी अवस्थाविशेषही प्रकृति है । यातैं प्रकृति मायास्वरूप है ॥ एकवस्तुके (१) प्रधान । (२) प्रकृति (३) माया । (४) अविद्या । (५) अज्ञान (६) शक्ति । ये नाम हैं ॥ (१) सर्वकार्यें अपनेमैं लीनकरिके प्रलयमैं स्थित उदासीनस्वरूपहू प्रधान कहैहैं । (२) सृष्टिके उपादानयोग्य तमोगुणप्रधान स्वरूपहूं प्रकृति कहैहैं ॥ (३) जैसैं देशकालादिक सामग्रीविना दुष्ट पदार्थकी इंद्रजालसैं उत्पत्ति होवैहै ।
२ किशां "प्र" जो सत्वगुण औ "कृ" जो रजोगुण तिनकरि सहित "ति" जो तमोगुण सो तमोगुणप्रधानस्वरूप प्रकृति है ।
|| ३१६ || १ जिससैं प्रकृपकारि सर्वजगत् करियेहै ऐसैं जो सृष्टिकी उपादानकारण सो म्रृकृति है ॥
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१६८ ।। कर्त्तासोकादि होनेतैं आत्माकी ब्रष्टतै पकता बने नहीं। इस प्रश्रका उत्तर॥ [ विचारसागरे
तहां इंद्रजालकूं माया कहेहैं । तैसैं असंगअद्वितीयब्रह्ममैं इच्छादिकदुरूप हैं तिनकूं कैरैंहैं । यातैं माया कहेहैं ॥ (४) स्वरूपकूं आच्छादन करैहैं । यातैं अज्ञान कहेहैं ॥ (५) ब्रह्मअवस्थातैं रोकेहैं । यातैं अविद्या कहेहैं । और— (६) स्वतंत्र कदै बी रहै नहीं । किंतु चेतनके आश्रितही रहैहैं । यातैं शक्तिक बी कहेहैं ॥ इसरीतिसैं प्रकृतिआदिक प्रधानकही मेद हैं । यातैं प्रधानरूप हैं ॥ ७ सो प्रधान ब्रष्टचेतनकी शक्ति है ॥
।। ३१७ ।। यद्यपि ब्रह्मकी शक्ति ब्रह्मसैं मिल्न कहैं तो अद्वैतश्रुतिसैं विरुद्ध होवैगो बी अभिन्न कहैं तो ताकूं ब्रह्मरूप होनेतैं ब्रह्मसैं मिल्नताकी शक्ति नामसैं कथन नर्थ होवैगो । यातैं शक्तिकों ब्रह्मसैं भेदअभेद दोनूं कहनै होवैंगें और मेदअभेद दोनूं—धर्म तमप्रकाशकी न्याईं एकआश्रयविषै रहै नहीं । परंतु शक्तिका ब्रह्मके साथि रुष्टिैं 'सरूपके संबन्धकी न्याईं कल्पितभेद औ वास्तवभेदरूप अनिर्वचनीय-तादात्म्यसंबंध है । तातैं शक्तिका अपने शक्ति-( आश्रय ) सैं वास्तवभेदके अभावतैं औ कोई प्रमाण करि भिन्नप्रतीतिके अभावकारी सो शक्ति ब्रह्मसैं मिल्न नहीं । किंतु जैसैं कल्पितसरूप परमार्थसैं रुष्टि-रूप है । तैसैं शक्ति परमार्थ्यैं ब्रह्मनहै ॥
।। ३१८ ।। इहां आविशदकारिके १ बुद्धिमंदताके सहवातैं विषयाशक्ति कुतर्क औ विपर्ययदुराग्रह रूप प्रतिबंधकका ग्रहण करना ॥ औ— २ धनप्रादिरूप प्रियवस्तुके नाश भये पीछे बी तिनके अनुसंधान (आविस्मरण )रूप भूत-प्रतिबंधकका ग्रहण करना ॥ ३ महालोकादिककी इच्छा किंवा जन्मांतरके
मिल्न नहीं । तैसैं चेतनमैं प्रधानरूप शक्ति ब्रष्टचेतनसैं भिन्नैं नहीं । याप्रकारतैं सर्वअनात्मपदार्थनका ब्रह्मविषै लयअचिंतनकारिके "सो अद्वैतब्रह्म मैं हूँ" यह चिंतन करै । ।।३८०।। ध्यान औ ज्ञानका भेद । अहंग्रहध्यान ।। जाकूं महावाक्यविचार कियेतैं बी बुद्धिकी मंदतादिक किसी प्रतिबंधक्तैं अपरोक्शज्ञान होवै नहीं ताकूं यह लयअचिंतनरूप ध्यान कबहै ॥
ध्यान औ ज्ञानका इतना मेद है:— १ जौन तो प्रमाण औ प्रमेयके आधीन है । हेतु शेषप्रपंचरूप भविष्य ( आगामी ) प्रतिबंधकका ग्रहण करना ॥
इन ज्ञानकी उत्पत्तिके प्रतिबंधकका निरूपण पंचदशिके ध्यानदीपनाम नवमप्रकरणके ३८ मैं ५३ वैं श्लोकपर्यंत तथा वेदांतपदार्थमंजूषाविषै कियाहै । जाकूं जिज्ञासा होवै सो तहां देखै ॥ ।। ३१९ ।। इहां यह रहस्य है:— १ आत्मज्ञान । २ स्मृतिज्ञान औ ३ प्रमाज्ञान । इसभेदतैं ज्ञान तीनप्रकारिका है । तिनमैं—
१ आत्मज्ञान केवल वस्तु ( ब्रह्मरूपविषय ) के आधीन है । औ २ स्मृतिज्ञान तौ अपने 'विषयके सदृश वा तद्रूपभानसहितुके ज्ञानकारिके वा अपने त्रिषय ( पूर्वदृष्टवस्तु ) के चिंतनकारिके उदय भये पूर्वदृष्टवस्तुत्के स्मृत्याकारके आधीन है । औ ३ प्रमाज्ञानके अंतरगत जो सुखादिकका ज्ञान सो न्यायमतमैं औ वाचस्पतिमिश्रके मतमैं तो मनरूप प्रमाण औ सुखादिरूप प्रमेयके
अनंगीकारतैं परंंतु सिद्धांतमैं मनविर्षै प्रमाणताके 'अनंगीकारतैं सुखादिकका ज्ञान केवलप्रमेय ( सुखादिरूप वस्तु ) के आधीन है ।
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३२०-विधि औ पुरुषकी इच्छाके आधीन नहीं । औ-२ ध्यान विधिके तथा पुरुषकी इच्छा औ विश्वास तथा हटके आधीन है । १ जैसे प्रमाणज्ञानमें प्रमातृनेत्र औ प्रमेयघटादिक हैं । तहां नेत्रका औ घटका संबंध हुये पुरुषकी इच्छाविना वी घटका प्रत्यक्षज्ञान होवैहै । भाद्रपदशुद्धचतुर्दशीके दिन चंद्रदर्शनका निषेध है, विधि नहीं, औ पुरुषकै यह इच्छा होवैहै:-“मेरें आज चंद्रदर्शन नहीं होवै” तौ वी किसीरीतिसैं नेत्रप्रमाणका जो प्रमेयचंद्रसैं संबंध होय जावै तौ चंद्रका प्रत्यक्षज्ञान अवश्यही होवैहै । इसरीतिसैं प्रमाणप्रमेयके आधीन है औ अन्य जे प्रमाणज्ञान हैं वे इंद्रियअनुमानादिरूप प्रमाणका जो प्रमेयरूप वस्तुके साक्ष संबंध होवेंहैं तिसके आधीन होवेंहैं । तिनमें—१ शाब्दप्रमाणसैं जन्य शाब्दज्ञानरूप जो शास्त्रीप्रमाण है सो महावाक्यसरूप शाब्दप्रमाणका औ प्रत्यक्षाभिन्नप्रकारूप प्रमेयका लक्षणग्रितिरूप जो परंपरासंबंध है । ताके ज्ञानके आधीन है । औ—२ अनन्यलौकिक पदार्थनका शाब्दप्रमाणरूप जो ज्ञान है । सो—( १ ) कहूं शक्तिरूत्तिरूप संबंधके ज्ञनके आधीन है । ( २ ) कहूं लक्षणावृत्तिरूप संबंधके ज्ञानके आधीन है । इसरीतिसैं ( १ ) कोई ज्ञान ध्येयरूप वस्तुमात्रके आधीन है । औ—( २ ) कोई ज्ञान प्रमाण औ प्रमेयरूप वस्तुके संबंधके वा तत्वसंबंधके ज्ञानके आधीन है । भ्रमप्रमा साधारणज्ञानके विषयकूं श्रेय कहैंहैं तामैं प्रमेयपना नहीं है । औ—केवलप्रमात्रज्ञानके विषयकूं प्रमेय कहैंहैं तामैं श्रेयपना वी है । वि. चो. ३३.
आधीन ज्ञान है । विधि औ इच्छाके आधीन नहीं ॥ औ—३ “ शालिग्राम विष्णुरूप है ” यह ध्यान करें ताकूं उत्तमफल प्राप्त होवेंहैं । तहां शास्त्रप्रमाणसैं विष्णुकूं तौ चतुर्भुजसुरति, शंख, चक्र, गदा, पद्म, लक्ष्मीसहित जानहै औ नेत्रप्रमाणतैं शालिग्रामकूं शिला जानहै । तथापि विधिपूर्वसइच्छातैं “ शालिग्राम विष्णु है ” येंहैं ध्यान होवेंहैं । परंतु सो ध्यान नानाकारका है—( १ ) कहूं तौ अन्यवस्तुका अन्यरूपसैं ध्यान । जैसे शालिग्रामका विष्णुरूपसैं ध्यान, याकूं प्रतीकध्यान कहैंहैं । औ—इसप्रकारका संबधज्ञान वस्तुके आधीन हैं ॥१ इहाँ “वस्तु” शाब्दकारिके ईश्वरचित वा मनोमय ( परोक्षज्ञानके विषय ) वा भ्रमरूप वस्तुके साक्ष संबधका ग्रहण है । यातैं ज्ञान विधिआदिकके आधीन नहीं । औ—२ ध्यान जो उपासना सो वस्तुके आधीन नहीं । कितु कर्त्ताक आधीन है । यद्यपि ध्यान वी मनकी वृत्तिरूप है तथापि सो पुरुषके किये इच्छआदिकके आधीन है । यातैं सो मानसज्ञान नहीं ॥ ३२० ॥ तहां विधि औ पुरुषकी इच्छा, विश्वास औ हटका उपलक्षण ( सूचक ) है ॥ जिस प्रकारसैं विधिआदिक चारिके आधीन ज्ञान नहीं । सो पंचमस्तरंगत ध्यानविधिके ७३९वें श्लोकके टीपणविपै हमनें लिख्याहै । यातैं इहाँ लिख्या नहीं ।
॥ ३२१ ॥ जाकी वृत्ति शास्त्रद्वारा परोक्षध्येयविपै स्थित होवै नहीं, सो पुरुष । पुरुषके प्रेरक शास्त्रके वचनसरूप विधिकरिके वोचित ( अन्यध्येयके प्रतिनिधिरूप ) वस्तुविपै अन्य ( ध्येय ) की बुद्धिकरिके उपासना करै । ता अन्यविपै अन्यकी बुद्धिकरिके उपासना ( ध्यान )कूं प्रतीकध्यान कहैंहैं ॥
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१७० ॥ कतौं ओङ्कार द्रोनतैं आत्माकी रक्षसैं एकतां बनै नहींं, ईस प्रकारका उच्चार ॥ [ विचारसागरै
(१) वैकुंठलोकवासी विष्णुका शंखचक्रादिक सहित चतुर्भुजमूर्तिलुपसैं ध्यान है । तहां अन्य-का अन्यरूपसैं ध्यान नहींं । किंतु ध्येयरूपके अनुसार यह ध्यान है ॥ वैकुंठवासी विष्णुका स्वरूप प्रत्यक्ष तौ है नहींं । केवल शास्त्रसैं जानि्यैहैं औ शास्त्रनै शंखचक्रादिकसहितही विष्णुका स्वरूप कह्याहै । यातैं ध्येयस्वरूपके अनुसारही यह ध्यान है ।
विधिविध्वासइच्छाविना ध्यान होवै नहींं ।
( १ ) "यह उपासना करें" ऐसा पुरुपका प्रेरकवचन विधि कहियैहै ।
( २ ) ता वचनमैं श्रद्धारूप विश्वास कहहैं । औ—
( ३ ) अंतःकरणकी कामनारूप रजोगुणकी वृत्ति इच्छा कहियैहै ॥ ध्यानके हेतु ये तीनि हैं । इनके नहींं ।
( ४ ) ध्यान हठसैं होवैहै । ज्ञानमैं हठकी अपेक्षा नहींं । कहोैं निरंतर ध्येयाकार चित्तकी वृत्तिरूप ध्यान कहहैं । तहां वृत्तिमैं विक्षेप होवै तो हठसैं वृत्तिकी स्थिति करै । औ-
ज्ञानरूप अंतःकरणकी वृत्तिसैं तत्काल आवरणमंग हुतैं वृत्तिकी स्थितिका उपयोग नहींं । यातैं हठकी अपेक्षा नहींं ।
वैकुंठवासी चतुर्भुजविष्णुके ध्यानकी न्यांईं "मैं ब्रह्म हूं" यह ध्यान वी ध्येयके अनुसार
॥ ३२२२ ॥ तैसैं "मैं ब्रह्म हूं" इस आकारवाला जो निर्गुणउपासनारूप अहंग्रहध्यान है, सो वी ध्येयानुसार ध्यान है ॥
॥ ३२२३ ॥ जैसैं संवादेभांतिकरिके प्रकट भये पुरुषकूं यथार्थज्ञानद्वारा इष्टवस्तुका लाभ होवैहै तैसैं "मैं ब्रह्म हूं" या वृत्तिकी स्थितिरुप अहंग्रहध्यान करै, ताकूं वी ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति होवैहै ॥
यध्यपि ध्यानका विषय जो ब्रह्म सो परमार्थरूप नहींं किंतु मनःकल्पित है । यातैं ध्येयस्वरूपका अपनैसैं अभेदकरिके चिंतन
है । प्रतीक नहींं । परंतु यह अहंग्रहध्यान है ॥ ध्येयस्वरूपका अपनैसैं अभेदकरिके चिंतन अहंग्रहध्यान कहियैहै ॥
जा पुरुषकूं अपरोक्षज्ञान नहींं होवै औ वेदकी आज्ञारूप विधिमैं विश्वासकरिके हठतैं निरंतर "मैं ब्रह्म हूं" या वृत्तिकी स्थितिरुप अहंग्रहध्यान करै । ताकूं वी ज्ञान प्राप्त होयके मोक्षकी प्राप्ति होवैहै ॥ १६७ ॥
(॥ प्रणवकी उपासना ॥ २८१—३०३॥)
॥ २८१ ॥ प्रणवका अहंग्रहध्यान ॥ औररीतिसैं अहंग्रहउपासना कहहैं:-
॥ सवैया छंद ॥ ध्यान अहिंग्रह प्रणवरूपको, कहोो शुरुवर अतिशय सुंदर ।
अच्छर प्रणव ब्रह्म ममरूप सु, यूं अनुलव निजमति गति धार ।
ध्यानसमान आन नहिंं याके, पंचीकरणपकार विचार ।
जो यह करत उपासन सो मुनि, तुरत नसै संसार अपार ॥ १६८ ॥
टीका:-हे द्वेष्य ! प्रणवरूपका कहियें याहिं तांकुं विषय करनैवाली वृत्तिरुप ध्यान वी
भ्रांतिबुद्धानही है । यथार्थज्ञान नहींं । तथापि मणिकी प्रभविषै मणिरूपदिरुप संवादेभांतिकरिके
दौड़े पुरुषकूं मणिके ज्ञानद्वारा मणिकी प्रासिकी न्यांईं उत्तदयानसैं ब्रह्मका ज्ञान होयके मोक्षकी प्राप्ति
संवैहै ॥
संवादेभमका वर्णन पंचदशींगत ध्यानदीपकैं
आरंभविषै दिखियैहै ॥
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पंचमस्तरंगः ४ ] प्रणवकी उपासना ॥ २८१-३०३ ॥ १७१
ओंकारस्वरूपका अहंग्रहध्यान मोहादिदोष-रहित आदिक श्रुतिके अनुसार सुरेश्वराचार्यने कहा-है, सो तूं कर । ताका संक्षेपतें प्रकार यह है:- प्रणवअक्षर ब्रह्मस्वरूप है ॥ "सो प्रणवरूप ब्रह्म में हूं" यार्तिसें अनुल्व कहिये क्षणमात्र-अंतरायरहित निजमनकी गति कहिये वृत्ति धार कहिये स्थित कर । याके समान आनध्यान नहीं है औ या ध्यानका प्रकार कहिये विशेष-रीति सुरेश्वरकृतपंचीकरणनाम ग्रंथसैं विचार । चतुर्थपाद स्पष्ट ॥ १६८ ॥
॥ २८१ ॥ निर्गुणरूप प्रणवउपासना के प्रकारका आरंभ । निर्गुणउपासनाकी रीति लिखें हैं । सगुणकी नहीं । चाहते हैं?
१ जाकूं ब्रह्मलोककी कामना होवै ताकूं निर्गुणउपासना तैं ची कामारूप प्रतिबंधक-ज्ञानद्वारा तत्काल मोक्ष होवै नहीं । किंतु ब्रह्मलोककीही प्राप्ति होवैहै । तहां हिरण्यगर्भ-के समान भोगनिकी भोगिके ज्ञान होवै तव मोक्ष होवै । औ---
२ जाकूं ब्रह्मलोककी कामना नहीं होवै ताकूं इसलोकमेंही ज्ञान होयके मोक्ष होवैहै । इसरीतिसैं सगुणउपासनाका फल बी निर्गुणउपासनाके अंतरभूत है । यातैं निर्गुण-उपासनाका प्रकार कहें हैं :-
जो कुछ कारणकार्यवस्तु है सो ओंकार-स्वरूप है । यातैं सवर्लूप ओंकार है । १ सर्वपदार्थनमें नाम औ रूप दो भाग हैं । तहां रूपभाग अपने अपने नामभागसैं न्यारा नहीं । किंतु नामस्वरूपही रूपभाग है । चाहते हैं? पदार्थका रूप कहिये आकार, ताका नामसैं निरूपणकरिके ग्रहण वा त्याग होवैहै । नाम जानैं बिना केवल आकारतैं व्यवहार सिद्ध होवै नहीं । यातैं नामही सार है ॥ औ आकार-के नाश होते या नाम शेप रहैहैं । जैसे घटका नाश होतैं मृत्तिका शेप रहैहै । तहां घट दृष्टिकासैं पृथक् वस्तु नहीं । मृत्तिकास्वरूप है । तैसैं आकारका नाश होतैं मृत्तिकाकी न्याई शेप रहै जो नाम तासैं आकार पृथक् नहीं । नामस्वरूपही आकार है ॥
किंवा जैसैं घटशरावादिकनमें मृत्तिका द्रात मांडूक्यउपनिषद्की कारिकाकी वी ग्रहण है ॥
॥३२४॥ इहां"मांडूक्य"शब्दकरिके गौडपादाचार्य-
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१७२ कर्तामोक्ता होनैतैं आत्माकी ब्रह्मसैं पकंता बने नहीं । इस प्रकशका उत्तर ॥ [ विचारसागरे
अनुगत है औ घटशरावादिक परस्परन्यभिचारी हैं । यातैं घटशरावादिक मिथ्या । तिनमैं अनुगत मृत्तिका सत्य है । तैसैं घट आकार अनेक हैं । तिन सकका "घट" यह दो अक्षरनाम एक है । सो आकार परस्परन्यभिचारी औ सर्वघटके आकारनमैं नाम एक अनुगत है । यातैं मिथ्या आकार सैंत्यानमत्तैं । पृथक् नहीं ।
इसरितिसैं सर्वपदार्थनके आकार अपने नामसैं मित्र नहीं । किंतु नामस्वरूपही आकार हैं ।
२ सो सारेनाम ओंकारसैं मित्र नहीं । किंतु ओंकारस्वरूपही नाम हैं । कहेतैं ? वाचकशब्दकूं नाम कहैहैं औ लोकवेदके सारे शब्द ओंकारसैं उत्पन्न हये हैं । यह श्रुतिमैं प्रसिद्ध है । संपूर्णकार्य कारणस्वरूप होवैहैं । यातैं ओंकारके कार्य जो वाचकशब्दरूप नाम सो ओंकारस्वरूप हैं ॥
इसरितिसैं रूपभाग जो पदार्थनका आकार सो तौ नामस्वरूप है औ सर्वनाम ओंकारस्वरूप है । यातैं सर्वस्वरूप ओंकार है ॥
॥ २८४ ॥ ओंकार औ ब्रह्मका अभेद ॥
३ जैसैं— (१) सर्वस्वरूप ओंकार है तैसैं सर्वस्वरूप ब्रह्मा है । यातैं ओंकार ब्रह्मरूप है ।
(२) किवा—ओंकार ब्रह्मका वाचक है । ब्रह्म वाच्य है । वाच्यके औ वाचकके आकार नाम कूंहेका है औ स्वादि—शब्दकेरी अन्य मृत्तिकाके पात्रनका ग्रहण है ।
॥ ३२५ ॥ शराव नाम कूंहेका है औ स्वादि—शब्दकेरी अन्य मृत्तिकाके पात्रनका ग्रहण है ।
॥ ३२६ ॥ घटशरावादिकनकी अपेक्षातैं मृत्तिका बहुकार्यस्थायी है यातैं सो आपेक्षिकसत्य कहियेहै ।
॥ ३२७ ॥ घटकी अपेक्षातैं "घट" ऐसा दोअक्षरवाला नाम बहुकालपर्यंत स्थायी है । यातैं पुण्यके क्षयतैं मरनैवाला बहुकालस्थायी देव जैसै
अभेद होवैहै । यातैं वी ओंकारं ब्रह्मरूप है । औ— (३) विचारदृष्टितैं जो अक्षर ब्रह्मविपै अध्यस्त है । ब्रह्म तिसंकां अधिष्ठान है । अध्यस्तक स्वरूप अधिष्ठानतैं न्यारा होवै नहीं । यातैं वी ओंकार ब्रह्म—स्वरूप है ॥
॥ २८५ ॥ चारिपादनके कथनपूर्वक आत्माका ब्रह्मसैं विराट्सैं अभेद । विराट् विश्वके ससअंग औ उच्रीस मुख ॥
४ ब्रह्मरूप ओंकारका आत्मासैं वी अभेद चिंतन करै । कहेतैं ? आत्माका ब्रह्मसैं मुख्य अभेद है । औ— ब्रह्मके चारिपाद हैं । तैसैं आत्माके वी चारिपाद है ॥
पाद नाम ऋभागका है । ताहीकूं अंश वी कहैहैं (१) विराद, हिरण्यगर्भे, ईश्वर, औ तंत्पदकां लक्ष्य ईश्वर साक्षी, ये चारि पाद ब्रह्मके हैं ।
(२) विश्व, तैजस, प्राज्ञ औ त्वंपदकां लक्ष्य जीवसाक्षी । ये चारिपाद आत्माके हैं ।
अमर कहिये है तैसैं वह नाम वी सत्य ( नित्य ) कहियेहै ।
॥ ३२८ ॥ यहां पादशब्द जो है सो धान्यके पादककी न्याई विभागरूप अर्थकं बोधक है । गौके पादककी न्याई अवयव ( अंग ) रूप अर्थकं बोधक नहीं ।
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जीवसाक्षीकीहिंँ तुरीय कहहैं। (१) समष्टिस्थूलप्रपंचसहित चेतन विरादू कहियेहैं । (२) व्यष्टिस्थूलआभिमानी विश्व कहियेहैं । विरादकी ओं विश्वकी उपाधि स्थूल हैं । यातैं विराद्रूपहिंँ विश्व हें । विरादतें न्यारा नहींँ । विरादरूप विश्वके सात अंग हैं:— (१) स्वर्गलोक मूर्धा हैं । (२) सूर्य नेत्र हैं । (३) वायु प्राण हैं । (४) आकाश भड़ हैं । (५) समुद्रादिस्थल जल मत्र्स्थान हैं । (६) पृथ्वी पाद हैं । (७) जा अयिैंँ होम करिये सो अभि मुख हैँ । ये सातअंग विश्वके कहहैं । मादृक्यमेंँ यथापि स्वर्गलोकादिक विश्वकें अंग चैँ नहींँ तथापि विरादकें अंग हैं । ता विरादसें विश्वका अभेद हैं । यातैं विश्वकें अंग कहहैं ॥
तैसैं विरादविश्वके उत्तीस मुख हैं:—पंचप्राण, पंचकर्मेन्द्रिय, पंचज्ञानेन्द्रिय, औ चारि अंत:करण, ये उत्तीस मुखकी न्योंई भोगके साधन हैं । यातैं मुख कहियेहैं । इन उत्तीसतैं स्थूलशब्दादिकनहूँ वाच्यशक्तिकरिके जाग्रतअवस्थाविपि भोग हैं । यातैं विराद्रूप विश्व स्थूलकका भोक्ता औ वाच्यशक्तिकहियेहैं औ जाग्रतअवस्थावालाकहियेहैं ।
॥ २८६ ॥ ॥ चतुर्दशत्रिपुटी ॥ प्राणादिक उत्तीस जो भोगके साधन हैं तिनविपेंँ श्रोत्रादिक इन्द्रिय औ अंत:करणचारि
ये नतुर्दैया अपने अपने विषय ओं अपने (१) समष्टिस्थूलप्रपंचसहित चेतन विराद् अपने देवनताकी सहाय चाहहैं । देवनताविपयकी सहायचिना केवल इनतैं भोग होवै नहीं । यातैं (२) व्यष्टिस्थूलआभिमानी विश्व कहियेहैं । पंचप्राण ओं नतुर्देशत्रिपुटी विराद्रूप विश्वके मुख हैं । इनकें समुदायका नाम त्रिपुटी हैं । सो त्रिपुटी इसरीतियैं कहहैं:— (१) [१] श्रोत्रेन्द्रिय अध्यात्म हैँ । ओं[२] ताका विषय शब्द अभिमूत हैं । [३] दिशाकी अभिमानी देवनता अधिदैव हैँ । (क) या प्रकारमैंँ क्रियाशक्तिवाले औ ज्ञानशक्तिवाले इन्द्रिय औ अंत:करण अध्यात्म कहियेहैं । (ख) तिनके विषय अभिमूत कहियेहैं । औ (ग) तिनके सहायिके देवता अधिदैव कहियेहैं । (२) [१] त्वचेन्द्रिय अध्यात्म हैं । [२] ताका विषय स्पर्शे अभिमूत हैँ । [३] वायुतचका अभिमानी देवनता अभिदैव हैं । (३) [१] नेत्रेन्द्रिय अध्यात्म हैं । [२] रूप अभिमूत हैं । [३] सूर्य अधिदैव हैँ । (४) [१] रसनेन्द्रिय अध्यात्म हैं । [२] रस अभिमूत हैँ । [३] वरुण अधिदैव हैँ । (५) [१] प्राणेन्द्रिय अध्यात्म हैँ । [२] गंध अभिमूत हैँ । [३] आञ्चनीकुमार अधिदैव हैँ ॥ औ वार्चिककार सुरेश्वराचार्यनैं पृथिवीका अभिमानी देवता प्राणका अधिदैव कहाहै । सो वी
॥ ३२९ ॥ वहि:मज्ञ ।
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१७४ ॥ कर्तांभोक्ता होनैंतैं आत्माकी ब्रह्मसैं एकता बनै नाहीं ? इस प्रश्नका उत्तर ॥ [ विचारसागरे
वनेहै । कहैंतैं ? पृथिवीसैं ग्रापकी उत्पत्ति है । यांतैं पृथिवी अधिदैव कहाहै औ सूर्यकी डंडवा-की नासिकातैं अश्विनीकुमारकी उत्पत्ति कहीहै । यांतैं नासिकाका अधिदैव कहूं अश्विनीकुमारही कहैंहैं ।
(६) [१] वाकइंद्रिय अध्यात्म है ।
[२] वक्तव्य अधिभूत है ।
[३] अभिदेवता अधिदैव है ॥
(७) [१] हस्तइंद्रिय अध्यात्म है ।
[२] पदार्थंका ग्रहण अधिभूत है ।
[३] इंद्र अधिदैव है ॥
(८) [१] पादइंद्रिय अध्यात्म है ।
[२] गमन अधिभूत है ।
[३] विष्णु अधिदैव है ॥
(९) [१] गुदाइंद्रिय अध्यात्म है ।
[२] मलका त्याग अधिभूत है ।
[३] यम अधिदैव है ॥
(१०) [१] उपस्थइंद्रिय अध्यात्म है ।
[२] श्रौम्यधर्मके सुखकी उत्पत्ति अधिभूत है ।
[३] प्रजापति अधिदैव है ॥
(११) [१] मन अध्यात्म है ।
[२] मननका विपय अधिभूत है ।
[३] चंद्रमाअधिदैव है ॥
(१२) [१] बुद्धि अध्यात्म है ।
[२] बोधव्य अधिभूत है ।
[३] बृहस्पति अधिदैव है ॥
॥ ३८० ॥ वचनक्रियाका विषय पदार्थ वक्तव्य कहियेहै । सो वचनक्रियाद्वारां वाकईंद्रियका अधिभूत है । ऐसैं सर्वइंद्रियनके आधिभूतकी क्रियाद्वारा जो विषयरूप अधिभूत हैं, वे जानी लेनै ॥ कहूं वचनादिक्रियाकूं अधिभूत कहीहै सो स्थूलदृष्टि-वाले जनोंके ज्ञानअर्थ है । श्रुतिअर्थके विचारसैं कहा नाहीं ॥
ज्ञानका विपय वेद्य कहियेहै ॥
(१३) [१] अहंकार अध्यात्म है ।
[२] अहंकारका विपय अधिभूत है ॥
[३] बुद्ध्र अधिदैव है ॥
(१४) [१] चित्त अध्यात्म है ।
[२] चिंतनका विपय अधिभूत है ।
[३] क्षेत्रज्ञ जो साक्षी सो अधिदैवहै॥
ये छहुद्दशत्रिपुटी औ पंचप्राण ये उक्तीस विराटरूप विश्वके मुख्य हैं ॥
॥ २८७ ॥ विश्व विराट् औ आकारका अभेदचिंतन ॥
९ जैसैं विराटैं विश्वका अभेद है तैसैं ओंकारकी प्रथममात्रा जो आकार ताका वीर विराटरूप विश्वतैं अभेद है । कहैंतैं ?
(९) ब्रह्मके चारिपादनमें प्रथमपाद विराट है । औ---
(२) आत्माके चारिपादनमें प्रथम विश्व है ।
(३) तैसैं ओंकारकी चारिमात्रारूप पादन-मैं प्रथमपाद आकार है ।
यांतैं प्रथमता तीनूंमें समानधर्म होनैंतैं विश्व-विराट्-अकारका अभेदचिंतन करै । जो सातअंग उक्तीससुख विश्वके कहे ।
॥ २८८ ॥ विश्व औ तेजसकी विलक्षणता ॥
सौई सातअंग औ उक्तीससुख तेजसकै वी जाननैहूं योग्य हैं ॥ परंतु इतना भेद है:-
॥ ३३१ ॥ मैथुनक्रियारूप पशुधर्मके ॥
॥ ३३२ ॥ साक्षीचेतन, जांतैं चित्तका आश्रय होनैकरि चिच्चेकै तैं आप्रम्ह करैहै यांतैं ताका अधिदैव काहियेहै । पाहैंतैं किसी आचार्यनैं चिंतन-रूप सृष्टिज्ञान साक्षीकै भाश्रित काहाहै । कहूं चित्तका अधिदैव नारायण ( वासुदेव ) कहाहै ॥
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( ९ ) विभके जो अंग भी मुख है मोनो नैसें नेजमकें धी हिरण्यगर्भेकूप जान्त । मातें? इँश्वररचिन है। आँ— मुखउपाधि नेजमकी है औ मुख्मही हिरण्य- ( २ ) नेजमके जो इंद्रिय-इंद्रिसा-विपयालप शिपुत्री जो मुखोदिसंग जो मनोमय है। मानेको हे। मोनं इंद्रियवकि एकता जाने ॥ तेज़रइरणगर्भेकी एकता जानिके, ओंकारकी दिनीसमाभासटकारमें दिनपरा अमेदचिन्तन करें। कहैं? तेजमकी मोग शुचि है। ( ३ ) मुखपि भोग नाम मुख अपन्या दुःखेकेजानका है ताकेपिं शुचिता जौं मुख्मना करनो भनें नहीं। नभयपि साष जो शब्ादिक विराटू है तिसके संंपंर्भमें जो मुख अभनो दुःखेका मातामातर मो शुचि कलिये है। आँ… (४) मानम जो शब्ादिक, तिनके संंपंतें जो भोग होंपे मो मुख्म कहिये है ॥ इसी कारपन….. (९) जिस तों शुचिता 'मोकता' शतिगंप कग है। आँ— (२) नेजम शुचिमता 'मोकता' कराहे । कहैं? (३) तेजमके मोग जो शब्ादिक है मो मानम है। यानें मुख्म है। आँ— (४) तिसकी अपेताकरिके शिपके भोग्य वायभ्यादिक है मो मुख्म है ॥ आँ — विश् वहिरप्रमा है। तैस अंनरप्रमा है। कार्तें? जो विशकी अंतःकरणकी युचिहुप प्रमा है मो चाहिर जावहे औ तेजकी महीं जावहे ॥ ॥ २८४ ॥ तेजस हिरण्यगर्भे ऑं उकारका अमेदचिलतन ॥ २ जैसें विश्का ऑं विराट्का अमेद है। ॥ २८५ ॥ जैसें पित ( शकदा शूर्पे ) । जलसै पितहकें बाँधे एकरूप होहै औ यरिमें अनंत बिंदु तड़ाग ( तज्जान ) विशे एकरूप होहै । तैसें जागत्स्वप्नके ज्ञान, सुप्तिमेंहि एकस्मविषाल्प
(९) आनमाके चारिपादनमें दिनीपाद नैस्म है। (२) मलके पादनमें हिरण्यगर्भे दूगता पाद है ॥ (३) ओंकारकी मात्रामें दितीयमात्रा उत्कार है ॥ दितीयना तीनोंमें समानधर्मे है। यानें तिनुंकी एकता दिन्तन करें ॥ ॥ २८६ ॥ प्रजापति ईश्वर ऑं मकारका अमेद ॥ प्राज्ञके विश्रेपण ॥ ३ ऑं प्रकारहु ईश्वररूप जान्ने। कहैं? (९) प्राज्ञकी काम्प उपाधि है। आँ… (२) ईश्वररची मी काम्प उपाधि है। ईश्वर जो प्राज्ञ पादनमें धनीन है ॥ (३) ओंकारकी चतुर्थीमात्रा मकार है ॥ तीनरचना तीनोंमें समानधर्मे है। यांतें तिनुंकी एकता जाने ॥ आँ— (९) यह प्राज्ञ प्रज्ञानघन है। कहैं? जामत्त ऑं स्वप्नके जितना जान है। जो सुप्तिस्थिेंप पनू कहिये में अविपाल्प होय जावहे। याते प्रज्ञानघन कहिये। आँ— (२) आनंद्रभुक् ची मर प्राज्ञ शुतिन कलाहे। कहैं? अवियार्ज आपृत जो आनंद है ताकुं यद प्राज्ञ भोगहै। यांत आनंद्रभुक् कलिये है ॥ तिस अभिनाजिं सिता जो अभिछान नूतस्सहित चेतनका प्रतिमिवरूप प्राज्ञीय सो 'प्रज्ञानघन' कलिये ॥
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ई ७६ ॥ कर्ताभोक्ता होनैतै आत्माकी एकता बनै नहीं । इस प्रकरणा उत्तर ॥ [ विचारसागरे
जैसेँ तैजस औ विर्वका भोग त्रिपुटीसैं होवैहै तैसेँ प्राज्ञके भोगकी बी . त्रिपुटी कहियेहै:-
( १ ) चेतनके प्रतिबिंवसहित जो अविद्याकी वृत्ति है सो अध्यासतम है ।
( २ ) अज्ञानसैं आबृत जो स्वरूप आनंद सो अभिभूत है । औ—
( ३ ) ईश्वर अधिकैहै ।
इसरीतिसैं—
( १ ) विरव तौ बहिरप्रज्ञ है । औ—
( २ ) तैजस अंतरप्रज्ञ है । औ—
( ३ ) प्राज्ञ प्रज्ञानघन है ॥
॥ २९९ ॥ वास्तव विरवतादिक तीनूंकी एकता ॥ तुरीयका ईश्वरसाक्षीसैं अभेद ॥
४ ऐसा जो तीनूंका भेद है सो उपाधिकरिके है ।
( १ ) विरवकी स्थूल सूक्ष्म अज्ञान तीनि-उपाधि हैं । औ—
( २ ) तैजसकी सूक्ष्म अज्ञान उपाधि है औ—
( ३ ) प्राज्ञकी एक अज्ञान उपाधि है ॥
इसरीतिसैं उपाधिकी न्यूनताधिकतासैं तीनूंका भेद है । परमार्थकरिके स्वरूपसैं भेद नहीं ॥
विरव, तैजस, औ प्राज्ञ, इन तीनूंविपै अनुगत चेतन है सो परमार्थसैं तीनूं उपाधिके संबंधसैं रहित है ॥ तीनूं उपाधिका अधिष्ठान तुरीय है ।
( १ ) सो वहिरप्रज्ञ नहीं । औ—
( २ ) अंतरप्रज्ञ नहीं औ—
( ३ ) प्रज्ञानघन वी नहीं ।
( ४ ) कर्मेन्द्रियोंका औ ज्ञानेंद्रियोंका विषय नहीं । औ—
( ५ ) बुद्धिका विषय नहीं ।
( ६ ) किसी शब्दका विषय नहीं ॥
ऐसा जो तुरीय है ताकूँ परमात्माका चतुर्थ-पाद ईश्वर साक्षी शुद्धब्रह्मरूप जानै ॥
॥२९२॥ दोंस्वरूपवाले ओंकार औ आत्मा-का मात्रा औ पादरूपसैं अभेदचिंतन॥
९ इसरीतिसैं देहकारका आत्माका स्वरूप कह्या । एक तौ परमार्थरूप है औ एक अपरमार्थरूप है ॥
( १ ) तीनिपाद तौ अपरमार्थरूपहैं । औ—
( २ ) एकपाद तुरीय परमार्थरूप है ॥
२ जैसैं आत्माके दो स्वरूप हैं तैसेँ ओंकारके बी दो स्वरूप हैं ॥
( १ ) आकार उकार औ मकार ये तीनिमात्रा-रूप जो वर्ण हैं सो तौ अपरमार्थ-रूप हैं औ—
( २ ) तीनूंमात्राविपै व्यापक जो अस्ति-भाति-आनंदरूप अविस्थानलक्षण है सो परमार्थरूप है ॥
जा ओंकारका परमार्थरूप है ताकूँ शुति-विपै अमात्रशब्दकरिके कह्याहै । कहोतेहैं ? ता परमार्थस्वरूपविपै मात्राविभाग है नहीं । यातैं अमात्र कहियेहै॥
इसरीतिसैं दोंस्वरूपवाला जो ओंकार है ताका दोंस्वरूपवाले आत्मासैं अभेद जानै ॥
९ व्यष्टि औ समष्टि जो स्थूलग्रपंच तासहित विरव औ विराटका आकारसैं अभेद जानै ॥
आत्माके जो पाद हैं । तीनिविपै—
( १ ) विरव आदि है औ—
( २ ) ओंकारकी मात्राविपै आकार आदि है ।
यातैं दोंनूॅं एक जानै ॥
२ सूक्ष्मग्रपंचसहित जो हिरण्यगर्भरूप तैजस है । ताकूँ उकाररूप जानै ॥
( १ ) तैजस बी दूसरा है औ—
( २ ) उकार बी दूसरा है ।
यातैं दोंनूॅं एक जानै ॥
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३ कारणउपाधिसहित जो ईश्वररूप प्राज्ञ है ताकूं मकाररूप जानै ॥ (१) जैसे ईश्वररूप प्राज्ञ तीसरा है । (२) तैसे मकार वि तीसरा है । यातें ईश्वररूप प्राज्ञ औ मकारकूं एक जानै ॥
४ तीनूंविपै अनुर्गत जो परमार्थरूप तुरीय है ताकूं ओंकारावर्णकी तीनिमात्राविपै अनुर्गत जो ओंकारका परमार्थरूप अमात्र है तासूं अभिन्न जानै ॥ (१) जैसे विश्वादिकविपै तुरीय अनुर्गत है । (२) तैसे आकारादिक तीनि मात्राविपै अमात्र अनुर्गत है । यातें ओंकारके अमात्ररूपकूं औ तुरीयकूं एक जानै ॥
इसीरीतिसैं आत्माके पाद औ ओंकारकी जो मात्रा हैं तिनकी एकता जानिके लयचिंतन करै ॥
॥२९६ ॥ लयचिंतनका अनुवाद ॥ (एकमात्रारूप विश्वादिककी अन्यमात्रारूपता)
सो लयचिंतन कहिये है :- १ विश्वरूप जो आकार है सो तेजसरूप उकारसैं न्यारा नहीं किंतु उकाररूपही है । ऐसा जो चिंतन करना सो या स्थानमें लय कहिये है ॥ ऐसेही औरमात्राविपै वि जानि लेना ॥
२ जा उकारविपै आकारका लय कियाहै । ता तेजसरूप उकारका प्राज्ञरूप जो मकार है ताकेविपै लय करै ॥
३ प्राज्ञरूप जो मकार है ताकूं तुरीयरूप जो ओंकारका परमार्थरूप अमात्र है ताकेविपै लीन करै । कहैंत ? स्थूलकी उत्पत्ति औ लय सूक्ष्मविपै होवैहै । यातें -
१ विश्वरूप जो आकार हैं ताका तेजसरूप उकारमें लय होवैहै । यातें तेजसरूप जो उकार है ताका कारण प्राज्ञरूप जो मकार है ताकेविपै लय होवैहै ॥
या स्थानविपै विश्वादिकनके ग्रहणंत समष्टि जो विराट् आदि हैं तिनका औ अपनी अपनी त्रिपुटी हैं, तिन सर्वका ग्रहण जानना ॥
३ जा प्राज्ञरूप मकारविपै उकार लय कियाहँ । ता मकारकूं तुरीयरूप जो ओंकारका परमार्थरूप अमात्र है, ताकेविपै लीन करै । कहैंत ? ओंकारके परमार्थस्वरूपका तुरीयसैं अभेद है ॥
सो तुरीय शुद्धविपै ईश्वर प्राज्ञ दोनूं कलिप्त होवैहैं ॥ जो जाकेविपै कलिप्त होवैहैं सो ताका स्वरूप होवैहै । यातें ईश्वरसहित प्राज्ञस्वरूप मकारका लय वर्णनहै ॥
इसीरीतिसैं जो ओंकारके परमार्थस्वरूप अमात्रविपै सर्वका लय कियाहै "सो मैं हूं" येसा एकाग्रचित्त होयके चिंतन करै ॥
स्थावरजंगमसब, असंग, अद्वय, असंसारी, नित्यमुक्त, निर्बंध औ ब्रह्मरूप जो ओंकारका परमार्थस्वरूप "सो मैं हूं" ऐसा चिंतन करनैंसैं ज्ञान उदय होवैहै । यातें ज्ञानद्वारा मुक्तिरूप फलका देनैवाला यह ओंकारका निर्गुणउपासना है सो सर्वसैं उत्तम है ॥
॥ २९७ ॥ ओंकारचिंतनमें परमहंसका अधिकार ॥
जो पूर्वरीतिसैं ओंकारके स्वरूपकूं जानैहै सो मुनि है । जो नहीं जाने है सो मुनि नहीं । कहैंत मुनि नाम मनन करनैवाले का है । यह ओंकारनि चिंतन मननरूप है । जाके ओंकारका चिंतनरूप मनन नहीं सो मुनि नहीं ॥
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१७८ ॥ कत्तोंमोक्ता होनैतैं आत्माकी ब्रह्मसैं पकतां बनै नहींं, इस प्रश्का उत्तर ॥ [ विचारसागरै
यह मांंडूक्यउपनिपद्की रीतिसैं संक्षेपतैं ओंकारका चिंतन कडाहै ॥ और भी नृसिंहतापनी आदिक उपनिपदनमैं याका प्रकार है ॥
यह ओंकारका चिंतन परमहंसोंका गोप्यधन है ॥ बहिर्युपुरुपका यथै अधिकार नहींं । अत्यंतअंतर्मुखका अधिकार है । गृहस्थकै यामैं अधिकार नहींं । धनपुत्रादिसंगादिकरहित परमहंसका अधिकार है ॥
॥ २९५ ॥ ओंकारके ध्यानवालेकूं फल ॥ २९५--२९६ ॥
१ पूर्बमकारतैं ओंकारा ब्रह्मरूपतैं ध्यान कियेतैं ज्ञानद्वारा मोक्ष होवैहै ।
२ परंतु जा पुरुपकी इसलोकके भोगनमैं कामना होवै, तीतत्रवैराग्य नहींं होवै औ हटसैं कामनाकूं रोकिके धनपुत्रादिकनकूं त्यागिके परमहंसगुरुकै उपदेशतैं ओंकाररूप ब्रह्मका ध्यान करै ताकूं भोगकी कामना ज्ञानमैं प्रतिबंध है । यातैं ज्ञान नहींं होवैहै । किंतु ध्यान करतही शरीरत्यागतैं अनंतर अन्यशरीरकी प्राप्ति होवैहै ॥
(१) जो इसलोककी भोगनकी कामना रोकिके ध्यानमैं लगा होवै तो इसलोकमैं अत्यंतविभूतिवाले पवित्रसत्संगींकुलमैं जन्म होवैहै ॥ तहां पूर्वकामनाकेविपै सारे भोग प्राप्त होवैहैं औ -पूर्वजनमकै ध्यानकै संस्कारनतैं फेरि विचारमैं अथवा ध्यानमैं प्रवृत्ति होवैहै तातैं ज्ञान होयके मोक्ष होवैहै ॥
औ-
॥ २९६ ॥ (२) ब्रह्मालोकके भोगनकी कामना रोकिके ओंकाररूप ब्रह्मके ध्यानमैं
लाग्या होवै तो शरीर त्यागिके ब्रह्मलोककूं जावैहै ॥ तहां मनुष्यनकूं पितरनकूं देवनकूं दुलेभ जो स्वतंत्रता है ताके आनंदकूं भोगैहै ॥ जितनी हिरण्यगर्भकी विभूति है, सो सारी सत्यसंकल्पादिक विभूति इसकूं प्राप्त होवैहै ॥
॥ २९७ ॥ तहां लोकके मार्गका कम ॥
जा मार्गतैं ब्रह्मलोककूं जावैहै सो मार्गेका कम यह है:-जो पुरुप ब्रह्मकी उपासनामैं तत्पर है ताके मरणसमय इन्द्रियअंतःकरण ग्रह्यपि सारे मूर्छित हैं । कहूं जानैनैं समर्थ नहींं औ यमके दूत ताके समीप आवैं नहींं जो ताके लिंगशरीरकूं ले जावैं । परंतु-
१ अधिका अभिमानी देवता ताकूं मरणसमय शरीरसैं निकालिके अपने लोककूं ले जावैहै ॥
२ ता अभिलोकतैं दिनका अभिमानी देवता ले जावैहै ॥
३ तिसतैं शुक्लपक्षका अभिमानी देवता अपने लोककूं ले जावैहै ॥
४ तिसतैं आगे उत्तरायण जो पड्मास है-तिनका अभिमानी देवता ले जावहै ॥
५ तिसतैं आगे संवत्सरका अभिमानी देवता ले जावैहै ॥
६ तिसतैं आगे देवलोकका अभिमानी देवता ले जावैहै ॥
७ तिसतैं आगे वायुका अभिमानी देवता ले जावैहै ॥
८ तिसतैं आगे सूर्यदेवता ले जावैहै ॥
९ तिसतैं आगे चंद्रदेवता ले जावैहै ॥
इन्द्रिय औ अंतःकरण अन्यप्राणिनकी न्यांई मूर्छित होवैहैं औ यातैं स्वतः कहूं जानैनैं समर्थ नहींं औ कियाशक्तिवाले प्राणकूं स्वरूपतैं अचेतन होनैकै हेतुकै अभावरै तिसकरे तिनका गमन संभवै नहींं ॥
॥ ३३४ ॥ यह मार्गका कम यजुर्वेदकी ईशावास्यउपनिषद्कै अंतविपै औ छोड्यनविषै लिख्याहै ॥
॥ ३३५ ॥ मरणसमय स्थूलशरीरसैं लिंग-चेतनाकै यभावकैद्रि उपासककै
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१० तिसतें आगे ब्रिजलीका अभिमानी देवता अपने लोकमें ले जावैहै ।
११ तहां ब्रिजलीके लोकमें तिस उपासकके सामने हिरण्यगर्भकी आज्ञातें दिव्यपुरुप हिरण्यगर्भलोकवाही हिरण्यगर्भेसमान-रूप ताके लेनैकं आंहै । मो पुत्र विजलीके लोकतें चरुणलोककूं ले जावैहै । ब्रिजलीका अभिमानी देवता साथि आवैहै ।
१२ चरुणलोकतें इंद्रलोककूं ले जावैहै औ चरुणदेवता भी इंद्रलोकतोंडी हिरण्य-गर्भलोकवासी पुरुप औ उपासकके साथि रहैहै ।
१३ तिसतें आगे इंद्रदेवता प्रजापतिके लोकतोंडी दोनूंकें साथि रहैहै ।
१४ तिसतें आगे प्रजापति तीन दोनूंकें साथि ब्रह्मलोक ले जानैवैपै समर्थ नहीं । यांतें ब्रह्मलोकमें ता दिव्यपुरुपके ब्रह्मलोकका अधिपति हिरण्यगर्भ है ।
सूक्ष्मसमष्टिका अभिमानी चेतन हिरण्य-गर्भ कहियेहै । ताहीकूं कार्यब्रह्म कहैहैं । कार्यब्रह्मके निवासस्थानकूं ब्रह्मलोक कहैहैं ।
|| २९८ || सायुज्यमोक्षका वर्णन || यद्यपि पूर्वरीतिसैं ओंकारकी उपासना शुद्धब्रह्मरूपकरिके कहीहै । शुद्धब्रह्मके उपास- ककूं शुद्धब्रक्षककी प्राप्ति चाहिये तथापि शुद्धब्रह्मकी प्राप्ति जानतैही होवैहै औ कामना-रूप प्रतिबंधतैं जाइकूं ज्ञान हुया नहीं ताकूं कार्यब्रह्मकी प्राप्तिरूप सायुज्यरूप मोक्ष होवैहै ।
१ ब्रह्मलोकमें प्राप्त जो उपासक है ताकूं हिरण्यगर्भके समान निःश्वति प्राप्त होवैहै । २ सत्यसंकल्प होवैहै ।
३ जैसें शारीरकी इच्छा करै तेसाई उसका शरीर होवैहै ।
४ जिन भोगनकी बांछा करै सो सारे भोग संकल्पतैही प्राप्त होवैंहैं ।
५ जो एकसमय हजारशरीरनसैं जुंदैजूदै भोगनकी इच्छा करै तौ ताही समय हजारशरीर औ उनके भोगनकी जुंदी सामग्री उपजैहै । औ—बहुत क्या कहैं ? जो कछु संकल्प करै सोई सिद्ध होवैहै । परंतु जगतकी उत्पत्तिपालन-संहार छोड़िके औरसारी निःश्वति ईश्वरके समान होवैहै । याहीकूं सायुज्यमोक्ष कहैहैं ।
ऐसें हिरण्यगर्भके समान हुवा बहुतकाल संकल्पसिद्ध दिव्यपदार्थनकूं भोगिके प्रलय-कालमें जब हिरण्यगर्भके लोकका नाश होवै । तव ज्ञान होयके उपासककूं विदेहमोक्षकी प्राप्ति होवैहै ।
|| २९९ || ओंकारके अहंङ्ग्रहध्यानतैं ब्रह्मलोककी प्राप्तिका नियम ||
१ राजाके प्रजाकी न्याईं ईश्वरके लोकविपै वासका नाम सालोक्यमुक्ति है ।
२ तिसतैं श्रेष्ठ राजाके किंकरकी न्याईं ईश्वरके समीप वास करनेका नाम सामीप्यमुक्ति है
३ तिसतैं श्रेष्ठ राजाके अनुजकी न्याईं ईश्वरके समानरूपकी प्राप्तिका नाम सारूप्यमुक्ति है ।
४ तिसतैं श्रेष्ठ राजाके द्वेष्टपुत्रकी न्याईं ईश्वरके समान सत्यसंकल्पादि ऐश्वर्य ( विभूति ) की प्राप्तिका नाम सार्ष्टिमुक्ति है ।
इसरीतिसैं शाङ्कल्यपै फलरूप चारिप्रकारकी मुक्ति कहीहै । तिनमें अंतकी सार्ष्टिमुक्ति श्रेष्ठ है । तिस सार्ष्टिमुक्तिकूंही सायुज्यमोक्ष वी कहैहैं ।
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१८० ॥ कछूमोकता होनैतैं आत्माकी ब्रह्मसैं पकता चैनै नहीं । इस प्रकरणा उत्तर [विचारसागरे
वाला ब्रह्मलोकी प्राप्तिवारा मोक्षकूं प्राप्त होवैहै! तैसैं और वी उपनिषदनमैं ब्रह्मकी उपासना कहीहै । तिनतैं यहीं फल होवैहै । परंतु अहं-ग्रहउपासनाविना औरउपासनतैं ब्रह्मलोकी प्राप्ति होवै नहीं । यह वार्ता सूत्रकारनै औ भाष्यकारनै वेदशास्त्रसामैं प्रतिपादन करीहै ॥
१ जैसैं नर्मदेश्वरका शिवरूपतैं औ शालि-ग्रामका विष्णुरूपतैं ध्यान कछाहै सो प्रतीकध्यान है । अहंग्रह नहीं ।
२ मनका ब्रह्मरूपतैं औआदित्यका ब्रह्मरूपतैं ध्यान कछाहै सो वी प्रतीकध्यान है । अहंग्रह नहीं ।
तिनतैं ब्रह्मलोकी प्राप्ति होवै नहीं ॥ तिनतैं ब्रह्मलोकी प्राप्ति होवैहै ।
कारिके चिंतन करै ताकूं अहंग्रहध्यान कछैहैं, ताहैं ब्रह्मलोकी प्राप्ति होवैहै ।
॥ ३०० ॥ उत्तरायणमार्गसैं ब्रह्मलोकमैं गयेकूं फेरी संसारकी अप्राप्ति औ ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति ।
पूर्व कछा जो मार्ग है ताकूं उत्तरायणमार्ग कहैंहैं औ देवमार्ग वी कहैंहैं ।
ता देवमार्गतैं ब्रह्मलोककूं जो उपासक जावैहै तिनकूं फेरी संसार नहीं होता । किंतु ज्ञान होयके विदेहमुक्तिकूं प्राप्त होवैहै ।
तहाँ जाके सद्भन जो गुरुउपदेशादिक हैं तिनकी वी अपेक्षा नहीं । किंतु ब्रह्मलोकमैं जिहाँ ज्ञान होवैहै ।
गुरुउपदेशादिक साधनविना ही ज्ञान होवैहै । कहैंतैं ? ब्रह्मलोकमैं तमोगुणरजोगुणका तो लेश वी नहीं । केवल सत्वगुणप्रधान वह लोक है ।
१ तमोगुण नहीं यातैं जड़ता-आलस्यादिक नहीं ।
२ रजोगुण नहीं, यातैं कामक्रोधादिरूप रजोगुणका कार्य विधिप नहीं ।
३ केवलसत्वगुण है, यातैं सत्गुणका कार्य ज्ञानरूप प्रकाश ता लोकमैं प्रधान है ।
॥ ३०१ ॥ हिरण्यगर्भैवासीकूं असंग निर्विकार ब्रह्मरूप आत्माका भान होवैहै, तामैं कारण ।
ओंकारकी ब्रह्मरूपतैं जो पूर्व उपासना करीहै तव ओंकारकी मात्राका अर्थ इसरीतिसैं चिंतन कियाहै:-
१ "स्थूलउपाधिसहित विराटविश्वचेतन आकारका वाच्य है ॥
२ सूक्ष्मउपाधिसहित चेतन हिरण्यगर्भतैज उकारका वाच्य है ।
३ कारणउपाधिसहित चेतन ईश्वरमाझ मकारका वाच्य है ॥"
ऐसा अर्थ जो पूर्व चिंतन कियाहै ताकी ब्रह्मलोकमैं स्मृति होवैहै औ सत्गुणप्रभावतैं ऐसा विवेचन होवैहै:-
१ स्थूलउपाधिकरिके चेतनमैं विराट्पना औ विश्वपना प्रतीत होवैहै ॥
( १ ) स्थूलसमष्टिकी दृष्टितैं विराट्पना है ॥ औ—
( २ ) स्थूलव्यष्टिकी दृष्टितैं विश्वपना है औ समष्टिसूक्ष्मलकी दृष्टिविना विराट्साव औ विश्वभाव प्रतीत होवै नहीं ।
२ तैसैं सूक्ष्मउपाधिसहित हिरण्यगर्भ-तैजस्चेतन उकारका वाच्य है ॥ तहाँ—
( १ ) समष्टिसूक्ष्मउपाधिकी दृष्टितैं चेतनमैं हिरण्यगर्भता प्रतीत होवैहै । औ—
( २ ) व्यष्टिसूक्ष्मउपाधिकी दृष्टितैं तैजसता प्रतीत होवैहै ॥
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सूक्ष्मउपाधिकी दृष्टिविना हिरण्यगर्भता और तेजसता प्रतीत होवें नहीं ॥ ३ तैसे मकारका वाच्य ईश्वर प्राज्ञ है ॥ तहां—
(९) समष्टिज्ञानउपाधिकी दृष्टितें चेतनमें ईश्वरता प्रतीत होवें है । और—
(२) व्यष्टिअज्ञानउपाधिकी दृष्टितें चेतनमें प्राज्ञता प्रतीत होवेंहैं ।
अज्ञानउपाधिकी दृष्टिविना ईश्वरता और प्राज्ञता प्रतीत होवें नहीं । जो वस्तु जाकेपै अन्यकी दृष्टितें प्रतीत होवें सो ताकेपै परमार्थसैं होवें नहीं । जो जाका रूप अन्यकी दृष्टिविना प्रतीत होवें सो ताका परमार्थरूप होवैहै । जैसें एकपुरुषपैं पिताकी दृष्टितें पुत्रता और दादाकी दृष्टितें पौत्रतादिक रूप भान होवेंहैं सो परमार्थसैं नहीं । पुरुषका पिंडही परमार्थ है । तैसैं स्थूलसूक्ष्म—करणउपाधिकी दृष्टितें जो विरादविश्वादिक रूप भान होवेंहैं सो मिथ्याहैं । चेतनमात्रही सत्य है ॥
सो चेतन सर्वमेदरहित है । कहेहैं ? ९ विराद् और विश्वका जो भेद है सो उपाधि तौ दोनोंकी व्यक्तपि स्थूल है तथापि समष्टिउपाधि विरादकी और व्यष्टिउपाधि विश्वकी । सो समष्टिव्यष्टि—उपाधिता निमित्त है यातें स्वरूपतै भेद नहीं ॥
२ तैसैं तेजसका हिरण्यगर्भतैं भेद वि समष्टिव्यष्टिउपाधितैं है । स्वरूपतैं नहीं ।
३ तैसैं ईश्वरतैं प्राज्ञका भेद वि समष्टि—व्यष्टिउपाधिके भेदतैं है । स्वरूपतैं नहीं ।
९ ऐसा प्राज्ञका ईश्वरतैं अभेद है । और—
२ तेजसका हिरण्यगर्भतैं अभेद है । ३ तथा विश्वका विरादतैं अभेद है । या प्रकारतैं स्थूलउपाधिवालेता सूक्ष्मउपाधिवालेतैं वा कारणउपाधिवालेतैं भेद नहीं । कहेहैं ? स्थूलसूक्ष्मकरणउपाधिकी दृष्टि त्यागते चेतनस्वरूपमैं किसीप्रकारका भेद प्रतीत होवें नहीं ॥ और—
अनात्मसैं वि चेतनका भेद नहीं । कहेहैं ? अनात्मदेहादिक अविद्याकालमैं प्रतीत होवेंहैं । परमार्थसैं नहीं । तिनका वि चेतनसैं भेद बने नहीं !
ऐसैं सर्वभेदरहित, असंग, निर्विकार, नित्यमुक्त, ब्रह्मरूप आत्मा . ओंकारका लक्ष्य स्वयंप्रकाशरूप तिस उपासकदृं मान होवैहै । तातें हिरण्यगर्भलोकसूं संसार होवें नहीं ॥
॥ ३०२ ॥ ॐ और महावाक्यके अर्थकी एकता ॥
ध्यानादि महावाक्यकै विवेकविना ज्ञान होवें नहीं, तथापि ओंकारका विवेकही महावाक्यक विवेक है ।
९(९) स्थूलउपाधिसहित चेतन अकारका वाच्य है । (२) स्थूलउपाधिकूं त्यागिके चेतनमात्र अकारका लक्ष्य ।
२(९) तैसैं सूक्ष्मउपाधिसहित चेतन उकारका वाच्य है । (२) सूक्ष्मउपाधिकूं त्यागिके चेतनमात्र उकारका लक्ष्य है ।
३(९) कारणउपाधिसहित चेतन मकारका वाच्य है ।
॥ ३३७ ॥ ज्ञानद्वारा मोक्षरूप फल होवैहै ।
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१८२ ॥ कर्त्तामोक्ता होनैतैं आत्माकी ब्रह्मसैं एकता बनै नहीं । इस प्रश्नका उत्तर ॥ [विचारसागरे
(२) कारणउपाधिकूं त्यागिके चेतनमात्र मकारका लक्ष्य है । इसरीतिसैं—
१ उपाधिसहित विश्वादिक आकारादिमात्राका वाच्य है औ—
२ उपाधिरहित चेतन सर्वमात्रकै लक्ष्य है ॥
१ तैसैं नामरूप सकलउपाधिसहित चेतन ओंकारवर्णका वाच्य है । औ—
२ नामरूपसकलउपाधिरहित चेतन ओंकारवर्णका लक्ष्य है ।
पेसैं ओंकारका औ महानावध्यनका अर्थ एकही है । यातैं ओंकारके विवेकतैं अद्वैतज्ञान होवैहै ॥
॥ २३८ ॥ इहां यह अभिप्राय हैः— जो जिज्ञासुकै वेदांतके श्रवणमननरूप विचारविषै प्रवृत्ति भईहै ताकूं विचार छोड़िके अन्यसाधन कर्त्तव्य नहीं ।
१ जो कदाचित् सो विचारशील पुरुष विचारकूं छोड़िके अन्यसाधनविषै प्रवृत्त होवैगा तो आरूढपतित होवैगा ।
२ किंचा ताकूं "करं लेढ़ि न्याय" (लहू गमायके हाथ चाटनैका दुःखांत) प्राप्त होवैगा । यातैं सो विचारशील पुरुष सद्वोधपर्यंत विचार करै । सो—
१ जाकी विचारविषै प्रवृत्ति होवै नहीं ताकूं निर्गुणउपासना कर्त्तव्य है । औ—
२ जाका निर्गुणउपासनामें अधिकार नहीं ताकूं "उपासतैं शिष्य श्रेष्ठ है" इस न्यायकरि सगुणउपासनाादिरूप कर्त्तव्य कहहै ॥ ॥ ३३९ ॥
१ मायाविशिष्टचेतनरूप कारणब्रह्म सगुणईश
२ किंवा ताके उपलक्षण जे हिरण्यगर्भे,
ऐसैं आचार्यकै मुखतैं श्रवणकरिके अदृष्टि नाम जो मध्यमशिष्य सो उपासना में प्रवृत्त होयके ज्ञानद्वारा परमपुरुपार्थमोक्षकूं प्राप्त हुवा ॥ १६८ ॥
॥१३०३॥ निर्गुणउपासना के अनधिकारीकूं कर्त्तव्य ।
निर्गुणउपासनामें जाका अधिकार नहीं, ताकूं कर्त्तव्य कहहैंः—
॥ सर्वैयाछंद ॥
जो यह निर्गुणध्यान न व्है तौ, सगुणईस करि मनको धोंम ।
वैश्वानर, हरि, हर, गौरी, गणेश, सूर्य, अरु तिनके अवताररूप कार्यब्रह्म सगुणईश
कहियेहै ।
३ किंवा तिनकी प्रतिमादिरूप प्रतिनिधि (तिनके ठिकाने स्थापित ) सो यहां सगुणईश
कहियेहै ।
उक्त उपास्यनमें पूर्वपूर्व श्रेष्ठ है ।
यद्यपि आगे सस्मतरंगउक्त रीतिकरि माया-विशिष्ट चेतनरूप कारणब्रह्मही ईश्वरपदकै मुख्यवर्यै है सोई उपास्य है तथापि "मायाकूं प्रक्षति ( सारै जगतकी उपादान ) जानै । औ ब्रह्मकूं महेश्वर जानै" इस श्रुतिकरि मायाविशिष्टचेतनतैं भिन्नं वस्तुकै अभावतैं श्रीविचारण्यस्वामीनैं सर्वमतसैं
भाविरुद्ध ईश्वरका विवरणद्विषै निरूपण कियाहै । ताके अनुसार हिरण्यगर्भादिक सर्वउपास्यवस्तु वी ईश्वर कहियेहै । तामैं—
॥ ३४० ॥मनको धाम कहिये स्थानक ( निवास ) कर ॥
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॥ निर्गुणउपासनाके अनंधिकारीकूं कर्त्तव्य ॥
सगुनउपासनहू नहीं है तौ, करि निष्कामकर्म भजि राम ॥ जो निष्कामकर्महू नहीं है, तौ करिये सुभकर्म सकाम । जो सकामकर्महू नहीं होवै, तौ सठ वारवार मरि जाम ॥ १६९ ॥
ओंकारको अर्थ लखि,
॥ ३४१ ॥ फलकी कामनासैं रहित स्वर्णोंश्रमके कर्मैकूं ईश्वरार्पणबुद्धिसैं कर घो तिसके साथि नाम-कीर्तनादिकरिके रामकूं भज । अथवा निष्कामकर्मकरिके राम भजि कहिये सो कर्म रामकूं अर्पण कर । फलकी कामनासैं रहित
भयो कृतार्थ अदृष्टि ॥ पढ़े जु याहि तरंग तिहि, दादू करहु सुहृष्टि ॥ ९७० ॥ इति श्रीविचारसागरे गुरुवेदादिव्यावहारिकप्रतिपादन मध्यसमाधिकारी-साधनवर्णनं नाम पंचमस्तरंगः
समाप्तः ॥ ५ ॥
होयके रामके अर्थ किया जो पुण्यकर्म सो ही रामकी प्रसन्नताका हेतु होवैतैं रामकाही भजन है । * इहांँ 'सठ' कहिये है दुष्ट ! जो 'मरि जाम' कहिये मरिके जनमकूं पाव ॥
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॥ श्रीविचारसागर ॥
॥ षष्ठस्तरंगः ॥ ६ ॥
॥ अथ श्रीगुरुवेदादिसाधनमिथ्यावर्णनम् ॥
॥ ३०४ ॥ ॥ उपोद्घात ॥ ॥ दोहा ॥ चेतन भिन्न अनात्म सब, मिथ्या स्वप्नसमान ॥ यूं सुनि बोल्यो तीसरो, तर्कदृष्टि मतिमान ॥ १ ॥
टीका:- १ चतुर्थतरंगमैं उत्तम अधिकारीकूं उपदेशका प्रकार कह्या । २ पंचमतरंगमैं मध्यमाधिकारीकूं कह्या । ३ या तरंगमैं कनिष्ठाधिकारीकूं उपदेशका प्रकार कहेहैं:- जाकूं शंका बहुत उपजै ताकी यद्यपि वृद्धि तीव्र होवैहै । तथापि वह कनिष्ठ- ाधिकारी है । यह तरंग युक्ति-अधीन है, यातैं मुनि- अर्थमैं जाकूं शतर्क उपजै ताकूं इस तरंगका उपयोग है । तर्कदूषितबुद्धि कनिष्ठअधिकारी होवै- है । ताकूं उपदेशका प्रकार या तरंगमैं है ॥ पहले तरंगमैं प्रणवउपासना औ जगतकी उत्पत्तिनिरूपणसैं पूर्व यह कह्या:-“जो चेतन-
सैं भिन्न अज्ञान औ ताकां कार्य अनात्म कहियेहै । सो अनात्मपदार्थ सारे स्वप्नकी न्याई मिथ्या है ” इस वार्ताकूं सुनिके दोऊ- मायंकूं अश्रुते उपराम देखिके- (तर्कदृष्टिका प्रश्न ॥ ३०५-३०६ ॥)
॥ ३०५ ॥ प्रश्न:-- स्वप्नदृष्टांतसैं जाग्रत- पदार्थ मिथ्या संभव नहीं । तर्कदृष्टि प्रश्न करैहै:- ॥ दोहा ॥
पहिली जानै वस्तुकीं, स्मृति स्वप्नमैं होय । जाग्रतमैं अज्ञात अति । ताहि लखै नहिं कोय ॥ २ ॥
टीका:- पूर्व जो अत्यंतअज्ञातपदार्थ है ताकूं स्वप्नमैं ज्ञान होवै नहीं । किंतु जाग्रतमैं जाका अनुभवज्ञान होवै ताकी स्वप्नमैं स्मृति होवैहै । यातैं स्वप्नतिज्ञानके विपय जाग्रतके पदार्थ सत्य होनैं । तिनका स्वप्नमैं स्मृतिरूप ज्ञान वी सत्य है । यातैं स्वपके दृष्टांतसैं जाम्रत- के पदार्थनकूं मिथ्या कहनां संभवै नहीं । तिनके मतके अनुसर शिष्य प्रश्न करैहै ॥
॥ ३४२ ॥ नैयायिक स्वप्नकूं जाम्रत्विषे अनुभव दिये पदार्थनकी स्मृतिरूप मानसविपर्यांस कहैहैं ।
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॥ ३०६ ॥ प्रश्न:-स्वप्न मिथ्या नहीं ॥ अन्यप्रकारतैं स्वप्नज्ञानके विपय पदार्थनकूं सत्तात्व प्रतिपादन करेंहैं:-
॥ दोहा ॥ अथवा स्थूलति लिंग ताजि, वाहिरि देखत जाय ॥ गिरि समुद्र वन वाजि गज, सो मिथ्या किहिं भाय ॥ ३ ॥
टीका:-अथवा कहिये औरप्रकारतैं स्वप्नका ज्ञान औ ताके विपय पदार्थ सत्य हैं, मिथ्या नहीं । कहैंतैं ? स्वप्नअवस्थामैं स्थूलशरीरकूं त्यागिके लिंगशरीर बहारि निकसिके साचे गिरिसमुद्रादिकनकूं देखहैं, यातैं स्वप्न मिथ्या नहीं ॥
(अंक ३०५-३०६ गत प्रश्नके उत्तर ॥ ३०७-३२८ ॥)
॥ ३०७ ॥ जाग्रतके पदार्थनकी स्वप्नमैं स्मृति नहीं ॥ ॥ दोहा ॥ यह हस्ती आगैं खरो, ऐसो होवै ज्ञान ॥ स्वप्नमैंहि स्मृतिरूप सो, कैसै होय सुजान ॥ ४ ॥
टीका:- १ पूर्वकालसंवंधी पदार्थका ज्ञान स्मृतिति होवैहै । जैसे पूर्व देखे हस्तीका "सो हस्ती यह है" ऐसा ज्ञान होवै सो प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्ष कहियेहै । जैसैं पूर्वदेखे हस्तीका "सो हस्ती यह है" ऐसैं ज्ञान होवै सो प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्ष कहियेहै ॥ तहां पूर्व हस्तीके ज्ञानके संस्कार औ हस्ती सैं नेत्रका संबंध प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षका हेतु है,
प्रत्यक्षमैं ता लक्षणकी अन्याति होवैगी । यातैं प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षका प्रथम कहा जो लक्षण सोई निर्दोष है । वाधाप्रातर साधारण है ।
॥ ३४२ ॥ प्रत्यक्षज्ञानकी सामग्रीसहित संस्कार-जन्यज्ञान, प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्ष कहियेहै । जो ताकूं संस्कारसहित इंद्रियसंवंधतैं जन्य कहैं तो सो लक्षण वाधप्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षमैं तो घटैगो ! परंतु अंतरप्रत्यभिज्ञा-
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यातैं "संस्कारजन्यज्ञान स्मृतिल्पही होवैहै" यह नियम नहीं । किंतु श्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्ष वी संस्कारजन्य होवैहै । परंतु इंद्रियसंवंधविना केवलसंस्कारजन्य ज्ञान होवैहै सो स्मृतिज्ञान कहियेहै ।
१ स्वप्नमैं हस्तीआदिकनका ज्ञान केवल-संस्कारजन्य नहीं; किंतु निद्राल्प दोषजन्य है औ हस्तीआदिकनकी न्याई स्वप्नमैं कल्पित-इंद्रिय वी हैं । यातैं इंद्रियजन्य है ।
यद्यपि स्वप्नके पदार्थ साक्षीसाक्ष्य हैं, इंद्रियजन्यज्ञानके विषय नहीं । तथापि अविवेकीकी दृष्टिैं स्वप्नका ज्ञान इंद्रियजन्य कहियेहै ॥
इसरीतिसैं स्वप्नका ज्ञान जागृतके पदार्थनकी स्मृति नहीं ॥
२ निद्रासैं जागिके पुरुष ऐसैं कहैहै:-"मैं स्वप्नमैं हस्तीआदिकनकूं देखताभया" । जो हस्तीआदिकनकी स्वप्नमैं स्मृति होवै तौ हस्तीआदिकनकी स्वप्नमैं स्मृति होवै तौ हस्तीआदिकनकूं स्मरण करताभया" ऐसैं कोई नहीं कहता । यातैं जाग्रतके पदार्थनकी स्वप्नमैं स्मृति नहीं ॥
३ "जाग्रतमैं जो देखे सुने पदार्थ हैं तिनकाही स्वप्नमैं ज्ञान होवैहै" यह नियम नहीं । किंतु जाग्रतमैं अज्ञातपदार्थनका वी स्वप्नमैं ज्ञान होवैहै । कदाचित् स्पष्टनमैं ऐसैं विलक्षणपदार्थ प्रतीत होवैंहैं, जो मारे जन्मविपै कधी देखे-सुने
होवैं नहीं, यातैं तिनका ज्ञान स्मृति नहीं । ४ यद्यपि "इस जन्मके पदार्थनके ज्ञानके संस्कारही स्मृतिके हेतु हैं" यह नियम नहीं किंतु अन्यजन्मके ज्ञानके संस्कारनतैं वी स्मृति होवैहै । कहैंतैं ? अनूलज्ञानविना प्रज्ञा नहीं होवै नहीं ।
यातैं बालककी स्तनपानमैं जो प्रथमप्रज्ञा होवैहै ताका हेतु वालककूं "स्तनपान मेरे अनुकूल है" ऐसा ज्ञान होवैहै । तहां अन्यजन्मविपै जो स्तनपानमैं अनुकूलता अनुभव करीहै ताके संस्कारनतैं वालककूं प्रथमअनुकूलताकी
स्मृति होवैहै । यातैं जन्मांतरके ज्ञानसंस्कारनतैं वी स्मृति होवैहै । तैसैं इस जन्मविपै अज्ञात-पदार्थनकी वा अन्यजन्मके ज्ञानके संस्कारनतैं स्वप्नविपै स्मृति संभवैहै ।
तथापि कोई पदार्थ स्वप्नमैं ऐसैं प्रतीत होवैंहैं, जिनकतैं जाग्रतमैं किसी जन्मविशेषमैं ज्ञान संभव नहीं । जैसैं अपनै मस्तकछेदनकूं आप नत्रनसैं स्वप्नमैं देखैहैं । तहां अपना मस्तकछेदन
नत्रनसैं जाग्रतमैं देखे नहीं । यातैं जाग्रतपदार्थन-के ज्ञानके संस्कारनतैं स्वप्नमैं स्मृति नहीं ।
५ ऐसैं स्वप्नकूं स्मृतिरूप खंडनमैं अनेकयुक्ति ग्रंथकारोंनैं कहीहैं, परंतु स्वप्नकूं स्मृति माननैंमैं पूर्वुक्तदूषण अतिप्रवल हैं:-जो स्मृतिज्ञानका विपय सनुजख प्रतीत होवै नहीं औ स्वप्नके हस्तीआदिक सनुजख प्रतीत स्वकालमैं होवैंहैं ।
यातैं हस्तीआदिकनकी स्वप्नमैं स्मृति नहीं । संस्कारमात्ररूप सामग्रीकूं अनुभवनाश्रकी अनन्तर सदा विद्यमान होनैहैं सदा स्मृति ह्र--लक्षणमैं उद्धृतपदकां वी निवेश कियाचहिये ।
इसरीतिसैं "उद्बूतसंस्कारमात्रजन्यज्ञान" स्मृति है । यह स्मृतिक लक्षण निर्दोष है ।
॥ ३४८ ॥ यहां यह विशेष है:-१ संस्कारजन्य ज्ञानकूं जो स्मृति कहैं तौ प्रत्यभिज्ञाज्ञान वी संस्कारजन्य है, तामैं स्मृतिके लक्षणमैं अतिन्यास होवैहैं । ताके निवारणअर्थ स्मृतिके लक्षणमैं माणपदकां निवेश कियाचहिये ।
२ जो संस्कारमात्रजन्य ज्ञानकूं स्मृति कहैं तौ है । यह स्मृतिक लक्षण निर्दोष है ।
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॥३०८॥ स्वपमें लिंगशरीर वाहिर जायके देखता नहीं । जाग्रतकें पदाथोंकूं देखता नहीं । "लिंगशरीर वाहिर निकासिके साचे गिरिसमुद्रादिकनकूं देखैहै" याका— उत्तर ॥ दोहा ॥
बाहिरि लिंग जु निकसै, देह'अमंगल होय । प्राणसहित सुंदर लसै, यातें लिंगाहि जोय ॥ ५ ॥
टीका:—जो स्थूलशरीरतैं निकसिके लिंग- शरीर वाहिर साचे गिरिसमुद्रादिकनकूं देखैहै तौ लिंगशरीरके निकसनेतैं जैसे मरण-अवस्थामैं शरीर भयंकररूप प्रतीत होवैहै, तैसे स्वप्मअवस्थावैं भी लिंगके अभावतैं स्थूल- शरीर अमंगल कहिये भयंकर हुवा चाहियें । तैसे प्राणरहित मृतकसमान हुवा चाहिये । औ स्वप्मअवस्थामैं ऐसा होवै नहीं, किंतु स्वम-अवस्थामैं स्थूलशरीर प्राणसहित होवैहै औ जाग्रतकी न्याईं सुंदर कहिये मंगलरूप होवैहै । यातैं स्थूलशरीरके वाहिर लिंगशरीर स्वप्मअवस्थामैं निकसै नहीं । औ— जो ऐसे कहै:—स्वप्मअवस्थामैं प्राण जावै नहीं, किंतु अंत:करण औ इंद्रिय वाहिरि पर्वतादिकनमै जायके तिनकूं देखैहैं; वाहिरि न होइ जावैं । यातैं स्थूलशरीर मरणावस्थाके समान भयंकर होवै नहीं औ प्राणकू वाहिरि जानेका कछू प्रयोजन वी नहीं । प्राणमैं ज्ञानशक्ति नहीं । किंतु क्रियाशक्ति है । यातैं वाहिरिके पदार्थनके ज्ञानकी जिनमैं सामर्थ्य है सोई जावैहै । ज्ञानशक्ति अंत:करण औ ज्ञानइंद्रियनमैं है । प्राणकी न्याईं कर्म-
इंद्रियनमैं वी ज्ञानशक्ति नहीं । क्रिया-शक्ति है । यातैं प्राण औ कर्मइंद्रिय शरीरमैं रहैंहैं । यातैं मरणनिमित्तैं दाहादिकनकी रिछा होवैहै औ वाहिरि अंत:करणज्ञानइंद्रिय जावैहैं । साचे पर्वतादिकनकूं देखिके प्राण औ कर्म-इंद्रियनके समीप आवैहैं । सो वी चनै नहीं । कहैतैं ?
१ स्थूलसूक्ष्मसमाजमैं सर्वका स्वामी प्राण प्राणचिना शरीरकूं देखिके क्षणमात्र वी रहनै नहीं देतें; बाहिरि लेजावैंहैं, दाह करैहैं । यातैं स्थूलशरीरका सार प्राण है, तैसैं सूक्ष्मशरीरमैं वी प्रधान प्राण है । प्राणइंद्रियादिक परस्पर श्रेष्ठताविवादकरिके प्रजापतिके समीप जायकै कह्या 'हि भगवान् ! हमारौवी कौन श्रेष्ठ है ?' तब प्रजापतिनैं कह्या । तुम सार स्थूलशरीरमैं प्रवशिकारिके एकएक निकसतें जावो । जिसकै निकसतैं शरीर अ-मंगलरूप होइकै गिरि पड़ै, सो तुमारमैं श्रेष्ठहै'। प्रजापतिके वचनतैं नेत्रादिक इंद्रियनतैं एकएक-के अभावतैं अंधादिरूप शरीरकी स्थिति देखी औ प्राणके निकसनेका उद्योग करतेंहीं शरीर गिरनै लगा । तब सर्वनैं यह निश्चय किया । हमारा सर्वका स्वामी प्राण है । इसकारणतैं जितनै शरीरमैं प्राण रहै । उतनै रहैंहैं । शरीरतैं प्राणके निकसतेंहीं सारे निकुस जावैहैं । यातैं सूक्ष्मसमाजकै राजाकी न्याईं प्राणही प्रधान है ! ताके निकसैविना अंत:करणज्ञानइंद्रिय वाहिरि निकसै नहीं ।
२ किंवा अंत:करण औ ज्ञानइंद्रिय भूतनके सत्गुणके कार्य हैं । तिनमैं ज्ञानशक्ति है । क्रियाशक्ति नहीं ! प्राणमैं क्रियाशक्ति है । ताके गलतैं मरणसमय लिंगशरीर इस स्थूलकूं तिनके अभिमानी देवनका ग्रहण है ॥
॥ ३४५ ॥ इहाँ प्राण कौ इंद्रियशब्दकरिके
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|| सिद्धांत:-जाग्रत्स्थमकी तुल्यता || ३०९-३१८ ||
[ विचारसागरे
त्यागिके लोकांतरकूं जावैहै औ प्राणकेही बलतैं इंद्रियद्वारा अंतःकरणकी दृष्टि बाहिरि घटादिकनकै समीपि जावैहै औ प्राणके सहायेविना अंतःकरणादिकनका बाहिरि गमन संभवै नहीं || इसीकारणतैं योगशास्त्रमैं कहाहै:—“प्राण-निरोधविना मनका निरोध होवै नहीं | प्राणके संचारतैं मनका संचार होवैहै | प्राणनिरोधतैं मनका निरोध होवैहै” | यातैं मनका निरोध-रूप जो राजयोग ताकी जिसकूं इच्छा होवै, सो प्राणनिरोधरूप हठयोगका अनुष्ठान करै | यातैं बी प्राणके आधीन अंतःकरणका गमन है | ताके निकलैविना अंतःकरणज्ञानइंद्रिय बाहिरि निकलै नहीं |
३ स्वप्नअवस्थामैं स्थूलशरीर प्राणसमेत प्रलीत होवैहै | यातैं “बाहिरि जायके साचे पदार्थनकूं स्वप्नमैं देखैहै” यह संभवै नहीं ||
४ किंवा तौइंद्रुप अपनै स्वप्नमैं मिलिके जो व्यवहार करै तौ जागिके वह संबंधी मिलै | तब ऐसैं नहीं कहता जो रात्रीहूं हम मिलेथे औ अस्माकंव्यवहार कियाथा औ पूर्वपक्षकी रीतिसैं तौ बाहिरि निकलिके ता संबंधीहूं मिलिके व्यवहार साचा कियाहै | ता मिलनेकै औ व्यवहारकै ज्ञान संबंधीहूकूं चाहिये औ मिले | जब संबंधीनैं कहा चाहिये औ मिले औ सिद्धांतमैं तौ संबंधी औ ताका मिलाप सच अंतरही कल्पित है ||
५ किंवा जो बाहिरि जायके साचे पदार्थनकूं देखै तौ रात्रीमैं सोया पुरुप हरिद्वारमैं मध्यान-
|| ३४६ || “हे सौम्य ( प्रियदर्शन ) ! प्राण ( रूप खंभमैं व्याप्ति ) है ( पदवीकी न्याई ) बंधन जिसका ऐसा मन है” इस श्रुतिकेरै मन प्राणके आधीन है | यह स्पष्ट जानिये है ||
|| ३४७ || इहां महलु काहिये हरिद्वारपुरमैं स्थित मंदिर ||
के श्रुयतैं तपे मह्हल गंगाैं पूर्वी औ नीलपर्वत गंगातैं पच्छिम देखैहै | तहां रात्रीमैं मध्यानका सूर्य नहीं | गंगातैं पूर्वीदिशामैं हरिद्वारपुरी नहीं औ गंगाैं पच्छिम नीलपर्वत नहीं | यातैं बी साचे पदार्थनका देखना स्वप्नमैं असंभव है|| औ-जाग्रतकी स्मृति अथवा ईश्वरकृत पर्वतादिकनका बाहिरि निकलसिकै स्वप्नमैं झूठी होवैहै | इन दोनूं पक्षनका निराकार किया ||
(सिद्धांत:-जाग्रत्स्थमकी तुल्यता || ३०९-३१८ ||)
|| ३०९ || सारा त्रिपुटीसमाज स्वप्नमैं उपजैहै ||
सिद्धांत कहैहैं:--
|| दोहा ||
यातैं अंतर उपजै, त्रिपुटी सकलसमाज || वेद कहत यां अर्थकूं, सब प्रमाण सिरताज || ६ ||
टीका:—जाग्रतके पदार्थनकी स्मृति औ बाहिरि लिंगका निकलना तौ संभवै नहीं | तथापि जाग्रतकी ज्ञाताज्ञान ज्ञेय त्रिपुटी स्वप्नमैं प्रतीत होवैहै | यातैं कंठकी नाड़ीके अंतरही सबकुछ उत्पन्न होवैहै |
सबप्रमाणनका सिरताज कहिये प्रधान जो वेद है। तानैं यह कहि है | उपनिषदमैं यह
|| ३१८ || “न तत्र रथो न रथयोगा न पंथानो मन्यन्ते रथान् रथयोगान् पथः सृजते” | अर्थ:—“तहां ( स्वप्नवै ) रथ नहीं है अरु घोड़े नहीं हैं औ मार्ग नहीं है [ किंतु स्वपकै अधिष्ठान साक्षी किंवा ब्रह्मचेतन है ] | जाग्रतके अंतरही रथ घोड़े औ मार्गनकूं सृजताहै” इस श्रुतिमैं स्वप्नकालमैं रथादि-
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प्रसंग है:-“जाग्रतके पदार्थ स्वप्नमें नहीं प्रतীত होवेंहैं । किंतु रथ औ घोडे तथा मार्ग तैसे रथमै बैठनेवाले स्वप्नमें नवीन उत्पन्न होवेंहैं । यातैं पर्वत समुद्र नदी वन ग्राम पुरी सूर्ये चंद्र जो कुछ स्वप्नमें दिखाईहैं सो नवीन उपजैहैं ॥
जो स्वप्नमें पर्वतादिक नहीं होवेंहैं तौ उनका प्रत्यक्षज्ञान स्वप्नमें होवेंहैं सो नहीं हुयाचाहिये । कहैंतैंऽऽविपयतैं इंद्रियका संबध औ अंतःकरणकी वृत्तिका संबध । प्रत्यक्षज्ञानका हेतु है । यातैं पर्वतादिकविपय औं तिनके ज्ञानके साधन इंद्रिय तथा अंतःकरण, सारे अंतर उत्पन्न होवेंहैं ॥
यद्यपि स्वप्नके पदार्थ भ्रतिकरजातादिकनकी न्याईं साक्षीभास्य हैं । अंतःकरणइंद्रियनका स्वप्नके ज्ञानमें उपयोग नहीं । यातैं जैसैं जो पर्वतादिक हैं तिनकीही उत्पत्ति स्वप्नमें माननी योग्य है । ज्ञाता ज्ञान औ इंद्रियनकी उत्पत्ति माननी योग्य नहीं ॥
१ तथापि जैसैं स्वप्नमें पर्वतादिक प्रतीत होवेंहैं तैसे इंद्रिय अंतःकरणसहित स्थूलशरीर बी स्वप्नमें प्रतीत होवेंहै, यातैं तिनकी बी उत्पत्ति माननी चाहिये ।
२ किंवा स्वप्नके पदार्थनिपै नेत्रादिकनकी विपयता भान होवैहै सो ऽव्यावहारिक नेत्रादिकनकी विपयता तौ स्वपके प्रातिभासिक पदार्थनिविपैै नहीं । कहैंतैंसमसत्तावाले पदार्थही आपसमैं साधकबाधक होवेंहैं । यह पंचमततंगमें प्रतिपादन करी है । यातैं ऽव्यावहारिक नेत्रादिक शरी-
रमें हैं बी, तिनतैं स्वप्नके पदार्थनकी विपमसत्ता तीनकर उपलक्षित सारे जगत्की नवीनसृष्टि ( उत्पत्ति ) कहीहै औ "संघ्ये सृष्टिराह हि (उत्कृष्टि जाग्रत औ सुप्रतिकी संधियिपै सृष्टिकूं कैहैहै)" यह उक्त श्रुतिरूप मूलवाला न्याससूत्र है
तिनके ज्ञानकी विपयता स्वपके पर्वतादिकनके दर्शनकूं वने नहीं ॥
होनेैं । तिनके ज्ञानकी विपयता स्वपके पर्वतादिकनके दर्शनकूं वने नहीं ॥
३ तैसे सुखदुःख औ तिनका ज्ञान तथा सुखदुःखज्ञानका आश्रय प्रमाता स्वप्नमें प्रतीत होवेंहैं औ बिना हुये पदार्थकी प्रतीति होवें नहीं ।
यातैं सारा त्रिपुटीसमाज स्वप्नमें उत्पन्न होवैहैं ॥
अनिर्वचनीयरयत्नकी यह रीति है:-जितनैं ऽज्ञान हैं, तिनके विपय सारे अनिर्वचनीयर उत्पन्न होवेंहैं ॥ विपयविना कोई ज्ञान होवें नहीं । याहूं सिद्धांत है ॥
अज्ञान औग्राह्यके मतमें तौ अन्यपदार्थका अन्यरूपतैं भान होवै, सो भ्रम कहिये है । सिद्धांतमें तौ जैसा पदार्थ होवै तैसाही ज्ञान होवैहै । यातैं ऽज्ञानस्थमें बी विपयककी उत्पत्ति ऽवश्य होवेंहै । विपयविना ज्ञान होवें नहीं ॥
इसरीतिसैं स्वप्नमें त्रिपुटीकी प्रतीति होनेैं सारा समाज उत्पन्न होवेंहैं ॥ याके विपै—
॥ ३१० ॥ स्वप्नके उत्पत्तिकी शंका-करिके अंतःकरण वा अविद्याके कारण औ चेतनके विवर्त्ते स्वपकी सिदिधे ॥ ३१०—३११ ॥
ऐसी शंका होवैहै:-स्वपके जो पदार्थ सो उत्तश्रुतिके अर्थ ( स्वप्नसृष्टि ) कूं दृढ करैहै । यातैं स्वप्नविपै जाग्रतके पदार्थनकी स्मृति किंवा लिंगशरीरका वाहरीि निमित्तन होयके तिसकरि साचे गिरिसमुदादिकनका दर्शन संभवे नहीं ॥
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प्रतीत होवेंहैं, तिनकी उत्पत्ति अंगीकार होवेंहैं । जैसे स्वमद्रांतसैं जाग्रतके पदार्थ मिथ्या सिद्धांतमैं कहेंहैं, तैसे जाग्रतके पदार्थनकी उत्पत्ति सामग्री वाले होवेंहैं स्वप्नके पदार्थही सत्य हुये चाहिये औ स्वप्नके माथि पदार्थनकी उत्पत्ति नहीं मानें तथ यह दोप नहीं । कहैंहैं ? जाग्रतके पदार्थ तो उत्पन्न हुये प्रतीत होवेंहैं औ स्वप्नमैं विनाहुये प्रतीत होवेंहैं । यातैं स्वप्नमैं विनाहुये पदार्थनका ज्ञान भ्रमरूप होवेंहैं । तिनकी उत्पत्ति माननी योग्य नहीं ॥ ता— ॥ ३१९ ॥ शंकाका समाधान ॥
दोहा ॥ साधन सामग्री बिना, उपजै झूठ सुभ होय ॥ बिन सामग्री उपजै, यू तिन्ह मिथ्या जोय ॥ ७ ॥ टीका:-१ जिस वस्तुकी उत्पत्तिमैं जितना देशकालादिसामग्री साधन कहिये कारण है, उतनी सामग्रीविना उपजै सो मिथ्या कहिये है औ स्वप्नके हस्तीआदिकनकी उत्पत्तिके योग्य देशकाल हैं नहीं । बहुतकालमैं औ बहुदेश- सूक्ष्मसंकुचितदेशमैं उपजैहैं । यातैं मिथ्या हैं । २ यद्यपि स्वप्नअवस्थामैं कालदेश वी अधिक प्रतीत होवेंहैं तथापि अन्यपदार्थनकी अनिर्वचनीयर प्रातिभासिक उत्पन्न होवेंहैं । कहैंहैं ? विपयविना प्रत्यक्षज्ञान होवै नहीं औ स्वप्नमैं अधिकदेशकालका ज्ञान होवैहै । भाव- हारिक देशकाल न्यून यातैं प्रातिभासिक उत्पन्न
होवैंहैं । परंतु स्वप्नअवस्थामैं उपजे जो प्रातिभासिक देशकाल हैं सो स्वप्नअवस्थाके हुस्टी- आदिकनके कारण नहीं । कहैंहैं ? कारण होवेंहैं सो पहली उपजैहै औ कार्य पीछे उपजैहै ॥ स्वप्नके देशकाल औ हस्तीआदिक एकही समयमैं होवेंहैं । यातैं तिनका कार्यकारणभाव चनै नहीं ॥ औ व्यवहारीक देशकाल न्यून हैं । हस्ती- आदिकनके योग्य नहीं । यातैं देशकालरूप सामग्रीविना उपजैहैं । यातैं स्वप्नके पदार्थ मिथ्या हैं ॥
३ और भी मातासैं आदि लेके हस्ती- आदिकनकी सामग्री स्वप्नमैं नहीं हैं । यद्यपि स्वप्नमैं प्राणी पदार्थनके मातापिता वी प्रतीत होवेंहैं तथापि स्वप्नके मातापिता पुत्रकी उत्पत्तिके कारण नहीं । कहैंहैं ? मातापिता औ पुत्र एकक्षणमैं साथ उपजैहैं । यातैं तिनका कार्यकारणभाव नहीं ॥ जा निद्रासहित अविद्यासैं स्वप्नके पदार्थ उपजैहैं सोई अविद्या तिन पदार्थनविपै मातापनापितापनाऔ पुत्रपनाऔ उपजावैहैं ॥ इसरीतिसैं स्वप्नके पदार्थन- की उत्पत्तिमैं औरकोई सामग्री नहीं । किंतु अविद्याही निद्रारूप दोपसहित कारण है । जो दोपसहित अविद्यासैं जन्य होवै सो शुक्तिरजतकी नाईं मिथ्या होवेंहैं । यातैं स्वप्नके पदार्थ सत्य नहीं । मिथ्या हैं ॥
तिनका उपादानकारण अंतःकरण है । अथवा साक्षात् अविद्याही तिनका उपादानकारण है ॥ १ पहलें पक्षमैं साक्षीचेतन स्वप्नका अधिष्ठान है । औ— २ दूसरे पक्षमैं ब्रह्मचेतन स्वप्नका अधिष्ठान है ॥
१ स्थूलसूक्ष्मदेहहयअवच्छिन्न कूटस्थचेतनरूप पारमार्थिकजीव है । औ— २ मायासैं आवृत्त कूटस्थविपेे कलिप्त स्वंतःकरणमैं चिदाभासरूप देखहयमैं अभिमानका कर्ता व्यावहारिकजीव है । औ—
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इसरीतिसैं अंतःकरणका अथवा अविद्याका परिणाम आँ चेतनका निवर्त्ते स्वप्न है ॥ याके
॥ ३१२ ॥ त्रिविधसत्तापक्षमें विलक्षण
जाग्रत्स्वप्नकी दोसत्ताके मानैतैं
अवलक्षणतां ॥ ३१२—३१३ ॥
ऐसी शंका होवैहै:--दूसरे पक्षमें ब्रह्म-
चेतन स्वप्नका अधिष्ठान कहा औ अविद्या
उपादानकारण कही । तहां अधिष्ठानज्ञानसैं
३ निद्रारूप मायासैं आाश्रित व्यवहारिक जीवरूप
अधिष्ठानमें कालिक प्रातिभासिकजीव है ॥
इस भेदतैं जीव त्रिविध हैं । तिसके वादी जे
वैदान्तिकस्वामीयादिक हैं तिनतैं स्वप्नका अधिष्ठान
व्यावहारिक जीव औ जगत् कहै हैं । तिनमें--
१ स्वप्नके जीव ( दृष्टा )का अधिष्ठान जाग्रत्का
जीव ( द्रश्य ) है । औ--
२ स्वप्नके जगत् ( दृश्य )का अधिष्ठान जाग्रत्-
का जगत् ( दृश्य ) है । अथ--
३ स्वप्नाध्यासका उपादान व्यवहारिक जीव जगत्-
का आावरक निद्रारूप अवस्थापादान ( तूल-
ज्ञान ) है ।
व्यावहारिक दृष्टा औ दृश्य जब हैं ताकूं सत्ता-
स्फूर्ति देनेहैरूप अधिष्ठानता संभवै नहीं । यातैं
अहंकारअनवच्छिन्नचेतन वा अहंकारअनवच्छिन्न चेतन
स्वप्नका अधिष्ठान है । यह दो मत समीचीन है ।
तिनमें--
१ प्रथममत मानें तौ अहंकारअनवच्छिन्नका
आाश्रयादक तूलज्ञानही स्वप्नका उपादान संभवैहै । औ--
जाग्रतके बोधसैं ब्रह्मज्ञानविना ताकी निवृत्ति भी
संभवैहै । औ--
२ अविद्यामैं प्रतिबिंबरूप जीवचेतन वा वृत्तिरूप
ईश्वरचेतन विवरणकारसक्की रीतिसैं व्यापक होतैंहैं
अहंकारअनवच्छिन्नचेतन । ताकूं स्वप्नका अधिष्ठान
मानैं तौ ताका आाच्छादक मूलाज्ञानही स्वप्नका
उपादान संभवैहै ।
कल्पितकी निवृत्ति होवैहैं औ स्वप्नका अधिष्ठान
ब्रह्म है । यांतें ब्रह्मज्ञानविना अज्ञानकीं
जागरणमें स्वप्नकी निवृत्ति नहीं हूई चाहिये ।
॥ ३१३ ॥ अन्यशंका:-जैसे स्वप्नका
अधिष्ठान ब्रह्म औ उपादानकारण अविद्या है ।
तैसैं वेदांतसिद्धांतमें जाग्रतके व्यावहारिक
पदार्थनका वी अधिष्ठान ब्रह्म है औ उपादान-
कारण अविद्या है । यांत--
१ जाग्रतके पदार्थनकूं व्यावहारिक कहै-
हैं औ--
उपादान मानना होवैहैं । जाग्रत्मेंऔ सै स्वप्नकी
वारूप निवृत्ति होवें नहीं । किंतु उपादानमें विलद्रूप
निवृत्ति होवेंहै । परंतु अहंकारअनवच्छिन्न चेतनकूं
स्वप्नका अधिष्ठान मानें औ शरीरके अंतरदेशस्थ
चेतनही अधिष्ठान संभवैहै । वाददेशस्थ चेतन नहीं ॥
वाददेशस्थ चेतनमैँहीं
जो स्वप्नकी अधिष्ठानता है । ताका अंतःकरणकूं
अवच्छेदक मानें तौ अहंकारअनवच्छिन्नकूं अधिष्ठानता
सिद्ध होवैहैं ॥ तिसी चेतनमें स्वप्नकी अधिष्ठानताका
अंतःकरणकूं अवच्छेदक ( व्यवहारिक ) नहीं मानै तौ
अहंकारअनवच्छिन्नकूं अधिष्ठानता सिद्ध होवैहै ।
अहंकारअनवच्छिन्न, अविद्याप्रतिबिंब औ वृत्ति
दोनूं हैं
अविद्यामैं प्रतिबिंबरूप जीवचेतनकूं अधिष्ठानता कह-
नांहीं समीचीन है ॥
दृष्टिसृष्टिवादककी रीतिसैं सर्व अनालम्बपदार्थनकी
एक ( प्रातिभासिक ) सत्ताकै होतैंहैं जाग्रत्स्वप्न दोनकूं
ब्रह्मचेतनही अधिष्ठान मान्यहै ॥
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स्वप्नकूं प्रातिभासिक कहैंहैं । ऐसा भेद नहीं हुवाचाहिये । कहैंहैं? दोनूंका अधिष्ठान ब्रह्म है औ उपादानकारण अविद्या है । यातैं— १ जागृत स्वप्न दोनूं व्यावहारिक हुये- चाहिये । २ अथवा दोनूं प्रातिभासिक हुये चाहिये । ॥ ३१४ ॥ सो दोनूं दृशंका बनै नहीं । कहैंहैं ?
प्रथमशंकाकासमाधान यह है:- निवृत्ति दोप्रकारकी होवैहै । यह पूर्व रल्याति- निरूपणमैं कहीहै ॥ १ कारणसहित कार्यका विनाशरूप अत्यंत- निवृत्ति तौ स्वप्नकी जागृतमैं ब्रह्मज्ञानविना बनै नहीं । २ परंतु दृढ़के अग्रहांतैं जैसैं घटका अत्यंतिका- मैं लय होवैहै । तैसैं स्वप्नकी हेतु जो निद्रादोष ताके नाशतैं वां स्वप्नकी विरोधी जागृतकी उत्पत्ति अविद्यामैं लयरूपनिवृत्ति स्वप्नकी ब्रह्मज्ञानविना संभवैहैं । ॥३१५॥ और जो शंका करी:-“जागृत- स्वप्न दोनूं समान हुयेचाहिये” सो बनै नहीं । कहैंहैं ? १ जागृतके देहादिक पदार्थनकी उत्पत्तिमैं तौ अन्यदोपरहित केवल अनादि- अविद्याही उपादानकारण है । औ— २ स्वप्नके पदार्थमैं तौ सादिनिद्रादोष वी अविद्याका सहायक है । १ यातैं अन्यदोपरहित केवल अविद्याजन्य व्यावहारिक कहियेहै । औ— २ सादिदोषसहित अविद्याजन्य प्राति- भासिक कहियेहै । ॥ ३५० ॥ तूलाविचारः ॥
१ स्वप्नके पदार्थ निद्रादोषसहित अविद्या- जन्य होइंतैं प्रातिभासिक हैं । औ— २ जागृतके पदार्थ अन्यदोपरहित अविद्याजन्य होइंतैं व्यावहारिक हैं । इसरीतिसैं स्वप्नके पदार्थनमैं जागृतपदार्थनतैं विलक्षणता है । परंतु यह संपूर्ण तीनप्रकारकी सत्ताकी मानिक रीतिसैं कहहैं । विचारदृष्टिसैं तौ— १ तीनि प्रकारकी सत्ता बनै नहीं । औ— २ जागृतस्वप्नकी परस्पर विलक्षणता वी बनै नहीं । ॥ ३१६ ॥ यद्यपि वेदांतपरिभापादिक ग्रंथनमैं पूर्वप्रकारैं व्यावहारिक औ प्राति- भासिकपदार्थनका भेद कछाहै । यातैं तीनि सत्ता मानीहैं । तैसैं विधारणयस्वामीनैं वी तीनि सत्ता मानीहैं । कहैंहैं: यह प्रसंग तीनहू लिखहैं:- १(१) एक तौ ईश्वररचित हैं । सो साक्ष्य (२) दूसरे जीवके संकल्पपरचित हैं । सो मनोमय कहियेहैं औ अंतर हैं ॥ २(१) जीवसंकल्पतैं रचित अंतरमनोमय साक्षीभास्य हैं । औ— (२) ईश्वररचित साक्ष्य हैं, सो प्रमाण- के विषय हैं ॥ औ— ३(१) अंतरमनोमय देहादिकहीजीवकूं सुखदुःखके हेतु हैं । औ— (२) साक्ष्य जो ईश्वररचित हैं, सो सुख- दुःखके हेतु नहीं । ४(१) यातैं अंतरमनोमयपदार्थनकी निवृत्ति सुखदुःखकूं अपेक्षित है ॥ औ—
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(२) वाध्यप्रपंच सुखदुःखकी हेतु नहीं। यातैं ताकी निष्ठति अपेक्षित नहीं ॥ जैसे दोपुरुषनके दोपुत्र विनदेशमें गये होवें तिनमें एकका पुत्र मري जावै। एकका जीवता होवै। सो जीवतापुत्र गडी विंभूतिकूं प्राप्त होयके किसी पुरुपद्वारा अपने पिताकूं अपनी विंभूति-प्राप्तिकौं औ दितीयके मरणका समाचार भेजै तहां समाचार सुनावनैवाला दुष्ट होवै। यातैं—१ जीवते पुत्रके पिताकूं कहैः—तेरा पुत्र मरिगया। औ—२ मरे पुत्रके पिताकूं कहैः—तैरां पुत्र शरीरतैं नीरोग है। वडी विंभूतिकूं प्राप्त हुवा है। थोडेकालमें हस्तींआरूढ बडे-बडेसमाजतैं आवैगा ॥
तां वंचककचनद्वै सुनिकें—१ जीवते पुत्रका पिता रोवैहै। वडे दुःखको अनुभव करैहै। औ—२ मरे पुत्रका पिता वडेहर्षकूं प्राप्त होवैहै। इसरीतिसैं देशांतरविषे—१(१) ईश्वररचितपुत्र जीवतैहै। तौ वी मनोमयपुत्र मरिगया। यातैं दुःख होवैहै ॥
(२) ईश्वररचित जीवतैका मूल होवै नहीं। २(१) तैसैं दूसरेका ईश्वररचितपुत्र मरिगयाहै। ताका दुःख होवै नहीं। (२) मनोमय जीवैहैं। ताका सुख होवैहैं ॥
यातैं—१ जीवसृष्टिही सुखदुःखकी हेतु है। २ ईश्वरसृष्टि सुखदुःखकी हेतु नहीं ॥ इसरीतिसैं विचारण्यसामर्थ्यनै जीवसृष्टि औ ईश्वरसृष्टि दोप्रकारकी कहीहै ॥ तहां—॥ ३५९ ॥ इहां ३१७ सैं लेके ३२९ पर्यंत मि. २५
जीवसृष्टि प्रातिभासिक है। औ—२ ईश्वरसृष्टि व्यावहारिक है ॥ ऐसैं औरग्रंथकारोंनै वी सत्ता तीनप्रकारकी कहीहै ॥१ चेतनकी परमार्थेसत्ता है। औ—चेतनसैं मिथ्य जडपदार्थनकी दोप्रकारकी सत्ता है। एक प्रातिभासिकसत्ता। औ दूसरी प्रातिभासिकसच्चा है ॥ २ सृष्टिके आदिकालमें ईश्वरसंकल्पतैं उपजे जो केवलअविद्याके कार्य पंचभूत औ तिनके कार्यकी व्यावहारिकसत्ता है ॥ ३ दोषसहित अविद्यांकै कार्य स्वप्नयुक्ति रजतादिकनकी प्रातिभासिकसत्ता है ॥
इसरीतिसैं देशांतरविषे—१ जागृत्पदार्थनकी व्यावहारिकसत्ता। औ—२ स्वप्नकी प्रातिभासिकसत्ता कहीहै ॥ ३१७ ॥ तथापि. अनात्मपदार्थनकी सर्वकी प्रातिभासिकी सत्ता है। यातैं दो-प्रकारकीही सत्ता है ॥१ चेतनकी परमार्थेसत्ता है। औ—२ चेतनसैं मिथ्य सकलअनात्माकी प्रातिभासिकी सत्ता है ॥
जागृत्स्वप्नके पदार्थनकी किंचितमात्र वी विलक्षणता होवै नहीं। या उत्तमसिद्धांतकूं प्रतिपादन करैहैं:—
॥ चौपाई ॥ बिन सामग्री उपजत यातैं, स्वप्नसृष्टि सब मिथ्या तातैं ॥ देसकालको लेस न जामैं, सर्व जगत उपजत है तामैं ॥ ८ ॥
दृष्टिसृष्टिवादकाही प्रतिपादन कियाहै ॥
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॥ सिद्दांत:-जागृतुस्वप्नकी तुंल्यतां ॥ रे०९५-३५२८ ॥ [ विचारसागरे
स्वप्नसमान झूठजग जानहुं, लेस सत्य ताहूं मतिं मानहुं ॥ जागृतमांहि स्वप्न नहिं जैसैं, स्वप्नमांहि जागृत नहिं तैसैं ॥ ९ ॥
टीका:- देशकालसामग्रीविना स्वप्नके हस्तीपरवतादिकं उपजैहैं । यातैं मिथ्या कहियेहैं ॥ तैसैं आकाशादिप्रपंचकी सृष्टि ब्रह्मतैं होवैहै, ता 'ब्रह्मविऐपे' देशकालका लेश वี नहीं है ॥ स्वप्नविऐपे हस्तीपरवतादिकनके योग्य तौ देशकाल नहीं है ! तथापि अल्पदेशकाल हैं । तैसैं आकाशादिकनकी सृष्टिमैं अल्पदेशकाल वीनहीं
॥ ३५२ ॥ इहां यह रहस्य है:-जैसे कोई दो वलिष्टपुरुष युद्धवनमें अपनीअपनी वलिष्टताका विवादकरिके स्वस्ववल्की परिक्षाअर्थे "जो अन्यकूं मारे सो वलिष्ठ" ऐसी प्रतिज्ञाकरिके 'उभयफलयुक्त- शक्ति ( शस्त्रविशेष ) कूं वीचमें धरिके तिसके एक- एक फलकूं हृदयदेशमें लगायके परस्परके सम्मुख वल्के करनैकरिके दोनूं शस्त्रकूं पावैं । तैसैं ब्रह्मरूप शून्यवनमें जागृतप्रपंच सौ स्वप्नप्रपंचरूप दो वलीपुरुष हैं । तिनका परस्परविऐ परस्परके दृष्टांतसैं परस्परका प्रहार होवैहै । सो दिखावैहैं:-
१ देशकालादिसामग्रीं विना उपजै । सो झूठ होवैहै । जैसे देहरूप साम्रिके पूर्ण होते वी कालरूप- सामग्रीकी न्यूनतासैं उपजे पांचका परेवा, ठोकर- की अशर्फी, चमड़ेका सर्प, इत्यादिक ऐंद्रजालिक- ( वाजिगरारचित ) पदाथैं मिथ्या कहियैहैं ॥
२ तैसैंही देशकालरूप सामग्रीके लेशतैं रहित ब्रह्मविऐपे जागृतप्रपंच प्रतीत होवैहै । यातैं सो असत् है । कहैंतैं ? प्रतीयमान देशकाल तौं जागृतप्रपंचके अंर्गत हैं । तिनतैं मिल्न देशकाल प्रपंचके कारण-
हैं । कहैंतैं देशकालरहित परमात्मासैं आकाश- दिकनकी सृष्टि कहीजहै ॥ इसकारणतैं- १ तैचरीयश्रुतिमैं आकाशादिकनकी क्रमतैं सृष्टि कहीहै । १ देशकालकी सृष्टि 'नहीं कही ॥ अथौ-
२ सूत्रकार भाष्यकारतैं 'ची देशकालकी सृष्टि, नहीं कही ।। tahां तैचरीयश्रुतिका औ सूत्रकारभाष्यकार- का यही अभिप्राय है:-आकाशादिक प्रपंचकी उत्पत्ति 'देशकालसामग्रीविना' होवैहै । 'यातैं स्वप्नकी न्याई मिथ्या हैं ॥
तौं पूछ्या' चाइये:-(९) वे देशकाल नष्टतैं अभिन्न हैं । (२) वा मिल्न है ? (१) यभिन्न कहै तौ 'ब्रह्मसैं मिल्नं देशकालके अंसकूं घटाइवै' प्रपंचकी प्रतीति सिद्ध भई ॥'चौ—
(२) जो ब्रह्मसैं मिल्न देशकाल कहै तौ (९) वे सत्य हैं । (२) किंवा मिथ्या हैं ? [१] सत्य कहै तौ शुद्धैतश्रुतिसैं विरोध होवैगौ । [२] मिथ्या कहै तौ तिनकूं वीन प्रपंचकी न्याई कार्य होतैं तिनके कारण वीन कोई देश- काल कहैं चाइये ॥
(क) जो आपके कारण आपही हैं तौ आत्माश्रय होवैगौ ।'चौ— (ख) जो 'श्रुतिदेशकालके' कारण द्वितीय औ द्वितीयके', प्रथम, कहैं तौ 'परस्परकी उत्पत्तिविाऐ परस्परकी अपेक्षाके होनैतैं अनन्योक्तप्राश्रय होवैगौ । चौ—
(ग) जो द्वितीयके, तृतीय, फेर तृतीयके, प्रथम- देशकाल कारण कहैं तौ चक्रकी न्याई भ्रमण- रूप चक्रिका होवैगी । (घ) जो तृतीयदेशकालके कारण चतुर्थ' औ चतुर्थके कारण पंचम कहैं तौ अनन्तदेश-
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॥ ३५८॥ यथापि मद्दुसूदनस्वामीनै देशकाल साक्षात् अविद्याके कार्य कहैंहैं । यातैं मायाविशिष्ट परमात्मासैं पहिली : मायाके परिणाम देशकाल होवैंहैं । तिसतैं अनंतर आकाशादिकनकी उत्पत्ति होवैहैं । यातैं योग्यदेशकालतैं आकाशादिक पंचककी उत्पत्ति संभवेंहैं तथापि मद्दुसूदनस्वामीका यह अभिप्राय नहीं:-जो देशकाल प्रथम होवैंहैं औ आकाशादिक उत्तर होवैंहैं । कहैंतैं ?
१ अतीतकालमें होवै सो प्रथम औ पूर्व कहिये है ।
२ भविष्यकालमें होवै सो उत्तर कहियेहै । जाकूं पाछें कहहै ।
आकाशादिकनकी उत्पत्तितैं प्रथम देशकाल उपजैहैं । या कहनैंतैं आकाशादिकनकी उत्पत्तिकालतैं पूर्वकालउपहितपरमात्मा देशकालकल्का अधिष्ठान है । यह सिद्ध होवैहैं । यातैं देशकालकी उत्पत्तिमैं पूर्वकालकी अपेक्षा होवैगी औ कालकै-घारारूप अवस्था होवैगी ।
यातैं ब्रकाविपैं कोईसी देशकाल सिद्ध होवै नहीं ॥ इसरीतिसैं देशकालरहित ब्रकांतैं जाग्रत्जगत्सकी उत्पत्ति प्रतीत होवैहैं । यातैं जाग्रत्पंच असत् ( तुच्छ ) है ॥
किंचा जाम्रत्कालमें स्वपदर्थनकी सृष्टि होवैहैं औ स्वप्नमें बहुत करिके जाम्रत्के पदार्थनकी सृष्टि होवैहैं नहीं । यातैं वी जाम्रत्पंच असत् है । ताके दृष्टांतसैं ( तिसके सटृश होनेकरि ) स्वप्नपंच वी असत् ( वंध्यापुत्रके समान ) है । औ जव जाम्रत्का अभाव है । तब ताके अंतरगत समाधियंगस्थाका वी चेतनमें अभाव है औ जत्र जाम्रत्स्वप्नका अभाव है
तय दोनूं अवस्थाविपैं वत्तिमानं तुच्छिके अभावतैं ताका विलयसूप्ति औ सुप्तिकी अंतरगत मरण मूर्छाकै वी अभाव है । इसरीतिसैं ब्रकाविपैं सारे प्रपंचकै असिद्धितैं अजातवाद सिद्ध होवैहै ।
कांलकी उत्पत्तिविना पूर्वकाल असिद्ध है । यातैं आकाशादिकनतैं पूर्वकालमें देशकालादिक होवैंहैं । यह कहनां वनैं नहीं । किंतु मद्दुसूदनस्वामिका यह अभिप्राय है:-- ९ जैसे भूतमेतीकपंच प्रतित होवैहैं तैसे देशकाल वी प्रतीत होवैहैं । औ---
(९) आत्मासैं भिन्न कोई नित्य है नहीं । यातैं देशकाल नित्य नहीं ॥ औ---
(२) विनाशुयेकी प्रतीति होवै नहीं । यातैं आकाशादिकनकी न्याई देशकालकी वी उत्पत्ति होवैहै ।
सो देशकाल मायाके परिणाम हैं औ चेतंतके विवर्त्त हैं । जो विवर्त्त होवै सो किसीकै कारण होवै नहीं । यातैं आकाशादिक प्रपंचककी उत्पत्तिमैं देशकालकूं कारणता वनैं नहीं ॥
२ किंचा कारण प्रथम होवैहैं, कार्य उत्तर होवैहैं ॥ आकाशादिक प्रपंचतैं देशकाल प्रथम होवैंहैं । यह कहनां चनै नहीं । यह चार्ती
॥ ३५२ ॥ देशकालककी उत्पत्तिमैं पूर्वकाल ( भूतकाल ) कूं कारण मानें तो ता ( पूर्वकाल ) की उत्पत्तिमैं किसी कालकूं कारण मान्या चरैहिये ।
१ जो सो आपकूं उत्पत्तिमैं आपही कारण है तौ आत्माश्रय होवैगा । औ---
२ ताका अन्य पूर्वकाल औ अन्यका आप कारण कहै तौ अन्योन्याश्रय होवैगी ।
३ जो द्वितीय पूर्वकालकै कारण तृतीयपूर्वकाल औ तृतीयपूर्वकालकै कारण प्रथमपूर्वकाल कहै तौ चक्रक दोष होवैगी ।
४ जो तृतीयपूर्वकालकै कारण चतुर्थपूर्वकाल औ चतुर्थकै कारण पंचमपूर्वकाल कहै । तौ अनवस्था होवैगी । इसरीतिसैं दोषस्मृकै सद्रावतैं देशकालककी उत्पत्तिमैं पूर्वकालकूं कारण मानना अयुक्त है ॥
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नैयैयी कहीं आयेहैं । यातैं बी देशकालक्रं कारण ब्रह्म है । ब्रह्मकी कारणता देशकालमें प्रतीत होवैहै औ देशकालमें कारणता नहीं ॥ किंतु स्वमके पितापुत्रकी थांई देशकासहित आकाशादिक पंच मायाविशिष्ट परमात्मातें उत्पत्ति होवैहै ॥ औ— कोई पदार्थ किसी देशमें किंसीकालमें उपजैहै, अन्यदेशमें अन्यकालमें नहीं उपजैहै । इसरीतिसैं सारे पदार्थ प्रलयकालमें नहीं उपजैहैं । सृष्टिकालमें उपजैहैं । यातैं देशकालहीं कारणता प्रतीत बी होवैहै तो बी जा मायातैं देशकालसहित पंचकी उत्पत्ति होवैहै । ता मायातेंहीं देशकालमें कारणता औ अन्यपंचमें कार्यता प्रतीत होवैहै । आकाशादिपंचके देशकाल कारण नहीं याकेविपै
॥ ३१९ ॥ ब्रह्मकी कारणता देशकालमें प्रतीत होवैहै । इत्यादिस्थलमें अन्यथाख्यातिका अंगीकार
॥ ३१९-३२१ ॥ ऐसी शंका होवैहै:-[पूर्वपक्षी] विनाशुये पदार्थकी तौ प्रतीति होवै नहीं औ सिद्धांतमें अंगीकार नहीं । जो विनाशुयेकी प्रतीति मानैं । तौ—१ असत्ख्यातिका अंगीकार होवैगा ॥ औ २ विनाशुये वंध्यापुत्र प्रासङ्गादिकनकी प्रतीति हुयचाहिये । यातैं विनाशुयेकी प्रतीति होवै नहीं ॥ यातैं देशकालमें कारणता नहीं होवै । तौ देशकालमें सर्वपदार्थनकी कारणता मायाके बलतैं बी प्रतीत नहीं हुयचाहिये औ कारणता देशकालमें प्रतीत होवैहै । यातैं देशकाल सर्व-पंचके कारण हैं । औ— जो सिद्धांती ऐसे कहै:-सर्वपंचका
कारण ब्रह्म है । ब्रह्मकी कारणता देशकालमें प्रतीत होवैहै । कहैंतैं ?—१ जैसैं देशकालका अधिष्ठान ब्रह्म है तैसैं सर्वपंचका अधिष्ठान ब्रह्म है । देश-कालमेंही ब्रह्मकी कारणता प्रतीति होवैहै । अन्यमें नहीं । या कहनेमें कोई हेतु नहीं । यातैं अधिष्ठानब्रह्मकी कारणता देशकालमें प्रतीत होवै । तौ ब्रह्म सर्वपंचका अधिष्ठान है । यातैं सर्वपंचमें कारणता प्रतीत हुयचाहिये । किसीमें कार्यता-ऐसा मेद नहीं चाहिये ॥ २ किंचा देशकालमें कारणता नहीं है औ ब्रह्ममें कारणता है । सो ब्रह्मकी कारणता देश-कालमें प्रतीत होवैहै । या कहनेतैं अन्यथाख्यातिका अंगीकार होवैगा । कहैंतैं ?—अन्यवस्तुकी अन्यरूपतैं प्रतीतिकूं अन्यथाख्याति कहैंहैं । देशकाल कारण नहीं । यातैं कारणतैं अन्य अकारण हैं । तिनकूं अन्यरूपतैं कहिये अकारणरूपतैं प्रतीति माननेमें अन्यथाख्यातिका अंगीकार होवैगा औ सिद्धांतमें अन्यथाख्याति अंगीकार नहीं ।
जो या स्थानमें अन्यथाख्याति मानै तौ युक्तिमें अनिर्वचनीय रूपकी उत्पत्ति सिद्धांतमें मानीहै सो निष्फल होवैगी । कहैंतैं ? अन्यथाख्यातिमें दो मत हैं:— (१) एक तौ अन्यदेशमें स्थित पदार्थकी अन्यदेशमें प्रतीति अन्यथाख्याति है । जैसैं कांताकरमें स्थित रजतकी सन्मुख शुक्तिदेशमें प्रतीति अन्यथाख्याति है ।
(२) अथवा अन्यपदार्थकी अन्यरूपतैं प्रतीति अन्यथाख्याति है । जैसैं शुक्तिकीहीं रजतरूपतैं प्रतीति अन्यथाख्याति कहियेहै ॥
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ऐसैं सारे भ्रमस्थलमें अन्यथाख्यातिसैं निर्वाह संभवैहै । अनिर्वचनीय रजतादिकनकी उत्पत्तिकथन असंगत होवैगा ॥ ओ— जो सिद्धांती ऐसैं कहैं—विपयकै समा- नाकार ज्ञान होवैहै । अन्यवस्तुका अन्यरूपतें ज्ञान संभवै नाहीं । यातैं रजताकार ज्ञानीकै विपय भी अनिर्वचनीय रजत उत्पन्न होवैहै । या अहेतुसिद्धांतमैं कारणतैं अन्य जो देशकाल, तिनविपै ब्रह्मकी कारणताका ज्ञान संभवै नहीं । यातैं देशकालमैं कारणता जो प्रतीत होवैहै ताका विनाहुयेका अथवा ब्रह्ममैं स्थितका भान संभवै नहीं । किंतु देशकालमैंही कारणता है । ताका भान होवैहै ॥ इसरीतिसैं "आकाशादिक प्रपंचके कारण देशकाल नहीं" । यह कथन असंगत है ॥ ॥ ३२० ॥ [सिद्धांती:--] सो शंका बने नहीं । कहैंतें ? ब्रह्मकी कारणता देशकालमैं प्रतीत होवैहै ! जैसैं जैप्यपुष्पसंबंधी स्फटिकमैं पुष्पकी रक्तता प्रतीत होवैहै । अधिष्ठानकी सत्यता स्वप्नकालमैं मिथ्याहस्तीपर्यंतादिकनमैं प्रतीत होवैहै । तहां स्फटिकमैं अनिर्वचनीय रक्तताकी उत्पत्तिका अंगीकार नहीं । किंतु पुष्पकी रक्तता स्फटिकमैं प्रतीत होवैहै, यातैं श्येतस्फटिक- की रक्तरूपतैं प्रतीति होनतैं रक्तताके ज्ञानमैं अन्यथाख्यातिही मानीहै ।
तैसैं स्वप्नमैं मिथ्यापदार्थनिविषै सत्यता प्रतीत होवै । तहां अनिर्वचनीयसत्यता तिन पदार्थनिविषै उत्पन्न होवैहै । यह कथन तोऊ "सत्य । मिथ्या है" । इस [ व्याघातदोषवाले ] वचनकी न्यांई संभवै नहीं औ विनाहुयेकी प्रतीति होवै नहीं । किंतु स्वप्नके अधिष्ठानचैतनकी सत्यकां ॥ ३५४ ॥ जावकके पुष्प । जाहीकै किसी- देसमैं जावलीकै किंवा जासूदके पुष्प भी कहतेंहैं । मध्यापदार्थनमैं प्रतीत होवैहै । यातैं मिथ्या- पदार्थनकी सत्यसत्ततैं प्रतीति होतैं सत्यताके ज्ञानमैं अन्यथाख्यातिही मानीहै । तैसैं अधिष्ठानब्रह्मकी कारणता देशकालमैं अन्यथा- ख्यातिसैं प्रतीत होवैहै । और— ॥ १२१ ॥ जो ऐसैं कहैं—इतैं स्थान- मैं अन्यथाख्याति मानैं तो सारे भ्रममैं अन्यथाख्यातिही माननी चाहिये ॥ सो शंका बने नाहीं । कहैंतें ? शुक्ति- रजतादिकनमैं अन्यथाख्याति माननैंमैं यह दोष कहांहैं:-विपयतैं विलक्षण ज्ञान घनै नहीं ॥ औ- जहां स्फटिकमैं रक्तताका ज्ञान होवै तहां रक्तपुष्पकै स्फटिकतैं संबंध है । यातैं स्फटिक- संवंधीपुष्पकी रक्तता स्फटिकमैं प्रतीत होवैहै । कहैंतैं ? अंतःकरणकी वृत्ति जब रक्तपुष्पाकार होवै, नाहीं ह्रस्व, निप्पय रक्तपुष्पसंबंधी स्फटिक है । यातैं पुष्पकी रक्तता स्फटिकमैं प्रतीत होवैहै ॥ औ [तैसैं] शुक्तिका तोऊ रजतरूपतैं ज्ञान संभवै नहीं । कहैंतें ? शुक्तिदेशमैं अनिर्वचनीय तथा व्यावहारिकरजत तोऊ अन्यमतमैं है नहीं । किंतु शुक्ति है । ता शुक्तिकै संबंधहैं शुक्तिके समानाकारही अंतःकरणकी वृत्ति होवैगी ! रजताकार अंतःकरणकी वृत्ति होवै नहीं । यातैं अविद्याका परिणाम । चैतनका विवर्त अनिर्व- चनीयरजत औ ताकां ज्ञान । दोनों उत्पन्न होवैंहैं । औ—
तैसैं स्फटिकमैं रक्तता प्रतीत होवै । तहां वृत्तिका संवंध स्फटिक औ रक्तपुष्प दोनोंसैं होवैहै । रक्तपुष्पकै संबंधतैं रक्ताकारवृत्ति होवैहै । ता वृत्तिकै स्फटिकतैं संबंधी ताहैं रक्ताकारदृष्टि होवैहै । ता दृष्टिकै स्फटिकतैंही संबंध है औ 'स्फटिकमैं रक्तताफी छाया है । यातैं पुष्पका धर्म रक्तता स्फटिकमैं ताही दृष्टिका विषय है ॥ यह पुष्प लालरंगवाला होवैहै ।
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इसरीतिसैं ९ जहां दोपदार्थनका संबंध है तहां एकके धर्मकी दूसरमें प्रतीति संबवै है। तहां अन्यथाख्यातिही संबवैहै २ जहां दोनों पदार्थनका संबंध नहीं तहां अन्यथाख्याति नहीं। किंतु अनिर्वच-नीयख्याति है॥ जैसे पुष्पसंबंधी स्फटिकमें पुष्पकी रक्तता प्रतीत होवैहै तैसैं स्वप्नके हस्तीपरवतादिकनका वी अधिष्ठानचेतनतैं संबंध है। यातैं चेतनका धर्म सत्यता वी चेतनसंबंधी हस्तीपरवतादिकनमें प्रतीत होवैहै। सो अन्यथाख्याति है॥ तैसैं अधिष्ठानचेतनका धर्म कारणता अधिष्ठान-चेतनसंबंधी देशकालमें प्रतीत होवैहै॥३२२॥ जाग्रतपंच सामग्रीविना होवैहै। यातैं स्वप्नसमान मिथ्या है॥ और जो पूर्व शंका करी:-“अधिष्ठान-चेतनका संबंध सर्वग्रपंचतैं है। जो संबंधीका धर्म अन्यथाख्यातिसैं अन्यमैं प्रतीत होवै तो चैतनकी कारणता सर्वग्रपंचमैं प्रतीत हुईचाहिये”। सो शंका बनै नहीं। कहैं? ९ जैसे स्वप्नमैं दो शरीर उत्पन्न होवैहैं। (९) एकशरीर पितारूप प्रतीत होवैहै। औ (२) दूसरा शरीर पुत्ररूप प्रतीत होवैहै॥ तहां दोनों शरीरनका स्वप्नके अधिष्ठान-चेतनतैं संबंध वी है। तथापि पिताशरीरमैं अधिष्ठानचेतनकी कारणता प्रतीत होवैहै औ पुत्र-शरीरमैं कारणता प्रतीत होवै नहीं। किंतु पिताजन्य पुत्र है। इसरीतिसैं पुत्रशरीरमैं कार्यता प्रतीत होवैहै। इसरीतिसैं यद्यपि अधिष्ठान-चेतनसैं संबंध तो सर्वका है। तथापि देश-कालमैं चेतनधर्म कारणताकी प्रतीति होवैहै औरनमैं कार्यताकी प्रतीति होवैहै॥
२ अथवा अधिष्ठानचेतन असंग है सो किसेका परमार्थतैं कारण नहीं। मायामैं आभास यद्यपि कारण है। तथापि आभासका स्वरूप मिथ्या होवैहै॥ जो आपही मिथ्या होवै सो दुसरेका कारण वनै नहीं। यातैं परमात्मारूपै प्रपंचकी कारणता होवै। तो ताकी देशकालमैं अमतैं प्रतीति संबवै। सो परमात्मा-विपै कारणता है नहीं। परमात्मा कारणतादिक धर्मरहित असंग है, ताकी कारणता देश-कालमैं प्रतीत होवैहै, यह कहनां संबवै नहीं। किंतु मायाकृत अनिर्वचनीयह देशकाल अनिर्वच-नीय कारणतावाले होवैहैं॥ औ-परमार्थसैं देशकाल कारण नहीं। जैसे पुत्रहीन पुत्र स्वप्नमैं पुत्रपौत्र दोनोंवांलूं देखै। तहां पुत्रपौत्रशरीर अनिर्वचनीय होवैहै औ पुत्रशरीरमैं पौत्रशरीरकी अनिर्वचनीयह-कारणता होवैहै। तहां परमार्थसैं पुत्रशरीर औ पौत्रशरीरका परस्परकार्यकारणभाव नहीं होवैहै। तैसैं अनिर्वचनीयहकारण देशकाल प्रतीत होवै-है। परमार्थसैं देशकाल औ 'आकांशादिक प्रपंचका कार्यकरणभाव है नहीं॥ इसरीतिसैं देशकालसामग्रीविना जाग्रतसंपंच-की उत्पत्ति होवैहै। यातैं स्वप्नकी न्याईं जाग्रत वी मिथ्या है॥ और— जैसे स्वप्नके स्थूलप्रादिक स्वप्नमैंही सुख-दुखके हेतु हैं। जाग्रतमें तिनका अभाव है। तैसैं जाग्रतके पदार्थनका स्वप्नमैं अभाव होवैहै। दोनों सम हैं॥ और—
॥३२४॥ जाग्रतके पदार्थ ज्ञानके साथिही उत्पन्न होवैहैं। यातैं दूसरी-जाग्रतमैं रहे नहीं॥३२३-३२४॥ जो ऐसैं कहै:-‘जाग्रतसैं स्वप्न होयके फिरी जायतन होवै, तहां पहली जाग्रतके जो
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पञ्चस्तरङ्ग: ६ ॥ जाग्रत्प्रपञ्चका मिथ्याज्ञान ॥
पदार्थ हैं सोई स्वप्नव्यवहित दूसरे जाग्रतमें रहहें औ प्रथमस्वप्नके पदार्थ दूसरे स्वप्नमें नहीं रहहें । यातैं स्वप्नके पदार्थंतें जाग्रतके पदार्थ विलक्षण हैं ।
सो शंका भी सिद्धांतके अज्ञानी मूर्खनकी दृष्टि हैं । कहहिं ' ऐसा मूर्खनको दीखत हैं । संसारमयाह अनादि हैं, तामैं जीववनहूं जाग्रत स्वप्नसुषुप्ति होवेंहैं ।
१ जाग्रतकालमें स्वप्नसुषुप्ति नष्ट होवेंहैं । औ- २ स्वप्नकालमें जाग्रत्सुषुप्ति नष्ट होवेंहैं । ३ नैसैं सुषुप्तिकालमें जाग्रत्स्वप्न नष्ट होवेंहैं ।
परंतु ' स्वप्न सुषुप्ति होवें तच् जाग्रतकालके स्त्रीपुत्रपगुधनादिक दूरी होवें नहीं किंतु बने रहहें । तिनकां ज्ञानहीं दूरी होवेंहैं । फिर जाग्रत होवें तच् प्रथमजाग्रतके विद्यमानपदार्थेन का ज्ञान होवेंहैं ' यह अज्ञानी मूर्खनकी दृष्टि हैं ।
॥ ३२४ ॥ सिद्धांत मत है :-
१ सारे पदार्थ चेतनका विचर्ने हैं । २ अविध्याके परिणाम हैं । यांतें मुक्तिरजतकी न्यायें . जिसकालमें जो पदार्थ प्रतीत होवें तिसकालमें अधिष्ठानचेतन-आश्रितअविध्याका द्विविधपरिणाम होवेंहैं ।
१ अविध्याके तमोगुणांशका घटादिक-विपयरूप परिणाम होवेंहैं । औ- २ अविध्याके सत्चगुणका ज्ञानरूप परिणाम होवेंहैं ।
घटादि चेतनकूं ज्ञान कहहैं औ साक्षी कहहैं ।
१ वृत्तिकूं चेतनके आभासग्रहणकी योग्यता होनतें वृत्तितचिछन्नसचेतनकूं ज्ञान कहहैं औ साक्षी कहहैं ।
२ घटादिक विपयकूं आभासग्रहणकूं योग्यता ता नहीं । इसकारणतें विपयतचिछन्न-चेतन ज्ञान नहीं औ साक्षी वी नहीं ।
इसरीतिसैं जाग्रतके पदार्थ औ तिनकां ज्ञान दोनों साथिही उत्पन्न होवेंहैं औ साथिही नष्ट होवेंहैं । यह वेदका गूढसिद्धांत है ।
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॥*सिद्धांत:-जागृतस्वप्नकी तुल्यता ॥ ३२५-३२८॥ [ विचारसागरे
जाग्रतके पदार्थ दूसरी .जाग्रतमैं रहैंहैं । यह कहनां संभवै नहीं ॥
॥३२५॥ जाग्रतके पदार्थनका परस्परकार्यकारणभाव नहीं
कारणतें होवैहै । साक्षात्अविद्याके परिणाम हैं नहीं । जो साक्षात्अविद्याके परिणाम होंवें . तो आकांक्षा-
दिक क्रमतें पंचभूतनकी उत्पत्ति औ पंचीकरण तिनसैं त्रिभांडकी उत्पत्ति ऋतिमैं कहीदै . सो, असंगत होवैगी । यातैं ईश्वरसृष्टि जाग्रतके पदार्थ अपने अपने उपादानके परिणाम है ।
अविद्याके साक्षात् परिणाम नहीं ॥
१ स्वप्नके तौ सारे पदार्थ अविद्याके परि-णाम हैं । तिनका एकअविद्या उपादान होवैहैं तिन पदार्थनकी औ तिनके ज्ञानकी एकअविद्यासैं एककाळमै उत्पत्ति संभवैहै ।
२ जाग्रतके पदार्थ . मिथ्याभिन्न कारणसैं उत्पन्न होवैंहैं । कार्यतैं .पहली कारण होवैहै औ कारणमै कार्येका .लय . होवैहै । यातैं घटकी उत्पत्तिसैं प्रथम औ . घटनाशतैं आगे . मृत्पिंड रहैहैं ॥
इसरीतिसैं कोई पदार्थ अल्पकाल . स्थिर औ कोई अधिककाल स्थिर . कार्यकारण .हैं ।
तैसैं स्वप्नके नहीं ॥॥३२६॥
सो शंका वने नाहीं । कहैंतैं ? जाग्रतके पदार्थनकी . न्यांई . स्वप्नके पदार्थन-विषैं . बी . कार्यकारणभाव प्रतीत . होवैहै॥ जैसे
किसीकूं ऐसां स्वप्न होवै:- मेरी गउके . वत्स हुवा है अथवा मेरीं गउके .पुत्र हुवा है ॥ तहां गउ औ वत्स . औ पुत्र-
विषैं कार्यता औ .अल्पकालस्थिरता . प्रतीत होवैहै . औ सारे समकाल हैं । कोई किसीकां कारण नहीं । किंतु गउ वत्स . श्रीआदिकनका अविद्याही . उपादान है ।
तैसैं जाग्रतविषैं . बी . कोई वृक्षके फल, . इनके .प्रत्यभिज्ञाज्ञानकी . न्यांई .अमरूप है । यामैं मुख्यवृंद्यांत .सम्प है । सो ऊपर ग्रंथकारनेही लिख्याहै ॥
जैसे 'निद्रातें उठे पुरुषकूं होवैहै । सो ज्ञान नदी
प्रवाह, दीपशिखा, आकाशदागत तारोंकी स्थिति' औ
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अधिकृकालस्थायिकारणस्वरूपतें कोई न्यूनक-लस्थायिकार्यलुप्तं स्वप्नकी न्याईं प्रतीत होवेंहैं। कोई किरीका परस्पर कार्यकारण नहीं । किंतु साक्षात् अविद्याके कार्य हैं । और-
॥ ३२७ ॥ श्रुतितें जो कमतें सृष्टि कहीहैं तहाँ श्रष्टिप्रतिपादनमैँ श्रुतिकी अभिप्राय नहीं । किंतु अद्धैतचोधनर्मे अभिप्राय है ॥
सारे पदार्थ परमात्मासें उपजेंहैं, यातें ताके विवर्तेंहैं । जो जाका विवर्ते होवें सो ताकाही स्वरूप होवेंहैं । यातें सारा नामरूप ब्रह्मतें पृथक् नहीं । प्रवाही है । इसअर्थे जो ध्यान करनेहैं सृष्टिका औरप्रयोजन नहीं ।
तहाँ कमकता जो कथन हैं सो स्वप्नदृष्टिं विपरीतदृष्टंतें लयंचितनके निमित्त है । ताका वि अद्धैतशोधही प्रयोजन है । यातें कमकथनमें वि अभिप्राय नहीं ॥
सृष्टिमें कम नहीं हैं, किंतु सारे पदार्थ एक अविद्यासें उपजेंहैं । तिनका परस्परकार्यकारण-भाव औ पूर्वोत्तरभाव औ अविद्याकृतस्वप्नकी न्याईं मिथ्या प्रतीत होवेंहैं ॥ औ-
श्रुतिनें तिनकी आपसमैं कार्यकारणता औ पूर्वोत्तरता कहीहैं । सो लयंचितनके निमित्त कहीहैं । ध्यानमें यह नियम नहीं:- जैसा स्वरूप होवें तैसाही ध्यान होवेंहै ॥
यातें जाग्रतके पदार्थनका आपसमैं कार्य-कारणभाव नहीं । किंतु-
॥ ३२८ ॥ दृष्टिसृष्टिवादका अंगीकार ॥ सारे पदार्थ साक्षात् अविद्याके कार्य हैं । मुक्तिरजतकी न्याईं वा स्वप्नकी न्याईं अविद्याकी दृष्टिउपहित साक्षींतें तिनका प्राकट्य होवेंहै । यातें सारे पदार्थ साक्षीभास्य हैं ॥ औ-
॥ ३५६ ॥ दृष्टि कहीये अविद्याकी दृष्टिरूप ज्ञान, ताकें समसमयमेंही सृष्टि कहीये मृपंचकी मि. शा. २६
ज्ञानाकार औ ज्ञेयाकार अविद्याका परिणाम एकही कालमें उपजेंहैं । साथही नष्ट होवेंहैं । यांतें जब पदार्थकी प्रतीति होवें तभी प्रतीतिका विपय पदार्थ होवेंहैं । अन्यकालमें नहीं होवेंहैं । याहीकूं दृष्टिसृष्टिवाद कहहैं ॥
या पक्षमें पदार्थकी अज्ञातसत्ता नहीं । ज्ञात-सत्ता है । अद्धैतवादमें यह सिद्धांतपक्ष है । या पक्षमें दो सत्ता हैं । तीनि नहीं । कहहैं? अनात्म-पदार्थ सारे स्वप्नकी न्याईं प्रातिभासिक हैं ।
प्रतीतिकालमें भिन्नकालमें अनात्माकी सत्ता नहीं, यांतें तीसरी व्यावहारिक सत्ता नहीं ॥
या पक्षमें सारे अनात्मपदार्थ साक्षीभास्य हैं । प्रमाणताप्रमाणका विपय कोई वि नहीं । कहहैं? अन्तःकरण औ इंद्रिय तथा घटादिक सारी-त्रिपुटी औ ज्ञान, स्वप्नकी न्याईं एककालमें उपजहैं । तिनका विपयविपयिभाव चै नाहीं ।
जो घटादिक विपय औ नेत्रादिक इंद्रिय । तैसें अन्तःकरण । ये ज्ञानतें प्रथम होवें । तो नेत्रादि-द्वारा अन्तःकरणकी दृष्टिरूप ज्ञान प्रमाणजन्य होवें सो अन्तःकरण इंद्रिय औ विपय तीनूं ज्ञानके पूर्वकालमें हैं नहीं । किंतु ज्ञानसमकालही स्वप्नकी न्याईं त्रिपुटी उपजहै । यांतें त्रिपुटी-जन्य ज्ञान कोई वि नहीं ।
तथापि ज्ञानविपै जाग्रतके पदार्थ साक्षीभास्य हैं ॥ प्रमाणजन्य ज्ञानके विपय नहीं । यांतें वि स्वप्नके समान मिथ्या हैं किंच-
१ जाग्रतमें कितनै पदार्थनकूं मिथ्यारूप-कारिके जानहै ।
२ औरनकूं सतरूपकारिके ऐसें जानहै:-(९) अनादिकालके पदार्थ हैं, तिनमें कोई
उत्पत्ति, ताका जो कथन सो दृष्टिसृष्टिवाद कहिये है । याहीकूं अजातवाद वि कहतेंहैं ॥
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२०२ ॥ अनादिकालका बंध नहीं तौ श्रवणादिक निष्फल होवैंगे, इसका उत्तर ॥ [ विचारसागर
नष्ट होवैहैं और तिसके समान उत्पन्न होवैहैं । ऐसेँ प्रपंचधाराका उन्छेद कदै होवै नहीं ॥ (२) जाकूं ज्ञान होवैहै ताकूं प्रपंचकी प्रतीति होवै नहीं । औरनकूं प्रपंचकी प्रतीति होवैहै । (३) ता ज्ञानीके साधन वेदगुरु हैं । तिनतैं परमसत्यकों प्राप्ति होवैहै । ऐसी प्रतीति जाग्रतमैं होवैहै । तहाँ— १ किसी पदार्थमैं मिथ्यापना । २ किसीमैं नाश । ३ किसीमैं उत्पत्ति । ४ वेदगुरु तैं परमपुरुषार्थकी प्राप्ति । ये सारी अविद्याकृत स्वप्नकी न्याईं मिथ्या हैं ॥
वासिष्ठमैं ऐसे अनंतवितिहास कहे हैं । १ क्षणमात्रके स्वप्नमैं बहुकाल प्रतीत होवैहै । औ- २ जाग्रतकी न्याईं शायिपदार्थ प्रतीत होवैहैं औ- ३ तिनतैं बहुकालभोग होवैहै ॥ यातैं जाग्रतपदार्थकी स्वप्नतैं किंचित्चितविलक्षणता नहीं । किंतु आत्मभिन्न सर्व मिथ्या है ॥
॥ ३५७ ॥ यह दृष्टांतविद्याका निष्कर्ष ( निचोड़ ) है ॥ या पक्षका प्रतिपादन दृढद्वारेण्यक उपनिषद्के न्यायद्यानमैं भाष्यकार औ वार्तिककारनै कियोहै औ शांकरभाष्य शर भामदगिरिकृत न्यायाद्यान-सहित मांडूक्यउपनिषद्की कारिकामैं कियोहै । ताकी वेदांतदीपिकोंनासक भाषाटीकाविषै हमनै स्पष्ट लिखदै जो वासिष्ठग्रंथमैं तथा वेदांतसुक्तावलीमैं तथा मुक्तिप्रभाकरके षट्संप्रकरणमैं तथा शांमपुराणमैं औ
॥३२९॥ प्रश्न:—स्वपनकी न्याई स्वल्पकालस्थायी संसार होवै तो अनादिकालका बंध नहीं होवैगा ॥ बंध-नित्यदृष्टिरूप मोक्षके निमित्त श्रवणादिक साधन निष्फल होवैंगे ॥ शिष्य उवाच ॥ ॥ दोहा ॥ लाख हजांन कलपको, यह उपज्यो संसार ॥ तामैं ज्ञानी मुक्त है, बंधे अज्ञ हजांर ॥ १३ ॥ झठो स्वप्नसमान जो, छन घतिका नहै जाम ॥ बद्ध कौन को मुक्त है, श्रवणादिक किह काम ॥ १३ ॥
टीका:— "ईशरमृष्टि अनंतकल्पतैं अनादि है, तामैं ज्ञानी मुक्तें होवैहै । अज्ञानकूं बंध रहैहै । जो स्वप्नसमान होवै तौ स्वप्न एकक्षण घड़ी तथा प्रहर होवैहै । तैसैं संसार भी क्षण अथवा अद्धैतसिद्ध्यादिकआकरग्रंथनमैं बी चाका प्रतिपादन है । जाकूं विशेष जिज्ञांसा होवै सो तिन ग्रंथनमैं देखै ॥ परंतु " शक ( गृहकै कोण ) 'विषै जो मृदु मिलै तौ पर्वतविषै किसअर्थ जाना ? " इस न्यायकरि जिज्ञासुकूं याधी ग्रंथविषै या दृष्टिसृष्टिवादरुप उक्तमसिद्धांतका ज्ञान होवै, ताकूं अभय बहुतग्रंथनकै देखनेका बुद्धिके विनोदबिना औरप्रयोजन नहीं ॥
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घडी चा प्रहरकाल चा किंचितअधिककाल होवैगा । १ स्वमकी न्याई स्वपकलस्थायी संसार होवै तो अनादिकालका बंध नहीं होवै । २ बंधनिवृत्तिरूप मोक्षके निमित्त श्रवणादिकसाधन निष्फल होवैंगे । [ गुरु:- ] यथापि पूर्वउक्तसिद्धांतमैं- १ बंधमोक्ष वेदगुरु अंगीकार नहीं । २ किंतु चेतन नित्यमुक्त है । ३ अविद्याके परिणा्म चेतनमैं नानांचिंर्तें होवैहैं, तातैं आत्मरुपकी किंचित्मात्र वी हानि नहीं ॥ ४ आत्मा सदा असंग एकरस है । ५ आजतोडी कोई मुक्त हुवा नहीं । आगें होवै नहीं । किंतु चेतन नित्यमुक्त है ! ६ अविद्या औ. ताके परिणा्मका चेतनसैं किसीकालमैं संवंध नहीं, यातैं बंध औ वेदगुरु श्रवणादिक औ समाधि तथा मोक्ष इनकी प्रतीति वी स्वमकी न्याई अविद्याजन्य है । यातैं मिथ्या है ॥ ७ इनविपै बहुकालस्थायीका वी अविद्याजन्य है ॥
॥ ३५८ ॥ इहाँ यह अभिप्राय है:- इस दृष्टिस्थितिादमैं एकजीवके अंगीकारतैं अन्यजीवरुप गुरु किवा शिष्यका अंगीकार नहीं । किंतु स्वप्नगत एकमुख्यजीवतैं मिल अन्यजीवभावकी न्याई अन्यजीवाभास प्रतीत होतहै । तैसैही आभासरुप गुरू किवा शिष्य है, तिस गुरुदृष्टी ईश्वरभावपूर्वैक भक्ति करीतहै सो वी स्वप्नगुरुके भ्रतिकी न्याई मिथ्या ( प्रातिभासिक सत्तावाली ) है ॥ या पक्षमैं जीव-ईश्वरादिकष्टपदार्थे स्वरुपसैं अनादि मानैहैं । तिनके मध्य- १ न्रह्मकी परमार्थसत्ता है ॥
तथापि या सिद्धांतकूं नहीं जानिके स्थूलद्रष्टिका प्रश्न है ॥ (अग्रंधदेव [ इच्छारहित आत्मदेव ]-का स्वप्न ॥ ३३०-४५२ ॥) ( ॥ गतप्रश्नका उत्तर ॥ ३३०--३३८ ॥)
॥ ३३० ॥ अग्रंधदेवकूं स्वमकी प्रतीति
॥ ३३०--३३९ ॥
॥ गुरुवाक्य ॥
॥ दोहा ॥ अग्रंधदेवकूं स्वप्नमैं, भ्रम उपज्यो जिहि रीति । सिष तोकूं यह उपजी, बंधमोक्ष प्रतीति ॥ १२ ॥ टीका:-हे शिष्य ! जैसैं निद्रादोषतैं स्वममैं अध्यापक, अध्ययन, वेदशास्त्र, पुराण, धर्मशास्त्र, अध्ययनकर्त्ता, कर्म औ तिनका फल प्रतीत होतहै औ तिन सर्वपदार्थनमैं सत्यताकी आं्रति होवैहैं । २ ब्रह्मसैं भिन्न प्रपंचकी व्यावहारिकसच्चा है ॥ चौ- ३ अन्य प्रवाहरुपसैं अनादि सकळंककार्यप्रपंचकी प्रातिभासिक सत्ता है । यातैं उत्तरउत्तरअध्यासके कारण पूर्वपूर्व अध्यासके ज्ञानजन्य संस्कारकी आश्रयभूत अविद्याके विधमान होनेतैं औ ईश्वरके त्रिवामान होनेतैं क्षणिकविज्ञानवादकी किवा अनेश्वरवादकी प्रातिादिक दोष नहीं । यह अर्थ अद्दैतसिद्धिमैं मदहुसूदनस्वामीनै लिख्योाहै ॥ यह वात्तो जीवके प्रसंगसैं कही ॥
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३०८ अनादिकालका वंध नहीं तौ अवणादिक निष्फल होवेंगें, इसका उत्तर ॥ [ विचारसागर
तथापि सो स्वप्नके सारे पदार्थ मिथ्या हैं । तैसे जाग्रतके सारे पदार्थ मिथ्या हैं । तिनविषै सत्यताप्रतीति भ्रम है । दोहेंमें बंधमोक्षग्रहणतैं सर्व अनात्माका ग्रहण है जैसे तेरेऊं हम गुरु प्रतीत होवेंहैं, वेदअर्थका बंधनिषेधक उपदेश करैहैं, सो तेरेऊं मिथ्याप्रतीति है ॥
जैसे अगृध्देवकेऊं स्वप्नमें मिथ्याप्रतीतिके विषय गुरुबेदादिक अनिर्वचनीय उपजैहैं, तैसे तेरी प्रतीतिकेऊं मेरेऐं आदिलेके सारे अनिर्वचनेय मिथ्या हैं ॥
॥ ३२९ ॥ सो अगृध्देवका ऐसा स्वम हुआहै:-एक अगृध्द नाम देवता अनादिकालका निद्रामें सोवताहुवा स्वमकूं देखताभया । तास्वमें तिस पुरुपकूं ऐसी प्रतीति हुई जो:-१ मैं चंडाल हूं । २ महोदरूंखा हूं । ३ अस्विय मज्जा रधिर त्वचा मांस मेद वीर्यरूप सप्तधातूंसे मेरा मुख भन्न्याहै । औ-४ महाघोर भयंकर सर्प हसती आदिकसैं युक्त जो वैं ताकेविषै मैं भ्रमण करूंहूं । सो देवता भ्रमण करताहुवा ता वनमें अनंतस्थान देखताहुवा ॥
३२९ कहूं नाना भयंकर प्राणी सन्मुख मक्षण करनेऊं धावन करैहैं । औ-
२ कहूं रोधिरसैं भरे कुंड हैं । तिन्हें पड़े हाहाकारशब्द करैहैं । औ-३ कहूं लोहेके तस्तंभ हैं तिन्हेसैं बंधे पुरुप रोवैहैं । औ-४ कहूं तसवायुक्त मार्ग होइके नयपादपुरुष जावैहैं औ तिन्द पुरुपनकूं राजमट लोहमय डंडनसै ताडना करैहैं ।
इसीतिसैं-१ नाना जो भयंकरस्थान हैं तिन्हकूं सो देवता देखताहुवा । औ-२ कदाचित आप भी अपराधकारिके स्वप्नमें तिन्ह दुःखनकूं प्राप्त होताभया । औ-३ कहूं दिव्यस्थान देखताहुवा । १ तिन्ह स्थानमें उत्तमदेव विराजैहैं । २ तिन्ह देवनके दिव्य भोग हैं । ३ अमृतके तीनसागरमें तिन्हकै रतिरहैहै । ४ क्षुधातृषाकी बाधा तिन्ह देवनकूं होवै नहीं । औ-५ मलमूत्ररहित जिनका प्रकारमान शरीर है । औ-६ उत्तमविमानमें स्थित होइके कोई देव रमण करैहैं । सो विमान ता देवकी इच्छाके अनुसार गमन करैहै । औ-७ कहूं रंभा ऊर्वसीसैं आदिलेके अप्सरा नृत्य का आरोप कियोहै । इस गोप्यअर्थकी प्रगटता हम आगे बी टिप्पणविषै प्रसंगसैं जहांतहां करैगें’॥
॥ ३६० ॥ संसारकूं ॥
॥ ३६१ ॥ देहधायक अभिमानी जीव हूं ॥
॥ ३६२ ॥ संसार ( जगत् )
॥ ३६३ ॥ इहसैं नरकनका वर्णन है ॥
॥ ३६४ ॥ पितृ ( पूय ) ॥
॥ ३६५ ॥ इहसैं स्वर्गलोकका वर्णन है_
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करैहैं तिन्हके संपूर्णांग दोपरहित हैं । औ संपूर्ण ३४ श्री गुणयुक्त हैं ॥
< उत्तमसुगंध तिन्हके शरीरसैं कामकी प्रकाशक आवैहैं औ कहूं तिन्हसैं देव रमण करैहैं । औ—
९ कदाचित् आप ³५ वीं देवभक्तिकूं प्राप्त होयके तिन्हैं बहुत्रकाळ रमण करैहैं । औ—
१० कदाचित् तिन्ह अप्सरानसैं दिव्यस्थानमैं रमण करताहुवा अ³⁶स्मात् संधिरमलपूरीत जो कुंड हैं । तिन्हविपै मज्जन करैहैं औ एकस्थानमैं सर्वका ³७ अधिपतिपुरुप स्थित है ताके आज्ञाकारी अ³८ अनुचर ताके आगे स्थित हैं !
१ कितनै अ³९ उपनकूं सो अधिपति औ ताके अनुचर सौम्यरूप प्रतीत होवैहैं । औ
२ कितनै ४० उपनकूं महा⁴¹भयंकररूप प्रतीत होवैहैं । औ
३ ता वनमैं स्थित पुरुषपनकूं कर्मके अनुसार फल देवैहैं ॥
इसरीतिसैं अग्रुध नाम देवता स्वमकालमैं नाना जो स्थान है तिन्हकूं देखताहुवा । औ
१ कहूं अन्यस्थानमैं ब्रात्रण वेदकी ध्वनि करैहैं । औ—
२ कहूं यज्ञशालामैं उत्तमकर्म करैहैं । औ—
३ कहूं उत्तमनदी वैहै । तिन्हमैं पुण्यके निमिच्च लोक स्वान करैहैं । औ—
४ कहूं ज्ञानवान् आचार्य शिष्यनकूं ब्रह्मविद्याका उपदेश करैहै । ता ब्रह्मविद्याकूं प्राप्त होयके वा वनसैं निकसि जावैहै ॥
इसरीतिसैं स्वभावपै अगृ४२धनाम देवता क्षणमात्रमैं नाना⁴³आश्रयरूप पदार्थ ता वनमैं देखताहुवा । ताकूं ऐसी प्रतीति स्वममैं हुई जो:-
१ मैं अनंतकालका या वनमैं स्थित हूं ।
२ या वनका कदी उच्छेद होवै नहीं ॥
३ (१) कदाचित् वाँगवान् चारि मुखनसैं नाँनआवीज निकासिके वनकी उत्पत्ति करैहै । औ—
(२) जैलसेचनसैं पालन करैहै । औ—
(३) कदाचित् घोरहास्यकरिके मुखसैं और तिन्हिके वचनकै कहैहै ॥
४ वनकी उत्पतिके संगि मेरी उत्पत्ति होवैहै औ वनके दाहसंगि मेरा दाह होवैहै । औ—
५ सर्ववनका दाहकरिके सो वागवान् एकही रहैहै ।
६ ताके शरीरमैं वनके बीज रहैहैं ॥
यह प्रतीति स्वममैं ताकै अगृ४४धदेवताकूं स्वभहीवपै हुई ॥
|| ३७२ || पापपुंजोंकू ।
|| ३७३ || इहाँसैं मृत्यु⁴५लोक [ गत भरतखंड ] का वर्णन है ।
|| ३७४ || महाविष्णुशिवरूपसैं जगत्की उत्पत्ति पालन खौं संहारका कर्त्ता ईश्वर ।
|| ३७५ || जीवनके परिपाक मये ⁴⁶ श्रद्धष्ट ।
|| ३७६ || कर्मके अनुसार सुखदुःखके अनुभव-रूप भोगके दैनैसैं ।
|| ३७७ || प्रलय ( संहार ) ।
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२०६ ॥ अनादिकालका बंध नहीं तौ श्रवणादिक निष्फल होवेंगें, इसका उत्तर ॥ [ विचारसागर
॥ ३३२ ॥ अगृधदेवका स्वप्नमें गुरुसैं मिलाप ॥
तब वारंवार अपना जन्ममरण सुनिके ता अगृधदेवनैं विचार किया जैं:—
१ किसी प्रकारसैं वनके चाहरि निकसी जाऊं । औ—
१ वनके चाहरि नहीं वी निकसूं तौ वी चांडालभाव मेरा दूरी होयजावै औ देवभाव सदा चन्या रहै ॥
३ सो और तौ कोई उपाय वनतैं निकसनेका है नहीं । ऋषिविद्याके उपदेश करनेवाले आचार्य अपनैं शिष्यनकूं वनके चाहरि निकासैंहैं ॥
यह विचारिके आचार्यनैं स्वप्नकालमेंही सो अगृधदेवता प्राप्तहुवा । सो विधिपूर्वक प्राप्तहुवा जो शिष्य ताकूं आचार्य देववाणीरूप मिथ्याग्रंथ उपदेश करताहुवा ॥
॥३३३॥ मिथ्याआचार्यकै मिथ्याशिष्यकूं मिथ्यासंस्कृतग्रंथसैं उपदेश ॥ ग्रंथके मंगलाचरण ॥ ३३३—३३८ ॥
संस्कृतग्रंथ जों मिथ्याआचार्यनैं मिथ्याशिष्यकूं उपदेश किया ता ग्रंथहूं आपाकरिके लिखहै ॥
संस्कृतग्रंथके आपाकरनैं मंगल करैंहैं । कहैंहैं:
१ मंगल करनेतैं जो ग्रंथकी समासिके प्रतिवंधकविघ्न हैं तिन्हका नाश होवैहै । विघ्न नाम पापका है । पापतैं शुभकारिकी समासि होवै नहीं । ता पापका मंगलतैं नाश होवैहै ॥ औ—
२ जो पापरहित होवै सो वी ग्रंथके आरंभमैं मंगल अवश्य करै । कहैंहैं ? जो ग्रंथआरंभमैं मंगल नहीं कियाहोवै । तौ ग्रंथकर्त्तीचैपुस्तकनकूं नास्तिकप्रांति होयकै ग्रंथमैं प्रवृत्ति होवै नहीं ॥
सो मंगल तीनि प्रकारका है:—एक वस्तुनिर्देशरूप है, औ दूसरा नमस्काररूप है, औ तीसरा आशीर्वादरूप है ।
सगुण अथवा निर्गुण जो परमात्मा सो वस्तु कहियेहै, ताके कीर्तनका नाम वस्तुनिर्देश कहियेहै ॥
अपना अथवा शिष्यनका जो वांछितवस्तु, ताके प्रार्थनका नाम आशीर्वादरूप मंगल कहियेहै । सो अपनै वांछितका प्रार्थन चतुर्थदोहैं में स्पष्ट है, शिष्यकै एकै प्रार्थन पंचमदोहैं में स्पष्ट है ॥
॥ ३३४ ॥ गणेश औ देवोंकूं इश्वरता पुराणमैं प्रसिद्ध है । यातैं अनईश्वरका चिंतन नहीं । औ पुराणमैं गणेशका जो जन्म है सो जीवकी न्याईं कर्मेका फल नहीं । किंतु रामकृष्णादिकनकी न्याईं भक्तजनोंके अनुग्रहवास्तै परमात्माकाही आविर्भाव होवैहै । यह व्यासभगवानका परमअभिप्राय है ॥
या स्थानमैं यह रहस्य है:—परमार्थदृष्टिसैं जीव वी परमात्मासैं मिल् नहीं । परंतु जन्ममरणादिक वंधक आत्मावैै जो अध्यास सो जीवका जीवपन है । सो जन्मादिकबंध गणेशादिकनकूं जन्ममैं प्रतीत होवै नहीं । यातैं जीव नहीं । इसरीतिसैं गणेशादिकनूं ईश्वरता है । यातैं ग्रंथके आरंभमैं तिन्हका चिंतन योग्य है ॥
॥३७८ ॥ चांडालभाव कहिये जीवभाव औ देवभाव कहिये ज्ञानीभाव ॥
॥ ३७९ ॥ यहां संस्कृतग्रंथके कथनकरि कोऊ—
एक अगृधदेवके दृष्टांतकरि युक्त संस्कृतग्रंथका ग्रहण नहीं । किंतु इस ग्रंथके मूलरूप अनेक संस्कृतग्रंथनका ग्रहण है ॥
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नानारूप ईश्वरका जो कथन है, सो सर्वत्र ईश्वरता चोतन करनेवास्ते है औ ईश्वरभक्ति औ गुरुभक्ति विधाकी प्राप्तिका मुख्यसाधन है । इसअर्थकूं चो चोतन करनेवास्ते है ॥ ३३५ ॥ अथ निर्गुणवस्तुनिर्देशरूप मंगल ॥
॥ दोहा ॥ जा विभु सत्य प्रकाशतैं, परकासत रवि चंद ॥ सो साछी मैं बुद्धिकौं, शुद्धरूप आनन्द ॥ १ ॥
॥ अथ सगुणवस्तुनिर्देशरूप मंगल ॥
॥ दोहा ॥ नासै विघ्न समूलतैं, श्रीगणपतिकों नाम ॥ जा चिंतन विन नहै नहीं, देवन्हके काम ॥ २ ॥ टीका:-त्रिपुरवधमें यह बातों प्रसिद्ध है ॥
॥ ३८० ॥ गणेश विष्णु शिव देवी औ आचार्य इनकूं ॥
॥ ३८१ ॥ मयदानपरचित तीनपुरके नाशमैं प्रष्टत भये महादेवका जब विजय भया नहीं, तब सो सर्वदेवसहित होयके विश्वराज जो गणेश ताकूं
॥ अथ नमस्काररूप मंगल ॥ ॥ सोरठा ॥ असुरनको संहार, लीनही पार्वतीपती ॥ तिन्हें प्रणाम हमार, भजतनकूं संतत भजै ॥ ३ ॥ ॥ अथ स्ववांछितप्रार्थनारूप आंशीर्वाद ॥
॥ मंगल ॥ दोहा ॥ जा सत्त्की सक्ति लहि, करै ईस यह साज ॥ मेरी वानीमैं वसहु, ग्रंथ-सिद्धिके काज ॥ ४ ॥ ॥अथ शिष्यवांछितप्रार्थनरूप आशीर्वाद॥
॥ दोहा ॥ बंधहरन सुख करन श्री, दादू दीनदयाल ॥ पढै सुनै जो ग्रंथ यह, ताके हरहु जंजाल ॥ ५ ॥ पूजताभया । तिसकरि महादेवके विजयद्वारा देवनका फायें ( निर्मययपना ) सिद्ध भया । यह प्रसंग पुराणमें प्रसिद्ध है ॥
॥ ६८२ ॥ जन्मदुःखेः ॥
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६०८ ॥ अनादिकालका बंध नहीं तो श्रवणादिक निष्फल होवैंगे, इसका उत्तर ॥ [ विचारसागर
॥ ३८६ ॥ अथ वेदांतशास्त्रकर्त्ता आचार्यनमस्कार ॥ ३८५ ॥
॥ कवित्व ॥
वेदवादवृक्ष्छ वन भेदवादवायुः आये । पकर हलाय किया कंटक पसारिके ॥ सरल सुछुद्ध सिष्य कंज पुनि तोरे गेरि । सूलनमें फेरत फिरत फेरि फारिके ॥ पेखी सु पथिक भग- - वान जानि अनुचित ।
॥ ३८३ ॥ वेदांत जो उपनिषद्, तिनकेका तात्पर्येका निर्णायक होनेतैं तिनका अनुसारी जो व्रक्षसूत्ररूप उत्तरमीमांसा, सो बी वेदांतशास्त्र कहियेहे । ताके कर्त्ता श्रीवेदव्यास ।
॥ ३८४ ॥
॥ श्लोकः ॥ आचिनोति च शास्त्रार्थं वाचारे स्थापयत्यपि ॥ स्थयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन कथ्यते ॥ ९ ॥
अर्थार्थः— जो शास्त्रके अर्थकूँ आचरे औ लोकनकूँ शास्त्रोक्तआचारविचै स्थापन बी करै औ जातैं आप बी शास्त्रोक्त आचारकूँ आचरताहै । तिस हेतुकरि सो आचार्य कहियेहे । इसशास्त्रोक्तउद्क्षणकरि संपन्न श्रीवेदव्यासजी हैं।यातैं सो साधारण ( सर्ववैआस्तिक सम्प्रदायोंके ) आचार्य हैं । तिनका नमस्काररूप मैंगल ग्रंथकार करैहैं। द्रह्हां गुरुशिष्यके संशादके मिषकरि ग्रंथकर्त्तानैं
अंकमें उठाय ध्यान व्यासरूप धारिके । सूत्रको बनाइ जाल बनको विभाग कीन्ह । करत प्रणाम ताहिं निश्शल पुकारिके ॥ ६ ॥ टीका:- (१) जैसैं वायु, ( २ ) वनमेंपैठिके, वृक्षनकूँ हलायके, (३) तिन्हके कंटक पसारिके, (४) सुंदर ( ५ ) कमलनके पुष्पनकूँ (६) स्वस्थानसैं तोरिके ( ७ ) कंटकनविथै अमावै तिन्ह भ्रमते पुष्पनकूँ देखिके । (८) पथिकैके चित्तमें ऐसी आवै:- (९) जो ये सुंदरकमल या स्थानयोग्य नहीं (१०) किंतु उत्तमस्थानयोग्य है । यह विचारिके जो मंगल क्रियाहै । सो आदिअंतकी न्याईं शास्त्रके मध्यविषै बी मंगल कियाचाहिये । इस विधिके अनुसार है ॥
॥ ३८५ ॥ मनकरि किन्वा वाणीकरि शरीर करि अपनी निश्चेष्टतापूर्वक इष्टकी उत्कटताके क्रमतैं चिंतन कथन हू करनेकै नाम नमस्कार है ॥ यह नीतिभांतिक नमस्कार क्रमतैं उत्तम मध्यम कोनिश्चरूप हैं । तिनमें— १ मनका नमस्कार बीज है यौ—
२ जो वाणीका है सो अंकर है । यौ— ३ जो शारीरका है सो दृक्ष है । ४ तिसतैं गुरुग्रादिककी प्रसन्नतारूप फल होवैहै ॥
॥ ३८६ ॥ पथिक कहिये पांथ । याहीकूँ बाटाऊ बी कहतेंहैं ॥
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वेष्टस्तरंग: ६७
॥ वेष्टनकौ जालरूपतामें रूपक तथा हेतु ॥
२०९
(११) तिन्ह पुष्पनकूं उठाईलेवै औ (१२) फेरि विचार करैं:-जो आगे वी पवन कंटकनविपै पुष्पनकूं तोडिके भ्रमण करावैहै, यातैं ऐसा उपाय करलूं, जांतैं फेरि वायु कंटकनमें पुष्पनकूं भमावै नहीं । (१३) यह विचारिके सूत्रके जालमें कंटकयुक्त वेष्टनका विभाग करीदेवै, ता जालमें पुष्पनका कंटकनमें प्रवेश होवै नहीं ॥
॥३३७॥ (९) तैसैं भेदवादी आचार्य-रूप जो वायु है, (२) सो वेदरूपी वनमें (३) वाद कहिये अर्थवादरूप जो 'कंटकसहित वृक्ष हैं, तिन्हतैं सकामकमरूप कंटक प्रवर्त-करिके, (४) सरल कहिये कपटरहित औ शुद्ध कहिये अतिशुद्ध रागादिदोषरहित, (५) जो शिष्यरूप कमलयुष्प, (६) तिन्हहूं भ्रमादिरूप जो स्वस्थान, तिसी तारिके, (७) सकामकमरूप कंटकनविपै भमावते देखिके, (c) पथिक समान न्यायकोविष्णुनै विचार किया:-(९.) जो यह सुंदरकमलरुलप शुद्धपुष्प या स्थान-योग नहीं है, (१०) किंतु मेरे स्वरूपकूं प्राप्त होने योग्य है । यह विचारिके व्यासरूप धारिके (११) तिन्ह शिष्यनकूं उपदेशरूप अंकमें स्थापन किया । जैसे पुष्पके अंकमें स्थित पुष्पकूं वात उडावनेविपै समर्थ नहीं तैसैं ब्रह्मानिष्ठ आचार्यके उपदेशमें स्थित पुष्पनकूं वेदवाती वृत्तिकावनमें समर्थ नहीं, यातैं उपदेश ही अंक कहिये गोद है, (१२) फेरि व्यास-भगवाननै विचार किया:-जो भेदवादी और पुष्पनकूं आगै वी सकामकमरुलप कंटकनमें
भमावैंगे ! यातैं ऐसा उपाय होवै ! जांतैं आगे शिष्य भमै नहीं । (१३) यह विचारिके सूत्र-रूपि जालमें वेदके वाक्यरूप वृक्षनका विभाग करीदिया ॥
जैसे वनमें दोप्रकारके वृक्ष होवें:-१ संकटक औ---२ कंटकरहित ।
तिन्हका जालमें विभाग करी देवै औ जालतैं पुष्पनका कंटकसहित वृक्षनमें प्रवेश होवै नहीं ॥
तैसैं वेदमें दोप्रकारके वाक्य हैं।१ एक तौ कर्मकी स्तुति करिके कर्मविपै रुचिरूप पुरुषकी प्रवृत्ति करावैहैं औ-२ दूसरे कर्मके फलकूं अनित्य बोधन कारक पुरुषकौ निवृत्ति करावैह ।
तिन्ह वाक्यनका---
॥३३८॥ वेदवचनैं विभागकरिके सूत्रनसैं यह बोधन किया:--जो सर्ववाक्यनका निश्चितमें तात्पर्य है, प्रवृत्तिमें किसी वाक्यकौ वी तात्पर्य नहीं ।
जो प्रप्तिचिवोधक वाक्य हैं, तिन्हका वी स्वाभाविक औ निपिद्ध जो प्रवृत्ति है, तैसैं निवृत्तिकरिके विवेकप्रवृत्तिसैं अंतःकरण शुद्ध होवै, तैसौं वी निवृत्तिमैं तात्पर्य है । औ-पुरुष होवै ! इसरीतिसौं निवृत्तिमैं तात्पर्य है । औ-अर्थवादवाक्यनै जो कर्मका फल बोधन
यातैं पूर्व ( तृतीयतरंग ) औ उत्तर ( इस तरंग ) का विरोध नहीं ।
॥३८८॥ इहां भेदवादिनकूं आचार्य कहाहै सो 'देवदत्त सिंह है' इस वाक्यकी न्याई गौणी-बृत्तिसैं कहाहै । मुख्य ( शक्तिवृत्तिसैं ) नहीं ।
. वि. सा. ३७
॥३८८॥ संशययुक्त करिके निष्ठातैं डिगावनेवैंमें ।
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कियाहै सो गुंडजिह्वान्यायतैं कियाहै । फलमैं तिनका तात्पर्य नहीं । यह अर्थ सूत्रनसैं व्यासजीनेै मोघन कियाहै । या अर्थहू सूत्रनसैं जानिके पुरुषकी सकाम कर्ममैं प्रवृत्ति होवै नहीं ॥ जैसे मतकौ जाल पुष्पनकौं कंडकुनसैं निरोध करैहै तैसे व्यासभगवान्के सूत्र सकाम कर्मनसैं निरोध करैहैं । यातैं जालरूप कहे ॥ ६ ॥
॥३८९॥ अगृधदेवके तीन प्रश्:- १ "मैं कौन हूं? २ संसारका कर्त्ता कौन है ? ३ मुक्तिका हेतु ज्ञान है. अथवा कर्म्म है अथवा उपासना है अथवा दोनों हैं ?"
॥ दोहा ॥ कोउक सिष्य उदारमति, गुरुके सरनै जाइ । प्रश्न कियो कर जोरिके, पादपद्म सिर नाइ ॥ ७ ॥
॥ ३८९ ॥ किसी बालककौं अपनी माता जिन्हैं गुडकी अंगुली लपेटवे कौं कटुभौषधमैं मधुर-रसकी बुद्धि उपजावनेकौं कटुकऔषध पिलाय देवै । ताकौं शास्त्रमैं "गुडजिह्वाम्याय" कहैंहैं । ताकी श्रुतिरूप जो माता है, सो पामरजीवकैरूप घालकरकै अपने जे कर्मफलके स्तावककवचनरूप हैं, तिसरहू गुडकी अंगुली
॥ शिष्य उवाच ॥ ॥ दोहा ॥ मो भगवान् मैं कौन यह, संसृति कांतें होइ । हेतु मुक्तिको जान वा, कर्म्म उपासन दोइ ॥ ८ ॥
टीका:- १ हे भगवान् ! मैं कौन हूं? (१) देहस्वरूप हूं ? (२) अथवा देहसैं मित्र हूं ? मैं मनुष्य हूं औ मेरा शरीर है । यह दो प्रतीति होवैहैं । यातैं मेरेदूँ संशय है । औ- देहसैं मित्र बी जो आप कहो तौ- (३) मैं कर्त्ता-मोक्ता हूं? (४) अथवा अक्रिय हूं ? जो अक्रिय कहो तौ बी- (५) सर्वशारीरिवपै एक हूं ? (६) अथवा नाना हूं ? यह प्रथमप्रश्नका अभिप्राय है ॥ औ- २ यह संसृति कहिये संसार, ताका कर्त्ता कौन है ? या का यह्ह अभिप्राय है:- (१) या संसारका कोई कर्त्ता है ? (२) अथवा आपही होवैहैं ?
चटायके कर्मके स्वर्गादिककी प्रतीतिरूप फलकौ बोधन-कारिके तिस कर्ममैं प्रवृत्ति करावैहै । परंतू जैसे तिस माताका बालककी रोगनिवृत्तिमैं तात्पर्य है । गुडकी अंगुलीके स्वादमैं नहीं । तैसे श्रुतिरूप माताका पापकी निवृत्तिद्वारा चित्तकी शुद्धिमैं तात्पर्य है । स्वर्गादिफलमैं नहीं ।
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यष्टस्सरंगः ६ ]
॥ सांख्यमतके आत्माका कथन ॥
२१९
जो कर्त्ता कहो तौ वी—
(३) कोई जीव कर्त्ता है ?
(४) अथवा ईश्वर कर्त्ता है ?
जो ईश्वर कहो तौ वी—
(५) एकदेशमें सो ईश्वर स्थित है ?
(६) अथवा सो ईश्वर व्यापक है ?
जो व्यापक है तौ वी—
(७) जैसैं व्यापकआकारतैं जीव भिन्न है तैसैं ता ईश्वरतैं जीव भिन्न है ?
(८) अथवा ईश्वरतैं जीव अभिन्न है ? औ—
३ मुक्तिका हेतु
(९) ज्ञान है ?
(२) अथवा कर्म है ?
(३) अथवा उपासना है ?
(४) अथवा दो हैं ?
जो दो कहो तौ वी—
(५) ज्ञान कर्म है ?
(६) अथवा ज्ञान उपासना है ?
(७) अथवा कर्म उपासना है ?
(९) “मैं कौन हूं?” याका उत्तर
॥ ३४०—३६९ ॥
॥३४०॥ आत्मा संघातका साक्षी है ॥
॥ श्रीगुरुवचन ॥
( अर्थदोहा )
सत् चित् आनंद एक तूं, ब्रह्म अजन्म असंग ॥
टीका:-प्रथम जो शिष्यनैं प्रश्न किया, ताका उत्तर कहहैं:-“तूं सत्चितआनंदस्वरूप
है” या कहनैतैं देहतैं भिन्न कहा । कहहैं ? देह असत्स्वरूप है औ जडस्वरूप है औ दुःख- रूप है औ कर्तामोक्ता वी नहीं । कहहैं ?—
१ जाकैदिपै दुःख होवै सो दुःखकी निवृत्ति औ सुखकी प्राप्तिवास्ते क्रिया
करै, सो कर्त्ता कहीयेहै ।
(९) सो तेरेइपै दुःख है नहीं, यातैं दुःख- की निवृत्तिवास्ते क्रियाका करै
नहीं ॥
(२) तूं आनंदस्वरूप है, यातैं सुखकी प्राप्तिके निमित्त वी तूं क्रियाका कर्त्ता
नहीं ॥
२ जो कर्त्ता होवै सोई मोक्ता होवैहै । तूं कर्त्ता नहीं, यातैं मोक्ता वी नहीं ।
पुण्यपापका जनक जो कर्म है ताका कर्त्ता औ सुखदुःखका मोक्ता स्थूलदृश्टिसंवात है ।
तूं नहीं । तूं संघातका साक्षी है ॥ याहीतैं—
॥ ३४१ ॥ आत्मा, सुखदुःखादिधर्मसैं रहित व्यापक एक है ॥ सांख्यमतका
खंडन
॥ ३४१—३५४ ॥
आत्मा एक है, नाना नहीं । जो आत्मा कर्तामोक्ता होवै तव तौ नाना होवै । कहहैं ?
कोई सुखी है, कोई दुःखी है । औ कर्तामोक्ता एकही अंगीकार होवै तौ एकके सुख होनैतैं
सर्वकौं सुख तथा दुःख खुश्वाचाहिये । यातैं मोक्ता नाना हैं औ आत्मा
मोक्ता है नहीं । यातैं एक है ॥
॥ ३४२ ॥ [पूर्वपक्षी:-] सांख्यके मतमैं आत्मा कर्तामोक्ता अंगीकार नहिं करिके
नानारूप जो अंगीकार किये, सो अत्यंत- विरुद्ध है। कहहैं ? यह सांख्यका सिद्धांत है:-
१(९) सत्स्वरजतमगुणकी समअवस्थाका नाम प्रधान कहहैं, सो प्रधान
प्रकृति है, विकृति नहीं ॥
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[९] विकृति नाम कार्यका है । औ— [२] प्रकृति नाम उपादानकारणका है । [१] सो प्रधान महतत्वका उपादानकारण है यातैं प्रकृति है । औ— [२] अनादि है, यातैं विकृति नहींं । औ— (३—८) महत्तत्व अहंकार औ पंचतन्मात्रा । ये सातप्रकृति विकृति हैं । [१] उत्तरोत्तरके प्रकृति हैं । औ— [२] पूर्वपूर्वके विकृति हैं । तन्मात्रा वी भूतनके प्रकृति हैं । इसरीतिसैं सातप्रकृति विकृति हैं । औ— (९—२४) पंचभूत औ दशइन्द्रिय औ मन, ये सोलह विकृति हैं । प्रकृति नहींं ॥ (२५) पुरुप प्रकृतिविकृति नहींं । कहैंतैं ? [१] जो हेतु किसी पदार्थका होवै तो प्रकृति होवै । औ— [२] कार्ये होवै तो विकृति होवै ।
[१] सो पुरुप किसीका हेतु नहींं । यातैं प्रकृति नहींं । औ— [२] कार्य नहींं । यातैं विकृति नहींं । इसरीतिसैं सांख्यमतमें पचीस तत्त्व हैं ॥ तत्त्व नाम पदार्थका है ॥ १ सांख्यमतमें ईश्वरका अंगीकार नहींं । २ स्वतत्रप्रकृति जगतका कारण है । औ— ३ पुरुपके भोगमोक्षके निमित्त प्रकृतिही प्रवृत्त होवैहै । पुरुप नहींं । ४ प्रकृतिके विपयरूप परिणामतैं पुरुपकौं भोग होवैहै ॥ औ— ५ बुद्धिद्वारा विवेकरुप प्रकृतिके परिणामतैं मोक्ष होवैहै । ७ यदपि पुरुप असंग है, ताकोऽपै भोग— मोक्ष नहैं । तथापि ज्ञान सुख— दुःख रागद्वेपसैं आदिलेके बुद्धिरूप परिणाम हैं । ता बुद्धिका आत्मासैं अविवेक है । विवेक नहींं । यातैं आत्मासैं
नहींं औ चेतनपुरुपकौं तिसके मतमें असंग होनेतैं तिसका प्रधानके साथि संबन्ध नहींं है औ चेतनके संबन्धबिना जड़तैं कार्यकी उत्पत्ति होवै नहींं । तातैं प्रधानरुप मायाकोंँ विशिष्ट चेतन अंतर्थ्यौमी ईश्वर है । सोईँ जगतका कर्त्ता है । ऐसैं मानना योग्य है ॥ औ— इसरीतिसैं सांख्यमतमें आंखके नानात्व औ प्रकृतिकी नित्यताके अंगीकारकरि आत्मविवेै सजातीयसंबंध औ विजातीय— संबन्धकी प्राप्तितैं नानाआत्माके असंगपनैका कथन वी व्याघातदोपयुक्त है औ एक व्यापक आत्माके अंगीकार किये नानाआत्मंतःकरणकरि भोगआदिकके असंकरकी व्यवस्था होवैहै । फेर आत्माके नानांत्वके अंगीकाररैं अद्धैतश्रुतिके ओ क्षरमायां टिप्पणलुक भेदवाधक— युक्तिक साथ विरोधैं बिना अन्यफल मिलै नहींं । इसरीतिसैं सांख्यमत असंगत है ।
॥ ३९० ॥ १ सेश्वरीसांख्य औ २ निरीश्वरी— सांख्य भेदतैं सांख्यमत द्विविध है । १ कर्दम औ देवहूतीका पुत्र जो भगवत्का अवतार कपिलदेव, तिसैं सेश्वरीसांख्य मान्याहै ॥ २ अन्य कोई कपिल भयौहै, तिसनैं निरीश्वरी— सांख्य मान्याहै । ताके मतमें ईश्वरका अकार नहींं । किंतु प्रधान (प्रकृति)कौं जगतका कारण मानिके पुरुपके भोगमोक्षका हेतु कह्याहै । सो वैन नहींं । कहैंतैं ? प्रलयकालमें सत्वादि— गुणनकी साम्य (मिलित)अवस्थाकौं प्रधानं कहैंहैं । सो जँव सृष्टिकालमें साम्यावस्थाकौं त्याग करै , तब जगतकी उत्पत्ति होवै । सो प्रधान जातैं जड़ है, तातैं सतः साम्यावस्थाके त्यागबिषे प्रवीण होवै
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आरोपित बंधमोक्ष हैं । परमार्थसैं नहीं ॥ < अविवेकसिद्ध जो आत्मामैं भोग, तासैही आत्मारौं सांख्यमतमैं भोक्ता कहैहैं । औ— ९ परमार्थसैं आत्मा भोक्ता नहीं । बुद्धिही भोक्ता है ॥ १० बुद्धि आत्मासैं भिन्न है । ११ इस ज्ञानका नाम विवेक है । otorrorassistant<|reserved_special_token_227|>इसरीतिसैं सांख्यमतमैं— १३ आत्मा असंग है । औ— १४ सुखादिक बुद्धिके परिणाम हैं । यातैं बुद्धिके धर्म हैं । औ— १५ आत्मा नाना हैं । [सिद्धान्ती:-] सो वात्तो अत्यंतविरुद्ध है । जो सुखदुःख आत्माके धर्म होवें तो सुखदुःखके भेद होतैं आत्माका भेद होवै । सो सुखदुःख आत्माके धर्म तो हैं नहीं । किंतु बुद्धिके धर्म हैं । यातैं सुखदुःखके भेदसैं बुद्धिकी ही भेद सिद्ध होवैहै । आत्माका भेद सिद्ध होवै नहीं ॥
जैसे एकही व्यापक आकाशमैं नानाउपाधि के धर्म, उपाधि औ आकाशके अविवेकसैं प्रतीत होवैहैं; तैसे एकही व्यापक आत्मामैं
॥३९१॥ इहां यह भेदकी बाधक युक्ति हैं:- ' एक व्यापकका भेद अन्यभावसैं वचर्ताहै', ऐसे कहनेवाले प्रतिवादीकों पूछा चाहिये:- ९ सो भेद मेदरहित आत्माविषे वचर्ताहै ? २ किंवा भेदरहित आत्माविषे सहित आत्माविषे ? ९ प्रथमपक्षकों कहैं तो न्यायातदोष होवैगा । कहैंतैं ? तिस भेदके आश्रय आत्मावौं मेदरहितवी कहता- hoovै ? २ किंवा दो हैं ? (९) जो एकही कहैं तो आपहीकरि सहित आत्माविषे आपहीके वचर्तैं आत्माअथयदोष होवैगा । औ— (२) जो जिस भेदकरि सहित आत्मा है सो-
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॥३४९॥ [पूर्वपक्षी:-] तैसे न्यायमतमैं वी आत्माका भेद असंगत है । कहैंत? यह न्यायका सिद्धांत है:-
१ सुख, दुःख, ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्मे, अधर्मे, ज्ञानेके संस्कार, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग औ विभाग, ये चतुर्दशगुण जीवरूप आत्माविषै हैं ।
२ संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, ज्ञान, इच्छा, औ प्रयत्न ये अष्टगुण ईश्वरमैं हैं ।
इतना भेद है:-
(१) ईश्वरके ज्ञान, इच्छा औ प्रयत्न नित्य हैं । औ-
(२) जीवके तीनूं अनित्य हैं ।
(१) ईश्वर व्यापक है और नित्य है ।
(२) जीव नाना हैं औ संपूर्ण व्यापक हैं । नित्य हैं । औ जीवका ज्ञान अनित्य है ।
यातैं जव ज्ञान गुण होवै तव तौ जीव
आत्माका विशेषणरूप भेद, ये दोनों परस्परमिन्न हैं ऐसैं कहैं तौ---
[१] तिस. आत्माके विशेषणरूप भेददोूं वी भेदरहित आत्माविषै तौ रहना संगतमैं नहीं । कितु भेदसहित आत्माविषै रहना कहाचाहिये । यातैं आत्माविषै प्रथमभेदकी सत्तिरूप द्वितीयभेदकूं विशेषण कहै औ फेर द्वितीयभेदकी सत्तिरूप प्रथमभेदकूं विशेषण कहै तौ परस्परकी सत्तिरूप अपेक्षा होवेंतैं अन्योन्याश्रयदोष होवैगा ।
[२] जो आत्माविषै द्वितीयभेदकी सत्तिरूप प्रथमभेदकी स्थितिर्थै ताके आश्रय आत्माकूं भेदसहित करनैकूं ताका विशेषण तृतीयभेद मानैं तौ तिस तृतीयभेदकी स्थितिर्थै वी पूर्वोक्ती न्यायी आत्माकूं भेदसहित किया-
चेतन है औ ज्ञानगुणका नाश होवै तव जडरूप रहैहैं ॥
३ ईश्वरजीवकी न्यायी आकार, काल, दिशा औ मन नित्य हैं ॥ औ-
४ पृथिवीजलतेजवायुके परमाणु नित्य हैं । जो झरोखेमैं सूरजकी प्रतित होवैहै, ताके छठे भागका नाम परमाणु हैं । सो परमाणु आत्माकी न्यायी नित्य हैं ।
५ और वी जातिसैं आदिलेके कितने पदार्थ न्यायमतमैं नित्य हैं ।
वेदविरुद्धसिद्धांतका बहुत लिखनैकां जिज्ञासुवूं उपयोग नहीं । यातैं लिखै नहीं ॥
६ "मैं मनुष्य हूं, ब्राह्मण हूं" ऐसैं जो देहवैपै आत्मशांति तासैं रागद्वेष होवैंहैं । ता रागद्वेपैं धर्मअधर्मके निमित्त प्रवृत्त होवैहैं ।
तिन्हैं? शरीरके संबध्द्वारा सुखदुःख होवैंहैं । इसरीतिसैं न्यायमतमैं आत्माकूं संसारका हेतु आत्मज्ञान है ॥
७ सो आत्मज्ञान तरवज्ञानसैं दूरी होवैहै । चाहिये । जो तिस तृतीयभेदकी स्थितिर्थै ताके आश्रय आत्माका विशेषण प्रथमभेद कहैं तौ प्रथम- भेदकूं द्वितीयकौं औ द्वितीयकूं तृतीयकी । फेर तृतीयकूं प्रथमभेदकी अपेक्षाकै होनैतैं चक्रकी न्यायी भ्रमणरूप चक्करदोष होवैगा । औ-
[३] जो तृतीयभेदकी स्थितिरर्थ भेदके आश्रय आत्माकूं भेदसहित करनैकूं ताका विशेषण अन्य- चतुर्थभेद कहै । फेर चतुर्थभेदकी स्थितिर्थ पंचम- भेद कहै तौ प्रमाणरहित भेदकी धारणारूप अनव- स्थादोष होवैगा ।
यातैं आत्माका परस्परभेद ( नानात्व ) असंगत है, यह भेदवादिकयुक्तिकै न्यायिकभादिक सर्वभेदवादी- करि संगत भेदकी रुकावट है ।
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< देहादिक संपूर्णे पदार्थेंसैं आत्मा मिलै है । या निश्चयका नाम तत्वज्ञान है ॥ (१) ता तत्वज्ञानसैं " मैं ब्रह्म हौं, मुख्य हौं " यह भ्रांति दूरि होवैहै । (२) भ्रांतिके नाशतैं रागद्वेषका अभाव होवैहै । (३) तिन्हके अभावतैं धर्मअधर्मके निमित्त प्रवृत्तिका अभाव होवैहै । (४) प्रवृत्तिके अभावतैं शरीरसंवंधरूप जन्मका अभाव होवैहै औ प्रारब्धका भोगतैं नाश होवैहै । (५) शरीरसंवंधके अभावतैं इक्कीस दु:खोंका नाश होवैहै ॥ न्यायमततैं एक शरीर औ श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, रसना, प्राण, किसी प्रकारकै आत्मासैं इतरपदार्थनका भेद मननरागद्वेषका अर्थ संभवै नहीं ॥ किवा १ इतरपदार्थनके ज्ञानसैंहि जो पुरुषार्थके (मोक्षके) साधन तत्वज्ञानकी प्राप्ति होवै तो सकलपुरुषनकूं तत्वज्ञानकी प्राप्ति हुईचाहिये । २ अथवा किसीकूं नहीं होवैगी । सो दिखावैहैं — १ जो इतरपदार्थनका सामान्यज्ञान तत्वज्ञान (आत्मज्ञान) सहित होवै है तौ सामान्यज्ञानसर्वपुरुषनकूं है । यातैं इतरपदार्थनके ज्ञानपूर्वक इतर पदार्थनके भेदज्ञानतैं सर्वकूं तत्वज्ञान हुयाचाहिये । औ — २ सर्वपदार्थनका असाधारणधर्म (एकधर्मीवपै विशेषरूप) है तिस विरोधरूपतैं इतर पदार्थनका ज्ञान तत्वज्ञानवि्षेभपेक्षित होवै तौ सर्वज्ञ ईश्वरविना असाधारणधर्मतैं सकलइतरपदार्थनका किसीकूं हि ज्ञान संभवै नहीं । यातैं सर्वे इतरपदार्थनके सकलआत्मामपदार्थनतैं मिलै आत्माका ज्ञान-
रूप तत्वज्ञान किसीकूं नहीं होवैगा । यातैं न्यायिक मतमें साध्या जो आत्माका ज्ञान-आत्मातैं औ अनात्मातैं भेदज्ञान सो संभवै नहीं । याहींतैं देहादिकपै आत्मभ्रांतिका अभाव, तातैं रागद्वेषका अभाव, तातैं धर्मअधर्मके निमित्त प्रवृत्तिका अभाव, तातैं शरीरसंवंधरूप जन्मका अभाव, तातैं इक्कीसप्रकारके दु:खका नाशरूप मोक्ष न्यायमते-कोंकै अनुसारीकूं नहीं होवैगी । किंतु महावाक्यरूप । श्रुतिअर्थके गोचर भेदज्ञानही कारणसहित मनर्थकी निश्चतिपूर्वक परमानंदकी प्राप्तिरूप मोक्षका हेतु है ।
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"मैं कौन हूँ" इस अग्रृब्धदेवके प्रकशका उक्तसार ॥ रे८०-३८९ ॥
[ विचारसागर
औ मन ये प्ट्रइंद्रिय औ पट्रइंद्रियोंके विपय औ पट्रइंद्रियके ज्ञान औ सुखदुःख, ये इकीस-
दुःख है ।
शारीरादिक वी दुःखके जनक हैं, यातैं
दुःख कहीयेहैं । औ—
॥ ३९३ ॥ न्यायमतमें श्रोत्रकूं भाकाशरूप
मानिके निय मान्याहै ।
सो वने नहीं:- कहैंहैं ?
१ श्रोतिरूपै नेत्रादिकनकी नाईं भाकाशतें श्रोत्रकी
उत्पत्ति कहीहै । जो उत्पत्तिवान् वस्तु होवै ताकी
नित्यता संभवै नहीं ॥ औ—
२ श्रोत्रकूं भाकाशरूप वी कहना संभवै नहीं ।
कहैंहैं? कर्णगोलकरूपति जो भाकाश है ताकूं न्याय-
मतमें श्रोत्र कहैंहैं, सो अयुक्त है । कहैंहैं? कर्ण-
गोलकरूपति भाकाशके होते वी कदाचित् श्रवणक्रियांका
मंदपना किवा अभाव होवैहै, सो नहीं, उपलब्धिये ।
यातैं पंचीकृत सूतरूप जो कर्णगोलकरूपति भाकाशका
है, तिसतैं भिन्न अपंचीकृत भूतारूप भाकाशका कार्य श्रोत्रइंद्रिय उत्पत्तिनाशवानला होनेतैं अनित्य
है ॥
३ किंबा दुर्ज्ञानतोपन्यायकरी तांकूं भाकाशरूप
मानैं तो वी ताकी नित्यता संभवै नहीं । कहैंहैं?
'आत्मन आकाशः संबृंतः'(आत्मासैं आकाश होता-
भया) इस तैत्तिरीयके वाक्यमें भाकाशकी उत्पत्ति
कहिके अनित्यता सूचना करीहै । जब भाकाशकी वी
अनित्यता सिद्ध भई तब तिसकें एकदेशरूप
श्रोत्रकी अनित्यता है यातैं क्या कहनाहै?
इसीतरितैं श्रोत्रकी नित्यता संभवै नहीं ।
तैसैं मनकी नित्यता वी वने नहीं । कहैंहैं?
१ मनकूं परमाणुरूप मानिके निय कहैं तिनकूं
पूछ्या चाहिये:- (१) मन निरवयव है ?(२) किंबा
सावयव है ?
(१) जो निरवयव कहैं तौ तिसविपै अवयववरूप
देकेक अभावतैं तिसका आत्माके साथि संयोग
स्वर्गादिकनका सुख वी नाशके भयतैं
दुःखका हेतु है । यातैं दुःख कहीयेहै ।
यद्यपि न्यायमतमें श्रोत्र औ मन नित्यैं हैं,
तिन्हका नाश वने नहीं, तथापि जिसरूप
संभवें नहीं । यातिं स्वतः भडआत्मभाविपै मनके संयोग-
सैं जन्य ज्ञानगुणकी उत्पत्तिके अभावतैं जगत्की
अंधताकू प्रसंग होवैगा । औ—
( २ ) जो मन सावयव है तौ तिसविपै घट-
पटादिककी नाईं अनित्यता सिद्ध भई ।
२ किंबा मन नित्य होवै तौ ताका सुपुति-
विपै विशेषज्ञानकी जनकतारूप लिंगके अभावतैं गम्य
अपने उपादान ज्ञानमें लय होवैहै सो नहीं हुवा-
चाहिये । यातैं वी मन अनित्य है ॥ औ—
३ जो नैयाॅयिक कहैं:-आत्मा औ मनका संयोग
ज्ञानका हेतु है सो संयोग एक्कों क्रियातें किवा
दोकी क्रियातें होवेंहैं ? विसुऱआत्मामैं तौ क्रिया
कंद वी होवें नहीं सों मोक्षकालमें किंबा सुपुतिकाल-
में वी भोगके सन्मुख अथटक्के अभावतैं मनमें वी क्रिया
होवै नहीं । यातैं आत्माके साथि मनके संयोगके
अभावतैं सुपुति आदिकविपै विशेष ज्ञान होवै नहीं ।
सो कथन वने नहीं । कहैंहैं? न्यायक जो
वस्तु है तिसके साथि सर्ववस्तुनका क्रियारें बिना वी
सदा संयोग रहैहै जैसैं व्यापक भाकाशके साथि
कियारहित पर्वतका किंबा वृक्षपापाणआदिकनका
सदाही संयोग रहैहै । तैसैं मोक्षकालमें किंबा
सुपुतिमें जो क्रियारहित वी मन विदमान होवै तौ
तिसके विसुभात्माके साथि संयोगकी सिद्धितैं विशेष-
ज्ञान ह्याचाहिये औ होता नहीं । यातैं सुपुति
आदिक कालविपै संबंघ मनका लय होवैहै । फेरि
जाग्रत्कालमें ताकी उत्पत्ति होवेंहै ।
इसीतरितैं उत्पत्तिनाशवान् होनेतैं मन अनित्य है ।
ताकी नित्यताका कथन प्रलापमात्र है।
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करिके श्रोत्र मन दुःखके हेतु हैं ! तिसरूपका नाश होवैहै । पदार्थनके ज्ञानी उतपत्तिकरिके दुःखके हेतु हैं, सो पदार्थनका ज्ञान मोक्षकालमें श्रोत्र औ मन करै नहीं । कहैंत ? जो कर्णगोलेकमें स्थित आकार है, सो श्रोत्र कहिये है । ता कर्णगोलकका मोक्षकालमें अभाव है । यातें आकाररूप श्रोत्रइंद्रिय है वीं । परंतु गोलकके अभावतैं ज्ञान होवै नहीं । इसरीतिसैं ज्ञानका जनक जो श्रोत्रइंद्रियका स्वरूप, सोई दुःख है औ ताकाही नाश होवैहै ॥ औ— १० आत्माके साथि मनके संयोगतैं ज्ञान होवैहै । सो मनका संयोग न्यायसिद्धांतमें (९) एककी क्रियातें होवैहै (२) अथवा दोकी क्रियातें संयोग होवैहै ॥ ॥ ३९४ ॥ ९ आत्माके साथि मनके संयोगतैं ज्ञान होवै तौ सुप्रतिप्रें तिस संयोगके अभावहूजे जागरणकालमें (उत्यानसमयमें) होनेबाली सुख औ अज्ञानकी स्मृतिका मूलभूत अनुभव सिद्ध होवैहै । सो नहीं हूयाचाहिये । २ किंतु :-आत्माके साथि मनके संयोगसैं जो ज्ञान होवै तौ न्यायमतमें मनकूं अनुपलब्ध माननें । यातैं संयोगसैं जन्य ज्ञान वीं होरिके एकदेशमेंहीं होवैगा । सारे शरीरमें नहीं । यातैं सारे शरीरविपै भये कंटकवेधकी पीडाका मान न हूवाचाहिये । औ- ३ जो मनकूं सिद्धांतकी न्याई सारे शरीरविपै वर्तमानवाला माने तौ यद्यपि सारे शरीरविपै पीडाका अनुभव असंभव नहीं तथापि सुप्रतिप्रें सुख औ अज्ञानका सामान्यज्ञान है ताका असंभव होवैगा । यातैं आत्माके साथि मनके संयोगतैं ज्ञान होवै नहीं । किंतु आत्माका स्वरूपभूत उतपत्तिनाशरहित ज्ञान नित्य है । ऐसें मानना योग्य है । ॥ ३९५ ॥ कोई न्यायका एकदेशी त्वचाके साथि मनके संयोगकूं ज्ञानका हेतु कहैहै ।
(९) जैसैं घाजघातका संयोग एकराजकी क्रियातें होवैहै ! औ— (२) दोसेप्तकका संयोग दोकी क्रियातें होवैहै ॥ तैसैं विभूआत्मामैं तौ क्रिया कदै वीं होवै नहीं औ मोक्षकालमें मनतैं वीं क्रिया होवै नहीं । यातैं संयोगवान् मनकाही मोक्षकालमें अभाव होवैहै ॥ और— ॥ ३९४ ॥ कोई ऐकदेशी त्वचाके साथ मनके संयोग ज्ञानका हेतु कहैहैं । आत्माके संयोगकूं ज्ञानका हेतु नहीं ॥ सुप्रतिप्रें पुरीतत् नाम नाडीवीपै मन प्रवेश करैहैं । त्वचासैं मनका संयोग हैं नहीं । यातैं सुप्रतिप्रें ज्ञान होवै नहीं । तिन्हके मतमें त्वचासैं संयोगवाला मनही ज्ञानद्वारा दुःखका हेतु होतैं दुःख है । केवल मन नहीं । मोक्षमैं त्वचाके नाश होतैं ताके साथि सो वीं असंगत है । कहैंत ?— १ जैसैं ‘मनके साथि आत्माका संयोग ज्ञानका हेतु है’ , इस अर्थके माननेमें कोई प्रमाण नहीं । तैसैं ‘त्वचाके साथि मनका संयोग ज्ञानका हेतु है’ इस अर्थके माननेमें कोई श्रुतिस्मृतिप्रमाण नहीं । २ जो प्रमाणकरि असिद्ध स्वकपोलकल्पित अर्थ माननै योग्य होवै तौ कीसनै कद्या किं:-“मैं मृगतृष्णाके जलमैं स्नानकरीके आकाशके पुष्पका मुकुटकरिके औ राधासंगका धनुपकारिके वंध्याका पुत्र संपामैं जाता देषियगा” इस वचनका अर्थ वीं मानना योग्य है । यातैं त्वचाके साथि मनका संयोग ज्ञानका हेतु नहीं । ३ किंतु :-सुप्रतिप्रें त्वचा औ मनके संयोगके अभाव हूये वीं बुद्धिमानोंकी बुद्धिकरि गम्य सुख औ अज्ञानका सामान्यज्ञान होवैहै । सो नहीं हूयाचाहिये ॥ यातैं त्वचा औ मनका संयोग ज्ञानका हेतु नहीं । किंतु आत्माका स्वरूपभूतही ज्ञान है । यह मानना योग्य है ।
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२९८ . ॥ 'मैं कौन हूँ' इसे वृदधदेवके प्रश्नका उत्तर ॥ ३५०-३५९ ॥ [ विचारसागर ]
संयोग है नहीं । यातें ज्ञान होवें नहीं । मोक्षकालमें मन है नहीं । परंतु दु:खका हेतु जो ज्ञानका जनक त्वचासैं संयोगवाला मन, ताका संयोगके नाशतैं नाश होवैहै ।
९ इसरीतिसैं मोक्षकालमें परमात्मासैं भिन्नही दु:खरहित होयके व्यापक आत्मा जडरूप स्थित होवेंहै । कहैंतें ? ज्ञानगुणतैं आत्माका प्रकाश होवैहै सो जीवका ज्ञान संपूर्ण इंद्रिय-जन्यही है । नित्य है नहीं । ता इंद्रियजन्य ज्ञानका मोक्षकालमें नाश होवैहै, यातें प्रकाश-रहित जडरूप होयके आत्मा मोक्षकालमें स्थित होवेंहै ।
यह न्यायका सिद्धांत है । औ—
॥ ३५५ ॥ न्यायमतमें पूर्वउक्तप्रकारसैं सुख दुःख औ बंधमोक्ष आत्मात्रों होवेंहैं, यातें कालमें मन है नहीं । आत्मा नाना है औ संपूर्ण व्यापक है ।
सर्वअल्पपदार्थनसैं जो संयोग, सोई न्यायमतमें व्यापकका लक्षण है औ सजातीय-विजातीय-स्वगत-भेदका अभाव, व्यापकका लक्षण नहीं । कहैंतें ? न्यायमतमें घट्यापि आत्मा निरपेक्ष है । यातें स्वगतभेदका अभाव है भी । परंतु सजातीय औ विजातीयके भेद आत्मासैं है । औ—
९ सजातीय जो दूसरा आत्मा, ताका भेद आत्मासैं है । औ—
२ विजातीय घटादिकनका भेद वी आत्मासैं है ।
यातें सजातीय-विजातीय-स्वगत-भेदका अभाव न्यापिकेंका लक्षण नहीं । किंतु सर्वअल्प-
इसीही लक्षणके अनुसार देशकालवस्तुस्वरूप संततैं रहित वी व्यापकका लक्षण हैं।। यहां—
९ "पृथक्" पदकरिके देशकृत संतका निपेध है । कहैंतें ? जो वस्तु परिच्छिन्न है सो नाना होवेंहै । जो व्यापक है सो नाना नहीं । किंतु व्यापकशक्ति न्याई एक है । आत्मा जालि एक है यातें परिच्छिन्न नहीं ।
यहैंतें आत्मा देशकृतअंतरैं रहित है
औ न्यायमतमें नाना व्यापक कहेंहै सो वद्यमानयुक्ति औ लोकानुमवतैं विरुद्ध हैं ।
उक्तस्मृतिगत एकपदकारि आत्माविपे देशकृतसंतका निपेध किया । औ—
२ निश्चयके वाचक "पद" पदकरि आत्माविपे निरपेक्षव्यापकताके कथनतैं आत्माविपे कालकृत संतका निपेध किया ।
३ "अद्वितीयं" पदकरि भेदके प्रतियोगी ( निरुपक ) अन्यशुक्ले निपेधतैं आत्माविपे वस्तु-कृत अंतरका निपेध किया ।
इसरीतिसैं सिद्धांतउक्त उभयत्रिध व्यापकका लक्षण श्रुतिभनुसार है ।
॥ ३५८ ॥ यह न्यायमततटूक्त व्यापकका लक्षण श्रुति युक्ति औ लोकानुमवतैं विरुद्ध है ॥
॥ ३५७ ॥ सिद्धांतमें सजातीय-विजातीय-स्वगत-भेदका अभाव व्यापकका लक्षण मान्यहै, सो "पद्मेवादितीयं ब्रह्म (एकही अद्वितीय ब्रह्म है)"
इस छंदोयके पाठ वध्यायके वचनभनुसार है । यहां—
९ "पद्म" पदकरि सजातीयभेदका निपेध है ।
२ "पद" पदकरि विजातीयभेदका निपेध है ।
३ "अद्वितीयं" पदकरि स्वगतभेदका निपेध है ।
॥ ३५९ ॥
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पदार्थनैं संयोगही व्याप्तक लक्षण हैं । यांकेऽविप— कोर्हि शंका करैहैं:-न्यायमतमें आत्माकी न्याईं आकाशकालादिा वी व्याप्तक हैं औ परमाणु मूर्त्त हैं । निरयच हैं । तिनमें सर्व व्याप्तक पदार्थनकौं संयोग वनै नहीं । कहैंत ? जो परमाणु साक्षयच होवें तथ तौ किसी देशमें आत्माकौं संयोग होवें औ किसी देशमें अन्य- व्याप्तक पदार्थनका संयोग होवें । सो परमाणु साक्षयच हैं नहीं । किंतु निरयच हैं औ अति- मूर्त्त हैं । तिन्हके साथि एकही देशमें सर्व- व्याप्तक पदार्थनका संयोग होवैगा । सो चनै नहीं । कहैंत ? जो एकके संयोगमें स्थान निरुद्ध है । ता देशमें अन्यपदार्थका संयोग वनै नहीं । यांतें नानापदार्थनकैं । व्याप्तकता वनै नहीं । एकही कोर्हि पदार्थ व्याप्तक वनैहै ॥
मत शंका चनै नहीं । कहैंत ? जो सावयववस्तुका संयोग है, सो तौ अन्यके संयोगका विरोधी हैं । १ जैसैं जा पृथिवीदेशमें हस्तका संयोजग होवें तादेशमें पादका संयोजग होवें नहीं औ निरयचका संयोजग स्थानक रिक्त नहीं । यांतें अन्यके संयोजगका विरोधी नहीं । यह वार्त्ता अनुभवसिद्ध है॥ २ जैसैं घटके जा देशमें आकाशका संयोग है, ता देशमेंही कालका औ दिशाका संयोजगी है । जो कोर्हि घटका देश आकाशकाल- दिशाकैं चाहिर होवें तौ ता देशमें आकाश- काल दिशाका संयोजग होवें नहीं । सो वाहिरि तौ कोई देश है नहीं । किंतु सर्वपदार्थनके सर्वदेश आकाशकालदिशामेंही हैं । यांतें सर्वपदार्थनकैं सर्वदेशनविपैं आकाशकालदिशाका संयोजग है ॥ ॥ ३०९ ॥ सर्वव्याप्तक । ॥ ४०० ॥ सर्वव्यापकका व्याप्तकवस्तुर्सि भिन्न सैं संयोजग हैं । यह इस वाक्यकका अर्थ है ॥
इसरीतिसैं परमाणुविपैं श्री एकही देशमें नानानिरयच चिनुका संयोजग चनैहैं । कोर्हि दोप नहीं । यांतें आत्मा नाना हैं औ संपूर्ण न्याप्तक हैं ॥ ॥३४६॥ [सिद्धांत:-] सर्वेकैं सर्वपदार्थनसैं संयोजग हैं । येँह न्यायकों सिद्धांत है । सो समीचीन नहीं । कहैंत ? जो न्याप्तक आत्मा नाना अंगीकार करें तौं सर्वेशरीरमें सर्वआत्माका संबंध . अंगीकार करना॥ होवैगा । यांतें कौन शरीर किसका है यह निश्र्चय नहीं होवैगा । किंतु एकैक आत्माके सर्वशरीर हुयेचाहिये । जो पेठैं कहैं:-जाके कर्मसैं जो शरीर उत्पन्न हुआहैं ता आत्माका सो शरीर हैं । मरो चो वी चनै नहीं । कहैंत ? कर्में जा शरीर- सैं होवेंहैं तौं कर्में करनैवाले पूर्वशरीरमें चो वी सर्व- आत्माका संबंध हैं । यांतें कर्में चो सर्व- आत्माकेही होवेंगें । एकके नहीं । और पेठैं कहैं:-जा आत्माके मनसहित- शरीर हैं, ता आत्माका सो शरीर है ॥
१ शरीरकी न्याईं मनके साथ चो सर्व- आत्माका संबंध हैं । ताकेऽविपैं यह निश्र्चय होवें नहीं । जो कौनसा मन किस आत्माका है । किंतु सर्वआत्माके सर्वमन हुयेचाहिये । २ तैसैं इंद्रिय वी सर्वआत्माके सर्वही होवेंगें । ३ वाहिरिके पदार्थनविपैं "यह मेरा है । यह औरका है" ऐसा च्यवहार चो शरीरनिमित्तक है । सो शरीर सर्व- आत्माके सवें हैं । यांतें वाहिरिके पदार्थ- वी सर्वआत्माके सर्व हुयेचाहिये । और सर्व परिछिन्न देह इंद्रिय मन परमाणु आदिक वस्तुन- सैं संयोजग हैं । यह इस वाक्यकका अर्थ है ॥
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जो ऐसैं कहैं:- जा आत्माकूं जा शरीरमैं अहंबुद्धि औ ममबुद्धि होवै ता आत्माका सो शरीर है, सो अहंबुद्धि औ ममबुद्धि एक है । यासैं सर्व आत्मामैं रहैं नाहीं । किंतु एकधर्ममैं एकही धर्मोंवैशै रहैहै । यातैं एकही आत्माका शरीर है । जा आत्माका जो शरीर है ता शरीरके संबंधी मनइंद्रिय औ बाह्यके पदार्थ ता आत्माके हैं । यातैं व्यापक नाना आत्मा अंगीकार करनेमैं बी दोप नाहीं ।
सो वार्ता बी बनैं नाहीं । कहैंहैं ? यद्यपि अहंबुद्धि एकदेहमैं एकही आत्माकूं होवैहै तथापि सो न्यायमतमैं बनैं नाहीं । किंतु सर्व आत्माकूं एकदेहमैं अहंबुद्धि हुئیचाहिये । कहैंहैं ? न्यायमतमैं बुद्धि नाम ज्ञानका है सो ज्ञान आत्मा औ मनके संयोगतैं होवैहै सो मनके साथि संयोग सर्वआत्माका है । यातैं मनके संयोगसैं जैसैं एकदेहमैं एकआत्माकूं अहंबुद्धि होवैहै तैमैं एकदेहमैं सर्वआत्माकूं अहंबुद्धि हुई चाहिये ।
जो ऐसैं कहैं:- यद्यपि मनका संयोग तौ सर्वआत्मासैं है तथापि जा आत्मामैं ज्ञानका जनक अदृष्ट है ता आत्माकूंही अहंबुद्धि होवैहै । तौ बी सर्वकूंही ज्ञान हुयाचाहिये । कहैंहैं ? जो व्यापक नाना आत्मा अंगीकार करें तौ एकशरीरकी चेष्टायशुभाक्रियातैं शरीरमैं स्थित सर्वआत्मामैंही अदृष्ट हुये च चाहिये । यह वार्ता पूर्व कही आये; यातैं व्यापक जो नाना आत्मा अंगीकार करैं तौ एकदेहमैं सर्वकूं सुखदुःखका भोग हुया चाहिये ।
यातैं 'व्यापक नाना कर्त्ता मोक्ता आत्मा है' ॥ ४०१ ॥ जैसैं नानाघटककूं व्यापक कहैना निष्फल है तैसैं देहदेहवैशैही कर्त्ता मोक्ता नाना आत्माकूं व्यापक कहैना निष्फल है ।
यह न्यायका सिद्धांत समीचीन नाहीं । औ- ॥ ३४७ ॥ हमारे सिद्धांतमैं तौ कर्त्ता मोक्ता अंतःकरण है, सो अंतःकरण नाना हैं । व्यापक अंतःकरणकूं अणु नाहीं । किंतु शरीरके समान ता अंतःकरणका परिमाण है ॥ दीपकके प्रकाशकी न्याई बड़े शरीरकूं प्राप्ति होवैहै, तैसैं अंतःकरण- का विकार. होवैहै । यह वार्ता सिद्धांतबिंदुके न्यायग्रंथमैं मधुसूदनस्वामीनैं प्रतिपादन करीहै । जा पाऊं ता शरीरसैं संबध है ता अंतःकरण-
कूं भोग होवैहै । जो अंतःकरणकूं व्यापक अंगीकार करें तौ सर्वशरीर सर्वके होवें औ भोग बी सर्वकूं होवै, सो व्यापक अंतःकरण नाहीं । यातैं दोप तौ शरीरके एकदेशमैं अंतःकरण रहैहै ऐसा अंगीकार करनेमैं नाहीं । कहैंहैं ? जो एककालमैंहीं पाद औ मस्तकमैं कंठकवेध होवै तौ दोनूं स्थानमैं एक- ही कालमैं पीडा होवैहै । सो नाहीं हुयीचाहिये । कहैंहैं ? जो अंतःकरण अणु होवै तौ एकही स्थानमैं एककालमैं रहै । यातैं जा स्थानमैं अंतःकरण होवै ता स्थानमैंहीं पीडा हुयीचाहिये । दोनूं स्थानमैं नाहीं ॥
यातैं अंतःकरण अणु औ व्यापक नहिं; किंतु शरीरके समान है । यातैं कोई दोप नाहीं । अणु औ व्यापकसैं विलक्षण जो है, ताहिंही मध्यमपरिमाण कहैंहैं ॥ औ- ॥ ३४८ ॥ [पूर्वपक्षी:-] न्यायमतमैं किसी- नवीननैं ऐसा अंगीकार कियाहै:-
किंवा नानांतःकरणके अंगीकार किये भोगकी असंकरकी सिद्धितैं व्यापकआत्माकूं नाना कहैना निष्प्रयोजन है ॥
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९ आत्मा नाना हैं, कर्त्ता भोक्ता हैं । व्यापक नहीं, यातें भोगका संकर नहीं ॥ २ अशु वी नहीं, यातें दोशस्थानमें पीडाका असंभव वी नहीं । किंतु जैसे वेदांतमतमें अंतःकरण मध्यमपरिमाण है तैसैं आत्मा वी मध्यमपरिमाण है, ताकेविपै चतुर्दशगुण रहहैं । ॥ ३४९ ॥ [ सिद्धांती:- ] सो वी समीचीन नहीं । कहैंतें ? ९ जो आत्माहूं संकोचविकासवाला अंगीकार करें तौ दीपकी प्रभाकी न्यांई आत्मा विकारी औ विनाशवाला होवैगा । यातें मोक्षप्रतिपादक शास्त्र औ साधन निष्फल होंवैंगे । औ- २ मध्यमपरिमाण अंगीकार करिके संकोचविकास अंगीकार नहीं करें तौ कौनसै शरीरके समान आत्माहूं अंगीकार करें, यह निश्चय होवै नहीं ॥ ३ जो महुष्यशरीरके समान अंगीकार करें तौ जब आत्मा हस्तीके शरीरकूं प्राप्त होवै, तव सर्वशरीरमें आत्मा नहीं होवैगा । यातें जादेशमें हस्तीके आत्मा नहीं है तौ देशमें पीडा नहीं हुइचाहिये । औ- ४ हस्तीके शरीरके समान अंगीकार करै तौ तासैं औरशरीर बडे हैं, तिन्हके एकदेशमें पीडा नहीं हुइचाहिये औ सचरैंसै बडा किसीकाशरीर है नहीं । जाकें समान आत्मा अंगीकार करें । औ- ५ सर्वसैं बडा विराद्का शरीर है; ताके समान जो आत्मा अंगीकार करें तौ विराद्के शरीरके अंतरभूत सर्वशरीर हैं । यातें सर्व-
॥४०२ इहां यह रहस्य है:-जैंसैं शरीरके अंतरर्गत मनइंद्रियआदिक सर्वअल्प पदार्थनसैं आत्माका आत्माके सर्वशरीरसैं संघंध होवैगा, ताकेविपै पूर्वपक्षी कहैहैं । औ- यह नियम है:-जो मध्यमपरिमाणवस्तु होवै सो शरीरकी न्यांई अनित्य होवैहै । यातें आत्मा वी अनित्य होवैगा औ अंतःकरणका तो हमारें मतमें ज्ञानते नाश होहै । यातें अनित्य है । मध्यमपरिमाण अंगीकार कियेंसैं दोप नहीं ॥ इसरीतिसैं नवीन ताकिंकमत वी समीचीन नहीं । औ-
॥ ३५० ॥ [ पूर्वपक्षी:- ] जो कोई ऐसैं कहैं:- आत्मा नाना हैं औ अशु हैं । [ सिद्धांती:- ] सो बातैं वी वनै नहीं । कहैंतें ? ९ जो आत्माहूं कर्त्ताभोक्ता अंगीकार करें तौ अंतःकरणके अणुपक्षमें जो दोप कहा सो दोप होवैगा ॥ औ- २ कर्त्ताभोक्ता अंगीकार नहीं करें तौ नानाआत्मा अंगीकार निष्फल होवैगा । एकही न्यायप सर्वशरीरमें अंगीकार करना योग्य है । औ- कर्त्ताभोक्ता अंगीकार नहीं करें तौ अपने सिद्धांतका वी त्याग होवैगा । कहैंतें ? अशु- वादीकै ग्रंह सिद्धांत है:-ज्ञानसुखदुःख- धर्मसैं आदिलेकै आत्माके धर्म हैं । यातें जो आत्माहूं अशु अंगीकार करें तौ जाशरीर- देशमें आत्मा नहीं है, सो देश शूनत्समान है । ताकेविपै पीडादिक नहीं हुइचाहिये ॥
॥ ३५९ ॥ और जो ऐसैं कहै:- यद्यपि आत्मा तौ शरीरके एकदेशमें है । परंतु कस्तूरीके गंधकी न्यांई ताका ज्ञान सारे शरीरमें संयोग है । यातें मध्यमपरिमाणवाले आत्माविषै वी न्यायसंप्रदायुक्त न्यायपकका लक्षण संभवैहै ।
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व्यापक है। यातैं सर्वशरीरविऐँ अनुकूलप्रतिकूलके संबन्धकूं अनुभव कहहै।
सो बी घनै नहीं। कहैंतैं? यह नियम है:-जितनैं देखमैंँ गुणवाला रहै तासैंँ वाहिरि गुण रहै नहीं। किंतु गुणोंमैंँ गुण रहैहै। जैसैंँ रूप घटादिकनतैंँ बाहिरि रहै नहीं, तैसैंँ आत्मतैंँ बी ज्ञान वी बनै नहीं। औ कस्तूरीकै सूक्ष्मभाग जितनैं देखमैंँ व्यापक होवैं, उतनैं देखमैंँही गंध व्यापक होवैहै। दृष्टांत बी बनै नहीं। यातैं 'आत्मा अणु है' यह पक्ष बी बनै नहीं। औ--
कहूँँ श्रुतिमैंँ आत्मा अत्यंतअणुसैंँ बी अणु जो कहाहै सो दुविचार्यै है, यातैं कह्याहै। जैसैंँ अत्यंतअणुवस्तुका मंददृष्टिपुरुपकूंँ ज्ञान होवै नहीं। तैसैंँ बहिरुपुरुपपकूँ आत्माका बी ज्ञान होवै नहीं। यातैं अणुके समान है। यह श्रुतिका अभिप्राय है। औ 'आत्मा अणु है' यह अभिप्राय नहीं। कहैंतैं? बहुुुत्स्थानमैंँ व्यापकरूप आपही वेदनैं प्रतिपादन कियोहै। यातैं अणु नहीं।
इसीरीतैंँ 'व्यापक तथा मध्यमपरिणाम अथवा अशुाआत्मा नाना हैं' यह कहना संभवै नहीं।
|| ३५२ || 'पाँचपरिशोपतैंँ एक व्यापक आत्मा है, ताकोविपै धर्मअधर्म सुखदुःख औ बन्धमोक्ष
|| ४०३ || 'षणोरणीयान्महतो महीयान्'
यह अर्थ उपदेशसहस्रमैंँ भगवान्माष्यकारनै प्रतिपादन कियोहै सो तिसके अनुसर हमनैं विचारचन्द्रोदयपकी दशमकलाविपै युक्तिसहित लिख्याहै। यातैं 'आत्मा अणु है' यह कथन निष्फल है।
|| ४०४ || निषेध भये अवशेष रहै एकअर्थविपै जो निश्चय होवै सो परिशेष कहियेहै। तिसपरिशेषतैंँ
जो अंगीकार करें। तौ किसीकूंँ सुख औ किसीकूंँ दुःख, किसीकूंँ बन्ध, किसीकूंँ मोक्ष, ऐसैं व्यवहार नहीं होवैगो। यातैं धर्मोदिक बुद्धिके धर्म हैं।
यद्यपि बुद्धि जड़ है। यातैं ताकोविपै बी धर्मसुखादिक बनै नहीं। तथापि आत्माके धर्मे नहीं हैं। इस अभिप्रायतैं 'बुद्धिके धर्म हैं' कहियेहैं औ 'बुद्धिके धर्म हैं' याकोविपै अभिप्राय नहीं।
१ जो वस्तु जामैंँ अध्यस्त होवैं, सो तामैंँ परमार्थसैंँ होवै नहीं। जैसैंँ सर्प रज्जुमैंँ अध्यस्त है, सो परमार्थसैंँ रज्जुमैंँ है नहीं। तैसैंँ बुद्धि औ सुखादिक आत्मामैंँ हैं नहीं। औ--
२ अध्यस्तवस्तु बी किसीका आश्रय होवै नहीं। यातैं बुद्धि बी सुखादिकनका आश्रय है नहीं। परंतु--
(१) अज्ञान तौ शुद्धचेतनमैंँ अध्यस्त है। औ--
(२) अंतःकरण अज्ञानउपहितमैंँ अध्यस्त है। औ--
(३) अंतःकरणउपहितमैंँ धर्मअधर्म सुखदुःख बन्धमोक्ष अध्यस्त हैं।
इसीरीतिसैंँ आत्मामैंँ धर्मादिकनके अधिष्ठान-
१ पृथिवीतैं जल सूक्ष्म है औ व्यापक है।
२ जलतैं तेज सूक्ष्म है औ व्यापक है।
३ तेजतैं वायु सूक्ष्म है औ व्यापक है।
४ वायुतैं आकाश सूक्ष्म है औ व्यापक है।
५ आकाशतैं माया सूक्ष्म है औ व्यापक है।
६ मायातैं आत्मा सूक्ष्म है औ व्यापक है। औ ७ इत्यादि श्रुतिनविऐँ आत्माकी सर्वतैं सूक्ष्मता औ व्यापकता कहीहै।
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पनैका अंतःकरण उपाधि है । यातैं अंतःकरणके धर्म कहिये हैं ॥ ॥ ३५३ ॥ जो अंतःकरणविधिष्टैं धर्मो-दिक अध्यस्त कहैं तौ चनै नहीं । कहैंतें ? विशेषणयुक्तका नाम विशिष्ट है ॥ धर्मोद्दिक अध्यासका अधिष्ठान जो आत्मा, ताका अंतःकरण जो विशेषण अंगीकार करें तौ अंतःकरण श्री धर्मसुखादिकंका अधिष्ठान होवैगा ॥ सो वार्ता चनै नहीं । कहैंतैं ? मिथ्या-वस्तु अधिष्ठान होवै नहीं । यातैं आत्मामैं धर्मो-दिकनके अध्यासका अंतःकरण विशेषण नहीं । किंतु उपाधि है ॥ १ उपाधिकाका यह् स्वभाव है :- आप तटस्थ होयके जितनै देशमैं आप होवै उतनै देशमैं स्थित वस्तुकूं जनावै ॥ औ-र विशेषणका यह् स्वभाव है :- जितनै देशमैं आप होवै उतनै देशमैं स्थित वस्तुकूं अपने सहित जनावै ॥ १ विशेषणवानकूं विशिष्ट कहैंहैं । औ-र उपाधिवालेकूं उपहित कहैंहैं । इसरीतिसैं अंतःकरणविशिष्टमैं जो धर्मोद्दिक अध्यस्त कहैं तौ जितनै देशमैं अंतःकरण हैं ता देशमैं स्थित चेतनभाग औ अंतःकरण दोनोंकूं अभिन्नतता होवै । सो अंतःकरण आप भी अध्यस्त है । यातैं अधिष्ठान चनै नहीं इस अभिप्रायैंतैं अंतःकरणुपहितमैं धर्मोद्दिक अध्यस्त कहे ॥ शांतैं "जितनै देशमैं अंतःकरण है उतनै देशमैं स्थित चेतनभागात्रमैं अधिष्ठानता है । अंतःकरणमैं नहीं" यह् वार्ता चनैहै ॥ ॥ ३५४ ॥ तैसैं अंतःकरण भी अज्ञान-उपहितमैं अध्यस्त है । अज्ञानविशिष्टमैं नहीं ॥ इसरीतिसैं अध्यस्त जो धर्मोद्दिक तिन्ह-का अधिष्ठान आत्मा है ॥
१ अध्यासके अधिष्ठानपनैकी अंतःकरण उपाधि है । यातैं बुद्धिके धर्म कहैंहैं । औ-र अविवेकसैं अंतःकरण-आत्मा दोनोंवैं-चियै प्रतीत होवैहै । यातैं अंतःकरण-विशिष्ट जो प्रमाता, ताके धर्म कहहैं । १ धर्मोद्दिक अंतःकरणके धर्म होवें । २ अथवा अंतःकरणविधिष्टप्रमाताके धर्म होवें । ३ अथवा रज्जुसर्प, स्वप्नके पदार्थ, गंधर्व-नगर, नभनीलताकी न्याईं किसीके धर्म ना होवै । सर्वप्रकारसैं आत्माके धर्म नहीं ॥ यद्यपि आत्मामैं अध्यस्त है तथापि जो वस्तु मैं अध्यस्त होवै सो ताहिमैं परमार्थ-सुखदुःख औ वंधमोक्षसैं रहित एकन्यापक आत्मा है ॥ अध्यस्त नाम कल्पितका है ॥ ॥ ३५५ ॥ आत्मा सत् है ॥ सो आत्मा सत् है ॥ १ जा वस्तुका ज्ञानतैं अभाव होवै सो असत् कहियेहै ॥ २ जाकी निष्ठिते किसी कालमैं भी नहीं होवै सो सत् कहियेहै ॥ सर्वपदार्थनका औ तिनकी निवृत्तिका आत्मा अधिष्ठान है ॥ जो आत्माकी निष्ठिति होवै तौ ताका औरअधिष्ठान कह्या चाहिये । कहैंतें ?- १ ज्ञानमैं निवृत्ति होवै नहीं ॥ २ जो आत्मा औ ताकी निवृत्तिका अन्य-अधिष्ठान अंगीकार करै तौ ताका औरअधिष्ठान अंगीकार करना होवैगा ॥ औ-र-
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॥ "मैं कौन हूँ" इसे अगृहीतदृश्योंके प्रकाशकके उत्तरें ॥ ३६०-३६९ ॥ [ विचारसागरे
आत्माकी जो निवृत्ति अंगीकार करै, ताकूं यह पूछेंहैं:- १ जो आत्माकी निवृत्ति किसीनें अनुभवन करीहै ? २ अथवा नहीं?
१ जो ऐसे कहै:-अनुभवन करीहै । सो बनै नहीं । कहैंहैं ? जो अनुभवन करनेंवाला है सोई आत्मा है औ अपना स्वरूप है, तांकि निवृत्तिका अनुभवन अपने मस्तकछेदनके अनुभनवसमान है । यातैं आत्माकी निवृत्तिका अनुभवन बनै नहीं । औ-
२ ऐसे कहै जो:- आत्माकी निवृत्ति तौ होवैहै । परंतू तांकि निवृत्तिका अनुभवन किसीकूं नहीं ॥
तौ यह वात्त्रों सिद्ध हुई । जो आत्माकी निवृत्ति तौ होवै नहीं । कहैंहैं ? जो वस्तु किसीनें अनुभवन नहीं करी, सो वंध्यापुत्रके समान होवैहै ।
यातैं आत्माकी निवृत्ति होवै नहीं । याहीतैं आत्मा सत् है ॥ औ-
॥ ३५६ ॥ आत्मा चित् (चैतन्य) है
॥ ३५६-३५९ ॥ आत्मा चित् है ॥
प्रकाशरूप जो ज्ञान सो चितैं कहियेहै ॥ १ जो अपकाशरूप आत्मा अंगीकार करैं तौ अनात्मजड़वस्तुका प्रकाश कदै होवै नहीं ॥ २ जो अंतःकरण औ इंद्रियनसैं पदार्थनका प्रकाश करैं तौ बनै नहीं । कहैंहैं ? अंतःकरण औ इंद्रिय परिच्छिन्न हैं । यातैं कार्य हैं ॥ १ जो परिच्छिन्न होवै सो घटकी स्थाई
कार्ये होवैहै औ अंतःकरण इंद्रिय बी परिच्छिन्न है, यातैं कार्ये हैं ॥ २ देशकालतैं जाका अंत होवै सो परिच्छिन्न कहियेहै ॥ ३ जो कार्ये होवैं सो जड़ होवैहै ॥
अंतःकरण औ इंद्रिय बी जड़ हैं । तिनतैं किसी वस्तुका प्रकाश बनै नहीं । यातैं जो आत्मा सर्वेका प्रकाश करैहै । सो प्रकाशरूप
॥ ३५७ ॥ जो ऐसें कहैं:-आत्मा प्रकाशरूप नहीं किंतु आत्मा तौ जड़ है औ ताकेविषै ज्ञानगुण है, ता ज्ञांतैं आत्मा औ अनात्माका प्रकाश होवैहै ॥ ताकूं यह पूछैंहैं:-
१ आत्माका ज्ञानगुण नित्य है? २ अथवा अनित्य है?
१ जो नित्य कहैं— तौ आत्माका स्वरूपही ज्ञान सिद्ध होवैगा । कहैंहैं ? यह नियम है:-जो आत्मासैं भिन्न होवै, सो अनित्य होवैहै ॥ जो ज्ञानकूं
आत्मासैं भिन्न अंगीकार करैं तौ अनित्यही ज्ञान है । यह कहना बनै नहीं । औ-
२ जो अनित्य अंगीकार करैं— तौ घटादिककी न्याईं जड़ होवैगा । जो अनित्यवस्तु होवै सो जड़ होवैहै । यातैं "ज्ञान अनित्य है" यह कहना बनै नहीं । किंतु ज्ञान नित्यही है ॥ सो नित्यज्ञान आत्मस्वरूपही
है ॥ जो अनित्य अंगीकार करैं तौ कदाचित् आत्मामैं ज्ञान होवै औ कदाचित् नहीं । यातैं आत्मासैं भिन्न बी ज्ञान होवै औ नित्य
अंगीकार कियेसैं तौ भिन्न होवै नहीं ॥
॥ ४०५ ॥ अलक्ष्यप्रकाशरूपं चित्त् कहैंहैं ॥
चैतनरूप ज्ञानका लोप नहीं है । इस अर्थविर्षे यह दृष्टि है:-द्रष्टाकी (स्वरूपप्रभूत) दृष्टिका लोप (नाश) नहीं है । अभिनाशी होवेंहैं ॥
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जो गुण होवै सो गुणवानुविहै कदाचित् रहै औ कदाचित् नहीं वी रहै । जैसे वस्खका नीलपीतगुण कदाचित् रहै औ कदाचित् नहीं रहै, यातैं जो गुण होवै सो आगमापायी होवैहै । औ-
ज्ञातकं नित्यता होनैंतैं आगमापायी है नहीं यातैं आत्माका स्वरूपही ज्ञान है । औ-
॥ ३५८ ॥ ज्ञातकूं अनित्य कहैं तौ 'इंद्रिय अथवा अंतःकरणसैं ज्ञान उत्पन्न होवैहै' यह कहना होवैगा ।
सो बनै नहीं । कहैंतैं ? सुपुप्तिमें इंद्रियादिक तौ हैं नहीं औ सुखका ज्ञान होवैहै सो नहीं लुबा चाहिये ।
जो सुपुप्तिमें सुखका ज्ञान अंगीकार नहीं करें तौ जागिके 'मैं सुखैँ सोया' यह सुपुप्तिके सुखकी स्मृति होवैहै, सो नहीं हुइचाहिये । जा वस्तुका पूर्व ज्ञान होवै ताकी स्मृति होवैहै औ अज्ञातवस्तुकी स्मृति होवै नहीं औ सुपुप्तिके सुखकी जागिके स्मृति होवैहै, यातैं सुपुप्तिमें सुखका ज्ञान होवै है । ता ज्ञातके जनक इंद्रियादिक सुपुप्तिमें हैं नहीं । यातैं नित्य है ।
ज्ञातकूं त्यागिके आत्मा कदै वी रहै नहीं, यातैं ज्ञान आत्माका स्वरूप है । जैसे उष्णताकूं त्यागिके अग्नि कदै वी रहै नहीं, यातैं उष्णता वह्निका स्वरूप है, तैसैं ज्ञान वी आत्माका स्वरूप है । जो आगमापायी होवै सो गुण होवैहै । उष्णता और ज्ञान आगमापायी हैं नहीं, यातैं अगिे औ आत्माके स्वरूप हैं ।
॥ ४०६ ॥ जातैं एकही विपयतैं कसीकूं सुख होवैहै औ कसीकूं दुःख होवैहै । यातैं सो विषय नियमतैं अपनी इच्छांतें रहित किंचा इच्छासहित सर्व पुरुषकूं सुखका हेतु नहीं । किंतु विषयकी वि. सा. २९
जो वस्तु कदाचित् होवै औ कदाचित् न होवै सो आगमापायी कहियैहै ।
॥ ३५९ ॥ उत्पत्ति औ विनाशा अंतःकरणकी दृष्टिके होवैंहैं, ज्ञानके नहीं ।
९ आत्मस्वरूप जो ज्ञान है सो विशेषव्यवहारका हेतु नहीं । किंतु ज्ञानसहित वृत्ति अथवा वृतितैं आरूढ ज्ञान व्यवहारका हेतु है । यह अवच्छेदवादकी रीति है । औ-
आभासवादमैँ आभाससहित वृतिसैं व्यवहार होवैहै । आभासद्वारा अथवा साक्षात् वृत्तिद्वारा आत्मस्वरूपज्ञानसैही सर्व व्यवहार सिद्ध होवैहै । नहीं तौ होवै नहीं ।
इसरीतिसैं सर्वका प्रकाशक ज्ञानस्वरूप आत्मा है । यातैं चित् है । औ-
॥ ३६० ॥ आत्मा आनंदरूप है
॥ ३६०-३६३ ॥
आत्मा आनंदरूप है ।
जो आत्मा आनंदरूप नहीं होवै तौ विपयसंवंधसैं स्वरूपआनंदका मान होवैहै, सो नहीं हुइचाहिये । विपयमें आनंद नहीं । यह बातों पूर्व कहीहै ।
जो विपयमें आनंद होवै तौ जा विपयतैं एकपुरुपकूं सुख होवै तासैही अन्यकूं दुःख होवैहै । जैसे अधिकें सर्पतैं अधिकीटर्कूं औ सर्वपिंशकके रूप देखनतैं सर्पनीसिंहनिकूं आनंद होवैहै औ अन्यपुरुपनकूं दुःख होवैहै सो नहीं हुइचाहिये औ सिद्धांतमैँ तौ अधिकीटर्कूं
इच्छासहित पुरुपकैही अपनी प्रातिलैं इच्छाके तिरस्कारद्वारा अंतःमुख भई वृत्तिमें प्रियेमोदप्रमोदके पर्यायूप आत्मस्वरूप आनंदके प्रतिबिंबमैं निमित्त है । यातैं विपयमें आनंदकी कारणताका ब्यमिचार है । औ-
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२५८६ ॥ "मैं कौन हूँ" इस अग्रधनदेवके प्रथका उच्तर ॥३८०-३८९॥ [ विचारसागर
अभिस्पर्धकी इच्छा होवें, तब चंचल-बुद्धिमें स्वरूपआनंदका मान होवें नहीं । अभिसंबंधतें क्षणमात्र इच्छा दूरि होयके निश्वलबुद्धिमें स्वरूपआनंदका मान होवेंहै । अन्यपदार्थकी इच्छा है नहीं किंतु पुरुषनें अभिसंबंधकी इच्छा है । तिन पदार्थकी इच्छा अभिसंबंधसैं दूरि होवें नहीं, यातें चंचलअंतःकरणमें अभिसंबंधसैं आनंद होवें नहीं । ताकेविचै—
॥ ३८१ ॥ यह शंका होवेंहै:-जो इच्छारूप अंतःकरणकी वृत्ति है सो तौ विपयग्रासिकैं नाशकूं प्राप्त होयगई औ अन्वयवृत्तिका कोई निमित्त है नहीं, यातें उत्पत्ति हुई नहीं औ वृत्तिसैं बिना स्वरूपआनंदका मान होवें नहीं; यातें विषयमेंही आनंद है । सो बातें बनें नहीं । कहतें—
१ यचपि इच्छारूप तौ अंतःकरणकी वृत्ति है सो इच्छारूप वृत्ति अभाव है सो तौ ताकेविचै आनंद प्रकाश होवें नहीं । कहतें ? इच्छारूप वृत्ति राजस है औ आनंदका प्रकाश सात्विकवृत्तिमें होवेंहै । तथापि वाछितपदार्थ जो मिल्याहै ताके स्वरूपकूं विषय करनें वास्ते, जो ज्ञानरूप अंतःकरणकी वृत्ति है सो सात्विक है । कहतें ? सत्गुणसैं ज्ञान होवेंहै यह नियम है । ता सात्विक वृत्तिमैं आनंदका मान होवेंहै । परंतु सो ज्ञानरूप वृत्ति विषयकी प्राप्तिसैं किंवा एकांतदशाके सेवनतैं होता जो है इच्छाका अभाव, सो प्रतिबिंबरूप सुखका नियमित कारण है ।
जो आत्मा आनंदरूप नहीं होवें तौ अंतःमुखवृत्तिविषै जो आनंद होवेंहै सो नहीं हया चाहिये । यातें आत्मा आनंदरूप है । यह सारे प्रकरणका निष्कर्ष ( निचोड़ ) है ।
ताके पृष्ठभागमें स्थित जो अंतःकरणउपहित चेतनस्वरूप आनंद, ताकी तिस वृत्तिसैं ग्रहण होवें नहीं । यातें विपयउपहितचेतनरूप आनंदका मान होवेंहै, सो विपयउपहितचेतन आत्मासैं भिन्न नहीं । यातें आत्मानंदकाही विपयमें मान कहिये है । ॥ ता ज्ञानरूप वृत्तिविषै विषयके साथ नेत्रादिकनका संघही निमित्त है ॥
२ अथवा ज्ञानरूप जो बहिर्मुखवृत्ति तासैं अन्यअंतर्मुखवृत्तितैं होवेंहै । ताकेविचै—अंतःकरणउपहितचेतनरूप आनंदकाही मान होवेंहै । यह उत्तमसिद्धांत है । ता वृत्तिकी उत्पत्तिमैं इच्छादिकनका अभावही निमित्त है । जैसे इच्छादिकनतैं रहित जो एकांतमें उदासीनपुरुष स्थित है, ताकूं बहिर्मुखज्ञानरूपतैं कोई वृत्ति होवें नहीं । आनंदका मान होवेंहै । यातैं इच्छादिकनके अभावरूप निमित्ततैं अंतरमुखवृत्ति आनंद ग्रहण करनेवाली होवेंहै । तासैं वाछितज्ञानसैं अनंतर अंतरमुखवृत्ति होवेंहै । तिसतैं अंतःकरणउपहित आनंदकाही ग्रहण होवेंहै ।
सो स्वरूपआनंदका ग्रहण औ विपयका ज्ञान अत्यंत अव्यबहित है, यातें पुरुषकूं ऐसी श्रुति होवेंहै:- मन विषयमें आनंद अनुपम
॥ ४०७ ॥ प्रकामप्रतायुक्त सात्विकीवृत्ति । याहीकूं मियमोद औ प्रमोदवृत्ति बी कहतेंहैं ।
॥ ४०८ ॥ जैसैं ध्यान हृदयकूं चावताहै, तिसकरि अपने मुखके मसोदेआदिक टूटे । श्वासयवनसैं रुधिर निकसताहै ताकूं प्राशन करिके "यह रुधिर मुखहृदयिमैं प्रास भयाहै" ऐसैं मनाताहै । तैसैं वाछित विषयकी प्राप्तिरूप निमित्तसैं इच्छाकी निवृत्ति
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कियाहैं? । प्रथमेंपक्षैं यह पक्ष उत्तम है । कहाहैं ? जो विपयका ज्ञानरूप दृष्टि है तैंसैं अंतःकरणउपहित आनंदका तौ भान चनै नहीं । यातैं विपयउपहित आनंदका भान होवैगा तौ मार्गमें दृष्टिका जो ज्ञानरूप दृष्टि है, सो वी सोत्मक है । तैसैं वी दृष्टउपहित चेतनस्वरूप आनंदका भान हुवा चाहिये । तैसैं सर्वज्ञातैं जेयउपहित चेतनरूप आनंदका भान हुवा चाहिये, यातैं अनात्मवस्तुका ज्ञानरूप जो वहिर्दृष्टिदृष्टि तैंसैं जेयउपहित चेतनस्वरूप आनंदका ग्रहण होवैं नहीं ।
इसीरीतैं विपयके सवंधैं आत्मस्वरूपानंदका भान होवैहै । जो आत्मा आनंदरूप नहीं होवै तौ विपयसवंधैं आनंदका भान चनै नहीं । यातैं आत्मा आनंदरूप है । औ--
३६२ । आत्माका सवंधी जो वस्तु है ताकोविषै प्रेम होवैहै । तैसैं सनिहितैं अधिक प्रीति होवैहै । इसीरीतैं वाहिरबाहिरके पदार्थनकी अपेक्षातैं अंतरअंतरके पदार्थनमें अधिकप्रीति है ।
१ परंपरातैं आत्माका सवंधी जो पुत्रका मित्र तामैं प्रीति होवैहैं । २ पुत्रके मित्रकी अपेक्षातैं पुत्रमें अधिकप्रीति होवै है । औ--
द्वारा अंतरमुख भई दृष्टिविपै प्रतिबिंबित स्वरूपआनंदका अनुभवकरिके "मैंने विषमें आनंद अनुभव कियाहै" ऐंसी अभिवेकी परंपरैं भ्रांति होवैहै ।
तिस आभकरि सो फेर वी अधिकअधिक विषयकी प्रातिके निमित्त प्रयत्न करताहै औ विवेकीपुरुषकौं उक्तप्रांति नहीं है । यातैं सो निरुपाधिक आनंदकी प्रातिके निमित्त वेदांतविचारआदिकविषै प्रयत्न करताहै ।
१ यद्यपि विषयमैं जो आनंदका भान होवैहै, सो वी स्वरूपका आनंद है । तथापि श्वानकी खड्डीविषै स्थित दुष्टधकी न्याई निपिद्ध होतैं सो
३ पुत्रसैं वी स्थूलसूक्ष्मशरीरमैं अधिकप्रीति है । औ-- ४ स्थूलसूक्ष्मशरीरमैं श्री. स्थूलतैं सूक्ष्ममैं अधिक प्रीति है । पूर्वपूर्वसैं उत्तरउत्तर आत्माके समीप हैं ।
५ आत्माका आभास सूक्ष्मशरीरमैं है, औरमैं नहीं । यातैं आभासद्वारा आत्माका सूक्ष्मशरीरसैं सवंध है । औरसैं नहीं ।
२ स्थूलशरीरसैं सूक्ष्मशरीरका सवंध है । यातैं स्थूलशरीरसैं सूक्ष्मशरीरद्वारा आत्माका सवंध है । औ--
३ पुत्रसैं स्थूलशरीरद्वारा सवंध है । औ ४ पुत्रके मित्रसैं पुत्रद्वारा सवंध है । इसीरीतैं उत्तरउत्तर जो आत्माके समीप ताकोविषै अधिक प्रीति है ।
जा आत्माके सवंध होतैं पदार्थमैं प्रीति होवै ता आत्मामैंही मूलप्रीति है औरपदार्थमैं नहीं । जैसैं पुत्रके मित्रमैं पुत्रके सवंधसैं प्रीति है, यातैं पुत्रमैं प्रीति है, पुत्रके मित्रमैं नहीं, तैसैं आत्माके अधिकसमीपमैं अधिकप्रीति है । यातैं आत्माविषैही सर्वकी प्रीति है ।
विपयआनंद उपादेय नहीं । कितु अनेकविक्षेपका हेतु होतैं हेय है ।
२ विषयके अभिमानपूर्वक विचारआदिक साधनतैं जो आनंदका भान होवैहै सो सुवर्णआदिकके पात्रविष स्थित दुष्टधकी न्याईँ शास्त्रविहित होतैं उपादेय है ।
१६९ । "विष्याकारदृष्टिसैं विषयउपहित चेतनरूप आनंदका भान होवैहै" इस प्रथमपक्षसैं "अन्य अंतःकरणउपहित चेतनभानआनंदकाही भान होवैहै" यह द्वितीयपक्ष उत्तम है । यहही पक्ष पूर्व चतुर्थ्यतरंगविषै वी कहाहै ।
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२२८ ॥ 'मैं कौन हूँ' इस अग्रंधदेवके प्रश्नका उत्तर ॥ ३५०-३६९ ॥ [विचारसागर
सो प्रीति आनन्दमें और दुःखके अभावमें होवैहै, औरमें नहीं । औरपदार्थमें जो प्रीति होवै सो आनन्द और दुःखके अभावके निमित्त होवैहै । यातैं आनन्द और दुःखके अभावसैं औरमें प्रीति नहीं । यातैं सच्ची प्रीतिका विषय जो आत्मा सो आनंदरूप है । औ-दुःखका अभाव आत्मारूप है । कल्पितका अभाव अधिष्ठानरूप होवैहै । जैसे सर्पका अभाव रज्जुरूप है यातैं कल्पित जो दुःख ताका अभाव वी आत्मारूप है ।
इसेरीतिसैं आत्मा आनंदरूप है । औ-
॥ ३६३ ॥ न्यायमतमें आत्माका आनन्दगुण है सो समीचीन नहीं । कहतैं? जो आनन्दगुणकूं नित्य अंगीकार करें तौ आगमापायी नहीं होवै । यातैं आत्माका स्वरूपही आनन्द सिद्ध होवैगा और नित्यानन्द न्यायमतमें है वी नहीं ॥ औ-
अनित्य जो कहैं, तौ अनित्यविषय और इन्द्रियके संबंधसैं आनन्दकी उत्पत्ति अंगीकार करनी होवैगी । यातैं सुखसैं आनन्दका भान नहीं हुवा चाहिये । कहतैं? सुपुसिमैं विषयका और इन्द्रियका संबंध है नहीं । यातैं आत्माका आनन्दगुण नहीं किंतु आत्मा आनंदरूप है । इसेरीतिसैं आत्मा सत्चिदानन्दरूप है ॥
॥ ३६४ ॥ सच्चिदानन्द परस्पर भिन्न नहीं ॥ ३६४-३६५ ॥
सो सच्चिदानन्द परस्पर मिल्न नहीं किंतु एकही है । जो आत्माके गुण होवें तौ परस्पर भिन्न वी होवें । और आत्मस्वरूप है । यातैं
१ एकही चेतन सर्वप्रपंच और मायाका अधिष्ठान है, यातैं ब्रह्म कहियेहै ।
२ अविद्या और न्यतिदेहादिकनका अधिष्ठान है, यातैं आत्मा कहियेहै ।
१ तत्पदका लक्ष्य ब्रह्म कहियेहै । औ-
२ त्वंपदका लक्ष्य आत्मा कहियेहै ।
१ ईश्वरसाक्षी तत्पदका लक्ष्य है । औ-
२ जीवसाक्षी त्वंपदका लक्ष्य है ।
१ व्यक्तिसंघातउपहित चेतन जीवसाक्षी है । औ-
२ जड़सैं चेतन कहियेहै । औ-
३ दुःखसैं चेतन सुखप्रीतिका निपय है । यातैं आनन्द कहियेहै ।
जैसे उष्णप्रकाशरूप अग्नि है तैसे सचिन्त-आनंदरूप आत्मा है । औ-सचितानन्दस्वरूपही शास्त्रमें ब्रह्म कहा है ।
यातैं रजकस्वरूप आत्मा है ॥ औ-ब्रह्म नाम व्यापकता है ।
१ देशतैं जाका अंत नहीं होवै सो व्यापक कहियेहै । तैसे आत्मा जो मिल्न होवै तौ देशतैं अंतवाला होवैगा ॥
२ 'जाका देशतैं अंत होवै ताका कालसैं वी अंत होवै' यह नियम है । यातैं अनित्य जाका कालसैं अंत होवै सो अनित्य कहियेहै । यातैं ब्रह्मसैं भिन्न आत्मा होवैगा ! जो अनात्मा घटादिक हैं सो जड़ हैं,
यातैं आत्मासैं भिन्न ब्रह्म वी जड़ही होवैगा । यातैं आत्मासैं भिन्न ब्रह्म वी नहीं । किंतु ब्रह्मस्वरूपही आत्मा है ॥
॥ ३६५ ॥
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२ समष्टिसंघातउपहित चेतन ईश्वरसाक्षी कहियेहै ।
यद्यपि जीवकी औ ईश्वरकी एकता चै नहिंँ तथापि जीचसाक्षी औ ईश्वरसाक्षीका उपाधिके भेदसैं भेद है औ खरूपसैं एकही है ।
जैसे मठमैंँ स्थित जो घटाकाश औ मठाकाश तिन्हका उपाधिके भेदविना स्वरूपसैं भेद नहिंँ, तैसे आत्मा औ ब्रह्मका उपाधिभेदविना भेद नहिंँ । एकही वस्तु है ।
॥ ३६६ ॥ ब्रह्मरूप आत्मा अजन्मा है ॥
सो ब्रह्मरूप आत्मा अजन्मा कहियेहै जन्मरहित है ।
जो आत्माका जन्म अंगीकार करें तौ अनित्य होवैगै । सो वादी परलोकवादी जो आस्तिक हैं तिन्हदूँ इष्ट नहिंँ ।
काहैं ? जो आत्मा उत्पत्तिनाशवान् होवै तो प्रथमजन्मविप्रै पूर्वकर्मविनाही सुखदुःखका भोग औ किये कर्मका भोगसैं विना नाश होवैगा ।
यातैं कर्तामोक्ता जो आत्मा अंगीकार करें तौ वी जन्मनाशरहितही अंगीकार करना होवैगै ।
औ आत्माका जन्म जो अंगीकार करें तौ हेतुसैं विना तौ किसी वस्तुका जन्म होवै नहीं ।
यातैं किसी हेतुसैंही जन्म कहनाहोवैगै । सो चनै नहिंँ ।
काहैं ? जो आत्माका हेतु हैं सो आत्मासैं भिन्न होइँ कहनाहोवैगै ।
सो आत्मासैं भिन्न संपूर्ण आत्मासैं कल्पित हैं ।
यातैं आत्माका हेतु चनै नहिंँ ।
जैसे रज्जुमैं कल्पितसर्प रज्जुका हेतु नहिंँ तैसे आत्मामैं कल्पितवस्तु आत्माका हेतु नहिंँ ।
॥ ३६७॥ जैसे एकरज्जुविपै नानापुरुपनकूँ दंड, सर्प, पृथिवीरुपा, जलधाराकी भ्रांतिहोवैहै ता भ्रांतिमैं दो अंश हैं ॥
१ एक तौ सामान्यइदंदंश है औ-२ एक सर्पादिक विशेषअंश है ॥
१ "यह सर्प है ।
२ यह दंड है ।
३ यह पृथिवीकी रुपा है ।
४ यह जलकी रुपा है । "
इसरीतिसैं सर्पादिक विशेषअंशमैंँ इदंदंश सारे व्यापक है ।
सो व्यापक सामान्यइदंदंश रजुस्वरूप है ।
ता सामान्यइदंदंशके ज्ञानकूँही भ्रांतिका हेतु रज्जुका सामान्यज्ञान कहैहै ।
सो सामान्यइदंदंश सत्य है ।
काहैं ? रज्जुका ज्ञान हुवैसैं अनंतर वी ता इदंदंशकी प्रतीति होवैहै ।
१ जैसे श्रोत्रिकोलमैंँ "यह सर्प है" यारीतिसैं सर्पादिकनसैं मिलिके इदंदंशकी प्रतीति होवैहै ।
२ तैसे ब्रांतिकी निवृत्तिसैं अनंतर वी "यह रज्जु है" यारीतिसैं रज्जुके साथ मिलिके इदंदंशकी प्रतीति होवैहै ॥
जो इदंदंश वी मिथ्या होवै तौ सर्पादिकनकी नयाई ब्रांतिकी निवृत्तिसैं अनंतर ताकी वी प्रतीति नहीं हुइचाहिये ।
यातैं सर्पादिक भ्रांतिमैं व्यापक जो इदंदंश सो सत्य है औ अधिष्ठान रजजुलुप है औ परस्परवभिचारी जो सर्पादिक सो कल्पित हैं ।
॥ ३६८ ॥ तैसे सर्वपदार्थनमैंँ पांचअंश हैं ॥
१ एक नाम, २ रुप, ३ अस्ति, ४ मति, औ ५ प्रिय ।
१ "घट" यह दोअक्षरका नाम ।
२ गोल रूप है ।
३ घट "है" यह अस्ति ॥
४ "घट प्रतीत होवैहै" यह 'मति ।
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२३० ॥ "मैं कौन हूँ" इस अगृथ्यदेवके प्रक्क्षका उत्तर ॥ ३५०-३६९ ॥ [ विचारसागरे
५ "घट प्रिय है" यह आनन्द । (सर्पादिक प्रिय हैं इसरीतिसैं सर्वपदार्थनमें पांच अंश हैं । १-३ तिन्हविपै अस्ति-भाति प्रियरूप तीन- अंश सर्वपदार्थनमें व्यापक हैं । औ- ४-५ नाम-रूप वयभिचारी हैं ।
जो वस्तु कहूँ होवै औ कहूँ नहीं होवै सो वयभिचारी कहियेहै ।
१-२ 'घट'नाम औ 'गोल'रूप पटविपै नहीं हैं । 'पट'नाम और ताका रूप घटविपै नहीं है । इसरीतिसैं सर्वपदार्थनविपै नामरूपअंश वयभिचारी हैं । औ- ३-५ अस्ति-भाति-प्रियरूप सर्वविपै अनुगत हैं । जैसे सर्पदंडादिकनमें अनुगत इदंतअंश सत्य औ अधिष्ठान है ।
तैसे सर्वपदार्थनमें अनुगत अस्ति- भातिप्रियरूप सत्य है औ अधिष्ठान- रूप हैं । औ- १-२ सर्पदंडादिकनकी न्याई वयभिचारी नामरूप कल्पित हैं औ- ३-५ अस्ति-भाति-प्रिय सच्चितआनंदरूप हैं यातैं आत्मस्वरूप है ॥
इसरीतिसैं सच्चितआनंदरूप आत्माविपै संपूर्ण नामरूपप्रपंच कल्पित है । सो कल्पित- पदार्थ कोई आत्माके जन्मका हेतु बनै नहीं । यातैं आत्मा अजन्मा है ॥
॥ ३६० ॥ जन्मसैं रहित है ।
॥ ३६१ ॥ "घटो जायते (घट होतहै)" इस व्यवहारका हेतु जन्म है । तिसके अनंतर "घटह्रे"
इसरीतिसैं अजन्मा कहिये . जन्मादिक पंदविचारसैं रहित आत्मा है । सत्ता नाम प्रगटताका है । औ- अपकष्य नाम घटनैक है ।
॥ ३६९ ॥ आत्मा असंग है । सो आत्मा असंग है । संग नाम संबंधका है । सो सजातीय- विजातीय-स्वगत-पदार्थनसैं होवैहै ॥ जैसे:- १ घटका घटसैं जो . संबंध है सो सजातीयसैं संबंध है । औ- २ घटका पटसैं जो संबंध सो विजातीयसैं संबंध है ।
३ स्वगत नाम अवयवका है । यातैं पटका तंतु सैं जो .संबंध सो स्वगतसैं संबंध है । १ आत्मा दोे अथवा अनंत होवें तौ सजातीयसैं आत्माका संबंध होवै सो आत्मा एक है । यातैं सजातीयआत्मासैं आत्माका संबंध नहीं ॥ औ-
२ आत्मासैं विजातीय . अनात्मा है सो मृगतृष्णाके जलकी न्याई आत्मामैं कल्पित है । जैसे मृगतृष्णाके जलसैं पृथिवीका संबंध होवै नहीं, जो संबंध होवै तौ उपरभूमि ता जलसैं मिली हुयी कहिये ॥ जैसे मृगतृष्णाके जलसैं उपरभूमिका संबध . नहीं तैसे आत्मामैं कल्पित .जो विजातीयअनात्मा तैसे आत्माका संबंध नहीं ॥
३ जो आत्माके अवयव होवें तौ आत्माका जात: (घट जन्मकू पाया )" इस व्यवहारका हेतु द्रव्यतारूप विकार है । याहीकूं प्रगटतता वी कहतहैं बौ सत्ता वी कहतहैं ॥
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पग्रस्तरंगः ६ ] ॥ आत्मा असंग है ॥ जगत्कर्ता ईश्वर सर्वंशक्तिमान् स्वतंत्र है ॥ ३७९
स्वगतं संबंध होवें । आत्मा नित्य है । यांतें निरवयव है, ताकें स्वगतमें संबंध यनें नहीं । इसरीतिमें सजातीय-विजातीय-स्वगतसंबंध आत्माविपें नहीं । यांतें आत्मा असंग हैँ ॥
इसरीतिमें हे शिष्य ! सच्चिदानंदघनरूप, अनंतशक्तिविकाररहित औ असंग आत्मा है । "सो तूं हैँ" यह प्रथमप्रश्नका अर्धदोहैंसें आचार्यैं उत्तर कयो ॥
(२ "संसारका कर्त्ता कौन है" याका उत्तर ॥ ३७०--३७२ ॥ )
॥ ३७० ॥ जगत्का कर्त्ता ईश्वर है ॥
"जगत्का कर्त्ता कौन हैँ" यह द्वितीयप्रश्नका उत्तर अर्धदोहैंसें कहहैं:--
॥ दोहा ॥ विभु चेतन माया करै, जगको उत्पत्ति भंग ॥
टीका:--विभु कहिये व्यापक जो चेतन, ताके आश्रित ओं ताड़ें त्रिपय करनेंहाली माया कहिये सत्असत्सें विलक्षण अद्भुतशक्तिरूप अज्ञान, तासें जगतकी उत्पत्ति भंग होवेंहें ।
उत्पत्ति औ भंग कहनेंतें स्थितिका ग्रहण अर्थंत होवेंहें ।
यांतें यह अर्थ सिद्ध हुवा:-- १ मायायुक्त जो चेतन सो ईश्वर कहियेहें । २ सो ईश्वर जगत्की उत्पत्तिपालननाशका हेतु हैँ ।
या कहनेंतें-- १ "जगत्का कोई कर्त्ता है अथवा आपसें होवेंहें ?" याका उत्तर कयो ॥ औ-
२ "जगत्का कर्त्ता कोई जीव है अथवा ईश्वर हैँ" याका मी उत्तर कयो ।
॥ ३७१ ॥ ईश्वर १ सर्वज्ञ, २ सर्वशक्तिमान, औ ३ स्वतंत्र हैँ ॥
जगत्का कर्त्ता ईश्वर हैँ । आपसें होवें नहीं । जो कर्त्ताओं बिना जगत् होवेंहें तौं कुलालविना घट हुवा चाहिये । यांतें अगत्का कोईकर्त्ता हैँ । १ मो कर्त्ता सर्वज्ञ हैँ । कहैंतें ? जो कार्यका कर्त्ता होवें सो तौं कार्यौं औ ताके उपादानकूं जानिके करहैं । यांतें जगत्का कर्त्ता भी जगतकौं ओं जगतके उपादानकूं जानिके करहैं । इसरीतिमें जगत्का कर्त्ता जगतकौं औ जगतके उपादानकूं जानहैं । यांतें सर्वज्ञ
२ सर्वशक्तिमान् हैँ । कहैंतें ? जो अल्पशक्तिवाले जीव हैँ तिन्हैंसें या जगत्की रचना मनमें मी चिंतन होवें नहीं । यांतें अद्भुत-
शक्तिवाला हैँ ॥ इसरीतैं जगत्का कर्त्ता सर्वशक्तियान् हैँ ॥ औ-३ स्वतंत्र हैँ । कहैंतें ? जो न्यूनशक्तिवाला पराधीन होवेंहें औ सर्वशक्तिवाला पराधीन होवें नहीं । यांतें स्वतंत्र हैँ ॥
इसरीतिसैं जगत्का कर्त्ता सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् स्वतंत्र हैँ । ताकूं ईश्वर कहहैं । औ-
॥ ३७२ ॥ अल्पज्ञ अल्पशक्तिमान् पराधीनकूं जीव कहहैं ।
घटादिक अल्पज्ञतादिक जीवमें मी परमार्थसें नहीं तथापि अविद्याकृत मिथ्या अल्पज्ञतादिक जीवमें प्रतीति होवेंहें । यांतें जीवमें कहियेहैं । अविद्याकृत अल्पज्ञतादिकनकी जो भ्रांति सोई जीवता हैँ ।
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५३८२ ॥ "संसारका कर्ता कौन है?" इस अज्ञदेवके प्रश्नका उत्तर॥३७०—३७४॥ [ विचारसागरे
सो अल्पज्ञतादिकनकी आंती ईश्वरमें नहीं । किंतु मायाकृत सर्वज्ञतादिक ईश्वरमें हैं । यह वार्ता विस्तारसैं आगे प्रतिपादन करेंगे । इसरीतिसैं जगत्का कर्ता जीव नहीं । ईश्वर है ।
॥ ३७३ ॥ ईश्वर कर्ता नित्य है ॥
सो ईश्वर एकदेशमें स्थित नहीं किंतु सर्वत्र व्यापक है । जो एकदेशमें अंगीकार करें तौ जा वस्तुका देशतैं अंत होवै ताकी कालसैं बी अंत होवैहै यातैं अनित्य होवैगा ॥ जो अनित्य होवै सो कर्तासैं जन्म होवैहै । यातैं ईश्वरका बी कर्ता अंगीकार करना होवैगा ॥
सो ईश्वरका कर्त्ता बनै नहीं । कहैंतैं ? १ आप तौ अपना कर्ता बनै नहीं । जो अपना कर्ता आपही अंगीकार करें तौ आत्माश्रयदोष होवैगा ॥ आपही क्रियाका कर्ता(आश्रय) औ आपही क्रियाका कर्म ( क्रियाका विषयरूप कार्य ) होवै तहां आत्माश्रय होवैहै । जैसैं कुलाल क्रियाका कर्त्ता है औ घट कर्म है तैसैं क्रियाका कर्त्ता औ कर्म भिन्न होवैंहैं । एक बनैं नहीं । यातैं आत्माश्रय दोष है ॥
कर्म नाम कार्यका है । औ—कार्यके विरोधीका नाम दोष है ॥ आत्माश्रय कार्यका विरोधी है । यातैं दोष है । यातैं— २ ईश्वरका कर्ता अन्य अंगीकार करना होवैगा । सो अन्य बी प्रथम कर्ताकी न्यांई कर्ताजन्यही कहना होवैगा ॥ सो ताका कर्त्ता बी प्रथमकी न्यांई तासैं मिल्रही कहना होवैगा ॥ सो प्रथम जो ईश्वर है, ताहूं द्वितीयकर्त्ताका कर्त्ता अंगीकार करें तौ अन्योन्याश्रयदोष होवैगा । यातैं—
तृतीयकर्त्ता और अंगीकार करना होवैगा । ता तृतीयका कर्त्ता जो द्वितीय मानें तौ अन्योन्याश्रयदोष होवै औ प्रथम मानें तौ चक्रिकादोष होवैगा. जैसैं चक्रका भ्रमण होवैहै तैसैं—
( १ ) प्रथमकर्त्ता द्वितीयजन्य औ— ( २ ) द्वितीयकर्त्ता तृतीयजन्य । औ— ( ३ ) तृतीय प्रथमजन्य । ( ४ ) सो प्रथम फेरी. द्वितीयजन्य । इसरीतिसैं कार्यकारणभावका भ्रमण होवैगा । चक्रिकास्थानमें कोई बी सिद्ध होवै नहीं । सर्वकी परस्पर अपेक्षा है ।
४ अन्योन्याश्रयमें दोकी परस्पर अपेक्षा है । एककी सिद्धि हुये बिना अन्यकी सिद्धि होवै नहीं । यातैं— (१) तैसैं कुलालका कर्त्ता आप नहीं, किंतु ताका पिता है । तैसैं प्रथम-ईश्वरकर्त्ता अन्यकर्त्ता है ॥ औ— (२) कुलालका पिता अपने पुत्रसैं उत्पन्न होवै नहीं । किंतु अन्यप्रितासैं उत्पन्न होवैहै ! तैसैं द्वितीयकर्त्ता प्रथमकर्त्तासैं उत्पन्न होवै नहीं । किंतु अन्यकर्त्तासैं— ही कहना होवैगा ॥ औ—
(३) कुलालका पितामह, कुलाल औ ताके पितासैं उत्पन्न होवै नहीं किंतु चतुर्थे जो कुलालका प्रपितामह, तासैं उत्पन्न होवैहै ॥
(४) तैसैं तृतीयकर्त्ता बी प्रथम औ द्वितीय- कत्तासैं उत्पन्न होवै नहीं । यातैं चतुर्थकर्त्ता और अंगीकार करना होवैगा ।
(५) ता चतुर्थका कर्त्ता और पंचम मानना होवैगा ।
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यातें अनवस्थादोष होवैगा। धाराका नाम अनवस्था है। जो कर्त्ताकी धारा अंगीकार करें तौ कौनसा कर्त्ता जगत्के करैहै? यह निर्णय नहीं होवैगा। किसीएककूं जगत्का कर्त्ता माननेमें कोर्है युक्ति नहीं। ता मुक्तिके अभावका नामही चिनगमनचिरह कहेहैं। औ—
६ धाराकी कहूं विश्वांतें अंगीकार करें तौ जा कर्त्तामें धाराका अंत अंगीकार किया, सोई कर्त्ता जगत्का माननै योग्य है। पूर्व सारे निष्फल होवेंगै। याका नामही प्राग्लोप कहैहैं।
पीछलेकै अभावका नाम प्राग्लोप है। इसरीतिसैं ईश्वरकै देशैं अंत अंगीकार करें तौ उत्पत्ति अंगीकार करनी होवैगी औ उत्पत्ति अंगीकार करें तौ आत्माश्रयादि-पद्दोष होवेंगै। यातैं ईश्वरकै देशैं अंत अंगीकार नहीं। किंतु व्यापक है। यातैं नित्य है।
|| ३७४ || ईश्वर औ जीवका स्वरूपसैं भेद नहीं।
ता व्यापक ईश्वरकै औ जीवका स्वरूपसैं भेद नहीं किंतु उपाधिसैं भेद है। कहैंतैं? १ अवच्छेदवादमें— (१) मायाविशिष्टचेतन ईश्वर कहैहैं। औ (२) अविद्याविशिष्ट चेतन जीव कहैहैं। २ आभाससंवादमें— (१) मायां औ आभासविशिष्ट चेतन ईश्वर कहैहैं। औ (२) आभाससहित अविद्याविशिष्टचेतनकूं जीव कहैहैं।
||४१२|| यह वार्ता आगै ४१८सैं ४४२ पर्यंतकै
१ आभासवादमें आभाससहित अविद्या औ मायाका भेद है। चेतनका नहीं। २ तैसैं अवच्छेदवादमें भी अविद्या औ मायाका भेद है। स्वरूपसैं चेतनका भेद नहीं। औ—
(३) (१) अज्ञानमें चेतनका प्रतिबिंब जीव है। औ— (२) चिद् ईश्वर है। या पक्षमें भी चेतनका स्वरूपसैं भेद नहीं। किंतु एकही चेतनमें जीवपना औ ईश्वरपना आरोपित है। यह वार्त्ता आगैं कहैंगे।
इसरीतिसैं जगत्का कर्त्ता सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान स्वतंत्र ईश्वर है। सो ईश्वर व्यापक है ताका औ जीवका विशेषणमात्रसैं भेद है औ स्वरूपसैं अभेद है। यह द्वितीयप्रश्नका उत्तर कहा।
(३ "मुक्तिका हेतु कौन?" याका उत्तर। || ३७५ || मुक्तिका हेतु ज्ञान है।
"मोक्षकां साधन ज्ञान है अथवा कर्म है अथवा उपासना है अथवा दो हैं?" याका उत्तर कहैहैं:-
|| दोहा || हेतु मोक्षको ज्ञान इक, नहीं कर्म नहीं ध्यान। रजजुसैं तबही नसै, होय रज्जुको ज्ञान || १० ||
टीका:-मुक्तिका हेतु कर्म औ ध्यान कहिये उपासना नहीं किंतु ज्ञानही हेतु है। औंकै कहैंगे। यह तीसरा "विचारमतीविचारवाद है।
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३७५-३८०
काहें? जो आत्मामैं वंध सत्य होवै तौ ताकी निवृत्तिरूप मोक्ष ज्ञानसैं होवै नहीं। किंतु कर्म अथवा उपासनातैं होवै॥ सो वंध आत्मामैं सत्य है नहीं किंतु रज्जुसर्पकी न्याईं मिथ्या है॥ ता मिथ्याकी निवृत्ति अधिष्ठान-ज्ञानसैंही बनेहै। कर्म अथवा उपासनासैं नहीं॥ जैसे रज्जुके सर्पे किसी क्रियातैं दूरी होवै नहीं, केवल रज्जुके ज्ञानसैं दूरी होवै है। तैसे आत्माके अज्ञानसैं प्रतीत जो होवैहै वंध, ता वंधकी प्रतीति औ अज्ञान आत्माके ज्ञानसैंही दूरी होवैहै॥
॥ ३७६ ॥ कर्म औ उपासना मुक्तिके हेतु नहीं ॥ ३७६-३७९ ॥
१ जो कर्मका फल मोक्ष होवै तौ मोक्ष अनित्य होवैगा। काहें? यह नियम है:- जो क्रियाआदिकर्मका फल अनित्य है औ यज्ञादिकर्मका फल स्वर्गादिक भी अनित्य है। जो मोक्ष भी कर्मका फल अंगीकार करें तौ अनित्य होवैगा। यातैं कर्मका फल मोक्ष नहीं॥
२ तैसे उपासानाका फल जो अंगीकार करें तौ भी मोक्ष अनित्य होवैगा। काहें? उपासना भी मानसकर्मही है औ कर्मका फलं
अनित्य होवैहै। यातैं उपासनारूप कर्मका फलं भी मोक्ष नहीं॥
॥ ३७७ ॥ कर्मकर्त्ताकौं कर्मसैं पांचप्रकारका उपयोग होवैहै:- १ पदार्थकी उत्पत्ति। २ पदार्थका नाश। ३ पदार्थकी प्राप्ति। ४ ता पदार्थका विकार। ५ तैसैं संस्कार॥ अन्यरूपकी भाविकानाम विकार है॥ संस्कार दोप्रकारका होवैहै:-मलकी निवृत्ति औ गुणकी उत्पत्ति॥
यह पांचप्रकारका कर्मसैं उपयोग होवैहै॥ सो मुमुक्षुकौं कोई वी चनै नहीं। यातैं मुमुक्षु ज्ञानके साधन श्रवणादिकसैंही प्रवृत्त होवै औ कर्ममैं नहीं॥
१ जैसैं कुलालके कर्मतैं कुलालकूं घटकी उत्पत्ति उपयोग होवैहै। तैसे मुमुक्षुकौं कर्मतैं मोक्षकी उत्पत्ति उपयोग चनै नहीं। काहें? जो अनर्थकी निवृत्ति औ परमानंदकी प्राप्तिरूप मोक्ष है॥
(१) सो अनर्थकी निवृत्ति आत्मामैं नित्यसिद्ध है॥ जैसैं रज्जुमैं सर्पकी निवृत्ति नित्यासिद्ध है॥ औ-
(२) आत्मा परमानंदस्वरूप है। यातैं परमानंदकी प्राप्ति वी नित्यासिद्ध है॥
शक्तिरूप स्वस्तिकादि कर्मका किंवा उपासानाका फल मोक्ष नहीं। यह अर्थ निश्चित है॥
॥ ४१३ ॥ "जैसैं यह कर्मचित लोक क्षीण होवैहैं तैसैं वह पुन्यरचित लोक क्षीण होवैहैं" ऐसे कर्मरचित लोकनकूं अनित्य जानिके तिनतैं ब्राह्मण (ब्रह्म होनेकी इच्छावाला, मुमुक्षु) वैराग्यवान् पावै॥ कृत जो कर्म तासैं श्रुति जो मोक्ष, सो नाहीं है" इस श्रुतिकरि औ "भावना (उपासना) तैं जन्म जो फल है" औ "जो कर्मका फल है, सो स्थिर है"। ऐसे मानने थेोग्य नहीं। दृढविदेहदशावासी-श्रुति- स्मृति- संगतिकी न्याई" इस शंकराचार्यके
॥ ४१४ ॥ जैसैं रज्जुविषै व्यावहारिक सत्तावाले सर्पकी अभावरूप सर्पकी निवृत्ति नित्यसिद्ध है तैसे आत्मामैं परमार्थसत्तावाले कार्यसहित अज्ञानरूप अनर्थकी अत्यंताभावरूप निवृत्ति नित्यसिद्ध है॥
॥ ४१५ ॥ जैसैं विशिष्टकंठमणिकी प्राप्ति किंवा गृहवित्तै गाढ़ (मोदी) निधिकी प्राप्ति नित्यसिद्ध है तैसे निजरूप परमानंदकी प्राप्ति-वी सर्वकूं नित्यसिद्ध है॥
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इसरीतिसैं स्वभावसिद्धमोक्षकी कर्मसैं उत्पत्ति चनै नहीं ॥ जो वस्तु आगै सिद्ध नहीं होवैहै ताकी कर्मसैं उत्पत्ति होवैहै औ सिद्धस्वककी उत्पत्ति होवै नहीं ॥ औ- ॥ ३७८ ॥ वेदांतश्रवण वी मोक्षकी उत्पत्तिके निमित्त नहीं कह्या । किंचिदमात्र ची कर्तव्य नहीं । इस वात्तौके जाननेवास्तै श्रवण है ॥ यह जानिके कर्चैष्यप्रांति दूरी होवैहै । औ- वेदांतश्रवणैं अनंतर ची जिनकौं कर्तव्य प्रतीति होवैहै, तिन्हैं तत्त्व जॉन्या नहीं ॥ इसीकरणतैं नित्यनिष्चत जो अनर्थ, ताकी निष्चत्ति औ नित्यग्रास्मानंदकी प्राप्ति । वेदांतश्रवणका फल देवैंगुरुनै नैष्कर्म्यसिद्धिमैं कहाहै । यातैं मोक्षकी उत्पत्तिरूप कमैंका उपयोग मुख्खू कहै नहीं ॥
पदार्थका नाशरूप उपयोग वी कर्मसैं चनै नहीं ॥ ३ जैसैं गमनरुप कमैं गामकी प्राप्ति होवैहै तैसैं मोक्षकी प्राप्तिरुप उपयोग कमैं चनै नहीं । कहैंतें ? जो आत्मा नित्यमुक्त है ताकूं मोक्षकी प्राप्ति कहनां चनै नहीं । जाकूं बंध होवै ताकूं मोक्षकी प्राप्ति कहनां चनै औ आत्मामैं बंध है नहीं । यातैं मोक्षकी प्राप्तिरुप कमैंका उपयोग मुख्खू चनै नहीं ॥ ४ जैसैं पाकलप कमैं अन्नका विकाररुप उपयोग होवैहै तैसैं मुख्खू कमैं विकाररुप उपयोग वी चनै नहीं, कहैंतें ? और तौं कोई विकार चनै नहीं । जो आत्मामैं प्रथम- बंध अंगीकार करैं औ मोक्षदशामैं चतर्थ्युजादिक विलक्षणरुपकी प्राप्ति अंगीकार करैं तौं अन्यरुपकी प्राप्तिरुप विकार कमैंका उपयोग मुख्खू चनै ॥ सो अन्यरुपकी प्राप्ति आत्मामैं अंगीकार नहीं । यातैं कमैं चिकाररुप उपयोग वी मुख्खू चनै नहीं ॥
॥ ३७९ ॥ २ जैसैं दंडके प्रहाररुप कमैंका घटका नाशरुप उपयोग होवैहै तैसैं मुख्खू कमैं किसिपदार्थका नाशरुप उपयोग वी चनै नहीं । कहैंतें ? अन्यपदार्थका नाश तो मुख्खू चोंछित है नहीं । बंधका नाशही कमैंका उपयोग कहनां होवैगा । सो बंध आत्मामैं है नहीं । मिथ्याप्रतीतिमैं होवैहै ॥ तौं मिथ्याप्रतीतिकी नाश कमैं चनै नहीं औ आत्माके यथार्थज्ञानसैं तौं मिथ्याप्रतीतिकी नाश चनैहै । यातैं मुख्खू कमैं
॥ ४१६ ॥ इहाँ यह स्मृति है:- ज्ञानान्मतेन तुष्य रतृत्यस्तस्य योगिन: । नैवास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति वेद स तत्वचित्त ॥ अस्यार्थ:- ज्ञानरुपअृतकृतें तुष्ट चो याहीतैं ऋतकृत्य ( ऋतार्थ ) भया जो योगी ( ज्ञानी ) है । ताकूं मोक्षके अर्थ किंचित् कर्तव्य नहीं हैं औ जाकूं कर्तव्य है सो तत्त्ववेतां नहीं ॥
॥ ४१७ ॥ मंडनमिश्र है नाम जिसका ऐसैं सुरेश्वराचार्यनै ॥
॥ ४१८ ॥ पूर्वपक्षकौं त्यागिके अन्यरुपकी प्राप्ति सो विकार कहियेहै । सोई विक्रिया औ परिणाम वी कहियेहै ॥
॥ ४१९ ॥ पाककौ कर्त्ता ( रसोइया ) ॥
॥ ४२० ॥ धोवनैरूप ॥
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२३६ ॥ "मुक्तिका हेतु कौन " इस अगृहीतदेवके प्रभ्नका उत्तर ॥ ३७५-४०६ ॥ [विचारसागरे
ताकेविशै मल है नहीं । यातैं मलकी निवृत्तिरुप संस्कार वने नहीं ॥ औ—
(२) अंतःकरणविशै पापरुप जो मल है ताकी निवृत्ति जो कर्मसैं उपयोग कहै तौ यह वार्तो· सत्य है । परंतु शुद्धांतःकरणवाला जो मुमुक्ष है ताका विचार कहैं । ताके अंतःकरणमैं वी पाप है नहीं । यातैं पापरुप मलकी निवृत्तिरुप संस्कार वी मुमुक्षुं कर्मसैं उपयोग वने नहीं ॥ औ—
(३) अज्ञानकूं जो मल कहैं तौ अज्ञान आत्मामैं है वी । परंतु ताकी निवृत्ति कर्मसैं होवै नहीं । कहैंतैं ? अज्ञानका विरोधी ज्ञान है । कर्म नहीं । यातैं मुमुक्षुं मलकी निवृत्तिरुप संस्कार कर्मसैं उपयोग वने नहीं ॥
(४) जैसैं वल्कलकूं कुशुममैं मृजननरुप कर्मका रक्तगुणकी उत्पत्तिरुप संस्कार उपयोग होवैहै । तैसैं गुणकी उत्पत्तिरुप संस्कार मुमुक्षुं कर्मसैं उपयोग वने नहीं । कहैंतैं ? अन्यविषै ता गुणकी उत्पत्ति कहनै चनै नहीं । आत्मा-
विषैही कहनै होवैगा । सो आत्मा निर्गुण है । ताकेविशै गुणकी उत्पत्ति वने नहीं । यातैं मुमुक्षुं गुणकी उत्पत्तिरुप संस्कार वी कर्मका उपयोग वने नहीं ॥
या प्रकरणमैं उपयोग नाम फलका है ॥
कर्मका पांचही प्रकारका फल होवैहै । और नहीं ॥ सो पांचप्रकारका फल कर्मका मुमुक्षुं वने नहीं । यातैं कर्मकूं त्यागिके ज्ञानके साधन
अवरणविशैही मुमुक्षु प्रवृत्त होवै ॥
उपासना वी मानसकर्मही है । यातैं ताके खंडनमैं पृथकयुक्ति नहीं करी ॥
॥ ४२१ ॥ दुवाथनैरुप ॥
॥ ४२२ ॥ कोई भत्सप्रंचनामक प्राचीननयति-
इसरीतिसैं केवलकर्म अथवा उपासना मोक्षका हेतु नहीं । किंतु केवलज्ञान है ॥ औ—
॥ ३८० ॥ आक्षेपः—कर्मै औ उपासना ज्ञानके औ मोक्षके हेतु हैं !
॥ ३८०—३८३ ॥
[पूर्वपक्षीः—]कोई कर्मउपासनासहित ज्ञानकूं मोक्षका हेतु अंगीकार करैंहैं औ ताकेविशै युक्तिदृष्टांत वी कहैं ॥
९ दृष्टांतः—जैसैं आकाशमैं पक्षीका 'एक-
पक्षसैं गमन होवै नहीं । किंतु दोपक्षसैं गमन होवैहै । तैसैं मोक्षलोककूं वी एक ज्ञानरुप
पक्षसैं गमन होवै नहीं । किंतु एकपक्ष तौ उपासनासहितकर्म है औ द्वितीयपक्ष ज्ञान है ॥
उपासना वी मानसकर्मही है । यातैं एकही पक्ष है ॥
॥ ३८१ ॥ २ अन्यदृष्टांतः—जैसैं सेतुके दर्शनसैं पापका नाश होवैहै, सो सेतुका दर्शन
वी प्रत्यक्षरुप ज्ञान है औ श्रद्धाभक्तिसहित गमनादिनियमकी अपेक्षा करैहै ॥ जो श्रद्धा-
दिकरहित पुरष होवै ताकूं सेतुदर्शनसैं फल
होवै नहीं ॥ जैसैं सेतुका प्रत्यक्षज्ञान श्रद्धा-
नियमादिककी फलकी· उत्पत्तिमैं अपेक्षा
करैहै । तैसैं ज्ञानज्ञान वी मोक्षरुप फलकी उत्पत्तिमैं कर्मउपासनाकी अपेक्षा करैहै ॥ औ—
केवलज्ञानसैं जो मोक्ष अंगीकार करैंहैं सो वी ज्ञानका हेतु तौ कर्मउपासना मानैहै ॥ शुद्ध
करण घुमकर्मसैं शुद्ध होवैहै औ उपासनासैं
निश्वल होवैहै ॥
इसरीतिसैं अंतःकरणकी शुद्धि औ निश्वलता-
द्वारा कर्मउपासना ज्ञानके हेतु अंगीकार कियेहैं ॥
कार ( ब्रक्षसूत्रको टीकाका . कर्त्ता ) समुचयवादी भयाहै तांके अनूसारी ॥
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॥ ३८२ ॥ जैसे ज्ञानके हेतु कर्मउपासनां अंगीकार किये तैसे ज्ञानके फल मोक्षके हेतु भी अंगीकार करने योग्य हैं ॥
१ दृष्टांत:-जैसे जलका सेचन वृक्षकी उत्पत्तिका हेतु है औ वृक्षके फलकी उत्पत्तिका भी हेतु है ॥ जो वनके वृक्षनके जलसेचनविना फल होवेंहैं सो वृक्षके मूलमें नीचे जलका संघंध है । यातें फल होवेंहैं औ जलके संघंध-विना वृक्षही सूख जावें । तैसे कर्मउपासनां ज्ञानकी उत्पत्तिके हेतु हैं औ ज्ञानका फल जो मोक्ष ताके भी हेतु हैं ॥
इसरीतिसैं कर्म उपासना ज्ञान तीनूं मोक्षके हेतु हैं । यातें ज्ञानवान् भी कर्म करै ॥
॥ ३८३ ॥ २ अथवा कर्मउपासनां ज्ञानकी रक्षाके हेतु हैं । कहैंत १ जो कर्मउपासनाके त्याग करे तौ उत्पन्न हुवा ज्ञान भी जलसैं बिना वृक्षकी न्यों आई नष्ट होवैगा । कहैंत २ शुद्धअंतःकरणमैं ज्ञान होवैहै औ शुभकर्म नहीं करै तौ ज्ञानवान्कू पाप होवैगा औ उपासनाके त्यागसैं अंतःकरण फेरि चंचल होयजावैगा । ता मलिन औ चंचल अंतःकरणमैं ज्ञान रहै नहीं । जैसे सृक्तीभूमिमैं उत्पन्न हुवा वृक्ष वी रहै नहीं ॥
३ अन्यदृष्टांत:-जैसे संस्कारसैं शुद्ध किये स्थानमैं वेदपाठादिकशास्त्रार्ती निवास करैहैं औ शुद्ध किया स्थान वी किसी निमित्तसैं फेरि मलिन होय जावै, तौ ता स्थानकूं त्यागि देवैहै ॥ तैसे कर्मके त्यागसैं मलिन औ उपासनाके त्यागसैं चंचल हुवा जो अंतःकरण, ताकैवैपै ज्ञान रहै नहीं । यातें कर्म औ उपासना ज्ञानकी रक्षाके हेतु हैं ॥
॥ ३८४ ॥ कर्मउपासनासैं ज्ञानका विरोध है ॥ ३८४-३८६ ॥
इसरीतिसैं-१ कर्म, उपासना औ ज्ञान तीनूं मोक्षके हेतु अंगीकार करें । २ तथा ज्ञानकी रक्षाके हेतु कर्मउपासना अंगीकार करें औ केवलज्ञान मोक्षका हेतु अंगीकार करें । दोसूंकारसैं ज्ञानवान्कूं कर्मउपासना कर्तव्य हैं ॥ याकूं सैमुचयवाद कहैंहैं ॥
[सिद्धांती:-] सो समीचीन नहीं । कहैंत ? देहसैं भिन्न जो आत्मा नहीं जाने, तासैं कर्मे होवै नहीं । कहैंत ? जन्मांतरके भोगके निमित्त कर्म करैहैं औ देहका अभिवंप दाह होवेंहैं । तासैं जन्मांतरका भोग बने नहीं । यातैं-१ शरीरतैं भिन्न आत्माका ज्ञान कर्मेका हेतु है । सो शरीरसैं भिन्न वी आत्माका कर्ताआकर्तारूपकारिके ज्ञान कर्मेका हेतु है ॥ "मैं पुण्यपापका कर्त्ता हूं औ पुण्यपापका फल मेरेकूं होवैगा" ऐसा जाकूं ज्ञान है, सो कर्म करैहैं ॥ औ ज्ञानवान्कूं ऐसा आत्माका ज्ञान है नहीं । किंतु "पुण्यपाप औ सुखदुःख-तैं रहित असंगब्रह्मरूप आत्मा है" ऐसा वेदांतवाक्यसैं ज्ञान होवैहै । सो ज्ञान कर्मेका हेतु नहीं । उलटा विरोधी है । यातैं ज्ञानवानूसैं कर्म होवै नहीं ॥ औ-२ कर्ताकर्मफलका भेदज्ञान कर्मेका हेतु है । सो कर्ताकर्मफलकी ज्ञानवान्कूं आत्मासैं भिन्न प्रतीति होवै नहीं । संपूर्ण आत्म-स्वरूपही प्रतीत होवैहैं । यातैं वी ज्ञानवान्सैं कर्म होवै नहीं ॥ औ-
॥ ४२३ ॥ या मतका प्रतिपादन इतिप्रभाकरके तृतीयप्रकाशमैं सम्यक् कियाहै ॥
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२३८ ॥ "मुक्तिका हेतु कौन ?" इस अग्रुदेवदेवके प्रश्नका उत्तर ॥ ३७५-४०६ ॥ [ विचारसागरे
भाष्यकारनैं घधुत्प्रकारसैं ज्ञानवानकूं कर्मका अभाव प्रतिपादन कियाहै । कर्मका औ ज्ञानका फलसैं विरोध है । यातैं वी ज्ञानकर्मका समुच्चय बनै नहीं ॥
१ कर्मका फल अनित्यसंसार है औ—
२ ज्ञानका फल नित्यमोक्ष है ॥ औ—
॥ ३८५ ॥ है आत्मामैं जाति-आश्रम-अवस्थाका अध्यास कर्मका हेतु है । कहैंतें ? जाति-आश्रम-अवस्थाके योग्य भिन्न-भिन्न कर्म कहैं हैं । यातैं जाति-आदिकनका अध्यास कर्मका हेतु है ॥
यद्यपि जाति-आश्रम-अवस्था देहके धर्म हैं
औ कर्मकूं देहसैं आत्मबुद्धि है नहीं । किंतु वात्स्य पूर्व कही । यातैं जाति-आश्रम-अवस्थाकी बुद्धि आत्मामैं कर्मकूं बनै नहीं । तथापि देहसैं भिन्न आत्माका ज्ञान अपरोक्षज्ञान
नहीं । किंतु शास्त्रसैं परोक्षज्ञान है औ देहमैं आत्मज्ञान अपरोक्ष है ॥ जो देहसैं भिन्न आत्माका अपरोक्षज्ञान होवै तो देहमैं अपरोक्ष-
आत्मज्ञानसैं विरोध होवै औ परोक्षज्ञानका अपरोक्षज्ञानसैं विरोध है नहीं । यातैं देहसैं भिन्न कर्ता-आत्माका ज्ञान औ देहमैं आत्मबुद्धि
दोनूं एककूं बनैहै ॥
दृष्टांत:-मूर्तिमैं ईश्वरज्ञान शास्त्रसैं परोक्ष है औ यागादि-बुद्धि अपरोक्ष है, तिन्हका विरोध नहीं । दोनूं एक-दूसरें हवैहैं । औ रजोगुण
॥ ४२४ ॥ यद्यपि वेदमै बी कहूं ज्ञानकर्मका समुच्चय लियाहै । तथापि समसमुच्चय औ क्रम-
समुच्चयके भेदतैं समुच्चय दो-प्रकारका है ॥
१. ज्ञानके साधन श्रवणादिक औ कर्मके साधन अभिहोत्रादिकनका एकही कालमै अनुष्ठान करनैका नाम समसमुच्चय है ॥ औ—
२ प्रथम अंतःकरण-शुद्धिके अर्थ जिनासापर्यंत कर्मै करना । पीचें कर्मकी विधिका अनादर-
जाकूं सर्पसैं । अपरोक्षमै ज्ञान है । ताकूं अपरोक्ष-सर्प-भ्रांति दूरि होवैहै । यातैं—
यह नियम सिद्ध हुवा:-अपरोक्ष-ज्ञानसैं भ्रांतिका अपरोक्षज्ञान विरोध है । परोक्षसैं नहीं । यातैं देहसैं भिन्न आत्माका परोक्षज्ञान औ देहसैं
अपरोक्ज्ञान बनैहैं । सो दोनूं कर्मके हेतु हैं ॥
१ देहसैं भिन्न वी कर्ता-रूपकरिके आत्माका ज्ञान कर्मका हेतु है ॥ सो कर्ता-रूपकरिके
आत्माका ज्ञान भ्रांति-रूप है औ भ्रांति
विद्यमानकूं है नहीं । यातैं कर्मका अधिकार नहीं ॥ औ—
२ देहमैं अपरोक्ष-आत्मबुद्धि होवै तव देहके धर्म जाति-आश्रम-अवस्थो प्रतीत होवें ।
किंतु साक्षात्-रूपकरिके आत्माका अपरोक्षज्ञान है ।
यातैं जाति-आश्रम-अवस्थाकी भ्रांतिके अभावतें
वी विद्यमानकूं कर्मका अधिकार नहीं ॥ औ
उपासना वी "मैं उपासक हूं । देव उपास्य
हैं" या बुद्धिसैं होवैहै सो विद्यमानकूं उपास्य-
संघात तो मेरा औ देवका स्वरुपकी न्याई
कलपित है औ चेतन एक है" यह विद्यानकू निश्चय है ।
यातैं ज्ञानका उपासना-सैं विरोध
है ॥ औ—
॥ ३८६ ॥ पक्षीके गमनका दृष्टांत बनै नहीं ।
कहैंतें पक्षी तौ दो-पक्ष एक-कालमै रहैं । तिनका करिके ज्ञानके साधन श्रवण-आदिक-करिके ज्ञानकूं
संपादन करनैका नाम क्रम-समुच्चय है ।
तिनमै—
१ समसमुच्चय त्याज्य है । औ—
२ क्रम-समुच्चय ग्राह्य है ।
यह वेदका तात्पर्य है । यातैं इहां समसमुच्चयका
खंडन किया । क्रम-समुच्चयका नहीं ॥
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परस्परविरोध नहीं औ ज्ञानकै तो कर्मउपासना-
सैं विरोध है । एककालमें वैन नहीं ॥ औ-
॥ ३८७ ॥ ज्ञानमैं कर्मउपासनाकी अपेक्षा नहींँ ।
॥ ३८८ ॥ ब्रह्मविद्या अपने फलकी उत्पत्ति-
में कर्मउपासनाकी अपेक्षा करै नहीं । कहैंत ?
जो ब्रह्मविद्याका फल वी स्वर्गेकी न्हाईं लोक-
विशेप अदृष्ट होवै, सो लोकविशेप वी
केवल ब्रह्मविद्यासैं शास्त्रनैं बोधन नहीं
किराहोवै । किंतु कर्मउपासना सहितैं बोधन
किराहोवै तो ब्रह्मविद्या वी सेतुके दर्शनेकी
न्याईं फलकी उनत्तिें कर्मउपासनाकी अपेक्षा
करै सो ब्रह्मविद्याका फल मोक्ष, स्वर्गेकी
न्याईं लोकविशेपलुप अदृष्ट तौ है नहीं । किंतु
मोक्ष नित्यप्राप्त है औ भ्रांतिसैं बंध प्रतीत होवैहै ।
तौ भ्रांतिकी निवृत्तिही ब्रह्मविद्याका फल
है ॥ सो भ्रांतिकी निवृत्ति केवलब्रह्मविद्यासैं
ह्मारैं प्रत्यक्ष है औ रज्ुज्ञानसैं सर्पभ्रांतिकी
निवृत्ति सवैं प्रत्यक्ष है । यातैं अधिष्ठानज्ञानका
दृष्टफल है ॥
दृष्टफलकी उत्पत्ति जितनी सामग्रीसैं प्रत्यक्ष-
प्रतीत होवैहै, सो सामग्री दृष्टफलकी हेतु
कहियेहै ॥
१ जैसैं तुरी तंतु वेमसैं पटकी उत्पत्ति
प्रत्यक्ष है । यातैं तूरी तंतु वेम पटकें
हेतु हैं ॥ औ-
२ केवलबोजनसैं तृषिरूप फल प्रतीत
होवैहै । यातैं केवलबोजन
तृष्णिका हेतु है ॥
तैसैं केवल अधिष्ठानज्ञानतैं भ्रांतिकी निवृत्ति
प्रत्यक्षप्रतीत होवैहै । यातैं केवलअधिष्ठानका
ज्ञानही भ्रांतिकी निवृत्तिका हेतु है ॥
जैसैं रज्जुका ज्ञान भ्रांतिकी निवृत्तिें
दीख्या जावैहै तिसौं लकडीका है । औ-
१ तंतु नाम पठके उपादानसूत्रका है ।
२ तंतु नाम पठके उपादानसूत्रका है ।
३ वेमनाप जिस नलिखाविषै सुत्न रहताहै तिस
नलिखाका है । याहीकूँ कहौंक नडा़ वी कहतेईँ॥
॥ ४२५ ॥ रामचंद्रने रामेक्षरसैं लेके लंकाकों प्रति
समुद्रकी पाँज बाँधी है ताका दर्शन ॥
॥ ४२६ ॥ ब्रह्मवेत्ता ज्ञानिनल्क ॥
॥ ४२७ ॥
१ तुरीनाप जिस लकडीपर कॅपंडा मॅनबननके
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६४० ॥ " मुक्तिका हेतु कौन " इस अग्र्यधेवके प्रश्नका उत्तर ॥ ३७५-४०६ ॥ [ विचारसागरे
अन्यकी अपेक्षा करै नहीं, तैसैं बंधकी भांतिका अधिष्ठान जो नित्यमुक्त आत्मा, ताका ज्ञान भी बंधभांतिकी निवृत्तिमैं कर्मउपासनाकी अपेक्षा करै नहीं ॥ औ—
॥ ३८९ ॥ १ ज्ञानेके फल मोक्षकूं जो स्वर्गकी न्याई लोकविशेष अदृष्ट अंगीकार करैहैं सो वेदवाक्यपसैं विरुद्ध है । कहैंतैं ? ज्ञानवानके प्राण कसीलोककूं गमन नहीं करते । यह वेदमैं कहाहै ॥ औ—
२ लोकविशेष अंगीकार करैंतैं स्वर्गकी न्याई मोक्ष अनित्य होवैगा । यातैं लोक-विरोधरूप मोक्ष नहीं ॥ औ—
३ लोकविशेष जो मोक्ष अंगीकार करें ताकूं भी केवलज्ञानसैही मोक्षलोककी प्राप्ति अंगीकार करनी योग्य है । कहैंतैं ? जो शास्त्रनै प्रतिपादन किया अर्थ होवै सो शास्त्रकै अनुसरही अंगीकार करियेहै ॥ सो शास्त्रनै केवलज्ञानसैं मोक्ष कहहै । यातैं केवलज्ञान मोक्षका हेतु है । कर्म उपासना ज्ञान तीनूं नहीं ॥ औ—
॥ ३९० ॥ वृक्षका दृष्टांत भी बैन नहीं । कहैंतैं ? यद्यपि जलका सेचन वृक्षकी उत्पत्ति औ रक्षामैं हेतु है तथापि वृक्षके फलकी उत्पत्तिमैं नहीं ॥ शुद्ध जो वृक्ष है ताकेविप उलत्ति मैं मल औ विक्षेप होवै तथपर्यंतही करै । शुद्ध औ निश्शलअंतःकरण जाका होवै सो जिज्ञासु श्रवणके विरोधी कर्मउपासनाका त्याग करै ॥ मल नाम पापका है ॥ सो अच्युति-
वासनाका हेतु है ॥ जवपर्यंत मल होवै तब पर्यंत अच्युति-वासना होवैहै ॥ जव अच्युति-वासना होवै नहीं तब मलका अभाव निश्श्चय करै ॥ अंतःकरणकी चंचलता औ एकाग्रता अनुभवन-
सिद्ध है । यातैं उत्तमजिज्ञासु औ विद्वानकूं कर्मउपासना निष्फल है ॥ औ—
॥ ३९१ ॥ कर्मउपासनातैं ज्ञानीकी रक्षा होवैहै नहीं ॥
पूर्व जो कह्यो "ज्ञानीकी रक्षाके निमित्त कर्मउपासना करै" ॥ जैसैं जलसैं उत्पन्न हुवा जो वृक्ष ताकी जलसैं रक्षा होवैहै । जो जलका संवंध नहीं होवै तो वृद्ववृक्ष भी सूक-
जावैहै ॥ तैसैं कर्मउपासनासैं उत्पन्न हुवा जो ज्ञान, ताकी कर्मउपासनासैं रक्षा होवैहै । जो ज्ञानी कर्मउपासना नहीं करै तो अंतःकरण मलिन औ चंचल फेरि होयजावैगा ॥ ता मलिन औ चंचल अंतःकरणमैं स्रुति-
सुमिमैं वृक्षकी न्याई उत्पन्न हुवा ज्ञान भी नष्ट होयजावैगा । यातैं ज्ञानवान् बी कर्मउपासना करै ॥"
सो बनै नहीं । कहैंतैं ? आंघाससहित अथवा चेतनसहित जो अंतःकरणकी
प्रथम प्रहार करैनैकी व्याधि देकै संतोषकूं प्राप्त करै । पीछे ताकूं मारै । ताका नाम दुर्जनंतोषणन्याय है ॥
॥ ४२९ ॥ इहां दुर्जनतोषणन्यायकरिके जो छोकविशेषकूं मोक्ष मानैं तो बी सो मोक्ष ज्ञानविना होवै नहीं । यह मातो सिद्धांती प्रतिपादन करैहैं ॥ वैसैं कसीका प्रमाणशानु होवै सो अपने निर्विकल्पशानकूं
॥ ४२९ ॥ जपपर्यंत ॥
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पक्षस्तरंग: ६ } || ज्ञानीकूं कर्मै औ उपासनांकां उपयोग नाहीं ||
"मैं असंग ब्रह्म हूं" यह वृत्ति सो वेदांतका फलरूप ज्ञान है, ताका कर्मउपासनाैं बिना नाश होवैगा अथवा चेतनस्वरूप ज्ञानका नाश होवैगा ।
जो ऐसैं कहैं:-स्वरूपज्ञान तौ नित्य है, यातैं ताका तौ नाश औ रक्षा वृथा हैं नहीं । परंतु वेदांतका फल जो ब्रह्मविद्यारूप ज्ञान है, ताकी कर्मउपासनासैं उत्पत्ति होवैहै औ कर्मउपासनाके त्यागसैं उत्पन्न हुई विद्या वी नष्ट होयजावैगी । यातैं ताकी रक्षाके निमित्त कर्मउपासना करै ।
सो वनै नहीं । कहैंतैं ?
१ एकवार उत्पन्न हुई जो अंतःकरणकी वृत्तिरूप ब्रह्माकारवृत्ति, तैसैं अज्ञान औ भांतिका नाशरूप फल तिसही समय सिद्ध होवैहै । अज्ञान औ भांतिके नाशतैं अंतर फेरि वृत्तिकी रक्षाका उपयोग नहीं । औ--
२ अंतःकरणकी वृत्तिकी कर्मउपासनासैं रक्षा वनै वी नहीं । कहैंतैं ? जब कर्मउपासनाका अनुष्ठान करैगा, तव कर्मउपासनाकी सामग्रीकाही वृत्तिरूप ज्ञान होवैगा । ब्रह्मका ज्ञान वनै नहीं । औरवृत्ति हुयेंतैं प्रथमवृत्ति रहै नहीं । यातैं कर्मउपासना ज्ञानकी उत्पत्तिके विरोधी हैं । यातैं कर्मउपासनातैं ज्ञानकी रक्षा होवै नहीं । औ--
|| ३९२ || ज्ञानीकूं पाप औ चंचलताके अभावतैं कर्म औ उपासनाका उपयोग नाहीं || ३९२—३९३ ||
पूर्वे जो कहा "ज्ञानवालेकूं कर्मके त्यागसैं पाप होवैहै" सो वातो वनै नहीं । कहैंतैं ?
१ जो शुभकर्मका त्याग है, सो पापका हेतु नहीं । किंतु निपिद्धकर्मका अनु्ष्ठानही पापकां हेतु है । यह वार्तो भाष्यकारनैं बहुतप्रकारसैं प्रतिपादन करीहै । यातैं कर्मके त्यागसैं पाप होवै नाहीं । औ--
२ ज्ञानवानकूं तौ सर्वप्रकारसैं पापका अभाव है । कहैंतैं ? पुण्यपाप औ तिनका आधय अंतःकरण परमार्थसैं हैं नहीं । अविद्यासैं मिथ्याप्रतीति होवैहैं । सो अविद्या औ मिथ्याप्रतीति ज्ञानवानके हैं नहीं । यातैं ज्ञानवानकूं शुभकर्मके त्यागसैं अथवा अशुभके अनु्ष्ठानसैं पाप वनै नाहीं ।
|| ३९३ || या स्थानमें यह सिद्धांत है:-
१ मंद औ २ दृढ, दोप्रकारका ज्ञान है ।
१ संशयादिकरहित जो ज्ञान, सो मंदज्ञान कदियेहै । औ--
२ संशयादिकरहित ज्ञान दृढ कदियेहै । जाकूं दृढज्ञान होवै, ताकूं किंचितमात्र वी कर्तव्य नहीं । एकवार उत्पन्न हुआ जो संशयादिकरहित अंतःकरणकी वृत्तिरूप ज्ञान, सोई अविद्याका नाश करि देवैहै । सो ज्ञान आप वी दूरी होयजावै तौ वी मलप्रकारसैं जाने आत्मामैं फेरि भ्रांति होवै नहीं । कहैंतैं ? जो भ्रांतिका कारण अविद्या है, सो अविद्या एकवार उत्पन्न हुये ज्ञानसैं नष्ट होयगई । यातैं ज्ञानके अभावतैं वृत्तिज्ञानकी आवृत्तिका कुछ उपयोग नहीं । औ--
जीवन्मुक्तिके आनंदकै वास्ते जो वृत्तिकी आवृत्ति अपेक्षित होवै तौ वारंवार वेदांतके अर्थका चिंतनही करै । वेदांतके अर्थचिंतनसैं ही वारंबार ब्रह्माकारवृत्ति होवैहै औ कर्मउपासनैं नहीं । कहैंतैं ? कर्म औ उपासनाका अंतःकरणकी वृत्ती औ निश्वलताद्वाराही ज्ञानमैं उपयोग है । औररीतिसैं नहीं । औ विद्वानकै अंतःकरणमैं पाप औ चंचलता हैं
वि. सा. ३१
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६४२ ॥ "मुक्तिका हेतु कौन" इंसैं अगृहीतदेवके प्रकर्षतां उध्दर ॥ ६७५-७०६ ॥ [ विचारसागरे
नहीं । रागद्वेषद्वारा पाप औ चंचलताका हेतु अविद्या है, ता अविद्याका ज्ञानसैं नाश होवैहै । यातैं विद्वानके पाप औ चंचलताके अभावतैं कर्मउपासनाका उपयोग नहीं । और-
॥ ३९४ ॥ ज्ञानिनके प्रारनृधकी विलक्षण-ता औ तिनकी जीवनमुक्तिके सुखअर्थ वी उपासनामैं अभप्रवृत्ति ॥
जो कदाचित् ऐसैं कहैं:-रागद्वेषादिक अंतःकरणके सहजधर्म हैं । जितनै अंतःकरण हैं, उतनै रागद्वेषका सर्वथा नाश ज्ञानवानके वी होवै नहीं । तिन्ह रागद्वेषतैं ज्ञानवानका वी अंतःकरण चंचल होवैहै । यातैं चंचलता दूरी करनैवास्ते ज्ञानवान् वी उपासना करै ॥
थ्यौपि ज्ञानवान् अंतःकरणकी चंचलतासैं विदेहमोक्षमैं हानि नहीं तथापि चंचल-अंतःकरणमैं स्वरूपआनंदका भान होवै नहीं । यातैं चंचलता जीवनमुक्तिकी विरोधी है । यातैं जीवनमुक्तिके निमित्त चंचलता दूरी करनैवास्ते उपासना करै ।
सो वनै नहीं । कहैंतैं ? यद्यपि इंद्रवोध जाके अंतःकरणमैं हुवाहै, ताकै समाधि औ विशेष समान हैं । यातैं अंतःकरणकी निश्चलता के निमित्त किसी यत्नका आरंभ विद्वानकूं वनै नहीं । तथापि विद्वानकी प्रवृत्ति औ निवृत्ति प्रारनृधके आाधीन है ॥ प्रारनृधकर्मे सर्वेका विलक्षण है ।
१ किसी विद्वानका जनकादिकनकी न्योंई भोगका हेतु प्रारनृध है । औ-
२ किसीका शुकदेव वामदेवादिकनकी न्योंई नित्स्तिका हेतु प्रारनृध है ॥
१ जाके भोगका हेतु प्रारनृध है ताकूं तौ प्रारनृधसैं भोगकी इच्छा औ भोगके साधनका यत्न होवैहै । औ-
२ जाके नित्स्तिका हेतु प्रारनृध होवै, ताकूं जीवनमुक्तिके आनंदकी इच्छा होवैहै औ भोगमैं ग्लानि होवैहै ।
जाकूं जीवनमुक्तिके आनंदकी इच्छा होवै सो ब्रह्माकारवृत्तिकी आवृत्तिके निमित्त वेदांत-अर्थका चिंतनही करै । उपासना नहीं । कहैंतैं ?
अंतःकरणकी निश्चलतामात्रसैं ज्ञानानंदका विशेषरूपसैं भान होवै नहीं । किंतु ब्रह्माकार-वृत्तिसैंही होवैहै । सो ब्रह्माकारवृत्ति वेदांत-चिंतनसैंही होवैहै । उपासनासैं नहीं ॥ औ-
अंतःकरणकी चंचलता वी विद्वानकूं वेदांतके चिंतनसैं दूरी होय जावैहै । यातैं अंतःकरणकी निश्चलताके निमित्त वी उपासनामैं प्रवृत्ति होवै नहीं ॥
इसरीतिसैं इंद्रवोध जाके हुवाहै ताकी कर्मउपासनामैं प्रवृत्ति होवै नहीं ॥ औ-
॥ ३९५ ॥ इंद्रअदृढज्ञानी औ उत्तम-मंदजिज्ञासुकूं कर्मउपासनामैं अधिकार नहीं ॥ ३९५-३९६ ॥
१ जाके मंदचोध है सो वी : मननः औ निदिध्यासनही करै । कर्मउपासना नहीं । कहैंतैं ? मंदचोध जाकूं हुवाहै सो उत्तम-जिज्ञासु है । ता उत्तमंजिज्ञासुहूं मनन-निदिध्यासनसैं बिना अन्यकरतन्य नहीं । यद्य वातों ! शारीरकमैं सवकार औ भाष्यकारनै प्रतिपादनं करीहै औ-
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३ चित्रानहूं मनननिदिध्यासन ही फैलैहै औ निश्रलता है । सो ताकूं श्रवणसैही होय-
नहीं । जो जीवन्मुक्तिके आनंदरके वास्ते चिdhan जावेगा । श्रवणकी आर्त्ततिं अंतःकरणका
मनननिदिध्यासनमें प्रवृत्त होवेंहैं सो ही दोप दूरी होयके इसजनमविपै अथवा अन्य-
अपनी इच्छासैं प्रवृत्त होवेंहै औ "मैं वेदकी जनमविप अथवा वृदालोकविप ज्ञान होवेंहै ।
आज्ञा नहीं करूंगा तो मेरेकूं जन्ममरणसंसार
होवैगा" इसगूंदिस जो किया कर सो
कर्त्तव्य कहियेहैं ॥ सो जन्मादिकनकी बुद्धि
विद्वानके होवें नहीं । यातैं अपनी इन्ह्छातैं जो
चिdhan मनननिदिध्यासन करै सो कर्त्तव्य नहीं ॥
इसीरीतिसं मंदजोध अथवा दृढजोध जाके
हुआहै तिसकूं कर्मउपासना करैन्य नहीं ॥ ओ-
३९६ ॥
३ जाके बोध नहीं हुआहै । किंतु
आत्माके जाननेंकी तीव्र इन्ह्छा है ।
भोगकी नहीं । ताका अंतःकरण शुद्ध है ।
यांतैं सो ही उत्तमधी जिज्ञासु है । ताकूं
थी बोधके वास्ते श्रवणादिकही कर्त्तव्य हैं ।
कर्मउपासना नहीं । कहैंतैं ? जो कर्मउपासनाका
फल है सो ताके सिद्ध है ॥ औ-
४ ज्ञानीकी सामान्यइच्छातैं जो श्रवणमें
प्रवृत्त हुआहै औ अंतःकरण भोगनमें आसक्त
है सो मंदजिज्ञासु है । सोवी श्रवणकूं
त्यागिके फेरी कर्मउपासनामें प्रवृत्त होवें नहीं ।
जो कर्मउपासनाका फल अंतःकरणकी शुद्धि
४३० ॥
१ "जे आत्मातत्व होवें वे श्रवणकूं वराह । मैं
तत्वकूं जानताडया किसकारणतैं श्रवणकूं
करहूं ?" औ--
२ "जे संदायककूं प्राप्त म्हेहैं वे मननकूं
करहु । संशयरहित मैं मननकूं करता नहीं ॥"
३ "जो चिपर्ययकूं पायदोहै सो निदिध्यासनकूं
करै । मैं देहविप आत्माके ज्ञानरूप विपरीतयकूं
कराचित भजता नहीं ॥ यांतैं मेरेकूं
१-२ इसरीतिसं ज्ञातवान औ उत्तम
जिज्ञासुका कर्मउपासनाविपै अधिकार
नहीं ॥ औ-
३ मंदजिज्ञासु ही जो वेदांतश्रवणमें
प्रवृत्त हुआह ताका अधिकार नहीं । औ-
४ ज्ञानीकी जाकूं इन्ह्छा तो है परंतु भोगमें
शुद्धि आसक्त है । यांतैं श्रवणमें प्रवृत्त
नहीं हुआ ऐसा जो मंदजिज्ञासु
ताका निष्कामकर्म औ उपासनामें
अधिकार है । औ--
५ जाकी भोगविपही आसक्ति है । ज्ञानीकी
इन्ह्छा नहीं । ऐसा जो घटिहुसंख्य है
ताका सकामकर्मविपै ही अधिकार है ।
यांतैं ज्ञानीकूं कर्मउपासनाका अधिकार
नहीं ॥ कर्मउपासनाका ज्ञान विरोधी है ॥ औ-
चिपर्ययकै अभार्थतैं कौन ध्यान है ?" कोई भी
नहीं ॥
इसीरितिसं पंचदशीके तृसिदीपमें विचारण्य-
स्वामीनैं विद्वानकूं कर्त्तव्यका अभाव सविस्तर
लिख्या है ॥
४३१ ॥ मोक्षकी सीढींपैं चढिके फेर तहांसि गिरै
ताकूं "करनेंलदिनायार ( प्रातलजुकूं गमायके हाथ
चाटनैका दर्षांत )" प्राप्त होवेंहै । यह अर्थ पंच-
दशिके ध्यानदीपनाम नवमप्रकरणके द्याह्यानविषै
हमने स्पष्ट लिह्या है ॥
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२४५.॥ "मुक्तिका हेतु कौन " इस अगृहीतदृशके प्रश्नका उत्तर ॥ ३७५-४०६ ॥ [विचारसागरे
॥ ३९७ ॥ दृढबोधके कर्मउपासना विरोधी नहीं । परंतु मंदबोधके विरोधी हैं ॥ ३९७-३९८ ॥
कर्मउपासना वी अंतःकरण शुद्धि औ निश्चलताद्वारा ज्ञानकी उत्पत्तिके तो हेतु हैं, परंतु ज्ञानकी उत्पत्तिसे अनंतर जो कर्मउपासना करे तो उत्पन्न हुवा ज्ञान नष्ट होयजावेगा । यातें ज्ञानके विरोधी हैं, रच्छाके हेतु नहीं । कहैंते ?
१ "मैं कर्ता हूं" और यज्ञादिक मेरेकूं करर्तव्य हैं । यज्ञादिकनका स्वर्गादि फल है या भेदबुद्धिसैं कर्म होवैहैं । औ-
२ "मैं उपासक हूं । देव उपास्य हैं" या भेदबुद्धिसैं उपासना होवैहै ।
सो देहुंअश्रकारकी बुद्धि "सर्वे ब्रह्म है" या बुद्धिकूं दूरीकरिके होवैहैं, यातें कर्मउपासना ज्ञानके विरोधी हैं ॥
यद्यपि ज्ञानवान् आत्माकूं असंग जानैहै तो वी देहका भोजनादिक व्यवहार अथवा जनकादिकनकी न्याय अधिराज्यपालनादिक व्यवहार करैहै । ता व्यवहारका ज्ञान विरोधी नहीं औ व्यवहार ज्ञानका वी विरोधी नहीं ।
काहेंते ? जो आत्मस्वरूप ज्ञानसैं असंग जान्याहै
तां आत्माविषै जो व्यवहार प्रतीत होवै तो व्यवहारका विरोधी ज्ञान, तथा ज्ञानका विरोधी व्यवहार होवै नहीं । किंतु संपूर्णव्यवहार देहादिकनका संबंध है नहीं ।
या बुद्धिसैं संपूर्ण व्यवहार करैहै । इसकारणपतैं विद्वान्की प्रवृत्ति वी निवृत्तिही कही है ॥
॥ ३९८ ॥ तैसैं अन्यव्यवहार ज्ञानका विरोधी नहीं तैसैं कर्मउपासना वी अन्य-ब्रह्मखपुपनके करावनै वास्ते आत्माकूं असंग जानिके औ देहवाकूंअंतःकरणके आश्रित क्रिया जानिके जो कर्मउपासना करै तो ज्ञानके विरोधी नहीं ।
काहेंते ? जो आत्मा विद्वाननै असंग जान्याहै ताकूं कर्ता जानिके कर्मउपासना करै तो ज्ञानके विरोधी होवें । सो आत्मका असंगरूप दृढनिश्चय कर्म-उपासनासैं विद्वानका दूरी होवै नहीं ।
यातैं जनकादिकननै आभास-रूप कर्म करै हैं ।
जो आत्माकूं असंग जानिके और व्यवहारकी अपेक्षा करता नहीं । किंतु यहां साधनौंकूंहीं अपेक्षा करता है ।"
१ "मन वाणी शरीर औ तिनतैं वाझपदार्थ ( गृहक्षेत्रभादिक ) जो हैं वे व्यवहारके साधन हैं;
दिनकूं तत्त्वचित मिथ्या जानताहै । परंतु स्वरूपतैं नाश करता नहीं । यातैं इस ( ज्ञान ) का व्यवहार कहैंते नहीं होवैगा ?" किंतु होवैगाही ॥
इसरीतिसैं ज्ञानशा औ प्रारब्धजनित व्यवहारका विरोध नहीं ॥
॥ ४३२ ॥ यह अर्थ विचारणयस्वामीनै तृप्तिदीपविचै वी ऐसैं लिख्या है:-
१ "प्रारब्ध जब जगत्की सत्यताकूं संपादन करिके भोगकूं देवै तब विषयका विरोधी होवै ।
भोगमात्रैं विषयकी सत्यता होवै नहीं ॥"
२ "विद्या ( ज्ञान ) जब जगतकूं विलय करै तब प्रारब्धकी विरोधी होवै औ मिथ्यापनके बोधसैं तो तिस ( जगत् ) का विलय नहीं होवैहै" ।
इहां प्रारब्ध-शब्दकरि ताके कार्य व्यवहारका वी ग्रहण है ॥
३ तैसैं ध्यानदीपविचै वी कहाहै:-"व्यवहार जो है सो प्रपंचकी सत्यताकूं वी आत्माकी जडताकूं धारण है ॥
॥ ४३३ ॥ आत्माकूं असंग जानिके औ देह-वाणीसनके आश्रित क्रिया जानिके जो कर्मउपासना करिये हैं सो आभासरूप हैं ॥
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न्याई देहादिकनके धर्म जानिके विद्वान शुभक्रिया करैं सो आभासरूप कर्म कहियेहै । ताका ज्ञानसैं विरोध नहीं औ भाष्यकारनै कर्मउपासनााका जो ज्ञानसैं विरोध कधाहै, सो आत्मामैं कर्त्तोंबुद्दिसैं जो कर्मउपासना करहैं ताका विरोध कधाहै जो आभासरूप कर्मउपासना करहैं ताका विरोध कधाहै नहीं ॥
॥ ३९९ ॥ तथापि मंदबोधके आभासरूप कर्म औ आभासरूप उपासना वी विरोधी हैं । कहैं ? जो संशयादिकसहित बोध है सो मंदबोध कहियेहै । जैसे अंतःकरणमैं " आत्मा असंग है, अथवा नहीं है ?" ऐसा कदाचित संशय होवै सो शुक्ति जो वारंबार " आत्मा असंग है, मेरेकूं किंचितमात्र वी कर्त्तव्य नहीं " या अर्थकूं चिंतन करै, तब तौ संशय दूरि होयके दृढ़बोध होयजावै औ कर्मउपासना करैगा तौ मंदबोध जो उत्पन्न हुवा है, सो दूरि होयके " मैं कर्त्ता भोक्ता हूं " यह विपरीतनिश्चय होयजावैगा । यातैं मंदबोधकी उत्पत्तिसैं पूर्वही कर्मउपासना करै औ अनंतर नहीं ॥
जो मंदबोधवाला कर्मउपासना करैगां तौ उत्पन्न हुवा बोध नष्ट होयजावैगा ॥
हष्टांत:-जैसैं पक्षी अपनै अंडेकूं पक्षकी उत्पत्तिसैं पूर्व सेवन करैहै औ पक्षकी उत्पत्तिसैं अनंतर नहीं । जो पक्षकी उत्पत्तिसैं अनंतर वी अंडेकूं सेवन करै तौ बालकपक्षीके ता अंडेके जलसैं पक्ष गलीजावै । तैसैं ज्ञानकी उत्पत्तिसैं पूर्वही कर्मउपासनााका सेवन करै औ ज्ञानकी उत्पत्तिसैं अनंतर नहीं ॥ जो ज्ञानकी उत्पत्तिसैं अनंतर वी कर्मउपासनााका सेवन करै तौ बालकपक्षीकी न्याई मंदज्ञानका नाश होयजावै औ दृढ़पक्षीकी जैसैं अंडेके संबंधसैं हानि होवै नहीं तैसैं दृढ़बोधकी तौ हानि होवै नहीं ।
औ दृढ़पक्षीकी न्याई हढ़बोधकी वी हानि होवै नहीं ॥
॥ ४०० ॥ उक्तअर्थ सर्ववेदकौं सार है । इसरीतिसैं ज्ञानवानकूं मोक्षके निमित्त किंचितमात्र वी कर्त्तव्य नहीं । यह तृतीयप्रश्नका उत्तर कधा ॥
जो शिष्यं आचार्यनै उत्तर कहे सो वेदके अनुसार कहे, यातैं यथार्थ हैं । यह वार्ता कहहैं :-
॥ दोहा ॥ सिष्य कहयो जो तोहिं मैं, सर्वे वेदको सार । लहै ताहि अन्यासहि,, संस्तति नसै अपार ॥ ३१ ॥
हे शिष्य ! जो मैं तेरेकूं कधा सो सर्व वेदका सार है । यातैं याविषै विश्वास कर औ याके जाननेतैं अनायास कहिये खेदविना अपार जो संस्तृति कहिये जन्ममरणरूप संसार, ताका नाश होवैहै ॥
॥ ४०१ भाषाी संप्रदाय ॥ यदपि खेदका नाम आयास है, ताके अभावका नाम अनायास है तथापि छंदके वास्ते अन्यास पढाहै ॥ आपामैं छंदके वास्ते गुरुके स्थानमैं लघु औ लघुके स्थानमैं गुरु पढनेकका दोष नहीं ॥
औ- मोक्षके स्थानमैं मोछहीी भाषामैं पाठ होवैहै । कहहैं ? यह भाषाकी संप्रदाय है ॥
॥ दोहा ॥ लघु गुरु गुरु लघु होत है, वृत्ति हेतु उचार ॥
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॥ २४६ ॥ "मुक्तिका हेतु कौन" इस अगुध्ददेवके प्रश्नका उत्तर ॥ ३७५-४०६ ॥ [ विचारसागर
रूं 'वहै अरुकी ठौरमें, अबकी ठौर वकार ॥ १ ॥ संयोगी क्ष न क पर ख न, नहीं टवर्ग णकार ॥ भाषामैं ऋ लृ ह नहीं, अरु तालव्य शकार ॥ २ ॥ टीका:-इतनै अक्षर भापामैं नहीं । कोई लिखै तौ कवि अगुध्द कहै ॥ १ क्षके स्थानमें छ । २ पके स्थानमें ख । ३ णकारके स्थानमें नकार । ४ ऋ-लृके स्थानमें रि-लिलि है । ५ शकारके स्थानमें सकार भाषामैं लिखनै योग्य है ॥४००वीं उत्तअधकका संगह ॥ ४०२-४०३॥
देवनको देव नू तौ सब सुखरासी है ॥ जीव जग ईस होय मायासैं प्रभासैं तौहि । जैसैं रज्जु सर्प सीप रूप रहै प्रभासी है ॥ १२ ॥ ॥ कवित्व ॥ राग जारी लोभ हारि देश मारि मार वारि । वारवार मृगवारी पारवार पेखिये ॥ ज्ञानभान आनि तम तम तारि भाग्याग । जीव सीव भेद छेद वेदन सु लेखिये ॥ वेदको विचार सार आपकूं संभारि यार । टारि दासपास आस इस्की न देखिये । निश्शल तू चल न अचल चलदल छल । नभ नील तल मल तासूं न दिसोखिये ॥ १३ ॥
दीनेताकूं लागि नर अपनो स्वरूप देखि । तू तौ सुद्धबुद्ध अज हर्यको प्रकासी है ॥ आपने अज्ञानतैं जगत सब तूही रचै । सर्वको संहार करै आप अविनासी हैं ॥ मिथ्यापरपंच देखि दुःख जिन आनि जिय ।
टीका:-ज्ञानके साधन कहैंहैं:-हे शिष्य ! राग जो पदार्थनमें रहआसक्ति है ताकूं जारीके, लोभकूं हारे कहिये नाश करि, देसकूं मारी, मार कहिये कामकूं वारि कहिये दूरि करि ।
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रांगलोभद्रेपकामके ग्राह्यतें सर्वेराजसी-तामसीवृत्तिका ग्रहण है । यातें सर्वेराजसीतामसीवृत्तिका नाश कर । यह अर्थ सिद्ध हुवा ॥ राजसीवृत्ति औ तामसीवृत्ति ये ज्ञानीके विरोधी हैं । तिन्हके नाशविना ज्ञान होवै नहीं; यातें तिन्हकी निवृत्ति ज़रूरी अपेक्षित है । विवेक, वैराग्य, षामादिपदसंप्रत्ति औ मुमुक्षुता, ये चारि जो ज़नके साधन हैं, तिनमें विवेक प्रधान है । कहैंतें विवेकसैं वैराग्यादिक उत्पन्न होवैहैं । यातें विवेकका उपदेश आचार्य करैहैं:-
हे शिष्य ! पारवार जो संसार है ताकूं वारंवार मृगवारि कहिये मृगतृष्णाके जल-समान मिथ्या जान ॥ १ पारवार नाम संसारका है । औ- २ अपारवार नाम आत्माका है ॥ 'पारवार मिथ्या है' या कहनैतें अपारवार मिथ्या नहीं किंतु सत्य है । यह वातो अर्थसैं कही ॥
जैसैं वाजीगरके तमासै देख्ते पुत्रकूं पिता कहै:- " हे पुत्र ! यह आम्रवृक्षसैं आदिलेके जो वाजीगर्ने वनायेहैं, सो सच मिथ्या हैं" या कहनैतें वाजीगरकूं मिथ्या नहीं जानैहै ॥ किंतु सत्य जानैहै ॥ तैसैं जगतकूं मिथ्या कहनैतें आत्माकूं सत्य जानि लेवैगा । या अभिप्रायतें आचार्यनैं पारवार मिथ्या कहा ॥
॥ ४३८ ॥ १ विषयनिषेपी दोषके दर्शैनतें रागका नाश होवैहै । औ---- २ अर्थनिषे अनर्थके ईक्षणतें लोभका नाश होवैहै। ३ कामके अभावतें क्रोधरूप द्वेषकी उत्पत्ति होवै नहीं । औ---- ४ पदार्थनके चिंतनरुपे संकदपके अभावतें
इसीरितिसैं 'जगत् मिथ्या है औ आत्मा सत्य है' या विवेकका उपदेश कन्या ॥ . ता विचेकसैं अन्यसाधन आपही उत्पन्न होवैहै । यातें विचेकके उपदेशतें सर्व्साधनका उपदेश अर्थसैं कहा ॥ ज्ञानके अंतरंगसाधन कथन करैहैं:- हे शिष्य ! ज्ञानरुपी जो भानु है ताकूं आनि कहिये श्रवणसैं संपादन करिके, तम कहिये अज्ञानरुपी जो तम कलियै अंधेरा है ताकूं तारि कहिये नाश कर ॥ तम नाम अंधेरे औ अज्ञानका है । अंधेरा उपमान है औ अज्ञान उपमेय है ॥ प्रथम जो तम शब्द है सो उपमेयका वाचक है औ दूसरा उपमानका वाचक है ॥ जाकूं उपमा दीजिये, सो उपमेय वखानि ॥ जाकी उपमा दीजिये, सो कहिये उपमानि ॥ ३ ॥ ॥ ४०४ ॥ ज्ञानका स्वरूप ऐंन्यग्राश्वनमें नानामकारका अंगीकार कियाहै । यातें महा-वाक्यके अनुसारे ज्ञानका स्वरूप कहैहैं:- हे शिष्य ! इच्छारूप कामकी उत्पत्ति होवै नहीं ! इसीरितिसैं अन्यराजसीतामसीदितिनके नाशका उपाय बी शाखसैं जानीलैना ॥ किंतु एकादशस्कंधके १३ वें अध्यायनिषे उक्त देशकालादिरुप दसाविधिकी पदार्थनके सेवनतें सत्य-गुणकी दृढद्वारा सर्वराजसीतामसीदितिनका नाश ( तिरस्कार ) होवैहै ॥ ॥ ४३५ ॥ सांध्यानन्यायादिकशास्त्रमैं ॥
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२४८॥ "मुक्तिका हेतु कौन" इस अग्रृशदेवके प्रकरणा उत्तर॥ ४०५-४०६॥ [ विचारसागरे
१ जीव औ ईश्वरवैफ अविद्या औ मायाभागकूं त्यागिके तिन्हका जो भेद प्रतीत होवैहै ताकूं छेद कfिये दूरि करी। औजीवईश्वरमें जो वेदन कहिये चेतनभाग है ताकूं भेदरहित ज्ञान॥
या कहनेते यह वात्तो कहो:-महावाक्यनमें भंगत्यागलक्षणातें जीवईश्वरकी एकता जान॥
शिवके स्थानमें सीव पाइ्याहै। तृतीयपादका अर्थ स्पष्ट है। पूर्वकहे अर्थकूं संक्षेपतैं चतुर्थपादसैं कहैं॥
हे शिष्य! चल कहिये विनाशी जो देहादिक संघात, सो तूं नहीं। किंतु अचल कहिये अविनाशी जो ब्रह्म सो तूं है। औ चलदल कहिये वृक्षरूप जो संसार सो छल कहिये मिथ्या है॥ जैसे नलविनै नीलता औ तल्लमल कहिये कटाहलुपता है नहीं। किंतु मिथ्या प्रतीत होवैहै। तैसैं संसार भी आत्मावपै है नहीं। मिथ्या प्रतीत होवैहै॥
वृक्षरूपकारिके संसार शुक्तिस्वरूपमैं कबहाहै। यातैं वृक्षके वाचक चलदलशब्दका संसारमैं प्रयोग कन्यााहै॥१३॥
॥४३६॥ १ सर्वसैं उत्कृष्ट होनैतैं 'जोचा ऐसा मायानिश्छितपरब्रह्म है मूल जिसका। औ- २ महत्तत्त्व है अंकुर जिसका। औ-- ३ अहंकार है स्कंध (पेड) जिसका। औ-- ४ पंचतन्मात्रा हैं शाखा जिसकी। ५ ये कहे जे महत्स्वादिक वे सवै कार्यताकि निकृष्ट होनैतैं जिसकी नीची शाखा कहिये हैं। औ-- ६ वैद्यादिक जे शास्त्र हैं वे प्ररोचनरूप शाखनसैं थानें । आनिलताद्यादिक। दोषणकूं
४०५॥ अन्यप्रकारसैं मोक्षका साधन ज्ञान है, यह कथन॥४०५-४०६॥। ॥ कवित्त ॥
- वान ज्ञानवान जान। राग रह विराग दोऊ धजा फररात हैं॥ विपेविषे सत्यभ्रम मतिवात तात। hallात प्रात रात gहरी न ठहरात है॥ साछच्य साछी पूतरी अनूजरी रु ऊजरी दै। देखि रागी त्यागी ललचात जन जात हैं॥ दांपतेहैं यातैं वे शाखैं जिसके पर्ण (पत्ते) hौं-७ चारिपुरुषार्थरूप जाके रस हैं हौं-- ८ धर्मअधर्मरूप जिसके पुष्प हैं। हौं-- ९ जगन्मरणआदिक दुःख जिसका फलहै। औ- १० अज्ञानीजीवरूप पक्षी जिसके भोंकत हैं। औ- ११ वैराग्यसैं तीक्ष्ण हूया ज्ञानरूप कुठार जिसका छेदक है।
ऐसा यह संसाररूप अश्वत्थवृक्ष है। इत्यादि अनेकप्रकारसैं शास्त्रनमें संसाररूप वृक्षकौं वर्णन किया है॥
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चंचल अचल भ्रम | ब्रह्म लखि रूप निज । दु:खकूप आनंद स्वरूपमें समात है ॥ १४ ॥ टीका:-हे शिष्य ! देहवान् कहिये देहअभिमानी अज्ञानी औ ज्ञानीवान्, बंध औ मोक्षके गेह कहिये धाम है ॥ १ अज्ञानी तौ बंधका धाम है । औ- २ ज्ञानी मोक्षका धाम है । राग औ विराग तिनकी भजा है । जैसे धजा राजाके नगरका चिन्ह होवैहै तैसे राग औ विराग तिन्हके चिह्न हैँ । १ अज्ञानका राग चिह्न है । औ- २ ज्ञानका विराग चिह्न हैँ । अज्ञानकी ओर वी विराग होवैहै, यातें ज्ञानकी अज्ञानमें विलक्षण विराग कहैहैं:-हे तात ! विपय जो शाब्दादिक हैँ तिन्हविपै सत्यभ्रम कहिये सत्पपनैकी श्रांति औ अममति कहिये रज्जुसर्पकी न्याई विपय भ्रमरूप है । यह मति निश्चय सो वातकी न्याई राग औ विराग हैँ हलावैहै । जैसे वायु धजाकी चंचलता करैहै तैसे विपयमें सत्यबुद्धि औ भ्रमबुद्धि राग औ विरागकूँ चंचल करैहै । शिथिल होन देवै नहीं ॥ १ विपयमें सत्यबुद्धि रागकी शिथिलता दू रि होवैहै । औ- २, विपयमें भ्रमबुद्धि विरागकी शिथिलता दूरी होवैहै ॥ ॥ ४०६ ॥ विपय असत्य हैँ । यातें तिन्हमें सत्यबुद्धि भांतिरूप है ! इस वास्तैके जनावनेकूँ कवितमें सत्यभ्रम कहा । सत्यबुद्धि नहीं कही ॥ श्रांतिज्ञान औ श्रांतिज्ञानका विपय जो
विध्यावस्तु, सो दोनूँ भ्रम कहियेहैं । या कहनेतैं अज्ञानके विरागतैं ज्ञानके विरागका भेद कहा । कहेहैं ? जो अज्ञानका विराग है, सो विपयमें मिथ्याबुद्धिसैं उत्पन्न नहीं हुवा ! यातैं मंद है । " विपय मिथ्या हैं " यह बुद्धि अज्ञानकूं होवै नहीं ॥ १ यद्यपि शास्त्रयुकिसैं अज्ञानी वी मिथ्या जानैहैं तथापि " विपय मिथ्या हैं " यह अपरोक्षमति ज्ञानवत्कूँहीं होवैहै । अज्ञानकूं नहीं । यातैं अज्ञानकूं विपयमें परोक्ष जो मिथ्याबुद्धि, तासैं अपरोक्षसत्यभ्रांति दूरी होवै नहीं । इसरीतिसैं अज्ञानकूं विपयमें जब विराग होवैहै, ता कालमें परोक्षमिथ्याबुद्धि है वी परंतु परोक्षमिथ्याबुद्धिसैं प्रवल अपरोक्षसत्यबुद्धि है । यातैं अज्ञानकी परोक्षमिथ्याबुद्धि विरागकी हेतु नहीं । किंतु प्रवल जो सत्यबुद्धि, तासैं विपयमें रागही होवैहै औ जो विराग होवै तौ भी मिथ्याबुद्धिसैं नहीं । किंतु विपयमें दोपदृष्टिसैं होवैहै ॥ औ- २ ज्ञानवान् करिके मिथ्या जानैहै । ता अपरोक्षमिथ्याबुद्धिसैं सर्वप्रपंचकूँ अपरोक्षरूप दू रि होवैहै । यातैं रागकी हेतु विपयमें सत्यबुद्धि तौ ज्ञानकूँ है नहीं । विरागकी हेतु विपयमें मिथ्याबुद्धि ज्ञानवानकूँ जो ज्ञानकूँ विपयमें सत्यबुद्धि फेरि होवै तौ राग वी फेरि होवै औ विराग दू रि होवै । सो अपरोक्षरूपतैं मिथ्या जानै पदाथमें फेरि सत्यबुद्धि होवै नहीं । जैसेँ अपरोक्षरूपतैं जो रज्जुमें सर्प, ताकेविषै सत्यबुद्धि फेरि होवै नहीं, तैसे ज्ञानकूँ फेरि
नहीं । इसरीतिसैं रागकी उत्पत्ति औ विरागकी निषृत्ति ज्ञानकै होवै नहीं । यातैं ज्ञानका विराग दृढ़ हैँ । औ- दोपदृष्टिसैं जो अज्ञानकूँ विराग होवैहै, वि. सा. ३ २
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सो तौ दूरी होय जावैहै । कहाहैं ? जा पदार्थनमैं दोषदृष्टि होवैहै ता पदार्थनमैंहीं अन्यकालमैं सम्यक्कुदृष्टि व्री होय जावैहै । जैसे सर्वपुरुषनकूं पञ्चधर्मके अंतमैं खीवीपै दोषदृष्टि होवैहै औ कालांतरमैं फेरि सम्यक्कुदृष्टि होवैहै । इसरीतिसैं दोषदृष्टि जब दूरी होवै तव अज्ञानौका विराग व्री दूरी होयजावैहै । यातैं अज्ञानीकूं दृढ़विराग होवै नहीं ॥
इसरीतिसैं राग औ विराग अज्ञानौके औ ज्ञानीके चिह्न कहे ॥
और व्री चिह्न कहैं:-है शिष्य ! जैसैं धामके ऊपरि पूतरि कहिये हस्तीआदिकनकी मूर्ति होवैहै तैसैं वंध्यमोक्षक धाम .जो अज्ञानी औ ज्ञानीका अंतःकरण है, ताकैवै साक्षीपूतरि है ॥
१ अज्ञानौकै अंतःकरणवैषै तो साक्ष्यरूपौ पूतरि है । औ— २ ज्ञानीके अंतःकरणमैं साक्षीरूपौ पूतरि है ॥ साक्षीकै विषषय जो प्रषंच है ताकूं साक्ष्य कहैं ॥
१ साक्ष्यरूप पूतरि अनूजरि कहिये मलिन है औ— २ साक्षीरूपी पूतरि उजरि कहिये शुद्ध है । आगे अर्थ साक्ष है ॥
चंचलग्रहम निजरूप लिखि औ अचलब्रह्म निजरूप लिखि । या क्रमतैं अन्यथै है ॥
॥ ४५७ ॥ अज्ञानौकूं दृढ़विराग होवै नहीं, इसौ अभिप्रायैं गीताविषै भगवानैं कहाहै:-निराहार (वहिरैंतैं विषयपनका त्यागी ) जो देहौ (जिंदासु) है, ताकै रसवर्जित, जैसैं होवैहै तैसैं . विषय - निवृत्त होवैहै कहिये ताकूं विषयपनवैषै जो स्थूलराग है सो
|| ४०७ || लक्षणा तीनिप्रकारकी हैं || ४०७-४०८ ||
भागत्यागलक्षणाका जो कवितवमैं विशेषकरिके ग्रहण कियाहै, तावैषै हेतु कहनैसूं लक्षणाका भेद कहैंहैं ॥
|| दोहा || त्रिविधलच्छना कहतहैं, कोविद बुद्धिनिधान ॥ जहतौ अरु अजहतौ पुनि, भागत्याग जिय जान �|१५| आदि दोइ नहीं संभवै, महावाक्यमैं तात ॥ भागत्यागतैं रूप निज, ब्रह्मरूप दरसात || १६ || अर्थ स्पष्ट ॥
|| ४०८ || शिष्य उवाच || || अर्थशांकरछंद || अव लच्छना प्रभु कहत काकूं । देहु यह समझाय ॥ पुनि भेद ताके तीनि तिनके । लच्छनहु दरसाय ॥ १७ ॥ टीका:-सामान्यज्ञानसैं अंतर विशेषका ज्ञान होवैहै । जैसैं सामान्यज्ञानत लक्षणका ज्ञान
निद्रित होवैहै । परंतु रसज्ञदकै वाच्य जो वासनारूप सुहरमराग सो मनमैं रहताहै । इस पुरुषका सो रस ( सूहमराग ) व्री परमरसकूं देखिके ( अपरोक्षकारिके ) निवृत्त होवैहै ॥
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पक्षस्तरंगः ६ ]
।। तीनप्रकारकी लक्षणा ।।
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जुयेैसैं अनंतर सारखतआदिक विशेषका ज्ञान होवैहै । तैसे लक्षणासामान्यका ज्ञान होवै तो जहत्याादिक विशेपरूपनका ज्ञान होवैहै । लक्षणाका सामान्यरूप जानैविना जहत्याादिक विशेषरूपनका ज्ञान होवै नहीं । इस अभिप्रायैं—
शिष्य कहैहै:- हे प्रभो! लक्षणा काहू कहतहैं, यह मैं नहीं जानूंहैं । यातैं लक्षणाका सामान्यरूप दिखायके तिसतैं अनंतर जो जहत्याादिक लक्षणाके तीनभेद कहिये विशेष हैं, तिन्हकै उदाहरण लक्षण दिखावो । छंदवास्ते प्रभोर्हू प्रभु पढ़्या । औ भापाकी संबद्रायैं लक्षणाके स्थान लछन पढ़्या ।
लक्षणके स्थान लछन पढ़्या ।।
।। ४३८ ।।
९ जैसे गौस्का गौसि संवंध है तव ताकी अनेकगौकै मध्यस्थित अपनी मातारूप गोैै प्रदत्ति होवैहै, संवंधविना प्रत्तति होवै नहीं, यातैं ता वत्सका औ गौका जो परस्पर जन्यजनकभावसंवंध जानियेहै तिस जन्यजनकभवावरूपकै ज्ञानकी हेतु जो वत्सकी गौविधै प्रत्तक्ति है सो वी संवंध कहियेहै ।
२ तैसे शाव्दकी अपनेऐपने अर्थविपै जो प्रद्तक्ति होवैहै सो वी किसी संवंधविना वनेै नहीं । यातैं शाव्दका अपने वाच्यरूप किन्चा लक्षणरूप अर्थकै साथि वाच्यवाचकभावरूप किन्चा लक्ष्यलक्षकभावरूप संवंध जानियेहै ।
इस द्विविधसंवंधकूंही स्मार्यस्मारकभावरूप संवंध वी कहतहैं ।
(९) वाच्यरूप किन्चा लक्यरूप जो अर्थ सो पदकरिकै स्मरण करानेै योग्य है । यातैं सो स्मायै कहियेहै । भौ—
(२) वाचकलरूप किन्चा लक्षकलरूप जो पद, सो तिस अर्थकै स्मरण करावनेैहारा है । यातैं सो स्मारक कहियेहै ।
।। ४०९ ।। गुरुवाक्य ।। श्रुति चित निज एकाग्र करि । अव सिष्य सुनि म वानि ।। ज्यौं लछछना अरु भेद तोहैं । लेहु नीके जानि ।। सुनि वृत्ति है दैभांति पदकी । सत्ति तामैं एक ।। तहां लछछना पुनि जानि दूजी । सुनहु सो सविवेक ।। १८ ।।
टीका:- पदका जो अर्थसैं संवंध सो वृत्ति कहिये है ।
तिन दोनूंका आपसमें स्मार्यस्मारकरूप संवंध है । तिस संवंधके ज्ञान करनैकी हेतु जो शाव्दकी अपने अर्थविपै प्रत्तक्ति सो वी शाव्दका अर्थसैं संवंध कहियेहै । तिसी प्रत्ततिल्हू संवंधकूं शाव्दकी वृत्ति भी कहतहैं ।
सो द्रत्तिल्हू संवंध कर्हूं शक्तिरूप होवैहै, कर्हूं लक्षणरूप होवैहै, यह प्रसंगसैं जानिलेनै ।
९ शाव्दविपै वृत्ति नाम अंतःकरणके वा अवधाकै परिणात्मक वी है ।
२ तैसे वत्सनेैालका नाम वी वृत्ति है ।
३ तैसे जीविकाका नाम वी वृत्ति है ।
४ तैसे प्राणोंकी क्रियाका नाम वी वृत्ति है ।
५ तैसे किसी व्याकरणके विभागका नाम वी वृत्ति है ।
तिनमेंसैं कोई वी वृत्तिशाव्दका अर्थ इहां जाननै योग्य नहीं । किंतु शाव्दका अर्थसैं जो संवंध सो योग्य है । इहां वृत्तिशाव्दका अर्थ आननै योग्य है ।
इस शाव्दकी वृत्तिका कछुक वर्णन हमनै वेदस्तुतिकी सामान्यार्थदीपिका करीहै तामैं तथा वृत्तिरन्वलिमैं वी लिक्ष्याहै ।
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।। लक्षणाके भेद ।। ४०७-४१९ ।।
सो शक्तिदृष्टि दोप्रकारकी है । ता दोप्रकारमें एक शक्तिदृष्टि है औ दूसरी लक्षणादृष्टि है ।
॥ ४३९ ॥ शब्दमें अपने अर्थके ज्ञान करनेकी जो सामर्थ्य है सो शब्दकी शक्तिदृष्टि कहिये है ।
सो शब्दकी शक्ति दो प्रकारके मध्यमें स्थित कपालसंयोगकी नांई औ कार्यकारणभावादिकनके मध्यमें स्थित समवायसंबन्ध कि वा तादात्म्यसंबन्धकी नांई शब्द औ अर्थ इन दोनोंके मध्यमें स्थित है ।
यातैं सो शक्ति शक्तिदृष्टिरूप शब्दका अर्थके साथि साक्षात्संबंध कहिये है ।
इसीतैं कही जो शब्दकी अर्थके साथि साक्षात्संबंधरूप शक्तिदृष्टि सो १ योगारुढि, २ रुढि, औ ३ योगारुढि उभयरूप, इसभेदतैं तीनप्रकारकी है ।
१ जिस शब्दविषै अपने अवयवनके योग ( मिलाप ) तैं अर्थके ज्ञान करनेकी सामर्थ्य है तिस शब्दका अपने अर्थके साथि योगशक्ति-रूप संबंध है । सोई शब्दकी योगदृष्टि कहिये है । जैसेैं "पगरखा" शब्द है । तिसविषै तिसके "पर" औ "रखा" ये दो अवयव हैं, तिनके योग (मिळाप) तैं पदार्थका ज्ञान करनेका सामर्थ्य है । यातैं "पगरखा" शब्दका अपने पाद-त्राणरूप अर्थके साथि योगाशक्तिरूप संबंध है ।
२ जिस पदके अवयवनसैं अर्थका ज्ञान होवै नहीं, किंतु "इस पदका यहही अर्थ होवै" ऐसा अर्थ करनेका संकेत (परिभाषा) जिस पदविपै होवै तिस पदका अपने अर्थके साथि रुढिशक्तिरूप संबंध है । सोई शब्दकी रुढिदृष्टि कहिये है । जैसेैं "पगड़ी" शब्द है, तिसके अवयवनसैं कुछ अर्थका ज्ञान होता नहीं । किंतु "पगड़ी" शब्दका शिरोवेष्टनरूपही अर्थ होवै । ऐसा जो लोकनका संकेत है सोई "पगड़ी" शब्दका अपने शिरोवेष्टन-रूप अर्थके साथि रुढिशक्ति है ।
३ जिस पदके अवयवनसैं बी अर्थका ज्ञान होवै औ तहांँ लोकनका बी संकेत होवै तिस शब्दका अपने अर्थके साथि योगारुढि उभयरूप शक्ति है । जैसैं "अंगरखा" शब्द जो है तिसके अवयव ।
तिनकूं सविवेक कहिये विवेकसहित । याका अर्थ लक्षणसहित मुनि'"अंग" औ "रखा" तिनके योगतैं कंचुक (पहिरण) रूप अर्थका ज्ञान होवैहै । औ "पगरूप अंगकी रक्षा करनेवाले पगरलेंकूं अंगरखा नहीं कहनां किन्तु इसी (कंचुक ) कूंही अंगरखा कहनां" ऐसा इस अंगरखशब्दविषै लोकनका संकेत वी है । यातैं अंगरखशब्दविपै अपने अर्थके साथि योगारुढ़िरूप शक्तिमयसंबंध है ।
यह कही जो तीनप्रकारकी शब्दकी शक्तिदृष्टि, याहीकूं मुख्यदृष्टि वी कहतेहैं ॥
॥ ४४० ॥
१ जो शब्दकी शक्तिदृष्टिरूप संबंघसैं जानिये-हैं ऐसा जो शब्दका साक्षात्संबंधी अर्थ सो शाक्ष्यअर्थ कहिये है ॥
२ तिस शब्दअर्थके संबंधी वक्ताके तात्पर्य-के निप्पाद्य अर्थके लिये जो शब्दका परंपरा-संबंध, सो शब्दकी लक्षणादृष्टि है ।
३ तिस लक्षणादृष्टिसैं जानिये है ऐसा जो शब्दका परंपरासैं (शक्यअर्थद्वारा) संबंधी जो अर्थ, सो शब्दका लक्श्यअर्थ कहिये है ।
१ जैसे पिताशब्दका शक्तिदृष्टिरूप साक्षात्-संबंध जनकरूप अर्थेस है । यातैं पिताशब्दकी शक्तिदृष्टिरूप संबंघतैं जानिये है ऐसा जो पिताशब्दका साक्षात्संबंधी जनकरूप अर्थ सो पिताशब्दका शाक्ष्यअर्थ कहिये है ॥
२ तिस जनकरूप शक्यअर्थका संबंधी औ किसी बंधुदिनमें "सबसे प्रथम पिताकी ताई नमस्कार कर" ऐसे पौरके प्रति वोधन करनेहारे वक्तापुरुषके तात्पर्य-का विषय जो पितामहरुंप अन्यअर्थ हैं, तिसविषै जो पिताशब्दका परंपरासंबंध सो पिताशब्दकी लक्षणादृष्टि है ।
३ तिस लक्षणादृष्टिसैं जानिये है ऐसा जो पिताशब्दका परंपरासैं (जनकरूप शक्यअर्थद्वारा) संबंधी पितामहरुंप अर्थ सो पिताशब्दका लक्श्यअर्थ है ।
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॥४९०॥ न्यायरीतिसैं शक्तिलक्षण ॥ ( ईश्वरेच्छा ) ॥ अथ शक्तिलक्षण ॥ ॥ दोहा ॥ या पदतैं या अर्थकी, वहै सुनतेहि प्रतीति ॥ ऐसी इच्छा ईशकी, सक्ति न्यायकी रीति ॥ १९ ॥
टीका:- या पदतैं कहिये घटपदतैं या अर्थकी कहियें सकलअर्थकी सुनतैही प्रीतीति कहिये ज्ञान सर्वप्रपंचकूं होवै, ऐसी जो ईश्वरकी इच्छा, ताकूं न्यायशास्त्रमैं शक्ति कहहै ॥
॥४९१॥ अथ स्वरीति शक्तिलक्षण ॥ ( पदमै अर्थके ज्ञानकी सामर्थ्ये ) अर्धेँशंकरच्छंद ॥ सामर्थ्य पदकी सक्ति जानहु । वेदमत अनुसार ॥ सो वहिमैं जिम दाहकी है सक्ति त्यौं निरधार ॥ २० ॥
कितु किसीद्वारा संबंघ होवै, तिस अर्थके साथि तिसका परंपरासंबंध कहियेहै ॥ जैसेँ पैत्ररूप तृतीयपुरुषका अपने पितामहरूप प्रथमपुरुषके साथि साक्षात्संबंध (जन्यजनकभाव) नहीं है, किंतु पुत्रका अपने पितासैं संबंध ( जन्म- जनकभाव ) है जो पिताका पितामहसैं संबंध है, यातैं पैत्रका पितामहसैं पिताद्वारा संबंध है, सो परंपरासंबंध है ॥ तैसेँ शब्दका अपने साक्षात्संबंधी शक्यअर्थसैं भिन्न जो शब्द्यअर्थका संबंधी, ताके साथि साक्षात् संबंध नहीं । किंतु शब्दका शक्तिरूप संबंध शक्य- अर्थसैं है जो शक्त्यर्थका संयोगादिरूप किसी बी
टीका:- ९ घटपदके श्रोताकूं कल्मरूप अर्थके ज्ञान करनैका जो घटपदविपै सामर्थ्ये, सोई घटपदमैं शक्ति है ॥ २ तैसे पदपदके श्रोताकूं चक्षुरूप अर्थके ज्ञान करनैका जो पट्पदविपै सामर्थ्ये, सोई पटपदमैं शक्तिवृत्ति है ॥ ऐसैं सर्वपदनमैं जानि लेनी ॥ दृष्टांत:- जैसैं बहिमैं अपनेसैं मिलतेही वस्तुके दाहु करनैकी सामर्थ्येरूप शक्ति है,
तैसे श्रोताके कर्णसैं मिलतेही वस्तुके ज्ञान करन- की जो पदविपै सामर्थ्ये, सो शक्ति कहियेहै । कहहैं औ चल बी कहहैं । जोर बी कहहैं ॥ जैसे अधर्मीं दाहकी शक्ति हैं तैसे जलविपै गीला करनैकी, चुपा दूरि करनैकी औ पिंड बांंधनैकी जो समर्थथी है, सो शक्ति है ॥ इसप्रकारसैं सर्वपदार्थनविपै अपना अपना कार्ये करनैकी सामर्थ्ये है, सोई शक्ति है ॥ यह वेदका सिद्धांत है ॥ ताहीकूं निधार कहिये निश्चय कर औ न्यायकी रीति त्यागनैकूं योग्य है ॥
प्रकारका संबंध वक्ताके तात्पयर्के विषयरूप अपने संबंधी अन्यअर्थसैं है । यातैं तिस शक्यके संबंधी अन्यअर्थसैं शाब्दक शक्त्यर्थेद्वारा संबंध है । यातैं सो परंपरासंबंध कहियेहै ॥ यह शब्दका परंपरासंबंधही लक्षणादृत्ति है, सो शब्दका परंपरासंबंध जिस अर्थके साथि होवै, सो शब्दका लक्षणार्थ है । यह लक्षणादृत्तिका सामानयलक्षण औ उदाहरण कहा । याके जहांत- आदिक त्रिविधभेदके अनेक उदाहरण आगे ( ४३० सैं ४३२ वें अंकपर्यंत ) त्रिविधलक्षणाके प्रसंगमैं टिप्पण- विषे हम लिंड़गे ॥
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॥४१२॥ प्रश्न:- वर्णसमुदायसैं जूदी शक्ति नहीं, यातैं ईशइच्छा शक्ति है ॥
॥ शिष्य उवाच ॥
॥ शंकरछंद ॥ ननु वादिनैं नहीं मति भाषै । वहि बिन कछु और है हेतुता जो दाहकी । सो वहिमैं तिहि ठौर ॥ इम पदनहूँ वर्णबिन कछु । सक्ति भासत नाहीं । या हेतुतैं जो ईसइच्छा । सक्ति मो मति माहिं ॥ २१ ॥
टीका:- ननु शब्द संदेहका वाचक है । वहिमैं ताके स्वरूपसैं जूदी शक्ति भासै कहिये प्रतीत होवै नहीं और पूर्वकबला दाहका हेतु जो वहिमैं सामर्थ्य, सोइ वहिमैं शक्ति है । सो बनै नहीं । कहैंतैं ? दाहकी हेतुता कहिये जनकता कारणपना केवल वहिमैहीं है । amसिद्धसामर्थ्य वहिमैं मानिके ताकैवै हेतुता माननैका औ प्रसिद्धहिमैं हेतुता त्यागनैका कछु प्रयोजन नाहीं । जैसैं दृष्टांतमैं शक्ति नहीं संभवे । इम कविते इष्टांतमैं पदनकै विंधे वी वर्णका समुदाय जो पदनका स्वरूप, तासैं जूदी शक्ति भासै नहीं औ ताका प्रयोजन वी नहीं ॥ या हेतुतैं ईश्वरकी इच्छालप जो न्यायकी रीति सोंई मेरी मतिमाँहि भासैहै ॥
॥४१३॥ यह "नड" ऐसा जो शब्द है, सो संदेहका वाचकं है । कहिये शंकारूप अर्थका जनक है । ( गतप्रश्नका उत्तर ।॥ ४१३-४२७ ॥ ) ॥ ४१३ ॥ सिद्धांतरोंतिसैं अभिआदिकमैं दाहादिकार्यकै सामर्थ्यरूप शक्तिका प्रतिपादन ॥
॥ गुरु उवाच ॥ ॥ शंकरछंद ॥ प्रतिबंधे होते वहिं नहिं । दाह उपजे अंग ॥ उत्तेजक रु ज्व धरेै तब । फिरि दहै वहि स्वसंग ॥. वहि वहिमैं जो हेतुता । तौ दाह वहै सबकाल ॥ जो नसैँ साजै वहि होने । हेतु सक्ति सु बाल ॥ २२ ॥
टीका:- हे अंग प्रिय ! प्रतिबंधके होते अभिसैं दाह होवै नहीं औ उत्तेजक समीप धरेै तव स्वसंग कहिये अभिसैं मिल्या जो पदार्थ, ताका दाह प्रतिबंध होते वी होवैहै ॥ जो शक्तिसैं बिना केवल अभिकूँ दाहकी हेतुता होवै तो सर्वकाल कहिये उत्तेजकसहित प्रतिबंधरहित कालकी वी दाह ह्वैचाहिये ! कहैंतैं ? दाहका हेतु केवलअभि ताकालमै वी है औ स्वमतमै तो यह दोप नहीं । कहैंतैं ? स्वमतमै अधिकी शक्ति अथवा शक्तिसहित अभि दाहका हेतु है । केवल अभि नहीं ॥ जहां प्रतिबंध है तहां यद्यपि प्रतिबंधसैं बोधक है । यातैं शिष्य इहाँ शंका करैहै । यह जानना ॥
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अभिका तौ नाश वा तिरोधान नहीं वी होता। तथापि अभिकी शक्तिका नाश वा तिरोधान होवैहै, यातैं दाहका हेतु शक्ति अथवा शक्तिसहितं अभिका अभाव होनैतैं दाह होवै नहीं ॥ औ-
जा स्थानमें प्रतिबंधके समीप आयाहैं । तहां प्रतिबंधनै तौ अभिकी शक्तिका नाश वा तिरोधन करिदिया, परंतु उत्तेजकनैं फेरि शक्तिकी उत्पत्ति वा प्रादुर्भाव कियाहै । यातैं प्रतिबंधके होते वी उत्तेजकके माहातम्यतैं दाहका हेतु शक्ति वा शक्तिसहित अभिके होनैतैं दाह होवैहै ।
चतुर्थपादका अक्षरार्थ यह है:-हे वाल ! अज्ञाततस्म्व जो नसै कहिये नाशारूं प्राप्त होवै प्रतिबंधतैं, औ उपजै उत्तेजकतैं, सु कहिये सो शक्ति दाहका हेतु है ॥
१ कारजका जो विरोधी सो प्रतिबंधक कहियेहै ॥ औ-
२ प्रतिबंधकके होते कारजका साधक उत्तेजक कहियेहै ।
१ अभिके स्थान प्रतिवंध औ उत्तेजक मणिमंत्र औपध हैं । जा मणि वा मंत्र औपधके सन्निधानसैं दाह होवै नहीं सो प्रतिबंधक । औ-
२ जा मणिमंत्र औषधके सन्निधानसैं प्रति-
॥ ४४२ ॥ इहां प्रतिबंधरूप जे मणिमंत्र औषध हैं औ तिनकरिके जो अभिकी दाह करनैकी शक्तिका नाश वा तिरोधान होवैहै; तैसैं उत्तेजक-रूप जे मणिमंत्रऔषध हैं वी तिनकरिके जो अभिकी शक्तिकी उत्पत्ति वा प्रादुर्भाव होवैहै, सो ठीककरनाथआदिकनिवै प्रसिद्ध है ॥
॥ ४४३॥ इस ऊपर कहे अर्थशंकरछंदका यह अर्थ है:-अब कहिये प्रतिबंधकके सन्निधावकालमैं शक्ति
बंधक होते वी दाह होवै सो उत्तेजक है ॥ ४४२ ॥ गुरुवाक्य ॥ ॥ अर्थशंकरछंद ॥ सिष रीति यह सबवस्तुमैं तूं । शक्ति लेहु पिछानी ।। विनशक्तिं नहीं कछु काज होवै । यहै निश्चै मानी ॥ २३ ॥
टीका:- हे शिष्य ! वहिक्रीं न्याईं जलादिक सर्वपदार्थनिवैपै तूं शक्ति पिछान । शक्तिसैं बिना किसी हेतुसैं कोई कार्य होवै नहीं ॥
सार्दशंकरछंदसैं शक्तिका प्रयोजन कव्या ॥ पूर्व जो शिष्यनैं प्रश्न.कियाथा:- “ शक्ति वधिकैसैं मिन्न प्रतीत होवै नहीं ” ताका समाधान कहनैतैं अद्देशंकरसैं शक्तिका अनुमवं दिसावैहै:-
॥ अर्थशंकरछंद ॥ अबै शक्ति यामैं है नहिं वह । शक्ति उपजी और ।। यह शक्तिको परसिद्धअनुभव । लोपिहै किस ठौर ॥ २४ ॥
[ अर्थ स्पष्ट ]
कहिये दाह करतैहै सामर्थ्य, यामैं कहिये प्रज्ञप्ति शक्तिमैं नहीं है औ फेर उत्तेजकके सन्निधावकालमैं वह औरशक्ति उपजिहै । यह शक्तिका प्रसिद्ध अनुभ-व ठीककरनायआदिकनके कौतुकके देखनेवैरे सर्वलोकनकूं है । तिस लोकनके अनुभवनकूं हे शिष्य ! तूं किस ठिकानै छोपैगा? अनुमितिप्रमारूप इस . यह अर्थ है ॥
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२५६
अन्यमतकी शक्तिका खंडन ४१५-४२७
सिद्धांतकी रीतिसैं शक्तिकै स्वरूप औ शक्ति मैं प्रमाण निरूपण कियो ॥
॥४१५॥ अन्यमतकी शक्तिका खंडन
॥ अर्थसंकलनन ॥
जो सक्ति इच्छा ईश्की सो । पदनके न नजीक ॥ मत न्यायको अन्याय या विधि । सक्ति जानी अलीक ॥ २५ ॥
टीका:- जो ईश्वरकी इच्छारूप पैंदंशक्ति कही, सो तौ नहैं । कहैंतैं ईश्वरकी इच्छा ईश्वरका धर्म है । यांतैं ईश्वरमें रहैं ॥ जो इच्छा सो पदकी शक्तित है । यह कहना नहैं ॥ जो पदका धर्म शक्ति होवै तौ पदकी शक्तित है, यह कहनां नहैं । यांतैं पदकी सामर्थ्य-रूपही पदकी शक्तित है । ईश्की ईच्छा पदके नजीक ही नहीं, सो पदकी शक्तित है । यह कहनां नहैं ॥
॥४१७॥ न्यायिकोंनैं पदशक्ति कहीहै ॥
॥४१५॥ ईश्की इच्छा ईश्का धर्म है । यांतैं सो ईश्के आाश्रित होतैं ॥ (ईश्के समीप है । यांतैं सो ईश्की शक्तित है । सो इच्छा घटादिपदनकौ धर्म नहैं । यांतैं पदनकी असंबंधी होतैं सो पदनकी शक्तित नहैं ॥ जैसैं कुलालकूं घट करनेकी इच्छा है, सो कुआलका धर्म है । घटका धर्म नहैं । तैसैं "इस (घट). पदका यह (कलशारूप) अर्थ होवै" इस संकल्प-पूर्वक जो ईश्वरकी इच्छा है, सो ईश्वरके आाश्रित
अलीक नाम झूठकौ है ।
॥४१६॥ अर्थ वै्याकरणरीतिशक्ति-लक्षण ॥ (पदमें अर्थकी योग्यता)
॥ अर्थसंकलनन ॥
योग्यता जो अर्थकी पद-मांधि सक्ति सु देखि ॥ यूं कहत वै्याकरणभूषण । कारिका हरि लेकि ॥ २६ ॥
टीका:- पदकेवै जो अर्थकी योग्यता काहिये अर्थके जानिकी हेतुता हेतुपना, सो पदमें शक्तित है । जैसैं घटपदवै कलशारूप अर्थके जानिकी हेतुतारूप योग्यता है, सोई शक्तित है । इसरीतिसैं वै्याकरणभूषणग्रंथमैं हरिकी कारिका प्रमाण लिखिके शक्तित कहीहै ॥
अथवा वै्याकरणके जो भूषण काहिये उत्तमवै्याकरणतैं हरिकी कारिका काहिये श्लोककूं देखिके कहैंत है । धर्मे है । यांतैं ईश्वरकी शक्तित है ।- पदनकौ धर्म नहीं । यांतैं सो पदनकी शक्तित नहीं यह जाननौ ॥
॥४१६॥ हरिकी कारिका काहिये हरिपंदित-क्कत ७०० के सुमारमें श्लोकसदृश व्याकरणकौ ग्रंथ है, तिसरूप प्रमाणकूं ठिखिके वै्याकरणभूषण-नामक ग्रंथमैं शक्तित कहीहै ।
॥४१७॥ यह वै्याकरणके भूषणकारकौ मत है औ मंजूषाप्रंथमैं योगभाष्यकी रीतिसैं वाच्य-वाचकभावकौ मूल जो पदअर्थकौ तादात्म्यसंबंधी सोई शक्तित मानीहै । यही शक्तित योगमतमैं भी मानीहै, तिस वाच्यवाचककै । तादात्म्यरूप शक्तिकौ खंडन आगें भतमतके प्रसंगमैं कियाहै ॥
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॥ ४९७ ॥ वैयाकरणरीतिकी शक्तिका खंडन ॥ ४१७-४१८ ॥
॥ गुरुवाक्य ॥
॥ सार्धशंकरछंद ॥ हे शिष्य ! वैयाकरणमतमें प्रबलदूषण एक । सामर्थ्य पदमें हैं न वा यह । पूछि ताहि विवेक । भाखै जु है तौ शक्ति मानहु । ताहि लोकप्रसिद्ध ॥ कहि नाहीं जो असमर्थी पद सो । योग्य व्है यह सिद्ध ॥ २७ ॥ असमर्थ हैं पद अर्थ योग्य हैं । कहतहीं सविरोध । जो औरदूषण देखनो तो । ग्रंथदपंने सोध ॥ ४८ ॥ टीका:-प्रथमपाद स्पष्ट ॥ हे शिष्य ! अर्थज्ञानकी हेतुताल्प योग्यताहू जो शक्ति मानैहै, ताकूं यह विवेक पुछ्च्या चाहिये:-तेरे मतमें पदविपै सामर्थ्य है अथवा नहीं है? प्रथमपक्ष कहै तौ हमारे मतकी शक्तिं वलसैं सिद्ध होवैहै । याक अन्वय:-" जो भाखैहै तौ लोकप्रसिद्ध शक्तिं ताहि मानहू । अर्थ जो वैयाकरणी कहै । पदमें सामर्थ्य है तौ लोकमें प्रसिद्ध जो सामर्थ्यरूप शक्ति है, ताहि पदमें वी मानहू । पदमें
अर्थज्ञानकी जनकतारूप योग्यताकूं शक्ति मति मान ॥ अभिप्राय यह है:-जो पदमें सामर्थ्य अंगीकार करै, ताहू सामर्थ्येसैं भिन्नरूप शक्तिका मानना योग्य नहीं । किंतु सामर्थ्य- रूपही शक्ति है; यह मानना योग्य है । कहतेहैं ? सामर्थ्य, बल, जोर औ शक्ति, ये चारि नाम एकवस्तुके लोकमें प्रसिद्ध हैं ॥ जोरहीनकूं लोक कहैहैं:-यह सामर्थ्यहीन है, बलहीन है औ शक्तिहीन है । और भर्जिंते- अचकूं कहैहैं:- याके विपै अंकुरउत्पत्तिकी सामर्थ्य नहीं है, बल नहीं है, शक्ति नहीं है ॥ इसरीतिसैं सामर्थ्य औ शक्तिकी एकता लोकमें प्रसिद्ध है । औ---- वहिमैं वी सामर्थ्यरूपही शक्ति निर्धारित है । यातैं पदमें सामर्थ्यरूपही शक्ति माननी योग्य है । औ पदमें सामर्थ्य मानिके तासैं भिन्न योग्यताकूं शक्ति कहनेकूं लोकप्रसिद्धिके विरोधविना औरफल नहीं । केवल लोक- प्रसिद्धिका विरोधही फल है ॥ औ- ॥ ४९८ ॥ जो ऐसैं कहैं:-सामर्थ्यकूंही हम योग्यता करैहैं तौ हमारीहू मत सिद्ध
होवैहै ॥ औ- ऐसैं कहैं:-हम सामर्थ्य अंगीकार करैं तौ सामर्थ्यरूप शक्ति पदमें संभवै, सो सामर्थ्यहू अंगीकारही नहीं करतें । यातैं अर्थज्ञानकी जनकतारूप योग्यताही पदमें शक्ति है, ताकूं पुछ्या चाहिये:- सामर्थ्यकं आवाह केवळ पदमेंहीं अंगीकार करैहै । अथवा वृत्त्यादिक सर्वपदार्थनमें सामर्थ्यकं अभाव अंगीकार करैहै ?
॥ ४९८ ॥ वृत्ते ( दश )
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जो अंत्यपक्ष कहै है तौ वृत्त्यादिक पदार्थनमैं सामर्थ्यरूप शक्तिके प्रतिपादनमैं उक्त जो युक्ति, तिन्हैं खंडित है ॥ औ—प्रथमपक्ष कहै तौ ताकैवैष अंत्यपक्षोक्त दोष तौ यथापि नहीं है । कहैंतैं ? जो वृत्त्यादिक सर्वपदार्थनमैं सामर्थ्यरूप शक्ति नहीं मानैं तौ प्रतिबंधकतैं पदार्थका अभाव तौ नहीं । यह अंत्यपक्षमैं दोष है । सो दोष प्रथमपक्षमैं नहीं । कहैंतैं ? वृत्त्यादिक सर्वपदार्थनमैं तौ सामर्थ्यरूप शक्ति है । यातैं प्रतिबंधकतैं दाहकके अभावका असंभव नहीं, परंतु पदके—वैष अर्थज्ञानकी जनकतारूप योग्यतासैं मित्र सामर्थ्यरूप शक्ति नहीं । किंतु पदमैं अर्थकी योग्यताही शक्ति है । यह प्रथमपक्ष है ॥ताकै—वैष प्रतिबंधकतैं दाहकका असंभवरूप दोष तौ नहीं ॥
तथापि पदवैष वृत्तिकी न्याईं सामर्थ्यैंका अंगीकार अवश्य कियोचाहिये । यह प्रतिपादन करेंहैं । शंकरके दोपादनतैं—"नहीं जो असमर्थे " इत्यादि "सविरोध" पर्यंत ॥ अथे नाहिं कहिये पदमैं सामर्थ्यैंका अंगीकार नहीं तौ जो असमर्थपद सो योग्य कहिये अर्थज्ञानका जनक है । यह सिद्ध कहिये मतका निश्चय है । सो असंगत है । कहैंतैं ? पद असमर्थ है है और अर्थयोग्य कहिये अर्थज्ञानका जनक है । यह वाक्य नयोंसंकाका अमोघवोर्यै है । इस वाक्यचौकी न्याई कहेलैही सविरोध है । विरोधसहित है ॥
१ सामर्थ्यसहितका नाम समर्थै है । और—२ सामर्थ्यरहितका नाम असमर्थै है । असमर्थैंसैं कोई कार्य होवै नहीं; यह लोकमैं प्रसिद्ध है ॥
॥ ४१९ ॥ मर्जितबीजको न्याईं सामर्थ्यहीन पदवैष अर्थज्ञानकी जनकतावैष थी अभावतैं सो योग्यता पदमैं शक्ति नहीं । किंतु तौ योग्यता जिस
प्रसिद्ध हैं । यातैं असमर्थपदसैं वी अर्थका ज्ञानरूप कार्य होवै नहीं । यातैं पदमैं सामर्थ्ये मानना योग्य है । जय सामर्थ्ये पदमैं अंगीकार क्रिया तथ शक्ति वी पदमैं सामर्थ्यरूपही मानी योग्य है ॥
इसरीतिसैं अर्थज्ञानकी जनकतारूप योग्यतैंता पदमैं शक्ति नहीं । किंतु सामर्थ्यरूपही शक्ति है ॥
जो वैयाकरणमतमैं औरदृपण देखना होवै तौ शक्तिके निरूपणमैं दृपणग्रंथकौं शोध कहिये देख । दृपण हष्टि है । यातैं दृपणोक्तदृपण लिख्या नहीं ॥
॥ ४१९ ॥ अथ भट्टरीतिशक्तिलक्षण
॥ ४१९-४२१ ॥
(पदका अर्थसैं भेदाभेदरूप तादात्म्य ।)
अर्धशार्करछंद
संबंध पदको अर्थसैं तादात्म्यशक्ति सु वेद । इम भट्टके अनुसारि भाखत । ताहि भेदाभेद ॥ २९ ॥
टीका:–पदका अर्थसैं जो तादात्म्यसंबंध, ताकौं भट्टके आखुसारी शक्ति कहैंहैं । सो वेद कहिये तूं जान । ताहि कहिये तिस तादात्म्यकौं भेदाभेदरूप कहैंहैं ॥ यह तिन्का अभिप्राय है:–
१ अभिपदका अंगारअर्थसैं अत्यंतभेद नहीं । जो अत्यंतभेद होवै तौ जैसैं अभिपदसैं अत्यंतभिन्न जलआदिक हैं, तिन्हकी अभिपदसैं सामर्थ्यकरिकै होवैहै सो सामर्थ्यही लोकप्रसिद्ध शक्ति है ॥
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प्रतीति होवै नहीं, तैसे अग्निपदकै अंगाररूप अर्थकी प्रतीति नहीं होवैगी । पदकै अत्यंतभिन्न अर्थकी प्रतीति होवै नहीं ॥ २ जैसैं पदका अपने अर्थसैं अत्यंतभेद नही, तैसे अत्यंतभेद वी नहीं ॥ जो अत्यंतभेद वाच्यवाचकका होवै तौ जैसैं अग्निपदके वाच्य अंगारसैं मुखका दाह होवैहै तैसे अंगारका वाचक अग्निपदके उच्चारण कियें वि मुखका दाह हुइआचाहिये औ पदके उच्चारणतैं दाह होवै नहीं । यातैं अत्यंतभेद वी नहीं । किंतु— अग्निपदका अंगाररूप अर्थसैं भेदसहित अभेद है ॥ १ भेद है, यातैं दाह होवै नहीं । औ— २ अभेद है, यातैं अग्निपदतैं जलआादिकनकी न्याई अंगारकी प्रतीतिका असंभव वी नहीं ॥ जैसैं अग्निपदका अंगाररूप अर्थसैं भेदसहित अभेद है, तैसे उदक, वन, जल, दक, इन जीवनपदनका पानीरूप अर्थसैं भेदसहित अभेद है ॥ १ जो अत्यंतभेद होवै तौ जैसैं उदकआदिकपदनतैं अत्यंतभिन्न अग्निादिक हैं, तिन्हकी उदकआदिकपदनतैं प्रतीति होवै नहीं, तैसे पानीरूप अर्थकी वी उदकआादिक पदनतैं प्रतीति नहीं होवैगी । यातैं अत्यंतभेद नहीं । औ— २ अत्यंतअभेद वी नहीं । जो अत्यंतअभेद होवै तौ जैसैं पानीतैं मुखमैं शीतलता हुइआचाहिये औ पदनतैं शीतलता होवै नहीं । यातैं अत्यंतअभेद नहीं । किंतु भेदसहित अभेद होनेतैं दोष नहीं ॥
इसरीतिसैं सर्वत्रही अपनेअपने वाच्यतैं वाचकपदनका भेदसहित अभेद है । ता भेदसहित अभेदकै अनुसारी तादात्म्यसंबंध कहैहै औ भेदअभेदरूप तादात्म्यसंबंधही सर्वपदनमैं अपनेअपने अर्थकी शक्तिका हेतु है । तादात्म्यसमंधतैं जुदी सामर्थ्यरूप शक्ति नहीं । भेदअभेदमैं युक्ति कही ॥ ॥ ४२० ॥
॥ अथ प्रमाण कहैहैं:— ॥ अर्धशारङ्करछंद ॥ यह ॐअच्छर ब्रह्म है यौं । कहत वेद अभेद ॥ पुनि वानिमैं पद अर्थ बाहरि । देखियत यह भेद ॥ ३० ॥ टीका:— सांख्य आदिक वेदवाक्यनमैं "ॐअक्षर ब्रह्म है" यह कथ्याहै । तहां ष्याकरणकी रीतिसैं प्रकरणरूप सर्वकी रक्षा करता ॐअक्षरका अर्थ है । ऐसा ब्रह्म है । यातैं ॐअक्षर ब्रह्मका वाचक है औ ब्रह्म वाच्य है ॥ १ जो वाच्यवाचकका आपसमैं अत्यंतभेद होवै तौ वाचक ॐअक्षरका औ वाच्यतब्रह्मका सांख्यआादिकनमैं अभेद नहीं कहते । औ यातैं वाच्यवाचकके अभेदमैं वेदवचन प्रमाण है ॥ औ— २ सर्वलोककी प्रतीतिसैं वाच्यवाचकका भेद सिद्ध है । कहैंहैं ॐअग्निादिकपद वाणिमैं है औ अंगारआदिक तिनका अर्थ वाणीतैं बाहरि चुभिआादिकनमैं है ॥ तैसे ॐअक्षररूप पदं वाणीमै है औ ताका अर्थ ब्रह्म वाणीमैं नहीं है किंतु वाणीतैं बाहरि कहिये अपने महिमामैं है । घच्यपि ब्रह्म व्यापक है,
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यातैं वाणीमें ब्रह्मका अभाव नहीं । तथापि ब्रह्ममें वाणी है औ वाणीमें ब्रह्म नहीं । इसरीतिसैं सर्वलोकनकूँ पद वाणीमें औ अर्थ वाणीतैं बाहरि प्रतीत होवैहैं । यातैं पदका औ अर्थका भेद लोकमें प्रसिद्ध है ॥
१ इसरीतिसैं वाच्यवाचकके भेदमें सर्वलोकका अनुभव प्रमाण है । औ-२ तिन्हकै अभेदमें वेदवचन प्रमाण हैं ! यातैं पदका अर्थसैं भेदअभेदरूप तादात्म्यसंबंध अग्रामाण नहीं । किंतु प्रमाणसिद्ध है ॥ ४२१ ॥
प्रसंगतैं अन्यस्थानमें बी भेदतादात्म्यसंबंध दिसावैहैं-॥ अर्थशंकरछंद । जो गुन गुनि औ जाति व्यक्ति । क्रिया अरु तद्दान संबंध लखि तादात्म्य इनको । कार्य कारण सान ॥ ३? ॥
टीका:-१ रूपरसगंधआदिक गुन है, तिन्हका आश्रय गुनी कहियेहै । जैसैं रूपआदिकनका आश्रय शुमि गुनी है ॥ २ अनेकनकै मांहि रहै जो एकधर्म सो जाति कहियेहै । जैसैं सर्वब्रह्मांडसरिरानके मांहि एक ब्रह्मणत्व है औ सर्वशरिरनमें हि शरिरत्व ॥ ४९ ॥
जो व्याध्येमें होवैहै सो व्यापकके भीतर कहियेहै । जैसैं घट न्यूनदेशमें है यातैं व्याप्य है । जो व्याप्य होवैहै सो व्यापकके भीतर होवैहै । जैसैं घट आकाशके भीतरहै औ आकाश घटके बाहरि बी है । तैसैं वाणी ब्रह्मतैं न्यूनदेशमें है । यातैं व्याप्य 'होनैतैं ब्रह्मके भीतर है औ ब्रह्म वाणीतैं
अधिकदेशमें होवैहै सो व्यापक कहियेहै । जैसैं घट न्यूनदेशमें है यातैं व्याप्य है । जो व्यापक होवैहै सो व्यापकके भीतर होवैहै । जैसैं घट आकाशके भीतरहै औ आकाश घटके बाहरि है ॥ ४५० ॥
है औ सर्वजीवनमांहि जीवत्व है । पुरुपनमें पुरुपत्व है । सर्वघटनमांहि घटत्व है ॥ जड़ूं लोकमेंहि ब्रह्मणपन, शरिरपन, जीवपन, पुरुपपन, घटपन कहतैंहैं, सोहि ब्रह्मण-आदिक शरिरनमांहि ब्रह्मणत्वआदिक जाति हैं ॥ जातिका औ आश्रय जो ब्रह्मणआदिक, सो व्यक्तिक कहियेहै ॥
३ गमनआगमनआदिक क्रिया कहियेहैं ॥ औ तद्दानू कहिये तिसवाला ॥ 'अर्थ यह, क्रियाका आश्रय । इतनै पदार्थनका तादात्म्यसंबंध है । यह लखि कहिये जानि ॥ औ कारणकार्यंकूँ सान कहिये गुनगुणीआदिकवैपै मिलाव । अभिप्राय यह है:-१ कारणकार्यका बी गुनगुणीकी न्याई तादात्म्यसंबंध है ।
२ गुनका औ गुनिका आपसमैं तादात्म्यसंबंध है ॥ ३ जातिका औ व्यक्तिका आपसमैं तादात्म्यसंबंध है । ४ तैसैं क्रिया औ क्रियावानका तादात्म्यसंबंध है ॥ तादात्म्य नाम भेदसहित अभेदका, है ।
कारणका औ कार्यका बी तादात्म्यसंबंध है ॥ तादात्म्य नाम भेदसहित अभेदका, है । अभिप्राय यह है, यथावेदमें लखि होनेहैं वाणीतैं वाधिर अधिकदेशन है, यातैं वेदान्तिक होनेहैं वाणी बी कहियेहै ॥
॥ ४५१ ॥ गुनगुणीआदिक इन चारिठिकानै भट्टकी न्याई 'वेदान्ती बी तादात्म्यसंबंध मानतेहैं । पंरतु वेदान्तमतमें तादात्म्यसंबंधका लकषण भट्टमततैं बिलक्षण कियाहै । सो आगे नेडेही कहियेगा । औ इतने चारिठोर नैैयायिक समवायसंबंध मानतेहैं ॥ गियसंबंधकूँ समवाय कहैहैं ॥
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यद्यपि निमित्तकारणका औ कार्यका तौ भेदाभेदरूप तादात्म्य नहीं है, किंतु अत्यंतभेद है तथापि उपादानकारणका औ कार्यका भेदाभेदरूप तादात्म्यही संबन्ध है ॥ जैसे घटके निमित्तकारण कुलालदंडआदिक हैं, तिनका घटरूप कार्यमें अत्यंतभेद ही है । परंतु उपादानकारण मृतिकापिंड औ घटकार्यका भेदसहित अभेद है ॥
१ जो मृतिकापिंडसे घट अत्यंतभिन्न होवै तौ जैसे मृतिकापिंडसे अत्यंतभिन्न तैलकी उत्पत्ति होवै नहीं । तैसे घटकी वी उत्पत्ति नहीं होवैगी ॥ औ—
२ उपादानकारणका कार्य अत्यंतभेद नहीं । कहैंत ? अपने स्वरूपसे अपनी उत्पत्ति होवै नहीं ।
१ यातें उपादानकारणका कार्य भेदसहित अभेद है । यातें अभेद है । अत्यंत भेदपक्षका दोष नहीं । औ—३ भेद है, यातें अभेदपक्षका दोष नहीं ।
इसरीतिसैं उपादानकारणका कार्यतें भेद युक्तिसिद्ध है ॥ औ—१ प्रतीतिसैं वी उपादानतें कार्यका भेदही सिद्ध है ॥ “यह मृत्पिंड है, यह घट है ।” इसरीतिसैं भिन्नमतितैं भेदं सिद्ध होवैहै ।
२ विचारतैं देखैं तौ घटके बाहरअंतर वस्तु प्रतीत होवै नहीं । किंतु मृतिकाही प्रतीत होवैहै । यातें अभेद सिद्ध होवैहै ॥
इसरीतिसैं उपादानकारणका कार्यतें भेदाभेदरूप तादात्म्यसंबंध है ॥ जैसे गुण औ गुणीका वी भेदाभेद है ॥
१ जो घटके रूपका घटतें अत्यंतभेद होवै तौ जैसे घटतें पटका अत्यंतभेद है, सो पट घटके आश्रित नहीं किंतु स्वतन्त्र है । तैसे घटका रूप वी घटके आश्रित नहीं होवैगा । औ—
२ गुणगुणीका अत्यंत अभेद होवै तौ वी घटका रूप घटके आश्रित वनै नहीं । कहैंत ? अपना आश्रय आप होवै नहीं ।
यातें गुणगुणीका भेदाभेदरूप तादात्म्य- संबन्ध है ॥ यह युक्ति, जाति औ व्यक्ति तथा क्रिया औ क्रियावालेके भेदाभेदरूप तादात्म्यसंबंधमें जाननी । औ खंडन करणा जो मत ताके- विपरीतयुक्ति कहनेका प्रयोजन नहीं । यातें औरयुक्ति नहीं लिखी ॥
॥ ४२२ ॥ अथ भेदाभेदखण्डन ॥
॥ ४२२-४२७ ॥
॥ दोहा ॥ एक वस्तुको एकमें, भेदाभेद विरुद्ध ॥ युक्तिजुत यातै कहत, यह मत सकल असुद्ध ॥३२॥
टीका:-अक्षरअर्थ स्पष्ट ॥ अभिप्राय यह है:-यद्यपि एकघटमें अपना जाका अभेद है औ परका भेद है । तथापि-१ जाका अभेद है ताका भेद नहीं औ
जो जैसनिकृत पूर्वमीमांसका वार्तिककार भया है सो यहां भट्ट कहिये ॥
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जाका भेद है ताका अभेद नहीं । इस अभिप्राय-
तैं एकवस्तुका भेदअभेद विरुद्ध कह्याहै ॥
२ तथा एकवस्तुका कहिये घटकाही
अपनेमैं अभेद औ परमें भेद है, परंतु जामैं
अभेद है तामैं भेद नहीं औ जामैं भेद है तामैं
अभेद नहीं । इस अभिप्रायते एकवस्तुका भेद
अभेद एकम विरुद्ध कह्याहै ।
भेदअभेद आपसमें विरोधी हैं । एकवस्तुमैं
जाका भेद होवै ताका अभेद औ जाका अभेद
होवै ताका भेद विरुद्ध है । यातैं वाच्यवाचक,
गुणगुणी, जातिव्यक्ति, क्रियाक्रियावान,
उपादानकरण कार्यका जो भेदअभेदरूप
तादात्म्य अंगीकार किया, सो अशुद्ध है ॥
॥ ४२७ ॥ पूर्व वाच्यवाचकके भेदअभेदमैं
प्रमाण जो कहा:-
१ "वाणीमैं वाचक औ वाहिरि वाच्य
भेद । यौं--
२ श्रुतिमैं ओंअक्षर ब्रह्म कह्याहै । यातैं
ताका समाधान:-
॥ दोहा ॥
प्रनववर्ण अरु ब्रह्मको,
कह्यो जु वेद अभेद ॥
तामैं अन्यरहस्य कछु,
लख्यो न भट्र सु भेद ॥ ४२८ ॥
टीका:- प्रनववर्ण कहिये ओंअक्षर अरु
ब्रह्मका जो वेदमैं अभेद कह्याहै, ता वेदवचनका
वाच्यवाचकके अभेदमैं तात्पर्य नहीं, किंतु
तामैं अन्यही रहस्य कहिये गोप्यअभिप्राय है ॥
सो भेद कहिये अभिप्राय भट्रनै लख्या
नहीं ॥
॥ ४२९ ॥ यह पञ्चामृविचाका सारा प्रसंग
हमनै पंचदशीके ध्यानदीपके भाषाटीकाके टिप्पण-
जहां ओंअक्षर ब्रह्म कह्याहै तिस वाक्यका
ओंअक्षर औ ब्रह्मके अभेदमैं तात्पर्ये नहीं है ।
किंतु "ओंअक्षर ब्रह्मरूपकारिके उपासना
करै" इस अर्थमैं तात्पर्य है । उपासना जाकी
विधान करीहै, ता उपास्यके स्वरूपको यह
नियम नहीं है:-जैसी उपासना विधान करीहै
तैसीही उपास्यको स्वरूप होवैहि । किंतु जैसी
वस्तुका स्वरूप है, ता तूं त्यागिके अन्यस्वरूपकी
ची तैकेविपै उपासना करियेहै ॥
१ जैसैं शालिग्राम औ नर्मदेश्वरकी विशेष-
रूप औ शिवरूपकारिके उपासना करीहै
तहां शंखचक्रआदिसहित चतुर्भुजस्मृति शाली-
ग्रामकी नहीं है औ गंगाभूपित जटाजूटडमरु-
चर्मंकपालिकासहित भद्रासंद्रुद्रसै शरणागतनैं
त्रिगुणरहित आत्माका उपदेश देनैवाली मूर्ति
नर्मदेश्वरकी नहीं है । किंतु दोऊं शिलारूप है ।
औ शालिको आदि तैं तिन शिलारूपको छोड़
त्यागिके दोऊंविपै क्रमतैं विष्णुरूप औ शिव-
रूपकी उपासना करियेहैं । यातैं उपास्यके
स्वरूपके आधीन उपासना नहीं होवैहै । किंतु
विधिके आधीन है । जैसैं शास्त्रका वचन
विधान करै तैसी उपासना करै ॥
२ जैसैं छांदोग्यउपनिषदमैं पंचाशिविद्या-
प्रकरणमैं स्वर्गेलोक, मेघ, भूमि, पुरुष औ ,
हीं, इन पांचपदार्थनकी अग्निरूपकारिके
उपासना कहीहै औ श्रद्धा, सोम, वर्पा,
अन औ हीं । इन पांच पदर्थनकी पंचअग्निकी
आहुतिरूप उपासना कहीहै । तहां स्वर्ग-
आदिक अग्नि नहीं है औ श्रद्धासोमआदिक
आहुति नहीं है । तथापि वेदकी आज्ञातैं
स्वर्गेलोकआदिकनकी अग्निरुपतैं औ श्रद्धाआदिक-
नकी आहुतिरुपतैं उपासन करियेहै ॥
विधे तथा छांदोग्यविधे लिट्याहै, तहां देखलेना ॥
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इसरीतिसें अंअक्षरफी क्रियारुपकारिके उपासना कहींहैं, तहां अंअक्षर क्रियारुप नहीं हैं तौ वी क्रियारुपकारिके उपासना वैनहैं । उपासनावाक्यमें वस्तुकें अभेदकी अपेक्षा नहीं । किंतु भिन्नवस्तुकी वी अभिन्नरुपतें उपासना होवैहैं ॥ आं—
विचारतें देखिये तौ क्रियाका वाचक जो अंअक्षर है, ताका तौ अपने वाच्य ब्राममें अभेद वैनहैं वी है । घटआदिक अन्यपदनकका अपनेअपने जडरुप अर्थमें अभेद वैनहैं नहीं । कहैंत ? सर्वे नामरुप ब्राममें कल्पित हैं । ब्राम अधिष्ठान है । अंअक्षर वी ब्रामका नाम है । यांतें ब्राममें कल्पित है । कल्पितस्तु अधिष्ठानमें भिन्न होवें नाहीं । किंतु अधिष्ठानसपही होवैहैं । यांतें अंअक्षर ब्रामरुप हैं ॥ आं—
घटआदिकपदनका जो जडरुप अपना अर्थ सो अधिष्ठान नहीं । किंतु वाच्यसहित घटआदिकपद ब्राममें कल्पित हैं । ओं ब्राम तिनका अधिष्ठान है । यांतें ब्राममें तौ सर्वेका अभेद वैनहैं । परंतु घटआदिक पदनका अपने जडरुप वाच्यअर्थमें अभेद किसी रीतिसें वैनहैं नहीं । यांतें भटमतमें वाच्यवाचकका अभेद असंगत है ॥ आं—
॥ ४२४ ॥ केंवलभेद जो वाच्यवाचकका अंगीकार करेंहैं, तिन्हके मतमें यह दोप भ्रांत कियाहैं:-जो घटपदका वाच्य घटपदसें अत्यंत भिन्न होवें तौ जैसें घटपदसें अत्यंतभिन्न क्रियारुप अर्थकी प्रतीति होवैहैं, तैसें अत्यंत भिन्नवस्तुकी वी प्रतीति होवैहैं । यह दोप वी जो समझें अर्थवा इष्टरुप शक्ती नहीं मानें तिन्हके मतमें हैं ॥
जो शक्ती अंगीकार करें तिन्हके मतमें दोप नाहीं । कहैंतें ? जो घटपदका वाच्य कलशा ओ तका अवाच्य घटआदिक, सो दोनों घटपदमें मिलें हैं । परंतु घटपदमें कलशरुप अर्थके ज्ञान करनकी शक्ती है । आ अन्यअर्थके ज्ञान करनेंकी शक्ती नाहीं । यांतें घटपदतें कलशरुप अर्थमें भिन्नअर्थकी प्रतीति होवें नाहीं ।
इसरीतिसें जा पदमें जिस अर्थकी शक्ती है, नाहीं अर्थकी तिस पदसें प्रतीति होवैहैं । अन्यअर्थकी नाहीं । यांतें वाच्यवाचकके अत्यंतभेदमें दोप नाहीं ॥ तिनका भेदसहित अभेदरुप तादात्म्यसंवंध वैनहैं नाहीं ॥
॥ ४२५ ॥ भेद ओं अभेद आपसमैं विरोधी हैं । तैसें उपादानकारणका कार्यतें भेदसहित अभेद नाहीं, केंवलभेद है ॥ ओ केंवल भेदवादीके मतमें नाहीं । कहैंतें ? कारणकार्यके अत्यंतभेदमें यह दोप है:-जो मृत्पिडसें अत्यंतभिन्न घटकी उत्पत्ति होवें तौ 'अत्यंतभिन्न तैलकों वी मृत्पिडसें उत्पत्ति हुइचाहिये' ओ लक्षण यह है:- प्रतियादीकों उक्ती मानिके वी स्वमतमें दोषका परिहार करै, ताकूं भौढिवाद कहैंहें ॥
यहां कार्यकारणके भेदपक्षमें भ्रांतमें दोप कद्याथा तिस भ्रांतुक्त दोपसहित पछकूं मानिके वी स्वमतमें दोषका परिहार कियाहै । यांतें यह भौढिवाद है ॥
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॥ धर्म्मभतकी शक्तिका खंडन ॥ ४१५-४२७ ॥
अत्यंतभिन्न तैलकी उत्पत्ति नहीं होवैगी, तौ अत्यंतभिन्न घटकी वी सृतिपडसै उत्पत्ति नहीं हुईचाहिये ॥
॥ ४२६ ॥ यह दोष नैैयायिकमतमें नहीं कहैं । सर्ववस्तुकी उत्पत्तिमें नैैयायिक प्रागभावकूं कारण मानैहैं ॥ जैसे घटकी उत्पत्तिमें दंडचक्रकुलाल कारण हैं, तैसे घटका कारण है ॥ तैसेही सर्वकी उत्पत्तिमें कारण है ॥
१ सो घटका प्रागभाव घटके उपादानकारण सृतिपडमें रहैहै । अन्यमें नहीं ॥
२ तैलका प्रागभाव तिलनमें रहैहै । अन्यमें नहीं ॥
ऐसें सर्वकार्यनका प्रागभाव अपनेअपने उपादानकारणमें रहैहै ॥ जिस पदार्थमें जाका प्रागभाव होवै तिस पदार्थसैं ताकी उत्पत्ति होवैहै । अन्यकी नहीं ॥
१ जैसे सृतिपडमें घटका प्रागभाव है, यातें सृतिपडसैं घटकी उत्पत्ति होवैहै । तैलकी नहीं ॥
२ तैलका प्रागभाव तिलनमें रहैहै । यातें तिलनतैं तैलकी उत्पत्ति होवैहै । घटकी नहीं ॥
ऐसें सर्वकार्यमें प्रागभाव कारण है । यातें अत्यंतभेद माननैतैं नैैयायिकमतमें दोष नहीं ॥
॥ ४२७ ॥ सामर्थ्यरूप शक्तिवादीके मतमें दोष नहीं । कहैंते? सृतिपडमें घटकी सामर्थ्यरूप शक्ति है । तैलकी नहीं । तिलनमें तैलकी सामर्थ्य है । घटकी नहीं ॥ यातें सृतिपडतैं घटकी उत्पत्ति होवैहै । तैलकी नहीं । तैसे तिलनतैं तैलकी उत्पत्ति होवैहै । घटकी नहीं ॥
इसरीतिसैं उपादानकारणका औ कार्यका अत्यंतभेद माननैमें दोष नहीं ॥
अत्यंतभेद माननैमें दोष नहीं । भेदाभेद असंगत है ॥
औ-अभेदमें तथा अभेदमें जो दोष मटनै कहेहैं सो दोनूपक्षके दोष भटके मतमें अवश्य रहैंहैं ॥
काहैंते? भेदनै भेदसहित अभेद अंगीकार कियाहै! यातैं यह अर्थ सिद्ध हुआ:-कारणकार्यका भेद वी है । औ अभेद की है ॥
१ भेद है, यातैं भेदपक्षउक्तदोष होवैगैं । औ-
२ अभेद है, यातैं अभेदपक्षउक्तदोष होवैंगे ॥
जैसे चोरीका दोष । औ घृतका दोष जो एक एक करनेवालें कहैंहैं, सो दोउँ न्यासन जाके होवें तौकें चोरीघृत दोनूंके दोष माननैहैं ।
तैसे गुणरुपणीआदिकनके भेदअभेद माननैहैं । वी भेदअभेदपक्षके दोनूं दोष होवैंगे ॥
औ-शक्तिवादीकै मतमें केवलभेद अंगीकार कियेतैं दोष नहीं । कहैंते? गुणीमें गुणके धारनेकी शक्ति है । अन्यकी नहीं ।
यातैं भेदपक्षमैं जो दोष कछा था:--घटके रुपादिक जैसे घटसैं मिन्र हैं तैसे पटादिक वी घटसैं मिन्र हैं ॥
रुपादिकनकी न्याई पटआदिक वी घटमें नहीं रहेचाहिये । अथवा पटआदिकनकी न्याई रुपादिक वी घटमें शक्ति नहीं रहेचाहिये ॥
सो दोष नहीं अंगीकार करै ताके मतमें केवलभेद माननैतैं वी दोष नहीं ।
उलटा--१ भेदमतमें भेदअभेद दोनों माननैतैं दोनंपक्षके दोष उक्तदर्शंतसैं हैं ॥
औ २ भेदअभेद विरोधीधर्मका असंभवदोष है ॥
तैसे जातिन्यतिक्का औ क्रियाक्रियावाचकका केवलभेद है ।
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पञ्चस्तरंग: ६१
धारनैकी शक्ती है औ क्रियावानमैं क्रिया धारने- की शक्ती है । अन्य धारनैकी शक्ती नहीं । इसरीतिसैं उपादान औ कार्येका तथा गुण- ीआदिकनका भेदअभेदरूप तादात्म्यसंबंध असंगत है । सर्वंका आपसमें भेद माननमैं भट्टउक्तदोपनैकी शक्ती ग्रसैहै ॥ यद्यपि वेदांतसिद्धांतमैं वी कार्ये गुण जाती क्रियाका उपादान गुणी व्यक्ती क्रियावानतैं अत्यंतभेद नहीं । किंतु तादात्म्यसंबंधही अंगी- कार कियाहै, तथापि वेदांतमतमैं भेदअभेद- रूप तादात्म्य नहीं । किंतु भेद औ अभेदसैं विलक्षण अनिर्वचनीयरूप तादात्म्यसंबंध है ॥ १ भेदसैं विलक्षण है, यांतैं अभेदपक्षके दोप नहीं । औ— २ अभेदसैं विलक्षण हैं, यांतैं भेदपक्षके दोप नहीं ॥ इसरीतिसैं भेदअभेदसैं विलक्षण अनिर्वचनीय- तादात्म्यसंबंध है ॥ परंतु भेदअभेदरूप तादात्म्य असंगत है । यांतैं "वाचकवाच्यका भेदअभेदरूप तादात्म्य संबंधही शक्ती है " यह भट्टअनुसारीका पक्ष
|| ४५५ || यद्यपि जहां केवलभेद होवै तहां तादात्म्य बनै नहीं । कहैंतैं अभेदप्रतीतिके वि-पयका नामही तादात्म्य है । यांतैं केवलभेदके होते अभेद- प्रतीतिं समथ नहीं । तांत तादात्म्यसंबंधमैं अभेद- की अपेक्षा है औ जहां केवलभेद होवै तहां संबंध होवै नहीं । कहैंतैं दोनूं पदार्थनका संबंध संंभवैहै । अपने स्वरूपसैं अपना संबंध संभवै नहीं । यांतैं सारे संबंधमैं भेदकी वी अपेक्षा है । जांतैं तादात्म्य वी संबंध है, यांतैं तामैं भेदकी वी अपेक्षा है ॥ इसरीतिसैं भेद अभेद दोनों विनां तादात्म्यसंबंध बनै नहीं । औ भेदअभेदका एकठिकानै रहनैका विरोध है । मि. शा. ३४.
|| शक्त्यंक लक्षणं ||
समीचीन नहीं । किंतु पदके सुनतैही अर्थके ज्ञान करनैकी जो पदमैं सामर्थ्ये सोई पदमैं शक्ती है । इति शक्तिनिरूपण ॥ || ४२८ || शक्त्यका लक्षण ॥ लक्षणाके ज्ञानमैं शक्यका ज्ञान उपयोगी है । कहैंतैं शक्यसंवेध लक्षणाका स्वरूप है । शक्य जानैविना शक्यसंवंधरूप लक्षणाका ज्ञान होवै नहीं । यांतैं शक्तिका लक्षण कहहैं:- || दोहा || नहे पदमैं जा अर्थकी , सक्ती शक्य सो जानि । वाच्यअर्थ पुनि कहत तिहि, वाचक पदहि पाछानि ॥४३॥ टीका:- जा पदमैं जा अर्थकी शक्ती होई, ता पदका सो अर्थ शक्य जानि औ शक्य- अर्थकूंही वाच्यअर्थ वी कहैंहैं ॥ जैसैं अभिपदमैं अंगारूप अर्थकी शक्ती है । यांतैं अभिपदका अंगार शक्यअर्थ औ वाच्य- अर्थ कहियेहै । औ— तथापि इहां कल्पितभेदसहित वास्तावभेदका नाम तादात्म्यसंवंध है औ इहां भेदअभेदसैं विलक्षण तादात्म्य कहाहै । तहां यह अभिप्राय है:- १ भेदसैं विलक्षण कहनेकैरी वास्तावभेदसैं रहित कव्या, यांतैं कल्पितभेदसहित जनाया । औ— २ अभेदसैं विलक्षण कहनेकैरी कल्पितभेदसैं रहित कव्या, यांतैं वास्तावभेद जनाया । इसरीतिसैं सिद्धांतमैं कल्पितभेदसहित वास्तव- भेद तादात्म्यसंवंध कहियेहै । याहीकूं अनिर्वच- नीयतादात्म्यसंवंध कहहैं ॥ || ४५६ || याहीकूं अभिधेयअर्थ औ मुख्य- अर्थ वी कहतहैं ॥
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२६६ ।। जहाती, अजहाती, औ भागत्यागलक्षणाकां लक्षणेण ।। ४६०-४६१ ।। [ विचारसागरे
।। ४६९ ।। लक्ष्यार्थ औ लक्षणाका सामान्यरूप ।।
।। अथ लक्षणा औ जहतिआदिक भेदलक्षण ।।
।। कवित्थं ।। संव्यको संबंध जो स्वरूप जानि लच्छनको । लच्छना सो भान जाको लच्छ सु पिछानिये ।। वाच्यअर्थ सारो त्यागि वाच्यको संबंध जहाँ । होई परतीति तहाँ जहती बखानिये ।। वाच्यजुत वाच्यके संबंधीका जु ज्ञान होय । ताहि ठौर लच्छना अजहतीहि मानिये ।। एक वाच्य भागत्याग । होत तहाँ भागत्याग । दूजो नाम जहती अजहती प्रमाणिये ।। ३५ ।।
टीका:-शक्य कहिये वाच्यअर्थका जो
संवंध कहिये मिलाप सो लक्षणाका स्वरूप कहिये लक्षण जानि ।। औ—जा अर्थेका पदकी शक्तिसैं ज्ञान न होवै किंतु लक्षणासैं भान कहिये ज्ञान होवै, सो पदका लक्ष्यार्थ कहियेहे ।। ।। ४६९ ।। १ जहाती, २ अजहती, औ ३ भागत्यागलक्षणाका लक्षण
।। ४७०-४७२ ।। लक्षणाके जहतिआदिक तिनी भेदनके लक्षण एकएक पादसैं कहेहैं:-“वाच्य” इत्यादिसैं:-
जहाँ वाच्यअर्थ संपूर्ण त्यागिके वाच्य अर्थके संवंधीकी प्रतीति होवै तहाँ जहतिलक्षणा कहियेहै ।। जैसेैं किसीने कहाँ:-“ गंगामैं ग्राम है” ।। या स्थानमें गंगापदकी तात्पर्य जहतिलक्षणा है । कहैंतैं? गंगापदका वाच्यअर्थ देवनदीका प्रवाहहै, ताकेविऐ ग्रामकी स्थितिका असंभव है । यातैं सारे वाच्यअर्थकूं त्यागिके तीरविैै गंगापदकी जहतिलक्षणा है ।
वाच्यके संवंधका नाम लक्षणा है । या स्थानमें गंगापदका वाच्य जो प्रवाह ताका तीरसैं संयोगसंबंध है । यातैं— ( १ ) गंगापदके वाच्यका जो तीरसैं संबंध सो लक्षणा ।। औ—
( २ ) वाच्य सारेेेका त्याग यावै जंअजहति- लक्षणा ।।
।। ४७७ ।। जहतिलक्षणाका सुगमउदाहरण यह है:-जिस घरका पिता परदेश गयाहोवै, सो घर *सुरके गृहमें विवाहकेअर्थे पितृमातादिकसंबंधिनकूं साथ लेजावै । तहाँ वचन पहिरावनेकै समयमें काहूने कहाँ कि “वरके पिताकूं वचन पहिरावो” इस वाक्यमें पिताशब्दका ज्ञानयअर्थे जो वरका जनक सो तहाँ
विधमान है नहीं । यातैं जनकरूप ज्ञानयअर्थमें शक्ताका तात्पर्ये संभवें नहीं । किंतु पिताशब्दका लक्ष्यअर्थ जो जनक, तिस सारेेकूं त्यागिके ताके संवंधी पिताके भ्राताका ग्रहण है । यातैं जहतिलक्षणा है ।। इहां जनकरूप श्ञानयअर्थका जो पितृभ्रातासैं
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॥ ४३१ ॥ र् 'वाच्यजूत' इत्यादिदत्तीय-पादसैं अजहतिलक्षणा दिखावैहैं:— वाच्यजूत कहिये वाच्यार्थेसहित । वाच्यके संवंधीका जा पदसैं ज्ञान होय, ता पदसैं अजहतिलक्षणा मानिये ॥ जैसे किसीने कहा:—“लोग घावन करैहैं ” तहां शोणपदकी लालरंगवाले अश्वविपै अजहतिलक्षणा है । कहैंतैं? शोण नाम लालरंगका है । यातैं शोणपदका वाच्य लालरंग है ॥ ता केवलमैं धावनका असंभव है । इसकारणतैं शोणपदका वाच्य जो लालरंग, तासहित अश्वमैं शोणपदकी अजहतिलक्षणा है ॥ सहोदरतारूप संवंध है सो लक्षणा है । तिस लक्षणाकारि जानियेहै जो वृत्तिमात्रतारूप अर्थ सो पिताशब्दका लक्ष्य हैं ॥
भापामैं शोणाकूं सोन पढ़ैहैं ॥ गुणका औ गुणीका तादात्म्यसंवंध फहैहैं ॥ औ लाल थी रूपका भेद होनैं गुण है । यातैं (१) शोणपदका वाच्य जो लालगुण, ताका गुर्णी अश्वकै साथै जो तादात्म्यसंवंध, सो लक्षणा । औ-
(२) वाच्यकै त्याग नहीं, अधिकका ग्रहण, यातैं अँजहतिलक्षणा ॥ ॥ ४३२ ॥ र् 'एक वाच्य' इत्यादिदत्तुर्थ-पादसैं भागत्यागलक्षणा बतावैहैं:— तात्पर्ये है । यातैं यहां सर्वशब्दका वाच्य जो नामरूप जगत्, तिस सारेकै त्यागकारिके तिसके संवंधी असित्-भाति-प्रियरूप अधिष्ठानका लक्ष्यरूप-कारिके ग्रहण है । यातैं जहतिलक्षणा है ॥
इहां आरोपित नामरूपकै अपने अधिष्ठानचेतनसैं जो तादात्म्यसंवंध है सो लक्षणा है । औ तिसतैं जानियेहै जो अधिष्ठानचेतन सो लक्ष्यअर्थ है । औ— मुख्यसिद्धांतमैं तौ अधिष्ठानकूं छोड़िके आरोपित-की प्रतीति होवै नहीं । किंतु अधिष्ठानसैं अभिन्न होवकै आरोपितकी प्रतीति होवैहै । यातैं असित्भाति-प्रियसहित नामरूप सर्वशब्दका किंचा जगत्- शब्दका वाच्यअर्थै है । तिसमैं नामरूपभागका त्यागकारिके अवरोप रहा जो असित्भातिप्रियरूप अधिष्ठानभाग सो लक्ष्य है । ऐसैं उत्कृष्टवृत्तितियागत सर्वपदमैं भागत्यागलक्षणा मानीहै । इसीरीतिसैं जहतिलक्षणाकै उदाहरण कहे ॥
॥ ४३८ ॥ अजहतिलक्षणाकै ये उदाहरण हैं:— १ “काकेम्यो धधि रक्षताम् ( चीटिनके निवारण अर्थ धूपमैं दधिकूं राखिके तहां किसी किंकरकूं बिठायकै स्वामीमैं कहा कि:—काकोंतैं दधिकूं रक्षा करना )” इस वाक्यविषै काकपदका वाच्य जो वायस पक्षी, केवल तिसैं दधिकी रक्षामैं वक्ताकै तात्पर्ये नहीं, किंतु दधिकै भक्षक होनैकारि काकके
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२६८ ॥ जहति, अजहति औ भागत्यागलक्षणाका लक्षण ॥ ४३०-४३२ ॥ [ विचारसागरे
जहां पदनके वाच्यअर्थमध्य एकभागका त्याग होवै औ एकभागका ग्रहण होवै, तहां भागत्यागलक्षणा कहिएहै ॥ ता भागत्यागलक्षणा वी अजहतिलक्षणा वी कहैहैं ॥
जैसे प्रथम देखि पदार्थकूं अन्यदेशमैं देखिके किसीने कह्या:-"सो यह है " तहां भागत्यागलक्षणा हैं । कहैंतें ?
(१) अतीतकालमैं औ अन्यदेशमैं स्थित वस्तुकूं "सो" कहैं । यातें अतीतकालसहित औ अन्यदेशसहितवस्तु "सो" पदका वाच्यअर्थ है ॥ औ
(२) वर्तमानकाल समीपदेशमैं स्थितवस्तुकूं "यह" कहैहैं । यातें वर्तमानकाल"यह" पदका वाच्यअर्थ है ।
सजातीय जे विडालादिक तिनकूं वी दधीकुं रक्षाकरना, ऐसा वाक्यका तात्पर्य है । यातैं काकपदके वाच्य जे वायसपक्षी, तिनका विडालादिकनके सहित जो सजातीयसंबंध, सो लक्षणा है । वाच्यका त्याग नहीं, अधिकका ग्रहण है, यातैं अजहतिलक्षणा ॥
२तैंसैं क्षेत्रनकी रक्षकके निमित्त मंचेपर बैठेहये पुरुष पक्षीनके उड़ावने निमित्त पुकारतहोवै । तहां काकके प्रति किसीने कहा कि:-"मंचे पुकारते हैं " तहां मंचपदकी मंचेपर बैठे पुरुषविशेष अजहतिलक्षणा है । कहैंतैं ? मंचपदके वाच्य मंचमैं पुकारनेकै असंभव है । यातैं मंचपदके वाच्य जो मंचे, तिनसहित पुरुषनविषै मंचपदकी अजहतिलक्षणा है ॥
इहां मंचपदके वाच्य जे मंचे तिनका अपने आघेय (आश्रित) पुरुषनके साथि आधेयतासंबंध है, सो लक्षणा औ वाच्यका त्याग नहीं : अधिकका ग्रहण है । यातैं अजहतिलक्षणा है ॥
३-४ तैंसैं छत्रीवाले जातैहैं औ छकड़ीनकूं प्रवेश करावो, इत्यादिकआज्ञाविषै वी छत्रीवालेपदमैं औ छकड़ीपदमैं अस्पने वाच्य छत्रीयुक्तपुरुष औ काष्ठसमहु तिनसहित तिनकै संबंधी 'छत्रीहरहित पुरुषनका औ छकड़ीके उठानेवाले पुरुषका ऋणमें ग्रहण है । यातैं
सहित औ समीपदेशसहित वस्तु, "यह" पदका वाच्यअर्थ है ॥ औअतीतकालसहित अन्यदेशसहित जो वस्तु, सो वर्तमानकाल औ समीपदेशसहित है, यह कहैंतें ?
(१) अतीतकालक औ वर्तमानकालका विरोध है ।
(२) तथा अन्यदेशका औ समीपदेशका विरोध है ।
यातैं दोनूं पदनमैं देशकाल जो वाच्यभाग ताकूं त्यागिके वस्तुमात्रमैं दोनूं पदनकी भोंगलक्षणा है ॥
वाच्यका त्याग नहीं । अधिकका ग्रहण होनैंतैं अजहतिलक्षणा है ।
इसीरीतैं जहां श्रुतिवाक्यमैं आत्माको सत्आदिविशेषणनके मध्य एक किन्ना दोविशेषणनका उद्धारण कियाहोवै, तहां तिन सहित अन्यअनुक्त सर्वविशेषणनका ग्रहण होवै । यातैं तहां (तैंसैं ठिकौने) सिद्धांतमैं वी अजहतिलक्षणाका उपयोग है ॥
४३१ "सो यह है" इस वाक्यमैं स्थित जे "सो" औ "यह" ये दोपद, तिनका परस्पर समान (एक) धर्मके बलसैं एकअर्थवानतारूप सामानाधिकरण्यसंबंध है । तिसके बलसैं तिनके वाच्यअर्थ जे परोक्षवस्तु औ अपरोक्षवस्तु, तिनकी एकता प्रतीत होवैहै औ तिन दोनूं वाच्यनकूं विरोधधर्ममैं
होनैंतैं तिनकी एकता संभवै नहीं । यातैं इहां लक्षणा करनी योग्य है ॥ यातैं जहांति किंवा अजहति लक्षणा तौ बने नहीं । किंतु भागत्यागलक्षणा बनैहै । यातैं
"सो" पदका वाच्य जो परोक्षतासहितवस्तुं औ "यह" पदका वाच्य जो अपरोक्षतासहित वस्तु, तिन मैं परोक्षता औ अपरोक्षताभागका त्यागकरिके अविरोधिस्वरूपमात्रका ग्रहण है ॥
१ इहां परोक्षताअपरोक्षताभागका वस्तुकै साथि साक्ष्यतासंबंध है । औ--
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( महावाक्यमें लक्षणा ।। ४३३-४४९ ।। ) "तत्त्वमसि" महावाक्यमें लक्षणा दिखावैनकूं "तत्" पद औ "त्वं"पदका वाच्यअर्थ दिखावैहैं ।। ॥ ४३३ ॥ "तत्"पदका वाच्यअर्थ ॥ दोहा ॥ sर्वशक्ति सर्वज्ञ विभु, ईश स्वतंत्र परोक्ष ॥ मायी तत्पद वाच्य सो, जामैं बंध न मोक्ष ॥ ३७ ॥ टीका:- १ सर्वशक्तित कहिये जामैं सर्वसामर्थ्य । २ सर्वज्ञ कहिये सर्ववस्तुके जाननैवाला । ३ विभु कहिये व्यापक । ४ ईशा कहिये सर्वका प्रेरक औ--- ५ स्वतंत्र कहिये कर्मके अधीन नहीं ॥ औ- २ वस्तुभागका अपनै स्वरूपसैं तादात्म्यसंबंध है । यह सारे वाच्यभागका जो वस्तुके साथ आश्रयता तादात्म्यसंबंध, सो लक्षणा है । औ- १ परस्परविरोधि परोक्षता औ अपरोक्षातारूप वाच्यभागका त्याग औ--- २ अविरोधि केबलवस्तुरूप वाच्यभागका ग्रहण है । यातैं यह भागस्यागलक्षणा है । तैसैं "तत्त्वमसि" वादिक महावाक्यपनमें स्थित जे जीवईशकै वाचक दोपद, तिनका वो परस्पर समानविमक्तिकै बलसैं एकअर्थवानूतरूप सामान्याधिकरण्यसंबंध है । तिसके बलसैं तिनके वाच्य जे जीवईश्वर तिनकी एकता प्रतीत होवैहै । औ तिन दोनूंके विरोधि धर्मवान होनैहैं तिनकी एकता संभवै नहीं । यातैं तहाँ लक्षणा अंगीकार करनै योग्य है ॥
६ परोक्ष कहिये जीवके प्रत्यक्षका विपय नहीं ॥ ७ मायी कहिये माया जाके अधीन ॥ औ- ८ बंधमोक्षरहित, जामैं बंध होवै ताका मोक्ष होवैहै । ईश्वर बंधरहित है । यातैं ईश्वरमैं मोक्ष वो नहीं ॥ इतनै धर्मवाला ईश्वरचेतन "तत्"पदका वाच्यअर्थ है ॥ ॥४३४॥ अथ"त्वं"पदवाच्यनिरूपण ॥ ॥ दोहा ॥ कहे धर्म जो ईशके, सब तिनतैं विपरीत ॥ वहै जिहि वेतन जीव तिहि, त्वपदवाच्य प्रतीत ॥ ३८ ॥ टीका:-जो ईशके धर्म कहे, तिनतैं तामैं आगे कहनैकै प्रकारसैं जहाँति किवा अजहति- लक्षणा तो संभवै नहीं किंतु भागत्यागही संभवैहै । यातैं सर्वमहावाक्यनमें दोदो पदनके वाच्य जे जीव औ ईश्वर तिनमैंसैं--- १ धर्मसहित उपाधिरूप विरोधिवाच्यभागका त्याग । औ--- २ अविरोधि चेतनभागका ग्रहण है ॥ १ इहाँ धर्मसहित मायाअविद्याका अधिष्ठानता- संबंध है । औ--- २ चेतनभागका अपनैसैं तादात्म्यसंबंध है । यह सारे वाच्यका चेतनभागसैं जो अधिष्ठानता- तादात्म्यसंबंध, सो लक्षणा है । औ--- १ विरोधिवाच्यभागका त्याग औ--- २ अविरोधिचेतनभागका ग्रहण है । यातैं यह भागस्यागलक्षणा कहियेहै ॥
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९७० ॥
महावाक्यनमें लक्षणा ॥ ४६३-४६३ ॥ [ विचारसागरे
विपरीतधर्म जामैं होवैं, सो जीवचेतन त्वंपदका वाच्य प्रतीत कहिये जान ॥ याका भाव यह है:- १ अल्पशक्ति । २ अल्पज्ञ । ३ परिच्छिन्न । ४ अनीश । ५ कर्मके अधीन । ६ अविद्यामोहित । औ- ७ बंधमोक्षवाला । औ- ८ प्रत्यक्ष । कहैंतें? अपना स्वरूप किसीकूँ परोक्ष नहीं । प्रत्यक्षही होवैहै ॥ यद्यपि ईश्वरहूँ वी अपना स्वरूप प्रत्यक्ष है, तथापि ईश्वरका स्वरूप जीवनकूँ प्रत्यक्ष नहीं । यातें परोक्ष कहियेहै । औ जीवके स्वरूपकूँ जीवईश्वर दोनों जानैहैं । यातें प्रत्यक्ष कहियेहै । इतनें धर्मवाला जीवचेतन "त्वं" पदका वाच्य कहियेहै ॥
॥ ४६३ ॥ वाच्यअर्थमें एकताका विरोध औ लक्षणकी कर্ত्तव्यता ॥
॥ दोहा ॥ महावाक्यमें एकता, नहै दोनोकी मान ॥
सो न वनेै यातैं सुमति, लड्य लछनहि जान ॥ ३८ ॥ टीका:-सामवेदके छांदोग्यउपनिषदमें उद्दालकनै अपने पुत्र श्वेतकेतुकूँ जगतकी उत्पत्ति करनैवाला ईश्वर बतायकै 'कबा:'-"तत्त्वमसि" । ताका यह वाच्यअर्थ है:- १ "तत्" कहिये सो, जगतकी उत्पत्ति करनैवाला सर्वशक्तिसर्वज्ञताआदिकधर्मसहित ईश्वर । २ "त्वं" कहिये तूं, अल्पशक्तितल्पज्ञताआदिक धर्मवाला जीव । ३ "असि" कहिये "है" इहाँ "सो तूं है" इस कहनेतैं ईश्वरजीवकी एकता वाच्यअर्थसैं मान होवैहै सो वनै नहीं । कहैंतें? — १ सर्वशक्तित औ अल्पशक्ति । २ सर्वज्ञ औ अल्पज्ञ । ३ विभु औ परिच्छिन्न । ४ स्वतन्त्र औ कर्मअधीन । ५ परोक्ष औ प्रत्यक्ष । ६ माया जाके अधीन औ अविद्यामोहित एक है । यह कहनाँ "अमि शीतल है" इस कहनेकै समान है । यातैं हेसुमति ! लक्षणाही कहिये लक्ष-णातैं लक्ष्यअर्थ जान । वाच्यअर्थमें विरोध है ॥
॥ ४६० ॥ यद्यपि जीव अपने निजरूप अहंपदके लक्ष्य कूटस्थमात्रकूँ नहीं जानताहै, तथापि अहंपदका वाच्य जो स्वंतःकरणविशिष्टचेतन, किवा स्थूलसूक्ष्मसंधातविशिष्टचेतन मैं हूँ ऐसैं जानताहै । यातैं जीवकूँ विशेषज्ञानतें पूर्व वी विशिष्टअमरूपसैं अपने स्वरूपका ज्ञान प्रत्यक्ष है ॥
॥ ४६१ ॥ "तत्त्वमसि" इस सामवेदके छांदोग्य-उपनिषदुके पांचवेंअध्यायगत महावाक्यका श्वेतकेतुपुत्रकेभति उद्दालकपितानै जिस रीतिसैं नवबार उपदेश
कियाहै, सो "तत् त्वं" इन दोपदके सामानाधिक-रण्यरूप संत्रंधके वलतैं कह्याहै ॥ सामानाधिकरण्यकरणका उदाहरणसहित लक्षण चतुर्थतरंगके ११३ में दोहाके टिप्पणविषै हमनैं लिख्याहै ।
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॥.दोहा.॥ आदि दोय नहिं संभवे, महावाक्यमैं तात ॥ भागत्याग यांतैं लखहु, नहिं जातैं कुसलात ॥ ३५ ॥ टीका:-हे तात ! महावाक्यमैं आदि दोय कहिये जहाति अजहाति नहीं संभवें । यातैं भागत्यागलक्षणा महावाक्यमैं लखहु कहिये जानो । यांतैं कुसलात कहिये विरोधकात परिहार होवै ॥ ॥४३६॥१महावाक्यमैं जहातिका असंभव ॥
॥ अथ जहातिअसंभवप्रतिपादन ॥
॥ दोहा ॥ झेय जु साछी ब्रह्मचिन्त, वाच्यमांहि सो लीन ॥ मानै जहतीलच्छना, नहै कछु झेय नचीन ॥ ४० ॥ टीका:-संपूर्णवेदांतका झेय, साक्षीचेतन औ ब्रह्मचित्त कहिये ब्रह्मचेतन है । सो साक्षी चेतन औ ब्रह्मचेतन स्वंपद औ तत्पदके वाच्यमैं लीन कहिये प्रविष्ट है ॥ ओ— जहतिलक्षणा जहां होवै, वहां वाच्यसंपूर्णका त्यागकरिके वाच्यकासंबंधी अन्यझेय होवैहै । यांतैं महावाक्यमैं जहतिलक्षणा मानैं तौ वाच्यमैं आया जो चेतन, तासैं नवीन कहिये अन्यकछु झेय होवैगा ॥ चेतनसैं मिथ्या असत जड़दुःखरूप है । ताके जाननतैं पुरुषार्थ सिद्ध होवै नहीं । यांतैं महावाक्यमैं जहाति लक्षणा नहीं ॥
॥ ४३७ ॥ २ महावाक्यमैं अजहातिका असंभव ॥
॥ अथ अजहातिलक्षणाआसंभव- प्रतिपादन ॥
॥ दोहा ॥ वाच्यहु सारो रहतहै, जहां अजहती मीत ॥ वाच्यअर्थ सविरोध यूं, तजहु अजहती रीत ॥ ४१ ॥ टीका:-हे मीत प्रिय ! जहां अजहतिलक्षणा होवै । तहां वाच्यअर्थ सारे रहहै औ वाच्यसैं अधिकका ग्रहण होवैहै ॥ महावाक्यनमैं अंजहति- लक्षणा अंगीकार करें तौ वाच्यअर्थ सारा रहैगा औ वाच्यअर्थ महावाक्यनमैं सविरोध कहिये विरोधसहित है ॥ विरोध दूरी करनेकै लक्षणा अंगीकार करीहै ॥ अजहाति मानैतैं महावाक्यनमैं विरोध दूरी होवै नहीं । यांतैं अजहातिकी रीति महावाक्यनमैं तजहू ॥
॥ ४३८ ॥ ३ महावाक्यमैं भागत्यागका अंगीकार ॥
॥ अथ भागत्यागलक्षणाप्रकार ॥
॥ दोहा ॥ त्यागि विरोधीधर्म सब, चेतन शुद्ध असंग ॥ लखहु लच्छनातैं सुमति, भागत्याग यह अंग ॥ ४२ ॥ टीका:-हे अंग ! हे प्रिय ! तत्पदका वाच्य ईश्वर औ त्वंपदका वाच्य जीव तिन्हके आपसमैं
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विरोधीधर्मी त्यागिके शुद्धअसंगचेतन लक्षणातें लखहद्र । यह भागत्यागलक्षणा है ॥ या स्थानमें यह सिद्धांत है:-ईश्वरजीवका स्वरूप अनेकप्रकारका अद्वैतग्रंथनमें कह्याहै ॥
१ विवरणग्रंथमैं (१) अज्ञानमैं प्रतीत जीव और- (२) चिच्च ईश्वर कह्याहै ॥ औ- २ विद्यारण्यकेभ मतमैं (१) शुद्धसत्चगुणसहित मायामैं आभास ईश्वर । औ- (२) मलिनसत्चगुणसहित जो अंतःकरणका उपादानकारण अविद्याका अंश, तामैं आभास जीव कह्याहै ॥
॥ ४३९ ॥ जीवईश्वरके स्वरूपमैं पंचदशीकार तथा विवरणकारादिकका मत (आभास प्रतिबिंब औ अवच्छेदवाद)
यद्यपि पंचदशीग्रंथमैं विद्यारण्यकस्वामीनै अंतःकरणमैं आभास जीव कह्याहै । तथापि अंतःकरणके आभासकूं जीव मानैं तो शुद्धसत्तमैं अंतःकरण रहै नहीं । यातैं जीवका वी अभाव हुयाचाहिये । औ प्राज्ञरूप जीव शुद्धसत्तमैं रहैहै ।
यातैं विद्यारण्यकास्वामीका यह अभिप्राय है:- अंतःकरणरूप परिणात्मकूं प्राप्त जो होवै अविद्याका अंश, तामैं आभास जीव है ॥
॥ ४६३ ॥ केवलबिद्याभासही जीवईश्वर नहीं है । कहैंतें ? अपने तादात्म्यसंंबंधकरि अभिन्न होइकै जो प्रतीत होवै सो आरोपित कहिये-है ॥ आरोपितकी स्फुरणप्रतितमैं भिन्नताकरिके प्रतीति होवै नहीं । जैसे रज्जुसर्पै सर्प आरोपित है यातैं रज्जुतैं भिन्नताकरिके प्रतीति होवै नहीं किंतु रज्जुतैं अभिन्न होइकै औ रज्जुकै स्वरूपकूं 'द्वापिके सर्पैकी प्रतीति होवैहै तैसैं मायाविद्यामैं
सो अविद्याका अंश शुद्धसत्तमैं वी रहैहै । यातैं प्राज्ञका अभाव नहीं ॥ औ- केवलबआभासही जीव ईश्वर नहीं है । किंतु १ मायाका अधिष्ठानचेतन औ मायासहित आभास ईश्वर है ॥ औ- २ अविद्या औ ताका अधिष्ठानचेतन औ अविद्याके अंशसहितआभास जीव है ॥
१ ईश्वरकी उपाधिमैं शुद्धसत्चगुण है । यातैं ईश्वरमैं सर्वशक्तिसर्वज्ञतादिक धर्म हैं । औ- २ जीवकी उपाधिमैं मलिनसत्चगुण है । यातैं ईश्वरमैं अल्पशक्तितअल्पज्ञतादिकधर्म हैं ॥
यदूं आभासवाद कहैहैं ॥ औ- ॥ ४५० ॥ विवरणके मतमैं यद्यपि जीव-ईश्वर होउंककी जाति एकही अज्ञान है । यातैं दोनूं अल्पज्ञ हुयेचाहिये । तथापि जा उपाधिमैं प्रतिबिंब होवै, ताका यह स्वभाव नहीं ॥
जैसे दरपणरूप उपाधिमैं मुखका प्रतिबिंब होवैहै । ग्रीवामैं स्थित मुख चिब है ॥ तहां दरपणरूप उपाधिके श्याम पीत लघुतादिक अनेकदोप प्रतिबिंबमैं भान होवैहैं औ ग्रीवामैं स्थित जो चिच है, तामैं भान होवै नहीं ॥
जे आभास हैं । जे वी जातैं आरोपित हैं यातैं तिन की अपने अधिष्ठानकूटस्थ औ बुद्धैं स्फुरणै भिन्नताकरिके प्रतीति संभवें नहीं । किंतु तिन दोनूंकी अपने अधिष्ठानकूटस्थ औ बुद्धैं स्फुरणै तादात्म्यसंंबंधरूप एकतादू पायकै तिनके स्वरूपकूं ढांपिकेही प्रतीति होवैहै ।
यातैं अधिष्ठानचेतन औ उपाधिसहितचिदाभास जीवै किंबा ईश्वर है ॥
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प्रतिबिंबरूप जीवमें अज्ञानकृत अल्पज्ञतादिक दोष हैं औं विवररूप ईश्वरमें नहीं । यांतें-
१ ईश्वरमें सर्वज्ञतादिक हैं । औं-
२ जीवमें अल्पज्ञतादिक हैं ॥
॥ ४६१ ॥ आभास. ओं प्रतिबिंबका इतना भेद हैं:-आभासपक्षमें तौं आभास मिल्या है औं प्रतिबिंबवादमें प्रतिबिंब मिल्या नहीं । किंतु सत्य हैं । कहैंतें ?
प्रतिबिंबवादीका यह सिद्धांत हैं:-दर्पणमें छाया वी नहीं । वृत्तिके वेंगसें जो दर्पणमें मुखकी प्रतीति सोई प्रतिबिंब है ॥
इसरीतिसें दर्पणरूप उपाधिके संघंधसें प्रीवीमें स्थित मुखही चिंररूप औं प्रतिबिंबरूप भान होवैहैं औं विचारसें विवप्रतिबिंभभाव हैं नहीं । तैसें अज्ञानरूप उपाधिके संघंधसें असंगचेतनमें विम्यानीईश्वरभान औं प्रतिबिंब-
स्थानीयभाव प्रतीत होवेंहैं औं विचारदृष्टिसें ईश्वरताज्ञाता हैं नहीं ।
अज्ञानतें जो चेतनमें जीवभावकी प्रतीति, मोई अज्ञानमें प्रतिबिंच कहियेहैं । यांतें चिंपनता औं प्रतिंबपनता तौं मिल्या है औं स्वरूपसें चिंयप्रतिबिंच सत्य हूँ । कहैंतें ? चि-
प्रतिबिंबका स्वरूप दृष्टांतविप तौं मुख है औं दार्शांतविप चेतन हैं । सो मुख औं चेतन सत्य हैं ॥
१ इसरीतिसें प्रतिबिंबकूं स्वरूपपंतं सत्य होनेतें सत्यम कहैंहैं । औं--
२ आभासका स्वरूप छाया मानेंहैं; यांतें मिल्या है ॥
यह आभासवाद औं प्रतिबिंबवादका भेद है ॥
औं--
२ सर्ष मिलिके एक समष्टि प्रतिबिंच कहियेहैं । तिनके मध्य जिस प्रति/बिंचका जलकै भभावकारिफे अभाव होवें तिसका सूर्येसें अभेद कहियेहैं !
अंशोंका नहीं । ऐसें जब सर्षप्रतिबिंबनका अभाव होवें तब सो समष्टिप्रतिबिंबका सूरयेसें भेद कहियेहैं ।
तैसें या उक्तआभासवादीकै पक्षमें--
१ अनेकभुदि वा अवियाआंशरहूप जलविहै अनेक ब्राकेने प्रतिबिंच ( आाभास ) हैं । तिनमें
एकएकप्रतिबिंच व्यष्टि कहियेहैं । औं--
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॥ ४६२ ॥ कितनै ग्रंथनमैं- १ शुद्धसत्गुणसहित ईश्वर कहियेहै ॥ और- २ सर्व मिलिकै एक समष्टिप्रतिबिंब कहियेहै तिनमैं १ अनेक व्यष्टिप्रतिबिंब जीव हैं । औ- २ एक समष्टिप्रतिबिंब ईश्वर है ॥ तिनके मध्य जिस जीवका उपाधिके अभावतैं अभाव होवैहै, तिसका ब्रह्मके साथि उपचारमात्र अभेद कहियेहै ।
ऐसैं जब सर्वज्ञज्ञानका अभाव होवैहै, तब सो समष्टिप्रतिबिंबरूप ईश्वरका विदेहमोक्ष होवैगा । १ या पक्षमैं जगत् औ ब्रह्मके किंवा जीवनब्रह्मके अभेदके बोधक श्रुतिवाक्यनमैं भागस्यागलक्षणाका स्वीकार नहीं । किं्तु "गंगामैं ग्राम है" इस वाक्यकै ध्याई सारे वाक्यका व्याग औ ताके संबंधी ब्रह्मके प्रहणतैं जहतिलक्षणाका स्वीकार है । यह अधि- घानकूटस्थकूं छोडिकै केवलबुद्धिसहित वा अविद्या- सहित आभासकूं जीव माननेदारो कोई वेदांतके एक- देशी आभासवादिका मत है ॥
२ या- पक्षमैं पुरुषार्थ ( मोक्ष )के निमित्त प्रयत्न करनेवाले जीवका मोक्षदशामैैं अभाव होवैहै। यातैं "धनहिंसिकी बांछसैं व्यापार करनैवालेका मूल- धन बी नष्ट भया" इसकै न्यायै मोक्षकी प्राप्तिके निमित्त प्रयत्न करनैवाले जीवका स्वरूप नष्ट होवैगा । यह अनर्थ जानिकै या सिद्धांतमैं किसी मुख्यश्रुति- प्रतिपाद्य नहीं होवैहै ।
यातैं यह पक्ष समीचीन नहीं ॥ औ- पंचदशी तथा विचारसागरग्रंथनमैं- १ अधिष्ठानकूटस्थसहित साभासशुद्धि वा अविद्याकूं जीव मान्याहै । औ- २ अधिष्ठानतत्सहित साभासमायाकूं ईश्वर मान्यांहै ।
यामैं वाध्यमागके एकदेशको व्यागतैं औ एकदेश- कै ग्रहणतैं महावाक्यादिकस्थलमैं सिद्धांतसममत २ मलिनसत्गुणसहित अंतःकरणका उपा- दान अविद्याके अंशविशिष्टचेतन जीव कहियेहै ॥
भागस्यागलक्षणाकाही स्वीकार है ॥ या पक्षमैं मुख्य आाकाशके दृश्यांतकाही स्वीकार है । तो आकाशके दृश्यांतका सविषतरवर्णन पंचदशीकै चित्रदीपमैं औ विचारसागरके चतुर्थतरंगमैं कियाहै ॥ yापक्षकी रीतिसैं- १ आकाशके किंवा मुख्यआदिकके प्रतिबिंबका अधिष्ठानरूप उपादान घटआकाश औ दर्पण- आदिक हैं। औ-- २ परिणामरूपादान जल औ अविद्यआदिक हैं । औ-- ३ निमित्तकारण महाकाश अरु मुख्यआदिक बिंब औ उपाधिकी संनिधि है ॥
तिंस प्रतिबिंबका वाधकिरिके अपने बिंत्र मुख- आादिकनसैं अमेद होवैहै । तथापि जहांलंगि जळ- दर्पणआदिक औ बिंबकी संनिधिरूप निमित्त होवैं होवैहै । याहीकूं वाधितानुवृत्ति कहहैं ॥ तैसैं- १ चिदाभासरूप जीवका अधिष्ठानरूप उपादान- कूटस्थ है औ-- २ परिणामरूपादान नानाजुद्दि किंवा अज्ञान- अंश हैं औ-- ३ प्रारब्ध निमित्तकारण है ।
तिनमैं जो विदाभास शुद्धि वा अज्ञानांश- रूप उपाधिसहित अपने स्वरूपका वाधकैरेके अहं- आादिक जीववाच्यपदका लक्षणअर्थ जो कूटस्थ- अधिष्ठानरूप अपनै निजरूप ताका अभिमानकारिके तिस अहंपदके लक्ष्य कूटस्थकै बिंबरूप महाकै साथि पूर्वसिद्धएकता है, ताकूं जानताहै सो मुक्त होवैहै । दूसरै बद्ध है ॥
यद्यपि उक्त "अहं ब्रह्मास्मि" इस ज्ञानके समय- मैैंही अविद्यारूप उपादानके नाशकारै ताकै कार्य-
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यार्के अवच्छेदवाद कहैंहें ॥ सर्वेही वेदांतकी प्रक्रियाँ अद्वैतआत्माके जनावनेकूँ है । यांतें ज्ञानसी प्रक्रियांतं जिज्ञासकूँ शोध होवै, सोई ताकूँ समीचीन है । तथापि वास्यश्रुति औ उपदेशसहिंमें भाप्यकारने आभासवादही लिख्याहै । यांतें आभासवादही मुखदय है ॥ ताकी रीतिसैं--
|| ४५५ || चारिमहावाक्यनमें भागत्यागका प्रदर्शन || १ ( १ ) माया । ओं-( २ ) मायामें आभास । ओं-( ३ ) मायाका अधिष्ठान जो चेतन । सो सर्वशक्तिसर्वज्ञतादिकधर्मसहित ईश्वर जगत्सहित चिदाभासका वाध होवैहै, तथापि जहाँलमि प्रारब्धरूप निमित्त हैं, तहाँलमि वाध अपने ( मिथ्या जानें ) देखदिजगत्सहित चिदाभासकी अनुसृति ( प्रनिति ) होवेंहै ॥ जय प्रारब्धका अंत होवेंहै, तब तिस प्रतीतिका अभाव होवेंहै । सोई ताका विदेहमोक्ष है । पूर्व्युक्तपक्षतें यह पक्ष उत्तम है ॥ ओं-- विंप्रतिंविंप्रचादिपं- १ प्रतिंविंचका अधिष्ठानरूप उपादान विंच है ओं- २ परिणामीडुपादान मुखप्रादिकविंचका अज्ञान है । ३ ताका निमित्तकारण वर्पण औ विंचकी सत्रि्भिआदिक है ।
विंप्रतिंविंप्रके अभेद्ज्ञानंतं प्रतीविंभभावकी निस्रुति होवेंहै । परंतु जहाँलमि विंच औ वर्पणकी सत्रि्भिरूप उपाधि ( निमित्त ) होवें तहाँलमि प्रतिंविंभावहित प्रतिंविंचके स्वरूपकी प्रतीति होवेंहै । जय वर्पणआदिकका अपसरण होवें, तथ प्रतीविंचकी प्रतीतिका अभाव होवेंहै । १ तैसैं एकही अज्ञानसैं कुड्मटसरूप विंचमें जीववरूप प्रतिंविंभाव प्रतीत होवेंहै, ताका उपादान अज्ञान है ओं अधिष्ठान शुद्ब्रह्म है ।
है, सोई तत्पदका वाच्य है ॥ ओं-( १ ) व्यावइविद्या । ( २ ) तामें आभास । ओं-( ३ ) ताका अधिष्ठानचेतन । अल्पशक्तिअल्पज्ञतादिकधर्मसहित जीव है । सो तवंपदका वाच्य है ॥ तिन्ह दोनूंकूँ 'तत्वमसि' वाक्यनै एकता शोधन करी । औ वैनैं नहीं । यांतें- १ आभाससहित माया औ मायाकृत सर्वशक्तिसर्वज्ञतादिकधर्म, इतनै वाच्यभागलक्षूँ त्यागिके चेतनभागविचै तत्पदकी भागलक्षणा ॥ २ तैसैं आभाससहितअविद्याआंश औ
निमित्तकारण षष्ट है । जय तिस प्रतिंविंचकूँ अपने विन्द्रासकूँ आपकी एकता प्रतीत होवै । तव्व ताका प्रतिंविंभाव ( जीवभाव ) निवृत्त होवेंहै । परंतु जहाँलमि प्रारब्धरूप उपाधि ( निमित्त ) हैं, तहाँलमि वाधित भये जगत्सहित इस जीवकै जीव-मावरहित स्वरूपकी प्रतीति होवेंहै । जय प्रारब्धका अंत होवेंगा तब तिस प्रतीतिका अभाव होवैके केवल्शुद्ब्रह्म अवशेष रहैगा, सोई ताका विदेह-मोक्ष है । यापक्षमें स्वमपकूँ नाहिं मुखदय एकजीवका अंगीकार है औ नानाजीन जो प्रतीत होवेंहैं, वेँ जीवाभास हैं । यांतें यह बी व्यावहारिकपक्षनविपै कहियैहै । परंतु अन्यसर्व- व्यावहारिक पक्षनविपै यह पक्ष उत्तम है ॥
|| ४५६ || इहां सर्वसंब्दकारि कार्यकारणउपाधिवाद, अवच्छिन्नअनवच्छिन्नवाद औ द्वैतसुध्दिवाद-आदिकपक्षनका प्रहण है । वेदांतके अनेकपक्षनका अनुवाद अपन्यासादिकृत सिद्बांततलेंमें तथा इत्ति-प्रभाकरके भछ्यमप्रकाशनमें कियाहै ॥
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अविद्याकृत अल्पशक्तिअल्पज्ञतादिकधर्मी जो त्वंपदका वाच्यभाग, ताहूँ त्यागिके चेतनभागमें त्वंपदकी भागत्यागलक्षणा है ॥ इसीरीतिसैं भागत्यागलक्षणातैं- १ ईश्वर औ जीवके स्वरूपमें लक्ष्य जो चेतनभाग, तिनकों एकता "तत्त्वमासि" महावाक्य बोधन करैहै ॥ २ तैसैं "अयं आत्मा ब्रह्म" इस महावाक्यमें- (१) आत्मापदका जीव वाच्य है । औ- (२) ब्रह्मपदका ईश्वर वाच्य है ॥ ब्रह्मपदका शुद्ध वाच्य नहीं । ईश्वरही वाच्य है । यह चतुर्थतरंगमें प्रतिपादन करीआयेहैं ॥ पूर्वकी न्यांई दोनों पदकी लक्षणा है । (३) लक्ष्यअर्थे परोक्ष नहीं । इस अर्थेकूं जनावनेकूं अयंपद है ॥ "अयं" कहिये सक्वे अपरोक्ष आत्मा ब्रह्म है । यह वाक्यकका अर्थ है ॥ ३ "अहं ब्रैबासिम" इस महावाक्यमें (१) अहंपदका जीव वाच्य है । औ- (२) ब्रह्मपदका ईश वाच्य है । दोनों पदनकी चेतनभागमें लक्षणा है ॥
"मैं ब्रह्म हूं " यह वाक्यकका अर्थ है ॥ "प्रज्ञानंमानन्दं ब्रह्म " इस महावाक्यमें- (१) प्रज्ञानपदका जीव वाच्य है । (२) ब्रह्मपदका ईश है । पूर्वकी न्यांई लक्षणा । (३) लक्ष्य जो ब्रह्मात्मा, सो आनंदरूप है । इस वाक्यमें- जनावनेकूं आनन्दपद है । आत्मासैं अभिन्नब्रह्म आनंदरूप है, यह वाक्यकका अर्थ है ॥ जैसैं महावाक्यनमें भागत्यागलक्षणा है । तैसैं अन्यवाक्यनमें सत्य, ज्ञान, आनन्दपद वोधक शुद्धब्रह्मकूं भागत्यागलक्षणासैंही बोधन करैहैं । शक्तिसैं नहीं । कहैंतैं ? शुद्धब्रह्म किसीपदकूं वाच्य नहीं । याहैं सिद्धांत हैं । यातैं सारें पद विशेषके वाचक हैं औ शुद्धके लक्ष्य हैं ॥
१ मायाकी आपेक्षिक सत्यता औ चेतनकी निरपेक्षिक सत्यता मिलीहुई सत्यपदका वाच्य है । निरपेक्षिक सत्य लक्ष्य है ॥ २ बुद्धिरूप ज्ञान औ स्वयंप्रकाशज्ञान, दोनों मिलै तौ ज्ञानपदका वाच्य औ स्वयंप्रकाशभाग लक्ष्य ॥ कहियेहै ॥ तिनमें प्रथमअपरोक् निलय ( सदाविद्यमान ) है मो दूसरा ( शुद्धद्वैतरूप ) अपरोक्ष औ स्फुरण ( कदाचित् होनैवाला ) है ॥
॥ ४७० ॥ यह यजुर्वेदकी बृहदारण्यक उपनिषद्गत महावाक्य है । याका विशेषप्रसंघ हमने श्रीपंचदर्शीके महावाक्यविवेकके टिप्पणविधे तथा श्रीबृहदारण्यककी भाषाटीकाविषै लिख्याहै ॥
॥ ४७१ ॥ यह ऋग्वेदकी ऐतरेयउपनिषदका महावाक्य है । याका विशेषप्रसंग हमने श्रीपंचदर्शीके महावाक्यविवेकके टिप्पणमें लिख्याहै ॥
॥ ४६७ ॥ यह उपदेशवाक्य काहियेहे ॥ इसीतैं मिल तीन अनुभयवाक्य काहियेहैं ॥
॥ ४६८ ॥ यह अथर्ववेदकी मांड्य्कयउपनिषद्गत महावाक्य है । याका विशेषप्रसंघ हमनै श्रीपंचदर्शीके महावाक्यविवेकके टिप्पणविधे किया मांहुक्यकी भाषाटीकाविषै लिख्याहै ॥
॥ ४६९ ॥ अपरोक्ष दोप्रकारका है । १ पक तो स्वयंप्रकाश होनैकरि बुद्धिरूप ज्ञानका विषय जो आत्माका स्वरूप, सो अपरोक्ष है । २ दूसरा " मैं स्वप्रकाश आत्मा हूं " इसरीतिसैं बुद्धिसैं अवलोकन करना, सो बी अपरोक्ष है ॥
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३ विपयसंवेधजन्य सुखाकार सात्विक अंतः-करणकी वृत्ति औ परमप्रेमका आस्पद स्वरूपसुख, इन दोनूं मिले आनन्दपदका वाच्य औ वृत्तिभागकूं त्यागिके स्वरूपभाग लक्ष्य । इसरीतिसैं सर्वपदनकी लक्षणा संक्षेपशास्त्रकूं प्रतिपादन करीहै ॥ ४४३ ॥ ॥ अथ उत्तकार्थ संग्रह ॥
"गंगामें ग्राम" जहति-अजहति - लक्षणा या ठौर लिखि । "सोन धावै" लक्षणा अजहति जनाईये ॥ "सोईं यह वस्तु" इहां लक्षणा है भागत्याग । दूजो नाम जहति अजहति सुनाईये ॥ "तत्वमसि" आदि महावाक्यनमें भागत्याग लक्षणा न जहति अजहति बताईये ॥ ब्रह्म काहू पदको न वाच्य यूं वखानैं वेद । यातैं सर्वपदनमें रीति यूं लखाइये ॥ ४३ ॥ मायामांही सत्यता जु औरभांति भाखियत । ब्रह्ममांहि सत्यता जु औरभांति भाखिये ॥
दोउ मिली सलपद वाच्य मुनी भाखतहैं । ब्रह्ममांहि सत्यता जु लक्षणाभाग राखिये ॥ बुद्धिवृत्ति मोहित है मिले ज्ञानपद वाच्य । संवितस्वरूप लक्षणैच बुद्धिवृत्ति राखिये ॥ आत्म औ विपैंको सुख वाच्यपद आनंदको । विपैसुख त्यागि आत्मसुख लक्षणैच आखिये ॥ ४४ ॥
॥४५॥॥भ्रक्ष:-दोनूं पदनमें लक्षणा निष्फल है ॥ महावाक्यनमें विरोध दूरी करनैकूं दोनूं-पदनमें लक्षणा अंगीकार करी ॥ तहां कोंई विरोध दूरी होहै । दोयपदमें लक्षणा माननैका प्रयोजन नहीं ॥
॥ दोहा ॥ एकहि पदमें लक्षणा, माने नहीं विरोध ॥ दोयपदनमें लक्षणा, निष्फल कहत खुबोध ॥ ४५ ॥ टीका:-सुवोध कहिये सुज्ञ । दोयपदनमें लक्षणा निष्फल कहतहैं । कहतैं ? एकहि पदमें लक्षणा मानतें विरोध दूरी होय जाइहै ॥ याका भाव यह है:-यद्यपि सर्वज्ञतादि-विशिष्टेकी अल्पज्ञतादिविशिष्टके साथ एकता
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॥ महावाक्यानमें लक्षणा ॥ ४४८-४५९ ॥
नहीं बनेहै । तथापि एकपदका लक्ष्य जो शुद्ध, ताकी विशिष्टके साथि एकता बनेहै ।
हष्टान्त:-जैसे—
१ “ शुद्धमुख्य ब्रह्माण है ” इसरीतिसैं शुद्धत्वधर्मविशिष्टमुख्यकी ब्रह्माणत्व-धर्मविशिष्टके साथि एकता कहनां विरुद्ध है । औ—
२ “ मुख्य ब्रह्माण है ” इसरीतिसैं शुद्धत्वधर्मरहित शुद्धमुख्यकूं ब्रह्माणत्व-विशिष्टता कहनैमें विरोध नहीं ॥
तैसे—
१ अल्पज्ञतादिर्मोविशिष्टचेतनकी औ सर्वज्ञतादिर्मोविशिष्टकी एकता विरुद्ध बी है ।
२ परन्तु जीववाचकपद औ ईश्ववाचकपद-की चेतनमें लक्षणाकरिके चेतनमात्रकी सर्वज्ञतादि-धर्मो-विशिष्टके साथि वा अल्पज्ञतादिर्विशिष्टके साथि एकता कहनैमें विरोध नहीं ।
यातैं दोपदमें लक्षणा माननैमें कोई युक्ति नहीं ॥
( गतप्रश्नका उत्तर ॥ ४४६-४५० ॥ )
॥ ४८६ ॥ दोनूं पदनमें लक्षणा सफलं है॥
॥ समाधान ॥ करिके ॥
लच्छनां जो कहै एक-पदमेंहि ताकूं यह ।
पूछि दोयपदनमें कौनसैंमें लच्छनां? ॥
प्रथम वा द्वितीयमें कहै ताहि भाखि यह ।
वाक्यनको होयगो विरोध मूढ़लच्छना ॥
तीनि वाक्यमध्य जीव-वाचक प्रथमपद ।
तत्वमसि " यामैं आदि--पद ईशलच्छना॥
प्रथम वा द्वितीयको नेम नहीं बनै यातैं ।
भाखत द्वैपदनमें लच्छना सुलच्छना ॥ ४६ ॥
टीका:-जो एकपदमें लक्षणा अंगीकार करै ताकूं यह पूछिः-दोनूं पदनमें कौनसै पदमें लक्षणा है?
जो ऐसैं कहैः—
१ सर्वमहावाक्यनके प्रथमपदमें लक्षणा है । द्वितीयमें नहीं ॥
२ यद्वा द्वितीयपदमें लक्षणा सर्ववाक्यनमें है । प्रथमपदमें नहीं ॥
ताकूं है शिष्य ! यह आक्षि:-हे मूढ़-लक्षण ! प्रथम वा द्वितीयपदमें जो नेमतैं लक्षणा सर्ववाक्यनमें मानैं तो वाक्यनका परस्पर-विरोध होवैगो । कहैंतैं ?—
१ तीनवाक्य मध्य कहिये .
(१) “ अहं ब्रह्मास्मि ” ।
(२) “ प्रज्ञानमानंदं ब्रह्म ” ।
(३) “ अयमात्मा ब्रह्म ” ।
इन तीन वाक्यनमें जीववाचकपद प्रथम कहिये पूवें है॥ औ—
(४) “ तत्वमसि ” या वाक्यमें आदिपद कहिये प्रथमपद, ईशलक्षण कहिये ईश्वरका बोधक है ॥
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(९) जो पूर्वपदमैं लक्षणा सारैं मानैं तौ तीनिवाक्यनका तौ यह अर्थ होवैगा:- चेतन सर्वज्ञतादि विशिष्टअंश सारे ईश्वररूप हैं ॥ औ-(२) "तत्त्वमसि" वाक्यका यह अर्थ होवैगा:- चेतन अल्पज्ञतादिविशिष्ट संसारी जीवरूप है । कहैंतैं ? तीनि वाक्यनमैं पूर्वै जीववाचक पद हैं ताकी चेतनभागमैं लक्षणा । औ द्वितीय ईश्वरवाचकपद, ताके वाच्यका ग्रहण । औ "तत्त्वमसि"मैं आदि ईशवाचकपद, ताकी चेतनभागमैं लक्षणा औ द्वितीय जीववाचकपद, ताके वाच्यका ग्रहण ॥ इसरीतिसैं लक्षणाका नेम करै तौ वाक्यनका परस्परविरोध होवैगा । तैसैं सर्ववाक्यनके द्वितीयपद कहिये आगिलै पदमैं लक्षणा मानैं । तौ (९) तीनि वाक्यनमैं पूर्व जो जीवपद, ताके वाच्यका ग्रहण औ उत्तर ईशपदकी चेतनभागमैं लक्षणा । यांतैं अल्पज्ञतादि-धर्मविशिष्ट चेतन है । यह तीनिवाक्यनका अर्थ होवैगा ॥ औ-(२) "तत्त्वमसि"मैं आदि ईशपद । ताके वाच्यका ग्रहण औ द्वितीय जीवपदकी चेतनभागमैं लक्षणा । यांतैं सर्वज्ञतादि-धर्मविशिष्ट चेतन है । यह "तत्त्वमसि" वाक्यनका अर्थ होनैंतैं परस्परविरोधही होवैगा ॥ इसरीतिसैं प्रथम वा द्वितीयपदमैं लक्षणाका नेम वनै नहीं । यांतैं सुलक्षणा काहिये सुंदरि है लक्षण जिनके, ते आचार्य हैपदनमैं लक्षणा माखतहैं । और-
॥ ४४७ ॥ ईश्वरवाचकपदमैं लक्षणा है । याका उत्तर ॥ जो ऐसैं कहै:-प्रथमपद वा द्वितीयदमैं लक्षणा है । यह नियम नहीं करैहै । किंतु सर्ववाक्यनमैं जो ईश्वरवाचकपद, तामैं लक्षणा है यह नियम करहै ॥ सो ईश्वरवाचक पूर्वै होवै वा उत्तर होवै । यांतैं वाक्यनका परस्पर-विरोध नहीं ॥ ताका-
॥ समाधान ॥ दोहा ॥ ईसपदहि लच्छक कहै, सब अनर्थकी खानि ॥ झेय होय श्रुतिवाक्यमैं, वहै पुरुपार्थ हानि ॥ ४७ ॥ टीका:- जो ईश्वरवाचकपदकूँही लच्छक कहह, तौ सर्वअनर्थकी आलंबनता पराधीनता जन्ममरणसैं आदिलेकै जो दुःखके साधन, तिनकी खानि जो संसारी जीव, सो श्रुति वाक्यनमैं झेय होवै । यांतैं पुरुषार्थ कहिये मोक्षकी हानि होवैगी ।
याका साब यह है:- जो ईश्वरवाचक पदमैंही लक्षणा मानैं तौ महावाक्यनका यह अर्थ होवैगा:- "तत्पदक लक्ष्य जो अद्रयअसंग-मायामलरहित चेतन, सो कामकर्मअविद्याके आधीन अल्पज्ञ, अल्पशक्ति, परिच्छिन्न, पुणपाप, सुखदुःख, जन्ममरण, गमन-आगमन आदिकअनर्थक पात्र है ।" जो महावाक्यकका ऐसा अर्थ होवै तौ जिन्हसूंहूँ इसी अर्थविपै बुद्धिकी स्थिति करनी होवैगी औ जामैं बुद्धिकी स्थिति होवहै । प्राणवियोगसैं अनंतर ताहीकूँ प्राप्त होवैहै । यांतैं वेदवाक्यनके विचारसैं मुमुक्षूअनर्थकही प्राप्ति होवैगी । आनंदकी प्राप्ति नहीं होवैगी । यांतैं ईश्वर-
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वाचकपदमें लक्षणा है । जीववाचकमें नहीं । यह नियम असंगत है । और— ॥ ४८८ ॥ जीववाचकपदमें लक्षणा है । याका उत्तर ॥ जो ऐसैं कहैं:- सर्वमहावाक्यनमें जो जीववाचकपद-हैं, तिनमें लक्षणा है । ईश- वाचकमें नहीं । यातैं पुवार्थकी हानि नहीं । जीववाचकपदमें लक्षणा मानैं तो महावाक्यनका यह अर्थ होवैगा:-“जो त्वंपद- का लक्ष्य चेतनभाग सों सर्वशक्ति, सर्वज्ञ, स्वतन्त्र, औ जन्मादिकनबंधरहित ईश्वररूप है ।” इस अर्थमैं बुद्धिकी स्थितिसैं जिज्ञासु अति- उत्तमईश्वरभावकीही प्राप्ति होवैही । यातैं जीववाचकपदमैं लक्षणाका नियम करहैं ताका—
समाधान ॥ दोहा ॥ साछी त्वंपद लच्छ्य कहु, कैसैं ईसवरूप ? ॥ यातैं दोपद लच्छना, भाखत जतिवर-भूप ॥ ४८ ॥ टीका:-त्वंपदका लक्ष्य जो साक्षी, सो ईश्वररूप कैसैं ? यह कहूँ । अर्थ यह:- त्वंपदके लक्ष्यकूं ईश्वररूप कहना बनैं नहीं, यातैं बुद्धि जो संबन्धी, तिनमैं हर जो ऐक्ष, तिनके भूप स्वामी, भाखतहैं ॥ याका भाव यह है:- जो जीववाचक पदमैं लक्षणा मानैं औ ईश्ववाचकमैं नहीं । ताकूँ यह पूछहैं:- १ त्वंपदकी लक्षणा व्यापकचेतनमैं है । २ अथवा जितनै देशमैं जीवकी उपाधि उतनै देशमैं स्थित जो साक्षीचेतन, तामैं त्वंपदकी लक्षणा है ?
मेंढकोवाक्यनमें लक्षणा ॥ ४८९-४९० ॥ (१) जो व्याप्तकचेतनमैं त्वंपदकी लक्षणा कहै तौ बनैं नहीं । कहैंतैं ? वाच्यार्थमैं जाका प्रवेश होवै, तामैं भागत्यागलक्षणा होवैहै औ वाच्यमैं प्रवेश न्याप्तकचेतनका नहीं । किंतु जीवपनैकी उपाधिदेशमैं स्थित जो साक्षीचेतन ताको वाध्यमैं प्रवेश है । यातैं साक्षीचेतनमैंहि त्वंपदकी लक्षणा है । व्यापकचेतनमैं नहीं ॥ ता साक्षीचेतनमैं सचेके हृदयका प्रेरण औ सर्वगपंचमैं व्याप्ततादिक ईश्वरके धर्मनका असंभव है । औ साक्षी सदाइपरोक्श है । ताकोवैषै परोक्षता ईश्वरधर्मका अत्यंतअसंभव है । औ—
२ मायारहितकूं मायाविशिष्ट कहनाअसंभव है । जैसैं डंडरहितकूं डंडी कहनाऔ संस्काररहित द्विजातिककूं संस्काराविशिष्ट कहनाअसंभव है । यातैं साक्षीचेतनका ईश्वरसैंअभेद कहै तौ महावाक्य असंभवअर्थके प्रतिपादक होवेंगें ॥ औ— ॥ ४९० ॥ दोनूं पदनमें लक्षणा औ ओतप्रोतभाव ॥ दोनूं पदनमैं लक्षणा मानैं तौ दोष नहीं । कहैंतैं ? जो एकताके विरोधी धर्म हैं, तिन्ह सकदूं त्यागिके दोनूं पदनमैं प्रकाशरूप चेतन जो वाध्यमागें, ता सर्ववन्धरहित चेतनमैं दोनूं पदनकी लक्षणा है ॥ उपाधि औ उपाधि- कृत धर्मनतैं चेतनका भेद है । स्वरूपमैं नहीं । उपाधि औ उपाधि- कृत धर्मनका त्याग कियेैं दोनूं पदनके लक्ष्य चेतनकी एकता संभवहै ॥ जैसैं घटाकाशमैं बनैं नहीं औ मठदृष्टि त्याग कियेैं एकता घनहैं ॥
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॥ दोहा ॥
तत् त्वं तत् रीति यह, सब वाक्यनमें जानि । जातें होय परोछता, परिच्छिन्नता हानि ॥ ४७९ ॥
टीका:-सर्ववाक्यनमें "तत् त्वं " "त्वं तत् " इसरीतिसैं ओतप्रोतभावकी रीति जानि । जा ओतप्रोतभाव कियेते चाक्यकेअर्थमें परोक्ष औ परिच्छिन्नताआंतिकी हानि होवैहै ॥ १ "तत् त्वं " या कहनेतें तत्पदकेअर्थका त्वंपदकेअर्थसैं अभेद कहा । सो त्वंपदका अर्थ साक्षी नित्य अपरोक्ष है । यातें परोक्षताभ्रांतिकी हानि । औ— २ "त्वं तत् " या कहनेतें त्वंपदकेअर्थका तत्पदकेअर्थसैं अभेद कहा । सो तत्पदका अर्थ न्यायक है । यातें परिच्छिन्नताआंतिकी हानि ॥ १ तैसे— ( १ ) "अहं ब्रह्म " । ( २ ) "प्रज्ञानं ब्रह्म " । ( ३ ) "आत्मा ब्रह्म " यातें परिच्छिन्नताहानि ॥
२ औ— किन्तु तिस अधिकारीकी दृष्टिसैं वाधित होवैहैं औ तृतीयचेतनका अभाव है औ चेतनसैं बिना अन्यजड़वस्तुके आश्रित मायाभविद्या रहैं नहीं औ मायाभविद्याकी स्थितिविना उत्त दोपकर्थकी भ्रांति संभवै नहीं औ जिज्ञासुके चित्तमें प्रतीतिमान जे भ्रांति, सिनकी मायाभविद्याविना अन्य गति ( कारण ) संभवै नहीं । इस अर्थपत्ति प्रमाणसैं मायाभविद्याकी स्थितिकल्पना होवैहै । यातैं महावाक्यकै उपदेशअनंतर जे मायाभविद्या कहाँ स्थित होवैहैं ? यह प्रश्न है । याका—
॥ ४७२ ॥ गमन औ आगमनरूप परिचयविना मार्गकै सम्यकूज्ञानकै अभावकी न्याई ओतप्रोतभावविना सम्यक्संभेदज्ञान होवे नहीं । यातैं महावाक्यकै उपदेशकै अनंतर जिज्ञासुकूँ ओतप्रोतभाव औ व्यतिहार वी करैहैं ॥
॥ ४७३ ॥ इहां यह दृष्ट है:-महावाक्यउपदेशकै अनंतर जिज्ञासुकूँ ब्रह्म औ आत्मविपये परोक्षता औ परिच्छिन्नताआंतिकी प्रतीत होवैहै, सो कारणविना संभवै नहीं । तथां अन्य तो कोई भांतिका कारण संभवै नहीं । किन्तु ब्रह्मादिपै स्थित अविद्या, भांतिका कारण संभव । सो मायाभविद्या, ब्रह्म औ आत्माके आश्रित होयकै पूर्व रहैहै । सो जब जिज्ञासुने "तत्त्वं " पदार्थका शोधन किया । तब दोनूं नष्ट होगैं ॥
जैसैं घटसरूपकै विचार कियेते घटनिष्ट अविद्या रहैं नहीं, तैसैं ब्रह्म औ आत्माकै विचार कियेते' तिनविपै स्थित मायाभविद्या रहैं नहीं ।
यह उत्तर है:-यद्यपि पदार्थशोधनके अनंतर ज्ञात ( विचारित ) जे ब्रह्म औ आत्मा, तिनविधे तो मायाभविद्या संभवैं नहीं, तथापि महावाक्यकी अर्थरूप जो ब्रह्मआत्माकी एकता, सो सम्यक्ज्ञात भई नहीं । किन्तु अज्ञान है । तिस एकतात्रिपै मायाभविद्या स्थित होयकै परोक्षतारूप औ परिच्छिन्नतारूप भांतिकूँ उपजावैहै । तिस भांतिके निवारणअर्थे ओतप्रोतभाव कार्यकन्य है । ओतप्रोतभावकै किये एकताकै सम्यक्ज्ञान होयकै मायाभविद्याकी निवृत्ति- द्वारा परोक्षतापरिच्छिन्नतारूप भांतिकी निवृत्ति होवैहै ।
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( १ ) " ब्रह्म अहं " । ( २ ) " ब्रह्म प्रज्ञानं " । ( ३ ) " ब्रह्म आत्मा " । यातैं परोक्षतादानि ॥ ॥ दोहा ॥ जीवब्रह्मकी एकता, कहत वेद-स्मृति-बैन ॥ सिष्य तहां पहिचानिये, भाग्यागकी सैन ॥ ५० ॥ टीका:-हे शिष्य ! जो वेद-बैन औ स्मृति-बैन, जीवब्रह्मकी एकता कहै । तहां सारै भाग्यागकी सैन पहिचानियें । ॥ ४५० ॥ ग्रंथ ( ३३३ उक्त )की समासि ॥ ॥ दोहा ॥ अस सिष्य गुरु उपदेश सुनि, मौ ततकाल निहाल ॥ भै विचारे याहि जो, ताके नसत जंजाल ॥ ५१ ॥ ॥ सोरठा ॥ मिथ्यागुरु सुरबानि, कियो ग्रंथ उपदेश यह ॥ सुनत करत तमहानि, यह ताकी भाषा करी ॥ ५२ ॥ ॥ दोहा ॥ अग्रधदेवकूं स्वपमें, यह किय गुरु उपदेश ॥
नस्यो न तहु दुःखमूल वह, मिथ्या बनको वेस ॥ ५३ ॥ वेष कहिये स्वरूप । अन्य अर्थ स्पष्ट । तौ बीं मन हु:अकका मूल भासतहै ॥ ॥ अग्रघ उवांच ॥ ॥ चौपाई ॥ भगवन यह तुम ग्रंथ पढ़ायो । अर्थसहित सो मो हिय आयो । बनदुःख मूल तऊ सुधिं भासै । कहु उपाय जांतैं यह नासै ॥ ५४ ॥ ( ग्रंथप्रश्नका उत्तर ॥ ४५२-४५३ ॥) ॥ ४५२ ॥ वनका नाशक हेतु यही ( उक्त ) है ॥ अग्रधदेवके स्वपकी समासि ( नाश ) ॥ बोले गुरु सुनि सिषकी बानि । सुनि सिष्य ठहै जातैं बन हानी ॥ अस उपाय को और नहीं है । बनका नासक हेतु यही है ॥ ५५ ॥ महावाक्यकों अर्थ विचारहु । "मैं अग्रघ" यौं टेरि पुकारहु ॥ सुनि पुनि वाक्य विचारे चेला । "अहं अग्रघ" यह दीनो हेला ॥ ५६ ॥ निद्रा गई नैन परकासे । बन गुरु ग्रंथ सबै वह नासे ॥
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॥ मिथ्यागुरुवेदतै मिथ्याजगत्का परिद्वार ॥
भयो सुखी वनदुख विसरायो । हुतो अग्रध निजरूप सु पायो ॥५७॥ त्यौं मिथ्या गुरु वेदतैं, मिथ्या जग परिहार ॥ ५९ ॥ लच्छनअर्थ लखि वाक्यको, न्है जिज्ञासु निहाल ॥ निरावरण सो आप है, दादू दीनदयाल ॥ ६० ॥
मिथ्यागुरुवेदतैं अज्ञानजन्य मिथ्याजगत्का परिहार होवैहै ॥
॥ दोहा ॥
अग्रधदेवमें नींदत, भौं वनदुख जिहि रीति ॥ आतमें अज्ञानतैं, त्यौं जगदुःख प्रतीति ॥ ५८ ॥ ज्यों मिथ्या गुरु ग्रंथतैं, मिथ्या वन संहार ॥
॥ इति श्रीविचारसागरे गुरुवेदादि-साधनमिथ्यावर्णनं नाम षष्टस्तरंगः समाप्तः ॥ ६ ॥
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॥४७४॥ ज्ञानीके ब्यवहारमें नियम नहीं॥
॥ दोहा ॥ उत्तम मध्य कनिष्ठ तिहुँ, सुनि अस गुरुपदेश ॥ ब्रह्म आतम उत्तम लख्यो, रह्यो न संशयु तेस ॥ १ ॥
टीका:-यद्यपि गुरुने उपदेश तीनोंहूँ साथिहीं किया, तथापि गुरुपदेशतें साक्षात्कार उत्तमतत्त्वदृष्टिहीं हुवा। ॥ दोहा ॥
भ्रमन करत ज्यौं पवनतें, सूको पीपरपात ॥ सेषकर्म प्ररब्धतें, क्रिया करत दरसात ॥ २ ॥
कबहुक चढि रथ बौंजि गज, बाग बगीचे देखि ॥ नमपाद पुनि एकले, फिर आवत तिहिं लेखि ॥ ३ ॥
विविधवेष सज्या सयन, उत्तम भोजन भोग ॥ कबहुक अनसन गिरि गुहा, रजनिं खेला संयोग ॥ ४ ॥
करि प्रणाम पूजन करत, कहुँ जन लाख हजूर ॥ उभै लोकतैं भष्ट लखि, कहत कर्म धिकार ॥ ५ ॥
जो ताकी पूजा करत, संचित सुकृत सु लेत ॥ दोषहृष्टि तिन्हि जो लखै, ताहि पापफल देत॥ ६ ॥
ऐसै ताकी देखको, बिना नियम ब्यवहार ॥ कबहु न भ्रम संदेह है, लख्यो तत्त्वनिधार ॥ ७ ॥
॥ ४७४ ॥ जीवनमुक्तिका लक्षण आगे ४७६ में शंकाविषै कहियेगा ॥ ॥ ४७५ ॥ विदेहमुक्तिका लक्षण आगे ४७५ में अकविषै कहियेगा ॥ ॥ ४७६ ॥ दोहा ॥
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॥ शानीकं अधिकअप्रत्यक्षिके नियमका आक्षेप ॥
नहिं ताकूं कर्तव्य कछुं, भयो भेदश्रम नास ।। उपज्यो वेदप्रमानतैं, अद्वय ब्रह्मप्रकास ।। ८ ।। ( ज्ञानीके व्यवहारमें नेमका आक्षेप ॥ ४५५-४५८ ॥ )
॥ ४५५ ॥ ज्ञानीकूं समाधि औ शरीर- निर्वोहतैं अधिक अमप्रत्यक्षिके नियमका आक्षेप ॥ ४५५-४५८ ॥
॥ दोहा ॥ ज्ञानीके व्यवहारमें, कोऊ कहत है नेम ॥
त्रिपुटि तजै दुख हेतु लखि, लहै समाधि सपेम ॥ ९ ॥
नहै किंचित व्यवहार जो, भिच्छासन जलपान ॥ भूलै नाहीं समाधिसुख, नहै त्रिपुटितैं ग्लान ॥ १० ॥
लहै प्रयत्न समाधिको, पुनि ज्ञानी इह हेत ॥ जो समाधिसुख तजि भ्रमत, नर कूकर खर प्रेत ॥ ११ ॥
गौडपादमुनि कारिकां, लिख्यो समाधिमकार ॥ ज्ञानी तजी विच्छेप यूं लहै सकलसुखसार ॥ १२ ॥
अष्टअंगविन होत नहिं, सो समाधिसुख मूल ॥ अष्टअंग ते अव सुनो, जे समाधि अनुकोल ॥ १३ ॥
पांचपांच यमनियम लखि आसन वजुतप्रकार ॥ प्रानायाम अनेकविध, प्रत्याहार विचार ॥ १४ ॥
छठो धारणा ध्यान पुनि, अरु सविकल्पसमाधि ॥ अष्टअंग ये साधिके, निर्विकल्प आराधि ॥ १५ ॥
सुनि समाधि कर्तव्यता, तत्वदृष्टि हसि देत ॥ उत्तर कछु भाखत नहींं, लखि तिहि बकत सपेत ॥ १६ ॥
टीका:-जैसे सपेत कहिये प्रेतसहित भूतके आवेशवाला वकै तैसे अन्यथा कहता सुनिके तत्वदृष्टि हसैहै ॥ अन्यदोहाका अक्षरार्थ स्पष्ट है ॥
भाव यह है:-ज्ञानीके शरीरव्यवहारका नियम नहीं । कहत हैं १ ज्ञानीके व्यवहारमें अज्ञान औ ताका कार्य भेदभ्रांति तथा भेदश्रमके कार्य रागद्वेष तौ हैं नहीं । किंतु ज्ञानीके वी प्रारब्धकर्मी शेष रहहैं, सोई ताके व्यवहारमें निमित्त हैं ॥ सो प्रारब्धकर्मी पुरुषभेदसैं नाना- प्रकारका होवैहै । यातैं ज्ञानीके प्रारब्धकर्मजन्य व्यवहारका नियम नहीं । यह सिद्धांतपक्ष है ॥
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कौई ऐसे कहेहैं:-ज्ञानीके व्यवहारमें और किसी कर्मका तौ नियम नहीं है, परंतु ज्ञानवान्के निवृत्तिका नियम है । प्रवृत्ति होवै तौ देहस्थितिके हेतु मिक्षा अशन कौपीन आच्छादनमात्र ग्रहणमें प्रवृत्ति होवैहै । अन्य प्रवृत्ति होवै नहीं । कहतें हैं ? ज्ञानीकी उत्पत्तिसं प्रथम जिज्ञासाकालमें विपयनमें दोषदृष्टि होवैहै । सो वैराग्य ज्ञानीकी उत्पत्तिसैं अनंतर वी दोषदृष्टिैं तथा विपयनमें मिथ्याबुद्धिैं होवैहैं ॥
१ अपरोक्षरूपतैं मिथ्या जानै पदार्थनमें सत्यबुद्धि होवै नहीं ॥ २ दोषदृष्टिैं राग होवै नहीं औ प्रवृत्ति रागतैं होवैहै । ज्ञानीके राग संभव नहीं, यातैं प्रवृत्ति होवै नहीं ॥
शरीरनिर्वाहक भोजनादिकनमें प्रवृत्ति तौ रागतैं विना प्रारब्धकर्मतैं संभवहै । कर्म तीनि प्रकारके हैं:-१ संचित, २ आगामी, औ ३ प्रारब्ध। तिनमें— १ भूतशरीरनमें किये कर्मे फलारंभरहित संचित कहियेहैं ॥ २ भविष्यत्कर्मे आगामी कहियेहैं ॥ ३ भूतशरीरनमें किया वर्तमानशरीरका हेतु कर्मे प्रारब्ध कहियेहै।
तिनमें— १ संचितकर्मका ज्ञानतैं नाश होवैहै ॥ २ ज्ञानवान्कूं आत्मामें कर्तृत्वभ्रांति नहीं । यातैं तादृक् आगामीकेक् संभव नहीं ॥ औ— ३ जिस प्रारब्धकर्मतैं ज्ञानीके शरीरका
॥ ४७७ ॥ केवळ संन्यासीहू ज्ञनका मुख्य अधिकारी माननिहारो शंकरानंदस्वामीआदिक ॥ ॥ ४७८ ॥ वर्तमानशरीरविषै किया कर्म आगामीकरम कहियेहैं ॥
आरंभ किया है, सोई प्रारब्धकर्म शरीरस्थितिके हेतु मिक्षादिकनमें प्रवृत्ति करावैहै । प्रारब्धकर्मका भोगविना नाश होवै नहीं और— .
कैसूं ऐसा लिख्याहै:-संचितआगामी-कर्मकी नाशै ज्ञानीके प्रारब्ध कर्म वी रहै नहीं, यातैं भोजनादिकप्रवृत्ति वी ज्ञानीकूं संभवै नहीं । ताका यह अभिप्राय है:-ज्ञानीकी दृष्टिैं आत्मामैं कर्म औ ताके फलका संबंध नहीं, यातैं आत्मामैं सर्वकर्मका निपेधअभिप्रायैं प्रारब्धका निपेध कियाहै: औ ज्ञातैं पूर्व किये प्रारब्धका ज्ञानीके शरीरकूं भोग होवै नहीं । इसैं अभिप्रायतैं प्रारब्धका निपेध नहीं । कहतैं हैं ?
सूत्रकारनै यह लिख्याहै:- १ ज्ञानीके संचितकर्मका ज्ञानतैं नाश होवैहै । २ आगामीका संबंध होवै नहीं । ३ प्रारब्धका भोगतैं नाश होवैहै । यातैं प्रारब्धके वलतैं शरीरनिर्वाहक क्रिया ज्ञानकी होवैहै । अधिक नहीं । परंतु—
॥ ४७६ ॥ कर्म नानारककारके हैं । जहां एककर्म नानाशरीरका आरंभक होवै । ऐसे कर्मतैं रचित प्रथमशरीरमैं जावत् ज्ञान होवै, तहां ज्ञानवानकूं अन्यशरीरकी प्राप्ति हुई चाहिये । कहतैं हैं ? यह फलका जानै आरंभ कियाहै, सो प्रारब्ध कहियेहै । ताका भोगविना नाश होवै नहीं ॥ अन्यकारीरका हेतु कर्म एक है, तानै प्रथमशरीर जो उपजाया तामैं ज्ञान हुवा, ता कर्मके फल ज्ञातैं अनंतर औरशरीर शेप
॥ ४७९ ॥ अपरोक्षालुभूति सौ विवेकचूडामणि-आदिक ग्रंथनविषै
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रहैहैं। यातें ज्ञानवान्कूं वी अन्यशरीरकी प्राप्ति हुईचाहिये। और—
॥ ४५७ ॥ जो पेसैं कहैं:-प्रारब्धकर्मका फल जितनैं शरीर होवेंहैं, उतनैं शरीर ज्ञानीकूं वी होवेंहैं। प्रारब्धके भोगतें अधिक होवें नहीं। यातें ज्ञान वी सफल होवेंहै। सो
कहै नहीं। कहतेंहैं:-'यह वचनेकूं ढांकनो है:-"ज्ञानवान्के प्राण अन्यलोकमें वा इसलोकके अन्यशरीरमें गमन नहीं करते। किंतु, तिसी स्थानमें अंतःकरण इंद्रियसहित लीन होवेंहैं।"
औ प्राणगमनविना अन्यशरीरकी प्राप्ति संभवै नहीं। यातें ज्ञानवान्कूं प्रारब्धशेपतैं औ शरीर होवेंहैं। यह कहनां तो संभवै नहीं।
किंतु—
यह समाधान है:-जहां अनेकशरीरनका आरंभक एककर्म होवै, तहां अंतःशरीरमेंहीं ज्ञान होवेंहैं। पूर्वशरीरमें ज्ञान होवें नहीं। कहतेंहैं—
१ विपयनमें आसक्ति।
२ बुद्धिमंदता।
३ भेदभावादिवचनमें विश्वास।
ये तीनूं ज्ञानके प्रतिबंधक हैं। तैसैं विल्क्षणां-प्रारब्ध वी ज्ञानका प्रतिबंधक है। औ—
श्रवणादिक होवें, तहां ज्ञान होवें नहीं किंतु प्रतिबंधक दूरि हुवैतैं प्रथमजन्मविपै किये जो श्रवणादिक हैं, तिनतैंहीं अन्यशरीरमें ज्ञान होवेंहैं। जैसे चांद्रदेवने पूर्वजन्मविपै श्रवणादिक किये,
तच प्रारब्धका फल एकशरीर शेप होते ज्ञान नहीं हुवा। किंतु श्रवणादिक करते वर्तमानशरीरका प्राप्त होतेंहीं अन्यशरीरकी प्राप्ति हुयेत
पूर्वजन्ममें लिये श्रवणादिकनतें गर्भविपै ज्ञान हुवाैहैं। यातें ज्ञानसैं अनंतर अन्यशरीरका संयोग होवें नहीं। औ वर्तमानशरीरकी चेष्टा
प्रारब्धधंस होवेंहैं। तहां जितनी चेष्टा शरीरकी निर्वाहक है सोई होवै। रागजन्य अधिकचेष्टा होवें नहीं। यातें सर्वप्रपंचतिरहित ज्ञानी होवेंहैं।
॥ ४५८ ॥ इसरीतिसैं निश्चयतिप्रधान
ज्ञानीका व्यवहार होवेंहै। याकेविहैं—
पेसैं चांंका है:-मनका स्वभाव अति-चंचल है। निःसंगतैं मनकी स्थिति होवें नहीं।
किसी आलंबतैं मनकी स्थिति होवेंहैं। यातें मनके किसी आलंबकी प्रसिनिमित्त वी ज्ञानवान्की
प्रवृत्ति होवेंहै।
ताका—
यह समाधान है:-यद्यपि समाधिहीन पुरुपका मन चंचल होवेंहै तथापि समाधितैं मनका विजय होवेंहैं औ ज्ञानवान् समाधि-विपैं स्थित होवेंहैं। यातें ज्ञानवान्की प्रवृत्ति
होवें नहीं।
॥ ४८० ॥ "न तस्य प्राणा हुत्क्रामंते। दृढवैधुत्वात् ( तिस ज्ञानकी प्राप्ति करिके) प्राण गमन करै नहीं।
किंतु इहां मरणके स्थानविपैहीं लीन होवेंहैं )" इत्यादि वेदवाक्यनका नगारा है।
॥ ४८१ ॥ ज्ञानके त्रिविधप्रतिबंधका निवृत्तिके - उपायसहित वर्णन श्रीपंचदशीगत ध्यानदीपविपै
लिख्याहै औ तिसकां नाममात्र कथन पूर्व पंचम-तरंगगत टिप्पणविपै हम कारिकाव्यैहैं।
॥ ४८२ ॥ जन्मांतरका हेतु प्रारब्धशेष ॥
॥ ४८३ ॥ इहां " वामदेव " दृष्टांतकतां क्रथभ-
देवके पुत्र भरतराजाका वी कथन है। भरतका वी तीनजन्मका हेतु प्रारब्धशेष था। तिसकनि साधन-
सामग्रीहैं होते वी ज्ञान भया नहीं। पीछे तृतीय-
जन्मविपै उपदेशतैं विनाही पूर्वेकतनविचारसैं ज्ञान
भया ॥
॥ ४८४ ॥ साक्ष्यरहित ॥
॥ ४८५ ॥ साक्ष्यतैं ॥
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॥ ४५९ ॥ समाधि के अष्टांग
॥ ४५९-४६५ ॥ सो समाधि इन अष्टांगनतें होवैहै:-१ यम, २ नियम, ३ आसन, ४ प्राणायाम, ५ प्रत्याहार, ६ धारणा, ७ ध्यान औ ८ सविकल्पसमाधि, इन अष्टांगनतें समाधि होवैहै ॥
॥ ४६० ॥ १ अहिंसा, २ सत्य, ३ अस्तेय, ४ ब्रह्मचर्य, औ ५ अपरिग्रह, ये पांच यम कहैंहैं ॥
॥ ४६१ ॥ १ शौच, २ संतोष, ३ तप, ४ स्वाध्याय औ ५ ईश्वरप्रणिधान, ये पांच नियम कहियेहैं ॥ औ- ज्ञानसमुद्रग्रंथमैं दशप्रकारकै यम औ दश- प्रकारकै नियम कहैंहैं । सो पुराणकी रीतिसैं कहैंहैं । वेदांतसप्रदायमैं यमनियमकै पांचपांचहों भेद हैं ॥
॥ ४६२ ॥ आसनके भेद अनंत हैं । तिनमैं:-१ स्वस्तिक, २ गोमुख, ३ वीर, ४ कूर्म, ५ पद्म, ६ कुक्कुट, ७ उत्तान, ८ कूर्मक, ९ धनुष, १० मत्स्य, ११ पश्चिम- तान, १२ मयूर, १३ शव, १४ सिंह, १५ भद्र, औ १६ सिद्ध । इत्यादिक चौंसठ- आसन योगग्रंथनमैं लिखेहैं । तिनकै लक्षण बी तहां लिखेहैं । ग्रंथके विस्तारभयतैं तथा वेदांतमैं अत्यंतउपयोगीं नाहीं, यातैं लक्षण लिखे नाहीं ॥
सिद्धआसन अत्यंतप्रधान है । ताका यह लक्षण है:-चामपादकी एडी गुदा मेंडूके मध्य सीवनमैं दाविके धरै । दक्षिणपादकी एडी मेढूके उपरि दाविके धरै । शुक्रकी न्याईं सरल- निश्चलशरीरतैं स्थितिकूँ सिद्धासन कहैंहैं ॥ औ- कोई ऐसे कहैंहैं:-चामपादकी एडी सीवनमैं नहीं लगावै । किंति मेंडूके उपरि लगावै । ताके उपरि दक्षिणएडी धरै ॥
औ पूर्वकी न्याईं यह सिद्धासनही अतिप्रधान है । कहैंहैं ? कितनै आसन तो रोगनाशके हेतुहैं । और कोई आसन ऐसे हैं, प्राणायामादिक समाधिके अंग जिनतैं होवैंहैं, औ सिद्धासन समाधि- कालमैं होवैहै । यातैं अतिप्रधान है ॥ याहीकूँ वज्रासन, भद्रासन, और गुसासन कहैंहैं ॥
॥ ४६३ ॥ आसनसिद्धितैं अंतर प्राणायाम बी करै । सो प्राणायाम बहुत- प्रकारका है । नाथपि संक्षेपतैं यह लक्षण है:-
१ नासाके चामछिद्रद्वारा इडा नाम नाडीतैं वायुं पूरण करै, ताकूँ पूरक कहैंहैं । २ दक्षिणतैं त्यागै, ताकूँ रेचक कहैंहैं । ३ सुखुष्मणातैं रोकै, ताकूँ कुंभक कहैंहैं । इसरौतिसैं पूरक रेचक कुंभककूँ प्राणायाम कहैंहैं ।
सो दोप्रकारका है:- १ एक अगमै है तैसैं २ दूसरा सगर्मै है ॥
१ प्राणवकै उच्चारणरहित प्राणायाम अगमै कहियेहै ॥ २ प्राणवकै उच्चारणसहितै प्राणायाम सगर्म कहियेहै ॥
॥ ४६४ ॥ १ विषयनतैं सकलइंद्रियनके निरोधकूँ प्रत्याहार कहैंहैं । २ अंतरायसहित अंतःकरणकी स्थिती धारणा कहियेहैं ॥
भाव है । यातैं तिस प्राणायामकी रीति 'हठ- प्रदीपिकासादिक' ग्रंथनमैं स्पष्ट लिखीहै ॥
॥ ४६५ ॥ खेमेकी न्याई ॥
॥ ४६५ ॥ सारे हठयोगका प्राणायाममैं अंतर-
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३ अंतरायरहित अद्वितीयवस्तुविपै अंतःकरणका प्रवाद, ध्यान कहियेहै ॥
॥ ४८५ ॥ व्युत्थानसंस्कारनका तिरस्कार औ निरोधसंस्कारनकी प्रगटता हुया अंतःकरणका एकाग्रतारूप परिणाम, समाधि कहियेहै । सो समाधि दोप्रकारकी है:- ९ एक सविकल्पसमाधि है । औ २ दूसरी निर्विकल्पसमाधि है ॥
९ ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयरूप त्रिपुटीसहित अद्वितीयवस्तुपै अंतःकरणकी वृत्तिकी स्थिति सविकल्पसमाधि कहियेहै । सो सविकल्पसमाधि दोप्रकारकी है:-(१) एक तौ शब्दानुविद्ध है औ (२) दूसरी शब्दाननुविद्ध है ॥
(९) "अहं ब्रह्मास्मि" इस शब्दकरिके अनुविद्ध कहिये सहित होवैहै, सो शब्दानुविद्ध कहियेहै ॥
(२) शब्दरहितकूं शब्दज्ञाननुविद्ध कहहैं ॥
२ त्रिपुटीरहित अखंडब्रह्माकार अंतःकरणवृत्तिकी स्थिति, निर्विकल्पसमाधि कहियेहैं ॥
इसरीतिसैं सविकल्प औ निर्विकल्पसमाधिके दो भेद हैं । तिनमें—
(९) सविकल्पसमाधि साधन है । औ—
(२) निर्विकल्पसमाधि फल है ।
९ साधनरूप जो सविकल्पसमाधि है, ताकैवपै यद्यपि त्रिपुटीरूप द्वैत प्रतीत होवैहै, तथापि सो द्वैत इसरीतिसैं ब्रह्मरूप करिके प्रतीत होवैहैं:- जैसे मृत्तिकारूप जानतैं विवेकींकूं मृत्तिकाके विकार घटादिक प्रतीत वौ होवैंहैं, परंतु मृत्तिकारूपही प्रतीत होवैंहैं, तैसैं सविकल्पसमाधिमैं त्रिपुटीद्वैत ब्रह्मारुपही प्रतीत होवैहै ॥
॥ ४८६ ॥ समाधिविषै जो अंतःकरणका अभाव होवैहै तौ योगीका देह निद्रालुक्षः म्पाइै
२ निर्विकल्पसमाधिविषै वौ सविकल्पसमाधिकी न्यांईं त्रिपुटीरूप द्वैत विद्यमान होवैहै, तौ वी त्रिपुटीद्वैतकी प्रतीति होवें नाहीं । जैसे जलमैं लवणकूं मेरैहैं, तहाँ लवण विद्यमान होवैहै, परंतु नेत्रसैं लवणकी सर्वथा प्रतीति होवें नाहीं ॥
इसरीतिसैं सविकल्पनिर्विकल्पसमाधिकों यह भेद सिद्ध हुवा:-
९ सविकल्पसमाधिमैं ग्रहणकरिके द्वैतकी प्रतीति होवैहै । औ—
२ निर्विकल्पसमाधिमैं त्रिपुटीरूप द्वैतकी अप्रतीति होवैहै ॥
॥४८६॥ सुपुसिसैं निर्विकल्पसमाधिका भेद ॥
तैसैं सुपुसिसैं निर्विकल्पका यह भेद है:-
९ सुपुसिमैं अंतःकरणकी वृत्तिकी अभाव होवैहै । औ—
२ निर्विकल्पसमाधिमैं ब्रह्माकारवृत्ति तौ अंतःकरणकी होवैहै, ताका भान
होवै नाहीं ॥
इसरीतिसैं—
९ सुषुप्तिमैं तौ वृत्तिसहित अंतःकरणका अभाव होवैहै । औ—
२ निर्विकल्पसमाधिमैं वृत्तिसहित अंतःकरण होवें नाहीं ।
निर्विकल्पसमाधिवपै अंतःकरणकी जो ब्रह्माकारवृत्ति होवैंहैं, ताका हेतु सविकल्पसमाधिका अभ्यास है । यांतैं साधनरूप अष्टअंगनमैं सविकल्पसमाधि गिनीहै । निर्विकल्पसमाधि फल है ॥
गिन्या चाहिये औ गिरता नाहीं । यांतैं समाधिविषै अंतःकरण होवैहै, यह जानियेहै ॥
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॥५६७॥ निर्विकल्पसमाधी दोप्रकारकी ॥
सो निर्विकल्पसमाधी वी दोप्रकारकी होवैहै:- १ एक अद्वैतभावनारूप औ २ दूसरी अद्वैतावस्थानरूप होवैहै ।
१ अद्वैतग्रन्थाकार अंतःकरणकी अज्ञातदशासहित होवै, सो अद्वैतभावनारूप निर्विकल्पसमाधि कहियेहै ॥
२ या समाधिमैं अभ्यास अधिक हुयेतैं ब्रह्माकारवृत्ति वी शांत होय जावैहै । यातैं शुद्धिरहितकूं अद्वैतावस्थानरूप निर्विकल्पसमाधि कहेहैं ॥
जैसें तमलोहके उपरि जलकी बूंद गेरी तमलोहमैं प्रवेश करैहै, तैसेैं अद्वैतभावनारूप समाधिके दृढअभ्यासतैं अत्यंतप्रकाशमान ब्रह्मवृत्ति लय होवैहै । सो अद्वैतावस्थानरूप निर्विकल्पसमाधी फल है औ अद्वैतभावनारूप निर्विकल्पसमाधि ताका साधन है ॥
॥ ५६८ ॥ अद्वैतावस्थानरूप समाधिसैं शुद्धि का भेद ॥
अद्वैतावस्थानरूप . समाधि. औ शुद्धि में इतना भेद है:-
१ शुद्धिसैं वृत्तिका लय अज्ञानमैं होवैहै ।
॥ ५६९ ॥ यातैं सो अद्वैतभावनारूप समाधि ॥
॥ ५७० ॥ यह अद्वैतावस्थानरूप निर्विकल्पसमाधिही ज्ञानकी सम्पममात्रिकरूप योगका पूर्षअवधि है ॥
॥ ५७१ ॥ इहां यह रहस्य है:-यद्यपि उक्तसमाधिविषै निःशेषरजतमैंके विरोधान्तैं आभिमानिककूं प्राप्त भये शुद्धसत्वगुणरूप उपादानविवैहै वृत्तिका लय संमवैहै । निर्विकारब्रह्मप्रकाशाविषै नहीं । तत्त-लोहेविषै जलबिंदुकै लयका दृष्टांत कद्वा । तहां वी विचारदृष्टिसैं पाथिवलोहेविषै जलबिंदुका लय नहीं । किंतु जलकतां उपादान जो असिमात्र ताकेसैंषे जलबिंदुका लय होवैहै । तांवों तत्तलोहेविषै उपचार
२ अद्वैतावस्थानसमाधिमैं वृत्तिका लय ब्रह्मप्रकाशमैं होवैहै ॥ परंतु-
निर्विकल्पसमाधीके लय, विक्षेप, कमाय; औ रसास्वाद, ये चारिवृत्ति ॥ ५६९-५७२ ॥
निर्विकल्पसमाधिमैं चारिवृत्ति होवैहैं, सो निपेध करिकै कहियेहै:- १ लय, २ विक्षेप, ३ कमाय, औ ४ रसास्वाद ।
१ आलस्यकरिके अथवा निद्राकरिके वृत्तिके अभावकूं लय कहैहैं । ता लयतैं शुषुप्ति-समान अवस्था होवैहै । ब्रह्मानंदका भान होवै नहीं । यातैं निद्राआलस्यादिक निमित्ततैं जब वृत्तिका पनै उपादान अंतःकरणमैं लय होतादिखै तथ योगी सावधान होयके निद्रादिकनकूं रोकिके वृत्तिकूं जगावै! इसरीतिसैं लयरूप विक्षका विरोधसहित वृत्तिका प्रवाहरूप जागरण, ताकूं गौडपादाचार्यैं चित्तेसंबोधन कहहैं ॥
( कथन ) होवैहै । तथापि ब्रह्मप्रकाशके भानरूप निमित्तकरिके वृत्तिका लय हुवाहै । यातैं उपचारतैं ब्रह्मप्रकाराविषै लय कहियेहै ।
किंवा तिस समाधिमान् म्रक्षविद्यारिष्टकी दृष्टिसैं गुणादिक प्रतीत होवें नहीं । किंतु शुद्धब्रह्म प्रतीत होवैहै । तहां तिस ( ब्रह्मविवर्त्ती ). इति ( दृष्टि ) का अभाव भया । यातैं वी ब्रह्मप्रकाशाविषै वृत्तिका लय कहियेहै ॥
॥ ५७२ ॥ यह अर्थ गौडपादाचार्यक्त मौडूक्य-उपनिषद्की कारिकाविषै लिख्याहै । तिसकी वेदांतदीपिकानाम भाषाटीकाविषै हमनै वी लिख्याहै ॥
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॥ ४७० ॥ २ विक्षेपका यह अर्थ है:-जैसें षाज वा विल्लीतैं डरिके चटिका गृहमें प्रवेष्ट करै, तथ भयऩ्याङ्कुलकैं गृहमैं अंतर तत्काल स्थान दिखै नहीं, यातैं फेरि चाहरि आयके भय अथवा मरणरूप खेढरूं प्राप्त होवैहै, तैसैं अनात्मपदार्थनकूं दृढ़हेतु जानिके अद्वैतानंदकूं विपय करनैवास्ते अंतर्मुख हुई जो वृत्ति, तहां किंचित काल वृत्तिकी स्थितिविना तत्कालही चेतन-स्वरूप आनंदका लाभ नहीं होवैहै । तातैं वृत्ति बहिर्मुख होवैहै । इसरीतिसैं बहिर्मुखवृत्ति विक्षेप कहियेहै ॥ सो वृत्तिकी स्थिताविना स्वरूपआनंदका अलाभ होवैहै । यातैं अंतरमुखवृत्ति हुयेैं वी जितनैकाल वृत्तिकै ब्रह्माकार होवै नहीं उतनैकाल वाह्यपदार्थनमैं दोषभावनातैं वृत्तिकूं बहिर्मुखता योगी होन देवै नहीं । किंतु वृत्तिकी अंतर्र्मुखताही स्थापन करै ॥
चित्तकी पांच भूमिका हैं:-तिनमैं ( ९ ) एक क्षेप नाम भूमिका है । (२) दूसरी मूढता । (३) तीसजी विक्षेप । (४) चौथी एकाग्रता । औ (५) पांचमी निरोध भूमिका है ॥
(९) लोकैवासना, देहैवासना शास्त्रैवासना इत्यादिकेक रजोगुणका परिणाम जो दृढ़अनात्मवासना, ताकूं क्षेप कहैहैं ।
(२) निद्राआलस्यादिक तमोगुणपरिणामकूं मूढता कहैहैं ।
(३) ध्यानमैं प्रवृत्तचित्तकी कदाचित् बाह्यप्रवृत्तिकूं विक्षेप कहैहैं ।
(४) अंतःकरणका अतीतपरिणाम औ वर्तमान परिणाम समानाकार होवै, ताकूं एकाग्रता कहैहैं ॥
यह एकाग्रताका लक्षण योगसूत्रमैं पतञ्जलिनैं कहाहै । ताका भाव यह है:-समाधिकालमैं योगीके अंतःकरणमैं एकाग्रता होवैहै । सो एकाग्रता वृत्तिका अभावरूप नहीं । किंतु जितनैं अंतःकरणके परिणाम समाधिकालमैं होवैंहैं, सो सारै ब्रह्मकैही विपय करैहैं । यातैं अंतःकरणके अतीतपरिणाम औ वर्तमानपरिणाम केवल ब्रह्माकार होतैं समानाकार होवैहैं ।
(५) ता एकाग्रताकी वृत्तिकूं निरोध कहैहैं॥
ये पांचभूमिका अंतःकरणकी हैं ।
॥ ४७१ ॥ ३ रागादिकदोषनकूं कपाय कहैं । यद्यपि रागादिक दोषकरकैं हैं:-(९) एक वासना हैं औ (२) दूसरे अंतर हैं ॥
(९) पुत्रष्रीधनआदिक जिनके विषय वर्तमान होैं सो वासना कहियेहैं ।
(२) भूतका वा भावीक चिंतनरूप जो मनोराज्य सो आंतर कहियेहैं ॥
सो दोऊंकरकै रागादिके समाधिमैं प्रवृत्ते योगीविषैं संभवे नहीं । कहैंतैं?
॥ ४९३ ॥ 'कोई लोक मेरी निंदा मंति करो, किंतु सर्वै स्तुतिैं करौ' इस आग्रहका दृढ़संस्कार लोकवासना है ॥
॥ ४९४ ॥ 'स्थूल किंवा सूक्ष्मदेहके रोगादिरूप किया पापरूप मलका औपधआदिककरि किया तीसरीदनकै नि:शेष निवारण करूंगा जौ तीसविषै करूंगा' इस आग्रहका दृढ़संस्कार देहवासना है ॥
शोभापुष्ट्यादिरूप किंवा पुण्यरूप गुणका संपादन करैगा' इस आग्रहका दृढ़संस्कार देहवासना है ॥
॥ ४९५ ॥ 'सर्वीशास्त्रनके पाठकूं किंवा अर्थकूं किआ तिस तिस शास्त्रोक्त आवरणकूं मैं धारण करूंगा' इस आग्रहका दृढ़संस्कार शास्त्रवासना है ।
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नाम हैं:-(१) क्षित, (२) मूढ, (३) विक्षिप्त, (४) एकाग्र और (५) निरुद्ध । तिनमें—
(१-२) क्षिस और मूढअंतःकरणका तो समाधिवैपै अधिकार नहीं ।
(३) विक्षिसअंतःकरणकूं अधिकार है ॥
(४-५) एकाग्र और निरुद्धअंतःकरण समाधिकालमें होवैहै ।
यह योगग्रंथनमें कहाहै । रागादिकदोषसहित अंतःकरण क्षिसही है ।
ता क्षिसअंतःकरणका योगमें अधिकार नहीं । यातैं रागादिक दोषरूप कषाय समाधिके विघ्न हैं ।
यह कहना संभवेै नहीं ।
तथापि यह समाघान है:- चाहे अथवा अंतर जो रागादिक हैं, सो तौ क्षिस-अंतःकरणमेंही होवैहैं ।
ताका अधिकार वी नहीं । तौ वी अनेकजन्तुपै पूर्व अनुभव किये जो वाध्यअंतररागद्वेष, तिनके सूक्ष्म-संस्कार विक्षिस्पादिकअंतःकरणमें वी संभवैहैं,
यातैं रागद्वेपका नाम कपाय नहीं । किंतु
॥ ४९६ ॥ जा पुरवकूं राजाके पास जानेका अधिकार होवै, ताकूं तौ घोड़ीदारने विग्र किया ऐसा कथन संभवै औ जाकूं तहां जानेका अधिकार ही नहीं, ताकूं घोड़ीदारने विग्र किया ऐसा कहना संभवै नहीं ।
वैसैं क्षिसअंतःकरणका जो समाधिमें अधिकार होवै तौ तिसकूं रागादिदोषरूप कषाय समाधिके विघ्न होैं ।
जातैं ता क्षिसअंतःकरणका समाधिमें अधिकार नहीं, यातैं ताकूं रागादिदोषरूप कषाय समाधिके विघ्न हैं, यह कहना संभवै नहीं ॥
॥ ४९७ ॥ इहाँ यह प्रयोजन है:- १ उद्भुत, २ आघारूप, औ ३ वासनारूप भेदतैं रागादिक तीनमातिके हैं ॥
१ वाध्यप्रवृतिके हेतु जे रागादिक वेँ उद्भुत-राग कहियेहैं ।
ताहीकूं वाधाराग वी कहैहै । औ—
२ मनोरज्यरूप जे रागादिक वेँ आघारूप राग कहियेहैं ।
रागद्वेपादिकनके संस्कार कैषाय कछियेहैं । सो संस्कार अंतःकरण रहै जितनैं दूरि होवै नहीं ।
यातैं समाधिकालमें वी अंतःकरणमें रहैंहैं, परंतु रागद्वेपादिकनके उद्धृतसंस्कार समाधिके विरोधी हैं ।
अउद्धृत विरोधी नहीं ॥ प्रगटकूं उद्दृत कहैहैं ।
अप्रगट कूं अनुद्धृत कहैहैं ॥
समाधिमें प्रवृत्ते योगींकूं जो रागद्वेपके संस्कारकी प्रगटता होवै तौ विपयनमें दोप-दर्शनतैं दाविदेहै ।
विक्षेपकपायका यह भेद है:-
(१) वाध्यविपयाकारवृत्तिकूं विक्षेप कहैहैं ॥
औ—
(२) योगीके प्रयत्नैं जहां वृत्ति अंतर्मुख तौ होवै, परंतु रागादिकनके उद्धृतसंस्कारनतैं अंतरमुख हुई वृत्ति वी रुकिजांचै,
कबहूंकू विपयमें करै नहीं, ताकूं कषाय कहैहैं ।
विपयमें दोपदर्शनसहित योगीके प्रयत्नैं कपायविपयकी निवृत्ति होवैहै ॥
कहियेहैं । तिनहीकूं आंतरराग वी कहैहैं ।
३ जन्मांतरविपै पूर्वअनुभव किये जे रागादिक, तिनके जे संस्कार, वेँ वासनारूप रागादिक कहियेहैं ।
तिनमें वासनारूप रागादिक उद्धृततैं दोमातिके हैं ।
यह स्थी जीवनमुक्तिविवेकनाम ग्रंथविषैं विचारण-स्वामीनें लिखीहै ॥
॥ ४९८ ॥ यामैं यह दषांत है:-जैसैं राजाके मिलनैअर्थ गृहीतै निकस्या जो कोहैं धनिक, ताकूं राजद्वारमैं जाग्रत् होइके स्थित जो द्वारपाल सो रोक देवै,
तैसैं सर्वविषयैं उपराम होइके निर्विकलप-समाधिके ज्ञानद्वारथ स्वंतमुख भया जो योगीका मन,
ताकूं बीचमैं ( समाधिकानंदलाभतैं पूर्व ) उद्दृतरागा-दिकका संस्काररूप कषाय रोक देवैहै ।
यातैं सो समाधिके विघ्न है ॥
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॥ ४७२ ॥ ४ रसास्वादका यह अर्थ है:- योगीहूं ग्रानन्दका अनुभव होवेंहै औ विकल्प-रुप दुःखकी निवृत्तिका अनुभव होवेंहै । कहूं दुःखकी निवृत्तिसैं वी आनन्द होवेंहै ॥ जैसें भारसाहीपुरुषका भार उतरेसैं ताहूं आनन्द होवेंहैं, तहां आनन्दमें और तौ कोई विपय हेतु है नहीं । किंतु भारजन्यदुःखकी निवृत्तिसैं यह कहेंहैं:-“मेरेकूं आनन्द हुआहै” यातें दुःखकी निवृत्ति वी आनन्दका हेतु है तैसें योगीहूं समाधिमें विकल्पजन्य दुःखकी निवृत्तिसैं जो आनन्द होवें ताका अनुभव रसास्वाद कहियेहै ॥
सविकल्पसमाधिसैं उत्तर निर्विकल्पसमाधि होवेंहै औ सविकल्पसमाधिसैं त्रिपुटी प्रतीत होवेंहै, यातें सविकल्पसमाधिका आनन्द त्रिपुटी-रुप उपाधिसहित होवेंतैं सोपाधिक कहियेहै औ निर्विकल्पसमाधिसैं त्रिपुटी प्रतीत होवें नहीं ! यातैं निष्पाधिक आनन्द निर्विकल्पसमाधिमें होवेंहै ॥ इसरीतिसैं सविकल्पसमाधिसैं उत्तर निर्विकल्पसमाधिके आरंभमें वी सविकल्पसमाधिके सोपाधिकआनन्दकूं । त्योंही सकें नहीं । किंतु ताहीकूं अनुभव करै, सो रसास्वाद कहियेहै । यातें विकल्पनिवृत्तिजन्य आनन्दका अनुभव अथवा सविकल्पसमाधिके आनन्दका अनुभव रसास्वाद कहियेहै ॥
जो दुःखनिवृत्तिजन्य आनन्दके अनुभवसैही योगी अलंयुद्धि करि लेय तौं सकलउपाधि-रहित ग्रानन्दाकार वृत्तिके अभावंत ताका अनुभव समाधिमें होवें नहीं । यातैं दुःखनिवृत्ति-जन्य आनन्दके अनुभवरुप रसास्वाद वी समाधिमें विट है ॥
वांछितकी प्राप्तिसैं वी विरोधीकी निवृत्ति- सैं आनन्दकी उत्पत्तिमें अनुग्घटतैं:- जैसें पृथिवीमें निधि होवें सो निधि अत्यंत-विपघरसरपैंतें रक्षित होवें । तहां निधिप्रासिकै विरोधी जो सर्प है, ताकी निवृत्तिसैं आनन्द होवेंहै । तहां सर्प-निवृत्तिके आनन्दमें जो अलंयुद्धि करै तौं उदम त्यागैंतैं निधिप्रासिका परमानंद प्राप्त होवें नहीं । तैसैं अहेतुकरुप निधि है देहादिक अनात्मपदार्थ्यनकी प्रतीतिरुप जो विकल्प सो सर्प है । विकल्परुप सर्पकी निवृत्ति-जन्य जो अवांतरआनंदरुपी रसका अनुभवरुप आस्वादन है, सो निधिरुपी अहेतुकरुपकी प्राप्तिजन्य जो महाआनंद है, ताकी प्रासिका प्रतिबंधक होवेंतैं विट कहियेहै ।
अथवा रसास्वादका यह और अर्थ है:-
॥ ४७३ ॥ ज्ञानचानकी वाध्यप्रवृत्तिके असंभवके आक्षेपकी समासि ॥
सावधानतैं चारिविद्याकूं रोकिके समाधिमें परमानंदकूं विद्यान्त अनुभव करैहै । ताहौंकूं जीवनमुक्त कहैंहैं ॥ इसरीतिसैं ज्ञानीका चित्त निरालंब नहीं होवेंहै ॥
जब प्रारब्धवशतैं समाधिसैं उत्थान होवें, तव वी समाधिमें जो परमानंदका अनुभव कियाहै, ताकी स्मृति होवेंहै । यातैं उत्थान-कालमें वी ज्ञानीका चित्त निरालंब नहीं । औ-ज्ञानवान्की जो भोजनादिकनमें प्रवृत्ति होवेंहै, सो केवल प्रारब्धसैं होवेंहै । परंतु भोजनादिक व्यवहारमें ज्ञानी खेद मानिके
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प्रवृत्त होवैहै । कहैंतें ? भोजनादिकनमें प्रवृत्तिकी वीर समाधिसुखकी विरोधी है । जाकूं भोजनादिक शरीरनिर्वाहकी प्रवृत्तिही खेदरूप प्रतीत होवै, ताकी अधिकप्रवृत्ति संभवै नहीं । इसरीतिसैं वृत्तआचार्योंनें लिल्याहै । औ जीवनमुक्तिक्का आनंद वीर बाह्यप्रवृत्तिमें होवै नहीं । किंतु निवृत्तिमें होवैहै । यातैं जीवनमुक्तिके सुखार्थी ज्ञानवान्की बाह्यप्रवृत्ति संभवै नहीं ॥
( ॥ अंक ४७५-४७९ गत आक्षेपका समाधान ॥ ४७४-४७८ ॥)
॥ ४७४ ॥ ज्ञानी निरंकुश है । प्रारब्धसैं व्यवहारासिद्धि ॥ तथोंपि ज्ञानवान्के निवृत्तिका वीर नियम कहैं । कहैंतें ? निवृत्तिमें अथवा प्रवृत्तिमें वेदकी आज्ञारूप विधि तो ज्ञानीकूं व्यवहारमैँ नियम होवैहै । यातैं ज्ञानी निरंकुश है । ताका व्यवहार प्रारब्धसैं होवैहै ॥
१ जिस ज्ञानीका प्रारब्ध शिक्षामोजनमात्रफलका हेतु है, ताकी शिक्षाभोजनमात्रमैं प्रवृत्ति होवैहै । २ जाकी प्रारब्ध अधिकभोगका हेतु होवै ताकी अधिकमैं वीर प्रवृत्ति होवैहै । औ— जो ऐसैं कहैं:-जाकी प्रारब्ध शिक्षामोजनमात्रका हेतु होवै, ताकी ज्ञान होवैहै । अधिकव्यवहारका हेतु जाका प्रारब्ध होवै, ताकूं ज्ञान होवै नहीं । यातैं शिक्षामोजनादिक व्यवहारतैं अधिकव्यवहार ज्ञानिका होवै नहीं । जाकी अधिकप्रवृत्ति होवै, सो ज्ञानी नहीं ॥
॥ ४७९ ॥ सब इहाँसैं मेधकार पूर्वउक्त ज्ञानवान्के
सो शंका वने नहीं । कहैंतें ? याज्ञवल्क्यजनकादिक ज्ञानी कहैंहैं । समभाविजयतैं धनसंग्रहव्यवहार याज्ञवल्क्यका तथा राज्यपालनव्यवहार जनकका कह्याहै औ वासिष्ठग्रंथमैं अनेक ज्ञानी पुरुषनके व्यवहार नानाप्रकारके कहैंहैं । यातैं ज्ञानीके प्रवृत्ति अथवा निवृत्तिका नियम नहीं । यद्यपि याज्ञवल्क्यनैं समभाविजयतैं उत्तर विद्धत्संन्यासरूप निवृत्तिही धारिहै औ प्रवृत्तिमैं ग्लानिके हेतु नानादोष कहैंहैं, तथापि 'याज्ञवल्क्यकूं विद्धत्संन्यासतैं पूर्व ज्ञान नहीं था' यह कहना तो संभवै नहीं किंतु ज्ञान तो प्रथम वीर था । परंतु विद्धत्संन्यासतैं पूर्व जीवनमुक्तिका आनंद प्राप्त हुवा नहीं । यातैं जीवनमुक्तिके आनंदवासतैं सर्वसंग्रहका त्याग कियाहै ॥
१ जनकका प्रारब्ध मरणपर्यंत राज्यपालनादिकसर्वभोगनका हेतु हुवहै । यातैं सदा त्यागका अभावही हुवा है । भोगनमैं ग्लानि ची हुई नहीं ॥ औ—
२ वामदेवादिकनका प्रारब्ध न्यूनभोगका हेतु हुवा है । तिनकूं सदा भोगनमैं ग्लानितैं प्रवृत्तिका अभावही कह्याहै । औ ३. वासिष्ठमैं ऐसा वीर प्रसंग है:- 'दैश्वरघ्वजकी ज्ञांतैं अनंतर अधिकप्रवृत्ति हुईहै ।'
इसरीतिसैं नानाप्रकारके विलक्षणव्यवहार निष्टिक्के नियमविपैं शंकाका समाधान कहैंहैं ॥
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ज्ञानी पुरुषके कहेहैं, तीन सर्वदृं ज्ञानी समान हैं औ तौका फल मोक्ष वी समान है औ प्रारब्धमेदसे न्यबहारका भेद है । न्यूनतासैं जीवनमुक्तिके सुखकी अधिकता औ न्यवहारकी अधिकतासैं जीवनमुक्तिके सुखकी न्यूनता होवैहै । याके विपे:—
॥ ४७५॥ ज्ञानीकूं विदेहमोक्षत्याग वा परलोककी इच्छा होवै नहीं ॥
कोई यह शंका करैहै:- जो जीवनमुक्तिके सुखकूं त्यागिके तुच्छभोगनमें प्रवृत्त होवै, सो विदेहमोक्षकूं वी त्यागिके बैकुंठादिक लोककी इच्छा धारिके जावैगा ।
सो शंका घने नहीं । कहैंतैं ?
१ जीवनमुक्तिके सुखका त्याग औ भोगनमें प्रवृत्ति तौ ज्ञानकी प्राघघ्रबलतैं संभवहै । औ—
२ विदेहमोक्षका त्याग औ परलोककूं गमन संभवै नहीं । कहैंतैं ?
(१) ज्ञानीके प्राण वाहिर गमन करें नहीं ।
॥ ४७६ ॥ इहां यह सांप्रदायिक श्लोक है:— कृष्णो भोगी भुकसस्यागी राजानौ जनकराजचौ । वसिष्ठ: कर्मकत्तौं च तौ पते धानिन: समा: ॥ १ ॥ अर्थार्थ:—- १ कृष्ण भोगी है । २ शुकदेव त्यागी भयाहै । ३ जनक अरु रामचंद्र राजा भयेहैं । जो ४ वसिष्ठसुनि कमेका कर्ता भयाहै । इसरितैं इनका प्रारब्धमेदतैं विलक्षणन्यवहार भयाहै । तथापि चे औ ये ( भाशुनिक ) ज्ञानी समान हैं ॥ १ ॥
उक्तअर्थके प्रतिपादक ये चित्रदीपके वी श्लोक हैं:— भाघरन्यवहारेनानास्वाहुधानामन्थानयथाघा । घर्त्तनं.तेन शास्त्राथैं भसित्तव्यं न पंडितै: ॥२॥
यातैं परलोककूं गमन संभवै नहीं । औ—
(२) विदेहमोक्षका त्याग वी संभवै नहीं । काहैंत ? ज्ञातैं अज्ञानकी निधत्ति होयके प्रारब्धभोगतैं अनंतर स्थूलसूक्ष्म- शरीराकार अज्ञानका चेतनमें लय विदेहमोक्ष कहीयहै । सो अवश्य होवैहै । जो मूलअज्ञान शाकी रहै अथवा नटअज्ञानकी फेरि उत्पत्ति होवै तौ विदेहमोक्षका अभाव होवै । सो मूलअज्ञानका विरोधी ज्ञान हुयेतैं अज्ञान वाकी रहै नहीं औ प्रमाणतैं नाश हुये अज्ञानकी फेरि उत्पत्ति होवै नहीं । यातैं विदेहमोक्षका अभाव होवै नहीं । औ—
विदेहमोक्षके त्यागमें तथा परलोकके गमनमें ज्ञानकी इच्छा वी संभव नहीं । कहैंत ?
(१) ज्ञातीकूं इच्छा केवल प्रारब्धसैं होवैहै । जितनी सामग्रीविना प्रारब्धका भोग संभवै नहीं, उतनी सामग्रीकूं प्रारब्ध रचैहै । इच्छा- स्वकर्ममात्रासारण वर्त्ततैं ते यथातथा ।
अविशिष्ट: सर्वयोध: समा मुक्तिरिति स्थिति:॥३॥
प्रारब्धकर्मके नाना होनेकरि ज्ञानिके भौर- औरप्रकारसैं ( परस्परविलक्षण ) वर्त्तनहै । तिसकारि पंडितजननैं रुढ़बोधसैं मोक्षके प्रतिपादक शास्त्रके अधिविधे श्रांत होना योग्य नहीं ॥ ३ ॥
सो ज्ञानी अपने अपने कर्मके अनुसार करि जैसैं तैसैं ( विलक्षण ) वर्त्तन करौ । सर्वेकां बोध समान है औ मुक्ति समान है । यह स्थिति ( शास्त्र- औ विद्वानकूं निधोर ) है ॥ ३ ॥
॥ ४७७ ॥ यह . शंका दैतविवेकविविदै विचारण्य स्वामिने लिखीहै ॥
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२५६६ ॥ ज्ञानीके ब्यवहारमैं नेमके आक्षेपका संमाथान ॥ ४७५७-४७५८ ॥ [ विचारसागरे
विना भोग संंभवें नहीं । यातैं ज्ञानीकी इच्छा वी प्रारब्धका फल है ॥ और—
(२) अन्यलोकमैं अथवा इसलोकमैं अन्य शरीरका संबंध ज्ञानीकूं प्रारब्धसैं वी होवै नहीं । यह पूर्वी इसीतरणमैं प्रतिपादन करि आयेहैं ।
यातैं ज्ञानीकूं प्रारब्धसैं विदेहमोक्षके त्यागकी वा परलोकके गमनकी इच्छा होवै नहीं ॥
॥ ४७६ ॥ ज्ञानीकी मंदप्रारब्धसैं जीवनमुक्तिसुखकी विरोधि प्रवृत्ति ॥
जीवनमुक्तिके सुखके विरोधी वर्तमानशरीरमैं अधिकभोगनकी इच्छा तौ मिक्षामोजन-
दिकनकी न्याईं जनकादिकनकूं संंभवेंहै ॥
॥ ५०२ ॥ द्वैतविवेकविषै पूर्वउक्तश्लोकारूप तर्कके कर्ता श्रीविदारणयस्वामिका "मंदप्रारब्धसैं भोगादिकमैं
प्रवृत्त ज्ञानीकूं विदेहमोक्षके त्यागकी वा परलोकके गमनकी इच्छा होवैगी " इस अर्थविर्षे अभिप्राय
नहीं । किंतु प्रयत्नरहित जे ज्ञानी हैं तिनकूं यथेष्टाचरणकी हेतु भोगादिककी आसक्ति छुडायकै
जीवनमुक्तिके सुखविषै आसक्त करनैमैं अभिप्राय है ।
जैसेैं रोगिष्टपदार्थके खानैवाले पुत्रकूं परम-
हितेच्छु जो तिसकी माता सो " हे पुत्र ! जब तूं
आरोग्यकी इच्छा त्यागिकै देखनैमात्र सुंदर इन
रोगिष्टपदार्थनकूं विवेक छोडिकै खाताहै, तव
वंचकौंके कियेहुए विषयुक्त लडुकै भक्षणके लोभ-
करि तूं जीवनकी इच्छा वी त्याग देगा " ऐसैं कहनै-
वाली माताकी " पुत्रकूं जीवनके त्यागकी वी
इच्छा होवैगी " इस अर्थमैं अभिप्राय
नहीं । किंतु तर्ककरि रोगके हेतु रोगिष्ट-
पदार्थनके भक्षणकी आसक्ति छुडायकै आरोग्य
( नीरोगता ) मैं आसक्त करनैवै अभिप्राय है ॥
तैसैं विदारणयस्वामिका' वी "विवेककूं छोडिकै
( उपेक्षाकरिके ) मंदप्रारब्धके फलमैं सहायकरनै ।
करि किषा कैशल्यभासनाकारि विवेकपै हेतु कामादिककी
विषै इच्छा संंभवै नहीं ।
या स्थानमैं यह रहस्य है:-ज्ञानीकी वावृत्ति जीवनमुक्तिके विरोधी नहीं । किंतु
जीवनमुक्तिके विलक्षणसुखकी विरोधी है,
काहेतैं ? आत्मा नित्यमुक्त है । अविद्यासैं वंध
प्रतीत होवैहै । जिसकलमैं ज्ञान होवैहैं,
तिसीकालमैं अविद्याकृत वंधभ्रम नष्ट होवैहैं ।
ज्ञान होतैं सैं मेरित वंधभ्रांति होवै नहीं ॥ शरीर-
सहितकूं वंधभ्रमका अभावही जीवनमुक्ति
कहियेहै ॥ देहादिकनकी प्रावृत्तिमैं तथा निवृत्तिमैं
ज्ञानीकूं वंधभ्रांति आत्मामैं होवै नहीं, यातैं
चाहै प्रावृत्तिसैं वी जीवनमुक्ति दूरि होवै नहीं ॥
तौ वी वावृत्तिसैं जीवनमुक्तकूं विलक्षणसुख
होवै नहीं । एकाग्रतरूप अंतःकरणपरिणामतैं
परवशारूप प्रमादकूं प्राप्त भयें ज्ञानीकूं जीवनमुक्ति-
रूप जीवनके त्यागकी वी परलोकके भोगकी
इच्छा होवैगी " इस अर्थमैं अभिप्राय नहीं । किंतु
अनिष्टापादनरूप तर्कसैं तौं यथेष्टाचरणरूप रोगकी
हेतु भोगमैं प्रवृत्ति छुडायकै जीवनमुक्तिके विलक्षण-
सुखरूप आरोग्यमैं आसक्त करनैविषै अभिप्राय
है ॥ श्लोक:- हृदयोषणवांन मोक्षकी इच्छासैं रहित हुया श्री मुक्त
होवैहै । या श्लोकमैं भाष्यकारका वचन प्रमाण
है ॥ श्लोक:- देहात्मभावबज्रज्ञानं देहात्मभाववाधकम् ।
आत्मन्येव भवेच्छ्रस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते ॥ ९ ॥
अर्थ:-अज्ञानीकूं देहविषै भासमुद्रिकी न्याईं
जानूं देहविपै आत्मभावका वाधक ज्ञान ब्रह्मसैं
अभिन्न आत्मभावी होवै, सो वृक्षसैं छूटे हत्स्तवाले
नरककी न्याईं न इछलतहुया वी मुक्त होवैहै ॥१॥औ-
स्वप्रैंतैं जगै पुत्रकूं जैसैं स्वप्रांतिकी निवृत्तिके
त्यागिवै अरु स्वप्रत परलोककै गमनविषै इच्छा
संंभवै नहीं; तैसैं ज्ञानीकूं वंधभांतिकी निवृत्तिरूप
विदेहमोक्षके त्यागवै शुद्ध स्वर्गादिपरलोककै गमन-
विषै इच्छा संंभवै नहीं ।
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सुख होवैहै । सो एकाग्रतापरिणाम वादवृत्तिमें होवै नहीं ।
इसरीतिसैं प्रारब्धमेदतैं ज्ञानी पुरुषपनके व्यवहार नानाप्रकारके हैं । परंतु जाका प्रारब्ध अधिकप्रवृत्तिका हेतु होवैहै, ताका मंदप्रारब्ध कहिये है । कहैंतें ? अधिकप्रवृत्ति एकाग्रताकी विरोधी है । औ एकाग्रताविना निरुपाधिक आनन्द प्रतीत होवै नहीं । यह समाधिनिरुपणमैं कहीहै ॥ और—
॥ ४७७ ॥ ज्ञानीके व्यवहारका अनियम ॥ ४७७-४७८ ॥
जो “पूर्वी कथा:-“ज्ञानीकूं सर्वआत्मपदार्थनमें मिथ्याशुद्धि होवैहै, राग होवै नहीं, यातैं प्रवृत्ति संभवै नहीं ” सो शंका बी बनै नहीं । कहैंतें ?
जैसे देहविषै मिथ्याबुद्धि वी ज्ञानीकूं रोगकी प्रवृत्ति संभवैहै,
तैसे सारी पृथिवीके राज्यकूं प्राप्त भये पुरुषकूं रोगका हेतु प्रारब्ध भोगका विरोधि होतैं मन्द कहिये है, तैसे भविष्यात्कार्यरूप शत्रुनका संहारकरिके महाभावकूं प्राप्त भये ज्ञानीका अधिकप्रवृत्तिका हेतु प्रारब्ध एकाग्रताका विरोधि होतैं मन्द कहिये है !
इहां मंदपदका निकृष्ट अर्थ है । शिथिल अर्थ नहीं । कहैंतें ? जैसे उत्कृष्ट सिध्यिलप्रारब्धजन्य-सुसाध्य वा कष्टसाध्य रोगकी तो औषधादिक प्रयत्नसैं निवृत्ति कदैहै । परंतु तीव्रतरप्रारब्धजन्य असाध्यरोगकी निवृत्ति करनी तिसतैं अशक्य है । तैसे शिथिलप्रारब्धके फलरूप प्रवृत्तिकूं तौ ज्ञानी जीवनमुक्तिके सुखअर्थ वासना (रागद्वेष) के निवारणरूप प्रयत्नसैं दूरी करैहै । परंतु तीव्रतरप्रारब्धकी फलरूप प्रवृत्ति तिसकदै निवारण करतैंकूं अशक्य है । इसरीतिसैं व्यवस्थाके किये प्रारब्ध औ पुरुषार्थ दोऊ सफल होवैहैं । यातैं अधिकप्रवृत्तिका हेतु प्रारब्ध शिथिल नहीं है । किंतु निकृष्ट है । यातैं मंद कहिये है ।
होवैहै तौ व्री. देखके अज्ञकूल जो भिक्षादिक हैं, तिनमैं केवल प्रारब्धसैं प्रवृत्ति होवैहै, तैसे जिसकौं अधिकभोगकौं प्रारब्ध होवै, तिस ज्ञानीकी अधिकप्रवृत्ति वी होवैहै ।
जैसे बाजीगरके तमासेकूं मिथ्या जानिके सर्वलोकनकी प्रवृत्ति होवैहै, तैसे सर्वपदार्थनमैं ज्ञानीकूं मिथ्याबुद्धि हुवैसैं बी प्रवृत्ति संभवैहै ।
औ—
॥ ४७८ ॥ जो ऐसैं कहै:-जाकूं जिस पदार्थमैं द्वेषबुद्धि होवै ताकैवै तिस पुरुषकी प्रवृत्ति होवै नहीं । ज्ञानीकूं अनात्मपदार्थनमैं द्वेषबुद्धि होवैहै, राग होवै नहीं, यातैं प्रवृत्ति संभवै नहीं ॥
सो बी बनै नहीं । कहैंतें ? जिस अपध्यसेवनमैं रोगीनैं अन्ययत्नतिरेकतैं दोपनिश्वय कियाहै, ता अपध्यसेवनमैं प्रारब्धतैं जैसे रोगीकी प्रवृत्ति होवैहै, तैसे प्रारब्धतैं ज्ञानीकी प्रवृत्ति संभवैहै ॥
॥ ५०३ ॥ जैसे सारी पृथिवीके राज्यकूं प्राप्त भये पुरुषकूं रोगका हेतु प्रारब्ध भोगका विरोधि होतैं मन्द कहिये है,
तैसे भविष्यात्कार्यरूप शत्रुनका संहारकरिके महाभावकूं प्राप्त भये ज्ञानीका अधिकप्रवृत्तिका हेतु प्रारब्ध एकाग्रताका विरोधि होतैं मन्द कहिये है !
॥ ५०४ ॥ पूर्वी वष्टतरंगर्गत ४०६ वैं अंकविषै कधा ॥
॥ ५०५ ॥ इहां यह विवेक है:-१ मंद, २ तीव्र औ ३ तीव्रतर इन भेदतैं प्रारब्धकर्मैं तीनि भांतिका है ॥
१ जाका उपादेयफल भिक्षाके धनकी न्याईं अधिकप्रयत्नसैं प्राप्त होवै अरु जाका अकस्मात् प्राप्त भया हेयफल सुसाध्य रोगकी न्याईं अल्पप्रयत्नसैं निवृत्त होवै, ऐसा जो प्रारब्ध है सो मंदप्रारब्ध है ॥ औ—
२ जाका उपादेयफल निमित्तनकै अनकी न्याई अत्यप्रयत्नसैं प्राप्त होवै अरु जाका अकस्मात् प्राप्त भया हेयफल कष्टसाध्यरोगकी न्याईं अधिकप्रयत्नसैं निवृत्त होवै, ऐसा जो प्रारब्ध है सो तीव्रप्रारब्ध है ॥ औ—
३ जाका उपादेयफल आसनपर प्राप्त भये अरककी न्याईं विना प्रयत्नसैं आपही प्राप्त होवै अरु जाका नलाफ्कारसैं प्राप्त भया हेयफल
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२९८ ।। तत्त्वदृष्टिका देशादिअपेक्षारहित देशेपात् ।। ४७९-४८० [ विचारसागरे
सर्वव्यवहारमेंँ प्रवृत्ति दोपदृष्टि हुये भी संभवैहै ।। ४७९ ।। तत्त्वदृष्टिका देशादिअपेक्षा-
इसीतैंँ ज्ञानीके व्यवहारका নিয়मेंँ नहीं ॥ यह पक्ष विदारणयस्लामेंँ विस्तारसैंँ तृत्ति-दीपमेंँ प्रतिपादन कियाहै, यातैंँ तत्त्वदृष्टिका
व्यवहार नियमरहित है । समाधिरूप नियमकी विधि सुनिके तत्त्वदृष्टि हसैंहै ॥ बलीयद्रकेके डामकी न्यायीं मरणांतप्रयत्नसैंँ बी
निवृत्त होवै नहीं, ऐसा जो प्रारब्ध सो तींतरमार रुध है ॥ इसीतैंँ मंद घौ तींनप्रारब्धका फल प्रयत्नके
आाधीन है । तिस प्रयत्नकी हेतु शुभाशुभवासना है । तिस वासनाकी निवृत्ति बी पुरुषार्थसैंँ ( पुरुषके
प्रयत्नसैंँ ) होवैहै ।। तिनमेंँ— १ शुभवासनाकी निवृत्ति कुसत्संगादिक
पुरुषार्थसैंँ होवैहै । घौ— २ अशुभवासनाकी निवृत्ति सत्संग अरु
विवेकज्ञानादिकसैंँ होवैहै जातैंँ ज्ञानी सत्संग अरु विवेकज्ञानादिगुणकरि
संंपन्न है, यातैंँ ताके चित्तमेंँ कोई अशुभप्रवृत्तिकी हेतु अशुभवासना होवै नहीं । किंतु शुभप्रवृत्तिकी
हेतु शुभवासनाधी होवैहै । यातैंँ तिस ज्ञानीकी मंद घौ तींतरमारब्धके निषिद्धफलविसै विधिनिषेधसैंँ जन्म
गुणदोषबुद्धिके अभाव हुये बी शुभवासनारूप स्वभावसैंही प्राप्तवैणवककी न्यायीं बी जाझणादिकके
वालककी न्यायीं प्राप्ति संभवै नहीं । किंतु निवृत्तिही संभवैहै ।। घौ—
रोगीकी अतियारोगनिवृत्तिके दोपानिस्वरूप होते बी जो अपध्यसेवनमेंँ प्रवृत्ति होवैहै, सो प्रयत्नशील
रोगीकी नहीं होवैहै । किंतु जिझालोलैप प्रयत्नरहित रोगीकी अपध्यसेवनमेंँ प्रवृत्ति होवैहै घौ किसी
प्रयत्नशील रोगीकी बी अपध्यसेवनमेंँ प्रवृत्ति होवैहै, सो तींतरमारब्धका फल है ।
इसीतैंँ दोषणिश्रयरूप घौ मिथ्यात्वनिश्रयरूप हढ़विवेकयुक्त ज्ञानीकी मंद घा तींन प्रारब्धके फलभूत
यथेष्टाचरणरूप निषिद्धप्रवृत्ति संभवै नहीं ॥ ।। ४७९-४८० ।।
रहित देखपात ।। ४७९-४८० ।। ।। दोहा ।। भ्रमन करत कछु काल यौं,
तत्त्वहृष्टि सज्ञान ।। जो प्रारब्धका भक्त कहै कि:- प्रारब्धका
फल सर्वथा अनिवार्य है, यातैंँ पुरुपप्रयत्न व्यर्थ है । सो कथन वनै नहीं:-काहेतैं ? जो ऐसे होवै
तौ सर्वज्ञरचित वेदशास्त्र, मंत्रशास्त्र, घौ योगशास्त्र- दृष्टफलके हेतु उपायके बोधक शास्त्र व्यर्थ होवैंहैने घौ
नर्थ कहना बनै नहीं । इस व्यवस्थाके प्रारब्ध घौ पुरुषार्थ दोनूं सफल होवैंहै । यह वासिष्ठभादिक
ईहां कछु आधेक विचार है, सो हम प्रमाद- मुदरमेंँ लिखेंगे । इहां प्रसंगसैंँ दिशामात्र जनाईहै ।।
५०६ ।। इहां यह अभिप्राय है:-स्वाधीन- कार्यविसै नियम होवेंहै । पराधीनकार्यविसै नियम
संभवै नहीं ।। जातैंँ ज्ञानीके शरीरका व्यवहार नानाप्रारब्धके आाधीन है । यातैंँ हाथसैंँ छूटे वान
वेगके आाधीन घौके वेधकी न्यायीं प्रारब्धके आाधीन ज्ञानीके देहके व्यवहारका नियम संभवै नहीं ॥
यद्यपि रागादिवासनाकूं रोकिके स्वाधीनचित्त- वाले कैक ज्ञानी, मंद किंचा तींतरप्रारब्धके फलरूप
शारीक व्यवहारकूं नियममेंही रखतेहैं; तथापि ज्ञानीसैंँ बी वचन नहीं ॥
।। ५०७ ।। ज्ञानीकूं प्रीतिस विना प्रारब्धभोग होवैहै घौ सो प्रारब्ध इच्छा अनिच्छा घौ परेच्छा-
मेदतैंँ तीनिर्मांतिका है । यह अर्थ श्रीविचारण्य- स्वामीने तृतीदीपविसै १४३ सैंँ १६२ मेंँ छेकपर्यंत
लिख्याहै । जाकूंँ जाननेकी इच्छा होवै, सो तहांँ देखलेइ । विस्तारके भयतैंँ इहांँ लिख्या नहीं ॥
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भोगै निजप्रारब्ध तब, लीन भये तिहिं प्रान ॥ १७ ॥
टीका:- १ प्रारब्धभोगतें अनंतर ज्ञानीके प्राण गमन करें नहीं । यातें 'तत्त्वडष्टिके प्राण लीन होते' यह कहा ॥ २ ज्ञानीके शरीरत्यागमें कालविशेपकी अपेक्षा नहीं । उत्तरायणमें अथवा दक्षिणायनमें देहपात होवै । सर्वथा मुक्त है । ३ तैसें देशविशेपकी अपेक्षा नहीं । काशी-आदिक पुनीतदेशमें अथवा अत्यंतमलीन देशमें ज्ञानीका देहपात होवै । सर्वथा मुक्त है ॥ ४ तैसें आसनविशेपकी अपेक्षा नहीं । पृथ्वीमें, सच्चासनतें अथवा सिद्धासनतें देहपात होवै ॥ ५ तैसें सावधान डाक्ष्यंचित्तन करतेंका अथवा रोगग्र्याकुल हाहाहब्द पुकारतेंका देहपात होवै । सर्वथा मुक्त है । कहैंतें ? जिसकालमें ज्ञांतें अज्ञान निवृत्त हुया तिसी कालमें ज्ञानी मुक्त हैं है ॥ यातें ज्ञानीकूं विदेहमोक्षमें देशकालआसन-दिकनकी अपेक्षा नहीं ।
जैसे ज्ञानीकूं देहपातमें देशकालादिकनकी अपेक्षा नहीं, तैसे ज्ञानीके लिंगशरीरमें भी देशकालआसनादिकनकी अपेक्षा नहीं । औ- ॥ ५०८ ॥ इहां यह सांप्रदायिक वचन है:- ॥ श्लोक: ॥ देहे पततु वा कार्य्यां श्वपचस्य गृहेऽपि वा ॥ कालसंप्राप्तिसमये सर्वथा मुक्त पच सः ॥ १ ॥ अस्यार्थ:—ज्ञानीका देह काशीविषे पडो
॥ ४८० ॥ उपासककूं देशकालादिकनकी अपेक्षा है । यद्यपि भीष्मादिक ज्ञानी कहेहैं औ भीष्मनै उत्तरायनविना प्राण त्याग किये नहीं तथापि भीष्मादिक अधिकारी पुरुप हैं, यातें उपासकनके उपदेशवासते तिन्होंनें कालविशेपकी प्रतीक्षा करीहै । औ— वसिष्ठभीष्मादिक अधिकारी हैं, यातेंही उनकूं अनेकजन्म हुयेहैं । कहैंतें ? अधिकारीपुरुपका एककल्पपर्यंत प्रारब्ध होवैहै । कल्पके अंतविना विदेहमोक्ष होवै नहीं औ कल्पके बीतरी तिनकूं इछ्छावलतें नानाशरीर होवैहैं । तथापि आत्मसाक्षात्प्राप्ति तिनकूं जन्ममरणआंति होवै नहीं । यातें जीवनमुक्त हैं ॥ तिन अधिकारी पुरुपनका व्यवहार संपूर्ण अन्यके उपदेशनिमित्त है ॥ औ— अन्यज्ञानीके व्यवाहरमें कोई नियम नहीं । इस अभिप्रायमें तत्त्वडष्टिके देहपातका देशकाल-आसनादिक कुछ कहा नहीं ॥ ॥ ४८१ ॥ अदृष्टिका देशादिकअपेक्षा-सहित देहपात ॥ ॥ दोहा ॥ दूजो सिष्य अहृष्टि तिहि, गंगातट सुभथान । देस इकंत पवित्र अति, कियो ब्रह्मको ध्यान ॥ १८ ॥
अथवा चांडालके गृहविषे पडो । परंतु ज्ञानप्राप्तिके समयमें वंधनभ्रांतिके निवृत्तितें सो ज्ञानी सर्वथा ( सर्वप्रकारसैं ) मुक्तहो है ॥ १ ॥
॥ ५०९ ॥ यह अथ विचारणयस्वामीनेै व्री भूतविवेकके भंतमें लिख्याहै ॥;
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सासुती तजी देहूं, पूर्व कह्यो जु राह । जाय मिल्यो सो ब्रह्मतें, पायो अधिक उछाह ॥ १९ ॥
टीका:-जैसे ज्ञानदीप देशकालकी अपेक्षा नहीं, तैसे विपरीत उपासककूं जाननी । उत्तमदेशमें उत्तमउत्तरायणादिक कालमें उपासक शरीर तजै, तब उपासनाका फल होवै औ—
ज्ञानदीपं मरणसमै सावधानतासैं झेपी स्थिरताकी अपेक्षा नहीं । उपासककूं मरणसमै ध्येयके स्वरूपकी स्मृतिकी अपेक्षा है ।
१ जिस ध्येयका पूर्वै ध्यान कियाहै, ता ध्येयकी स्थिरता मरणसमै होवै, तब उपासनाका फल होवैहै ।
२ जैसैं ध्येयकी स्मृति चाहिये तैसैं ध्येयब्रह्माकी प्राप्तिका जो मार्ग पंचमतरंगमें कह्याहै, ताकी वी स्मृति चाहिये । मार्गोंचितन वी उपासनाका अंग है । औ—
ज्ञाननिमित्त श्रवणमें देशकालआसनकी अपेक्षा नहीं । ध्यानमें उत्तमदेश, निरंतरकाल औ सिद्धादिक आसनकी अपेक्षा है । याते मरणसमै वी योगशास्त्ररीतिसैं देहपात क्याहा ।
( ॥ तर्कदृष्टिकी निश्चय । विद्याके अष्टादशप्रस्थान ४८२-४९१ ॥ )
॥ ४८२ ॥ सर्वशास्त्रकूं ब्रह्मज्ञानकी हेतुता । ॥ दोहा ॥ तर्कदृष्टि पुनि तीसरो, लहि गुरुर्मुखजुपदेस ॥
अष्टादसप्रस्थान जिन, अवगाहन करि वेस ॥ २० ॥ जेति बानी वैखरी, ताको अलं पिछान ॥ हेतु मुक्तिको वान लखि, अद्वयानिश्चय ज्ञान ॥ २१ ॥
टीका:-तर्कदृष्टि नाम तीसरा गुरुद्वारा उपदेशकूं श्रवण करके सुनैअर्थमें अन्यशास्त्रनका विरोध दूरी करनेकूं सर्वशास्त्रनका अभिप्राय विचारिके यह निश्चय कियाः-
१ सकलशास्त्रनका परमप्रयोजन मोक्ष है । २ मोक्षका साधन ज्ञान है । ३ सो ज्ञान अद्वयानिश्चयरूप है । ४ मेदनिश्चयप यथार्थज्ञान नहीं ।
५ सारे शास्त्र साक्षात् अथवा परंपरातें ब्रह्मज्ञानके हेतु हैं ।
यथापि संस्कृतवैखरीवाणीके अष्टादशप्रस्थान हैं । तिनमें—
१ कोई कर्मकूं प्रतिपादन करैहैं । २ कोई विषयसुखके उपायनकूं प्रतिपादन करैहैं ।
३ कोई ब्रह्मभिन्न देवनकी उपासनाकूं वोधन करैहैं ॥
४ तैसे ज्ञाननिमित्त जो न्यायसांख्यआदिक शास्त्र हैं, सो वी मेदज्ञानकूंहीं यथार्थज्ञान कहैहैं ।
यातैं सर्वकूं अद्वैतब्रह्माकी बोधकता वने नहीं ॥
तथापि सकलशास्त्रनके कर्ता सर्वज्ञ हुयेहैं औ ऋषाल हुयेहैं, यातैं तिनके किये मूलशास्त्र- का तौ वेदके अनुसरही अर्थ है । परंतु तिनके न्यायशास्त्रादिकर्ता आंत हुयेहैं । मूलसूत्र-
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करणके अभिप्रायतें विलक्षणअर्थ कियाहै । सो वेदसैं विरुद्ध तीन सूत्रनका अर्थ नहीं । किंतु संबेशास्त्रनका वेदानुसारि अर्थ है । यह तर्कदृष्टिनै उच्चतमसंस्कारतैं निश्चित किया ॥ ॥ ४८३ ॥ विद्याके अष्टादशाप्रस्थान ॥ विद्याके अष्टादशाप्रस्थान ये हैं:- चारिवेद, चारिउपवेद, षट् वेदके अंग, पुराण, न्याय, मीमांसा औ धर्मशास्त्र । इसरीतिसैं वैखरीवाणीरूप विद्याके आठारह भेद हैं । तिन्हदूं प्रस्थान कहैहैं ॥ ॥४८४॥ चारिवेदका ब्रह्मज्ञानमैं तत्पर्ये ॥ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद औ अथर्ववेद, ये चारिवेद हैं । तिनमैं— १ कितने वचन झेयब्रह्मकूं बोधन करैहैं । २ कितने द्रेयकूं शोषन करैहैं । औ— ३ वाकी कर्मकूं बोधन करैहैं । जो कर्मके बोधक वेदवचन हैं, तिनका वी अंत:- करणसुद्धिद्वारा ज्ञानही प्रयोजन है ॥ औ— प्रधृत्तिमैं किसी वेदवचनका अभिप्राय नहीं । किंतु निपिद्धस्वाभाविक प्रवृत्तिसैं रोकनमै ॥ ॥ ५१० ॥ विद्याके संगकूं प्रस्थान कहैहैं ॥ विद्याके आध्यात्मप्रस्थान प्रथमाराणके शास्त्रमैं हैं तथा मधुसूदनसरस्वतीकृत प्रस्थानभेदमैं लिखेहैं । ॥ ५११ ॥ गर नाम जहर, तिसका दान कहिये देना, सो गरदान कहिये । तिसतैं आदिलेकै ॥ ॥ ५१२ ॥ जैसैं— १ " पर्णींत मार्योका संग करना " औ— २ " ऋतुमती भार्योका संग करना " औ— ३ " हुतशेष ( होमकारिके अवशेष रहे मांस)का भक्षण करना " औ— ४ " सूत्रामणियागविधै दुरापान करना " इत्यादि वेदके विधिवचनका जैसैं अन्य (राग) तैं प्राप्त सर्वच्रीका संग किया सर्वदा पर्णीत स्त्रीका संग किया मांसमचकी सेवा, तिनविषै प्रधृत्ति करावैमैं
अभिप्राय है । यातैं अभिचारादिकर्मेका प्रतिपादक जो अथर्ववेद है, ताका वी निपिद्धचिमैं तत्पर्ये है ॥ जो द्रेपतैं शत्रुमारणमैं प्रदत्त होवै तौ गरदानसैं अथवा अभिदाहसैं शत्रुं नहीं मारै । इसवास्तै अभिचारकर्म श्येनयागादिक कहियेहैं। शत्रुमारणके निमित्त जो कर्म सो अभिचार कहियेहैं ॥ ऐसा श्येन नाम यहै है ॥ श्येनयागका बोधक जो वेदवचन है ताका यह अर्थ नहीं:-शत्रुमारणकामनावाला जाकूं कामना होवै, सो श्येनयागतैं मित्र जो गरदानादिक शत्रुमारणके उपाय हैं, तिनमैं प्रधत्त होवै नहीं ! इसरीतिसैं द्रेपतैं प्राप्त जो वचनका अभिप्राय है । प्रधृत्तिमैं नहीं । कहैंतैं ? प्रधृत्ति द्रेपतैं प्राप्त है । जो अन्यतैं प्राप्त होवै तौ वाक्यका अभिप्राय होवै नहीं ॥ इसरीतिसैं सारे अथर्ववेदका निपिद्धचिमैं तत्पर्ये है । और तिनिवेदनमैं कर्मबोधकवाक्य- नका अंत:करणसुद्धिद्वारा ज्ञानमैं उपयोग स्पष्ट है ॥ तैसैं— अभिप्राय नहीं । किंतु तीनविधै स्वाभाविक जो प्रवृत्त है तिसके संकोचद्वारा निपिद्धचिमैं अभिप्राय है, यातैं वे वेदवाक्य परिसंख्याविधिरूप हैं । नियमविधिरूप किंवा अपूर्वविधिरूप नहीं ॥ तैसैं श्येनयागबोधक अथर्ववेदके वचनका वी अन्यतैं (द्रेपतैं) प्राप्त शत्रुमारणविषै प्रधृत्तिमैं अभिप्राय नहीं । किंतु तिस स्वाभाविक प्रवृत्तिके रोकनैद्वारा तिन गरदानादिकनतैं निपिद्धचिमैं अभिप्राय है । यातैं यह श्येनयागबोधक वचन वी परिसंख्या- विधिरूप है ॥ अन्यतैं प्राप्तसंबधंका तिसके संकोचके निमित्त बोधक जो वेदवचन सो परिसंख्यारूप कहिये । इन विधिवचनोंका सर्विस्सर वर्णन वेदांतपदार्थ- मंजूषाविषै कियाहै॥
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॥ ४८५ ॥ चारिउपवेदका ब्रह्मज्ञानमें
तात्पर्ये ॥
चारि उपवेद हैं:-आयुवेंद, धनुवेंद, गांंधर्ववेंद औ अथर्ववेंद । तिनमें—
१ आयुवेंदके कर्त्ता ब्रह्मा, प्रजापति, अश्विनीकुमार, धन्वंतरी आदिक हैं । चरक वारभट्टादिकृत चिकित्साशास्त्र आयुवेंद है औ वात्स्यायनकृत कामशास्त्र वी आयुवेंदके अंतर्भूत है । कहैंतें ? कामशास्त्रका विपय वाजीकरण-संभोगादिक वी चरकादिकनै कथन कियेहैं ।
तिस आयुवेंदका वैराग्यमेंहीं अभिप्राय है । कहैंतें ? आयुवेंदकी रीतिसैं रोगादिकनकी निद्धिति हुयेैं वी फेरी रोगादिक उत्पन्न होवैहैं, यातैं लौकिकउपाय तुच्छ हैं, इसअर्थमें आयुवेंदका अभिप्राय है । औ औपध-दानादिकनतैं पुण्य होयके अंतःकरणकी शुद्धिद्वारा वी ज्ञानमें उपयोग है ॥
तैंसैं—
२ विश्वामित्रकृत धनुवेंदमें आयुध निलुपण कियेहैं । आसुध चारिप्रकारके हैं:- (१) मुक्त, (२) अमुक्त, (३) मुक्तामुक्त, औ (४) यंत्रमुक्त ।
(१) चक्रादिक हाथरैं फैंकिये, सो मुक्त कहियेहै ॥
(२) खड्गादिक अमुक्त कहियेहै ।
(३) बरछीआदिक मुक्तामुक्त कहियेहै ।
(४) सरगोलीआदिक यंत्रमुक्त कहियेहै ।
इसरीतिसैं चारिप्रकारके आयुध हैं । तिनमें—
(१) मुक्तआयुधकूं अमित्र कहैहैं ॥
(२) अमुक्तकूं शस्त्र कहैहैं ॥
इन चारिप्रकारके आयुधनकूं ब्रह्मा, विष्णु, पचुपति, प्रजापति, अभि, वरुण आदिकदेवता
मंत्र कहैहैं । क्षत्रिय कुमार अधिकारी कहैहैं औ तिनके अनुसारि ब्रह्मादिक वी अधिकारी कहैहैं । तिनके चारिभेद कहैहैं:-१ पदाति, २ रथाल्ड, ३ अश्वारूढ, औ ४ गजारूढ । और युदमें सकुन मंगल कहैहैं ॥
(१) इतना अर्थ धनुवेंदके प्रथमपादमें कहाहै । औ—
(२) आचार्यक लक्षण तथा आचार्यतैं शस्त्रोंके ग्रहणकी रीति, धनुवेंदके द्वितीयपादमें कहीहै । औ—
(३) गुरुसंपद्रायैं प्राप हुये शस्त्रोंका अभ्यास तथा मन्त्रसिद्धि-देवतासिद्धि प्रकार तृतीयपादमें कहाहै ।
(४) सिद्ध हुये मन्त्रनका प्रयोग चतुर्थ-पादमें कहाहै ।
इतना अर्थ धनुवेंद है । सो ब्रह्मादिप्रजापत-आदिकनैं विश्वामित्रकूं प्राप हुबाहै । तानैं प्रकट कियाहै और विश्वामित्रतैं धनुवेंद उत्पन्न नहीं हुवा ॥
दृष्टचौरादिकनैं प्रजापालन क्षत्रियका धर्मवीओषक धनुवेंद है । यातैं ताका वी अंतःकरणशुद्धि, करिके ज्ञानद्वारा मोक्षमेंहीं अभिप्राय है ॥
तैंसैं—
३ गांंधर्ववेंद भरतनैं प्रगट कियाहै । तामैं स्वर, ताल, मूर्छनासहित गीत, नृत्य, औ देवता-नायिकानिरूपण विस्तारसैं कियाहै । देवता-का आराधन, निर्विकल्पसमाधिकी सिद्धि गांंधर्ववेंदका प्रयोजन कहाहै । यातैं ताका वी अंतःकरणकी एकाग्रताकरिके ज्ञानद्वारा मोक्षही प्रयोजन है ॥
तैंसैं—
४ अर्थवेंद वी नानाप्रकारका है:-नीति-शास्त्र, अक्षशास्त्र, शिल्पशास्त्र, दुपकार-शास्त्रसैं आदिलेके धनप्राप्तिके उपायबोधकशास्त्र
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अर्थवेदैः कहियेहैं । धनप्राप्तिके सकलउपायन्हैं उपयोगी नहींं । औ पाणिनिकृततव्याकरण निपुणपुरुपहैँ वी भाग्यविना वी धनकी प्राप्ति होवै नहींं । यातैं अर्थवेदक वी वैराज्यमेंही तत्पर्यै है । तैसैं—
॥ ४८६ ॥ चारिवेदनके पड्अंगनका अर्थसहित प्रयोजन ॥
अर्थसहित अर्थज्ञान ॥ चारिवेदनके पड्अंग ये हैं:-१ शिक्षा, २ कल्प, ३ व्याकरण, ४ निरुक्त, ५ ज्योतिप, औ ६ पिंगल । ये छै वेदके उपयोगी होनतैं वेदके अंग कहियेहैं । तिनमें—
१ शिक्षाका कर्त्ता पाणिनि हैँ । वेदके शब्दन्हैं अक्षरके स्थानका ज्ञान औ उदात्त, अनुदात्त, और स्वरितकै ज्ञान शिक्षातैं होवैहैं । वेदनके व्याख्यानरूप जो अनेकप्रतिशाखा नाम ग्रंथ हैं सो वी शिक्षाके अंतरभूत हैं । तैसैं—
२ वेदविहित कर्मके अनुष्ठानकी रीति कल्पसूत्रनतैं जानीजावैहै । यज्ञ करावनैवाले; ब्राह्मण ऋत्विक् कहियेहैं । तिनके मित्र- करनैयोग्य जो कर्म, तिनके प्रकारके बोधक कल्पसूत्र हैं । तिन कल्पसूत्रके कर्त्ता कात्यायनआश्वलायनादिमुनि हैं । यातैं कल्पसूत्र वी वेदके उपयोगी होनतैं वेदके अंग हैं । तैसैं—
३ व्याकरणतैं वेदके शब्दनका शुद्धताका ज्ञान होवैहैं । सो व्याकरणसूत्ररूप अष्टाध्याय पाणिनिनाम मुनिनैं कियाहै । कात्यायनं औ पतंजलिनैं तिन सूत्रनके व्याख्यान औ भाष्य कियेहैं और जो व्याकरण हैं । तिनमें वेदके शब्दनका विचार नहींं । यातैं पुराणादिकनमें उपयोगी तो हैं, परंतु वेदके
॥ ५१३ ॥ याहीकूँ स्थापयवेद वी कहैंहैं ॥ ॥ ५१४ ॥ उदधस्रर उदात्त कहियेहै ॥ ॥ ५१५ ॥ नीचस्वर अनुदात्त कहियेहै ॥
४ यास्कनामा मुनिनैं त्रयोदशअध्यायरूप निरुक्त कियाहै । तहां वेदके मंत्रन्हैं अप्रसिद्ध पदनके अर्थबोधके निमित्त नाम निरूपण कियेहैं । यातैं वैदिक अप्रसिद्धपदनके अर्थज्ञानमें उपयोगी होनतैं निरुक्त वी वेदका अंग है । संज्ञाका बोधक; जो पंचाध्यायसूप निघंडू नाम ग्रंथ यास्कनैं कियाहै सो वी निस्कके अंतरभूत हैँ ॥ और अमरसिंह हैमादिकनैं किये जो संज्ञाके बोधक कोप हैं सो सारे निरुक्तके अंतरभूत
५ आदित्यगणादिकृत ज्योतिष वी वेदका अंग है । कहाहैं? वैदिककर्मके आरंभमें कालका ज्ञान चाहिये । सो कालज्ञान ज्योतिपतैं होवैहै । यातैं वेदका अंग हैँ ॥—
६ पिंगलमुनिनैं सूत्र अष्टअध्यायतैं छंद निरूपण कियेहैं,तिनतैं वैदिकछंदयत्रीआदिकछंद- नका ज्ञान होवैहै, यातैं पिंगलकृतसूत्र वी वेदके अंग हैं ॥ तैसैं—
यह पद जो वेदके अंग हैं तिनमें वेदके उपयोगी जो अर्थ नहींं, ताका प्रसंगतैं निरू- पण कियाहै । प्रधानतासैं नहींं । यातैं वेदका जो प्रयोजन है सोई पड्अंगनका प्रयोजन है । पृथक् नहींं ॥
॥ ५१७ ॥ अष्टादशपुराण तथा उप- पुराणका अर्थ ॥
पुराण अष्टादश हैं । यास्कनामा मुनिनैं कियेहैं । तिनके ये नाम हैं:-१ ब्रह्म । २ पद्म ।
॥ ५१६ ॥ समानस्वरकका ज्ञान स्वरितका ज्ञान कहियेहै ।
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३ वैष्णव। ४ शैव। ५ भागवत। ६ नारदीय। ७ मार्कंडेय। ८ आग्नेय। ९ भविष्य। १० मननद्वारा वेदांतजन्य ज्ञानही फल है ॥ ओं-
रक्षवैवर्त। ११ लैंग। १२ वाराह। १३ स्कंद। १४ वामन। १५ कौर्म। १६ मात्स्य। १७ गाणरुड औ १८ ब्रह्मांड। ये अष्टादशपुराण व्यासनै किये॥॥ तैंसें—
कर्णादनां मुनिनै दशअध्यायरूप वैशेषिकसूत्र कियेहैं। तिनका वी न्यायमें अंतरभाव होवैहै। यातैं युक्तिप्रधान न्योंयसूत्रनका वी
फल है ॥ ४८/९ ॥धर्ममीमांसां औ ब्रह्ममीमांसां भेदतैं दो मीमांसा औ संकरषणकांडका
फल ॥ मीमांसाके दो भेद हैं:- ९एक धर्ममीमांसां। औ २ दूसरी ब्रह्ममीमांसा ॥ ९ धर्ममीमांसाकूं पूर्वमीमांसा कहेहैं। २ ब्रह्ममीमांसाकूं उत्तरमीमांसा कहेहैं॥
९ धर्ममीमांसाके द्वादशअध्याय हैं। जैमिनीनाम ताका कर्त्ता है। कर्मअनुष्ठानकी रीति तैंहैं प्रतिपादन करीहै। यातैं विधिसैं कर्ममें
प्रवृत्ति है ॥ धर्ममीमांसाका फल है। कर्ममें प्रवृत्तिसैं अंतःकरणशुद्धि, तैंसैं ज्ञान औ ज्ञाने मोक्ष,
इसीतैं धर्ममीमांसाका मोक्षफल है। औ धर्ममीमांसाके द्वादशअध्यायनमें आपसमैं अर्थेका
मेद है, सो कठिन है। यातैं लिख्या नहीं ॥ औ संकरषणकांड पंचअध्यायरूप जैमिनिनै कियाहै। ताकेविपै उपासना कहिहै। ताका वी धर्ममी-
मांसाके विपै अंतरभाव है ॥ तैंसें— २ ब्रह्ममीमांसाके चारिअध्याय हैं। ताका कर्त्ता व्यास है। एकएक अध्यायके चारिचारी-
पाद हैं ॥ तदहैं— मद्दाचार्यनै वी अपने ग्रंथमैं लिख्याहै। यातैं इनका उत्तफल सेंमवैहै ॥
॥ ५९७ ॥ यह वार्त्ता आगे ५९० सें ५९७ सें प्रतिपादन करेंगें। धर्मशास्त्रमैं कर्मकांडका अर्थ है औ पुराणनमें उपनिषद्रूप ज्ञानकांडका अर्थ
है। यह सूत्रसंहिताके न्यास्वानमें श्रीविचारण्यस्वामीनें लिख्या है ॥
॥ ५९८॥ न्यायसूत्रनका मननद्वारा वेदांत-जन्यज्ञानही फल है। यह भत्ये म्यायपारंगतदशिरोमणि
पंचअध्यायरूप न्यायसूत्र गौतमनै कियेहैं। तिनमें युक्ति प्रधान है ॥ युक्तिंचिंतनतैं पुरुपकी तीव्रबुद्धि होवैहै, तब मनन करनैपै समर्थ
॥ ५९९ ॥ जिसविपै धर्मकी मीमांसा ( विचार ) है, सो धर्ममीमांसा कहियेहैं ॥
॥ ५२० ॥ जिसविपै ब्रह्मकी मीमांसा ( विचार ) है, सो ब्रह्ममीमांसा कहियेहै ॥
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७ प्रथमअध्यायमें यह अर्थ है:-सारे-उपनिपदशास्त्रों ब्रह्मकूं प्रतिपादन करैंहैं । अन्यकूं नहीं ।
२ उपनिपदवाक्यनकां मतभेद पुरुषपक्ष आपसमें विरोध प्रतीत होवैहै, ताका परिहार द्वितीयअध्यायमें कह्याहै ।
३ ज्ञान तथा उपासनाके साधनका विचार तृतीयअध्यायमें कह्याहै । और-
४ ज्ञानउपासनाका फल चतुर्थेअध्यायमें कह्याहै ।
यह ब्रह्ममीमांसारूप शारीरकशास्त्रही सर्व-शास्त्रनमें प्रधान है । श्रुतिस्मृतिकूं यही उपदेश है ताके वेदार्थ्यानरूप ग्रंथ घ्याचपि नाना तथापि श्रीशंकरकृतभाष्यरूप व्याख्यानही श्रुतिस्मृतिकूं श्रोतव्य है । ताका ज्ञानद्वारा मोक्षफल स्पष्टैहै । तैसे-
॥ ४९० ॥ स्मृति आदिक ग्रंथनके कर्त्ता औ प्रयोजन
मनु, याज्ञवल्क्य, विष्णु, यम, अंगिरा, वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त्त, शातातप, पराशर, गौतम, शंख, लिखित, हारीत, आपस्तंब, शुक्र, बृहस्पति, ग्यपास, कात्यायन, देवल, नारद इत्यादिक सर्वज्ञ हुवैहैं । तिनौनैं वेदके अनुसार स्मृतिनामाग्रंथ कियैहैं । सो धर्मशास्त्र कहियेहैं । तिनमें वर्णाश्रमके कायिक वाचिक मानसिक धर्म कहैहैं । तिनका वी अंतःकरण-
॥ ५२९ ॥ शंकराचार्यक्तभाष्य, रामानुज-भाष्य, मध्वभाष्य, भास्कराचार्यक्तभाष्य, विष्णु-स्वामीकृतभाष्य, विज्ञानेंद्रभिक्षुकृतभाष्य, नीलकंठ-भाष्य, इत्यादिभाष्यरूप व्याख्यान ।
॥ ५२२ ॥ इहां भाष्यशब्दकरि श्रीशंकराचार्यके शिष्यप्रशिष्यनके किये तिस भाष्यके व्याख्यानोंका वि. सा. ३५
शुद्धद्वारा ज्ञान होयकै मोक्षही प्रयोजन है । तैसें-न्यासनै महाभारत औ वाल्मिकिनैं रामायण कियाहै, तिनका वी धर्मेशास्त्रमें अंतरभौव है, औ-
देवताआराधनके निमित्त जो मंत्रशास्त्र हैं, ताका वी धर्मशास्त्रमें अंतरभौव है । देवताआराधनका अंतःकरणशुद्धि प्रयोजन है । तैसें-सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र, वैष्णवतंत्र, शैव-तंत्रादिक वी धर्मशास्त्रके अंतरभूत हैं । कहैंतें ? इनमें वी मानससंघर्मका निरूपण है । तहां-
॥ ४९१ ॥ सांख्यशास्त्रका फल ॥ सांख्यशास्त्रका पडअध्यायरूप कपिलनै कियाहै । ताकें-
१ प्रथमअध्यायमें विषय निरूपण कियेहैं । २ द्वितीयअध्यायमें महत्तत्वअहंकादिक प्रधानके कार्ये कहैहैं ।
३ तृतीयअध्यायमें विपयतैं वैराग्य कह्याहै । ४ चौथे अध्यायमें विरक्तोंकी आरव्यायिका कहीहै ।
५ पंचमै अध्यायमें परपक्षका खंडन कह्याहै । ६ छटे अध्यायमें सारे अर्थका संक्षेपतैं संग्रह कियाहै ।
प्रकृतिपुरुषपकें विवेकतैं पुरुषका असंगज्ञान सांख्यशास्त्रका प्रयोजन है । ताका वी तत्त्वपदकें लक्ष्यअर्थशोधनद्वारा महावाक्यजन्य-ज्ञानमें उपयोग होवैहैं मोक्षही फल है । तैसे-
वे भाष्यके व्याख्यमान अनेक हैं । तिनके नाममात्रका कीर्तन हमनैं पंचदशीगीत तृसिदीपकें १०२ वें श्लोकके टिप्पणभाष्ये कियाहै । तहां देखलेना ।
॥ ५२३ ॥ उपासनारूप धर्म ॥
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॥ ४९२ ॥ योगशास्त्रका फल औ शरीरक उत्तियाँ अविरोध ॥
योगशास्त्र चारिपादरूप है । पतंजलि ताका कर्त्ता है, सो पतंजलि ऋषिका अवतार है । एकऋषि संध्याउपासन करेथा, ताकी अंजलिमें प्रकट होयके पृथिवीमें पड़्याहै । यातैं पतंजलि नाम कहीयेहै ॥ तानै—
१ शरीरका रोगलुप्ती मल दूरी करनैं वास्ते चिकित्साग्रंथ कियाहै ॥ औ—
२ अगुद्रशब्दका उच्चारणरूपी जो वाणीका मल है, ताके नाशकूं पाणिनीयकरणका भाष्य कियाहै ॥ तैसैं—
३ विश्वपरूप अंतःकरणका मल है, ताके नाशकूं योगसूत्र कियेहैं ॥ तहां—
१ प्रथमपादमें चित्तवृत्तिका निरोधरूप समाधि औ ताके साधन अभ्यासवैराग्यादिक कहेहैं ॥ तैसैं—
२ विश्वसिद्धिकूं समाधिके साधन, यम, नियम, आसन, प्राणयाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, औ समाधि, ये आठ समाधिके अंग द्वितीयपादमें कहेहैं ॥
३ तृतीयपादमें योगकी विभूति कहीहै ॥
४ चतुर्थपादमें योगका फल मोक्ष, कह्याहै ॥
इसीतैं योगशास्त्र की ज्ञानसाधन निदिध्यासनकूं संपादनद्वारा मोक्षका हेतु है ॥ औ-
शरीरक मत्रमें जो सांख्ययोगका खंडन कियाहै, सो तिनके व्यास्यान जो उपनिपदनसै विरुद्ध कियेहैं, तिनका खंडन कियाहै ॥ तैसैं—
॥ ४९३ ॥ पांचरात्र औ पाशुपततंत्रादिकका फल ॥
न्यायवैशेषिक्का खंडन वी विरुद्धनयात्मक्यान-
का है ॥
तैंसैं नारदनै पंचरात्रनाम तंत्र कियाहै । तामैं वासुदेवमें अंतःकरण स्थापन कव्याहै, ताकी श्री अंतःकरणकी स्थिरतासैं ज्ञानद्वारा मोक्षही फल है ॥ सारे वैष्णवग्रंथ पंचरात्रके अंतरभूत हैं ॥ सो पंचरात्र धर्मशास्त्रके अंतरभूत है ॥
तैसैं पाशुपततंत्रमें पशुपतिका आराधन कहीहै । ताकी अंतःकरणकी निश्वलताद्वारा मोक्षसाधन ज्ञान फल है ॥
॥ ४९४ ॥ शैवग्रंथादिकनका फल औ वाममार्गे ॥
जो शैवग्रंथ हैं, सो सारे पाशुपततंत्रके अंतरभूत हैं ॥
तैसैं गणेश, सूर्य, देवीकी उपासनावोधक ग्रंथनका चित्तकी निश्वलताद्वारा ज्ञान फल है । औ सैका धर्मशास्त्रमें अंतरभूत हैं । परंतु—
देवीकी उपासनाके बोधक ग्रंथनमें दो-
संप्रदाय हैं;-एक दक्षिणसंप्रदाय औ दूसरी उत्तर-
संप्रदायहूं वाममार्ग कहेहैं॥
तिनमें—
१ दक्षिणसंप्रदायककी रीतिसैं जिन: ग्रंथनमें देवीकी उपासना है, सो तौ धर्मशास्त्रके अंतरभूत, है ॥ औ—
२ वाममार्गे जिन ग्रंथनमें है, सो धर्मशास्त्रसैं
विरुद्ध है, यातैं अप्रमाण है ॥
घृण्यौपि वामतंत्र शिवने कियाहै तथापि
सकलशास्त्र औ वेदसैं विरुद्ध है, यातैं
प्रमाण नहीं ॥
जैसैं विष्णुके बुद्धअवतारनै नास्तिकग्रंथ
कियेहैं सो वेदविरुद्ध हैं ॥ यातैं प्रमाण नहीं॥
तैसैं शिवकृत वामतंत्र श्री अत्यंतविरुद्ध है ॥
लिख्याहै । औ उत्तमपदार्थके जो नाम हैं,
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सोई मलिन पदार्थके नाम लोकवंचनके निमित्त कहेंहैं । मदिराका नाम तीर्थै । मांषका नाम शुद्ध । मदिरापात्रका नाम पात्रै । प्याजकै नाम न्यास । लशुनका नाम शुकदेव । मदिराकारी कलालका नाम दीक्षित कहैंहैं ॥ तैसैं वेदै्यासेवी चर्मकारौ आदिक चांडालीसेवीकै प्रागसेवी काशीसेवी कहैंहैं ॥ ओ भैरवचक्रमें स्थित जो चांडालादिक हैं, तिनकूं श्राघण कहैंहैं औ अत्यंत ब्यभिचारिणीकूं योगिनी औ ब्यभिचारीकूं योगी कहैंहैं । ऐसैं अनेकप्रकारसैं निपिद्ध तिनका ब्यवहार हैँ । पूजनमें समै अनेकदोपवती स्त्रीकूं उत्तमशक्ति कहैंहैं । जातिकी चांडाली अत्यभिचारिणी रजस्वलाहीकूं देवीबुद्धिसैं पूजन करेंहैं , ताकी उच्चिष्ठमदिरा पान करेंहैं औ अधिकमदिरापानसैं जो वमन करिदेईं , ताकूं पृथ्वीसैं नह्हां गिरतैं देवैंहैं । किंतु आचार्यसहित दूसरै सावधान भक्षण करेंहैं । वमनकूं भैरवचि कहैंहैं ॥ ओ
जिन्हा लगायकै मंचनका जप करेंहैं १ मदिरा, २ मांस, ३ मत्त्स, ४ मुद्रा, औ ५ मंत्र, इन पांच मकारकूं भोगमोक्षनिमित्त सेवन करेंहैं ॥ प्रथमदितीयादिक तिन मकारनके अश्रसिद्ध नामनतैं ब्यवहार करेंहैं । इसतैं आदिलेकै वामतंत्रका सकलव्यवहार इसलोकतैं औ परलोकतैं भ्रष्ट करैहैं । इसी कारणतैं करणैछेदै योगी औ अवधूतगुसाईं तैसैं अनैसन्यासी औ द्वैताद्वैत वाममार्गीहू सेवन करेंहैं तौ ही वौ लोकवेदनिंदित जानिके गुप्त राखैहैं ॥ अधिक कया कहैं ? वामतंत्रकी रीति सुनिके शुचेःम्लेच्छके वी रोमांच होय जावैं । ऐसैं निंदित वामतंत्र है ॥ सर्वैभी जो अभिषांण करेंहैं, सो
॥ ५२४ ॥ पझांडुकै काहिये कंदका ॥ ॥ ५२५ ॥ वेश्याका सेवन करैवाला ॥
सारे निंदितमार्गे वामतंत्रमें कहैंहैं । अतिनीच ब्यवहार लिखनैं योग्य नहीं । यातैं विशेषप्रकार लिख्या नाहीं । सर्वथा वामतंत्र त्यागनैं योग्य हैँ ॥ तैसैं— ॥ ५२६ ॥ ॥ नास्तिकमत ॥
नास्तिकमत त्यागनैं योग्य है । नास्तिकनके पद्मेद हैं:—१माध्यमिक, २ योगाचार, ३ सौत्रांतिक, ४ वैभापिक, ५ चार्वाक औ ६ दिगंबर । ये छहह वेदकूं प्रमाण नहीं मानहैं । तिनका आपसमैं विलक्षणसिद्धांत है ॥ ९ माध्यमिक शून्यवादी हैं । २ योगाचारके मतमें सारै पदार्थ विज्ञानसैं भिन्न नहीं । विज्ञप्ति मात्र है । सो विज्ञान क्षणिक है । ३ सौत्रांतिकमतमें विज्ञानकै आकार चाह्यपदार्थ विपयविना होवै नहीं । यातैं विज्ञानतैं बाह्यपदार्थका अनुमान होवैहै । इसरीतिसैं सौत्रांतिकमतमें अनुमानप्रमाणके विपय बाह्यपदार्थ हैं । प्रत्यक्ष नहीं । और स्थिर नहीं । किंतु सारै पदार्थ क्षणिक हैँ ॥ औ— ४ वैभापिकमतमें बाह्यपदार्थ क्षणिक तौ हैं, परंतु प्रत्यक्षप्रमाणके विपय हैं । इतना भेद है ॥ ५ चार्वाकमतमें पदार्थै क्षणिक नहीं । परंतु तिसकै मतमें देहू आत्मा है ॥ औ— ६ दिगंबरमतमें देह आत्मा नहीं । देहसैं परिमाण होवै, 'उतना आत्माका परिमाण है ॥ इसरीतिसैं इनका आपसमैं मतका भेद है । और भी इनकी आपसमैं मतकी विलक्षणता बहुत है । परंतु सारै वेदके विरोधी हैं । यातैं
॥ ५२६ ॥ चांडालीकै सेवन करैवाला ॥
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नास्तिक हैं। इसकारणतैं तिनके मतका उपपादन औ खंडन विशेषकरिके लिख्या नाहीं। इसरीतिसैं-
॥ ४९६ ॥ साहित्यआदिकके तात्पर्यपूर्वक तर्कदृष्टिका संग्रहोही निश्चय ॥
वाममार्ग औ नास्तिक मतनके ग्रंथ यद्यपि संस्कृतवाणीरूप हैं, तथापि वेदवाक्य हैं। यातैं वेदके अनुसारी विचारके प्रसंगान अशुद्धिही है॥
और सम्मटआदिकनै जो सांहित्यग्रंथ कियेहैं तिनका वी कामशास्त्रमैं अंतरभाव है। तैसैं सकलकाव्यनका वी किसीकौं कामशास्त्रमैं अंतरभाव है। औ किसीकौं धर्मशास्त्रमैं अंतरभाव है॥
इसरीतितैं आगमशास्त्रके अभिप्राय सो ब्रह्मज्ञानद्वारा मोक्षके हेतु हैं। कोई साक्षात्ज्ञानका हेतु है। कोई परंपरातैं ज्ञानका हेतु है। यह तर्कदृष्टिनैं सकलशास्त्रनका अभिप्राय निश्चय किया॥
यद्यपि उत्तरमीमांसाविना सारे शास्त्र जिज्ञासुद्रू हेय हैं। यह शारीरकमें सूत्रकारभाष्यकारनै प्रतिपादन कियाहै। यातैं अन्यशास्त्र वी मोक्षके उपयोगी हैं। यह कहना संभवें नाहीं। तथापि सारग्राहीदृष्टिसैं तर्कदृष्टिनैं यह सार निश्चय किया॥
॥ ४९७ ॥ तर्कदृष्टिका एकविद्यानसैं मिलाप ॥
॥ दोहा ॥ सुनि भसिद्ध विद्वान पुनि, मिल्यो आप तिहि जाय ॥ निश्चय अपनो ताहि तिहि, दीनो सकल सुनाय ॥ २२ ॥
टीका:-गुरुद्वारा सुने अर्थमें बुद्धिकी स्थिरताके निमित्त सकलशास्त्रनका अभिप्राय विचारन्या, तैं वी फेरि संदेह हुवा:-जो शास्त्रनका अभिप्राय में निश्चय किया सोई है अथवा अन्य अभिप्राय है? कहैंतैं? तर्कदृष्टि करिएअधिकारी कहाहै। यातैं वारंवार उक्तर्थकै संदेह होवैहै। ताकी निश्चयतिवास्ते अन्यविद्वानके निश्चयतैं अपने निश्चयकी एकता करनेकूं गया॥
॥ दोहा ॥ तर्कदृष्टिकै चैन सुनि, सो वोल्यो बुधसंत ॥ जो मोसौं तैं यह कह्यो, सोई मुख्यासिद्धांत ॥ २३ ॥
॥ ५२७ ॥ भालंकारके ग्रंथ ॥
॥ ५२८ ॥ नायकाभेद चौ रसभेदआदिक सर्थके प्रतिपादक काव्यग्रंथका ॥
॥ ५२९ ॥ भगवत्चरित्रके प्रतिपादक काव्यग्रंथका ॥
॥ श्लोक: ॥ भक्तिभाग्ने यत्र विशेषोक्त वेदाः परा प्रमा ॥ मतानि तानि सर्वाणि जीवोद्धारस्य हेतवः ॥ १॥
भक्तिभाग्ने यत्र विशेषोक्त वेदाः परा प्रमा। मतानि तानि सर्वाणि जीवोद्धारस्य हेतवः ॥ १ ॥ अर्थ:- जिन मतोंविषै ( न्यायपरमात्माके ) भक्ति किवा ज्ञान हैं, फिर जिन मतोंविषै चारिवेद परमप्रमाण हैं, वे सर्वमत साक्षात किवा परंपरातैं जीवके उद्धारके हेतु हैं ॥ १ ॥
॥ ५३० ॥ इहाँ किसी सारग्राही दृढिवाले पंडितका वचन है:-
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॥ ज्ञानीकूं इच्छाका संभव औ इच्छाके अभावका अभिप्राय ॥
संशाय सकल नसाय यूं, लख्यो ब्रह्म अपरोछ । जग जान्यो जिन सब असत, तैंसों बंध रु मोछ ॥ २४ ॥
॥ ४९८ ॥ ज्ञानीकूं इच्छाका संभव औ इच्छाके अभावका अभिप्राय ॥
सेष रह्यो प्रारब्ध यूं, इच्छा उपजी येह ॥ चलि तत्कालहि देखिये , जननिजनक जुति गेह ॥ २५ ॥
टीका:-"ज्ञानीका सकलच्यवहार अज्ञानी- की न्याईं प्रारब्धसैं होवैहै," यह पूर्व कह्यो है । यातैं इच्छा संभवे है । औ कहूं शाखमै ऐसा लिस्याहै:-"ज्ञानीकूं इच्छा होवै नहीं ।" ताका यह अभिप्राय नहीं:-"ज्ञानीका अंतःकरण पदार्थकी इच्छारूप परिणमैहू प्राप्त होवै नहीं ।" कहैंत ? अंतःकरणके इच्छादिक सहजधर्म हैं औ- अंतःकरण यद्यपि भूतनतें सत्वगुणका कार्य कह्याहै तथापि रजोगुणतमोगुणसहित सत्वगुणका कार्य है ! केवलसत्वगुणका केवलसत्वगुणका कार्य होवै तो चेतनभाव अंतःकरणका नहीं हुयाचाहिये । तैंसैं राजसी- वृति कामक्रोधादिक औ मूढतादिक तमसावृत्तिकै किसी अंतःकरणकी नहीं हुइचाहिये । यातैं केवलसत्वगुणका अंतःकरण कार्ये नहीं । किंतु अप्रधानरजोगुणतमोगुणसहित प्रधानसत्वगुण- वाले भूतनतैं अंतःकरण उपजैहैं, यातैं अंतःकरणमैं तीनूं गुण रहैंहैं । सो तीनूं गुण बी पुरुषपनके जितनैं अंतःकरण हैं तिनमैं सम नहीं ।
किंतु न्यूनअधिक हैं । यातैं गुणोंकी न्यूनता- अधिकतासैं सर्वके विलक्षणस्वभाव हैं । इस- रीतिसैं तीनूंगुणोंका कार्य अंतःकरण है ॥ जितनैं अंतःकरण रहै उतनैं रजोगुणका परिणांस्वरूप इच्छाका अभाव चनै नहीं । यातैं ज्ञानीकूं इच्छा होवै नहो । तोहू यह औभिप्राय है:-अज्ञानी औ ज्ञानी दोऊंकूं इच्छा तौ समान होवैहै । परंतु- १ अज्ञानी तौ इच्छादिक आत्माके धर्म जानैहैं । औ- २ ज्ञानीकूं जिस कालमैं इच्छादिक होवैहैं; तिसकालमैं घी आत्माके धर्म इच्छादिकनकूं जानै नहीं । किंतु काम, संकल्प, संदेह, राग, द्वेष, श्रद्धा, भय, लज्जा, इच्छादिक अंतःकरणके परिणाम हैं । यातैं अंतःकरणके धर्मैं जानैहैं ॥
इसरीतिसैं इच्छादिक होवै बी हैं । आत्माके धर्मैं इच्छादिक ज्ञानीकूं प्रतीत होवैं नहीं । यातैं ज्ञानमैं इच्छाका अभाव कह्याहै ॥ तैंसैं- मनवाणीतनसैं जो ब्यवहार ज्ञानी करै सो सारा ज्ञानीकूं आत्ममैं प्रतीत होवै नहीं । किंतु सारी क्रिया मनवाणीतनमैं है ॥ औ- "आत्मा असंग है" यह ज्ञानीकौं निश्चय है । यातैं सर्वव्यवहारकर्त्ता बी ज्ञानी अकर्त्ता है । इसी कारणतैं श्रुतिमैं यह कह्यो है:- " ज्ञानीतैं उत्तर किये जो वतमाशरीरमैं शुभअशुभकर्म, तिनके फल पुण्यपापका संबंध होवै नहीं ॥"
॥ ४९९ ॥ शुभसंततिराजाका प्रसंग ॥ ४९९-५०० ॥ शुभसंततिनाम राजाकूं त्यागिके तीनूं पुत्र
॥ ५३९ ॥ अंतःकरणसहित चिदाभासका ॥
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॥ छुसंततिराजाका प्रसंग ॥ ४९९-५०८ ॥
निकसे। तहां पुत्रकी कथा कही। अब पिताकी प्रसंग कहहैं:-
॥ दोहा ॥
पुत्र गये लखि गेहैं, pितु चित्त उपज्यो खेदु ॥ सूनो राज न तिनि तज्यो, नहिं यथार्थे निर्वेद ॥ २६ ॥
टीका:-पुत्र गृहैं निकसे, तव राजाद्वें तीव्रवैराग्यके अभावतैं तिनके वियोगका दुःख हुआ। तैसे मंदवैराग्य हुवा है। यातैं विपयभोगका सुख होवै नहीं औ वाहिरि निकसनेकै इच्छा करी। सो पुत्रनके निकसनै सूनाराज छोड़ि सकें नहीं। यातैं वी दुःख हुवा। जो तीव्रवैराग्य होता तौ सूनाराजी त्यागि देवता, सो वैराग्य तो न हुआ नहीं। किंतु मंद हुवा हैं, यातैं त्यागि सकै नहीं। औ भोगनमें आसक्ति नहीं। यातैं उभयथा खेदही है। यथार्थनिर्वेद कहिये तीव्रवैराग्य नहीं ॥ मंदवैराग्यका फल उपासकी जिज्ञासा कहहैं:-
॥ ५०० ॥ शुभसंततिक पंडितोैं प्रक्ष:-
"ऐसा कौन देव है, जो सोवै नहीं। किंतु जागताहै?"
॥ चौपाई ।
सुभसंतति पितु सों वडभागा । भयो प्रथम तिहिं मंदविरागा ॥ जिज्ञासा उपजी यह तातैं । देव ध्येय को ध्याऊं जाइैं? ॥ २७ ॥ पंडित निरनो करन बुलाये । yथायोग्य आसन चैठाये ॥ प्रश्न कियो यहु सवके आगे । अस को देव न सोवै जागे ? ॥२८॥ पुरुपारस्थ हित जन जिहि जाचै । भक्तिमानके मनमैं राचै ॥ सुति यह पृथिवीपतिकी वानी । इक तिनमैं वेल्यो सुजानि ॥ २९ ॥
॥ ५०१ ॥ विष्णुडपसकका उत्तर ॥
सुन राजा तुहिं कहूं सु देवा । सिव विरंचिलागे जिहि सेवा ॥ संख चक्र धारी हितकारी । pद्म गदा धर परुपकारी ॥ ३० ॥ मंगलमूर्ती विस्नु रूपालद् । निज सेवक लवि करत निहाल ॥ सक्ति गनेस सुर सिव जे हैं । सव आज्ञा ताकींमें ते हैं ॥ ३१ ॥ भारत सकलग्रंथ यह भाखै । pद्मपुरान तपनी आंखै ॥ विसुरुरूपैं उपजत सवही । पैैं भीर जाचैं तिहि तवही ॥ ३२ ॥
[तापनी कहीये च्रूसहिततापनी । रामतापनी गोपालतापनी उपनिपद् ]
विविधवेपको धरी अवतारा । सवदेवनकूं देत सहारा ॥ यातैं ताकी कीजै पूजा । विस्नुसमान सेव्य नहिं दूजा ॥ ३३ ॥ विस्नु भक्त सिव उत्तम कहिये । तथापि सेव्य सरूप न लहिये ॥
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रूप अमंगल सिवको सवसम । 'ध्यान करैं नहिं ताकौं यौं हम ॥३४॥ [ सव कहिये सुरदà, ताके सम अमंगल ] राख डमरु गजचर्म कपाला । भौ आप कितिं कहै निहाला ॥ ताको पूत गनेस हु तैसो । रूप विलच्छन नरपशु जैसो ॥ ३५ ॥ सठ हटतैं 'श्यावत जो देवी । तासमरूप धरत तिहिं सेवी ॥ तिय निंदित असुची न पवित्रा । औगुन गिनैं न जात विचित्रा ॥३६॥ कपट कूटको आकर कहिये । पराधीन निज तंत्र न लहिये ॥ ऐसो रूप जु चाहिये जाइक । सो सेवहु नर खरसम्म ताकौं ॥३७॥ भ्रमत फिरै निसदिन यह भानू। रहत न निश्शल छन इक थानू ॥ भ्रमतौ फिरै उपासक ताको । तिहि समान सेवक जौ जाको ॥३८॥ आन देव यातैं सव त्यागै । सेवनীয় इक हरि नित जागै ॥ पूजन ध्यान करन विधि जो है । नारदपंचरात्रमें सो है ॥ ३९ ॥
टीका:— विष्णुबुद्धिè त्यागिके प्रसिद्ध जो चारिउपसना हैं, तिन एकएकका निपेध किये- तैं वी स्मार्तउपासना कौ निपेध किया । काहेतैं ? पांचोंदेवतन कौ समझिèकरिके उपासै, ताकौं स्मार्तउपासना कहैंहैं । शिवादिक चारिदेवतन कौ विष्णुकी समतां निपेधैहैं स्मार्तउपासना कौ निपेध वी अर्थसैं कियाहै॥ ॥ ५०२ ॥ शिवसेवकका उत्तर ॥ सिवसेवक मुनि सुनि तिहि चैनà । क्रोधसहित बोलयो चल नैना ॥ सुन राजन वानी इक मोरी । जामैं वचन प्रमाण करोरी ॥ ४० ॥ सिवसमान आन को कहिये । माँगि देउँ जौं जिहि जो चाहिये ॥ सव विभूति हरिकौं दै मागी । धरत विभूति आप नित्य लागी ॥४?॥ चर्म कपाल हेतु इहि धारै । सम नहिं उत्तम अधम विचारै ॥ नच रहत उपदेसत येहि । नहिं विरागसम सुख ठहै कहि ॥४२॥
टीका:—वैष्णवनै चर्मकपालादिक निंदित- वस्तुका धारण आयेâप किया । ताका यह समा- धान है:—महादेवतैं सर्वपदार्थनमैं समबुद्धिè हि है॥ औ तुम्हारे पास कुंडलका उपकरण (साधन) नंदि- केश्वर, खटवांग ( चारपाइएकी पडिरुप काष्ठमय शस्त्र ), कुठार, गजचर्मे, भस्म औ सर्प है । इस हेतु तैं जानियेहैं कि स्वामिराम पुरषकूं विषय- रूप मृगतृष्णा (जलजुबुदिसैं ग्रहण करीहै सूर्यकि किरण) भगवंती नहिं'
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द्वितीयपादका अन्यय यह है:-समविचारै। उत्तम अधम नहींं विचारै ॥ भारततातपर्ये नाहिं देव्यों। जो अप्पयदीक्षित बुध लेव्यो ॥ ४८ ॥
टीका:-वैष्णवनै यह कहा:-“भारतादिक ग्रंथनमैं विष्णु सर्वदेवनका पूढ्य कछाहै। सो वैष्णु नहीं।” कहैंहैं। भारतग्रंथका तात्पर्ये देखैं शिवहूंही ईश्वरता भतीत होवैहै। यह अप्पय- दीक्षित नाम विद्वाननै सकलपुराणइतिहासका तात्पर्ये लियाहै ॥
तहां भारतमैं यह प्रसंग है:-अखस्त्यामानै नारायणअवतार औ आग्रेयअवतारका प्रयोग किया, tव वहुतसेनाक तौ संहार वी हुवा। परंतु पंचपांडवोंमैं कोई म्लैया नहींं। तव स्थकूं त्यागिके धुरुवेंद औ आचार्यनकूं धिक्कार करता बनकूं चल्या। तहां न्यास- भगवानकूं ताकूं मिले औ। यह कहहो:-“हे ब्राह्मण ! तूं आचार्य औ वेदकूं धिक्कार मति कहूं। ये अंडन कुष्ण दोऊं नरनारायणरूप हैं। इन्हूनैं शिवका पूजन बहुत कियाहै। यातैं
इनकी भक्तिके आधीन हुवा त्रिशूली महादेव इनके रथके आगै रहैहै। यातैं इन दोऊंकें उपरि प्रयोग किये अनेकशस्त्रास्त्रनकी सामर्थ्यहूं महादेव नाथा करिदेवहैं ॥
सदावर्तं ऐसो दे भारी। काशीपुरी मरे नरनारी ॥ सो सौंय्यमुक्तिकूं जावै। गर्भवाससंकट नाहिं पावै ॥ ४३ ॥
सिवसममान नरनारी ते सब। लहत सु दिव्यभोग सगरे तब ॥ करत आप अद्भयुपदेशा। तजत लिंग यूं ब्रह्मप्रवेसा ॥ ४४ ॥
ऊचननीच रंचहु नाहिं देखै। मुक्ति सबनकूं दै इक लेखै ॥ सिवसममान राजन को दाता। भक्त अभक्त सबनको त्राता ॥ ४५ ॥
विस्नुसु भाव सुन्यो हम ऐसो। जगमैं जन प्राकृत है तैसो ॥ trाता भक्त अभक्त न त्राता। यह प्रसिद्ध सबजगमैं नाता ॥ ४६ ॥
हरिसेवक हर सेव्य बखान्यो। रामचंद्र रामेश्वर मान्यो ॥ स्कंदपुरान व्यास बहु भाख्यो। हरिसेवक हर सेव्यहि राख्यो ॥ ४७ ॥
कह्यो जु भारत पदपछरानां। सबदेवनतैं हरि अधिकाना ॥ इस भारतप्रसंस्तैं नारायणरूप कुष्णकी विष्णुप्रति महादेवकी क्रिपातैं उपजीहै। यह सिद्ध होवैहैं। यातैं विष्णुचत्रिकूं प्रतिपादक जो ग्रंथ हैं, सो शिवकी अतिचतारकूं प्रतिपादन करैहैं। काहैं ? तिन ग्रंथनमैं विष्णु सेव्य कछाहै, सो विष्णु भारतप्रसंगतैं शिवका भक्त है यातैं। जिस
शिवकी भक्तितैं विष्णु सेव्य होवैहैं, सो शिवही उपासक थे। इन्हूनैं सिद्धांतलेशानाम वेदांतका ग्रंथ ॥ ५३७ ॥ सिवसममान ईश्वरयुक्त शिवलोककूं ॥ ॥ ५३८ ॥ ये पंडित दक्षिणादिशमैं शिव काशीपुरी है, तिसविषै भयेहैं वो ने बडे शिवके
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परमसेऽ्य है । इसरीतिसें अप्पदीक्षितने सकल वैष्णवग्रंथनका प्रतिपाद्य शिव कछाहै ॥ चौपाई ॥
सिव सचको प्रतिपाद्य वखान्यो । भक्तनमें उत्तम हरि गान्यो ॥ ईस देव पद सर्वमें कहिये । महतसहित इक सिवमें लहिये ॥५९॥
टीका:-महादेव, महेश, शिवकूं कहहैं औरनकूं देव ईश कहहैं ॥
सिवतें भिन्न असिव जो कहिये । तिहिं तजी सिव कल्याणहि लहिये ॥ जलसायी जिन्हिं नाम वखान्यो । सो जागै यह मिथ्या मान्यो ॥ ५० ॥
टीका:-कल्याणकूं शिव कहहैं, तातें भिन्न औरदेवता अधिष रूप हैं । तिन अकल्याणरूप देवतानकूं त्यागिके कल्याणरूप शिवकूं उपासै ॥
विरख लख जब सर्वकूं उपज्यो डर । निर्भैय किये सकल गर धरि गर ॥ जाको पूत गनेस कहावै । विघ्नजाल ततकाल नसावै ॥ ५१ ॥
कारजमें कारण गुन होवै । यूं सिव विरख मूलतें खोवै ॥ जन्ममरन दुःख विरख कहावै । तिहिं समूल सिवध्यान नसावै ॥५२॥
सेवनयोग्य सदाशिव एका । जागै सहित समाधि विवेका ॥ तंत्र पाखुपत रीति जु गावै । त्यूं पूजनकरि ध्यान लगावै ॥ ५३ ॥
नारदपंचरात्रमें कह्यो । यह परिमल परसंग अनूठो ॥ यांतें सिवसेवा चित लावै । पुरुपारथ जो वहै सु पावै ॥ ५४ ॥
टीका:-नारदपंचरात्रका मत सूत्रभाष्यमें खंडन कियाहै । ताके अनुसारि रामानुज आदिक नवीन वैष्णवनका मत कल्पतरुकी टीका परिमलमें खंडन कियाहै ॥
सिवको पूत गनेस वतायो । कारणगुन कारजमें गायो ॥ suni गनेस्को पूजक बोल्यो । अस किय कोप सिंहासन डोल्यो॥५५॥
राजन सुन दोनूं ये झूठहै । वचन सत्य सम कहत अनूठे ॥ sिवको पूत गनेस वतावै । पराधीनता तैंमैं गावै ॥ ५६ ॥
कहुं प्रसंग सुनहुं इक एषो । लिख्यो व्यासभगवत मुनि जैसो ॥ चढे त्रिपुर मारनकूं सारै । हरिहरसहित देव अधिकारै ॥ ५७ ॥
॥ ५३५ ॥ श्रीशंकराचार्यविरचित ब्रह्मसूत्रभाष्यके ऊपरि वाचस्पतिमिश्रकृत भामतीतिलकभाष्यनामक टीका नि. सा. ७०
है । तिसके व्याख्यानका नाम कल्पतरु है । ताका परिमलनामक उपाध्यायन है । तामैं ॥
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नाहिं गनेसको पूजन कीनो । त्रिपुर न रंचहु तिनैं छीनो ।। पुनि पछिताय मनाय गनेसा । त्रिपुर विनास्यो रहो न लेसा ।।५८।।
भयो समरथ किनो जिहि बूझा । सेवनयोग्य सु इक नहिं दूजा ।। रामपूत दसरथको जैसै । विघ्रहरन सिवको सुत तैसै ।। ५९ ।।
व्यास गनेसपुरान बनायो । सवको हेतु गनेस बतायो । हरि हर विधि रवि सक्ति समेता । तुंडीन तें उपजत सब तेता ।। ६० ।।
करत ध्यान जिहि छन जन मनमैं । नासत विघ्न प्रधान गननमैं ।। विघ्रहरन यूं जगत निसदन । भक्तिसहित सेवहु तिहि अनछन ।।६१।। ५०४ ।।
देवीभक्तका उत्तर ।। हेतु गनेस सक्तिको सुनिके । भगतभागवत उचम्यो गुनिके ।। गुन गनन दानि बानी मानि । तीनूं सकल कहत ये काची ।। ६२ ।।
टीका:-भगतभागवत कहिये भगवतीको भगत ।। सूनें देव सक्तिबिन सारे । मृतक देहसम लखि हलारे ।।
।। ५३६ ।। कुंडादंडकतैं ।। सक्किहीन असमर्थ कहावै । सो कैसे कारज उपजावै ।। ६३ ।।
जिन बहु सक्तिउपासन धारी । तातैं भये सकल अधिकारी ।। होरि हर सूर गनस प्रथाना । तिनमैं सक्ति देखियत नाना ।। ६४ ।।
सक्ति लोकमैं भाखत जाऊं । रूप भगवतीको लिखि ताऊं ।। टीका:-भगवतीके दो रूप हैं:-१ सामान्य औ २ विशेष ।।
१ सर्वपदार्थनमैं अपना कार्य करनेऐकी जो सामर्थ्यरूप शक्ति, सो भगवतीका सामान्यरूप है । औ- सामान्यरूप शक्तिके संख्यारहित अनंतअंश है । जामैं शक्तिके न्यूनअंश होवें सो अल्पशक्ति होवैहै । असमर्थ कहियेहै ।। जामैं शक्तिके अधिक अंश होवें सो समर्थ कहियेहै ।। विष्णुशिव-
आदिकनमैं शक्तिके अंश अधिक हैं । यातैं अधिकसमर्थ कहियेहै ।। इस रीतिसैं भगवतीका सामान्यरूप जो शक्ति ताके अंशनकी अधिकतासैं विष्णु, शिव, गणेश, सूर्यकी महिमा प्रसिद्ध है औ शक्तिसैं रहित होवै तौ जैसैं प्राणविना शरीर
अमंगलरूप होवैहै, तैसैं सारे देव हतारे कहिये अमंगलरूप होय जावैं । यातैं जिस शक्तिकी अधिकतासैं देवनकी महिमा प्रसिद्ध है, सो महिमा शक्तिकी है । तिन देवनका नहिं ।। विष्णुशिव- आदिकननै भगवतीके सामान्यरूप शक्तिकी
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आधिकउपासना करीईहै। यातें तीनमें शक्तिके अंश अधिक हैं। यह पूर्वग्रन्थनमें भगवतीभक्तका अभिप्राय है॥ जैसैं भगवतीके निराकाररूप शक्तिके अनंतअंश हैं, तैसैं साकाररूपके भी अनंतअंश हैं। तीनें साकारअंशनमें कलारूप प्रधान हैं औ माहेश्वरि, वैष्णवी, शांरी, गाणेश्वरीआदिक वी प्रधानअंश हैं। चिग्रहूंकूं भगवतीकी उपासनतें वैष्णवीनाम भगवतीके अंशका लाभ। तैसैं अन्यदेवतनकूं भगवतीके उपासनतें निजनिज माहेश्वरिआदिक अंशका लाभ हुयाहै। तीनमें भी भगवतीके विष्णु औ शिवदोनों प्रधानभक्त हैं। कहैंतैं? ध्याताकूं ध्येयरूपकी प्राप्ति उपासनाकी परमअवधि है॥ विष्णुशिवकूं उपासनसौं ध्येयरूपकी प्राप्ति हुयीहै, यातैं प्रधानउपासक हैं। यह अढ़ाई चौपाईतैं प्रतिपादन करेहैं:-
|| चौपाई || लाख करोरि मात्रिका गन पुनि। तंत्रग्रंथ लिखि अंस सकल गुनि॥६५॥ kाली ताको अंस प्रधान।। माहेश्वरी आदि लिखि नाना॥ हरि हर ब्रह्म सकल तिहिं ध्यावै। निजनिज अंसै कपा तहि पावै॥६६॥ ध्येयरूप ध्याता है जवही। siddh उपासन लिखिये तवही॥
|| ५३७ || ६३ सें ६४वीं चौपाईरूप पूर्वोक्तग्रंथभागमें भगवतीके भक्तका यह जो आगे कहियेगा सो अभिप्राय है॥ || ५३८ || हरिहरभादिक निज निज
अस उपासना हरि अरु हरकी। नारीमूर्ति धरी तजि नरकी॥६७॥ || दोहा || असृत मथनप्रसंमै, होरि मोहिनीस्वरूप॥ अर्धअंग सिवको लसै, देवीरूप अनूप॥६८॥
टीका:- मथनकरिके असृत प्रगट कियो, तव सुरअसुरनका विवाद मेटनमें विष्णु असमर्थ हुवा। तत्र अपने उपास्यरूप भगवतीका ऐसा एकाग्रचित्तसैं ध्यान कियो, जतैं आप विष्णु उपास्यरूपहूं प्राप्त हुवा। ता रूपके माहात्म्यसैं अखुर वी ताके अश्रूळ हुये॥ तैसैं शंिवनै वी समाधिमैं ऐसा भगवतीका ध्यान कियो, जतैं अधोविग्रह शंिवका उपास्यरूप हुवा। कदाचित विेश्वपतैं समाधिका आव होवैहैं। यातैं सारा-विग्रह शंिवका उपास्यरूप नहीं॥ इसरीतिसैं सारे देव भगवतीके उपासक हैं। सो उपासना दोरीतिसैं कहीईहैं:- दक्षिणआश्रायतैं और उत्तरआश्रायतैं पूर्व दक्षिण आश्राय कहा। आगैं उत्तरआश्राय कहैंहैं:-
|| चौपाई || भक्त भगवतीके हर हरि हैं। इन सम कौन उपासन करि हैं॥ तदपि महामाया जो ध्यावै। तुरत सकल पुरुषारथ पावै॥६९॥ कहिये वैष्णवी माहेश्वरी आदिक भगवतीके अंशानकूं तिसकी रूपातैं पावतैंहैं। यह अर्थ देवीभागवतमैं स्पष्ट लिख्यो है॥
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नहीं साधन जगमें अस औरारा । उपजै भोग मोछ इकठौरा ॥ भक्त भगवतीको जो जगमें । भोगै भोग न आवत भगमें ॥ ७० ॥
सिवकृत तंत्ररीत यह गाई । भक्तिभगवती अतिसुखदाई ॥ पंच मकार न तजिये कबहू । जिनाहि सनातन सेवत सवहू ॥ ७१ ॥
कृष्णदेव बलदेव सुजानि । प्रथमा पिवत सदा ज्यूं पानी ॥ औरप्रधान पुरातन जेते । सेवत सकल मकारहि तेते ॥ ७२ ॥
तिन सेवनकी जो विधि सारी । सिव निजमुख भाषी उपकारी ॥ सिवको वचन धरै जो मनमें । लहै सुभोग मोछ इक तनमें ॥ ७३ ॥
ग्रंथ भागवत व्यास वनायो । उपपुरान काली समुझायो ॥ भक्ति भगवतीकी इक गाई । पूजाविधि सगरी समुझाई ॥ ७४ ॥
ध्याता सकल भगवतीके हैं । हरि हर सूर गनेस जिते हैं ॥ सकल पिये प्रथमा मतिवारे । पूजत सक्ति मम मन सारे ७५ ॥
जगजननी जागै इक देवी । परमानंद लैहि तिहि सेवी ॥ ॥ ५०५ ॥ सूर्यभक्तका उत्तर ॥
सूर्यभक्त भगवतीको यह सुनी । क्रोध सहित बोल्यो इक सुनी पुनि ण्श॥ सुन राजन वानी इक मोरी । भाखूं झूठ न सपथ करोरी ॥ अतिपापिष्ठ नीच मत याको । श्रवन सनेह सुन्यो तैं जाको ॥ ७७ ॥
औगुन जिते वखानत जगमें । ते गिनियत गुनगन या भगमें ॥ महा मलिनहि तीरथ राखत । सुद्ध नाम आमिपको आखत ॥७८॥
कहत और यूं सब विपरीता । संशुमंत्र सेवी मति रीता ॥ दच्छिन संगदाय जो दूजी । यदपि श्रेष्ठ अनेक न पूजी ॥ ७९ ॥
तथापि चिन भानू सब अंधे । इन सवके मन जिनमें वंधे ॥ करत भानु सगरी उज्जियारो । ता बिन होता तुरत अंधियारो ॥८०॥
और प्रकाशक जगमें जे हैं । अंस सवें सूरजके ते हैं ॥ वालकी 'मति रीता' कहिये बुद्धि युक्तिप्रमाणकरि शून्य होनहैं खालीहैं ॥
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भानु समान कौन हितकारी । भ्रमत आप परहित मति धारी ॥८१॥
काल अधीन होत सब कारज । ताहि त्रिविध भाखत आचारज ॥
वर्तमान भावी अरु भूत । सूरज क्रिया करत यह सूत ॥ ८२ ॥
या विधि सकल भानुतें उपजे । भस्म होत सच जब वह कुपिजे ॥
भानुरूप द्वैभांति पिछानहु । निराकार साकारहि जानहु ॥ ८३ ॥
निराकार परकास ज़ कहिये । नामरूपमें व्यापक लहिये ॥
अधिष्ठान सचको सो एहा । जगत विवर्त वहे जिहि अविवेका ॥ ८४ ॥
"अहं भानु" अस वृत्ति उदै जब । तामें प्रगटि विनासत तम तव ॥८५॥
टीका:-सूर्यके दो रूप हैं:-निाकार-प्रकाश औ साकारप्रकाश । तिन दोनोंमें सारे नामरूपमें व्यापक हैं । जाकं वेदांती भ्रांतिकरि के ब्यवहार करैंह, सो निराकारप्रकाशारूप जो सूर्यका सामान्यानुरूप है, सो सारे जगत्का अधिष्ठान है । ताकी अज्ञानतें जगद्रूपि विवर्त उपजैहै ॥ सोई निराकारप्रकाश अंतःकरणकी वृत्तिमें प्रतिबिं-सहित ज्ञान कहियेहैं ॥ " अहं भानु " ऐसी अंतःकरणकी वृत्ति प्रकाशके प्रतिबिंबसहित होवै, तव अज्ञानकी निवृत्तिद्वारा जगत्की निवृत्ति होवैहै ॥
सुनि साकारूप यह ताको । होय चांदिनाँ दिनमें जाको ॥
ताके अंस और चहतेरे । चंद तारका दीप घनेरे ॥ ८६ ॥
यांतें द्वैविधभानु बतायो । ज़ेय ज़ेयको भेद जनायो ॥
वेद सकल याहीकुँ भाखत । रूप प्रकाश सत्य तिहिं आखत॥८७॥
टीका:-निाकार साकारभेदतैं भानुके दोरूप हैं । तिनमें निराकाररूप ज़ेय हैं । साकाररूप ज़ेय है । याहीकुँ वेदांतनमें निर्गुणसगुणभेदतें दोपकारका ग्रंथ रहैहैं ॥ जामें लेस न तमको कवही ॥ लिखि तिहि जग जन जागत सचही ॥
कवहु न सोवै सो यूं जागै । ध्यान करत ताको तम भागै ।
ओरहि जगत भाखत सगरे । राजन जानि ज़ठ ते झगरै ॥ ८९ ॥
ऐसे पांचउपासक बोले । निजगुण अगुण परके खोले ॥
पंडित और अनेक जु आये । भिन्नभिन्न निज मत समुझाये ॥ ९० ॥
टीका:-जैसे पांचउपासक परस्परविषुद्ध
॥ ५०६ ॥ उक्तमतके अनुवादपूर्वक स्मार्तमत ॥
॥ ५४० ॥ प्रकास ॥
॥ ५४१ ॥ वेदके अंतभागरुप उपनिवदनमें ॥
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वचन बोले, तैसैं अनेकपंडित निजनिजबुद्धिके अनुसार विरुद्धही बोले ॥ जैसे इन पांचूंक परस्पर विरुद्ध मत है, तैसैं सारे जो पंडित पांचूंदेवतानमैं मेदबुद्धि करै नहीं, ताका मत वी इन सर्वतैं विरुद्ध है । कहैंतै ?—
वैष्णवका यह मत है—विष्णुसमान और देव नहीं । सारे विष्णुके भक्त हैं । और विष्णुके जो रामकृष्णनारायणआदिक नाम हैं, तिनके समान जो अन्यदेवके नामकूं जानै, सो नामापराधी है । ताकूं रामादिकनामउच्चारणका यथार्थफल होवै नहीं ॥
तैसैं शैवमतमैं शिवसमान अन्यदेव नहीं और शिवके नामउच्चारणका फल विष्णुनामउच्चारणतैं होवै नहीं ॥
इसरीतिसैं सर्वके मतमैं अपनैपनै उपास्यदेवके समान अन्यदेव नहीं और स्मार्त्तमतमैं सारे देव सम हैं । यांतैं ताका मत वी पांचूंकातैं विरुद्ध है ॥ तैसैं—
॥ ५०७ ॥ घटशास्त्रनककी परस्पर विरुद्धता ॥१ सांख्य, २ पातंजल, ३ न्याय,४ वैशेषिक, ५ पूर्वमीमांसा, औ ६ उत्तरमीमांसा, इन पदशास्त्रनका मत वी परस्पर विरुद्ध हैं । कहैंतै ?
१ सांख्यशास्त्रमैं ईश्वरका अंगीकार नहीं ।२ योगमैं निरपेक्ष प्रकृतिपुरुपके विचेकज्ञानतैं मोक्ष मानिहै । औ पातंजल शास्त्रमैं ईश्वरका अंगीकार औ समाधितैं मोक्ष मानिहै । यह विरोध है॥३-४ न्यायमतमैं चारप्रमाण औ वैशेषिकमतमैं दोयप्रमाण ।यह विरोध है ॥ तैसैं न्याय-वैशेषिकका और वी आपसमैं बहुत विरोध है । जिज्ञासुकूं अपेक्षित नहीं । यांतैं लिख्या नहीं ॥
५ तैसैं पूर्वमीमांसासमैं ईश्वरका अंगीकार नहीं । मोक्षरूप नित्यसुखका :अंगीकार नहीं । किन्तु कर्मजन्यपुषखही पुुपार्थ है ॥ और-६ उत्तरमीमांसासमैं ईश्वरका मोक्षका अंगीकार । विपयसुख पुुपार्थ नहीं ॥ और उत्तर-
धर्मोंमैं ( अन्यदेवताके नामोंमैं ) तुल्यता भगवत्-नामविषै जाननी । ये दश शिव औ विष्णुके जपविषै नामापराध हैं ॥ ? ॥
दोहा ॥ राम राम सब को कहै, दशरथ कहै न कोय ॥ एकबार दछारit कहै, तु कोटिजन्मफल होय ॥ १ ॥
इहां “दशरथ कहै न कोय” इस द्वितीय-पादका यह अर्थ है:—दशापराधनैं विना (रहित होयके) रामनामकूं कोई नहीं कहता । अन्यार्थ स्पष्ट ॥
॥ ५४२ ॥ जाके दशनामपराधमैं कोई वी नामापराध होवै सो नामापराधी कहियेहै । वे दश-नामापराध ये हैं:—१ श्लोक: ॥ संसिद्धाडसति नामवैशकथा श्रीशैवायोर्मेंधी-श्रद्धा शृतिशाखादैशिकगिरां नामान्यथावादश्रवम् । नामास्तिती निपिद्धच्युचिविततस्यागो हि धर्मोस्तरै: सास्यं नादि जपे लिवस्य न दश-नामपराधा दश २
अर्थ:—१ सत्पुरुषनकी निंदा, २ असाधु-पुुपके पांच नामके महिमाकी कथा, ३ विष्णुका वाक्यमैं अश्रद्धा, ४ शास्त्रवाक्यमैं अश्रद्धा, ५ गुरुवाक्यमैं अश्रद्धा, ८ नामविषै अर्थवादका ( महिमाकीस्वतिका ) श्रवम, ९ 'अनेकापापका नाशक नाम मेरेपास है' इस विश्वासैं निपिद्धकर्मका आचरण । उक्तविश्वाससैहीं त्रिहितकर्मका त्याग भो १० अन्य-
॥ ५४३ ॥ योगनिरपेक्ष कहिये समाधिरूप योगकी अपेक्षासैं रहित केवल ॥
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मीमांसाका मत या ग्रंथमैं स्पष्टही है । सर्वशास्त्रनका मत यातें विरुद्ध है ॥ औरनमैं भेदवाद है । यामैं भेदका खंडन औ अभेदनका प्रतिपादन है ॥ इसरीतिसैं सकलशास्त्रनके सिद्धांत परस्पर विरुद्ध हैं ॥
॥ ५०८ ॥ तकेडष्टिका पितासैं मिलाप ॥ ॥ चौपाई ॥ वचन विरुद्ध सुने जव राजा । यह संसै उपज्यो तिहि तौजा ॥ इनमैं कौन सत्य बुध भाखत । युक्ति प्रमाण सकल सम आखत ॥
सं सोक दुखित यौं जियें । को उपास्य यह लख्यो न हियमैं ॥ चिंता हृदय हुई यह जाकूं । निजसंदेह सुनाऊं काहिं ॥ सास्नानिपुन पंडित जग जेते । सुने विरुद्ध वकत यह तेते ॥ यूं चिंतत बहुकाल भयो जब । तकेदृष्टि तिहि आय मिल्यो तब ॥
॥ ९४८ ॥ कोई दोऊकौं अंगनमैं बिठि भर गयाथा । तिस बिलेखकौं वेदवीका दरवज्जा खुल्ला छोडिके गामसैं बाहरि छोड गई । तहां तिलक पिच्छाडी कोई रोगिष्ट लेठ तिसके भंगनमैं प्रवेशकं पायके मरगया । तिसतैं तिस डोकरीकौं जैसैं बढी चिंता भई । तैसैं सुभसंतति राजनै वी उपास्य देवकं अज्ञानकौं दूरी करनैअर्थ पंडितनके प्रति प्रश्न कियो ।
॥ दोहा ॥ मिले परस्पर ते उमैं, पुत्र पिता "जिहि रीति ॥ करि प्रणाम आसिष दुहुं, आसन लहै सप्रेमति ॥ ९९ ॥ ( तर्कदृष्टिका पितामति उपदेश ॥ ५०९-५२२ ॥ )
॥ ५०९ ॥ कारणरूपकी उपास्यता औ कार्यरूपकी निकृष्टता ॥ ॥ चौपाई ॥ निजपितु चिंतासहित लखि, सुत बोल्यो यह बात ॥ को चिंता चित रोवरे, मुख प्रसन्न नाहिं तात ॥
सुभसंतति सुतकी सुनी बानी । तिहि भाखी निज सकल कहानी ॥ चित चिंताको हेतु सुनायो । को उपास्य यह तत्व न पायो ॥ तकेडष्टि सुनी पितुके बैन । बोल्यो सुभसंतति सुखवैदना ॥
तिसतैं राजा काहिं न विचारीं उत्पन्न भया । ताके निवारणकी तिसकूं बडी चिंता भई ॥
॥ ५४५ ॥ जिहि कहिये जैसी रीति है तैसैं । दुहुं कहिये पुत्र औ पिता दोऊं क्रमतैं प्रणाम औ आशीर्वादकरिके प्रीतिसहित स्वासनकं प्रास भये । यह अर्थ है ॥ ॥ ५४६ ॥ दुखारे चित्तमैं कौन चिंता है ?
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कारनरूप उपास्य पिछानहु । ताके नाम अनंताहि जानहु ॥ ९७ ॥ कारजरूप तुच्छ लिखि तजिये । यह सिद्धांत वेदको भजिये ॥ रचे व्यास इतिहास पुराना । तिनमें यही मतो नहीं नाना ॥ ९८ ॥ मनमें मर्म न लखत जु पंडित । करत परस्पर मत ते खंडित ॥ नीलकंठपंडित बुध नीको । कियो ग्रंथ भारतको टीको ॥ ९९ ॥ तिन यह प्रथमहि लिख्यो प्रसंगा । श्रुतिसिद्धांत कव्यों जो चंगा ॥५१०॥ पुराणउक्त स्तुति और निंदाके करनैमें व्यासका अभिप्राय ॥
टीका:-यद्यपि सकलपुराणनका कर्ता एक व्यास है, तानै स्कंदपुराणमें शिवकूं स्वतंत्रतादिक ईश्वरधर्म कहे औ अन्यदेवनकूं शिवकृपातें सारी विभूतिकी प्राप्ति कही । यातें जीवधर्म कहे ॥ तैसें विष्णुपुराण पद्मपुराणमें विष्णुकूं ईश्वरता कही । तैसें किसीकूं पुराणमें, विष्णुशिवतैं भिन्न जो गणेशादिक हैं, तिनकूं ईश्वरता कही । इस रीतिसैं व्यासवाक्यनमें विरोध प्रतीत होवैहै ॥ ताका- यह समाधान करैहैं--सैरही ईश्वर हैं ॥ जा प्रकरणमें अन्यदेवकी निंदा है, ताकीं निंदाकरिके तिसकी उपासनात्यागमें व्यासका अभिप्राय नहीं । किंतु वैष्णवपुराणमें शिवादिकनकी निंदा औ विष्णुकी स्तुतिकारिके विष्णुकी उपासनामें प्रवृत्तिकी हेतु है ॥ तैसें शिवपुराणमें विष्णु आदिकनकी निंदा वी तिनकी उपासनाके त्याग अर्थ नहीं । किंतु तिनकी निंदा शिवकी उपासनामें प्रवृत्तिके अर्थ है ॥ जो एकप्रकरणमें अन्यकी निंदा त्यागवास्ते होवैहै तौ सर्वकीं उपासना तौ त्याग हैवैगी । यातें अन्यकी निंदा एककी स्तुतिके अर्थ है । त्यागअर्थ नहीं ॥
उदाहरण:-वेदमें अग्निहोत्रके दोकाल कहेंहैं ॥ एक तौ सूर्यउदयसैं प्रथम औ दूसरा सूर्यउदयतैं अनंतर काल कछ्वाहै । तहां उदयकालके प्रसंगमें अनुदयकालकी निंदा करीहै औ अनुदयकालके प्रसंगमें उदयकालकी निंदा करीहै ॥ तहां निंदाका तात्पर्य त्यागमें होवै तौ दोऊंकालमें होमका त्याग होवैगा औ नित्यकर्मका त्याग संभव नहीं । यातें उदयकालकी स्तुति वास्तै अनुदयकालकी निंदा है औ अनुदयकालकी स्तुति वास्तै उदयकालकी निंदा है । तैसें एकदेवकी उपासनाके प्रसंगमें अन्यकी निंदाका एककी स्तुतिमें तात्पर्य है । अन्यकी निंदामें तात्पर्य नहीं ॥५११॥ पांचदेवनके उपासकनकूं सम ( ब्रह्मलोक ) फलकी प्राप्ति ॥
जैसेैं शाखामेदतैं कोई उदयकालमें होम करैहै औ कोई अनुदयकालमें करैहै । फल दोऊंकूं समान होवैहै । तैसे इछ्छामेदतैं पांचदेवनमैं जाकीं उपासना करै तिन सर्वतैं ब्रह्मलोककी प्राप्ति होवैहै । तहां भोग भोगिके विदेहमोक्ष होवैहै ॥ यद्यपि विष्णु आदिकनकी उपासनातैं वैकुंठलोकादिकनकी प्राप्ति पुराणमें कछीहै । देवी औ सूर्य; ये पांच देव ।
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ब्रह्मलोककी नहीं । तथापि उच्चमउपासक विदेहमुक्तिके अधिकारी देव्यानमार्गमें सारे ब्रह्मलोककूही जावैहैं । परंतु एकही ब्रह्मलोक वैष्णवउपासककूं वैकुंठरूप प्रीतीत होवैहै और लोकवासी सारे तिसकूं चतुर्भुजपार्पदरूप प्रतीत होवैहैं औ आप भी परब्रह्मरूप होवैहै ।। तैसैं शैवउपासककूं ब्रह्मलोकही शिवलोक प्रीतीत होवैहै । तिसलोकवासी सारे त्रिनेत्रमूर्ति अपनैसहित प्रीतीत होवैहैं ।। इसरीतिसैं सर्वउपासकोंकूं ब्रह्मलोकही अपनै उपास्यक लोक प्रीतीत होवैहै । कहैंतैं ? यह निषम है:- देव्यानमार्गविना अन्यमार्गमें जे जावैहैं, तिनका संसारमें आगमन होवैहै औ देव्यानमार्ग एक ब्रह्मलोकका है । यातैं विदेहमोक्षके योग्य उपासक सारे ब्रह्मलोककूं जावैहैं । तिस ब्रह्मलोकमें ऐसी अद्भुतमहिमा है:-उपासककी इच्छाके अनुसर सारी सामग्रीसहित वह ब्रह्मलोकही तिनकूं प्रीतीत होवैहै । इसरीतिसैं पांचूं देवनके उपासककूं सफल होवैहै । याकैवैप-
|| ५१२ || एकपरमात्मामें नानानामरूप संभवैहैं ।। यह शंका होवैहै:-पांचूं देवनके नामरूप भिन्न भिन्न कहैंहैं और ईश्वर एक है । एकईश्वरके नानारूप संभवैं नहीं । ताका यह समाधान है :- परमार्थमें नामरूप कोहैं परमात्मामें हैं नहीं । मंढुद्धिं उपासन-
|| ५१८ || १ देव्यान । २ पित्रयान । १ सूर्यमंडलकूं भेदनकरिके ब्रह्मलोकमें जानेका जो मार्ग सो देव्यानमार्ग है । याहीकूं आर्चिमार्ग वी कहैहैं ।। चौ- २ चंद्रमंडलकूं भेदनकरिके इंद्रलोकरूप ब्रह्म- वासतै नामरूपहित परमात्माके मायाकृत कल्पितनामरूप कहैहैं । यातैं एकपरमात्मामें नानाकृतकल्पितनामरूप नाना संभवैहैं ।। इसरीतिसैं सर्वपुराणकथनका विरोध दूरी होवैहै ।। ५१३ ।। सारपुराणनका कारण औ कार्यब्रह्मके उपासककी क्रमतैं उपादेयता औ हेतयतामें तात्पर्य है ।। ५१३-५१४।।
पुराणवाक्यनमें विरोधशंकाका मूल्यसमाधान तो यह है:-विष्णु । शिव । गणे्श । देवी । सूर्य । इसतैं आदिलेके जितनै एकएकके नाम हैं, सो सारे कारणब्रह्मके नाम हैं औ कार्यब्रह्मके वी सो सारे नाम हैं ।। जैसे मायाविशिष्टकारणकूं ब्रह्म कहैंहैं औ हिरण्यगर्भ कार्य है ताकूं वी ब्रह्म कहहैं । इसरीतिस कारणब्रह्मकूं विष्णु । शिव । गणे्श । देवी । सूर्यपद बोधन करैंहैं ।। औ कार्यब्रह्मकूं वी पांचूं पद बोधन करैंहैं ।। ऐसैं पांचूं पदनके जो नारायण, नीलकंठ, विधेश, शक्ती, भादु इत्यादिक अनंतपर्योय हैं, सो सारे कारणब्रह्म औ कार्यब्रह्म दोनूंकूं बोधन करैंहैं ।। कहूं कारणब्रह्मकूं, औ कहूं कार्यब्रह्मकूं प्रसंगतें बोधन करैंहैं ।। जैसे सैधवपद अथ लवण दोनूंकूं बोधन करहै ।। मोजनप्रसंगमें सैधवपद अक्षरकूं बोधन करहै ।। वैष्णवपुराणमें-
-लोकमें जानेका जो मार्ग, सो पित्त्रयानमार्ग है । याहीकूं धूममार्ग वी कहैहैं ।। औ- ३ वारंवार जन्ममृत्युकै कारण मृत्यु लोकविषै आवैहै- का जो मार्ग सो तीसरा जायस्त्रध्यास्वमार्गहै । ये तीन संसारके मार्ग हैं औ चौथा ब्रह्मज्ञानरूप जो मार्ग, सो मोक्षका मार्ग है ।।
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विष्णुनारायणादिक पद कारणब्रह्मके बोधक हैं। शिवगणेशसम्बन्धी पद कार्यब्रह्मके बोधक हैं। यातैं—
॥ ५१४ ॥ १ वैष्णवग्रंथनमें विष्णुकी स्तुति औ शिवादिकनकी निंदा हैं। व्यासका यह अभिप्राय है:-कारणब्रह्म उपास्य है औ कार्यब्रह्म उपास्य नहीं ॥
२ तैसैं स्कंदपुराणादिक शैवग्रंथनमें शिवमहेशादिकपद कारणब्रह्मके बोधक हैं औ विष्णुगणेशदेवीस्वर्यादिक पद कार्यब्रह्मके बोधक हैं। यातैं तिनमें भी कारणब्रह्मकी स्तुति औ कार्यब्रह्मकी निंदा है ॥
३ तैसैं गणेशपुराणमै गणेशपद कारणब्रह्मका वाचक औ विष्णुशिवादिकपद कार्यब्रह्मके वाचक हैं। यातैं कारणकी स्तुति औ कार्यकी निंदा है ॥
४ तैसैं कालिकापुराणमै कालिदेव्यादिक पद कारणब्रह्मके बोधक औ विष्णुशिवगणेशसूर्यादिकपद कार्यब्रह्मके बोधक। यातैं कालीपदबोधककारणकी स्तुति औ विष्णुशिवादिकपदबोध्यकार्यब्रह्मकी निंदा है ॥
५ तैसैं सौरपुराणमै सूर्यभादुपदवोध्य कारणब्रह्म है, ताकी स्तुति औ अन्यपदवोध्यकार्यकी निंदा है ॥
इसरीतिसैं सकलपुराणमैं कार्यकारणकी संज्ञालुप संकेतका तौ मेद है। उपादेयहेतु जो अर्थ ताका मेद नहीं ॥ सकलपुराणनमैं—
१ कारणब्रह्मकी उपासना उपादेय है। औ
२ कार्यकी उपासना हेय है । यातैं सारे पुराण एककारणब्रह्मही उपास्यता बोधन करैहैं । तिनका आपसमैं विरोध नहीं ॥
॥ ५१५ ॥ मूर्तिप्रतिपादनका अभिप्राय ॥
गुणादिकमूर्ति मायाके परिणाम हैं औ चेतनके विवर्त्त हैं। यातैं कार्य हैं औ तिनकी भी उपासना कहीहै। तथापि तिन चतुर्हुजादिकमूर्तियोंका जो मायाविशिष्टकारण है, तिसैं विचार कियेैं मेद नहीं। यातैं तिन आकारकारणलुपतैं तिनकी उपासनामैं तात्पर्य है। कहैंत? आकार कार्य है। यातैं तुच्छ है औ कारण सत्य है॥ औ जाकी मन्दप्रज्ञा आकारमैही स्थित होवै, सो शास्त्रप्रज्ञा निश्वल होयके कारणब्रह्मकी उपासना करै। तैसैं वी प्रज्ञा निश्वल होयकै कारणब्रह्मकी उपासनामैं स्थिति होवैहै ॥
॥ ५१६ ॥ कारणब्रह्मकी उपासना इसरीतिसैं कहीहै:- ब्रह्म जगतका कारण है। सत्यसंकल्प है। सर्वज्ञ है। सतंत्र है। सर्वका प्रेरक है। कृपालु है। ऐसें ईश्वरके धर्मनकूँ चिंतन करै ॥ मूर्तिंचिंतनमै शास्त्रका तात्पर्ये नहीं ॥
और—अनेकमूर्ति जो शास्त्रमैं लिखीहैं, सो उपासनाके निमित्त नहीं। किंतु सारीमूर्ति एकदेशमैं होवैहै औ कदाचित् होवैहै न्यावर्त्तक होवै, सो उपलक्षण कहियेहै। जैसे 'काकवाला देवदत्तका गृह है'। या वाक्यमैं देवदत्तके गृहका काक उपलक्षण है। कहैंत? गृहके एकदेशमैं काक होवैहै औ कदाचित् होवैहै। सर्वदा नहीं। औ अन्यगृहतैं देवदत्तके गृहका न्यावर्त्तक है। तैसैं जगतका कारण ब्रह्म है। ताके एकदेशमैं मूर्ति होवैहै औ कदाचित् होवैहै। चतुर्हुजादिकमूर्ति कारणब्रह्मवैपही होवैहैं। अन्यमैं नहीं। यातैं न्यावर्त्तक होनैतैं उपलक्षण है ॥
ध्ययपि चतुर्हुज, त्रिनेत्र, सतुंड, अष्ट-वस्तुके स्वरूपका ज्ञान होवै। जैसे काकतैं
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॥ उत्तरमीमांसाकी प्रमाणता । औरनकी अप्रमाणता ॥
देवदत्तके गृहका ज्ञान होवै । अन्य प्रयोजन काहेकैं नहीं ॥ तैसैं चतुर्वेदिकआकारनैं निराकारकारणब्रह्मका ज्ञानही उपासनाके निमित्त मृतिंप्रतिपादनका प्रयोजन है । अन्य नाहीं ॥ औ
॥ ५१७ ॥ आकारनमें आगृहवाले शैवादिककूं खेदकी प्राप्ति ॥ मंदमज्ञावाले शास्त्रअभिप्रायकूं समझैबिना तिन आकारमैं आगृह करें । और ख्यालसारमैंन्या-गतैं परस्पर कलह करेंहैं ॥ खींके भाईकूं म्याल कहैंहैं । कुंकुरकूं सारमेय कहैंहैं । दृष्टांतकूं न्याय कहैंहैं ॥ kिसीके सालेका नाम उत्फालक था और सालेके श्वश्रूका नाम धावक था ॥ तिस पुरुषके गृहके कुंकुरेकां नाम धावक औ दूसरें गृहके कुत्तरकां नाम उत्फालक था ॥ तहां तिस पुरुष-पक्की खी गृहविपै प्रथम आई । तव दूसरें कुंकुर आपसमें हमेस लड़हैं । तहां थोके पतिश्वसुर-आदिक उत्फालककूं गालि देवैं । औ अपने धावककी वड़ाई करें तब तव खींकरै यह भ्रांति हुई:-मेरे भाईकूं गालि देवैंहैं । ताके श्वश्रूकी वड़ाई करेंहैं ॥ तैसैं दूषित दूयेकैं भरतसैं केश करतैहुई ॥
जैसैं तिनके अभिप्राय जानैबिना समान-संज्ञातैं भ्रमकरिके खींनैं कलेश किया तैसैं वैष्णवग्रंथनमैं शिवादिकनमतैं कार्यब्रह्मकी निंदा करैंहैं । तहां अभिप्रायकूं नहिं जानिकै शैवादिक दुःखित होवैंहैं । और विष्णुनामतैं कार्यकी निंदाहू नहीं जानिके वैष्णव दुःखित होवैंहैं ॥ औ और— सकलपुराणनका यह अभिप्राय हैः- १ कारणब्रह्म उपास्य है । २ कार्यब्रह्म त्याज्य है ॥ १ मायाविशिष्टचेतन कारणब्रह्म कहियेहै ॥ २ मायाकृत कार्यविशिष्टचेतन कार्यब्रह्म कहियेहै ॥ यहही अर्थ भारतकी टीकाके आरंभमैं लिख्याहै । और सारे वेदांतनका यहही सिद्धांत है ॥
॥ ५१८ ॥ उत्तरमीमांसाकी प्रमाणता । औरनकी अप्रमाणता । ५१८-५२० ॥ ॥ चौपाई ॥ सुभसंतति सुनि शुतके बैना । उपज्यो जियमें किंचित चैनां ॥ pुनि तिन प्रस्थ कियो निजपूताहिं । शास्त्र परस्पर कहत असूताहिं ॥१०१॥ तहांः-पुराणमे विरोधशंकाके नाशितै चैन कहियै सुख हुया औ पदशास्त्रनकी परस्पर-विरोधशंका मिटी नाहीं । यातैं किंचित चैन हुवा । सर्वथा नाहीं । असत कहियै विरुद्ध कहैहै ॥
॥ चौपाई ॥ तिनमैं सत्य कौन सो कहियै । जाको अर्थ बुद्धिमैं लहियै ॥ १०२ ॥ तर्कदृष्टि सुनि निजपितु वानी । बोल्यो बचन सुनु परमगुरुनी ॥ उत्तरमीमांसा उपदेशा । वेदविरुद्ध न जामैं लेसा ॥ १०३ ॥ शास्त्र पंच ते वेदविरुद्धं । यातैं जानहु तिनहिं असुद्धं ॥
॥ ५१९ ॥ कुजेेा ॥
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किंचितअंस वेदअनुसारी। लवि बहुग्रहत मंद अधिकारी॥१०४॥
टीका:-यद्यपि पदश्रवणके कर्त्ता सर्वज्ञ कहैं॥
१ सांख्यका कर्त्ता कपिल। २ पातंजलका कर्त्ता पतंजलि ( सेपकौ अवतार)।
३ न्यायका कर्त्ता गौतम। ४ वैशेषिकशास्त्रका कर्त्ता कणाद।
५ पूर्वमीमांसाका कर्त्ता जैमिनि। ६ उत्तरमीमांसाका कर्त्ता व्यास॥
इन सबका माहात्म्य प्रसिद्ध है। यातैं इनके वचनरूप शास्त्र वी सारैं समानप्रमाण चाहिये। तथापि सर्ववाक्यनमें प्रवलप्रमाण वेदवाक्य है। कहैंतैं?
१ वेदका कर्त्ता सर्वज्ञईश्वर है। ताकैवै अ्रमसंदेहविप्रलिप्सादोष संभवै नहीं॥
२ इन शास्त्रनके कर्त्ता जीव हैं। तिनवै अ्रमभादिक दोपनका संभव है॥
१ यद्यपि शास्त्रकार वी सर्वज्ञ कहैंहैं तथापि तिनकूं सर्वज्ञता योगमाहात्म्यसैं हुईहै। यातैं गुंजनयोगी हुयेहैं। औ
२ ईश्वरकूं सर्वज्ञता स्वभावसिद्ध युक्तयोगी है।
१ जाकूं चिंतन किये पदार्थका ज्ञान होय सो शुंजानयोगी कहियेहै।
२ जाकूं सर्वदा एकरस सारैपदार्थ अपरोक्ष प्रतीत होवैं सो युक्तयोगी कहियेहै पैसा ईश्वर है॥
१ युक्तयोगीकृतवेदवचन प्रबल। औ- २ शुंजानयोगीकृत शास्त्रवचन हुबेल हैं यातैं—
॥५२०॥ वेदअनुसारीशास्त्र प्रमाण औ
वेदविरुद्ध अप्रमाण। पांचशास्त्र जैसे वेदविरुद्ध हैं तैसे शारिरकआदिकग्रंथनमें स्पष्ट है औ उत्तरमीमांसाकिसीअंशमें वेदविरुद्ध नहीं।
यातैं प्रमाण है और शास्त्र वी किसी अंशमें वेदके अनुसारी देखिके मंदबुद्धि तिनमें विश्वास करेंहैं। परंतु बहुतअंशमें वेदविरुद्ध है यातैं त्याज्य है॥
किसीअंशमें वेदअनुसारी होनेतैं उपादेय होवै तौ जैनशास्त्र वी अहिंसा- अंशमें वेदअनुसारी है सोउपादेय हुयाचाहिये। और त्याज्य है। उपादेय नहीं॥
यद्यपि सुगत ईश्वरका अवतार है। जाकूं बुद्ध कहैंहैं। ताके वचन वी वेदसम मान प्रमाण चाहिये। तथापि बुद्ध विप्रलिप्सानिमित्तसैं हुयाहै। यातैं ताके वचन सर्वथा अप्रमाण हैं॥
वंचनकी इच्छाकूं विप्रलिप्सा कहैंहैं। जाकूं बहकावनेकी इच्छा कहैंहैं॥
यातैं सर्वअंशमें वेदअनुसारी उत्तरमीमांसा- ही सर्वथा मुख्यश्रेष्ठ उपादेय है॥
यद्यपि उत्तरमीमांसा व्यासकृत सूत्ररूप है ताका व्याल्यान वी अनेकपुरुपोंनैं नानारीतिसैं कियाहै तथापि पूर्वचरितोंकरैकृत व्याख्यान- ही वेदअनुसारी है। और नहीं।
यह पंचम- तंत्रमें प्रतिपादन करीहै। यातैं औरपंचशास्त्र अप्रमाण हैं॥५२१॥ अन्यशास्त्रनकी योग्यतामैं
हष्टांत औ हेतु॥५२१-५२२॥ जो इसतंत्रमें पूर्व सारेशास्त्र मोक्षउपयोगी कहे सो तर्कदिटिके सारग्राहीविवेकतैं कहे॥
जैसे किसीका शास्त्र तरवारि मारै तैसे शधिर निकसिके दैवातिसैं रोग निवृत्त होय जावै। तब सारग्राही पुरुप तरवारि मारनेका उपकार मानी लेवै, तैसे अन्यशास्त्रनसैं वी किसीरीतिसैं
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॥ राजाका मृत्यु औ ब्रह्मलोककी प्राप्ति ॥
अंतःकरणकी शुद्धि वा निश्शलता हेतुं पुरुष निष्ठ होयके वेदअनुसार निष्प्रय करै तां मोक्ष होवैहैं ॥ सर्वैथा तिनहींमें आग्रह करै तां अंधगोलांगूलन्यातें अंधकूं प्राप्त होवैहैं ॥ यांतें सकलयास्क त्यागिके अद्वैतन्यायनरीति-मैं उत्तरमीमांसां उपदेश है ॥
॥ ५२२ ॥ अंधगोलांगूलन्यात यह है:-किसी धनिके भूपणयुक्त पुत्रकूं चोर लेगये । वनमें भूपण ले ताके नेत्र फोड़िके छोड़ि गये । तय तां रुदन करते बालककूं कोई निर्देयवंचक वली उन्मत्त घलीवर्दके लांगूल पकड़ाय देवैं आ यह कहैं:- तूं इसका लांगूल मति छोड़ियो । तेरे ग्राममें यह पहुंचाय देवैगा । सो दुःखी-चालक ताके वचनमें विश्वासकरिके दुःख अनु भावकरिके नष्ट होवैहैं ॥
तैंसैं विपयरूप चोर विचेकरूप नेत्रकूं फोड़िके संसारवनमें गैरहैं । तहां भेदवादी-निर्देयवंचक अन्यशास्त्रनके सिद्धांतमें आग्रह करावैहैं औ यह कहैं:- हमारे उपदेशही तेरेकूं परमसुखप्रासिका हेतु होवैगा ! ताकें चाक्यनमें विश्वासकरिके पुरुषार्थखु राहित होवैहैं औ जन्ममरणरूप महा-दुःखकूं अनुभव करहैं । यांतें अन्यशास्त्र त्याज्य हैं ॥
॥ ५२३ ॥ राजाका मृत्यु औ ब्रह्म-लोककी प्राप्ति ॥ ५२३-५२४ ॥
॥ दोहा ॥ तर्कद्विष्टि के बचन सुनी । सुभसंतति तिहि तात ॥
॥ ५५० ॥ भेदवादी चराचायें, तिनके शास्त्रविपै उत्त परमेश्वर औ मोक्षके अपरोक्ज्ञानसैं रहित हैं औ यथोक्तउपासनादिरूप मोक्षके साधनोंसैं रहित हूये वही अन्यहरणके निमित्त लोकनकूं अपने संसै सोक नस्यो सकल । लघ्यो हिये कुसलात ॥
१०५ ॥ करणब्रह्म उपासना । करी बहुत चित लाय ॥ तकद्वष्टि निज लिखै गुरु । राजसमाज चढाय ॥ १०६ ॥
टीका:- यद्यपि तर्कद्विष्टि पुत्र था तथापि उपदेश उत्तम कन्या । यांतें गुरुपदवीकूं प्राप्त हुवां । यह ब्रह्मविद्याका माहात्म्य है ॥
॥ ५२४ ॥ ॥ दोहा ॥ कछू वदीयौ काल तव । तजि राजा निजभ्रान । मदालोकनैं सो गयो । मुनि जहँ जात सध्यान ॥१०७॥
टीका:- राजाके मरणका देशकाल कबहू नहीं । ताका यह अभिप्राय है:- उपासकके मरणमें देशकालकी अपेक्षा नहीं । दिनमें मरे अथवा रात्रिमें । दक्षिणायनमें अथवा उत्तरायण-पवित्रभूमिमें अथवा अपवित्रमें ॥ सर्वैथा उपासनके वलतें देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोककी प्राप्ति होवैहै ॥ और अद्वैतके प्रसंगमें जो पूर्व देशकालकी अपेक्षा कहीं सो योगसहित-उपासककूं कहीहै ॥ केवलईश्वरशरणउपासककूं देशकालकी अपेक्षा नहीं । यह अर्थ सूत्रकार-भाष्यकारनै प्रतिपादन कियाहै ॥
संप्रदायके चिन्हसहित सांकेतिक मंत्रका उपदेश देवैहैं औ हमारे उपदेशसैं अन्यसन्मार्गतैं रुकै हूये इनका साराजनम व्यर्थ होवैगा । ऐसी करुणा त्यावते नहीं । यांतें निर्देयवंचक हैं ॥
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॥ ५३५ ॥ तर्कदृष्टिका देहपात औ परमात्मासैं अमेद ॥
॥ दोहा ॥ राजकाज सब तज कियो । तर्कदृष्टि हुसियार ॥ लग्यो न रंचक रंग तिहि । लख्यो ब्रह्म निरधार ॥ १०८ ॥ अंत भयो प्रारब्धको । पायो निश्चल गेह ॥ आतम परमातम मिल्यो । देह खेहतैं छेह ॥ १०९ ॥
टीका:-देहका खेह कहिये राखमैं । छेह कहिये अंत । आत्मा कहिये कूटस्थसाक्षी ताका परमात्मासैं अमेद ॥ यद्यपि कूटस्थका परमात्मासैं सदाअमेद है तथापि उपाधिर्ऋत मेद है ॥ उपाधिके लयतैं उपाधिॄतमेदका अभाव होवैहै ॥ परमात्मासैं अमेद कध्यो ताका यह अभिप्राय है:-विदेहमुक्तिमैं ईश्वरतैं अमेद होवैहै । शुद्धचेतनब्रह्मसैं नहीं । यह वार्त्ता शारीरकभाष्यके चतुर्थऽध्यायमैं प्रतिपादन करीहै ॥ तहां यह प्रसंग है:-
१ विदेहमुक्तिमैं सत्यसंकल्पादिकलुपकी प्राप्ति जामनिक मतसैं कहीहै ॥ २ औडुलोमिके मतसैं सत्यसंकल्पादिकनका अभाव कध्याहै ॥ ३ सिद्धांतमतमैं सत्यसंकल्पादिकनका भाव अभाव दोऊं कहेहैं । ताका यह अभिप्राय है:-ईश्वरतैं अमेद होवैहै, ईश्वरके सत्यसंकल्पादिक मुक्तमैं । अन्य जीवोंकरि व्यपहार करिये है ॥ सो ईश्वर परमार्थडष्टिसैं शुद्ध है । ताकेविषै
कोई गुण है नहीं । किंतु निर्गुण है । यातैं सत्यसंकल्पादिकनका अभाव है ॥ यद्यपि संसारदशाविपै थी जीव परमार्थसैं निर्गुण है, शुद्ध है, तथापि जीवकूं संसारदशामैं अविद्यासैं कर्त्तोपनाभोक्तापना प्रतीत होवैहै ॥ ईश्वरकूं कदै बी आत्मामैं अथवा अन्यमै संसार प्रतीत होवै नहीं । यातैं सदा असंग निर्गुण शुद्ध है । यातैं ईश्वरतैं जो अमेद है सोई शुद्धसैं अमेद है ॥ औ-
ईश्वरतैं अमेदकूं शुद्धअवसैं अमेद नहीं मानैं तो ईश्वरकूं शुद्धअवस्थाकी प्राप्ति कदै बी होवै नहीं । कहैंतैं:-जीवकी न्याई ईश्वरकूं उपदेशजन्य ज्ञान औ विदेहमोक्ष तौ कदै होवै नहीं । सदा प्राप्त जो ताका रूप सो शुद्ध नहीं । यातैं जीवतैं बी न्यून ईश्वर सदािसिद्ध है । यह सिद्ध होवैगा । यातैं यह मानना योग्य है:-
१ ईश्वरकूं आवरण नहीं । यातैं उपदेशजन्य ज्ञानकी अपेक्षा नहीं ॥ २ आवरणके अभावतैं भ्रांति नहीं । यातैं नित्यसर्वज्ञ है । नित्यमुक्त है ॥ ३ माया औ ताका कार्य आत्मामैं प्रतीत होवें नहीं । यातैं सदा असंग है । याहीतैं शुद्ध है ॥
इसरीतिसैं ईश्वरतैं अमेदही शुद्धचेतनसैं अमेद है ॥ औ दृष्टांतसैं बी ईश्वरतैंही अमेद सिद्ध होवैहै ॥ जैसे मठमैं घटका अभाव होवै तौ मठाकाशमैं घटाकाशका लय होवैहै । महाकाशमैं नहीं ॥ तैसे विद्वान्का शरीर ईश्वरकृत ब्रह्मांडमैं नष्ट होवैहै औ ब्रह्मांड सारा ईश्वरशरीरमयाके अंतरभूत है ॥ विद्वान्का आत्मा विदेहमोक्षमैं ब्रह्मांडके बाहिरि गमन करै नहीं । यातैं ईश्वरतैं
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अभेद होवेंहैं । परंतु जैसैं मठाकाशसैं घटाकाश-का अभेद हुवा । सो मठाकाश महाकाशरुपहै । तैसैं ईश्वरतैं अभेद होवेंहैं, सो ईश्वर भेदरसमही है । यांतैं भेदरपकी प्राप्ति कठिन जु औरनिवंध हैं । जिनमें मतके भेद होवेंहैं ॥
॥ ९३९ ॥ इस भाषाग्रंथके रचनाका प्रयोजन ॥
पहैं ग्रंथ अंडेतके । रह्यो न एकहु सेप ॥ ९३९ ॥
कठिन जु औरनिवंध हैं । जिनमें मतके भेद ॥
॥ ९४० ॥
श्रमते अवगाहन किये । निश्शलदास सवेद ॥ ९४२ ॥
॥ दोहा ॥
यह विचारसागर कियो । जामें रत्न अनेक ॥
तिन यह भापाग्रंथ किय । रंच न उपजी लाज ॥
तामें यह इक हेतु है । दयाधर्म सिरताज ॥ ९४३ ॥
गोष्य वेदसिद्धांततें । प्रगट लहत सविचेक ॥
विन व्याकरण न पढ़ि सकै । सांख्य न्यायमें अ्रम कियो ।
पंडित व्याकरण असेप ॥
॥ ९५? ॥
रहैं मत रसय हैं—ज्ञाननिपुणि । निपुणि विदेहमोक्षतैं पूर्वे मठौंदिजमत कछु हैहि । नांरै । किंतु खुसन्रमादि है । यांैं ताकी दरिसैं तां खुसदरिसैंदि अभेद होवेंहैं । सोई तांैं खुसकी प्राप्ति है । ओ—
अतद्जनोंकी दृष्टीसैं मठौंदभादिक उच्यैं लौं प्रतोत होवेंहैं । यांतैं तिनकी दृष्टीसैं जानिका देहसरसैं ( ईश्वरके देहरुप त्रैलोक्येसैं ) अभेद होवेंहै । सो ईश्वर वास्तवअभेदलकी है । यांतैं वी जानिकी खुसद्रलकी प्राप्ति होवेंहैं ॥
उक्तविदेहमोक्षैं ज्ञानीजीवका ग्रहसैं जो अभेद, जांने ) ओ तिसकरि सो परमानंदकौं पावै । इस तांैं आभासवादभादिक भिन्नभिन्न वेदांतके पक्षनका भिरोमणि दयाधर्मभूषित हेतुतैं यह भापाग्रंथरुप वापिका कियो मिट्टसुमुद्र कियोहैं, तिसकी वृद्धि श्रो अधिक-वितारसैं ठसैया है । सोई विचारसागरके पछतरंग-गत ४९१ दै अंकके टिप्पणमें हमैं संक्षेपतैं
जानियाहैं ॥
॥ ९५२ ॥ जाने पास दोरी लोटा होैं सो !
नृपते जरुरका पान करिबेकहैं ओ जानै पास वह सामदी नांरै सो लूपके जलका पान करसक्ता नांरै । तौ वी सो पुरप वापिका ( बावड़ी ) के मिसा भिस्टसुमुद्रके जलका पान धनायाससैं कर-सक्ताहैं । तैसैं जाने कार्यकोशऽऽकारगरसुप
सामदी है सो तो सांख्यमतप्रन्यनके अर्थेकौं तात्परयसहित जानिसक्ताहैं जाने पास यह सामदी नहीं, सो पुरप मंदसुबुद्धिचाला है । यांतैं सो संस्कृतमंधनके अर्थकौं जानिसक्ता नांरै । तौ वी सो मंदपुरुष इस भापाग्रंथके अर्थक सरायसैं पढ़ै ( याके अर्थकौं
जाने ) ओ तिसकरि सो परमानंदकौं पावै । इस भापाग्रंथरुप वापिका कियो मिट्टसुमुद्र कियोहैं, तिसकी वृद्धि श्रो अधिक-वितारसैं ठसैया है । सोई विचारसागरके पछतरंग-गत ४९१ दै अंकके टिप्पणमें हमैं संक्षेपतैं
वै वी भापा जाननेंवाले जनौंकै विशेष सुखकर होनैतैं हितकारक हैं ॥
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॥ मंगलाचरणपूर्वक ग्रंथकी समात्ति ॥
पढै याहि अनयासही । लहै सु परमानंद ॥१९४॥ ॥ ५२७ ॥ मंगलाचरणपूर्वक ग्रंथकी समात्ति ॥ दिशीतैं पच्छिमदिशा । कोस अठारह गाम ॥ तामैं यह पूरो भयो । किहडौली तिहि नाम ॥ १९५ ॥ ज्ञानी मुक्ति विदेहमें । जासौं होय अभेद ॥ ॥ ५५३ ॥ किहडौलीग्राममें श्रीनिष्कलङ्कदासजीका गुरुडार है । तहाँ अव्यापि तिनकी शिष्यशाखा वी है । तिनोंनै जो ग्रंथ संग्रह कियेथे वे वी तहाँ विधमान हैं ॥
दादू आदूरूप सो । जाहि बखानत वेद ॥ १९६ ॥ नामरूप व्यविचारिमें । अनुगत एक अनूप ॥ दादूपदको लच्छ्य है । अस्तिभातिप्रियरूप ॥ १९७ ॥ इति श्रीविचारसागरे जीवनमुक्तिविदेह-मुक्तिवर्णनं नाम सप्तमस्तरंगः समाप्तः ॥ ७ ॥ ॥ इति श्रीपंडितपीतांबरविरचित विचार-सागरटीप्पणिकायां सप्तमतरंगटीप्पणं संपूर्णम् ॥
॥ समासोऽयं विचारसागरो ग्रंथः ॥
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॥ श्रीवृत्तिरत्नावलि ॥
अथोत्
॥ श्रीवृत्तिप्रभाकरसार ॥
॥ अथ प्रथमरत्नप्रारंभः ॥ ९ ॥
॥ सकारणसंभेद वृत्तिस्वरूप-निरूपण ॥ १-२४ ॥
॥ ग्रंथकर्तृकृतमंगलाचरण ॥
॥ दोहा ॥ जागृत स्वप्न सुपुस्तिको, साक्षी में पर जानि ॥ दुखद देह अभिमानकी, होय मूल्युत हानि ॥ ८ ॥
॥ ९ ॥ वृत्तिके सामान्यलक्षणका निर्णय ॥ १-९ ॥
॥ १ ॥ "अहं ब्रह्मास्मि " या वृत्तिसें कार्यसहित अज्ञानकी निस्तिि औ परमानंदकी प्राप्ति होवैहैं । यह वेदांतका सििद्ांत है ॥ ॥ २ ॥ तहां यह जिज्ञासा होवैहैं:- वृत्ति किसकूं कहैंहैं औ वृत्तिका कारण कौन है औ वृत्तिका प्रयोजन कौन है? यातैं वृत्तिप्रभाकरका सारांशभूत वृत्तिरलावलिनाम ग्रंथ लिखैंहैं ॥ ॥ ३ ॥ अंतःकरणक औ अज्ञानका जो
परिणाम, सो वृत्ति कहियेहैं ॥ यद्यपि क्रोधसुखादिक अंतःकरणके परिणाम हैं औ आकारादिक अज्ञानके परिणाम हैं, तिनकूं वृत्ति नहीं कहैंहैं, तथापि विपयका प्रकाशक जो अंतःकरण औ अज्ञानका परिणाम, सो वृत्ति कहियेहैं ॥
॥ ४ ॥ क्रोधसुखादिकरूप जे अंतःकरणके परिणाम, तिनतें किसी पदार्थका प्रकाश होवै नहीं । तैसैं आकारादिकनतैं वी प्रकाश होवै नहीं, यातैं सो वृत्ति नहीं, किंतु ज्ञानरूप परिणामतैं प्रकाश होवैहैं, ताहीकूं वृत्ति कहैंहैं ॥
॥ ५ ॥ यद्यपि सुख, दुःख, काम, वृति, क्रोध, क्षमा, धृति, अश्रुति, लज्जा औ भयादिक जितने अंतःकरणके परिणाम हैं, तिन सर्वका अनर्थनामें वृत्तिशब्दसैं व्यवहार लिख्याहै, तथापि तत्त्वज्ञानुसंधान अद्वैत- कोसुभादिक ग्रंथनमें प्रकाशकपरिणामही वृत्ति कछाहै ॥ औ—
॥ ६ ॥ कितनेक ग्रंथनमें अज्ञाननाशक परिणामकूं वृत्ति कहैंहैं । औ परोक्षज्ञानसैं वी असच्च्यापादक अज्ञानांशका नाश होवैहै ।
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॥ सकारणसम्बन्ध-वृत्तिस्वरूपानिरूपण ॥ १—२४ ॥
अथवा विपयचैतनस्थ अज्ञानका नाश तौ| तासैं प्रथमही निरावृत ज्ञानीके स्वरूपका
अपरोक्षज्ञानविना होवै नहीं। प्रमाणचैतनस्थ
अज्ञानका नाश परोक्षज्ञानसैं वी होवैहै। यातैं
परोक्षज्ञानमें उत्तलक्षणकी अन्यासि नहीं॥
॥ ७ ॥ तथापि सुखदुःखके ज्ञानरूप
वृत्तिमैं औ मायादृत्तिरूप ईश्वरके ज्ञानमें, तथा
शुक्तिरजतादिगोचर भ्रमलुप अविद्यादिस्थम
औ स्वप्नगोचर औ सुप्रतिभगत सुख औ
अज्ञानगोचर विद्यादृत्तिमैं औ प्रत्यभिज्ञा ज्ञानरूप
वृत्तिमैं उत्तलक्षणकी अन्यासि है। कहैंतैं ?-
९ प्रथमं अज्ञातसुखादिक उपजैं, पीढ़े
तिनका ज्ञान होवै, तौ सुखादिज्ञानतैं चेतनके
अज्ञानका नाश संभवै। सो अज्ञातसुखादिक
हैं नहीं। किंतु सुखादिक औ तिनका ज्ञान
एककालमें उपजैहैं। यातैं अज्ञातसुखादिकनके
अभावतैं सुखादिगोचरवृत्तिरैं अज्ञानका नाश
संभवै नहीं॥
२ तैसैं ईश्वरदृं असाधारणरूपपैंत सकल-
पदार्थ सदा प्रत्यक्ष प्रतीत होवैहैं, यातैं अज्ञानके
अभावतैं मायाकी वृत्तिरूप ज्ञानतैं वी अज्ञानका
नाश संभवै नहीं ॥
३ शुक्तिरजतादिक औ स्वप्नगत मिथ्या
पदार्थनकी औ तिनके ज्ञानकी वी एककालमें
उत्पत्ति होवैहै। यातैं भ्रमवृत्तिसैं वी अज्ञानका
नाशं होवै नहीं ॥
४ तैसैं सुप्रतिभमें वृत्ति है तौ वी अपने
विषयभूत स्फुरूपादान अहं स्वरूपसुखके आवरण
अज्ञानका नाश तिसतैं होता नहीं औ ज्ञान-
गोचर प्रत्यभिज्ञा ज्ञान होवैहै। तहां वी
आवरणके अभावतैं तिसतैं तौका नाश होवै
नहीं ॥ जैसैं "अहं ब्रह्मास्मि " इस एकवार
उदयभये ज्ञानसैं स्वरूपके आवरणका नाश
होवैहै। पीढ़े अनेकवार विचारसैं विद्वानदृं
'अहं ब्रह्मास्मि ' ऐसी वृत्ति उदित होवैहै।
तासैं प्रथमही निरावृत ज्ञानीके स्वरूपका
आवरण मंग होता नहीं। तैसैं धारावाहिक
वृत्ति होवै तहां वी उत्तफलकी द्वितीयादि-
वृत्तिमैं अन्यासि है॥ कहैंतैं ? ज्ञानधारै होवै तहां
प्रथमज्ञानसैं अज्ञानका नाश हुये द्वितीयादिक
ज्ञानदृं अज्ञानकी नाशकता संभवै नहीं ॥
॥ ८ ॥ यातैं प्रकाशकपरिणामकूं वृत्ति
कहैंहैं। याका यह भाव है:- "असत्त्" "न्यचहार-
का हेतु जो अविद्या औ अंतःकरणका परिणाम,
सो वृत्ति कहियेहै ॥
॥ ९ ॥ प्रकाशकपरिणामकूं वृत्ति कहै वी
अज्ञातपदार्थगोचरवृत्तिमेंही अज्ञाननाशकता-
रूप प्रकाशकता होऔ अनावृतपदार्थगोचर
वृत्तिमैं प्रकाशकता है नहीं। कहैंतैं ? अनावृत
चेतनके संघंगेसैंही विपयप्रकाशके संभवतैं
वृत्तिमैं प्रकाशकताकी कल्पना अयोग्य है।
यातैं वृत्तिमैं अज्ञाननाशकतासैं विना अन्य-
विधप्रकाशकताके असंभवतैं द्वितीयलक्षणकी वी
प्रथमलक्षणकी अन्यासि होवैगी। यातैं "असत् न्यचहारका
हेतु अविद्या औ अंतःकरणका परिणाम"
वृत्ति कहियेहै ॥
॥ २ ॥ वृत्तिके भेदका निरूपण
॥ १०—१७ ॥
१०॥ सो वृत्तिज्ञान दोप्रकारका है ॥
१ एक प्रमाणरूप है औ २ दूसरौ अग्रामरूप है ॥
॥ ११ ॥
९ ( ९ ) प्रमाणजन्य यथार्थज्ञानकूं प्रमा
कहैंहैं ॥
( २ ) वा अवाधितअर्थकूं विपय करने-
वाले ज्ञानकूं प्रमा कहैहैं ॥
( ३ ) वा अवाधितअर्थकूं विपय करनेहारे
स्मृतिसैं भिन्न ज्ञानकूं प्रमा कहैहैं ॥
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(४) चा यथार्थअनुभवहूँ प्रमा कहहैं । २ तैंसें भिन्न ज्ञानहूँ अपमा कहहैं । ॥१२॥ प्रथमलक्षणके अनुसार तौ प्रत्यक्षादिमेदतं प्रमाणज्ञान पट्प्रकारका है । औ तैंसें भिन्न ईश्वरज्ञान औ सुखादिगोचरज्ञान औ स्मृतिज्ञान औ अ्रमज्ञान अप्रमारूप हैं । तिनमें ईश्वरज्ञानादिक यथार्थअप्रमा हैं औ अ्रमज्ञान अयथार्थअप्रमा है । औ-
॥ १३ ॥ काहू ग्रंथकारके मतमें तौ यथार्थज्ञान प्रमा है औ अयथार्थज्ञान अपमा है । ताकी रीतिसें द्वितीयलक्षण है ताके अनुसार तौ ईश्वरज्ञान औ सुखादुःखादिगोचरज्ञान औ स्मृतिज्ञान थी प्रमा हैं । औ अ्रमज्ञान अपमा है । परंतु-
॥ १४ ॥ प्राचीनआचार्योंने स्मृतितिसें भिन्न यथार्थज्ञानिमें प्रमाणव्यवहार कियाहै । यातें स्मृतिसें व्यावृत्त प्रमाका लक्षण कलपाचाहिये । ताकी रीतिसें तृतीय औ चतुर्थलक्षण है । ताके अनुसार तौ प्रत्यक्षादिप्रमादिक ज्ञान औ ईश्वरज्ञान औ सुखादिगोचरज्ञानहू प्रमा हैं औ तैंसें भिन्न स्मृतिज्ञान औ अ्रमज्ञान अपमा हैं ॥
॥ १५ ॥ मुक्तिरजतादिज्ञान स्मृतितिसें भिन्न हैं । अवाचितअर्थकूं विपय करें नहीं । किंतु वाचितअर्थकूं विपय करेंहें । यातें प्रमा नहीं ॥ औ अवाचित अर्थकूं विपय करनेंवाला स्मृतिज्ञानहू है औ स्मृतिज्ञानमें प्रमाज्यवहार है नहीं । यातें बहुतग्रंथनमें "स्मृतितिसें भिन्न अवाचितअर्थ-गोचरज्ञान" सो प्रमा कहियेहै ॥
॥ १६ ॥ चतुर्थेलक्षणकी पदकृत्ति यह है:-यथार्थ तौ स्मृति थी है । सो अनुभवरूप नहीं । अनु.स्मव तौ अ्रमज्ञान थी है । सो यथार्थ नहीं । यातें "यथार्थअनुभव" प्रमा है ।
औ तैंसें भिन्न अपमा है । यह प्रमाका लक्षण थी स्मृतिसें न्यायतस है ॥ ॥ १७ ॥ ईश्वरज्ञान औ सुखादिगोचरज्ञान यी यथार्थ अनुभवरूप हैं । यातें सो यी प्रत्यक्षादि पदअनुभवकी नाईँ प्रमा है । तैंसें भिन्न स्मृतिज्ञान औ अ्रमज्ञान अपमा हैं । तौ अप्रमालिक निरूपण आगे अथमार्त्तनें लेकै तयोदशरत्नपर्यंत कहेंगे ॥
॥ ३ ॥ प्रमा औ अप्रमाकी संख्य़ा अरु कारण ॥ १८-२४ ॥
॥ १८ ॥ प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति, शाब्दी, अर्थापत्ति औ अभाव, ये पदप्रमाणजन्य ज्ञान । इस भेदतें प्रमाणज्ञान अष्टविध है ॥
॥ १९ ॥ १ प्रत्यक्षादिप्रमाण औ प्रत्यक्षकी मेद सुखादिज्ञान जीवआश्रितप्रमा कहियेहैं । औ-
॥ २० ॥ २ भूत-भावी-वर्त्तमान सकलपदार्थगोचर मायाकी वृत्तिरूप ज्ञान ईश्वरआश्रित प्रमा कहिये है ॥
॥ २० ॥ फेर तिनमें— १ प्रत्यक्षप्रम औ मायाकी वृत्तिरूप ईश्वरका ज्ञान औ प्रत्यक्षप्रमाके अंतर्गत सुखादिगोचरज्ञान प्रत्यक्षरूप हैं । औ-
२ शाब्दादिप्रमाणजन्य मांतिकी है ॥
३ तैंसें अभावप्रमा थी प्रत्यक्षपरोक्षमेदतें दो-भांतिकी है । अथवा अभावकूं विवादका विपय होनेंतैं अभावप्रमा परोक्षही है । औ-
४-६ अनुमिति उपमिति औ अर्थापत्तिप्रमा परोक्षही हैं ॥
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|| ३१ || प्राणिके कर्मनके अनुसार सृष्टिके आदिकालमें सर्वपदार्थनके विपय करनैवाला ईश्वरका ज्ञान उपजैहै, सो भूत-भविष्यत्-वर्तमान सकलपदार्थके सामान्यविशेष-भावकूं विषय करैहै औ प्रलयपर्यंत स्थायी है । यातैं एक औ नित्य कहैहैं । ताका उपादानकारण माया है औ निमित्तकारण सर्वग्राणिनके अदृष्टादिक हैं ॥
|| ३२ || धर्मादिक निमित्तसैं अनुकूलप्रतिकूलपदार्थके संबन्ध होनैं अंतःकरणके सत्व-गुणका औ रजोगुणका परिणामरूप सुखदुःख होवैहै ॥ जो सुखदुःखका निमित्त है, ताहि निमित्तसैं सुखदुःख विषय करनैवाली अंतःकरणकी वृत्ति होनैहै । ता वृत्तिमैं आरूढ साक्षी सुखदुःखकूं प्रकाशैहै । ताका अंतःकरण उपादान है औ वृत्त्यादिक निमित्त हैं ॥
|| ३३ || प्रमाणजन्य यथार्थज्ञान पदविथ है। तिसका उपादानकारण अंतःकरण है औ निमित्तकारण प्रत्यक्षादिप्रमाण तथा इंद्रियसंयोगादिक हैं ॥
|| ३४ || अविद्याके परिणाम भ्रमज्ञानका उपादानकारण अविद्या है औ निमित्तकारण सजातीयवस्तुके ज्ञानजन्य संस्कार । प्रमाणादोष प्रमेयदोष अविद्याष्ठानके सामान्य-अंशका अज्ञान औ तिमिरादिक हैं ॥
|| इति श्रीवृत्तिरत्नावलीयां सकारणसमेदवृत्तिस्वरूपनिरूपणं नाम प्रथमं रत्नं समाप्तम् ॥१॥
|| अथ द्वितीयरत्नप्रारंभः || २ ||
|| १ || प्रत्यक्षप्रमाणनिरूपण || २५-८८ ||
|| ८ || षट्प्रमाणोंके नाम लक्षण औ मतभेदसैं स्विकार || २५-२७ ||
|| २५ || प्रमाणके षट्भेद हैं:-प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति औ अनुपलब्धि ।
अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति औ अनुपलब्धि ।
|| २६ || १ प्रत्यक्षप्रमाके जो करण सो प्रत्यक्ष-प्रमाण कहियेहैं !
२ अनुमितिप्रमाके करणकूं अनुमान-प्रमाण कहैहैं ॥
३ शब्दप्रमाके करणकूं शब्दप्रमाण कहैहैं ॥
४ उपमितिप्रमाके करणकूं उपमानप्रमाण कहैहैं ।
५ अर्थापत्तिप्रमाके करणकूं अर्थापत्ति प्रमाण कहैहैं ॥
६ अनुपलब्धिप्रमाके करणकूं अनुपलब्धि-प्रमाण कहैहैं ॥
प्रत्यक्ष औ अर्थापत्तिप्रमाणके औ प्रमाके एकही नाम हैं॥
|| २७ || १ चार्वाकके मतमैं एक प्रत्यक्षप्रमाण मान्यहै॥
२ कणाद औ सुगतके मतमैं प्रत्यक्ष औ अनुमान, ये दो प्रमाण मानेंहैं ॥
३ सांख्यशास्त्रका कर्ता जो कपिल है, ताके मतमैं प्रत्यक्ष, अनुमान औ शब्द ये तीन प्रमाण मानेंहैं ।
४ नैयायशास्त्रका कर्ता जो भौतम है ताके मतमैं प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द औ उपमान, ये चारिप्रमाण मानेंहैं ॥
५ पूर्वमीमांसाका एकदेशी भट्टका शिष्य जो प्रभाकर है । ताके मतमैं प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, औ अर्थापत्ति, ये पांच प्रमाण मानेंहैं ॥
६ भट्टके मतमैं षट्प्रमाण मानेंहैं औ-
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७ वेदांतके ग्रंथनमें ची पट्ट्रमाणही लिखेहैं ॥
यद्यपि सूत्रकारभाष्यकारनैं प्रमाणसंख्या लिखी नहीं तथापि सिद्धांतका अविरोधी जो भट्ट मत है ताहूँ अद्वैतवादमैं मानैहैं । यातें वेदांतपरिभाषादिक ग्रंथनमें पट्ट्रमाणही लिखेहैं ॥
॥५॥ प्रत्यक्षप्रमाण औ प्रमाके स्वरूपका निर्णय ॥ २८—३५ ॥
॥ २८ ॥ अज्ञनाका ज्ञापक प्रमाण कहियेहैं ? वा प्रमाका करण प्रमाण कहियेहैं ? प्रत्यक्षग्रामके करण नेत्रादिकंद्रियन हैं, यातें नेत्रादिकइंद्रियनकूं प्रत्यक्षप्रमाण कहैंहैं ॥
॥ २९ ॥ न्यायपारवाला जो असाधारण कारण होवै, सो करण कहियेहैं । अथवा व्यापारसहित जो असाधारण कारण होवै, सो करण कहियेहैं ॥
॥ ३० ॥ कार्यमैं नियत अव्यभिचारपूर्ववृत्ति होवै, सो कारण कहियेहैं । सो कारण १ साधारण औ २ असाधारण भेदतैं दो भांतिका है ॥
१ सर्वकार्यके कारणकूं साधारणकरण कहहैं । ईश्वर औ ताके ज्ञान, इच्छा, क्रति, दिश्रा, काल, अदृष्ट, प्रागभाव औ प्रतिबंधकाभाव, ये नव साधारणकारण हैं ॥ २ इनमैं भिन्न जे घटादिकके कपालादिक कारण, सर्व असाधारणकारण हैं ॥ तिनमैं वी ( १ ) कोई उपादानकारण होवैहैं ( २ ) कोई निमित्तकारण होवैहैं ॥
( १ ) जाके स्वरूपमैं कार्यकी स्थिति होवै, सो उपादानकारण कहियेहैं ।
( २ ) तैंसे भिन्न निमित्तकारण कहियेहैं । जैसैं घटका उपादान द्रुपद है औ निमित्त दंडादिक हैं ।
असाधारणकारण वी दोप्रकारका होवै है:-१ एक तौ व्यापारवाला होवैहै । औ २ दूसरा व्यापाररहित होवैहै ॥
कारणतैं उपजिके कार्यकूं उपजावै, सो व्यापार कहियेहैं । जैसैं कपाल घटका कारण है औ कपाल दोक संयोग वी घटका कारण है ॥ तहां कपालकी कारणतामैं संयोग व्यापार है । कहेहैं ? कपालसंयोग कपालतैं उपजैहै औ-१ कपालके कार्य घटकूं उपजावैहै । यातैं संयोगरूप व्यापारवाला कारण कपाल है । औ-२ जो कार्यकूं किसीद्वारा उपजावै नहीं किंतु आपही उपजावै, सो व्यापारहीन कारण कहियेहैं ॥
कपालका संयोग असाधारणकारण तौ है, व्यापारवाला नहीं । यातैं करण नहीं कहियेदै। केवल घटका कारण कहियेहैं ॥
॥ ३१ ॥ तैसैं प्रत्यक्षप्रमाके नेत्रादिक इंद्रिय करण हैं । कहेहैं ? नेत्रादिक इंद्रियनका अपने अपने विषयतैं संबंध नहीं होवै, तौ प्रत्यक्षप्रमा होवै नहीं । इंद्रियविषयका संबंध होवै तव उपजिके प्रत्यक्षप्रमाकूं उपजावैहै, सो व्यापार असाधारणकारण इंद्रिय हैं । यातैं इंद्रियनकूं प्रत्यक्षप्रमाण कहहैं । इंद्रियजन्य यथार्थज्ञानकूं प्रत्यक्षप्रमात कहहैं ॥
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॥ ३२ ॥ यद्यपि जिनके मतमें मनइंद्रिय नहीं, उनके मतमें इंद्रियजन्यता प्रत्यक्षका लक्षण नहीं, तथापि तहाँ विपयचेतनका वृत्तिचेतनसें अभेदही प्रत्यक्षज्ञानका लक्षण है। ताहींसू प्रत्यक्षप्रमाण वेद कहैहै ॥
॥ ३३ ॥ सो प्रत्यक्षप्रमाण दोप्रकारकी है:-१ एक अभिज्ञाप्रत्यक्ष है औ २ दूसरी प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्ष है ॥
१ केवल इंद्रियादिसंबंधजन्य ज्ञान अभिज्ञाप्रत्यक्ष है। औ— २ प्रत्यक्षसामग्रीसहपूर्वसंस्कारजन्य ज्ञान प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्ष है ॥
सो प्रत्येक वि आंतरप्रत्यक्षप्रमाण औ वाद्यप्रत्यक्षप्रमाणके भेदतें दो प्रकारकी है। आंतरप्रत्यक्षप्रमाण वि दोप्रकारकी है:-एक आत्मगोचर है औ दूसरी अनात्मगोचर है ॥
आत्मगोचर वि दोप्रकारकी है:-एक शुद्धात्मगोचर है औ दूसरी विशिष्टात्मगोचर है। शुद्धात्मगोचर वि दोप्रकारकी है:-एक तो ब्रह्मागोचर है औ दूसरी ब्रह्मगोचर है ॥
॥ ३४ ॥ “त्वं” पदार्थबोधक वेदांतवाक्यसैं “शुद्ध: प्रकाशोज्ज्वल” एसी वृत्ति होवैहै, ता वृत्तिदेशमैं अंतःकरणउपहित शुद्धचेतन है। यातैं ता वृत्तिके विषय चेतनमैं ब्रह्मता वि है। परंतु ता वृत्तिमैं ब्रह्माकारवृत्ति हुई नहीं। कहैंतें? अवांतरवाक्यसैं होती तौ ब्रह्माकारवृत्ति हुईहै। महावाक्यसैं वि होती। कहैंतें—
॥ ३५ ॥ शब्दजन्यज्ञानका यह स्वभाव है:-सहिततपदार्थसैं जिसरूपतैं शब्द बोधन करै, तिसरूपकूं ज्ञान विपय करैहै औ जिसरूपतैं शब्द करै नहीं, तिसरूपतैं शब्दजन्यज्ञान विपय करै नहीं ॥
जैसेँ:-दशमपुरुषपदँ “दशमोऽस्ति” इसरीतिस कहैं, तब “दशमोऽहं” इसरीतिसैं श्रोताँ ज्ञान होवै नहीं ॥ जैसेँ दशमैं आत्मता है, तथापि आत्मताचोधक शब्दाभावतैं आत्मताका ज्ञान होवै नहीं, तैसैं आत्मामैं ब्रह्मता सदा है तौ वि ब्रह्मताचोधक शब्दाभावतैं ज्ञान होवै नहीं। यातैं उक्तवृत्ति ब्रह्मागोचरशुद्धात्मगोचरसुद्धात्मगोचर है ॥
॥ ३६ ॥ शंकासमाधानपूर्वकँ प्रत्यक्षप्रमाणका निर्णय ॥ ३६-५३ ॥
॥ ३६ ॥ प्रत्यक्षके प्रसंगतैं यह शंका होवैहै:-सिद्धांतमैं 'इंद्रियजन्यज्ञान' प्रत्यक्ष होवैहै। इसका तैं अंगीकार नहीं। कहैंतैं? वाद्यघटादिकनका प्रत्यक्षज्ञान तौ सिद्धांतमैं वि इंद्रियजन्य है तौ वि मनकूँ इंद्रियताका अभाव-
तैं आंतरसुखदुःखका ज्ञान इंद्रियजन्य नहीं। किंतु सुखदुःख साक्षीभास्य है ॥ विशिष्टात्म-भाग स्वयंप्रकाश है। यातैं जीवका ज्ञान वि साक्षीभास्य है। चेतन-करण शब्द है। यातैं वह वि शब्दप्रमाणजन्य ज्ञान सर्व मनइंद्रियजन्य है तौ वि मायाकी वृत्तिरूप ईश्वराश्रितप्रत्यक्षप्रमाण मैं इंद्रियअनुमान-
दिग्रमाणजन्य नहीं। यातैं तहाँ ताके मतमैं वि अन्याथि होतैं इंद्रियजन्यता प्रत्यक्षज्ञानका लक्षण नहीं। किंतु—
॥ ३७ ॥ वृत्तिव्यवच्छिन्नचेतनसैं विषयाव-चेतनका हेतु है ॥
१ जहाँ 'त्रियसंवद्ध घटादिक होवें, तहाँ इंद्रियद्वारा अंतःकरणकी वृत्ति वाद्य जायके विपयके आकारके समानाकार होयके विपयतैं
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संघंधवती होवैहै । यातैं वृत्तिचेतनकी औ विषयचेतनकी उपाधि एकदेशमें होवेंतैं उपहित-चेतनका वी अभेद होवैहै ॥
२ तैसैं सुखादिकज्ञान यद्यपि इन्द्रियजन्य नहीं औ शुद्धात्मज्ञान वी शब्दजन्य है इन्द्रियजन्य नहीं, तथापि विषयचेतन औ वृत्तिचेतनका भेद नहीं । कहैंतैं ? सुखाकारवृत्ति अंतःकरणद्वेषमै है औ सुख वी अंतःकरणमें है । यातैं वृत्तिउपहितचेतन अरु विषयउपहितचेतनका अभेद है ॥
तैसैं आत्माकारवृत्तिका उपादानकरण अंतःकरण है औ अंतःकरणउपहित चेतनके अभिमुख हुईहै । यातैं आत्माकारवृत्ति वी अंतःकरणद्वेषमें होवैहै, सो अंतःकरणही शुद्धात्माकी उपाधि है ॥
इसरीतिसैं दोनों उपाधि एकदेशमें होवेंतैं वृत्तिचेतन अरु विषयचेतनका अभेद होवैहै । यातैं सुखादिकज्ञान औ शुद्धात्मज्ञान प्रत्यक्षरूप है ॥
॥ ३८ ॥ इहाँ यह निष्कर्ष है:-जहां विपयका प्रमातासैं छत्रिद्वारा अथवा साक्षाद संबंध होवै, तिस विपयका ज्ञान प्रत्यक्ष है । सो विपय वी प्रत्यक्ष कहिये है । जैसे घटका प्रमाता सैं छत्रि प्रत्यक्ष है, तव घट प्रत्यक्ष है, ऐसां न्यायवार होवैहै ॥
॥ ३९ ॥ वाध्यपदार्थनका वृत्तिद्वारा प्रमातासैं संबंध होवैहै, सुखादिकनका प्रमातासैं साक्षात्संबंध है ॥
अतीतसुखादिकनका प्रमातासैं वर्तमान-संबंध नहीं । यातैं अतीतसुखादिकनका ज्ञान स्मृतिरूप है । प्रत्यक्षरूप नहीं ॥
॥ ४० ॥ अतीतसुखादिकनका वी प्रमातासैं संबंध तौ हुया है, तथापि प्रत्यक्षलक्षणमें वर्तमानका निवेश है ॥
१ "प्रमातासैं वर्तमानसंवंधी योग्यविषय" प्रत्यक्ष कहियेहै ॥
२ "प्रमातासैं वर्तमानसंवंधी योग्यविषयका ज्ञान" प्रत्यक्षज्ञान कहियेहै ॥
योग्य कहैं तौ धर्मोंदिक सदा प्रमाताके संबंधी हैं, यातैं सदाही प्रत्यक्ष कहैं चाहिये औ तिनका शब्दादिकनसैं ज्ञान होवैहै, सो प्रत्यक्षज्ञान कबौं चाहिये ॥ धर्मोंदिक प्रत्यक्षयोग्य लक्षणमें योग्यपदके निवेशतैं दोप नहीं ॥ १ योग्यता औ २ अयोग्यता अनुसवके अनुसार अनुसेय हैं ॥
१ जौं वस्तुमैं प्रत्यक्षताका अनुभव होवै, तामैं योग्यता । औ—
२ जामैं प्रत्यक्षताका अनुभव नहीं होवै, तामैं अयोग्यता ।
यह अनुमान अथवा अर्थापत्तिमैं ज्ञान होवैहै ॥
इसरीतिसैं प्रत्यक्षयोग्यवस्तुका प्रमातासैं वर्तमानसंवंध होवै, तहां प्रत्यक्षज्ञान होवैहै । या अर्थमें—
॥ ४१ ॥ यह शंका है:-ब्रह्मपोचरज्ञान परोक्ष नहीं हुयाचाहिये ! कहैंतैं ? ब्रह्मका प्रमातासैं असंबंध होवै तौ वाध्यादिज्ञानकी न्यौई ब्रह्मज्ञान वी परोक्ष होवै ॥ जौं अवांतरवाक्यसैं "सत्यकल्प, ज्ञानस्वरूप, अनंत-स्वरूप ब्रह्म है" ऐसें वृत्ति होवै, तिसकालमें वी ब्रह्मका प्रमातासैं संबंध है । यातैं अवांतरवाक्यजन्य ब्रह्मज्ञान वी प्रत्यक्षही हुया चाहिये औ सिद्धांतमें अवांतरवाक्यजन्य ब्रह्मज्ञान प्रत्यक्ष नहीं, किंतु परोक्ष है । सो उक्तरीतिसैं संभवै नहीं ॥ या शंकाका—
॥ ४२ ॥ यह समाधान है:-प्रत्यक्षलक्षणमें विपयका योग्यता विशेषण कहाहै । तैसैं योग्यप्रमाणजन्यता ज्ञानका विशेषण है । यातैं
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उक्तदोष नहीं । चाहते हैं ? प्रमातासैं वृत्तिमानसंवंधवाला जो योग्यविषय, ताका योग्यप्रमाणजन्य ज्ञान प्रत्यक्षज्ञान कहियेहै ॥ या लक्षणमैं उक्तदोष नहीं । चाहते हैं ?-
॥ ४३ ॥ वाक्यकै यह स्वभाव है:-
१ श्रोताके स्वरूपबोधकपदघटित वाक्यतैं अपरोक्शज्ञान होवैहै । २ श्रोताके स्वरूपबोधकपदरहित वाक्यतैं परोक्षज्ञान होवैहै ॥
विपयसंहित होवै औ प्रत्यक्षयोग्य होवै तौ वी स्वरूपबोधकपदरहित वाक्यतैं अपरोक्षज्ञान होवै नहीं ॥ जैसैं दशमके बोधक द्विविधवाक्य हैं ॥
१ एक तौ "दशमोसि" ऐसा वाक्य है । औ- २ दूसरा "दशमस्त्वमसि" ऐसा वाक्य है ॥
तिनमैं प्रथमवाक्यसैं श्रोताकूं दशमका परोक्षज्ञानही होवैहै । वाक्यजन्य ज्ञानका विषय दशमपुरुष है । सो दोनूं स्थानमैं अतिसंहित है ॥
जो स्वरूपसैं भिन्न होवै औ संबंधी होवै, सो संहित होवैहै औ प्रत्यक्षयोग्य है ॥ दशमपुरुष श्रोताके स्वरूपसैं भिन्न नहीं । किंतु श्रोताका स्वरूप है । यातैं अतिसंहित है औ प्रत्यक्षयोग्य है । जो प्रत्यक्षयोग्य नहीं होवै तौ द्वितीयवाक्यसैं बी दशमका प्रत्यक्षज्ञान नहीं हुयाचाहिये औ द्वितीयवाक्यसैं प्रत्यक्षज्ञान होवैहै । यातैं प्रत्यक्षयोग्य है ॥
इसरीतिसैं 'अतिसंहित' औ वाक्यजन्यप्रत्यक्षयोग्यताका जो वाक्यसैं प्रत्यक्षज्ञान होवै नहीं तौ वह वाक्य अयोग्य है ॥ द्वितीयवाक्यसैं तिसी दशमका अपरोक्शज्ञान होवैहै, यातैं द्वितीयवाक्य योग्य है ॥ वाक्यनकी योग्यता औ अयोग्यतामैं और तौ कोई हेतु है नहीं । स्वरूपबोधकपदघटितत्व औ स्वरूपबोधकपदरहितत्वही योग्यता औ अयोग्यताके संपादक हैं ॥
इसरीतिसैं- १ "दशमस्त्वमसि" यह वाक्य तौ योग्यप्रमाण है । तिसतैं जन्य "दशमोसि" यह प्रत्यक्षज्ञान है ॥ २ तैसैं "दशामोसि" यह वाक्य अयोग्यप्रमाण है । तिसतैं जन्य कहिये उत्पन्न जो "दशमः कुतोऽस्ति" ऐसा दशमका ज्ञान सो परोक्ष है ॥
॥ ४४ ॥ तैसैं ब्रह्मबोधक वाक्य भी दोप्रकारके हैं:- १ "सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म" इसरीतिसैं अवांतरवाक्य हैं ॥ २ "तत्वमसि" इसरीतिसैं महावाक्य हैं ॥
१ अवांतरवाक्यनमैं श्रोताका स्वरूपबोधक पद नहीं है । यातैं प्रत्यक्षज्ञानके जननमैं योग्य अवांतरवाक्य नहीं ॥ औ- २ महावाक्यनमैं श्रोताके स्वरूपक बोधक पद हैं । यातैं प्रत्यक्षज्ञानजनननमैं योग्य महावाक्य है ॥
१ इसरीतिसैं योग्यप्रमाण महावाक्य हैं । तिनसैं उत्पन्न हुया ज्ञान प्रत्यक्ष है ॥ औ- २ अयोग्यप्रमाण "सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म" इत्यादिक वाक्य हैं । तिनसैं उपज्या ब्रह्मका ज्ञान परोक्ष होवैहै ॥
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|| ४५ || अवांतरवाक्य वि दोषकारक हैं:-१ तत्पदार्थके बोधक हैं और २ तमपदार्थके बोधक हैं । तिनमें—
१ तत्पदार्थबोधक वाक्य तो अयोग्य हैं और-२"घ एष ह्यंतज्योंति: पुरुष:"इत्यादिक तमपदार्थबोधक अवांतरवाक्य तो महावाक्यनको न्याई योग्य हैं । अयोग्य नहीं । कहैंतैं ? श्रोतके स्वरूपके बोधक तिनमें पद हैं । यातैं तमपदार्थबोधक अवांतरवाक्यतैं भी अपरोक्ष-ज्ञान होवैहै । परंतु वह अपरोक्षज्ञान ब्रह्माभेद-गोचर नहीं । यातैं परमपुरुषार्थका साधक नहीं। किंतु परमपुरुषार्थका साधन जो अभेद-ज्ञान, तामैं पदार्थशोधनद्वारा उपयोगी है ॥
इसरीतिसैं प्रमातैं संबंधी भी ब्रह्म है और योग्य है । तथापि अयोग्य जो अवांतरवाक्य तिनतैं प्रमाताके परोक्षज्ञान संग्रह होवैहै ॥ या कहनेतैं-
|| ४६ || अन्यथांका होवैहै:-प्रमातासैं घटमानसंवंधवाला जो योगविषय, ताका योग्यप्रमाणजन्य ज्ञान प्रत्यक्षज्ञान कहियेहै । या फहनेतैं सुखादिकनके प्रत्यक्षमैं उत्तलक्षणका अभाव है । कहैंतैं सुखादिप्रत्यक्षमैं प्रमाणजन्यता का अभावतैं योग्यप्रमाणजन्यता सर्वथा संंभवै नहीं । यातैं उत्तलक्षणमैं अव्यासिदोप है
या शंका—
|| ४७ || यह समाधान है:- योग्य प्रमाणजन्यताका लक्षणमैं प्रवेश नहीं । किंतु अयोग्यप्रमाणअजन्यताका प्रवेश है । यातैं अव्यासि नहीं । कहैंतैं ? "प्रमातासैं वर्तमान-संवंधवाला जो योग्यविषय, ताका अयोग्य-प्रमाणसैं अजन्यज्ञान " सो प्रत्यक्षज्ञान कहियेहै । इसरीतिसैं कहे अवांतरवाक्यजन्य ब्रह्मज्ञानकी व्याप्ति होवैहै ।
उत्तरीतिसैं ब्रह्ममात्रके बोधक अवांतर वाक्य अयोग्यप्रमाण हैं ॥
वि. सा. ४३
१ "ब्रह्मास्ति" यह परोक्षज्ञान तिनतैं जन्य है । अन्य नहीं । यातैं परोक्षज्ञानमैं लक्षण जावै नहीं ॥ औ-
२ सुखादिगोचरज्ञानका संग्रह होवैहै । कहैंतैं सुखादिगोचरज्ञान किसी प्रमाणतैं जन्य नहीं । यातैं अयोग्यप्रमाणतैं अन्य
३ इंद्रियजन्यपटादिज्ञान, तैसैं महावाक्य-जन्य ब्रह्मज्ञान योग्यप्रमाणजन्य होनेतैं यातैं प्रत्यक्षज्ञानका उत्तलक्षण दोपरहित है॥
इसप्रकार इहां प्रमातासैं विषयका अभेद हेतु है और विपयीकी अपरोक्षता सो ज्ञानगत अपरोक्षतामैं हेतु है ॥ तथाहों—
|| ४८ || यह शंका होवैहै:- प्रमातासैं अभेदअर्थकूं अपरोक्ष मानिके अपरोक्ष-अर्थनोचर्ज्ञानकूं अपरोक्षत्व कहैं, तौ स्वप्रकाशआत्मसुखरूप ज्ञानमैं अपरोक्ष-ज्ञानके लक्षणकी अन्यासि होवैगी । कहैंतैं ?
अपरोक्ष कहिये विषय जिसका तिस ज्ञानकूं अपरोक्ष कहैं तौ ज्ञानका और विपयका परस्परमेद सापेक्ष विपयविपयीभाव-संवंध है । तिसी स्थानमैं ज्ञानगत अपरोक्ष-लक्षण होनेतैं विपयविपयीरभावके असंभवतैं
तामैं उत्तलक्षण संबंचै नहीं ॥
अध्यापि पूर्वमीमांसके वार्तिककारभट्टके शिष्य प्रभाकरके मतमैं "स्व कहिये अपना स्वरूप है, प्रकाश कहिये विषयी जिसका, सो स्वप्रकाश" कहियेहै । इसरीतिसैं स्वप्रकाश-पदके अर्थसैं भी अभेदमैं विषयविपयीभाव संंभवैहै । तथापि प्रकाशयप्रकाशकका भेद अनुभवसिद्ध होनेतैं भेदविना प्रभाकरका विषयविपयीभाव असंगत है । यातैं स्वप्रकाश-
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।। ९ ।। प्रत्यक्ष प्रमाण निरूपण ।। २५-८८ ।।
[ द्वितीयतनावलि ]
पदका उत्तअर्थ नहीं । किंतु “ स्व कहिये अपनी सत्तासैं , प्रकासा कहिये ‘संशयादिराहित्य’ ही स्वप्रकासापदका अर्थ अद्वैतग्रंथनमैं कछाहै ।
इसीरितैं स्वप्रकासाज्ञानतैं अभिन्न स्वरूपसुखमैं विषयविपयीभावके अभावतैं अपरोक्षता उत्कलक्षण तो संभव नहीं ।। यातैं
।। ४९ ।। अपरोक्षता यह लक्षण है :-“ स्वव्यवहारके अनुकूल चैतन्यसैं अनाआृत विपयका अमेद ‘ अपरोक्षत्वका लक्षण है ।
अनाआृतविपयतैं स्वव्यवहारानुकूल चेतनका अमेद अपरोक्षज्ञानका लक्षण है । यातैं शाब्दजन्यप्रत्यक्षज्ञानविपै भी अपरोक्षता संभवैहै । अन्यासिदोप नहीं ।
१ स्व कहिये विषय तौ घटादिगोचरवृत्तिकालमैं घटादिक है तथापि सो चेतन नहीं ।
२ चेतन तौ ताका आधिष्ठान है । सो चेतनमैं सर्वज्ञ्यवहारहेतुवृत्तिके अभावतैं ता घटादिविपयाकारवृत्तिके अनुकूल नहीं ।
३ स्वव्यवहारके अनुकूल तौ वृत्तिवाअभिन्नसाक्षीचेतन है । सो तिस घटादिविपयाकारवृत्तिके अभावतैं ता घटादिविपयसैं अभिन्न नहीं ।
४ साक्षीचेतनसैं अमेद तौ धर्मोधर्मीका है । सो साक्षी तिसमैं प्रत्यक्षयोग्यताके अभावतैं स्वव्यवहारके अनुकूलचेतन नहीं ।
यद्यपि संसारदशामैं वी वृत्तिविशिष्टचेतन जीवका ब्रह्मसैं अमेद होवैहैं सर्वप्रमाणसैं ब्रह्म अपरोक् है , ऐसा व्यव हार हुयाचाहिये ।
औ अवांतरवाक्यजन्य ब्रह्मका ज्ञान वी अपरोक्ष हुयाचाहिये , तथापि संसारदशामैं
आत्मतब्रह्मका स्वव्यवहारानुकूलचेतनसैं अमेद है । अनाआृतब्रह्मरूप विपयका अमेद नहीं होनैहैं ब्रह्ममैं अपरोक्षत्व नहीं ।
।। ५० ।। १ यह शंका है :- चेतनमैं घटादिक अध्यस्त हैं औ विपयाकारवृत्तिकालमैं वृत्तिचेतनसैं विपयचेतनकी एकता होनैतैं
स्वाधिष्ठानविपयचेतनसैं अभिन्नघटादिकका वृत्तिचेतनसैं अमेद हुये वी ताकी उपाधिरूप वृत्तिसैं अमेद संभवै नहीं । जैसे रज्जुमैं
कल्पित सर्पदंडमालाका रज्जुसैं अमेद हुये वी सर्पदंडमालाका परस्परमेद होवैहै ।
ब्रह्ममैं कल्पित सकलदृइतका अमेद नहीं औ ब्रह्ममैं अमेद हुये वी परस्परअमेद होवै नहीं ।
तैसैं वृत्तिचेतनसैं तौ वृत्तिका औ घटादिकनका अमेद संभवैहै । तिनकी उपाधिभूत वृत्ति औ घटादिक विपयका परस्परअमेद होवै
नहीं । यातैं वृत्तिरूप प्रत्यक्षज्ञानमैं उत्कलक्षणकी अन्यासिदोप है ।
।। ५१ ।। २ अन्यशंका :- समनंगोचर कहिये एकविपयवाले ज्ञानमात्रसैं अज्ञानकी निस्तिति मानैं परोक्षज्ञानसैं अज्ञानकी
निस्तिति हुयाचाहिये ! इस दोषके परिहारअर्थै अपरोक्षज्ञानसैं अज्ञानकी निस्तिति कहीहै । तामैं अन्योन्याश्रयदोप होवैहै । कहैंत ? ज्ञानकी
निस्तिति कहि अनाआृतविपयका स्वव्यवहारानुकूलचेतनसैं अमेद हुया । ज्ञानका अपरोक्षत्व कहलातैं अज्ञानकी निस्तितिके आधीन
अज्ञनकी निस्तितिके आधीन अपरोक्षत्व कहलातैं
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॥ ७ ॥ आंतप्रत्यक्षमामके भेदकानिर्धार ॥ ५८-६१ ॥
ज्ञानेके अपरोक्षत्वकी सिद्धि कही । यातैं परस्परऐक्ष्या होनैंतैं अन्योन्याश्रयदोष होवैहै ॥
तादात्म्यसंबंध तौ प्रमाणकी महिमातैं कहैहैं ॥ अन्यज्ञानक ब्रह्मसैं तादात्म्यसंबंध है, सो ब्रह्मकूं व्यापकता होनैंतैं औ सकलकी उपादानता होनैंतैं विपयकी महिमातैं कहैंहैं ॥
ये दो शंका हैं ॥ तामैं—
॥ ५२ ॥ १ प्रथमशंकाका उत्तरः— अद्वैतवेद्याचार्यकी रीतिसैं अपरोक्षत्वधर्म चेतनका है वृत्तिका नहीं । जैसैं अहमित्यादिक अंतःकरणवृत्तिके धर्म हैं, तैसैं अपरोक्षत्वधर्म वृत्तिमैं नहीं हैं किंतु विपयाकारवृत्तिउपहितचेतनके अपरोक्षत्वका उपाधि वृत्ति है । यातैं ताका आरोपकारिके वृत्तिज्ञान अपरोक्ष वृत्तिमैं ताका आरोपकारिके वृत्तिज्ञान अपरोक्ष व्यव हार होवैहै । औ वृत्तिका धर्म मानै तो सुखादिगोचर वृत्तिके अनंगीकारपक्षमैं साक्षी रूप अपरोक्षज्ञानमैं अपरोक्षत्व व्यवहार नहीं हुया जाहिये । यातैं वृत्तिका धर्म नहीं ॥
इसीरीतिसैं वृत्तिज्ञान लक्ष्य नहीं । किंतु चेतन-ज्ञान लक्ष्य है । यातैं अन्याथि नहीं ॥
॥ ५३ ॥ २ अन्यशंकाका उत्तरः— ज्ञान मात्रसैं अज्ञानकी निवृत्ति औ अपरोक्ष-ज्ञानसैं अज्ञानकी निवृत्ति नहीं कहैंहैं । किंतु प्रमाणकी महिमातैं जहाँ विपयतैं ज्ञानका तादात्म्यसंबंध होवै, तिस ज्ञानसैं अज्ञानकी निवृत्ति होवैहै ॥
प्रमाणमहिमातैं वाधकइंद्रिय-जन्यज्ञान औ महावाक्यरूप प्रमाणमहिमातैं शाब्दजन्यग्राह्यज्ञान विपयतैं तादात्म्यसंबंधवाला होवैहै । यातैं उक्तउभयज्ञानसैं अज्ञानकी निवृत्ति होवैहै ॥
यद्यपि सर्वका उपादान ब्रह्म होनैंतैं ब्रह्म-गोचर सकलज्ञानोंका तादात्म्यसंबंध है । यातैं अनुमितिरूप ब्रह्मज्ञानतैं औ अवांतरवाक्य-जन्य ब्रह्मके परोक्षज्ञानतैं अज्ञानकी निवृत्तिं हुई चाहिये । तथापि महावाक्यतैं जीवब्रह्मका अभेदगोचरज्ञान होवै । ताका विपयसैं
तादात्म्यसंबंध तौ प्रमाणकी महिमातैं कहैहैं ।
अन्यज्ञानक ब्रह्मसैं तादात्म्यसंबंध है, सो ब्रह्मकूं व्यापकता होनैंतैं औ सकलकी उपादानता होनैंतैं विपयकी महिमातैं कहैंहैं ॥
इसीरीतिसैं उक्त अपरोक्षज्ञानके लक्षणमै अन्योन्याश्रय दोष नहीं । यातैं उक्तलक्षण निर्दोष है ॥
यद्यपि अपरोक्षज्ञानके लक्षणमै और वी शंकासमाधानरूप विवाद रहैत है । सो कठिन जानिके औ विस्तारके भयसैं लिख्या नहीं । संक्षेपतैं रीतिमात्र जनाईहै ॥
ऐसैं प्रसंगसैं प्रत्यक्षज्ञानका लक्षण कछा ॥
॥ ७ ॥ आंतरप्रत्यक्षप्रामाके भेदका निर्धार
॥ ५४-६१ ॥
॥ ५४ ॥ पूर्वपक्षंग यह है:- शुद्धात्मगोचर प्रत्यक्षप्रमादोप्रकारकी है:-एक ब्रह्मगोचर है, दूसर ब्रह्मागोचर है । ब्रह्मागोचर कहि आये ॥
महावाक्यजन्य “अहं ब्रह्मास्मि” इस-रीतिसैं ब्रह्मसैं अभेदआत्मकूं जो विपय करै सो ब्रह्मगोचरशुद्धात्मगोचर प्रत्यक्षप्रमादोप्रकारकी है । “अहं ब्रह्मास्मि” या ज्ञानकूं वाचस्पति मनोज्ञ कहैहैं । औरनके मतमै यह ज्ञान शाक्यजन्य है ॥
॥ ५५ ॥ तामैं ही इतना भेद है । संक्षेप-शारीरकका यह सिद्धांत है:- महावाक्यतैं ब्रह्मका प्रत्यक्षज्ञानही होवैहै । कदै बी परोक्ष-ज्ञान महावाक्यतैं होवै नहीं ॥
॥ ५६ ॥ अन्यपंथकारोंका यह मत है:- विचारसहित महावाक्यतैं अपरोक्षज्ञान होवैहै । विचाररहित केवलवाक्यतैं परोक्षज्ञान होवैहै ॥
॥ ५७ ॥ सर्वैके मतमै “अहं ब्रह्मास्मि” यह ज्ञान शुद्धात्मगोचर है औ ब्रह्मगोचर है ।
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॥ ३ ॥ प्रत्यक्षप्रमाणनिरूपण ॥ २५-८८ ॥
[ चैतन्यवादौपाधिक ]
तैसैं प्रत्यक्ष है । या अर्थमैं किसीक़ा विवाद नहीं ॥
॥ ५८ ॥ जीवईश्वरक़ा स्वरूपनिरूपण वी ग्रंथकारोंनै आभासवाद अवच्छेदवाद वृंप्रति-विंचवादादिरीतिसैं बहुत्रकारसैं लिख्याहै । तहां—
१ जीवके स्वरूपमैं तौ एकत्वअनेकत्वका विवाद है । औ—
२ सर्वेश्वमतमैं ईश्वर एक है । सर्वज्ञ है । नित्य मुक्त है ॥
ईश्वरमैं आवरणका निरूपण किसी अद्वैत-वादके ग्रंथमैं नहीं ॥ जो ईश्वरमैं आवरण कहै सो वेदांतसंग्रदायसैं बहिर्मूत है । परंतु नाना-अज्ञानवादमैं जीवाथित भ्रांतिविपयक अज्ञान है । यह वाचस्पतिक़ा मत है । तहां जीवके अज्ञानतैं कलिप्त ईश्वर खो हैं । तथापि जीवके अज्ञानसैं कलिप्त ईश्वर थी सर्वज्ञही मानेंहैं । ईश्वरमैं आवरणका अंगीकार नहीं ॥
॥ ५९ ॥ इसरीतिसैं वेदांतकी अनेकप्रक्रिय हैं । तामैं आग्रह नहीं । कहैंहैं ? प्रक्रियाही मोक्षकी हेतु नहीं । किंतु तिस प्रक्रियातैं जन्म जो बोध है, सो केवल मोक्षका हेतु है यातैं—
१ चेतनमैं संसारधर्मका संभव नहीं । औ—
२ जीवईशक़ा परस्परमैद नहीं ।
इसअर्थके बोधअर्थ अनेकरीति कहीहैं । जिस पक्षसैं असंगग्रहात्माका बोध होवै, सोई पक्ष आदरणीय है । यह सर्वग्रंथकारोंका तात्पर्य है । यामैं किसीक़ा विवाद नहीं ॥
॥ ६० ॥ ऐसैं शुद्धात्मगोचरप्रमाके दो भेद कहे औ विशिष्टात्मगोचरप्रत्यक्षप्रमाके अनंतभेद हैं ॥
"अहं सुखी । अहं दुःखी । अहं मज्ञः:" । इततैं आदिलेक अनंतभेद हैं ॥
यद्यपि अवाधितअर्थतैं विपय करै सो ज्ञान प्रमा कहियेहै । "अहं कर्त्ता" इत्यादिकज्ञान-का "अहं न कर्त्ता" इत्यादिक ज्ञानसैं बाध होवैहै, ताकूं प्रमा कहऩा संभवै नहीं, तथापि संसारदशामैं अवाधितअर्थकूं विपय करै सो प्रमा कहियेहै ॥
संसारदशामैं उत्तज्ञानोंका बाध होवै नहीं यातैं प्रमा है ॥
इसीरीतिसैं आत्मगोचरआंतरप्रत्यक्षप्रमाके भेद कहे ॥
॥ ६१ ॥ "मथि सुखं । मथि दुःखं" । इत्यादिक सुखादिगोचरज्ञान वी आत्मगोचर-प्रत्यक्षप्रमा है । परंतु—
१ "अहं सुखी, अहं दुःखी" इत्यादि-समैं तो अहंपदक़ा अर्थ आत्मा विशेष्य है औ सुखदुःखादिक विशेषण हैं ॥
२ "मथि सुखं । मथि दुःखं" इत्यादिक प्रमामैं सुखदुःखादिक विशेष्य हैं । आत्मा विशेषण है ॥
यातैं "मथि सुखं । मथि दुःखं" इत्यादिक ज्ञानकूं आत्मगोचरप्रत्यक्षप्रमा़ नहीं कहैंहैं । किंतु सुखादिक विशेष्य होनेंतैं अनात्मगोचरआंतरप्रत्यक्षप्रमा़ कहैहैं ॥
इसप्रकार आंतरप्रत्यक्षप्रमाके भेद कहे ॥
॥ ६२ ॥ वाह्यप्रत्यक्षप्रमाके भेदक़े कथनपूर्वक श्रोतृजप्रमाक़ा निर्देश ॥ ६२-७१ ॥
वाध्यप्रत्यक्षप्रमा़ पांचप्रकारकी ग्राण ये हैं । यातैं सो प्रत्यक्षप्रमाण है ॥
इस इंद्रियतैं जन्म यथार्थज्ञान क़मतैं श्रोतृशमा
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त्वाचप्रमा चाक्षुप्रममा रासनप्रमा औ ग्राणजप्रमा कहियेहैं ॥
॥ ६३ ॥ यद्यपि शब्दजन्यज्ञान औ किसी ग्रंथकारके मतमें अनुपलब्धिप्रमाणजन्य अभावका ज्ञान, ये दोनूं अपरोक्ष होवेहैं । यातैं प्रत्यक्षप्रमाके सप्तभेद कहे चहिये ॥
काहेतैं ? श्रोत्र आकाशके सत्लगुणभागतैं उपजैहै । यातैं कार्यरूप द्रव्य है औ दो द्रव्यौंका संयोग होवैहै । यातैं श्रोत्रका आकाशसैं संयोग है औ संयोगवालेकौं संयुक्त कहेहैं । यातैं श्रोत्रसंयुक्त आकाश है । तैसैं शब्दगुणका तादात्म्यसंवंध है । कहहैं ? सिद्धांतमे २ जातिव्यक्तिकौं, ३ क्रियाक्रियावान्का औ ४ कार्यउपादानकारणका तादात्म्यसंवंध है ॥
॥ ६८ ॥ १ (१) अनेकधर्ममें जो एकधर्म रहै, ताकौं जाति कहेहैं । (२) जातिके आश्रयहूँ व्यक्ति कहेहैं ॥
२ (१) कर्मसैं भिन्न जो जातिमात्रका आश्रय वा द्रव्यमें भिन्न जो जातिका आश्रय, सो गुण कहियेहै ॥ (२) गुणके आश्रयहूँ गुणी औ द्रव्य कहेहैं ॥
३ (१) चेतनकौं क्रिया कहेहैं । (२) ताके आश्रयहूँ क्रियावान कहेहैं ॥
४ (१) उत्पन्न होवै सो कार्य कहियेहै । (२) कारणका लक्षण कहियै ॥
यातैं श्रोत्रका शब्दसैं श्रोत्रसंयुक्ततादात्म्यसंवंध सिद्ध हुवा । औ—
॥ ६९ ॥ दोप्रकारके शब्दमें जो शब्दत्वजाति, ताके ज्ञान जो कतवादि औ तार्तदि तासौं श्रोत्रका श्रोत्रसंयुक्त तादात्म्यवत् तादात्म्यसंवंध है । कहहैं ? तादात्म्यवालेकौं तादात्म्यवत कहहैं औ अभिन्न वी कहहैं । यातैं उत्कसंवंधवाला होतैं श्रोत्रसंयुक्ततादात्म्य-वत् जो शब्द है, तासौं शब्दत्वादिकनका तादात्म्य है ॥
॥ ७० ॥ यद्यपि आकाशतैं वी श्रोत्रका संयोगसंवंध है औ वृक्षमाण रसनाग्राणका वी द्रव्यसैं संयोग है । यातैं इन तीन इंद्रियतैं वी द्रन्यका प्रत्यक्ष क्रिया चहिये, तथापि श्रोत्रमें
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औ रसनाग्राणमें द्रव्यके प्रत्यक्षकी योग्यता नहीं । यातें वह संबंध साकल्य नहीं । किंतु निष्फल है ॥ ॥ ७९ ॥ श्रोत्रजन्य ग्रहका श्रोत्रेन्द्रिय करण है । औ श्रोत्रसंयुक्तादात्म्य औ श्रोत्रसंयुक्तादात्म्य, यह दोसंवंध अपने कारण श्रोत्रसें उपजिके, ताकी कोय श्रोत्रग्रामें उपजावैहैं, यातैं व्यापार है औ श्रोत्रग्रमा फल है ॥
॥७॥ बाह्यप्रत्यक्षममाके भेद । त्वाचप्रमााक निर्बंध ॥ ७२-७८ ॥
॥ ७२ ॥ तैसैं त्वकइन्द्रियतैं स्पर्शके औ स्पर्शके आश्रित स्पर्शत्वजाति औ ताके व्याप्य कठिनत्वादिकका ज्ञान होवैहै ॥
॥ ७३ ॥ तहां स्पर्शत्वजातिमान्से ग्राह्यगुणकूं स्पर्श कहैंहैं ॥ सो शीत, उष्ण, अनुणाशीत औ कठिन न्येदतैं चारप्रकारका है ।
जहां त्वक्सैं द्रव्यका प्रत्यक्ष होवै, तहां त्वकूक द्रव्यसैं त्वकसंयोग है । कहैंतैं? त्वकइन्द्रिय वायुके सत्वगुणभागतैं उपजैहै, यातैं द्रव्य सयोगही है ॥
॥ ७४ ॥ उद्भूतलूप औ उद्भूतस्पर्शीवाल पृथिवी, जल, औ तेज, इन तीन द्रव्यनका त्वाचप्रत्यक्ष होवैहै औ अनुद्भूतलूप अनुद्भूतस्पर्शीवाल पृथिवीआदिककूं नों त्वाचप्रत्यक्ष होवें नहीं औ वायुके गुण स्पर्शेका तो त्वाचप्रत्यक्ष होवैहै । परंतू वायुका होवें नहीं । कहैंतैं ?
॥ ७५ ॥ यह नियम है:-जिस द्रव्यमैं उद्भूतलूप होवै, तिस द्रव्यका औ ताकी योग्यजातिका औ ताके आश्रित लुपसंख्यादियोग्यजाजिक औ ताके आश्रित लुपसंख्यादियोग्य गुणनकूं चाक्षुपप्रत्यक्ष दोवैहै । अन्यका नहीं ।
प्रत्यक्षयोग्यकूं उभयूत कहैहैं । औ प्रत्यक्षके अयोग्यकूं अनभूूत कहैहैं ॥ औ— ॥७६॥ जिस द्रव्यमैं उभयूतलूप औ उभयूतस्पर्शी होवै, तिस द्रव्यका औ ताकी जातिका औ ताके आश्रित प्रत्यक्षयोग्यगुणनका त्वाचप्रत्यक्ष होवैहै । अन्यका नहीं । जैसैं धाण . रसन नेत्रमैं लूप औ इंद्रियें दोनूं हैं । परंतू उभयूत नहीं ।
यातैं पृथिवीजलतेजलूप वी तिन . इन्द्रियनका त्वाचप्रत्यक्ष औ चाक्षुप्रत्यक्ष होवै नहीं । औ श्रोत्रमैं जो परमालुस्मरज प्रीतीत होवै, सो न्ययुकलूप पृथिवी है । तामैं उद्भूतलूप है । यातैं न्ययुकका चाक्षुप्रत्यक्ष तौ होवैहै । उद्भूतस्पर्शके अभावतैं त्वाचप्रत्यक्ष होवै नहीं ॥
वायुमैं उद्भूतस्पर्शी तौ है । लूप नहीं । यातैं वायुका त्वाचप्रत्यक्ष तथा चाक्षुप्रत्यक्ष होवै नहीं । यातैं यह सिद्ध हुवा:-द्रव्यके चाक्षुप्रत्यक्षमैं उद्भूतलूप हेतु है औ स्पर्शी दोनूं हेतु हैं ॥
॥ ७७ ॥ इसरीतिसैं जहां त्वाच्चप्रमा होवै, तहां त्वकइन्द्रियका द्रव्यसैं संयोगही संबंध है औ द्रव्याश्रित जो द्रव्यत्वजाति औ त्वाच प्रत्यक्षके योग्य जो स्पर्शे, संख्या, परिमाण, पृथकत्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, औ द्रवत्व, ये नवगुण, तैसैं त्वकूक त्वकसंयुक्तता- दातम्यसंवंध है । कहैंतैं ?
१ स्पर्शमैं त्वकूक योग्यता है । औरकी नहीं । औ— २ लूपमैं नेत्रकी योग्यता है । औरकी नहीं॥ औ— संख्यादिक अषगुणनमैं त्वक् औ नेत्र दोनूं- की योग्यता है । औ— ३ श्रोत्रकी शब्दमात्रमैं योग्यता है । औ
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४ रसनाकी रससात्रमें योग्यता है औ- ५ ग्राणककी गंधमात्रमें योग्यता है ॥ इहाँ मात्रपदसैं द्रव्यमें योग्यताका निपेध है । यातैं त्वकूसैं संयोगवाला होवेंतैं त्वक्- संयुक्त जो द्रव्य, तामैं जाति औ गुणनका तादात्म्य हैं औ स्पष्टोदिगुणमें जो स्पष्टोत्पादिक जाति है, तासैं त्वकूका त्वकूसंयुक्ततादात्म्य- वत्तादात्म्यसंघंध है ॥ यातैं—
॥ ७८ ॥ त्वकूजन्यज्ञानका त्वकूइंद्रिय करण है । औ त्वकूसंयोग औ त्वकूसंयुक्ततादात्म्य औ त्वकूसंयुक्ततादात्म्यवत्तादात्म्य, ये तीन- संघंध व्यापार हैं औ त्वाचप्रमां फल है ॥
॥ ९० ॥ बाह्यप्रत्यक्षमामाके भेद । चाक्षुषप्रमाका निद्धॉर । ७९—८१ ॥ तैसैं नेत्रसैं उद्दतरूपवाले पृथिवी- जलतेजद्रव्यका औ ताके आश्रित योग्यजाति औ रूपसंख्यादिनवयोग्यगुणनका प्रत्यक्ष होवै- है । नेत्रइंद्रियसात्र ग्रााह्यगुणनू रूप कहैंहैं । सो शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश औ चित्र इन मेदानसैं सप्तप्रकारका है ॥
॥ ८० ॥ तहाँ द्रवयसैं नेत्रका संयोगही है औ द्रव्यत्वजाति औ रूपादिगुणनसैं नेत्रसंयुक्त- तादात्म्य है औ रूपादिगुणनके आश्रित रूपत्वा- दिकजातिसैं नेत्रसंयुक्तदातात्म्यवत्तादात्म्य है ।
॥ ८१ ॥ नेत्रजन्यज्ञानका नेत्र करण है औ नेत्रसंयोग औ नेत्रसंयुक्ततादात्म्य औ नेत्रसंयुक्ततादात्म्यवत्तादात्म्य, यह तीनसंघंध व्यापार हैं औ चाक्षुप्रमां फल है ।
॥ ९१ ॥ बाह्यप्रत्यक्षप्रमाके भेद रासनप्रमाका निद्धॉर । ८२—८४ ॥ तैसैं रसनासैं रसका औ ताके आश्रित रसत्काही ज्ञान होवैहै । रसनातैं
ग्राह्य गुणनू रस कहैंहैं । सो मधुर, आम्ल, लवण, कटुक, कपाय, औ तिक्त मेदसैं पदप्रकारका है ॥ ८३ ॥ तहाँ रससैं रसनाका रसनसंयुक्त तादात्म्य औ रस्त्वसैं औ ताके न्याप्य मधुरत्वादिकसैं रसनसंयुक्ततादात्म्यवत्तादात्म्य है । यातैं—
॥ ८४ ॥ रसनजन्यज्ञानका रसनइंद्रिय करण है औ रसनसंयुक्ततादात्म्य औ रसन- संयुक्ततादात्म्यवत्तादात्म्यसंघंध व्यापार है औ रासनप्रमां फल है ॥
॥ ९२ ॥ बाह्यप्रत्यक्षप्रमाके भेद । ग्राणजप्रमाका निद्धॉर औ सामग्रीके अनुवादसहित प्रमक्षप्रमाका उपसंहार । ८५—८८ ॥
तैसैं ग्राणसैं गंधगुणका औ ताके आश्रित गंधत्वजाति औ ताके न्याप्य सुगंधत्व- दुर्गंधत्वका ज्ञान होवैहै । ग्राणसैं ग्राह्य गुणनू गंध कहैंहैं । सो सुगंधदुर्गंधमेदसैं दोप्रकारका है । तहाँ—
॥ ८६ ॥ गंधसैं ग्राणका ग्राणसंयुक्ततादा- त्म्य है औ गंधत्वसैं ग्राणसंयुक्ततादात्म्य- वत्तादात्म्य है । यातैं—
॥ ८७ ॥ ग्राणजन्य यथार्थज्ञानका ग्राण- इंद्रिय करण है औ उद्दोसंघंध व्यापार हैं औ ग्राणजप्रमां फल है ॥
॥ ८८ ॥ इसरीतिसैं पांचप्रकारकी जे बाह्यप्रत्यक्षप्रमां वे फल हैं । ताके श्रोत्रादिक पंच- इंद्रिय करण हैं । ताके संयोग, संयुक्ततादात- म्यवत्तादात्म्य ये तीन- संघंध व्यापार हैं ॥ इसरीतिसैं संक्षेपतैं प्र्त्य क्षप्रमां कही ॥ इति श्रीधृतिरत्नावलियां प्रत्यक्षप्रमाण- निरूपणं नाम द्वितीयं रत्नं समाप्तस्म्र ॥ २ ॥
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|| अथ तृतीयरत्नप्रारंभ: || ३ ||
|| अनुमानप्रमाणनिरूपण || ८९-१०४ ||
|| २ || अनुमानप्रमाणनिरूपण || ८९-१०४||
||१३२|| सामग्रीसहित अनुमितिप्रमाका निर्धार || ८९--९६ ||
|| ८९ || अनुमितिप्रमाका जो करण होवै सो अनुमानप्रमाण कहियेहै ||
लिंगज्ञानजन्य जो ज्ञान सो अनुमिति कहियेहै || जैसेैं पर्वतमैं भूमका प्रत्यक्षज्ञान होयके वहिका ज्ञान होवैहै || तहां भूमका प्रत्यक्षज्ञान लिंगज्ञान कहियेहै || तैसे वहिका ज्ञान अनुमिति उपजैहै || यातैं पर्वतमैं वहिका ज्ञान अनुमिति है ||
जाके ज्ञानसैं साध्यका ज्ञान होवै, सो लिंग कहियेहै ||
अनुमितिज्ञानका विषय साध्य कहियेहै || अनुमितिज्ञानका विषय वधि है || यातैं सो साध्य है ||
भूमज्ञानतैं वहिरूप साध्यका ज्ञान होवैहै || यातैं भूम लिंग है || व्याप्यके ज्ञानतैं व्यापकका ज्ञान होवैहै || ऋतैं व्याप्यकौं लिंग कहैंहैं || व्यापककौं साध्य कहैंहैं || व्यासिवालेकौं व्याप्य कहैंहैं || व्यासिके निरूपककौं व्यापक कहैंहैं ||
अविनाभावरूपसंबंधकौं व्यासि कहैंहैं || जैसेैं भूमविपै वहिका अविनाभावरूप संबंध है || सोई भूमविपै वहिकी व्यासि है || यातैं भूम वहिका व्याप्य है || ता व्यासिरूपसंबंधका निरूपक वहि है || यातैं भूमका व्याप्य निरूपक वहि है ||
वधिविना. जो होवै नहीं, ताका अविना-भावरूपसंबंध तामैं कहियेहै || वहिविना भूम
होवै नहीं || यातैं वहिका अविनाभावरूप-संबंध भूममैैं है || वहिमैं भूमका अविनाभाव नहीं || वहिका न्याप्य भूम है ||
|| ९० || यातैं जहां अनुमिति होवै, तहां प्रथम महानसादिकमैैं वारंचार भूमवहिका सहचार देखिके मूलउच्छेदरहित उंची भूमरेखामैैं वहिकी न्यासिका प्रत्यक्षरूप निश्चय होवैहै || पर्वतादिकमैैं देखेता प्रत्यक्ष होवैहै || तिसतैं अनंतर संस्कारका उद्बव होयके व्यासिकी स्मृति होवैहै || तिसतैं अनंतर "वहिमान् पर्वतः " ऐसा अनुमितिज्ञान होवैहै || तहां—
|| ९१ || व्यासिका अनुभव करण है || व्यासिकी स्मृति व्यासापार है || पक्षमैैं साध्यका ज्ञानका अनुमिति फल है ||
इसरीतिसैं वाक्यप्रयोगविना व्यासिज्ञान-दिकतैं जो अनुमिति होवै, सो स्वार्थानुमिति कहियेहै || ताके करण व्यासिज्ञानादिक
|| ९२ || जहां दोका विवाद होवै, तहां वहिनिश्चयवालā. पुरुप अपने प्रतिवादीकी निश्चितिवासतैं वाक्यप्रयोग करैहै || ताकौं परार्थानुमान कहैंहैं ||
|| ९३ || सो वाक्य वेदांतमतमैैं तौनि-अवयवका होवैहै || प्रतिज्ञा, हेतु, औ उदाहरण, ये वाक्यके अवयवके नाम हैं || " पर्वतो वह्नि-मान्, भूमात् || यो यो भूमवान् सोग्निवान् | यथा महानस: || " इतना महावाक्य है || तामैं तीनिअवयवांतरवाक्य हैं || तिन्हके प्रतिज्ञा-प्रतिज्ञावाक्य कहियेहै || ऐसा " पर्वतो
प्रतिज्ञावाक्य कहियेहै || ऐेसा " परवतो
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वस्तीरत्न ३ ] ॥ १८ ॥ वेदांतविपै उपयोोगी अनुमानका निद्धीार ॥ ९७-१०१ ॥ ३४५-
'वहिमान' यह वाक्य है । 'वस्तिविशिष्टं पर्वतं वहिमानं' ऐसा बोध या वाक्यतैं होवैहै । तहां— १ वहि साध्य है । २ पर्वत पक्ष है । ३ प्रतिज्ञावाक्यतैं उत्तर जो लिंगका बोधक वचन सो हेतुवाक्य कहियेहै । ऐसा वाक्य 'भूमात' यह है ॥ ४ हेतुसाध्यका सहचारबोधक जो दृष्टांत-प्रतिपादक वचन, सो उदाहरणवाक्य कहियेहै ।
वादीप्रतिवादीका जहां विवाद न होवै, किंतु दोनूंका निश्चित अर्थ जहां होवै सो दृष्टांत कहियेहै ॥ ९८ ॥ इहां प्रतिवादी जो ऐसें कहै:- 'जीवमैं चेतनत्व हेतु तो है औ ब्रह्माभेदरूप साध्य नहीं है' इसरीतिसैं पक्षमैं चेतनत्व-हेतुका ब्रह्माभेदरूप साध्यसैं व्यभिचारकी शंका करै तो तकैसैं शंकाकी निष्पत्ति करै ॥
॥ ९९ ॥ इहां तकेका यह स्वरूप है:- जीवमैं चेतनत्व हेतु मानिके ब्रह्माभेदरूप साध्य नहीं मानै तो चेतनकी अद्वितीयताकी प्रतिपादक श्रुतिका विरोध होवैगा । अनिष्टके आपादनतक कहियेहै । श्रुतिका विरोध सर्वआस्तिकनकूं अनिष्ट है ।
॥ १०० ॥ 'व्यावहारिकपंचों मिथ्या । यत्न यत्र ज्ञाननिवर्त्येतं तत् मिथ्यात्वं । यथा शुक्तिरजतादौ ॥' इहां— १ 'व्यावहारिकपंच' पक्ष है । २ 'मिथ्यात्व' साध्य है । ३ 'ज्ञाननिवर्त्यता' हेतु है । ४ 'व्यावहारिकपंचो मिथ्या' यह प्रतिज्ञावाक्य है ।
५ 'यत्र यत्र ज्ञाननिवर्त्येतं तत् मिथ्यात्वं । यथा शुक्तिरजतादौ' यह उदाहरणवाक्य है ॥ ॥ १०१ ॥ इहां वी प्रपंचकूं ज्ञाननिवर्त्यता मानिके मिथ्यात्व नहीं मानै तो सत्की ज्ञाततैं निष्पत्ति यनै नहीं । यातैं ज्ञानसैं सकलप्रपंचकी निष्पत्तिप्रतिपादक शुक्तिस्मृतिका विरोध होवैगा । या तकैतैं व्यभिचारशंकाकी निष्पत्ति होवैहै ॥
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॥ १५ ॥ न्याय औ वेदांतके मतमें अनु-मानके स्वीकासका निर्णय
॥ १०२--१०४ ॥
॥ १०२ ॥ इसरीतिसैं वेदांतअर्थके अनु-सारी अनेकअनुमान हैं । परंतु वेदांतवाक्यतें अद्वैतज्ञानहै जो निश्चय कुदैहै । तिसकी संभावना मात्रका हेतु अनुमानप्रमाण है । स्वतत्रअनुमान ब्रह्मानिश्चयका हेतु नहीं । कहैंतैं ? वेदांतवाक्यविना अन्यप्रमाणकी ब्रह्मचिपै प्रष्टि नहीं । यहां सिद्धांत है ॥
॥ १०३ ॥ न्यायमतमें १ केवलान्वयी, २ केवलव्यतिरेकि, औ ३ अन्वयव्यतिरेकि इन भेदतैं तीनप्रकारका अनुमान अंगीकार कियाहै ।
१ जहां हेतुसाध्यके सहचारज्ञानतैं हेतुमैं व्याप्तिका ज्ञान होवैहै, सो अन्वयके अनुमान कोहियेहै ।
२ जहां साध्याभावमैं हेत्वभावके सहचार-दर्शनतैं हेतुमैं साध्यकी व्याप्तिका ज्ञान होवै सो केवलव्यतिरेकि अनुमान कहियेहै ॥
केवलान्वयिअनुमानमैं अन्वयके सहचारका उदाहरण मिलेहै औ केवलव्यतिरेकिअनुमानमैं व्यतिरेकके सहचारका उदाहरण मिलेहै । यह भेद है ॥
३ जहां दोनूंके उदाहरण मिलैं सो अन्वयव्यतिरेकि अनुमान कहियेहैं । यहां अन्यके सहचारका उदाहरण महानस है औ व्यतिरेकके सहचारका उदाहरण महाहद है ।
इसरीतिसैं तीनप्रकारका अनुमान नैया्यिक कहैहै ॥
॥ १०४ ॥ वेदांतमतमैं केवलव्यतिरेकिया प्रयोजन अर्थापत्तिसैं होवैहै औ केवलान्वयि-अनुमान कोई है नहीं । कहैंतैं ? सर्वपदार्थका उदाहरण ब्रह्ममैं अभाव है, यांतैं व्यतिरेकसहचारका उदाहरण ब्रह्म मिलैहै । यध्यपि व्यतिरेकज्ञानकी विपयतारूप जेयता ब्रह्मविषै है, तौकी अभावी ब्रह्मरूप नहां, तथापि जेयतादिक मिथ्या हैं । मिथ्यापदार्थ औ ताका अभाव एकअधिष्ठानमैं रहैंहैं । यांतैं सोई अन्वयज्ञान एकप्रकारका अनुमान मान्या है । औ विचारदृष्टिसैं केवलव्यतिरेकि-अनुमान वी अर्थापत्तिसैं न्यारा माननैहूं योग्य है । यह वेदांतका मत है ॥
वेदांतवाक्यसैं अद्वैतब्रह्मका जो निश्चय हुयाहै, मननद्वारा ताकी संभावनामात्रका हेतु अनुमानप्रमाण है । स्वतत्र ब्रह्मानिश्चयका हेतु नहीं । यह अनुमानका प्रयोजन है ॥
यह संक्षेपतैं अनुमानप्रमाण कद्याहै ॥
॥ इति श्रीमत्परमलावल्यों अनुमानप्रमाण-निरुपणं नाम तृतीयं रत्नं समाप्तम् ॥ ३ ॥
॥ अर्थ चतुर्थरतप्रारंभ: ॥ ४ ॥
॥ उपमानप्रमाणनिरुपण ॥ १०५--११४ ॥
॥ १०५ ॥ उपमितिप्रमाका कारण उप-मानप्रमाण कदियेहैं ॥
वेदांतमतमैं उपमितिउपमानका यह स्वरुप है:- ग्रामविषै गव्यक्तिकूं देखनैवाला वनमैं जायकै गवयदैं देखे, तव "यह पशु गौके
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चतुर्थखण्ड ४ ] ॥१७॥ जिस ज्ञासुके अनुकूल उपमिति और उपमानका स्वरूप ॥१०८-११४॥ ३४७
सदृश है" ऐसा प्रत्यक्ष होवैहै । तिसतैं अनंतर "मेरी गौ इस पशुके सदृश है" ऐसा ज्ञान होवैहै । तहां—
१ गवयमें गोसादृश्यका ज्ञान उपमान प्रमाण कहियेहैं । और—
२. गोमें गवयका साधृश्यज्ञान उपमिति कहियेहैं ॥
३ यातैं साधृश्यज्ञानजन्य ज्ञानरूप उपमिति, गोमें गवयका साधृश्यज्ञान है ।
४ ताका करण गवयमें गौका साधृश्यज्ञान है, सोई उपमान है ॥
॥ १०६ ॥ भेदसहित समानधर्मकूं सादृश्य कहहैं । जैसे गवयमें गौके भेदसहित समान अवयव गचयसैं हैं, सोई गौका साधृश्य है ॥ गौके समानधर्म गौमें हैं । भेद नहीं । गोका भेद अश्वमें है । समानधर्मे नहीं । यातैं साधृश्य नहीं ॥ चंद्रमें भेदसहित आकाश-जनकतारूप समानधर्म मुखमें है, सोई मुखमें चंद्रका साधृश्य है ॥
॥ १०७ ॥ यद्यपि उत्तज्ञानकूंही उपमिति माने तौ आत्मामैं किसीका साधृश्य नहीं । यातैं जिज्ञासुके अनुकूल उदाहरण मिलै नहीं ॥
॥ १७ ॥ जिज्ञासुके अनुकूल उपमिति और उपमानका स्वरूप
॥ १०८ ॥ यद्यपि असंगतादिक धर्मैंतैं आकाशके सदृश आत्मा है, यातैं आकाशमैं आत्माका साधृश्यज्ञान उपमान है, आत्मामैं आकाशका साधृश्यज्ञान उपमिति है, तथापि जिस अधिकरणमैं जिस पदार्थके अभावका ज्ञान होवै, तहां अभावज्ञानमैं भ्रमबुद्धि हुये-विना तिस अधिकरणमैं ता पदार्थका ज्ञान होवै नहीं । जैसे आत्मामैं कर्तृत्वादिकनका
अभावज्ञान हुया । न्यायादिकशास्त्र सुने वी प्रथमज्ञानमैं भ्रमबुद्धि हुयेविना "कर्त्ता मोक्ता आत्मा है" ऐसा ज्ञान होवै नहीं ॥
जाकूं वेदांतअर्थ निश्चयकरिके नैयायिकादिनके कुचंगतैं "कर्त्ता मोक्ता आत्मा है" ऐसा ज्ञाने होवैहै । तहां प्रथमज्ञानमैं भ्रमबुद्धि होवैहै । प्रथम ज्ञानमैं भ्रमबुद्धि हुयेविना विरोध-ज्ञान होवै नहीं । सो भ्रमबुद्धि अमरूप होवै, अथवा यथार्थ होवै । इसमें आग्रह नहीं । परंतु भ्रमबुद्धिमैं भ्रमत्व निश्चय नहीं चाहिये । यह आयहै ॥
इसरीतिसैं जिस कालमैं गुरुग्रंथनतैं जिज्ञासु-लक्षण ऐसा दृढनिश्चय हुयाहै;- आकाशादिक सकलप्रपंच गंधर्वनगरकी नाईं दृश्यप्रपंच भाव है, तातैं विलक्षणस्वभाव आत्मा है । आकाश-दिनमैं आत्माका किंचित वी साधृश्य नहीं । तिस कालमैं आकाश औ आत्माका साधृश्यज्ञान संभवै नहीं । यातैं उत्तमजिज्ञासुके अनुकूल सिद्धांतकी उपमितिका उदाहरण मिलै नहीं ॥
॥ १०९ ॥ तथापि साधृश्यज्ञानजन्य ज्ञान अथवा वैधर्म्यज्ञानजन्य ज्ञान, इन दोनोंमैं कोईएक होवै सो उपमिति कहियेहै ॥
खड़गमृगमैं उद्दकै वैधर्म्यज्ञानतैं उद्दमैं खड़गमृगका वैधर्म्यज्ञान होवैहै ॥ प्रथिवीमैं जलके वैधर्म्यज्ञानतैं जलमैं पृथिवीका वैधर्म्यज्ञान होवैहैं । यातैं उद्दूमैं खड़गमृगका वैधर्म्यज्ञान औ जलमैं पृथिवीका वैधर्म्यज्ञान उपमिति है । ताका करण उपमान कहियेहै । यहां खड़ग मृगमैं उद्दकै वैधर्म्यज्ञान औ पृथिवीमैं जलका
वैधर्म्यज्ञान करण होवैतैं उपमान है । और—
॥ ११० ॥ वीपरीत वी उपमानउपमिति भाव संभवैहै ॥ इंद्रियसंघंधमैं साधृश्यज्ञान उपमान है औ इंद्रियसैं व्यवहितमैं साध्य-
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३४८. ॥ ४ ॥ शाब्दप्रमाणनिरूपण ॥ ११५-१५१-॥ [ व्यचिरत्नावलि
ज्ञान उपमिति है। तैसे प्रपंचमें आत्माके वैधर्म्यका ज्ञान उपमान है औ प्रपंचमें आत्माके वैधर्म्यज्ञान तैं आत्मामैं प्रपंचका वैधर्म्यज्ञान उपमिति है।
॥ १११ ॥ न्यायमतमें तौ संज्ञाके संज्ञीमें वाच्यताके ज्ञान उपमिति है। सो व्यवहारमें उपयोगी है। जैसे सदृशज्ञानतैं उपमिति होवैहै,
तैसे विधर्मज्ञानसैं वी होवैहै ॥ जहां खड़गमृगके वाच्यतैं नहीं जानता अन्य पुरुषतैं "उप्मृ- विधर्मा शृंगसहित नासिकावाला खड़गमृगपदका वाच्य है" इस वाक्यतैं सुनिके वाक्यार्थ- जुभवसैं उत्तर । वनमैं जायके उष्ट्रविधर्मखद्ग- mृगके प्रत्यक्षसैं उत्तगैडमैं खड़गमृगपदकी वाच्यता जानीहै ॥
विरुद्धधर्मवालेकूं विधर्म कहैंहैं । विरुद्धधर्मकूं वैधर्म्य कहैंहैं । खड़गमृगमैं उष्ट्रतैं विरुद्धधर्म हसग्रीवावादिक हैं । पृथिवीमें जलादिकतैं विरुद्धधर्म गंध है । सारम्राहीदित्सैं उत्तरीति मानै तौ सिद्धांतमैं हानि नहीं । उलटी अनुकूलता है । ताका सिद्धांतके अनुकूल यह उदाहरण है ॥
॥ ११२ ॥ आत्मपदका अर्थ कैसा है ? या प्रश्रका "देहादिवैधर्म्यवान् आत्मा" ऐसा गुरुकै उतरतैं अनित्य अशुचि दुःखस्वरूप देहादिकनतैं विधर्मी नित्यशुद्ध आनंदरूप आत्म-पदकै निश्चय है । ऐसा देहादिपदार्थमैं निश्चय-कालमैं मनकै आत्मासैं संयोग होयके उपमितिज्ञान होवैहै । औ सर्वथा नैया- यिकरीति मैं विद्रेप होवै तो पूर्वउक्तसिद्धांतकी रीतिही अंभिकरणीय है। परंतू--
-- ॥११३ ॥ पूर्व कद्याथा जो "व्यापारवाला असाधारण-कारण" करण कहिये है। यह लक्षण सिद्धांतकी रीतिसैं इहाँ बने नहीं । कहैंत ?
१ प्रत्यक्ष, अनुमितिरमा औ शाब्दी- प्रमाके व्यापारवाले कारण हैं । औ- २ उपमान, अर्थापत्ति औ अनुपलब्धि । ये तीन उपमिति आदिक प्रमाके निश्चयोपार कारण हैं ॥
यातैं "व्यापारसैं मिल्न असाधारणकारण"कूं करण कध्या चहिये । कहैंत ? जैसे व्यापा- रकरण कध्या चहिये । कहैंत ? जैसे व्यापा- मिल्रता वी व्यापारमैं नहीं है । यातैं सिद्धांत- की रीतिसैं व्यापारवत् पदके स्थानमैं व्यापार- mिल्र कध्याचालिये ॥
॥ ११४ ॥ इसरीतिसैं प्रपंचमैं ब्रह्मकी ब्रह्मता ज्ञान उपमान है औ प्रपंचतैं विधर्मे ब्रह्म है। यह उपमानप्रमाण ताका फल उपमितिज्ञान है ।
॥ इति श्रीवचिरत्नावलियां उपमानप्रमाण- nिरुपणं नाम चतुर्थ रत्नं समासम् ॥ ४ ॥
॥ अथ पंचमरत्नप्रारंभः ॥ ५ ॥
॥ ८ ॥ शाब्दीप्रमाके भेद
॥ ११५-११८ ॥
॥ ११५ ॥ शाब्दीप्रमाके करणकूं शाब्द-प्रमाण कहैंहैं । शाब्दीप्रमाकी दोप्रकारकी है । एक व्यावहारिक है औ दूसरी पारमार्थिक है ।
॥ ११६ ॥ व्यावहारिकशाब्दीप्रम वी दो- प्रकारकी है । १ एक लौकिकवाक्यजन्य है औ २ दूसरै वैदिकवाक्यजन्य है ।
१ " नीले घटः " इत्यादिक लौकिक- वाक्य हैं ॥
२ " वृहस्पतिः पुरंदरः " इत्यादिक वैदिकवाक्य है ।
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१ जैसे नीलके अमेदवाला घट है, यह प्रथमवाक्यका अर्थ है ॥
२ तैसे वज्रहस्तके अमेदवाला पुरंदर है, यह द्वितीयवाक्यका अर्थ है ॥
१ प्रथमवाक्यमें विशेषणबोधक “नील” पद है औ “घट” पद विशेष्यबोधक है ।
२ द्वितीयवाक्यमें “वज्रहस्त” पद विशेषणबोधक है औ “पुरंदर” पद विशेष्यबोधक है ॥
इसीरीतिसँ लौकिकवैदिकवाक्यनकी समानरीति है परंतु—
॥ १९७ ॥ वैदिकवाक्य दोप्रकारके हैं ।
१ एक व्यवहारिकअर्थके बोधक हैं औ २ दूसरे परमार्थतत्त्वके बोधक हैं ॥
१ ब्रह्मसैं मिल्न सारा व्यवहारिक अर्थ कहियेहे ।
२ परमार्थतत्त्व ब्रह्म कहिहेहे ॥
॥ १९८ ॥ ब्रह्मबोधकवाक्य वी दोप्रकारके हैं ॥
१ “तत्”पदार्थके वा “स्वं”पदार्थके स्वरूपके बोधक अवांतरवाक्य हैं
(१) जैसे “सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” यह वाक्य “तत्”पदार्थका बोधक है ।
(२) “य एप हृद्यंतर्ज्योति: पुरुष:” यह वाक्य स्वंपदार्थके स्वरूपका बोधक है॥
२ “तत्”पदार्थी तंपदार्थके अमेदके बोधक “तत्त्वमसि” आदिक महावाक्य हैं ॥
॥१९९॥ शब्दकी दृष्टिके भेद । शक्तिदृष्टिका निरूपण ॥ ११९-१२४ ॥
॥ १९९ ॥ जा अर्थमें जा पदकी वृत्ति होवै, ता अर्थकी ता पदसैं प्रतीति होवैहै ॥ पदका अर्थसैं संबंध, वृत्ति कहियेहे ॥ शक्ती औ लक्षणामेदतैं सो वृत्ति दोप्रकारकी है ॥
॥ १२० ॥ पदार्थबोधहेतुसामर्थ्यकूं शक्तिकहैहैं ॥
जिस अर्थमें पदकी शक्ती होवै, सो अर्थ पदक अर्थ कहिहैहैं ।
जैसे घट औ पट पदमें कलश औ वस्वरूप अर्थके बोधकी सामर्थ्य है, सो शक्ती है ॥
यांतैं घट औ पटपदका कलश औ वस्वृत्ति अर्थ है । ताहीकूं वाच्यअर्थ वी कहैहैं ॥
॥ १२१ ॥ सो शक्तित १ योग, २ रुढ, औ ३ योगरुढउभयरूप मेदतैं तीनप्रकारकी है।
१ अवयवशक्तिकूं योग कहैहैं । जैसे पाचकपद है, तहां पाचअवयवका पाक अर्थ है । अकअवयवका कर्त्ता अर्थ है ॥
इसीरीतिसैं पाचकपदके अवयवनमें जो अर्थका बोधहेतुसामर्थ्य सो पाचकपदमें अवयवशक्ती है ॥
अवयवशक्तिसैं जो शब्द अपने अर्थकूं जनावै, सो यौगिकशब्द कहिहैहै । जैसे पाचकादिकशब्द हैं॥
औ—
॥ १२२ ॥ २ परिभापाशक्तिकूं रुढि कहिहैहै ।
जैसे छंदोयंधनमें वाण, रस, मुनि शब्दका पच, पढ, सप्त अर्थ है । यह वस्वका असाधारणसंकित होनेतैं परिभाषा है ।
यांतैं परिभापातैं जो शब्दमें बोधहेतुसामर्थ्य सो रूढिशक्ती कहैहै ।
औ—
॥ १२३ ॥ ३ अवयव परिभापा दोहुंककी योगरुढउभयरूप शक्तिकहैहैं ।
जैसे घट डिश्य कविभिध्य शब्द हैं ॥
औ—
॥ १२४ ॥ अर्थबोधहेतुसामर्थ्यंकूं शक्तिकहैहैं । जैसे पंकजशब्दके पंकअवयवका कर्दम अर्थ है औ ज अवयवका जात अर्थ है ।
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॥ ४ ॥ शब्दप्रामाण्यनिरूपण ॥ १२५-१५१ ॥
(९) इसरीतिसैं कादवतैं उपज्या कमल, पंकजशब्दका अर्थ है। कहतैंहैं?पंकजशब्दमें अवयववाचकशक्ति है। औ—
निपेध है औ लक्षणा॥वृतिसैं शब्दकूं ब्रह्मज्ञानकी करणताई है। यातैं लक्षणा॥वृत्तिजन्य ज्ञानमें वी चिंताभासरूप विपय होतैंहै झूठकूं औपनिपदत्व संभवैहै॥ औ—
(२) जलजंतु वी पंकतैं उपजैहैं, तातैं पंकज नहीं कहैहैं। किंतु कमलपुष्पकूंही पंकज कहैहैं। यातैं पंकजशब्दमें परिभाशाशक्ति वी है।
लक्षणा॥शक्तिजन्य ज्ञानमें वी चिंताभासरूप फलकां विपय ब्रह्म नहीं है। किंतु आवरणमोहरूप हृत्तिमात्रकी विपयतता झूठविपै है॥
यातैं पंकजशब्दमें दोऊँ सामर्थ्य होतैंहै योगरूढउभयरूप शक्ति है।
जैसे शब्दजन्यज्ञानकी विपयताका सर्वथा निपेध नहीं, तैसे मानसज्ञानकी विपयताका वी सर्वथा निपेध नहीं। किंतु शाब्दमादिसंस्काररहित विद्विस्मनकी ब्रह्मज्ञानमें हेतुता नहीं
॥ १२४ ॥ सर्वके मतमें शक्ति औ लक्षणा अर्थनिरूपणमें वी दोकाही उपयोग है॥
औ मानसज्ञानमें जो चिंताभासअंश है ताकी विपयतता नहीं। यातैं भाप्यकारीतिसैं ब्रह्मप्रमाका उत्कमं सहकारी है औ शब्द करण
॥ २० शब्दकी वृत्तिके भेद। लक्षणावृत्तिका निरूपण ॥ १२५-१३९ ॥
॥ १२५ ॥ यदपि "चिन्मनसा न चुतते"
करताई कहनैंमें कुछ वी विरोध नहीं॥
१ यत कहिये जिस ब्रह्मकूं मनकरिके लोक नहीं जानैहैं। इत्यादिक श्रुतिमैं जैसे मानसज्ञानकी विषयताका निपेध करैया है।
॥ १२७ ॥ इसप्रकार दूषितैंहैं। ताम
२ तैसे"यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" कहिये जिस ब्रह्मतैं मनसहित वाणी वी न प्राप्त होयके निवर्त्ती होतीहै। इत्यादिकश्रुतिमैं शब्दकी विपयताका वी निपेध कियाहै॥
शक्ति कहियै औ—
यातैं महावाक्यनकूं ब्रह्मप्रमा की करणताई कहनां विरुद्ध है॥
शाब्यसंबंधकूं लक्षणा कहैहैं।
॥ १२८ ॥ यदपि उत्तरीतिसैं शक्तिवृत्तिजन्य ज्ञानकी अविपयतता होतैंहै शक्तिवृत्तिका कथन निरर्थक है॥
॥ १२९ ॥ तथापि—
१ शक्तिज्ञानविना शब्य जो वाच्यअर्थ ताका ज्ञान होवै नहीं॥ औ—
२ शाब्यके ज्ञानविना शाब्यसंबंधरूप लक्षणाका ज्ञान चनै नहीं औ—
३ लक्षणाके ज्ञानविना लक्ष्य जो पदार्थ ताका ज्ञान सो चनै नहीं॥
४ पदार्थज्ञानविना वाच्यार्थज्ञान चनै नहीं॥
यातैं—
१ शक्तिज्ञानका शाब्यज्ञानमें।
२ शाब्यज्ञानका लक्षणाज्ञानमें।
३ लक्षणाज्ञानका लक्ष्यरूप पदार्थज्ञानमें॥ औ
॥ १२६ ॥ तथापि शब्दकूं ब्रह्मज्ञानकी करणताई नहीं, इस अर्थमें श्रुतिका तात्पर्य
होवै तौ "तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि"
'कहिये तिस उपनिषद्रम्य पुरुषकूं मैं पूछताहौं' इस श्रुतितैं ब्रह्मकूं उपनिषदवेद्यत्वरूप "औपनिपदत्व" कथन असंगत होवैगा। यातैं
शक्तिवृत्तिसैं ब्रह्मकां ज्ञान शब्दसैं होवै नहीं! लक्षणा॥वृतिसैं ब्रह्मगोचरज्ञान होवैहै। यातैं शक्तिवृत्तिसैं 'शब्दकूं' ब्रह्मज्ञानकी करणताका
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पंचमस्त्तम ५ ] ॥ २० शब्दकी वृत्तिके भेद । लक्षणावृत्तिका निरूपण ॥ १३२५-१३३९ ॥ ३५१
४ पदार्थज्ञानका पदार्थसमुदायके संघंधके ज्ञानरूप वाक्यार्थज्ञानमें—
उपयोग होवेंतें शक्तिवृत्तिका कथन निष्फल नहीं । किंतु परंपरासें वाक्यार्थज्ञानमें उपयोगी होवेंतें सफल है ॥
॥ १३३० ॥ इसरीतिसें कही जो लक्षणा सो १ केवललक्षणा औ २ लक्षणलक्षणा भेदतें दोप्रकारकी हैं ।
१ शाक्यके साक्षात्संवंधकूं केवललक्षणा कहैं । औ—
२ शाक्यके परंपरासंवंधकूं लक्षणलक्षणा कहैं ।
शक्यसंवंधपन दोनूंमें हैं । तामें कहूं लक्षणलक्षणाही गौणी भी कहियेहै ।
॥ १३३१ ॥ लक्षणलक्षणाके उदाहरण—
"द्विरेफो रौति" इत्यादि हैं । याका द्विरेफ पदका शक्य दोरेफ हैं ध्यनि करेंहैं । यह अर्थ पदनकी शक्तिसैं प्रतीत होवेंहैं ॥ इहां द्विरेफपदका शक्य
जैमेंं "तीरे ग्रामः" ऐसा कहैं तौ तीसमें शीतपावनतादिकनकी प्रतीति होवें नहीं ॥ गंगापदसैं तीरका बोधन करै । गंगाके धर्म शीतपावनादिक तीसमें प्रतीत होवेंहैं यातें गंगा-
पदकी तीसमें प्रयोजनवती लक्षणा है । औ—
२ पदकी जिस अर्थमें शक्तिवृत्ति होवें नहीं औ शक्तिकी न्याईं जिस अर्थकी प्रतीति जिस पदसैं सर्वक्रूं प्रसिद्ध होवें, तिस अर्थमें ता पदकी प्रयोजनमूलकलक्षणा ऐसी निरूढलक्षणा
कहियेहै ॥
जैसें "नीलो घटः" इत्यादिवाक्यसूं सुन-
तेंही सर्वपुरुषनकूं गुणकी प्रतीति अतिप्रसिद्ध हैं । यातें नीलादिक पदनका गुणमें प्रयोजन-
शून्यलक्षणा होवेंतें निरूढलक्षणा है ।
निरूढलक्षणा शक्तिके सदृशा होवेंहैं । कोई विलक्षण अनादि तात्पर्य होवेंहैं ।
इसरीतिसैं लक्षणाके भेद कहे ॥
॥ १३३२ ॥ जहदलक्षणा औ अजहदलक्षणा महावाक्यनमें नहीं । किंतु भागत्यागलक्षणा है ।
ताकी रीती पूर्व कहीआए ।
सो भागत्यागलक्षणा महावाक्यनमें लक्षणा नहीं, किंतु केवललक्षणा है । कहैंतें ?
जहां भागत्यागलक्षणा होवें, तहां वाच्यका एकदेश लक्ष्य होवेंहै । ता वाच्यके एकदेशतैं
वाच्यका साक्षात्संवंध है । यातें केवललक्षणा
होवेंहैं औ—
महावाक्यनतैं जिस्वासकूं अखण्डार्थकका बोध होवेंहै, ऐसा ईश्वरका अनादि तात्पर्य है । यातैं
निरूढलक्षणा है । प्रयोजनवती नहीं ॥ इहां
॥ १३२ ॥ सो केवललक्षणा औ लक्षण-
लक्षणा ये दोनूं भी जहदलक्षणा, अजहदलक्षणा,
भेदतैं तीनप्रकारकी हैं । सो प्रत्येक लक्षणा भी १ प्रयोजनवती लक्षणा औ २ निरूढलक्षणा भेदतैं दोप्रकारकी है ॥
१ जहां शक्तिवाले पदकूं लक्षणिक शब्दप्रयोगमें प्रयोजन काहिये फल होवें, सो प्रयोजनवती लक्षणा कहीयेहै ॥
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॥ १३४ ॥ ऐसी शंका होवैहै:-१ वाच्यअर्थका लक्षणचेतनसैं संबंध मानै तौ लक्षणअर्थमैं असंगतकी हानि होवैगी।२ संबंध नहीं मानै तौ लक्षणा बनै नहीं।कादैं? शक्तिसंबंधकूं अथवा शाब्द्यसंबंधकूं लक्षणा कहैंहैं। सो असंगमैं संंमबै नहीं।ताका—
॥ १३५ ॥ यह समाधान है:-वाच्यअर्थमैं १ चेतन औ २ जड़ दो भाग है। तामैं—१ चेतनभागका लक्षणअर्थमैं तादात्म्यसंबंध है॥सकल पदार्थनका स्वरूपमैं तादात्म्यसंबंध होवैहै॥वाच्यभागचेतनका स्वलूपही लक्षणचेतन है।यातैं वाच्यमैं चेतनभागका लक्षणचेतनमैं तादात्म्यसंबंध है।औ—
२ वाच्यमैं जड़भागका लक्षणचेतनसैं अध्यासनतासंबंध है।कल्पितके संबंधतैं अध्यासका स्वभाव बिगरे नहीं॥ जैसे कल्पितमृगतृष्णाके जलतैं अध्यासनभूमि गीली होवै नहीं।ऐसैं यहां बी जानि लैना॥
॥ १३६ ॥ अन्यशंका:-१ "तत्" पदकी अखण्डचेतनमैं लक्षणा मानै औ "त्वं"पदकी बी अखण्डचेतनमैं लक्षणा मानै तौ पुनरुक्तिदोष होनैं।"घटो घट:" इस वाक्यकी न्याय अप्रमाणताक होवैगी॥
२ दोनूंपदनका लक्षणअर्थ जुदा मानै तौ अभेदबोधकता नहीं होवैगी॥ताका—
॥ १३७ ॥ यह समाधान है:-१ मायाविशिष्ट औ अंत:करणविशिष्ट तौं "तत्" पदका औ "त्वं" पदका वाच्य है।उपहित लक्ष्य है। जो ब्रह्मचेतन दोनूं पदनका लक्ष्य होवै तौ पुनरुक्तिदोष होवै। सो ब्रह्मचेतन
लक्ष्य नहीं। किंतु मायाउपहित औ अंत:करण-उपहित लक्ष्य हैं। सो उपाधिके भेदसैं भिन्न हैं। पुनरुक्ति नहीं॥ औ—२ उपहित दोनूं परमार्थसैं अभिन्न हैं। यातैं अभेदबोधकता चाक्यकूं संमबैहै॥ इसरीतिसैं तत्पदार्थ औ त्वंपदार्थका उद्देश विधेयमान मानिके अभेदबोधकता निर्दोष है॥
१ "तत्"पदार्थमैं परोक्षताभ्रमनिवृत्तिके अर्थ "तत्"पदार्थकूं उद्देशकरिके "त्वं"पदार्थता विधेय है॥२ "त्वं"पदार्थमैं परिच्छिन्नताभ्रमनिवृत्तिके अर्थ "त्वं"पदार्थकूं उद्देशकरिके "तत्"पदार्थता विधेय है॥ औ—
॥ १३८ ॥ पुनरुक्तिके परिहारवास्ते किसी-ग्रंथकारका यह तात्पर्य है:-जो पदनकूं मिल-मिललक्षणकता मानैं तौ पुनरुक्तिकी शंका होवै। सो मिलमिल लक्षणकता नहीं। किंतु मीमांसक-रीतिसैं दोनूंपद मिलिके अखण्डब्रह्मके लक्षक हैं॥इसरीतिसैं लक्षणाके प्रसंगमैं बहुतविचार प्राचीनआचार्योंनैं लिख्याहै। ताकी संक्षेपतैं रीतिमात्र जाननैहै॥
॥ १३९ ॥ इसरीतिसैं प्रथम तौ पदकी शक्ति वा लक्षणाके ज्ञानसहित वाक्यका श्रवण-साक्षात्कार होवैके पूर्व अनुवृत्तपदार्थनकी सृष्टि होवैहै। तिसतैं अनंतर पदार्थनके संबंधका ज्ञान वा संबंधसहित पदार्थनका ज्ञानरूप वाक्यर्थबोध होवैहै। ताहीकूं शब्दबोध बी कहैंहैं। यातैं शब्दकी शक्ति अथवा लक्षणाध्यासिका ज्ञान-शब्दबोधका हेतु है॥
॥ २१ ॥ शब्दबोधके आकांक्षआदिकं चारिसहकारीकां निरूपण
॥ १४०-१५१ ॥
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पंचमस्तन ५ ई ॥ २१ ॥ शाब्दबोधके आकांक्षादिसहकारिका निरूपण ॥ ८५०-८५१ ॥ ३५३
ज्ञान ३ तात्पर्यज्ञान, औ ४ आसत्ति ये चार सहकारी हैं ॥
१ आकांक्षा नाम इच्छाका है, सो च्याकि चेतनमें होवैहैं, तथापि पदके अर्थका जितनै-काल पदाथोंतरसैं अन्वयज्ञान होवै नहीं, इतनेकाल अपने अर्थक अन्वयवास्ते पदोतरकी इच्छा सदृश प्रतीति होवैहैं । अन्वयबोध हुया पाछें प्रतीति होवै नहीं । सो आकांक्षा कहियेहैं ॥ जैसेँ "अयमेति पुत्रो राज्ञः: पुत्रोप-उपसारयंतां" कहिये "यह राजाका पुत्र आवैहै" ऐसें राजपदार्थका पुत्रपदार्थसैं अन्वयबोध हुया पाछें पुत्रुपपदार्थमें अन्वयबोधहेतु आकांक्षा राजपदार्थमें हैं नहीं । यातैं "राजाके पुत्रको निकासो" ऐसा बोध होवै नहीं । किंतु "पुरुपकूं निकासो " ऐसा बोध होवैहैं । जो आकांक्षाज्ञान शाब्दबोधका हेतु नहीं होवै तौ "राजाका पुत्र आवैहै, राजाके पुरुपको निकासो" ऐसा बोध हुयाचाहिये । यातैं आकांक्षाज्ञान शाब्दबोधका हेतु है ॥
॥ १४१ ॥ २ एकपदार्थका पदाथोंतरसैं संवंधकूं योग्यता कहैं । जहां योग्यता नहीं होवै, तहां शाब्दबोध होवै नहीं । जैसेँ "वह्निना सिंचति" या वाक्यमें वह्निति-करणतारूप तृतीयापदार्थका सेचनपदार्थमें निरुपकतासंवंधरूप योग्यता है नहीं । यातैं शाब्दबोध होवै नहीं ! जो शाब्दबोधमें योग्यता हेतु नहीं होतु तो "वह्निना सिंचति" या वाक्यतैं शाब्दबोध हुया चाहिये । यातैं योग्यताज्ञान शाब्दबोधकी हेतु है ॥
॥ १४२ ॥ ३ वाक्याकी इच्छाकूं तात्पर्य कहैं । जा अर्थमें तात्पर्यज्ञान होवै नहीं, ताका शाब्दबोध होवै नहीं ॥
(१) जैसेँ "संधवमानीय" या वाक्यतैं भोजन-समयमें अश्वाविपै वक्ताकी इच्छारूप
तात्पर्ये संबंधै नहीं, यातैं अश्वका शाब्दबोध होवै नहीं ।
(२) तैसैं गमनसमयमें लवणका शाब्दबोध होवै नहीं ।
जो तात्पर्यज्ञान शाब्दबोधका हेतु नहीं होवै तौ "संधवमानीय" या वाक्यतैं भोजनसमयमें अश्वका बोध औ गमनसमयमें लवणका बोध हुया चाहिये । यातैं शाब्दबोधमें तात्पर्यज्ञान हेतु है ॥
॥ १४३ ॥ वेदांत जो वेदका अंतभाग उपनिपद् ताका तात्पर्य, अहेतु अनुपादेय जो अद्वितीयब्रह्म ताके बोधमें है । उपासना-विधिमैं तात्पर्य नहीं । कहैंतैं ?
( १ ) लौकिकवाक्यकै तात्पर्ये तौ प्रकरणादिकनतैं जानिये है । सो प्रकरणादिक कालापकाक कतिपयदिनमें लिखैहैं ॥ औ-
( २ ) वैदिकवाक्यकै तात्पर्यज्ञानके हेतु उपक्रमोपसंहारादिक पद् हैं ॥ [ ९ ] उपक्रम-उपसंहारकी एकरुपता । [ २ ] अभ्यास । [ ३ ] अपूर्वता । [ ४ ] फल । [ ५ ] अर्थवाद औ [ ६ ] उपपत्ति । ये पद् वैदिकवाक्यकै तात्पर्यके लिंग हैं । इनतैं वैदिकवाक्य-नका तात्पर्य जानियेहै । यातैं तात्पर्यके लिंग कहियेहैं । जैसेँ "धूमतैं वह्नि जानियेहै । औ-
( ३ ) उपनिपदतैं भिन्न कमैकांडबोधक वेदकै तात्पर्ये कमविधिमैं है । जैसेँ जैमिनिकृत द्रशाध्याायमें स्पष्ट हैं, औ-
तैसैं जैमिनिकृत द्वादशाध्यायमें स्पष्ट हैं॥ औ-
( ४ ) उपनिपद्रुप वेदके उपक्रमोपसंहारादिक अद्वितीयब्रह्ममें हैं । यातैं अद्वितीयब्रह्ममें तिनका तात्पर्ये है ॥
॥ १४४ ॥ [ १ ] जैसेँ छांदोग्यके पद्ध-मि. सा. ८५
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ध्यायकां उपक्रम कहिये आरंभमें अद्वितीय ब्रह्म है औ उपसंहारक कहिये समासिमें अद्वितीयब्रह्म है। जो अर्थ आरंभमें होवै सोई समासिमें होवै तहां उपक्रमोपसंहारकी एकरूपतां कहियेहै।
॥ १४५ ॥ [ २ ] पुनः कथनकां नाम अभ्यास है। छांदोग्यके पञ्चमाध्यायमें नवचार "तच्चमसि" वाक्य है। यातैं अद्वितीयब्रह्ममें अभ्यास है।
॥ १४६ ॥ [ ३ ] प्रमाणांतरतैं अज्ञाततारूप अपूर्वतां कहैंहैं। उपनिपद्रूप शब्दप्रमाणतैं औरप्रमाणकां अद्वितीयब्रह्म विषय नहीं। यातैं अद्वितीयब्रह्ममें अज्ञाततारूप अपूर्वतां है।
॥ १४७ ॥ [ ४ ] अद्वितीयब्रह्मके ज्ञातैं मूलसहित शोकमोहकी निवृत्ति फल कधयाहै।
[ ५ ] स्तुति अर्थवां निदककी बोधकवचन अर्थवाद कहियेहैं। अद्वितीयब्रह्मबोधकी स्तुति उपनिपदनमें स्पष्ट है॥
॥ १४८ ॥ [ ६ ] कथन करे अर्थके अनु्कूल युक्तिकूं उपपत्ति कहैंहैं। छांदोग्यमें सकलपदार्थनकां ब्रह्मसैं अभेदकथनके अर्थ कार्यका कारणतैं अभेदप्रतिपादन अनेकदृष्टांतनसैं कधयाहै।
॥ १४९ ॥ इसरीतिसैं पद्रुलिंगतैं सकलउपनिषदनका तात्पर्य अद्वितीयब्रह्ममें है। सो उपनिपदनके न्यायनयानमें भगवानुभाष्यकारनै पद्रुलिंग स्पष्ट लिखेहैं। तिनतैं वेदांतवाक्यनकां अद्वैतब्रह्ममें तात्पर्ये निश्चय होवैहै॥
जा अर्थमें वक्ताके तात्पर्येकां ज्ञान होवै ता अर्थकां श्रोताकूं शब्दसैं बोध होवैहैं। यातैं तात्पर्येज्ञान वी शब्दबोधकां हेतु है॥ औ—
॥ १५० ॥ ४ योग्यतादनके शक्ति वां लक्षणाद्वचिरूप संवंधतैं व्यचधानरहित पदार्थन-
की सृष्टि आसक्ति कहियेहैं। इसरीतिकी आसक्ति स्वरूपसैं शब्दबोधकी हेतु है॥
ताका यथप्रकारतैं आकारांक्षाज्ञान, योग्यताज्ञान, तात्पर्यज्ञान, औ आसक्ति ये शब्दबोधके हेतु हैं॥
॥ १५१ ॥ इसरीतिसैं—१ इहाँ शक्ति वां लक्षणासहित शाब्दकां ज्ञान प्रमाका करण होतैं प्रमाण है॥
२ पदार्थनिकी स्मृति तिससैं उपजिके शाब्दीप्रमाकूं जनैहै। यातैं व्यापार है॥
३ शाब्दीप्रमां फल है॥
इति श्रीरघुवरत्नावल्यां शब्दप्रमाणनिरूपणं नाम पंचमं रत्नं समासम् ॥ ५ ॥
अथ षष्ठरत्नप्रारंभः ॥ ६ ॥
॥ ५ ॥ अर्थोपच्तिप्रमाणनिरुपण ॥ १५२-१६२॥
॥ १५२ ॥ अर्थापत्तिप्रमां औ प्रमाणके स्वरूपकां निर्देश ॥ १५२-१५३ ॥
अर्थापत्तिप्रमाके करणकूं अर्थापत्तिप्रमाण कहैंहैं। जैसे प्रमाण पत्तिशब्द वी प्रमाण औ प्रमा दोनूंका बोधक प्रत्यक्ष शब्द है। तैसे अर्थापत्तिप्रमां औ प्रमाणके
॥ १५३ ॥ उपपादक कल्पनकां हेतु उपपाद्य ज्ञानकूं अर्थापत्तिप्र नाम कहैंहैं।
उपपादकज्ञानकूं अर्थापत्तिप्रमा कहैंहै। उपपादक संपादक पर्यायशब्द हैं॥
उपपाद्य संपाद्य पर्यायशब्द हैं॥
१ जिसविना जो संभवै नहीं, तिसकां सो उपपाद्य कहियेहै। जैसे रात्रीभोजनविना
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॥ २३ ॥ अर्थापत्तिप्रमाणके भेद ॥ १५६-१५७ ॥
दिवाअभोजीपुरुषमें स्थूलता संभव नहीं । यांतं रात्रिभोजनकी स्थूलता उपपादक है ॥ २ जिसके अभावमें जाके अभाव होवें, सो ताका उपपादक कहिये हैं । जैसे रात्रिभोजनके अभावमें स्थूलताका दिवाअभोजींक अभाव होवेंहैं । यांतं रात्रिभोजन स्थूलताका उपपादक है ।
१ इतरितैं उपपाद्यकी अनुपपत्तिके ज्ञानतैं उपपादककी कल्पना अर्थापत्तिप्रमाण कहिये हैं ।
२ उपपादक कल्पनाका हेतु उपपाद्यकी अनुपपत्तिका ज्ञान अर्थापत्तिप्रमाण कहिये हैं ।
'अर्थ कहिये उपपाद्यवस्तु, ताकी आपत्ति कहिये कल्पना' या अर्थैं अर्थापत्तिप्रमाण गौणक है । औ अर्थकी कल्पना जिसतैं होवें सो उपपाद्यकी अनुपपत्तिका ज्ञानरूप प्रमाण अर्थापत्तिप्रामाणद्वारा अर्थ है ॥
॥ २३ ॥ अर्थापत्तिप्रमाणके भेद
॥ १५६-१५७ ॥
॥ १५६ ॥ सो अर्थापत्ति १ दृष्टार्थापत्ति औ २ शुतार्थोपत्ति भेदतैं दोपकारकी है ।
१ जहां दृष्टउपपाद्यकी अनुपपत्तिके ज्ञानतैं उपपादककी कल्पना होवें, तहां दृष्टार्थापत्ति कहिये हैं । जैसे दिवाअभोजीस्थूलमें रात्रिभोजनकी ज्ञान दृष्टार्थापत्तिस्थूलता सा दृष्ट है ॥
॥ १५५ ॥ २ जहां शुतउपपाद्यकी अनुपपत्तिके ज्ञानतैं उपपादककी कल्पना होवें, तहां शुतार्थोपत्ति कहिये हैं । जैसे " गृहेअसदेवदत्तो जीवति " या वाक्यकूं सुनिके गृहसैं वादिदेशमें देवदत्तकी सतत्त्वविना गृहमें असदेवदत्तका जीवन चले नहीं । यांतं गृहैं
असदेवदत्तके जीवत्की अनुपपत्तिसैं देवदत्तकी गृहंतें वादिदेशतककी कल्पना करियेहैं । तहां गृहैं असतदेवदत्तका जीवन घट नहीं; किंतु घट है ॥
१ शुतअर्थकी अनुपपत्तिसैं उपपादककी कल्पना शुतार्थापत्तिप्रमाण कहिये हैं ।
२ ताका हेतु शुतअर्थकी अनुपपत्तिका ज्ञान शुतार्थापत्तिप्रमाण कहिये हैं ।
इहां गृहमें असदेवदत्तका जीवन उपपाद्य है । गृहंतें वादिसत्ता उपपादक है ॥
॥ १५६ ॥ १ अभिधानानुपपत्ति औ २ अभिहितानुपपत्ति भेदतैं शुतार्थोपत्ति दोपकारकी है ॥
१ " द्वारें " अथवा " पिधेहि " इत्यादिस्थलमें जहां वाक्यकर्ता एकदेश उच्चारित होवें, एकदेश उच्चारिते नहीं होवें, तहां शुतपदके अर्थके अन्यययोग्यअर्थका वोधक जो पद ताका अध्याहार होवेंहैं । सो अर्थके वा पदके अध्याहारकका ज्ञान अन्यप्रकारतैं संभवें नहीं, यांतं अभिधानानुपपत्ति है ।
काहैं ? एकपदार्थका इतरेपदार्थांतरसैं अन्ययबोधमें वक्ताके तात्पर्यकूं अभिधान कहहैं । " द्वारें " इतना कहै, तहां " द्वारकूं " दांकों " यह बोध श्रोत्राकूं होवेंहै ऐसा वक्ताका तात्पर्यरूप अभिधान है । यांतं अस्विधानानुपपत्ति कहिये है ॥
( १ ) अर्थ अथवा शब्दका अध्याहार उपपादक है । औ—
( २ ) पूर्वोक्त तात्पर्यें उपपाद्य है ।
॥ १५७ ॥ २ जहां सारे वाक्यकका अर्थ अन्यअर्थकल्पनविना अनुपपन्न होवें, तहां
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३५६ || ५ || अर्थापत्तिप्रमाणनिरूपण || १५२-१६२ || [ वृत्तिरत्नावली
आभिहितानुपपत्तिरूप शुतार्थोपत्ति है || जैसैं "स्वर्गकामो यजेत" या वाक्यका अर्थ अपूर्वेकल्पनविना अरुपपन्न है | यातैं आभिहितानुपपत्तिरूप शुतार्थोपत्ति है || इहाँ—
(१) यागद्वारा स्वर्गसाधनता उपपाद्य है ताकी अनुपपत्तिसैं उपपादकपूर्वककल्पना है | (२) अंतकी आहुतिों याग कहैहैं || (३) सुरवविशेषद्वारा स्वर्गी कहैहैं | (४) कर्मे जन्यसंस्काररूप अदृष्टद्वारा अपूर्व कहैहैं || औ—
स्वर्गेसाधनता दृष्ट नहीं, किंतु शुत है | यातैं शुतार्थोपत्ति है || || २८ || अर्थापत्तिप्रमाका जिज्ञासुं उपजोगा || १५८-१६२ ||
|| १५८ || शुतार्थोपत्तिका जिज्ञासुके अनुकूल उदाहरण:-"तरीते शोकमात्रवित्तु" यह है | इहाँ ज्ञातैं शोककी निश्चितिकी शुत है | ताकी शोकमिथ्यात्वविना अनुपपत्ति है | यातैं ज्ञातैं शोककी निश्चिति अनुपपत्तिसैं वंध्यमिथ्यात्वकी कल्पना होवैहै | वंध्यमिथ्यात्व उपपादक है | ज्ञातैं शोकनिश्चिति उपपाद्य है | सो दृष्ट नहीं | किंतु शुत है | यातैं शुतार्थोपत्ति है || तैसैं—
|| १५९ || महावाक्यनैं जीवब्रह्मका अभेद श्रवण होवैहै, सो औपाधिकभेद होवै तौ संभवै | स्वरूपसैं भेद होवै तौ संभवै नहीं | यातैं जीवब्रह्मकै अभेदकी अनुपपत्तिसैं भेदका औपाधिकत्वज्ञान अर्थापत्तिप्रमाणजन्य है |
९ इहाँ जीवब्रह्मका अभेद उपपाद्य है | २ भेदमै औपाधिकता उपपादक है | १ सारे उपपाद्यज्ञान प्रमाण हैं | २ उपपादकज्ञान प्रमा है ||
इहाँ जीवब्रह्मका अमेद ,विद्यावृदूं हेतु है | यातैं हेत्वर्थोपत्ति औ शुतार्थोपत्ति दोनूंका उदाहरण है || १९० || तैसैं रजतके अधिकरण युक्तिमैं रजतका निषेध दृष्ट है | सो रजतके मिथ्यात्वविना संभवैं नहीं | यातैं निषेधकी अनुपपत्तिसैं रजतमिथ्यात्वकी कल्पना होवैहै | यह दृष्टार्थी—
पत्तिका उदाहरण है || इहाँ— १ रजतनिषेध उपपाद्य है औ— २ मिथ्यात्व उपपादक है || || १९१ || मनके विलयसैं अनंतर निर्विकल्पसमाधि कालमै अद्वितीयब्रह्ममात्र रूप रहैहै | सकलअनात्मवस्तुका अभाव होवैहै | मो अनात्म वस्तुका भाव होतैं तौ मनके विलयसैं
ताका अभाव संभवै | जो मानस नहीं होवै तौ मनके विलयतैं अभाव होवै नहीं | कहैहैं? अन्यकै विलयतैं अन्यका अभाव होवै नहीं | यातैं मनके विलयतैं सकलदेताभावकी अनुपपत्ति सैं मनोमात्र है | यह कल्पना
होवैहै || इहाँ— १ मनके विलयतैं सकलदेतका विलय उपपाद्य है | २ ताका ज्ञान अर्थापत्तिप्रमाण है |— ३ सकलदेतडूं मानसता उपपादक है | ४ ताका ज्ञान अर्थापत्तिप्रमा है ||
|| १६२ || या स्थानमै उपपादकप्रमा असाधारणकारण अर्थापत्तिप्रमाण है || सो निर्यो पार है तौ बी तामैं उपपादकप्रमाकी कारणता संसवेंहै | यह उपमाननिरूपणमै
कह्याहै || इति वृत्तिरत्नावल्यां पठें रत्नम् ||
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॥ अथ सस्समरनप्रारंभः ॥ ७ ॥ ॥६॥ अनुपलब्धिप्रमाणनिरूपणम्॥१६३-१८९ ॥ न्यायशास्त्रको रीतिसैं असावके स्वरूपका निद्धार ॥ १६३-६१९ ॥ ॥१६३॥ अभावकी प्रसाके असाधारणकारणकूं अनुपलब्धिप्रमाण कहैंहैं । १ प्राचीननैयायिक, निपेधमुखप्रतीतिके विपयकूं अभाव कहैंहैं । औ— २ नवीननैयायिक संत्रंध साधैयतैं भिन्न होवें औ प्रतीogिसापेक्षप्रतीतिके विपय होवें, ताहकूं अभाव कहैंहैं ॥ प्रतीogिसापेक्षप्रतीतिके विपय तौं संत्रंध औ साधैय वीरु हैं, सो ताहकूं भिन्न नहींं । ताकूं भिन्न तौं और वीरु हैं । सो प्रतीogिसापेक्ष- प्रतीतिके विपय नहींं । किंतु प्रतीogिनिरपेक्ष- प्रतीतिके विपय हैं यातैं अभावके लक्षणकी कहूं वीरु अतिन्याप्ति नहींं ॥
॥ १६४ ॥ सो अभाव दोप्रकारका है:- १ एक अन्योन्याभाव औ २ दूसरा संसर्गाभाव है । तिनमें अन्योन्याभाव तौं एकविधही है ॥ संसर्गाभावके चारिभेद हैं ( १ ) एक प्राग- भाव है ( २ ) प्रध्वंसाभाव है ( ३ ) सामयिकाभाव हैं औ ( ४ ) अत्यंताभाव है ॥
॥१६५॥ १ अभावके निपेधक अभावकूं अन्योन्याभाव कहैंहैं ॥ वा अत्यंताभावसैं भिन्न उत्पत्ति औ नाशांत शून्य अभावकूं अन्योन्याभाव कहैंहैं । ताहीकूं भेद् औ भिन्नता औ अतिरिक्तता औ जुदाई वीरु कहैंहैं ॥ ( १ ) उत्पत्तिशून्य तौं प्रागभाव वीरु है, सो नाशशून्य नहींं ।
( २ ) नाशशून्य तौं प्रध्वंसाभाव वीरु है । सो उत्पत्तिशून्य नहींं । ( ३ ) उत्पत्तिनाशशून्य अभावरूप तौं अत्यंताभाव वीरु है । "घट: पटो न " ऐसा कहनैसैं घटमैं पटके अभेदका निपेध होवैहै । यातैं घटमैं पटके अभेदक घटमैं पटका अन्योन्याभाव है ॥
॥ १६६ ॥ २ तासैं भिन्न अभाव । ताहकूं संसर्गाभाव कहैंहैं ॥
( ९ ) अनादि सांत जो अभाव, सो प्रागभाव कहियेहैं । अपने प्रतियोगिके उपादानकारणमैं प्रागभाव रहैहै । जैसैं घटके कारण कपालमैं घटका प्रागभाव रहैहै । सो अनादि कहिये उत्पत्तिरहित है औ सांत कहिये अंतवाला है ॥
[ १ ] अनादि अभाव तौं अत्यंताभाव वीरु है, सो सांत नहींं । [ २ ] सांत अभाव 'तौं सामयिकाभाव वीरु है, सो अनादि नहींं । औ— [ ३ ] वेदांतमतमैं अनादि औ सांत माया है, सो अभाव नहींं । किंतु जगतका . उपादानकारण होनैतैं सत्असततैं विलक्षण अनिर्वचनीय भावरूप माया है ॥
॥ १६७ ॥ ( २ ) सादिअनंत जो अभाव, सो प्रध्वंसाभाव कहियेहै । जैसैं मुद्ररा दिखनतैं घटादिकनका ध्वंस होवैहै ॥
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[ १ ] अनंतअभाव तौ अत्यंताभाव वी है सो सादि नहीं ।
[ २ ] सादिअभाव तौ सामयिकाभाव वी है, सो अनंत नहीं ।
[ ३ ] सादिअनंत तौ मोक्ष वी है । कहैं? (क) ज्ञातैं मोक्ष होवैहै । यातैं सादि है औ (ख) मुक्तकूं फेरि संसार होवै नहीं । यातैं अनंत है । परंतु मोक्ष अभावरूप नहीं । किंतु भावरूप है ॥
यच्चपि अज्ञान औ तिसके कार्यकी निवृत्तिकूं मोक्ष कहैंहैं । निवृत्ति नाम ध्वंसका है यातैं मोक्ष वी अभावरूप है । तथापि कल्पितकी निवृत्ति अधिष्ठानरूप होवैहै ॥ अज्ञान औ ताका कार्य कल्पित है । यातैं तिन्हकी निवृत्ति अधिष्ठानमात्ररूप है । यातैं अभावरूप मोक्ष नहीं । किंतु ब्रह्मरूप होनेंतैं भावरूप है ॥
॥ १६८ ॥ (३) उत्पत्ति औ नाशवाला जो अभाव, सो सामयिकाभाव कहियेहै ॥
जहां किसीकालमें पदार्थ होवै औ किसीकालमैं न होवै, तहां पदार्थशून्यकालमें तिसपदार्थका सामयिकाभाव होवैहै ॥ जैसे भूतलादिकनमें घटादिक किसीकालमें होवेंहैं औ किसीकालमें नहीं होवें । तदहां घटशून्यकालसंबंधीभूतलादिकनमैं घटादिकनका सामयिकाभाव है ॥
समयविशेषमैं उपजै औ समयविशेषमैं नष्ट होवै, सो सामयिकाभाव कहियेहै ॥ भूतलैं घटकूं अन्यदेशमैं लेजावैं तव घटका अभाव भूतलमैं उपजहै औ तिसी भूतलमैं घटकूं लेआवें तव घटका अभाव भूतलमैं नष्ट होवैहै ॥ इसरीतिसैं सामयिकाभाव उत्पत्तिनाशवाला है ॥
[ १ ] उत्पत्तिवाला तौ प्रागभाव वी है । सो नाशवाला नहीं ।
[ २ ] नाशवाला तौ प्रध्वंसाभाव वी है । सो उत्पत्तिवाला नहीं ।
[ ३ ] उत्पत्तिनाशवाले तौ घटादिकभूतमौतिक अनेकपदार्थ हैं, सो अभावरूप नहीं । किंतु विधिसुरुपप्रतीति कहिये अस्तिप्रतीतिके विपय होनेंतैं भावरूप हैं ॥
॥ १६९ ॥ (४) अन्योन्याभावसैं मिलि जो उत्पत्तिशून्य औ नाशशून्य अभाव, सो अत्यंताभाव कहियेहै ॥
जहां किसीकालमैं जो पदार्थ न होवै तहां तिस पदार्थका अत्यंताभाव कहियेहै ॥ जैसे घासुमैं रूप औ गंथ किसीकालमैं नहीं होवैहै । तहां रूप औ गंधका अत्यंताभाव है । आत्मामैं रूप, रस, गंध, स्पर्शी, औ शब्द कदी वी रहैं नहीं । यातैं रूपादिकनके अत्यंताभाव आत्मामैं रहैहैं ॥
[ १ ] उत्पत्तिशून्य तौ प्रागभाव वी है, सो शून्य नहीं ।
[ २ ] नाशशून्य तौ प्रध्वंसाभाव वी है । सो उत्पत्तिशून्य नहीं ।
[ ३ ] उत्पत्तिनाशशून्य ब्रह्म वी है, सो अभावरूप नहीं । किंतु भावरूप है ।
[ ४ ] उत्पत्तिनाशशून्य अभावरूप तौ अन्योन्याभाव वी है । सो अन्योन्यभावसैं मिलि नहीं ॥
॥ २३ ॥ उत्तअभावके स्वरूपमैं वेदांतसैं विरुद्धअंशका प्रदर्शन
॥ १७०-१७८ ॥
॥ १७० ॥ इसरीतिसैं अभावका कथन
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न्यायशास्त्रकी रीतिसैं किया। यामैं जितना अंशो वेदांतसैं विरुद्ध है, सो संक्षिप्तैं दिखावैंहैं:-
१ कपालमैं घटका प्रागभाव अनादि कहैंहैं, सो प्रमाणविरुद्ध है। यातैं वेदांतके अनुसार नहीँ। कहैंत? घटप्रागभावका अधिकरण साधि हैं औ प्रतीयोगी घट वी साधि है। प्रागभाव अनादिता किसरीतिसैं होवै?
औ-मायामैं सकलकार्यैके प्रागभावकूं अनादिता कहैं तो संभवैहै। कहैंत? माया अनादि है। परंतु मायामैं कार्येका प्रागभाव मानना व्यर्थ है औ सिद्धांतमैं इष्ट वी नहीँ। यातैं प्रागभाव सादिसांत है।
॥१७१॥ २ तैसैं अन्योन्याभाव वी अपने प्रतियोगीके उपादानमैंहीं रहैहै। यातैं घटका अंश कपालमान्यतिसैं ही अनंत है। यह कथन असंगत है। घटअंशका अधिकरण जो कपाल, ताकै नाशतैं घटअंशका नाश होतैं प्रध्वंसाभाव वी सादिसांत है।
॥ १७२ ॥ ३ तैसैं अन्योन्याभाव वी सादिसांतअधिकरणमैं सादिसांत है। जैसैं घटमैं पटका अन्योन्याभाव है। ताका अधिकरण घट है। सो सादि है औ सांत है। यातैं घटवृत्ति पटान्योन्याभाव वी सादिसांत अनादिअधिकरणमैं अन्योन्याभाव अनादि परंतु अनादि वी सांत है। अनंत नहीँ।
॥ १७३ ॥ जैसैं ब्रह्ममैं जीवका भेद है, सो जीवका अन्योन्याभाव है। ताका अधिकरण ब्रह्म है। सो अनादि है। यातैं--
( १ ) ब्रह्ममैं जीवका भेदरूप अन्योन्याभाव अनादि है औ--
( २ ) ब्रह्मज्ञानसैं अज्ञाननिवृत्तिद्वारा भेदका अंत होवैहै। यातैं सांत है।
॥ १७४ ॥ अनादिपदार्थकी वी ज्ञानसैं
निश्चिति अद्वैतवादमैं इष्ट है। इसवीवास्तैं शुद्ध-चेतन, जीव, ईश्वर, अविद्या, अविद्याचेतनका संबंध औ अनादिका परस्पर भेद, ये पञ्चपदार्थ अद्वैतमतमैं स्वरूपसैं अनादि कहैंहैं औ शुद्ध-चेतनाविना पांचकी ज्ञानसैं निश्चिति मानैंहैं। यामैं--
॥ १७५ ॥ यह शंका होवैहैं:- जीव-ईश्वरकूं अद्वैतवादमैं साधिक कहैंहैं। मायाका कार्य मायिक कहेहैं। जीवईश मायाके कार्य हैं औ अनादि हैं। यह कहनां विरुद्ध है।
॥ १७६ ॥ इसका समाधान है:- जीवईश मायाके कार्य हैं। यह मायिकपदका अर्थ नहीँ है। किंतु मायाकी स्थितिके अशीन जीवईशकी स्थिति है। मायाकी स्थितिविना जीवईशकी स्थिति होवै नहीँ। यातैं मायिक हैं औ मायाकी नाईं अनादि हैं। इसरीतिसैं अनादिअन्यो-न्याभाव वी सांत हैं। अन्योन्याभाव अनंत नहीँ।
॥ १७७ ॥ ५ तैसैं अत्यंताभाव वी आकाशादिकनकी नाईं अविद्याका कार्य है औ विनाशी है।
इसरीतिसैं अद्वैतवादमैं सारे अभाव विनाशी हैं। कोई अभाव नित्य नहीँ। औ अद्वैतवादमैं अनात्मपदार्थ सारे मायाके कार्य हैं। यातैं आत्मभिन्नकूं नित्यता संभवै नहीँ। जैसैं घट-दिक भावपदार्थ मायाके कार्य हैं, तैसैं अभाव वी मायाके कार्य हैं। यातैं मिथ्या है। औ--
॥ १७८ ॥ कोई ग्रंथकार अद्वैतवादी एक अत्यंताभावकूं मानैहैं। औरअभावकूं अलीक कहैहैं। अलीक नाम झूठका है।
१ जैसैं घटका प्रागभाव कपालमैं कहैंहैं, सो अलीक है। कहैंत? घटकी उत्पत्तिसैं पूर्व-कालसंबंधी कपालही 'घटो भविष्यति' या प्रतीतिका विषय है। घटका प्राग-भाव अप्रसिद्ध है।
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२ तैसैं मुद्रादिकनतैं चूणीकृतकपाल अथवा विभक्तकपालतैं पृथकू घटध्वंस व्री अभावसिद्ध है ॥
३ तैसैं घटासंबंधी भूतलही घटका सामधिकाभाव है ॥ घट होवै तब घटका संबंधी भूतल है । यातैं घटासंबंधी भूतल नहीं । इसरीतिसैं अधिकरणसैं पृथक् नहीं ॥
४ तैसैं घटमैं पटके भेदकं घटत्वि पटान्योन्याभाव कहैंहै । सो दोनूंके अभेदका अत्यंतभावरूप है । दोपदार्थनके अभेदात्यंताभावसैं पृथक् अन्योन्याभाव अप्रसिद्ध है ॥
इसरीतिसैं एक अत्यंतभाव है और कोई अभाव नहीं । इसरीतिसैं अभावके निरूपणमैं बहुतविचार है, ग्रंथविस्तरभयतैं रीति-मात्र जनाई है ॥
॥ २७ ॥ सामग्रीसहित अभावप्रमाण-औ ताके जिज्ञासुकूं उपयोगके कथनपूर्वक प्रमाणदृचिका उपसंहार ॥१७९-१८१॥
॥ १७९ ॥ इसरीतिसैं उक्त जो अभाव, ताका प्रमाणज्ञान होवै । तहाँ अभावप्रमाकात असाधारणकारणरूप जो प्रतियोगीका अनुपलंभ, सो करण होनतैं प्रमाण है ॥
उपलंभ नाम ज्ञानका है । ताहीकूं प्रतीति औ उपलब्धि वी कहैंहै । ताके अभावकूं अनुपलंभ औ अनुपलब्धि कहैंहैं ॥
उपमान औ अर्थापत्तिकी न्यांई याका वी व्यवहारत नहीं है । यातैं इहाँ वी करणलक्षणमैं व्यवहारवत् पदका प्रवेश नहीं । किंतु न्यापारवत्पदका प्रवेश है ॥
इसप्रकार अनुपलब्धिप्रमाण है । औ अनुपलब्धिप्रमाणका फल है । ताहीकूं अभावप्रमाण वी कहैहैं ॥
॥ १८० ॥ अनुपलब्धिनिरूपणका जिज्ञासुकूं यह उपयोग है :-
" नेह नानास्ति" इत्यादिक श्रुति प्रपंच-का ऐककालिकअभाव कहैंहै । अनभवसिद्ध-ग्रंथका ऐककालिक अभाव बनै नहीं । यातैं प्रपंच-का स्वरूपसैं निषेध नहीं करैहै ॥
किंतु प्रपंच का पारमार्थिक नहीं । यातैं पारमार्थिकत्वविशिष्ट-प्रपंचका ऐककालिक अभाव श्रुति कहैहै ॥
इस रीतिसैं पारमार्थिकत्वविशिष्टप्रपंचका अभाव श्रुतिसिद्ध है औ-
२ अनुपलब्धिप्रमाणतैं वी सिद्ध है । जो पारमार्थिकत्वविशिष्टप्रपंच होता है तो उस प्रपंचकी स्वरूपसैं उपलब्धि होवैहै, तैसैं पारमार्थिकप्रपंचकी वी उपलब्धि होती औ स्वरूपसैं तौ प्रपंचकी उपलब्धि होवैहै ।
यातैं पारमार्थिकत्वविशिष्टप्रपंचका अभाव है ॥
इसरीतिसैं प्रपंचाभावका ज्ञान अनुपलब्धिसैं होवैहै । और वी अनेकअभावका ज्ञान जिज्ञासुकूं इष्ट है । ताका हेतु अनुपलब्धिप्रमाण है ॥
॥ १८१ ॥ इसरीतिसैं संक्षेपतैं ईश्वरआश्रित औ संप्रदायप्रत्यक्षादि पंडितकारकौ जीवाश्रित भेदतैं दोप्रकारकी प्रमा कही । सो स्मृतिसैं मिन्न यथार्थत्वचिन्तानरूप है ॥
इति श्रीवृत्तिरत्नावल्या अनुपलब्धिप्रमाण-निरूपणं नाम सप्तमं रत्नं समाप्तम् ॥ ७ ॥
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॥ अथ अष्टमरत्नप्रारंभः ॥
॥ ९ ॥ अग्रमात्रस्थिते भेद अनिर्वचनીયस्व्याति- निरूपण ॥
॥ ९८२—९८६ ॥
॥ ९८२ ॥ अप्रमात्रस्थिति थी यथार्थ अथ- यार्थ भेदतें दोप्रकारकी है । स्मृतिरूप अंतः- करणकी वृत्तिकूं यथार्थेअप्रमा कहहैं । सो स्मृति थी ९ यथार्थस्मृति औ २ अयथार्थ स्मृति भेदतें दो- प्रकारकी हैं ॥
तिनमें— ॥ ९८३ ॥ ९ यथार्थस्मृति दोप्रकारकी है । ( ९ ) एक आत्मस्मृति हैं औ ( २ ) दूसरी अनात्मस्मृति है ॥
( ९ ) तत्तत्स्यादिवैकल्यजन्यअनुभवते आत्मतत्वकी स्मृति यथार्थेआत्म- स्मृति है ॥
( २ ) च्यावहारिकपंचकां मिथ्यात्वअनु- भव हुया ताके संस्कारतें मिथ्यात्व- रूपतें प्रपंचकी स्मृति, यथार्थ- अनात्मस्मृति है ॥
॥ ९८४ ॥ २ तैंसें अयथार्थस्मृति थी दोप्रकारकी हैं । ( ९ ) एक आत्मगोचर है औ ( २ ) अनातमगोचर है ॥
( ९ ) अहंकारादिकनमें आत्मत्वभ्रमरूप अनुभवके संस्कारतें अहंकारादिकन- में आत्मत्वकी स्मृति औ आत्मामें कर्तृत्व अनुभवके संस्कारतें 'आत्मा कर्त्ता हैं' यह स्मृति । दोनूं आत्मगोचरअयथार्थेस्मृति है ॥
औ— ( २ ) प्रपंचमेंँ सत्यत्वभ्रमके संस्कारतें
"प्रपंच सत्य हैं" यह स्मृति अनात्मगोचरअयथार्थस्मृति है ॥
॥ ९८५ ॥ यद्यपि संसारदशामेंँ जा ज्ञानेके विपयका वाध न होवै, वा प्रमाणके होते जा ज्ञानेके विपयका वाध न होवै, सो यथार्थ- ज्ञान कहियेहै ॥
यातैं उत्कृष्टतितं अपमा है तौं थी यथार्थही कही । फेर ताहीकूं अयथार्थ कहना असंभव है ॥
॥ ९८६ ॥ तथ्यपिं इहाँ उत्कृष्टतितूं परमार्थटषिें तौं अयथार्थता है औ उत्त- लक्षणके अनुसार संसारदशिसें यथार्थता होनेंतें आपेक्षिकयथार्थता थी है । यातैं उत्कृष्टतितूं यथार्थेअप्रमा कहनेंमें असंभवदोष नहीं ॥
इसरीतिसें यथार्थअप्रमा कही ॥
॥ २९ ॥ अयथार्थअप्रमाके भेद । संशय औ भ्रमकों निर्देश ॥ ९८७—९९७ ॥
॥ ९८७ ॥ अयथार्थअप्रमा थी दोप्रकारकी है । ९ एक स्मृतिलुप अविद्याकी वृत्ति है औ २ दूसरी अनुभवरूप है ॥
॥ ९८८ ॥ ९ उद्दूतसंस्कारमात्रजन्यज्ञानकूं स्मृति कहहैं ॥
( ९ ) ज्ञान तौ अन्य थी है । सो संस्कार- जन्य नहीं ।
( २ ) संस्कारजन्य तौ प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्ष थी है । सो संस्कारमात्रजन्य नहीं ॥
( ३ ) अनुभवके वाध हुये उपज्या जो स्मृतिकाके हेतु भावना नाम संस्कार, सो तौ निरंतर रहैहै । यातैं सदां स्मृति हुइचाहिये । परंतूं सो संस्कार उद्दूत नहीं । किंतु अनुद्दूत है ।
यातैं कहूं अतिप्यासि नहीं ॥
सो स्मृति ( ९ ) यथार्थ औ ( २ ) अयथार्थ- भेदतें दोप्रकारकी हैं ।
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( ९ ) यथार्थानुभवजन्य स्मृति यथार्थ है । सो पूर्वेही कही । औ—
( २ ) अयथार्थे 'अनुभवजन्य स्मृति अयथार्थ है । सो अयथार्थेअग्रिमाके अंतर्भूत है ॥ अनुभवमें यथार्थता अवाधितार्थकृत है ॥ अनाधितार्थनिपाक अनुनभव यथार्थ कहेहै । प्रमा कहीयेहै । यातें अवाधितार्थके आधार अनुवमें यथार्थता है औ स्मृतिमें यथार्थता औ अयथार्थता अनुवकके आधार है ।
॥ १८९ ॥ २ स्मृतिसैं भिन्न जो ज्ञान, ताकूं अनुभव कहेहैं ॥ सो वी ( १ ) यथार्थे ( २ ) अयथार्थे भेदतैं दोप्रकारका है ॥
( १ ) यथार्थानुभव तौ पूर्वे कहा । ( २ ) अयथार्थानुभव वी संशय अरु निशय औ तर्कमेदतैं तीनप्रकारका है ॥ अयथार्थेहूही भ्रम औ भ्रांति औ अध्यास कहेहैं ॥
॥ १९० ॥ संशय निशयरूप भ्रम अनर्थका हेतु है । यातें निवर्तनीय है ॥ जिज्ञासुंकूं निवर्तनीय जो भ्रम, ताके भेद कहेहैं:- एकधर्ममें विर्द्ध नानाधर्मेका ज्ञान, संदाय कहीयेहै । सो संदाय दोप्रकारका है ॥ १ एक प्रमाणसंदाय है औ २ दूसरा प्रमेयसंसदाय है ॥
१ प्रमाणभेदसंदेह प्रमाणसंशय कहेहै । ताहीकूं प्रमाणगतअसंभावना कहेहै ॥ "वेदांतवाक्य अद्वितीयब्रह्मविपे प्रमाण हैं वा नहीं हैं?" यह प्रमाणसंदाय है ॥ ताकी निश्ति शरीरकके प्रथमाध्यायकके पठनसैं वा श्रवणतें होवैहै ॥ २ प्रमेयसंशय वी आत्मसंशय औ अनात्मसंशय भेदतैं दोप्रकारका है ॥
अनात्मसंशय अनंतविध है । ताके कहनेसै उपयोग नहीं ॥ ॥ १९१ ॥ आत्मसंशय वी अनेकप्रकारका है ॥
१ आत्मा क्यासैं अभिन्न है अथवा भिन्न है? २ अभिन्न है वा तो सर्वदा अभिन्न है अथवा मोक्षकालमेंही अभिन्न होवैहै । ३ सर्वदा अभिन्न नहीं? ४ आनंदादिकऐश्वर्यवान् होवै तौ वी आनंदादिक गुण हैं अथवा निज्य आत्माका खरूप है? इस्तै आदिलेके "तत्" पदार्थोभिन्न "त्वं" पदार्थोभिन्न अनेकप्रकारका संशय है ॥
॥ १९२ ॥ ३ तैसैं केवळ "त्वं" पदार्थ-गोचरसंशय वी आत्मगोचरसंशय है ॥ ( ९ ) आत्मा देहादिकनतैं भिन्न है वा नहीं ? ( २ ) भिन्न कहै तौ वी अशुद्ध है वा मध्यपरिमाण है वा विश्वपरिणाम है? ( ३ ) जो चेतन कहै तौ वी कर्ता है अथवा अकत्ता है? ( २ ) अकत्ता कहै तौ वी परस्परभिन्न अनेक हैं अथवा एक है?
इसीरीतके अनेकसंशय केवळ "त्वं" पदार्थगोचर हैं ॥
॥ १९३ ॥ २ तैसैं केवळ "तत्" पदार्थगोचर वी अनेकप्रकारके संशय हैं ॥ ( १ ) वैकुंठादिलोकनिवासी ईश्वर परिच्छिन्नहस्तपादादिकअवयवसहित शरीरी है अथवा शरीररहित विश्व है?
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( २ ) जो शरीररहित विषय कहैं तौ वी परमाणुआदिक सापेक्ष जगत्का कर्त्ता है अथवा निरपेक्ष कर्त्ता है ? ( ३ ) परमाणुआदिकका निरपेक्ष कर्त्ता कहैं तौ वी केवलकर्त्ता है अथवा अभिन्ननिमित्तोपादानरूप कर्त्ता है ? ( ४ ) जो अभिन्ननिमित्तोपादान कहैं तौ वी प्राणिकर्मनिरपेक्ष कर्त्ता होवेंतें विपमकारितादिक दोषवाला है अथवा प्राणिकर्मसापेक्षकर्त्ता होवेंतें विपमकारितादिकदोषपरहित है ? इसतैं आदि अनेकप्रकारके “ तत्त्व ” पदार्थ गोचरसंशय है सो सकलसंशय प्रमेयसंशय कहिये हैँ ।। ॥ १९४ ॥ तिनकी निश्चित्ति मननसैं होवैहै। शरीररकै द्वितीयाध्यायके अध्ययनसैं वा श्रवणसैं मनन सिद्ध होवैहै, तौसैं प्रमेयसंशयकी निश्चित्ति होवैहै ।। ॥ १९५ ॥ ज्ञानसाधनका संशय औ मोक्षसाधनका संशय वी प्रमेयसंशय है । कहावैं?- प्रमाके विषयकूँ प्रमेय कहैंहैं । ज्ञानसाधन मोक्षसैं फल कहैंहैं प्ररमेय है । यातैं ज्ञानसाधनका संशय औ मोक्षसाधनका संशय वी प्रमेयसंशय है ।। तिनकी निश्चित्ति शरीररकै तृतीयाध्यायसैं होवैहै । तैसैं- प्रमेयसंशय है । ताकी निश्चित्ति शरीररकै चतुर्थाध्यायसैं होवैहै ।। ॥ १९७ ॥ घघ्यापि शरीररकै चतुर्थाध्यायमें प्रथम साधनविचारही है । उत्तर फलविचार है । मोक्षरूँ फल कहैंहैं । तथापि- १ चतुर्थोध्यायमें साधनविचार जितनैमैं है, उतनै चतुर्थोध्यायसहित तृतीयाध्यायसैं साधनसंशयकी निश्चित्ति होवैहै ।।
२ शिष्यतुर्योध्यायसैं फलसंशयकी निश्चित्ति होवैहै ।। इसरीतिसैं संशयरूप अ्रमका निरूपण किया ।। ॥ ३० ॥ अयथार्थअप्रमाेके भेद निश्चित्तिरूप अ्रमज्ञानका निर्देश ।।१९८-२०७।। निश्चयरूप अ्रम कहैंहैं:- संशयसैं मिन्न ज्ञानकूँ निश्चित्ति कहैहै । यथार्थज्ञान औ अयथार्थज्ञान, दोनों संशयतैं मिन्नज्ञान होवेंतैं निश्चित्तिरूप है ।। जैसेँ शुक्तिमैं रजतम्रम होवै, तहां- १ स्व कहिये रजत औ ताका ज्ञान । २ ताका पारमार्थिक औ अध्यावहारिक अभाव । ३ ताका अधिकरण कहिये अधिष्ठान जो रजतु वा रजतविशिष्टशुक्ति वा रज्जुप्रतिहतचेतन वा इदमाकारष्ट्युपहितचेतन । ४ तैं अवभास जो रजत औ ताका ज्ञान सो अ्रम कहियेहै ।। ॥ १९९ ॥ अथवा अधिष्ठानसैं विपमसत्ता- व्याकरणरीतिसैं अध्यासपदके औ अवभास- पदके विषय औ ज्ञान, दोनों वाच्य हैँ ।। यातैं- ॥ २०० ॥ अर्थाध्यास औज्ञानाध्यास भेदतैं अध्यास दोप्रकारका है ।। १ कहूं केवलसंबंधमात्रका अध्यास है । २ कहूं संबन्धविशिष्टसंबंधीका अध्यास है । ३ कहूं केवलधर्मीका अध्यास है । ४ कहूं धर्मविशिष्टधर्मीका अध्यास है । ५ कहूं अन्योन्याध्यास है ।
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६ कहूं अन्यतराध्यास है ॥ अन्यतराध्यासवो दोप्रकारका है ( १ ) एक आत्मामें अनात्माअध्यास है । ( २ ) दूसरा अनात्मामें आत्माअध्यास है ॥ इसीरीतिसैं अर्थाध्यास अनेकप्रकारका है । उत्तलक्षणका सवंत्र समन्वय है ॥ ॥ २०१ ॥ तथाहि शुक्तिसिद्धांतमें तो सकलअध्यासका अधिष्ठान चेतन है । रज्जुमें सर्प प्रतीत होवै तहां वी इंद्राकारवृत्त्यवच्छिन्नचेतनसैं अभिन्न रज्जुअवच्छिन्नचेतनही सर्पका अधिष्ठान है । रज्जु अधिष्ठान नहीं । यह अर्थ विचारसागरमें स्पष्ट है ॥ तथाहं-
१ चेतनकी परमार्थसत्ता है । २ अथवा ताकी उपाधि रज्जु व्यवहारिक होनेतैं रज्जुअवच्छिन्नचेतनकी व्यवहारिकसत्ता है ॥ दोनूंप्रकारसैं सर्प औ ताके ज्ञानकी प्रातिभासिकसत्ता होनेतैं अधिष्ठानकी सत्तासैं विपमसत्तावाला अवभास सर्प औ ताका ज्ञान है यातैं दोनूंको अध्यास औ अवभास कहैंहैं ॥ ॥ २०२ ॥ सत्ताके तीन भेद हैं ॥ १ एक प्रातिभासिक है । २ दूसरी व्यवहारिक है औ ३ तीसरी पारमार्थिक है ॥ १ जाका ब्रह्मज्ञानविना रज्जुआदिकअवच्छिन्नचेतनके ज्ञाततैं वाध होवै, ताकी प्रातिभासिकसत्ता है । ऐसे रज्जु-सर्पादिक हैं ॥ औ-
२ ब्रह्मज्ञानविना जाका वाध न होवै औ ब्रह्मज्ञान हुये जाकी अधिष्ठानसैं भिन्नसत्तासृत्ति रहै नहीं, ताकी व्यवहारिकसत्ता है । ऐसे अविद्या औ आकारादिक हैं ॥ औ- ३ तीनकाल जाका वाध न होवै, ताकी पारमार्थिकसत्ता है । ऐसैं चेतन पारमार्थिकसत्ता है । ऐसैं चेतन इसीरीतिसैं सर्वअध्यासोंमें आरोपितसैं अधिष्ठानकी विपमसत्ता है ॥ ॥ २०३ ॥ जापदार्थमें आधारता प्रतीत होवै सो अधिष्ठान कहीयहै । वह आधारता परमार्थसैं होवै वा आरोपित होवै । ताकी परमार्थितामें आग्रह या प्रसंगमें नहीं । कहैंतैं ? जैसे आत्मामें अनात्माका अध्यास है, तैसैं अनात्मामें आत्माका अध्यास है । औ अनात्मामें परमार्थसैं आत्माकी आधारता है नहीं किंतु आरोपितआधारता है । यातैं आधारमात्रकोऊ या प्रसंगमें अधिष्ठान कहैंहैं ॥
॥ २०४ ॥ यद्यपि आत्माका अधिष्ठान अनात्मा है, या कहनसैं आत्मा वी आरोपित होवैगा । ॥ २०५ ॥ तथापि भाष्यकारनैं शरीरके आरंभमें आत्माअनात्माका अन्योन्याध्यास कबहैहै । यातैं अनात्मामें आत्माके अध्यासका निपेध तो हैनैं नहीं ॥ परस्परअध्यासकूं अन्योन्याध्यास कहैंहैं । यातैं अनात्मामें आत्माअध्यास मानिके उत्तंकका समाधान कद्याचाहिये । सो समाधान इसीरीतिसैं है:-अध्यास दो प्रकारका होवैहै । १ एक तो स्वरूपाध्यास होवैहै । औ २ दूसरा संसर्गाध्यास होवैहै ॥ १ जापदार्थका स्वरूप अनिर्वचनोय उपजै, ताकूं स्वरूपाध्यास कहैंहैं । जैसे-( १ ) शुक्तिमें रजतका स्वरूपाध्यास है । ( २ ) आत्मामें अहंकारादिकअनात्माका स्वरूपाध्यास है ॥
२ तैसैं जापदार्थका स्वरूप तो व्यावहारिक वा पारमार्थिक प्रथम सिद्ध होवै । औ
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अनिर्वचनीयसंवंध उपजै, सो संसर्गाध्यास कहिये है ॥ जैसैं मुखमें दर्पणका कोई संवंध है नहीं औ दोनूं पदार्थ न्यावहारिक हैं । तहां दर्पणमें मुखका संवंध प्रतीत होवैहैं । यातैं अनिरवचनीयसंवंध उपजैहैं ॥ इसरीतिसैं अनेक-
स्थानौमै संवंधी तो न्यावहारिक हैं ॥ तिनके संवंध औ संवंधनके ज्ञान अनिरवचनीय उपजैहैं तिनकूं संसर्गाध्यास कहैंहैं ॥
॥ २०६ ॥ तैसैं चेतनका अहंकारमैँ अध्यास नहीं । किंतु चेतन तौ पारमार्थिक है । ताके संवंधका अहंकारमैँ अध्यास है । आत्मता चेतनमैँ है औ अहंकारमैँ प्रतीत होवैहैं । यातैं आत्मचेतनका तादात्म्य-
संवंध अहंकारमैँ अनिरवचनीय हैं ॥ अथवा आत्मश्रुत्तितादात्म्यकका अहंकारमैँ अध्यास है । अनिरवचनीयसंवंध है । यातैं चेतन कल्पित नहीं । किंतु चेतनका अहंकारमैँ तादात्म्यसंवंध अथवा आत्मचेतनके तादात्म्यकका संवंध
कल्पित है ॥
॥ २०७ ॥ इसरीतिसैं— १ जहाँ पारमार्थिक पदार्थका अभाव हुया तिसकी जहाँ प्रतीति होयै, तहां पारमार्थिक पदार्थका न्यावहारिकपदार्थमै अनिरवचनीय संवंध उपजैहै औ ताका अनिरवचनीयही ज्ञान उपजैहै ॥ औ—
२ न्यावहारिक पदार्थका अभाव हुया जहाँ प्रतीति होवै, तहां अनिरवचनीयही संवंधी उपजैहै औ संवंधीका अनिरवचनीयज्ञान उपजै- है । औ कहूं संवंधमात्रा औ संवंधका अनिरवचनीयज्ञान उपजैहै ॥
सारहैँ अधिष्ठानसैं अध्यस्तकी विषमसत्ता- ही अनिरवचनीयसत्ता है ॥ आत्माका अनात्मामैँ अध्यास होवै, तहां
वी अधिष्ठानअनात्मा न्यावहारिक है ॥ औ अध्यस्त आत्मा नहीं । किंतु आत्माका संवंध सत्असत्सैं विलक्षणकूं अनिरवचनीय कहैंहैं ॥
या प्रसंगमैँ— ॥ ३१ ॥ प्रसंगप्रासशंकासमाधानादिक-
अर्थका कथन ॥ २०८-२१९ ॥
॥ अथ चारीशंका ॥
१ प्रथम शंका यह है:— "स्वप्रपंचका अधिष्ठान साक्षी है " यह कहा । सो संभवै नहीं । कहैंहैं ? जिस अधिष्ठा- नमैं जो आरोपित होवै तिस अधिष्ठानसैं सो संवद्ध प्रतीत होवैहैं ॥ जैसैं शुक्तिमैं आरोपित " इदं रजतं " इसरीतिसैं शुक्तिकी इदंतासैं संवद्ध प्रतीत होवैहैं ॥ आत्मामैँ
कर्तृत्वादिक आरोपित हैं, सो " अहंकरतृ " इसरीतिसैं संवद्ध प्रतीत होवैहै ॥ तैसैं स्वमके गजादिक साक्षीमैं आरोपित होवें तौ " अहं गज: " " मथि गज: " इसरीतिसैं साक्षीसैं संवद्ध गजादिक प्रतीत हुये चाहिये ॥
॥ २०९ ॥ २ दूसरी शंका यह है:— " शुक्तिमैं रजताभाव न्यावहारिक है औ पारमार्थिक है " यह पूर्व कह्या ।
सो संभवै नहींं । कहैंहैं ? अद्वैतवादमैँ एकचेतनही पारमार्थिक है । तासैं भिन्नकूं पारमार्थिक मानैं तौ अद्वैतवादकी हानि होवैगी ॥ पारमार्थिकरजत है नहीं । यातैं पारमार्थिकरज-
तका अभाव है । यह कहना तौ संभवैहै औ पारमार्थिकअभाव है यह कहना संभवै नहीं ॥
॥ २१० ॥ ३ तृतीय शंका यह है:— " शुक्तिमैं अनिरवचनीयरजतके उत्पत्तिनाश होवैहैं " यह पूर्व कह्या ।
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. ॥ १ ॥ अग्र्यामोेद अनिर्वचनीयष्व्यातिनिरूपण ॥ [ वृत्तिरत्नावళि
सो संभवै नहीं। कहैंतें ? जो रजतके उत्पत्तिनाश होैं तौ घटके उत्पत्तिनाशक्री न्योंई रजतके उत्पत्तिनाश प्रतीत हुऐचाहिये ॥
( १ ) जैसैं घटकी उत्पत्ति होवै तव "घट उपजैहै" इसरीतिसैं घटकी उत्पत्ति प्रतीत होवैहै। औ—
( २ ) घटका नाश होवैहै, तव "घटका नाश हुया" इसरीतिसैं घटका नाश प्रतीत होवैहै ॥
( १ ) तैसैं शुक्तिमैं रजतकी उत्पत्ति होवै तव "रजतकी उत्पत्ति हुई" इसरीतिसैं उत्पत्ति प्रतीत हुऐचाहिये ॥ औ—
( २ ) रजतका ज्ञानसैं नाश होवै तव "रजतका शुक्तिदेशमै नाश हुया" इसरीतिसैं नाश प्रतीत हुऐचाहिये ॥ औ
शुक्तिमैं केवल रजत प्रतीत होवैहै। तौकिं उत्पत्तिनाश प्रतीत होवैं नहीं। यातैं शास्त्रांतरकी रीतिसैं अन्यथाख्यातिआदिकही समीचीन हैं। अनिर्वचनीयरज्याति संभवै नहीं ॥
॥ २११ ॥ ४ चतुर्थ शंका यह है:- "सतअसतसैं विलक्षण अनिर्वचनीयरजतादिक उपजैहैं" यह पूर्व कहा। सो सर्वथा असंगत है ॥
( १ ) सतसैं विलक्षण असत होवैहै। औ
( २ ) असतसैं विलक्षण सत होवैहै ॥
( १ ) "सतसैं विलक्षण तौ है औ असत नहीं" यह कथन विरुद्ध है।
( २ ) तैसैं "असतसैं विलक्षण है औ सत नहीं" यह कथन वी विरुद्ध है।
वारितांके क्रमतैं ये समाधान हैं:-
॥ २१२ ॥ १ प्रथमशंकाका समाधान:- "साक्षीमैं स्वमअध्यास होवै तौ 'अहं गज:'
'मयि गज:' ऐसी प्रतीत हुऐचाहिये" या शंकाकारहू समाधान है:-पूर्व अनुभवजनितसंस्कारैं अध्यास होवैहै। जैसैं पूर्वअनुभव संस्कारके समान अध्यास होवैहै औ संस्कारके समान अज्ञान होवैहै ॥
सर्वअध्यासोंका उपादानकारण अविद्यां तौ समान है। परंतू निमित्तकारण पूर्वअनुभवजन्य संस्कार है, सो विलक्षण है ॥ जैसैं अनुभवजन्यसंस्कार होवै तैसाही अविद्याका परिणाम होवैहै ॥
( १ ) जिसपदार्थकी अहंमाकार ज्ञानजन्यसंस्कारसहित अविद्या होवै, तिस पदार्थका अहंमाकारअविद्याका परिणामरूप अध्यास होवैहै ॥
( २ ) जिसकी ममताकार अनुभवजन्यसंस्कारसहित अविद्या होप, तिस पदार्थका ममताकारअविद्याका परिणामरूप अध्यास होवैहै ॥
( ३ ) जिस पदार्थका इदमाकार अनुभवजन्यसंस्कारसहित अविद्या होवै, तिसपदार्थका इदमाकारअविद्याका परिणामरूप अध्यास होवैहै ॥
स्वकै गजादिकनका पूर्वअनुभव इदमाकारही हुयाहै। अहमाकारादिकअनुभव हुया नहीं। यातैं अनुभवजन्यसंस्कार वी इदमाकारही होवैहै ॥ यातैं "अयं गज:" ऐसी प्रतीति होवैहै। "मयि गज:"
"अहं गज:" ऐसी प्रतीति होवै नहीं ॥
संस्कार अनुभव है। कार्यके अनु्कूल संस्कारकी अनुभूति होवैहै। संस्कारजनकपूर्वअनुभव वी अध्यासरूप है। ताका जनक संस्कार वी इदमाकारही होवैहै ॥ औ अध्यासप्रवाह अनादि है। यातैं प्रथमअनुभवकी
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इदमाकारतामैं कोई हेतु नहीं । यह शंका संभवै नहीं । कहैंतें ? अनादिपक्षमैं कोई अनुभव प्रथम नहीं । पूर्वपूर्वमैं उत्तर सारै अनु भव हैं ॥ ॥२१३॥
३ द्वितीयांशंकाका समाधानः- "अभावकं पारमार्थिक मानें तो अद्धैतकी हानि होवैगी " या द्वितीयांशंका— यह् समाधान हैः—सकल्पपदार्थ सिद्धांतमैं कलिप्त हैं, तिनका अभाव पारमार्थिक है, सो भ्रमरूप है । यह् भाप्यकारकूं संमत है । यामैं विशेषयुक्ति आगैं चतुर्दशारत्निपयें कहैंगे । इसकारणतैं अद्धैतकी हानि नहीं ॥ ॥ २१४॥
३ तृतीयांशंकाका समाधानः- "युक्तिमैं रजतकी उत्पत्ति मानैं तो उत्पत्तिकी प्रतीति हुईचाहिये " याका— यह् समाधान हैः—युक्तिमैं तादात्म्यसंवंधसैं रजत अध्यस्त है औ युक्तिक्की इदंताका संबंध रजतमैं अध्यस्त है । यातैं "इदं रजतं" इसरीतिसैं रजत प्रतीत होवैहै । जैसे युक्तिके इदंताका संबंध रजतमैं अध्यस्त है, तैसैं युक्तिमैं प्राक्सिद्धत्वधर्म है ॥ रजतप्रतीतिकालमैं प्रथमसिद्धं प्राक्सिद्ध कहैहैं । रजतप्रतीति कालमैं प्रथमसिद्ध युक्ति है । इसरीतिसैं युक्तिमैं प्राक्सिद्धत्वधर्म है । ताके संवंधका अध्यास वी रजतमैं होवैहै ॥ रजतं " यह् प्रतीति नहीं होवैहै । "प्राग्जातं रजतं पश्यामि " यह् प्रतीति होवैहै ॥ या प्रतीतिकी विशय प्राग्जातत्व है । मो रजतमैं प्रतीतिकी विशय प्राग्जातत्व है । किंतु रजतमैं "इदानीन्जातत्व " है । औ "प्राग्जातत्व " रजतमैं प्रतीत होवैहै ॥
तहां रजतमैं अनिर्वचनीयराग्जातत्वकी उत्पत्ति मानैं तो गौरव होवैहै ॥ युक्तिके प्राग्जातत्वकी रजतमैं प्रतीति मानैं तो अन्यथा ख्याति माननी होवैहै औ ऐसैं स्यानमैं अन्यथाख्यातिकूं मानैं वी हैं । तथापि युक्तिके प्राक्सिद्धत्वधर्मका अनिर्वचनीयसंवंध रजतमैं उपजैहै । यह् पक्ष समीचीन है ॥
प्राक्सिद्धत्वधर्मका अनिर्वचनीयसंवंध रजतमैं उपजैहै । यह् पक्ष समीचीन है ॥ इसरीतिसैं युक्तिके प्राक्सिद्धत्वके संवंधकी प्रतीतिसैं उत्पत्तिप्रतीतिका प्रतिबंध होवैहै । कहैंतें ? वाक्सिद्धता औ वच्चमानउत्पत्ति, दोनूं परस्पर विरोधी हैं ॥ जहां प्राक्सिद्धता होवै तहां अतीतउत्पत्ति होवैहैं । वच्चमानउत्पत्ति होवै तहां प्राक्सिद्धता होवै नहीं ॥
इसरीतिसैं युक्तितत्प्राक्सिद्धत्वके संवंधकी प्रतीतिसैं उत्पत्तिप्रतीतिका प्रतिबंध होनेतैं रजतकी उत्पत्ति हुये ची उत्पत्तिकी प्रतीति होवै नहीं ॥ औ— जो कहा "रजतका नाश होवै तो ताकी प्रतीति हुईचाहिये " ताका— यह् समाधान हैः— अधिष्ठानका ज्ञान होवै तौ रजतका नाश होवैहैं औ अविछ्छान-ज्ञानतैं रजतका वाधनिश्चय होवैहै ॥ युक्तिमैं कालत्रयमैं रजत नहीं । इस निश्चयकूं वाध कहैंहैं । ऐसैं निश्चय नाशप्रतीतिका विरोधी है । कहैंतें ? नाशमैं प्रतियोगी कारण होवैहैं औ वाधसैं प्रतियोगीका सर्वदा अभाव भासैहै ॥
जाका "सर्वदा अभाव है " ऐसैं ज्ञान होवै, ताकी नाशबुद्धि संभवे नहीं ॥ किंचा जैसा घटादिकनका गुह्यरादिकनसैं चूर्णीभावरूप नाश होवैहैं, तैसा कलिप्तका नाश होवै नहीं । किंतु अधिष्ठानके ज्ञानतैं अज्ञानरूप उपादानसहित कलिप्तकी निवृत्ति होवैहै ॥ अधिष्ठानमात्रका अवधेषही अज्ञानसहित कलिपतकी निच्चत्ति होवैहै ॥ सो अधिष्ठान युक्ति है । ताका अवधेषरूप रजतका नाश अनभवसिद्ध है । यातैं रजतके नाशकी प्रतीति दोवैं नहीं । यह् कथन साहसतैं है ॥
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॥२१५॥ ४ चतुर्थशंकाका समाधानः-
"सत् असत्सैं विलक्षण कथन विरुद्ध है" या चतुर्थशंकाका—
यह समाधान है:- जो स्वरूपपरहितऽं सद्दिलक्षण कहैं औ विधमानस्स्वरूपकं असद्विलक्षण कहैं तो विरोध होवै । कहैंहैं ? एकही पदऽर्थमै स्वरूपपरहित्य औ स्वरूपसहित्य नहीं ।
यातैं सदसद्दिलक्षणका उक्त अर्थ नहीं । किंतु—
१ कालत्रयमैं जाका वाध नहीं होवै ताकूं सत् कहैंहैं ॥
२ जाका वाध होवै सो सद्दिलक्षण कहियेहै ॥
३ शशश्रृंगवंध्यापुत्रकी नांई स्वरूपहीनकूं असत् कहैंहैं ।
४ तैसैं विलक्षण स्वरूपवान् होवैहै ॥ इसरीतिसैं—
१ वाधके योग्य स्वरूपवाला सदसद्दिलक्षणशब्दका अर्थ है ॥
२ सद्दिलक्षणशब्दका वाध्योग्य अर्थ है ।
३ स्वरूपवाला इतना असद्दिलक्षणशब्दका अर्थ है ॥
इसरीतिसैं जहां अज्ञान है तहां सारे अनिर्वचनीयपदार्थकी उत्पत्ति होवैहैं ॥
॥ २१६ ॥ कहूं संबंधीकी उत्पत्ति होवैहै ॥ जैसे शुक्तिमैं रजतकी उत्पत्ति है औ रजतमैं शुक्तिदृष्टितादात्म्यकै संबंधकी उत्पत्ति होवैहै ।
शुक्तिदृष्टितादात्म्यकै रजतमैं अन्यथाऽध्यास्यति नहीं । तैसैं शुक्तिमैं प्राक्सिद्धतधर्म है । ताके अनिर्वचनीयसंबंधकी रजतमैं उत्पत्ति होवैहै । ताकी व अन्यथाऽध्याति नहीं ॥ इसरीतिसैं
१ अन्योन्याऽध्यासका वी यह उदाहरण है । औ—
२ संबंधाऽध्यासका यह उदाहरण है । संबंधी अध्यासका वी यह उदाहरण है । औ—
१ अनिर्वचनীয়वस्तुकी प्रतीतिऽकूं ज्ञानध्यास कहैंहैं ॥ औ—
२ ज्ञानेके अनिर्वचनायविपयककूं अर्थोध्यास कहैंहैं ॥
यातैं—
१ ज्ञानाऽध्यास अर्थोध्यासका वी यह उदाहरण है । औ—
२ रजतत्वभ्रमविशिष्टरजतका शुक्तिमैं अध्यास हैं । यातैं धर्मीअध्यासका वी यह उदाहरण है ॥
॥ २१७ ॥ जहां अन्योन्याऽध्यास होवै, तहां दोनोंका परस्पर स्वरूपमैं अध्यास नहीं होवैहै ।
किंतु आरोपितका स्वरूपसैं अध्यास होवैहै । औ सत्यवस्तुका धर्मी अथवा संबंध अध्यस्त होवैहै ॥
संबंधाध्यास वी दोप्रकारका होवैहै:-
१ कहूं धर्मकै संबंधका अध्यास होवैहै औ कहूं केवल संबंधका अध्यास होवैहै ॥
( १ ) जैसे उक्तउदाहरणमैं शुक्तिदृष्टितारूप धर्मकै संबंधका रजतमैं अध्यास है । औ—
( २ ) "रक्तः पटः " या स्थानमैं कुठुम्बतरक्तरूप धर्मकै संबंधका पटमैं अध्यास है । औ—
( ३ ) दर्पणमैं मुखके संबंधका अध्यास होवैहै ॥
२ ( १ ) अंतःकरणका आत्मामैं स्वरूपसैं अध्यास है ॥ औ—
( २ ) अंतःकरणमैं आत्माका स्वरूपसैं अध्यास नहीं । किंतु आत्मसंबंधका अध्यास होनैतैं आत्माका संगोंध्यास है । ज्ञानस्वरूप आत्मा है । अंतःकरण नहीं ॥ औ ज्ञानका संबंध अंतःकरणमैं प्रतीत होवैहै । यातैं आत्माके संबंधका अंतःकरणमैं अध्यास है ॥ तैसैं "घटः स्कुरति" "पटः स्कुरति " इसरीतिसैं स्कुरण-
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संवन्ध सर्वपदार्थनमैंँ प्रतीत होवेंहैं ॥ या आत्मसंवन्धका निखिलपदार्थनमैंँ अध्यास है ॥
॥ ३१८ ॥ आत्मामैंँ काणत्वादिक इन्द्रियधर्म प्रतीत होवेंहैं । यांतँ काणत्वादिक धर्मेनका आत्मामैंँ अध्यास होवेंहै । औ इन्द्रियनका आत्मामैंँ तादात्म्याध्यास नहीं है । कहैंतँ?
" अहं काण:" ऐसी प्रतीति होवेंहैं औ "अहंनेत्रँ" ऐसी प्रतीति होवें नहीं । यांतँ नेत्रधर्मेनका आत्मामैंँ अध्यास है । नेत्रनका आत्मामैंँ अध्यास नहीं ॥
यथापि नेत्रादिनिखिलशपंचकका अध्यास आत्मामैंँ हैँ, तथापि द्रश्यचेतनमैंँ समग्रपंचकका अध्यास है । "त्वँ" पदार्थमैंँ निखिलपंचकका अध्यास नहीं । अविद्याका ऐसा अद्भुतमहिमा है । एकही पदार्थका एकधर्मेन विशिष्टका अध्यास होवेंहैं । अपरधर्मविशिष्टका अध्यास होवें नहीं ॥
जैसे द्रश्यत्वादिगुणोंमैंँ विशिष्ट शरीरका आत्मामैंँ तादात्म्याध्यास होवेंहैं । शरीरत्वविशिष्टशरीरका अध्यास होवें नहीं । इसीवास्ते विवेकी यी "द्रश्योऽहँ" "मन्यमहँ" ऐसा व्यवहार करेंहैं ॥ औ "शरीरमहँ" ऐसा व्यवहार विवेकीका होवें नहीं ॥
यांतँ अविद्याका अद्भुतमहिमा होवेंतँ इन्द्रियके अध्यासविना आत्मामैंँ काणत्वादिक धर्मेनका अध्यास संभवैहै । यी धमोऽध्यासका उदाहरण है ॥
॥ ३१९ ॥ यथोक्तरीतिसँ सकलपदार्थमैंँ पूर्वोक्त दोनूँ लक्षण संभवैंहैं । परन्तु १ परोक्ष औ २ अपरोक्ष भेदसँ भ्रम दोप्रकारका है ॥
१ अपरोक्षभ्रमके उदाहण तौ कहे ॥ औ—२ जहाँँ वहिर्यून्यदेशमैंँ महँनसत्स्वरूप हेतुतँ वृत्तिका अनुमितिज्ञान होवेंहै । वा विप्रलंभकके वाक्यसँ वृत्तिका शाब्दभ्रम होवेंहै । वे दोनूँ परोक्षभ्रम हैं ॥ जहाँँ परोक्षभ्रम होवें,
तहाँँ न्यायोक्तिक जिस रीतिसँ अन्यथाख्याति आदिकसँ निर्वाह करेंहैं ॥ तैसँ विलक्षण कहनावैंमैंँ अद्वैतवादिका आग्रह नहीं है ॥
अपरोक्षाध्यासविपैही पारिभाषिकाध्यास विलक्षण मानेंहैं । कहैंतँ? कर्तृत्वादिक अनर्थग्राम अपरोक्ष है । तौही स्वल्पमैँ ज्ञाननिवृत्त्यर्थ अध्यासका निरूपण है । यांतँ अपरोक्षभ्रमकँहीं दृष्टांतताके अर्थ अध्यासता प्रतीतवत् पादनमैंँ आग्रह है । परोक्षग्रामविपै शास्त्रांतरसँ विलक्षणता कहनावैंमैंँ प्रयोजन नहीं ॥
औ उत्करीतसँ लक्षणका समन्वय
॥ ३२ ॥ सिद्धांतमैंँ स्वीकृत अनिर्वचनीयरख्यातिका निर्धार ॥ २२०-२२२ ॥
॥ २२० ॥ सिद्धांतमैंँ अनिर्वचनीयरख्याति है । तौकी यी रीति हैँ:-जहाँँ रज्जुसर्पादिकश्रम होवेंहै । तहाँँ—१ प्रथसक्षणमैंँ तौ सर्पादिकसंस्कारसहित पुस्पके तिमिरादिदोषसहित नेत्रका रज्जुसादिकसँ संघ होवें, तथ रज्जुका विशेषधर्म रज्जुत्व भासैं नहीं । औ रज्जुमैंँ जो मुंजरुप अवयव हैं सो भासैं नहीं । तथ—२ द्वितीयक्षणविशै रज्जुमैंँ सामान्यधर्म इदंत भासैहै ॥
( १ ) वर्तमानकाल औ पुरोदेशका संबंध इदंत भासैहै । ताहिंके सामान्यअंश औ आधार वी कहैंहैं ॥
( २ ) मुंजरुप त्रिलयाकार रज्जुत्वधर्मविशिष्टरज्जु यह विशेषअंश कहिये है । ताहिंकूँ अधिष्ठान वी कहैंहैं ॥
सो अधिष्ठानका सामान्यज्ञान वी अध्यासका हेतु है । सो सामान्यज्ञान दोषसहित नेत्ररूप प्रमाणसँ उपजैहै । यांतँ भ्रम है । यांतँ
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नेत्रद्वारा अंतःकरण रजयुक्तं प्राप्त होयके इदमाकारपरिणामकं प्राप्त होवैहै ॥ तदनंतर-३ तृतीयक्षणमें तिस दोपजन्य इदमाकारवृत्तिप्रहितचेतनस्थअविद्यामैं क्षोभ होवैहै ॥ उपादानकी कार्याभिमुखतांकं क्षोभ कहैहैं ॥ औ-
४ चतुर्थक्षणमैँ तिस अविद्याके तमोरजगुणका अंश औ सतोगुणका अंश होनूं सर्पादिदिविपयाकार औ ज्ञानाकारपरिणामकं प्राप्त होवेंहैं । सो सर्पादि औ ताका ज्ञान अविद्याके परिणाम औ चेतनके विवर्त्त हैं ॥ यातैं एक सर्पादिक औ ज्ञानरूप धर्मीमैं दोधर्मी हैैं । जैसैं एकही पुरुपरूप धर्मीमैं स्वपिताकी अपेक्षातैं पुत्रत्व औ पितामहकी अपेक्षातैं पौत्रत्व ये दोधर्मी रहैंहैं, तैसैं यहां सर्पैँ आदिलेके आकारादिसकलप्रपंचमैँ विकारी अविद्याकी अपेक्षातैं परिणामत्व औ रज्वादिकुपहित वा मायुपहितचेतनरूप अधिष्ठानकी अपेक्षातैं विवर्त्तत्व ये दोधर्मी रहैंहैं॥
( १ ) उपादानके . समनसत्तावाला औ अन्यथास्वरूप परिणाम कहियेहै । जैसैं अपने उपादान दुग्धके समनसत्तावाला कहिये व्यवहारिकसच्चावाला औ मिथ्यात्व दुग्धतैं आम्ल होनैतैं अन्यथा कहिये और स्वरूप दधि है । यातैं दुग्धका परिणाम है ॥ तैसैं उक्तप्रपंच वी अविद्याके समन प्रातिभासिक वा व्यवहारिकसच्चावाला औ अरुपअविद्यारूपवाला होनैतैं अन्यथा कहिये और स्वरूप है यातैं अविद्याका परिणाम है॥ औ-
( २ ) अधिष्ठानसैं विपमसत्तावाला अन्यथास्वरूप विवर्त्त कहियेहै । जैसैं न्यायवहारिक औ पारमार्थिकसच्चावाला रज्जुस्वरुपहित औ मायाप्रहितचेतन है । यातैं विपम कहिये विलक्षण जो प्रातिभासिक औ न्यायवहारिकसच्चावाला औ संसारदशामैं अशासित उमय-
चेतनसैं वाधित होनैकारि अन्यथा कहिये और स्वरूप होनैतैं सर्पादिपंच चेतनका विवर्त्त है ॥ २२९ ॥ इसरीतिसैं सर्प दंड माला जल-धारा औ पृथ्वीकी दरार इत्यादि दश पदार्थेन-मैंँ जिसजिस संस्कारसहित पुरुपके दोप-सहितनेत्रका रजुजुसंघ होयके जाके इदमााकारवृत्ति होवै, ताकी वृत्तिप्रहितचेतनमैँ स्थित अविद्याकासो पदार्थ औ तिसतिसका ज्ञानरूप परिणाम साथिही होवैहै ॥
१ जहां एकरजुमैं सर्पादिकमैँ एकही पदार्थके संस्कारसहित द्रष्टुपरुपनके सदोपनेत्रका रजुसंघ होयके जाके इदमाकारदृत्ति होवे, ताकी वृत्तिप्रहितचेतनमैँ स्थित अविद्याकासो पदार्थ औ तिसतिसका ज्ञानरूप परिणाम साथिही होवैहै ॥
२ औ जहां एकरजुमैं द्रष्टुपरुपनके सदोपनेत्रका रजुजुसंघ होयके सर्प दंड मालादिक एकएकका तिन्हकूं भ्रम होवै । तहां जाकी वृत्तिप्रहितचेतनमैँ जो निपथ उपज्याहै सो ताहीकूं प्रतीत होवेंहैं । अन्यकूं नाहीं ॥ २३० ॥ इसरीतिसैं उक्त जो भ्रमज्ञान है सो इंद्रियजन्य नाहीं । किंतु अविद्याकी वृत्तिरूप
का परिणाम भ्रम है, सो इदमाकारवृत्ति नेत्रसैं रज्वादिकुपिपयके संघधेतें होवैहै ! यातैं भ्रमज्ञानमैँ इंद्रियजन्यताकी प्रतीति होनैहैं तैसरीक्तकूं इंद्रियजन्यताकी आंमति होवैहै ॥
औ कोई वेदान्ती ची ऐसैं अंगीकार करैहैं परंतु तांकि उक्ति, युक्ति औ अनुभवसैं विरुद्ध है । यातैं समीचीन नाहीं ॥
इसरीतिसैं सिद्धांतमैँ अंगीकरणीय अनिर्व-चनीयासत्यातिकी रीति संक्षेपतैं कही ॥ इति श्रीदृप्तिरत्नावल्यां अनिर्वचनीयासत्याति-निरूपणं नाम अष्टमं स्तबकं समाप्तम् ॥ ८ ॥
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॥ अथ नवमरत्नप्रारंभः ॥ ९ ॥
॥ ३ ॥ अप्रमााणत्विमेद सत्कष्यातिभदर्शनपूर्व्वेक खंडन ॥ २२३-२३० ॥
॥३३॥ सिद्धांतसें भिन्न सकलख्य्यातिनके नामसोहित सत्कष्यातियादके कथन-पूर्वेक ताके निराकरणकी योग्यता
॥ २२३-२२५ ॥
॥ २२३ ॥ शुक्ति आदिकमें रजतादिश्रम होवै, तहां सिद्धांतपक्षसें बिना पांच मत हैं:- सत्कष्य्याति, असत्कष्य्याति, आत्मकष्य्याति, अन्यथाकष्य्याति, औ अज्ञाति, भ्रमके ये नाम कहैंहें । सर्व्वेके मतमें अन्यतम भ्रमका नाम प्रसिद्ध हैं । तिससें भिन्न भिन्न ताकूं अन्यतम कहैंहें ॥
॥ २२४ ॥ तिनमें सत्कष्य्यातिवादीका यह सिद्धांत है:- शुक्तिके अवध्वनके साथि रजतके अवयव सदां रहैंहैं ॥ जैसे शुक्तिके अवयव सत्य हैं तैसेही रजतके अवयव हैं । मिथ्या नहिं हैं ॥ जैसे दोषसहित नेत्रसंघंधतें सिद्धांतमें अविद्याका परिणाम अनिर्वचनीयरजत उपजै है तैसे दोषसहित नेत्रसंघंधतें रजतावयवसैं सत्यरजत उपजैहै ॥ अधिष्ठानज्ञानतैं जैसे अनिर्वचनीयरजतकी निष्चिति सिद्धांतमें होवैहै तैसे शुक्तिज्ञानतैं सत्यरजतका अपनें अवयवमें श्वंस होवैहै ॥ यह सत्कष्य्यातिवादीका मत है ॥
॥ २२५ ॥ सो सत्कष्य्यातिवादीका मत निराकरणीय है । कहैंतैं ? शुक्तिरजतदृष्टांतसैं प्रपंचके सिद्धांत्वकी अनुमिति होवैहै ॥ सत्कष्य्यातिवादमें शुक्तिमैं रजत सत्य है । तिसकूं दृष्थांत घरिके प्रपंचमें मिथ्यात्वसिद्धि होवै नहीं । यातैं यह पक्ष निराकरणीय है ॥
॥ ३४ ॥ सत्कष्यातिवादका खंडन
॥ २२६-२३० ॥
॥ २२६ ॥ या पक्षमें यह दोष है:- शुक्तिज्ञानसैं अनंतर तीनकालमें रजत नहिं है ! इसरीतिसैं शुक्तिमैं शुक्तिदेशमें रजतभाव प्रतीति होवैहै ॥ सिद्धांतमें तौ अनिर्वचनीयरजत मध्यकालमें होवैहैं, औ व्यावहारिकरजतभाव ऐककालिक है । सत्कष्य्यातिवादीके मतमें व्यावहारिकरजत होवै, तिसकालमें व्यावहारिकरजतभाव संभवे नहीं । यातैं ऐककालिकरजतभावकी प्रतीति अनिर्वचनीयरजतकथन विरुद्ध है ॥ औ—
अनिर्वचनीयरजतकी उत्पत्तिमैं तौ प्रसिद्धरजतकी सामग्री चाहिये नहिं । दोषसहित अविद्यांसें ताकी उत्पत्ति संभवैहै । औ व्यावहारिकरजत तौ रजतकी प्रसिद्धसामग्रीविना संभवे नहीं । औ शुक्तिदेशमें रजतकी प्रसिद्धसामग्री है नहिं । यातैं सत्यरजतकी उत्पत्ति
॥ २२७ ॥ जो पैंस कहै:- शुक्तिदेशमें रजतके अवयव सामग्री हैं ।
ताकूं यह पूँछहैं:- १ रजतावयवनका वी उद्धृतलप है वा २ अनुद्धृतलप है ?
१ उद्धृतलप कहै तौ रजतावयवनका वी रजतकी उत्पत्तिसैं प्रथम प्रत्यक्ष हुयाचाहिये । औ—
२ अनुद्धृतलप कहै तौ अनुद्धृतलपवाले अवयवनतें रजत वी अनुुद्धृतलपवाला होवैगा । यातैं रजतका प्रत्यक्ष नहिं होवैगा ॥ औ—
॥ २२८ ॥ जहां एक रज्जुमैं दशपुरुपनदीं भिन्नभिन्नपदार्थनका भ्रम होवै । किसीकूं दंडका,
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३६२
॥ ३ ॥ अग्रिमार्तण्डिमेद असत्ख्यातिप्रदर्शनपूर्वकखंडन ॥ [ वृत्तिरत्नावलि
किसीऊँ मालाका, किसीऊँ सर्पका, तथा जलधाराका इत्यादिकपदार्थके अवयव स्वरूपरजुदेशमें संभवेंनहीं। कहैंतैं? मूर्तद्रव्य स्थानका निरोध करेंहैं ॥ औ सिद्धांतमें तौ अनिर्वचनीयदंडाधिक हैं। सो व्यावहारिकदेशका निरोध करें नहीं । औ तिन दंडादिकनमें स्थाननिरोधादिकफल नहीं मानैं तौ दंडादिकनकै सत् कहना विरुद्ध है औ निष्फल है ॥
॥ २३९ ॥ दंडादिककी प्रतीतिमात्र होवैहै । अन्यकार्य तिनतैं होवै नहीं । ऐसैं कहैं तौ अनिर्वचनীয়वाद सिद्ध होवैहै ॥ औ-
॥ २३० ॥ भ्रमस्थलमें सत्पदार्थकी उत्पत्ति मानैं तौ अंगारसहित ऊपरभूमिमें जलप्रभम होवै । तहां जलैं अंगार शांत हुवैेचाहिये ॥ औ तुलके उपरि घरे गुंजापुंजमैं अग्निप्रभम होवै । तहां तुलका दाह हुवैाचाहिये । यातैं अवयव तौ स्थाननिरोधादिकके हेतु नहीं । औ अवयवीं सुनिके बुद्धिमानोंकूं हानि होवैहै । यातैं सर्वथा निर्हेतुक होनेतैं यह पक्ष असंभवित है ॥
इति श्रीवृत्तिरत्नावल्या सत्ख्यातिप्रदर्शनपूर्वकखंडनं नाम नवमं रत्नं समाप्तम् ॥ ९ ॥
॥ अथ दूशामरत्नप्रारंभ ॥ १० ॥
॥ ३ ॥ अग्रिमार्तण्डिमेद असत्ख्यातिप्रदर्शनपूर्वकखंडन ॥ २३१-२३४ ॥
॥ ३५ ॥ द्विविधअसत्ख्यातिवादके कथनपूर्वक असत्ख्यातिवादीके प्रति प्रक्ष ॥ २३१-२३२ ॥
॥ ' २३१ ॥ असत्ख्याति दोप्रकारकी मानैहैं ॥ ' १ एक तौ शुक्त्यादिअभिदानमैं असत्ख्यातिकी प्रतीतिरूप है । औ-
२ दूसरी असतवरजतत्वसमवायिकी प्रतीति-रूप है ॥ २३२ ॥
यह पुछैहैं:-‘असत्ख्याति’ या वाक्यमें— १ निःस्वरूप असन्निश्चयका अर्थ है? २ अथवा असत्शब्दका अर्थ अवाध्य-विलक्षण है?
॥ ३६ ॥ असत्ख्यातिवादका खंडन
॥ २३३ ॥ जो असत्शब्दका अर्थ निःस्वरूप है ॥
तौ “ शुक्ते मे जिहा नास्ति ” इसवाक्यकै न्याईं असत्ख्यातिवादका अंगीकार निलैज्जका है । कहैंतैं ? सत्स्वरूपतिरहितकूं निःस्वरूप कहैं । यातैं “सच्चास्फूर्तितिरून्य यी प्रतीत होवैहै ।” यह असत्ख्यातिवाद कहै । तैसैं सिद्ध होवैहै ॥
॥ २३४ ॥ अवाध्यविलक्षण असत्शब्दका अर्थ कहैं तौ अवाध्यविलक्षण वाध्य होवैहै ॥ वाध्यके योग्यकूं वाध्य कहैं ॥ इसरीतिसैं वाध्यके योग्यकी प्रतीति असत्ख्याति कहियेहै । यह सिद्ध हुवै । सोई सिद्धांतिका मत है । कहैंतैं ? अनिर्वचनीयख्याति सिद्धांतमैं है औ वाध्ययोगयहू अनिर्वचनीय होवैहै ॥ इसरीतिसैं सिद्धांतसैं विलक्षण असत्ख्यातिवाद है । यह कहना संभवें नहीं ॥
इति श्रीवृत्तिरत्नावल्या असत्ख्यातिप्रदर्शनपूर्वकखंडनं नाम दशमं रत्नं समाप्तम् ॥ १० ॥
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॥ अथ एकादशरत्नप्रारंभः॥ १९ ॥
॥ ४ ॥ अज्ञानाश्रितिमेद आत्मश्रुत्यत्रिमदर्शनं-पूर्वक खंडन ॥ २३५-२४० ॥
॥ ३७ ॥ आत्मख्यातिवादका अनुवाद-पूर्वक खंडन ॥ २३५-२३८ ॥
॥ २३५ ॥ तैसैं आत्मख्यातिवाद वी असंगत हैं । कहैंतें ? विज्ञानवादीकै मतमैं आत्म-ग्र्य्याति हैं । धानिकविज्ञानरूप बुद्धिं विज्ञानवादी आत्मा कहैंहैं ॥ तिसकै मतमैं बाह्यरजत नहीं हैं । किंतु विज्ञानरूप आत्माके धर्म रजत अंतर सत्य हैं । ताकी दोपकैं चलतैं बाह्यदेशमैं प्रतीति भ्रम हैं । यातैं रजतज्ञानमैं रजतगोचरत्व-अंश भ्रम नहीं । किंतु रजतका बाह्यदेशस्थत्व-प्रतीत्यंशमैं भ्रम हैं ॥ जो रजतकी बाह्यदेशमैं उपलब्धि मानें तौ बाह्यदेशमैं सत्यरजत तौ संभवैं नहीं । अनिर्वचनीयर माना होवैगो । सो अनिर्वचनीयवस्तु लोकमैं अप्रसिद्ध हैं । यातैं अंतररजत उपजैहै । ऐसैं मानैं तौ कोई दोप नहीं ॥ यह विज्ञानवादीकै अभिप्राय हैं ॥
हुऐँचाहिये । यातैं आंतररजतका असंभव हैं । ताकी बाह्यदेशमैं प्रतीति वनै नहीं ॥ किंतु-बाह्यदेशमैंहीं अनिर्वचनीयरजत उपजैहै । यह सिद्धांतकी रीतिही समीचीन हैं ॥ औ अनिर्वचनीयरास्तुकी अप्रसिद्धकल्पनादोप कहैं, सो दी अनिर्वचनीयर हैं कहैहैं । कहैंतें ?—
॥ २३८ ॥ अद्वैतवादका यह मुख्य-सिद्धांत हैं:—१ चेतन सत्य हैं । २ तैसैं भिन्न सकल मिथ्या हैं ॥ अनिर्वचनीयरूं मिथ्या कहैंहैं, यातैं चेतनसैं मिथ्यापदार्थकूं सत्यकथनमैंहीं अप्रसिद्ध-कल्पना हैं । चेतनसैं मिथ्यापदार्थनमैं अनिर्वचनीयता तौ अतिप्रसिद्ध हैं ॥ युक्तिसैं विचार करैं तौ किसी अनात्मपदार्थका स्वरूप सिद्ध होवै नहीं औ प्रतीति होवैहैं । यातैं सकलअनात्मपदार्थ अनिर्वचनीय हैं ॥ सिद्धांत-नगरकी न्पांई सारामप्रपंच दृढनष्टस्वभाव हैं ॥
॥ ३८ ॥ अनिर्वचनीयरख्यातिकी रीतिपूर्वक अद्वैतवादीकूं अनिर्वचनीयरपदार्थकी प्रसिद्धि ॥ २३९--२४० ॥
॥ २३९ ॥ स्वप्नसैं जायत्पदार्थमैं किंचिद्रि-लक्षणता नहींं, औ युक्तिरजत प्रातिभासिक हैं । कांताकरादिकमैं रजत व्यावहारिक हैं ॥ इसरीतिसैं अनात्मपदार्थनमैं मिथ्यात्व-विलक्षणता परस्पर कहीहै, सो स्थूलबुद्धि-वालेके अद्वैतबोधमैं प्रवेशवास्ते असंधदतीनयासैं कहीहै ॥ स्थूलबुद्धिपुरुपकूं प्रथमही मुख्य-सिद्धांतकी रीति क़दै, तौ अद्वतअर्थकूं सुनिके अनात्मसत्यत्वभावनावालापुरुप श्विमुख होयके पुरुपार्थसैं भ्रम होयजावै । इसवास्ते—
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१-२ अनात्मपदार्थनकी न्यावहारिकप्रातिभासिकमेदसैं द्विविधसत्ता कही है । औ-३ चेतनकी पारमार्थिकसत्ता कही ॥ ॥२४०॥ चेतनसैं ग्रपंचककी न्यून्सत्ता बुद्धिमैं आरुढ हुये सकलअनात्मपदार्थनकूं स्वाप्निद्रष्यांतसैं प्रातिभासिक जानिके निपेघवाक्यनतैं सर्वेअनात्मकूं सच्चास्फूर्तिदृृग्न्य जानिलेै । इस-वास्ते सच्चामेद कबहै । औ अनात्मपदार्थनका परस्परसत्तामेदमैं अद्वैतशास्त्रका तात्पर्ये नहीं । यातैं अद्वैतवादीकूं अनिर्वचनीयपदार्थ अप्रसिद्ध है । यह कथन विरुद्ध है ॥ इसरीतिसैं आत्म-ख्यातिवादिका मत असंगत है ॥
इति श्रीदृृचिरत्नावल्यां आत्मख्यातिपूर्वक ॥ अथ त्रयोदशरत्नप्रारंभ: ॥१३॥
सरपका रज्जुमैं ज्ञान संभवै नहीं । जो रज्जुके समीप सरपै होवै तो दोऊंसैं नेत्रका संयोग होयकै सरपत्ववृतिसर्पककी रज्जुमैं नेत्रजन्यधर्म-प्रतीति संभवै । औ जहां रज्जुके समीप सरपै नहीं, तहां रज्जुमैं सरपत्वभ्रम नेत्रजन्य संभवै नहीं ॥ इहां जातैं सरपच्यक्तिसैं नेत्रसंयोगके अभावतैं सरपत्वसामान्यैं नेत्रसंयुक्तसमवायका अभाव है । यातैं सरपत्वविशिष्टरज्जुका ज्ञान संभवै नहीं । इसरीतिसैं अन्यथाख्याति असंगत है ॥
इति श्रीदृृचिरत्नावल्यां अन्यथाख्यातिप्र-दार्शनपूर्वकखंडनं नाम द्वादशं रत्नं समाप्तम् ॥१२॥
॥ अथ द्वादशरत्नप्रारंभ: ॥१२॥
॥ ५ ॥ अप्रमावृत्तिभेद अन्यथाख्यातिप्रदर्शन-पूर्वक खंडन ॥ २४१-२४२ ॥
॥ ३१ ॥ अन्यथाख्यातिवादका कथन-पूर्वक खंडन ॥ २४१-२४२ ॥
॥२४१॥ तैसैं नैयायिक अन्यथाख्याति मानैहैं । ताकी यह रीति है:-दोपसहित नेत्रका संयोग रज्जुसैं जब होवै, तब रज्जुत्वधर्मसैं नेत्रका संयुक्तसमवायसंबंध तौ है, परंतु दोषके चलतैं रज्जुत्व भासै नहीं । किंतु रज्जुमैं, सरपत्व भासैहै । सो सरपत्वका ज्ञान नेत्रजन्य है । तैमैं पूर्ववृत्तसर्पका उद्बुद्धसंस्कार भी सहकारी है ॥ या मतमैं धर्मी जो सरपे, ताका अध्यास नहीं । किंतु सरपत्वरूप धर्म-मात्रका अध्यास है । यह नवीननैयायिकनका मत है ॥
॥ २४२ ॥ सो नवीननैयायिकनका मत सभीचीन नहीं । काहेतैं? नेत्रसैं अंतरायसहित
॥ ४० ॥ अख्यातिवादका अनुवाद-पूर्वक खंडन ॥ २४३-२४४ ॥
॥ २४३ ॥ सांल्यप्रभाकरमतमैं अख्याति मानीहै, ताकी रीति यह है:-जहां शुक्तिस तथा रज्जुसैं दोपसहित नेत्रका संबंध होवै, तहां शुक्तिकका तथा रज्जुकका विशेषरूप भासै नहीं । किंतु सामान्यरूप इदंता भासैहै ॥ औ शुक्तिसैं नेत्रेक संबंधजन्य ज्ञान हुये रजतके संस्कार उद्बुद्ध होवैकै शुक्तिके सामान्यज्ञानके उत्तरक्षणमैं रजतकी स्मृति होवैहै । तैसैं रज्जुके यथपि .सकलस्मृतिविभानमैं पदार्थकी सत्ता वी भासैहै । तथापि दोपसहित नेत्रके संबंधतैं संस्कार उद्बुद्ध होवै । तहां दोषके माहात्म्यतैं तत्त्आंशका प्रबोध होवैहै । यातैं प्रमृष्टतत्ताक-समृति होवैहै ॥ प्रमृष्ट कहीये लस इंद्रैहैं तथा जिसकी, सो प्रघृष्टतत्कारोबदका अर्थै है ॥
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॥ तकंभ्रमादि औ चतुर्दशज्ञानोंका कथन ॥
इसरीतिसैं "इदं रजतं" "अयं सर्पः" इत्यादिकस्थलमें दोज्ञान हैं ॥ १ ताका शुक्तिका औ रजत्का सामान्य-इंद्रूपका प्रत्यक्षज्ञान यथार्थ है । औ-२ रजतका तथा सर्पका स्मृतिज्ञान वी यथार्थ है । इसरीतिसैं भ्रमज्ञान अप्रसिद्ध, है ॥
यद्यपि जा पदार्थमें इष्टसाधनताका ज्ञान होवै तामैं प्रवृत्ति होवैहै औ जामैं अनिष्टसाधन-ताका ज्ञान होवै तासैं निवृत्ति होवैहै । या मतमैं इष्टसाधनताज्ञान औ रज्जुमैं अनिष्ट-साधनताका ज्ञान कहैं तौ भ्रमका अंगीकार होवै । यातैं इष्टसाधनताज्ञानके औ अनिष्टसाधनता-ज्ञानके अभावतैं शुक्तिमैं रजतार्थिकी प्रवृत्ति औ रज्जुमैं निश्चत्ति नहीं हुईचाहिये । औ होवैहै यातैं भ्रमज्ञान अवश्य्क है ॥
नथापि-- १ जा पदार्थमैं पुरुपकी प्रवृत्ति होवै ता पदार्थका सामान्यरूपतैं प्रत्यक्षज्ञान । औ- २ इष्टपदार्थकी स्मृति । औ- ३ स्मृतिके विपयतैं पुरोवर्त्तिपदार्थका भेद-ज्ञानाभाव । ४ तैसैं स्मृतिज्ञानका पुरोवर्त्तिके ज्ञानतैं भेदज्ञानाभाव । इतनी सामग्री प्रवृत्तिकी है ॥
रज्जुमैं सर्पज्ञानतैं जो निश्चत्ति होवैहै, सो वी विश्वप्रवृत्तिही हैं । यातैं भ्रमज्ञानोचैना प्रवृत्ति संभवैहै ॥ यह अध्यातिवादका अभिप्राय है ॥ ज्ञानद्रयका विवेकाभाव औ उभयविपयका विवेकाभाव अध्यातिपदका पारिभाषिक अर्थ है ॥
॥ २४४ ॥ यह अध्यातिवादिका मत वी समीचीन नहीं । कहैंतैं-- १ शुक्तिमैं रजतभ्रमतैं प्रवृत्त हुये पुरुषकूं
रजतका लाभ नहीं होवै, तथ पुरुष यह कहै-है:--"रजतज्ञान्प्रदेशमैं रजतज्ञानसैं मेरि निष्फल प्रवृत्ति हुई ॥" इसरीतिसैं भ्रमज्ञान अनुभावसिद्ध है । ताका लोप संभवै नहीं ॥ औ २ मरुभूमिमैं जलका वाघ होवै, तथ यह कहैहै:--"मरुभूमिमैं मिथ्याजलकी प्रतीति मेरैकं हुई" या वाधलैं वी मिथ्याजल औ तकी प्रतीति होवैहै ॥
अध्यातिवादीकी रीतिसैं तौ "रजतकी शुक्तिमैं प्रवृत्ति हुई" ऐसा वाध हुयाचाहिये । और "मरुभूमिके प्रत्यक्षसैं औ जलकी स्मृतिसैं मेरि प्रवृत्ति हुई" ऐसा वाध हुयाचाहिये । औ-विपय तथा भ्रमज्ञान दोनूं त्यागिके अनेक-प्रकारकी विरुद्ध्कल्पना अध्यातिवादमैं हैं । तथापि नेत्रसंयोग हुये दोपके माहात्म्यतैं शुक्तिको विशेषपतैं ज्ञान होवै नाहीं । यह कल्पना । तैसैं तत्त्वशास्त्रै प्रमोपेतैं स्मृतिकल्पना औ विपयनका भेद है । औ भासै नहीं ॥
तैसैं ज्ञानोंका भेद है । कदी वी 'भासै नहीं । इत्यादिसकलकल्पना विरुद्ध हैं ॥ औ रजतकी प्रतीतिकालमैं अभ्रुप्रदेशमैं रजत भतीत होवैहै । यातैं अध्यातिवाद वी अनुभावविरुद्ध है ॥
॥ ४१ ॥ तकंभ्रमके निर्णयपूर्वक ख्याति-निरूपण औ खंडनके उपसंहारसहित चतुर्दशज्ञानोंका कथन ॥ २४५-२४८ ॥
यद्यपि अनिर्वंचनीयाध्यातिका मंडन औ अन्यख्यातिनका प्रतिपादन औ खंडन । अन्यग्रंथनमैं विस्तारसैं लिख्याहै । तथापि वह युक्ति कठिन होतैं ख्यप्रमातिमान-आस्तिकअधिकारीकूं अनुयोगी जानिके यहां संक्षेपतैं रीतिमात्र जनाईहै ॥
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॥ २४६ ॥ इसप्रकार संशय औ निश्चयरूप भ्रम कव्हा ॥ तैसे तीसरा तर्क वी भ्रमही है ॥ कहैंत ? व्यापकके आरोपतैं व्यापकका आरोप तर्क कहियेहै ॥ जैसे "यदि वहिंर्न स्यात्तदा भूमोऽपि न स्यात्" ऐसा ईशान भूमवदिसहित देशमें होवै, सो तर्क है ॥ तहां वहिका अभाव व्याप्य है ॥ भूमका अभाव व्यापक है ॥ वहिके अभावके आरोपतैं भूमाभावका आरोप होवैहै ॥ वहिधूमके होते वहिअभावका औ भूमाभावका ज्ञान है । यातैं भ्रम है ॥ वाध आरोप कहैंहैं ॥ इसरीतिसैं तीसरा तर्क वी भ्रम है ॥
॥ २४७ ॥ यद्यपि तर्कज्ञान वी भ्रमनिश्चयके अंतर्भूत है । तथापि यहां भूमवहिका सद्भाव है । यातैं उनके अभावका बाध है ! ताके होते वी पुरुषकी इच्छाें वहिके अभाव-
का औ भूमाभावका "भ्रमज्ञान" होवैहै । यात आरोपरूप विलक्षणता होतैंहैं पृथक् कव्हा ॥
॥ २४८ ॥ इसप्रकार भ्रमात्मक्रमाभेदतैं वृत्तिज्ञान त्रयोदश हैं ॥ यद्यपि वृत्तिज्ञानके प्रसिद्धभेद त्रयोदशही हैं, औ अवांतरभेद अनंत हैं । तथापि स्वसके प्रातिभासिकरजु आदि अवच्छिन्नचेतनमैं अध्यस्तसर्पादिकनका ज्ञान मिलिके चतुर्दशज्ञान हैं ॥ इसरीतिसैं रत्तोपरचित चतुर्देशवृत्तिज्ञानका स्वरूप वी कारण लक्षण-पूर्वक संक्षेपतैं निरूपण किया ॥ इति श्रीवृत्तिरत्नावल्यामव्यात्मप्रकाशनपूर्वकखंडनं नाम त्रयोदशं रत्तं समाप्तम् ॥ १३ ॥
॥ अथ चतुर्दशरलप्रारंभः ॥१४॥ ॥ वृत्तिफलनिरूपण ॥ २४९-२५७ ॥ ॥ ४२ ॥ अवस्थात्रयका निरूपण ॥ ॥ २४९-२५३ ॥
॥ २४९ ॥ उत्कवृत्तिरूप ज्ञानका प्रयोजन यह है:- १ जीवकूं अवस्थात्रयका संघंध वृत्तिसैं होवैहै । औ-- २ पुरुषपार्थग्रामि वी वृत्तिसैं यातैं- १ संसारप्राक्तिकी हेतु वृत्ति है । औ-- २ मोक्षप्राप्तिकी हेतु वी वृत्ति है । कहैंत ?
॥ २५० ॥ अवस्थात्रयके संघंधसैं जीवकूं संसार है ॥ अवस्थात्रयका कालकूं वाचक है ॥
१ स्वप्नावस्था औ सुपुप्तिअवस्थासैं मिल्र जो इंद्रियजन्यज्ञानका आधारकाल औ इंद्रिय-जन्यज्ञानके 'संस्कारका आधारकाल, सो जाग्रतअवस्था कहियेहै ॥
यद्यपि इंद्रियजन्य ज्ञान नहीं है । तथापि संस्कार हैं । औ इंद्रियजन्यज्ञानके संस्कार खसाक्ष्या सुपुप्तिअवस्थामैं वी हैं, यातैं इसरीतिसैं "जाग्रतअवस्था" यह व्यव हार इंद्रियजन्यज्ञानके आधारही है । सो इंद्रियजन्य-
ज्ञान अंतःकरणकी वृत्तिरूप है ॥ अंतःकरणकी मतभेदसैं कोई आवरणनिवृत्ति प्रयोजन मानहैं । तामैं वी नाना मत हैं । औ कोई प्रकारशहेतु भ्रमातसैं विपयका संघंध वृत्तिका प्रयोजन मानहैं । उत्कप्रयोजनवाली इंद्रियजन्य
अंतःकरणकी वृत्ति जाग्रतअवस्थामैं होवैहै ॥
॥ २५१ ॥ २ इंद्रियसैं अजन्य जो विपय गोचर अंतःकरणकी अपरोक्ष्यवृत्ति ताकी अवस्थाकूं स्वप्नावस्था कहैंहैं ॥ स्वप्नमैं द्वैष औ ज्ञान अंतःकरणका परिणाम है ॥ औ--
ज्ञन अंतःकरणका परिणाम है ॥ औ-- ॥ २५२ ॥ ३ सुखगोचर अविद्यागोचर अज्ञानकी साक्षात्परिणामरूप वृत्तिकी अवस्थाकूं सुखुसिअवस्था कहैंहैं ॥ सुपुप्तिमैं अविद्याकी
वृत्ति सुखगोचर औ अज्ञानगोचर होवैहै ॥
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॥ २५३ ॥ यथ्रापि अविद्यागोचरत्वत्ति जाग्रतमें वी "अहं न जानामि" इसरीतिसें होवैहै, तथापि वह वृत्ति अंतःकरणकी है । अविद्याकी नहीं ॥ तैसें प्रातिभासिक रजतकारत्वत्तिं जाग्रतमें अविद्याका परिणाम है । सो अविद्यागोचर नहीं । तैसें सुखाकारवृत्तिं जाग्रतमें है । सो अविद्याका परिणाम नहीं है ॥
॥ २५४ ॥ इसरीतिसैं उक्तसुप्रसिमें अविद्याकी वृत्तिमें आरुढ साक्षी अविद्याकूं प्रकाशै है औ स्वरूपसुखदुःखकूं प्रकाशैहै ॥ सुप्रसिमें अवस्थामें सुखाकार अविद्याका परिणाम जिस अज्ञानांशका शंका हूयाहै, तिस अज्ञानांशमें तिस पुरुपका अंतःकरण लीन है ॥ जाग्रतकालमें तिस अज्ञानांशका परिणाम अंतःकरण होवैहै । यातें अज्ञानकी वृत्तिसैं अननुभूतसुखकी जाग्रतमें स्मृति होवैहै ॥ उपाधिकरणकी औ कायिकी भेद नहीं होवैतैं । अनुभव औ सरणारडूं व्यधिकारणता नहीं । नाम भिन्न अधिकरणता नहीं ॥
॥ २५५ ॥ इसरीतिसैं तिनी अवस्था हैं ॥ मरणका औ मूर्छाका कोई सुप्रसिमें अंतरभव कहैं हैं । कोई पृथक् कहैं हैं ॥ यह अवस्थामेद वृत्तिके आधीन है ॥ जाग्रत्सुप्तिमें तौ अंतःकरणकी वृत्ति है ॥ १ जाग्रतमें इंद्रियजन्य अंतःकरणकी वृत्ति है। २ स्वप्नमें इंद्रियअजन्य अंतःकरणकी वृत्ति है । ३ सुप्रसिमें अज्ञानकी वृत्ति है ॥ ॥ ४२ ॥ वृत्तिके प्रयोजनका कथन ॥ २५६-२५७ ॥
॥ २५६॥ १ अवस्थाका अभिमानही वंध है ॥ निरुपणं नाम चतुर्दशं रत्नं समाप्तम् ॥ समास्सोदयं वृत्तिरलनावलिग्रंथ: ॥
अभिमान वी भ्रमज्ञानकूं कहैं हैं ॥ सो वी वृत्तिविषयप है । यातैं वृत्तिकृतवंधही संसार है ॥ औ- २ वेदांतवाक्यनसैं "अहं ब्रह्मास्मि" ऐसी अंतःकरणकी वृत्ति होवै । तैसैं प्रपंचसहितअज्ञानकी निशृत्ति होवैहै । सोई मोक्ष है ॥ यातैं- १ वृत्तिका संसारदशामें तौ व्यवहारसिद्ध प्रयोजन है । औ- २ वृत्तिका परमप्रयोजन मोक्ष है ॥
॥ २५७ ॥ कलिपतकी निशृत्ति अधिष्ठानरूप होवैहै । यातैं 'संसारनिवृत्ति मोक्ष है' । या कहनेतैं ब्रह्मरूप मोक्ष है । यह सिद्ध होवैहै ॥ निशृत्तिका अधिष्ठानरूप ब्रह्म ज्ञातत्वविशिष्ट नहीं किया । कितु ज्ञातत्वरूप उपलक्षणसैं लक्षित है । यातैं सो निशृत्ति वी ज्ञातत्वोपलक्षितअधिष्ठान है ॥ इसरीतिसैं संक्षेपतैं वृत्तिज्ञानका प्रयोजन निरुपण किया ॥
॥ दोहा ॥ वृत्तिसूरके दर्शमैंं, मंदहष्टि जे लोक ॥ पीतांबर ता हित रची गाथा रत्न कुलोक ॥ ९४ ॥
इति श्रीमत्प्राज्ञापुरसरस्वतीपुज्यपादशिष्य-पीतांबरशर्मविदुषा परमहंसत्साधुश्रीमभिलोक-रामाज्ञया संक्षेपणीयां वृत्तिरतनावल्यों वृत्तिफल-समास्सोदयं वृत्तिरलनावलिग्रंथ: ॥ ९४ ॥
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॥ साधुश्रीसुंदरदासजीकृत स्वप्नबोध ॥
॥ दोहा छंद ॥
स्वप्नें मेला भयो । स्वप्नेंहि बिछोह ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नैं । नहीं मोह निंमोह ॥१॥
स्वप्नें संग्रह कीयो । स्वप्नही मैं त्याग ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नैं । ना कछु राग विराग ॥२॥
स्वप्नेंही पति भयो । सपने कामी होइ ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । कामी पति न कोउ ॥३॥
स्वप्नें पंडित भयो । सपने मूरख जान ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । नहीं ज्ञान अज्ञान ॥४॥
स्वप्नें राजा कहैं । स्वप्नहीं रंक ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । नहि साथरौं प्रयंक ॥५॥
स्वप्नें हत्या लगी । सपने नहायो गंग ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । पाप न पुण्य प्रसंग ॥६॥
स्वप्ने दुरगतन कियो । सपने झूठ्यो आभि ॥ दोन जु मिथ्या नहै गये । सुंदर देख्यो जागि॥७॥
स्वप्नें गयो प्रदेशनैं । सपने आयो मौन ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । आयो गयो जु कौन ॥८॥
स्वप्ने खोई वस्तुकों । पाई स्वप्नेंहि माहिं ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । पाई खोई नाहिं ॥ ९ ॥
स्वप्नें भूल्यो फिन्यो । सपने पाई वाट ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । ओघट रह्यो न घाट ॥१०॥
स्वप्ने चौरासी भम्यो । सपने यमकी मार ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । नहिं दुइयो नहिं पार ॥११॥
स्वप्नें मरनि को करै । सपने जनमै आइ ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । को आवै को जाइ ॥१२॥
स्वप्नेंहि स्वर्ग गयो । सपने नरकहिं दीन ॥ सुंदर जातो स्वप्नतैं । धर्मे अधरम न कीन ॥१३॥
स्वप्नें दुर्बल भयो । स्वप्नेंहि सुपुष्ट ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । नहीं रूप नहीं कुटिल ॥१४
स्वप्नें सुख पाइयो । सपने पायो दुःख ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । ना कछु सुख नहिं दुःखा॥१५
स्वप्नें योगी भयो । स्वप्नें संन्यास ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । ना घर ना बनवास ॥१६
स्वप्नें लोका भयो । स्वप्नेंहि मथेन ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । ना कछु लेन न देन ॥१७
स्वप्नें ब्राह्मण भयो । स्वप्नें शूद्रत्व ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । नहिं तम रज कहिं सत्॥१८
स्वप्नें यम नियम व्रत । सपने तीरथ दान ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । एक सत्य भगवान ॥ १९
स्वपे दोखो दारिका । सपने जगत साख ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । ना को संग न साथ ॥२०
स्वप्नें मथुरा गयो । स्वप्नें हरिद्वार ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । नहिं बदरी केदार ॥ २१
स्वप्नें काशी मुवै । स्वप्नें घरमाहिं ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । मुक्ति रासौमौ नाहिं २२
स्वप्ने दुष्कर तप कियो । सपने संजम ताप ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । नहिं आसीस न श्राप ॥२३
स्वप्नें निद्रा भई । स्वप्नेंहि प्रंसंस ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । नहीं कृष्ण नहिं कंस ॥२४
स्वप्नें मारथ नयो । सपने यादव साख ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । मिथ्या वचन विलास ॥२५
स्वप्नेंहि स्वर्ग गयो । सपने नरकहिं दीन ॥ सपने सकल संसार है । स्वमा तीनौं लोक ॥ सुंदर जाग्यो स्वप्नतैं । तव सत् जान्यो फोक ॥२६
॥ इति साधुश्रीसुंदरदासजीकृत स्वप्नबोधः संपूर्णः ॥
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॥ श्रीनाटकदीप ॥ १० ॥
श्रीरामकृष्णपण्डितकृत संस्कृतटीका । तथा
प्रकटनिष्ठ पण्डित श्रीपीलांवरजीकृत
भापाटीकासहित
प्रकटकृतों
हरिप्रसाद भगीरथजी
पुस्तकालय-मुंबई।
( श्रीविचारसागर चतुर्थ वृत्तिके साथ में यह ग्रंथ
रेजिस्टर दिया है ॥ )
श्रीपंचदशीसटीकाराभापादितीयाध्यात्मिक १ अलौकिक
हृदियुक्त रु. १०) इस ग्रंथकी जिल्द सुवर्णोदीपक-
रंगयुक्त गजेन्द्रमोक्षादिक साधनियोंसे देवीध्यमान
करीहै । सो वादमें दिये विनर्से ज्ञान होवैगा । इस
आश्रिति चिपै विद्वज्जनोंके बहुतेरे अभिप्राय मिलै हैं ।
तिसमें थोड़े इक्ठे लख्युमंथविपै छापेहैं ॥ पंचदशीमूल-
॥ ॐ॑ पंचदशीसटीकासभापा .
श्रीनाटकदीपकी प्रसंगदर्शक-
अनुक्रमणिका ॥
१ अध्यारोप औ अपवादपूर्वेक बंध-
निरुक्तिके उपाय विचारक
चिपय ( जीवपरमात्मा ) सहित
कथन. ..... ... ..... ... ३९४५
१ अध्यारोप औ साधम ( विचारज्ञान्य-
ज्ञान ) सहित भपवाद. ... ... ३९४५
२ पंचमहावाक्यविचारके विषय
जीव ओं परमात्माका स्वरूप. ... ३९६३
३ श्लोक १० उक्त दृष्टांतके वर्णन-
करि परमात्माकं निर्विकारी होनेकरि
सर्वकी प्रकाशकता. ... ... ... ३९८५
२ परमात्माके यथार्थ स्वरूपका विरोध-
करी निश्चित. ... ... ... ८०००
१ साक्षी परमात्मामें बुद्धीकी चंचलता-
का आरोप. ... ... ... ८०००
२ साक्षीके देहकलिदरहित निजस्वरुपके
कथनपूर्वेक ताकी भ्रमनिवृत्ति उपाय ... ८०१२
मात्र द्वितीयाध्यात्मिक १ ×प्रकाशस्विचारेक. ॥ × प्रथमफल-
विचारेक औ महानवाक्यविचेक ॥ × विनारसागर औ
वृत्तिरननवली पयावृत्तिप्रकरण अध्यासवृत्ति औअधिकता-
युक्त ० अभिनविंदर जिल्दमें × खुंदराविलास ज्ञान-
सहित श्रुंदसरकाव्य चतुर्थयंग्रंथि ९॥ × सटीका शट्रा-
वकगीता उत्तमसरींमें तृतीयाध्यात्मिक छपतीहै × विचार-
चंद्रोदय पंचमाध्यात्मिक अधिकतायुक्त है ॥ × वेदांत
विनोदके श्लोक ७ प्रत्येक.)-॥ × गजेन्द्रमोक्ष सभाषा.
× मूल तथा संपूर्ण आयासहित दशोपनिषदु-
ईशावास्योपनिषद् द्वितीयाध्यात्मिक × छांदोग्योपनिषदु
६ × मुंडकादिन्यकोपनिषद् १० × वालकोधसटीक
द्वितीयाध्यात्मिक ९।
ठिकाना:-
हरिप्रसाद भगीरथजीका
प्राचीन पुस्तकालय, कालबादेवी-मुंबई।
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विषय
प्रथमींसारणी
चौथींसारणी
द्वितीयसारणी
तृतीयसारणी
योग
सांख्य
वेद
चार्वाक
बौद्ध
जैन
ईश्वर
कर्म
मोक्ष
फल
पाप
पुण्य
नरक
स्वर्ग
आत्मा
पुनर्जन्म
वेदप्रामाण्य
|| इति मतैकदेशसंग्रहार्थसारसंग्रहः प्रथमः ||
ठिकाना:- भीकतरामायण भंडार, पुस्तक प्रकाशक, प्राचीन पांडुलिपि शोधकेंद्र
काळोपीठी रोड, जुनी जुनी
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वेदविषयक उलटफेर
प्रस्तावना
परिच्छेद
विषय
पृष्ठ
संकेत
विषय
पृष्ठ
संकेत
वेदविषयक विचारक उलटफेर
प्रस्तावना
परिच्छेद
विषय
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विषय
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वेदविषयक विचारक उलटफेर
प्रस्तावना
परिच्छेद
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वेदविषयक विचारक उलटफेर
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वेदविषयक विचारक उलटफेर
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परिच्छेद
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वेदविषयक विचारक उलटफेर
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संकेत
इति श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमच्छंकरभगवत्पूज्यपादशिष्यपरम्पराप्राप्त श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचिते सारस्वतसर्वस्वे विचारसागरे वेदविषयक विचारक उलटफेर इति नाम सप्तमः प्रकरणग्रन्थः ॥
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॥ ॐ श्रीपंचदशीसटीकासभाषाटिप्पणी द्वितीयावृत्ति ॥ रु० ३० ॥
यह द्वितीयावृत्तिकी मुद्रणशैलीकी नवीनताविषै विद्वज्जनोंका क्या अभिप्राय होता है, सो जाननेनिमित्त श्रीनाटकदीपिकानाम दशमप्रकरण तीनोंकूं भेजाथा । सो देखिके अनेकविद्वानोंनै अपने अभिप्राय लिख भेजे हैं । तीनमेंसैं मातृ थोड़ेही संक्षेपमें नीचे दिये हैं ॥
श्रीमद्भदुरामशार्मा ( पोर्वंदर ) ( तिनोंके संस्कृतपत्रकपरसैं ) छापनेकी सुंदरशैली देखिके मैं प्रसन्न हुइहूं । संपूर्णग्रंथ ईसहीं शैलिसैं छापा जावैगा तो यह संस्कृतभाषाविषै अज्ञजनोंकूं तथा केवलभाषा जाननेवाले जिज्ञासुओंकूं अत्यंत उपकार होवैगा । इतनही नहीं, परंतु इस ग्रंथकी मनोहर मुद्रणरचना गीर्वाणभाषाके रहस्यकूं जाननेहारे निर्मत्सरशास्त्रपंडितोंकूं भी आनंद उत्पन्न करैगी । ऐसी आशा रखताहूं । विषयकी अनुयूलताके रक्षणनिमित्त स्थूल औ सूक्ष्म अक्षरनकूं रखेहैं ॥ प्रकरणोंके अवांतरविभागकूं युक्तिपुरःसर दिखायेहैं ॥ श्लोकांक टीकांक औ टिप्पणांक उपरांत अक्षरके अनुकमसैं सूचिपत्र, ऐसी उत्तमरीति औ सुंदराक्षरयुक्त भाजपत्रंत कोईं वृंथ छपा नाहीं है । इसलिए स्वल्पपण है ।
सूत्रेषु ग्राहैरिवास्तद्यतिकरस्तुभगे रक्षैररक्षतांगै- मैंदानामप्यखेदैविलसतिच्छुदुषामत्यसीमप्रसादम् । अर्थ:- स्थूल औ सूक्ष्मअक्षरोंकी रचनासहित मध्यकी रेखांसैं अधविभागमें सींमा करीहै । पंडितेसेद औ अनेक- मेदसैं मूल व्याख्या औ अवतरणकूं दिखायेहैं ॥ सुंदर- स्पष्ठाक्षरसैं छाप्यहै । ऐसी उत्तमसंरचनासैं विद्वानोंकूं अतिशय आनंद औ मंदबुद्धिकूं सुगमता होवैहै ॥
पंडितश्रीविद्यानाथ शास्त्री (ग्रावणकोर ) महाराजाकॉलिजके संस्कृतप्रोफेसरसाहेब ॥ भवदंगीकृता रीतिस्सर्वैरनुतोषकारिणी । अनेकभावाविहृद्यप्यथिनीसुधियांसुखकम् ॥१॥ तदुपकान्तरीयैव समातिमप्रार्थ्ययामहे । भाषालक्ष्यं पृथकृत्य मुद्रितं चेतदुच्योभनमु ॥२॥ अर्थ:- तुह्मैनें अंगीकार करी रीति सर्वकूं संतोषकारक है औ विद्वानोंकूं सुख देखैहैं ॥ आरामत रातिस् ग्रंथके समासिकूं इच्छितहै ॥ उमैय भाषालक्ष्यं पृथक् करके छापी सो बहुत इष्ट कियो है ॥
पं. वेनिसः मेम. पं. ( वनारस् ) संस्कृतकॉलेजके प्रिंसिपलसाहेब । ( तिनोंके इंग्रेजीपत्रकपरसैं ) दोविभागमें छापीहुई पंडितपीतांबरजीकी टीकावालीकी पंचदशीसका द्वितीयकालसैं मेरेकूं अनुभव है । यह वरीमान- नमूना, रचना औ मुद्रणशैलीविवै निरववाद छधाणावकूं दर्शोवतहै ॥
पंडितश्रीकृष्णाचार्य ( चित्रदर ) पञ्चयपपाठशालाके संस्कृतभाषाध्यापक ॥ पञ्चयप्प्रविचारशालाके संस्कृतभाषाध्यापक ॥ चित्रपटैरहितविद्यासादृश्यविचार्ज्जालं वितरति सकृदेवालोकनात्यत्रवजन्तोः । तद्वति समवलोकयानन्दसान्द्रांतरातमा सक्छेरसकलवर्गमादधत् क्षेमप्रदाः ॥ ३ ॥ अर्थ:- जो विचक्षण् चित्रकाळ विद्याके परिजयसैं साध्य है । सो विज्ञान सर्वमुदुपजनौंकूं यह ,प्रकरणके मातृ एक- चार अवलोकन किये होवैहै । ऐसैं देखिके अतिशयप्रसभयै ऋणयावैं सकलरसिकवर्गैके साथै हृपंकूं पावतेहैं ॥
पंडित श्रीनारायणशास्त्री (कांजीवरम्) पञ्चयपपाठशालाके संस्कृतशिक्षक ॥ नाटकदीपेऽपि येऽत्र तत्रिकायां भवाधिधानौकार्याम् । पक्ष्षिणा यावत् हृदयं निरवद्यं तावदभावाति ॥१॥ स्थालीपुलाकर्नीतिं संस्म्यायातत्समस्तमेव स्वात् । इति मन्यतेरधिकांशिच्छेद्युक नारायणास्मेधःशास्त्री । अर्थ:- नाटकदीप रूप अधीष औ संस्कारसागर तरेनैकै नौकारूप टीका, यह तुह्मकूं देखिके हृदयकूं आनंद कारी किर्मेल्लान् सुकरातहै औ कांजीवरसी नारायण- शास्त्री स्थालीपुलाकन्यकाका स्मरणकारिके समस्तप्रंश ऐसाहीं आनन्दकारी होगा ऐसैं मानतेहैं ॥
श्रीमद्दुर्गोस्वामि देवकीनंदनाचार्यजी । सुंदरै । ( तिनोंके संस्कृतपत्रकपरसैं ) छापनैमें जो यह प्रकार लियाहै सो भतिरमणीय औ सर्वकूं पठण करनैं—करावनेमें सुगम है । ऐसा मेरा अभि- प्राय है ॥
प्रोफेसर रघु, मॅक्स मूलर साहेब, के, पेमू । ऑक्सफर्ड ॥ ( तिनोंके इंग्रेजीपत्रकपरसैं ) तुह्मारी मुद्रणशैली वडे धन्यवादकूं योग्य है ॥
श्रीतावधानी श्रीनिवासाचार्य ( मधुरास ) पञ्चयप्पाठशालाके संस्कृतपंडित ॥ रेखासीमनितताराध पृथुभिरपृथुमिश्राक्षरन्यासमेधै- मूलनन्याध्याचताराज्ञुपरचितभिदं पञ्चिकमेधैस्तथाङ्कैः ।
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अथ श्रीपंचदशी
नाटकदीपः । दशमप्रकरणम् ॥ १० ॥
परमात्माद्वयानन्दपूर्णः पूर्वं स्वस्मायया । स्वयंमेव जगद्रूपा प्राविशजजीवरूपत: ॥ ९ ॥
॥ ॐ श्रीपंचदशी ॥
टीकाकारकृतमंगलाचरणम् ॥ नाटकदीपस्योक्तं भावाकृतोकृतमंगलाचरणम् । श्रीमत्सर्वगुरुन् नत्वा पंचदशया नृभापया । कुर्वे नाटकदीपस्य टीकां तत्त्वप्रकाशिकाम्॥ १ ॥
॥ ॐ श्रीपंचदशी ॥
अथ नाटकदीपकी तत्त्वप्रकाशिका व्याख्या ॥१० ॥ भाषाकृतोकृत मंगलाचरण टीका:-श्रेष्ठसर्वगुरुननेकु नमनकारिके पंच-दशीके नाटकदीपनामदशामप्रकरणकी तत्त्व-प्रकाशिकानामक टीकां नरभापसैं मैं करलहूं ?
॥ संस्कृतटीकाकारकृत मंगलाचरण ॥ टीका:-श्रीमत्पभारततीर्थ औ विद्याরণ्य इन दोऊ मुनिीश्वरनहूं नमनकारिके येरेकरि नाटक-दीपका अर्थे संक्षेपकारिके कहियेहै ॥ १ ॥
नत्वा श्रीभारततीर्थैविधारण्यमुनिीश्वरौ । अर्थो नाटकदीपस्य मया संक्षिप्य वच्यते ॥१॥ ४५ चिकीर्पितस्य ग्रंथस्य निष्प्रत्यूहपरिपूरणायाभिमतदेवतातस्याद्युस्मरणलक्षणं मंग-लाचरणमंदाधिकारणामन्वयासेन निष्पपंच-
॥ १ ॥ अध्यारोप औ अपवादपूर्वक बंधनिद्यत्तिके उपाय विचारका विषय ( जीव परमात्मा )सहित कथन ॥ ३९४५-३९९९ ॥
॥ १ ॥ अध्यारोप औ साधन ( विचार-जन्य ज्ञान ) सहित अपवाद ॥
॥ ३९४५-३९६२ ॥
॥ १ ॥ आत्मामैं अध्यारोप ॥
४५ प्रारंभ करनेकूं इचछित नाटकदीपलुप साक्षीकूं नाटकका रूपकरि प्रकाश करनेभारा प्रकरण की
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२८४ ॥ १ अधयारोप अपवाद औ वंधनिवृत्तिका उपायविचार औ ताका विषय ३९४५-३९९९ [पंच-
दीप:
३९४६
विष्णुवैद्युतमदेहेषु प्रविश्टो देवताड्भवत् ।
मत्योदध्रमदेहेषु स्थितो भजति देवताम् ॥ २ ॥
टिप्पणांक:
७४५
नाटकदीप:
॥ १० ॥
श्लोकांक:
१११८
ऋष्यात्मप्रतिपत्तिसिद्धये । " अधयारोपापवाद-
भ्यां निष्पपंचं प्रपंच्यते । शिष्याणां बोध-
सिद्धचर्थे तत्स्वज्ञः " कोऽपितः " इति-
न्यायमनुसृत्यात्मन्यध्यारोपं ताचदाह (पर-
मात्मेति )—
४६ ] पूर्वे अद्वयआनंदपूर्णः परमात्मा
स्वमायया स्वयं एव जगत् श्रुत्वा
जीवरूपतां प्राविशत् ॥
४७ ) पूर्वं श्रुते: श्राकू । अद्वयआनंदपूर्णः
" सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं"
" विज्ञानमानंदं ब्रह्म " । " पूणेमदः पूणम्"
इत्यादिश्रुते:
४८ नहु परमात्मन् एवंकस्य सर्वशरीरेषु
ग्रंथकोई निवेद्यपारिपूणतां अर्थ हइदतक स्वरूप-
पके स्मरणरूप मंगलकृं आचरतेहुए आचार्य्ये,
मंद अधिकारिनकूं श्रमसैं बिना निष्पपंचब्रह्म-
आत्माके निश्चयकि सिद्धिर्थे " अधयारोप
औ अपवादकरि प्रपंचरहित परमात्माकूं
निल्पण करिएहै ॥ शिष्यनके बोधकि सिद्धि-
अर्थे तत्स्वज्ञपुरषोंनैई कर्म कल्पिआहैई " इसन्यायूं
अनुसारिके आत्मावैपै अधयारोपकूं प्रथम
कहैहैं:—
४६ ] पूर्वे अद्वय आनद औ पूणेरूप
जो परमात्मा था । से अपनी माया-
करि । आपही 'जगलरूप होइके तिस-
विपैई जीवरूपसैं प्रवेश करता भया ॥
४७ ) श्ृतिं पूर्वे अद्वय आनद औ पूण
कहिएइए " हे सोम्म ! यह जगत आगे एकहिई
अद्वितीय सत्हीई था " औ " विज्ञानआनंद-
इत्यादिश्रुतिमसिद्ध: स्वगतादिभेदशून्य: परमा-
नंदरूप: परिपूण: । परमात्मा स्वमायया
" मायां तु प्रकृतिं विद्याद् मायिनं तु
महेश्वरं" इति श्रुत्युक्तया स्वनिष्ठया माया-
ऋत्या स्वयमेक जगद्रूत्चा " तदात्मानं
स्वयमकृत सच्च त्यचाभवत् " इति श्रुते:
स्वयमेव जगदाकारतां प्राप्य जीवरूपत:
प्राविशत् । " तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्
अनेन जीवेनात्मानुप्रविशय " इत्यादिश्रुते:
जीवरूपेण प्रविश्वानित्यर्थ: ॥ १ ॥
४८ नहु-एकही परमात्माकूं सर्वशरीरन
रूप ब्रह्म है " औ " यह पूण है । यह पूण है"
इत्यादिश्रुतिकरि ग्रसिद्ध जो स्वेंगतादिक
मेदरहित परमानंदरूप परिपूणपरमात्मा था ।
सो अपनी मायाकरि कहिइएइए " मायाकूं तु
प्रकृति नाम उपदान जानइए औ मायावालेकूं
तौ महेश्वर नाम मायाका अधिष्ठाननिमित्त
जानइए " इश्रुतिमें उक्त अपनेवैपै स्थित माया
शक्तिकरि आपही जगतरूप होइके कहिइए
" सो नह आपही आपकूं करताभया । स्थूल-
तामया कहिइएइए " तिस जगतकूं रचिके तिस-
हीके प्रति पीछे प्रवेश करताभया । इस जीव-
रूपकरि प्रवेशकरिके " इत्यादिक श्रुतिंई जीव-
रूपसैं प्रवेशकरकूं प्राप भया । यह अर्थ है ॥ १ ॥
४८ नहु-एकही परमात्माकूं सर्वशरीरन
३९०-३१८ टिप्पणविपै ॥
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दसी। ] ॥९॥ अध्यारोप औ साधन ( विचारजन्य ज्ञान ) सहित अपवाद ॥ ३९५९-३९६२ ॥ ३९८५
नाटकदीप: ॥ १० ॥ श्लोकांक: १११९ ११२०
अनेकजन्मभजनात्स्वविचारं चिकीर्षति । विचारेण विनष्ट्रायां मायायां शिष्यते स्वयम् ॥३॥ अंदयानंदरूपस्य सद्रयत्वं च दुःखिता । वंध: प्रोक्त: स्वरुपेण स्थितिमुक्तिरितीर्यते ॥ ४ ॥
टीकांक: ३९५९ टिप्पणांक: उ
प्रविष्टत्वे पूज्यपूजकादिभावेन प्रतीमान उत्तमाधमभावो विरुद्धयेतेत्याशंक्याह— ४९ ] विष्ण्वादिमदेहु प्रविष्ट: देवता अभवत् । मत्स्यादधमदेहेऽपु स्थित: देवतां भजति ॥ ५० ) नायं स्वाभाविक उत्तमाधमभाव: किंतु शरीरोराधिनिवंधनोऽतो न विरोध इति भाव: ॥ २ ॥
५१ इत्थमात्मन्यध्यारोपं संक्षेपेण प्रदर्श्य ससाधनं तदुपवादं संक्षिप्य दर्शयति— ५२ ] अनेकजन्मभजनात् स्वविचारं चिकीर्षति, विचारेण मायायां विनष्ट्रायां स्वयं शिष्यते ॥ ५३ ) अनेकजन्मभजनात् अनेकेषु जन्मस्वरूपितानां कर्मणां ब्रह्माणि समर्पणरूपात् भजनात् स्वविचारं स्वस्यात्मनो ब्रह्मरूपस्य ज्ञानसाधनं श्रवणादिकं, चिकीर्षति । ततः स्वविचारेण विचारजनितज्ञानेन, मायायां स्वस्याद्यानंदरूपादिज्ञानाविद्यादिशब्दवाच्यायां विनष्ट्रायां, स्वयं अंदयानंदपूर्ण: परमात्मस्वरूपोऽभ्यते ॥ ३ ॥
५४ नतु "तद्रबाहमिति ज्ञात्वा सर्वयेदै: ५२ ] अनेकजन्मविषै भजनतैं अपने विचारकूं करनेकूं इच्छताहै । विचारकरि मायाके नष्ट भये आप अवशेष रहताहै ॥ ५३ ) अनेकजन्मविषै अनुसंधान किये कर्मनके ब्रह्मपै समर्पणरूप भजनतैं अपने ब्रह्मरूपपैके ज्ञानके साधन श्रवणादिरूप विचारकूं करनेकूं इच्छताहै । तातैं अपने विचारकर कहिये विचारजनितज्ञानकरि अपने अंदयआनंदपूर्णतै-आदिकरुपकी आच्छादक अज्ञानअविद्यआदिक शब्दकी वाच्य मायाके निःस्तत भये आप अंदयआनंदपूर्णरूप परमात्माही अवशेष रहताहै ॥ ३ ॥
विपै प्रवेशकूं पायहुये पूज्य औ पूजकआदिक- भावकरि प्रतीमान जो उत्तमअधमभाव है, सो विरोधकूं पावैगै । यह आशंका करि कहहैं:- ४९ ] विष्णुआदिउत्तममदेहनिकैप्रवेशकूं पायाहुया परमात्मा देवता कहिये पूज्य होतामया औ मनुष्यआदिक अधमदेहनिविषै स्थित हुया परमात्मा देवताकूं भजताहै ।।
५० ) यह उत्तमअधमभाव स्वाभाविक नहीं है । किंतु शरीररूप उपाधिका कियाहै । यातैं विरोध नहीं है । यह भाव है ॥ २ ॥ साधन ( विचारजन्य ज्ञान ) सहित अपवाद ॥
५१ ऐसैं आत्माविषै अध्यारोपकूं संक्षेपसैं दिखायके साधनसहित तिसके अपवादकूं संक्षेपकरिके दिखावैहैं:- वि. ४९
॥ ३ ॥ तत्तीयश्लोकउक्तअपवादकूं बंधनिवृत्ति ( मुक्ति ) रूप ज्ञानफलरूपपात्री सिद्धि ॥ ५४ नहु । "सो ब्रह्म मैं हूं । ऐसैं जानिके
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३८६ ॥ ९ अध्यारोप अपवाद औ वंधननिवृत्तिका उपायविचार औ ताका विषय ३९४५-३९९९ [ पंच-
प्रसुच्यते" इत्यादि॑श्रुतिभिः वंधननिवृत्तिलक्षणस्य मोक्षस्य ज्ञानफलत्वाभिधानात् परमात्मावशेप-
स्यं तत्फलत्वाभिधानमनुपपत्तिमित्याशंक्याह-
५५ ] अद्वय आनंदरूप आत्माकूं द्रैत-
हुःखिता बंधः प्रोक्तः स्वरुपेण स्थिति:
सर्ववंधनोतीं छूटताहै" इत्यादिक श्रुतिनकारी
वंधकी निवृत्तिरूप मोक्षकूं ज्ञानकी फलरुपताके
कथनतें परमात्माके अवशेष रहनैकूं तिस ज्ञानकी
फलरुपताका कथन वनै नहीं । यह आंशका
कारि कहेहैं:-
५५ ] अद्वय आनंदरूप आत्माकूं द्रैत-
सहितपना औ दु:खीपना बंध 'कहा है
मुक्तिः इति ईरयते ॥
५६ ) अद्वितीये ब्रह्माणि वास्तवस्य वंधस्य
मोक्षस्य वा दुर्निरुपत्वात् दु:खित्वादिश्रुति
होनतें दु:खीपने आदिकका अमहीं वंध है औ
स्वरुपकरि स्थितिरुप तिस वंधकी निवृत्तिचीही
मोक्ष है । यातें श्रुतिनका विरोध नहीं है ।
यह भाव है ॥ ४ ॥
४१ इहाँ यह रहस्य है:-
(१) महावाक्यके श्रवणतें "मैं ब्रह्म हूं" ऐसी अंतःकरणकी
वृत्तिरुप तत्वज्ञान होवैहै । तिसतें प्रपंचसहित
निवृत्ति होवैहै, सोई मोक्ष है ॥ किंतु तिसकी प्राप्तिकी अधिष्ठान-
रुप होवैहै यातें वहांतें मोक्षरुप सोध है । यह
सिद्ध होवैहै । यह भाष्यकारका सिद्धांत है । औ-
(२) न्यायमकरंदक ( श्रृंगेश्वरवादी ) नें कलिपतकी
निवृत्ति अधिष्ठानरुप मानीहै । किंतु अधिष्ठानसैं भिन्न
सततुप, असततुप, सततअसततुप वंधी सततसत्तें विलक्षण
अनिवर्चनीय, इन चारोंप्रकारसैं विलक्षणप्रकारसोंही कलिप-
तकी निवृत्ति मानीहै ताहीतें पंचमप्रकार कहेहैं । यह समीचीन
नहीं । कहेहैं ? सततुप आदिकवस्तु लोकशास्त्र आदिकमें
प्रसिद्ध हैं ! इससैं विलक्षण कोई वस्तु प्रसिद्ध नहीं । अप्रसिद्ध-
वस्तुविषे पुरूषकी अभिलाषा होवै महैं । किंतु प्रसिद्धसैंहि
यातें पंचमप्रकाररुप नित्यतिसैं मैनें पुरूषकी अभिलाषाकी
विषयतारुप पुरूषार्थताका अभाव होवैगा । यातें अप्रसिद्धान-
रुपही निवृत्ति माननी चाहिये ।
(१) सो अधिष्ठानरुप निवृत्ति आत्माअधिष्ठानरुप मानें
तौ प्रयत्नविनाही सर्वकूं मोक्षकी प्राप्तिके होवेंतैं श्रवणादिककी
निष्फलता होवैगी । औ-
( २ ) ज्ञातअधिष्ठानरुप निवृत्ति मानें तौ विदेहमोक्ष-
दशामें मंझासैं पैं ज्ञातत्व कहिये ज्ञानके विषय होनैहैं धर्मका
अभाव है । यातें मोक्षकूं परमपुरूषार्थताकां अभाव होवैगौ औ-
(३) ज्ञातलरुप धर्मके अभावतैं ज्ञातत्वविशिष्ट वा ज्ञातत्व-
पहित अधिष्ठानरुप वी निवृत्ति संभवै नहीं । कहेहैं ? विशे-
षणवाला विदेहट कहियेहै वी उपाधिवाला उपहित
कहियेहै । विदोषण 'औ उपाधिये जितनैककारनविचे आप
विवमान होवें तितनै कालपर्यंत अपने संबंधीचें स्वकृं अन्य
वस्तुतें भिन्नकरिके जनावैहैं । विदेहमोक्षदशामें ज्ञातत्वके
अभावतैं तिस ज्ञातत्वकूं विशेशनरुपकरि वी उपाधिरुपकरि
अज्ञातअवस्थावालें तितकरै जनावना संभवै नहीं ।
याहैं तितकरै अज्ञातत्वसहित अज्ञानकी
निवृत्ति है । कहेहैं ? उपलब्ध लक्षण जो है सो अपने भाव
(वर्त्तमान) अभाव ( अविद्यमान् ) दोनूंकालमें वी अपने संबंधी-
उपलक्षण काकें होते न होते वी "यह देवदत्तके गृहकै"
ऐसा व्यवहार होवैहै, तैसैं जीवनसुरूफिदशामें ज्ञातत्वके होते
औ विदेहमुरूफिदशामें ताकें न होते वी काऱेसहितअज्ञानकी
निवृत्तिसैं अज्ञान जो है सो ज्ञातत्वउपलक्षित है । यह
व्यवहार होवैहै ॥ सोई
कलिपतकी निवृत्ति अज्ञानसैं भिन्न है । इस पक्षमें
आपग्रह होवै तौ वी वानिर्वचनकी निवृत्ति यानिर्वचनरीरुप है,
पंचमप्रकाररुप नहीं है। नित्यृत्ति नाम वंधसका है । सो
ध्वंस न्यायमतमें तौ अनंतशभावरुप है । परंतु सिद्धांतमतमें
क्षणिकभाव विचाररुप है । कहेहैं यार्कसुनिनें जन्माधिकपद्-
भाव ( अनिर्वंचनीय ) विचार कहेहैं । तिनमें श्वसनशब्दकै
पत्यौय नाश क्षणिकरुप .गिन्याहै । यातैं सो ध्वंस क्षणिक-
भावरुप है । सो ज्ञानसैं उत्तर्काळ एकक्षण रहैहै । पीछे तिस
निवृत्तिका अस्तंत अभाव होवैहै । सो अत्यंतअभाव ब्रह्मरुप
है । यातैं द्रैतकी शंका नहीं ॥ औ-
ब्रह्मरुप होवेंतैं अनंत है । यातैं सिद्धांतमें मोक्षं स्वादि औ-
अनंत कहियेहै ॥ इसरीतिसैं स्वरुपकरि स्थितिरुप वंधकी
निवृत्तिही मोक्ष है ।
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२७ नहु "कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः" इति स्मृतिमोंक्ष्य कर्मसाधन- तावगमात् किमनेन विचारजनितज्ञाननेनैवत आह—
४८] अविचारकृतो वंधो विचारेण निवर्तते ॥
४९) विचारप्रागभावोपरलक्षिताज्ञानकृतस्य वंधस्य न विचारजन्यज्ञानादनन्यतो निःसृत्य- रुपपद्यते । उदाहृतस्मृतौ च संसिद्धिरशब्देन चित्तशुद्धिरेषाभिधीयते, न मोक्ष इति भावः ॥
॥ ४ ॥ वंधनिवृत्त्यर्थं विचारकर्तव्यता श्रो विचारके विषयका सूचन ॥
४७ नहु "जनकादिक जे सयेहैं, वे करमकरिहीं संसिद्धि लौं प्राप्त भये" इस गीतास्मृतितैं मोक्षलौं करमलप साधनवान्त्रैक जाननेतैं इस विचारसैं जनित ज्ञातकरि क्या प्रयोजन है ? तहाँ कहेहे:-
४८] अविचारका किया जो बंध है, सो विचारकरि निवर्त्ते होवैहै ॥
४९) विचारके प्रागभावकरि उपलक्षित अज्ञानका किया जो बंध है, ताकी विचारसैं जन्य ज्ञानतैं अन्यसाधनतैं निःसृति संभवै नहीं औ उदाहरण करी गीता स्मृतिवपै "संसिद्धि" शबदकरि चित्तशुद्धिही कहियेहै ! मोक्ष नहीं । यह भाव है ॥
६० विचारकरि बंधकी निःसृति कही, सो किसकूं विषय करनैहारे नाम किस वस्तुकै
अविचारकृतो वंधो विचारेण निवर्तते ॥ ५ ॥
तस्माज्जीवपरात्मानौ सर्वदेव विचारयेत् ॥ ५ ॥
अँहंमित्यभिमंता यः कर्ताऽसौ तस्य साधनम् ।
मंनस्तस्मै क्रिये अंतरँहिवृत्ती कमोतिथते ॥ ६ ॥
६० विचारेण वंधननिःसृतिहक्ता किं विषयेण जनकादयः
६१] तस्मात् जीवपरात्मानौ सर्वदा एवं विचारयेत् ॥
तत्वसाक्षात्कारपर्यंतं सर्वदा विचारं कुर्यादित्यर्थः ॥ ५ ॥
तत्र जीवस्वरूपं तावत्रिलुपयति ( अहंमिति )—
यः "अहँ" इति अभिमंता असौ कर्ता ॥
६४] यः "अहँ" इति अभिमंता असौ कर्ता ॥
६५) यः चिदाभासविशिष्टः अहंकारो
६१] तातैं जीव औ परमात्माकूं सर्वदाही विचार करना ॥
६२) तत्वके साक्षात्कारपर्यंत सर्वदा जीव परमात्माकूं विचार करना । यह अथे है ॥५॥
॥ २ ॥ पंचमश्लोकोक्तविचारके विषय जीव औ परमात्माका स्वरूप ॥ ३९६३-३९८४ ॥
॥ १ ॥ त्रिययुक्त कारणसहित कर्तोरूप जीवका स्वरूप ॥
६३ तिन जीवपरमात्मारूप विचारके विप- यनपै जीवके स्वरूपकौं प्रथम निरुपण करैहैं:-
६४] जो "अहँ" ऐसैं मानताहै, यह कर्त्ता है ॥
६५) जो चिदाभासविशिष्ट अहंकार
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३८८॥ ९ अध्यारोप अपवाद औ वंधनिवृत्तिका उपायविचार औ ताका विपय३९५-३९९ [पंच-
टीकांक: ३९६७ टीप्यणांक: ऊँ नाटकदीप: ॥ १० ॥ दलोकांक: ११२३ ११२४
"अंतर्मुखाहमित्येषा वृत्ति: कर्तारमुद्धिखेत् । बहिर्मुखेदमित्येषा वाद्यं वस्त्वदसुंलिखेत्॥७॥ इदंमो ये विशेषा: स्युरंधरूपपरसादय: १ असांकेयण तान्भियाद्घाणादींद्रियपंचकम्।८।
व्यवहारदशायां देहादौ अंतर्मन्यते असौ कर्ता कतृलादिर्मेविशिष्टो जीव इत्यर्थ: ॥ ६६ तस्य किं करणमित्यपेक्ष्यामाह— ६७] तस्य साधनं मन: ॥ ६८) कामादिवृत्यिमान्त:करणभागो मन: । ६९ करणस्य क्रियात्मकत्वात् तत्कियां दर्शयति— ७० ] तस्य क्रमोतिथते अंतरैवृत्ती क्रियें ॥ ७१ अनयो: स्वरूपं विपयं च विविच्य
व्यवहारदशामें देहादिकविपै "अहं" कहिये मैं पैंसैं मानताहै । यह कर्ता कहिये कर्त्तापने-आदिकधर्मेविशिष्ट जीव है । यह अर्थ है ॥ ६६ तिस कर्त्ताका कौन करण है ? इस पूछनैकी इच्छाके भये कहैं:— ६७ ] तिस कर्त्ताका साधन कहिये करण मन है ॥ ६८) कामादिकृत्यिमान्तं अंत:करणका भाग मन है ॥ ६९ करणकूं क्रियाकरि व्याप्त होनेतैं तिस मनकूं क्रियाकूं दिखावैंहैं:- ७०]तिस मनकी ऋमकरि उत्पन्न अंतरैवृत्ति औ बहिरैवृत्तिरूप क्रिया हैं ॥ ६ ॥ जीवके करण मनकी क्रियाका स्वरूप औ विषय ॥
७१ इन अंतरबहिरैवृत्तिके स्वरूपकूं औ विषयकूं विवेचनकरिके दिखावैंहैं:- ७२] अंतर्मुखैवा "अहं" इति वृत्ति: कर्तारं उद्दिखेत । बहिर्मुखैवा "इदं" इति वाद्यं इदं वस्तु उद्दिखेत ॥ ७३) इदमित्येषा इति बहिर्वृत्ते: स्वरूप-दर्शयति—
७२] अंतर्मुखवो जो "अहं" इस आकारवाली वृत्ति है, सो कर्त्ताकूं विषय करैहै औ बहिर्मुख जो "इदं" कहिये यह इस आकारवाली वृत्ति है, सो वाद्या इदं-वस्तुकूं कहिये इसवस्तुकूं विषय करैहै ॥ ७३) "इदं" ( यह ) इस आकारवाली इदंतैं मूलके पदकari वahiraivṛttike स्वरूपका कथन . किया औ अवशेष रहे उत्तरार्धगत मूलके भागकरी वahiraivṛttike विपयकूं दिखावतेहैं:—यह बहिर्वृत्ति देहतैं बाहर वर्तमान जो इदंपनैकारी निर्देश करियेहै वस्तु, तिसकूं विषय करैहै । यह अर्थ है ॥ ७ ॥
७४ नतु मनसैव सर्वेऽव्यवहारासिद्धौ चक्षुरादिकंद्रियनक व्यर्थेताका प्रसज्येत्यर्थ: ॥ ७४ नतु । मनकरिही सर्वेऽव्यवहारासिद्धिके हुये चक्षु आादिकंद्रियनकी व्यर्थेताका प्रसंग होवैगा । यहां आशंका करि कहैं:-
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कैंतोरे च क्रियां तदद्रु व्यावृत्तविषयानपि । स्फोरयेदेक्यत्नेन योग्सौ साक्ष्यत्र चिद्रुपः ॥ ९ ॥
ईक्षे श्रणोमि जिघ्रामि स्वादयामि स्पृशाम्यहं । इति भासयते सर्व नृत्यशालास्थदीपवत ॥ १० ॥
विषोपा ये गंधरूप-रसायः सुहु; तानु घ्राणादिेंद्रिय-पंचकं असांकर्गेण भियात॥ ८ ॥
मनसेऽमिति सामान्यमात्रं गृह्रते न तु तद्विशेषो गंधादिरतस्तद्र्रहणे घ्राणादिक-ग्रुपसुज्यत इत्यर्थः ॥ ८ ॥
कर्ता च क्रियां तदद्रुत व्यावृत्तविषयानकूं बी एक्यत्नकरी तौपयतां आप एक्यत्नेन ये चिद्रुप स्फोरयेत असौ अग्न साक्षी ॥
इदं पदारथके भेद जे गंधरूप परस आदिक हैँ. तिनकूं घ्राणआदिक इंद्रियनका पंचक परस्पर मिलापविना भेदकरि ग्रहण करैहै ॥
मनकरि 'ग्रह' ऐसें सामान्यवस्तु मात्र ग्रहण करिये हैं, परंतू तिसका विशेष गंध आदिक दिक नहीं । यातैं तिस वस्तुके विशेषके ग्रहण चिपै घ्राणआदिकइंद्रियनका पंचक उपयोगकूं पावताहै । यह अर्थै है ॥ ८ ॥
परमात्मा ( साक्षी ) का निरुपण ॥ ८ ॥
ऐसें सामग्रीसहित जीवके स्वरुपकूं निल्पण करीके अव परमात्माकूं निल्पण करैहैं:-
कर्तारं च क्रियां तैसें भिन्न विषयनकूं बी एक्यत्नकरी जो चिद्रुप हुया प्रकाशाताहै, मो इहां
कर्तारं पृथोंक्तमहंकाकाररुपं । क्रियां अहंमिदमात्मकनेदितिरुपां । व्यावृत्त-विषयानपि व्यावृत्तान अन्योन्यविलक्षणान ग्राणादिग्राह्यान गंधादीन विषयान च । एक-तयनेन युगपदेव इय चिद्रुपः; चिद्रुप एव सन् । स्फोरयेत् प्रकाशयेत् । अस्सावत्र वेदांत-शास्त्रे साक्षी इत्युच्यते इत्यर्थः ॥ ९ ॥
साक्षीके एक्यत्नकरी सर्वके प्रकाश करनैकूं आकारकरी दिखावैहैं:-
"अहं ईक्षे, श्रुणोमी, जिघ्रामि, स्वादयामि, स्पृशामि " इति सर्वे भासयेत् । साक्ष्री यहिहैहे ॥
पूर्व श्लोक ६ चिपै उक्त अहंकाररुप कर्तारकौं औ "अहं" अरु "इदं" इस आकार-वाली मनकी वृत्तिलप क्रियार्कौं अरु ग्राणादिकइंद्रियनसैं ग्रहण करनैकूं योग्य गंधादिक विषयनकूं एक्यत्नकरी कहिये एककालवैपही जो चेतनरुपही हुया प्रकाशाताहै, यह चेतन इहां वेदांतशास्त्रविषै साक्षी ऐसें कहियेहै । यह अर्थै है ॥ ९ ॥
साक्षी ( परमात्मा ) के एकप्रयत्नसैं सर्वकी प्रकाशकता वेदांतसहित थाकार ॥ ९ ॥
"अहं ईक्षे, श्रुणोमि, जिघ्रामि, स्वादयामि, स्पृशामि " इति सर्वे भासयेत् । साक्ष्री यहिहैहे ॥ ९ ॥
"अहं ईक्षे, श्रुणोमी, जिघ्रामि, स्वादयामि, स्पृशामि " इति सर्वे भासयते ॥ १० ॥
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३९० ॥ १ अध्यारोप अपवाद औ वंधनिवृत्तिका उपायविचार औ ताका विपय३९८५-३९०९ [पंच-
टीकांक: ३९८२ टीपणांक: ॐ नृत्यशालास्थिततो दीपः प्रभुं सर्व्यांश्र नर्तकीम्। दीपयेदविशेषेण तदभावेऽपि दीप्यते ॥ ९१ ॥ नाटकदीप: ॥ ९० ॥ श्लोकांक: ९२७ ९२८
ऐहंकारं धियं साक्षी विषयानपि भासयेत् । अहंकाराद्यभावेऽपि स्वयं भात्येव पूर्ववत्॥ ९२ ॥
८२ ) इक्षे रूपमेहे पश्यामोत्यवं दृश्यदर्शन-दृश्यलक्षणां त्रिपुटीमेकयत्नेन भासयेत् । एवं ऋृणोमी इत्यादावपि योज्यम्॥
८३ अभुपदविकारीतवेनैकावभासकत्वे दृष्टांतमाह—
८४ ] नृत्यशालास्थदीपवत् ॥ १० ॥
८५ दृष्टांतं स्पषयति—
८६ ] नृत्यशालास्थित: दीप: प्रभुं सर्व्यां नर्तकीं आविशेषेण दीप-
येत । तदभावे अपि दीप्यते। ८७ ) अविशेषणं प्रभवादिविपयाविशेपवमासनाय इदृशाविकारमंतरेणापि याचत् ११
८८ दार्थांतिकेके योजयति ( अहंकारमिति )—
८९ ] साक्षी अहंकारं धियं विषयान् अपि भासयेत् । अहंकाराद्य-
भाचे अपि स्वयं पूर्ववत् भाति एव ॥
८२ ) “रूपकूं मैं देखताहूं” ऐसें रूपदृश्य जो अहंकार, दर्शन जो द्रष्टिरुप दृश्य, इस त्रिपुटीकूं एकयत्नकरी प्रकाशताहै । ऐसें “मैं शब्दकूं सुनताहूं” इत्यादिकनयवहारविषै वी श्रोतन्य, इत्यादिकत्रिपुटीकूं एकयत्नकरी प्रकाशताहै । सो योजना करनैकूं योग्य है ॥
८३ एककालविषै अविकारी होनैकरी अनेकनके प्रकाशकपनाविषै दृष्टांत कहैहैं:-
८४ ] नृत्यशालाविषै स्थित दीपककी न्याई ॥ १० ॥
॥ २ ॥ श्लोक १० उक्त दृष्टांतके वर्णन-
करि परमात्माकूं निर्विकारी होनैकरी सर्वकी प्रकाशकता ॥ ३९८५-३९९९ ॥
॥१॥ श्लोक १० उक्त दृष्टांतकी स्पष्टता ॥
८५ 'दृष्टांतकूं स्पष्ट करैहैं:- ८६ ] नृत्यशालाविषै स्थित जो
दीप, सो प्रभु जो सम्रपति, ताकूं औ सर्व्य जे समार्पित श्वेत लोक तिनकूं औ नर्तकी जो नृत्य करनैहारी स्री, ताईं संपूर्णताकारि प्रकाशताहै औ तिन प्रभुआदिकनके अमाव हुये वी
८७ ] अशेषकरि कहिये प्रभुआदिक विपयनके भेदकै प्रकाशनैअर्थ बुद्धीआदिक
विकारसैं बिना दीपक प्रकाशताहै । यह अर्थ है ॥ ९१ ॥
॥ २ ॥ दृष्टांतक्तअर्थकै दार्शान्तमैं योजना ॥
८८ दार्थांतिकविषै जोडतहैं:-
८९ ] ऐसें साक्षी अहंकारकूं औ बुद्धिकूं औ शनादिकविषयनकूं वी प्रकाशताहै औ अहंकारादिकके
अभाव हये वी आप पूर्वैकी न्यांई भासताहै है।
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दशौ। ] ए तस्यान्तवर्णनकृतिः परमात्माकुं निर्विकारिलासं सक्की प्रकाशयता ३९८४-३९८९ ॥ ३९८९
. नाटकदीप:
॥९०॥
श्लोकः १९२०, १९३०
निर्ंतरं भासमाने कूटस्थे ज्ञसिरुपतः । तद्रासा भासमानेयं बुद्धिनृत्यत्यनेकधा ॥ ९३ ॥
अँहंकारः प्रभुः सभ्या नर्त्तकी सतीः । तालादिधारीणयक्षाणि दीपः साक्ष्यवभासकः ९४
९० ) सुप्त्यादौँ अहंकाराभावेऽपि तत्तत्क्थितया भासमेच इत्यर्थः ॥ ९३ ॥
न चू प्रकाशालुपाया बुद्धिरेवाहंकारादि- सर्वेन्द्रियवभासकत्वसंभावात किं तदतद्रिक्- साक्षिकलपनयेत्याशंक्याह ( निरंतरभिति )-
९२ ] कूटस्थे ज्ञसिरुपतः निरंतरं भासमाने इयं बुद्धिःः तद्रासा भासमाना अनेकधा नृत्यति ॥
९३ ] कूटस्थे निर्विकारे साक्षिणि । ज्ञसिरुपतः स्वप्रकाशचैतन्यतया, निरंतरं भासमाने सदा स्वरुपिति सति, बुद्धिस्तद्रासा तस्य साक्षिणः स्वरुप-
९० ) सुप्त्यादिकाविपै अहंकारादिकके अभाव हुये वी आत्मा तिस अभावका साक्षी होनैकरि भासताही है । यह अर्थ है ॥ ९३ ॥
॥ ९३ ॥ बुद्धिं भिन्न सर्वप्रकाशसाक्षीनेरं अंहीकारकी योग्यता ॥
९१ नचू प्रकाशरूप बुद्धिरेवही अहंकार- आदिक सर्वेन्द्रियतुनके अवभासकपनैके संभवैतें तिस बुद्धिं भिन्न साक्षीकी कल्पनासैं क्या 'प्रयोजन है ? यह आंशंकाकारि कहिहैं:-
९२ ] कूटस्थकुं ज्ञसिरुपतैं निरंतर भासमाने होते तिस कूटस्थके प्रकाश- करि भास्यमान यदृ बुद्धि अनेक- प्रकारसैं नृत्य करती है ॥
९३ ) निर्विकारसाक्षींकुं स्वप्रकाश चैतन्य होनैकरि सदास्वरुपायमान होते । यह बुद्धि
तिसं साक्षीके स्वरूप चैतन्यकरि भासमानही
९४ श्लोक १२-१३ उत्तअर्थकुं श्रोटाकी बुद्धिविपै सुगम करनैहैः-
९५ ] अहंकारः प्रभुः । विषयः सभ्या: । मतिः नर्त्तकी । अक्ष्षाणि तालादिधारिणि । अवभासकः साक्षी दीपः ॥
९४ ] श्रोटाकी बुद्धिमैं सुगम करनैहैः- नाटक- त्वेन निरुपयति-
९५ ] अहंकार स्वामी है औ विषय सभ्या: है । बुद्धि नर्त्तकी है औ इन्द्रियतालआदिक्के धारण करनै- द्वारे हैं औ अचभासक साक्षी दीप है ॥
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९६) विपयमोगसाकल्यवैकल्याभिमानप्रयुक्तहर्षविषादवच्चानुल्याभिमानिप्रसृतुल्यत्वमहंकारस्य । परिसरवर्तिचेपि विषयाणां
९६ ) विषयमोगकी संपूणर्ता औ असंपूर्णताके अभिमानके किये हर्ष औ विषादवाला होनेंतैं अंहंकारकूं नृत्यका अभिमानी प्राणु जो राजा ताकी तुल्यता है औ चारीओरतें वर्तनैहारें हुये भी तिस उत्तहर्षविषाद-
४६ जैसें मुखका अभिमानी राजा तिसकी संपूणर्ताताके अभिमानकरि हर्षविषादवाला होवैहै औ नर्तकीआदिकका धनाढ्यता करि आश्रय है औ तृषाशालाका निवासीहै औ भनैदरारमुख्त है औ वडे कार्यका कर्त्तां है औ वडेमोगका मोक्ता है । तैसैं अहंकार वी भोगकी संपूणर्ता औ असंपूणर्ताके अभिमानकरि हर्षविषादवाला होवैहै औ उपाधिरूपतासैं आत्मघनयुक्त होनैकरि बुद्धीआदिकनका आश्रय है औ समष्टिरूपतैस्थितरूप धारला का अहंभावमावरी निवासीहै औ चुभाषुभाषितरूप अनंतदराकारि युक्त है औ सर्वे कार्यका कर्त्तां है श्री सर्वेभोगका मोक्ता है । यातैं सामा-
हैकार तृष्यअभिमानी राजाके तुल्य है ॥
४७ जैसैं सभाभिषै स्थित पुरुष ( अपनेके टिप्पणविपै एक्त ) राजाके घरमैं रहित हुये चारीओरतैं वर्त्तैहैं औ राजाके स्वाधीन हैं । तैसैं शब्दादिकविषय वी करणेभोक्तृत्वआदिकका तद्राहीत्यात्स भ्यपुष्पसाम्यें । नानाविधविकारिस्वात् नर्तकीसाम्यं धियः । धीविक्रिया-
वान्ताकारि रहित होनेंतैं विषयनकूं सभ्यपुरुषनकी समता है औ नानाप्रकारके विकार वालाहोनेंतैं नर्तकीकूं समता है औ बुद्धिके विकारनके
( ८ ) इंद्रजालादिकपूर्वपदार्थकूं देखिके आश्रयकूं पावतीहूइ अथुत्ततरसकूं दिखावतीहै । औ—
( ५ ) वांच्छितविषयके लाभतैं आनंदकूं पावतीहूइ हास्यरसकूं दिखावतीहै । औ—
( ६ ) श्रृंगारादिकसैं जन्य दुःखकी चिंताकारि भयकूं पावतीहूइ भयानकरसकूं दिखावतीहै । औ—
( ७ ) मलीनपदार्थके संसर्गकरि म्लानीकूं पावतीहूइ वीररसकूं दिखावतीहै । औ—
(८) कोषादिकके प्रसंगसैं भय दिखावतीहूइ रौद्ररसकूं दिखावतीहै । औ—
( ९ ) त्रियपदर्थके नाशकरि उदासीनहूइ शांतरसकूं दिखावतीहै ।
( १ ) बुद्धि जब ग्रंथसंस्कारसहित होनै तब द्वितीयपुष्ट गत ८ में टिप्पणविपै उक्त अमनिसमें आदिलेकै जो ४८ वें टिप्पणविपै एक्ता दैसींप्रस्तिरूप भूषणयुक्त हुईं छौंगाररसकूं दिखावतीहै । औ—
( २ ) कामादिकजुतके जयविषै पुरुषार्थकरि वीररसकूं दिखावतीहै । औ—
( ३ ) अभ्यांतादुःखकरि ग्रस्त पुरुषकूं देखिके दयाभावकूं पाइर्हुइ करुणारसकूं दिखावतीहै । औ—
( ४ ) एकही कद्रितीय अभंग निर्विकार निष्प्रपंच मक्ष्मविधे सजातीयादिसेवनयुक्त औ संग शर कटुर्थादिविकारवान् प्रपंचकूं देखिके वा गुरुडपारसै शोकिकवस्तुकूं जानिके आश्रयकंवान् .हूइ अथुत्ततरसकूं दिखावतीहै । औ—
( ५ ) राज्यपदरहै पतत्न होइके रंकपदकूं प्राप्त भये राजेकी न्यांई ब्रह्मभावसैं पतत्न होइकै जीवभावकूं प्राप्त भये परमात्माकूं देखिके ना अपरोक्षज्ञानकी प्राप्तिकरि हर्षकूं पाइके निरावरणस्वरुपानंदकूं अदुभवकारिके हास्यरसकूं दिखावतीहै । औ—
( ६ ) ज्ञानसैं चिना विचारण करनैकूं असाक्य जन्ममरणादिरसकूं दिखावतीहै । औ—
४८ जैसैं नर्तकी, तृष्यउपयोगी अनेकचेष्टारूप विकार ( अनर्थआभयव ) वालो होनेंहै कीं सर्वलोकनकी ओर हृत्त आदिककूं प्रसारतीहै औ ( १ ) श्रृंगार, (२) वीर, (३) करुण, ( ४ ) अद्भुत, (५) हास्य, (६) भयानक, ( ७ ) वीभत्स, (८) रौद्र, ( ९ ) शांत इन नवरसरूप नवोभावकरि राजाकूं रंजन करती है ।
तैसैं बुद्धि वी कामादिपरिणामरूप अनेकविकारवालो होनै औ सर्वविषयाकार होनैकरि अपने अभिमागरूप हृत्तकूं सर्वओरतैं प्रसारतीहै । औ—
( १ ) श्रृंगारसंस्कारसैं रहित होइकै तब वज्रभूषणादिकी शोभाके अभिमानकरि छौंगाररसकूं दिखावतीहै । औ—
( २ ) क्षीरकी प्रवालतां देखिके युद्धादिकके प्रसंगमैं पुरुषपन्नैक अभिमानकरि वीररसकूं दिखावतीहै । औ—
( ३ ) पुश्चकलषादिसंवंधिके दुःखकूं देखिके कोमल भये संतःकरणमैं करुणारसकूं दिखावतीहै । औ—
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॥ १० ॥ स्वंस्थासथानसंस्थितो दीपः सर्वतो भासयेद्यथा । स्थिरसस्थायी तथा साक्षी वहिरंतः प्रकाशयेत् १५
नामनुकूलव्यापारवच्वान्तालादिधारिसमानत्व- सर्वतः भासयेत् तथा स्थिरसस्थायी निश्चित्यनांपि । पतनसर्वांवभासकत्वात् साक्षिणो- साक्षी वहिः अंतः प्रकाशयेत् ।
दीपासादृश्यमसतीति दृश्यत्वम् ॥ १४ ॥
९७ नतु साक्षिणोऽ्यहंकाराद्यभासकत्वे तेन । तेन संचंधापगमागमरुपविकारवच्वं स्वादित्याशंक्याहं ( स्वस्थानेति )—
९८ ] दीपः यथा स्वस्थानसंस्थितः: अनु्कूलव्यापारवान् होनेहैं इंद्रियनू तालआदिक्के धारण करनैहारे पुरुपनकी समानता है औ इन सर्वंका अवभासक होनेहैं सांक्षींकू दीपक्की सदृशता है । ऐसें देखनैंकू योग्य है ॥ १५ ॥
॥ ५ ॥ साक्षीके निर्विकारित्वंका श्लोक १० उत्क दृशांतपूर्वंक कथन ॥
९७ नतु । साक्षींकूं वी अहंकारादिकके अवभासकपनैकै हुये तिस अहंकारादिकके साथ संचंधके अपगम नाम नाश औ आगम
( ९ ) विशिष्टिंदित यथेच्छाचलनास्पल दुराचारसैं मलानींकूं पावतीहुए बीभत्सरंकूं दिखावतीहैं । औ—
( च ) अहंाज्ञानतंकूं समनर्गियेंं म्रष्टि करावनैंकै वास्ते संसारदुःखके भयंंकू जनावतीहुए वा तत्ज्ञांनके वलकरि काळहूं मी डरावतीहुए रौद्ररसंकूं दिखावतीहैं ।
( ९ ) द्रव्यहोत्रिआन्यों वा भयंोत्पादनके वास्ते हेयभयंके उदयकरि वा जगदंकू विस्मृतिस्थाप उपराम करि प्रपंचकी अरुचिकूं पायकै शांतिरसंकूं दिखावती है । औ—
(१०) निरावरण परिपूर्ण सगुणत्मिक जीवनमुक्तिक्के शिलक्षण आनंदकूं आखादन करतीहुए नवर्सरतैं विलक्षण दशमर्सरंकू दिखावती है ॥
इसरीतिसैं बुद्धि नवर्सकूं दिखायकै साभास अहंकारकूं रंजन करतीहै यातैं नर्तककी समान है ॥
४९ जैसे तालद्दवंगसारंगीभादेकनाद्यनकै धारनेहारे पुरुप नर्तककी चेष्टाके अध्यकूल न्यायारवान्य् होवैहै । तैसें इंद्रिय ,
टीकांक: ३९९७
टिप्पणांक: ७५०
९९ ) जैसे गमन आदिकविकाररहित दीपक अपने देशविपैं स्थित हुयाही अपने समीपके सर्वपदार्थनकूं प्रकाशताहै । ऐसें गमनादिक-
विकाररहित स्वरुपविपैं स्थित हुया साक्षी वी सर्वकूं प्रकाशताहै । यह भाव है॥ १५॥
नाम उत्पत्तिरुप विकारवान्पना होवैगा । यह आशंकाकारि कहैहैं:-
९८ ] जैसैं दीप अपने स्थानकेविपैं स्थित हुया सर्वओरतैं प्रकाशताहै तैसैं स्थिरसस्थायी कहिये तीनकाल अचल हुया साक्षी वहिरअंतर प्रकाशता है ।
९९ ) जैसें गमन आदिकविकाररहित दीपक अपने देशविपैं स्थित हुयाही अपने समीपके सर्वपदार्थनकूं प्रकाशताहै । ऐसें गमनादिकविकाररहित स्वस्रुपविपैं स्थित हुया साक्षी वी सर्वकूं प्रकाशताहै । यह भाव है॥ १५॥
वी जिस जिस विषयके ग्रहण करनैकूं बुद्धि जातीहै, तिस तिसके सन्मुख होनैकरि बुद्धिके विकार जे परिणाम आदिक धारनिके समान है ॥
५० जैसें म्रुखशालाविपैं स्थित दीपक जब सभा समाविष्ट होवैहैं तब वहिरअंतर सर्व जगत रात्रौंधकारसैं प्रकाशताहै वी
जब सभा न होवै तब वी प्रकाशता है औ आप गमन-
आगमनभादिकक्रियारुप विकारसैं रहितहुया ज्योंका त्यों अपने स्थानविपैं स्थित है, तैसैं साक्षी वी जाग्रत्स्वप्नकालमैं स्थित अहंकारादिकसर्वकूं प्रकाशताहै औ चिदुष्ति मूर्छा शरु -
समाधिकालविपैं इन शव्देके अभाव हुये तिनके अभावकूं प्रकाशताहै औ आप गमनआगमनशादिकविकारनसैं रहित
हुया ज्योंका त्यों खमाधिमैं स्थित है । यातैं साक्षी दीपक्के
वि. ५०
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३९४ ॥२॥ परमात्मोके यथार्थस्वरूपका विशेषकरि निद्धार ॥ ४०००-४०५० ॥ [पंच-
तीकांफ:
बंहिरंतरविभागोडयं देहापेक्षो न साक्षिणि ।
विषैया वाध्यदेशस्था देहस्यांतरहंकृति: ॥ १६ ॥
नाटकदीप:
॥ १० ॥
दिप्पणांक:
अंतस्था धी: सहेवाक्षैर्बंहिर्याति पुन: पुन: ।
भास्यबुद्धिस्थचांचल्यं साक्षिण्यारोप्यते वृथा.१७
श्लोकांक:
११३२
११३३
४००० ननु साक्षिणो वहिरंतरवभासक-
त्वाभिधानमडुपपत्तं "अपूर्वमनपरमान्तर-
मनाद्बम" इति श्रुत्या .तस्य वाध्यांतरविभाग-
भाषाभिधानादिल्याशंक्याह (बंहिरिति)-
१ ] अयं वहिरंतरविभाग: देहापेक्ष:
न साक्षिणि ॥
२ कस्म्य धाह्यत्वं कस्म्य चांतरत्वमित्यत
आह--
॥ २ ॥ परमात्मोके यथार्थस्वरूपका
विशेषकरि निद्धार
॥ ४०००-४०५० ॥
॥ १ ॥ साक्षीपरमात्मामैं बुद्धिके चंचल-
ताका आरोप ॥ ४०००-४०११ ॥
॥ १ ॥ वास्तसाक्षीकूं वाधिरमितरपनैकें अभाव-
पूर्वक वाध्यमितरकें वस्तुचका कथन ॥
४००० ननु, साक्षीचूं वाधिरमितर अव-
भासकपनका कथन अयुक्त है । कहिते है "न पूर्व
है । कोहिते " न अपस
कहिये कार्य है । न अंतर है । न वाध्य है" इस श्रुतिकरि तिस
साक्षीआत्माके वाधिरमितरविभागके अभावके
कथनतैं । यहआशंकाकारि कहैं:-
१ ] यह जो " वाधिरमितर" ऐसा
विभाग है, सो देहके अपेक्षाकरि है;
साक्षीविषै नहीं है ॥
३ ] विषय: वाध्यदेशस्था: । देहस्य
अंत: अहंकृति: ॥ १६ ॥
४ ननु "स्थिरस्थायी तथा साक्षी वहिरंत:
प्रकाशयेत" इति अविकारीण: सतो वहिरंत-
इत्य्राहमित्यंतरहंकाकारसाक्षितया प्रथमतो भास-
कस्यांतरं "घटं परयामि" इति घटाकारवृत्ति-
कस्यानंतरं "घटं परयामि" इति घटाकारव्दत्ति-
स्फुरणालुपेण वंहिरिंग्मातुभावादित्याशंक्याह-
५ ] अंतस्था धी: अंक्षै: सह एव पुन:
३ तथ किसकूं वाध्यपनपना है औ किसकूं
आंतरपनना है? तहां कहैं:-
३ ] शब्दादिकविषय वाध्यदेशविस्थै
स्थित हैं औ देहके भीतर अहंकार
है ॥ १६ ॥
॥ २ ॥ वाधिरमितरप्रकाशमान साक्षीविषै बुद्धिकी
चंचलताका भारोप ॥ .
४ ननु "तैं सस्थिरस्थायी हुया साक्षी
वाधिरमितर प्रकटसातहै " इस १५ वें श्लोक-
उक्तप्रकारकरि अविकारी हुये साक्षीके वाधिर-
मितरअवभासकपनका कथन अयुक्त है ।
कहतैं "मैं घटकूं देखताहूं " इहां "मैं"
ऐसें मीतर अहंकारका साक्षी होनैकरी प्रथमतेैं
ऐसें घटाकारव्दितिके स्फुरणलुपकरी वाधिर-
निर्गमनके अनु भवतैं, यह आशंकाकारि कहैं:
५ ] देहके भीतरंस्थिति जो बुद्धि है ।
सो इंद्रियनके साथिही वारंवार
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॥ ९ ॥ साक्षी परमात्मामैं बुद्धिकी चंचलताका आरोप ॥ ८०००-४०९१ ॥ ३९५
गृहांतरगतः स्वल्पो गवाक्षादातपोड्चलः । तत्र हस्ते नर्त्यमाने नृत्यतीवातपो यथा ॥९८॥
निजेस्थानस्थितः साक्षी वहिरंतरगमागमौ । अकुर्वन्बुद्धिचांचल्यात्करोतीव तथा तथा ॥९९॥
पुनः वहिः याति । भास्यबुद्धिस्थचांचल्यं साक्षिणि बृथा आरोप्यते ॥
६ ) दृश्यग्राहकत्वेन देहांतरावस्थित बुद्धेः रूपादिग्रहणाय चक्षुरादिद्वारा भूयो भूयो निर्गच्छति । तथा च तत्रैव चांचल्यं तद्रासके साक्षिण्यारोप्यते अतो न वास्तवं साक्षिणः चांचल्यमिति भावः ॥ ९७ ॥
७ भासके भास्यचांचल्यारोपः क इत्याशंक्याह ( गृहांतरगत इति )—
८ ) गवाक्षात् गृहांतरगतः स्वल्प-आतपः अचलः तत्र हस्ते नृत्येमाने यथा आतपः चलति इव ॥
९ ) गवाक्षात् गृहांतरगतः स्वल्प-आतपोड्चल एव वर्त्तते तत्र तस्मिन्नातपे पुरुषेण हस्ते नृत्यमाने इतस्ततः चालयमानत्वेन तु चलतीव लक्ष्यते ॥ ९८ ॥
१० दार्ष्टान्तिकमाह—
११ ] निजस्थानस्थितः साक्षी वहिः अंतः गमागमौ अकुर्वन् बुद्धिचांच-ल्यात्तथा करोति इव ॥ ९९ ॥
८ ] गवाक्षतैं गृहके भीतर प्रास जो स्वल्पआतप काहिये सूर्यका प्रकाश है, सो स्वरुपतैं अचल होवैहै । तहां हस्तके नृत्येहूये जैसे आतप नृत्य करतेहूयेकी न्याई होवैहैं ॥
९ ) गवाक्ष जो झरोखा तातैं गृहके भीतर आया जो थोड़ा आतप काहिये भूप है, सो अचलही वर्त्तताहै । तिस आतपविपै पुरुषकारि हस्तके इधर उधर चलायमान कियेहूये जैसैं आतप चलतैकी न्याई देखियेहै औ चलता नहीं । यह अर्थ है ॥ ९८ ॥
१० दार्ष्टान्तिकरंकाह—
११ ] तैसैं निजस्थानमै कहिये स्वरूप-विपै स्थित हुया साक्षी वाहिरभीतर-गमनआगमनकूं न करताहुया बुद्धिकी चंचलतांतैं तैसैं तैसैं करतहूयेकी न्याई होवैहै ॥ ९९ ॥
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३९६ ॥ २ ॥ परमात्माके यथार्थस्वरूपका विशेषकरि निर्भर ॥ ४०००-४०५० ॥
[पंच- टीकांक: ४०१२ टिप्पणांक: ॐ नाटकदीप: ॥ १० ॥ श्लोकांक: ११३६ ११३७
नै बाध्यो नांतर: साक्षी बुद्धिदेशे हि तावुभौ । बुद्धथादेशोषसंशांतौ यत्र भात्यस्ति तत्न स:॥२०॥ देशे: कोऽपि न भासेत यदि तर्हेस्वदेशभाकू । संवेदेशप्रकृत्यैव सर्वगतं नै तु स्वत: ॥ २१ ॥
॥ २ ॥ साक्षीके देशकालादिरहित निजस्वरूपके कथनपूर्वक ताके अनुभवका उपाय ४०१२-४०५० ॥
१२ "निजस्थानस्थित:" इत्यनेन किं वाध्यादिदेशस्थत्वमेवोच्यते नेत्याह ( न बाध्य नांतर: )— १३] साक्षी वाध्य: न आंतर: न ॥ १४ तत्र हेतुमाह— (बुद्धिरेति)— १५ ] हि तौ उभौ बुद्धे: देशौ ॥ १६ तर्हि किं विवक्षितमित्यत आह— १७ ] बुद्धयादेशोषसंशांतौ स: यत्र भाति तत्न असित ॥
॥ २ ॥ साक्षीके वाध्यांतरदेशै रहित साक्षीका निजस्थान ॥
१८) आदिशब्देनादेशादयो गृह्यन्ते । संशांतिशब्देन तन्मतीतयुपरततिवृत्तिवक्षिता ॥२०॥ १९ नतु सर्वव्यवहारोपरतौ देश एव नोपलभ्यते कूत्रतत्वनिष्ठत्वमुख्यत इत्याशंक्य स्वामिभ्रायमाविष्करोति ( देश इति )— २० ] यदि क: अपि देश: न भासेत तर्हि अदेशभाकू असतु ॥ २१ ) देशादिकलपनाधिष्ठानस्य स्वातिरिक्कदेशापेक्षा नास्तीति भाव: ॥
हये सो साक्षी जहां स्वस्वरूपविपै भासताहै तर्हांही है ॥ १८) इहां आदिशब्दकरि इंद्रियादिक ग्रहण करियेहैं औ संशांतिशब्दकरि तिन बुद्धिादिकके प्रतीतिकी नित्तृति कहनेइचछित है ॥ २० ॥
॥ २ ॥ देशादिरहित आत्माके सर्वगतपनै औ सर्वसाक्षीपनैकी अवास्तवता ॥
१९ नतु सर्वव्यवहार जो प्रतीति ताकी नित्तृतिके हुये देशही प्रतीत नहीं होवै है । तथ साक्षीका तिसविपै स्थितपना कहैतैं कहियेह ? यह आशंकाकरि अपने 'अभिप्रायहू प्रगट करैहैं:— २० ] जब कोइं बी देशा नहीं भासताहै । तब देशरहूं न भजनैहारा कहियें देשרहित साक्षी होड़ ॥ २१ ) देशादिकलप्नाके अधिष्ठानकूं अपनेतैं भिन्न देशकी अपेक्षा नहीं है । यह भावहै ॥
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२ साक्षीका देशाफालादिरहित निजस्वरूप औ ताके अनुभวกका उपाय ४०१२-४०५० ॥ ३९७
नाटकदीप :- अंतर्तवहिव्हि सर्व वा यें देशं परिकल्पये । युब्धिस्तदेेशाग: साक्षी तथा वस्तुषु योजयेत् ॥ २२ ॥
टीकांक: ४०२२
येंचदृपादि कल्पयेत युब्ध्या तत्तत्प्रकाशनं । तस्य तस्य भवेत्साक्ष्री रैंतो वागुब्ध्यगोचर: ॥ २३ ॥
टिप्पणांक: उँ ३
२२ नतु देशादिभावे शाब्दे सर्वगतत्वे- साक्षित्वाध्युब्धिविरुद्धयेतव्यत आह— सर्वदेशामकृत्रप्त्या एव सर्वगतत्वं २३ ]
२४ स्वाभाविकमेव किं न स्वादित्यत आह ( न तु स्वत् इति )— २५ ] स्वतः तु न ॥
२६ ) अद्वितीयत्वादसंगलवाचैति भाव: ॥ ३१ ॥
२७ इसर्वगतत्वत्सर्वसाक्षित्वमपि न वस्तुभिल्याह—
२२ नतु देशआदि के अभाव हुये शाब्द- चिपें सर्वगत कहिये सर्वविपै न्यायक औ सर्वके साक्षीपनैका जो कथन है । सो विरोधकूं पावैगा । तहां कहैंहैं— २३ ] सर्वदेशकी कल्पनाकारिही आत्माकूं सर्वगतपना है ॥
२४ स्वाभाविक कहिये स्वरूपसैही सर्वगत- पना क्यूं नहीं होवैगा ? तहां कहैंहैं— २५ ] स्वतः कहिये स्वलपतैं सर्वगतना नहीं है ॥
२६) आत्माकूं अद्वितीय होनैतैं स्वाभाविकसर्वगतपना नहीं है । यह भाव है ॥ ३१ ॥
२७ सर्वगतपनैकी न्यायी सर्वसाक्षीपना यी वास्तव नहीं है । ऐसें कहैं—
२८ ] अंत: वा बाहिरदेशकूं वा यें सर्वे साक्षित्वाध्युब्धिवेतव्यत आह—
देशां बुद्धि: परिकलपयेत । तद्देशाग: साक्षी तथा वस्तुषु योजयेत् ॥ २२ ॥
२९ "तथा वस्तुषु योजयेत" इत्येतत् प्रपंचयति—
३० ] यत् यत् रूपादि बुब्ध्या कल्पयेत, तत् तत् प्रकाशयन् तस्य साक्ष्री भवेत् ॥
३१ तर्हि किं तस्य निजं रूपमिल्यत आह— ३२ ] स्वतः वागुब्ध्यगोचर: ॥ २३ ॥
२८ ] अंतर वा बाहिरदेशकूं जिस सर्ववस्तुकूं बुब्धि कल्पतीहै । तिस देशविषै स्थित साक्षी कहियेहै तैसें सर्ववस्तुनिविषै योजना करनां ॥ २२ ॥
२९ "तैसें वस्तुनिविषै योजना करनां" इस २२ श्लोककूं वर्णन करैहैं— ३० ] जो जो रूपादिकवस्तु बुद्बि- करि कल्पना करियेहै । तिस तिस वस्तुकूं प्रकाशातहुया तिस तिस वस्तुका साक्ष्री होवैहै ॥
३१ तह तिसका निजरूप क्या है ? तहां कहैहैं— ३२ ] स्वरूपतैं वाणी औ बुब्धिका अविषय है ॥ ३३ ॥
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२९८ ॥ २ ॥ परमात्माके यथार्थस्वरूपका विशेषकरि निर्धार ।। ४०००-४०५० ।। [पंच-
टीकांक: ४०३२ नाटकदीप: ॥ १० ॥
श्लोकांक: ११४० तिप्पणांक: ७५९
केथं तादृश्या ग्राह्या इति चेत्सैन युक्तताम् । सर्वत्रहोपसंशांतौ स्वयमेवावशिष्यते ॥ २४ ॥
नै तत्न मानापेक्षास्ति सैवप्रकाशास्वरूपता: । तादृग्व्युत्पत्त्यपेक्षा चेच्छृणुतिं पठ गुरोर्मुखात् ॥ २५ ॥
३३ अवाज्ञानस्योध्दवे गृह्यतेति शंकते ( कथमिति )—
३४ ] तादृक् मया किं ग्राह्य इति चेत् ।
३५ अग्राह्यत्वसिद्धमेवेत्याह—
३६ ] मा एव गृद्यताम् ॥
३७ नन्वात्मनो "विचारण विनष्टायां मायायां शिष्यते स्वयम्" इत्युक्तं परमात्माश- शेषणं न सिद्धयेदित्यत आह—
॥ ५ ॥ श्लोक ३३ उक्त विवरणका अगला-
ताक्ती इष्टापत्तीपूर्वक, श्लोक २३ उक्त परमात्माके अवशेषका कथन ॥
३३ वाणी अरु मनके अधिपय हुये सुषुप्त-
करि ग्रहण नहीं होवैगो । इरीतिसैं वादी शंका कहैहैं:—
३४ ] तैसा मनवाणीका अधिपय साक्षी मेरीकरि कैंसैं ग्रहण करनैकों योग्य है ?
ऐसैं जो कहै ।
३५ अग्राह्यता इयहै । ऐसैं सिद्धांती कहैहैं—
३६ ] तौ मति ग्रैहण करो ॥
३७ नहु "आत्माके विचारकरि मायाके नाश हुये आप परमात्माही ग्रेप रहताहै" ऐसैं तृतीयश्लोकविपै कधा जो परमात्माका अवशेष रहना, सो नहीं सिद्ध होवैगो । तहां
३८ ] सर्वग्राहककी कहिये सर्वप्रतीतिकी सम्यकुशांतिके हुये आपही अवशेष रहताहै ॥
३९ ) स्वातमातिरिक्तस्य द्वैतस्य मिध्य्यात्व-
निश्चयेन तत्सत्यतयुपरांतौ स्वात्मा एव सत्यतया अवाशिष्यते इति भाव: ॥ २४ ॥
४० यद्यप्युक्तन्यायेन स्वात्मा परिदृश्यते तथापि तदापरोक्ष्याय किंचिद्माणमपेक्षित-
मित्यत आह ( न तत्रैति )—
४१ ] तत्न मानापेक्षा न अस्ति ॥
लहैं:—
३८ ] सर्वग्राहकी कहिये सर्वप्रतीतिकी
सम्यकुशांतिके हुये आपही अवशेष रहताहै ॥
३९ ) स्वात्मातें मिन्न द्वैतके मिध्यापनैकें निश्चयकरि तिस द्वैतकी प्रतीतिकी उपरतिके हुये स्वात्माही सल्यपनैकिरि अवशेष रहताहै'। यह भाव है ॥ २४ ॥
॥ ५ ॥ प्रमाणपेक्षारहित स्वप्रकाशास्वरुके
श्रुतिकारि उत्तमअधिकारीकूं बोधनका उपाय ॥
४० यद्यापि श्लोक २४ उक्त न्यायकरि स्वात्मा परिदृशक विपय होवैहै, तथ्यापि
तिसके अपरोक्ष्य करनैअर्थ 'कछुक' प्रमाण
अपेक्षित है । तदहां कहैंहैं:—
४१ ] तिस स्वात्माविषै प्रमाणकी
अपेक्षा नहीं.है ॥
करि जौं मनकी वृत्तिन्यासिकरि मनआदिक्का साक्षी
स्वयंप्रकाशास्वरूप सो आत्मा जानना योग्य है ॥
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४२ तत्न हेतुमाह—
४३] स्वप्रकाछास्वसुपत: ॥
४४ नन्वात्मन: स्वप्रकाशतया स्वत: स्फुर्त्तां मानं नापेक्ष्यत इति न्यायपत्तिसिद्धये मानमपेक्षितमित्याशंक्य शुतिरीहात्र प्रमाणमित्याह—
४५] तादृग्ज्ञुत्पत्त्यपेक्षा चेत्न् गुरो: सुग्नात्न् शुति पठ ॥ २९ ॥
४२ तिसविंप हेतु कहहैं—
४३] स्वप्रकाछास्वस्वरुप होनैतैं ॥
४४ ननु “आत्माकी स्वप्रकाशाताकरी आपहीं स्फूर्त्तिविपै प्रमाण अपेक्षित नाहींहैं” ऐसैं बोधकी सिद्धि अर्थ प्रमाण अपेक्षित है । यह आाशंकाकरि शुति ही इहाँ प्रमाण है । ऐसैं कहहैं—
४५] तैसैं बोधकी अपेक्षा जो होवै तौ ब्रह्मनिष्ठगुरुकै मुखतैं शुतिकूं पठ कर ॥ २९ ॥
४२ जैसैं “द्वाआषिपै चह्रु है” हस बचनकूं चुनिकै स्थूलद्रिवाला पुरुप द्वाआकूं लसकारिकै पिछै धर्मसहित द्वाआकूं हाटिकै छोडिकै द्वालाकै समीप स्थित होनैकरि द्वाआकै आधीन चेंद्रकूं देखताहै । तैसैं मंदबुद्धिवाला
४६ एहमुत्तमाधिकारीण आत्मानुभवो—पायमभिधाय मंदाधिकारीणस्तं दर्शयति ( यदीति )—
४७] सर्वभ्रतत्याग: यदिं अशाक्य: नहिं धियं शारणं ब्रज ॥
४८ बुद्धिशरणत्वे किं फलमित्यत आह—
४९] तदधीन: अंत: वा वहि: एप: अनुभूयताम् ॥
४६ ऐसैं उत्तमाधिकारीकूं आत्माके अनुभवके उपायकूं कहिके जब मंदअधिकारीकूं
४७] सर्वभ्रतीतिकां त्याग जब अशाक्य है, तब बुद्धिके प्रति शारण लैक्य करहु ॥
४८ बुद्धिके शरण होनैविपै क्या फल
४९] तिस बुद्धिके अधीन अंतर वा चाहिर यह परमात्मा अनुभव करना ॥
४२ जैसे “द्वाआषिपै चह्रु है” हस बचनकूं चुनिकै स्थूलद्रिवाला पुरुप द्वाआकूं लसकारिकै पिछै धर्मसहित द्वाआकूं हाटिकै छोडिकै द्वालाकै समीप स्थित होनैकरि द्वाआकै आधीन चेंद्रकूं देखताहै । तैसैं मंदबुद्धिवाला
अधिकारी गुरुकै उपदेशतैं बुद्धिकूं लक्ष्यकरिकै बाआखअंतर धर्मसहित बुद्धिकूं हाटिकै छोडिकै अभिध्यान साक्षीपकरि बुद्धिके समीप स्थित होनैकरि बुद्धिके आधीन हुयेकी न्यांई जो परमात्मा है, ताहैं साक्षीपकरि अनुभव करताहै ।
यदिं शरणं तंंद्रधीनोंंतरवहिरेंवंपोडनुभूयताम् । ॥ २६ ॥
॥ इति श्रीपंचदश्यां नाटकदीप: ॥ ३० ॥
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८००॥ २ ॥ परमात्माकेयथार्थस्वरूपका विशेषकरि निर्धार ॥ ८०००-८०५० ॥ [पंचदशी.]
५०) बुद्धध्या यचत्परिकल्प्यते वाह्यमांतरं वा तस्य तस्य साक्षित्वेन तदृधीनं परमात्मा तथैव अनुभूयतां इत्यर्थः ॥ २६ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरित्राजकाचार्यविद्यारण्यमुनिवर्यंकिंकरेण रामकृष्णाश्रयविदुषा विरचिते पंचदशीप्रकरणे नाटकदीप- न्याख्या समाप्ता ॥ १० ॥
५०) बुद्धिकरि जो जो वाह्य वा अंतरवस्तु चारी औरतैं कल्पना करियेहै । तिस तिस वस्तुकां साक्षी होनेकरि तिस बुद्धिके अधीन परमात्मा है । सो तैंसैं साक्षीपनैकरिही अनुभव करना । यह अर्थ हैं ॥ २६ ॥
इति श्रीमत्परमहंस परित्राजकाचार्य ग्रापू- सरस्वतीपूज्यपादाशिष्य पीतांबरशर्म- विदुषा विराचिता पंचदश्या नाटकदीपस्य तत्त्वप्रकाशि- काडलया न्याख्या समाप्रा ॥ १० ॥
पुस्तक मिलनेका ठिकाना:- हरिप्रसाद भगीरथजी, ग्राचीन पुस्तकालय, काठवाडेवें रोड रामवाडी, मुंबई।
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विचार-दर्शन । ( हिन्दी भाषामें अपूर्व ग्रन्थ ) इस ग्रन्थके विपयमें साहसके साथ कहते हैं, कि, ऐसी पुस्तक आजतक किसी भाषामें बनी नहीं । यह नवीन विचारकी नवीन विचारश्रेणी New thought है । जिसमें—वेद, वेदाङ्ग, उपनिपद्, शास्त्र, स्मृति, पुराण, कल्प, सूत्र, गाथा, अवस्था, वाइवल, कुरान, सिक्खिय, योग, तन्त्र, मन्त्र, ज्योतिप, वैद्यक, विज्ञान, मेस्मेरिज्म, आदि सबका रहस्य, गूढभेद एवं सार निकाल- कर सब धर्मोंकी एकवाक्यता करके—चाह्यजगत्, जगत्का व्यवहार, आन्तरजगत्, विचारशक्ति, विचारसंयम, विचारसंस्कार सामर्थ्य, जिज्ञासा, श्रद्धा, सद्रुरू, वैराग्य, सद्विचार, अभ्यास, आत्मा, परमात्मा, जीवात्मा, कर्म, उपासना, कर्म-भक्ति-ज्ञानयोग, अष्टाङ्गयोगका पूर्ण विचे- चन करके क्रियारूप, ज्ञानरूप, सत्स्वरूप, ऐ- तिह्य, नवनीति, धनमूल ऋद्धि-समृद्धि, सुखशान्ति, भूतभविष्यत्प्रत्यक्षत्कालज्ञान, अमरत्व आदि—जो सो साध्य करनेके लिये अमोघ शक्ति प्राप्त करनेका सरल सीधामार्ग दिखाया है । जिससे चाहे जो थोड़े परिश्रम एवं समयमें इच्िछत फल साध्य करके विजय पा सकता है । यह पुस्तक क्या है मानों, सुख शान्ति, आनन्द, उत्साह, आरोग्य, बल, ऐश्वर्यका खजाना है । भाग्यशाली, पुण्यवान्, धार्मिक ही को यह प्राप्त होसकती है; कागज, छपाई, जिल्द—चहुत वदिया, स्वच्छ एवं सुनहरी है । इसके बहुमूल्य ग्रन्थकी कीमत सिर्फ ५) रुपया रख्खी है । डाकमहँसूल ८ आने. एकादशस्कन्ध भापा श्रीचतुरदासजी कृत. इसमें श्रीमद्भागवतांतर्गत एकादशस्कन्धका वेदान्तरहस्य सरल भापामें बड़े विस्तारके साथ लिखकर सर्व साधारणके सहजमें समझने योग्य कर दिया गया है । की० १४ आना.डा. म. ५ आना.
वेदान्तमतदर्शन । भापा. यह ग्रन्थ अत्युत्तम है. इसमें दो खंड हैं तथा वेदान्तविधिचारादि ५० प्रसंग हैं; जिनमें ९८२ मत हैं और अनेक श्लोकोंपर सूत्र व दृष्टियोंके प्रमाण भी दिये हैं कीमत १२ आना. डा. म. २ आना. सुभाषितरत्नाकर. भापाटिकासहित । यह अलंकार ग्रन्थ संस्कृतज्ञ पंडितों तथा हिंदी रसिक जनोंके निमित्त परमोत्तम अलंकार- रूप है । इस ग्रन्थमें पाँच प्रकाश हैं । प्रथम प्रकाशमें सुभाषित, विद्या, कवि, पंडित वैद्य आदि तथा धर्म, नीति सम्बन्धी सम्पूर्ण वि- योंकी प्रशंसा और तद्दूषकद्रविपयोंकी निन्दा वर्णित है । द्वितीय प्रकाशमें राजसभा सम्बन्धी सब विपयोंका वर्णन है. तृतीय प्रकाशमें संसारके समस्त व्यवहारोंके अनुसार सामान्य नीति वर्णन की गई है । चतुर्थ प्रकाशमें समस्याऐं, पहेली, कूट-श्लोक और क्रिया आदि गूढश्लोक, अन्तरालाप, बहिरालाप, प्रश्नोत्तरश्लोक, भापा- चित्र, संस्कृतचित्र काव्य, षृङगार आदि नवरस निल्पण और विपयोपहास वर्णित है. पंचम प्रकाशमें धर्मोधर्म निरूपण, वर्णाश्रमधर्मे, स्त्रीधर्म- तप तथा तीर्थनिरूपण, पुनर्जन्मनिरूपण, मोक्ष- स्वरूप, म्रक्षनिरुपण, वर्णन है । समाजोंमें बोलने योग्य यह ग्रन्थ पंडितों तथा सामान्य पुरषोंके लिये भी रत्नकी खान है इसीलें इसका नाम " सुभाषित रत्नाकर " रक्खा है । इस ग्रन्थमें ज्योतिष्विर्त्पन्नित नारायणप्रसाद मिश्र लखीमपुर खीरी निवासीनें अनेक काव्य नाटक इतिहास स्मृति और नीति ग्रन्थोंका उत्तमोत्तम विषय लेकर लिखा है इसीलें इस ग्रन्थके आश्रयसे सामान्य पंडित भी सभामें बोल सकता है तथा सभाओंमें व्याख्यान देनेकी सामर्थ्य इस ग्रन्थके पढ़नेसे हो जाती है । इस ग्रन्थकी भापाटीका भी सरल भाषामें की गई है ।
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( २ ) इस परमोत्तम ग्रन्थकी एक एक प्रति प्रत्येक पंडितजनको अपने पास रखनी उचित है—मूल्य भी सबके सुबतीके लिये इतने बड़े ग्रन्थका केवल ३ रुपया मात्र रखा है । डाक खर्चे ६ आना। अष्टोपनिषद्राषा पका। ( अर्थात् आठ उपनिषदोंका सुरसपष्ट शांकरभाष्यानुसार स्पष्ट अर्थ और मनुपदेशक शब्द, अन्तर्युखी रामायण, आत्मस्तोत्राष्टक, जगद्विलास आदिका वर्णन.) आजकल वेदांतके जितने ग्रंथ छपे और विनाछपे नजर आते हैं उन सबका मुख्य आधारस्तंभ वेदका उपनिषद्भाग है। सो वे चारों वेदोंके उपनिषद् एकसौ आठ १०८ हैं। उनमेंसे ईश, केन, कठ, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और वृहदारण्यक ये दश ही उपनिषद् मुख्य होनेसे इनपर श्रीमान् स्वामी शांकरस्वा- मेजीने संस्कृतमें अज्ञ बोधके लिये भाष्य किया है। परंतु वह भाष्य संस्कृतमें होनेके कारण संस्कृततसे अनजान लोगोंको समझमें अच्छी तरह नहीं आता, और सभी वेदान्तग्रन्थोंमें सब जगह उपनिषद् मंत्रोंका ही उपयोग किया गया है, यह विचारकर शंकराचार्यजीने जो उपनिषद् मंत्रोंका, पक्षपातको छोड़कर कर्मकाण्ड, उपास- काण्ड और ज्ञानकाण्डके विपे भाष्यरूप यथासंभव अर्थ किया है, उसीका आश्रय लेकर श्रीमत्परमहंस स्वामी हरिप्रकाशराजजीने ईश, कठ, केन, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय और छान्दोग्य इन आठों उपनिषदोंकी यथार्थ भापा संक्षेपसे की है। वही "अष्टोपनिषद्राषा- फक्का" हमने सर्व साधारणके उपयोगके अर्थ अच्छे सुविचार ग्लेज कागजपर छापी है और छोटे अक्षर सबके सुबतीके लिये कीमंत भी बहुत ही कम अर्थात् ३) रुपये रख्खी है। डाक- महसूल ६ आना।
ब्रह्मसूत्र ( वेदान्तदर्शन ) शारीरकभाष्यानुसार सूत्रभावर्थप्रकाशिका- भापाटीका, अधकरणसूत्र, तथा उनका प्रसंग दर्शिंत करनेवाली सूची और आकारादि वर्गणाक्रम- जुसार सूचीबोलने प्रकासहित। इसमें सूत्र और शांकरभाष्यके मतन विपयोंका विवेचन सरल रीतिसे किया गया है; जिससे यह पुस्तक सर्व साधारणके सग्रहयोग्य हो गयी है। ऐसी सरल, और वेदान्तके गूढ सिद्धान्तोंको स्पष्टसे समझाने- नेवाली यह टीका अपने ढंगकी एकही है; क्योंकि भामती, आनन्दगिरि आदि सब टीका- ओंके सहारसे लिखी गयीहै। की. १-१२३। ०-४
वेदस्तुति ( सान्वयभापाटीका सहित ) श्रीमद्भागवतन्तर्गत दशमस्कन्धोत्तरार्धके ८७ वें अध्यायमें श्रीकृष्ण भगवान्ने श्रुतदेव ब्राह्मण और राजर्षिलस्थको सन्मार्गे नाम वेदमार्गेका उपदेश किया है अर्थात् इस स्तुतिमें समस्त वेदोंने ब्रह्म प्रतिपादन किया है।की. ०-८३। ०-१
पुस्तक मिलनेका पता- हरिप्रसाद भगीरथजीका माचीन पुस्तकालय, कालकादेवी रोड-रामवाडी-चौपाटी.