1. Vivarana-Prameya-Sangrah-Sanskrit
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अच्युतग्रन्थमालायाः (ख) विभागेऽष्टमं प्रसूनम्
श्रीमत्प्रमहंसपरिव्राजकाचार्यविद्यारण्यमुनिविरचितह: विवरणप्रमेयसंग्रह:
डवरालकृतेन भापानुवादेन
समलङ़कत:
श्रीजो० म० गोयनकासंस्कृतमहाविद्यालयभूतपूर्वाध्यक्षेण पं० श्रीचण्डी प्रसाद शुक्कशास्त्रिणा श्रीमदच्युतग्रन्थमाला-विश्वनाथपुस्तकालयाध्यक्षेण साहित्याचार्य- पं० श्रीश्रीकृष्णपन्तशास्त्रिणा च
सम्पादित:
प्रकाशनस्थानम- अच्युतग्रन्थमाला-कार्यालयः, काशी।
प्रथमावृत्ति: १५०० ] संवत् १९९६
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प्रकाशक- श्रेष्टिमवर श्रीगौरीशङ्कर गोयनका
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सुढन्ह
नाथ श० सोमण श्रीलक्ष्मीनारायण प्रेस, काशी
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- श्री *
सम्पादकीय वक्त्तव्य
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीविद्यारण्यमुनिजीकी कृति विवरणप्रमेयसंग्रहको भाषानुवादके साथ पाठकोंके सम्मुख रखते हमें परम हर्ष हो रहा है। वैदान्त- दर्शनमें दो प्रस्थान अति प्रसिद्ध हैं-विवरणप्रस्थान और भामतीप्रस्थान। यह विवरणप्रस्थानका अति प्रामाणिक और समादत अन्थ है। चतुःसूत्री भाष्यपर लिखी गई पश्चपादिका टीकाके नौ वर्णकोंका यह व्याख्यानरूप है। पश्चपादिकाके ऊपर प्रकाशात्म यति द्वारा निर्मित विवरणनामक निवन्धका अवलम्बन कर विवरण- प्रमेयसंग्रहकी रचना की गई है। विवरणप्रमेयसंग्रह्के आरम्भमें स्वयं अन्थकार कहते हैं- 'भाष्यटीकाविवरणं तन्निवन्घनसङग्रहः। व्याख्यानव्याख्येयभावक्लेशहानाय रच्यते।।' प्रस्तुत अन्थके प्रमेयांशके विषयमें अनुवादकने भूमिकामें प्रकाश डाल ही दिया है, उसको दुहराना पिष्टपेपण होगा, अतः उसपर मौनमुद्रा धारण कर मैं ग्न्थकारके नीवनके विपयमें दो चार शब्द निवेदन कर देना चाहता हूँ। श्रीविद्यारण्यमुनिका पूर्वावस्थाका नाम माघवाचार्य था। उन्होंने सन् १३३५ ई० में विजयनगरके राज्यकी नींव डाली थी और स्वयं राज्यका मन्त्रिपद ग्रहण कर उसका विस्तार किया था। उन्हींके सत्पयत और बुद्धिबलसे दक्षिणमें यवनसाम्राज्य शिथिल हुआ था। श्रीमाघवाचार्यजीका जन्म तेरहवीं शताब्दीके अन्तिम भागमें हुआ था और चौदहवीं शतान्दीके अन्त भागमें उनका देद्दावसान हुआ था। वे लगभग १०० वर्षतक नीवित रहे थे। उनके पिताका नाम श्रीमायण और माताका नाम श्रीमती था, एवं वेदभाष्यकार सायण और भोग- नाथ दो उनके सहोदर भाई थे। उनका वौधायन सूत्र और भारद्वाज गोन्न था। उन्होंने पराशरमाघवके प्रारम्भ श्रोकमें अपना परिचय इस प्रकार दिया है- श्रीमती जननी यस्य सुकीर्ततिर्मायणः पिता। सायणो भोगनाथश्च मनोबुद्धी सहोदरौ।।
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वौधायनं यस्य सूत्रं शाखा यस्य च याजुषी। भारद्वाजं यस्य गोन्रं सर्वज्ञः स हि माघवः ॥ प्रतीत होता है कि माधवाचार्यका कुल नाम 'सायण' था। सर्वदर्शनसंग्रहके पारम्भ श्रोकमें उन्होंने अपनेको सायणरूपी क्षीरसागरका कौस्तुभ कहा है- श्रीमत्सायणदुग्घाव्घेः कौस्तुमेन महौजसा। क्रियते माघवार्येण सर्वदर्शनसंग्रहः॥ पूर्वेषामतिदुस्तराणि सुतरामालोच्य शास्त्राण्यसौ। श्रीमत्सायणमाधवः प्रभुरुपन्यासत् सतां प्रीतये।। माघवीय धातुवृत्तिके आरम्भ क्रोकमें उन्होंने अपने श्रीपितृचरण मायणको भी सायण उपाघिसे अलङ्कृत किया है- अस्ति श्रीसङ्गमक्ष्मापः पृथ्वीतलपुरन्दरः । तस्य मन्न्निशिखारतमस्ति मायणसायण: ।। पिताके नामके साथ सायणशव्दका प्रयोग करनेसे स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि सायण माघवका कुल नाम था। वेदभाष्यकार सायणाचार्य अपने कुलनामसे ही प्रसिद्ध थे। पराशरमाधवमें उन्होंने 'सायणो भोगनाथश्च' वाक्य द्वारा सायणके कुलनामका ही उल्लेख किया है। तैत्तिरीयसंहिताके भाष्यके आरम्भ श्रोकसे भी उनका 'सायण' कुल नाम था, यही स्फुट प्रतीत होता है- 'अन्वशात् माधवाचार्य वेदार्थस्य प्रकाशने।। स ग्राह नृपति राजन् सायणार्यो ममाऽनुजः । सर्व वेत्त्येष वेदानां व्याख्यातृत्वे नियुज्यताम् ।। इत्युक्तो माघवार्येण चीरवुक्कमहीपतिः अन्वशात् सायणाचार्य वेदार्थस्य प्रकाशने।।' जहांपर 'सायणमाघवीय' इस प्रकारका उल्लेख है, वहांपर भी 'सायण' कुल नाम ही संगत होता है और जहां पर 'सायणाचार्यविरचिते माधवीये' ऐसा उल्लेख है, वहांपर माधवाचार्यकी आज्ञासे सायण द्वारा विरचित यही अर्थ युक्ति- -युक्त प्रतीत होता है। और भी अनेक स्थलोंमें श्रीसायणाचार्यकी कुलनामसे प्रसिद्धि देखी गई है। अतः माधवाचार्यका 'सायण' कुलनाम ही था। श्रीमाधवाचार्यजीके ग्रन्थोंके अवलोकनसे प्रतीत होता है कि उनके तीन
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( ३ ) -गुरु थे-श्रीशङ्करानन्द, श्रीविद्यातीर्थ और श्रीभारतीतीर्थ। उन्होंने विवरणप्रमेयके -आरम्भमें श्रीशक्करानन्दजीको प्रणाम किया है- स्वमात्रयानन्दयदत्र जन्तून् सर्वात्मभावेन तथा परत्र। यच्छक्करानन्दपदं हृदब्जे विभ्राजते तद् यतथो विशन्ति ॥ और ग्रन्थकी समाप्तिमें श्रीविद्यातीर्थजीको ग्रन्थका समर्पण किया है- यद्विद्यातीर्थगुरवे शुश्रूपाऽन्या न रोचते तस्मात्। अस्त्वेषा भक्तियुता श्रीविद्यातीर्थपादयोः सेवा।। और जैमिनीयन्यायमालाविस्तरमें उन्होंने श्रीभारतीतीर्थको गुरुरूपसे प्रणाम किया है- स भव्यादू भारतीतीर्थयतीन्द्रचतुराननाद्। कृपामव्याहतां ल््वा परार्ध्यप्रतिमोऽभवत् ॥ इससे प्रतीत होता है कि श्रीमाधवाचार्यके (श्रीविद्यारण्यसुनीश्वरके) पहले विद्यातीर्थ गुरु थे, उनके देहावसानके पश्चात् उनके शिष्य श्रीभारतीतीर्थके समीप उन्होंने विद्या पाप्त की थी और वृद्धावस्थामें श्रीशक्करानन्दजीसे संन्यासदीक्षा ली थी, इस प्रकार उनके तीन गुरु होनेमें कोई आपत्ति प्रतीत नहीं होती। श्रीमाधवाचार्यने चिरकाल तक विजयनगरराज्यके मन्त्रित्वपदमें आसीन रहकर, बड़ी कुशलतासे राज्यका संचालन और विस्तार कर वृद्धावस्थामें संन्यासग्रहण किया। वे संन्यास-ग्रहण करनेके पश्चात् शङ्गरीमठके अध्यक्ष हुए थे। श्रीमाधवाचार्यने अपना गार्हस्थ्यजीवन केवल राजनीतिसेवामें ही व्यतीत नहीं किया था, किन्तु उन्होंने उत्तम ग्रन्थोंकी रचना कर संस्कृतभण्डारकी वृद्धि करते हुए सरस्वती देवीकी भी प्रचुरमात्रामें सेवा की थी। वीरबुक्क राजाकी आज्ञासे उन्होंने कुछ कालके लिए जयन्तीपुरमें राज्य भी किया था। उनके शासनकालमें उक्त देश अधिक समृद्ध हुआ था। उसी समय माघवाचार्यने कोङण देशकी राजधानी गोवापर अपना अधिकार स्थापित किया और मुसलमानों द्वारा भग्न सप्नाथ प्रभृति देवताओंकी मूर्तियाँ स्थापित कीं। राज्यकार्यमें उनकी निपुणता असीम थी, जो सबपर विदित है, शास्त्रचर्चामें भी उनकी प्रतिभा सर्वतोमुखी थी। वे समानरूपसे वैयाकरण, दार्शनिक, कवि, स्मृति- -संग्रहकर्त्ता एवं सर्वदर्शनपारंगत थे। इस प्रंकारका सम्पूर्ण गुणोंका अपूर्व सम्मिश्रण
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( ४ विरलेमें ही दिखाई देता है। श्रीमाघवाचार्यने जिस विषयमें हाथ डाला उसे पूर्ण करके ही छोड़ा। श्रीमाधवाचार्यने (श्रीविद्यारण्यमुनीश्वरने) वेदान्तमें-विचरणप्रमेयसंग्रह, बृहदा- रण्यकवार्तिकसार, पश्चदशी, अनुभूतिप्रकाश, अपरोक्षानुभृतिकी टीका, जीवन्मुक्ति- विवेक, ऐतरेयोपनिषद्दीपिका, तैत्तिरीयोपनिषद्-दीपिका और छान्दोग्योपनिषद्- दीपिकाका निर्माण किया। व्याकरणमें- माधवीयधातुवृत्तिकी रचना की। धर्मशास्त्रमें- पराशरमाधव और कालमाघवका निर्माण किया। मीमांसामें- जैमिनीयन्यायमालाविस्तरकीरचना की। इनके अतिरिक्त शङ्करदिगुविजय, सूतसंहिताटीका* आदि स्फुट अ्रन्थोंका भी उन्होंने निर्माण किया। प्रतीत होता है कि श्रीमाधवाचार्यने पूर्वोक्त ग्रन्थोंमें से विवरणप्रमेयसंग्रह, पश्चदशी, अपरोक्षानुभूतिकी टीका, अनुभूतिपकाश, वृहदारण्यकवार्तिकसार, छान्दो- ग्योपनिषद्दीपिका, जीवन्मुक्तिविवेक, ऐतरेय, तैत्तिरीय और छान्दोग्य उपनिपदोंपर दीपिका-इन वेदान्त ग्रन्थोंकी रचना संन्यासग्रहणके अनन्तर की थी, कारण कि इन सबकी विद्यारण्यकृतिरूपसे प्रसिद्धि है। श्रीविद्यारण्यमहासुनिका पञ्चपादिकाविवरणके ऊपर लिखा गया प्रस्तुत विवरण- प्रमेयसंग्रहनामक प्रमेयबहुल ग्रन्थ दार्शनिक संसारमें एक अपूर्व और उपादेय ग्रन्थरत्न है। पश्चदशीकी रचना कर उन्होंने वेदान्ततत्व-जिज्ञासुओंका जो उपकार किया है, उसका वर्णन नहीं हो सकता। यदि कहा जाय कि पश्चदशीके सदश प्रमेय- बहुल एवं सुबोध अन्थ वेदान्तजगत्में दूसरा नहीं है, तो कोई अत्युक्ति न होगी। अनुभूतिप्रकाश, जीवन्मुक्तिविवेक आदि ग्रन्थ भी अपनी तुलना नहीं रखते। जिनकी लेखनीसे विवरणप्रमेयके सदश टीकानिबन्घ, पराशरमाधवके समान स्मृतिनिबन्ध, माघवीयधातुवृत्तिके सहश व्याकरणग्रन्थ और जैमिनीयन्यायमाला- * कुछ लोगोंका कथन है कि सूतसहिता किसी अन्य माधवांचार्यकी रचना होगी, यह सायणमाधवकी रचना नहीं है, देखिये रुद्रभाष्यभूमिका, पूना, आनन्दाश्रम सं० सी० ।
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५ ) विस्तरके सदृश मीमांसाग्रन्थ, सर्वदर्शनसंग्रहके सदृश संग्रहनिबन्ध प्रसूत हुए, उन्हें सर्वतन्त्रस्वतन्त्र कहना ही उचित है। सूतसंहिताके ऊपर श्रीमाघवाचार्यने जो टीकाकी रचना की है, उससे उनके अगाघ पाण्डित्यका पता चलता है। विवरणप्रमेयसंग्रहका भापानुवाद हमारे आदरणीय मित्र व्याकरणचार्य, काव्यतीर्थ, वेदान्तभूपण पण्डितदर श्रीललिताप्रसादजी डवरालने वड़े परिश्रमसे किया है। आदर्श प्रतिमें जहाँ तहाँ अश्ुद्धियाँ रह गई थी, विवरण, तत्त्वदीपन आदिके आधारपर उनको शुद्ध कर उन्होंने पाठका संशोधन भी भलीभाँति किया है। हम उनके इस प्रकार परिश्रमपूर्वक किये गये अनुवादकार्यके लिए उन्हें हार्दिक धन्यवाद देते हैं। अन्तमें हम भगवान् काशीपुराघिपति श्रीविश्वनाथजीको कोटिशः प्रणाम करते हैं, जिनकी असीम कृपासे ही दानवीर श्रीमान् सेठ गौरीशक्कर गोयनकाजीका. वेदान्तप्रचाररूप शुभ सङ्कर्प दिन-पर-दिन विकसित हो रहा है, इति शम्।
वसन्तपख्जमी चिनीत १९९६ श्रीकृष्णपन्त
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भूमिका यह अनुभवसिद्ध है कि प्राणिमात्र सुखको ही परम पुरुपार्थ समझता है। केवल उसीकी आासिके लिए सदा सांसारिक तथा पारलौकिक कृत्योंके साधनमें लीन रहता है। कामनाओंकी पूर्ति ही सुखकी साधारण तथा सच्ची परिभाषा हो सकती है दूसरे शब्दोंमें यह कह सकते हैं कि कामनाओंका निश्शेष होना ही सुख है। ऐहिक अथवा पारलौकिक सुखके साधनोंसे तो कामनाओंकी वृद्धि ही होती है, उससे उनका निश्शेष होना कभी भी सम्भव नहीं है। एकमें तो कमसे कम निन्नानवेका फेर कभी भी पिण्ड नहीं छोड़ता और दूसरेमें भी "क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके विशन्ति" (पुण्य-क्षय होनेपर पुनः मर्त्यलोकमें आना पड़ता है) इसके अनुसार जन्म-मरणके चक्र-भ्रमणमें कामनाएँ नृत्य करती ही रहती हैं। वस्तुतः सच्चा सुख तो तभी समझना चाहिये ज कि कामनाओंका अन्त हो जाय, और कामनाओंका अन्त पूर्णकाम होनेपर ही हो सकता है, जैसे कि श्रीगौड़- पादाचार्य कहते हैं-"आप्कामस्य का स्पृहा"। पूर्णकाम होना भी आत्म- स्वरूपके साक्षात्कारके विना कथमपि सम्भव नहीं है, कारण कि केवल आत्मा ही सुख तथा आनन्दका सागर है। उसके बिना सुख या आनन्द कहांसे मिल सकता है? यह सिद्धान्त शास्त्रके अतिरिक्त युक्ति तथा अनुभवसे भी सिद्ध है। जिस पुरुपके पास अखण्ड प्रकाश देनेवाली मणि विद्यमान है, उसको किसी भी दीप आदि वहिर्भूत साधनोंकी अपेक्षा नहीं रहती, उसके समीप तो रात्रि-दिन एक-सा प्रकाश रहता है एवम् सुख या आनन्द स्वरूप ्रह्मात्माका अपरोक्ष ज्ञान होनेपर वहिर्मूत साधनोंकी अपेक्षा ही नहीं रह जाती है ? फिर कौन-सी कामना घेर सकती है। जो कुछ भी वाहरी साधनोंसे सुख-सा प्रतीत होता है, वह सव आत्मीयताके ही नाते होता है। जिस स्त्री, पुरुप वाल, या वृद्ध एवम् स्थावर तथा जङ्गम सम्पत्तिके साथ आत्मीयताके लेशका भी सर्वथा अभाव है, उसके द्वारा सुख-प्राप्तिकी आशा कमी भी नहीं की जा सकती। जिसके साथ जिस तारतम्यसे आत्मीयताका नाता है, उसमें ही आत्मीयताके तारतम्यके अनुसार सुखकी मात्रा पाई जाती है। महर्पियोंने उस आनन्दात्मक ब्रह्मात्माके साक्षात्कारके एकमात्र उपायभृत
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२ ) उपनिषद् भागका अपनी दिव्य दृष्टि द्वारा प्रकाश पाकर, वेदान्तदर्शनका आवि- भीव किया। शास्त्रकी गहनता और साथ-साथ कालक्रमसे बुद्धिचलका हास होता देखकर परम दयालु महर्षि वेदन्यासजीने उक्त वेदान्तशास्त्रके तात्पर्य- निर्णयके लिए वेदान्तमीमांसाके रूपमें ब्रह्मसूत्रोंका निर्माण किया, जिनके ऊपर श्रीमगवान् शङ्कराचार्यजीने भाष्यकी रचना की। उक्त भाष्यके गूढ़ तात्पर्यको सरल तथा विस्तृतरूपमें दर्शाना ही प्रकृत ग्रन्थका मुख्य प्रयोजन है। ऐसा होनेपर भी यह ग्रन्थ साक्षात् भाष्यको प्रतीक बनाकर व्याख्यानरूपमें नहीं लिखा गया है, किन्तु भाष्यकी पश्चपादिका नामकं टीकाके व्याख्यानभूत विदरणको लक्ष्य करके स्वतन्त्र निवन्धरूपमें लिखा गया है। इसलिए परममूलभूत पश्चपादिकाके विपयमें प्रसङ्गपाप्त कुछ निवेदन कर देना अप्रासङ्िक न होगा। सन् १८९१ इ० में ई० जे० लाजरस कम्पनी द्वारा मुद्रित पश्चपादिकाकी भूमिकामें अ्रन्थकारके विपयमें लिखा है कि पश्चपादिकाके प्रणेता श्रीपत्मपादाचार्य श्रीशङ्कराचार्य भगवत्पादके प्रमुख शिष्योंमें थे। भाष्यकी टीका करनेके लिए अन्य शिष्योंने इनसे अधिक अनुरोध किया था, क्योंकि ये श्रीश्कराचार्यजीसे तीन वार भाष्य पढ़ चुके थे। दूसरी बात यह भी थी कि सुरेश्वराचार्य द्वारा विरचित वार्तिकके ऊपर अश्रद्धाप्रदर्शन करते हुए गुरु महाराजने भी आज्ञा दी थी कि भाष्य- पर टीका की जाय। इसके अतिरिक्त यह भी उसी भूमिकाके प्रारम्भमें ही लिखा है-"अस्याः किल पश्चैव पादाः प्रचरेयुस्तन्राऽपि आद्या चतुःसूतयेव प्रसिद्धत्रेदिति भगवता शङ्करभगवत्पादेन रचयिताऽमिदधे, इति वर्णयन्ति स्म शक्करदिग्विजये माघवाचार्याः।" अर्थात् भगवान् श्रीशङ्कराचार्यजीने इस अ्रन्थके रचयिता पझ्मपादाचार्यजीसे कहा था कि इस टीकाके पाँच ही पाद प्रचलित हों और उसमें भी चार सूत्रतक ही यह प्रसिद्ध हो इत्यादि वृत्तका आधार माघवाचार्यप्रणीत शङ्करदिग्विजय है। इसके आगे लिखा है कि बहुत डूँढा गया, परन्तु चार सूत्रतक ही यह ग्रन्थ मिला और इसका व्याख्यानभूत विवरंण भी इतना ही मिलता है। इंन लेखोंके आधारसे ज्ञात होता है कि श्रीपद्मपादाचार्यने सम्पूर्ण भाष्यपर टीकां बनाई होगी और उसमें पाँच पादोंकी टीकाका नाम पञ्चपादिका * शङ्करदिगविजय पूनाका संस्करण सर्ग १३ श्रोक ५-७३।
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( ३ ) पड़ा होगा, परन्तु इस समय चार ही सूत्रोंके भाष्यकी टीका मिलती है, इसलिए अधिककी प्राप्तिका उपाय होना चाहिये, ऐसी कुछ विद्वानोंकी धारणा हो गई है। परन्तु मेरी धारणा इसके विपरीत है। जैसे 'भिषक द्रव्याणि संस्थाता रोगी च' चतुर वैद्य, शुद्ध ताजी औपधियाँ या उपयुक्त सामग्री, परिचारक एवम् रोगी-इन चार पादोंकी सम्पत्तिसे चिकित्साशासत्रकी उपयोगिता है, वैसे ही वेदान्तदर्शनशास्त्रकी उपयोगिता भी (१) अध्यास, (२) जिज्ञासा, (३) लक्षण, (४) प्रमाण और (५) समन्वय-इन पाँच पादोंकी सम्पत्तिपर ही निर्भर है। अर्थात् वेदान्तदर्शन भी पञ्चपादात्मक ही है। इसका प्रथम पाद अध्यासवाद है, जिसका पूर्ण विवरण अध्यासभाष्यमें किया गया है। उसमें दिखलाया गया है कि अनर्थ उपस्थित है और मिथ्या होनेसे उसका निवारण भी सम्भव है। दूसरा पाद न्रह्मजिज्ञासाधिकरण है, उसमें विस्तृतरुपसे दिखलाया गया है कि उपस्थित अनर्थकी निवृत्ति व्रह्मापरोक्षज्ञानके अतिरिक्त दूसरे किसी भी साधनसे नहीं हो सकती। तीसरा पाद जन्माद्यधिकरण है, उसमें स्वरूप तथा तटस्थ लक्षणोंके द्वारा ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन किया गया है। चौथा पाद शास्त्रयोनित्वाधिकरण है, जिसमें व्रह्मसद्भावमें प्रमाण दिया गया है। इन दोनों पादोंसे ब्रह्ममें लक्षण तथा प्रभाण न होनेकी आशङ्काका पूर्णतया खण्डन किया गया है। पांचवाँ पाद समन्वयाधिकरण है, उसमें स्पष्ट तथा विस्तृतरूपसे व्याख्यान किया गया है कि ब्रह्ममें प्रमाणरूपसे दिखलाई गई श्रुतियोंका प्रामाण्य न्रह्ममें तात्पर्य माननेसे ही उपपन्न हो सकता है, विधिमें तात्पर्य माननेसे कथमपि नहीं हो सकता। इस प्रकार (१) अध्यास, (२) ब्रह्मसाक्षात्कार- विचार, (३) ब्रह्मका लक्षण, (४) व्रह्ममें प्रमाण और (५)- ब्रह्ममें समन्वय-ये पाँच पाद ही वेदान्तशास्रकी उपादेयता सिद्ध करते हैं। उक्त पाँच पादोंका प्रतिपादन चतुःसूत्रीके भाप्यमें ही समाप्त हो जाता है। इन पाँच पादोंके व्याख्यानभूत भाष्यकी टीकाका नाम ही 'पञ्चपादिका' है। इस आशयकी पुष्टि शङ्र- द्विग्विजयकी "तत्राऽपि सूत्रयुगलद्यमेव भूझ्ा-अर्थात् इसमें (सम्पूर्ण भाष्यमें) भी प्रथम चतुःसूत्री ही प्रसिद्धिको अवश्य प्राप्त करे" इत्यादि पंक्तियाँ स्पष्ट रीतिसे व्यक्त कर रही हैं। अन्यथा यहांपर 'एव' शब्द देना व्यर्थ हो जाता है। मेरा ध्यान है, जैसा कि शङ्करदिग्विजयसे पता चलता है, भाष्यकार भगवत्पादको भी इंतने ही ग्रन्थकी टीकां करनेके लिए अत्यन्त विरक्त श्रीपद्म
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४) पादाचार्यको प्रेरित करनेकी आवश्यकता प्रतीत हुई, क्योंकि इतना ही ग्रन्थ उक्त रीतिसे अत्यन्त महत्त्वका है। यद्यपि प्रतिज्ञा कोकके 'भाप्यं प्रसन्नगम्भीरं तद््यास्यां श्रद्धयाऽडरमे' इस उत्तरारद्वसे सम्पूर्ण भाप्यकी टीका करना प्रतीत होता है, चतुःसूत्रीके भाप्यमात्रकी नहीं; तथापि चतुःसूत्रीके ही भाष्यको भी भाष्य कहनेमें कोई विरोध नहीं आ सकता। प्रतिज्ञामें पश्चपादिका नाम नहीं दिया गया है, सम्भव है चतुःसूत्रीके भाप्यकी टीका करके पूज्य गुरुपादोंकी सेवामें भेंट करनेके अनन्तर उक्त नामकी प्रसिद्धि पूज्य- पादोंके श्रीमुखसे ही हुई हो। 'पदादिवृन्तभारेण गरिमाणं विभत्तिं यत्' (पदादिरूप वृन्तोंके द्वारा जिस भाप्यको गुरुता प्राप्त है।) यह प्रतिज्ञा- श्रोकका पूर्वार्द्ध भी उक्त आशयको व्यक्त कर रहा है। यहांपर यदि 'पदादि' शब्दसे लक्षणा द्वारा पदच्छेद आदि लिए जायँ, तो इससे भाष्यमें कौन-सी असाधारण गुरुता आ सकती है, कारण कि पदच्छेदादिका रहना तो सभी निवन्धोंमें साधारण है। और यदि पादार्थक पदशब्द मानकर अध्यायोंके पाद लिये जायँ, तो भी उक्त विशेषण भाप्यकी गुरुतामें प्रयोजक नहीं हो सकता, क्योंकि अध्यायोंके पाद आदि वृन्त तो सूत्रोंमें हैं, इससे भाप्यमें गुरुता कैसे आा सकती है? इसलिए उक्त प्रतिज्ञाश्लोकका इस प्रकार अर्थ करना चाहिए-'उक्त अध्यासादि पांच पाद आदि वृन्तोंके द्वारा जिस (चतुःसूत्रीके) भाष्यको गुरुता प्राप्त हुई है, उस प्रसन्न-प्रसादप्राप्त-तथा गम्भीर-गूढार्थक (चतुःसूत्रीके) भाष्यकी टीकाको [ पूज्य गुरुवचनोंमें] श्रद्धाकी प्रेरणासे आरम्भ करता हूँ'। सम्भव है पदके स्थानमें पाद ही पाठ हो।
विवरणकारने इस श्लोकका कुछ भी व्याख्यान नहीं किया है। तत्त्रदीपनके व्याख्यानके अनुसार तो उक्त विशेषणके आधारपर भाष्यपदसे भगवान् शज्करा- चार्य द्वारा प्रणीत प्रकृत शारीरकमा्यका ही ग्रहण कैसे होगा ? क्योंकि पदच्छेद, पदार्थकथन तथा विग्रहवाक्य आदि किस भाष्यमें नहीं हैं, जिससे कि अन्य भाष्योंकी व्यावृत्ति हो सके। भाष्यपदसे तो 'सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र' इंत्यादि लक्षणसे लक्षित अन्य भी भाष्य लिए जा सकते हैं, अतः इतरव्यावृत्तिके लिए ही उक्त विशेषण दिया गया है। पदादिका पदच्छेदादिपरक माननेसे विशेषण व्यर्थ ही होगा, क्योंकि पदच्छेदादिका रहना तो भाष्यका स्वरूप ही है। यदि पदच्छेदादि न हों, तो भाष्य ही कैसे कहलाएगा?
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अथवा आदि पदके स्वारस्यसे 'पद' शब्दका तन्त्रके द्वारा निर्देश मानकर पद्शन्दकी आवृत्ति करके एक पद्शव्दको अध्यास आदि पादपरक और दूसरेको पदच्छेदादिपरक मानकर व्याख्यान करना चाहिए। इससे यही धारणा स्थिर होती है कि श्रीपद्मपादाचार्यकेा चार सूत्रोंके भाप्यकी ही टीका करना अभिप्रेत था। इतने ही अंशमें अवच्छेदवाद, प्रतिविम्बवाद, एकाविद्यावाद तथा नानाऽविद्यावाद इत्यादि विवादग्रस्त विषय प्रायः सभी आ जाते हैं। झेप अ्रन्थमें तो चतुःसूत्रीप्रतिपादित विपयका ही खण्डन, मण्डनादि नानाविध शेली द्वारा स्पष्टीकरणमात्र है। विवरणकारने प्रतिनिम्ब्वादका समर्थन किया है-उनका मत है कि जैसे जलमें एक तो व्यापकरूप आकाश स्वतः विद्यमान है और दूसरा महाकाशका प्रतिविम्वरूप आकाश भी है, घैसे ही देहधारी प्राणियोंमें भी जीव और अन्तर्यामी रूप द्विगुणित चैतन्यकी सदष्टान्त उपपत्ति हो सकती है; इस पक्षमें एक जीव- बादको लेकर प्रतिकर्मकी व्यवस्था जलसूर्यकादि द्ष्टान्त द्वारा की गई है। एवम् इस प्रस्थानके गतमें शब्द द्वारा भी अपरोक्ष ज्ञान होता है, परन्तु होता है अधिकारीको; अतमव 'दशमस्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंसे ही भ्रान्त दशमने अपना साक्षात्कार कर पाया। दुर्योघनने दौपदीके 'अन्धेका पुत्र अन्वा' इस वाक्यसे ही उसके या पाण्डवोंके अभिमानका तत्काल ही साक्षात्कार किया था। इस अ्रन्थमें प्रारम्भसे अन्ततक कुल नौ वर्णक हैं। प्रथम वर्णकमें "श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यः" की नियमविधिताका प्रतिपादन करते हुए जीव और ब्रह्मके ऐक्यरूप विषयादि अनुबन्धोंका दिग्ददन कराकर अध्यास तथा जीवन्रह्भेद, प्रमाण, प्रमेय, प्रमातृत्व आदिकी व्यवस्था अहंकार तथा अविद्याका परिचय इत्यादि मुख्य-मुख्य प्रारम्भिक विपयोंका विवेचन किया गया है। द्वितीय वर्णकमें वेदान्तशास्त्रकी सारथकता दिखलाते हुए पूर्वमीमांसासे गतार्थ न होना मुख्यतः प्रतिपादन किया गया है। तृतीय वर्णकमें वेदान्तशास्त्रके आरम्भकी उपयोगिताको पुष्ट करनेके लिए 'अथातो न्रहाजिज्ञासा' इस प्रथम सूत्रके पदोंकी विस्तृत व्याख्या करते हुग ज्ञान और कर्मके समुच्चयका निराकरण किया गया है। ग्रथम वर्णकमें संक्षेपनः सूचित अधिकारी, विपय, प्रयोजन, सम्बन्धरूप अनुवन्धचतुष्टयका चतुर्थ वर्णकमें विस्तृतरूपसे प्रदर्शन किया गया है। पांचवं वर्णकमें ब्रह्मके स्वरूप यथा तटस्थ लक्षण दिखलाये गये हैं। छठे वर्णकमें लक्षणोंका
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पृथक् प्रतिपादन करनेकी आवश्यकता दिखलाई गयी है। सातवें वणर्कमें 'शास्त्रयोनित्वात्' इस सूत्रका ब्रह्ममें प्रमाण दिखलानेके तात्पर्यसे व्याख्यान किया गया है। आठवें वर्णकमें सिद्धस्वरूप वस्तुका बोध करानेमें शब्दसामर्थ्य माननेपर भी सातवें वर्णकमें दिये गये प्रमाणोंका तात्पर्य ब्रह्ममें नहीं हो सकता, इस आशद्ाका उत्थानपूर्वक खण्डन किया गया है। और नवम वर्णकमें उन वादियोंके मतका खण्डन किया गया है जिनका यह आग्रह है कि शब्दमात्रका कार्यसे अन्वित ही अर्थ होता है, अतः ब्रह्म भी कर्मकाण्डका ही अज्ञ है। भगवान् भाष्यकारके अनन्तर वेदान्तशास्त्रमें दो प्रवल मत माने जाते हैं- एक विवरणकारका और दूसरा भामतीकारका। ये दोनों विवरणप्रस्थान और भामतीप्रस्थान स्वतन्त्र नामोंसे आधुनिक वेदान्तजगत्में प्रसिद्धिको प्राप्त हैं। इन दोनों प्रस्थानोंमें कुछ विषयोंकी व्याख्या करनेमें मतमेद हो गया है। जैसे- (१) भामतीप्रस्थान 'श्रोतव्यः' इसको विधि न मानकर अनुवादकमात्र मानता है और विवरणप्रस्थान विधि मानता है। इस प्रस्थानका अभिप्राय यह है कि यद्यपि "श्रोतव्यः" श्रवण (विचार ) का अपूर्व विधान नहीं करता, कारण कि न्रह्मज्ञानके निमित्त विधीयमान अध्ययनविधिसे ही अन्वय और व्यतिरेक द्वारा तात्पर्यावधारणा- त्मक विचार प्राप्त ही है, तथापि श्रवणको नियमविधि मानना आवश्यक है। आशय यह है कि जैसे सोमयागादि वैदिक कर्मोंके प्रति "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" इस अध्ययनविधिको, आचार्यकरणपूर्वक द्विजरूप अधिकारीके अध्ययनके ही पुण्यजनक होनेसे, नियमविधि मानते हैं, वैसे ही प्रकृतमें भी श्रवण-नियम- पूर्वक वेदान्तवाक्योंका ही विचार करने-से ब्रह्मज्ञानका उपयोगी अदृष्ट उत्पन्न हो सकता है, दूसरे वाक्योंके विचारसे या अनियमसे नहीं हो सकता, इस प्रकार नियमविधि मानना उचित है। भाष्यकार आचार्यपादने दर्शनको ही विधि माननेका निषेध किया है, श्रवणको नियमविधि माननेका निषेध नहीं किया है। यदि दर्शनको विधि मान लें, तो 'द्रष्टव्यः' इस पदमें विधिरूप प्रत्ययार्थमें दर्शन विशेषण और ब्रह्म दर्शनका विषय (कर्म) होनेसे अत्यन्त अप्रधान हो जायगा। इससे वेदान्तवाक्योंका प्रधान प्रतिपाद्य ब्र्म न होगा और दर्शन (ज्ञान) के पुरुषव्यापाराधीन न हो सकनेसे उसे विधि मानना संगत भी नहीं हो सकता। ज्ञान तो विषयादि सामग्रीके अधीन है, इससे उसमें पुरुषके कायिक या मानसिक किसी भी व्यापारकी अपेक्षा नहीं होती, इसलिए दर्शनको विधि मानना तो कथ-
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) मपि सम्भव नहीं हो संकता, अतः 'द्रष्टव्यः' पदमें "अर्हे कृत्यतृचश्र" सूत्रसे अर्ह (योग्य) अर्थमें तव्यप्रत्ययका विधान करना उचित है, विधिरूप अर्थमें नहीं। परन्तु 'श्रोतव्यः' पदमं तो "प्रैातिसर्ग०' इत्यादि पाणिनीय सूत्रसे विधिरूप अर्थमें तव्यप्रत्ययका विधान करनेमें दर्शनका अनुवाद करके विचारके विधानमें कोई दोप नहीं आता, बल्कि नियमविधि माननेसे ही ब्रह्मका वेदान्तैकगम्यत्व भी सिद्ध हो सकता है। यदि शङ्का हो कि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इस वाक्यमें सर्वत्र तव्यप्रत्यय अर्हार्थक ही है, अतः पूर्वोक्त वाक्यके साथ संगति हो सकती है। एवं दर्श-पूर्णमासप्रकरणमें रनस्वलाके लिए रात्रित्रतके विधानार्थ अगत्या वाक्यभेद माननेपर भी प्रकृतमें वाक्यभेदका मानना प्रभाकरानुयायियोंको सह्य नहीं है। यदि ऐसा कहा जाय, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि "तस्माद् ब्राह्मण: पाण्डित्यं निर्विद्य" इत्यादिके तात्पर्यवलसे श्रवणको विधि मान सकते हैं। भगवान् सूत्रकारने भी 'सहकार्यन्तरविधि०' सूत्रसे इसका स्पष्टीकरण किया है। एक वाक्यको विधायक और दूसरेको अनुवादक माननेसे पुनरुक दोप भी नहीं आता। देखिये ग्रन्थ पृ० १३-१४। (२) जीवन्रह्मभेदके विपयमें भामतीप्रस्थान "गन्धस्पर्शरसादीनां कीदृशी प्रतिविम्वता" के अनुसार नीरूप ब्रह्मका प्रतिविम्ब असम्भव कहकर घटा- काशादिद्टट्टन्तसे अवच्छेदवादकी सिद्धान्तरूपसे पुष्टि करता है। इसके विपरीत विचरणप्रस्थान जीवको ब्रह्मका प्रतिविम्ब मानता है। यद्यपि ग्रीवास्थ मुख और दपर्णगत मुखमें भेद दीख पड़ता है, यदि विम्वभूत मुख पूर्वाभिमुख हो तो दर्पणगत पश्चिमाभिमुख दीख पड़ता है, तथापि दर्पणगत मुखके लिए "यह मेरा ही मुख है" ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है, अतः उसमें भेदप्रत्यक्षको भ्रम मानना उचित है, कारण कि दर्पणमें विम्वसे अतिरिक्त मुखकी उत्पत्तिका कोई साघन नहीं है। दर्पणादि उपाधिके अवयवोंका ताहश परिणाम होना सम्भव नहीं है, प्रथम तो प्रतिविम्वमें दीखता हुआ निम्नोन्नतभाव दर्पणका स्पर्श करनेसे नहीं मालूम होता और विम्बकी अपेक्षा उपाधिके तारतम्यके अनुसार छोटे या बड़े प्रतिविम्ब दीख पढ़नेसे बिम्बकी मुहर भी प्रतिविम्बको नहीं कह सकते। मुहरकी छापमें न्यूनाधिक परिमाण नहीं आ सकता। और विम्बसे दर्पणादि उपाधिका मुहरकी तरह अत्यन्त व्यवधानशून्य संयोग न होनेपर भी प्रतिबिम्ब दीख
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(6) पड़ता है। मुहरकी छाप छिद्रशुन्य संयोगके बिना नहीं हो सकती। दूसरी बात यह भी है कि बिम्वसन्निधानके हटते ही प्रतिविम्ब भी नहीं रह जाता; -इसलिए प्रतिबिम्त बिम्बसे अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। परन्तु शुक्तिरजतके तुल्य मिथ्या भी नहीं है। कारण कि प्रतीयमान वस्तुका वाधके अनन्तर ही मिथ्यात्व सिद्ध होता है। शुक्तिरजतस्थलमें तो 'यह रजत नहीं है' ऐसा वाध होता है। प्रकृतमें 'यह मेरा मुख नहीं है' ऐसा बाध नहीं होता, किन्तु 'दर्पणमें मेरा सुख नहीं है' इस प्रकार देशविशेषके सम्बन्धका ही वाध होता है। अतएव जीव और ब्रह्मके वास्तविक ऐक्यका होना असङ्गत नहीं होता। अमूर्त आकाशका भी प्रतिबिम्ब दीखता है, इससे नीरूप होनेपर भी आत्माक्ा प्रतिविम्ब हो सकता है। श्रीवास्थ मुखका दर्पणमें दीख पड़ना स्वममें अपने शिरश्छेदके दीखनेके तुल्य मायामय होनेसे असम्भव नहीं है। जीव तथा ब्रह्मका ऐक्य होते हुए भी जैसे देवदत्त आदि द्रष्टा प्रतिविम्बगत मलिनतादि दोपोंके सन्भावका अपने बिम्बभूत मुखमें अनुभव नहीं करता वैसे ही जीवगत भ्रम आदि दोपोंका अनुभव या संसर्ग ब्रह्ममें नहीं हो सकता। उपाधिका स्वभाव प्रतिविम्बमें ही दोपोंक्ता संसर्ग कर सकता है, विम्वमें नहीं। इस उपाधिके विनाशसे शुद्ध (विम्ब- प्रतिविम्बभावरहित) ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है। इस प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि श्रुतिवाक्यसे सिद्ध जीव और ब्रह्मके ऐक्यकी सिद्धि होती है। प्रतिबिम्बवादका समर्थन 'रूपं रूपं प्रतिरूपो वभूव' इत्यादि श्रुति तथा 'एकधा बहुधा चव दृश्यते जलचन्द्रवत्' इत्यादि स्मृति एवम् 'अतएव चोपमा सूर्यका- दिवत्' इत्यादि सूत्ररूप प्रमाणोंसे होता है, प्रतिविम्ब्नवादके आगमप्रमाण द्वारा सिद्ध होनेसे. 'नीरूपका प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता' इत्यादि प्रत्यक्षादि विरोध वाधित हो जाते हैं, कारण कि श्रुत्यादिरूप आगमप्रमाण सबसे प्रवल माना जाता है, आकाशादिद्ष्टान्तका तात्पर्य तो केवल ब्रह्मकी असंगतामात्रके वोधनमें है, प्रतिबिम्बवादका खण्डन करके अवच्छेदवादका समर्थन करनेमें नहीं है। यद्यपि सोपाधिक अ्रमस्थलमें उपाधिरूप दोपकी निवृत्तिसे ही भ्रमकी निवृत्ति देखी गयी है, अधिष्ठानके ज्ञान द्वारा नहीं, अतः जीव और ब्रह्मके भेदकी निवृत्ति भी अधिष्ठानभूत ब्रह्मसाक्षात्कारसे मानना सङ्गत न होनेकी आशक्का करना उचित नहीं है; कारण कि प्रकृतमें अहक्काररूप उपाधि, जिसके कारण कर्तृत्व आादि घर्मविशिष्ट जीवकी कल्पना होती है, अधिष्ठानतत्त्वसाक्षात्कारसे ही निवृत्त होने योग्य है, क्योंकि अहद्कार मूल अविद्याका कार्य होनेसे निरुपाधिक ही
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( ९ ) भ्रम है। इसलिए अहक्कारोपाधिक कर्तृत्व आदि सोपाधिक अ्रमकी निवृत्ति अधि- ष्ानतत्त्वस्वरूप त्रह्मके साक्षात्कारसे अवश्य हो सकती है। इस प्रकार विवरणप्रस्थानके अनुसार प्रतिविम्बवादका संक्षेपमें परिचय कराया गया है। वस्तुतः प्रतिविम्बवाद और अवच्छेदवाद दोनों कल्पनामात्र ही हैं। आत्माकी वास्तविक असङ्गता घटाकाशादिद्श्टन्तसे अधिक स्पष्ट हो सकती है, इसलिए अवच्छेदवादकी कल्पना की गई और अल्पज्ञत्व, सर्वज्ञत्व, संसारित्व और मुक्तत्व आदि व्यवस्था प्रतिविम्ब्पक्षमें सुगम होती है, इसलिए प्रतिविम्बवादकी कल्पना की गई है। मुख्य अजाति पक्षमें घटाकाशादि दष्टान्त समझना चाहिए। संसारको आविधिक अनिर्वचनीय कार्य माननेवाले अनिर्वचनीयवादियोंको जीव और न्म्मके भेदको भी, जो कि अविद्याकार्य अहक्कारोपाधिक विम्बप्रतिविम्ब- रूप ही है, अनिर्वचनीय ही मानना पड़ेगा; इतना ही दोनों मतोंमें भेद है। वस्तुतः जीव तो ब्रहारूप ही है। (३) भामतीप्रस्थानमें शव्दप्रमाणसे परोक्ष ही ज्ञान माना गया है, प्रत्यक्ष नहीं। उक्त प्रस्थानके अनुसार त्रह्मसाक्षात्कार श्रवणानन्तर मनन और निदिध्यासन करनेसे शुद्ध हुए अन्तःकरण द्वारा ही होता है। विवरणप्रस्थानमें, सन्निकृष्टविपयस्थलमें शव्दसे भी प्रत्यक्ष माना जाता है। अतएव श्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति प्रधानकारणता वनती है। मनन और निदि- ध्यासन तो श्रुत अर्थको ही पुष्ट करते हैं, अतः वे स्वतन्त्र प्रमाण नहीं माने जा सकते, उनका उपयोग केवल प्राक्तन पाप कर्मोंके फलस्वरूप असम्भावना, विपरीत भावना तथा चित्तकी अस्थिरता आदि प्रतिबन्धकके निवारणमें ही होता है। अर्थात् शव्दश्रवणसे उत्पन्न हुआ भी साक्षात्कार संशयादिके रहते चित्तकी एकाग्रताके विना स्थिर नहीं रह सकता, मनन निदिध्यासन द्वारा असंभावना आदिकी निवृत्तिपूर्वक चित्तके एकाग्र होनेपर ही स्थिर होता है। इस विषयमें पञ्चदशीकार भी कहते हैं- "वाक्यमप्रतिबद्धं सत् आ्क् परोक्षावभासिते। करामलकवद् वोधमपरोक्ष प्रसूयते॥।" (तत्त्वदीप० ६२ इलोक) श्रव्ञणात्मक विचारके पहले 'तत्त्वमंसि' वाक्य आपाततः परोक्षरूपसे ब्रह्मका
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(90) ज्ञान कराकर उक्त प्रतिबन्धोंके न रहनेसे करामलकके तुल्य ब्रह्मका अपरोक्ष (साक्षात्कार) करा देता है। 'शब्द द्वारा ही ब्रह्मका अपरोक्ष (साक्षात्कार) होता है' इसमें "आचार्य- वान् पुरुषो वेद", "तं त्वौपनिषदं पुरुषम्", "वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः" इत्यादि श्रुतियाँ और स्मृतियाँ भी प्रमाण हैं। "यतो वाचो निवर्तन्ते" इत्यादि वाक्य तो ब्रह्मके साक्षात्कारमें शब्दगत शक्तिरूप व्यापारका ही निपेध करते हैं, लक्षणारूप व्यापारका निषेध नहीं करते। इस विपयमें अधिक विस्तार प्रकृतानुपयोगी होनेसे नहीं किया गया। विद्वान् इस विषयमें अधिक ऊहापोह तत्-तत् अन्थोंसे स्वयं ही कर सकते हैं। काशीसे बाहर रहनेके कारण इस अ्रन्थका अनुवाद करनेमें विशेप असुविधा रही। इसकी प्रथम सुद्रित मूल पुस्तक जो मेरे पास थी, उसके यत्र तन्र अशुद्ध होने तथा विषयके दुर्जेय होनेके कारण कभी-कभी अर्थनिर्णय करना कठिन हो जाता रहा। यों तो प्रगाढ़ विद्वानोंको भी सन्देह होता ही है-"ज्ञातसारोऽपि खल्चेकः सन्दिग्धे कार्यवस्तुनि", फिर मेरे जैसे व्यक्तिके लिए तो पद-पदपर सन्देह होना अनिवार्य है। तथापि जो कुछ दुःसाहस किया, उसका एकमात्र कारण विश्व- तारक पतितपावन भगदान् श्रीकाशीपुरोके अधीश्वर परम दयाल भगवान्का तथा विद्वानोंकी गुणग्राहिताका ही अवलम्बन था। अन्तमें इस पुस्तकके सुसम्पादनके लिए श्रीयुत माननीय पं० चण्डीप्रसादजी शुझ, श्री पं० श्रीकृष्ण पन्त शास्त्री तथा पं० मूलशङ्कर शास्त्री व्यासको अनेकानेक धन्यवाद देता हुआ विद्वानोंसे प्रार्थना करता हूँ कि यदि अनुादमें कहीं दोष प्रतीत हो, तो क्षमा करनेकी कृपा करें।
विदुपामनुकम्पाप्रार्थी- ललिताप्रसाद डवरांल:
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विवरणपमेयसङ्ग्रहकी विषयसूची
विषय
श्रवणविधिविचार पृष्ठ पछ्क्त
नहाविचारकी कर्तव्यता ... २-३
मपच्की अविद्यात्मकताका सूत्र द्वारा सूचन ... ... १५-४
आत्मा और अनात्माके तादात्म्याच्यासका विचार २० -१०
... तमकी भावरूपताका विचार २६ -२ ... ... अध्यासका विचार २१ -८ ... अध्यासके अपलापकी आशक्का २६ -१ ... ४०-७ ... कार्याप्यासके अनादित्वका विचार ४३ -३ अध्यासके प्रति भावरूप अज्ञानकी उपादानता ४८ -१ ... अज्ञानकी विद्विमें अनुमान प्रमाण ५८-४ ... अज्ञानावरणका विचार ६० - १० ... आवरणशब्दका निर्वचन ... ६६-५ अज्ञानशब्दमें प्रविष्ट नजशव्दका अर्थ ७१- ६ अज्ञानके स्थानमें तमोगुणको आवारक नहीं मान सकते ७४ - ६ अज्ञानका सम्बन्ध दोनेपर भी आत्माकी असद्गता ... अध्यासकी उपपत्ति ... ६१-४ धर्माध्यासका उपपादन ८६-१ दो प्रकारके अध्यासोंका कथन ... ६१-२ अख्यातिवादका आशकापूर्वक खण्डन ες -4 उत्त विपयमें बौद्धकी आशक्का और उसका परिहार १११-१ ... रजतादि्रमोंकी स्मृतिरूपताका खण्डन ... ११७ - ६ अन्यथाख्या तिवादियों को आयक्ष और उसका परिहार ११६-७ आत्मरूयातिवादकी आशक्क और उसका निरास १२३-१ भ्रमज्ञानकी अनेकविघताका खण्डन १२६-४ रजतकी मायामयताका उपवादन ... १२३ -१ वाधका निरूपण १३६-३ .. स्वाम पदार्थमें भ्रमत्वका उपपादन १४१ - ८, नाम आदिमें व्रहाहष्टिरूप अध्यासका कथन १४६ - ६ अधिष्ठानके विषयमें शून्यवादियों के मतका निरा करण १४८-४ आत्मामें अदकारादिभ्रमका उपपादन ... १५५ - १ आश्रय और विषय भेदकी अज्ञानमें अनेपक्षा १६५ -. १
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२ )
पृष्ठ पड्क विपय जीव और ब्रह्मके भेदका खण्डन १६७ - ५ ... अन्त:करणमें अज्ञानाश्रयत्व माननेवाले भास्करके मतका खण्डन १७१-७ 'घटमहं जानामि' इस प्रतीतिमें प्रमाकरका मत १८५ - ६ आत्मा में ज्ञानकमत्वका भाट्टमतके अनुसार उपपादन १८७ -१ सौगतामिमत संवेदनमें प्रामाण्य तथा फळत्वका खण्डन १६३-८
अहद्कारमें अनात्मत्वका प्रतिपादन १६४-८ ... ज्ञानमें सुगताभिमत भेदका खएडन २०१-५ ... सुषुसिमें अदङ्कारके अस्मरणमें हेतु २०४~४
अहङ्गारके उपादान आदिका कथन २१२ -६- अहङ्कारके अध्यस्त होनेपर भी उसकी प्रतीतिका उपपादन २१८-६ जीवके प्रतिबिम्बित होनेपर भी बिम्ब-प्रतिबिम्बभावसे भेदका खण्डन २२० -८ जलमध्यमें वृक्षाध्यासकी उपपत्ति २२७ - ५ अमूर्त पदार्थ होनेपर भी ब्रह्मके प्रतिविम्बकी उपपत्ति २३१-६ जीवावच्छेदकी उपपत्ति २३४-२ ज्ञानाश्य आत्माके साथ मनके संसर्गका खण्डन २४२- १ चैतन्यके व्यापक होनेपर मी प्रतिकर्मव्यवस्थाका उपपादन २४६- २ अन्तःकरणके साथ जीवचैतन्यके स्वाभाविक सम्बन्धका उपपादन २५१-३ विज्ञानवादियों के मतका प्रदर्शनपूर्वक खण्डन २५६- ८ ज्ञानमें क्षणिकत्वका खण्डन २५६-६ प्रत्यमिश्ञाका निर्वचन २६१- १० प्राभाकरमतसे त्यमिन्ाश्रयत्वरूपसे आत्माक्री सिद्धिका खण्डन २६५ - ३ स्पायी पदार्थोंमें क्रमिक कार्योत्पादकत्वका विचार कूटस्थ चैतन्य में सम्पूर्ण पदार्थोंके अध्यस्त होनेमें पूर्वपक्षीका आक्षेप २७७-३ २६३-७ उक्त आक्षेपका प्रमाणपूर्वक परिहार निर्विकल्पक चैतन्यमें सविकल्पक अध्यास्का उपपादन २८४-३
आत्माकी अनुमेयताका खण्डन २८६ -६
आत्माके स्वप्रकाशत्वका साघन २६१-१ ...
आत्मा में अनात्माध्यास्षका निरूपण ... RER - ₹
अध्यासजनित ब्रह्मज्ञानमें स्वरूपमिध्यात्वका प्रतिपादन प्रमातृत्वादि व्यवहारके प्रति अध्यासकी उपादानताका समर्थन २०४ - ५ शात्तीय व्यवहारमें आध्यासिकत्वका कथन ३०६ - ६ आतमा और अनात्माके अध्यासकर विशेषरूपसे निरूपण २१४-८ अन्तःकरणमें अक्षिषेद्यत्वका उपपादन ... २१५- ६ अम्तःकरणमें अनुमानवेद्यत्वकी आगङ्का और उसका परिहार ३२३-१ भातमा और अनात्मा दोनोंके अध्याससे मातमामें मिथ्यातवशङ्ाका परिहार ३२३-७ २२६ - ६
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३ )
विषय पृष्ठ पब्क
जीवमें ब्रह्मस्वरूपत्वकी उपपत्ति ३३७ - ६ .. ... प्रत्यक्षरूपवाघकस्थलमें भी अध्यास-निवृत्तिकी नान्तरीयकता ३४२ -३ ... 'विद्यापाप्ति' शब्दका निर्वचन ३४५ - १ ... .. प्रमाणमें तर्ककी उपयोगिता ... ३४६ -४ प्रामाण्यवादमें बौद्धमतका खण्डन ... ३४८-५ अप्रामाण्यका परतस्त्व और उसका उपपादन マ ミ ー タ ... अग्रामाण्यके स्वतरूवमें अनुपपत्ति ... ३५४ -३ ... निदिध्यासनमें अङ्गित्वका खण्डन ... ३५६ - ११ जीवन्मुक्ति अवस्थामें देहादिकी उपपत्ति ... २६२ - ४ सूत् द्वारा विषय और प्रयोजनका प्रतिपादन ३६५ -१ लिङादिप्रत्ययके इष्टसाधनत्वार्थकत्वकी उपपत्ति ३६६-२ धात्वर्थ और स्वर्गादिके परस्र साध्यमाघनसम्बन्के परिज्ञान में विरोघीके मतका परिहार ३७३-२
द्वितीय वणकका आरम्भ ... ३७७ - १ ..
पूर्वमीमांसासे उत्तरमीमांसाके गतार्थत्वकी शक्का ३७७- १० ... संक्षेपसे पूर्वमीमांसाके पदार्थोंका संग्रह ... ३७६ - १ ... शास्त्रके आरम्भमें किसी एक देशी का मत ३८५- १ ...
एकदेशीके मतानुसार व्रह्माजिज्ञासासूत्रका अवतरण ३८६-४ अन्य एकदेशी द्वारा शास्त्रारम्मका समर्थन ३६५ -१ ... पूर्वपक्षी द्वारा शास्त्रारम्भमें प्रकारका खण्डन २६६- 1
विधिवाद ४०३- १ ... ... पूर्वमीरमांसाके अनारम्भकत्वका शक्कापूर्वक खण्डन ४१७ -१ पूर्वमीमांसाके प्रथम सूत्रका धर्मविचारपरत्वकथन ४३०-८ पूर्वमीमांसाके द्वितीय त्रका वेदैकभागार्थविचारपरत्वकथन ४३२ -३
भावना और उसके भेद ४३४ -३
चोदना-पदार्थका निरूपण ४३६-७
वेदान्तोंका ब्रह्मपरत्वकथन ४३६-३ ... प्रभाकरकी रीतिसे श्ास्त्रारम्भका उपपादन ४४१ - ४ ...
पभाकरके मतका खण्डन ४४६ - १ ... पूर्वमीमांसा द्वारा उत्तरमीमांसाकी अगतार्थता ४५३- ५
तृतीय वणकका आरम्भ ४५६- १ ... ...
जिज्ञासाशब्द्के अर्थका निर्वचन ४५६-८ ... अथशब्दार्थका नि्चेचन ४६१- १
अध्ययनविधि में अधिकारीका कथन ४७३- १ ...
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विपय पृष्ट पडिकि
अध्ययनविधिमें अध्यापनविधिपयुक्त्वका कथन ४७६ १ अध्ययनमें स्वविधिप्रयुक्तत्व ४८६-३ ... अध्यापनकी अनित्यता ४६१-२ ... उपनयनसंस्कारकी नित्यता ४६४ -४ ... अध्ययनमें नित्यत्व-कल्पना ४६४- ११ अध्यापनमें नित्यत्वशङ्का ... YEE-१० 'तमध्यापयीत' इस विधिमें व्यर्थत्वशङ्का और उसका परिहार ५०६- २ अध्ययनविधिका दढीकरण ५१३ -१ ... अध्ययनविधिकी अक्षरग्रहण-पर्यन्तता ... ५१६-३ शावरमाष्यमें उक्त अध्ययनविधिका विचारहेतुतामें तात्पर्यं ५२० - ४ ... धर्मविचारमें कतुविधिमयुक्तत्व ५२२-८ ... अथशब्दकी आनन्तर्यार्थकता ... ५२४ - ५ ... ब्रह्मविचारमें पूर्वमीमांसाकी अनपेक्षा ... ५२६-२ ब्रह्मज्ञानमें कर्मोपयोगिताका विचार ... ... ५३५ -५ संन्यासाधिकारका विचार ... ५४८'- ८ ज्ञानकमके समुचयका निराकरण ..* ५५३ -१ ... अथशब्दकी क्रमार्थकताका निरास ... ५५६ - ६ अथशब्दकी अधिकारिविशेषणार्थकता ... ५६३-४ ... अतःशब्दकी हेत्वर्थता ... ... ५७१-७ नित्यानित्य वस्तुके विवेकका फल ... ... ५७३-१ ब्रह्मज्ञानकी पुरुषार्थता ... ब्ह्म जिज्ञाणमें घड्ठीसमास ५s५ - ६ .... ... ज्ञानकी अन्त:करणपरिणामरूपता ५७६-७
सम्बन्धादिका प्रदर्शन ५८० -८ ... पदर-७ चतुर्थ वगाकका आरम्भ 424-3 ब्रह्ममें औपचारिक विचारविषयत्वका कथन ... ब्रह्मकी आत्मरूपसे प्रसिद्धि ५८६-४- ... देहाद्यात्मवादियों के मतका निरूपण 4.0 ५६७-१ देहात्मवाियोंके मतका निराकरणं ... ५६६ - ११ इन्द्रियोंकी गोलकरूपताका खण्डन ... ... ६०७-७ . इन्द्रियोंके भौतिकत्वका खण्डन ६११-३ इन्द्रियोंमें प्राप्यकारित्व और परिच्छिन्नत्व ... ६१७- २ मनकी सावयवता ... ६२१-८ आत्मामें स्वयंप्रकाशता ६२१-३ ... ६२७ -४.
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विपय पृष्ठ पडिक्त आत्माके विषय में विभ्रतिपत्तियाँ ... मत-मतान्तरोंका निरास ६२६-६ ... ... ६३६-७ द्वितीय सृतका आरम्भ .. . ६४५ -१ द्वितीय सूचके साथ प्रथम सृतकी सङ्कति ... व्रह्मके स्वरूप और तटस्थ लक्षण ६४५ -२ ... सूत्रस्थ 'अस्य' और 'यतः' पदोका अर्थ ६४७ -२
परिणामवादका खण्डन ६४६ - १
... ६५१ -६ वादियों के मतसे प्रपश् की भिन्नता ... ... वरदाके दो लक्षणों की उपपत्ति ६६३-२
... ... ६६७ - ८ जन्मादिमें वृद्धमादि विकारोंका अन्तर्भाव ६७१ -६ व्रद्मापरिणामवादका निरास ६६३-१० ... मायाका निर्वचन ६८१-७ मतमेदसे जगदुपादानका निरूपण ... ६८५ - ६ स्त्रभावादिवादियोंके मतोका निराकरण ... ६८-४ बढ़ामें युक्ति और अनुभवकी अपेक्षा ... ६६६-३ -'सत्यं श्ञानमनन्तं ब्रद' आदि वाक्योंमें व्रहास्वरूपयोधकत्व ७०५-६ ... बहके आनन्दादि-स्वरूपका कथन ७०६-४
तृतीय सूत्र का आरम्भ ७१५-१ ... वेदमें पौरूपेयत्वकी आयक्षा और उसका परिहार ७१५ -२ वेदोपादानत्वसे ब्रहा के सर्वज्ञत्वका साधन ७२६ - ८
तृतीय सूत्रके द्वितीय वणकका आरम्भ ७३४-१ ...
सर्वज्ञ वहमें शास्त्रेकगम्यत्व ७३४ - २
चतुर्थ सूत्रका आरम्भ ७३८-१ .. ...
ब्रह्मामें वेदान्त प्रमाण नहीं हो सकते [ पूर्वपक्ष ] ७३८ -२ वेदान्तोंका अदवितीय व्रहामें तात्पर्य [उत्तरपक्ष ] ७४४ -७ ... 'तत्वमसि' आदि वाक्योंकी अखण्डार्थकता ७५१ -३ ... वेदान्तमें निरपेक्षमामाण्यका उपपादन ... ७५७ -४ चित्रगत निम्नोव्तादिद्ट्टान्तसे वेदान्तोंमें अग्रामाण्य शङ्का और परिहार ७६७ -३
चतुर्थ सूत्रके द्वितीय वर्णकका आरम्भ ७७० -१ ...
कार्याङ्गरूपसे वेदान्तमें व्रह्मप्रतिपादकत्व शङ्का ७७०-२
उक्त शक्काके परिहार द्वारा अद्वितीय वस्तुमें वेदान्तपामाण्यका उपपादन ७७३-१
नियोगकी अनिरप्यता ७७७ - ५ ... जीव और बहमके भेदकी शक्काका परिदार
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विपय पृष्ठ पड्क
कमोंसे मिध्याज्ञानकी निवृत्तिका अभाव ७८३-१. ... जीव और ब्रह्मके ऐक्यबोधक शास्त्रका कथन ७६० -१ मेदाभेदवादका निरूपणपूर्वक खण्डन ७६०-११ ... स्वरूपाभिव्यक्तिरूप ब्रह्मप्राप्तिका निरूपण ८०५-३ क्रियापूर्वक ब्रह्मप्राप्तिका खण्डन ८०६-४, क्रिया में संयोग-विभागातिरिक्तत्व ८१४-५ क्रिया में प्रभाकरका मत ८१५ - ५ F00 ज्ञानमें क्रियासे वैलक्षण्य ८१७-८ 0 .. ध्यान और स्मरणमें वैलक्षण्य ८२२-७ ध्यानमें वस्तुविषयत्वका खण्डन ८२६ - ८ ... ध्यानमें पुरुषप्रयत्नकी अपेक्षा ... ८३२-६ 2 .. ज्ञान और ध्यानके वैषम्यका उपसंहार ... ८२६-६ ... अमिहितान्वयवादमें भी वेदान्तोंकी उपपत्ति ८६ -३ अन्विताभिधानवादमें शततग्रहका विचार ८४५ - १ ... शक्तिगह्दमें प्रभाकरके मतका खण्डन ... ८५७-३ ... अविद्याप्रयुक्त शरीर आदिका सम्बन्ध ८६४-७ ... तत्वज्ञानसे संसारकी निवृत्तिका कथन जीव और ब्रह्मके भेदाभेदका खण्डन ८६६-२ ...
... जीव और ब्रह्मका अमेद ५७१-२
... वेदान्तोंका ब्रह्ममें ही पर्यवसान ८७४-३ .. अन्थका उपसंहार ८७७-५
... द७६-१
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ॐ नमः परमात्मने श्रीविद्यारण्यमुनिप्रणीत
विवरणप्रमेयसंग्रह:
[भाषानुवाद सहित ]
स्वमात्रयाऽSनन्दयदत्र जन्तून् सर्वात्मभावेन तथा परत्र। यच्छङ्करानन्दपद हृदव्जे विभ्राजते तद्यतयो विशन्ति ॥१॥ भाष्यटीकाविवरणं तन्निवन्धनसंग्रहः। व्याख्यानव्याख्येयभावक्केशहानाय रच्यते ॥२ ॥
सरसिजमनोज़नयनां बालां वन्दे सतीमम्बाम् ।। १ ॥ भाष्यस्य टीकाविवृतेः पमेयसङ्कस्य श्रीमाधवगुम्फितस्य। गुरुन् प्रणम्याडर्थप्रकाशनाय भापां विधत्ते ललिताप्रसादः ॥२॥ इस लोकमें अपनी मात्रा द्वारा और परलोकमें सर्वात्मता द्वारा सव प्राणियों- को आनन्द दे रहा जो शक्करानन्दपद हृदयकमलमं प्रकाशमान है वही सब योगियोंका गम्य स्थान है, अर्थात् उसे मैं प्रणाम करता हूं * ॥ १ ॥ भगवत्पाद श्रीशक्कराचार्य द्वारा निर्मित ब्रह्मसूत्रभाप्यके ऊपर जो पञ्च- पादिका-टीकाका व्याख्यान विवरण है, उसमें ग्रथित विपयोंका संग्रहात्मक यह विवरणप्रमेयसंग्रहनामक ग्रन्थ व्याख्यानव्यार्येयरूप केशकी निवृत्तिके लिए बनाया जाता है ॥ २ ॥। * यह प्रसिद्ध है कि विद्यारण्यमुनि या माधवाचार्यके गुरु श्रीदाङ्करानन्द थे, अतः 'गुरु- रेव परं साक्षात् नास्ति तत्त्वं गुरो: परम् अर्थात गुरु ही साक्षात परंन्रह्म है, गुरुसे पृथक् तत्त्व नहीं है, इस ग्रामाणिक स्मृतिके आधारपर ग्रन्थके आरम्भमें सर्वमय मूलतत्त्वस्वरूप अपने.
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विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
नित्यस्वाध्यायविधितोऽधीत्य वेदान्तमस्य ये। संशेरतेजर्थे ते सूत्रभाष्यादिष्वधिकारिणः ॥।३।। नित्यो हि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इत्यध्ययनविधिः 'त्राह्मणेन निष्कारणो धर्म: पडङ्गे वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च' इति वचनात्। काम्यत्वे हि वेदाध्ययनस्याऽ- न्योन्याश्रयता-अर्थाववोधे सति कामना, कामनायां सत्यां पडङ्गो- पेतवेदाध्यनप्रवृत्तस्याऽर्थाववोध इति। अतः सर्वोपि नित्यविधिवलादेव पडङ्गसहितं वेदमधीत्याऽर्थ जानाति । कश्चित् पुण्यपुञ्जपरिपाकवशानिरतिशयपुरुपार्थश्रेप्सायां तद्ुपायं वेदेड- न्विष्येदमवगच्छति-'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' इत्या- नित्य स्वाध्यायविघिसे वेदान्तोंका अध्ययन करके जिन लोगोंको वेदान्तके अर्थावधारणमें-तात्पर्यज्ञानमें-सन्देह होता है, वे ही ब्रह्मसूत्रभाप्य आदि निबन्धोंके अधिकारी हैं ॥ २ ॥। 'स्वाध्यायो ऽध्येतव्यः' (वेदाध्ययन करना चाहिए) इस प्रकारकी अध्ययन -- विधि नित्यविधि है, क्योंकि 'ब्राह्मणेन०' (ब्राह्मणको किसी कारणकी अर्थात् फलकी इच्छाके बिना केवल अपना कर्तव्य समझकर वेदाध्ययन करना चाहिए, उसके अर्थोंको जानना चाहिए और अनन्तर उसमें प्रतिपादित कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिए) इस प्रकार स्वाध्यायाध्ययनमें नित्यविधिका ही प्रतिपादक वचन मिलता है। इसपर भी यदि कोई हठात् उसे नित्यविधि न मानकर काम्य- विधि माने, तो अन्योऽन्याश्रय दोप आवेगा-क्योंकि तभी वेदग्रतिपादित फलकी कामना होगी जब वेदार्थका परिज्ञान होगा, और वेदार्थका परिज्ञान तभी होगा जब कामना होनेके वाद छः अङ्गोंसे युक्त वेदके अध्ययनमें पुरुष प्रवृत्त होगा। अतः नित्यविधिके बलसे पहले षडङ्गसहित वेदाध्ययन करके ही सभी अधिकारी वेदार्थको जानते हैं, यह निर्विवाद है। उन वेदार्थाभिज्ञोंमें से कोई पुण्यपुञ्जके परिपाकसे (प्रभावसे) निरतिशय पुरुषार्थकी अभिलाषा होनेपर उसके सम्पादनके लिए वेदमें पुरुषार्थके हेतुकी अन्वेषणा कर यह जानता है-'आत्मनस्तु०' (आत्माके लिए ही सभी वस्तुएँ प्रिय गुरुका स्मरण कर अ्न्थकार नमस्कार करते हैं, जिससे आरब्ध ग्रन्थकी निर्विन्न समाप्ति हो। और इसीसे अनुवन्धचतुष्टय भी वतलाया गया है-ब्रह्मात्मैक्य विषय है, दुःखनिव्ृत्ति प्रयोजन है, वक्ष्यमाण विशेषणसे युक्त तत्वजिज्ञास अधिकारी है और प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्वन्ध है।
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अ्रंवणावेधिका विचार ] भापानुवादसहित MnY
त्मशेपतयैवाऽन्यस्य. सर्वस्य प्रियत्वोक्तेरात्मव्यतिरिक्तात् सर्वस्माद् विर- क्तोऽविकारी, 'आत्मनि खल्वरे दष्टे श्रुते मते विज्ञाते इद सर्वं विज्ञा- तम्' इत्युपक्रम्य 'एतावदरे खल्वमृतत्वम्' इत्युपसंहारात् परमपुरुपार्थ- भूतस्याऽमृतत्वस्याऽऽत्मदर्शनोपायत्वं अ्रतिपाद्य, दर्शनस्य चाडपुरुपतन्त्र- स्याऽविधेयत्वात् 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यात्मदर्शनमनूद्य तदुपायत्वेन 'श्रोतच्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इति मनननिदिध्यासनाभ्यां फलो- पकार्यङ्गाभ्यां सह श्रवणं नामाडङ्गि विधीयत इति। ननु पडङ्गोपेतवेदाध्यायिनः सत्यपि वेदार्थावगमे विचारमन्तरेण होती हैं) इस श्रुतिसे आत्माके अङ्गरूपसे ही अन्य सभी वस्तुएँ प्रिय कही गई हैं, अतः आत्मभिन्न सब वस्तुओंसे विरक्त पुरुष ही वेदान्तप्रतिपाद्य विषयका अधिकारी है, और 'आत्मनि खल्वरे०' (हे मैत्रेयि ! श्रवण, मनन और निदि- ध्यासन द्वारा आत्माका साक्षात्कार होनेपर ही यह सब ज्ञात हो जाता है) इस प्रकार उपक्रम करके 'एतावदेव अरे खल्यमृतत्वम्' (हे मैत्रेयि ! यही अमृतत्व है) इस प्रकार उपसंहार होनेसे पुरुपका परम अमीष्ट अमृतत्व ही है और उसका उपाय केवल आत्मदर्शन है, ऐसा प्रतिपादन कर अपुरुपतन्त्र*दर्शनके विधेय न होनेके कारण 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (अरे मैत्रेयि ! आत्माका दर्शन करना चाहिए) इस श्रुतिसे दर्शनका अनुवाद करके 'श्रोतव्य:०' (उसके उपाय- रूपसे श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना चाहिए) इस वाक्यसे आत्म- साक्षात्काररूप फलके प्रति उपकारक t मनन और निदिध्यासनरूप अङ्गोंके साथ श्रवण नामवाले अङ्गीका विधान किया जाता है। यदि शक्का हो कि जिसने छः अङ्गोंके साथ वेदोंका अध्ययन किया है,
*दर्शनशब्दका ज्ञान अर्थ होता है। ज्ञान नित्य है, वह पुरुप द्वारा विधेय नहीं हो सकता। यदि कथश्चित वृत्यात्मक ज्ञान लिया जाय, तो भी वह विपयादि कारणकलापके अधीन होनेसे पुरुष द्वारा विधेय नहीं हो सकता है, इसलिए 'आत्मा द्रष्व्यः' इसको दर्शनविधि नहीं मान सकते हैं, किन्तु यह दर्शनानुवादमात्र है, यह भाव है। + अर्थात श्रवण आत्मसाक्षात्कारके प्रति स्वतन्त्र कारण नहीं है, किन्तु मनन और निदि- ध्यासनके साथ कारण है, अतः ब्रह्मज्ानरूप फलमें सहकारीरूपसे उपकारक मनन और निदि- ध्यासनरूप सहकारियोंके साथ श्रवणरूप अज्वीका (मुख्य साधनका) 'श्रोतव्यः' इतादिके साथ विधानकिया जाता है।
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णीक
तात्पर्यानवगमान्न तेनाऽवगतोऽर्यः श्ुत्यभिप्रेतो भवितुमर्हतीति चेद्, मैवम्; एतच्छ्ुतितात्पर्यस्यैव पुराणेषु प्रतिपादितत्वाद। तथा हि- "श्रोतव्यः श्ुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः । ज्ञात्वा च सततं ध्येय एते दर्शनहेतवः ॥ १ ॥ तत्र तावन्मुनिश्रेष्ठाः! श्रवणं नाम केवलम्। उपक्रमादिभिलिङ्गै: शक्तितात्पर्यनिर्णयः ॥२॥ सर्ववेदान्तवाक्यानामाचार्यमुखतः प्रियात्. । वाक्यानुग्राहकन्यायशीलनं मननं भवेत्॥ ३ ॥
उसको वेदार्थका परिज्ञान होनेपर भी विचारके विना उनके तात्पर्यका ज्ञान न होनेसे उस पुरुषके द्वारा ज्ञात अर्थ श्रुतिका तात्पर्यविषय नहीं हो सकता है? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि श्ुतिके तात्पर्यनिर्णायक वेदान्तविचारके पूर्व भी पुराणोंमें श्रुतिका वैसा ही (पूर्वोक्त ही) तात्पर्य निर्णीत है। जैसे- श्रुति वाक्योंसे आत्माका श्रवण करना चहिए, युक्तियों द्वारा आत्माका मनन करना चाहिए और मननसे परिपक्क ज्ञानके वाद उसका ध्यान करना चाहिए, क्योंकि आत्माके साक्षात्कारमें श्रवण, मनन और निदिध्यासन कारण हैं ॥१॥ हे श्रेष्ठ मुनियो ! अवण, मनन और निदिध्यासन इन तीनोंमें से श्रवण उसे कहते हैं-जो आचार्यके सुन्दर मुखसे निकले हुए शन्दों द्वारा उपक्रम आदि छः प्रमाणोंके आधारपर सब वेदान्तवाक्योंकी शक्तिके तात्पर्यका निर्णय है। और वेदान्तवाक्योंके अर्थके अनुग्राहक-समर्थक-पञ्चावयव वाक्योंसे युक्त अनु- मानका परिशीलन मनन कहलाता है।।२-३।।
- पञ्चावयवोंकी अनुमानमें अत्यन्त उपयोगिता होती है, वे हैं-प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन। यद्यपि वेदान्तसिद्धान्तमें तीन ही अवयवोंकी अपेक्षा मानी जाती है, तथापि कोई लोग प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण और कोई लोग उदाहरण, उपनय और निगमन इस प्रकार उनकी उपयोगिता मानते हैं, अतः ऐसी उक्तिमं कोई विशेष आग्रह नहीं है, यह भाव है।
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अवणािधिका विचार ] भापानुवांदसहितं
निदिध्यासनमैकाग्रयं श्रवणे मननेऽपि च। निदिध्यासनसंज्ञं च मननं च द्वयं बुधा :! ।।४।। फलोपकारकाङ्गं स्यात् तेनाऽसम्भावना तथा। विपरीता च निर्मूलं प्रविनश्यति सत्तमाः!॥५॥ आ्राधान्यं मननादस्मिन्निदिध्यासनतोऽपि च। उत्पच्तावन्तरङ्गं हि ज्ञानस्य श्रवणं बुधा: ।।।६।। तटस्थमन्यव्यावृत्या मननं चिन्तनं तथा। इतिकर्तव्यकोटिस्था: शान्तिदान्त्यादय: क्रमात्॥७॥
श्रवण और मननके अनन्तर अर्थात् विचार और तदनुकूल युक्तियोंके परि- झीलनके अनन्तर मनकी एकाग्रता-सव विषयोंकी ओरसे चित्तको बटोर कर श्रुत-मत विपयमें ही उसको सदा लीन करना-निदिध्यासन कहलाता है। हे वित्र* उत्तम मुनिजनो ! निदिध्यासन और मनन ये दोनों फलोप- कारक अज् हैं, इनसे क्रमशः असम्भावना तथा विपरीतभावना समूल नष्ट हो जाती है ॥। ४, ५।। हे वुधवृन्द ! मनन और निदिध्यासन की अपेक्षा श्रवण में प्रधानता है, क्योंकि वह ज्ञानोत्यत्तिमें अन्तरङ-मुख्य-साधन है ॥६॥ और मनन तथा निदिध्यासन तो असम्भावना आदिकी व्यावृत्ति द्वारा ज्ञानके वहिरद साधन हैं। शम, दम आदि तो इतिकर्तव्यताकोटिमें वर्तमान हैं।।।७।।
- इसमें सत्तमशब्दका ही उत्तम अर्थ है। सत्तमशब्दका प्रयोग इसलिए किया गया है कि इन मुनियोंने आत्मश्रवणके लिए जिज्ञासा की है, अतः आत्मश्रवण नहीं चाहने- वालोंसे ये श्रवणके विपयमें प्रश्नकर्ता मुनि उत्तम हैं, यह भाव है। + तात्पर्य यह है कि उदाहरणके लिए ग्रहयाग लीजिए। उसकी इतिकर्तव्यता है-इस प्रकार मण्डल हो, अमुक अमुक मन्त्रसे अमुक अमुक दिशामें अमुक अमुक आकारके मण्डलके ऊपर असुक अमुक पौर्यापर्यसे अमुक अमुक ग्रह वा इन्द्रादि देवताका आवाहन, ध्यान आदि पोटदोपचारसे पूजा करे, अमुक देवता या ग्रहकी प्रसन्नताके लिए अमुक मन्त्र, जप या पाठ अमुक संख्यामें करे एवम् अमुकामुक कर्ममें अमुक द्रव्यकी आहुति दे इत्यादि क्रियाकलाप- परिपाटी इतिकर्तव्यता कहलाती है। इसी तरह आत्मसाक्षातकार के उपाय विचारकी इतिकर्तव्यता शम, दम आदि हैं। शम, दम आदि प्रक्रियाके अनुशीलनसे ही विचारका उदय होता है।
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विवरणप्रमेयसंग्रह [.सूत्र १, वर्णक १
ततः सर्वाङ्गनिष्ठस्य प्रत्यग्बह्ैक्यगोचरा। या वृत्तिर्मानसी शुद्धा जायते वेदवाक्यतः ॥।८।। तस्यां या चिदभिव्यक्ति: स्वतःसिद्धा च शाङ्करी। तदेव ब्रह्मविज्ञांनं तदेवाऽज्ञाननाशनम् ॥९॥ 'तत्त्वमसि' (वह ब्रह्म तू है) इत्यादि महावाक्योंसे शम, दम आदि चार साघनोंसे सम्पन्न पुरुवकी जीवव्रह्मैक्यविषयक जो शुद्ध मानसिक वृत्ति होती है, उसमें होनेवाली स्वतःसिद्ध शाङ्करी चित्की-चैतन्यकी-अभिव्यक्ति ही ब्रह्मविज्ञान है। और वही अज्ञानका नाशक है ।।८, ९।।
*इस 'लोकमें 'स्वतःसिद्ध' और 'शाङ्करी' दो विशेषण हैं। उनका संक्षेपमें यह अमिग्राय है- वेदान्तमतमें ज्ञान स्वतःप्रकाश-अपने आप प्रकाश होनेवाला-माना गया है। इसके प्रकाशके लिए किसी द्वितीय ज्ञान (प्रकाश) की आवश्यकता नहीं है, जिस तरह प्रथम घटज्ञानका प्रकाशक द्वितीय ज्ञान (घटको में जानता हूँ, ऐसा अनुव्यवसाय) नैयायिक मानते हैं, उस तरह वेदान्ती नहीं मानते, ज्ञानके स्वप्रकाश होते हुए भी घट, पट आदिका प्रकाश सदव नहीं होता, इसका यह कारण है कि वेदान्त-मतमें ज्ञान स्वतः आकारवाला नहीं है। इसके घट, पटआदि आकार विषय- रूप उपाधि द्वारा ही होते हैं। और विषय वेदान्त-मतमें तत्तदवच्छिन चैतन्य ही है, वह चैतन्य अज्ञानसे आघृत रहता है। जव इन्द्रियसे विषयावच्छिन्न चैतन्यका संयोग होता है, तच मन- अन्तःकरण-चक्षु आदि वाह्येन्द्रियोंके द्वारा विषय देशमें जाकर नालीके द्वारा खेतमें गये हुए जलकी तरह विषयके आंकारमें परिवर्तित हो जाता है, इस परिवर्तनको मनकी विषयाकार वृत्ति कहते हैं। वृत्तिके उत्पन्न होते ही विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण नष्ट हो जाता है, यह वृत्ति जड़ मनका परिणाम है, अतः वृत्ति भी जड़ ही है। इसलिए इतने ही से विपयका प्रकाश नहीं हो सकता, विषयप्रकाशके लिए जव उस मनोवृत्तिमें चित् (नित्य प्रकाश) का प्रतिनिम्व पड़ता है, तब इस वृत्तिके माहात्म्यसे ज्ञान भी विषयाकार हो जाता है और उस समय अन्तःकरणसे नित्य सम्बद्ध साक्षी भी इसकी गवाही देता है। ऐसी परिस्थितिमें विषयका प्रत्यक्ष हो जाता है-इस प्रत्यक्षप्रक्रियासे घट, पट आदिके प्रत्यक्षके लिए विषय-इन्द्रिय-सन्निकर्ष, विषयाकार मनोवृत्ति, उस वृत्तिसे आवरणविनाश अथवा साक्षीसे सम्बन्ध और उस वृत्तिमें चिदाभास या चित्प्रतिबिम्ब, इंतनी सामग्री अपेक्षित है। अत एव घट, पट आदि प्रत्यक्षस्थलीय मनोवृत्ति साक्षिभास्य होनेसे, स्वयंप्रकाश नहीं कहीं जा सकती। परन्तु जहांपर 'सोऽहं' 'तत्त्वमसि' (वह मैं हूँ, या वह तू है) इत्यादि वाक्योंके श्रवण (विचार) से ब्रह्माकार मनोवृत्ति होती है (हम कह आये हैं कि मनकी वृत्ति विषयके आकारवाली होती है, इसलिये वेदान्तवाक्योंके श्रवणके अनन्तर होनेवाली वृत्तिका विषय ब्रह्म है, अतः यह ब्रह्माकार वृत्ति कहलांती है) वहाँपर ब्रह्माकार वृत्तिके होते ही ब्रह्म को आवृत किया हुआ अज्ञानावरण तुरन्त नष्ट हो जाता है, क्योंकि वृत्तिज्ञान अज्ञानका नाशक है। अय आवरणके नष्ट होते ही उस वृत्तिमें अभिव्यक्त स्वयंप्रकाश ब्रह्मरूपी विषय चिदाभासके
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श्रवणविधिका विचार ] भापानुचादसहित
प्रत्यग्न्रह्मैक्यरूपा या वृत्ति: पूर्णाडभिजायते। शब्दलक्षणसामग्रया मानसी सुदृढा भृशम् ॥१०।। तस्याथ्र द्रष्टृभूतश्व प्रत्यगात्मा स्वयंत्रभः । स्वस्य स्वभावभूतेन ब्रह्मभूतेन केवलम् ॥११॥ स्वयं तस्यामभिव्यक्तस्तदूपेण सुनीश्वरा :! । ब्रह्मविद्यासमाख्यस्तदज्ञानं चित्प्रकाशितम् ॥१२। प्रतीत्या केवलं सिद्ध दिवाभीतान्धकारवत्। अभूतं वस्तुगत्यैव स्वात्मना ग्रसते स्वयम् ॥१३।। हे मुनीध्रो ! 'तत्वमसि' आदि शब्दरूप सामग्रीसे जो प्रत्यगब्रह्माकाररूप पूर्ण और अत्यन्त सुदृढ़ मनकी वृत्ति उत्पन्न होती है, उसका द्रष्टा स्वतःपरकाशमान प्रत्यगात्मा ही है, अन्य नहीं है, क्योंकि उस वृत्तिमें अपने स्वभावभृत ब्रह्मरूपसे आप ही (प्रत्यगात्मा ही) अभित्यक्त हुआ है। अतः इतर द्रष्टाकी आव- श्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वयं द्रष्टारूप है। उक्त स्वरूपसे अभिव्यक्त परमात्मा ही 'ब्रह्मविज्ञान' शव्दसे कहलाता है, और चित्से प्रकाशित ब्रह्माज्ञान दिवाभीत अर्थात् उल्ल द्वारा कल्पित अन्धकारके समान केवल प्रतीतिमात्रसे सिद्ध विना ही सयंप्रकाश हो जाता है, और इसके प्रकाशके लिए साक्षिप्रतिभासकी आवश्यकता नहीं है-यह तो स्यं सकल विश्वका साक्षी नित्यसिद्ध प्रकाश है, इसके प्रकाशके लिए द्वितीय साक्षी कौन हो सकता है? केवल आवरण नाशके लिए इसे वृत्तिमात्रकी आवश्यकता रहती है। इसलिए यह चिद्मिव्यक्ति नित्यसिद्ध कही गई है। अव रहा 'शाङ्करी' विशेषण, यह अधिक गूढ़ अभिग्राय रखता है। व्युत्पत्तिके अनुसार (शङ्करस्य इयं शाङ्करी) यङ्कासम्बन्धिनी, ऐसा अर्थ मालूम पढ़ता है। इसमें विचारणीय यह है कि शक्कर कौन, उसका सम्बन्ध क्या और किससे? यदि अभिव्यक्तिसे, तो अभिव्यक्ति, ज्ञान या शह्कर तो पर्याय ही हैं। एक ही पदार्थमें सम्बन्ध कैसे? और ज्ञान तथा विपयका सम्वन्ध भी तो अपने मतमें काल्पनिक (आध्यासिक) ही है। इस दशामें इससे समूल अज्ञानका नाश कैसे हो सकता है? इत्यादि अनेक विकल्पोंका भण्डार यह विशेषण है। अस्तु, संक्षेपमें उत्तर लिखते हैं-यह श्लोक पौराणिक है, पुराणोंमं तन्त्र मतका पर्याप्त सङ्गह पाया जाता है। अतः 'शाङ्करी' विशेषण भी तन्त्रमतकी छाया है। जिसका भाव होता है-शिवसरूप शङ्करक्ता खभाव। उपरोक अभिव्यक्ति शुद्ध, नित्यप्रकाश शिवसवरूप ही है. और उसका सवतःसिद्धप्रकाशत्व भी स्वभाव ही है, अतः सवतःसिद्ध और शाक्करी दोनों विशेषणोंकी सार्थकता हुई, अन्यथा 'शाह्गरी' विशेषण निरर्थक ही नहीं प्रत्युत असङतार्थक भी हो जाता। अथ च श्रीशङ्हराचार्य- प्रतिपादित अद्वैतवृत्तिका बोध कराना भी 'शाङरी' विशेपणका तात्पर्य है।
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विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १ V स्वात्मनाऽज्ञानतत्कार्यं असन्नात्मा स्वयं बुाः !। स्वयमेवाऽवशिष्यते ॥१४॥ एवंरूपावशेषस्तु स्वानुभूत्येकगोचरः। येन सिध्यति विश्रेन्द्रास्तद्धि विज्ञानमैश्वरम्॥" १५ ।। नन्वेवमपि श्रवणस्य विधिनोपपद्यते। तथा हि-स कि ज्योतिष्टो- मादेरिवाऽपूर्वविधि: १ उताऽवघातादिवन्नियमविधि: १ किं वा 'पश्च पश्चनखा भक्ष्याः' इत्यादिवत् परिसङ्ख्याविधि :! नाऽडद्यः, वेदान्तश्रवणादीनां टष्टफल-
है, वास्तवमें वह कोई वस्तु ही नहीं है। आत्मज्ञानके उदित होनेपर अपने-आप ही अपनेको तथा अपने कार्य अध्यास आदि सबको जब निगलता है अर्थात् उन सबको समेटकर वह अन्धकार (अज्ञान) स्वयं विलीन हो जाता है। हे विज्ञजनो ! तव वही आत्मा आनन्दरूप होकर अपने पूर्णब्रह्मरूपसे अवशिष्ट रहता है। [इसलिए] हे विप्रेन्द्रो ! केवल अपने अनुभवसे ज्ञात होनेवाला उक्त ब्रह्मावशेष जिस विज्ञानसे सिद्ध होता है, वही ब्रह्मविज्ञान है, ऐसा आप जानें ॥१०-१५॥.
. अब शक्का करते हैं कि इसपर भी श्रवणको विधि मानना युक्तिसङ्गत नहीं हो सकता-क्योंकि जो श्रवणको विधि मानता है, उससे पूछना चाहिए कि क्या. तुम 'ज्योतिष्टोमेन यजेत' इस विधिके समान श्रवणको अपूर्वविधि मानते हो? अथवा 'ब्रीहीनवहन्ति' इसके समान नियमविधि मानते हो? या 'पञ्च पञ्चनखा' भक्ष्याः इसके समान परिसङ्ख्याविधि मानते हो? *। इसमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानरूप दृष्टफलके प्रति वेदान्तके श्रवण आदिकी साधनता
- 'ज्योतिष्टोमेन यजेत' (ज्योतिष्ठोम याग करे) यह अपूर्वविधि है, अर्थात् ज़्योतिष्टोम याग, इस वाक्यको छोढ़कर किसी अन्य प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, अतः यह अपूर्च विधि है। 'ब्रीहीनवहन्ति' (धानोंको मूसलसे कूटे अर्थात् मूसलसे कूटकर धानके छिलके निकाले) यह नियमविधि है, क्योंकि छिलका निकालना अन्य साधनोंसे प्राप्त है, अवघातसे ही व्रीहिके छिलके निकाले जायँ ऐसा नियम होनेसे यह विधि नियमविधि कहलाती है। 'पश्व पश्चनखा भक्ष्या:' (पाँच पाँचनखवाले खाने चाहिएँ अर्थात् पञ्च और अपन्चनखवाले जितने प्राणी हैं, उनमें से शशक (खरगोश), शल्लकी (शाही), गोधा (गोह), खड्गी (गेंडा) औ़र कूर्म, ये पाँच ही खाने चाहिएँ, इतर नहीं) यह परिसङ्गयाविधि है, क्योंकि रागसे पन्चनख और अपश्चनखका भक्षण प्राप्त है, अतः इससे इतरकी निवृत्ति होती है।
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श्रवणविधिका विचार ] भापानुवादसहित ९
ब्रह्मज्ञानं प्रति साधनत्वस्याऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां सिद्धत्वात्; प्रसिद्ध हि लोके वैद्यशास्त्रश्रवणस्य तद्विपयावगमं अ्रति साधनत्वम्। न द्वितीय:, नियमादृष्टस्य कल्पकाभावात्। अवधातादौ तु नियमादष्टजन्यपरमापूर्वमेव एतत्कल्पकम्। न च त्रह्मज्ञानमदष्टजन्यम्, केवलव्यतिरेकाभावात्। नहि वेदान्तश्रवणादौ सत्यपि नियमादष्टाभावापराधेन ब्रह्मज्ञानानुत्पत्तिर्ष्टचरी। ज्ञानस्य कर्थ- चिद्दृष्टजन्यत्वेऽप्ययं विधिर्भाप्यविरुद्धा, समन्वयसूत्रव्याख्याने महता प्रयत्नेन विधिनिराकरणात्। अन्यथा वेदान्तानां विधिपरत्वं ब्रह्मपरत्वं चेति वाक्यभेदप्रसङ्ग: । नाऽपि तृतीयः, पञ्चनखापञ्चनखभक्षणयोरन्यतः
तस्मात् नास्ति श्रवणविधिरिति।
अन्वय-त्यतिरेकरूप प्रमाणसे प्राप्त ही है, लोकमें प्रसिद्ध है कि आयुर्वेदशास्त्रका विचार आयुर्वेदके प्रतिपाद्य विपयोंके परिज्ञानमें साधन है [ इसी प्रकार वेदान्तशास्त्रका विचार भी वेदान्तके विषयके परिज्ञानमें कारण हो सकता है, यह भाव है ]। द्वितीय पक्ष भी युक्ति-युक्त नहीं है, क्योंकि नियमविधिसे उत्पन्न होनेवाले अटष्टकी कल्पना करनेवाला कोई नहीं है। अवघात आदि स्थलोंमें तो अवहनननियमादप्टसे उत्पन्न होनेवाला परम अपूर्व ही नियमाद्ष्टका कल्पक है, [प्रकृतमें नियमादृष्टका कल्पक व्रह्मज्ञान तव होता, जव वह नियमादष्टसे जन्य होता, परन्तु ] व्रह्मज्ञान नियमाहप्टसे जन्य नहीं है, क्योंकि केवलव्यतिरेक प्रमाण नहीं है। कारण कि वेदान्तश्रवणके रहते नियमादृष्टके अभावमात्रसे व्रह्मज्ञानकी अनुत्पत्ति नहीं देखी जाती है। यदि कथश्चित् तुम्हारे कथनानुसार ब्रह्मज्ञानको अदष्टजन्य मान भी लिया जाय, तथापि यह श्रघ्णविधि भाष्यविरुद्ध ही है, क्योंकि समन्वयसूत्रमें बड़े ऊहापोहसे भगवान् भाष्यकारने श्रव्णविधिका परिहार किया है। यदि यह न माना जाय, तो वेदान्तवाक्योंके विधिपरक और ब्रह्मपरक होनेसे वाक्यभेद प्राप्त होगा। तृतीय परिसङ्ख्याविधिका भी सम्भव नहीं है, क्योंकि जैसे पञ्चनख और अपञ्चनखके भक्षणकी रागसे प्राप्ति. होनेपर अन्यतरकी निवृत्तिके लिए उक्त स्थलमें परिसंख्याविधि मानी जाती है, वैसे आत्मसाक्षात्कारकी उपनिषत्से अतिरिक्त प्रमाण द्वारा प्राप्ति नहीं है, अतः श्रवणविधि नहीं है।.
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१० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
अत्रोच्यते-दष्टफलस्याऽपि धर्मज्ञानस्य साधनेऽध्ययने नियमविधि- स्तावदङ्गीकृत एव। यदा त्वर्वाचीनपुरुपार्थे परोक्षे धर्मज्ञानेऽप्येवम्, तदा किमु वक्तव्यं परमपुरुपार्थब्रह्मसाक्षात्कारसाधने श्रवणे नियमविधिरिति ! यद्य- ध्ययने नियमादष्टजन्यं यागीयापूर्व तत्कल्पकं स्यात्, तर्हिं श्रवणेऽपि ब्रह्मज्ञानं तत्कल्पकमस्तु, ब्रह्मज्ञानस्य सर्वाद्ृष्टजन्यत्वात्; 'सर्व कर्माडखिलं पार्थ ! ज्ञाने परिसमाप्यते' इति स्मरणात्। अत्र हि प्रसिद्धयागादीनेवाडपेक्ष्य सर्वग्रहणमिति भ्रमं व्युदस्य श्रवणादेरपि संग्रहायैवाऽखिलमित्युक्तम्, अन्यथा पौनरुक्यात्। "योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शुद्रत्वमाछु गच्छति सान्वयः ॥" (मनुस्मृ० २।१६८)
इस प्रकार पूर्वपक्ष होनेपर समाधान कहते हैं कि धर्मज्ञानरूप दष्टफलके प्रति साधनभूत अध्ययनमें पूर्वमीमांसकोंने नियमविधिका ही अङ्गीकार किया है। जब द्वितीय श्रेणीके परोक्षरूप धर्मज्ञानात्मक पुरुषार्थके उपायभूत अध्ययनमें नियमविधिका स्वीकार किया जाता है, तो प्रथम श्रेणीके पुरुषार्थरूप ब्रह्मज्ञानके प्रति साधनभूत वेदान्तविचारमें नियमविधि है, इसमें कहना ही क्या है? अर्थात् 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि ही है। यदि वेदाध्ययनमें अध्ययननियमसे उत्पन्न हुए अदष्टजन्य यागसम्बन्धी अपूर्व अपने कारणभूत नियमजन्य अद्ृष्टकी कल्पना करनेवाला हो सकता है, तो फिर श्रवणमें भी ब्रह्मज्ञान नियमादष्टकी कल्पना अवश्य कर सकता है, क्योंकि सभी अदष्टोंसे ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति होती है, कारण कि 'सर्व कर्मा Sखिलम्०' (सव कर्मोंकी परिसमाप्ति ज्ञानमें ही होती है) ऐसा श्रीमद्भगवद्गीताका वाक्य है। इस वाक्यमें किसीको भ्रम हो जाय कि पूर्वमीमांसोक्त प्रसिद्ध यागोंकी ही अपेक्षासे 'सर्व' शब्द दिया गया. है, तो उसकी निवृत्ति करके श्रवण आदिका परिग्रहण करनेके लिए 'अखिलम्' शब्द कहा गया है, अन्यथा पुनरुक्ति हो जायगी। यदि कहो कि 'योऽनघीत्य०' (जो द्विज-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-वेद न पढ़कर अन्य अर्थशास्त्र आदि विषयोंमें परिश्रम करते हैं, वे जीते-जी ही अपने पुत्रपौत्रोंके साथ शीघ्र शूद्धत्वको प्राप्त होते हैं) इस प्रकारकी स्मृतिसे वेदाध्ययन न करनेपर पाप होता है, ऐसा कहा गया है, अतः स्वाध्यायाध्ययनमें विधिका .
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श्रंवणविधिका विचार] भापानुवादसहित
इत्यकरणे प्रत्यवायमपेक्ष्य विध्यङ्गीकारे प्रकृतेऽपि तथाऽस्तु। "नित्यं कर्म परित्यज्य वेदान्तश्रवणं बिना। वर्तमानस्तु संन्यासी पतत्येव न संशयः ॥।" इति प्रत्यवायसस्मरणात्। नतु ब्रह्मज्ञाने श्रवणादीनामन्वयव्यतिरेकादिना नास्ति साधनभाव- प्राप्तिः; निर्विशेषस्य त्रह्मणो वेदान्तैकसमधिगम्यत्वात्, तत्कथ नियम- सिद्धि: १ मैवम्; 'बीहीनवहन्ति' इत्यत्र शास्त्रैकगम्यापूर्वीयव्रीहिष्वन्यतो दलनाद्यप्राप्तावपि अवघाते यथा नियमः, तथा श्रवणेऽपि पाक्षिकत्व- मन्तरेणैव नियमोऽस्तु। अथ व्रीहिमात्रसाधारणाकारेण प्राप्तिमपेक्ष्य तत्र नियम: १ तद्राऽपि समानम्, विपयज्ञानमात्रसाधारणाकारस्य सुवचत्वात्। अथाऽबघातेऽपूर्वविधिरेव सन् फलतो नियम इति व्यवहियते, श्रवणेऽपि तथा अङ्गीकार किया जाता है, तो ब्रह्मज्ञानके साधन श्रवणमें भी उसी प्रकार विधि हो सकती हैं, क्योंकि 'नित्यं कर्म०' (नित्य कर्मोंका परित्याग करके जो संन्यासी वेदान्तश्रवण नहीं करता, वह निःसन्देह पतित हो जाता है) इस स्मृतिसे वेदान्तश्रवण न करनेसे भी प्रत्यवाय सुना जाता है। यदि शक्का हो कि अन्वय और व्यतिरेकसे ब्रह्मज्ञानके प्रति श्रवण आदिमें साधनता प्राप्त नहीं हैं, क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म केवल उपनिपत् प्रमाणसे गम्य है, इसलिए श्रवणकी नियमविधि कैसे हो सकती है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'बीहीनवहन्ति' (त्रीहियोंका अवघात करे) इत्यादि अवघातस्थलमें शास्त्र- मात्रसे ज्ञात होनेवाले अपूर्वसम्बन्धी ब्रीहियोंमें प्रमाणान्तरसे तुपमोचनकी-विदलन- की-प्राप्ति न होनेपर भी जैसे नियमविधि मानी जाती है, वैसे ही श्रवणमें भी पाक्षिक प्राप्तिके न होनेपर भी नियमविधि मानी जा सकती है। यदि कहिए कि सर्वसाधारण त्रीहियोंको लेकर विदलनकी प्राप्तिकी अपेक्षा करके उक्त स्थलमें नियमविधि है ? तो वह यहाँपर भी अर्थात् श्रवणस्थलमें भी समान है, क्योंकि सर्वसाधारण विषयज्ञानको लेकर विचारमें हेतुता प्राप्त ही है, ऐसा कह सकते हैं। यद्यपि अवघातमें (विशेषाकारसे) अपूर्वविधि ही है, तथापि जैसे फलतः नियमविधिका* व्यवहार होता है, वैसे ही श्रवणमें अपूर्वविधि होनेपर भी *अर्थात् अवघातसे उत्पन्न तण्डल ही अपूर्वके प्रति कारण हैं, अन्य साधनोंसे निष्पन्न तण्डल नहीं, इस प्रकार अन्यमें निषेध होनेसे अवघातमें नियमविधि फलित होती है, वस्तुतः
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१२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
भविष्यति। न च भाष्यविरोधः, दर्शनविधेरेव तत्र निराकरणात्। दर्शन- विधाने हि 'प्रकृतिप्रत्ययौ अ्रत्ययार्थ सह तृतः प्राधान्येन' इति न्यायेन अत्ययार्थस्य नियोगस्यैव प्राधान्याद् दर्शनस्य प्रकृत्यर्थतया गुणभृतत्वेन तद्विशेषणस्य व्रह्मणोऽपि सुतरां गुणभाव: स्यात्; ततो न वेदान्तै्त्रह्म सिध्येद्। फलत्वेन प्रधानं ब्रह्मदर्शनमुददिश्य श्रवणविधाने तु न कोऽपि दोप:। वाक्यभेदश्व किमेकदेशिनाSSपाद्यते कि वा तान्त्रिकेण? नाऽडद्य:, वेदान्तेऽप्यवान्तरवाक्यभेदेन 'विविदिपन्ति यज्ञेन' इत्यत्र ज्ञानसाधनत्वेन यज्ञादिविध्यङ्गीकारात्। न द्वितीयः, प्रेताग्निहोत्रप्रकरणे 'अधस्तात् समिधं फलतः नियमविधिका व्यवहार होगा। यदि शक्का हो कि श्रवणविधि माननेसे समन्वयसूत्रके भाप्यके साथ विरोध होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त भाष्यमें दर्शनविधिका ही निराकरण किया गया है, श्रत्णविधिका निराकरण नहीं किया गया है। कारण यह है कि यदि आत्मसाक्षात्कारका विधान किया जाय, तो 'प्रकृतिप्रत्ययौ' (प्रकृति और प्रत्यय दोनों मिलकर प्रधानरुपसे प्रत्वयक्के अर्थका ही अभिधान करते हैं) इस न्यायसे नियोगरूप (प्रेरणारूप) प्रत्ययार्थक ही मुख्य होनेसे प्रकृतिका अर्थ होनेके कारण दर्शन (साक्षात्कार) गाण होगा और दर्शनमें विशेषणतया प्रविष्ट व्रह्म तो अत्यन्त गौण अर्थात् अमुख्य होगा। इस परिस्थितिमें वेदान्तवाक्योंसे ब्रह्मकी सिद्धि नहीं हो सकेगी, [अतः दर्शनविधिके निराकरणमें ही समन्वयसूत्रके भाष्यका तात्पर्य है, श्रवणविधिके निराकरणमें उसका तात्पर्य नहीं है, यह भाव है] । यदि फलरूपसे प्रधानीभृत त्रह्मसाक्षात्कारको उद्देश्य करके श्रवणका विधान करें, तो कोई भी दोप नहीं है। और [वेदान्तवाक्योंके विधिपरक और ब्रह्मपरक माननेमें वाक्यमेद, प्रसक्त होगा, ऐसा जो पीछे कहा गया है, उसपर कहते हैं कि ] क्या किसी एकदेशी वेदान्तीने वाक्यमेदका अपादान क्रिया है या पूर्वमीमांसकने इनमें पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अवान्तर वाक्योंके भेदसे वेदान्तमें भी 'विविदिषन्ति यज्ञेन' (यज्ञोंसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा करते हैं) इत्यादि स्थलोंमें ज्ञानके साधनरूपसे यज्ञ आदिकी विधिका अङ्गीकार किया गया है। अवघातविधि नियमविधि नहीं है, ऐसा यदि कहा जाय, तो यह प्रकार विचारमें भी लागू हो सकता है, क्योंकि वेदान्तविचारसे ही ब्रह्मज्ञान होता है, अन्य साधनोंसे नहीं होता, इस प्रकार श्रवणविधिको अपूर्वविधि माननेसे भी फलतः नियमविधि हो सकती है, यह भाव है।
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श्रवणावैधिका विचार ] भापानुवादसहित १३
धारयन्नुद्रवेत्' इत्यधोधारणं विधाय 'उपरि हि देवेभ्यो धारयति' इति पठितम्। तत्र दैविकमुपरिधारणमन्यप्रकरणमध्ये श्रुतमपि विधेयमिति 'विधिस्तु धारणेऽपूर्वत्वात्' इत्यधिकरणे निर्णीतत्वात्। अथ कथश्चिदेतदधिकरणं प्रभाकरो नाडङ्गीकुर्यात् तथापि दर्शपूर्ण- मासग्रकरणे 'तिस्रो रात्रीर्वतं चरेत्' इति रजस्वलाया वतकलापविधि- मङ्गीकरोत्येव। तस्माद् ब्रह्मप्रकरणेऽपि श्रवणं विधीयतां का तव हानि: ? अथ ततकलापस्य प्रकरणान्वयासम्भवादगत्या वाक्यमेदाश्रयणम्, इह तु तव्यप्रत्ययस्याऽ्ह्रथित्वेनाऽप्यन्वयसंभवान्न तद्यक्तमिति तवाऽ-
वाक्यं परितोप:, तर्हि 'तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निविंद्य' इत्यादि श्रवणादिविधायकमस्तु, तस्याऽनारभ्याऽधीतत्वेनोक्तविरोधा- द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रेतामिहोत्रप्रकरणमें 'अधस्तात् समिधं धारयन्ननुद्रवेत्' (सुग्दण्डके नीचे समिधाको रखकर आवसथ्य अगनिके पास जायं) इस श्रुतिसे अधोधारणका विधान करके 'उपरि हि देवेभ्यो धारयति' (देवताओंके लिए सुग्दण्डके ऊपर समिधा रक्खे) इस प्रकारका वाक्य पढ़ा गया है। इसमें देवतोद्देश्यक उपरिधारण यद्यपि अन्य प्रकरणमें (प्रेतामिहोत्र प्रकरणमें) श्रुत है, तथापि वाक्यमेदसे उपरिधारणका विधान किया जाता है, इस प्रकारका निर्णय 'विधिस्तु धारणेऽपूर्वत्वात्' (पूर्वमी० अ० ३ पा० ४ सूत्र १५) इस सूत्रमें किया गया है। यदि इस अधिकरणको प्रभाकर किसी तरहसे न माने तो दर्शपूर्ण- मासग्रकरणमें 'तिस्रो रात्रीर्वतं चरेत्' इस वाक्यसे वाक्यमेदका अङ्गीकार करके उसके मतमें भी रजस्वलाके त्रतोंका विधान किया ही गया है। इसलिए ब्रह्म- प्रकरणमें वाक्यमेदसे श्रवणका विधान किया जाय, तो भी तुम्हारी क्या हानि है? यदि तुम्हे असन्तोप हो कि रजस्वलाके त्रतकलापका दर्शपूर्णमासप्रकरणमें अन्वय नहीं हो सकता है, इसलिए अगत्या हमको वाक्यभेदका अवलम्बन करना पड़ता है, और प्रकृत 'श्रोतव्यः' इत्यादि ब्रह्मपकरणस्थ वाक्योंमें तो 'तव्य' प्रत्ययका अर्ह (योग्य) अर्थ हो सकता है, अतः वाक्यमेद करना युक्त नहीं है, तो 'तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य' + इत्यादि वाक्य ही श्रवणका विधायक है, कारण कि यह वाक्य किसी दूसरे प्रकरणका आरम्भ करके नहीं पढ़ा गया है, अतः पूर्वोक्त रीतिसे प्रकरणविरोध
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१४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्रं १, वर्णक १
भावात्। आपाततः श्रवणाद्यप्रतीतावपि वाक्यपर्यालोचने वाक्यस्य श्रवणादिविधिपरत्वात्। सूत्रकारेणैव 'सहकार्यन्तरविधिः' इति सूत्रे पाण्डि- त्यवाल्ययो: श्रवणमननरूपत्वेन विधिं सिद्धवत्कृत्य 'अथ मुनिः' इति वाक्यशेषे निदिध्यासनरूपत्वेन मौनस्य विधित्वग्रतिपादनाद् असाम्प्रदायि- कत्वं दूरापास्तम्। ननु एवमपि अधीत्य स्वाध्यायेनाऽवगतस्य 'श्रोतव्यः' इत्यस्य श्रवणविधेरनुपपत्तिस्तदवस्थैवेति चेत्, न; तव्यप्रत्ययस्य विधावपि 'तद्विजिज्ञासस्व' इत्यादिपु समानप्रकरणेपु श्रुत्यन्तरेपु श्रवणस्य अवश्यं वाक्यभेदेन विधेरङ्गीकर्तव्यतया त्वदपरितोपस्य निरव- स्मरणात्।
काशत्वात्। न चैकस्यामेव शाखायां 'श्रोतव्यः' 'पाण्डित्यं निविद्य' इति
या वाक्यमेद प्रसक्त नहीं हो सकते हैं। यद्यपि उक्त वाक्यमें अर्थात् 'ब्राह्मणः पाण्डित्यम्' इत्यादि वाक्यमें पाण्डित्य शब्दको सुनते ही आपाततः 'पण्डिताई' ऐसा अर्थ प्रतीत होता है, अरवणरूप अर्थ प्रतीत नहीं होता, तथापि वाक्यका पूरा पर्य्यालोचन करनेसे उक्त वाक्य श्रवणका विधायक ही ज्ञात होता है। 'सहकार्यन्तरविधि:०' (ब्र० सू० ३। ४।४७) इत्यादि सूत्रमें सूत्रकारने ही पाण्डित्य और बाल्यकी क्रमशः श्रवण और मनन रूपसे विधि सिद्धसी करके 'अथ मुनिः' इस वाक्यशेषसे निदिध्यासनरूप मौनविधिका प्रतिपादन किया है, अतः इस वाक्यकी विधायकतामें असाम्प्रदायिकत्वका भी खण्डन हुआ समझना चाहिए। यदि कहो कि उक्त प्रकारसे श्रवणका विधान होनेपर भी वेद पढ़कर उससे ज्ञात 'श्रोतव्यः' इस श्रवणविधिकी, अनुपपत्ति ज्योंकी त्यों ही है, क्योंकि 'श्रोतव्यः' इस वाक्यमें विधायक प्रत्यय नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'तव्य' प्रत्ययका विधि भी अर्थ है। और समानप्रकरणमें पढ़े गये 'तद्विजिज्ञासस्व' (ब्रह्मका विचार करो) इत्यादि वाक्योंसे वाक्यभेद द्वारा श्रवणका विधान अवश्य करना होगा, (क्योंकि इस स्थलमें विधायक लोट् लकार है) अतः तुम्हारा वाक्यभेदप्रयुक्त असन्तोष भी निरालम्बन ही है। यदि शङ्का हो कि एक ही शाखा में 'श्रोतव्यः' (विचार करना चाहिए) 'पाण्डित्यं निर्विद्य' (पाण्डित्यका-श्रवणका-सम्पादन करके) इस प्रकार दो बार श्रवणका
*भूतकालीन न्राह्मणोंने श्रवण आदि साधनोंसे आत्माका साक्षात्कार करके जीवन्मुक्ति प्राप्त की थी, अतः इदानीन्तन ब्राह्मण भी श्रवणकी प्राप्ति करें, यह श्रुतिका अर्थ है।
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ब्रह्मविचारकी कर्तव्यता ] भापानुवादसहित १५
श्रवणविधिद्वयं पुनरुक्तमिति वाच्यम्, एकत्र विधायाऽपरत्र वििमनूद्य विशे- पकथनात्। अथवा यथा द्विमैत्रेयीब्राह्मणमपुनरुक्तम्, एकस्योपसंहाररूपत्वात्; तथा द्विःश्रवणविधिर्भवतु। तस्मात् उपपद्यत एव श्रोतव्य इति विधिः ॥१॥ तत्र श्रवण नाम वेदान्तवाक्यानि विचार्य 'उपक्रमादिभिलिद्गैर्वाक्यतात्प- र्यनिर्णयः' इति पुराणवचनेनोक्तम्। तथा च विरक्त्ेनाऽधिकारिणाऽमृतत्व- साधनभूतात्मदर्शनाय वेदान्तवाक्यविचार: कर्तव्य इति। एवं तावदधीत- स्वाध्यायः पुमान् वेदादेवाऽवगत्य पश्चादेवं संदिग्धे-किं वैराग्यमात्रमधि- कारिविशेपणम् उताऽन्यदप्यस्ति १ नानाविशेपणेपु तद्विशिष्टाधिकारिणि च किं ग्रमाणम् १ वेदान्तवाक्यविचारश् धर्मविचारेणैव गतो न वा १ कर्थ वा वेदान्तवाक्यानि विचार्याणि१ किंलक्षणमात्मतत्वम् १ तस्मिंश्र किं प्रमाणम्१
विधान करनेसे पुनरुक्ति होगी, तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन दो वाक्योंमें एक वाक्यसे श्रवणका विधान कर दूसरे वाक्यसे अनुवाद करके विशेषका कथन किया जाता है। अथवा जैसे एकके उपसंहाररूप होनेसे दो बार कहे गये मैत्रेयीव्राह्मणमें पुनरुक्ति नहीं है? वैसे ही एकके उपसंहाररूप होनेसे दो बार कही गई श्रवणविधि भी पुनरुक्तिदोपग्रस्त नहीं हैं। इससे श्रवणको विधि मानना युक्ति-युक्त ही है।१॥ श्रवण, मनन और निदिध्यासनोंमें से पूर्वोक्त पुराणवचनसे श्रवणका- वेदान्तवाक्योंका खूच सोच समझकर उपक्रम आदि हेतुओं द्वारा किया गया तात्पर्थ- निर्णय-अर्थ कहा गया है। इस परिस्थितिमें विरक्त अधिकारीको मोक्षके प्रति कारणभूत आत्मसाक्षात्कारके लिए वेदान्तवाक्योंका विचार करना चाहिए, यह सिद्ध होता है। वेदका अध्ययन करनेके बाद अधिकारी पुरुष- स्वाध्यायसे ही 'आत्मज्ञानके लिए श्रवण करना चाहिए'-यह जानकर फिर इस प्रकार सन्देह करता है-क्या वैराग्य ही अधिकारीका विशेषण अर्थात् अधि- कारिताकी योग्यताका सम्पादक है: अथवा दूसरा भी कोई अधिकारिताका सम्पादक विशेषण है? यदि दूसरे भी विशेषण हैं, तो उन विशेषणोंसे युक्त अधिकारीमें क्या प्रमाण है: वेदान्तका विचार धर्मके विचारसे गतार्थ है अथवा नहीं? अर्थात् वेदान्तवाक्योंका विचार धर्मविचारसे गतार्थ हो सकता है? या नहीं ? किस प्रकार वेदान्तवाक्योंका विचार करना चाहिए? आत्मतत्त्त्वका क्या लक्षण है? और
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१६ विचरण्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
तस्य च प्रमाणस्यास्ति केनचिद् विरोधो न वा १ तत्त्यगोचरज्ञानं च किं कर्मभिः समुच्चित्याऽमृतत्वसाधनम् उत केवलमेव : केवलस्य साधनत्वे वा किं प्रसाणम् १ कीदशममृतत्वं किंग्रमाणकं चेति। त एते संदेहा अन्येऽप्येवं- विधा नानाविवैर्न्यायैनिर्णेतव्याः। तांश्च न्यायान् परमकृपालुर्भगवान् वादरायण: सूत्रयितुकाम: प्रथमतः 'श्रोतव्यः' इति वाक्ये प्रतिपन्नमधिकारि- विषयफलाख्यानुवन्धत्रयोपेतं विधिं न्यायेन निर्णयंस्तदर्थभूतविचारकर्तव्यतां वक्ष्यमाणकृत्स्शास्त्रप्रवृत्तिहेतुत्वेनोपोद्घातभूतां सूत्रयामास-'अथातो ब्रह्म- जिज्ञासा' इति। तत्र 'आत्मनस्तु कामाय' इति वाक्ये विरकत्युपलक्षितसाधनचतुष्टयसपन्नो य एवाऽधिकारी अरतीयते स एव अथशब्दार्थः । 'अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन' इति वाक्ये वित्तोपलक्षितलौकिकवैदिककर्मभिरमृतत्वं नास्तीति यटुक्तं उसमें प्रमाण क्या है? यदि उसमें कोई प्रमाण है, तो उसके साथ किसी प्रमाणका विरोध है अथवा नहीं: तत्त्वविषयक विज्ञान क्या कर्मोंकी सहकारितासे- अमृतत्वका साधन है, अथवा वह स्वतन्त्र ही उसका साधन है: यदि स्वतन्त्र ही साधन है, तो उसमें प्रमाण क्या है, अमृतत्व कैसा है? और उसमें क्या प्रमाण है: इस प्रकारके सन्देहोंका और इनके समान अन्य कई सन्देहोंका भी अनेक प्रकारकी युक्तियोंसे निर्णय करना चाहिए। उन युक्तियोंका, अत्यन्त कृपालु भगवान् वेदव्यासजीने, एकरूपसे सूत्रों द्वारा ग्रथन करनेके लिए पहले 'श्रोतव्यः' इस वाक्यसे अवगत अधिकारी, विषय और सम्बन्ध रूप तीन अनुवन्धोंसे युक्त विधिका निर्णय करते हुए उपोद्धातभूत विचारकर्तव्यतारूप श्रवणके अर्थको, जो कि कहे जानेवाले सम्पूर्ण वेदान्तशास्त्रमें प्रवृत्तिका प्रयोजंक है, 'अथातो व्रह्मजिज्ञासा' (ब्र० सू० अ० १ पा० १ सू० १) इस सूत्रसे सूत्रित किया है। 'आत्मनस्तु कामाय' (आत्माके काम-सुखके लिए) इत्यादि वाक्यमें वैराग्यसे उपलक्षित चार साधनोंसे युक्त जो अधिकारी प्रतीत होता है, वही सूत्रस्थित 'अथ' शब्दका अर्थ है। 'अमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति०' (द्रव्यसे अर्थात् लौकिक-वैदिक कर्मोंसे अमृतत्वकी आशा नहीं है) इस वाक्यका- वित्तशव्दसे उपलक्षित अर्थात् द्रव्यसाध्य लौकिक और वैदिक कर्मोंसे अमृत- त्वकी आशा नहीं है, इस प्रकार-जो अर्थ है, वही 'अतः' शव्दका हेतुरूप
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बह्मविचारकी कर्तव्यता ] भापानुवादसहित १७
तदेवाऽतःशब्देन हेतुक्रियते । 'आत्मनि खल' इत्यादिना वाक्येनाऽमृत- त्वसाधनात्मदर्शनाय वेदान्तवाक्यविचाररूपं श्रवणं कर्तव्यमित्युक्तम्। तत्सवं
नन्वेतत् सूत्रं विधायकमनुवादकं वा! नाऽडद्यः, लिङ्-लोट-तव्यप्रत्यया- नामदर्शनात्। नेतरः, अग्नवर्तकेनाऽनेन श्रवणविध्यसङ्गहम्रसङ्गात्, मैवम्; 'कर्तव्या' इत्यध्याहार्यत्वात। ज्ञानेच्छयोर्वस्तुतन्त्रयो: कर्तुमशक्यत्वात् अध्या- हृतेन जिज्ञासापदं नाऽन्वियादिति चेत, तर्ह्यनयैवाऽनुपपच्या जिज्ञासापदेनाS- नुष्ठानयोग्यो विचारो लक्ष्यताम्। अविनाभावसम्वन्धश्र सन्दंशन्यायग्रसादात् सुसंपाद:। संदष्टो हि ज्ञानेच्छाभ्यां विचार:। ग्रथमत इच्छायां सत्यां
अर्थ किया जाता है। 'आत्मनि खल' इत्यादि वाक्योंसे जो यह कहा गया है कि अमृतत्वरके प्रति साधनभृत आत्मदर्शनके लिए वेदान्त-विचाररूप श्रवण करना चाहिए, वही सब 'न्ह्मजिज्ञासा' शव्दका अर्थ है। यदि शङ्का हो कि 'अथातो न्रह्मजिज्ञासा' यह सूत्र विधायक है या अनुवादक है: पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि सूत्रमें लिङ्, लोटू और तव्य प्रत्यय देखनेमें नहीं आते [ जिससे कि विधायक समझा जाय ]। दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो अनुवादक होता है वह प्रवर्तक नहीं होता, अतः इस अनुवादक सूत्रसे श्रवणविधिका सङ्गह नहीं होगा, तो यह युक्त नहीं हे, क्योंकि 'कर्तव्या' पढ़के अध्याहारसे उक्त सूत्रको विधायक माननेमें कोई हानि नहीं है। यदि शक्का हो कि ज्ञान और इच्छा तो वस्तुके अधीन हैं, अतः इनका विधान न होनेसे अध्याहृत 'कर्तत्या' शब्दका जिज्ञासाशव्द्रके साथ अन्वय नहीं हो सकता? तो इसपर यह कहते हैं कि इसी अन्वयकी अनु- पपत्तिसे जिज्ञासाशव्दकी अनुष्ठानके योग्य पुरुपप्रयलसाध्य विचारमें लक्षणा करनी चाहिए, [अतः उक्त दोप नहीं हो सकता है ]। इच्छा और ज्ञानके साथ विचारका अविनाभावसम्धन्ध 'सन्दंश' न्यायके प्रसादसे प्राप्त हो सकता है, क्योंकि ज्ञान और इच्छा दोनोंके द्वारा विचार पकड़ा गया है [ अर्थात् इच्छा होनेपर विचार होता है और विचार होनेपर ज्ञान उत्पन्न होता है, अतः सँड़सीमें दोनों तरफसे जैसे कोई पदार्थ पकड़ा जाता है, वैसे ही विचार भी इच्छा
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१८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
विचारे सति पश्चादेव ज्ञानोत्पत्तेः । न च वाच्यं लक्षणायां विचाराख्यो विपयानुवन्ध एव सिध्येद् न ब्रह्मज्ञानाख्य: फलानुबन्ध इति, अजहल्लक्षणया स्वार्थस्याऽपि स्वीकृतत्वाद्। ब्रह्मज्ञानजनकत्वान्यथानुपपत्या विचारस्य वेदान्तवाक्यविषयत्वं लभ्यते। नह्यन्यविचारकाणां ब्रह्मज्ञानमुपलभामहे। फलत्वान्यथानुपपच्या ब्रह्मज्ञानस्य मोक्षसाधनत्वसिद्धिः। अधिकारिभिरिष्यमाणं हि फलम्। अत्र हि साधन- चतुष्टयसंपन्ना अधिकारिणो निःशेषदुःखोच्छित्तिनिरतिशयानन्दावासी तत्सा- और ज्ञानसे पकड़ा जाता है, अतः 'सन्दंश' न्यायसे अविनाभाचसम्बन्ध हो सकता है, यह तात्पर्य है]। यदि शङ्का हो कि जिज्ञासाशब्दकी विचारमें लक्षणा माननेपर विचार रूप विषयकी ही सिद्धि होगी, ज्रह्मज्ञानरूप फलानुबन्धकी सिद्धि नहीं होगी, * तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि [ 'अथातो ज्रह्मजिज्ञासा' इस सूत्रमें रहनेवाले ब्रह्मजिज्ञासाशब्दकी ] अजहलक्षणा मानी जाती है, अतः ब्रह्मज्ञानरूप स्वार्थका भी अङ्गीकार होता है। विचारमें जो वेदान्तवाक्योंकी विषयता है, वह ब्रह्मज्ञानके प्रति कारणताकी अन्यथानुपपत्तिसे प्राप्त होती है, क्योंकि वेदान्तशास्त्रके सिवा अन्य शास्त्रका विचार करनेवालोंको ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति हुई हो, ऐसा कहीं- पर भी नहीं देखा जाता। फलत्वकी अन्यथानुपपत्तिसे ब्रह्मज्ञानमें मोक्ष- साधनताकी सिद्धि होती है। क्योंकि फल उसे कहते हैं-जिसकी अधिकारियों द्वारा इच्छा की गई हो। चार साधनोंसे सम्पन्न जो वेदान्तशास्त्रके अधिकारी हैं, वे सम्पूर्ण दुःखोंका उच्छेद और निरतिशय आनन्दकी प्राप्ति तथा उनके साधनको छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं चाहते हैं, तत्त्वज्ञान दुःखका * तात्पर्य यह है कि प्रवृत्तिमें प्रयोजक ज्ञानके विषयीभूत-विषय, सम्वन्ध, प्रयोजन और अधिकारी-इस प्रकारके चार अनुबन्ध हैं। यदि प्रकृतमें 'ब्रह्मजिज्ञासा' शंब्दकी विचारमें लक्षणा मानी जायगी, तो विचाररूप विषयलक्षण अनुबन्धकी ही सिद्धि होगी और ब्रह्मज्ञानरूप फलानु- बन्धकी अर्थात् प्रयोजनरूप अनुवन्धकी सिद्धि नहीं होगी, अतः'ब्रह्मजिज्ञासाशन्दकी विचारमें लक्षणा नहीं माननी चाहिए। इसका अजहल्लक्षणाके अज्गीकार द्वारा परिहार करते हैं, जहाँ अजहललक्षणाका आश्रयण किया जाता है, वहाँ सवार्थका परित्याग नहीं होता है, परन्तु अवान्तर- रूपसे स्वार्थका भी वह बोध करती है, जैसे 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' (कौओंसे दहीकी रक्षा करो) यहांपर अजहलक्षणाके प्रभावसे खार्थ-काक और लक्ष्य-अकाक दोनोंका ग्रहण होता है, चैसे ही प्रकृतमें भी ब्रह्मज्ञानरूप फलानुवन्धकी सिद्धि हो सकती है।
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ब्रह्मविचारकी कर्तव्यता] भापानुवादसाहित. १९
धनं च विहाय नान्यदिच्छन्ति। तच्वज्ञानस्य दुःखोच्छेदानन्दावासिरूप- त्वासंभवेन परिशेपात्तत्साधनत्वम्। . तदेवं साधनचतुष्टयसंपन्नस्य कर्मभिर्मोक्षासिद्धेर्मोक्षसाधनव्रह्मज्ञानाय वेदान्तवाक्यविचारः कर्त्तव्य इति शुतार्थः समग्रोऽपि सूत्रे संगृहीतः । एवं शास्त्रप्रवृत्तिहेतुत्वं च विचारकर्त्तव्यताया अन्वयव्यतिरेकसिद्धम्। सति ह्यनुवन्धत्रयोपेते विधौ पुरुपाः प्रवर्तन्ते, ज्योतिष्टोमादौ तथा दर्शनात्। असति तु न प्रवर्तन्ते, सप्तद्वीपा चसुमतीत्यादौ प्रवृत्त्यदर्शनाद। सा च विचारकर्त्तव्यता वक्ष्यमाणशास्त्रप्वृतिहेतुभूता प्रथमसूत्रेणाS- नेनेत्थं निणीयते- विमतं शास्त्रमारम्भणीयम्, सम्भावितविपयग्रयोजनत्वात्, कृष्यादिव- दिति। न च सूत्रे विपयप्रयोजनानुपादानाननाऽयं विपयः सूत्रसिद्ध इति उच्छेद और आनन्दावासिरूप नहीं हो सकता है, अतः परिशेपात् उन दोनोंके प्रति तत्त्वज्ञान साधन ही है। उक्त प्रकारसे साधनचतुष्टयसम्पन्न पुरुपको कर्मोंसे मोक्षफल नहीं हो सकता है, अतः अधिकारीको मोक्षके साधनीभूत ब्रह्मज्ञानके लिए वेदान्त-वाक्योंका विचार करना चाहिए, इस प्रकार समग्र श्रुति द्वारा अभिप्रेत अर्थ इस 'अथातो ब्रह्म- जिज्ञासा' सूत्रमं संगरहीत किया गया है। इस प्रकारसे अन्वय और व्यतिरेक द्वारा विचारकी कर्तव्यतामें शास्त्रके प्रति प्रवृत्तिकी हेतुता सिद्ध हुई, क्योंकि तीन अनुबन्धोंसे युक्त विधिमें पुरुष प्रवृत्त होते हैं, ऐसा ज्योतिष्टोम आदिमें देखा जाता है। और तीन अनुवन्धोंसे शून्य वस्तुमें किसीकी प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि 'ससद्वीपा वसुमती' (पृथ्वी सात द्वीपोंसे युक्त) इत्यादिमें प्रवृत्ति नहीं देखी जाती। और वह विचारकी कर्तव्यता आगे कहे जानेवाले शास्त्रमें प्रवृत्तिकी जनक है, अतः उसका इस प्रथम सूत्रसे निम्न लिखित प्रकारके न्यायवाक्योंसे इस प्रकार निर्णय किया जाता है- विवादग्रस्त वेदान्तशास्त्रका आरम्भ करना चाहिए, क्योंकि इस शासत्रके विपय तथा प्रयोजनरूप दोनों अनुबन्धोंका सम्भव है, जैसे कि कृपि (खेती) आदिका-उसके विषय और प्रयोजनके सम्भावित होनेसे-आरम्भ किया जाता है। यहांपर यह शङ्का नहीं करनी चाहिए कि सूत्रमें विषय और प्रयोजनका कथन न होनेसे यह विषय सूत्र द्वारा सिद्ध ही नहीं है, क्योंकि
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२० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
शङ्कनीयम्, सुखतोऽनुपादानेऽप्यर्थात् सूचितत्वात्। सूत्रस्य हि सूचनमलङ्गार, न तु दोपाय। तत्र तावद् 'जन्माद्यस्य यतः' इत्यादिशास्त्रेण विचार्याणां वेदान्तानां 'स वा अयमात्मा ब्रह्म' इत्यादिश्ुतिप्रसिद्धं ब्रह्मात्मैकत्वं विषयः। तच्चैकत्वमखण्डैकरसवस्तुप्रतिपादकेन ब्रह्मशब्देन सूत्रे सूत्रितम्। 'तरति शोकमात्मवित्' 'ब्रह्मविदामोति परम्' इत्यादिश्चुतिप्रसिद्धं दुःखोच्छेदव्रह्मग्रासती प्रयोजनम्। ते च तत्साधनभूतव्रह्मज्ञाननिर्द्देशात् सूत्रिते एव। न केवलं सूत्रकारो विषयप्रयोजने सत्रितवान्, किन्तु तयोरुपपादनं चवमभिप्रेयाय- विमत शास्त्रं सम्भावितविषयप्रयोजनम्, अविद्यात्मकवन्धप्रत्यनीकत्वात्, जाग्रद्ोधवदिति। न च वन्धस्याऽविद्यात्मकत्वमसूत्रसूचितमिति वाच्यम्, वन्धस्य
सूत्रकारने साक्षात् अपने सुखसे (अपने शब्दोंसे) यद्यापे ऐसा नहीं कहा है, तो भी अर्थतः सूचित कर दिया है। वाचक शब्दोंसे अमीष्ट अर्थका साक्षात् प्रतिपादन न कर अर्थात्-व्यञ्जना वृत्तिसे-उस अर्थका वोधन करना सूत्रोंका अल- झ्वार ही है, दोष नहीं है। पहिले विषयको लीजिए-'जन्माद्यस्य यतः' इत्यादि सूत्रों द्वारा विचार किये जानेवाले जो वेदान्तवाक्य हैं, उनका-'स वा अय- मात्मा ब्रह्म (यह आत्मा ब्रह्म है) इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे सिद्ध न्रह्मात्मक्य ही- विषय है, उस एकत्वरूपी विषयको-अखण्डेकरस वस्तुका वोध करानेवाले ब्रह्मशब्दके रखनेसे सूत्रकारने-सूचित किया। 'तरति शोकमात्मवित्' (आत्म- ज्ञानी शोकसे पार होता है) 'ब्रह्मविदाननोति परम्' (व्रह्मज्ञानवाला पर पदको प्राप्त करता है) इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे अवगत दुःखविनाश तथा परम पदकी प्राप्ति रूप फल ही. वेदान्तके प्रयोजन हैं। और इन दोनों प्रयोजनोंको इनके उपायभूत ब्रह्मज्ञानके निर्देशसे ब्रह्मजिज्ञासापदसे ही सूचित कर दिया है। सूत्रकारने विषय तथा प्रयोजनको ही सिर्फ सूचन नहीं किया, वल्कि निम्न- लिस्तत प्रकारसे इनका स्पष्ट उपपादन भी किया है-विवादग्रस्त शास्त्र. विषय तथा प्रयोजन दोनोंकी सम्भावनासे युक्त है, अविद्यास्वरूप बन्घका विरोधी (उच्छेद करनेवाला) होनेसे, जाग्रत् अवस्थाके ज्ञानके समान। यदि कहो कि वन्ध अविद्यात्मक है, इसको सूत्रकारने अपने सूत्रमें नहीं कहा है, अतः
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ब्रह्मविचारकी कर्तव्यता] भापांतुवादसहित २१
ज्ञाननिवर्त्यत्वाङ्गीकारेणैव तत्सूचनात्। तथा हि-निःशेपदुःखनिवर्तकत्वं तावद् ब्रह्लज्ञानस्य फलत्वसिद्धये सूत्रकारेणाऽङ्गीकृतम्। प्रमातृत्वकर्तृत्व- भोक्तृत्वादिवन्धंश्र सर्वोऽपि दुःखवीजत्वाद् दुःखमेव। तत्र विचारणीयम्- किमयं वन्धः पारमार्थिक: स्यादपारमार्थिको वेति। आद्ये ब्रह्मज्ञानान्न निवर्तेत । ये त्वेकदेश्यादयः पारमार्थिकस्यैव ज्ञानान्निवृत्तिमङ्गीकुर्युस्ते प्रष्टव्या :- ज्ञानं स्वविपये वा निवृत््याख्यमतिशयं जनयति स्वाश्रये वा? आद्येऽपि स्वविपयं संसारिणमात्मानमेव निवर्तयेद्, उत तह्गतं धर्ममात्रम्, अथवा स्व्वोध्याखण्डैकरसत्वविरोधिन एव कर्तृत्वादीन्, किंवा विषय- गतानवबोधमेव १ न तावत् प्रथमद्वितीयतृतीया:, नहि नानावर्णे चूतादि-
अविद्यात्मक वन्ध नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानसे वन्धनकी निवृत्ति माननेसे सूत्रकारने अर्थतः वन्धकी अविद्यात्मकता सूचित कर ही दी है। कारण कि सूत्रकारने ब्रह्मज्ञानको वेदान्तवासतरके फलकी सिद्धि करनेके लिए दुःखका उच्छेद करनेवाला मान ही लिया है। और प्रमातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि सम्पूर्ण बन्ध भी दुःखके प्रति हेतु होनेसे स्वयं दुःखरूप ही हैं। इस परिस्थितिमें यहांपर इस प्रकार विचारना चाहिए- यह वन्ध (संसार) पारमार्थिक (सत्य) है अथवा अपारमार्थिक (मिथ्या) है? यदि कहो कि पारमार्थिक है, तो उसकी ब्रह्मज्ञानसे निवृत्ति नहीं हो सकेगी। जिन भास्कर आदि एकदेशियोंने पारमार्थिक सत्य वस्तुकी ही ज्ञानसे निवृत्ति मानी है, उनके प्रति प्रश्न करना चाहिए कि क्या ज्ञान अपने विपयमें निवृत्ति नामका कोई विशेष उत्पन्न करता है? अर्थात् ज्ञानके होनेसे उसका विषय निवृत्त हो जाता है अथवा क्या अपने आश्रयमें वह ज्ञान उक्त विशेषको उत्पन्न करता है अर्थात् ज्ञान अपने आश्रयको ही हटा देता है? यदि प्रथम पक्ष मानो, तो उसमें भी प्रश्न इस प्रकार किये जा सकते हैं कि क्या वह ज्ञान अपने विपीभूत केवल संसारी आत्माकी ही निवृत्ति करता है ? अथवा अपने विषयमें रहनेवाले सम्पूर्ण धर्मोंकी निवृत्ति करता है? अथवा आत्मपदसे ज्ञात होनेवाले अखण्डैकरसके विरोधी-कर्तृत्व आदि धर्मोंकी ही निवृत्ति करता है? या केवल विपयके अज्ञानकी निवृत्ति करता है ? परन्तु इन विकल्पोंमें से प्रथम, द्वितीय और तृतीय विकल्प तो युक्त ही नहीं हैं, क्योंकि विचित्र वर्णवाले
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२२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
फले नीलभागज्ञानं स्वविषयं वा तत्समवेतरसादिकं वा विरोधिनं पीति- मादिगुणं वा निवर्तयति। चतुर्थे त्वस्मन्मतापत्तिः। आश्रयातिशयपक्षेऽरपि किमाश्रयनिवृत्तिः, किं वा तद्गुगानाम् उताश्रयं विपयोभयसंवन्धिधर्माणाम्? नाऽडद्य:, प्रतिक्षणमात्मविनाशापत्ते:। न द्वितीयः, घटज्ञानेनाऽSत्मगतधर्मादि- गुणानिवृत्तेः । न तृतीयः, स्वदेहज्ञानेन देहात्मसंचन्धाद्यनिवृत्तेः। 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति' इति श्षतत्वाद् वास्तवोऽपि बन्धो ज्ञानविवर्त्य इति चेद्,
अर्थात् चितकवरे आम आदि फलके नीलगुणविशिष्ट भागका परिज्ञान- अपने विषयीभूत फलको या उसमें (आममें) समवाय सम्बन्धसे रहनेवाले रस आदिको अथवा नीलके विरोधी पीत आदि गुणोंको-निवृत्त नहीं करता है। यदि चतुर्थ विकल्पका अर्थात् ज्ञान विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति करता है, इस चौथे विकल्पका अङ्गीकार किया जाय, तो हमारे (वेदान्तियोंके) मतमें ही तुम्हारा आना हुआ। ज्ञान अपने आश्रयमें (आत्मामें) अतिशयको-निवृत्ति नामके विशेषको-उत्पन्न करता है, इस द्वितीय विकल्पका अङ्गीकार, यदि किया जाय, तो उसमें भी प्रश्न होता है कि क्या वह ज्ञान आश्रयकी (आत्माकी) ही निवृत्ति करता है? अथवा उसके गुणोंकी निवृत्ति करता है अथवा आश्रय और विषय दोनोंके साथ सम्बन्ध रखनेवाले धर्मोंकी निवृत्ति करता है ? इनमें पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानसे आश्रयकी निवृत्ति माननेसे प्रतिक्षण ज्ञानके होनेसे प्रत्येक क्षणमें आत्माके विनाशकी प्रसक्ति होगी। द्वितीय विकल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि घटज्ञानसे आत्माके गुणोंकी निवृत्ति नहीं देखी जाती। तीसरा विकल भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपनी देहका ज्ञान होनेसे शरीर और आत्माके सम्बन्ध आदि निवृत्त नहीं होते। यदि* शङ्का हो कि 'तमेव विदित्वा०' (उस परमात्माको जानकर विद्वान् पुरुष मृत्यु-संसार-को पार कर जाता है.) इस प्रकारकी श्रुतिमें प्रपश्चकी उक्ति होनेसे संसारके सत्य
*शङ्काका अभिंप्राय यह है कि यदि बन्ध मिथ्या होता, तो मिथ्यापदार्थ कुंछ है ही नहीं फिर उसकी निवृत्तिके उपायको दिखलानेकी आवश्यकता ही क्या थी ? उपाय दिखाया गया है, अतः वन्धनकी सत्यता माननी होगी।
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ग्रह्मविचारकी कर्तव्यता ] भापानुवादसहित २३
न; अतेर्बन्धसत्यत्वासत्यत्वयोस्ताटस्थ्यात्। अस्माभिस्तु अ्तोपप्त्यर्थ वन्धस्याऽविद्यात्मत्वं कल्प्यते । यथाज्योतिष्टोमादीनां श्तस्य स्वर्ग- साधनत्वस्योपपत्यर्थमपूर्व भवद्िः कल्प्यते तद्वत्। अथ तत्र क्षणिकानां कर्मणां कालान्तरभाविफलसाधनत्वाभावव्याप्तिनियम: कल्पकोऽस्ति, तहीं- हाऽपि 'ज्ञानमज्ञानस्यैव निवर्तकम्' इति व्याप्तिनियम: कल्पकोऽस्तु । अतोऽ- पारमार्थिकत्वमवशिष्यते बन्धस्य। तदेवं ब्रह्मज्ञाननिवर्त्यस्य वन्धस्याजज्ञा- नात्मकत्वं सूत्रेणेव सूचितम् । माननेपर भी उसकी ज्ञानसे निवृत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि श्रुति केवल इतना ही ग्रतिपादन करती है कि बन्ध (संसार) केवल ज्ञानसे निवृत्त होता है, बन्ध सत्य है या मिथ्या, इस विपयमें श्रुति तटस्थ है।। अतः श्रुतिप्रतिपादित अर्थकी उपपत्तिके लिए हम बन्धको अविद्यात्मक मानते हैं। जैसे कि 'स्वर्गका * यजेत' (स्वर्गकी इच्छावाला याग करे) इस श्रुतिवाक्यसे बोधित स्वर्गसाधनताकी ज्योतिष्टोम आदि यागमें सङ्गतिके लिए आप (मीमांसक) भी अपूवकी कल्पना करते हैं। यदि शङ्का हो कि याग तो क्रियाकलाप- रूप है, और क्रिया क्षणिक है अर्थात् अस्थायी है, तथा स्वर्ग आदि फल यागके अव्यवहित उत्तर क्षणमें तो होते नहीं, किन्तु कुछ कालके बाद होते हैं, अतः कार्यके अव्यवहित पूर्वकालमें रहनेवाला ही कारण हो सकता है, इस नियमसे क्रिया- त्मक याग स्वर्गके प्रति साधन नहीं हो सकता है, इससे श्रुतिकी सङ्गतिके लिए अपूर्वकी कल्पना की जाती है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्त्या हम भी कहेंगे कि 'ज्ञानमज्ञाननाशकम्' अर्थात् ज्ञान अज्ञानका नाशक होता है, यह लौकिक नियम ही बन्घकी अज्ञानात्मकताका कल्पक है। इसलिए बन्घका अपार- मार्थिकत्व ही (मिथ्यात्व ही) अवशिष्ट रह जाता है। अतः पूर्वोक्त सम्पूर्ण शास्त्ार्थसे ब्रह्मज्ञानसे निवृत्त होनेवाले बन्घकी अज्ञानात्मता ही सूत्र द्वारा सूचित की गई। + तात्पर्य यह है कि वन्धका सत्यत्व या मिथ्यात्व जो उपपन्न हो उसे मान लीजिए, इसमें श्रुतिका कोई विरोध नहीं है। अव हमसे पूछिए-चन्ध सत्य है या मिथ्या? हम कहेंगे कि वन्धको सत्य मानकर उसकी ज्ञानसे निवृत्ति माननेमें पूर्वोक्त दोष आते हैं, और सत्य वस्तुकी निवृत्तिका सम्भव भी नहीं है। प्रपश्वकी ईश्वरज्ञानसे निवृत्ति मानना भी दृष्टान्तकोटिको नहीं पा सकता, क्योंकि निवृत्त होवेवाला प्रपथ् तो हमारे मतमें मिथ्या ही है। अब परिशेपात् बन्धको मिथ्या ही मानना होगा। इससे उसकी निवृत्तिका भी सम्भव हो सकता है। बन्धको अविद्याकल्पित माने थिना श्रुतिका, ब्रदाज्ञानसे मृत्युका पार करना, यह अर्थ करना कमी भी सकत नहीं हो सकता।
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२४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
नन्वेवं तदविद्यात्मकत्वं सूत्रकारेण मुखत एव वर्णनीयम्, विषयप्रयोजन- साधनद्वारा कृत्स्शास्त्रारम्भसमर्पकंत्वात्। मुखतोऽप्रतिपादनेऽतात्पर्यप्रसङ्ग इति चेत्, तहिं वर्णितमेवैतन्ुखतो द्वितीयाध्याये 'तद्गुणसारत्वाद्' इत्यादि- सूत्रे। सूत्रस्य चाऽयमर्थ :- आत्मनो देहोत्क्रान्तिपरलोकगत्येतल्लोकागतीनां श्रुतत्वात् सर्वगतत्वं विरुद्धमिति चेद्, वुद्धिगुणसारत्वात्। बुद्धयात्मनोरि- तरेतरतादात्म्याध्यासेन बरुद्धिगुणेष्वेवोत्क्रान्त्यादिषु सर्वगतस्याऽडत्मनोऽभि- मानमात्रं जायते। तच्च श्त्याऽनूद्यते-निजस्वरूपघोधनायेति। तहिं
पुनः शङ्का करते हैं कि यदि वन्ध अविद्यात्मक है, यह सूत्रकारको अभिमत है, तो उन्हें अपने मुखसे ही बन्ध अविद्यात्मक है, ऐसा कहना चाहिए था, क्योंकि मुखतः प्रतिपादित वन्धका अज्ञानात्मकत्व ही सम्पूर्ण शास्त्रका प्रारम्भ करनेमें हेतु होता है। यदि उसका अर्थात् वन्धकी अविद्यात्मकताका सूत्रकारने मुखसे प्रतिपादन नहीं किया है, तो सूत्रकारका उसमें तात्पर्य भी नहीं हो सकता है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि बन्धकी अविद्यात्मकताक्का द्वितीय अध्यायमें 'तद्रुणसारत्वात्' इत्यादि सूत्रमें स्पष्टरूपसे अपने ही मुखसे सूत्रकारने प्रतिपादन किया है। उक्त सूत्रका यह अर्थ है- आत्माकी देहसे उत्ान्ति विरुद्ध है (निकलना), परलोककी यात्रा और इस लोकमें आगति (आना) श्रुतिमें सुनी जाती हैं, अतः उसका सर्वगतत्व (सब्र जगह रहना) विरुद्ध है, [अर्थात् जो सर्वत्र विद्यमान है, उसका आना, जाना और निकलना कैसे वन सकता है, क्योंकि वह तो सर्वत्र विद्यमान ही है, फिर उसका कहांसे और कहां आना जाना हो? यदि जैसे हम एक गांवसे दूसरे गांवमें जाते हैं वैसे ही वह मी इस लोक और परलोकमें जाता आता है, ऐसा माना जाय, तो वह सर्वगत सब कालमें सब जगह विद्यमान कैसे होगा ? ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर सूत्रकार उत्तर देते हैं]-'तहुणसारत्वात्' सूत्रमें तत्पदका अर्थ वुद्धि, जो मन, अन्तःकरण आदि नामसे भी कही जाती है, लिया गया है। उसके गुण काम-सङ्कल या गमनाऽगमन आदि लिए जाते हैं। सूत्रार्थ हुआ-बुद्धि और आत्माका इतरेतराध्यास होनेसे वुद्धिके पूर्वोक्त जाना-आना आदि गुणोंमें सर्वगत आत्माको अभिमानमात्र हो जाता है, उस अध्यासमूलक स्व्गतत्वाभिमानको ही लेकर 'अपनी गति, आगति, उत्क्रान्ति आदि माननेवाले. अरे जीव ! तू सर्वगत आत्मा है'
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ब्रह्मविचारकी कर्तव्यता ] भापानुवादसहित २५
कृत्सशास्त्रारम्भं प्रत्युपोद्घातत्वात् प्रथममेवाऽध्यासविपयं सूत्रं प्रणेतच्यम्। उपोद्घातश्र प्रतिपाद्यमथं वुद्धौ संगृह्य ग्रागेत् तदर्थमर्थान्तरवर्णनमिति चेद्, न; अतिपादने प्रवृत्तेन सूत्रकारेण विरोधपरिहारसूत्रस्य प्रथमतो चक्तुमशक्यत्वात्। प्रतिपादयं मुखतः प्रतिज्ञाय पश्चात् तत्सिद्धिहेतुप्रदर्शनं प्रतिपादनम्। तथा च प्रथमेनाऽध्यायेन ब्रह्मणि वेदान्तसमन्वयं प्रदर्श्य तदु- पपादको विरोधपरिहार: पश्चात् कर्त्तव्यः । ग्रथममग्रदर्शिते पुनः समन्वय- विशेपे तदविरोधाशङ्का तन्निराकरणं च निर्विपयं स्यात्। नन्वेवमादावध्यासानुक्ता विपयप्रयोजनासिद्धया शास्त्रप्रवृत्तिर्न स्याद्, इस प्रकार केवल अपने स्वरूपका बोध करानेके निमित्त क्ुति अनुवाद करती है, अतः उक्त सूत्रका वाच्यार्थ यह हुआ कि सर्वगत आत्मामें कर्तृत्व आदि ससर्गाध्यासमूलक होनेसे मिथ्या हैं। इससे वन्ध अविद्यात्मक है, इसमें सून्नकारका तात्पर्य स्वरसतः उपपन्न हुआ। यदि शक्का हो कि ऐसी दद्यामें, यह सूत्र रचे जानेवाले इस सम्पूर्ण त्रह्ममीमांसाशास्त्रके प्रति उपोद्घातरूप हुआ, इसलिए चन्धको मिथ्या कहनेवाला अध्यासप्रतिपादक सूत्र ही सर्वप्रथम लिखना चाहिए था, क्योंकि अपने वत्तव्य अर्थका बुद्धिमें सङ्गहकर ग्रन्थप्रणयनसे पूर्व ही उसके अनुकूल दूसरे अर्थका वर्णन करना ही अर्थात् प्रतिपाद्य अर्थका प्रतिपादन करना ही उपोद्यात कहा जाता है [ संक्षेपतः इसका आशय यह हुआ कि वेदान्तका तात्पर्य न्रम्यान्म्यक्यमें ही है, उसकी सिद्धि अध्याससिद्धिके अधीन है, अतः अध्यासका ही मुख़तः प्रथम वर्णन करना उचित है], तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सूत्रकार प्रतिपाद्यके प्रतिपादनमें प्रवृत्त हैं, इसलिए विरोध-परिहार करनेवाला उक्त सूत्र सर्व- प्रथम-प्रतिपादके प्रतिपादनसे पूर्व-नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रतिपाद्य अर्थकी सर्वप्रथम साक्षात् तद्वाचक शव्दोंसे प्रतिज्ञा करके पश्चात् प्रतिपाद्य अर्थकी सिद्धि करनेवाले हेतु (न्यायवाक्य) का प्रयोग करना प्रतिपादन कहलाता है। इसलिए पहले अध्यायसे सभी वेदान्तोंका तात्पर्य ब्रह्म (ब्रह्मात्मैक्य) में ही है, यह दिख़लाकर वादमें उसका प्रतिपादक विरोध-परिहार करना ही उचित समझा जाता है। यदि पहले समन्वयविशेपका प्रदर्शन न किया जाता, तो उसके विरोधकी आश़क्का और उसका परिहार निरर्थक होता। इसपुर भी यदि शक्ा हो कि यदि पहले अध्यासका स्वरूप न कहा जाय, तो विषय और प्रयोजनकी असिद्धि, होनेसे शासत्रमें प्रवृत्ति नहीं होगी? तो
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२६ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
मैवम्; अथमसूत्रेऽध्यास: साक्षादनुक्तोऽप्यर्थात् सूचित इत्युपपादितत्वात् सिध्यत्येव शास्त्रप्रवृतिः॥।२।। ननु सूत्रसूचितोऽप्यध्यासो न युक्तिसहः । तथा हि-आत्मानात्मानौ इतरेतरतादात्म्याध्यासरहितौ, क्वाऽपीत रेतरभावरहितत्वात्, तमःप्रकाशवत्। न च हेत्वसिद्धि:, विमतौ तादात्म्यशून्यौ, विरुद्धस्वभावत्वात्, तमःप्रकाश- चत्। न चाडसिद्धो हेतु:, विमतौ विरुद्धस्वभावी, युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरत्वाद्, देवदचतद्वैरित्। न च वाच्यं देवदत्तस्य स्वशरीरादिसंघातेऽस्मत्प्त्यय- स्तत्रैव तद्दैरिणो युष्मत्प्रत्ययः; नच तत्र विरोधोऽस्ति। एवं तद्वैरिण्यपि यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रथम सूत्रमें यद्यपि साक्षात् अध्यास नहीं कहा गया है, तथापि अर्थात् उसका उपपादन किया गया है, अतः शास्त्रमें प्रवृत्ति हो सकती है।।२।। यदि शक्का हो कि अध्यास सूत्र द्वारा सूचित होने पर भी युक्तियोंसे सिद्ध नहीं हो सकता है। कैसे? देखिए-आत्मा और अनात्मा परस्पर तादास्म्याध्याससे रहित हैं, कहींपर भी उनके परस्पर तादात्म्यकी उपलब्धि न होनेसे, प्रकाश और अन्धकारके समान । यदि शङ्का हो कि उक्त अनुमानके हेतुकी सिद्धि नहीं है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मा और अनात्मा तादाम्याध्याससे रहित हैं, विरुद्धस्वभाववाले होनेसे, तम और प्रकाशके समान। यदि शङ्का हो कि इस अनुमानमें भी हेतुकी असिद्धि है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि विमत अर्थात् आत्मा और अनात्मा परस्पर विरुद्ध स्वभाववाले हैं, युष्मत्प्रत्यय और अस्मत्परत्ययके* विषय होनेसे, देवदत्त और उसके वैरीके समान। यदि शक्का हो कि देवदत्तको अपने शरीर, इन्द्रिय आदि सङ्गातमें जहाँ अस्मत्प्रत्यय (मैं व्यवहार) होता है, चहींपर उसके वैरीको युष्मत्प्रत्यय (तू व्यवहार) होता है, परन्तु वहाँ विरोध नहीं है, वैसे ही देव- * युष्मत्प्रत्यय और अस्मत्प्रत्यय हैं-तू और मैं इस प्रकारके व्यवहार। सामान्य घट, पट आदिका व्यवहार ही, जो आत्माके लिए नहीं होता है, युप्मत्प्रल्यय कहलाता है। आत्माके व्यवहारको अस्मत्प्रत्यय कहते हैं। घट, पट आदि जितने अनात्म पदार्थ हैं, वे सव के सव युष्मत्प्रत्ययके विषय हैं और आत्मा अस्मतप्रात्ययका विषय है। भागेके ग्रन्थमें भी जहाँ युष्मत्प्रल्यय और अस्मत्प्रत्ययका प्रयोग हो, वहाँपर भी यही अर्थ समझना चाहिए।
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आत्मांनात्माका तादांत्म्याध्यास ] भापांनुवाद्साहेत
प्रत्ययव्यत्यासेन योजने दृष्टान्त: साध्यविकल: स्यादिति। नहि भिन्ना- श्रययोः अत्यययोविंपया दष्टान्तत्वेन विवक्ष्येते; किं तहिं समानाश्रययो- रिति। नहि प्रत्येकाकारौ दृष्टान्तत्वेन विवक्ष्येते; किं तहिं देवदत्तप्रतीत्या तद्वैरिप्रतीत्या च सिद्ध: समुदायाकारो दृष्टान्त इति नोक्तदोप:। स्यादेतत्- किमत्र लोकग्रसिद्धावात्मानात्मानौ पक्षीक्रियेते१ किं वा प्राभाकरादि- सिद्धौ ? उत वेदान्तिसिद्धी १ नाऽडद्यः, द्वयोरनुमानयोः सिद्धसाधनत्वात्। तृतीयानुमानस्याऽनुभवविरोधात्। लोके हि देहादिचैतन्यान्तसंघात आत्मा पापाणादिरनात्मा। न च तयोरैक्याध्यासैक्ये वेदान्त्यभिमते। नाऽपि
दत्तके वैरीमें भी प्रत्ययको (न्यवहारको) उलटा करनेसे अर्थात् देवदत्तके वैरीको अपने शरीरसङ्कातमें जहाँ अस्मत्पत्यय-मैं, इस प्रकारका व्यवहार-होता है, उसी शरीर- सद्गातमें देवदत्तको युष्मत्पत्यय-तू, इस प्रकारका व्यवहार-होता है, इसीसे भी युष्मत्प्रत्यय और अस्मत्पत्ययका विरोध नहीं है, अतः दृष्टान्तवाक्य-तृतीय अनुमानमें जो 'देवदत्त और उसके वैरीके समान, यह जो दष्टान्त दिया है-वह साध्यसे- विरुद्धस्वभाववत्त्वरूप साध्यसे-हीन होगा? तो यह शङ्का भी युक्त नह्ीं है, क्योंकि हम भिन्न-भिन्न पुरुपके व्यवहारके विपयको-युष्मत्प्रत्ययगोचर और अस्मत्पत्ययगोचरको-दष्टान्तरूपसे नहीं कहते हैं, किन्तु समानाश्रय- वाले प्रत्ययके विपयको कहते हैं, वैसे प्रत्येक अलग-अलग देवदत्त और उसके चैरी दष्टान्त नहीं हैं, किन्तु देवदत्तकी और उसके वैरीकी प्रतीतिसे सिद्ध हुआ जो समुदायाकार है, उसको ही दष्टान्त मानते हैं, अतः दृष्टान्त साध्यहीन नहीं हो सकता है। यहाँ शङ्का करते हैं कि इन अनुमानोंमें जो आत्मा और अनात्मा पक्षरूपसे कहे गये हैं, क्या वे लोकप्रसिद्ध आत्मा और अनात्मा हैं, या प्रभाकर आदि द्वारा माने गये आत्मा और अनात्मा हैं या वेदान्तियों द्वारा माने गये आत्मा और अनात्मा हैं ? प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं है, क्योंकि उसके माननेसे प्रथम अनुमानमें और द्वितीय अनुमानमें सिद्धसाधन होगा और तृतीय अनु- मानमें अनुभवविरोध होगा, कारण कि लोकमें यह सिद्ध है कि देहादिचतन्या- न्तका समुदाय आत्मा है और पापण (पत्थर) आदि अनात्मा हैं और उनके तादात्म्याध्यास और उनकी एकता वेदान्ती वस्तुतः नहीं मानता है, और उनका
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२८ विवरणप्रमेयसंग्रहं [ सूत्र १, वर्णक १
तयोनियतो विरोधोऽनुभूयते। न द्वितीयः, प्राभाकरादयो हि प्रमातृत्वकर्तृ- त्वभोकृत्वाद्याश्रयं जडमात्मानमाहु, इन्द्रियदेहाद्यखिलग्रपञ्चमनात्मानम्। तत्र वेदान्तिमते प्रमातृत्वाद्याश्रयोऽहङ्कारो जाड्यं च तत्कारणमज्ञानमित्यु- भयमप्यनात्मन्येवाऽन्तर्भवति। तथा चाऽनात्मन एककोटेरध्यासतादात्म्यविरो- धानङ्गीकारात् पूर्वोक्तमेव दोषद्वयं स्यात्। न तृतीय:, वेदान्तिनो हि सर्वों- पपुवरहित विज्ञानघनमात्मानमाहुस्तव्वतिरिंक्त च सर्वमनात्मानम्। तत्र कि- मेकस्मिन् प्रत्ययद्वयगोचरत्वं हेतुत्वेन विवक्षितम् उताऽत्मन्यस्मत्प्रत्ययगोचर- त्वम् अनात्मनि चेतरदिति। आद्ये स्वरूपासिद्धिः, द्वितीये भागासिद्ि: । परस्पर विरोध भी नियमसे नहीं भासता है। द्वितीय पक्ष भी अर्थात् प्रभाकर आदि द्वारा माने गये आत्मा और अनात्मा भी पक्ष नहीं हो सकते हैं, क्योंकि प्रभाकर आदि आत्माको कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्मोंका आश्रय तथा जड़ मानते हैं और इन्द्रिय, देह आदि सम्पूर्ण प्रपश्चको अनात्मा मानते हैं। इस परिस्थितिमें वेदान्तीके मतके अनुसार प्रमातृत्व आदि धर्मोंका आश्रय अहक्कार और उसका कारण जड़ अज्ञान ये दोनों अनात्म पदार्थोमें ही अन्तर्भूत होते हैं, इसलिए अनात्मरूप एक कोटिमें तादात्म्याध्यास और विरोधिताका स्वीकार न होनेसे पूर्वोक्त ही दोष अर्थात् सिद्धसाधन और अनुभवविरोध इस द्वितीय कल्पमें भी आते हैं। तृतीय पक्ष अर्थात् वेदान्ती द्वारा स्वीकृत आत्मा और अनात्मा पक्ष हैं, यह पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि वेदान्ती लोग सव उपाधियोंसे रहित विज्ञानरूप पदार्थको ही आत्मा मानते हैं और उससे भिन्न सम्पूर्ण पदार्थों- को अनात्मा मानते हैं, अब इसमें यह पूछा जाता है कि क्या एक वस्तुमें रहनेवाली युष्मत्मत्ययविषयता और अस्मत्प्रत्ययविपयता हेतु है ? अथवा मिन्न वस्तुमें रहनेवाली अर्थात् आत्मामें अस्मत्पत्ययविषयता और अनात्मामें युष्मत्प्रत्ययविषयता हेतु है? प्रथम पक्ष मानना तो युक्त नहीं है, क्योंकि प्रथम पक्षका आश्रयण करनेसे स्वरूपासिद्धि दोप होगा *। द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस पक्षका अवलम्बन करनेसे । भागासिद्धि * पक्षमें हेतु नहीं रहेगा अर्थात् एक वस्तुमें युष्मत्प्रत्यय और अस्मत्प्रत्ययकी विपयता नहीं रह सकती है, अतः विरुद्धस्त्रभावका साधन नहीं हो सकता है, यह भाव है। + पक्षके एक देशमें हेतुका न रहना भागासिद्धि है।
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आत्मानात्माका तादात्म्याध्यास ] भापानुवादसहित २९
देहेन्द्रियान्त:करणप्राणादिष्वनात्मसु युष्मत्प्रत्ययाभावात्।व्यवहारदष्टया तद्भावेऽपि शास्त्रदृष्टया 'चिदवभास्यो युष्मदर्थः' इत्येतल्लक्षणानुसारेणास्त्येव तत्र युष्मत्प्रत्यय इति चेद्, एवमपि स्वप्रकाशे चिदात्मनि वेदान्तिनामस्म- त्प्रत्ययाभावात् स दोपस्तद्वस्थः । तस्मात् नाऽनुमानसिद्धिरिति। अत्रोच्यते-वेदान्तिनं प्रत्यस्त्येवाऽनुमानसिद्धिः। न चाऽडत्मनि भागा- सिद्धिः; स्वग्रकाशस्याप्यहङ्कारे स्फुटतरव्यवहारयोग्यत्वेनाऽस्मत्प्रत्ययगोचर- त्वस्योपचरितुं शक्यत्वाद्। न चैवं मन्तव्यं देहद्वयसाक्षिणोश्चैतन्ययोरन्योन्यं युष्मदस्मदर्थत्वेऽपि विरोधाभावादनैकान्तिक इति; चैतन्यस्य चिद्वभास्यत्व- लक्षणलक्षितयुप्मदर्थत्वाभावाद्। तादश एव चाऽत्राऽभिप्रेतो न तु लौकिक-
दोप होगा। कारण कि देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण आदि अनात्म पदार्थोंमें युष्मत्प्रत्ययकी विषयता नहीं है। यदि शक्का हो कि यद्यपि व्यवहारदष्टिसे अन्तःकरण आदि अनात्माओंमें युष्मत्पत्ययकी विषयता नहीं है, तथापि शासत- दृष्टिके अनुसार अर्थात् 'चिदवभास्यो युष्मदर्थः' इस लक्षणके अनुसार तो अन्तःकरण आदिमें युष्मत्प्रत्ययकी विपयता है ही, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर भी स्वप्रकाश चिदात्मामें वेदान्ती लोग अस्मत्पत्ययकी विपयताका अङ्गीकार नहीं करते हैं, इसलिए भागासिद्धि और स्वरूपासिद्धि तदवस्थ ही हैं, अतः उक्त अनुमानकी सिद्धि नहीं हो सकती है। उक्त शक्काका समाधान करते हैं-वेदान्तीके प्रति तथोक्त अनुमानकी सिद्धि हो सकती है। यदि शङ्का हो कि आत्मामें भागासिद्धि पूर्वमें दी गई है, तो वेदान्तीके प्रति उक्त अनुमान कैसे हो सकता है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आत्माके स्वप्रकाश होनेपर भी अहक्कारके रहते ही वह स्पष्ट व्यवहारका योग्य, होता है, अतः 'अस्मत्परत्ययकी विपयता उसमें गौणरूपसे मानी जाती है। यदि शङ्का हो कि दोनों शरीरोंके अर्थात् देवदत्त और उसके प्रतिद्वन्दीक शरीरोंके साक्षीरूप चैतन्यमें परस्पर युष्मदर्थ और अस्मदर्थका (अर्थात् तू और मैं इस प्रकारका) व्यवहार होनेसे युष्मदर्थ और अस्मदर्थका विरोध न होनेके कारण व्यमिचार होगा? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्य चिदवभास्यत्वरूप लक्षणसे लक्षित युष्मदर्थ नहीं. हो सकता, अतः प्रकृतमं वही चिदवभास्यत्वरूप-चित्से प्रकाशित होनेवाला-
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३० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक
युष्मदर्थः। तथाऽप्येतेनाऽनुमानेन प्रत्ययद्वारा विरोधसिद्धिर्न तु स्वरूपेणेति चेद् तर्ह्येवमस्तु- आत्मानात्मानौ विरुद्धस्वभावौ, विपयिविपयत्वात्, नेत्ररूपचदिति। ननु चिद्ूपस्याऽडत्मनो जड़रूपमनात्मानं अ्रति साधकत्वेनाऽडनुकूल्यमनुभूयते; अतो वध्यघातकभावलक्षणस्य सहावस्थानसामर्थ्याभावलक्षणस्य वा विरो- धस्य च प्रातिकूल्यस्य प्रसाधनेऽनुभवविरोध: तथा दष्ान्तथ् साध्यविकल इति चेद्, मैवम्; भावाभाववत् परस्परात्मतासामर्थ्याभावलक्षणस्य विरोधस्येह विधक्षितत्वात्। कथं तर्हि मध्याऽनुमाने तमःप्रकाशयोर्द्दष्टान्तत्वम्, तयोः सहावस्थानसामर्थ्याभावलक्षणविरोधस्य अ्सिद्धत्वादिति चेद्, मैवम्; मन्दप्रदीपे वेश्मनि तमसो दीपेन सहावस्थानात्। अन्यथा स्फीतालोकप्रदेश- युष्मदर्थ विवक्षित है, अतः उक्त दोष नहीं है। अव पुनः शक्का करते हैं कि तथोक्त अनुमानसे यही सिद्ध होता है कि आत्मा और अनात्माका प्रतीतिसे ही विरोध है, वस्तुतः अर्थात् स्वरूपतः विरोध नहीं है? तो इसपर कहते हैं कि यही अनुमान हो- आत्मा और अनात्मा विरुद्धस्त्रभाववाले हैं, क्रमशः विपयी और विपय रूप होनेसे, नेत्र और रूपके समान। यदि शङ्का हो कि चैतन्यरूप जो आत्मा है, वह जड़रूप अनात्माका साधक है, अतः उस आत्मामें अनात्माके प्रति अनुकूलता ही अनुभूत होती है, अतः उनके नाश्यनाशकरूप अथवा एक साथ अवस्थितिमें असामर्थ्यरूप विरोध या प्रतिकूलताका साघन किया जाय, तो अनुभवविरोध होगा और 'नेत्र और रपके समान' इस प्रकार जो दृष्टान्त दिया गया है, वह साध्यशून्य भी होगा? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो आपने दो प्रकारके विरोध ऊपर वतलाये हैं, उनमें से एकका भी साधन नहीं किया जाता है, किन्तु भावपदार्थ और अभावपदार्थके समान परस्पर तादा- त्म्यसामर्थ्यका जो अभावात्मक विरोध है, वही प्रकृतमें विवक्षित है। अव यदि सहावस्थान होनेसे विरोध नहीं किया जाता, तो पूर्वोक्त द्वितीय अनुमानमें अन्धकार और प्रकाशका दष्टान्त कैसे सङ्गत होगा, क्योंकि इन दोनोंमें तो एक साथ न रहना रूप ही विरोध प्रसिद्ध है, तो इस प्रकारकी शङ्का भी नहीं जँचती, क्योंकि टिमटिमाते हुए दीपवाले घरमें अन्धकारका भी दीपकप्रकाशके
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तमकी भावरूपताका विचार ] भापानुवादसहित ३१
वदत्राऽपि स्पष्टरूपदर्शनप्रसङ्गाद्। तम:प्रकाशशव्दाभ्यां तदेकदेशभूतौ छायातपावुपलक्ष्येते इति चेत्, तथाऽपि छायायामेकविधायां तारतम्येनोप- लभ्यमानमौपूण्यं स्व्रधर्मिण आतपस्यापि अवश्यमवस्थानं सूचयतीति सहावस्थानं दुर्वारम्। एवमेव तम:प्रकाशशव्दराभ्यां लक्षितलक्षणया छायातपस्थयो शैत्यौ- पण्ययोः स्वीकारेऽपि सहावस्थानं सुसंपादम्। तस्मात् जातिव्यक्तयोर्यथा तादात्म्यसामर्थ्यं नैवं तमःप्रकाशयोरित्ययमेव तयोविरोधः ॥ ३।। ननु तम:प्रकाशटष्टान्ते भावाभावरूपत्वमुपाधि:। आलोकाभावस्तम इति तार्किका रूपदर्शनाभावस्तम इति आ्रभाकरा इति चेद्; मैवम्; उप- साथ रहना देखा गया है। यदि ऐसा न मानो, तो जैसे अधिक तेजके प्रकाशमें स्पष्ट रूपदर्शन होता है, उसी भाति मन्द प्रकाशमें भी स्पष्ट रूपदर्शन होना चाहिए। यद्यपि तमपदसे अन्धकारसामान्य नहीं लेते, किन्तु उस अन्धकारका ही एक अवयव (विशेषरूप) छाया लेते हैं एवं प्रकाशशव्दसे भी प्रकाशका एकेदश आतप (धूप) ही लेते हैं, तब इनका सह अवस्थान (साथ रहना) नहीं होता, तो पूर्वोक्त विरोध बना ही है, ऐसा कह सकते हैं, तथापि एक प्रकारकी छायामें तारतम्यसे (कमी वेशीसे) अनुभवमें आनेवाली गरमी अपने धर्मी आतप- का भी अवश्य रहना सूचित करती ही है। धर्मीके विना धर्मका रहना असम्भव है, अतः यदि वहां धर्मकी उपलन्धि है, तो धर्मी अवश्य है, अतः सहाव- स्थान दुर्वार है। इसी प्रकार 'तम और प्रकाश शब्दोंसे लक्षितलक्षणा द्वारा छाया और आतपके स्थानमें अनुभवमें आनेवाली ठंढक और गरमी लेते हैं' ऐसा यदि स्वीकार किया जाय, तो भी सहावस्थान वन सकता है [क्योंकि ऐसे स्थानपर सर्दी और गरमीका भी तारतम्यसे एक साथ रहना होता ही है]। इन सवसे यही निर्णय होता है कि जिस प्रकार जाति और व्यक्तिका तादात्म्य (अमेद) है, उस प्रकार प्रकृत अन्धकार तथा प्रकाशका भी तादात्म्य न होना ही विरोध है ॥३॥ यदि शक्का हो कि तमःप्रकाश दष्टान्तमें भावाSभावत्वरूप उपाधि है। क्योंकि प्रकाशका अभाव अन्धकार है, यह नैयायिक मानते हैं और प्राभाकर कहते हैं कि रूपदर्शनका अभाव अन्धकार है, इसलिए सोपाधिक दष्टान्त होनेसे अनुमान नहीं वन सकता, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि जो वस्तु उपचय (वृद्धि)
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३२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
चयापचयाद्यवस्थाभेदवच्वेनो पलक्ष्यमाणस्याSभावत्वायोगात्। नीलरूपत्वेन द्रव्यत्वात्। ननु भावत्वपक्षे वहलालोकव्ति देशे निमीलितनयनस्य कर्थ तम:प्रतीतिः, वहलालोकेन निवृत्यङ्गीकारात्। सहावस्थानं तु मन्दालो- केनैव पूर्वमुक्तमिति चेद्; न, गोलकान्तर्वतितमसः ग्रतीत्युपपत्तेः । न च
नात्। न चैवं गोलकान्तरस्थाञ्जनादेरपि निमीलितनयनेन ग्रहणग्रमङ्ग :; तमोव्पतिरिक्तरूपिण आलोकसहकृतचक्षुर्ग्राह्यत्व्नियमाद्। अथ मतम्-द्रव्यत्वे सति तमस आलोकचिनाशितस्याऽडलोकापगमे झटिति नोत्पत्तिः, कार्यद्रव्याणां व्णुकादिक्रमेणवाऽडरम्भादिति, तन्न; और अपचय (ह्ास) रूप अवस्थाविदेषोंसे युक्त अनुभवमें आवे, उसको अभाव रूप मानना योग्य नहीं है। और अन्धकारमें नीलरूपवत्ताकी प्रतीति होती है, इसलिए रूपवान् होनेसे वह द्रव्य है। इससे अन्धकार अभावरूप नहीं हो सकता, किन्तु भावरूप ही है। अन्धकारको भावरूप माननेमें यदि शक्का हो कि अधिक प्रकाशवाले स्थानमें आँख वन्द करनेपर अन्धकारकी प्रतीति कसे होगी? क्योंकि उस स्थानमें अधिक प्रकाशने अन्धकारको दूर कर दिया है। अन्धकारका और प्रकाशका साथ-साथ रहना तो मन्द प्रकाशमें ही कहा गया है? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि आँखोंके गोलकके अन्दर अन्धकार आँख वन्द करनेपर दिखाई देता है। और ऐसा भी नहीं कह सकते हैं कि आँखोंमें अपने भीतरकी वस्तुका ग्रहण करनेकी सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि वन्द किये गये कान भी अपने भीतरी (मन ही मन कहे हुग) शव्दका ग्रहण करते देखे जाते हैं। इसी प्रकार इन्द्रियसामान्य होनेसे आँखोंमें भी भीतरी रूप ग्रहण करनेकी शक्ति है। यदि शक्का हो कि तब तो आँख वन्द करने या खुली रखनेपर आँखोंमें लगाये गये अज्जन (काजल) का भी दर्शन होना चाहिए, परन्तु होता नहीं हैं, तो यह शक्का भी ठीक नहीं है, क्योंकि अन्धकारसे
ऐसा नियम है। अतिरिक्त रूपवान् वस्तुका आलोकसहकृत आँखसे ही प्रत्यक्ष किया जाता है,
पुनरपि अन्धकारको भाव माननेमें दोप देते हैं-यदि. अन्धकार द्रव्य है तो आलोकसे नष्ट किये हुए अन्धकारकी आलोकके दूर होते ही तुरत उत्पत्ति कैसे होगी ? क्योंकि कायद्रव्योंका आरम्भ तो द्यणुकादिक्रमसे ही होता है।
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तमकी भावरूपताका विचार] भापानुवादसहित ३३
विवर्तवादिनां क्रमानपेक्षणात्, कांरणं तु मूलाविद्यैव। अथाऽपि तमो न रूप- वद्द्रव्यम्, स्पर्शशन्यत्वात्, आकाशवत् इति चेद्, न; वायुर्न स्पर्शवान्, रूपशून्यत्वात्, आकाशवदित्याभासेन समानत्वात् ग्रत्यक्षविरोधस्य तुल्यत्वात्। अथाऽडलोकाभावे समारोपितं नीलरूपं गोचरयतीति तमःप्रत्यक्षस्याऽन्यथा गतिरुच्यते एवमपि हेतुरनैकान्तिक :- रूपवद्द्रव्यस्यैव धूमस्य चक्षुःप्रदे- शादन्यत्र स्पर्शशन्यत्वात्। तत्र विद्यमान एव धूमस्पर्शोऽनुद्धत इति चेत,
उत्तर देते हैं कि ऐसा दोष नहीं है। विवर्तवादियोंके मतमें पदार्थकी उत्पत्तिमें द्वयणु- कादि क्रमकी अपेक्षा नहीं होती, उनके मतमें विवर्त्तका कारण तो मूला अविद्या ही है। यदि शक्का हो कि अन्धकार (पक्ष), रूपवाला द्रव्य नहीं हो सकता (साध्य), स्पदशून्य होनेसे (हेतु), आकाशके तुल्य (द्ृष्टान्त), इस अनुमानसे अन्धकार रूपवान् द्रव्य सिद्ध नहीं हो सकता? तो यह शङ्का भी ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त अनुमान-वायु स्पशवाला नहीं है, रूपरहित होनेसे, आकाशके तुल्य- इस अनुमानाभासके सदश़ है, कारण कि दोनों अनुमानोंमें प्रत्यक्षविरोभ तुल्य है। [तात्पर्य यह है कि यदि आकाशके दृष्टान्तसे अन्धकारमें स्पर्शशून्यत्व हेतुसे रूपचद् द्रव्यत्वका अभाव सिद्ध करते हो, तो उसी आकाशको दृष्टान्त बनाकर रूपवत्त्वाभावको हेतु मानकर वायुमें स्पर्शवत्ताका अभाव सिद्ध क्यों न किया जाय। परन्तु यह किसीको अभीष्ट नहीं है, इसलिए इस दूसरे अनुमानको आभास अवक्य मानना चाहिए। इसीके तुल्य पहला अनुमान भी आभास ही है। यदि आप-"दूसरे अनुमानमें प्रत्यक्ष विरोध आता है, क्योंकि वायुमें स्पशवत्ताकी प्रत्यक्षसे उपलन्धि होती है इससे वह आभास है"-ऐसा कहें तो अन्धकारमें भी नीलरूपवत्ताकी प्रत्यक्षसे प्रतीति होनेसे पूर्व अनुमान भी प्रत्यक्षविरोधसे आभास ही है। ] आलोक (प्रकाश) के अभावमें नीलरूपका आरोप किया जाता है। उस आरोपित नीलरूपसे अन्धकारमें रूपवत्ताकी प्रतीति होती है इस तरहके पूर्वपक्षीके प्रत्यक्षविरोधको दूर करनेपर भी स्पर्शशून्यत्वरूप हेतु तो व्यभिचारग्रस्त है ही, क्योंकि यद्यपि धूम रूपवान् ही द्रव्य है, तथापि आँखको छोड़कर और कहीं भी उसका स्पर्श नहीं होता। ऐसी अवस्थामें स्पर्शशून्यत्वरूप
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३४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
तर्हिं तम:स्पर्शोपि सन्नेव सर्वत्रानुद्भूत इति हेत्वसिद्धि: स्यात्। न च सतः सर्वत्रानुद्वोऽसम्भावितः, आकरजे सुवर्णादी सत एव स्वपरप्रकाश- कभास्वररूपस्योष्णस्पर्शस्य च सर्वत्रानुद्भवदर्शनात्। तदेवं भावरूपतमोवादे न कोडपि दोप:। नन्वभाववादेऽपि तथा। उपचयाद्यवस्थानां अ्तियोग्यालोकोपाधि- कत्वाद् नीलरूपस्याऽडरोपितत्वादिति चेद्, मैवम् ; दुर्निरूपत्वात्। तथा हि-किमालोकमात्राभावस्तमः, उतैकैकालोकाभावः, सर्वालोकाभावो वा। अथमद्वितीयपक्षयोः प्रागभाव इतरेतराभावः पध्वंसाभावो वा तम इति हेतुसे रूपवत्ताका अभाव सिद्ध नहीं हो सकता। यदि कहो कि धूममें स्पर्श विद्यमान ही है किन्तु वह केवल चक्षुसे अन्यन्र अनुद्भूत रहता है, तो यह कहना अन्धकारमें भी समान ही है, क्योंकि अन्घकारमें स्पर्श है परन्तु सर्वत्र अनुद्भूत है, इससे हेतुकी असिद्धि स्पष्ट है। यदि शक्का हो कि विद्यमान वस्तुका सर्वत्र उद्धूत न होना सम्भव नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सुवर्ण तैजस द्रव्य है इससे उसमें उष्ण स्पर्श और प्रकाशका होना अनिवार्य है परन्तु इन दोनों गुणोंकी कहींपर भी खनिज सुवर्णादिमें उद्भूतता नहीं देखी जाती है, इससे यह सिद्ध हुआ कि विद्यमान वस्तु भी सर्वत्र उद्धूत नहीं रह सकती है। इससे निष्कर्ष निकला कि अन्धकारको भावरूप रूपवान् द्रव्य माननेमें कोई दोप नहीं है। यदि शङ्का हो कि अन्धकारको अभावरूप माननेमें भी तो कोई दोष नहीं होता, क्योंकि इसमें वृद्धि और ह्ासकी प्रतीतिके कारण तो अभावरूप अन्धकारके प्रतियोगी आलोकके वृद्धि और ह्रास हैं, स्वतः उसमें वृद्धि और ह्रास नहीं है (आलोककी वृद्धिसे अन्धकारका ह्ास और आलोकके हाससे अन्धकारकी वृद्धि मालूम होती है, यह अभिग्राय है) और उसमें प्रतीयमान नीलरूप तो आरोपित ही है, यह शङ्का भी सङ्गत नहीं हो सकती, क्योंकि यह दुर्निरूप है, अर्थात् तेजका अभाव अन्धकार है इसका निरूपण करना. कठिन है। दुर्निरूपताको दिखाते हैं-क्या आलोकमात्र (आलोकसामान्य) का अभाव अन्धकार है? या एकका (किसी भी आलोकविशेषका) अभाव अन्धकार है अथवा सब आलोकोंका अभाव अन्धकार है: इत तीनों विकल्पोंमें प्रथम और द्वितीय पक्ष मानें तो हम प्रश्न करेंगे कि यहाँ अभावपदसे प्रागभाव, अन्यो- न्याडभाव या प्रध्वंसाभावका ग्रहण है? इनमें से किसी भी अभावका ग्रहण
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तमका भावरूपताका विचार ] भापानुवादसहित ई५
दुर्भणम्, सवितृकरसंतते देशे प्रदीपजन्मनः प्राग्वा जाते वा प्रदीपे दीपनाशे वा तमोबुद्धभावात्। तृतीये सर्वालोक्संनिधानमन्तरेण न निवर्तेत । रूपदर्शनाभावस्तम इत्यप्ययुक्तम्, वहलान्धकारसंवृतापवरकमध्य- स्थितस्य वहीरुपदर्शनान्तस्तमोदर्शनयोर्युगपदेव भावात्। तस्मात् नाभावस्तम इति दृष्टान्ते नाऽस्त्युक्तोपाधि:।।४।।
नहीं हो सकता, क्योंकि सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशमान देशमें दीपक जलानेसे पूर्व (जब कि दीपके प्रकाशका प्रागभाव है) या जला लेनेपर (दीपक-प्रकाशके साथ अन्घकारकी अन्योन्याभावदशामें) अथवा दीपके बुझ जानेपर (उसकी ध्वंसाभावद्श्यामें) भी अन्धकार नहीं देखा जाता। तृतीय पक्ष भी नहीं वनता, क्योंकि यदि सम्पूर्ण आलोकोंका अभाव अन्धकार है, तो जब तक सम्पूर्ण आलोकोंका सन्निधान न हो जायगा, तब तक अन्धकार निवृत्त ही न हो सकेगा [क्योंकि सम्पूर्ण आलोकोंका अभावरूप ही अन्धकार है। अभावरूप अन्धकारकी निवृत्ति अभावा Sभावरूप होनेसे प्रतियोगिस्वरूप है। प्रकृतमें प्रतियोगी सर्वालोक है, एक आलोकके न रहनेसे भी सर्वालोक नहीं हो सकता प्रतियोगीकी सत्ताके लिए सब आलोकोंके सन्निधानकी आवश्यकता है, यह भाव है ]-। मीमांसक-मलका खण्डन करते हैं कि अन्घकारको रूपदर्शनका अभाव कहना भी अयुक्त है, क्योंकि घने अन्धकारसे व्याप्त घरमें बैठे हुए पुरुपको बाहर रूपका दर्शन और अन्दर अन्धकारका दर्शन एक-साथ ही होता है। [तात्पर्थ यह है कि यदि रूपदर्शनाऽभावको अन्धकार मानें, तो अन्धकार रहते रूपका दर्द्न न होना चाहिए, क्योंकि व्याप्ति है कि जिस वस्तुके अभावकी बुद्धि होती है, उस वस्तुकी वुद्धि नहीं हो सकती, इसलिए रूपदर्शनाभाव बुद्धिके रहते रूपदर्शनवुद्धि कैसे हो सकती है? यदि कहा जाय कि जहांपर (घरके अन्दर) रूपदर्दनाभावरूप तम है वहांपर रूपदर्शन नहीं होगा, इससे कोई विरोध नहीं है, तो ऐसा सक्कोच करनेपर भी निर्वाह न होगा, क्योंकि तब हम प्रश्न करेंगे कि वह अभाव प्रागभाव आदिमें से कौनसा अभाव है? इनमेंसे कोई भी नहीं वन सकेगा, क्योंकि यत्किश्चित् रूपदर्शनके प्रागभाव, अन्योन्याभाव या ध्वंसके रहनेपर भी सौरालोकवाले देशमें अन्धकार नहीं देखा जाता। यदि अन्धकार सकलरूपदर्शनाभावरूप माना जाय,
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३६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
नन्वेवमप्यन्योन्यतादात्म्यसामर्थ्याभावाख्यो भवदीयो मूलहेतुरनै- कान्तिक:। 'इद रजतम्' इत्यत्र भ्रान्तिस्थले पुरोवर्त्तिरजतयोविंविक्तयोस्ता- दात्म्यसामर्थ्याभावेऽपि तादात्म्यसंदर्शनादिति चेद्, न; तत्र सामर्थ्य- सद्भावेन हेत्ववृत्तेः। तत्सामर्थ्यं च सम्यग्रजतस्थले पुरोवत्तिरजतयोर्वास्तव- तादात्म्यदर्शनाद्वगन्तव्यम्। न चैवमात्मानात्मनोरपि क्वचिद्वास्तव- तादात्म्ये सति तत्सामर्थ्यसम्भवादसिद्धो हेतुरिति वाच्यम्, वास्तवतादात्म्यस्य तथोः काऽपि दुःसंपादत्वात्। तथा हि-किं द्रप्डुर्द्दश्यतादात्म्यमुच्यते
तो पूर्वोक्तरीतिसे सम्पूर्णरूपदर्शनोंके सन्निधानके बिना अन्धकारकी निवृत्ति ही नहीं हो सकेगी। ] इसलिए तम अभावरूप नहीं है इससे दृष्टान्तमें उक्त उपाधि नहीं है।।४।। पूर्वोक्त इन तीनों अनुमानोंसे प्रतीति द्वारा और चौथे अनुमानसे स्वरूपतः आपने यह सिद्ध किया है कि आत्मा और अनात्मामें परस्पर अध्यास नहीं है अर्थात् उनके परस्पर तादात्म्याध्यासका अभाव है-इस साध्यका प्रधान हेतु 'एकका दूसरेके साथ तादात्म्य हो जानेकी सामर्थ्यका अभाव' जो आपने कहा है, वह व्यभिचारग्रस्त है। देखा जाता है कि 'यह चाँदी है' इस म्रमात्मक प्रतीतिमें सामने पड़ा हुआ शुक्तिका टुकुड़ा और चाँदी-इन दोनोंके भिन्न-भिन्न होनेसे परस्पर तादात्म्यकी सामर्थ्य न रहनेपर भी तादात्म्यभ्रम होता है। ऐसी अवस्थामें पूर्वोक्त हेतुसे परस्परतादात्म्याध्यासका अभाव कसे सिद्ध होगा ? इस प्रकार शक्का होती है। ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि भ्रमस्थलमें दोनों (सामनेवाला इदम् और चाँदी) के परस्पर तादात्म्यकी सामर्थ्य होनेसे हेतु नहीं है। वह सामर्थ्य बाजारके सच्चे चाँदीके टुकड़ेमें स्पष्ट है, क्योंकि जिस प्रकार भ्रमस्थलमें 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस प्रतीतिसे इदम् (यह) का और रजतका तादात्म्य होता है उसी प्रकार 'इदं रजतम्' (यह रजत है) सत्यरजतस्थलमें भी दोनोंका तादात्म्य है, तब किस आधारपर कहा जा सकता है कि सामने पड़े हुए शुक्तिके डकुड़े और रजत इन दोनोंमें परस्पर तादात्म्य- सामर्थ्यका अभाव है। यदि शक्का हो कि इसी प्रकार आत्मा और अनात्माका भी कहींपर सत्य तादात्म्य होगा, अतः उनमें तादात्म्यसामर्थ्र्यका सम्भव होनेसे हेतु असिद्ध है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मा और अनात्मा का परस्पर सत्य तादात्म्य कहींपर भी नहीं हो सकता है-देखो, आत्मा द्रष्टा है
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३७
दृश्यस्य वा द्रष्ट्ृतादात्म्यम् १ आद्येऽपि न तावत् स्वाभाविकम्, चिदेकरसे द्रष्टरि दृशयांशासम्भवात् ; अन्यथा कर्मकर्तृभावेन तादात्म्यानुपपत्तेः। आग- न्तुकत्वेऽपि किं द्रष्ट स्वयमेव दृश्यांशाकारेण परिणमते उत हेतुवलाद? उभयमप्यसङ्गतम्, द्रष्टनिंरयवत्वात्। नहि निरवयवमाकाशं स्वतो वा
और अनात्मा दृश्य है, ऐसी परिस्थितिमें क्या द्रष्टाका दृश्यके साथ तादात्म्य कहते हो या दृश्यका द्रष्टाके साथ तादात्म्य कहते हो? यदि प्रथम पक्ष अर्थात् द्रष्टाका दश्यके साथ तादात्म्य कहते हो, तो विचार करना चाहिए कि यह तादा- त्म्य स्वाभाविक है या आगन्तुक (किन्हीं दूसरे कारणोंसे प्राप्त) है ? स्वाभाविक तो उनका तादात्म्य हो नहीं सकता, क्योंकि आत्मा चिदेकरस-शुद्धचिद्रूप-है, अतः उसमें दृश्यत्वांश रह ही नहीं सकता। यदि यह न मानो, तो कर्तृकर्मरूप होनेसे* तादात्म्यकी उपपत्ति ही न होगी [ दृश्य कर्म है और द्रष्टा कर्ता है, यह तभी हो सकता है, जब द्रष्टा और दृश्य मिन्न-भिन्न हों, अन्यथा नहीं, यह भाव है]। यदि आप स्वसम्मत तादात्म्यको आगन्तुक मानें, तो प्रश् होता है कि क्या द्रष्टा स्वतः दश्याकारमें परिणत होता है, या किसी हेतुके वलसे? ये दोनों ही पक्ष ठीक नहीं हैं, क्योंकि द्रष्टा निरवयव है, [अतः उसका स्वतः या किसी कारणसे
*"परसमवेत क्ियाजन्यफलशालित्वं कर्मत्वम्" यह कर्मका लक्षण है। इसमें परपदसे कर्मसे भिन्न कर्त्ता लेना चाहिए, इसलिए परका अर्थ कर्ता हुआ "कर्तामें समवायसम्वन्धसे रहनेवाली कियासे उत्पन्न हुआ जो फल उसका आश्रय कर्म कहलाता है"। इस लक्षणमें क्रियाकी अपेक्षासे परपदका अर्थ कर्ता अ्रधान है और कर्म किया और कर्ता दोनोंकी अपेक्षासे प्रधान है। इसलिए एकमें ही गुण जौर प्रधान भाव नहीं हो सकता। यद्यपि "यो देवदत्तो गच्छति तं पश्यामि" (जो देवदत्त जा रहा है उस देवदत्तको मैं देखता हूँ) यहांपर एक ही देवदत्तमें गमन और दर्शनके प्रति गुण और प्रधान भाव प्राप्त है, तथापि एक ही कियामें एक को ही गुणप्रधान- भाव नहीं वन सकता है, यह कर्तृकर्मभाव विरोधका तात्पर्य है। और "सच्च त्यच्चाऽभवत्." (यह ब्रह्म सत् और त्त् जगत् हो गया) इत्यादि श्रुति तो अवि- द्यात्मक परिणाम दिखाती है न कि वास्तव परिणाम जो उत्तर पक्षमें स्पष्ट होगा। "देवदत्तो यज्दत्त जानाति" (देवदत्त यज्ञदत्तको जानता है) इस प्रतीतिसे जैसे दो द्रष्टाओंका भी परस्पर विपयि- विपयभाव देखा गया है, वैसे ही जड हश्यके भी विपयी और विपय दोनों बन जानेसे समान होनेमें भी क्या हानि है ? यह कुतर्क भी आपात रमणीय है, क्योंकि ग्रत्यगात्मा प्रत्यक्षका विपय नहीं है, किन्तु परोक्षवृत्तिसे वेद्य होनेसे अनुमेय है। अव विषयीके समान होने दृशय भी अनुमेय ही रह जायगा। वहिरिन्द्रिय जन्य प्रत्यक्षका विपय नहीं होगा।
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३८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
कारणान्तराद्वा सावयवाकारेण परिणममानं दष्टम्। दृश्यस्य धर्मिणो द्रष्ट्रा प्रतियोगिना तादात्म्यमित्यस्मिन् द्वितीयेऽपि पक्षे द्रष्टृत्वस्य स्वाभाविकत्वे दृश्यत्वं हीयेत। अंशतो दृश्यत्वमपि स्वस्याऽस्तीति चेद , तर्हिं कर्मकर्त- त्वविरोधः । आगन्तुकत्वेऽपि किं दृश्यं स्वयमेव चिद्रपेण परिणमते उताऽत्मचैतन्यं स्वस्मिन् संक्रामयति। नाद्यः, जड़जन्यस्य कार्यस्य चिद्रू- पत्वासम्भवात्। नहि जड़ाया मृद: परिणामो घटः चिद्रूपो दृष्टः । न द्वितीय :; आत्मचैतन्यस्य सर्वगतस्य वस्तुतः प्रवेशायोगात्। तदेवं
सिद्धेर्मध्यानुमानं सुस्थम्। ततो मूलानुमानासद्धेरध्यासाभावः सुस्थितः ।
दृश्याकारमें परिणाम नहीं हो सकता है ] जैसे कि निरवयव आकाशका किसी भी प्रकार सावयत्वरूपसे परिणाम नहीं देखा जाता। दश्यका द्रष्टाके साथ तादा- त्म्य है अर्थात् दृश्य द्रष्टाके आकारमें परिणत होता है, यह दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस पक्षमें दृश्यका द्रष्टाके आकारमें परिणत होना यदि स्वाभाविक है, तो द्रष्टा और दृश्य दोनोंके समान हो जानेसे उसका दृश्यत्व ही नष्ट हो जायगा। यदि अंशत दृश्यत्व माना जाय, तो पूर्वोक्त कर्तृकर्म- विरोध होगा, आगन्तुक मानें, तो क्या स्वयं ही दश्य द्र्टाके आकारमें परिणत होता है, या अपनेमें आत्मचतन्यका सङ्क्रमण कराता है। पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि जड़का परिणामरूप कार्य चैतन्यात्मक नहीं हो सकता, कारण कि जड़ मिट्टीका कार्य घट चतन्यरूप नहीं देखा जाता। दृश्य चतन्यको ही अपनेमें सङ्कान्त कर अपना अंश बना लेता है, यह द्वितीय पक्ष भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि सर्वत्र व्यापक चतन्यका स्थलविशेषमें सड्क्रमण भी नहीं हो सकता। इस रीतिसे जिनका कहीं भी सत्य तादात्म्य उपपन्न नहीं हो सकता, ऐसे आत्मा और अनात्माकी तादात्म्यसामर्थ्य न होनेसे हेतुकी (तादात्म्यसामर्थ्यके अभावकी) सिद्धि हो जानेसे द्वितीय अनुमान की (विमतौ तादात्म्यशून्यौ इत्यादि अनु- मानकी) उपपत्ति हो सकती है, और इसीसे मूलभूत प्रथम अनुमानकी ('आत्मानात्मानौ इतरेतरतादात्म्यध्यासरहितौ' इत्यादि अनुमानकी) सिद्धि हो जानेसे अध्यासका अभाव सिद्ध हो ही जाता है।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३९
मा भूद् धर्मिणोस्तादात्म्याध्यासः। तथाप्यात्मधर्माणामनात्मनि संसर्गा- व्यासोऽस्तु। न च चिदेकरसस्याऽऽत्मनो धर्मासम्भवः; आनन्दविपयानुभव- नित्यत्वादीनां सच्ात्। यद्यपि एते स्वरूपभूता एवाउडत्मनः, तथाप्यन्त :- करणवृत्युपाधौ नानेवाऽवभासन्त इति तेपां धर्मत्वसुपचर्यते। न च धर्मिणं विहाय धर्माणां स्व्रातन्त्र्येणाऽध्यासासम्भवः, जपाकुसुमसंनिधौ लोहितः स्फटिक इत्यादौ धर्ममात्राध्यासदर्शनात्। नैतत् सारम् ; धर्माणां स्वात- न्त्यायोगात्। स्फटिकेऽपि प्रतिविम्वितजपाकुसुमाश्रितमेव लौहित्यं प्रतीयते न तु स्वातन्त्र्येण। तस्मात् नाडस्ति धर्माणामप्याश्रयव्यत्यासेन संसर्गा-
यदि शङ्का हो कि आत्मा और अनात्मा रूप धर्मियोंका परस्पर तादात्म्याध्यास उक्त युक्तिसे भले ही न हो, परन्तु आत्माके धर्मोक्का अनात्मामें अध्यास हो सकता है ? यदि कहो कि आत्मा तो चिदेकरस है, अतः उसमें कोई धर्म ही नहीं रह सकते हैं, इसलिए उसके धर्मोंका अध्यास नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मामें आनन्द और विषयका अनुभव (ज्ञान), नित्यत्व आदि धर्म विद्यमान हैं। यद्यपि ये पूर्वोक्त आनन्द आदि आत्माके स्वरूपभूत हैं, धर्म नहीं हैं, तथापि अन्तःकरणकी वृत्तिरूप उपाधिके होनेपर अनेक-से भासते हैं, अतः उनमें (आनन्द आदिमें) आत्मधर्मत्वका उपचारसे (अमुख्यरूपसे) व्यवहार होता है। यदि फिर झक्का हो कि धर्मीे अध्यासके बिना धर्मोंका स्वतन्त्र- रूपसे अध्यास नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जपा- कुसुमकी सन्निद्धि होनेपर ('स्फटिक रक्त है' इत्यादि अध्यासस्थलमें धर्मीका अध्यास न होनेपर भी जपाकुसुम और स्फटिकके परस्परतादात्म्याध्यास न होनेपर भी) केवल धर्मका अध्यास देखा जाता है। [अतः आत्मा और अनात्मारूप धर्मियोंका परस्पर तादात्म्याध्यास न होनेपर भी उनके धर्मोंका अध्यास हो सकता है, यह पूर्वपक्ष बन सकता है। ] इसका समाधान यह है कि यह पूर्वपक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि धर्मीके अध्यासके विना स्वतन्त्ररूपसे धर्मोंका अध्यास नहीं हो सकता। स्फटिक रक्त है, इत्यादि स्थलमें भी स्फटिकमें प्रति- विम्वित जपांकुसुमगत रक्तिमाका ही अध्यास होता है, स्वतन्त्ररूपसे नहीं, अतः आश्रयके अध्यासके बिना धर्मोंका संसर्गाध्यास नहीं हो सकता है। धर्म और
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४० विवरणप्रमेय संग्रह [सूत्र १, चर्णक १
ध्यासः। धर्मधर्मिणोरर्थयोरध्यासे निराकृते तदविनाभूतो ज्ञानाध्यासोऽपि निराकृत एव । तस्मात् न युक्तिसहोध्यास इति। अत्रोच्यते-किं युक्तिविरोधादवस्तुत्वमध्यासस्याऽडपाद्यते किं वा वस्तु-
त्वयुक्तिविरोधयोरिष्टत्वात। विरुध्यते ह्यात्मानात्माध्यासो युक्तिभिरित्ये- वानिर्वाच्यत्वमङ्गीक्रियते। अन्यथा तस्य वस्तुत्वमेवाऽभ्युपेयं स्यात् । ननु तर्हिं अपलपाम एवाऽध्यासम्-नाऽस्त्येवात्मानात्मनोरध्यास :; तत्सामग्रयभावात् ; लोके हि 'इदं रजतम्' 'अयं सर्प' इत्यादावधिष्ठानाध्य- स्यमानयोर्गुणावयवकृतं सादृश्यमध्याससामग्री, न चाऽसावत्रास्ति; आत्मनो 1
धर्मीरूप अर्थोंके अध्यासका निराकरण होनेसे तन्निवन्धन ज्ञानाध्यासका भी निराकरण हुआ ही समझना चाहिए, अतः अध्यासका किसी भी युक्तिसे समर्थन नहीं हो सकता है। उक्त शह्कापर कहा जाता है-क्या आप 'युक्तिविरोध होनेसे अध्यास नहीं मानना चाहिए' ऐसा कहते हैं, अथवा आपका यह अभिप्राय है कि अध्यास कोई वस्तु ही नहीं है। यदि पूर्व पक्ष अर्थात् युक्तिविरोधसे अध्यासको वस्तु न मानना, यह आपको अभीष्ट है, तो ठीक नहीं है, क्योंकि अनिर्वचनीयवादका अवलम्बन करनेवाले हमारे (वेदान्तियोंके) मतमें अध्यासको अवस्तु (वस्तु नहीं है, ऐसा) कहना और युक्तिविरोध दिखाना अभीष्ट ही है। कारण कि आत्मा और अनात्माका परस्परात्मतारूप अध्यास युक्तियोंसे विरुद्ध है; इसीसे तो हम उस अध्यासकी अनिर्वचनीयताका स्वीकार करते हैं (मिथ्या मानते हैं) । यदि ऐसा न होता, तो अध्यासको वास्तविक ही मानना पड़ता। अब रहा दूसरा पक्ष-हम अध्यास ही नहीं मानते अर्थात् आत्मा-अनात्मा दोनों भिन्न ही हैं इनका अध्यास हो ही नहीं सकता, क्योंकि उक्त अध्यासकी सामग्री नहीं है। लोकमें 'इदं रजतम्' (यह चाँदी है), 'अयं सर्पः' (यह साँप है) इत्यादि भ्रमस्थलमें गुण या अवयवोंके द्वारा अधिष्ठान और अध्यस्यमान दोनोंकें साहश्यकी प्रतीति होना अध्यास (भ्रम) की सामग्री है, वह सामग्री
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ४.१ निर्गुणत्वाननिरवयव्रत्वाच्च। न च वाच्यम्-'लोहितः स्फटिकः' इत्यत्राऽ- सत्येवोक्तसादश्येऽस्त्यध्यास इति; तत्र सोपाधिकभ्रमत्वेन सादश्यानपेक्ष- णात्। लौहित्याश्रयभूतं संनिहितं जपाकुसुममुपाधिस्तस्य स्फटिके लौहि- त्यावभासनिमित्तत्वात्। नन्वेवं कर्तृत्वाद्याश्रयं संनिहितमहङ्कारमुपाधिं कृत्वाऽडत्मनि कर्तत्वादिकमध्यसितुं शक्यमिति चेत्, तर्ह्यस्तु कर्थचित्
धिक्को न सम्भवत्येव, सादृश्याभावादिति चेत्, तदेतदसारम्; गुणैरवय- वैश्र शन्यस्याऽपि गन्धस्य 'केतकीगन्धसदृशः सर्पगन्धः' इत्यादौ यथा सौगन्ध्यधर्मेण सादृश्यम्; तथाऽऽत्मनोऽपि पदार्थत्वधर्मेण सादृश्य-
प्रकृत आत्मा और अनात्मामें नहीं है, क्योंकि आत्मा निर्गुण और निरवयव है। [शक्ति- रजत या रज्जुसर्प सावयव और सगुण हैं; अतः उनका अवयवकृत और गुणकृत सादृश्य वन सकता है। ] यदि शक्का हो कि 'लोहितः स्फटिकः' (लाल स्फटिक है) इस स्थलमें सादृश्यके न रहनेपर भी अध्यास होता है, इससे अध्यासमें सादृश्यकी अपेक्षा नहीं है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त दष्टान्तमें ('लोहितः स्फटिक:' इत्यादिमं) उपाधिके द्वारा अध्यास-भ्रम-होनेसे सादृश्यकी अपेक्षा नहीं होती है। लौहित्यका आश्रयभूत निकटस्थित जपाका फूल ही यहां उपाधि है; क्योंकि उस फूलका सन्निधान होना ही स्फटिकमें लौहित्यकी (लालिमाकी) प्रतीतिका हेतु है। यदि शक्का हो कि कर्तृत्व आदिका आश्रय तथा चिदात्माके सन्निहित अह्द्कार (अन्तःकरण) को ही उपाधि बनाकर आत्मामें अन्तःकरण प्रभृति अनात्माके कर्तृत्व आदि धर्मोंका अध्यास कर सकते हैं? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस अवस्थामें भी कर्तृत्व आदि सोपाधिक अध्यासका सादृश्यके विना किसी-न-किसी प्रकार सम्भव होनेपर भी आत्मामें अहङ्कारसे लेकर शरीरपर्यन्त धर्मियोंका तादात्म्याध्यास, जो कि निरुपाधिक है, सादृश्य न होनेसे नहीं ही वन सकता, अतः इन सब कारणोंसे अध्यासको न मानना ही उचित है? यह शुन्वा ही सारहीन है, क्योंकि जैसे गुण और अवयवोंसे शून्य गन्धका भी 'केतकीके (केवड़ेके) गन्धके सदश सर्पका गन्ध है' इस प्रतीतिमें सुगन्धसामान्यसे सादृश्य देखा जाता है, वैसे ही आत्मा और अनात्माके भी पदार्थत्वसामान्यसे सादृश्यका सम्भव है। [अतः सामग्रीका अभाव न होनेसे अध्यासमें
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४२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
सम्भवात्। चैतन्यैकरसे धर्मः. कोऽपि वस्तुतो न सम्भवतीति चेत् ; तर्हि मा भून्निरुपाधिकभ्रमं प्रति साद्ृश्यस्य सामग्रीत्वम्। सादृश्यमन्तरेणैव 'पीतः शङ:' इति निरुपाधिकभ्रमदर्शनात्। अथ तत्र रागपित्तोद्रेककाचकाम- लादि सामग्रयन्तरमस्ति; अस्त्येव तर्ह्यत्राऽप्यविद्याख्या सामग्री। नतु ज्ञानाभावत्वेन भावरूपत्वेन च विप्रतिपन्नाया अविद्याया: सामग्रीत्वाङ्गीकारात् वरमध्यासापलाप एवेति चेत्, मैवम् : अत्यगात्मसच्व-
कुछ बाधा नहीं है?। ] यदि शङ्का हो कि चैतन्यैकरस आत्मामें वस्तुतः किसी धर्मका सम्भव नहीं है, [ तव सादृश्यादि धर्म कैसे रह सकेंगे?) तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि निरुपाधिक अ्रममें सादृश्य सामग्री (कारण) नहीं माना जाता। कारण कि सादृश्यके न रहते भी 'पीतः शङ्ग:' (पीला शङ्ग) ऐसा निरुपाधिक भ्रम देखा जाता है। यदि शङ्का हो कि 'पीतः शङ्ग:' (पीला शङ्ग) इस अध्यासभ्रममें पित्तके बढ़ जानेसे नेत्रगत कामला, काच आदि अन्यान्य दोप- रूप सामग्री उपस्थित है, अतः उसीसे 'पीतः शङ्ग:' आदि अध्यास उपपन्न होंगे? तो इसका भी उत्तर देते हैं कि प्रकृत आत्मा और अनात्माके अध्यासमें भी अविद्या सामग्री मौजूद ही है। वादी फिर शङ्का करता है कि अविद्याके बारेमें विवाद है अर्थात् वह ज्ञानाभावरूप है या भावरूप है, अतः इस तरह विवादग्रस्त अविद्याको अध्यासकी सामग्री माननेकी अपेक्षा अध्यासको ही न मानना अच्छा है। [अभिप्राय यह है कि कारणके बिना अध्यास नहीं बन सकेगा और यदि अध्यास मानें तो उसका कारण भी मानना होगा-उसका दूसरा कोई कारण प्राप्त नहीं है परिशेषात् अविद्याको ही उसका कारण मानना होगा-अविद्या विवादास्पद वस्तु है। इस विवादका सामना एवं अपने सिद्धान्तका स्थापन करनेके लिए बड़े समारोहसे शास्त्रार्थ करना होगा। इतने कोलाहलकी अपेक्षा अध्यासको न मानना ही अच्छा है जब अध्यास ही नहीं माना जायगा तव किसके लिए विवाद होगा]। वादीकी इस शङ्काका उत्तर देते हैं कि अध्यासका अपलाप नहीं कर सकते। केवल प्रत्यगात्माकी सत्ताका अवलम्बन करके उस चिदानन्दके आच्छादकरूपसे विद्यमान अनादिसिद्ध एवं प्रत्यक्षसे दिखाई देनेवाले अध्यासका अपलाप नहीं कर सकते। यदि प्रत्यक्षसिद्ध अध्यासका भी अपलाप किया जाय, तो प्रत्यगात्माका भी अपलाप करना होगा ॥
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अध्यासविचार ] भापांनुवादसाहेत ४३
मात्रसुपजीव्य तदीयचिदानन्दाच्छादकत्वेन व्यवस्थितस्याऽनादे: ग्रत्यक्ष- स्याऽपलापायोगाद्। अन्यथा प्रत्यगात्माप्यपलप्येत। कार्यस्याऽध्यासस्याऽनादित्वमयुक्तमिति चेद्, मैवम् ; आत्मनि ताव- त्कर्तत्वभोकतृत्वरागादिदोपसंयोग एवाडध्यासः। तत्र भो कृत्वाध्यास: कर्तृत्वा- ध्यासमपक्षते; अकर्तुर्भोगाभावात्। कर्तृत्वं च रागादिदोपसंयोगाध्यासम- पंक्षते; रागादिरहितस्य कर्तृत्वाभावात् । दोपसंयोगश्च भोक्तत्वमपेक्षते; अनुपशुक्तेऽनुपभुक्तजातीये वा रागाद्यनुत्पत्तेः । तथा च वीजाद्ुरवत् प्रवाह- रूपेण कर्तत्वादीनामनादित्वम्। एतेनैतदप्यपास्तम्-प्रपश्चस्य अ्रतीतौ सत्यामारोप, आरोपे च प्रतीतिरिति परस्पराश्रयत्वमिति। अनादित्वे सति
[ तात्पर्य यह है कि प्रत्यगात्मा चतन्यस्वरूप है, जड़ नहीं है और सत् है, तुच्छ नहीं है, इससे उस साक्षिस्वरूप प्रत्यगात्माकी सत्तासे सत्ताका प्राप्त होकर अविद्या उसके निरवच्छिन्न आनन्द, अनन्तत्व, विभुत्व, सत्यत्व आदि स्वरूपको आच्छादित करती है। अतएव सावच्छिन्न विपयानन्दका अनुभव होनेपर भी नित्यानन्दका अनुभव नहीं होता। एवम्भूत अध्यासका जो अपलाप करते हैं उनको यही मानना होगा कि नित्यानन्दादिस्वरूपवाला कोई प्रत्यगात्मा ही नहीं है।] अब शक्का करते हैं कि अध्यासको यदि आप कार्य कहते हैं; तो ऐसी अवस्थामें अध्यास अनादि कैसे? उत्तर देते हैं-आत्मामें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि दोपके संसर्गको ही अध्यास कहते हैं। इसमें जो कर्ता नहीं है वह भोग करनेवाला नहीं हो सकता, इसलिए भोक्तृत्वका अध्यास कर्तृत्वके अध्यासकी अपेक्षा रखता है। और कर्तृत्वका रागद्वेपके विना सम्भव नहीं हे; अतः कर्तृत्वाऽध्यासमें राग आदि धर्मोंके सम्बन्धाध्यासकी अपेक्षा है। और यह रागादिरूपदोपका सम्बन्ध भोक्तत्वके बिना अनुपपन्न है, क्योंकि अनुपभुक्त एवं अनुपभुक्तसजातीय जो नहीं हैं, ऐसे भोगोंमें रागादि होते ही नहीं, अतः रागादिदोपसंसर्गाध्यासमं भोक्तृत्वकी अपेक्षा है। इस करमसे वीजाङ्करकी भाँति प्रवाहरूपसे कर्तृत्वादिमें अनादित्व सिद्ध हुआ। इस अनादिपरम्पराके दिखानेसे प्रपञ्चकी प्रतीति होनेपर अध्यासकी कल्पना और अध्यास सिद्ध होनेपर प्रपञ्चकी प्रतीति इस प्रकार वादी द्वारा प्रदर्शित अन्योन्याश्रय दोप
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४४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
पूर्वपूर्वाध्यासोपदरशितस्य देहादेः संस्काररूपेण स्थितस्योत्तरोत्तराध्यास- हेतुत्वात्। न च देहादेरवस्तुत्वादनारोप इति वाच्यम्, प्रतीतिमात्रेणारोप्यत्वसिद्धौ चंस्तुसत्ताया अप्रयोजकत्वात् । 'इदं रजतम्' इत्यादौ हि सत्यानृतयोः शुक्तिरजतयोस्तादात्म्यमव्यस्यते। न च दूरस्थवनस्पत्योः सत्ययोरेव तादा- त्म्यमध्यस्यत इति वाच्यम्; तत्राऽपि सत्येव वृक्षद्वयेऽधिष्ठानेऽनृतस्यैवैकत्वध- मस्याऽव्यासात्। अन्यथा वस्तुनोर्गुणगुणिनोरपि तादात्म्यस्याऽध्य- स्तत्वप्रसङ्गात्।
भी खण्डित हो गया। अनादि प्रवाहपरम्परामें अन्योन्याश्रय दोष नहीं आता। किञ्च, अनादि होनेपर भी पूर्व-पूर्व अध्यासके द्वारा दिखलाई देनेवाले संस्काररूपसे स्थित देह आदि उत्तरोत्तर अध्यासके कारण हो जायँगे [ भाव यह है कि जैसे पूर्व-पूर्व वीज और वृक्ष उत्तरोत्तर वृक्ष और वीजके कारण होते हैं तथा पूर्व-पूर्व रजतज्ञान संस्कारद्वारा उत्तरोत्तर रजतभ्रमके कारण होते हैं वैसे ही आत्मामें भी भोग द्वारा विषयमें रागादि और रागादिसे कर्तृत्व आदि हेतुपरम्परासे उत्तर-उत्तर अध्यास होते हैं ]। यदि शङ्का हो कि देहीदि तो कोई वस्तु ही नहीं हैं, अतः उनका आत्मामें आरोप कैसे होगा? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतीतिमात्रसे आरोप्यकी सिद्धि हो जानेसे ही आरोप हो सकता है, अतः आरोपमें वस्तु- सत्ताकी आवश्यकता नहीं है। इसीसे 'यह रजत है' इस भ्रमस्थलमें भी सत्य शुक्ति और अनृत (मिथ्या) रजतका परस्पर तादात्म्य अध्यस्त होता है। यदि शङ्का हो कि जहांपर दूर देशमें स्थित दो पेड़ोंमें ऐक्यका (एकत्व संख्याका) आरोप होता है, वहांपर तो दोनों वृक्ष सत्य ही हैं, सत्य और अनृत नहीं है। इससे सत्यानृतका ही तादात्म्य अध्यास कहलाता है। इस नियममें व्यभि- चार होगा? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त स्थलमें सत्य अधिष्ठानभूत दो वृक्षोंमें अनृतरूप एकत्व अध्यस्त है। अन्यथा (यदि दो सत्य वस्तुओंमें ही प्रतीयमान अध्यस्त माना जाय, तो) गुण और गुणीरूप सत्य
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ४५
यद्यप्यात्मानात्मनोरन्योन्यस्मिन्नन्योन्यतादात्म्याध्यास: समान:, तथा- प्यात्मनः संसृष्टरूपेणैवाऽध्यासो न स्वरूपेणेति सत्यत्वम्, अनात्मनस्तु स्वरूपेणाऽप्यध्यास इत्यनृतत्वम् । न च तयो: सत्यानृतयोस्तादात्म्ये गुणगुण्यादाविव भेदाभेदावभासेन दो वस्तुओंका भी तादात्म्य अध्यस्त माना जायगा। यद्यपि आत्मा और अनात्मामें दूसरेमें दूसरेमें तादात्म्यका अध्यास एक-सा ही है; तथापि आत्माका अध्यास अनात्मामें संसृष्टरूपसे ही है, स्वरूपसे नहीं। इससे आत्मा सत्य सिद्ध हुआ। अनात्माका तो स्वरूपसे भी अध्यास है, इससे उसमें अनृतत्व सिद्ध होता । है। शन्का होती है कि सत्यानृतके तादात्म्य (पूर्वोक्त रीतिसे भेदाऽमेद) *'वेदान्तमतमें गुण और गुणीका तादात्म्य (भेदाऽभेद) मानते हैं, अतएव 'नीलो घटः' ऐसा रामानाधिकरण ग्रयोग संगत होता है। यदि सवथा अमेद मानें, तो 'घटो घटः' के तुल्य 'नील: घटः' यह प्रयोग अप्रामाणिक होगा। और यदि सर्वथा भेद मानें, तो 'अश्वो गर्दभः' इस प्रयोगकी तरह उक्त प्रयोग अग्रामाणिक होगा। इससे उक्त स्थलमें समान विभकतिका प्रयोग देखनेसे मेदाऽभेद ही सिद्ध होता ै, यह भेदाऽभेदरूप तादात्म्य अध्यस्त नहीं है। + तात्पर्य यह है-'इदं रजतम्' पुरोदृश्यमान इदम् पदार्थ और रजत दोनों परस्पर तादात्म्यापज हैं। दृदंका तादात्म्य रजतमें और रजतका तादात्म्य इदम् पदार्थमें है। एवं अध्यस्त पदार्थ अनृत और अधिष्टान सत्य होता है, ऐसा नियम है। तब दोनोंके अध्यस्त और दोनोंके अधिष्टान होनेसे पर्यायेण एक ही में सत्यत्व और अनृतत्व दोनोंका ग्रसङ्ग आ जाता है। ऐसा माननेसे शन्यवाद आ जायगा। अतः इदम् पदार्थ स्वरूपतः सत्य हैं, क्योंकि वही दोनों अध्यासोंका अधिष्ठान और अनध्यस्त है। जो इदमंश रजत- तादात्म्यापज होनेसे संसष्ट है वही रजतमें अध्यस्त है, उसको अनृत माननेमें कोई बाधा नहीं है। स्वम्पतः वही सत्य और अनध्यस्त है। एघम् आत्मा और अनात्माके परस्पर अध्याससे सिद्ध 'अहं स्थूल:' (मैं मोटा हूँ) इतयादयाकारप्रतीतिमें अहंपदार्थ (आत्मा) का स्थूल देहमें अध्यास और स्थूल देहका अहंपदार्थमें परस्पर अध्यास होनेके कारण दोनों अध्यस्त होनेसे दोनों अनृत ही हैं, अतः आपाततः निरयधिक भ्रमका प्रसभ्न मालम होता है। इसलिए कहा गया है कि आत्माका संसषत्वरूपसे ही अध्यास है, स्वरूपसे नहीं। 'अहम् इस उदाहरणमें आत्माका 'अहं' (मैं) यह रूप संसष्ट ही है, स्वरूपभृत नहीं है। आत्माका स्वरूपभूत रूप तो सत्-चित- आनन्दादि है, स्वरूपभूत चंतन्यादि अविद्यावलसे अहमाकारको प्राप्त हुआ है। आत्माका संसरष्ट रूप ही (अहम्) है, अतः यह भी अवश्य मिथ्या ही है। इसका भी अधिष्ठान चिदेकरस आत्मा ही है, जिसका कभी भी वाध नहीं होता, अतः वह सत्य है। इससे परमार्थतः निरवधिक भ्रमका प्रसन्न नहीं है, इत्यादि तात्पर्य समझना चाहिए।
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४६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
'शौकयवान् पटः' इतिवद् 'देहेन्द्रियादिमान् अहम्' इति वा 'ममेदं देहादि' इति वा प्रत्ययः शङ्कनीय :; इतरेतरत्वमत्यन्तैकत्वमापाद्यैवाऽध्या- सस्वीकारात्। तर्हिं तादात्म्याध्यास इति न वक्तव्यं किं त्वेकत्वा- ध्यास इ्त्येव वाच्यमिति चेद्, न; 'पटस्य शौकयम्' इतिवत् 'मम देहः' इति भेदव्यवहारस्य दर्शनात्। न चैवं सति भेदग्रहेण भेदाग्रहे व्यापके निवृत्ते तद्व्याप्योऽध्यासोऽपि निवर्तेतेति वाच्यम्, भेदग्रहस्याऽ- नङ्गीकारात्। नहि लौकिक: 'मद्देहः' इति भेदं व्यवहरन्तोऽपि शास्त्र- संस्कारमन्तरेण देहाद्भिन्नमात्मानं गृह्नन्ति। तस्मादनुभवत एकत्वाध्यास एच, व्यवहारतस्तु तादात्म्याध्यास इत्यपि व्यपदेषठुं शक्यते; देहात्मनोरहमित्यभेदव्यवहारस्य मद्देह इति भेदव्यवहारस्य
माननेसे गुण और गुणीका मेद तथा अभेद दोनोंके प्रतिभास होनेसे जैसे 'शौक्ल्यवान् पटः' (शुल्क गुणवाला वस्त्र) यह प्रतीति होती है, वैसे ही 'देहे- न्द्रियादिमानहम्' (देहेन्दियादिवाला मैं हूँ) या 'ममेदं देहादि' (यह देहादि मेरा है) यह भी प्रतीति होनी चाहिए ? इसका समाधान देते हैं कि यह ठीक नहीं है, क्योंकि इतरेतरत्वका अध्यास अत्यन्त एकत्वका आपादान करके ही स्वीकृत किया गया है। 'तब तो ऐसी दशामें आपको तादात्म्यका अध्यास न कहना चाहिए; किन्तु एकत्वका ही अध्यास कहना चाहिए' ऐसी शङ्का उत्पन्न होती है; इसका समाधान करते हैं कि 'कपड़ेकी सफेदी' इस प्रतीतिके तुल्य 'मेरा शरीर' इस प्रतीतिके होनेसे भेदव्यवहार भी देखनेमें आता है। यदि शङ्का हो कि अब तो इस भेदप्रतीतिने अध्यासके प्रति व्यापकीभूत 'मेदके अग्रह' को हटा दिया, इस व्यापकके निवृत्त हो जानेसे इसका व्याष्य अध्यास भी निवृत्त हो जायगा, अर्थात् अध्यास नहीं होगा। तो यह भी युक्त नही है, क्योंकि भेदग्रहका स्वीकार नहीं है। यद्यपि लौकिक पुरुष (शास्त्रीय ज्ञानसे शून्य पुरुप) 'मेरा देह' ऐसा मेदसे व्यवहार करते हैं, तथापि शास्त्रोपदेशसे जन्य संस्कारके हुए बिना 'देहसे आत्मा भिन्न है' ऐसा स्वीकार नहीं करते। इससे अनुभवसे एकत्वका अध्यास ही व्यवहारसे तादात्म्यका अध्यास है ऐसा कह सकते हैं, क्योंकि देह आदि और आत्मा इन दोनोंमें 'अहम्' (मैं) इस रीतिसे अमेदव्यवहार और 'मेरा शरीर है' इस प्रकार भेदव्यवहार
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ४७
च सद्भावात्। न चैकत्वमेव तादात्म्यमिति वाच्यम्; भेदाऽभेदसहमन्यो- न्याभावविरोधि तादात्म्यम्, भेदविरोध्येकत्वमिति तयोर्विविक्तत्वात्। जीव- ब्रह्मणोरप्येकत्वमेव वस्तुतोऽविद्याकल्पितभेदमपेक्ष्य तादात्म्यमिति व्यपदिश्यत इत्यविरोधः। न च जीवन्रह्मैक्यवदात्मदेहैक्यमनुभूयमानमपि वास्तवं
दध्यस्तमेवैकत्वम्।
भी होता है। [ 'न चैतयोः सत्यानृतयोः' ग्रन्थसे लेकर 'शक्यते' तक ग्रन्थका संक्षेपसे तात्परत्य यह है कि यदि गुण और गुणीमें भेदाडमेदकी तरह आत्मा और अनात्मामें भी भेदाSमेदका स्वीकार करते हैं तो भेदका स्वीकार करनेसे सिंह और माणवककी भेदप्रतीतिके प्रसिद्ध होनेसे जैसे 'सिंहो माणवकः' इस प्रतीतिको गौणी प्रतीति मानते हैं, अध्यास नहीं मानते हैं वैसे ही देह और आत्माकी भेदप्रतीतिके प्रसिद्ध होनेसे 'अहं स्थूलः' 'अहं मनुष्यः' यह प्रतीति भी गौणी हो जायगी। इससे भेदका स्वीकार नहीं किया जा सकता। कारण कि जो जो प्रतीयमान होते हैं वे सबके सव स्वीकृत होते हैं, ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि उक्त लोकप्रतीतिमें ही व्यभिचार है और मरुमरीचिका भी तो प्रतीत होती है, क्या उनका स्वीकार कर सकते हैं? इस आशयको लेकर अ्न्थकारने लिखा है कि अनुभवसे एकत्वका ही स्वीकार किया जाता है, और व्यवहारमें भेद-अभेद दोनोंके आनेसे तादात्म्यका ही स्वीकार किया जाता है।'] 'एकत्व ही तादात्म्य है' यह भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि भेद और अमेद दोनोंको सहनेवाला (जिसमें भेद और अभेद दोनोंका परस्पर कोई विरोध न हो, ऐसा) तथा अन्योन्याभावका विरोधी तादात्म्य है और भेदका विरोधी एकत्व है, इस रीतिसे एकत्व और तादात्म्यका विषय अत्यन्त विविक्त- भिन्न है। वस्तुतः जीव और ब्रह्मका एकत्व ही है, किन्तु अविद्याकल्पित मेदको लेकर तादात्म्यके माननेमें कोई विरोध नहीं आता। यदि शङ्का हो कि जीव और ब्रह्ममें एकत्व जैसे वास्तविक है वैसे ही अनुभवसे सिद्ध आत्मा और देहके ऐक्यको भी परमार्थ (सत्य) ही क्यों न मान लिया जाय? तो यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि सत्य और अनृतरूपसे अन्यत्र- पृथक-पृथक गृहीत होनेवाले पदार्थोंका ऐक्य (एक होना) सत्य नहीं हो
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४८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
सत्यध्यासोदयादसति चाऽनुदयात्। नन्वेतावन्वयव्यतिरेकावध्यासप्रतिवन्धक- तच्वज्ञानाभावावषयतयाऽप्युपपन्नाविति चेद्, न; तच्चज्ञानस्य प्रतिवन्धक- लक्षणरहितत्वात्। सति हि पुष्कलकारणे कार्योत्पादविरोधितया जायमानं प्रतिबन्धकम्। तच्वज्ञानं त्वसत्येव काचकामलादिदोपाख्येऽध्यासपुप्कल- कारणे जायत इति लक्षणरहितम्। तथाऽपि तच्वज्ञानस्याऽध्यासविरोधि- तया विरोधिसंसर्गाभावविषयत्वेनाऽपि तावुपपत्स्येते इति चेद्, न;
सकता। इसलिए देह और आत्माका ऐक्य अध्यासमूलक ही है। [देहादिकी बिनाशिता प्रत्यक्षसिद्ध है इसके अनृतत्वसाधनके लिए विशेष युक्तिके प्रदर्शनकी आवश्यकता नहीं है और आत्माको शास्त्र अविनाशी घोपित करते हैं, अतः आत्मा सत्य सिद्ध है। इससे इनका अनृतत्व और सत्यत्व अन्यत्र प्रसिद्ध है, इनका अनुभूयमान ऐक्य भ्रमात्मक ही है। और भेद वास्तव हे इसलिए दोनोंका तादात्म्य अध्यस्त है, यह भाव है ]। पूर्वोक्त अध्यासका उपादान कारण अनादि अनिर्वचनीय भावरूप अविंद्या है, क्योंकि उस अविद्याके रहनेपर अध्यास होता है और उस अविद्याके न रहनेपर अध्यास नहीं होता, ऐसा अन्वय और व्यतिरेक है। यदि शक्का हो कि दिखाये गये अन्वय और व्यतिरेक अध्यासके प्रतिबन्धक तत्त्वज्ञानके अभावमें ही लागू रहेंगे अर्थात् अविद्याके रहनेपर तत्त्वज्ञानका अभाव और अविद्याके न रहनेपर तत्वज्ञान होता है, अतः इससे अविद्याकी कारणता सिद्ध नहीं हो सकती? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तत्त्वज्ञानमें प्रतिवन्धकका लक्षण नहीं जाता है। प्रतिबन्धक उसको कहते हैं जो कार्यके सम्पूर्ण कारणकलापके रहते भी उस कार्यका विरोधी होकर उत्पन्न हो। तत्वज्ञान तो अध्यासके जवर्दस्त कारण काच, कामला आदि दोषके न रहनेपर ही उत्पन्न होता है। इस कारण तत्त्वज्ञान प्रति- बन्घकके लक्षणसे रहित है। यदि शक्का हो कि प्रतिबन्धकके लक्षणसे शून्य होनेपर भी तत्त्वज्ञान अध्यासका विरोधी तो है ही, इससे आपके पूर्वोक्त अन्वय और व्यतिरेक विरोधी तत्त्वज्ञानके सम्बन्धके अभावको लेकर ही उपपन्न हो जायंगे, क्योंकि यह नियम है कि कार्यमात्रका प्रतिबन्धकका संसर्गाभाव कारण है, फिर वे अन्वय और व्यतिरेक अविद्याके साधक क्यों माने जायँ?
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अध्यासविचार ] भापांनुवादसहित ४९
कार्यस्य तावदुपादानापेक्षा ग्रथममुत्पद्यते, पश्चाद्विरोधिसंसर्गाभावापेक्षा; तथा च 'अन्तरङ्गचहिरङ्गयोरन्तरङ्गं वलवद्' इति न्यायेनाऽन्तरङ्गोपादान- विषयत्वमेव तयोन्याय्यम्। प्रध्वंसवदुपादानापेक्षेव मा भूदिति चेद्; विमतं सोपादनम्, भावत्वे सति कार्यत्वाद्, घटवदित्यनुमानात्। नतु पटगुणे रूपेऽनैकान्तिको हेतु:, नहि तस्योपादानं संभवति। तस्य किं पट एवोपादानं द्रव्यान्तरं वा ? नाऽडद्यः, सव्येतरयोविपाणयोरिव युगपदुत्प- न्नयोः कार्यकारणभावानुपपत्तेः । द्वितीये द्रव्यान्तरगतत्वेन पटगुणत्वहानि- रिति, मतम् ; ताकिंकमते तावद् 'उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं तिष्ठति' इति न्यायेन यौगपद्याभावात् पटस्यैवोपादानत्वसंभवः । वेदान्तिमते तु तन्तू-
तो यह शक्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि कार्यको सबसे प्रथम उपादान कारणकी अपेक्षा होती है। अनन्तर विरोधीके संसर्गाभावकी अपेक्षा होती है। इसलिए 'अन्तरञ और वहिरङ्ग इन दोनोंमें अन्तरङ्ग बलवान् होता है' इस न्यायसे पूर्वोक्त अन्वय और व्यतिरेक द्वारा अन्तरङ्ग उपादान (अविद्या) की ही सबसे पहले अपेक्षा उचित है। यदि शक्का हो कि प्रध्वंसरूप कार्यमें जैसे उपादानकी अपेक्षा नहीं होती है, वैसे ही अध्यासमें भी उपादानकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अनुमानसे अध्यासमें सोपादानत्व सिद्ध है-विवादग्रस्त (अध्यास) उपादान कारणवाला है, भावरूप कार्य होनेसे, घटके समान। यदि शक्का हो कि वस्त्रके गुण शुझ, नील आदि रूपमें यह हेतु व्यभिचरित है, क्योंकि उसका कोई उपादान नहीं हो सकता। यदि उपादान मानते हैं, तो पट ही उपादान है या कोई दूसरा द्रव्य ? पट तो उपादान नहीं माना जा सकता, कारण कि एक साथ उत्पन्न होनेवाले गऊ आदिके दाहिने और वायें सींगोंमें जैसे कार्यकारणभाव नहीं होता, वैसे ही साथ-साथ उत्पन्न होनेवाले पट और उसके गुण शुक्क आदि रूपमें कार्यकारणभाव नहीं हो सकता। दूसरे पक्षमें, अन्य द्रव्य पटके गुणके प्रति यदि उपादान माना जाय, तो वह पटका गुण नहीं कहा जायगा। तो यह भी शङ्का सङ्गत नहीं है, क्योंकि नैयायिकोंके मतमें उत्पन्न हुआ द्रव्य क्षणभर गुणरहित रहता है, इस नियमसे गुण और द्रव्य एक-साथ उत्पन्न नहीं होते। इससे पटके गुणका उपादान पट ही हो सकता है। [अतः भावरूप कार्यमें सोपादानत्वका व्यमिचार नहीं है ]। पूर्वोक्त नैयायिकसमत नियमको न
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५0 विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
नामुपादानत्वेऽपि कार्यकारणयोरभेदात् पटगुणत्वं न हीयते।न च काचादि- दोपाणामुपादानत्वसंभवेऽपि किमनेनाऽज्ञानेनेति वाच्यम्, अध्यासतदुपा- दानयोरेकाश्रयत्वनियमात्। इह त्वध्यास आत्माश्रितो दोपाश्चेन्द्रियाद्या- श्रिता इति नोपादानत्वं तेपाम्। ननु रजताध्यासः शुक्त्याश्रितः ग्रतीयते तदुपादानं त्वज्ञानमात्माश्रितमिति त्वन्मतेऽपि नैकाश्रयत्वसिद्धिः, मैवम्; आत्माश्रितस्यैवाऽव्यासस्य शुक्तिसंसर्ग इत्युपपादयिप्यमाणत्वात्। ननु तहिं अर्थाध्यासस्याऽज्ञानम्ुपादानमस्तु ज्ञानाध्यासस्य त्वात्मा- न्तःकरणं चोपादानं भविष्यति, सम्यग्ज्ञानेपु मतभेदेन तयोरुपादानत्वा-
माननेवाले वेदान्तियोंके मतमें यद्यपि तन्तु ही पट और उसके गुण दोनोंके प्रति उपादान कारण हैं, तथापि कार्य और कारण इन दोनोंमें अभेद होनेके कारण तन्तुके गुण होनेपर भी उनके पटगुण कहलानेमें कोई आपत्ति नहीं है। इससे अध्यासमें सोपादनत्व सिद्ध हुआ। परन्तु उसके उपादान काच आदि दोप ही मान लिये जायँ, अतिरिक्त अविद्याको उपादान माननेकी क्या आवश्यकता है? ऐसी शक्ा भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अध्यास और उसके उपादानको एक ही आश्रयमें रहना चाहिए, ऐसा नियम है। आपके कथनके अनुसार यह नहीं बनेगा, क्योंकि अध्यास ज्ञानरूप होनेसे आत्मामें है और काच आदि दोप इन्द्रिय आदिमें हैं। अतः काच आदि दोप अध्यासके प्रति उपादान कारण नहीं हो सकते हैं। यदि शङ्का हो कि रजतका तादात्म्याध्यास शुक्तिमें ही प्रतीत होता है और उसका उपादान अविद्या आत्मामें आश्रित है इससे (अविद्या माननेपर भी) आपके मतमें एकाश्यत्व (एक ही जगह रहने) की सिद्धि नहीं हो सकती ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मामें ही रहनेवाले अध्यासके साथ शुक्तिका सम्बन्ध है, इसका उपपादन आगे किया जायगा। [अज्ञानका आश्रय तथा विषय चेतन ही है, जड़ नहीं हो सकता, इत्यादि अज्ञानके प्रकरणमें कहा जायगा, यह भाव है। ] अच्छा, तो अर्थाध्यासके प्रति अज्ञानको उपादान भले ही मानो, परन्तु ज्ञानाध्यासके प्रति आत्मा या अन्तःकरण ही उपादान होंगे, क्योंकि सम्यग्ज्ञान (प्रमाज्ञान)के विषयमें नैयायिक और वेदान्तियोंका मतभेद है, अतः आत्मा और अन्तःकरण उपादान माने गये हैं? ऐसा यदि कहो, तो यह भी ठीक नहीं
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अध्यासविचार ] भापानुवांदसहित
दिति चेद्, मैयम्: आत्मनोऽपरिणामित्वात्। अन्तःकरणस्य चेन्द्रिय- संयोगलिङ्गादिसापेक्षत्वात्। नह्यत्र संयोगादि: संभवति। मिथ्यापदार्थस्य प्रत्ययमात्रशरीरस्य ग्रत्ययात् प्रागसिद्धेः केनेन्द्रियं संयुज्येत। इन्द्रिया-
न चाऽिष्ठान[ज्ञान]संग्रयोगादेव भ्रान्तिज्ञानोत्पत्तिसिद्धिः, मिध्यार्थ- संग्रयोगाभावे तत्प्रतीत्यनुपपत्तेः । न च संस्कारोपनीततया 'सोडयं देवदत्तः' इति प्रत्यभिज्ञायां तत्तांशवत् तत्प्रतीति :; तद्वदेवाऽभ्रान्तत्वापत्तेः। न चाऽधि-
है, क्योंकि आत्मा परिणामी नहीं है, इससे वह उपादान नहीं हो सकता। और अन्तःकरणके परिणामी होनेपर भी वह प्रत्यक्षस्थलमें इन्द्रिय-संयोग तथा परोक्षज्ञानमें हेतु या शब्द आदिकी अपेक्षा रखता है। और अध्यास- स्थलमें इन्द्रियसंयोग आदिका सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रतीतिमात्र- स्वरूप मिथ्यापदार्थ प्रतीतिसे पहले किस तरह इन्द्रियसे संयुक्त हो सकेगा? इन्द्रियके अन्वय और व्यतिरेक तो भ्रमज्ञानके अधिष्ठानभूत पुरोवर्ती विपयके ज्ञान करानेसे अन्यथासिद्ध हैं। यदि शक्ा हो कि अधिष्ठानके साथ हुए इन्द्रियसंयोगसे ही भ्रमज्ञानकी उपपत्ति हो जायगी। तो यह भी झंका ठीक नहीं है, क्योंकि वस्तुके साथ इन्द्रियसम्प्रयोग हुए बिना मिथ्या वस्तुका ज्ञान नहीं हो सकता है ? यदि शक्का हो कि साक्षात् विपयके साथ सम्प्रयोग न होनेपर भी 'सोऽयं देवदत्तः' (यह वही देवदत्त है) इस प्रत्यभिज्ञामें तच्तांशके समान संस्कार द्वारा मिथ्या विपयके साथ सम्बन्ध हो जानेसे मिथ्या वस्तुकी प्रतीति हो सकती है। [ तात्पर्य यह है कि जैसे मरत्यभिज्ञामें पुरोवर्ती देवदचसे इन्द्रियसंयोग होता है तत्तांशके साथ अर्थात् पूर्वानुभृत परोक्ष देवदत्तके साथ इन्द्रियका संयोग नहीं होता तो भी पूर्वानुभवसे उत्पन्न संस्कार उद्वुद्ध होकर तत्तांश की प्रतीति करा देता है, वैसे ही भ्रमस्थलमें भी शुक्ति आदि अधिष्ठानके साथ यद्यपि इन्द्रियसंयोग है, रंजतादिसे नहीं है, तथापि चाकचिक्य सादृश्य आदि दोपमाहात्म्यसे पूर्वानुभृत रजतका संस्कार उद्बुद्ध होकर मिथ्या रजतादिविपयकी प्रतीति करा देगा, अतः मिथ्या विपयके साथ भी इन्द्रियसंयोगकी आवश्यकता नहीं है। इससे अन्तःकरण ज्ञानाध्यासका उपादान हो सकता है।] तो यह
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५२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
ष्ठानसंसगांशस्याऽसत्ाद् भ्रान्तत्वम्: तर्हि तस्याड़सच्चेन संप्रयोगायोग्य-
ननु मिथ्यार्थेऽन्त:करणमिन्द्रियसंप्रयोगं नाडपेक्षते; विनाऽपि तेन स्वापज्ञानदर्शनादिति चेत् ; तथाऽप्यन्तःकरणस्य ज्ञानाकारपरिणामे ज्ञातृत्व- शून्यत्वाद् मिथ्यार्थव्यवहारो न सिध्येत्। अथाऽन्त:करणमेव जड़मपि ज्ञानकर्तृत्वाकारेण परिणंस्यते, आत्मा वा ज्ञाता भविभ्यतीति मन्येथा :;
भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि आपके द्वारा प्रदर्शित प्रत्यभिज्ञाकी रीतिसे भ्रम- प्रक्रिया समझी जाय, तो प्रत्यभिज्ञास्थलमें तच्तांशकी तरह मिथ्यारजतका ज्ञान भी भ्रमज्ञान नहीं कहा जा सकेगा। यदि कहो कि शुक्तिरजतज्ञानस्थलमें अधिष्ठान शुक्ति आदिका रजतके साथ संसर्ग नहीं है इससे भ्रम कहलाता है। [प्रत्यभिज्ञास्थलमें तो पुरोवर्ती देवदत्तका पूर्वानुभूत परोक्ष देवदत्तके साथ संसर्ग है, इससे भ्रम नहीं कहा जाता] तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यदि अ्रमस्थलमें अधिष्ठानका संसर्ग नहीं हैं, तो संप्रयोगमें अयोग्य मिथ्या रजतादिका अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ही न होगा। पुनः यदि शङ्का हो कि यथार्थ वस्तुके ज्ञानके लिए तो अन्तःकरण इन्द्रियसंयोगकी अपेक्षा करता है और मिथ्यावस्तुके ज्ञानके लिए उसकी अपेक्षा नहीं करता, क्योंकि स्वप्में विषयेन्द्रिय-संयोगके बिना स्वमके पदार्थोंका ज्ञान होता है ? तो यह भी शक्का ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर भी निर्वाह नहीं हो सकता, कारण कि उपादान होनेके नाते अन्तःकरणका ज्ञानके आकारमें परिणाम हो जानेपर ज्ञातृत्वरहित होनेसे मिथ्या वस्तुका व्यवहार सिद्ध न होगा। [ व्यवहार ज्ञान, अभिलपन, उपादान और हान मेदसे चार प्रकारका होता है यह चतुर्विध व्यवहार ज्ञातृत्वसम्पत्तिसे ही वन सकता है, ज्ञातृत्वका प्रयोजक अन्तःकरण तो मिथ्याज्ञानाकारमें परिणत हो गया है, इससे मिथ्यावस्तुविषयक व्यवहारकी सुतरां असिद्धि होगी, यह तात्पर्य हुआ ] यदि शक्का हो कि जड़ अन्तःकरण ही ज्ञानके कर्तृत्वाकारसे परिणत हो जायगा और आत्मा ज्ञाता होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि भ्रम, यथार्थज्ञान, वन्ध और मोक्षके एका- श्रयत्व (एक ही आधारमें होने) का नियम है। इस नियमके अनुसार जब अन्तःकरण भ्रान्त होगा तव उसमें ही सम्यक् ज्ञान और वन्घनिवृत्ति-मोक्ष मानना होगा। आत्मामें भ्रम नहीं है; अतः उसमें सम्यक् ज्ञान तथा बन्धनिवृत्ति-मोक्षकी स्थिति
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ५३
एवमपि भ्रान्तत्वे तस्यैव सम्यग्दर्शनवन्धनिवृत्ती प्रसज्येयाताम्। इष्यते त्वात्मन एव भ्रान्तत्वादिकम् , तचाऽडत्माश्रिताज्ञानोपादानत्वपक्षे सिध्यति; नाऽन्यथा। तस्मादज्ञानमेवोपादानं परिशिष्यते। न चाऽज्ञाने विवदितव्यम्; 'अहमज्ञः' 'मामन्यं च न जानामि' इति प्रत्यक्षेण जड़ात्मिकाया अविद्याशक्तेरात्मानमाश्रित्य वाह्याध्यात्मिकेपु व्याप्ताया अनुभूयमानत्वात्। ननु ज्ञानाभावविपयोऽयमनुभव:, तन्न; 'अहं सुखी' इतिवद्परोक्षानुभवत्वात्। अभावस्य च पष्टप्रमाणगम्यत्वाद्। अ्रत्यक्षाभाववादे तु धर्मिप्रतियोगिनोरात्मज्ञानयोः प्रतीतौ 'मयि ज्ञानं नास्ति' इति एतादशं ज्ञानाभावप्रत्यक्षं व्याहन्येत। तयोरप्रतीतौ च हेत्व-
भी न वनेगी, ऐसा इषट नहीं है प्रत्युत ] आत्मामें ही भ्रम, सम्यक् ज्ञान और बन्ध- निवृत्ति-मोक्ष इष है, वह तव वन सकता है, जब अध्यासका उपादान कारण आत्माश्रित अज्ञान माना जाय। अन्यथा (अन्तःकरण आदिको भ्रमका उपादान माननेपर) उक्त (भ्रान्त्यादिकी एकाश्रयत्वरूप) व्यवस्था सङ्गत न होगी, अतः परिशेषात् अज्ञान ही अध्यासका उपादान सिद्ध हुआ। और अज्ञानके अस्तित्वमें भी सन्देह नहीं करना चाहिए। क्योंकि 'मैं अज्ञ-अज्ञानी हूँ' और मैं अपने आपको तथा दूसरेको नहीं जानता हूँ' इस प्रत्यक्षप्रतीतिसे आत्मामें आश्रित होकर सब वाह्य घट आदि और आध्यात्मिक अहद्कार आदि वस्तुओंमें व्याप्त जड़स्वरूप अविद्या शक्ति सिद्ध ही है। इससे प्रत्यक्षसिद्ध वस्तुमें विवाद करना उचित नहीं है। यदि कहो कि 'मैं नहीं जानता' इत्यादि पूर्वोक्त अनुभव ज्ञानके अभावको ही विषय करता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त अनुभव 'मैं सुखी हूँ' इस अनुभवके सद्वश प्रत्यक्ष अनु- भव है और अभाव तो 'अनुपलन्धिरूप छठे प्रमाणका विषय होनेसे परोक्ष है, प्रत्यक्ष नहीं है। अभावको प्रत्यक्ष माननेवालेके मतमें भी धर्मी (अहंपदार्थ ज्ञाता-आत्मा) प्रतियोगी (ज्ञानकी) प्रतीति रहनेपर 'मुझमें ज्ञान नहीं है' इस प्रकार ज्ञानके अभावका प्रत्यक्ष व्याहत (परस्परविरुद्ध) होगा, इस व्याघातके भयसे यदि आत्मा और ज्ञान दोनोंकी प्रतीति नहीं होती, ऐसा
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५४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
भावादेव तत्प्रत्यक्षानुत्पादः। ननु सर्वत्र व्यवहारो ज्ञानस्य फलत्वेन लिङ्गं भवति; तल्िङ्गाभावेन ज्ञानाभावोऽनुमीयते इति चेद्, न; तदापि धर्म्यादि- अ्रतीत्यप्रतीत्योरुक्तदोपात्। पष्ठमानगम्यो ज्ञानाभाव इति भट्टमतेऽपि अयमेव दोषः । अस्मन्मते तु साक्षिवेद्यो ज्ञानमात्राभावः। ज्ञानविशेषा- भावस्तु 'व्यवहारे भट्टनयः' इत्यभ्युपगमेन षष्ठमानगम्यः । यदा तु 'मही घटत्वं घटतः कपालिका कपालिकाचूर्णरजस्ततोऽणुः' इति पुराणमतमाश्रित्याऽभावपदार्थ एव नाडङ्गीक्रियते, तदा न काऽपि चिन्ता।
माना जाय, तो हेतुके बिना अभावका ज्ञान ही नहीं होगा [ क्योंकि अभावज्ञानमें धर्मी तथा प्रतियोगी दोनोंका ज्ञान कारण माना गया है]। ज्ञानका फल सर्वत्र व्यवहार देखा गया है, अतः फल होनेके कारण व्यवहार ज्ञानका अनुमान करनेमें लिङ्ग 'हेतु' है। फलस्वरूप व्यवहाररूपी हेतु न होनेसे ज्ञानके अभावका अनुमान किया जाता है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा माननेमें भी धर्मी आदिकी प्रतीति और अप्रतीतिमें उक्त दोष बना ही है। [यदि ज्ञानाभावका व्यवहाररूप फलाभावसे अनुमान करते हैं, तो प्रश्न होता है कि इस अनुमानके अनुव्यवसायमें धर्मी (आत्मा) और प्रतियोगी (ज्ञान) की प्रतीति है या नहीं ? यदि है तो 'मैं अपनेमें ज्ञानाभावका अनुमान करता हूँ', या 'मैं ज्ञानाभाववाला हूँ' इनमें धर्मी और प्रतियोगी दोनोंका ज्ञान होनेसे व्याघात बना ही है। यदि यही पक्ष अभिमत है, तो अनुमानका उदय ही असम्भव है। पर्वतादि धर्मीके ज्ञानके बिना जब कोई भी अनुमिति नहीं देखी गई है, तव अनुव्यव- सायकी आशा करना तो दूर ही रहा, यह भाव हुआ।] षष्ठ प्रमाणसे (अनुपलब्धिसे) अभाव जाना जाता है, इस भट्ट (मीमांसक) मंतमें भी यही पूर्वोक्त व्याघात आदि दोष आते हैं। और हमारे (वेदान्तियोंके) मतमें तो ज्ञानसामान्यका अभाव साक्षीसे जाना जाता है और ज्ञानविशेषका अभाव अनुपलब्धि नामक षष्ठ प्रमाणसे ही जाना जाता है, क्योंकि व्यवहारमें भट्ट (मीमांसक) का मत ग्राह्य है, ऐसा सिद्धान्त है। अगर पृथ्वी, घट, कपाल, उसके भी छोटे टुकुड़े, फिर उसका चूर्ण और तव परमाणु इस पुराण मतको आश्रयणकर अभाव पदार्थका स्वीकार ही न किया जाय तो हमें कोई चिन्ता भी नहीं है। [ तात्पर्य यह है कि प्रभाकरानुयायी
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ५५
ननु भावरूपाज्ञानस्यापि ज्ञाननिवर्त्यत्वाङ्गीकारादहमज्ञ इत्याद्याश्रयविपय- प्रतीतिगभिंतमज्ञानप्रत्यक्षं व्याहतमेव ।. मैवम्, आश्रयविपयांज्ञानानि त्रीण्यपि एकेनैवर साक्षिणाऽवभास्यन्ते। तथा चाऽडश्रयविपयौ साधयन्नयं साक्षी तद्व- देवाज्ञानमपि साधयत्येव न तु. निवर्तयति। तन्निवर्तकं त्वन्तःकरणवृत्ति- ज्ञानमेव । तचचात्र नास्तीति कर्थ व्याहतिः ?
मीमांसक अभाव पदार्थ नहीं मानते। पृथ्वी या घटके अभावका उपपादन पूर्वोक्त पुराणवचनके अनुसार यों है-पृथ्वी ही घटभावसे परिणत हो गई। अव घट रहा, पृथ्वी नहीं रही, यही पृथ्वीका अभाव है। घटके टुकड़े कर दिये गये घटका अभाव अर्थात् घट नाम वदल कर कपाल हो गये, एवम् उसका अभाव और छोटे टकुड़े उसका भी अभाव चूर्ण (धूल) उसका भी अभाव अन्ततः परमाणु हो गये, वस यही अभाव पदार्थ है। इससे अतिरिक्त अभाव कुछ नहीं है। इस प्रकार अभावका खण्डन हो गया। हम चेदान्तियोंकी, एक अद्वैततत्त्वपर अवलम्वित होनेसे, अभावका ही क्या प्रपञ्चमात्रका खण्डन कर देनेसे कोई हानि नहीं है।] वादी वेदान्तिमतमें दोप देता है कि भावरूप* अज्ञानको ज्ञानसे निवर्त्य माननेपर भी 'मैं अज्ञ हूँ' ऐसा आश्रय और विपय दोनोंकी प्रतीतिसे युक्त अज्ञानका प्रत्यक्ष बाधित ही है। समाधान करते हैं कि नहीं वाधित नहीं है, क्योंकि आश्रय, विषय और अज्ञान तीनों एक ही साक्षीसे प्रकाशित होते हैं। इसलिए आश्रय और विपयको प्रकाशित करता हुआ साक्षी उन्हींकी तरह अज्ञानको भी प्रकाशित करता है, उसकी निवृत्ति नहीं करता। अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाला तो अन्तःकरणकी वृत्तिमें प्रतिविम्बित चिदरूप ज्ञान है। और अज्ञानका विनाशक वह वृत्तिज्ञान प्रकृतमें नहीं है। तव व्याघात कैसे होगा?
- तात्पर्य यह है कि यदि भावरूप अज्ञानका प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, तो जञानसे उसकी निवृत्ति कैसे होगी। ज्ञानसे निवृत्ति माननेसे तो व्याघात वना ही है। यदि कहो कि निवृत्ति नहीं होती, तो अनिर्मोक्ष प्रसङ् होगा 1 यदि माना जाय कि भावरूप अज्ञानका प्रत्यक्ष (ज्ञान) नहीं होता है, तो ऐसे भावरूप अज्ञानके माननेमें प्रमाण ही क्या होगा-ऐसा आप कह भी नहीं सकते। आप तो इस भावरूप अज्ञानमें प्रत्यक्ष ही प्रमाण देते हैं, इस विवादसे भावरूप अज्ञान नहीं मानना चाहिये, इस अमिप्रायसे शङ्का की गई है। समाधानका आशय यह है कि भावरूप अज्ञानका प्रत्यक्ष होता है और वह ज्ञानसे नष्ट भी होता है तव भी कोई व्याघात नहीं है, क्योंकि एक कालमें भाव और अभावका रहना विरुद्धं है। जैसे घटाभावकालमें एवं घदाभावके देशमें घटका रहना विरुद्ध
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५६ विघरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
नन्वहं घट न जानामीत्यत्राज्ञानव्यावर्तको घटो न तावद् संन्धरहितेन साक्षिणा अत्येतुं योग्य: ; वाह्यविषयसिद्धेः स्वसंवद्धप्रमाणायत्तत्वाद्। नाऽपि प्रमाणेन; प्रमाणनिवर्त्यत्वादज्ञानस्येति चेत्, सत्यम्; केवलस्य घटस्य साक्षिवेद्यत्वाभावेऽपि अज्ञातत्वधर्मविशिष्टस्याज्ञानद्वारा संबन्ध- वता साक्षिणा प्तीतिरुपपद्यत एव। न च वाच्यं केवलस्य साक्षि- वैद्यत्वाभावे विशिष्टस्याऽपि तदनुपपन्नम्, रसादेश्चाक्षुपद्रव्यविशिष्ट- शङ्का करते हैं कि "मैं घटको नहीं जानता" इस प्रतीतिमें अज्ञानके व्यावर्तक (विशेषक) घटसे सम्बद्ध हुए बिना उसका साक्षीसे भान तो नहीं हो सकता, क्योंकि वाह्य विषयोंके प्रतिभासकी सिद्धि अपनेसे (साक्षीसे) सम्बद्ध प्रमाणके (अन्तःकरणसे युक्त चक्षु आदिके) अधीन है। प्रमाणसे भी उसकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि प्रमाणव्यापारके होते ही अज्ञान निवृत्त हो जाता है। तो इस शङ्काका समाधान यह है कि यद्यपि आपका कहना सच है तथापि केवल घटादि बाह्य विषयोंके साक्षिवेद्य नहीं होनेपर भी अज्ञातत्वघर्म- विशिष्ट विषयोंका अज्ञानके द्वारा सम्बन्ध हो जानेसे साक्षीसे प्रतीति हो ही सकती हैं। यदि शक्का हो कि केवल विषय साक्षी से वेद्य नहीं है तो विशिष्ट भी साक्षिवेद्य कैसे होगा? जसे कि केवल रसादिके चक्षुसे वेद्य न होनेसे चाक्षुप द्रव्य (आम्रादि) विशिष्ट होनेपर भी वे चक्षुसे वेद्य नहीं होते हैं। तो यह
है। परन्तु एक देश या एक कालमें भी दो भावोंका रहना कोई विरुद्ध नहीं है। जैसे एक ही देश और कालमें घट और पट दो भाव पदार्थ रह सकते हैं वैसे ही हमारे मतमें ज्ञान अज्ञान दोनों भाव पदार्थ हैं। इससे उनका एक ही अधिकरणमें तथा एक कालमें रहना व्याहत नहीं है। साक्षिज्ञान ही जैसे विषय तथा आश्रय दोनोंका प्रतिभासरूप है वैसे ही विषयका विशेष्य होनेसे भावरूप अज्ञानका भी पतिभासरूप है अपने प्रतिभाससे (ज्ञानसे) अपना नाश कहीं नहीं देखा गया। अन्यथा घटज्ञानसे घटनिवृत्ति हो जानी चाहिए। ज्ञानका अज्ञानसे विरोध तव आता जब हम भी वादीकी भाँति अज्ञानको ज्ञानका अभावरूप मानते, किन्तु ऐसा हम मानते नहीं, इससे सिद्ध हुआ कि अपने साधक साक्षिज्ञानका कोई विरोध नहीं है-विरोध है पूर्शेक्त वृत्तिज्ञानसे। यहां इस शंकाका भी अवकाश नहीं है कि वृत्तिज्ञान भी तो वस्तुतः साक्षिज्ञान ही है (विम्व-ग्रतिविम्वमें अमेद माना जाता है) केवल वृत्तिरूप उपाधि है। तव अपनेसे भासित होनेवाले अज्ञानका अपने ही द्वारा नाश कैसे होगा; क्योंकि देखा गया है कि सूर्यके प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले तिनका-फूस आदि को आतशी शीशा द्वारा आकर सूर्यप्रकाश स्वयं भस्म कर देता है वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिए।
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स्थाऽपि चाक्षुपत्वादर्शनादिति, परमाणोः केवलस्य मानसप्रत्यक्षत्वाभावेऽपि 'परमाणुमहं जानामि' इंति ज्ञानविशेपणतया मानसप्रत्यक्षविषयत्वस्य परैर- ङ्गीकारात्। लोकेऽपि राहो: केवलस्याऽप्रत्यक्षत्वेऽपि चन्द्राद्युपरक्तस्य प्रत्यक्षत्वदर्शनात्। परमतेऽपि 'घटमहं न जानामि' इत्यत्र ज्ञानाभावविशे- पणस्य घटस्य प्रतीत्यप्रतीत्योर्दूपणस्याभिहितत्वात्। तस्मात् सर्वं वस्तु ज्ञाततयाऽज्ञाततया वा साक्षिचैतन्यस्य विपय एव। ननु तहिं ज्ञाताज्ञात- विपयभेदो न स्यात् तथा प्रमाणव्यापारवैयर्थ्य तदन्वयव्यतिरेकविरोध- शचेति चेद्, मैवम्; यद्दज्ञानमज्ञातत्वधर्म स्वविपये संपाद्य तस्य साक्षिणा
भी शङ्का उचित नहीं है, क्योंकि केवल परमाणुके मानसप्रत्यक्षविपय न 1 होनेपर भी दूसरे दर्शनकारोंने 'परमाणुको मैं जानता हूँ' इस ज्ञानके विशेपणरूपसे उसमें मानसप्रत्यक्षकी विपयता मानी है। और लोकमें भी राहुका स्वतः प्रत्यक्ष न होनेपर भी चन्द्रादिके सम्बन्धसे उसका प्रत्यक्ष अनुभवसिद्ध है। [ यह कहना भी सङ्गत नहीं हो सकता कि भावरूप अज्ञान माननेसे उसकी उपपत्तिके लिए इतनी कष्टप्रद कल्पना करनेकी अपेक्षा अज्ञान ज्ञानाभावरूप ही क्यों न मान लिया जाय ? इस आशङ्कासे कहते हैं कि] दूसरे दर्शनकारोंके (नैयायिक आदिके) मतमें अज्ञानको अभावरूप माननेपर भी 'घटको मैं नहीं जानता' इस प्रतीतिमें घटाभावके विशेपणीभूत घटकी प्रतीति या अप्रतीतिमें दूपण (प्रतीति होनेसे व्याघात अप्रतीति होनेसे घटाभावज्ञानका ही असम्भव होगा, इस प्रकार दूषण) दे ही चुके हैं। इससे सभी वस्तुएँ कुछ ज्ञानके विशेषणरूपसे और कुछ अज्ञानके विशेष- णरूपसे साक्षीरूप चैतन्यकी विषय हैं-अर्थात् साक्षी ज्ञातत्वरूपसे और अज्ञातत्वरूपसे सभी वस्तुओंको विषय करता ही है। [जो ज्ञानका विषय है वह ज्ञात और जो अज्ञानका विषय है वह अज्ञात कहलाता है। अज्ञात वस्तुका ज्ञान करानेके लिए प्रमाणव्यापार अपेक्षित होता है, तदनन्तर विषयका ज्ञान होता है, ऐसा सिद्धान्त है। ऐसी स्थितिमें यदि आपके (वेदान्त) मतमें सभी वस्तुएँ साक्षिज्ञांनकी विपय हैं, तो सब ज्ञात ही होंगे, पुनः ज्ञाताऽज्ञातव्यवस्था नहीं बनेगी, इस प्रकार शक्का करते हैं ] तब तो ज्ञात और अज्ञात विपयोंकी व्यवस्था ही न बनेगी और प्रमाणव्यापार भी व्यर्थ हो जायगा और प्रमाणव्यापार होनेपर ज्ञातता होती. है, प्रमाणव्यापार न होनेपर नहीं होती है, इस अन्वय और व्यतिरेकका विरोध भी होगा। समाधान करते हैं कि
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५८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
सम्बन्धं घटयति तद्वत् प्रमाणमपि ज्ञातत्वं धर्म स्वविपये संपाद्य तस्य साक्षिणा सम्बन्धघटकमित्यङ्गीकारेणोक्तदोपनिवृत्तेः । तदेवमुक्तोपपत्तिसहित- महमज्ञ इति प्रत्यक्षं भावरूपाज्ञाने प्रमाणम्। तथाप्यनुमानैकरुचिं अति तदप्युच्यते प्रत्यक्षवदुयपत्त्यपेक्षां विना साक्षादेव भावरूपत्वसाधनाय। विमतं प्रमाणज्ञानम्, स्वप्रागभावव्यति- रिक्तस्वविषयावरणस्वनिवर्त्यस्वदेशगतवस्त्वन्तरपूर्वकं भवितुमर्हति, अप्र- काशितार्थप्रकाशकत्वात्, अन्धकारे प्रथमोत्पन्नप्रदीपप्रकाशवद्, इति। ज्ञान- उक्त शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जैसे अज्ञान अपने विपयमें अज्ञातत्व धर्मका सम्पादन करके उस विषयका साक्षीसे सम्बन्ध करा देता है, वैसे ही प्रमाण भी अपने विषयमें ज्ञातत्व धर्मका सम्पादन करके उसका साक्षीसे सम्बन्ध जोड़ देता है, इस सिद्धान्तका अङ्गीकार करनेसे उक्त दोषकी निवृत्ति हो जाती है। इन पूर्वोक्त युक्तियोंके द्वारा 'अहमज्ञः' (भैं अज्ञानी हूँ) यह प्रत्यक्षप्रतीति भावरूप अज्ञानमें प्रमाण हुई। * तथापि-प्रत्यक्षसे भावरूप अज्ञानके सिद्ध होनेपर भी 'बद्धमुष्टिवानरन्याय' से तर्क हीमें विश्वास रखनेवालोंके प्रति प्रत्यक्षमें जैसे उपपत्तियोंकी अपेक्षा होती है, वैसे अनुमानमें नहीं होती, अतः उपपत्तियोंके विना ही अनुमान साक्षात् साध्यकी सिद्धि करता है, वह स्वयं उपपत्तिस्वरूप है, इसलिए भावरूप अज्ञानके साधनके लिए अनुमान प्रमाण भी कहते हैं- विवादग्रस्त प्रमाणज्ञान अपने प्रागभावसे अतिरिक्त, अपने विषयका आवरण, अपनेसे निवर्त्य और अपने अधिकरणमें स्थित वस्त्वन्तरपूर्वक होता है, अर्थात् स्वप्रागभावव्यतिरिक्त आदि चार विशेषणोंसे विशिष्ट स्वभिन्न अन्य वस्तु प्रमाणज्ञानकी उत्पत्तिसे पूर्व अवश्य रहती है, अप्रकाशित अर्थका प्रकाश करनेवाला होनेसे; अन्घकारमें प्रथम उत्पन्न प्रदीपके प्रकाशके समान [क्रमशः *प्रत्यक्ष प्रमाण सर्वश्रेष्ठ होनेपर भी भ्रमादिसाधारण देखा गया है। अतएव अपने प्रामाण्यके लिए वह परीक्षाकी आवश्यकता रखता है। परीक्षोत्तीर्ण ही प्रत्यक्ष प्रमाण होता है। प्रमाणन्तरोंसे तथा व्यवहारसे संवाद या विसंवादके निराकरणादि प्रकारसे ही परीक्षा की जाती है, अतः पूर्वोक्त प्रत्यक्षप्रतीतिके प्रामाण्यकी रक्षाके निमित्त प्रमाणान्तरोंका संवाद दिखाते हैं-प्रमाणान्तरोंमें भी प्रथम तर्कप्रवण नैयायिकोंके सुखमुद्रणके लिए 'पररीत्या परो वोधनीयः' इस न्यायका अवलम्बन करके इस ग्रन्थसे भावरूप अज्ञानके साधनके लिए अनुमान भी प्रमाण दिखाते हैं।
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अध्यासविचार भापानुवादसहित ५९
मात्रस्य पक्षत्वे त्वनुवादज्ञाने हेत्वसिद्धि: स्यादिति प्रमाणेत्युक्तम्। तथा धारावाहिकव्यावृत्तये विमतमिति। वस्तुपूर्वकमित्येवोक्ते स्वाश्रयेणाSS- त्मादिना सिद्धसाधनता स्याद्, अतो वस्त्वन्तरेत्युक्तम्। तथा स्वाश्रयातिरिक्तसामग्रीं धर्मादिकं पूर्वज्ञानं प्रागभावं चाऽवरोहक्रमेण
अनुमान प्रयोगमें आये हुए पढ़ोंके प्रयोजनका निरूपण करते हैं ]-यदि पक्षमें प्रमाणपद नहीं दिया जाता, तो ज्ञानमात्र पक्ष होता। अनुवादज्ञानमें हेतु न जानेसे हेत्वसिद्धि दोप आ जायगा, [क्योंकि अनुवादज्ञान पूर्व प्रकाशित अर्थका ज्ञान है, अप्रकाशित अर्थका नहीं, इससे उसमें हेतुकी असिद्धि हुई ] अतःसव ज्ञान न लिए जायँ, यह प्रमाणपद देनेका प्रयोजन हुआ। धारावाहिक प्रमाण ज्ञानकी व्यावृत्तिके लिए विमत* पद दिया गया है। यद्यपि वस्तुपूर्वक इतना ही कह देनेसे भी निर्वाह हो सकता था, तथापि प्रमाणज्ञानके आश्रयीभूत आत्मादिको लेकर सिद्धसाधन दोष होगा, अतः वस्त्वन्तर पद दिया गया है। [आदिपदसे अन्तःकरण और उसकी वृत्ति आदि लिए जायेंगे ]। उसी प्रकार अवरोहक्रमसे 'स्वदेशगत' आदि चारों विशेषण स्वाश्रयसे अति- रिक्त सामग्रीकी, धर्मादिकी, पूर्वज्ञानकी और स्वपागभावकी व्यावृत्ति करते हैं ।।
- तात्पर्य यह है कि विपयेन्द्रिय संयोगसे घटका ग्रमात्मक ज्ञान होता है। जब तक इसकी विरोधी दूसरी कोई वृत्ति नहीं होगी तब तक दीपशिसाकी भाँति उसके अनेक ज्ञानोंकी धारा वनी ही रहेगी। यह ज्ञानधारा सजातीय होनेसे प्रमाणज्ञान कहलाती है। उत्तर-उत्तर धाराके पूर्व-पूर्व धारा वस्त्वन्तर है। अतः धाराज्ञानमें सम्पूर्ण विशेषणोंके जानेसे वाराजञान भी पक्ष हो जायगा, जो इष नहीं है, क्योंकि निरुक्त धारावाहिक ज्ञानको उक्त रीतिसे वस्त्वन्तर- पूंरचक सभी मानते हैं, अतः सिद्धसाधन दोप आ जायगा। इसलिए विमतम, (विवाद ग्रस्त) पद दिया गया है। धारावाहिक ज्ञानमें किसीका विवाद न होनेसे वह पक्षकोटिमें नहीं आ सकता। * स्वाश्रयसे अतिरिक्त चश्षुरादि सामग्रीका निवारण करनेके लिए स्वदेशगत विशेषण दिया गया है। कार्यमात्रके प्रति धर्मादि-अदृष्ट कारण माना गया है, अतः उसको लेकर सिद्धसाधन या अर्थान्तर न हो जाय, इसलिए स्वनिवर्त्यपद दिया गया है। ग्रमाणज्ञानसे धर्मादिकी निवृत्ति नहीं होती है, योग्यविभुगुणोंको स्वोत्तरवर्तिगुणनाश्यत्व होनेसे पूर्वज्ञान उत्तर ग्रमाणज्ञानसे निवर्त्य होता है और उस ग्रमाणज्ञानसे पूर्व भी रहता है, अतः इसकी व्यावृत्ति करनेके लिए स्वविपयावरणपद दिया गया है। पूर्वज्ञान खवनाशक उत्तर ज्ञानके विषयका आवरण नहीं करता। एवं कार्यके प्रति पागभाव कारण माना गया है।
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६० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १,वर्णक १
स्त्रदेशेत्यादिविशेषण चतुष्टयेन निवर्तयति। एतावता च विवक्षितविशेषं भावरूपा- ज्ञानं सिध्यति। धारावाहिकज्ञानेषु व्यभिचारं वारयितुम् अप्रकाशितेति। धारावाहिकप्रभासूभयवैकल्यं वारयितुं प्रथमेति। आतपवति देशे समुत्पन्न- दीपप्रभायां तद्वारयितुमन्धकारे इति। अनिर्वचनीयस्य ज्ञानार्थरूपद्विविधाध्यासस्याऽन्यथानुपपत्या तदुपादा- नस्याऽज्ञानस्याऽनिर्वचनीयत्वम्। न चाऽन्यथाप्युपपत्तिस्तस्य सत्यत्वे तत्कार्यस्यापि सत्यत्वप्रसङ्गात्। तथा च मूलकारणत्वान्यथानुपपत्त्याSनादि- त्वम्। सादित्वे चोपादानपरम्परापेक्षायां मूलकारणं न सिध्येद्। तदेवमना-
ननु किभिदमज्ञानमात्मानमिवानात्मानमप्यावृणोति किं वा नावृ-
इस अनुमानसे विवक्षित है विशेष जिसका, ऐसा भावरूप अज्ञान सिद्ध होता है। धारावाहिकज्ञानमें हेतुके व्यभिचारवारण करनेके लिए 'अप्रकाशित' पद दिया गया है। [दृष्टान्तवाक्यके पदोंकी मीमांसा करते हैं]-धारावाहिक दीप- प्रभाओंमें साध्य और हेतु दोनोंका अभाव है, अतः असिद्धिरूप दोषका वारण करनेके लिए 'प्रथम' पद दिया गया है। सूर्यके प्रकाशवाले देशमें जलाये गये दीपकी प्रभामें व्यभिचारवारण करनेके लिए अन्धकार पद दिया गया है। ज्ञान और अर्थके मेदसे उक्त द्विविध अनिर्वचनीय अध्यासकी अन्यथानुपपत्तिसे उस अध्यासके प्रति उपादानभूत अज्ञान भी अनिर्वचनीय ही सिद्ध होता है। अध्यासकी अन्यथा उपपत्ति भी नहीं हो सकती, क्योंकि उस कारणको सत्य माननेसे कार्य भी सत्य हो जायगा। इसलिए मूलकारणकी अन्यथानुपपत्तिसे इस अज्ञानमें अनादित्व ही सिद्ध होता है। उसको सादि माननेपर उपादानपर- म्पराकी अपेक्षासे मूलकारण भी सिद्ध न हो सकेगा। इस प्रकार आत्माका आश्रय करके आत्माको विषय करनेवाला अनिर्वचनीय भावरूप अनादि अज्ञान ही अध्यासके प्रति उपादानकारण सिद्ध हुआ। क्या यह पूर्वोक्त रीतिसे सिद्ध भावरूप अज्ञान जसे आत्माको आवृत करता है, वैसे ही अनात्माको आवृत करता है या नहीं? आवृत करता है, यह उक्त विशेषणविशिष्ट प्रागभावको ग्रहणकर पूर्वोक्त सिद्धसाधन या अर्थान्तर न हो जाय, इससे स्वप्रागभावव्यतिरिक्त पद दिया गया है, यह भाव है।
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अध्यासविचार ] भांपानुवादसहित ६१
णोति ? नाऽडद्यः; प्रमाणप्रयोजनयोरभावात्। तथा हि 'इदं नीलम् अज्ञानेनावृतम्' इति प्रमाणेन ग्रहीतव्यम्, तच्च नीलप्रतीत्यप्रतीत्योन संभा- व्यते। अथ मन्यसे नीलावगतिकाल एवाऽज्ञानावरणासंभवेऽपि नीलावगतेः पूर्वकालीनमावरणं गम्यत एवेति, तन्न; गमकानिरूपणात्। किमिदानी- मवगतत्वं गमकं किं वा इदानीमेवेत्यवधारणम्, किं वा तदेवेदं नीलमिति अत्यभिज्ञान्यथानुपपत्तिः १ आहोस्विदभिज्ञाप्रत्यभिज्ञयोर्मव्ये ज्ञानस्मृत्य- भावान्यथानुपपत्तिः १ नाऽद्य, धारावाहिकज्ञानेपु पूर्वमवगतस्यैव पश्चा-
पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि वह अज्ञान अनात्माको आवृत करता है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है और ग्रयोजन भी नहीं है। यदि अज्ञान अनात्माको आवृत करेगा, तो 'यह नील अज्ञानसे आवृत है' इस प्रकारके किसी प्रमाणसे ही अनात्माके आवरणका ग्रहण करना होगा। परन्तु इस प्रकारके प्रमाणका नीलकी प्रतीति या अग्रतीति कालमं सम्भव नहीं है। [ तात्पर्य यह कि जिस प्रमाणसे आपको नीलका अज्ञानसे आवृत होना प्रतीत हुआ है, उस प्रमाणसे यदि नीलकी ग्रतीति हो तो व्याघात होगा अर्थात् नीलकी पतीति होनेपर फिर वह कैसे आवृत होगा ? यदि नीलकी प्रतीति नहीं होती यह माना जाय, तो नीलके ऊपर अज्ञान- कृत आवरणने कुछ अतिशय उत्पन्न किया, यह कैसे ज्ञात होगा और इसमें उक्त प्रमाणका प्रामाण्य भी कैसे होगा ] अव शक्का करनेवाला कहता है कि यद्यपि नीलके ज्ञानकालमें ही अज्ञान द्वारा होनेवाले आवरणका सम्भव नहीं है, तथापि नीलज़ान होनेके पूर्वकालमें आवरणकी प्रतीति होती ही है, यदि इसे नहीं माना जाय तो नीलज़ानके पूर्वकालमें भी नीलकी प्रतीति होनी चाहिए। समाधान करते हैं कि नहीं-ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि इस अवगतिके पूर्वकालिक आवरणका गमक (सिद्ध करनेवाला हेतु) कोई नहीं बन सकता, क्योंकि उक्त विपयमें प्रश्न हो सकता है कि क्या इस समयमें वस्तुका अवगम गमक है? या इसी समयमें वस्तुका अवगम, इस प्रकार अवधारणगर्भित अवगम गमक है? 'अथवा तदेवेदं नीलम्' (यह वही नील है) इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञाकी अन्यथा अनुपपत्ति गमक है? आहोस्वित् अभिज्ञा और प्रत्य- भिज्ञाके मध्यमें ज्ञानजन्य स्मृतिके अभावकी अन्यथा अनुपपत्ति गमक है? इन चारों चिकल्पोंमें से कोई भी गमक नहीं हो सकता, क्योंकि 'अभी अवगत होना सूचित करता है कि अब तक अनवगत अर्थात् आवृत था' इस आशयसे किया गयी
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६२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ?
दप्यवगमेन पूर्वकालीनावरणं विनैवेदानीमवगतत्वसंभवात्। न द्वितीय:,
सिद्धिरिति। न तृतीयः, अभिज्ञाय कंचित्कालं विस्मृतस्यैव अरत्यभिज्ञेति नियमाभावात्। सर्वदा स्फुरत्यप्यात्मनि सोऽहमिति प्रत्यभिज्ञानदर्शनात्।
ज्ञानानां स्मृत्यभाव इत्यपि सुवचत्वात्। नहि यद्यदनुभूतं तत्तत् स्मर्यत
प्रथम विकल्प उचित नहीं है, क्योंकि धारावाहिक ज्ञानोंमें पूर्वमें अवगतका ही पीछे भी अवगम होता है। उस पश्चाद्धावी अवगमका विषय ही अव अवगत हुआ है, ऐसा व्यवहार होता है, और पीछे होनेवाले अवगमके पूर्वकालमें अनवगम न रहनेसे उसका आवरण भी नहीं है। अतः प्रथम विकल्पमें व्यभिचार आया। उत्तरकालवैशिष्ट्य तो पूर्वकालमें अज्ञात ही है, इस प्रकार व्यभिचारका वारण करना उचित नहीं है, क्योंकि पूर्वकालमें हुई अवगतिका विषयभूत अर्थ ही 'अवगम कर रहा हूँ' इस उत्तरकालविशिष्ट अव- गतिका विषय है, इससे विशेषणभूत अर्थके होनेसे व्यभिचार वना ही है। यदि इस कालसे पूर्वकालमें आवरण नहीं रहा, तो 'अभी जाना' ऐसा अवधारण क्यों? इस आशयवाला द्वितीय विकल्प भी गमक नहीं हो सकता, क्योंकि अन्योन्याश्रय दोष होगा-पूर्वकालमें आवरणके सिद्ध होनेपर अभी ही जाना गया, ऐसा अवधारण सिद्ध होगा और इस अवधारणके वलसे पूर्वकालमें अनवगतिका प्रयोजक आवरण सिद्ध होगा। पूर्वापरकालसम्बन्धको विषय करने- वाली प्रत्यभिज्ञा मध्यमें आवरणकी फलभूत अनवगतिके बिना नहीं हो सकती। तृतीय विकल्प भी युक्तिसह नहीं है, क्योंकि किसी वस्तुके पूर्व अनुभवके घाद कुछ कालके अनन्तर उसको भूल जानेसे ही प्रत्यभिज्ञा होती हैं, यह कोई नियम नहीं हैं, कारण कि आत्माका सर्वदा नित्यस्फुरण होनेपर भी 'सोऽहम्' (वही मैं हूँ) ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है। पूर्वोक्त चतुर्थ विकल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि अभिज्ञा और प्रत्यभिज्ञाके मध्यमें आवरणके न होनेपर उत्पन्न हुए ज्ञानोंका ही स्मरण नहीं होता, ऐसा कह सकते हैं [ एतावता स्मरण नहीं होता, ऐसी वात नहीं है] क्योंकि अनुभवसे जो जो ज्ञात होते
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ६३
एवेति नियमोऽस्ति। न च वाच्यं 'त्वदुक्तमर्थ' न जानामि' इति विपयसंवन्ध्य- ज्ञानमनुभृयते सम्बन्धश्राज्ञानस्याऽडवरणत्वेनात्मनि ट्ष्टस्तत्कथमपलप्यत इति। साक्षिचैतन्येन स्व्रस्मिन्नध्यस्तानामज्ञानविपयतत्सम्वन्धानामनुभवा- ङ्ीकारात्। सम्बन्धश्राज्ञानविपययोः कार्यकारणभावलक्षणो नावरकाब्रियमा- णत्वलक्षण:, अध्यस्तस्याऽडवरणायोगात्। प्रतीतिकाले तावदावरणं व्याहतम्। अग्रतीतिकाले तु स्वयमेव नास्ति, द्विचन्द्रादिवदध्यस्तस्य प्रतीतिमात्र- शरीरत्वात् । यद्यध्यस्तमप्यात्रियेत तदा तत्प्रतिभासः कदाचिदृपि न स्यात् ; अध्यस्तस्य मानाऽगोचरत्वेन तदावरणानिवृत्तेः। ग्रमाणगम्यं हि वस्तु हैं उन सचका स्मरण होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। कारण कि मार्गमें उदासीनभावसे अनुभूत तृणादिका स्मरण नहीं होता है, यह सर्वानुमत है। 'मैं आपके कहे हुए अर्थको नहीं जानता हूँ' * इस प्रतीतिमें विपयके सम्बन्धी अज्ञानका अनुभव है, और अज्ञानका आवरणत्वरूप सम्बन्ध भी आत्मामें देखा गया है। इस दश्यामें उसका अपलाप (न मानना) कैसे सम्भव है ? समाधान करनेवालेका कहना है कि उक्त प्रतीतिमें अर्थात् 'तुम्हारे कहे हुए अर्थको मैं नहीं जानता' इस प्रतीतिमें साक्षीमें अध्यस्त अज्ञान, उसका विषय तथा अज्ञान विषयके सम्बन्ध आदिका ही साक्षी चैतन्यके द्वारा अनुभव अङ्गीकार किया गया है। अज्ञान और विपयका परस्पर सम्बन्ध कार्यकारणभावरूप है, आवरणा- त्रियमाणत्वरूप नहीं है, क्योंकि स्वयं विषय ही आत्मामें अध्यस्त है और अध्यस्त पदार्थमं आवरणका सम्बन्ध नहीं हो सकता। विपयकी प्रतीतिके कालमें उसका आवरण है, यह कहना तो विरुद्ध ही है। और जिस कालमें उस अध्यस्तकी प्रतीति नहीं है, उस कालमें तो वही स्वयं नहीं है, क्योंकि अध्यस्त तो द्विचन्द्रादिके तुल्य प्रतीतिमात्रशरीर होता है, इससे विषयकी अप्रतीतिके कालमें तो आवरणका सम्भव ही नहीं हो सकता। यदि अध्यस्तका भी आवरण मान लिया जाय, तो उसकी प्रतीति कभी हो ही नहीं सकती। क्योंकि अध्यस्त द्विचन्द्रादि पदार्थोमें प्रमाणकी विषयताके न होनेसे उसके आवरणकी कभी भी * युक्तियोंसे विषयमं आवरण की सिद्धि नहीं हो सकती, तो न सही, परन्तु 'मैं अमुक्क वस्तुको नहीं जानता' इस प्रतितिसे विषयका आवरण प्रतीत होता ही है और प्रतीयमानका अपलाप भी नहीं कर सकते, इसलिए विपयमं आवरण मानना चाहिए, इस आशयसे शड्ा करते हैं।
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६४ विवरण प्रमेय संग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
परमार्थत्वादप्रतीयमानमपि तिष्ठति तत्कथंचिदात्रियेतापि, अध्यस्तं तु माननिवर्च्यं तत्कर्थ नामाSSत्रियेत। तस्मात् नाऽस्त्येवानात्मावरणे प्रमाणम्। तथा प्रयोजनं च दुःसंपादम्, सर्वत्र ह्यावरणस्य प्रसक्तप्रकाशप्रतिबन्धः प्रयोजनम्। तदत्र किमनात्मनि स्वतःप्रकाशः अ्रसक्तः ? किं वा प्रमाण- वलाद१ चैतन्यवलात् १ नाद्य:, जड़त्वात्। न द्वितीय:, माननिवर्त्यस्या- चरणस्य तत्प्रतिवन्धकत्वायोगात्। न तृतीयः, चैतन्यावरणादेव तत्सिद्धा- चनात्मनि पृथगावरणकल्पनावैयर्थ्यात्। नहि सूयें मेरुव्यवहिते सति रात्रावारणप्तिबन्धाय छत्रादिकमपेक्ष्यते। अथाऽभ्रच्छन्नेऽपि सवितर्योष्ण्या-
मपि वारयितुं पृथगावरणमित्युच्येत; तदसत्; किमेकमेव अज्ञानमात्माश्रय-
निवृत्ति ही नहीं होगी। प्रमाणगम्य वस्तुके पारमार्थिक होनेसे वह अप्रतीयमान भी कदाचित् हो सकता है, अतः उसको आवृत मानना भी ठीक है, और अध्यस्त, तो प्रमाणसे निवृत्त होता है, अतः उसमें आवृतत्व कैसे रह सकता है, इसलिए विषयके आवरणमें कोई भी प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार विषयका आवरण माननेमें कोई प्रयोजन भी नहीं है, क्योंकि आवरणका सर्वत्र यही प्रयोजन होता है कि विद्यमान प्रकाशका प्रतिवन्ध हो। इस परिस्थितिमें क्या अनात्मामें प्रकाशकी प्रसक्ति स्वयं है? या प्रमाणके बलसे? अथवा चैतन्य द्वारा : प्रथम पक्ष अर्थात् अनात्मामें स्वयं तो प्रकाश हो नहीं सकता, क्योंकि अनात्मा जड़ पदार्थ है। द्वितीय विकल्प भी नहीं वन सकता, क्योंकि प्रमाणसे निवृत्त होनेवाला आवरण प्रमाणसे प्रसक्त प्रकाशका प्रतिबन्धक नहीं हो सकता। तीसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि चैतन्यके ही आवरणसे अनात्माका भी आवरण सिद्ध हो जायगा, अतः अतिरिक्त अनात्माका आवरण मानना निष्पयोजन है, क्योंकि सूर्यके मेरु द्वारा व्यवहित होनेपर रात्रिमें सूर्यतापके निवारण करनेके लिए कोई छाताका उपयोग नहीं करता है। यदि शक्का हो कि सूर्यके मेघ द्वारा आच्छन्न होनेपर भी साधारण उष्णरूप गर्मीका प्रतिबन्ध करनेके लिए जैसे आवरणकी अपेक्षा की जाती है, वैसे ही प्रकृतमें भी अज्ञान द्वारा आवृत चैतन्यके साधारण प्रकाशका निरास करनेके लिए पृथक् आवरण मानना चाहिए,
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ६५
मनात्मावरणं चेत्यङ्गीक्रियते, कि वा प्रतिविषयमज्ञानभेद: कल्प्यते ? नाऽडद्य :; आवरणविनाशमन्तरेण विपयावभासायोगात्। एकपदार्थज्ञानेनैवा ज्ञाननिवृत्ता सधो मुक्तिप्रसङ्गात्। न द्वितीय:, कल्पकाभावात्; अज्ञाना- वृतचैतन्यकृतप्रकाशलेशस्येष्टत्वात्। अन्यथेदमज्ञातमिति व्यवहारो न सिध्येत्। अतः प्रमाणप्रयोजनशन्यत्वादावरणपक्षो दुर्भणः । नाऽपि द्वितीयः, आवरणाभावे सत्यनात्मनः सर्वदा प्रतीतिग्रसङ्गादिति। अत्रोच्यते-आद्योऽनङ्गीकृत एव। द्वितीये तुकर्थ सर्वदा ग्रतीतिः ? किं तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि यहाँ विकल्प होता है कि क्या एक ही अज्ञान आत्माका आश्रयण करके विपयको आवृत करता है, ऐसा मानते हो? या प्रतिविपय अज्ञानका भेद मानते हो? इनमें प्रथम पक्ष तो युक्त नहीं है, क्योंकि आवरणके विनाश के बिना विषयका प्रकाश नहीं हो सकता। [ यदि कहो कि विषयका प्रकाश होनेसे ही आवरण करनेवाले अज्ञानका भी नाश हो जाता है, तो यह कहना युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि ] एक ही घटज्ञानसे अज्ञानके निवृत्त होनेपर तत्क्षण ही मुक्तिका प्रस् हो जायगा, परन्तु यह देखा नहीं जाता। अब रहा दूसरा पक्ष अर्थात् प्रतिविषय अज्ञानका भेद मानना, यह दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञानके भेदका कल्पक कोई प्रमाण ही नहीं है[ तात्पर्य यह है कि आप यदि कहें कि अज्ञान प्रतिविषय भिन्न-भिन्न है, अतः जिस विपयका अज्ञान नष्ट होगा, उसी विपयका प्रत्यक्ष होगा, अन्यका नहीं, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकार अनेक अज्ञान और उसके प्रागभाव और ध्वंस माननेमें कोई पमाण नहीं है, इसलिए परिशेपात एक ही अज्ञान मानना युक्तियुक्त है]। कारण कि अज्ञानसे आवृत चैतन्यकृत प्रकाश ही हमें इषट है। यदि ऐसी वात न होती, तो 'यह अज्ञात है' यह व्यवहार ही सिद्ध न होता। अतः प्रमाण और प्रयोजनके न होनेसे अज्ञानका आवरणपक्ष मानना युक्तियुक्त नहीं है। द्वितीय पक्ष अर्थात् अन्ञान अनात्माको आवृत नहीं करता है यह पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि आवरणके अभावमें सर्वदा ही अनात्माकी प्रतीति होगी। इस प्रश्नपर कहा जाता है-पहले पक्षका (अनात्माके आवरणपक्षका) तो प्रदर्शित रीतिसे अनज्गीकार ही किया गया है। अव रहा द्वितीय पक्ष अर्थात् आवरणाभावपक्ष; उसमें आप दोप देते हैं कि आवरणके न होनेपर विपयकी सर्वदा प्रतीति होगी, ठीक है, परन्तु यहांपर यह प्रक्न उपस्थित होता
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६६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
ज्ञाततया उताऽज्ञाततया अथवा कदाचिद् ज्ञाततया अन्यदा वा अज्ञाततया ! नाऽडद्यः, ज्ञाततापादकप्रमाणप्रवृत्ते: कादाचित्कत्वात्। न द्वितीय, अज्ञात तायाः कश्चित् कालं ज्ञाततया निवृत्तेः। न तृतीयः, इष्टत्वात्। उक्तं हि- 'सर्व वस्तु ज्ञाततयाऽज्ञाततया वा साक्षिचैतन्यस्य विपय एव इति। नन्वज्ञातत्वं नामाऽज्ञानविषयत्वम्। विषयत्वं च विपयिकृतातिशयाधार- त्वम्। न चाऽज्ञानकृतमावरणमनात्मन्यङ्गीक्रियते तत्कथ तस्याऽज्ञातत्वमिति? उच्यते-शुक्तीदमंशावच्छिन्नचैतन्यगतमज्ञानं रजताध्यासमुत्पाद्य तदवभासा- ख्यमतिशयं शुक्तौ करोतीति शुक्ेरज्ञातत्वसिद्धिः। एवं सर्वत्राऽनात्मन्यावरणा- है कि अनात्माकी सर्वदा प्रतीति किस रूपसे होगी? क्या ज्ञातत्वरूपसे पदार्थकी हमेशा प्रतीति होगी: अथवा अज्ञातत्वरूपसे होगी? या कभी ज्ञातत्वरूपसे और कभी अज्ञातत्वरूपसे प्रतीति होगी? इनमें प्रथम पक्ष-सर्वदा विपय ज्ञातत्वरूपसे ज्ञात रहता है यह पक्ष-तो युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञातताको उत्पन्न करनेवाली प्रमाणकी प्रवृत्ति-अन्तःकरणका परिणाम-तो कभी-कभी होनेवाली है। द्वितीय पक्ष-अज्ञाततारूपसे सर्वदा ज्ञानका रहना-भी नहीं वन सकता, क्योंकि अज्ञा- तताकी भी कुछ कालतक ज्ञाततासे निवृत्ति हो जाती है। अव परिशेपात् तृतीय पक्ष रहा, परन्तु वह इष्ट ही है, क्योंकि विषयका कदाचित् ज्ञात होना और कदाचित् अज्ञात होना अनुभवसिद्ध होनेसे इष्ट ही है। इसमें विवरणकी भी सम्मति है-सब वस्तुएँ ज्ञातता और अज्ञाततारूपसे साक्षिचतन्यकी विपय हैं। [ तात्पर्य यह है कि ज्ञातत्वरूपसे विषय प्रमाणव्यवधानकी अपेक्षा रखक्र साक्षीसे सम्बद्ध रहता है और अज्ञातत्वरूपसे वह अज्ञानका विशेषण होकर साक्षीसे सम्बद्ध रहता है ]। यहाँ शङ्का होती है कि अज्ञातत्वका अर्थ अज्ञानविषयत्व ही हो सकता है और विषयत्व विषयी (ज्ञान) से उत्पन्न अतिशय (विशेपता) का अधिकरण कहलाता है। इस अवस्थामें जब आप अज्ञानकृत आवरणविशेषका अनात्मामें स्वीकार नहीं करते, तब आपके मतमें अनात्मामें-जड़विषयमें-अज्ञातत्व (अज्ञानकृत आवरणरूप अतिशयका आधारत्व) कैसे होगा ? उत्तर देते हैं कि शुक्तिरूप इदमंशसे, अवच्छिन्न चतन्यमें [ वस्तुगत्या शुक्ति कहा गया है प्रतीतिसे इदमंश है, ऐसा समझना चाहिए ] स्थित जो अज्ञान है वही उसमें (शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यमें) रजताध्यास (रजतविशेष)का उत्पादन करके उस रूपान्तर रजतके अवभास- स्वरूप अतिशयकों शुक्तिमें उत्पन्न करता है, इसीसे शुक्तिमें अज्ञातत्वकी
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अध्यासविचार] भांपानुवादसहितं ६७
नङ्गीकारेऽप्यज्ञातत्वं वेदितव्यम्। ननु रजताख्यो विक्षेपो न तावच्छुक्तौ ज्ञाता- यामवभासते, तस्य शुक्तिज्ञाननिवर्त्यत्वात्। अज्ञातायां तु झुक्तौ कर्थ तदतिशयो विक्षेप इत्यवगम्येत ! मैंवम्, शुक्त्याकारो न ज्ञातः इदमाकारशच ज्ञात इति दोपद्वयनिवृत्तेः। नन्वात्माश्रयमज्ञानमेक्मेव तच्च विक्षेपमात्रं करोति नावरणमित्य- स्मिन् पक्षेऽ्रपि किं मुसलेन घट इव शुक्तिज्ञानेन विक्षेप एवोपादाने प्रविलाप्यते उतोपादानमपि निवर्च्यते। आद्ये तर्थैव त्रह्ज्ञानेनाऽपि विक्षेपमात्रप्रविलये सति अनिर्मोक्षापत्तिः। द्वितीये शुक्तिज्ञानेनैवाज्ञाननिवृत्तौ सदो मुक्ति- प्रसङ्ग:। सदो मृक्तिपरिजिहीर्पया प्रतिविपयमज्ञानभेदे वाऽध्यासस्या
सिद्धि होती है। इसी प्रकार सर्वत्र अज्ञानविषय अनात्मामें-अज्ञानकृत आवरणके न माननेपर भी-अज्ञातत्व समझना चाहिए। यदि शङ्का हो कि रजतस्वरूप विक्षेपका ज्ञात शुक्तिमें अवभास ही नहीं हो सकता; क्योंकि रजतादिविशेष शुक्तिज्ञानसे निवृत्त हो जाते हैं। यदि शुक्तिका ज्ञान ही नहीं है, तो उसमें अज्ञानकृत अतिशयका भान कैसे हो सकता है? यह शक्का भी ठीक नहीं है, क्योंकि शुक्तित्वरूपसे शुक्तिका आकार (स्वरूप) ज्ञात नहीं है, परन्तु इदन्त्वाकारसे (पुरोवर्तितत्वाकारसे) तो वह ज्ञात है, इस प्रकार उक्त दोनों दोप नहीं रह सकते। आत्माका आश्रयण करनेवाला अज्ञान एक ही है और वह जड़ (अनात्मा) विपयमें केवल विक्षेप-रूपान्तर-उत्पन्न करता है, आवरणको उत्पन्न नहीं करता है; इस आपके सम्मत पक्षमें हम भी प्रश्न कर सकते हैं कि जैसे मुसलाघात घटको उसके उपादानकारण मिट्टीमें मिला देता है, वैसे ही क्या शुक्तिज्ञान विक्षेपका ही (रजतादि रूपान्तरका ही) उसके उपादान अज्ञानमें विलापन करता है ? या उपादानकी भी निवृत्ति करता है? इन दो विकल्पोंमें कौन अभीष्ट है : प्रथम विकल्प तो कह नहीं सकते, क्योंकि जैसे शुक्त्यादिके ज्ञानसे विक्षेपमात्रके विलीन होनेपर भी उपादान अज्ञान वना ही रहता है, वैसे ही नव्ज्ञानसे भी विक्षेप (प्रपश्च) का विलयनमात्र होगा, उपादान अज्ञान तो बना ही रहेगा, इससे मुक्ति कभी हो ही नहीं सकेगी। दूसरां पक्ष भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि एक शुक्तिके ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होते ही मुक्ति मिल जानी चाहिए। यदि सदयोभुक्तिका मसङ्ग न. आने-पावे, इस इच्छासे प्रतिविषय
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६८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्रे १, वर्णक २
ज्ञानानुपादानकत्वे चाउङ्गीक्रियमाणे कल्पनागौरवाध्याससत्यत्वे ग्रसज्येया- तामिति, मैवम्; न तावत् अ्रथमपक्षे दोपोऽस्ति। विमतं न्रह्मज्ञानम्, विक्षेपो- पादाननिवर्तकम्, तद्विरोधित्वे सति पश्राद्भावित्वाद्; यथा शुक्तिज्ञानं स्वप्राग- भावरजताध्यासयोनिवर्तकमित्यनुमानात् । द्वितीयपक्षेऽपि नास्त्युक्तदोप:, मूलाज्ञानस्यैवाऽवस्थाभेदा रजताद्युपादानानि शुक्त्यादिज्ञानैनिवर्त्यन्ते इत्यङ्गी-
अज्ञानभेद माना जाय, अथवा अध्यासका उपादान कारण अज्ञान न माना जाय, तो प्रथम पक्षमें पूर्व व्याख्यानरीतिसे कल्पनागौरव और द्वितीय पक्षमें अध्यासकी सत्यता आ जायगी। सिद्धान्ती कहता है कि उक्त शक्का ठीक नहीं है, क्योंकि प्रथम पक्षमें (एक ही अज्ञान आत्माका आश्रयण कर विषयमें विक्षेपमात्र उत्पन्न करता है आवरण नहीं करता है, इस पक्षमें) कोई दोप नहीं है। कारण कि हम अनुमान करेंगे कि ब्रह्मज्ञानसे उपादान-अज्ञान भी नष्ट हो जाता है। अनुमान प्रयोग यों है-विमत (विवादग्रस्त) ब्रह्मज्ञान (पक्ष) विक्षेप और उपादान- अज्ञान-दोनोंका निवर्तक है, उनका विरोधी होकर उनके पश्चाद्भावी होनेसे (हेतु), जैसे शुक्तिज्ञान स्वप्रागभाव और रजताध्यास दोनोंका निवर्तक है (उदाहरण)। [ इस अनुमानका आशय यह है कि परस्पर विरुद्ध दो पदार्थ एक कालमें एक आश्रयमें नहीं रह सकते। उदाहरणमें लीजिए-शुक्तिज्ञानके साथ उसके प्रागभावका तथा रजतादि रूपान्तरके अवभासका विरोध है, इसलिए शुक्तिज्ञान दोनोंको ही दूर करेगा। ब्रह्मज्ञान तो विक्षेप और मूल अज्ञान दोनोंका विरोधी है, क्योंकि मूल अज्ञानका अधिकरण भी आत्मा ही है और उसके विरोधी ब्रह्मज्ञानका अधिकरण भी आत्मा ही है, इसलिए न्रह्मज्ञान स्वविरोधी मूलाज्ञानको भी अपने अधिकरणमें नहीं रहने देगा, इससे प्रतिपक्षीका यह कथन-शुक्त्यादिके ज्ञानसे अज्ञानसहित अध्यासकी निवृत्ति नहीं देखी जाती, अतः ब्रह्मज्ञानसे भी अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि इसमें कोई दृष्टान्त नहीं मिलता-खण्डित हो गया, क्योंकि ज्ञान और अज्ञानका लोकमें विरोध स्पष्ट ही है। आगम भी कहतें हैं-"तरति शोकमात्मवित्" इत्यादि। इस रीतिसे शुक्तिज्ञानकी भाँति ब्रह्मज्ञान केवल विक्षेपमात्रका निवतक नहीं है, किन्तु मूल अज्ञानका भी निवर्तक है; अतः ब्रह्मज्ञान होनेपर मुक्ति होनेमें कोई बाधा नहीं है। ] द्वितीय पक्षमें भी उक्त दोष नहीं
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ६९
कारात्। तदेवं जड़ेष्वावरणानङ्गीकारे न कोऽपि दोपः। यत्तु भावरूपाज्ञान- साधकानुमाने स्व्रविपयावरणेत्युक्तम्, तत्तथैवात्मविपये। शुक््यादिजड़विपये तु
आवरणत्वं न तु साक्षादित्यविरोध:। चैतन्यव्यवधायकत्वेन फलत
नन्वात्मन्यप्यावरणं नाम किं अकाशनाशः किंवा प्रकाशस्य विपयपाक- ्वाख्यकार्योत्पादने प्रतिवन्ध उत तत्रैव सहकार्यन्तरप्रतीक्षा १ नाऽडद्यः, प्रका- शस्य नित्यात्मचैतन्यरूपत्वात्। नाऽपि द्वितीयतृतीयौ, अन्तःकरणवृत्तिव्यक्त- आता, क्योंकि शुक्तिज्ञानसे मूल अज्ञानके अवस्थामात्र-रजत आदिके उपादान कारण-नष्ट होते हैं, ऐसा अङ्गीकार है। [आशय यह हुआ कि शुक्तिके ज्ञानसे मूल अज्ञानकी एक अवस्थाका नाश होनेसे मूल अज्ञानकी अन्य अवस्थाएँ जब शेष ही रहती हैं, तब शुक्तिज्ञानसे सद्यः मुक्तिका प्रसङ्ग कैसे होगा? ब्रह्मज्ञानसे तो मूल अज्ञानका नाश होता है अतः उनकी अनन्त कल्पनाएँ और अध्यास- सत्यता आदि दोप नाममात्रको भी नहीं रह जाते] इससे जड़ विपयोंमें आवरणका अङ्गीकार न करनेमें कोई भी दोप नहीं है। अविद्याकी भावरूपताके साधक अनुमानमें स्वविषयावरणपदमें स्थित विषयपदसे पूर्वोक्त रीतिके अनुसार आत्मरूप ही विषय लेना चाहिए। शुक्ति आदि जड़ विपयोंमें तो रजत आदिके उपादानभूत अज्ञानके अवस्थाविशेषोंके चैतन्यका व्यवधायक होनेसे फलतः आवरण सिद्ध होता है, साक्षात् सिद्ध नहीं होता, अतः कोई विरोध नहीं है।[ आशय यह है कि घटको आवृत कर देनेपर भी प्रकाशका घटके साथ व्यवधान होगा और प्रकाशके- दीपादिके-ढक देनेपर भी परस्पर दोनोंका व्यवधान हो जायगा। जड़-घटादि- चिषयमें प्रदर्शित युक्तियोंसे आवरण वन नहीं सकता, अतः चेतनके अज्ञान द्वारा आवृत कर दिये जानेपर विषय और चेतनका व्यवधान वन जाता है, और इस व्यवधानके द्वारा विपयमें अज्ञातता आ जाती है, अतः यह फलतः आवरण कहलाता है ]। शङ्का करते हैं कि आत्मामें भी आवरण क्या वस्तु है-क्या प्रकाशका नाश है? अथवा प्रकाशके विपयमें प्रकटतारूप कार्यका प्रतिबन्ध करना ? अथवा उक्त कार्य करनेमें दूसरे किसी सहकारीकी प्रतीक्षा रखना? इन तीनोंमें से प्रथम कल्पका कहना तो उचित नहीं है, क्योंकि प्रकाश नित्य आत्मचैतन्यरूप है, उसका नाश नहीं हो सकता। दूसरे और तीसरे पक्ष भी नहीं
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७० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक
चित्प्रकाशमन्तरेण विषये पृथक् आकट्यानङ्गीकारात् ; ततो दुनिरूपमावरण- स्वरूपमिति चेत्, सत्यमेतत्; अत एवाऽडवरण स्याऽनिवाच्याविद्यारूपत्व- मङ्गीकर्त्तव्यम्, न तु दुर्निरूपत्वमात्रेण तदपलापो युक्त :; अनुमानसिद्धत्वात्। तथा हि-अस्ति तावन्मूढानामेवं व्यवहार :- अशनायाद्यतीतं विवेकि- प्रसिद्धमात्मतत्वं 'नाऽस्ति, न प्रकाशते च' इति । सोऽयं व्यवहार आत्मनि भावरूपावरणनिमित्तो भवितुमहति, 'अस्ति, प्रकाशते' इत्यादिव्यवहार- बन सकते; क्योंकि अन्तःकरणकी विषयाकार वृत्तिसे व्यक्त चिदाभाससे भिन्न विपयमें प्रकटता नामकी किसी दूसरी वस्तुका अङ्गीकार ही नहीं किया गया है। [तात्पर्य यह है कि विषयेन्द्रियसंयोग आदि सामग्रीके रहते अन्तःकरणका विषयाकार परिणाम अवश्य होगा। स्वच्छस्वभाव होनेसे उसमें चिदाभास भी पड़ेगा ही, इसमें अज्ञान कुछ नहीं कर सकता अर्थात् प्रमाणके सामने अज्ञान रहता ही नहीं। ] अतएव आत्मामें भी आवरणके स्वरूपका निरूपण करना नहीं वन सकता। इससे प्रत्यक्ष- सिद्ध अज्ञानकी भी सिद्धि नहीं हो सकती। उत्तर देते हैं-बहुत ही ठीक कहा, जब निरूपण नहीं हो सकता तभी तो हम आवरणको अनिर्वचनीय अविद्यारूप मानते हैं। निरूपण नहीं हो सकता, एतावता उसका अपलाप नहीं हो सकता है, क्योंकि आवरणकी तो अनुमानसे सिद्धि होती है। [ जैसे कोई प्रश्न करे कि मिश्री कैसी होती है, उत्तर दिया जायगा-मधुर, पुनः प्रश्न होगा कि माधुर्यका निरूपण करो, तो उत्तर यही होगा उसका निरूपण नहीं हो सकता, क्या एतावता अनुभव- सिद्ध माधुर्यका अपलाप हो सकेगा? वैसे अनुमानसिद्ध आवरणके स्वरूपका निर्वचन नहीं है, इसलिए अनुमानसिद्ध आवरणका अपलाप नहीं कर सकते, अनुमानप्रयोग दिखाते हैं]-यद्यापे 'मैं हँ', 'मैं जाता हूँ', करता हूँ, सोता हूँ, इत्यादि पामरपर्यन्त प्रसिद्ध प्रतीतिसे आत्मा सबको प्रतीत है, तथापि शास्त्रीय विचार करनेवाले पुरुषोंमें भूख-प्याससे रहित कर्तृत्व-भोक्तृत्वशून्य जो आत्मतत्व्व प्रसिद्ध है, उस आत्मतत्त्वके विषयमें अविवेकी जन 'नास्ति, न प्रकाशते' (न है और न प्रकाशित ही होता है) इस तरहसे व्यवहार करते हैं। यह अविवेकियोंका व्यवहार स्वयंप्रकाश आत्मामें भावरूप अज्ञानकृत, आवरणके ही द्वारा हो सकता है, 'अस्ति, प्रकाशते' (है, प्रकाशित होता है) इत्यादि व्यवहारके पर्याप्त कारण रहते हुए भी. इसके विपरीत 'नास्ति, न प्रकाशते' (नहीं है, प्रकाशित नहीं होता है)
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ७१
पुष्कलकारणे सति तद्विपरीतव्यवहारत्वाद्, यन्नैवं तनैवम्: यथास्ति ग्रकाशते घट इति व्यवहार:। न च कारणपौप्कल्यमसिद्धम्, नित्यसिद्धस्वप्रकाश- चैतन्यातिरेकेणात्राऽन्यापेक्षाभावात्। न चान्यथासिद्धि: ; इतोऽतिरिक्त्ता- वर्णस्य मूर्त्तद्रव्यस्याऽऽत्मनि निरवयवे सर्वगते दुःसंपादत्वात्। एवं चाऽऽत्मन्युक्तव्यवहारयोग्यत्वम् आवरणस्य स्वरूपमिति निरूपितं भवति। नन्वज्ञानमित्यत्र नजो यद्यभावोऽर्ः तदा ज्ञानाभाव इति स्याद्, विरोध्यर्थत्वे च भ्रान्तिज्ञानम्, अन्यार्थत्वे च भ्रान्तिसंस्कार; तथा च ज्ञानाभावभ्रान्तिज्ञानतत्संस्कारा एवाऽज्ञानाभिधानास्त एव ब्रह्मततत्वावभासं
व्यवहार होनेसे, जो ऐसा नहीं है, वह ऐसा भी नहीं है, जैसे घट सत् है और प्रकाशित होता है। 'अस्ति, प्रकाशते' इस व्यवहारके लिए पुष्कल कारण-सामग्री नहीं है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि नित्यसिद्ध स्वयंप्रकाश चैतन्यसे भिन्न- अतिरिक्त-सामग्रीकी अपेक्षा ब्रह्मके 'अस्ति, प्रकाशते' व्यवहारके विषयमें नहीं है। यह आत्मा घट-पट आदिकी भाँति जड़ नहीं है, जो इन्द्रियसे संयोग और आलोकादि की अपेक्षा करे। 'नास्ति, न प्रकाशते' (नहीं है, प्रकाशित नहीं होता है) व्यवहारके आवरणसे दूसरे कारणसे सिद्ध न होनेपर वह अन्यथासिद्ध है, यह कहना उचित नहीं है। इस (हमारे सम्मत भावरूप आवरण) के सिवा निरवयव सर्वगत आत्मामें दूसरे मूर्तद्रव्यसे किया गया आवरण किसी प्रकार भी सम्पन्न नहीं हो सकता-इस प्रकार अनुमानसे सिद्ध भावरूप आवरणका अपलाप करना साहसमात्र होगा। यदि स्वरूपनिरूपणका दुराग्रह ही हो, तो सुनिये वह भी कहते हैं-परमात्मामें 'अ़स्ति, प्रकाशते' इस तरहकी व्यवहारयोग्यताके रहते भी उसका 'नास्ति, न प्रकाशते' इस विपरीत व्यवहारके योग्य हो जाना ही आवरणका स्वरूप है। अब अज्ञानकृत भावरूप आवरणका प्रयोजन दिखलानेके लिए शङ्का करते हैं-'अज्ञान' पद 'न' और 'ज्ञान' दो पदोंके समाससे बना है। इसमें 'नञ्' का अर्थ यदि अभाव माना जाय, तो 'ज्ञानाभाव' ऐसा अर्थ होगा। यदि विरोधी अर्थ माना जाय, तो ज्ञानविरोधी-अ्रन्तिज्ञान-अर्थ होगा और भेद अर्थ माना जाय, तो ज्ञानका भेद-भ्रान्तिजनक संस्कार अज्ञानका अर्थ होगा। अव इस प्रकार ज्ञानाभाव, भ्रमज्ञान और उसका जनक संस्कार ये तीन अज्ञान पदके अर्थ
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७२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
प्रतिवध्योक्तव्यवहारं जनयिष्यन्ति किमनेन भावरूपावरणकल्पनेनेति चेद्, मैवम् ; सुषुप्तादौ ब्रह्मतत्वानवभासस्यानन्यथासिद्धत्वात्। तथा हि-किं तत्र ब्रह्मतत्वस्य स्वत एवाऽनवभास: किं वा पुरुषान्तरसंवेदनवद् द्रष्ट- र्जीवाद् ब्रह्मतत्वस्य भिन्नत्वेन उत अतिबन्धवशात्: नाऽडद्यः, त्रह्मणः स्वप्रकाशत्वात्। न द्वितीयः, तच्वमसीत्येकत्वश्चतेः । तृतीये किं भ्रान्ति- ज्ञानात् प्रतिबन्ध उत तत्संस्काराद् अथवा ज्ञानाभावाद् आहोस्वित् कर्म- वशात् : नाऽडद्यः; सुषुप्यादौ मिथ्याज्ञानस्याऽपि लप्तत्वात्। न द्वितीयः, रजतभ्रमसंस्कारस्य शुक्तितत्वावभासप्रतिबन्धकत्वादर्शनात् । तृतीये तु
होंगे। ये ही तीनों ब्रह्मतत्त्वके 'अस्ति, प्रकाशते' इस पूर्वोक्त अवभासको रोककर निर्दिष्ट 'नास्ति न प्रकाशते' व्यवहारको उत्पन्न कर देंगे, फिर ज्ञानकृत भावरूप आवरणकी कल्पना करनेमें क्या प्रयोजन है? उत्तर देते हैं-ऐसा नहीं है। यदि भावरूप आवरण न माना जाय, तो सुषुप्त पुरुषमें ताद्ृश ब्रह्मतत्त्वका अनवभास कैसे उपपन्न होगा? [पञ्चपादिकामें मूल पाठ 'सुपुप्ति' मिलता है। अतः सुपुप्ति अवस्थामें अर्थ करना चाहिए। हमारे मतमें तो अज्ञान सुपुप्ति अवस्थामें अहङ्कारादि विक्षेपको संस्कारमात्रसे शेष रखकर स्थित रहता है, पुनः अदृष्टवश जागरादि अवस्थाओंमें विक्षेपका प्रादुर्भाव करता है, सुषुप्तिमें स्थित अज्ञान ही सुपुप्तिमें अश्ञनायाद्यतीत ब्रह्मतत्त्वका अवभास रोकता है। ] सुपुप्तिमें ब्रह्मतत्त्वानवभासकी अन्यथासिद्धिका अभाव दिखाते हैं-क्या सुषुप्तिमें ब्रह्मतत्त्वका स्वयं अवभास नहीं होता? अथवा जैसे दो पुरुषोंमें भेद होनेसे पुरुषान्तरका ज्ञान पुरुषान्तरको नहीं हो पाता वैसे ही द्रष्टरूप जीव और ब्रह्मतत्त्वके भिन्न होनेसे अनवभास है क्या ? या अन्य किसी दूसरे प्रतिबन्धके कारण अनवभास है: प्रथम पक्ष माना नहीं जा सकता, क्योंकि ब्रह्म स्वयंप्रकाश है. उसका स्वतः अनवभास कैसे होगा ? दूसरा पक्ष-जीव और ब्रह्मका भेद कहना-भी नहीं बनता, क्योंकि 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि श्रतिवाक्योंसे एकत्व सिद्ध है। तीसरा पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि उस तृतीय पक्षमें क्या भ्रान्तिज्ञानसे प्रतिबन्ध है अथवा उसके संस्कारसे या ज्ञानके अभावसे अथवा कर्मवश प्रतिबन्ध है? पहला पक्ष नहीं कह सकते, क्योंकि सुषुप्ति आदिमें मिथ्याज्ञान-भ्रम-भी नहीं रहता है। दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता, क्योंकि रजतभ्रमसंस्कार शुक्तितत्त्वके अव-
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ७३
न तावत् स्वरूपज्ञानस्य नित्यस्याऽभावः संभवति। अन्यज्ञानाभावस्तु न स्वयंग्रकाशन्रह्मतत्वावभासग्रतिवन्धक्षमः । अन्यथा मुक्तावपि प्रतिवन्ध- ग्रमङ्गात्। चतुर्थेऽपि किं कर्माणि चैतन्यमखिलमपि प्रतिवध्नन्ति उत स्वावभासकांशं विहाय। आद्ये साधकाभावाद् कर्माणि नैव सिध्येयुः। न द्वितीयः, अग्रामाणिकार्द्धजरतीयत्वप्रसङ्गात्। न च भावरूपावरणेऽपि
भासका प्रतिबन्धक नहीं देखा जाता है। इससे प्रपन्नभ्रमके संस्कारके रहनेपर भी न्रह्मतत्त्वाचमासका प्रतिबन्ध नहीं हो सकता है। तृतीय पक्षका भी सम्भव नहीं है, क्योंकि स्वरूपभूत ज्ञान नित्य है, अतः उसका अभाव नहीं हो सकता, इसलिए ज्ञानाभावशव्दसे नित्यस्वरूप ज्ञानका अभाव तो कह नहीं सकते, अतः परिशेपात् अन्य ज्ञानका अभाव कहना होगा, परन्तु वह स्वयंप्रकाश ब्रह्मतत्वके अवभासका प्रतिबन्ध नहीं कर सकता है, अन्यथा सुपुप्ति आदिमें ही नहीं, वल्कि मुक्तिदशामें भी त्रह्मतत्त्वावभासका प्रतिबन्ध हो जायगा। चतुर्थ पक्ष भी नहीं बनेगा, क्योंकि क्या कर्म सम्पूर्ण चेतन्यका प्रतिवन्ध कर देते हैं ? या अपनेको (कर्मोंको) प्रकाशित करनेवाले अंघको छोड़कर शेप अंशका प्रतिवन्ध करते हैं? पहला पक्ष नहीं वन सकता, क्योंकि सम्पूर्ण चतन्यका प्रतिबन्ध हो जानेपर कोई भी अपना (कर्मोंका) साधक ही नहीं रह जायगा। इस दशामें कर्म ही सिद्ध न होंगे। कुछ अंगको ग्रतिबद्ध करते हैं, ऐसा द्वितीय विकल्प भी नहीं हो सकता, क्योंकि अप्रामाणिक अर्द्धजरतीयत्व प्रसक्त होगा। [आशय यह है कि कर्मपदसे यागादि स्थूलरूप क्रियाकलाप लेना तो सुपुप्िमें सम्भव नहीं है, इसलिए यागादिका सूक्ष्मरूप (अदष्टादि) ही लेना होगा, वह निराश्रय नहीं रहेगा, किन्तु आत्माका आश्रयण करके ही रहेगा, तब स्व स्वाश्रयीभूतका प्रतिबन्ध कैसे कर सकेगा? और सुपुपिमें अदृष्ट भी तो संस्काररूपसे ही रहेगा। जैसे रजतादिका संस्कार अधिष्ठानतत्वावभासका प्रति- बन्धक नहीं होता, वैसे ही संस्काररूप कर्म भी प्रतिवन्धक नहीं हो सकते। इस आशयको आगे अ्न्थकार अनुमान द्वारा सिद्ध करेंगे। यदि अंशतः प्रतिबन्ध 'तुप्यतु दुर्जनन्याय' से माना भी जाय, तो अर्द्धजरतीयता उपस्थित ही है। इसलिए भावरूप आवरण ही सुपुप्ति आदिमें ब्रह्मतत्त्वके अवभासका प्रतिवन्ध करता है। इस प्रतिबन्धकी सिद्धिके लिए भावरूप आवरण मानना सम्योजन है]। १०
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७४ विवरणअमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
तुल्यौ विकल्पदोपाविति वाच्यम्, स्वावभासकांशपरित्यागस्याडर्दजरतीय- स्याऽप्यहमज्ञ इत्यपरोक्षानुभवान्यथानुपपत्या कल्प्यत्वात्। न च तथा कर्माण्यपरोक्षाण्यनुभूयन्ते। यद्यपि तत्र परोक्षानुभव एव कल्पकः स्यात्, तथाऽपि कर्माणि न प्रतिवन्धकानि, संस्काररूपत्वाद, रजत- भ्रान्तिसंस्कारवत्। नतु 'ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्चयत्युत'इति स्मरणात् तमोगुण एव प्रतिवन्धकः स्यादिति चेद्, न; तस्य ब्रह्मज्ञानादनिवृत्तावनिर्मोक्षप्रसङ्गात्। शङ्का-भावरूप आवरण माननेपर भी उक्त दोनों विकल्पोंका प्रसङ्ग है अर्थात् स्वाश्रयको सर्वाशसे आवृत करनेपर स्वयं सिद्ध नहीं हो सकेगा और अंशतः आवृत करनेसे वही अर्द्धजरतीयता बनी है। उत्तर-भावरूप अज्ञानपक्षमें यह दोष देना ठीक नहीं है, क्योंकि अपने साधक अंशका त्याग कर इतर अंशका प्रतिबन्ध करनेमें 'अहमज्ञः' (मैं अज्ञानी हूँ) इस प्रत्यक्ष अनुभवकी अन्यथा अनुपपत्तिरूप प्रमाणसे अर्द्धजरतीयकी कल्पना ठीक ही है। [आशय यह है कि 'मैं अज्ञानी हूँ' इस प्रत्यक्ष प्रतीतिमें अज्ञान और आश्रय दोनों प्रतीत होते हैं। अज्ञान यदि आश्रयका आवरण करता है, तो आश्रयके आवृत होनेसे जब स्वयं वह असिद्ध होगा, तव 'अहमज्ञः' यह प्रतीति कैसे बनेगी, परन्तु यह प्रतीति अवश्य होती है; अतः उसकी उपपत्तिके लिए मानना ही पड़ेगा कि स्वसाधक अंशका आवरण नहीं करता है। इस अवस्थामें उक्त प्रतीतिकी अन्यथा अनुपपत्तिसे उक्त अर्द्धजरतीयकी कल्पना ठीक ही है]। कर्मसे प्रतिबन्ध माननेवाला ऐसा नहीं कह सकता, क्योंकि कर्म उक्त प्रतीतिके विषयके समान प्रत्यक्ष नहीं है। यद्यपि कर्मोंका परोक्षानुभव भी तो अन्यथा अनुपपन्न है, अतः वही कल्पक हो जायगा, तथापि कर्म प्रतिबन्धक नहीं हो सकते, संस्काररूप होनेसे, रजतसंस्कारके समान, इस अनुमानसे संस्काररूप कर्म प्रतिबन्धक नहीं हो सकते हैं। प्रतिपक्षी पुनः शङ्का करता है कि 'ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सल्जयत्युत' (तम निद्रा, आलस्य आदि द्वारा ज्ञानको आवृत कर पुरुषको कर्तव्यके अकरणमें प्रेरित करता है) इस भगवद्गीताके वचनको प्रमाण मान कर सुषुपि आदि अवस्थाओंमें तम ही ब्रह्मतत्त्वावभासका प्रतिबन्धक होगा, अतिरिक्त आवरणकारक अ़ज्ञान माननेकी क्या आवश्यकता है? उत्तर देते हैं-ऐसा नहीं कहना
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अध्यासविचार ] भांपानुवादसहित ७५
निवृत्तौ तु तस्यैव भावरूपावरणत्वानाममात्रे विचाद: स्यात्। तस्माद्व्ेदा- भेदवादिनाऽपि सुपुपौ ज्ञानाभाव एव ब्रह्मतत्त्वानवभासहेतुरित्यमुं दुराग्रहं परित्यज्य भावरूपाज्ञानमेवाऽङ्गीकर्त्तव्यम्। यञ्च तदीयं दुराग्रहान्तरं जाग्रत्स्वमयोरहं मनुप्य इति भ्रान्तिरेव न्नह्मतच्ानवभासहेतुरिति, तदप्यसत्; तन्मते भ्रान्तेरस्या दुर्भणत्वाद्। यथैव खण्डो गौर्मुण्डो गौरित्यत्रोभयसामानाधिकरण्येन गोत्वजातेरेकस्या एवोभाभ्यामपि व्यक्तिभ्यां सह भेदाभेदौ प्रमाणिकावेव स्वीक्रियेते तथै-
चाहिग, क्योंकि यदि न्रह्मज्ञानसे उसकी निवृत्ति नहीं होती, तो मोक्ष ही सिद्ध नहीं होगा। और यदि उसकी निवृत्ति मानते हैं, तो भावरूप आवरण अज्ञान ही हुआ, केवल नाममात्रमें झगड़ना रहा। [ आगय यह है कि तमको नित्य प्रतित्रन्धक माननेसे त्रह्मज्ञान होगा ही नहीं, क्योंकि प्रतिबन्धकका नाश होनेपर ही प्रतित्ध्यका उदय होता है। जब तक घटादिविपयप्रतिभासका प्रतिवन्धक अन्धकार होगा, तब तक प्रतिभास नहीं होगा। म्रकाशसे प्रतिवन्धक अन्धकारके दूर होनेपर ही घटका प्रतिभास होगा, अतः तमको अनिवर्त्य माननेसे अनिर्मोक्ष प्रसद्न होगा। यदि इस दोपके परिहारकी इच्छासे उसे ज्ञाननिवर्त्य मानते हो, तो लोकशास्रसिद्ध 'ज्ञानसे अज्ञानरूप आवरण ही निवृत्त होता है' इस नियमका त्याग कर नवीन नामकरणका प्रयास करना व्यर्थ है, अतः उवत स्मृतिमें भी 'तमः' शब्द अज्ञानका पर्याय ही है, पदार्थान्तर नहीं है।] इस पूर्वोक्त शासार्थसे सिद्ध हुआ कि भेदाऽमेदवादी भास्करको भी 'सुपुप्तिमं ज्ञानाभाव ही त्हातत्त्वका अवभास न होनेमें कारण है' अपने इस दुराग्रहको छोड़कर भावरूप अज्ञान मानना ही पड़ेगा। उस मदाडमेदवादी 'भास्कर' का जो यह दूसरा दुराग्रह है-जाग्रत् और स्वम् इन दोनों अवस्थाओंमं 'अहं मनुष्यः' (मैं मनुप्य हूँ) यह भ्रमप्रतीति ही ब्रह्म- तत्त्वके अनवभासका कारण है यह विलकुल तुच्छ है, क्योंकि उसके मतमें 'अहं मनुष्यः' यह प्रतीति भ्रम है, ऐसा सिद्ध नहीं हो सकता। जैसे 'खण्डो गौः, मुण्डो गौः' (गाय खण्ड हे, गाय मुण्ड है) इस प्रतीतिमं खण्ड और मुण्ड दोनोंका सामानाधिकरण्य देखने से एक ही गोत्व जातिका खण्ड और मुण्ड दोनों व्यक्तियोंके साथ प्रामाणिक ही भेद और अमेद माने जाते हैं, वैसे ही 'अहं मनुष्यः' 'अहं
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७६ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्रे १, वर्णक ई-
वाऽहं मनुष्योऽहं ब्रह्मेति चैकस्य जीवस्य शरीरव्रह्मभ्यामुभाभ्यामपि सह भेदामेदौ प्रामाणिकावेव किं नाऽङ्गीक्रियेते १ तथा चाऽहं मनुष्य इति देहा- त्मनोरभेदप्रत्ययोऽपि प्रमाणिक एव स्यात्, न तु भ्रान्ति:। 'नाऽहं मनुष्यः, किन्तु ब्रह्म' इत्ययं शास्त्रीयनिषेधोऽपि 'नाडयं खण्डो गौः, किन्तु मुण्डः' इतिवदुपपद्यते। अथोच्येत प्रतिपन्नेदन्तोपाधौ यथा 'नेदं रजतम्' इति निषेधः तथा प्रतिपन्नात्मोपाधौ 'नाऽहं मनुष्यः' इति मनुष्य- त्वस्य निषेधात् मनुष्यत्वप्रतीतिरात्मनि भ्रान्तिरिति, तन्न; तथा सति खण्डो गौरिति खण्डाकारेण प्रतिपन्ने गोत्वोपाधौ पश्चान्नायं खण्ड इति निषेधात्
ब्रह्म' इस प्रतीतिसे एक जीवका मनुष्यपदवाच्य शरीर और ब्रह्म दोनोंके साथ भी भेद और अभेद प्रामाणिक ही क्यों न माने जायँ, अतः इस प्रतीतिको भेदाडमेदवादी भ्रम नहीं कह सकता। 'अहं मनुष्यः' (मैं मनुष्य हूँ) इस प्रकार देह और आत्माका अभेदज्ञान भी प्रामाणिक ही होगा, भ्रमात्मक नहीं। जैसे 'नेदं रजतम्' इस निषेधसे 'इदं रजतम्' यह भ्रान्ति है, वैसे ही 'नाहं मनुष्यः' इस शास्त्रीय निषेधसे 'अहं मनुष्यः' यह प्रतीति भी भ्रमात्मक ही सिद्ध होगी, यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'मैं मनुष्य नहीं हूँ, किन्तु ब्रह्म हूँ' यह शास्त्रीय निषेध भी जैसे 'यह गाय खण्ड नहीं है, किन्तु मुण्ड है' इस प्रतीतिकी उपपत्ति होती है, वैसे ही इसकी भी उपपत्ति हो जायगी। [ सामान्यतः निषेध पूर्वप्रतीतिमें भ्रमत्वका साघक नहीं है, किन्तु स्वसमानाधिकरणनिषेध पूर्वप्र- तीतिमें भ्रमत्वका साघक है; इस अभिप्रायसे शङ्का करते हैं ]-जैसे इदम् पदार्थमें ही तो अमेदेन रजत प्रतीत होता है और उसी इदन्तारूप उपाधिमें उसका निषेध किया जाता है, इससे 'इदं रजतम्' यह पूर्वप्रतीति भ्रमात्मिका मानी जाती है, वैसे ही आत्मामें देहसामानाधिकरण्यकी प्रतीति है और शास्त्रसे उस आत्मारूप उपाधिमें ही मनुष्यत्वका निषेध किया जाता है, अतः इससे 'अहं मनुष्यः' (मैं मनुष्य हूँ) यह आत्मामें मनुष्यत्वकी पूर्वप्रतीति भ्रमात्मिका है। उक्त व्याप्तिमें भी व्यभि- चार देखकर उत्तर देते हैं-ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि 'खण्डो गौः' इस प्रतीतिसे खण्डाकारसे प्रतिपन्न गोत्वरूप उपाघिमें पश्चात् 'नाडयं खण्डो गौः' (यह खण्ड गौ नहीं है) इस निषेधसे पूर्वकालिक खण्डप्रतीति भ्रमात्मक ही मानी जायगी, पर मानी नहीं जाती; इससे उक्त व्याप्ि भी व्यभिचरित है।
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अध्यासविचार ] भांपानुवादसाहेत
खण्ड्रतीतेरपि भ्रान्तित्वप्रसङ्गात्। न च वाच्यं सुण्डे खण्डो निपिध्यते, न तु गोत्वोपाधाविति; मुण्डे खण्डस्याऽप्रसक्तत्वात्। ननु खण्डव्यत्त्यवच्छिन्नं गोत्वं प्रतिपन्नोपाधिः, न च तत्र खण्डो निपिव्यते, किन्तु मुण्डव्यक्तयवच्छिन्ने गोत्व इति चेत, तर्हिं प्रकृतेऽपि मनुष्यत्वाचच्छिन्न आत्मा प्रतिपन्नोपाधि:। न च तत्र मनुष्यत्वं निपिध्यते, किन्तु ब्रह्मत्वावच्छिन्न आत्मनि। एवं स- त्यनुगतेन गोत्वेन खण्डमुण्डव्यक्ती इवाऽनुगतेनाऽडत्मना शरीरब्रह्मणी संवद्धे, ततः खण्डो गौरिति प्रत्ययवदहं मनुष्य इति प्रत्ययस्य प्रामाणिकत्वं दुर्वारम्। अथ तत्र व्यवहारानुच्छेदात् ग्रामाण्यं तव, तत्प्रकृतेऽपि समानम्। त्वन्मते
मुण्डमें खण्डका निषेध किया जाता है, किन्तु खण्डाकारसे प्रतिपन्न गोत्वरूप उपाधिमें खण्डका निषेध नहीं किया जाता; इससे व्यभिचार नहीं है, ऐसा भी कहना उचित नहीं है, क्योंकि मुण्डमें खण्डकी प्रसक्ति ही नहीं है, जिससे कि उसका उसमें निषेध किया जाय। 'खण्डो गौः' इसमें खण्डव्यक्त्यवच्छिन्न गोत्व प्रतिपन्न उपाधि (खण्ड- त्वाकारका समान अधिकरण) है, उसमें खण्डका निषेध नहीं करते हैं, किन्तु मुण्ड- व्यक्त्यवच्छिन्न गोत्वमें निषेध करते हैं, इससे भ्रम नहीं है; ऐसा यदि कहो तो हम भी कह सकते हैं कि 'अहं मनुष्यः' इस प्रतीतिमें भी मनुष्यत्वावच्छिन्न आत्मा प्रतिपन्न उपाधि है, क्योंकि उसमें मनुष्यत्वका निषेध नहीं है, किन्तु न्रह्नत्वाच्छिन्न आत्मामें निषेध है; इससे दोनों प्रतीतियाँ समान हैं। एकमें भ्रमत्व और दूसरीमें प्रमात्व केसे उपपन्न होगा? ऐसी दशामें इस प्रकार दोनोंमें अनुगत गोत्वके साथ खण्ड-मुण्ड व्यक्तिके तुल्य अनुगत आत्माके साथ शरीर और ब्रह्म ये दोनों सम्बद्ध हैं, इससे 'खण्डो गौः' इस प्रतीतिके समान 'अहं मनुष्यः' इस प्रतीतिका भी प्रमात्मक होना दुर्वार होगा। 'खण्डो गौः' इस प्रतीतिमं व्यवहारानुच्छेद है अर्थात् 'नायं खण्डो गौः' इस निषेधके अनन्तर भी गोमें खण्डव्यवहार देखा जाता है और 'अहं मनुष्यः' इस व्यवहारका ्रह्मसाक्षात्कार होनेपर 'नाहं मनुष्यः' इस निषेधके अनन्तर आत्मामें वाध देखा जाता है; अतः 'अहं मनुष्यः' इस प्रतीतिको भ्रम कहते हैं, इस प्रकार व्यवहारका अनुच्छेद तो 'मैं मनुष्य हूँ' इस मतीतिमें भी समान है, [क्योंकि त्रह्ाज्ञान होनेपर भी जीवन्मुक्त अवस्थामें प्रारव्घवश 'अहं मनुष्यः' इस पकार आत्मामें मनुप्यत्वका व्यवहार देखा ही जाता है]। तुम्हारे मतमें मोक्षदशामें
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विवरणप्रमेयसंग्रहं i सूत्र १, वर्णक १
मोक्षावस्थायामपि सर्वोपादानकारणभूतेन ब्रह्मणा सर्वज्ञेनाऽभिन्नस्य जीवस्य सर्वात्मतया सर्वशरीरेन्द्रियाद्यभिमानव्यवहारानुच्छेदात्।
भेदाभेदप्रयोजकानां पञ्चानामप्यभावाद्देहात्मनोरभेदो आ्रन्तिरिति चेद्; मैवम्; पश्चानामपि संभूय प्रयोजकत्वं तावव्यभिचारदर्शनादयुक्तम्। एकै- कस्य प्रयोजकत्वे तु प्रयोजकवाहुल्यगौरवस्य त्वयैवाङ्गीकृतत्वात शरीर-
भी सब प्रपश्चका उपादान कारण सर्वज्ञ ब्रह्मसे अभिन्न जीवका सर्वात्म होनेसे सब शरीरेन्द्रियादिमें आत्माभिमानका उच्छेद नहीं होता है, हम वेदान्तियोंके मतमें प्रपश्न अविद्यात्मक है, अविद्याके नष्ट होनेसे सव व्यवहारका उच्छेद होना सम्भव है; परन्तु आपके मतमें तो सव प्रपश्च सत्य है। उसका उच्छेद नहीं होगा, प्रत्युत जीवित अवस्थामें तो अपने एक ही शरीरेन्द्रियका अभिमान था, अव तो मोक्षदक्षामें सर्वात्म होनेसे सब शरीरेन्द्रियादिका अभिमान हो जायगा, तब भला व्यवहारके उच्छेदका कैसे सम्भव है ? जाति और व्यक्ति (खण्ड गौ और सुण्ड गौ) कार्य और कारण (सुवर्ण और कुण्डल) गुण और गुणी (नील और घट) विशेषण और विशेष्य (दण्डी और पुरुप) अवयव और अवयवी (शरीर और हाथ) ये पांच ही सम्बन्ध भेदाडभेदके प्रति प्रयोजक माने गये हैं। 'मैं मनुष्य हूँ' इस प्रत्ययमें इनमें से कोई भी नहीं है। जातिव्यक्ति- सम्बन्ध भी नहीं कह सकते, क्योंकि शरीर और आत्मा दोनों द्रव्य ही हैं! कार्यकारणभाव भी उपपन्न नहीं है, क्योंकि शरीर पाश्चभौतिक है, आत्माक्का कार्य ही नहीं है। दोनोंके द्रव्य होनेके कारण गुणगुणिभाव भी नहीं कह . सकते। जैसे दण्डका वैशिष्ट् चैत्रादि पुरुषके अधीन है, वैसे देहका वैशिष्ट आत्माके अधीन नहीं है, अतएव विशेष्यविशेषणभाव भी नहीं कह सकते। आत्माके निरवयव द्रव्य होनेसे अवयवावयविभाव सम्घन्ध भी नहीं हो सकता। अतः मानना होगा कि 'अहं मनुष्यः' यह प्रतीति भ्रमात्मिका है। उत्तर देते हैं कि यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि पाँचोंको मिलांकर भेदाडमेदका प्रयोजक मानना तो व्यभिचार दिखाई देनेसे अयुक्त है, क्योंकि पांचोंका मिलाव कहीं भी नहीं दिखाई देता। यदि एक-एकको अलग-अलग प्रयोजक मानते हैं, तो प्रयोजकब्राहुल्यप्रयुक्त गौरवका तो आपने स्वीकार कर ही
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ७९
शरीरिसम्बन्धोऽपि ग्रयोजकः कि न स्यात्। एतस्याऽग्रयोजकत्वे तथैवान्येपामषि तदापादयितुं शक्यमिति न क्वाऽपि भेदाभेदौ सिध्ये- ताम् । अथाऽतिप्रसङ्गभिया पञ्चस्वेव निर्वन्धः, तहिं शरीरात्मनोः कार्यकारणभावोऽस्तु। ब्रह्मगतकारणत्वस्यात्मनि चेतनत्वसाम्येनोपच- रितुं शक्यत्वात्। -
लिया, तब शरीरशरीरिभाव भी भेदाऽमेदका प्रयोजक क्यों न माना जाय? यदि कहो कि शरीरशरीरिभाव सम्बन्ध भेदाऽमेदका प्रयोजक नहीं है, तो अन्य जातित्यक्ति आदि सम्बन्ध भी तुल्यन्यायसे अप्रयोजकत्वके आपादक हो सकते हैं ऐसी दशामें कहीं भी मेदाडमेद सिद्ध नहीं होगा। [आशय यह है कि खण्ड गौ, नीर घट इत्यादि सामानाधिकरण्य प्रतीतिसे जसे उक्त सम्बन्ध भेदाऽमेदके प्रयोजक माने गये हैं, वैसे ही सामानाधिकरण्यप्रतीति 'मैं मनुष्य हूँ' इसमें भी है, तब शरीरशरीरिभाव भी भेदाऽमेदका प्रयोजक क्यों न माना जाय ? यदि शरीर- शरीरिभावको मणिमन्त्रन्यायसे प्रयोजक न मानते, तो तुल्यन्यायसे पूर्वोक्त सम्बन्ध भी भेदाडमेदका प्रयोजक न माना जायगा। 'यह रजत है' इस प्रतीतिके तुल्य 'मैं मनुष्य हूँ' यह प्रतीति नहीं है; क्योंकि आपके (सर्वत्र भेदाSमेदवादीके) मतमें मोक्षदशा तक शरीरेन्द्रियादिके भानका उच्छेद न होनेसे 'मैं मनुष्य हूँ' इस प्रतीतिका उत्तर कालमें कभी भी बाध नहीं होता। यदि गुणगुण्यादिसम्बन्ध भेदाडमेदके प्रयोजक हैं, तो शरीरशरीरिभावरूप सम्बन्ध भी प्रयोजक है। यदि यह प्रयोजक नहीं है, तो गुणगुण्यादि भी नहीं हैं। इससे भेदा5मेदकी सिद्धि ही नहीं होगी, और कहीं भेदा Sमेद मानते हैं, कहीं नहीं मानते, इससे 'सर्वत्र भेदाडभेढ है' इस अपने सिद्धान्तका विरोध भी होगा, इससे आप प्रतिज्ञाभ्रष्ट हो जायँगे।] यदि अतिप्रसङ्गके भयसे (मैं मनुष्य हूँ, इत्यादि प्रतीतिमें भी प्रामाणिक मेदाSमेदके प्रसंगके) उपरोक्त जातिव्यक्ति आदि पांच ही सम्बन्धोंके स्थलोंमें मेदाडमेद प्रामाणिक हैं, अन्यत्र अ्रमात्मक ही हैं, ऐसा यदि कहो, तो 'मैं मनुष्य हूँ' इस प्रतीतिमें भी आपके मतमें मेदाऽभेद प्रामाणिक हो सकता है, क्योंकि शरीर और आत्माका कार्यकारणभाव सम्बन्ध है। चेतनत्वके सामान्य होनेसे ब्रद्यगत कारणत्वका जीवात्मामें आरोप किया जा सकता है।
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विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
ननु मुख्यसम्बन्ध एव अयोजक:, तदभावादेवाहं मनुष्य इति प्रतीतिर्भ्रान्तिरिति चेत्, एवमपि भ्रान्तिर्नामाऽन्त:करणपरिणामश्चेदात्मा- श्रयाऽविद्या न स्यात्। अन्तःकरणपरिणाम एवात्मन्यारोप्यत इति चेत, तथाप्यन्यथाख्यातिवादिनस्तव मतेऽविष्ठानारोप्ययो: संसर्गस्य शून्यत्वा- दात्माविद्यासम्बन्धो न स्यात्। अथात्मपरिणामो भ्रान्तिरिति चेद्, न; आत्मनोऽपरिणामित्वात्। आत्मनोऽपरिणामित्वमस्माकमसिद्धमिति चेत, सत्यम् ; तथापि नित्यज्ञानगुणस्त्वयाऽऽत्मा स्वीक्रियते, तथा च तस्मि स्तिष्ठत्येव ज्ञाने भ्रान्तित्वाकारपरिणामो वक्तव्यः। तच्च न युक्तम्। एकजातीयविशेषगुणद्वयस्याऽविनश्यदवस्थस्यैकस्मिन् द्रव्ये युगपत्समवाया-
मुख्य सम्बन्ध ही भेदाऽमेदका प्रयोजक है, गौणसम्बन्ध नहीं है, जीवात्मा तथा शरीरका कार्यकारणभाव गौण है, अतः भेदाऽमेदके प्रामाणिक न होनेसे 'मैं मनुष्य हूँ' यह प्रतीति भ्रम मानी जाती है, ऐसा यदि आपका कहना हो, तो समवायिकारणकी मीमांसा करनेपर उक्त प्रत्यय भ्रम नहीं हो सकेगा। भ्रान्ति 'भ्रमज्ञान' यदि अन्तःकरणका परिणाम माना जाय, तो अज्ञानको आत्माश्रयत्व नहीं बन सकेगा, जैसे तन्तुजन्य पटको मृदाश्रयत्व नहीं होता, वैसे ही अन्तःकरण- परिणाम अविद्या आत्माश्रय नहीं कही जा सकती। यदि अन्तःकरणका परिणाम ही अज्ञान आत्मामें आरोपित किया जाता है, ऐसा माना जाय, तो आत्माका और अज्ञानका सम्बन्ध नहीं बनेगा, क्योंकि अन्यथाख्याति (रजतादिके भ्रमस्थलमें शुक्ति आदि अधिष्ठानमें आरोप्य रनतादिका सम्बन्ध न रहते हुए सादृश्यसे आप -. णस्थ रजत उपनीतभानसे भासित होता है, ऐसा) माननेवाले आपके मतमें अधिष्ठान और आरोप्यका सम्बन्ध ही नहीं माना गया है। और सर्वत्र ही मेदाऽमेद्वादी आरोप मान भी नहीं सकता है, यह भी एक दूसरा दोप समझना चाहिए। उक्त दोषके कारण अन्तःकरणपरिणाम न मानकर आत्माका ही परिणाम भ्रम ज्ञानको मानें, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि आत्माका परिणाम ही नहीं हो सकता, बह तो अपरिणामी है। यदि वादी कहे कि आत्मा अपरिणामी हमारे मतमें सिद्ध नहीं है, तो ठीक है, परन्तु आत्माको आप नित्य ज्ञानरूपी गुणवाला मानते ही हैं, तब नित्य जानके रहते आत्माका भ्रमाकार परिणाम कहना होगा; जो कभी सङ़गत नहीं हो सकता है। कारण कि एकजातीय दो विशेप गुणोंका बिना
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अध्यासविचार ] भपानुवादसहित
योगात्। नहि पटे शौक्ल्यद्वयं युगपत्समवेतं दश्यते। तस्माज्ागरस्वमयो-
नन्व्ज्ञानेन सम्बन्धे सत्यात्मनोऽसङ्गत्वं भज्येतेति चेद्, न; सग्बन्ध- स्याप्यनादेरज्ञानवत्कत्पितस्य स्वकार्यवदसङ्गत्वाभञ्जकत्वात्।
एक दूसरेके विनाशके एक ही अधिकरणमें समवायसे रहना वन नहीं सकता। जैसे कि एक पटमें एक साथ दो शुक गुणोंका समचाय नहीं होता है। [एकजातीय पद देनेसे एक ही आम्रफलमें रूप, रस दो गुणोंके अविरोधसे युगपत् स्थितिका दष्टान्त भी खण्डित हो गया। प्रकृतमें एक आत्मा द्रव्यमें नित्य ज्ञानके रहते भ्रमात्मक ज्ञानाकार परिणाम नहीं वन सकता। यदि वह ज्ञानको हठात् गुण न मानकर द्रव्य ही मान ले, तो भी नित्य ज्ञानाकारमें परिणत आत्माका भ्रमज्ञाना- कारमें परिणाम नहीं हो सकता है, कुण्डलाकारमें परिणत सुवर्णका पूर्व आकारके विद्यमान रह्ते कटकाकार परिणाम नहीं देखा गया है। आत्माके नित्यज्ञानका विनाश नहीं होगा, इससे पूर्वाकारका नाश होनेपर दूसरा तत्सजातीय आकारका ग्रहण करेगा, यह कहना भी नहीं बनेगा। ] इससे भावाभाववादीको भी स्वम् और जागरणमें अनादि अनिर्वचनीय भावरूप अज्ञान ही ब्रह्मको आवृत करता है, मानना ही होगा, अतः हमारा पूर्वोक्त कथन सिद्ध हो गया। शक्का-अज्ञानके साथ सम्बन्ध होनेसे आत्माक्ता असङ्त्त्व वाधित हो जायगा। समाधान-ऐसा नहीं होगा, क्योंकि यह अविद्याका सम्बन्ध भी तो अनादि और अविद्याकी नाई कल्पित ही है, अतः वह कल्पित सम्बन्ध स्वाध्यस्त प्रपश्चके तुल्य आत्माकी पारमार्थिक असङ्गताका व्याघात नहीं कर सकता। [जिस प्रकार आकाशमें कल्पित मालिन्य वास्तविक नहीं है, उसी प्रकार आत्मामें अध्यस्त अविद्यासम्बन्ध वास्तविक नहीं है, किन्तु कल्पित है। मिथ्या पदार्थका पारमार्थिक पदार्थसे विरोध नहीं हो सकता, अतः कल्पित सम्बन्ध आत्माकी पारमार्थिक असङ्रताको नहीं मिटां सकता। जैसे आम्रफलके पक्क जानेसे उत्पन्न हुआ माधुर्य अपने धर्मी आम्रफलमें ही. अन्यथाभाव कर देता है, वैसे ही अध्यस्त अज्ञानवाले आंत्मामें ज्ञान होनेपर अज्ञानकी निवृत्ति होनेसे धर्मी आत्मामें अन्यथाभाव आ जायगा। आरोपित अविद्यासम्बन्धं आदि धर्मोंके मिथ्या होनेसे दोप भी नहीं आ सकता है ।। ११
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विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, चर्णक १
तदेवं भावरूपाज्ञानमनात्मानमनावृत्यैव तत्र विक्षेपमात्रं जनयति आत्मानं त्वावृत्य तन्र 'अहमिदम्' 'ममेदम्' इत्येवं व्यवहारयोग्यानध्यासानपि जनयति। नन्वहमिति निरंशश्चिदात्मा प्रतीयते, न त्विदं रजतमितिवदंशद्वया- नुविद्वं रूपम्, ततो नाऽयमध्यासः। तथेदमित्यपि शरीरं प्रतीयते। न च तस्याऽध्यस्तत्वं सम्भवति, प्रमाणभूतैरिन्द्रियैः गृह्यमाणत्वात्। अध्यस्तत्वे चाऽज्ञानवत् केव्लसाक्षिप्रत्यक्षवेद्यता स्यात्। यद्यपीदं रजतमितिवद्हं मनुष्य
उक्त प्रकारकी युक्तियोंसे यह निप्कर्ष निकला कि भावरूप अज्ञान अनात्माको आवृत न करके उसमें विशेष (रजतादि रूपान्तरक्का प्रतिभास) उत्पन्न करता है, और आत्माको तो आवृत भी करता है तथा उसमें 'अहमिदं ममेदं' (यह मैं हूँ, यह मेरा है) इस प्रकारके व्यवहारयोग्य (अहक्कारादिरूपान्तर प्रतिभासात्मकविशेष) अध्यासोंको भी उत्पन्न करता है। 'अह्म्' यह प्रत्यय अंशशून्य चिदात्माको विषय करता है, 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस प्रत्ययके समान दो अंशोंसे-सामान्य अनिष्ठान अंश और रजत विशेषाकार अंशसे-युक्त रूपवाला नहीं है, अतः यह अध्यास नहीं हो सकता। वैसे 'अहमिदम्' इसमें जो इदमंश है, वह भी केवल शरीरको विषय करता है, (जैसे 'इदं रजतम्'का 'इदम्' अंश जो अध्यस्त रजतपदार्थ है उसका ही तादात्म्यसे बोध करता है, वैसे 'अहमिदम्' इस ज्ञानमें प्रविष्ट अंश अहंपदार्थ निरंश चिदात्माके साथ तादात्म्यको प्राप्त नहीं है, किन्तु शरीरको विषय करता है) और शरीरको अध्यस्त कह नहीं सकते, क्योंकि शरीर प्रमाणभूत इन्द्रियों (चक्षुरादियों) से गृहीत होता है। शरीरको अध्यस्त माननेपर तो अज्ञानके तुल्य वह केवल साक्षिप्रत्यक्षसे ही गृहीत हो सकता है। [अध्यस्त पदार्थ प्रमाणगम्य नहीं होता है, प्रत्युत प्रमाण द्वारा उसकी निवृत्ति होती है, इस वेदान्तके नियमसे शरीरादिके अध्यस्त माननेमें ग्रमाण- भून चक्षुरादि इन्द्रियोंसे उसकी निवृत्ति हो जानी चाहिए, परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता है, अतः शरीर अध्यस्त नहीं है यह, शंका करनेवालेका आशय है]। यद्यपि 'इदं रजतम्' इस भ्रान्तिकी तरह 'अहं मनुष्यः' (मैं मनुष्य हूँ) इस ज्ञानमें भी 'मैं'और 'मनुष्य' इस प्रकार दो अंशोंकी प्रतीति होती है, इससे अधिष्वानारोप्यभाव
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अध्यासाविचार ] भापानुवादसहित ८३
इत्यंशद्वयवत्वेनाविष्ठानारोप्यभाव: प्रतीयते, तथापि नाऽसौ नियतः । आत्मन्युत्क्रान्ते पृथगपि शरीरस्योपलम्भात्। नह्यध्यस्तं रजतमधिष्ठा- नात् पृथगुपलभ्यते। अथ शरीरोपलम्भकं मानं व्यावहारिकमेव न तच्चावेदकमिति मन्येथास्तथाप्यात्मन्यव्यस्तत्वे तत्रैव लयः स्यात्। न च तथा श्रूयते, किन्तु पृथिवीं शरीरमिति पृथिव्यामेव लयः श्रूयते; ततो नात्मन्येतदध्यस्तम्। तथा ममेदमित्यपि शरीरव्यतिरिक्तम् अहंबुद्धययोग्यमहंकर्तृसम्वन्धि
(अधिष्ठान उसे कहते हैं-जिसमें मिथ्या पदार्थ भासित होता है और आरोष्य उसे कहते हैं-जो भासित होता है) स्पष्ट प्रतीत होता है, तथापि यह नियत नही है, अर्थात् अहंपद्वाच्य आत्माके शरीरसे निकल जानेपर भी मनुष्यपदवाच्य शरीरकी उपलब्धि रह जाती है। और अध्यस्त रजत अधिष्ठानके बिना पृथक् उपलब्ध नहीं होता है। [तात्पर्य यह है कि यदि शरीर आन्मामें अध्यस्त होता तो आत्माके न रहनेपर शरीर भी नहीं रहता, किन्तु ऐसी बात नहीं है, शरीर तो आत्मा (अधिष्ठान) से पृथक् उपलब्ध होता है, अतः वह अध्यस्त नहीं माना जा सकता ]। यदि कहो कि शरीरका ज्ञान करानेवाले चक्षु आदि प्रमाण व्यावहारिक ही हैं, तत्त्व्ावेदक नहीं हैं [अर्थात् वे चक्षु आदि प्रमाण व्यावहारिक विपयको प्रत्यक्ष कर सकते हैं, त्त्वभूत पदार्थको विषय नहीं कर सकते, अतः उनका ज्ञान व्यावहारिक ही होगा, तास्विक (पारमार्थिक) नहीं होगा। इससे शरीर व्यावहारिक है, इतना ही सिद्ध होता है, यह नहीं माना जा सकता कि यह इन्द्रियज्ञय होनेसे पारमार्थिक है, अध्यस्त नहीं है]। तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि यदि शरीरको आत्मामें अध्यस्त मानो, तो भ्रमात्मक रजतका जिस तरह शुक्तिमें लय होता है, उसी तरह इसका भी लय आत्मामें ही होगा। परन्तु ऐसा श्रुति नहीं कहती है, बल्कि इसके विपरीत कहती है कि 'पृथिवीं शरीरम्' (शरीरका पृथ्वीमें लय होता है) इससे सिद्ध हुआ कि 'अह- मिदम्' इस प्रत्यय में इदंपदका अर्थ-शरीर-आत्मामें अध्यस्त नहीं है। उक्त रीतिसे 'ममेदम्' (यह मेरा है) इस प्रतीतिमें भी 'इदम्' पदार्थ शरीरसे भिन्न 'मम' पदका अर्थ आत्मा जो अहंबुद्धियोग्य विपय है, उसके सम्बन्धी
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८४ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र- १, वर्णक १
वस्तुजातं प्रतीयते, न चं तत्राऽध्यासशङ्कापीति। उच्यते-अहमित्यत्र तावज्ञ- डांशान्तर्भावं प्रतिपादयिष्यामः, ततोऽसावध्यास एव। शरीरस्याप्यन्तः- करणेन्द्रियवद् दृश्यत्वादध्यस्तत्वं साधनीयम्। अन्तःकरणेन्द्रियाणां चात्मनः पृथक्सच्वोपलव्व्यभावादज्ञानवत् केवलसाक्ष्यपरोक्षतयाऽध्याससिद्धिः। न च तेपां संसृष्टतयैवाध्यासो न स्वरूपेणेति शङ्कनीयम्, 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति' अत्रैव 'समवलीयन्त' इत्यांत्मतच्वावबोधे सत्यात्मन्येव लय-
वस्तुजातका अवलम्बन करता है, इससे यहांपर अध्यासकी शङ्का ही नहीं हो सकती। [अध्यासमें तादात्म्यकी प्रतीति होती है और तादात्म्यकी प्रतीति समान- विभक्तिस्थलमें होती है। यहांपर 'मम इदम्' ऐसा सम्बन्धवोधक विभिन्न- विभक्तिका निर्देश होनेसे अध्यास नहीं माना जा सकता, इससे आपके 'अहमिदम्' तथा 'ममेदम्' दोनों व्यवहार अध्यास नहीं कहे जा सकते, यह भाव है]। इसपर कहते हैं-'अहम्' इस प्रत्ययमें जडांश भी मिला है, यह अहंकारनिरूपणके अवसरपर दिखलाया जायगा। इससे (अहंप्रत्ययमें दो अंश होनेसे ) अहंप्रत्यय अध्यास ही सिद्ध होता है। शरीर भी अन्तःकरण तथा इन्द्रियोंकी तरह दृश्य होनेसे अध्यस्त ही है, ऐसा सिद्ध करना चाहिए। अन्तःकरण और इन्द्रियादिकोंकी अध्यस्तता सिद्ध करते हैं-अन्तःकरण या इन्द्रियोंका आत्मासे पृथक् (शरीरसे आत्माके निकल जानेपर) उपलन्धि नहीं होती है, अतः अज्ञानकी तरह केवल साक्षिप्रत्यक्षसे ही इनका ज्ान होता है, इससे अज्ञानके तुल्य इनका भी अध्यास सुतरां सिद्ध है। * इन्द्रिय और अन्तःकरण आदिका संसृष्टरूपसे ही अध्यास हो सकता है, स्वरूपसे नहीं हो सकता, ऐसी शङ्का भी नहीं करनी चाहिए; क्योंकि 'नं तस्य प्राणा:०' (उसके प्राण कहीं निकल नहीं जाते हैं, किन्तु यहाँ (आत्मामें ही) लीन हो जाते हैं) ऐसी श्रुति है। इस श्रुतिसे आत्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेपरं
.* माना कि अन्तःकरण और इन्द्रियोंका 'अहं स्मरामि, गच्छामि, श्ृगोमि, पश्यामि' इत्यादि व्यवहारोंमं अव्यास हो, परन्तु इन प्रतीतियोंमें सर्वत्र अन्तःकरण आदिका संसष्टरूपसे भान होता है, अतः इनका अध्यास भी संसष्टरूपसे ही (अर्थात् इनका आत्मासे संसर्ग मिथ्या है.) मानना चाहिए, स्वरूपसे तो ये सत्य हो हैं। आत्मासे पृथक् इनकी उपलब्धिका अभाव भी संसष्टरूपसे ही रहता है, इस आशयसे शंङ्का और समांधान करते हैं.। .- :
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित
श्रणात्, स्वरूपतोऽप्य्याससिद्धेः। शरीरस्याऽपि पृथिवीद्वारेणात्मन्येव लय इत्यवगन्तव्यम्। यदा देहेन्द्रियादिविशिष्टो भोक्ताऽव्यस्तस्तदा तदुपकरणं वाह्यभोग्यजातमध्यस्तमिति किमु वक्तव्यम्। नहि स्वममाहेन्द्रजालकल्पि- तस्य राजो राज्योपकरणं पारमार्थिकं भवति। तस्मादहमिदं ममेदमित्येते त्रयोऽप्यध्यासा एव। आणादिका आत्मामें ही लय सुना जाता है, इससे इनका स्वरूपतः भी अध्यास सिद्ध है। [जैसे रज्जुसर्पका, रज्जुका साक्षात्कार होनेपर, रज्जुमें लय हो जाता है, अतः वह सर्प रज्जुमें अध्यस्त माना जाता है, वैसे ही अन्तःकरण आदिका भी आत्मामें ही लय हो जाता है, अतः ये भी आत्मामें ही अध्यस्त हैं। इस तरह जब अन्तःकरण आदि अध्यस्त हैं तब शरीरका अध्यस्त होना सुतरां सिद्ध है, यह उत्तरका आशय है]। शरीरका लय पृथिवीके द्वारा आत्मामें ही होता है, ऐसा समझना चाहिए। [ आत्मतत्त्वसे आकाशादि- क्रमसे सृषिटि प्रादुर्भूत होती है। तथा लय तद्विपरीत क्रमसे -- पृथ्व्यादि- क्रमसे-होता है, अन्ततः सकल प्रपञ्च आत्मामें लीन हो जाता है, इससे पृथ्व्यादि- क्रमसे शरीरका लय आत्मामें ही है * (पृथ्वीमें आत्यन्तिक लय नहीं है, अन्यथा उसका उपलम्भ ही नहीं होगा) ] जब देह, इन्द्रिय आदिसे युक्त भोग करनेवाला (अहं) आत्मामें अध्यस्त माना गया है तव उसके उपकरण बाहरी भोग्य सभी पदार्थ अध्यस्त हैं, इसमें क्या कहना? अर्थात् कैमुतिकन्यायसे ये सभी अध्यस्त ही हैं। जसे-स्वन्न तथा इन्द्रजालमें कल्पित राजाके लिए उसके राज्य-साधन-हाथी, अश्व, अमात्य आदि सभी-कल्पित ही होते हैं, पारमार्थिक नहीं होते, [चैसे ही आत्माके वस्तुतः निरञ्जन होनेपर भी उसका भोक्ता होना स्वाप्निक तथा ऐन्द्रजालिक राजा होनेके तुल्य है और उस कलपित भोक्ताका देहेन्द्रियादि उपकरण भी स्वाभिक राज्यकी भाँति कल्पित ही है] इससे 'अहम्' (मैं) 'इदम्' (यह) 'मम इदम्' (यह मेरा) ये तीनों अध्यास ही हैं, यह सिद्ध हुआ।, *आत्माके इस शरीरसे निकल जानेपर शरीरकी उपलब्धि अध्यासकी वाधिका नहीं है, क्योंकि मृतक भी घट-पट आदि पृथ्वी विकारकी तरह अधिष्ठानसत्तानुवेधसे प्रतीयमान रहता है। वस्तुतः यह शरीर या मनुष्यादि कुछ नहीं है। शरीर आदि व्यवहार तो उसमें भूतपूर्व- गंतिसे अज्ञानज़नित संस्कार द्वारा होते हैं।
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८६ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
न च केवलधर्माध्यासेऽपि वित्रदितव्यम्; 'वधिरोऽहम्'इत्यत्रेन्द्रियधर्मस्य
ज्ञानाध्यासस्त्वर्थाध्यासाविनाभूतत्वान पृथक् साधनीयः । तदित्थम- नुभवारूढोऽध्यासोऽपलपितुमशक्य इति सिद्धम्। गुरुशिष्यौ वादिनौ वा शास्त्रे तच्तविचारकौ। तत्र शिष्यं प्रति गुरु: पूर्वमध्यासमुक्तवान् ।। १॥ विवदन्तेऽत्र येऽध्यासे तानुददिश्याथ लक्षणम्। संभावनाप्रमाणं च कथ्यतेऽध्याससिद्धये ॥ २ ॥ ननु सर्वत्र लक्षणेन लक्ष्यमितरस्माद् व्यावर्च्यते संभावनया च तस्य स्त्रदेशकालोपाधावसंभावनावुद्धिनिरस्यते, प्रमाणेन च तत्सद्भानः साध्यते।
केवल धर्मका (धर्मीके विना) अध्यास होता है, इसमें भी किसीको विवाद (शङ्का) नहीं करना चाहिए, क्योंकि 'वधिरोऽहं' (मैं वहिरा हूँ) इस प्रतीतिसे केवल इन्द्रियधर्म वहिरेपनका भी आत्मामें अध्यास देखा जाता है। ज्ञानाध्यास भी अर्थाध्यासके विना कहीं नहीं रहता है अर्थात् अर्थाध्याससे अविनाभूत-व्याप्त है, अतः उसको पृथक साधन करनेकी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार अनुभवसिद्ध अध्यासका अपलाप नहीं हो सकता है, यह सिद्ध हुआ। [आगे अध्यासलक्षण तथा सम्भावनाके प्रदर्शक ग्रन्थके अवतरणस्वरूप दो श्लोक अ्रन्थकार रचते हैं ]- गुरु और शिष्य अथवा वादकथामें प्रवृत्त दो पुरुष ही शासत्रविपयक तत्त्वविचार करनेवाले होते हैं, उनमें गुरुने शिष्यके प्रति पहले अध्यास कह दिया है ॥१॥ जो विप्रतिपन्न लोग अध्यासके विषयमें विवाद करते हैं, उनके प्रति लक्षण किया जाता है और सम्भावना तथा ग्रमाण अध्यासकी सिद्धिके लिए कहे जाते हैं ॥ २ ॥ शङ्का करते हैं कि सभी जगह लक्षणसे लक्ष्य दूसरोंसे भिन्न किया जाता है, सम्भावनासे अपनी देशकालरूपी उपाधिमें उसकी असम्भावना (न हो सकनेकी शङ्का) का दूरीकरण होता है और प्रमाणसे उसका सद्भाव (अपने देशकालमें होना ) सिद्ध होता है। इससे यहाँपर ( ये दोनों कार्य )
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अध्यांसविचार ] भापानुवादसहित ८७
तथा चात्राध्याससाधनायोपन्यसिष्यमाणानि प्रत्यक्षानुमानव्यवहारान्यथानु-
च पर्थवस्यन्ति। अव्यावृत्तस्याऽसंभावितस्य चाऽध्यासस्य प्रमातुमशक्यत्वात्। अतो न लक्षणसंभावने प्रमाणात् पृथग्वर्णनीये इति चेद्, मैवम् ; द्विविधो ह्यत्रा- ध्यासाकारः। अन्यस्यान्यात्मता मिथ्यात्वं चेति । तत्राऽन्यस्यान्यात्मतायाः साधकत्वेनोपन्यसिप्यमाणैः ग्रत्यक्षादिभिर्न मिथ्यात्वमनुभवितुं शक्यते, मिथ्यात्वस्येदं रजतमित्यत्र वाधानुपपत्तिगभ्यत्वात्। इह च वाधाभावात्।
त्यवगन्तुमशक्यत्वादस्त्येव वाध इति चेद्, मैवम् ; यौक्तिकवाधे सत्यपि
अध्यासका साधन करनेके लिए आगे दिखाये जानेवाले प्रत्यक्ष, अनुमान, व्यवहार, अन्यथाऽनुपपत्ति और आगमरूप प्रमाण ही अध्यासके अन्यव्यावर्तक तथा अस- म्भावनाके निवर्तक अर्थतः हो जायँगे, क्योंकि अन्यसे जो व्यावृत्त नहीं है तथा जिसकी असम्भावनाकी निवृत्ति नहीं हुई है, ऐसा अध्यास प्रमात्मक ही नहीं हो सकता (अर्थात् अध्यासको प्रमात्मक कराते हैं, इसीसे यह सिद्ध हो गया कि लक्ष्य इतर पदार्थोंसे भिन्न और असम्भावनासे रहित है), इसलिए प्रमाणसे पृथक् लक्षण तथा सम्भावनाका वर्णन करना व्यर्थ है। समाधान करते हैं-ऐसी शङ्का उचित नहीं है, क्योंकि यहांपर अर्थात् वेदान्त- सिद्धान्तमें अध्यासके दो भेद माने गये हैं। एक तो अन्यको-दूसरी वस्तुको- अन्य-दूसरी वस्तु-समझना और दूसरा उसका मिथ्यात्व। प्रथम आकार (अन्यकी अन्यात्मता) के साधक ही प्रत्यक्षादि प्रमाण जो सब आगे दिये जायँगे, उनसे अध्यासकी मिथ्यात्मता नहीं सिद्ध होगी, क्योंकि मिथ्यात्व प्रत्यक्षादिसे गम्य नहीं है। यह रजत है, इस प्रत्ययमें भी रजतका मिथ्यात्व 'नेदं रजतम्' इस वाधकी अनुपपत्तिसे ही प्रतीत होता है, 'प्रत्यक्ष' से प्रतीत नहीं होता [अर्थात् यदि उक्त रजत मिथ्या न होता, तो उसका 'नेदं रजतम्' ऐसा बाध न होता, और 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) ऐसा वाध होता है, अतः मिथ्या है ]। 'मैं मनुष्य हूँ' यहाँपर वाघका योग नहीं है अर्थात् 'नाइमस्मि' (मैं नहीं हूँ) अथवा 'नाहं मनुष्यः' (मैं मनुष्य नहीं हूँ) ऐसी बाध- प्रतीति ब्रह्मसाक्षात्कारके पूर्व किसीको भी नहीं होती है। [आगे वर्णन
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८८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र, १, वर्णक १
भ्रान्तिप्रतिभासोच्छेदिनोऽपरोक्षवाधस्याभावेन मिथ्यात्वांध्यवसायस्यास्प- प्टत्वात्। अतस्तस्य स्पष्टीकरणाय लक्षणमेव वक्तव्यम्।
किये जानेवाले प्रत्यक्ष*, अनुमान t, व्यवहारानुपपत्ति और आगम x तो केवल आत्मामें अनात्मवुद्धि होती है अध्यासके इस एक अंशमें ही प्रमाण हैं, इनसे मिथ्यात्वकी सिद्धि नहीं हो सकती, यह आशय है। ] 'अहं मनुप्यः' इत्यादि स्थलमें भी जब तक 'अहम्' (मैं आत्मा) भिन्न पदार्थ है और 'मनुष्य' (शरीरादि) भिन्न पदार्थ है, इस प्रकार एक दूसरेका विवेक-पार्थक्यज्ञान, जो कि वाधका कारण है, न हो जाय; तव तक 'अहं मनुष्यः' इस ज्ञानको अध्यास नहीं समझ सकते हैं। इससे उक्त प्रतीतिमें भी चाघ होता ही है। [क्योंकि यदि 'मैं मनुष्य हूँ' इस व्यवहारको प्रत्यक्षादि आंशिक अध्यास कहते हैं, तो यह सिद्ध हुआ कि मैं और शरीर भिन्न हैं, परन्तु भमसे अभिन्न समझे जाते हें (अध्यस्त हें), अतः भ्रमात्मक ज्ञान होनेसे यहाँपर भी अध्यांस कहा गया है, यह बिना किसी प्रमाण- न्तरके ही सिद्ध हो जाता है। यह भी नहीं कह सकते कि अन्यको अन्यरूपसे समझनेमें परस्पर विवेकग्रहकी आवश्यकता नहीं है जिससे वाध निमित्त बना ही रहे, अनात्मा देवदत्तका अपनेको देवदत्त समझना भी अध्यास ही है इन युक्तियोंसे अध्यासके मिथ्यात्व सिद्ध होनेपर भी लक्षणादि द्वारा उसका. मिथ्यात्वप्रतिपादन करना आवश्यक ही है] यदि ऐसा कहो, तो ठीक नहीं है, क्योंकि पूर्वप्रदर्शित युक्तियोंसे (अन्यकी-अन्यात्मतावभासकी अनुपपत्तिसे) बाधके सिद्ध होनेपर भी भ्रमात्मक ज्ञानका उन्मूलन करनेवाले प्रत्यक्ष बाधके न होनेसे मिथ्यात्वका अध्यवसाय (निश्चय) स्पष्ट नहीं हो सकता है। (युक्तिजन्य, ज्ञान अपरोक्ष ज्ञान होता है, वह 'अहं मनुप्यः' इस प्रत्यक्ष भ्रमका निवारण नहीं कर सकता।) अतः 'मैं मनुष्य हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष अध्यासके मिथ्यात्वको स्पष्ट करनेके लिए लक्षण ही करना चाहिए।
- 'अहं मनुष्यः' (मैं मनुष्य हूँ) इत्यादि ज्ञानको प्रत्यक्ष समझना चाहिए। + 'अहं मनुष्यः' इत्यादि व्यवहार अध्यासनिमित्तक है, व्यवहार होनेसे, पश्चादिके व्यवहार के समांन, ऐसा अनुमान समझना चाहिए। * अपनेमें कर्ता, भोक्ता, प्रमाता आदि व्यवहार करना व्यवहारपदसे लिया जाता है। X 'अष्टवर्ष ब्रांह्यणमुपनयीत' इ्रत्यादि शास्त्र लेना चाहिए।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ८९
रोधिधर्माणामुपलम्भादसंभावनावुद्धिर्जायते। न च वाच्यम् आत्मन्यविप- यादिरूपेऽनवगते सति नासंभावनावुद्धि:, अचगते तु नाध्यास एव तिप्ठतीति; परोक्षावभ सस्यासंभावनावुद्धिहेतुत्वात, तावता चाऽपरोक्षाध्यासाऽनिवृत्तेः। अव सम्भावनाकी आवश्यकता दिखलाते हैं-'तथा लोके' इत्यादिसे। अप्रामाण्यके हेतुसे रहित अर्थात् प्रमाणभूत चक्षु आदि इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानसे लोकमें निश्चित किया गया भी उत्पात-सूचक सूर्यके छिद्रादिमें 'सूर्यमं छिद्रकी संभावना नहीं है' ऐसी असम्भावना बुद्धि देखी जाती है, इसी दृष्टान्तसे 'मैं मनुष्य हूँ' इस अध्यासमें भी असम्भावना- बुद्धि हो सकती है, क्योंकि आत्मामें अविपयत्व * असङ्गत्व t, सादश्यका, अभाव आदि अध्यासके विरोधी धर्म पाये जाते हैं [ अध्यासके लिए ज्ञानका विषय होना एवम् सावयवी होना तथा सादृश्यका रहना अत्यन्त आवश्यक है, इन धर्मोंके रहनेसे शुक्तिमें रजतादिका भ्रम उपपन्न होता है। आत्मामें इन धर्मोंके न रहनेसे अध्यास नहीं वन सकता इस असम्भावनावुद्धिके निराकरणके लिए सम्भावनाका पृथक कहना आवश्यक है ]। यहांपर यह शक्का हो सकती है कि जब तक आत्मामें अध्यास विरोधी अविपयत्व आदि धर्मोंका निश्चय नहीं होता, तब तक आत्मामें अध्यासकी असम्भावनावुद्धि नहीं हो सकती है और जब अविपयत्व आदि अध्यासविरोधी उक्त धर्मोंका ज्ञान आत्मामें हो गया, तब अध्यास ही नहीं टिक सकता। फिर असम्भावनावुद्धि किसको विपय करेगी? उत्तर देते हैं कि यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि परोक्ष अवभास ही असम्भावनाका कारण है। इतने ही से अंपरोक्ष अध्यासकी निवृत्ति नहीं हो सकती है [आत्मामें अविषयत्वादिका परोक्षज्ञान होनेसे अध्यासकी असम्भावना बुद्धि हो सकती है। * अधिष्ठान शुक्त्ादि और अध्यस्त रजतादि इन दोनोंका ज्ञान होना अध्यासके लिए आवश्यक होता है, और आत्मा वेदान्तमतमें ज्ञानका अविपय है। + शुक्तिरजतादिके द्रष्टकी चक्ष आदि इन्द्रियोंका जब अध्यस्तके साथ अनुषत्ग होता है तब चमकी उत्पत्ति होती है, और आत्मा सज्रहित माना गया है। 1 छुक्तादि-अधिष्ठान अध्यस्त-रजतादिका परस्पर गुण तथा अवयवका सादृश्य
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९० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
तस्मादसंभावनानिरासाय प्रमाणात् पृथगेव संभावनाऽपि वक्तव्यैव। तथा चान्यैरपि लक्षणसंभावनापूर्वकत्वं प्रमाणस्योक्तम्। मानाधीना मेयसिद्धिर्मानसिद्धिश्च लक्षणाद्। तच्चाध्यक्षादिमानेपु गीर्वाणैरप्यवारणम् ।१।। संभावित: प्रतिज्ञायां पक्षः साध्येत हेतुना। न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः ॥।२।। इति।
परन्तु इस परोक्षज्ञानसे 'मैं मनुष्य हूँ' इस प्रत्यक्षभ्रमकी निवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि प्रत्यक्षज्ञानसे ही प्रत्यक्षम्रम निवृत्त हो सकता है। इससे जब भ्रम बना है, तव उक्त परोक्षज्ञानसे अध्यासकी असम्भावना भी बनी है यही उत्तरका तात्पर्य है ]। इसलिए असम्भावनाकी निवृत्तिके लिए प्रमाणसे पृथक् सम्भावनाका भी कथन सर्वथा सङ्गत है। इस पूर्वोक्त आशयसे ही दूसरे तन्त्रकारोंने भी प्रमाणको लक्षण तथा सम्भावनापूर्वक ही माना है- प्रमेयकी सिद्धि प्रमाणके अधीन है अर्थात् प्रमाणसे ही प्रमेयकी सिद्धि होती है और प्रमाणकी सिद्धि लक्षणसे होती है। और वह लक्षण यदि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंमें है, तो देवताओंसे भी उन प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंका निवारण नहीं हो सकता ॥।१।। [प्रमाणसंवाद आदि हेतुसे ही पक्षकी पुष्टि होती है, इसमें प्रमाण देते हैं]- प्रतिज्ञावाक्यमें सम्भावित पक्ष (वहियुक्त पर्वतादि) हेतुके (धूमादिके) द्वारा यदि सिद्ध किया जाता है और जो पक्ष प्रतिज्ञा वाक्यमें वास्तवमें संभावित नहीं है अर्थात् उत्पत्ति कालमें ही नष्ट हो गया है। उसकी हेतुओंसे रक्षा (साघन) नहीं हो सकती है [अभिप्राय यह है कि 'पर्वतो वहिमान्' इस प्रतिज्ञावाक्यसे जव पर्वतंमें वह्िकी संभावना होती है, तभी धूमादि हेतुसे बहिकी सिद्धि होती है। यदि प्रतिज्ञावाक्यसे पर्वतमें वहिकी सिद्धि न हो तो हेतुसे भी उसका साधन देवता भी नहीं कर सकते हैं ॥।२iI]
होनेसे ही अ्रमकी उत्पत्ति होती है, यह सावयव पदार्थोंमें ही सङ्गत है। आत्मा निरवयव है, अतः उसमें सादृश्य भी नहीं वन सकता !
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अभ्यासवेचार] भापानुवादसहित ११
तत्राऽपि लक्षणपूर्विका संभावना। लक्षणेन हि व्यावृत्तस्वरूपे उपस्थापिते पश्चादिदं संभाव्यत न चेति विचारो युज्यते। अन्यथा निविं- पयो विचार: स्यात्। ततो लक्षणमेव अ्थमं वक्तव्यम्। तदुच्यते-द्विविधो हध्यासो ज्ञानविशिष्टोऽथोरऽर्थविशिष्टं ज्ञानं चेति। तत्राऽर्थस्य तावत् स्मर्य- साणसदशोऽन्यात्मनाऽवभास्यमानोऽन्योऽर्थोऽध्यास इति लक्षणम्। ज्ञानस्य
ननु 'इदं रजतम्' इत्यत्र चक्षुरादिग्रमाणाभावाद् पारिशेष्यात् स्मर्यमाण- मेत रजतं न पुनस्तत्सदशमित्यख्यातिवादिन आहुरिति चेटू, मैवम्;
इन दोनोंमें अर्थात् लक्षण और संभावनामें लक्षणपूर्वक सम्भावना होनी चाहिए. अर्थात् सम्भावनासे पूर्व लक्षणका होना आवश्यक है, क्योंकि लक्षण द्वारा इतर पदार्थोंसे व्यावृत्त स्वरूप (असंकीर्ण) उपस्थापित वस्तुमें पीछे 'यह सम्भव है या नहीं' यह विचार करना युक्त होता है। [घट या वन्ध्यापुन्नादि पदार्थका शव्दादि द्वारा ज्ञान हो जानेपर ही तद्विपयक 'है या नहीं' इत्यादि विकल्प हो सकता है, इसी भावको लेकर आगे विपर्यय दिखलाते हैं ]-अन्यथा- इसके विपरीत लक्षण किये बिना पूर्व ही 'यह वस्तु है या नहीं' इत्यादि विचार करना-विषयहीन हो जायगा। अतः विचारके विषयका प्रतिपादन करनेके लिए सर्वप्रथम लक्षण करना आवश्यक होता है। इससे अब अध्यासका लक्षण कहते हैं। ['स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदष्टावभासः' इस भाप्यलक्षणकी व्याख्याके उद्देश्यसे मेदप्रदर्शनपूर्वक लक्षण करते हैं ]- अध्यास दो प्रकारका है-एक ज्ञानविशिष्ट अर्थ और दूसरा अर्थ- विशिष्ट ज्ञान। उद्देशक्रमसे पहले अर्थाध्यासका लक्षण करते हैं-उनमें स्मर्यमाणके-स्मरणविपयके-सदृश और दूसरी वस्तुके रूपसे प्रतीयमान होने- वाला अर्थ अर्थाध्यास कहलाता है। और दूसरा 'स्मरणके समान अर्थात् असन्निहित विपयक और दूसरी वस्तुका दूसरे रूपसे अवभास ज्ञानाध्यास कहलाता है। यहाँपर मीमांसक सक्का करता है कि 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस शुक्ति- रजतज्ञानमें रजतके साथ चक्षुरादि प्रमाणके (संप्रयोगके) न होनेसे परिशेषसे स्मरण- का ही रजत विषय है, स्गर्यमाणक सदश रजतान्तर नहीं है: यह उसकी शक्का
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विवरणग्रमेयसंग्रह [ सूंत्र १; वर्णेक र
पुरोवस्थितत्वेनावभासमानत्वाद्। न चेदमंशस्यैव तथाजवभासो न रजत- स्येति मन्तव्यम्; यथा सम्यकस्थलेष्विदं रजतमयं घट इत्यादिष्वितरेतर- संसृष्टौ सामान्यविशेषावपरोक्षाववभासेते तथेहापि प्रतिभासात्। अथ मतं सामान्यविशेपयोर्नैरन्तर्येण प्तिभासात्तथा व्यवहारः, न तु संसर्गसवित्स- द्भावादिति, तन; परमार्थस्थलादीपन्न्यूनताया अप्यदर्शनाद्। पुरोवर्ति-
भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'यह रजत है, इस प्रकार शुक्तिमें सामने स्थितरूपसे रजतकी प्रतीति होती है। [जो स्मर्यमाण-स्मरणका विषय है, वह पदार्थ सामने विद्यमान है, ऐसा प्रतीत नहीं होता। और यह शुक्तिरजत सामने विद्यमान मालूम होता है]। मीमांसक फिर शक्का करता है कि यह सामने विद्यमानताकी प्रतीति इदमंशमें है, रजतांशमें नहीं। इसका वेदान्ती खण्डन करता है कि यह भी कहना उचित नहीं है, क्योंकि जैसे सच 'व्यावहारिक' रजतस्थलमें 'इदं रजतम्' (यह रजत है) तथा 'अयं घटः' (यह घड़ा है) इत्यादि ज्ञानमें एक दूसरेके साथ मिले हुए सामान्य और विशेष दोनों अंश प्रत्यक्ष भासित होते हैं, वैसे ही 'यह रजत है' इस भ्रमात्मक शुक्तिरजतज्ञानमें भी दोनों अंशोंका (इदम् सामान्य अंश और रजत विशेष अंशका) प्रत्यक्ष अवभास होता है। मीमांसकका यह कथन भी कि सामान्य विशेष दोनों अंशोंका नैरन्तर्य (अव्यवधान) होनेसे ऐसा (दोनों अंशोंका प्रत्यक्ष) मालूम होता है, दोनोंके परस्पर संसर्गज्ञानका सद्भात्र है, इससे नहीं [ अर्थात् दोनों (यह और रजत) अंश अव्यवहित रहते हैं, इससे दोनों अंशोंका प्रत्यक्ष ज्ञान जान पड़ता है, इससे यह समझना उचित नहीं है कि दोनों अंशोंका परस्पर संसर्ग (तादात्म्य) ज्ञान है। अतः दोनोंका प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि भ्रममें संसर्गज्ञान नहीं है। सामान्य अंशका ही प्रत्यक्ष तथा रजतका ही स्मरण है ]। ठीक नहीं, क्योंकि परमार्थ स्थलसे कुछ भी प्रकृतमें कमी नहीं है। [अर्थात् 'इदं रजतम्' इस भ्रमज्ञानमें और 'इदं रजतम्' इस प्रमाज्ञानमें जरा-सी भी न्यूनताका अनुभव नहीं होता है। जब तक परमार्थ रजतज्ञानसे भ्रमज्ञानमें कोई न्यूनताका अनुभव न हो, तव तक यह कहना सङ्गत नहीं होता कि भ्रमज्ञानीय सामान्य और विशेष दोनों अंशोका परस्पर संसर्गग्रह नहीं होता] यदि कहो कि भ्रमज्ञानमें पुरोवतीं
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अध्यांसविचार ] भोंपानुवादसहित ADY
रजताभाव एवं न्यूनतेति चेद्, नः; किमपरोक्षसंविदभावाद्रजताभावनिश्चयः, किं वा नेदं रजतमिति वाघकज्ञानात नाद:, संविदभावस्यैवाऽसंग्रतिपत्तेः। अर्थाभावेनैव संविद्भावनिश्चये स्यादन्योन्याश्रयता। तस्मादपरोक्षसंवित्स-
याधीन: संवित्सत्तानिश्चय इति वाच्यम्, तथा सत्यर्थनिश्चयोऽपि तथैव निश्चयान्तराधीन इत्यनवस्थाप्रसङ्गात्। तस्मात् संविननिश्वयः स्वत एव तद्धीना चार्थसत्ता। नापि द्वितीय:, 'इदं रजतम्' इति पूर्वज्ञानेन विरुद्ध-
रजतके अभावकी ही कमी है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस अवस्थामें प्रश्न होता है कि क्या प्रत्यक्षज्ञानके अभावसे रजतके अभावका निश्चय किया जाता है अथवा 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस वाघक ज्ञानसे? पहला पक्ष तो सक्गत नहीं है, क्योंकि भ्रमात्मक रजतका प्रत्यक्षज्ञान नहीं है, इस प्रकार संविद्का अभाव सम्प्रतिपन्र-उभय वादियोंको सम्मत-नहीं है। यदि अर्थके (रजतादि विपयके) अभावसे ही प्रत्यक्षज्ञानका अभाव माना जाय, तो अन्योन्याश्रय दोप होगा। कारण कि अर्थाभावसे ज्ञानाभाव और ज्ञानाभावसे अर्थाभावका निश्चय होगा। इससे अपरोक्ष ज्ञान होनेसे ही पुरोवर्ती रजतकी सत्ता माननी चाहिए। ऐसा भी नहीं कह सकते कि आपके (वेदान्तीके) उक्त कथनके विपरीत अर्थकी (रजतादि विपयकी) सत्ताके निश्चयसे ही ज्ञानकी सत्ताका निश्चय हो सकता है, क्योंकि ऐसा माननेमें रजत आदि अर्थका निश्चय भी इसी तरहसे दूसरे-दूसरे निश्चयोंके अधीन होगा, इस प्रकार अनवस्था हो जायगी। [ यदि अर्थसत्ताके निश्चयानन्तर संवित्सत्ताका निश्चय कहो, तो अर्थसचाका निश्चय भी तो किसी निश्चयान्तरसे ही होगा और इस अर्थसत्ताके निश्चायक निश्चयान्तरका भी निश्चय तो निर्विपयत्व रूपी दोपभयसे निश्चयान्तरसे ही करना होगा, इस प्रकार अनवस्थासे मूलभूत अर्थसत्ताका निश्चय ही नहीं वनेगा। स्वतः तो अर्थसत्ताका निश्चय अर्थके जड़ होनेसे नहीं वनेगा, यह तात्पर्य हुआ]। इससे संवित्-प्रत्यक्षज्ञानकी सिद्धि. स्वतः है और इस स्वतः सिद्ध प्रत्यक्ष ज्ञानके निश्चयसे अर्थकी सत्ता सिद्ध होती है। द्वितीय पक्ष-वाधक ज्ञानसे अर्थाभावका निश्चय भी उचित नहीं है, क्योंकि 'हदं रजतम्' (यह रजत है) इस पूर्वज्ञानसे विरुद्ध 'नेदं रजतम्' (यह
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१४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
स्योत्तरज्ञानस्य बाधासामर्थ्यात्। तर्ह्युत्तरज्ञानस्य का गतिरिति चेत, पूर्वज्ञानस्य त्वन्मते या गतिः सैव भविष्यति। यथा त्वयेदं रजतमित्य- त्रेदमाकाररजताकारयोरविवेक: कल्पितः तथा निपेधेऽप्यविवेक एव नतु संसर्गसंविदिति किं न कल्प्यते ? व्यवहारसंवादज्ञानान्निपेधसंसर्गसंविद- स्तीति निश्चीयत इति चेत्, तर्हिं संविद: स्वप्रकाशत्वं हीयेत। विप्रतिपन्नं
रजत नहीं है) इस द्वितीय ज्ञानमें बाघकत्वका सामर्थ्य नहीं बन सकता। जिस समय 'इदं रजतम्' (यह रजत है) ऐसा प्रथम ज्ञान हुआ उस समय कोई विरोधी तो है नहीं, अतः वह उत्पन्न हो जायगा। अनन्तर 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) उत्पन्न हुआ भी विरोधी ज्ञान प्रथम उत्पन्न ज्ञानका वाध कैसे कर सकेगा, यह अभिप्राय है] मीमांसक प्रश्न करता है-यदि वह बाधक नहीं है, तो उत्तरज्ञानका कैसे समन्वय होगा? वेदान्ती प्रतिबन्दी उत्तर देता है-जैसा समन्वय आपके मतमें पूर्ववाक्यका है, वैसा ही समन्वय उत्तर वाक्यका भी होगा। इसीको स्पष्ट करते हैं-जैसे तुमने, 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस भ्रमज्ञानमें-इदमाकार (सामान्य अंश) और रजताकार (विशेष अंश) इन दोनोंका अविवेक (असंसर्गा Sज्ञान) कल्पित है [ संसर्गसंवित् नहीं], ऐसा माना है, वैसे ही निषेधवाक्यमें भी अविवेक ही कल्पित होगा न कि निषेधका संसर्गज्ञान (संवित्) । [ यह, रजत और अभाव-इन तीनोंके भी अविवेककी (असंसर्गाग्रह-संसर्गके अभावके अज्ञान की) कल्पना करके संगति हो जानेसे उत्तरवाक्यमें 'न' पदसे 'निषेधका संसर्गज्ञान ही बोधित होता है' ऐसा क्यों माना जाय? यह आशय हुआ ।] 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस निषेधवाक्यसे रंजताभावका ज्ञान होनेसे प्रवृत्त्यभावरूप व्यवहार देखा जाता है, इससे उत्तर वाक्यमें निषेधंका संसर्गज्ञान रहता है, इस आशयसे मीमांसक प्रतिबन्दीका खण्डन करता है-व्यवहार-रजताभावज्ञानसे होनेवाला प्रवृत्त्यभावरूप व्यवहार- के संवादसे 'नेदं रजतम्' इस उत्तर वाक्यमें निषेधका सम्बन्धग्रह है, ऐसा निश्चय होता है और पूर्ववाक्यमें रजतज्ञानसे व्यवहार नहीं होता है, अतः उसमें सम्बंधसंवित्का सद्भाव नहीं है। वेदान्ती इस का खण्डन करता है-'व्यवहारसंवाद- ज्ञानसे निषेधके सम्बन्धका ज्ञान होता है, यदि ऐसा मानते हो, तो संविदू-
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ९५
प्रत्येवैवं प्रसाधनान्न ममापसिद्धान्न इति चेत, तथाप्यनवस्था दुष्परिह्दरा। न च पुरोवर्त्तिरजताभावः सर्वसम्प्रतिपन्न इति वाच्यम्,- यथाग्रतिभास- मेव मिथ्यारजतस्य ुक्तिज्ञानेन निरसनयोग्यस्याऽस्माभिरभ्युपगमात्। मिध्यारजताभ्युपगमोऽपि नेदं रजतमिति त्रैकालिकनिपेधेन विरुध्यत इति चेत, न; तस्य निषेधस्य लोकप्रसिद्धपरमार्थरजतविपयत्वात्। न चैवमप्रसक्त- प्रतिपेध: शङ्धनीयः, मिथ्याभृने रजते परमार्थरजतार्थित्रवृत्तिदर्शनेन पर- मार्थरजतत्वम्य सामान्योपाधी प्रसक्तेरङ्गीकार्यत्वात्। अन्यथा भूतले
ज्ञानके स्वप्रकाशत्वका विधान हो जायगा। (मीमांसक संविद्को स्वप्रकाश मानता है, अतः उक्त रीतिसे अपसिद्धान्त दोप आ जाता है)। यदि मीमांसक आगरह करे कि हम ऐसा प्रसाधन (व्यवहारसंवादसे संसर्गसवित्का ग्रह कहना) उनके प्रति है, जो संवित्के स्वप्रकाशत्वमें विवाद करते हैं अर्थात् ज्ञानको अनुमेय मानते हैं, तो भी अनवस्थाका परिहार तो नहीं हो सकता। सामने विद्यमान शुक्तयादिमं रजतका अभाव सभी वादी मानते हैं, यह कथन भी उचित नहीं है, क्योंकि हम वेदान्ती प्रतिभासके अनुसार शुक्तिज्ञानसे वाधने योग्य मिथ्या रजतफा स्वीकार करते ही हैं, इससे रजतका अभाव सर्ववादिसिद्ध है, ऐसा नहीं मान सकते। मीमांसक पुनः शंका करता है-'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस त्रैकालिक निषेधसे प्रतिभासकालमें भी मिथ्यारजतका स्वीकार विरुद्ध होगा। चेदान्ती उत्तर देता है-ऐसा नहीं, 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) यह निषेध लोक- प्रसिद्ध परमार्थ (व्यावहारिक) रजतको विषय करता है। मीमांसकको यह शक्का नहीं करनी चाहिए कि लौकिक रजत तो यहाँपर प्रसक्त ही नहीं है। 'इनं रजतम्' ग्रतिभासका तो मिथ्यारजत विषय है, इससे नो प्रसक्त नहीं है, उसके निषेधका प्रसन्न होगा, (जो किसीको भी अभीष्ट नहीं है), क्योंकि मिथ्यारजतमें लोकप्रसिद्ध परमार्थ रजतकी इच्छावाले पुरुपकी प्रवृत्ति देखनेसे परमार्थ रजतत्वकी भी सामान्य उपाधि (इदमंश) में प्रसक्तिका अङ्गीकार माना गया है [ यदि दृदमंशमें केवल प्रातिभासिक रजत ही प्रसक्त होता, तो उसमें लौकिक रजतसे काम लेनेवाले पुरुपकी प्रवृत्ति नहीं होती; किन्तु प्रवृत्ति देखी जाती है, अतः रजतप्रतिभासकी प्रसक्तिसे एक
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९६ चिवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
घटनिषेधोऽपि दुर्भणः स्यात्। घटसच्वे निषेधो व्याहन्येत घटासच्वे चाऽप्रसक्तप्रतिपेधः। ततो देशसामान्योपाधिना कालसामान्योपाधिना घटग्रसक्तिर्न तु साक्षात्। तथैव परमार्थरजतस्याप्यस्तु। एवं च सत्युत्तर- कालीनो नाऽस्त्यत्र रजतमिति प्रत्ययः परमार्थरजतविषयो मिथ्यैव रजतमभादिति प्रत्ययश्च मिथ्यारजतविषय इत्युभयमप्युपपद्यते । अन्यथैक: परत्ययोऽपलप्येत । ननु रजतापरोक्ष्यानुपपच्या तु संसृषावभासं परिकल्प्य तदुपपत्तये हि मिथ्यारजतकल्पनाक्केशः क्रियते। रजतापरोक्ष्यं तु संसृष्टावभासमन्त-
सम्बन्धी ज्ञान दूसरे सम्बन्धीका स्मारक होता है, इस न्यायके वलसे परामार्थ रजत भी वुद्धिमें आ जाता है, यह भाव हुआ ]। ऐसा न माननेमें वाघक दिखाते हैं-अन्यथा-इसके विपरीत माननेमें-तो भूतलमें घटका अभाव भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि घटकी सत्तामें (घटके रहते हुए) घटका निषेध करना व्याहत-असङ्गत-होगा। और घटके न रहनेपर उसका निषेध करना अप्रसक्तप्रतिषेध हो जायगा। इसलिए देशसामान्य तथा काल- सामान्य उपाधिसे ही घटकी प्रसक्ति कहनी होगी, साक्षात् तद्देश या तत्काल ही में प्रसक्ति प्राप्त नहीं है। एवं परमार्थ रजतकी भी सामान्यतः प्रसक्ति समझनी चाहिए। पूर्वोक्त प्रक्रियाका अङ्गीकार करनेपर उत्तरकालमें होनेवाले 'यहांपर रजत नहीं है' यह प्रत्यय (ज्ञान) लोकप्रसिद्ध परामार्थ रजतको विषय करता है। और झूठा ही रजत भासता था, यह ज्ञान मिथ्यारजतको विषय करता है, इस तरह दोनों ज्ञानोंकी व्यवस्थाकी उपपत्ति बन गई; नहीं तो एक ज्ञानका अपलाप हो जाता। [अर्थात् उत्तरकालमें यहां रजत नहीं है, अब तक मिथ्या ही रजत भासित हुआ था, ऐसी दो तरहकी प्रतीति होती है। यही दो प्रकारका अनुभव उक्त व्यवस्थामें प्रमाण है, यदि उक्त व्यवस्था न मानी जाय, तो परस्पर विरुद्ध होनेसे कोई एक ज्ञान नहीं होना चाहिए, यह अभिप्राय हुआ ]। मीमांसक पुनः शङ्का करता है-रजतके प्रत्यक्षकी अनुपपत्तिसे 'इदं रजतम्' ज्ञानको परस्पर संसर्गयुक्त ज्ञान मानना पड़ता है। और माने हुए इस संसृष्ट ज्ञानकी उपपत्तिके लिए मिथ्यारजतकी कल्पनाका क्लेश उठाना पड़ता है। (ये सब क्लेश क्यों उठाए जायँ) रजतका प्रत्यक्ष तो संसर्गयुक्त ज्ञान माने विना
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अध्यासविचार ] भपानुवादसहित १७
रेणवाऽपरोक्षशक्तिज्ञानाविवेकादप्युपपद्यत इति चेद्, न; तथा सति विवेक- ज्ञानसमयेऽप्येतावन्तं कालं तद्रजतमनेनाऽविविक्तमित्यविवेक एव परा- मृध्येत, न च तथा परामृश्यते; किं त्वेतावन्तं कालमिदं रजतमित्यभादिति प्रत्यभिज्ञया संसृष्टावभास एव परामृश्यते। अतः पुरोवर्त्तिमिथ्यारजतम- ड्रीकर्त्तच्यम्; अन्यथा शुक्तिं दृष्ट रजते प्रवर्तन इति किं केन सङ्गच्छेत ? नस्मात् न स्मर्यमाणमिदं रजतम्, किन्तु स्मर्यमाणसदृशमेव। तत्सादृ्डयं च पूर्वानुभवसापेक्षज्ञानगम्यत्वादुपपन्नम्। नह्यननुभूतरजतस्य
ही सामने विद्यमान चक्षुगोचर (प्रत्यक्षविषय) शुक्तिका विवेक न होनेसे (अर्थान् शुक्तिका रजतसे पृथकरूपसे ज्ञान न होनेसे ) भी वन सकता है। उत्तर देते हैं-यह शक्का ठीक नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा (शुक्तिज्ञानके अिवेकसे रजतका आपरोक्ष्य (प्रत्यंक्ष ) होता, तो शुक्तिज्ञानके विवेकके अनन्तर या विवेककालमें 'इतने समय तक, वह रजत इससे विविक्त (शुक्तिसे भिन्न) नहीं जाना' इस तरह अविवेक ही का परामर्श होता' परन्तु ऐसा परामर्श नहीं होता है; (प्रत्युत इसके विपरीत विवेकज्ञान होनेपर) 'इतने समय तक यह रजत है' ऐसा प्रतीत हुआ' इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञासे संसष्टज्ञानका ही परामर्झ होता है। इसलिए (संसष्टज्ञानकी उपपत्तिके लिए) पुरोवर्ती मिथ्यारजतका अङ्गीकार करना ही चाहिए। अन्यथा शुक्तिको देखकर रजतमें प्रवृत्ति होती है, यह प्रवृत्ति क्या किसी प्रकार संगत हो सकती है? [नियम है कि पुरुपकी जहां-कहीं भी प्रवृत्ति होती है, वह तद्विपयक ज्ञानके अनन्तर ही होती है। रजतकी इच्छा रखने- वाले पुरुपकी पुरोवर्ती 'इदम्' पदार्थमें प्रवृत्ति देखी जाती है; इससे इदंपदार्थको उसने रजतरूपसे अवश्य जाना है, ऐसा मानना ही होगा, यह भाव है। ] इससे इस भ्रमज्ञानके विषय रजतको स्मर्यमाण अर्थात् स्मरणका विपय नहीं कह सकते, किन्तु स्मर्यमाणके सदश ही कह सकते हैं। और यह स्मर्यमाणका सादृश्य पूर्व अनुभवकी अपेक्षावाले ज्ञानसे ज्ञेय होनेके कारण संगत होता है। जिस पुरुपको कभी भी रजतका अनुभव नहीं हुआ है, उसको रजतभ्रम नहीं होता। [जैसे स्मर्यमाण पदार्थ स्मृतिसे ज्ञेय होता है, और स्सृतिज्ञान अनुभवकी अपेक्षा रखता है; वैसे ही भ्रमज्ञानका विपय पदार्थ भी रजतके संस्कारज्ञानसे ज्ञेय है और संस्कार पूर्वानुभवकी अपेक्षा रखता है, अतः स्मर्यमाण और अ्रमात्मक पदार्थमें
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९८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
अत एव संस्कारजन्यत्वाद् ज्ञानाध्यासस्याऽपि स्मृतिसाम्यमवगन्त- व्यम्। विमतं न संस्कारजम्, स्मृतिव्यतिरिक्तज्ञानत्वात्, ग्रत्यक्षवत्; इति चेद्, न; संप्रयोगमात्रजन्यत्वस्योपाधित्वात्। न चाऽनुमानागमा- दिज्ञानेषु साध्याव्याप्ति: शङ्कनीया, व्याप्यादिज्ञानसापेक्षत्वेन संस्कारजेपु तेषु साध्याभावात्। स्यादेतत्-विमताः प्रत्यया यथार्थाः, प्रत्ययत्वात्, पूर्वानुभवसापेक्षज्ञानगम्यत्व रूप सादृश्य वन गया।] यह अर्थाध्यासमें सादृश्य कहा गया। अब ज्ञानाध्यासमें सादृश्य कहते हैं कि अतएव अनुभवसापेक्षसंस्कारगम्य होनेसे ही ज्ञानाध्यासमें भी स्मृतिकी समानता समझ लेनी चाहिए। * विमत-भ्रम संस्कारजन्य नहीं है, स्मृतिभिन्न ज्ञान होनेसे, प्रत्यक्षके समान। [ कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रत्यक्षमें स्मृतिभिन्नत्व और संस्कारजन्यत्वाभावका साहचर्य नियमरूप व्याप्ति देखी गई है, अतः आपका वेदान्तीका ] अभिमत स्मृतिभिन्न भ्रम भी संस्कारजन्य नहीं हो सकता। इस प्रकारके अनुमानसे स्मृतिसाम्य भ्रममें नहीं है, यदि वादी ऐसा कहे, तो उसका यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि उक्त अनुमानमें संप्रयोगमान्रजन्यत्व अर्थात् केवल इन्द्रियसंनिकर्षसे जन्यत्वरूप उपाधि। है। अनुमान, आगम आदि ज्ञानोंमें संस्कारजन्यत्वके अभावरूप साध्यकी अव्याप्ति है, अर्थात् अनुमानादिमें संस्कारजन्यत्वाभावरूप साध्य है, किन्तु सम्प्रयोगमात्रजन्यत्वरूप उपाधि नहीं हैं, अतः साध्यकी व्यापक उपाधि नहीं हुई, ऐसी शक्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उन अनुमान आदि ज्ञानोंमें व्याप्तिज्ञानकी भी अपेक्षा है, अतः संस्कारजन्य होनेसे संस्कार जन्यत्वाभावरूप
- विमतपदसे वह पक्ष लिया जाता है, जो विवादका विषय न हो। प्रकृतमें भ्रमज्ञानको वेदान्ती संस्कारजन्य और स्सतिसे मिनन एक ही ज्ञान मानते हैं। मीमांसक इससे विपरीत भ्रमको अनुभव और स्मरण रूप दो ज्ञान मानते हैं, इससे भ्रम विमतिग्रस्त होनेसे विमत कहलाता है। * साध्यके व्यापक और साधनके अव्यापकको उपाधि कहते हैं। उपाधिको दिखानेके लिए स्मरण रखना चाहिए कि प्रायः पक्षमें साधनाव्यापकत्व और दृष्टान्तमें साध्यव्यापकत्व दिखाया जाता है। जैसे प्रकृतमें भ्रमज्ञान पक्ष है, उसमें साधन (हेतु) स्मृतिभिन्नज्ञानत्व विद्यमान है और सम्प्रयोगमान्नजन्यत्व नहीं है। क्योंकि भ्रम दोषादिसे भी जन्य होता है। अतः साघनाव्यापकत्व उक्त उपाधिमें आ गया। दृष्टान्त प्रत्यक्षज्ञानमें संस्काराजन्यत्वरूप साध्य और उपाधि दोनों हैं, अतः उपाधि साध्यव्यापक हो गई। यहांपर व्यापकका लक्षण समानाधिकरणघटित समझना चाहिए!
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अध्यासविचार ] भापांनुवादसहित
संमतवत्, इति न्यायेन प्रमाणं स्मतिथ्ेति द्वैराश्यमेव ज्ञानस्य। तथा च रजतज्ञानमपि नाऽध्यास:, किन्तु स्मृतिः, संस्कारमात्रजन्यत्वात्, संम- तवत्। न च स्मृतित्वे सत्यतिसादृश्याच्छुत्त्यन्तरमेव किं न स्मर्यत इति वाच्यम्, कर्तृगतरागादिदोपाणामपि निमित्तत्वाद्, शुक्त्यन्तरे तदभावात्। तैरेव दोपैः स्मरणाभिमानस्य प्रमुपितत्वान्न रजतस्मरणे तत्तांश उल्लिख्यते। तथाविशेपावभासकत्वस्य तैरेव प्रतिवद्धत्वान्न शुक्तिग्रहणेऽपि नीलपृष्ठ- त्वादिकमवभासते। तथा च ग्रहणस्मरणे उभे अप्यविवक्ते संपद्येते, ततो रजतार्थी पुरोवत्तिनि प्रवर्त्तते। ननु किं ग्रहणस्मरणे दे. अपि प्रवर्त्तके १ आहोस्विदेककम्। आद्येऽपि
साध्य भी उनमें नहीं है। मीमांसक अपना मत प्रकट करता है-विमत- सभी भ्रमादिज्ञान यथार्थज्ञान-प्रमाज्ञान-ही हैं, ज्ञान होनेसे-संमतके अर्थात् प्रत्यक्षादि ज्ञानके समान, इस अनुमानसे इन्द्रियसम्प्रयोगादिनन्य प्रमाण ज्ञान और स्मरण इस प्रकार ज्ञानके दो ही भेद हो सकते हैं। इस दशामें भ्रमात्मक रजतज्ञान भी अध्यास नहीं है, किन्तु स्मृति ही है, क्योंकि वह संस्कार- मात्रजन्य है, जैसे कि सम्मत। अर्थात् माता, पिता आदिके स्मरणात्मक ज्ञान संस्कारनन्य हैं। 'यदि भमको स्मरण माना जाय, तो शुक्तिके अत्यन्त सादश्यसे दूसरी शुक्तिका ही स्मरण होना चाहिए, रजतका नहीं' यह शक्का उचित नहीं है, क्योंकि रजतार्थीमें विद्यमान रागादि दोष भी भ्रममें निमित्त माने गये हैं, वे दोप दूसरी शुक्तिमें नहीं हैं। इन्हीं दोषोंके कारण स्मरणाभिमानके प्रमेय हो जानेसे रजतके स्मरणमें तचांशका उल्लेख नहीं होता है। एवम् इन्हीं दोषोंके कारण विशेषताके सूचक धर्मोंके भी प्रति- बद्ध हो जानेसे शुक्तिका अनुभव होते हुए भी नीलपृष्ठत्वादिका अवभास नहीं होता है। इस प्रकार अनुभव और स्मरण दोनों भी अविविक्त हो जाते हैं अर्थात् पार्थक्यरूपसे गरहीत नहीं होते हैं, इसलिए रजतार्थी पुरुषकी पुरोवर्ती पदार्थमें ही प्रवृत्ति होती है। वेदान्ती मीमांसकके मतमें दोष देते हैं-आपने (मीमांसक ने) कहा कि अविविक्त हुए अ्हण और स्मरण प्रवृत्ति कराते हैं, इसमें हम (वेदान्ती) आपसे पूछते हैं कि ग्रहण (अनुभव) और स्मरण दोनों प्रवर्तक हैं या एक-एक प्रवर्तक
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक १
किं संभूय प्रवर्तके ? कि वा क्रमेण? नाऽडद्यः, स्मृतिग्रहणयोयोगपद्या- भावात्। क्रमविशिष्टयोई्योः प्रवर्त्तकत्वमित्ययुक्तम् ; पूर्वज्ञानस्य पवृत्तिं प्रति व्यवहितस्याऽकारणत्वात्। नाऽप्येकैकस्य प्रवर्त्तकत्वम्, व्यवहारस्य विशिष्टविषयत्वात्। ततो विशिष्टप्रवृत्तये संसृष्टप्रत्यय एष्टव्य इति चेद्, न; ग्रहणस्मरणनैरन्तर्योत्पचेः प्रवर्तकत्वात्। इदं रजतमित्यभादिति संसर्ग- प्रत्ययः अरत्यभिज्ञायत इति चेद, न; तादृशव्यवहारमात्रत्वात्। यस्तु जात- मात्रस्य वालस्य मधुरे तिक्तत्वावभासस्थूत्काराद्यनुमेयः, सोऽपि जन्मान्तराद्- नुभूततिक्तत्वस्मृतिरेव, न तु भ्रान्तिरूपः संसर्गप्रत्ययः। माधुर्यविशेपतत्तांशौ हैं। यदि प्रथमपक्ष मानते हो, तो क्या दोनों मिलकर प्रवर्तक होते हैं ? या क्रमशः ? पहला पक्ष नहीं बनता, क्योंकि ग्रहण और स्मरण इन दोनोंका एक कालमें होना असम्भव है, कारण कि ज्ञानेच्छादि योग्य विभु गुणोंका उत्तरगुणनाश्यत्व माना गया है। क्रमसे होनेवाले दोनों ज्ञानोंको क्रमशः प्रवर्तक मानना भी अयुक्त है, क्योंकि पूर्वज्ञान उत्तर ज्ञानसे व्यवहित है, अतः वह प्रवृत्तिके प्रति कारण नहीं हो सकता। एक-एक भी प्रवृत्तिका कारण नहीं हो सकता, क्योंकि व्यवहार विशिष्टको विषय करता है अर्थात् रजतार्थीकी प्रवृत्ति रजतत्वविशिष्ट पुरोवर्ती पदार्थमें होती है। यह प्रवृत्ति पूर्वोक्त नियमके अनुसार एक विशिष्टज्ञानसे ही हो सकती है-एक-एक ज्ञानसे नहीं हो सकती, यह तात्पर्य है अतः विशिष्ट प्रवृत्तिके लिए संसर्गयुक्त विशिष्टज्ञानको ही अभीष्टका साधक मानना होगा। इस पूर्वोक्त पूर्वपक्षका मींमांसक उत्तर देता है-यह पूर्व पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि ग्रहण और स्मरणकी अव्यवधानसे उत्पत्ति ही प्रवृत्तिके प्रति हेतु होगी। 'इदं रजतम्' (यह रजत है) ऐसा प्रतीत हुआ, इस प्रतीतिसे संसर्गयुक्त विशिष्ट ज्ञानकी प्रत्यभिज्ञा होती है; यह भी कहना उचित नहीं है; क्योंकि ऐसा व्यव- हारमात्र है (अर्थात् जसे दूरस्थ दो वृक्षोंमें उत्पन्न न हुआ भी एकत्व दूरत्व -- दोषसे भासित होता है, वैसे ही सर्वत्र भ्ममें संसर्गयुक्त विशिष्ट ज्ञानके उत्पन्न न होते हुए भी दोषवशात् संसर्गज्ञानकी प्रत्यभिज्ञाका व्यवहार होता है।) [ इससे संसष्टज्ञान उत्पन्न ही होता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, यह भाव है] । सद्योजात बालकके थूकनेसे अनुमान किये गये मधुर रसमें कड्डवा- पनका ज्ञान भी जन्मान्तरमें अनुभूत तिक् रसका स्मरण ही है, अ्रमरूप संसर्गज्ञान नहीं है। माधुर्यविशेप और तता ये दोनों अंश तो ग्रहण और स्मरण
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अध्यासविचार नसाल भापानुवादसाहेत
तु ग्रहणस्मरणयोः पित्तदोपान्नोल्लिख्येते। जन्मान्तरानुभूतं चन स्मर्यत इति च भाष्यकारवचनं श्यिकाभिग्रायम्। अन्यथा स्तनपानादावपीष्ट- साधनतास्मृत्यभावेन प्रवृत्तिर्न स्यात्। भ्रान्तिपक्षेऽपि जन्मान्तरानुभवः कारणत्वेनैष्टव्यः । अन्यथाऽनुभूतत्वाविशेपेण सप्तमरसोऽपि भ्रान्तौ भासेत। अतच्वे तत्वज्ञानमिति चढ़ता शास्त्रकारेणैव दशितः संसर्गावभासो भ्रमत्वेनेति चेद्, न; तस्य व्यवहाराभिप्रायत्वात्। सम्यकूप्रदेशेपु संसर्गज्ञानस्य प्रवर्तत- कत्वं व्यासं तत्कुत्ोऽत्र त्यज्यत इति चेद्, गौरवादिति ्रूमः । भ्रान्ति-
दोनों ज्ञानोंमें पिच दोपसे ही विषय नहीं होते हैं। [ग्रहणमें माधुर्यविशेपकी प्रतीति और तिक्तमें तचकी प्रतीति दोपसे छिप जाती है, यह भाव है।] 'जन्मान्तरमें अनुभृतका स्मरण नहीं होता है' यह भाष्यकारका वचन तो ग्रायिक है [ अतः आप्तवचनसे कोई विरोध नहीं है ]। यदि ऐसा न माना जाय, तो स्तनपानादिमं भी इषटसाधनताका स्मरणात्मक ज्ञान न होनेसे प्रवृत्ति न होगी। [ क्योंकि प्रवृत्तिमात्रमें इष्टसाधनत्वका ज्ञान अर्थात् यह कार्य मेरा इष्टका साधक है, ऐसा ज्ञान कारण है, अतः भाष्यवचनको प्रायिक ही मानना चाहिए। ] वालकके उस तिक्तावभासको यदि भ्रान्ति मानें, तो भी जन्मान्तरका अनुभत कारण बनाने के लिए आश्रयणीय होगा ही। क्योंकि भममें पूर्वानुभवको कारण वेदान्ती मानते ही हैं। पहले ही कह आये हैं कि जिसको रजतका अनुभव नहीं है उसको रजतभ्रम नहीं होता, यह गृढ़ांभिप्राय है।] नहीं तो, अननुभूतत्वमें कोई विशेष न होनेसे मधुरादि छः रसोंसे अतिरिक्त सातवां रस भी अ्रममें भासित होना चाहिए। [ जैसे इस जन्ममें अनुभवमें न आया हुआ मधुर रस वालकके भ्रमका विषय होता है, वैसे ही अनुभवमें न आया हुआ सप्तम रस भी भ्रमका विपय होना चाहिए, यह तात्पर्य हुआ।] 'जो वस्तु तात्विक नहीं है, उसमें तत्त्वज्ञान होना भ्रम है, इस प्रकार कहनेसे सांख्यशास्तरकारोंने भी मममें संसर्गज्ञान दिखलाया है, यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि शास्त्रोंका यह वचन भी व्यवहारके अभिप्रायसे ही है (अर्थात् अयथार्थ ज्ञानके अभावमें भी अयथार्थ व्यवहार होता है; एतदभिप्रायक सांख्यसिद्धान्त है।) यदि शङ्का करो कि यथार्थ ज्ञानस्थलमें संसर्गज्ञान प्रवर्तक माना गया है, उसका प्रकृतमें त्याग करना उचित नहीं है? तो इसका समाधान यही करते हैं कि प्रकृतमें ऐसा मानना गौरवग्स्त है।
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१०२ वेवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक १
वादिनाऽपि तत्कारणत्वेनाऽचश्यं ग्रहणस्मरणयोरविवेक एष्टव्य: । तथा चं तेनैवोभयसिद्धेन प्रवृत्तिसिद्धौ किमतिरिक्तसंसर्गज्ञानेन१ तस्मादख्याति- रेव युक्त्ेति। अत्रोच्यते-केयमख्यातिर्नाम। किं ख्यात्यभावमात्रमुतान्यार्थिनोड- न्यत्र प्रवृत्तिहेतुविज्ञानम्! अथाविविक्तानेकपदार्थज्ञानम् ? आद्ये, सुपुपौ भ्रमः स्यान्न जाग्रत्स्वनयोः। द्वितीये, झटिति वाधादालस्याद्वा यत्र न प्रवृत्तिस्तत्र भ्रमवादीको-एक विशिष्टसंसर्गज्ञानरूप भ्रम माननेवालेको-भी भ्रमके प्रति कारण- रूप ग्रहण और स्मरणका अविवेक मानना तो आवश्यक ही है। इस अवस्थामें उभयवादिसिद्ध पूर्वोक्त ग्रहण और स्मरणके अविवेकसे ही विशिष्टव्यवहारकी यदि उपपत्ति हो जाती है, तो अतिरिक्त भ्रमात्मक संसर्गज्ञानकी कल्पना क्यों की जाय ? [ग्रहण और स्मरणसे अतिरिक्त तृतीय ज्ञानकी कल्पना करनेमें स्पष्ट ही गौरव है और मेरे-अहणस्मरणवादीके मतमें गौरव नहीं है, क्योंकि 'इदम्' पंदार्थका ग्रहण भ्रमवादी मानता ही है, अन्यथा अधिष्ठानका स्फुरण ही नहीं होगा। एवं पूर्वानुभूत रजतका स्मरण भी अनिवार्य है, अन्यथा जिसने रजतका अनुभव नहीं किया है, उसको भी रजतत्रम होना चाहिए। इससे ग्रहण और स्मरणके उभयमतसिद्ध होनेसे हमारा यह पक्ष गौरवग्रस्त नहीं है, यह वादीका तात्पर्य है। इससे यह सिद्ध हुआ कि अख्याति ही युक्त है। वेदान्ती अख्यातिवादका खण्डन करता है-इस मतके विषयमें कहा जाता है कि आपकी अख्याति क्या वस्तु है ? [ इसका विवेचन कीजिए, ऐसा भीमांसकके प्रति पर्यनुयोग हुआ ] विकल्प करते हैं-क्या ख्यातिका न होना ही अख्याति है? अथवा अन्य वस्तुको चाहनेवाले पुरुषकी अन्य वस्तुमें प्रवृत्ति- कारणत्वका विज्ञान ख्याति है ? या अविविक्त अनेक वस्तुओंका विज्ञान ख्याति है। पहला पक्ष तो नहीं हो सकता, क्योंकि इसके माननेमें केवल सुषुप्ति (गाढ़निद्रा) * ही में अ्रम सकेगा जागर-स्वम्नमें नहीं होगा। जागर या स्वममें कुछ-न-कुछ ख्याति रहती ही है, अतः ख्यातिका सामान्याSभाव नहीं हो सकता। द्वितीय पक्ष भी दोषपूर्ण है, 'इदं रजतम्' इस भ्रमके अव्यवहित उत्तर क्षणमें ही शीघ्र 'नेदं रजतम्' बाध हो गया, * वंस्तुतः वेदान्तमतमें सुपुपिमें भी अज्ञानकी ख्याति रहती ही है, अतः अम्युपगमवादसे यह ग्रन्थ है या 'पररीत्या परो वोधनीयः' इस न्यायसे प्रवृत है।
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अध्यासचिचार ] भापानुचादसहित १०३
भ्रान्तिर्न स्यात्। तृतीयेऽपि अविविक्तत्वप्रतियोगिविविक्तत्वं नाम किं भेदग्रहः ? उताभेदाग्रहः १ अहोस्वित् इतरेतराभावभेद्द्वित्वादिसंख्याविशिष्ट- ज्ञानम्? नाद्य:, इदमिति रजतमिति चाडपुनरुक्तशव्दद्वयस्मृतिहेतुत्वेन सामान्यविशेपयो भेदग्रहे सत्यविवेकासंभवात्। न द्वितीय, उक्तरीत्या भेदस्य गृहीतत्वादेव तद्विरुद्धस्याभेदस्याSडग्रहे सति तदग्रहनिपेधस्याऽविविक्तत्वस्थ दुःसंपादत्वात्। तृतीयेऽपि किमाहत्यैय द्वित्वादिज्ञानमपेक्षितम्१ उताऽऽनुपङ्गि- कमपि पर्याप्म्। आद्ये, 'गामानय दण्डेन'इत्यत्र गोदण्डयोरपि साक्षाद् द्वि- अथवा 'इदं रजतम्' इस भ्रमके रहते भी आलस्यके कारण जहाँ प्रवृत्ति न हुई चहाँपर द्वितीय विकल्पात्मक अख्याति (भ्रम) नहीं होनी चाहिए। तीसरा विकल्प भी युक्तियुक्त नहीं हे; क्योंकि इस तीसरे विकल्पमें भी विविक्तत्वके अभावका प्रतियोगिभृत विविक्तत्व क्या भेदका ज्ञान है ? अथवा अभेदका अज्ञान विविक्तत्व है, या इतरेतराभाव-भेद-द्वित्वादिसंख्याविशिष्ट ज्ञान विविक्तत्व है? [जैसे घट और पटका विवेक इतरेतराभावविशिष्टज्ञान है और दोनोंका भेदविशिष्ट ज्ञान भी है एवम् दोनोंमें विद्यमान द्वित्व संख्याविशिष्टज्ञान भी है, अतः इन दोनोंका विवेकग्रह वनता है। अन्यथा अविवेक होगा वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए यह इन चिकल्पोंका भाव है] इनमें प्रथम पक्ष-भेदज्ञान युक्त नहीं है, क्योंकि 'इदम्' और 'रजतम्' इन दोनों अपुनरुक्त शव्दोंके स्मृतिके कारण होनेसे 'इदम्' सामान्य और 'रजतम्' विशेष इन दोनोंका भी भेदग्रह स्पष्ट होनेपर 'इदम्' और रजतका अविवेक असम्भव होगा। द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि जब प्रथम विकल्पके खण्डनके अवसरमें प्रदर्शित रीतिसे मेदग्रह हो ही गया, तब भेदके विरोधी अभेदके अग्रह रहते हुए इस अभेदा 5ग्हके निषेधस्वरूप अविविक्तत्वका सम्पादन दुःसाध्य हो जायगा। तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि इसमें विकल्प होगा कि निरुक्त द्वित्वादिका ज्ञान साक्षात् रहना चाहिए या उसका आनुपङ्िकरूपसे रहना भी विवेकग्रहके लिए उपयुक्त है, यदि साक्षात् द्वित्वादिज्ञान विवेकका उपयोगी माना जाय, तो 'दण्डसे गौ ले आओ' इस वाक्यमें गौ और दण्डमें भी साक्षात् * द्वित्वादिकी प्रतीति न होनेसे अविवेककी (भ्रमकी) प्रसक्ति हो जायगी। * गौ और दण्ड इनमें साक्षात एकत्व ही है, अन्यथा इनमें द्विवचन हो जाना चाहिए। यदि गोगें कर्मभाव और दण्डमें करणभावका भेदका साक्षात होनेसे विचेक है ही, ऐसा
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१०४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
त्वाद्यपतीतेरविवेक: प्रसज्येत। द्वितीये, पुरोवर्ततिरजतयोर्यनुपङ्गििकद्वित्वादि ज्ञानसन्ध्ावादविवेको न स्यात्। ननु प्रतियोगिनमुपजीव्याविवेकानिरूपणेऽपि धर्मिद्वारा निरुप्यता- मिति चेत्१ तदप्यसत् न तावत् प्रतीयमानयोधमिणोरविवेक: संभवति, अपुनरुक्तत्वेन स्पष्ट प्रतिभासात्। अप्रतीयमानयोरविवेकश्रेत् ! सुषुप्तावपि भ्रमः प्रसज्येत । नन्वविवेको नामाऽसंसर्गाग्रहः। स च प्रतीयमानयोरिदंरजतयोः संभ- वति, 'इदंरजते असंसृष्टे' इति प्रत्ययादर्शनादिति चेत्, तदाऽपि किं ग्रहण- दूसरे * पक्षमें तो पूरोवर्ती 'इदम्' पदार्थ और 'रजत' इन दोनोंमें भी आनु- षङ्विक द्वित्वादिज्ञानका सद्भाव है ही, अतः इनका (इदम् और रजतका) अविवेक (संसर्गग्रम) नहीं हो सकेगा। यदि शङ्का हो कि प्रतियोगी (विवेक) के निरूपण द्वारा अविवेकका प्रतिपादन नहीं बन सकता है, तो मत बने; परन्तु धर्मियोंके द्वारा ही यदि निरूपण कर लिया जाय, तो क्या हानि है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतीतिमें आनेवाले "इदम् और रजत" दोनों धर्मियोंका अविवेक सम्भव नहीं है। वहां तो अपुनरुक्त भिन्न-भिन्न इदम् और रजत इस प्रकार प्रतीतिमें आनेसे भेद- की स्पष्ट ही प्रतीति हो रही है। यदि प्रतीतिमें न आनेवाले धर्मियोंके अवि- वेकका भ्रम मानो, तो सुुप्तिमें मी भ्रमका प्रसङ्ग हो जायगा। [सुपुप्तिमें किसी भी आकारका ज्ञान नहीं रहता है, यह भाव है।] पुनः मीमांसक अविवेकका विवरण करता है-असंसर्ग (सम्चन्धाभाव) का अग्रह (ज्ञान न होना) ही अविवेक कहलाता है। और वह असंसर्गका अग्रह प्रतीतिमें भासनेवाले इदम्-पुरोवर्ती और रजतका हो सकता है, क्योंकि इदं और रजत अससष्ट (संसर्गाभावविशिष्ट) हैं, ऐसा ज्ञान नहीं होता है। वेदान्ती खण्डन करता है-"यह भी सङ्गत नही है" क्योंकि अविवेकका अर्थ असंसर्गका अग्रह माननेपर भी हम विकल्प करेंगे कि क्या ग्रहण (अनुभव) और कहा जाय, तो गोगत कर्मकारकत्व और दण्डगत करणकारकत्वका भेद कैसे वनेगा, क्योंकि कारकत्व दोनोंमें समानरूपसे विद्यामान है। तव इन कर्मकारंक और करणकारकका भेद- प्रयोजक आप कर्मवोधिका और करणवोधिका भिन्न २ दो विभक्तियोंके आनेसे अपुनरुक शब्द द्वारा ही भेद कहेंगे, तो आनुपज्विक भेदादि द्वारा द्वित्वादिशिष्टज्ञान हुआ, इस आशयसे माने हुए आनुषज्ञिक द्वित्वादिविशिष्ज्ञान पक्षका खण्डन इस ग्रन्थसे करते हैं-
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १०५
स्मरणयोरेवाऽसंसर्गाग्रहो विवक्षितः, उत ययो: कयोशिद् १ आहोस्विित् संसर्ग- ज्ञानरहितयोः। आद्ये 'अहं मनुष्यः' इति भ्रमो न स्यात; उभयोरपि ग्रहण- त्वात्। द्वितीये 'खण्डो गौः, शुक्क: पटः' इत्यपि भ्रमः स्थात् ; असंसर्गग्रती- त्यभावात्। तृतीयेऽपि स एव दोप :; नहि तत्र संसर्गज्ञानं संभवति। तद्वि- पयस्यैक्यस्याऽभावात्। ऐक्यस्य च तद्विपयत्वं अत्यभिज्ञायामवगतम्। यदि गुणगुण्यादिसंचन्ध एव तद्विपयो नैक्यमित्युच्यते तहींदं रजत- मित्यत्राऽपि सादृश्यसंवन्धस्तद्विपय इति वक्तुं शक्यत्वेन संसर्गपरत्ययो
स्मरण इन दोनों ज्ञानोंके असंसर्गके अग्रहको ही अविवेक कहते हैं ? अथवा किसी भी दो ज्ञानोंके असंसर्गके अग्रहको अविवेक कहते हैं ? अथवा संसर्ग- रहित ज्ञानोंके ही असंसर्गा 5ग्रहको अविवेक कहते हैं ? यदि प्रथम पक्ष माना जाय, तो 'अहं मनुष्यः' (मैं मनुष्य हूँ) इस प्रतीतिको भ्रम नहीं कहना चाहिए, क्योंकि इस प्रतीतिमें मैं और मनुष्य ये दोनों ज्ञान अनुभवात्मक ही हैं; इसलिए 'अहं मनुष्यः' इस ज्ञानमें ग्रहण और स्मरणके अविवेकरूप भ्रमके लक्षणकी अन्याप्ति हो जायगी। द्वितीय पक्ष माननेसे 'खण्डो गौः' (एक प्रकारका विशे गौ) इस ज्ञानमें और 'शुक पटः' (सफेद कपड़ा) इस ज्ञानमें भ्रमत्व हो जायगा। इससे लक्षणमें अतिव्याप्ति दोष आवेगा; क्योंकि प्रदर्शित दोनों ज्ञानोंमें असंसर्गकी प्रतीति नहीं है। तृतीय विकल्पमें भी प्रथम विकल्पमें उक्त दोपका ही सद्भाव है, अतः वह भी नहीं माना जा सकता; क्योंकि 'खण्डो गौः' इत्यादि ज्ञानमें संसर्गज्ञानका सम्भव ही नहीं है। संसर्गज्ञानका प्रयोजक ऐक्यज्ञान उक्त जानमें है ही नहीं। संसर्गज्ञानका ऐक्य आलम्बन है, यह 'सोऽयम्' इत्याकारक प्रत्यभिज्ञामें सिद्ध है। यदि मीमांसक गुणगुण्यादिसम्बन्ध ही संसर्गज्ञानका आलम्बन है, ऐक्य नहीं, ऐसा समाधान करे, तो 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस ज्ञानमें साहश्य- सम्बन्ध भी संसर्गज्ञानका विषय है, ऐसा भी मान सकते हैं, इससे 'इदं रजतम्' इस भ्रममें भी संसर्गज्ञानका निवारण नहीं हो सकता। [इससे लक्षणमें अन्याप्ति दोष रह जायगा। खण्डनकर्ताका आशय यह है कि गुण- गुण्यादि सम्बन्ध सब संसर्गज्ञानके प्रयोजक हैं, यह तो असम्भव होनेसे आप नहीं मान सकते, अतः प्रत्येकको ही उसका प्रयोजक मानना होगा; १४
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१०६ विवरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
दुर्वारः। अथ तत्र नेदं रजतमिति असंसर्गप्रत्ययेन वाधान्न संसर्गतत्प्रत्ययौ संभवतः; तर्हि त्वन्मते गुणगुण्यादावपि इतरेतराभावज्ञानाख्योऽसंसर्ग- प्रत्ययोऽस्त्येवेति संसर्गतत्प्रत्यययोरसंभवाद् भ्रमत्वापत्तिस्तदवस्था। तस्माद् नाऽसंसर्गाग्रहोऽप्यविवेक:। नन्वविवेकं दूषयताऽत्र विवेचकं किंचिन्निरूपणीयम्। न तावत् ग्रहणं स्मर्यमाणात् स्वार्थ विविनक्ति विशेषावभासकत्वस्य दोषैः प्रतिवद्धत्वात्। नाऽपि स्मरणं ग्रह्यमाणात् स्वार्थ विवेक्तुमलम्, स्मरणाभिमानस्य प्रमुपित- त्वादिति चेद् : मैवम्; उभयोरपि विवेचकत्वस्य सुसंपादत्वाद। तथा हि-
इस अवस्थामें हम सादृश्यसम्बन्धको भी संसृष्टमानका प्रयोजक मान सकते हैं, क्योंकि कोई राजनियम तो है नहीं कि केवल पांच ही सम्बन्ध संसर्गज्ञानके प्रयोजक हैं, छठा या सातवाँ नहीं है ]। यदि कहो कि 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस असंसर्गज्ञानसे वाघित हो जानेके कारण 'इदं रजतम्' इसमें संसर्ग और संसर्गज्ञान नहीं हो सकते, तव तो तुम्हारे (मीमांसकके) मतमें गुणगुण्यादिस्थलमें भी इतरेतरा 5भावज्ञानरूप (एकमें दूसरेका परस्पर अभावज्ञानरूप) असंसर्गज्ञान विद्यमान ही है, इससे- संसर्ग और उसके ज्ञानके असम्भव होनेसे गुणगुण्यादिभावविशिष्ट 'शुकः पटः इत्यादि ज्ञानमें भ्रमत्वकी आपत्ति तदवस्थ ही (वैसी ही बनी) है। इससे अव्याप्ति-अतिव्याप्तिदोषपूर्ण होनेसे असंसर्गा ऽग्रह-संसर्गके अभावके अग्रहरूप-अविवेकका (भ्रमका) निर्वचन नहीं हो सकता। शङ्का-अविवेकको अर्थात् ग्रहण और स्मरणके विवेकाग्रहको माननेमें दूषण देनेवाले वेदान्तीको 'ग्रहणस्मरणका अविवेक 'भ्रम नहीं है, किन्तु ग्रहण- स्मरणसे अ्रममें विवेक (मेद) है' इसको सिद्ध करनेके लिए किसी विवेचकका निरूपण करना चाहिए। ग्रहण तो अपने विषयको स्मरणके विषयसे विभक्त नहीं कर सकता, क्योंकि विशेषको सूचित करनेवाले शुक्तित्वादि दोषोंसे प्रतिबद्ध है। एवं स्मरण भी अपने विषयको अनुभूयमानसे विभक्तक करनेमें समर्थ नहीं है, क्योंकि उसका स्मरणाभिमान दोषोंसे ही प्रमुषित हो गया है; [अतः किसी विवेचकके न होनेसे ग्रहण और स्मरणके अविवेकको ही भ्रम मानना चाहिए; उससे अतिरिकतको भ्रम नहीं मानना चाहिए, यह भाव है।]
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अभ्यासविचार ] भांपांनुवादसहित १०७
किमिदमाकाररजताकारयोस्तत्तजातिव्यक्तिविशिष्टयोरेव त्वया भेदोऽभ्युपेयते किं वा केवलयोरपि ? नाऽद्यः, ग्रकृतयोरिदमाकाररजताकारयोर्जात्याद्य- विशिष्टयोरमैदाभावेनैक्ये संति तद्ोचरसंसर्गज्ञानग्रसङ्गाद। द्वितीयेऽपि किं ग्रथमज्ञानेन वस्तु गृहीत्वा द्वितीयज्ञानेन धर्मिप्रतियोगिभावमवगत्य पश्चात् तृतीयज्ञानेन भेदो गरह्यते ? उत वस्तुना सहैव भेदग्रहणम्१ आद्ये सर्व-
समाधान-नहीं, उक्त शक्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ग्रहण और स्मरण दोनों ही विचेचक हो सकते हैं; इसे कहते हैं- क्या ततज्जातिव्यक्तिविशिष्ट इदमाकार और रजताकारके मेदका आप स्वीकार करते हैं ? या केवल इदमाकार और रजतके मेदका ही? यदि प्रथम पक्ष माना जाय, तो 'इदं रजतम्' इस प्रकृत अ्रममें भासित होनेवाले इदमाकार और रजताकार दोनोंके तत्तज्जातिव्यक्तिविशिष्ट न होनेसे उनका भेद है नहीं, अतः ऐक्य होनेसे ऐक्यालम्बनक संसर्ग- ज्ञानका ग्रसङ्ग हो जायगा। [अर्थात् परस्पर विरोधी दो पदार्थोंमें एकका निषेध करनेसे दूसरेका विधान स्वतः सिद्ध हो जाता है, इस प्रसिद्ध नियमसे प्रकृतमें भेदका निषेध करंनेसे ऐक्य होगा, और ऐक्यसे संसर्गज्ञानके प्रसङ्गसे भ्रमलक्षणकी आपके मतमें अव्याप्ति होगी, यह भाव है]। यदि द्वितीय पक्ष अमीष्ट है, तो भेदग्रहकी प्रक्रिया वतलाइए। क्या 'इदं रजतम्' इस ग्रथम ज्ञानसे वस्तुओंका (इदम् और रजत का) ज्ञान हुआ, अनन्तर दूसरे ज्ञानसे गृहीत वस्तुओंमें धर्मिप्रतियोगिभावका ज्ञान (एक वस्तुमें धर्मिज्ञान दूसरी वस्तुमें प्रतियोगिवुद्धि अर्थात् अमुक वस्तुका भेद अमुक वस्तुमें हैं, इस प्रकारका ज्ञान) करके तदनन्तर तृतीय ज्ञानसे भेदका ग्रह होता है? अथवा वस्तुग्रहके साथ-साथ प्रथम ज्ञानसे ही भेदका भी ज्ञान हो जाता है? अर्थात् मेदविशिष्ट ही वस्तुका भान होता है ? ये दोनों ही प्रक्रियाएँ सङ्गत नहीं हैं, क्योंकि यदि प्रथम पक्ष मानो, तो सम्पूर्ण वस्तुओंके ज्ञानको, भेदके ज्ञानसे पूर्व अविविक्तविषयक होनेसे, भ्रमज्ञान कहना पड़ेगा, परन्तु यह किसीको भी इष नहीं है। यदि द्वितीय पक्ष मानो, तो 'इदं रजतम्' इस ज्ञानमें प्रथमतः इदमाकारके ज्ञात होते ही भेदका भी ग्रह हो जानेके कारण
- ग्रहणसे स्मरणका और उसके विपयका स्मरणके विपयसे विेक हो सकता है। इसका समर्थन करते हुए पूर्वोक्त दोपोंका निराकरण करते हैं-'तथाहि' इत्यादिसे।
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१०८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
पदार्थज्ञानानां भेदग्रहणात् प्राग अविविक्तविपयतया भ्रमत्वप्रसङ्ग: । द्वितीये च इदन्ताग्रहणादेव भेदस्यापि गृहीतत्वेन भेदापेक्षितो विशेषोऽप्यवभासित एवेति ग्रहणस्य विवेचकत्वमङ्गीकार्यम्। तथा स्मरणमपि विवेचकमेव। नहि स्मरणाभिमानो निरुपयितुं शक्य:, यत्प्रमोपात् स्मृतेरविवेचकत्वम्। तथा हि किं स्मृतिरेव स्मरणा- भिमान: स्मृतेरन्यो वा स्मृतिगतधर्मो वा पूर्वानुभवविशिष्टत्वेनाऽर्थग्रहणं वा स्वगत एव कश्चित्स्मृतिविशेपो वा पूर्वानुभवगोचराद्विज्ञिष्टज्ञेयनिमित्तो विशेषो वा फलभेदकजनकत्वं वा स्मरामीत्यनुभवो वा। नाऽ्द्यः, स्मृतेः भेदसे अपेक्षित विशेषाकारका भी अवभास हो ही गया, अतः ग्हणको विवेच- क मानना चाहिए अर्थात् जब ग्रहण विवेचक हो गया, तव अविवेक कैसे रह सकता है, यह भाव है। उसी प्रकार स्मरण भी विवेचक हो ही सकता है, जिसके प्रमोपसे स्मरण विवेचक नहीं वन सकता, ऐसे आपके अभिमत स्मरणाभिमानका निरूपण नहीं किया जा सकता, क्योंकि क्या स्मृति ही स्मरणाभिमान है ? या स्मृतिसे भिन्न ? अथवा स्मृतिमें रहनेवाला धर्म? अथवा पूर्वानुभवविशिष्टत्वरूपसे (पहिले इसका अनुभव हुआ है, इस प्रकारकी प्रतीतिसे) अनुविद्ध वस्तुका ज्ञान? अथवा स्वगत कोई स्मृतिविशेष: (अर्थात् स्पृतिज्ञानमें एक प्रकारकी विलक्षण स्मृति) या पूर्व अनुभवके विषयसे विशिष्ट ज्ञेयका निमित्तरूप विशेष? अथवा फलभेदका जनक? (पूर्व अनुभवके फलसे अतिरिक्त विशेष फलका जनक) अथवा 'स्मरामि' (स्मरण करता हूँ) इस प्रकारका अनुभव स्मरणाडभिमान है? [इस प्रकार आठ विकल्प दिखाकर खण्डन करते हैं ]- प्रथम पक्ष (स्मृति ही को स्मरणाभिमान मानना) तो उचित नहीं है, क्योंकि स्मृतिका प्रमोष होनेसे रजतज्ञानका अभाव ही प्रसक्त होगा अर्थात् रजतकी स्मृति ही तो आपके मतमें भ्रम है, उसका आप प्रमोष मानते हैं, तो अवशिष्ट कौन-सा ज्ञान रह गया, जिसको कि आप भ्रम कहेंगे, यह भाव है। दूसरा पक्ष भी नहीं मान सकते, क्योंकि अतिरिक्तका प्रमोष होनेसे स्मृतिको अविवेचकत्व होगा, इस प्रकार वैयधिकरण्यका प्रसङ्ग आ जाता है। [अर्थात् स्मृतिसे स्मरणाभिमान अतिरिक्त है और उसका ही आप प्रमोष मानते हैं। अतः
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १०९
प्रमोपे रजतज्ञानस्येवाऽभावप्रसङ्गात्। न द्वितीयः, अन्यस्य ग्रमोपे स्मृतेर- विवेचकत्वमिति वैयधिकरण्यापातात्। न तृतीयः, तादृशधर्मानुपलम्भात्। न चतुर्थ:, पूर्वदष्टः स एवाडयं देवदत्त इति प्रत्यभिज्ञाभ्रमे पूर्वानुभवसं- भेदग्रहे सत्येव विना तत्प्रमोपमविवेकदर्शनात्। अथ केवलस्मृतिमभिलक्ष्योक्तम् प्रत्यभिज्ञा तुन तथेति चेत्, तथापि नाडयं पक्ष एव संभवति। तथा हि- किं पूर्वानुभवः स्व्रात्मानमपि विपयीकरोति उतार्थमात्रम्! नाद्य:, वृत्ति- विरोधात्। द्वितीये त्वर्थ एव स्पृत्याऽवभास्यो न तु पूर्वज्ञानं तस्यानतु- भृतत्वात्। ननु ज्ञातो घट इत्यत्र ज्ञानविशिष्टार्थस्मृतिर्दश्यत इति चेत्, न;
स्मृति पूर्णरूपसे ही रही, उसका तो कोई अंश कम नहीं हुआ, तब स्मृति अपने विपयको अनुभवके विपयसे क्यों न विविक्त कर सकेगी, यह भाव है]। तीसरा पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि वैसा स्मृतिमें कोई धर्म दीखता ही नहीं है। चौथा पक्ष भी संगत नहीं है, 'पहले देखा गया ही यह देवदत हे' इस प्रत्यभिज्ञा-भ्रममें पूर्वानुभवके सम्मेदका अह होनेपर ही उस सम्मेदके प्रमोपके विना अविवेक देखा जाता है। यदि यह समाधान दिया जाय कि उस स्मरणाभिमानका प्रमोप (अ्रमात्मक) स्मृति स्थलमं ही मानते हैं; प्रतिज्ञा वैसी नहीं है; तो भी यह सम्भव नहीं हो सकता है, क्योंकि क्या पूर्व अनुभव अपनेको भी विषय करता है? या केवल विषयमात्रको विषय करता है ? पहला पक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि उसके माननेमें वृत्तिका विरोध हो जायगा। [अनुभव या स्मरण कोई भी ज्ञान हो, सभी अन्तःकरणके वृत्तिविशेष हैं, इनसे दूसरे पदार्थका अवभास होता है, अपना जवभास नहीं, अन्यथा कर्तृकर्मविरोध होगा, इस विरोघसे प्रकृतमें पूर्वज्ञान केवल अर्थमात्रको विषय करता है, अपनेको जो कि अर्थके स्मरणके कारण संस्कारका जनक है, विपय नहीं करता। अतः उसका स्मरणमें विषय होना असम्भव है, क्योंकि पूर्वानुभवमें विषय न होनेसे उसका संस्कार ही नहीं हुआ, तब बिना संस्कारके स्मृति कैसे हो सकती है, संस्कार अनुभूतका ही होता है, अतः यह पक्ष विरुद्ध हुआ, यह तात्पर्य है]। दूसरे पक्षमें तो केवल अर्थ ही स्मृतिका विषय होगा, पूर्वज्ञान विपय नहीं होगा? क्योंकि वह पूर्व अनुभवका विषय ही नहीं हुआ है। 'ज्ञातो घटः' 'यह
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११० विवरणत्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
स्मृत्यन्तरत्वाद। अनुव्यवसायेन ज्ञानागोचरानुमानेन वा जन्येयं स्मृतिर्व्यवसायजन्याया घटमात्रगोचरायाः स्मृतेरन्या। न चाऽनयाऽपि स्वजनको [ डनु ] व्यवसायाख्यः पूर्वानुभवो विषयीक्रियते किं तर्ह्यनु- व्यवसायेनानुभूतो व्यवसाय [विशिष्टो ] घट एव। अत एतत्सिद्धम्- विमता स्मृतिर्न स्वमूलज्ञानविशिष्टमर्थ गृह्नाति, स्मृतित्वात्, पदार्थस्मृतिवत्, इति। पदानि हि स्वसंवद्धेष्वर्थेषु स्मृतिं जनयन्ति।
घट अनुभवका विषय हुआ है' इस प्रकार ज्ञानविशिष्ट अर्थका स्मरण देखा गया है, इससे पूर्व ज्ञान भी स्मृतिका विषय होता है, ऐसा मीमांसकका प्रतिपक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि अनुभवमें ज्ञानविशिष्ट-घटविषयक 'ज्ञातो घटः' इस स्मरणसे यह भिन्न स्मरण है, क्योंकि अनुव्यवसायसे अथवा ज्ञानविषयक अनुमानसे उत्पन्न हुई स्मृति व्यवसाय (प्रथम ज्ञान) से उत्पन्न केवल घटको विषय करने वाली स्मृतिसे भिन्न ही होती है। यह स्मृति भी अपने जनक अनुव्यवसाय- नामक पूर्व अनुभवको विषय नहीं करती, किन्तु 'घटको मैं जानता हूँ' इस अनुव्यवसायसे जाने गये व्यवसायविशिष्ट घटको ही विषय करती है। [शङ्का और समाधानका तात्पर्य यह है कि भीमांसकके मतमें 'ज्ञातो घटः' इस प्रतीतिमें ज्ञानविशिष्ट घटके विषय होनेसे ज्ञान भी स्मरणका विषय कहलाता है। और वेदान्तीके मतमें स्मृति दो प्रकारकी होती है। एक प्रथम ज्ञानसे अनुभूत घट-पटादि विषयकी होती है। इस स्मृतिमें केवल घट-पटादि ही विषय होते हैं, पूर्वानुभवजनित संस्कार द्वारा ही स्मृति होती है। और संस्कार पूर्व अनुभवके विषयका ही हो सकता है, प्रकृतमें केवल घट- पटादि ही पूर्व अनुभवके विषय हैं। अतः अनुभव स्वयं पूर्व अनुभवका विषय न होनेसे संस्कारके विना स्मरणका विषय नहीं हो सकता। दूसरी-अनुव्यवसायसे अथवा घटपटादि विषयमें प्रकटतास्वरूप कार्यसे किये गये कारणभूत ज्ञानके अनुमानसे अनुमित अपनेमें विद्यमान ज्ञान द्वारा उत्पन्न-स्मृति है। इस स्मृतिमें अवशय पूर्वानुभवका संभेद होता है, क्योंकि इस स्मृतिके जनक अनुव्यवसाय तथा अनुमिति दोनोंमें पूर्वानुभव विषय है]। इससे यह (अनुमान) सिद्ध हुआ कि-विमत स्मृति अपने मूलज्ञानविशिष्ट अर्थका ग्रहण नहीं करती, स्मृति होनेसे, पदार्थस्मृतिके समान; क्योंकि पद अपनेसे सम्बद्ध अर्थोंमें ही
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १११
नन्वेतद् वौद्धो न सहते। तथा हि-पदानामर्थः संयोगादिसंन्धाना- मसंभवात् सम्बद्धार्थस्मारकत्वमित्येतदयुक्तम्। बोधजननशक्ति: सम्बन्ध इति चेत्, किमनुभवजननशक्ति:१ किं वा स्मृतिजननशक्ति: १ नाडद्यः, पदानां वाक्यरूपेण वाक्यार्थानुभवजनकत्वेऽपि स्वार्थेपु तदसंभवात्। व्युत्पत्तिकाले पदार्थानां मानान्तरगृहीतत्वेनाऽपूर्वार्थत्वाभावात्। तदुक्तम्-'पदमभ्यधिका- भावात् स्मारकान विशिष्यते' इति। द्वितीयेऽपि सा शक्तिर्न तावदज्ञाता स्मृतिसुत्पादयति; ज्ञातकारण- स्मृति उत्पन्न करते हैं.। [ इससे तात्पर्य यह निकला कि केवल घट-पटादिज्ञानसे उत्पन्न संस्कारोंके द्वारा हुई स्मृति शुद्ध विपयको ही ग्रहण करती है और अनुमान अथवा अनुव्यवसायजन्य संस्कार द्वारा उत्पन्न हुई पूर्व ज्ञानको भी विषय करने वाली स्मृतिसे भिन्न है।] शङ्का-'पदोंसे अपनेसे सम्बद्ध अर्थकी स्मृति होती है' इस मतको वौद्ध नहीं सहता है, क्योंकि पदोंका अर्थोंके साथ संयोग आदि सम्बन्धोंके असम्भव होनेसे 'पद सम्बद्ध अर्थका स्मरण कराते हैं, यह मत युक्त नहीं है। यदि पदोंकी अर्थवोधोत्पादिका शक्तिको सम्बन्ध माना जाय, तो यह भी नहीं वनता, क्योंकि इस वोधजननशक्तिको क्या अनुभवात्मकबोध-जनन शक्तिरूप मानते हो? या स्मरणात्मक वोधजननशक्तिरूप मानते हो? प्रथम पक्ष तो नहीं माना जा सकता, क्योंकि पदोंमें वाक्यरूपसे वाक्यार्थानुभव- जनकता होनेपर भी उनमें अपने अर्थविषयक अनुभवके प्रति जनकता नहीं है। व्युत्पत्तिकालमें पदार्थोंका दूसरे ग्रमाणोंके द्वारा ग्रहण होता है; अतः पदोंका वह अपूर्व अर्थ नहीं कहा जा सकता। [ मीमांसकका तात्पर्य यह है कि यद्यपि वाक्यरूपसे पद वाक्यार्थोंके अनुभावक हैं, तथापि प्रत्येक पदकी व्युत्पत्तिके ग्रहके समयमें तो वह अपने-अपने अर्थके ही अनुभावक हैं; इससे पदोंमें अर्थानुभवजनकत्व सिद्ध हो गया। बौद्ध कहता है कि व्युत्पत्तिग्रह तो वृद्ध व्यवहारादिसे ही होता है, और वह अर्थ, जिसको कि आप पदका अर्थ कह रहे हैं; व्यवहार दर्शनादिरूप प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके द्वारा ही गृहीत हुआ; पदने कोई अपूर्व अर्थका ग्रहण नहीं कराया, पदार्थ वही माना जा सकता है, जो केवल पदके द्वारा बोघित हो ]। ऐसा कहा भी गया है कि यह अधिक अर्थका बोधक न होनेसे (अर्थात् नूतन अर्थका नहीं? प्रत्युत पूर्वसिद्ध अर्थका ही बोधक)
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११२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
त्वाद्। नापि ज्ञाता; शक्ते कार्यैकसमधिगम्यत्वेन स्मृत्युत्पत्तिशक्ति ज्ञानयोः परस्पराश्रयत्वात्। अथोच्यते-मध्यमवृद्धप्रवृत्त्या प्रवृत्तिहेतु- ज्ञानमनुमाय शब्दानन्तर्यात्तजनकत्वं शब्दस्य निश्चित्यावापोद्धारा- भ्यां व्युत्पत्तिकाल एव शक्तिनिश्रयान्नान्योऽन्याश्रयतेति। तदापि किं शब्दमात्रे शक्तिनिश्रयः अर्थविशेपसंचद्धे वा नाद्य, अस्य होनेसे स्मारकसे भिन्न नहीं है अर्थात् स्मारक ही है। यदि स्मरणको जननशक्तिरूप सम्बन्ध मानो, तो वह भी सङ्गत नहीं है; क्योंकि इस पक्षमें अज्ञात होती हुई उक्त शक्ति स्मरणको उत्पन्न नहीं कर सकती, कारण कि ज्ञात ही शक्तिरूप कारणमें कार्यजननसामर्थ्य होती है। [ऐसा न मानने पर जिनको शक्तिग्रहण नहीं है; उनको भी पदश्रवणसे अर्थका बोध हो जायगा]। यदि ज्ञात शक्तिको स्मरणकी उत्पादिका मानो, तो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि शक्तिका कार्यके द्वारा ही परिज्ञान होनेसे स्मृतिकी उत्पत्ति और शक्ति इन दोनोंमें परस्पर अन्योन्याSSश्रय दोष हो जायगा। [आशय यह है कि जब स्मृतिका उदय हो, तब स्मृतिरूप कार्य 'कार्यमात्रं सकारणकस्' इस व्याप्तिके द्वारा अपनी कारणशक्तिका ग्रह करा सकेगा, और उक्त शक्तिका ज्ञान होनेपर ही स्मृतिकी उत्पत्ति हो सकती है, अतः अन्योऽन्याश्रय है। ] उक्त दोषके वारणके लिए यदि कहा जाय कि [उत्तम वृद्धको 'गामानय' इस वाक्यके श्रवणके अनन्तर] मध्यम वृद्धकी (जिससे वह वाक्य काम करानेके अभिप्रायसे कहा गया है) प्रवृत्तिको देखकर प्रवृत्तिके कारण ज्ञानका [मध्यम वृद्ध उक्त वाक्यका अर्थ समझ गया और इस वाक्यका ऐसा ही अर्थ है अन्यथा ज्ञानके विना प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती इत्यादि तर्क द्वारा अनुमान कर शब्दके आनन्तर्यसे (शब्दके श्रवणके अनन्तर तादृश अर्थज्ञानका उदय होनेसे) 'शब्द ही इस अर्थका जनक है' इस प्रकार शब्दकी अर्थजनकत्वरूप सामर्थ्यका निश्चय करके अवाप और उद्धारसे* * जव प्रथम "गामानय" वाक्य सुना और मध्यमवृद्धके व्यवहारको देखा तव व्युत्पित्सु वालकने उक्त वाक्यका यही अर्थ है ऐसा निश्चय किया। तदनन्तर 'गां वधान' 'अश्वमानय' ऐसे वाक्य सुने और मध्यम वृद्धकी प्रवृत्ति मिन्न भिन्न प्रकारकी देखी वालकने विचार किया गो पद और आश्रय भिन्न मिन्न वाक्योंमें होते हुए भी समान है और अर्थकी भी अनुवृत्ति दिख रही है। इससे गोपदका सास्नालाङगूलादिमान् अर्थ है और अनयका दूर देशसे समीप देशमें लाना अर्थ है-इस प्रकारके अन्वय और व्यतिरेकसे प्रत्येक पदके अर्थके वोधक आवापोद्वापको आवापोद्धार कहते हैं।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ११३
शब्दस्याऽयमर्थ इति नियमासिद्धिप्रसङ्गात्। द्वितीयेऽपि शक्तिसम्वन्धस्य व्यवस्थापकं संचन्धान्तरमेष्टव्यमित्यनवस्था स्यात्। शक्ति: स्वपरनिर्वा- हिका इति चेत, तथापि स्मृतिकाले किं शब्दमात्रदर्शनादर्थ: स्मर्यते कि वाऽ-
नाद:, अनियमापत्ते:। न द्वितीयः, शब्ददर्शनसमय एवार्डर्थस्याऽपि दष्टत्वेन शब्दजन्यस्मृतिवैयर्थ्यात्। न तृतीयः, तावता स्मृत्यसंभवात्। अन्यत्र
व्युत्पत्तिके समयमें ही शक्तिका निश्चय हो जायगा [स्ृतिरूप कार्यसे नहीं] अतः अन्योन्याश्रय दोष नहीं हो सकता। तव भी क्या शब्दमात्रमें शक्तिका निश्चय होता है? अथवा अर्थविशेपसे सम्बद्ध शब्दमें शक्तिका निश्चय होता है? यदि शव्दमात्रमें कहो, तो 'इस शब्दका यह अर्थ है' इस प्रकारके नियमकी सिद्धि नहीं वन सकेगी [क्योंकि आप तो अर्थविशेषसे असम्बद्ध शब्दमें ही शक्तिका निश्चय मानते हैं, तव नियम कैसे बनेगा ]। अर्थविशेपसे सम्बद्ध शव्दमें ही शक्तिनिश्चय होता है, ऐसे द्वितीय पक्षमें भी ताहश शक्ति- सम्बन्धके व्यवस्थापक दूसरे सम्बन्धकी खोज करनी होगी, फिर उस सम्बन्धके व्यवस्थापक तीसरेका अन्वेपण करना होगा इत्यादि रीतिसे अनवस्था हो जायगी। यदि शक्ति अपनी और दूसरे सम्बन्धकी स्वयं व्यवस्थापिका है अर्थात् सम्बन्धान्तरकी आवश्यकता नहीं है, ऐसा कहो, तो भी यह विकल्प उपस्थित होगा कि जिस समय स्मृति हो रही है, उस समय क्या शब्दमात्रके दर्शन (श्रवण) से अर्थका स्मरण होता है ? या अर्थको विपय करनेवाले शक्ति- शाली शब्दसे? अथवा शक्तिज्ञानसे उत्पन्न संस्कार और शव्ददर्शन दोनोंसे? इनमें पहला पक्ष नहीं वन सकता, क्योंकि अनियमकी आपत्ति होगी। [ यदि सामान्य शव्दश्रवणसे ही अर्थका स्मरण हो जाता है, तो प्रत्येक शव्दसे प्रत्येक अर्थका स्मरण हो जाना चाहिए। अमुक शब्दसे अमुक अर्थका ही स्मरण होता है, ऐसा नियम नहीं वनना चाहिए ] दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि शव्ददर्शनके समयमें ही अर्थका भी ज्ञान हो ही जायगा, ऐसी अवस्थामें अर्थज्ञानके लिए मानी गई शब्द द्वारा अर्थकी स्मृतिका वैयर्थ्य हो जायगा। तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि इतना माननेपर भी स्मृतिका होना सम्भव नहीं है, कारण कि अन्य स्थलों (शुक्ति-रजत आदि) १५
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११४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
स्मारकस्मार्ययोः सादृश्यचिरोधिकार्यकारणंभावादिसम्वन्धान्तरनियमात् श- ब्दार्थयोस्तदभावात्। तस्मात् पदानि स्मारकाणि, वाक्यं पुनः प्रमाणमित्ये- तद्वेदवादिनां प्रक्रियामात्रमिति । अत्रोच्यते-शब्ददर्शनात् शक्तिसंस्काराच्चार्ऽर्थस्मृतौ न कश्चिद्दोषः। यदुक्तमन्यत्रेत्यादिना तदसत्। किमन्यत्रेव शब्देऽपि सादृश्यादिकम- भ्युपेयमित्युच्यते किं वा शब्दवदन्यत्रापि शक्तिरेवाडस्तु मा भूत्सादृश्यादि- कमिति किं वा शब्दे सादृश्यादिकमूलसम्बन्धाभावात् सत्यामपि शक्तौ न स्मृतिजनकत्वमिति। नाद्यः शब्दे सादृश्यादर्शनाद्, अदष्टस्य च कल्पने गौरवात्। अन्यत्र तु दृष्टत्वेनाडकल्पनीयत्वात्। न द्वितीय:, अनुभूयमानस्याऽ-
में स्मारक और स्मार्यमें सादृश्यके विरोधी कार्य-कारणभाव आदि सम्बन्धान्तरोंके रहनेका नियम है, अर्थात् उपरोक्त सम्बन्धोंमें से जब कोई भी एक सम्बन्ध रहेगा, तभी स्मार्यस्मारकभाव होगा [ जैसे कि शुक्ति-रजतमें सादृश्य, रामार्जुनमें विरोध, और राम-दशरथमें जन्यजनकभावसे एक दूसरेका स्मरण होता है इत्यादि। ] इस प्रकार शब्द और अर्थमें उपरोक्त कोई अन्य सम्बन्ध नहीं है, अतः शब्द और शब्दार्थमें स्मार्यस्मारकभाव न बन सकनेसे पद स्मारक होते हैं और वाक्य प्रमाण है, यह वेदवादी मीमांसकोंकी प्रक्रिया अपनी परि- भाषामात्र ही है। इतना बौद्धकी ओरसे 'पद पदार्थका स्मारक है' इस मतमें पूर्वपक्ष हुआ। इस पूर्वपक्षका उत्तर दिया जाता है। शब्दके साक्षात्कार और शक्ति- संस्कार-इन दोनोंसे अर्थकी स्मृति होनेमें कोई बाघा नहीं है। 'अन्य स्थलोंमें सादृश्य आदि सम्बन्ध ही स्मारक हैं' इत्यादि पूर्वोक्त नियम भी अयुक्त है, क्या अन्य स्थलोंकी भाँति शब्दस्थलमें भी सादृश्य आदि सम्बन्धोंका स्वीकार करना चाहिए ? या शब्दस्थलकी भाँति अन्य स्थलोंमें भी शक्तिका ही स्वीकार करना चाहिए: सादश्यादि सम्बन्धोंका स्वीकार नहीं करना चाहिए ? अथवा शक्ति रहते हुए भी सादृश्य आदि मूल सम्बन्धोंके न रहनेसे शब्द स्मृतिका उत्पादक नहीं हो सकता? इसमें प्रथम पक्ष भी नहीं वन सकता, क्योंकि शब्दस्थलमें सादश्य नहीं पाया जाता है और नूतन 'अदृष्ट' की कल्पना करनेमें गौरव है। अन्य स्थलोंमें तो सादश्य आदि दृष्ट (अनुभूत) हैं, अतः नवीन कल्पना नहीं
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सव्यासविचार] ११५
पलापायोगात्। न तृतीयः, शक्तस्य कार्याजनकत्वे व्याघातापत्ते:। तस्मा- च्छक्तिमन्ति पदानि अर्थेपु स्मृति जनयन्त्येव। नहि तत्रार्थः सह पूर्वानु- भवाः स्मर्यन्ते। अन्यथा घटादिवदलुभवानामपि तत्तच्छव्दार्थत्वं प्रसज्येत। नाडपि पश्चमः, कारणविपयाद्युपाधिमन्तरेण ज्ञानानां स्वरूपेपु क्वापि विशेषानुपलम्भात। नाऽपि पष्ठससमौ, अनुभवगताभ्यां ज्ञेयफलाभ्यामति- रिक्तज्ेयफलयोः स्मृतावभावात्। नाडप्यष्टमः, स्मरामीत्यस्याऽनुभवस्याऽन्य- होती है, (अतः कुछ गौरव नहीं है)। द्वितीय विकल्प भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि जिस वस्तुका अनुभव हो रहा हो, उसका अपलाप नहीं किया जा सकता, अर्थात् अन्य स्थलोंमें अनुभवसिद्ध सादृश्य आदि सम्बन्धोंका गव्दद्ृष्टान्तसे निपेध नहीं कर सकते। तीसरा विकल्प भी युकत नहीं है, क्योंकि 'शक्तिके रहते यदि कार्य नहीं हो तो व्याघात दोप होता है। 'यदि शक्ति हो तो कार्य अवश्य होता है' ऐसा नियम है, शक्ति रहते कार्य नहीं होता, ऐसा कहना तो 'मुझमें बोलनेकी सामर्थ्य नहीं है' इस कथनके तुल्य विरुद्ध है। ('शब्दका अर्थके साथ अर्थवोधजननरूप शक्ति ही सम्बन्ध है, उसका ग्रह व्युत्पत्तिकालमें व्यवहार-दर्शनसे हो जानेपर अन्य समयमें भी शब्द साक्षात्कारसे निरुक्त शक्तिसंस्कारके उद्वुद्ध होते ही शव्दसम्बन्धी अर्थका स्मरण हो जाता है' यह उक्त समाधानका सरल तात्पर्यार्थ है)। इससे शक्ति- शाली पढ़ अर्थविपयक स्मृति उत्पन्न करते ही हैं, यह सिद्ध हुआ। पदार्थ- मात्रकी स्मृतिमें अर्थोंके साथ-साथ पूर्व अनुभव (व्यवसाय) भी विषय नहीं होते। यदि पूर्व अनुभव भी स्मृतिके विपय मान लिये जायँ, तो जैसे घट पदका अर्थ घट (कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ) है, वैसे ही ज्ञानको भी घटादि पदका अर्थ मानना होगा। [इससे 'स्मृति विवेचक नहीं हो सकती है' इसमें आपने जो (पूर्वानुभवविशिष्ट अर्थका ग्रहण स्मरणाभिमानरूप) चतुर्थ विकल्प किया है, वह उपपन्न नहीं हो सका] पांचवाँ विकल्प (अपनेमें कोई एक विशेष) भी नहीं हो सकता, क्योंकि ज्ञानोंके स्वतः निराकार होनेसे उनमें कारण या विपय आदि उपाधिके सम्पर्कके बिना स्वयं कोई विशेष उपलब्ध नहीं हो सकता। छठा और सातवां पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभवके ज्ञेय (विपय) तथा फल (प्रकटता आदि) से अतिरिक्त स्मरणका कोई ज्ञेय या फल नहीं है। आठवाँ पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि 'स्मरामि' (स्मरण करता
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११६ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
त्र विवेचकत्वे सिद्धे सति अत्र कथचित् पमोपादविवेचक इति वकुं शक्ये- तापि। तदेव तावदसिद्धम्। ग्रहणवाचकशब्दपरित्यागेन स्मरणवाचकश्दा- नुविद्धो ह्ययमनुभवो जायते। स कथ प्रथमतो ग्रहणस्मरणयोरसति विवेके सम्भवेत् १ तथा च विवेके सत्यनुभवः अनुभवे च सति विवेक इति स्याद- न्योन्याश्रयता। तदित्थं अमोपणीयस्य स्मरणाभिमानस्य दुर्भणत्वात् स्मरणस्य विवेचकत्वं प्रामोत्येव।
हूँ) यह स्मरणाभिमानरूप ज्ञान यदि भमसे अन्य स्थलमें विवेचक (भेदक) सिद्ध हो, तो यहां (अ्मस्थलमें) किसी प्रकार (दोप विशेषादि ) से उसका प्रयोग होनेसे वह अविवेचक है, ऐसा कहना किसी प्रकार वन सकता है। परन्तु ऐसा तो है नहीं, अर्थात् स्मरण करता हूँ, यह ज्ञान कहींपर भी विवेचक नहीं है। 'स्मरामि' (स्मरण करता हूँ) यह अनुभव तो ग्रहण (अनुभव) वाचक शब्दके परित्यागसे और स्मरणवाचक शब्दके (स्मृधातुके) योगसे होता है। यदि ग्रहण और स्मरणमें उक्त अनुभव होनेके पूर्व ही मेदका (विवेकका) ग्रहण नहीं हुआ हो तो वही-'स्मरामि' (स्मरण करता हूँ) ऐसा अनुभव ही-कैसे हो सकेगा, इसके विपरीत यदि-'स्मरामि' अनुभव होनेपर ही विवेक मानो, तो विवेक होनेपर अनुभव और अनुभव होनेपर विवेक इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा। (जैसे सास्नालाङगूलादिविशिष्ट आकृतिमें एकशफादि आकृतिसे स्वतः- सिद्धमेदमूलक 'गौ' इत्यादि व्यवहार होता है एवं स्मरण और अनुभवमें स्वंतःसिद्धमेदमूलक ही 'स्मरामि' अनुभव है, न कि यह अनुभव स्वयं भेदक है। ऐसा प्रतिपक्षी वेदान्तीका सरल तात्पर्यार्थ हुआ। इसलिए इस पूर्वोक्त रीतिसे अपलापयोग्य उस स्मरणाभिमानका निरूपण नहीं वन सकता है, अतः स्मरणमें विवेचकत्व सुतरां प्राप्त हो जाता है। मीमांसक पुनः पूर्वपक्ष करता है-अनुभव और स्मरण यदि दोनोंमें घट, पट आदि अर्थमात्र विषय होते हैं, तो इसमें परस्पर भेद कैसे होगा? इसलिए भेदकी प्रतीति उपपन्न करनेके लिए आपको (वेदान्तीको) भी स्मरण- में पूर्वानुभवविशिष्ट अर्थविषय होता है, ऐसा अवश्य मानना ही होगा, यही हमारा स्मरणाभिमान होगा। (तब उसके दोषवशात् प्रमुपित होनेसे स्मरण विवेचक नहीं हो सकता)।
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अंध्यासविचार] भापानुवादसाहेत
ननु ग्रहणस्मरणयोरर्थमात्रविययत्वे भेदाभावग्रसङ्गेनाSवश्यं त्वयाऽपि स्मृते: पूर्वानुभवविशिष्टार्थविपयत्वं स्वीकार्य तदेव स्मरणाभिमानोऽस्त्विति चेद्, न; कारणविशेपादेव भेदसिद्धेः। अन्यथा त्वन्मतेऽपि पूर्वानुभव- गोचरानुमानज्ञानात् स्मृते: को भेद: स्याद् १ विपयस्य समत्वात्। ननु स इत्याकारेण स्मृतिर्ज्ञानानुमानाद्भिद्यत इति चेत्, कोडयं स इत्याकार; किं परोक्षदेशकालादिविशिष्टता उत पूर्वानुभवसंभिन्नता किं वा संस्कारजन्य- त्वम् : नाड्य्य:, अनुमानादिष्वपि स्मृतित्वप्रसङ्गात्। न द्वितीय:, ज्ञाना- नुमानेऽपि प्रसङ्गात्। तृतीये तु कारणविशेष एव भेदहेतुः स्यात्। अस्तु तर्हिं प्रकृतेऽपि संस्कारजन्यैव रजतस्मृतिरिति चेद्, न; रजतस्य
उत्तर देते हैं-नहीं (उपर्युक्त भेद नहीं है) कारणविशेपसे ही भेदकी सिद्धि होती है। (स्मृतिका कारण संस्कार है और अनुभवका इन्द्रिय- संप्योग आदि कारण है, अतएव उनका भेद है, यह भाव है)। यदि कारणविशेष द्वारा भेद न मानो, तो पूर्वानुभवको विपय करनेवाले अनुमान और स्मृतिमें तुम्हारे मतमें भी क्या भेद होगा? क्योंकि दोनों स्थलोंमें पूर्वानुभव- विशिष्ट अर्थ समान है। स्मृतिमें 'सः' (वह) ऐसा आकार होता है, वही आकार व्यवसायविषयक ज्ञानानुमानसे स्मृतिका भेद करता है, ऐसा यदि आप कहें, तो वतलाइए 'सः' यह आकार परोक्ष देशकालादिके सम्बन्धका सूचक है? या पूर्व अनुभवके सम्पर्कका वोधक है अथवा संस्कारसे उत्पन्न हुआ है, ऐसा अवगम कराता है? पहला पक्ष नहीं कह सकते। अनुमान आदि ज्ञानोंमें भी स्मृतिलक्षणकी अतिव्यापि हो जायगी (इन ज्ञानोंमें भी परोक्ष देश, काल आदिका सम्बन्ध रहता है)। द्वितीय पक्ष भी नहीं बन सकता, क्योंकि ज्ञाना- नुमानमें भी प्रसङ्ग हो जायगा (उसमें भी व्यवसायका सम्बन्ध रहता है)। तीसरा पक्ष माननेमें तो कारणविशेष ही भेदका कारण निश्चित होगा। यदि स्मृति और अनुभवमें कारणविशेष संस्कार ही भेदक है, तो भ्रम- में भी संस्कार ही स्मृति उत्पन्न करेगा, इस आशयसे मीमांसक शक्का करता है- 'प्रकृतमें (भ्रमस्थलमें) भी संस्कार द्वारा उत्पन्न हुई रजतकी स्पृति ही है।' समाधान-ऐसा ठीक नहीं है, (अ्रमस्थलमें भी रजत सामने स्थित
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११८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
पुरोवस्थितत्वेन प्रतिभासादित्युक्तोत्तरत्वात्। न च पुरोवस्थितत्वमविवेक- कृतमिति वत्तुं शक्यम्, अविवेकस्य भ्रमं प्रति अप्रयोजकत्वात्। तथा हि-किं गृह्यमाणयोरविवेक: किं वा गृह्यमाणस्मर्यमाणयोरुत स्मर्यमाणयोः? नाद:, स्वमद्शायामात्मव्यतिरिक्तस्य कस्याप्यग्रहणेन द्वयोर्गह्यमाण- योरभावे तदविवेकस्य अ्रमप्रयोजकस्याप्यभावेन अ्रमाभावग्रसङ्गात्। न द्वितीय:, स्वम्न एव गृह्यमाणेनात्मना स्मर्यमाणस्य नीलादेरविवेके सत्यहं
है, ऐसा प्रतिभासित होता है, यह उत्तर पहले ही दिया जा चुका है (स्मरण- विषयकी सामने अवस्थिति नहीं हो सकती)। रजत (भ्रमविषयकी सामने अवस्थिति अविवेकसे मालूम होती है, वस्तुतः सामने नहीं है) ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि अ्रमके प्रति अविवेक प्रयोजक नहीं है। (ऐसा कोई नियम नहीं है कि अविवेकसे ही भ्रम हो), अविवेककी भ्रमप्रयोजकताका निरास करते हैं-देखिए, क्या अनुभवमें आनेवाले ही दो पदार्थोंका अविवेक भ्रमप्रयोजक है? अथवा अनुभवविषय और स्मरणविषयका अविवेक भ्रमप्रयोजक है? या स्मरणके विषयभृत दो पदार्थोंका अविवेक भ्रम प्रयोजक है? इनमें पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि स्वम अवस्थामें आत्मासे अतिरिक्त किसी भी पदार्थका ग्रहण नहीं होता है, अतः उसमें अनुभवके विषयभूत दो पदार्थोंका अभाव होनेसे उनका अविवेकरूप भ्रमका प्रयोजक भी नहीं है, इससे स्वान् पदार्थ भ्रमविषय नहीं कहे जा सकेंगे। द्वितीय विकल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वन्नमें ही अनुभवके विषयीभूत आत्माके साथ स्मरणविषय नीलादिका अविवेक होनेपर 'अहं नीलः' (मैं नील हूँ) इस प्रकारका प्रतिभास प्रसक्त होगा। स्वप्नदशामें अहं* प्रतिभास जागरके तुल्य ही है। वही आत्मा है, वह तो स्वन्नमें सत्य ही है, इतर पदार्थ काल्पनिक होनेसे अहमात्मक आत्मामें ही अध्यस्त हैं, अतः आत्मासे भिन्न कोई भी पदार्थ अनुभवका विषय नहीं है। जो भासित होता है, वह मीमांसकमतमें स्मरण-विषय है, इसमें गृह्यमाण दो पदार्थोंके न होनेसे पूर्वपक्षका खण्डन तथा अनुभूयमान आत्मा और स्मर्यमाण
*यद्यपि यह भी वेदान्तीके मतमें भ्रम ही है, तथापि अन्य वादीसे सम्प्रतिपत्न जागर- तुल्यताको लेकर अहंप्रतिभास ही आत्मप्रतिभास है और वह जागरतुल्य सत्य है, ऐसा मानकर प्रश्न है।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ११९
नीलमिति प्रतिभासप्रसङ्गाद्। तृतीये तु परोक्षमेव सर्व भ्रान्तावभासेत, सर्वस्याऽपि स्मर्यमाणत्वात्। एवं च सति प्रकृतस्य पुरोवस्थितरजतज्ञानस्य स्मृतित्वानुमाने परोक्षावभासित्वोपाधिर्द्रष्टव्यः । यथार्थानुमानस्य चाडयं प्रतिप्रयोगः । विवादाध्यासिताः प्रत्यया न यथार्थाः, वाध्यमानत्वाद्, भ्रान्तिव्यवहारवत् इति। तस्माद् ज्ञानद्वैराश्य- दुराग्रहं परित्यज्य तृतीयं भ्रान्तिज्ञानमङ्गीकर्तव्यम्। ननु तर्हि मा भूदख्याति :; अस्त्वन्यथाख्याति :; देशकालान्तरगतं (मीमांसक रीतिसे) नीलादिका अविवेक होनेसे दूसरे पक्षका खण्डन हुआ।) तीसरा पक्ष मान लेनेसे तो भममें सब पदार्थ परोक्ष ही भासित होंगे, क्योंकि सभी तो स्मरणके विपय हैं। [ यदि सभी स्मर्यमाणोंका अविवेक ही भ्रम- प्रयोजक है, तो स्मर्यमाण सभी परोक्ष होते हैं, इससे उन सबका भेदग्ह नहीं हुआ, अतः सब भ्रममें भासित होनेवाले पदार्थ परोक्ष ही होंगे। तब 'इदं रजतम्' (यह रजत है) ऐसा प्रत्यक्षावभासका सूचक इदमादि शब्दोंसे अभि- लाप नहीं वनेगा, यह तात्पर्य है]। इस प्रकारके निर्णयसे सिद्ध हुआ कि मीमांसकोंका पूर्वोक्त रजतज्ञान भी अध्यास नहीं है, किन्तु स्मृति है इत्यादि पृष्ठ संख्या ९९ में कहे गये अनुमानमें परोक्षत्वावभासित्व उपाधि लगानी चाहिए। (इससे उक्त अनुमान दूषित हुआ) एवं सभी ज्ञान यथार्थ ज्ञान हैं इत्यादि पृ० संख्या ९८ में प्रतिपादित अनुमानका प्रतिपक्षी अनुमानप्रयोग इस प्रकार करना चाहिए-विवादयुक्त (भ्रमादि) ज्ञान यथार्थ नहीं हैं, वाघके विषय होनेसे, भ्रान्तिसे उत्पन्नव्यवहारके समान। अतः मीमांसकको ज्ञानके केवल ग्हण और स्मरण दो ही राशियाँ हैं, ऐसा दुराग्रह छोड़कर तीसरा भ्रमज्ञान मानना ही चाहिए। इससे मीमांसकसंमत भ्रमविपयक अख्यातिवादका खण्डन हुआ। अब नैयायिक सम्मत अन्यथास्यातिवादका निराकरण करनेके लिए शक्का करते हैं-(स्मरणाभिमानके प्रमोपके उपपन्न न हो सकनेसे) भ्रम भले ही अख्याति न हो, परन्तु अन्यथाख्याति तो हो सकता है। काच आदि दोषोंसे दूषित *यद्यपि भ्रममें विचाद ही हैं कि वह यथार्थ है या अयथार्थ। परन्तु तज्जनित 'इदं रजतम्' इत्यादि शब्दामिलापरूप व्यवहार और रजतार्थीके पवृत्तिरूप व्यवहारका अययार्थत्वरूप वाधि- तत्व सबको ही सम्प्रतिपन्न है, अतः व्यवहारके समान, यह दष्ान्त दिया गया है, यह भाव है।
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१२० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
हि रजतं शुक्तिसंप्रयुक्तेन दोषोपहितेन्द्रियेण शुत्त्यात्मना गृह्यते। न चव- मननुभूतस्याऽपि ग्रहणप्रसङ्ग:, सादृश्यादेर्नियामकत्वादिति; तदेतद्सत्, किं ज्ञानेऽन्यथात्वं किं वा फले उत वस्तुनि ! नाऽडद्य:, रजताकारज्ञानं शुक्तिमालम्वत इति हि ज्ञानेऽन्यथात्वं वाच्यम्। तत्र शुक्तेरालम्वनत्वं नाम किं ज्ञानं प्रति स्वाकारसमर्पकत्वम् १ उत ज्ञानप्रयुक्तव्यवहारविषयत्वम् ? नाऽडद्य:, रजताकारग्रस्तं ज्ञानं प्रति शुक््याकारसमर्पणासंभवात्। न द्वितीयः,
इन्द्रियका शुक्तिसे सम्पर्क होनेपर दूसरे देश (आपण आदि) तथा दूसरे कालमें विद्यमान रजत एतद्देशकालगत) शुक्तिरूपसे (शुक्तिके साथ अभेदेन) गृहीत होता है। यदि अन्य देशकालगतका भी दोषसे अन्यत्र अन्यात्मना भान हो सकता है, तो जिस पदार्थका कभी भी अनुभव नहीं हुआ है, उसका भी ग्रहण हो जाना चाहिए, इस प्रकारका अतिप्रसङ्ग नहीं दे सकते, क्योंकि अन्यथाभान होनेमें सादश्य आदिका ज्ञान नियामक है। (अननु- भूतमें सादश्यज्ञान नहीं होता है। आदि पदसे काचादि दोषका समवधान लेना चाहिए। इस शङ्काका खण्डन करते हैं-यह (अन्यथाख्याति) कहना उचित नहीं है। आप जिस पदको अन्यथाख्याति कहते हैं, उस पदसे तीन प्रकारके अन्यथात्वका भान हो सकता है-एक ज्ञानका अन्यथात्व, दूसरा ज्ञानके फल प्रकटता अथवा अनुव्यवसाय में अन्यथात्व, तीसरा ज्ञान विषयका अन्यथात्व। आप किसमें अन्यथात्व मानते हैं ? इस आशयसे विकल्प करते हैं-क्या ज्ञानमें अन्यथात्व मानते हो? अथवा फलमें ? या वस्तुमें (ज्ञानविषयमें) ? पहला पक्ष नहीं कह सकते, क्योंकि रजताकार ज्ञान हो और उसका आलम्बन शुक्ति हो, ऐसा ही अन्यथात्व ज्ञानमें कहना होगा, उसमें शुक्तिका आलम्बनत्व क्या पदार्थ है? इस जिज्ञासाके उत्तरमें ज्ञानको अपना आकार समर्पण करना : अथवा ज्ञानजनित व्यवहारका (शब्दाभिलाप अथवा हानोपादानरूप प्रवृत्तिका ) विषय होना आलम्बनत्व है? इन दोनोंमें से एकको ही आप कहेंगे। इनमें प्रथम पक्ष भी नहीं वनता, क्योंकि जो रजताकारसे घिरा हुआ है, उस ज्ञानको शुक्ति अपना आकार दे सकती है यह असम्भव है। द्वितीय विकल्प भी नहीं हो सकता, क्योंकि व्याघ्र आदिके (हिंस्क जन्तुके) दर्शन-साक्षत्कारात्मक ज्ञान-होनेसे किये गये प्रहार आदि व्यवहारके विषय खड्ग,
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अध्यासविचार ] भपानुवादसहित १२१
त्वप्रसङ्गात्। नाऽपि फलेऽन्यथात्वम्, फलस्य स्फुरणस्य भ्रान्तौ सम्यगज्ञाने वा स्वरूपतो वैपम्यादर्शनात्। वस्तुन्यपि कथमन्यथात्वम् ? किं शुक्तिकाया रजततादात्म्यं किं वा रजताकारेण परिणाम: १ आद्येऽपि किं शुक्तिरजत- योरत्यन्तं भेदः किं वा भेदाभेदौ १ नाऽडद्यः, अत्यन्तभिन्नयोर्वास्तवतादा- त्म्यासम्भवाद् ; अनिर्वचनीयत्वस्य त्वयाऽनभ्युपगमात्। शून्यतादात्म्य- अतीतौ गुणगुण्यादावपि तत्संभवेन भ्रान्तित्वं दुर्वारम्, समवायस्य प्रक्रियामान्रसिद्धस्य तादात्म्यानतिरेकात्। भेदाभेदपक्षे तु खण्डो गौरिति-
भाला, धनुप आदि प्रहारसाधन व्याघ्रादिज्ञानके विषय हो जायँगे। और फलमें भी अन्यथात्व नहीं वन सकता, क्योंकि स्फुरणरूप फलका (प्रकटतारूप माननेसे जो वस्तुनिष्ठ होता है अथवा अनुव्यवसायात्मक ज्ञानरूप माननेसे आत्मनिष्ठ होता है उसका) भ्रान्तिज्ञानमें अथवा सम्यकज्ञानमें स्वरूपतः कोई वैषम्य (भेद) नहीं देखा जाता। तीसरे पक्षमें कहा गया वस्तुमें अन्यथात्व क्या शक्तिका रजतके साथ तादात्म्य (अमेद) है? या शुक्तिका रजतके आकारसे परिणाम है ? यदि प्रथम पक्ष मानते हो, तो क्या शुक्ति और रजतका अत्यन्त भेद मानते हो ? या भेदाऽभेद? अन्त्यन्त भेद मानना भी ठीक नहीं है, क्योंकि अत्यन्त भिन्न पदार्थोंका वास्तविक तादात्म्य हो ही नहीं सकता, क्योंकि अनिर्वचनीय (मिथ्या) पदार्थका आप स्वीकार करते ही नहीं हैं। [यदि अनिर्वचनीय पदार्थका स्वीकार किये विना ही अवास्तविक तादात्म्य माना जाय, तो तादात्म्यके असत् हो जानेसे चन्ध्यापुत्र आदिकी माँति अपरोक्षरूपसे उसका प्रतिभास नहीं हो सकता। किंच, सामान्य, विशेष, गुण और गुणियोंका तादात्म्य भी असत् हो जानेसे भ्रम कहलाएगा, इस आशयसे कहते हैं-] शून्यतादात्म्यकी प्रतीति माननेपर गुणगुण्यादि स्थलमें भी (अत्यन्तमेदवादीके मतमं) अवास्तव तादात्म्यका सम्भव होनेसे आ्रान्तिका प्रसङ्ग नहीं हटाया जा सकता। अपनी प्रक्रियासे-परि- भाषामात्रसे-सिद्ध समवाय तो तादात्म्यसे अतिरिक्त नहीं है। [नीलो गौ:' इत्यादि गुणगुणिभावस्थलम सामानाधिकरण्यप्रतीतिका आलम्वन तादात्म्य नहीं है, किन्तु समवाय है, और वह समवाय सत् ही है, इससे शून्य संसर्ग नहीं है, इस पूर्वपक्षके उत्तरमें समवाय तादात्म्यसे अतिरिक्त कहा गया है, यह भाव है ]। दूसरे भेदाSमेदपक्षमें तो 'खण्डो गौः' आदि खण्डनामात्मक गुणविशिष्ट सामान्य- १६
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१२२ विवरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
वद्भ्रान्ति: स्यात्। परिणामपक्षेऽपि वाधो न स्यात्-विमतं रजतज्ञानम वाध्यम्, परिणामज्ञानत्वात्, क्षीरपरिणामदधिज्ञानवत्। ततः क्षीरवदेव शुक्ति: पुनर्न दृश्येत। ननु कमलस्य विकाशरूपपरिणामहेतोः सूर्यतेजसोऽ- पगमे पुनर्मुकुलीभाववद्रजतपरिणामहेतोदोपस्याऽपगमे पुनः शुक्तिभावोऽ- स्तु, मैवम् : विकसितमेव मुकुलमासीदितिवद्रजतमेव शुक्तिरासीदिति प्रतीत्यभावात्। कर्थचित्तद्द्धावेऽपि न परिणामपक्षो युक्त:, निर्दोपस्याऽपि रजतप्रतीतिप्रसङ्गाद्। नह्येकमेव क्षीरं दधिरूपेण कंचित्पुरुपं प्रति परिणतः मन्यं प्रति नेति दृष्टचरम्। तस्मान्नाऽन्यथाख्याति: सुनिरूपा।
विशेषभाव स्थलकी नाईं 'इदं रजतम्' वह प्रतीति भी भ्रम नहीं होगी। यदि परिणामपक्ष माना जाय, तो उसका बाध नहीं होगा, क्योंकि इसमें अनुमान होगा कि 'विमत (भ्रमात्मक) रजतज्ञान वाध्य नहीं है, परिणामज्ञान होनेसे, दूधके परिणामभूत दधिके ज्ञानकी तरह। तव तो (ऐसा माननेसे) दूधकी भाँति (जैसे दधिरूपमें परिणत होनेपर दूधका दर्शन नहीं होता, वैसेही) शुक्तिका पुनः दर्शन ही नहीं होगा ? [ परिणाम होनेपर भी कारणकी निवृत्ति होनेसे परिणामीके दर्शनका दष्टान्त द्वारा वादी समर्थन करता है ]- जैसे कमलके विकासरूप परिणामके कारणभूत सूर्यप्रकाशके अस्त होनेपर फिर कमलका मुकुलीभाव (बंधी हुई कलीका रूप) देखा जाता है, वैसे ही रजतरूप परिणामके कारण काच आदि दोपोंके निकल जानेपर पुनः शुक्तिका रूप देखा जा सकता है। उत्तर देते हैं-ऐसा नहीं है, क्योंकि जैसे खिला हुआ ही कमल बँधी हुई कलीके रूपमें हो गया है, वैसे ही रजत ही शुक्तिकाके रूपमें हो गया है, ऐसी प्रतीतिका अभाव है ( इससे दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकमें अत्यन्त वैषम्य हो गया)। कथंचित् (तुष्यतु दुर्जनन्यायसे) तादृश प्रतीतिका सद्भाव मान भी लिया जाय, तो भी परिणाम पक्ष युक्तिसंगत नहीं है; कारण कि जिस पुरुषके नेत्रोंमें काचादि दोष नहीं हैं, उसको भी रजतग्रम होना चाहिए। एक ही (वही) दूध किसी-किसी पुरुषके लिए तो दघिरूपसे परिणत हो जाय और किसी-किसी के प्रति न हो, ऐसा अब तक कहीं देखा या सुना नहीं गया है। इसलिए अन्यथास्यातिका भी निरूपण करना नहीं बन सकता।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १२३
अस्तु तर्द्यात्मख्याति :- विमतं रजतं वुद्धिरूपम्, संप्रयोगमन्तरेणाऽपरो- क्षत्वाद्, बुद्धिवत्। ननु चतुविधान् हेतून् अतीत्य चित्तचैत्या उत्पद्यन्त इति हि सौगतानां मतम्। तत्र न तावत् सहकारिप्रत्ययाख्यादालोकादे रजता- कारोदयः संभवति, तस्य स्पष्टतामात्रहेतुत्वात्। नाऽप्यधिपतिप्रत्ययारख्यांत् चक्षुरादे:, तस्य विपयनियममात्रहेतुत्वात्। नाऽपि समनन्तरप्रत्यया- ख्यात् पूर्वज्ञानात: विजातीयवटज्ञानानन्तरं विजातीयरजतभ्रमोदयदर्श- नात्। नाऽप्यालम्वनप्रत्ययाख्याद्राह्याद, विज्ञानवादिना तदनङ्गीकारात्।
अच्छा तो भ्रम आत्मर्याति ही मान लिया जाय, [ यद्यपि पूर्वोक्त दृपणोंसे शुक्तिकाका रजताकारमें परिणाम नहीं बन सकता, तथापि दोपदूपित इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुआ ही चाक्षुपादि ज्ञान रजतादिरूपसे परिणत हो सकता है, ऐसा अन्यथा- र्यातिको माननेवाले कुछ आचार्य मानते हैं, उनके मतका अथवा विज्ञानवादीके मतका खण्डन करनेके लिए आत्मख्याति मानकर यह पूर्वपक्ष किया गया है।] क्योंकि विमत (भ्रमविषय) रजत वुद्धिरूप है, इन्द्रियसन्निकर्पके बिना अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) होनेसे, वुद्धिके समान, इस प्रकार अनुमान हो सकता है। शक्का-चार प्रकारके (सहकारी प्रत्यय १, अधिपति प्रत्यय २, समनन्तर प्रत्यय ३ और आलम्बन प्रत्यय ४ इस प्रकारके चार) हेतुओंकी अपेक्षा करके चित्त और चैत्य (ज्ञान और ज्ञानके विषय सुख-दुःख) उत्पन्न होते हैं, ऐसा बौद्ध लोग मानते हैं। परन्तु इन चारोंमें सहकारी प्रत्ययके नामसे पुकारे जानेवाले आलोक आदिसे रजतके आकारका उदय नहीं हो सकता, क्योंकि आलोक आदि तो स्पष्टतामात्रके प्रति ही हेतु हैं। अधिपति प्रत्ययसे अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियोंसे भी रजताकार नहीं वन संकता, क्योंकि चक्षुरादि तो केवल विपयके नियममात्रके हेतु हैं। [ अर्थात उत्पन्न हुए रसादिज्ञानमें रसादिविपयमात्रका नियमन ही चक्षुरादि अधिपति प्रत्यय करते हैं, नवीन आकारके उत्पादक नहीं हैं ]। समनन्तर प्रत्यय नामक पूर्वज्ञानसे भी रजताकार नहीं होता, क्योंकि विजातीय घटज्ञानके अनन्तर विजातीय रनतभ्रमका उदय देखा जाता है। [ समनन्तर प्रत्यय केवल सजातीय उत्तरज्ञानमात्र कहलाता है, विजातीय ज्ञानकी उत्पत्ति करानेमें उसकी सामर्थ्य नहीं है]। आलम्बन प्रत्यथ नामक वाह्य पदार्थसे भी नहीं कह सकते, क्योंकि जब विज्ञानवादीके मतमें बाह्य पदार्थका स्वीकार ही नहीं
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१२४ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूंत्र १, वर्णक
ततः कथं विज्ञानस्य रजतकार इति चेत, संस्कारसामर्थ्यादिति ब्रूमः। ननु संस्कारस्याऽपि स्थायित्वे क्षणिकं सर्वमिति सिद्धान्तहानिः । क्षणिकत्वेऽ- पि तस्य ज्ञेयत्वेन विज्ञांनमात्रवादहानिरिति चेद्, न; अनादिसिद्धज्ञान सन्ततौ यदा कदाचित्पूर्व रजतज्ञानमुत्पन्नं तदेव संस्कार इत्यङ्गीकारात्। यद्यपि संस्कारो विजातीयानेकज्ञानव्यवहितस्तथापि कदाचित्सजातीयं रजतज्ञानान्तरसुत्पादयति। यथा व्रीहिवीजमनेकाङ्करादिकार्यव्यवधानेन पुनः सजातीयवीजान्तरमुत्पादयति तद्वत्। अथ न पूर्ववीजादुत्तरवीजो- त्पत्तिः, किन्तु पूर्वीजजन्याङ्कुरादिसन्तानादिति मन्यसे ! तर्ह्यत्रापि पूर्वरजत- ज्ञानजन्यज्ञानसन्तान एव संस्कारोस्तु। एवं पूर्वरजतज्ञानमपि पूर्वरज- तज्ञानादुत्पद्यते। ततोऽनादिवासनाप्नापितं रजतं वुद्धिरूपमेव सद् भ्रान्त्या बहिर्वदवभासते इति।
है, तब विज्ञानको रजतका आकार कैसे प्राप्त हो सकेगा? बौद्ध उक्त शङ्काका समा- धान करता है कि संस्कारकी सामथ्यसे ही ज्ञान रजताकार होगा, ऐसा हम कहते हैं। वादी शङ्का करता है-यदि संस्कार फिर स्थायी माना जाय, तो 'सब क्षणिक ही हैं' ऐसी प्रतिज्ञा न बन सकनेसे आपके सिद्धान्तकी हानि होगी। यदि संस्कार भी क्षणिक ही माना जाय, तो वह भी ज्ञेय हो जायगा, इससे विज्ञान- मात्रवादकी (विज्ञानसे इतर पदार्थ कुछ नहीं है इस मतकी) हानि होगी। बौद्ध समाधान देता है-नहीं, हानि नहीं होगी, अनादिसिद्ध ज्ञानसन्तानमें (बराबर चलनेवाली ज्ञानधारामें) किसी समय पूर्वमें उत्पन्न हुआ, रजतज्ञान ही संस्कार है, ऐसा अङ्गीकार किया गया है। यदपि संस्कार विजातीय घट, पट आदि विषयक अनेक ज्ञानोंसे व्यवहित हो गया है, तथापि कदाचित् (उत्पन्न पूर्वज्ञान) सजातीय दूसरे रजतज्ञानको उत्पन्न कर देता है। दृष्टान्त देते हैं- जैसे ब्रीहिका बीज अनेक अङ्कर आदि कार्योंके व्यवधान रहते भी सजातीय दूसरे व्रीहिबीजोंको उत्पन्न करता है, वैसे ही व्यवहित भी संस्कार सजातीय ज्ञान उत्पन्न कर सकता है। यदि पूर्व बीजसे उत्तर बीजकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु पूर्व वीजसे उत्पन्न हुए अङ्करादिकी परम्परासे बीजान्तरकी उत्पत्ति होती है, ऐसा मानते हो, तो प्रकृतमें भी पूर्व रजतज्ञानसे उत्पन्न ज्ञानपरम्पराको ही संस्कार समझ लीजिए। इस प्रकार प्रथम रजतज्ञान भी पूर्व रजतज्ञानसे
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहेत १२५
अचोच्यते-किं तद्रजमलौकिकत्वाजन्मरहितम् उत लौकिकरज- तवदेव जायते? आद्ये जायमानज्ञानस्वरूपं न स्यात्। द्वितीयेऽपि किं वाह्यार्थाजायते उत ज्ञानात्? नाऽडद्यः; त्वया वाद्यार्थस्याऽनङ्गीकारात्। ज्ञानमपि विशुद्धं तावन जनकम् ; विशुद्धज्ञानस्य भोक्षरूपत्वाद्। अथ दुष्टका- रणजन्यज्ञानाद्रजतोत्पाढः, तथाऽपि कि जनकग्रतीतिरेव रजतं गृह्भाति अन्या
भावग्रसङ्गाद्। अन्यग्रतीतिरपि न तावददुष्टकारणजन्या रजतग्राहिणी, अति- प्रसङ्गात्। दुष्टकारणजन्या अपि यदि रजतजन्या तदा रजतस्याऽर्थक्रिया- उत्पन्न होता है। इससे अनादि वासनाके द्वारा उपस्थापित रजत ज्ञानरूप ही होता हुआ भमसे बाहरके जैसा प्रतीत होता है। अब पूर्वोक्त पूर्वपक्षका उत्तर कहा जाता है-क्या वह रजत अलौकिक होनेसे जन्मरहित है? या लौकिक रजतकी नाई ही उत्पन्न होता है? यदि जन्मरहित है, तो उत्पन्न होनेवाले ज्ञानका वह स्वरूप नहीं हो सकता। यदि जन्म माना जाय, तो उसका जन्म वाह अर्थसे होता है ? या ज्ञानसे : पहला पक्ष भी नहीं वन सकता, क्योंकि वास अर्थका तुम्हारे मतमें अङ्गीकार ही नहीं किया गया है। ज्ञानसे मानना भी नहीं वनता, क्योंकि विशुद्ध ज्ञान तो उत्पन्न करने- बाला हो ही नहीं सकता, क्योंकि विशुद्ध ज्ञान मोक्षरूप है। यदि दूपित कारणोंसे उत्पन्न ज्ञानसे रजतकी उत्पत्ति मानो, तो हम विकल्प करेंगे कि क्या रजतकी जनक प्रतीति ही रजतको ग्रहण करती है ? या दूसरी प्रतीति पहला चिकल्प नहीं मान सकते, क्योंकि जन्य (उत्पन्न होनेवाला) और जनक (उत्पन्न करनेवाला) दोनों ही क्षणिक हैं, अतः उनके भिन्नकालिक होनेसे रजतकी प्रत्यक्ष प्रतीतिके अभावका प्रसन्न हो जायगा। [जिस कालमें जब तक जनककी प्रतीति है, तब तक जन्य उत्पन्न ही नहीं हुआ, इससे उस कालमें जन्यकी प्रतीति नहीं हो सकती और जन्यके उत्पन्न होनेपर क्षणिक जनककी प्रतीति जब विनष्ट हो गई, तब जनकपतीतिस्वरूप जन्यकी (रजतकी) प्रतीतिका प्रत्यक्ष कैसे होगा, यह भाव हुआ। ] दूसरी प्रतीति भी अदूपित (शुद्ध) कारणोंसे उत्पन्न होकर अ्रमविषय रजतको ग्रहण करानेवाली नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसा माननेसे अतिप्रसन् हो जायगा अर्थात् सभी यथार्थज्ञान अ्रमके उत्पादक हो जायंगे। दूपित कारणोंसे उत्पन्न प्रतीति भी यदि रजतसे उत्पन्न हुई है, तो रजतको
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१२६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
कारित्वेन सच्वे सति बाह्योऽर्थौडङ्गीकार्य: स्यात्। रजताजन्यत्वे तु न रजतं तद्विपयः स्यात् ; ज्ञानाकारार्पको हेतुर्विषय इत्यङ्गीकाराद। तस्मादा- त्मख्यातिपक्षे रजतमेव न प्रतीयेत। ननु तवाऽपि रजतज्ञानस्य स्मृतित्वे स्यादख्यातिर्ग्रहणत्वे चाऽन्यथा- ख्यातिः आत्मख्यातिर्वा स्यात्, नहि ज्ञानस्य स्मृतिग्रहणाभ्यामन्य: प्रकार: संभवतीति चेद्, मैवम् ; किं विलक्षणसामग्रयनिरूपणात्तदसंभवः १ किं वा विलक्षणज्ञानस्वरूपानिरूपणाद् उत विलक्षणविषयानिरूपणात् ! नाऽडद्य: संप्रयोगसंस्कारदोषाणां सामग्रीत्वात्। न च वाच्यं दोपः प्रतिबन्धकत्वेन पूर्वप्राप्तकार्यानुदयस्यैव हेतुर्नत्वपूर्वकार्योदयस्येति ; अनुदयस्य प्रागभाव-
अर्थक्रियाकारित्व (व्यवहारप्रयोजकत्व) होनेसे उसके सत् हो जानेपर बाह्य अर्थ मानना ही होगा, और वह प्रतीति यदि रजतसे जन्य नहीं है, तो उस प्रतीतिका विषय रजत नहीं हो सकता, क्योंकि ज्ञानमें आकारका समर्पक हेतु ही विषय होता है; ऐसा आपके मतमें अङ्गीकार किया गया है, इससे आत्मख्याति- पक्षमें रजतकी प्रतीति ही नहीं बन सकती। विज्ञानवादी शङ्का करता है-तुम्हारे मतमें भी यदि रजतकी स्मृति मानी जाय, तो अख्यातिवाद प्रसक्त होगा, और यदि रजतका ग्रहण (अनुभव) माना जाय, तो सुतरां अन्यथाख्याति या आत्मख्याति ही प्रसक्त होगी, क्योंकि स्मरण और ग्रहणसे अतिरिक्त ज्ञानका कोई तीसरा प्रकार ही नहीं होता है। वेदान्ती समाधान देता है-नहीं, (आप ज्ञानके तृतीय प्रकारका असम्भव कैसे कहते है ?) क्या विलक्षण सामग्रीका निरूपण न होनेसे तृतीय प्रकारका असम्भव है ? या विलक्षण ज्ञानके स्वरूपका निर्वचन नहीं किया जा सकता है, इससे उसका असम्भव है ? अथवा विलक्षण विषयका निरूपण न हो सकनेसे उसका असम्भव है: पहला विकल्प युक्त नहीं है, क्योंकि संप्रयोग, संस्कार, और दोषात्मक सामग्री उस स्थलमें विद्यमान ही है [ अर्थात् शुक्तिसे इन्द्रिय- संप्रयोग, पूर्वानुभूत रजतसंस्कार, विषयगत चाकचिक्यादि और इन्द्रियगत काचादि दोषोंके रहते हुए सामग्रीका अभाव नहीं कह सकते, यह भाव है ] और यह कहना भी उचित नहीं है कि दोष प्रतिबन्धक ही होते हैं, अतः दोष प्राप्त कार्यके उदयका अभाव ही करते हैं, किसी अपूर्व कार्यके उत्पन्न करनेमें
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अध्यासविचार] भापानुवादसहित १२७
रूपस्याSनादित्वेन दोपाजन्यत्वात्। चातपित्तादिदोपाणां चाडपूर्वकार्योत्पाद- कत्वदर्शनात्। न च दोपस्य संस्कारोद्ोधकत्वेनाऽन्यथासिद्धि:, तदुद्धोध- स्याऽवान्तरव्यापारत्वात्। नह्युद्यमननिपतने कुर्बन् कुठार: छिदिक्कियां पत्यहेतुर्भवति। ननु संग्रयोगस्वेदन्तामात्रज्ञानोपक्षीणत्वात् संस्कारस्य स्मृतिजनकत्वेऽपि त्वयाऽत्र स्मृतेरनङ्गीकृतत्वाद्दोपस्य च स्वातन्त्र्येण ज्ञानहेतुत्वादर्शनाद् रजता- चभास: कथमिति चेत्, उच्यते-प्रथमं दोपसहितेनेन्द्रियेणेदन्तामात्र- विपयाऽन्तःकरणवृत्तिर्जन्यते, तत इदन्तायां तद्राहकवृतौ च चैतन्यमभि-
हेतु नहीं होते हैं', क्योंकि उदयका अभाव प्रागभावरूप है, अतः वह नित्य है, जन्य नहीं है, इस अवस्थामें दोपसे जन्म नहीं हो सकता है। और बात, पित्त आदि दोपोंको अपूर्व कार्यकी (ज्वरादिकी) उत्पत्ति करते हुए देखा गया है। दोप संकारके उद्दोधनमात्र करा देनेसे ही अन्यथासिद्ध हैं (अतः अपूर्व कार्यके प्रति हेतु नहीं हो सकते) ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दोपोंमें संस्कारका उद्दोधन करना तो अवान्तर व्यापार है [ प्रधान व्यापार तो अपूर्व कार्य उत्पन्न करना ही है] ऊपर उठता और नीचे गिरता हुआ (उद्यमन और निपतन करता हुआ) कुठार छेदनक्रियाके प्रति अहेतु नहीं होता है। [अर्थात् वह छेदनके प्रति हेतु ही हैं, उसके उद्यमन-निपतनरूपी आवान्तर व्यापारोंसे छेदनके प्रति अन्यथासिद्धि नहीं हो सकती।] पुनः वौद्ध शक्का करता है-इन्द्रियसम्प्रयोग केवल इदन्ताका ज्ञान करा- कर सामर्थ्य हीन हो गया [इससे सम्प्रयोगमें भ्रमात्मक अपूर्व ज्ञान उत्पन्न करानेकी सामर्थ्य नहीं है ] अतः संस्कार यद्यपि स्मृतिका जनक है, तथापि आप वेदान्ती (ग्रम स्थलमें) स्मृतिको मानते ही नहीं। [ इससे 'म्रमरूप' अपूर्व कार्यके प्रति संस्कारको भी हेतुत्व नहीं हो सकता ।] और दोप स्वतन्त्र रूपसे ज्ञान उत्पन्न करते हुए नहीं देखे गये हैं ( अतः दोष भी अ्रमके हेतु नहीं हो सकते) तब आपके (वेदान्तीके) मतमें 'अ्रममें' रजतका प्रत्यक्ष कैसे होगा? उत्तर देते हैं-पहिले दोपयुक्त इन्द्रियसे 'इदम्' को ही विपय करनेवाली अन्तः- करणकी वृत्ति उत्पन्न होती है, तदन्तर इदन्तामें और इदन्ताके ग्राहक वृत्तिमें चैतन्य अभिव्यकत होता है, तादश चैतन्यमें विद्यमान अविद्या दोषसे
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१२८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
व्यज्यते, तच्चैतन्यनिष्ठा चाऽविद्या दोषवशात् संक्षुआ्नाति, तत्रेदमंशावच्छिन्न- चैतन्यस्थाऽविद्या संक्षुभिता सती सादृश्यादुद्धोधितरूप्यसंस्कार सहायवशाद् रूप्याकारेण विवर्त्तते। वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यस्थाऽविद्या तु रूप्यग्राहिवृत्ति- संस्कारसहकता वृत्तिरूपेण विवर्चते; तौ च रूप्यविवर्त्तवृत्तिविवत्तौ स्वस्वाधिष्ठानेन साक्षिचैतन्येनाऽवभास्येते इत्येवं रजतावभासः । यद्यप्यत्राऽ- न्तःकरणवृत्तिरविद्यावृत्तिश्चेति ज्ञानद्यम्, तथाऽपि तद्विपयः सत्यानृतयोरिदं- रजतयोरन्योन्यात्मतयैकत्वमापन्नस्ततो विपयावच्छिन्नफलस्याऽप्येकत्वेन ज्ञानक्यमप्युपचर्यते । नाऽपि द्वितीयतृतीयौ, मिथ्याज्ञानमिथ्याविषययोर्नि- रूपणात् । यद्यप्यत्र संप्रयोगसंस्कारौ निरपेक्षावेव प्रमितिस्मृत्योर्जनने समर्थौ, तथापि अमितिस्मृतिनैरन्तर्योत्पत्तिमात्रेण परवृत्यसंभवादुभाम्यां संग्रयोगसंस्का-
संक्षुब्ध होती है। उनमें इदम् अंशसे अवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या संस्कारवश क्षुब्ध होती हुई सादृश्यसे उद्बुद्ध हुए रजतसंस्कारकी सहायतासे रजतके आकारमें विवर्तरूप परिणामको प्राप्त हो जाती है। और वृत्तिसे अव- च्छिन्न चैतन्यगत अविद्या तो रजतको त्रहण करनेवाली वृत्ति सँस्कारसे सहकृत होकर रजतको विषय करनेवाली वृत्तिके रूपसे वदल जाती है, ये दोनों अर्थात् रजतविवर्त और वृत्तिविवर्त अपने-अपने अधिष्ठानभूत साक्षिचतन्य द्वारा प्रकाशित होते हैं, इस प्रक्रियाके अनुसार हमारे मतमें रजतका अवभास सिद्ध होता है। यद्यपि उक्त प्रक्रियामें अन्तःकरणवृत्ति और अविद्यावृत्ति ये 'अलग अलग दो ज्ञान है; तथापि उन दोनोंके विषय सत्य-इदम् अंश-और मिथ्या-रजत अंश-परस्परतादात्म्यापन्न होनेसे एक हो गये हैं, इससे विषयावच्छिन्न फल (प्रकटनादि ) के भी एक हो जानेसे 'इदं रजतम्' इत्या- कारक ज्ञानका भी एक ही होना गौणवृत्तिसे व्यवहार किया जाता है। मिथ्या ज्ञान और तादश विषय नहीं है, इस प्रकारके पूर्वोक्त द्वितीय और तृतीय विकल्प भी संगत नहीं हैं, क्योंकि मिथ्याज्ञान और मिथ्या विषयका निरूपण हो हीगया है। यद्यपि प्रकृतमें इन्द्रियसप्रयोग और संस्कार एक दूसरेकी अपेक्षा न रखते हुए ही प्रमाज्ञान और स्मरणको उत्पन्न करनेमें समर्थ हैं, तथापि यथार्थ ज्ञान 'और स्मृतिका अव्यवधान हो जानेसे ही (रजतार्थीकी) प्रवृत्ति
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १२९
राभ्यां जन्यमेकं मिथ्याज्ञानं कल्पनीयम्। यथा निरन्तरोत्पन्नेप्वपि वर्णज्ञानेपु यौगपद्याभावात् पदार्थज्ञानान्यथानुपपच्या पूर्वपूर्ववर्णसंस्कारसहितमन्त्यवर्ण- विज्ञानमेकमेव हेतुत्वेन, त्वया कल्प्यते, तद्वत्। ननु विमतं ज्ञानं नैकं भिन्नकारणजन्यत्वाद्ूपरसज्ञानवदिति चेद्, न; अनुमानप्रत्यभिज्ञयोरनैकान्त्यात् । तत्रोभयन्रापि स्मृतिगर्भमेकैकमेच हि प्रमाणज्ञानमभ्युपगतम्। कारणं चानुमानस्य व्यापतिसंस्कारलिङ्गदर्शने, प्रत्य- भिज्ञायास्तु सम्प्रयोगसंस्कारी। न चानुमानस्य व्यासिस्मृतिलिङ्गदर्शने कारणं न संस्कार इति वाच्यम्, ज्ञानद्वययौगपद्यासम्भवात्। यद्यपि स्मृतेः
न होनेसे सम्प्रयोग और सँस्कार इन दोनोंसे उत्पन्न हुए स्मरण और अनुभवसे विलक्षण एक मिश्याज्ञानकी कल्पना करनी ही चाहिए। जैसे अव्यवधानसे उत्पन्न हुए भी वर्णज्ञानोंमें एक साथ रहनेका अभाव है, इससे पदार्थज्ञानकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः इसकी अन्यथा अनुपपत्ति होनेसे क्रमशः जायमान वर्णज्ञानोंसे अतिरिक्त पूर्व-पूर्व अक्षरोंके सहित अन्त्य वर्णके विज्ञानात्मक एक ही हेतुकी कल्पना तुम करते हो, वैसे ही [हम प्रवृत्तिरूप हेतुसे अतिरिक्त ज्ञानकी कल्पना करते हैं ]। पुनः शङ्खा करते हैं-विमत (भ्रम) ज्ञान एक नहीं है, भिन्न-भिन्न कारणोंसे उत्पन्न होनेसे, रूपज्ञान और रसज्ञानके तुल्य। [ इस अनुमानसे अ्रममें एकज्ञानत्व नहीं वन सकता।जसे रूपज्ञान चक्षुसे और रसज्ञान रसनासे भिन्न- भिन्न कारणोंसे होता है वैसे ही मममें भी इदन्ताका ज्ञान सम्प्रयोगसे और रजतका ज्ञान संस्कारसे होता है, ऐसी दशामें एक ज्ञान कैसे? यही शड्काका तात्पर्य है ।) उत्तर देते हैं-यह अनुमान ठीक नहीं है, क्योंकि आपका 'प्रकृत हेतु भिन्नकारणजन्यत्व' अनुमान और प्रत्यभिज्ञामें व्यभिचरित है। कारण कि इन दोनों (अनुमान और प्रत्यभिज्ञा) में स्मृतिगर्भ एक-एक ज्ञान ही प्रमाण- प्रमितिकरण माना गया है। अनुमानमें व्याप्तिका संस्कार और लिङ्ग (धूमादि) का प्रत्यक्ष ये दो भिन्न-भिन्न कारण हैं और प्रत्यभिज्ञामें तो इन्द्रियसम्प्रयोग और संस्कार ये दो भिन्न-भिन्न कारण हैं। अनुमानमें व्याप्तिस्मरण और हेतुका प्रत्यक्ष ही कारण है, संस्कार कारण नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि दो ज्ञान एक कालमें नहीं रह सकते हैं। यद्यपि स्मृतिको प्रत्यभिज्ञाके कारण १७
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१३० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
अत्यंभिज्ञाकारणतायां नायं दोपस्तथापि स्मृतिहेतुत्वेनावशयं संस्कारोद्वोधो वक्तेव्यः। तथा च तेनैव तदुत्पत्तौ, स्मृतेः केवलव्यतिरेकाभावाद्गौरवाच्च न कारणत्वम्। ननु रूप्यधीने निरपेक्षानेककारणजन्या अभिज्ञात्वाद् घटज्ञान- वदिति चेद्, न; रूप्यधीरुक्तजन्या अभिज्ञाप्रमाणस्मृतिभ्यामन्यत्वात् माननेमें यह दोष नहीं है, [ 'सोडयं देवदत्त:' (यह वही देवदत्त है) इस प्रत्यभिज्ञाज्ञानमें तत्तारूपकी स्मृति और इदमंशका प्रत्यक्ष एक ही कालमें होता है, इससे प्रत्यभिज्ञाकी कारणभूत स्मृति प्रत्यक्षके साथ-साथ होती ही है। अतः ज्ञानद्वयका यौगपद्याऽसम्भव नहीं है, यह भाव है] तथापि स्मृतिके कारणस्वरूप संस्कारका उद्वोधन अवश्य ही मानना पड़ेगा। इसलिए उस संस्क्ारसे ही प्रत्यभिज्ञाकी उत्पत्ति हो सकती है, फिर केवल व्यतिरेकके *अभावसे तथा गौरव होनेसे स्मृतिको कारण न मानना ही उचित है। अनुमान द्वारा शङ्का करते हैं-रजतज्ञान निरपेक्ष अनेक (एक दूसरेसे सम्बन्ध न रखनेवाले सम्प्रयोग और संस्कार इन दो) कारणोंसे जन्य नहीं है, अभिज्ञा होनेसे, घटज्ञानकी तरह। (एक देश या एक कालमें ही रहनेवाली वस्तुके ज्ञानको प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। भ्रमात्मक रजतज्ञान भी अभिज्ञारूप है, इससे निरपेक्षकारणोंका समभित्याहार इसमें कारण नहीं माना जा सकता।) उक्त अनुमानमें सत्प्रतिपक्षदोषरूप उत्तर देते हैं-ऐसा नहीं है, क्योंकि हम इसका विरोधी अनुमान करेंगे-त्रमात्मक रजतज्ञान उक्त निरपेक्ष अनेक कारणोंसे उत्पन्न होता है, अभिज्ञाप्रमाण और स्मृतिसे भिन्न होनेसे, प्रत्यभिज्ञाके तुल्य, (प्रत्यभिज्ञामें भिन्न देश और कालका अवच्छेद रहता है, यह अवच्छेद भ्रममें भी समान है, और प्रत्यभिज्ञाको कोई भी अभिज्ञा नहीं कहता, अतः तत्तुल्य भ्रम भी अभिज्ञा नहीं कहा जा सकता) ऐसा भी अनुमान करना सुलभ है, और रजत- भ्रमबुद्धि प्रमा-यथार्थ ज्ञान है, संस्कारसहित हेतुसे उत्पन्न होनेसे, अनु- मानके समान [अनुमानमें व्याप्तिसंस्कार तथा हेतुदर्शन दो कारण होते हैं, एवम् अ्रममें भी वेदान्तमतमें पूर्वानुभूत रजतका संस्कार और इन्द्रियसम्प्रयोग ये दो * स्मृतिके न होनेपर भी उद्वुद्ध संस्कारसे प्रत्यमिज्ञा होती है, अतः स्मृतिके अभावमें पत्यमिज्ञाका अभावरूप व्यतिरेक नहीं है, किन्तु उसका अभाव है, अतः संस्कारको कारण अवश्य मानना चाहिए। ऐसी दशामें जव कि संस्कार ही प्रत्यमिज्ञारूप ज्ञान करा देगा, तव अन्तर्गड् स्मृतिको उसमें कारण माननेकी क्या आवश्यकता है?
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अध्यांसविचार ] भापांनुवादसाेत १३१
प्ंत्यभिज्ञावदित्यपि सुवचत्वात। न च वाच्यं रूप्यधीः ग्रमा संस्कारसहित- हेतुजन्यत्वादनुमानवदिति, दोपाजन्यानु भवत्वस्योपाधित्वाद्। ननु ज्ञानेऽनुपपच्यभावेऽपि रूप्यस्य सत्वेनानुभूयमानस्य मिथ्यात्वं विरुद्धमिति चेद्, मैवम्; शुक्तीदन्तांशवच्छक्तिसचाया एव रजतसंसर्गाङ्गी- कारात्। तर्हि तस्य संसर्गस्यैव सच्वेनानुभृतस्य मिथ्यात्वं विरुद्धमिति चेद्, एवं तरहिं त्रिविधं सच्मस्तु-ब्रह्मण: पारमार्थिक सच्वम्, आकाशा- कारण हैं इससे यह अनुमानके सदश प्रमा ही है। किश्च, जैसे प्रत्यभिज्ञामें स्मृति और अनुभव दो कारण हैं तथा चित्रज्ञानमें नील, पीत आदि अनेक अवभासं कारण हैं और जब उक्त दोनों ज्ञान प्रमा (यथार्थ) माने जाते हैं तब ऐसे संस्कार और इन्द्रियसम्प्रयोग ( प्रत्यक्ष सामग्री) से जायमान रजताव- भास यथार्थ क्यों न माना जाय ? यह आशय है], ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि इस अनुमानमें दोपसे उत्पन्न न होनेवाला अनुभवत्व उपाधि है। (अनुमानादि उपर्युक्त तीनों ज्ञानोंमें यथार्थज्ञानत्व भी है और दोपाजन्याऽनुभवत्व-दोपसे न होनेवाला अनुभवत्व मी है, अतः साध्यव्यापकत्व है। और रजतबुद्धिमें निरुक्त हेतु 'संस्कारसहित हेतुजन्यत्व' है, परन्तु उक्त उपाधि नहीं है, अतः साधनाऽ्त्यापकत्व भी है।) यदि शक्का की जाय कि (भ्रमात्मक) रजतज्ञानको एक ज्ञान माननेमें यदि कोई अनुपपत्ति न भी हो, तो भी रजत 'इदं रजतं सत्' (यह रजत सत् है) इस प्रकार सत् प्रतीत होता है, ऐसी दशामें उसे मिथ्या कहना उक्त अनुभवके विरुद्ध है। तो यह शक्का ठीक नहीं है, क्योंकि शुक्तिकी इदन्तांशकी भाँति शुक्तिकी सत्तामें ही रजतसम्चन्धका स्वीकार माना गया है। [जैसे 'इद रजतम्' (यह रजत है) इस प्रतीतिसे शक्तिमं विद्यमान इदन्ता-पुरोवर्तिता (सामने रहना) ही रजतमें भासित होती हे, वैसे ही 'सत्' इस अनुभवसे मी शुक्तिकी ही सत्ताका अवभास होता है, यह आशय है] तब तो जो सद्रृपसे अनुभवमें आ रहा है उस संसर्ग का भी मिथ्यात्व अनुभवके विरुद्ध ही है यदि ऐसा कहा जाय, तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त दोपके वारणके लिए तीन प्रकारकी सत्ता का स्वीकार करना आवश्यक है। प्रथम ्रह्ममें * पारमार्थिक सत्ता, द्वितीय आकाश * जिसका तीनों कालमें भी वाघ न हो, उससे पारमार्थिक सत्त्व कहते हैं।
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१३२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
देर्मायोपाधिकं व्याहारिकं सच्चम्, शुक्तिरजतादेरविद्योपाधिकं प्रातिभासिकं सच्चम्। तत्रापारमार्थिकसच्वयोर्द्वयोमिथ्यात्वमविरुद्धम्। न च मिथ्या- त्वकल्पनं मानहीनम्, 'मिथ्यैव रजतमभात्'इति रजततद्ज्ञानयोमिथ्यात्व- प्रत्यभिज्ञानात्। अतो न मतान्तरवदस्मन्मते अनुभवविरोधो निर्मूलकल्पना वा। अख्यातौ त्वपरोक्षावभासिन: स्मर्यमाणत्वं विरुध्यते। ज्ञानद्वयरज- तापारोक्ष्यस्मृतित्वस्मरणाभिमानप्रमोपादिकं वह्वद्ष्टं कल्प्यम्। एवं आदिकी मायाके कारण प्राप्त हुई * व्यावहारिक सत्ता और तृतीय छुकिरजत आदि (भ्रमविषय) की अविद्याजनित प्रातिभासिक सत्ता। इन तीनों सत्ताओंमें अग्रिम दोनों अपारमार्थिक हैं, इनका मिथ्यात्व विरुद्ध नहीं है। और मिथ्यात्वकी कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं है, ऐसा भी नहीं कहना चाहिए, कयोंकि 'अवतक असत्य (झूठा) ही रजत प्रतीत हो रहा था' इस प्रतीतिसे रजत तथा उसके ज्ञानके मिथ्यात्वका प्रत्यभिज्ञान ही प्रमाण है। इसलिए हमारे (वेदान्तीके) मतमें दूसरे मतोंकी भाँति अनुभवविरोध अथवा निमूल कल्पना, कोई भी दोष नहीं आता। [ दूसरे मतोंमें विरोध दिखलाते हैं-] अख्यातिवादमें तो प्रत्यक्ष अवभासित होनेवाले रजतको स्मर्यमाण-स्मरणका विषय कहना विरुद्ध है; और एक ज्ञानको दो ज्ञान कहना, रजतके प्रत्यक्षत्व तथा स्मृतित्व एवं स्मरणाभिमान (तत्ताद्यंश) का प्रमोष, इत्यादि अनेक प्रकारकी नवीन कल्पनाएँ करनी होंगी। इस ग्रकार अन्यथाख्याति आदि अन्य मतोंमें भी विरोध और निर्मूल कल्पना आदि जो दोप
- अधिष्ठान तत्त्व-ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर जिसका वाध हो और जो केवल व्यवहारकालमें सम्वादि हो अर्थात् दो, तीन, चार या अधिकसे अधिक पाचवीं कक्षा तक स्थायी हो उसे व्यावहारिक सत्त्व कहते हैं। इस व्यावहारिक सत्ताकी उत्पादिका अविद्या माया कहलाती है। + जिसकी अधिष्ठानभूत ब्रह्मसे इतर शुक्ति आदिके ज्ञानसे निवृत्ति हो और व्यवहारमें जो विसम्वादि हो अर्थोत् जो केवल प्रतिभासकालमें स्थायी हो उसे प्रातिभासिक सत्ता कहते हैं, और इसकी उत्पादिका अविद्या है। माया और अविद्याका अवान्तर भेद आगे चलकर स्पष्ट वतलाया जायगा। * अन्यथाख्यातिवादमें-शुक्ति-रजतके अनुभूयमान संसर्गको भी शून्य कहना, (न मानना) आपणस्थ रजतका पुरोदेशमें प्रतिभास और इन्द्रियके व्यवहितके ग्रहण करनेमें दोषोंकी सामर्थ्यकी कल्पना करना इत्यादि-प्रत्यक्षविरुद्ध अनेक नवीन कल्पनाएँ आती हैं, एवं आत्मख्यातिमें भी आन्तर रजतका वाहर प्रतीत होना, शून्य संसर्गका भासना, इत्यादि पूर्वोक्त प्रमाणविरुद्ध सभी कल्पनाएँ आती हैं।
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अध्यासविचार.] भापानुवादसहित १३३
मतान्तरेष्वपि यथायोगमूहनीयम्। अतो रजतं मायामयमित्यस्मन्मत- मेवादर्तव्यम्। ननु तत्वज्ञाननिवर्त्यत्वाद्रजतमविद्यामयं न तु मायामयम्। न च मायैवाविद्या, लक्षणप्रसिद्धिभ्यां तयोर्मेदावगमात्। आश्रयमव्यामोहयन्ती कर्तुरिच्छामनुसरन्ती माया तद्विपरीता त्वविद्या। लोके हि मायानिमिंत- हस्त्यश्वरथादौ मायाशब्द एव असिद्धो नाविद्याशब्द इति। उच्यते- अनिर्वचनीयत्वे सति तच्वावभासप्रतिवन्धविपर्ययावभासयोहेतत्वं लक्षणं तच्चोभयोरविशिष्टम्। न च मन्त्रौपधादि सत्यं वस्त्वेव मायेति वाच्यम्,
आते हैं उनका हमें विचार करना चाहिए। और इससे-अख्यातिवादादि मतोंके खण्डित हो जानेसे-रजत मायामय है, इस हमारे मतका ही आदर करना चाहिए। [प्रातिभासिक रजत मायामय कहा गया है, यह उचित नहीं है, क्योंकि माया तो अपने आश्रय ऐन्द्रजालिक आदिमें भ्रम नहीं करती और उसकी इच्छाके अनुसार रहती है। शुक्तिरजतमें ऐसा नहीं देखा गया है कि भ्रम किसी पुरुपकी इच्छाका अनुवर्तन करता हो, इस आशयसे झक्का करते हैं-] रजत तत्त्वज्ञानसे निवर्त्य (विनाशी) होनेके कारण अविद्याका विकार हो सकता है, मायाका नहीं, और माया ही अविद्या है, ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि लक्षण और प्रसिद्धिसे इन दोनोंमें मेदकी ग्रतीति होती है। [ मेदकी सिद्धि लक्षणद्वारा दिखाते हैं-] माया अपने आश्रयमें व्यामोह (भ्रम) उत्पन्न नहीं करती, उसकी इच्छाके अधीन रहती है। और इससे प्रतिकूल अविद्या होती है। (अर्थात् आश्रयको व्यामोहित करती है, उसकी इच्छाका अनुवर्तन नहीं करती।) [प्रसिदद्धिसे भी भेद सिद्ध करते हैं-] यह प्रसिद्ध है कि लोकमें मायासे उत्पन्न हाथी, घोड़े, रथ आदि 'माया' शब्दसे ही प्रसिद्ध हैं, अविद्याशब्दसे नहीं। (अर्थात् इनको माया कहा जाता है, अविद्या नहीं।) [अविद्या और मायामें कोई भेद नहीं है, इस आशयसे इनका लक्षण करते हुए उत्तर देते हैं-] 'अनिर्वचनीय होकर तत्त्वावभासके प्रतिबन्धका कारण और विपर्यय- मिथ्या अवभासका कारण' यह लक्षण अविद्या और माया दोनोंमें एक रूप- सा है। मन्त्र, औपध आदि सत्य वस्तु ही माया है, यह भी नहीं मानना
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१३४ विचरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
तत्र मायाशब्दप्रयोगाभावात्। द्रष्टारो हि दष्टमिद्रजालमेव मायां वदन्ति न त्वदष्टं मन्त्रादिकम्। मन्त्रान्वयव्यतिरेकौ तु काचादिवन्निमित्तकारणत्वे- नोपपननौ। न ह्यनिर्वचनीयं मायाशब्दवाच्यमिन्द्रजालं सत्यमन्त्राद्युपा- दानकं भवति। अतोऽनाद्यनिर्वचनीयं किंचिदुपादानं कल्पनीयम्, सादित्वे- इनवस्थापतेः । तस्य च मायाशब्दवाच्यत्वमुपादानोपादेययोरभेदादुपपन्नम्। एवं चेन्द्रजालोपादानत्वेन कल्पिता मायव रजताद्यध्यासानामप्युपादानमस्तु, मास्तु परृथगविद्या; मायां तु प्रकृतिमिति सर्वोपादानत्वक्षतेः। अतो लाघवान्मायैवाविद्या। न च मायाया आश्रयं प्रत्यव्यामोहकत्वं नियतम्,
चाहिए, क्योंकि मन्त्रादिमें मायाशव्दका प्रयोग नहीं देखा गया है। देखनेवाले पुरुष हाथी-घोड़े आदि दिखाई पड़नेवाले वस्तुस्वरूप इन्द्रजालको ही माया कहते हैं। दिखाई न देनेवाले मन्त्र, औपध आदिको नहीं कहते। मन्त्र आदिके साथ अन्वय और व्यतिरेक (यदि मन्त्र, औषध आदिका प्रयोग है, तो ताद्दश हस्ती, अश्र आदि दीखते हैं, अन्यथा नहीं; इत्यादि व्याप्ति) तो अक्षिगत काचादि रोगके तुल्य मणिमन्त्रादिकी निमित्तकारणताका ही प्रतिपादन करनेमें उपयुक्त हैं। अनिर्वचनीय, जो मायापदसे व्यवहृत होता है, ऐसे इन्द्रजालके उपादान (समवायिकारण) मन्त्र आदि सत्य पदार्थ नहीं माने जा सकते; क्योंकि मृदादि सत्य उपादानोंसे सत्य ही घटादिकी उत्पत्ति होती है। इसलिए ऐसे किसी एक उपादानकी कल्पना करनी चाहिए जो अनादि और अनिर्वचनीय (मिथ्या) हो, कारण कि उसे सादि माननेमें अनवस्थाकी आपत्ति होगी। (क्योंकि उत्तरोत्तर कारणान्वेपणपरम्परा न रुकनेसे मूल कारणकी भी असिद्धि हो जायगी।) इससे उस मूल कारणका मायापदसे ही व्यवहार करना उपादान और उपादेयमें अभेद माननेसे उचित ही है। इस प्रकार ऐन्द्रजालिक वस्तुकी उपादानस्वरूप मानी गई माया ही रजत आदि अध्यासों (विग्रमों) की भी उपादान रहे, पृथक् अविद्याकी कल्पनाकी क्या आवश्यकता है? क्योंकि मायाके लिए 'मायां तु प्रकृति' (मायाको प्रकृति समझो) इस वाक्यसे सकल प्रपञ्चका उपादानत्व प्राप्त ही है। (इससे मायाकी उंपादानत्वकल्पना नूतन नहीं है।) इसलिए माया ही अविद्या है, यह लाघवमूलक कल्पना ही विलकुल ठीक है। और ऐसा भी क़ोई. नियम नहीं है कि माया अपने आश्रयको व्यामोहित नहीं
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १३५
विप्णोः स्वाशरितमाययैव रामावतारे मोहितत्वात्। नाप्यविद्याया आश्रय- व्यामोहनियतिः, जलमध्येऽधोमुखत्वेन वृक्षेष्वध्यस्तेष्वपि तदूर्ध्वमुखतायां द्रषटुरव्यामोहात्। अथात्र तीरस्थवृक्षदर्शनजन्यविवेक्वशादव्यामोहः अवि- द्यास्वभावस्तु व्यामोहक इति चेत, तर्हैन्द्रजालिकस्यापि प्रतीकारज्ञानादव्या- मोहः । माया तु स्वभावाद् व्यामोहिकैव, इन्द्रजालद्रष्टपु व्यामोह- दर्शनात्। सति तु अतीकारज्ञाने तेऽपि न मुद्यन्त्येवेत्यनाश्रयत्वं न व्यामोहप्रयोजकम्। न च माया क्तुरिच्छामनुसरति, मन्त्रौपधादौ निमित्तकारण एव कर्तु: स्वातन्त्र्यात्। तादृशं चेच्छानुवर्तित्वमविद्याया अपि द्ष्टम्, नेत्रस्याङ्गुल्यवष्टम्भेन द्विचन्द्रभ्रमोत्पत्तेः। अविद्यास्वरूपे कर्त्ता न करती, क्योंकि विष्णु अपनी मायासे ही रामावतारमें मोहित * हुए थे, यह देखा गया है। तथा अविद्या अपने आश्रयको व्यामोहित करती ही है, ऐसा भी नियम नहीं है, क्योंकि यद्यपि देखनेवालोंको जलमें प्रतिविग्वित हुए वृक्ष आंधे सुंह-से मालम पड़ते हैं तथापि उन तीरस्थ वृक्षोंकी उद्र्ध्वमुखतामें उन्हें जरा भी व्यामोह नहीं होता। यदि कहो कि यद्यपि अविद्याका स्वभाव अपने आश्रयमें भ्रम उत्पन्न करना ही है तथापि ऐसे स्थलमें तीरमें स्थित वृक्षके प्रत्यक्षसे उत्पन्न हुए विवेकके कारण अविद्याके आश्रयमें व्यामोह (भ्रम) नहीं होता, तो यह भी कहना उचित नहीं है, कारण कि ऐन्द्रजालिक (इन्द्रजाल दिखानेवाले पुरुष) को प्रतीकारका ज्ञान होनेसे (मायाके द्वारा भी) व्यामोह नहीं होता है। माया तो स्वभावसे आश्रयमें व्यामोह उत्पन्न करती ही है, क्योंकि इन्द्रजाल देखनेवालोंमें व्यामोह देखा गया है। प्रतीकारका ज्ञान होनेपर वे भी व्यामोहित नहीं होते हैं, इसलिए अनाश्रयत्व (मायाका आश्रय न होना) भ्रमका प्रयोजक नहीं है। और माया कर्ताकी इच्छाके अनुसार चलती है, ऐसा भी कोई नियम नहीं है, क्योंकि मन्त्र, औपध आदि निमित्त कारणोंके प्रयोगमें ही कर्ताका स्वातन्त्र्य है। उस प्रकारकी इच्छाका अनुवर्तन करना तो अविद्यामें भी देखा गया है, क्योंकि नेत्रको अङ्गुलीसे कुछ दवा देनेसे दो चन्द्र दीखनेका भ्रम उत्पन्न होता ही है। यदि अविद्याके स्व- रूपमें कर्ताका व्यापार उपयोगी नहीं है, तो मायाके स्वरूपमें भी कर्ताका व्यापार उपयोगी नही है; (अर्थात् यदि अविद्यास्वरूपकी निष्पत्ति कर्तृव्यापाराधीन
तथापि रामो लुलमे मृगाय।
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१३६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १ 1
व्याप्रियत इति चेत्, तदितरत्रापि समम्। प्रसिद्धिरपि शास्त्रीया तावत्तयोर- भेदमेव गमयति, 'भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः' इत्यादिश्ठुतौ सम्यग्ज्ञान- निवर्त्याविद्यायां मायाशब्दग्रयोगात्। तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते। योगी मायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः॥ इति स्मृतौ मायाऽविद्ययोर्मुखत एवैकत्वनिर्देशात्। लोकप्रसिद्धिस्त्वे- कस्मिन्नपि वस्तुन्युपाधिभेदादुपपद्यते। विरूपजनकत्वाकारेणेच्छाधीनत्वा- कारेण वा मायेति व्यवहारः। आवरणाकारेण स्वातन्त्र्याकारेण वाविद्येति व्यवहारः । तस्माद्रजतस्य मायामयत्वसुपपन्नम् ।
नहीं है, तो मायाका स्वरूप भी कर्तृव्यापाराधीन नहीं है;) ऐसा समझना चाहिए। और श़ास्त्रीय प्रसिद्धि भी इन दोनोंमें अभेदका ही बोध कराती है, क्योंकि 'भूयश्चा०'(अन्तमें विश्वमायाकी निःशेष निवृत्ति हो जाती है) इत्यादि श्रुतिमें सम्यक् ज्ञानसे निवृत्त होनेवाली अविद्याके लिए ही मायाशब्दका प्रयोग देखा गया है। 'तरत्यविद्यां०' (जिस परमात्माका हृदयमें समावेश हो जानेपर योगीजन विस्तृंत मायारूप अविद्याको पार कर जाते हैं, उस अमेय विद्यास्वरूप परमात्माके लिए नम- स्कार है) इस स्मृतिमें माया और अविद्याका ऐक्य 'मायाम् अविद्याम्' इन समानाधि- करणशब्दों द्वारा स्पष्ट ही कहा गया है। लोकमसिद्धि तो एक ही वस्तुमें उपाधिके मेदसे उपपन्न हो सकती है। [जसे-] विरूपजनकत्वरूपसे (ब्रह्मरूप अधिष्ठानमें घट, पट आदि विक्षेप उत्पन्न करनेवाली होनेसे) अथवा इच्छाके अधीन उसका आकार पानेसे (ऐन्द्रजालिकको हाथी, घोड़ा, आदि जो कुछ दिखानेकी इच्छा होती है, माया उसकी इच्छाके अनुसार तादश आकारका ग्रहण कर लेती है; इससे) 'माया' यह व्यवहार होता है और अधिष्ठानके अवभासका प्रतिबन्धक जो आवरण है उसके रूपसे अथवा स्वातन्त्र्यसे (इच्छाके अधीन रूपग्रहण न करनेसे) 'अविद्या' यह व्यवहार होता है। [ इससे इन्द्रजाल आदिके लिए मांयाशब्दंका व्यवहार और अन्यत्र अविद्याशब्दका व्यवहार भी उपपन्न ही है, अतः कोई विरोध नहीं है। ] इससे शुक्तिरजतको मायामय कहना सङ्गत ही है।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १३७
ननु कोडयं केशः रजतं यथावभासं पारमार्थिकमेवास्त्विति चेद्, न; तथा सति घटादिवद्दोपरहितैरपि गृह्येत। पारमार्थिकग्रहणं प्रत्याे दोपस्य कारणत्वे, निर्दोपाणां न किंचित् प्रतिभायात्। मायामयत्वे तद् दोप एव नियंस्यति। विमतं सर्वैरग्राह्यं शुक्तीदमंशगत्वाच्छौक्ल्यवदिति चेद्, न; इदमंशमात्रगतत्वस्योपाधित्वात्। मायारजतं तु दोपजन्यवुद्धयाऽभिव्यक्ते शुक्तीदमंशावच्छिन्ने चैतन्येऽध्यस्तम्, ततो निर्दोपैर्न गृह्यते। न ह्यन्यवुद्धि: पुरुपान्तरप्रत्यक्षा। अथ पुनः परमार्थवादी कथचिद् दृष्ट नियामकं जूयात्,
अब दिगम्बर शक्का करते हैं-जैसी प्रतीति हो रही है उसके अनुसार रजतको परमार्थ सत् क्यों न मान लिया जाय, व्यर्थ इतनी कल्पनाओंका केश क्यों उठाया जाय ? उत्तर देते हैं-नहीं, यदि प्रतीतिके वलसे रजतको सत्य मान लिया जाय, तो सत्य घट आदिकी तरह शुक्ति-रजतका भी सबको अव- भास होने लगेगा। और यदि पारमार्थिकके ग्रहणमें भी दोप ही कारण मान लिया जाय, तो जिनकी इन्द्रियोंमें कोई दोप नहीं है, उन्हें किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं हो सकेगा। और मायामय (मिथ्या) माननेमें तो कोई दोप नहीं आता, क्योंकि दोष ही उसका नियम करेंगे (अर्थात् दोपसे मायामयका ही प्रतिभास हो सकता है, इससे जिसमें दोप होंगे उसे ही मायामयका प्रतिभास होगा, दूसरेको नहीं)। पुनः दिगम्वर शक्का करते हैं-विमत (शुक्तिरजत) सबसे ही ्ह्य है, शुक्तिके इदमंशगत होनेसे, शुक्तिके इदमंशगत शुक्ल गुणके समान, इस अनुमानसे हम रजतको परमार्थ सिद्ध करते हैं। उत्तर देते हैं-नहीं, ऐसा अनुमान कभी नहीं कर सकते, क्योंकि उक्त अनुमानमें इदमंशमात्रगतत्व उपाधि है। रजतको माया- मय माननेपर तो वह दोपसे उत्पन्न हुई भ्रमात्मक वुद्धिसे अभिव्यक्त हुए शुक्तिके इदमंशसे अवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्त होता है, इसलिए दोपरहित प्रमाताको उसका ग्रहण नहीं होता है। [क्योंकि उसमें मायामय रजतग्रहण करनेका हेतु दोप नहीं है] कारण कि दूसरे 'पुरुप'की बुद्धिका दूसरे पुरुपको प्रत्यक्ष नहीं हो सकता। [विपयके मिथ्यात्वके बिना ज्ञानका अयथार्थत्व-्रमत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता, इससे भ्रमत्वकी सिद्धिके लिए रजतादि विषयको मिथ्या माननेकी कल्पना अब तक की गई है। यदि हम प्रतिभासको सत्य मान लें, तव तो प्रति- भासके अनुसार रजत यथार्थ ही होगा-इस आशयसे शक्का करनेवाले वादीके १८
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१३८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, चर्णक १ तथाप्यसौ नेदं रजतमिति प्तिपन्नोपाधौ रजतस्य त्रैकाल्याभाववोधकं बाधकप्रत्यक्षं कथं निस्तरेत्१ मिथ्यावादे त्वनुकूलमेवैतत्, प्रतिपन्नोपा- धावत्यन्ताभावप्रतियोगित्वस्यैव मिथ्यात्वलक्षणत्वात्। न ह्ययं निपेधो मिथ्यारजतं गोचरयतीत्यधस्तादेव मिथ्यैवाभादिति प्रत्यभिज्ञाप्रत्ययमा- श्रित्योपपादितम्। अन्यथाख्यात्यात्मख्यात्योस्तु 'नेदं रजतं' किन्तु तद्र- मतका अनुवाद कर खण्डन करते हैं-] यदि फिर भी भ्रमविपयको परमार्थ सत् कहनेवाला वादी किसी प्रकार दुराग्रहसे दृष्टको नियामक कहे, (अर्थात् दृष्ट-प्रतिभासके विषय घट, पटादि परमार्थ सत् हैं, अतः रजत भी प्रतिभासमान होता है, अतः परमार्थ सत् है, यदि ऐसा कहे) तो वह जिस पुरोवर्तीमें प्रतीत होता है उसमें ही 'यह रजत नहीं है' इस प्रकार तीनों कालमें रजतके अभावके बोधक बाधक प्रत्यक्षका किस तरह पार पावेगा। अर्थात् सङ्गति किस प्रकार करेगा। मिथ्यावाद (मायामय माननेवालेके मत) में यह सब अनुकूल (सङ्गत) ही है, क्योंकि जिस अधिकरणमें जिसका सत्वेन प्रतिभास हो रहा है उसी अधिकरणमें उसके त्रिकालमें रहनेवाले अभावका प्रतियोगी होना, यह मिथ्यात्वका लक्षण है। [ अर्थात् जिस शुक्त्यादिमें रजत प्रतीत होता है उसी शुक्त्यादिमें 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) ऐसा त्ैकालिक अभाव प्रतीत होता है, इससे रजतके तादृश अभावका प्रतियोगी होनेसे वह मिथ्या सिद्ध होता है।] 'नेदं रजतम्' यह निषेध मिथ्या रजतको विषय नहीं करता है (अर्थात् मिथ्या रजतका निषेध नहीं करता है), इसका पहले ही 'अवतक यह मिथ्या ही रज़त भासित होता रहा' इस प्रत्यभिज्ञाप्रतीतिका आश्रयण करके प्रतिपादन कर चुके हैं। अन्यथाख्यातिपक्षमें (अर्थात् अन्य देश और कालमें विद्यमान रजतका इस देश और कालमें प्रतिभास माननेवालेके मतमें) 'नेदं रजतं किन्तु तद् रजतम्' यह (इस देश और कालमें प्रतीयमान) रजत नहीं है, किन्तु वह (देशान्तर तथा कालान्तरमें विद्यमान) रजत है, ऐसा वाधकज्ञान होना चाहिए और आत्मख्यातिपक्षमें (आन्तर ज्ञान ही बाहर रजतरूपसे भासित होता है, इस मंतमें) भी यह रजत नहीं है, किन्तु बुद्धि है, ऐसा बाधकज्ञान होना चाहिए, न कि अबतक मिथ्यैव रजत भासित होता रहा, यह परामश।
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अध्यासविचारं] भांपानुवादसहित १३९ जतमिति वा बुद्धिरिति वा परामर्शः स्याद्, न तु मिथ्यैवेति। अतो निर्दो- पैरग्रहणाद्वाधपरामर्शाभ्यां च रजतस्य मिथ्यात्वमेव युक्तत न सत्यत्वम्। ननु कोडयं वाधो नाम यद्धलान्मिथ्यात्वनिश्चयः। किमन्यार्थिनो ऽन्यत्र परवृत्तिनिरोधः किं वा तत्प्रवृत्तियोग्यताविच्छेद उताऽविविक्तंतया प्रतिपन्नस्य विवेक आहोस्वित्तादात्म्येन प्रतिपन्नस्यान्योन्याभावप्रतिपत्तिः अथवा विपरीतज्ञानस्य प्रध्वंसः तद्विपयप्रध्वंसो वा दोपादिग्रध्वंसो वा? नादः, विरक्तस्य प्रवृत्यभावेन वाधाभावग्रसङ्गात्। अथ रागपूर्वकप्रवृत्ति- निरोधो वाध:, तदापि दूरे मरीच्युदकं दृष्ट्रा अ्रवर्त्तमानस्य मार्गे सर्पचोरादि- दर्शनेन निवृत्तौ वाधग्रसङ्ग: । न च तत्र वाध, उदकज्ञानस्यानिवृत्तेः।
इसलिग दोपरहित पुरुषोंसे उसका ग्रहण न होनेसे और 'नेर्द रजतम्' इस वाध- ज्ञानसे तथा 'मिथ्यैवाजभात्' इस परामर्शसे भी भ्रमविषय रजतादिको मिथ्या (मायामय) मानना ही उचित है, न कि सत्य मानना । पुनः शक्का करते हैं-यह बाध क्या वस्तु है? जिसके बलसे मिथ्यात्वका निश्चय होता है, क्या अन्य वस्तुकी अपेक्षा रखनेवाले पुरुपकी अन्य वस्तुमें प्रवृत्तिका प्रतिबन्ध होना अथवा उसकी प्रवृत्तिकी योग्यताका विच्छेद : किंवा जिसे पहले विवेक न हुआ हो उसे पीछे विवेक होना? या जो तादात्म्यसे समझा गया हो उसके अन्योन्याभावका ग्रहण करना ? अथवा विपरीत ज्ञानका नाश? अथवा उस ज्ञानके विपयका नाथ? या दोपादिका नाश ? इनमेंसे पहला पक्ष उचित नहीं हो सकता, क्योंकि विरक्त पुरुप की प्रवृत्ति न होनेसे वाधके अभावका प्रसङ्ग हो जायगा (क्योंकि बिना प्रवृत्ति हुए उसका प्रतिबन्ध कहना असङ्गत है, विरक्तकी प्रवृत्ति ही नहीं होती; अतः प्रवृत्तिका प्रतिबन्धरूप वाघ नहीं होगा, इससे विरक्तके भ्रमविषय शुकिरजतमें मिथ्यात्व नहीं वनेगा)। यदि रागपूर्वक प्रवृत्तिके प्रतिबन्धको वाध कहें, तो भी दूरदेशमें मरीचि-जलको देखकर रागसे ही हुई प्वृत्तिके बीच मार्गमें सर्प या चोर आदिके मिल जानेसे हुए प्रतिबन्धमें भी वाधका प्रसङ्ग हो जायगा और वहां पर बाध है नहीं, क्योंकि वहां उदकज्ञानकी निवृत्ति नहीं देखी जाती। (यदि बाध होता, तो उदकज्ञानकी भी निवृत्ति हो जाती।) दूसरा 'विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक वार वाघसे भरमके निवृत्त हो जानेपर भी दूसरे समय
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१४० विवरणंप्रमेयसंग्रहं i सूंत्र १, चर्णक १
न द्वितीय:, कालान्तरे तत्रैव शुक्तौ भ्रान्तिपवृत्तिसंभवेन योग्यताया अविच्छे- दात्। तृतीयेऽपि किं वस्तुषु गृहीतेषु भेदो धर्मः सन् पश्चाद् गृह्यते उत वस्तु- स्वरूपभूतस्तदैव गृह्यते ! आद्ये, सर्वत्र वस्तुज्ञानस्याविविक्तविपयस्य भेदज्ञानं वाधकं स्यात्। द्वितीये, वस्तुनि गृहीते काप्यविवेको न स्यात्। चतुर्थेऽप्य- त्यन्तभेदवादे भेदाभेदवादे वा 'शुक्लो घटः' इति प्रथमं तादात्म्यं प्रतिपद्य पश्चाद् घटस्य शौक्ल्यमिति भेदग्रतिपत्तिर्वाः स्यात्। न पश्चमः, ज्ञानस्य क्षणिकस्य स्वत एव प्रध्वंसात्। नापि पष्ठसतमौ, वस्तुनोविपयदोपयोर्ज्ानेन
उसी शुक्तिमें भमसे रजतार्थीकी प्रवृत्तिका सम्भव होनेसे योग्यताका विनाश नहीं है। तीसरे विकल्प माननेमें भी, क्या वस्तुओंके गृहीत होनेपर धर्म होता हुआ भेद पीछे गृहीत होता है? अथवा वस्तुओंका स्वरूप ही होता हुआ भेद वस्तुग्रहणकालमें ही गृहीत होता है ? [ जैसे उत्पन्न हुए घटका पहले ग्रहण होता है, पुनः उसमें रक्त, पीत आदि धर्मोंकी उत्पत्ति होती है, उसके अनन्तर उनका ग्रहण होता है, इस प्रकार वस्तुका भेद ग्रहणके अनन्तर गृहीत होता है अथवा जैसे वर्तुलाद्याकार घटका स्वरूप ही है घटके ग्रहणकालमें ही उसका भी ग्रहण हो जाता है वैसे ही वस्तुग्रहणकालमें ही भेदका भी ग्रहण हो जाता है, यह दोनों विकल्पोंका तात्पर्य है] पहिला विकल्प माननेमें सर्वत्र ही अविविक्तविषयक वस्तु-ज्ञानका भेद- ज्ञान वाधक हो जायगा। [ अर्थात प्रथम (विवेक-ज्ञानके पूर्व) द्रव्यादि सभी पंदार्थ विविक्त-पृथक् पृथक् गहीत नहीं होते, प्रत्युत सामान्यतः एक ही ज्ञानमें *अविवेकसे ग्ृहीत होते हैं पश्चात् निरुक्त ज्ञानके विषयोंमें इतरेतराभावात्मक विवेक होता है। उस पूर्वज्ञानको भी भ्रमत्वापत्ति हो जायगी, यह तात्पर्य है ] द्वितीय विकल्प माननेमें तो वस्तुके ग्रहणके साथ ही विवेकका ग्रहण होनेसे कहीं भी अविवेक नहीं होगा (पुनः भ्रम ही कैसे होगा? जिसका आप वाध करते हैं)। चतुर्थ विकल्पमें भी अत्यन्त भेदवाद अथवा भेदाभेदवाद दोनों मतमें भी 'शुको घटः' (सफेद घड़ा) इस समानाधिकरणप्रतीतिसे प्रथमतः तादात्म्य (अमेद) की प्रतीति होकर पश्चात् घड़ेकी सफेदीकी (द्रव्य नहीं है, किन्तु गुण है इस प्रकारकी) प्रतीतिसे भेदका ज्ञान होना बाध कहलाने लगेगा। (अर्थात् इस प्रकारका वाघ आपके अभीष्ट मिथ्यात्वकी सिद्धि नहीं कर सकता) पश्चम विकल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि क्षणिक ज्ञानका स्वतः विनाश होता है। छठां और सातवां विकल्प भी ठीक
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अध्यासविचारं ] भांपानुवादसहित २४५
प्रध्वंसासम्भवात्। न च वाघ एवापलपनीय:, लोकप्रसिद्धत्वात्। तस्माद्वाघं न पश्याम इति। उच्यते-अज्ञानस्य वर्चमानेन प्रविलीनेन वा स्वकार्येण सह तच्ज्ञांनेन निवृत्तिर्वाधः, तथाविधाऽनववोधनिवृत्तौ वाधग्रसिद्धेः। नन्वेवं सति शुक्तिज्ञानमेव मिथ्यारजततदुपादानयोनिवर्त्तकत्वाद्धाधकं स्यात्, सत्यमेवम् ; रहस्यमेतत्, तथापि परमार्थरजतबुद्धा प्रवर्त्तमानस्य तदभाव- बोधनेन अवृत्याकाङ्भोच्छेदित्वान्नेदं रजतमिति ज्ञानमपि वाधकत्वेन व्यपदिश्यते। ततो वाधान्मिथ्यात्वनिश्चयः । नन्वस्त्वेवं मिथ्यारजतज्ञानं भ्रमः । स्वम्पदार्थज्ञानं तु न प्रमाणम्,
नहीं जँचता, क्योंकि ज्ञानके विषय या दोष का ज्ञानसे नाश नहीं होता। और वाधका अपलाप भी नहीं कर सकते, क्योंकि बाध लोकमें प्रसिद्ध है। इससे हम बाधका कोई लक्षण नहीं देखते। [जिस वाधके द्वारा आप भ्रमविपयको मिथ्या कह रहे हैं। ] उत्तर देते हैं-तत्वज्ञानसे वर्तमान तथा प्रविलीन अपने कार्यके साथ-साथ अज्ञानकी निवृत्ति ही वाघ है, क्योंकि तथ्ाविध अनवबोध (समूल अज्ञान) की निवृत्तिमें ही वाधशव्दकी प्रसिद्धि है। (अर्थात् अज्ञाननिवृत्ति ही बाध है।) [यदि अनबोध (अज्ञान) की निवृत्ति ही वाध है, तो रजतका बाध शुक्तिज्ञानसे होता है, इससे शुक्तिज्ञान ही वाध होगा, इस आशयसे शङ्का करते हैं-] तब तो ऐसा माननेसे शुक्तिज्ञान ही मिथ्यारजत और उसके उपादान अज्ञानका निवर्तक है, अतः शुक्िज्ञान ही वाधक होगा [ वादीका गूढाशय यह है कि शुक्तिज्ञानसे रजतका अभावज्ञान हुआ, इससे प्रवृत्तिका विघात हुआ, रजतके मिथ्यात्वसे नहीं, उत्तर देते हैं-] आपका ऐसा कहना यद्यपि ठीक है, क्योंकि यही वेदान्त शास्त्रकां रहस्य; सिद्धान्त है-तथापि परमार्थ रजतबुद्धिसे प्रवृत्त हुए पुरुपकी रजतके अभाववोघनसे निषेधप्रवृत्तिकी आकाह्ाके उच्छेदकारक होनेसे 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) यह ज्ञान भी वाधक कहा जाता है। इसलिए वाघज्ञानसे मिथ्यात्वंका निश्चय होता है। [ इतने ग्रन्थसे मिथ्याज्ञानका 'इन्द्रियसंप्रयोग, पूर्वानुभूतका सरकार और दोप' इन तीन कारणोंसे उत्पन्न होनेवाला अवभास तटस्थलक्षण और अन्यमें अन्यका
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१४२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
वाधितत्वात्। नापि स्मृतिः, अपरोक्षत्वात्। नापि भ्रम:, तल्लक्षणाभावाद। भ्रमस्य हि कारणत्रितयजन्यत्वं तटस्थलक्षणम्। न हि तत्स्वमेऽस्ति, निद्राख्यदोषस्यादृष्टोद्वुद्धसंस्कारस्य च सच्वेऽपि तृतीयस्य संप्रयोगस्या- भावात्। नापि स्वरूपलक्षणं परत्र परावभास इत्येवंरूपं तत्र संभवति, परत्रेत्युक्तस्याधिष्ठानस्याभावात्। ततस्त्वत्पक्षे स्वमनप्रत्ययस्य का गतिरिति। उच्यते-सम्प्रयोगो हि जागरणे बाह्यशुक्तीद मंशादिगोचरान्त:करणधृंत्युत्पा- दकः, अन्तःकरणस्य देहाद्वहिरस्वातन्त्र्यात्। सवमे तु देहस्यान्तरन्तःकरणं स्त्रतन्त्रत्वात्स्वयमेव प्रवर्तिष्यत इति नास्ति संप्रयोगापेक्षा। ततो जागरणे अवभास स्वरूपलक्षण हुआ, इन दोनों लक्षणोंकी स्वप्नादिज्ञानमें अव्याप्ति है, क्योंकि स्वप्नमें इन्द्रियसंप्रयोग तथा अधिष्ठानादिका भी अभाव है। और स्वाम्त ज्ञानको प्रमाण भी तो नहीं कह सकते, क्योंकि भ्रमका लक्षण उसमें जाता है; अतः स्वाप् ज्ञानको किस कोटिमें रखेंगे ? इस आशयसे शङ्का करते हैं-] पूर्वोक्त रीतिसे मिथ्यारजतज्ञानको भ्रम सिद्ध किया जा सकता है, परन्तु स्वाप्न ज्ञानको नहीं। स्वाप्न पदार्थका ज्ञान तो प्रमाण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जागरणमें उसका बाध हो जाता है। और स्मृति भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रत्यक्ष अवभास है। अ्रम भी नहीं कह सकते, क्योंकि उसका लक्षण ही स्वाप्न ज्ञानमें उक्त प्रकारसे नहीं जाता है। 'पूर्वोक्त तीनों कारणोंसे उत्पन्न होना" यह त्रमका तटस्थलक्षण है। इसका स्वममें सम्भव नहीं है। यद्यपि निद्रादि दोष और अदृष्ट द्वारा उद्बुद्ध संस्कार रूप दो कारण हैं, तथापि तीसरे इन्द्रियसंभयोगरूप कारणका अभाव ही है। एक वस्तुमें अन्य वस्तुका अवभास, इस प्रकारका स्वरूपलक्षण भी उसमें नहीं घटता। कारण कि 'अन्य वस्तुमें' इससे निर्दिष्ट अधिष्ठान-अंश स्वप्नमें नहीं है। इसलिए तुम्हारे मतमें स्वप्नज्ञानकी क्या दशा होगी? यथार्थ या अयथार्थ किसीमें भी उसके न आनेसे वह तीसरी कोटि कौन-सी है? जिसमें स्वप्नादिज्ञानका अन्तर्भाव हो? इसपर कहते हैं-सम्प्रयोग जागरणमें वाह्य शुकिरूप इदमंश आदि विषयमें अन्तःकारणकी वृत्तिको उत्पन्न कराता है, क्योंकि अन्तःकरणकी देहसे बाहर स्वतन्त्रता नहीं है। स्वप्नमें तो देहके भीतर अन्तःकरणका स्वातन्त्र्य होनेसे वह स्वयं प्रवृत्त हो सकता है (वृत्याकारपरिणाम वन सकता है) अत एव इन्द्रियसम्प्रयोगकी उसे अपेक्षा नहीं
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १४३
स्वभेऽप्यन्त:करणवृत्तिरेव तृतीयं कारणम्। अधिष्ठानमपि सर्वत्र वृत्यव- च्छिन्नं चैतन्यमेव । शुक्तीदमंशादिस्तु चक्षुरादिसंग्रयोगस्यैव जनका, अन्यथा निर्विपयस्य संग्रयोगस्यानुत्पत्ते :; अधिष्ठानचैतन्यावच्छेदकोपाधि- त्वात्। ततो यथा जागरणे संग्रयोगजन्यवृत्यभिव्यक्ते शुक्तीदमंशावच्छिन्ने चैतन्ये स्थिताऽविद्या रजताकारेण विवर्तते तथा स्वभेऽपि देहस्यान्तरन्तः- करणवृत्तौ निद्रादिदोपोपप्लतायामभिव्यक्ते वृत्त्यवच्छिन्चैतन्ये स्थिता- Sविद्याऽदृष्टोदोधितनानाविपयसंस्कारसहिता प्रपश्चाकारेण विवर्चताम्। नतु स्वमभ्रमस्यात्मचैतन्यं चेदधिष्ठानं तदाऽध्यस्यमानसामानाधि- करण्येमेदं रजतमयं सर्प इतिवदहं नीलमहं पीतमित्यादिरूपेण अ्तीयात्, न त्विदं नीलमित्यादिपुरोदेशसंवन्धेन। अथ स देशोऽपि चैतन्येऽध्यस्तः, तर्हिं
है। इससे जागरण और स्वप्नमें भी संप्रयोगस्थानीय अन्तःकरणकी वृत्ति ही तृतीय कारण है। और अधिष्ठान भी सर्वत्र जागरण और स्वप्नमें वृत्यवच्छिन्न (वृत्तिप्रतिविम्धित) चैतन्य ही है। शुक्ति आदिका इदमंश आदि तो चक्षु- रादि इन्द्रियसंप्रयोगका ही जनक है। अन्यथा निर्विपयक संपयोगकी उत्पत्ति ही नहीं होगी। कारण कि अधिष्ठान चैतन्यका अवच्छेदक ही उपाधि मानी जाती है। इससे जैसे जागरणमें संप्रयोगसे उत्पन्न अन्तःकरणकी वृत्तिमें अभिव्यक्त शुक्तिरूप इदमंशावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या रजतके आकारमें विवर्तरूप परिणामको प्राप्त होती है वैसे ही स्वप्नमें भी देहके भीतर ही होनेवाली निद्रादि दोपोंसे दूपित अन्तःकरणकी वृत्तिमें अभिव्यक्त वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यमें विद्यमान अविद्या अद्ृष्ट द्वारा उद्बुद्ध किये गये नाना विपयोंके संस्कारोंसे युक्त होती हुई प्रपश्चके आकारमें विवर्तरूपसे परिणामको पा सकती है। स्वप्नमें निरुक्त वृत्यवच्छिन्न आत्मचैतन्य ही है उसमें स्वाप्न पदार्थका अवभास माननेमें अनेक दोप दिखलाते हैं-यदि स्वप्नभ्रमका अधिष्ठान आत्मचैतन्य है, तो अध्यस्यमान (अध्यास-मिथ्याज्ञानका जो विषय है, उस) पदार्थके साथ सामानाधि- करण्य (तादात्म्य) होनेसे 'इदं रजतम्' (यह रजत है) 'अयं सर्पः' (यह सर्प है) इस प्रकारकी प्रतीतिके तुल्य 'मैं नील हूँ' 'मैं पीत हूँ' इस प्रकारकी प्रतीति होनी चाहिए। 'यह नील है' इत्याकारक समीपदेशके सम्बन्धसे नहीं होनी चाहिए। [आत्म- चैतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे 'यह नील है' ऐसी प्रतीति आत्मचैतन्यसे बहिर्भूत
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१४४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
देशोऽहमित्यप्यन्तरेव प्रतिभासेत। अथ मन्यसे अत्यल्पमिदमुच्यते, जागरेऽपि चैतन्यस्यैवाधिष्ठानत्वात् किं तत्र न चोदयसीति ! तर्ह्यस्तु तत्रापि चोदमिति। अत्र ब्रूम :-- किं शरीरावच्छिन्नाहङ्कारसामानाधिकरण्येनान्तः प्रतीतिरापाद्यते उत चैतन्यसामानाधिकरण्येन? नादः, अहङ्कारस्यानधि- ष्ठानत्वात्। न द्वितीय:, इष्टापत्तित्वात् । अन्यथाऽध्यस्तानां स्व्तो जड़ानां स्फुरणं न स्यात्। अहमुल्लेखस्त्वहङ्कारप्रयुक्त इति नात्र चैतन्यमात्रे संजायते।
देशसम्बन्धका अवगाहन करनेवाली इदन्त्वावच्छेदेन तादात्म्यप्रतीति नहीं होनी चाहिए, यह भाव है। ] यदि उस पुरोवर्ती देशको भी आत्मामें अध्य- स्त मानो, तो 'मैं देश हूँ' ऐसा भी अन्दर ही प्रतिभासित होना चाहिए। [आत्मचतन्यके साथ तादात्म्य दिखानेवाली प्रतीति होनी चाहिए, न कि बाह्य देशके साथ, यह तात्पर्य है। ] यदि कहो कि यह आत्मचैतन्यके साथ तादात्म्य- प्रतीतिका अतिप्रसङ्गात्मक दोष तो अत्यल्प है, इसे केवल स्वप्नमें ही क्यों देते हो, जागरण-अवस्थामें चैतन्यको ही अधिष्ठान होनेसे वहांपर भी क्यों नहीं देते ? तो जागरणमें भी यही दोष रहे, इस शङ्काके उत्तरमें हम (वेदान्ती) कहते हैं-क्या [ यद्यपि चैतन्य सर्वत्र व्यापक है और 'सर्व- प्रत्ययवेद्येऽस्मिन् ब्रह्मरूपे व्यवस्थिते' इस रीतिसे सर्व प्रतीतियोंका विषय भी आत्मचैतन्य ही है तथापि स्पष्ट अभित्यक्ति शरीरावच्छेदसे ही होती है और शरीरावच्छेदसे होनेवाली अहमाकार प्रतीति ही मुख्यतः आत्मचतन्यको विषय करती है, ऐसे ] शरीरावच्छिन्न अहङ्कारके साथ सामानाधिकरण्य (तादात्म्य) से अन्तःप्रतीति ('अहं देशः' 'अहं नील' इत्याद्याकारक भीतरी प्रतीति) की आपत्ति दे रहे हो? अथवा (शुद्ध) चैतन्यके साथ सामानाधिकरण्यसे उक्त आपत्ति दे रहे हो? प्रथम विकल्प तो हो नहीं सकता, क्योंकि अहद्कार अधि- छ्ान नहीं माना गया है। द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानना इष्ट ही है। (अर्थात् स्वाप्न पदार्थ अन्दर ही भासित होता है उसका अधिष्ठानभूत आत्मचैतन्यके ही साथ तादासम्य होता है, इसलिए द्वितीय पक्ष इष्ट होनेसे दोषका आपादक नहीं हो सकता) द्वितीय पक्षके इष्ट माननेमें हेतु देते हैं-यदि आत्मचैतन्यको अधिष्ठान न मानो, तो अध्यस्त पदार्थ स्वतः जड़ (अपकाश- स्वरूप) है उसका स्फुरण-प्रकाश नहीं होगा, इससे घटपटादि विषयोंका सुझे
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १४५
ननु घटादयोऽपि शुक्तिरजतादिवत् स्फुरणसमानाधिकृता एवावभासन्ते। यद्येवं तहिं चैतन्य एव तेऽप्यध्यस्यंन्ताम्। न च घटादिस्फुरणं ग्रमाणजन्यं नात्मस्वरूपमिति वाच्यम्, विमतं विपयावच्छिन्नचैतन्यमहङ्कारावच्छिन्नचैत- न्याद्वस्तुतो न भिद्यते उपाधिपरामर्शमन्तरेणाऽविभाव्यमानभेदत्वाद् यथा घटाकाश महाकाशात्। एवं च सति शरीरापेक्षयाऽन्तर्वहिर्विभागं कृत्वाऽहं
ज्ञान हो गया, इस प्रकार आत्म-संसर्गके भानकी उत्पत्ति नहीं होगी। [अब 'अहं नीलः' प्रतीतिका निवारण करते हैं-] प्रतीतिमें 'अहम्' का उल्लेख तो अहक्वारके द्वारा ही होता है, इसलिए यहांपर चतन्यमात्रमें 'अहम्' आकारका उल्लेख नहीं होता है। [आगे प्रतिपादन की जानेवाली युक्तिसे इदमनिदा- त्मक अहंक्कारके द्वारा तत्तत् शरीरेन्द्रिय-संघातमें ही तत्तत् प्रमाताको अहम्का उल्लेख़ करनेवाली प्रतिनियत प्रतीति होती है, घटपटाद्यवच्छेदसे नहीं, यह भाव है]। [स्वाप्न पदार्थ तथा शुक्तिरजत आदि विभ्रम ही नहीं है, वल्कि व्यावहारिक घट, पट, आदि सकल प्रपश्न भी आत्मचतन्यमें ही अध्यस्त है; इस वेदान्त- सिद्धान्तके समर्थनके अभिप्रायसे शक्का करते हैं-] घटादि पदार्थ भी शुक्ति- रजतादिके तुल्य 'सन् घटः स्फुरति' इत्यादि प्रतीतिसे स्फुरणात्मक सद्नूप ब्रह्मके साथ सामानाधिकरण्य (तादात्य) को ही प्राप्त हुए प्रतीत होते हैं। और यदि ऐसा मान लिया जाय (अर्थात् जो जिसके साथ तादात्यापन्न ही प्रतीत होता है वह उसमें अध्यस्त है), तो घट, पट आदि व्यावहारिक पदार्थ भी आत्म- चैतन्यमें ही अध्यस्त मान लिए जायंगे। [ जैसे शुक्तिरजतका स्फुरण परमार्थतः चैतन्यस्वरूप है यह प्रतीति होती है, वैसे घटादिका स्फुरण चैतन्यस्वरूप है, यह प्रतीति नहीं होती, अतः घटादिका अध्यास आत्मचैतन्यमें नहीं हो सकता; इस आशयसे शक्का करते हैं-] इन्द्रियादिप्रत्यक्षप्रमाण द्वारा उत्पन्न घटादिका स्फुरण (ज्ञान) आत्मस्वरूप नहीं है, ऐसा कहना भी नहीं बनता, क्योंकि विमत विपयावच्छिन्न चतन्य (घटादिस्फुरण) अहक्कारावच्छिन्न चतन्यसे वस्तुतः मिन्न नहीं है, उपाधिके परामर्शको छोड़कर भेदप्रतीतिके न होनेसे, जैसे घटाकाश महाकाशसे वस्तुतः भिन्न नहीं है। [जैसे घटाकाश और महाकाशमें केवल घटरूप उपाधिका उल्लेखमात्रविशेप है, और आकाशसामान्य उभयत्र समान है वैसे ही विपयावच्छिन्नचैतन्य और अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्यमें भी केवल १९
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१४६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
नाहमित्यात्मानात्मव्यवहारोऽहङ्कारोपाधिकोऽवगन्तव्यः। अन्तर्वहिर्व्यापतश्व एकस्यापि चैतन्यस्यानन्तत्वादुपपद्यते। न हि चैतन्यमणुपरिमाणम्, शरीरव्यापित्वेनोपलम्भात्। नापि निरवयवस्योपाधि विना मध्यमपरि माणं युज्यते। ततः सर्वगतचैतन्येऽधिष्ठाने जागरणव्यवहारः पारमार्थिक- त्वेनाभिमतोऽप्यध्यस्तः किमु वक्तव्यं स्वम्स्तत्राध्यस्त इति। ननु 'नाम ब्रह्मेत्युपास्ते' इत्यादौ नामादिषु ब्रह्मदृष्टयध्यासो विधीयते। तत्र कथ कारणदोपमन्तरेण भ्रम इति चेद्, मैवम् ; तत्र हि मानसी क्रियैच
विषय और अहक्काररूप उपाघिमात्रकृत विशेष है चैतन्यसामान्य उभयत्र समान ही है, अतः दोनों चैतन्योंमें पारमार्थिक कोई मेद नहीं है। इस अनुमानसे घटादिका स्फुरण आत्मस्वरूप ही है और आत्म-चैतन्यमें ही अध्यस्त है, यह सिद्ध किया गया ।] इस निर्दिष्ट प्रकारसे शरीरकी अपेक्षा भीतर अथवा बाहर इन दो विभागों की कल्पना करके 'अहम्' (मैं) 'नाहम्' (मैं नहीं) यह इस प्रकार आत्मा और अनात्माका व्यवहार अहङ्काररूप उपाधिके कारण है, ऐसा समझना चाहिए। और एक ही चतन्यका भीतर या वाहर सर्वत्र रहना अनन्त-व्यापक होनेसे उपपन्न है। चैतन्य अणुपरिमाण तो है ही नहीं जिससे एक कालमें एक ही छोटेसे स्थानमें उसका रहना हो, क्योंकि सम्पूर्ण शरीरमें उसकी व्याप्तिका उपलम्भ होता है। और निरवयव पदार्थका उपाधिसंसर्गके विना मध्यमपरिमाण (शरीरादिपरिच्छेदसे परिच्छिन्न परिमाण) होना भी सङ्गत नहीं है। इस हेतुसे जागरणकालमें पारमार्थिकरूपसे माने गये घट, पट आदि सकल व्यवहार सर्वगत चैतन्यरूप अधिष्ठानमें ही जब अध्यस्त हैं तब स्वप्न उस सर्वगत आत्म-चैतन्यमें ही अध्यस्त है, यह कहनेकी आवश्यकता ही क्या है ? अर्थात् बिना कहे ही यह सिद्ध है कि स्वप्न आत्म-चतन्यमें ही अध्यस्त है। [इतने पूर्वोक्त ग्रन्थके विचारसे स्वप्नादिपदार्थज्ञानमें भ्रमलक्षणकी अव्याप्तिका परिहार किया गया अव नामोपासनादिमें अतिव्याप्तिका परिहार करनेके लिए शक्का करते हैं-] 'नाम व्रह्मेत्युपास्ते"* (नामको ब्रह्म समझकर उसकी उपासना करे) इत्यादि श्रुतिसे नाममें ब्रह्मदृष्टिरूप अध्यासका विधान किया जाता है और अध्यास भ्रम है वह कारणदोषके बिना कैसे उपपन्न होगा? इस प्रकारकी शङ्का भी ठीक श्रुतिमें तो 'नाम व्रह्मेत्युपासीत' ऐसा. पाठ है।
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अध्यासविचारं ] भांपांनुवादसहित १४७
विधीयते, न ्रान्तिज्ञानम्; अपुरुपतन्त्रस्याविधेयत्वात्। न च देवता- स्मरणनग्नस्त्रीविस्मरणयोरिच्छाधीनत्वात् पुरुपतन्त्रमेव ज्ञानमिति वाच्यम्, तन्रापि मनस ऐकाग्रयापादने स्मृतिहेतौ विस्मृतिहेती च विपयान्तरप्रवर्चने पुरुपस्य स्वातन्त्र्यं न स्मृतिविस्मृत्योरित्यङ्गीकार्यत्वात्। अन्यथा पौनः पुन्येनावृत्तिमन्त्रेण सकृदधीतवेदादिकं कदाचित् पुरुपेच्छया झटिति स्मरेत्, पुत्रमरणादिकं च सद्य एव विस्मरेत्। तस्मान्न भ्रमो विधेय इति भ्रमस्य कारणत्रितयजन्यत्वं न व्यभिचरति। परत्र परात्मतावभास इत्येवंरुपतायां तु न कस्यचिदपि विवाद:। अख्यातिवादिनाऽपि संसृष्टव्यवहारसिद्धये
नहीं है, क्योंकि 'नाम व्रह्मेत्युपासीत' (नामको व्रह्म समझकर उसकी उपासना करे) इत्यादि श्रुतिमं मानसी-किया (उपासना) का ही विधान है, भ्रमज्ञानका नहीं, क्योंकि जो वस्तु पुरुपके व्यापारके अधीन नहीं है उसका विधान नहीं हो सकता। [ज्ञान पुरुपके व्यापारके अधीन नहीं है, क्योंकि इन्द्रियादिसंप्रयोग होनेपर वह अपने-आप ही उत्पन्न हो जाता है। यहांपर पुरुपमं 'कर्तुम्-अकर्तुम्-अन्यथाकर्तु वा' (करने, न करने या विपरीत करनेकी) कुछ भी सामर्थ्य नहीं है, अन्यथा दुर्गन्धका अनुभव या कट् शब्दोंका प्रत्यक्ष किसीको भी नहीं हो सकता। ] देवताके स्मरण और नम स्त्रीके विस्मरणके इच्छाके अधीन होनेसे ज्ञान मी पुरुषाधीन है ही, यह भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि चहांपर भी स्मृतिके कारण मनके ऐकाय्यसम्पादनमें और विस्मृतिके कारण विषयान्तरकी प्रवृत्तिमें पुरुपका स्वातन्त्र्य है न कि स्मृति या विस्मृति रूप ज्ञानकी उत्पत्तिम, ऐसा माना गया है। यदि ऐसा न मानकर स्मरण और विस्मरणमं भी पुरुपका स्वातन्त्र्य मान लिया जाय, तो पुनः पुनः आवृत्ति किये विना भी एक वार ही पढ़े हुए वेदादि ग्रन्थोंका जब कभी पुरुप चाहे अपनी इच्छामात्रसे शीघ्र स्मरण कर लेगा और पुत्रमरण आदि (अनिष्ट प्राप्तिजन्य शोक) जल्दी ही भूल जायगा, यह दोप उपस्थित होगा; इसलिए भ्रम (अध्यास) का विधान नहीं किया जा सकता। अतः वह इन्द्रियसंप्रयोग आदि तीन कारणोंसे उत्पन्न होता है, इसका कहीं भी व्यभिचार नहीं है। 'अन्य वस्तुका अन्य वस्तुके रूपसे अवभास होना' इस अंशमें तो किसीको भी विवाद नहीं है। अख्यातिवादी (मीमांसक) को भी संसष्टव्यवहार ('इदं
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१४८ विवरणप्रमेयसंग्रहं [ सूत्र १, वर्णक ३
मानसस्य संसर्गज्ञानस्य संसर्गाभिमानस्य वा वलादङ्गीकार्यत्वात्। इतरे त्वधिष्ठानाध्यस्यमानयोः स्वरूपदेशकालविशेेपु विवदमाना अपि नोक्त- भ्रमस्वरूपे विवदन्ते। ननु शून्यवादी शून्य एव संवृतिबलाद्रजतादिभ्रमं वदन् परत्रेत्युक्तं सद्रूपाधिष्ठानं न सहते। न च निरधिष्ठानभ्रमासंभवः, केशोण्ड्रकगन्धर्व- नगरादिभ्रमस्य त्वन्मतेऽपि तथात्वात्। न च निरवधिकवाधासंभवः, 'न सर्पः' इत्याप्वाक्यस्य वाधकस तथात्वादिति। नैतत्सारम्, अङ्गुल्या-
रजतम्' इस प्रकार इदंपदवाच्यमें रजतत्वके सम्बन्धविशिष्टज्ञान) की सिद्धिके लिए मानस संसर्गज्ञान अथवा संसर्गाभिमानको हठात् मानना ही पड़ेगा। आत्मख्याति या अन्यथाख्यातिवादी प्रभृति अन्य सब वादी तो अधिष्ठान (शुक्त्यादि) और अध्यस्यमान (रजत आदि) के स्वरूप, देश और काल विशेषोंमें विवाद करते हुए भी 'अन्यमें अन्यका अवभास' लक्षण अ्रमके स्वरूपके विषयमें कुछ भी विवाद नहीं करते। [ परत्रपदसे अभिमत अधिष्ठानको न माननेवाला बौद्ध भ्रमलक्षणमें विवाद करता हुआ शङ्का करता है-] शून्यवादी बौद्ध शून्यमें ही साम्वृत्तिक सत्तासे रजतादिभ्रमका समर्थन करता हुआ परत्रपदसे कहा गया जो सद्रप अधिष्ठान है, उसका सहन नहीं करता हुआ अपने पक्षका स्थापन करता है-निरधिष्ठान (बिना अधिष्ठानके ) भ्रम हो नहीं सकता, ऐसा आप नहीं कह सकते; क्योंकि केशोण्डरक या गन्धर्व नगर आदि भ्रम तुम्हारे (वेदान्तीके) मतमें भी बिना अघिष्ठानके ही होता है (अर्थात् शुक्तिज्ञान होनेके अनन्तर रजतका 'नेदं रजतम्' वाधसे शुक्ति सत्य रहती है उसका बाध नहीं होता वह बाघित न होनेसे ही बाधकी अवधि कहलाती है ] अतः वाध अवधिके सहित ही होता है, ऐसा भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि 'न सर्पः' (सर्प नहीं है) यह आपवाक्यस्वरूपबाध निरबधिक होता है [ अर्थात् जिस भ्रमका बाध आपके अभिमत अधिष्ठानके ज्ञानसे नहीं हुआ बल्कि 'सर्प नहीं है' इस आप्- वाक्यसे हुआ, उस वाधमें कुछ भी अवधि नहीं है, और जो सर्प भासित हुआ उसका बाघ हो गया, अधिष्ठान है ही नहीं, उसका ज्ञान भी नहीं है, यह भाव है]। इस बौद्धकी शङ्काका उत्तर देते हैं-यह कहना यथार्थ नहीं है, कारण
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अंध्यासविचार ] भांपानुवादसहित १४९
5पाङ्गावष्टम्भे सति वेष्टितानां नेत्रर्मीनां केशोण्ड्रकाविष्ठानत्वाद्। आकाशस च गन्धर्वनगराधिष्ठानत्वात्। अन्यथा शून्यज्ञानस्यापि भ्रमत्वप्रसङ्गात्। तथात्वे च शून्यासिद्धेः। ज्ञानज्ञेयभ्रमयोरन्योन्याधिष्ठा नत्वे चाधिष्ठानस् पूर्वभावित्वेनान्योन्याश्रयत्वात्। वीजाङ्करन्यायेन ज्ञान- ज्ञेयव्यक्तीनां परम्पराभ्युपगमेऽपि वीजाङ्कुरप्रवाहानुगतमृद्दद् ज्ञानज्ञेय- प्रवाहानुगतस्य स्थायिनः कस्यचिदभ्युपगन्तव्यत्वात्। तदनभ्युपगमे
कि अङ्गुलीसे अपाङ्गभागमें नेत्र दवाकर मलनेसे एकत्रित हुई नेत्रकी किरणें ही केशोण्ड्रकके अविष्ठान हैं और आकाश गन्धर्वनगरका अधिष्ठान है। नहीं तो शून्य ज्ञानको भी अ्रमत्वका प्रसङ्ग हो जायगा। ऐसा होनेपर शून्यकी ही असिद्धि हो जायगी। (भ्रमसे साध्यकी सिद्धि नहीं होती और निरधिष्ठानक भी भ्रम हो सकता है, ऐसी दशामें शून्य ज्ञान भी शुकतिरजतज्ञानके तुल्य निरधिष्ठानक होनेसे भ्रम कहला सकेगा।) 'रजतका अधिष्ठान भ्रम और भ्रमका अधिष्ठान रजत' इस ग्रकार ज्ञेय-रजतादि और भ्रम-ज्ञान इन दोनोंको परस्पर अधिष्ठान मान लेनेमें अन्योन्याश्रय दोप होगा, क्योंकि अधिष्ठानका अध्यस्यमानसे पूर्वकालमें रहना आवश्यक है। (भ्रम और रजतको एक दूसरेका अिष्ठान मानकर भ्रमकी साधिष्ठानता सिद्ध नहीं हो सकती, अतः अन्य तृतीय सत्यको अधिष्ठान मानना ही होगा) वीजाङ्करन्यायसे ज्ञान (भ्रम-ज्ञान) और ज्ञेय (रजतादि) व्यक्तियोंकी परम्परा माननेपर भी वीजाङ्करप्रवाहमें अनुगत मिट्टीकी भाँति ज्ञान और ज्ञेयके प्रवाह (परम्परा) में अनुगतरूपसे प्रतीत होनेवाली किसी स्थायी वम्तुको अवश्य ही मानना होगा। [जैसे घट और कपालमें परस्पर अन्वित-अनुगत मृत्के अन्वयसे कार्यकारणभावकी उपपत्ति होती है वैसे ही परस्पर अन्वित वीजाङ्करमें अन्वयी- अनुगत तदारम्भक कारण द्रव्यके अन्वयसे कार्यकारणभावकी उपपत्ति होती है और बीजाङ्करपरम्परामें जिस वीजसे जो अङ्कर उत्पन्न हुआ है उसी अङ्करसे अपने कारण स्वरूप वीजकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु दूसरे वीजकी उत्पत्ति होती है एवम् यह बीज भी पुनः दूसरे अङ्करको उत्पन्न करता है, अपने कारणभूत अङ्करक्को नहीं। और इस प्रकार एकत्र वीजाङ्करमें कार्यकारणका ग्रह हो जानेपर उस गृहीत कार्य- कारणभावको लेकर अदृष्ट बीजाङ्करपरम्परामें भी कार्य-कारणभावका ग्रह हो जाता है अतः बीजाङ्करपरम्परामें अनवस्था तथा अन्योन्याश्रय दोष नहीं आता और
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१५० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
चाऽदष्टकल्पनायामन्धपरम्परापत्तेः । 'न सर्पः' इत्याप्तवाक्यवाधस्यापि किंतु रज्जुरित्येतत्पर्यन्तत्वेन सावधिकत्वात्। किमप्यत्र नास्ति वृथा त्वं विभेपी- त्येवंरूपवाधेऽप्यत्रेत्युक्तस्य पुरोदेशसयैववधित्वाद्। जगत्कारणत्वेन पररुच्य- मानं प्रधानं नास्तीत्यादिवाधेऽपि संप्रतिपन्नजगत्कारणमात्रस्यात्धित्वात्। यत्रापि मायाविनिर्मितहस्त्यश्वरथादावन्यत्र वा निरधिष्ठानभ्रमं निरवधिकवाधं च त्वं शकसे तत्रापि भ्रमवाधयोः साधकं साक्षिचेतन्य- मेवाधिष्ठानमवधिश्च साद। न च तदपि वाध्यम्, तद्ाधस साधकाभावात्।
अ्रममें तो जिस अ्रमज्ञानमें जो रजत भासित हो रहा है उन्हीं दोनोंमें प्रथम-प्रथम कार्यकारणभावका ग्रहण होता है, अतः अन्योन्याश्रय तथा अनवस्था दोष विद्यमान ही है, यह खण्डनका आशय है।] उक्त आशयसे ही खण्डन करते हैं-यदि कोई अनुगत स्थायी कारण नहीं मानते हो, तो अदष्टकी कल्पना करनेमें अन्ध-परम्पराके प्रसङ्गकी आपत्ति अवश्य आ सकती है। [आपवाक्यस्वरूपवाध निरवधिक है, इस पूर्वोक्त कथनका खण्डन करते हैं-] 'सर्प नहीं है' इस आप्तवाक्यस्वरूपव्वाधका भी 'किन्तु रज्जु है' यहां तक तात्पर्य होनेसे आपवाक्यरूपवाध भी सावधिक हो ही गया। [ अर्थात् 'सर्प नहीं' यह सुननेपर 'तो क्या है ?' ऐसी अपेक्षाका नित्य उदय होनेसे पुरोवर्ती वस्तुमात्र अवधि विद्यमान ही है, इस अभिप्रायसे कहते हैं-] और 'यहां कुछ भी नहीं है, व्यर्थ ही तुम डर रहे हो' इस प्रकारके वाधमें भी 'यहाँ' इस पदसे उपस्थित हुआ पुरोदेश (सामनेका स्थल) ही अवधि विद्यमान है। 'दूसरे दार्शनिकों (सांख्यमतानुयायियों.) से जगत्का कारण माना हुआ प्रधान नहीं है' इस बाधमें भी सर्वसम्मत जगत्का कारणमात्र ही अवधि है। [केवल त्रिगुणत्व- मात्रका अभावोधन होता है, ऐसा ही 'परमाणवो न सन्ति' (परमाणु नहीं हैं) इस बाधमें भी समझना चाहिए। निमित्ताSभिन्नविवर्तोपादनकारण त्रह्मरूप सदघिष्ठान सर्वत्र अवधि है, उसका वाध नहीं होता, अन्य प्रधान परमाणु आदिका बाध होता है, यह तात्पर्य है। ] जिन मायारचित हस्त्यश्वादि स्थलमें या अन्यत्र दूसरे स्थलोंमें जहाँ भी आप निरधिष्ठान अ्रमकी शक्का करते हो उन स्थलोंमें भी भ्रम या वाधका साधक साक्षी, चैतन्य ही अधिष्ठान या अवधि होगा। ['भ्रमविपयके वाधित होनेसे भ्रमका
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १५१
अन्यस्य च सर्वस् जड़त्वात्। न च शून्यस्याधिष्ठानत्वम्, अध्यस्- मानेष्वनुगत्यभावात्। भावे वा भ्रान्तिकाले शून्यं रजतमिति प्रतीयाद्, न त्विदं रजतमिति। इदमिति प्रतीयमानमेव शून्यमिति चेत्, तर्हिं नाममात्रे विवाद:। नापि शून्यस्यावधित्वम्, सर्ववाधे तदप्रतीतेः। प्रतीतौ चा, चैतन्यमेव शून्यनाम्नाऽभिधीयते। नापि शून्यस्याध्यसमानत्वम्, तथा सत्यध्यस्तस्यापरोक्षप्रतीत्यभावप्रसङ्गात् । अथ शून्यवादिनः ग्रति-
भी बाध और अ्रमके वाधित होनेसे उस वाघित अ्रमका अवभास करानेवाले साक्षि-चैतन्यका भी वाध हो गया, इस आशयसे शक्का-समाधान करते हैं-] साक्षि-चैतन्यका भी वाध कीजिए? नहीं, उसका बाध नहीं कर सकते, क्योंकि साक्षि-चतन्यके वाधका कोई साधक नहीं है। साक्षि-चैतन्यसे अतिरिक्त सब वस्तु जड़रूप है। [ यदि भ्रमका अधिष्ठान प्रकाशस्वरूप साक्षि-चैतन्य न हो अर्थात् उसका भी वाध हो, तो भ्रमका प्रतिभास ही नहीं हो सकेगा, और प्रतिभासके अनुभवसिद्ध होनेसे उसका अपलाप कर नहीं सकते। 'भ्रम वाधित है' इसका तात्पर्य इतना ही है कि वोधमें मिथ्या रजतादिका संसर्ग ही वाघित है न कि बोध ही। शुद्ध वोधस्वरूप तो अधिष्ठानरूपसे शेप रह जाता ही है] शून्यको अधिष्ठान मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि अध्यस्यमान (भ्रमके विषय रजतादि) में शून्य अनुगम्यमान नहीं है। [सद्रृप अधिष्ठान तो 'सदिदं रजतम्' इस अनुभवबलसे सर्वत्र अन्वयी है।] यदि शुन्यको अन्वयी मान लिया जाय, तो अ्रमदशामें 'शून्य रजत है' इस प्रकारकी प्रतीति होनी चाहिए, 'यह रजत है' ऐसी प्रतीति नहीं। यदि 'इदम्' (यह) इस प्रतीतिका विषय होने- वाला ही शून्य है, ऐसा मानो, तो केवल नाममात्रमें विवाद रहा। [अतिरिक्त माननेमें दोप देते हैं-] और शून्यको अवधि भी नहीं मान सकते, क्योंकि सब वाधके अनन्तर शून्यकी प्रतीति नहीं होती। यदि प्रतीति होती है, ऐसा आप कहते हैं, तो इसका मतलब यह है कि चैतन्य ही को आप शून्यनामसे कह रहे हैं। [ इतने ग्रन्थसे अधिष्ठानकी शून्यताका निराकरण किया गया। अब अध्यस्यमान विपयकी शून्यताका निराकरण करते हैं-] शून्यको भ्रमका विपय होना भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर अध्यस्त. विपयके प्रत्यक्षावभासके अभावका प्रसङ्ग हो जायगा। यदि
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१५२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत १, वर्णक १
भासमात्रनिराकरिष्णोरिष्टमेवतत्, तर्हि तन्निराकरणमपि न ग्रतिभासेतं। ननु तवाप्यध्यस्तस्य शून्यत्वं मतमेवेति चेद्, न; वाघप्रतियोगि- त्वस् सिद्धये तत्प्रतीतिकाले सदसद्वैलक्षण्याङ्गीकारात्। वाधादूर्ध्व तु भवत्येव शून्यत्वम्। विनष्टस्य अन्यतायाः कस्याप्यविवादात्। ये तु वाधितसय रजतादेरन्यत्र सच्मिच्छन्ति तेपां कि वाधकज्ञानमेव तद्गमक किं वेह वाधानुपपत्तिः१ नाद्यः, नेदं रजतं किन्तु देशान्तरे बुद्धौ वेत्यक्ष्णा- इनवगमात्। आपवाक्येनाप्यभिहितो रजताभाव एव गम्यते, न त्वदुक्त मन्यत्र सच्चम्।
शून्यवादी-हम तो प्रतिभासमात्रका निराकरण करना अपना इष ही समझते हैं [ तब भ्रमकी प्रत्यक्ष प्रतीति न होनेका प्रसङ्ग कोई दोप नहीं है ]-ऐसा कहकर समाधान करे; तो उसके निराकरणका भी प्रतिभास न होगा। [क्योंकि प्रति- भासमात्रके निषेधसे निराकरणके प्रतिभासका भी निपेध हो गया। और आपके अभीष्टका भी स्वयं आपको भान नहीं होगा, इससे आपका सब प्रयास ही विफल हो जायगा, यह भाव है। ] आपको (वेदान्ती) को भी तो अध्यस्त रजतादिका शून्य मानना अभीष्ट ही है, यदि ऐसा कहो, तो यह नहीं कह सकते, क्योंकि हम (वेदान्ती) बाध- प्रतियोगित्वकी सिद्धिके लिए रजतादिको प्रतीतिके समय सदसत्से विलक्षण (अनिर्वचनीय) मानते हैं। वाधके अनन्तर तो उसमें (अध्यस्त रजतादिमें) शून्यत्व है ही। विनष्ट हुई वस्तुकी शुन्यतामें किसीको भी विवाद नहीं है। ['यद्यपि विनाशके अनन्तर सब वस्तुओंका शून्यत्व रहता है। यह सर्वसम्मत है। तथापि भ्रमसे प्रतीयमान रजतादिका वाध होनेपर शून्यत्व नहीं रहता, क्योंकि वह देशान्तरमें विद्यमान ही रहता है' इस किसी एकदेशी के मतका अनुवाद कर खण्ड़न करते हैं-] जो वादी बाधित रजतादिका दूसरे स्थानोंमें सत्त्व मानते हैं [ उनसे हम (वेदान्ती) विकल्प करते हैं कि ] उनके मतमें क्या बाधक ज्ञान ही अन्यत्र सत्ताका साधक है? अथवा यहाँपर बाधकी अनुपपत्ति: इनमें पहिला पक्ष नहीं बन सकता, क्योंकि 'यह रजत नहीं है किन्तु देशान्तरमें (आपण आदिमें) अथवा बुद्धिमें है' इस तरहका प्रत्यक्ष चक्षुसे नहीं होता है। और 'नेदं रजतम्' इस, आपवाक्यसे भी अभिहित (अभिधा शक्तिसे
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १५३
इह वाधानुपपत्तिश्र न तावहवादिसिद्धा, अन्यथाख्यातौ संसर्गस्यात्म- ख्याती च वहिष्ट्रस्यान्यत्र सत्वमन्तरेणेवेह ाघाङ्गीकारात् । अख्याति- वादिनाऽपि छुक्तौ रजतगोचरमिथ्याज्ञानस्य प्रतिवादिप्रसिद्धस्यान्यत्र सच्चमनङ्गीकत्यैवेह निषेध: क्रियते। नापि लोकसिद्धा, इह भग्नघटस्यान्यत्र सच्व विनंव निषेधात्। तर्हि घटवदेव कालभेदेन तत्र सच्चमस्त्विति चेद, न; पूर्वमत्र घटोऽभृनेदानीमितिवत्कालविशेपोपाधौ निपेधाभावात्। निरुपा- बोधित) रजताभाव ही प्रतीत होता है, न कि आपका कहा हुआ, अन्यत्र सत्त्व (आपण आादि या बुद्धिगें रह्ना)* । [यहाँपर अन्यत्र सत्त्वके बिना वाधकी उपपत्ति नहीं हो सकती (अर्थात् जिस अधि- करणमें जिस वस्तुका प्रतिभास हो रहा है उसी अधिकरणमें उसका अभाव तभी ग्रसिद्ध हो सकता है, जब कि उसका अन्यत्र सत्त्व हो) एतदर्थक द्वितीय पक्षका निराकरण करते हैं-] यहाँपर वाधकी अनुपपत्ति भी सकलवादिसिद्ध नहीं है, क्योंकि अन्यथा- ख्यातिवादमें संसर्गके और आत्मख्यातिवादमें वहिष्ट्रके अन्यन्न सत्त्वके बिना ही बाधका अज्ीकार किया गया है। अर्यातिवादी भी शुक्तिमें अन्य- वादियोंके मतमें प्रसिद्ध रजतविपयक मिथ्याज्ञानका (अन्यत्र) सत्त्व माने बिना ही यहाँपर निषेध करता है। [वाधकी अन्यथा अनुपपत्ति ] लोकसे भी सिद्ध, नहीं है, क्योंकि यहाँपर नष्ट हुए, घटका अन्यत्र सत्त्वके विना ही निपेध होता है। तब तो ऐसी दद़ामें घटके तुल्य कालमेदसे वहाँ (अ्रमात्मक रजतस्थलमें) रजतका सत्च मान लिया जाय ? अर्थात् जैसे घटका निपेधकालमें अभाव और उससे अन्य कालमें सत्त्व रहता है वैसे ही 'नेदं रजतम्' इस निपेध- कालमें भी रजतका अभाव और तदितर प्रतिभासकालमें सत्त्व मान लिया जाय ? क्या हानि है, तो ऐसा मानना भी ठीक नहीं है, कारण कि 'पहले यहाँपर घट था, * 'न त्वनुक्तम्' ऐसा भी पाठान्तर मिलता है, जिसका अर्थ यह है-अभिधासे नहीं कहा गया प्रतीत नहीं होता है। तात्पर्य यह है कि वाक्य दो प्रकारके होते हैं-एक मुख्य वृत्ति (अभिधा यक्ति) से अर्थका वोध करानेवाले, जसे 'घटमानय'। और दूसरे जहांपर मुख्य वृत्तिसे उपस्थित अर्थका वाध होता है, ऐसे स्थलोंमें अमुख्य वृत्ति (लक्षणा) से अर्थका बोध करानेवाले, जसे 'गन्नायां घोपः' । प्रकृतमें 'नेदं रजतम्' वाक्यमें लक्षणाके बीज वाधादिके न होनेसे लक्षणाका अवसर तो है नहीं, मुख्य वृत्ति (अभिधा) द्वारा उक्त आप्तवाक्य रजतके देशान्तरवर्तित्वका बोध नहीं करा सकता; वाक्य अभिहित पदार्थके संसर्गका ही वोध करा सकता है। विधरणके अनुसार 'न त्वनुक्तम्' पाठ ही समीचीन प्रतीत होता है।
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१५४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
धिकनिषेधश्र परंमार्थरजतस्यात्र कालत्रयेऽपि शून्यत्वादुंपपद्यते। तच्छन्यत्वं चोत्तरकाले मिथ्यैव रजतमभादिति परामर्शादवगम्यते, अन्यथा सत्यमेवा- भादिति परामृश्येत। भ्रान्तिकालप्रतीतिस्तु मिथ्यारजतमात्रेणाप्युपपद्यत- एव। तच्च मिथ्यारजतं सोपादानं शुक्तितत्वज्ञानेन वाध्यते। न चास्य बाधकज्ञानस्यान्यत्र रजतसचासाधकत्वं शङ्गितुमपि शक्यम्। ततो वाधा- दुपरि समारोप्यस्य शून्यत्वेऽपि पूर्व सद्ूपाधिष्ठाने .मिथ्यावस्त्ववभासः शून्यवादिनाप्यभ्युपेयः। इस समय नहीं है' इस प्रतीतिके समान कालविशेपरूप उपाधिमें निपेधका अभाव है।[अमके वाधमें दष्टान्त विषम है, दष्टान्तभूत भमन घटके वाघमें 'नेदानी' घट:, (इस समय घट नहीं है) इस प्रकारके निषेधसे वर्तमानकालमें घटका अभाव बोधित होता है। और दार्ष्टान्तिक भ्रमवाधमें 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस निषेधसे किसी कालविशेषमें नहीं, बल्कि कालमात्रमें रजतका अभाव बोधित होता है, अंतः प्रतिभाससे अन्य कालमें भी रजतका सत्त्व नहीं माना ज़ा सकता। इससे न होनेवाला भी जो प्रतिभास हो रहा है, वही अनिर्वचनीयकी : उत्पत्ति सिद्ध करता है, जिससे 'मिथ्यैव रजतमभात्' यह बोधका परामर्श होता है, यह भाव है। ] उक्त आशयसे कहते हैं-किसी कालकाा उल्लेख किये बिना ही निरुपाधिक निषेध यहाँपर परमार्थरजतके तीनों कालमें भी शून्यत्व ( न होने) से ही उपपन्न हो सकता है। और उस परमार्थरजतकी शून्यताकी प्रतीति 'मिथ्या ही रजत ग्रतीत हुआ था' इस वाधकालसे उत्तर होनेवाले पसामर्शसे पतीत होता है,, अन्यथा (नहीं तो. 'सत्य ही रजत प्रतीत हुआ था' ऐसा परामर्श होना चाहिए था.। भ्रमकालमें होनेवाली प्रतीति (प्रतिभास) तो मिथ्यारजतका ही आलम्बन करके बन सकती है। और वह मिथ्यारजत अपने उपादान (अविद्या) के सहित शुक्तितत्व (अधिष्ठानतत्त्व ) के ज्ञानसे वाधित हो जाता है। यह बाधकज्ञान अन्य देशकालादिमें रजतकी परमार्थ सत्ताका : साधक है, ऐसी शङ्का किसीको हो भी नहीं सकती है अर्थात् अधिकरण माने गये देशमें काल और वस्तु रूप उपाधियोंके अविशेषसे किया गया निषेध अन्यत्र सत्ताका बोधक कैसे हो सकेगा? [ अब 'निरधिष्ठानक भ्रम नहीं हो हो सकता' मूलमें की गई. इस प्रतिज्ञांका उपसंहार करते हैं-] इससे वाधके अनन्तर समारोप्य (रजतादि) का शून्यत्व सिद्ध होनेपर भी बाधसे पूर्वकालमें
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अंध्यासविचार. ] भापांतुवादसहित. १५५
नन्विदं रजतं ह्ौ चन्द्रमसावित्यादिष्वधिष्ठानप्रंतीतिसंस्कारदोपाख्य: कारणत्रितयजन्यत्वेन तंटस्थलक्षणेन. सत्यस्याधिष्ठानस्य मिध्यात्मतावभासा- दुत्पन्नेन स्वरूपलक्षणेन च.लक्षितो भ्रमोऽस्तु नाम, आत्मनि त्वहङ्कारादि- रूपभ्रमो वा जीवव्रह्मरूपेणानेकजीवरूपेण च भेदभ्रमो वा कथं घटिष्यते लक्षणासंभवाद। तथाहि-तत्र तावदोपस्त्रिविधः-विपयगतः सादंश्यादि: करणगतस्तिमिरादि: द्रष्टृगतो रागादिश्चेति । अत्र चात्मव विषय- करणद्रष्ाख्यत्रितयस्थानीयः, अन्यस्य सर्वस्याध्यस्यमानकोटित्वात्। न चाद्वितीये निष्कलङ्कस्वभावे चात्मन्युक्तदोपा अन्यतो वा स्वतो वा संभवन्ति। कथचिदविद्याख्यस्यावास्तवदोपस्य संभवेऽप्यध्यस्ताहङ्कारादि-
शुक्त्यादि सद्ूप अधिष्ठानमें मिथ्या वस्तुका ज्ञान शून्यवादी भी मानता ही है। [ त्रह्ममें अहङ्कारादि प्रपञ्चाध्यासके ऊपर किये गए वादियोंके पूर्वपक्षोंका निरा- करण करनेके लिए अनुवाद करते हैं-] 'यह रजत है', 'दो चन्द्रमा हैं' इत्यादि स्थलोंमें 'अधिष्ठानकी सामान्यसे प्रतीति, संस्कार, तथा दोष इन. तीन कारणोंसे उत्पन्न होना' इस तटस्थलक्षण तथा 'सत्य अधिष्ठानको मिथ्यावस्तुके रूपमें समझना' इस स्वरूपलक्षणसे लक्षित किया गया भ्रम माना जा सकता है, परन्तु आत्मा (त्रह्म) में तो अहङ्कारादिरूप भ्रम, जीव-ब्रह्मरूप भेदभ्रम और अनेक जीव भेद्रम कैसे सङ्गत हो सकता है, क्योंकि इसमें अ्रमके पूर्वोक्त दोनों लक्षण नहीं मिलते। कारण कि इन तीन कारणोंमेंसे दोपरूप कारण तीन पकारका है- एक तो विपयमं सादृश्य आदि, दूसरा इन्द्रियमें तिमिर आदि रोग और तीसरा द्रष्टामें राग (रजत आदिकी उत्कट इच्छा)। इस प्रकृत अहक्कारादि प्रपञ्चाध्यास स्थलमें आत्मा ही विषय, करण,द्रष्ट इन तीनोंके स्थानमें है. अर्थात् आत्मा ही अहङ्काररूप द्रष्टा, दृश्य-विपय और इन्द्रिय है, इससे अतिरिक्त सकल पदार्थ अध्यस्यमान कोटिमेंसंत्य आत्मरूपी अधिष्ठानमें आरोपित की जानेवाली मिथ्या वस्तुकी पङंक्तमें-हैं, अर्थात् हैं ही नहीं। और अद्वितीय निष्कलक्कस्वभाव आत्मामें पूर्वोक्त तीनों प्रकारके दोप न तो किसी बाहरी आगन्तुक कारणसे, आ सकते हैं I क्योंकि उसके : निष्कलक्क स्वभाव होनेसे कोई भी. बाहरी दोपानुषङ्ग उसमें नहीं आ. सक़ंता] और न अपने-आप ही उसमें ठहर सकते हैं। किसीतरह अविद्यानामक मिथ्या दोपका सम्भव होनेपर भी अध्यस्त
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१५६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक है
प्रतिभासो न कारणत्रितयजन्यः, तस्य नित्यात्मचैतन्यरूपत्वाद्। यद्यपि शुक्तिरजतादिस्फुरणमपि चैतन्यमेव तथापि तस्य सोपाधिकस्य संभवत्यौ- पचारिकं जन्म, अत्र तु उपाधिरप्यध्यस्तकोटिस्थ एव तत्कथं निरुपाधिकस्य जन्म १ ततो नास्ति तटस्थलक्षणस्। तथेतरदपि नास्त्येव, सत्यत्वेऽप्यधिष्ठानत्वासंभवात्। अधिष्ठानं हि सामान्येन गृहीतं विशेपेणागृहीतम् । आत्मा तु निःसामान्यविशेप: कथमधिष्ठानं स्यात्! आत्माऽधिष्ठानं वस्तुत्वात् शुक्यादिवदिति चेद्, न; परप्रकाश्यत्वस्योषाधित्वात्। तहिं सिद्धान्तरहस्यानुसारेणैवमनुमीयताम्- अहक्कारादिका प्रतिभास निरुक्त तीन कारणोंसे उत्पन्न हुआ नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह नित्य आत्म चैतन्यरूप है। यद्यपि शुक्तिरजतादिका प्रतिभास भी चैतन्यरूप ही है तथापि सोपाधिक होनेसे उसका औपचारिक (अध्यस्त) जन्म हो सकता है, और इस प्रकृत अहङ्कारस्फुरणमें तो उपाधि भी अध्यस्त पङिक्तमें ही है, तब निरुपाधिकका जन्म कैसे हो सकता है? इससे तटस्थ- लक्षणका यहांपर सम्भव नहीं है। [यद्यपि शुक्तिरजतस्थलमें भी 'सर्वप्रत्ययवेद्येऽ- स्मिन् ब्रह्मरूपे व्यवस्थिते' इस वचनके अनुसार त्रह्मप्रतिभास ही है तथापि शुक्तिरूप इदन्तासे प्रतिभासमान इदमावच्छिन्नचैतन्योपाधिकमें रजतावच्छिन्न चैतन्यरूप स्फुरण उक्त कारणत्रितयसे जन्य हो सकता है, किन्तु नित्य चैतन्यात्मक स्फुरण तो कमी जन्य हो ही नहीं सकता; इसलिए अध्यात्म प्रतिभास अध्यास नहीं हो सकता, यह आशय है।] .इसीप्रकार दूसरा स्वरूपलक्षण भी नहीं हो सकता, क्योंकि, आत्मचै- तन्यके नित्य होनेपर भी उसमें अधिष्ठानत्व नहीं हो सकता। कारण कि अधिष्ठान सामान्य अशसे ग्रहीत होता है, विशेष अंशसे गृहीत नहीं होता है। [इससे अधिष्ठान सामान्य और विशेष रूप इन दो अंशोंसे सावययव होता है] आत्मा तो सामान्य और विशेष रूपसे रहित है, अतः वह कैसे अधिष्ठान हो सकेगा? अगर ऐसा अनुमान करें कि 'आत्मा अधिष्ठान है, वस्तु होनेसे, शुक्ति आदिके तुल्य' तो इस प्रकारके अनुमानसे भी आत्माका अधिष्ठान होना नहीं सिद्ध हो सकता, क्योंकि 'पर- प्रकाश्यत्व-दूसरेसे प्रकाशित होना' यह इस अनुमानमें उपाधि है। वादीद्वारा किये गये अनुमानके दूषित होनेपर भी सिद्धान्तरहस्यके अनुसार आत्माके अघिष्ठानत्वका साधन करते हैं-] तब सिद्धान्तरहस्यके अनुसार यदि ऐसा अनुमान करें कि 'आत्मा
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अंध्यासविचार ] भांपानुवादसहित १५७
आत्माऽविष्ठानं चिद्रूपत्वात् शुत्तयचच्छिन्नचैतन्यवदिति, मैचम्; इदमं- शशुतयंग्ञावच्छिन्नरूपेण सांशस्य चैतन्यस्य सामन्यग्रहणविशेपाग्रहणयोः संभवेऽपि निरशे आत्मनि तदसंभवात्। निरंशोऽप्याकागादिवन् कार्त्स््येना- वभासत इति चेद्, न; स्वयंज्योतिपो यावत्सच्वमवभासाद्। स्वयंज्योतिय्टं चात्रायं पुरुपः स्वयंज्योतिः आत्मैवास्य ज्योतिरिन्यादिश्रुतिसिद्धम्। नन्वत्र ज्योतिःशव्देन प्रकाशगुणमात्रमभिधीयते तदाश्रयो द्रव्यं वा? नाद:, आत्मनो ज्योति:शब्दाभिधेयस्य गुणत्वग्रसङ्गात्। द्वितीये, प्रकाशगुणा- अधिष्टान है, चिद्रूप होनेसे, शुक्त्यक्छिन्नचेतन्यके सदय, तो यह भी नहीं वन सकता, क्योंकि इदमंझ (सामान्यरूप) और शुक्ति-अंश (विशेपरूप) इन दोनों अंशोंसे अवच्छिन्न होनेसे सावयव चतन्य (शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य) के- सामान्य अंशके ग्रहण (ज्ञान) और विशेष अंशके अग्रहण (अज्ञान) का सम्भव होनेपर भी निरंग आत्मामें इसका (सामान्य अंशके ग्रहण और विशेष अंशके अग्रहणका) सम्भव नहीं है। निरवयव होता हुआ भी आकाशकी भाँति वह सम्पूर्णतः भासित नहीं होता अर्थात् जैसे आकाशके अवयव न होनेसे उसके निरंश होनेपर भी उसका सर्वात्मना अवभास नहीं होता वैसे ही आत्मामें भी सम्पूर्णका ज्ञान न होकर कुछका ही ज्ञान होगा, ऐसी दशामें ग्रहणा और डग्रहणका सम्भव हो जायगा, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि 'स्वयंज्योति' का (जिसका प्रकाश स्वयं हो रहा है उसका) यावत्सत्त्व अवभास होगा। [अर्थात् चह जितना भी है सर्वात्मना स्वयंप्रकाश दीपककी भाँति अपने-आप प्रकाशित होनेवाला है तव कैसे संभव हो सकता है कि कुछका ग्रहण होगा, और कुछका नहीं, यह तात्पर्य है।] स्वरयंज्योतिष्ट्रमें प्रमाण देते हैं-आत्माका स्वयंज्योतिष्ट- अपने-आप प्रकाशित होना, 'अत्रायं०' (यहांपर स्वमदशाम यह पुरुप-आत्मा स्वयंज्योति-स्व्रयंप्रकाशस्वरूप हो जाता है), 'आत्मैवा०' (आत्मा ही इसकी ज्योति-प्रकाश है) इत्यादि ्रुतिसे सिद्ध है। ज्योतिःशव्दार्थके ऊपर शङ्का करते हैं-'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः' इस श्रुतिमें ज्योतिःशव्दसे केवल प्रकाशगुण ही लिया जाता है या उसका (परकाशका) आश्रय द्रव्य लिया जाता है ? गुणमात्र तो नहीं ले सकते, क्योंकि ज्योतिः- शब्दसे कहे जानेवाले आत्माको गुणपदार्थ होनेका प्रसङ्ग आजायगा। [ यदि ज्योतिःशब्दसे आत्माका अभिधान नहीं होता, तो आगे 'आत्मैवास्य ज्योतिः'
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१५८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ?
ख्यस्य ज्ञानस्य जन्यत्वेऽप्यात्मनो ज्योतिष्वश्रुतिर्न विरुध्यते। ततो न याव- त्सच्त्रमात्मनोऽवभास इति चेद्, मैवस्; चैतन्यमात्रवाची ज्योति:शब्दस्त- द्रूप आत्मेत्येव श्ृत्या विवक्षितत्वात्। अन्यथा स्वयमिति विशेषणस्य एवकारस्य च वैयर्थ्यात्। तथा हि-किं घटादाविव्यात्मन्यपि ग्राहकज्ञानस्य ग्राह्याव्तिरिक्तत्वप्राप्तौ तव्वावृत्तये वाक्यद्वये विशेषणद्वयं कि वा ज्ञानजनक- स्यान्यत्वव्यावृत्तये ! आद्ये, ग्राह्यग्राह्यकयोरात्मतजज्ञानयोरेकत्वे श्रुतिः पर्य- वस्यति। एवं च सत्यात्मनो गुणत्वं ज्ञानस्य द्रव्यत्वं प्रसज्येतेति चेत्, असज्यतां नाम, तार्किककल्पितानां द्रव्यादिपरिभापाणां वस्तुनि विरोधा-
इस प्रकार सामानाघिकरण्यसे निर्देश नहीं किया जाता। ] द्वितीयं पक्ष (प्रकाश- गुणका आश्रय द्रव्य ज्योति:शब्दसे लिया जाता है इस पक्ष) में प्रकाशगुणरूपी ज्ञानके जन्य होनेपर भी आत्माके स्वयंज्योतिष्ट होनेमें कोई विरोध नहीं है। इससे आत्माका यावत्सत्त्व अवभास (प्रकाश) नहीं बन सकता, यदि ऐसा कहो, तो ऐसा कह नहीं सकते, क्योंकि चैतन्य ही का वाचक उक्त श्रुतिमें ज्योतिःशब्द है, इससे ज्योतिःस्वरूप आत्मा है, यही अर्थ श्रुतिसे विवक्षित है। अन्यथा यदि प्रकाशगुणमात्र अथवा तदाश्रय द्रन्य ज्योति:शब्दका अर्थ मान लिया जाय, तो 'अत्राऽयं पुरुषः स्वयं ज्योतिः' यहांपर 'स्वयम्' इस विशेषणका रखना तथा आगे . 'आत्मैवास्य ज्योतिः' यहांपर 'एव' पदका देना व्यर्थ हो जायगा। इसीका उपपादन करते हैं-जैसे घटादिज्ञानस्थलमें घटादिका ग्राहकज्ञान घटादि-ग्राह्यसे भिन्न है वैसे ही आत्मा- में भी आत्माका ग्राहकज्ञान ग्राह्य आत्मासे भिन्न है ऐसे ज्ञान और आत्मारूपी ग्राह्यमें भी प्राप्त हुए भेदकी व्यावृत्तिके लिए क्या उपर्युक्त दोनों वाक्योंमें दोनों विशेषण हैं ? अथवा ज्ञानजनकके भेदकी व्यावृत्तिके लिए हैं? प्रथम पक्षका स्वीकार करनेपर (ग्राह्य और ग्राहकमें प्राप्त भेदकी व्यवृत्तिके लिए हैं, इस पक्षका स्वीकार करनेपर) तो ग्राह्य और ग्राहक, आत्मा और उसके ज्ञान इन दोनोंकी एकता (अमेद) में श्रुतिका तात्पर्य हो जायगा। और ऐसा तात्पर्य माननेपर आत्माको गुणत्व और ज्ञानको द्रव्यत्वका प्रसङ्ग आ जायगा। ठीक है, आ जाय, क्या हानि है? क्योंकि तार्किकोंकी कल्पित द्रव्यादि परिभापाएँ वस्तुमें विरोध पैदा करनेवाली नहीं हो सकती हैं।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १५९
जनकत्वात्। न द्वितीयः, शुतहान्यश्रुतकल्पनाग्रसङ्गात्। स्वयं ज्ञानं जनय- त्यात्मय ज्ञानं जनयति नान्यज्नकमिति हि त्वया कल्प्यते, नच तथा श्रयते; किन्तु स्व्रयंज्योतिरात्मैन ज्योतिरिति ततो नान्यज्ज्योतिरित्येवोप- लभ्यते। न चापेक्षितत्वाज्जनकमपि निरूपणीयमेवेति वाच्यम्, नित्यज्ञानस्य तदनपेक्षत्वात्। विमतं ज्ञानं जायते ज्ञानत्वाद् घटादिज्ञानवदित्यनुमीयत इति चेद्, न; वेदान्तिमते दष्टान्तासिद्धेः । घटादिज्ञानेऽपि स्फुरणांशस्य नित्यचैतन्य- रूपत्वाद्, अन्तःकरणवृत्त्यंशस्य चाज्ञानत्वाद् ज्ञानव्यवहारस्य च तत्रौप-
[अर्थात् गुणाश्रय द्रव्य और द्रव्यसमवायि गुण इत्यादि पारिभापिक नियम- के अनुसार ज्ञानाश्रय आत्मा द्रव्य और आत्मसमवायि ज्ञान गुण है, इनका परस्पर ऐक्य नहीं हो सकता। यह नैयायिकोंका कहना संगत नहीं है, क्योंकि परिभाषाएँ तो अपनी-अपनी व्युत्पत्ति या इच्छाका अनुसरण करनेवालीं हुआ करती हैं, ऐसी परिभापाएँ वस्तुस्थितिकी साधिका नहीं मानी जा सकती हैं।]'ज़ानजनकके भेदकी व्यावृत्तिके लिए हैं; इस द्वितीय पक्षका भी स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसका स्वीकार करनेपर श्रुतकी हानि और अश्रुतकी कल्पनाका प्रसङ् आ जाता है। इस अनिष्ट प्रसङ्गको दिखाते हैं-स्वयं ज्ञान अपनेको उत्पन्न करता है आत्मा ही ज्ञानको उत्पन्न करता है, दूसरा कोई जनक नहीं है, यही कल्पना तुम कर सकते हो, परन्तु ऐसी श्रुति नहीं है। 'स्वयं ज्योतिरात्मैव ज्योतिः' ऐसी ही श्रुति है, इससे आत्मासे अतिरिक्त दूसरी कोई ज्योति नहीं है, ऐसा ही अर्थ उपलब्ध होता है। अपेक्षित होनेसे जनकका भी निरू- पण करना ही चाहिए, ऐसा भी कहना उचित नहीं है, क्योंकि नित्य ज्ञानको जनककी अपेक्षा ही नहीं होती है। विमत ज्ञान (ज्योतिःशब्दवाच्य प्रकाशगुणात्मक ज्ञान) जन्य है, ज्ञान होनेसे, घटादिज्ञानकी तरह, ऐसा अनुमान यदि किया जाय तो वह भी नहीं बन सकता, क्योंकि वेदान्तियोंके मतसे उक्त अनुमानमें द्ष्टान्तकी असिद्धि है। कारण कि घटादिज्ञानमें भी स्फुरणात्मक अंशके नित्य चतन्यरूप होनेसे और अन्तःकरणकी वृत्तिके अज्ञानात्मक होनेसे ज्ञानव्यवहार तो वहांपर भी औपचारिक ही माना गया है। [अर्थात् आपका द्ष्टान्त घटनान है, हमारे
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१६० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, चर्णक १
चारिकत्वात्। न चैतव्तिरेक्यनुमानम्, सपक्षसद्भावाद्। यद्यपि मतान्तरे घटज्ञानं दष्टान्तस्तथापि नैतदुपपद्यते। तथा हि-आत्माश्रितमिदं ज्ञानं किं प्रकाशंगुणवत्किंचिद् द्रव्यमिति अङ्गीक्रियते किं वा ग्रकाशगुण एवेति? आद्ये, ज्ञानद्रव्यस्यैव प्रकाशगुणवच्वेन ज्योतिष्टे सत्यात्मनः श्ुत्युक्तं ज्योतिष्टं न स्यात्। द्वितीयेऽपि किमाश्रयद्रव्यैः सह ज्ञानगुणस्य जन्म उत ज्ञानस्यैव : नाद्यः, आत्मद्रव्यस्य नित्यत्वात्। न द्वितीय:, विमतं ज्ञानं द्रव्यजन्मव्यतिरेकेण स्वद्रव्योपाधौ न जायते प्रकाशगुणत्वात् प्रदीप- प्रकाशवत्। तत्र हि दीपप्रकाशो दीपद्रव्येण सहैव जायते न तु तव्चतिरे- केणेति न साध्यवैकल्यम्। दर्पणादौ च सत एव अ्रकाशस्य घर्पणेनाभि-
मतमें घटज्ञानके दो अश हैं। एक स्फुरण प्रतिभासस्वरूप है जो कि नित्य चैतन्यस्वरूप ही है अतः वह जन्य नहीं है और उसमें जो अन्तःकरणकी वृत्तिरूप दूसरा अंश है यद्यपि वह अंश जन्य है तथापि उसमें ज्ञानत्व नहीं है, अतः घटज्ञानादिको भी जन्य न होनेसे दृष्टान्त-असिद्ध है, यह भाव है।] और उक्त अनुमानको व्यतिरेकी अनुमान भी नहीं कह सकते, क्योंकि उसका सपक्ष विद्यमान है। [ व्यतिरेकीका कोई सपक्ष नहीं होता।] यद्यपि नैयायिक आदि दूसरोंके मतमें (जो घटज्ञानको जन्य मानते हैं) घटज्ञान दष्टान्त हो सकता है, तथापि यह उपपत्तिसे युक्त नहीं है। उपपत्तिका अभाव दिखाते हैं-आत्मामें आश्रित यह ज्ञान क्या प्रकाश गुणवाला कोई द्रव्य है, ऐसा मानते हो ? अथवा केवल प्रकाशगुण ही? यदि पूर्व विकल्प मानो, तो ज्ञान-द्रव्यके ही प्रकाश गुणवाला होनेसे ज्योतिष्ट (ज्योतिःस्वरूप) होनेपर श्रुतिमें कथित आत्माके ज्योतिष्टकी सिद्धि नहीं होगी। द्वितीय विकल्पमें भी क्या आश्रयभूत द्रव्योंके साथ ज्ञानरूपी गुणका जन्म होता है? अथवा ज्ञानका ही? इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मारूपी द्रव्य नित्य है उसका जन्म नहीं हो सकता। दूसरा भी ठीक नहीं जँचता, क्योंकि विमत ज्ञान द्रव्यजन्मके बिना अपनी द्रव्यरूपी उपाधिमें उत्पन्न नहीं होता है, (अर्थात् द्रव्यजन्मके साथ ही उत्पन्न होता है,) प्रकाशगुण होनेसे, प्रदीपके प्रकाशके तुल्य। इस दष्टान्तमें दीपका प्रकाश दीपरूपी द्रव्यजन्मके साथ-साथ ही उत्पन्न होता है, इसके विपरीत- दीपजन्मके बिना नहीं होता। इससे साध्यवैकल्य नहीं आता है (अर्थात् दृष्टान्तमें
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १६१
व्यक्तिर्न तु जन्मेति नाडनैकान्तिकत्वम्। न चाऽन्त:करणप्रकाशे व्यभिचार: शङ्नीय:, परिणामवादे प्रकाशवदन्त:करणद्रव्यस्यैव वटादिज्ञानरूपे- णोत्पतेः। आरम्भवादे तु प्काशो नाऽन्त:करणगुणः । तस्मादजायमानस्य ज्ञानस्य जनकानपेक्षत्वादात्मैव्र ज्योतिर्न त्वात्मव्यतिरिक्तं ज्योतिरित्येव श्रुत्यभिप्रायः। ज्योतिष्वं चाडत्र चिद्रूपत्वमेव विवक्षितं नं जड़प्रकाशरूपत्वमिति 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इत्यादिश्युत्यन्तरादवगम्यते। प्रज्ञानशव्देनाऽत्र ज्ञातृत्वमुच्यत इति चेद्, न; भावार्थप्रसिद्धिविरोधात्। अ्रकृषटं ज्ञानमस्येति विग्रहे ज्ञातृत्वं लभ्यत इति चेत, तथापि प्रतिक्षणमात्मनि ज्ञानोत्पत्तिकल्पने गौरवम्। तदकल्पने
साध्य नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते)। दर्पण आदिमें घर्पण आदिसे पहले ही विद्यमान प्रकाशकी केवल अभिव्यक्ति होती है, जन्म नहीं होता, इससे अनैकान्तिकता नहीं है [ मलिन दर्पणको साफ करनेके अनन्तर उत्पन्न हुए दर्पणके प्रकाशमें 'द्रव्यजन्मके साथ-साथ होना रूप' साध्य नहीं है, ऐसा व्यभि- चार भी नहीं हो सकता, क्योंकि वहांपर पूर्वसिद्ध दर्पणका प्रकाश, जो मलावृत था, उसकी अभिव्यक्ति ही हुई है, उत्पत्ति नहीं हुई ]। अन्तःकरणके प्रकाशमें भी व्यमिचारकी शक्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परिणामवादमें प्रकाशयुक्त अन्त:करणद्रव्यकी ही घटादिज्ञानरूपसे उत्पत्ति होती है। आरम्भवाद (नैयायिकमत) में तो प्रकाश अन्तःकरणका गुण ही नहीं है। इससे सिद्ध है कि उत्पन्न न होनेवाले ज्ञानको अपने जनक की अपेक्षा न होनेसे आत्मा ही ज्योति:शव्दवाच्य है, आत्मासे अतिरिक्त ज्योति और कुछ नहीं है, यही श्रुतिका अभिग्राय है। ज्योतिष्टपदसे यहांपर चिद्रपता ही विवक्षित है, जड़गकाशरूपता विव- क्षित नहीं है, यह 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (प्रज्ञान ही व्रह्म है) इत्यादि दूसरी श्रुतिसे जाना जाता है। इस श्रुतिमें प्रज्ञानशव्दसे ज्ञातृत्व कहा गया है, ऐसा. नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा कहनेपर भावार्थकी प्रसिद्धिका विरोध होगा। प्रकृष्ट-उत्तम या अधिकहै ज्ञान जिसका इस विग्रहमें ज्ञातृत्वकी प्रतीति होती है, यह भी कहना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर प्रतिक्षण आत्मामें ज्ञानोत्पत्तिकी कल्पना करनेसे गौरव हो जायगा। और इसकी कल्पना २१
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१६२ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
चाऽडत्मा न प्रकाशेत, प्रकाशते च सदैवाऽडत्मा। तस्मात् स्वप्रकाशचतन्य- रूपस्याऽडत्मनो यावत्सच्वमवभास एवाऽम्युपेयः ।
न; जीवाद् ब्रह्म भिन्नमभिन्नं वा १ भिन्नत्वे ब्रह्मण्येवाऽधिष्ठानेऽनवभास- विपर्यासौ स्यातां न जीवे। अभिन्नत्वं च मानहीनम्। अथ मानमेतद्- 'अयमात्मा ब्रह्म' इत्यादि वाक्यमखण्डार्थनिष्ठम्, कार्यकारणभावहीनद्रव्य- सात्रनिष्ठत्वे सति समानाधिकणत्वाद, सोडयं देवदस इति वाक्यवदिति, तहिं ज्ञानप्रकाशविरोधादाश्रयविषयभेदाभावाच्च नाडज्ञातता ब्रह्मणः। तदित्थमन- धिष्ठाने दोपरहिते आत्मनि नाऽहङ्काराद्यध्यास इति। अत्रोच्यते-अद्वितीये निष्कलङ्केऽप्यात्मन्यविद्याख्योऽनृतरूपो दोपोडस्तीति
न करनेसे आत्मा प्रकाशित ही नहीं होगा किन्तु आत्मा सदैव प्रकाशित रहता है। इससे स्वप्रकाश चैतन्यस्वरूप आत्माके यावत्सत्त्व अवभास (साक- ल्येन प्रकाश) का ही स्वीकार करना चाहिए। अब आत्मामें अहक्कारादिके अध्यासका खण्डन करते हैं,-ब्रह्मके आकारका अवभास न होनेसे आत्मामें उसके विशेष अंशका ग्हण न होना अनुभवसे ही सिद्ध है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, कारण कि जीवसे ब्रह्म भिन्न है ? या अभिन्न ? यदि भिन्न है, तो जैसे शुक्तिरजतस्थलमें शुक्तिरूप अधिष्ठानमें ही अनवभास और विपर्यय होते हैं वैसे ही ब्रह्मरूप अधिष्ठानमें ही अनवभास और विपर्यय होंगे जीवमें नहीं, [अन्यके अग्रहणसे अन्यमें अनवभास और विपर्यय नहीं हो सकते ]। और अभिन्न माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। अगर यह परमाण कहा जाय कि 'अयमात्मा ब्रह्म' (यह आत्मा ब्रह्म है) इत्यादि श्रुतिवाक्य अखण्डार्थ- विषयक तात्पर्यवाला है, कार्यकारणभावसे रहित द्रव्यमात्रपरक होता हुआ समा- नाधिकरण होनेसे, 'यह वह देवदत्त है' इस प्रत्यभिज्ञावाक्यके समान, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ज्ञान प्रकाशका विरोध होनेसे और आश्रय और विषयकां भेद न होनेसे ब्रह्मकी अज्ञातता सिद्ध नहीं होगी। ऐसी अवस्थामें इस प्रकार अधिष्ठान-दोषरहित आत्मामें अहङ्कारादिका अध्यास नहीं हो सकता। इस शक्काका उत्तर कहा जाता है-अद्वितीय निष्कलङ्क आत्मामें भी अविद्यानामक मिथ्याभूत दोष है, यह सिद्धान्त श्रुतिसे तथा श्रुतार्थापत्तिसे
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अध्यासविचार ] भापानुवांदसहित १६३
अ्तेः भ्ुतार्थापत्तेश्वाऽवगम्यते। ्रुतिस्तावत्-'तद्यथा हिरण्यं निधिं निहितमक्षे- त्रज्ञा उपर्युपरि संचरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वा: प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृततेन हि पत्यूढा' इति सुपुसिकाले सर्वासां प्रजानाम् अनृतरूपाविद्यापिहितत्वेन न्रह्मचैतन्यानवभासं दर्शयति। तच्चाऽविद्या- पिधानं मिथ्याज्ञानतत्संस्कारज्ञानाभावकर्मभ्योऽन्यद् मिथ्यात्मकमित्यावरण- वादे समर्थितम्। अतार्थापत्तिरपि त्रह्मज्ञानाद् वन्धनिवृत्ति: श्रूयमाणा ब्रह्मणि प्रागनव- बोधोऽध्यासवन्धहेतुदोपोऽस्तीति कल्पयति। न चवमज्ञानस्य प्रमाण-
ज्ञात होता है। प्रथम श्रुतिको दिखाते हैं-जैसे अक्षेत्रज्ञ-क्षेत्रके याथार्थ्यको न जाननेवाले, ऊपर-ऊपर चलनेवाले, भौतिक परिज्ञान रखनेवाले, क्षेत्रमें गड़े हुए हिरण्य-सुवर्णमय-कोश़को नहीं जान सकते वैसे ही ये सभी प्रजाएँ (जनसाधारण) प्रतिदिन ब्रह्मलोकमें जाती हुई भी ब्रह्मको नहीं जान सकतीं, क्योंकि वे सबके सत्र अनृत-मिथ्याभूत-अविद्यासे व्याप्त हो रही हैं। यह श्रुति सुपुप्तिकालमें सभी प्राणियोंको मिथ्यास्वरूप अविद्यासे आवृत्त होनेके कारण त्रह्मचतन्यका प्रकाश नहीं होता यह दिखा रही है। और वह अविद्याकृत आवरण मिथ्याज्ञान, उसके संस्कार, ज्ञानाभाव तथा कर्म इन सबसे भिन्न मिथ्यात्मक ही है, ऐसा आवरणवादप्रकरणमें समर्थन किया गया है। [सुपुप्तिकालमें सम्पूर्ण विशेष ज्ञानोंके विलीन हो जानेसे मिथ्याज्ञान भी नहीं है अतः ब्रह्मज्ञानका प्रतितन्धक नहीं हो सकता। एवं रजतभ्रमके संस्कार रहते हुए भी शुक्तिज्ञानके होनेसे उसका संस्कार भी प्रतिबन्धक नहीं हो सकता। कादाचित्क ज्ञानाभाव स्वतःसिद्ध, ज्ञानका प्तिवन्धक नहीं हो सकता। कर्म तो प्रति- बन्धक हो ही नहीं सकता, अन्यथा ब्रह्मदर्शन कभी भी नहीं हो सकेगा। इसलिए इन सबसे भिन्न ही विलक्षणस्वभाव तथा सामार्थ्यवाला यह मिथ्याभूत अविद्याSSवरण है, यह तात्पर्य है ]। अत्र श्रुतार्थापत्तिको दिखाते हैं-ब्रह्मज्ञानसे श्रूयमाण बन्धकी निवृत्ति है, साक्षात्कारसे पूर्व अनवभास, (अज्ञान) अध्यास या बन्धका कारण रहते हैं-ऐसी कल्पना करती है। इस प्रकार अज्ञानकी श्रुति और श्रुतार्थापत्तिरूप प्रमाणोंसे सिद्धि
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१६४ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
गम्यत्वेन तात्विकत्वं स्यादिति वाच्यम्. अविद्या नाम काचिदनिर्वच- नीयभावरूपा नास्तीति वादिन: पक्षं निराकर्तुमेव ग्रमाणोपन्यासात्। अविद्यास्तरूपं तु साक्षिचतन्यादेव सिध्यति। यच्तूक्तं जीवन्रह्मणोरभेदपक्षे नाऽज्ञातता ब्रह्मण इति तत्र कोऽभिग्रायः? किमज्ञानमाश्रयविषयभेदापेक्षं सदेकस्मिन् न संवध्यत एव उत संवध्य स्वाश्रयैकत्वेन विरुध्यते किं वा प्रकाशस्व्रभावस्याऽविद्याश्रयत्वं चिरुद्धम् अथवा अविद्याश्रयत्वे ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वादिहानिरिति १ नाद्यः, विमतम- ज्ञानमाश्रयविपयभेदं नापेक्षते, अक्रियात्मकत्वाद्, घटादिवत् । तथा विमत- मेकपदार्थमेवाSSश्रयत्यावृणोति च आवरकत्वादपवरकस्थतमोवदिति भेदमन- पेक्ष्यैकस्मिन्नेव संवन्धद्वयसिद्धेः। होनेपर तो उसमें वास्तविकत्व आ जायगा, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अविद्यानामक कोई अनिर्वचनीय भावरूप पदार्थ नहीं है, इस सिद्धान्तवाले वादीके पक्षका खण्डन करनेके लिए ही निरुक्त प्रमाणोंका उपन्यास किया गया है। अविद्याका स्वरूप तो साक्षि-चैतन्यसे ही सिद्ध होता है। [ यदि अविद्याके स्वरूपकी सिद्धिके लिए प्रमाणोंका दिखलाना आवश्यक होता, तो उसमें प्रामा- णिकत्वका प्रसङ्ग आता, किन्तु ऐसा नहीं किया गया है, अतः उक्त दोप नहीं आता, यह भाव है। ] जो आपने यह कहा है कि जीव और ब्रह्मका ऐक्य (अभेद) होनेसे ब्रह्मकी अज्ञातता नहीं हो सकती, सो इस शङ्कासे आपका क्या अभिप्राय है ? क्या अज्ञान अपने आश्रय और विषयके भेदकी अपेक्षा रखता हुआ एकमें ही सम्बन्ध नहीं कर सकता या सम्बन्ध करके अपने आश्रयके एकत्वसे विरुद्ध होता है अथवा प्रकाशस्वभाव आत्माका अविद्याश्रय होना विरुद्ध है? अथवा ब्रह्मके अविद्याश्रय होनेसे सर्वज्ञत्वकी हानि होगी? इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि विमत (अज्ञान) आश्रय और विषयके भेदकी अपेक्षा नहीं रखता, अक्रियात्मक होनेसे, घटादिके समान। और विमत (अज्ञान) एक ही पदार्थको आश्रय भी बनाता है और आवृत भी करता है, आवरक होनेसे, कोठेके अन्दर (पर्देके भीतर) विद्यमांन अन्धकारकी तरह, इस प्रकारके अनुमानोंसे भेदकी अपेक्षा न रखकर एक ही में आश्रयत्व और विषयत्व-इन दोनों सम्बन्धोंकी सिद्धि हो सकती है!
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अव्यासविचारं ] भांपानुवादसहित १६५
ननु ज्ञानवदज्ञानमप्याश्रयविषयभेदमपेक्षत एव, अहमिदं जानामीति- वदहमिदं न जानामीति व्यवहारात्। मैवम, द्वयसापेक्षज्ञानपर्युदासा- भिधाय्यज्ञानशब्दवशादेव तथा प्रतीतेः, मायादिशव्दव्यवहारे तदभावाद्। यथा स्थितिः कर्मनिरपेक्षाप्यगमनशव्देनाभिधीयमाना कस्य किंविपय- मगमनमिति कर्मसापेक्षवद्भाति तद्वत्। न द्वितीयः, विमतं स्वाश्रयैकत्वेन न विरुध्यते, आवरणत्वात, तमोघत्। नापि तृतीयः, किं प्रकाशस्वभावस्याऽ- ज्ञानाश्रयत्वविरोधोऽनुभृयते उताऽनुभीयते १ नाउडद्यः, अज्ञानसाधकसाक्षि चैतन्येऽहमज्ञ इत्यज्ञानाश्रयताया एवाऽनुभवात् । अनुमानमपि कथम्, कि- मात्मा नाऽज्ञानाश्रय:, आभासमानत्वात्, पुरोवर्तिघटवदिति; किं चाडत्माS- ज्ञानविरोधिस्वरूप:, प्रकाशत्वात्, अन्तःकरणवृत्तिवदिति; अथवा आत्मा पुनः शका-ज्ञानके समान अज्ञान भी आश्रय और विपयके भेदकी अपेक्षा रखता ही है। 'मैं इसे नानता हूँ' इस प्रतीतिके तुल्य 'मैं इसे नहीं जानता हूँ' ऐसी प्रतीति होती ही है, यह यदि कहो, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि आश्रय और विषय की अपेक्षा रखनेवाला ज्ञान है, उसका पर्युदास-निपेध- करनेवाले अज्ञानशब्द के बलसे ऐसी प्रतीति होती है। माया आदि शब्दोंसे व्यवहार करनेपर तो, ऐसी प्रतीति नहीं होती है। जैसे स्थिति कर्मनिरपेक्ष होनेपर भी अगमन- शब्द (गमननिषेध) से कही जाती हुई किसका और किविपयक अगमन है, इस तरह कर्मसापक्ष-सी प्रतीत होती है, चसे ही वह माया अज्ञान (ज्ञाननिषेध) शब्दसे प्रतिपादित होती हुई आश्रय और विपयके भेदकी अपेक्षा करनेवाली-सी प्रतीत होती है, वस्तुतः माया आश्रय और विषय मेदकी अपेक्षा रखनेवाली नहीं है। दूसरा विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि विमत (अज्ञान) अपने आश्रयके एकत्वसे विरुद्ध नहीं है, आवरण होनेसे, अन्धकारके समान। तृतीय विकल्प भी नहीं जँचता, कारण कि क्या प्रकाशस्वभाव आत्माके अज्ञानाश्रय होनेका विरोध अनुभवमें आ रहा है अथवा अनुमानमें ? इनमें प्रथम पक्ष नहीं कह सकते, क्योंकि अंज्ञानके साधक साक्षि-चैतन्यमें 'मैं अज्ञ (अज्ञानाश्रय) हूँ' इस प्रतीतिसे अज्ञानका आश्रय होना अनुभवमें आ रहा है। अनुमान भी कैसा है? क्या 'आत्मा अज्ञानका आश्रय नहीं है, प्रकाशमान होनेसे, सामने दिखाई देनेवाले घटके समान ऐसा है? अथवा क्या आत्मा अज्ञानका विरोधिस्वरूप है, प्रकाश होनेसे, अन्तःकरणकी वृत्तिकी तरह, ऐसा है : अथवा
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१६६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक१
अज्ञानसंसर्गविरोधी, स्वयंग्रकाशत्वात्, प्राभाकराभिमतसंवेदनवदिति! नादः वाधितविपयत्वात्। परैरपि हि जन्यज्ञानेनाऽत्मनि भासमान एवाऽज्ञानाश्रय- त्वमभ्युपगन्तव्यम्। अन्यथाऽऽत्मावभासक्षणे सर्वज्ञत्वग्रसङ्गात्। न द्वितीयः, अज्ञानावभासकभाने व्यभिचारात्। न च तदेवाऽसिद्धमिति वाच्यम्, परेषामपि स्वाभिमताज्ञानप्रतीत्यभावे तव्यवहारायोगाद् । न तृतीय:, दृष्टान्ताभावात्, स्वप्रकाशसंचेदनस्यैवाऽडत्मत्वात्। नापि त्रह्मण: सर्वजत्वा- दिहानिरिति चतुर्थः पक्षः, यथा सत्यपि विम्त्प्रतिविम्बयोरक्ये मलिन- दर्पणगतप्रतिविम्बेऽध्यस्तेन श्यामत्वादिना न विम्बस्याऽवदातताहानि: तथा जीवस्याऽविद्याश्रयत्वेऽषि न ब्रह्मण: सर्वज्ञत्वादिहानिरिति चक्तुं शक्यत्वात्। किंच, जीवव्रह्ैक्यं वा स्वप्रकाशत्वं वा यददविद्यामपह्मोतुसुपन्यस्यते
क्या आत्मा अज्ञानके सम्बन्धका विरोधी है, स्वयंप्रकाश होनेसे, प्राभाकरों (भीमांसकों) के अभिमत संवेदन-ज्ञानके समान, ऐसा है ? इनमें पहला अनुमान नहीं बनता, क्योंकि वह बाधितविषय है। दूसरे दर्शनकारोंको भी जन्यज्ञानसे प्रकाशमान आत्मामें ही अज्ञानाश्रयत्वका स्वीकार करना चाहिए। अन्यथा आत्माके प्रकाश क्षणमें सर्वज्ञत्वका प्रसङ्ग हो जायगा। द्वितीय पक्ष भी उचित नहीं है। कारण कि अज्ञानका भासन करानेवाले प्रत्ययमें व्यभिचार है। और ऐसा भी नहीं कह सकते कि वही (अज्ञानका प्रकाश एक प्रत्यय) असिद्ध है, क्योंकि दूसरे वादियोंको भी उनके अभिमत अज्ञानकी प्रतीति नहीं है, अतः अज्ञानत्यवहार करनेका अवसर ही नहीं होगा। तृतीय पक्ष भी नहीं कह सकते, क्योंकि उसमें दष्टान्तका अभाव है और स्वप्रकाश संवेदन ही आत्मा है। ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वादिकी हानि हो जायगी, ऐसा पूर्वकथित चतुर्थ विकल्प भी उचित नहीं है, क्योंकि जैसे विम्न और प्रतिविम्बका ऐक्य (अमेद) होनेपर भी गन्दे दर्पणके अन्दर प्रतिविम्नमें अध्यस्त (दर्पणकी मलिनताके कारण मालूम पड़नेवाले) काले वर्णसे विम्वकी सफेदीमें कोई हानि नहीं आती, वैसे ही जीवके अविद्याश्रय होनेपर भी व्रह्मकी सर्वजतामें हानि नहीं हो सकती, ऐसा कह सकते हैं। और भी साधक कहते हैं-जीव और ब्रह्मका ऐक्य या स्वप्रकाशत्व अथवा सर्वज्ञत्व आदि जिसका, अविद्याका खण्डन करनेके लिए, उपन्यास करेंगे वह सवका-सब अविद्याके अहणाभावत्व (ज्ञानाभावत्व) का निराकरण करके उसकी
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अध्यासविचार ] भापानुचादसहित १६७
तत्तदविद्याया ग्रहणाभावत्वं निराकृत्य भावरूपत्वं साधयिष्यति। भाव- रूपाच्छादनमन्तरेण विद्यमानानां सर्वज्ञत्वादीनां तदुपेतस्य ब्रह्मणथाऽनव- भासानुपपत्तेः । ग्रहणाभावमात्रेण तु जीवाद् भिन्नस्य जडस्याऽसर्वजस्य घटा- देरेवाऽनवभास उपपद्यते न विपरीतस्य त्रह्मणः । ननु जीवस्याऽविद्याश्रयत्वं ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वमिति वढ़ता जीवन्रह्णो विंभागो वक्तव्य एचेति चेत, किं वास्तवविभाग आपादते, उताऽविद्याकृतः? आद्येऽपि किमन्त:करणकतावच्छेदाद् विभागा, उत स्वाभाविकादतिरेकाद् अथवा स्वाभाविकादंशांशिभावात्? नाऽडद्यः, सादेरन्त:करणस्याSनाद्यवच्छेद- कत्वायोगात्। न चाऽन्त:करणमप्यनादि, सुपुप्त्यादावभावात्। सूक्ष्मावस्थं तत्तत्राप्यस्तीति चेत, किं सक्ष्मता नाम निरवयवत्वापत्ति: उतावयवापचय- मात्रं किं वा कारणात्मनाऽवस्थिति: अथवा संस्कारशेपत्वम्: नाऽऽद्यः,
भावरूपताकी सिद्धि करेंगे। भावरुप आवरणके विना विद्यमान सर्वज्ञत्वादिका तथा उन सर्वज्त्वादि गुणोंसे युक्त त्रह्मका अग्रकाश उपपन्न नहीं हो सकता है। ज्ञानाभावमात्रसे तो जीवसे पृथक जड़ और असर्वज्ञ घटादिका ही अप्रकाश होता है इसके विपरीत चेतन और सर्वज्ञ-नित्य ज्ञानवाले- त्रषाका नहीं। यदि ऐसा कहो कि 'जीव अविद्याश्रय है और न्रह्म सर्वज्ञ है' इस पक्षको माननेवाले वादीको जीव और ब्रह्मका भेद कहना ही होगा, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा पर्यनुयोग करते हो, तो हम पूछेंगे कि क्या जीच और नरस्ममें वास्तविक भेदकी आपत्ति दी जा रही है अथवा अविद्याकृत मेदकी ? वास्तविक माननेमें भी क्या अन्तःकरणके कारण उत्पन्न हुए अवच्छेद (भेद) से विभाग है? अथवा स्वाभाविक ही मेदसे विभाग है ? किं वा स्वाभाविक अंशाशिभावसे : इनमें पहला पक्ष तो बन नहीं सकता, क्योंकि अन्तः- करणका भेद प्रयोजक नहीं हो सकता। अन्तःकरण अनादि है यह भी नहीं कह सकते, कारण कि सुपुप्ति आदि अवस्थामें उसका अभाव हो जाता है। सुपुप्ति आदिमें भी वह सूक्ष्म अवस्थामें रहता ही है, यदि ऐसा कहो, तो क्या निरवयव हो जाना सूक्ष्मता है या अवयवोंका घट जाना ही सूक्ष्मता है अथवा कारणके स्वरूपसे रहना है या संस्कारका शेप रह जाना सूक्ष्मता
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१६८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
सावयवस्याऽवयवाभावे स्वरूपनाशात्। न द्वितीयः, अवशिष्टावयविनोऽकार्य- त्वप्रसङ्गात्, कदाचिदप्यनपायात् । संपूर्णकार्यत्वे वा जागरणवव्धवहारापत्तेः। तृतीयेऽपि किं कारणमेव तिष्ठत्युत कार्यमपि १ आद्ये, अन्तःकरणाभावापचिः। द्वितीये, व्यवहारापत्तिः। नापि चतुर्थः, संस्कारस्याऽवच्छेदानुपादानत्वेन सुप्तावनवच्छिन्नस्य जीवस्य मुक्तिप्रसङ्गात्। अथावच्छिद्यमानमेव काष्ठ- चद्वच्छेदोपादानम्, अन्तःकरणं तु कुठारवन्निमित्तमेवेति चेत्, तर्हिं नाऽवच्छेदसिद्धिः निरवयवस्य चैतन्यस्य परमार्थतः काष्ठवद्विदारणो- पादानत्वायोगात्। अस्माकं त्वविद्यैवावच्छेदोपादानम्। द्वैधीभावोऽप्यविद्यानिष् एव सन् आत्मनि परमध्यस्यते। अन्त:करणस्याऽप्यविद्याकार्यस्याऽविद्याद्वारैवाऽडत्मा- है। इनमें पहला मत ठीक नहीं है, क्योंकि सावयव पदार्थके अवयवोंका नाश होनेपर स्वरूपका ही नाश हो जाता है। द्वितीय मत भी उचित नहीं है, क्योंकि अवशिष्ट अवयवोंवाला अन्तःकरण अकार्य (नित्य) हो जायगा। अतः उसका नाश कभी भी नहीं हो सकेगा। यदि सम्पूर्णको कार्य ही मानो, तो जागरणके तुल्य सुपुप्तिमें भी व्यवहार होना चाहिए। [ सुपुप्तिमें कुछ कम हुए अवयव यदि कार्यरूप ही हैं तो सुपुपिसे प्रथम जागरादिमें विद्यमान अन्तःकरण और इस अवस्थाके अन्तःकरणमें व्यवहाराभावके प्रयोजक हेतुकी सिद्धि नहीं होगी और यत्किश्चिददयवाभाव व्यवहारसामान्याभावका नियामक नहीं हो सकता, यह तात्पर्य है] तृतीय विकल्पमें भी क्या कारण ही रह जाता है? या कार्य भी रहता है : पहले पक्षमें तो अन्तःकरणका अभाव ही आया और द्वितीयमें व्यवहार होनेकी आपत्ति है। चतुर्थ भी ठीक नहीं है, क्योंकि संस्कारके अवच्छेद (भेद) का उपादान न होनेसे सुपुप्तिमें अनवच्छिन्न जीवकी सुक्ति हो जायगी। यदि कहो कि सुपुप्तिमें अवच्छेदक काष्ठके समान अवच्छेद्य (जीव) ही अवच्छेदका उपादान है अन्तःकरण तो कुठारके समान निमित्त ही है, तो ऐसी दशामें अवच्छेद (मेद) की सिद्धि नहीं हो सकेगी। परमार्थमें अवयव- शून्य चैतन्य सावयवय काष्ठकी भाँति विदारणका उपादान नहीं वन सकता। हमारे मतमें तो अविद्या ही भेदका उपादान है। मेद भी अविद्यामें स्थित ही आत्मामें अध्यस्त-आरोपित-होता है। अन्तःकरण भी अविद्याका कार्य होनेसे अविद्या द्वारा ही आत्माका भेदक है साक्षात्
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १६९
वच्छेदकत्वम्, न साक्षात्: ततो नकोऽपि दोप:। नाप्यतिरेकादिति द्वितीयः पक्ष:, क्लपाविद्यासामर्थ्यादेव जीवत्रह्मविभागसिद्धावति रेककल्पनावकाशा- भावात्। न च वाच्चं जीवस्य त्रह्मविपयाऽविद्येति निरुपणीयत्वेन विभागाधीनाऽविद्या न विभागस्य हेतुरिति, भेदाधीनस्याऽपि धर्मिप्रति- योगिभावस्य भेवहेतुत्वदर्शनात्। अन्यथा तवापि जीवाद् न्रह्मणो व्यतिरेक इति विभागाधीनोऽतिरेकः कथ विभागहेतु: स्याद! अपि च नाडविद्याऽडश्र- यविपयभेदमपक्षत इत्युपपादितमधस्तात्। नापि तृतीयः, निरचयस्य स्त्रत एवांऽशांशिभावायोगात्। तस्मादविद्याकत एव विभाग आपादनीयः, स चेष्ट एव।
नहीं है, इससे कोई दोप नहीं आता। [अर्थात् जीवको अविद्याका आश्रय और आत्माको सर्वज माननेपर जीव और ब्रह्की वास्तविक विभागकल्पना आदि दोष नहीं आते ] अतिरेकसे (मेदसे) ही विभाग है, ऐसा द्वितीय विकल्प भी नहीं वन सकता, कयोंकि मानी गई अविद्याकी सामर्थ्यसे ही जीव और ब्रह्मके विभागकी सिद्धि होनेसे अतिरेककी कल्पना करनेका अवकाश नहीं आता। ब्रह्म- विषयगी जीवकी अविद्या है, ऐसा निरूपण करना है, इसलिए विभागाधीन अविद्या मेदका कारण नहीं हो सकती [ जवतक जीव और ब्रह्मका भेद सिद्ध, न हो जाय तवतक 'जीवाश्रित त्रह्मविषयक अविद्या है' इसका निरूपण ही नहीं होगा, अनः इसकी सिद्धिके लिए अविद्याके पूर्व ही विभाग मानना चाहिए। ऐसी अवस्थामें अविद्या पूर्वसिद्ध विभागको कैसे सिद्ध कर सकती है: इससे अति- रेकको ही भेदहेतु मानना चाहिए। मानी गई अविद्यासे काम नहीं चलेगा ] यह शक्का भी उचिन नहीं है, क्योंकि मेदाधीन भी धर्मिप्रतियोगिभाव भेदका हेतु देखा गया है। अन्यथा व्यतिरेकवादी तुम्हारे मतमें भी जीवसे ब्रह्मका व्यतिरेक (मेद) है इस प्रकारका विभागाधीन व्यतिरेक भी विभागका हेतु कैसे बनेगा? और वम्तुतः अविद्या आश्रय और विषयके भेदकी अपेक्षा नहीं रखती है, इस विषयका पहले ही उपपादन किया जा चुका है। तृतीय पक्ष भी नहीं वन सकता, क्योंकि अवयवशून्य आत्मामें अपने-आप अवयवावयविभाव नहीं वन सकता। इसलिए अविद्यानिमित्तक ही विभाग मानना पड़ेगा। वह इष्ट ही है।
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१७० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
यद्यप्यसावविद्या चिन्मात्रसम्बन्धिनी जीवब्रह्मणी विभजते, तथापि ब्रह्मस्वरूपसुपेक्ष्य जीवभाग एव पक्षपातिनी संसारं जनयेद्। यथा मुख- मात्रसंवन्धि दर्पणादिकं विम्बप्रतिविम्बौ विभज्य. प्रतिविम्बभाग एवा- तिशयमादधाति तद्वत्। नन्वहमज् इत्यहङ्कारविशिष्टात्माश्रितमज्ञानमवभास- ते न चिन्मात्राश्रितमिति चेद्, मैवम्; यद्वत् 'अयो दहति' इत्यत्र दग्धृत्वा- यसोरेकाग्निसम्वन्धात् परस्परसम्बन्धावभास: तद्वदज्ञानान्तःकरणयोरेकात्म- सम्बन्धादेव सामानाधिकरण्यावभासो न त्वन्त:करणस्याऽज्ञानाश्रयत्वात्। .अन्यथाऽविद्यासम्बन्धे सत्यन्त:करणसिद्धिरन्तःकरणविशिष्टे चाडविद्यासम्बन्ध इति स्यादन्योन्याश्रयता। न चाऽन्त:करणमन्तरेणाऽविद्यासम्बन्धो न दष्टचरः, सुषुसे संमतत्वात्। अथासङ्गस्य चैतन्यस्याऽडश्रयत्वानुपपच्तेर्विशिष्टाश्रयत्वं यद्यपि यह अविद्या शुद्ध चिद्धनके साथ ही सम्बन्ध रखती हुई जीव और ब्रह्मके विभागको करती है तथापि ब्रह्मस्वरूपकी उपेक्षा करके जीवभागमें ही पक्षपांत रखती हुई संसारको उत्पन्न करती है। जैसे मुखसे सम्बद्ध दर्पण आदि बिम्बं और प्रतिबिम्बका विभागकर प्रतिबिम्बभागमें ही अतिशय (दर्पणादि उपांधिगत मालिन्य आदिके सम्बन्ध) का आरोप करता है, वैसे ही अविद्या भी चिन्मात्रसे सम्बन्ध रखती हुई जीव और ब्रह्मका मेद करके प्रतिबिम्बस्थानीय जीवमें ही असर्वज्ञत्व आदि अतिशयका उपाधिगत दोषके संसर्गसे आरोप करती है। 'अहम् अज्ञः' (मैं अज्ञानी हूँ) इस प्रकारकी प्रतीतिसे अहङ्कारं- विशिष्ट आत्मामें रहनेवाला ही अज्ञान प्रतीत होता है, चिन्मात्राश्रित प्रतीत नहीं होता, ऐसी शङ्का भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जैसे लोहा जलाता है, इस प्रतीतिमें दाहकर्तृत्व और लोहा इन दोनोंका एक अगिनिके साथ सम्बन्ध होनेसे परस्पर सम्बन्धके अवभासकी प्रतीति होती है वैसे ही अज्ञान और अन्तःकरणका एक आत्माके साथ सम्बन्ध होनेसे ही सामानाधिकरण्यकी प्रतीति होती है, अन्तःकरणके अज्ञानका आश्रय होनेसे उक्त प्रतीति नहीं होती है। अन्यथा अविद्यासे सम्बन्ध होनेपर अन्तःकरणकी सिद्धि और अन्तःकरणविशिष्टमें अविद्याका सम्बन्ध होता है, ऐसा अन्योन्याश्रय दोष आ जायगा। यह कहना भी सङ्गत नहीं है कि अन्तःकरणके बिना अविद्याका सम्बन्ध कहीं देखा ही नहीं गया है, क्योंकि सुषुप्तिमें ऐसा देखा गया है, जो सर्वसम्मत है। और असङ्ग आत्मा अविद्याका आश्रय नहीं हो सकता, अतः विशिष्ट (अन्तःकरण
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अध्यासविचार ] भांपानुवादसहितं १७१
कल््यत इति चेत्, तदाऽप्यन्तःकरणचतन्यतत्सम्बन्धानामेव विशिष्टत्वे चैतन्यस्याSडश्रयत्वं दुर्वारम्। अन्यदेव तेभ्यो विशिष्टमिति चेत्, तथापि जड़स्य तस्य नाऽज्ञानाश्रयत्वम्। अन्यथा भ्रान्तिसम्यग्ज्ञानमोक्षाणामपि जड़ाश्रयत्वप्रसङ्गात्। अज्ञानेन सहेकाश्रयत्वनियमात्। न च चैतन्यस्य काल्पनिकेनाSडश्रयत्वेन वास्तवमसङ्गत्वं विहन्यते। अतश्चिन्मात्राथितमज्ञानं
यस्तु भास्करोऽन्त:करणस्यैवाऽज्ञानाश्रयत्वं मन्यते तस्य तावदात्मनः सदा सर्वज्ञत्वमनुभवविरुद्धम्। असर्वज्ञत्वे च कदाचित् किंचिन जानातीत्य- ज्ञानमात्मन्यभ्युपेयमेव। अथाऽग्रहणमिध्याज्ञानयोरात्माश्रयत्वेऽपि भावरूपम- ज्ञानमन्त:करणाश्रयमिति मन्यसे, तदाऽपि ज्ञानादन्यचेदज्ञान काचकामला- दयव तत् स्पात्। अथ ज्ञानविरोधि, तन्न; आत्माश्रितज्ञानेनाऽन्तःकरणा- विशिष्ट) में अविद्याके आश्रयत्वकी कल्पना करते हैं; यदि ऐसा है, तो अन्तःकरण, चतन्य और इनका सग्बन्ध इन तीनोंका ही जब विशिष्टत्व भाप्त हे, तब चैतन्यका अविद्याका आश्रय होना नहीं हटाया जा सकता* । यदि विशिष्ट इन तीनोंसे मिन्न ही माना जाय, तो भी वह जड़ है, अतः वह अज्ञानका आश्रय नहीं हो सकता। अन्यथा अ्रमज्ञान, यथार्थज्ञान और मोक्षको भी जड़ाश्रित मानना पढ़गा, क्योंकि वे अज्ञानके साथ एक ही आश्रयमें रहते हैं, यह एक नियम है। काल्पनिक आश्रयत्व माननेसे चैतन्यका पारमार्थिक सजरहित्यमें कोई विरोध भी नहीं आता। इसलिग अज्ञान चिन्मान्में आश्रित है। वह जीवका पक्षपाती होनेसे जीवाश्रित है, ऐसा कहा जाता है। भास्करके मनका खण्डन करते हैं-जो भाम्कर अन्तःकरणको ही अज्ञानका आश्रय मानते हैं। उनके मतमें प्रथम तो अनुभवचिरुद्ध आत्माके सर्वदा सर्वज्ञ होनेका प्रसभ् याजायगा और अनुभवके अनुरोधसे आत्माको असर्वज्ञ माननेपर केंदा- चिन् 'वह कुछ नहीं जानता है' ऐसा अज्ञान आत्मामें मानना ही पड़ेगा। [ अर्थात् जन आत्मामें सदेव सर्वज्ञत्व नहीं है, तो उसके असर्वज् होनेसे 'कुछ नहीं जानता' ऐसा कादाचित्क अज्ञानका सद्ाव आत्मामें आ ही गया, तब अज्ञानाश्रय अन्तःकरण ही है, यह केसे वन सकता है। ] आत्माको ज्ञानाडभाव और मिथ्याज्ञानको- दस मतमें विशिष्ट प्रत्येकसे अतिरिक्त नहीं है।
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१७२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
श्रितस्याऽज्ञानस्य विरोधासंभवात्। एकस्मिन्नपि विपये देवदत्तनिष्ठज्ञानेन यज्ञदत्तनिष्ठस्याऽज्ञानस्याऽनिवृत्तेः । अन्यत्र भिन्नाश्रययोरविरोधेऽपि करण- गतमज्ञानं कर्तृगतज्ञानेन विरुध्यत इति चेद्, न; यज्ञदत्तोऽयम् अन्तःकरण- लयहेत्वदष्टवान्, सुपुसौ लीयमानान्त:करणत्वादित्यनुमातरि देवदत्ते स्थिते- नाऽनेन ज्ञानेनाऽनुमितिकरणभू ते सुपुप्तयज्ञद त्तान्त:करणे स्थितस्याज्ञानस्या- निवृत्तेः । ज्ञातृसंबन्धिन्यन्तःकरणे स्थितस्य निवृत्तिरस्त्येवेति चेद्, न; अज्ञानस्याऽन्तःकरणगतत्वे मानाभावात्। विमतं करणगतं भ्रान्तिनिमित्त- दोषत्वात् काचादिकवदिति चेत्, तर्हि चक्षुरादिपु तत्प्रसज्येत। सादित्वा- त्तेषामनाद्यज्ञानाश्रयत्वानुपपत्तिरिति चेद्, अन्त:करणेऽपि तुल्यम्। सत्कार्य-
विपर्ययका आश्रय माननेपर भी भावरूप अज्ञानका अन्तःकरण ही आश्रय है, यदि ऐसा मानते हो, तो भी यदि अज्ञानशब्दरसे ज्ञानसे भिन्न अर्थका ग्रहण है, तो वह काचकामल आदि (रोग) ही होगा। यदि अज्ञानशव्दका ज्ञानविरोधी अर्थ कहो, तो उसे कह नहीं सकते, क्योंकि आत्मामें रहनेवाले ज्ञानसे अन्तःकरणमें स्थित अज्ञानके विरोधका असम्भव है। एक विषयमें भी देवदत्तके ज्ञानसे यज्ञ- दत्तका अज्ञान निवृत्त नहीं होता। [ ज्ञान और अज्ञानका सामानाधिकरण्यसे ही विरोध होता है। ] दूमरे स्थलोंमें भिन्न-मिन्न अधिकरणमें स्थित ज्ञान और अज्ञानका विरोध न होनेपर भी करण (साधन) में विद्यमान अज्ञान कर्तामें स्थित ज्ञानसे विरुद्ध होता ही है, यदि ऐसा कहो, तो यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि 'यह यज्ञदत्त अन्तःकरणविनाशक अदष्टवाला है, सुपुप्िमें इसके अन्तःकरणका लय हो जानेसे इस तरहका अनुमान करनेवाले देवदत्तमें (प्रमातामें) विद्यमान इस (पूर्वोक्त अनुमानरूप) ज्ञानसे अनुमितिके साधनभूत सुपुप्त यज्ञ- दंतके अन्तःकरणमें स्थित अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है। ज्ञाताके ही अन्त :- करणमें स्थित अज्ञानकी निवृत्ति होती ही है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि अज्ञान अन्तःकरणका आश्रयण करता है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है। विमत (अज्ञान) करणमें रहता है, भ्रान्तिके कारणस्वरूप दोष होनेसे, काच आदि रोगके संमान। यह अनुमान प्रमाण होगा, यदि ऐसा मानो, तो चक्षुरादि इन्द्रियोंमें उस अज्ञानकी प्रसक्ति हो जायगी। यदि कहो कि नेत्र आदि सादि हैं, इससे वे अनादि अज्ञानके आश्रय नहीं बन सकते, तो अन्तःकरण भी सादि है, अतः वह भी अज्ञानका
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १७३
वादाश्रयणान्न साद्यन्तःकरणमिति चेत्, चक्षुरादावपि तुल्यम्। अतो नाऽन्त :- करणाश्रयमज्ञानम्, किन्तु आऽत्माश्रयम्। तदुक्कमाक्षेपपूर्वकं विश्वरूपाचार्य :- 'नन्वविद्या स्वयंज्योतिरात्मानं ढौकते कथम्। कूटस्थमद्वितीयं च सहस्रांशुं यथा तमः ॥ प्रसिद्धत्वादविद्यायाः साऽपह्वोतुं न शक्यते। अनात्मनो न सा युक्ता बिना त्वात्मा तया नहि ॥' इति। तस्याश्राऽविद्याया जीवत्रह्मविभागहेतुत्वं पुराणेडभिहितम्- 'विभेदजनकेज्ञाने नाशमात्यन्तिक गते। आत्मनो त्रह्मणो भेदमसन्तं क: करिष्यति ॥' इति। आश्रय नहीं वन सकता। यदि कहो कि सत्कार्यवादके आश्रयणसे अन्तःकरण सादि नहीं है, तो चक्षु आदिमें भी यही बात लागू हो सकती है। इसलिए अज्ञान अन्तःकरणका आश्रयण नहीं करता, किन्तु आत्माका ही आश्रयण करता है। इस निर्णयको विश्वरूपाचार्यने आक्षेपपूर्वक कहा है-जैसे सूर्यका आच्छादन अन्धकार नहीं कर सकता वैसे ही स्वयंज्योति (स्वतः प्रकाशमान), कृटस्थ (नित्य) तथा अद्वितीय आत्माका अविद्या आच्छादन नहीं कर सकती है [ अर्थात् जैसे अन्धकार सूर्यको नहीं ढक सकता वैसे ही जड़स्वरूप अविद्या मी चेतनात्मक आत्माको नहीं ढक सकती। यदि आत्मा घटादिके समान परप्रकाश होता अथवा स्वप्रकाश होता हुआ कादाचित्क प्रकाशवाला होता, अथ च सावयव या परिणामी होता, तो शायद यह सम्भव होता, परन्तु आत्मा ऐसा है नहीं यह स्वयंज्योति और कूटस्थ विशेषणोंसे दर्शाया गया है। किञ्व, सूर्यको जैसे बादल ढक लेते हैं, वैसे ही अविद्या भी उसे ढक लेती है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि वह तो अद्वितीय है। उसके अतिरिक्त वादलके स्थानमें और कोई दूसरा पदार्थ तो है ही नहीं, यही अद्वितीय विशेषणका अभिप्राय है ]। दूसरे श्लोकसे अविद्या ही न मानी जाय, इस पक्षका खण्डन करते हैं- अविद्या प्रसिद्ध है [स्वयंप्रकाश आत्माके ब्रह्मस्वरूपका भान न होनेसे] इससे उसका अपहब नहीं कर सकते। वह अविद्या अनात्माश्रित है (अर्थात् उसका आश्रय अनात्मा है) यह कहना युक्तिंसगत नहीं हैं, क्योंकि उस अविद्याके बिना अनात्माकी आत्मा-सत्ता-ही नहीं है।
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१७४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
अविद्यांया अनादित्वादेवाऽनादिविभागहेतुत्वमविरुद्धम्। अविद्याडना- दित्वं च 'प्रकृ्ति पुरुपं चैव विद्ध्यनादी उभावापे' इति स्मृतावुक्तम्। प्रकृति- र्नाम माया, 'मायां तु प्रकृतिम्' इति श्रुतेः । मायाविद्ययोश्चेकत्वमवोचाम ॥ नन्वेवं स्त्रप्रकाशस्याऽविद्याश्रयत्वेऽपि नाविद्याविपयत्वं संभवति, सदा भासमानत्वात्। नहि भासमाने घटें घटं न जानामीत्यज्ञानविपयत्वं व्यवहरन्ति। त्वदुक्तमर्थ न जानामीति भासमानस्यैवाऽर्थस्याऽज्ञानं प्रति व्यावर्त्तकतया विपयत्वं व्यवहियत इति चेद्, न; तत्राप्यनवगतस्यैवारऽर्थंगत- विशेषाकारस्य विषयत्वात्। अनवगतस्य व्यावर्त्तकतया प्रतीतिर्न युक्त्तेति चेद्, एवं तर्हिं त्वदुक्तमर्थ न जानामीत्यत्रापि गतिस्त्वयैव वाच्येति।
और वह अविद्या जीव और ब्रह्मके विभागका कारण पुराणमें कही गई है- जब ज्ञानदशामें भेदको उत्पन्न करनेवाला अज्ञान अत्यन्त नष्ट हो गया, तव आत्मा (जीव) और ब्रह्मका असदू (स्वतः न होनेवाला) भेद कौन करेगा ? अविद्या अनादि है, इसलिए इसका अनादि भेद (जीव-ब्रह्म भेद) का हेतु होनेमें विरोध नहीं है। अविद्याकी अनादिता 'प्रकृति०' (प्रकृति (माया-अविद्या) और पुरुष इन दोनोंको ही अनादि समझो,) इस स्मृतिमें कही गई है। प्रकृति मायाका नाम है, क्योंकि 'मायां तु प्रकृति' (प्रकृतिको ही माया समझो) इस तरह श्रुतिमें कहा है। माया और अविद्याके एकत्वका प्रतिपादन तो हम पहले ही कर चुके हैं। शङ्का-इस पूर्वोक्त विवेचनके अनुसार स्वम्रकाश ब्रह्मके अविद्याश्रय सिद्ध होनेपर मी उसके सदैव भासमान होनेसे वह अविद्याका विषय नहीं हो सकता। घटके प्रकाशित होनेपर 'मैं घटको नहीं जानता हूँ' इस प्रकार घटमें अज्ञानविषयताका कोई व्यवहार नहीं करता। 'तुम्हारे कहे हुए अर्थको मैं नहीं जानता हूँ' इस प्रतीतिसे भासमान अर्थके ही अज्ञानके प्रति व्यावर्तक होनेसे अज्ञानविषयत्वका व्यवहार होता है, ऐसा कहना भी नहीं वनता, क्योंकि उक्त प्रतीतिमें भी जो ज्ञात नहीं हुआ है वही (अर्थमें रहनेवाला विशेषाकार) अज्ञानका विषय है। ['त्वदुक्त अर्थका सामान्य ज्ञान होनेपर भी विशेष ज्ञान नहीं हुआ' यह 'तदुक्तमर्थ न जानामि' इस वाक्यका तात्पर्य है] जो ज्ञात
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अध्यासविचार ] भांपानुवादसहित १७५
उच्यते-प्रमाणेन हि प्रकाश्यमानोऽ्थों नाऽज्ञानस्य विपय:, प्रमाणस्याऽज्ञाननिवर्त्तकत्वात्। यन्तु साक्षिप्रत्यक्षगम्यं घटादिकं चैतन्यमेच वा न तस्याऽज्ञानविपयत्वे काचिद्धानिः । नहि साक्षिचैतन्यमज्ञान- निवर्त्तकं प्रत्युत तत्साधकमेव। अन्यथैतदज्ञानं सर्वः ग्रमाणैर्न्यायैश् विरुध्यमानं कर्थ सिध्येत्। तदुक्तम्- 'सेयं भ्रान्तिनिरालम्या सर्वन्यायविरोधिनी। सहते न विचारं सा तमो यद्दिवाकरम् ॥' इति। विचारासहत्वं चाडविद्याया अलङ्कार एव । तदप्युक्तम्-
नहीं है, उसकी विशेषणतया प्रतीति नहीं हो सकती, यदि ऐसा कहो तो 'तुम्हारे अर्थको मैं नहीं जानता' इस वाक्यकी संगति भी आप ही (वेदान्ती) करें? [ अर्थात् अनवगत तो विशेषण हो ही नहीं सकता, परन्तु अवगत भी जब अज्ञानका विशेषण नहीं हो सकता तब जैसे सदाभास भाव ब्रह्म अज्ञानका विपय नहीं वन सकता वैसे ही 'त्वदुक्तम्' इत्यादि वाक्यकी भी पूर्वोक्त रीतिसे असङ्गति नहीं हट सकती, शन्ाका यही तात्पर्य है] उत्तर देते हैं-प्रमाण द्वारा प्रकाशित होनेवाला अर्थ अज्ञानका विपय नहीं हो सकता, क्योंकि प्रमाण अज्ञानका निवर्तक होता है। किन्तु जो केवल साक्षि-प्रत्यक्षसे ज्ञात होनेवाला घटादि अथवा चतन्य ही है उसके अज्ञानका विषय होनेमें कोई हानि नहीं है। साक्षि-चैतन्य अज्ञानका निवर्तक नहीं होता है, वल्कि इसके विपरीत अज्ञानका साधक ही होता है। अन्यथा यह अज्ञान सब ग्रमाण या न्यायोंसे. विरुद्ध होता हुआ कैसे सिद्ध हो सकेगा? वह इस प्रकार कहा गया है- वह यह भ्रान्ति (अज्ञान) आलम्बन रहित होती हुई (प्रमाणरूपी या विषयरूपी आलम्वशून्य) सव न्यायोंसे विरोध रखनेवाली विचारयुक्तिके सामने नहीं ठहर सकती, जैसे कि सूर्यके सन्मुख अन्धकार नहीं टहर सकता। और विचारोंके युक्तियोंके-सामने न टिक सकना अविद्याका अलंकार ही है। ऐसा भी कहा है-
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१७६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
'अविद्याया अविद्यात्वमिदमेवात्र लक्षणम् । यद्विचारासहिष्णुत्वमन्यथा वंस्तु सा भवेत् !! ' इति । न चाडविचारितरमणीयाया आत्मानमाच्छादयितुमसामर्थ्यं शङ्कनीयम्, 'अहो धाष्टर्यमविद्याया न कश्चिदतिवर्चते। ग्रमाणं वस्त्वनादृत्य परमात्मेव तिष्ठति ॥' इत्युक्तत्वात्। युस्त्थेकशरणेनाप्यनुभवो नाऽपलपितुं शक्यते, अनुभवनिष्ठत्वाद्युक्ते:। अन्यथा युक्तिरप्रतिष्ठितैव स्यात्। अनुभूयते हि स्वयंज्योतिपोऽपि भोत्तु- र्देहादिसंघाताव्यावृत्तत्वमज्ञानतिरोहितमेव। नन्वहमित्यात्मप्रतीतौ तद्भेदोऽपि प्रतीयत एव भेदस्य वस्तुस्वरूपत्वात्। युक्तियोंके सामने न ठहर सकना ही अविद्याका अविद्यात्व है और वही लक्षण है, अन्यथा (यदि युक्तियोंसे वह सिद्ध हो सके) तो वह यथार्थ वस्तु ही हो जाय। इस प्रकार अविचारितरमणीय (विना विचारके ही सुन्दर मालम पड़ने- वाली, विचार करनेपर कुछ नहीं) अविद्यामें आत्माको आच्छन्न करनेकी सामर्थ्य नहीं है, यह शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि- 'आश्चर्य है ! अविद्याकी कितनी प्रबल घृष्टता है जिसका अतिक्रमण कोई कर नहीं सकता। जो अविद्या प्रमाण वस्तुका भी तिरस्कार करके परमात्माके ऊपर आसन जमा बैठी है।' यह कहा गया है। केवल युक्तियोंका सहारा लेनेवाला पुरुष भी अनुभवका अपलाप नहीं कर सकता है, क्योंकि युक्ति भी अनुभवपर ही निर्भर है। नहीं तो युक्ति प्रतिष्ठित (प्रसिद्ध) नहीं हो सकती है। [अर्थात् केवल युक्तिसे, जिसमें अनुभवका संवाद न हो वस्तुसिद्धि नहीं मानी जाती है, ऐसी युक्तियां केवल प्रलाप कहलाती हैं ] स्वयंज्योति-स्वप्रकाश-आत्माक्का देहादिसंघातरूप भोक्तासे भेद अज्ञानसे आच्छन्न है, यह अनुभव सिद्ध है। शङ्का-'अहं' इस प्रकारकी आत्मप्रतीतिमें देहादिसंघातसे आत्मामें भेद भी प्रतीत ही होता है (इससे भेद अज्ञानसे आच्छन्न है ऐसा कहना नहीं वनता), क्योंकि भेद वस्तुका स्वरूप ही है [अर्थात् आत्मा और देहादिसङ्वातका भेद उसका स्वरूप ही है। तव 'अहम्' इस स्वरूपके भानके साथ-साथ तत्स्वरूप
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ?மட்
न चाडहं मनुप्य इति भिथ्याभूतदेहतादात्म्याभिमानेन भेदस्तिरोहित इति वाच्यम्, ऐक्याभिमानस्य भेदप्रतीत्यनुसारेणापि गौणतयोपपत्तौ भेद- प्रतीतिविरुद्धमिथ्यात्वकल्पनायोगात्। यदि देहसमानाधिकृतत्वादहमिति प्रत्ययो नाऽडत्मनो देहव्यतिरिक्तत्वं गृहीयात्तदा तन्नैव सिध्येद्, प्रमाणा- भावात्। आगमानुमानयोरपि तद्विरोधे प्रमाणत्वायोगात्। न चाऽहंप्रत्य- यस्य द्विचन्द्रादिचोधवन्मिथ्यात्वादविरोध इति वाच्यम्, आगमानुमान-
मेदका भी भान हो ही गया, यह भाव है]। 'मैं मनुष्य हूँ' इस प्रकारकी प्रतीतिसे देहके साथ मिथ्याभूत तादात्म्य (अभेद) का अभिमान होनेसे भेदग्रतीति तिरोहित हो गई है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि भेदप्रतीतिका अनुसरण करनेसे भी ऐक्य (अमेद) का अभिमान गौणलक्षणासे भी उपपन्न हो सकता है, इससे भेदप्रतीतिके विरुद्ध मिथ्यात्वकी कल्पना नहीं की जा सकती। [जैसे सिंह और माणवकके मेदके सर्वप्रसिद्ध होने- से भी 'सिंहो माणवकः' ऐसा सामानाधिरण्यनिर्देसे लक्षणाके द्वारा सिंह और माणवक्तमें अभेदकी प्रतीति होती है जिससे शौर्यातिशयका बोध होता है वैसे ही 'अहं मनुष्यः' इति प्रतीतिमें भी लक्षणाके द्वारा अभेदकी प्रतीति होती है। ] यदि मैं मनुष्य हूँ' इस प्रतीतिमें मनुष्यपदसे वोधित होनेवाले देहके साथ समानाधिकरण होनेसे 'मैं' यह प्रत्यक्ष प्रतीति आत्मासे देहके भेदका ग्रहण न करा सके, तो वह (देह और आत्माका भेद) सिद्ध ही नहीं हो सकेगा, इसमें दूसरा कोई प्रमाण ही नहीं है। [ वस्तुमात्रकी सिद्धि प्रायः प्रत्यक्षसे ही होती है और दूसरे आगम, अनुमान आदि भी प्रत्यक्षका विरोध न करते हुए ही ग्रमाण होते हैं। एवं प्रकृतमें आत्माका प्रत्यक्ष 'अहम्' (मैं) ऐसी प्रतीति है। वह प्रतीति मनुष्य (देह) के साथ समा- नाधिकरण होनेसे देह और आत्माके भेदका ग्रहण नहीं कराती, प्रत्युत अभेदका बोधन कराती है, इसलिए प्रत्यक्ष ही अमेदका ग्राहक है, तद्विपरीत भेदका ग्राहक और कोई दूसरे प्रमाण नहीं माने जा सकते। अतः प्रमाणाभाव है, यह तात्पर्य है। ] आगम-शास्त्र और अनुमान न्यायवाक्यप्योग भी प्रत्यक्षके- विरोधमें प्रमाण नहीं माने जाते हैं। 'अहम्' प्रत्यक्ष भी (जो देहादिसे अभिन्न- विषयक-सी प्रतीति हैं) द्विचन्द्रादिज्ञानके तुल्य मिथ्या है, ऐसा नहीं २३
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१७८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
प्रामाण्यसिद्धौ तन्मिध्यात्वं तन्मिध्यात्वे चेतरप्रामाण्यमित्यन्योन्याश्रय- त्वात्। द्विचन्द्रादिवोधस्य प्रमाणवलावलचिन्तायाः प्रगेव झटिति वाध्य- त्वात्तन्मिथ्यात्वसिद्धिः । अत्र तु अमाणवलावलचिन्तायामसञ्जातविरो- धितयाऽहंप्रत्यय एव वलीयानिति तद्विरुद्वाभ्यामागमानुमानाभ्यां देहव्यतिरिक्तत्वं न सिध्येत्। तस्मादहंप्रत्ययेनैव देहव्यतिरिक्तत्वसिद्धौ मनुष्यत्वाभिमानो गौणो न मिथ्येति। नैतत्सारम्, किमर्थतो देहव्यतिरिक्तात्मविपयोऽहंग्रत्ययः किं वा प्रतिभासतः १ नाऽडद्य, अर्थतो भेदसत्ताया अप्रयोजकत्वात्। सिंहो देवदत्त इत्यादौ हि भेदप्रतिभास एव गौणत्वप्रयोजको दृष्टः। अन्यथा इदं
कहना चाहिए, क्योंकि 'आगम और अनुमानके प्रामाण्यकी सिद्धि होनेपर उसका मिथ्यात्व और उसका (देह और आत्माके तादात्म्यका) मिथ्यात्व सिद्ध होनेपर आगम आदिका प्रामाण्य सिद्ध होगा'इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोषका प्रसद्ग होगा। द्विचन्द्रादिप्रत्यय तो मिथ्या सिद्ध हो जायगा, क्योंकि वहाँपर एकचन्द्रप्रतिपादक आगमादि प्रमाण प्रवल है, द्विचन्द्रके प्रत्यक्ष आदि दुर्वल हैं, इस विचारके पहले ही शीघ्र द्विचन्द्रप्रत्यक्ष वाधित हो जाता है। (इससे द्विचन्द्र'दिस्थलमें अन्योन्याश्रयका अवसर नहीं है) 'अहम्' प्रत्यक्षमें तो प्रमाणकी वलाबल चिन्ताका अवसर आनेपर कोई विरोध न होनेसे 'अहं' प्रत्यक्ष ही वलवान् हो जाता है, इसलिए 'अहं' प्रत्यक्षसे विरुद्ध आगम और अनुमान दोनोंसे आत्मामें देहका भेद सिद्ध नहीं हो सकेगा। अत एव 'अहं' प्रत्यक्ष द्वारा ही देहका भेद सिद्ध हो जानेपर अहंमें मनुष्यत्वाभिमान गौण लक्षणाके द्वारा ही है, मिथ्या नहीं है। उत्तर-यह कथन ठीक नहीं है। क्या 'अहम्' यह ज्ञान वस्तुतः देहसे भिन्न आत्माको विषय करता है अथवा क्या प्रतिभाससे? [ 'अहं' इस प्रतीतिमें जैसे आत्मा भासता है वैसे ही भेद भी भासता है। यह द्वितीय विकल्पका तात्पर्य है और प्रथम विकल्पका यह तात्पर्य है कि प्रतिभास केवल आत्माका ही होता है और वह आत्मा देहसे भिन्न है, 'अहं' प्रत्ययमें भेद नहीं भासता ] पहला विकल्प उचित नहीं है, क्योंकि वस्तुतः भेदका रहना किसी अर्थका साधक नहीं है। 'सिंहो माणवकः' यहांपर भी भेदका ज्ञान ही
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अंध्यासविचार ] भापांनुवादसहित १७९
रजतमित्यत्राऽप्यर्थतो भेदसद्भावेन गौण एव व्यवहार: स्याद्, न आ्रान्तः । द्वितीयेऽपि किमहंप्रत्ययो विचारात् आगेव व्यतिरेकमवभासयति उत पश्चात्: नाउडद्यः, विचारशास्त्रवैयर्थ्यांत्। न द्वितीय, प्राप्तापप्तविवेकेन विचारस्यैव व्यतिरेकवोधकत्वात्। ननु विचारो नाम युक्त्यनुसन्धानम्, नहि युक्ति: स्वातन्त्र्येण ज्ञानजननी किन्तु प्रमाणानुग्राहिका सती व्यति- रिक्तात्मविपयत्वमहंग्रत्ययस्य प्रमाणस्य विवेचयति। मैवम्, किं युक्ति- विषयविशेपे प्रमाणं नियमयति एतावदेव त्वया ग्रहीतव्यं नाऽधिकं नाऽि न्यूनमिति किं वा स्वतःसिद्धे विपये ग्रहणाय अवृत्तस्य प्रमाणस्य प्रसक्तं प्रतिवन्ध निरस्यति ? नाऽडद्य:, पुरुपबुद्धिवैचित्रयेण युक्तीनामव्यवस्थिततया गौण व्यवहारका साधक है। [ स्वरूपतः भेद रहते हुए भी यदि उस भेदफी प्रतीति नहीं होती है, तो वहांपर भेदप्रतीति स्वतः छिपी हुई है उसके छिपानेके लिए लक्षणा या उपचारका अवसर ही नहीं है, इस दशामें उक्त 'सिंहों माणवकः' प्रतीतिको भ्रम ही कह सकते हैं गौण या औपचारिक नहीं ]। अन्यथा (भेद- ज्ञानके विना भी यदि गौणव्यवहार माना जाय) तो 'यह रजत है' यहांपर भी अर्थतः मेद रहनेसे (ुक्ति और रजत दोनों वस्तुओंमें स्वतः भेद होनेसे) गौणव्यवहार ही होना चाहिए भ्रमव्यवहार नहीं। द्वितीय विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि 'अहम्' यह ज्ञान विचार होनेके पूर्व ही मेदका भी बोध करा देता है अथवा विचारके अनन्तर? पहला पक्ष उचित नहीं है, क्योंकि इससे विचारशास्त्र न्यर्थ हो जायगा। द्वितीय विकल्प भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्राप्ता डप्राप विवेकसे विचार ही मेदवोधक सिद्ध होता है। युक्तियोंके अनुसंधानको विचार कहते हैं। युक्तियां स्वतन्त्र होकर ज्ञानको उत्पन्न नहीं कर सकतीं, किन्तु प्रमाणोंका अनुग्रह करती हुई (अर्थात् प्रमाणोंको सहायता देती हुई-प्रमाणित करती हुई ही) प्रमाणभूत 'अहम्' प्रत्ययका देहसे भिन्न आत्मा है, ऐसा विवेचन करती हैं, यदि ऐसी शक्का की जाय, तो वह उचित नहीं है, क्योंकि क्या युक्तियाँ प्रमाणका विषयविशेपमें नियम कर देती हैं इतना ही तुम्हें ग्रहण करना चाहिए, न तो इससे अधिक और न इससे कम या स्वतः सिद्ध विपयमें उसका ग्रहण करनेके लिए प्रवृत्त हुए प्रमाणके आये हुए प्रतिबन्धको दूर कर देती हैं ? इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि पुरुषबुद्धियोंके विचित्र (परस्पर भिन्न-भिन्न होनेसे) अव्यवस्थित होनेसे
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१८० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वंर्णक २
अमाणानामव्यवस्थितविपयत्वापत्तेः नन्विष्टापत्तिरेपा प्रमाणानां नियत- विषयत्वे शास्त्रकाराणां मतभेदासंभवादिति चेद्, न; विरुद्धस्थले स्व्रमतमेव प्रामाणिकं नाऽन्यदिति स्वैरङ्गीकारात्। अव्यवस्थितविपयत्वे च परमतान्यपि प्रामाणिकत्वेनाSSदर्तव्यानि स्युः। न च प्रवलयुक्तीनां वह्नीनां अमाणनियामकत्वं वाच्यम्, नहि सहस्रमपि युक्तयः सकल- शास्त्राभिमतवुद्धिप्रभवा अपि चक्षुपः शब्दविपयत्वं सम्पादयेयुः रूप- विपयत्वं वा निवारयेयुः। द्वितीये तु किमहंप्रत्ययस्य देहादिग्रतियोगि- कात्मभेदोऽपि स्वतःसिद्धो विपयः किं वाऽडत्ममात्रम्। आद्ये लौकाय- तिकस्य प्राकृतानां च विवेक: असज्येत। अथ तेपां शास्त्रीययुक्तिभि:
युक्तिको भी अव्यवस्थितविषयत्व होनेकी आपत्ति होगी। [ वुद्धिके अनुसार ही युक्ति होती है जब वुद्धि अव्यवस्थित है तो युक्ति भी अव्यवस्थित अवश्य होगी ] प्रमाणोंका अनियत होना इष्ट ही है। उन्हें नियतविषय माननेपर, तो शास्त्रकारोंका मतभेद नहीं होगा, ऐसा भी कहना उचित नहीं है, क्योंकि विरुद्ध स्थलमें अपने मतको ही प्रामाणिक और दूसरेके मतको अप्रमाणिक सब लोग मानते हैं। प्रमाणोंको अव्यवस्थित विषय माननेपर तो दूसरोंके मत (सिद्धान्त) भी प्रमाण मानकर आदर करने योग्य हो जायंगे अर्थात् दूसरोंके मतोंको मानना पड़ेगा। बहुत-सी प्रवल युक्तियाँ प्रमाणकी नियामक होंगी, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि हजारों भी युक्तियां, जो सकलशास्त्रसम्मत बुद्धियोंसे भी उत्पन्न हुई हों, शब्दको वे आंखोंका विषय नहीं वना सकतीं और न उनकी रूपविषयताका ही निवारण कर • सकती हैं। [ यदि युक्तियां ऐसा कर सकतीं तो हम मानते कि युक्तियाँ प्रमाण (इन्द्रियादि) की नियामक हैं। परन्तु वे ऐसा कर नहीं सकतीं; अतः युक्तियोंमें प्रमाणनियामकत्व नहीं वन सकता। द्वितीय पक्ष भी नहीं जँचता, क्योंकि 'अहं' प्रत्ययका स्वतःसिद्ध देहादिप्रति- योगिक आत्मामें भेद भी विषय है? किं वा केवल आत्मा ही विषय है? पहले पक्षका स्वीकार करनेपर लौकायतिक (नास्तिक) और साधारण जनोंको भी विवेंकज्ञान होनेका प्रसक्क आ जायगा। यद्यपि कह सकते हो कि उनको (नास्तिक और साधारण जनोंको) शास्त्रीय युक्तियों द्वारा
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अंध्यांतविचार] भांपानुवादसहित १८१
प्रतिबन्धानिरसनादविवेकस्तथापि शास्त्राभिज्ञेन त्वया न कदाचिदपि देहादिव्यतिरिक्तोऽहमिति प्रत्येतुं वक्तुं वा शक्येत। अहमित्यनेनैव भेदोक्तौ देहादिव्यतिरिक्त इत्यस्य पौनरुत्त्यप्रसङ्गात्। अथाऽत्ममात्रं विपय: तर्हि सुखेन युक्तयोऽहंप्रत्ययस्याऽऽत्मग्रहणे प्रसक्तं प्रतिबन्धं निरस्यन्तु नतावताऽहंग्रत्ययस्य देहादिविपयत्वमनुभूयमानमपोढ शक्यम्। नन्वेवमहं मनुष्य इति प्रत्ययः स्वविपयमेव गृह्णातीति भ्रमो न स्यात्। मैवम्, नहि स्त्रविपयग्राहि प्रमाणमन्यविषयग्राह्यप्रमाणमित्य- स्मन्नवस्था, किन्तु सत्यग्राहि प्रमाणं सत्यानृतग्राहि चाऽप्रमाणमिति। अहंप्रत्ययश्च सत्यमात्मानमसत्यं देहादिकं चैकीकृत्य गृह्णातीति भ्रम एव। न च स्वप्रकाशे निरंशे आत्मन्यगृहीतविशेपांशासंभवादभ्रम इति
प्रतिबन्धका निरसन न होनेसे विवेक नहीं हो पाता, तो भी शास्त्रको जाननेवाले आप तो देहादिसे अतिरिक्त ही 'अहम्' है ऐसा प्रत्यय कभी भी नहीं कर सकते और न कह ही सकते हैं, क्योंकि 'अहम्' इतनेसे ही मेदका बोध हो ही गया पुनः 'देहसे भिन्न है' ऐसा कहना पुनरुकत दोप हो जायगा। यदि 'अहम्' यह प्रत्यय केवल आत्माको ही विषय करता है, तो 'अहं' प्रत्ययके आत्माके ग्रहणमें प्राप्त हुए प्रतिबन्धको युक्तियां आनन्दसे भले ही हटावें, किन्तु इतनेसे ही (प्रतिबन्धमात्रके हटा देनेसे ही) 'अहं' प्रतीतिका देहादिविषयत्व जो अनुभवमें आ रहा है वह नहीं हटाया जा सकता। 'अहं स्थूलः' इस प्रतीतिमें 'अहम्' ज्ञानका विषय देह आदि है, ऐसा अनुभवमें आता है; इसका अपलाप नहीं हो सकता। पूर्वोक्त प्रकारसे 'मैं मनुष्य हूँ' यह ज्ञान अपने विषय (देहादि) का ही ग्रइण करता है, तब 'अहं मनुष्यः' यह भ्रम नहीं कहा जा सकता, यदि ऐसा कहें, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि जो अपने विपयका ग्रहण करता है वह प्रमाण और जो दूसरेके विपयका ग्रहण करता है वह अप्रमाण, इस प्रकार प्रमाण और अप्रमाणकी व्यवस्था हमारे मतमें नहीं है, किन्तु सत्य पदार्थका ग्रहण करनेवाला प्रमाण और सत्य अनृत-असत्य पदार्थका ग्रहण करनेवाला अप्रमाण माना जाता है। और 'अहम्' प्रतीति तो सत्य आत्मा और असत्य-अनात्मा देहेन्द्रियादि इन दोनोंका एकरूपसे (अमेदसे) ग्रहण
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१८२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ?
वाच्यम्, यद्वदकारादिवर्णेषु निरवयवेषु साकल्येन भासमानेषु ध्वनिगतं हस्वदीर्घत्वादिकमारोप्यते न च हस्वत्वादिकं वर्णधर्म:, स एवाडयमकार इत्यादिप्रत्यभिज्ञया वर्णानां सर्वगतत्वावगमाद् वर्णसर्वगतत्वज्ञानवतामपि तद्युत्त्यननुसन्धानेन हृस्वत्वादिप्रमोऽनुवर्त्तत एव तद्वदात्मन्यप्यावाल- पण्डितमनुभवसिद्धं देहादितादात्म्यभ्रमं शास्त्रजन्यन्रह्मात्मतत्वसाक्षात्कारेण विना बाधरहितं को निवारयेत्। गौणत्वं चाऽहं मनुष्य इति प्रत्य- यस्योत्तरत्र समन्वयसूत्रे निराकरिष्यते। तदेवं स्वयंत्रकाशमानो निरंशोऽप्यात्मा मिथ्याभिमानतिरोहितो ब्रह्म- तत्वाकारेणाऽगृहीत इत्याकारभदेन सामान्यग्रहणविशेषाग्रहणयोः संभवांद- घिष्ठानत्वमविरुद्धम्। ततः सत्यस्याऽधिष्ठानस्य मिथ्यावस्तुसंभेदावभास
करती है, अतः भ्रम ही है। दृष्टान्त देते हैं-जैसे अवयवशून्य अकारादि वर्णोंका पूर्ण भान होनेपर भी व्यञ्ञक ध्वनिमें विद्यमान हस्वत्व, दीर्घत्व आदि धर्मोंका आरोप होता है। ह्स्वत्व आदि तो वर्णके धर्म हैं नहीं, क्योंकि 'यह वही अकार है, इस प्रकार प्रत्यभिज्ञावुद्धिसे वर्णोंका सर्वगतत्व प्रतीत होता है। व्णोंके इस सर्वगतत्वका ज्ञान रहते हुए भी 'उन युक्तियोंका अनुसन्धांन किये बिना हस्वत्व आदिकी अनुवृत्ति होती ही रहती है। दार्श्टान्तिकमें समन्वय करते हैं-इसी तरह आत्मामें भी बालकसे लेकर घुरन्धर विद्वान् तक सबके अनुभवसे सिद्ध देह आदिका आत्मासे तादात्म्यका भ्रम शास्त्र द्वारा उत्पन्न हुए ब्रह्मात्मतत्त्वके साक्षात्कारके विना बाध रहित होता है, ऐसी दशामें तब उसकी निवृत्ति कौन कर सकता है ? 'अहं मनुष्यः' (मैं मनुष्य हूँ) यह प्रतीति गौण है, इसका समन्वय- सूत्रमें खण्डन करेंगे। इस पूर्वोक्त विवेचनसे स्वयंप्रकाश अवयवशून्य भी आत्मा मिथ्या (अहम्) अभिमानसे आच्छन्न हुआ ब्रह्मतत्वाकारसे गृहीत नहीं होता है। इस प्रकार आकारका भेद होनेसे ('आत्माऽस्मि' इस सामान्य आकार और ब्रह्मतत्त्वात्मक विशे- धाकारका) भेद होनेसे सामान्य अंशका ग्रहण और विशेष अंशका अग्रहण-इन दोनोंका सम्भव होनेसे ब्रह्मतत्त्वका अधिष्ठान होना विरुद्ध नहीं है। ऐसी अवस्थामें 'सत्य अधिष्ठानका मिथ्यावस्तुके संसर्गसे भान होना' (अर्थात् सत्य पदार्थमें अनृत पदार्थका तादात्म्य प्रतीत होना) अध्यासका स्वरूपलक्षण भी (अहंकारादि
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १८३
इति स्वरूपलक्षणमस्त्येव। तरिपयकरणद्रष्टाख्यत्रितयस्थानीये आत्म-
संसारे पूर्वपूर्वाध्याससंस्कारस्य सुलभत्वाच्च कारणत्रितयजन्यत्वं तटस्थ- लक्षणमपि सुसंपादम्। यद्यप्यत्राधिष्ठानाध्यस्यमानयोरात्मानात्मनोरेकी- करणेनावभासकं चैतन्यं स्वरूपतो न जायते तथापि विशिष्टविपयो- परक्ताकारेण तस्य जन्म न विरुद्धम्। एवं च सति यन्तु पूर्व लक्षणमुक्तं तत्र स्ृतिसमानशव्देन कारणत्रितयजन्यत्वं विवक्षितम्। अन्य- स्याऽन्यात्मतावभास इत्यनेन च सत्यस्य मिथ्यासंभेदावभास इति व्याख्ये- यम्। तस्मादात्मन्यहङ्गारादिश्रमो वा सोपाधिकभेदभ्रमो वा लक्षणलक्षित एवेति सिद्धम्।
अध्यासमें) है ही। एवं विषय, इन्द्रिय तथा द्रष्टा इन तीनोंके स्थानापन्न आत्मामें अविद्या दोपका समर्थन पहले किया गया है, इससे आत्मचैतन्य ही अधिष्ठानग्राहक प्रमाण है और संसारके अनादि होनेसे पूर्व-पूर्व अध्यासका संस्कार भी मुलभ है, इस प्रकार अधिष्ठान, ग्रमाण और संस्कार इन तीन कारणोंसे जन्यत्वरूप तटस्थलक्षण भी (उक्त अध्यासमें) सुगमतासे घटता है। [ 'इदं रजतम्' यह ज्ञान अध्यस्यमान रजत और अधिष्ठान शुक्ति दोनोंको विपय करने वाला और उक्त तीन कारणोंसे जन्य है, और अहक्काराध्यासमें जो आत्मचैतन्य ही आतमा और अनात्माके सम्मेदका अवभासी है वह तो जन्य नहीं है, इस अभिप्रायसे झक्ा करके समाधान करते हैं ] यद्यपि अहंकारादि अध्यासमें अधिष्ठान अध्यस्यमान स्वरूप आत्मा तथा अनात्माका ऐक्यसे अवभास करानेवाला चैतन्य (आत्मचतन्य) स्वरूपतः जन्य नहीं है, तथापि विशिष्टविपयसे सम्बलित आकारवान्का जन्म होना विरुद्ध नहीं है। ऐसी स्थितिमें जो पूर्व लक्षण किया गया है उसमें स्मृतिसमानशव्दसे "कारणत्रितयजन्यत्व" (तीन कारणोंसे उत्पन्न होना) ऐसा विवक्षित है। 'अन्यका अन्य स्वरूपसे अवभास होना।' इस लक्षणसे 'सत्यवस्तुका मिथ्या वस्तुके संभेदका अवभास' ऐसा व्याख्यान करना चाहिए। इससे आत्मामें अहज्कारादिका भ्रम अथवा सोपांधिक (जीव और ब्रश्मका) मेद भ्रम लक्षणोंसे-स्वरूप और तटस्थ इन दोनों लक्षणोंसे लक्षित ही सिद्ध होता है।
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१८४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
नतु कथ प्रत्यगात्मन्यध्यास: संभाव्यते, सर्वत्र ह्यध्यस्यमानेन समाने-
नस्तदस्ति। उच्यते-एकस्मिन्विज्ञानेऽघिष्ठानाध्यस्यमानयो: संभिन्नतयाS- वभास एवाऽध्यासेऽपेक्ष्यते नाधिष्ठानस्य विषयत्वं केवलव्यतिरेकाभावात्। अस्ति चाऽत्राऽऽत्मानात्मसंभेदावभासकमहमित्येकं ज्ञानम्। यद्यप्यात्मा निरं- शत्वादविषयत्वाचांशेन वा स्वरूपेण वा नाडस्य ज्ञानस्य विपयस्तथाप्या-
प्रत्ययरूपेणाऽवभासते। अस्ति चेदं रजतमितिवदिदमित्यध्यासे द्वैरुप्यम्। यथाडयो दहतीत्यत्र दग्धृत्वविशिष्टस्याऽम्रेरयसश् द्वैरूप्यावभासस्तथाऽहमु-
शङ्का-प्रत्यगात्मामें अध्यासकी कैसे सम्भावना हो सकती है? क्योंकि सर्वत्र शुकिरजत आदि अध्यास स्थलमें जिस इन्द्रियसे अध्यासके विषय रजतादि- का ज्ञान होता है उसी इन्द्रियसे अधिष्ठानका भी ज्ञान होता है, इससे अधिष्ठानको सर्वत्र समानेन्द्रियविज्ञानविषयत्व ही देखा गया है। ऐसा समाने- न्द्रियविज्ञानविषयत्व युष्मत्प्रत्ययके विषय न होनेवाले आत्माका नहीं है। समाधान-एक विज्ञानमें अधिष्ठान और अध्यस्यमान दोनोंके ऐक्यसे अवभास होना ही अध्यासमें अपेक्षित है, 'अधिष्ठानका निरुक्तज्ञानविषयत्व होना' अपेक्षित नहीं है, ऐसा माननेमें केवलव्यतिरेकका अभाव है। (जो विषय नहीं है उसमें अध्यास नहीं होता ऐसा केवल व्यतिरेक नहीं है, क्योंकि विषय न होनेवालीस्वतःप्रकाश संवित्में क्षणिकका अध्यास देखा गया है। और आत्मा तथा अनात्मा दोनोंके तादात्म्यका बोधक 'अहम्' इस आकारवाला एक ज्ञान देखा ही गया है। यद्यपि आत्मा अवयवशून्य एवं अविषय होनेसे अंशसे अथवा स्वरूपसे भी 'अहम्' इस ज्ञानका विषय नहीं है तथापि आकाश- प्रतिबिम्वसे युक्त दर्पणके सदृश आत्मामें अध्यस्त हुआ अन्तःकरण जिसमें आत्माका प्रतिविम्ब पड़ा हुआ है 'अहम्' इस आकारके ज्ञानसे प्रकाशित होता है। 'इदं रजतम्' इस अध्यासके समान 'अहम्' अध्यासमें भी दो रूप हैं ही। जैसे 'अयो दहति' (लोहा जलाता है) इस प्रतीतिमें दाहकर्तृत्वविशिष्ट असिका और लोहेका दो रूपसे अवभास होता है, (अमिका लोहके आकारसे चतुष्कोणादि आकार और लोहेका दाहकर्तृत्व आदि जैसा कि पहले
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अध्यासविचार] भापानुवादसहित १८५
तत्र दुःखितया परिणामितया जड़तया विपयेन्द्रियादिव्यावृत्ततया वाडनुभू- यमानोंऽशोऽन्त:करणम्, प्रेमास्पदतया कूटस्थतया साक्षितया विपयेन्द्रियाद्य-
हंग्रत्ययः। नुवृत्तचतन्यरूपतया चाऽनुभूयमानोंऽश आत्मा। तस्मादिदमनिदमात्मकोऽ-
नन्वेतत् प्राभाकरो न सहते। तथाहि-घटमहं जानामीत्यत्र स्वप्रकाश- विज्ञानं घटादीन्व्रिपयत्वेनाऽडत्मानं चाडडश्रयत्वेन स्फोरयति। ततोऽहमित्या- त्मैव भासते न तत्रेदमंशः। न च वाच्यम् अयो दहतीत्यादावयःपिण्डा- देर्दग्वत्वव्यतिरेकवदहं जानामीत्यत्राऽहङ्कारस्य ज्ञातृव्यतिरेकोऽस्त्विति, यथा शीतलायःपिण्डो दीपज्वालाद्यात्मकश्च दग्धा, विविक्तो कचिदुपलभ्येते
प्रतिपादन किया गया है) वैसे ही 'अहमुपलमे' (मैं जानता हूं) इस प्रतीतिमें उपलन्धिकंर्तृत्वविशिष्ट आत्मा और अन्तःकरणके दो रूपका प्रकाश होता है। [ उपलन्धि स्फुरणरूप होनेसे जड़धर्म नहीं है अतः तद्रप आत्मा अन्तः- करणसे सम्पद्ध हुआ-सा परिणामी अन्तःकरणके संभेदसे प्रतीत होता है।] इसमें दुःखी, परिणाभी, जड़ तथा विपय और इन्द्रियसे पृथक रूपसे प्रतीतिमें- अनुभवमें-आनेवाला अंश अन्तःकरण है और प्रेमके आलम्बनरूपसे, कूटस्थ- (अपरिणामी) रूपसे, साक्षिस्वरूपसे एवं विषय और इन्द्रियादिमें अनुवृत्त चितन्यरूपसे अनुभवमें आनेवाला अंश आत्मा है, इससे 'इदम्' तथा 'अनिदम्'-जड़ तथा चेतन दोनोंसे सम्मिलित अवभासवाला अहंग्रत्यय है। शक्का-प्राभाकर (मीमांसक) इस निर्णयको सहन नहीं कर सकता। [ उसके मतका उपपादन करते हैं-] 'मैं घटको जानता हूं' इस ज्ञानमें स्वतः प्रकाशमान विज्ञान (संविटूप ज्ञान) घटादिको विपयरूपसे और आंत्माको आश्रयरूपसे स्पष्ट ही प्रकाशित करता है। इससे 'अहम्' इस आकारसे आत्मा ही प्रकाशित होता है। उसमें इदम्-जड़ अंश नहीं है। जैसे 'लोहा जलाता है' इस प्रतीतिमें लोहेके गोलेमें दाहकर्तृत्वका अभाव है वैसे ही 'मैं जानता हूं' इस प्रतीतिमें भी अहङ्कारमें ज्ञातृत्वका अभाव है, यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि ठण्डा लोहा और दीपज्वालादिके रूपमें विद्यमान दाहक अभि. ये. दोनों जैसे किसी स्थलमें पृथक्-पृथक पाये जाते हैं वैसे ही २४
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१८६ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
तथाऽहङ्कारज्ञात्रोः क्वचिदपि विवेकानुपलम्भात्। ततोऽहङ्कार एवाऽडत्मा स च संविदाश्रयत्वेनाऽपरोक्ष:। यस्तु सांख्य आत्मानमनुमिमीते जड़ेऽन्तःकरणे चित्प्रतिविम्ब- स्तादशविम्बपुरःसरः, प्रतिविम्बत्वाद्, मुखप्रतिविम्ववदिति। तथाऽन्येऽपि स्वस्वप्रक्रियानुसारेण येऽनुभिमते तेपामात्मनो नित्यानुमेयत्वमहमित्यप- रीक्षावभासविरुद्धम्। अथ परावबोधनार्थान्यनुमानानि तर्हि सन्तु नाम। यत्तु तार्किकैरात्मनो मानसप्रत्यक्षचिपयत्वमुक्तं तदसत्, प्रमाणाभावात्। मनोन्वयव्यतिरेकयोविंषयानुभवेनैवाऽन्यथासिद्वेः। विपयानुभवं प्रत्याश्रय- त्वसम्बन्धादेवाऽऽत्मसिद्धावात्मनि ज्ञानान्तरकल्पने गौरवाद्।
अहक्कार और ज्ञानका कहींपर भी विवेक (पृथक-पृथक् स्वरूप) नहीं पाया जाता है, इसलिए अहंकार ही आत्मा है, वह संविद् (ज्ञान) का आश्रय होनेसे प्रत्यक्ष है। मीमांसक सांख्यमतका खण्डन करता है-जड़ अन्तःकरणमें चित्का प्रतिबिम्ब चिद्रूप विम्न्रपुरःसर है अर्थात् जैसा प्रतिविम्न चिद्रूप है वैसा ही बिम्न् भी चेतनस्वरूप है, प्रतिबिम्न्र होनेसे (हेतु), मुखके प्रतिबिम्बके तुल्यं (द्ृष्टान्त), इस प्रकार जो सांख्यवादी आत्माका अनुमान करते हैं और अन्यवादी भी जो अपनी-अपनी प्रक्रियाके अनुसार आत्माका अनुमान करते हैं उन सबके मतमें अत्माका नित्यानुमेय होना 'अहम्' इस प्रत्यक्षज्ञानसे विरुद्ध है। यदि वे लोग कहें कि हमारा अनुमान दूसरोंको समझानेके लिए है, तव तो रहे अनुमान, कोई हानि नहीं है। नैयायिकोंने जो आत्माको मानस प्त्यक्षका विषय कहा है, वह भी संगत नहीं है; क्योंकि ऐसा माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। मनके साथ अन्वय और व्यतिरेक तो विषयके अनुभवसे अन्यथासिद्ध हैं। विषयानुभवके प्रति आश्रयत्व- सम्बन्धसे ही आत्माकी सिद्धि होनेपर आत्मामें ज्ञानान्तरकी कल्पनामें गौरव होगा। [ यदि मन है और उसका आत्माके साथ संयोग होता है तो आत्माका प्रत्यक्ष होता है। सुषुप्तिमें मन नहीं है और मनका आत्माके साथ संयोग नहीं है तो आत्मप्रत्यक्ष भी नहीं होता। इस अन्वय और व्यतिरेकसे घटादिप्रत्यक्ष ही आत्माका प्रत्यक्ष
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अध्यासविचार ]· भांपानुवादसहित १८७
नन्वस्तु तर्हि भाटमतम्। आत्मा ज्ञानकर्म, अत्यक्षत्वाद्, घटवत्। न च कर्मकर्तत्वविरोधः, द्रव्यांशस्य प्रमेयत्वं वोधांशस्य प्रमातृत्वमिति व्यव- स्थितत्वात्। नाऽपि गुणप्रधानभावविरोध:, प्रमेयांशः प्रधानं अ्रमात्रंशो गुणभूत इति सुवचत्वात्। नैतयुक्तम्, द्रव्यांशस्याऽचेतनस्याऽडत्मत्वायोगात्।
नहीं करा सकता, किन्तु आत्ममनःसंयोग ही आत्माका प्रत्यक्ष करा सकता है, यह नैयायिकका अभिप्राय है। मीमांसक खण्डन करता है- प्रदर्शित अन्वय और व्यतिरेक घट, पट आदि ज्ञानके ही साधक हैं। आत्म- मनःसंयोगके विना कोई भी ज्ञान नहीं हो सकता। इससे जैसे विषय और ज्ञानके सम्वन्धसे विपयका प्रत्यक्ष होता है उसके प्रकाशके लिए ज्ञानान्तरकी कल्पना नहीं की जाती, वैसे ही आत्माका भी विपयानुभवके साथ आश्रयत्व- सम्घन्धसे ही आत्माका प्रत्यक्ष हो जायगा, इसलिए आत्मविपयक्क अतिरिक्त ज्ञानकी कल्पना गौरवग्रस्त है। ] भाट्टमत (प्रभाकरसे भिन्न कुमारिलभट्टके अनुयायियोंका मत) ही मान लिया जाय ? उनके मतमें 'आत्मा ज्ञानका कर्म है, प्रत्यक्ष होनेसे, घटके तुल्य' इस अनुमानसे आत्मा ज्ञानका कर्म है, यह सिद्ध है। [जैसे ज्ञानसे घटादिमें प्राकट्यनामक फल उत्पन्न होता है और उस फलके आश्रय होनेसे घटादि ज्ञानके कर्म हैं वैसे ही आत्मा भी आत्मज्ञानका कर्म है और स्वप्काशज्ञान उसमें प्राकट्यरूप फल उत्पन्न करता है, यह तात्पर्य है। ] इस प्रकार भाटमतका स्वीकार करनेपर कर्मकर्तृविरोध होगा [अर्थात् जो आत्मा स्वयं ज्ञानकर्ता है वह ज्ञानकर्म नहीं हो सकता। यद्यपि 'तण्डलः पच्यते स्वयमेव' के समान कर्म आदि भिन्न-भिन्न कारक भी कर्ता हो सकते हैं तथापि एकको एक ही कालमें भिन्न-भिन्न कारकत्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती। ] यदि ऐसा कहो, तो ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि द्रव्यांशको प्रमेयत्व (कर्मत्व) और बोघांशको प्रमातृत्व (कर्तृत्व) माननेसे व्यवस्था वन सकती है। [अर्थात् इस मतमें द्रव्य और वोध उभयस्वरूप ही आत्मा है, इसमें द्रव्यस्वरूप बोधाकारको प्रधान माननेसें आत्मामें कर्तृत्वकी और बोधस्वरूप द्रव्याकारको प्रधान माननेसे कर्मत्वकी उपपत्ति हो जायगी, इससे एकके एककालमें शक्तिद्वय माननेमें विरोध नहीं आता।] इससे गुण-प्रधानभावमें भी विरोध नहीं आता, क्योंकि प्रमेय अंश प्रधान और प्रमातृ
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१८८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
बोधांशस्यैव कर्मत्वे पूर्वोक्तविरोधद्वयानिस्तारात्। न च वोधो युगपत्प्रमेय- त्वेन प्रमातृत्वेन च परिणामाहों निरवयत्वात्, कथश्चित्प्रधानादिवत्परिणामेऽ- पि प्रमातृभागस्य स्वप्रकाशत्वेन संविदाश्रयत्वेन चाऽप्रतीतावपसिद्धान्तापत्ते :; विषयत्वेन प्रतीतौ घटवदनात्मत्वप्रसङ्गात्। तस्मात् संविदाश्रयतयैवाऽऽत्मा प्रत्यक्ष:, घटाद्यस्तु संविद्विपयतया प्रत्यक्षा: । यस्तु सौत्रान्तिको घटादीननुमिमीते-संवेदनेपु विषयप्रतिविम्बाऽवभा-
अंश अप्रधान होगा, ऐसा कह सकते हैं। पूर्वोक्त यह भाट्ट मत युक्त नहीं है, क्योंकि जड़ द्रव्यांशको आत्मा मानना नहीं वन सकता। और यदि बोधरूप अंशको ही कर्म भी माना जाय, तो पूर्वोक्त कर्तृ, कर्म या गुणप्रधानभावमें विरोध बना ही रहा। वोधका प्रमातृत्वरूपसे और प्रमेयत्व- रूपसे एक ही साथ परिणाम नहीं हो सकता, क्योंकि वह अवयवशून्य है; [अपरिणामी पदार्थका परिणाम नहीं हो सकता] साम्यावस्थामें निरवयव होते हुए भी कथंचित् प्रधान (सांख्याभिमत प्रकृति) के समान निरवयव बोधका परिणाम माननेमें भी प्रमातृभागकी स्वप्रका- शरूप तथा संविदाश्रयत्वरूपसे प्रतीति न होनेसे [ उक्त प्रकारसे आत्माकी प्रतीति ज्ञानकर्मत्वरूपसे ही होती है यह कहा गया है] अपसिद्धान्तकी आपत्ति होगी। [इस मतमें बोध स्वप्रकाश और आत्मा संविदाश्रय माना गया है, उक्त विवेचनसे इस सिद्धान्तकी सिद्धि नहीं होगी। ] और वोधका विषयरूपसे प्रकाश होनेसे तो घटादिके समान अनात्मत्वका प्रसङ्क आ जायगा। इससे संविदाश्रय आत्मत्वरूपसे ही प्रत्यक्ष है और घटादि तो ज्ञानके विषयत्वरूपसे प्रत्यक्ष हैं। जो सौत्रान्तिक (वौद्धैकदेशी) घटादिका अनुमान द्वारा ज्ञान होता है ऐसा कहता है, [अनुमानका स्वरूप दिखाते हैं-] ज्ञानोंमें विषयके प्रतिविम्वका अवभास (पक्ष) उस आकारवाले बिम्बके सामने रहनेसे होता है (साध्य), जो जिस प्रकारका नहीं है उसमें उस प्रकारका अवभास (ज्ञान) होनेसे (हेतु), दर्पणमें दिखाई देनेवाले मुखप्रतिभासके तुल्य (दृष्टान्त), (दर्पण स्वतः सुखस्वरूंप नहीं है, परन्तु मुख दिखाई देता है, अतः सिद्ध होता है कि
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अध्यासविचार] भायानुवादसहित · १८९
स व्यक्तव्य: किमस्मिन्ननुमानज्ञाने प्रतिविम्भावमन्तरेण साक्षाद्विपयभूता विपया अवभासेरन् न वा। आद्ये, अत्रैवाडनैकान्तिको हेतुः। द्वितीये, प्रतिज्ञा- तार्थस्य विम्त्रपुरःसरत्वस्याऽप्रतिभासाद् अनुमानानुदय एव। अतोनुभूयमानं विषयापरोक्ष्यं नाडपलपनीयम्। यच्ु विज्ञानवादिना विज्ञानरूपत्वेनैत्र विपयाणामापरोक्ष्यमुक्तम्, तदसत्; अविज्ञानरूपस्य वहिष्ट्रस्याऽप्यापरोक्ष्यदर्शनात्। तस्याऽपि विज्ञानरूपत्वे रजत- दर्पणके सामने विद्यमान विम्वभूत देवदत्तादिके मुखक्का ही प्रतिभास उसमें दिखाई दे रहा है वैसे ही ज्ानमें भी विषय प्रतिभास है)। उस (सौत्रान्तिक) अनुमानकर्तासे कहना चाहिए कि क्या इस आपके निर्दिष्ट अनुमानज्ञानमें प्रतिबिम्बभावके बिना ही साक्षात् विषय होते हुए घट, पट आदि विषय प्रतीत होंगे या नहीं: यदि पूर्व कल्प मानते हो, तो इस पूर्वोक्त अनु- मानमें ही हेतुका व्यभिचार हो गया। [अर्थात् यदि अनुमानमें घट, पट आदि साक्षात् विषय हो गये, तो वह अनुमानज्ञान तद्वान् ही हो गया। तब अत- स्मिन् तदवभासरूप हेतु नहीं गया और इस अनुमानज्ञानके तुल्य प्रत्यक्षज्ञानमें भी घटादि साक्षात् विपय हो ही जायंगे, इससे हानि ही क्या होगी ] द्वितीय पक्षमें तो आपके प्रति ज्ञानविम्नपुरस्सरत्वका प्रतिभास न होनेसे अनुमानका ही उदय नहीं होगा। [अर्थात यदि अनुमानज्ञानमें बिम्बभावको प्राप्त विषय भासित ही हो गया, तो विपयका ज्ञान हो ही गया, तब निष्प्रयोजन अनुमानका उदय क्यों होगा? और घटाकारज्ञानमें घटको विपय न मानना तो प्रत्यक्ष विरुद्ध, ही है] इससे अनुभवमें आनेवाले घट, पट आदि विपयोंका प्रत्यक्ष नहीं होता, इस प्रकारका अपलाप करना उचित नहीं है। विज्ञानवादी (दूसरे बौद्धैकदेशी) ने जो यह कहा है कि विज्ञानके साथ विषयका अभेद होनेसे घट, पट आदि विपयोंका प्रत्यक्ष होता है, तो उसका ऐसा कहना भी तुच्छ है, क्योंकि विज्ञानसे भिन्न बहिष्ट्रका भी प्रत्यक्ष देखा गया है। [अर्थात्* घटके प्रत्यक्षमें वह विषय होता है वैसे ही 'अयं घटः' (यह बाह्य पदार्थ * नैयायिक प्रत्यक्षादि ज्ञानकी प्रक्रिया इस प्रकार मानते हैं-'आत्मा मनसे और मन इन्द्रियसे और इन्द्रिय घट, पट आदि विपयोंसे संयुक्त होती है' इस प्रक्रियाके अनन्तर समवाय सम्बन्धसे आत्मामें ज्ञान उत्पन्न होता है। इस मतमं ज्ञान आत्माक्ा गुण है। गुण और गुणीका समवाय सम्बन्ध होता है। आत्मामें उत्पन्न हुए इस ज्ञानका प्रत्यक्ष मनः-संयुक्त
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१९० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
वद्धाघो न स्यात्। अतो घटादि प्रमेयं विषयत्वेन प्रत्यक्षम्। प्रमितिस्तु स्वप्रकाशत्वेन न. प्रत्यक्षा। यत्तु तार्किका मनःसंयुक्तात्मनि समवेता प्रमिति: संयुक्तसमवायसम्बन्धेन ज्ञानान्तरप्रत्यक्षेत्याहुः । यच् भाट्टाः विषयनिष्ठा प्राकट्याख्या प्रमितिः
घट है), इस प्रकार इदन्तारूप बहिर्भाव भी विषय होता है जो विज्ञानस्वरूप नहीं है, उस बहिर्भावको भी विज्ञानस्वरूप माननेसे रजतके तुल्य उसका भी बाध नहीं होगा। इसलिए घटादि प्रमेयोंका विषयत्वरूपसे ही प्रत्यक्ष होता है, और प्रमिति तो स्वप्रकाश है, अतः उसका विषयत्वरूपसे प्रत्यक्ष नहीं होता है। यत्तु ग्रन्थसे ज्ञानको ज्ञेय माननेवालोंके पूर्वपक्षका उपपादन करके खण्डन करते हैं-तार्किक मनःसंयुक्त आत्मामें समवायसम्बन्धसे विद्यमान ज्ञानका संयुक्तसमवायसम्बन्धसे दूसरे ज्ञान द्वारा प्रत्यक्ष होता है, ऐसा कहते हैं। और भट्टानुयायी मीमांसक विषयमें रहनेवाला प्रकटतानामक ज्ञान संयुक्त- तादात्म्यसम्बन्ध द्वारा दूसरेसे ज्ञेय है, ऐसा कहते हैं ।। उपरोक्त दोनों मत
आत्मामें उक्त ज्ञानके समवायसे उत्पन्न ज्ञानान्तर (अनुव्यवसाय) से होता है। निरुक्त पूर्वज्ञान स्वयं प्रत्यक्ष नहीं है। और भाट मीमांसक ज्ञानको विषयसमवेत मानते हैं, उनका कहना है कि ज्ञानसामग्रीसे विषयमें प्रकटतारूप ज्ञान उत्पन्न होता है उसका प्रत्यक्ष स्वयं नहीं होता, परन्तु इन्द्रियसे संयुक्त घटादिमें होनेवाली प्रकटताके साथ घटादितादात्म्यसे उसका ग्रहण होता है। * विज्ञानवादी "इदं रजतम्" इस भ्रममें "नेदं रजतम्" इस वाधज्ञानसे केवल इदंता- वहिर्भावमात्रका वाध मानता है, क्योंकि वह वहिष्ट विज्ञानसे भिन्न वस्तु है। रजतका, विज्ञान स्वरूप होनेसे, वाघ नहीं मानता। एवं 'अयं घटः' इत्यादि प्रत्यक्षस्थलमें भी इदन्ताको भी यदि विज्ञानस्वरूप मान लिया जाय, तो उसका भी वाघ प्राप्त नहीं होगा। इसलिए इदन्ता-चहिष्ट्रको विज्ञानस्वरूप नहीं मान सकते, और इदन्ताका 'अयं घटः' इत्याकारक प्रत्यक्ष होता हीं है। इस प्रकार वहिभावका जो कि विज्ञानस्वरूप नहीं है, जव प्रत्यक्ष हो ही रहा है तब यह व्याप्ति कि विज्ञानस्वरूप होनेसे ही विषयका प्रत्यक्ष है नहीं मानी जा सकती। *ज्ञानग्राहक दूसरा ज्ञान माननेमें यदि ग्राह्य और ग्राहक इन दोनों ज्ञानोंका एक कालमें होना मानते हो, तो उन दोनोंका फल भी एक कालमें ही होना चाहिए जो कि सम्भव नहीं है। घटादि ज्ञानकालमें सर्वप्रथम मनमें एक प्रकारकी क्रिया होती है, उससे अनन्तर विभाग और तदन्तर पूर्व संयोगका नाश, तत्पश्चात उत्तर संयोग इस प्रकार अनेक क्षणोंके विलम्बसे होनेवाले द्वितीय ज्ञानकाल तक प्रथम क्षणमें ही नष्ट होनेवाला प्रथम ज्ञान कैसे रह सकता है?
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १९१
संयुक्ततादात्म्येनाऽन्यवेद्येत्याहु:, तदुभयमप्यसत् ; ग्रमितिगोचरप्रमित्यन्त- राङ्गीकारेण युग पदज्ञानद्दयावस्थानप्रसङ्गात्। विनश्यदविनश्यतो: फलयोर्यौंग- पद्यमिष्टमेवेति चेत्, तथापि संयुक्ते वस्तुनि समवायस्य तादात्म्यस्य वा ग्रहणप्रयोजकत्वे ग्रमित्याश्रयगतपरिमाणरसादीनामपि अ्रमितिग्राहकेणव ज्ञानेनाऽपरोक्षता प्रसज्येत । अथोच्यते-आत्मनिष्ठपरिमाणादीनां घटादिगतरसादीनां च अ्रमिति- प्रत्यायकज्ञानेनाऽपरोक्षत्वयोग्यता नास्तीति । एवमपि ग्रमिते: स्वसत्तायां प्रक्काशव्यतिरेकादर्शनाद् न घटादिवदन्यवेद्यता युज्यते । तुच्छ हैं, क्योंकि ज्ञानविपयक दूसरे ज्ञानके माननेपर एक कालमें ज्ञानरूप दो फलोंकी अवस्थितिका प्रसङ्ग हो जायगा। *यदि नष्ट होते हुए और नष्ट नहीं होनेवाले दो फलोंका एक कालमें रहना माना जाया तो भी सयुंक्त हुई वस्तुमें समवाय अथवा तादात्म्यके ग्रहणपयोजक होनेसे प्रमितिके आश्रयमें विद्यमान परिमाण तथा रसादिके भी प्रमिति (ज्ञान) का ग्रहण करनेवाले दूसरे ज्ञानसे प्रत्यक्षका प्रसङ्ग हो जायगा। यदि कहा जाय कि आत्मनिष्ठ परिमाणादि तथा विपयगत रसादिमें प्रत्यक्ष ज्ञान- ग्राहक ज्ञानविपयत्वकी योग्यता नहीं है। [इससे उक्त दोप नहीं आता ] ऐसा माननेपर तो प्रमिति (ज्ञान) की अपनी सत्तामें प्रकाशका व्यतिरेक न होनेसे उसकी घटादिके तुल्य अन्यवेद्यता युक्त नहीं हैx । * यहांपर इस दोपका अभ्युपगम मालूम होता है, क्योंकिं आगे तथापिसे संयुक्तसम- वाय या संयुक्ततादात्म्यके ग्राहक माननेमें अन्य दोप दे रहे हैं, परन्तु तत्त्वदीपन इस दापका भी ख्डन करता है इसलिए तत्त्वदीपनका पाठ दिया जाता है-"न च विनश्यदविनश्यतोः सहावस्थानमिप्यते इति शठ्क्यम्, पूर्वोत्तरवेदनयोनिचर्त्त्यनिवर्तकभावेन विरोधाद भास्य- भासकवत्ताऽनुपपत्तरित्यर्थः । ....... दूपणान्तरमाह-संयुक्तेति ।" नष्ट होते हुए और नष्ट नहीं होनेवालेका साथ रहना हष है, ऐसी शक्का भी नहीं कर सकते, क्योंकि पूर्वोत्तर ज्ञानोंमें निवर्त्यनिवर्तकभाव होता है, अतः विरोध होनेसे भास्यभासक (ग्राह्यग्राहक) भाव नहीं वन सकता। आगे संयुक्तादिसे दपणान्तर कहते हैं। *. योग्य विभुविशेष गुणोंमें स्वोत्तरवर्तिविशेप गुणनाश्यत्व माना गया है। * जिस प्रकार संयुक्तसमवाय आत्मसभवेत ज्ञानका ग्रहण करा देता है उसी प्रकार आत्म- समचेत परिमाणका भी वही ग्रहण करा देगा। तथा संयुक्ततादात्म्यसे भी प्राकय्यके तुल्य विपयके रसादिका भी ग्रहण चक्षुसे ही होने लगेगा। X अनुभव आदि ज्ञान प्रकाशस्वरूप है, अतः ज्ञानान्तरसे गम्य नहीं हो सकता। यदि घट, पट आदिके तुल्य अन्यसे ज्ञेय होता, तो जसे कभी घटादिकी सत्ताका सन्देह होनेपर जिज्ञासा होती है
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१९२ विवरणप्रमेयसंग्रह. [सूत्र १, वर्णक १
न च वाच्य प्रमाणाख्यादात्मव्यापाराद् घटादिपु जायमानस्य प्राकस्वस्य घटगतरूपादिवदन्यवेद्यतेति कोऽसावात्मनो व्यापारः परिस्पन्दः परिणामो वा ! नाऽडद्यः, सर्वगतस्य तदसंभवात्। द्वितीये तु मृत्परिणामफलस्य घटस्य मृदि चाऽऽत्मपरिणामफलस्य प्राकट्यस्याऽत्मैवाश्रय: स्यात्। केशपलितत्व- परिणामाच्छरीरे वार्द्धकवदात्मपरिणामाद्विपये प्राकव्यमिति चेत्, तथापि किं प्राकव्याश्रयत्वं चेतनत्वं किं वा प्राकट्यजनकत्वम् उत तज्जनकज्ञानाख्यच्या- पाराधारत्वम्। आद्ये घटादयश्चेतना: स्यु:। द्वितीये, पुनश्रक्षुरादयश्चेतना-
प्रमाणनामक आत्माके व्यापारसे घटादि विपयमें होनेवाली प्रकटता घटादि गतरूपकी भाँति अन्यवेद्य है, ऐसा भी नहीं कहना चाहिए, क्योंकि यह आत्माका प्रमाणनामक व्यापार कौन वस्तु है? परिस्पन्द या परिणाम? इनमें प्रथम परिस्पन्द नहीं कह सकते, क्योंकि सर्वव्यापक आत्मामें उसका सम्भव नहीं है।। द्वितीय परिणाम पक्ष लें, तो जैसे मिट्टीका परिणामरूप फल घटका आश्रय मिट्टी ही है वैसे ही आत्मपरिणामरूप फल-प्राकट्यका भी आश्रय आत्मा ही होगा। जैसे केशपलितत्व (वालोंका पक जाना) रूप परिणामसे जनित बुढ़ापा शरीरमें रहता है, वैसे ही आत्मपरिणामसे उत्पन्न फल (प्रकटता) विषयमें रहेगा यदि ऐसा कहा जाय, तो भी क्या प्राकट्य (ज्ञान) का आश्रयत्व चेतनत्त्व है, अथवा प्राकट्यका जनकत्व है ? किंवा प्राकट्यके जनक ज्ञाननामक व्यापारका आश्रय होना है? इनमें प्रथम कल्प माननेमें तो घटादि विषयोंको भी चेतनत्वका प्रसङ्ग होगा। यदि द्वितीय (प्राकट्यजनकत्व) माना जाय, तो चक्षुरादि इन्द्रिय भी चेतन (संवित्के
वैसे ही ज्ञानकी सत्तामें भी सन्देह होनेसे जिज्ञासा होती; परन्तु अनुभव होनेपर उसकी सत्तामें न तो सन्देह ही होता है और न जिज्ञासा अतः अनुभव स्वसत्तामें प्रकाशस्वरूप ही है, यह भाव है। * प्रकटताको स्वप्रकाश माननेसे उसका जन्म नहीं हो सकता, यह शङ्का करनेवालेका आशय है। + परिस्पन्द-स्वचलन, प्रादेशिक पदार्थमें सम्भव है जैसे कुठार जमीनमें पड़ा है, तक्षाने हाथमें उठाया, काष्टके ऊपर गिराया और काष्ठका छेद हुआ इस प्रकार कुठार में उत्पन्न स्पन्दने काष्ठच्छेद किया इस तरह स्पन्द्का सर्वव्यापक आत्मामें सम्भव नहीं है, जिसके द्वारा विषयमें प्राकट्यने जन्म लिया, ऐसा मानते हो। 1 सकर्मक क्रियाविषयमें ही अतिशय उत्पन्न करती है।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित १९३
स्तथा स्युः । न तृतीयः, आत्मा ज्ञानक्रियावान्, तज्जन्थफलसम्वन्धित्वात्, यथा भुजिजन्यतृपिसम्वन्धी भुक्तिक्रियावान् देवदत्तः, इति हि त्वया ज्ञानाधारत्वमात्मनोऽनुमातव्यम्, तत्राऽसिद्धो हेतुः स्याद्, आत्मनः फलसम्बन्धाभावात्। 'मया घटोऽनुभूयते' इति फलसम्बन्धः प्रतीयत इति चेत्, तहिं विपये एव फलं नाऽडत्मनीति वदतस्तव मते प्रतीतिविरोधस्त्वयैव संपादित: स्यात्। अतोऽतिदुष्टी तार्किकभाट्टपक्षावुपेक्ष्य प्रमातृव्यापारस्य प्रमाणस्य फलभृतायाः ग्रमितेः स्वप्रकाशत्वमादर्तव्यम्। यन्तु सौगतेन संवेदनमेव प्रमाणं तदेव तत्फलं चेत्युक्तम्, तत्र स्फुट एव स्वात्मनि वृत्तिविरोवः। यद्यपे ग्रमातुरात्मनो नाडस्ति क्चिद् व्यापार- स्तथाप्यात्ममनश्रक्षुविपयाणां चतुर्णा संनिकर्ष एव ग्रमाणरूपः सन् ग्रमातृ- जनकत्वरूप) हो जायँगे। तृतीय पक्ष भी नहीं वनता, क्योंकि आत्मा ज्ञानक्रिया- वाला है, उससे (ज्ञानक्रियासे) जन्य फलसम्ब्न्धी होनेसे, भोजन क्रियाजनित तृप्तिके सम्घन्घी भोजनक्ियावान् देवदत्तके समान, इस प्रकार ही तुम आत्मामें ज्ञानाधारत्वका अनुमानसे उपपादन करोगे। इस अनुमानमें हेतु असिद्ध है, क्योंकि आत्मामें फलसम्बन्धका अभाव ह। 'मुझे घटका अनुभव हो रहा है' इस प्रतीतिसे फलका सम्बन्ध आत्मामें प्रतीत होता है, यह यदि कहो, तो 'विपयमें ही फलका सम्बन्ध है, आत्मामें नहीं है' यह कहनेवाले तुमने स्वयं ही अपने मतमें प्रतीतिके विरोधका सम्पादन कर दिया। इस पूर्वोक्त विवेचनसे तार्किक और भाट्ट दोनों मत अत्यन्त दूपित हैं, इससे इन दोनों मतोंकी उपेक्षा करके प्रमातृत्यापार प्रमाणके फलस्वरूप अनुभवमें स्वप्रकाशत्वका ही आदर करना चाहिए। चौद्धोंने संवेदन (अनुभव) ही प्रमाण। और संवेदन ही फल है, ऐसाx कहा है। इस वौद्ध मतमें अपनेमें अपनी वृत्तिका विरोध स्पष्ट + ही है। यद्यपि प्रमातृस्वरूप आत्माका कोई व्यापार नहीं है, तथापि आत्मा (प्रमाता), मन *वादी प्राकव्यरूप फल विपयमें ही कहता है। 1. अर्थाकारविशिष्ट होनेसे करणव्युत्षत्ति द्वारा ज्ञान प्रमाण है। 1 अर्थकी उपलब्धिस्वरूप होनेसे भावव्युत्पत्तिसे स्फुरणात्मक फल भी है। x करण और फलका परस्पर मिन्न होना लोकप्रतीतिसे सिद्ध है, अन्यथा कार्यत्व और करणत्व ये दोनों एकमें उपपन्न नहीं हो सकते, अतः ज्ञानको ही प्रमाण तथा फल दोनों मानना विरुद्ध है। १५
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१९४ विवरणग्रसेय संग्रह [सूत्र १, वर्णक ?
व्यापारत्वेनोपचर्यते। न चाञ्व्यभिचारिण्यां प्रमितौ सत्यां हानोपा- दानोपेक्षाणां व्यभिचरितानां अ्माणफलत्वमुपपद्यते। न चाऽडत्मा स्वप्रकाश इति वेदान्तपक्षो युक्तिसहः, उभयवादि- सिद्ध संवित्स्वप्रकाशत्वमान्नेण व्यवहारसिद्धावात्मनोऽपि तत्कल्पने गौरवात्। तस्मात् त्रिपुटीप्रत्यक्षवादिन: प्राभाकरस्य यन्मतं 'कुम्भमहं जानामि' इत्यादिपु विपयसंवेदनस्य स्वपकाशस्याऽडश्रयत्वेन पदीपाश्रयवर्तिवत्प्रकाश- मानोऽहङ्कार आत्मैव, न त्विदमनिदरूप इति तदेवाऽऽदरणीयम्। अत्रोच्यते-विचारे सत्यहङ्कारस्याऽनात्मत्वमेव पर्यवस्यति, आत्म- (आन्तर इन्द्रिय), चक्षु (वाह्य इन्द्रिय) और विषय इन चारोंका सन्निकर्ष ही प्रमाणरूप (प्रमा-ज्ञानजनक) होता हुआ प्रमाताका व्यापार है, ऐसा उपचारसे बोधित होता है। अव्यभिचारी अनुभवरूप फलके रहनेपर व्यभिचारी हान तथा उपादानको प्रमाणका फल मानना ठीक नहीं है *। 'आत्मा स्वप्रकाश है' यह वेदान्तका पक्ष युक्तियोंसे सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि संवित्के उभयवादिसिद्ध स्वप्रकाशत्वसे ही व्यवहारकी सिद्धि हो सकती है फिर भी आत्माको स्वप्रकाश माननेमें गौरव है। इससे त्रिपुटी प्रत्यक्षकोt माननेवाले प्रभाकरका जो यह मत है कि 'मैं घटको जानता हूँ' इत्यादि ज्ञानस्थलमें स्वप्रकाशभूत विषयज्ञानका आश्रय होनेसे प्रदीप (शिखा) की आश्रय वर्तिका (बत्ती) के समान प्रकाशित होता हुआ अहद्कार (मैं) आत्मा ही है, इदमनिंदरूप नहीं है, वही मानने योग्य है। इस पूर्वपक्षपर कहा जाता है-विचार करनेपर अहङ्कारमें अनात्मत्व ही सिद्ध होता है; क्योंकि आत्मा ही अनुभवरूप है, जैसे आपसे प्रश्न किया * विपयका अनुभव हुए विता ग्हण या त्याग नहीं वन सकता, अतः अनुभवका होना आवश्यक है। तथा अनुभव होनेपर हान और उपादान अवश्य ही हों, इसमें कोई प्रबल प्रमाण नहीं है, क्योंकि उदासीन पुरुषमें हान और उपादान नहीं दिखाई देते। अतः हान और उपादान व्यभिचारी हैं। + 'अहं घटं जानामि' (मैं घटको जानता हूँ) इस ज्ञानमें त्रिपुटीका भान होता है अर्थात् इसमें 'अहम्' यह प्रथम अंश आत्माका प्रत्यक्ष है, 'घटको' यह द्वितीय विषयांशका प्रत्यक्ष और 'जानता हूँ' यह तृतीय ज्ञानांशका प्रत्यक्ष है, इस त्रिपुटीके प्रत्यक्षमं अहम् 'मैं' ज्ञानाश्र- यत्वरूपसे, घट ज्ञानक्रियाजन्य अतिशयके आश्रयत्वरूपसे और ज्ञान स्वयम् आत्मरूपसे स्वप्रकाश होनेके कारण प्रकाशित रहता है।
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अंध्यासविचार] भापानुवादसहित १९५
नोऽनुभवरूपत्वात्। तथाहि-इदं तावंद् भवान् प्रष्टव्यः किमात्मैव चित्प्रकाश उताऽनुभवोऽपि अथवाऽनुभव एवेति । आद्ये जड़प्रकाशोऽय- मनुभवः किं चक्षुरादिवद्ग्रकाशमानो विश्वमभिव्यनक्ति आहोस्विदा- लोकवत् सजातीयप्रकाशान्तरनिरपेक्षतया. प्रकाशमान एव विपयाभिव्य- झकः । नाऽडद्य:, चक्षुपः स्वातिरिक्तानुभवजनकत्वाद्, अनुभवस्य चाडतथा- त्वात्। द्वितीये स्वातिरिक्तानुभवमनपेक्ष्य स्फुरणमित्येतस्य चित्प्रकाश- लक्षणस्य सच्चेनाऽनुभवश्चित्पकाश एव भवेत्। यद्यप्यनुभवचक्षुरालोकानां घटादिव्यञ्ञकत्वं समानम्, तथाप्यनुभवस्य विपयाज्ञानविरोधित्वात् चित्प्र- काशत्वम् आलोकस्य विपयगततमोविरोधित्वाञ्जडप्रकाशत्वम् चक्षुपश्चाऽ- परोक्षानुभवं प्रति साक्षात्साधनत्वादज्ञातकरणत्वमिति संभवत्येव वैपम्यम्। नन्वालोकवत् सजातीयानपेक्षत्वमनुभवस्येत्ययुक्तम्, आलोकस्य सजा- - जाता है कि क्या आत्मा ही चित्प्रकाश है? या आत्म और अनुभव दोनों चित प्रकाश "चैतन्यरूप' है? अथवा केवल अनुभव ही 'चैतन्य' है और आत्मा जड़ है? यदि प्रथम पक्ष माना जाय, तो जड़प्रकाश यह अनुभव चक्षु आदि इन्द्रियोंकी भाँति स्वयं प्रकाशित न होता हुआ क्या विश्वको (विपयको) प्रकाशित करता है, अथवा आलोककी भाँति अपने सजातीय दूसरे आलोककी अपेक्षा न रख कर ही प्रकाशित होता हुआ विषयका प्रकाश करता है? इसमें प्रथम कर्प युक्त नहीं है, क्योंकि चक्षु अपनेसे भिन्न घट, पट आदि विपयके अनुभवका जनक है और आपका अनुभव तो ऐसा है नहीं। और द्वितीय कल्पमें, तो अपनेसे भिन्न ज्ञान (अनुभव) के विना ही स्फुरणरूप चित्प्रकाशके लक्षणका अनुभवमें समन्वय होनेसे अनुभव चित्प्रकाश सिद्ध हो जाता है। यद्यपि अनुभव, चक्षु और आलोक ये तीनों समानरूपसे ही घटादि विपयोंके प्रकाशक हैं, तथापि विषयके अज्ञानका विरोधी होनेसे अनुभव चित्पकाश है, विपयगत अन्धकारका विरोधी होनेसे आलोक जड़- प्रकाशक है और प्रत्यक्ष अनुभवके प्रति चक्षुके साक्षात्करण होनेसे वह अज्ञातकरण है, इसलिए तीनों कारणोंमें परस्पर वैषम्य हो सकता है। आलोकके सदृश अनुभव भी सजातीय द्वितीयकी अपेक्षा नहीं रखता, यह तुम्हारा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि आलोक (दीपादि प्रकाश) अपने सजातीय
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१९६ विवरणप्रमेयसंग्रहं [ सूंत्र १, वर्णेक १
तीयचक्षु:प्रकाश्यत्वादिति चेद्, न; चक्षुः किमालोके तमो वारयत्यु- ताऽनुभवं जनयति? नाऽडद्यः, आलोकस्य निस्तमस्कत्वात्। द्वितीयेऽपि विजातीयेनैव चक्षुर्जन्यानुभवेन प्रकाश्यत्वमालोकस्य। तस्मादालोक- वत् सजातीयानपेक्षस्याऽनुभवस्य चित्प्रकाशत्वं युक्तम्, जड़प्रकाशत्वे जग- दान्ध्यप्रसङ्गात्। प्रमातृचैतन्यमेव जड़ानुभववलात् सर्वमवभासयतीति चेद्, न; जड़ानुभवो यद्यात्मचैतन्यस्य विपयसम्वन्धमात्रे हेतुस्तदा वुद्धिपरिणाम एवाडयं स्यात्, ततो वेदान्तिमत प्रवेशः ।
चक्षुसे प्रकाशित होता है, इस प्रकार शङ्का करना भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा पूर्वपक्ष करनेपर यह प्रश्न होता है कि क्या चक्षु आलोकमें रहनेवाले अन्धकारका वारण करता है या (तद्विषयक) अनुभवको उत्पन्न करता है ? इनमें प्रथम कल्प उचित नहीं है, क्योंकि आलोकमें अन्धकार रहता ही नहीं है। दूसरा पक्ष माननेपर भी चक्षुसे उत्पन्न हुए विजातीय अनुभवसे ही आलोक प्रकाशित होता है। इससे सजातीयचक्षुःप्रकाश्यत्व तो तब भी सिद्ध नहीं हुआ। इसलिए आलोकके सदश सजातीयकी अपेक्षा न रखनेवाले अनुभवको चित्- प्रकाश मानना युक्तिसंगत ही है, उसे जड़प्रकाश माननेपर तो जगत् अन्धकामय हो जायगा *। प्रमातृचैतन्य ही जड़ अनुभवके बलसे सम्पूर्णका प्रकाश कर देता है, यह समाधान भी उचित नहीं है, क्योंकि जड़ अनुभव यदि केवल आत्मचैतन्यके विषयके साथ सम्बन्धमें ही कारण है: तो यह जड़ानुभव केवल वुद्धिका परिणाम ही सिद्ध हुआ, इससे वेदान्तियोंके मतमें ही आपका प्रवेश हुआ ।। यदि इस जड़ अनुभवको आत्मप्रकाशका भी कारण मानते हो, तो यह
- यदि विषयका प्रकाशक अनुभव स्यं प्रकाश न हो, तो ज्ञानप्रकाश्य जगत्का प्रकाश कैसे हो सकेगा; क्योंकि "सयं नष्टः परान्कथं साधयितुं समर्थः" की उक्ति चरितार्थ होगी, स्वयं जो प्रकाशित नहीं है, वह दूसरोंको कैसे प्रकाशित कर सकता है, यह भाव है। + 'उपरागार्था वृत्तिः' वेदान्ती मानते ही हैं, यह विषयसम्वन्धजनक अनुभव वेदान्तियों द्वारा स्वीकृत वृत्तिके चदलेमें ही हुआ, जो इष्ट ही है।
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अध्यासविचार ] भापातुवादुसहितं १९७
अथाऽडत्मप्रकाशेऽपि हेतु:, तदसत्; चिदूपस्य जड़ाधीनप्रकाशानुप- पत्तेः। अस्तु तहिं विपयमान्रप्रकाशकः।न च वेदान्तमतापत्तिः, आत्मचैत- न्यात् पृथगेव विपयाभिव्यक्तये जड़ानुभवजन्यानुभवान्तरस्वीकारादिति चेत्, तर्हिं अस्याडपि द्वितीयानुभवस्य तथैव जड़त्वेनाऽनुभवान्तरापेक्षायामनवस्था स्यात्। नाऽप्यात्मानुभवावुभावपि चित्प्रकाशाविति द्वितीय: पक्षः, तयोरन्यो- न्यनिरपेक्षसिद्धिप्रसङ्गात्। तथात्वे च तयो: संविदात्मनोः सम्वन्धः केनाऽव- गम्येत। उभयोरप्यन्योन्यवार्तानभिज्ञतया न सम्बन्धग्राहित्वं संभवति। अथ मन्यसे आत्मा स्वयमेव न प्रकाशते, चिद्नूपत्वात, पुरुपान्तर- संवेदनवत्, ततोऽनुभवाधीनाऽडत्मसिद्धिरिति, तन; अनुभवेऽपि तथा- उचित नहीं है, क्योंकि चैतन्यस्वरूप आत्माका जड़के अधीन प्रकाश होना नहीं वन सकता। अच्छा तो वह विषयका ही प्रकाशक हो, ऐसा होनेपर वेदान्तमतमें हमारा प्रवेश भी नहीं होगा, क्योंकि आत्मचैतन्यसे अतिरिक्त ही विषयके प्रकाशके लिए जडानुभवसे उत्पन्न दूसरे अनुभवका स्वीकार किया जारहा है, [और ऐसा वेदान्ती नहीं मानते ] इस प्रकार समाधान भी नहीं कर सकते, क्योंकि यह पूर्वानु- भवजन्य द्वितीय अनुभव भी तो प्रथमके सदश जड़ ही होगा, तव वह भी अतिरिक्त अनुभवकी अपेक्षा करेगा, इस प्रकार अनवस्था दोप होगा। दूसरा पक्ष (आत्मा और अनुभव दोनों चित्प्रकाश ही हैं) भी उचित नहीं है, क्योंकि इन दोनोंकी एक दूसरेकी अपेक्षा न रख कर ही सिद्धि हो जायगी। ऐसा होनेसे आत्मा और संवित् (ज्ञान) उन दोनोंका सम्बन्ध किसके द्वारा प्रतीत होगा? दोनोंको परस्पर एक दूसरेका पता न होनेसे वे सम्बन्धके ग्राहक नहीं हो सकते *। यदि यह मानो कि आत्मा स्वयं प्रकाशित नहीं होता है, चिद्रूप होनेसे दूसरे पुरुपके ज्ञानके समान,। इससे अनुभवके अधीन ही आत्माकी *दोनोंको चेतन माननेमें दोनों ही देवदत्त और यज्ञदत्त-इन दोनों चेतन पुरुपोंकी तरह ये स्वसत्तामें या प्रकाशमें परस्पर निरपेक्ष हो जायँगे और यह भी दूसरा दूषण हो जायगा कि अपने ग्रहणके विना अपने सम्वन्धके ग्रहणका सम्भव न होनेसे आत्मा और ज्ञानका परस्पर सम्वन्धग्रहण न तो अपनेसे और न अतिरिक्तसे ही हो सकेगा। + जैसे संवेदन (ज्ञान) के चेतन होनेपर भी पुरुपान्तरका ज्ञान पुरुपान्तरको स्वयं प्रकाशित नहीं रहता, किन्तु उपायान्तरोंसे प्रकाशित होता है, वैसे ही चेतन अत्मा भी है।
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१९८ विवरणप्रमैयसग्रह [सूंत्र १, वर्णक १
प्रसङ्गात्। अव्यवहितत्वादनुभवः स्वप्रकाश इति चेत्, तदात्मन्याे समानम्। तत आत्मा स्वयमेव प्रकाशते, चिद्रूपत्वे सत्यव्यवहितत्वात्, अनुभववत् इति प्रामोति। नाऽप्यनुभव एव चित्प्रकाश इति तृतीय: पक्ष:, आत्मैव चित्प्रकाश इति वलादङ्गीकार्यत्वात्, आत्मानुभवयोरभेदाद्। तथाहि -- सोडयमनुभव आत्मगुण इति तार्किका: प्राभाकराश्राऽडहुः । आत्म- स्वरूपत्वाद् द्रव्यमिति सांख्या अर्थादाचक्षते। तथा परिणामक्रियाफल- त्वात् क्रियाफलयोरैक्यविवक्षया कर्मेति भाट्टाः। तत्र कर्मत्वे गमनादि-
सिद्धि होती है,* तो यह मानना भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभवमें भी ऐसा कहनेका प्रसङ्ग है। अव्यवहित चिद्रप होनेसे अनुभव स्वप्रकाश है, यदि ऐसा कहो, तो आत्माके विषयमें भी अव्यवहित चिद्रप होनेसे आत्मा स्वप्रकाश है, यह कहना एक-सा है। इसलिए 'आत्मा स्वयं ही प्रकाश है, चेतन होकर अत्यवहित होनेसे, अनुभव (सम्मत) के समान' ऐसा अनुमान प्राप्त होता है। अनुभव ही चेतनप्रकाश है आत्मा नहीं, यह तीसरा पक्ष भी मानने योग्य नहीं है, क्योंकि आत्मा ही चित्प्रकाश है, ऐसा जबरदस्ती मानना ही होगा, क्योंकि आत्मा और अनुभव दोनोंमें अमेद है। [ 'तथाहि०' ग्रन्थसे दोनोंका अमेद दिखाते हैं। प्रथम खण्डन करनेके उद्देशसे दूसरे वादियोंका मत दिखलाते हैं-] वह पूर्वोक्त अनुभव (ज्ञांन) आत्माका + गुण है, ऐसा नैयायिक और प्रभाकरानुयायी मीमांसक मानते हैं। आत्मस्वरूप होनेसे अर्थतः द्रव्य है, ऐसा सांख्यमतावलम्बी कहते हैं। ज्ञान परिणामक्रियाका फल है तथा क्रिया और फलमें ऐक्यकी विवक्षासे वह कर्म है, ऐसा भाटमतानुयायी मीमांसक
• पुरुषान्तरका ज्ञान व्यवहित है, अतः उसे दृष्टान्त मानकर ज्ञानके स्त्रप्रकाशत्वका खण्डन नहीं हो सकता, क्योंकि अपना अनुभव अपनेसे अव्यवहित है, अतः उसके स्वप्रकाश होनेमें कोई बाा नहीं है। परन्तु यह युक्ति आत्मामें भी समान है अर्थात् दूसरे देवदत्त आदिका चेतन आत्मा व्यवहित होनेसे खप्रकाश नहीं है और अपना चेतन आत्मा अव्य- वहित होनेसे खप्रकाश है। + प्रतिलोमकमका आश्रय लेनेका अभिप्राय यह है कि 'हठात् आत्माको अनुभवरूप मानना होगा' ऐसी जो प्रतिज्ञाकी गई है, उसकी सिद्धि अन्तमें गुणत्वपक्ष माननेसे ही होगी।
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अध्यासविचार] भापानुचादसहित ११९ क्रियावत् प्रकाशत्वं फलत्वं चाडयुक्त्म्। द्रव्यत्वेऽप्यणुपरिमाणश्रेद् खद्योत- बद्वस्त्वेकदेशं परिमितमेव स्फोरयेत्। महत्परिमाणत्वे तदूपस्याऽऽत्मनोऽपि सर्वन्राऽवभासग्रसङ्ग: । अथ तदाश्रय आत्मा, तथापि स एव दोपः । मध्यम- परिमाणत्वे सावयवत्वेनाऽवयवपरतन्त्रत्वादात्मपरतन्त्रता न स्याद्। अथ घटस्य भूतलपरतन्त्रतावदात्मपरतन्त्रता स्याद्, एवमपि प्रदीपप्रकाशयो- गतमिति व्यवहारदर्शनात्। आत्मचैतन्ययोभेंदे व्यवहारोऽयं काप्ठेन प्रकाशितमितिवदुपचरितः स्यात्। गुणत्वपक्षे प्रदीपगतभास्वररूपवदाश्रय- कहते हैं [ इन मतोंका प्रतिलोमक्रमसे खण्डन करते हैं-] ज्ञानको कर्म माननेमें गमनादि क्रियाके तुल्य अनुभवमं प्रकाशत्व और फलत्व दोनों अयुक्त होंगे, ज्ञानके द्रव्य माननेपर भी यदि वह अणुपरिमाण माना जाय, तो खद्योतकी भाँति वस्तुके एक छोटे-से भागमात्रका ही प्रकाश कर सकेगा और यदि महत्परिमाण माना जाय, तो तदूप आत्माका भी सर्वत्र प्रकाश मसक्त होगा। यदि ज्ञानका आश्रय आत्मा है स्वरूप नहीं है ऐसा मानो, तो भी पूर्वोक्त दोप चना ही है। उसे मध्यमपरिमाण माननेमें तो अवयववान् होनेसे वह अवय्चोके अधीन रहेगा, आत्माके अधीन नहीं रहेगा। यदि घटकी भूतला- धीनताके तुल्य ज्ञानकी आत्मपरतन्त्रता मानी जाय, तो भी प्रदीप और प्रकाशके समान आत्मा और चेतन्यका* अभेद ही मानना पड़ेगा, क्योंकि 'प्दीपसे प्रकाशित हो रहा है' इस व्यवहारके सहश मैंने जान लिया, ऐसा व्यवहार देखा जाता है। यदि आत्मा और चैतन्यका परस्पर भेद माना जाय, तो 'काछठसे प्रकाशित हुआ, + इस व्यवहारके समान उक्त व्यवहार भी उपचरित होगा। अनुभवको गुण माननेमें जसे प्रदीपमें रहनेवाले श्वेत रूपकी उत्पत्ति आश्रयकी उत्पत्तिसे मिन्न नहीं होती है, वैसे ही अनुभवकी उत्पत्ति भी उसके आश्रयकी उत्पत्तिसे भिन्न नहीं होगी। इस अवस्थामें नित्य होनेसे आत्माके
*· काष्ठमें जलते हुए अंभिके प्रकाशसे दीखनेवाले घट, पट आदि विपय काष्ट और अग्निका भेद रहते हुए भी काप्टसे प्रकाशित होते हैं, ऐसा व्यवहार जसे काष्ट और अग्निमें अभेदका आरोप करके होता है वैसे ही आत्मा और चैतन्य के भिन-भिन्न माननेपर भी 'मैं जानता हूँ या मने जान लिया' यह व्यवहार गौण कहलाने लगेगा।
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२०० विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
जन्मव्यतिरेकेण जन्मासम्भवान्नित्यतयाऽऽत्मन्यव्यभिचारवलादर्थत आत्मै- वाऽनुभवः स्यात्। अनुभवाधीनसिद्धिक आत्मा कथमनुभव इति चेद्; न; तथा सति घटवद्नात्मत्वप्रसङ्गात्। न च नीलपीताद्यनुभवानां भिन्नत्वाद् नाऽऽत्मस्वरूपतेति वाच्यम्, स्वरूपतोऽनुभवेषु भेदाप्रतीतेः। भेदकल्पने च मानाभावात्। न च जन्मविनाशौ भेदकल्पकौ, तयोर्भेंद- साथ व्यभिचार न होनेके कारण अर्थतः आत्माको ही अनुभवरूप मानना पड़ेगा*। अनुभवके अधीन जिसकी सिद्धि है, ऐसा आत्मा अनुभवरूप कैसे हो सकता है? यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि घटादि विषयके सददश आत्मामें भी अनात्मत्व का प्रसङ्ग हो जायगा।। नील, पीत आदिके अनुभव, परस्पर भिन्न होनेसे, आत्म- स्वरूप नहीं हैं, यह भी दोष नहीं दे सकते, क्योंकि स्वरूपतः अनुभवोंमें भेदकी प्रतीति नहीं है। अनुभवरूपमें स्वतः भेदकल्पना करनेमें कोई प्रमाण नहीं है। जन्म या विनाश ये दोनों भेदकी कल्पना करनेवाले होंगे, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि-[ जसे पाकके अनन्तर घटमें रक्त रूप उत्पन्न हुआ, इस प्रतीतिसे रक्तानुभवका जन्म प्रतीत होता है और रक्तानुभवकी स्थितिकालमें श्याम अनुभवके न रहनेसे उसके विनाशकी प्रतीति होती है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझ लेना चाहिए, यह भाव है ] उनकी (जन्म और विनाशकी) सिद्धि भी भेदके सिद्ध होनेपर-ही
- घटगत नील आदि गुण 'गुणसमूहो द्रव्यम् इसे न माननेवालोंके मतमें नीलादि गुणोंके आश्रय घटसे अतिरिक्त हैं, और उनका जन्म घटजन्मसे पृथक् माना जाता है, परन्तु प्रदीपगत भास्वररूप ऐसा नहीं है, अर्थात् उसका जन्म आश्रय-जन्मसे पृथक नहीं माना जाता, अन्यथा 'उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं तिष्टति' इस मतके अनुसार प्रदीपके जवतक भास्वर रूपका जन्म नहीं होगा, तव तक उसका अप्रकाश रहेगा, परन्तु ऐसा है नहीं, अतः प्रदीपादि आश्रयका जन्म ही भाखर रूपका जन्म है, अतिरिक्त नहीं है, अतः प्रदीपके साथ उसकी नित्यता और अव्यभिचारिता रही। अतएव घटादिगत नीलादि रूपको छोड़कर प्रदीपगत भास्वर रूपको दृष्ठान्त बनाया है। एवं प्रकाशात्मक अनुभवरूप गुण भी उसके आश्रय आत्मासे अतिरिक्त नहीं है और जन्म न होनेसे नित्य तथा अव्यमिचारी है, इससे उसको चाहे अनुभव कहिए या आत्मा, शब्दमात्रका मेद है अर्थतः एक ही हैं। भेद केवल इतना ही है कि दष्टान्तस्थलमें आश्रय तथा प्रकाश दोनों जन्य हैं और दारष्टन्तिक स्थलमें आश्रय तथा प्रकाश गुण दोनों ही अजन्य है। 1 जैसे घट, पट आदि विषयोंकी सिद्धि अनुभवके अधीन है, अतः वे प्रतिभासप्राण- अनात्मा-हैं वैसे ही आत्मा भी हो जायगा। ..
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २०१ सिद्धिपूर्वकत्वेन परस्पराश्रयत्वात्। ननु चक्षुरादिसाधनार्थवत्ायोत्तर- संविज्न्माभ्युपेयम् तथा यौगपद्यव्यावृत्तये पूर्वसंविन्नाशथ्ाम्युपेय इति चेट, न; एकस्या: संविदो विपयविशेपैः सम्बन्धानामृत्पत्तिविनाशाभ्यामेव तत्सिद्धौ संविदोऽप्युत्पत्तिविनाशयोगरवात्। यत्तु सुगताः कल्पयन्ति-ज्वालानामिव सादड्यात् संविदां सन्नेव भेदः परोपाधिमन्तरेण न विभाव्यत इति, तद्युक्तम्; ज्वालानामन्य- वेद्यत्वेन तथात्वेऽपे स्वप्रकाशसंचिन्निष्टभेदस्याऽविभावनायोगाद। न च स्वप्रकाशन्रह्मतच्वाऽविभावनं निदर्शनीयम्, तत्राऽविद्यावरणस्य प्रमाणे: साधि- नत्वात्। तस्मादेकेव संविदनादि :; अनादित्वं च प्रागभावरहितत्वात्। तदुक्तं सुरेश्वरवार्ततिके- होगी, अतः ऐसा माननेपर अन्योन्याश्रय दोप होगा *। यदि कहो कि चक्षु आदि साधनोंकी सार्थकताके लिए उत्तर ज्ञानका जन्म मानना पड़ेगा एवं दोनों पूर्व और उत्तर ज्ञानोंकी एक कालमें साथ-साथ स्थितिकी व्यावृत्तिके उपपादनके लिए पूर्वज्ञानका नाश भी मानना आवश्यक होगा, तो ऐसा भी कहना ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही ज्ञानके विषयविशेपोंके (भिन्न-भिन्न विषयोंके) साथ सम्बन्धोंकी उत्पत्ति और विनाशके द्वारा ही जब उसकी (दोनों ज्ञानोंके यौगपद्यकी) व्यावृत्ति भी सिद्ध हो सकती है, तब ज्ञानकी उत्पत्ति और नाघ माननेमें गौरव होगा। और बौद्ध जो यह कल्पना करते हैं कि दीपज्वालाओंके सदश सादृश्य होनेसे ज्ञानोंमें वर्तमान मेद भी ज्ञानके अतिरिक्त दूसरी उपाधिके बिना मालम नहीं होता, उनकी वह कल्पना भी युक्तिसे विरुद्ध है, क्योंकि ज्वालाभोंके अन्यवेद्य होनेसे उन्हें वैसा (परस्पर भिन्न रहनेपर सद होनेसे अतिरिक्त उपाधिके बिना उनके भेदका प्रतीत न होना) माननेपर भी स्वग्रकाश ज्ञानमें विपयरूप उपाधिके चिना भेदकी प्रतीति नहीं देखी गई है। और स्वप्रकाश ब्रह्मतत्त्वका प्रतीत न होना दष्टान्तमें नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उसमें अविद्यारूप आवरण ममाणोंके द्वारा सिद्ध किया जा चुका है। इसलिए संविद् (ज्ञान) एक ही है और अनादि है; प्रागभावसे रहित होनेसे वह अनादि सिद्ध होता है। यही चात सुरेश्वराचायने वार्तिकमें कही है- * अनुभवोंमं जब नील, पीत आदि विपयोंके मेदसे भेद सिद्ध हो तव उनका जन्म और विनाश सिद्ध हो सकता है और जन्म-विनाशकी सिद्धिके अनन्तर ही परस्पर मेद सिद्ध होता है, अतः अनुभव स्वतः एक ही है, मेद औपाधिक है। २६
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२०२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
'कार्य सरवैर्यतो दृष्ट ग्रागभावपुरःसरम्। तस्याऽपि संवित्साक्षित्वात् प्रागभावो न संविदः ॥' इति। तदेवं स्वप्रकाशानुभवस्य नित्यत्वादात्मस्वरूपत्वमविरुद्ध्म्। तथा चाऽऽत्मैच विषयोपाधिकोऽनुभव इति व्यपदिश्यते अविवक्षितोपाधिश्चा- त्मेति। यथा वृक्षाणामेवैकदेशावस्थानोपाधिना वनत्वम् उपाध्यविव- क्षायां च वृक्षत्वं तद्वत्। एवं च सति त्रिपुटीप्रत्यक्षवादी कथमात्म- नोऽनुभवाश्रयत्वेनाऽवभासं ब्रूयात्! कथं वाऽहङ्कारस्य जडस्याऽडत्मत्वं संपा- दयेत्१ ननु कुम्भमहं पश्यामीत्यहङ्कारो द्रष्टत्वेन परामृश्यते द्रष्टा चाऽडत्मै- वेति चेद्, न; सुषुप्तावप्यहमित्येवात्मावभासप्रसङ्गात्; न चैवमस्ति। ततो नाऽहङ्कार आत्मा, सुपुपावनवभासात्। 'सभी वादी कार्यको प्रागभाव पुरस्सर मानते हैं, अर्थात् जिसका प्रागभाव हो, वही कार्य है। उस प्रागभावका भी संचिद्के द्वारा प्रकाश होनेसे संवित्का प्रागभाव नहीं 1 हो सकता।' इस प्रकार स्वप्रकाश अनुभवके नित्य होनेसे उसे आत्मस्वरूप माननेमें कोई विरोध नहीं है। इससे आत्मा जब विषयरूप उपाधिसे संसृष्ट होता है, तव 'अनुभव' इस व्यवहारका भांगी बनता है। और जव उपाधिकी विवक्षा नहीं होती तब वह 'आत्मा' इस व्यवहारका विषय होता है; जसे वृक्षोंके एकदेशविशेषमें अवस्थि- तत्वरूप उपाधिके होनेपर उनमें वन-जङ्गल-व्यवहार होता है और उपाधिकी विवक्षा न होनेपर 'वृक्ष' व्यवहार होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी है। उक्त प्रकारकी व्यवस्थाके सिद्ध होनेपर त्रिपुटीपत्यक्षवादी प्रभाकर आत्माका, अनुभवका आश्रय होनेसे, अवभास-प्रत्यक्ष-होना कैसे कह सकता है? अथवा किस प्रकार जड़ अहक्कारमें आंत्मत्वका सम्पादन कर सकता है? 'मैं घटको देखता हूँ', इस ग्रतीतिमें 'मैं' (अहङ्कार) द्रष्टत्वरूपसे प्रतीत होता है और द्रष्ट ही तो आत्मा है, ऐसी शङ्का भी नहीं हो सकती, क्योंकि सुषुप्ति-अवस्थामें भी 'मैं' (अहम्) इस प्रतीतिसे ही आत्माकी प्रतीति होनेका प्रसङ्ग हो जायगा और ऐसा है नहीं। [ सुषुप्तिमें आत्मा तो अनुवर्तमान है, परन्तु 'मैं' या 'अहङ्गार' की अनुवृत्ति नहीं है ] अतः अहङ्कार आत्मा नहीं हो सकता है, क्योंकि सुषुप्तिमें उसका अवभास नहीं होता है। : " यदरि ज्ञानका भी प्रागभाव मान लिया जाय, तो प्रागभावका प्रकाश ही नहीं हो सकेगा, यह भाव है।
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अध्यासविचार] भापानुवादसहित
अथ सुपुप्तौ विपयानुभवाभावात् सतोऽप्यहङ्कारस्याऽनवभास:, तन; किं तत्राऽनुभव एव नाऽस्ति उत विपयोपरागाभाव: १ नाद्य :; अनुभवस्य नित्यत्वात्। न द्वितीय :; विपयोपरागस्याऽऽत्मग्रतीतावप्रयोजकत्वात्। आत्मनो द्रष्टत्वाकारोऽहद्कारस्तत्प्रतीती च विपयोपरागः प्रयोजक इति चेत्, किं द्रषटृत्वं नाम दृशयावभासकत्वम् उत दृश्यच्यावृत्तत्वम् अथवा चिन्मान्नत्वम् ? द्रष्टृत्त्वस्याऽत्मत्वायोगाढ् नाहद्कार आत्मा स्यात्। तृतीये विपयानपेक्ष त्वादहक्वार: सुपुपावुह्िख्येत। अस्त्येव तत्राऽहमुल्लेख इति चेद्, न; तथा सत्युत्थितेन पूर्वदिनाहङ्कारवत् सौपुप्ताहृक्गारोऽपि स्मर्येत। यद्यपि यद- नुभूतं तत् स्मर्यत एवेति नाडस्ति नियमस्तथाप्यत्राप्यात्मनि स्मर्यमाणे चिद्रपोडहद्कार: कर्थ न स्मर्येत १ सौपुपाहृक्कारगोचरस्य नित्यचैतन्या- यदि यह कहा जाय कि सुपुप्िमें विपयका अनुभव न होनेसे अहक्कारके रह्नेपर भी उसकी प्रतीति नहीं होती है? तो यह कहना युक्त नहीं है, क्योंकि सुपुप्तिमें क्या अनुभव नहीं है: या विपयके संसर्गका अभाव है? इनमें प्रथम कल्प नहीं हो सकता, क्योंकि अनुभव नित्य है। द्वितीय कल्प भी नहीं हो सकता, क्योंकि विषयका संसर्ग आत्माकी प्रतीतिमें कारण नहीं है। आत्माका द्रष्टृत्वरूप आकार ही अहकार (मैं) हे, उस रूपकी प्रतीतिमें विषयसम्बन्व प्रयोजक (कारण) है? यदि ऐसा कहो, तो क्या द्रष्टृत्व दृश्यका प्रकाशकत्व है? अथवा दृश्यसे व्यावचत्व्र है ? या चिन्मात्रत्व हे : प्रथम और द्वितीय विकल्पमें तो द्ष्टत्वके दृश्यसे ही निरूपित होनेसे आगन्तुक दष्टृत्वमें आत्मत्व नहीं रह सकता अर्थात् इन दोनों विकल्पोंमें-निरुक्त द्रष्टत्वरूप अहक्कार विपयका संसर्ग होनेसे-अनात्मा ही सिद्ध होता है। तृतीय विकल्पमें विपयकी अपेक्षा ही नहीं रहती, इससे सुपुप्िमें भी अहम्का उल्लेख प्राप्त हो जाता है। सुपुप्तिमें अहम्का उल्लेख है ही, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा होनेपर तो सुपुपिसे जगे हुए पुरुपको जाअत्-अवस्थामें पूर्व- दिनमें अनुभूत अहक्वारके समान सुपुप्तिमें अनुभूत अहक्वारका भी स्मरण होना चाहिए। यद्यपि जो विषय अनुभवमें आता है वह सब स्मरणमें भी आता है, यह नियम नहीं है, तथापि प्रकृतमें सौपुप्त आत्माका स्मरण होनेपर उसके स्वरूपभूत चिद्रृप अहक्वारकावादीके मतमें स्मरण क्यों न हो। सुपुपि अवस्थाके अहक्कारको
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२०४ विवरणप्रमेयसंग्रहं i सूत्र १, वर्णक १
नुभवस्याऽविनाशेन संस्कारानुत्पादादस्मृतिरिति चेत्, तहिं तथैव पूर्वदिनाS- हङ्कारो न स्मर्येत। अस्मन्मते तु पूर्वदिने जातस्याऽहृङ्कत्यवच्छिन्नचैतन्य- स्याऽनित्यत्वेन संस्कारोत्पादे तत्स्मृतिरविरुद्धा। नन्वेवमेव सौपुसाह्कारोऽप्युत्थितेन स्मर्यताम् १ सुखमहमस्वाप्समिति परामर्शदर्शनादिति चेद्, एवं तर्हिं अव्यवस्थितवादिनं त्वां तार्किकवराक एव निर्भर्त्सयतु। तथाहि- नाडन्र सुपुशिकालीन आत्मा तत्सुखं वा परामृश्यते, किं तर्द्युत्थाना- . वसरे प्रतिभासमानमात्मानं पक्षीकृत्य सुखोपलक्षितो दुःखाभावोऽनुमीयते। अहं स्वम्जागरितान्तराले दुःखरहितः, नियमेनाऽस्मर्यमाणतदातनदुःख- विषय करनेवाला चतन्यानुभव नित्य है, उसका विनाश नहीं होता, अतः संस्कारकी उत्पत्ति न होनेसे । उसका (सौपुसाहक्कारका) स्मरण नहीं होता ? यदि ऐसा कहो, तो इसी युक्तिसे पूर्वदिनमें अनुभूत अहङ्कारका भी स्मरण नहीं होना चाहिए। [ वादीके मतमें नित्य चैतन्याऽनुभवका विषय अहक्कार है, उस अनुभवका नाश नहीं होता ] अपने मतमें तो पूर्व दिनमें उत्पन्न हुआ अहङ्कारावच्छिन्न चैतन्य अनित्य है, [इससे उसका विनाश सम्भव है ] अतः
विरुद्ध नहीं है। संस्कारकी उत्पत्तिके होनेपर उसका (पूर्वदिनमें अनुभूत अहक्कारका) स्मरण होना
ऐसी दशामें यदि तुम ऐसा तर्क करो कि सुधुप्िमें अनुभूत अहङ्कारका भी स्मरण होना चाहिए: क्योंकि 'मैं सुखसे सोया' ऐसा सुप्तोत्थित पुरुपका परामर्श देखा ही गया है, तो इस विषयमें यही उत्तर है कि इस प्रकार अव्यस्थित वाद कहनेवाले तुमको नैयायिक ही डांट-डपट देगा, क्योंकि नैयायिकका मत देखो- "मैं सुखसे सोया' इस प्रतीतिमें सुपुप्तिकालके अनुभूत आत्मा तथा सुखका स्मरणात्मक उल्लेख नहीं है, किन्तु जाग जानेपर प्रकाशित होनेवाले आत्माको पक्ष करके सुखोपलक्षित * दुःखाभावका अनुमान किया जा रहा है। [अनु- मानका स्वरूप दिखाते हैं-] मैं स्वम और जागरणके मध्यकालीन सुपुप्तिमें दुःखरहित था, नियमतः उस कालमें अनुभूत दुःखोंका स्मरण न होनेसे, * अभाव पदार्थ सातिशय नहीं होता अर्थात् घटका अभाव कम या अधिक नहीं होता है, किन्तु वह एक-सा ही होता है। और सुख भाव पदार्थ है, उसमें न्यूनत्व और आधिक्यका सम्भव है, अतः उसके फलस्वरूप अज्ञलाघव आदिमें भी तारतम्य (कमी-वेक्षी) हो सकती है।
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अव्यासविचार ] भांपानुवादसहित २०५
त्वात्, कुम्भवदिति। यद्यपि शा्दव्यवहार एव लक्षणा ग्रसिद्धा, न प्रत्यक्षानुमानादौ, तथाप्यत्र मुख्यसुखासम्भवाद् दुखाभाव एवाडम्युपेयो न तु मुख्यसुखव्यवहारः। न च परामर्शदव सुख्यसुखं कल्पयितुं शक्यम्, तथा सत्यन्नसुखं पानसुखमिति विपयविशेपनिष्ठतया स्मृति- प्रसङ्गात्। अथ विपयांशे संस्कारानुद्धोध: कल्प्येत, एवमाि सुखमहम- स्वाप्सं न किश्चिद्वेदिपमिति चैतन्याभावपरामर्शः सुखानुभवप्रतिकूलत्वाद्
तत्पूर्वकाले मुखानुभवमनुमापयेढिति चेट्; न, अनुभवानन्तरक्षणे स्मरण- सम्भवेऽनुमानवैयर्थ्या् तारतम्येन दृश्यमानमङ्गलाघवादिकं सातिशयेन स्वापसुखेन विना न स्याद् दुःखाभावस्यैकरूपत्वादिति चैद्, न; प्रति- योगिदुःखजनककरणच्यापारस्योपरमतारतम्यादभावेऽपि तत्प्रतीतेः ।
घटके समान । है, याने लक्षणा होती है, यद्यपि शाव्दव्यवहारमें ही लक्षणाकी प्रसिद्धि प्रत्यक्ष या अनुमानमें नहीं होती, तथापि प्रकृतमें मुख्य सुखका असम्भव होनेसे (सुखपदका अर्थ) दुःखका अभाव ही मानना होगा, मुख्य सुखका व्यवहार नहीं माना जा सकता। और प्रकृत परामर्शसे अर्थात् 'मुखसे सोया' इस स्मरणसे भी मुख्य सुखका व्यवहार नहीं मान सकते, क्योंकि ऐसा माननेपर अन्नसुख, पानसुख इस प्रकार विषयविशेष- विपयक मुखके स्मरणका प्रसङ्क आ जायगा। यदि विपयांशके संस्कारका उद्दोध नहीं हुआ माना जाय, तो ऐसा माननेपर भी 'मैं सुखसे सोया कुछ भी नहीं जाना' इस प्रकार चैतन्यके अभावका परामर्श सुखानुभवके प्रतिकूल होनेसे दुःखाभावको ही लक्षित करता है। गाढ निद्राके अनन्तर जागनेपर अनुभूय- मान शरीरका हलकापन तथा मुखकी प्रसन्नता आदि उठनेके पूर्वकालमें सुखानु- भवके अनुमापक होंगे? ऐसा भी मानना उचित नहीं है, क्योंकि अनुभवके अनन्तर क्षणमें स्मरणका सम्भव होनेसे अनुमान करना निष्पयोजन है। तार- तम्यसे अनुभूयमान अङ्गलाघव आदि निद्रामें अनुभूत अतिशयचिशिष्ट सुखके बिना सम्भव नहीं होगा, कारण कि दुःखका अभाव तो एकरूप होता है ? यदि ऐसा कहो, तो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि प्रतियोगी दुःखको उत्पन्न करनेवाले साधनोंके (इन्द्रियोंके) व्यापारके उपरमके तारतम्यसे अभावमें भी
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२०६ चेवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ₹
नन्वास्तां तावच्ार्किकसमयः; सिद्धान्तस्तु कथमिति चेत्, तर्हि सावधानमनस्केन श्रूयताम्- अस्ति स्वप्रकाशसाक्षिचैतन्यस्वरूपभूत आनन्दः सर्वदा भासमानो- डपि जाग्रत्स्वमयोस्तीव्रवायुविक्षिसप्रदीपप्रभावद् 'अहं मनुष्यः' इत्यादि- मिथ्याज्ञानविक्षिप्तया न स्पृष्टमवभासते। सुपुप्ौ तु तदभावाद्विस्पष्ट- मेवाऽवभासते। आवरणाविद्या तु त्रह्मतत्वाकारमाच्छादयन्त्यपि स्वभासकं साक्षिचैतन्याकारं नावृणोति। नो चेदविद्यैव निःसाक्षिका सती न सिध्येत्। ततश्च सुपुसावनुभूत आनन्द आत्मा भावरूपाज्ञानं चेति त्रयमप्युत्थितेन परामृश्यते 'सुखमहमस्वाप्स न किश्चिदवेदिपम्' इति। उस तारतम्यकी * प्रतीति हो सकती है। यह तो तार्किक मत हुआ, इससे हमें क्या लेना-देना है, अतः इसको रहने दीजिए, आखिर सिद्धान्त 1 क्या है? यदि ऐसा प्रश्न करो, तो सावधान- मन होकर उसका उत्तर भी सुनो- यद्यपि स्वप्रकाश साक्षिचैतन्यका स्वरूपभूत आनन्द सदैव प्रकाशमान रहता है, तथापि जाग्रत् और स्वप्न अवस्थामें, वेगशाली वायुके झकोरोंसे विखरती अर्थात् अत्यन्त चञ्चल दीप ज्वालाकी कान्तिके तुल्य, 'मैं मनुष्य हूँ' इस मिथ्याज्ञानके द्वारा उड़ाये हुए होनेसे वह आनन्द स्पष्ट प्रकाशित नहीं होता। और सुषुपिमें तो उसके न होनेसे स्पष्ट प्रकाशमान रहता है। आवरणस्वरूप अविद्या तो ब्रह्मतत्त्वके स्वरूपको ढकती हुई भी अपनेको (अविद्याको) भासित करनेवाले साक्षिचतन्यस्वरूपकों आच्छन्न नहीं करती, अन्यथा कोई उसका साक्षी (प्रकाशक) न होनेसे स्वयं ही सिद्ध नहीं होगी ।। इससे सुषुप्तिकालमें अनुभव किये गये आनन्द, आत्मा और भावरूप अज्ञान (अविद्या) * इन्द्रियोंके व्यापारमें लगे रहनेसे टुःख हुआ करता है। उनके व्यापारमें कमी ज्यादा होनेसे अभावके प्रतियोगी दुःखमें भी तारतम्य होता है, यह भाव है। + सुपुप्ति-अवस्थामें (वेदान्तसिद्धान्तमें) नित्यानुभवस्वरूप साक्षिचेतन्यका अवभास रहता है, वह नित्य है, उसका विनाश न होनेसे संस्कारका होना सम्भव नहीं है। इस दशामें 'मैं सुखसे सोया' इस परामर्शमें 'अहम्' (मैं) इस आकारका परामर्श न होगा यह प्रश्नका भाव है। 4 ब्रह्मतत्त्वके स्वरूपके अनवभासनसे आवरण फल स्पष्ट ही है। अब आवारक अविद्याकी अ- - सिद्धिमें उक्त फलकी असिद्धि हो जायगी, अतः अविद्याकी असिद्धि अभीष्ट नहीं मानी जा सकती।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २०७
नन्वेतत् त्रयं सुपुप्ती नाऽन्त:करणवृत्तिभिरनुभूयते तासां तत्राजभावाद्। चैतन्येनाऽनुभवे तस्याऽविनाशिन: संस्कारानुत्पादकत्वान्न परामर्श: सिध्ये- दिति चेट्, मैनम्, अविद्यैवोत्तत्यग्राहकवत्तित्रयाकारेण सुपुप्तौ विवर्चते। 'ताभिर्वृत्तिभिरवच्छिनाशरिदाभासा उत्तत्रयमनुभृयोत्थानकाले विनङ्मचन्ति तत्संस्कारजन्या स्मृतिः किं न स्यात्। अविद्याविशिष्टस्याऽऽत्मनोऽनुभवि- तृत्वमन्त:करणविशिष्टस्यैव स्मर्तत्वमिति वैयधिकरण्यमिति चेद, न; उत्थानेऽ- प्यविद्याविशिष्टस्यैव स्मर्तत्वाङ्गीकारात। अन्तःकरणं तु स्मृतस्याऽर्थस्य
इन तीनोंका जागृत पुरुष 'मैं सुखसे सोया था मैंने कुछ नहीं जाना' * ऐसा परामई (स्मरण) करता है। इन तीनोंका अनुभव सुपुप्तिकालमें अन्तःकरणकी वृत्तियोंसे नहीं हो सकता, वर्योंकि उस कालगें अन्तःकरणकी वृत्तियोंका अभाव है, चतन्य (नित्य साक्षी) द्वारा अनुभव माननेपर तो वह नित्य है, उसका विनाश नहीं होता, अतः संस्कारका उत्पादक नहीं हो सकता, तब (संस्कारके विना) परामर्श (मैं सुखसे सोया कुछ नहीं जाना यह स्मरण) सिद्ध नहीं हो सकता, यह नहीं कह सकते, क्योंकि अविद्या (भावरूप अज्ञान) ही कथित आत्मादि तीनोंका ग्रहण करनेवाले तीन वृत्तियोंके आकारमें सुपुप्तिमें विवर्तरूप परिणामको प्राप्त कर लेती है। उन वृत्तियोंसे अवच्छिन्न चिदाभास (चतन्यप्रतिबिम्न्र) उक्त आत्मादि तीनोंका अनुभव करके जागनेके समय नष्ट हो जायँगे, अतः उनके संस्कारोंसे स्मृति क्यों नहीं होगी ? (सुपुप्िमें) अविद्याविशिष्ट आत्मा अनुभव करता है और (जागरणमं) अन्तःकरणविशिष्ट आत्मा स्मरण t करता है, ऐसा वैयधिकरण्य दोप होगा? यदि ऐसा कहो, तो ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि जागनेपर भी अविद्याविशिष्ट ही आत्मा स्मरण करता है, ऐसा अङ्गीकार किया गया है, अन्त :-
2 मैं, यह आत्मांश है, मुससे, यह आनन्दांश है, कुछ नहीं जाना, यह अज्ञानांश है। जागरणके होते ही अहंकारका तादात्म्याध्यास हो जाता है, अतः 'मैं' इसका परामर्श होता है, वस्तुतः सुपुप्तिमें शुद्ध आत्माके साक्षीस्वरूपका अनुभव ही होता है, इसका स्पष्ट विवेचन अगले मृलमें ही हो जायगा। + स्गरण और अनुभवमें सामानाधिकरण्यका नियम है, अन्यथा देवदत्तके अनुभूतका यज्ञ- दत्तको स्मरण होना चाहिए।
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२०८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
शब्दानुविद्धव्यवहारमापादयति। न च सुखमित्यनेन नाडवेदिपमित्यनेन च दुःखाभावज्ञानाभावयोरेव परामर्श इंति वाच्यम्, तयोः सुषुपौ सतोर- प्यननुभवात्। तत्प्रतियोगिनोर्दु:खज्ञानयोस्तदानीमस्मरणात्। कथं तर्हि सौषुपयोरननुभूतयोर्दु:खाभावज्ञानाभावयोरवगमः १ अर्था-' पच्येति ब्रूम:। उक्तरीत्या सौषुप्तमविक्षिसं सुखमनुस्मृत्य एतदन्यथानुपपच्या तद्विरोधिनो दुःखस्याऽभावः प्रमीयते। तथा परामृष्टभावरूपाज्ञानानुपपच्या
नतु भावरूपाज्ञानं ज्ञानेन न विरुध्यते, जागरणे तयो: सहावस्थाना-
करण तो स्मृत पदार्थका शब्दानुविद्ध * व्यवहार उत्पन्न करता है। और यह भी नहीं कहना चाहिए कि 'सुखसे' इससे 'और कुछ नहीं जाना' इससे क्रमशः दुःखाभाव और ज्ञानाभावका ही परामर्श होता है, क्योंकि सुषुप्िमें रहनेपर भी उनका अनुभव नहीं होता है, और उनके प्रतियोगी दुःख और ज्ञानका उस कालमें स्मरण भी नहीं होता है ।। तब तो सुषुपिकालमें विद्यमान अननुभूत दुःखाभाव और ज्ञानाभावकी प्रतीति कैसे हो सकती है : हम कहते हैं-अर्थापत्ति प्रमाणसे हो सकती है। अर्थापत्ति दिखलाते हैं-उक्त प्रकारसे सुधुप्तिकालमें अनुभूत (अहंकारसे अनुपहित) स्थिर सुखका स्मरण कर इसकी अन्यथा अनुपपत्तिसे (यदि दुःखका लेश भी होता, तो स्थिर सुखका अनुभव नहीं होता, जिसका मैं इस समय स्मरण कर रहा हूँ) उस सुखके विरोधी दुःखके अभावका ज्ञान किया जाता है। एवम् स्मरण किये गये भावरूप अज्ञानकी अन्यथा अनुपपत्तिसे उसके विरोधी ज्ञानका (वृत्तिज्ञानका) अभाव जाना जाता है। भावरूप अज्ञानका ज्ञानके साथ विरोध नहीं हैं, क्योंकि जाग्रत् अवस्थामें उन दोनोंका एक साथ रहना देखा गया है, यह कहना भी उचित नहीं है, कारण कि * स्मरण और अनुभवका कर्ता एक ही अविद्याविलास है, परन्तु जागरणमें सविकल्प वृत्ति होती है, अतः उस अवस्थामें आत्माका सविकल्प वृत्ति द्वारा परामर्श करनेके लिये अन्तः- करण अहङ्कारतादात्म्यापन्न अहंशन्दका ('मैं' का) अनुवेध-संसर्ग-करा देता है। * प्रतियोगिज्ञानपुरःसर ही अभावका ज्ञान होता है, सुषुप्तिमें विषयके बिना डुःख या ज्ञान तो हो ही नहीं सकता, और उस कालमें इनका स्मरण मी नहीं है।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित, २०९
दिति चेद्, न; अज्ञानमात्रस्य अपश्चज्ञानैरविरोधेऽि विशेपाकारपरिण ताज़ानस्य तद्विरोधित्वात्। घटज्ञानाकारेण हि परिणतमज्ञानं पटादिज्ञा- नविरुध्यते; अन्यथा घटज्ञानकाल एव पटादिकं सर्व जगदवभासेत। एवं सति सुपुप्तावस्थाकारेण परिणतस्याऽप्यज्ञानस्याशेपविशेपज्ञानैः विरोधो भविप्यति। ततो युक्तैवार्ऽर्थापचिः । अथ सुपुसौ ज्ञानं नाऽडसीत, अस्मर्यमाणत्वात्: इत्यनुमीयताम्।
कर्थ तर्हि गरृहमध्ये प्रातर्गजो नासीदस्मर्यमाणत्वादिति मध्याह्वेऽनुमीयते? नव्रमनुमीयते, किं तहिं १ गृहावकाशमापूर्य वर्त्तमानं कुसूलादिकं प्रातरनुभूय मध्याह्वे तदनुस्मृत्य तदन्यथानुपपच्या प्रातर्गजाभावोऽपि ग्रमीयते। तदेवं
अज्ञानमान्रका पपश्ज्ञानोंके साथ विरोध न होनेपर भी विशेष आकारमें परिणत अन्ञानका ज्ञानके साथ विरोध है ही, कारण कि घटज्ञानके आकारमें परिणत अज्ञानका पटज्ञानके साथ विरोध होता है, यदि न होता तो घटज्ञानके कालमें ही पट आदि सम्पूर्ण जगत्का ज्ञान हो जाता। ऐसा सिद्धान्त मांननेपर सुपुप्तिमें विशेष अवस्थाके आकारमें परिणत अज्ञानका सम्पूर्ण विशेष ज्ञानोंके साथ विरोध होगा ही। इससे अर्थापत्ति युक्त ही है। सुपुप्तिकालमें ज्ञान नहीं था, इस समय स्मरण न होनेसे, इस प्रकारका अनुमान ही कर लीजिए, इस अर्थापत्तिका प्रयोजन क्या है? ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि मार्गमें स्थित अस्मर्यमाण तृण आदिमें हेतु व्यभिचरित है, क्योंकि उसका भी स्मरण नहीं होता। तब कैसे 'प्रातःकाल घरके आँगनमें हाथी नहीं था, उसका स्मरण न होनेसे, इस प्रकार मध्याहमें अनुमान किया जाता है? नहीं, इस प्रकारका यह अनुमान नहीं है, तव क्या है? सुनिये-प्रातः- कालमें घरके सम्पूर्ण स्थानको घेरे हुए कुसूल आदि पदार्थोंको देख कर मध्याह्में उनका स्मरण हुआ, इसके बाद उसकी अन्यथा अनुपपत्तिसे (यदि घरमें गज होता तो कुसूल आदि सामग्रीसे वह घर न घिरा होता, इस प्रकारकी अनुपपच्तिसे) प्रातःकालमें गजके अभावका भी निश्चय होता है। इसलिए सुपुप्तिमें विद्यमान दुःखा-
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२१० विवरणप्रमेयसंग्रहं [सूत्र १, वर्णक १
सुषुसौ दुःखाभावज्ञानाभावौ अर्थापत्तिवेद्यौ, भावरूपाज्ञानानन्दात्मानस्तु स्मर्यन्त इति सिद्धान्तस्थितिः। नन्वेतावताऽहङ्कारे किमायातम् ? इदमायातम्-न सुषुप्तावहङ्कारोऽनुभूयते, नाऽप्युत्थितेन परामृश्यत इति। का तर्हिं सुखमहमिति परामर्शगतस्याऽहमुल्लेखस्य गतिः? एपा गति :-- सुपुसौ विलीनोऽहङ्कारः प्रवोधे पुनरुत्पद्यते, स चोत्पन्नः परामृश्यमानमा- त्मानं सविकल्पकत्वेन स्पष्टव्यवहारायोपलक्षयति, एतदेकप्रयोजनत्वादहङ्का- खृत्तेः। अत एवाउऽत्मा कदाचिदपि नाऽन्याभिरन्त:करणवृत्तिभिर्व्यवहियते। तदुक्तं नैष्कर्म्यसिद्धौ-
अतो वृत्तीर्विहायाऽन्या ह्यहंवृत्योपलक्ष्यते।।
भाव और ज्ञानाभाव अर्थापत्तिसे जाने जाते हैं। भावरूप अज्ञान, आनन्द और आत्मा इन तीनोंका स्मरण किया जाता है, इस प्रकार सिद्धान्तमत है। प्रश्न-इतने बड़े व्याख्यानसे अहक्कारमें क्या आया ? उत्तर-यही आया कि अहङ्कारका सुषुप्तिमें अनुभव नहीं होता है, और न जागृत पुरुष ही उसका स्मरण करता है। तब कहिये कि 'मैं सुखसे सोया' इस परामर्शमें 'अहम् के उल्लेखकी क्या गति होगी? सुनिये यह गति होगी-सुपुप्तिमें लीन हुआ अहंकार जागनेपर पुनः उत्पन्न होता है और उत्पन्न हुआ अहंकार स्मरणके विषय आत्माको सवि- कल्परूपसे स्पष्ट व्यवहारके लिए [ अहम्-मैं-उल्लेखसे ] उपलक्षित करता है। एकमात्र यही प्रयोजन (आत्माका स्पष्ट सविकल्प उल्लेख हो सके) अहङ्कारवृत्तिका है, इसीलिए आत्माका कभी भी [ अहमाकार वृत्तिसे अतिरिक्त दूसरी अन्तः- करणकी वृत्तियोंसे ] व्यवहार नहीं होता है। यह नैष्कर्म्यसिद्धिमें कहा गया है- आत्माके प्रत्यक्स्वरूप होने, अतिसूक्ष्म होने तथा आत्मदृष्टिमात्र द्वारा उसका अनुशीलन होनेसे अन्य घटपटाद्याकार वृत्तियोंको छोड़कर केवल अहमाकारवृत्तिसे वह उपलक्षित होता है, [ इसमें युक्तिका प्रदर्शन करते हैं-]
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २११
आत्मभावाविनाभावमथ वा विलयं त्रजेत। न तु पक्षान्तरं यायादतश्चाऽहंियोच्यते ।।' इति। ततो जाग्रत्स्वनयोरात्मत्वेन प्रतिभासमानोऽप्ययं जडोऽहङ्गार: सुपुप्ता- वभावान्न स्वयंप्रकाशस्याऽडत्मनः स्वरूपमिति श्रुतिस्मृतिकुशलैरभ्युपेयमिति। तथा च श्ुतिः 'स एवाधस्तात् स उपरिष्टात्'इत्यादिना भूमाख्यस्य ब्रह्मण: सार्वात्म्यमभिधाय 'अथातोऽहंकारादेशः एवाहमेवाधस्तात्' इत्यादिना- इहङ्कारस्याऽपि सर्वात्मत्वमुत्त्वा 'अथात आत्मादेश एवात्मैवाऽधस्तात्'इत्या- दिनाऽऽत्मानमहङ्गाराज्ज्ेदेन निर्दिशति। ननु जीवन्रह्मणोः सार्वात्म्यव्यपदेशो यथा एकत्वसिद्धयर्थस्तथवा- डहङ्गारस्याऽऽप्यात्मकत्वसिदचर्थो व्यपदेश: स्यात्१ मैवम्; पूर्व भेदेन क्योंकि इस अहक्कारकी दो अवस्थाएँ है-एक तो आत्माके साथ व्याप्त रहना और दूसरी विलीन हो जाना *। इससे अतिरिक्त तीसरी दशाको यह नहीं पाता, अत एव 'अहम्' वुद्धिसे आत्माका सविकल्प बोध होता है। 'इसलिए जाग्रत् और स्वम अवस्थाओंमें आत्माके स्वरूपसे यद्यपि जड़ अहक्कार प्रतिभासमान है तथापि सुपुपिमें उसका अभाव होनेसे स्वप्रकाश आत्माका वह स्वरूप नहीं हो सकता है' ऐसा श्रुति और स्मृति आदि शास्त्रोंमें प्रवीण विद्वान् मानते हैं। इसके अनुकूल श्रुति है-वही ब्रह्म नीचे है वही ऊपर है। इत्यादि वाक्यों द्वारा भूमानामक ब्रह्मके सार्वात्म्यका (सर्वस्वरूपता या सर्वव्यापकताका) प्रतिपादन करके 'इसके अनन्तर अहक्कारादेश है कि मैं ही नीचे ऊपर सर्वत्र विद्यमान हूँ' इत्यादि वाक्योंसे अहक्कारमें भी सर्वात्मभाव कहा गया है, 'तदनन्तर आत्मादेश हैं कि आत्मा ही नीचे-ऊपर सर्वत्र विद्यमान है' इत्यादि वाक्योंसे आत्माका अहक्कारसे भेद दिखलाया गया है, [ अन्यथा भिन्न-भिन्न निर्देश करना व्यर्थ हो जाता। विभिन्न निर्देशकी सार्थकता है, ऐसी शक्का करते हैं-] जैसे जीव और ब्रह्मका सार्वात्म्यव्यवहार उन दोनोंमें एकत्वकी सिद्धिके लिए माना गया है, वैसे ही आत्माके साथ एकत्वकी सिद्धिके लिए ही अहक्कारके सार्वात्म्यका व्यपदेश माना जा सकता है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि उपदेशसे * अविनाभाव व्याप्ति कहलाती है अर्थात् अहवृत्तिके उदयमें उसके साथ आत्माकी व्याप्ति रहती है अर्थात् आत्मतादात्म्यापन हुए. बिना वह प्रतीत ही नहीं होती। अन्यथा यदि आत्माके साथ व्याप्ति नहीं है, तो उसका विलय ही हो जाता है।
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२१२ विवरणप्रमेयसंग्रह .[ सूत्र १, वर्णक १
प्रतिपन्नयोजीवव्रह्मणोर्युक्त एकत्वसिद्धयर्थो च्यपदेशः, द्वयोः सार्वात्म्या- योगात्। अहङ्गारस्य तु पूर्वमेवात्मैकत्वेन प्रतिपन्नस्य पृथगुपदेशो भेद- सिद्धयर्थ इति गम्यते। न चैवमहङ्कारस्य सार्वात्म्योपदेशो व्यर्थः, ब्रह्मण: परोक्षस्याऽपरोक्षाहङ्गारतादात्म्यकथनार्थत्वात्। तहिं घट्टकुटीग्र- भातन्यायेनाऽहङ्कार एवाऽडत्मा स्यादिति चेत्, पुनरहङ्कारव्युदासेन ब्रह्मणो सुख्यात्मत्वोपदेशात्। श्रुत्यन्तरे च अहङ्कारश्चाऽहङ्कर्त्व्यश्च'इति स्पष्टं विषयेन्द्रियप्रवाहमध्ये पाठात्। स्मृतिश्च 'महाभूतान्यहङ्कारः' इति कार्य- अपञ्चमध्ये गणयति। तर्ह्यहद्कारः किमुपादानः १ किनिमित्तः १ किंस्वरूपः १ किंग्रमाणकः ? पूर्व मेदसे गृहीत जीव और ब्रह्मका एकत्व सिद्ध करनेके लिए तादृश व्यपदेश करना सुसङत हो सकता है, क्योंकि दोनोंमें सार्वात्म्यका योग ही नहीं हो सकता है। परन्तु अह्कारका तो उपदेशसे पूर्व ही आत्माके साथ एकत्वग्रह है ही, अतः उसके भेदकी सिद्धिके लिए ही पृथक् व्यपदेश है, ऐसा ही तात्पर्य प्रतीत होता है। इस प्रकार अहङ्कारका सार्वात्म्योपदेश व्यर्थ होगा, यह भी नहीं कहना चाहिए, क्योंकि अपरोक्ष अहङ्कारके साथ परोक्ष ब्रह्मके तादात्म्यका वोधन करनेसे वह सप्रयोजन है। इस प्रकार माननेसे तो घट्टकुटीप्रमातन्यायसे * अहक्कार ही आत्मा सिद्ध होता है ? नहीं, सिद्ध नहीं होता, क्योंकि फिर अहङ्कारके पृथककरण से ब्रह्ममें ही मुख्य आत्मत्वका उपदेश किया गया है। दूसरी श्रुतिमें भी 'अहङ्कारश्राहंकर्तव्यश्च' (अहङ्कार और अहङ्कर्तव्य) इस प्रकार स्पष्ट ही विषय और इन्द्रियप्रवाहके बीचमें अहक्कारका पाठ आया है। और स्मृति भी 'महाभूतान्यहक्कारः' (महाभूत और अहङ्कार) इत्यादि वाक्योंसे अहक्कारकी कार्यप्रपञ्चोंमें गिनती करती है। प्रश्न-अहङ्कार यदि आत्मासे भिन्न है और कार्य है, तो उस अहक्कारका उपादान (समवायिकारण) क्या है ? निमित्त कारण क्या है ? तथा उसका * मुझे चुझ्गी न देनी पड़े, इसलिए कोई व्यापारी रात्रिमें छिपकर किसी वस्तुको लेकर चला, परन्तु दैवयोगसे पुलिसकी चौकीपर ही उसको सनेरा हो गया और परुड़ा गया, यही 'घट्टकुटीप्रभातन्याय' कहलाता है। * जैसे सूक्ष्म अरुन्धती ताराको दिखलानेके लिए उसके पास स्थूल ताराको ही पहले अरुन्घती कहते हैं, पीछे उसके पासका मुख्य अरुन्धती सूक्ष्म तारा बतलाया जाता है। एवं परोक्षब्रह्मका उपदेश करनेके लिए अपरोक्ष अहङ्कार ही ब्रह्म कहा गया, तदनन्तर मुख्य ब्रह्मका प्रतिपादन करनेके लिए उसके पृथक्करणका उपदेश किया गया है।
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अध्यासविचार ] भांपानुवादसहित. २१३ किंकार्य: १ किमिति सुपुप्तौ नास्तीति चेत्, उच्यते-अहङ्कारस्याऽनाद्यनिर्वचनीयाSविद्या उपादानम्, अविद्यायाः परमेश्वराधिष्ठितत्वं निमिच्तम्, ज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिद्वयं स्वरपम्, कूटस्थ- चैतन्यं प्रमाणम्, कर्तृत्वभोक्तृत्वादिकं च कार्यम्। सुपुपेरन्तःकरणप्रलय- रूपत्वान तत्र सद्भावः । यद्यापे क्रियाशक्तिरूपः ग्राणः सुपुपौ वर्तते, तथापि प्राणस्याऽहङ्कारादन्यत्वे तल्लयो न विरुध्यते। अनन्यत्वे च ग्राणांशं विहायाऽवशिष्टस्य लयः कल्प्यताम्। दृष्टिसृष्टिसमाश्रयणे तु सुप्- पुरुपं प्रति सर्वलयो मुख्य एव सेत्स्यति। यन्तु सांख्या मन्यन्ते-स्वतन्त्रमचेतनं पारमार्थिकं प्रधानमेव महदहङ्का- रादिकृत्स्जगदुपादानम् न त्वविद्या परमेश्वराधिष्ठितेति, तदसत्; तथा सत्यहङ्कार: तद्गतकर्तृत्वभोकतृत्वादि च इदन्तयैव भासेत अयं कर्ताऽयं
स्वरूप क्या है? क्या उसमें प्रमाण है? क्या उसका फल है ? और सुपुप्तिमें वह क्यों नहीं रहता है ? उत्तर-अहक्कारका उपादानकारण अनादि अनिर्वचनीय अविद्या है, अविद्याका परमेश्वराधिष्ठित होना ही उसका निमित्तकारण है, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति ये दो उसके स्वरूप हैं, कूटस्थ चैतन्य उसमें प्रमाण है, कर्तृत्व भोक्तृत्व आदि उसके कार्य हैं। सुपुप्ति अन्तःकरणकी प्रलयरूपा ही है, इसलिए सुपुप्तिमें अहद्कार (अन्तःकरण) नहीं रहता। यद्यपि क्रियाशक्तिरूप प्राण सुपुप्तिमें रहता है, तथापि प्राणसे अहङ्कार यदि भिन्न माना जाय, तो उसका ल्य विरुद्ध नहीं होता। यदि प्राण अहङ्कारसे भिन्न न माना जाय, तो प्राणांशको छोड़कर वाकी अंशके लयकी कल्पना करनी चाहिए अर्थात् अन्तःकरण अंशवाला पदार्थ है, अतः एक अंश रह जाता है एकका लय होता है। और दृष्टिसंष्टिपक्ष माननेमें तो सुपुप्त पुरुषके प्रति सवका लय मुख्य लय ही सिद्ध हो जायंगा। स्वतन्त्र अचेतन पारमार्थिक प्रधान ही अहद्कार आदि सम्पूर्ण जगत्का उपा- दान है, परमेश्वरके सहारे रहनेवाली अविद्या नहीं है, ऐसा सांख्यवादी मानते हैं, परन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर अहद्कार और उसके कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म इदन्तासे ही अर्थात् यह कर्ता है-यह भोक्ता है, इस प्रकारसे ही भासित होने
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२१४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
भोक्तेति न त्वात्मन्यध्यस्ततयाऽहं कर्ताऽहं भोक्तेति अ्तिभासः सिध्येत्, अनिर्वचनीयख्यातेः सांख्यैरनङ्गीकारात् ख्यात्यन्तराणां च निरस्तत्वाद्। यच्च नैयायिका मन्यन्ते-अस्ति किश्िदिन्द्रियं मनो नाम अणु- परिमाणं सुखदुःखेच्छाज्ञानादिनिभित्तकारणम्। यद्येतन्न स्यात्तर्यात्मेन्द्रिय- विपयादिपु समवहितेष्वेव दृश्यमानं ज्ञानकादाचित्कत्वं न सिध्येद। न त्वेतस्मान्मनसोऽतिरिक्त मध्यमपरिमाणं सुखदुःखादिपरिणामि अन्तःकरणं नामाऽस्ति, यस्याऽन्त:करणस्य वृत्तिभेदादहङ्कारो वेदान्तिभिरयःपिण्डदर्प- णोदकपात्रसदृशो वर्ण्यते। यथाऽयःपिण्डेन स्वगतो हस्वदीर्घवर्तुलत्वाद्या कारो वहौ आरोप्यते दर्पणेन चैकमेव मुखविम्वप्रतिविम्बरूपेण विभज्यते,
लगेंगे, आत्मामें अध्यस्तरूपसे 'मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ' इस प्रकारका प्रतिभास सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि अनिर्वचनीयर्यातिको सांख्य नहीं मानता है, दूसरी दूसरी ख्यातियोंका निराकरण I किया ही गया है। और जो कि नैयायिक मानते हैं-मन एक इन्द्रिय है, वह अणुपरिमाण है और सुख, दुःख, इच्छा और ज्ञान आदिका निमित्तकारण है। वह मन यदि नहीं होता, तो आत्मा, इन्द्रिय (चक्षुरादि वहिरिन्द्रिय) तथा विपयादिके विद्य- मान रहते ही ज्ञानका दश्यमान कभी-कभी उदय होना सिद्ध नहीं होता। [मनके माननेपर तो जब इससे संयोग होता है तब ज्ञान होता है। और जब संयोग नहीं होता तब ज्ञान भी नहीं होता, इससे ज्ञानका कादाचित्कत्व सिद्ध होता है ] इस पूर्वोक्त मनसे अतिरिक्त मध्यम परिमाणवाला जिसका सुख, दुःख आदिके स्वरूपमें परिणाम हो, ऐसा अन्तःकरणनामक पदार्थ नहीं है, जिस अन्तःकरणकी वृत्तियोंकी विभिन्नताके कारण अहङ्कारका वेदान्ती लोहेके तप्त टुकड़े, दर्पण तथा जलपात्रके सदृश वर्णन करते हैं।[वेदान्तियोंके वर्णन प्रकारको दिखाते हैं-] जैसे लोहेका टुकड़ा अपनेमें वर्तमान ह्स्वत्व, दीर्घत्व, वर्तुलत्व (छोटाई, लम्बाई और गोलाई) आकारको [अपनेमें संसृष्ट] आगमें समर्पित करता है, और दर्पण एक ही मुखमें * तात्पर्य यह है कि उक्त मतमें चेतन आत्मा और अचेतन प्रधानका अत्यन्तविचेक रहनेसे चेतनाऽचेतनका 'अहं भोक्ता' इस प्रकार व्यवहार नहीं वन सकता। इसकी उपपत्ति केवल अनि- र्वचनीय ख्यातिमें ही हो सकती है, जिसको सांख्य मानता ही नहीं, अतः उसके मतके अनुसार 'अयं भोक्ता' ऐसा विविक्त प्रतिभास होना ही प्राप्त होगा, जो कि होता नहीं।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २१५
उदकपात्रेण च चन्द्रप्रतिविम्बे गमनागमनादय आरोप्यन्ते; तथैवाऽहृङ्कारेण स्वगतकर्तत्वादिकमात्मन्यारोप्यते, एक एव चाऽडत्मा जीवव्रह्मरूपेण विभ- ज्यते, जीवे एव परलोकगमनादय आरोप्यन्ते। न च बुद्धिरेवाऽन्त:करण- मिति वाच्यम्, आत्मगुणज्ञानव्यतिरेकेण बुद्धेरभावाद्। तस्मान्नाऽस्ति वेदान्त्यभिमतमन्तःकरणमिति। तदप्यसत्, 'बुद्धेर्गुणेन' इत्यादिश्रुतिष्वनेकशोऽन्तःकरणस्य परिणामिनो ज्ञानक्रियाशक्तिरुपस्य आत्मनि सर्वसंसारापादकस्य मनोबुद्धयादिशब्दवा- च्यस्य प्रसिद्धत्वात्। नो चेदसङ्गस्याऽडत्मनः संसारो न सिध्येत्। सति त्वन्त:करणे तेनाऽडत्मनि मिथ्यासंसार आरोप्यते जपाकुसुमेनेव स्फटिके मिथ्यालौहित्यम्। यस्तु लौहित्यमिथ्यात्वं न सहते, स वक्तव्य:, किं स्फटिकप्रवृत्ता नयनरश्मयः स्फटिकप्रतिस्फालिता जपाकुसुममुपसर्पेयुः ! किं वा कुसुमगत- रूपमात्रं स्फटिके ग्रतिविम्वितं स्फटिकात्मना भाति उत पझ्मरागादिमणि- विम्तप्रतिनिम्बभावसे भेद उत्पन्न कर देता है एवं जलसे भरा पात्र चन्द्रप्रति- विग्नमें गमन और अगमन आदिका आरोप करता है। वैसे ही अहंकार अपनेमें रहने- वाले कर्तृत्व आदिका आत्मामें आरोप करता है, आत्माको जीव और ब्रह्मभेदसे विभक्त करता है और जीवमें परलोकके गमन और अगमनका आरोप करता है। बुद्धि ही अन्तःकरण है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि आत्माके ज्ञानरूप गुणसे भिन्न वुद्धि कोई अतिरिक्त वस्तु नहीं है। इसलिए वेदान्तिसम्मत अन्तःकरण नहीं है। नैयायिकोंका कथन भी असत् है, क्योंकि 'वुद्धेर्गुणेन' इत्यादि श्रुतियोंमें अनेक बार ज्ञान-क्रियाशक्तिस्वरूप, परिणामी तथा आत्मामें अखिल संसारका आपादक जो कहा गया है, वह मन, वुद्धि, आदि शब्दोंसे कहा जानेवाला अन्तःकरण पसिद्ध ही है। यदि यह न माना जाय, तो असद आत्माका संसार ही सिद्ध नहीं हो सकेगा। अन्तःकरणके रहनेपर तो उसके द्वारा आत्मामें मिथ्या संसार आरोपित किया जाता है, जैसे जपाकुसुमके संनिधानसे स्फटिकमें मिथ्या (वस्तुतः न रहनेवाला) लौहित्य आरोपित किया जाता है। जो [ अर्यातिवादी जपाकुसुमके संनिधानसे प्रतीयमान स्फटिकगत ] लौहित्यको मिथ्या नहीं मानता है, उससे पूछना चाहिए कि क्या स्फटिकमें पड़ी हुई नयनरश्मियाँ स्फटिकसे टकराकर जपाकुसुमपर पड़ती हैं? या
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२१६ विचरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
प्रभयेव कुसुमप्रभया व्याप्तत्वात् स्फटिको लोहित इवाजवभासते अथवा तत्र व्याप्तुवन्ती ग्रभैव लोहिता भाति आहोस्विरित्तया प्रभया स्फटिके नृतनं लौहित्यमुत्पादितम् १ आद्ये, नेत्राभिमुखं कुसुममपि प्रतीयेत। यदि तदवय- वदोषवलान् कुसुमे संप्रयोगस्तहिं लौहित्यमपि न भायात्, संयुक्तसम- वायसम्बन्धाभावात्। न द्वितीय: क्कचिदपि द्रव्यं परित्यज्य रूपमात्रस्य प्रतिविम्ादर्शनात्। तृतीये तु स्फटिकलौहित्ययोः सम्वन्धो मिथ्येति त्वयाऽभ्युपगतमेव स्याद्, इवशव्द्ग्रयोगात् । चतुर्थे स्फटिकशौक्ल्य- मपि प्रतीयाद्, अप्रतीतिकारणाभावात्। न च तया प्रभया विरोधिगुण- युक्तया शौक्ल्यमपसार्यते, तथा सति नीरूपस्य स्फटिकस्य अचाक्षुपत्व- स्फटिकमें प्रतिविम्नित हुआ फलका लौहित्य-लालरंग-मात्र स्फटिकरूपसे प्रतीत होता है? अथवा पझ्मराग आदि मणिकी कान्तिके समान पुप्पकी प्रभासे (चमकसे) व्याप्त होनेके कारण स्फटिक रक्त-सा दिखाई देता है? किंवा उसमें स्फटिकमें व्याप्त होती हुई प्रभा ही लाल मालम पड़ती हैं? अथवा उस फूलकी प्रभा स्फटिकमें नया लाल रंग उत्पन्न कर देती है ? इनमेंसे प्रथम विकल्पके माननेपर जपाफूलकी प्रतीति भी प्रसक्त होगी। .यदि कहा जाय कि उस जपाकुसुमके अवयवगत दोपके कारण पुप्पके साथ इन्द्रियका संयोग नहीं है, अतः उसकी प्रतीति नहीं होती है; तो तुल्य युक्तिसे लाल रङ्गकी भी प्रतीति नहीं होगी, क्योंकि वहांपर संयुक्तसमवाय संनिकर्ष नहीं है। [द्रव्यगत गुण, कर्म या जातिका प्रत्यक्ष संयुक्तसमवाय सम्बन्धसे ही होता है। ] द्वितीय पक्ष भी नहीं वनता, क्योंकि द्रन्यको छोड़कर कहीं भी रूपमात्रका प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता। तृतीय विकल्पका अङ्गीकार करनेपर, तो तुमने स्फटिक और [ प्रतीयमान ] लाल रंगका सम्बन्ध मिथ्या है, ऐसा मान ही लिया है; क्योंकि तुमने 'इव' (जैसे) शब्दका प्रयोग किया है। चतुर्थ कल्पमें स्फटिकगत श्वेतगुणकी भी प्रतीति होनी चाहिए, क्योंकि उसकी प्रतीतिके न होनेमें कोई कारण नहीं है। यदि शक्का हो कि शुक्कके विरोघी लाल गुणसे युक्त उस फूलकी प्रभासे [ स्फटिकका ] शुक्क गुण हटा दिया जाता है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा होनेपर स्फटिक रूपसे रहित हो जायगा, तब उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष ही नहीं होगा। केवल शुक्क गुणका प्रतिवन्ध होता है, ऐसा भी नहीं कह सक़ते, क्योंकि स्फटिकमें भी
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २१७
प्रसङ्गात्। नाऽपि शौक्ल्यं प्रतितद्धयते, स्फठिकेऽपि प्रतिवन्धप्रसङ्गात्। नहि रूपं विहाय द्रव्यमात्रस्य चाक्षुपत्व्रं संभवति, वायावपि तत्प्रसङ्गाद्। पश्चमेऽपि प्रभा निमित्तकारणं चेद, तदा प्रभापगमेऽपि स्फटिके लौहित्य- मवतिष्ठेत। उपादानं प्रभेति चेद, न; मणावितर कुसुमे प्रभाया एवाऽदर्शनात्, पूर्वोक्तदूपणानामङ्गीकारवादत्वाठ्। तदेवं स्फटिके मिथ्यालौहित्यं कुसुमनि- मित्तमित्यद्गीकर्त्तव्यम्। एवमात्मन्गहङ्गारनिमित्तं कर्तृत्वादिकमारोप्यते। ननु किमहङ्गारगतस्यैव कर्तृत्वस्याऽSत्मन्यारोप उताऽऽत्मनि मिध्याभूवं कर्तत्वान्तरमुत्पदते १ आद्ये, लोहितदृष्टान्तवैपम्यं स्यात् ; द्वितीये त्वहङ्कारः सत्यकर्ता आत्मा च मिथ्याकर्त्तेति कर्तद्वयापत्ति:, भैवम्; न तावदाद्यः पक्षो दुम्यति; आत्मनि वस्तुतोऽसदेव कर्तृत्वं भातीत्यस्मिन्नंशे दष्टान्त उक्तः । न चैवमन्यथाख्यातिः; कर्तत्वधर्मसहितस्याऽहङ्कारस्याऽत्म-
प्रतिबन्ध आ जायगा, कारण कि रूपके बिना द्रव्यमात्रके चाक्षुप प्रत्यक्षका सम्भव नहीं है, [अन्यथा ] वायुका भी चाक्षुप प्रत्यक्ष हो जायगा। पञ्चम कल्पके माननेमें भी, यदि पुष्पप्रभा निमित्तकारण है, तो प्रभाके दूर होनेपर भी स्फटिकमें लाल रक रह जाना चाहिए। प्रभा उपादान (समवायिकारण) है, ऐसा मानना भी युक्त नहीं है; क्योंकि मणिके समान पुप्पमें प्रभा ही नहीं देखी जाती। और [ यदि हठ करो, तो ] पूर्वोक्त (चतुर्थ कल्पमें आये हुए) दूपणोंका अन्ीकार करना होगा। इससे निप्कर्ष यह हुआ कि स्फटिकमें पुप्पनिमित्तक मिथ्यालौहित्य भासता है। इसी तरह आत्मामें अहक्कार- निमित्तक कर्तृत्वादिका आरोप किया जाता है। शक्का करते हैं कि क्या अहक्कारमें विद्यमान कर्तृत्वधर्मका ही आत्मामें आरोप किया जाता है? अथवा आत्मामें मिथ्याभूत (अहक्कारगत कर्तृत्वसे अतिरिक्त कर्तृत्व उत्पन्न होता है? प्रथम पक्ष माननेमें लोहितदष्टान्तका वैषम्य होगा और द्वितीय पक्षमें तो अहक्वार सत्य कर्ता और आत्मा मिथ्या कर्ता है, इस प्रकार दो कर्ता मानने पड़ेंगे ? परन्तु यह शक्का युक्त नहीं है, कारण? प्रथम कल्पमें कोई दूपण नहीं आता, क्योंकि 'आत्मामें वस्तुतः न रहनेवाला ही कर्तृत्व प्रतीत होता है' इस अंशमें 'लोहितः स्फटिकः' यह दष्टान्त दिया गया है। और ऐसा माननेसे अन्यथार्यातिपक्ष होगा, यदि ऐसी शक्का की जाय, तो यह भी ठीक भी नहीं है, २८
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२१८ विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
न्यध्यस्ततया मिथ्यात्वाङ्गीकारात्, अन्यथाख्यातावारोप्यस्य रजतादेः सत्यत्वात्। नाऽपि द्वितीये दोप :; आत्माहङ्कारयोरेकतापच्या कर्तृद्वया- असक्ेः। ननु नाऽहङ्कार: कर्तत्वाद्यनर्थहेतु :; 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्यादौ
संभिन्नचिजडोभयरूपस्य ग्रन्थित्वोपचारात्। अथ मतमहङ्कारादेरध्यस्तत्वे प्रतीतिन स्यात्, आत्मा न स्वात्म- न्यध्यस्तं अत्याययति, अधिष्ठानत्वात्, स्फटिकवदिति, तन्न; जडत्वस्यो- पाधित्वात् । आत्मा तु चेतनः। एवमप्यध्यस्तगोचरज्ञानव्यापारशन्य- त्वात् फलतो जड इति चेद्, न; अव्यवधानेन चित्संसर्गादेव ग्रति- क्योंकि कर्तृत्वधर्मसहित अहक्कारके आत्मामें अध्यस्त होनेसे उसमें मिथ्यात्व माना गया है। और अन्यथाख्यातिमें तो आरोपविषय रजतादि सत्य माना जाता है। एवं द्वितीय पक्षमें भी दोप नहीं है, क्योंकि आत्मा और अहद्कार इन दोनोंकी ऐक्यवुद्धि हो जानेसे दो कर्ताओंकी प्रतीति नहीं होती। कर्तृत्व आदि अनर्थोंका कारण अहद्कार नहीं है, किन्तु 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः (हृदयकी गाँट टट जाती है) इत्यादि वाक्योंमें श्चत हृदयकी अ्रन्थि ही अनर्थका कारण है? यदि ऐसी श्का हो, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अधिष्ठानभूत आत्माके सहित अहक्वारमें ही- परस्परतादात्म्यापन्न चित् और जड़ उभयरूप होनेके कारण लक्षणा द्वारा-ग्रन्थि- शब्दसे व्यवहार किया गया है। यदि शङ्का हो कि अहक्कार आदिको अध्यस्त माननेमें उनकी ग्रतीति ही नहीं होगी, क्योंकि 'आत्मा अपनेमें अध्यस्तका प्रकाश नहीं करा सकता, अधिष्ठान होनेसे; स्फटिकके समान' ऐसा अनुमान उक्त अर्थका पोपक है, तो यह युक्त नहीं है; कारण कि जड़त्व इसमें उपाधि है; आत्मा तो चेतन है* । अध्यस्तविषयक ज्ञानरूप व्यापारसे रहित होनेके कारण आत्माका जड़ होना फलित हो जाता है, ऐसा कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि अव्यवधानसे चित्तका *साध्यका व्यापक होकर और साधनका अव्यापक होना उपाधिका लक्षण है। स्फटिकमें जड़त्व भी है और अपनेमें अध्यस्त जपाकुसुमादिको प्रकाशित न कर सकना भी है, अतः दृष्टान्तमें साध्यव्यापकत्व हुआ और आत्मामें अधिष्टानत्व हेतु तो है, परन्तु जडत्व नहीं है; अतः साधनाव्यापकत्व हुआ। उपाधिस्थलमें प्रांयः दृष्टान्तसे साध्यव्यापकत्व और पक्षमें साधना- व्यापकत्व समझना चाहिए।
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अध्यासविचार ] भापांनुवांदसहित २१९
भाससिद्धौ ज्ञानव्यापारस्याऽप्रयोजकत्वात्। तर्ह्हङ्कारो नेदमंशः स्याद्, ज्ञानक्रियाव्यवधानमन्तरेण भासमानत्वात्, साक्षिस्वरूपवदिति चेद्, न; चित्स्वभावे साक्षिणि चित्कर्मत्वस्येदमंशलक्षणस्याऽभावात्। अहङ्कारे तल्क्षणमनुभवसिद्म्। प्राभाकरादयः पुनः शास्त्ररहस्यमजानन्तो लोकव्यवहारानुसारेण
मोमुह्यन्ते। ज्ञानक्रियाकर्मत्वमेवेदमंशलक्षणं मन्यमानास्तद्रहितोऽहङ्कार आत्मेति वृथा
यद्यप्यहङ्कारोऽपि वृत्तिज्ञानवेद्यः, अन्यथा पूर्वदिनाहङ्कारे स्मृत्य- संभवात्; तथाऽपि तस्य वृत्तिज्ञानस्याऽहङ्कारांशत्वादत्यन्तभेदाभावा- च्छरीरविपयादिवद्वेद्यत्वं न स्पष्टम् । सूक्ष्मद्शिनां तु स्पष्टमिति चेंद्, एत्रमपि वृत्तिवेद्यत्वलक्षणं वृत्तिनिवर्त्यामविद्यां न व्यामोति। ततश्चित्कर्म- सम्बन्ध होनेसे ही प्रतिभासकी सिद्धि होनेपर ज्ञानव्यापार साधक नहीं है। तब तो 'अहक्कार इदम् अंश अर्थात् जड़ नहीं होगा, ज्ञानक्रियाके व्यवधानके बिना ही प्रकाशमान होनेसे, साक्षिस्वरूपके समान' यह भी शक्का नहीं हो सकती; क्योंकि चित्स्वभाव साक्षीमें चित्कर्मत्वरूप इदमंशके लक्षणका अभाव है और अहक्कारमं उसका लक्षण अनुभवसिद्ध है। शास्त्रके रहस्यके अनभिज्ञ प्रभाकर आदि मीमांसक लोकव्यवहारके अनुसार ज्ञानक्रियाका कर्म होना ही इदमंश (अनात्मा) का लक्षण है, ऐसा मानते हुए ज्ञानकरियाकर्मत्वरूप इदमंशका उक्त लक्षण अहक्कारमें न होनेके कारण वह अहक्कार आत्मा है, इस प्रकारके वृथा भ्रममें पड़े हैं। यद्यपि अहक्कार भी वृत्िज्ञानसे जाना जाता है, अन्यथा पूर्व दिनमें अनुभूत अहक्कारका स्मरण नहीं हो सकता, तथापि उस वृतिज्ञानके अहक्कारांश होनेके कारण अत्यन्त भेद न होनेसे शरीर या घट, पट आदि विपयोंकी तरह (अहङ्कारमें) वेद्यत्वकी स्पष्ट प्रतीति नहीं होती। सूक्ष्मविचारशील विद्वानोंको तो (अहक्कारमें भी वेद्यत्वकी) स्पष्ट प्रतीति होती ही है। ऐसा मानो, तो वृत्तिवेद्यत्वरूप इदमंशका लक्षण वृत्तिसे निवृत्त होनेवाली अविद्याको व्याप्त नहीं कर सकता। इसलिए हदमंशका * अहक्वार यदि स्त्रप्रकाश होता तो नित्य होनेसे उसका संस्कार न हो सकता और संस्कारके बिना स्मरण नहीं बनता। अहद्कारको वृत्तिवेद्य माननेमें वृत्तिके अनित्य होनेसे संस्कारका सम्भव है, अतः स्मरण भी उपपन्न होता है।
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२२० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
त्वमेवेदमंशलक्षणम्। कुतस्तर्हि लक्षणसाम्ये शरीरविपयादाचेव लोकस्येदं- व्यवहारो नाऽहङ्कारे; तदनभिज्ञत्वादिति न्रूमः। यथा वल्मीकपापाण- वृक्षादिपु मृन्मयत्वसाम्येऽपि विवेकहीना वल्मीकमेव तथा व्यवहरन्ति, न वृक्षादि तद्वत्। अभिज्ञास्तु यथालक्षणं चिदंशमनिदन्तया जडांशं चेदन्तया व्यवहरन्ति। तस्मात् चित्प्रतिविम्बगभितोऽहद्गार इदमनिदमा- त्मकत्वेन परीक्षकैर्निरूप्यमाणोऽि पामरैरेकीकृत्य अहंग्रत्ययरूपेणाऽनुभृत इति सिद्धम्।
नेद: सात्। तत्र हि ग्रीवास्थदर्पणस्थयोरन्योन्याभिमुखत्वेन भेदो- इनुभूयते। मैवम्, मदीयमिदं सुखमित्यैक्यप्रत्यभिज्ञया भेदानुभवस
चित्कर्मत्व (चिद्भास्यत्वरूप) ही लक्षण करना उचित है, लक्षणकी समानता आनेपर शरीर तथा घट, पट आदि विपयोंमें ही इदम् (अनात्मा) व्यवहार होता है, अहक्कारमें ऐसा क्यों नहीं होता है ? उसके रहस्यको न जाननेसे, यही हम उत्तर देते हैं। जैसे यद्यपि वल्मीक (.चाँवी) पत्थर, पेड़ इत्यादि समानरूपसे मिट्टीके ही विकार हैं, तथापि विवेकहीन पुरुप चल्मीकमें ही वैसा (मिट्टीका ढेर) व्यवहार करते हैं, वृक्षादिमें नहीं करते, वैसे ही [अहक्वारमें इदंत्यवहार नहीं करते और अन्यत्र करते हैं ]। और जानकार विद्वान् तो लक्षणके अनुसार चिदंशमें आत्मा और जडांशमें इदम् (अनात्मा) व्यवहार करते हैं। इससे चित्-चेतन आत्माके प्रतिबिम्बसे युक्त अहक्कार, इदमनिदात्मत्वरूपसे (आत्मा और अनात्मा-इन दोनोंके सम्पुटरूपसे) विवेकशील पुरुपों द्वारा निरूपित होनेपर भी पामर-विवेकहीन-पुरुष उसको एक समझकर अहम् (मैं) इस प्रतीतिरूपसे उसका अनुभव करते हैं, ऐसा सिद्धान्त हुआ। शङ्का-यदि जीव अहक्कारस्थ प्रतिनिम्भरूप माना जाय, तो दर्पणगत भुखप्रतिविम्बके तुल्य विम्बसे भेद होगा क्योंकि वहांपर ग्रोवाके ऊपर रहनेवाला मुख और दर्पणगत [प्रतिविम्वस्वरूप ] मुख-इन दोनोंमें एक दूसरेके सम्मुख होनेसे भेदका अनुभव किया जाता है। उत्तर-उक्त शक्का उचित नहीं है, क्योंकि 'यह मेरा मुख है' इस प्रकार एकताकी म्रत्यभिज्ञासे भेदप्रतीतिका बाध होता है। प्रत्यभिज्ञाका
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २२१
वाधात्। न च अत्यभिज्ञैवेतरेण वाध्येति वाच्यम्, सति भेदे ग्रति- विम्बासम्भवात्। किं प्रतिबिम्बो नाम मुखलाञ्छितमुद्रा उत दर्पणावयवा एव विम्बसंनिधिवशात् तथा परिणमन्ते। नाऽऽद्यः, दर्पणस्थमुखस्येतर- स्मादल्पत्वात्। यत्र तु औ्रौढदर्पणे म्रौढं मुखमुपलभ्यते, तत्रापि तस्य न मुद्रात्वम्, दर्पणमुखयोः संयोगाभावात्। न द्वितीय :; निमित्तकारण- स्य विम्वस्यापायेपि तस्याऽवस्थानप्रसङ्गात्। नहि तथाजवतिप्ठते। तेनैव पुरुपेण दर्पण तिर्यङ्निरीक्षिते पुरुपान्तरेण सम्यगवलोकिते वा तन्मुखानुपलम्भात्। न चैवं मन्तव्यं क्वचिन्निमित्तापाये कार्यमप्यपैति, हस्तसंयोगजन्यस्य कटग्रसारणस्य हस्तसंयोगापायेऽपायदर्शनादिति। न
ही भेदप्रतीतिसे वाध है, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि भेद माननेमें प्रतिबिम्त्का सम्भव नहीं है, क्योंकि क्या प्रतिबिम्ब मुखकी छापवाली मुहर है ? या दर्पणके अवयव ही विम्ब्रके सामने आ जानेपर प्रतिबिम्ध- रूपसे परिणत हो जाते हैं? [जिसके कारण मुखका आकार दीखता है] इनमें से पहला पक्ष नहीं मान सकते, क्योंकि दर्पणमें विद्यमान मुख विम्त्रभूत मुखसे छोटा है। [मुहर ठीक उसी परिमाणकी होती है, जितने परिमाणवालेसे वह छापी जाय, यदि मुखकी छाप प्रतिविम्ब होती, तो मुखके समान परिमाणवाली ही होती, न्यून या अधिक नहीं होती ] जिस बड़े दर्पणमें पूर्ण परिमाणवाला मुख दिखाई देता है, उस स्थलमें भी वह मुहर या छाप नहीं मानी जा सकती, क्योंकि दर्पण और मुखका संयोग ही नहीं है, [छापमें संयोग अपेक्षित है, सन्निधान-मात्रसे मुहर नहीं उतर सकती ] दूसरा विकल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि विम्बभूत निमित्तकारणके हट जानेपर भी प्रतिबिम्बकी स्थितिका प्रसङ्ग होगा। परन्तु उस दशामें अर्थात् बिम्बके सामने न रहनेपर प्रतिबिम्ब तो वहां रहता ही नहीं, क्योंकि वही पुरुप, जिसके कि मुखका प्रतिबिम्ब उस दर्पणमें पड़ा था, सामनेसे मुंह हटाकर यदि फिर तिरछे देखे अथवा दूसरा पुरुप खूब सावधानीसे भी देखे, तो भी उस दर्पणमें उसका मुख नहीं दिखाई देता है। [ इससे सिद्ध हुआ कि वहां प्रतिविम्धकी स्थिति नहीं रहती है।] 'कहीं-कहीं- पर निमित्त कारणका विनाश होनेपर फार्य भी नष्ट हो जाता है, जैसे हाथके वलसे उत्पन्न चटाईका फैलाव हाथके हटा देनेसे ही नष्ट हो जाता है [और फिर संकुचित
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२२२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
तत्र निमित्तापायात् कार्यापायः किन्तु चिरकालसंवेष्टनाहितेन संस्कारेण संवे- एटनलक्षणविरुद्कार्योत्पादात्। अन्यथा चिरकालग्रसारणेन, संवेष्टनसंस्कारे विनाशितेऽपि हस्तापाये प्रसारणमपेयाद्, न चैवमपैति। इह तु चिरकाल- विम्वसंनिधावपि अन्ते चिम्बापाये प्रतिविम्बोऽपि गच्छत्येवेति न विम्बः परिणामस्य निमित्तम्। अथ मन्यसे चिरकालावस्थितोऽपि कमलविकासः सवितृकिरणस्य निमित्तस्याऽपायेऽपगच्छतीति। तन्, तत्रापि प्राथमिकमुक्क- लत्वे हेतुभि: पार्थिवैराप्यैश्च कमलावयवैः पुनरपि रात्रौ मुकुलत्वे विरुद्ध- कार्ये जनिते विकासापायात्। अन्यथा तादृगवयचरहिते साने कमलेऽपि
हो जाता है ] ऐसा देखा गया है' इस प्रकारकी शङ्का (प्रकृतमें) नहीं कर सकते, क्योंकि वहांपर निमित्तकारणके विनाशसे कार्यका विनाश नहीं है, किन्तु चिरकालके संवेष्टनसे प्राप्त संस्कार द्वारा पुनः फेलावके विरुद्ध संवे- षटनरूप कार्यकी उत्पत्ति होती है, जिससे फैलावका नाश होता है, [निमित्त कारणके विनाशसे नहीं होता है ] नहीं तो बहुत दिनों तक फैलाए रखनेसे संवेष्टन- संस्कारके नष्ट हो जानेपर भी हाथके हटा देनेसे फैलाव मी हट जाता परन्तु नहीं हटता। प्रकृतमें तो बहुत देर या दिनों या वर्पों तक विम्ब्रके सामने रहते हुए भी अन्तमें बिम्तके हट जानेसे प्रतिविम्व भी चला ही जाता है, इसलिए विम्न्र [तादृश-प्रतिबिम्ब-स्वरूप ] परिणामका निमित्त नहीं है। यदि मानो कि [सूर्यकी किरणोंके द्वारा उत्पन्न ] बहुत काल * (दिन भर) तक स्थित कमलपुष्पका विकास सूर्यकी किरणरूप निमित्त कारणके हट जानेसे हट जाता है (अर्थात् पुष्पके विकासका विनाश हो जाता है), तो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि वहांपर (कमलपुष्पके विकासके नष्ट होनेपर) मी प्राथमिक मुकुलतामें अर्थात् कमलके वन्द होनेमें हेतुभूत पार्थिव तथा जलीय परमाणुओंसे वने हुए कमलपुष्पके अवयवोसे, फिर भी रात्रिमें मुकुलत्वरूप विकासके विरुद्ध कार्यके उत्पन्न होनेसे ही, विकासका नाश होता है। (निमित्त
- कमल हेमन्त या शिशिरमें नहीं विकसित होते, इनका विकाश ग्रायः वसन्तसे प्रारम्भ होता है। उन दिनोंमें रात्रि छोटी और दिन बड़े होते हैं। अतः विकास अधिक कालस्थायी होनेसे उसका संस्कार ही दृढ़ कालत्थायी होनेसे अधिक हो सकता है।
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अध्यासविचार ] भापानुवांदसहित २२३
रात्रौ विकासोऽपगच्छेत्। आदर्शे तु मुखाकारपरिणते पुनः केन हेतुना समतलाकारपरिणामः स्यात्। तदवयवानां कारुकर्मव्यतिरेकेणाडकिश्चित्कर- त्वात्। अत एव विम्बसंनिधिमात्रेण नादर्शावयवा मुखाकारेण परिणमेरन्; अन्यथा दर्पणद्रव्ये ग्रतिमामुखे कर्त्तव्ये सति लौकिका विम्बमेव संनिधापये- युर्न तु कारुमपेक्षेरन्। दर्पणद्रव्यस्यान्याकारपरिणामे कारुकर्मापेक्षायामपि प्रतिविम्बपरिणामे पुनःस्वरूपपरिणामे वा न तदपेक्षेति चेद्, एवमपि न मुखग्रतिविम्बाकारपरिणामो युक्तिसहः । चक्षुर्नासिकादिनिम्नोन्नतभावस्य स्पर्शेनाऽनुपलम्भात्। समतलमेव हि पाणिना स्पृश्यते। समतलेन व्यवहितं
कारण सूर्यके किरणोंके हट जानेसे विकासरूप कार्यका नाश नहीं होता) अन्यथा उन (पार्थिव और जलीय) अवयवोसे रहित मुरझाये हुए कमलके पुप्पसे भी रात्रिमें विकासको चला जाना चाहिए। [ दार्शन्तिकमें विपमता दिख- - लाते हैं-] दर्पणके मुखके आकारमें परिणत हो जानेपर तो फिर किस हेतुसे समतलाकार (बिना प्रतिविम्बवाला अपना पुराना आकार) प्राप्त होगा? क्योंकि दर्पणके अवयव कारीगरके व्यापारके विना अकि्चित्कर हैं[ अर्थात् दर्पणके अवयवोंकी चित्रकारकी दस्तकारीके बिना अपने आकार वदलने या पुनः प्राप्त करनेमें सामर्थ्य ही नहीं है ]। इसीसे बिम्वके सामने आनेसे ही दर्पणके अवयवोंका स्वयं मुखके आकारमें परिणाम नहीं हो सकता। यदि ऐसा हो सकता, तो लोक दर्पणमें (शीशेमें) मुखकी तसवीर खोदने या वनानेके लिए विम्वको ही सामने रख देते, वह अपने-आप वन जाती, फिर उसके लिए कारीगरकी जरूरत नहीं समझते। यद्यपि दर्पणके दूसरे आकारमें बदलनेके लिए कारीगरकी आवश्यकता है, तथापि प्रतिविम्वरूप परिणामके लिए (जो कि शीशेके आकारको वदलता नहीं है) अथवा पुनः अपने प्रतिविम्बरहित स्वरूपमें आ जानेके लिए शिल्पीकी आवश्यकता नहीं है? ऐसा यदि कहो, तो भी इस परिस्थितिमें मुखके प्रतिविम्बके आकारके सदश दर्पणका परिणाम है, यह मानना युक्तियोंसे विरुद्ध है, क्योंकि आँख, नाक आदिका नीचा-ऊँचापन छूनेसे मालम नहीं पड़ता। हाथसे समतलका ही स्पर्श होता है। [ यदि आकारका
अग्रिम अग्रिम मुकुल पूर्व-पूर्व मुकुलजनित संस्कारसे मी उपप हो सकते हैं, परन्तु प्रथम मुकुलका कारण वही मुकुल नहीं हो सकता, अतः उसका कारण जलीय तथा पार्थिच अवयव ही होंगे। इस अमिप्रायसे ग्रथम पद दिया गया है।
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२२४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
मुखमिति चेत् , तर्हिं चाक्षुपमपि न स्यात्। तत एतत्सिद्धम्-विमत आदर्शो मुखव्यत्त्यन्तररहितः. तज्जन्मकारणशून्यत्वाद्, यथा विपाणजन्मकारणशून्यं विषाणरहितं शशमस्तकमिति। ननु तर्हि शुक्तिरजतवन्मिथ्यात्वापत्तेर्न विम्बैकत्वासिद्धिः, अत्यभिज्ञा तु व्यभिचारिणी, मिथ्यारजतेऽपि मदीयमिदं रजतमिति तद्दर्शनादिति चेत्, विषमो दृष्टान्तः। नेदं रजतमिति हि तत्र रजतस्वरूपवाधया रज- ताभिज्ञाया भ्रमत्वे तत्प्रत्यभिज्ञाया अपि भ्रमत्वमुचितम्। इह तुन तथा नेदं मुखमिति स्वरूपवाधः, किन्तु नाऽत्र मुखमिति देशसंवन्धमात्रवाधे तादश परिणाम हो गया होता, तो छूनेसे ऊंचा-नीचा जरूर मालूम पड़ता] समतलसे मुख ढका हुआ है [ इससे छूनेमें ऊँचा-नीचा मालम नहीं पड़ता ] यदि ऐसा कहा जाय, तो उसका चक्षुसे प्रत्यक्ष भी नहीं होगा, इसलिए यह सिद्ध हो गया कि विवादग्रस्त आदर्श दूसरी (विम्बसे अतिरिक्त) मुखव्यक्तिसे शून्य है, क्योंकि उसमें अर्थात् दर्पणमें उसका-दूसरे मुखका-जन्म देनेवाला कोई कारण ही नहीं है, जैसे विषाणोंको उपजानेवाले कारणोंसे शून्य खरगोशका विषाणसे रहित सिर। ['प्रतिबिम् मिथ्या है' इस प्रतिविम्वमिथ्यात्ववादका खण्डन करते हैं-] तब, तो शुक्तिरजतके समान प्रतिविम्बमें भी मिथ्यात्वकी आपत्ति होनेसे एक विम्बकी सिद्धि नहीं होगी यह प्रतिबिम्ब मेरा मुख है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा तो व्यभिचरित है, क्योंकि यह शुक्तिरजत मेरा हैं, इस प्रकार मिथ्यारजतस्थलोंमें भी वह देखी गई है, अतः प्रत्यभिज्ञासे मिथ्यात्वका अभाव या विम्में एकत्वकी सिद्धि नहीं हो सकती, इस प्रकार यदि कहो, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि दष्टान्त विषम है। [दृष्टान्तकी विषमता दिखाते हैं-] वहाँपर अर्थात् भ्रमात्मक शुक्तिरजतस्थलमें 'यह रजत नहीं है' इस प्रकार रजत स्वरूपका बाध होनेसे रजता- मिज्ञाका-रजतके प्रथम ज्ञानका-अ्रमत्व सिद्ध होनेपर उसकी प्रत्यभिज्ञाको- यह रजत मेरा है, इस द्वितीय ज्ञानको-अ्रम मानना उचित है। [क्योंकि उत्तरकालिक बाधसे पूर्वकालिक ज्ञान भ्रम माना जाता है और मूलज्ञानके अरमात्मक होनेसे तन्मूलक प्रत्यभिज्ञा भी सुतरां अ्रम होगी। ] मुखप्तिविम्ब स्थलमें, तो 'यह रजत नहीं है' इस वाघके सददश 'यह मुख नहीं है' ऐसा स्वरूपबाध नहीं होता, किन्तु 'यहां दर्पणके अन्दर मुख नहीं है' इस प्रकार
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २२५.
समुत्पन्ना मदीयमेव सुखमिति प्रत्यभिज्ञा कथ अ्रमः स्यात्। न च स्वसु- खावयवानामचाक्षुपत्वांत् कथ प्रत्यक्षपत्यभिज्ञानमिति वाच्यम्, नासा- दिकतिपयावयवदर्शनादपि घटादिवदवयविनश्वाक्षुपत्वोपपत्तेः । 'यः पुन- र्दर्पणापगमे प्रतिविम्बापगमो नाऽसौ स्वरूपवाध:, दर्पणेऽपि तत्प्रसङ्गात्। ननु 'तत्च्वमसि' वाक्येन जीवरूपः प्रतिविम्वो वाध्यते, यः स्थाणुरसौ पुरुप इंतिवद् वाधायां सामानाधिकरण्यात्, संसार्यविनाशे च मोक्षानुपपत्तेः।
देशके सम्बन्धमात्रका निषेध होता है, इससे [ प्रतिबिम्ब देखनेसे ] उत्पन्न हुई 'यह मेरा ही मुख है' यह प्रत्यभिज्ञा भ्रम कसे हो सकती है? यदि शङ्का हो कि अपने मुखावयव अपनी आँखोंसे नहीं देखे जाते हैं, अतः अपनेको उक्त प्रत्यक्ष प्रत्यभिज्ञा ('मेरा ही यह मुख है' ऐसी चाक्षुष प्रत्यभिज्ञा) कैसे हो सकती है? यह शङ्का भी नहीं कर सकते, क्योंकि नासाके अग्रभाग आदि कुछ अवयवोंके दीख पड़नेपर भी घटादिके समान अवयवीका चाक्षुष प्रत्यक्ष हो सकता है। [तात्पर्य यह है कि चक्षुके साथ विषयका सन्निकर्ष होनेसे ही चाक्षुप प्रत्यक्ष होता है। यद्यपि वह सन्निकर्ष गृह, वृक्ष, घट, पट आदि सब स्थलोंमें एक ओरसे (जो अवयव सामने होगा, उससे) ही होता है, दूसरी ओरका सामनेके अवयवसे आड़ होने या उसके भीतरी अवयवोंके वाह्य अवयवोंसे आच्छन्न होनेसे किसी प्रकार मी नहीं हो सकता है, तथापि गृह, वृक्ष, घट आदि अवयवीका चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है, 'मैं घटादिके सामनेके अवयवोंको देख रहा हूँ' इस प्रकार अवयवोंका चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसे ही प्रकृतमें भी मुखके नासाग्रादि कतिपय अवयवोंके चक्षुःसन्निकर्षसे उत्पन्न प्रत्यक्ष भी अवयवी मुखका ही प्रत्यक्ष कहा जायगा।] और जो दर्पणके हटा देनेपर प्रतिविम्बका चला जाना दीख पड़ता है, वह भी स्वरूप- बाध नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दर्पणमें भी उसका प्रसङ्ग हो जायगा। [ जैसे दर्पणके हटा देनेसे प्रतिबिम्ब नहीं दीखता, परन्तु प्रतिबिम्बके स्वरूपका बाध मानते ही हैं, वैसे ही दर्पणका न दीखना भी तो समान ही है, इससे दर्पणका भी स्वरूपवाध क्यों न माना जाय: पुनः प्रतिविम्ब स्थलमें वाधकी आशङ्का होती है-] 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि वाक्योंसे जीवरूप प्रतिबिम्बका स्वरूपवाध है अर्थात् 'जो स्थाणु है वह पुरुष है' इस
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२२६ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
मैवम्, सोडयं देवदत्त इतिवदैक्यपरत्वेनाऽपि सामानाधिकरण्यसम्भवात्। विरुद्धांशवाधमात्रेण मोक्षोपपत्तेः। कृत्स्नस्य जीवस्य वाधे मोक्षस्याऽ- पुरुपार्थत्वात्। यस्तु मन्यते प्रतिविम्व एव नास्ति दर्पणग्रतिस्फालिता नेत्र- रश्मयः परावृत्य विम्वमेव दर्पणादविविक्तं गृह्लन्तीति। स्पष्ट ग्रत्यङ्मु- वाक्यके समान, यहांपर भी जीवका वाध होनेपर सामानाधिकरण्य होता है; क्योंकि संसारी जीवका विनाश न माननेपर मोक्षकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी * । ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि 'सोऽयं देवदत्तः' (वह यह देवदत है) इस प्रतीतिके समान अभेदके तात्पर्यसे भी सामानाधिकरण्यका सम्भव हो सकता है। विरुद्ध अंशमात्रका वाध होनेसे मोक्षकी संगति हो सकती है। सम्पूर्ण अंशसे जीवका वाध होनेसे मोक्षकी पुरुषार्थता सिद्ध नहीं होगी ।। जो वादी कहते हैं कि प्रतिबिम्ब नामका कोई पदार्थ ही नहीं है, किन्तु दर्पणसे टकराई हुई नेत्रकी किरण लौटकर फिर विम्ब्को ही दर्पणसे अविविक्त विम्न (मुख़) के आकारमें ग्रहण करती हैं, · जैसे 'स्थाणुरयं पुरुष:' इस वाक्यका तात्पर्य होता है कि जिसको आप स्वाणु समझे हुए. हैं, वह स्थाणु नहीं है, वल्कि मनुप्य है, अतः यह कोई नियम नहीं है कि दो पदोंका एक विभक्त्यन्त होना 'नीलो घटः' की भाँति सर्वत्र अभेदका ही बोधन करे। जैसे उपर्युक्त वाक्यमें वाधमें भी एकविभक्त्यन्त होनेसे सामानाधिकरण्य देखा गया है, वैसे ही तत् और त्वम् इस वाक्यका मी 'जिसको तू तू (जीव) समझता है वह तू नहीं है किन्तु वह वह (त्रह्म ) है' इस प्रकार 'जीव' के वाधमें ही तात्पर्य है-इससे सिद्ध है कि जीवरूप प्रतिविम्व वाधित है: यदि अतिबिम्वस्वरूप संसारी जीव वाधित न हो और सत्य माना जाय, तो मुक्ति कैसे होगी? यह तात्पर्य हुआ। + जैसे 'सोडयं देवदत्तः' इस प्रत्यभिज्ञामं तत्पदका अर्थ परोक्ष देवदत्त है और अयं पदका अर्थ प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला देवदत्त है, इसमें प्रत्यक्ष और परोक्ष अंश विरुद्ध हैं, अतः उनका वाध हो जाता है और शुद्ध देवदत्त भासता है, वैसे ही तत् और त्वम् पदमें प्रत्यकृत्व और पराक्त्व विरुद्ध जो अंश हैं उनका जब बाघ होता है तव शुद्ध चैतन्यमें अमेद भासता है, इससे वह जो अपनेको पराक समझता था उसके उस पराक्त्व अंशका वाध होनेपर उसने अपने असली शुद्ध चैतन्य स्वरूपको पाया, इससे उसका मोक्ष पुरुषार्थ बनता है। यदि उसका सर्वात्मना विनाश हो जाता, तो ऐसे पुरुषाथसे वह कोसों भागता अर्थात् उसको पुरुषार्थ ही नहीं समझता, अतः 'तत्त्वमसि' वाक्यमें अमेद ही पर्यवसित होता है। 'स्थाणुः पुरुषः' इस स्थलमें तो स्थाणु और पुरुपका अमेद होना सम्भव ही नहीं है, अतः वाघ होनेपर सामानाधिकरण्य होता है, अमेदमें नहीं। प्रकृतमें तो काल्पनिक भेदके त्यागनेसे शुद्ध चैतन्यमें अभेदका सम्भव है।
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अभ्यासविचार ] भापानुवादसहित ३२७
खत्वाद्यनुभवेनैवाऽसौ निराकरणीयः। कथ तर्हिं सूर्तद्रव्यस्य मुखस्यैकस्य विभिन्नदेशद्वये युगपत् का्त्स्यैन वृत्तिः । दर्पणदेशवृत्तेर्मायाकृतत्वा- दिति न्ूम:। नहि मायायामसम्भावनीयं नाम, स्वशिरश्छेदादिकमापे स्वमे माया दर्शयति। नन्वेवमेव जलमध्येऽधोमुखस्य वृक्षग्रतिविम्बस्य तीरस्थवृक्षेणक्ये सति तीरस्थो वृक्षोऽधिष्ठानम्, तत्र च मायया जलगतत्वमधोमुखत्वं चाडध्यस्तमिति वक्तव्यम्। न चाऽन्राऽथ्यासहेतुरस्ति, अधिष्ठानस्य साकल्येन प्रतीते :; तत्कथमसावध्यासः ? उच्यते-किमत्र वृक्षावरणाभावादध्यासा- उनका तो प्रतिविम्त्रमं प्रत्यङ्मुखत्वादिके अनुभवसे ही निराकरण हो जाता है। [यदि दर्पण और मुखका भेदग्रह नहीं होता, तो बिम्बके विपरीत दिशाकी ओर मुख किये हुए का प्रतिचिम्न्न न दिखाई देता। जिस दिशाको विम्ब है, उसी ओर प्रतिबिम्नका भी रुख दिखाई देना चाहिए, परन्तु इससे विपरीत दिखाई पड़ता है, अतः प्रतिबिम्ब नहीं है, यह नहीं कह सकते। ] अब शक्का करते हैं -- एक ही मुग़रूप मूर्त द्रव्यका भिन्न-भिन्न दो देशोंमें एक साथ और सर्वात्मना रहना कैसे हो सकता है? उत्तर देते हैं कि दर्पणदेशमें विम्ब्का रहना मायासे वन सकता है। मायाके विषयमें कुछ भी असम्भव नहीं कहा जा सकता, क्योंकि माया तो सवममें अपने सिरका छेदन भी दिखा देती है, जिसका जागरमें प्रमाण द्वारा कथमपि सम्भव नहीं है। [उक्त विवेचनसे प्रतिविम्ब विम्व्नसे भिन्न और सत्य सिद्ध हो जाता है, इसको अन्योन्य तादात्म्यरूप अध्यास नहीं कह सकते और अध्यासका कारण अघिष्ठानका अज्ञान भी नहीं हैं, इस आशयसे शक्का करते हैं-]आपके पूर्वोक्त कथनानुसार माननेपर मी तो जलमें नीचे मुँह किये हुए वृक्षके प्रतिबिम्बका तीरमें विद्यमान वृक्षके साथ अन्योन्य तादात्म्य होनेपर भी तीरमें खड़ा हुआ पेड़ अधि- मान है और उसमें जलगतत्व-जलके बीच दिखाई देना-और अधोमुखत्व- नीचेकी ओर टहनियोंको लटकाये हुए मालम पड़ना-ये दोनों अंश मायासे अध्यम्त-आरोपित-हैं, ऐसा ही कहना होगा। परन्तु यहांपर तो अध्यासका .कारण नहीं है, क्योंकि अधिष्ठानभूत तीरस्थ वृक्षके सभी पुरोवर्तित्वादि सामान्य और वृक्षत्व तथा तीरगतत्व आदि अंशोंकी जब प्रत्यक्ष प्रतीति होती है; तत्र कैसे अध्यास हो सकता है? इसपर उत्तर कहा जाता है कि क्या वृक्षमें मायाकृत
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२२८ विवरणप्रमेयसंग्रहं i सूत्र १, वर्णेक १
भाव: किं वा दोषाभावात् उतोपादानाभावात् आहोस्विदध्यासविरोधिनोऽ- घिष्ठानतत्त्वज्ञानस्य सद्भावात् ? नाऽडद्य:, चैतन्यावरणस्यैवाध्यासोपादान- तया जडे पृथगावरणानुपयोगात्। एतेन तृतीयोऽपि निरस्तः । न द्वितीयः, सोपाधिकश्रमेषूपाधेरेव दोषत्वात्। न चतुर्थः, निरुपाधिक-
तर्हि सोपाधिकभ्रमस्य कर्तत्वादेर्नात्मतच्वज्ञानान्निवृत्तिः, किन्त्वहङ्कारो-
आवरण नहीं है, इसलिए अध्यासका अभाव कहते हो? या दोषके न होनेसे? अथवा उपादानके अभावसे? किंवा अध्यासके विरोधी अधिष्ठानके तत्त्वज्ञानके रहनेसे: इनमें पहला पक्ष तो उचित नहीं है, क्योंकि चैतन्यका आवरण ही अध्यासका उपादान माना गया है, इससे अतिरिक्त जड़ पदार्थमें आवरण मानना, किसी उपयोगका नहीं है। इससे तृतीय पक्षका भी खण्डन हो ही गया समझना चाहिए [जब जड़में आवरण माना ही नहीं जाता तब 'आवरणके न होनेसे' कहना व्यर्थ ही है, यह भाव हुआ ]। द्वितीय विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि सोपाधिक म्रमस्थलमें उपाधि ही दोष है। चतुर्थ विकल्प भी उचित नहीं है, क्योंकि निरुपाधिक भ्रमस्थलमें ही अधिष्ठानतत्त्वज्ञान भ्रमका विरोधी माना गया है * । शङ्का-तब तो सोपाधिक कर्तृत्वादिरूप भ्रम आत्मज्ञानसे निवृत्त नहीं होगा, किन्तु अहङ्काररूप उपाधिका विनाश होनेसे ही निवृत्त होगा।
85 अधिष्ठानके तत्त्वज्ञानसे निरुपाधिक भ्रम शुक्तिरजत अथवा रज्जुसर्प आदि अध्यास नहीं होने पाते या ज्ञानसे पूर्व हुए भी तो अधिष्टानका तत्त्वज्ञान होनेपर निधृत्त हो जाते हैं। परन्तु रोपाधिक अरममें यह नियम नहीं है, उसमें तो तत्त्वज्ञान और अध्यास दोनों एक कालमें रह सकते हैं। जैसे पित्तरोगसे दूषित रसनेद्रिय पुरुषको मिश्रीका नीम जसे कडवा लगना या विलक्षण प्रकारसे अङुलीके द्वारा निपीडित नेत्रसे दो चन्द्रमा देखना उक्त मिश्रीके तिक्तरसास्वाद तथा द्विचन्द्रद्शनसे 'मिश्री मधुर होती है' या 'चन्द्रमा एक है' इस ज्ञानमें कोई वाधा नहीं आती और न मिश्रीके माधुर्यज्ञान तथा एक चन्द्रज्ञानसे अध्यासमें ही कोई वाघा भती है। उसकी निवृत्ति तो केवल उपाधिकी निवृत्तिसे ही होती है, इससे विषयमें भी फलतः आवरण होना अध्यासका कारण माना गया है। प्रकृतमें तो वृक्षादि विपय फलतः भी आवृत नहीं हैं फिर कैसे अध्यास होगा' यह शङ्का भी दूर हो गई, क्योंकि फलतः आवरण मी विषयज्ञानका प्रतिवन्धक है, जो कि निरुपाधिक भ्रममें ही उपयोगी है। यहांपर तो सोपाधिक भ्रम है, अतः फलतः आवरणकी भी आवश्यकता नहीं है। यह भ्रमके अधिष्ठानभूत वृक्षादिके ज्ञानसे निवृत्त होनेवाला नहीं है, यह तो तभी निवृत्त होगा जब जलरूप उपाधिका शोपण होगा।
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अंध्यासविचार ] भापानुवादसहित २२९
पाध्यपगमादिति चेद, वाढम्; पारमार्थिकदर्पणाछ्ुपाधेस्तत्कृतभ्रमस्य च
ज्ञानान्निवृत्तौ कर्तत्वादेर्ज्ञानान्निवृत्तिरर्थात् सिध्यति। ननु कर्थ ते तच्वज्ञानम्। जीवो नाऽडत्मतादात्म्यं जानाति, प्रतिबिम्ब- त्वाद्, दर्पणगतग्रतिविम्बवदिति चेद्, न; अचेतनत्वस्योपाधित्वात्। यस्तु लौकायतः शरीरस्यै चैतन्यं मन्यते तं ग्रति दर्पणगतजाड्येन प्रतिवद्धत्वात् प्रतिविम्बस्याऽचेतनत्वं सुसम्पादम्। चेतनत्वे तु विम्ब्रचेष्टया
उत्तर-ठीक है, पारमार्थिक दर्पण आदि उपाधि अथवा उस उपाधिसे जनित भ्रमकी निवृत्ति यद्यपि तत्त्वज्ञानसे नहीं होती, तो भी अज्ञानजनित अह- काररूप उपाधि जो कि निरुपाधिक श्रम है, उसकी जब आत्मतत्वज्ञानसे निवृत्ति हो जाती है, तब इस अहक्काररूप उपाधिके निवृत्त हो जानेपर ज्ञानसे कर्तृत्व'दि निवृत्त हो जाते हैं, यह अर्थात् सिद्ध हो जाता है। [ यदि जीव प्रतिविम्त्र है, तो जैसे दर्पणगत भुखप्रतिबिम्न ज्ञानशून्य होता है, वैसे ही जीव भी ज्ञानशून्य होगा, इस अभिप्रायसे शक्का करते हैं-] तुमको तत्त्वज्ञान होगा कैसे? क्योंकि जीव आत्माके साथ अपना अभेद नहीं 1
जान सकता, कारण कि वह प्रतिविम्न्न है, दर्पणमें प्राप्त प्रतिविम्बके समान। [जैसे दर्पणस्थ प्रतिबिम्न विम्बके साथ अभेदका ग्रहण नहीं कर सकता, वैसे ही जीव भी प्रतिविम्धवादमें नह्मके साथ अभेद ग्रहण नहीं करेगा। ] ऐसी शक्का नहीं हो सकती, क्योंकि उक्त अनुमानमें अचेतनत्व उपाधि है। [अर्थात् दर्पणादिगत मुखादि प्रतिविम्न अचेतन है, उसका विम्बभूत ग्रीवास्थ मुखादि अचेतन नहीं है और विम्बभूत आत्मा तो चेतन है, अतः अहंकारगत प्रतिबिम्बभूत जीव चेतन है।] जो लौकायतिक (नास्तिक) शरीरको ही चेतन मानता है उसके मतमें शरीर या ग्रीवास्थ मुखके चेतन होनेसे उक्त अचेतनत्व उपाधि नहीं वनेगी, ऐसी शक्का नही करनी चाहिए, क्योंकि उसके मतमें दर्पणकी जड़तासे चैतन्यके प्रतिबद्ध होनेसे प्रतिविम्ब्नका अचेतन होना सरलतासे प्रतिपादित हो सकता है। [ जैसे दर्पणकी मलिनतासे विम्त्रगत स्वच्छता रुक जाती है-प्रतिविम्बित नहीं होती, वैसे ही उपाधिके जड़ांशसे बिम्बका चैतन्यांश भी प्रतिबिम्बितहोनेसे रुक जाता है, यह भाव है। ] प्रतिबिम्बको चेतन माननेपर तो विम्वकी चेष्टाके बिना भी उसमें
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२३० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ₹
विनाऽपि स्वयं चेष्टेत। जीवस्य तु प्रतिविम्वत्वेऽपि नोपाधिजाड्येन प्रति- बन्ध इत्यनुभवात् सिद्धम्। यद्यपि लोके विम्बभूतस्यैव देवदत्तस्य भ्रम- निवर्तकतच्वज्ञानाश्रयत्वं दष्ट तथापि न तत्र विम्बत्वं प्रयोजकम्, किन्तु भ्रमाश्रयत्वम् । जीवश्च भ्रमाश्रयः। अविद्यायाश्चिन्मात्राश्रयत्वेऽपि जीव- पक्षपातित्वेन भ्रमोत्पादनाद्। ननु ब्रह्म स्वस्य जीवैक्यं न जानाति चेत्, असर्वज्ञं स्याद्, जानाति स्वयं चेष्टा होनी चाहिए, परन्तु बिम्बमें चेष्टा हुए बिना प्रतिविम्बमें चेष्टा नहीं पाई जाती। जीवका चैतन्य तो प्रतिविम्ब होनेपर भी उपाधिगत जड़तासे नहीं रुकता यह प्रत्यक्ष अनुभवसे सिद्ध है। [क्योंकि सभी प्रतिविम्वस्वरूप जीवको चेतन मानते हैं।] यद्यपि लोकमें बिम्बभूत देवदत्त ही अ्रमनिवर्तक तत्त्वज्ञानका आश्रय देखा गया है, दर्पणाद्युपाधिगत प्रतिबिम्ब नहीं, तथापि उसमें विम्ब होना प्रयोजक नहीं है [ देवदत्त विम्बभूत है, एतावता उसको तत्त्वज्ञान 'होता है, ऐसा कार्यकारणभाव नहीं है, जिससे 'बिम्बभूत आत्माको ही भ्रमका विरोधी तत्वज्ञान होगा' ऐसी शङ्का करनेका अवसर आवे ], किन्तु भ्रमका आश्रय होना इसमें कारण है। [ लोकमें यही नियम है कि जिसको भ्रमज्ञान हुआ सम्यकूज्ञान (तत्त्वज्ञान) से उसके ही भ्रमकी निवृत्ति होती है, अर्थात् भ्रमाश्रयगत तत्त्वज्ञानको तद्गत भ्रमनिवर्तकत्व है, इससे भ्रमाश्रयत्वके साथ कार्यकारणभाव है, बिम्बत्वके साथ नहीं। ] और जीव भ्रमका आश्रय है। यद्यपि •अविद्या चित्का ही * आश्रयण करती है, तथापि जीवमें ही उसका पक्षपात + होनेसे उसीमें भ्रमका उत्पादन करती है। यदि शक्का हो कि ब्रह्म जीवके साथ यदि अपना ऐक्य-अभेद-नहीं जानता
- आत्मा ही अविद्याका आश्रय है, इसका विशेषरूपसे विवेचन हो चुका है। संक्षेप- शारीरककार भी लिस्ते हैं :-
निर्विभागचितिरेव केवला' इत्यादि। १३१९। + पक्षपातका निरूपण भी पहले कर चुके हैं। यहांपर पक्षपातका अर्थ अतिशयकारित्व है, उपाधि अपनेमें रहनेवाले मालिन्यादि दोषोंका प्रतिविम्बमें ही अर्पण कर सकती है, बिम्वमें नहीं। एवम् अविदया भी भ्रमाथरयत्वका अतिशय प्रतििम्वस्थानीय जीनमें ही करती है, शुद्ध चिद्ूप न्रह्ममं नहीं।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २३१
चेज्जीवगतं भ्रमं स्व्गतत्वेन पश्येदिति चेद्, न; स्वमुखतत्प्रतिविम्वयोरैक्यं जानताऽपि देवदत्तेन स्व्मुखे प्रतिविम्बगताल्पत्वमलिनत्वाद्यदर्शनाद्। न च जीवस्य प्रतिविम्वत्वे मानाभावः, श्रुतिस्मृतिसूत्रेभ्यस्तत्सिद्धेः। 'रूपं रूपं प्रतिरूपो वभृव' इति क्षुतिः। 'एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रचत्' इति स्मृतिः । 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' इति सनन्नम्। न चाऽमूर्तस्य त्रह्मणः प्रतिविम्नासम्भनः। अमूर्तस्याप्याकाशस्य स्वाथिताभ्रनक्षत्रादिविशिष्टस्य जले प्रतिविम्बभावदर्शनात्। जलान्तराकाशोड- भ्रादिग्रतिविम्वाधार इति चेद्, न; जानुमात्रेऽपि जले दरविशाला- काशदर्शनाद्।
है, तो वह असर्वज्ञ हो जायगा और यदि जीवके साथ अपना अभेद जानता है, तो जीवके भ्रमको मीं अपना ही भ्रम समझने लगेगा ? तो यह शक्का युक्त नहीं है, क्योंकि अपने मुखको और उसके साथ प्रतिविम्बके ऐक्यको जानता हुआ भी देवदत्त अपने मुखमें प्रतिविम्त्रगत अल्पत्व और मलिनत्व आदिको नहीं समझना। और जीवको प्रतिविम्बरूप माननेमें कोई प्रमाण ही नहीं है, यह मी नहीं कह सकते, क्योंकि श्रति, स्मृति तथा वेदान्तसूत्रोंसे उसकी सिद्धि होती है। 'रूपं रूपं' (वह प्रतिशरीर प्रतिबिम्धरूपमें हो गया) ऐसी श्रुति है, 'पकवा०' (स्वयं एक ही है तो भी जलमें चन्द्रादिकी भाँति वह नाना प्रकारका मानम होता है) ऐसी स्मृति है और 'अत एव चोपमा० (३।२।१८ न्र० सृ.) (आत्मा चतन्यरूप निर्विशेष हे उपाधिवश ही उसमें विशेषका दर्शन होता है, अतएव उसके नानाभावगें सूर्यककी-जलादिप्नतिविम्बकी-उपमा दी गई है) ऐसा सूत्र है। यदि शक्का हो कि अमूर्तभूत न्रमयपदार्थका प्रतिविम्ब कैसे हो सकता है? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अमूर्त आकाशका भी अपनेमें आश्रित मेघ, तारा आदिके सहित जलमें प्रतिबिम्ब देखा जाता है। [ यद्यपि मेध और नक्षत्रोंके सहित आकाश जलमें नहीं है, तथापि जलमें वह इनसे विशिष्ट दीख़ पड़ता है, अतः वाहर (ऊपर) विद्यमान आकाशका वह प्रतिबिम्ब ही है, इस अभिप्रायको व्यक्त करनेके लिए 'स्वाश्रिताग्रनक्षत्रादिविशिष्टस्य' यह विशेपण दिया है। ] जलके मीतर विद्यमान आकाश ी अम्र, नक्षत्र आदि प्रतिविम्बका
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२३२ विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
जीवो घटाकाशचदुपाध्यचच्छिन्नो न प्रतिविम्ब इति चेन्, न; तथा सति जीवोपाधिमध्ये ब्रह्मणोऽपि सच्चे चैतन्यं [कथ] तत्र द्विगुणं स्यात्, न चैवमाकाशस्य घटे द्वैगुण्यं दृष्टम्। न्रह्मणः तत्राऽसच्वे च सर्वगतत्वसर्वनियन्त- त्वादिहानिः । उभयानुगतचिदाकारस्यैव सर्वगतत्वसर्वनियन्तृत्वादि न ब्रह्मणीति चेद्, न; 'य आत्मानमन्तरो यमयति' इति श्रुत्या प्रकरणलभ्यस्य ब्रह्मण एव जीवमध्ये नियन्तृत्वेनाऽवस्थानश्रवणात्। अतः सर्वत्र शास्त्रे
अधिकरण है, ऐसी भी शङ्का ठीक नहीं है, क्योंकि 'जानुपर्यन्त-घुटने प्रमाण- वाले-जलमें ही अर्थात् थोड़े जलमें दूर और वड़ा आकाश़ दीख पड़ता है। यदि जलाकाश ही तादृश प्रतिविम्धयुक्त दीख पड़ता, तो कम गहरे जलमें जलके परिमाणानुसार ही आकाश भी दीख पड़ता। अवच्छेदवादी प्रतिविम्बवादका खण्डन करते हैं-जीवको घटाकाशके तुल्य उपाध्यवच्छिन्न ही मानना चाहिए, प्रतिविम्न नहीं, यह पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर जीवोपाधिके मध्यमें ब्रह्मके मी रहनेसे उसमें द्विगुण चैतन्य कैसे होगा क्योंकि अवच्छेद्वादमें आकाशका घटरूप उपाधिमें द्विगुण होना देखा नहीं गया है। यदि ब्रह्मकी जीवावच्छेद उपाधिमें सत्ता न मानो, तो ब्रह्का सर्वव्यापकत्व तथा सकलनियामकत्व उपपन्न नहीं हो सकेगा [यदि आप घटाकाशदष्टान्तसे जीवको भी अवच्छिन्न मानते हो, तो जैसे घटमें अवच्छिन्न आकाशकी ही वृत्ति है, उसमें अनवच्छिन्न आकाशकी वृत्ति नहीं देखी जाती, वैसे ही दार्टान्तिकमें नहीं है, क्योंकि दार्ष्टान्तिमें तो चेतनकी दो वृत्तियाँ है- एक तो अवच्छिन्न जीवकी वृत्ति है और द्वितीय अन्तर्यामीकी है, यह द्विगुणित चैतन्यकी वृत्ति प्रतिविम्धपक्षमें ही वन सकती है, उपाधिमें द्विगुणित चैतन्यकी वृत्तिके न माननेसे ब्रह्मकी सर्वान्तर्यामितासे विरोध होगा, अतः अवच्छेदवादमें दार्धान्तिकमें वैषम्य आता है]। दोनोंमें-उपाध्यन्तर्गत अवच्छिन्न जीव और उपाधिके वाहर अवस्थित ब्रह्ममें-अनुगत चिदाकारमात्रमें ही सर्व- गतत्व और सर्वनियन्तृत्व आदि हैं-वाहर अवस्थित त्रह्ममें नहीं' ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि 'य आत्मानमन्तरो०' (जो जीवको अन्तः प्रविष्ट होकर यमन-शुभाऽशुंभ कर्म तथा तत्-तत फलोंमं नियमन-करता है) इत्यादि श्रुतिसे प्रकरणप्राप्त ?ै नीनमें नियन्ता होकर रहना सुना जाता
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. अध्यासविचार] भापानुचादसहित २३३
घटाकाशदष्टान्तोऽसङ्गत्वसाधको न जीवत्वसाधकः। प्रतिविन्वपक्षे तु द्विगुणीकृत्य वृत्तिर्न दोपाय, जलमध्ये स्वाभाविकजानुमात्राका- शस्य प्रतिविम्नितविशालाकाशस्य च वृत्तेः । तस्मादहङ्कारोपाधिकृतो न्रह्मप्रतिविम्बो जीव:। यद्यप्यज्ञानं जीवावच्छेदोपाधिरिति पुरस्तादुक्तम्, तथाऽपि सुपुपावज्ञान- मात्रावच्छिन्नस्य जीवस्य स्व्प्नदशायामीपत्स्पष्टव्यवहारायाऽन्त:करणसुपाधि- रिष्यते तथा जागरणे विस्पष्टव्यवहाराय स्थूलशरीरसुपाधि: । है। इसलिए शास्त्रोंमें सर्वत्र घटाकाशदष्टान्त ब्रह्मके असङ्त्त्वका-निर्ले- पत्वका-ही साधक है, जीवत्वका साधक नहीं है अर्थात् घटाकाश- दष्टान्तसे अवच्छेदवादकी सिद्धि नहीं हो सकती। प्रतिविम्वपक्षमें तो चैतन्यकी द्विगुणित वृत्तिके होनेमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि जलके अन्दर स्व- भावतः रहनेवाले घुटनेतकके आकाशकी और दूसरी जलमें प्रतिविम्धित महाकाशकी वृत्ति देखी जाती है। [अतः प्रतिविम्बपक्षमें द्विगुणित वृत्तिका दष्टान्त मिलता है, अवच्छेदवादमें नहीं मिलता। ] इसलिए अहक्काररूप उपाधि द्वारा कृत ब्रह्मका प्रतिविम्ब ही जीव है। यद्यपि पहले अज्ञान ही जीवावच्छेदरूप उपाधि [अर्थात् जिस उपाधिके लगनेसे ब्रह्मका जीवरूपसे भिन्न व्यपदेश होता है, वह उपाधि ] माना गया है, तथापि सुपुप्िमें केवल अज्ञानसे अवच्छिन्न जीवका स्वप्न अवस्थामें कुछ थोड़ा स्पष्ट व्यवहार हो, इसलिए जैसे वहाँ अन्तःकरणको उपाधि मानते हैं, वैसे ही जागर अवस्थामें अत्यन्त स्पष्ट व्यवहारके लिए स्थूल शरीर भी उपाधि माना जाता है ।* * चैतन्यमात्रैकरस जिसका श्रुतियाँ 'प्रपशोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम्०' इत्यादि प्रकारसे वर्णन करती हैं और जो किसी प्रकार भी विकल्पको प्राप्त नहीं होता, वही अज्ञानमात्र उपाधिसे सुधुप्तिदशामें आनन्दमय होनेसे आनन्दभुक कहलाता है, बहुत कम परन्तु कुछ विकल्पके योग्य हो जाता है, जिसका सुप्तोस्थित पुरुप 'सुखमहमत्राप्सम्' (में सुखसे सोया) इस प्रकार परामर्श करता है, यह विकल्प भी परम सूक्ष्म है, क्योंकि इसका कारणीभूत अज्ञानरूप उपाधि स्वयं अतिसूक्ष्म है। इस अवस्थाका श्रुतियोंमें 'यत्र सुप्रो न कश्वन, काम कामयते न कश्वन स्वप्नं पश्यति तत् सुपुप्तम्' इस प्रकार वर्णन किया गया है। यहांपर अज्ञानमान्रमें खाम्याभिमानी प्राक्ञ कहलाता है। इसके अनन्तर खप्नावस्थामें पूर्वावस्थासे कुछ स्थूल व्यवहारका भागी होनेके लिए अज्ञानरूप उपाधिसे युक्त ही अतिरिक अन्तःकरणरूप उपाधिसे युक्त होता है, जिसके कारणं रूप उपाधिमें ही जागरके ३0
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२३४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, चर्णक १
रेणावच्छेदात्। नन्व्य जीवावच्छेदः किं भ्रमगत उत चैतन्यगतः १ आद्ये.सुपुपि- सूच्छादौ स न स्यात्। तत्र ्रमाभावात्। ततश्चाऽविद्यायास्तत्कार्यमूर्च्छा- दवस्थानां च जीवपक्षपातित्वं न स्यात्। द्वितीयेऽपि तस्य कार्यत्वे सुपुप्यादावभावात् स एव दोप:। अकार्यत्वे चाविद्याऽधीनत्वं न स्यात्। इस प्रकार यह भी नहीं कह सकते कि उपाधिभेदसे जीवभेदका प्रसङ्ग हो जायगा अर्थात् सुप्ति, स्वम् और जागर तीनों अवस्थाओंमें जीव भिन्न-भिन्न होंगे, क्योंकि पूर्व-पूर्व उपाधिसे अवच्छिन्नका ही उत्तर-उत्तर उपाधिसे अवच्छेद हो जाता है। [उपाधिके भेदसे उपघेयका वास्तव भेद वहींपर होता है जहाँपर पूर्व-पूर्व उपाधिका संसर्ग उत्तरोत्तर उपाधिमें न हो; जैसे एक ही जल पदार्थ गोल थालीमें रखनेसे गोलाकार हो जाता है, चौकोनी थालीमें चौकोना हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें अज्ञानोपाधिकका ही उत्तरोत्तर उपाधि लगनेसे' उत्तरोत्तर भिन्न-भिन्न व्यपदेश होता है, इससे जीवभेद होनेकी आशङ्का नहीं हो सकती, यह भाव है। ] अव शङ्का होती है कि यह जीवाऽवच्छेद-ब्रह्मका जीवव्यपदेशरूपी भेद-भ्रमगत-श्रमाधीनहै? या चैतन्यगत-चैतन्याघीन-है? इनमें पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि सुपुप्ति या मूर्च्छा दशामें जीवका अभाव प्रसक्त हो जायगा, कारण कि इन अवस्थाओंमें भरम नहीं रहता है। [ यदि भ्रम ही नहीं रहा, तो उसके अधीन होनेवाला जीवविभाग भी कैसे रह सकता है? ] द्वितीय पक्षके माननेमें भी उस जीवविभागको कार्य माननेसे सुपुप्िमें उसके न होनेसे वही पूर्वोक्त दोष होगा। [सुपुप्तिमें कार्यमात्रका विनाश हो जानेसे सुतरां जीवरूप कार्य भी नहीं रहता, यह भाव है।] और यदि यह जीवमेद कार्य न माना जाय, तो वह अविद्याके अधीन नहीं होगा। समान सम्पूर्ण व्यवहार करता है। इस उपाधिका खाम्याभिमानी तैजस कहा गया है, इसका श्रुति इस प्रकार वर्णन करती है-'स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सत्ताज्न एकोनविशतिमुखः प्रविविक्भुक्तजसो द्वितीयः पादः' इति। तदनन्तर वाहर भी प्रकट स्थूल व्यवहारके लिए अज्ञान और अन्तःकरण दोनों उपाधियोंसे युक्त ही जागर अवस्थामें स्थूल देह उपाधि होता है और विश्व संज्ञाको प्राप्त होता है, ध्रुति कहती है-'आगरितस्थानो वहिःप्रज्ञः सताङ एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग् वैश्ानय:' इसका स्थूल देहमें स्वाम्याभिमान रहता है।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २३५
उच्यते-जागरणस्वपयो: स्थूलसक्ष्मशरीरक्रतो जीवावच्छेदो भ्रमरूप- त्वादविद्याकार्यः। सुपस्यादौ तु चैतन्यगतो जीवावच्छेदोऽनादिरप्यात्मा- विद्ययो: सम्बन्ध इवाऽविद्याधीनो भविष्यति। यद्यपि सम्बन्ध इवाजवच्छेदो
इस शङ्काका समाधान करते हैं-जागरण तथा स्वम अवस्थाओंमें क्रमशः स्थूल और सूक्ष्म शरीरके द्वारा प्राप्त जीवरूप विभाग अ्रमात्मक होनेसे अविद्याका कार्य है। सुपुप्ति आदिमें यद्यपि चतन्यगत जीवावच्छेद है और वह अनादि है, तो भी आत्मा और अविद्याके सम्बन्धके समान अविद्याके अधीन होगा। [ यद्यपि अविद्या स्वतन्त्र होकर सम्बन्धकी उपादान नहीं हो सकती, क्योंकि जैसे मृदादि उपादान घटादिसे पृथक् स्वतन्त्र रहते नहीं दिखाई देते हैं, वैसे ही अविद्या चित्सम्बन्धके बिना पृथक नहीं रहती, तथापि सम्बन्धका निमित्त अवश्य है। अनुयोगिप्रतियोगिनिष्ठ भेद उनसे ही निरूपित होता है, अतः यह जीवन्नह्मका भेद उनके ही अधीन होना चाहिए। अविद्याश्रय कैसे ? इस आशकाका समाधान करते हैं-यद्यपि इत्यादिसे ] यद्यपि अविद्या और त्रह्मके सम्बन्धकी तरह अवच्छेद-जीवन्रह्मविभाग-अविद्याश्रित नहीं है, तथापि अविद्याविशिष्ट चैतन्यके आश्रित होनेसे अविद्याके अधीन मान लेना भी चिरुद्ध नहीं है। [विशिष्टाश्रित धर्म विशेषणाश्रित माना जाता है, यह भाव है। इसीमें दष्ठान्त देते हैं-]जैसे दर्पण विशिष्ट मुखके आश्रित-अधीन- चिम्नप्रतिविम्बमेद दर्पणके अधीन है वैसे ही यहाँ पर भी समझना चाहिए।
गहां पर हमारी आदर्श प्रतिमें निम्नलिखित अधिक पाठ है। पर वह ठीक नहीं जंचता। मूल पुस्तकका पाठ निकाल देना हमें पसन्द नहीं है, इसलिए उसको टिप्पणीमें देते हैं-सम्पादक। 'अनिर्वचनीयसंस्कार उपाधिन भ्रान्तिजन्य इति नियमोऽस्ति। तदेवं चैतन्यैकरसोSनिदंरुपोSS प्यात्मा स्वात्मन्यध्यस्तेऽह्कारे प्रतिविम्वितो जीवावच्छेदस्याSविद्याधीनत्वात्तत्सम्वन्धवदुपपद्यते।' अनिर्वचनीय (मिथ्या) संस्कार (सूक्ष्म शरीरका संस्कार) जिसमें है, ऐसी अविद्या जीवकी उपाधि है, भ्रान्तिजन्य (स्थूल-सक्ष्म शरीर) उपाधि नहीं है। ऐसा होनेपर यहं निप्कर्ष निकला कि चैतन्यैकरूप इदमाकार प्रतीतिका अविपय आत्माका अपने में अञ्यस्त अहंकारमें प्रतिविम्ब अविद्या सम्बन्धके समान अनादि है, क्योंकि जीवमेद अविद्याके अधीन है। प्रकृतिमं भी अविद्याविशिष्ट हाके अधीन जीवावच्छेदमं (ब्रह्मजीवविभागमें) सम्वन्धकी तरह अविद्यानिमित्तकत्व उपपत्तियुक्त ही है। + 'जीव इशो विशुद्धा चित् तथा जीवेशयोर्भिदा। अविद्यातचितोर्योगः पडस्माकमनादयः ।।' जीव १ ईश १ तथा शुद्ध चैतन्य३-का मेद ४ अविद्या ५ एवम् अवि्ी
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२३६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्रे १, वर्णक १
नतु भवद्दि: प्रतिविम्वस्याऽवस्तुत्वाभ्युपगमान्न जीवस्य प्रतिविम्ब- तेति चेद् ? मैवम्; नहि वयं प्रतिविम्बस्वरूपभूतस्य मुखस्य चैतन्यस्य वा मिथ्यात्वं ब्रूम: किं त्हि ! प्रतिविम्वत्वस्य धर्मस्य तदापादकमेद- विपर्यासादेश्च मिथ्यात्वं ब्रूमः । ग्रतिविम्वस्य प्रत्यभिज्ञया तत्त्वमसि- वाक्येन च सत्यविम्वात्मतामवादिष्म। ग्रतिविम्वत्वधर्मस्य मिथ्यात्वेऽ- पि धर्मो वध्यते मुच्यते चेति न वन्धमोक्षयोरसंभवो नाऽपि तयोर्त्रह्मणि विम्वप्रसङ्ग: ।
ध्यास उपाधिशून्यः कथं सिध्येत्: रज्जुसर्पवदिति त्रूमः । अथ तत्र आप प्रतिविम्बको अवस्तु मानते हैं, इसलिए जीव प्रतिविम्त् नहीं माना जा सकता? यह शक्का भी ठीक नहीं है, क्योंकि हम (वेदान्ती) प्रतिबिम्बके स्वरूपभूत मुख या चैतन्यको मिथ्या नहीं कहते हैं, किन्तु प्रति- बिम्बत्व धर्मको और उसके प्रयोजक भेदको (ब्रह्मजीवभेदको या विम्तप्रतिविम्न्न- मेदको) अथवा विपर्यासको ही मिथ्या-अवस्तुभूत-कहते हैं। इससे स्वरूप- भूत मुख या चेतनका कुछ नहीं विगड़ता और प्रतिविम्बकी प्रत्यभिज्ञासे या 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे विम्ब और प्रतिविम्बका स्वरूप सत्य कहा गया है। [ यहांपर शङ्का होती है कि प्रतिविम्धका स्वरूपभूत विम्त्र कैसे है? उसका समाधान करते हैं कि जैसे मुखादिके प्रतिविम्बस्थलमें उत्पन्न हुई 'यह प्रतिविम्ब मेरा ही मुख है' इस प्रत्यभिज्ञासे उसकी विम्ब (सत्यमुख) स्वरूपता सिद्ध होती है, वैसे ही ब्रह्मके जीवादि प्रतिविम्वस्थलमें ऊपर उक्त श्रुतिवाक्योंसे जीवरूप प्रतिबिम्बकी ब्रह्मस्वरूपता सिद्ध होती है। बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था करते हैं-] प्रति- बिम्बत्व धर्मके मिथ्या होनेपर भी धर्मीको वन्धन होगा और उसीको मोक्ष होगा, धर्मी चेतन तो वस्तुभूत है, इससे बन्ध और मोक्षका असम्भव दोष भी नहीं आ सकता और बिम्बभूत ब्रह्ममें उनका प्रसङ्ग भी नहीं आ सकता। इस प्रकार अहक्कारादि उपाधिके कारण विम्वप्रतिविम्नभेदरूप अध्यास यद्यपि सिद्ध हुआ, तो भी उपाधिसे रहित अहङ्कारादि अध्यास किस प्रकार सिद्ध होगा ? यदि ऐसी शङ्का करो, तो हम कहेंगे कि रज्जुमें भ्रमात्मक सर्परूप अध्यासके और चैतन्यका सम्बन्ध ६ ये छः पदार्थ हम वेदान्तियोंके मतमें अनादि हैं, तथापि इनमें चित्को छोबकर शेष पांचोंको अविद्याधीन और ज्ञाननिवर्त्य मानते हैं।
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अध्यास विचार ] भांपानुवांदसहित २३७
स्वतन्त्रपदार्थोपाध्यभावेऽपि सर्पसंस्कारमात्रमुपाधिस्तंर्हि प्रकृतेऽप्यहङ्कार- संस्कार: कुतो नोपाधि: ? नहि प्रमाणजन्यः संस्कार उपाधिर्न भ्रान्तिजन्य इति नियमोऽस्ति। तदेवं चैतन्यैकरसोऽनिदरूपोऽप्यात्मा स्वात्मन्य- व्यस्तेऽहङ्कारे प्रतिविम्त्रतोऽहंव्यवहारयोग्यः सन् अहमित्येतस्मिन् अत्ययेऽ-
सम्भवत्येव तत्राऽध्यासः ।
समान अहक्कारादि अध्यासकी सिद्धि होगी। यदि कहो कि यद्यपि रज्जुसर्पस्थलमें कोई स्वतन्त्ररूपसे पदार्थान्तर उपाधि नहीं है, तो भी वहाँपर सर्पसंस्कारमात्र ही उपाधिं है ? फिर प्रकृतमें भी अहक्कारसंस्कार उपाधि क्यों न मान ली जाय ? क्योंकि 'प्रमाणजन्य संस्कार ही उपाधि हो सकता है, भमसे उत्पन्न संस्कार उपाधि नहीं हो सकता', ऐसा कोई नियम नहीं है [ जिससे कि चक्षुरादिग्रमाणजन्य सर्पसंस्कार उपाधि माना जाय और * ्रमजन्य अहक्कारसंस्कार उपाधि न माना जाय ]। इस पूर्व कथित विवेचनके अनुसार चैतन्यैकरस अनिदंरूप आत्मा भी अपनेमें अध्यस्त अहक्कारमें प्रतििम्नित होकर 'अहम्' व्यवहारके योग्य होता हुआ 'अहम्' इस प्रतीतिमें अध्यस्यमान अहङ्कारके अमेदसे प्रतीत होकर 'अहं' प्रतीतिका विपय होता है, इस प्रकार उपचार किया जाता है, अतः अहक्कारादिस्थलमें अध्यासकी उपपत्ति हो सकती है [ पिण्डाण्ड या त्रह्माण्डकी अत्यक्तावस्थामें माया (अविद्या) जो मूल कारण है, वह ब्रह्ममें विलीन हो जाती है। ब्रह्म सिसक्षावश ज्यों ही उस अविद्याके उन्मुख हुआ कि दोनोंके अति स्वच्छ पदार्थ होनेसे उनमें परस्पर प्रतिविम्बग्राहित्व आ जाता है। अविद्याकी सत्ता न्रह्म साम्मुख्यके बिना है ही नहीं और साम्मुख्य होते ही परस्पर प्रतिविम्नित होनेसे दोनोंका सम्पुट हो जाता है, यही (त्रह्मप्रतिविम्वविशिष्ट अविद्याप्रतिविम्न ही) स्वात्मामें अध्यस्त अहक्कार कहा गया है। सम्पुटके अविद्यामें परिवर्तनसे ही आध्यासिक अहंप्रतीति वन जाती है, जिससे निरञ्जन आत्माको भी अहंग्रतीतिका विषय होना पड़ता है, यह भाव है ]।
- पूर्व-पूर्व भ्रमजन्य संस्कार उत्तरोत्तर भ्रमका कारण होता है, इंस प्रंकार अनादिसिद्ध परम्परासे अन्योन्याश्रय या अनवस्था दोप नहीं आता।
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२३८ चिचरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
ननु न तावननिर्विकल्पकतयाऽवभासमाने चैतन्ये सविकल्पकाहङ्का- रादध्यास: सम्भवति; तथाविधस्याऽद्ष्टचरत्वात्। नाऽपि प्रमातृत्वादिविकल्प- विशिष्टतयाऽवभासमाने तत्सम्भवः प्रमातत्वादेरहङ्गारपूर्वकत्वात्। न च पूर्वपूर्वाहङ्कारकृतप्रमातत्वादिसंस्कारेण चैतन्यस्य सविकल्पकत्वम्, प्रमातृप्र- माणादिव्यवहारस्य सर्वेणाऽपि चादिना दुरुपपादत्वाद्। तथाहि- वेदान्तिसांख्ययोमेते किमहङ्कारः प्रमाता उतात्मा १ नाऽडद्य:, तस् जड़त्वात्। द्वितीयेऽपि प्रमाणाख्यक्रियारूपेण परिणामित्वं प्रमातृत्वम्, तच्चाS- विकारिण्यात्मनि दुःसम्पादम्। अन्तरेणैव प्रमातृत्वं चैतन्येन विषयप्रकाशे तस्य सर्वगतत्वेन सर्वं युगपत् प्रकाशेतेति प्रतिकर्मव्यवस्था न सिध्येद्। [ लोकमें रज्जुसर्पस्थलमें 'सर्पः' इत्याकारक सविकल्पक अध्यास है, उसका अिष्ठान भी रज्जु सविकल्पक ही है, एवं सविकल्पक अध्यास सविकल्पक अधिष्ठानमें ही देखा गया है, निर्विकल्पकमें नहीं। ] आत्मा तो निर्विकल्परूपसे भासित होनेवाला चैतन्य है, अतः उसमें सविकल्पक अहङ्कारका अध्यास कैसे हो सकेगा, क्योंकि ऐसा कहीं नहीं देखा गया है। प्रमातृत्व * आदि धर्म विशिष्ट होकर भासनेवाले आत्मामें भी उस अहक्काराध्यासका सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रमातृत्व आदि धर्म भी तो अहक्कारमूलक ही हैं। [ अहक्काररूप अध्यासके बिना असंग आत्मामें प्रमातृत्व नहीं बन-सकता, अतः उत्तर कालमें सिद्ध होनेवाला पदार्थ पूर्वकालमें रहनेवालेका अधिष्ठान नहीं हो सकता। ] पूर्व-पूर्व अहङ्कारजनित प्रमातृत्व आदि संस्कारसे चतन्यका सविकल्पक होना भी नहीं वन सकता, क्योंकि कोई भी वादी प्रमातृ, प्रमाण आदि व्यवहारकी उपपत्ति नहीं कर सकते। अनुपपत्तिको दिखलाते हैं-वेदान्त या सांख्य वादियोंके मतमें क्या प्रमाता अहक्कार हैं? अथवा आत्मा ? इसमें पहला पक्ष नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह जड़ है। दूसरे पक्षके माननेपर भी प्रमाणस्वरूप व्यापारके रूपमें परिणाम ही प्रामाता कहलाता है, और वह परिणाम विकारसे शून्य आत्मामें नहीं हो सकता। यदि प्रमातृत्वके बिना (तादश परिणामके हुए बिना) ही शुद्ध चैतन्यके द्वारा विपयका प्रकाश-अवभास- माना जाय, तो सब वस्तुओंका एक साथ प्रकाश होने लगेगा, क्योंकि वह शुद्ध चैतन्य तो सर्वत्र व्यापक है, इसी अवस्थामें प्रतिकर्मव्यवस्था-सर्वदा सवको * आदि पदसे कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिका ग्रहण है।
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अध्यासविचार] भापानुवादसहित २३९
तार्किकादिमतेपि किं सर्वगतात्मन्युत्पद्यमानं ज्ञानं यावदात्मसम- वायि १ उत शरीरावच्छिन्नात्मप्रदेशसमवायि १ नाऽडद्यः; नियामकाभावेन युगपत् सर्वावभासग्रसङ्गात्। धर्माधर्मी नियामकाविति चेद्, न; तयोः सुखदुःसजनकविपयेपु तथात्वेऽपि उपेक्षणीयतृणादिसर्ववस्तुष्वनियामक- त्वाद्। यस्य ज्ञानस्य यञ्जनकं तत्तन प्रकाश्यमिति नियम इति चेद्, नः चक्षुरादेरपि चक्षुर्जन्यज्ञानवेद्यत्वप्रसङ्गात् । विपयत्वे सति यस्य जनकं वेद्यमिति चेट्, न; विपयत्वस्याऽद्याऽप्यनिरूपणात्। लोकग्रसिद्धा तनिरूपणेऽपि ज्ञानस्य गुणत्वे क्रियात्वे वा न स्वजनकविपयग्रा-
सव वस्तुओंका एक साथ ज्ञान न होना, प्रत्युत तत्तत्सामग्रीके अनुसार प्रतिनियत वस्तुका ज्ञान होना-सिद्ध नहीं हो सकेगी। नैयायिक आदि वादियोंके मत्में भी क्या सर्वव्यापक आंत्मामें उत्पन्न होनेवाला ज्ञान आत्माके सब प्रदेशमें समवायसे रहता है? या शरीरावच्छिन्न आत्मप्रदेशमें ही समवायसे रहता है ? प्रथम कल्प युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेगें किसी नियामकके न होनेसे एक साथ सब विषयोंका प्रकाश हो जानेका प्रसक्ग आ जायगा। धर्म और अधर्म नियामक होंगे, यह कहना भी नहीं हो सकता, क्योंकि उन दोनोंके सुख और दुःख देनेवाले विपयोंके नियामक होनेपर भी उपेक्षाविषय-जो सुख या दुःखगें से किसीके भी उत्पादक नहीं हैं, ऐसे-तृणादि सभी विषयोंके प्रति उनका नियामकत्व नहीं वन सकता। जिस ज्ञानका जो जनक है, वह उस ज्ञानसे प्रकाशित होता है, यह नियम है, ऐसा भी नहीं कह सकते, ययोंकि चक्षरादि इन्द्रियोंको उनसे उत्पन्न होनेवाले जञानसे प्रकाशित होनेका प्रसन हो जायगा। [तात्पर्य यह है कि चक्षरादि इन्द्रियाँ प्रत्यक्षवेद्य नहीं होती हैं, किन्तु केवल तत्तत् इन्द्रियजनित ज्ञान द्वारा ही जानी जाती हैं; उक्त नियमके माननेसे तो इन्द्रियोंमें भी स्वजन्यज्ञानमकाश्यत्वका प्रसभ्ग होगा। ] विषय होते हुए जो जनक हैं वे उससे वेद्य हैं अर्थात् विपयतासम्बन्धसे जिस ज्ञानका जो जनक है वह उस जानसे वेद्य है, ऐसा भी नहीं मान सकते, क्योंकि अब तक विषयता सम्बन्धका ही निरूपण नहीं हो पाया है और अनिरूपित पदार्थ विशेपण नहीं वन सकता। यदि लोकप्रसिद्धिसे विषयत्वका निरूपण मान भी लिया जाय,
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२४० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, बर्णक १
हित्वनियमसिद्धिः। अदीपगुणस्य ग्रकाशस्याऽजनकेऽपि घटे प्काशकत्व- दर्शनात्। वाणादिक्रियाणां चाऽनुददिष्टेऽपि वस्तुनि स्वाश्रयसंयुक्तेति शयहेतुत्वदर्शनात्। अथ ज्ञानाश्रयस्याऽत्मनोऽपि निरवयवत्वाद् न सर्वसंयोग इति नाडस्ति युगपत् सर्वावभासप्रसङ्ग: १ तर्हि न किश्विदपि प्रकाशेत, क्रियारूपस्य गुणस्य वा ज्ञानस्य स्वाश्रयमतिलङ्ध्याऽन्यत्र संसर्गायोगात्। असंसृष्ट- ग्राहित्वे चाऽतिप्रसङ्गात्। शरीरावच्छिन्नात्मप्रदेशसमवायि ज्ञानमित्यस्मिन् पक्षेऽपि प्रदेशस्य तो भी ज्ञानको गुण या क्रिया माननेपर स्वजनकविषयग्राहित्वरूप नियमकी* सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि प्रदीपके प्रकाशरूप गुणका अपनेको उत्पन्न न करनेवाले घटमें भी प्रकाशकत्व देखा गया है। बाण आदिकी क्रियाओंका भी अपनी अनुद्दिष्ट [अर्थात् अजनक, जैसे छोड़नेवाला पुरुष वाणक्रियाका जनक है, वैसे ही उद्देश्य जिसको लक्ष्य करके छोड़ा जाता है, वह भी उसका जनक है, अतः अनुद्दिष्ट जो लक्ष्य नहीं है, वह अजनक भी हुआ] स्वाश्रयसंयुक्त वस्तुमें अति- शयका-छेदन आदिका-कारण बनना देखा गया हैं [ इससे ज्ञानको गुण या क्रिया माननेमें व्याप्ति न होनेसे नियम नहीं बन सकता, यह भाव है ]। यदि कहो कि ज्ञानके आश्रय आत्माका भी निरवयव होनेसे सब वस्तुओंके साथ संयोग नहीं हो सकता, इसलिए एक साथ सब विषयोंके प्रकाशका प्रसङ्ग नहीं हो सकता, तो किसी भी वस्तुका प्रकाश नहीं हो सकेगा। [निरचयव आत्माका तो सबके साथ क्या एकके भी साथ संयोग नहीं होगा] क्योंकि क्रियास्वरूप या गुणरूप ज्ञानका अपने आश्रय आत्माको छोड़ दूसरे विषयोंसे संसर्ग-सम्वन्ध-करनेका अवसर ही नहीं है। यदि कहें कि यद्यपि संसर्ग नहीं है, तो भी विषयका ग्राहक हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अतिप्रसङ्ग होगा। [ज्ञान प्रादेशिक आत्मसमवायी है, इस द्वितीय विकल्पका खण्डन करते हैं-] शरीरावच्छिन्न आत्मामें समवायसे ज्ञान उत्पन्न होता है (व्यापक *'स्वरूपज्ञानस्य जनको यो विषयस्तस्य आ्हित्वं तद्रूपो यो नियमस्तस्य सिद्धिः' ऐसा समास है। ज्ञानका जनक जो घट, पटादि विषय है उसका ही ज्ञान प्रकाश करता है, ऐसा नियम है। उसकी सिद्धि, यह पदार्थ हुआ।
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अध्यासावचार ] भापानुवादसहित २४१
स्वाभाविकत्वे सावयवत्वमात्मनः ग्रसज्येत। औपाधिकत्वेऽपि ज्ञानं तत्प्र- देशसंयुक्तग्राहि चेत्, तदा देहाद्ाह्यो घटादिर्न भासेत। बाह्यात्मप्रदेश- संयुक्तग्राहित्वे वाहं सर्वमप्यवभासेत। ननु सम्बन्धरहितेऽपि वस्तुनि व्यवस्थयैव ज्ञानक्रियाऽतिशयं जन- यिष्यति। यथाऽभिचारक्रियया सहस्रयोजनव्यवहितोऽप्युदिष्ट एव पुरुपो मार्यते तह्त्। तन, तत्राऽयि हन्तृहन्यमानपुरुपद्वयसंयुक्तस्य देवतात्मन ईश्वरस्य वा कृत्यादेरवा नियामकस्याऽनुमेयत्वाद्। विमतमभिचारकर्म स्व- सम्बन्धिन्यतिशयजनकम्, क्रियात्वात, वाणादिक्रियाचत्।
आत्मामें नहीं, बल्कि प्रादेशिक आत्मामें समवायसे ज्ञान उत्पन्न होता है) इस पक्षमें भी प्रदेशको स्वाभाविक माननेपर आत्माको सावयव मानना पड़ेगा। औपाधिक-आगन्तुकमाननेपर भी यदि ज्ञान तत्-तत् प्रदेशसे संसर्ग रखनेवाली वस्तुका ही ग्राहक है, ऐसा मानो तो शरीरसे वाहर रहनेवाले घट आदि विपयोंका पकाश नहीं होना चाहिए और यदि बाहर तथा आत्माके प्रदेशसे-शरीरसे-संयुक्त दोनों ही विपयोंका आ्हक माना जाय, तो बाहरके सभी विपयोंका प्रकाय होने लगेगा। ज्ञानक्रिया सग्तन्धरहित विपयमें भी व्यवस्था-नियम-से ही अतिशय- प्रकाश-को उत्पन्न करेगी, जैसे अभिचारक्रियासे (मारणकर्मसे) हजार योजन दूरके व्यवधानमें बेठा हुआ भी उद्दिष्ट ही (जिसको उद्देश्य करके आभिचारिक प्रयोग किया जाता है) पुरुप मारा जाता है, वैसे ही (ज्ञानक्रिया भी उद्दिषका ही प्रकाश करती है) यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि उस (आभिचारिक कर्म) में भी मारने और मारे जानेवाले दोनों पुरुषोंसे संसर्ग रखनेवाला देवता-स्वरूप *, आत्मा अथवा + ईश्वर अथवा कत्यादिको ही नियामक मानना अनुमानसे सिद्ध होता है। अनुमानप्रयोग दिखलाते हैं-विमत अभिचारकर्म अपने सम्बन्धी (उह्दिष्ट) में अतिशयका जनक है, क्रिया होनेसे, वाणादिकी क्रियाके समान। [वाणादिक्रियाका अपने * अभिचारकर्मकर्ता और शत्रु दोनोंसे देवतात्मा संयुक्त है। + अभिचारकर्तासे आराधित ईश्वर ही संयोजक है। * अभिचारकर्मसे उत्पन्न हुई कृत्या अथवा अदष्ट नियामक होगा।
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२४२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
तर्ह्येवमस्तु ज्ञानाधारेणाऽडत्मना मनः संयुज्यते, मनसा चेन्द्रियम्, तेन च विषयः, सा चेयं संयोगपरम्परा नियामिकति। तद्प्यसत्, तस्याः परम्पराया ज्ञानात्पूर्व ज्ञानोत्पादन एवोपक्षयात्। ज्ञानादुपर्यपि संयोगपर- म्परया विषयावभासे विपयसंयुक्ततत्संयुक्तादिरूपेणाजवस्थितं सर्व जगदव- भासेत । एवमणुपरिमाणदेहपरिमाणात्मपक्षयोरपि दोपा ऊहनीया: । तस्मान्न सर्ववादिनां प्रमाणादिव्यवहारसम्भवः । अत्रोच्यते-सत्यमेवमन्यत्र, वेदान्तिमते तु कथचित्सम्भवति। तथा-
आश्रय बाणसे संयुक्त पुरुष आदिमें अतिशय-छेदनादि करना-देखा गया है। इस दष्टान्तसे अदृष्ट अभिचारक्रियाका आश्रय और शत्रु दोनोंसे संयुक्त देव- तात्मा आदिकी सिद्धि होती है, यह भाव है।] तब ऐसा मानिए कि ज्ञानके आधार आत्मासे मनका संयोग होता है, मनसे इन्द्रियका और इन्द्रियका विपयसे, इस रीतिसे यह संयोगपरम्परा ही नियम-व्यवस्था-करनेवाली होगी। यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि वह (आपसे प्रदर्शित) परम्परा ज्ञानसे पहले ज्ञानकी उत्पत्तिमें ही चरितार्थ है। ज्ञानके अनन्तर भी संयोगपरम्परासे विपयका प्रकाश माननेपर तो विषय- संयुक्त या विषयसंयुक्तरूपसे वर्तमान सकल जगत्का प्रकाश होने लगेगा। [ संयोगपरम्परा तो किसी-न-किसी रीतिसे सकल जगत्के साथ हो ही जाती है, अतः ज्ञानोत्पत्तिके अनन्तर भी उक्त परम्परासे ज्ञान माननेपर सकल पदार्थोंका ज्ञान होने लगेगा। ] इस रीतिसे आत्माको अणुपरिमाण या देह- परिमाण माननेमें भी दोषोंका उद्धावन करना. चाहिए। [अर्थात् पूर्वोक्त रीतिके अनुसार आत्माको सर्वगत माननेपर भी विषयके साथ ज्ञानकी (प्रकाश की) जैसे व्यवस्था नहीं बन सकती, चैसे ही आत्माको अणुपरिमाण माननेपर अत्यल्पका ही ज्ञान होने पावेगा और देहपरिणाम माननेपर देहसे बाहर दूरकी वस्तुके साथ संयोग सम्बन्ध न होनेसे वह भासित नहीं होगा । ] इससे भी वादियोंके मतमें प्रमाण आदि व्यवहारका सम्भव नहीं है, इस प्रकार वैतण्डिकका सिद्धान्त स्थिर हुआ। [वेदान्ती वैतण्डिकको उत्तर देते हैं-]उक्त पूर्वपक्षपर कहा जाता है-ठीक है, अन्य मतोंमें प्रमाण आदि व्यवहार नहीं बन सकता, परन्द वेदान्तियोंके
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अध्यासविचारं ] भापानुवादसहित २४३
हि-सर्वगतं चिदात्मानमावृत्य स्थिता भावरूपाऽविद्या विविधजगदा- कारेण विवर्चते। तत्र शरीरमध्ये स्थितोऽन्तःकरणाख्योSविद्याविवर्तो धर्माधर्मप्रेरितो नेत्रादिद्वारा निर्गत्य यथोचितं घटादिविपयान् व्याप्य तत्त- दाकारो भवति। यथा लोके पूर्णतटाकस्थम् उदकं सेतुगतच्छिद्रान्निर्गत्य कुल्याप्रवाहरूपेण केदारान् प्रविश्य चतुष्कोणत्वेन त्रिकोणत्वेन वर्त्तुलत्वेन वा तत्तत्केदारानुसारि अवतिष्ठते तद्वत्। नहयुदकवदन्तःकरणं परिस्यन्दते, येनातिदूरवर्तिचन्द्रनक्षत्रधुवादिप्रापतिर्झटिति न सिध्येद। किं तर्हि सूर्यरश्मि- वत्तैजसत्वाद्दीर्घप्रभाकारेण परिणमते। अत एव रश्मिवत् सहसा सङ्कोचोऽ- प्युपपन्नः। उपपननश्चाऽन्तःकरणस्य क्षीरादिवत् साचयवत्वात् परिणाम: ।तच्च परिणतमन्त:करणं देहाभ्यन्तरे घटादी च सम्यग््याप्य देहघटयोर्मध्यदेशेऽ मतमें तो किसी-न-किसी प्रकार * वन सकता है। [ उपपादन करते हैं-]क्योंकि सर्वव्यापक चिद्रूप आत्माको आवृत करके विद्यमान भावरूप अविद्या नानाप्रकारके जगत्के आकारमें परिणत हो जाती है। उस शरीरके अन्दर रहनेवाला अन्तःकरणनामक अविद्याका परिणाम धर्म और अधर्मसे प्रेरित हो कर, चक्षुरादि बाह्य इन्द्रियोंके रास्तेसे बाहर निकल कर यथोचित [जिस विपयसे जिस इन्द्रियका जैसा संसर्ग हुआ ] घटादि विपयोंको व्याप्त कर तत्-तत् आकारमें हो जाता है। जैसे लोकमें भरे हुए तालावका जल नालीसे बहता हुआ खेतमें जाकर उस उस खेतके अनुसार चतुष्कोण (चौकोना) तिकोना या गोल हो जाता है वैसे ही अन्तःकरण भी घट, पट आदिके आकारमें हो जाता है। अन्तःकरण जलकी तरह धीरे बहनेवाला (तरल) पदार्थ है नहीं, जिससे अत्यन्त दूर प्रदेशमें रहनेवाले चन्द्रमा, नक्षत्र धुव, आदिकी प्राप्ति जल्दी सिद्ध न हो सके, किन्तु सूर्यकी किरणोंके समान तैजस होनेसे दीर्घ प्रभाके आकारसे परिणत हो जाता है। इसलिए किरणोंकी तरह जल्दी सक्कोच भी हो जाता है। अन्तःकरणका सूर्यरश्मिद्ष्टान्तसे अति- शीघ्र जाना और जल्दी ही सिमिट जाना दोनोंका सम्भव हो सकता है। और अन्तःकरणका, सावयव होनेसे, दूध आदिकें तुल्य परिणाम होना भी संगत होता है। परिणामको प्राप्त हुआ वह अन्तःकरण देहके अन्दर और घट आदि- * 'वस्तुतः प्रमाणादि व्यवहार मिथ्या होनेसे नहीं ही है परन्तु व्यवहारदशामें कल्पित है' इससे 'कथंचन' कंहा गया है।
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२४४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
पि दण्डायमानमविच्छिन्नं व्यवतिष्ठते। तत्र देहावच्छिनान्तःकरणभागोS हङ्काराख्यः कर्तेत्युच्यते। देहविपयमध्यवर्तिदण्डायमानस्तद्ग्ागो वृत्तिज्ञा- नाभिधा क्रियेत्युच्यते। विपयव्यापकस्तद्भागो विपयस्य ज्ञानकर्मत्वसम्पादक- मभिव्यक्तियोग्यमित्युच्यते। तस्य च त्रिभागस्याऽन्तःकरणस्याऽतिस्वच्छ- त्वाच्चैतन्यं तत्राऽभिव्यज्यते। तस्याऽभिव्यक्तस्य चैतन्यस्यकत्वेऽप्यभिव्यञ्ज- कान्तःकरणभागभेदात् त्रिधा व्यपदेशो भवति। कर्तृभागावच्छिन्नश्चिदंशः प्रमाता, क्रियाभागावच्छिन्नश्चिदंशः ग्रमा- णम्, विषयगतयोग्यत्वभागावच्छिन्नश्चिदंशः प्रमितिरिति अ्रमातृप्रमाणप्र-
विषयमें पूर्ण व्याप्त होकर देह और घटके वीचके देशमें भी लम्बे डंडेकी तरह बरावर-अविच्छिन्न-रहता है। (अर्थात् अन्तःकरणका परिणाम देहके अन्दरसे घट आदि विषय तक वरावर बना रहता है। इससे अन्तःकरणके परिणामके मुख्य तीन भाग हुए-एक देहके अन्दर, दूसरा देह और विषयके मध्य देशमें और तीसरा घट, पट आदि विषय देशमें रहनेवाला।) उनमें देहावच्छिन्न-देहके अन्दर विद्यमान-अन्तःकरणका परिणाम भाग जिसका 'अहक्कार' ऐसा नाम पड़ता है वह कर्ता (प्रमाता) कहलाता है। देह और विपय देशके मध्यमें डंडेके समान रहनेवाला अन्तःकरणका परिणाम भाग 'वृत्तिज्ञान' नामकी क्रिया कहलाती है। विषयको व्याप्त करनेवाला उसका भाग विषयको ज्ञानका कर्म वनानेवाला 'अभिव्यक्तियोग्य' ऐसा कहा जाता है। इस प्रकार तीन भागवाले उस अन्तःकरणके अत्यन्त स्वच्छ पदार्थ होनेसे उसमें (अन्तःकरणमें) चैतन्य अभिव्यक्त होता है। उस अभिव्यक्त चैतन्यके एक होनेपर भी उसके अभिव्यञ्जक (प्रकाशक) अन्तःकरणके भागोंका भेद होनेसे तीन प्रकारका चैतन्य है, ऐसा व्यवहार किया जाता है। कर्तृभागावच्छिन्न-देहाभ्यन्तर देशमें परिणत अन्तःकरणभागमें अभिव्यक्त- प्रतिबिम्वित-चैतन्य प्रमाता कहलाता है और क्रियाभागावच्छिन्न-देह और विषयके मध्यदेशमें परिणत अन्तःकरणभागमें अभिव्यक्त-चैतन्यांश प्रमाण कहलाता है तथा विषयमें विद्यमान योग्यत्व भागसे अवच्छिन्न चैनन्यांश प्रमिति- ज्ञान-कहलाता है। इस प्रकार प्रमाता, प्रमाण और प्रमिति-इन तीनों व्यवहारोंका असाङ्र्य-पृथक्-पृथक विवेक-न जाता है और तीनों भागोंमें जो अन्तः-
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २४५
मितीनामसाङ्कर्यम्। भागत्रयेऽप्यनुगतस्यैवाऽन्तःकरणाकारस्य प्रमातप्रमेय- सुम्बन्धरूपत्वात् 'मयेदमवगतम्' इति विशिष्टव्यवहारोऽप्युपपद्यते। व्यङ्गय-
हारो न विरुध्यते। नन्वन्त:करणेन चैतन्यस्याऽभिव्यक्तिर्नाम आवरणविनाशश्रेद्, घट- ज्ञानेनैव मोक्ष: स्यात्, आत्मगतातिशयश्रेत् आत्मनो विकारित्वं स्यादिति चेद्, न; आवरणाभिभवस्याऽभिव्यक्तित्वाद्। यत्तुक्तमहङ्कारस्य जडत्वादात्मनोऽपरिणामित्वान्न प्रमाता सिध्यतीति।
करणका आकार अनुगत है उसके प्रमातृ और प्रमेयके सम्बन्धरूप होनेसे 'मैंने इसको जान लिया' ऐसा विशिष्ट व्यवहार भी युक्तियुक्त है। व्यङ्गय चैतन्य और व्यख्क अन्तःकरणका ऐक्याध्यास होनेसे एक दूसरेमें एक दूसरेके धर्मोंका व्यवहार भी विरुद्ध, नहीं होता। यदि अन्तःकरण द्वारा चैतन्यकी अभिव्यक्तिको आवरणका विनाश कहा जाय, तो घटज़ानसे ही मोक्ष हो जायगा। [ तात्पर्य यह है कि स्वपकाश आत्माकी तो सदैव अभिव्यक्ति होनी चाहिए, अतः अन्तःकरण द्वारा मानी हुई अभिव्यक्तिकी संगतिके लिए वेदान्तसिद्धान्तमें स्वीकृत अनादि अज्ञानके विनाशको ही अभिव्यक्ति कहना होगा। इस मतमें घटज्ञान भी अन्तःकरण द्वारा चैतन्यकी ही अभिव्यक्ति है, एवम् घटज्ञान होनेसे सुतरां अनादि अज्ञानका विनाश हो गया। इससे 'निवृत्तिरात्मा मोहस्य' के अनुसार घटज्ञानसे ही मोक्षकी सिद्धि हो जानी चाहिए।] यदि चैतन्यकी अभिव्यक्तिको आत्मामें एक प्रकार परिणाम माना जाय, तो आत्मामें विकारित्वका प्रसङ्ग आ जायगा। इस प्रकारकी दोनों शक्काएँ उचित नहीं हैं, क्योंकि आवरणके अभिभवको अभिव्यक्ति मानते हैं। [अभिभवको विनाश नहीं कहते, किन्तु प्रतिबन्ध या विषयावच्छिन्न चैतन्यगत अज्ञानकी निवृत्ति कहते हैं, इससे अज्ञानरूपी आवरणका समूल उच्छेद नहीं होता। जिससे घटज्ञानमात्रसे मोक्षलाभका प्रसङ्ग हो। मोक्ष तो निरवच्छिन्न चैतन्यगत आवरणके समूल उच्छेदको कहते हैं। घटज्ञानादिसे तो सावच्छिन्न- . गत आवरणका ही प्रतिबन्ध या विनाश होता है।] 'अहक्वारके जड़ (अचेतन) होने तथा आत्माके परिणामी न होनेसे प्रमाताकी
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
तदसद, चिद्भिव्यक्तिविशिष्टः परिणाम्यहङ्कारः प्रमातेति दर्शितत्वात्। यच्च चैतन्यस्य सर्वगतत्वान्न प्रतिकर्मव्यवस्थेति, नाडसौ दोष: किमेकेन पुरुषेण यत्सुखदुःखादिकमनुभूयते तत्सवैरनुभवितव्यं सर्वपुरुष- चैतन्यस्यैकत्वादित्यापाद्यते ! कविं वा देवदत्तेन यदा घटोऽनुभूयते तदा कृत्सं जगत्तेनाऽनुभवितव्यम् १ तच्चैतन्यस्य सर्वगतत्वादिति। नाडडद्य:, नहि वयं चैतन्यस्य केवलस्य विषयानुभवहेतुत्वं ब्रूमस्तस्याऽविद्यावृतत्वात्, किं तर्ह्यन्तःकरणाभिव्यक्तस्य तथात्वम्। तानि चाऽन्तःकरणानि प्रतिपुरुषं व्यवस्थितानि। तत्कथं सर्वपुरुषभोगसङ्करः। नाऽपि द्वितीयः, नहि देव-
सिद्धि नहीं हो सकती' इस प्रकार की गई जो आपत्ति है वह भी असत्- असंगत-है, क्योंकि चित् (चैतन्य) की अभित्यक्तिसे युक्त परिणामी अहङ्कार प्रमाता है, ऐसा पूर्वमें ही दिखला चुके हैं। जो कि चैतन्यके सर्वगत (व्यापक) होनेसे प्रतिकर्मव्यवस्थाका (तत्-तत् पुरुषको ही तत्-तत् घट, पट आदिका ही ज्ञान होना) असम्भव दोष दिया गया है वह भी नहीं आता, [ खण्डन करनेके लिए विकल्प करके दोष दिखाते हैं ]- एक पुरुष जिस सुख-दुःख आदिका अनुभव करता है क्या उस सुख-दुःखका सको अनुभव करना चाहिए, क्योंकि 'सब पुरुषोंमें एक ही चैतन्य है' ऐसी आपत्ति दी जा रही है? या 'जिस कालमें देवदत्त घटका अनुभव करता है उसी कालमें उसको सम्पूर्ण जगत्का ज्ञान हो जाना चाहिए क्योंकि उसका चैतन्य सकल विश्वमें व्याप्त है' ऐसी आपत्ति दे रहे हो ? इनमें प्रथम दोष नहीं आता, कारण कि हम केवल-शुद्ध-चैतन्यको विषयभानका कारण नहीं कहते, क्योंकि वह तो अविद्यासे आवृत है (जो स्वयं आवृत होनेसे प्रकाशमान नहीं है, वह दूसरेके प्रकाशका कारण कैसे हो सकेगा!) किन्तु अन्तःकरणसे अभिव्यक्त चतन्यको विषयके प्रकाशका (ज्ञानका) कारण कहते हैं, वे अन्तःकरण (जिनसे चैतन्य अभिव्यक्त होता है) प्रत्येक पुरुषमें व्यवस्थित (भिन्न-भिन्न) हैं। इस प्रकार माननेमें सकल पुरुषोंके भोगोंका सांकर्य कैसे हो सकता है ? [ जिसके अन्तःकरणाभिन्यक्त चैतन्यसे विषय संसर्ग होगा उसको ही अनुभव होगा ] दूसरा विकल्प भी ठीक नहीं है, कारण कि देवदत्तका अन्तःकरण व्यवस्थासे परिच्छिन्न एक साथ
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अध्यासविचार] भापानुवादसहित २४७
दत्तान्त:करणं व्यवस्थापरिच्छिन्न युगपत्कृत्सेन जगता सम्बध्यते, येन तद- भिव्यक्तचैतन्यवलात् सर्वमसावनुभवेद्। परिच्छिन्नस्याऽपि सूर्यरश्मिवत् सर्वव्यापी परिणामः स्यादिति चेद्, न; अन्तःकरणपरिणामसामय्याः पुण्यपापनेत्रश्रोत्रादिरूपायाः प्रतिविपयं व्यवस्थितत्वेन परिणामस्याऽपि व्यवस्थासिद्धेः । यस्तु योगमभ्यस्य
सम्पूर्ण जगत्के साथ सम्बन्ध नहीं कर सकता, जिससे उस अन्तःकरणसे अभिव्यक्त चतन्यके प्रभावसे सारे जगत्का वह अनुभव कर सके। [तत्-तत् देहेन्द्रियसंघातान्तःपाती अन्तःकरण केवल तत्-तत् देहेन्द्रियसंयुक्त विपयसे ही सम्बन्ध कर सकता है एवं उस अन्तःकरणसे अभिव्यक्त चैतन्यका सम्बन्ध भी उन्हीं विपयोंसे हो सकता है, जिनके साथ उसके अभिव्यञ्जक अन्तःकरणका सम्बन्ध होगा। सकल विश्वके साथ नहीं, अतः शुद्ध चैतन्यके सर्वगत होनेपर भी उक्त दोप नहीं आता अर्थात् प्रतिकर्मव्यवस्था वननेमें कोई दोप नहीं है। ] 'परिच्छिन्न [तत्-तत् अन्तःकरणाभिव्यक्त] चेतन्यका भी सूर्य किरणोंकी तरह सर्वव्यापी परिणाम हो सकता हे' ऐसा भी नहीं मान सकते, क्योंकि पुण्य, पाप आँख, कान आदि अन्तःकरणके परिणामकी सामग्रीके प्रतिचिषय व्यवस्थित द्वोनेसे परिणामकी व्यवस्था भी सिद्ध हो जाती है, [अर्थात् अदष्ट-पुण्य और पाप- वश सुख-दुःख आदिके जनक याहय विपयसे जिसके आंख, कान आदिका संसर्ग हुआ उसका अन्तःकरण उन विषयसंसृष्ट आंख और कानोंके द्वारा निकल कर तादद विषय देशमें जाकर तचदाकार परिणामको प्राप्त हो अपनेमें प्रतिविम्धित चैतन्य (चिदाभास) के साथ अेदको प्राप्त हो जाता है, यह निर्दोष व्यवस्थित नियम है, इसके अनुसार अन्तःकरणका तत्तदाकार परिणाम संसर्गके विना होता ही नहीं, अतः सूर्यकिरणोंका द्ष्टान्त प्रकृतमें लागू नहीं हो सकता ] जो पुरुष योगाभ्यासके द्वारा अपने अन्तःकरणका सर्वव्यापी परिणामको उत्पन्न करनेवाली सामग्रीका सम्पादन कर सकेगा उसको एक ही कालमें सकल विश्वका अनुभव होगा ही, इससे कोई हानि नहीं है। [ पूर्वमें कह आये हैं किअन्तःकरणके परिणामका मूल कारण अह्के चशीभूत आंख और कान ही हैं, अतएव 'मनुष्यो यथा पश्यति यथा शृणोति तथा जानाति' (मनुष्य जसे देखता या सुनता है, वैसे ही
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२४८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
सर्वव्यापिपरिणामसामग्रीं सम्पादयेत् स युगपत्सर्वमवगच्छत्येव न ततः काचिद्धानिः । नतु किं चैतन्यस्यासङ्गितया स्व्रतो विपयोपरागाभावात् तत्सिद्धयेऽ- न्तःकरणोपाधि: कल्प्येत किं वा सत्यपि तदुपरागे विषयप्रकाशनसिद्धये? नऽडादः, असङ्गितयैवाऽवस्थान्तःकरणोपाधावपि तस्याऽनुपरागप्रसङ्गात्। न द्वितीयः, चित्सम्बन्धादेव प्रकाशसिद्धावुपाधिवैयर्थ्यात्। तत उपाधिपरित्यागे सर्वगत चैतन्येन संयुक्तसर्ववस्तुपरकाशयौगपद्यं केन वार्यते।
जानता है,) इस सिद्धान्तकी उपपत्ति होती है। यदि योगी अपने योगाभ्यासके बलसे आँख और कानोंके दर्शन और श्रवणमें देशकालके व्यवधानका प्रतिबन्ध हटा देता है, तो सुतरां उसकी आँख और कानोंका देशकालसे व्यवहित भी विपयके साथ संसर्ग हो जाता है, अतः आँख और कानोंसे विषयसंसर्ग होना अन्तःकरणके परिणामका हेतु है। उस योगीके अन्तःकरणकी सर्वाकार परिणामसामग्री वन जाती है।] अन्तःकरणरूप उपाधि माननेका प्रयोजन शङ्कासमाधानपूर्वक सिद्ध करते हैं-चैतन्य (ब्रह्म) संगरहित है, इससे चैतन्यके साथ विषयका संसर्ग स्वतः नहीं हो सकता, क्या इसलिए अन्तःकरणरूप उपाधिकी कल्पना की जाती है ? या (चैतन्यके सर्वव्यापी होनेसे) चैतन्यका विषयसे संसर्ग होनेपर भी विषयके प्रकाशकी सिद्धिके लिए: अर्थात् विषयसंसर्गके लिए उपाधि मानते हो ? या विषयप्रकाशके लिए? प्रथम कल्प नहीं वनता, क्योंकि 'चैतन्य' के असङ्ग होनेसे ही अवस्था-परिणामविशेष-को प्राप्त अन्तःकरणरूप उपाधि माननेपर भी विषयका संसर्ग न होनेका दोष आ ही जायगा। (क्योंकि जो पदार्थ असंग है, उसका उपाधिसे भी संसर्ग होना नहीं बन सकता। इसलिए विषयसंसर्गके लिए उपाधि मानना व्यर्थ है।) द्वितीय विकल्प भी नहीं बनता, क्योकि चतन्यके साथ संसर्ग होनेसे ही विषयके प्रकाशकी सिद्धि हो जायगी, उसके लिए उपाधिका स्वीकार करना निष्प्रयोजन है। इस प्रकार (उपाधिके निष्प्रयोजन होनेके कारण) उपाधिके न माननेमें सर्वव्यापक चैतन्य (आत्मा)से संयुक्त हुई सब वस्तुओंके ज्ञानका एक साथ ही होना कौन रोक सकता है?
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अध्यासविचार] भापानुवादसहित २४९
अथ मन्यसे किं प्रतिविम्यभृतजीवचैतन्यस्य युगपद् सर्वावभासकत्व- मापादयसि किंवा विम्बभूतब्रह्मचैतन्यस्य ! नाऽडद्यः, तस्य परिच्छिन्नत्वात्। न द्वितीय:, इष्टत्वात्। जीवत्रह्मणोर्भेदाभावेऽपि किश्चिज्ज्ञत्वसर्वज्ञत्वे असङ्गीणे विम्वप्रतिविम्धमुखयोरदातश््यामत्वे इचेति, नैतत्सारम् ; तथा सति विपयेऽनुभवस्य व्रह्मचतन्यरूपतया सर्वज्ञत्ववद्हङ्गारावच्छिन्नजीवा- नुपङ्गाभावाजीवस्य किश्चिज्ज्ञत्वसपि न स्यात्। जीवोपाधेरन्तःकरणस्य चक्षुरादिद्वारा विपयसम्बन्धाज्जीवस्य विपयज्ञातृत्वं घटत इति चेद्, न; अन्त :- यदि मानो कि क्या प्रतििम्बभावको प्राप्त जीवचैतन्य सकल वस्तुओंका एक साथ ही प्रकाश करनेवाला होगा ? या विम्बभूत ब्रह्मचैतन्य? इनमें पहला पक्ष वन नहीं सकता, क्योंकि वह जीवचतन्य परिच्छिन्न है, इससे वह सकल वस्तुओंसे संयोग नहीं कर सकता। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंफि ऐसा मानना इष ही है। जीव और ब्रह्मका भेद न होनेपर भी अल्पज्ञत्व और सर्वज्ञत्व का सांकर्थ्य नहीं होगा-[ अर्थात् जीव अल्पज्ञ और ब्रह्म सर्वज्ञ है यह व्यवस्था वनी ही रहेगी। इसमें दृष्टान्त देते हैं-]विम्व और प्रतिबिम्ब भावको प्राप्त हुए दोनों मुखोंकी स्वच्छता और श्यामताके तुल्य। [ यद्यपि वस्तुतः शीवास्थ और दर्पणादिस्थ मुखमें भेद नहीं है तथापि ग्रीवास्थ मुखमें स्वच्छता और दर्पणादिस्थ मुखमें श्यामता व्यवस्थित ही रहती है। ] यह मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेमें विपयनिष्ठ अनुभवके ब्रह्मचैतन्यरूप होनेसे अहक्कारावच्छिन्न जीवक़ा अनुपङ्ग न होनेसे जीवमें सर्वज्ञत्वकी भाँति अल्पज्ञत्व भी नहीं होगा। [ जैसे विम्बभूत सुखमें प्रतिबिम्बभावका और प्रति= चिम्ब्रगत शयामताका अनुषङ्ग नहीं होता है वैसे ही विम्बस्थानीय ब्रह्ममें प्रति- विम्व्स्थानीय अहक्कारावच्छिन्न जीवका और तद्गत अल्पज्ञत्वका संसर्ग नहीं हो सकता है और न प्रतिबिम्बमें विम्बत्व या बिम्बगत अवदातत्व आदि धर्मोंका संसर्ग होता है और विपयानुभव वेदान्तमतमें विपयावच्छिन्न चतन्यं बिम्ब- स्थानीय ब्रह्मरूप ही है उसमें अहक्कारावच्छिन्न चैतन्य अनुगत नहीं हो सकता, अतः तादृश जीवको, विषयसंसर्ग न होनेसे, किसी भी विपयका प्रकाश नहीं होना चाहिए, यह तात्पर्य है। ] जीवकी उपाधि अन्तःकरणका चक्षुरादि वहिरिन्द्रियोंके द्वारा विपयके साथ सम्बन्ध हो जानेसे जीवको विपयका ज्ञान होना संगत हो जायगा, ३२
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२५० विवरणप्रमेयसंग्रह [सृत्र १, वर्णक १
करणसंसृष्टवस्तुज्ञातृत्वे ब्रह्मस्वरूपमपि जीव: सर्वदा जानीयात्। सर्वगतस्य न्रह्मणोऽन्त:करणेऽपि संसृष्टत्वाद्। अथ मतमविद्योपाधिकत्वाज्जीवः सर्वगतः। स च न कत्सं जगदव- भासयितुं क्षम:, अविद्यावृतत्वेन स्व्रयमप्यप्रकाशमानत्वात्। 'अहमज्ञ:' इति परिच्छिन्नतयाऽवगताया अप्यविद्यायाः सर्वगतचैतन्यतिरोधायकत्वमप्युप- पन्नमेव। नेत्रसमीपे धृतेनाऽङ्गुलिमात्रेण महत आदित्यादेरपि तिरोधानदर्श- नात्। एवं च सत्यन्त:करणोपरागेण यत्राऽडचरणमभिभृयते तत्रैवाडभिव्यक्ेन चैतन्येन किंचिदेव प्रकाश्यते न सर्वमपि; तदपि न युक्तम्, कार्यभृताऽ-
[ अर्थात् वृत्ति द्वारा अहङ्कारावच्छिन्न जीवका विषयसंसर्ग होनेसे जीवका अल्पज्ञत्व वन जायगा ] ऐसा भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि अन्तः- करणसे संयुक्त वस्तुका ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर जीवको ब्रह्मस्वरूपका भी संदेव ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि सर्वत्रव्याप्त ब्रह्मका अन्तःकरणके साथ भी संसर्ग है ही [ अतः अन्तःकरणसे संयुक्त त्रह्मका ज्ञान जीवको सदैव होना चाहिए ]। [जीवको अन्तःकरणावच्छिन्न न मानकर अविद्यावच्छिन्न स्वीकार करनेसे सर्वव्यापक होनेपर भी अन्तःकरणके सम्बन्धसे यद्विपयाव्च्छिन्न चैतन्यगत आवरणका अभिभव होगा, उसी विषयका प्रकाश होगा। अन्यत्र आवरणके उद्भूत रहनेसे प्रकाश नहीं होगा, इससे जीवका अल्पज्ञत्व वन जाता है। इस आशयसे 'अथ मतम्' इत्यादि ग्रन्थसे पूर्वपक्ष करते हैं-] अगर माना जाय कि जीव अविद्योपाधिक होनेसे सर्वत्र व्याप्त है, तो भी वह सम्पूर्ण विश्वका प्रकाश करनेमें समर्थ नहीं है, क्योंकि अविद्यासे आच्छन्न होनेके कारण वह स्वयं भी प्रकाशित नहीं हो सकता [ दूसरोंका प्रकाश करना तो दूर रहा]। 'अहमज्ञः' (मैं अज्ञान वाला हूं-मैं नहीं जानता) इस प्रकार परिच्छिन्नरूपसे प्रतीत हुई भी अविद्याका-अज्ञान का-सर्वत्र व्यापक चैतन्यको आवृत कर देना युक्ति- संगत ही है। कारण कि आँखके सामने केवल छोटी-सी अङ्गुलि रख देनेसे सूर्य आदि बड़े पदार्थका भी छिप जाना देखा गया है। ऐसी दशामें (चैतन्यके अज्ञानावृत रहनेसे) अन्तःकरणके संसर्गसे जिस स्थलमें आवरणका अभिभव हुआ उस स्थलमें अभिव्यक्त हुआ चैतन्य किसी वस्तुका ही प्रकाश कर सकता है, सम्पूर्णका नहीं। [ अर्थात् यदिषयाकार अन्तःकरणकी वृत्ति हुई उसमें तद्विपया-
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अंध्यांसविचोर ] भापांनुवांदसहित २५
न्तःकरणेन स्वोपादानस्याऽज्ञानस्याSभिभवायोगात् । तस्मान्न केनाऽपि प्रकारेण व्यवस्थासिद्धिरिति।
करणे उपरज्यते, तादशस्वभावत्वात्। यथा सर्वगताऽपि गोत्वादिजातिः सास्रादिमन्रक्तावुपरज्यते, नाऽन्यत्र तद्वत्। अथ व्यक्तिरेव न सर्वगता जाति- स्तर्हि प्रदीपप्रभादष्टान्तोऽस्तु । सा हि रूपरसगन्धवाय्वादिदेशव्यापिन्यपि रूपमेव प्रकाशयति नाऽन्यत्। तथा चाऽन्त:करणोपाधिश्वैतन्यस्य विपयोपराग-
वच्छिन्न चैतन्यके अभिव्यक्त होनेसे उतना ही प्रकाशित हुआ, शेप आवृत ही रह गया, अतः जीवका अल्पज्ञ होना उचित ही है।] [ इस पूर्वपक्षका खण्डन करते हैं-] ऐसा मी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि कार्यरूप अन्तःकरणसे अपने उपादान कारण अज्ञानका अभिभव होना सम्भव नहीं है। इसलिए किसी भी प्रकार व्यवस्था नहीं वन सकती। [ आवरणाभिभव या विपयोपराग दोनों भी प्रयोजन अन्तःकरणरूप उपाधिके नहीं हो सकते, अतः जीवको या तो विलकुल अज्ञ होना चाहिए या सर्वज्ञ ही होना चाहिए 'जीव अल्पज्ञ और त्रह्म सर्वज्ञ है' यह कहना तथा प्रमातृत्वादि प्रतिकर्मव्यवस्था किसी भी प्रकार नहीं बन सकती, यह संक्षेपार्थ हुआ ]। [ समाधान देते हैं-] इस पूर्वोक्त पूर्वपक्ष पर कहा जाता है-[ अविद्यां- वच्छिन्न या अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन्य जीव है, इस उभयमतसाधारण उपाघिके स्वीकारकी आवश्यकता और सङ्जति दिखाते हैं-] जीव चैतन्य असङ्गी होनेसे अन्य विपयोंमें सम्बन्ध नहीं करता हुआ भी अन्तःकरणमें सम्बन्ध करता है, क्योंकि उसका ऐसा ही स्वभाव है। जैसे सर्वत्र व्याप् भी गोत्व आदि जाति सास्नादि- गलकम्बल-वाली व्यक्तिमें ही सम्बन्ध करती है, अन्यत्र-एक खुरवाली व्यक्तिमें नहीं, इस दष्टान्तके तुल्य चतन्य भी अन्यत्र उपरक्त न होता हुआ भी अन्त :- करणमें उपरक्त होता है। यदि व्यक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है, जाति नहीं, यही मत है, तो प्रदीपकी कान्तिको दष्टान्त समझना चाहिए। वह प्रदीपकी ज्योति-प्रकाश- रूप, रस, गन्ध और वायु आदि प्रदेशोंमें सर्वत्र व्याप्त होती हुई भी जैसे केवल रूपको ही प्रकाशित करती है रस, गन्ध आदिको नहीं, वैसे ही अन्तःकरण- रूप उपाधिका भी असङ्क चैतन्यके साथ विषयके सम्बन्धकी सिद्धि करनेके
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२५३ विवरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, चर्णक
सिद्धर्थों भविष्यति। न चाऽसत्युपरागे चित्पकाशो विपवानवभासयितुमीषटे, प्रदीपप्रकाशवत् संयुक्तद्योतकत्वाद्। त्रह्म हि सर्वोपादानत्वादन्तरेणवौपाधि- कसुपरागं स्वस्वरूपवत् स्वाभिन्नं जगदवभासयति। न तु तथा जीव:, अनुपा- दानत्वात्। न च स्वतोऽनवभासकस्य जीवस्य घटादिवदन्यसम्ब्रन्धाद- व्यवभासकत्वं नेति शङ्कनीयम्, केवलवह्वेस्वणाद्यदाहकत्वेऽप्ययःपिण्डस- मारूढस्य तद्दाहकत्वदर्शनात्। तदेवमसङ्गिनः साक्षिचतन्यस्याऽविद्यानावृ- तस्य जीवत्वेऽपि स्यादेवाऽन्तःकरणवशाद् व्यवस्था। यदा त्वन्तःकरणप्रति- विम्न्ो जीवस्तदाऽपि परिच्छिन्नत्वात् सुतरां व्यवस्था सिध्वेद। विपयानु-
लिए स्वीकार करना होगा, क्योंकि विषयके साथ उपराग हुए बिना चतन्य- प्रकाश विषयका प्रकाश करनेमें समर्थ नहीं हो सकता; कारण कि चेतन्यका प्रकाश प्रदीपके प्रकाशके तुल्य संयुक्त वस्तुका ही प्रकाश कर सकता है। [ इतने ग्रन्थसे जीवके उपाधिवश विपयप्रकाशत्वरूप प्रमातृत्व और किश्चिज्ज्ञ त्वकी उपपत्ति की गई है, अव त्रह्मकी सर्वज्ञताका समर्थन करते हैं-] ब्रह्मचैतन्य तो सकल विश्वका उपादान होनेसे औपाधिक सम्बन्धके बिना ही अपने स्वरूपकी तरह अपनेसे अभिन्न (भेदरहित) जगत् भासित करता है [अतः ब्रह्म सर्वज्ञ है]। जीव ऐसा (सर्वज्ञ) नहीं है, क्योंकि वह सकल विश्वका उपादान नहीं है। [ यदि घट स्वयं प्रकाशक नहीं है, तो वह उपाधिवश भी प्रकाशक नहीं हो सकता, इस दष्टान्तसे जीवको भी प्रकाशकत्व नहीं वन सकता, इस आशयसे शङ्का करते हैं-] स्वतः प्रकाश न करनेवाले जीवको घटादिकी भाँति दूसरेके सम्बन्धसे मी प्रकाशकत्व नहीं वन सकता, ऐसी भी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि देखा गया है कि केवल अभि (औपा- धिक संसर्गशून्य शुद्ध तेजःपुञ्ज) यद्यपि तृणादिका दाह नहीं भी कर सकता है, तथापि लोहपिण्डमें संसक्त होकर (अर्थात् औपाधिक संसर्ग पाकर) तृणादिका दाह करनेवाला हो जाता है, इसी प्रकार सङ्गवर्जित अविद्यानावृत -साक्षिचैतन्यको जीव माननेपर भी अन्तःकरणरूप उपाधिके द्वारा सब व्यवस्था बन जायगी। और यदि (उपरोक्त साक्षी चतन्यको जीव न मानकर) अन्तःकरणप्रतिविम्न्नको जीव माना जाय, तो भी जीवके परिच्छिन्न होनेसे बड़ी सुगमतासे व्यवस्था त्रनेगी [ ब्रह्मचैतन्यके अन्तःकरणमें प्रतिबिम्नित होनेसे वह
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अध्यासावेचार] भापानुवादसहित २५३
भवस्य ब्रह्मचैतन्यरूपत्वेऽपि जीवोपाध्यन्त:करणपरिणामे विपयाव्यापिन्य-
कारपरिणतान्त:करणवृत्त्यभावान्न सदा जीवस्य त्रह्मज्ञानप्रसङ्ग: । नह्यन्त :- करणस्वरूपमात्रं वस्त्वभिव्यञ्जकम्, किन्तु तदाकारपरिणामः। अन्यथाS- न्त:करणान्तर्गतानां धर्मादीनामप्यभिव्यक्तिग्रसङ्गाद्। जीवोऽपि जीवाका-
परिच्छिन्न हो जाता है, अतः उसमें परिच्छिनप्रमातृत्वरूप अल्पज्ञत्व स्वतः उपपन्न होता है ]। [ वेदान्तमतमें ] विपयानुभवके ब्रह्मचैतन्यरूप होनेपर भी सकल विपयको व्याप न करनेवाले जीवकी उपाधि अन्तःकरणके परिणाममें अव्यक्त होनेसे जीवचैतन्यरूप होना भी विरुद्ध नहीं है। [ वादीने जो शङ्का की है कि विपयानुभव भी ब्रह्मचतन्य ही है, उसमें जीवचतन्यका अनुपङ्ग नहीं है, अतः जीवमें अल्पज़त्व भी नहीं बनता, उस शक्काका उत्तर देते हैं-माना कि विषयानुभव ब्रह्मचतन्य है, वह तो विषयाकार परिणत अन्त.करणका परिणाम और उसमें प्रतिविम्नित चैतन्यस्वरूप ही है और वह परिणाम संसष्टके ही आकारका होगा। सकल विषयके आकारका तो होगा नहीं, अतः सर्व- व्यापक ब्रह्मचैतन्य तो उस परिणाममें व्यक्त हो नहीं सकेगा। व्यक्त होगा तो उससे प्रतिम्धित चैतन्य ही जो कि जीव कहलाता है, अतः विपयानुमवको जीवचैतन्य कहना कोई विरुद्ध नहीं है और उसका अल्पज्ञ होना भी संगत है। विषयानुभवको ब्रह्मचैतन्य कहना जीव और ब्रह्मके अभेदको लेकर या अनुभव- सामान्यके वलसे समझना चाहिए। ] ब्रह्मका अन्तःकरणके साथ सम्वन्ध होनेपर भी व्रह्माकारमें परिणत अन्तःकरणकी वृत्ति न होनेसे जीवको सदैव ब्रह्मज्ञानका प्रसङ्ग भी नहीं आता [ जिस विषयके आकारका अन्तःकरण परिणाम होता है, जीवके व्यापकपक्षमें उसी विपयसे अवच्छिन चैतन्यगत आवरणका अभिभव अथवा परिच्छिन्नपक्षमें उसी विषयसे चैतन् (साक्षी) का संसर्ग होता है और ज्ञान भी उसी विपयका होता है, अतः ब्रह्माकार वृत्तिके विना ब्रह्मगत आवरणका अभिभव नहीं हो सकता ] क्योंकि अन्तःकरण स्वरूपतः वस्तुका अभिव्यञ्जक नहीं है, किन्तु तत्-तत् विपयके आकारका परिणाम [ही वस्तुका अभिव्यञ्जक है ]। यदि अन्तःकरण स्वरूपतः व्यञ्जक माना जाय, तो अन्तःकरणके अन्दर विद्यमान धर्म आदिका भी प्रत्यक्ष होने लगेगा। जीव
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२५४ विवरणप्रमेयंसग्रह [सूत् १, वर्णक २
राहवृत्तिरूपेण परिणतेऽन्तःकरणेऽभिव्यज्यते, नाऽन्तःकरणमात्रे; सुपुप्तावहं- वृत्यभावे जीवाप्रतीतेः। तदित्थमन्तःकरणप्रतिविम्वस्य जीवत्वेऽपि ग्रति- कर्मव्यवस्थायां न कोऽपि विन्नः। यदा चाऽविद्योपाधिक: सर्वगतो जीवस्तदाऽप्यावरणतिरोधायकेनाS- न्तःकरणेन व्यवस्था सिध्येत्। सम्भवति हि कार्यस्याऽप्युपादानतिरोधायकत्वम्, - हि वृश्चिकशरीरे गोमयं प्रत्यभिज्ञायते वृक्षादौ वा मृत्स्वरूपम्। तंदवं
भी जीवाकार अहंवृत्तिके परिणामको ग्राप्त हुए अन्तःकरणमें अभिव्यक्त- प्रकाशित-होता है, अन्तःकरणमात्रमें नहीं, क्योंकि सुपुप्तिमें अहंवृत्तिके न होनेसे जीवकी प्रतीति भी नहीं होती है। इस प्रकार अन्तःकरणमें चैतन्यके प्रतिविम्बको जीव माननेपर भी प्रतिकर्मव्यवस्थामें कोई भी विन्न-बाघा-नहीं है। [अब अविद्योपाधिक पक्षमें प्रतिकर्मव्यवस्थाकी सिद्धि करते हैं-] यदि अविद्योपाघिसे जीवको सर्वगत (व्यापक) माना जाय, तो भी आवरणका अभिभव करनेवाले अन्तःकरणके द्वारा सब व्यवस्था सिद्ध हो जायगी। [जीव व्यापक होनेसे विषयसंसर्ग तो स्वयं भी कर लेता है, परन्तु अविद्यावरण होनेसे प्रकाश नहीं कर सकता। विषयाकार परिणाम द्वारा आवरणके हट जानेसे प्रकाश होता है, इस पूर्वोक्त रीतिसे प्रतिकर्मव्यवस्था सिद्ध होती है। अविद्या- कार्य अन्तःकरण अपने उपादानका अभिभव कैसे कर सकता है? वादीकी इस शक्काका दष्टान्त द्वारा निराकरण करते हैं-] क्योंकि कार्यका अपने उपादानको छिपा देना भी सम्भव है, कारण ! देखा गया है कि वृश्चिक- बिच्छू या पेड़ आदिरूप कार्य अपने गोमय-गोवर-या मिट्टी आदि उपादान कारणके स्वभावका तिरोधान कर देते हैं। विच्छूके शरीरमें गोमयकी अत्यभिज्ञा-पहिचान-नहीं होती और न वृक्षादिमें मिट्टीका स्वरूप ही पहिचाना जाता है। [प्रकृतमें भी अन्तःकरणरूप अविद्याकार्य विपयाकारमें परिणत होनेपर अपने उपादानभूत अविद्याका आवरण करनेवाले स्वभावका विनाश कर देता है, जिससे वस्तुका प्रकाश हो जाता है और तद्विप- यावच्छिन्न चैतन्यमें अविद्याका स्वरूप देखता नहीं है; अन्यथा उसका प्रकाश ही नहीं हो सकता।]
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २५५
वेदान्तिमते सर्वेणाऽपि प्रकारेण प्रमात्रादिव्यवहारसिद्धौ पूर्वपूर्वाहङ्गार- कृतग्रमातृत्वादिसंस्कारेण सविकल्पके चैतन्ये सम्भवत्येव सविकल्पका- हङ्काराद्यध्यास:। न च सर्वस्य ज्ञेयस्य चैतन्यविवर्तत्वे चैतन्याति रेकेणाऽसत्वाद् विज्ञा- नवादिमतप्रवेश इति वाच्यम्, किश्वित्साम्यान्मतान्तरप्रवेशे सर्वमतसाङ्क- र्यंस्य दुरपवादत्वात्। सर्वसाम्यं तु प्कतेऽपि नाडस्ति। विज्ञानवादी हि क्षणिकान्यनेकानि विज्ञानानि विपयाश्च तेभ्योडभिन्ना इत्याह। तथ्वदर्शी तु नित्यमद्वितीयं विज्ञानं विपयाश तत्राऽध्यस्ताः पृथगर्थक्रियासमर्थास्तेपां
इस उपरोक्त रीतिसे वेदान्तीके मतमें सब प्रकार प्रमातृ आदि [आदि पदसे प्रमाण, प्रमेय तथा प्रतिकर्मव्यावस्थाका ग्रहण है ] व्यवहारकी सिद्धि होनेपर पूर्व- पूर्व अहक्वारके कारण उत्पन्न हुए प्रमातृत्व आदि संस्कारसे सविकरपक चैतन्यमें सविकल्पक अहङ्कारादिका अध्यास सम्भव ही है। यदि सम्पूर्ण घट, पट आदि ज्ञेय पदार्थ चैतन्यके ही विवर्त हैं, तो चैतन्यसे अतिरिक्त किसी भी पदार्थके न होनेसे विज्ञानवादीके मतमें प्रवेश होता है। [ जैसे विज्ञानवादी वौद्धके मतमें विज्ञानसे अतिरिक्त जगत् कुछ भी नहीं है वैसे ही ज्ञेयरूप जगत् को चैतन्यविवर्त माननेमें विज्ञानस्वरूप चैतन्यसे अति- रिक्त कुछ नहीं होगा, क्योंकि विवर्तवादमें अधिष्ठानके अतिरिक्त अध्यस्त कुछ नहीं रहता; इसलिए इस मतमें और विज्ञानवादमें कोई भेद नहीं रहा। ] ऐसी शक्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यदि कुछ थोड़ी-सी समानता होनेसे पर- मतप्रवेश हो, तो सम्पूर्ण मतका साङ्कर्य हो जायगा, क्योंकि यत्किश्चित् समानता सब मतोंमें है। [अर्थात् परमतप्रवेश माननेमें सम्पूर्ण सिद्धान्तका साम्य होना आवश्यक है यत्किश्चित्साम्य ही परमतप्रवेशका प्रयोजक नहीं हो सकता।] सम्पूर्ण सिद्धान्तकी समानता तो प्रकृतमें भी नहीं है। [ भेद दिखलानेके लिए दोनों मतोंको दिखाते हैं-] कारण कि विज्ञानवादी (बौद्ध) विज्ञानको क्षणिक और अनेक तथा विपयोंको उससे अभिन्न मानता है। तत्वद्रष्टा (वेदान्ती) तो विज्ञानको नित्य, अद्वितीय एक तथा विपयोंको उसमें अध्यस्त और उससे पृथक् तथा अर्थक्रियासमर्थ-व्यवहारसम्पादनमें पट्ट-और उनका अबाधित स्थायित्व है, ऐसा मानता है।
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२५६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
चाऽवाधितं स्थायित्वमस्तीति चदति। अद्वितीयं हि संवेदनम्, सर्वत्र अत्यभिज्ञानात्। घटसंवित्पटसंविदिति भेदावभासो विपयोपाधिको न स्वाभाविक:। अद्वितीयत्वादेव संविदोऽपि नित्यत्वम्। न च संविद्विपयावभिन्नौ, ग्रत्यक्त्वाप्रत्यकृत्वरूपेणाऽनुवृत्त- व्यावृत्तरूपेण चाऽत्यन्तविलक्षणत्वाद्। विपयाणां च पृथगर्थक्रियासामर्थ्य- मनुभवसिद्धम्। स्थायित्वं च प्रत्यभिज्ञानाद्वगन्तव्यम्। तस्माचतन्येऽ- हङ्काराद्यध्यासेऽपि नास्ति मतसाङ्गर्यमिति सिद्धम्। नन्वित्थं विज्ञानवादी मनुते- सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः । अन्यच्ेत् संविदो नीलं न तद्भासेत संविदि॥
[वेदान्तमतका समर्थन करते हैं-] संवेदन-अनुभव-अद्वितीय एक है, क्योंकि उसका सर्वत्र प्रत्यभिज्ञान-एक-सा ज्ञान-होता है। घटज्ञान एवं पटज्ञान ऐसा भेदज्ञान तो घट, पट आदि विषयके कारण औपाधिक है स्वाभाविक नहीं है। और अद्वितीय होनेसे ही ज्ञानका भी नित्यत्व सिद्ध होता है। संवित्-ज्ञान- और विषय अभिन्न नहीं है, क्योंकि दोनों प्रत्यक्त्व और अप्रत्यकृत्वरूपसे तथा अनुवृत्त तथा व्यावृत्तरूपसे अत्यन्त विलक्षण हैं। [ चैतन्यात्मक संवित् प्रत्यक् अक्षररूप तथा मालामें सूत्रकी तरह सर्वत्र व्याप्त है और विषय वाह्यरूप तथा प्रत्येक परस्पर भिन्न-भिन्न हैं] और विपयोंकी पृथक व्यवहार सम्पादनसामर्थ्य अनुभवसे सिद्ध ही है। और स्थायित्व प्रत्यभिज्ञा ज्ञानसे ही सिद्ध है, इसलिए चतन्यमें अहक्काराध्यासके माननेसे भी मतसाङ्कर्य नहीं हो सकता। [ पुनः विज्ञानवादी वौद्धमतकी समानता दिखलाते हैं-] विज्ञानवादी बौद्ध ऐसा स्वीकार करता है- . नील (विषय) और उसका ज्ञान दोनोंका अमेद है, क्योंकि दोनोंके साथ-साथ ही उपलम्भ-प्रकाश-का नियम है (अर्थात् नीलादि विपय और उनका ज्ञान साथ-साथ उपलठंध होते हैं। विषयके विना ज्ञान नहीं होता और ज्ञानके बिना विषय नहीं। अतः उनका अमेद मानना उचित है। यदि संवित् (विज्ञान) से नील भिन्न होता, तो उसका विज्ञानमें भान
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २५७
भासते चेत् कुतः सर्व न भासेतैकसंविदि। नियामकं न सम्बन्धं पशयामो नीलतद्वियो:॥ संविज्जनकत्वमेव नियामकः सम्बन्ध इति चेद्, न; इन्द्रियस्याऽपि तज्नकस्य विषयत्वप्रसङ्गात्। तस्मादभेद एव नीलतद्वियोः । 'अहगिद जानामि' इति ज्ञातज्ञेयज्ञानानि विविक्तस्व्ररूपाणि परस्परं सम्बद्धान्यनुभृयन्ते इति चेट्, न; क्षणिकानां सम्बन्धानुपपत्तेः । स्थायित्वे हि ज्ञातज्ञेययोजि-
(प्रकाश) नहीं होना चाहिए। यदि [ भिन्न होनेपर भी ] भासित होता है, तो एक ही विज्ञानगें सब कुछ क्यों नहीं भासित हो जाता, क्योंकि नील और नीलविज्ञानका नियामक सग्बन्ध तो कोई दीख नहीं पड़ता। [ यदि नील और नीलवुद्धि पस्पर भिन्न दो पदार्थ हैं, तो इन दोनोंका सम्बन्ध कोई-न-कोई अवश्य होगा। यदि सम्बन्धके बिना भी नीलबुद्धिमें नील भासित होता है, तो नील ही क्यों भासित होता है? सभी पदार्थ नीलवुद्धिमें ही वयों नहीं भासित होते, क्योंकि ऐसा कोई नियामक सम्बन्ध तो है नहीं, जिससे ऐसा नियम किया जा सके कि नीलवुद्धिमें नील ही भासित होता है, दूसरा पदार्थ नहीं। अतः यही मानना होगा कि नील पदार्थ और नीलवुद्धि एक ही वस्तु हैं।] ज्ञानका जनक नील है, अतः संविज्जनकत्व सम्बन्ध ही नियम करनेवाला सम्तन्ध होगा, यह मानना भी नहीं वनता, क्योंकि ज्ञानकी जनक इन्द्रियाँ भी हैं, अतः उनमें भी विपयत्व होनेका प्रसङ्ग आ जायगा [यदि बौद्धमतमें ज्ञानजनकत्वरूप सम्बन्ध तत्-दूत ज्ञानकी विपयताका नियामक माना जाय, तो चक्षुरादि इन्द्रियाँ भी नीलादिज्ञानकी जनक होती ही हैं, इसलिए उनमें भी नीलादिज्ञानकी विषयता चली जायगी। इसलिए नीलविपय और नीलज़ान-इन दोनोंमें अभेद ही हे, यह वौद्धोंका भाव है ]। झक्का-'मैं इसको जानता हँ' इस प्रत्यक्ष अनुभवसे ज्ञाता, विपय और ज्ञान ('अहम्' प्रतीतिसे ज्ञाता और 'इदम्' से विपय तथा 'जानामि' से ज्ञान) ये तीनों अंश पृथक-पृथक् स्वरूपवाले एक दूसरेसे सम्बन्ध रखते हुए अनुभवमें आते हैं [ इससे विषय और ज्ञानका अभेद मानना अनुभवविरुद्ध है, अन्यथा 'जानामि' (जानता हूँ) या 'इदम्' (इसको) इन दो पदोंमें से एक ही पदके देनेसे ज्ञान और ज्ञेय दोनोंका बोध होना चाहिए और क्रियाकर्मभावकी- आस्यग्राहकत्वकी-प्रतीति नहीं होनी चाहिए ]।
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२५८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
ज्ञासान्तरोत्पन्नज्ञानक्रियाद्वारा सम्बन्धो युज्येत, स कर्थ क्षणिकयोः स्यात् ? तस्मादेवं कल्पयितव्यम्-ग्रथमं तावदहमिति इदमिति च जानामीति च ज्ञानत्रयं तत्तदाकारोपसतं क्रमेणोत्पन्नम्: ततः प्रथमद्वितीयज्ञानाख्यवासना- वासिताद् वृतीयज्ञानात् तदनुरूपमाकारत्रयोपसुतं ज्ञानान्तरमुत्पन्नमिति। एवं
समाधान-नहीं-उपर्युक्त कथन युक्त नहीं है, क्योंकि क्षणिक पदार्थोंका सम्बन्ध नहीं हो सकता है। पदार्थोंके स्थायी होनेपर ही जाता* तथा ज्ेयका जिज्ञासासे उत्पन्न ज्ञानक्रिया-वाह्य तथा आभ्यन्तर इन्द्रियोंके व्यापार-द्वारा ही सम्बन्ध हो सकता है, वह सम्बन्ध क्षणिक पदार्थोंका किस प्रकार होगा? [वौद्ध 'इदमहं जानामि' (मैं इसे जानता हूँ) इस अनुभवकी उपपत्ति दिखलाता है-] इसलिए ऐसी कल्पना करनी चाहिए-[ यद्यपि अनुभवमें 'मैं' 'इसे' 'जानता हूँ' इस प्रकार तीनों पृथक्-पृथक होते हुए भी परस्पर सम्बद्ध प्रतीत होते हैं, तथापि क्षणिक होनेसे सम्वन्ध तो इनमें वन नहीं सकता और ज्ञानमें नीलादि विषयका प्रतिभास निर्विवाद है। इसकी उपपत्ति बतलाना सबको अनिवार्य है, अतः प्रतिभासकी उपपत्तिके लिए आगे लिखी कल्पना ही उपयुक्त है] 'मैं इसको जानता हूँ' ऐसा परस्पर सम्बद्ध एक ज्ञान नहीं होता है, किन्तु प्रथम 'मैं' यह ज्ञान, अनन्तर 'इसको' यह द्वितीय ज्ञान और तदनन्तर 'जानता हूँ' यह तृतीय ज्ञान होता है। इस प्रकार 'मैं' 'इसको' 'जानता हूँ'-इन तीनों आकारोंसे व्याप्त भिन्न-भिन्न तीन ज्ञान क्रमसे एक दूसरेके पीछे उत्पन्न होते हैं। तदनन्तर प्रथम और द्वितीय ज्ञानरूपी वासनासे वासित हुए तृतीय ज्ञानसे इसके अनुरूप तीन आकारवाला अतिरिक्त ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार प्रक्रिया माननेसे 'क्षणिक
- ज्ञान और विषय-ज्ञेय-के अभेद या भेदके विवादरूप प्रकरणसे तथा विवरण- ग्रन्थके 'स्थायित्वे हि विज्ञानविपययोः क्रियानिमित्त०' इत्यादि पाठसे 'ज्ञातृ' इस पाठकी अपेक्षा 'ज्ञान' यह पाठ अच्छा मालम होता है। आगे स्वयं विवरणप्रमेयसंग्रहकार भी लिखते हैं- 'ज्ञानज्ञेययोः सम्वन्धानिरूपणेन० इत्यादि' अथवा इस मतमें क्षणिक विज्ञानसे अतिरिक्त चेतन कुछ नहीं है और चेतन ही प्रमाता-ज्ञाता-है, इसलिए ज्ञान और ज्ञातृका अमेद मान- कर ज्ञानके स्थानमें ज्ञातृपदका निवेश किया गया है। यही कारण है कि ज्ञातासे ज्ञेयका सम्बन्ध दिखलाया गया है। ज्ञानके साथ ज्ञेयसम्बन्ध दिखलानेका तात्पर्य मी चेतनके साथ ही विषय- सम्बन्ध दिखलानेमें है।
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अध्यासविचार ] भापांनुवांदसहितं २५९
सति क्षणिकज्ञानमेव विपयाकारमित्यभ्युपेयम्। अन्यथा ज्ञानज्ञेययो: सम्व- न्धानिरूपणेन ज्ञेयं न प्रतीयेत। न च ज्ञानक्षणिकत्वे विवदितव्यम्। यथा नीलज्ञानं नीलस्य पीतादिव्यावृत्तिमपि बोधयति तथा वर्त्तमानत्वेनाऽव- भासमानं ज्ञानं स्वस्य भूतभविष्यत्कालद्वयसम्बन्धव्यावृत्तिमपि बोधयि- ष्यति। ततो ज्ञानस्य क्षणिकत्वं प्रत्यक्षसिद्धमिति। अत्रोच्यते-न ज्ञानं क्षणिकम्, प्रतिक्षणं स्वरूपभेदानवभासात्। अति- सादश्याद्ज्ेदानवभास इति चेद्, न; विकल्पासहत्वात्। किं संविद्धर्मों
ज्ञान ही विषयका आकार है' ऐसा मानना पड़ेगा, नहीं तो ज्ञान और ज्ञेयके सम्बन्धका निरूपण न हो सकनेसे ज्ञयकी प्रतीति ही नहीं होगी। [ तात्पर्य यह है कि ज्ञान और ज्ञेयका आगन्तुक सम्बन्ध बन नहीं सकता, अतः उनमें स्वाभाविक अभेद ही मानना चाहिए, नहीं तो विषयके ग्रतिभासकी उपपत्ति नहीं हो सकेगी। ] और ज्ञानको क्षणिक माननेमें विवाद तो करना ही नहीं चाहिए (अर्थात् ज्ञान क्षणिकही है, इसमें विवादका अवसर नहीं है)। [ज्ञानकी क्षणिकताका साधन करते हैं-] जैसे नीलज्ञान नीलका पीतादिसे भेद भी दिखलाता है, वैसे ही वर्तमानरूपसे प्रतीयमान ज्ञान अपने भूत तथा भविष्य दोनों कालोंके सम्बन्धका अभाव भी प्रकट करेगा। इससे ज्ञानकी क्षणिकता ग्रत्यक्ष अनुभवसे सिद्ध होती है। [ इस 'न चेत्थं विज्ञानवादी मनुते' से लेकर 'प्रत्यक्षसिद्धमिति' तकके प्रवन्धसे प्रतिपादन किये गये वौद्धमतका अगले ग्रन्थसे खण्डन करते हैं-] इस शक्कापर उत्तर कहा जाता है-ज्ञान क्षणिक नहीं है, क्योंकि प्रतिक्षण ज्ञानके स्वरूपभेदकी प्रतीति नहीं होती। [ यदि ज्ञान क्षणभर ही टिकनेवाला होता, तो दूसरे क्षणमें हुए ज्ञान और पूर्वक्षणमें हुए ज्ञानमें परस्पर स्वरूपभेदकी प्रतीति होती, परन्तु ऐसा अनुभवमें आता नहीं है, अतः पूर्वोत्पन्न ज्ञान ही द्वितीयादि क्षणमें भी स्थायी रहता है, इससे स्व्ररूपमेदका प्रसङ्ग ही नहीं आता।] 'अत्यन्त सदश होनेसे स्वरूपभेदकी प्रतीति नहीं हो सकती' यह समाधान मी ठीक नहीं है, क्योंकि यह समाधान विकल्पोंको नहीं सह सकता [प्रतिपादकी समर्थक युक्तियोंका समन्वय न हो सकना ही विकल्पासहत्व कहलता है ] क्या ज्ञानका धर्म भेद है और वह भेद दूसरे
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२६० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, चणंक १
ज्ञानान्तरगम्यश्च भेदः किं वा संवित्स्वरूपभूतस्तयैव संविदा वेद्यः १ आद्येऽपि धर्मिप्रतियोगिभूतयोः संविदो: संविदन्तराविषयत्वे तयोर्भेदग्रहो न सिध्येत। विषयत्वे वा धर्मिप्रतियोगिभेदाख्यत्रितयमपि भेदसंवेदने कल्पितं तद- भिन्नं च स्यात्। द्वितीये संवित्स्वरूपभूतो भेद: सादृश्यान्नाऽवभासत इत्युक्ते संविदेव नाडवभासत इत्युक्तं स्यात्, ततो जगदान्ध्यप्रसङ्ग:। अथाऽपि संविदां
ज्ञानसे जाना जा सकता है? अथवा ज्ञानका स्वरूप भेद है और वह भेद उसी ज्ञानसे प्रतीत होता है: प्रथम विकल्प माननेमें भी यदि धर्मी और प्रतियोगीरूप दो ज्ञान भेदके ग्राहक दूसरे ज्ञानके विषय न माने जायँ, तो उन दोनोंके भेदका ग्रहण ही सिद्ध नहीं होगा। [ भेद दो पदार्थोंके विना नहीं हो सकता, इसलिए दो ज्ञानोंमें ही भेद होगा, जिस ज्ञानका भेद धर्म है, वह ज्ञान धर्मी हुआ और जिस ज्ञानका वह भेद है वह ज्ञान प्रतियोगी हुआ। यदि ये दो ज्ञान भेदग्राहक अतिरिक्त तृतीय ज्ञानके विषय न माने जायँ, तो धर्मिज्ञानके न होनेसे धर्मभृत भेदका ज्ञान कैसे होगा ? इससे ज्ञानकी क्षणिक- ताका साधक भेद ही सिद्ध नहीं हो सकता, यह तात्पर्य हुआ।] यदि अन्य ज्ञानके विषय वे होते हैं, ऐसा माना जाय, तो धर्मी, प्रतियोगी और भैद ये तीनों भेदज्ञानमें कल्पित होंगे और भेदज्ञानसे अभिन्न होंगे। [ तात्पर्य यह है कि केवल मेदमात्र तो अतिरिक्त ज्ञानका विषय नहीं होगा, किन्तु धर्मी और प्रति- योगीसे विशिष्ट ही मेद ज्ञानका विपय होगा; इससे धर्मी और प्रतियोगीभूत ये दोनों ज्ञान तथा भेद तीनों विषय हुए। विज्ञानवादी बौद्धके मतमें वाह विषय नहीं है, सब ज्ञानसे कल्पित ही हैं, इसलिए ये तीनों भी भेदज्ञानसे ही कलपित हुए। और जैसे ज्ञानसे कल्पित घटादिविषय ज्ञानसे अभिन्न माने जाते हैं, वैसे ही भेदज़ञानसे कल्पित प्रकृत धर्मी और प्रतियोगीभूत दोनों ज्ञान और मेद तीनों भेदज्ञानसे अभिन्न हो जायँगे। इस प्रकार अभेद हो जानेपर भेदसिद्धिमें कुठाराघात हो जानेसे ज्ञानकी क्षणिकता नहीं वन सकती। ] द्वितीय कल्पमें ज्ञानका स्वरूप ही भेढ है और वह अतिसादृश्यसे प्रतीत नहीं होता है, इसका तात्पर्य तो यही होगा कि ज्ञानका स्वरूप ही प्रकाशित नहीं होता है, ऐसी दशामें ज्ञानस्वरूपमें प्रकाशित होनेवाला सारा प्रपश्च ही प्रकाशित नहीं होगा। [ इसे आप माननेको उद्यत नहीं होंगे। अतः ज्ञानमेद वन ही नहीं सकता,
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अंध्यासविचार] भापानुवादसहित २६१
सादृश्यनिर्वाहाय भेदोऽङ्गीक्रियत इति चेत्, सादृश्यस्य मानहीनत्वादैक्याव- भासविरुद्धत्वाच। न च वाच्यमैक्यावभासस्य भ्रमत्वान्न सादृश्यविरोधित्वं अरत्युतक्यभ्रम एव भिन्नेपु सादृश्यमन्तरेणाऽनुपपन्नस्तत्कल्पक इति, अन्यो- न्याश्रयत्वात्। संविदां भिन्नत्वे सादश्ये च सिद्धे सत्यैक्यावभासस्य भ्रम- त्वसिद्धिस्तत्सिद्धौ चेतरसिद्धिरिति। अथ मतम्-सादृश्यस्य मानहीनत्वमानचिरोधित्वयोः सिद्धाचै- क्यप्रत्ययस्य प्रमाण्यसिद्धिस्तत्सिद्धावितरसिद्धिरिति तुल्यं तवापीतरेतरा- श्रयत्वमिति, तन्न; ऐक्यवोधिकाया: प्रत्यभिज्ञाया मया स्वतःप्रामा- ण्याङ्गीकारात्। ननु केयं प्रत्यभिज्ञा नाम १ न तावदेकस्याऽतीतचर्त्तमानकालद्वयसंबन्ध-
इससे ज्ञानकी क्षणिकता बहुत दूर चली गई। ] यदि कहा जाय कि ज्ञानोंके परस्पर साहश्यकी सिद्धिके लिए भेद मानना आवश्यक है, तो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि ज्ञानोंका सादृश्य माननेमें कोई प्रमाण नहीं है और ज्ञानोंकी अनुभयमान एकताके साथ विरोध भी है। और ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि 'एकताकी प्रतीति भ्रममूलक है' इससे सादश्यका विरोध नहीं हो सकता, प्रत्युत परस्पर भिन्न-भिन्न ज्ञानोंमें साहश्यके बिना नहीं उपपन्न होता हुआ एकता- भ्रम ही साहश्यकी कल्पना करनेवाला है, क्योंकि ऐसा माननेमें अन्योन्याश्रय दोप आजाता है। [अन्योन्याश्रय दिखलाते हैं-] ज्ञानोंके परस्पर भिन्न होने तथा सादश्यकी सिद्धि होनेपर ही एकताकी प्रतीतिको भ्रम कह सकते हैं और एकता- अ्रमके सिद्ध होनेपर ही भेढ तथा सादृश्यकी सिद्धि हो सकती है। यदि यह मानो कि 'जव सादृश्यमें प्रमाणहीनता वा प्रमाणविरोध सिद्ध हो जाय तब एकताज़ान प्रमाज्ञान कहा जा सकता है और जब एकताज्ञानकी प्रमाण द्वारा सिद्धि प्राप्त हो जाय, तब दूसरे पक्षकी सिद्धि होगी, इस प्रकार तुम्हारे मतमें भी इतरेतराश्रय दोप समान ही है, तो यह मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि एकताको सिद्ध करनेवाली प्रत्यभिज्ञा मेरे मतमें स्वतःप्रमाण है [-इसकी सिद्धिके लिए प्रमाणान्तरकी आवश्यकता नहीं है, जिससे कि उपर्युक्त दोपका अवसर हो ]। [प्रतिवादी शक्का करता है-]यह प्रत्यमिज्ञा कौन पदार्थ है? यह नहीं
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२६२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
विषयं प्रत्यक्षज्ञानं प्रत्यभिज्ञा; प्रत्यक्षज्ञानस्य वर्त्तमानमात्रार्थग्राहित्वात्। पूर्वानुभवसंस्कारस हितादिदानीन्तनवस्तुप्रमितिकारणाज्जातस्य तस्य तथात्व- मिति चेदू, एवमप्यात्मनि सोऽहमिति प्रत्यभिज्ञा न सिध्येत्। नित्ये स्वयं- प्रकाशे तस्मिन् संस्कारस्य जन्यज्ञानस्य चाऽसम्भवात्। नाऽपि स्वरूपज्ञान- मेव प्रत्यभिज्ञा, तस्य प्रदीपप्रभावद्वर्तमानप्रकाशिनः पूर्वांपरपरामर्शात्म- कत्वायोगात्। अस्मन्मते तु सोऽहमित्याकारद्वयोपसुतं ज्ञानद्वयमेतन्न प्रत्यभिज्ञा। तस्मादनया दुर्निरूपया प्रत्यभिज्ञया कथमैक्यसिद्धिः ?
कह सकते कि एक ही घट, पटादि विषयका भूत और वर्तमान दोनों कालके सम्बन्धको विषय करनेवाला प्रत्यक्षज्ञान प्रत्यभिज्ञा है, क्योंकि प्रत्यक्षज्ञान वर्तमान विषयको ही ग्रहण करता है। 'पूर्वानुभवसे-भूतकालमें हुए प्रत्यक्षसे-उत्पन्न संस्कारसे सहकृत वर्तमानकालिक वस्तुके चक्षुःसन्नि- कर्षादि प्रमाज्ञानके कारण द्वारा उत्पन्न हुआ प्रत्यक्ष उक्त प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा कहा जा सकता है' यदि ऐसा कहो, तो आत्माको विषय करनेवाली 'वह मैं हूँ' इस प्रत्यभिज्ञाकी सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि नित्य और स्वयंप्रकाश आत्मामें संस्कार तथा जन्य ज्ञानका सम्भव नहीं है। [ विज्ञानस्वभाव आत्मा क्षणिक तो नहीं है वह स्थायी अर्थात् नित्य है और स्वयंप्रकाश होनेसे किसी अतिरिक्त ज्ञानका विषय भी नहीं है, इसलिए नित्य स्वयंप्रकाश विज्ञानस्वरूप होनेसे उसका नाश होगा नहीं, इससे उसमें संस्कार भी नहीं हो सकता। इसलिए जब आत्मविषयक कोई अतिरिक्त वर्तमानकालिक प्रमाकारण हो ही नहीं सकता, तब जन्यज्ञान-प्रत्य- भिज्ञा-का विषय आत्मा कैसे होगा, यह तात्पर्य है ] स्वरूपज्ञान ही अत्यभिज्ञा है, ऐसा भी नहीं मान सकते, क्योंकि दीपककी प्रभाके समान वह स्वरूपज्ञान वर्तमानका ही प्रकाश करता है, पूर्व और अपर-भूत और वर्तमान-दोनों कालोंका परामर्श नहीं कर सकता। हमारे (विज्ञानवादीके) मतमें तो 'सोडहम्, (वह मैं) इस प्रकार (वह और मैं) इन दो आकारोंसे व्याप्त दो ज्ञान हैं, प्रत्यभिज्ञा नामक एक ज्ञान नहीं है। इसलिए जिस प्रत्यभिज्ञाका निरूपण नहीं बन सकता, ऐसी प्रत्यभिज्ञासे विज्ञानकी एकता कैसे सिद्ध हो सकती है? [उपर्युक्त पूर्वपक्षका उत्तर देते हुए प्रत्यभिज्ञाका साधन करते हैं-]
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अध्यासविचार ] भापांनुवादसहित २६३
उच्यते-केवले चिदात्मनि जन्यज्ञानतत्संस्कारयोरसम्भवेऽप्यन्त :- करणविशिष्टे तत्सम्भवादुक्तप्रत्यभिज्ञा किंन स्यात् ? न च विशिष्टस्य अत्य- भिज्ञाविपयत्वे तस्यैव प्रत्यभिज्ञातृत्वमपीति कर्मकर्तृत्वविरोध: शङ्कनीय:, सर्वादिनां देहव्यतिरिक्ताद्यनुमानविपयतयाऽऽत्मनि कर्मकर्तृभावस्य सम्प्रतिपन्नत्वात्। अथ मतम्-नाऽनुमानादौ विपयस्य कर्मकारकत्वम्, अतीतादिवस्त्वनु- माने विषयस्याऽविद्यमानस्य ज्ञानजनकत्वायोगात्। विपयत्वं त्वविद्यमा- नस्याऽपि कर्थचित् सम्भविष्यति, ज्ञानस्य तदाकारत्वात्। ततोऽनुमानादौ
यद्यपि केवल शुद्ध चिदात्मामें जन्यज्ञान तथा संस्कार नहीं वन सकते, तथापि अन्तःकरणविशिष्ट आत्मामें दोनोंका सम्भव है, इसलिए सव अन्तःकरण- विशिष्ट आत्मविषयक उक्त प्रत्यभिज्ञा क्यों नहीं हो सकती है? [ 'सोऽहम्' इसी प्रत्यभिज्ञामें अन्तःकरणविशिष्ट ही आत्मा विपय होता है। ] विशिष्ट ही आत्मा प्रत्यभिन्ञाक्का विषय (कर्मकारक) और वही (विशिष्ट ही) प्रत्यभिज्ञाका कर्ता होगा, इससे एकको ही कर्ता और कर्म होना विरुद्ध होगा, इस प्रकार शङ्का भी नहीं कर सकते, क्योंकि इस वातको सभी वादी स्वीकार करते हैं कि देह- व्यतिरिक्त आत्मा आदि अनुमानका विषय होनेसे उनमें कर्तृकर्मभाव दोनों होते हैं। ['आत्मा देहेन्द्रियादयतिरिक्तः, आत्मत्वात् चेतनत्वाद्वा' इत्यादि अनुमानका विषय- कर्मकारक-भी आत्मा ही है और अनुमाता अर्थात् अनुमान करनेवाला कर्ता भी आत्मा ही है, इससे आत्मामें कर्मकर्तृत्व दोनों भाव रहते ही हैं, अन्यथा आत्माका देहेन्द्रियादिसे भिन्न होना अप्रामाणिक हो जायगा ।] अनुमान आदि (प्रत्यक्षेतर) ज्ञानोंमें विषय कर्मकारक नहीं माना जाता है, क्योंकि भूतकालीन वस्तुके अनुमानमें अविद्यमान विपयको ज्ञान- जनकत्व नहीं वन सकता। [ज्ञानजनक ही कर्मकारक होता है, अतः कर्मका प्राधान्य होता है। अविद्यमान पदार्थ जनक (प्रधान) नहीं हो सकता, अतः भूत और भविष्यद् अनुमानके अनुरोधसे अनुमानका विषय कर्म नहीं माना जा सकता। विज्ञानवादी विपयत्व और कर्मत्वको एक समझनेवाले वादीको उत्तर देता है- विपय तो अविद्यमान वस्तु भी किसी-न-किसी प्रकार हो सकती है, क्योंकि ज्ञान तो तद्विपयके आकारवाला ही होता है। [ इसलिए ज्ञानके आकारंका समर्पक भी
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२६४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
कर्तृत्वमेव आत्मनः, प्रत्यक्षे तु विपयस्य ज्ञानजनकतया कर्मकारकत्वम्, ततो विरोधस्तदवस्थ इति, मैवस्; अन्तःकरणविशिष्टतयैवाऽऽत्मनः प्रत्यभि- ज्ञातृत्वं पूर्वापरकालविशिष्टतया च प्रत्यभिज्ञेयत्वमित्युपाधिभेदेनाऽविरोधात्। किमेतावता प्यासेन प्रत्यभिज्ञैतर मा भूदिति चेद्, न; सोऽहमिति अ्रत्य- भिज्ञाया: स्वानुभवसिद्धत्वात्। अविसंवादित्वेन च भ्रान्तित्वायोगात्। यदुक्त्तम्-सोऽहमित्याकारद्वयोपसु तं ज्ञानदयमित,तस् ता ति विज्ञानं क्षणिकमित्यत्राऽपि ज्ञानद्वयग्रसङ्गेन विज्ञानस्य क्षणिकत्वासिद्धिप्रसङ्गात्।
विषय हो सकता है। कर्म तो ज्ञानजनक ही होता है, अतः कर्तृभूत आत्माके भी विषय होनेमें कोई वाधा नहीं है, परन्तु कर्म नहीं हो सकता। ] इससे अनुमान आदि ज्ञानोंका आत्मा कर्ता ही हो सकता है (कर्म नहीं), प्रत्यक्षज्ञानमें तो विषय ज्ञानका जनक माना जाता है, अतः प्रत्यक्षमें कर्मकर्तृत्वका विरोध ज्यों-का-त्यों बना ही हुआ है, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अन्तः- करणविशिष्टरूपसे ही आत्मा प्रत्यभिज्ञाका कर्ता है और पूर्वापर-भूतवर्तमान- कालविशिष्टरूपसे आत्मा प्रत्यभिज्ञाका कर्म है, इस प्रकार उपाधिभेद द्वारा व्यक्तिभेद होनेसे आत्मामें कर्मकर्तृभावका विरोध नहीं आ सकता। [ उपाधिभेदसे एक ही व्यक्तिमें व्यक्तिभेदकी कल्पना करनेके लिए ] इतना परिश्रम क्यों उठाया जाय, इससे यही अच्छा है कि प्रत्यभिज्ञा ही न मानी जाय, ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि 'सोऽहं' (वह मैं हूं) इस प्रकारकी प्रत्यमिज्ञा अपने अनुभवसे सिद्ध है। और अविसंवादी (बाधित न होनेसे) भ्रम भी नहीं मान सकते। विज्ञान- वादीका यह भी कहना 'सोऽहम्' (वह मैं) इस प्रकारके दो आकारोंसे व्याप्त ये दो ज्ञान है, उचित नहीं है; क्योंकि ऐसा माननेपर विज्ञान क्षणिक है, इसमें भी (विज्ञान और क्षणिक, इस प्रकार दो आकार होनेसे अर्थमेदके प्रसङ्गसे) दो ज्ञानोंका प्रसङ्क हो जायगा, अतः विज्ञानमें क्षणिकत्व सिद्ध नहीं हो सकेगा। एकमात्र विज्ञानको ही माननेवाले (विज्ञानवादी) के मतमें क्षणिकत्व आदि धर्म अवास्तव (मिथ्या) ही हैं, यदि ऐसा मानो, तो 'सोऽहम्' (वह मैं हूं) इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभवके आधारपर स्थायित्व आदि धर्मोंको ही अवास्तव मानकर उनका स्वीकार कर लिया जाय, यही अच्छा होगा। [एकमात्र विज्ञानतत्त्व ही वास्तव है, इसमें विवाद न हो, उससे, अतिरिक्त सब कुछ कल्पित है। कल्पना
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित .२६५
विज्ञानमात्रवादिनां क्षणिकत्वादिधर्मा अवास्तवा एवेति चेत्, तर्हिं स्थायि- त्वादिधर्मा एवाडयास्तवा उपादीयन्ताम्: 'सोऽंहम्' इत्याद्यनुभवानुसारित्वात्। यञ्च प्राभाकरा मन्यन्ते-नैव 'सोडहम्'इति प्रत्यभिज्ञाविपयत्वेनाडय- मात्मा सिध्यति, किं तर्हि 'सोडयं घटः' इत्यादिग्रत्यभिज्ञाश्रयत्वेनेति १ तद- युक्तम्, पूर्वापरकालविशिष्टस्य क्षणमात्रवृत्तिम्त्यभिज्ञाश्रयत्वासम्भवेन ग्रत्य- भिज्ञानात् स्थायित्वासिद्धिप्रसङ्गात्। अथ मतम्-'मम संवेदनं जातम्'इतीदानीमनुस्मर्यमाणा पूर्वकालीना
अनुभवबलसे होती है-'सोऽहम्' (वह मैं हूँ) यह प्रत्यभिज्ञा भूत और वर्तमान कालसे सम्वन्ध रखती हुई अनुभवमें आती है, अतः उससे स्थायित्व सिद्ध होता है। विज्ञानकी क्षणिकतामें उक्त अनुभव नहीं वन सकता, अतः स्थायित्वकी ही कल्पना करनी उचित है ]। [ प्रभाकरके अनुयायी मीमांसकोंका खण्डन करनेके लिए उनके मतका अनुवाद करते हैं-] जो प्रभाकरमतानुयायी-मीमांसकैकदेशी-स्वीकार करते हैं कि आत्माकी सिद्धि 'सोऽहम्' (वह मैं हूँ) इस प्रत्यमिज्ञाका विषय होनेसे नहीं होती है, किन्तु 'सोडयं घटः' (वह यह घट है) इस प्रत्यभिज्ञाके आश्रयत्वरूपसे होती है। [ यदि आत्मा विषय माना जाय, तो घट, पट आदिकी भाँति उसमें दृश्यत्व और अनात्मत्वका प्रसङ्क आ जायगा, अतः घट, पट आदिसे विलक्षण ज्ञानाश्रयत्वसे ही आत्माका अनुसन्धान करना चाहिए, पूर्वपक्षका यह तात्पर्य है। अब उसका खण्डन करते हैं-] उनका मत भी अयुक्त है, क्योंकि पूर्व और अपर- भूत और वर्तमान कालसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा क्षणमात्र, रहनेवाली प्रत्यभिज्ञाका आश्रय नहीं हो सकता। इसलिए 'घटोऽयम्' (यह घट है) इत्यादि प्रत्यभिज्ञानसे (प्रत्यभिज्ञाके आश्रय होनेसे) स्थायित्वकी सिद्धि नहीं हो सकती। [ अर्थात् ज्ञानके बलसे प्रकाशित होनेवाली वस्तु ज्ञानका कर्म ही हो सकती है, उसका आश्रय नहीं। यदि कथंचित् उसे आश्रय मान लें, तो भी क्षणिक ज्ञानके आश्रय होनेसे अनुमित होनेवाले पदार्थमें क्षणिकत्व ही सिद्ध हो सकता है। पूर्व और अपर दोनों कालमें सम्बन्ध रखना सिद्ध नहीं हो सकता।] [ प्राभाकर प्रत्यभिज्ञाके विना भी स्थायित्वकी सिद्धि दिखलाता है-] यदि मान लिया जाय कि 'पहले मुझे ज्ञान उत्पन्न हुआ था' यह वर्तमान स्मरणमें ३४
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२६६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक
घटादिसंवित् स्वाश्रयं तदानीन्तनमात्मानं साधयति। स्मृतिश्व स्वाश्रयमि- दानीन्तनमात्मानं साधयति। ततश्र स्थाय्यात्मा सिध्यति न पुनरप्रामा- णिक 'सोऽहम् इत्यात्मविषयं प्रत्यभिज्ञानं किश्चित् कल्पनीयमिति। नैत- त्सारम्, स्मृतिपूर्वानुभवौ ह्यभिज्ञाद्वयवत्तत्कालीनमात्मानं यद्यपि साध- यतः, तथाप्येकस्याडस्याऽऽत्मनः कालद्वयसम्बन्धो न केनापि सिध्येत्। संविद्- द्वयसेव सम्बन्धस्याऽपि साधकमिति चेद, तहिं तथैव घटादिष्वप्यभिज्ञाद्वयेन आनेवाला [पूर्वकालिक ] घादिज्ञान अपने पूर्वज्ञानके आश्रय उस कालमें विद्यमान आत्माकी सिद्धि करेगा। और इस कालमें होनेवाली पूर्वानुभवकी स्मृति इस कालमें विद्यमान आत्माकी सिद्धि करेगी, इससे आत्माका स्थायित्व सिद्ध हो ही जाता है, इसके लिए 'सोऽहम्' (वह मैं हूँ) ऐसी आत्माको विषय करनेवाली किसी अतिरिक्त प्रत्यभिज्ञाकी प्रमाणशून्य कल्पना उचितनहीं है। [ तात्पर्य यह है कि 'मुझे ज्ञान हुआ था' इस प्रकारके स्मरणमें पूर्वकालिक अनुभव ही विषय होता है, इसमें विवाद नहीं है। और वह पूर्वानुभव बिना आश्रयके हो नहीं सकता और इस समयका आश्रय ही उस कालके अनुभवका आश्रय होता है, यह कहना सङत नहीं है; इसलिए उस आश्रयका पूर्वकालसे सम्बन्ध मानना उचित ही है। और इस कालमें होनेवाली उक्त स्मृति इस कालमें सम्बन्ध रखनेवाले आश्रयकी कल्पना करती है, इसलिए सिद्ध हुआ कि ज्ञानाश्रय आत्माका पूर्व और अपर कालसे सम्बन्ध सिद्ध होनेसे प्रत्यभिज्ञाके बिना भी आत्मामें स्यायित्व सिद्ध हो जाता है। ] यह कहना सारगर्भित (यथार्थ) नहीं है, क्योंकि यद्यपि स्मरण और पूर्वकालका अनुभव दो ज्ञानके सदृश अपने-अपने कालमें विद्यमान आत्माकी सिद्धि करते हैं, तथापि एक ही आत्माका पूर्व और अपर दोनों कालोंसे सम्बन्ध तो किसीसे भी सिद्ध नहीं हो सकेगा। [ज्ञानोंके क्षणिक होनेसे जैसे वर्तमान कालमें होनेवाले दो अनुभव पृथक्-पृथक् दो आश्रयोंकी कल्पना करते हैं, वैसे ही स्मरण और पूर्व अनुभव भी अपने-अपने कालसे सम्बन्ध रखनेवाले भिन्न-भिन्न दो आश्रयोंकी ही कल्पना कर सकते हैं। एकके ही पूर्व और अपर कालसे सम्बन्धकी कल्पना नहीं कर सकते। यह तभी सम्भव हो सकता है जब कि 'सोडइम्' इसे एक ही ज्ञान मान लिया जाय, परन्तु ऐसा मीमांसक मानता है नहीं। ] दो ज्ञान ही सम्बन्धका साधन करनेवाले हैं, यदि ऐसा भी मान लिया जाय, तो एक-सी युकि होनेके
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अध्यांसविचार ] भांपांनुवादसहित २६७
स्थायित्वसिद्धौ तत्सिद्धये प्रत्यभिज्ञा नाऽपेक्ष्येत। तद्दार्ढ्याय तत्र प्रत्यभिज्ञेति चेद्, एवमपि प्रकृते संविद्द्वयं किं साक्षात् सम्बन्धसाधकमुत प्रत्यभिज्ञा- मुत्पाद्य : आद्यऽपि न तावदेकैकं तत्साधक्रम्, एकैकस्य कालद्वयविशिष्टा - त्मन्यनाश्रितत्वाद्। नापि सम्भूय तत्साधकम्, अतीतानुभवस्य वर्त्तमान- स्मृतेश्र यौगपद्यायोगात्। द्वितीये स्थाय्यात्मविपयं सोऽहमिति प्रत्य- भिज्ञानं त्वयैवाङ्गीकृतं स्यात। न च वाच्यं न क्वचिदपि ज्ञानविपयत्व-
कारण घटादिमें भी दो ज्ञानोंसे स्थायित्वकी सिद्धि हो ही जायगी, फिर उसके लिए प्रत्यभिज्ञाकी अपेक्षा न होगी। [ मीमांसकका कहना है कि आत्माके स्थायित्वकी सिद्धिके लिए 'सोऽहम्' (वह मैं हूँ) ऐसी आत्म-विपयक प्रत्यभिज्ञाकी कल्पना व्यर्थ है, क्योंकि 'वटोडयम्' (यह घट है) यह घटविपयक प्रत्यभिज्ञा ही अपने आश्रयकी स्थायिता सिद्ध कर देगी। इसपर वेदान्तीका कहना है कि पूर्वोक्त प्रकारसे ज्ञानद्वय ही यदि स्थायित्व सिद्ध करता है, तो घटादिविपयक दोनों ज्ञानोंसे ही आत्माका स्थायित्व सिद्ध हो जायगा, फिर उसके लिए 'घटोऽयम्' (यह घट है) ऐसी प्रत्यभिज्ञाकी कल्पना व्यर्थ ही है। ] केवल स्थायित्वकी दृढ़ताके लिए प्रत्यभिज्ञाकी कल्पना की जाती है, ऐसा यदि मान लिया जाय, तो भी दो ज्ञानोंमें स्थायित्वसाधकत्व नहीं वन सकता, क्योंकि हम विकल्प करेंगे कि क्या वे दोनों ज्ञान [ पूर्वापरकालसे ] सम्वन्धके साक्षात्ं साधक हैं: अथवा प्रत्यमिज्ञाको उत्पन्न करके (उसके द्वारा) साधक हैं ? प्रथम कल्पके माननेमें भी एक-एक ज्ञान तो पूर्व और अपर कालसे सम्बन्धके साधक नहीं हो सकते। क्योंकि एक-एक ज्ञान पूर्व और अपर दोनों कालोंके साथ सम्बन्ध रखनेवाले आत्मामें आश्रित नहीं हैं। [ एक ज्ञान एक कालसे सम्बन्ध रखनेवाले आत्मामें आश्रित है, भिन्न कालविशिष्टमें नहीं, अतः कैसे कालदूय सम्बन्धके साधक हो सकते हैं। ] और दोनों मिलकर भी उसके साधक नहीं हो सकते, क्योंकि बीते हुए अनुभव और वर्तमान स्मरणका एक साथ रहना सम्भव ही नहीं हो सकता। द्वितीय कल्पमें स्थायी आत्माको विषय करनेवाली 'सोहम्' (वह मैं हूँ) इस प्रत्यभिज्ञाको तुमने स्वीकार कर ही लिया है। यदि आत्मा कभी भी ज्ञानका विषय नहीं होता है, तो
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विवरणंप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
मात्मनस्तत्कथ परत्यभिज्ञाविपयत्वमिति, 'मम संवेदनं जातम्'इति स्मृति- ज्ञानविषयत्वात्। यद्यप्यनेन स्मृतिज्ञानेन स्वोत्पत्तिकालीन आत्मा स्वाश्र- यत्वेनैव प्रकाश्यते न विषयत्वेन, तथापि स्मर्यमाणसंवेदनाश्रयभृतस्तत्सं- वेदनकालीन आत्मा विपयीक्रियत एव। अथोच्येत-स्मृत्या संवेदनमेव विषयीक्रियते, तच्च संवेदनं स्मृतं सत् स्वाश्रयमात्मानमाश्रयतयैव प्रत्याययि- व्यतीति। तदसत्, स्मृतिकाले संवेदनस्याविद्यमानस्य स्वाश्रयसाधकत्वा- योगात्। स्वयंत्रकाशमानं हि संवेदनमाश्रयं साधयति न तु स्मृतिविष- यतया परप्रकाश्यम्। अन्यथा धर्मादीनामपि परतःसिद्धानां स्वाश्रयात्म- साधकत्वप्रसङ्गात्। तस्मादतीतकालीन आत्मा स्मृतिविषय एवेत्यभ्यु- पेयम्। तथा च 'सोऽहम्' इति प्रत्यभिज्ञाऽपि आत्मानं विपयी-
प्रत्यभिज्ञाका विषय कैसे हो सकेगा? ऐसी शक्का भी नहीं कर सकते, क्योंकि 'मुझे ज्ञान हुआ था' इस स्मृतिज्ञानका आत्मा विपय ही है। यद्यपि इस स्मृतिज्ञानसे अपने (ज्ञानके) उत्पत्तिकालके आत्माका ही अपना (ज्ञानका) आश्रय होनेसे ही प्रकाश होता है, विषय होनेसे नहीं, तथापि स्मरणमें विषय हुए ज्ञानका आश्रय और उस ज्ञानकालमें विद्यमान आत्मा निरुक्त स्मृति- ज्ञानसे विषय किया ही जाता है। [ क्योंकि स्पतिज्ञान 'मुझे ज्ञान हुआ' इतना है, इसके विषयमें आत्मा और ज्ञान दोनों हैं ] यदि कहो कि स्मृति ज्ञानसे केवल पूर्वानुभव-ज्ञान-ही विषय किया जाता है, आत्मा नहीं; और वह ज्ञान स्मरणविषय होता हुआ अपने आश्रय आत्माको आश्रयत्वसे-आश्रय- रूपसे बोधित करता है, तो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि स्मरणके समयमें अविद्यमान ज्ञानको अपने आश्रयके साधन करनेका योग-अवसर-नहीं आ सकता। [स्मृतिमें आनेवाली अविद्यमान दीपज्वाला अपने आश्रय गृहादिका प्रकाश करते कहींपर भी नहीं देखी गईं है ] स्वयं प्रकाशित होनेवाला ही ज्ञान अपने आश्रयकी सिद्धि कर सकता है, स्मृतिका विषयं होकर दूसरेसे प्रकाशित होनेवाला ज्ञान नहीं सिद्ध कर सकता; अन्यथा दूसरेसे सिद्ध हुए धर्मादि भी अपने आश्रय आत्माके साधक हो जायँगे। इससे मानना ही होगा कि भूतकालविशिष्ट आत्मा स्मरणका विषय होता ही है। इससे 'सोऽहम्' (वह मैं हूँ) यह प्रत्यभिज्ञान भी आत्माको विषय करेगा ही; इस प्रकार
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित
करिप्यतीति ग्राभाकरैरप्यात्मविपयप्रत्यभिज्ञयैव संविदात्मनः क्षणिकत्वं निराकरणीयम्। अथैवं घटादिपु क्षणिकत्वं साध्येत-विमता उपान्त्यादयो घटसचाक्षणा: स्वस्वानन्तरक्षणभाविघटनाशव्यास्ा:, घटसत्ताक्षणत्वाद्, अन्त्यक्षणवद़िति। तन्न, चिमतो घटनाशक्षणो घटसत्तावान्, कालत्वात, संमतवदित्याभाससमा-
मभाकरके अनुयायी मीमांसकोंको भी आत्माको विषय करनेवाली प्रत्यभिज्ञाके चलपर ही ज्ञानस्वरूप आत्मामें क्षणिकत्वका निराकरण करना होगा। (अर्थात् प्रत्यमिज्ञाविरोधसे सादश्यकी कल्पना नहीं वन सकती, जिससे कि अति- सादश्यज्ञान भेदको छिपा सके। अतः ज्ञानमें स्थायित्व सिद्ध नहीं हो सकता, अतः प्रत्यभिज्ञाको एक ज्ञान ही मानना उचित है और पूर्व और अपर कालसे सम्बन्ध रखनेवाली प्रत्यभिज्ञाका कर्ता एक स्थायी चेतन ही हो सकता है। 'न च ज्ञानस्य क्षणिकत्वे विवदितव्यम्' इत्यादि ग्रन्थसे की गई ज्ञानकी प्रत्यक्षसिद्ध क्षणिकताका, इस प्रकार अनुभवसिद्ध प्रत्यभिन्ञाके साथ विरोध होनेसे, खण्डन हो गया। अब ज्ञानकी क्षणिकता दर्शानेके निमित्त दृष्टान्त की सिद्धि करनेके लिए घटादिकी क्षणिकताका अनुमान द्वारा साधन करते हैं-] अब हम (बौद्ध) आगे दिखलाए जानेवाले अनुमानसे क्षणिकता सिद्ध करेंगे- विवाद्ग्रस्त उपान्त्यादि घट सचाके क्षण अपने-अपने अनन्तर क्षणमें होनेवाले घटके विनाशसे व्याप्त हैं, घटकी सत्ताके क्षण होनेसे, अन्तिमक्षणके सदश। [तात्पर्य यह है कि सकलवादीके सम्मत विनाशके अधिकरण क्षणसे अव्यवहित पूर्वक्षणविशिष्ट सत्ता ही अन्त्यपदसे लेनी चाहिए, उस अन्तिम क्षणका अपनी- सत्ताके क्षणसे दूसरे क्षणमें विनाश हो जाता है, इस प्रकार अन्तिम क्षणसे अन्यवहित पूर्वक्षणकी सचाका विनाश उसके उत्तरवाले अन्तिम क्षणमें होगा, अतः सिद्ध हुआ कि उत्तर-उत्तर क्षण अपनी-अपनी पूर्व-पूर्वक्षणविशिष्ट सत्ताके विनाशसे व्याप्त हैं। इससे ज्ञात होता है कि सचावान्का उत्तर क्षणमें विनाश अवश्य होता है, अतः घटादिकी क्षणिकता सिद्ध हुई। अर्थात् अपने सत्ताक्षणसे अव्यवहित दूसरे क्षणमें विनष्ट हो जाना ही क्षणिकत्व है। 'सोडयं घटः' इत्यादि ऐक्यप्रतीति अतिसादृश्यमहिमासे भ्रम है। इस दष्टान्तसे ज्ञान भी सत्त्वविशिष्ट है, अतः वह भी घटादिके समान क्षणिक सिद्ध हुआ।]
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७० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूंत्र १, वर्णक है
नत्वात्। अत्र घटाभावानुभवविरोध इति चेत्, तर्हि क्षणिकत्वानुमानेऽपि 'सोजयं घटः' इति प्रत्यभिज्ञाविरोधोऽस्त्येव। ननु सर्वे भावा: क्षणिकाः, अर्थक्रियाकारित्वाद्, व्यतिरेके शशविपाणवत्। विपक्षे स्थायिनोऽर्थक्रियानुपपत्तिर्वाधिका। न च स्थायिन एव पदार्थस्य निमित्तसंयोगादन्यथाभूतस्याऽर्थक्रियापूर्वकं कार्यमुत्पादयितुं सामर्थ्यं न क्षणिकस्येति वाच्यम्, किमसौ स्थायी पदार्थ एकमेव कार्यमुत्पादयेद् उत [उक्त अनुमानका विपक्षी अनुमान दर्शाते हैं-ऐसा नहीं है, क्योंकि विवादग्रस्त घटनाशक्षण, घटकी सत्तावाला है, काल होनेसे, सम्मतके तुल्य, इस अनुमानाभासके तुल्य ही पूर्व अनुमान है। [ तात्पर्य यह है कि जिस तरह वौद्धने अन्तिम क्षण- विशिष्ट सत्ता अथवा सत्ताविशिष्ट अन्तिम क्षणका उसके अव्यवहित दूसरे क्षणमें विनाश होता है, इस दष्टान्तसे व्याप्ति बना ली कि 'उत्तर-उत्तर क्षण पूर्व-पूर्वके विनाशाधिकरण हैं, क्षणाविशेष होनेसे, इसी तरह प्रतिवादी हम (वेदान्ती) उसके अनुमानमें अनुकूलतर्कशन्यता दर्शानेके लिए जैसे घटसत्ताविशिष्ट क्षणमें घटसत्ता है इसमें किसीको भी विवाद नहीं हो सकता, इसको दंष्ान्त लेकर कालाविशेषसे घटसत्ताविनाशविशिष्ट क्षणमें भी घटसत्ताका अनुमान करेंगे, इस अनुमानाभास (अनुकूलतर्कशून्य) के तुल्य ही उसका भी अनुमान है। ] यदि कहो कि इस वेदान्तीके दर्शाये अनुमानमें घटाभावका अनुभव ही स्पष्ट विरोध है, तो हम भी कहेंगे कि बौद्धके क्षणिकत्वसाधक अनुमांनमें 'सोऽयम्' इस प्रत्यभिज्ञाके साथ विरोध स्पष्ट ही है। [ प्रकारान्तरसे क्षणिकत्वसाधक दूसरा अनुमान दिखलाते हैं-] सभी भाव-पदार्थ-क्षणिक हैं, अर्थक्रियाकारी होनेसे, इसके विपरीत शशश्रुङ्गके तुल्य। [ यहांपर शशशृङ्ग व्यतिरेकी दष्टान्त है अर्थात् जो क्षणिक नहीं है, वह व्यवहारका प्रयोजक नहीं है, जैसे खरगोशका सींग। और घट- पटादि सत्वशील पदार्थ व्यवहारके उत्पादक देखे जाते हैं, अतः वे सब क्षणिक हैं ] इसके व्यतिरेक (क्षणिकत्वाभाव) की सिद्धिमें स्थायी पदार्थका व्यवहारप्रयोजक न हो सकना ही बाधक है। व्यवहारपूर्वक कार्य उत्पन्न करानेकी सामर्थ्य निमित्तकारणके सम्पर्कसे अन्यथाभावको प्राप्त हुए स्थायी .,१ अर्थक्रिया=व्यवहार.।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २७१
युगपढनेकानि अथवा क्रमेणानेकानि ? तत्र प्थमद्वितीययोः कृतं स्थायि- त्वेन, सकत्कार्योत्पादनस्य क्षणिकेनैव सिद्धेः। न तृतीया, समर्थस्य क्षेपायोगात्। अतो भावानामेकस्मिनेव क्षणेऽर्थक्रियाकारित्वलक्षण- त्वमिति। नैतद्युक्तम्, त्वन्मतेरऽ्र्थक्रियाया दुर्निरूपत्वात्। किमर्थ- क्रिया नाम संविदां स्वगोचरज्ञानजननं किं वा क्षणान्तरोत्पादनम्? आद्येऽपि स्व्सन्ताने तज्जननं पुरुपान्तरसन्ताने वा सर्वज्ञसन्ताने वा ? नाद्य:, संविदां स्वग्रकाशत्वेन तदसम्भवात्। अस्तु तहिं द्वितीय:,
पदार्थको ही है; क्षणिक पदार्थको नहीं; ऐसा कहना भी नहीं बन सकता, क्योंकि क्या यह स्थायी पदार्थ एक ही कार्यको उत्पन्न करेगा? या एक साथ ही अनेक कार्योको अथवा क्मशः अनेक कार्योंको? उनमें प्रथम और द्वितीय विकल्प माननेमें पदार्थको स्थायी मानना व्यर्थ ही है, क्योंकि कार्यकी उत्पत्ति क्षणिकसे ही सिद्ध हो सकती है। तीसरा विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि कार्योतपादनमें समर्थके कालका विलम्त नहीं हो सकता। (अर्थात् यदि एक ही स्थायी पदार्थ अनेक कार्यके उत्पादनमें समर्थ है, तो वह अनेक कार्योंको एक साथ ही क्यों नहीं उत्पन्न करेगा? जब कार्यकी कारणसामग्री उपस्थित है तब उसको रोकनेवाला कौन है? जो क्रमिक कार्योत्पत्ति करावे।) इसलिए भाव-पदार्थो-का लक्षण एक ही क्षणमें अर्थक्रियाकारित्वरूप ही हो सकता है। [खण्डन करते हैं-] ऐसा कहना भी युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि तुम्हारे मतसे अर्थक्रियाका निरूपण नहीं हो सकता। क्या अर्थक्रियाका मतलब ज्ञानोंका अपनेको विपय करनेवाले ज्ञानको उत्पन्न कराना है ? या क्षणान्तरकी उत्पत्ति कराना है। प्रथम कल्पमें भी अपने ज्ञानके सन्तान (प्रवाह-परम्परा) में उस ज्ञानको उत्पन्न करना है? अथवा दूसरे पुरुपके ज्ञानसन्तानमें अथवा सर्वज्ञके ज्ञानसन्तानमें: [अर्थात् ज्ञान अपनी धारा ही में अपनेको विषय करनेवाले ज्ञानका जनक है? या दूसरे पुरुपके ज्ञानप्रवाहमें पुरुषान्तरके ज्ञानको विषय करनेवाले ज्ञानका जनक है? अथवा सर्वज्ञके ज्ञानके सभी ज्ञान विषय हैं ? अर्थात् सर्वज्ञज्ञानधारामें ज्ञानविषयक ज्ञानजनकत्व है? यह अभिप्राय है।] प्रथमकल्प-ज्ञान ज्ञानविषयक ज्ञानका जनक है-नहीं माना जा सकता, क्योंकि ज्ञान स्वप्रकाश हैं, वे दूसरे ज्ञानके विषय नहीं हो सकते। तब तो दूसरा
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२७२ विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत १, वर्णक १
देवदचसंवेदनं हि स्वप्रकाशमपि यज्ञदत्तसंवेदनस्य विषयत्वाजनकं भविष्यतीति । तदसत्, न तावत् प्रत्यक्षज्ञानस्य विपयतया जनक- मिति शक्यं वक्तुम्, नहि पुरुपान्तरज्ञानं पुरुपान्तरप्रत्यक्षतया क्वचिद् दृष्टम्। नाप्यनुमानज्ञानस्य विपयतया जनकम्, त्वया प्रत्य- क्षज्ञानमेव विपयजन्यमित्यङ्गीकारात्। ननु तर्हि तृतीयोऽस्तु, सर्वज्ञस्य हि प्रत्यक्षज्ञानं सर्वपुरुषगतसंवेदनानि विपयीकुर्वत् तै्जन्यते। मैवम्, तथा सति सोपश्वैः संसारिसंवेदनरीश्वरसंवेदनमप्युपप्लुतं स्यात् ; त्वन्मते ज्ञानज्ञेययोरमेदाव। अथेश्वरज्ञानमुपप्लुतमपि नोपप्रवदोषं भजते, त्वज्ञानेनोपपुववाधा- पक्ष ही मान लिया जाय? [यद्यपि देवदचका ज्ञान स्वप्रकाश भी है, तथापि यज्ञदत्तके ज्ञानविषयक ज्ञानका जनक होगा, क्योंकि [विपयके बिना ज्ञान नहीं होता, अतः विषय ज्ञानका जनक होता है, यह मानना ही होगा। एवम् देवदत्तके ज्ञानको विषय करनेवाले यज्ञदत्तके ज्ञानका जनक देवदत्तके ज्ञानको मानना उचित ही है ] यह उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष- ज्ञान विषयतया ज्ञानका जनक है, ऐसा कह नहीं सकते, क्योंकि पुरुषान्तर का ज्ञान दूसरे पुरुषके प्रत्यक्ष ज्ञानका चिषय होता कहींपर भी नहीं देखा गया है। पुरुषान्तरका ज्ञान तो अनुमेय ही हो सकता है। अनुमानरूप ज्ञानके जनक पुरुषान्तर ज्ञानको विषयतया मानेंगे, ऐसा भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि तुम प्रत्यक्ष ज्ञानको ही विषयजन्य (विषयके द्वारा उत्पन्न होनेवाला) मानते हो [अनुमान ज्ञानको नहीं ]। अच्छा, तो तीसरा विकल्प मान लीजिए, क्योंकि सर्वज्ञका प्रत्यक्षज्ञान सभी पुरुषोंके ज्ञानको विषय करता है अतः वह (सर्वज्ञज्ञान) उन विषयभूत पुरुषान्तरोंके ज्ञानोंसे उत्पन्न किया जाता है, तो यह भी संगत नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे रागद्वेषजनित सुख- दुःख प्रभृति उपप्लवसे विशिष्ट संसारी जीवोंके ज्ञानोंसे सर्वज्ञ ईश्वरका ज्ञान भी उपप्रवयुक्त हो जायगा, क्योंकि तुम्हारे-विज्ञानवादीके-मतमें ज्ञान और ज्ञेय-विषय-का अभेद माना गया है। [ सर्वज्ञ ईश्वरके ज्ञानका विषय उपपनुवयुक्त संसारीका जान हुआ और इन दोनोंमें तुम्हारे मतमें माना गया अमेद है। अतः ईश्वरका ज्ञान उपप्लुत हो जायगा ]। यदि कहो कि ईश्वरका ज्ञान उपल्लवसे युक्त होता हुआ भी उपल्लवके दोषोंका
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २७३
दिति चेद, मैवम्; न तावत्तदेव ज्ञानं स्वोपप्नवं वाधते, उपपनवस्य एकस्मिन्नेव क्षणे प्राप्तिवाधयोई्योरसम्भवात्। नाऽपि ज्ञानान्तरमुपपुवमनूद्य वाधितुं क्षमते, पूर्वज्ञानोपप्ठवस्य ज्ञानान्तराविपयत्वाद् विपयत्वे च पूर्वज्ञानवदेव ज्ञानान्तर- सुपफ्लुतं सत् कथं वाधकं स्यात् १ न चोपप्नवांडयं विहाय संवेदनांशस्यैवे- श्वरज्ञानं प्रति विपयतया जनकत्वम्, तथा सति उपप्रवानभिज्ञ: ईश्वर: कथमुपदिशेद् !
भागी नहीं होता, क्योंकि तत्त्वनानसे उपप्रवोंका बाध हो जाता है, [जैसे अन्ञानी वालकको दोपवशात् द्विचन्द्र देखनेसे आश्चर्य होता है और ज्ञानीको इन्द्रियदोपवशात् द्विचन्द्र दिखाई देनेपर भी आश्चर्य नहीं होता, वह जानता है कि चन्द्र एक ही है' मगर दोपवश दो चन्द्र दीख रहे हैं, वैसे ही संसारीको उपप्लबके ज्ञानसे सुखदुःखादिका भागी होना पड़ता है। ईश्वरके ज्ञानका संसारी- ज्ञान विषय है, अतः यदि उसके ज्ञानमें उसका उपराग आ भी जाय, तो भी वह सुखदुःखका अनुभवकर्ता नहीं वन सकता, क्योंकि वह समझता है कि इनसे मेरा कोई सम्तन्ध नहीं है। अथवा ये सब मिथ्या ही हैं, केवल मेरे ज्ञानका विषय संसारीका ज्ञान है और उसके ज्ञानके विषय ये उपश्रव हैं। इसीसे मेरे ज्ञानके भी विषय हो रहे हैं। इससे वाधित हो जाते हैं। ] ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि वही ज्ञान उपप्वसहित ज्ञानको तो वाधित करता नहीं, कारण कि उपप्वकी एक ही क्षणमें प्राप्ति तथा बाध दोनोंका सम्भव नहीं हो सकता, [अर्थात् विज्ञानवादी ौद्धके मतमें ज्ञान क्षणिक हैं। जिस क्षणमें उपप्नवसहित ज्ञान हुआ, उसी क्षणमें तो उसका वाधक ज्ञान हुआ नहीं। और उस क्षणमें जो उत्पन्न ज्ञान है वही ज्ञान स्वयं अपनेको वाधित नहीं कर सकता।] और दूसरा ज्ञान भी उपप्नवका अनुवाद करके उसका बाध करनेमें समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि पूर्वज्ञानका विषयभूत उपश्ठव दूसरे ज्ञानका विषय ही नहीं है। यदि उपश्नवको भी दूसरे ज्ञानका विपय होना मान लिया जाय, तो भी ज्ञान और ज्ञेयमें अभेद माननेसे पूर्वज्ञानकी भाँति वाधक दूसरा ज्ञान भी उपप्नवयुक्त होता हुआ कैसे.नाधक हो सकेगा ? उपप्रवरूप भागको छोड़कर ज्ञानभाग-मात्र ही ईश्वरके ज्ञानका विपय होता है, अतः केवल ही ज्ञान विषयतया ईश्वरके ज्ञानका जनक है, यदि यह कहो, तो यह नहीं कह सकते, क्योंकि उपप्वको नहीं जाननेवाला ३५
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२७४ विरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
नाऽपि क्षणान्तरोत्पादनमर्थक्रियेति द्वितीयः पक्ष, त्वत्प्रक्रियया चरमक्षणस्याऽसच्तप्रसङ्गात्। तथाहि-विज्ञानानि स्थायित्वकल्पनया द्रव्य- गुणादिकल्पनया रागादिदोपैविपयैश्चोपप्लुतानि पूर्वपूर्वसजातीयविज्ञान- लक्षणेभ्यः संस्कारेभ्य उत्तरोत्तराण्युत्पघन्ते। तत्र 'सर्वमिदं क्षणिकम्' इति भावनया स्थायित्वकल्पना निवर्तते। 'स्वलक्षणम्' इति भावनया द्रव्यगुणादि- कल्पना नश्यति। 'दुःखम्' इति भावनया रागादिदोपप्रवृत्तिसुखदुःखोपप्वाः क्षीयन्ते। 'शून्यम्' इति भावनया विपयोपप्नवविगमः। ततश्व भावनाभेदेश्व- तुर्विधैः संस्कारविरोधिमिश्रतुविधोपप्रवे क्रमेण मन्दीकते भावनाप्रकर्पस्थाS- न्त्यभूतादुपान्त्यप्रत्ययात् 'सर्वोपप्जवविरहि विज्ञानमुत्पद्यते। तच्च संसारस- ईश्वर कैसे उपदेशक हो सकता है। [ जिसको भले-बुरे, सुख-दुःखका कुछ भी ज्ञान नहीं है, वह प्रवृत्ति-निवृत्तिके लिए उपदेश कैसे कर सकता है?] द्वितीय पक्ष भी-दूसरे क्षणको उत्पन्न कर देना अर्थक्रियाका लक्षण है, यह-भी नहीं वन सकता, क्योंकि तुम्हारी प्रक्रियाके अनुसार अन्तिम क्षण असत् हो जायगा। [असत्त्वका उपपादन करते हैं-] स्थायित्व तथा द्रव्य, गुण, कर्म, विशेष्य और विशेषण आदिके सम्बन्धकी कल्पनासे एवं रागादि दोषों और विषयोंसे उपप्लुत ही उत्तर-उत्तर विज्ञान पूर्व-पूर्व सजातीय विज्ञानस्वरूप संस्कारोंके द्वारा उत्पन्न होते हैं। उनमें 'सर्वमिदं क्षणिकम्' (यह सव-कुछ क्षणिक है) इस भावनासे स्थायित्वकी कल्पना नष्ट होती है। स्वलक्षण-असाधारणस्वरूप-असङ्ग-की भावनासे ज्ञातृज्ञेय- ज्ञानसम्बन्धादिस्वरूप द्रव्यगुणादिकी कल्पना निवृत्त होती है। दुःख- विज्ञानसे भिन्न सव दुःखका मूल है-इस प्रकारकी भावनासे रागादि दोपसे उत्पन्न प्रवृतिजनित सुखदुःखादि उपप्ठव नष्ट हो जाते हैं। 'सव शुन्य है' इस भावनासे विषयरूप उपफ्व भी नहीं रह जाता। उसके वाद संस्कारके विरोधी इन उपर्युक्त भावनाके चार भेदोंसे चारों प्रकारके (स्थायित्व, ज्ञातृज्ञेयज्ञानादि- रूप द्रव्यगुणादि, रागादि दोषप्रवृत्ति-सुखदुःखादि तथा विपय इन) उपप्लवोंके क्रमशः मन्द किये जानेपर भावनाप्रकर्ष-पूर्ण परिपाक-के अन्तिम क्षण स्वरूप उपान्त्य प्रत्यय-समनन्तर प्रत्यय-के उत्पन्न होनेपर सब उपक्लवोंसे शन्य, शुद्ध, विज्ञान उत्पन्न होता है। वही विज्ञान संसारप्रवाहका अन्त्य होनेसे
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अंध्यांसविचार ] भापानुवादसहितं २७५
न्तानान्त्यत्वात् 'चरमक्षणः' इति गीयते। तस्य च कार्याभावादसत्वापततौ तथैय क्रमेण पूर्वपूर्वज्ञानानामप्यसच्च प्राप्तुयाद्। चरमक्षण ईश्वरज्ञानस्य जनका, तद्विपयत्वादिति चेत्, तर्हि चरमक्षणसर्च- ज्ञज्ञानयोर्विशुद्धतया तुल्यस्वभावयोरेकसन्तानत्वं स्यात ; तुल्यस्वभावयो: कार्यकारणभावस्यैकसन्तानलक्षणत्वात्। ततः सन्तानाविच्छेदादनिर्मोक्ष: स्यात्। सर्वज्ञसन्तानप्रचेश एव मोक्ष इति चेद्, एवमपि चरमक्षणस्येश्वरज्ञा- नविपयत्वं दुर्निरूपमिति जनकत्वं दूरापास्तम्। भेदे हि सति संविदो विषय- विपयिभाव:।न चेह भेदो विद्यते। न तावत् संवित् संविदन्तरात् संविदाकारेण चरम क्षण कहलाता है। [शुद्ध विज्ञानका उदय होनेपर संसारधारा नहीं चलती है, अतः वह विज्ञानक्षण संसारका अन्तिम क्षण कहलाता है, उस क्षणमें तुम्हारा अभिमत सजातीय उत्तर क्षणका जनकत्वरूप सत्त्वलक्षण नहीं हो सकता, अतः उस क्षणको असत्वलक्षण आक्रान्त कर लेगा और इष्टापत्ति कह नहीं सकते, इस आशयसे कहते हैं ] और वह अन्तिम क्षण व्यापारान्तरका जनक नहीं है, अतः उसी क्रमसे पूर्व-पूर्व ज्ञानोंकी मी असचा प्राप्त हो जायगी। [अर्थात् यदि उस अन्त्य-क्षणमं सत्त्वलक्षण नहीं गया, तो वह असत् कहलाया; तब उसका जनक पूर्व क्षण सजातीय सत्त्वान्तरका उत्पादक नहीं हुआ, इससे वह पूर्व क्षण भी सत्त्वलक्षणसे व्याप्त न होनेके कारण असत् होगा, ऐसे ही उससे पूर्व-पूरच सभी क्षण असत् हो जायँगे, यह तात्पर्य है।] यदि कहो कि अन्तिम क्षण ईश्वरके ज्ञानका जनक है, क्योंकि वह ईश्वरके ज्ञानका विषय है, तो अन्तिम क्षण और ईश्वरविज्ञान-इन दोनोंके शुद्धस्वरूप होनेसे समानस्वभाववालोंमें एकसन्तानत्व होनेका प्रसङ्ग आ जायगा, क्योंकि समान- स्वभाववालोंमें कार्यकारणभाव होना ही एकसन्तानत्वका लक्षण है। ऐसी दशामें सन्तानके न रुकनेसे जीवको मोक्ष नहीं हो सकता। 'सर्वज्ञके सन्तान-सर्वज्ञके नानपवाह-में प्रवेश कर जाना ही मोक्ष है' ऐसा माननेपर भी अन्तिम क्षण ईश्वरके विज्ञानका विषय है, इसका निरूपण करना जब आसान नहीं है, तब वह ईश्वरीय विज्ञानका जनक है, यह कहना तो वन ही नहीं सकता। [ विषय ही तो जनक होता है, जो विपय ही नहीं है, उसमें जनकत्वकी सम्भावना तो पहले ही नष्ट हो चुकी है। अन्तिम क्षणके विपयत्वका निराकरण करते हैं-]मेदके सिद्ध होनेपर ही ज्ञानमें विषयविपयिभाव सिद्ध होगा। और यहां प्रकृतमें -ईश्वरज्ञान
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२७६ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्षक १
भिद्यते, तथा सति वैलक्षण्यसिद्ये प्रतियोगिनोऽसंविच्प्रसङ्गात्। नाऽपि संविदाकारेण, धर्मिणोऽसंवित्चप्रसङ्गात्। तस्मात् चरमक्षणस्य सर्वज्ञज्ञानो- त्पादनलक्षणयारऽर्थक्रियया सच्चं दुःसम्पादम्। यद्यस्याऽर्थक्रिया कल्प्येत, तदापि सा किं कारणस्य सच्वं सम्पादयति उत तत्प्रतीतिम्! नाऽडद्य:, कार्यात् पूर्वमेव कारणस्य सच्चात्। अन्यथा कारणत्वायोगाद्। द्वितीयेऽपि तत्कार्य स्वकार्येण प्रतिभासितं सत् कारणं प्रत्याययति, तदपि तथेत्यनवस्था स्याद्। संवित् स्वयमेव स्वात्मानं प्रकाशयतीति नाऽनवस्थेति चेत्, तारहि अर्थक्रियाप्रतीतिहेतुरिति पक्षो हीयेत। स्वयमेत्र स्वस्याऽर्थक्रियेति वद्त आत्माश्रयत्वं दुर्वारम्। तदेवं सत्चं नाम नाऽर्थक्रियाकारित्वम्, किन्तु और अन्तिम क्षणोंमें-भेद नहीं है। एक ज्ञान दूसरे ज्ञानसे ज्ञानाकार द्वारा भिन्न है (अर्थात् ज्ञानत्व भेदका प्रयोजक है) ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वैलक्षण्यकी-भेदकी-सिद्धिके लिए प्रतियोगी असंविद्-ज्ञानसे भिन्न -हो जायगा [ क्योंकि दो घटोंमें घटत्वरूपसे भेद नहीं देखा गया है]। संविदाकार (ज्ञानत्वरूप) से भी भेद नहीं मान सकते, क्योंकि ऐसा माननेपर धर्मी (जिसका असवित्व धर्म है वह धर्मी) असवित् हो जायगा (अर्थात् ज्ञान नहीं कहलायेगा)। इसलिए अन्तिम क्षणमें सर्वज्ञके ज्ञानको उत्पन्न करनेवाली अर्थक्रियासे सत्त्वकी सिद्धि करना अत्यन्त कठिन है। यदि इस अन्तिम क्षणकी अर्थक्रियाकी कल्पना की जाय, तो भी क्या वह कारणसत्ताकी सम्पादक है अथवा उसकी प्रतीतिकी सम्पादक है : इनमें प्रथम कल्प उचित नहीं है, क्योंकि कार्यसे पूर्व क्षणमें ही कारणकी सत्ता मानी जाती है, [ इससे कार्य कारणकी सत्ताका उत्पादक है, यह कहना संगत नहीं है।] यदि ऐसा न मानो, तो वह कारण ही नहीं कहलावेगा। दूसरे पक्षमें भी वह कार्य अपने कार्यसे प्रतीत होता हुआ कारणकी प्रतीति कराता है, वह कारण भी ऐसे ही अपने कार्यसे प्रकाशित होता हुआ कारणको प्रतीत कराता है, इस प्रकार अनवस्था हो जायगी। ज्ञान स्वयं ही अपने आपको प्रकाशित कर देता है, इससे अनवस्था नहीं होगी, यदि ऐसा माना जाय, तो अर्थक्रियाकी प्रतीति-प्रकाश-हेत है, यह पक्ष नहीं रह सकता। स्वर्यं ही अपना प्रकाशन करना अपनी अर्थक्रिया है, यदि यह माना जाय, तो आत्माश्रयदोष नहीं हटाया जा सकता। तव तो इस प्रकार सव
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अध्यासविचार i भापानुवादसहित २७७
स्वाभाविक: कथिद्धर्मः । तथा चैकस्मिन् क्षणेऽर्थक्रियां कृत्वा पुनस्तूप्णी- म्भृतस्याऽपि स्थायिन: सच्चं न विरुध्यते। यदुक्तं स्थायिन: क्रमेणाडनेककार्योत्पादकत्वं नाडस्ति, समर्थस्य क्षेपायो- गाद् इति। तदसत्, शक्तस्याऽपि सहकारिसंनिधानविशेपक्रमापेक्षया कार्यक्रम उपपन्नः लोके तथेवाऽनुभवात्। अथ मतम्-शक्तस्य सहकार्यपेक्षाया अप्ययुक्तत्वाद्शक्ता एव सवे पदार्थाः परस्परापेक्षया सामग्रीं जनयन्ति, साच शक्ता कार्यमुत्पादय- तीति; तदप्ययुक्तम्, सामग्रीं प्रत्यपि पदार्थानां शक्तत्वेऽन्योन्यापेक्षा न युक्ता, अशक्तत्वे च तद्जनकत्वान्निष्फलाऽन्योन्यापेक्षेति अनपेक्षेव सर्वत्र
अर्थक्रियाको उत्पन्न करना नहीं है, किन्तु वस्तुका एक स्वाभाचिक धर्म है। ऐसी दशामें एक क्षणमें अर्थक्रियाको उत्पन्न करके विरत हुए-कार्य न करते हुए-मी स्थायी पदार्थमें सत्ताका अज्गीकार करना विरुद्ध नहीं है। स्थायीको करमसे अनेक कार्योंका उत्पादन करना नहीं बन सकता, क्योंकि समर्थको कार्योत्पत्तिमें विलम्ध नहीं होता, ऐसा जो पहले कहा गया है वह भी युक्ति-युक्त नहीं है, क्योंकि समर्थ भी अपने सहकारियोंके क्रमिक सनिधान- विशेपसे क्रमशः कार्योंका उत्पादन कर सकता है, लोकमें भी यह देखा जाता है। [इसलिए शक्तसे-समर्थसे-क्रमशः कार्य न होंगे, किन्तु युगपत् ही हो जायँगे, यह की गई शक्का युक्त नहीं है, यह भाव है।] यदि कहो कि जिसमें शक्ति होती है, उसको किसी सहकारीकी आवश्य- कता नहीं होती है, इसलिए अशक्तिवाले ही सब पदार्थ एक दूसरेकी अपेक्षा करके सामग्रीका उत्पादन करते हैं, और उस शक्तकी सामग्रीसे कार्यकी उत्पत्ति होती है, तो यह भी कहना युक्त नहीं है, क्योंकि यहाँ यह विकल्प हो सकता है कि एक दूसरेकी अपेक्षा करके सामग्रीका उत्पादन करनेवाले प्रत्येक पदार्थमें सामग्रीको उत्पन्न करनेकी शक्ति है या नहीं ? यदि शक्ति है, तो उन पदार्थोंको एक दूसरेकी अपेक्षा ही किसी अवस्थामें नहीं हो सकती। यदि शक्ति नहीं है, तो उन पदार्थोंसे सामभीका उत्पादन ही नहीं हो सकता है, फिर पदार्थोंकी अन्योन्य अपेक्षा ही व्यर्थ है। इसलिए सर्वत्र अनपेक्षा ही बनी
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[सूत्र १, वर्णकं १
स्यात्। मा भूचार्हैं कस्याऽपि सहकार्यपेक्षेति चेद्, न; अनुभवतरिरोधाद्। न चाऽनुभवो भ्रान्त:, वाधाभावात्। यद्यपि शक्तस्याऽशक्तस्य चाडपेक्षा न युक्तेत्युक्तम्, तथापि शक्तत्वाशक्तत्वविनिर्मुक्तवस्तुमात्रस्य सहकार्यपेक्षा स्यात् न्यायस्याऽस्य त्वयाऽप्यङ्गीकार्यत्वात्। तथाहि-कार्यसच्े सिद्धान्त- हानि:, असच्वे च कारणविशेपेण कार्यविशेपस्य सम्बन्धानिरूपणात् सरवं सर्व- स्मादुत्पद्येत; इति परेण चोदिते सच्चासत्वसम्बन्धत्वासम्बन्धत्वाविश्येषं विमुच्य नियतपूर्वभावि कारणम्, नियतोत्तरभावि कार्यम्, इति त्वया निरूपणीयम्। अन्वयव्यतिरेकौ तत्र निरूपकौ स्त इति चेत्, सहकारि- ण्यपि स्त एव। तस्मादस्त्येव सहकार्यपेक्षा। तत्कृतस्तृपकारविशेप- शिन्त्यताम् ? रहेगी। यदि कहो कि सहकारीकी अपेक्षा ही किसीको नहीं है? तो यह भी कहना असङ्गत है, क्योंकि ऐसा कहनेपर अनुभवके साथ विरोध होगा अर्थात् लोकमें सहकारीकी अपेक्षा सर्वत्र देखी जाती है। इस अनुभवको भ्रान्त भी नहीं कह सकते, कारण कि वही अनुभव भ्रमात्मक होता है, जिसका कि बाध हो। सहकारीके अनुभवका वाध नहीं होता है, अतः वह भ्रम कैसे हो सकता है ? यद्यपि यह कहा गया है कि शक्तको या अशक्तको सहकारीकी अपेक्षा मानना युक्त नहीं है, तथापि शक्तत्व और अशक्तत्वसे रहित जितनी वस्तुएँ हैं उनको तो सह- कारीकी अपेक्षा है ही, और इस व्यवस्थाको तुम्हें भी मानना ही पड़ेगा, क्योंकि तुमसे कोई प्रश्न करे कि क्या तुम कार्यको सत् मानते हो या असत् ? यदि सत्का अङ्गीकार करोगे, तो किसी कारणके साथ किसी कार्यके सम्बन्ध- विशेषका निरूपण न हो सकनेसे सभी कार्य सभीसे उत्पन्न हो जायँगे? इस परिस्थितिमें सत्त्व और असत्त्व एवं सम्बद्धत्व और असम्त्द्धत्वका परित्याग करके सुम्हें यही कहना होगा कि कार्यसे पूर्वमें नियमतः रहनेवाला कारण होता है और कारणसे उत्तरकालमें नियमतः उत्पन्न होनेवाला कार्य कहलाता है। [अतः शक्तत्व और अशक्तत्वसे विनिर्मुक्त वस्तुमात्रको सहकारीकी अपेक्षा माननेमें कोई हानि नहीं है। ] यदि कहो कि हमारे मतमें तो अन्वय और व्यतिरेक प्रमाणभूत हैं, तो हम भी कह सकते हैं कि सहकारीकी अपेक्षामें भी अन्वय और व्यतिरेक प्रमाण हैं। इससे सिद्ध हुआ कि सहकारीकी अपेक्षा है ही। हाँ, इसका विचार करना अपेक्षित है कि उस सहकारीसे कौन-सा उपकार होता है?
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २७९ यचवत्रैकदेशी मन्यते-अन्वयव्यतिरेकसिद्धभृम्युदकादिसहकारिणो वीजाख्ये कारणे विशेपमुच्छनताख्यं जनयन्ति, ततस्तद्ीजमङ्कराख्ये कार्ये शक्तम्, अन्यथाऽनुपकारिभूम्यादिर्वीजेन नाऽपेक्ष्येत इति, तदसत् वीजं स्वगतविशेपोत्पती शक्तं न वा ? न चेत्, सहकारिसहस्त्रसन्निधानेऽपि न तज्जनयेत, ततो नाह्ुरोत्पादनेऽपि शक्ष्यति।अथ शक्तम्, तदापि यदि सह- कारिकृतविशेपान्तरं ग्राप्य उच्छनतायां शक्नुयात्, तदाऽनवस्था स्याद्। अथ तदग्राप्यैच तत्र शक्तम्, तर्हि अङ्करेऽपि विशेपमन्तरेणैव शक्तं स्याद्। अथ मतम्-अङ्करोत्पत्तिरुच्छूनत्वजन्मपूर्विका, उच्छूनत्वोत्पत्तिस्तु सहकारिसननिधिमात्रसाध्या, तथैव दष्टत्वात् इति, तन; तथा सति शक्तिमता कारणेन स्वात्मनि अनुपकुर्वननपि सहकार्यपेक्षित इति त्वयैव स्वमतव्याघात
इस विषयमें किसी एकदेशीका मत है कि अन्वय और व्यतिरेक द्वारा निश्चित पृथ्वी, जल आदि सहकारी कारण अङ्गरके हेतुभूत वीजमें उच्छूनत्वरूप अतिशयको पहले उत्पन्न करते हैं, फिर वह वीज अङ्कुररूप कार्यके लिए समर्थ होता है। यदि भूमि आदि वीजमें किसी अतिशयविशेपका उत्पादन न करें, तो वह वीज अनुपकारी भूमि आदिकी अपेक्षा ही न करेगा, एकदेशीका यह मत ठीक प्रतीत नहीं होता है, कारण कि उसके प्रति यह विकरप कर सकते हैं-वह वीन अपनेमें रहनेवाले अतिशयकी उत्पत्तिमें समर्थ है या नहीं ? यदि उसकी उत्पत्तिमें वीज समर्थ नहीं है, तो हजार सहकारियों- का सामीप्य रहनेपर मी उससे अतिशयकी उत्पत्ति हो ही नहीं सकती, इससे अङ्करका उत्पादन भी उसमें न होगा। यदि वीजको अतिशयकी उत्पत्तिमें समर्थ माने, तो भी वह वीज सहकारी द्वारा अन्य विशेपकी प्राप्ति कर उच्छूनतातिशयो- त्पत्तिमें समर्थ हो, तो अनवस्थादोप होगा और यदि उस अन्य विशेपकी प्राप्ति न करके उसमें उसे समर्थ माना जाय, तो अङ्करोत्पत्तिमें विशेपके विना भी वह समर्थ हो सकता है। यदि कहो कि लोकमें यह देखा जाता है कि अङ्करकी उत्पत्ति उच्छूनत्वके उत्पन्न होनेपर ही होती है और उच्छूनत्वकी उत्पत्ति सहकारीकी सन्नि- धिमात्रसे होती है, तो यह भी कहना अयुक्त है, क्योंकि ऐसा माननेपर तुमने यह स्वीकार कर लिया कि शक्तिवाले कारणने अपनेमें किसी उपकारविशेषको
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२८० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
आपादित: स्यात्: तस्माननैकदेशिपक्षो युक्तिसहः । नन्वत एवास्मन्मतमादरणीयम्-नहि वयं तद्वत कारणस्वरूपे सहकार्यु- पकार ब्रूम:, किन्तर्हि क्षणिकान्मूलकारणादुत्पद्यमानं कार्य सहकारिकारणा- न्यपेक्षते, कार्यस्य वहुकारणसाध्यत्वादिति ब्रूमः। यद्यपि स्थायिकारण- मतेऽपि एतावत् समानम्, तथापि त्वन्मते यावत्कारणसच्वं नैरन्तर्येण कार्योत्पत्तिर्दुर्वारा, नियामकाभावात्। न च सहकारिसम्बन्धो नियामका, सम्बन्धेनाऽपि यावत्सम्बन्धिसत्वं भवितव्यत्वात्। न च तस्य सम्बन्धान्तरं नियामकम्, अनवस्थानात्। न च वाच्यं क्षणिकपक्षेऽरपि न कारणसस्वक्षणे कार्य जायते, तयोयौंगपद्यप्रसङ्गात्। अन्यदा जन्माङ्गीकारेऽपि अनियमा- पत्तिरिति, कारणानन्तरक्षणस्य कार्यनियामकत्वात्। अतः क्षणिकवाद एव भेयान्।
न करनेवाले सहकारीकी अपेक्षा कर ली, इससे तुम्हारे मतका ही व्याघात हुआ। इससे एकदेशीका पक्ष उपपततिशून्य है। क्षणिकवादी कहता है कि इससे तो हमारा मत मानना उचित है, क्योंकि हम एकदेशीके समान कारणके स्वरूपमें सहकारी द्वारा कोई उपकार होता है, ऐसा नहीं कहते हैं, प्रत्युत यह कहते हैं कि मूलभूत क्षणिक कारणसे उत्पन्न होनेवाला कार्य सहकारी कारणोंकी अपेक्षा करता है, कारण कि अनेक कारणोंसे कार्य हुआ करता है। यद्यपि कारणके स्थायित्ववादमें भी यह अंश समान है तथापि उस मतमें जवतक कारणका अस्तित्व रहेगा, तबतक निरन्तर कार्यकी उत्पत्तिका वारण नहीं हो सकेगा, क्योंकि निरन्तर उत्पत्तिके रोकनेमें कोई नियामक नहीं है। मूल कारणके साथ सहकारीका सम्बन्ध नियामक है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि जबतक सम्बन्धियोंकी सता है तबतक सम्बन्ध रहेगा ही। यदि सम्बन्धका भी अन्य सम्बध नियामक माना जाय, तो अनवस्थादोष होगा। क्षणिकवादमें भी जिस क्षणमें कारण होता है, उस क्षणमें तो कार्य हो नहीं सकता, कारण कि ऐसा माननेमें कार्य और कारणका यौग- पद्य प्रसक्त हो भी जायगा। और अन्य समयमें कार्यकी उत्पत्तिके माननेमें अनियमकी प्राप्ति होगी, यह भी कह नहीं सकते, क्योंकि कारणका अव्यवहित उत्तर क्षण कार्यका नियामक है, अतः क्षणिकवाद मानना ही उचित है।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २८१
मैवम्, सर्वंत्र कार्यकारणभावो व्यासिवलान्निश्चेतव्यः। तत्र किं तव सते कार्यकारणभावव्याप्तिधूमाग्निव्यक्योरुत तत्सन्तानयोः १ नांऽऽद्य, क्षणिकयोरन्वयव्यतिरेकवुद्धिद्वयकालावस्थानायोगात्। द्वितीयेद्गारावस्था- दप्ययनेर्धूमो जायेत, तत्सन्तानपातित्वाविशेपात्। काष्टाभावाद् जन्म नेति चेद्, नः तस्यापि स्वसन्ताने विद्यमानत्वात्। न चाऽनिकाठ्ठयो: सम्बन्धा-
क्षणिकवादियोंका मत युक्त नहीं है, क्योंकि सभी जगह कार्यकारणभावका निश्चय व्याप्िके आधारपर ही किया जाता है। इस परिस्थितिमें क्षणिकवादीसे पूछना चाहिए कि क्या तुम्हारे मतमें धूम और अगिरूप व्यक्तिमें कार्यकारणभावकी व्याप्ि रहती है, या धूम और अग्निके सन्तानमें रहती है? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि क्षणमात्र कालमें रहनेवाले धूम और अझि अन्वयज्ञान और व्यतिरेकज्ञानके दो कालोंमें रह ही नहीं सकते। दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण कि उसके माननेसे तो अद्गारावस्थापन्न अभिसे भी धूमकी उत्पत्ति प्रसक्त होगी, क्योंकि अगिका सन्तान तो अङ्गारावस्थामें भी विद्यमान है। [यदि कहो कि अङ्गारदशामें लकड़ी नहीं है, अतः धूमकी उत्पत्ति नहीं होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि लकड़ी भी उस सन्तानमें रहती ही है। अभि और लकड़ीका परस्पर सम्वन्ध नहीं है, अतः अङ्गारसे धूम नहीं होता? यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों सन्तानोंके नित्य होनेके कारण उस सम्बन्धका भी अस्तित्व विद्यमान है। अभनि और धूमव्यक्ति, क्षणिक होनेसे, अन्वय और व्यतिरेक-इन दोनों वुद्धियोंके समयमें अवस्थित ही नहीं रह सकते, इसलिए उनमें व्याप्तिग्रह कैसे हो ? द्वितीय पक्ष माननेपर अझ्गार-जलते हुए लाल कोयलेके रूपमें विद्यमान अभि-से भी धूमकी उत्पत्ति होनी चाहिए, क्योंकि अङ्गारावस्थापन्न अगनि भी अगिसन्तानमें पड़ी ही है, इसमें कोई विशेषता नहीं है। [ जैसे अग्नि धूमजनक अग्निसन्तानमें पतित है, वैसे ही अ्ाररूप अग्नि भी है ] काष्ठ न होनेसे धूमका जन्म नहीं होता, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि काष भी तो अपने सन्तान-प्रवाह-में विद्यमान ही है। अग्नि और काष्ठका सम्बन्ध नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों प्रवाहों- अग्नि और काषठसन्तानों-के नित्य होनेसे उनका सम्बन्ध अनिवार्य है और वह सम्बन्ध दूसरे सम्बन्ध द्वारा होता है, सदैव विद्यमान नहीं रहता, ऐसा भी ३६
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२८२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
भाव:, सन्तानद्वयनित्यत्वेन तस्याप्यनिवार्यत्वाद्। स सम्बन्धः सम्बन्धा- न्तरपूर्वकत्वान्न सदातन इति चेद्, न; अनवस्थापत्तेः । त्रिचतुरकक्षाविश्रा- न्त्यभ्युपगमाददोष इति चेत्, तर्हि स्थायिकारणपक्षेऽपि तथवाऽनवस्थायाः सुपरिहरत्वान्नोक्तदोष:। ननु सहकारिण उपकारकत्वाङ्गीकारे यदि स्थायित्ववादी स्वमतमपि समीकुर्यात् तर्हि तन्नाङ्गीकुर्म इति चेद, न; धूमकाष्ठयोः कार्यसहकारिणोरुप- कार्योपकार कभावस्याऽन्वयव्यतिरेकसिद्धस्याऽवर्जनीयत्वात्। अन्वयव्यतिरेक- योश्चोपकार्योपकारकभावसाधकत्वं मूलकारणतत्कार्थयोरगिधूमयोर्द्ष्टम् । तस्मादुपकारके सहकारिणि मतद्वयेऽ्यपेक्षा समाना। तथा च क्षणिकपक्षे थथा एकवह्वेः सहकारिभेदाद् देशभेदाच युगपदनेककार्यजनकत्वमभ्युपेयते
नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेमें अनवस्था होगी। यदि कहो कि तीन या चार कक्षामें ही सम्बन्धपरम्पराकी करपना समाप्त कर देंगे, (अर्थात् तीसरे या चौथे सम्बन्धके सम्चन्धान्तरकी कल्पना नहीं करेंगे) इससे कोई दोष नहीं होगा, तो कारणको स्थायी माननेवालेके मतमें भी पूर्वोक्त प्रकारसे ही अनवस्थादोषका परिहार हो ही सकता है, इससे उस मतमें दिया गया अनवस्थारूप दोष नहीं आ सकता। सहकारीको उपकारक माननेमें यदि स्थायित्वपक्षका समर्थक वेदान्ती अपने मतको भी समान बतावे [ अर्थात् हमारी ही जैसी युक्तियोंसे अपने मतमें आये हुए गुण और दोषोंका समर्थन या खण्डन करे ], तो इसे हम स्वीकारं नहीं कर सकते, ऐसा कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि कार्य और सहकारीरूप धूम और काष्टका उपकार्य और उपकारकभाव जो अन्वय और व्यतिरेकसे सिद्ध है उसे कोई हटा ही नहीं सकता है। अन्वय और व्यतिरेक उपकार्य और उपकारक- भावके साधक हैं, यह सिद्धान्त मूलकारण अभि और उसका कार्य धूम- इन दोनोंमें प्रत्यक्षरूपसे देखा गया है, इसलिए दोनों मतोंमें अर्थात् क्षणिकवाद तथा स्थायित्ववादमें उपकारक सहकारीकी अपेक्षा एक-सी ही है, क्योंकि क्षणिकवादमें जैसे एक ही अगनि सहकारी तथा देशके मेदसे .एक साथ अनेक कार्योंकी उत्पादक मानी जाती है अर्थात् अगनि अपने देशमें दूसरी अग्निको उत्पन्न करती है और अपने ऊपरके देशमें धूमको, नीचे
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अंध्यासविचार] भापानुवादसहित २८३
वहिः स्व्देशे वह्मयन्तरमेव जनयत्युपरिष्द् धूममधस्ताङ्गस्म पुरुपे विज्ञानं चेति। तथा स्थायिपक्षेऽप्येकस्य कारणस्य कालभेदात् सहकारिभेदाचाऽनेकका- र्यजनकत्वम्। ततः क्रमकारित्वं किं न स्यात् १ न चैतावता क्षणिकस्थायि- वादिनोर्मतसाङ्कर्य शङ्कनीयम्, पूर्वस्य ग्रतिकर्मव्यवस्थावादस्याऽन्ते निरा- कृतत्वात् । तदेवमतिदुष्टं क्षणिकविज्ञानवादिमतमुपेक्ष्य कूटस्थनित्यचतन्ये सर्वमप्यध्यस्ततया प्रतीयत इत्ययमेव वेदान्तवादोऽतिनिर्दोपत्वादादरणीयः। नन्वयमपि वादो दुष्ट एव। तथाहि-कूटस्थचतन्येन चेत् स्वस्मिन्न- ध्यस्ता: पदार्था अपरोक्षा अवभास्यन्ते, तदाऽनुमेयादयोऽप्यपरोक्षा: स्यु:। न चेच्चैतन्यमपरोक्षप्रतीतिजनकम्, तदा घटाद्योऽपि नाऽपरोक्षा: स्यु: नियामकाभावाद्। देशमें भम्मको और पुरुपमें स्वविषयक ज्ञानको उत्पन्न करती है, वैसे ही स्थायित्ववादमें भी एक ही कारण काल और सहकारीके भेदसे अनेक कार्योंका उत्पादक माना जा सकता है। इसलिए क्रमसे कार्योंको उत्पन्न करना संगत क्यों नहीं होगा : इतनी समानतासे क्षणिकवाद और स्थायित्ववादमें समानताकी शक्का भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि क्षणिकवादका प्रतिकर्मव्यवस्थावादके अन्तमें हम खण्डन कर आये हैं। इस प्रकार 'अधिकाधिक दोपपूर्ण क्षणिक विज्ञानवादी-बौद्धमत-की अवहेलना करके 'कूटस्थ-परिणाम या विकारसे शुन्य-नित्य चतन्यमें-स्थायी आत्मामें-सम्पूर्ण पदार्थ अध्यस्तरूपसे प्रतीत होते हैं' यह वेदान्तका सिद्धान्त सर्वथा दोपरहित होनेसे आदरणीय अर्थात् मानने योग्य है। अब शक्का होती है कि यह उपर्युक्त सिद्धान्त भी अर्थात् 'कूटस्थ चैतन्यमैं सत प्रपञ्च अध्यस्त है' यह मानना भी दोपपूर्ण ही है, क्योंकि अपनेमें-कूटस्थ चैतन्यमें-आरोपित पदार्थोंका कूटस्थ चैतन्य ही यदि अपरोक्ष अवभास कराता है, तो अनुमानके विषयभृत वहि आदिका भी अपरोक्षरूपसे अवभास होना चाहिए। [ क्योंकि अनुमेय भी चैतन्यमें अध्यस्त ही हैं ] यदि कूटस्थ चैतन्यको प्रत्यक्ष- ज्ञानका जनक न माना जाय, तो घटादिका भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा, क्योंकि नियामक तो कोई है नहीं। [चैतन्यसे अतिरिक्त प्रकाशक कोई है नहीं और जत चतन्य अप्रत्यक्षका भी प्रंकाश करता है तब घटादिका प्रत्यक्षप्रकाश होता है और अन्यका अप्त्यक्षप्रकाश होता है, इसका नियामक कौन होगा ! यह भाव है]।
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२८४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
न चेन्द्रियमापरोक्ष्यनियामकमिति शक्यं वक्तुम्, बाह्येन्द्रियस्य तथात्वे सुखदुःखादेरापरोक्ष्याभावप्रसङ्गात्। अन्तःकरणस्य तथात्वे त्वनु- मेयादावापरोक्ष्यं दुर्वारम्। नैप दोप:, कारकत्वव्यञ्जकत्वयोर्नियामक- त्वात्। योऽयमन्त:करणपरिणामो नेत्रादिद्वारा निर्गत्य घटादीन् व्यामोति तस्य हि कर्मभूता घटादय: कारकाः। घटाद्यभावे तव्यापिपरिणामानुपप- तेः। घटादिभिरुत्पादिते च परिणामे चैतन्यमभिव्यज्यत इति व्यञ्जकत्वं घटादीनाम्। ततस्तेपां युक्तमापरोक्ष्यम्। न चैवमनुमेयादिपु कारकत्व- व्यञ्जकत्वधर्मद्वयं नियमेन सम्भवति, अतीतानागतयोरपि कदाचिदनुमेयत्वात; तयोश्च वर्त्तमानधर्मद्वयाश्रयत्वानुपपच्ेः।
इन्द्रिय प्रत्यक्षकी नियामक होगी, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि यदि चक्षुरादि वाह्येन्द्रियको प्रत्यक्षकी नियामक मानो, तो सुख, दुःख आदिका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा। [क्योंकि इनका प्रकाश वाह्येन्द्रियोंसे नहीं होता है।] यदि अन्तःकरण प्रत्यक्षका नियामक माना जाय, तो अनुमेयोंका भी प्रत्यक्ष प्रसक्त होगा। [क्योंकि अनुमेयोंका भी अन्तःकरण द्वारा ही ज्ञान होता है ] यह दोष नहीं आता, क्योंकि कारकत्व और व्यञ्ञकत्वको नियामक मान सकते हैं। [अर्थात् प्रत्यक्षस्थलमें विषयकारक तथा व्यञ्ञक दोनों होते हैं, अनुमानादिस्थलमें नहीं। विषयके कारकत्व और व्यञ्ञकत्वका उपपादन करते हैं-] नेत्र आदि इन्द्रियोंके द्वारा वाहर निकल कर जो यह अन्त :- करणका परिणाम घटादिको व्याप्त करता है, उसके विपयभूत घट आदि कारक कहलाते हैं। घट आदि विषयके न रहनेसे उस विपयको व्याप्त करनेवाले परिणामकी उपपत्ति ही नहीं हो सकती। और घट आदि विषयोंसे उत्पन्न उस परिणाममें चैतन्यकी अभिव्यक्ति होती है, इससे घट आदि विषय व्यञ्जक होते हैं। इससे घट आदि विषयोंका प्रत्यक्ष होना युक्तिसंगत है। और अनुमानके विषयोंमें उक्त प्रकारके कारकत्व और व्यञ्जकत्व दोनों धर्मोंका नियमतः सम्भव नहीं है, क्योंकि भूत तथा भविष्यत्कालीन पदार्थ [जो विद्यमान नहीं हैं ] भी किसी समय अनुमानके विषय होते हैं, परन्तु े पदार्थ वर्तमान कारकत्व और व्यञ्ञकत्व धर्मोंके आश्रय नहीं होते।
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अध्यासार्वचार] भॉपांनुवादसाहेत
ननु यदा 'वृष्टिरासीत्' इत्यनुमीयते तदा वृष्टिरतीतत्वाकारेण वर्चते ततो वर्त्तमानधर्माश्रयत्वं स्यादिति चेद्, नैतद्युक्तम् ; किमनुमान- काले वृष्टेरवर्त्तमानत्वमुच्यते उताऽतीतत्वधर्मस्य। आद्ये, वृष्टेर्युगपदती- तत्वं वर्तमानत्वं च व्याहन्येत। न द्वितीया, अतीतत्वं नाम वर्त्तमानकालव्यावृत्तभूतकालयोगित्वम्, ततश्च यथा वटादौ वर्त्तमान- कालोऽनुगतः सन्नवच्छेदको न तथाऽतीतत्वधर्मः, किन्तु घटाभावस्य घट इवाऽतीतत्वधर्मस्य वर्तमानकाल: केवलं निरूपक इति नाऽतीतत्व-
यदि कहो कि जन्र 'वृष्टि हुई थी' ऐसा अनुमान किया जाता है तब अनुमान- कालमें वृष्टि अतीतत्वाकारसे विद्यमान ही है, इससे वह अतीत वृष्टि भी विद्यमान धर्मट्यकी आश्रय हो ही जायगी, यह कहना भी युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि अनुमान कालमें वृष्टिका वर्तमानत्व प्रतीत होता है? अथवा उसके अतीत्ववर्मका वर्तमानत्व? प्रथम पक्ष मानने पर वृष्टिमें एक ही कालमें अतीतत्व और वर्तमानत्व दोनोंका एक साथ होना सम्भव नहीं है। दूसरा पक्ष भी नहीं बनता, क्योंकि जब वर्तमानकालसे भिन्न भूतकालमें रहना ही अतीतत्वपदार्थ है तब जैसा घटादिमें वर्तमान काल अनुगत होता हुआ अवच्छेदक हे वैसा अतीतत्वधर्म अवच्छेदक नहीं है, [ जैसे 'घटोऽस्ति' (घट है) इस प्रतीतिमें वर्तमान काल तो अन्वयरूपसे घटका अवच्छेदक है अर्थात् वर्तमानकालिक घटकी सत्ताका बोध कराता है वैसे 'घटो नाडस्ति' में प्रतीयमान लट्लकारका अर्थ होता हुआ भी वर्तमान काल अन्वयरूपसे घटका अवच्छेदक नहीं है अर्थात् घटाभावके वर्तमानकालिक सत्ताका वोध कराता है, इस अभिप्रायसे 'अतीतवृष्टिर्वर्तते' (भूतकालीन वृष्टि है) इस प्रतीतिकी उपपत्ति करते हैं-किन्तु घट जैसे घटाभावका (प्रतियोगितया) निरूपक है वैसे ही अतीतत्व धर्मका भी वर्तमान काल केवल निरूपक ही है। इससे अतीतत्वधर्ममें घटके तुल्य वर्तमानत्वका सम्भव नहीं है। [ यहाँ पर 'घटवत्' (घटके तुल्य) यह व्यतिरेकी द्ष्टान्त है। घटरूप धर्मीके अभावमें धर्म नहीं रह सकता। इस नियमसे अतीतत्वधर्मका धर्मी घट ही जब नहीं है, तव उस अतीत्व धर्मके साथ अन्वयिरूपसे वर्तमानत्वका योग कैसे सम्भव
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विवरणग्रमेयसंग्रह i सूत्र १, वर्णक १
धर्मस्य घटवद्वर्त्तमानत्वसम्भवः। नन्वयं धर्मो यदि न सर्वथा वर्त्तमान- त्वव्यवहारार्हस्तर्हि नरविपाणवद्सन्नेव स्यात्, ततो वर्तमान एवाडयं धर्म इति चेद्, एवमपि न तद्धर्मविशिष्टायां वृष्टौ कारकत्वव्यञ्ञजकत्वे सम्भवतः । नहि मृतो देवदत्तो घटं कुरुते, नाऽपि विनष्टः प्रदीपस्तमभि- व्यनक्ति। नन्वनुमेयादिषु विपयेष्वकारकेष्वव्यञ्ञकेपु च सत्सु कथमनुमानादि- जन्यज्ञानस्य तद्विपयाकारतेति चेद्, लिङ्गशन्दादयो ह्यविनाभावशत्तया- दिसम्बन्धविशेषवलात् तच्तद्विपयाकारं ज्ञाने समर्पयन्तीति ब्रूमः । हो सकता है, यह तात्पर्य हुआ।] यदि यह अतीतत्वधर्म सर्वथा वर्तमान व्यवहारके योग्य नहीं है, तो मनुष्यके सींगकी भाँति असत् ही हो जायगा, इससे यह अतीतत्व आदि धर्म वर्तमान ही हैं, ऐसा भी मानो, तो भी अतीतत्व आदि धर्म-युक्त वृष्टिमें कारकत्व तथा व्यञ्ञकत्व हो ही नहीं सकते; [ कथञ्चित् अतीतत्व आदि आकारसे वृष्टिको वर्तमान मान भी लें, तो भी उस आकारसे विद्यमान पदार्थ वर्तमान कारकत्व तथा व्यञ्जकत्व दो धर्मोंसे सम्बन्ध नहीं कर सकता, इस अभिप्रायसे दष्टान्त देते हैं-] क्योंकि मरा हुआ-अतीत-देवदत घटको नहीं कर सकता और न बुझा हुआ-अतीत-दीपक घटका प्रकाश कर सकता है। [ इससे विद्यमान ही पदार्थ कारक तथा व्यञ्जक हो सकते हैं। प्रत्यक्षस्थलमें ऐसा सम्भव है, परन्तु अनुमानस्थलमें सम्भव नहीं है। ] यदि शङ्का हो कि अनुमितिज्ञानके विपय यदि कारक तथा व्यञ्जक नहीं होते हैं, तो अनुमान आदि प्रमाणोंसे उत्पन्न हुए ज्ञानमें उस विषयका आकार कैसे प्राप्त होगा? [अर्थात् ज्ञान आपके मतमें स्वतः निराकार है, कारक तथा व्यञ्जक विषयका आकार ही ज्ञानको प्राप्त होता है, यह अनुमेयोंमें सम्भव नहीं है] तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि लिङ्ग (हेतु) तथा शब्द आदि अविना- भाव-व्याप्ति तथा शक्ति आदि सम्बन्धविशेषके आधारपर सामर्थ्यसे तत्-तत् विषयके आकारको ज्ञानमें समर्पण कर देते हैं, ऐसा हम कहते हैं। [ तात्पर्य यह है कि जैसे पर्वत आदिमें धूमके दर्शनसे धूम तथा बहिके अविनाभावका अर्थात् अन्वय- व्यतिरेकसिद्ध व्याप्तिका स्मरण होनेपर उसके वलसे अनुमितिज्ञानको बह्िका आकार प्रापत होता है वैसे ही शाव्दज्ञानमें भी शब्दका श्रावण प्रत्यक्ष होनेके अनन्तर
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २८७
विपयत्वं धर्मोऽङ्गीक्रियते तथा कारकत्वव्यञ्ञकत्वधर्मेऽप्यङ्गीकारये सति प्रत्यक्षे इवानुमानादि प्वपि विपयतयैव ज्ञानाकारार्पकत्वं भविष्यतीति वाच्यम्, नहि विप- यत्वं नामाऽनुमेये कश्चिद्दावरूपो धर्मः, येन द्टान्तः स्यात्, किन्तर्ष- नुमानप्रवृत्ते: पूर्वमनुमेयस्य यादृगवस्थाऽडसी चादगवस्थानिवृत्तिरेव विषयत्वशव्देनोच्यते। न च सैवाडवस्था ढष्टान्तत्वेन शङ्कनीया,
'यह श्द इस अर्थका वाचक है' इत्यकारक शक्तिका स्मरण होनेसे शाब्दवोध उस शक्तिके विषयभत अर्थका आकार प्राप्त कर लेता है, इत्यादि रीतिसे परोक्ष- ज्ञानमें विषयका आकार आता है, उसके लिए अन्तःकरणका विपयाकार परिणाम तथा उसमें चित्के आभासकी आवश्यकता नहीं होती है, अतः अनुमेय आदिमें कारकत्व तथा व्यञ्ञकत्व नहीं आते ।] यदि ऐसी शङ्का हो कि अतीत तथा अनागत अनुमितिज्ञानके विपयोंमें जैसे विषयत्वका स्वीकार किया जाता है वैसे ही कारकत्व तथा व्यज्जकत्व भी ही मानने पड़ेंगे : तब तो प्रत्यक्षज्ञानके समान अनुमिति आदि ज्ञानोंमें भी विपयताके कारण ही ज्ञानाकारसमर्पकत्व मानना होगा, [हेतु तथा शक्तिज्ञानके वलसे ही अतीत अनुमेयादिमें आपको वर्तमान विपयत्वरूप धर्म जब मानना ही है, तव उसी प्रकार कारकत्व या व्यञ्ञकत्व क्यों नहीं मान लेते यह तो आप कह ही नहीं सकते कि अतीतमें कोई वर्तमान धर्म नहीं माना जाता, अन्यथा अतीत विपय ही नहीं होगा, इससे विषयता प्रत्यक्षादि तुल्य ही अनुमानादिमें भी वर्तमान है। इस सिद्ध विषयताके वलसे ही ज्ञानको आकारकी प्राप्ति हो जायगी, अनुमानादिस्थलमें अतिरिक्त लि्ग तथा शक्तिज्ञान आदिको आकारसमर्पक माननेकी कल्पना व्यर्थ है]। तो ऐसी शक्का उचित नहीं है, क्योंकि अनुमेयोंमें विषयता कोई भावरूप धर्म नहीं है, जिसमें दृष्टान्त वन सके, किन्तु अनुमान करनेके पहले अनुमेय़की जैसी अवस्था रहती है, उस अवस्थाकी निवृत्ति होनी ही विषयताशब्दसे कही जाती है। [उसी अवस्थाका विपयतापदसे द्ृष्टान्त दे रहे हैं-] प्रत्यक्षज्ञान- स्थलमें अज्ञानरूप पगवस्थाकी निवृत्ति होती ही है, ऐसी आशङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि वह पागवस्था भी तो उस प्रागवस्थाकी निवृत्तिका प्रागभाव-
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२८८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
तस्या अप्युक्तनिवृत्तिप्रागभावरूपत्वात्। अतोऽतीतादनुमेयेपु भावरूपं कारकत्वं दुःसम्पादम्। अतीताद्यनुमेयस्याऽकर्मकारकत्वे कथ तत्र 'वृष्टिं जानाति' इति सकर्मक- धातुप्रयोग: ? उपचारादिति ब्रूमः। यथा सकर्मके प्रत्यक्षज्ञाने फलमस्ति तथाऽनुमानादावपि तत्सच्वमात्रेण सकर्मकत्वमुपचर्यते। मुख्यस्य कर्मणस्तन्राऽङ्गीकारे, प्रत्यक्षवदतीताद्यनुमानेऽप्यापरोक्ष्यं दुर्वारम् । एवं च सति यत्र वर्तमानोऽग्न्यादिरनुमीयते तत्राऽप्यनुमेयत्वसाम्या-
स्वरूप ही है। प्रागवस्था भी अभावरूप ही है, भावरूप तो नहीं है, -- अभाव भावके उत्पादनमें असमर्थ है। तथा वह किसीका धर्म नहीं वन सकता, अतः विषयत्वसे ज्ञानाकार नहीं आ सकता। ] इसलिए अतीत आदि अनुमेयोंमें भावरूप कारकत्वकी सम्पत्ति होना कठिन है। यदि शङ्का हो कि अतीत आदि अनुमेय कर्म कारक नहीं बन सकते, तो ऐसे स्थलमें 'वर्षाको जानता है, इस प्रकार सकर्मक धातुका प्रयोग कैसे होता है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उपचारसे होता है, ऐसा कहते हैं। जैसे सकर्मक प्रत्यक्षज्ञानमें फल है वैसे ही अनुमान आदिमें भी फल है, उस फलके होनेकी समानतासे ही अतीत अनुमेयादिस्थलमें सकर्मकत्वका गौण-व्यवहार किया जाता है। यदि इन स्थलोंमें मुख्य कर्मकारकत्वका व्यवहार हो, तो प्रत्यक्षकी भाँति अतीत आदिके अनुमानमें भी साक्षात्कार होनेका निवारण नहीं कर सकते। [ तात्पर्य यह है कि 'घटं पश्यामि जानामि च' (घट देख रहा हूँ और जान रहा हूँ) ऐसे प्रत्यक्षस्थलमें अभावरूप प्रागवस्थाकी निवृचतिसे भिन्न फल भावरूप प्रकटता या अनुव्यवसाय है। एवं अतीता Sनुमेयस्थलमें भी उक्त फल विद्यमान है। एतावैतैव गौण सकर्मकत्वका व्यवहार वहांपर है। कारकत्व तो विद्यमानमें ही होता है। अतः मुख्य कारक माननेमें साक्षात्कारकी आपत्ति आ जाती है। अतीतसे भिन्न वर्तमान वह्न्यादिविषयक अनुमितिस्थलमें भी विषयके कारकत्वके अभावका प्रतिपादन करते हैं-] ऐसी दशामें इस पूर्वोक्त निर्णीत सिद्धान्तके अनुसार जहाँ विद्यमान-अतीतानागतसे भिन्न-वहि आदिका अनुमान किया जाता है वहाँपर अनुमेयत्वके समानभावसे रहनेके कारण [जैसे • अनुमेयत्व अतीत् अनागत वहि आदिमें है वैसे ही वर्तमान वहि आदिमें भी है,
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अध्यांसविचार ] भापानुवादसहित २८९
दग्न्यादेरकर्मकारकत्वमापरोक्ष्यपरिहारायाऽवगन्तव्यम्। प्रत्यक्षे पुनरविना- भावसम्वन्धादीनामभावाद्विज्ञानस्याSडकारसमर्पणाय विपयस्य कर्मकारकत्व- मेवाऽभ्युपेयम्। सम्भवति हि तत्र नियमेन कारकत्वम्, प्रत्यक्षविपयस्य वर्त्तमानत्वनियमाद। तस्मात् कूटस्थचतन्ये सर्वदा सर्वपदार्थानामध्यस्तत्वे समेऽपि कारकत्वव्यक्षकत्ववशात् पत्यक्षविपयेष्वेवाऽपरोक्ष्यं व्यचस्थास्यते। न च निर्चिकल्पके चतन्ये कथ सविकल्पकपदार्थाध्यास इति शङ्ग- नीयम्, पूर्वपूर्वअमातृत्वादिसंस्कारेण सविकल्पकमेव चतन्यमहङ्काराद्य- व्यासाधिष्ठानमिति प्रतिकर्मव्यवस्थावादे प्रत्युक्तत्वात्। ननु तथापि संस्कारादिसर्वप्रपश्चोपादानं मूलाज्ञानं निर्विकल्पकचत-
इस अनुमेयत्वमें कोई विशेषता नहीं है ] साक्षात्कार-प्रत्यक्ष ज्ञान-होनेकी आपत्ति दूर करनेके लिए वर्तमान भी उन वहि आदिमें कर्म कारकत्वका अभाव ही रहता है, ऐसा ही स्वीकार करना चाहिए। [ प्रत्यक्षमें अनुमानादिकी अपेक्षा विलक्षणता दिखलाते हैं-]प्रत्यक्षस्थलमें तो अविनाभाव-व्याप्ति-आदि सम्बन्ध- के अभावसे विज्ञानको आकार देनेके लिए विपयको कर्मकारक मानना ही होगा। प्रत्यक्षस्थलमें विपय नियमतः कर्मकारक हो सकता है, क्योंकि प्रत्यक्षज्ञानके विपयका वर्तमानरूपसे रहना आवश्यक है। [अन्यथा अतीत और अनागतके समान विषयके वर्तमान न होनेसे उसमें इन्द्रियसम्प्रयोग आदि ही नहीं हो सकेगा, जिसके बिना प्रत्यक्षका होना सुतराम् असम्भव है। ] यद्यपि इस पूर्वनिर्णीत सिद्धान्तके अनुसार कूटस्थ चैतन्यमें सभी पदार्थ अर्थात् अतीत, अनागत और वर्तमान अध्य- स्तत्वरूपसे समान ही हैं, तथापि कारकत्व और व्यञ्जकत्वके कारण प्रत्यक्षज्ञानके ही विपयोंमें साक्षात्कारकी व्यवस्था की जाती है। [ इस प्रकार पटाघपरोक्षरूप प्रतिकर्म-व्यवस्था उपपन्न होती है। ] निर्विकल्पक चैतन्यमें सविकल्पक पदार्थोंका अध्यास कैसे होगा? ऐसी शङ्का उचित नहीं है, क्योंकि पूर्व-पूर्व प्रमातृत्व आदिके संस्कारसे सविकल्पक चैतन्य ही अहक्कारादिके अध्यासका अधिष्ठान होता है, इस प्रकारसे प्रतिकर्म- व्यवस्थाके समर्थनप्रकरणमें इस शङ्काका खण्डन कर आये हैं। यद्यपि पहले न्यवस्था बतलाई गई है, तथापि यह शङ्ा हो सकती है कि ३७
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२९० विवरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ?
न्ये एवाडध्यसनीयम्, अज्ञानाध्यासाधीनसिद्धिकत्वादन्यस्य सर्वस्य सविकल्पकत्वसम्पादकस्य वस्तुनः । न च निर्विकल्पकस्याऽधिष्ठानत्वमुप- पद्यते, सर्वत्र सविकल्पकस्यैवाविष्ठानत्वदर्शनात् ।. तत्कथमज्ञानाध्यास :?
योजकत्वात्। तच्च केवलव्यतिरेकाभावादवगन्तव्यम्।
संस्कार आदि सकल प्रपश्चके उपादानभूत मूल अज्ञान* का अध्यास निर्विकल्पक चैतन्यमें ही करना अपेक्षित है, क्योंकि सविकल्पक व्यवहारके प्रयोजक आत्मासे अतिरिक्त संस्कार आदि सम्पूर्ण पदार्थोंकी सिद्धि अज्ञानाध्यासके ही अधीन है अर्थात् अज्ञानाध्यासके बिना संस्कार आदि कोई भी पदार्थ अपना अस्तित्व नहीं रख सकते। और निर्विकल्पक तो अघिष्ठान हो नहीं सकता, क्योंकि सर्वत्र-रज्जु सर्प आदि स्थलमें-सविकरपक् रज्जु आदि ही अधिष्ठान देखे गये हैं-इन सब विरोधोंसे अज्ञानका अध्यास संगत कैसे होगा? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि निर्चिकल्पक चैतन्य भी प्रत्यक्ष स्फुरणमात्रसे ही अधिष्ठान हो सकता है, अतः अधिष्ठानमें सविकल्पकत्वका होना आवश्यक नहीं है। यह सिद्धान्त केवलव्यतिरेकके अभावसे समझना चाहिए ।।
- संक्षेपशारीरकमें भी कहा है- 'आश्रयत्वविषयत्वभागिनी निर्विभागचितिरेव केवला। पूर्वसिद्धतमसो हि पश्चिमो नाSSश्रयो भवति नाऽपि गोचरः ।।' अर्थात् निर्विकल्पक चैतन्य ही मूल अज्ञानके अध्यासका अधिष्ठान है, क्योंकि सवका मूल कारण होनेसे अज्ञानका सवसे पहले रहना ही आवश्यक है, इसलिए उसके अनन्तर प्रतीय- मान होनेवाले पदार्थ उसके अधिष्ठान नहीं हो सकते। + पृथ्वीमें इतरभेदरूपी साध्यके साधक गन्धवत्त्व हेतुमें 'जो इतरभेदवान् नहीं है, वह गन्धवान नहीं है', इस प्रकारके केत्रल व्यतिरेकका अभाव नहीं है, किन्तु व्यतिरेक, ही है। अतः उक्त हेतुसे पृथ्वीमें इतरभेदकी सिद्धि होती है। प्रकृतमें जो सविकल्पक नहीं होता, वह अधिष्ठान नहीं होता, ऐसा केवलव्यतिरेक सम्प्रतिपन्न नहीं है, क्योंकि वेदान्तमतमें निर्विकल्प आत्मा मी स्फुरणमात्रसे अविद्याका अधिष्ठान होता है और अपरोक्ष ही अधिष्ठान होता है, इस विषयमें 'जो किसी भी अंशसे अपरोक्ष नहीं है वह अधिष्ठान नहीं हो सकता' ऐसा केवल-व्यतिरेक सम्प्रतिपन्न है। रज्जुसर्पे
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अध्यासविचार] भापानुवादसहित २९१
आत्मनो नित्यानुमेयत्वान्नाऽपरोक्षतेति चेद्, न; अहङ्गारवादेऽह- मित्यपरोक्षानुभवविरोधेन प्रत्युक्तत्वात् । अहमित्यनुभवोऽनुमानजन्य एव, तथापि भूयोऽभ्यासपाटवाद् व्याप्तिपक्षधर्मतोल्लेखमन्तरेण झटिति तदुत्पत्तौ अपरोक्षभ्रमः प्राणिनां तत्रेति चेद, न; तथा सति घटादिकं जानतो देवदत्तस्य 'मयेदं विदितम्' इति सम्वन्धावगमो न स्यात्। यथा परेण विदिते घटे स्वस्य सम्बन्धो न ग्रतीयते तथा स्वेन विदितेऽपि, उभयो- रनित्यानुमेययोरविशेपाद्। स्वेन ज्ञानावसरे स्वस्य ज्ञानाश्रयत्वं विशेष इति चेद्, न; स्वात्मन्यप्रतीयमाने ज्ञानाश्रयत्वस्य दुरवगमत्वात्। न च
आत्मा नित्य अनुमेय-अनुमितिका ही विषय-है, प्रत्यक्ष नहीं है, ऐसी शक्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पहले अहक्कारवादमें 'अहम्' इस प्रकारके प्रत्यक्ष अनुभवके विरोधसे [ इस शक्काका ] खण्डन किया गया है। यद्यपि 'अहम्' का (मैं-आत्मा-का) अनुभव अनुमानसे ही होता है, तथापि वार वार अधिक अभ्यास होनेसे व्याप्ति तथा पक्षघर्मताके उल्लेखके विना जल्दी आत्माकी मतीतिके उत्पन्न हो जानेके कारण वस्तुतः अनुमित आत्मामें मनुष्योंका प्रत्यक्षत्वभ्रम हो जाता है, ऐसा पूर्वपक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे घटादिको जानते हुए देवदत्तको 'मैंने इसे जान लिया' इस प्रकार अपनेमें विपयसम्बन्घकी प्रतीति नहीं होगी। जसे दूसरे पुरुप द्वारा जञायमान घटमें अपना सम्बन्ध नहीं जान पड़ता वैसे ही अपने द्वारा ज्ञात घटमें भी सम्बन्धका ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि ऐसी दशामें अपने तथा दूसरेके आत्माओंके नित्यानुमेय होनेमें कोई अन्तर नहीं रहा। [ 'प्रवृत्त्यादयनुमेयोऽयम्' की रीतिसे जैसे अन्य देहस्थ आत्मा अनुमेय है, अतः उसके ज्ञानका सम्बन्ध अपनेमें नहीं होता, वैसे ही अपने आत्माके अनुमेय होनेसे अपने ज्ञानका भी सम्बन्ध अपनेमें नहीं होगा, यह भाव है। ] स्वकीय ज्ञानके अवसरमें स्वयं ज्ञानका आश्रय होता है [ पर जिस समय परदेहस्थ आत्माको ज्ञान होता है उस समय अपना आत्मा ज्ञानाश्रय नहीं रहता ], यह विशेष है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि
आदि अध्यासस्थलोंमें सर्वत्र आपरोक्ष्य है, अतः आपरोक्ष्यको केवलव्यतिरेकके वलसे अधिष्ठानत्वका प्रयोजक मानना उचित है, किन्तु सविकल्पकत्वमें केवलव्यतिरेकके अभावसे अधिष्ठानत्वका प्रयोजकत्व नहीं मान सकते, यह तात्पर्य है।
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३९२ विवरणग्रमेयसंग्रहं [सूंत्र १, वर्णकह
ज्ञानाश्रयत्वं फलसम्वन्धादनुमातुं शक्यम्, फलसम्वन्धस्याऽद्याप्यसिद्धेः। तत आत्मा स्वप्रकाशत्वेनाऽपरोक्षो न नित्यानुमेयः । यस्तु स्वप्रकाशत्वे विवदते स चक्तव्य :- किमात्मा संविदाश्रय- त्वेनाऽपरोक्ष: कि वा संवित्सम्बन्धमान्रसत्वादुत संविदुपाधित्वादथो संविद्वि- षयत्वात् १ नाद्य:, आत्मा न संविदाश्रयत्वेनाऽपरोक्ष, संवित्कर्मतामन्तरे- णाऽपरोक्षत्वात्, संवेदनवद् । न द्वितीय:, अतिप्रसङ्गात्। तृतीयेऽपि न स्वात्माके प्रतीत न होनेसे 'हम ज्ञानाश्रय हैं' ऐसा उसमें बोध हो ही नहीं सकता। फलके-विषयप्रकाशके-सम्बन्धसे ज्ञानके आश्रयका अनुमान हो जायगा, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि विपयप्रकाशका सम्बन्ध अवतक सिद्ध ही नहीं हुआ है। इसलिए आत्मा स्वप्रकाश होनेसे प्रत्यक्ष है, नित्य अनुमेय नहीं है। [यदि आत्मा प्रत्यक्ष न हो और उसे स्वपकाश न माना जाय, सो संसारमें किसी भी पदार्थका प्रकाश-ज्ञान-न हो सकेगा। श्रुति भी कहती है-'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' (जब उसका प्रकांश होता है तभी सब प्रकाशित होते हैं और उसके प्रकाशसे ही सब कुछ प्रकाशित होता है) इत्यादि।] जो चादी आत्माके स्वप्रकाश होनेमें विवाद करता है अर्थात् आत्माको स्वप्रकाश नहीं मानता, उससे पूछना चाहिए कि क्या आत्मा संवित्का आश्रय होनेसे प्रत्यक्ष है? अथवा संवित्के सम्बन्धमात्रसे ? या संवित्की उपाधि होनेसे: अथवा ज्ञानका विषय होनेसे ?- इन विकल्पोंमेंसे प्रथम विक्प महीं हो सकता, क्योंकि आत्माका ज्ञानके आश्रयत्वरूपसे प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि ज्ञानके समान वह ज्ञानके कर्म हुए बिना ही अपरोक्ष है। द्वितीय कल्प भी नहीं मान सकते, क्योंकि ऐसा माननेसे अतिप्रसङ्ग हो जायगा,
'घटमहं जानामि' (मैं घटको जानता हूँ) इस प्रकार आत्मप्रतीतिसे संचलित विषयका ही अनुभव होता है। उसका निमित्त कोई ज्ञान अवश्य है। उसका आश्रय आत्मा ही है, अतः ज्ञानका आश्रय होनेसे आत्माकी सिद्धि होगी, ऐसा पूर्वपक्षीका अभिप्राय है। उत्तर देने- वालेका अभिप्राय है कि ज्ञानसे आत्माका प्रकाश हुआ, ऐसा जो तुम्हें अभिमत है, वह वन नहीं सकता, क्योंकि जो जो घट, पटादि वस्तुएँ ज्ञानाधीनप्रकाश हैं, वे ज्ञानकी कर्म अवश्य होती हैं, इसमें कहीं भी व्यमिचार नहीं है। इस व्याप्तिके अनुसार आत्मा भी ज्ञानका कर्म होना चाहिए। परन्तु घह तो ज्ञानके तुल्य स्वप्रकाश है, शेय नहीं है।
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अंध्यासविचार ] भापानुवादसहित २९३
तावत् संविदुपाधित्वं नाम संविदाश्रयत्वम्, विपयस्याऽनाश्रयस्याऽपरोक्षत्वा- भावप्रसङ्गात्। नाप्याऽऽश्रयविपययोरन्यतरत्वम्, विपयस्य दुर्निरूपत्वाद्। संवित्प्रयुक्तव्यवहारयोग्यो विषय इति चेद्, आत्माऽपि तर्हिं विपयः स्या- त्। आश्रयव्यतिरिक्तत्वे सति संविध्धावर्त्तकत्वं चक्षुष्यतिव्याप्तम्। आश्रव्यतिरिक्तत्वे सति संवित्प्रयुक्तव्यवहारयोग्यत्वं च संविदात्मसम्बन्धेऽ- तिव्याप्तम्। न च सम्बन्धस्य विपयत्त्वमिष्टम्: अपरोक्षत्वप्रसङ्गात्। अनुमेयो हि नित्यं समवायो भवतेष्यते। चतुर्थेऽि न तावदात्मविपयं संवेदनं घटादिविपयसंवेदनाद्भिन्नकालीनम् । तथा सति 'मयेदं विदित-
[ क्योंकि संवित्का सम्बन्ध तो परोक्षाऽपरोक्षसाधारण है]। तृतीय विकल्पमें संविदुपाधित्व संवित्का आश्रय होता है, ऐसा भी नहीं मान सकते, क्योंकि जो संवित्का आश्रय नहीं है, ऐसे विपयोंके अपरोक्षत्वका अभाव हो जायगा। आश्रय और विषय-इन दोनोंमें से एकको संवित्की उपाधि कहेंगे, क्योंकि यहाँ पर उपाधिका अर्थ विशेषण करेंगे। ज्ञानमें दोनों विशेषण होते ही हैं] ऐसा मी नहीं है, क्योंकि विपयका निरूपण करना अत्यन्त कठिन है। जो ज्ञानजनित व्यवहारके योग्य हो, उसे विपय कहते हैं, ऐसा निर्ववचन करनेमें तो आत्मा भी विपय हो जायगा। आश्रयसे मिन्न ज्ञानके व्यावर्तक-विशेषण-को ही विपय कहेंगे, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह लक्षण नेत्रमें अतिव्याप्त हो जायगा। [ क्योंकि 'यह ज्ञान नेत्रों द्वारा हुआ है, अतः 'चाक्षुपं ज्ञानम्' इस प्रतीतिमें 'आश्रयसे भिन्न ज्ञानका विशेषण' नेत्र है ही।] और यदि 'आश्रयसे अतिरिक्त होता हुआ जो ज्ञान द्वारा व्यवहारके योग्य हो' ऐसा कहें, तो ज्ञान और आत्माके सम्बन्धमें भी लक्षणकी अतिव्याप्ति हो जायगी और सम्बन्धको विषय मानना इष्ट है नहीं। [अनिष्टमें लक्षणका जाना ही अतिव्यापित दोप है। ] यदि सम्बन्धको विपय मान लिया जायगा, तो घट, पट आदिकी भाँति समवायका भी प्रत्यक्ष हो जायगा। [आप समवायसम्बन्धको नित्य अनुमेय मानते हैं।] और चौथे विकल्पमें अर्थात्-ज्ञानका विपय होनेसे आत्मा प्रत्यक्ष है, इसमें भी ऐसा नहीं कह सकते हैं कि 'आत्माको विषय करनेवाला ज्ञान घटादिको विषय करनेवाले ज्ञानसे भिन्न कालमें हुआ है' क्योंकि ऐसा माननेसे 'मैंने इसे
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२१४ विवरणप्रमेयंसग्रह [सूत्रे १,वर्णक ।
,म्' इति संवेद्यसम्बन्धो नावगम्येत। नापि तयोरेककालत्वम्। युगपद्विरुद्ध- विषयग्राहिज्ञानद्वयोत्पादायोगात्। नहि देवदत्तस्याऽग्रपृष्ठदेशस्थितार्थव्या- पिगमनक्रियाद्वयावेशो युगपद् दृश्यते। विरुद्धपरिस्पन्दद्वयस्य युगपद- नुपपत्तावपि परिणामद्यस्य नाऽनुपपत्तिरिति चेद्, न; निरवयवस्याऽवय- वशः परिणामद्वयानुपपत्तेः। नाऽपि का्त्स्र्येन परिणामद्वयम्, कृत्सशरीर- वर्तिनो चिरुद्धपरिणामयोर्वा्ययौवनयोयोगपद्यादर्शनात्। तस्मात् परि-
जान लिया' इस प्रकार ज्ञानका विषयके-ज्ञेयके-साथ सम्बन्ध प्रतीत नहीं होगा। [क्योंकि आत्माके स्वप्रकाश होनेमें अपने और दूसरेके ज्ञानके विषयमें कोई विशेष तो है ही नहीं ] उन दोनों [ विपय और आत्माको विपय करनेवाले] ज्ञानोंका एक ही कालमें होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि एक साथ विरुद्ध-भिन्न मिन्न विषयोंको ग्रहण करनेवाले-दो ज्ञानोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। आगे और पीठकी ओर विद्यमान दो विभिन्न वस्तुओंको उपयोगमें लानेके लिए देवदत्तका एक ही साथ दोनों ओरको चलना नहीं देखा गया है। परस्पर विरोधी दो गमनक्रिया एक साथ नहीं हो सकतीं, यह हमने मान लिया; परन्तु दो परिणाम तो एक साथ हो सकते हैं ? [जैसे दधिरूपमें परिणत दूधमें घनत्व और अच्छत्व ], नहीं हो सकते, क्योंकि अवयवशून्य पदार्थोंमें एक-एक अवयव करके दो परिणामोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। अवयव द्वारा न सही, किन्तु सम्पूर्णरूपसे एक साथ तो दो परिणाम-परिवर्तन-हो जायँगे, ऐसा भी नहीं हो सकते, क्योंकि सम्पूर्ण शरीरको व्याप्त करनेवाले विरोधी परिणामका- वाल्यावस्था और वृद्धावस्था-इन दोनोंका-एक साथ रहना नहीं देखा गया है। [अवयवी पदा्थोंमें एक-एक अवयवमें रहनेवाले भिन्न-भिन्न परिणाम तो देखे जाते हैं, परन्तु समी अवयवोंको व्याप्त करनेवाले भिन्न दो परिणाम एक साथ एक कालमें नहीं देखे गये हैं] इससे अन्तमें यही मानना होगा कि स्वप्रकाश होनेसे ही आत्मा अपरोक्ष-प्रत्यक्ष-है। अधिष्ठान-जिसमें आरोप होता है, और. अध्यस्यमान-जिसक। आरोप हो रहा है-ये दोनों पदार्थ जब एक ही इन्द्रियके द्वारा ग्रहीत
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २९५
मात्रेणाडध्यासो न क्वचिद् दृष्ट इति, साक्षिणा मनोमात्रेण वा प्रत्यक्षे आकाशे
त्वमिष्यंत इति चेदू, नः तथा सति रूपस्पर्शवच्वप्रसङ्गात्। चक्षुरन्वयव्यति रेकौ
ये तु वादिन: स्वस्वप्रक्रियानुसारेण नित्यानुमेयमाकाशमिच्छन्ति तान्प्रत्यध्यस्यमानेनकेन्द्रियग्राद्यत्वाभावाद् भवत्येवोदाहरणम् । तस्यैतस्य
होते हैं तब अध्यास होता है, [क्योंकि ऐसा ही छुकिरजताध्यासस्थलमें देखा गया है ] अपरोक्षतामात्रसे अध्यासका होना कहीं भी नहीं देखा गया है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि साक्षी या मनके द्वारा प्रत्यक्ष हुए आकाशमें मलिनता आदिका चाक्षुप प्रत्यक्ष देखा गया है। क्षपणक या भट्टमतानुयायी आकाशका प्रत्यक्ष मानते ही हैं, यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे आकाशमें रूपवत्ता तथा स्पर्शवत्ताका प्रसङ्ग आ जायगा। [और रुप तथा स्पशसे रहित द्रव्यका चाक्षुप हो ही नहीं सकता ] आँखका अन्वय तथा व्यतिरेक तो आकाशके अनुमापक मूर्त द्रव्यके अभावको विषय करनेसे ही अन्यथासिद्ध है। [ यदि आकाशका चाक्षुप प्रत्यक्ष नहीं मानते हो, तो नेत्र चंद करनेपर या नेत्रहीन पुरुपको भी आकाशका साक्षात्कार होना चाहिए, परन्तु ऐसा देखा नहीं गया है। इससे आँखोंसे ही आकाशका प्रत्यक्ष होता है और आँखोंके बिना नहीं होता, इस प्रकार आकाशके प्रत्यक्षमें नेत्रोंका अन्वय और व्यतिरेक दष्ट है। यह पूर्वपक्षीका-आकाशको चाक्षुप प्रत्यक्ष माननेवाले क्षपणक आदिका-सिद्धान्त है। वेदान्ती खण्डन करता है कि उपर्युक्त अन्वय और व्यतिरेक मूर्त द्रव्यके अभावके ग्रहण करानेसे. अन्यथा सिद्ध हैं, अतः वे आकाशके चाक्षुपत्वके ज्ञापक नहीं हो सकते; इस प्रकार मूर्त द्रव्याभावका साधन करनेमें चक्षुके अन्वय और व्यतिरेक उपक्षीण हो जाते हैं।] जो भिन्न-भिन्न वादी अपनी अपनी प्रक्रियाके अनुसार आकाशको नित्य अनुमेय मानते हैं, उनके मतमें तो आकाश और अध्यस्यमान तल मलिनतादि एक ही इन्द्रियसे गृहीत होते ही नहीं हैं। इससे उदाहरण होता ही है। [ वाद्येन्द्रियग्राह्य शब्दरूपविशेप गुणका आश्रय होनेसे वैशेषिक,
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२९६ विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
णदोपाभ्यां संस्पृश्यते, अनुपादानत्वाद्। तदेवं वेदान्तवादे सर्वदोपपरिहारस्य सुकरत्वात् सम्भाव्यत एव प्रत्यगात्मन्यप्यनात्माध्यासः। नन्वात्मन्यनात्माध्यासो लक्षणसम्भावनाम्यायुपेतोऽपि न प्रमाणम- न्तरेण सेद्धुमर्हति, मानाधीनत्वात् सर्वत्र मेयसिद्वेरिति चेत्, तर्ह्न्न प्रत्यक्षा- नुमानार्थापच्यागमाः प्रमाणत्वेनाऽवगन्तव्या। सर्वो लोको मनुष्योऽहं
नैयायिकादि आकाशका अनुमान करते हैं। बौद्ध तथा चार्वाक आदि तो आकाशको मूर्तद्रव्याभावसे अनुमेय कहते हैं। ऐसा ही सिद्धान्त प्रभाकरानुयायी मीमांसकोंका भी है। केवल इतना ही भेद है कि उनके मतमें अभाव भावान्तर ही है, इत्यादि प्रक्रियाओंसे आकाश अनुमेय भी इन वादियोंके मतमें है और अनुमेय इस आकाशमें आरोपित (मिथ्याभूत ) तल मलिनता आदिके आरोपका प्रत्यक्ष सभी वादी मानते हैं, तब यह नियम कहाँ रहा कि अध्यस्यमान और अधिष्ठानका एक ही इन्द्रियसे ग्हण होना चाहिए : दोनोंके एक ही इन्द्रियसे गृहीत न होनेपर भी अध्यास होता है, इसका दृष्टान्त आकाशको नित्यानुमेय माननेवाले वादियोंके मतमें आकाशमें अध्यस्यमान तलमलिनतादि स्पष्ट ही है, यह तात्पर्य हुआ।] तत्वज्ञानसे निवृत्त होनेवाली उस अविद्या तथा उसके कार्यभूत अहक्कार आदि प्रपश्च के अधिष्ठानभूत आत्मा भी अध्यस्यमान अविद्या तथा अहक्कार आदि प्रपश्चके गुण दोषोंसे संसृष्ट नहीं होता, क्योंकि आत्मा उसका (अज्ञान आदिका) उपादान नहीं है। इस प्रकार वेदान्तमतमें सब दोषोंका निवारण करना सरल है, अतः प्रत्यगात्मामें अर्थात् कूटस्थ निर्विकल्प चतन्यमें अनात्मपदार्थका अध्यास सम्भव ही है। आत्मामें अनात्माका अध्यास लक्षण तथा सम्भावनासे युक्त भले ही हो, किन्तु वह प्रमाणके बिना सिद्ध हो नहीं सकता, क्योंकि 'मानाधीना मेयसिद्धिः' सर्वत्र प्रमाणके द्वारा ही प्रमेय-वस्तु-की सिद्धि होती है, यदि यह शक्का करते हो, तो इस अध्यासकी सिद्धिमें प्रत्यक्ष, अनुमान, अर्थापत्ति तथा आगम-श्रुति-इनको तुम्हें प्रमाणरूपसे समझना चाहिए। [ प्रत्यक्ष प्रमाण
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित २९७
देवोऽहं पशुरहम्' इति जातिविशिष्टशरीरेन्द्रियादिसंघाते चिद्ूपस्य स्वस्य तादात्म्यमध्यस्यैव व्यवहारं प्रमातृप्रमेयादिरूपं कुरुत इति ग्रत्यक्षमेतत्। यद्यप्यत्रेन्द्रियापगमे ग्रमाणकोटावनन्तर्भावात् प्रत्यक्षसाम्यसम्भवस्तथापि नित्यं साक्षिप्रत्यक्ष सम्भविष्यति। यत्र सामग्यभावेऽप्यापरोक्ष्यं दृश्यते, तत्र साक्षिप्रत्यक्षतेति हि वेदान्तमर्यादा। तथाऽनुमानमपि-विमतौ देव- दत्तस्य जाग्रत्स्वन्नकाली तस्यैवाऽहं मनुष्य इत्यादध्यासपुरःसरत्रमातृत्वा-
दिखाते हैं] सारा संसार 'मैं मनुष्य हूँ, मैं देवता हूँ, मैं पछ हूँ', इस प्रकार जातिसे विशिष्ट शरीर, इन्द्रिय आदि समूहमें चिद्रूप आत्माके अमेदका अध्यास करके ही प्रमाता, प्रमेय आदिरूप व्यवहार करता है' यह प्रत्यक्ष ही है। [जबतक देहेन्द्रियादिसद्कातमें 'अहम्' 'मम' इत्यािअभिमान नहीं होता, तबतक प्रमाण, प्रमेय, प्रमातृत्व आदि कोई भी व्यवहार नहीं हो सकता, अन्यथा सुपुप्िकालमें भी जागर और स्वमके समान प्रमातृत्व आदिका व्यवहार होना चाहिए, क्योंकि मनुष्यत्व तथा ब्राह्मणत्व जातिसे युक्त पैरसे लेकर मस्तक पर्यन्त इस देहमें प्राणीमात्रका 'मैं' और हाथ, पैर आदि अवयवोमें तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंमें 'मेरा' ऐसा व्यवहार जो होता है, वह अध्यासके बिना हो नहीं सकता, यह भाव है] यद्यपि 'मनुष्योहम्' 'ममेदम्' ( मैं मनुष्य हूँ, चक्षुरादि इन्द्रियाँ मेरी हैं) इत्यादि व्यवहारमें चक्षु आदि इन्द्रियाँ प्रमाणकोटिमें नहीं आतीं अर्थात् उक्त व्यवहार इन्द्रियविकलको भी होता है, अतः प्रत्यक्षसामग्रीका-इन्द्रिय-सम्प्रयोग आदिका-सम्भव नहीं है, [इसलिए उक्त व्यवहार प्रत्यक्ष नहीं माना जा सकता] तथापि नित्य साक्षिप्रत्यक्ष माना जायगा। [ वाह्य वस्तुके प्रंत्यक्षमें इन्द्रिय-संप्रयोग आदि अपेक्षित हैं, आत्मप्रत्यक्षमं नहीं, इसलिए साक्षीसे भास्य होनेके कारण उक्त व्यवहारका साक्षी द्वारा प्रत्यक्ष माननेमें कोई बाधां नहीं है।] जिस स्थलमें प्रत्यक्षसामग्रीका अभाव है, और प्रत्यक्षज्ञान देखा जाता है, उस स्थलोंमें साक्षी द्वारा प्रत्यक्ष है, इस प्रकार वेदान्तका सिद्धान्त है। एवम् अनुमान मी निरुक्त अध्यासमें प्रमाण है-विमत अर्थात् विवादग्स्त देवदचकी जाग्रत् और स्वप्न अवस्था उसी देवदत्तके 'मैं मनुष्य हूं' इत्यादि अध्यास द्वारा ही प्रमातृत्व आदि व्यवहारसे युक्त हैं, उसीकी
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२९८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्गक १
दिव्यवहारवन्तौ, तस्यैव सुषुप्त्यादिकालादन्यकालत्वात्, यन्नैवं तन्नैवम्, यथा तस्यैव सुपुप्यादिकाल इति। अर्थापत्तिरपि प्रमातृत्वादिव्यवहारो देहादितादात्म्याध्यासं विना नोपपद्यते, सुपपादावध्यासाभावे व्यवहारा- नुपलम्भादिति । आगमस्तु 'ब्राह्मणो यजेत' इत्यादिरवगन्तव्यः।
सुपुप्ति अवस्थासे भिन्न अवस्था होनेसे, [आदिशव्दसे मूर्च्छा आदि अवस्था लेनी चाहिएँ ] जो ऐसा नहीं है, वह ऐसा नहीं है, जैसे उसी देवदत्तका सुषुप्तिसमय। [यहांपर व्यतिरेकव्याप्ति दिखलाई गई है। देवदचकी सुपुप्ि अवस्था देवदतके ही प्रमातृत्व आदि व्यवहारसे शून्य है, परन्तु देवदत्तकी सुप्ति अवस्थामें यज्ञदत्तके प्रमातृत्व आदि व्यवहार हैं ही, उनकी व्यावृत्तिके लिए ही 'तस्यैव'-उसकी ही-ऐसा पद दिया गया है, अतः यज्ञदत्तकी अवस्थाको लेकर दोष नहीं दिया जा सकता। उस देवदत्तकी जाग्रत् और स्वप्न दोनों अवस्थाएँ 'मैं' मनुष्य हूं' इत्यादि अभिमानयुक्त प्रमातृत्व आदि व्यवहारसे पूर्ण हैं और इससे विपरीत कालको अर्थात् जिस कालमें उक्त व्यवहार नहीं रहता, उस कालको जागर या स्वप्न नहीं कह सकते, यह भाव है।] अर्थापत्ति भी इसमें प्रमाण है। प्रमातृत्व आदि व्यवहार देहादिके साथ तादात्म्य-अध्यासके बिना नहीं हो सकते, क्योंकि सुपुप्ति आदि अवस्थाओंमें मनुष्यमें उक्त अध्यास न होनेसे उक्त प्रमातृत्व आदि व्यवहार नहीं देखा जाता है। [आत्मा स्वयं कूटस्थ निर्विकार तथा अपरिणामी है। स्वयं उसमें प्रमातृत्व आदि परिणाम नहीं हो सकते। और 'मैं मनुष्य हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष व्यवहारोंसे उसका निर्वाह नहीं हो सकता, अतः प्रमातृत्व आदि व्यवहारकी उपपत्तिके लिए अध्यासको मानना ही पड़ेगा, यह भाव है ]।
आगम-शास्त्र-प्रमाण दिखलाते हैं-'व्राह्मणो यजेत' (व्राह्मण यज्ञ करे) इत्यादि श्रुति भी अध्यासमें प्रमाण है। [अन्यथा ब्राह्मणपद जो ब्राह्मणत्वजातिविशिष्टका यागमें अधिकार दिखलाता है, वह निर्धर्मक आत्मामें अध्यासके बिना उपपन्न नहीं होगा। यद्यपि यह आगम प्रमाण भी अर्थापत्तिकी कोटिमें ही प्रविष्ट है, तथापि 'मैं मनुष्य हूँ' इस लौकिक व्यवहारकी
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अध्यासाविचार ] भांपांतुवादसहितं २९९
ननु ग्रमातृत्वादिव्यवहारो देहात्मनोः सम्बन्धमात्रमपेक्षते, न तादात्म्यमिति चेत्, कोडसौ सम्वन्धः१ स्वस्वामिभावश्चेत्, तहिं भृत्यादि- शरीरेणाऽपि प्रमातृत्वादिव्यवहार: स्यात्। अस्तु तर्हि स्वेच्छामात्रानुविधा- यित्वं सम्बन्धः। भृत्यादिशरीरं तु स्ववचनानुविधायीति नाऽतिप्रसङ्ग इति चेदू, मैवम् ; यदीच्छानुविधानयोग्यतामात्रं विवक्षितं तदा सुपुरेऽपि तत्स
उपपत्तिके लिए कल्पित अध्याससाधिका अर्थापत्ति भी स्वतन्त्र प्रमाण मानी गई है, क्योंकि लौकिक वाक्योंको स्वतःप्रामाण्य नहीं है। और 'श्राहणो यजेत' इस वेदिकवाक्यमूलक अर्थापसिको स्वतन्त्र न मानकर वैदिक वाक्योंको ही, स्वतःप्रामाण्य होनेसे, प्रमाण कहा गया है। इतनी सारी कर्पनाएँ तब आवश्यक होतीं, जब 'मैं मनुष्य हूँ' इत्यादि व्यवहार तादात्म्य- अध्यासके बिना नहीं होता, परन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि तादात्म्यसे भिन्न स्वत्वं आदि भेदसम्बन्धमूलक भी उक्त व्यवहार हो सकते हैं, जैसे मेरा परिवार, धनं आदि व्यवहार, इस आशयसे शक्का करते हैं-]। अमातृत्व आदि व्यवहार देह और आत्माके परस्पर सम्बन्धकी ही अपेक्षा करते हैं, तादात्म्य सम्बन्धकी नहीं; ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उस सग्वन्धका कोई नामनिर्देश भी तो करना होगा, इस परिस्थितिमें हम प्रश्न करेंगे कि वह सम्बन्ध कौन-सा है: यदि उत्तरमें स्वस्वामिभाव- सम्बन्ध-मालिक और नौकरके जैसा सम्बन्ध-माना जाय, तो नौकर आदिके शरीरसे भी स्वामीको ममातृत्व आदि व्यवहार होने लगेगा अर्थात् सेवकका व्यवहार भी मालिकका होना चाहिए। अच्छा, तो अपनी इच्छाका ही अनुविधान करनामात्र सम्बन्ध मानेंगे। [जब देवदत्त आदि रहूँ, बैहूँ, खाऊँ, पीऊँ इत्यादि इच्छा करते हैं, तभी सकल व्यवहार होते हैं, क्योंकि व्यवहारमात्रमें इच्छा कारण है। उस इच्छाका अनुसरण करना ही देह और आत्माका सम्बन्ध है, यह स्वेच्छानुविधानरूपी सम्वन्ध भृत्यके साथ नहीं है, यह भाव है। ] सेवक आदिका शरीर तो अपने मालिकके चचनका अनुसरण करनेवाला है, इससे पूर्वोक्त अतिप्रसङ्ग नहीं आता, ऐसा भी कहना उचित नहीं है, क्योंकि यदि इच्छाका अनुविधान करनेकी योग्यता- मात्र सम्बन्ध माना जाय, तो सुपित्िकालमें उस योग्यताके रहनेसे उक्त व्यवहार
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक १ -0
च्वाद् व्यवहारो दुर्वारः। अथेच्छयाऽनुविधीयमानत्वम्, तर्ह्यत्यातुरे तदभावात् अ्रमातृत्वादिव्यवहारो न स्यात्। इच्छानुविधानस्य व्यवहारमूलत्वमनुभवसिद्धमिति चेत्, किमेतत्सार्व- त्रिकमुत क्ाचित्कम् : नाऽडद्य:, इच्छानुविधानमन्तरेणैव दुर्गन्धादिप्रमात- त्वदर्शनात्। न द्वितीयः, इच्छाया अप्यध्यासमूलत्वेनाऽध्यासस्यैव व्य- चहारहेतुत्वात्। नह्यन्त:करणतादात्म्याध्यासमन्तरेणेच्छारूप: परिणामो निर्विकारस्याऽड़त्मन: सम्भवति। न चाsऽत्मानात्मनोः संयोगसमवायौ व्यवहारनिमित्तम्, सुपुसेऽपि तयोः सच्ाद् व्यवहारापत्ते :; भोकतभोग्यान्वयस्वकर्मारभ्यत्वस्वेन्द्रियाघिष्ठे- यत्वादिसम्वन्धानां भोगाद्यध्यासमूलत्वात्। भृत्यादिशरीरे सद्भावाच्च न
भी नहीं हटाया जा सकता। [ क्योंकि योग्यता जनकतावच्छेदकरूप ही है, अतः तादश जनकतावच्छेंदकता सुषुप् देवदत्त आदिमें है ही। ] और यदि इच्छासे प्रेरित अनुविधान (व्यवहार) करना ही सम्बन्ध है, [योग्यतासम्बन्ध नहीं, इससे सुघुप्तिमें योग्यता रहनेपर भी इच्छाके न होनेसे व्यवहारापत्ति नहीं आती ] ऐसा कहो, तो आतुर (अशक्त) पुरुषमें उसके अभावसे अर्थात् इच्छा रहते हुए भी अनुविधान न करनेसे प्रमातृत्व आदि व्यवहार नहीं होगा। 'इच्छानुविधान समस्त व्यवहारोंका मूल कारण है, यह सिद्धान्त अनुभवसे सिद्ध है, यदि ऐसा मानो, तो हम प्श्न करेंगे कि यह आपका सिद्धान्त सर्वत्र लागू होता है ? या कहीं कहीं? इनमें प्रथम कल्प उचित नहीं है, क्योंकि इच्छानुविधानके बिना भी दुर्गन्ध आदि अनभीष्ट वस्तुका प्रमातृत्व देखा गया है। दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता, क्योंकि इच्छाका भी मूल-आदि कारण-अध्यास ही है, इसलिए अध्यासको ही सब व्यवहारोंका कारण मानना चाहिए; कारण कि अन्तःकरणके साथ तादात्म्य-अध्यासके हुए बिना निर्विकार कूटस्थ आत्माका इच्छात्मक परिमाण हो ही नहीं सकता। यदि कहो कि आत्मा-कूटस्थ चतन्य और अनात्मा-देहेन्द्रियसंघात- का परस्पर संयोग तथा समवायसम्बन्ध ही निरुक्त 'अहं' 'ममेदं' व्यवहारके निमित्त हैं, तो ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि सुषुपिमें उक्त सम्बन्धोंके रहनेसे व्यव- हारकी भी आपत्ति हो जायगी। भोक्तृ-भोग्यसम्बन्ध स्वकर्मारभ्यत्व, स्वेन्द्रियाS-
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अध्यासावेचार भोपानुवादसाहित ३०१
व्यवहारत्वम्। अथ भृत्यादिव्यावृत्त्यर्थमव्यवधानेन भोग्यत्वं सम्वन्ध इत्युच्येत, तदापि भोगयोग्यतामात्रं चेत, सपुसेऽप्यस्ति। अथ भुज्यमान- त्वम्, तथाऽप्यात्मनः सर्वशरीरदेशकालेष्वव्यवधानस्य समत्वात् कस्य- चिदेव शरीरस्य कयोश्चिदेव देशकालयोर्भोग्यत्वे नियामको मूलसम्बन्धोS- पेक्ष्येत। तस्मात्तादात्म्याध्यास एव व्यवहारहेतु:। अस्मिन्नपि पक्षे शरीरविशेपेऽध्यासस्य किं नियामकमिति चेद्, लिङ्ग शरीरविशेप इति तृमः । न च लिङ्गशरीरात्मनोः सम्बन्धः सादि:, येन
धिष्ठेयत्व आदि सम्बन्ध भी प्रमातृत्व आदि व्यवहारके कारण नहीं बन सकते, क्योंकि उक्त सम्बन्ध भी भोगादि अध्यासके ही कारण होते हैं और ये सम्बन्ध भृत्यसेचक आदिके शरीरमें भी विद्यमान हैं [ भोकतृभोग्यत्व आदि सम्बन्धोंको प्रमातृत्व आदि व्यवहारके प्रति प्रयोजक माननेमें प्रथम तो अन्योन्याश्य दोप आता है-आत्मामें भोगादिकी सिद्धिके अनन्तर ही भोक्तृ-भोग्यत्व आदि सम्बन्धोंकी सिद्धि और उक्त सम्बन्धोंकी सिद्धिके अनन्तर ही आत्मामें भोक्तृ-भोग्यत्व आदिकी सिद्धि हो सकती है। दूसरा दोप-भोक्ताका भोग तो सेवक आदिका शरीर भी है, अतः उस शरीरमें उक्त सम्बन्धके जानेसे तद्द्वारा स्वामीको भी निरुक्त प्रमातृत्व आदि व्यवहार होने लगेंगे। ] यदि भृत्यादिकी व्यावृत्तिके लिए अव्यवधानसे ही भोग्यत्व सम्बन्ध माना जाय, तो भी इसमें यदि भोगयोग्यतामात्र मानते हो, तो सुपुप् पुरुषमें भी ऐसी योग्यता है। और यदि अव्यवधानसे भुज्यमानत्व सम्बन्ध माना जाय [जो सोये हुएमें नहीं है] तो भी सम्पूर्ण देश तथा कालोंमें आत्मा समानभावसे साक्षात् विद्यमान है, इससे [ सबकी एक साथ भोगकी व्यावृत्तिके लिए ] किसी शरीर विशेपका कोई-कोई देश और काल विशेष ही भोग हैं, इसका नियम बांधनेवालेको किसी दूसरे मूलकारणकी अपेक्षा होती है। अतएव तादात्म्यका अध्यास ही निरुक्त व्यवहारका कारण है। क्या इस तादात्म्याध्यासपक्षमें भी शरीरविशेपमें अध्यासका नियामक कोई है? हाँ, लिङ्गशरीरविशेष है, ऐसा हम कहते हैं। और लिन्न शरीर तथा आत्माका सम्बन्ध सादि नहीं है, जिससे उस सम्बन्धमें भी दूसरे नियामकको
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
तत्राऽपि नियामकान्तरमन्विष्येत। न च प्रमातृत्वादिव्यवहारस्य देहादि- तादात्म्याध्यासमूलत्वे कारणदोपादग्रामाण्यं प्रत्यक्षादीनां प्रसज्येतेति वाच्यम्; तत्र तत्वावेदकप्रामाण्यहानिर्वेदान्तव्यतिरिक्तानामभ्युपगतैव। व्यावहारिक- प्रामाण्यं तुन हीयते, व्यवहारे बाधाभावाद्। मोक्षावस्थायां वाध्यत्व-
हाराङ्गत्वं चोभयं विरुद्धमिति वाच्यम्, उभयस्य ग्रमाणसिद्धत्वात्। तत्राSड-
हूँढनेकी आवश्यकता आ जाय। [ अनादि वीजाङ्करादि पदार्थोंमें अनवस्था और अन्योन्याश्रय आदि दोप अकिश्चित्कर होते हैं, अतः नियामकान्तरकी खोज नहीं होती ] यदि शङ्का हो कि प्रमातृत्व आदि व्यवहार देहादितादात्म्या- ध्यासके आधारपर ही माना जाता है, तो कारणके दोपसे [ अध्यासके मिथ्या पदार्थ होनेसे) प्रत्यक्ष आदि प्रामाणोंमें भी अप्रामाण्य हो जायगा अर्थात् प्रत्यक्षादि प्रमाण नहीं कहे जा सकते, तो यह शक्का युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि इसके उत्तरमें वेदान्तोंको छोड़कर अन्यत्र तत्त्वावेदक प्रामाण्यका अभाव हम मानते हैं। व्यावहारिक प्रामाण्यकी कोई हानि नहीं है, क्योंकि व्यवहारमें कोई बाध नहीं है? * यदि व्यवहारमें बाध नहीं होता, तो अप्रमाण-मिथ्या-कैसे कहते हो? इस आशङ्काका समाधान करते हैं-मोक्ष अवस्थामें (न्यावहारिक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके) बाधित होनेसे ही वे आध्यासिक अर्थात् मिथ्या माने जाते हैं। आध्यासि- कत्व और अविसंवादित्व t-यथार्थ व्यवहारका प्रयोजकत्व-ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं, ऐसी शङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि दोनों अर्थात् आध्यासिकत्व और
- दो प्रकारके व्यवहार होते हैं-पारमार्थिक और अपारमार्थिक। एवं दो प्रकारके प्रमाण होते हैं-जो परमार्थके दर्शक हैं, वे पारमार्थिक कहलाते हैं और दूसरे अपारमार्थिक। वेदान्तवाक्य आत्माको कूळस्थ निर्विकार, शुद्ध, वुद्ध, मुक्त स्वरूप बतलाते हैं। जैसा कि परमार्थतः परमात्मा है, अतः उनमें पारमार्थिक प्रामाण्य है। और इससे इतर प्रत्यक्ष आदि प्रमाण उस कूटस्थ आत्मामें प्रमातृत्व आदिका वोधन करते हैं, अतः वे अपारमार्थिक हैं। शङ्काविषसे मरण होना देखा जाता है, अतः अपारमार्थिक प्रमाणोंसे भी व्यवहार होता है, इसलिए इनमें व्यावहारिक प्रामाण्य माना जाता है। और जिनका व्यवहारमें भी वाध हो जाता है, जसे शुक्तिरजत आदि उनमें व्यावहारिक प्रामाण्य भी नहीं माना जाता है, इन्हीं स्थलोंमें भ्रमव्यवहार होता है। * जहाँ रजतदर्शनसे रजतज्ञान हुआ, तदनन्तर रजतार्थींकी प्रवृत्ति हुई और उसको रजतका
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अध्यासविचार ] भापानुचादसहित ३०३
ध्यासिकत्वे तावत्प्रमाणान्युक्तानि, इतरच्चाऽनुभवसिद्धम्। अविसंवादित्वं न निश्चेतुं शक्यत इति चेत्, तत्र तावत्प्रत्यक्षादिजन्यव्यवहारस्याऽविसंवाद आपातिक: साक्षिसिद्धः।आत्यन्तिकस्तु नाऽभ्युपेयते। वेदान्तानां चाऽत्यन्ता- वाध्यविषयत्वात्तत्वावेदकग्रामाण्यमुचितम्। स्वयं मिध्याभूता अपि अधाध्यं वोधयन्त्येव, स्वमकामिनीसंदर्शनादौ मिथ्याभूतेऽपि वास्तवश्रेयःसूचकत्व- दर्शनात्। ननु ग्रत्यक्षादीनि व्यावहारिकप्रमाणानि, व्यवहारार्थक्रियासमर्थ- वस्तुविपयत्वादिति हि त्वया तेपां ग्रामाण्यं साधनीयम्। तथा च परतः-
ताद्ृश व्यवहारका कारणत्व प्रमाणसे सिद्ध हैं। 'आध्यासिक है' इसमें तो हम प्रमाण कह ही आये हैं। और तादश व्यवहारका कारण है, यह दूसरी बातं तो अनुभवसे ही सिद्धू है। अविसंवादित्वका निश्चय करना कठिन है, ऐसा भी नहीं कहना चाहिए; क्योंकि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे उत्पन्न हुए व्यवहारका अविसंवाद-ठीक-ठीक मिलना-आपातिक-प्रथम-प्रथम ज्ञान या व्यवहार होते ही-साक्षीके द्वारा सिद्ध है [घटादिके ज्ञानके अनन्तर जलाहरण आदि व्यवहार करनेसे अधिक विचार किये बिना ही शीघ्र साक्षीसे उक्त घटादि व्यवहारमें अविसंवाद सिद्ध होता हैं। ] आत्यन्तिक अविसंवाद तो माना नहीं जाता है,क्योंकि मुक्तावस्थामें सवका वाघ हो जाता है, ऐसा कहा ही है। और वेदान्तोंका विषय (ब्र्म-आत्मा) तो कभी भी वाधित नहीं होता। [मुक्तावस्था भी आत्मस्वरूप ही है। ] इसलिए ऐसे वेदान्तोंको तत्त्वावेदक प्रमाण मानना उचित ही है। वैदान्त स्वयं मिथ्या होते हुए भी कभी वाघित न होनेवाले ब्रत्मका (आत्माका) बोध कराते ही हैं। स्वनमें सुन्दरीका दर्शन आदि मिथ्या होता हुआ भी वास्तव-व्यावहारिक अभ्युदयका सूचक होता ही है, ऐसा देखा गया है। यदि शक्का हो कि प्रत्यक्ष आदि व्यावहारिक प्रमाण हैं, व्यवहार- प्रयोजक अर्थक्रिया करनेमें समर्थ वस्तुविपयक होनेसे, [घटादि प्रत्यक्षका फल-भृपणादिविरचन-सिद्ध हो गया। इससे उसका ज्ञान व्यवहारसे मिलता हुआ होनेसे अधिसंवादि कहलाया। और जहाँ झुक्तिमें रजतज्ञान होनेपर व्यवहारसे मेल न हो सके, वहाँ • संवाद नहीं है। अतः उसको विसंवादि तथा भ्रम कहते हैं।
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३०४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ?
प्रामाण्यापत्तिरिति चेद्, न; विमतानि प्रमाणानि, यथार्थविपयत्वादिति साधयतस्तवापि तुल्यत्वात्। अथ विषययाथार्थ्य विपयिज्ञानादेव सिध्यति, न ज्ञानान्तरादिति न परतस्त्वम् ; तर्ह्यस्मन्मतेऽपि विपये व्यावहारिकार्थ- क्रियासामर्थ्य विपयिज्ञानादेव सिध्यतीति समानम्। अथाप्यध्यासोपादानत्वे ब्रह्मज्ञानस्य प्रपश्चज्ञानवन्मिथ्यात्वं प्रसज्येतेति बेद्, न; स्वरूपमिथ्यात्वस्येष्टत्वात्। अथ विपयमिथ्यात्वं साध्यम्, तर्हि
विषय घंट है। और वह घट अर्थक्रियाकी सामर्थ्य रखता है, इससे उसका ज्ञान व्यवहारतः प्रमाण है। अतः उसका जनक भी तादृश प्रमाण है ] इस प्रकार अनुमान द्वारा तुम-चेदान्ती-प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके प्रामाण्यकी सिद्धि करोगे, ऐसा करनेपर परतः प्रामाण्यकी आपत्ति होगी। [ ऐसा वेदान्तीको अमीष्ट नहीं है, वे तो स्वतः प्रामाण्य मानते हैं], ऐसी शङ्का उचित नहीं है, क्योंकि 'विमत-प्रत्यक्ष आदि-प्रमाण हैं, यथार्थविषयक होनेसे', इस प्रकार अनुमान द्वारा तुमको भी (प्रमाणोंके प्रामाण्यका साधन करना) समान ही है। [मीमांसक ज्ञानोंका स्वतः पामाण्य स्वीकार करते हुए भी यथार्थविषयकत्वरूप हेतुसे प्रत्यक्षादिको प्रमाण मानते हैं। ] विषयका याथार्थ्य उस विषयके ज्ञानसे ही सिद्ध हो जाता है, अतिरिक्त ज्ञानसे नहीं, इससे 'परतः प्रामाण्य आता है' यह अपसिद्धान्त नहीं आता, ऐसा समाधान किया जाय, तो हमारे मतमें भी विषयमें व्यावहारिक अर्थक्रियाकी सामर्थ्य भी विषयीसे-ज्ञानसे-ही सिद्ध हो जायंगी, ज्ञानान्तरकी आवश्यकता नहीं, यह प्रक्रिया समान ही है। हतना माननेपर भी यदि (प्रमातृत्वादि) सकल व्यवहार अध्याससे ही होता है, तो ब्रह्मज्ञान भी प्रपञ्चके ही सदश मिथ्या हो जायगा, ऐसी शङ्का उचित नहीं है, क्योंकि स्वरूपतः मिथ्या मानना इष्ट ही है। [यदि ब्रह्मज्ञान स्वरूपतः मिथ्या है, तो शुक्तिरजतके तुल्य उसमें भी ब्रह्मसाक्षात्कार- रूप अर्थक्रियाकी सामर्थ्य नहीं होनी चाहिए, वह पर्यनुयोग करना उचित नहीं है, क्योंकि स्वन्ञावस्थामें मिथ्या मी स्वाम्निक अश्वादिमें आरोहणादिरूप अर्थक्रिया- सामर्थ्य देखी ही गई है। ] यदि विषयमिथ्यात्व-ब्रह्मज्ञानका विषय-ब्रह्म-
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अध्यासविचार ] भापानुचादसहित ३०५
विनश्वरग्राहित्वं प्रपञ्चज्ञाने उपाधि:। अथ बह्मज्ञानमपि विनश्वरग्राहि, दुष्टकारणजन्यत्वात्, रज्जुसर्पज्ञान- वदिति चेद्, न; हेत्वसिद्धेः । नहि त्रह्मज्ञानं काचकामलादिदोप- जन्यम् । त्रह्मज्ञानोपादानमज्ञानमेव दोप इति चेद्, न; चैतन्य- स्याउद्ेतावभास ग्रतिवध्य द्वेताचभासजनकत्वेन चैतन्यं प्रत्यज्ञानस्य दोपत्वेऽपि त्रह्मज्ञानं अ्रत्युपादानतयाऽनुकूलस्य तस्य गुणत्वाद्। एकस्यैव दोपत्वगुणत्वे विरुद्धे इति चेद्, न; काचादीनां रज्ज्वादितत्वावभासं प्रति विरोधित्वेन दोपत्वेऽपि स्वकारणभूतयापानुमाने लिङ्गत्वेन गुणत्वदर्शनाद।
मिध्या है, यह सिद्ध करना* चाहो, तो विनश्वरग्राहित्व प्रपञ्चज्ञानमें उपाधि है अर्थात् वममें मिथ्यात्वप्रदर्शक अध्यासोपादानज्ञानग्राह्यत्वरूप हेतु उक्त उपाघिसे दृपित है, क्योंकि प्रपश्चमें-'नेह नानाडस्ति किश्वन' इस श्रुतिसे विनाशित्वका वोध होता है, अतः उसका ज्ञान विनाशीका गह भी कराता है और उक्त हेतु भी है, ब्रह्मज्ञान ऐसा नहीं है। ] यदि कहो कि 'बहज्ञान भी विनाशीका ही बोध कराता है, दुष्ट कारण द्वारा उत्पन्न होनेसे, रज्जुसर्पज्ञानके समान, इस अनुमानसे ब्रह्ममें मिथ्यात्व ही सिद्ध होगा, तो यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि उक्त अनुमानमें हेतु असिद्ध है। [ हेतुकी असिद्धि दिखलाते हैं-] व्रम्मज्ञान रज्जुसर्पज्ञानके समान काच, कामला आदि दोपोंके द्वारा नहीं होता है। न्रह्ज्ञानका उपादान- जनक-सज्ञान ही दोप है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि यद्यपि चैतन्यके अद्वैतरूपसे होनेवाले ग्रकाशको रोककर अज्ञान द्वैतका ही ज्ञान कराता है, अतः चैतन्यके भति वह दोप हो सकता है, तथापि ब्रह्मज्ञानके प्रति तो उपादान होनेसे वह जनक ही हुआ, इसलिए वह गुण ही है, दोष नहीं। यदि कहो कि एक ही अज्ञानमें परस्पर विरोधी गुणत्व और दोपत्व दोनों कैसे हो सकते हैं? तो यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि काचादिमें रज्जुतत्त्वके बोध करानेमें [प्रतिवन्धक होनेसे ] दोपत्व होनेपर भी अपने नेत्रगत काचादि
• इसमें अनुमान प्रयोग ऐसा करेंगे-व्रह्म मिथ्या है, अध्यासमूलक ज्ञानका विपय होनेसे, प्पन्नके समान। ३९
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३०६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
ततः प्रमाणकारणेपु सर्वेपु सत्सु तद्विरोधित्वेनाऽडगन्तुको यः काचादि: स एवाऽम्रामाण्यहेतुर्दोपः। लोके तु विरोधिप्वपि क्षुत्पिपासादिपु नेसर्गिक- त्वमात्रेण दोपवुद्धिर्न दृश्यते तत्र किमु वक्तव्यं नैसर्गिंकमनुकूलं चाज़ज्ञानं न दोप इति। तस्मादाध्या सिकानामाि प्रत्यक्षादीनां नाडग्रामाण्यमित्यध्यास उपादानं व्यवहारस्य। विमतोऽध्यासः अ्रमातृत्वादिव्यवहारस्य निमित्तकारणम्, अध्यासत्वात,
रोगके कारणभूत पाप आदि अदृष्टके अनुमानमें हेतुभूत होनेके कारण गुण ही होते हैं, ऐसा देखा गया है अर्थात् अनुभवसिद्ध ही है। इससे सम्पूर्ण विपयेन्द्रिय- सन्निकर्ष, आलोकसंयोग आदि प्रमाणकारणोंके रहते, उनके विरोधी बनकर आनेवाले बाहरी जो काच आदि नेत्रगत रोग हैं, चे ही रोग [ प्रमाणोंमें] अप्रामाण्यके कारणीभूत दोप हैं। जैसे लोकमें भी भूख, प्यास आदि विरोधी पदार्थोंमें नैसर्गिकत्वमात्रसे ही दोपवुद्धि नहीं देखी जाती, वैसे ही नैसर्गिक और अनुकूल अज्ञान भी दोप नहीं हो सकता, इसमें कहना ही क्या ? [यद्यपि आगन्तुक दोष ही होता है, तथापि यदि वह सर्वसाधारण तथा स्वाभाविक हो, तो उसमें दोपत्व ुद्धि नहीं होती, जैसे थोड़ा-सा भी ज्वर या जुखाम हो जानेसे दोष माना जाता है, क्योंकि वह क्षणिक परिवर्तनशील है। और प्रतिदिन होने- वाले भूख और प्याससे उत्पन्न दुःखमें दोपवुद्धि नहीं होती, क्योंकि यह आजन्म स्थायी है, अतः वस्तुतः आगन्तुक होते हुए भी वे दोप नहीं माने जाते अर्थात् ज्वरादि रोग शरीरके स्वांस्थ्यके साधन नहीं हैं, अतः दोप हैं और क्षुत्पिपासादिजनित सन्तांपं शरीरके स्वास्थ्यके साधन हैं, अन्यथा भोजनादिकी अनिच्छासे भोजन किये बिना शरीरस्थिति दुःसाध्य हो जायगी, अतः वे दोप नहीं हैं, वैसे ही जो आगन्तुक होता हुआ भी प्रमाकारण है, वह दोप नहीं है, अतः न्रह्मज्ञानका उपादानभूत अज्ञान दोष नहीं है। और उसके विपरीत रज्जुसर्पज्ञानके उत्पादक काचादि दोष हैं, यह व्यवस्था हुई। ] इस सारे प्रघट्टकसे निष्कर्ष यह निकला कि अध्याससे उत्पन्न होनेपर भी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंमें अप्रामाण्य नहीं आता, इससें अध्यास ही प्रमातृत्व आदि व्यवहारका उपादान कारण है। यदि शङ्का हो कि विमत अध्यास, प्रमातृत्व आदि व्यवहारका निमिच्त कारण है, अध्यास होनेसे, शुक्तिरजत आदि अध्यासके समान, इस अनुमानसे अध्यासको
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अध्यासविचार ] भांपांनुवादसहित
शुंक्तिरजताध्यासवत्, इति चेद्, न; व्यवहारानाश्रयत्वस्योपाधित्वाद्। रजंताध्यासमन्तरेणाऽऽप्यात्मनि प्रमातृत्वादिव्यवहारदर्शनात् रजताध्यासो नं तदाश्रयः, । देहात्माध्यासस्तदाश्रयः, सुपुसे देहात्माध्यासहीने व्यव- हारातुपललम्भात्। अथ मतम्-व्यवहार: प्रमातनिष्ठः, प्रमातृत्वं चाऽडत्मनश्रेतनत्वाद्विनैवाS- ध्यासं सिध्यतीति। तन, अध्यासमन्तरेणाऽसङ्गस्याऽऽत्मनो निर्व्यापारस्य प्रमाजनकत्वेन कारकप्रयोकृत्वलक्षण प्रमातृत्वानुपपत्तेः। अतोऽध्यासोपादानक
प्रमातृत्वादि व्यवहारके प्रति निमित्तकारण मानना चाहिए, उपादान नहीं, तो यह शक्का उचित नहीं है, क्योंकि 'व्यहारानाश्रयत्व' इसमें उपाधि है। [शुक्तिरजताध्यासदष्टान्तमें 'अहम्' इत्यादि-प्रमातृत्व आदि-व्यवहारका आश्रयत्व नहीं है, क्योंकि अध्यासका आश्रय आत्मा होता है और प्रमातृत्व आदिका भी आश्रय प्रमाता होता है, इससे शुक्तिरजताध्यास व्यवहारंका अनाश्रय है। और विमत अक्कारादि अध्यास 'अहम्' इत्यादि-प्रमातृत्व आदि-व्यवहारका आश्रय है, इस प्रकार साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वरूप उपाधि दिखलाते हैं-] रजता- ध्यासके बिना भी आत्मामें प्रमातृत्व आदि व्यवहार देखा गया है, इसलिए रजताध्यास 'अहम्' 'ममेदम्' इत्याद्याकार प्रमातृत्वव्यवहारका आश्रय नहीं हो सकता। [ यद्यपि प्रमातामें रजताध्यास मी कभी कभी हो जाता है, तथापि वह प्रमातृत्वका प्रयोजक नहीं माना जा सकता, अतः वह निमित्त ही हो सकता है और विमत अध्यास तो व्यवहारका उपादान है। ] और [ विमत ] देहाध्यास प्रमातृत्व आदि व्यवहारका आश्रय है, क्योंकि देहाध्याससे रहित सुपुप्त पुरुषमें उक्त व्यवहार नहीं देखा जाता। अ्रमातृत्वव्यवहार पमातामें होता है, और आत्मा चेतन है, इससे उसमें प्रमातृत्व आदि व्यवहार अध्यासके बिना भी हो सकता है, यदि ऐसी शङ्का हो, तो वह मी बन नहीं सकती, क्योंकि अध्यासके विना असङ् तथा निर्व्यापार आत्मा प्रमा-ज्ञानका जनक न होनेसे 'कारकोंका प्रवर्तकस्वरूप' प्रमाता नहीं हो सकता, [ क्योंकि आत्मा स्वतः संवित्स्वरूप है और सहकारी भी उसका नहीं है। एवम् उसका कोई परिणाम भी नहीं हो सकता ] इसलिए प्रमातृत्व आदि व्यवहारका उपादान अध्यास ही है। यदि कहो कि
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३०८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूंत्र १, वर्णक ३
एव प्रमातृत्वादिव्यवहारः। अविवेकिव्यवहार एव तादशः, नतु विवेकि- व्यवहार इति चेद्, न; विवेकिव्यवहारोऽपि लौकिकस्तावत्पश्वादिव्यवहार- समत्वादध्यासकार्य एव। पश्वादीनां च देहादिसंघातेऽहमित्यभिज्ञाव्यव-
विवेकिभिरपि लौकिकव्यवहारकाले देहात्मनोभेदो गृह्यते, येन पश्वादि- साम्यं न स्याद्। भेदग्रहणे च देहस्याऽनुकूलेऽन्नपानादौ प्रतिकूले च ताड़- नादौ पश्वादिवन्ममेदमनुकूलं ग्रतिकूलमिति बुध्धा अवृत्तिनिवृती नोप- पद्येयाताम्। देहात्मनोरभेद: प्राकृतप्रत्यक्षेणैव गम्यते, पामराणामपि स्त्रीश द्रादीनां
विवेकहीन पुरुंषोंका ही व्यवहार अध्यासोपादानक हो सकता है, विचारवान् पुरुषोंका व्यवहार तो ऐसा नहीं होगा, [क्योंकि ज्ञानी लोग तो आत्मा और अनात्माका विवेकज्ञान रखते हैं, जिसको शुक्ति और रजतका भेदज्ञान हो उसको भ्रम नहीं होता है] तो यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि विचेकशील पुरुषोंका व्यवहार भी लौकिक ही है, अतः वह पशु आदि अविवेकीके व्यवहारके सदश अध्यासका ही कार्य है। [ पश्वादिके व्यवहारमें अध्यास दिखलाते हैं-] पश्ु, आदि जीवोंको देहादिसंघातमें 'अहम्' इस प्रकारका व्यवहार अध्यासके द्वारा ही होता है। जैसे शुक्ति और रजत-इन दोनोंमें भेदके गृहीत न होनेके कारण एकताज्ञानसे शुकिमें 'इदं रजतम्' यह एक ज्ञान होता है। विवेक- मैदग्रह-करनेवाले पुरुष भी लोकमें व्यवहार करते समय देह और आत्माका भेदग्रह नहीं करते, जिससे कि उनके व्यवहारमें पशु आदिके व्यवहारकी तुलना न आवे। [उनको भी लौकिक व्यवहारकालमें देहात्मका भेदग्रह नहीं होता और पशुको भी नहीं होता, भेदग्रहसे तो व्यवहार ही नहीं होगा।] भेदका ज्ञान होनेपर तो देहके अनुकूल-पोषक-अन्न, पानादिमें और प्रतिकूल-घातक-ताड़न, मारण आदिमें पशुओंकी भाँति मेरा यह भोजनादि अनुकूल है और ताडनादि प्रतिकूल है, ऐसा समझकर [ भोजनादिमें ] प्रवृत्ति और [ ताडनादिसे ] निवृत्ति आदिका सम्भव ही नहीं हो सकेगा। देह और आत्माका भेद तो साधारण प्रत्यक्ष द्वारा ही प्रतीत होता है,
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अध्यासविचार ] भापांनुवादसहित ३०६
परलोकार्थगङ्गास्नानादिप्रवृत्तिदर्शनादिति चेद, न; आसवाक्यपरम्परयैव तत्र भेदावगमात्। नो चेदात्मज्ञानाय शास्त्रं न प्रवर्तेत। तस्मात् विवेकिनामपि लौकिकव्यवहार आध्यासिक एव। ननु विवेकिनां शास्त्रीयव्यवहारो नाऽडध्यासिका, परलोकसम्वन्धिनमा- त्मानमाप्तवाक्याद्विज्ञायैव वैदिककर्मसु अ्रवर्चमानत्वात्। स्यादेतत, किं 'चित्रया यजेत पशुकाम:' 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो क्योंकि बिलकुल अज्ञानी स्री, शूद्र आदि भी परलोकके निमित्त गङ्गास्नान आदि पुण्य कार्योंमें प्रवृत्त हुए देखे जाते हैं। [यदि उन्हें देह और आत्माके भेदका- ज्ञान नहीं होता अर्थात् दोनोंको एक ही समझते, तो देह तो इसी लोकमें नष्ट हो जाता है, परलोकमें तो जाता ही नहीं, ऐसे ज्ञानके रहते परलोकमें फल देनेवाले पुण्यकार्यमें उनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती ]। यह पूर्वपक्ष भी उचित नहीं है, चयोंकि आपवाक्यकी परम्परासे ही उन्हें देह और आत्मामें भेदज्ञान होता है, नहीं तो आत्मज्ञानके लिए शास्त्रोंमें उनकी प्रवृत्ति न होती, इसलिए विवेकी पुरुषोंका लौकिक व्यवहार अध्यासके कारण ही होता है। विचेकशील विद्वानोंका शास्त्रीय व्यवहार अध्यासमूलक नहीं हो सकता [किन्तु ऐहलौकिक व्यवहार अध्यासमूलक है ] परलोकमें जानेवाले आत्माको आसवाक्य द्वारा जानकर ही अर्थात् 'आत्मा परलोकमें भी रहता है' इस प्रकार शिष्ट पुरुपोंका वचन सुनकर ही सर्वसाधारणकी वैदिक यज्ञ-यागादि कर्म करनेमें प्रवृत्ति होती है। [शिष्ट विद्वानोंके वचन तथा व्यवहारसे. 'आत्मा इस देहके मरणके अनन्तर मी विद्यमान रहता है, जिसको इस देह द्वारा किये गये पाप-पुण्योंका फल भोगना होता है' ऐसा जानकर ही विवेकी विद्वानोंकी वैदिक पुण्य कर्मोंमें प्रवृत्ति होती है, ऐसा कहना तब हो सकता जब कि याजकोंकी वैदिककर्ममें प्रवृत्ति आत्माको परलोकसम्बन्धी माने बिना नहीं हो सकती, परन्तु वह तो अन्यथा भी उपपन्न हो सकती है, इस आशयको प्रकट करते हैं-'स्यादेतत्' इस्यादिसे] आपका उक्त कथन अन्यथा भी सम्भावित है। अन्यथा सम्भावना दिखलाते हैं-आप सर्वसाधारणकी यैदिक कर्मोमें प्रवृत्ति होनेके कारण आत्माको देहसे भिन्न और परलोकसम्बन्धी कहते हैं-इसमें प्रश्न होता है कि पशुसम्पत्तिकी इच्छावाला पुरुष 'चित्रा' नामका याग करे, स्वर्गकी कामनासे ज्योतिष्टोमनामक याग करे इत्यादि वैदिकवाक्योंसे
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१० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
यजेत्' इत्यादिफल चोदना देहव्यक्तिरिक्त्तं पारलौकिमात्मानं कल्पयेत् १ कि वा 'यावञ्जीवमग्निहोत्रें जुहोति'इत्यादिनित्यचोदना ? अथवा 'गृहदाहवान् यजेत इत्यादिनैमित्तिकचोदना १ आहोस्वित् प्रायश्वित्तचोदना १ आद्येऽपि किं देहव्यतिरिक्तमात्मानमन्तरेण पश्चादिफलमनुपपन्नम् १ उत स्वर्गादि- फलम् १ नाऽऽद्य:, पश्चादीनामस्मिन्नेव जन्मनि लब्धुं शक्यत्वात्। न चैहिकफलत्वे चित्रादीनां समनन्तरनियतफलेभ्यः कारीर्यादिभ्यो मेदो न स्पादिति शङ्कनीयम्, अस्मिन्नेव जन्मनि यौचनवार्द्धकादिकालभेदेनाऽि चित्रादीनामनियतफलत्वोपपत्तेः। कारीर्यादीनां त्वनावृष्टा सस्येपु शुष्यत्सु विधानान्नियतसमनन्तरफलत्वम्। नाऽपि द्वितीय :-
प्रतीयमान फलविषयक प्रेरणा ही क्या आत्मामं देहसे भेद और परलोकके सम्बन्धकी कल्पना करती है ? [ अर्थात् काम्यविधिसे उक्त कल्पना होती है ? ] या 'जबतक जीवन रहे, तव तक अग्निहोत्र करना चाहिए' इत्यादि नित्यविधि कल्पक है : अथवा 'गृहदाहवाला यज्ञ करे' इत्यादि निमित्त विधि कल्पक अथवा प्रायश्चितविधान उक्तार्थका कल्पक है ? आद्य पक्ष [काम्यविधिको करपंक मानने ] में मी प्रश्न होता है कि क्या देहादिसे भिन्न आत्माके विना पशुसम्पत्ति आदि फल नहीं वन सकते ? अथवा स्वर्ग आदि अदष्ट फल नहीं वन सकते ?। पहला कल्प नहीं मान सकते, क्योंकि पशु आदि फल इसी जन्ममें पाये जा सकते हैं। यदि चित्रादि यागका भी इस जन्ममें ही मिल सकनेवाला फल माना जाय, तो नियमतः तुरत ही फल देनेवाले कारीरी आदि यागोंसे चित्रादिका भेद नहीं होगा, ऐसी शक्का भी नहीं हो सकती, क्योंकि इसी जन्ममें जवानी, बुढ़ापा आदि अवस्थाओंके मेदसे भी चित्रादिमें अनियतफलत्वकी उपपत्ति हो सकती है। कांरीरी आदिका वृष्टिके अभावसे सूखती हुई कृषिके लिए विधान किया गया है, अतः ये तुरत ही फल देनेवाले सिद्ध होते हैं। [यौवनमें किये गए चित्रादि याग वुढ़ापेमें फल देनेसे भी सफल हो सकते हैं, इसलिए इनको फल न देनेसे समनन्तर निष्फल मानना आवश्यक नहीं है। कारीरी आदि याग यदि विलम्बसे फल दें, तो 'का वर्षा जब कृपी सुखाने' कृषिके नष्ट होनेके अनन्तर फलस्वरूप वर्षा होनेसे भी व्यर्थ ही रहेंगे, अतः उनको समनन्तर फल देनेवाला माना है ] दूसरा-स्वर्गादि फलकी अनुपपत्ति-पक्ष भी नहीं हो
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३११
अत्रैव नरकस्वर्गाविति मातः प्रचक्षते। मनः ग्रीतिकर: स्वर्गों नरकस्तद्विपर्ययः॥ इति न्यायेन पश्चादिजन्यसुखस्यैव स्वर्गशब्दाभिधेयस्य ज्योतिष्टोमादि- फलस्याऽप्यत्रव सम्भवात्। नहि तत्सुखं चित्रादिफलम्, पश्चादिमात्रकामस्थ तद्विधानात्। निरतिशयप्रीतेः स्वर्गत्वेऽप्यैहिकत्वमविरुद्धम्, साम्राज्यादि- प्राह्या तस्या अध्यत्रैव सम्भवात्। शास्त्रेपु मेरुप्ृष्ठे स्वर्गभोगोऽवगम्यत इति चेत, सोऽपि मन्त्रौपधादिसिद्धेनानेनैव शरीरेण सुसम्पाद:। यदि तथा
सकता [क्योंकि स्वर्ग कोई अतिरिक्त लोक तो है नहीं, केवल एक विलक्षण सुख़ ही स्वर्ग कहलाता है, वह इस जन्ममें भी मिल सकता है, इसमें पुराण- वाक्य भी ग्रमाण हैं] हे मातः ! 'इसी लोकमें नरक तथा स्वर्ग हैं' ऐसा विद्वानोंका कहना है। स्वर्ग और नरकका लक्षण करते हैं-मनको प्रसन्न करनेवाला स्वर्ग और इससे विपरीत-मनको दुःख देनेवाला-नरक है। इस न्यायसे पशु आदि सम्पत्तिके द्वारा प्राप्त हुआ सुख, जो स्वर्ग आदि शब्दोंसे कहा जाता है, ज्योतिष्टोम आदि यागका फल है, उसका तुरन्त इसी जन्ममें मिल जाना सम्भव है। वह सुख चित्रादि यागका फल नहीं माना जा सकता, क्योंकि केवल पशु आदि सम्पत्तिको ही चाहनेवालेके लिए उसका विधान है [ और जोतिष्टोमादि तो सर्वविध सम्पत्ति- जनित सुखकी कामनासे होते हैं ] यद्यपि निरतिशय प्रीति-जिस सुखसे बढ़कर कोई भी दूसरा सुख न हो ऐसा ही सुख स्वर्ग कहलाता है तथापि उसका इस लोकमें पराप्त होना कोई विरुद्ध नहीं है, क्योंकि साम्राज्य आदिकी प्राप्तिसे उक्त प्रकारकी प्रीति भी इस जन्ममें ही हो सकती है। शास्त्र-पुराणोंके द्वारा मेरु- सुमेरुपर्वत-के शिखरपर स्वर्गका भोग मिलता है, ऐसा प्रतीत होता है। यदि यह सिद्धान्त माना जाय, तो वह भी मन्त्र तथा औपधके पभावसे सिद्धि पाकर इस शरीरसे ही अच्छी तरह प्राप्त हो सकता है [दिलीप, दशरथ, दुष्यन्त आदिका वर्तमान शरीरसे इन्द्रसभामें जाना शास्त्रोंमें प्रसिद्ध ही है ] यदि ऐसा होना [इस युगमें ] दिखाई देगा, तो जैसे [ कारीरी यागके अनन्तर भी ] वर्षा न होनेसे कारीरी आदि यागमें कुछ उसके अङ्गसम्पादन करनेमें त्रुटिकी कल्पना की जाती है, वैसे ही यहाँ ज्योतिष्टोमादि यागमें कुछ अझहीनताक़ी ही
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३१२ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
न दश्येत तर्हि वृष्टयाद्यनुत्पादे कारीर्यादिष्विवात्रापि किंचिदङ्गचैकल्पं कल्पनीयम्। नापि द्वितीयतृतीयौ, नित्यनैमित्तिकचोदनयोर्गुरुमते फल- शून्यत्वात्। भट्टमतेऽयि तत्फलस्येहैव भोक्तुं शक्यत्वात्। नापि चतुर्थ:, प्रायचिचित्तस्य पापापगममात्रफलत्वात्। अकृतग्रायश्चित्तस्य ्रह्महत्यादे: फलं भोकुमात्मा नरकगामीति चेद्, न; स्व्गवन्नरकस्याप्यनेनैव जन्मना भोगसंभवात्। श्वशूकरादिदेहेपु पापफलोपभोग: शास्त्रे प्तीयते इति चेत्, न; तत्र झूकरादि समानदुःखमासिमात्रस्य विवक्षितत्वाद्। अतो न कल्पना करनी चाहिए। दूसरे और तीसरे-नित्य या नैमित्तिक विधि कल्पक है-पक्ष भी नहीं हो सकते, क्योंकि गुरु-प्रभाकर-मीमांसकके मतमें इन नित्य और नैमित्तिक दोनों विधियोंमें फल कुछ नहीं रहता। कुमारिलभट्टके मतमें भी वह फल इस जन्ममें ही भोगा जा सकता है। अर्थात् सुख मिलना या दुःखका दूर होना इत्यादि फल इस विद्यमान शरीरसे ही भोगे जा सकते हैं, अतः अदष्ट वस्तुकी-पारलौकिक शरीरकी-कल्पना क्यों की जाय ? चतुर्थपक्ष-प्रायश्चित विधानको कल्पक मानना-मी नहीं बन सकता, क्योंकि प्रायश्वचित्तका केवल पाप दूर होना ही फल है। 'जिन ब्रह्महत्यादि पापोंका प्रायश्चित नहीं किया गया है, उनका फल भोगनेके लिए आत्मा नरकगामी होगा'। [इससे आत्माका परलोकसम्बन्ध सिद्ध होता है। ] ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि स्वर्गके तुल्य नरकका भी इस विद्यमान जन्मसे ही भोग हो सकता है। [ 'जैसे सर्वश्रेष्ठ सुखको स्वर्ग कहते हैं, वैसे ही उत्कट दुःखको ही नरक कह सकते हैं'। ] कुत्ता या सूअर आदि देहोंमें पापका भोग मिलता है, ऐसा शास्त्रोंसे सिद्ध है। [इससे देहान्तरसे पापभोग मिलना सिद्ध होता है।] ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि कुत्ता, सूअर आदि योनियोंमें प्राप्त होनेवाले दुःखके समान दुःख पाना ही शास्त्रका तात्पर्य है। इसलिए देहसे आत्मा भिन्न है, इसका साधक कोई प्रत्यक्षादि नहीं है। [ 'स्यादेतत्'से लेकर 'न किश्ित्कल्पकम्' तकके अ्रन्थसे आत्माके परलोकसम्वन्घका निराकरण किया गया है। इसका खण्डन करते हैं-] यह आपका कहना ठीक नहीं है, [अर्थात् आत्माका परलोकसे सम्वन्ध है उसमें प्रमाण दिखलाते हैं ] देवताधिकरणन्यायसे प्रमाण १ भट्ठ नित्य और काम्यविधिको सफल मानते हैं।
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अच्यामविचार] १३
देहच्यनिरित्तान्मनः किचिक्वकमपतीनि। नैनवेवय, वेवनाविकणन्या्यन
नाहचकारनि चेह नः वेहव्यनिरिकान्मतसवव्य विविमिग्नपसिनच्चेन
अन्यया नवीयेन साध्यकारण मन्त्रार्थत्रादादिगामान्यमाधित्य देहच्यति रिक आत्मा कर्य विचारिा। न व पूवन्त्रगनदंव नाविकरण सतकार- माध्यक्ागस्यां मन्त्राविययामाप्य निवक्मिति वाच्यम्। नहि नत्र माने पचे नन्त तया अर्थवाड आदिसे विभिष्ट वेश काक, तया करीर आडिसे भोगने आपक स्वर्ग अपद स्लोंकी पनीति होती है, अनः यही मनीति वेहसे मिन्र आनाकी सिद्धि करती है। यि वद्ा हो कि वदपे उक निर्म वेवन्तक्े
स्वीकार नहीं किया है तो वह भी युक् नहीं है, क्योंकि यद्यपि जैनिनिने मेवा कोई भुत नहीं रचा जिपनें 'देइसे आिविच आला है इस प्रभारके साझान् नवक अथके वाचक मब्द आये हो, क्योंकि नेहमे मिन्न आलतत्क्री वैिक अमोंने अपक नहीं है, यापि पिद्र वद्द और साध्य अमेताण्डको विष्य अनेवाके सन्पूरे वेडके अनपलत्वनर (किसीओी अपेक्षा न रन्हनेमाले) प्रमण्यका मुच द्वर पनिरादन करनेमे बेहसे अनिरिक आलका मी प्रतिराठक मुत्र अयान् रवा ही है *। वादे नैनिनि ऐया न मानते, तो उनके मान्यकारने नन्त्र, अरथवार आदिका परनाप्य नानकर सहसे मिन्न आाा है ऐेसा विचार कैसे किया? [भाययकार मूतविनद अर्यका प्िपावन नहीं कर्ते हैं] पूबनीनांसके ववनाविकपने सतकार वया मानकार दोनोंने नन्ताविके धानाय्यक्रा नण्डन किया है. ऐेस भी कहा सहन नहीं है, क्योंकि कम नेववाविकाणक
भग्से अवपेसत्कसन प्रामवका बोबन किया गया है। और ऐवा ही आनान 'हन्न्ादश्व कितटन इम सूतसे सम्ून केदोत कहा गया है। बह मिद्द ऋशेमेहन्यिरित आाल- क्ं-दरनिमि न समते, तो मन्तूर्न वेदका समातरपसे प्रामान्य कैसे स्वांकार करते ?
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३१४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
मन्त्रादिमात्रस्य प्रामाण्यनिराकरणे तात्पर्यम्, किन्तु विरुद्धस्यैव 'महान् इन्द्रो वज्रवाहु:' इत्यादिमन्त्रवलाद् देवताया विग्रहवच्चे सति ऋत्विगादिवत्सं- निधानेनोपकारकत्वं स्यात् तच्चाऽनुभवविरुद्धमिति निराक्रियते। अविरुद्धस्य तु मन्त्रादे: आमाण्यमङ्गीकृतमेव अर्थवादगतलिङ्गानामपि तत्र तत्र द्वादश- लक्षण्यां अ्रमाणत्वेनोदाहियमाणत्वाद्। तदेवं मन्त्रादिवलाद्देहादिव्यतिरिक्तमात्मानमवगत्य विवेकिन: शास्त्रीय- क्र्मसु प्रवर्तन्ते इति न तव्वहार आध्यासिक:। नैष दोपः। किं कर्मिणो मन्त्रार्थवादादिवलाद् देहव्यतिरिक्तमखण्डैकर- समात्मानमवगच्छेयुः उत परलोकगामिनम् १ नाऽडद्यः, तस्य वेदान्तैकवेद्य-
तात्पर्य सम्पूर्ण मन्त्रादिके प्रामाण्यके खण्डनमें नहीं है, किन्तु विरुद्ध (संगत न होनेवाले) मन्त्रादिके प्रामाण्यके खण्डनमें ही है। जैसे कि. 'महानिन्द्रो' (वज्र हाथमें रखनेवाला बड़ा इन्द्र) इत्यादि मन्त्रोंसे इन्द्रादि देवताका शरीरसम्बन्ध प्रतीत होता है, परन्तु ऐसा माननेसे ऋत्विजोंके-याग करानेवाले पुरोहितोंके-सदृश़ यज्ञमें उपस्थित होकर ही यज्ञका उपकार कर सकते हैं-यह अनुभवसे सऋ्त नहीं है, इसलिए ऐसे अर्थोंके प्रतिपादक मन्त्रादिका ही प्रामाण्य नहीं माना जा सकता, सचका नहीं। जो विरुद्ध नहीं और अनुभवादिसे संगत अर्थके वोधक हैं, उनका प्रामाण्य तो माना ही गया है। अर्थवादमें आये हुए उपपादक हेतुओंका वारह अध्यायवाली पूर्वमीमांसामें जहाँ तहाँ प्रमाणस्वरूपसे उदाहरण दिया ही गया है। इस प्रकार मन्त्रादिके आधारपर देहादिसे भिन्न आत्माको जानकर विवेकी विद्वानोंकी शास्त्रीय यज्ञ-यागादि कर्मोंमें प्रवृत्ति होती है, अतः उनका व्यवहार अध्यासमूलक नहीं कहा जा सकता। समाधान-यह दोष नहीं आता अर्थात विचेकशील विद्वानोंका शास्त्रीय व्यवहार भी अध्यासमूलक ही है। क्या वैदिक कमोंके करनेवाले विद्वान् मन्त्र, अर्थवाद आदिके आधारपर आत्माको देहसे भिन्न अखण्ड एकरस है, ऐसा जानते हैं? या परलोकमें जानेवाला है, ऐसा जानते हैं। [दोनों परस्पर-विरुद्ध धर्म एकमें हो नहीं सकते, क्योंकि अखंड-एकरसमें गमन और अगमनका सम्भव नहीं है]।
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अंध्यासंविचांर ] भौंपांतुवादसहित ३१५
त्वाद्। द्वितीयेऽपि परलोकगाम्यात्मज्ञाने सति किमध्यासमात्रं निवर्तत इति तवाडभिग्राय उत स्थूलदेहाध्यासो निवर्तत इति। नाऽडद्यः, सर्वगतस्य परलोकगमनानुपपत्तेरन्त:करणाध्यासो न निवर्तत इत्यङ्गीकार्यत्वात्। न द्वि- तीयः, अपरोक्षाध्यासस्य परोक्षज्ञानमात्रेण निवृत्त्ययोगात्। ततो विवे- किनां शास्त्रीयव्यवहारोऽप्याध्यासिक एव। यद्ययं सर्वोऽपि व्यवहारोऽध्यासमूलस्तर्ह्यांत्मानात्मनो: कस्य कुत्राऽ- ध्यास इति विशेपतो निरूपणीयम् इति चेत्, भ्रयतां तर्ह्यवधानेन।
प्रथम पक्ष तो नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा आत्मा तो केवल वैदान्त द्वारा ही d Ad N. N. जाना जा सकता है, [कर्मकाण्डके मन्त्र, अर्थवादसे नहीं] दूसरे पक्षके माननेमें भी आत्मा परलोकमें जाता है, इतना ज्ञान होनेपर अध्यासमात्र निवृत्त हो जाता है [ किसी भी प्रकारका अध्यास नहीं रह जाता ] क्या ऐसा तुम्हारा अभिप्रायं है ? अथवा स्थूल देहसे तादात्म्याध्यास ही निवृत्त होता है: ऐसा अभिप्राय है ? इनमें पहला कल्प नहीं कह सकते, क्योंकि सब प्रकारके अध्यासकी निवृत्तिसे निष्कलक्क व्यापक ब्रह्म ही रहेगा, इस प्रकार सर्वत्र समानभावसे व्याप् आत्माका परलोक-गमन नहीं वन सकता (वह तो इहलोक, परलोकमें एकरस होकर युगपत् विद्यमान ही है) परलोकगमनकी उपपत्तिके लिए अन्तःकारणके साथ तादात्म्याध्यास निवृत नहीं होता है, सूक्ष्म शरीरके साथ तादा तम्याध्यास रहता ही है, ऐसा मानना आवश्यक है। दूसरा कल्प भी उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष अध्यास परोक्ष ज्ञानसे निवृत्त नहीं हो सकता, [क्योंकि शुक्ति- रजतके प्रत्यक्ष भ्रमकी शुक्तिके परोक्ष ज्ञानसे निवृत्ति नहीं देखी जाती। मन्त्र, अर्थ- चाद आदिसे केवल यही परोक्ष ज्ञान होता है कि आत्मा परलोकगामी है। उसका साक्षात्कार नहीं होता। इससे सिद्ध है कि विवेकशील विद्वानोंका यज्ञ- याग आदि शास्त्रीय व्यवहार भी अध्यासके ही कारण है। यदि सम्पूर्ण व्यवहार अध्यास ही कराता है, तो इसका विशेषरूंपसे निरूपण करना चाहिये कि आत्मा ( चेतन) और अनात्मा (जड) इन दोनोंमें किसका किसमें अध्यास है? ऐसा यदि चाहते हो, तो सावधान होकर सुनो। साक्षी चतन्य नित्यैकरस आत्मामें अन्तःकरण (आभ्यन्तर इन्द्रिय), इन्द्रिय १ अन्तःकरणाध्याससे अहम् इत्यादि प्रमातृत्वादि व्यवहार होता है।
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३१६ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वणक ऐ
रोप्यन्ते, तत्रापि पूर्वपूर्वाध्यासविशिष्टं चतन्यमुत्तरोत्तराध्यासाधिष्ठानमव- गन्तव्यम्। न च आत्मनि वाह्यविषयाध्यासे विवदितव्यम्, पुत्रभार्यादिपु चिकलेपु सकलेषु च सत्स्वहमेव विकल: सकलो वेति व्यवहारदर्शनाद्। ननु नाडयं सुख्यो व्यवहारः, असार्वत्रिकत्वात्। नहि पुत्रे मृतपत्नीके सत्यहं मृतपलीक इति व्यवहारो दश्यत इति चेद्, मैचम्: क्वचिददर्शनमात्रेण टष्टस्थलेपु मुख्यत्वस्याऽनिवार्यत्वात्। नहि क्वचिच्छुक्तौ रजतव्यवहारो न दृष्ट इत्य-
(वाहे चक्षुरादि), देह-स्थूँल और सूक्षम, उससे वाहरी पुत्र, कलन्र, हस्ती, अब्व आदि विषयों तथा उनके धमोंका क्रमसे आरोप होता है, परन्तु उस क्रममें भी पूर्व-पूर्व आरोपसे युक्त चैतन्य ही उत्तर-उत्तर आरोपका अधिष्ठान होता है, ऐसा जानना चाहिये ? आत्मामें वाह्य-पुत्रादि-विपयोंके अध्यासके विषयमें विवाद नहीं करना श्वाहिये, क्योंकि पुत्र या स्त्रीकी रुग्णावस्थामें या किसी भी प्रकारकी कोई खरावी आनेपर कुटुम्बी (गृहस्वामी-पिता) अपनेको "अहमेव विकल:" मैं ही चीमार हूँ या मुझमें ही खरावी है इत्यादि रूपसे 'मैं तंग हो गया' इत्यादि व्यवहार करता हुआ देखा जाता है। ऐसा व्यवहार सर्वत्र नहीं देखा गया, इसलिए मुख्य नहीं है, क्योंकि पुत्रकी स्त्रीके मरनेपर उसका पिता 'मेरी स्त्री मर गई', ऐसा नहीं कहता, (इससे वाह्य विषयोंके अध्यासकी पुष्टि नहीं होती) ऐसी शङ्का करना ठीक नहीं है? कहींपर नहीं देखा जाता, केवल इतनेसे ही जहांपर पुत्र, कलत्रादिके लिए 'मैं' व्यवहार देखा जाता है, वहांपर मुख्य व्यवहारका निवारण कोई नहीं
२ वाह्येन्द्रियोंके अध्याससे 'मैं अन्धा हूँ, चहिरा हूँ' इत्यादि व्यवहार होता है। १ मैं मोटा हूँ, जाता हूँ, खाता हूँ, इत्यादि व्यवहार स्थूल देहाप्यासका फल है। ४ सूक्ष्म देहाध्याससे स्वाप्निक व्यवहार तथा पारलौकिक फलवाले वैदिक यज्ष- यांगादिमं प्रवृत्ति होती है।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसाहेत ३१७
न्यनापि रजतरूपेण भातायां शुक्तौ रजतव्यवहार औपचारिको भवति। अस्तु शुक्तिरजतयोस्तादात्म्यग्रतीतेर्मुख्य आरोपः। स्वदेहपुत्रयोस्तु भेद- प्रतीतेः 'सिंहो देवदत्तः' इतिवद्गौण एवैकत्वव्यवहार इति चेद्, न; वैप- म्यात्। नहि सिंहसुखदुःखाम्यां देवदत्तः संस्पृश्यत इति तदेकत्वच्यव- हारिणो गौणी प्रतीतिः । अत्र तु पुत्रसुखद्:खाभ्यामहमेव संस्पृष्ट इति पिताडभिमन्यते। अथाऽतिस्ेहवशादभिमानो नाऽध्यासवशादिति मन्येथाः। तन्न, सेहस्याऽप्याध्यासिकत्वात्। अन्यथा तस्यैव पितुः पारित्राज्यं ग्रा- पस्य विवेकज्ञाने सति तेष्वेव पुत्रादिपु कर्थ न यथापूर्व सनरेहो दृश्येत।
कर सकता। कहीं शुक्तिमें रजतव्यवहार नहीं देखा गया, इससे दूसरे स्थलमें जहांपर शुक्तिका भान रजतरूपसे हुआ है, वहांपर शुक्तिमें रजतव्यवहार गौण है (मुख्य नहीं है) ऐसा नहीं माना जाता है। शुक्ति और रजतमें तादात््यका अध्यास होता है, इसलिए रजतव्यवहार मुख्य माना जाता है, और अपने शरीर और पुत्रमें तो भेदज्ञान रहता है, इसलिए 'देवदत्त शेर है' इस प्रतीतिके तुल्य उक्त 'हं विकल:' इत्यादि प्रतीति गौण ही है, ऐसा पूर्वपक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि यहांपर वैषम्य है अर्थात् दोनों प्रतीतियोंमें समानता नहीं है। वैपम्य दिखलाते हैं-सिंहके सुखदुःखोंसे देवदत्तका कोई सम्वन्ध नहीं रहता, इससे शेर और देवदत्तके तादात्म्यको विनष्ट करनेवाली 'देवदच शेर है' ऐसी प्रतीति गौण मानी जाती है। और प्रकृतमें तो पुत्रके सुख-दुःखोंसे मैं ही सुखी और दुःखी है इस तरह पिताका अभिमान होता है, (अतः यह अभिमान ही तादात्म्यका सूचक होता है)। अधिक प्रेमके कारण उक्त अभिमान होता है, अध्यासके कारण नहीं, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्नेह भी तो अध्यासके द्वारा ही होता है। [मुख्य प्रेमास्पद तो आत्मा ही है आत्मासे मिन्न वही प्रेमास्पद होगा जिसके साथ आत्माका सम्बन्ध होगा, निरञ्जन आत्माका सम्बन्ध आध्यासिक ही हो सकता है। अतएव सम्बन्धके तारतम्यसे ही स्नेह तथा 'अहम्, ममेदम्' व्यवहारका तारतम्य हो जाता है.]। यदि ऐसा-स्नेह अध्यासमूलक है-न मानो, तो उसी पिताके (जिसका पुत्रमें अधिक स्नेह था) संन्यास-वैराग्यकी अवस्थाको माप्त होनेसे 'पुत्रादि में नहीं हूँ' ऐसा विवेक ज्ञानका उदय होनेपर उन पुत्रादिके ऊपर पहली अवस्थाका जैसा स्नेह क्यों नहीं देखा जाता?
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३१८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
नाऽपि वास्तवस्य स्नेहस्य विवेकज्ञानमात्रादपगमः संभवति। ज्ञानमज्ञान- स्यैव निवर्तकमिति व्याप्तिदर्शनात्। ननु यदि पुत्रादिपु स्नहकृतोऽहमिति व्यवहार आध्यासिक: क्थ तर्हि भाष्यकारेणेक्षत्यधिकरणे राजः सर्वार्थकारिण्यतिस्त्रिग्धभृत्ये 'ममात्मा भद्रसेनः' इति व्यवहारो गौणत्वेनोदाहृतः । विपम उपन्यासः, नहि तत्र भद्रसेनस्वरूपप्रयुक्तो राज: स्नरेह: विपरीतकारिणि तस्मिन्नेव द्वेपदर्शनाद्। किं तर्हिं तत्कृतेष्वनुकूलेपु राजकार्येष्वेच सनहः। पुत्रेषु तु पितुर्निरुपाधिक एव सनहः । कार्याक्षमे विपरीतकारिणि वा स्रहाऽनपायात्। अथापि न सनह आध्यासिक:, स्रहपात्रेपु वस्त्रालङ्कारादिष्वहंबुध्भावादिति चेद्, न
वास्तव स्नेहका विवेक ज्ञान होनेसे ही विनाश होना सम्भव नहीं हो सकता। वास्तव-व्यावहारिक-सर्प रज्जुसर्पके भेदभानसे नहीं मर जाता, क्योंकि ज्ञान अज्ञानको ही दूर कर सकता है, ऐसी ही व्याप्ति देखी जाती है। शङ्का-अगर पुत्रादिमें स्नेह द्वारा उत्पन्न होनेवाला मैं-अहम्-इत्यादि व्यवहार अध्यासमूलक होता, तो भाष्यकारने ईक्षत्यधिकरणमें सव प्रकारके राज-काज करनेवाले और अत्यन्त प्रीतिपात्र अपने अमात्य आदि सेवकके लिए 'भद्रसेन मेरी ही आत्मा है अर्थात् मैं ही हूँ' राजाके इस व्यवहारको जो गौण माना है, वह कैसे वन सकेगा? समाधान-इस दष्टान्तका रखना वेमेल है, वहांपर राजाका उसके ऊपर प्रेम नहीं है, क्योंकि वही भद्रसेन यदि राजाके प्रतिकूल कुछ भी कर दे, तो राजाका उसके साथ द्वेष भी देखा जाता है। तव किस कारणसे स्नेह है ? इसपर यही कहना होगा कि-उस भद्रसेनके किये हुए राजाके अनुकूल राजकाजमें ही स्नेह है और (दार्श्टान्तिक) पुत्रादिके ऊपर तो पिताका किसी उपाधिसे- पुत्रस्वरूपसे बाह्य पदार्थके कारण-स्नेह नहीं है, क्योंकि कामकाजमें असमर्थ तथा अपने प्रतिकूल कार्य-मूँछें उखाड़ना, गोदीमें मैला कर देना आदि-करनेवाले बालकके ऊपर स्नेह नहीं हटता। इतनेपर भी स्नेह अध्यासके कारण नहीं है, क्योंकि स्नेहपात्र वस्र-आभूषण आदिके ऊपर 'अहं-मैं' वुद्धि नहीं होती है, यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि उनमें भी 'मम' (मेरा है) ऐसी प्रतीतिका
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३१९
तत्रापि ममबुद्धिलक्षणाध्यासस्य सच्चात्। अध्यासस्याऽहमिति ममेति चाऽडकारदवयं सनेहतारतम्यादुपपद्यते। तत्तारतम्यं च 'तदेतत्प्रेयः पुत्रात्' हत्यस्या: अ्वनेर्व्याख्यानावसरे विश्वरूपाचार्येर्दर्शितम्। 'वित्तात्पुत्र: प्रियः पुत्रात्पिण्ड: पिण्डात्तथेन्द्रियम्। इन्द्रियेभ्यः प्रिय: ग्राणः ग्राणादात्मा पर: प्रियः ॥' इति। अतः प्रियमात्रे वित्तादौ नियमेन ममेति सम्बन्धाध्यास एव भवति। प्नियतरे पुत्रे कदाचिदैक्यमप्यध्यसते। प्रियतमे देहे प्रचुरैक्याध्यासः। ततोऽपि प्रियतमे त्वन्तःकरणे नियत ऐक्याध्यास:। ननु पुत्रे चेदैक्यवुद्धिराध्यासिकी कथ तर्हि चतुःसूत्र्यवसाने भाष्ये होना ही अध्यास है। अध्यासके 'मैं-और मेरा' इस प्रकारके दो आकार स्नेहके तारतम्य-न्यूनाधिक्य-से उपपन्न होते हैं। स्नेहका तारतम्य 'तदेतत्मेयः पुत्रात्' इस श्रतिके व्यास्यानके अवसरपर वार्तिककार विश्वरूपा- चार्यने दिखलाया है- धनकी अपेक्षा पुत्र ज्यादा प्यारा होता है, पुत्रसे भी ज्यादा प्यारा अपना शरीर और शरीरसे इन्द्रियां प्रिय, इन्द्रियोंसे प्राण अधिक प्रिय होता है और पराणसे भी आत्मा अधिक स्नेहपात्र होता है। इसलिए सामान्यतः प्रिय धन आदिमें नियमतः-'मेरा है' ऐसा सम्बन्धका अध्यास ही होता है और उससे अधिक विशेष प्रीतिपात्र पुत्रादिके विषयमें जब कभी तादात्म्यका अध्यास हो जाता है, इससे उनमें अहं और मम दोनों व्यवहार होते हैं, उनसे मी विशेष प्रीतिपात्र देहमें अधिकतया तादात्याध्यास होता है और उससे भी अधिक सनेहपात्र अन्तःकरणमें नियमतः तादात्म्याध्यास होता ही है, इसमें कभी भी व्यमिचार नहीं है। यदि पुत्रमें तादात्म्यकी-ऐक्यकी-प्रतीति अध्यासमूलिका मुख्य है, तो चतुःसूत्रीकी समाप्तिमें 'गौणमिथ्यात्मनोऽसत्वे' * गौण आत्माके मिथ्या 'गौणमिथ्यात्मनोऽसत्वे पुत्रदेहादिवाधनात्। सद्वसमात्माहमित्येवंवोधि कार्य कथं भवेत्।।' इस कारिकाको भाष्यकारने 'अहं ब्रझ्माऽस्मि' (में ब्रह्म हूँ) इस प्रकारके ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए ही सब-कुछ विधान तथा प्रमाण है, इस उपकमसे कहा है। इसलिए दोनों आत्माओंका वाध करना अभिप्रेत है, वस्तुतः गौणका वाध नहीं होता। आरोपितका ही वाध होता है।
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३२० विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक
गौणमिथ्यात्मनोऽसच्वे पुत्रदेहादिवाधनादिति गौणात्मत्वेन पुत्र उदा- हृतः। ना्डर्यं दोषः, देहवदैक्याध्यासस्य आ्रचुर्य नास्तीत्येतावन्मात्रं तत्र विव्षितम्, न त्वात्मैक्याध्यासः पुत्रे सर्वथा नास्तीति। अन्यथा कथम् 'आत्मा वै पुत्रनामाऽसि' इति श्रुतिरुपपद्येत। इयं हि श्रतिलोंकसिदूं पुत्रतादात्म्याध्यासमनुवदति। तस्मादस्त्येव पुत्रभार्यादिपु विषयेष्वध्यासः। अथ. कथचित्पुत्रादितादात्म्यांध्यासेऽपि विप्रतिपद्येथास्तथापि तद्धर्मा- ध्यासोऽङ्गीकार्य एव। स्तनन्धये पुत्रे वस्त्रालङ्कारादिना पूजिते सत्य- हमेव पूजित इति पितुरभिमानदर्शनात्। तथाऽङुल्या स्वदेहं प्रदर्श्य वचनेना्यमहमिति व्यवहारो देहतादात्म्याध्यासमात्मनो गमयति। कृशो
होनेपर पुत्रात्माका बांध हो जाता है एवं मिथ्यात्माके असद्भावमें देहात्माका बाध होता है, इस भाष्यसे पुत्रको जो गौण आत्मा कहा है वह कैसे सङ्गत होगा? नहीं, इस प्रकार भाव्यासङ्गति या भाष्यविरोधात्मक दोष नहीं है, क्योंकि देहमें तादात्म्यका-ऐक्यका-अध्यास जैसे प्रचुरतासे होता है वैसे ही पुत्रादिमें नहीं होता, इतना ही तात्पर्य है। इससे विपरीत यह नहीं है कि पुत्रमें आत्माका अध्यास-सर्वथा नहीं है। अन्यथा 'आत्मा वे पुत्रनामाऽसि' (आत्मा ही पुत्र है) यह श्रति संगत नहीं होगी। यह श्रुति लोकसिद्ध तादात्म्यके अध्यासका ही अनुवाद करती है, इससे पुत्र, स्त्री आदि बाह्य विषयोंमें अध्यास है ही। यदि कथंचित तुष्यतु दुर्जनन्यायसे पुत्रादि विषयोंमें आत्माका तादात्म्याध्यास माननेमें विवाद करो, तो भी उनके धर्मोंका अध्यास तो मानना ही होगा। दूध पीनेवाले छोटे वचका वस्त्र, आभूषणों द्वारा सत्कार करनेपर मेरा ही सत्कार हुआ, ऐसा पिताका अभिमान देखा जाता है एवं अंगुलीसे अपने. देहको दिखाकर कहा जाता है, कि 'यह मैं हूँ' ऐसा व्यवहार-अङ्गुली दिखाकर देहको मैं हूँ कहना-आत्माका देहमें तादात्म्याध्यासका बोधन करता है। 'मैं दुवला
इसमें पुन्रादिको गौण और देहादिको मिथ्या कहना ममकार और अहंकार दोनोंकी निवृत्तिके लिए है। पुन्रादिमें ममकार और अहंकार दोनों होते हैं, इतनेसे केवल ममकारका प्रयोजक पुत्रमें आत्मोपकारकत्वमात्रके आरोपकी विवक्षा करके गौण व्यवहार माना गया है। इससे मुख्यात्मत्वकी निवृत्ति नहीं की जा सकती।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३२१
हं कृष्णोऽहमिति व्यवहारे देहधर्माणां कृशत्वादीनामात्मन्यध्यास: प्रसिद्धः। मूकोऽहं वक्ताऽहमन्धोऽहं द्रष्टाऽहमितीन्द्रियधर्मा एवाऽऽत्म- न्यध्यस्यन्ते। नह्यत्र धर्मिणामिन्द्रियाणामध्यासो घटते, नित्यानु- मेयानां तेपामपरोक्षाध्यासायोग्यत्वात्। अहं कामी कोपीत्यन्त:करणधर्मा आत्मन्यारोप्यन्ते। न च कामादय आत्मन एव धर्मा नान्तःकरणस्येति वाच्यम्, सत्येवान्तःकरणे तेपां भावात्। आत्मोपादानकत्वेऽपि कामा- दीनामन्त:करणं निमित्तमिति तदन्वयव्यतिरेकाविति चेद्, न; निमित्त- स्याऽन्त:करणस्याऽपायमात्रेण सुपुस्ौ कामाद्यपायानुपपत्तेः। अन्तःकरणात्म- संयोगस्याऽसमवायिकारणस्याऽपायात्तद्पाय इति चेद्, एवमप्यन्त:करणस्यो- पादानत्वमेव. कल्पनीयम्, अभ्यर्हितत्वात्। निमिचतत्वमप्यभर्यहिंतमेच,
पतला हूँ तथा काला हूँ, इस व्यवहारमें देहके दुर्वलत्व आदि धर्मोंका आत्मामें अध्यास प्रसिद्ध ही है। मैं गूँगा हूँ, वक्ता हूँ, अन्धा हूँ, देखनेवाला हूँ, इस प्रकार इन्द्रियके धर्मोंका ही आत्मामें आरोप किया जाता है। यहांपर धर्मवाली इन्द्रियोंका अध्यास नहीं वन सकता, क्योंकि इन्द्रियां अनुमानसे ही जानी जाती हैं; इसलिए वे प्रत्यक्ष नहीं हैं; अतः परोक्ष इन्द्रियोंका प्रत्यक्ष अध्यास होना योग्य नहीं है। 'मैं कामी हूँ क्रोधी हूँ' इस तरह अन्तःकरणके धर्म आत्मामें आरोपित होते हैं। काम आदि आत्माके ही धर्म हैं, अन्तःकरणके नहीं हैं, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि अन्तःकरणके रहते ही कामादि धर्मोंकी स्थिति है। उपा- दान आत्माके रहते हुए भी अन्तःकरणके साथ अन्वय और व्यतिरेक अन्तःकरणको निमित्तकारण बतलाते हैं, ऐसा भी नहीं हैं, क्योंकि निमित्तकारण अन्तःकरणके विनाशसे ही सुपुप्षिमें काम आदि धर्मोंका विनाश उपपन्न नहीं होगा, [क्योंकि निमिचकारण- का नाश होनेपर कार्यका विनाश नहीं देखा जाता]। अन्तःकरण और आत्माका संयोग कामादिका असमवायिकारण है, सुपुप्िमें उस असमवायिकारणका नाश होनेसे उन कामादि धर्मोंका नाश होता है, यह कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि इससे तो अभ्यर्हित होनेसे यही उचित है कि अन्तःकरणको ही उपादान मान लिया जाय। [ क्योंकि कार्य उपादान कारणकी ही नियमतः अपेक्षा रखता ४१
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३२२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
तदभावे कार्यानुत्पादादिति चेद्, न; चक्षुरादौ निमित्तान्तरस्याऽत्र सद्भावेन तस्याऽकल्पनीयत्वात्। न. चोपादानान्तरमत्राऽस्ति, येनोपादानत्वमपि न कल्प्येत। आत्मन उपादानत्वे त्वहं काम इति सामानाधिकरण्यप्रत्ययः स्याद्, न तु दण्डी देवदत्त इतिवदहं कामीति सम्वन्धप्रत्ययः । अन्तःकरण- सामानाधिकरण्यं तु कामादीनां 'काम: सङ्कल्पः' इत्यादिश्रुतिसिद्धम् । ततोऽन्तःकरणधर्मा एव कामादय आत्मन्यारोप्यन्ते, अन्तःकरणं च स्वसा- क्षिण्यात्मन्यैक्येनाऽव्यस्यते। अन्यथा केवलसाक्षिणो Sहमित्यभिमानविशि- ष्टत्वेन प्रतीतिन स्यात्। है, निमित्तकरणकी नहीं।] 'निमित्तकारण भी अभ्यर्हित है, क्योंकि उसके बिना कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती है, ऐसा मानना उचित नहीं है, क्योंकि यहांपर चक्षुरादि दूसरे निमित्त कारणोंके सद्धावसे वैसी कल्पना नहीं बन सकती, [यदि कोई दूसरा निमित्तकारण नहीं होता, तो अन्तःकरणके निमित्तकारणत्वकी कल्पना की जाती, परन्तु प्रकृतमें वैसा है नहीं ]। और प्रकृतमें दूसरा उपादान है नहीं, जिससे अन्तःकरणको उपादान मी न माना जाय ? आत्माको यदि उपादान माना जाय, तो 'मैं काम हूँ' इस तरह समानाघि- करण होनेकी आपत्ति हो जायगी और दण्डी देवदत्तकी भाँति 'मैं कामी हूँ' इस प्रकार सम्बन्धका ज्ञान नहीं होगा। [ जसे 'घड़ा मिट्टी है' इत्यादि स्थलोंमें उपादान कारणके साथ कार्यका अभेदव्यवहार होता है, वैसे ही 'मैं काम हूँ' यह समानाधिकरण व्यवहार हो जायगा, क्योंकि अमेदवोधको ही समानाधिकरण कहते हैं। ऐसे स्थलोंमें दोनों समान- विभत्तयन्त ही होते हैं। और पुरुषका संयोगसम्बन्ध मालूम होता है; क्योंकि दण्डका पुरुष उपादान कारण नहीं है। उपादानके साथ कार्यका संयोगादि भेदसम्बन्ध नहीं हो सकता]। और अन्तःकरणके साथ कामादि धर्मोंका सामानाधिकरण्य तो 'कामः सङ्कल्पः' इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध है। इससे कामादि अन्तःकरणके ही धर्म हैं, उनका आत्मामें [ सम्बन्धि- विधया ] आरोप होता है [ तादात्म्यसे नहीं ] । और अन्तःकरण अपने साक्षी चैतन्यमें ऐक्यसे-तादात्म्यसे-ही आरोपित होता है; ऐसा न माननेसे केवल शुद्ध निरज्जन साक्षीके 'अहं' (मैं) इस अभिमानसे विशिष्टरूपकी प्रतीति नहीं बनेगी।
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अध्यांसविचार ] भांपानुवादसहित ३२३
ननु न साक्षिवेद्यमन्त:करणंम्, किन्त्वात्मेन्द्रियविपयेधु समवहितेपु दश्यमानस्य ज्ञानोत्पत्तिक्रमस्याऽन्यथानुपपच्या गम्यमिति चेद्, न; अन्य- थाऽप्युपपत्तेः। आत्मन एव क्रमेण ज्ञानजननसामर्थ्यकल्पनेऽप्युपपन्नस्त- त्क्रमः । न चाऽवश्यं कस्यचिन्नियामकस्य कल्पनीयत्वे मन एव कल्प्य- तामिति वाच्यम्, सिद्धस्यैवाऽडत्मनः सामर्थ्यमात्रकल्पनस्य सामर्थ्योंपेत- द्रव्यान्तरकल्पनाल्लघीयस्त्वात्। ननु तर्ह्यनुमानेन मनोऽवगम्यताम्-विमतः क्रमः कर्तुः क्रम- कारिसाधारणकारणापेक्ष:, बहुविपयसंनिधानवतः कर्तुः कार्योत्पाद- क्रमत्वाद, वाहुच्छेद्यसंनिधानवतो देवदत्तस्य कुठारसापेक्षच्छिदिक्रिया- यदि शक्का हो कि अन्तःकरण साक्षीसे प्रकाशित होनेवाला नहीं है, किन्तु आत्मा, इन्द्रिय और विपय-इन सबके इकट्टे होनेपर घट, पटादि विषयक ज्ञानकी अनुभवसिद्ध उत्पत्तिके क्रमकी अन्यथा अनुपपचतिसे ही वह जाना जाता है, तो यह शक्का उचित नहीं है, क्योंकि अन्यथा भी उपपत्ति हो सकती है। अर्थात् आत्मामें ही कमसे ज्ञानोत्पत्तिकी सामर्थ्य माननेसे ज्ञानकी क्रमोत्पत्ति वन सकती है। यदि ज्ञानकी कमसे उत्पत्तिमें किसीको नियामक माननेकी अवश्य कल्पना करनी ही है, तो अन्तःकरणको ही उसका नियामक मान लेंगे' ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि निर्विवादसिद्ध आत्मामें केवल सामर्थ्यकी कल्पनाकी अपेक्षा एक नवीन दूसरा द्रव्य मानना और उसमें सामर्थ्यकी कल्पना करनेमें गौरव है। [ क्योंकि अन्तःकरणके माननेमें धर्म और धर्मी दोंनोंकी कल्पना करनी पड़ती है और आत्माको क्रमिक ज्ञानकी उत्पत्तिका नियामक माननेमें केवल धर्म-सामर्थ्यमात्र-की कल्पना करनी पड़ती है, अतः लाघव है] अनुमानसे ही मनकी प्रतीति होगी [ साक्षी द्वारा नहीं, अनुमानका प्रयोग करते हैं] विमत क्रम [ज्ञानकी उत्पत्तिके क्रमके नियामकमें विवाद है-कोई मानते हैं कि अन्तःकरण इसका नियामक है और कोई इसको नहीं मानते, इसलिए यह ज्ञानोत्पच्तिका क्रम विवादपूर्ण हुआ ] कर्ताके क्रमिक कार्य करनेवाले साधारण कारणकी अपेक्षा रखता है; अनेक विषयोंके संनिधानवाले कर्ताके कार्योंकी उत्पत्तिका क्रम होनेसे, [ एक कालमें अनेक विषयोंसे सन्निकर्ष होनेपर भी अनुभवादि कार्यकी उत्पत्ति क्रमसे ही होती है, एक साथ नहीं] बाहुओंसे तोड़ने-फाड़ने लायक विपयोंके सन्निधानवाले देवदत्तकी कुठारकी अपेक्षा रखनेवाली तोड़ना-फाड़ना आदि छेदनक्रियाके क्मके समान। [ भाव यह है कि जैसे देवदत्तको अपने वाहुवलसे चार टुकड़ोंको चीरना या फाड़ना है। उसमें उसको कुठारकी
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३२४ विवरणप्रमैयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
क्रमवदिति। नैतत्सारम्, मनःकर्तकेषु अतीन्द्रियंसंयोगेपु वर्त्तमाने क्रमेऽनैकान्त्यात्। नहि मनस इन्द्रियैः क्रमेण संयोगे किंचित्साधारणं कारणमस्ति। अदष्टमेव तद्भ्विष्यतीति चेद्, एवमपि वृक्षात्पततः फलस्याSड- काशप्रदेशसंयोगक्रमेऽनैकान्त्यम् । तत्रापि गुरुत्वं साधारणं कारणमिति चेढू, एवं तर्हि चक्षुषः अ्रतिविपयसंयोगेषु वत्तमानक्रमेऽनैकान्त्यात्। न चाऽदष्टमत्राऽपि सममिति वाच्यम्, अदृष्टव्यतिरिक्तस्यैव साधारणकारणस्य साध्यत्वेन विवक्षितत्वात। एवं च सति प्रथमत उक्तमनैकान्तिकस्थलमप्य- दुष्टम्।
अपेक्षा है, वह उस कुठारके द्वारा क्रमसे ही छेदन कर सकता है, एक साथ नहीं। वैसे ही आत्माको भी दर्शनके अनेक विषयोंके ज्ञानोंका तथा दर्शन, स्पर्शन आदि अनेक ज्ञानोंका उदय अन्तःकरणकी अपेक्षा रखता हुआ क्रमसे ही होगा ] यह अनुमान सारगर्मित नहीं है-व्याप्तिसे शून्य है, क्योंकि [कार्यकी उत्पत्तिके क्रममात्रमें साधारण कारण अपेक्षित नहीं है, ऐसा नियम नहीं है, इसमें व्यभिचार दिखलाते हैं-] मनके प्रत्येक इन्द्रियके साथ होनेवाले संयोगोंके कममें उक्त हेतुके न होनेसे व्यभिचार है। अतः किसी दूसरे साधारण कारणकी अपेक्षा नहीं है। अर्थात् मनका इन्द्रियोंके साथ क्रमसे होनेवाले संयोगमें कोई साधारण कारण नहीं है। उसमें इन्द्रियोंसे होनेवाले मनोजन्य संयोगमें अदृष्ट ही साधारण कारण होगा [कार्यमात्रके प्रति अदृष्ट साधारण कारण होता है, इस नियमसे ] यदि ऐसा माना जाय, तो भी वृक्षसे गिरते हुए फलके आकाशदेशमें होनेवाले संयोगक्रममें व्यभिचार वना ही है। उसमें गुरुत्व-भारीपन-साधारण कारण माना जाय, तो आँखका एक-एक विषयके साथ होनेवाले संयोगोंके कममें व्यभिचार आ जायगा। यहाँपर भी पहलेकी तरह अदष्टको साधारण कारण माना जायगा' ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि विमतः क्रमः-इत्यादि अनुमानके प्रयोगका अदष्टसे भिन्न साधारण कारणके ही साधन करनेमें तात्पर्य है। [ यदि उक्त अनुमानका साध्य अदष्ट ही माना जाय, तो सिद्धसाधन दोष होनेकी आपत्ति होगी, अतः उससे अतिरिक्त ही साध्य मानना चाहिए] ऐसा माननेपर-अदष्टसे अतिरिक्त साध्य (साधारण कारण) स्वीकार करनेपर पूर्वोक्त मनसे उत्पन्न होनेमें प्रत्येक इन्द्रियसंयोगोंमें विद्यमान क्रमस्थलके भी व्यभिचारका द्ष्टान्त होनेमें कोई दोष नहीं है।
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अंध्यासविचार] भापानुवादसहित ३२५
अथ मतम्-विमता विज्ञानादिविशेपगुणोत्पत्तिः स्वाथ्रये द्रव्यान्तर- संयोगलक्षणासमवायिकारणापेक्षा, नित्यद्रव्यविशेगुणोत्त्तित्वाद्, अभि संयोगापेक्षपरमाणुगतलौहित्योत्पचिवत्। तथा च द्रव्यान्तरं यत्तन्मन इति। नैतद्प्युपपन्नम्, आत्मनः शरीरेन्द्रियसंयोगोऽपि ज्ञानासमवायिकारणमिति तत्र सिद्धसाधनत्वात् । स्वम्ज्ञानपक्षीकारे मनःसिद्धिरिति चेद्, न; शरीरे- णैव सिद्धसाधनत्वात्। नहि स्वमेऽ्यात्मन: शरीरसंयोगोऽपगच्छति। तर्ह्यस्तु प्रत्यक्ष मन इति चेद्, न; अणुपरिमाणत्वे मनसः परमाणुवदि- न्द्रियागम्यत्वात्। अनन्तपरिमाणत्वे युगपत्सर्वजगदवभासप्रसङ्गात्। मध्य- विपक्षी दूसरा अनुमानप्रयोग करता है-विज्ञानादि विशेषगुणोंकी उत्पत्ति अपने आश्रयमें द्रव्यान्तरके संयोगरूपी असमवायिकारणकी अपेक्षा रखता है, नित्य द्रन्यके आश्रित विशेष गुणोंकी उत्पत्ति होनेसे, अभनिसंयोगकी अपेक्षा रखनेवाले परमाणुमें स्थित लौहित्यकी उत्पत्तिके समान। इस अनुमानसे प्रकृतमें द्रव्यान्तरकी अपेक्षा सिद्ध, होती है, वह द्रव्यान्तर कौन है? इस जिज्ञासाका उत्तर यह है कि जो अपेक्षित द्रव्यान्तर है वह मन ही है। यदि ऐसा मानो तो यह भी युक्तियोंसे सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि आत्माका शरीर तथा इन्द्रियोंके साथ संयोग भी ज्ञानका असमवायिकारण है, इससे उस आत्म- शरीरेन्द्रियसंयोगमें सिद्धसाधन दोप आता है। स्वप्नज्ञानको पक्ष माननेमें मनकी सिद्धि होगी अर्थात् स्वम्नज्ञानमें आत्ममनःसंयोग ही असमवायिकारण होगा, वाह्येन्द्रिय तथा शरीर तो स्वन्नमें निश्चेष्ट रहता है, इससे मनको मानना ही चाहिए, ऐसा भी नहीं मान सकते, क्योंकि स्वप्नज्ञानको पक्ष मान कर किये गये अनुमानमें मी शरीरके कारण सिद्धसाधन दोप बना है अर्थात् शरीर और आत्माका संयोग स्वप्नमें भी सिद्ध ही है। कारण कि स्वसमें भी आत्माका शरीरके साथ संयोग नष्ट नहीं होता है, किन्तु बना ही रहता है। [ इससे स्वमज्ञानपक्षकं अनुमानसे भी सिद्धका ही साधन हुआ जो अनुमितिका विरोधी है। ] अच्छा तो मनको प्रत्यक्षगम्य ही समझना चाहिए अर्थात् मन प्रत्यक्ष है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि मनको यदि अणुपरिमाण मानो, तो परमाणुकी तरह वह इन्द्रियोंका गोचर नहीं हो सकेगा। और यदि उसे अनन्त-महत्-परिमाण माना १ न्यायमतमें ज्ञानाश्रय आत्मा है।
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३२६ विवरणप्रमेयसंग्रह i सूत्र १, वर्णक ₹
मपरिमाणत्वेऽपि न तस्येन्द्रियगम्यत्वम्, स्वनावस्थायामिन्द्रियाभावेऽपि मनोदर्शनात्। न च मनसः प्रतीतिरेव नास्तीति वाच्यम्, मम मनो- न्यत्र गतमित्यनुभवात्। ततः परिशेषान्मनसः साक्षिवेद्यत्वं सिद्धम्।
कारादिषु चैतन्योपलम्भाद्। नन्वात्मानात्मनोरन्योन्याध्यासे द्वयोरप्यध्यस्तत्वेन मिथ्यात्वं स्यात् तथा द्वयोरप्यधिष्ठानत्वेन सामान्यावभास एव स्यान्न कस्यापि विशेषा- चभास इति चेद्, भैवम् ; चिज्जड़रूपेण द्वयोर्विशेषावभासस्तावदितरेतरा- ध्यासं गमयति। अध्यासे विशेषावभासस्याऽध्यस्यमानताप्रयुक्तत्वात्। एक-
जाय, तो एक साथ ही सम्पूर्ण जगत्का ज्ञान होने लगेगा। मध्यम परिमाण -- शरीरपरिमाण-माननेमें भी वह इन्द्रियोंसे गम्यनहीं है, क्योंकि बाह्य इन्द्रियोंका अभाव होनेपर भी वह देखा जाता है[ मन अपना व्यापार करता रहता है ]। और मनकी प्रतीति ही नहीं होती है [ प्रतीतिके बिना पदार्थका स्वीकार असम्भव है, इससे मन है ही नहीं ] यह भी नहीं मान सकते, क्योंकि मेरा मन दूसरी जगह चला गया है, इस प्रकार उसका अनुभव होता है। अतः परिशेषसे -- अनुमान तथा प्रत्यक्षका विषय न हो सकनेसे-मन.साक्षीके द्वारा ही प्रतीत होनेवाला सिद्ध होता है और वह-मनका अनुभव करानेवालां- साक्षी प्रत्यगात्मा, अनात्मा तथा अन्तःकरण आदिमें तादात्म्यरूपसे आरोपित होता है, क्योंकि अहक्कारादिमें चैतन्यकी उपलब्धि होती है। यदि आत्मा और अनात्मा इंन दोनोंका परस्पर अध्यास है, तो दोनोंका रूप अध्यास ही हो गया, इसलिए दोनों ही मिथ्या कहलाने चाहिए, और दोनोंके अधिष्ठान होनेसे दोनोंके सामान्य अंशका ही ज्ञान होना चाहिए, एकके भी विशेष अंशका ज्ञान नहीं होना चाहिए, ऐसी शक्का भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि आत्मा और अनात्मा इन दोनोंके चित् और जड़रूप विशेष अंशका ज्ञान होना ही दोनोंके परस्पर अध्यासका बोधक होता है। कारण कि अध्यासमें विशेष अंशका . घोध होना ही आरोपमें विषय होने-का कारण होता है। [शुकतिरजतादिभ्रम स्थलमें 'इदं रंजतम्' (यह रजत है) इत्यादि प्रतीतिमें विशेषाकारसे भासित होनेवाला
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३२७
तराध्यासे चैकस्यैव विशेपावभासः स्यात्। न च द्वयोरपि मिथ्यात्वापातः, चेतनस्याऽचेतने स्वरूपाध्यासाभावात्संसृष्टतयैवाऽव्यासात्। न च विशेपाव- भासादधिष्ठानत्वविरोध:, अधिष्ठानधर्मतया विशेपाप्रतीतेः। देहस्य चेत्- नत्वमात्मनो Sचेतनत्वमिति वैपरीत्येन ग्रतीतेः। नच वाच्यं द्वयोर्विशेपा- चभासे सति नाध्यासः सम्भवति, सामानाधिकरण्यमस्ति चेद्रौणं तद्धविष्य, तीति। नहि लौकिका अन्तःकरणादावात्मनो गौणीं बुद्धिमभिमन्यन्ते, किन्तु मुख्यामेव। नहि दष्टेऽनुपपन्नं नाम ।
रजत ही अध्यासका विपय है। इदम्-सामान्य अंश विषय है ] यदि 'आत्मा और अनात्मा इन दोनोंमें से, एकको ही अध्यासका विषय मानो, तो एकंका ही: विशेष रूपसे ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि दोनोंका अध्यास माननेमें दोनोंको मिथ्या होनेक़ा दोप आ जायगा, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि चेतन-आत्मा-का अचेतन- जड़-में स्वरूपतः अध्यास नहीं हो सकता है किन्तु संसृष्टत्व रूपसे ही अध्यांस होता है। [आत्माका वह संसष्टत्वरूप मिथ्या ही है, स्वरूप ही सत् है। 'अहं स्थूलः, अहं गच्छामि' इत्यादि स्थलोंमें स्थूलत्व और कर्तृत्वादि धर्मोंसे संसृष्ट ही चैतन्यका अध्यास है वह मिथ्या ही है और शुद्ध चतन्य सत् है] और चेतन और जड़ अर्थात् आत्मा और अनात्माका विशेपरूपसे ज्ञान अधिष्ठानत्व-अध्यासका विषयी होने-का विरोधी है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि अधिष्ठानके धर्मरूपसे विशेषकी प्रतीति नहीं होती है। कारण कि देहमें चेतनत्व और आत्मामें अचेतनत्वकी विपरीत प्रतीति होती है। [शच्चा है कि जैसे शुक्ति अधिष्ठान है, उसकी विशेप अंश शुक्तित्वकी प्रतीति नहीं होती है वैसे ही प्रकृतमें आत्मा और अनात्मा दोनों अधिष्ठान हैं, उनके जड़ और चेतन इनदोनों विशेष अंशोंकी प्रतीति नहीं होनी चाहिए? समाधान देते हैं कि विशेप अंशके स्फुरणमात्रसे अधिष्ठानत्वका विरोध नहीं है, अन्यथा शुक्ति- रजतस्थलमें भी शुक्तिको अविष्ठान होनेका अवसर नहीं आता, क्योंकि उस पुरोवर्ती-शुक्तिमें भी रजतत्वरूप विशेष अंशका स्फरण होता ही है। केवल इतना ही अधिष्ठानत्व होनेमें प्रयोजक है, उसका ही यह विशेष अंश है, ऐसी निश्चित प्रतीति नहीं होनी चाहिए। प्रकृतमें 'अहं गच्छामि' इसमें गमनशील शरीरमें कर्तृत्वलक्षण चैतन्यकी प्रतीति होती है, और वस्तुतः चेतन, आत्मामें
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३२८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
नन्वादिशब्दोऽनुपपन्नः । अन्तःकरणमात्रे शुद्धस्याऽडत्मनोऽध्यासाद्। इन्द्रियादौ त्वध्यस्तात्मविशिष्टमन्तःकरणमेव सम्वन्ध्यत इति चेत, सत्यमेवम् तथापि चैतन्यमेवेन्द्रियाद्यवच्छिन्नं प्रकाशते, नान्त:करणमिति अतिभासा- मिप्रायेणादिशब्द उक्तः । चैतन्यस्य देहेन्द्रियादावनुस्यूतत्वेन प्रतिभासादेव तत्र लौकायतादीनामात्मभ्रमः। अन्यथा चैतन्याध्यासवत्यन्तःकरणे एव सर्वेषामपि वादिनामात्मत्वभ्रमः स्यान्न तु देहादौ। तदित्थमात्मानात्म-
जड़की प्रतीति होती है, इसी अ्रमसे नैयायिक और मीमांसक आदि आत्माको ज्ञानाश्रयत्वेन अनुभवका विषय कहते हैं, स्वप्रकाशरूप चैतन्य नहीं कहते। इस प्रकार विपरीत विशेष अंशकी प्रतीतिमात्रसे अधिष्ठानत्वका विरोध नहीं हो सकता।] और दोनोंके विशेष अंशकी प्रतीति होनेपर अध्यासका सम्भव नहीं है। यदि कहो कि सामानाधिकरण्यसे अध्यास कहेगें और वह सामानाघिकरण्य गौण है-यह उचित नहीं है, क्योंकि लोकमें सर्वसाधारण जन अन्त :- करणमें होनेवाली आत्मवुद्धिको गौण नहीं कहते हैं, मुख्य ही कहते हैं। [ सामान्य और विशेष, दोनों अंशोकी प्रतीति रहते अध्यास कहना संगत नहीं है, इस अंशका खण्डन करते हैं-] अनुभवमें आनेवाली वस्तुके लिए नहीं कहा जा सकता कि इसकी उपपत्ि ही नहीं हो सकती। [ अनुभवका अपलाप नहीं कर सकते और न अनुभवके वलसे वस्तुका अन्यथाभाव ही हो सकता हैं। आत्मामें 'अहं गच्छामि, जानामि, तिष्ठामि' इत्यादि व्यवहार अनुभवमें आता है, वस्तुतः आत्मा ऐसा नहीं है, अतः उक्त व्यवहारकी उपपत्ति अध्यास द्वारा ही करनी होगी, इससे अनुभवका अपलाप भी नहीं होता और न इससे वस्तुमें ही विपर्यय आता है। ] अन्तःकरणादि शब्दमें आदि शब्द देना नहीं घटता, क्योंकि अन्तःकरण- मात्रमें शुद्ध आत्माका अध्यास होता है। इन्द्रियादिमें तो आत्माके आरोपसे विशिष्ट करणका ही सम्बन्ध-आरोप-होता है, ऐसा कहना यद्यपि सत्य है, [ऐसा ही होता है। जैसा कि 'तत्रापि पूर्वपूर्वाध्यासविशिष्टम्' इत्यादि ग्रन्थसे प्रतिपादन किया गया हैं। ] तथापि इन्द्रियादिसे अवच्छिन्न चतन्यका ही प्रकाश होता है, अन्तःकरणका नहीं। इस प्रतिभासके अनुसार ही आदिशब्द दिया गया है। [आत्माध्यासविशिष्ट अन्तःकरण ही देहेन्द्रियादिमें अध्यस्त
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३२९
नोरन्योन्याध्यासे लक्षणसम्भावनासद्भावग्रमाणैरुपपादिते विवदितु केनाऽपि न शक्यत इति सिद्धम्। ननु विमतं शास्त्रं सम्भावितविपयप्रयोजनम्, अध्यासात्मकवन्धप्रंत्य- नीकत्वात्, जाग्रद्ोधवत्, इत्यन्ुमातुमध्यासो भवता प्रसाधितः। तत्र प्रयोजनं
ध्यासस्य निवृत्तिः १ नाऽडद्य :; सति हेतौ निवृत्तस्याऽनर्थस्य पुनरप्युत्पत्तेः। होता है। और देह, इन्द्रियादिमें आत्मव्यवहार कराता हुआ स्वयं निवृत्त हो जाता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो जैसे 'मैं स्थूल हूँ', 'मैं काना हूँ' इत्यादि शरीरेन्द्रियमें आत्मसमानाघिकरणसे 'मैं' व्यवहार होता है, वैसे ही अन्तःकरण- समानाधिकरणसे भी अन्तःकरण 'स्थूल या काना है' इत्यादि लौकिक व्यवहार होना चाहिए। 'वुद्धि स्थूल है' यह व्यवहार तो बाह्य इन्द्रियोंके लिए नहीं होता, केवल अन्तःकरणके लिए ही होता है, अतः वह आध्यासिक नहीं है। इससे अन्तःकरणोपाधिक चैतन्यका अध्यास होनेपर भी व्यवहारमें उपाधि निवृत्त हो जाती है, यह तात्पर्य हुआ। ] चैतन्यका देहादिमें बरावर सम्बन्ध होनेके कारण ही लौकायतिकोंको उसमें चैतन्यका भ्रम होता है। नहीं तो, चैतन्यके अध्याससे विशिष्ट अन्तःकरणमें ही अन्य सभी वादियोंको भी आत्माका-चैतन्यका-भ्रम होना चाहिए, देह आदिमें नहीं। लक्षण, सभ्भावना तथा प्रमाण द्वारा इसप्रकार आत्मा और अनात्माके परस्पर अध्यासके उपपादित होनेपर कोई भी विवाद नहीं कर सकता [ कि देहेन्द्रियादि विषयोंमें आत्माका अध्यास नहीं है]। इसप्रकार हमारा ही सिद्धान्त सिद्ध होता है। शङ्का-विमत शास्त्र [विमत शास्त्रका अर्थात् वेदान्त शास्त्रका विषय- सिद्धब्रह्म-और प्रयोजन-बन्धकी निवृत्ति-माने गये हैं, इसमें दूसरे वादी सम्मति नहीं रखते, इसलिए इसको विमत कहा है ] विषय तथा प्रयोजनसे युक्त हो सकता है, अध्यासरूप वन्धका विरोधी होनेसे, जागरणकालके बोधके सदश, ऐसा अनुमान करनेके लिए ही आपने अध्यासकी सिद्धि की है। उसमें प्रश्न होगा कि क्या कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनर्थोंकी निवृत्ति ही प्रयोजन है : अथवा उक्त अनर्थके कारणभूत अविद्या और उसके कार्य अध्यासकी निवृत्ति? प्रथम प्रयोजन नहीं हो सकता, क्योंकि निवृत हुए अनर्थके कारणकी (अविद्याकी) ४२
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३३० विचरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
न द्वितीय :; अनादेरध्यासस्य निवृत्ययोगाद्। शासत्रप्रामाण्यान्निवृत्तिरिति चेदू, न; प्रत्यक्षविरोधात्। नहि देहादिभ्यो न्यायतो विविक्तेऽप्यात्मनि अध्यासनिवृत्तिं पश्यामः । उच्यते-अनादेः आ्रगभावस्य भवन्मतसिद्धसंसारहेतोनिवृत्तिरिवाS- यासस्याऽपि निवृत्तिः किंन स्यात्१ अध्यासो न निवर्तते, अनादि- भावरूपत्वादात्मवदिति चेद्, न; किं भावरूपत्वं नाम सत्यत्वम् उताऽभाववैलक्षण्यम् १ आद्ये अनिर्वचनीयवादिनां हेत्वसिद्धिः। न द्वितीय: विमतो ज्ञाननिवत्य:, अज्ञानात्मकत्वात्, रजताद्यध्यासवत्। न च पूर्वानु- मानेन वाध:, तस्यैवाडनेन वाध्यत्वात्। यथा सामान्यशासत्रं विशेपेण वा-
उपस्थिति होनेपर पुनः अनर्थकी उत्पत्ति हो सकती है। दूसरा भी नहीं हो सकता, क्योंकि अनादि अध्यासकी निवृत्ति नहीं हो सकती। शास्त्रोंके प्रमाणसे अनादि अध्यासकी भी निवृत्ति मान लेंगे, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि इसमें प्रत्यक्षविरोध है; कारण कि देहादिसे आत्माका युक्तियों द्वारा भेदग्रह कर लेने- पर भी अध्यास निवृत्त हो गया हो, ऐसा नहीं देखते हैं। समाधान-जैसे आपके (नैयायिक और माध्वादिके) मतमें संसारके कारण अनादि प्रागभावकी निवृत्ति होती है, वैसे ही अनादि अध्यासकी भी निवृत्ति क्यों नहीं होगी? अध्यासकी निवृत्ति नहीं होती, अनादि होकर भावरूप होनेसे, आत्माके सदश, [प्रागभाव तो अनादि होते हुए भी अभावरुप है, अतः निवृत्त हो सकता है और अनादि भावरूंप तो आत्माके समान नित्य है। ] इस अनुमानसे अध्यासकी नित्यता सिद्ध होगी, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि भावरूपत्व सत्यत्व-अवाध्यत्व-रूप है या अभावसे भिन्नत्वरूप है ? प्रथम पक्ष माननेमें हमारे (अनिर्वचनीयवादीके) मतमें हेतुकी असिद्धि है, [ हमारे मतमें अध्यास अनिर्वचनीय है, उसमें सत्यत्वरूप भावत्व है ही नहीं। ] द्वितीय कल्प भी नहीं हो सकता, क्योंकि 'विमत-अध्यास-ज्ञानसे निवृत्त हो जाता है, अज्ञानस्वरूप होनेसे, रजतादि अध्यासके समान' [यह अनुमान अध्यासकी निवृत्तिका बोध कराता है। ] पहले अनुमानसे इस अनुमानका बाध भी नहीं होगा, [ जिससे वह अनुमानका साधक हेतु सत्प्रति- पक्ष दोषसे दूषित हो] क्योंकि पूर्व अनुमान ही इस अनन्तर कहे गये
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अध्यांसविचार ] भापांतुर्वादसहित ३३१
ध्यते तथा सामान्यानुमानं विशेपानुमानेन किं न वाध्यते? ननु निवृत्तिर्नामं स्वोपादानगतोत्तरावस्था, घटस्य मृद्गतकपालरूपत्वग्रापेर्निवृत्तित्वाद्; नहि निरुपादानस्याऽविद्याध्यासस्य सा सम्भवतीति चेद्, न; स्वाश्रयगतोत्तराव- स्थाया निवृत्तित्वात्। अन्यथा परमाणुगतश्यामत्वादेरनादेरनिवृत्ति- प्रसङ्गात्। यद्यपि न्यायतो देहादिव्यतिरिक्तात्मनि विज्ञाते तांवतैवाऽध्यासनिवृत्तिर्न दृष्टा, तथापि तत्वमस्यादिवाक्याद् ब्रह्मरूपत्वावगतावविद्यातत्कार्याव्यासस्य विरोधिनो निवृत्तिर्युज्यते। विरुध्यते हि ब्रह्मविद्यया त्रह्मावरणाज्ञानं तत्कार्थ च। देहव्यतिरिक्तात्मज्ञानेन तु देहात्मत्वं विरुध्यत इति तस्यैव
अनुमानसे वाधित होता है। [इसमें विनिगमक दिखलाते हैं-] जैसे सामान्य शास्त्र विशेष शास्रसे वाधित होता है, वैसे ही सामान्य अनुमान भी विशेष अनुमानसे क्यों न बाधित हो ? [आपके पूर्व अनुमानमें 'अनादि पदार्थ निवृच नहीं होता' यह सामान्य व्याप्ति है, और हमारे अनुमानमें 'अनादि अज्ञान ज्ञानसे निवृत्त होता है' यह विशेष व्याप्ति है। अतः हमारा ही अनुमान वाधक होगा]। अपने उपादानमंसमवायिकारणमें-उसकी अगली अवस्था ही, निवृत्तिपदार्थ है, जैसे घटकी निवृत्ति उसके उपादानभूत मिट्टीमें हुई कपालरूप दूसरी अवस्था ही है, जिसका कोई उपादान नहीं है, ऐसे अविद्याध्यासकी वह उक्त लक्षण निवृत्ति नहीं हो सकती, यह पूर्वपक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि अपने आाश्रयमें होनेवाली दूसरी अवस्था ही निवृत्तिपदार्थ है। यदि ऐसा न मानो, तो परमाणुमें, विद्यमान अनादि श्यामत्वादि गुणकी निवृत्ति नहीं हो सकेगी; क्योंकि श्यामत्वका परमाणु आश्रय है, उपादान नहीं। यद्यपि युक्तियोंसे आत्मा देहादिसे भिन्न है, यह जान लेनेपर ही अध्यासकी निवृत्ति नहीं देखी जाती, तथापि 'तत्त्वमसि' इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे न्रह्मात्मक्यका साक्षात्कार होनेसे विरोधीकी-अविद्या और उसके अध्यासस्वरूप कार्यकी-निवृत्ति होना संगत ही है, क्योंकि ब्रह्मविद्यासे-ब्रद्के ज्ञानसे-ब्रह्मको आवृत करनेवाले अज्ञान तथा अज्ञानके कार्य अध्यासका विरोध सिद्ध ही है। आत्मा और देहमें मेदकें ज्ञानसे देहको आत्मरूप मानना ही विरुद्ध है, इसलिए
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३३२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
तेन निवृत्तिः। यद्यप्यहंप्रत्यये भासमानश्विदात्मा न्रहैव, तथापि ब्रह्माकारेण न भासत इति नाऽहंप्रत्ययो ब्रह्मविद्या। यौक्तिकज्ञानस्य कर्थचिद् ब्रह्मगोच- रत्वे ऽप्यप्रमाणत्वात् परोक्षत्वाद्वा नाऽपरोक्षाध्यासनिवर्त्तकत्वम्। ततो वेदान्त-
नतु नाऽध्यासनिवृत्तिमात्रं शास्त्रप्रयोजनम्, किन्त्वानन्दावासिरपीति चेत्, सत्यम् : तथापि जीवव्रह्मणोरेकत्वलक्षणे विपये निर्दिष्टे सति जीवस्याSडन- न्दावासिरपि विषयान्तःपातितया साक्षाल्लभ्यते। 'आनन्दो त्रह्म' इति श्ुत्या ब्रह्मण एवाऽडनन्दरूपत्वात्। ग्रयोजनत्वं चाऽऽनन्दाचापे: पुरुषाकाङ्क्षाविषय- त्वादेव प्रसिद्धय् , अतो नाऽसौ.प्रयोजनत्वेन पृथङ् निर्देष्टव्या।
देहसे भिन्न आत्मा है, इस ज्ञानसे देहात्मवादकी ही निवृत्ति होगी [अध्यासकी नहीं ]। यद्यपि अहम् (मैं) इस वुद्धिमें चिदात्मा त्रह्मका ही प्रकाश होता है, . तथापि [उक्त प्रत्ययमें ] ब्रह्माकारसे [ चिदात्माका ] भान नहीं होता, इसलिए 'अहम्' ( मैं) वुद्धि ब्रह्मविद्या नहीं कही जा सकती। यद्यपि विचार करनेसे उत्पन्न हुआ (युकि द्वारा उत्पन्न हुआ) 'अहम्' ज्ञान किसी तरह ब्रह्मको विपय करता है, तथापि वेदान्त आदि प्रमाणसे जन्य न होनेसे तथा परोक्ष होनेसे वह अपरोक्ष अध्यासकी निवृत्ति नहीं करा सकता, [ क्योंकि यादश ज्ञान होगा, तादश ही अज्ञान निवृत्त होगा ] इससे वेदान्तवाक्योंके द्वारा मनन और निदिध्यासनके अनन्तर ब्रह्मके साक्षात्कारसे ही अध्यासकी निवृत्ति होती है। अध्यासकी निवृत्ति ही शास्त्रका प्रयोजन नहीं हो सकता, किन्तु आनन्दप्राप्ति भी है, उसका भी पृथक निर्देश करना चाहिए, इस शक्काका उत्तर देते हैं कि ठीक है, यह भी प्रयोजन हो सकता है, तथापि जीवन्रह्मैक्यस्वरूप. विपयका निर्देश कर देनेसे जीवको आनन्द प्राप्त होना भी साक्षात् विषयकोढिमें आ ही जाता है, क्योंकि 'आनन्दो ब्रह्म' (आनन्दरूप ब्रह्म है) इस श्रतिसे ब्रह्म आनन्दरूप ही माना गया है। और आनन्दपाप्तिको प्रयोजन मानना तो मनुष्यकी आकाङ्माका (उत्कट इच्छाका) विषय होनेसे ही है। इसलिए आनन्दप्राप्तिको प्रयोजनकोटिमें प्रथक् कहनेकी आवश्यकता नहीं है। [ उपर्युक्त कथनसे विषय प्रयोजन होता ही है, इससे-विषयप्रतिपादनसे-ही प्योजनका प्रतिपादन हो जाता है, अतः उसका पृथक् प्रतिपादन करनेकी आवश्यकता
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अंध्यासाविचार ] भापानुवांदसाहेत ३३३
तर्ह्यध्यासनिवृत्तिरपि न पृथग् निर्देष्टव्या, शास्त्रविपयत्वात्, आनन्दावा- सिवदिति चेद, मैवम् ; किमियमध्यासनिवृत्ति: शास्त्रस्य स्वातन्त्र्येण विपय उत त्रह्मात्मैकत्वलक्षणे विपयेऽन्तर्भविष्यति? नाऽडद्यः; त्रहमात्मैकत्वस्यैव शास्त्रप्रतिपाद्यत्वात्। 'भूयश्राऽन्ते विश्वमायानिवृत्तिः' 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः'इत्ये-
कृतत्वात्। त्रह्मगतसग्रपश्चत्वस्य जीवगताSविद्यातत्कार्ययोश्र निवृत्तिमन्तरेण तत्तमस्यादिवाक्योक्तमप्यैक्यं नोपपद्यत इति चेद्, आयातं तर्ह्यस्मदुक्तं साम-
नहीं होती, इस आपके सिद्धान्तके अनुसार अनर्थनिवृत्ति शास्त्रके विपयसे पृथक् है, यह कहना प्राप्त नहीं होता; इस आशयसे शक्का करते हैं-]अध्यासकी निवृत्तिको [प्रयोजनकोटिमें ] पृथक नहीं कहना चाहिए, क्योंकि आनन्दकी प्राप्तिके तुल्य यह दुःखकी निवृत्ति भी शास्त्रका ही विषय है। [समाधान करते हैं-]ऐसा नहीं। क्या अध्यासनिवृत्ति स्वतन्त्ररूपसे शास्त्रकी विषय होगी या ब्रह्मजीवके अमेदस्वरूप विषयमें उसका भी अन्तर्भाव होगा? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्म और जीवका ऐक्य ही शास्त्रका प्रतिपादनीय विषय है। 'अन्तमें विश्व- गायाकी सर्वथा निवृत्ति होती है' तथा 'हृदयकी गाँठ-चिदचिद्का अविवेकात्मक अहक्कार-छिन्न-भिन्न हो जाती है' इत्यादि फलके सूचक वेदवाक्योंसे अपने- जीव और ब्रह्मके-एकत्वका (अमेदका) बोध होनेसे प्रतीत होनेवाली अध्यासकी निवृत्तिका अनुवाद किया जाता है। [उसका स्वातन्त्र्येण निर्देश नहीं है]। दूसरां पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्म और आत्मा-जीव-के ऐक्यके बोधक 'तत्त्वमसि' इत्यादि श्रुतिवाक्यका अध्यासकी निवृत्ति विषय नहीं है। ब्रह्ममें सम्रपश्चत्व- ब्रह्ममें प्रपश्चका प्रकाश होना-और जीवमें विद्यमान अविद्या तथा उसका कार्य अध्यास, इन दोनोंकी निवत्ति हुए विना 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंसे प्रतिपादित ऐक्य-अमेद-भी उपपन्न नहीं हो सकता है [ इससे श्रुतिवाक्योंसे निवृत्तिका भी प्रतिपादन हो ही गया ], यदि ऐसा मानो, तो हमारा ही सिद्धान्त आ-गया कि अविद्यादिकी निवृत्ति सामथ्यसे प्रतीत होती है। [ साक्षास् स्वातन्त्र्यसे नहीं ]। 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंमें यद्यपि अध्यासकी निवृत्ति अर्थात् प्रतीत होती है तथापि 'अस्थूलमनणु०' (स्थूल नहीं, अणु नहीं) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें तो
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३३४ विवरणप्रमेयसंग्रह i सूत्र १, वर्णक १
थ्यलभ्यत्वमविद्यानिवृत्तेः। तच्वमस्यादिमहावाक्येष्वध्यासनिवृत्तेरर्थलभ्यत्वेऽ- प्यस्थूलमनण्वित्यवान्तरवाक्येपु साक्षात् सा अतिपाद्यत इति चेत् : मैवम्, नह्यत्र ब्रह्मात्मसाक्षात्कारेण मोक्षावस्थायां निष्पत्स्यमाना वन्धनिवृत्ति- रस्थूलादिशब्दार्थ:, कि तर्हि स्वतोऽसङ्गस्य ब्रह्मणः कालत्रयेऽपि स्वाभाविकं यन्निष्प्रपश्चस्वरूपं तदेवाऽस्थूलादिशब्दैः प्रतिपाद्यते। प्रतिपादिते हि तस्मिन्पश्चान्महावाक्येन त्रह्मात्मत्वं साक्षात्कर्तु जीवः शक्तुयान्न पुन- रन्यथा, ब्रह्मपदार्थस्यालौकिकत्वात्। न च ब्रह्मणो निष्प्रपश्चत्वप्रतिपादनेन सप्रपश्चत्वग्राहकप्रमाणविरोध:, तादृशप्रमाणस्यैवाऽभावात्। ग्रत्यक्षादीनां प्रपश्चगोचरत्वेऽपि ब्रह्माग्राहित्वेन तदुभयसम्वन्धावोधकत्वात्। 'इरद सर्वं यदयमात्मा' इत्यादिवाक्यानि च न ब्रह्मणः सर्वप्रपश्चात्मत्वं प्रतिपादयन्ति, सर्वोपादानतयैव तत्सिद्धेः; किं तर्ह्यन्यतः सिंद्धमेव तदनूद्य निष्प्रपश्चत्वग्रति- वह साक्षात्-शव्दों द्वारा ही-कही गई है, ऐसा भी नहीं हो सकता, क्योंकि उक्त श्रुतिवाक्योंमें अस्थूलादि शब्दोंसे ब्रह्मसाक्षात्कार होनेसे मोक्षावस्थामें उत्पन्न होनेवाली बन्धनिवृत्तिको नहीं समझना चाहिए; किन्तु स्वतः (उपाघि दोषके बिना) सङ्गवर्जित ब्रह्मका जो स्वभावसिद्ध (निरुपाधिक) प्रपश्नशुन्यत्व- स्वरूप है, उसको ही समझना चाहिए। उस स्वाभाविक स्वरूपका प्रतिपादन करनेके अनन्तर 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्योंसे जीव अपने ब्रह्मस्वरूपक्का साक्षात्कार करनेमें समर्थ हो सकता है; इसके बिना नहीं, क्योंकि ब्रह्मपदार्थ लौकिक नहीं है। यदि ब्रह्मको प्रपश्नशून्य मानो, तो उसमें सम्रपश्चत्वके बोधक प्रमाणोंसे विरोध आ जायगा, ऐसा भी नहीं मान सकते, क्योंकि इसमें प्रमाणका अभाव है। प्रत्यक्षादि प्रमाण प्रपञ्चको विषय करते हैं, वे ब्रह्मको विषय नहीं कर सकते, इसलिए उन प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे प्रपश्च तथा ब्रह्म दोनोंके सम्बन्धका वोध नहीं हो सकता। 'इदं सर्व यदयमात्मा' (जो यह सब कुछ प्रप्च है, वह आत्मा ही है) इत्यादि वाक्य भी ब्रह्मको सकलप्रपश्चस्वरूप नहीं कहते; क्योंकि वह सर्वात्मकता तो सवका [ विवर्तात्मक ] उपादान होनेसे भी हो सकती है। किन्तु दूसरे शास्त्रसे और प्रत्यक्षादिसे सिद्ध प्रपश्चका अनुवाद करके [ उक्त वाक्य ] ब्रह्ममें प्रपश्चराहित्यके प्रतिपादक वाक्योंसे अपेक्षित निषेध्यके समर्पक होनेके कारण वाक्यैकवाक्यता*को प्राप्त होते हैं, * 'नेह नानाऽस्ति किञ्वन' इत्यादि निषेधवाक्यका वोध 'नाना' पदार्थके ज्ञानके अधीन है,
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अध्यासविचार] भाषानुवादसहित ३३५
पादकवाक्यापेक्षितनिपेध्यसमर्पकतया वाक्यैकवाक्यतां प्रतिपद्यन्ते। अन्यथा पुरुपार्थभूतनिप्प्रपश्चत्वविरुद्मपुरुपार्थभूतं सप्रपञ्चत्वं कथं प्रतिपादयेयुः । निप्प्रपश्चसग्रपश्चत्वयोः पुरुपार्थत्वापुरुपार्थत्वे सुपुपजागरयोद्षट अ्षुतिसिद्धे च। न च सप्रपश्चत्वानुवादेन निप्प्रपश्चत्वप्रमितिर्वाध्यते, अनुवादस्याऽनु- वादत्वेन निप्प्रपश्चग्रमित्यर्थतया चाऽन्र दुर्वलत्वाद्। नन्वप्राप्तं प्रपश्चं त्रह्मणि सम्रपश्चवाक्यैः प्रापय्य पुनस्तन्निपेधोऽनर्थक अन्यथा उक्त वाक्य पुरुपार्थभूत प्रपश्चराहित्यके विरोधी सप्रपञ्चत्वका कैसे प्रतिपादन करते? निष्पपञ्चत्व और सपपश्वत्वका पुरुपार्थत्व और अपुरुषार्थत्व सुपुप्त और जागरणमें देखा गया है, और ये श्रुतिसे भी सिद्ध हैं। [जागरणमें प्रपश्च देखा गया है, उसको पुरुषार्थ नहीं मान सकते, क्योंकि वह दुःख- मिश्रित है। स्वर्गादि प्रपञ्च भी विनाशी होनेसे पुरुपार्थ नहीं है और सुपुसमें प्रपश्च नहीं है और निरतिशय सुख़ रहता है, अतएव प्रपश्नराहित्यरूप पुरुपार्थ उस कालमें है। एवम् 'अशव्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् ........ निचाय्य तं मृत्युमुखाद् प्रमुच्यते' इत्यादि श्रुतियाँ निप्प्रपश्चताको पुरुपार्थ वतलाती है।] सप्पश्चत्वके अनुवादसे निष्प्रपञ्चत्वकी प्रमा वाधित हो जायगी, यह नहीं कद सकते, क्योंकि [ अवाधित ज्ञानको ही प्रमा कहते हैं और जहांपर तद्वच्ताका निश्चय है, चहांपर तद्भाववत्ता बुद्धि वाधित होती है, इसलिए तद्यत्ताके निश्चयके अनन्तर तदभाववचाकी प्रमा नहीं हो सकती, किन्तु आहार्य ज्ञान ही होगा] अनुवाद होनेसे तथा निष्प्रपञ्चकी प्रमाका अजञ-उपकारक-होनेसे अनुवाद दुर्वल है। [अनुवाद विधेयका बाध नहीं कर सकता, अन्यथा उसका अनुवादत्व ही नहीं वनेगा, प्रत्युत विधेय तो अनुवादका वाध कर सकता है, जैसे इक्के अनुवादसे विधीयमान यण्। और यह पहले ही सिद्ध किया गया है कि निषेधप्रमाके लिए निषेध्यका अनुवाद करना आवश्यक होता है और प्रमाणान्तराभासोंसे सिद्धका भी अनुवाद हो सकता है। प्रमाणसिद्धकी ही प्रमिति होगी, इससे भी अनुवाद दुर्बल है। ] शक्का-ब्रह्ममें प्रपञ्च तो प्राप्त ही नहीं है, अतः प्रपश्च दिखानेवाले वाक्योंसे इसलिए इन वाक्योंको 'नाना' पदार्थके बोधक 'इदं सर्वम्' इत्यादि वाक्योंकी अपेक्षा होनेसे दोनोंका उपजीव्य और उपजीवकभाव होता है, इसीको वाक्यकवाक्यता कहते हैं।
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३३६ विवरणप्रमेयसंब्रह [सूत्र १, र्णक ?
एव, प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरमिति न्यायाद् । नैष दोप:, अद्वितीयत्वप्रतिपादनपरश्रुत्युक्तसर्वोपादा नत्वसामर्थ्यादेव प्राप्तः प्रपञ्चो यद्यनूद्य न निपिध्यते तदा नाऽद्वितीयत्वं ब्रह्मण: सिध्येत्। तच्च श्रुतसामर्थ्ये सप्रपश्चत्वस्य ग्रापकमेव न प्रमापकम्, साक्षान्निपेधञ्त्या विरोधे श्रुतसामर्थ्यस्य दौर्वल्यात्। दुर्वलस्याऽपि यावद्वाधं शुक्तिरजतादिज्ञानवत् प्रापकत्वमविरुद्धम्। अन्यथा वाघा- सुपपत्तेः। आ्रप्तमेव हि सर्वत्र वलवत्प्रमाणेन वाध्यते नाऽप्राप्ं नाऽपि ब्रह्ममें प्रपश्चकी प्राप्ति कराकर फिर उसका निषेध करना व्यर्थ है, क्योंकि न्याय है-'कीचड़में हाथ सानकर उसके धोनेकी अपेक्षा कीचड़का स्पर्श न करना ही अच्छा है'। समाधान-यह दोष नहीं आता, क्योंकि अद्वितीयत्वके प्रतिपादनमें तात्पर्य- वाली श्रुतिसे कहा गया है कि व्रह्मा सकल प्रपश्चका उपादान है, इससे ही व्रद्ममें प्रपश्च प्राप्त है। [जैसे घटके उपादान मिट्टीमें घट प्राप्त है वैसे ही सर्व- प्रपञ्चोपादान ब्रह्ममें भी सब प्रपञ्च प्राप्त ही है। ] यदि इसप्रकार प्राप्त हुए प्रपञ्चका अनुवाद करके निषेध न किया जाय, तो ब्रह्मकी अद्वितीयता सिद्ध न हो सकेगी। [ यदि श्रुतिसे सप्रपञ्नत्वरूप अर्थके वलसे ब्रह्ममें प्रपञ्चका सम्बन्ध आता है, तो वह प्रमाणसिद्ध हो गया। प्रमाणसिद्धका वाध नहीं होता, इस आशक्काका समाधान करते हैं-] वह श्रुतिप्रतिपादित (सप्रपश्चत्वरूप) अर्थका सामर्थ्य (ब्रह्ममें प्रपञ्चका) प्रापकमात्र है, प्रमाजनक प्रमाण नहीं है, क्योंकि 'नेह नानाऽस्ति' इत्यादि साक्षात् निषेधश्रतिसे विरोध होनेपर श्रुत अर्थका सामर्थ्य दुर्बल है। [अतएव वाघित होनेसे प्रमाका जनक नहीं हो सकता, बाध्यमान भी प्रापक होता है, इसमें दृष्टान्त देते हैं-] जवतक बाष न हो तवतक दुर्बलको भी शुक्ति- रजतादिज्ञानके तुल्य प्रापक होनेमें कोई विरोध नहीं है, अन्यथा बाधकी ही उपपत्ति न होगी, क्योंकि जो प्राप्त है, उसका ही सर्वत्र बाध होता है। जो प्राप्त नहीं है, या जो प्रमाणसिद्ध है उन दोनोंका वाध नहीं होता। [ इसलिए बाधकी उपपत्तिके लिए दुर्बलको भी प्रापक मानना ही पड़ता है। प्रपञ्चगापक वाक्योंके निषेध वाक्यके अर्थोका उपयोगी होनेसे
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मध्यासविचर ] भापानुवादसहित ३३७
अमितम्। न च 'सर्व खल्विदं त्रह्म' इत्याद्युपासनाप्रकरणपठितवाक्यानि सम्रपश्च ब्रह्म प्रमापयन्ति, अन्यपराणां तेपां तात्पर्योपेतनिष्य्पश्चवाक्य- वाधितत्वात्। आरोपितरूपेणाऽप्युपासनोपपतेः । आरोपोऽपि नाऽत्यन्तम- प्राप्तस्य सम्भवतीति चेद, न; सृष्टिवाक्यैरद्वितीयत्वग्रतिपत्तये निपेध्यसमर्पकैः प्रापितत्वात्। तस्मात् निप्प्रपञ्चन्नह्मप्रमितौ न कश्िद्विरोधः । तथापि ताढशं नम कर्तत्वादिग्रपश्रोपेतस्य जीवस्य कथमात्मा स्यात् ! उच्यते-न तावज्जीवे कर्तत्वादिग्रपश्चोऽनुमानादिगम्यः; अपरोक्ष- त्वात्। नाऽपि चक्षुरादिगम्य :; जीवस्य वाह्येन्द्रियाविपयत्वेन तन्निष्ठ-
स्वार्थवोधकत्व नहीं हो सकता, यह मान लिया, परन्तु उपासनावाक्य तो प्रपश्चमें प्रमाण होंगे, इस आशयसे शक्का करते हैं-]'सर्व खल्विदं ब्रह्म' (यह सब कुछ प्रपञ्च व्रदा ही है) इत्यादि उपासनाके प्रकरणमें पढ़े गये वाक्य ब्रह्ममें प्रपञ्चके सम्बन्धमें प्रमाण होंगे, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि अन्य-स्वार्थसे भिन्न-अर्थ (उपासनादिरूप) में तात्पर्य रखनेवाले 'सर्व खल्विदम्' इत्यादि वाक्योंका अपने ही स्वार्थमें तात्पर्य रखनेवाले (प्रपश्चका निपेध करनेवाले) वाक्योंसे चाघ हो जाता है। और आरोपितरूपसे भी उपासनाकी उपपत्ति हो सकती है। अत्यन्त अप्राप्त रूपका आरोप भी तो नहीं हो सकता, ऐसी भी शक्का नहीं कर सकते, क्योंकि व्रह्ममें अद्वितीयत्वका बोधन करनेके लिए निषेधके प्रतियोगीके वोधक सृष्टिवाक्योंसे वह प्राप्त है। इससे प्रपश्चशुन्य ब्रह्मकी प्रमामें कोई भी विरोध नहीं है। शक्का-तथापि अर्थात् न्रममको प्रपश्चरहित मान भी लिया तो भी ऐसा-प्रपश्न- शंन्य-न्र् कर्तृत्व आदि प्रपश्चसे विशिष्ट जीवका स्वरूपभूत कैसे हो सकता है? समाधान-जीवमें कर्तृत्व आदि प्रपञ्च अनुमानसे नहीं जाना जा सकता, क्योंकि वह प्रत्यक्ष है। चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि जीवके बाहिरी चक्षु आदि इन्द्रियोंका विषय न होनेसे उसमें विद्यमान कर्तृत्व आदि प्रपश्च भी वाद्य इन्द्रियोंका विपय नहीं हो सकता। अन्तःकरणसे भी नहीं ४३
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३३८ विवरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
कर्तृत्वादेरपि तथात्वात्। नाऽपि मनोगम्या, प्रमाणाभावात्। अन्वय- व्यतिरेकौ तु मनसः कर्तृत्वाद्युपादानतयाऽप्युपपन्नौ, आत्मन एव कर्तृत्वा- द्युपादानत्वकल्पनेऽपि मनसः कर्तृत्वादिग्रत्यायकत्वं नाऽन्वयव्यतिरेकसिद्धम्, व्यतिरेकस्य संदिग्धत्वात। यत्र मनो नाऽस्ति न तत्र कर्तृत्वादिग्रतिभासो यथा सुषुप्ाविति हि व्यतिरेको वाच्य:, स च संदिग्ध:, सुपुप्तौ क्तृत्वा- देरनवभास: किं मनसोऽसच्ात् किं वा स्वयमसच्चादित्यनिर्णयाद्। न चैवं कर्तृत्वादे: अ्रत्यायकाभाव: शङ्कनीय:, साक्षिण: प्रत्यायकत्वात्। यच्ु कर्तृत्वभोकृत्वरागद्वेपसुखदुःखादयोऽपि आत्मनि स्वयंत्रकाशा
जाना जा सकता, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है। मनके कर्तृत्वादिके अन्वय और व्यतिरेक मनके ही कर्तृत्वादिका उपादान होनेसे सङ्गत हो सकते हैं, [ अर्थात् अन्तःकरणके रहते ही कर्तृत्व आदि प्रपञ्च जीवमें भासित होता है, उसके विना नहीं, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेकसे जीवमें प्रपञ्चका ज्ञान मानसिक होगा, यह वादीका तात्पर्य है। सिद्धान्ती उक्त अन्वय और व्यतिरेकसे कर्तृत्व आदि प्रपञ्चका मन ही उपादान है, ऐसा सिद्ध करता है-] इससे विपरीत आत्मा-जीव-को ही कर्तृत्व आदि प्रपञ्चका उपादान मानने की कल्पना करनेपर मन कर्तृत्व आदि प्रपश्चका बोध कराता है, यह अन्वय और व्यतिरेकसे सिद्ध भी नहीं होता, क्योंकि यहां व्यतिरेकमें संदेह है। [ संदेहका उपपादन करते हैं-] 'जिस दशामें मन नहीं है, उस दशामें कर्तृत्व आदि प्रपश्नका बोध भी नहीं होता, जैसे सुषुप्ति अवस्थामें' इस प्रकार आप व्यतिरेकव्याप्ति दिखलायेंगे, वह व्यतिरेक संदेहयुक्त है, क्योंकि सुषुप्तिमें कर्तृत्व आदिकी प्रतीति न होना क्या मनके अभावसे है ? या स्वयं कर्तृत्व आदिके ही अभावसे है ? इसका निर्णय नहीं हो सकता। और ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि कर्तृत्व आदिका बोध करानेवाला कोई है ही नहीं, क्योंकि साक्षी उसका बोध करानेवाला विद्यमान है। अन्य वादियोंके मतको दिखलाकर उनका खण्डन करते हैं-बौद्धोंका कहना है-कर्तृत्व, भोक्तृत्व, राग, द्वेष, सुख और दुःख आदि प्रपञ्च आत्मा-जीव-में स्वयं प्रकाशित होता है। ऐसी ही कल्पना जरन्मीमांसक (प्रभाकरानुयायी). भी
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नध्यांसविचार ] भापानुवादसाहेतं ३३९ इति बौद्धा जरत्माभाकराश्च कल्पयन्ति, न तद्युक्तम् ; यदि कर्तत्वादीनां द्रव्यत्वं तदा प्रत्येकं प्रकाशगुणकल्पनादात्मप्रकाशस्यैव तत्प्रत्यायकत्व- कल्पनं लघीयः। यदि च तेपां गुणत्वं तदा तेपु प्रकाशगुण एव न सम्भवति, गुणस्य गुणान्तराभावात्। कर्तृत्वादय एव प्रकाशरूपगुणा इति चेत्, तर्हि तेपामादित्यादिग्रकाशवत्स्वाश्रयोपाधावुत्पत्तिर्न स्यात्। न च कर्तृत्वादेः स्वसत्तायां प्रकाशव्यतिरेकाभावेन स्वग्रकाशत्वं कल्पयितुं शक्यम्, नित्यात्म्रकाशसंसर्गादपि तदुपपत्तेः । सन्तु तर्हिं साक्षिवेद्या एव कर्तत्वादयस्तथापि ते सत्या इति चेद्, न; प्रमाणाप्रमाणसाधारणस्य साक्षिणो विपयसत्यत्वमिध्यात्वयोस्ताटस्थ्यात्। तत्सत्यत्वकल्पने चाडस-
फरते हैं। इनकी यह कल्पना उचित नहीं है, क्योंकि कर्तृत्व आदि प्रपञ्च यदि द्रव्य माना जाय, तो सबमें ही प्रकाशात्मक गुण मानना होगा [ इससे प्रकाश गुणवाले अनेक द्रव्य होंगे ] इसकी अपेक्षा एक आत्माको ही प्रकाश गुणवाला मानकर उसके ही प्रकाशसे कर्तृत्व आदि सच प्रपश्नका प्रकाश माननेमें लाघव है। यदि वे कर्तृत्व आदि गुण माने जायँ, तो उनमें प्रकाशात्मक गुणका सम्भव नहीं है, क्योंकि गुणमें गुण नहीं माना गया है। यदि कर्तृत्व आदि सभी गुण प्रकाशात्मक हैं, ऐसा मानो, तो उनकी सूर्य आदिके प्रकाशके तुल्य अपने आश्रयरूप उपाधिमें उत्पत्ति नहीं होगी। [ क्योंकि कर्तृत्वादि तथा सुखादि अपने आश्रयमें उत्पन्न होते हैं और सुर्यादि प्रकाश अपने आश्रयमें उत्पन्न नहीं होते, इससे यही सिद्ध होता है कि कर्तृत्वादि प्रकाशात्मक गुण नहीं हैं]। कर्तृत्व आदि प्रपञ्च अपनी सचामें प्रकाशसे रहित नहीं है, इससे उनको स्वप्रकाश माननेकी कल्पना हो सकती है, यह भी नहीं हो सकता, क्योंकि आत्माके नित्य प्रकाशके साथ सम्वन्ध होनेसे भी उनके प्रकाशकी उपपत्ति हो सकती है। अच्छा यदि कर्तृत्व आदि प्रपश्चको साक्षिवेद्य-साक्षीके द्वारा प्रकाशित होनेवाला-मान भी लिया जाय, तो भी उनको सत्य मानना चाहिए (मिथ्या नहीं), ऐसा नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रमाणापमाणसाधारण साक्षी विपयके सत्यत्व तथा मिथ्यात्वमें उदासीन रहता है। [ प्रमाणसिद्ध तथा भ्रमात्मक-प्रतिभासमात्रसिद्ध-वस्तु मात्रको साक्षी सर्वथा प्काश कर ही देता है, अतः वह विषयमें सत्यत्व तथा
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३४० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
दत्वश्जुतिव्याकोपाठ। इन्द्रो मायाभिरिति सर्वसंसारधर्माणां मिथ्यात्व श्रवणात्। तदेवम् 'अस्थूलमनणु' 'न जायते म्रियते' इत्याद्यवान्तरवाक्यानि महा- वाक्यापेक्षितौ वस्तुतो निष्प्रपञ्चौ चिन्मात्ररूपौ तत्वंपदार्थौ समर्पयन्ति, न त्वध्यासनिवृत्ति प्रतिपादयन्ति। ननु तर्ह्यवान्तरवाक्यसमर्पितौ स्वाभाविकप्रपश्चरहितौ तत्वंपदार्था- वेवोपजीव्य महावाक्येनैकत्वं अ्रतिपाद्यत इत्यध्यासनिवृचिमन्तरेणाऽनु- पपत्यभावादार्थिकत्वमपि तस्या अविद्यानिवृत्तेस्तत्प्रतिभासस्य च कथमिति चेद् ?
मिथ्यात्वका कल्पक नहीं हो सकता ]। यदि आग्रहसे कर्तृत्व आदि प्रपञ्च सत्य मान लिया जाय, तो ब्रह्मके असङ्गत्वका वोधन करनेवाली श्रुतियोंसे विरोध होगा। कारण कि 'इन्द्रो मायाभि: *' इत्यादि श्रुतिसे सव संसारके धर्मोंका मिथ्या होना दिखलाया गया है। इसी तरह 'स्थूल नहीं अणु नहीं, न उत्पन्न होता है और न मरता ही है' इत्याद्यर्थक अवान्तर वाक्य महावाक्योंसे अपेक्षित वस्तुतः प्रपश्नशन्य केवल चिद्ूप तत् और त्वं पदार्थका ही बोधन करते हैं, अध्यासकी निवृत्तिका प्रति- पादन नहीं करते। शङ्का-पूर्वोक्त रीतिसे 'अस्थूलमनणु' इत्यादि अवान्तर वाक्योंसे उपस्थित कराये गये प्रपञ्चशून्य केवल चिन्मात्र तत् और त्वं पदार्थका आश्रयण करके ही 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्योंसे एकत्वका प्रतिपादन होता है, ऐसा सिद्धान्त हुआ, इस सिद्धान्तकी अनुपंपत्ति अध्यासकी निवृत्तिके बिना भी नहीं है, अर्थात् अध्यासके निवृत्त न होनेपर भी उक्त सिद्धान्तकी उपपत्ि हो सकती है तब ऐक्यकी अन्यथानुपपत्तिसे अध्यासकी निवृत्ति तथा अध्यासनिवृत्तिका प्रतिभास ये दोनों अर्थात् सिद्ध कैसे हो सकते हैं ?
- 'इन्द्रो मायामि: पुरुरूप ईयते' (इन्द्र मायाके कारण अनेकरूप होता है) अर्थात् ईश्वर-ब्रह्म आत्मा ही मायाशवलित होकर, शुक्तिको न जाननेसे रजताकार प्रतिभासकी तरह, कर्तृत्व भोक्तृत्व आदि अथ च घट-पठादि प्रपच्चाकारसे परिणत हुआ प्रतिभासित होता है, इससे सकल अपन्न मिथ्या वतलाया गया है।
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अध्यासविचार] भांपानुवादसाहेत ३४१
विरोधिनमविद्यातत्कार्याध्यासं निवत्तयन्नेवोदेति, शुक्तितच्ताववोधे तथादर्यनात्। नेदं रजतमिति निपेध- कज़ानं तत्राऽध्यासनिवर्त्तकमिति चेट्, मवम्; निषेधः परमार्थरजतगोचर इत्यर्यातिवादे प्रतिपादितत्वात। स च रजतनिपेध: परमार्थरजतार्थिनः पवटत्याकाङ्भामुच्छिन्दनध्यासवाधकत्वेनोपचर्यते। साक्षादध्यासवाधस्तु शु क्िन्ञानेनवेत्यनिर्वचनीयरू्याताँ वाधविचारेऽ्भिहितम्। न च वाच्यं शुक्तिज्ञानं शुक्तितत्व्रप्रत्यायन एव व्याप्रियते नाऽध्यासनिवृत्ताविति, आर्थिकार्थस्य नतर निरंपेक्षत्वात्। तथाहि-लोके तुलया सुवण संमिमा नस्य सुवर्णकारस्य हस्तस्तुलाया उन्नमन एव ग्रयतते। तत्रैकभागस्यावन-
समाधान-जैसे शुकतितत्वका साक्षात्कार रजताध्यासका निवर्तक ही होता है, पेसा देखा गया है, चैसे ही ऐक्यको (अमेदको) विपय करने- चाला न्तत्वसाक्षातकार भी विरोधी अविद्या तथा उसके कार्य अध्यासको निकृच करता हुआ ही उदित होता है। ऐसा नहीं कह सकते कि शुक्ति- साक्षात्कारस्थलनें 'नेद रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस प्रकार निषध करनेवाला ज्ञान अध्यासकी निवृत्ति करता है; क्योंकि उक्त निषेध परमार्थरजतका निषेध करता है। इसका अख्यातिवादके अवसरपर प्रतिपादन कर आये हैं। वह रजतका निषभ परमार्थ रजतको चाहनेवाले पुरुषकी प्रवृत्ति करानेवाली उत्कृष्ट इच्छाको नष्ट करता है, इतनेसे ही उस निषेधको उपचारतः अध्यासका वाधक माना गया है, साक्षात् नहीं। अध्यासका साक्षात् चाध तो शुक्तितत्त्वके साक्षात्कारसे ही होता है। इसका निरूपण अनिर्वचनीयर्यातिका प्रतिपादन करते हुए वाधके विचारके अवसस्पर कह आये हैं। और यह नहीं कहा जा सकता कि झुक्तिका ज्ञान शुक्तितत्त्वके प्रकाशमें ही उपयुक्त हो जाता है, अध्यासकी निवृत्ति करानेमें उसका व्यापार नहीं रहता, क्योंकि अर्थात् सिद्ध हुए विषयको [ अपनी सिद्धिमें ] अन्य यल्नकी आवश्यकता नहीं होती। इसमें लोकसिद्ध दष्टान्त देते हैं, क्योंकि तराजूसे सोनेको तोलनेमें प्रवृत्त हुए सुनारका हाथ केवल तुलाके उठानेमें ही अपना व्यापार करता है। उस तुलामें एक भागका नीचे जाना नान्तरीयक (अपने आप ही होनेवाला) है, उसमें
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३४२ विर्वरणप्रमेयसंग्रहं i सूंत्र १, वर्णक १
मनं नाऽन्तरीयकं न तु तत्र हस्तः प्रयतते। शासत्रेषु च नाऽन्तरीयकसिद्धा अर्थाः ग्रयतनिरपेक्षा: सर्वत्र ग्सिद्धा:। ननु यत्र वाक्याद्वाघस्तत्र नेदं रजमिति वाक्यस्थ परमार्थरजतचिप- यत्वाच्छुक्तिकेयमिति वाक्यस्य चाऽध्यासनिरासप्रतिपादने सामर्थ्याभावात् तन्निवृत्तिप्रतिभासो नान्तरीयकोऽस्तु, यत्र पुनः ग्रत्यक्षं वाधकं तत्र कथं नाऽन्तरीयकतयाऽध्यासनिवृत्तिग्रतिभास इति चेद्, उच्यते-न तावचत्रा-
हाथ कोई व्यापार नहीं करता। और शास्त्रोंमें भी-अपने आप ही सिद्ध हो जानेवाले पदार्थ प्रयत्नकीव्यापारविशेषकी-अपेक्षा नहीं रखते हैं, यह सर्वत्र प्रसिद्ध है। जहांपर वाक्य द्वारा बाध होता है, वहांपर 'यह रजत नहीं है' इस वाक्यका सत्य रजत विषय है, और 'यह शुक्ति है' इस वाक्यकी अध्यासकी निवृत्तिमें सामर्थ्य नहीं है, इसलिए अध्यासकी निवृत्तिकी प्रतीति नान्तरीयक- अपने आप सिद्ध-हो सकती है, क्योंकि 'नेदं रजतम्' अथवा 'शुक्तिकेयम्'-ये दोनों वाक्य साक्षात् अध्यासकी निवृत्तिका बोधन नहीं करते अर्थात् पूर्व वाक्य सत्य रजतका निषेध करता है और उत्तर वाक्य शुक्तितत्त्वकी प्रतीति कराता है। परन्तु जहांपर प्रत्यक्ष ही बाध करता है, [वाक्य नहीं] उस स्थलमें अध्यासकी निवृत्तिकी प्रतीति नान्तरीयक कैसे हो सकती है? [ तात्पर्य यह है कि जहांपर इन्द्रियादिगत दोषके कारण भ्रमात्मक रजतका ज्ञान हुआ, अनन्तर आप्त पुरुषसे 'नेदं रजतम्' इत्यादि चाक्य सुना, उंस वाक्यका साक्षात् अध्यासनिवृत्तिके बोधनमें तो तात्पर्य है ही नहीं, वह तो 'यह पुरोवर्ती परमार्थ रजत नहीं है' इस प्रकार परमार्थ रजतका निषेध करता है। वहांपर अध्यासकी निवृत्तिका प्रतिभास नान्तरीयक होनेसे अर्थतः सिद्ध हो सकता है। परन्तु जहांपर भ्रमात्मक रजतके प्रत्यक्षके अनन्तर प्रत्यक्ष सामझ्रीके बलसे ही रजतके अभाव तथा शुक्तितत्त्वका प्रत्यक्ष हुआ, वहांपर तो शुक्ति तथा रजतात्मक अध्यासकी निवृत्ति दोनों प्रत्यक्षगम्य ही हैं, इससे निवृत्ति भी प्रत्यक्ष ज्ञानकी साक्षात् ही विषय हो जाती है। उसका प्रतिभास नान्तरीयक नहीं माना जा सकता, क्योंकि योग्य प्रतियोगीके ही अभावका प्रत्यक्ष होता है। प्रातिभासिक रनत इन्द्रियसंप्रयोगके योग्य न होनेसे
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३४३
रोपितरजताभावोऽनुपलव्धिगम्यः, अपरोक्षत्वाद्। आरोपितरजततदभावौ हि न सम्प्रयोगयोग्यौ। नहि प्रतीतिमात्रशरीरमारोपित रजतं प्रतीतेः पूर्वमस्ति, येनेन्द्रियं संयुज्येत। प्रतियोगिनो रजतस्येन्द्रियसम्प्रयोगाभा चादेव तदभावोऽपि नेन्द्रियेण सम्बध्यते। ततो वाक्यवाधवत् प्रत्यक्षवा- धेऽपीन्द्रियेण शुक्तितच्वे ज्ञायमाने नाऽन्तरीयकतयैवाऽध्यासनिवृत्ति: ग्रती- यते। एवश्च जीवन्रह्मणोरेकत्वे वाक्यादनुभवाद्वा जायमाने सत्यविद्या- तत्कार्यनिवृत्तराथिक्या: साक्षाच्छास्त्नप्रतिपाद्येऽनन्तर्भावात् प्रयोजनत्वेन विप- यात् पृथग् निदेशो युक्ततरः। यद्यपि विचारशास्त्रस्य वेंदान्तगसन्देहापगम एव साक्षात्प्रयोजनं वेदान्तारम्भस्य च ब्रह्मविद्याप्राप्ति: फलम्, तथाऽप्यध्या-
प्रत्यक्षके योग्य ही नहीं है, अतः अध्यासनिवृत्ति प्रत्यक्षविपय हो नहीं सकती, इस आशयसे समाधान देते हैं-] उस प्रत्यक्ष स्थलमें (जहांपर भ्रमके अनन्तर शुक्तितत्वका प्रत्यक्ष हुआ) आरोपित रजतका अभाव अनुपलव्घिसे नहीं जाना जाता, कारण कि उसका प्रत्यक्ष होता है। प्रातिभासिक रजत तथा उसका अभाव इन्द्रियसन्निकर्पसे जानने योग्य भी नहीं है, क्योंकि केवलप्रतिभासस्वरूप आरोपित रजत ज्ञानसे पहले रहता ही नहीं, अतः उसका इन्द्रियसे सन्निकर्ष नहीं होता। प्रतियोगी रजतका इन्द्रियसे संप्रयोग नहीं. हो सकनेके कारण ही उस (रजत) का अभाव भी इन्द्रियसे सम्प्रयुक्त नहीं हो सकता। इससे वाक्य द्वारा प्राप्त हुए वाधस्थलके तुल्य प्रत्यक्षसे प्राप्त वाधस्थलमें भी नेत्र आदि इन्द्रिय द्वारा शुक्तितत्त्वके ज्ञात होनेपर अध्यासकी निवृत्ति नान्तरीयक होनेसे ही प्रतीत होती है, साक्षात् नहीं। इस प्रकार जीव और ब्रह्मके अभेदका, वाक्य तथा अनुभव द्वारा, ज्ञान होनेपर अविद्या तथा उसके कार्यकी अर्थतः सिद्ध होनेवाली निवृत्तिको शासत्रके साक्षात् प्तिपादनीय. विषयकोटिमें न आनेसे प्रयोजनरूपसे पृथक् कहना अत्यन्त युक्तिसंगत है। यद्यपि विचारशास्त्रका वेदान्त शास्त्रोंमें प्राप्त हुए सन्देहोंका दूर करना ही मुख्य प्रयोजन है, और वेदान्त शास्त्रके आरम्भका ब्रह्मविद्याकी-ब्रह्मज्ञान-की प्राप्ति ही फल है। तथापि अध्यासकी निवृत्ति विद्याका-व्रम्मज्ञान-का फल और वह पुरुषकी आकाडक्षाका
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३४४ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ?
सनिवृत्तेर्विद्याफलत्वेन पुरुपाकाङ्गविपयत्वेन च परम्परया शास्त्रग्रयोज- नत्वमप्युपपन्नम्। ननु केयं ब्रह्मविद्याया: प्रप्तिर्नाम या वेदान्तारम्भफलत्वेनोपवर्ण्यते। सर्वत्र ह्यप्राप्तस्य स्वरूपेण निष्पन्नस्य गवादे: प्राप्तिर्भवति। न तु नित्य- प्राप्तस्य स्वरूपस्य, नाऽप्यनिष्पनस्य नरविषाणादेः। विद्या तु ज्ञातारमाशरित्य ज्ञेयं प्रकाशयन्त्येव निप्पद्यते तथैव ग्रतीयते चेति स्वरूपतः प्रतीतितश्च नित्यप्राप्ताः तत्कथं तस्याः प्राप्ति? विषय है, इसलिए भी परम्परासम्बन्धसे [ अध्यासनिवृत्तिको ] शास्त्रका प्रयोजन होना अधिक उचित है। अब प्रश्न उठता है कि जिसको वेदान्तशास्त्रके आरम्भका प्रयोजन कहा जा रहा है, वह न्रह्मविद्याकी प्राप्ति क्या वस्तु है? लोकमें सर्वत्र ऐसा ही देखनेमें आता है कि स्वरूपतः सिद्ध गो आदि वस्तु जो प्राप्त नहीं है, उसका ही प्राप्त करना सम्भव है। और जो वस्तु नित्य प्राप्त-सदैव ही अपनेको मिली हुई-है तथा जो मनुष्यका सींग स्वरूपसे भी सिद्ध नहीं है (अर्थात् जिसका होना भी सर्वथा सम्भव नहीं है) उसकी प्राप्ति संगत नहीं है। प्रकृतमें विद्या तो ज्ञाताको आश्रय करके ज्ञेय पदार्थका प्रकाश करती हुई ही उत्पन्न होती है तथा उसी तरह प्रतीत भी होती है, इसलिए स्वरूपसे तथा प्रतीतिसे नित्य प्राप्त ही है, अतः उस नित्यप्राप्त विद्याकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? [तात्पर्य यह है कि जैसे गो आदि विषय और प्राप्ति ये दोनों परस्पर भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं और एकके बिना भी दूसरेके स्वरूप तथा प्रतीतिकी सिद्धि होती है, इससे स्वरूपतः सिद्ध भी गो आदि पदार्थ प्राप्तिके विना सम्भव है, अतः ऐसे पदार्थकी प्राप्ति किसी प्रयत्नका फल हो सकती है, परन्तु विद्याकी प्रतीति तथा स्वरूपकी प्राप्ति तो साथ ही होती है, विद्याका स्वभाव या स्वरूप- ही है कि अपने आश्रय-माता-को विषयका साक्षात्कार कराती ही है और विषयके साक्षात्कारको निश्चित करती ही हुई प्रतीत भी होती है, अतः प्रतीति तथा स्वरूप दोनों तरहसे विद्या नित्य प्राप्त ही है अन्यथा वह विद्या ही नहीं कही जा सकती, इस विद्याकी प्राप्ति किसी भी प्रयलका अर्थात् वेदा- न्तारम्भादिका फल नहीं कहा जा सकता।]
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अध्यासविचार] भापानुवादसहित ३४५
उच्यते-प्रमाणजनितान्तः:करणवृत्तिर्विद्या तया विषयनिश्चयः प्राप्ति शव्देन विवक्षितः । तत्र घटादिविद्यायाः स्वोत्पत्तिमात्रेण. विपयनिश्चायक- त्वेऽपि न त्रह्मविद्यायास्तथा सहसा निश्ायकत्वम्, असम्भावनाविपरीत- भावनाभ्यामभिभृतविपयत्वात् । तत्राऽसम्भावना नाम चित्तस्य अत्यग्- त्रह्मात्मक्यपरिभावनाप्रचयनिमित्तैकाय्यवृत्ययोग्यतोच्यते विपरीतभावनेति च शरीराद्यध्याससंस्कारप्रचयः। न चाऽपरोक्षात्रभासनिमित्तप्रमाण गृहीते वस्तु- न्युभयविधचित्तदोपादपरोक्षावभासनिश्चयाभावो न दष्टचर इति वाच्यम्, वाराणसीप्रदेशादावार्द्मरिचमख्जर्यादिष्वत्यन्ताटष्टपूर्वेषु दूरदेशात् समानीतेपु
समाधान किया जाता है-प्रकृतमें विद्याशव्दसे प्रमाण-इन्द्रियादि-द्वारा उत्पन्न हुई अन्तःकरणकी वृत्ति ली जाती है। उस अन्तःकरणकी वृत्तिसे विषयका निश्चय करना प्राप्तिश्दका तात्पर्य समझना चाहिए। यद्यपि घटादिविषयक विद्या केवल अपनी उत्पच्तिसे ही घटादि विपयका निश्चय कर देती है, तथापि ब्रह्म- विद्या-विचारके पूर्व त्रद्ाका परोक्ष ज्ञान-अपने विषय ब्रह्मका सहसा (विचारके विना) निश्चय नहीं करा सकती, कारण कि उसका विपय असम्भावना और विपरीतभावनासे घिरा हुआ है। उनमें असम्भावना है-व्रह्म तथा आत्माकी-जीवकी-एकताका वार बार चिन्तन करनेसे उत्पन्न होनेवाली चित्तकी एकाग्रवृत्तिकी योग्यताका अमाव और शरीरादिमें आत्म-तादात्म्या- व्यासके संस्कारोंका दार्व्य विपरीतभावना है। प्रत्यक्ष ज्ञानको उत्पन्न करनेवाले प्रमाणोंसे ज्ञात हुई वस्तुमें चितके पूर्वोक्त असंभावना और विपरीत- भावना-इन दो दोपोंके कारण प्रत्यक्ष ज्ञानके अभावका निश्चय नहीं देखा गया है। [ एवम् प्रत्यक्ष ज्ञानसे-गृहीत घटादिके तुल्य न्रह्मविपयक प्रत्यक्ष ज्ञान- रूप विद्यासे-जात हुए व्रह्ममें चित्तके उक्त दोपोंसे ब्रह्मपत्यक्षके अभावका निश्चय होना संगत नहीं है] ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि [ काली या सफेद ] गोल मिर्चकी ताजी हरी मञ्जरी काशी आदि [ पूर्वोत्तर ] प्रदेशोंमें कभी मी नहीं देखी जाती है। दूर देशसे (दक्षिण भारतसे) लाई गई उन मञ्जरियोंको प्रत्यक्ष देख लेनेपर भी चित्तके उक्त दोपोंके कारण 'यह हमारे सामने मिचकी ही कोंपल है' ऐसा विश्वास उत्पन्न न होनेसे तुरत देखते ह्ी 'यह मिरिचमञ्जरी ही है' इस निश्चयकी उत्पत्ति नहीं देखी जाती है।
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३४६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
प्रत्यक्षेण दृश््यमानेष्वप्यविश्वासेन झटिति निश्चयोत्पादादर्शनात्। अतः शास्त्रप्रमाणादुत्पन्नाऽपि त्रह्मविद्या चित्तदोपप्रतिवद्धा तर्क सहायमपेक्ष्य पश्चाद्विपयं निश्चिनोति। तर्कस्य प्रमाणत्वे स्वतन्त्रत्वादप्रमाणत्वे चाऽनुपकारित्वान्न प्रमाणं प्रति सहकारित्वं सम्भवतीति चेद, मैवम् : तर्कस्याऽप्रमाणभृतस्य स्वातन्त्र्येण चस्त्वनिश्चायकत्वेऽपि नाऽत्यन्तमनुपकारित्वम्, ग्रमाणतच्छक्तिप्मेयाणां स्वरूपे सम्भवासम्भवप्रत्ययरूपत्वात् । अत एव प्रमाणानामनुग्राहकस्तर्क इति तर्कविद:।
[अर्थात् यह कहना कि 'प्रत्यक्ष दृष्ट वस्तुमें संशय नहीं होता' व्यभिचरित है। ] इसलिए वेदान्तशास्त्ररूप प्रमाणसे उत्पन्न हुई भी ब्रह्मविद्या चित्तके दोषोंसे प्रतिबद्ध होकर (स्वयं विषयका निश्चय करानेमें असमर्थ होकर) सहायक तर्ककी-विचारकी-अपेक्षाके अनन्तर ही विषयका निश्चय कराती है। शङ्का-यदि तर्कको-विचारको-अर्थात् युक्तिवादको प्रमाका जनक मानो, तो वह स्वतन्त्र प्रमाण हो जायगा, सहायक नहीं होगा और यदि उसको प्रमाका जनक न मानो, तो वह प्रमाणका उपकारी नहीं हो सकेगा। [क्योंकि प्रमा- जनकका उपकार जो प्रमाका जनक होगा वही कर सकता है। प्रमाका अजनक नहीं कर सकता ] इससे प्रमाणके प्रति तर्कका सहायक होना नहीं वन सकता। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि यद्यपि तर्क स्वयं प्रमाण नहीं है, अतः स्वतन्त्ररूपसे चस्तुका निश्चय नहीं करा सकता, तथापि वह प्रमाणका अत्यन्त * उपकारी नहीं है, ऐसा नहीं है, किन्तु है ही। कारण कि प्रमाण और उसकी शक्ति तथा प्रमेय-विषय-इनके स्वरूपोंमें सम्भव या असम्भवविषयक ज्ञानस्वरूप ही तर्क है। [अर्थात् तर्क द्वारा प्रमाणादिमें सम्भव या असम्भवका ही ज्ञान होता है, प्रमाणादिनिश्चयरूप नहीं है । ] अतएव तर्क प्रमाणोंका अनुग्राहक-सहकारी-है, ऐसा तर्कवादी- नैयायिक-स्वीकार करते हैं। * अत्यन्त पद इसलिए देते हैं कि प्रमाणको उपकारी तर्ककी सहायता सरवत्र अपेक्षित नहीं है। यथा-जहांपर दोपरहित चित्तावस्थामें हुए प्रत्यक्षके विषयका स्वयं ज्ञान ही निश्चय करा देता है या श्रद्धालको विना कुचोय किये ही गुरुवाक्योंमं श्रद्धा होनेसे गुरुके उपदेशमात्रसे निश्रय हो जाता है, ऐसे स्थलोंमें तर्ककी सहायताकी अपेक्षा नहीं रहती है।
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अंध्यांसविचार ] भापानुवादसहित ३४७
ननु प्रमाणस्य तर्कापेक्षया निश्चायकत्वेऽपसिद्धान्तापत्तिः। तथा- हि-ज्ञानानां ग्रामाण्यमप्रामाण्यं च स्वत एवेति सांख्याः। उभयमपि परत इति तार्किकाः । अग्रामाण्यमेव स्वत इति वौद्धाः । प्रामाण्यमेव स्त्रत इति वेदान्तिनः । न तावत् सांख्यपक्षो युक्त:। तत्र किमेकस्यामेव ज्ञानव्यक्तौ प्रामा- ण्याग्रामाण्ययोः समावेशोऽभिग्रेत उत व्यक्तिभेदेन तयोर्व्यवस्था। नाऽडद्य:, विरोधात्। न द्वितीयः, अस्या व्यक्ते: ग्रामाण्यमस्याथ्चाऽप्रामाण्यमिति
[यदि प्रमाण वस्तुका निश्चय करानेमें तर्फकी अपेक्षा रखते हैं, तो वेदान्त- सम्मत प्रमाणोंमें स्वतःप्रामाण्यकी उपपत्ति नहीं होगी, इस आशयसे शङ्का करते हैं-] यदि तर्ककी सहायतासे प्रमाणोंको वस्तुका निश्चायक मानें, तो अपसिद्धान्तकी-अपने प्रमाणोंके स्वतःप्रामाण्य सिद्धान्तके विरुद्ध सिद्धान्तकी- आपत्ति आ जायगी [ जिसको वेदान्ती मान नहीं सकता ]। [अपसिद्धान्तके स्पष्टींकरणके लिए भिन्न-भिन्न वादियोंका प्रमाणविषयक मत दिखलाते हैं -- ] सांख्यसिद्धान्त है कि ज्ञानका मामाण्य-वस्तुनिश्चायकत्व-या अगामाण्य स्वतः- तर्क आदिकी अपेक्षाके विना-ही सिद्ध है। नैयायिक मानते हैं कि प्रमाणोंके प्रामाण्य अथवा अपामाण्य दोनों ही परतः-दूसरे तर्कादिकी ही सहायतासे- होते हैं। [अर्थात् प्रमाणोंमें मामाण्य या अपामाण्य कोई भी स्वतः नहीं है। ] बौद्ध कहते हैं कि प्रमाणोंमें स्वतः अप्रामाण्य है [और प्रामाण्य दूसरेकी सहायतासे है। ] और वेदान्ती प्रमाणमें प्रामाण्यको स्वतः-अन्या- निरक्षेप-ही मानते हैं। [प्रसनपाप्त अन्य वादियोंके मतोंका खण्डन करते हैं-] इनमें सांख्यमत युक्तिसअत नहीं है। क्या एक ही ज्ञानव्यक्तिमें प्रामाण्य तथा अपामाण्य दोनोंका समाचेश है अथवा भिन्न-भिन्न ज्ञानव्यक्तियोंमें इनकी व्यवस्था करते हो ? अर्थात् एक ज्ञानव्यक्तिमें मामाण्य दूसरी व्यक्तिमें अप्रामाण्य है, ऐसी व्यवस्था करते हो? पहला पक्ष नहीं वन सकता, कारण कि प्रामाण्य और अग्रामाण्य दोनोंका एक साथ रहना विरुद्ध है। दूसरा विकल्प भी उचित नहीं है, क्योंकि इस ज्ञानव्यक्तिमें प्रामाण्य है और इसमें अपामाण्य है, इसका कोई व्यवस्थापक नहीं है।
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३४८ विवरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
व्यवस्थापकाभावात्। ज्ञानत्वस्योभयत्र समत्वात्। अन्यस्य व्यवस्थापकस्य
नाऽप्युभयं परतः। तदा हुत्पन्नमात्रं ज्ञानं प्रामाण्याप्रामाण्यरहितं किश्चित्कालं समवतिष्ठेत। न चैतल्लोके प्रसिद्धम्। अस्तु तर्हि वौद्धपक्ष :-- अप्रामाण्यमेव स्वतः प्रामाण्यं परत इति। नाडयमप्युपपन्नः । तत्र प्रामाण्यस्य परतस्त्वम् उत्पत्तौ जसौ वा १ नोत्पत्तौ तत्सम्भवति, चक्षुरादिकारणेभ्य उत्पन्नस्य ज्ञानस्य क्षणिकस्य स्वस्मिन् प्रामाण्यधर्मोत्पत्तिपर्यन्तमवस्थानासंभवात्। ननु ज्ञानकारणाद् ज्ञानोत्पत्तौ कारण कि ज्ञानत्व दोनों व्यक्तियोंमें एक-सा ही है। स्वतस्त्ववादी दूसरेको व्यवस्थापक नहीं मानता। [ज्ञानोंका प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य स्वतः है, इससे ज्ञानसामान्यमें दोनोंका ही होना स्वतः पाया जाता है और इस भूतलमें अमुक कारणसे अमुक ज्ञानव्यक्तिमें मामाण्य और इतरमें अमुक कारण न होनेसे या भिन्न कारण होनेसे अप्रामाण्य है, ऐसी व्यवस्था नहीं की जा सकती।] प्रामाण्य तथा अग्रामाण्य दोनों ही दूसरेके कारण हैं, ऐसा भी मानना ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे उत्पन्न हुआ ज्ञान पहले कुछ समय तक प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य दोनोंसे रहित होगा। परन्तु ऐसा लोकमें प्रसिद्ध नहीं है। ऐसी दशामें 'अप्रामाण्य तो स्वतः है और प्रामाण्य परतः है, यह बौद्धपक्ष ही मान लिया जाय ।' यह भी युक्तिसंगत नहीं है । [विकल्प करके युक्तिविरोध दिखलाते हैं-] उस मतमें ज्ञानोंका दूसरेकी सहायतासे प्रामाण्य उत्पत्तिमें है अथवा ज्ञप्तिमें है : [ अर्थात् ज्ञानव्यक्तिके उत्पन्न होनेके अनन्तर उससे इतर व्यक्ति उस ज्ञानमें प्रामाण्य उत्पन्न करती है अथवा ज्ञानोंके साथ-साथ ही उत्पन्न होता हुआ भी ग्रामाण्य दूसरेकी सहायतासे मालूम हो सकता है, स्वतः नहीं ?] उत्पत्तिमें ऐसा होना-ज्ञानके उत्पन्न होनेके अनन्तर उसमें प्रामाण्यका उत्पन्न होना- सम्भव नहीं है, क्योंकि ज्ञानके कारण चक्षुरादि इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुआ क्षणमात्रस्थायी ज्ञान अपनेमें प्रामाण्यधर्मकी उत्पत्ति होने तक स्थिर ही नहीं रह सकता। 4
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अंध्यासविचार ] भापानुवादसांहेत ३४९
तद्यदि न सम्भवेत् कर्थ तर्हि ग्रामाण्यस्य गुणान्वयव्यतिरेकाविति चेदू, न; आमाण्यप्रतिबन्धकस्य दोपस्याऽभावं विपयीकृत्याऽवस्थानेऽपि तयोरुपपच्ेः । न च गुणान्वयव्यतिरेकयोदोपाभावविषयत्वे वैयधिकरण्यं शङ्कनीयम्, दोपाभावस्यैव गुणत्वाद्। नहीन्द्रियादिपु दोपाभावव्यतिरेकेण गुणो दृदयते। अथ यः कश्िदुणः स्यात् तदापि दोपनिवृत्तिहेतोस्तस्य गुणस्य दोपाभावेनव साक्षादन्वयव्यतिरेकी निवृत्ते तु दोपे ग्रामाण्यं निष्प्रतिबन्धं सिध्यतीति प्रामाण्वेनाऽपि सह गुणस्य दोपाभावह्वाराऽन्वयव्यतिरेकौ शक्रा-ज्ञानके कारण चक्षरादि इन्द्रियोंके द्वारा ज्ञानकी उत्पत्ति होनेके अनन्तर उसके कारण चक्षुरादि इन्द्रियोंके गुणोंसे उस ज्ञानमें प्रामाण्यकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकारके उत्पत्तिपरतस्त्वका यदि ज्ञानमें होना सम्भव नहीं हो सकता, तो ग्रामाण्यके साथ गुणका अन्वय और व्यतिरेक कैसे होगा ? अर्थात् कारणगत गुणोंसे ही ज्ञानमें प्रामाण्य हो सकता है, अन्यथा नहीं; इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक नहीं वन सकेगा। समाधान-प्रामाण्यके प्रतिबन्धक दोपोंके अभावको विषय करके भी अन्वय और व्यतिरेककी उपपत्ति हो सकती है। यदि दोपके अभावको लेकर गुणोंके अन्वय और व्यतिरेककी उपपत्ति की जाय, तो व्यधिकरण दोप हो जायगा, ऐसी शक्का भी नहीं हो सकती है, कारण कि दोपके अभावका ही नाम गुण है। क्योंकि ज्ञानके कारण इन्द्रियादि दोपके अभावसे अतिरिक्त कोई गुण पदार्थ नहीं पाया जाता। शक्षा-यदि कोई [ अतिरिक्त ] गुण हो भी, तो दोपकी निवृत्तिके कारणी- मृन उस गुणका अन्वय और व्यतिरेक तो साक्षात् दोपके अभावके ही साथ है अर्थात् उस विद्यमान गुणके रहनेसे दोपोंकी निवृत्ति हो जाती है, अतः गुणोका अन्वय और व्यतिरेक दोपाभावके ही विपयमें मानना चाहिए, [ज्ञानोंके प्रामाण्यमें नहीं ] दोपोंके निवृत्त हो जानेपर ज्ञानोंका प्रामाण्य बिना किसी रुकावटके ही सिद्ध हो जाता है। इससे दोपाभावके द्वारा ही प्रामाण्यके साथ गुणके अन्वय और व्यतिरेककी प्रतीति होती है, प्रामाण्यके विपयमें गुणका
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक १
प्रतीयेते, न तु तत्र साक्षात्तौ विद्येते। अस्तु. तर्हि प्रतिवन्धकस्य दोषस्याऽभाव एव आ्माण्यकारणं साक्षादन्वयव्यतिरेकवच्वादिति चेद्, न, तथा सति दोपस्य प्रतिवन्धकत्वासंभवात्। सत्येव पुष्कलकारणे कार्योत्पादविरोधितया प्रास्तं हि प्रतिवन्धकम्। न हि दोषाभावे सति दोषः प्राम्ोति। अतो नोत्पच्तौ परतस्त्वम्। ज्ञप्तिरपि आ्माण्यस्य कथं परतः स्यात १ प्रामाण्यं नाम ज्ञानस्यार्थपरिच्छेदसामर्थ्यम्, तत्किं गुणजन्यत्वज्ञानादवगम्यते अर्थ- क्रियासंवादज्ञानाद्वा १ नाऽडद्:, घटे झ्ञायमानेऽपि तस्य ज्ञानस्य गुणजन्यत्वं यावन ज्ञायते तावद् घटपरिच्छेदसामर्थ्याप्रतीतौ घटव्यवहारानुदयप्रसङ्गात्।
अन्वय और व्यतिरेक साक्षात् नहीं है। तव तो अन्वय और व्यतिरेकके बलसे प्रतिबन्धक दोषका अभाव ही प्रामाण्यका कारण होगा? [अतः प्रामाण्यमें परतस्त्व सिद्ध हो गया ]।
समाधान-उक्त शङ्का नहीं बन सकती, कारण कि ऐसा माननेसे दोष प्रतिवन्धक नहीं हो सकता, क्योंकि पर्याप्त कारणोंके रहते कार्यकी उत्पत्तिमें बाधा पहुँचानेवाला ही प्रतिवन्धक कहलाता है। दोषका अभाव होनेपर दोषकी प्राप्ति नहीं हो सकती। [ यदि गुण है तो, दोषका अभाव होनेसे प्रतिबन्धक दोषकी प्राप्तिका सम्भव ही नहीं है। अथ च गुण नहीं है, तो पुष्कल कारण ही नहीं है। इसलिए दोषके रहते हुए भी यदि वह प्रति बन्धक नहीं कहा जा सकता, तो प्रतिबन्धक दोषका अभाव ज्ञानोंका प्रामाण्य उत्पन्न करता है, यह कहना कैसे सङ्गत हो सकता है ? इस अभिपायसे प्रघट्टकका निष्कर्ष लिखते हैं-] इसलिए उत्पत्तिमें परतस्त्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती। [दूसरे पक्षका खण्डन करते हैं-] प्रामाण्यकी ज्ञप्ति-ज्ञात होना-भी दूसरेके द्वारा कैसे सम्भव होगा: कारण कि ज्ञानोंके अर्थपरिच्छेदकी-विषयका निश्चयात्मक ज्ञान करानेकी-सामर्थ्य ही तो प्रामाण्य है, ऐसी दशामें क्या वह प्रामाण्य गुणसे उत्पन्न हुआ है, इसलिए जाना जाता है ? अथवा अर्थक्रियाके व्यवहारके संवाद- ज्ञानसे जाना जाता है: प्रथम पक्ष नहीं माना जा सकता, क्योंकि घटका ज्ञान होनेपर भी जबतक उस ज्ञानमें यह ज्ञान गुणसे उत्पन्न हुआ है, ऐसा ज्ञान न हो, तवतक उसमें घटका निश्चय करनेकी सामर्थ्यकी प्रतीति न होनेसे 'यह घट है'
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३५१
अस्तु गुणजन्यत्वज्ञाने सति पश्चाद् व्यवहार इति चेद्, न; वटज्ञानवद् गुणजन्यत्वज्ञानस्याऽपि स्वग्रामाण्यनिश्चायकज्ञानान्तरात् प्रागकिश्चित्करत्वे सत्यनवस्थाप्रसङ्गात्। द्वितीयेऽप्ययं न्यायस्तुल्य: । अथ मतम्-साधनभूतभोजनादिज्ञानानां तृप्त्यादयर्थक्रियासंवादज्ञानात् प्रामाण्यावगम:, फलभृततृप्त्यादिज्ञानानां तु स्वत एव तदवगम :; अर्थ- क्रियान्तराभावात्, ततो नाऽनवस्थेति। तदसव्, विमतं साधनज्ञानं स्वत एव प्रमाणम्, ज्ञानत्वात्, फलज्ञानवत्। विपक्षे चाऽन्योन्याथ्रयग्रसङ्गो वाघ:। ऐसा घटव्यवहारका उदय नहीं हो सकता। गुणजन्यत्व ज्ञान होनेके अनन्तर ही व्यवहार होगा, ऐसा भी नहीं है; क्योंकि घटज्ञानके सदश गुणजन्यत्व ज्ञानके मी अपनेमें प्रामाण्यका ज्ञान करानेवाले दूसरे ज्ञान होनेके पूर्व अकिश्चित्कर होनेके कारण [ दूसरे ज्ञानोंकी अपेक्षासे] अनवस्थाका प्रसङ्ग होगा *। द्वितीय पक्ष माननेमें भी यह न्याय-अनवस्थादोषप्रसङ्ग- समान ही है। [व्यवहारसंवादसे यदि ज्ञानका प्रामाण्य मानो, तो व्यवहारसंवादज्ञानका प्रामाण्य किसी दूसरे ज्ञानसे होगा, उसका तीसरेसे और उसका भी चौथे से, इत्यादि रीतिसे अनवस्था बनी ही है।] हेतुभूत भोजनादि ज्ञानोंका प्रामाण्य तृप्तिरूप व्यवहारसे जाना जायगा। और फलस्वरूप तृप्ति आदि ज्ञानोंका ग्रामाण्य स्वतः प्रतीत हो जायगा। इससे अनवस्थाका प्रसङ्ग नहीं आता, यह कहना भी युक्त नहीं है; क्योंकि विमत-विवादग्रस्त साधनज्ञान (तृप्तिके कारण भोजनादि- ज्ञान) स्वतः निश्चायक हैं, ज्ञान होनेसे, तृप्ति आदि फलज्ञानके समान। [ प्रतिवादी फलज्ञानको स्वतःप्रमाण मानता ही है, उसमें विद्यमान ज्ञानत्व- सामान्यसे कारण ज्ञानको भी स्वतःप्रमाण मानना उचित है। कोई ज्ञान स्वतःप्रमाण और कोई परतःप्रमाण होता है, इसमें विनिगमक नहीं है। उक्ता- नुमानमें अनुकूल तर्क दिखलाते हैं-] इस उक्तानुमानसे सिद्ध स्वतःप्रामाण्यके विपरीत परतःप्रामाण्य माननेमें अन्योन्याश्रयका प्रसङ्गरूप बाध है। कार्यमें जैसे ज्ञान गुणजन्यत् ज्ञान होनेके पूर्व निशायक नहीं हो सकताएवम् गुणजन्यत्व ज्ञान मी स्वयं निश्चायक नहीं हो सकता, कारण कि वह भी तो ज्ञान ही है।
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३५२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
प्रवृत्तस्यार्ऽर्थक्रियासंवादज्ञानात् आमाण्यनिश्चयः आ्रमाण्यनिश्चये च प्रवृत्तिरिति। अनिश्चिते एव प्रामाण्ये तन्निश्वयाय प्रवृत्त्युपपत्तेर्नाऽन्योन्याश्रयतेति चेत्, सति संदेहे तथाऽस्तु। असंदिग्धार्थेष्वभ्यस्तघटादिविपयज्ञानेपु कथ प्रामाण्य- निश्चयाय प्रवृत्ति: स्यात्। ननु सुवर्णपरीक्षायां निरीक्षणनिकर्पणदाहच्छेद- रूपात् प्रत्ययचतुष्टयादर्थनिश्चयः, नप्रथमप्रत्ययमात्रात्, ततः परतः प्रामाण्य- मनिवार्यमिति चेद्, न; तत्र हि द्वितीयादि ज्ञानानि प्रथमज्ञानग्रामाण्यग्रति- बन्धकसंशयादिनिरासीनि, न तु तद् प्रामाण्यनिश्चायकानि। तस्मात् ग्रामाण्य- स्योत्पत्तौ जस्ौ च ज्ञानोत्पादकज्ञापकातिरिक्तानपेक्षत्वलक्षणं स्व्तस्त्वम-
प्रवृत्त पुरुपको अर्थक्रियाके-व्यवहार वा फलके-संवादज्ञानसे [प्रवृत्तिपयोजक ज्ञानके ] प्रामाण्यका निश्चय होगा और [ उस प्रवृत्तिप्रयोजक ज्ञानके] प्रामाण्यका निश्चय होनेपर ही प्रवृत्ति होगी, इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोप है। प्रामाण्यका निश्चय न होनेपर ही उसके निश्चयके लिए प्रवृत्तिकी उपपत्ति हो जायगी [ इससे अन्योन्याश्रय नहीं आता ] ऐसा मानना, तो केवल सन्देह- स्थलमें ही हो सकता है। जिनके विपयमें कोई सन्देह नहीं है, ऐसे पूर्ण परिचित घटादिको विषय करनेवाले ज्ञानोंमें प्रामाण्यनिश्चयके लिए प्रवृत्ति क्योंकर होगी? [निश्चित विपयस्थलमें मी प्रामाण्य निश्चयके लिए प्रवृत्तिका दष्टान्त देकर शक्का करते हैं-] सोनेकी परीक्षाकालमें निरीक्षण-देखना, कसौटीपर चढ़ाना- घिसना-एवम् आगमें तपाना और टुकड़ा करना-इन चार प्रकारके ज्ञानोंसे विषयका निश्चय होता है, केवल सुवर्णज्ञानमात्रसे नहीं होता, इस दष्टान्तसे ज्ञानोंका प्रामाण्य दूसरेके अधीन है, इस सिद्धान्तका निवारण नहीं किया जा सकता, यह कहना भी नहीं बनता, कारण कि ऐसे स्थलोंमें निकर्षणादि-द्वितीयादि ज्ञान- केवल प्रथम ज्ञानके प्रामाण्यमें (दोषवशात् उत्पन्न हुए) प्रतिबन्धक संशयादि- का ही दूरीकरण करते हैं, [आदि पदसे असम्भावना या विपरीतभावना ली गई है ] प्रामाण्यके निश्चायक नहीं हैं। इस निष्कर्पसे स्वरूपप्रामाण्यकी उत्पत्ति तथा ज्ञप्ति-प्रतीति-दोनोंमें ज्ञानको उत्पन्न करनेवाली तथा प्रतीति करानेवाली सामग्रीके अतिरिक्त किसीकी अपेक्षा न रखना लक्षणवाला स्वतस्त्व ही मानना चाह़िए।
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३५३
भ्युपेयम् । अग्रामाण्यस्य तु ज्ञानकारणगतदोपादुत्पत्तिर्वाधाच्च. ज्ञत्तिरिति परतस्त्वम्। अप्रामाण्यं परतो नोत्पद्यते, प्रामाण्याभावत्वात्, ग्रामाण्यग्रागभाववदिति चेद्, न; हेत्वसिद्धेः। अग्रामाण्यं नामाऽज्ञानसंशयविपर्ययाः। तदुक्तं भट्टपादै :- 'अग्रामाण्यं त्रिधा भिनं मिथ्यात्वाज्ञानसंशयैः।' इति। अज्ञानशब्देन चाऽत्र वस्त्वन्तरज्ञानं विवक्षितम्, 'विज्ञानं वाऽन्यवस्तुनि'इति तैरेवोक्तत्वात्। ततस्तत्र त्रयाणामपि नाडभावत्वम्। स्वतः ग्रामाण्यस्याऽपि किन्तु अप्रामाण्यकी उत्पत्ति तो ज्ञानके कारणमें-इन्द्रियादिमें-स्थित दोपसे होती है। और उत्तर कालमें वाधज्ञान होनेसे उस अप्रामाण्यकी प्रतीति होती है, इसलिए अप्रामाण्यको अपनी उत्पत्ति तथा ज्ञप्ति-प्रतीति-दोनोंमें परतस्त्व है। शक्का-ज्ञानोंका अप्रामाण्य परतः [दोपादिसे ] उत्पन्न नहीं होता है, कारण कि वह अपामाण्य प्रामाण्यका अभावरूप है, जैसे कि प्रामाण्यका प्रागभाव । [अप्रामाण्य भी प्रामाण्यमागभाव ही है और वह किसीसे उत्पन्न नहीं होता है, यह भाव है। ] समाधान-ऐसा अनुमान नहीं बन सकता, क्योंकि उक्त अनुमानका प्रामाण्याभावरूप हेतु सिद्ध नहीं है। [ अधर्मकी भाँति अप्रामाण्यकी अभाव- रुपताका निपेध कर भावरूपताके समर्थनके लिए उसका निर्वचन करते हैं-] क्योंकि *अज्ञान, संशय और विपर्यय-इन तीन ज्ञानोंको ही अपामाण्य कहते हैं। यही वात कुमारिलभट्टने भी कही है- मिथ्यात्व-विपर्यय-संशय और अज्ञान-इन मेदोंसे अग्रामाण्य तीन प्रकारका है। अज्ञानशब्दसे यहांपर वस्त्वन्तरका ज्ञान विवक्षित है, क्योंकि 'विज्ञानं वाऽन्यवस्तुनि' (मिन्न वस्तुविषयक विज्ञान ही अज्ञान है) ऐसा उन्हींने कहा है। इसलिए अप्रामाण्यके स्वरूपभूत तीनों अभावात्मक नहीं हैं। [स्वतः- प्रमाण ज्ञानोंमें कोई भी अपामाण्य नहीं कह सकता, इस आशङ्काका निराकरण * अज्ञानकी भावरूपता अज्ञानवादमें दिखलाई गई है। विरुद्धकोटिद्वयात्मक ज्ञान ही संशय कहलाता है। जो वस्तु जैसी है, उसको वैसी न समझना, विपर्यय कहलाता है। जैसे शुक्तिमें रजतभ्रम। ४५
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३५४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक
दोपवलादप्रामाण्यमविरुद्धम्, स्वत उष्णस्याऽप्यग्रेर्मन्त्रादिना प्रतिवन्धे शैत्यदर्शनात्। यदि कर्थचिदपरामाण्यस्य स्वतस्त्वमाशङ्केथास्तदानीमप्रमाणज्ञानादपि यावद्दोपाधिगममुत्पद्यमानं व्यवहारं कर्थ समर्थयेथाः: तस्मात् ग्रामाण्यमेव स्वतः इति स्थितम्। तथा च सति ब्रह्मविद्यायास्तर्कापेक्षत्वे कर्थ नाऽप- सिद्धान्त: १ नैप दोप:, तर्कस्य प्रतिबन्धनिराकरणमात्रहेतुत्वात्।यद्यपि ब्रह्म स्वप्रकाशं करते हैं-] स्वतःप्रामाण्यवाले ज्ञानोंमें दोषविशेपसे अप्रामाण्यका होना विरुद्ध नहीं है, क्योंकि स्वयं उष्णस्वभाव अग्निमें भी मणि, मन्त्र आदि प्रतिवन्धकके सद्भावसे शैत्य-दाहशक्तिका तिरोभाव-देखा गया है। यदि आप आग्रहवश अप्रामाण्यमें स्वतस्त्व-स्वभावसिद्धत्व-की ही आशङ्का करें, तो अप्रमाणज्ञानसे भी, जवतक दोपका परिज्ञान नहीं हो पाता, तबतक होनेवाले, व्यवहारका समर्थन किस रीतिसे आप करेंगे। [ जिसके मतमें ज्ञानोंमें स्वतःअप्रामाण्य है, उसके मतमें सभी ज्ञान प्रथम शुक्ति-रजतज्ञानके समान अप्रमाण ही होंगे और अप्रमाण ज्ञान अर्थ- क्रियाकारी नहीं होते। इस अवस्थामें शुक्तिरजतज्ञानके अनन्तर होनेवाले रजतार्थीके प्रवृत्तिरूप व्यवहार, 'रजतमिदम्' ऐसे ज्ञान तथा शब्दुव्यपदेश आदिकी उपपत्ति कैसे होगी ? यद्यपि दोपज्ञानके अनन्तर व्यवहार या व्यपदेश सब बाधित हो जाते हैं तथापि दोषज्ञानके पूर्व तो यथार्थस्थलके समान व्यवहार तथा व्यपदेश होते ही हैं, इनका अपलाप तो कोई नहीं कर सकता, यह तात्पर्य है। ] इससे ज्ञानोंमें प्रामाण्य स्वतः ही है, यही सिद्धान्त युक्त है। इस सिद्धान्तके अनुसार ब्रह्मविद्याको ब्रह्मपाप्तिरूप फलके जननमें तर्ककी यदि अपेक्षा है, तो अपसिद्धान्त-अपने सिद्धान्तका विरोध-क्यों नहीं होता ? उक्त दोष नहीं आता, कारण कि तर्क केवल प्रतिवन्धका निराकरण ही करता है। [ ब्रह्मकी प्राप्तिमें कोई प्रतिवन्ध आ ही नहीं सकता, क्योंकि वह तो स्वयं्रकाश है, इससे तर्कका प्रतिवन्धनिराकरणरूप फल भी नहीं हो सकता। इस प्रकार वादीकी शङ्ाको मनमें रख कर समाधान करते हैं -!
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अंध्यासविचार ] भापानुवादसाहेत ३५५
शन्दथ तत्राऽपरोक्षज्ञानजनने समर्थस्तथापि दुरितैथ्ित्तकृतविपरीतप्रवृत्तेर्चिप- यासम्भावनया देहेन्द्रियादिविपरीतभावनया च प्रतिवन्धः सम्भवति, ततो निश्वलोऽपरोक्षोऽनुभवो न जायते। तत्राऽऽश्रमधर्मानुष्ठानाद् दुरितापगमः । शमादिसेवनाचित्तस्य विपरीतप्रवृत्तयो निरुध्यन्ते। मननात्मकेन तर्केण जीवत्रह्मैक्यलक्षणस्य विपयस्याऽसम्भावना निरस्यते। निदिध्यासनेन विप- रीतभावनां तिरस्कुर्वती सूक्ष्मार्थनिर्द्धारणसमर्था चित्तवृत्तेरेकाग्रता सम्पद्यते। ततः शब्द्रजनितमपरोक्ष ज्ञानं निश्चलं प्रतितिष्ठति। वेदान्तशब्दस्य च ब्रह्मा- परोक्षावगतिहेतुत्वं 'तं त्वौपनिपदं पुरुषं पृच्छामि' इति तद्धितप्रत्ययेन दर्शि- तम्। उपनिपत्स्वेध सम्यगवगतः पुरुप इति तद्धितप्रत्ययार्थः । नह्यपरोक्षे
वद्यपि न्रह्म स्वप्रकाश है और शब्द (श्रुति) उसका अपरोक्ष ज्ञान करानेमें समर्थ है तथापि पाप कर्मोंके कारण चित्तकी विपरीत वृत्ति-बुद्धि- विपर्यय-होनेसे विषय-त्रह्म-की असम्भावना अथवा देहेन्द्रियादिविपरीत- भावनासे उसका प्रतिबन्ध होता है, इससे स्थिर साक्षात्काररूपी अनुभवं नहीं हो सकता। इस अवस्थामें आश्रमधर्मकेयज्ञ आदिके-अनुष्ठानसे पापक्मोंका विनाश होता है और शम आदिके अनुष्ठानसे चित्तकी विपरीत प्रवृत्तियाँ रुक जाती हैं। मननस्वरूप तर्कसे जीव और ब्रह्मके ऐक्यरूपं विपयमें प्राप्त हुई असम्भावनाका दूरीकरण होता है। और निदिध्यासनसे- पुनः पुनः जीव और ब्रह्मकी एकताके परिशीलनसे-चित्त-वृत्तिकी निश्चंल एकाग्रता हो जाती है, जिससे विपरीतभावना बिलकुल दूर हो जाती है और अत्यन्त सूक्ष्म विपयका निश्चय करनेकी सामर्थ्य भी प्राप्त हो जाती है। उसके अनन्तर शब्द-उपदेश-द्वारा उत्पन्न हुआ साक्षात्कारात्मक ज्ञान निश्चल- रूपसे अवस्थित रहता है। 'तन्त्वौपनिपदं पुरुपम्' इस वाक्यमें आया हुआ [ 'औपनिपदः'-उपनिषत्सु अवगतः अर्थात् उपनिपदोंमें ही जाना गया है, इस प्रकार अवगतिरूप अर्थ कहने- वाला ] तद्धित प्रत्यय ही 'वेदान्तशब्द त्रह्मविपयक अपरोक्ष ज्ञानका कारण है', इस सिद्धान्तका निर्णय कराता है। यहांपर 'उपनिपदोंमें ही भली- भाँति अवगत है', ऐसा तद्धितप्रत्ययका अर्थ है, कारण कि अपरोक्ष ब्रह्ममें
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३५६ विरवरणंप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णेक १
ब्रह्मणि परोक्षज्ञानं सम्भवति। ततः प्रथमत एव शब्दादुत्पन्नमपरोक्षज्ञानं प्रतिबन्धापाये पश्चाननश्वलं भवति। अथवा यथा सम्प्रयोगोऽभिज्ञानमुत्पाद्य पुनः पूर्वानुभवसंस्कारापेक्षया प्रत्यभिज्ञानसुत्पादयति तथा शब्द एव अ्रथमं ब्रह्मणि परोक्षज्ञानसुत्पाद्य पुनर्वर्णितप्रतिवन्धक्षयापेक्षया द्वितीयमपरोक्षज्ञानमुत्पादयति। न च स्वयं- प्रकाशे ब्रह्मणि परोक्षज्ञानं विभ्रम, स्वयंत्रकाशेऽि पुरुपान्तरसंवेदने परोक्षानुमानदर्शनात्। एवं सति शब्दात् अ्रथममपरोक्ष परोक्ष वा ब्रह्मज्ञानं जातमपि तावतैव निश्चलापरोक्षानुभवरूपेण प्रतिष्ठाया अभावादग्रापमिव भवति। मनननिदिध्यासनयोः कृतयो: फलरूपेण प्रतिष्ठितत्वाद् ब्रह्म- विद्या प्राप्तेति व्यपदिश्यते। नन्वेवं सति निदिध्यासनानन्तरमेव फलोदयदर्शनात्तस्यैवाSङ्गित्वं श्रवण-
परोक्ष ज्ञान नहीं हो सकता। इसलिए पहले ही शन्दसे अपरोक्ष ज्ञान उत्पन्न होकर प्रतिबन्धके हट जानेपर पीछे निश्चल होता है। [शब्द परोक्षज्ञानका ही जनक है, इस सिद्धान्तके अनुसार व्याख्या करते हैं-] अथवा जैसे इन्द्रियसंप्रयोग आदि पहले ज्ञानको उत्पन्न कराकर पश्चात् प्राक्तन अनुभवजनित संस्कार द्वारा प्रत्यभिज्ञाको उत्पन्न कराते हैं, वैसे ही शब्द पहले ब्रह्मविपयक परोक्षज्ञानको उत्पन्न करके अनन्तर पूर्वप्रतिपादित- रीतिसे प्रतिबन्धका विनाश होनेपर दूसरे अपरोक्षज्ञानको उत्पन्न कर देता है। स्वर्यंप्रकाश ब्रह्मके परोक्षज्ञानको भ्रमात्मक मानना उचित नहीं है, कारण कि अन्य पुरुपके ज्ञानके विपयमें, जो कि स्वयंप्रकाश भी है, परोक्ष अनुमान देखा गया है। इस सिद्धान्तके अनुसार शब्दसे प्रथम अपरोक्ष या परोक्ष रूपसे ब्रह्मज्ञान हो जानेपर भी उतने ही से-शब्द द्वारा ज्ञान होने ही से-निश्चल अपरोक्षरूपसे वह प्रतिष्ठित नहीं हो सकता, इसलिए वह अप्राप्त-सा ही रह जाता है। मनन तथा निदिध्यासनके अनन्तर फलरूप निश्चल अपरोक्षानुभवसे प्रतिष्ठित हो जाता है, इसलिए 'ब्रह्मविद्या प्राप्त हुई' ऐसा व्यवहार होता है। यदि शङ्का हो कि इस सिद्धान्तके अनुसार निदिध्यासनके अनन्तर ही अपरोक्ष- साक्षातकाररूप फलका उदय होनेसे निदिध्यासनमें ही अद्वित्व-प्रधानत्व-
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अंध्यांसाविचार] भापानुवादसहित ३५७
मननयोस्तु तदुपकारितयाऽङ्गत्वं प्राप्तमिति चेदू, मैवम्; निदिध्यासनस्याड- नुभवोत्पत्तौ करणत्वायोगात्। नहि निदिध्यासनं नाम किंचित्प्रमाणम्, वेनाऽनुभवजनने स्वयं कारणं स्यात। श्रवणं तु शब्दशक्तितात्पर्याधारणरूपं सत्करणभूतशब्दातिशयहेतुत्वात करणमिति कृत्वा श्रवणस्यैवाऽङ्गित्व पुचितम्। ्रवलप्रतिवन्धनिवारकयोर्मनननिदिध्यासनयोः सहकारिभूतचित्तातिशयहेतु- त्वात् फलोपकार्यङ्गत्वम्। मननं हि विषयगताऽसम्भावनां निराकृत्य चित्ते संशयमपनयति। निदिध्यासनं च. विपरीतभावनां निराकृत्य चित्तवृत्ते- रकाय्यं जनयति। शमादीनां यज्ञादीनां चाऽरादुपकारकत्वादितिकर्त्तव्यता- रूपत्वम्, तत्राऽप्यन्तरङ्गाः शमादयः श्रवणाधिकारप्रतिवन्धकस्य चित्ते-
और उसके उपकारी होनेसे श्रवण और मननमें तो अद्गत्व प्राप्त हुआ ? तो यह भी उचित नहीं है, कारण कि निदिध्यासन अनुभवरूप-साक्षात्काररूप-ज्ञानके प्रति कारण नहीं हो सकता। क्योंकि निदिध्यासन कोई प्रमाण नहीं है जिससे कि वह अनुभवकी उत्पत्ति करानेमें कारण माना जा सके। और श्रवण तो शब्दनिष्ठ शक्तिका तात्पर्य- निर्णायक होकर अनुभवके जनक शब्दमें अतिशयको उत्पन्न करनेवाला होनेसे कारण-अनुभवात्मक प्रमाक्का जनक-हो सकता है, इसलिए श्रवणको अभ्ी मानना उचित हे। प्रवल प्रतिबन्धको दूर करनेवाले मनन और निदिध्यासन तो सहकारीभूत चित्तमें अतिशयके जनक होनेसे फलोपकारी अङ्ग हैं, क्योंकि मनन विपयमें प्राप्त असम्भावनाको हटाकर चित्तमें उत्पन्न हुए संशयको दूर करता है और निदिध्यासन विपरीतभावनाको नष्ट करके चित्तवृत्तिकी एका्रता उत्पन्न करता है। एवं शम तथा यज्ञ आदि आरादुपकारक* होनेसे इतिकर्तव्यतारूप हैं। उनमें भी शम आदि अन्तरङ्ग हैं, क्योंकि वे * आरादुपकारक। आराद यानी दूरके तत्त्वसाक्षात्काररूप फलमें, उपकारक अर्थात् तत्वसाक्षात्कारकी प्रतिवन्धिका असम्भावनावुद्धिके मूल कारण पापादिका विनाश करनेसे ब्रहमज्ञानमें यज्ञादि उपकारी होते हैं। अतः वर्तमान तथा अतीत जन्ममें किये गये यज्ञादि ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिमें इतिकर्तव्यतारूप हैं। इससे दुरितोंका क्षय होना अत्यन्त आवश्यक है, यह सूचित किया गया है। स्मृतिकारोंने भी कहा है- 'महायन्ञैथ यज्ञक्ष ब्राह्मीयं कियते तन्चुः'। महायज्ष तथा यत्ञासे शरीर न्रह्मज्ञानके अनुकूल किया जाता है। इसी प्रकार-
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३५८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक १
न्द्रियगतविपरीतप्रवृत्याख्यस्य दष्टदोपस्य निवारकत्वात्। यज्ञादयश्षाऽ- दृष्टदोषस्य निवारकतया बहिरङ्गाः। अत इतिकर्तव्यतया फलोपकार्य- डाभ्यां चोपकृतमङ्गिभूतं श्रवणमेव निश्चलापरोक्षानुभवजनकम्। यन्तु श्रवणमापातिकमङ्गानुष्ठानात् प्रक्परोक्षज्ञानमग्रतिष्ठितापरोक्षज्ञानं श्रवणमें अपेक्षित अधिकारेके प्रतिबन्धक चित्तेन्द्रियगत विपरीत प्रवृत्तिरूप दृष्ट- दोषके निवारक हैं और यज्ञ आदि अदएँ दोपके निवारक होनेसे बहिरद्ग हैं। इस निष्कर्षसे इतिकर्तव्यतास्वरूप होनेसे फलोपकारी अङ्गोंसे-मनन और निदि- ध्यासन इन दोनोंसे-उपकृत होकर प्रधान श्रवण ही निश्चल अपरोक्षानुभव- रूप साक्षात्कारका उत्पादक है। श्रवण तो आपातिक-प्रथम-प्रथम अङ्गोंके अनुष्ठानसे-मनन और निदिध्या-
'ऋणानि त्रीण्यप्राकृत्य मनो मोक्षे निचेशयेत्'। अर्थात् यज्ञादिके द्वारा देव-ऋण, सन्न, दानादिसे मनुष्य ऋण एवं गार्हस्थ्यका विधानकर पुत्रोत्पादनसे पितृ-ऋणको दूर कर मोक्षमें मन लगावे। तात्पर्य यह है कि किसी प्रकार भी पापका लेश रहनेसे मनकी मोक्षमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। श्रति भी कहती है- 'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मगा विविविपन्ति यज्ञेन'। ब्राह्मण वेदानुवचन द्वारा यज्ञादि करनेसे ही ब्रह्मविविदिषाके अधिकारी होते हैं। शम तथा दम आदिका भामतीमें इस प्रकार विवेचन किया गया है-रागादिरूप कपायोंके मदसे उन्मत्त होकर मन नानाप्रकारके भले-वुरे कमोंमें इन्द्रियोंको प्रवृत कराता हुआ पुरुषको अत्यन्त घोर दुःखजनक संसाररूप अग्निमें जलाता है। अनन्तर अतिशय पुण्यराशिके फलोदयस्वरूप गुरु- कृपा या सत्सङ्गसे उदित हुए प्रसङ्गयानके पुनः परिशीलनसे प्राप्तं वैराग्य द्वारा रागादि कपायोंका मद उतरनेसे मन पुरुषके अधिकारमें हो जाता है। इस प्रकार मनके वशीकारको शम कहते हैं। और इस प्रकार वशमें हुआ शान्त मन तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके उन्मुख होनेकी योग्यताका लाभ करता है। इस योग्यताको दम कहते हैं। आदिपदसे 'तस्माच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः श्रद्धावित्तो भूत्वात्मान्येवात्मानं पश्येत्', 'सर्वमात्मनि पश्यति' इस क्षतिमं प्रतिपादित तितिक्षा आदि लेने चाहिएँ। इस प्रकार शम, दम आदिको ब्रंह्मविद्याकी प्राप्तिमें अव्यवधानेन कारण होनेसे भी अन्तरङ्गत्व प्राप्त होता है। १ 'तस्मात् शान्तो दान्त:' इत्यादि अ्रुतिसे शम, दम आदिसे सम्पन्न पुरुषका ही ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। २ इन्द्रियोंकी विषयोन्मुखता विपरीत प्रवृत्ति है। ३ वर्तमान जन्ममें सब तरहके उपाय करनेपर मी मनकी स्थिरता तथा श्रद्धा न होना प्राकन पापोंकी सूचना है। उनका निवारण करना यज्ञ-यागादिके अदृष्टका काम है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि कर्मोका कारणस्व ज्ञानकी इच्छा (विविदिपा) में है, ज्ञानमें नहीं है।
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अप्यासविचार] भांपानुवादस हित ३५९
वा जनयति। तस्य निदिध्यासनाङ्गत्वेऽपि न नः किंचिद्धीयते, संसार-
संसारनिवर्तकम्, सत्यपि तस्मिन् संसारदर्शनादिति चेदू, न; तच्वापरोक्षात् समृलाध्यासनिवृत्तेरन्वयव्य तिरेकशास्त्रसिद्धत्वात्। अध्यासविरोधिदेहव्यति- रेकावगमनत्तच्ावयोधोऽध्यासविरुद्वोऽपि न तमपनयेदिति चेद्, न; वपम्यात्। तच्यज्ञानं हि मूलाज्ञानविरोधि, न तु तथा देहव्यतिरेकज्ञानम्। तहिं नच्वज्ञानान्मूलाज्ञाननिवृत्ती सदः शरीरपातः स्यादिति चेद्, न;
सनसे पूर्व केवल अपरोक्षज्ञान अथवा जिसका साक्षात् अनुभव प्रतिष्ठित-निश्चल- नहीं हो पाया है, ऐसे अपरोक्षज्ञानको ही उत्पन्न करता है, ऐसा जो वादी मानता है, उसके सिद्धान्तके अनुसार श्रवणके निदिध्यासनाङ होनेपर भी हमारे मतगें कोई हानि नहीं है; कारण कि संसारकी निवृत्ति करनेवाले न्रमतत्वके अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न करनेमें समर्थ श्रवणको हम भी अझी मानते हैं। नवाज्ञान संसारका निवर्तक नहीं है, क्योंकि न्रह्मज्ञान होनेपर भी संसारकी निवृत्ति नहीं होती, यह शक्का भी उचित नहीं है, कारण कि न्सतत्त्वके अपरोक्ष ज्ञानसे समूल अध्यासकी निवृत्ति अन्वय और व्यतिरेक तथा शाबत्रसे सिद्ध है। अध्यासके विरोधी देहादिके साथ आत्माके मेदज्ञानके समान व्रस्तत्वका ज्ञान भी अध्यासका विरोधी होता हुआ उस अध्यासको निवृत्त नहीं कर सकता। [ अर्थात् यद्यपि प्रायः सर्व- साधारणकी प्रतीतिसे सिद्ध है कि आत्मा देहादिसे भिन्न है, तथापि उससे उनकी संसारनिवृत्ति नहीं देखी जाती, अतः तादश भेदज्ञान जैसे अध्यासविरोधी होता हुआ भी अध्यासकी निवृत्ति नहीं कर सकता है, वैसे ही न्रहज्ञानको भी ससझना चाहिए । ] यदि ऐसी शक्का की जाय, तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि नाज्ञान तथा देहात्मभेदज्ञानमें वैपम्य है-समानता नहीं है। [ वैपम्य दिखलाते हैं-] तत्वज्ञान ही मूल अज्ञानका विरोधी है, और देहात्मभेदज्ञान तो उसके समान मूल अज्ञानका विरोधी नहीं है। इसलिए देहात्मभेदज्ञानके रहते भी संसारनिवृत्ति-अध्यासनिवृत्ति-नहीं होती, इस तरह दष्टान्त और दार्या- न्तिककी विषमता स्पष्ट है ऐसी दशामें तत्त्वज्ञानसे मूल अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर उसी क्षणमें तुरत शरीरपात-देहका छूट जाना-हो जाना चाहिए, ऐसा दोष भी
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३६० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
अज्ञानतत्कार्यसंस्कारादपि शरीराद्यनुवृत्तिसम्भवात्। चक्रभ्रमणादिक्रियायां ज्ञाने च संस्कार: प्रसिद्धो नान्यत्रेति चेद्, न; गन्धादौ संस्कारदर्शनात्। निःसारितपुष्पे पुष्पपात्रे स्थिताः सूक्ष्मा: पुष्पावयवा एव गन्धवुद्धिम् उत्पादयन्ति न संस्कार इति चेत, तथापि प्रलयावस्थायां सर्वकार्यसंस्कारोड- म्युपगम्य एव। ये तु नाऽभ्युपगच्छन्ति, तान् अत्यनुमातव्यम्-विमतः कार्य- विनाश: संस्कारव्याप्त:, संस्कारविनाशादन्यत्वे सति विनाशत्वाद्, ज्ञान- विनाशवदिति। क्रियाज्ञानयोरेव संस्कार इति अ्सिद्धा वाध इति चेत्, तर्ह्यविद्यातत्कार्ययोरापे भ्रान्तिज्ञानरूपत्वात् संस्कारहेतुत्वमस्तु। अविद्यादि-
नहीं आता। कारण कि अज्ञान या अज्ञानजनित संसकारसे भी शरीरकी अनुवृत्ति हो सकती है। संस्कार चक्रत्रमण-चाकमें भ्रमि-आदि क्रिया तथा ज्ञानादिस्थलोंमें ही होता है, अन्यत्र नहीं होता, ऐसा भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि गन्धादिस्थलमें भी संस्कार देखा गया है। फूलोंकी डलियोंमें से फूलोंको वाहर कर देनेपर भी उस फूलोंके पात्रमें फूलोंके सूक्ष्म अवयव रह जाते हैं, वे ही अवशिष्ट सूक्ष्म अवयव गन्धका ज्ञान कराते हैं, संस्कार नहीं, ऐसा माननेपर भी प्रलयदशामें सम्पूर्ण कार्योंका अर्थात् सकल संसारका जनक संस्कार मानना ही होगा। जो वादी [प्रलय ] नहीं मानते हैं, उनके प्रति अनुमान द्वारा उसे सिद्ध करना होगा। [अनुमानका प्रयोग दिखलाते हैं-] विमत-विवादग्रस्त- कार्यका विनाश संस्कारसे व्याप्त है अर्थात् जहाँ जहाँ कार्यका विनाश होता है, वहां सर्वत्र उसका संस्कार शेष रह ही जाता है, [ इस तरह कार्यके विनाशके साथ संस्कारकी व्याप्ति सिद्ध होती है। ] संस्कारविनाशसे मिन्न होकर विनाश होनेसे, [ यदि कार्यविनाश भी संस्कारविनाशरूप होता, तो कार्यविनाशके अनन्तर संस्कार नहीं रह सकता, अतएव निरुक्त विशिष्ट हेतु उक्त अनुमितिमें उपयुक्त ही है। ] ज्ञानविनाशके तुल्य।
ज्ञान और भ्रमि-सी क्रियामें ही संस्कारजनकत्व होता है, इस लोक- प्रसिद्धिसे [ कार्यमात्रके विनाशस्थलमें संस्कार माननेका ] बाध होगा, ऐसा यदि माना जाय, तो अविद्या तथा अविद्याके कार्य भी भ्रमात्मक ज्ञान ही हैं, इस कारण वे भी संस्कारजनक होंगे। [ संस्कार तो केवल स्मरणके ही प्रति
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अध्यासनिचार ] भापानुवादसहित ३६१
संस्कार: सिध्येत्, तथापि स्मृतिमात्रकारणात् संस्कारात् कथमपरोक्षद्वैताव- भास इति चेत, प्रपश्चापरोक्षकारण चैतन्याश्रितदोपत्वात् संस्कारस्येति वदामः। अपरोक्षकारणनेत्रादिगतका चादिदोपाणामपरोक्षभ्रमहेतुत्वात्। न च केवलस्य चैतन्यस्य न संस्काराश्रयत्वसम्भव इति वाच्यम्, अविद्याश्रयत्ववदुपपत्तेः । संस्कारस्य कार्यत्वेऽपि प्रध्वंसचन्नोपादानापेक्षा, अविद्यासंस्कारव्यतिरिक्त- भावरूपकार्याणामेवोपादानजन्यत्वात्। अत एवाऽत्यत्र संस्कारस्य स्वोपा-
कारण है, प्रत्यक्ष अनुभवका जनक तो है ही नहीं, इसलिए संस्कारका होना प्रकृत अर्थका साधक नहीं हो सकता, इस आशयसे शक्का करते हैं-] यदि शका हो कि अविद्या आदिके साक्षी चतन्यके नित्य होनेपर भी उसकी जवच्छेदक ज्ञानाभासरूप वृत्तिके अनित्य होनेसे यद्यपि संस्कारकी सिद्धि हो सकती है, तथापि केवल स्मृतिके टी कारण संस्कारसे द्वेत प्रपश्चका प्रत्यक्षात्मक ज्ञान कैसे हो सकता है? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षज्ञानके कारण चतन्यमें स्थित दोपरूप होनेसे संस्कार प्रत्यक्षज्ञानका जनक हो जाता है, ऐसा हम कहते हैं। [अपरोक्षज्ञानके कारणमें आए हुए दोपसे अपरोक्ष भ्रम होता है, इसमें दृष्टान्त देते हैं-] कारण कि प्रत्यक्षज्ञानके कारण चक्ष आदिगें काचादि दोप-रोग-झुकतिरजत, द्विचन्द्र आदि प्रत्यक्ष भ्रमके जनक होते ही हैं। और केवल शुद्ध चतन्य संस्कारका आश्रय नहीं हो सकता, ऐेसी भी शक्ा नहीं हो सकती, क्योंकि जसे शुद्ध चतन्य अविद्याका आश्रय होता है, वैसे ही संस्कारका भी आश्रय हो जायगा। [अर्थात् अविद्याश्रय होनेपर भी जसे चैतन्यका अससिित्व बना रहता है, वसे ही संस्कारका आश्रय होनेपर भी उसका बाध न होगा। ] संस्कार यद्यपि कार्य है, तथापि वह प्रध्वंसके तुल्य उपादानकी अपेक्षा नहीं रखता, कारण कि अविद्या तथा संस्कारसे भिन्न भावरूप कार्योंकी ही उपादानसे उत्पत्ति मानी जाती है। [इससे संस्कारका कोई उपादान न दोनेसे उसे नहीं मानना चाहिए, यह भी शक्का नहीं हो सकती। ] अतएव अन्य स्थलमें संस्कारके अपने उपादानमें आश्रित रहनेका नियम होनेपर भी प्रकृतगें संस्कारका अपने अनुपादन चैतन्यमें रहना समत ही है। संस्कारके
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३६२ विवरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
दानाश्रयत्वनियमेऽप्यत्राऽनुपादानचैतन्याश्रितत्वसुपपद्यते। न च संस्काराङ्गी- कारे विदेहमुत्त्यभावः, प्रार्धकर्मणोऽन्ते तच्वज्ञानानुसन्धानादेव संस्कार- निवृत्तौ तत्सिद्धेः। अथ मन्यसे-अविद्याया निवृत्तत्वात् संस्कारस्य चाऽनुपादान- त्वान्निरुपादानो देहेन्द्रियादि: कथ सिध्धेदिति ? तर्हिं तत्वसाक्षात्कारे जातेऽप्याप्रारब्धक्षयमविद्यालेशानुवृच्या जीवन्मुक्तिरस्तु। प्रतिबन्धकस्य प्रारब्धकर्मणः क्षये तत्वज्ञानादविद्यालेशोऽपि निवर्तते, अतः सर्वसंसार- निवर्तकन्रह्मात्मैकत्वविद्याप्रापये सर्ववेदान्तारम्भः। यद्यप केपुचिद्वेदान्तेपु सगुणोपासनानि विधीयन्ते, तथापि तेपां गोदोहनादिवत् प्रसङ्गिकत्वादुपा- माननेमें विदेहमुक्तिका अभाव होगा, ऐसा दोष भी नहीं देना चाहिए, कारण कि प्रारब्ध कर्मोंका नाश होनेपर तत्त्वज्ञानके अनुसन्धानसे-दढ़ निश्चल अपरोक्षानु- भूतिसे-ही संस्कारकी निवृत्ति हो जानेपर विदेहमुक्तिका होना सम्भव है। यदि शङ्का हो कि अविद्या तो नष्ट ही हो गई है, और संस्कार उसका उपादान कारण है नहीं, इस अवस्थामें उपादानके-समवायिकारणके-बिना देहेन्द्रियादिकी सिद्धि कैसे हो सकती है? [वेदान्तमतमें इस वर्तमान देहेन्द्रियादिसङ्घातका उपादानकारण अविद्या है, तत्त्वज्ञानसे उसकी निवृत्ति हो जानेपर देहेन्द्रियादिसङ्कातकी स्थिति नहीं रहती, क्योंकि कार्यकी स्थिति उपादानके साथ ही रह सकती है और जो शेष संस्कार रह जाता है, वह उसका उपादान नहीं है, इस दशामें जीवनमुक्तिका होना सम्भव नहीं हो सकता, यह शक्काका अभिप्राय है। ] तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तत्त्वसाक्षातकार होनेपर भी प्रारब्ध कर्मोंका नाश होनेतक [ पुष्पपात्रसे पुष्पोंके बाहर निकाल देनेपर भी पुष्पोंके सूक्ष्म अवयवोंके शेष रहनेके सदश ] अविद्याके लेशकी अनुवृचिसे जीवन्मुक्तिकी सिद्धि होगी। प्रतिबन्धक-अविद्याकी पूर्णतया निवृत्तिको रोकनेवाले प्रारब्ध कर्मका [ भोगसे ] नाश होनेपर तत्त्वज्ञानसे अविद्याका लेश- सूक्ष्मावंस्थासे जरा-सा शेष रहा हुआ सम्बन्ध-भी निवृत्त हो जाता है। इसलिए सम्पूर्ण संसारकी निवृत्ति करा देनेवाले जीव और ब्रह्मके ऐंक्यज्ञानकी प्राप्तिके लिए सकल वेदान्तश्ञास्त्रोंका प्रारम्भ है। यद्यपि किसी-किसी स्थलमें वेदान्तशास्त्रोंमें भी सगुण उपासनाओंका विधान है, तथापि उन सगुण उपासनाओंके गोदोहनके तुल्य प्रासङ्गिक होनेसे कर्मभूत-प्राप्य-
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अंध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३६३
सनकर्मभूत निर्चिंशेषं ब्रह्मैव तत्राऽपि प्रतिपाद्यम्। उपास्यत्वेन विधीयमाना गुणा अप्यध्यारोपापवादन्यायेन निर्विशेपत्रह्मप्रतिपत्तावुपयुज्यन्ते । अप- वादात् प्रागवस्थायामारोपितैस्तैस्तैगुणैविशिषं ब्रह्म तस्मै तस्मै फलायोपास्य- त्वेन विधातुं शक्यम्। ननु यदि सुमुक्षुणाऽवगन्तव्यं ब्रह्मस्वरूपं वोधयितुमारोपितगुणप्रपश्च- माश्रित्योपासनाविधिस्तदा मोक्षेऽधिकृतस्यैवोपासनाधिकार: स्यात्। यथा दर्शपूर्णमासयो: 'चमसेनाऽपः प्रणयेत्' इति ाक्यात् प्राप्तमपाम्प्रणयनमाश्रित्य 'गोदोहनेन पछ्चुकामस्य' इति विधीयमाने गोदोहने दर्शपूर्णमासाधिकारिण निर्विशेष (निर्गुण) ब्रह्म ही उन वेदान्तवाक्योंसे प्रतिपादनीय विषय है। उपासनाके योग्यरूपसे विधान किये जानेवाले गुण भी अध्यारोपापवाद- न्यायसे * निर्विशेप-गुणरहित-ब्रह्मज्ञानको करानेके ही उपयोगमें आते हैं। अपवाद-निषेध-करनेसे पूर्व अवस्थामें आरोपित उन-उन गुणोंसे विशिष्ट ब्रहाका ही उस-उस फलके लिए उपास्यत्वरूपसे विधान किया जा सकता है। शक्का-यदि मुमुक्षु द्वारा जानने योग्य ब्रह्मके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आरोप किये गये गुण-प्रपञ्चको लेकर उपासनाविधि है, तो मोक्षके अधिकारीका ही उपासनाओंमें अधिकार मानना चाहिए। जैसे 'दर्श- पूर्णमास यागमें 'चमसपात्रविशेपसे जलका प्रणयन करे' इस वाक्यसे प्राप्त जलप्रणयनका आश्रयण करके 'पशुकी इच्छा करनेवाला ['गावो दुधन्तेऽस्मिन्' इस अधिकरणत्र्युत्पत्तिसे ] जिस पात्रमें दूध दुहा जाता है उससे जल प्रणयन करे' इस वाक्यसे विधीयमान गोदोहनमें दर्श-पूर्णमासके अधिकारवाले दीक्षित पुरुषका ही अधिकार प्राप्त होता है, वैसे ही मुमुक्षुका ही सगुण उपासनाओंमें भी अधिकार होगा। *अध्यारोपापवादन्याय-अन्तरधिकरणमें प्रतिपादन किया गया है कि सर्वसाधारण मनुष्योंकी युद्धिमें निर्गुण ब्रह्मका आना दुःसाघ्य है, उनकी ब्रह्मोन्मुख प्रवृत्तिके लिए सगुण ब्रह्मकी उपासना कही गई है। जैसे खेल-कृदमें ही मन लगानेवाले वालकोंको अक्षरोंका परिचय करानेके लिए इस युगमें अक्षरोंके आकारमं मिठाईके खिलौने दिये जाते हैं। और वर्णपरिचय होनेपर वे खिलौने फिर छोड़ दिये जाते हैं वैसे ही मन्दवुद्धि पुरुषोंको भी सगुण उपासनासे न्रह्मपरिचय कराकर त्रह्मज्ञानका दृढ़ अभ्यास होनेपर स्वयं गुणोंका त्याग हो जाता है और निर्विशेष न्रह्मका साक्षात्कार होता है।
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३६४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णेक १
नैप दोप:, तत्र हि दर्शपूर्णमासाधिकारिण एवाऽप्ग्रणयनप्रापि:, तत्प्राप्तिमत एव पशञुकामनायां गोदोहनविधिरित्यधिकृताधिकारता स्यात्।
नाडधिकृताधिकारता। ननु सगुणन्रह्मोपासनाविधायकानां वेदान्तानां त्रह्म- प्रतिपत्तिपरत्वेऽपि न प्राणाद्युपासनविधायकानां तदस्तीति चेत्, न; तेपा- मपि अन्तःकरणशुद्धिद्वारेण तत्रैव पर्य्यवसानाद्। तस्माद सर्वेपामपि वेदा- न्तानां ब्रह्मैव विपयस्तद्विद्याप्राप्याऽनर्थनिवृत्ति: ग्रयोजनम्, ततस्तद्विचार- शास्त्रस्यापि ते एव विपयप्रयोजने इत्यवगन्तव्यम् । समाधान-ऐसा दोष नहीं आता, कारण कि आपके दष्टान्तस्थलमें दर्श-पूर्णमासोंके अधिकारीको ही जलके प्रणयनकी प्राप्ति है और उसकी प्राप्ति- वालेको ही पशुओंकी कामना-इच्छा-होनेपर गोदोहनकी विधि है, इसलिए अधिकृताधिकारताका * अर्थात् दर्शपूर्णमासोंके अधिकारीका ही अधिकार होना सम्भव है। प्रकृत दार्ष्टान्तिकमें शब्द द्वारा आरोप किये गये प्रपञ्चका ज्ञान मुमुक्षुके अतिरिक्त पुरुषोंको भी हो सकता है, अतः इसका अचलम्बन करके विधान करनेपर भी अधिकृतकी अधिकारता सिद्ध नहीं होती। यद्यपि सगुण ब्रह्मकी उपासनाके विधायक वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य ब्रह्मज्ञान करानेमें [ अध्यारोपाप- वादन्यायसे ] हो सकता है, तथापि प्राणादिकी उपासनाके विधायक वेदान्त- वाक्योंका तो तात्पर्य ब्रह्मज्ञानमें नहीं हो सकता, ऐसी शक्का भी उचित नहीं है, क्योंकि उन प्राणादि उपासनाओंका भी अन्तःकरणकी शुद्धिके द्वारा उस निर्गुण ब्रह्मके ज्ञानमें ही तात्पर्य मानना होगा। इस निष्कर्षसे सभी वेदान्तवाक्योंका विषय ब्रह्म ही है। उसका ज्ञान प्राप्त करनेसे अनर्थकी- दुःखोंकी-निवृत्तिरूप प्रयोजन सिद्ध होता है। इसलिए उस ब्रह्का विचार करनेवाले उत्तरमीमांसाशास्त्रके भी वे ही दोनों विषय और प्रयोजन होंगे, ऐसा समझना चाहिए। * 'अपः प्रणयन्ति' इस वाक्यमें गार्हपत्यस्थलमें आहवनीयके प्रति जलोंका के जाना ही प्रकृष्ट नयनरूप जलोंका प्रणयन है। वह प्रणयन पशुकामनावालेको दोहनपात्रसे करना चाहिए, इस वाक्यके अर्थसम्पादनमें अधिकार स्वरसतः यज्ञाधिकृत पुरुषका ही प्रतीत होता है। अतएव गोदोहनका पूर्वमीमांसामें क्मयुक्त पुरुषार्थत्व सिद्ध किया गया है।
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अंध्यांसावेचार] भापानुवांदसहित ३६५ ननु विचारकर्तव्यतामात्रं प्रथमसूत्रस्याऽर्थः, तत्राऽसूत्रिते विपयप्रयोजने वेदा न्तविचारसम्बन्ितया किमिति उपपाद्येते इति चेत्? उच्येते एवाडर्थतो विपय- प्रयोजने। तथाहि-इष्टसाघनतैव विधायकानां लिङ्-लोद-तव्य-प्रत्ययानामर्थ इति तावदुचरत्राऽभिधास्यते। मोक्षकामेन ब्रह्मज्ञानाय चेदान्ता विचारयितव्या इृत्यस्मिन् सूत्रवाक्ये तव्यप्रत्ययेन धात्वर्थस्य विचारस्य सामान्येनेष्टसाध- नता घोध्यते। तत्र किं तदिष्टमिति विशेपाकारेण फलजिज्ञासायां स्वर्गादि- वदधिकारिविशेपणतया मोक्ष एव विचारफलत्वेनाऽवगम्यते। ब्रह्मज्ञानं तु वात्वर्थविचारसाध्यत्वात् फलीभूतमोक्षसाधनत्वाच्च अपूर्ववद्वान्तर-
यदि ऐसी शब्का हो कि प्रथम सूत्र 'अथातो व्रह्मजिज्ञासा' का तात्पर्य तो विचार-कर्तत्यतामात्र अर्थात् त्रह्मविषयक विचार करना चाहिए-इसमें ही है। उस सूत्रमें जिनका प्रतिपादन नहीं किया गया है, ऐसे विपय और प्रयोजन वेदान्त-विचारके सम्बन्धी हैं, ऐसा क्यों कहा जा रहा है? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि सूत्रसे अर्थ द्वारा विपय और प्रयोनन कहे ही गये हैं। [सूत्रसे ही विषय तथा प्रयोजनकी अर्थतः सिद्धि दिखलाते हैं-] क्योंकि आगे जाकर कहा जायगा कि विधिका प्रतिपादन करनेवाले लिड, लोट्, तव्य आदि प्रत्ययोंका अर्थ इष्टसाधनता ही है। 'मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको न्रह्मन्ञानकी मासिके लिए वेदान्तशास्त्रोंका विचार करना चाहिए, इस प्रकारके सूत्रार्थको प्रकाशित करनेवाले वाक्यमें तव्यप्रत्ययसे धातुके विचाररूप अर्थमें इएसाधनताका बोधन होता है। वह इष्साधन वस्तु क्या है? इस प्रकार विशेप जिज्ञासाका उदय होनेपर स्वर्गादिके तुल्य अधिकारीके विशेपण होनेसे मोक्ष ही विचारके फलरूपसे प्रतीत होता है। ब्रह्मज्ञांन तो धातुके अर्थके विचारसे साध्य होनेके कारण और मोक्षरूप फलका कारण होनेसे अपूर्व-मटृष्ट-के तुल्य अवान्तर व्यापार होगा। [जैसे 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि श्रतिसे स्वर्गकाम-स्वर्गकी कामना रखनेवाला-अश्वमेध आदिका अधिकारी कहा गया है, इसमें स्वर्ग विशेषण है, अतः अधिकारीके विशेषणरूपसे स्वर्ग ही अश्वमेधादि यज्ञोंका प्रधान फल माना गया है, परन्तु कारणका कार्यके अव्यवहित पूर्वमें रहना, यह नियम है। कालान्तरमें भावी स्वर्गके प्रति उक्त यागोंकी कारणताकी रक्षाके लिए तवतक स्थायी यज्ञजन्य अपूर्व-पुण्य-ही
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३६६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सुत्र १, वर्णक १
व्यापाररूपं भविप्यति। ननु नेष्टसाधनता लिडादिग्रत्ययार्थः, किन्तु नियोगो मानान्तरा- गम्यः, स च धात्व्थेपु नियोज्यं नियुद्ञानः सामर्ध्याद्दात्वर्थेडस्य फल- साधनत्वं कल्पयतीति।
मध्यमें अवान्तर व्यापार माना गया है। वैसे ही 'आत्मा वा अरे द्ष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादि श्रुतियोंसे वेदान्तविचारमें मोक्षकामनावालेका अधिकार होनेसे मोक्ष ही विचारशास्त्रोंका मुख्य फल है, परन्तु वह आत्मज्ञानके बिना अनुपपन्न है, अतः ब्रह्मज्ञानमध्यवर्ती अवान्तर व्यापार मानना चाहिए, यह तात्पर्य है।] शङ्ा-लिडादिप्रत्ययका अर्थ इष्टसाधनता नहीं है, किन्तु नियोग (कार्य) ही है, जो कि किसी दूसरे प्रमाणसे नहीं जाना जा सकता। और वह-लिझादिका अर्थ-नियोग (अपूर्व) रूपी धातुके अर्थ यागादिमें अधिकारीको नियुक्त करता हुआ सामर्थ्र्यसे धात्वर्थमें फलसाधनताकी कल्पना करता है। [ तात्पर्य यह है कि जसे लोकमें लिडादिसे कार्यका ही बोध होता है, वैसे ही वेदमें भी कार्य ही लिडादिका अर्थ होगा। 'घटं कुरु' इत्यादि वाक्यके बिना कार्यकी प्रतीति नहीं होती, इसलिए 'अनन्यलभ्य' ही शब्दार्थ मानना चाहिए। इष्साधनत्व तो प्रत्यक्षदर्शनादिसे उत्पन्न व्याप्तिग्रहादि या आवापोद्वापसे भी गृहीत हो सकता है। परन्तु यज्ञ-यागादि कार्य क्षणभङ्गर होनेसे कालान्तरभावी स्वर्गादिके कारण नहीं हो सकते, अतः 'यजेत' इत्यादि वैदिक लिजादिका अर्थ अपूर्वात्मक नियोग मानना चाहिए, जो स्वर्गादिकी प्राप्ति तक बना रहता है। इस प्रभाकरसिद्धान्तके अनुसार 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि श्रुतिवाक्योंका 'स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले पुरुषकी कृतिका लक्ष्य और यागको विपय करनेवाला नियोग' इस रीतिसे अर्थवोध होता है। इसमें स्वर्गकामी नियोज्य अधिकारी और याग विषय सिद्ध होता है। यदि याग अभीष्ट स्वर्गका हेतु न हो, तो स्वर्गकामीके प्रति याग निर्दिष्ट नियोगका विषय नहीं हो सकता। इसलिए 'यजेत' इत्यादि लिड्से नियोग अनुपन्न होता हुआ याग और स्वर्गमें कार्यकारणभावकी कल्पना करता है। इस प्रकार. प्रभाकर इष्टसाधनत्वको लिङ्का अर्थ नहीं मानता।]
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अध्यासविचार ] भापानुवादसहित ३६७
नेतत्सारम्, अनुपपत्यभावात्। किं घात्वर्थस्य फलसाधनत्वमन्तरेण नियोगस्य स्वरूपमनुपपन्नमुत तत्प्रवर्तकत्वमनुपपन्नम् १ नाडडद्यः, असत्यपि फले नित्य-नमित्तिक-नियोगस्वरूपस्य सत्वात्। द्वितीयेऽपि किं नियोग: फलकामनामपेक्ष्य प्रवर्तक: उत स्वयमेव प्रवतकः ? आद्ये फलकामनैव ग्रवर्तयतु कि नियोगेन : अ्रत्यक्षादिपु फल- कामनायाः प्रवर्तने स्वातन्त्रयदर्शनात्। द्वितीये नदीवेगादिवनियोग: फल- कामनारहितमपि पुरुषं वलात् अ्रवर्तयेत्। तथा च तत्प्रवर्तकत्वं धात्वर्थस्य
समाघान-यह मत युक्तियुक्त नहीं है, कारण कि यहांपर अनुपपत्ति नहीं है अर्थात् नियोगकी अन्यथा भी उपपत्ति हो सकती है। [अनुपपत्तिके निरासके लिए विकल्प करते हैं-] क्या यजादि घातुओंके अर्थ यागादिके फल- स्वर्गादि-के कारणके विना लिडर्थ नियोगका स्वरूप ही नहीं बन सकता ? या उस नियोगमें धात्वर्थ यागादिमें प्रवर्तकत्व नहीं वन सकता? अर्थात् यागमें स्वर्गकारणत्वग्रहके बिना नियोग यागादिमें प्रवृत्ति नहीं करा सकता ? प्रथम कल्प युक्त नहीं है, क्योंकि फल न रहते हुए भी नित्य, नमित्तिक विधिस्थलोंमें नियोगका स्वरूप बना ही रहता है। [ 'राहपरागे स्नायात्, अहरहः सन्ध्या- मुपासीत' (सूर्य-चन्द्रग्रहणमें सनान करना चाहिए, इत्यादि अथवा प्रतिदिन सन्ध्योपासन करना चाहिए) इत्यादि नित्य विधियोंमें किसी फलविशेपका श्रवण नहीं है और लिसर्थ नियोगका स्वरूप विद्यमान है, इससे धात्वर्थका फलविशेपसे सम्बन्ध होनेपर ही नियोगका स्वरूप वनेगा, ऐसा नहीं माना जा सकता।] दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस कल्पमें क्या नियोग फलकी इच्छासे ही प्रवृत्ति कराता है? अथवा स्वयं [कामनाकी अपेक्षा न रखकर ही ] प्रवर्तक है? प्रथम पक्षके माननेमें तो फलकामना ही प्रवृत्ति करा देगी, अतिरिक्त नियोगसे क्या प्रयोजन : [प्रत्यक्ष आदि स्थलमें फलकामनाको स्वतन्त्ररूपसे प्रवर्तकत्व देखा गया है। घटादिके प्रत्यक्ष दर्शनसे जलाहरणादि कामनासे 'कुरु कार्यम्' इत्यादि नियोगके बिना भी जलाहरणादिमें प्रवृत्ति हो जाती है। ] यदि स्वयं प्रवर्तक है, ऐसा दूसरा पक्ष मानो, तो नदीवेगके तुल्य फलकी इच्छा न रखनेवाले पुरुपको भी जवर्दस्ती यज्ञ-यागादिमें प्रवृत्त करेगा। [ जैसे नदीका चेग बह जानेकी इच्छा न रखनेवालेको भी वहा ले जाता है, वैसे ही नियोग हठात् सबको कार्यमें प्रवृत्त कर देगा।] इससे निष्कर्ष यह निकला कि धात्वर्थ यागादिमें स्वर्गादि
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३६८ विचरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
फलसाधनत्वाभावेऽपि उपपन्नम्। अन्यथा नदीवेगोऽपि फलसाधने प्रवर्तवेत्। नियोगमात्रस्य धात्वर्थफलसम्वन्धाकल्पकत्वेऽपि फलकामिना ग्रमीयमाणी नियोगस्तत्कल्पकः इति चेत्, न; अन्राऽि तयोः सम्वन्धमन्तरेणाऽनुपपत्यभावात् । न तावत् काम्यफलस्य धात्वर्थसाध्यत्वमन्तरेणाऽधिकारिविशेपणत्वमनुपपन्नम् १ जीव- नादीनामसाध्यानामपि 'यावज्जीवं जुहुयात्' इत्यादिष्वधिकारिविशेपणत्वदर्श- नात्। असाध्यस्व्भावानां तथात्वेऽपि साध्यस्वभावस्य फलस्याऽधिकारिविशेप- णत्वं धात्वर्थसाध्यतया विनाऽनुपपन्नमिति चेत्, न; किं साध्यस्वभावस्येत्यत्र साध्यशब्देन धात्वर्थसाध्यत्वं विवक्षितम् उत साध्यत्वमात्रम् १ आद्ये कल्प्य- फलके प्रति कारणताकी प्रतीति न होनेपर भी नियोग पुरुपकी प्रवृत्ति करा सकता है। अन्यथा-यदि ऐसा न मानो, तो-नदीका वेग भी किसी अमीष्ट फलके होनेपर ही प्रवृत्ति करावेगा। [ परन्तु ऐसा है नहीं, अतः प्रभाकर- सिद्धान्त सङ्कत नहीं है।] शङ्का-यद्यपि सामान्यतः नियोग (साधारण धात्वर्थ) तथा अमीष्ट फल दोनोंके परस्पर कार्यकारणभावरूप सम्बन्धकी कल्पना करनेवाला नहीं चन सकता, तथापि स्वर्गादि फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुपसे जाना गया नियोग [अर्थात् पुरुषके प्रति 'स्वर्गकामो यजेत्' इत्यादि श्रुतिवाक्यमें आए हुए लिड़् द्वारा उपस्थित कराया गया नियोग तो धात्वर्थ यागादिका स्वर्गादि फलके साथ कार्यकारणभाव सम्बन्धमें नियामक अवश्य ही होगा। समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें भी उनका सम्वन्ध न होनेपर अनुपपत्ति नहीं है, कारण कि कामनाके विषय स्वर्गादि फलोंको धात्वर्थ यागादिसे सिद्ध न मानकर अधिकारीके विशेषण होनेमें कोई अनुपपत्ति-बाघा- नहीं है, क्योंकि 'जबतक जीवन है तवतक हवन-अगिहोत्र-करे' इस वाक्यमें किसी भी धातुके अर्थसे सिद्ध न होनेवाले जीवन आदि मी अधि- कारीके विशेषण होते हुए देखे गये हैं। जीवनादि जो साध्य फल नहीं हैं, उनके विषयमें ऐसा माननेपर भी साध्यस्वमाव-सिद्ध होनेवाले- स्वर्गादि फलोंका तो धात्वर्थसे उत्पन्न होनेवाले माने विना अधिकारीका विशेषण होना सङ्गत नहीं है, यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि क्या साध्यस्वभाव यहांपर साध्यपदसे घात्वर्थ द्वारा साध्य-सिद्ध होने लायक- अर्थ लेना है या केवल साध्यत्व ही प्रथमपक्ष माननेमें कल्प्य और कल्पकके
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अध्यासविचार] भापानुवादंसहित ३६९
कल्पकयोरभेदात् आत्माश्रयापत्तिः। द्वितीयेऽपि किं स्वर्गस्य साध्यत्वं शब्दात् प्रतीयते उत अर्थात् १ नाऽडद्य:, वाचकपदाभावाद। न द्वितीय:, कल्पका- भावात्। नहि स्वर्गस्य साध्यत्वमन्तरेण किश्चिदनुपपन्नं पश्यामः । स्वर्गस्य साध्यत्वाभावे कामियोगोऽनुपपन्न इति चेत्, एवमपि नाडस्याऽधिकारिविशे- पणत्वम् , यद्लात् धात्वर्थस्य साध्यता कल्प्येत। यथा 'शुष्कदण्डी देव- दत्त:' इत्यत्र दण्ड एव देवदत्तविशेपणम्, शुष्कत्वं दण्डविशेपणम्, तथा
अभेद होनेसे आत्माश्रय दोप हो जायगा। [अर्थात् जिस धात्वर्थसे फलका कार्यकारण- भाव सम्बन्ध सिद्ध करना अभीष्ट है, उसी धात्वर्थसे फलमें तुम साध्यत्व मानते हो, इस . परिस्थितिमें धात्वर्थसाध्यत्व ही करप्य-कल्पक कोटिमें भ जाता है। अथ च स्वर्गादि यागसाध्य है, इस प्रकार स्वर्गादिमें यागसाध्यत्वकी सिद्धि यागमें स्वर्गादिजनकताकी सिद्धिके अनन्तर ही होगी और यागमें स्वर्गजनकत्वकी सिद्धि स्वर्गमें यागसाध्यत्वकी सिद्धिके अनन्तर ही हो सकती है। ] साध्यत्वसामान्यपक्षमें भी क्या स्वर्गमें साध्यत्वकी प्रतीति उसके वाचक किसी शब्दके द्वारा होती है? अथवा अर्थात् होती है? प्रथम करप युक्त नहीं है, कारण कि कोई वाचक पद यहांपर नहीं है। दूसरा भी ठीक नहीं है, कारण कि उस अर्थका कोई कल्पक नहीं है। [ वाचक पदके विना उसके अर्थकी प्रतीति अध्याहार या अनुपपत्तिमूलक आक्षेपसे ही हो सकती है। जैसे-'पीनोडयं देवदत्तो दिवा न भुङके' इत्यादि स्थलमें पीनत्वकी अनुप- पत्ति रात्रिभोजनकी अर्थात् प्रतीति करा देती है। वैसे ही 'प्रविश' या 'पिण्डीम्' इत्यादि स्थलोंमें क्रियाकारकभावकी अनुपपत्तिसे ही शव्दाध्याहार अथवा अर्था- ध्याहार द्वारा 'गृहम्' या 'भुङ्क्ष्व' इत्यादि अर्थोंकी कल्पना होती है। इस प्रकार प्रकृतमें अनुपपत्ति आदिका अभाव दिखलाते हैं-] यदि स्वर्ग साध्य न भी माना जाय, तो भी हम कोई अनुपपत्ति यहांपर नहीं पाते। स्वर्गको साध्य न माननेपर स्वर्गादिकी कामना रखनेवाले पुरुपके प्रति नियोग नहीं हो सकता, इससे उसे साध्य मानेंगे, ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि ऐसा माननेपर भी स्वर्गादिका अधिकारीका विशेपण होना सिद्ध नहीं है, जिसके बलपर स्वर्गादिमें धात्वर्थ यागादिके साध्यभावकी कल्पना की जा सके। जैसे 'देवदत्त शुष्क-सूखे हुए- दण्डको धारण करनेवाला है' इस वाक्यमें दण्ड देवदत्तका विशेषण है और शुष्क दण्डका विशेषण है, वैसे ही [ 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि श्रुतिवाक्यसे] ४७
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३७० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक १
'स्वर्गकामोऽधिकारी' इत्यत्राऽपि कामनैवाधिकारिविशेपणम्, स्वर्ग: काम- नाया: विशेषणम्, कामनाद्वारा स्वर्गस्याऽधिकारिविशेषणत्वं स्यादिति चेत, तथापि न तस्य धात्वर्थसाध्यता सिध्धति, 'अध्येतुकामो मैक्ष्यं चरेत्' इत्यत्र साध्यस्वभावस्याऽधिकारिविशेपणस्याऽप्यध्ययनस्य धात्वर्थभृत- मैक्ष्यचरणसाध्यत्वादर्शनात्। 'द्रव्यकामो राजानं धर्मकामो यज्ञान्ं उपसेवेत' इत्यादौ चैपरीत्यमपि दृष्टमेवेति चेत्, तर्हिं स्वर्गतत्कामनयोरधिकारि- विशेपणत्वमेव दुर्निरूपम्। तथाहि-न तावत् स्वर्गकामपदं दर्शपूर्णमास- नियोगस्य पुरुपेणाडयोगं व्यवच्छिनत्ति, नित्यविधित्रलादेवायोगव्यव च्छेदस्य सिद्धेः। नाऽपि तदन्ययोगव्यवच्छेदकम्, अस्वर्गकामस्य दर्श- पूर्णमासव्यवच्छेदे नित्यविधिविरोधात्। नित्यनियोगाद् भिन्नो हि काम्य- 'स्वर्गकी कामनावाला अधिकारी है' यहांपर कामना-इच्छा-ही अधिकारीका विशेषण है और स्वर्ग इच्छाका विशेषण है। यदि कामनाके द्वारा स्वर्ग अधिकारीका विशेपण मान लिया जाय, तो भी वह धात्वर्थके द्वारा साध्य नहीं हो सकता। [अधिकारीके विशेषणके साध्य होनेमें व्यभिचार दिखलाते हैं-] 'अध्येतुकामो मैक्ष्यं चरेत्' (अध्ययनकी इच्छा रखनेवाला भिक्षाचरण करे) इस वाक्यमें यद्यपि साध्यस्वभाव अध्ययन अधिकारीका [उक्त रीतिसे ] विशेषण है, तो भी मिक्षाचरणरूपी (भीख मांगनारूप) प्रकृत घात्वर्थका वह साध्य नहीं पाया जाता है। 'द्रव्यकी इच्छासे राजाका और धर्मकी इच्छासे यज्ञोंका सेवन करे' इत्यादि वाक्योंमें पूर्वोक्त दष्टान्तसे वैपरीत्य [अर्थात् परम्परा- रूपसे अधिकारीके विशेषणभूत द्रव्य, धर्म आदि प्रकृत घात्वर्थ सेवनादिके साध्य] मी देखा ही गया है, यदि यह कहा जाय, तो स्वर्ग तथा स्वर्गकी इच्छा ये दोनों अधिकारीके विशेषण सिद्ध नहीं किये जा सकते, क्योंकि प्रथम तो 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि वाक्यमें आया हुआ स्वर्गकामपद दर्शपूर्णमास-नियोगके अधिकारी पुरुषके साथ सम्बन्धाभावकी व्यावृत्ति नहीं करता, क्योंकि उक्त स्थलमें नित्यविधिकी सामर्थ्यसे ही सम्चन्धाभावकी व्यावृत्ति सिद्ध है। और उससे अन्यके साथ सम्बन्धाभाव [अर्थात् स्वर्गकाम अधिकारीका ही दर्शपूर्णमाससे सम्बन्ध है, दूसरेका नहीं ] का भी बोधक नहीं है, क्योंकि स्वर्गकी कामना न रखनेवाले अधिकारी पुरुषका दर्शपूर्णमाससे सम्बन्धाभाव बोधन करनेसे तो नित्यविधिका विरोध होगा। नित्य नियोगसे काम्य नियोग भिन्न है।
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मध्यासविचार ] भांपानुवादसहित ३७१
नियोगः। तत्राऽयोगान्ययोगव्यवच्छेदे नाडस्त्युक्तदोप इति चेद्, मैनम् यद्यपि यावज्जीववाक्येन बोध्यो नित्यनियोग, काम्यनियोगय्च स्वर्ग- कामवाक्यवोध्य:, तथापि साङ्गदर्शपूर्णमासनियोगस्योभयत्रैकत्वेन प्त्य-
न च अधिकारिविशेषणत्वाभावे स्वर्गकामपदवैय्थ्य शङ्कनीयम्, यथा 'दुण्डी प्रेपानन्वाह' इत्यादौ ऋत्विजः प्रैपानुवक्तु: प्राप्तत्वात् दण्डिविशेषण- परं वाक्यं यत्ग्रैपानन्वाह तद्दण्डी सन्निति, तथा स्वर्गकामपदमपि विशेषण- स्वर्गपरम्। तदुक्तं पार्थसारथिना-
उस काम्य नियोगमें अयोगकी-सम्बन्धाभावकी-और अन्ययोगकी-दूसरेके साथ सम्बन्धकी-व्यावृत्ति माननेमें कहा गया (नित्यविधिविरोध) दोप नहीं आता, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यद्यपि नित्य नियोग-नित्य विधि-'यावजीवं जुहुयात्' इत्यादि वाक्यगत यावज्जीव-जीवनपर्यन्त-पदसे सूचित होता है और काम्यविधान 'स्वर्गकाम' पदसे ज्ञात होता है तथापि अपने अद्गोंके सहित दर्यपूर्णमास नियोगविधिका काम्य तथा नित्य दोनों स्थलोंमें ['स्वर्गकामो यजेत' इस प्रकरणमें भी और 'यावज्जीवं जुहुयात्' इस नित्यविधिमें ] भी एक-सा ही प्रत्यभिज्ञान होनेसे [नित्य और काम्य दोनों स्थलोंमें ] कोई भेद नहीं है। ऐसे स्थलोंमें नित्य तथा काम्य, इस प्रकारका विभाग तो केवल अधिकारमेदसे ही है। और यह भी कहना उचित नहीं है कि स्वर्ग या उसकी इच्छाको अधिकारीका विशेषण न माननेसे स्वर्गकामपद व्यर्थ हो जायगा, कारण कि जैसे 'दण्डधारण करता हुआ प्रेपोंका अनुवदन करे' इत्यादि वाक्योंमें प्रैपोंका अनुवदन करनेवाले ऋत्विक्के प्राप्त होनेसे वह वाक्य दण्डिचिशेषणपरक माना जाता है अर्थात् 'प्रैपका अनुवदन दण्डी होता हुआ ही करे'। [ तात्पर्य यह है कि ग्रैषानुवचन तो 'मैत्रा- वरुण: प्रेप्यति चान्वाह' इस वाक्यसे सिद्ध ही है। 'दण्डी प्रैपानन्वाह'. इस वाक्यका प्रैपानुवचनकर्ताके दण्डविशेषणमात्रमें तात्पर्य है, इससे दण्डमें अधिकारि- विशेपणत्व नहीं आता। ] वैसे ही प्रकृतमें स्वर्गकामपद भी केवल विशेपणीभूत स्वर्गतात्पर्यक ही है। [ इसका विशिष्ट पुरुपके अधिकारके बोधनमें तात्पर्य नहीं है। ] इस विपयमें पार्थसारथिने कहा है-
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३७२ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
'अपेक्षित्वाद्भाव्यस्य कामशव्दो हि तत्पर:। विशेपणप्रधानत्वं दण्डीत्यादिपु दर्शतम् ।।' इति। स्वर्गकामपदस्य फलमात्रपरत्वेऽप्यर्थादधिकारी लभ्यते। घात्वर्थस्य यागस्य स्वर्गसाधनत्वे लिङादिप्रत्ययै्वोधिते सति मदपेक्षितफलसाधनमिदं कर्मेति कर्मण्यधिकारं पुरुपः स्वयमेव प्रतिपद्यते। एवं च फलपरं स्वर्ग- कामपदं साधनवचनेनाऽन्विताभिधानमर्हति, तच्चेष्टसाधनतायास्तव्याद्यर्थत्े
भाव्यकी-यागादिसे जिसकी भावना-उत्पादना-करनी हो उसकी-अपेक्षा होती है, इस अपेक्षासे कामशब्द अर्थात् स्वर्गकामपद दिया गया है, जो कि भाव्य-सवर्गादिरूप-अर्थका बोधन करता है, क्योंकि[ इसमें शक्ा होती है कि स्वर्गकामपद तो धर्मी पुरुपविशेपका वाची है, उसका तात्पर्य धर्ममें-स्वर्गादिमें-कैसे होगा? दष्टान्त द्वारा उक्त शङ्ाका उत्तरार्द्वसे वारण करते हैं-] 'दण्डी' इत्यादि पदोंमें विशेषणकी-धर्मकी-प्रधानता देखी गयी है। [ यहांपर दण्डीपदसे 'दण्डी प्रैपानन्वाह' इत्यादि वाक्यगत 'दण्डी' पद लेना चाहिए, उसका तात्पर्य दण्डरूप विशेषणमें ही है। यह पहले ही कह आये हैं। ] [ ऐसा माननेसे तो अधिकारीका लाभ नहीं होगा, इस आशक्काके अभिप्रायसे समाधान करते हैं-] यद्यपि स्वर्गकामपदका विशेपणान्वित फल- मात्रका बोधन करनेमें तात्पर्य है, तथापि अधिकारी अर्थतः प्राप्त हो जाता है। लिङादिप्रत्ययोंके द्वारा धात्वर्थ यागमें स्वर्गकी कारणताक्ता बोध होनेपर मेरे अभीष्ट फलको उत्पन्न करनेवाला यह [ 'यजेत' इत्यादि श्रुतिबोधित यागादि ] कर्म है, इतना ज्ञान होनेपर ही पुरुष उस कर्ममें अपना अधिकार स्वयं जान जाता है। इस निर्णयके अनुसार फलवोधनके तात्पर्यसे प्रयुक्त स्वर्गकामपद साधनवचनके साथ अन्वित होकर ही अपने अर्थको कहता है। [ तात्पर्य यह है कि 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि श्रतिवाक्योंमें पहले लिडादि प्रत्यय द्वारा यागमें इष्टसाधनत्वकी प्रतीतिके अनन्तर याग किसका इष्टसाधन है, इस जिज्ञासाका निराकरण स्वर्गकामपद करता है। इस स्वर्ग- कामपदका स्वर्गबोधनमें तात्पर्य होनेसे उसको अपने साधक हेतुकी अपेक्षा होती है। इस आकाह्लाकी ही 'यजेत' आदि लिडन्तपदसे पूर्ति होती है।
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अध्यासविचार] भापानुवांदसहित ३७३
सिध्यति, न नियोगस्य तदर्थत्वे। तस्मात् न नियोगो लिडादिग्रत्ययार्थः। अन्ये पुनर्धात्वर्थस्वर्गयोः साध्यसाधनसम्वन्धावगममेवमाहु :- विपय- नियोज्याभ्यां विशिष्टो नियोगस्तावद्विधिवाक्यादवगम्यते। विपयो याग, नियोज्य: स्वर्गकाम:, तयोश्र कर्मकर्तरूपेण परस्परान्वयो नियोगनिष्पन्य- न्यथानुपपच्याऽवगम्यते। अन्वयाभावे नियोज्येन विपयेऽननुष्ठीयमाने तदनुष्ठानसाध्यो नियोगो न निप्पदते। तत्र यथा दण्डिनाऽन्वीयमानस्य दण्डनाऽप्यन्वयस्तथा स्वर्गकामविशिष्टनियोज्येनाऽन्वीयमानस्य यागस्य
अतः विशेषणीभूत स्वर्गादिपरक पद भी इएसाधनताके बोधक 'यजेत' आदि पदोंके अर्थसे अन्वित अर्थका ही बोध कराते हैं। अतः 'यजेत' आदि लिङ्का वाच्य अर्थ नियोगरूप नहीं हो सकता ।] और स्वर्गकामादि पदोंकी साधन- बचनके साथ अन्वित अर्थका चोष करानेकी योग्यता तभी सिद्ध हो सकती है, जब इषसाधनत् ही 'तव्य' आदि मत्ययोंका अर्थ मान लिया जाय। नियोगको उन अत्ययोका अर्थ माननेमें उक्त योग्यता सिद्ध नहीं होगी। इस निर्णयसे नियोग सिसदिका अर्थ नहीं हो सकता। दूसरे वादी घात्वर्थ यागादि और स्वर्गादिका कार्यकारणसग्बन्ध निम्न प्रकारसे सिद्ध करते हैं-'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि विधिवाक्योंसे विषय और नियोज्य-अधिकारी-इन दोनोंरो विशिष्ट ही नियोग प्रतीत होता है। विषय है-याग, और स्वर्गकी इच्छा करनेवाला है-नियोज्य, इन दोनोंका कर्म और फर्ता रुपसे परस्पर अन्वय, नियोगनिष्पत्तिकी अन्यथा उपपत्ति न हो सफनेसे, पतीत होता है। [अतः विशिष्ट ही नियोग माना जागगा, एवं नियोज्य और विषयका परस्पर कियाकारकभाव सम्बन्ध अवश्य होगा ।] यदि उनका परस्पर अन्वय नहीं गाना जाय, तो नियोज्य पुरुपके द्वारा विषय यागादिका अनुछान न किये जानेपर उसके-नियोज्य पुरुपके-यागादिका अनुषान करनेपर सिद्ध होनेवाला नियोग सिद्ध ही नहीं हो सकेगा अर्थात् अनुछाताके बिना यागकी असिद्धि और याग न दोनेसे नियोगकी निष्पत्ति होना असम्भव है। 'दण्डी प्रैपानन्वाह' इस वाकयमें जैसे विशिष्ट दण्डीके साथ अन्चयको प्राप्त होनेवाले प्रेपानुवचनका दण्डके साथ भी अन्वय होता है, चैसे ही स्वर्गकामरूपी विशिष्ट नियोज्यके साथ अन्यको मारा होनेवाले यागके विशेपण स्वर्गका मी अन्वय होता है। [ अर्थात्
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३७४ i सूंत्र १, वर्णक १
विशेपणीभूतस्वर्गेणाऽप्यन्वयो भवति। स चाऽन्वयो गुणप्रधानभावाढते न सम्भवति। ततः स्वर्गस्य ग्राधान्येन यागस्य गुणभावेनाऽन्वये सति तयोः साध्यसाधनसम्बन्धः स्यादिति। नैतत्सारम्, उक्तरीत्या कर्तविशेपणभूतजीवनगृहदाहादिनाऽपि याग- स्याऽन्वयप्रसङ्गात्। अस्तु को दोप इति चेद्, उच्यते-तत्र किं जीवनादे- र्धात्वर्थ प्रत्यङ्गत्वेनाऽन्वयः किं वा प्राधान्येन१ आद्ये नित्यदर्शपूर्णमासाधि- कारिविशेषणस्य जीवनस्य दर्शपूर्णमासाङ्गत्वेन तद्विक्ृतौ सौर्यादावप्यन्वयः प्रसज्येत। तथाहि-'सौर्य चरुं निर्वपेद् ब्रह्मवर्चसकामः' इत्यनेन विहितस्य कर्मणो दर्शपूर्णमासविकृतित्वं निर्वपतिचोदनासामर्थ्या सिद्धम्। तत्र 'प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्या' इति अतिदेशेन प्रकृतिभूतदर्शपूर्णमासाङ्गानां विशेषणके साथ अन्वय विशिष्ट अन्वयके विना नहीं हो सकेगा ] और वह अन्वय गुणप्रधानभावके अतिरिक्त [समप्राधान्य ] सम्घन्धसे नहीं हो सकता। इससे स्वर्गका प्राधान्यसे और यागका गुणभावसे अन्वय माननेमें इन दोनोंका साध्यसाधन अर्थात् कार्यकारणभाव सम्बन्ध ही होगा। [ स्वर्ग अमीष्ट है, अतः उद्देश्य होनेसे कर्म होगा और याग क्रियास्वरूप होनेसे कारण होगा, इस ग्रकार 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि वाक्यसे याग द्वारा अपने अमीष्ट स्वर्गकी साधना करे, ऐसा नियोग बोघित होता है। ] आपका यह मत युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि [ विशेषणान्वयके बिना विशिष्टान्तय नहीं हो सकता, यह माननेमें अतिप्रसङ्ग दोप दिखलाते हैं-] आपकी उक्त रीतिसे विशेषणान्वयको विशिष्टान्वयके प्रति प्रयोजक माननेसे कर्ताके प्रति विशेषणीभूत जीवन, गह तथा दाह आदिसे भी यागका अन्वय प्राप्त हो जायगा। यदि अन्वय हो जाय, तो भी क्या दोप है ? यदि ऐसा कहो, तो दोष कहते हैं-जीवन आदिका धात्वर्थके साथ गुणभावसे अन्वय है? या प्राधान्यसे है ? यदि प्रथम कल्प मानो, तो दर्शपूर्णमासका अज्ञ होनेसे उसकी विकृति सौर्यादिमें नित्य दर्शपूर्णमासके अधिकारीके प्रति विशेषणी- भूत जीवनका भी अन्वय प्राप्त हो जायगा, क्योंकि ब्रह्मतेजकी इच्छा करनेवाला 'सौर्य चरुका निर्वाप करे' इस वाक्यसे विहित कर्म निर्वपनरूप चोदनाके बलसे दर्शपूर्णमासका विक्ृति याग है, यह सिद्ध है। उस स्थलमें 'प्रकृतिके तुल्य विकृति करनी चाहिए' इस अतिदेशसे प्रकृतिस्वरूप
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भाषानुवादसहित ३७५
विकृतौ प्राप्तिदर्शनात्, तदविशेपाज्जीवनमपि प्राप्तुयात्ततो यावज्जीवं सौर्ये चरुं निर्वपेदिति स्यात्। न च कामाधिकारेण नित्याधिकारस्य बाधाद- दोप इति वाच्यम्; यथा प्रकृतौ नित्यकाम्याधिकारस्तथा विकृतावपि प्रसङ्गात् । द्वितीये जीवनादे: प्राधान्येन स्वर्गादिवंत्साध्यत्वं स्यात् । तस्मात् फलविशेपपरं स्वर्गकामपद सामान्येन श्रेय:साधनत्वविध्यभिधायिना लिडादिपदेनाऽन्विताभिधानं करोति। नतु यदि लिडादिप्रत्ययरिष्टसाधनता विधीयते, तदा 'ज्योतिष्टोमेन यजेत' इत्यत्र तृतीया न सिध्ेत, तिङ्-कृत्-तद्धित-समासैरनमिहिते करणे कारके तृतीयाविधानात्। नाडयं दोप:, धात्वर्थस्य यागसामान्यस्य कारणत्वेऽभिहितेऽपि याग- दर्शपूर्णमासके अङ्गोंकी विककृतिमें प्राप्ति देखी गई है। इसमें कोई विशेष न होनेसे जीवन भी [ विक्कृतिमें ] प्राप्त होगा। इससे 'जीवनपर्यन्त सौर्य चरुका निर्वाप करे' ऐसा प्रसङ्ग आ जायगा। और काम्यविधानसे नित्याधिकारका वाध हो जायगा। [यदि 'सौर्य चरुम्' इत्यादि विधिमें भी यावज्जीवनका सम्बन्ध हो, - तो इसमें भी नित्यविधित्व प्राप्त हो जायगा। अतः यहांपर यावज्जीवनका सम्बन्ध नहीं होगा। ] इसलिए इसमें कोई दोप नहीं है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि जैसे प्रकृति याग (दर्शपूर्णमास) में नित्य और काम्य दोनोंका अधिकार है, वैसे ही विकृति यागमें भी दोनोंका अधिकार प्राप्त हो जायगा। [जीवनादिका प्रधानरूपसे धात्वर्थके साथ अन्वय है, ] इस द्वितीय पक्षमें जीव- नादिके प्रधान होनेसे स्वर्गादिके तुल्य उनमें साध्यत्व प्राप्त हो जायगा। [ अर्थात् जैसे स्वर्गादि यागसाध्य माने जाते हैं, वैसे ही जीवनादिको भी यागसाध्य मानना पड़ेगा । ] इससे अर्थात् धात्वर्थके फलस्वरूप स्वर्गादिके सम्बन्धकी सिद्धि न होनेसे स्वर्गात्मक फलविशेषके तात्पर्यसे प्रयुक्त स्वर्गकामपद सामान्यतः इषसाधनत्वविधिके अभिधायक लिडादिपदसे अन्वित अर्थका अभिधान करता है। शङ्का-यदि लिडादिप्रत्ययोंसे इष्टसाधनताका अभिधान होता है, तो 'ज्योतिष्टोमनामक यागसे यज्ञ करना चाहिए' इस वाक्यमें ज्योतिष्टोमपदसे तृतीया विभक्तिकी सिद्धि नहीं होगी, कारण कि तिड्, कृत, तद्धित और समाससे अभिहित न होनेवाले करणकारकमें तृतीयाका विधान होता है। समाधान-उक्त दोष नहीं आता, क्योंकि सामान्य यागस्वरूप धात्वर्थकी
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३७६ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक १
विशेपज्योतिष्टोमकरणत्वस्याऽनभिहितत्वाद्। तत इएसाधनताया विधायक- प्रत्ययार्थतायां न कोऽपि दोप:, तथा च 'मोक्षकामेन वेदान्ता विचारयि- तच्याः' इत्यनेन सूत्रवाक्येनाऽपि श्रेयोमात्रसाधनत्वे विचारस्याऽभिहिते सति अर्थात ध्रयोविशेपो मोक्षो विचारशासत्रप्रयोजनमिति लभ्यते। त्रह्मजिज्ञा- सेति शव्देन विपयोऽि सचितः । यद्यपि समन्वयाध्यायेनैव विषयोऽवग- म्यते चतुर्थाध्यायेन च प्रयोजनम्, तथापि प्रवृत्तिहेतुत्वात् ग्रथममूत्रेऽपि ते
तात्पयमिति सिद्धम् । इति श्रीविद्यारण्यमुनिप्रणीते विवरणोपन्यासे ग्रथमं वर्णकं समाप्तम्। कारणताका [लिड्के स्थानमें आए तिङ्प्रत्ययसे ] बोध होनेपर मी यागविशेष ज्योतिष्टोमगत करणकारकत्वका अभिधान [ उस लिड्से ] नहीं हुआा है। [थतः अनमिहित करणमें तृतीयाविभकिकी सिद्धि हो गई। ] इससे 'यजेत' आदि पद्घटक विधायक लिड्ादि प्रत्ययोंका इष्टसाधनतारूप अर्थ माननेमें कोई भी दोप नहीं आता। इस प्रकार प्रकृतमें 'मोक्षकी इच्छावालेको चेदान्तशास्त्रोंका विचार करना चाहिए' इस सूत्रवाक्यसे भी विचार करना अम्युदयमात्रका कारण है, ऐसा सूचित हो जानेपर अर्थात् सिद्ध हो जाता है कि अयोविशेष मोक्ष विचार- शान्बका प्रयोजन है। और त्रम्मजिज्ञासापदसे विषय भी सूचित कर दिया गया है। वद्यपि समन्वयाध्यायसे ही विपयकी प्रतीति होती है। और चतुर्थ अध्याबसे प्रयोजनकी प्रतीति होती है, तथापि विचारप्रवृत्तिके हेतुभून इन दोनोंकी सूचना प्रथम सूत्रनें भी आवश्यक है। [यहांपर सूत्नमें स्पष्ट क्यों नहीं कहा गया? अथवा सूतके अनेकार्थक होनेका दोप होगा, इत्यादि शह्काथोंका सवकाश नहीं है, क्योंकि ये दोनों बातें सूत्रके लिए भूषण ही हैं। सूत्रोका अर्थकी सूचना करना या बहर्षक होना ही लक्षण है, जैसा कि अभियुर्क्तोंने कहा है-
अस्तोगम नयं च सूत्रं सूत्नविदो विट्ुः ॥'] इस प्रकार पयोजनक होनेसे विचारशान्का आलम्भ अववय करना चाहिस, ह तारय है./ .. हुआ। रति णोपन्यास- .मथम्-
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पूर्वमीमांसासे उत्तरमीमांसाके गतार्थत्वकी शङ्का] भापानुवादसहित ३७७
अथ द्वितीयं वर्णकम आत्मा श्रोतव्य इत्यस्य विधेर्वेदान्तवाक्यगः । विचारो विपय: साक्षात् स निरुप्योऽत वर्णके।। वेदान्तव्यवधानेन व्ह्ैक्यं विपयो विधेः। निरुपितः स पूर्वस्मिन् वर्णके सग्रयोजन: ॥ वेदान्ता यदि शून्या: स्युर्विपयेण फलेन च। तदा दूरे तद्विचारोऽतस्तयोः पूर्वमीरणम्। सम्भाविते विचारेऽद्य पूर्वमीमांसया स किम्। गतो न वेति सन्देहे निर्णयोऽत्राऽभिधीयते।। ननु वेदान्तानामर्थनिर्णयाय न्यायकलापोऽपेक्षितः।सच 'अथातो धर्म-
द्वितीय वर्णक [प्रथम इलोकसे द्वितीय वर्णकके प्रमेयका संग्रह करते हैं-] 'आत्मा श्रतव्यः' (आत्माका श्रवण-विचार-करना चाहिए) इस विधि- वाक्यका साक्षात् विपय वेदान्तवाक्योंसे किया जानेवाला विचार है, उसका ही इस (द्वितीय) वर्णकमें निरूपण किया जायगा। [ द्वितीय श्लोकसे प्रथम वर्णकके प्रमेयका उपसंहार करते हैं-] वेदान्तशास्त्रोंके द्वारा ब्रम्मके ऐक्य-जीव और ब्रह्मके ऐक्य-(अथवा सर्व- तादात्म्य) रूप विषयका प्रथम वर्णकमें प्रयोजनके सहित निरूपण किया गया है। [तृतीय शरोकसे सर्वप्रथम विषय तथा प्रयोजनके निरूपणकी आवश्यकता दिखलाते हैं-] यदि वेदान्तशास्त्र विषय तथा प्रयोजनसे रहित हों अर्थात् इन शास्त्रोंका न तो कोई विषय हो और न कोई प्रयोजन हो, तो इनका विचार करना प्राप्त ही नहीं होता, इसलिए सर्वप्रथम इन दोनोंका (विषय और प्रयोजनका) वर्णन करना उचित है। वेदान्तोंके विपय तथा प्रयोजनके सिद्ध होनेपर उन वेदान्तोंका विचार करना अवश्य सम्भावित होता है, परन्तु अपेक्षित विचार पूर्वमीमांसशास्त्रसे गतार्थ है या नहीं, इस सन्देहका यहाँ निर्णय किया जाता है। वेदान्तवाक्योंका अर्थनिर्णय करनेके लिए न्यायवाक्योंकी अपेक्षा होती ४८
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३७८ विवरणत्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
जिज्ञासा' इत्यादिसूत्रैः सूत्रितः। न च विधिवाक्यार्थस्य तत्र निर्णयः प्रवृत्त इति वाच्यम्, कृत्स्वेदस्य विधिमात्रपरत्वात्। वेदान्ता: सिद्धपरा इति चेत, न ; तेपामप्यात्मा द्रष्टव्य इत्यादिज्ञानविधिपरत्वात्। तर्हि क्रिया- विधिकलापः पूर्वमीमांसायां निरूपितः ज्ञानविधिनिरूपणायोत्तरमीमांसाSS- रभ्यतामिति चेद्, न; उत्पत्तिविनियोगप्रयोगाधिकाराणां चतुणी विध्यपेक्षितरूपाणां क्रियायां निरूपितानां ज्ञानेऽपि न्यायसाम्बेन वोद्ुं शक्यत्वात्।
है। ऐसे न्यायवाक्योंका 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इत्यादि सूत्रोंसे प्रतिपादन किया गया है। उनमें केवल विधिवाक्योंके (कर्मकाण्डोंके) अर्थका ही निर्णय किया जाता है, ऐसा नहीं कहना चाहिये, क्योंकि सम्पूर्ण वेदवाक्योंका तात्पर्य विधिमें-क्रियाकलापात्मक कर्मकाण्डमें-ही है [अर्थात् कोई भी ऐसा वेदवाक्य नहीं है, जिसका विचार विधिवाक्योंके विचारसे पवृत्त पूर्वमीमांसामें न किया गया हो]। वेदान्तवाक्योंका सिद्ध वस्तुके प्रतिपादनमें तात्पर्य है [साध्यस्वरूप कर्मकाण्डमें नहीं ] यह कहना मी उचित नहीं है, कारण कि उनका (वेदान्तवाक्योंका) भी 'आत्मा द्रष्ट्यः' (आत्माका साक्षात्कार करना चाहिए) इत्यादि ज्ञानविधिमें तात्पर्य है। तब तो क्रियाकलापात्मक कर्मकाण्ड- विघिका निरूपण पूर्णमीमांसामें हो ही गया, सिद्ध वस्तुके विवेकात्मक ज्ञान- विधिके निरूपणके लिए उत्तरर्मीमांसाशास्त्रका आरम्भ किया जाय ? ऐसा कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि विधिवाक्योंसे अपेक्षित उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग तथा अधिकार इन चारोंका क्रिया-कर्मकाण्ड-में निरूपण किया गया है; इन्हें न्यायसाम्यसे ज्ञानमें भी जान सकते हैं, [ क्योंकि वाक्यार्थ तो सर्वत्र समान रीतिसे ही होता है ]। [अर्थात् क्रियाकलापकी सिद्धि इन चारोंके बिना नहीं हो सकती, अतः इनके ही कारण विधिवाक्योंमें विधिवाक्यत्व वनता है, अन्यथा नहीं। इससे सिद्ध होता है कि जिसको इन चारोंकी अपेक्षा हो, वही विधिवाक्य है। एवं ज्ञानको भी इन चारोंकी अपेक्षा होती है, इससे सिद्ध हुआ कि ज्ञान- विधि भी क्रियाकलापके तुल्य विधि ही है। इस तरह ज्ञान तथा किया इन दोनों विधियोंमें कोई वैषम्य नहीं है, यह तात्पर्य है।]
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संक्षेपसे पूर्वमीमांसाका पदार्थसंग्रह] भापानुवादसहित ३७९ तत्रोत्पत्तिविधिर्नाम कर्मस्वरूपमात्रबोधकः 'अग्निहोत्रं जहोति' इत्यादि:। तथाऽङ्गाङ्गिसम्बन्घवोधकः 'दभा जहोति' इत्यादिचिनियोगविधिः। साङ्गप्रधानकर्मण्यनुष्ठानवोधकः ग्रयोगविधिः ।स च श्रौत इति भाट्टाः। विध्याक्षेपलक्षणोपादानप्रमाणेन कल्पनीय इति ग्राभाकराः। फलकामिनो जीवनादिनिमिचवतो वा कर्मण्यधिकारप्रतिपादकोऽधिकारविधिः । त एते विधयः क्रियायां निरूपिता ज्ञानेऽपि यथायोगमुत्प्रेक्षितं शक्याः । अन्यथा क्रियामेकामुदाहृत्य निरूपिताः क्रियान्तरे पुनः प्रतिपादनीया: स्यु:।
[ उत्पत्ति आदि चारों विधियोंका विवेक दिखलाते हैं-] उनमें कर्मके स्वरूपमात्रका बोध करानेवाली विधि उत्पत्तिविधि है, जसे 'अग्निहोत्रं जुहोति' (अग्निहोत्र करना) इत्यादि। अङ्गाद्विमावरूप सम्बन्धका प्रतिपादन करने- वाली विधि विनियोगविधि है, जसे 'दवि-दही-से हचन करना' इत्यादि। अङ्ग सहित प्रधान कर्ममें अनुषठानका बोध करानेवाली विधि प्रयोगविधि है। वह प्रयोगविधि श्रौत-साक्षात् श्रुतिके तात्पर्यकी विषय-है, ऐसा भट्ृमतानुयायी कहते हैं। विधिके आक्षेपात्मक उपादानप्रमाणसे उस प्रयोगविधिकी कल्पना की जाती है, ऐसा प्रभाकारानुयायी मीमांसक कहते हैं। स्वर्गादि फलकी इच्छा रखनेवाले तथा यावज्जीवन झुचिकालकी रक्षाके निमित्त राहपरागमें स्नान आदिके लिए उपस्थित होनेवाले पुरुपके अश्वमेध आदि यागात्मक स्नान, संध्या आदि क्रियाकलापमें अधिकारका प्रतिपादन करनेवाली विधि अधिकारविधि है। इस प्रकार उक्त चारों विधियाँ, जिनका क्रियामें निरूपण किया गया है, ज्ञान- फाण्डमें भी यथायोग-जहांपर जिस प्रकार जिस विधिका समावेश हो सके- लगाई जा सकती हैं। अन्यथा इन चारों विधियोंका जिस एक क्रियाका उदाहरण देकर निरूपण किया गया हो उसी क्रियामें समझी जायँगी, दूसरी क्रियामें पुनः इनका निरूपण करना होगा।
अधिक आशङ्काओंसे (एकके निरूपणके अनन्तर मसङ्गसे क्रमशः प्राप्त हुई शक्काओंसे) [ उत्पन्न हुए सन्देहको ] दूर करनेके लिए दूसरे-दूसरे अध्यायोंके आरम्भके तुल्य एक शास्त्रके अनन्तर दूसरे शासत्रका आरम्भ करना
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३८० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ई
यम्। तथा हि-वेदाप्रा माण्यशङ्गायां प्रथमेऽध्याये तत्प्रामाण्यं निरूपितम्। सर्वकर्मैक्यशङ्कायां द्वितीये 'यजति', 'जुहोति' इत्यादिशव्दान्तरादिहेतुभिरुत्पत्ति- विधिसेदपूर्वक: कर्मभेदो निरूपितः। सर्वत्र समप्राधान्यशङ्गायां तृतीये श्चतिलि- लिङ्गादिप्रमाणैरड्वाङ्गिभाव उक्तः। चतुर्थे कत्वर्थत्वेनैतावतामनुष्ठानं पुरुपार्थ-
चाहिए। जैसे-वेदोंमें मामाण्यकी आशङ्काका उदय होनेसे [ वारह अध्यायवाली पूर्वमीमांसाके ] प्रथम अध्यायमें उनके म्रामाण्यका निरूपण किया गया है। सब प्रकारके कर्मोंमें एक ही प्रकारकी विधि प्राप्त होनेकी आशक्कासे द्वितीय अध्यायमें 'यजति' (याग करना), 'जुहोति' (हवन करना) इत्यादि दूसरे-दूसरे (भिन्न-भिन्न) शव्द आदि हेतुओंसे उत्पत्ति, विधि आदि भेदपूर्वक कर्मोंका भेद दिखलाया गया है। सभी विधिवाक्योंमें समानभावसे प्रधानता प्राप्त होनेकी शक्कासे तृतीय अध्यायमें श्रति, लिङ्गं आदि प्रमाणोंसे अझ्गाङ्विमार्वेका-गुणगुणिभावका अर्थात् किसीमें प्रधानत्व और किसीमें उसके उपकारकत्वका निर्णय किया गया है। चौथे अध्यायमें
(१) उत्पत्ति, प्रयोग, विनियोग और अधिकार-इस प्रकार चार भेद पहले दिखलाये गये हैं। चारोंका स्वरूपवर्णन आगे चलकर मूलमें ही होगा। (२) अ्त्यादि-न्याय इस प्रकार दिखलाया गया है-ध्रुतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्याना समवाये पारदौर्वल्यमर्थविप्रकर्षात' यह जै० सूत्र है। इसका तात्पर्य यह है कि सृत्रमें पठित श्रुति आदि जहांपर सब प्राप्त हों वहांपर परको बाघ कर पूर्व-पूर्वको मानना चाहिए। [ इसमें सूत्रकार अर्थविप्रकर्ष हेतु देते हैं। ] अर्थात् श्रुत्यादिमें लिन्ग आदि पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा पर-पर विलम्बसे अर्थका वोध कराते हैं, अतः पूर्वकी अपेक्षा पर दुर्चल हैं। जैसे-'न्रोहीन् अवहन्ति' यह श्रुति दूसरे प्रमाणकी अपेक्षा न रखती हुई स्वतः प्रमाणभूत है। यहांपर अवघातक्रियासे उत्पन्न अतिशयका भागी होना रूप कर्मपदार्थको द्वितीया विभक्तिकी क्रुति ही अपनी प्रकृतिके अर्थभूत ब्रीहिको क्रियाके प्रति शेपी-प्रधान-वतला रही है। इसमें दूसरे प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है। (३) अर्थविशेषका प्रकाश करनेकी सामर्थ्य लिह्नमें है, जैसे 'वहिदेवसदनं दामि' इस मन्त्रमें उपलादिलवनमें भी अजत्व प्राप्त हो सकता है, परन्तु शव्दसामर्थ्यसे पुरोडाशके संदनस्वरूप कुश, काश आदि स्वरूप मुख्य वर्हिका ही लवन लिया जाता है। कहा भी है- 'सामर्थ्य सर्वशब्दानां लिङ्गमित्यमिधीयते' अर्थात् शब्दसामर्थ्यका नाम लिन्ग है। (४) परस्पर आकाड्क्षादि द्वारा एक ही अर्थमें तात्पर्यका पर्यवसायक पदसमूह वाक्य
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संक्षेपसे पूर्षभीमांसाका पदार्थसंग्रह ] भापानुवादसहित ३८१
त्वेन चैतावतामिति निर्धारितम्। पश्चमे 'वाजपेयेनेश्ट गृहस्पतिसवेन यजेत' इत्यादौ क्रमो दर्शितः। पष्ठे कामिन इहाधिकारो जीवनादिनिमित्तवतश्चे- हेति विचारितम्। इति पूर्वपट्केन प्रकृतिविध्यपेक्षितो विचार: कृतः। समग्राङ्गसंयुक्तो विधि: प्रकृतिः। विकलाङ्गसंयुक्तो विधिर्विकृतिः । विकृति- विध्यपेक्षितो विचारः सपममारभ्योत्तरपद्केन कृतस्तत्रापि सप्मेन प्रकृत्यु- पदिष्टानामङ्गानां सामान्येन विकृतावतिदेशो निर्णीतः । इत्थं कुर्यादित्यु- पदेशस्तद्वत्कुर्यादित्यतिदेशः। अष्टमे तु प्रकृतिभूतायां दर्शपूर्णमासाख्या- यामिष्टावाग्ेयोऽपाकपाल इत्यत्र पुरोडाशप्रकृतिद्रव्यभूतानां व्रीहीणां ये निर्वापावघातग्रोक्षणादयो धर्मा अभिहितास्ते विकृतिभूतसौर्यचरौ व्रीहि-
इतनी विधियोंका अनुष्ान यज्ञका और इतनी विधियोंका अनुष्ठान पुरुपका उपकार करते हैं, यह निर्णय किया गया है। [ किसके अनन्तर किसका विधान हो, इस संशयकी निवृत्तिके लिए ] पाँचवें अध्यायमें 'वाजपेयनामक यागके अनन्तर 'वृहस्पतियज्ञसे याग करे' इत्यादि वाक्योंमें विधियोंका क्रम दिखलाया गया है। [अधिकारीकी जिज्ञासासे ] छढे अध्यायमें कामनावाले पुरुपके [काम्यविधिमें ] तथा जीवन आदि निमित्तवाले पुरुपके [नित्य-नेमित्तिकविधिमें ] अधिकारका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार पूर्वमीमांसाशासत्रके प्रथम छः अध्यायोंसे प्रकृतिविधिमें अपेक्षित विचार किया गया है। सम्पूर्ण अझ्गोंके सहित विधिको प्रकृति कहते हैं और अङ्गोंकी कमी रखनेवाली विधिको विकृति कहते हैं। इस विकृतिविधिका उपयोगी विचार, सातवं अध्यायमें आरम्भ कर, उत्तरार्द्के छः अध्यायोंमें किया गया है। उनमें भी सातवें अध्यायसे प्रकृतिमें उपदेशरूपसे कहे गये अङ्गोंका विक्ृतिमें अतिदेश होता है, ऐसा सामान्य नियम बतलाया गया है। 'ऐसा करे' इस प्रकारके कथनको उपदेश कहते हैं। और 'वैसा करे' इसको अतिदेश कहते हैं। आटवें अध्यायमें प्रकृतिस्वरूप दर्शपूर्णमासनामक इष्टिमें-यागमें-'आये- योऽषाकपाल:, (अग्निदेवतासम्बन्धी पुरोडाश आठ कपालोंमें पकाया जाता है) इस विधिमें पुरोडाशकी प्रकृतिरूप [जिन द्र्व्योंसे पुरोडाश बनाया जाता है] कहलाता है। जसे-'यस्य पर्णमयी जुट्ूः' (जिसकी पणमयी जुहू है।) इत्यादि वाक्यमें परस्पर समभिव्याहारसे पर्णता और जुह्मं अम्ञात्िभाव प्राप्त होता है।
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३८२ विवरणत्रमेयसंग्रह [सूंघ १, वर्णक २
द्रव्यसारुप्यद्वारेण चरुप्रकृतिभृतत्रीहिप्व्प्यतिदिश्यन्त इत्यादिविश्ेपातिदेशो निरूपित: । तदुक्तम्- 'सप्मेनातिदेशेन धर्मा: सन्तीति साधिते। ततोऽट्टमेन यो यस्य यतश्रेति निरूपणा ॥।' इति। नवमे तु प्रकृत्युपदिष्टमन्त्रसामसंस्कारकर्मणां चिक्रतावतिदिष्टानां प्रकृति-
द्रव्य धानोंके निर्वापे, अवघाते, प्रोक्षणँ आदि जो धर्म बतलाये गये हैं, उन धर्मोंका विकृतिभूत सूर्यदेवतासम्बन्धी चरु-हवनद्रव्य-में त्रीहिरूप दव्यके सादृश्यसे चरुके प्रकृतिभूत द्र्व्यमें भी अतिदेश किया जाता है, इस रीतिसे विशेष अतिदेशका निरूपण किया गया है। ऐसा कहा भी है- सप्तम अध्यायमें प्रतिपादित अतिदेशसामान्यसे धर्मोकी सत्तामात्रका साधन किया गया है, और जिस धर्मका जिससे अतिदेश किया जाता है, इस प्रकारका विशेष अतिदेश आठवं अध्यायमें कहा गया है। नचें अध्यायमें तो प्रकृतिमें उपदिष्ट और विकृतिमें अतिदेशसे
(१) कार्यान्तरकी अपेक्षाके बलसे दो वाययोंकी परस्पर आकायसासे एववाक्यताको प्रकरण कहते हैं। जैसे प्रयाजादिमें 'समिधो यजति' (रामिनका बाग) इत्यादि वाकगमें फल- विशेपका निर्देश न होनेसे इतना ही बोध होता है कि समिद्यागन भावना करे, परन्तु क्या भावना करे, ऐसी आकाछ्क्षा वनी ही रह नयी। एवं दर्शपूर्णमासवाकयमें 'दर्शपूर्ण- माससे स्वर्गकी भावना करे।' इतना ही बोध होता है। "ैसे करे' इति कर्तव्गताकी आकादक्षा बनी ही रहती है, इसलिए प्रयाजवाक्य और दर्शपूर्णमासवाकयोंमें, परस्पर साकादूक्ष होनेसे, अज्गाद्िभाव उपपन्न होता है। (२) कम अर्थात् देशसामान्य, वह पाठसादेशसे हो अथवा अनुष्ानसादेश्यसे हो, स्थान कहलाता है। जैसे 'इन्द्राग्निदेवताक एकादश कपालमें संस्कृत पुरोगशका निर्धाप करे, और विश्ानरदेवताक द्वादश कपालमें संस्कृत पुरोडाशका, इस प्रकार कनसे विहित कर्मोनें 'इन्द्राग्नी रोचनादिव' इत्यादि मन्न्रोंका यथासंखय प्रथम गन्न्नका प्रथम कमगें, द्वितीयका द्वितीयमें कमात्मक स्थानवलसे विनियोग होता है। (३) योगशब्दोंका योगार्थ समाख्या कही जाती है। जैसे 'होतुरिदं हौन्रम्' यहांपर शैपिक अणूके लसे होत्रपदसे विधीयमान कर्म होतासे ही किये जानेवाले होते हैं, इसी समास्याके वलसे 'औपनिषद' पदसे मी ब्रह्मज्ञानका साधन वेनान्तवाकय माना गया है। इनके परस्पर विरोधका उदाहरण विस्तारभयसे नहीं दिया गया है।
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संक्षेपसे पूर्वमीमांसाका पदार्थसंग्रह] भापानुवादसहित ३८३
चिकृत्योर्द्रव्यदेवताभेदे सति अकृतिगतद्रव्यादिशव्दं विहाय विकृतिस्थित- द्रव्यादिशब्दाध्याहारादिलक्षण ऊहो दर्शितः । तद्यथा 'अग्नये जुष्टम्' इति मन्त्रस्य विकृतौ सूर्याय जुष्टमिति पदप्रक्षेपः । दशमे तु विकृतावतिदिष्टा- नामङ्गानां ग्रकुतौ साचकाशानां विकृतिगतविशेपाङ्गोपदेशादिना वाधो दर्शितः। तद्यथा विकृतावतिदेशप्राप्तानां प्रकृतिसम्बन्धिवर्हिपां शरमयं वर्हिरिति विक्रतिगतविशेपोपदेशेन वाधः । तथा 'कृष्णलान् श्रपयेत्' इति विहिते विक्रतिभूते कृष्णलपाके प्राकृता अवघाताद्यः प्राप्ता, तत्र कृष्ण- लाख्येपु सुवर्णशकलेपु रूपविमोकासम्भवादवघातस्य बाधः । तथा 'तौ न पशौ करो' इति निपेधात् पशावाज्यभागयोर्वािः। एकादशे त्वनेकशेपिविधि-
प्राप्त मन्त्र, साम, संस्कार और कर्मोंका प्रकृति और विकृतिमें द्रव्य-सम्बन्धी देवताओंका मेद होनेपर प्रकृतिमें आये हुए शब्दोंका त्याग कर विकृतिमें आये हुए द्रव्यादि शब्दोंका अध्याहार आदिरूप ऊह दर्शाया गया है। जैसे कि 'अझये जुष्टम्' इस मन्त्रका विक्ृतिमें 'सूर्याय जुष्टम्' ऐसा पदप्रक्षेप किया गया है। दसवें अध्यायमें तो विकृतिमें अतिदिष्ट (अतिदेश द्वारा प्राप्त किये गये) जिन्होंने प्रकृतिमें अवकाश प्राप्त किया है अर्थात् जो चरितार्थ हैं-ऐसे अङ्गोंका विक्कृतिमें दर्शाये गये विशेष अङ्गोंके उपदेश आदिसे बाध दिखलाया गया है। जैसे विकृतिमें सामान्य अतिदेशवाक्यसे प्राप्त हुए प्रकृतिसम्वन्धी (प्रकृतिमें चरितार्थ हुए) कुशोंका 'शरमयं वर्हिः' (शरकण्डा कुश होना चाहिए) विकृतिमें किये गये विशेष उपदेशसे वाध होता है। एवम् 'कृष्णलोंका पाक करे' इस वाक्यसे प्रतिपादित विकृतिरूप कृष्णलपाकमें प्रक्कृतिमें होनेवाले अवधात आदि प्राप्त होते हैं। परन्तु वहांपर कृष्णलनामसे कहे जानेवाले सुवर्णके टुकड़ोंमें रूपका विमोक असम्भव है, इसलिए अवघातका वाध होता है। [ जैसे न्रीहि आदि द्रन्योमें अवघात द्वारा उनके तुपादिको पृथक् कर देनेसे प्रथमरूपका परित्याग सम्भव है वैसे सुवर्णके खण्डोंमें सम्भव नहीं है ]। तथा 'तौ पशौ न करोति' (उन दोनोंको पशुमें न करे) इस निषेधसे पशुमें आज्य भागोंका वाघ होता है। ग्यारहवें अध्यायमें अनेक शेपी-प्रधान-विधिमें प्रयुक्त शेष-उपकारक-विधिका एक बार अनुप्ठान कर देनेसे ही सम्पूर्ण शेषी विधियोंकी उपकारसमानता तन्त्रनामसे कही
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३८४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
प्रयुक्तस्य शेपस्य सकृदनुष्ठानादेव सर्वशेषिणासुपकारसाम्यरूपं तन्त्रनाम- कमुक्तम्। तद्यथा-आग्नेयोऽष्टाकपाल, उपांशुयागमन्तरा यजति, अन्नीपो- मीय एकादशकपाल इत्युक्तपौर्णमासकर्मप्रयुक्तस्य प्रयाजादे: सकृदनुष्ठाना- देव शेषित्रयोपकार इति। द्वादशे त्वेकशेपिप्रयुक्तशेपानुष्ठानस्यप्रयोजक- सामर्थ्यप्रयुक्तशेष्यन्तरेऽप्युपकार: प्रसङ्गाख्यो दशिंतः । तद्यथा पशुविधि- युक्ताङानां पशुपुरोडाशेऽप्युपकारः। तदेवं प्रत्यध्यायमाशङ्कान्तरनिराकरणेन विध्यसम्भेदो यथा निरूपितस्तथा प्रतिपत्तव्यस्य ब्रह्मणः अत्यक्षादिभिरसिद्ध- त्वात् प्रतिपत्तिविध्ययोगाशङ्कायां तन्निराकरणायोत्तरमीमांसाऽडरभ्यत इति । तदेतद्युक्तम्, अत्यक्षाद्यसिद्धानामपि यूपाहवनीयादीनां यथा सिद्धि- स्तथा ब्रह्मणोऽपि सिद्धौ पृथग मीमांसानर्थक्यात्। गई है। जैसे 'अभि देवताके निमित्त आठ कपालोंमें संस्कृत पुरोडाश, उपांशु- याग, अग्नीषोमीय एकादश कपालमें संस्कृत पुरोडाश, इस प्रकार उक्त पौर्णमास कर्ममें प्रयुक्त प्रयाज आदि अङ्गका एक बार अनुष्ठान करनेसे ही शेषी तीनोंका उपकार हो जाता है। बारहवें अध्यायमें एक शेषीसे प्रयुक्त शेषके अनुष्ठानसे पुनः अनुष्ठान न करानेवाले और अनुष्ठान करानेकी सामर्थ्य रखनेवाले दूसरे शेषीकी उपकारसिद्धिका प्रसङ्गनामसे निरूपण किया गया है। जैसे- पशुविधिके अङ्गोंका पशुपरोडाशमें भी उपकार हो जाता है। इस प्रकार प्रत्येक अध्यायमें दूसरी दूसरी आशङ्काओंको दूर करनेसे जैसे विघिके अंशोंका भेद निरूपित है वैसे ही ज्ञेय ब्रह्मकी प्रत्यक्षादि शब्देतर प्रमाणोंसे सिद्धि न होनेसे प्रतिपत्ति-ज्ञानविधि-का सम्बन्ध प्राप्त न होनेकी * आशक्काके उदय होनेसे उत्तरमीमांसा-वेदान्तविचारात्मक शास्त्र-का आरम्भ किया गया है। इस पूर्वोक्त प्रकारसे उत्तरमीमांसाके आरम्भकी आवश्यकताको सिद्ध करना युक्तिसङ्गत नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे सिद्ध न होनेवाले यूप- स्तम्भ-आहवनीय-अग्नि-आदि पदार्थविशेषोंकी जैसे सिद्धि होती है, वैसे ही ब्रह्मके भी सिद्ध हो सकनेसे अलग उत्तरमीमांसाशास्त्रका आरम्भ करना सार्थक नहीं हो सकता। * जव कोई प्रतिपत्तव्य सिद्ध हो तव उस्रकी प्रतिपत्तिके लिए विधि करना सम्भव है, परन्तु जव न्ञेय ही नहीं है, तो उसके लिए विधि कैसे सम्भव है?
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शास्त्रारम्भमें मतान्तरसे पूर्वपक्ष ] भापानुवादसाहित ३८५
अथ मतम्-'यूप तक्षति' इत्यादौ न यूपमृददिश्य तक्षणादि विधीयते, येन यूपाकारस्य लोकमसिद्धिरुपेक्ष्येत, किं तर्हि 'खादिरो यूपो भवति' इत्यादिनाऽ- वगतं खदिरादिप्रकृतिद्रव्यं तक्षति यूप कर्तुमित्यलौकिकयूपाकारस्य साध्यत्वं प्रतीयते। स चाऽडकारो 'यूपे पशचुं वभ्नाति' इति विनियोगदर्शनाद्विशेपतोडवगम्यते -तक्षणादिपरिनिष्पन्रः पशुवन्धाधारः काष्टविशेपो यूप इति। एवमाहवनी- यादयोऽपि। न त्वन्न तथा ब्रह्मण: किश्चित्साधकमस्ति। तत आरब्धव्या
['यूप तक्षति' इस वाक्यसे लोकसिद्ध यूपका विधान नहीं है। जिसका विधान है वह यूप केवल शास्त्रीय है, एवम् आहवनीय अनिसे महानस आदिमें स्थित साधारण लौकिक अगनि नहीं ली जाती, किन्तु मन्त्रादि द्वारा विधिपूर्चक संस्कृत अलौकिक अग्नि ली जाती है। जैसे यूप और तादश अननि प्रत्यक्षादिसिद्ध नहीं है। तथापि 'यूपमष्टास्त्री करोति', 'अगनीनाद्धीत' इत्यादि वाक्योंसे इनके विधानकी सिद्धि होती है। इसके लिए पृथक मीमांसा नहीं की गई है। वैसे ही ब्रह्मके प्रत्यक्षादि सिद्ध न होनेपर भी उसकी 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि दर्शन-ज्ञान-विधि उपपन्न हो सकती है, यह तात्पर्य है।] यदि कहो कि 'यूप तक्षति' (यूपको छीलता है) इत्यादि वाक्यमें यूपको उद्देश्य करके तक्षण-छीलने-का विधान नहीं है, जिससे कि यूपके स्वरूपकी लोकप्रसिद्धि न मानी जाय, किन्तु 'खादिरो यूपो भवति' (खरका बना यूप होता है) इत्यादि वाक्यसे प्रतीत हुआ खदिर- खरका पेड़-आदि यूपकी प्रकृतिभूत द्रव्य यूप बनानेके लिए छीला जाता है, इस प्रकार अलौकिक (प्रत्यक्षादिसे असिद्ध) यूपके आकारका [अष्टास्त्रीकृत ] साध्यत्व प्रतीत होता है। और वह आकार 'यूपमें पशु बाँधा जाता है' इत्यादि विनियोगके दिखाई देनेसे विशेरूपसे प्रतीत हो जाता है-छिल कर बनाया गया, पशुके वन्घन-रस्सी, शृङ्गला आदि-का आधार एकविशेपप्रकारका काष्ठ यूप-स्तभ-कहलाता है। यही रीति आहवनीय आदि अझिस्थलमें भी है। इस प्रकार प्रकृतमें ब्रह्मका साधक कोई नहीं है। अर्थात् अन्यत्र उसका विनियोग नहीं देखा गया है, इसलिए व्रह्मविपयक प्रतिपत्तिविधिमें सम्भावित उक्त आशक्काओंके निराकरणके लिए उत्तरमीमांसाशास्त्रके आरम्भकी आवश्यकता आ जाती है। तो यह कहना
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३८६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, षर्गक २
उत्तरमीमांसेति। नैतदप्युपपन्नम्, व्रह्मसिद्धिमन्तरेणापि 'योपा चा व गौत- साथि:' इत्यादाविवाSऽरोपितरूपेणोपासने ग्रतिपत्तिविध्युपपत्तेः। ततोऽभ्यधि- काशङ्काया अभावान्नोत्तरमीमांसाSSरव्धव्या। अत्र केचित् सिद्धान्तैकदेशिनोऽभ्यधिकाशङ्गामेवमाहु :- 'चोदनालक्षणो- जर्थो धर्मः' इति ब्रुवता विधेः प्रामाण्यं दशितम्। न च 'सदेव सोम्य' इत्यादि- वैदानां विधिरहितानां तत्सम्भवति। न च तेपां 'सोऽन्वेष्टव्यः' इत्यादि- विधिभिरेकवाक्यतेति वाच्यम्, भावकर्मार्थवाचिनस्तव्यप्रत्ययस्य तत्र विधायकत्वाभावात्। विधावपि तव्यप्रत्यययोऽस्तीति चेत्, तथापि नेह विधि: सम्भवति, तव्यप्रत्ययस्य कर्माभिधायित्वात्। 'गन्तव्यम्' इत्यादौ या मानना भी युक्त नहीं है, कारण कि ब्रह्मकी सिद्धिके विना भी अर्थात् व्रह्म असिद्ध भी हो, तो भी आरोपितरूपसे भी उपासनामें प्रतिपत्तिविधिका सम्भव है। जैसे-'हे गौतम, योषा-स्त्री-ही अभिरूप है' इस वाक्यमें आरोपसे योषा अग्नि मानी जाती है। इसलिए किसी भी अधिक-अतिरिक्त- आशंकाके न होनेसे उत्तरमीमांसा-वेदान्तविचारशास्त्र-के पृथक आरम्भ करनेकी आवश्यकता नहीं है। [ यह शङ्का स्थिर होती है।] समाधान-इस लम्वे प्रघट्टकसे की गई शङ्काका समाधान कोई सिद्धान्तैकदेशी अतिरिक्त शङ्काको ही इस प्रकार कंहते हैं-[अतिरिक्त शङ्का यहांपर हो सकती है जिसके निराकरणके लिए पृथक मीमांसा आवश्यक है।] 'प्रेरणात्मक अर्थ ही धर्म है' इस पू० मी० प्रथमसूत्रसे ही जैमिनिमुनिने विधिका प्रामाण्य दर्शाया है। 'हे सौम्य, सद्वप ब्रह्म ही सत्य है' इत्यादि वेद [ वेदान्त ] वाक्योंका विधिरहित होनेसे प्रामाण्य सम्भव नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते, और 'उस ब्रह्मकी खोज करनी चाहिए' इत्यादि विधिवाक्योंके साथ उनकी एकवाक्यता होगी, ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि भाव या कर्म*रूप अर्थका वाचक होनेवाला तव्यप्रत्यय विधिरूप अर्थका बोघक नहीं हो सकता। यदि कहो कि विधिरूपां अर्थमें भी तव्यका विधान है, तो भी प्रकृतमें विधि नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रकृतमें तव्यप्रत्यय छ 'तयोरेवं कृत्यक्तखलर्थाः' पा० सूत्र ही तव्य आदि कृत्यप्रत्ययका भावकर्म अर्थ वोधन करता है। 'प्रैषातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च' इस पाणिनिसूत्रसे प्रैप-विधि-में भी कृत्यप्रत्ययोंका विधान होता है।
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सिद्धान्तिकदेशी के मतसे त्रद्षजिज्ञासासूत्रका अवतरण] भापानुवादसहित ३८७
तु तव्यप्रत्ययस्य मावार्थस्य प्राधान्येन स्वतन्त्रफलाय विधानं युक्तम्। इत्यत्र कर्माभिधायितव्यप्रत्ययादपि घात्वर्थ- विपयो विधिर्द्ष्ट इति चेद्, अस्त्वप्राप्तस्वाध्यायगतप्राप्तिफलाय तन्र विधि:। प्रकते तु कि स्व्रतन्त्रफलाय कर्मीभृतन्रह्मणो दृष्टिर्विधीयते किं वा कर्मकारक- गतफलाय। नाऽडद्य:,अवघातादिवत् कर्मकारकद्रव्ये गुणभृताया दर्शनक्रियायाः स्वतन्त्रफलाय विधातुमशक्यत्वात्। न द्वितीयः, चतुर्विधं हि कर्मकारके क्रियाजन्यफलम् -- उत्पत्तिराप्तिविकार: संस्कारथ्। तत्राऽड़दौ नित्यम्रासे निविकारे त्रह्मणि न त्रिविधं फलं सम्भवति। नाऽप्यज्ञानाधर्मादिमलापकर्पण- लक्षणः संस्कार: शङ्गनीय:, अवेक्षिताज्यस्येव संस्कृतस्य त्रह्मणोऽन्यत्र विनियोगाभावात् । कमरूप अर्थका बोवक है। 'गन्तव्यम्' इत्यादि पदस्थलमें तो भावार्थक तन्यपत्थयका प्रधानतया स्व्रतन्त्र फलके लिए विधान उचित है। [अर्थात् 'गन्तव्यम्' यहांपर किसी कर्मके न होनेसे क्रियाका प्राधान्य प्रतीत होता है। अतः भावार्थक तव्यपत्ययके वलसे गमनक्रियामं विधानकी प्रतीति संगत है, लेकिन 'सोऽन्वेष्टव्यः' द्रव्यादि स्थलमें तत्पदार्थरूप कर्मके रहते क्रिया प्रधान नहीं हो सकती, जिससे कि कर्मार्थक तव्यप्रत्यय भी विधिका बोध करा सके। ] 'स्वाध्यायोऽध्येतत्यः' (स्वाध्याय-वेद-पढ़ना चाहिए) इस वाकयमें कर्मार्थक तव्यप्रत्ययसे भी धातुके पठनरूप अर्थमें विधि देखी गई है, यदि ऐसा कहो, तो वहांपर अन्य प्रमाणसे प्राप्त न होनेवाले स्वाध्याय प्रापतरूप फलके लिए विधि मानी जा सकती है। प्रकतमें तो क्या स्वतन्त्र फलके लिए कर्मकारक ब्रह्मदर्शनका विधान है अथवा कर्मकारकमें होनेवाले फलके लिए? इनमें पहला करप नहीं हो सकता, क्योंकि अवघात आदिके तुल्य कर्मकारकरूप द्रव्यमें विशेषणीभूत दर्शनक्रियाका स्वतन्त्र फलके लिए विधान नहीं वन सकता। दूसरा पक्ष भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि कर्मकारकमें क्रियाके द्वारा चार प्रकारका ही फर हो सकता है-उत्पत्ति, प्राप्ति, विकार और संस्कार। इनमें से प्रथम तीन फल तो उत्पत्तिरहित एवं नित्यप्राप्त तथा विकारशन्य न्रवागें नहीं हो सकते। अज्ञान तथा अधर्मादि रूप मलको दूर करनेसे संस्कारात्मक फलकी मी आशका नहीं हो सकती, क्योंकि अवेक्षण संस्कारसे संस्कृत घृतके तुल्य संस्कृत त्रम्मका कहीं दूसरी विधिमें विनियोग नहीं है।
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३८८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूंत्र १, वर्णक २
अथाऽडत्मनि सक्तुन्यायेन विधि: सम्भविष्यति। तथा हि-'सत्तून् जुहोति' इति क्रतुप्रकरणे श्रवणात् करत्वङ्गता सक्तुहोमस्याऽवगता। तत्राऽङ्गानि द्विविधानि-अर्थकर्माणि संस्कारकर्माणि च। तत्र कारकाण्यनाश्रित्य स्वांतं- न्त्येण गृहीतानि प्रयाजादीन्यर्थकर्माणि। व्रीह्यादिकारकगुणभूतानि संस्कार- कर्माणि। तत्र न तावत् सक्तुहोमस्याऽर्थकर्मता, व्रीहिगुणप्रोक्षणवत् सक्तुद्रव्य- गुणभूतत्वात्। नाऽपि संस्कारकर्मता। द्विविधो हि संस्कार :- विनियुक्त संस्कारो विनियोक्ष्यमाणसंस्कारथ्। तद्यथा '्रीहिमिर्यजेत' इति विनियुक्तान् ब्रीहीनुददिश्य विहितः प्रोक्षणादिविनियुक्तसंस्कार:। 'आहवनीये जुहोति' इति विनियोक्तुमग्नेराहवनीयत्वसिद्ये विहित आधानादिर्विनियोक्ष्यमाण- संस्कार:। तत्र होमेन भस्मीकृतानां सक्तूनां करतुं प्रत्यनुपकारिणां क्रतौ
सकुन्यायसे आत्मविषयक विधिका होना सम्भत होगा। सक्तुन्यायका दिग्दर्शन कराते हैं-'सक्तूनू जुहोति' (सत्तुओंका हवन करता है) इस वाक्यका यज्ञपकरणमें श्रवण होनेसे सक्तुहोमकी यज्ञार्थता-यज्ञका उपकारक होना- प्रतीत होती है। ऐसे स्थलमें अङ्ग-उपकारक-दो प्रकारके होते हैं-एक अर्थ- कर्म और दूसरे संस्कारकर्म। उन दोनोंमें क्रतुके उपकारकोंका आश्रयण न करके स्वतन्त्ररूपसे उपात्त प्रयाज आदि अर्थकर्म कहलाते हैं और त्रीहि आदि कारकोंके विशेषण हुए संस्कारकर्म कहलाते हैं। इनमें सक्तुहोमको अर्थकर्म-स्वतन्त्रकर्म- नहीं मान सकते, कारण कि ब्रीहिका विशेषण जैसे प्रोक्षण होता है वैसे प्रकृतमें होम भी सक्तुरूप द्रव्यका विशेषण है [ जैसे 'ब्रीहीन् प्रोक्षति' यहांपर पोक्षण स्वतन्त्र अर्थकर्म नहीं है वैसे ही 'सक्तून् जुहोति' इस वाक्यमें उपाच होम भी स्वतन्त्र अर्थकर्म नहीं है, किन्तु सक्तुरूप द्रव्यका विशेषण है ]। सक्तुहोम संस्कारकर्म भी नहीं हो सकता। संस्कार दो प्रकारका होता है-एक विनियुक्तका संस्कार और दूसरा विनियोक्ष्यमाणका संस्कार, जसे 'व्रीहिसे याग करे' इस वाक्यसे यागमें विनियुक्त त्रीहिको उद्देश्य करके कहा गया [ त्रीहीन् प्रोक्षति] प्रोक्षण आदि संस्कार विनियुक्तका संस्कार कहा जाता है। 'आहवनीये जुहोति' (आह- वनीय-अभि-में हवन होता है) इस विनियोगकी सिद्धिके लिए अभिको आह- वनीय बनानेके निमिच् ['अग्नीनादधीत' इत्यादि ] विहित आधानादि संस्कार विनियोक्ष्यमाणके संस्कार कहलाते हैं। इन दोनोंमें से सकतुदोम कोई भी संस्कार
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सिद्धान्तैकदेशी के मतसे म्रह्मजिज्ञासासूत्रका अवतरण] भापानुवादसहित २८९
विनियोगासम्भवानोभयविधसंस्कारोऽप्यत्र घटते। न च सक्तुहोमवाक्यस्य वैयर्थ्यं युक्तम्, अध्ययनविधिपरिगृहीतत्वात्। तस्मात् 'सक्तून्' इति द्वितीय- याऽवगतं ग्राधान्यं विहाय सक्तुभिरिति तृतीयया परिणामेन सक्तूनां गुणभावं होमक्रियायाः प्राधान्यं चोपादायाऽर्थकर्मता निरूपिता। तदत् 'आत्मा- नमुपासीत' इत्यत्राऽप्यात्मनो विभक्तिविपरिणामेनाऽऽत्मगुणकमुपासनाकर्मैव स्वतन्त्रफलाय ग्राधान्येन विधीयते। विषम उपन्यासः । दृष्टान्ते हि शब्दतः करणभूता अपि सक्त- चोऽर्थतः कर्मभूताः, होमक्रियाकृतातिशयस्य भस्मीभावलक्षणस्य विक्रा- रस्य सक्तुपु सद्भाचात्। ततो 'जुहोति' इति सकर्मकधातुप्रयोगो युक्तः। दार्श्टान्तिके तु यद्यात्मनोऽर्थंतः कर्मत्वं तदोत्पच्यादीनां चतुर्णां क्रिया- फलानामेकं वक्तव्यम्, तच्च निराकृतम्। अकर्मकत्वे चोपासीतेति नहीं हो सकता, क्योंकि हवनसे भस्म किए गए सक्तुओंका कतुके प्रति कोई भी उपकार न होनेसे कतुमें विनियोग नहीं हो सकता। सक्तुहोमप्रापक वाक्यको व्यर्थ कहना उचित नहीं है, क्योंकि अध्ययनविधिसे उसका परिग्रह होता है। [ अन्यथा स्थालीपुलाकन्यायसे अध्ययनविधिसे परिगृहीत स्वाध्यायमात्रके वैय्थर्यका प्रसङ हो जायगा। ] इसलिए-सक्तुदोमकी सार्थकताके लिए- 'सक्तून्' इस द्वितीयासे प्राप्त हुए प्राधान्यका त्यागकर उस पदको 'सक्तुभिः' इस प्रकार तृतीयाविभक्तिमें बदल देनेसे सक्तुओंके विशेषण होने और होम- क्रियाके पधान होनेसे सक्तुहोममें अर्थकर्मताका निरूपण किया गया है। इस सक्तुहोमके तुल्य 'आत्माकी उपासना करे' इस वाक्यमें भी 'आत्मानम्' इस द्वितीयान्तपदको 'आत्मना' तृतीयान्त परिणाम करके आत्माको विशेपण मानकर प्रधानतया उपासनारूप कर्मका ही स्वतन्त्र फलके निमित्त विधान किया जायगा। विषम उपन्यास है (अर्थात् दष्टान्त सक्तुहोम तथा दार्टान्तिक आत्मो- पासनामें समानता नहीं है)। कारण कि दष्टान्तमें 'सक्तुभिः' इस तृतीयान्तपद द्वारा शब्दतः करण होते हुए भी सक्तु अर्थतः कर्म ही हैं, कारण कि होमक्रियासे उत्पन्न किया गया अतिशयरूप भस्म हो जाना विकार सक्तुओंमें विद्यमान ही है। इसीलिए 'जुहोति' यह सकर्मक धातुका प्रयोग किया जाना उचित ही है। दार्शन्तिक व्रदामें यदि अर्थतः-वस्तुतः-कर्मकारक होना माना जाय, तो [ क्रिया- कृत अतिशय ] उत्पत्ति आदि क्रियाके चार फलोंमें कोई एक बमममें अवश्य
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३९० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
सकर्मकधातुप्रयोगोऽनुपपन्नः। नन्वात्मन्यासिः क्रियाफलं भविष्यति, स्वरूपतो नित्यप्राप्तस्याऽप्युपासनायाः पूर्व प्रतीतितोऽप्राप्तत्वात्। नैतद्युक्तम्, स्वप्रकाशचैतन्यरूपत्वेन प्रतीतितोऽपि नित्यग्राप्तत्वात्। अतो विध्यभावादविवक्षितार्था वेदान्ता इति धर्मजिज्ञासानन्तरं सानं प्राप्त- मिति तामेतामभ्यधिकाशङ्कां निराकर्तु ब्रह्मजिज्ञासां त एव सिद्धान्तैकदेशिन एवमवतारयन्ति-अथातो व्रह्मजिज्ञासेति। अयमभिप्रायः-धर्मजिज्ञासानन्तरं ब्रह्म जिज्ञासितव्यं न स्नातव्यमिति। न च वेदान्तेषु विध्यभाव:, 'कटः कर्त्तव्यः' इत्यादिवत् 'आत्मा द्रष्टव्यः' इत्यादौ
रहना चाहिए, इसका हम पहले ही खण्डन कर आए हैं [ अर्थात् इन चारोंमें एक भी फल नहीं हो सकता। ] और यदि न्रहा कर्मकारक नहीं है, तो 'उपासीत' ऐसा सकर्मक धातुका प्रयोग सङ्गत नहीं होगा। आत्मामें प्राप्तिरूप क्रियाफल सम्भव होगा, क्योंकि यद्यपि न्रह्म-आत्मा-नित्य प्राप्त है तथापि उपासनासे पहले प्रतीतिसे अप्राप्त ही है [ जैसे वर्तमान भी सूक्ष्म दृश्य पदार्थ अणुवीक्षण यन्त्रसे देखनेके पूर्व अहष् रहते हैं और यन्त्रव्यापारानन्तर दर्शनमें आते हैं, वैसे ही नित्य प्राप्त भी व्रह्म उपासनाके विना प्रतीतिमें नहीं आता और उपासनाके माहात्म्यसे आ जाता है। एतावता ब्रह्म प्राप्य कर्म हो सकता है ]। यह कथन भी युक्तिपूर्ण नहीं है, क्योंकि आत्माके स्वप्रकाश चैतन्यरूप होने से प्रतीतिसे भी नित्यप्राप्त है। इसलिए 'द्रष्टव्य' दर्शनको विधि कहना संगत न हो सकनेसे वेदान्तवाक्य [ब्रह्म नित्य सिद्ध वस्तु है ऐसे ] विवक्षित अर्थका बोध नहीं करा सकते, इसलिए धर्मजिज्ञासा-कर्मकाण्डप्रतिपादक पूर्वमीमांसा-के अनन्तर स्नान-गार्हस्थ्यदीक्षाके निमित्त स्नान-पाप्त होता है, इस प्रकार इस वढ़ी हुई आशक्काको दूर करनेके लिए न्रह्मजिज्ञासा-वेदान्तवाक्योंका विचारात्मक उत्तरमीमांसा-आवश्यक है। वे ही सिद्धान्तके एकदेशी इस प्रकार अवतरण देते हैं-अब ब्रंह्जिज्ञासाका आरम्भ होता है। तात्पर्य यह है-धर्मजिज्ञासाके अनन्तर ब्रह्मजिज्ञासा करनी चाहिए, सान नहीं। [ ब्रह्मजिज्ञासाके अनन्तर ही स्ान-समावर्तन-होना चाहिए ] वेदान्तोंमें विधिका अभाव है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि 'चटाई बनानी चाहिए' इस विधिके
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पूर्वमीमांसासे उत्तरमीमांसाका पुनः गतार्थत्व कथन] भापानुवादसहित ३९१
कर्मकारकगतफलाय विध्युपपत्तेः । सम्भवति ह्यात्मन्यज्ञानादिमलापकर्पण- लक्षणः संस्कारः । न च संस्कृतस्याऽऽत्मन आज्यादिवदन्यत्र विनि- योगोऽपेक्ष्यते, स्वयमेव पुरुपार्थत्वात्। अपुरुपार्थसंस्कारस्यव विनियोगा- पेक्षत्वात्। तदेवं वेदान्तेषु विध्यभावलक्षणामभ्यधिकाशङ्गां निराकृत्य प्रतिपत्तिविधिं च समर्थयितुमुत्तरमीमांसारम्भ इति। तदेतत् सिद्धान्तैक- देशिमतं पूर्वपक्षिणो नाभिमतम्। तथाहि-सिद्धान्तेकदेशिना विध्य-
रूपत्वेन प्रतीतितोऽपि प्राप्तत्वानोपासनाविधिरिति। सा न युक्ता, यथा 'हिरण्यं भार्यम्' इत्यत्र भूपणार्थत्वेन ग्राप्तं हिरण्यधारणमभ्युदयार्थत्वेन नियम्यते तद्वत् ग्राप्तस्याऽप्यात्मज्ञानस्य कर्तसमवायिमोक्षफलाय नियमविधिसम्भवात्। सदृश 'आत्मदर्शन करना चाहिए' इत्यादि वाक्यमें आत्मरूप कर्मकारकमें फलकी उपपत्तिके लिए दर्शनविधि उपपन्न है। और आत्मामें अज्ञानादि मलका हटाना आदि संस्काररूप क्रियाफलका सम्भव है। दर्शनविधिसे सहमत न्रह्मका [अवेक्षणसे संस्कृत वृतकी तरह] 'आज्याहुतीरजुहोति' इत्यादिके समान दूसरी विधिमें कहीं भी विनियोग अपेक्षित नहीं है, क्योंकि नरह्दर्शन स्वयं पुरुपार्थ है। जो संस्कार पुरुपार्थ नहीं हैं, उनके ही अन्यत्र विधिमें विनियोगकी अपेक्षा होती है। [अन्यथा संस्कार व्यर्थ होगा, पुरुपार्थ संस्कार तो स्वयं सफल है। ] इस प्रकार वेदान्तोंमें विधिके प्राप्त न होने की बढ़ी हुई आशक्वाका खण्डन करके प्रतिपत्तिविधिका समर्थन करनेके लिए उत्तरमीमांसाका आरम्भ करना आवश्यक है। इस प्रकारके सिद्धान्तके एकदेशियोंका मत पूर्वपक्षीको सम्मत नहीं है। पूर्वपक्षीकी असम्सतिका वर्णन करते हैं-उक्त सिद्धान्तैकदेशीने वेदान्तोंमें विधिके प्राप्त न होने की बढ़ी हुई आशक्का दिखानेके अवसरपर अन्तमें सबसे वढ़ी-चढ़ी यही युक्ति दिख़लाई है कि स्वप्रकाश चैतन्यरूप होनेसे ब्रह्मा प्रतीतिसे भी प्राप्त ही है, इसलिए उसे पानेके लिए उपासनाका विधान नहीं बन सकता, वह युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे 'सुवर्णका धारण करना चाहिए' इस विधानमें भूपणके निमिच प्राप्त हुआ सुवर्णका धारण करना अभ्युदय फलके लिए है ऐसा नियम माना जाता है वैसे ही नित्य प्राप्त भी आत्मज्ञान उपासनाकर्तांके मोक्षरूपी फलको देनेवाला है, ऐसा नियमविधान सम्भव हो सकता है।
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३९२ [सूत्र १, वर्णक २
हिरण्यधारणस्याऽग्राप्तिरपि पक्षेस्तीति नियमविधिस्तत्राऽस्तु। इह तु स्वरूपचैतन्यत्वेनाऽऽत्मग्रतीतेनित्यग्राप्तत्वान्न नियमविधिरिति चेत, तर्हना- त्मप्रतिभासनिवृत्तये परिसंख्याविधिरद्ृष्टार्थः स्यात्। अतो नाऽम्यधिकाशङ्का सम्भवति। यच्चाभ्यधिकाशङ्गानिराकरणे तेनैव सिद्धान्तैकदेशिना फलमविद्यादि- मलापनयनमुक्तम्। तदप्यसत्, किं लौकिकात्मज्ञानमविद्यामपनयति उताडलौकिकात्मज्ञानम्। आद्येऽपि न तावत् स्वरूपमेव तामपनयति, अहमिति सर्वदाऽSत्मप्रतीतावप्यविद्यानिवृत्यदर्शनात्। नाऽपि विधि- बलात्। तर्ह्यसम्भावितपाकेषु कृष्णलेपु विधिवलादपि सुख्यः पाको
पक्षमें हिरण्यधारण करनेकी अप्राप्ति मी है [ ऐसी कोई राजाज्ञा या स्वभाव नहीं है कि सब ही सुवर्णधारण करें। अतः सुवर्णधारण पाक्षिक प्राप्त है], इससे वहांपर नियमविधि हो सकती है। लेकिन [ 'नियमः पाक्षिके सति' ] प्रकृतमें स्वरूपचैतन्य होनेसे आत्मप्रतीति नित्य प्राप्त है, [क्योंकि उसका सबको ही और सर्वत्र प्रकाश होना स्वरूपप्राप्ति सार्वदेशिक है, पाक्षिक नहीं है।] इससे नियमविधिका होना सम्भव नहीं है। यदि ऐसी शक्का करो, तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि अनात्माकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि ही अदए्टफल मान ली जायगी। इसलिए आपकी बढ़ी हुई [ वेदान्तोंमें विधिका अभावरूप ] 1 आशङ्का सम्भव नहीं है। और जो उक्त अभ्यधिक शङ्काका निवारण करते हुए उस सिद्धान्तैक- देशीने ही अविद्यादि मलका दूर करना फल कहा है वह मी असंगत है, क्या लौकिक आत्मज्ञान अज्ञानको दूर करता है : अथवा अलौकिक आत्मज्ञान? प्रथम पक्ष माननेमें [ लौकिक आत्मज्ञानका ] स्वरूप ही अविद्याकी निवृत्ति नहीं करा सकता, कारण कि 'अहम्' (मैं) इस प्रकार सदैव आत्माकी प्रतीति होनेपर भी अविद्याकी निवृति नहीं देखी जाती। 'विधान किया गया' इस विधानकी सामर्थ्यसे निवृत्ति मानी जाय, ऐसा भी नहीं है, क्योंकि जिनका पाक होना सम्भव नहीं है [ अर्थात् जिनमें पाकसे कोई विलक्षण आकार, रूप, रस आदि नहीं हो सकते ] ऐसे कृष्णल सुवर्णके टुकड़ोंमें पाकका विधान करनेकी सामर्थ्यसे
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पूर्वमीमांसासे उत्तरमीमांसाका पुनः गतार्थर्रवकथन] भापानुवादसहित ३९३
दर्शयितुं शक्य: । द्वितीयेऽपि कि तादृात्मज्ञानमत्यन्तमप्रसिद्धसुत सामान्यतः प्रसिद्धम् अथवा विशेपतः १ नाऽऽद्यः, अत्यन्ताप्रसिद्धस्य विध्ययोगात्। यागादावपि हि कश्चिद्यागं दष्टवतः पुरुपस्य यागत्व- सामान्योपाधिना प्रसिद्धौ सत्यां दृष्टयागव्यक्तिसद्दशं यागव्यत्त्यन्तरं ग्रति- पत्तुवुद्धिस्थमेव विधीयते। अन्यथा 'ममेदं कर्त्तव्यम्' इति प्रति- पच्यसम्भवात्। न द्वितीयः, अलौकिकात्मज्ञानत्वसामान्याक्रान्तस्य व्यक्ति- विशेपस्य कस्यचिदपि पूर्वमननुभूतत्वात्। तृतीयेऽपि किं तादगात्मज्ञानं पुरुपान्तरे विशेपतः ग्रसिद्म् उत विधेः प्रतिपच्तर्यधिकारिण्येव ? नाऽडद्यः, पुरुपान्तरप्रसिद्धेरधिकारिणं प्रत्यनुपयोगात्। न द्वितीयः, अधिकारिणि विशेपतः ग्रसिद्धस्यारऽर्थस्य विधिवैयर्थ्यात्। तदेवं सिद्धान्तैकदेशिनाऽभिहि-
अगतार्थत्वं प्रतिपादयितुं शक्यम्। तेनोत्तरमीमांसाया
भी मुख्य पाक दिखलाया जा सकता है। [कृष्णलोंमें मुख्य पाक माना नहीं गया है] दूसरा-अलौकिक आत्मज्ञानसे निवृत्ति-पक्ष माननेमें क्या वैसा-अलौकिक- आत्मज्ञान अत्यन्त अप्रसिद्ध है ? अथवा सामान्यतः प्रसिद्ध है ? या विशेष रूपसे प्रसिद्ध है? प्रथम पक्ष नहीं बनता, क्योंकि अत्यन्त अप्रसिद्धका विधान नहीं हो सकता। यागादिस्थलमें भी किसी यागको देख चुके पुरुपका यागव्वसामान्यरूपसे प्रसिद्धिके सिद्ध होनेपर दृष्ट यागविशेषके सदश जाताकी बुद्धिमें स्थित ही दूसरे यागका विधान किया जाता है। अन्यथा 'मेरा यह कर्तव्य है' ऐसा ज्ञान सम्भव न होगा। दूसरा पक्ष भी नहीं बनता, क्योंकि अलौकिक आत्मज्ञानत्वसामान्यसे अवच्छिन्न किसी भी ज्ञानव्यक्तिविशेपका पहले अनुभव ही नहीं हुआ है। तृतीय पक्ष माननेमें भी क्या वैसा आत्म-ज्ञान दूसरे पुरुषमें विशेपरूपसे प्रसिद्ध है? अथवा विधिके जाननेवाले अधिकारीमें ही विशेषरूपसे प्रसिद्ध है? इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि दूसरे पुरुपकी प्रसिद्धिका अधिकारीके प्रति कोई उपयोग नहीं है। दूसरा पक्ष भी कोई कार्यसाधक नहीं है कारण कि अधिकारीमें विशेषरूपसे प्रसिद्ध अर्थका विधान करना व्यर्थ है। तब तो इस प्रकार सिद्धान्तके एकदेशीसे प्रतिपादित अधिक आशक्का और उसका निराकरणप्रकार दोनों संगत नहीं हैं, इससे उचरमीमांसा गतार्थ नहीं है, ऐसा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता है। ५०
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३९४ विचरणप्रमेयसंब्रह : [ सूत्र १, वर्णक २
अपरे पुनः सिद्धान्तैकदेशिन एवमगतार्थत्वमाहु :- न वयं सद्वद् वेदान्तेपु विध्यभावलक्षणामभ्यधिकाशङ्कां त्रूम:, येनोक्तदोप: स्यात्, किन्तु विधिमभ्युपेत्यैव ्रह्मासिद्धिलक्षणाम्। तथा हि-प्रतिपत्ति- विध्यपेक्षितानामुत्पच्यादीनां चतुर्णी रूपाणां क्रियाविध्युक्तन्यायेन यद्यपि निर्णयः सिद्धः तथापि प्रतिपत्तव्यस्य न्रह्मणः सिद्धवस्तुप्रतिवोधनसमथैरपि पत्यक्षादिभिरदर्शनाद् वेदस्य च कार्यमात्रपरस्य सिद्धब्रह्मतत्त्वाप्रतिपादकत्वा- दारोपितरूपस्य च ब्रह्मण उपासनायां मोक्षलक्षणात्यन्तिकफलासम्भवादनुपा-
तत्र चैव निर्णीयते-न कार्यमात्रपरो वेदा, उपासनाविधिपरैरवेदा- न्तैर्वह्मणोऽप्यवगस्यमानत्वात्। यथा रूपप्रत्यायनाय प्रवृत्त चक्षुर्द्वव्यमपि प्रख्यापयति तद्वत्। दूसरे सिद्धान्तके एकदेशी उत्तरमीमांसाकी इस प्रकार अगतार्थता कहते हैं-हम (दूसरे सिद्धान्तैकदेशी) उन सिद्धान्तैकदेशियोंके समान वेदान्तोंमें विधिके अभावरूप अभ्यधिक आशक्काको नहीं कहते हैं, जिससे कि पूर्वपक्षीका दिया हुआ दोष आा सके। किन्तु विधिको मानकर ही ब्रह्मकी असिद्धिको कहते हैं। कथित न्रह्मासिद्धिका प्रतिपादन करते हैं,-क्योंकि प्रतिपत्ति- विधिसे अपेक्षित उत्पत्ति आदि चारों प्रकारोंका क्रियाविधिस्थलमें कहे गये न्यायसे यद्यपि निर्णय सिद्ध है तथापि प्रतिपत्तिके कर्म ब्रह्मका सिद्ध [घट पट आदिरूप ] वस्तुके बोध करानेमें समर्थ प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे दर्शन नहीं हो सकता, तथा वेदका कार्यमात्रमें तात्पर्य है, अतः वह सिद्ध-अकार्य-व्रह्मतत्वका प्रतिपादक नहीं हो सकता। और ब्रह्मकी आरोपितरूपसे उपासना करनेसे मोक्षस्वरूप अव्यभिचरित फलका सम्भव न होनेसे ब्रह्म उपासनायोग्य नहीं होगा, इन दोनों बढ़ी हुई आशक्काओंके निवारणके लिए उत्तरमीमांसाका आरम्भ करना आवश्यक है। इस एकदेशीके मतमें सिद्धान्तका निम्न प्रकारसे निर्णय किया जाता है- वेदोंका तात्पर्य केवल कार्य-विधि-में ही नहीं है क्योंकि उपासनाविधिमें तात्पर्यवाले वेदान्तवाक्योंसे [ कार्यसे मिन्न सिद्ध ] न्रह्मकी भी प्रतीति कराई जाती है। जैसे रूपका ज्ञान करानेके लिए प्रवृत्त हुआ चक्षु द्रव्यका भी बोध कराता है वैसे ही उपासनापरक वेदान्तवाक्य भी सिद्ध ब्रह्मकी प्रतीति कराते हैं।
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जन्य सिद्धान्तैकदेशी द्वारा शास्त्रारम्भसमर्थन] भापानुवादसहित
नतु कर्थ वेदानामुपासनाविधिपरत्वम् १ न तावदुपासनं नाम व्रह्मापरोक्षज्ञानम्, तस्य परमानन्दसाक्षात्काररूपत्वेन फलभूतस्य स्वर्गवदवि- धेयत्वाद्। नाऽपि दृष्टिज्ञानं, तत्र विधेरश्रवणात्। नहि शाब्दज्ञानं कर्तव्य- मित्येतादशो विधि: क्वचिच्छूयते । मैवम्, 'इदं सर्वं यदयमात्मेत्मा' इत्यादिवाक्यानां विधिपराणां शाव्दज्ञानविधौ पर्यतसानात्। न च वाच्यं यद्यमात्मेत्यात्मस्वरूपमुद्दिश्य तदिदं सर्वमिति प्रपश्चरूपत्वविधाने सति आत्मनोऽचेतनत्वप्रसङ्गेन विधेरवोदुरभावादात्मनः प्रपश्चरूपत्वस्याडपुरुपार्थ- त्वात् कथमेतद्वाकयं विधिपरमिति१ यदिदं सर्वमिति प्रतिपनं प्रपञ्चमुद्दिश्य
शक्का-वेदोंका उपासनाविधिमें तात्पर्य ही कैसे हो सकता है? [डपा- सना विघिकी अनुपपत्ति दिखानेकेलिए विकल्प करते हैं] ब्रह्मके अपरोक्ष ज्ञानको-साक्षात्कारको-उपासना नहीं कह सकते, कारण कि यह तो परम आनन्द साक्षात्काररूप होनेसे उपासनाका फलस्वरूप माना गया है। अतएव स्वर्गके सदश विधेय नहीं हो सकता। [यहांपर वैधम्यसे दष्टान्त है जैसे-स्वर्ग आदि फल याग द्वारा उत्पाध होनेसे विधेय हो सकते हैं अतः ऐसे फलोंकी उत्पादक विधिका अनुशासन सम्भव है, परन्तु सुख आदिका साक्षात्कारात्मक अनुभव-ऐसे, जो फल उत्पाद्य नहीं हो सकते, उनका विधेय होना या इनके लिए विधिका प्रतिपादन करना संगत नहीं है। ] और दृष्टिज्ञानको-शब्दोंके द्वारा दर्शनको-भी उपासना नहीं कह सकते, कारण कि इस शाब्द ज्ञानके विधानका श्रवण नहीं है। 'शान्द ज्ञान करना चाहिए' ऐसे विधिवाक्यका कहीं श्रवण नहीं है। समाधान-ऐसी शक्का नहीं हो सकती, क्योंकि 'यह सब जो कुछ है वह सब आत्मा ही है' इत्यादि विधिपरक वाक्योंका शाब्द ज्ञानके विधानमें ही पर्यवसान है। ऐसी शक्का भी नहीं करनी चाहिए कि 'जो यह आत्मा' इत्यादि प्रकारसै आत्माके स्वरूपको उद्देश्य करके उसमें 'वह यह सब' इस प्रकार प्रपश्चरूपत्वका विधान होनेपर आत्माके अचेतन होनेका प्रसङ्ग होनेसे विधिका ज्ञाता कोई (चेतन) रहेगा ही नहीं। इसलिए आत्माका प्रपश्चरूप होना पुरुपार्थ नहीं माना जा सकता। इस अवस्थामें 'इदं सर्व यदयमात्मा' इत्यादि वाक्यका
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३९६ विवरणप्रमेयसंग्रह सूत्र १, वर्णक २
तदयमात्मेत्यप्रतिपन्नात्मरूपस्यैव विधानात्। 'नेति नेति' इत्यादिवाक्यपर्या- लोचनया प्रपञ्चं प्रविलाप्याऽडत्मैव विधेय इति विशेपनिश्चयात्। यद्यपि 'इद सर्वं यद्यमात्मा' इत्यत्र विधिर्न श्रयते तथापि 'पूपा प्रपिष्टभागः' इत्यादाविव विधिः कल्प्यतामिति। तमेतमप्येकदेशिशास्त्रारम्भप्रकारं पूर्वपक्षी नाडङ्गीकुरुते। तथा हि- 'पूपा अपिष्टभागः' इत्यत्र अपिष्टो भागो यस्येति समासे यथा अ्रमीयमाणो द्रव्यदेवतासम्बन्धः स्वािनाभूतं याग गमयति। यागश्च स्वाविनाभूतं [शाब्द ज्ञानरूप ] विधिमें कैसे तात्पर्य हो सकता है? कारण कि 'यदिदं सर्वस्' जो यह सब माना हुआ (दश्यमान संसार) है, उसको उद्देश्य करके 'तदयमात्मा' (वह यह आत्मा ही है) इस प्रकार अप्रतिपन्न (जो सर्ववादियोंका सम्मत नहीं है) आत्माके स्वरूपका ही विधान है। [दृश्यमान जगत्को नैयायिक 'यथार्थ', वेदान्ती 'प्रातिभासिक' इत्यादि जिस किसी रूपसे सभी वादी मानते ही हैं। परन्तु उस प्रपञ्चको वेदान्तीसे अतिरिक्त कोई भी वादी ब्रह्मरूप नहीं मानता। इससे अप्रतिपन्नका विधान सक्त है] क्योंकि 'नेति नेति' (ऐसा नहीं, ऐसा नहीं) इत्यादि वाक्यका विचार करनेसे 'अध्यारोपापवादन्यायसे' प्रपञ्चका-दृश्ष्य जगत्का-निराकरण [यहाँपर अपने-अपने कारणमें लयरूप निराकरण है ] करके आत्मा ही विधेय है, ऐसा विशेष निश्चय होता है। यद्यपि 'इदं सर्वं यद्यमात्मा' इस वाक्यमें विधिका श्रवण [विधिके बोधक तव्य या लिडादि प्रत्यय ] नहीं है, तथापि 'सूर्य प्रपिष्टभागवाला है' * इत्यादिके समान विधिकी करपना करनी चाहिए। इस प्रकार एकदेशी द्वारा प्रतिपादित शास्त्रारम्भप्रकारका भी पूर्वपक्षी स्वीकार नहीं करता। खण्डनप्रकार कहते हैं-'पूपा प्रपिष्टभागः' यहांपर प्रपिष्ट है भाग जिसका, इस समासमें जसे निश्चितरूपसे ज्ञात होनेवाले द्रव्यका देवताके साथ सम्बन्ध अपने अविनाभूत + यागका बोध कराता है। * जैसे 'प्रपिष्टभाग' इस पदमें 'प्रपिष्टरूपो भागो यस्य' इस प्रकार षप्ट्यर्थमें बहुब्रीहि समास है, जिसके द्वारा देवताके साथ प्रपिष्टरूप द्रव्यके सम्वन्धका वोध होता है और वह सम्वन्ध अन्य किसी भी प्रमाणसे सिद्ध नहीं है, अतः अपूर्व होनेसे पूषा-सर्यरूप देवता-के उद्देश्यसे प्रपिष्टरूप द्रव्यका वैध त्याग करना प्राप्त होता है, इसलिए वहांपर विधिवोधक पदकी कल्पना करनी पड़ती है वैसे ही ब्रह्ममें भी समझना चाहिए। +हव्य-पिष्टादि-इस भूलोकमें हैं और पूषा आदि देषता तत्तद् लोकमें अथवा मम्न्नात्मक
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पूर्वपक्षीके मतसे शास्त्रारम्भखण्डन ] भापानुादसहित ३९७
विध्यर्थ नियोगमिति। श्रुतसामर्थ्याद्विध्यर्थे प्रतिपन्े व्यवहारमान्राय पूपोदे- शेन पिष्टपरित्यागः कर्त्तव्य इत्युपसंहियते। तद्वदत्र न द्रव्यदेवतासम्बन्धः अमीयते, यद्धलाद् विधि: कल्प्येत। अथ मन्येत-यथा 'विश्वजिता यजेत' इत्यादिपु ग्रमीयमाणौ याग- नियोगावन्यथानुपपच्या चेतनं स्वर्गकामं नियोज्यं कल्पयतः, तथेहापि शृयमाणरचेतन आत्मा यागनियोगौ कल्पयतीति। तदसत्, अनुपपत्तेर- और याग अपने अविनाभून । विध्यर्थ नियोगका वोधन कराता है। इस प्रकार 'पूपा प्रविष्टभागः' इत्यादि श्रव्रणकी सामर्थ्यसे विध्यर्थ नियोग- की सिद्धि होनेपर केवल व्यवहारके लिए 'सूर्यके उद्देश्यसे पिष्टका परित्याग करना चाहिए' ऐसा उपसंहार किया जाता है। [ अर्थात् 'पूषा प्रपिष्टभागः' यहांपर उक्त रीतिसे प्रपिष्टभागपदके श्रवणसामर्थ्यसे ही विधिकी प्रतीति हो जाती है केवल स्पष्ट प्रतीतिके लिए विध्यर्थक 'कर्तव्य' आदि पदकी कर्पना करनी पड़ती है। कर्तत्य आदि पदोंकी कल्पनाके अनन्तर विधिकी प्रतीति होती है, ऐसा नहीं है। ] वैसे ही 'सर्व यदयं मात्मा' इस प्रकृत वेदान्तवाक्यमें किसी देवता और द्रव्यके सम्बन्धकी प्रतीति नहीं होती, जिसकी सामर्थ्यसे विधिकी कल्पना की जाय। शक्का-जैसे 'विश्वजित् यागके द्वारा इएकी भावना करनी चाहिए' इत्यादि स्थलोंमें प्रतीत होनेवाले याग और विध्यर्थ (नियोग) अपनी अन्यथा अनुपत्तिसे स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले चेतन नियोज्य (अधिकारी) की कंपना करते हैं, वैसे ही प्रकृतमें भी श्रुतिसे प्रतीयमान चेतन आत्मा भी याग और नियोगकी कल्पना कर लेगा। समाधान-ऐसा कहना युक्त नहीं है, क्योंकि इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। [जैसा याग या नियोग-प्रेरणा-चेतन अधिकारीके बिना उपपन्न नहीं है वैसा हैं, उनके साथ द्रव्यका साक्षात् सम्बन्ध अनुपपन्न है। विधिविहित आधारमें त्यागका प्रति- पादक शव्दप्रमाणगम्य याग ही तादृश सम्वन्धका उपपादक होगा अर्थात् तत्-तद देवताके उद्देश्यसे विशेपमन्त्रोंसे किये गये द्रव्यका त्याग ही द्रव्य और देवताके सम्बन्धका उपपादक ह। ऐसे सम्बन्धके चिना यागकी उपपत्ति ही नहीं होती, अतः याग देवताद्रव्यसम्वन्धसे अघिनाभृत है। + 'यजेत' इत्यादि लिहादि प्रत्यय ही यागादिंविधिके प्रतिपादनमें समर्थ है और लिझदि विधिकी यागादि कियाकलापके बिना सम्भव ही नहीं है, अतः विध्यर्थ यागके अविनाभावसे ग्रस्त है।
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३९८ विवरणप्रमेयसंग्रह i सूत्र १, वर्णेक ३
भावात्। अन्तरेणाऽपि यागनियोगौ, लोकव्यवहारे चेतनस्य दष्टत्वात्। नियोगाभावे कृत्स्वेदस्य कार्यपरत्वनियमोऽनुपपन्न इति चेद्, एवमपि न नियोग: कल्पयितुं शक्यः, तत्साधनस्य धात्वर्थस्य कस्यचिदप्य- भावात्। सोऽपि कल्प्यत इति चेत, तत्र किं पाक गमनं करोतीत्येकपाक्क- गमनादिसर्वधात्वर्थानुगत: कृत्यर्थः कल्प्यते, उत ज्ञह्यर्थः कल्प्यते, अथ वोभयम् १ आद्ये 'यदिदं सर्व तदयमात्मा कर्त्तव्यः' इति वचनव्यक्ति: स्याद्। तथा च सति अशक्यविधानमापद्येत। नहि निपुणतरेणाऽपि घटः पटीकर्तु शक्यते। अथाजमी पिष्टपिण्डाः सिंहाः क्रियन्तामित्यत्राऽन्यदन्याकारेण क्रियमाणं दष्टमिति चेद्, एवमप्यत्रेतिकर्तव्यताया अभावादसंपूर्णो विधिः।
प्रकृतमें नहीं कह सकते। ] कारण कि याग और नियोगके विना भी लोक- व्यवहारमें चेतनकी उपपत्ति देखी गई है। [यदि लोकमें चेतनकी उपपत्ति याग और नियोगसे ही होती, तो चेतनसे अपने उपपादक याग और और नियोगकी कल्पना की जा सकती, परन्तु चेतन यागादिके बिना भी देखा गया है, अतः उक्त कल्पना नहीं मानी जा सकती।] यदि 'इदं सर्व यदयमात्मा' इत्यादि वेदवाक्योंमें नियोगकी प्रतीति नहीं होती, तो सम्पूर्ण वेदोंका कार्यमें ही तात्पर्य है, यह नियम नहीं वन सकेगा। ऐसा माननेपर भी प्रकृत नियोगकी कल्पना नहीं की जा सकती, कारण कि उस नियोगका उपपादक कोई भी घात्वर्थ-क्रिया-नहीं है। यदि कहो कि घात्वर्थकी भी कल्पना की जाती है, तो यह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि 'इदं सर्वम्' इत्यादि वाक्योंमें क्या 'पाक गमन करता है' इस प्रकार एक पाक गमनादिसे सम्पूर्ण घात्वर्थके साथ अन्वित होनेवाले कृति-करना-रूप धात्वर्थकी कल्पना की जाती है? अथवा 'पाक गमनको जानता है' इस प्रकार सकल घात्वर्थानुगत ज्ञप्ति-जानना- रूप घात्वर्थकी कल्पना की जाती है या दोनोंकी: प्रथम कृतिरूप घात्वर्थकी कल्पना माननेमें 'जो यह सम्पूर्ण है उसे आत्मा करना चाहिए' इस प्रकारका वाक्य होगा। ऐसा वाक्यार्थ माननेमें विधान करना सम्भव नहीं होगा, कारण कि चतुरसे चतुर भी कारीगर घटको कपड़ा नहीं बना सकता। 'पिष्टपिण्डों-सने हुए आटेके गोले-का सिंह बनाना चाहिए' इन वाक्योंसे भिन्न वस्तुका भिन्न आकारसे बनाना देखा गया है, ऐसा यदि कहा जाय, तो भी इतिकर्तव्यता-बनानेका
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पूर्वपक्षीके मतसे शास्त्रारम्भखण्डन ] भापानुवादसहित ३९९
नहि शमादयः प्रपश्चविलयनेतिकर्त्तव्यता रूपा:, तेपां ज्ञानेतिकर्तच्यता- रूपत्वात्। न द्वितीयः, प्रपश्चे सर्वस्मिन् विधिवलादात्माकारेण ज्ञायमानेऽपि प्रपश्चमावस्याऽनिवृत्तेः। नहि योपिदादिष्वग्न्यादिरूपेण ज्ञायमानेपु योपिदादिभावोऽपि निवृत्तः। न तृतीय:, पक्षद्वयदोपप्रसङ्गाद्। ननु योपिदग्न्यादिपु मानसी क्रिया, न ज्ञानम्। इह त्वात्मतच्वज्ञानेन विधीयमानेन अपश्चः ग्रविलीन: स्यात्, स्थाणुतच्वज्ञानेन पुरुपभावप्रविलय- दर्शनादिति चेत्, तर्हिं स्थाणुत्वज्ञानस्येवाऽडत्मतच्वज्ञानस्याऽपि विधि- व्यतिरिक्तं किश्चित्प्रापकं वत्तव्यम्, तच्चज्ञानस्य वस्तुतन्त्रस्याऽविधेयत्वात्।
प्रकार-न होनेसे विधानकी पूर्णता नहीं होगी। प्रपश्चके विलयन-निराकरण- स्वरूप शमादि ही इतिकर्तव्यता-विधिके सम्पादन प्रकार-होंगे, यह भी नहीं मान सकते, कारण कि शम, दम आदि ज्ञानकी इतिकर्तव्यतारूप हैं। द्वितीय-ज्ञानक्रियारूप मानना-पक्ष भी नहीं वन सकता, कारण कि सम्पूर्ण प्रपश् विधानके वलसे आत्माका स्वरूप माना जाय, तो भी प्रपश्नकी सचा नहीं मिट सकती। स्त्री आदिको अगिरूप माननेसे उनका स्त्रीत्व नहीं चला जाता। दोनों-जप्ति और कृति-का मानना तीसरा विकल्प भी नहीं वन सकता, कारण कि इसमें ऊपर कहे गए दोनों पक्षोंके दोप प्राप्त होते हैं। शङ्का-स्त्रीको अग्नि समझनेमें मानसव्यापार है, ज्ञान नहीं। [ प्रकृतमें ज्ञानपद जिससे अर्थका ज्ञान हो 'ज्ञायतेऽनेन' ऐसा करणल्युडन्त है। जहां- पर दूसरी वस्तु दूसरे रूपमें जानी जाय वहांपर उसका सम्भव नहीं है, अतः योषिदमि स्थलोंमें ज्ञान न मानकर मानसव्यापार-आहार्यारोप-मानना चाहिए -जो कि पुरुप व्यापाराधीन है। ] प्रकृतमें विहित आत्मतत्त्वज्ञानसे प्रपश्चका विलय होगा, जसे कि स्थाणु-सुखे शाखाहीन काष्ठ-के तत्त्वज्ञानसे पुरुपभावका विलीन-नष्ट-हो जाना देखा गया है। समाधान-तब तो जसे स्थाणुतत्त्वके ज्ञानका प्रापक विधिसे भिन्न ही वस्तु है, वैसे ही विघिसे अतिरिक्त ही किसी दूसरी ज्ञानसामग्रीको ही ब्रह्मतत्त्व- ज्ञानका भी प्रापक मानना चाहिए। तत्त्वका ज्ञान वस्तु-पदार्थ-के अधीन है उसका विधान नहीं हो सकता। [ विधान उसका ही हो सकता है जिसमें
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४०० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
विधायकशब्दव्यतिरिक्ता वेदान्तगता: शव्दास्तत्प्रापका इति चेत्, तर्हि तेभ्य एव ज्ञानसिद्धे: कृतं विधिना : ननु उत्पन्नेपि ज्ञाने पुनस्तादशं ज्ञानव्यक्यन्तरं विधीयते। न च विधिवैयर्थ्यम्, मन्त्रेष्टिघत् प्राप्तस्यापि पुनर्विध्युपपत्तेः । तथा हि-'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इत्यत्र स्व्शाखा स्व्रा- ध्यायशव्देनोच्यते। अतस्तन्मध्यपातिनो मन्त्रा अपि स्वाध्यायविधिना पठितव्यतया स्वीकृतास्ते च गृहीतपद्पदार्थसम्बन्धस्य स्वार्थे प्रत्यय- सुत्पाद्य प्रयोजनशून्या व्यवतिष्ठन्ते। न च स्वार्थानुष्ठापकत्वं प्रयोजनम्, स्वार्थस्य द्रव्यदेवतास्वरूपस्याऽननुष्ठेयत्वात्। नाऽपि तत्प्रमापकत्वम्,त्राह्मण- वाक्यैरेव मन्त्रार्थस्य द्रव्यादेः प्रमितत्वात्। ततो निष्प्रयोजनत्वे प्राप्ते
पुरुष-कर्ता-के व्यापारकी सामर्थ्य करने न करने या अन्यथा करनेमें हो। ज्ञान तो अपनी सामझीके बलसे अवश्य ही हो जायगा। वह पुरुप प्रमाताके ड्यापारकी अपेक्षा नहीं रखता। अतः ज्ञानका विधान करना संगत और सम्भव नहीं है। ] वेदान्तशास्त्रमें आए हुए विधिप्रतिपादक शब्दोंसे भिन्न-तव्य आदि प्रत्ययरहित-शब्द ही व्रह्मतत्त्वज्ञानके पापक हैं यदि ऐसा कहो, तो उन शब्दोंके द्वारा ही ज्ञानकी सिद्धि हो जायगी, फिर विधि माननेकी आवश्यकता ही क्या है? ज्ञानके उन शब्दोंसे उत्पन्न हो जानेपर भी पुनः उसी प्रकारके दूसरे ज्ञानका विधान किया जाता है, इस प्रकार सिद्धका विधान करना व्यर्थ नहीं माना जा सकता, क्योंकि मन्त्रोंमें जैसे प्राप्तका भी पुनर्विधान हो सकता है। [ मन्त्रोंमें पुनर्विधानका साफल्यप्रकार दिखलाते हैं-] 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस वाक्यमें स्वाध्यायपदसे अपनी शाखाके वेदका ग्रहण किया जाता है। इससे उस शाखामें पढ़े हुए मन्त्र भी स्वाध्यायविधिके द्वारा पाठ्यरूपसे लिए जाते हैं, ऐसे ही मन्त्र अध्ययन * से ज्ञात पद तथा पदार्थके. सम्बन्धका अपने स्वार्थमें बोध कराकर प्रयोजनसे रहित हो जाते हैं। स्वार्थका ही अनुष्ठान करना प्रयोजन नहीं माना जाता, कारण कि द्रव्य- देवतारूप स्वार्थका अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। स्वार्थभूत द्रव्यदेवताकी प्रमिति करना प्रयोजन भी नहीं हो सकता, क्योंकि मन्त्रोंके अर्थ द्रन्यदेवताकी प्रमिति तो ब्राह्मणवाक्योंसे ही हो जाती है। इससे मन्त्रोंमें निष्प्रयोजनत्व * अर्थज्ञानपर्यन्त ही अध्ययन कहलाता है, केवल पाठमात्रको अध्ययन नहीं कहते हैं।
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पूर्वपक्षीके मतसे शास्त्रारम्भखण्डन ] भापानुवादसहित ४०१ श्रुतिलिङ्गादिभिर्व्रीह्यादिवन्मन्त्राः सप्रयोजनस्य कर्मणोडङ्गभावेऽपि न विनि- युज्यन्ते। तत्र 'ऐन्ना गार्हपत्यसुपतिष्ठते' इत्यस्मिन् त्राह्मणे 'गार्हपत्यम्' इति द्वितीयाश्ुतिः 'कदाचन स्तरीरसि'इत्येतन्मन्त्रस्ेन्द्रप्रकाशनसमर्थस्याऽपि गार्ह- पत्योपस्थाने विनियोगं बोधयति, भुतसामर्थ्यलक्षणाछ्िङ्गाच्छतेर्वलीयस्त्वात्। 'वर्हिर्देवसदनं दामि'इत्ययं मन्त्रस्तु मन्त्रलिङ्गाद् वहिर्लवने विनियुज्यते। एवं वाक्यप्रकरणस्थानसमाखयाभिरपि तत्र तत्र मन्त्रा विनियुक्ता:। ते च मन्त्राः केनोपकारेण प्रधानापूर्वसिद्धेरुपकुर्वन्तीति चीक्षायामनुष्ठानापेक्षितद्रव्यदेवता- दिस्मारणेनेति कल्पनीयम् , दृष्टोपकारे सत्यदष्टकल्पनानुपपत्ते: । सम्भ-
त्वात्। यद्यपि त्राह्मणवाक्यैर्द्रव्यदेवतादिस्मृतिः सम्भवति तथापि मन्त्रैरेव
प्राप्त होनेपर उनके सार्थक्यके लिए व्रीहि आदिके तुल्य श्रति, लिङ्ग आदि प्रमाणोंसे मन्त्रोंका प्रयोजनविशिष्ट (यज्ञ-यागादि) कर्मोंके-अङ्ग-उपकारक होनेमें भी विनियोग नहीं किया जाता है। इनमें 'ऐन्द्री ऋचासे गार्हपत्य अग्निका उपस्थान करना चाहिए' इस ब्राह्मणवाक्यमें 'गार्हपत्यम्' इस प्रकार द्वितीयान्त पदकी श्रति 'कदाचन स्तरीरसि' इस मन्त्रकी इन्द्रदेवताके प्रकाशनमें सामर्थ्य होते हुए भी इसका गार्हपत्यके उपस्थानमें विनियोग बोधन करती है, क्योंकि श्रतसामर्थ्य- रूप लिन्नकी अपेक्षा श्रुति वलवान् मानी गई है। 'वर्हिर्देवसदनं दामि' इस मन्त्रका तो मन्त्रलिकसे वर्हि-कुशा-के लवन-छेदन-में विनियोग होता है। इस प्रकार वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्याओंसे मन्त्रोंका तत्-तत् विधियोंमें विनियोग किया गया है। ऐसे विनियोगमें लाये गए मन्त्र किसका उपकार करनेसे प्रधान अपूर्वकी सिद्धिका उपकार करते हैं, इस जिज्ञासाके होनेपर उत्तरमें यही कल्पना की जानी चाहिए कि द्रव्य देवताका स्मरण-उपस्थान-करानेसे प्रधानकी सिद्धिमें उपकार करते हैं, क्योंकि दष्ट-प्रत्यक्ष-उपकारका सम्भव रहते अदष-अप्रत्यक्ष-की कल्पना उपयुक्त नहीं है। हुं, फट् आदिसे भिन्न मन्त्रोंके द्वारा अर्थस्मरण हो सकता है। [ इससे हुं, फट आदिके दृष्टान्तसे मन्त्रोंका अर्थवोध करानेमें सामर्थ्य नहीं है, इस कथनका खण्डन हुआ। ] [स्वाध्यायके अध्ययनविधिमात्रसे अर्थस्मरण नहीं होगा, इस शङ्काका निराकरण करते हैं-]स्वाध्याय-मन्त्रोंके पढ़ने-का अर्थज्ञान- पर्गन्तमें तात्पर्य है। ग्द्मपि ब्राह्मणवाक्योंसे द्रव्य, देवता आदिका स्मरण हो सकता है, ५१
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४०२ विवरणप्रमेयसंग्रह '[सूत्र १, वर्णक २
स्मृतावद्ृष्टविशेपः कल्पनीयः । अन्यथा मन्त्राणामानर्थक्यप्रसङ्गात्। अध्ययनविध्युपात्तानां तदयोगात्। एवं च सति प्रयोगविधि: सवैरद्वैर- पूर्वोपकारं कारयन् मन्त्रैरर्थज्ञानलक्षणमुपकारं कारयति। तत्र यथा प्रयोगवचनो
त्रापि सोक्षोपकारिव्रह्मज्ञानव्यत्तयन्तरमनुष्ठापयतु। न चाऽत्र दार्श्टान्तिके तद्वत् प्रयोगविधिर्नास्तीति शङ्कनीयम्, तस सम्पादयितुं शक्यत्वात्। ननु सर्वत्रोत्पन्ने कर्मणि विनियोगोत्तरकालमधिकारसम्बन्धे सति पश्चात् प्रयोगविधिरन्विष्यते। इह तूत्पच्यादिविधित्रयाभाचे कथ प्रथमत एव अयोगविधिसम्पादनमिति चेद्, न; उत्पत्यादिविधित्नयस्थाडप्यत्र सुसम्पाद-
तथापि मन्त्रोंसे ही स्मरण होनेमें अदृष्टविशेष-पुण्य-की करपना मानी जाती है। अन्यथा मन्त्र अनर्थक हो जायँगे। [मन्त्रोंको अनर्थक मानना इष् नहीं है ] कारण कि अध्ययनविघिसे प्राप्त हुए मन्त्रोंका आनर्थक्य नहीं वन सकता। इस सिद्धान्तके अनुसार प्रयोगोंका विधान सम्पूर्ण अङ्गंके द्वारा प्रधान, अपूर्वका उपकार कराता हुआ मन्त्रोंसे [ द्रव्यदेवतारूप ] अर्थज्ञान- लक्षण उपकार कराता है। [निष्कर्ष कहते हैं-]जैसे प्रयोगविधानका कथन मन्त्रस्थलमें मन्त्रोंके द्वारा अध्ययनकालमें उत्पन्न हुए अर्थज्ञानके अतिरिक्त अपूर्वके उपकारी दूसरे ज्ञानका अनुष्ठान कराता है, वैसे ही प्रकृतमें भी मोक्षके उपकारी ब्रह्मज्ञानसे भिन्न दूसरे ज्ञानका अनुछान कराना सम्भव होगा। प्रकृत दार्ष्टान्तिकमें-ब्रह्मज्ञानमें-दष्टान्त मन्त्रोंमें जैसी प्रयोगविधि है वैसी प्रयोग- विधि नहीं है, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि प्रकृतमें मी प्रयोगविधिका सम्पादन हो सकता है। शङ्ा-कर्मके उत्पन्न-उत्पत्तिविधिसे सिद्ध-होनेपर विनियोग होता है अनन्तर अधिकारीका सम्बन्ध होनेपर प्रयोगविधिकी अपेक्षा होती है। अर्थात् प्रयोगविधिके पूर्व उत्पत्तिविधि, विनियोगविधि तथा अधिकारविधिका होना आव- श्यक है। प्रकृत ब्रह्मज्ञानमें उत्पत्ति आदि तीनों विधियोंके न होनेसे सर्वप्रथम ही प्रयोगविघिका सम्पादन कैसे हो सकेगा? समाधान-उत्पत्ति आदि तीनों विधियोंका भी सम्पादन किया जा सकता
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विधिवाद ] भापातुवादसहित
त्वात्। तथाहि-'वेदान्तवाक्येनाSSतमज्ञानं कुर्यात्' इत्येवं वेदान्तशब्दलक्षणकर- पेन विशिष्टस्याSSत्मज्ञानस्य स्वरूपवोध उत्पत्तिविधिस्तावदध्याहियते। न च वाच्यं विशिष्टप्रतीतौ नोत्पत्तिविधित्वं सम्भवति, स्वरूपमात्रवोधकत्वादुत्पत्ति- विधेरिति, 'सोमेन यजेत' इत्यत्र विशिष्टोत्पत्तिविधेरङ्गीकृतत्वात्। तत्र हि सोमशब्दो यागविशेपनामधेयं गुणवाची वेति विचार्य वल्लीविशेपे रूढस यागनामत्वासम्भवाङ्गुणवाचित्वं निर्धारितम्। तत्र यद्यपि 'दनना जुहोति' इति- वत् 'सोमेन यजेत' इत्युक्ते गुणसम्बन्ध: ग्रतीयते, तथापि 'अग्निहोत्रं जुहोति' इतिवत् पृथगुत्पच्यश्रवणात् सोमगुणविशिष्टयागोत्पत्तिविधिरिति अङ्गी- कर्त्तव्यम्। तद्वत् प्रकृतेऽपि विशिष्टोत्पत्तिविधि: किं न स्यात्१
है। क्योंकि 'वेदान्तवाक्यसे आत्मज्ञान करना चाहिए' इस प्रकार वेदान्तशब्दरूप करणसे विशिष्ट आत्मज्ञानकी स्वरूपनोधात्मक उत्पत्तिविधिका अध्याहार किया जाता है। विशिष्टप्रतीतिके विपयमें उत्पत्तिविधिका सम्भव नहीं है, कारण कि उत्पत्तिविधि स्वरूपमात्रका बोध करानेवाली है, ऐसी शक्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'सोमयागसे इषका सम्पादन करे' इस वाक्यमें विशिष्टकी उत्पत्तिविधि मानी गई है। यहांपर सोमशब्द यागविशेपका नाम है अथवा गुणवाची है: इसका विचार करके एक लताविशेषमें रूढ़ सोमशब्द यागका नाम नहीं हो सकता, इसलिए सोमशबंद गुणवाची है, ऐसा निश्चित किया है। यद्यपि 'दहीसे हवन करना चाहिए' इस विधिके समान 'सोमसे याग करना चाहिए' ऐसा कहनेसे गुणका सम्बन्ध ही प्रतीत होता है, [ उत्पत्तिविधि प्रतीत नहीं होती] तथापि 'अभिहोत्र करता है' इस विधिके तुल्य प्रकृतमें पृथक उत्पत्तिविधिका श्रवण नहीं है। इसलिए सोमगुणविशिष्ट यागकी ही उत्पत्तिविधि माननी चाहिए। [ जैसे 'दध्ना जुहोति' यह वाक्य केवल 'अग्नि- होत्रं जुहोति' इस उत्पत्तिविधिको उद्देश्य करके दधिरूप गुणमात्रका बोध कराता है वैसे प्रकृतमें कोई अन्य उत्पत्तिविधि नहीं है, जिसके द्वारा ज्ञातका अनुवारव करके सोमगुणका विधान किया जाय। दूसरी बात यह है कि प्रसिद्धिरूप रूढिके बलवान् होनेसे यागका नाम भी वल्लीविशेप सोम नहीं माना जा सकता, अतः उसके विशिष्टविधि होनेमें कोई क्षति नहीं है। ] ठीक इसीके तुस्य प्रकृत- ब्रह्मज्ञानविधि-में मी उत्पत्तिविधि क्यों नहीं होगी?
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विवरणप्रमेय संग्रह [सूत्र १, वर्णक २
स एवोत्पत्तिविधि: पर्यालोचितो विनियोगाधिकारप्रयोगाखव्यविधित्रया- कारेण सम्पद्यते । अ्थमं तावदुत्पत्तिविधिवोधितमात्मज्ञानं कथमिति जिज्ञा सायाम् 'फलवत्संनिधावफलं तदङ्गम्' इति न्यायेन फलवदात्मज्ञानप्रकरणपठि- तशमादीनि निष्फलानि इतिकर्त्तव्यत्वेन विनियोजयन्नङ्गाङ्गिसम्बन्धवोधक- त्वादुत्पत्तिविधिरेव विनियोगविधिः सम्पद्यते। ततः शमादीतिकर्तव्यतानु- गृहीतैर्वेदान्तवाक्यकरणैरात्मज्ञानं कुर्यादित्येवंरूपेण निप्पन्नः स एव विनि- योगविधिः साङ्गे कर्मणि 'ममेदं कर्तव्यम्' इति प्रतिपत्तारमधिकारिणमा- काङ्गन्नर्थवादगतं मोक्ष फलत्वेन रात्रिसत्रन्यायेनोपसंहृत्य 'मोक्षकामः कुर्यात्' इत्येवमधिकारविधि: सम्पद्यते। 'रात्रिसत्रे' ह्वेवमर्थवाद:श्रयते-'प्रतितिष्ठन्ति ह वै य एता रात्रीरुपयन्ति' इति । तन्राऽश्रुतत्वादधिकारी कल्पनीयः। स किं इस प्रकारकी कल्पनासे सिद्ध वही उत्पत्तिविधि विचार करनेसे नियोग, अधिकार तथा प्रयोग नामक तीनों विधियोंके रूपमें परिणत हो जाती है। [ विधित्रयकी स्वरूपसम्पत्ति दिखलाते हैं-] सर्वप्रथम उत्पत्तिविघिसे वोघित आत्मज्ञान कैसे सम्पन्न हो, ऐसी जिज्ञासा होनेपर 'फलवान्की सन्निधिमे निष्फल उसका अङ्ग होता है' इस न्यायसे फलयुक्त आत्मज्ञानके प्रकरणमें पढ़े हुए स्वयं निष्फल शमादि (विधि) का इतिकर्तव्यताके रूपमें विनियोग करती हुई उत्पत्ति- विधि ही अङ्गाङ्विसम्तन्घवोधक होनेसे विनियोगविधि हो जाती है। [आत्मज्ञान करना चाहिए, यह तो उत्पत्तिविधि हुई और इसको अपने करणकी आकाङ्कासे उसका सम्बन्धवोधन करना ही विनियोगविधि है। इस कार्यको उक्त उत्पत्तिविधिने शमादिविधिको अपना अङ्ग बनाकर सम्पन्न किया है, यह भाव है। ] इसके अनन्तर शमादिरूप इतिकर्तव्यतासे उपकार पाकर करणत्व- को प्राप्त हुए वेदान्तवाक्योंसे 'आत्मज्ञान करना चाहिए' इस प्रकारके स्वरूपको प्राप्त वही विनियोगविधि साङ्ग-अङ्गोंके सहित-अनुष्ठानमें 'मुझे यह करना चाहिए' इस प्रकारके प्रमाता अधिकारीकी आकाह्ा करती हुई अर्थवादगत मोक्षको रात्रिसत्रन्यायसे फल वनाकर 'मोक्षकी इच्छा रखनेवाला आत्मज्ञान करे' इस प्रकार अधिकारविधिके आकारको पा जाती है। 'रात्रिसन्र' (याग) में अर्थवादका इस प्रकार श्रुतिमें वर्णन आया है कि 'ज़ो पुरुष इन रात्रिविशेषोंका उपयान करते हैं, वे प्रतिष्ठाको माप्त होते हैं' इसमें अधिकारीका श्रवण नहीं है, इसलिए अधिकारीकी कल्पना करनी
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विधिवादं] भापानुवादसहित ४०५
स्वर्गकामो भवेत् किं वाऽ्डर्थवादिकप्रतिष्ठाकाम इति सन्देहः। तत्र विश्वजि- न्न्यायेन स्वर्गकाम: प्राप्तः। 'विश्वजिता यजेत' इत्यत्र फलस्याऽश्रुतस्याऽपेक्षायां 'स स्वर्ग: स्यात् सर्वान्प्रत्यविशिष्टत्वात्' इति सूत्रेण क्चिन्नियोज्यविशेपणत्वेन श्रुतः स्वर्ग इतरत्राऽपि फलत्वेन कल्पनीयः, सर्वेपां स्वर्गार्थित्वाविशेपादिति निर्णीतम्। तथा रात्रिसत्रे Sपि स्वर्ग: फलं तत्कामोऽधिकारीति पूर्वपक्षे पापते 'फल- मात्रेयो निर्देशात्' इति सन्नेणेत्थं राद्धान्तितम्-विश्वजिदादौ फलस्योत्पत्तौ अश्रवणात् स्वर्ग: कल्प्यतां नाम, रात्रिसत्रे त्वर्थवादनिदिष्टा प्रतिष्ठैव फलम्; सार्थवादेनैव वाक्येन नियोगप्रतीतेः । अर्थवादानां विध्येकवाक्यताया
चाहिए। वह अधिकारी स्वर्गकी इच्छा करनेवाला होगा ? अथवा अर्थवादसे सिद्ध प्रतिष्ठाकी कामनावाला होगा? ऐसा सन्देह होता है। इस अवसर- पर [पूर्वमीमांसामें ] विश्वजिन्न्यायसे स्वर्गकी कामनावाला प्राप्त होता है, कारण कि 'विश्वजित् याग करना चाहिए' इस विधिमें फलका श्रवण न होनेसे किस फलके लिए उक्त याग किया जाय? ऐसी अपेक्षा होनेमें 'जहां कोई फलश्रुति न हो वहां सभी विधियोंके अविशेप होनेसे स्वर्गको ही फल मानना चाहिए' इस सूत्रसे किसी एक विधिमें स्वर्ग नियोज्य-अधि- कारी-के विशेषणरूपसे श्रुत है, इसलिए जहांपर फलश्रुति नहीं है ऐसी दूसरी विधिमें भी स्वर्गरूप ही फलकी कल्पना करनी चाहिए, क्योंकि सभी समानरूपसे स्वर्गके प्रार्थी हैं, ऐसा निर्णय किया गया है। एवं रात्रिसत्रमं भी स्वर्गको ही फल मानना चाहिए और उसकी इच्छा रखनेवाला अधिकारी होगा, इस प्रकार पूर्वपक्षके प्राप्त होनेपर 'फलमात्रेयः ' इत्यादि सूत्र द्वारा यह सिद्धान्त किया गया है कि विश्वजित् आदि यागकी उत्पत्ति- विधिमें फलका श्रवण नहीं है। इससे वहांपर स्वर्गरूप फलकी कल्पना करना संगत है, परन्तु रात्रिसत्रस्थलमें तो अर्थवादमें दिखलाया गया प्रतिष्ठारूप ही फल मानना चाहिए। कारण कि अर्थवादसे युक्त वाक्यसे ही नियोगकी प्रतीति होती है। [और स्वर्गरूप फल तो भिन्न वाक्यसे प्रतीत होता है। रात्रिसत्रका विधान तो अर्थवादके साथ एकवाक्यता प्राप्त होकर ही होता *'फलमात्रेयो निर्देशादशुती हनुमानं स्यात्' (जै० सू० ४।३।१८।) अर्थात् जहांपर फल- निर्देशका श्रवण नहीं हो वहींपर अनुमानसे स्वर्गरूप फलफी कल्पना करनी चाहिए।
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४०६ विवरणग्रमेय्संग्रह. [सूत्र १, वर्णक २
अर्थवादाधिकरणे निर्णीतत्वात्। तत आर्थवादिकप्रतिष्ठाकामो यथा रात्रिसत्रेऽ- धिकारी तथा 'तरति शोकमात्मवित्' इत्याद्यर्थवादावगतमोक्षकाममधिका- रिणं संपादयन्नधिकारविधि: स्यात्। ततः स एव साङ्गतत्वज्ञानमधिका- रिणाऽनुष्ठापयन् प्रयोगविधिः संपद्यते। ततः प्रयोगविधिलाद मन्त्रवद् वेदान्तशव्दा: प्रथमतः स्वार्थमात्मानमववोध्याऽपि पश्चादपूर्वोपकारि- विधेयज्ञानव्यत्त्यन्तरे पर्यवस्थास्यन्ति। न च वाच्यं मन्त्राणामपूर्वोपकारि- अत्ययमात्रे तात्पर्यम्, स्वार्थस्य ब्राह्मणवाक्यैः प्रतिपादितत्वात्। वेदान्तानां तु स्वार्थेऽपि तात्पर्य वक्तव्यम् । अन्यतोऽम्रासतत्वाद्। अतो न. विधेय-
है] अर्थवादवाक्योंकी विधिवाक्योंके साथ एकवाक्यता होती है। ऐसा (पूर्वमीमांसाके) अर्थवाद अधिकरणमें निर्णय किया गया है। जैसे अर्थ- वादसे सिद्ध प्रतिष्ठाकी इच्छावाला पुरुष रात्रिसत्रमें अधिकारी माना जाता है, वैसे ही 'आत्मज्ञानी पुरुष शोक-दुःखजालस्वरूप प्रपञ्न-को पार करता है' इस अर्थवादसे प्राप्त मोक्षस्वरूप फलकी कामनावालेको अधिकारी बनाती हुई अधिकारविधि हो जायगी। तदनन्तर वही साङ्ग तत्त्वज्ञानका- शम, दम आदि इतिकर्तव्यताविशिष्ट ब्रह्मतत्त्वसाक्षात्कारका-अधिकारीके द्वारा अनुष्ठान कराती हुई प्रयोगविधि हो जाती है। तदनन्तर प्रयोगविधिकी सामर्थ्यसे मन्त्रोंके तुल्य वेदान्तशब्द अपने अर्थभूत आत्माका बोध करानेके अनन्तर अपूर्वोपकारक दूसरी विधेय ज्ञानव्यक्तिमें पर्यवसन्न हो जायंगे। [अर्थात् जैसे मन्त्र स्वाध्यायविघिसे अपने स्वार्थका बोधन करनेके अनन्तर भी प्रयोगविधिके बलसे अपूर्वोपकारक विधेयभूत अन्य यागादि व्यक्तिमें पर्यवसित होते हैं] वैसे ही. 'यदिदम्' इत्यादि वेदान्तवाक्य भी अपने स्वार्थभूत आत्माका बोध कराकर 'तरति शोकमात्मवित्' इत्यादि अर्थवादसे कल्पित प्रयोगविधिकी सामर्थ्यसे अपूर्वोपकारक दूसरी विधेय ज्ञान व्यक्तिमें पर्यवसित होंगे, यह भाव है। यदि शङ्का हो कि मन्त्रोंका तो तात्पर्य अपूर्वके उपकारक बोधनमें ही है, क्योंकि उनके स्वार्थ-द्रव्यदेवतासम्बन्ध या स्वरूप-का तो ब्राह्मणवाक्योंसे भी निर्णय किया गया है और वेदान्त वाक्योंका तो स्वार्थमें-ब्रह्मके अर्थबोधमें-भी तात्पर्य है, यह कहना होगा, कारण
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विधिचाद ] भापानुवादसहित ४०७
प्रत्यये तात्पर्यमिति, कुल्याप्रणयनन्यायेनोभयार्थत्वाविधेयत्वात्। यथा शाल्यर्थ कुल्याः ग्रणीयन्ते ताभ्य एव पानीरयं च पीयते तद्वत्। ननु स्थायिनां कुल्यादीनां युगपत्क्रमेण वाऽनेककार्यकारित्वमस्तु, उपलभ्यमानंत्वात। शव्दस्य तु न तावत्क्रमकारित्वं क्वचिद्पि, विरभ्य व्यापारानुपलम्भात्। नाऽपि युगपदर्थद्वये तात्पर्य प्रत्यक्षेण दृशयते। न्याय- तस्तत्कल्पने च न युगपद् न्यायद्वयप्रवृत्ति: संभवतीति चेदू, न; प्रयाज- वाक्येप्घर्थद्वये तात्पर्यस्थाऽङ्गीकृतत्वात्। 'समिधो यजति', 'तनूनपातं यजति', 'इडो यजति', 'वहिर्यजति', 'स्वाहाकारं यजतीति' पञ्चवाक्यानि पश्च प्रयाजान्
कि वह (आत्मज्ञान) दूसरे किसीसे प्राप्त नहीं है, इस लिए दृष्टान्त और. दार्टान्तिकमें वेषम्य होनेसे वेदान्तवाक्योंका उक्त प्रकारके विधेयमें तात्पर्य नहीं हो सकता, तो यह शब्का उचित नहीं है, क्योंकि कुल्याप्रणयनन्यायके अनुसार वेदान्तवाक्योंका दोनोंमें अर्थात् स्वार्थ और विधेय ज्ञानव्यक्त्यन्तरमें तात्पर्य हो सकता है। जैसे-खेतीको सीचनेके लिए गूलें-पानहरे-चनाई जाती हैं और उनसे ही जल भी पिया जाता है वैसे ही वेदान्तवाक्योंमें भी समझना चाहिए। [ अर्थात् अपूर्व अर्थका बोधन करानेसे वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य स्वार्थके-व्रह्मस्वरूपके-बोधमें भी होगा, इस परिस्थितिमें प्रयोग-विधिके चलसे ज्ञानव्यक्तयन्तरमें तात्पर्य होनेसे वेदान्त विधिपरक भी होंगे।] शङ्का-कुल्यादि स्थायी पदार्थ हैं, अतः उनसे तो एक साथ या क्रमसे अनेक कार्योंका सम्पादन हो सकता है, कारण कि वैसा प्रत्यक्ष देखा जाता है। शब्दमें तो कमसे कार्यकारित्व कभी भी नहीं हो सकता, क्योंकि शन्दका विराम होनेके अनन्तर व्यापार नहीं देखा जाता। और एक साथ दो अर्थोंमें शब्दका तात्पर्य भी कहीं नहीं देखा गया है। यदि न्याय द्वारा दो अर्थोंमें तात्पर्यकी कल्पना करो, तो भी एक साथ दो न्यायोंकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। समाधान-प्रयाजवाक्योंमें शब्दोंका दो अर्थोंमें तात्पर्य माना गया है। [ प्रयाजवाक्योंमें उभयार्थता दिखलाते हैं-] 'समित् याग करता है', 'तनूनपात याग करता है', 'इडा याग करता है', 'वर्हि याग करता है'। 'स्वाहाकार याग करता है' इस प्रकार पांच वाक्य पांच प्रयाजोंका तथा
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
क्रमं च तदनुष्ठानस्य वोधयन्तीति द्यङ्गीकृतम्। अतः प्रयाजवाक्यवदुभ- यार्थां वेदान्तशब्दा मन्त्रवद्पूर्वोपकारिणि ज्ञानव्यक्त्यन्तरे विधेये पर्यवस्था- स्यन्तीति। अत्रोच्यते-वेदान्तानां विधेयसमर्पकतायां न स्वार्थपरता संभ- वति। विधायकस्य योपिदग्न्यादिवाक्यस्य स्वार्थपरत्वादर्शनाद्। योपिदादिपदार्थस्य लोकसिद्धतया न तत्र स्वार्थपरता इह तु विधि- ब्रह्मणोरलौकिकत्वादुभयपरत्वं वेदान्तजन्यज्ञानस्य स्यादिति चेत्, किमत्र वेदान्तेपु या ज्ञानव्यक्तिविंधीयते सैव वेदान्तार्थभूतं ब्रह्मस्वरूपं प्रमाप- यति उत ज्ञानव्यत्त्यन्तरम् : आद्ये विरुद्धूत्रिकद्वयापत्तिलक्षणं वैरुप्यं ब्रह्मण: असज्येत । प्राधान्यसुपादेयत्वं विधेयत्वं चेत्येकं त्रिकम् ।
उनके अनुष्ठानके क्रमका भी वोधन कराते हैं, ऐसा माना ही गया है। इस- लिए प्रयाजवाक्योंके दष्टान्तसे वेदान्तवाक्य दोनों अर्थमें तात्पर्य रखते हुए मन्त्रोंके समान अपूर्वका उपकार करनेवाली दूसरी ज्ञानव्यक्तिके विधानमें पर्यवसित होते हैं अर्थात् परम तात्पर्य रखते हैं। [इस प्रकार एकदेशीने ज्ञान- विधिका समर्थन कर वेदान्तवाक्य भी कार्यपरक हैं, ऐसा सिद्धान्त किया है। ] [ सिद्धान्तमतका प्रदर्शन करते हैं-] इस एकदेशीके मतकी आलोचनामें कहा जाता है कि वेदान्तोंका विधेयमें तात्पर्य माननेसे स्वार्थवोधनमें तात्पर्य नहीं हो सकता, कारण कि विधानमें तात्पर्य होनेसे 'योषिदग्नि' आदि वाक्योंका स्वार्थमें तात्पर्य नहीं देखा जाता। यदि कहो कि योषित् आदि पदार्थ तो लोकप्रसिद्ध हैं, इसलिए उन वाक्योंका स्वार्थके वोधनमें तात्पर्य नहीं है; प्रकृतमें तो विधि और व्रह्म दोनों लोकसिद्ध नहीं हैं, इसलिए वेदान्त- शब्दों द्वारा उत्पन्न ज्ञानका दोनोंमें तात्पर्य माना जायगा, तो यह कहनां उचित नहीं है, क्योंकि प्रकृतमें जिस ज्ञानका विधान किया जाता है, वही ज्ञानव्यक्ति वेदान्तवाक्योंके अर्थभूत न्रह्मस्वरूपका निश्चय करा देती है? अथवा उससे दूसरी ज्ञानव्यकि न्रह्मस्वरूपका बोध कराती है। प्रथम पक्षके माननेसे परस्पर विरुद्ध दो त्रिकोंकी आपत्तिस्वरूप ब्रह्ममें वैरूप्य प्रसक्त हो जायगा। [ उनमें प्रथम त्रिक दिखलाते हैं] प्राधान्य, उपादेयत्व और विघेयत्व यह एक त्रिक है और गुणभाव-गुणत्व-
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विधिवाद ] भाषानुवादसहित ४०९
गुणभावमुद्देश्यत्वमनुवाद्यत्वं चेत्यपरं त्रिकम्। तत्र अमापकस्य ज्ञानस्य प्रमेयार्थतया प्रमेयस्य ब्रह्मणः प्राधान्यम्। तथा कस्य ज्ञानमित्यपेक्षायां ब्रह्मणो ज्ञानमित्येवं विधेयज्ञानं ग्रति व्यावर्त्तकतया तदर्थस्य व्रह्मणो गुणभावः तथा प्रमाणविपयस्य त्रह्मणः अमाणजन्यातिशययोगित्वाकारेण साध्यत्वादुपादेयत्वं तथा स्वभावतः सिद्धवाद् ब्रह्मण उद्देश्यत्वम् । तथेदानीं ग्रमाणविपयस्य ब्रह्मण: पूर्वमज्ञाततयाड्गीकार्यत्वाद् विधेयत्वम्। तथेदानीमुद्देश्यस्य त्रह्मण: पूर्व ज्ञातत्वादनुवाद्यत्वम्। तदेवं विधेयज्ञान- मेव ब्रह्मप्रमापकमित्यस्मिन्नाद्यपक्षे चैरुप्यं दुर्वारम्। अस्तु तर्हि द्वितीयः पक्ष :- वेदान्तेभ्य उत्पन्नं ग्रथमज्ञानं ब्रह्मपरं द्वितीयज्ञानं विधेयतया
उद्दश्यत्व तथा अनुवाद्यत्व दूसरा त्रिक है। इनमें प्रथम त्रिकका प्रथम प्राधान्य न्रह्ममें आता है, क्योंकि प्रमाजनक ज्ञान प्रमेयके लिए ही होता है, [और वह प्रमेय ज्ञानक्रियासे जन्य फलका आश्रय होनेसे ब्रह्म ही है। ] अतः ब्रह्ममें प्राधान्य प्राप्त होता है। इसके विरुद्ध द्वितीय त्रिकका प्रथम गुणत्व भी न्रह्ममें दिखलाते हैं-'किसका ज्ञान' इस प्रकारकी अपेक्षा होनेपर 'ब्रह्मका ज्ञान' इस प्रकारके उत्तरवाक्यमें विधेयभूत ज्ञानके प्रति विशेपण होनेसे वेदान्तशव्दार्थ न्रह्ममें गुणभाव प्राप्त होता है। एवं प्रमाणके विषय ब्रह्ममें प्रमाणजन्य अतिशयका सम्बन्ध होनेके कारण साध्यत्व होनेसे ब्रह्ममें उपादेयत्व भी आता है। और स्वभावतः सिद्ध होनेसे ब्रह्ममें उद्देश्यत्व आता है। एवं इस समय प्रमाणविपय ब्रह्ममें पहले (वेदान्तवाक्यके श्रवणसे पूर्व ) अज्ञातस्वरूप माननेसे विधेयत्व सिद्ध होता है। [ अपूर्व ही विधेय होता है और पूर्वसिद्ध उद्देश्य होता है, इस प्रकार उद्देश्यत्व और विधेयत्व ब्रह्ममें विरूपत्वके प्रतिपादक हैं] एवं उद्देश्यस्वरूप ब्रह्मके प्रथम ज्ञात होनेसे उसका अनुवाद भी प्राप्त होता है [ जो विधेयके विरुद्ध है] इस परिस्थितिमें विधेयज्ञान ही न्रह्मका निश्चायक है, इस प्रकारके प्रथम पक्षके माननेमें उक्त रीतिसे ब्रह्ममें वैरूप्य नहीं हटाया जा सकता। यदि कहो कि दूसरा पक्ष-विधेय ज्ञानसे अन्य ज्ञान ही ब्रह्म प्रमापक है-ही मान लिया जाय। क्या हानि है? क्योंकि वेदान्त- वाक्योंसे उत्पन्न प्रथम ब्रह्मज्ञान ब्रह्मपरक होगा और द्वितीय ज्ञान विधिका ५२
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४१० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, चर्णक २
विधिपरमिति। नाऽ्यमपि पक्ष: समीचीनः, शब्दस्योभयपरत्वाभावे तज्जन्यज्ञानस्याऽसक्ृज्जातस्याऽप्युभयपरत्वानुपपत्तेः। न च शव्द्रस्योभय- परत्वम्, प्रयाजवाक्यदृष्टान्तस्य निराकरिष्यमाणत्वात्। ननु वैरुप्यप्रसङ्गो न दोपमावहति। अन्यथा गुणकर्मविधाना- नुपपत्तेः। तथाहि-क्रत्वङ्गभूतत्रीह्यादिकारकसंस्कारार्थानि कर्माणि गुणकर्माणि । तत्र व्रीहीणामन्यार्थत्वसिद्धत्वज्ञातत्वलक्षणानि गुणत्वो- देश्यत्वानुवाद्यत्वानि तावद् विद्यन्ते। यागक्रियां प्रति कारकत्वादन्या- विषय होनेसे विधिपरक होगा [ इससे कोई विरोध नहीं है] तो, यह दूसरा पक्ष भी दोषरहित नहीं है, क्योंकि शब्दका दो अर्थोंमें तात्पर्य न होनेसे उस शब्दसे उत्पन्न ज्ञानके बार बार उत्पन्न होनेपर भी उसका दो अर्थोंमें तात्पर्य हो नहीं सकता, [ जैसे घट-पटसे उत्पन्न घटज्ञान पुनः पुनः उत्पन्न होनेपर भी दो अर्थोंमें तात्पर्य नहीं रखता ]। शब्दका दो अर्थोंमें तात्पर्य होता है, इसमें दिये हुए प्रयाजवाक्योंके दष्टान्तका आगे खण्डन किया जायगा। [इससे शन्दोंका दो अर्थोमें तात्पर्य नहीं माना जा सकता, अतः अभियुक्तोंका 'सकृदुक्तः शब्द: सकृदेवार्थ गमयति' (एक वार उच्चारण किया गया शब्द एक ही अर्थका बोधन कर सकता है,) यह सिद्धान्त ही स्वीकरणीय है। ] शङ्का-वैरूप्यका प्रसङ्ग दोषाधायक नहीं है। यदि वैरूप्यप्रसङ्ग दोष- कारक हो, तो गुणकर्मके विधानकी उपपत्ति न हो सकेगी, क्योंकि यज्ञके अङ्गभूत व्रीहि आदि साधनोंके संस्कारके लिए किये जानेवाले (अवघातादि) कर्म गुणकर्म कहलाते हैं। ऐसे स्थलमें व्रीहि आदि साधनद्रव्योंमें अन्यार्थत्व, सिद्धत्व तथा ज्ञानत्वस्वरूप गुणत्व, उद्देश्यत्व तथा अनुवाद्यत्व प्राप्त होता है, [अन्यार्थत्व अर्थात् स्वार्थके लोकतः सिद्ध होनेसे उसमें तात्पर्य न होनेके कारण ब्रीह्यादिमें यज्ञोपकारकत्व सिद्ध होता है, अतः ब्रीह्यादि गुण-विशेषण- होते हैं एवं लोकसिद्ध होनेसे अपूर्वस्वरूप विधेय नहीं हो सकते, अतः उद्देश्य ही होंगे, तथा प्रथम ज्ञान ही उद्देश्य होता है, अतः उद्देश्यका अनुवाद ही उचित है। इस आशयका स्वयं ग्रन्थकार ही प्रकाश करते हैं ]- ज्रीहि आदि यागक्रियाके प्रति कारक-साधन-होनेसे अन्यार्थत्व होता है। और
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विविवाद ] भोपांनुवादसहित ४११
र्थत्वम्। मानान्तरगम्यत्वात् सिद्धत्वज्ञातत्वे। तथा शेपित्वसाध्यत्वाज्ञा- तत्वलक्षणानि ग्राधान्योपादेयत्वविवेयत्वानि प्रोक्षणक्रियावशाद् त्रीहीणामत्र संभविष्यन्ति। ग्रोक्षणस्य त्रीह्यर्थतवाद् व्रीहीणां शेपित्वम्। ग्रोक्षण- जन्यातिशयवदाकारेण पूर्वमसिद्धत्वात् साध्यत्वाज्ञातत्वे। तत्र गुणत्वोददेश्य- त्वानुवाद्यत्वाख्यं त्रिकं त्रीहिशब्दात् प्रतीयते। प्राधान्योपादेयत्वविधेयत्वाख्यं तरिकं प्रोक्षणक्रियाजन्यातिशयवाचिद्वितीयाविभत्त्या ग्रतीयते। ततो त्रीहिमोक्षणादिपु' गुणकर्मस्वेकस्यां ग्रमितौ विरुद्धत्रिकद्वयापत्तिर्दुर्वारेति नेयं दोपावहेति चेद्, मैवम्; न तत्र क्रियाजन्यातिशयो विभक्तिगम्यः,
प्रत्यक्ष आदि अन्य लौकिक प्रमाणों द्वारा सिद्ध होनेसे-सिद्धत्व और ज्ञातत्व माना जाता है। इस पूर्वोक्त त्रिकसे भिन्न दूसरा त्रिक भी त्रीहि आदिमें दिखलाते हैं-गोपिल्व, साध्यत्व तथा अज्ञातत्व स्वरूप प्राधान्य, उपादेयत्व तथा विधेयत्व लक्षण अन्य त्रिक भी प्रोक्षण आदि क्रियाकी सामर्थ्यसे त्रीहि आदि द्रव्योंमें सम्भव होगा। प्रोक्षणक्रिया त्रीहिके संस्कारके लिए है, अतः त्रीहिको शेषित्वलक्षण प्राधान्य प्राप्त है- [जिसके लिए जिसका विधान है, वह प्रधान होता है; जैसे सेवकोंका सब कार्य स्वामीके निमित्त होता है। वहांपर स्वामी प्रधान होता है] प्रोक्षणक्रियासे उत्पन्न अतिशययुक्त आकारसे त्रीहि प्रोक्षणसे पूर्व सिद्ध नहीं है। इसलिए उस आकारसे त्रीहियोंमें साध्यत्व और अज्ञातत्व भी प्राप्त है। इनमें गुणत्व, उद्देश्यत्व तथा अनुवादयत्व रूप त्रिक त्रीहिशव्दसे प्रतीत होता है और प्राधान्य, उपादेयत्व तथा विधेयत्व रूप दूसरा त्रिक प्रोक्षणक्रियासे जनित अतिशयको कहनेवाली द्वितीया विभक्तिसे मालम होता है। [ द्वितीया विभक्ति 'कर्मणि द्वितीया' (पा० सृ०) से कर्मरूप अर्थमें होती है और कर्म पदार्थ क्िया- जन्यफलाश्रयत्वस्वरूप है]। इस रीतिसे गुणकर्मभूत व्रीहिमोक्षणादिस्थलमें एक ही ज्ञानमें विरुद्ध दो त्रिकोंकी आपत्ति दूर नहीं की जा सकती, इसलिए उक्त वैरुप्यकी आपत्ति दोपजनक नहीं मानी जा सकती। समाधान-ऐसा नहीं है, कारण कि उक्त गुणकर्ममें क्रियासे उत्पन्न अतिशय विभक्ति द्वारा प्रतीत नहीं होता है, किन्तु त्रीहिके लिए विहित ग्रोक्षणादि क्रियाविधिकी अनुपपत्तिसे पतीत होता है। [अर्थात् त्रीहिमें प्राधान्यादि त्रिक
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४१२ विवरणग्रमेय संग्रहं [सूत्र १, वर्णक २
किन्तु व्रीह्यर्थक्रियाविध्यनुपपत्तिगम्यः। अतः शाब्दे ज्ञाने गुणत्वोद्देश्यत्वानु वाद्यत्वान्येव अ्रमीयन्ते। प्रधान्योपादेयत्वविधेयत्वांनि त्वर्थापच्येति ज्ञानभेदान तत्र वैरुप्यप्रसङ्ग:। प्रकृतेऽपि तर्हि ्रह्मज्ञानविधेयज्ञानयोमेदा- दविरोधोऽस्त्वति चेद्, न; व्रीह्यादाविव ब्रह्मणि मानान्तरस्याऽसंभवात्। नहि सामग्रीभेदमन्तरेण कार्यभेद: संभवति। अथोच्येत-विधायकपद- व्यतिरिक्तपद्समुदायो ब्रह्मस्वरूपं प्रथमतः प्रतिपाद्य पुनस्तदनुवादज्ञानं जनयित्वा तस्य ज्ञानस्य विधिविपयत्वसमर्पणेन पुनर्विधायकपदेन पदैकवाक्यतां गच्छति,'ततः ग्रमाणभेदसिद्धिरिति। नैतद्युक्तम् , पदैक- वाक्यतायाः प्राग् वाक्यरूपस्य पदससुदायरय प्रमाणत्वायोगात्। अथाडत्र
अर्थापत्तिगम्य है, साक्षात् शब्द द्वारा नहीं, यह भाव है ] अतएव शव्दजनित ज्ञानमें गुणत्व, उद्देश्यत्व तथा अनुवाद्यत्वरूप त्रिककी ही प्रतीति होती है। प्राधान्य, उपादेयस्व तथा विधेयत्व रूप त्रिक् तो अर्थापत्तिसे प्रतीत होता है। इस प्रकार ज्ञानभेद होनेसे वैरूप्यका प्रसङ्ग नहीं है। तब तो प्रकृतमें भी व्रह्मज्ञान और विधेयज्ञानमें भेद होनेसे कोई विरोध नहीं होगा, ऐसा कहना भी नहीं बनता, कारण कि त्रीहि आदि (लौकिक द्रव्यों) की भाँति ब्रह्ममें किसी दूसरे प्रमाणका सम्भव नहीं है। सामग्रीके भेदके बिना कार्य- मेदका सम्भव नहीं है। यदि विधायक पदोंके अतिरिक्त शब्दोंका समुदाय- वेदान्तवाक्य-पहले ब्रह्मस्वरूपका प्रतिपादन कर, पश्चात् उसके अनुवाद- ज्ञानको उत्पन्न करके उस ज्ञानको विधिका विषय वनानेके अनन्तर विधायक पदोंसे पदैकवाक्यताको प्राप्त होता है, इस कारण ्रमाणभेदकी सिद्धि हो जायगी, [ इस आशङ्काके द्वारा करणमेदसे ज्ञानभेद दिखलाया। ब्रह्म- स्वरूपका बोधक स्वतन्त्र वेदान्तवाक्य करण-प्रमाण-है। और ज्ञान- विधिकी बोधक पदैकवाक्यताकी रीतिसे विधायक वाक्योंके साथ एकवाक्यता- पन्न वेदान्तवाक्य करण हैं, इससे करणभेद सिद्ध हुआ। इस पूर्व शङ्काके समाधानसे तो एक शब्दज्ञानका दोनोंमें तात्पर्य होनेका निराकरण किया गया था], ऐसा कहो तो यह कथन मी युक्त नहीं है, कारण कि पदैकवाक्यसे पहले वाक्यरूप पदसमुदाय प्रमाण नहीं माना जा सकता।
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विधिवाद] भापानुवादसहित ४१ ३
ब्रह्मवाक्यं ज्ञानविधिवाक्यं चेति द्वेधा विभज्य पश्चादर्थवादविधि- वाक्ययोरिव वाक्यैकवाक्यता कल्प्येत, तदसत्; अर्थवादानामफलानां विध्येकवाक्यत्वेऽपि त्रह्मवाक्यस्य स्वत एव पुरुपार्थपर्यवसायिनस्तद- योगात्। अथ प्रथमिकशाव्दज्ञानस्य परोक्षत्वेनाडफलत्वात् फलभृतापरोक्षा- नुभवहेतुत्वाभावात् तद्धेतुज्ञानं विधेयम्। ततो ब्रह्मवाक्यस्य तद्विध्येक- वाक्यत्वं युक्तमिति चेद्, तर्हिं यागस्य त्रीह्यादिवद्विधीयमानज्ञानस्य किश्चित्करणकारकं वक्तव्यम्। तच्च न संभवति, त्वन्मते शब्दस्य परोक्ष- ज्ञानोपक्षयात्। इन्द्रियादीनां च ब्रह्मगोचरत्वाभावाद्। अथ मतं शाव्दज्ञानस्याऽपरोक्षानुभवहेतुता यद्यापे स्वतो न दश्यते तथापि विधिवलाद् भविष्यति, ततः शब्द एव विधेयज्ञानकरणमिति। तदयु-
[ इससे एकवाक्यताको प्राप्त नहीं हुआ, वेदान्तवाक्य पृथक् प्रमाण न होनेसे प्रमाणभेद नहीं पाता ।] यदि कहो कि ब्रह्मवाक्य और ज्ञानविधिवाक्य इस प्रकार दो वाक्योंका विभाग करके पीछे अर्थवादवाक्य और विधिवाक्योंके तुल्य वाक्यकवाक्यताकी करपना करेंगे, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि स्वतन्त्र फल न रखनेवाले अर्थवाद- वाक्योंकी विधिवाक्यके साथ एकवाक्यता होनेपर भी ब्रह्मवाक्यकी विधिवाक्यके साथ एकवाक्यता नहीं हो सकती, कारण कि ब्रह्मवाक्य स्वयं-दूसरे विधि- वाक्यके साथ एकवाक्यता हुए विना-भी पुरुपार्थका वोधन करनेमें समर्थ हैं। यदि प्रथमोत्पन्न शव्दज्ञान परोक्ष होनेसे निप्फल है, अतः फलस्वरूप अपरोक्ष अनुभवका कारण नहीं हो सकता, इसलिए उक्त फलके कारणीभूत ज्ञानको विधेय मानना होगा। इससे ब्रह्मवाक्यकी उस विधेयज्ञानविधिके साथ एकवाक्यता संगत ही है, ऐसा यदि कहो, तो जैसे यागके ब्ीहि आदि कारकोंका विधान किया जाता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञानका भी कोई करण कारक कहना होगा, वह करण कोई नहीं हो सकता, क्योंकि तुम्हारे-विधिवादी सिद्धान्तैक- देशीके-मतमें शब्द परोक्ष ज्ञानको उत्पन्न करके व्यापारहीन हो जाता है। और इन्द्रिय आदि करण ब्रह्मको विषय ही नहीं कर सकते। यद्यपि शब्दज्ञान अपरोक्ष अनुभव-साक्षात्कार-का कारण स्वतः नहीं देखा गया है, तथापि विधान सामर्थ्यसे हो जायगा,
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४१४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३े
क्तम्। किमत्र शब्दजन्यं प्राथमिकं त्रह्मज्ञानं विधेयमृत तेन ज्ञानेनाऽवगतं ब्रह्मोददिश्य प्रत्ययसंतानः । नाऽडद्य, विधेयज्ञानस्यैव न्रहमप्रमापकत्वे वैरू- प्यस्य दर्शितत्वात्। न द्वितीयः, ग्रत्ययसंतानस्याऽ्रुतत्वात्। 'आत्मेत्वेवो- पासीत' इत्यादौ प्रत्ययसंतानरूपस्योपासनस्य विधिः श्रूयत इति चेद्, न;
तात्पर्याद्। एवकारयोगादात्मनः प्रतिपादत्वनिर्णयात्। तदुक्तम्- 'यच्छन्द्योगः प्राथम्यमित्याद्युद्देश्यलक्षणम्। तच्छव्द एवकारश्च स्यादुपादेयलक्षणम् ॥।' इति ॥
[अन्यथा अपरोक्षानुभवके लिए शब्द ज्ञानका विधान व्यर्थ हो जाता है।] इसलिए शब्द ही विधेयभूत ज्ञानमें करण-साधन-कारक होगा, यदि ऐसा मानो तो वह भी युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि प्रकृतमें शव्दसे प्रथम उत्पन्न हुआ त्रद्मज्ञान विधेय है ? अथवा उस प्रथम ज्ञानसे प्राप्त त्रहाको उद्देश्य करके ज्ञान- सन्तान-ज्ञानधारा-विधेय है?। इनमें प्रथम पक्ष नहीं बनता, क्योंकि विधेय ज्ञानको ही न्रह्मस्वरूपका निश्चायक माननेमें वैरूप्यपससकी आपत्ति दिखला आये हैं। दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता, क्योंकि ज्ञानसन्तान-ज्ञानधारा- श्रुतिमें नहीं दिखलाई गई है। 'आत्मा है, इस प्रकार ही उपासना (पुनः पुनः परिशीलन) करे' इत्यादि वाक्योंमें ज्ञानधारारूप उपासनाका विधान श्रुतिमें आया है, ऐसा कहना भी साधक नहीं है, कारण कि स्वभावसिद्ध ज्ञानको उद्देश्य करके उसके अलौकिक आत्मस्वरूपविपयका प्रतिपादन करनेमें उपासना- वाक्यका तात्पर्य है। [अर्थात् 'अहम्' इत्यादि प्रत्ययसिद्ध लौकिक आत्माको उद्देश्य करके दूसरे प्रमाणोंसे न जाना हुआ प्रपञ्चशून्य अलौकिक आत्मा ही उपासनाका विषय है, इसमें ही उपासनावाक्यका तात्पर्य है]। यह 'आत्मेत्येव' इस वाक्यमें 'एव' पदके सम्बन्घसे आत्मा प्रतिपाद है, ऐसा ही निर्णय होता है। ऐसा ही अभियुक्तोंने कहा भी है-यत् शब्दका सम्बन्ध अथवा प्रथम कहना, इत्यादि उद्देश्यका लक्षण है। और तत् शब्दका सम्बन्ध तथा 'एव' पद देना उपादेयका लक्षण है।
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विधिवाद] भापानुवादसहित ४१५
न चैतद्वाक्यमात्मानं तदुपासनं च ग्रतिपादयितुं शक्रोति, वाक्यभेद- प्रसङ्गात्। न च 'निदिध्यासितव्यः' इति वाक्यसुपासनां विदध्यात्, आत्म- प्रतिपादकवाक्यमध्ये पठितस्य तस्य स्तुतिपरत्वात्। अन्यथा वाक्यभेदा- पत्तेः। नन्वात्मन्येवाऽऽत्मानं पश्येदिति ज्ञानविधानेन संतानविधिरुपलभ्यते, ज्ञानस्य सर्वत्र प्रवाहेणाऽविनाभावादिति चेद्, नः अविनाभावासिद्वेः। क्वचित्पुरोवर्चि वस्तु सक्रद् दृष्वतो झटिति प्रत्यङ्मुखत्वादिदर्शनाद्। अथाऽपि दर्शपूर्णमासप्रकरणे मलवद्धाससो व्रतकलापविधानवदात्मप्रकरणे सन्तानरूपं निदिध्यासनं विधातुं शक्यत इति चेद्, एवमपि संतानस्याऽग्रमाण-
'आत्मेत्येव' इत्यादि वाक्य आत्मा तथा उसकी उपासना दोनोंका प्रतिपादन करनेमें समर्थ नहीं हैं, कारण कि दोनोंमें तात्पर्य माननेसे वाक्यमेद हो जायगा। 'निदिध्यासन करना चाहिए' यह वाक्य भी उपासनाका विधान नहीं कर सकता, क्योंकि आत्माके प्रतिपादक वाक्योंके मध्यमें पढ़े हुए उक्त वाक्यका स्तुति- मात्रमें तात्पर्य है। नहीं तो वाक्यभेदकी आपत्ति हो जायगी। अपने ही में अपनेको देखे (आत्मामें ही आत्मवुद्धि करे, अनात्मामें आत्मवुद्धि न करे) इस प्रकार ज्ञानके विधानसे ज्ञानधाराका विधान पाया जाता है, क्योंकि ज्ञानका सर्वत्र प्रवाहके साथ अविनाभाव है। [ जैसे घट, पट आदि अनात्म पदार्थका ज्ञान घट, पटादि अनात्मप्रवाहके साथ ही है एवं आत्मज्ञान भी प्रवाहका सहचारी ही है। इस प्रकार प्रवाहका और ज्ञानका सर्वत्र साहचर्यरूप अविनाभाव है, अतः 'ज्ञान' पदकी ज्ञानसत्तामें लक्षणा करेंगे ] इस प्रकार कहना संगत नहीं, कारण कि अविनाभावकी सिद्धि नहीं है। [प्रवाह तथा ज्ञानधाराके साहचर्यके अभावका दष्टान्त द्वारा समर्थन करते हैं]-कभी कभी सामनेकी वस्तुको एक बार ही देखनेवाले पुरुपका तुरन्त ही ्रत्यङमुख हो जाना देखा गया है। [ जैसे किसी सभ्य पुरुषके सामने वीभत्स या लज्जाजनक वस्तु अचानक आ भी जाय, तो भी वह तुरन्त प्रत्यङमुख हो जाता है, वहांपर ज्ञानधारा और प्रवाहका साहचर्य नहीं है और ज्ञान है ] यदि दर्शपूर्णमासप्रकरणमें मलयुक्त वस्त्- वालेके ततके समूहोंके विधानके तुल्य आत्मप्रकरणमें सन्तान-धारा-रूप निदिध्यासनका विधान किया जा सकता है, ऐसा कहो, तो ऐसा माननेपर भी अप्रमाणरूप सन्तान अपरोक्ष अनुभवका कारण नहीं हो सकता। इसलिए
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४१६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
स्याऽपरोक्षानुभवहेतुत्वासंभवान् शाव्दज्ञानाहिशेप: सिध्येत्। न च भृत- पुत्रादेर्भावनाधिक्यादापरोक्ष्यं दृष्टमिति वाच्यम्, तत्र विपयस्यासंग्रयुक्त- त्वेन तदापरोक्ष्यस्य आन्तत्वात्। 'ज्ञानग्रसादेन विशुद्धसच्वस्ततस्तु तं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः' इति श्ुत्या ध्यानस्याऽपरोक्षानुभवहेतुत्वमुक्त- मिति चेद्, मैवम्; नाऽन्र 'ध्यायमान: पशयति' इत्येवमन्वयो येन ध्यानं दर्शन- हेतुः स्याद्, अपि तु ध्यायमानो ज्ञानप्रसादेन पश्यतीति। शानशन्द्रेऽना- त्राऽन्त:करणमुच्यते, ज्ञायतेऽनेनेति व्युत्पत्तेः। तस्य प्रसाद ऐकाय्यम्। तच्च सहकारिकारणम्। लोके दु्ज्ेयवस्तुदर्शने चित्तकाय्यसहायायेक्षाया दष्टत्वात्।
शान्दज्ञानकी अपेक्षा कोई विशेष नहीं सिद्ध हो सकता। भावनाके आधिक्यसे- पुनः पुनः भावना करनेसे-मरे हुए पुत्र आदिका साक्षात्कार देखा गया है, ऐसा कहना भी उचित नहीं है, क्योंकि मरे पुत्रके साक्षात्कारस्थलमें विषय- मृत पुत्रादि-का इन्द्रियसे सम्प्रयोग न होनेसे उसका साक्षात्कार भ्रम है। शङ्का-ज्ञानके प्रसादसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, इसके अनन्तर ध्यान करता हुआ, उपासक उस निष्कल-निरवयव-आत्माका साक्षात्कार करता है, इस श्रुतिसे ध्यान अपरोक्ष अनुभवका कारण कहा गया है। समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि इस वाक्यमें 'ध्यायमानः पश्यति'-ध्यान करता हुआ देखता है' ऐसा अन्वय नहीं है (ध्यान और दर्शनमें कार्यकारण- भावका बोधक नहीं है) जिससे ध्यान दर्शनका हेतु हो सके, किन्तु 'ध्यान करता हुआ ज्ञानप्रसादसे साक्षात्कार करता है, ऐसा अन्वय है। यहांपर ज्ञानशव्दसे अन्तःकरण लेना चाहिए, क्योंकि यह ज्ञानपद 'जिससे जाना जाता है' इस प्रकार करणव्युत्पचतिसे करणार्थक है। उस ज्ञान (अन्तःकरण) का प्रसाद-एकाग्रता है। और वह सहकारी कारण है। लोकमें दुर्ज्नेय-समझनेमें कठिन-वस्तुके अपरोक्ष अनुभवात्मक दर्शन करनेमें चित्तैकाग्रताकी सहायताकी अपेक्षा देखी जाती है। इस प्रकार (विचारनिष्कर्में) सहकारी कारणको प्राप्त हुई चितैकाय्ताका ज्ञानधारारूप ध्यान साधन है, ऐसा श्रुतिका तात्पर्यार्थ कहना होता है। इस प्रकार जो श्रुतिसे सिद्ध नहीं होता, ऐसा अश्रुत अर्थकी कल्पना करना (श्रुति तो 'ध्यायमानः पश्यति'-इस प्रकार दर्शनमें ध्यानका अन्वय
- ज्ञानसे चित्तके प्रसादसे एकाग्रता, ऐसा अर्थ आगे करना है।
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शास्त्रारम्भमें पूर्वपक्ष ] भापानुवादसह्वित ४१७
एवं च सहकारिभूतचित्तैकाय्यस्य अ्रत्ययसन्तानरूपं ध्यानं साधनमित्युक्त भवति। न चैवमश्चुतान्वयकल्पनमयुक्तमिति वाच्यम्, अदष्टानुपपन्नार्थ- कल्पनादन्वय मात्रचैपरीत्यकल्पनस्य लघीयस्त्वाद। नह्यन्यत्र ध्यानस्याऽ- परोक्षप्रमितिहेतुत्वं दष्टम्, नाऽप्युपपन्म्, ध्यानस्य प्रमाणरूपत्वाभावात्। साक्षात्कारस्य तु प्रमाणभूतः शब्द एव कारणमिति पूर्ववर्णके विद्याप्राप्तिवादे 'तं त्वौपनिपदम्' इति तद्वितप्रत्ययमुपजीव्य सिद्धान्तिना समर्थितम्। अतः शब्दज्ञानस्य तत्सन्तानस्य वा नाऽपरोक्षानुभवकरणतया विधेयत्वसम्भवः । यदुक्तं प्रयाजवाक्यवद्वेदान्तानासुभयार्थत्वे सति ब्रह्मप्रतिपादनं विधेय- ज्ञानव्य्त्यन्तरपर्यवसानं च भविष्यतीति। तदपेशलम्, दृष्टान्तासिद्धेः।
दिखा रही है) युक्तिसंगत नहीं है, ऐसा नहीं कहना चाहिए, कारण कि जो लोकमें कहीं देखा ही नहीं गया है तथा जिसकी युक्तियोंसे भी उपपत्ति नहीं हो सकती, ऐसे अदृष्ट और अनुपपन्न अर्थकी कल्पना करनेकी अपेक्षा तो अन्नयके वैपरीत्यकी (अश्युत ध्यानका मनःप्रसादके साथ अन्वयकी) कल्पना करनेमें ही लाघव है। दूसरे स्थलमें कहीं भी ध्यान अपरोक्ष अनुभव-साक्षा- त्कार-का हेतु नहीं देखा गया है और ध्यानमें साक्षात्कारकी कारणता युक्तिसे भी उपपन्न नहीं है, कारण कि ध्यान प्रमाणरूप नहीं है। [ ब्रक्ष ] साक्षात्कारका तो प्रमाणस्वरूप शब्द ही कारण है, ऐसा पूर्ववर्णकमें विद्या- प्राप्तिवादके अवसरपर 'तन्त्वौपनिषदम्' इस वाक्यमें तद्धितप्रत्ययका आश्रयण कर सिद्धान्तीने समर्थन किया है। इससे शब्दजन्यज्ञानका अथवा उसके सन्तान (धारा) का अपरोक्ष अनुभवके करणरूपसे विधान नहीं हो सकता है। और जो कहा गया है कि 'समिधो यजति' इत्यादि प्रयाजवाक्यके तुल्य अर्थात् जैसे 'समिधो यजति' 'तनूनपातं यजति' इत्यादि वाक्योंका समिधादि याग और उनके अनुष्ठानका क्रम इन दोनोंमें तात्पर्य है वैसे ही-'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि वाक्यके उभयार्थक होनेसे उनका ब्रह्मके प्रतिपादनमें और न्रम्मज्ञानके विधानमें भी पर्यवसान होगा, वह ठीक नहीं है, क्योंकि दष्टान्तकी असिद्धि है; प्रयाजादि याग ही 'समिधो यजति' इत्यादि वाक्यका अर्थ ५३
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४१८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, चर्णक ₹
प्रयाजा एव हि तत्र शब्दगम्यास्तदनुष्ठानक्रमस्त्वर्थापत्तिगम्यः । ननु न तावत्प्याजा एव क्रमः, तेपां क्रमशव्दानभिधेयत्वात्। नापि तदतिरिक्त: क्रम: सुनिरूप:, एकैकस्मिन्प्रयाजे क्रमादर्शनाद्। संयोगवदनेकाश्रितः क्रम इति चेद, न; तथा सति संयोगिनोरिव ग्रयाजानां यौगपद्यप्रसङ्गान्। यौगपद्ये च कालकृते क्रमव्याघातात्। मैवम्, लोकग्रसिद्धस्य क्रमस्याङ-
कालवस्तूपाधिपरामर्शमन्तरेण स्वतन्त्र: क्रमो न दश्येत, तर्ह्ेकदेशोपाधिकेषु वृक्षेपु वनव्यवहारवत् संनिहितानेकक्षणोपाधिकेषु प्रयाजेपु क्रमव्यवहारोऽ-
है, उनका अनुष्ठानक्रम तो वाक्यका अर्थ नहीं है वह अर्थापतिसे गम्य है।[ जब पयाजस्थलमें दोनों वाक्यार्थ नहीं हैं तब प्रकृतमें वे दष्टान्त कैसे हो सकते ?] शङ्का-[ यदि क्रम कोई वस्तु सिद्ध हो, तो वह शाब्द है अथवा अर्था- पत्तिगम्य है यह विचार हो सकता है लेकिन क्रम तो कोई वस्तु ही नहीं है इससे यह विचार निराधार है-] प्रयाज ही क्रम हैं यह नहीं कह सकते, क्योंकि क्रम- शब्दसे प्रयाज की और प्रयाजशव्दसे क्रमकी प्रतीति नहीं होती है। और पयाजसे अतिरिक्त भी क्रम नहीं है, क्योंकि प्रत्येक प्रयाजनमें क्रम नहीं दिखाई देता। यदि कहो कि संयोगके तुल्य क्रम अनेकमें रहता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा हो, तो संयोगी दो पदार्थोंके तुल्य क्रमयुक्त वस्तुओंमें एककालिकत्वका प्रसङ्ग हो जायगा, और यदि प्रयाजोंको एककालिक मान लिया जाय, तो उनमें कालकृत क्रमका-पौर्वापर्यका-व्याघात हो जायगा। समाधान-अनेक वस्तुओंमें कालकृत क्रम प्रसिद्ध है, उसका अस्वीकार नहीं हो सकता है। और क्रम कालकृत ही होता है, इससे क्रमिक वस्तुओंमें यौगपद्य-एककालिकत्व-नहीं होगा। यदि कहें कि देश, काल और वस्तुरूप उपाधिसे अतिरिक्त क्रम कोई वस्तु नहीं है, तो यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि एक देश जिनका उपाधि-अधिकरण-है ऐसे वृक्षोंमें जैसे 'वन' व्यवहार होता है वैसे ही सन्निहित अनेक क्षण जिनकी उपाधि-अधिकरण-हैं ऐसे प्रयाजोंमें क्रमव्यवहार होनेमें हानि क्या है? [अभिप्राय यह है कि क्रमव्यवहारमें देश, काल आदि उपाधि-निमितहैं क्रमशब्दके अर्थ नहीं हैं। क्रमशब्दका अर्थ पदार्थान्तर है, इससे यह विचार हो सकता है कि वह शाब्द नहीं है, अर्थापचि-
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शास्त्रारम्भमें पूर्वपक्ष ] भोपानुंवादसहिंत ४१९
स्तु। अथाऽनुष्ठेयंपदार्थानामनिष्पन्नस्वभावत्वाद्देशकालवस्तुकृतः क्रमो न सम्भवेत्, तर्हि वाक्यपाठक्रम एव स्मर्यमाणोऽनुष्ठेयपदार्थेऽप्युपकल्पताम्। ननु कथमयं क्रमोऽनुष्ठेयविशेपणतया ग्रसीयते, विधायकाभावात्; प्रयोग- वचनस्य तद्विधायकत्वे परस्पराश्रयत्वग्रसङ्गात्। विहिते प्रयोगविधिः, प्रयोगविधौ च तद्विधिकल्पनेति। नैप दोप:, एकस्य कर्तुर्युगपदनेक- पदार्थप्रयोगानुपपच्या क्रमस्य ग्रमीयमाणत्वात्। ततः प्रयाजवाक्यानामे- कार्थपरत्वान्न तद्दृष्टान्तेन वेदान्तानामर्थद्वयपरत्वं सम्भवति।
चक्षुपा द्रव्यस्याऽपि प्रतीतिदर्शनादिति, तदप्यसत् । यथा प्रतिवस्तु
गम्य है। ] यदि कहें कि अनुषेय यागरूप पदार्थ असिद्ध हैं उनमें कालकृत क्रमकाव्यवहार नहीं होगा, तो प्रयाजवाक्योंके पाठमें जो क्रम है, उसीका स्मरण कर यागोमें भी क्रमकी कल्पना कर व्यवहार कीजिए, कोई हानि नहीं है। शक्का-अनुष्ठेय यागमें विशेपणरूपसे यह क्रम कैसे भासेगा, क्योंकि क्रमका विधायक कोई वाक्य नहीं है। यदि कहें कि 'समिधो यजति' इत्यादि विधि- वाक्य ही क्रमविशिष्ट यागका विधान करेंगे, तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि ऐसा माननेमें अन्योन्याश्रयका प्रसङ्ग होगा, कारण कि क्रमका विधान होनेपर क्रमविशेपित यागका विधान होगा और यागका विधान होनेपर उनमें क्रमकी कल्पना होगी। समाधान-'समिधो यजति' इत्यादि वाक्योंसे बोध्य क्रमविशिष्ट याग नहीं है, किन्तु एक कर्त्ता अनेक यागोंको एक कालमें कर नहीं सकता है, इससे-एककर्त्तक अनेक यागोंकी एक कालमें अनुपपत्तिसे-क्रमकी कल्पना होती है, अतः अन्यो- न्याश्रय नहीं होता। इससे यह सिद्ध हो गया कि प्रयाजवाक्य केवल यागका ही विधायक है, क्रमका विधायक नहीं है अर्थात् एकार्थ है; अतः प्रयाजवाक्यके दष्टान्तसे वेदान्तवाक्य दो अर्थका बोध नहीं करा सकेंगे। अर्थात् यदि उनको ज्ञानविधिपरक मानें, तो वे ब्रह्ममें पर्यवसित नहीं होंगे। पीछे जो यह कहा गया है कि 'आत्मेत्येवमुपासीत' इत्यादि वाक्य उपासनाका विधान करते हैं, उन वाक्योंसे ही ब्रह्मका बोध भी होगा। जैसे कि रूपकी प्रतीतिके लिए प्रवृत्त चक्षुसे द्रव्यका भी ग्रहण होता है, वह कहना भी
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४२० िवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
सम्प्रयोगनिरपेक्षमेव प्रमाणं चश्षुर्न तथा प्रतिपदार्थ प्रमाणं शब्द: किन्तु यत्र तात्पर्य तत्र सम्भूयैव प्रमाणम्। तथा च विधिपरा वेदान्ता कथ ब्रह्मावगमयेयुः। नन्वेवं तर्हि वेदान्तशव्दा ब्रह्मस्वरूपं मा प्रमापयन्तु किन्तु विधायकपद्जन्यविधिप्रमितिविषयत्वेनैव ब्रह्मज्ञानं समर्पयन्तु ब्रह्मस्वरूपं त्वर्थापच्या सेत्स्यति, विधेयज्ञानस्य ज्ञेयभूतन्रह्मस्वरूपमन्त- रेणाऽनुपपच्तेरिति चेदू, महदिदं न्यायविचारकौशलमायुष्मतः, यदेक- स्मिन् विपये ब्रह्मस्वरूपाख्ये प्रथमप्रतिपत्तिः प्रमाणं तस्मिनेव द्वितीयज्ञानं न प्रमाणमिति। तथा क्षुतिर्न प्रमाणम्, अ्त्यर्थापत्तिश्च प्रमाणमिति। अथ श्रतिविधिशेपत्वान् स्वार्थे प्रमाणं अत्यर्थापत्तिस्त्वनन्यशेपत्वात् प्रमाणम्, इत्युच्येत, एवमपि नाऽन्र ब्रह्म सिध्येत्, 'वाचं धेनुमुपासीत' इत्यादाविव ठीक नहीं है, क्योंकि चक्षु एक वस्तुके अ्हणमें दूसरी वस्तुके सम्बन्धकी अपेक्षा नहीं रखता और शब्द एक अर्थके बोधमें अन्य शब्दके सम्बन्धकी अपेक्षा रखता है, क्योंकि परस्परसमभिव्याहाररूप आकांक्षा शव्द्बोधमें कारण है, ऐसी परिस्थितिमें ब्रह्मज्ञानविधायक वेदान्तवाक्योंसे ग्रह्मका अवगमन कैसे होगा ? शङ्का-जब ऐसी बात है, तब वेदान्तवाक्य व्रम्मस्वरूपका प्रतीपादन न करें, विधायक पदोंसे उत्पन्न विधिकी प्रमितिके विषय होकर ही न्रह्मज्ञानका विधान करें, परन्तु ब्रह्मके अवगमके बिना ब्रह्मज्ञानका विधान नहीं हो सकता, इससे ब्रह्मज्ञानके विधानकी अनुपपत्तिरूप अर्थापत्ति प्रमाणसे ही ब्रह्म प्रमित होगा, नुकसान क्या है? समाधान-ठीक है, यह आपकी महती न्यायकुशलता है, जो एक ही बँह्स्वरूपके विषयमें प्रथम ज्ञान प्रमाण है और द्वितीय ज्ञान प्रमाण नहीं है एवं ब्रह्ममें श्रुति प्रमाण नहीं है, वल्कि श्रुतिमूलक अर्थापत्ति प्रमाण है। यदि आप कहें कि श्रुति विधि-शेष होनेसे अपने अर्थमें प्रमाण नहीं है, श्रुति- मूलक अर्थापचि अन्यशेष न होनेके कारण प्रमाण है, तो आपका यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मकी उपांसनाका विधान ब्रह्मके स्वरूपके बिना भी हो सकता है। जैसे 'वाच धेनुसुपासीत' (वाणीकी धेनुरूपसे उपासना करे) यहांपर वस्तुतः बाणी धेनु नहीं है, पर धेनुरूपसे उसकी उपासना होती है, वैसे ही त्रह्मके वस्तुतः न होनेपर भी आरोपसे ब्रम्मोपासना होगी। यदि कहें-
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झास्त्रारम्भमें पूर्वपक्ष ] भापानुवादसहित
विधेयज्ञानस्य वास्तवज्ञेयमन्तरेणाप्युपपत्तेः। स्वतःप्रामाण्यमाश्रित्य विधेयज्ञानाद् ब्रह्मसाधने तथैव सिद्धार्थपद्जन्यप्राथमिकज्ञानाद् ब्रह्म किं न सिध्येत् १ तत्सिद्धौ च तावतैव सुस्युपपत्तौ विधिवैयर्थ्यम्। अथ विधेयज्ञानस्यारोपितविपयतायामदष्टफलकल्पनात् ततो विषयग्रमिति- लक्षणं दृष्टफलं कल्प्यत इति चेद, न; सकलप्रमाणविरोधप्रसङ्गांत्। तदेव- मत्यन्तदुष्टस्य प्रतिपत्तिविधेरध्याहर्तुमशक्यत्वात् 'इदं सर्वं यदयमात्मा'इत्यादि वेदान्तैर्मन्त्रैरिव प्रयोगवचनो न ज्ञानव्यत्त्यन्तरमनुष्ठापयति, ततो नानेनापि सिद्धान्तैकदेशिना वेदान्तविचारस्याऽगतार्थत्वं सुसम्पादम्। नन्वध्ययन- विध्युपात्तानां वेदान्तानां धर्मत्रह्मविपयत्वाभावे सत्यानर्थक्यं स्ादिति चेद्, मैतम्; यद्यपि वेदान्तानां सिद्धन्नह्मस्वरूपावोधकत्वान्नास्ति ब्रह्म, तथापि न वेदान्तवैयर्थ्य, कर्तृत्वभोककत्वादिविशिष्टस्याहंग्रत्ययगम्यस्य कि विधेयज्ञान स्वतः प्रमाण है, इससे उसीसे ब्रह्म सिद्ध होगा, तो सिद्धार्थक सत्य, ज्ञान, आनन्द आदि पदसे जन्य प्रथम ज्ञानसे ही ब्रह्मकी सिद्धि क्यों नहीं होगी? और जय ब्रह्मज्ञान हो गया तब उसीसे मुक्तिकी उपपति हो गई फिर विधि व्यर्थ है। विधेयज्ञानरूप उपासनाको यदि आरोपितविषयक मार्ने, तो उसके अदृष्ट (पुण्य) फलकी कल्पना करनी पड़ेगी। इससे विषय- प्रमितिलक्षण टष्ट फलकी ही कल्पना क्यों न करें? क्योंकि अदछ फलकी करपनाकी अपेक्षा दष्ट फलकी कलपना करना उचित है, तो आपका यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि इस कल्पनामें सभी प्रमाणोंका विरोध हो जायगा। इसलिए अत्यन्त दुष्ट-दोपसे युक्त-प्रतिपत्तिविधिका अध्याहार नहीं किया जा सकता है। इससे 'इदं सर्व यदयमात्मा' (जो यह सब है वह आत्मा ही है) इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे मन्त्रोंके समान प्रयोगवचन ज्ञानव्यक्त्यन्तरका अनुष्ठान नहीं करा सकेगा। अतः यह सिद्धान्तैकदेशी भी वेदान्तविचारको अगतार्थ नहीं कर सकता। 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' (स्वाध्यायका-अपनी शाखाका-अध्ययन करे) इस अध्ययनविघिसे गहीत वेदान्त यदि त्रह्मविषयक् न हों, तो वे वेदान्तवाक्य अनर्थक हो जायँगे, यदि यह कहें, तो यह कहना भी उचित नहीं है। यद्यपि वेदान्तवाक्योंके सिद्ध ब्रह्स्वरूपके बोधक न होनेसे ब्रह्मा नहीं है, तथापि वेदान्तोंमें वैयर्थ्य नहीं है, क्योंकि कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदिसे विशिष्ट और 'अहं'
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४२२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
जीवात्मनो विद्यमानः कर्तत्वादिभिरविद्यमानैश्चाऽन्तर्यामित्वन्रह्मत्वादि- भिर्वेदान्तोक्तसमस्तगुणैविंशिष्टतयोपासनोत्पत्तिविधौ शमद्मादीतिकर्त्तव्य- तोपसंहारेण विनियोगविधौ मोक्षकामिनियोज्यसम्बन्धितयाऽविकारविधौ साङ्गे कर्मण्यधिकारिण्यनुष्ठापकतया प्रयोगविधौ च वेदान्तानां पर्यवसा- नाङ्गीकारात्। तत्र विध्यपेक्षितन्यायस्य सर्वस्य पूर्वतन्त्र एव गतत्वादभ्य- धिकाशङ्काया अदर्शनाननैवारब्धव्योत्तरमीमांसेत्येवं पूर्व पक्ष:। अत्राऽमिदष्मे-किं सिद्धे व्युत्पच्यभावाद्वेदान्तानामुपासनाक्रियापर- त्वमुच्यते किंवा जैमिन्यादिवचनसामर्थ्यात् १ तत्राऽडद्यः समन्वयसूत्रे निराकरिष्यते। न द्वितीयः, वेदान्तानां जैमिन्यादिभिरविचारितत्वात्। 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इत्यत्र हि सूत्रे भाष्यकारादिभिर्धर्ममात्रविचारप्रतिज्ञा- परत्वेनाऽधिकरणमाचितं न तु कृत्स्वेदार्थविचारप्रतिज्ञापरत्वेन। तथा- हि-धर्ममीमांसाशास्त्रं विषयः, ततः किमारम्भणीयं न वेति संदेहः। प्रत्ययके विषय जीवात्माके विद्यमान कर्तृत्वादि धर्मसे तथा अविद्यमान अन्त- र्यामित्व, ब्रह्मत्व आदि वेदान्तोक्त समस्त गुणोंसे विशिष्टरूपसे उपासनाकी उत्पत्तिविधिमें, शम, दम, आदि इतिकर्तत्यताके उपसंहारसे विनियोगविधिमें, मोक्षकामी पुरुषरूप जो नियोज्य हैं, उनके सम्वन्घीरूपसे अधिकारविधिमें तथा अङ्गसहित कमोंमें अधिकारीके अनुष्ठापक-प्रवर्तक-होनेसे प्रयोग- विधिमें वेदान्तोंका पर्यवसान है। उन विधियोंमें अपेक्षित सम्पूर्ण न्यायोंका पूर्वतन्त्रमें ही कथन हो चुका है, इससे अधिक शक्काके न होनेसे उत्तरभीमांसाका आरम्भ नहीं करना चाहिए, यह पूर्वपक्ष है। इसपर उत्तर कहते हैं-क्या सिद्ध पदार्थमें शब्दोंका सङ्केतग्रह न न होनेसे वेदान्तोंको उपासनाक्रियापरक मानते हैं अथवा जैमिनि आदिके वचनकी सामर्थ्यसे: इनमें प्रथम विकल्पका 'तत्तु समन्वयात्' इस सूत्रमें निराकरण किया जायगा। रहा द्वितीय विकल्प, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि महर्षि जैमिनि आदिने वेदान्तवाक्योंका विचार ही नहीं किया है। देखिए- 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इस पूर्वमीमांसाके प्रथम सूत्रमें भाष्यकार शवरस्वामी प्रभृति आचार्योंने धर्ममात्रविचारकी प्रतिज्ञाके तात्पर्यसे अधिकरणकी रचना की है। सम्पूर्ण वेदार्थके विचारकी प्रतिज्ञाके तात्पर्यसे अधिकरणकी रचना नहीं की है। उस अधिकरणका धर्ममीमांसाशास्त्र विषय है, उसका आरम्भ करना
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शास्त्रारम्भपूर्वपक्षका समाधान ] भापानुवादसहित ४२३
तदर्थमर्थान्तरं चिन्त्यते-अध्ययनविधिरद्ृष्टार्थो दष्टार्थों वेति? तत्राऽदषटार्थ इति तावत् प्राप्तम्, दृष्टफलसाधने भोजनादौ विध्यदर्शनात्। अध्ययन- क्रियाकर्मणि स्वाध्याये संस्कारप्रासिलक्षण दष्टफलं सम्भवेत्। कथम- दष्टार्थतेति चेद्, मैवम्। न तावत् संस्कारः सम्भवति; संस्कृतस्य स्वाध्याय- स्य कुत्रचित्कृतौ विनियोगादर्शनाद्। नाऽपि प्राप्तिः, अक्षरग्रहणमात्र- रूपायाः प्राप्तः स्वयमफलत्वात्फलान्तरासाधनत्वाच्च। अर्थावबोधसाधन तदिति चेत्, तर्ह्यर्थावयोधाक्षरग्रहणयोः साध्यसांधनभावस्य लोकसिद्धत्वा- द्विधिवैयर्थ्यम्। यदि कर्मकारकगतफलाभावे कर्माभिधायितव्यप्रत्ययेन कर्मप्रधानो विधिर्न सम्भवेत्, तर्हि सकुन्यायेन 'अधीयीत' इति वैपरीत्यं कल्प्य- ताम् : न च फलाश्रवणादध्ययनस्य कथमदष्टार्थतेति वाच्यम्, 'यदचो-
चाहिए या नहीं ? ऐसा सन्देह होता है। इस अर्थकी सिद्धिके लिए अर्थान्तरकी .
चिन्ता करते हैं-'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस अध्ययनविधिका दृष्ट फल है या अदए ? पहले अदृष्ट फल है यह प्राप्त हुआ, क्योंकि जिनका दष्ट ही फल है ऐसे भोजन आदिमें शास्त्रीय विधि दिखाई नहीं देती। अध्ययनक्रियाका कर्म जो स्वाध्याय उसमें संस्कार और प्राप्ति ये ही दो दृष्ट फल हो सकते हैं, फिर वे अदृष्टार्थक हैं यह कैसे कहते हैं? यदि यह कहें, तो ठीक नहीं है, क्योंकि संस्कार स्वाध्यायका फल नहीं हो सकता है, कारण कि संस्कृत स्वाध्यायका कहींपर विनियोग नहीं दीखता और प्राप्ति मी दष्ट फल नहीं हो सकती, क्योंकि अक्षरग्रहणरूप प्राप्ति स्वयं फल नहीं है। सुख और दुःखकी निवृत्ति-ये ही दो फल कहलाते हैं। इन दोनोंकी वह साधिका मी नहीं है, जिससे कि वह परम्परया फल कहलावे। यदि कहें कि अर्थावबोधकी साधनं होनेसे अक्षरप्राप्ति फल है, तो यह मी उचित नहीं है, क्योंकि अक्षरप्राप्ति और अर्थावबोध-इन दोनोंमें कार्यकारणभाव लोकसिद्ध है, अपूर्व नहीं है, अतः उनका विधान नहीं हो सकता, कारण कि 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ' इसके अनुसार अत्यन्त अप्रापिमें ही विधि होती है। यदि कर्मकारक गत फलका अभाव होनेपर कर्मका अभिधान करनेवाले तव्यप्रत्ययसे कर्मप्रधान विधिकी सम्भावना नहीं है, तो सक्तुन्यायसे 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' की जगह 'स्वाध्यायमधीयीत' ऐसे वाक्यकी कल्पना कर लीजिए।
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४२४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ₹
इंधीते पयसः कुल्या अस्य पितन् स्वधा अभिसम्भवति यद्यजृपि घृतस्य कुल्या' इत्यादिना त्रह्मयज्ञरूपजपाध्ययनफलत्वेन अ्यमाणस्य घृतकुल्या- देरव्ययनत्वसाम्येन प्रथमाध्ययनेऽप्यतिदेषुं शक्यत्वाद्; ततो रात्रिसत्र- न्यायेन घुतकुल्यादिकामः 'स्वाध्यावेनाधीयीत' इत्येवं विधिः सम्पद्यते। यदि केचिदर्थवादफलातिदेशं नेच्छन्ति, तर्हि तन्मते विश्वजिन्न्यायेन स्वर्ग: कल्पनीयः । तदुक्तम्- 'चिनाऽि विधिनाऽदष्टलाभान्नहि तदर्थता। कल्प्यस्तु विधिसामर्थ्यात् स्वर्गो विश्वजिदादिचत् ।।' इति।
[कर्मकारकमें क्रियाजन्य अतिशय न होनेसे कर्मका प्राधान्य नहीं प्राप्त होता। 'अतः सक्तून् जुहोति' इसमें जसे सक्तुका प्राधान्य प्राप्त न होनेपर शक्त साघन माने जाते हैं वैसे ही प्रकृत 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस विधिमें भी स्वाध्यायको अध्ययनका साधन मानकर 'सक्तुभिः' के 'तुल्य स्वाध्यायेन' इस प्रकार तृतीयान्तविपरिणाम कर लिया जायगा, यह तात्पर्य है।] [अर्थवादमें भी ] फलका श्रत्रण नहीं है, इसलिए मध्ययनका अदृष फल कैसे माना जाय, यह कहना मी उचित नहीं; कारण कि 'यहचोऽघीते' (ऋचाओंका जो अध्ययन करता है, उसके पितरोंको दूधकी धाराएँ तृप्त करती हैं और जो यजुर्वेदमन्त्रोंका अध्ययन करता है, उसके पितरोंको वीकी घाराएँ) इत्यादि अर्थवादमें ब्रह्मयज्ञरूप जप तथा अध्ययनका फल घृतकुल्या आदि श्रुत है। उस फलके सम्बन्धका, अध्ययनसामान्य होनेसे, ग्रथम अध्ययनमें भी अतिदेश किया जा सकता है। इससे रात्रिसत्रन्यायके वलपर 'वृतकुल्यादिकी इच्छावालेको स्वाध्यायका अध्ययन करना चाहिए' ऐसी विधि सम्पन्न होगी। यदि कोई वादी अर्थवादमें सुने गये फलका अतिदेश प्रथम अध्ययनमें नहीं करना चाहे, तो उसके मतमें विश्वजिन्न्यायसे रवर्गरूप फलकी ही कल्पना करनी चाहिए। कहा भी है- 'अष्ट फलका लाभ तो विधिके विना भी हो सकता है, इसलिए विधिका अटष्ट फल नहीं मानना चाहिए। अतएव विधिकी सामर्थ्यसे विघिको सफल वनानेके लिए 'विश्वजित्' आदि यागोंकी भाँति स्वर्गरूप फलकी कल्पना करनी चाहिए।'
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पूर्वमीमांसारम्भमें पूर्वपक्ष और सिद्धान्त ] भापातुवादसहित ४२५
न चाउदष्टार्थत्वेऽपि स्वाभाविकस्वार्थवोधसामर्थ्यस्य का हानिरिति वाच्यम्, अन्यार्थस्याऽपि स्वार्थपरतायां मन्तार्थवादयोरतिग्रसङ्गात् । तस्मादान्नायस्याऽविवक्षितार्थत्वाद्वर्मस्य च प्रत्यक्षाद्विपयत्वात् ग्रमाणानु- ग्राहकतर्करूपस्य विचारस्याऽनुग्राह्यप्रमाणाभावे निरालम्चनत्वान्न शास्त्रमा- रम्भणीयमिति पूर्वपक्षे प्राप्ते राद्धान्तं न्रूम :- 'लभ्यमाने फले दष्टे नाऽटष्टफलकल्पना । विधेस्तु नियमार्थत्वान्नाऽडनर्थक्यं भविष्यति।' लभ्यते हि कर्मकारके स्वाध्याये द्विविध दष्टफलम् -- अध्ययनक्रियाज- नितं फलवदर्थाववोधहेतुभूतग्राप्तिः संस्कारश्च। अर्थावचोधार्थाक्षरग्रहणयोः साध्यसाधनभावस्य लोकसिद्धत्वेऽपि न विधिव्ैयर्थ्यम्, नियमार्थत्वात्। न अदृष्टरूप फलमें तात्पर्थ माननेसे भी अपने स्वाभाविक अर्थबोध करानेकी सामथ्यकी क्या हानि होगी? ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि अन्य अर्थमें तात्पर्य रखने- वाले वाक्यका स्वार्थमें मी तात्पर्य माननेसे मन्त्र तथा अर्थवादमें भी अतिप्रसक्ति हो जायगी अर्थात् मन्त्र और अर्थवादोंकी भी स्वार्थवोधनमें सामर्थ्य हो जायगी, जो कि इषट नहीं है। इस पूर्वोक्त निष्कर्षके अनुसार आग्नाय- वेद-स्वरूप स्वाध्यायके अविवक्षितार्थ होनेसे [ अर्थात् किसी भी अर्थका बोध करानेमें उसका तात्पर्य निर्द्धारित न होनेसे] धर्मके प्रत्यक्ष आदिका विषय न होनेसे तथा प्रमाणकी पुष्टि करनेवाले तर्कस्वरूप विचारके, जिसकी तर्क द्वारा पुष्टि करना अभीष्ट है ऐसे, अनुग्राह्य प्रमाणके बिना अवसर न पानेसे विचारशासका प्रारम्भ करना नहीं प्राप्त होता। इस प्रकारका पूर्वपक्ष-शङ्ा- होनेपर हम इस प्रकार सिद्धान्त-समाधान-करते हैं- हष्ट फलका मिलना सम्भव हो, तो अदष्ट फलकी कल्पना नहीं करनी चाहिये। विधिको नियमार्थ माननेसे तो उसके व्यर्थ होनेकी सम्भावना नहीं होगी। प्रकृतमें दष्ट फलकी सम्भावना दिखलाते हैं-कर्मकारकमूत स्वाध्यायमें- वेदमें-अध्ययनक्रियासे उत्पन्न हुए समस्त अर्थज्ञानकी कारणस्वरूपप्राप्ति और संस्कार ये दो दष्ट फल पाये जाते हैं। यद्यपि अर्थज्ञान और अक्षर- ज्ञानमें कार्यकारणभाव लोकसिद्ध है तथापि नियमार्थ होनेसे विधि व्यर्थ नहीं मानी जा सकती। [सिद्धका विधान प्राप्त होनेपर ही नियमकी उपपत्ति ५४
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४२६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
च संस्कृतस्य विनियोगाभावा, क्रतुविध्युपादानप्रमाणादेव विनियोगसिद्धेः। क्रतुविधिरहिं स्त्रविपयावबोधमपेक्षमाणस्तस्य जनकतया संस्कृतं स्वाध्याय- सुपादत्ते। ननूपादानप्रमाणं ज्ञानस्य जनकतया स्वाध्यायमात्रमादसे न संस्कारमिति चेत्, सत्यम्, तथापि कर्मप्रधानाध्ययनविधिसामर्थ्यादेव संस्कृतस्वाध्यायजन्यविशिष्टज्ञानवतैवाऽनुष्ठितो यागोऽपूर्व जनयतीति कल्प्यते। प्रधानवदनङ्गस्याऽप्यध्ययनस्य क्रतूपकारित्वमविरुद्धम्, तत उभयविधिसामर्थ्याद्विवक्षितार्थों लभ्यते। एवं च यथाश्रुतकर्मकारकगत-
होती है। संस्कृत स्वाध्यायका कहीं दूसरे विधानमें विनियोग नहीं है, ऐसा भी नहीं कहना चाहिए, कारण कि ऋतुविधिके उपादान प्रमाणसे ही विनि- योगकी सिद्धि हो जाती है, क्योंकि कतुका विधान अपने विषयके ज्ञानकी अपेक्षा रखता है। वह अपने विषयके ज्ञानका जनक होनेसे स्वाध्यायका संस्कृत उपादान करता है। [अतः स्वाध्याय करतुका उपादानप्रमाण होता है। ] उपादानप्रमाण तो विषयज्ञानका जनक होनेसे केवल स्वाध्यायका ही ग्रहण करेगा, संस्कारका नहीं, ऐसा कहना यद्यपि ठीक है; तथापि कर्मप्रधान [अध्येतव्यः इसमें तव्यप्रत्यय कर्मकारकरूप अर्थमें हुआ है और कृदन्त स्थलमें प्रत्ययार्थ प्रधान होता है] अध्ययनविधिकी सामर्थ्यसे ही संस्कारयुक्त स्वाध्यायसे उत्पन्न हुए विशिष्ट ज्ञानवान् अधिकारी द्वारा ही किया गया याग अपूर्व-पुण्य-को उत्पन्न करता है, ऐसी कल्पना की जाती है। [अध्ययन कतुका उपकार तो तब कर सकता है जब कि अध्ययन कतुका अङ्ग हो, इस आशङ्ाका दष्टान्त द्वारा समाधान करते हैं-] आधान- अमिका संस्कार विशेष-क्रतुका अङ्ग न होता हुआ भी संस्कृत अभिमें ही हवन करनेसे अपूर्व होना माना गया है एवं प्रकृतमें मी अध्ययन यद्यपि कतुका अङ्ग नहीं है तो भी उसे क्रतुके उपकारक माननेमें कोई विरोध नहीं है। इस प्रकार दोनोंके विधानोंकी सामथ्यसे विवक्षित अर्थका लाभ हो जायगा। [अर्थात् 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' विधिसे स्वाध्यायका संस्कार तथा संस्कृंत स्वाध्यायसे ही याग करनेसे अदष्टकी सिद्धि होती है। इस प्रकार दोनोंका विधान होनेसे वेदमें विवक्षितार्थत्व सिद्ध होता है] इस प्रकार यथाश्रुत कर्मकारक (तन्यप्रत्ययसे प्रधानतया गृहीत स्वाध्यायरूप कर्मकारक) में दष्ट फल-
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पूर्वमीमांसारम्ममें सिद्धान्त ] भापानुवादसहित ४२७
दृष्टफलसम्भवे सकुन्यायेनाऽश्ुतकरणत्वकल्पनमदष्टफलकल्पनं चाडन्याय्यम्। ननु तव्यप्रत्ययेन प्रकृत्यर्थभूताध्ययनोपरक्त्तमपूर्वमभिवीयते, न तु कल्प्यत इति चेद्, मैचम् ; अपूर्वाभिधायितव्यप्रत्ययः स्वाध्यायगतत्वेनै- वाडपूर्वमभिद्ध्यानाऽध्ययनगतत्वेन, तव्यप्रत्ययस्य कर्मभूतस्वाध्याय- परत्वात्। अपूर्वस्य धात्वर्थजन्यत्वनियमेऽपि तदुपरक्तत्वानियमेन स्वा- व्यायगतत्वमविरुद्धम्। नन्व्रदष्टार्थत्वे स्वाध्यायस्य विवक्षितार्थंता न
तथा स्याद, विपनिर्हरणादिकार्यान्तरविनियुक्तमन्त्रादिवदिति चेढू, न: सत्यध्ययन विधिवाक्यस्याऽप्यविवक्षितार्थत्वादद्ष्टार्थतयाऽध्ययन- विधानमित्वेतादशं त्वन्मतमपि न सिध्येत्। अथोच्येत अध्ययनवाक्य-
संगत नहीं है। संस्कारादि-का सम्भव होनेपर सक्तुन्यायसे अश्चत फलकी करपना न्याय-
सक्का-तव्यप्रत्ययसे प्रकृति (इडधातु जिससे तव्यप्रत्ययका विधान किया गया है) के अर्थभूत अध्ययनसे उपरक्त-सम्बद्ध-अपूर्वका-पुण्यका- अभिधान होता है, तव्यका वाच्य अर्थ ही अध्ययनसम्बन्धी पुण्यरूप है, उस अर्थकी कल्पना नहीं होती है [ वाच्यवृत्तिसे लब्ध अर्थ कल्पित नहीं कहा जाता ]।
समाधान-ऐसा नहीं हो सकता, कारण कि अपूर्वका वाचक तव्यप्रत्यय स्वाध्यायसम्बन्धी अपूर्वका ही अभिधान कर सकता है, अध्ययनसे सम्बद्धका नहीं, क्योंकि कर्मवाचक तव्यप्रत्ययका कर्मकारकभूत स्वाध्यायके बोधनमें ही तात्पर्य है। अपूर्व घात्वर्थफल क्रियासे ही उत्पन्न होता है। इस नियमके रहते भी उसका (अपूर्वका) धात्वर्थसे उपरक्त रहनेका नियम नहीं है, इसलिए अपूर्वका स्वाध्यायगत होना विरुद्ध नहीं हो सकता। विषका दूरीकरण आदि दूसरे कार्योमें विनियुक्त मन्त्रोंकी तरह स्वाध्यायको यदि अदष्टपरक मानें, तो उसमें विवक्षितार्थत्व नहीं होगा [ स्वार्थमें तात्पर्य नहीं होगा ] ऐसी शक्का भी नहीं कर सकते, कारण कि ऐसा माननेसे अध्ययनविधिके बोधक "स्वाध्यायोऽ ध्येतव्यः" इस वाक्यमें भी अविवक्षितार्थत्व होनेसे 'अदृष्ट अर्थमें तात्पर्य रखकर अध्ययनका विधान है' ऐसा आपका मत भी सिद्ध नहीं हो सकता।
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४२८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
स्याऽदष्टत्वार्थत्वं तस्यारऽर्थविवक्षाप्रतिवन्धक न भवति; स्व्रवाक्यार्थम- ध्ययनावच्छिन्नफलभावनारूंपं प्रत्येवाऽध्ययनविधिनाऽध्ययनवाक्यस्य विनियुक्तंत्वाद्। नंहि मन्त्रेष्वपि विनियुक्तत्वमात्रमविवक्षितार्थत्व- प्रयोजंकम्, किन्तु स्वार्थादन्यत्र विनियुक्तत्वम्। न चाऽध्ययनवाक्यं स्वार्थादन्यत्र विनियुज्यते तेन स्वार्थपरस्य तस्य कस्मादविवक्षितार्थता स्यात्। ज्योतिष्टोमादिवाकयानि तु यागाद्यवच्छिन्नफलभावनारूपात् स्वार्था- दन्यत्राऽथ्ययनावच्छिन्नफलभावनायामध्ययनविधिना विनियुज्यन्ते, ततो
दुर्वार इति। नैतद्युक्तम्, न तावदृद्ृष्टार्थत्वेनाऽर्थविवक्षा अ्रतिवध्यते, शङ्का-अध्ययनवाक्यका अदष्टार्थत्व उसकी अर्थविवक्षाका प्रतिबन्ध नहीं कर सकता, कारण कि स्व्रवाक्यका अर्थ अध्ययनावच्छिन्नफल- भावनारूपके प्रति ही अध्ययनविधिसे अध्ययनवाक्यका विनियोग है। [अध्ययनविधिका प्रतिपादक वाक्य 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' है, उसका अर्थ है- 'स्वाध्यायके अध्ययनसे इष्टकी भावना करनी चाहिए' इस प्रकार अध्ययनका विधान है, इस विधानसे अध्ययनावच्छिन्न फलभावनामें ही अध्ययन- विधिका विनियोग है, अन्य फलमें नहीं, इसलिए अध्ययनविधि स्वार्थका प्रतिबन्ध नहीं कर सकती ] मन्त्रोंमें भी केवल विनियुक्त होनेसे ही स्वार्थ- परताका प्रतिवन्ध नहीं होता, किन्तु स्वार्थसे अन्यत्र विनियोग होनेसे ही स्वार्थका प्रतिवन्ध होता है। और अध्ययनवाक्यमें स्वार्थसे अन्यत्र विनियोग नहीं होता है। इस कारण उस अध्ययनवाक्यमें अविवक्षितार्थत्व होनेका प्रसङ्क कैसे आ सकता है ? [स्वाध्यायको अदष्टार्थ माननेमें स्वार्थविवक्षाका अभाव दिखलाते हैं-] ज्योतिष्टोम आदि यागोंके प्रतिपादक वाक्यस्वरूप 'स्वाध्यायका' तो अध्ययनचिधिके वलसे यागादिसे युक्त फलभावना- रूंप स्वार्थसे अन्यत्र अध्ययनावच्छिन्नफलभावनारूप (अध्ययन विधिके) स्वार्थमें अंव्ययनविधिसे विनियोग किया जाता है। इसलिए मन्त्रोंके सददश अन्य फलमें विनियुक्त अदष्टार्थक स्वाध्यायमें अर्थविवक्षाप्रतिवन्धत्व नहीं हटाया जा सकता। [ इस प्रकार अदष्टार्थ माननेपर भी अध्ययनविधिकी स्वार्थ- विवक्षा उचित ही है और स्वाध्यायको अदष्टार्थ माननेसे स्वार्थपरता नहीं- बन सकती ।]
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पूर्वमीमांसारम्भमें सिद्धान्त ] भापानुवादसहित ४२९
स्वतन्त्राऽटए्स्य निरपेक्षस्वर्गादिफलजनकस कर्थचित्प्रतिबन्धकत्वशङ्गा- यामप्यत्र तदभावात्। अत्र हि स्वराध्यायगतकर्मत्वग्रतीतिनिर्वाहाय कर्मगतमदृष्टमवश्यं कल्पनीयम्, तस्य च कर्मद्वारेणैव फलमपेक्षितमित्यक्षर- 1 सामर्थ्यसिद्धार्थाववोध एव तत्फलं स्यात्। तथा चाऽव्ाऽटषं नार्ऽर्थविवक्षाया वाधकं ग्रत्युत साधकमेव। कर्मगताटप्टस्याऽवर्जनीयत्वे तस्याऽटष्टार्थान- बोधलक्षगफलोत्पादनेन चरितार्थतायां च ततोऽतिरिक्तस्वरतन्त्रादृष तत्फलं वा कल्पयितुमशक्यम्, गौरवप्रसङ्गात्। नाऽप्यन्यत्र विनियोगोड-
समाधान-ऐसा कहना युक्तिसंगत नहीं है, कारण कि अदृष्टार्थत्व होनेसे स्वार्थविवक्षाका प्रतिबन्ध नहीं होता। निरपेक्ष स्वर्गादि फलके जनक अदृष्टमें कथचित् स्वार्थप्रतिबन्धकत्वकी आशङ्का हो भी सकती है। परन्तु प्रकृतमं ऐसा नहीं है। [अर्थात् जिन वाक्योंकी केवल स्वतन्त्र अद्दष्टकी कल्पनासे ही संगति है। उनके स्वार्थकी विवक्षा कर्थचित् प्रतिबद्ध हो सकती है, जैसे ज्योतिष्टोमादि यागवाक्य कालान्तरमें होनेवाले निरपेक्ष स्वर्गादिकी जनकता क्रियाकलापात्मक ज्योतिषोमादिम नहीं वन सकती, अतः अ्ुतिप्रतिपादित कारणताकी रक्षाके लिए स्वतन्त्र अदट्टकी कल्पना होती है, परन्तु प्रकृतमें 'प्रमाणवन्त्यदष्टानि कल्प्यानि सुबहून्यपि' इस न्यायसे स्वतन्त्र अद्ष्टकी कल्पना नहीं हो सकती, कर्मकारकगत टष्टफलसमवायी अटष्टकी ही करपना हो सकती है। इस आशयसे समाधान करते हैं-] 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस वाक्यमें कर्मकारकभूत स्वाध्यायमें प्राप्त कर्मत्वकी प्रतीतिके निर्वाहके लिए कर्मकारकगत अदष्टकी अवश्य करपना करनी होगी। और उसका कर्म द्वारा ही फर अपेक्षित है। इसलिए अक्षरोंकी सामर्थ्यसे सिद्ध अर्थज्ञान ही उसका फल होगा। इस प्रकार अदष्ट अर्थविवक्षाका प्रतिवन्धक नहीं है। प्रत्युत-इसके विपरीत-अर्थविवक्षाका साधक ही है। [ स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ] इस वाक्यसे स्वाध्यायका अध्ययन प्राप्त है, अध्ययनव्यापार अर्थावबोधपर्यन्त कहलाता है। इसलिए अर्थाववोध न होनेसे अध्ययन ही नहीं कहा जा सकता। अतः कर्मकारकभूत स्वाध्यायका अर्थाववोधरूप फल समवायी स्वाध्यायगत अदृष्ट. माना जायगा। कर्मकारकगत अटष्टका त्याग नहीं करना है। कर्मकारकगत अटष्ट मानना ही है। उसकी अदृष्ट अर्थके ज्ञानरूप फल उत्पन्न करानेसे चरिता-
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४३० विवरण्रमेयसंग्रह : [सूत्र १, वर्णक २
र्थविवक्षां पतिवश्नाति, अन्यत्र विनियुक्तानामपि मन्त्राणां स्वसा- मर्थ्यसिद्धार्थाववोधकत्वदर्शनात् । अन्यथा ब्राह्मणादिवाक्यैरपि स्मर्नुं शक्यस्य द्रव्यदेवतादेर्मन्त्रैरेव स्मरणाय नियमफलो विनियोग: कर्थ सङ्गच्छेत । तदुक्तम् -- 'विधिशक्तिर्न मन्त्रस्य नियोगेनाऽपनीयते। स्वतो विधास्यति ह्येपां नियोगात्स्मारयिष्यति ।।' इति । तस्माद्विवक्षितार्थमाम्नायमवलम्व्य प्रवृत्तं तदनुग्राहकं धर्मविचारशा- स्त्रमारम्भणीयमिति। तदेवं पूर्वमीमांसारम्भाधिकरणपर्यालोचनया कृत्स्- वेदस्याऽर्थविवक्षां धर्ममात्रस्य विचारावसरं च प्रदर्शयितुमादिसत्रं प्रववृते, न तु सर्ववेदार्थविचारप्रतिज्ञानायेत्यवगम्यते। ननु वेदवाक्यानि विचार- थंता हो जाती है, इसलिए गौरवग्रस्त होनेसे स्वतन्त्र अदृष्ट या उसके फल की अतिरिक्त कल्पना नहीं हो सकती। अन्यत्र विनियोग होना भी अर्थ- विवक्षाका प्रतिबन्धक नहीं हो सकता। अन्यत्र विनियुक्त हुए मन्त्रोंका भी अपनी सामर्थ्यसे सिद्ध अर्थका बोध कराना देखा गया है। ऐसा न माननेपर त्राह्मणादिवाक्योंसे भी स्मरणमें आ सकने योग्य द्रव्य, देवता आदिका मन्त्रोंके द्वारा ही स्मरण करनेके लिए नियमार्थ विनियोग कैसे संगत होगा? [अन्यत्न विनियुक्त मी मन्त्रोंका द्रव्य, देवता आदिके स्मरणरूप स्वार्थमें तात्पर्य होनेसे ही नियमकी उपपत्ति हो सकती है] ऐसा कहा भी है-मन्त्रकी विघिशक्ति नियोगसे नहीं हटाई जा सकती। इनकी विधिशक्ति ही स्वतः विधान करेगी। और नियोग द्वारा स्वयं द्रव्य, देवता आदि स्वार्थका स्मरण भी करा लेगी। इसलिए स्वार्थविवक्षायुक्त आन्ञाय-वेद-को विषय करके प्रवृत्त हुए उसके अनुग्राहक धर्मविचारशास्त्र पूर्वमीमांसाका आरम्भ करना चाहिए। इस प्रकार पूर्वमीमांसाके आरम्भाधिकरणकी पर्यालोचना-विचार-करनेसे सम्पूर्ण वेदकी अर्थविवक्षा और धर्ममात्रके विचारका अवसर दिखानेके लिए 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इस प्रथम सूत्रका प्रणयन किया गया है, सम्पूर्ण वेदके अर्थ- विचारकी प्रतिज्ञाके लिए नहीं किया गया है, ऐसा प्रतीत होता है। शङ्का-'वेदवाक्योंका विचार करना चाहिए' इत्यादि भाष्यप्रमाणसे 'पूर्वमीमांसासे' सम्पूर्ण वेदके अर्थमात्रके विचारकी प्रतीति होती है?
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पूर्वमीमांसाप्रथमसूत्रका धर्ममात्रविचारपरत्वकथन] भापानुवादसहित ४३१
येदित्यादिभाष्यलिङ्गाद् वेदार्थमान्नविचारोऽवगभ्यते। मैवस्, त्वया तद- भिग्रायानववोधाद। भाप्यकारो हि धर्मे सामान्यतः प्रसिद्धिं विशेपतो विश्रतिपति चोपन्यस् चैत्यवन्दनादीनामेव धर्मत्वाद् बुद्धादिवाक्यान्येव विचार्याणीति पूर्वपक्षीकृत्य सिद्धान्तसूत्रमर्थकथनपुरःसरमेवमवतासयति स्म-धर्माय वेदवाक्यानि विचारयिप्यन वेदस्याऽर्थविवक्षां विचारावसरं च प्रदर्शाेतुम् 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इति सूत्रयामास जमिनिरिति। ततः पूर्वापरपर्यालोचनया धर्मविचार एव भाष्यकाराभिप्रेत इति निश्चीयते । सूत्रस्य चाडयमर्थ :-- वेदमधीत्यानन्तरमधीतवेदस्य वितक्षितार्थस्य विचार- हेतुत्वाड्ूर्मविचारः कर्नव्य इति। तत्राऽप्यथशव्देन कृत्स्रवेदाध्ययनस् पूर्ववृत्तत्वमभिधायाऽत:शव्देन च कृत्स्वेदस्य विचक्षितार्थत्वे हेतूकते सति सर्ववेदार्थविचारः कर्त्तव्य इत्येव प्रतिज्ञा यद्यपि प्राप्ता, अन्यथा समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि आपको-शक्का करनेवालेको- उक्त भाप्यके अभिप्रायका ज्ञान नहीं हुआ है। [ उक्त भाष्यका तात्पर्य स्वयं दिखाते हैं-] भाप्यकारने धर्मके विपयमें सामान्यतः प्रसिद्धि और विशेपरूपसे विप्रतिपत्तिका उपन्यास करके चत्यवन्दन आदि ही धर्म है और बुद्ध आादि नास्तिकोंके ही वाक्य विचार करने योग्य हैं, ऐसा पूर्वपक्ष करके अर्थ करते हुए सिद्धान्तसूत्रका निम्न प्रकारसे अवतरण दिया है-धर्मके निमित्त वेदवार्क्योंका विचार करनेवाले सूत्रकार जमिनि मुनिने वेदकी अर्थविवक्षाको और विचारके अवसरको दिखानेके लिए 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इस प्रथम सृन्नका प्रणयन किया है। तदनन्तर पूर्वांपर- विचार करनेसे धर्मविचारमें ही भाष्यकारका अभिपाय है, ऐसा निश्चय होता है। और सूत्रका भी यह अर्थ है कि वेद पढ़नेके अनन्तर विवक्षितार्थ-सार्थक-अधीत वेदके विचारका कारण होनेसे धर्म विचार करना चाहिए। उस वाक्यमें अथशव्दसे सम्पूर्ण चेदका अध्ययन पहले ही सम्पन्न हुआ यह कहकर अतः शब्दसे सम्पूर्ण वेदमें विवक्षितार्थत्व- रूप हेतुकी सिद्धि करके यद्यपि 'सम्पूर्ण वेदार्थका विचार करना चाहिए' ऐसी ही प्रतिज्ञा प्राप्त होती है। अन्यथा प्रतिज्ञा तथा हेतुका वैयधिक- रण्य प्राप्त होता है। (सम्पूर्ण वेदार्थका विवक्षितार्थत्व होना हेतु है। और विचारकी प्रतिज्ञा केवल कुछ ही भागके विपयमें की जाय, तो
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४३२ विचरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, कर्वण २
प्रतिज्ञाहेत्वोर्वैयधिकरण्यात्। तथापि वेदशव्दं परित्यज्य धर्मशव्दमुच्चार्य प्रतिजानतः सूत्रकारस्य वैदैकदेशार्थविचार एवाडभिप्रेत इति गम्यते। युक्तं च धर्मस्यैव विचार्यत्वम्। लोके हि यत्सन्दिग्धं सप्रयोजनं च तद् विचार्यम्, धर्मश्च सामान्याकारेण लोकप्रवादसिद्धत्वाद ग्निहोत्रचत्यवन्दना- दिविशेपाकारेण वादिभिर्विप्रतिपन्नत्वाच्च सन्दिग्धः, पुरुपैरर्थ्यमानस्य सुखस्य साधनतया सम्रयोजनश्चेति विचारयोग्यः । वेदार्थस्तु वेद- ग्रामाण्यप्रतिपादनात्प्ाङ् न सामान्यतः प्रसिद्धः। अत एव न विशेष- तोडपि प्रतिपद्यते। नापि पुरुषार्थसाधनतयाऽवगम्यते। तत्कर्थं तस्य विचारयोग्यता। न च वाच्यं वेदार्थस्यैवाऽग्निहोत्रादेविचारसाध्यता
हेतुप्रतिज्ञामें वैयधिकरण्य होगा। अतः सम्पूर्ण वेदार्थके विचारकी प्रतिज्ञा ही प्राप्त होती है) तथापि वेदशब्दको छोड़कर धर्मशब्दका उच्चारण करके प्रतिज्ञा करनेवाले सूत्रकारका वेदके कुछ भाग- कर्मकाण्डभाग-मात्रके अर्थका विचार करनेमें ही अभिपाय जाना जाता है। (नहीं तो सूत्रकार 'अथातो वेदजिज्ञासा' ऐसा ही सूत्र बनाते वेदकी जगह धर्मशब्द न रखते। और धर्मका ही विचारका विषय होना उचित भी है। कारण कि लोकमें जो सन्दिग्ध तथा प्रयोजनशाली होता है, उसीका विचार किया जाता है, और- धर्म सामान्यतः लोकप्रसिद्धिसे सिद्ध है। और अमिहोत्र या चैत्यवन्दन आदि विशेष आकारके विषयमें वादियों द्वारा विवाद होनेसे [अर्थात् कोई वादी चैत्यवन्दन को धर्म मानते हैं और कोई अग्निहोत्रादि यागोंको धर्म मानते हैं ] सन्देहका अवसर आता है। पुरुषोंके अभीष्ट सुखका हेतु होनेसे प्रयोजनसहित भी है, इससे धर्मविचारके योग्य है। और सम्पूर्ण वेदार्थमात्र तो वेदके प्रमाण्यके प्रतिपादनसे पहले सामान्यतः प्रसिद्ध नहीं है। अतएव विशेष- रूपसे मी नहीं जाना जा सकता। और न वह किसी पुरुषार्थका साधन है, ऐसा ही प्रतीत होता है। इसलिए कैसे विचार करने योग्य हो सकता है। 'अर्थात् वेदार्थकी सामान्यतः सिद्धि न होनेसे, विशेषतः विप्रतिपत्ति न होनेसे एवम् सपयोजन न होनेसे वह विचारका विषय नहीं हो सकता'। वेदार्थस्वरूप अग्निहोत्रादिको तो आपने भी विचारसाध्य माना है, ऐसा
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द्वितीयसूत्रका भी वेदेकदेशनिचारपरत्वकथन ] भापानुवादसहित ४३३
भवताऽप्यङ्गीकृतेति, धर्मत्वप्रयुत्तयैवाऽङ्गीकृतत्वात्। न चोक्तवैयधिकरण्य- दोप:, विचार्यस्याग्निऽहोत्रादेर्धर्मस्य दैवगत्या वेदार्थत्वेन वैयधिकरण्य- परिहारात्। तस्माद्वर्ममात्रविचारपरं प्रथमसूत्रम्। तथा 'चोदनालक्षणोऽयों धर्मः' इति द्वितीयमत्रमपि वेदेकदेशार्थविचारमेव गमयति। 'तत्र यश्चोदना- लक्षण: स धर्मः' इति वचनव्यत्तया धर्मलक्षणपरं सूत्म्। अर्थात्प्रमाण- प्रतिज्ञेति ग्राभाकराः । 'यो धर्म: स चोढनालक्षणः' इत्यन्वयात् ग्रमाणप्रतिज्ञा मुखतः अर्थाद्वर्मलक्षणमिनि वार्तिककारीयाः । तन्र मतद्वयेऽपि यदि कत्सो वेदो धर्ममेवाडवघोधयेत् तदा वेदप्रमाणको धर्म इति वक्तव्यं स्यात्। चोदनालक्षण इति तु वदन् सूत्रकारो वेदकदेशमेव धर्मपरं मन्यत इति भी नहीं कह सकते, कारण कि धर्मत्वप्रयुक्तिसे ही अगिनिष्टोमादिरूप वेदार्थ विचारसाध्य माना गया है*। और पहले कहे गये वैयधिकरण्य दोपका भी प्रसक् नहीं है, कारण कि विचारके विषय अिहोत्र आदि धर्मके [ अभ्युदयके साधनके ] अकस्मात् वेदार्थस्वरूप हो जानेसे वयधिकरण्य दोपका परिहार हो सकता है; इसलिए 'अथातो धर्मजिन्ञासा' इस पूर्वमीमांसाशान्न्नके प्रथम सूत्रका धर्मके विचारमें ही तात्पर्य है। एवम् 'चोदना- रक्षणोऽथों धर्मः' इस दूसरे सूत्रसे भी वेदके एक भागका-कर्मकाण्ड- मात्रके ही अर्थका-ोध होता है। उसमें 'जो प्रेरणात्मक अर्थ है वह धर्म है' इस प्रकार वचनकी प्रतीतिसे दूसरे सूत्रका तात्पर्य धर्मके लक्षण करनेमें ही है और प्रमाणकी प्रतिज्ञा अर्थात् सूचित होती है, ऐसा प्रभाकरानुयायी- भीमांसकोंका मत है। [ चोदनाको उद्देश्य मानकर धर्मका विधान किया गया है, इसलिए धर्मके लक्षणमें मुख्य तात्पर्य है और चोदनात्मक' प्रमाणका ज्ञापन करना अर्थात् सिद्ध होता है। ] 'जो धर्म है वह चोदना-प्रेरणा-स्वरूप है' ऐसा अन्वय करनेसे प्रमाणकी प्रतिज्ञा शब्दतः प्रतीत होती है और धर्मका लक्षण अर्थात् प्रतीत होता है, ऐसा वार्तिककारका मत है। [ धर्म उद्देश्य होनेसे तात्पर्यका सुख्य विषय नहीं होग, चोदनाके विधेय होनेसे प्रमाण ज्ञापन ही मुख्य है। ] इन दोनों मतोंमें भी यदि सम्पूर्ण वेद धर्मका ही बोध करा- चे, तो धर्ममें वेद ही प्रमाण है, ऐसा ही कहना होगा। चोदना-प्रवर्तना-ही * वेदार्थस्वरूप ज्योतिषोम आदि श्रेयःसाधन हैं, अतएव उनका विचार किया गया है। स्वातन्त्रयसे नहीं। ५५
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४३४ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक २
गम्यते। स्यादेतत्, चोदनाग्रहणं वेदैकदेशस्य धर्मपरत्वमिति ज्ञापनाय न भवति किन्तु अर्थभावनारूपायाः पुरुपप्रवृत्ते: पुरुपार्थपर्यवसायित्वद्योत- नाय। तथाहि-अस्ति तावद्भाव्यकरणेतिकर्तव्यतालक्षणेनांऽशत्रयेणोपेता भावना नाम, 'कि केन कथमित्यंशत्रयपूर्णा हि भावना' इति भट्टाचार्य- रुक्तत्वात्। सा च द्वेधा-अर्थभावना शब्दभावना चेति। तत्र पुरुपप्रवृत्ति- रर्थभावना। लिडादिशब्द एवांऽशत्रयविशिष्टः शन्दभावनेति केचित्। तदुक्तम्- 'किमाद्यपेक्षितैः पूर्णः समर्थः प्रत्ययो विधौ। तेन प्रवर्त्तनावाक्यं शास्त्रेऽस्मिंश्चोदनोच्यते ।।' इति।
धर्मका लक्षण है, ऐसा कहते हुए सूत्रकार वेदके एक भागका ही धर्ममें तात्पर्य मानते हैं। उक्त तात्पर्यमें शङ्का करते हैं-स्यादेतत्-अर्थात् आपका कहना तब माना जा सकता है जव कि कही जानेवाली शक्काका समाधान हो जाय-चोदनाशब्दका ग्रहण वेदके एक किसी भागका ही तात्पर्य धर्ममें है, ऐसा ज्ञापन करनेके लिए नहीं है, किन्तु अर्थभावनारूप पुरुप- प्रवृत्तिका पुरुषार्थमें तात्पर्यबोधन, करनेके लिए है [ अर्थात् अर्थभावनारूप पुरुषप्रवृत्ति पुरुषार्थ है, ऐसा अर्थ चोदनापदसे प्रतीत होता है]। कारण कि भावना तीन अंशोंसे युक्त होती है-एक अंश भाव्य-जिसको भावनासे पुरुष सिद्ध करता है, दूसरा अंश करण-जिसके द्वारा भावना करता है और तीसरा अंश इतिकर्तव्यता-भावनाप्रकार, कौन, किसके द्वारा तथा कसे ? इन तीन अंशोंसे पूर्ण ही भावना कहलाती है, ऐसा भट्टाचार्यने कहा है।' वह तीन अंशवाली भावना अर्थभावना और शब्दभावनाके मेदसे दो प्रकारकी है। उनमें पुरुषकी प्रवृत्ति अर्थभावना है और तीन अंशोंसे युक्त लिङ़ आदि शब्द ही शब्दभावना है, ऐसा कोई कहते हैं। जैसा कि कहा है- किमादि अपेक्षित अंशोंसे पूर्ण तथा विधिमें समर्थ प्रतीति होती है [अर्थात् कौन: किस प्रकार तथा किससे-इस प्रकार तीन अंशोंसे युक्त ही प्रतीति होती है। ] इसलिए प्रवर्तनाबोधक वाक्य ही इस शास्त्रमें चोदनाशब्दसे कढ़ा जाता है।
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भावना और उसके मेद] भापांनुवांदसहितं ४३५
लिङादिशव्दस्य व्यापारः पुरुपप्रवर्त्तनालक्षणः शव्दभावनेत्यन्ये। लिङदिशन्दस्य गुणः अ्वर्त्तनासामर्थ्यलक्षणः शब्दभावनेत्यपरे। त्रिवि- धाया अप्यस्याः शब्दभावनायाः पुरुपप्रवृत्तिरूपाऽर्थभावनैव भाव्यत्वेनाऽ- चगन्तव्या। शब्दभावनाप्रत्यायकं ज्ञानमेव करणं स्तुतिनिन्दार्ऽर्थवादादि- ज्ञानमितिकर्त्त्यता। न च शब्दभावनाया वाचकपदाभावः, लिङादि-
. रूपविशेपाकारेण शब्दभात्रनाभिधायित्वस्याऽप्यङ्गीकारात्। तदुक्तम्- 'अभिधाभावनामाहुरन्यामेव लिडादयः। अर्थात्मभावना त्वन्या सर्वाख्यातेषु गम्यते ॥।' इति। अभिधाभावनामप्याहुरेवेत्यन्वयः । नतु 'सम्बन्धवोधः करण तदीयम्' इति मण्डनाचार्ये: स्वर्गयागयोः साध्यसाधनसम्बन्धाववोधस
पुरुपका-अधिकारीका-प्रवर्तनरूप लिडादिशब्दका व्यापार ही शब्दभावना कहलाती है, ऐसा दूसरे वादी मानते हैं। प्रवर्तनासामर्थ्यस्वरूप लिडादि- शन्दका गुण ही शव्दभावना कहलाती है, ऐसा दूसरे वादी मानते हैं। इस प्रकार तीन प्रकारकी भी इस शव्दभावनाकी पुरुषप्रवृत्तिरूप अर्थ- भावनाको ही भाव्यके स्वरूपमें मानना चाहिए। शव्दभावनाका बोधक ज्ञान ही साधन है। स्तुतिनिन्दास्वरूप अर्थवादादिज्ञान ही इतिकर्तव्यता है। शब्दभावनाका कोई वाचक पद नहीं है, ऐसा मी नहीं है, कारण कि लिझादि प्रत्ययान्तके आख्यातत्वसामान्याकारसे अर्थभावनाका वाचक होनेपर भी लिझादिरूपचिशेपाकारसे शव्द्भावनाका वाचक होना भी माना गया है। [ यद्यपि मीमांसकोंके मतमें आख्यातकी भावनामें शक्ति है और वह भावना पुरुषपरवृत्तिरूप अर्थभावना ही है, तथापि उसा अधिष्ठान आख्यातत्वरूपसे ही माना गया है। अर्थात् लिङ आदि विशेपरूपसे शव्दभावनाका ही अभिधान होता है, ऐसा माना गया है]। कहा है- 'लिडादि प्रत्यय अन्य ही अभिधाभावना-शब्दभावना-को कहते हैं। और इससे भिन्न अर्थस्वरूप भावना ही सब आख्यात स्थलोंमें प्रतीत होती है।' लिडादि अभिधाभावनाको भी कहते ही हैं, ऐसा अन्वय है। शक्का-सम्बन्धका ज्ञान ही विधिका करण-साधन-है, इस पकार मण्डम-
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४२६ चिवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
करणत्वमुक्त ततो न शब्दभावनाप्रत्यायकस्य ज्ञानस्य करणत्वमिति चेद्, द्वयोरपि करणत्वात्। हस्तेन शरेण विद्ध इत्यादौ करणद्वयदर्शनात् । शब्दभावनाज्ञानस्य च करणलक्षणोपेतत्वात्। इतिकत्तव्यतानुगृहीतो भाव्यहेतु: करणमिति हि तल्लक्षणं शब्दभावनाज्ञानं च स्तुत्यादिज्ञाना- नुगृहीतं सत्प्रवर्त्तकज्ञानत्वात्पुरुपप्रवृत्तिलक्षणभाव्यहेतुरिति कुतो न करणं स्यात् सेयमंशत्रयवती शव्दभावना स्वभाव्यरूपायां पुरुपप्रवृत्तिलक्षणा- यामर्थभावनायां पुरुपं प्रेरयन्ती चोदनेत्युच्यते। 'चुद् प्रेरणे' इत्यस्मा- द्वातोश्चोदनाशव्दनिष्पत्तेः। तच्च चोदनाप्रेरकत्वमर्थभावनायाः पुरुपार्थ- विषयत्वमन्तरेण न सिध्यति, अपुरुपार्थे पुरुपस्याऽप्रवृत्ते:। ननु 'यजेत' इत्यत्र लिङ्प्रत्ययगम्याया अर्थभावनाया धात्वर्थो भाव्य इति वाच्यम्, एकपदो-
मिश्रने स्वर्ग और यागके साध्यसाधनसम्बन्धके ज्ञानको कहा है। इससे शब्द- भावनाका बोध करानेवाला ज्ञान करण नहीं हो सकता। समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि दोनों ही करण माने गये हैं। जैसे हाथके द्वारा वाणसे शत्रु घायल किया गया, इस प्रतीतिमें हाथ और वाण-दो करण देखे गये हैं। और शब्दभावनाका ज्ञान करणके लक्षणसे युक्त भी है। इतिकर्त- व्यतासे अनुगृहीत भाव्य विपयका जनक करण कहलाता है, यह करणका लक्षण है, और शब्दभावनाका ज्ञान स्तुत्यादि अर्थवादके ज्ञानसे अनुगृहीत होता हुआ प्रवर्वकज्ञानस्वरूप होनेसे पुरुषप्रवृतिस्वरूप भाव्यका कारण है, इससे शन्दभावना करण क्यों नहीं होगी ? वह यह इस प्रकार तीन अंशवाली शब्द्रभावना अपने भाव्यात्मक पुरुषप्रवृत्तिरूप अर्थभावनामें पुरुषको प्रवृत्त कराती हुई चोदना-प्रेरणा-कहलाती है। 'चुद् प्रेरणे' इस धातुसे चोदनाशब्दकी सिद्धि हुई है। और अर्थभावनामें चोदनाप्ेरकत्व पुरुषार्थविषयक हुए बिना सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि जो पुरुषार्थ नहीं है, उसमें पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं होती। शङ्का-'यजेते' इस पदमें लिङ्प्रत्ययसे ज्ञात होनेवाली अर्थभावनाका धत्वर्थ-याग-ही भाव्य माना जायगा, क्योंकि दोनों-घात्वर्थ-याग-और फिडर्थ-अर्थभावना-के 'यजेत' इस एक पदसे ही बोधित होनेसे वे दोनों ही
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चोदनापदार्थनिरूपण] भापानुवादसहित ยู รุง
पात्तत्वेनाऽत्यन्तसंनिहितत्वात्। स च कशात्मकस्तत्कथमर्थभावनायाः पुरुपार्थविषयत्वमिति चेद्, उच्यते-अनयेवाऽनुपपच्या धात्र्थ विहाय भिन्नपदोपाचमप्यधिकारिविद्येपणं स्वर्गभाव्यं कल्पयामः । ततशच स्वर्गा- दिकं भाव्यं धात्वर्थः करणं प्रयाजादय इतिकर्तव्यतेत्येवमंशत्रयमर्थ- भावनायाः सम्पद्यते। तदेवमर्थभावनायाः पुरुपार्थपर्यवसायित्वं द्योतयितुं प्रेरणार्थवाचकस्य चोदनापदस्य ग्रहणं सूत्रकारेण कृतम्, न तु वेदैकदेशस्यैव धर्मपरत्वं द्योतयितुमिति। तदेतदसारम्, सूत्रे वेदग्रहणेऽप्यर्थभावनानां पुरुपार्थपर्यवसायित्वसिद्धेः। तथाहि-'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इति तव्यप्रत्य- यस्य व्यापार: शव्दभावना। सा चाऽध्ययनविपयपुरुपप्रवृत्तिलक्षणार्थ- भावनारूपभाव्यनिष्ठा स्वरगोचरज्ञानकरणिका घृतकुल्याद्यध्ययनफलार्थ- वादा दिज्ञाने तिकर्त्तव्यताका सती पुरुपप्रवृत्तिलक्षणार्थभावनामध्ययनकरणिकां स्वाध्यायरूपभाव्यनिष्ठां प्राङमुखत्वादीनिकर्त्तव्यतामुत्पा्यति। तत्र संत्यन्त सन्निहित हैं। और वह यागस्वरूप घात्वर्थ केशरूप है, तो अर्थ- भावना पुरुपार्थविषयक कैसे हो सकती है? समाधान-इस अनुपपत्तिसे ही घात्वर्थको छोड़कर भिन्नपदसे गृहीत अधिकारीका विशेषण स्वर्गरूप भाव्यकी ही करपना की जाती है। इसलिए स्वर्गादि भाव्य है, घात्वर्थ करण है और प्रयाज आदि इतिकर्तव्यता है- इस प्रकार अर्थभावनाके तीन अंश उपपन्न होते हैं। इस प्रकार अर्थभावनाका पुरुपार्थमें तात्पर्य है, इसका द्योतन करनेके लिए प्रेरणारूप अर्थके वाचक चोदनापदका ्रहण सूत्रकारने किया है, 'केवल वेदके एकदेशका ही धर्ममें सात्पर्य है' ऐसा वोधन करनेके लिए चोदनापदका उपादान नहीं किया है। यह सब पक्ष सारयुक्त नहीं है, क्योंकि सूत्रमें [ धर्मपदके स्थानमें) वेदपवके रहते भी अर्थभावनाओंका पुरुषार्थमें तात्पर्य सिद्ध हो सकता है। [सिद्धि दिखलाते हैं-तथाहि ] 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' (स्वाध्यायका अध्ययन करना चाहिए) इस वाक्यमें तव्यप्रत्ययका व्यापार शब्दभावना है, यह शव्दभावना अध्येयनविपयक पुरुषप्रवृत्तिरूप अर्थभावनात्मक भाव्यमें अपने स्वरूपज्ञानरूप करणसे और घृतकुल्यादिरूप अध्ययनफल अर्थवादादिज्ञानरूप इतिकर्तव्यतासे युक्त होती हुई अध्ययनात्मक साधनवाली पुरुपप्रवृत्तिस्वरूप अर्थभावनाको स्वाध्यायरूप भाव्यमें प्राप्त प्राङ्मुखत्व आदि इतिकर्तव्यताको उत्पन्न करती है।
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४रट विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक २
भाव्यस्य स्वाध्यायस्य फलवद्विज्ञानजनननिमिनत्वमन्तरेण तामर्थभावना- मुत्पादयितुमसमर्था शब्दभावना स्वाध्यायगतलिडादिशव्दाभिधेयक्रतु- भावनानां स्वर्गादिविषयत्वं परंपरया कल्पयति। ततोऽध्ययनविधि- सामर्थ्यादिव वेदस्य विशिष्टफलविषयभावनाप्रतिपादकत्वं सिद्धमिति वेद- ग्रहणेनापि विवक्षितार्थसिद्धर्न तदर्थ सूत्रे चोदनाग्रहणमपेक्षितं प्रत्युत कृत्स्वेदस्य धर्मपरत्वं दतस्तव तत्प्रतिकूलमेव। चोदनाग्रहणे हि सति विधिवाक्यानामेव धर्मपरत्वं नेतरेपां वेदान्तानां किन्तु अर्थान्तरपरत्वं तेपामित्याशङ्का स्यात् तथा लौकिकविधिवाक्यानामपि धर्मपरत्वमा- शङ्क्येत । तदुभयव्यावृत्तये त्वन्मते वेदपदमेव सूत्रे वक्तव्यमापद्येत । वेदाध्ययनान्तरं धर्मविचारं प्रतिज्ञाय चोदनालक्षण इति त्रुवता वैदिक्येव
उसमें भाव्यस्वरूप स्वाध्यायका सफल विज्ञानके उत्पन्न करनेमें निमिच हुए विना उस अर्थभावनाको उत्पन्न करानेमें असमर्थ होती हुई शन्दभावना स्वाध्यायगत लिडादि शव्दोंके वाच्य अर्थभूत यज्ञ भावनाओंमें स्वर्गादि- विषयत्वकी परम्परासे कल्पना करती है। इस हेतुसे अध्ययनविधिकी सामर्थ्यसे ही वेदको विशिष्टफलविषयक भावनाका प्रतिपादन करना सिद्ध हो जाता है, इससे वेदग्रहणसे भी विवक्षित अर्थकी सिद्धि होनेसे, इसके लिए सूत्रमें चोदना- ग्रहण करनेकी अपेक्षा नहीं है, वल्कि सम्पूर्ण वेद धर्मपरक ही है, ऐसा माननेवाले सुम्हारे ही प्रतिकूल होता है। और चोदनापदका ग्रहण करनेपर विधिवाक्य ही धर्मपरक होता है, अन्य वेदान्त नहीं, किन्तु उन अन्य वेदान्तोंको अर्थान्तरपरक होना ही प्राप्त होता है, ऐसी आशक्का होगी। एवम् लौकिक विधि- वाक्योंको मी धर्मपरक होनेकी आंशङ्का होगी, इन दोनों आशक्काओंकी व्यावृत्तिके लिए तुम्हारे मतके अनुसार वेदपदका ही सूत्रमें कहना आवश्यक हो जायगा। [ यदि सूत्रमें वेदपद होगा, तो वेदवाक्यबोधित प्रेरक धर्म कहलायेगा और सम्पूर्ण वेदान्तका तात्पर्य धर्ममें ही सिद्ध होगा, अन्यथा लौकिक विधिको धर्म होनेकी और वेदान्तवाक्योंको अर्थान्तरपरक होनेकी आशक्का बनी ही रहेगी। ] वेदाध्ययनके अनन्तर धर्मविचारकी प्रतिज्ञा करके 'चोदनालक्षणो धर्मः' (चोदना- मेरणा-स्वरूप धर्म है) ऐसा सूत्र बनानेसे वेदप्रतिपादित प्रेरणाका विवक्षित होना
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वेदान्तोंका बदापरत्वकथन ] भापानुवादसहित ४३९
चोदना विवक्षितेति गम्यत इति चेट्, न; अ्रथमसूत्रे 'वेदाध्ययनानन्तरम्' इति विशेपाभावात्। एतत्सून्रानुसारेण तत्रापि सर्वचोदनानन्तर्थकल्पभाप्रस- झ्ात्। न च वेदाधिकरणे 'वेदांश्चैके संनिकर्पम्' इति सूत्रगतवेदपदादति- प्रसङ्गपरिहारः। वेदाधिकरणस्याऽतिदूरस्थत्वात्। अतो वेदान्तानां धर्म- परत्वपर्युदासाय चोदनाग्रहणमिति मूत्रभाष्यवार्तिककाराभिग्रायेण वेद्रा- न्तानां त्रह्मपरत्वमेव सिध्यति। न च 'दष्टो हि तस्यार्थः कर्मावन्ोधनम्' इति भाष्यवचनात् कृत्स्वेदस्य धर्मपरत्वसिद्धिः, सामान्यस्य भाप्यस्य प्रथमद्वितीयसत्नगतविशेपवचना- प्रतीत हो ही जाता है, ऐेसा भी नहीं कह सकते, कारण कि 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इस प्रथम सूत्रमें 'वेदाध्ययनानन्तरम्' (वेदाध्ययनके अनन्तर) ऐसा विशेषरूपसे नहीं कहा गया है। इस सूत्रके अनुसार उसमें भी सम्पूर्ण चोदनाके आनन्तर्यकी कर्पनाका अतिप्रसङ्ग हो जायगा। वेदाधिकरणमें 'वेदश्चिके संनिकर्पम्' (गौतम आदि आचार्य वेदोंको संनिकर्ष मानते* हैं) इस सूत्रमें वेदपदसे अतिप्रसङ्गका वारण हो जायगा। (अर्थात् सकल वेदाध्ययनका ही आनन्तर्य लिया जायगा, सकल चोदना-प्रेरणाओं-का नहीं।) यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि वेदाधिकरण अत्यन्त दूर है, (अर्थात् अत्यन्त दूरके अधिकरणगत सूत्रमें स्थित वेदपदका सम्बन्ध प्रथम सूत्रमें नहीं आ सकता,) इसलिए वेदान्तोंमें धर्मपरकताके निषेधके लिए चोदनापदका ग्रहण किया गया है, इसलिए सूत्र, भाष्य तथा वार्तिककारके अभिपायसे वेदान्तोंका न्रह्ममें ही तात्पर्य सिद्ध होग है। 'दृष्टो हि तस्या०' ('उसका अर्थ कर्मका वोध कराना ही देखा गया है) इस भाष्यवचनसे सम्पूर्ण वेदका धर्ममें ही तात्पर्य सिद्ध होता है, ऐसा भी नहीं माना जा सकता, कारण कि उक्त सामान्यभाष्यवचनके तात्पर्यका प्रथम तथा द्वितीय सूत्रोंमें कहे गये भाष्यके विशेषवचनोंसे ही निर्णय करना होगा। [ प्रथम सूत्रमें धर्मपद है और दूसरे सूत्रमें 'चोदनालक्षणो धर्मः' इस प्रकार धर्मका लक्षण-चोदनारूप-कहा गया है। इन दोनों सूत्रोंमें दोनों पदोंके व्याख्यानभूत भाप्यसे विधायक वेदवाक्य ही धर्मपरक है, वेदान्तवाक्य नहीं। इसलिए सामान्य भाष्यके भी इसके ही अनुसार तात्पर्यविशेषकी कल्पना दिखलाते हैं। ] * नैयायिक वेदोंको पुरुपप्रणीत मानते हैं, यदि वेद पुरुषप्रणीत न होते, तो काठक- कठ मुनिसे ओक्ा-सूक इत्यादि नामोसे नहीं पुकारे जा सकते, इससे कठ, आपिशल आदि मनुप्यके नामोंका सम्बन्ध होनेसे वेद पौकषेय हैं।
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४४० विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
नुसारेण निर्णेतव्यत्वात्। तद्धि भाष्यं पूर्वापरपर्यालोचनायां वेदस्याडर्थ- सद्धावमात्रे पर्यवसितं ततः कर्मानववोधकत्वलक्षणमयोगं व्यवच्छिनत्ति न तु ब्रह्मधोधकत्वलक्षणमन्ययोगम्। ननु 'आम्रायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' इति सूत्रादानर्थक्यं क्रियारहितानामिति चेद्, मैवम्। न तावदानर्थक्यमभिघेयाभावः। एव- मेव भृतमर्थमनुवदन्तीति भाष्येऽभिधेयप्रदर्शनात्। नापि ग्रयोजनाभाव:, सोऽरोदीदित्याद्यर्थवादानां विध्येकवाक्यतामन्तरेण प्रयोजनाभावेऽपि चेदा- वह भाष्य तो पूर्वापरग्रन्थके प्रसङ्गका विचार करनेसे सम्पूर्ण वेदकी सार्थकता के समर्थनमें ही पर्यवसित होता है, इससे कर्मका वोध न करना, इस प्रकार अयोग-सम्बन्घाभाव-की ही निवृत्ति करता है 'ब्रह्मका वोध करना' इत्यादि प्रकारसे अन्य योगका विच्छेद नहीं करता। [ अर्थात् 'दष्टो हि तस्यार्थः कर्मा- बोधनम्' इस भाष्यवचनमें 'हि' पद है, जो एवके अर्थके लिए आया है। एव- कारकी दो अर्थोंमें खण्डशः शक्ति है, इससे कहींपर अयोगव्यवच्छेद-सन्बन्धा- भाव-की निवृत्तिरूप अर्थ है। जैसे-'नीलमुत्पलं भवत्येव' (नील कमल होता ही है) अर्थात् कमलके साथ नीलगुणके सम्बन्धके अभावका व्यवच्छेद होता है। और कहींपर अन्ययोगव्यवच्छेद-सन्निहित पदार्थसे इतरके साथ सम्बन्धके अभाव-में एवकारकी शक्ति है। जैसे-'पार्थ एव धनुर्घरः' (अर्जुन ही धनुर्धारी हैं) अर्थात् अर्जुनमें जसा धनुर्घारित्वका सम्बन्ध है, चैसा दूसरोंमें नहीं है। एवम् प्रकृतमें 'हि' पदका अयोगव्यवच्छेद अर्थ है, जिससे वेदोंसे 'कर्मसम्वन्ध नहीं है' इस प्रकार सम्बन्धाभावकी ही निवृत्ति होती है। अन्य अथोंसे वेदोंका सम्वन्ध नहीं है, इस प्रकार अन्ययोगव्यवच्छेद नहीं होता । ] शङ्का-वेदमात्रका क्रियाकलापमें ही तात्पर्य है, जो वेदवाक्य क्रियापरक नहीं हैं, उनको अनर्थक होना प्राप्त होता है, इस सूत्रके वलसे क्रियामें तात्पर्य न रखनेनाले वाक्योंके अनर्थक होनेका दोष आता है। समाधान-ऐसा दोष नहीं आता, कारण कि अनर्थक पदका अर्थ अभिधेय अर्थका अभाव नहीं हो सकता, क्योंकि 'भूतमर्थ' (भूत-सिद्ध-अर्थका अनुवाद करते हैं) इस भाव्यमें अमिघेयका प्रदर्शन किया गया है। और प्रयोजनका अभाव भी नहीं हो सकता, क्योंकि 'सोडरोदीत्' (वह रोया) इत्यादि अर्थवाद वाक्योंकी विधिवाक्यके साथ एकवाक्यता. किए विना प्रयोजनका अभाव होनेपर
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शास्त्रारम्भमें प्रभाकरका मत] भापानुवादसहित ४४१
न्तेपु शयमाणस्य फलस्याऽनिवार्यतवात्। अतएव भाष्यकारेण तस्मिन्र- धिकरणे क्रियाप्रकरणपठिता अर्थवादा एवोदाहता न तु वेदान्तवाक्यं कि- व्विदप्युदाहृतम्। तदेवं भट्टमते वेदान्तानामगतार्थत्वं सिद्धम्। नजु प्राभाकरास्तु शास्त्रारम्भमेवरमाहु :- अध्ययनविधिर्हि विचार विद्धाति, स च स्वाध्यायस्य फलपर्यन्ततामाकाङ्गन वेदार्थविचारमेव विद- ध्यान धर्मविचारम्। न च वेदार्थे सामान्यग्रतिपत्यभावः, सार्ङ्ग वेद- मधीतवत आपाततस्तदर्थप्रतिपत्तिसच्चात्। नाऽपि विशेषप्रतिपत्यभाव:, 'उद्भिदा यजेत पशुकाम:' इत्यादौ पशुकाममुददिश्य यागो विधीयते, याग- विधानं चोहिश्य पशुकामाधिकार इत्यादिवचनव्यक्तिमन्देहात्। सस्मात
भी वैदान्तवाक्योंमें सुनाई देनेवाले फलका निवारण नहीं किया जा सकता। इसलिए ही भाष्यकारने उस अधिकरणमें क्रियापरकरणमें-कर्मकाण्डमें-पढ़े हुए अर्थ- वादोंका ही उदाहरणरूपसे ग्रहण किया है, किसी भी वेदान्तवाक्यका उदाहरणरूपसे ग्रहण नहीं किया है। इस पूर्वोक्त विवेचनसे भट्टमतमें वेदान्तवाक्योंकी अगतार्थता सिद्ध होती है। [अतः वेदान्तवाक्योंका विचार करनेके लिए पृथक् मीमांसा करना आवश्यक है, क्योंकि पूर्वमीमांसासे वेदान्तवाक्योंका विचार नहीं किया जा सकता।] प्रमाकरमतानुयायी मीमांसक शासत्रके आरम्भका निरूषण निम्न प्रकारसे करते हैं-अध्ययनविधि ही विचारका विधान करती है। और वह विधि स्वाध्यायके-वेदके-फलकी आकाङ्डा करती हुई वेदार्थके विचारका ही विधान करेगी, धर्मके विचारका नहीं। वेदार्थका सामान्यतः ज्ञान नहीं है, ऐसा भी नहीं कहना चाहिए, कारण कि अङ्भेंके सहित वेद पढ़नेवाले पुरुषको आपा- ततः-विचारके पूर्व भी सामान्यतः-[ तात्पर्यका निश्चय न होते हुए भी] वेदार्थका ज्ञान हो जाता है। और ऐसा भी नहीं है कि विशेषरूपसे ज्ञान न हो, क्योंकि 'पशुओंकी प्राप्तिकी इच्छासे उद्भिद्याग करना चाहिए' इत्यादि विधिमें पशुकाम पुरुषको उद्देश्य करके यागका विधान किया जाता है या याग- विधिको उद्देश्य करके पशुकाम पुरुषका अधिकार विहित है: अथवा दोनोंका विधान है: इस प्रकार वचनव्यक्तिका सन्देह होता ही है। [ 'उद्विदा यजेत पशुकाम:' इस वाक्यमें याग को उद्देश्य कर पश्युकाम पुरुषके अधिकारका और पशु- कामको उद्देश्य करके यागका विधान है, इस प्रकार पृथक्-पृथक्को उद्देश्य करके ५६
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४४२ विवरणत्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
'अथातो धर्मजिज्ञासा' इत्यस्याऽधिकरणस्य वेदार्थविचारो विषयः, स कर्त्तव्यो, न वेति संशयः। न कर्त्तव्य इति तावत्प्ाप्तम् , आलम्बनप्रमाणाभावात्। आम्नायालम्वनो विचार इति चेद्, न; अध्ययनविधिशेपतयाऽSम्रायस्य स्त्रार्थविवक्षायोगात्। अध्ययनाङ्ग्त्वमान्नायस्य न सम्भवति, विनियोजका- भावादिति चेद्, न; प्रयुक्तिशेपत्वस्याऽनिचार्यत्वात्। अध्ययनं तावद-
माणस्वाध्यायनिष्पाद्यम्। अतोऽध्ययनस्थ प्रयोजकोऽध्यापनविधिस्तदुप-
पृथक्-पृथक्का विधान है: अथवा दोनोंको उद्देश्य करके एकका विधान अथवा एक को ही उद्देश्य करके दोका विधान है? इस प्रकार सामान्य दृष्टिसे बचनकी कल्पना द्वारा एक ही अर्थमें विरुद्ध नाना अर्थान्तरोंकी आपाततः प्रतीति होनेसे वेदार्थके विषयमें भी विप्रतिपत्तिका सम्भव होनेसे वेदार्थका सामान्य ज्ञान होनेपर भी विशेषरूपसे वेदार्थ सन्देहका विपय होता ही है। अतः वेदार्थके विचारका अवसर प्राप्त होना असंगत नहीं है। ] इसलिए 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इस धर्मजिज्ञासा-अधिकरणका वेदार्थ-विचार ही विषय है। उक्त विचार करना चाहिए या नहीं करना चाहिए : ऐसा संशय प्राप्त होता है। इसमें प्रथम 'नहीं करना चाहिए' ऐसा प्राप्त होता है, कारण कि आलम्वनप्रमाणका अभाव है। [ विचार किसी विवक्षितार्थ विपयको लेकर ही हो सकता है। बेदार्थके विचारप्रसन्बमें ऐसा कोई विवक्षितार्थ आलम्बन नहीं है ] आम्नायका- वेदका-ही आलम्बन करके विचारका प्रसङ्ग होगा, ऐसा नहीं माना जा सकता, क्योंकि अध्ययनविधिका अङ्ग होनेसे आम्नायमें-वेदमें-स्वार्थ- विवक्षाका अवसर नहीं है। आम्नाय-वेद-अध्ययनविधिका अद्र नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें कोई विनियोजक नहीं है, ऐसी शङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि प्रयुक्ति-अध्ययनरूप प्रयोग-द्वारा आम्नायको, अध्ययन- विधिके अङ्ग होनेका निवारण नहीं किया जा सकता। उपपादन करते हैं- अध्यापनविधिसे प्रयुक्त अनुषानात्मक होनेसे अध्ययन उसका अङ्ग होता है, और उचचारणस्वरूप वह अध्ययन उच्चारण किये जानेवाले स्वाध्याय- आम्नाय-द्वारा ही निष्पन्न हो सकता है। [ अध्ययन-पढ़ना-'आचार्य- सुखतः प्रियात्' इत्यादि चचनोंके अनुसार अध्यापन-पढ़ाना-रूप गुरुव्यापारके
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श्ासांरम्मर्मे प्रभाकरका गत] भांपानुवादसहित ४४३
कारिणमास्नायमपि प्रयुङ्क्ते प्रयुक्तो चाउङ्रत्वान्न विवक्षितार्थत्वम्। अथ मन्यसे-न प्रयुक्तिमात्रादङ्वत्वम्, अनङ्गस्याऽप्युपकारस्य प्रयुक्तिसम्भवाद्; अतो विपनिर्हरणादिमन्त्रवाक्यवदवित्रक्षितार्थत्वं नास्तीति, तहिं प्रकारा-
विना नहीं बनता। इसलिए अध्ययन अध्यापनका अन्ग है। और अध्ययनका उपकारी आग्नाय है। विषयके बिना अध्ययनका होना असंभव है। इसलिए आग्नायगें उच्चारणरूप-अध्ययनत्व निश्चित है।] इसलिए अध्ययनका प्रगोजक अध्यापन-पढ़ाना-विधि है। वह अध्यापनविधि उसके उपकारी आग्नायको भी अनुष्ठानमें प्रयुक्त करती है। इस प्रकार प्रयुक्तिमें अम् होनेसे स्वाध्यायकी अपनी स्वार्थविवक्षा सिद्ध नहीं हो सकती। प्रयुक्तिमात्रसे अ्ञ होनेका नियम नहीं है, क्योंकि जो अज नहीं है, उससे भी उपकारकी प्रयुक्ति हो सकती है। (अर्थात जैसे आधानकी उत्तर ऋतुमें प्रयुक्ति है। परन्तु आधान उत्तर कनुका अन्र नहीं माना गया है) इसलिए तिपनिवारणमें प्रयुक्त मन्त्र- वाक्योंके दष्टन्तसे स्वाध्यायमं सरविवक्षितार्थत्व सिद्ध नहीं होता। पृ० ४२७ पं० ७ में विषनिर्हरणादिमन्त्रवाक्योंके दष्टान्तसे स्वाध्यायमें अविवक्षितार्थत्व सिद्ध कर आए हैं। इसलिए यहांपर उक्त दष्टान्त प्रयुक्तिमात्रसे अविवक्षितार्थतवका साघक नहीं हे यह कहनेमें तात्पर्य है। वस्तुतः विवरणके पाठके अनुसार 'प्रयुक्ती चानलान्न विवक्षितार्थत्वम्' इस ग्रन्थके आगे 'अतो विपनिर्हरणादि- मन्त्रवाक्यवत् विचक्षितार्थत्वं नास्ति' यंह पाठ होना चाहिए, और 'अथ मन्यसे न पयुकिमात्राद्त्वम्' इसके आगे 'अनपस्याऽप्याधानस्य प्रयुक्तिसम्भवात्' ऐसा उपकारके स्थानमें आधान पाठ रखना सकत मालस होता है। यथाश्रुत पाठ रखने के आग्रहसे ऊपर कथित अनुवाद किया गया है और यथाश्नुत उपकारको उपकारकपरक माननेसे तो सप्ति नहीं वन सकती, क्योंकि अङ्ग और उपकारक पंयाय ही हैँ अथवा 'विधिशक्तिर्न मन्त्रस्य' इत्यादि पृ० ४३० पं० ५ में प्रति पादित न्यायसे विपनिर्हरणादि मन्त्रवाक्योंकी भी स्वार्थविवक्षा मानकर उक्त वाक्योंका दष्टान्त विवक्षितार्थत्वमं दिया गया है।] यदि ऐसा सिद्धान्त मानते हैं, तो दूसरी रीतिसे आम्नायके अविवक्षितार्थत्वका सम्पादन करेंगे। [ कोई आचार्य आग्नायकी अध्ययनमें प्रयुक्ति मानकर अद्गत्व- सिद्धि द्वारा अर्थविवक्षाका अभाघ कहते हैं और कोई-कोई प्रयुक्तिमात्रको भव्नत्वका
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
न्तरेण वित्रक्षितार्थत्वं सम्पादयामः। स्वाध्यायविधिवाक्ये तव्यग्रत्वचेनाS- पूर्वस्य प्रतिपादनात् तदङ्गता तावत स्वाध्यायस्याऽधिगता। यद्यप्यध्यापन- विघिप्रयोज्यमध्ययनस्याऽध्यापनाङ्गत्वमपि प्राप्तं क्रतुप्रयुक्त्तस्य प्रयाजादेः क्रलङ्गतदर्शनात् तथापि प्रथमानगतमपूर्वाङ्गत्वं नाऽपाकर्तु शक्यम्, तत- ाऽपूर्वांङ्गस्व स्व्राध्यायस्याऽविवक्षितार्थत्वात् 'न वेदार्थविचारः कर्तव्यः' इति पूर्वपक्षे प्राप्ते राद्धान्तं न्रम :- न तावत् प्रयुक्तिवलादध्यापनाङ्गत्वमध्ययनस्य गुज्यते, उत्तरतु- प्रयोजक न मानकर प्रयुक्तिसे ही अर्थविवक्षाका अभाव नहीं मानते हुए स्वाध्यायकी अविवक्षितार्थताका अन्य प्रकारसे साधन करते हैं] 'स्वाध्यायोऽ्येतव्यः' इस अध्ययनके कर्मकारक स्वाध्यायघटित विधिवाक्यमें [ कर्मार्थक ] तव्यप्रत्यवसे अपूर्वका प्रतिपादन करनेसे स्वाध्यायको अपूर्चका अङ्ग होना पाप्त ही होता है। [नियम है 'मूतं मव्यायोपदिश्यते' सिद्ध वस्तुका उपदेश साध्यके निमिच होता है, इसके अनुसार सिद्धस्वरूप स्वाध्यायका कर्मकारकत्व असिद्धभूत अपूर्वके ही निमित्त होनेसे वह अपूर्वका अङ्ग है और अक्गका स्व्रार्थमें तात्पर्य नहीं होता, इसलिए स्वाध्यायको-वेदको-अविवक्षितार्थ ही मानना होगा। ] यद्यपि अध्यापनविघिके द्वारा प्रयुक्त अध्ययनको अध्यापनका अह्ग होना मी प्राप्त होता है, क्योंकि क्रतुप्रयुक्त प्रयाजादिको क्रतुका मङ्ग होना देखा गया है, तथापि पहले ही से ज्ञात हुए अपूर्वका अङ्क होना नहीं छोड़ा जा सकता। [ अर्थात् अध्यापनविघिसे सामान्यतः अध्ययनमात्रका अनुष्ठान नहीं होता, किन्तु 'उपनीय तु यो विगम्' इत्यादिसे विहित अध्ययनका ही अनुष्ठान प्राप्त होता है। अन्यथा अनु- पनीतादि अनधिकारीको भी अध्ययन प्राप्त हो जायगा। एवम् गुरुके- आचार्यके-मुखसे नियमपूर्वक अध्ययनमें ही पुण्य है, इस प्रकार अध्या- पनको प्रथमतः अपूर्वका-पुण्यका-अज्ञ होना प्राप्त है, उसका निष्प्रमाण त्याग नहीं किया जा सकता ]। इस हेतु अपूर्वके अङ्गभूत स्वाध्यायके अविवक्षितार्थ होनेसे वेदार्थका विचार नहीं करना चाहिए। इस प्रकार पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर सिद्धान्त पक्ष कहते हैं। [ उक्त पूर्वपक्षमें दो आचार्योंका मत है एक प्रयुक्तिके कारण अज्ञ मानते है दूसरे अपूर्वका अञ्ञ मानते हैं। दोनोंका क्रमशः समाधान करते हैं-]प्रयुक्तिके
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शास्त्रारभमें भभाकरमतका खण्डन] भार्पानुवादसहित I ४४५
प्रयुक्तस्याऽडधानस्य तदङ्गत्वादर्शनात्। ग्रयाजादीनां विनियोजकप्रकर- णादिग्रमाणवलादङ्गत्त्वसिद्धेः। इह च तादयप्रमाणाभावात्। अपूर्वार्थत्वं त्वध्ययनस्य नाडर्थविवक्षाप्रतिन्धकम्, अपूर्वस्य स्वाध्यायगततव्यप्रत्य- याभिहितत्वेन प्रयोजनाकाह्वयां दृष्टे सत्यदष्कल्पनाऽनुपपच्या स्वाध्याय- सामर्थ्यजन्यं प्रयोजनवद्विज्ञानं फलमिति कल्पयितुं शक्यत्वात्। तस्मा- द्विवक्षितार्थस्य वेदस्यारऽर्थविचारः कर्त्तव्य इति स्थितम्। एवं च वेदार्थवि- चारं प्रतिजानतां प्राभाकराणां मते वेदान्तानामगतार्थत्वं दुःसम्पादमिति।
कारण अध्ययनको अध्यापनका अङ्ग होना, यही पहले सम्गत नहीं है, कारण कि उत्तर करतुमें प्रयुक्ति होनेसे भी आधानको उत्तर करतुका अङ्ग होना नहीं देखा गया है। ऋतुमें प्रयुक्तिके आघारपर प्रयाजादिका क्रतुके अम्र होनेगें दिए गए दट्टान्तका खण्डन करते हैं-]प्रयाजादिफो विनियोजक प्करण आदि प्रमाणके आधारपर कतुका अऊ्ञ होना सिद्ध होता है। प्रकृत में तादय़ प्रकरण आदि कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए प्रयुक्तिमात्रसे अज्ञभावकी सिद्धि नहीं हो सकती। [दूसरे आचार्योंके मतका खण्डन करते हैं-] अध्ययनको अपूर्वका निमित्त माननेसे भी उसकी विवक्षितार्थताका प्रतिबन्ध नहीं दो सकता, कारण कि स्वाध्यायगत अपूर्वका तव्यप्रत्ययसे अभिधान होता है। [मीमांसकमतमें अपूर् लिडादिप्रत्ययका अर्थ है। ] उसके प्रयोजनकी आकाद्वा होनेपर हए्टफलके सम्भव होनेपर अटष् फलकी करपना करना उपपन्न न होनेसे स्वाध्यायकी सामर्थ्यसे उत्पन्न हुआ प्रयोजनशाली विज्ञान ही फल है, ऐसी कल्पना की जा सकती है। [ तात्पर्य यह कि जैसे 'सोमेन यजेत' इत्यादि विधिवाक्यघटक लिझादिप्रत्ययसे अभिहित अपूर्व स्वर्गादिरूप फलकी प्राप्तिके द्वारा समयोजन होता है, वैसे ही प्रकृतमें 'स्वाध्यायोऽ्येतव्यः' इस वाक्यमें आये दुए तव्यप्रत्ययसे स्वाध्यायगत अपूर्वका अभिधान होता है, उसका प्रयोजन सफल वेदार्थविज्ञान ही मानना उचित है। इस विवेचनसे विवक्षितार्थ चेदके अर्थका विचार करना चाहिए, यह सिद्धान्त निश्चित होता है। इस प्रकार वेदार्थके विचारकी प्रतिज्ञाका समर्थन करनेवाले प्रभाकरानुयाथी मीमांसकोंके मतमें वेदान्तोंकी अगतार्थताका सम्पादन नहीं किया जा सकता। [ प्रभाकरा- सुयायी मीमांसकोंका कहना है कि 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इस प्रथम सूत्रसे
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४४६ विवरणप्रमेयसंग्रंह [सूंत्र १, वर्णक २
अत्रोच्यते-यद्यपि कृत्सवेदाध्ययनविधिप्रयुक्तो विचारो वेदार्थमेव विपयीकुर्यात् तथा्यनन्यथासिद्वेन सूत्रकृतधर्मग्रहणेन वेदार्थैकदेश- विषयः संपद्यते। न चैवमध्ययनविधिविरोध, सामान्यरूपस्य विधेः प्रतिवाक्याध्ययनं अतिवाक्यविचारं च व्यापारभेदेन वेदार्थैकदेशविचारे
धर्मपदको वेदार्थका उपलक्षण मानकर वेदार्थमात्रके विचारकी प्रतिज्ञा सूत्रकारने की है। इससे वेदान्तवाक्योंके अर्थका विचार भी प्रतिज्ञात हो जानेसे उसके लिए पृथक् सीमांसाका आरम्भ करना प्राप्त नहीं होता, अर्थात् पूर्वमीमांसासे ही वेदान्तवाक्योंका भी विचार हो जायगा।] इस प्राभाकरमतके ऊपर विचार किया जाता है-यद्यपि सम्पूर्ण वेदोंके अध्ययनकी विघिसे प्रयुक्त हुआ विचार वेदार्थको ही विषय करेगा तथापि अनन्यथासिद्ध सूत्रघटक धर्मग्रहणसे वेदार्थके एक भागको विषय करनेवाला ही सिद्ध होता है। [अर्थात् धर्मकी सिद्धि वेदसे ही हो सकती है, धर्म वेदार्थस्वरूप ही है। धर्मकी सिद्धि वेदसे अन्य प्रमाण द्वारा होती ही नहीं है, अतः धर्म अनन्यथासिद्ध है। उसका ग्रहण सूत्रमें 'अथातो वेदार्थ- जिज्ञासा' इस प्रकार वेदार्थपदसे हो ही जाता है, पुनः धर्मत्रहण व्यर्थ होकर विचारके विषयका नियम कर देगा कि इस प्रथम सुन्रसे केवल वेदार्थके एफदेशका विचार करनेकी ही प्रतिज्ञा की गई है। ] इस प्रकार वेदार्थेक- देशको ही विषय माननेसे अध्ययनविधिका विरोध भी नहीं आता। [पूर्व- पक्षीका तात्पर्य है कि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस अध्ययनविधिवाक्यसे सकल वेदका अध्ययन प्राप्त होता है और 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इस सूत्रमें सकल वेद पढ़नेके अनन्तर विचारका प्रारम्भ किया गया है, इस प्रकार उपक्रमके बलसे सम्पूर्ण वेदार्थका विचार प्राप्त होता है, एकदेशमें ही तात्पर्यका निर्णय करनेसे विरोध आता है। ] [ यदि सम्पूर्ण वेदके अध्ययनप्रयुक्त सम्पूर्ण वेदार्थको विचारका विषय माना जाय, तो धर्मपदके स्थानमें वेदार्थपद देना ही उचित था और वेदार्थके एकदेशको विषय माननेसे सम्पूर्ण वेदके अध्ययनविधिमें प्रयुक्तिकी उपपत्ति भी प्रतिवाक्य विचार प्राप्त होनेसे प्रयोजन तथा व्यापारभेदसे हो सकती है इस आशयसे समाधान करते हैं-] क्योंकि सामान्यविधिके प्रति- वाक्यके अध्ययन एवम् प्रतिवाक्यके विचारमें व्यापारभेदसे वेदार्थके एकदेशके
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शास्त्रारम्भमें प्रभाकरकामत खण्डन] भापानुवादसहित ४४७
पि चरितार्थत्वात्। यथा 'चक्षुपा रूपं पशवेत्' इति विधेर्नीलरूपदर्शनमात्रे- णाडपि चरितार्थता तद्त्। अथ तत्र सर्वरूपदर्दनस्याऽयक्यत्वात संकोचस्तहिं अत्रापि अविरक्तेनानधिकारिणा ेदान्तानां विचारयितुमशक्यत्वादेव संको- चोडस्तु। न चवमध्ययनेऽपि संकोचप्रसङ्ग, तत्र विरक्त्ेरधिकार प्रत्यग्रयो- जकत्वाद्: विचारस्य चाऽसंकोचे धर्मग्रहणमनुपपन्नं स्यात्। चेदार्थविचार इत्येव चक्तव्यत्वात्। पुरुपार्थद्योतनाय चेदार्थ एव धर्मशब्देन निदिश्यत
विचार करनेपर भी चारितार्थ्य हो सकता है। [यद्यपि स्वाध्यायाध्ययन सामान्यतः सम्पूर्ण वेदका प्राप्त होता है एवम् विचार मी सम्पूर्ण वेदार्थका ही प्राप्त होता है तथापि प्रतिवाक्यके अध्ययन तथा विचारमें व्यापारभेद होनेसे सामान्यविधिको विशेपपरक माननेमें कोई वाधा नहीं है, अतएव प्रथम सत्रको वेदार्थविशेपके विचारपरक माननेपर भी अध्ययनविधिमें प्रयुक्तिकी अनुपपत्ति नहीं हो सकती। इस आशयको दष्टान्तसे सिद्ध करते हैं-] जैसे 'चक्षुरिन्द्रियसे रूप देखना-रूपका प्रत्यक्ष करना-चाहिए, इस (सामान्य) विधानका (विशेष) नीलरूपमात्रके दर्शनसे भी चारितार्थ्य हो सकता है, वसे ही प्रकृतमें भी सामान्यवेदार्थका विचार विशेपपरक हो सकता है। दृष्टान्त स्थलमें सम्पूर्ण रूपका दर्शन हो नहीं सकता, इसलिए सामान्यविधिका विशेपपरक माननेमें संकोच करना पड़ता है, यदि यह कहा जाय, तो प्रकृतमें भी जिसको वैराग्य नहीं हुआ है, ऐसे अनधिकारी पुरुपसे वेदान्तोंका विचार करना मी नहीं हो सकता, इसलिए संकोच करना प्राप्त होता है। इस प्रकार अध्ययनविधिमें संकोच नहीं हो सकता, कारण कि अध्य- यनमें वैराग्य अधिकारका प्रयोजक नहीं है। ['ब्राह्मणेन निप्कारण: पडड़गो वेदोऽध्येयः इत्यादि नित्यविधिके वलसे वैराग्य हो अथवा न हो, उपनीत- द्विज होनामात्र अध्ययनमें अधिकारका ग्रयोजक है। और वेदान्तविचारमें 'शान्तो दान्तः' इत्यादिके अनुसार शमदमादिसाधनचतुष्टयसम्प्राप्तिके अनन्तर ही अधिकार प्राप्त हो सकता है। इसलिए अध्ययनविघिका संकोच नहीं हो सकता] और विचारका संकोच न किया जाय, तो धर्मग्रहणकी उपपत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वेदार्थविचार-वेदार्थका विचार-किया जाना-ऐसा सामान्यरूपसे ही कहना पड़ेगा। वेदार्थको पुरुपार्थबोधन करनेके लिए धर्मशब्दसे निर्देश किया गया
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४४८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, चर्णक २
इति चेद् न; धर्मशब्दस्य वेदार्थवाचकत्वाभाचाद्। अचेदार्थे चैत्यवन्द- नादावपि कैश्चिद्धर्मशब्दप्रयोगात्। अथाऽन्वयव्यतिरेकसिद्धश्रेय:साधनाभि- धायी धर्मशब्दो वेदार्थशच श्रेयःसाधनमिति तत्र धर्मशब्दो वर्त्तत इति मन्यसे, तर्हि श्रेयोरूपं ब्रह्म न धर्मशब्देनाऽभिधीयते, साधनत्वाभावात; तत एकदेशविचारोऽङ्गीकार्यः। नो चेद् व्रह्मणोऽपि संग्रहाय सूत्रे वेदार्थ- पदं वक्तव्यम्। न च सामान्यतोऽप्यप्रतिपन्नस्य न्रह्मणः कथ संग्रह इति वाच्यम्, साङ्गवेदाध्यायिनो विचारात् प्राग् धर्मवद् ब्रह्मणोऽप्यापातनः प्रति- पत्ते: सचात्। ततश्च चेदार्थपदाभावादादिसूत्रं धर्ममात्रविचारविपयम्। तथा लक्षणपर द्वितीयसून्नमपि धर्मविपयम्, न वेदार्थविपयम्। लक्षणं है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि धर्मशब्द वेदार्थका वांचक नहीं है। जो वेदार्थ नहीं है, ऐसे चत्यवन्दन आदिमें भी कई-एक वादी धर्म- शब्दका प्रयोग करते हैं। अन्वय और व्यतिरेकसे सिद्ध श्रेय-अभ्युदय-के साधनका वाची धर्मशब्द है और वेदार्थ भी अभ्युदयका साधन-कारण-है। इससे धर्मशब्दकी वेदार्थमें वृत्ति हो सकती है। [अर्थात् श्रेयःसाघनमें विशेष न होनेसे धर्मशब्दका प्रयोग वेदार्थके लिए आ सकता है। और श्रेयःसाधन न होनेसे चैत्यवन्दनादिकी व्यावृत्ति हो सकती है। ] यदि ऐसा मानते हो, तो श्रेय-अभ्युदय-स्वरूप ब्रह्म तो धर्मशब्दसे नहीं लिया जा सकता, कारण कि ब्रह्म साधनरूप नहीं है, किन्तु ्रह्म स्वयं अभ्युदयस्वरूप है। इससे 'अथातो घर्मजिज्ञासा' इस सूत्रसे वेदार्थके एकदेशका ही विचार करके प्रतिज्ञा माननी होगी, नहीं तो ब्रह्मका भी संग्रह करनेके लिए वेदार्थपद ही सूत्रमें देना चाहिए। जिसकी सामान्य रीतिसे भी प्रतीति नहीं है, [ विशेषरूपसे नहीं है, इसमें तो कहना ही क्या ? ] ऐसे ब्रह्मका [ वेदार्थपदसे भी ] कैसे संग्रह हो सकेगा! [ सामान्यतः प्रतीत और विशेषतः विप्रतिपन्न ही विचारका विषय हो सकता है, ब्रह्ममें ऐसा नहीं है। ] ऐसी शङ्का भी नहीं कर सकते, कारण कि अरजोंके सहित वेदोंको पढ़ लेनेपर विचार करने के पूर्व ही धर्मकी भाँति ब्रह्मकी भी आपाततः प्रतीति होती ही है। इसलिए वेदार्थपदके न रहनेसे प्रथम सूत्रका विषय धर्ममात्रका ही विचार है। एवं धर्मके लक्षणमें तात्पर्यवाला दूसरा 'चोदनालक्षणोऽर्यो धर्मः' सूत्र भी धर्मविषयक ही है। वह वेदार्थमात्रको विषय नहीं करता। लक्षण लक्ष्यका
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शास्त्रारम्भमें मभाकरमतका खण्डन ] भापानुवादसहित ४४९
हि लक्ष्यस्याऽन्यत्र ग्रसङ्गभ्रमनिरासपरम्। तत् धर्मस्य लक्ष्यत्वे चैत्यंवन्दनादौ प्रसङ्गभ्रमो निरस्यते, कैश्चित् चैत्यवन्दनादिपु धर्मत्वभ्रमं प्राप्य विप्रतिपद्यमा- नत्वात्। नकु वेदार्थेपि विप्रतिपत्तयः सन्ति-किमर्थवादादिलक्षणो वेदार्थः किं वा चोदनालक्षण इति, ततस्तन्निरासाय लक्षणमुच्यतामिति चेत, तर्हि 'चोदनालक्षणो चेदार्थ:' इति सत्रे लक्षणं वक्तव्यम्, धर्मग्रहणे हि वेदार्थविश्रति- पत्तिनिरासोडशाब्द: स्यात्। वेदार्थमेव विचक्षित्वा धर्मशब्द: प्रयुक्त इति चेइ न; तस्य तदवाचकत्वाद्। न च धर्मशब्दो घेदार्थ लक्षयति, जह- लक्षणायां वेदार्थस्याऽधमत्वप्रसङ्गात्। अभिधेयादन्यस्य तीरादेर्लक्ष्यस्याS-
भ्रमसे अन्यत्र ग्राप्त प्रसङ्गका निवारण करना ही अपना प्रयोजन रखता है। उस सूत्रमें धर्मके लक्ष्य होनेसे चैत्यवन्दनादिको धर्म समझनेका भ्रम दूर किया जाता है, क्योंकि कोई-कोई चेत्यवन्दन आदिको धर्म समझ कर विरुद्ध प्रतीति करते हैं अर्थात् अ्रममें पड़कर चैत्यवन्दनादिको भी धर्म मान बैठते हैं। शक्का-वेदार्थके विपयमें भी विप्रतिपत्तियाँ-संशयात्मक विरुद्ध प्रतीतियां- होती हैं, जैसे क्या अर्थवादादिरूप धर्म है? अथवा प्रेरणात्मक धर्म है ? इसलिए उक्त संशय-विप्रतिपत्ति-को दूर करनेके लिए ही लक्षण किया जाता है अर्थात् दूसरे सून्में भी लक्षणका विपय लक्ष्य वेदार्थ ही है। समाधान-इस शक्ाके अनुसार तो 'चोदनात्मक वैदार्थ है' इस प्रकार ही सूत्रमें लक्षण करना चाहिए था, धर्मका ग्रहण करनेपर, तो वेदार्थविपयक विप्रतिपत्तिका समाधान शब्द द्वारा नहीं हो सकता। शब्बा-वेदार्थकी विवक्षासे ही धर्मश्दका प्रयोग किया गया है। समाधान-ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि धर्मपद वेदार्थका वाचक नहीं है। . [ शन्दपयोगका नियम है कि जिस अर्थकी विवक्षा हो उसके वाचक शन्दका ही प्रयोग करना चाहिए, अन्यथा अतिप्रसङ्क होगा और आलक्कारिकोंका अवाचकत्व दोप विराजमान हो जायगा। ] धर्मशब्दकी वेदार्थमें लक्षणा भी नहीं कर सकते, क्योंकि जहलक्षणामें वेदार्थके अधर्म होनेका प्रसङ्ग आ जायगा। जैसे अभिधेय-वाच्य-अर्थसे इतर तीर आदि लक्ष्यमूत अर्थ गझ्मारूप नहीं हैं। ['जहति स्वानि-स्वीयानि-पदानि यः स जहत्स्वः एवंभूतोर्थो यस्यां लक्षणायाम् सा जह्ल्क्षणा' इस जहत्स्वार्था लक्षणामें लक्षकपद अपने स्वार्थका-वाच्यार्थका- ५५
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४५० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक २
गङ्गात्वदर्शनात्। अजहल्लक्षणायामपि कीदशी वचनव्यक्ति:१ यशचोदनालक्षणः स धर्म इति यो धर्मः स चोदनालक्षण इति वा। द्वेधाऽपि न वेदार्थ- विवक्षा सिद्धति, चोदनाधर्मशब्दयोर्वेदतदर्थैकदेशवाचिनोः कृत्स्नवेदतदर्थ- लक्षकत्वे कारणाभावात्। नहि यच्चाक्षुपं तदूपं यद्रूपं तच्ाक्षुपमित्यत्र सर्व- प्रत्यक्षतद्विपयलक्षणा टष्टा। मुख्यार्थेऽनुपपत्यभाव उभयत्राऽपि समान: ।
त्याग कर देता है। जैसे 'गङ्गायां घोषः' यहांपर गङ्गापदसे अपने प्रवाहरूप वाच्य अर्थका त्याग करके लक्षणाके द्वारा गङ्गासे भिन्न केवल तीररूप अर्थका बोध होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी धर्मपदसे जहत्स्वार्था लक्षणाके द्वारा धर्मभिन्न अधर्मस्वरूप वेदार्थका बोध होगा, जो कि यहाँ इष्ट नहीं है। ] अजहल्लक्षणाके [ जिस लक्षणामें स्वार्थका त्याग नहीं होता है, उसको अजहलक्षणा कहते हैं, जसे 'श्वेतो धावति' 'कुन्ताः प्रविशन्ति' इत्यादि ] माननेमें वचनका स्वरूप कैसे होगा? क्या जो प्रेरणात्मक अर्थ है वह धर्म है ? अथवा जो धर्म है वह प्रेरणात्मक अर्थ है? अर्थाद् चोदनात्मक धर्मका लक्षण है। दोनों प्रकारकी वचनव्यक्तिसे भी वेदार्थ- मात्रकी विवक्षा सिद्ध नहीं हो सकती, कारण कि चोदना तथा धर्म-ये दोनों शब्द वेद तथा वेदार्थके एक देश-किसी एक भाग-के ही वाचक * हैं, अतः उन दोनों पदोंसे लक्षणा द्वारा भी सम्पूर्ण वेद तथा सम्पूर्ण वेदार्थका बोध किसी कारणवश नहीं हो सकता। जो चाक्षुष प्रत्यक्ष है वह रूप है या जो रूप है-वह चाक्षुष प्रत्यक्ष है, इस प्रकारके वाक्योंमें सम्पूर्ण प्रत्यक्षों तथा प्रत्यक्षके सम्पूर्ण विषयोंकी प्रतीति लक्षणाके द्वारा नहीं देखी गई है। सुख्य अर्थमें अनुपपत्तिका अभाव दोनों स्थलोंमें समान ही है। [ जो चाक्षुष है वह रूप है, इत्यादि स्थलमें सुख्य अर्थका चाघ आदि लक्षणाके बीजके न होनेसे लक्षणा नहीं होती, यदि यह कहो, तो जो चोदनात्मक अर्थ है वह धर्म है, इस स्थलमें भी मुख्यार्थका बाघ नहीं है, इस प्रकार मुख्यार्थके बाघ आदि लक्षणाके कारणका अभाव दोनों स्थलोंमें समान ही है। ]
- लिझदिप्रत्ययघटित विधिवाक्यस्वरूप होनेसे वेदका विधायक वाक्यसमूहात्मक भाग चोदना है और चोदनाविहित अभ्युदयका साधनभूत विधायक वाक्यात्मक वेदका अंर्थ है-धर्म। अतः धर्म भी वेदार्थैकदेश ही हुआ।
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शास्रारम्ममें मभाकरमतका खण्डन] भापानुवादसहित ४५१
अथोच्येत- 'उपनीय तु यः शिप्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः। सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते।।' हत्यादिवत् संज्ञाविधिपरमिदं सूत्रम् , ततो धर्मशव्दस्य पूर्वमभिधान- लक्षणावृत्योरभावेऽपि वेदार्थविवक्षा भवतीति, तन; ग्रयोजनाभावाद्। यथा 'आचार्याय गां दद्यात्' इत्यादिकार्यान्तरे नियोगार्थमाचार्यसंज्ञा विधीयते न तथेह कार्यान्तरमस्ति यदर्थ वेदार्थस्य धर्मसंज्ञा विधीयते। धर्मशव्दस्य वेदार्थवाचकत्वाङ्गीकारेऽपि सूत्रगतार्थशब्दवैयर्थ्यं चोदनाशव्दस्य कृत्स्वेद- लक्षणापरत्वमधिकरणरचनानुपपत्तिश्च त्वन्मते वारयितुं न शक्यते। न च 'इयेनेनाभिचरन्यजेत'इत्यादयोऽर्थशब्दव्याव्च्याः, तेपामपि वेदार्थत्वव्यावृत्त्य- शक्का-यदि कहा जाय कि 'जो द्विज (ब्राह्मण) शिष्यका उपनयन संस्कार करके रहस्य और कल्पके सहित वेदको पढ़ावे उसको आचार्य कहते हैं' इत्यादिसे जैसे आचार्यसंज्ञाका विधान होता है, वैसे ही इस सूत्रका मी संज्ञाके विधानमें तात्पर्य है, इसलिए धर्मशब्दका इस संज्ञासूत्रसे पहले अभिधाशक्ति तथा लक्षणा-इन दोनों वृत्तियोंके न होनेपर भी [ संज्ञासूत्रके चलसे ] वेदार्थकी चिवक्षा होती है। समाधान-तो यह भी नहीं कह सकते, कारण कि ऐसा कहनेसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। [आचार्यसंज्ञाके विधानमें प्रयोजन दिखलाते हैं-]जैसे 'आचार्यको गाय देनी चाहिए' इत्यादि गोदानरूप प्रभृति दूसरे कार्योंमें नियोगकी सिद्धिके लिए आचार्यसंज्ञाका विधान किया जाता है, वैसे प्रकृतमें कोई अन्य कार्य नहीं है, जिससे कि वेदार्थकी धर्मसंज्ञा विहित हो। [अभ्युपगमवादमें भी दूषण देते हैं ]-कथश्चित् धर्मशन्दको चेदार्थका घाचक मान भी लिया जाय, तो भी सूतमें दिये गये अर्थशब्दका वैयर्थ्य, चोदनाशव्दकी सम्पृर्ण वेदमें लक्षणा तथा अधिकरणरचनाकी अनुपपचि- ये सब दोप तुम्हारे मतमें [ संज्ञासूत्र मानकर धर्मको वेदार्थकी संज्ञा माननेवालेके मतमें ] हटाये नहीं जा सकते। 'श्येन यागसे अभिचार करते हैं' इत्यादि अर्थशब्दके व्यावर्त्य होंगे [ अर्थात् वेदार्थ श्रेय.साधन होता है और शयेनयागादि आभिचारिक (मारण-उच्चाटनके साधन) कृत्य
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४५२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक २
योगात् ; अवेदार्थत्वे च धर्मशब्देनैव व्यावृत्तिसिद्धेः । सिद्धामेव व्यावृत्तिम र्थशव्दोऽनुवदतीति चेद्, न; तथा सति वैयर्थ्यतादवस्थ्यात्। वेदार्थैक- देशभूतधर्मविचारपक्षे तु श्येनादे: प्रतिषेधचोद नालक्षणस्याऽनर्थत्वेनाऽधर्मत्व- सिद्धिरर्थशब्दप्रयोजनं भविष्यति। अर्थशब्दवैयर्थ्येऽपि चोदनाशब्दस्य लक्षणापरत्वं कथमिति चेद्, उच्यते-कि चोदनातिरिक्तोऽपि कश्चिद्वेद- भागोऽस्ति उत न १ यदि नाऽस्ति तदा चोदनालक्षणोऽर्थश्चोदनार्थ इति
हैं, अय:साधन नहीं हैं], ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि उन श्येन- याग आदिमें वेदार्थत्वकी व्यावृत्ति नहीं हो सकती। तात्पर्य यह है कि इयेन- आागादि भी वेदप्रतिपादित होनेसे वेदार्थ ही मांने जायँगे। [ यदि वे वेदार्थ नहीं हैं, तो धर्म भीनहीं होंगे, क्योंकि आपके मतमें धर्म और वेदार्थ एक ही वस्तु है। इस आशयसे लिखते हैं-] श्येनयागादि यदि वेदार्थ नहीं हैं, तो धर्म- शब्दसे ही उनकी व्यावृत्ति सिद्ध हो जायगी। [इससे भी अर्थशब्द व्यर्थ ही है ] धर्मशब्दसे सिद्ध हुई व्यावृत्तिका ही अर्थशब्द अनुवाद करता है, यह मानना भी उचित नहीं है, कारण कि उसको अनुवादक माननेसे मी वैयर्थ्य- दोष तो बना ही है। [यदि अर्थशब्द उसका अनुवादक न हो तो भी धर्मज्ञानसे ही अमीष्ट व्यावृत्ति उपलब्ध ही हो जाती है। इससे अर्थपदका सार्थक्य नहीं आ सकता। ] [ सिद्धान्त पक्षमें अर्थशब्दका सार्थक्य दिखलाते हैं-वेदार्थके एकभागमात्र धर्मके ही विचारविषयक प्रथम सूत्रको मानने- वालेके पक्षमें तो प्रतिषेधात्मक प्रेरणास्वरूप श्येन आदि यागके अंनर्थक होनेसे उनमें अधर्मत्वकी सिद्धि ही अर्थशब्दका प्रयोजन होगा। [पूर्व मूलमें दिखाए गए प्रभाकरमतमें तीन दोषोंमें से प्रथम दोप-अर्थ- शब्दका वैयर्थ्य-बतलाया गया है। अब चोदनाशन्दकी सम्पूर्ण नेदमें लक्षणाका असम्भवरूप द्वितीय दोष दिखलाते हैं-] अर्थशब्दके व्यर्थ होनेपर मी सम्पूर्ण वेदमें चोदनाशब्दकी लक्षणा कैसे सिद्ध हो सकती है: [अर्थशब्दका व्यर्थ होना ही दोष नहीं है। दूसरा दोष मी म्रभाकरमतमें आता है, मीमांसक पूछता है-कैसे: वेदान्ती उत्तर देता है-] कहा जाता है, क्या चोदनासे अतिरिक्त कोई वेदका भाग है? या नहीं: यदि नहीं है, तो 'प्रेरणात्मक अर्थ प्रेरणात्मक है' ऐसा
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शास्वारम्भमें प्रभाकरके मतका खण्डन ] भाषानुंवादसहित ४५३
सूत्नार्थ: स्यात्, ततो लक्ष्यलक्षणयोरैक्यमापद्येत। अस्ति चेद् सोऽपि वेद भागोऽर्थवान्न वा १ अर्थवांश्चेत् कथ चोदनाप्रमेयोऽचोदनाभागस्याऽर्थः स्यात् : अर्थशून्यत्वेऽि चोदनार्थ: कथ सार्थकनिरर्थकमागद्वयसमुदायवेदार्थ: सात्। तस्मात् चोदनाशव्दस्य कृत्सवेदलक्षकत्वं त्वया दुर्वारम्। अधिकरणं चैवं त्वया रचनीयम्-कि वेदार्थश्चोदनालक्षणः किं वार्डर्थवादादिलक्षण इति। विशये सति नार्ऽर्थवादादिलक्षण: किन्तु चोदनालक्षण इति। सेयं रचना नुपपन्ना, वेदस्य ग्रामाण्यग्रतिपादनात् प्रगर्थवत्वस्यैवाऽनिश्चयात्। प्रथम-
सूत्रका अर्थ होगा। [क्योंकि धर्म और चोदना-दोनों पद आपके मतमें सम्पूर्ण चेदके लक्षक होनेसे पर्याय ही हो गए]। ऐसा अर्थ होनेपर लक्ष्य और लक्षणमें ऐक्य हो जायगा। [लक्ष्य और लक्षणका ऐक्य होनेसे लक्षण करना ही व्यर्थ होता है। घटका लक्षण कम्वुग्रीवादिरूप ही होता है न कि घट ही। ] यदि चोदनासे अतिरिक्त वेदभागकी सचा मानते हो, तो हम पूछते हैं कि वह अतिरिक्त वेदभाग अर्थवान् है? या निरर्थक है? यदि सार्थक है, तो चोदना-लिझधर्थ-का प्रमेय अर्थ चोदनासे भिन्न भागका अर्थ-प्रमेय-कैसे हो सकता है? [ वेदके दो भाग हैं-एक चोदनात्मक और दूसरा उससे भिन्न। इस दशामें चोदनाभागका जो अर्थ है, उसे इतरभागके अर्थसे भिन्न ही होना चाहिए, एक नहीं, अन्यथा भेद नहीं बन सकेगा।] उस इतरभागके निरर्थक माननेमें मी चोदनात्मक अर्थ सार्थक और निरर्थक दोनों वेदभागोंका अर्थ कैसे हो सकता है ? [अर्थशुन्य भागका चोदनारूप अर्थ कैसे हो सकता हैं: उसका चोदनारूप अर्थ कहना व्याघातदोपसे अस्त है । ] इसलिए तुमको-प्रभाकरमतानुयायीको-चोदनापदकी सम्पूर्ण वेदमें लक्षणा मानना दुर्वार हो जायगा। [ इस सम्पूर्ण वेदरूप अर्थमें चोदनापदकी लक्षणा करनेसे चोदना और अर्थ-इन दोनों पदोंका सार्थक्य नहीं हो सकता।] इनके अति- रिक तीसरा दोप भी दिखलाते हैं-तुमको-गुरुमतानुयायीको-अधिकरणकी रचना इस प्रकार करनी होगी-क्या वेदार्थ चोदनास्वरूप है अथवा अर्थवादादि- स्वरूप है: इस प्रकार संशय उत्पन्न होनेपर वेदार्थ अर्थवादादिस्वरूप नहीं है, किन्तु चोदना-प्रेरणा-स्वरूप है। [ इस प्रकारके निर्णयमें सूत्रका तात्पर्य होगा। ] परन्तु उक्त तात्पर्यवाली आपकी कल्पित रचना उपपन्न नहीं हो
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
सूत्रे Sध्ययन विधिप्रयु क्ताप्रामाण्यनिराकरणेऽपि पौरुषेयत्वादिप्रयु क्ताप्रामाण्य- मनिराकृतम्। अन्यथोत्तरसूत्रसन्दर्भस्य प्रामाण्यग्रतिपादकस्य वैयर्थ्यापातात्। न च दढीकरणाय पुनः प्रतिपादनमिति वाच्यम्, अदार्ढ्यशङ्काया अभा- वात्। वेदप्रामाण्यस्याऽपि वेदार्थान्तःपातित्वात् सूत्र सन्दर्भेण प्रतिपादनमिति चेद्, न; तथा सति ग्रामाण्यस्य सिद्धरूपतया वेदस्य कार्येकनिष्ठत्वहानि- प्रसङ्गात्। तर्हिं प्रथमसूत्रमेव प्रामाण्यं साधयति, नाऽन्यः सूत्रसन्दर्भ इति चेदू, न; भाष्यविरोधात। भाष्यकारो हि द्वितीयाध्यायमारभमाणो वृत्तं प्रमाणलक्षणमित्यनुवदन् प्रथमाध्यायेन वेदस्य प्रामाण्यमेव साधितं दर्शयति- किं चोदनालक्षणो वेदार्थों नार्ऽर्थवादादिलक्षण इति। अयमेव यद्यस्य सूत्र-
सकती, क्योंकि वेदके प्रामाण्यसमर्थनके पूर्व उसके समर्थक होनेका निश्चय नहीं हो सकता। यद्यपि प्रथम सूत्रमें अध्ययनविधिसे वेदके अप्रामाण्यका निरा- करण हो जाता है [ यदि वेद विवक्षितार्थ नहीं है, तो उसका अध्ययनविधान निष्प्रयोजन हो जाता है, इत्यादि अनेक युक्तियोंसे वेदके सार्थक्यका पहले ही प्रतिपादन कर आए हैं। ] तथापि पुरुषप्रणीत होनेसे प्राप्त हुआ अप्रामाण्य तो निराकृत नहीं हुआ। अन्यथा-यदि सर्वविध अप्रामाण्यका निराकरण हो गया होता-वेदोंके प्रामाण्यका प्रतिपादक द्वितीय सूत्रका सन्दर्भ व्यर्थ हो जायगा। [ वेदोंकी अध्ययनविधि द्वारा प्राप्त प्रामाण्यको ] दढ करनेके लिए ही पुनः प्रतिपादन किया गया है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि अदृढ़ होनेकी आशङ्का ही नहीं है। शङ्ा-वेदोंका प्रामाण्य भी वेदोंकी अर्थकोदिमें ही आ जाता है, इसलिए सूत्रसन्दर्भसे उसका प्रतिपादन किया गया है। समाधान-ऐसा नहीं मान सकते, कारण कि इस प्रकार माननेसे प्रामाण्य सिद्धरूप हो जायगा, अतः वेदोंका तात्पर्य केवल कार्यमें ही है, इस प्रकारके आपके सम्मत नियमकी हानिका प्रसञ्क हो जायगा। यदि कहो कि तब तो प्रथम सूत्र ही प्रामाण्यकी सिद्धि करता है, दूसरा सूत्रसन्दर्भ नहीं, तो ऐसा भी नहीं कहना चाहिए, क्योंकि ऐसा माननेमें भाष्यसे विरोध आता है। भाष्यकारने द्वितीयाध्यायको प्रारम्भ करते हुए प्रथम अध्यायसे वेदका आ्रमाण्य ही सिद्ध किया है, उसे दिखाते हैं-क्या चोदनास्वरूप ही वेदार्थ है: अर्थवादादिस्वरूप नहीं
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पूर्वमीमांसाद्वारा गतार्थ न होनेसे पक्षविचारारम्भका समर्थन] भापानुवादसहित ४५५
स्याउर्थस्तदार्ऽर्थवादमन्त्राधिकरणानारम्भः प्रसज्येत। अस्मिशेव सूत्रे मन्त्रा- र्थवाद्योर्धर्मप्रमापकत्वनिराकरणात्। स्ताचकत्वादिनाऽन्यप्रकारप्रतिपा- दनार्थस्तदधिकरणारम्भ इति चेद्, न; अत्रैव धर्मग्रमापकत्वनिराकरणे
लोचनया कार्यनिष्ठो वेदभागो विचार्यतया अ्रक्रान्तो विचारितश्च न वस्तुतख्व्रनिष्ठः । तस्मादगतार्थत्वाद्वस्तुतथ्वनिष्ठं वेदभागं विचारयितुमुत्तरमी- मांसाऽडरघव्येति सिद्धम्। * इति विवरणप्रमेयसंग्रहे प्रथमसूत्रें द्वितीयवर्णकं समाप्तम्
है? यदि यही इस सूत्रका अर्थ होगा, तो अर्थवादमन्ताधिकरणका प्रारम्भ ही न होगा, क्योंकि इसी सूत्रमें मन्त्र और अर्थवादके धर्मनिश्चायक होनेका खण्डन हो जाता है। स्तावकत्व-स्तुति करनेवाले-आदि अन्य प्रकारसे प्रतिपादन करनेके लिए उस अधिकरणका प्रयोजन है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि यहीं-इसी प्रथम सूत्रमें ही-धर्मके प्रमापक-निश्चायक-होनेका निराकरण हो जानेसे पुनः उस अधिकरणमें अर्थवाद आदिके धर्मप्रमापक हो जानेकी आशक्कासे युक्त पूर्वपक्षके उद्यका सम्भव ही नहीं हो सकता। इन युक्तियोंसे 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इस प्रथम सूत्रतथा 'चोदनालक्षणोऽर्ो धर्मः' इस द्वितीय सूत्रकी पर्यालोचनासे-सन्दर्भपूर्वक विचार करनेसे कर्ममें तात्पर्य रखनेवाले वेद- भागमें ही विचारविषयत्व प्रक्रमपाप्त है और उसीका विचार मी किया गया है, वस्तुतत्त्व-सिद्धान्त-का विचार करना पूर्वमीमांसामें प्रक्रमप्राप्त भी नहीं है और उसका उसमें विचार भी नहीं किया गया है। इसलिए पूर्व- मीमांसा द्वारा अगतार्थ होनेसे सिद्धवस्तुपरक वेदान्तवाक्योंका विचार करनेके लिए उत्तरमीमांसाका आरम्भ किया जाना चाहिए, यह सिद्ध होता है। श्री पं. ललितापरसादडबरालविरचित विवरणप्रमेयसंग्रह- भाषानुवादमें प्रथमसूत्रका द्वितीयवर्णक समाप्त।
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४५६ . [सूत्र १, वर्णक ३
अथ तृतीयं वर्णकम् एवं सूत्रस्य तात्पर्याच्छास्त्रारम्भो निरूपित: । वर्णकद्वितयेनाऽथ पदव्याख्या निरुष्यते।। तात्पर्ये निश्चिते पूर्व तन्न योजयितुं पदस्। सुशकं तेन तात्पर्यं कथितं वर्णकदये।। तृतीये वर्णके सूत्रपदव्याख्यामुखेन तम्। शास्त्रारम्भं दृढीकर्तु पदार्थोऽन विचार्यते।। अथशव्दस्य चत्वारोऽर्था वृद्धव्यवहारे प्रयोगसामर्थ्यात्प्रसिद्धाः आनन्तर्यमधिकारो मङ्गलाचरणं प्रकृतादर्थादर्थान्तरत्वं च । तत्रेतरपर्युदा- सेनाSSनन्तर्यमथशब्देनोपादीयते। तच जिज्ञासापदस्याऽवयवार्थस्वीकारे लभ्यते। तत्राऽधिकारो नाम आ्रम्भः। नहि ब्रह्मज्ञानेच्छा कर्त्तव्यतया अतिपाद्यतया वा प्रारब्धुं शक्या, इच्छाया विपयसौन्दर्यमात्रजन्यत्वात्प्रत्य- तृतीय वर्णक उक्त रीतिसे सूत्रके तात्पर्यका निश्चय कर द्वितीय वर्णकमें वेदान्तशास्त्रा- रम्भका विस्तारपूर्वक उपपादन किया गया, अब 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस सूत्रके प्रत्येक पदकी व्याख्या करेंगे। पहले सूत्रके तात्पर्यका परिज्ञान होनेपर ही उसके पदोंकी ठीक-ठीक योजना हो सकती है, इसीलिए प्रथम दो वर्णकोंसे हमने सूत्रके तात्पर्यका सविशेष निरूपण किया है। अव तृतीय वर्णकमें-जिज्ञासा- सूत्रमें कहे गये पदोंकी व्याख्या द्वारा वेदान्तशास्त्रके प्रारम्भको पुनः दढ़ करनेके लिए पदोंके अर्थोका विचार करते हैं। व्यवहारमें वृद्धोंके प्रयोगकी सामर्थ्यसे अथशब्दके चार अर्थ प्रसिद्ध हैं- आनन्तर्य, अधिकार, मङ्गलाचरण और प्रकृत अर्थसे अर्थान्तर। उक्त चार अर्थोंमें से अन्य सब अर्थोंको छोड़ कर प्रकृतमें केवल आनन्तर्य ही अथशब्दका अर्थ लेना चाहिए। और यह जिज्ञासाशब्दके अवयवार्थका अङ्गीकार करनेसे अनायास ही लब्ध होता है। [जब जिज्ञासाशब्दको अवयवार्थक अर्थात् 'ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा' इस व्युत्पचिसे ज्ञानेच्छावाचक मानेंगे, तब अथशव्दका अधिकार अर्थ हो नहीं सकता, क्योंकि] अधिकारशब्दका अर्थ है-प्रारम्भ। इच्छाका उत्पाद्यत्वरूपसे या प्रतिपाद्यत्वरूपसे हम लोग प्रारम्भ नहीं कर सकते, क्योंकि
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जिज्ञासाशन्द विचारार्थक है। भापानुवादसहित ४५७
धिकरणमग्रतिपाद्यमानत्वाच्च। ननु जिज्ञासाशव्दो विचारे रूढः । भाष्यकारादिभिस्तन्र विचार- विवक्षया प्रयुक्तत्वात्। अतो 'रूढिर्योगमपहरति' इति न्यायेनाऽचयवार्थस्वी- कारो न युक्तस्ततोऽथशब्दोऽप्यधिकाराथों भविष्यतीति विचारस्य प्रारन्धुं यक्यत्वादिति चेद, मैवम् ; रूठिरयोगमपहरतीति न्यायस्याऽन्राऽप्रसरात्। तथाहि-द्विविधा तावच्छव्दवृत्तिमुख्यामुर्यभेदात्। तत्र रूढिर्योगश्चेति दयं मुख्यम्, लक्षणा गौणवृत्तिश्चेति द्वयममुख्यम्। अवयचार्थमनपेक्ष्य वृद्धप्रयोगमात्रेण व्युत्पाद्यमाना अश्वगजादिशब्दा रूढाः। अवयवार्थद्वारा
वह केवल विपयके सौदययसे अपने-आप उत्पन्न हो जाती है एवं इस वेदान्त- झास्त्रके प्रत्येक अधिकरणमें उसका प्रतिपादन भी नहीं मिलता। शक्का-जिज्ञासाशव्द विचाररूप अर्थमें रूढ़ है, इसीसे भगवान् भाष्य- कार आदिने तत्-तत् स्थलोंमें विचाररूप अर्थकी विवक्षासे उक्त शब्दका प्रयोग किया है, अतः 'रूढिर्योगमपहरति' इस न्यायसे जिज्ञासाशव्दको अवयवार्थ- परक मानना युक्त नहीं है। इस परिस्थितिमें अथशब्द अधिकारार्थक भी हो सकता है, क्योंकि विचारका प्रत्येक अधिकरणमें प्रारम्भ है ही। समाधान-ऐसा नहीं हो सकता, कारण कि 'रूढि योगार्थका अपहार करती है' इस न्यायका यहांपर प्रसङ्ग नहीं आता, क्योंकि सुख्य और अमुख्य इस प्रकार शब्दकी दो वृत्तियां होती हैं। इनमें रूढि और योग-ये दोनों मुख्य वृत्तियाँ हैं और लक्षणा तथा गौणी-ये दोनों अमुख्य वृत्तियाँ हैं। अवयवोंके अर्थकी अपेक्षा न रखकर केवल वृद्धोंके व्यवहारमात्रसे व्युत्पादमाने अश्व-घोड़ा, गज-हाथी आदि शब्द रूढ़ कहे जाते हैं। और अवयवार्थ द्वारा विशिष्ट अर्थका अभिधान करनेवाले (१) जिज्ञासुको तत्-तत् पदोंका अर्थवोध करानेके लिए जिसका आश्रय लिया जाता है, उसको व्युत्पत्ति कहते हैं। और वे सब पद व्युत्पच्तिके विपय होनेसे व्युत्पाद्यमान होते हैं। अश्व तथा गज आदि पदोंका अर्थवोध करानेके लिए 'पचतीति पाचकः' या 'रसोई करनेवाला रमोइया' इस भाँति प्रकृति प्रत्ययार्थरूप अवयवार्थके दिखानेका सहारा नहीं लिया जाता, केचल अंगुलीका निर्देश करके दिखा दिया जाता है कि इस वस्तुको वृद्ध लोगं घोा और इसको हाथो कहते हैं। इस प्रकार वृद्धव्यवहारका ही सहारा लिया जाता हैं। इस भाँति अश्व, गज आदि शब्द वृद्धव्यवहारसे ही व्युत्पाद्यमान होते हैं।
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४५८ विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, व्णक ३
'अभिधेयाविनाभृतप्रतीतिर्लक्षणोच्यते। लक्ष्यमाणगुणैर्योगाद्ृत्तेरिष्ट तु गौणता।।' इत्युक्तत्वादभिधेयाविनाभृततीरप्रत्यायको गङ्गाशव्दो लाक्षणिक:। शौर्यादिगुणयोगाददेवदत्ते प्रयुज्यमान: सिंहशब्दो गौण: । न च पङ्कजादिशव्देपु योगरूढ्याख्या पञ्चमी शब्दवृत्तिरस्तीति शङ्कनीयम्, तत्र रूढिकल्पने प्रयोजनाभावात्। तामरसे व्यवहारवाहुल्या- चतुरानने, कमलासन आदि शव्द यौगिक कहलाते हैं। 'मुख्य अर्थके सम्बन्धकी प्रतीतिको लक्षणा कहते हैं। और गुणोंके सम्बन्धसे जहां अर्थकी प्रतीति होती है, ऐसे स्थलोंमें गौणी वृत्ति मानी जाती है'। इस अभियुक्तोंके वचनके अनुसार मुख्य-प्रवाहरूप-अर्थसे नित्य सम्वन्ध रखनेवाले तीरकी प्रतीति करानेवाले 'गङ्गायां घोष:' इस प्रयोगमें गङ्गाशब्द लाक्षणिक है और [ 'सिंहो देवदत्तः' इस प्रयोगमें ] शौर्य आदि गुणोंके सम्बन्धसे देवदत नामक पुरुषरूप अर्थमें प्रयोग किया गया सिंहशब्द गौण है। पङ्कजादिशन्दोंमें योगरूढिनामक पांचवीं शब्दवृत्ति माननेकी शक्का नहीं करनी चाहिए, कारण कि पङ्कजादि स्थलमें रूढि माननेका कोई प्रयोजन नहीं है। तामरसे अर्थात् सूर्यविकासी कमलसामान्यमें ही पङ्कजपदका अधिक प्रयोग होता है, इससे उत्पलें आदि-कमलविशेषकी व्यावृत्ति सिद्ध हो जायगी। और (१) चत्वारि आननानि यस्य, अर्थात् चार मुख जिसके हैं, इस बहुव्रीहि समासके चलसे 'चतुर' और 'आानन' दोनों अवयवोंका 'चार' और 'मुख' अर्थको लेते हुए विशिष्ट ब्रह्माका वोध हुआ, एवं कमल और आसन इन अवयवोंसे वने हुए कमलासन पदमें मी समझना चाहिए।
अर्थ है। (२) यहांपर अविनाभाव पदका व्याप्तिरूप विशिष्ट सम्बन्ध नहीं है, किन्तु सम्बन्मात्र
(३) पङ्चजका अवयवार्थ है, जो कीचड़में पैदा हो। कीचढ़में तो सेवाल आदि भी होते हैं। परन्तु पङ्कज केवल कमलको ही कहते हैं। यह नियन्त्रण रूढ़िने किया और स्थलकमल भी पङ्ढज नहीं कहा जा सकता, यह नियम योगाथने किया। इस प्रकार पङ्कजादि शब्दोंमें योग और रूढि दोनोंसे मिश्रित पांचवीं वृत्ति मानी जाती है। () 'पङ्करहं तामरसंम्' इत्यादि अमरकोशमें पङ्चजका पर्याय पङ्करुह सूर्यविकासी कमल- सामान्यके नामोंमें आया है। (५) 'स्यादुत्पलं कुवलयम्' इस अमरकोशसे चन्द्रविकासी कमलको उत्पल कहते हैं। और कभी कमी नीलादि विशेषण देनेसे या प्रसिद्धिसे नीलकमलको उत्पल कहते हैं। .
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जिजोसाशन्द विचारार्थक है। भापानुवादसहित
दप्युत्पलादिव्यावृत्तिसिद्धेः। दश्यते ह्यनेकार्थस्याऽपि गोशव्दस्य प्रयोग- बाहुल्यात् सास्रादिमन्रक्तो प्रथमप्रतिपत्तिः। ततश्चतस्र एव शब्दवृत्तयः। तत्र य: शब्द एकत्राडयें स्ढोऽपरत्र यौगिको यथा छागे रूढोडजशब्द आत्मनि यौगिकस्तत्राऽजं पश्चेत्युक्ते रूढिर्योगमपहरतीति न्यायः प्रसरति। इह तु जिज्ञासाशव्दो न विचारे रुढः। ज्ञानेच्छालक्षणाद्यौगिकार्थाद्विचार- स्याऽत्यन्तपार्थक्याभावात्। नहि ज्ञानेच्छामात्रं जिज्ञासाशब्दार्थ:, किन्तु विचारसाध्यज्ञानविपयेच्छा। ज्ञानं खल्विष्यमाणं विषयेण सहाऽवगतमिष्यते, अनवगते विपये इच्छायोगाद।
देखा मी जाता है कि गोशब्दके अनेके अर्थ हैं, परन्तु गोशव्दसे श्रवण करते ही [प्रकरण आदि अर्थनिश्चायकोंकी अपेक्षाके बिना ही ] गलकम्वल और लम्बी पूँछ आदिसे युक्त चतुप्पाद पशु 'गौ' रूप ही अर्थका योध होता है। कारण कि उक्त पशु गाय या चैलके वोध करानेमें ही गौ शब्दका अधिक प्रयोग होता है। [अतः पर्रजपद मी अधिक प्रयोग होनेसे कुवलय आदिका व्यावृत्ति करा देगा, इसके लिए पांचवीं वृत्ति मानना व्यर्थ है ] इस कारण शव्दकी चार ही वृत्तियाँ हैं। ऐसी दशामें जो शब्द एक अर्थमें रूढ्व है और दूसरे अर्थमें यौगिक है, जैसे अजशब्द बकरारूप अर्थमें रूढ है और वही अज शव्द आत्मामें ('न जायते' जिसका जन्म नहीं होता, योग द्वारा) यौगिक है, ऐसे स्थलमें 'अजको देखो' ऐसा वाक्य कहनेसे 'रूढि योगका अपहार करती है' इस न्यायका अवसर आता है। प्रकृतमें जिज्ञासापद विचाररूप अर्थमें रूढ [केवल वृद्धत्यवहारव्युत्पाद्य] नहीं है। ज्ानकी इच्छारूप यौगिक अर्थकी अपेक्षा विचाररूप अर्थ अत्यन्त भिन्न नहीं है [ अर्थात् ज्ञानकी इच्छा और विचार-ये दोनों रात-दिनकी गाँति परस्पर भिन्नार्थ नहीं हैं] कारण कि ज्ञानकी केवल इच्छा यहांपर जिक्षासापदका अर्थ नहीं है, किन्तु विचारसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानके विपयकी इच्छा है, क्योंकि इच्छाके विपय-अमीष्ट-ज्ञानको उसके विपयके साथ ही जानना इष्ट है। ज्ञानके विषयके ज्ञात न होनेपर इच्छाका होना सम्भव नहीं है।
(१) "गौ: स्वर्गे च चलीवर्दे रश्मी च कुलिशे पुमान्। स्री सौरमेयी दग्वाणदिग्याग्भूप्वप्सु भूम्रि च।"
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४६० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ३
ततश्च प्तिपन्ने वस्तुनि व्ञानमिष्यमाणं संदिग्धे निश्चयफलं परोक्षेऽपरोक्षफलं वैष्यते। तच्चोभयं प्रमाणादिविचारप्रयत्नसाध्यमिति प्रतिपन्ने वस्तुनि विशिष्टज्ञानमिष्यमाणमविनाभावेन प्रमाणादिविचारं गमयति। ततो भाष्यकारादिभिर्जिज्ञासाशब्दो लक्षणया विचारे प्रयुक्तो न तु रूढ्या, येनाऽत्रोक्तन्याय: प्रसरेत्। नतु शब्दत इच्छाया: प्राधान्येपि नेच्छामात्रं सूत्रेण प्रतिपाद्यते, अयोजनाभावात् किन्तु इष्यमाणज्ञानप्रदर्शनमुखेन तत्साधनं विचारमन्त- रणीतश्षुतिमुपलक्ष्य स एव तात्पर्येण प्रतिपाद्यते। अतोऽर्थंतः प्रधानानां
ज्ञात वस्तुके ज्ञानकी इच्छाका प्रयोजन दिखलाते हैं-ज्ञात हुई वस्तुमें जानकी इच्छा होना सन्देहस्थलमें निश्चयात्मक ज्ञानरूप फलके लिए है और परोक्षस्थलमें साक्षात्काररूप फलके लिए है। ये दोनों फल प्रमाण आदि विचारविषयक प्रयत्नसे ही सिद्ध हो सकते हैं, इस रीतिसे ज्ञात वस्तुमें इच्छाका विषय हुआ विशिष्ट ज्ञान अविनाभाव द्वारा प्रमाण आदिके विचारका बोध कराता है। इसलिए भाष्यकारादिने जिज्ञासा शब्दका लक्षणाके द्वारा विचाररूप अर्थमें प्रयोग किया है, रूढिके द्वारा नहीं, जिससे उक्त 'रूढि योगार्थका अपहार करती है' न्यायका अवसर आ सके। शक्का-शब्द द्वारा इच्छाका प्राधान्य होनेपर भी इच्छाका ही सूत्रसे प्रतिपादन नहीं किया गया है, क्योंकि इसमें कोई प्रयोजन नहीं है, किन्तु इच्छाके विषयभूत ज्ञानके द्वारा उस ज्ञानके साधनीभूत अन्तर्णीत विचारको उपलक्ष्य करके उसीका तात्पर्य द्वारा प्रतिपादन किया जाता है। इसलिए अर्थसे माप मधानीमृत विचार, ज्ञान और न्रह्म इनमें से किसी भी एकके प्तिपादनमें
इस मेंदनी कोशके अनुसार गो शब्दके अर्थ स्वर्ग, वैल, किरण, चज्र, गाय, दृष्टि, चाण, दिशां, वाणी, पृथ्वी, जल ग्यारह है। इनमें प्रथम अर्थोंमें पुछ्रिद्न हैं और शेषमें स्त्रीलिन। (:) प्रकृति और प्रत्ययार्थमें प्रत्ययार्थका ही प्राधान्य होता है, इस व्युत्पत्तिके वलसे जिज्ञासापदमें इच्छाको ही शान्दप्राधाम्य है। (१) आपाततः ज्ञात न्रह्मके ज्ञानकी इच्छा निश्चयरूप या साक्षात्काररूप फलके लिए होती हुई प्रमाणादि विचारमें पर्यवसित होती है, अतः जिज्ञासापदसे शब्दतः विचारका बोध न होवे हुए भी अर्थेतः विचारका बोध होता है। अतः विचाररूप अर्थ जिज्ञासापदसे अन्तर्गीत गृहीत है।
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अथशब्दार्थविचार ] भांपानुनादसहित ४६१
विचारज्ञानत्रह्मणामन्यतमस्य तात्पर्येण प्रतिपाद्यस्याऽऽरम्भायाऽथशब्द इति चेद; मैवम्। तथा सत्यथशव्देनाSSनन्तर्याभिधानमुखेन शास्त्रीयसाधनचतु- ष्टयसंपन्नस्याऽधिकारिविशेपस्य न्यायतः समर्पणाभावात् कर्त्तव्यतया विधीय- मानो विचारो निरधिकारोऽननुष्ठेयः स्यात्। न च विचारविविरेव विश्व- (सूत्रका) तात्पर्य मानकर [सूत्रमें ] आरम्भवाची अथशब्द है। [ यद्यपि जिज्ञासापदसे शब्दतः इच्छाका प्राधान्य है, उसका अधिकारप्रारम्भ सम्भव नहीं, तथापि अर्थतः विचारादिका ही प्राधान्य है, इसलिए अर्थतः प्रधान विचारका प्रारम्भ करना सम्भव है और विचारादिका प्रतिपादन प्रत्येक अधिकरणमें किया भी गया है, यह तात्पर्य है ]। समाधान-ऐसा मानना उचित नहीं है, कारण कि अथशब्दका आपका सम्मत अधिकाररूप अर्थ माना जाय, तो अथशब्द द्वारा आनन्तर्यरूप अर्थका बोधन करनेसे शास्त्रपतिपादिते साधनचतुष्टयकी सम्पत्ति-उत्कर्ष- युक्त अिकारिविशेषका न्यायसे [शब्दार्थ द्वारा ] बोध नहीं हो सकता। इसलिए कर्तव्य मानकर विहित विचार अधिकारके बिना अनुष्ठानके योग्य नहीं हो सकता। [हमारे मतमें अथशब्दसे आनन्तर्यरूप अर्थमें तात्पर्यका प्रतिपादन करनेसे शम, दम आदि साधनचतुष्टयसम्पन्न ही विचारका अधिकारी है, यह प्रतिपादित होता है। अतः अधिकारयुक्तके लिए ही विहितका अनुष्ठान संगत होता है। ] यह भी
(१) 'नित्यानित्यविचेक:, इहामुन्नार्थभोगविरागः, शमदमादिसाधनसंपत्, मुमुक्षुत्ं च' नित्य-आत्मा-अनित्य देहेन्द्रियादि विषय अर्थात् दृदय, इनका तथा इनके धर्मोंका विचेकज्ञान। इस लोक्में तथा परलोकमें भी प्राप्य विषयभोगसे विरक्ति। शम-विरकतिका मूल साधन मनका विजय है, जिससे पाप-पुण्योंकी उत्पन्न करनेवाली फलभावनासे होनेवाली प्रवृत्तियां शान्त हो जाती हैं। इसके कारण ही पुरुष जितेन्द्रिय तथा वशी कहलाता है। और चक्षमें आये हुए मनकी सूक्षमातिसूक्ष्म आत्मतत्त्वके साक्षात्कार करनेमें योग्यता प्राप्त करना दम है। आवि पनसे विपयोंसे जनित सुम, दुःस, शीत, उप्ण आदि वन्द्ोंसे उद्देग न होना तितिक्षा है, जैसे कि भगवान्ने गीतामें कहा है 'मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोण्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽ- नित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ।I' तथा वैराग्य, भोगेच्छासे विमुखता एवम् न्रहाततत्वमें श्रद्धा रखना, श्रुति कहती है 'तस्माच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षः श्रद्धावित्तो भूत्वाSडतमन्येवाSSत्मानं पश्येत, 'सर्वमात्मनि पक्ष्ति' और गोक्षकी इच्छा करना। इन चारोंके उत्कर्पवालेको ही श्रान अधिकारी कहता है।
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४६२ विंवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक ३
जिन्न्यायेनाSधिकारिविशेषं कल्पयित्वा पवृत्तिपर्यन्तो भविष्यति किमानन्त- यर्रनाऽथशव्देनेति वाच्यम्, कर्त्तव्यतयाजवगतो विचारः प्रारम्भमर्थाद्गम- यति किं विचारप्रारम्भार्थेनाऽथशव्देनेत्यपि सुवचत्वात्। तर्हिं विधिसामर्थ्या- दुभयप्रास्तौ कस्तत्र निर्णय इति चेद्; विध्यपेक्षितोपाधित्वादानन्तर्याभिधा- नमुखेनाऽधिकारिसमर्पणमेव युक्तमिति ब्रूमः । यद्यथशब्देन विशिष्टाधिकारिणं मुखतोऽसमर्प्य विश्वजिन्न्यायेन तं कल्पयसि तदा विचारविध्यन्यथा- नुपपच्या सामान्यतस्त्रैवर्णिकाधिकारं अ्रसक्त्तं कृत्वा पुनस्तन्निपेधेन मोक्ष- कामाधिकार: कल्पनीय इति गौरवं स्यात्। ततो वरमथशब्देनैव विशि- ष्टाधिकारिसमर्पणम्।
कहना संगत नहीं होता कि विचारका विधान करना ही विश्वजिन्न्यायसे अधिकारि- विशेषकी कल्पना करके स्वयं प्रवृत्तिपरक हो जायगा। इसके लिए अथ शब्दको आनन्तर्यार्थक माननेकी आवश्यकता ही क्या है ? कारण कि कर्तव्यरूपसे समझा गया विचार-विवेक-प्रारम्भरूप अर्थका अर्थात् बोध करा देता है। मारम्भार्थक अथशब्द रखनेकी आवश्यकता ही क्या है ? प्रतिवादीका ऐसा भी कहना सरल और सम्भव है। यदि विधिसामर्थ्यसे प्रवृत्ति-अनुष्ठान- और विचारविधिसामर्थ्यसे ही प्रारम्भरूप अर्थ दोनों सम्भव हैं, तो इनमें से किस अर्थका निर्णय किया जाय, ऐसी शङ्का होती है। उत्रमें कहेंगे कि विधिसे अपेक्षित उपाधि-हेतु-बलसे आनन्तर्यरूप अर्थका वोध करा कर अधिकारीका उपस्थान करना ही युक्तिसङ्गत है।
विपक्षमें वाधक दिखलाते हैं-यदि अथशब्द द्वारा साक्षात् विशिष्ट- सांधनचतुष्टयसम्पन्न-अधिकारीका समर्पण न करके विश्वजिन्नया य से अिािकी कल्पना करो, तो विचारविधिकी अन्यथा अनुपपतिसे सामान्यतः तीन- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य-वर्णोंके अधिकारकी प्रसक्ति करनेके अनन्तर [अति- प्रसङ्गका वारण करनेके लिए ] निषेध वचन करना होगा, मोक्षकी इच्छा रखने- वालेको ही वेदान्तविचारमें अधिकारकी कल्पना करनी होगी, इस प्रकार गौरव होगा। इसलिए-उक्त गौरवसे छुंटकारा पानेके लिए-अथशबंदसे ही विशिष्ट अधिकारीका समर्पण करना उचित है।
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जानन्तयारिक-अथशब्दोपयोग ] भापानुवादसहित ४६३
ननु विधिग्रतिपत्तिविशिष्टाधिकारिप्रतिपत्योः कालभेदे सत्युक्तदोपो भवति। नेह कालभेदः । किन्तु रात्रिसत्रन्यायेनाऽर्थवादगतं मोक्ष ब्रह्मज्ञानं वा फलत्वेन परिणमथ्य मोक्षकामो न्रह्मज्ञानकामो वा विचारयेदिति विधिप्रतिपत्तिसमयेऽधिकारिविशिष्टविधि: ग्रतीयते; ततो न प्रसज्य- प्रतिपेघरूपं गौरवमिति चेत्, तत्रेदं वक्तव्यम्-किं विशिष्टाधिकारं विचार- शास्त्रम् उत त्रैवर्णिकमान्राधिकारमिति! आद्ये ग्रतीतो विधिरुत्सर्ग- तस्त्रैवर्णिकसम्बन्धी पश्चादर्थवादवलात् त्रैवर्णिक विशेपमोक्षकामसम्वन्धीति शक्का-विधिके बोध और विशिष्ट अधिकारीके बोधमें जहां कालभेद होता है [ अर्थात् दोनों भिन्न-भिन्न कालमें होते हैं ] वहींपर उक्त गौरवरूप दोष आाता है। प्रकृतमें कोई कालमेद नहीं है, किन्तु रात्रिसत्रन्यायसे अर्थवादसे अवगत मोक्ष या न्रद्मज्ञानका फलरूपसे परिणाम करके (अर्थात् फल मानकर) मोक्षकी कामनावाले अथवा व्र्मज्ञानार्थीको विचार करना चाहिए, ऐसा विधि- ज्ञानकालमें ही अधिकारिविशिष्ट विधिका ही बोध होता है [ निरधिकार विधिका बोध नहीं होता । ] इससे (त्रैवर्णिकके अधिकारकी प्रसकतिका निषेधात्मक) प्रसज्य प्रतिषेधरूप गौरव आनेका अवसर नहीं आता। समाधान-ऐसा नहीं, कारण कि इसमें हमको कहना है कि विचार- शास्त्रमें विशिष्टका ही अधिकार है ? अथवा तीनों वर्णमात्रका ही अधिकार है: यदि दोनों विकल्पोंमें प्रथम विकल्प माना जाय, तो सूत्र द्वारा प्रतीत हुआ विधान सामान्यतः (वेदाधिकारी होनेसे) तीनों वर्णोंके लिए है, ऐसा प्रतीत होनेके अनन्तर अर्थवादकी साम्थ्यसे तीनों व्णोंमें विशिष्ट व्यक्ति जो (१) रात्रिसत्रन्याय 'प्रतितिप्ठन्ति ह वा एतेयएता रात्रीरुपयन्ति' इस रात्रिसत्र-'आयु- ज्योतिः इत्यानि वाक्योंसे प्रतिपादित सोमयागविशेषके प्रतिपादक वाक्यमें 'अमुक इच्छासे करे' ऐसा अधिकारका श्रवण नहीं है, इसलिए अविशेपरूपसे स्वर्ग सवका ही अभीष होनेसे स्वर्गकामीका अधिकार निःसन्देह प्राप्त होता है, अन्यथा विधिवयर्थ्य होता है। वाक्यशेष द्वारा फलकल्पना सन्देहस्थलमें मानी जाती है, 'प्रतिष्ठन्ति' पद्धुति भी लक्षणाके द्वारा स्वर्ग- परक ही हैं, इस पूर्वपक्षके उत्तरमें जैमनि अधिकरणमालाके चतुर्थ अध्यायके 'फलमान्रेयो निर्देशादश्ुती ह्यनुमानं स्यात्' १८ वं सूत्रसे निर्णय किया गया कि 'प्रतितिष्ठन्ति' पदश्नुतिसे प्रतिष्ठा- कामका ही अधिकार क्रुतिसिद्ध है। श्रुतिसिद्ध न होनेसे ही अश्ुतका अनुमान होता है। एवम् श्रीत प्रतिष्ठारूप फलसे ही विधि चरितार्थ हो जाती है। चैसे ही प्रकृतमें अर्थवाद गत श्रीत फल मानना उचित है।
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४६४ विवरणप्रभेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
कालमेदेन प्रतिपत्तेरुक्तदोपो दुर्वारः। ननु त्वत्पक्षेऽपि विधिवलात् सर्वा- धिकारप्रसक्तावथशब्देन विशिष्टाधिकारिसमर्पणात् प्रसज्यप्रतिषेधो दुर्वार इति चेद्, न; श्रवणविधिप्रकरणपठितस्यैव साधनचतुष्टयसंपन्नाधिकारिणोड- थशव्देन न्यायतः समर्पणात् । द्वितीयेऽपि किं फलतः सर्वाधिकारं शास्त्रं किं वा विधित :? नाऽडद्यसर्वपां बराज्ञानलक्षणफलार्थित्वाभावात्। न च वस्तुसुखसाक्षात्काररूपे ब्रह्मज्ञाने किमित्यर्थित्वाभाव इति वाच्यम्, मोक्षार्थी है, उसके ही लिए हैं, ऐसा माननेसे प्रतिपत्तिमें कालमेद आ जाता है अतः उक्त दोष नहीं हटाया जा सकता। शक्का-अथशब्दको आनन्तयर्थक माननेवाले के मतमें भी विधानकी साम्थ्यसे सबका ही (अधिकारिमात्रका) अधिकार प्रसक्त होनेपर अथशब्द द्वारा विशिष्ट (मोक्षार्थी) अधिकारीका समर्पण होता है। समाधान-मेरे मतमें यह दोष नहीं आता, कारण कि श्रवणविधिमें पढ़े गयें साधनचतुष्टयसे युक्त अधिकारीका ही अथशब्द द्वारा न्यायत समर्पण किया जाता है। संकुचिताधिकारयुक्तका ही विधानअथशब्द प्रतीत कराता है, प्रसक्तका निषेध नहीं कराता। द्वितीय कल्प माननेमें भी विकल्पोंका उदय होगा कि क्या फलके द्वारा शासत्रमें सबका ही अधिकार कहते हो? विचारशास्त्रका ब्रह्मज्ञान या मोक्षरूप फल है, इसके लिए सभी विचारशास्रके अधिकारी होंगे? अथवा विधिसामर्थ्यसे? (विधान ही स्वयं सबका अधिकार कहता हैं?) इनमें प्रथम कल्प नहीं हो सकता, कारण कि सभी ब्रह्मज्ञानरूप फलकी चाह नहीं रखते हैं। वस्तुभूतमें वस्तु पदका देना विशेष अर्थका साघक नहीं, अथवा वस्तुतः पाठ उचित मालूम होता है। (वास्तविक) सुखके साक्षात्कार- स्वरूप ब्रह्मज्ञानकी इच्छा नहीं होती, ऐसा क्या असंगत कहा जाता है ? अर्थात् सुखको कौन नहीं चाहता? ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि साधारण लोगोंकी दृष्टिमें ब्रह्मज्ञान पुरुषार्थ नहीं है, इसलिए उसकी इच्छा सर्व- साधारणको नहीं हो सकती। (ब्रह्मज्ञानको पुरुषार्थ न माननेका उप- पादन करते हैं-यह निश्चित है कि ब्रह्मज्ञानसे मनका (मनोवृत्तियोंका) विलय हो जाता है, जिसके कारण सम्पूर्ण विषयोंके सम्पर्क (इच्छामें
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ज्ानन्तयर्थिक-अथशब्दोपयोग। मापानुवादसहित ४६५
ब्रह्मज्ञानाद्धि मनसोऽपि वियोगानिखिलविपयानुपङ्गनिधृत्तिः श्रूयते। सा च सार्वभौमोपक्रमं नक्षलोकावसानमुत्कृष्टोत्कृष्टसुखं श्रूथमाणं सोपायं निवर्तयति; अतो त्रह्मज्ञानमपुमर्थः, उत्कृष्टसुखनिवर्तकत्वाद्, व्याध्यादि- वत्, इति मन्वानो लोको न ब्रह्मज्ञानमर्थयते, प्रत्युत तस्मादुद्विजते। ब्रह्म- ज्ञानं पुमर्थ:, निरतिशयानन्दहेत्वात्, धर्मवत्। सद्धेतुत्वं च श्रुतिसिद्धमिति चेद, एवमपि दष्टानन्दोपायान् विपयान् परित्यव्य श्रुतानन्दसाधने ब्रह्मज्ञाने पेक्षा न युक्ता। तदुक्तम्- 'अथाऽडनन्दः श्रुतः साक्षान्मानेनाऽविषयीकृतः। दृष्टानन्दाभिलापं स न मन्दीकर्तुमप्यलम् ।।' इति॥
माना) की निवृत्ति हो जाती है। और वह विषयाभिलाषाकी निवृत्ि अतिशय सुखवाले सार्वमौमसे-भूलोकके साम्राज्यसे-लेकर ब्रह्मलोक तककी इच्छाकी उपायसहित निवृत्ति करा देती है। [अर्थात् जब मनका विलय होनेसे सम्पूर्ण विपयोंका अनुपज्ञ ही निवृत्त हो जाता है तब किसी सुखमात्रा तक पहुँचानेवाले विषयकी प्राप्तिके उपायका अन्वेषण करना नहीं बनता।] इसलिए 'ब्रह्मज्ञान पुरुपार्थ नहीं है, उत्कृष्ट सुखका निवर्तक होनेसे, व्याधि-रोग- आदिके समान। [जैसे रोग सब प्रकारके सुखोंका निवर्तक होनेसे पुरुषार्थ नहीं है वैसे ही ब्रह्मज्ञान भी पुरुषार्थ नहीं हो सकता। ] इस प्रकार सिद्धान्त मानकर सर्वसाधारण लोग ब्रक्मज्ञानको नहीं चाहते, प्रत्युत-उसके विपरीत-उससे भय खाते हैं। उक्त अनुमानके प्रतिकूल ब्रह्मज्ञान पुरुषार्थ है, सबसे उत्कृष्ट आनन्दका कारण होनेसे, धर्मके समान, ऐसा अनुमान करेंगे, व्रह्मज्ञान उत्कृष्ट सुखका कारण है, यह 'तरति शोकमात्मवित्' (आत्मज्ञानी शोकको पार कर जाता है) इस श्रुतिसे ही सिद्ध है; यदि ऐसा कहो तो, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले आनन्ददायक विषयोंको छोड़कर शब्द द्वारा जाने हुए-सुने हुए -- आनन्ददायक ब्हाज्ञानमें निश्चयात्मिका बुद्धिका होना युक्तिसअत नहीं है। कहा भी गया है- 'किसी अन्य प्रमाणका विषय न होनेवाला श्रुत आनन्द प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले आनन्दका बाध करनेमें तो क्या न्युन करनेमें भी समर्थ नहीं है।' शङ्का-सम्पूर्ण विषयोंके सम्पर्कसे होनेवाला आनन्द भी ब्रह्मज्ञानसे ही ५९
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४६६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूभ १, वर्णक ३
नतु निखिलविपयानुपङ्गसाध्य आनन्दो ब्रह्मज्ञानादेव सिध्यतीति नित्यतुप्ये विषयपरित्यागेन ब्रह्मज्ञानमपेक्ष्यतामिति चेत्, न पामराणां विपयविच्छेदिकायां तृप्तावप्युद्वेगदर्शनात्। तथा च मूर्खा वदन्ति-अहो कष्ट किमिति सृष्टिरेवं न वभूव यत्सर्वदैव भोक्तुं सामर्थ्यमतृपिर्योग्यानां चाऽक्षय इति। मोक्षम्तु विषयसुखलेशमपे नार्डर्हतीति तेपामभिमान: । तथा च रागिगीतमुदाहरन्ति-
सिद्ध होता है, [पहले मझ्जलाचरणमें ग्रन्थकार कह आये हैं कि 'स्वमात्रयानन्दय- दत्र जन्तून्' अर्थात् विषयानन्दमें मी व्रह्मानन्दकी ही मात्रा है। श्रुति भी कहती है-उसकी ही आनन्दमात्राके सहारे अन्यन्न भी आनन्द है। अतः मूल आनन्दके ज्ञानसे नित्य आनन्द अर्थात् पूर्ण तृप्ति होती है] अतः नित्य तृप्षिके लिए विषयका परित्याग कर ब्रह्मज्ञानकी ही अपेक्षा करो। समाधान-ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि सर्वसाधारण अविवेकी पुरुषोंको तृप्ति होनेपर विषयका विनाश होनेसे, उद्वेग-विकलता- अर्थात् अरुचि देखी जाती है। [ विवेकशून्योंका व्यवहार दिखलाते हैं-] मूर्ख-विचाररहित-पुरुप कहा करते हैं कि अहो? बड़ा दुःख है कि सृष्टि ऐसी क्यों नहीं हुई कि भोग करनेकी सामर्थ्य सदैव वनी रहती और अतृप्ति तथा भोग करनेकी सामग्रीका विनाश न होता। [विषयाभिलापी लोगोंको सक, वनिता आदि विषय रहते हुए भी वार्द्धक्य अथवा रोगादिके कारण सामथ्यके क्षीण होनेपर पश्चात्ताप होता है कि विधाताने यह क्या किया कि हमारी भोगशक्ति पूर्ववत् न रही, अब् हमारे ये विषय किस कामके हैं ? एवं भोगसामर्थ्य भी है और भोग भी है, परन्तु भोगके अनन्तर ही क्षणिक तृक्ति हो जाने के कारण तुरत अरुचि हो जानेसे खेद होता है कि अतृप्ति ही वनी रहती, तो ऐसा सुन्दर विषय क्यों छोड़ा जाता ! बराबर ही भोग किया करते तथा क्षणान्तरमें पुनः अतृप्त हो जानेसे भोगा- भिलाषमें प्रवृत्त हुए प्राणीने देखा तो विषय ही समाप्त। बस, सृष्टिके इन तीनों गुणोंसे भिन्न होनेके लिए विषयियोंका पूर्वोक्त आक्ोश है। ] मोक्ष तो विषय- सुखके अंशको भी नहीं पा सकता, इस प्रकार उनका अभिमान है। इस अभि- प्रायसे रागियोंके. गीतका उदाहरण देते हैं-
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अनन्तपार्थक-अथशव्दोपयोग] भापानुवादसाहितं
'अपि वृन्दावने शून्ये शृगालत्वं स इच्छति । न तु निर्विषयं मोक्ष कदाचिद्पि गौतम ! ॥' इति। रनन्वस्तु तहिं विधितः सर्वाधिकारं शास्त्रमिति द्वितीय: पक्ष: । ष्टफलो ह्वयमध्ययनविधिर्यातदर्थाववोधं व्याप्रियमाणः फलनिष्पत्ये विचारमप्यनुष्ठापयति। तथा चाऽध्ययनविधेस्त्रैवर्णिकाधिकारत्वात् तत्पयो- जनस्य विचारस्याऽपि तथात्वं युक्तम्। यद्यपि न विचारोऽ्ययनविधे- विपयः, पाठमात्रस्यैव धात्वर्थत्वाद्। नाऽपि तदुपकारी, विचारमन्तरेणाऽपि पाठनिष्यत्ते :; तथाऽपि अध्ययनविधे: फलपर्यन्तत्वसिद्धये विचारस्य तदि- धिप्रयोज्यत्वं भविष्यति। यथा 'ब्रीहीनवहन्त्ि' इत्यत्र सकृदवधातमात्रेण
हे गौतम ! वह विपयरागी पुरुष शून्य वृन्दावनके जंगलोंमें सियार होना चाहता है, परन्तु विपयहीन मोक्षको कभी भी नहीं चाहता। शक्का-यदि प्रथम पक्ष-मोक्ष या बहज्ञानरूप फलके कारण विचार- शासत्रमें सवका अधिकार मानना-युक्तिसअत न हो, तो द्वितीय पक्ष-विधि- साम्थ्यसे ही सचका अधिकार प्राप्त होना-मानो, क्योंकि अर्थज्ञान- रूप फलवाला अध्ययनविधान अर्थज्ञान कराने तक अपना व्यापार करता हुआ 'न्ह्मज्ञान या मोक्षरूप' फलकी सिद्धिके लिए विचारका भी अनुष्ठान करा देता है। इसलिए अध्ययनविधिमें तीनों वर्णोंका अधिकार होनेसे विचार- शास्त्रमें भी सभी अधिकारियोंका अधिकार प्राप्त होना युक्तिसंगत होता है। यद्यपि विचार न अध्ययनका विषय है, क्योंकि पढ़ना-पाठमात्र करना- ही 'इड् अध्ययने' धातुका अर्थ है, और न उसका-पढ़नेका-उंपकारी ही है, क्योंकि विचार किए बिना भी पाठ हो सकता है; तथापि अध्ययनविधानकी फलपर्यन्त सिद्धिके लिए विचार अध्ययनविधिका प्रयोज्य मांना ही जायगा। [ तात्पर्य यह है कि यदि अध्ययनसे ब्रह्मज्ञान या मोक्ष न होगा, तो अध्ययन व्यर्थ हो जायगा और न्रह्मज्ञान तभी हो सकता है, जब विचार किया जाय, इसलिए अध्ययनको सफल करनेके लिए अध्ययनविधान ही विचारकी भी सिद्धि करेगा।] जैसे 'ब्रीहियोंका-धानोंका-अवघात करना चाहिए' इस विधानमें केवल एकवार ही मूसलका आघात कर देनेसे विधिके चरितार्थ होनेपर भी चावलोंकी सिद्धिरूप फंल पानेके लिए अवि:
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विवरणप्रमेयसंगरह [सूंम १; वर्णक ३
विध्युपपत्तावपि तन्दुलनिष्पत्तिलक्षणफलसिध्धर्थमविहितस्य विहितानु- पकारस्याऽप्यवघातपौनःपुन्यस्य विधिप्रयोज्यत्वं तद्वत्। तस्मात् विचार- साध्यार्थनिश्चयफलाद्ध्ययनविधेः शास्त्रं सर्वाधिकारं आप्तमिति। नैत- त्सारम् किमर्थज्ञानमध्ययनस्य दष्टफलमन्वयव्यतिरेकसिद्धम्, उत तदुद्देशेन विधानात् शास्त्रीयम्, किंवा विधेः प्रयोजनपर्यन्ततासामर्थ्येन लस्यम् : आद्येऽपि न तावदर्थनिश्चयोऽ्ययनफलम्, केवलादध्ययनादा- वृत्तिसहिताद्वा निश्चयानुदयात् । विचारेण तदुदये विचारस्यैव फलं स्याद् नाऽध्ययनस्य। यद्यर्थस्याऽडपातदर्शनमध्ययनफलं न तदा विचारस्य तत्प्रयोज्यत्वम् , साङ्गवेदाध्ययनादेव तत्सिङ्धेः। नन्वस्तु तर्हि विधिवलाच्छास्त्रीयमिति द्वितीयः पक्षः। तथाहि- हिंते तथा अनुपकारी भी मुसलाघातोंका वरावर करते रहना अवधातविघिसे ही सिद्ध होता हैं वैसे ही प्रकृतमें भी विचार अध्ययनविधिसे प्रयोज्य होता है, इंसलिए विचारसाध्य अर्थनिश्रय-व्रह्मज्ञान-रूप फलके कारण विचांरशास्त्रमें तीनों वर्णोंका अधिकार प्राप्त होता है। समाधान-उक्त कथनमें कोई सार-तत्त्व-नहीं है। क्या अध्ययनका अर्थज्ञानरूप दष्ट फल अन्वय-व्यतिरेकसे सिद्ध है: अथवा अर्थज्ञानके उद्देश्यसे अध्ययनका विधान होनेसे शार्रसे सिद्ध है ? या विधानकी प्रयोजन- पर्यन्त सामर्थ्य होनेसे वह [ अर्थज्ञानका हष्ट फल ] सिद्ध होता है? प्रथम पक्ष माननेमें भी अध्ययनका अर्थनिश्रयरूप फल नहीं हो सकता, कारण कि केवल पढ़नेसे या बार-वार आवृत्ति करनेसे ही अर्थके निश्चयका उदय नहीं हो पाता। विचारके द्वारा उसका [ अर्थनिश्चयका ] उदय होता है, इंसलिए विचारका ही वह फल होगा, अध्ययनका नहीं। अर्थका-ब्रह्मका- आपातदर्शन [पढ़ते ही साक्षात्कार हो जाना ] अध्ययमका फल है, यदि ऐसा कहो, सो विचारको अध्ययनका प्रयोज्य मानना सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि अन्गोंके सहित वेदके पढ़नेसे ही वह-ब्रह्मनिश्चयरूप फल-सिद्ध हो जायगा। [ इस अवस्थामें अध्ययनविधिका विचारपर्यन्त तात्पर्य क्यों कर मानना होगा ? ] शङ्का-दष्ट फल अ्वय-व्यतिरेकसे सिद्ध नहीं है, तो विघिकी सामर्थ्यसे (i) 'त्रीहिनवहन्ति' यह विधिवाक्य केवल अवघातका विधान करता है, अवघातकी बरावर आवृत्तिरूप पौनःपुन्यका विधान नहीं करता। इससे पौनःपुन्य-आवृत्ति-अविहित है।
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आनन्तयार्थिक-अथशब्दपियोग] भापानुवादसहित ४६९
अध्येतव्य इति तव्यप्रत्ययेन स्वव्यापारः शव्दभावना विधिरूपतयाS- भिधीयते। सा च शव्दभावनार्र्थभावनां निप्पादयन्ती फलवदर्थाववोध पुरुपार्थ भाव्यत्वेन कल्पयति। तत्र भाव्यान्तरत्वात् समानपदोपात्तमध्ययनं करणतामापद्यते। यद्यध्ययनमेव भाव्यं स्यात् तदाऽक्षरावापि: फलमिति मतं त्वदीयमपि न सिध्येत्। ततः करणस्याऽध्ययनस्य भाव्योरऽर्थावोधो विधिवलात् फलं भविष्यतीति। नैतदप्युपपन्नम्, कर्माभिधायिना तव्य- अत्ययेन कर्मभूतस्व्राध्यायगतप्राप्तिलक्षणभाव्याभिधाने संभवति भाव्या-
उसको शास्त्रीय फल मान लंगे, ऐसा दूसरा विकल्प रहेगा, क्योंकि 'अध्येतव्यः' इस पदमें तव्यप्रत्ययसे व्यापाररूप शब्दभावना ही विधिस्वरूपमें अमिहित होती है। [तव्यप्रत्ययका अर्थ शाव्दी भावना ही अपवृत्तको प्रवृच करानेवाली विधि है। ] वह शब्दभावना अर्थभावनाको उत्पन्न करती हुई अर्थनिश्चयात्मक पुरुपार्थकी साध्यत्वरूपसे कल्पना करती है। वहांपर भाव्यान्तर होनेसे समानपद्से वोधित हुआ अध्ययन करण हो जाता है। [ 'भावयेत्' इत्यादि पदात्मिका शब्दी भावनामें भाव्य और किस प्रकार तथा किस साघनसे ? इन अशोंकी अपेक्षा होनेपर अर्थभावना शान्दी भावनासे साध्य होगी और अर्थभावनाको मी करणकी अपेक्षा होनेपर अध्ययन करण माना जायगा, कारण कि स्वाध्यायका अध्ययन तो स्वयं पुरुपार्थ हो नहीं सकता और अर्थनिश्चयात्मक साध्य दूसरा विद्यमान ही है। इसलिए प्रत्ययार्थ- भावनासे गृहीत अध्ययनको करणभावना ही मानना उचित है। ] यदि अध्ययन ही भावनासे साध्य माना जाय, तो इस दशामें 'अक्षरोंका ज्ञान होना फल है' ऐसा तुम्हारा मी मत सिद्ध नहीं होगा। [यदि संनिहित अध्ययन द्वारा प्रत्य- यार्थभावना अपने माव्यांशमें निराकाङ्व हो जाय, तो अध्ययनक्रियाका अक्षर- ग्रहणान्त स्वाध्यायकी प्रषतिरूप फलकी सिद्धि नहीं हो सकती, जैसा कि अध्य- यनके बारेमें पद्मपादाचार्य कहते हैं-'सा हधीयमानावाप्तिफलत्वादक्षरग्रहणमात्रा' इति। इसलिए करणभूत अध्ययनक्रियाका साध्य-अर्थनिश्रयात्मक फल ही- अध्ययनतिधिकी सामर्थ्यसे होगा। समाधान-ऐसा कहना भी नहीं बन सकता, कारण कि कर्मरूप अर्थको कहनेवाले तव्यप्रत्ययसे कर्मभूत अपने स्वाध्यायकी प्रासिरूप भाव्य-
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- ४७० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक मे
न्तरकल्पनायोगात्। समानपदोपात्तमध्ययनं परित्यज्य भिन्नपदोपाचस्य बहिरङ्गस्य स्वाध्यायस्य प्राप्ते: कथ भाव्यत्वमिति चेद्, नः स्वाध्यायस्य कर्माभिधायितव्यप्रत्ययार्थत्वेन प्रत्ययार्थभृतभावनां प्रति अकृत्यर्थाद- व्ययनादप्यन्तरङ्गत्वात्। नाडपि तृतीयः, अक्षरग्रहणस्यैवाऽध्ययनतिधिप्रयोजनत्वात्। नन्वक्षर- ग्रहणस्य स्वयमपुरुषार्थत्वात् न फलत्वं तदर्थावचोधस्य त्वया विधिग्नयोजनत्वा- नङ्गीकारादन्यस्य च कर्मकारकगतफलस्याऽभावात् सक्तुन्यायेन कर्मप्राधान्यं परित्यज्य स्वाध्यायाध्ययनेन स्वर्ग भावयेदिति कल्पना प्रसज्येत, ततो वरमर्थातवोघस्य विधिप्रयोजनत्वम्, दृष्टे सत्यदष्टं न कल्प्यमिति न्यायाद्। संभवति हि साङ्गवेदाध्ययनमात्रादर्थनिश्चयः। अर्थावचोघहेतोर्व्याक- साध्य-की प्रतीतिका सम्भव होनेसे दूसरे साध्यकी कल्पना करनेका अवसर नहीं आ सकता। 'अध्येतव्यः' इस समानपदसे गृहीत अध्ययनको छोड़ कर 'स्वाध्यायः' इस मिन्नपदसे ज्ञात वहिरक्र स्वाध्यायकी प्राप्ति साध्य कैसे हो सकती है ? ऐसी शक्का नहीं हो सकती, कारण कि स्वाध्याय कर्मवाचक तव्यप्रत्ययका अर्थ है, इसलिए स्वाध्याय प्रत्ययार्थ भावनाके प्रति प्रकृतिके अर्थ अध्ययनकी अपेक्षासे मी अन्तरञ् है। तीसरा निकल्प-विघिका अर्थनिश्चयरूप प्रयोजनपर्यन्त सात्पर्य होनेसे शास्त्रमें सवका अविकार मी नहीं माना जा सकता, कारण कि अक्षरग्रहण ही अध्ययनविधिका प्रयोजन माना गया है। शङ्का-अक्षरका ग्हण स्वयं पुरुषार्थ नहीं है, इसलिए वह फल नहीं हो सकता, उसके अर्थज्ञानको तुम-वेदान्ती-अध्ययनविधिका प्रयोजन मानते नहीं। इन दोनोंसे अतिरिक्त कोई कर्मकारकगत फल है नहीं, इसलिए सक्तुन्यायसे [प्रत्ययार्थ होते हुए मी ] कर्मके प्राधान्यका त्याग कर 'स्वाध्यायके अध्ययनसे स्वर्गकी भावना करनी चाहिए' यह करपना करनी होगी। [ अर्थात् विश्विन्न्यायसे अध्ययनविधिका मी स्वर्ग ही भाव्य होगा। ] इससे यही उत्तम है कि अध्ययनविधिका अर्थ निश्चयरूप ही प्रयोजन माना जाय। न्याय मी है कि दृष्ट फलके सम्भव रहते अदष्ट फलकी कर्पना नहीं करनी चाहिए। अन्गोंके सहित वेदाध्ययनसे ही अर्थका निश्चय होता है, क्योंकि अर्थावबोधका कारण व्याकरण भी तो अञ्ञ है, ऐसा माननेसे विचार-
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अध्ययनविमिमें अधिफारीकी अपेक्षा] भापानुवादसहित ४७१
रणत्याऽ्यद्गत्वाद्। न चैवं विचारशास्त्रवैयर्थ्यम्, अवयुद्धार्थवगतविरोध- परिहाराय तदपेक्षणात्। अतः पुरुपार्थभृतफलवदर्थावघ्ोधो विधिग्रयो-
पुरुषार्थत्वात्। फलभृनक्षीरादिहेतूनां गवादीनामपि पुरुपरथ्यमानता- दर्शनात्। विघेरक्षरगहणमात्रोपक्षयेऽर्थज्ञानमाकस्मिकं स्यादिति चेद्, न; अर्थावषोधस्य फलप्रयुक्तत्वात्। नहि विधिप्रयुक्तोरऽर्थावयोध:, लॉकिकापताकयानां विधिमन्तरेण फलवद्र्थवबोधकत्वदर्शनात्। न चाड- ध्ययनादकरग्रहणस्य विशेषाभावात् क्थं तयोहेतुफलभाव इति वाच्यम् अक्षगवापतिर्नाम स्वाधीनोच्यारणयोग्यत्वाख्योऽक्षरधर्मः। अध्ययनं तु तदर्थो वाअनसव्यापार इति विशेपसद्भावात्। एवं च तर्ाष्ययनस्याऽक्षरग्रह-
शाख् व्यर्थ मी नहीं हो सकता, कारण कि ज्ञात अर्थमें प्रतीत विरोधके परिहारके लिए विचार-शासकी अपेक्षा है। इससे पुरुार्थस्वरूप फलवान अर्थ-ज्ञान (नम्ज्ञान) ही अव्ययनविधिका प्रयोजन है, अक्षरग्रहण नहीं। समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि अर्थज्ञानका कारण होनेसे अक्षरग्रहण भी पुरुपार्थ हो सकता है। [पुरुषार्थका उपकारी भी पुरुपोंका अमीष्ट प्रयोजन होता है। इसमें दष्टान्त देते हैं-] फलस्वरूप दूध यःदिके कारणभूत गाय आदि मी पुरुपोंके अर्थ-प्रयोजन-होते दिखलाई देते हैं। [यद्यपि ममीष्ट दुग्धादि है तथापि उनके साधन गौ आदि भी पुरुपार्थ माने जाते ही हैं] अक्षरका ग्रहण- मात्र करा देनेसे विधिकी सामर्थ्य क्षीण हो जाती है, इसलिए अर्थज्ञान आकस्मिक दो जायगा। ऐसा दोप भी नहीं आ सकता, क्योंकि अर्थज्ञान (अक्षर ग्रहणरूप) फलसे उत्पन्न होता है। विधिसे ही अर्थनिश्चय नहीं माना जा सकता, कारण कि लौकिक आप वाक्योंमें विधिके बिना भी सकल सर्थनोधकत्व देखा गया है। अध्ययन और अक्षरपरिचय-इनमें कोई विशेष नहीं है। [अर्थात् अक्षरग्रहण और अध्ययन एक ही वस्तु हैं ] इससे इनमें कार्यकारणभाव कैसे हो सकता है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि अक्षरोंका ज्ञान-परिचयात्मक ग्रहण करना-अक्षरोंके अधीन है (अन्यकी-गुरु आदिकी-सहायताके बिना, उच्चारणके योग्य हो जाना अक्षरोंका एक धर्म है) और अध्ययन तो अक्षरपरिचयके निमित्त वाणी और मनका व्यापार कहलाता
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४७२ विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत १, वर्णक ३
णहेतुत्वमन्वयव्यतिरेकसिद्धमिति व्यर्थों विधिरिति चेद्, न; अवघाता- दिवद्दृष्टोत्पत्तये नियमार्थत्वात्। न चैवं दृष्टफलत्वहानि:, दष्टफलभृता- क्षरप्रासिसमचेतस्यैव नियसादट्टस्याउङ्गीकारात्। दृष्ट सत्यदषं न कल्प्यमिति न्यायस्य स्वतन्त्रादृष्टविपयत्वाद्। अर्थाववोध एव फलमिति चदताऽपि नियमविधित्वाङ्गीकारात्। न चोपपत्तिसाम्ये सत्यक्षरग्रहणे एव किमिति पक्षपात इति वाच्यम्, अध्ययनविधेः फलवदर्थाववोध: ्रयोजनमिति पक्षे यस्य यस्मिन्कर्मण्यधिकारस्तस्य तद्वाक्याध्ययनमेव स्याद्, न तु चाक्यान्तराध्ययनम्, तन्र प्रवृश्यादिफलाभावात्। ततो न कृत्स्रवेदाध्ययन- सिद्धिः। अस्मत्पक्षे तु कृत्स्वेदावाप्ति: प्रयश्चित्तजपादाधुपयुज्यते।
है, इसलिए दोनोंमें विशेष विद्यमान है। इस प्रकार अध्ययनको तो अक्षर- ग्रहणका कारण होना अन्वय और व्यतिरेकसे ही सिद्ध हो गया, फिर उसके लिए विधान करना व्यर्थ है? नहीं, कारण कि अवघात आदिके तुल्य अटष्टकी उत्पत्तिके लिए नियमार्थ है। [तुषसे रहित धान तण्डल कहलाते हैं। धानोंका तुप छुड़ानेके लिए अन्वयव्यतिरेकसे अवधानके सिद्ध होनेपर जसे अदृष्ट अपूर्व तपकी उत्पत्तिके लिए 'ब्रीहीनवहन्ति' यह विधान है वैसे ही 'अध्येतव्यः' यह विधान भी नियमार्थ हैं, जैसा कि ग्न्थारम्भमें ही प्रतिपादन कर आये हैं। ] ऐसा नियमार्थ माननेमें उसे दृष्ट फलके प्रति कारण होनेकी वाधा नहीं हो सकती, कारण कि नियमसे उत्पन्न अदृष्ट फल भी हष्ट फलभूत अक्षरग्रहणसमवायी ही माना गया है। 'दष्ट फलके सम्भवमें अदष्ट फलकी कल्पना करना अनुचित है, यह न्याय केवल स्वतन्त्र अदए फलको ही विषय करता है [ दृष्ट फलगत अदृष्ट फलका निवारण नहीं करता ]। अर्थज्ञानको ही (अध्ययनविधिका) फल माननेवाले आपको भी यह नियम मानना ही है। दोनों-(अर्थ ज्ञान-और अक्षरज्ञान) में समान युक्ति होनेसे अक्षर ग्हणमें ही आग्रह क्यों किया जाय: ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि अध्ययनविधिका फल सफल अर्थज्ञान माननेके पक्षमें जिसका जिस कर्ममें अधिकार है, उसको उन्हीं वाक्योंका अध्ययन प्राप्त होगा। दूसरे वाक्योंका नहीं, क्योंकि उनमें प्रवृत्ति आदि फल नहीं है। इससे [ अध्ययनविधिके द्वारा ] सम्पूर्ण वेदके अध्ययनकी सिद्धि नहीं हो सकती। हमारे [अक्षरग्रहण फल माननेवालेके] मतमें तो सम्पूर्ण वेद् का ज्ञान प्रायश्चित, जप आदिमें उपयुक्त होता है।
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अध्ययनविपिमें अधिकारीकी अपेक्षा ] भाषानुवादसहित ४७३
नन्वर्थ विनोधमधिकारिविशेपणमुदिियाऽध्ययनं विधातव्यम्, निरधिका- रविधानायोगात्। अक्षरावाप्तिमुदि्य विधानेऽपि तदवाप्तिकाम एवाधिकारी स्यादिति चेद, न; अर्थाऽ्यवोधोदेशनपूर्वकशव्दोचारणाभावे वाक्यस्य तात्प- र्यासिद्रेः। लोकेऽर्थवयोधमुहिश्योच्यास्तिशब्दे तात्पर्यदर्शनात्। न च लौ- कवदेव विधिर्मा भृदिति वाच्यम्, तद्ूदत्र शच्दोच्चारणप्रयोजकस्य रागस्याऽ- "जैसे राजसूय आदि यज्ञोंमें न्राक्मण और वैश्य आदिका अधिकार न होनेसे उनमें उक्त वर्णोंकी प्रवृत्ति नहीं होती, अतः उक्त वर्ण उक्त अर्थका प्रतिपादन करनेवाले वाक्योंको नहीं पढ़ेंगे, वैसे ही सफल सोम आदि यागके प्रतिपादक वाक्योंको क्षत्रिय आदि नहीं पढ़ेंगे। इस परिस्थितिमें केवल अपने-अपने उपयोगमें आने- वाले यज्ञयागादिके प्रतिपादक वेदभागका ही तत्-तत् अधिकारी द्वारा पढ़ना प्राप्त दोगा। और अक्षरअहृणरूप फलपक्षमें तो अधिकारी-मात्रकी सम्पूर्ण वेदाध्ययनमें प्रवृत्ति दोगी, क्योंकि अक्षरग्रहणकी फलवत्ता अर्थज्ञानसे ही होती है, प्रृत्तिसे नहीं। अर्थज्ञान सभी अध्ययन करनेवालोंको होगा। अन्यथा स्वाध्यायका जपयज् नहीं बनेगा। एवं प्रायश्ित्तभागी होगा। अतः सम्पूर्ण वेदका अध्ययन
नात्पर्य है ]। पराप्त दोता है, इसीलिए अक्षर्रहणरूप फल माननेमें हमारा आगरह है, यह
शक्ाअधिकारीके अर्थज्ञानरूप विशेषणको उद्देश्य करके अध्ययनका विधान करना होगा [अर्थात् 'अध्येतव्यः' इस विघिसे 'अर्थाववोधकामः स्वाध्या- येनेएं भावयेत्' इस प्रकार अर्थज्ञानार्थीको अधिकारी माननेमें अर्थज्ञानको ही फल मानना उचित है], क्योंकि अधिकाररहितका विधान नहीं होता। अक्षर- ज्ञानको उद्देश्य करके स्वाध्यायका विधान करनेपर भी उसकी प्राप्तिकी इच्छा- वाला दी अधिकारी माना जायगा। समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि अर्थज्ञानको उद्देश्य करके यदि शब्दात्मक वाक्यका उच्चारण न किया जाय, तो उस वाकयका तात्पर्य ही सिद्ध न होगा, चयोंकि अर्थज्ञानको उद्देश्य करके रचचारण किये गये शब्दोंमें ही तात्मर्य देखा जाता है। लोकमें जैसे विधि नहीं होती, वैसे ही स्वाध्यायके अध्ययनका विधान भी नहीं होगा, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि लौकिक शब्दोंके समान वैदिक शब्दोंके उच्चारणमें रागरूप हेतु नहीं है। [ स्वाध्यायात्मक वेदवाक्योंके ईश्वरोक्त होनेसे उनमें रागादिहेतुकत्वका सम्भव ही नहीं है।] ६0
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४७४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत १, वर्णक ३
भावात्। अथोच्येत विश्वजिन्न्यायेन स्वर्गकामोऽधिकारी कल्प्यंताम्। अथ- वा वाजसनेयिनां ब्रह्मचर्यमागामित्यादिनोपनयनस्य प्रकृतत्वादुपनीतोड- धिकारीति त्रकरणग्रमाणेन कल्प्यतामिति। तदसतं, अर्थाऽवबोधलक्षण दष्टफलकामेऽधिकारिणि सत्यन्यकल्पनायोगात्। एवं चार्डर्थववोधकामोऽ- ध्ययनेनाडर्थावचौधं भावयेदिति विधिः संपद्यते। विचारेणारडर्थाचवोधं भावयेदिति विधिस्त्वार्थिक:। विचारेणापरिहते विरोधेऽर्थनिश्चयातु- दयादर्थावबोध एव फलमिति। नैतत्सारम्, तत्र किं विधिवलादक्षरग्रहण- मात्रे निष्पन्ने सते श्रुतव्याकरणस्य पुरुपस्य लौकिकवाक्यार्थ इव वेदार्थों- पि स्वतो वुध्यत इति कृत्वा तद्वोधस्य फलत्वसुच्यते किं वार्ऽर्थववोधकाम-
शङ्का-विश्वजिन्न्यायसे स्वर्गार्थीको ही अघिकारी माननेकी कल्पना की जाय अथवा 'वाजसनेयी माध्यन्दिनीय शाखावाले ब्रह्मचर्यको पावें' इत्यादि वाक्योंसे जिसका उपनयन हो गया हो उस अधिकारीकी ही करपना की जाय, कारण कि उपनयन अकरणपराप्त है। और प्रकरणरूप प्रमाणसे वैसी कल्पना युक्तियुक्त है। [अर्थात् विश्वजिन्न्यायसे स्वर्गार्थी या प्रकरणप्रमाणसे उपनीत अधिकारी माना जाय ]। समाधान-ऐसा उचित नहीं है, कारण कि अर्थज्ञानरूप दष्ट फलका अधिकारी जब मिल सकता है तब दूसरी कल्पना करनेका अवसर ही नहीं आता। अतः 'अर्थज्ञानका अर्थी अध्ययन द्वारा अर्थज्ञानरूप भाव्यकी-साध्यकी- भावना करे' इस प्रकार विधान सम्पन्न होता है। 'विचार द्वारा अर्थ- निश्चयकी भावना करे' यह तो अर्थतः ही आ जाता है, क्योंकि विचार द्वारा विरोधका परिहार न होनेपर अर्थका निश्चय ही नहीं हो सकता, इसलिए अर्थज्ञानको ही फल मानना चाहिए। समाधान-उक्त कथन सारभूत नहीं है, कारण कि वह विकल्पसे नहीं बनता, [विकलप दिखलाते हैं-] आपके पक्षमें विधानकी सामर्थ्यसे केवल अक्षरका ज्ञान होनेपर व्याकरणकी व्युत्पच्तिसे युक्त पुरुषको लौकिक वाक्यकी तरह वेदार्थज्ञान भी स्वयं ही हो जाता है, इसलिए क्या अध्ययनविधिका अर्थज्ञान फल कहा जा रहा है: या अर्थज्ञानार्थीको उद्देश्य करके विधान किया है, इसलिए कहा जा रहा है? इनमें प्रथम करपको हम
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अध्यगनविभिम अधिकारीकी अपेक्षा ] भापानुवादसहित ४७५
मुहिध्य विधाननः। नत्राऽडद्यमङ्गीकर्मः । द्वितीयोऽनुपपन्न, अध्ययनात्
योगान्। वेदोरऽर्थवान वाक्यप्रमाणत्वादाप्ंवाक्यवदित्यनुमानेन प्रतिपन्नो वेदार्थ दति चेन्, तर्वनुमानसिद्धत्वादेव नं वेदार्थज्ञानं काम्येत।सांमान्यतोS- नुमितोऽपि वेदार्थो नाऽग्निहोत्रादिविशेषाकारेण प्रतिपन्न इति चेत्, वर्वग्निहोत्रादिगोचरव्रोधोऽप्यप्रतिपनः कर्थ काम्येत । पित्राद्युपदेशत एवारिहोतायययगमे कामनावयर्थर्य तदवस्थम। अथौपदेशिकज्ञानस्याड- प्रमाणन्वानत्र निर्णयज्ञानं काम्यत इति चेन, तत्र न ताचदप्रामाण्ये निश्चिने निर्णयवञानकामना संगवति, अर्थम्य विभ्रममात्रत्वात्। अग्राम- व्यसंदेहे तु नदिचारम्थवान्वस्षरी नाउध्ययनस्य। अथ मन्यसे औपदेशिक-
मानते हैं। पर दूसरा पक्ष नहीं चनता, कारण कि अध्ययनसे पहले वेदका सर्थे नो जात हुआ ही नहीं है, इसलिए तहिशिष्टका ज्ञान-वेदार्थका ज्ञान-भी नहीं चन सकता, अतः असिहकी कागना-इच्छा-ही नहीं होगी। ेह अर्धवाला है, वावयरप प्रमाण ोनेसे, आप्तवाकयके तुल्य' इस अनुमानसे चेवान सिद् ही है, ऐेसा नी नहीं कह सफते, कारण कि तन तो अनुमानसे दी सिल हो गया, अतः वेनार्थज्ञानफी इच्छा दी नहीं हो सकती। वद्यगि अनुमान व्वारा सामान्यतः बेदका कुछ अर्थ अवश्य है, इतना ही मान होता है, नथापि वह वेदार्थ अमिहोत्र आदि विशेष आकारसे नहीं जाना गगा है, इसलिए [विशेषतः ज्ञान प्राप्त करनेके लिए] वेदार्थज्ञानकी फामना की जायगी, यदि ऐेसा मानो, तो अमिहोत्रादिका मी ज्ञान नहीं है अतः उसकी मी इच्छा कैसे दो सकती है? यदि पिता आदि [ आदिपदसे गुरु सादिका अहण है] के उपदेशसे अमिदोत्र आदिका ज्ञान हो गया, सो पुनः उसकी इच्छा दी व्यर्थ है। उपदेश द्वारा प्राप्त हुए ज्ञानके प्रमाण न दोनेसे उसमें निश्चयात्मक ज्ञानकी अभिलाषा हो सकती है, यह भी नहीं कह सकते, कारण कि अपामाण्यके निश्चित होनेपर निर्णयात्मक ज्ञानकी इच्छी हो ही नहीं सकती है, [जैसे शुकिरजजञानमेंअप्रामाण्यका निश्चय होनेसे झुकिरिजतमें निश्चय करनेकी इच्छा नहीं होती ], क्योंकि वह अर्थ-विपयं- विसममान् है। और अमामाण्यके सन्देहमें तो विचारका ही अवसर
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४७६ विवरणप्रमेय संग्रह [सूव १, वर्णक ३
ज्ञानं प्रामाण्यविचारायैव वेदाध्ययनं तदर्थविचारश्च वेदस्य तन्मूलप्रमाण- त्वादिति। एवं तर्द्यस्तु कथचिदर्थातवोधोऽधिकारिविशेपणम्, तथापि तदुद्देशेन विधानमयुक्तम्। तत्र किं वेदार्थविशेषज्ञानानां विशेपाकारेणाड ध्ययनविधावुद्देश्यत्वमुत सामान्याकारेण। नाऽड्द्य:, युगपचदसम्भवात्। द्वितीयेऽर्थमात्रज्ञानमुद्दिश्योच्चरितस्य शब्दस्य तत्रैव तात्पर्य स्यान्नाऽगि- होत्रादिविशेपज्ञाने। अथ विधिसामर्थ्यादर्थमात्रे तात्पयेऽपि वाक्य- शत्त्यनुसारेण विशिष्टार्थे तात्पर्य कल्प्येत तहिं विधेस्तत्र तात्पर्यनिमि- त्तत्वं न स्यात्। किश्र, कथश्चिदुद्दिश्य विधानेऽपि नाऽध्ययनमात्राद् दृष्टफलतयार्ऽर्थाववोधसिद्धि, अदर्शनात्। ननु वेदस्याऽर्थाचचोधमुद्दिश्यो- चारणाभावे स्वार्थे तात्पर्य न स्यात्, तात्पर्यहेतोरभावादिति चेद्, मैचम्; न होता है, अध्ययनका नहीं। उपदेश द्वारा माप्त हुए ज्ञानमें प्रामाण्यके विचारके लिए ही वेदका पढ़ना और वेदार्थका विचार करना आवश्यक है, क्योंकि औपदेशिक ज्ञानका मूल प्रमाण वेद ही है, यदि यह माना जाय, तो इस प्रकार यद्यपि कथश्चित् अर्थनिर्णय अधिकारीका विशेषण हो सकता है, तथापि अर्थाव- बोधको-अर्थनिश्चयको-उद्देश्य करके उसका विधान करना युक्तिसंगत नहीं है। [ युक्तियोंका अभाव दिखलाते हैं-] इस मतमें क्या वेदार्थके विशेष ज्ञानोंके विशेषरूपसे अध्ययनविधिमें उद्देश्यत्व मानते हो अथवा सामान्यरूपसे ? इनमें प्रथम विकल्प नहीं बन सकता, क्योंकि एक साथ सम्पूर्ण वेदोंका विशेष ज्ञान होना सम्भव नहीं है। दूसरे विकल्पके माननेमें सामान्यतः अर्थज्ञानको उद्देश्य करके उच्चारण किए गए शब्दका उस सामान्य अर्थमें ही तात्पर्य निश्चित होगा, अगनिहोत्रादि विशेषज्ञानमें नहीं। यदि विधानकी सामथ्यसे अर्थमात्रमें सामान्यतः तात्पर्य रहनेपर भी वाक्यशक्तिके अनुसार विशिष्ट अर्थमें तात्पर्यकी कल्पना की जायगी, यह माना जाय, तो विशिष्ट अर्थमें तात्पर्यकी प्रतीति करानेमें विधिका निमित्त होना नहीं बन सकता। और भी सुनिए कि कथश्चित् [अर्थावबोधको ] उद्देश्य करके विधान माननेपर भी अध्ययनमात्रसे दुष्टफलके रूपमें अर्थावबोधकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसा देखा नहीं गया है। शक्का-यैदि वेदका उच्चारण अर्थज्ञानको उद्देश्य करके नहीं होगा, तो बेदका स्वार्थ ही नहीं बन सकेगा, कारण कि [ अर्थज्ञानको उद्देश्य करके उच्चारण
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अध्ययनविधिमे अधिकारीकी अपेक्षा ] भापानुवांदसहित
तावच्छोतुरुचारणं तात्पर्यनिमित्तम्, लोके तदभावात्। नाऽपि वक्तुरुचा- रणम्, अपौरुपेये वेद तात्पर्याभावप्रसङ्गात्। नन्वेवमपि वेदसार्र्थप्रतिपाद- क्त्वं न स्याद् उद्दिश्योच्चारणस्य प्रतिपादनहेतोरभावादिति चेद्, न; शब्द- स्प प्रतिपाद्कत्वस्वाभाव्यात्। तर्वर्थज्ञानमुदिय शब्दोचारणं लोके व्यर्थ स्यादिति चेद्, न; पुरुपसम्बन्धकृतदोपाख्यप्रतिबन्धपरिहारार्थत्वाद्। ननु वेदस्यार्ऽर्थप्रतिपाद नसामर्थ्येपि न वोधकत्वं सम्भवति, बोधस्य तात्पर्याधीन- त्वाद् तात्पर्यस्य पुरुपधर्मस्याऽत्राSसम्भवादिति चेद, मैवम्; तात्पर्य हि पङ्गिधलिङ्गगम्यतया शन्द्ध्मों न पुरुपधर्म इति समन्वयसूत्रे वक्ष्यमाण- त्वात्। तदेवमध्ययनविघंर्यावदर्थाववोधफलमव्यापारान्न विधितो विचार- करनारूप ] तात्पर्यका हेतु बहांपर नहीं है। समाधान-ऐसा नहीं माना जाता, कारण कि शोताका उन्तारण तो तात्पर्यका निमित नहीं होता, क्योंकि लोकमें ऐसा नहीं देखा जाता है। वक्ताका उच्चारण भी [तात्पर्यनिगित्त नहीं है। ] क्योंकि अपोरुपेय-जिसका कोई पुरुष वक्ता नहीं है, ऐसा चेद मी तात्पर्यरहित हो जायगा। यदि कहो कि उच्चारणको उद्देश्य न माना जाय, तो वेद अर्थका प्रतिपादक नहीं हो सकेगा, कारण कि अर्थप्रतिपादनका उद्देश्य उच्चारणरूप कारण वेदगें नहीं है, तो ऐसा कहना उचित नहीं हैं, क्योंकि अर्थप्रतिपादन करना शब्दका स्वभाव है। त तो [यदि शन्दका अर्थ प्रतिपादन करना स्वभाव ही है तो] लोकमें अर्थज्ञानके उद्देश्यसे शब्दोंका उच्चारण करना ही व्यर्थ होगा, ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि पुरुपके सम्बन्धसे प्राप्त दोपरूप प्रतिबन्धकका परिहार करनेके लिए शब्दोचारण सार्थक होगा। शक्ा-वेदोंकी [शब्दात्मक वाक्य होनेके कारण ] अर्थप्रतिपादन करनेमें सामर्थ्य रहते हुए मी वे बोधक नहीं होंगे, क्योंकि बोधका होना तात्पर्य- ज्ञानके अधीन है। तात्पर्य पुरुपका धर्म है, अतः वह अपौरुपेय वेदमें नहीं रह सकसा। तात्पर्य * छः प्रकारके कारणोंसे निश्चित होता है, और वह शब्दधर्म है, पुरुपधर्म नहीं, इसका प्रतीपादन समन्वयसूत्रमें करेंगे। तब तो इस प्रकार • १ उपक्रम-उपसहार, २ अभ्यास, ३ अपूर्चता, ४ फल, ५ अर्थघाद और-६ उपं- पत्ि। इनका विशेष विवरण समन्वयसूत्रके प्रथम व्णेकर्मे किया जायगा।
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विवरणप्रमेयसँग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
शास्त्रस्य सर्वाधिकारिता सिध्यति। नन्वध्ययनविधेरर्थाववोधकामाधिकारं नाऽङ्गीकरोपि अधिकारान्तरं च न श्रुतं ततोनध्ययंनमेव प्रसज्येत। अन्र ग्राभाकरा आहु :- नाऽव्ययनविधि: स्वतन्त्रमधिकारिणमपेक्षते, अध्ययनविधिप्रयुक्त्या तद्विपयानुष्ठानसिद्धेः। न च वाच्यं विधिर्हि सर्वत्र स्वविषयं तदङ्गं वाऽनुष्ठापयति, न चाऽध्ययनमध्यापनविधेर्विपयोऽङ्गं वा तत्कर्थं तेनाऽनुष्ठाप्यत इति, अविषयस्याऽतदङ्गस्याऽप्याधानस्योचरकाम्यक्रतु- विधिभिरनुष्ठापितत्वादिति। सोऽयं प्राभाकरोक्तः परिहारोऽनुपपन्नः ।
अध्ययनविधानका अर्थज्ञानपर्यन्त व्यापार नहीं हो सकता। इसलिए विघिके चलसे विचारशास्त्रमें [शमदमादिसम्पन्न सुमुक्षुके अतिरिक्त ] सवका अधिकार सिद्ध नहीं होता। शङ्का-अध्ययनविधिमें अर्थज्ञानके अभिलाषीका अधिकार आप नहीं मानते और इससे अतिरिक्तका अधिकार श्रुतिमें कहा नहीं गया है, इसलिए अध्ययनके अभावका प्रसङ्क हो जायगा [अर्थात् अधिकारशन्यविघिमें सबकी उपेक्षा होनेसे किसीकी भी प्रवृत्ति न होगी एवं अध्ययनका सर्वथा अभाव होगा ] इस शङ्काका समाधान करनेके लिए प्रथम प्रभाकरानुयायी भीमांसके प्रवृत्त होते हैं-वे कहते हैं-अध्ययन स्वतन्त्र अधिकारीकी अपेक्षा नहीं करता, क्योंकि अध्ययनविधिके प्रयोगसे अध्ययनका अनुषान सिद्ध हो जायगा। [पहले ही मूलमें प्रतिपादित आचार्यकरण तथा 'अध्यापयेत्' इससे अध्यापनके विधानसे ही अध्ययनका प्रयोग प्राप्त होगा। अन्यथा-श्विष्यके अध्यापनके बिना-आचार्यका स्वरूप एवं अध्यापन दोनों अनुपपन्न होंगे, इसलिए अध्य- बनका अनुष्ठान अधिकारीकी कल्पनाके बिना भी सम्भव है]। ऐसा भी नहीं कहा ज सकता कि विधान सर्वत्र अपने विषय तथा अङ्गका ही अनुष्ठान कराता है और अध्यापनका अध्ययन न तो विषय है और न अङ्ग ही है, इसलिए पाठन कर्म कैसे अध्ययनका अनुष्ठान करा सकता है : कारण कि उत्तरकालिक काम्य क्रतुओंके विधानसे आधान [ आग्न्याधान ] का अनुष्ठान कराया जाता है जो आधान उन काम्य यज्ञोंका न तो विषय है और न अङ्ग ही है। [ इसलिए अविषय तथा अनङ्ञंका भी विधि द्वारा अनुष्ान सिद्ध होता है] इतना प्रभाकरका सिद्धान्त है। परन्तु यहं प्रभाकरानुयायियोंका कहा हुआ समाधान युक्तिसअ्त नहीं है।
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अध्वयनविधिमें अध्यापनविधिप्रयुक्तत्व ] भापानुवादसहित ४७९'
तथाहि-अध्यापनविधिरप्यथूयमाणाधिकार एव। 'अष्टवर्ष ब्राह्मणसुपनयीत' 'तमध्यापयीत'इत्यत्राSSचार्यकरणकाम इत्यश्रवणात्। तत्कथमध्ययनं तत्प्रयुक्तं यत् तत्राऽधिकारिणं परिकल्थ्य तत्प्रयुक्तिरध्ययनस्योच्चेतातर्ध्ययने स्वतन्त्रीS- धिकारी कल्प्यताम्, लाघवाद्। लघीयसी हि स्वविधिग्रयुक्तिरन्यविधिग्रुक्त:। अथैकत्ाऽधिकारिकल्पनमात्रेणेतरस्य तत्प्रयुक्तानुष्ठाने सम्भवत्युभयत्र तत्क- रपने गौरवमिति मन्यसे तर्ह्यध्ययन एवाऽधिकारिणं परिकल्प्य तत्प्रयुक्तिम- न्यस्य किंन न्रपे१ यदि लिखित पाठादप्यध्ययनसिद्धेर्नाडव्ययनविधिरध्यापनं
[ असब्रति दिखलाते हैं-अध्ययनविधिमें मी अधिकारीका श्रवण ही नहीं है। कारण कि 'आठ वपके ब्राह्मणका उपनयन [यज्ञोपवीत संस्कार ] करना चाहिए और उसको पढ़ाना चाहिए' इस विधिवाक्यमें 'आचार्यकरणकी इच्छासे' ऐेसा श्रवण नहीं है, इसलिए अध्यापनसे अध्ययन कैसे प्रयुक्त होगा, जिससे उस अध्यापनमें अधिकारीकी कल्पना करके अध्ययनकी अध्यापनसे प्रयुक्ति कही जा सके। तव तो अध्ययनमें स्वतन्त्र अधिकारीकी कल्पना करनी चाहिए, क्योंकि उसमें ही लाघव है, कारण कि (अध्यापनरूप) अन्य विधिकी प्रयुक्ति माननेकी अपेक्षा (अध्ययनमें अधिकारीकी कल्पना करके) स्वयं अध्ययनविधिके वलसे ही अध्ययनमें प्रयुक्ति माननेमें लाघव है। यदि एक विधिमें अधिकारीकी कल्पना कर देनेसे ही दूसरे विधानके अनुष्ठानका सम्भव हो जानेके कारण दोनों विधियोंमें अधिकारी तथा प्रयुक्तिकी कलपना करनेमें गौरव मानते हो, तो अध्ययनमें ही अधिकारीकी कल्पना करके उसीसे अध्यापनमें प्रयुक्ति होती है, ऐसा क्यों नहीं कहते ? [ऐसा ही क्यों कहते हैं कि अध्यापनसे अध्ययनमें प्रयुक्ति हो अध्ययनसे अध्यापनमें नहीं ]। यदि लिखे हुए ग्रन्थके पढ़नेसे अध्ययनकी भी सिद्धि होती है, अतः अध्ययन अध्यापनकी प्रयुक्ति नहीं कर सकता, यह माना जाय, तो प्राङ्मुखत्वादि रहित अविहित अध्ययनसे अध्यापनकी सिद्धि होनेके कारण विहित अध्ययनकी भी प्रयुक्ति अध्यापनविधि नहीं कर सकेगी। [ तात्पर्य है कि जिसका कोई वैदिक विधिके समान विधायक वाक्य नहीं है, ऐसे नाटक, उपन्यास या समाचार पत्रादिका अध्ययन अध्यापनके बिना हो सकता है, अतः अध्यापन अध्ययनका
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४८0 विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र १, वर्णक ३
हितमध्ययनमध्यापनविधि: प्रयोजयेत्। अथोच्येत प्रयतः ग्राङ्मुखः पवि- त्रपाणिरधीयीतेति माणवकस्य प्राङ्मुखत्वाद्यध्ययनाङ्गं अ्षुतं तथाजध्यापनेऽ- पि प्रङ्ुखं पवित्रपाणिमध्यापयीतेति माणवकस्य प्राङ्मुखत्वादिविशेपण- श्रवणाद्विहितमेवाऽध्ययनं प्रयुज्यत इति। तर्हि 'गीती शीघ्री शिराकम्पी तथा लिखितपाठकः । अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च पडेते पाठकाधमाः॥' इति लिखितपाठस्य निन्दासद्जावादाचार्याधीनो वेदमधीष्वेत्यध्ययन-
प्रयोजक नहीं हो सकता। और अध्यापनका तो अध्ययनके बिना सम्भव नहीं है अतः अध्ययन अध्यापनका प्रयोजक है। इससे वेदान्तीकी 'अध्यायन ही अध्यापनका प्रयोजक है, अध्यापन अध्ययनका क्यों नहीं' शक्काकां समाधान हो गया। परन्तु साथ-साथ शङ्का उत्पन्न होती है-हमने मान लिया कि अध्यपन अध्ययनका प्रयोजक है, परन्तु यह नियम कैसे होगा कि अध्यापन 'प्राङ्मुख होकर पढ़ना' इत्यादि वििविहित ही अध्ययनकी प्रयुक्ति करेगा जब कि अध्यापन अविहित उक्त लौकिक रीतिके अनुसार अध्ययनसे भी चरितार्थ हो सकता है] यदि संयत होकर अर्थात मनकी चश्चल वृत्तियोंको रोककर 'पूर्वकी ओर मुख किये और पवित्रीधारण किये-शिष्यको पढ़ावें' इत्यादि वाक्योंमें माणवक-शिष्य-के पूर्वाभिमुख होकर बैठना आदि विशेपणोंका श्रवण होनेसे विहित ही अध्ययनका प्रयोग होगा, ऐसा मानो तो-'गीत गाकर तथा बहुत जल्दी एवं शिरको कँपाता हुआ अथवा गुरुके उपदेशके बिना केवल लिखे हुए ग्रन्थके आधारपर पढ़नेवाला और बिना अर्थ जाने पढ़ने एवं बहुत नीचे स्वर [अर्थात् जिसमें तत्तस्थानानुपदानादि परिचय न हो सके) से पढ़ने- वाला-ये सब निकम्मे पढ़नेवाले माने गये हैं। इस प्रकार लिखितके वलपर पढ़नेवालेकी निन्दाके श्रवणसे तथा 'आचार्यत्वविशिष्ट गुरुके अधीन होकर पढ़ो' इस प्रकार आचार्य द्वारा पढ़नेके नियमके विधानसे अध्ययनविधि अध्या- पनकी प्रयुक्ति क्यों न करे? [ यदि अध्यापनके विना मी लौकिक अध्ययनके तुल्य ही 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' अध्ययनका विधान होता, तो लिखितके ही बलपर पढ़नेकी निन्दा और अध्ययनमें आचार्यपूर्वकत्व आदि नियम न होता। इस
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अध्ययनविधिम अध्यापनविधिप्रयुक्तत्व ] भापानुवादसाहित ४८१
धी्वेतिवाक्यार्थ आचार्यत्वस्याऽध्यापनादुत्तरकालभावित्वादिति, तदसत्; तद् द्वितीयं जन्म। तद् यस्मात्स आचार्य हत्युपनयनाख्यद्वितीयजन्महेतुत्व- मात्रेणाSSचार्यश्रवणाद्। 'आचिनोति हि शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि। स्वयमाचरते यस्मादाचार्यः स उदाहृतः ।।' इति स्मृतावाचारे शिप्यान् स्थापयतीति व्युत्पत्तिः प्रतीयत इति चेद्, एवमप्यध्यापनात् पूर्वमाचार्यत्वमविरुद्धम्। अध्यापनादाचार्यत्वस्योच्तरकाल-
प्रकार उक्त निन्दा तथा नियमसे मानना होगा कि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इससे विहित अध्ययन अध्यापनकी प्रयुक्ति करता ही है] । यदि 'आचार्यके अधीन होकर पढ़ो, इसमें आचार्यकरणविधिके प्रमाणसे ही 'पढ़ो' ऐसा वाक्यार्थ है, कारण कि अध्यापनके ही अनन्तर आचार्य होना उपपन्न हो सकता है' ऐसा सिद्धान्त हो, तो वह मी उचित नहीं है, कारण कि 'उपनयन संस्कार ( दविजा- तिका) दूसरा जन्म है। वह दूसरा जन्म जिसके द्वारा होता है, वह आचार्य कहलाता है। इस वचनसे उपनयननामक द्वितीय जन्मका कारण होनेसे आचार्य जाना श्रुतिसे सिद्ध हैं। 'जो शासार्थका आचयन-ज्ञानवृद्धि-कराता है तथा आचारमें स्थापित मी करता है [ अर्थात् श्रति तथा स्मृतिमें कहे गये नियमोंके अनुसार शिष्योंके व्ववहारकी व्यवस्था भी बांधता है] और स्वयं तदनुसार आचरण करता है, इससे वह आचार्य कहलाता है। इस स्मृतिमें 'शिष्योंको आचारमें लंगाए रखना' ऐसी व्युत्पत्ति प्रतीत होती है। [ उपनयन करानेसे आचार्य कहलाता है, ऐसा नहीं है। ] ऐसा कहो तो भी अध्यापनसे पूर्व ही आचार्य होनेमें कोई विरोध नहीं। यदि आचार्यपदवीकी सिद्धि अध्यापनके अनन्तर मानी जाय, तो आचार्यकरणविधिप्रयुक्त- 'पढ़ो' ऐसा अध्याहार सहित योजनाका प्रसङ्ग होगा। 'आचार्याधीनोऽधीष्व' यहांपर तत्पदसे उपनयन लिया जाता है। [अर्थात् आचार्य होना उपनयन संस्कारसे ही हो सकता है। अध्यापनके उत्तर कालमें ही नहीं ]। ६१
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४८२ विवरणप्रमेयसग्रह् [सूत्र १, वर्णक ३
भावित्वे चाचार्यकरणविधिप्रयुक्तोऽधीष्वेति साध्याहारयोजना प्रसज्येत । तस्मादधिकारिकल्पनासाम्यादित रेतरप्रयुक्तिसाम्याच्च काम्यविधिप्रयुक्ति- सम्भवेऽध्ययनस्य कथमध्यापनविधिप्रयुक्तिरिति। अत्रोच्यते-नाऽध्यापन- विधेरधिकारी कल्पनीयः, श्रुतिस्मृत्योः अतीयमानत्वाद्। तथाहि- 'अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनधीत'इति श्रुतावात्मनेपदेनाSSचार्यकरणसाध्यता प्रतीयते, संमाननोत्सञ्ज नाचार्यकरणेत्यादिना व्याकरसूत्रेणSSचार्यकरणे साध्ये तद्विधा- नात्। न चाऽऽचार्यत्वम्, करिश्चिल्लोके प्रसिद्धमस्ति ततो यथाऽडहवनीये जुहोतीत्यत्राऽऽहवनीये होमाधारत्वेन विनियुक्ते सत्यसंस्कृतस्य होमाधारत्वा- योगात् संस्कृतस् सम्भवाच्ाSSधानसंस्कृतोऽगनिराहवनीयत्वेन निश्चितः तथा
इस वाक्यमें अध्याहार करके 'आचार्याधीन' 'आचार्यकरणविधिप्रयुक्तोऽघीष्व' ऐसा करना होगा। इसकी अपेक्षा 'ओदनं पचति'-या 'गृहस्थः सदशी भार्यामुपेयात्' इंत्यादि वाक्योंमें जसे पाचक या गृहस्थ शब्दोंका प्रयोग भावी संज्ञाके आश्रयणसे होता है, वैसे ही आचार्यशब्दके प्रयोगको भावी संज्ञाके आश्रयणसे उपपन्न कर अध्यापनसे अध्ययनकी प्रयुक्ति मानना ही उचित है, इस आशयसे सिद्धान्ती प्राभाकरमतके दूषक प्रघट्टकका निर्णय करते हैं-इस- लिए पूर्वोक्त युक्तियोंके वलसे अधिकारीकी कल्पना तथा एक दूसरेकी प्रयुक्ति करनेमें समानता होनेसे काम्यविधिकी प्रयुक्तिका सम्भव होनेमें अध्यापनविघिसे अध्ययनकी प्रयुक्ति कैसे होगी? प्रभाकरानुयायीं द्वारा सिद्धान्तीकी उक्त शङ्कामें कहा जाता है। अध्यापनविघिके अधिकारीकी कल्पना नहीं करना है, कारण कि श्रुति तथा स्मृतिमें ही उसकी प्रतीति सिद्ध है। जैसे कि श्रुति है-'आठ वर्षके ब्राह्मणका उपनयन संस्कार करना . चाहिए' इस श्रतिमें आत्मनेपदसे आचार्यकरणमें भाव्यता-साध्य होना- प्रतीत होती है, कारण कि 'संमाननोत्सञ्जनाचार्यकरण-' इत्यादि व्याकरणसूत्रसे आचार्यकरणके साध्य होनेमें आत्मनेपदका विधान किया जाता है। घट, पट आदिके तुल्य माचार्यपदार्थ लोकमें कोई प्रसिद्ध है ही नहीं, इसलिए जैसे-'आहवनीयमें हवन किया जाता है' यहांपर आहवनीयका होमाधारके रूपमें विनियोग किये जानेपर संस्काररहित अगिमें होमाधारताका सम्भव नहीं है, अतएव आधाननामक संस्कारसे संस्कृत अग्नि ही आह्वनीय
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अध्ययनविधिमें अध्यापनविधिप्रयुक्तत्व] भापानुवादसहित
'आचार्याय गां दद्यात्' इत्यत्राऽऽचार्य दक्षिणां प्रति सम्प्रदानत्वेनाऽवगते सत्यनुपकारिण: सभ्प्रदानत्वायोगादुपकारिणोऽत्र सम्भवाच्चीपनयननिष्पादना- ख्येनोपकारेण माणवकं प्रत्युपकुर्वत आचार्यत्वं निश्चीयते। नन्वेवमप्युप- नयनसाध्यमाचार्यत्वं भवेनाऽध्यापनसाध्यमिति चेद्, न; उपनयनस्ाऽध्या- पनाङ्गत्वात्। 'उपनयीत तमध्यापयीत' इत्येकग्रयोगतावगमात्, नच निरपेक्ष- विधिभेदान्न प्रयोगैक्यमिति चाच्यम्, उपनीयाऽध्यापयेदित्वेवंप्रयोगैक्य- कल्पनात्। तमिति प्रकृतपरामर्शिना तच्छदेन कर्मैक्यप्रतीतेः। न चोप- नयनस्याऽध्यापनाङ्गत्वेऽप्यध्ययनस्य न तत्प्रयुक्तिरिति वाच्यम्, माणवक- विपयाध्यापनेनाSSचार्यत्वं भावयेदिति वाक्यार्थस्वीकरणेनाSSध्यापनक्रियानि- वर्तकतया माणवकस्य क्रियां प्रति गुणभूतत्वाद् उपकारकत्वे वक्तव्ये दृष्टे सत्य- टष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वाद् उपगमनाध्ययनाभ्यामुपकरोतीति कल्प्यत्वात्। रूपसे निश्चित माना गया, ऐसे ही आचार्यके लिए दक्षिणामें गाय देनी चाहिण. 'यहांपर आचार्यको दक्षिणाके प्रति सम्प्रदानत्व-उद्देश्यत्व-प्रतीत हुआ, परन्तु अनुपकारी सम्प्रदान-उद्देश्य नहीं हो सकता, और यहांपर उपकारीका होना सम्भव है, इसलिए उपनयनसंस्कारके सम्पादनरूप उपकारके द्वारा माणवकका उपकार करनेवालेमें ही आचार्यत्व निश्चित होता है, ऐसा माननेपर भी उपनयनके द्वारा आचार्यत्वकी सिद्धि होगी, अध्यापन द्वारा नहीं; ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि उपनयन अध्यापनका ही अङ्ग है। 'उपनयन करे' और 'उस उपनीतको पढ़ावे' इन दोनों विधियोंमें एकप्रयोगत्व प्रतीत होता है। निरपेक्ष विधिके मेदसे एकप्रयोग होनेका निषेध नहीं कर सकते, कारण कि 'उपनयन संस्कार कराके अध्यापन करावे' इस प्रकार एक ही प्रयोगकी कल्पना होती है, क्योंकि तत्शब्दके प्रकृत परामर्शी होनेसे तत्शव्दसे दोनोंमें एककर्मत्वकी प्रतीति होती है। 'माणवकके अध्यापनसे आचार्यत्वकी भावना करे' इस प्रकार वाक्यार्थका स्वीकार करनेसे अध्यापनक्रियाके सम्पादक होनेसे गुणभूत माणवकमें अध्यापनक्रियाके प्रति उपकारकत्व कहना होगा, कारण कि दष्ट फलके रहते अदष्ट फलकी कल्पना करना अन्याययुक्त होता है। [ माणवकका उपकारफत्व दिखलाते हैं-] माणवक उपगमन-गुरुके समीपमें नियमपूर्वक बैठने और अध्ययनसे [अध्यापन] क्रियामें उपकार करता है, ऐसी ही कल्पना करनी चाहिए। .
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, चर्णक ३
ननूपनयनाध्ययनाभ्यां निष्पाद्यस्याऽध्यापनस्य यद्यप्याचार्यत्वं फलं तथापि श्रुतावधिकारी कल्पनीयः, एतत्काम इत्यश्रवणादितति चेद्, न; कामोपवन्ध- मात्रस्य कल्प्यत्वात्। ततश्र अ्तावुपनीयाऽध्यापयेदाचार्यकरणकाम इत्येवम- ध्यापनविधि: साधिकार: सम्पद्यते, तथा स्मृतावपि। 'उपनीय तु य: शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः । सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते।।' इत्युपनयनाध्यापनयो: प्रयोगैक्यादध्यापने विधिश्रवणादाचार्यत्वफल- अ्रवणाच्ाSSचार्यत्वकामो माणवकमुपनीयाघ्यापयेदिति निष्पाद्यते। अध्ययने तु नाऽधिकारनिमित्तम्, किश्चिच्छुतमस्तीति विशेपः। न चाऽध्ययनस्य स्वतन्त्रविध्यन्तरविहितस्य कथ स्वतन्त्रविध्यन्तरप्रयुक्तानुष्ठानमिति शङ्क- नीयम्, आधानद्ष्टान्तेन प्रयुक्तत्वात्। आधाने हि ब्राह्मणोऽग्निमादधीतेति
शङ्ा-उपनयन और अध्ययनसे सिद्ध होनेवाले अध्यापनका यद्यपि आचार्य- पद पाना फल है, तथापि श्रतिमें अधिकारीकी कल्पना करनी ही होगी, क्योंकि अमुक कामनावाला पुरुष [ अध्यापन करे ] ऐसा अधिकारीका श्रवण नहीं है। समाधान-ऐसा नहीं, कारण कि केवल कामनाके सम्बन्धमात्रकी कल्पना होती है। इससे ही श्रुतिमें आचार्यकरणकी इच्छावाला शिष्यका उप- नयन करके अध्यापन करे, इस प्रकार अध्यापनविधि साधिकार हो जाती है, ऐसा स्मृतिमें भी कहा है। जो ब्राह्मण शिष्यका उपनयनसंस्कार करके रहस्य तथा कल्पके सहित वेदका अध्यापन करे, उसको आचार्य कहते हैं। इस तरह श्रति तथा स्मृतिसे उपनयन तथा अध्यापन दोनोंका एकप्रयोगत्व होता है। तथा अध्यापनमें श्रौतविधि है और आचार्यत्व- रूप फल भी ्रुतिसिद्ध है, इसलिए आचार्यत्वकी इच्छासे 'माणवकका उपनयनसंस्कार करके अध्यापन करावे' इस प्रकार अधिकारकी निष्पत्ति की जाती है। अध्ययनमें तो अधिकारका निमिच कोई सुननेमें नहीं आया है, इतना विशेष है। स्वतन्त्र दूसरी विघिसे विहित अध्ययनके अनुष्ठानकी प्रयुक्ति स्वतन्त्र दूसरी विधिके द्वारा न हो सकनेकी शक्का नहीं करनी चाहिए, कारण कि आधानके इष्टान्तसे ऐसी प्रयुक्ति देखी गई है। क्योंकि आधान-अग्न्याधान-
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अभाकर मतका निराकरण ] भापानुवादसहित ४८५
श्ुयते। तत्र किमाधानं स्वातन्त्र्येणाऽनुप्ठेयम् उताऽन्यप्रयुकत्या। आद्येऽपि न तावद् पुरुपमुददिश्य नित्यतया स्वतन्त्रमाधानं विधातुं घक्यम्, ग्रोक्षणादि-
स्वतन्त्रकाम्यतया तद्विधेयं फलाश्रवणात्। न च सकुन्यायेन गुणप्रधान- वैपरीत्यकल्पनया नित्याधिकारता कामाधिकारता वा शङ्कनीया। भस्मी- भूतसक्तुना उपयोगासम्भवेन तत्र वेपरीत्यकल्पनेऽपि प्रकृते संस्कृताये: क्रत्वन्तरे विनियोगयोग्यतया तदसम्भवाद। द्वितीयेऽपि किमाधानस्योत्तर-
संस्कारमें 'ब्राह्मण अग्निका आधान करे' यही श्रुतिका अर्थ है। उसमें विकर्प होता है कि क्या आधानका स्वतन्त्र अनुष्ठान होता है ? अथवा दूसरे विधानकी प्रयुक्तिके वलसे होता है? प्रथम पक्ष माननेपर भी पुरुपको उद्देश्य करके नित्यत्व- रूपसे आधानका स्वतन्त्र अनुष्ठान नहीं हो सकता, कारण कि प्रोक्षण आदि संस्कारके सदश कर्मकारकके संस्काररूप आधानका कर्मभूत द्रव्यके संस्कारमें तात्पर्य होनेसे अग्नि ही उद्देश्य है, काम्यरूपसे मी उसका विधान नहीं हो सकता, क्योंकि फलका श्रवण नहीं है। सक्तुन्यायसे गुण-प्रधानमावकी विपरीत करपना करके नित्य अधिकारका काम्य अधिकारमें परिवर्तन करनेकी आशङ्का नहीं की जा सकती, कारण कि भस्म किये गये सक्तुसे किसी कार्यका होना सम्भव नहीं है, इसलिए 'सक्तून् जुहोति' इस स्थलमें गुण-प्रधानभावमें विपरीत कल्पना करनेपर भी प्रकृतमें संस्कारसे युक्त अग्निकी दूसरे यक्षमें उपयोगयोग्यता होती है, इस- लिए सकुन्यायसे विपरीत करपनाका सम्भव नहीं है। दूसरे पक्षमें-दूसरे द्वारा पयुक्तिसे अनुषेय माननेमें-मी क्या आधानकी अग्रिम नित्य यज्ञके विधान द्वारा प्रयुक्ति होती है ? अथवा-अग्निम-काम्यविधि द्वारा: इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, कारण कि उपादेयसे मिन्न उद्देश्यभूत आहवनीयका-होमाधारभूत अग्निका-नित्य अथवा काम्य दोमें से किसीके भी विधान द्वारा प्राप्त हुई प्रयुक्तिसे अनुष्ठान करनेका विपय होना सम्मव है नहीं, [ उपादेय ही अनुष्ठेय होता है, और वह क्रियासे पूर्व असिद्ध होता है। अग्नि आधानसे पूर्व सिद्ध है और आधान उद्देश्य है, इसलिए वह अनुष्ठेय नहीं हो सकता। ] इस तात्पर्यको स्पष्ट करते ६१
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४८६ विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र १, वर्णक ३ै
विधिरनुष्ठापयति । अन्यथा स्वर्गकामादीनामप्यनुऐ्ठेयत्वप्रसङ्गात्। तस्मादु- त्रकाम्यक्रतुविधिप्रयुक्ति: परिशिष्यते। नहि विधिरिव कामोप्युपादेय- मेवाऽनुष्ठापयति येनोक्तदोप: स्यात्। किन्तु यद्यदुद्देश्यमुपादेयं वा विना काम्यमानस्य न सिद्धिस्तत्सर्व विधिसहकारितयाऽनुष्ठापयति। दृश्यते हि लोके विधिरागयोवैंषस्यम्। 'सौवर्णपीठे समुपविशेत्' इति विधिस्तथाविध- पीठाभावे पुरुषं न तत्रोपवेशयति रागस्तु तथाविधं पीठमुत्पाद्याऽपि तत्र निवेशयति। एवं च सति प्रकतेऽप्याचार्यकरणकामनैवाSडचार्यप्रेरणद्वारेणाS- ध्यापनसिच्धर्थ माणवकेनाऽड्ययनं निर्वर्तयतीति स्थितम्। तदेतत्प्राभाकरमतं वेदान्तिनो न बहु मन्यन्ते। तथा हि-किं 'तमध्य- ध्यापयीत' इत्यत्राSSचार्यत्वं विधेयम् उत विधिरूपमथवा नैयोगिकं फलम् ? हैं-विधि उपादेयका ही अनुषान कराती है। इसके विपरीत-यदि उद्देश्य भी अनुष्ठेय माना जाय, तो स्वर्गार्थी आदि अधिकारी भी अनुष्ठेय होने लगेंगे। इससे अगले काम्य क्रतुओंके कारण प्राप्त हुई प्रयुक्तिसे अनुष्ठेय मानना, यह दूसरा पक्ष ही अवशिष्ट रहता है। विधिवाक्यके सडेश कामना भी उपादेयका ही अनुष्ठान कराती है, ऐसा कोई नियम नहीं है, जिससे कि अनुपादेयका अनुष्ठेय होनेका असम्भवरूप उक्त दोषका प्रसञ्त हो, किन्तु नियम यह है कि जिस-जिस उद्देश्य अथवा उपादेय-साध्य-के विना कामनाविषयकी सिद्धि नहीं हो सकती है, उन सबका ही कामना प्रधानविधिके सहकारीरूपसे अनुष्ठान कराती है। लोकमें विधि और कामनामें वैषम्य-मेद-देखा गया है। जैसे विधि है 'सोनेके पीठ-आसन-पर बैठे'। परन्तु उक्त विधान सुवर्णनिर्मित आसनके न होनेपर पुरुषको ऐसे पीठपर नहीं बैठा सकता-[ इसके विपरीत, राग-कामना-तो ऐसे सुवर्णपीठको बनवाकर भी उसमें पुरुषको बैठा सकता है, इस प्रकार दोनोंमें वैषम्य हो जानेसे आचार्यकरणकी कामना ही आचार्यकी पेरणा करके अध्यापनकी सिद्धिके लिए माणवक द्वारा अध्ययनका अनुष्ठान कराती है, ऐसा सिद्धान्त स्थिर हुआ अर्थात् अध्यापन द्वारा उत्पन्न हुई प्रयुक्ति अध्ययनका अनुष्ठान करा देगी, इसमें अधिकारके श्रवणकी आवश्यकता नहीं है। इस पूर्वोक्त प्रभाकरके अनुयायियोंके मतको वेदान्ती अच्छा नहीं मानते हैं, क्योंकि 'उसको अध्ययन करावें' इस वाक्यमें क्या आचार्यत्व विघेय है: अथवा विधिका स्वरूप है: या लिडर्थ-नियोगका फल है? इनमें प्रथम विकल्प नहीं
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भभाकर मतका निराकरण] भांपानुवादसहित ४८७
नाऽडद्य, उपनयनाऽध्यपनभावार्थवियत्वाद्विये:। न द्वितीय:, आत्मने पदमात्रभिधेयस्याSSचार्यत्वस्य विधिपदानभिधेयतया विधिरूपत्वायोगात्। न तृतीय:, 'अचारान् ग्राहयति' इति व्युत्पच्या हेतुकर्तत्वनिवन्धनस्याSडचा- र्यत्वस्य लौकिकत्वात्, अलौकिकस्यैव नैयोगिकत्वात्। न चोपनयनसाध्य- त्वादलौकिकमाचार्यत्वं स्यादिति वाच्यम्, द्वितीयं जन्म तद्यस्मात् स आचार्य इति स्मृतावुपनयन श्रति हेतुकर्तृत्वस्यैव लौकिकस्याSडचार्यशन्दनिमित्तत्वा- वगमात्। यद्याचार्य त्वमलौकिकं स्यात् तदा व्याकरणसूत्रे सँमाननादिभिलौंकि- कार्थः सह कथ पठ्येत ? नतु विधायकपत्ययश्रवणाद् नियोगः प्रतीयते, तस्य नियोज्यविशेषणाकाल्कायां स्वर्गवन्नियोगसाध्यत्वेनैव नियोज्यविशे- पणत्वमाचार्यस्याऽम्युपेतव्यम्, कारकफलस्य तदनुपपचे: । न चाऽडचार-
माना जा सकता, कारण कि विधिका उपनयन तथा अध्यापनरूप अर्थ विषय है, [आचार्यत्व विषय नहीं है ] दूसरा पक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि केवल आत्मने- पदका ही अर्थ आचार्यत् है, इसलिए आचार्यत्व विधिपद (लिडादि) का अर्थ न होनेसे विघिका स्वरूप नहीं हो सकता। तीसरा पक्ष भी नहीं कह सकते, क्योंकि आचार्यपदकी 'आचारोंका ग्रहण करानेवाला' ऐसी व्युत्पत्ति होनेसे हेतु और कर्ता होनेके कारण उत्पन्न हुआ आाचार्यत्व लोकसिद्ध पदार्थ है। [अतः उसे नियोगफल नहीं मान सकते, कारण कि अलौकिक पदार्थ ही नियोगका फल माना गया है। उपनयनविधिका साध्य-विषय-होनेसे आचार्यत्व अलौकिक होगा, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि जिसके कारण द्वितीय जन्म होता है अर्थात् जो द्विजन्मा-व्यपदेशका हेतु है, वह आचार्य कहलाता है, इस स्पृतिमें लोकसिद्ध हेतुकर्तृत्वरूप ही आचार्यशब्दका प्रवृति- निमित्त प्रतीत होता है। यदि आचार्यत्व अलौकिक होता, तो व्याकरणसूत्रमें संमानन आदि लौकिक अर्थोंके साथ आचार्यकरणका पाठ कैसे होता है? शक्का-'अध्यापयीत' इत्यादि विधिबोधक प्रत्ययके श्रवणसे नियोगकी प्रतीति होती है। उस नियोगको नियोज्य-विशेषणकी आकाङ्वा होनेपर स्वर्गके तुल्य नियोगसाध्य होनेसे आचार्यको ही नियोज्यविशेषण मानना चाहिए, कारण कि फल नियोज्यका विशेषण नहीं हो सकता। उपनयन- विघिमें आचारग्राहकत्वरूप हेतुकर्तृत्व आचार्यशब्दका प्रवृत्तिनिमिचत नहीं
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विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३ं
ग्राहकत्वमुपनयने हेतुकर्तृत्वं चाऽऽचार्यशव्दप्रवृत्तिनिमित्तम्, विकल्पापतेः। अतो मन्त्राद्यलौकिकसाधनान्तरविधानादलोकिकमाचार्यत्वम्। सम्मानना- दीनां तु तदभावाद्भवतु लौकिकत्वम्। अतस्तैः सह पाठेऽप्यलौकिकमेवाSS- चार्यत्वमिति चेद्, एवमप्युपनयननियोगफलं भविष्यति, तेनाऽध्यापनविधे: कुतः साधिकारता ? अथ मतमुपनयने अ्ुतमप्याचार्यत्वमध्यायनफलं भविष्यति, उपन- यनस्य तदङगत्वादिति; तन्न, तथा सत्यङ्गेघु फलश्षुतिरर्थवाद इति न्यायेनाSSचार्यत्वस्य नियोज्यविशेषणत्वासंभवप्रसङ्गात्। नन्वेवं सत्यनधि- कारमध्ययनं सर्वथा नाऽनुष्ठीयेतेति चेद्, न; उपनीतस्याऽध्ययनाधिकार-
हो सकता, कारण कि ऐसा माननेमें विकल्पकी आपत्ति होगी। इसलिए मन्त्रादि अलौकिक साधनोंसे भिन्न साधनों द्वारा सिद्ध किया गया आचार्यत लौकिक ही है। [ यद्यपि आचारश्राहकत्वरूप आचार्यत्व लौकिक है, तथापि उपनयन संस्कार तथा साङ्गोपाङ्ग अध्यापनविशिष्ट आचारग्राहकत्वरूप आचार्यत्वके लोक- सिद्ध न होनेसे उसे अलौकिक ही मानना चाहिए ] सम्मानन आदि अलौकिक मन्त्रादि साधनोंसे सम्पन्न नहीं है, इसलिए वे लौकिक कहे जाते हैं, इस कारण उन लौकिक सम्मानन आदिके साथ पाठ होनेपर भी आचार्यतव अलौकिक ही है। समाधान-यद्यपि ऐसा मान भी लिया जाय अर्थात् उक्त प्रकारका विशिष्ट आचार्यत्व अलौकिक मान भी लिया जाय, तो भी वह उपनयनरूप नियोगका ही फल होगा, इससे अध्यापनविधिका अधिकारयुक्त होना कैसे हो सकता है! शक्का-यद्यपि उपनयनविधिमें आचार्यत्वका श्रवण है, तथापि वह अध्यापनका फल माना जायगा, कारण कि उपनयन अध्यापनका अ- उपकारक-है। समाधान-ऐसा नहीं है, कारण कि अध्यापनके अन्गभूत उपनयनके फलरूपसे आचार्यत्वको अध्यापनका फल माननेमें 'अज्गोंमें फलका श्रवण अर्थवाद है' इस न्यायसे आचार्यत्व नियोज्यका विशेषण नहीं हो सकेगा। शङ्का-इस प्रकार तो अधिकाररहित अध्ययनका किसी भी दशामें अनु- ष्ान पाप्त नहीं होगा.
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अध्ययनमें स्वविधिश्रयुक्तता] मापातुवादसहितं
त्वात् ; वाजसनेयिशाख्ायासुपनयनं ग्रकम्याऽध्ययनस्य विहितत्वात्। सर्वं- स्मृतिपु चोपनीतोऽधीयीतेत्यवगमात्। अतोऽध्ययनस्य स्वविधिप्रयुक्ता- सुष्ठानोपपत्ती तदनुष्ठानसिद्धयेऽध्यापनेऽिकारिणं परिकल्प्य न मन: खेदनीयम्। ननु न तं कल्पयामि किन्त्वत्सत्येव सः, श्रुतौ दुःसंपादत्वेपि 'उपनीय तु यः शिष्यम्' इत्यादिमनुवाक्येन तदवगमादिति चेद्, न; तद्वाक्यस्योपनयनाध्यापनानुवादेन कर्तुराचार्यसंज्ञाविधायकत्वाद्, वाक्य- गतयत्तच्छव्दाभ्यामनुवाद्विध्योर्निश्रयात्। आचार्यसंज्ञायाश्च नमस्कारा- दिविधानेपृपयोगात्। नन्वेवमप्यप्रवुद्धस्य माणवकस्योपनीतस्य स्वाधिकारं
समाधान-उपनयनसंस्कारसे संस्कृतका ही अधिकार प्राप्त है, कारण कि बाजसनेयिशाखामें उपनयनका उपक्रम करके अध्ययनका विधान किया गया है, तथा सब स्मृतियोंमें 'उपनीतको ही पढ़ाना चाहिये' ऐसा ही मिलता है। इस कारण अध्ययनके अनुष्ठानकी अपने ही विधानसे उपपत्ति हो जानेसे उसके अनुष्ठानकी सिद्धिके लिए अध्यापनविधिमें अधिकारीकी कल्पना करके मनको परिश्रम नहीं देना चाहिए। शङ्का-हम अध्यापनविधिमें अधिकारीकी कल्पना नहीं करते हैं, किन्तु ग्रह तो है ही। यद्यपि श्रुतिमें सुगमतासे अधिकारीका सम्पादन नहीं हो सकता, तथापि 'जो शिष्यका उपनयन संस्कार करके' इत्यादि मनुवचनसे उसकी प्रतीति होती है, [इसलिए उसकी कर्पना करनेकी आवश्यकता नहीं है।] समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, मनु आादिका वह वचन उपनयन और अध्यापनका अनुवाद करके कर्ताकी आचार्यसज्ञाका विधायक है, क्योंकि वाक्यमें आये हुए 'यत्' और 'तत्' शव्दसे अनुवाद और विधिका निश्चय होता है। नमस्कार आदिके विधानमें आचार्यसंज्ञाका उपयोग होता है [इससे आचार्यसंज्ञाको व्यर्थ होनेका प्रसम्न नहीं आता। ] शक्का-अप्रबुद्ध तथा उपनीत शिष्य अपना अधिकार प्राप्त कर अध्य- यनका अनुष्ान नहीं कर सकता, इसलिए अध्यापनका विधान ही कथंश्चित् अधिकारयुक्त हो अध्ययनकी भी मयुक्ति करा ही देता है।
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४९० विवरणप्रमैयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
प्रयुङ्क्त एवेति वाच्यमिति चेत्, तत्र किमध्यापनविधिरविहितमध्ययनं प्रयुङ्क्ते उत विहितम् 2 नाऽडद्य:, अध्ययनविध्यप्रेरितानां तत्र प्रयोजन- शून्यानां पुरुषाणामाचार्य प्रति गुणभावेन प्रवृत्त्ययोगात्। द्वितीये विधि- स्वरूपसिद्धयेऽध्ययनेऽधिकार्यपि स्वीकार्यः । विपय एव विधिस्वरूपसाधको नाडधिकारीति चेत, तर्हिं विहितस्याऽव्ययनस्याऽधिकारिविशेपाभावाद्यं कंचि- दध्यापयेदिति प्राप्नुयात्। तस्मात् प्रकरणसमपितनोपनीतेनाऽधिकारिणा साधिकारोऽन्ययनविधि: स्वयमेव स्वविपये पुरुपं प्रवर्तयति। अन्यथा स्वाधि- कारविधिनैवाSप्रवर्तितस्य प्रवृत्त्यसम्भवात्। न च चालकस्य स्वाधिकारप्रतिपन्य-
समाधान-ऐसी शङ्का नहीं करते, कारण कि ऐसा माननेमें विकर्प हो सकते हैं कि क्या अध्यापन अविहित अध्ययनकी प्रयुक्ति करता है अथवा विहितकी : प्रथम पक्ष नहीं माना जा सकता, कारण कि अध्ययन विघिसे अप्रेरित और उसमें प्रयोजन शन्य पुरुषोंकी आचार्यके प्रति गुणभावसे प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। [ जिनका वेदके अध्ययनमें अधिकार नहीं है, ऐसे द्विजे- तर वर्णी और अनुपनीतके लिए 'अध्येतव्यः' इस पदमें आये तव्यप्रत्ययके लिए नियोग प्रेरणा ही नहीं करता, अतएव उनको आचार्यका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता, इससे सिद्ध हुआ कि आचार्यकरणका विधान अविहित लौकिक अध्ययनकी प्रयुक्ति नहीं कर सकता। ] विहित अध्ययनका अध्यापन प्रयोजक है, इस दूसरे विकल्पमें विधिके स्वरूपकी सिद्धिके लिए अध्ययनमें अघिकारी भी मानना ही होगा [अधिकारीके बिना विधिका स्वरूप ही नहीं वन सकता।] विषय ही विधिके स्वरूपका प्रतिपादक होता है, अधिकारी नहीं, ऐसा यदि कहो, तो विहित अध्ययनका अधिकारीविशेष निर्दिष्ट न होनेसे 'जिस किसी [ अनघि- कारी] को भी पढ़ावे, ऐसा 'अतिसङ्ग' प्राप्त हो जायगा। इसलिए प्रकरण- पाप्त उपनीत अधिकारीके द्वारा अधिकारयुक्त अध्ययनका विधान स्वयं अपनेमें पुरुषकी प्रवृत्ति करा लेगा [अध्ययनके अनुष्ानकी प्रयुक्ति अध्ययन द्वारा माननेकी आवश्यकता नहीं है, अन्यथा स्वाधिकारविधिके द्वारा प्रवृत्त न किये गये पुरुषकी प्रवृत्तिका सम्भव नहीं है। [ जिस विधानमें पुरुष अपना अधिकार नहीं समझता, उसे करनेके लिए उसकी प्रवृत्ति नहीं देखी गई है, इसलिए अपने अधिकारकी विधिसे मेरित होकर ही पुरुष प्रवृत्त होता है] बोधरहित बालकको
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अध्यापनकी अनित: ता ] भापानुवादसहित ४९१
सभ्भवः, विध्यर्थापरिज्ञानेऽपि संध्योपासनसमिदाहरणादिकर्त्तव्यताप्रतिपत्तिव-
विधिप्रयुक्तौ नाऽयं केशः, आचार्यस्य प्रबुद्धस्य स्व्राधिकार प्रतिपतुंशक्यत्वाद्। यद्यपि कश्षित् प्रेक्षावान् माणवको न स्व्राधिकारमवुद्ध्वा प्रवर्त्तेत तथाप्यन्योऽप्र- बुद्धू आचार्यप्रेरितः अ्रवर्त्तिष्यत एव। ततः प्रवाहरूपेणाऽध्यापनं न विच्छि- दयत इति चेद, एवमप्याचार्य: किमन्येनोपनीतान्माणवकानव्यापयेद उत स्वरेनैवोपनीतान्, नाऽडद्यः, उपनयनस्याऽपि त्वन्मतेऽ्यापनाङ्गतया तद्वैकल्ये नियोगानिप्पचावाचार्यत्वफलाशिद्धेः। तर्हास्तु द्वितीयः, उक्तदोपाभावादिति अपने अधिकारका ज्ञान होना सम्भव नहीं है, यह कहना भी उचित नहीं है, कारण कि विधिका अर्थपरिज्ञान न होनेपर मी 'सन्ध्योपासन', 'समिधाओंका लाना' इत्यादि नसचारीके कर्तव्योंका जैसे पिता आदिके उपदेशके बलसे ज्ञान हो जाता है, वैसे ही उपदेशकी सामर्थ्यसे अध्ययनमें कर्तव्यताका ज्ञान होगा। शक्का-अध्ययनकी अध्यापन द्वारा प्रयुक्ति माननेमें यह केश (उपदेश- सामर्थ्यका आश्रयण) नहीं करना होता, क्योंकि प्रबुद्ध-विद्ञान्-आचार्य को अपने अधिकारका परिज्ञान होना सरल है। यद्यपि कमी-कभी चतुर वालक अपने अधिकारको जाने बिना अध्ययन आदि कार्यमें प्रवृत्त नहीं होते, तथापि दूसरा मन्दवुद्धि वालक आचार्यकी प्रेरणासे प्रवृत्त होगा ही। इस कारण प्रवाह- रूपसे प्राप्त अध्ययनका लोप नहीं होने पाता। अध्ययनविधिको स्वयं अधिकारशन्य माननेमें उसका अनुष्ठान सम्भव न होनेसे अध्यापनका उच्छेद होना सम्भव हो जाता है, इस आशकाका समाधान करते हैं कि यद्यपि चतुर वालक अधिकारके परिज्ञानके बिना अध्ययन नहीं करेंगे, तथापि भोले वालक गुरुकी मेरणा मानकर अधिकारकी जिज्ञासाके बिना प्रवृत हो ही जायँगे, और आचार्य तो प्रवुद्ध ही है, उसको अपने आचार्यत्वकी रक्षाके लिए वालकोंकी अध्य- यनमें प्रेरणा करना अमीष्ट ही है, अतः अध्यापनका लोप नहीं हो सकता।] समाधान-ऐसी आशक्ा करनेपर भी विकल्प होंगे कि क्या आचार्य दूसरेके द्वारा उपनयनसंस्कृत वालकोंको पढ़ावे? अथवा अपने ही द्वारा उपनीत वालकोंको? प्रथम कल्प माननेमें तुम्हारे मतमें उपनयन मी अध्यापनका अब्र होगा, अतः उसके अभावमें नियोगकी पूर्ति नहीं होगी इसलिए आचार्यत्वरूप फल भी सिद्ध नहीं हो सकेगा। अच्छा तो-स्वयं
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४९२ विवरणग्रमेयसंग्रह [.सूत्र १, वर्णक ३
चेदू, न; एवमपि नित्यानित्यसंयोगविरोधस्य दुरपवादत्वात्। तथा हि-अध्यापनं तावदनित्यम्, द्रव्यार्जनार्थत्वाद्। नह्याचार्यत्वमध्यापनफलं
चाऽटष्ट तत्फलत्वेन कल्प्यम्, दृष्टे सति तदयोगात। अस्ति टष्टम्- 'पृण्णां तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका। याजनाध्यापने चव विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ।।' इत्यध्यापनस्य द्रव्याजनोपायत्वेन स्मरणात्। ननु याजनस्य जीवि- कार्थत्वं युक्त ऋत्विग्भ्यो दशिणादिविधौ सति सर्वाङ्गानुष्ठापकस्य दक्षिणा- दयनुष्ठायकतया द्रव्यार्जनं निश्चित्य तदर्थिना याजने प्रवृत्तिसम्भवात्। अत्र
उपनयन कराकर अध्यापन करे-यह दूसरा पक्ष मानिये, क्योंकि इसमें प्रथम करपमें दिया गया दोष नहीं आता, ऐसा मी नहीं है, कारण कि ऐसा माननेपर भी नित्य तथा अनित्य पदार्थके संयोगका विरोध नहीं हटाया जा सकता। (विरोध दिखलाते हैं-) अध्यापन तो अनित्य है, कारण कि उसका प्रयोजन द्रव्य कामना है। [ काम्यविधि सब अनित्य हैं, कामनारहितको उनका विधान प्राप्त नहीं होता है ] अध्यापनका फल (प्रयोजन) आचार्यत्व नहीं हो सकता है, कारण कि (आचार्यत्व) सुख पाने एवं दुःखनिवारण करनेका उपाय न होनेसे पुरुषार्थ नहीं माना जा सकता। अध्यापनकी अदृष्ट फलकी करपना भी नहीं की जा सकती, कारण कि दृष्ट फलके रहते अदष्टकी कल्पना नहीं की जाती। अध्यापनका दष्ट फल है-ब्राह्मणके छः कर्मोमेंसे तीन कर्म उसकी जीविका है (अर्थात् धन कमानेके साधन हैं)। इन तीन कर्मोको दिखलाते हैं-पहला यज्ञ करना, दूसरा अध्यापन-पढ़ाना-और तीसरा शुद्ध परिग्रह-दान-लेना। इस प्रकार स्मृतियोंमें पढ़ाना द्रव्यु कमानेका उपाय कहा गया है।
शङ्का-यज्ञ कराना तो जीविकाके लिए ही मानना उचित है, कारण कि याजकोंके लिए दक्षिणादानका विधान है, अतः सर्वाज्रपूर्ण यज्ञका अनुछान करानेवाला ही दक्षिणा आदिका भाजन होता है, इसलिए द्रव्यार्जनका निश्चय करके द्रव्यकी इच्छासे यज्ञ करानेमें प्रवृत्तिका होना सम्भव है।
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अध्यापनकी अ्तित्यता] भापानुवादसहित ४९३
तु भृतकाध्यापननिपेधात्। प्रकारान्तरेण द्रव्यार्जनाभावाद् न तादर्थ्यम- ध्यापनस्येति चेद्, मवम् ; माणचकस्याऽध्ययनाङ्गत्वेन गुरुदक्षिणादिविधाना- - तस्माद् द्रव्यार्जनकामेनाऽनुष्ठेयत्वादध्यापनमनित्यम्। उपनयनाख्यस्तु संस्कारो नित्या, अकरणे दोपश्रवणात्। 'आपोड़गानु द्ाविशाचतुविशाच वत्सरात्।' इति त्रैवर्णिकानामुपनयनस्याऽमुख्यं कालमभ्यनुज्ञाय पश्चात्स्मर्यते। 'अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कताः । सावित्रीपतिता वात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ।।' 'नैतैरपूतैविधिवदापद्यपि च क्हिचित्। बामान्यौनांथ सम्बन्धानाचरेद् न्राम्मण: कचित् ।।' इति।
अध्यापनमें तो भृतकाध्यापनका (चेतन आदि लेकर अध्यापन करनेका) निषेष है और अध्यापनमें वेतन लेनेके अतिरिक्त दूसरे प्रकारसे द्रव्यार्जन होता नहीं, इसलिए अध्यापनको द्रव्यार्जनका निमित्त नहीं माना जाता। समाधान-माणचक शिष्यके लिए अध्ययनके अम्ञभूत (उपकारक) दक्षिणा- दानका विधान टोनेसे अन्गी-प्रधानभूत-अध्ययनमें प्रवर्तक-अनुष्ठान कराने- वाली-अध्यापनविधि ही दक्षिणा और शुश्पा-सेवा-आदि अक्गोंमें भी अनुषापक होती है। इस निष्कर्पसे द्रव्यार्जनकी इच्छासे किया जानेवाला अध्यापन अनित्य है। और उपनयनरूप संस्कार नित्य है, क्योंकि उपनयनसंस्कार न करनेसे दोपका श्रवण है- न्राम्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका यथाक्रम सोलह, वाईस तथा चौबीस वर्ष तक उपनयनका गौण काल है। इस प्रकार तीन वणोंके लिए उपनयनके गौण कालकी प्रतिज्ञा करनेके अन्तर स्पृतिमें कहा गया है कि इस निर्दिष्ट अवधिके अनन्तर इन तीनों वर्णोंका यदि उचित समयपर संस्कार नहीं किया गया, तो ये सावित्री- गायत्री-वतसे पतित होते हुए व्रात्य दोपसे दूपित होते हैं और इनकी आर्य- जन निन्दा करते हैं। तथा नागाणको इन अपवित्र पतित ब्राम्मणोंके साथ आपत्ि आ पड़नेपर मी लराल या यौन सम्बन्ध-विवाह आदि सम्बन्ध-नहीं करना चाहिए। ६३
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४९४ विवरणप्रमेयसंग्रह्द [सूत्र १, वर्णक ३
नन्वकरणे दोषश्रवणमात्रेणोपनयनस्य नित्यतायां आयश्चित्तस्याऽपि नित्यता असज्येत। 'अतीते चिरकाले तु द्विगुणं व्रतमर्हति।' इति प्रयश्चित्ताकरणनिमित्तदोपस्य निरासाय प्रायश्चित्तान्तरविधानाद् ।. नहि प्रायश्चित्त नित्यं दोपापनयकामिनाऽनुष्ठेयत्वात्। उच्यते, न आयश्वित्ताकरणनिमिच्तदोपनिरासाय द्विगुणं व्तसुच्यते किन्तु आयश्चित्तेन निराकर्त्तव्यस्य पूर्चदोपस्यैवाऽतीते चिरकाले द्विगुणवतापेक्षयैव निरास इत्युच्यते। अन्यथा आयश्ित्तानवस्थाप्रसङ्गात् । ततो नोपनयनस्य नित्यता- यामतिप्रसङ्ग:। तच्चोपनयनं नित्यभूतमध्ययनाङ्गत्वादङ्विनोऽध्ययनस्ाऽपि नित्यतां कल्पयति।
शङ्का-उपनयनके न करनेमें दोपका श्रवण होनेसे ही उपनयन संस्कार यदि नित्य माना जाय, तो इसके आयश्चितको भी नित्य मानना होगा। 'अधिक समय बीतनेपर द्विगुण त्रत करना चाहिए।' इस प्रकार प्रायश्चित न करनेसे उत्पन्न हुए दोषका निवारण करनेके लिए 'द्विगुण व्रतरूप' दूसरे प्रायध्धित्तका विधान किया गया है। इससे प्रायश्चित नित्य नहीं हो सकता, कारण कि दोष दूर करनेकी इच्छासे उसका अनुषान किया जाता है। [ इससे काम्य- विधान नित्य नहीं हो सकता ]। समाधान-प्रायश्चित न करनेसे उत्पन्न हुए दोषको दूर करनेके लिए. द्विगुण वतका अनुष्ठान नहीं है; किन्तु प्रायश्चित्से हटाये जानेवाले पूर्व दोषका अधिक समय बीतनेपर द्विगुणित व्रतकी अपेक्षासे निरास स्मृतिमें कहा गया है, प्रायश्चित्त न करनेसे उत्पन्न हुए नवीन दोषके निराकरणके लिए नहीं है। अन्यथा प्रायश्चितकी अनवस्थाका प्रसङ् हो जायगा। इससे उपनयन संस्कारको नित्य माननेपर भी अतिप्रसङ्ग नहीं हो सकता। और वह उपनयन नित्यविधिभूत अध्ययनका अङ्ग होनेसे अज्गीमृत अध्ययनमें भी नित्यताकी कल्पना करता है। शङ्का-उपनयनको अध्ययनका अङ्ग मानना उचित नहीं है, कारण कि अध्ययनका आरम्भ-उपक्रम-न करके ही उपनयनका विधान किया गया है।
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अध्ययनमें नित्यताकी कल्पना] भांपान्ुवांदसहित ४९4
यद्यनङ्गत्वे संस्कारकर्मत्वं नोपपद्यते, तर्हिं हिरण्यधारणवद् गत्यन्तरं कल्प- नीयम्। 'हिरण्यं भार्यम्' इत्यत्र हिन तावद्विरण्यधारणस्य प्रयाजादिवदर्थक- रमता घटते, कर्मकारकप्राधान्येन विधानात्। यदि संस्कारकर्मत्वं तदाS- पि संस्कार्यहिरण्यद्वारा ऋतुविशेपेण संवध्येत उत कतुमात्रेण। नाऽडध:, विशेपसंबन्धवोधकश्तत्यादीनामभावात्। न द्वितीया, एकस्य संस्कारस सर्वक्रतूपकारित्वानुपपत्तेः । अतः संस्कारकर्मत्वं परित्यज्याऽभ्युदयफल: स्त्रतन्त्रो विधिरभ्युपगतः । एवमुपनयनविधिरपि स्वतन्त्र एवाऽभ्युदयफल: स्यात्। अत्रोच्यते, अनारभ्याऽधीतस्योपनयनस्याऽध्ययनाङ्गत्ववोधकानां पूर्व-
ध्याक्षेपरूपोपादानप्रमाणेनोपनयनस्याऽध्ययनाङ्गत्वं सिध्यति। अनुपपननं
यदि अङ्ग न माननेमें उपनयन संस्कारकर्म नहीं वन सकता, तो हिरण्यधारणके सष्टान्तसे दूसरी गतिकी करपना करनी चाहिए। [हिरण्यधारणदष्टान्तमें गतिकरपना दिखलाते हैं ]-'हिरण्य-सुवर्ण-धारण करना चाहिए' इस विधानमें सुवर्णका धारण प्रयाज आदिके समान अर्थकर्म नहीं वन सकता, कारण कि कर्मकारककी प्रधानतासे उसका विधान किया गया है। ('भार्यम्ं' इस पदमें प्रत्ययार्थ कर्मरूप अर्थ प्रधान है) यदि वह संस्कारकर्म माना जाय, तो ग्रइन यह होगा कि क्या संस्कार्य हिरण्य द्वारा यज्ञविशेपसे वह सम्बद्ध होगा? या यज्ञ- सामान्यसे: प्रथम कल्प नहीं बन सकता; क्योंकि विशेष करतुके साथ सम्बन्धका वोध करनेवाले श्रुति आदि कोई प्रमाण नहीं हैं। दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि एक संस्कार सब क्रतुओंका उपकारक नहीं वन सकता। इसलिए संस्कार- कर्म माननेका परित्याग करके उसे अम्युदय देनेवाला स्वतन्त्र ही विधान माना गया है। इसी प्रकार उपनयनको भी अभ्युदय देनेवाली स्वतन्त्र विधि ही मानना चाहिए, अध्ययनका अङ्ग नहीं मानना चांहिए। समाधान-इस आशक्कामें कहा जाता है-किसीका उपक्रम न करके पढ़े गये उपनयनविधानमें अध्ययनकी अङ्गताके बोधक पूर्वमीमांसाके तीसरे अध्यायमें कहे गये श्रुति आदि प्रमाण न होते हुए भी उसी शास्त्रके चौथे अध्यायमें कहे गये विधिके आक्षेपरूप उपादान प्रमाणसे उपनयन अध्ययनका अम् सिद्ध होता है और आचार्यके समीप गये विना अध्ययन बन नहीं
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४९६ [सूत्र १, वर्णक ३े
दमधी्वेत्युपसत्तौ नियमविधानात्। ततोऽध्ययनविधिरुपसतति स्वाङ्गत्वेनाSS- क्षिपति। तथोपनयनाख्यसंस्कारविघिश्व प्रयोजनमपेक्षमाण उपसत्तिसमवेतमे- चाउंदष्ट कल्पयति, दष्टसमवाय्यदष्टसंभवे स्वतन्त्राद्ृष्टायोगात्। ततश्रोपनयना-
च्यमङ्गत्वेऽपि-न प्रोक्षणादिवत्संस्कारकर्मतयाऽङ्गता प्रयाजादिवत्फलोपकार्यङ्ग- तैव कि न स्यादिति। अङ्गिस्वरूपनिष्पादकतया संनिपत्योपकारिणः संस्कार- स्याऽभ्यर्हितत्वात्। फलोपकार्यङ्गन्तु नाभ्यहिंतम्, अपूर्वद्वारेणाSडरादुपकारक- तवात्। अतो माणचकसँस्कार कर्मतयवोपनयनमध्ययनस्वरूपोपकार्यङ्गम्। किं चोपादानप्रमाणवच्छुतिप्रकरणे अप्यव्ययनाङ्गत्वमुपनयनस्य गमयतः, अष्टवर्पो
सकता और लिखे हुये वेदको स्वयं पढ़ लेनेका निषेध होनेसे आचार्यके अधीन ही अध्ययन है, कारण कि आचार्यके पास जाकर 'यह पढ़ो' ऐसा पढ़नेके नियमका विधान है। इससे अध्ययनविधान उपसत्तिका (अर्थात् नियमपूर्वक आचार्यके पास जाकर आचार्यके उपदेशानन्तर पढ़नेका) अपने अङ्गत्वरूपसे आक्षेप करता है। इस प्रकार उपनयननामक संस्कारविधान प्रयोजनकी अपेक्षा करता हुआ उपसत्तिगत ही अदष्ट फलकी करपना करता है, कारण कि दष्टगत अदृष्ट फलकी सम्भावना रहनेपर स्वतन्त्र अदष्टकी कल्पना नहीं होती, इस कारण उपनयन और अध्ययन दोनों विघियोंके उपादानके वलसे उपनयन ही अध्ययनका अङ्ग प्रतीत होता है। शङ्का-अध्ययनका अङ्ग होनेपर भी उपनयनको प्रोक्षण आदिके समान संस्कारकर्मके रूपमें अङ्ग क्यों मानते हैं, अध्ययनका फलोपकारी ही अङ्ग क्यों न माना जाय ? समाधान-अङ्गी-प्रधानभूत-अध्ययनके स्वरूपका निष्पादक होनेसे उप- नयन संनिपत्य उपकारी संस्कार ही अभ्यर्हित-उचित-है, फलका उपकारी अङ्ग तो अभ्यहिंत नहीं है, कारण कि अपूर्वके द्वारा आरात् उपकारक है, इसलिए माणवक-बालक-का संस्कार कर्म होनेसे ही उपनयन अध्ययनका स्वरूपो- पकारी ही अङ्ग है। और भी हेतु है कि उपादान ग्रमाणके तुल्य श्रुति तथा प्रकरण ये दो.प्रमाण भी उपनयन अध्ययनका अङ्ग है, ऐसा बोधन करते हैं।
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अंध्ययनमें नित्यंताकी कल्पन] भाषांनुवादसहित ४९७
त्राह्मण उपगच्छेत्सोऽधीयीतेति वाक्यविपरिणामस्य विवक्षितत्वाद्। तच्छु- तिरेवोपनयनसंस्कृतं माणवकतमादायाध्ययने चिनियुङ्क्ते। न च तच्छव्देनैव माणवकस्यैव परामर्शो न संस्कारस्येति बक्तुं युक्तम्, संस्कारस्याऽनन्तरप्रक्ृ- तत्वाद्। न च श्तेरनाकाद्वितस्य समर्पणप्रसङ्ग, उपनयनाध्ययनयोरुपस- चिद्वारा परस्परसाकाद्गत्वस्य दर्शितत्वाद्। ननु सोऽधीयीतेत्यत्र संस्कृतो माणवक: ग्रातिपदकार्थ एव न तु विभक्त्यर्थः । न च प्रातिपदिकमात्रम- ङ्गाङ्गिभावसंवन्धं वोधयितुमलम्, द्वितीयाश्ुत्यादेरेव तद्वोधकत्वादिति चेदू, मैवम्: प्रातिपदिकस्याऽप्यन्विताभिधायितया संवन्धप्रतिपादकत्वाद्। अन्वि-
'आठ वर्षके त्राह्मणका उपनयन होना चाहिए' इस अ्रुतिवाक्यका आठ वर्पका न्राह्मण आचार्यके समीप जाय और वह पढ़े, इस प्रकारका वाक्यके विपरिणाममें-परिवर्तनमें-तात्पर्य है। इसलिए श्रुति ही उपनयनसंस्कारसे संस्कृत चालकको लेकर अध्ययनमें प्रेरित करती है। 'सोऽधीयीत' इस वाक्यमें 'तद्' शब्दसे केवल बालकका ही परामर्श-बोध-होता है, संस्कारका परामर्श नहीं होता। [यदि संस्कारका मी परामर्श होता तो संस्कृत वालक लिया जाता और उससे उपनयनरूप संस्कार अध्ययनके स्वरूपका उपपादक हो सकता, परन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि तत् शब्द केवल माणवकका परामर्श करता है। ऐसा कहना मी युक्तियुक्त नहीं है, कारण कि संस्कार ही समीपमें प्रकरणप्राप्त है (और 'तत्' शब्द स्वभावतः समीपवर्तीका परामर्श करता है)। श्रुतिमें अनपेक्षित अर्थका बोध कराना दोप इससे नहीं आता, कारण कि उपनयन और अध्ययनकी उपसचिके- नियमपूर्वक आचार्यके पास बैठनेकेद्वारा परस्पर अपेक्षा पूर्वमें ही दिखला चुके हैं। शङ्का-'सोऽघीयीत-वह पढे' इस वाक्यमें संस्कारयुक्त बालक तो प्रातिपदिकका ही अर्थ है, विभक्तिका अर्थ नहीं है (विभक्त्यर्थ होनेसे ही उपनयन और अध्ययनमें अङ्गाब्विभावका बोध हो सकता है) केवल प्रातिपदिक अप्गाङ्गि- भावका बोध करनेमें समर्थ नहीं है, कारण कि द्वितीया विभकिका श्रवण आदि ही उक्त सम्वन्धका बोधक है। समाधान-अन्वित-सम्बद्ध-अर्थका वाचक होनेसे प्रातिपदिक मी सग्वन्धका बोधक हो सकता है। यदि अन्वित अर्थका वाचक न
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विवरणप्रमेयरसग्रह् [सूत्र १, वर्णक ₹"
ताभिधायित्वाभावे तत्प्रयोग एव न स्याद। तस्मात्तच्छन्दभ्रुतिरङ्गत्त्वं गमयति। तथा प्रकरणमपि तद्रमकं वाजसनेयिशाखायां सर्वस्मृत्यनुमित- श्रुंतिषु चोपनयनं प्रकृत्याऽध्ययनविधानात्। न चैवमुपनयनप्रकरणे पठितम- व्ययनमेवाऽङ्गं प्रसज्येतेति वाच्यम्, अध्ययनस्य फलत्वात्। फलवत्सं- निधावफलं तदङ्गमिति न्यायेनोपनयनस्यैवाऽङ्गत्वग्राप्तेः। अत उपादानश्षुति- प्रकरणरुपनयनस्याऽङ्गत्वं सिद्धम्। तच्चोपनयनं स्वयं नित्यभूतमङ्गिनोऽ ध्ययनस्य कथ न नित्यतामापादयेत्। नह्यङ्ग्यभावे कदाचित्कुत्रचिदङ्गं संभवति। अस्ति ह्यथ्ययनस्याऽप्युपनयनवदकरणे अ्रत्यवायः। 'योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शुद्धत्वमाशु गच्छति सान्वयः॥।'
माना जाय, तो उसका प्रयोग ही न होगा। ('सोडधीयीत' यहांपर प्रधानविधिभूत अध्ययनसे अन्वित ही तच्छन्द्रका अर्थ है, अन्यथा उक्त प्रयोग न होगा) इस कारण 'तत्' शठदका श्रवण ही उपनयनकी अङ्गता कहता है। एवं प्रकरण मी उसकी (अङ्गाङ्गिभाव सम्वन्धकी) प्रतीति कराता है, कारण कि वाजसनेयि- शाखामें और सम्पूर्ण स्मृतियोंमें एवं अनुमित श्रुतियोंमें मी उपनयनका प्रक्रम (उपक्रम) करके अध्ययनका विधान किया गया है। इस दशामें तो उपनयनके प्रकरणमें पढ़े गये अध्ययनके अद्गत्वके प्रसङ्गकी आशङ्का भी नहीं करनी चाहिए, कारण कि अध्ययन फल है। फल अङ्ग नहीं हो सकता, [वह तो (प्रधान) अङ्गी होगा] और 'फलवान्के सन्निधानमें उसका अङ्ग फलशन्य होता है' इस न्यायसे उपनयनको ही अङ्ग होनेका अवसर है। इसलिए उपादान, श्रुति तथा प्रकरण-इन तीनों प्रमाणोंसे उपनयन अङ्ग ही सिद्ध होता है, और वह अङ्गस्वरूप उपनयन नित्य होता हुआ अपने अब्गी अध्ययनकी नित्यताका प्रतिपादन कैसे नहीं करेगा : ( अर्थात् नित्यभूत अङ्र अपने अङ्गीकी नित्यताको भी सिद्ध करेगा) । यह निश्चित है कि अब्गीके अभावमें अङ्गका रहना सम्भव नहीं हो सकता और उपनयनके न करनेमें जैसे प्रायश्चित्तका श्रवण है, वैसे ही अध्ययनके न करनेपर भी. प्रायश्चित्का श्रवण. है-'जो नाक्मण वेदको न पढ़कर दूसरे शास्त्रोंमें परिश्रम करता है, वह इसी जीवनमें अपने वंशके सहित शुद्रतुल्य हो जाता है।' जो श्रोत्रिय नहीं तथा
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अध्यापनमें नित्यत्वशङ्का ] मापानुवादसहित ४९९
अथोत्रिया अनतुवाक्या अनययः शद्रसघर्माणी भवन्तीति स्मरणात्। तथा च नित्यमध्ययनं द्रव्यकामासुष्टेयेनाऽनित्येनाऽध्यापननेन कर्थ पयुज्येत। न च वाच्यं काम्यमप्यध्यापनं नित्यसमीहितजीवनफलहेतुत्वान्नित्यमिति। ताचताऽध्यापनस्य नित्यवद्नुष्टानासिद्धेः। शब्दप्रमाणाद्वि नित्यकर्तव्य- ताप्रमितौ संध्यावन्दनादाविवाडकरणे प्रत्यवायभयान्नियमेन पुरुपः प्रवर्तते। अध्यापनस्य तु न शव्दाननित्यकर्त्तव्यता अ्रमीयते, किन्तु नित्यसमीहितस्य जीवनाख्यफलस्य हेतुत्वेन कल्प्यते। नहि तथा कल्पयिेतुं शक्यम्, अध्यापनमन्तरेण याजनप्रतिग्रहादिनाऽपि जीवननिष्पत्तेः। अथ मन्यसे उपनयनाध्यापनयोनित्यपुत्रोत्पादनविधिशेपतया नित्य- त्वं भविष्यति । नित्यक्च पुत्रोत्पादनविधि:, नाडपुत्रस्य लोकोडस्तीत्य-
अनुवाक नहीं जानते एवं अिधारण नहीं करते वे ब्राह्मण शुद्ध जैसे होते हैं, ऐसा स्मृतिकारोंने कहा है। इसलिए द्रव्यकी कामनासे किये जानेवाले अनित्य (काम्य) अध्यापनसे नित्य अध्ययनकी प्रयुक्ति कैसे हो सकती है?। अध्यापन काम्य होता हुआ मी नित्य हो सकता है, कारण कि अध्यापन नित्य तथा अमीष्ट जीवनरूप फलका कारण है, [जीवनकालको सुखमय बनानेवाला द्रव्योपार्जन सर्वदा अभीष्ट होनेसे जीविका नित्य है और उसका कारण अध्यापन है, अतः वह मी नित्य हो सकता है] ऐसा भी कहना नहीं वन सकता, कारण कि ऐसा माननेपर भी अध्यापनके, नित्य विघिके तुल्य, अनुष्टानकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि श्द प्रमाणसे नित्यविधिका निश्चय होनेपर सन्ध्यावन्दन आदिमें जैसे न करनेसे प्रायश्वित्तके डरसे नियम- पूर्वक पुरुप प्रवृत्त होता है, इसलिए नित्य सन्ध्यावन्दन आदि विधिका अनुष्ठान शब्दतः नित्य प्राप्त होता है। अध्यापनकी नित्यता तो शब्द द्वारा निश्चित नहीं होती, किन्तु नित्य तथा अमीष्ट. जीवन-जीविकारूप-फलका कारण होनेसे उसकी नित्यताकी कल्पना की जाती है, परन्तु ऐसी कर्पना करना सम्भव नहीं है, क्योंकि अध्यापनके बिना भी यज्ञ करने तथा शुद्ध परिग्रहसे भी जीवनकी सिद्धि हो सकती है। शक्ा-वादी मानता है कि उपनयन और अध्यापन दोनोंकी नित्यता नित्य- भूत पुत्रोत्पादन विधिके अङ्ग होनेसे सिद्ध होगी और पुत्रोत्पादन विधि नित्य
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५०० विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
करणे अत्यवायश्रवणात्। तथा 'त्रिभिऋ्णैर्वा जायते ब्रह्मचर्येणर्पिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः' इति ऋणत्रयमुपन्यस्य पश्चांत् 'एप वा अनृणो य: पुत्री यज्वा ब्रह्मचारी चाऽस्ति' इति पुत्रिणः पितृन्प्रत्यानृण्यं दर्शयति। तचाS- नृण्यं पुत्रस्य पिण्डपितृयज्ञाद्यनुष्ठानद्वारेण पितृतृप्तिहेतुत्वादुपपद्यते। तदनुष्ठानं चाऽनुपनीतस्याऽनधीतस्य वेदार्थमजानतो न संभवति। अतो नित्यस्य पुत्रोत्पादनविधेः फलपर्यन्ततापेक्षितमनुशासनं तच्छेपतया विधीयते। तस्मातपुत्रमनुशिष्ट लोक्यमाडु: तस्मादेनमनुशासतीति। ततश्र पितुरेव नित्यपुत्रोत्पादनविधिसामर्थ्यादुपनयनाध्यापनविधीनां नित्यत्वं आप्तमिति।
है, कारण कि 'पुत्रहीनको कोई लोक (सद्गति) प्राप्त नहीं होता' इस प्रकार पुत्रोत्पादन न करनेमें प्रायश्चित्तका श्रवण है, और 'तीनों ऋणोंके साथ पुरुष उत्पन्न होता है' ऋषियोंके लिए न्रह्मचर्य, देवताओंके लिए यज्ञ एवं पितरोंके लिए पुत्र-सन्तान, इस प्रकार तीन ऋणोंका उलेख करनेके अनन्तर-यह ऋण मुक्त हो जाता है, जो पुत्रवान् हो जाय और जो यज्ञ करे तथा जो ब्रह्मचारी हो, इस प्रकार पुत्रवान् पुरुष पितरोंके प्रति ऋणसे मुक्त होता है, यह दिखलाया गया है। वह ऋणसुक्ता पितरोंकी सृप्तिके कारणभूत पिण्डपितृयज्ञ आदिके अनुष्ठान द्वारा उपपन्न होती है। और उन पिण्डपितृ आदि यज्ञोंका अनुष्ठान ऐसे पुत्रसे नहीं हो सकता-जिसका उपनयन संस्कार न हुआ हो तथा जिसने वेद न. पढ़ा हो एवं जो वेदके अर्थको न जानता हो। इसलिए नित्यभूत पुत्रकी उत्पादनविधिकी सफलताके लिए अपेक्षित अनुशासनका पुत्रोत्पादनविधिके अक्रके रूपमें ही विधान किया जाता है, इस कारण 'शिक्षित पुत्र ही लोकोंकी प्राप्तिका साधन कहा गया है, इस- लिए ही उसको आचार्य वेदादिका उपदेश देते हैं' (अर्थात् पुत्रके बिना पुण्यलोक नहीं मिल सकते और पुत्र होनेपर भी उसके उपनयन संस्कार और वेदाध्ययन कराये बिना फलकी प्राप्तिका सम्भव नहीं है, इसलिए उत्तम लोककी प्राप्तिरूप फलकी सिद्धिके लिए उपनयन तथा अध्यापन आवश्यक है एवं-पुत्रोत्पादन विधिको सफल करनेवाले दोनों उसके अङ्ग हैं। इस निष्कर्षसे पिताको ही नित्य पुत्रोत्पादन विघिकी सामर्थ्यसे उपनयन तथा अध्यापनविधिका नित्य होना प्रीम होता है। (इस प्रघट्टकसे वादीका आशय यह है कि दिया राया
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मखुनला Acc. No. अध्यापनमें नित्यत्वका निरास] भापानुचादसहित ५०१
नैतत्सारम् , संप्रतिपत्तिकर्मविधिशेपार्थवादरूपस्य 'तस्मात्पुत्रम्" इति वाक्य स्याऽनुशासनविधायकत्वायोगात्। यदा हि पिताऽरिष्टादिना स्वस्य मरणं निश्चिनुते तदा स्वानुप्ठेयानि वेदतदर्थतत्फलानि पुत्रे समर्पयेत् स च पुत्रस्तान्यनुष्टेयतया स्वीकुर्यात् तदेतत्संग्रतिपत्तिकर्म। तथा च श्रूयते 'अथातः संप्रतिपत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यते तदा पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति। स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति।' तत्र च संप्रतिपत्तिकर्मणि पूर्वानुशासनमन्तरेणाSकस्मादेव सकलकतव्यसंग्रहानुपपत्तेः फलपर्यन्त- पूर्वनिवृ तमेवारडर्थंवादतयाऽनेन वाक्येनाऽनूद्यते। ननु मा भूदेतद्वाक्येऽनुशासनविधानं तथाऽपि नित्य-
नित्यानित्यसंयोगविरोघरूप दोप अध्यापनके नित्य माननेपर मी नहीं आ सकता है)। समाधान-अध्यापनमें उक्त प्रकारसे नित्यत्वका साधन करना सारभूत नहीं है, कारण कि अपना ही अनुषेय समझकर पिताके द्वारा समर्पित कर्मोंका स्वीकार करना संप्रतिपत्तिकर्म कहलाता है। कर्मविधिका अङ्र तथा अर्थवादस्वरूप 'तत्मात्पुत्रम्-' यह पूर्वकथित वाक्य उपदेशका विधायक हो नहीं सकता है। जव कि पिता अ़रिष्ट आदिसे अपना (आसन्न द्दी) मरण निश्चित कर ले तब अपने किये हुए वेदके अध्ययन तथा अर्थविचार एवं उसके फल सचको ही पुत्रके अधीन कर दे और वह पुत्र उन सबका अनुष्ठान अपना कर्तव्य समझ कर उन्हें स्वीकार करे' इसको संप्रतिपत्तिकर्म कहते हैं, ऐसा ही श्रुतिमें कहा गया है-जय पिता अपनेको मरणा- सन्न समझता है तब पुत्रसे कहता है कि तुम ब्रह्म हो, तुम यज्ञ हो, तुम लोक हो, तब वह पुत्र कहता है-मैं ब्रह्म, मैं यज्ञ, मैं लोक हूँ। उस सम्प्रतिपत्ति कर्ममें पहले दिये हुए उपदेशके बिना अकस्मात् ही सम्पूर्ण कर्तव्योंका सङ्गह-स्वीकार कर अनुष्ठान करना-उपपन्न नहीं हो सकता, इसलिए पहले ही (मरणासन्न अवस्थाके उपदेशसे पूर्व ही) किये गये अनुशासनका (कर्तव्यके उपदेशका) ही फलपर्यन्त पुत्रकी उत्पादनविघिसे आक्षेप होता है, जिसका कि अर्थवादके रूपमें इस वाक्यसे अनुवाद किया जाता है, अतः 'तस्मात्पुत्रम्- इत्यादि वाक्य विधायक नहीं है। ६४
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.५०२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ३
पुत्रोत्पादनविधिसामर्थ्यादेव पितुरुपनयनाद्यनुशासनविधिर्नित्य एव प्राप्त इति चेट, मैवम्; पितुः पुत्रं अत्यननुष्ठापकत्वात्। अन्यथा स्तनन्धयस्येत- रस्य वा मृतपितृकस्योपनयनाद्यभावप्रसङ्गात्। अनुशासनं तु कर्त्तव्यार्थोप- देशनमात्रमिति श्रौतलिङ्गादवगम्यते। तथा च अ्रतिः 'श्वेतकेतुहारुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्य न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽन- नूच्य ब्रह्मवन्धुरिव भवतीति'। न च वाच्यं पितरि कथश्चिन्मृते माणवक एवा- Sडचार्यान्तरमाहूय नित्यमुपनयनादिकं सम्पादयिष्यति ततोऽनुष्ठापनमेवाड- शङ्का-यद्यपि 'तस्मात् पुत्रम्'-इस वाक्यमें अनुशासनका विधान मान भी लिया जाय, तथापि नित्यभूत पुत्रोत्पादनविधिकी ही सामर्थ्यसे पिताके लिए उपनयन आदि अनुशासनका विधान नित्य ही प्राप्त होता है। [तात्पर्य यह है कि जवतक उपनयन आदि अनुशासन पिता न करे तवतक उस पुत्रका पिण्डपितृयज्ञादिमें अधिकार न होनेसे नित्यभृत पुत्रोत्पादनका विधान सफल न होगा, अतः पिताको अनुशासनविधान भी नित्य ही प्राप्त होता है। ] समाधान-नहीं, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि पुत्रके प्रति अनुष्ठानका प्रयोजक पिता नहीं है। नहीं तो (यदि पिताके ही कारण अनुशासनका सम्भव होता तो) जिस दुधमुँहे या कुछ वयस्क (उपनयनयोग्य) वालकका पिता मर गया होगा उसके उपनयन आदि अनुशासनका अभाव हो जायगा, [ क्योंकि अनुष्ठानके कारण पिता तो उसके रहे ही नहीं ] किन्तु अनुशासन तो कर्तव्यके पालनके लिए उपदेशमात्र है, इस प्रकार श्रुतिसिद्ध लिङ्गसे प्रतीत होता है। जसे कि ्रुति है-'अरुणिके पुत्र श्वेतकेतुसे उसका पिता उपदेश करता है'-आरुणेय श्वेत- केतु कोई एक (ब्राह्मण) था, उससे उसके पिता कहते हैं कि 'हे श्वेतकेतु! ब्रह्मचर्य (वेदाध्ययनत्रत) धारण करो, हे सौम्य ! अर्थात् हे सुशील उत्तम मतिवाले पुत्र ! हमारे कुलका बालक कोई भी वेदका अध्ययन तथा मनन किये बिना न्राह्मण जैसा नहीं हुआ है'। (अर्थात् संस्कार तथा वेदाध्ययनादि कर्महीन जातिमात्रसे ब्राह्मणत्रुव नहीं हुआ है)। शङ्का-दुरदृष्टवश पिताके मर जानेपर भी बालक (माणवक) ही किसी अन्य आचार्यको बुलाकर उपनयन आदि संस्कारोंका सम्पादन कर लेगा, इससे उसके लिए अनुष्ठान ही अनुशासन होगा 'अर्थात् अनुशासनका विधान वो नित्य ही हुआ'।
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अध्यीपनमें नित्यत्वका निरास] मापांनुवादसहित ५० ३े.
नुशासनमस्त्विति । तत्र किं माणवकः स्वाधिकारसिद्धर्थमाचार्यान्तरं करोति किं वाऽऽचार्यनियोगसिध्वर्थम् : नाऽडद्यः, अध्यापनप्रयुक्तिमध्यय- नस्य चदता भवता माणवकस्य पृथगधिकारानङ्गीकारात्। न द्वितीय:, न-
साधनसम्पादनं युक्तम्। अथ साधनान्तरप्रतिनिध्युपादानवदधिकारिणोऽपि प्रतिनिध्युपादानेन कर्त्तव्यं माणवका संपादयेत्, तन, वैपम्यात्। सर्वत्र हाविकारिणः कर्त्तव्यमनुष्ठातुं साधनान्तरप्रतिनिधिरादीयते। अधिकारि- प्रतिनिधिस्तु कर्त्तव्यमनुष्ठातुमादीयेत। न तावन्मृतस्याऽडचार्यस्य कर्चव्यं
समाधान-उक्त शक्षामें प्रष्टव्य यह होता है कि क्या 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस विविसे प्राप्त अपने अधिकारकी सिद्धिके लिए माणवक मृत पितासे अतिरिक्तको आचार्य बनाता है? अथवा 'तमध्यापयीत' इस विधिसे माप्त आचार्यके नियोगकी सिद्धिके लिए? इनमें प्रथम कल्प नहीं कह सकते, कारण कि 'अध्ययनकी प्रयुक्ति- अनुषान-अध्यापनके द्वारा होती है, इस प्रकारके आपके मतमें माणवकका- चालकका-अलग कोई अधिकार ही नहीं माना गया है। दूसरा कल्प भी नहीं हो सकता, क्योंकि दूसरेका नियोग-अधिकार-दुसरेकी कर्तव्य बुद्धिको उत्पन्न नहीं कर सकता और जो कर्तव्य नहीं है उसके अनुष्ठानके लिए (आचार्यकरण आदि) उपायोंका सम्पादन करना युक्तिसङ्गत नहीं होता, इससे कर्तव्य समझे बिना ही आचार्यकरणका सम्पादन करेगा, इस शक्काका अवकाश नहीं रह जाता। शह्का-जैसे साधनान्तर प्रतिनिधिरूपसे लिये जाते हैं, वैसे ही अधिकारीके- आचार्यके-कर्तव्यका भी प्रतिनिधिके उपादानसे माणवक सम्पादन करेगा। समाधान-ऐसा नहीं हो सकता, कारण कि दष्टान्तमें यहांपर विपमता है। [दष्टन्तका स्वरूप दिखलाते हैं ]-सर्वत्र ही अधिकारीके कर्तव्यका अनुष्ठान करनेके लिए दूसरे साधनभूत प्रतिनिधिका उपादान होता है। और अधिकारीका प्रतिनिधि तो कर्तव्यके अनुष्ठानके लिए लिया जाता है। [ अधिकारीको अपना कर्तव्य करना है; परन्तु निरुक्त साधन नहीं मिलता है, ऐसी दशामें दूसरा साधन प्रतिनिधि लिया जाता है, एवं कर्तव्य करना आवश्यक है, परन्तु कारणवशात् अधिकारी समर्थ नहीं हुआ तब वह अन्य प्रतिनिधि करेगा, क्योंकि कर्तव्य करना आवश्यक है, अतः अधिकारि-
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५०४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
संभवति, विधिसंचन्धनिमित्तस्य निवृत्तत्वात्। नाऽपि प्रतिनिधित्वेनोपादेय- स्याsऽचार्यस्य तत्संभवः। तस्याऽऽचार्यस्य कर्त्तव्यत्वसिद्धच्ुत्तरकालीनत्वात्। अतो न माणवक आचार्यान्तरमादायाऽध्येतुमहति। अथ मृताचार्यशिक्षितं माणवकमन्य आचार्यः स्वीकृत्य स्वाधिकारं निर्वर्तयितुमध्यापयेत्, तदप्य- युक्तम् : पूर्वोपनीतस्य माणवकस्याऽऽचार्यान्तरेण पुनरुपनयनासंभवे सत्यु-
वैकल्य या साधनवैकल्यमें प्रतिनिधिका ग्रहण होता है; परन्तु जहांपर कर्तव्य प्राप्त ही नहीं है, ऐसे स्थलमें प्रतिनिधिका ग्रहण प्राप्त नहीं होता, इस आशयसे दार्ध्टान्तिक-आचार्यकरण-में वैषम्य दिखलाकर प्रतिनिघिग्रहणका असम्भव दिखलाते हैं] मरे हुए आचार्यके कर्तव्यका तो सम्भव नहीं है, क्योंकि विधिके सम्बन्धका निमित तो वहांपर निवृत्त हो गया है, [ 'अध्यापयीत' इस विधिके अधिकारी आचार्यके मर जानेपर उक्त विधि किस नियोगका बोधन करेगी' इसलिए मरनेपर 'अहरहः सन्ध्यामुपासीत' इसके अधिकारके तुल्य किसी भी विधिका अधिकार नहीं रह जाता, अतः मृतका कुछ कर्तव्य ही नहीं है] और 'मृत पिताके' प्रतिनिधिस्वरूपसे लिये गये उस दूसरे आचार्यका ही वह कर्तव्य हो सकता है, कारण कि वह (प्रतिनिधिभूत) आचार्य तो कर्तव्यकी सिद्धिके अनन्तर कालमें ही किया गया है। [ तात्पर्य यह है कि उपनयन, अध्यापन आदिको माणवकने कर्तव्य समझकर निर्द्धारित कर लिया, अब पिताके अभावमें उस कर्तव्यका पालन कैसे हो, तव उसने आचार्यकरण किया जिससे प्रतिनिधिभूत आचार्य उपनयन आदिको अपना कर्तव्य समझे।] इस कारण माणवक (जिसका पिता मर गया हो) दूसरेको आचार्य बनाकर अध्ययन नहीं कर सकता। शङ्का-आचार्य-पिता-ने माणवकको शिक्षा अर्थात् उपनयन संस्कार आदि उपदेश दे दिये, परन्तु पढ़ाये बिना मर गया, ऐसे मरे हुए आचार्य द्वारा शिक्षित माणवकको दूसरा आचार्य शिष्य बनाकर अपने अधिकारकी सिद्धिके लिए पढ़ा लेगा। समाधान-यह भी कथन युक्त नहीं है, कारण कि पहले (मृत) आचार्य द्वारा उपनीत शिष्यका दूसरे आचार्य द्वारा दुवारे उपनयन संस्कारका सम्भव न होनेसे उपनयनरूप अञ्बके अभावमें अभ्ञीभूत अध्यापनकी
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अंध्यापन में नित्यत्वका निरास] भांपानतुवादसहित ५०५
सत्यद्गिनोऽध्यापनस्यापि तत्राऽनुष्ठितत्वेन पुनरनुष्टानायोगात्। अन्यथा स्वोपनीतस्याऽध्यापनात् प्रागेव मृतावङ्गिमात्रानुष्ठानाय माणवकान्तरस्वीकार: तर्हनुपनीतमप्यध्यापयेत्। यदि स्वोपनीतानध्याप्य द्रव्यवाहुल्यायाऽन्या- नप्यध्यापयतीत्युच्येत, तदा दरिद्रं नाऽध्यापयेद्। शुभ्धपायै दरिद्रमप्यध्या- पयिष्यतीति चेद्, एवमयि त्वन्मते लौकिकवैदिकव्यवहारो दुर्वारः। लोके हि माणवककर्तव्यनिप्पत्तये एवाSडचार्योSन्विष्यते नाऽऽचार्यकर्तव्यनिप्पत्ये माणवक:। वेदेऽपि सत्यकामो ह जावालो ब्रह्मचर्यायाचार्य स्वयमेवाड- न्विष्योपसन्नवानिति गम्यते। तथा च क्षतिः 'स ह हारिद्ुमन्तं गौतम- मेत्योवाच त्रह्मचर्य भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति' तदेवमध्या- पनस्य नित्यत्वे वहुदोपसद्भावादनित्येन च तेन नित्यस्याऽ्व्ययनस्य प्रयुक्तो
सिद्धि नहीं हो सकती। इससे विपरीत [अङ्गवैकल्यसे भी अङ्गीकी सिद्धि हो सकती है तो ] अपने द्वारा उपनीत शिष्यके पढ़ानेसे पूर्व ही मरण हो जानेपर केवल अज्जीभूत अध्यापनकी (पढ़ानेकी) सिद्धिके लिए दूसरे माणवकका लेना स्वीकार हो तो, जिसका उपनयन न किया गया हो, उसको भी पढ़ा दिया जा सकता है। यदि अपने द्वारा उपनीत शिष्योंको पढ़ाकर अधिक द्रव्यकी अभिलापासे दूसरोंको भी पढ़ा लिया जायगा, ऐसा कहो तो धनहीन वालकको पद़ाना प्राप्त न होगा। यदि शुश्रपा-सेवा-के लिए धनहीनका भी पढ़ाना प्राप्त होगा, तो ऐसा माननेपर लौकिक वैदिकव्यवहार तुम्हारे मतमें दुर्वार हो नायगा। लोकमें वालकके कर्तव्यकी निप्पत्तिके लिए ही आचार्यकी अन्वेपणा होती है, आचार्यके कर्तव्यकी सिद्धिके लिए माणवककी खोज नहीं की जाती। एवं वेदमें भी सत्यकाम जाबाल ब्रह्मचर्य (वेदाध्ययन) के लिए स्वयं आचार्यकी खोजके लिए गुरुकुलमें पहुँचा था। जैसे कि श्रुति है-'स ह' इत्यादि। अर्थात् वह गौतमके पारा जाकर कहने लगा भगवन् ! मैं नियमपूर्वक वेद पढ़ना चाहता हूँ, इसलिए आपका शिष्य बनृं। इस प्रकार अध्यापनविधिको नित्य माननेमें बहुत दोषोंके आ जानेसे उसे अनित्य ही मानना चाहिए, तब उस अनित्य अध्यापनसे
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५०६ विवरणप्रमेयसंग्रहं [सूत्रं १, वर्णक ३
नित्यानित्यसंयोगविरोधात् स्वविधिग्नयुक्तमेवाऽध्ययनमङ्गीकार्यम्। ननूपनयनाध्ययनयोः स्वविधिप्रयुक्तत्वे सति तत्प्रयुक्ततयैवोपनय- नाध्यापनसिद्धेरुपनयीत तमध्यापयीतेति तद्विधानमनर्थकमिति चेद्, मैवम्, नाऽन्राऽडचार्यव्यापारयोरुपनयनाध्यापनयो्विधि:, किन्तु माणचक- व्यापारयोरुपगमनाध्ययनयोः । ननु वाक्ये प्रयोजककर्तुराचार्यस्य व्यापारौ प्रतीयेते, तत्र साक्षात्कर्तुर्माणवकस्य व्यापारयोः स्व्रीकारे विरोधाजीच-
न्याय्यत्वात्। नाऽपि शब्दविरोध, 'एतया ग्रामकामं याजयेत्' इत्यत्र प्रयोजकव्यापारमन्तरेण स्वार्थेऽपि णिच्प्रत्ययप्रयोगदर्शनात्। याजनस्य वृत्त्यर्थतया आपस्याऽनुवादेनाऽप्रापं यजनमेव विधीयते। एवम् 'अच्यापयीत' इत्यत्र किं न स्यात्।
नित्यभूत अध्ययनकी प्रयुक्ति माननेमें नित्यानित्यसंयोगका विरोध होनेसे अध्ययनको अपनी विधि द्वारा ही प्रयुक्त हुआ मानना चाहिए। शङ्का-यदि उपनयन और अध्ययन स्वविघिप्युक्त माने जायँ, तो उसीसे उपनयन और अध्यापनकी सिद्धि हो जायगी, फिर 'उपनयीत' 'अध्या- पयीत' इन वाक्योंसे उनका विधान करना व्यर्थ ही है। समाधान-नहीं, वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि यहाँ आचार्यके व्यापार- भूत उपनयन और अध्यापनकी विघि नहीं है, किन्तु माणवकके व्यापारभूत उप- गमन और अध्ययनकी विधि है। यदि शङ्का हो कि वाक्यमें प्रयोजकभूत कर्ता आचार्यके उक्त दो व्यापार प्रतीत होते हैं, माणवकके नहीं होते, तो यह शक्का मी युक्त नहीं है, कारण कि वहाँ प्रयोजक कर्ताको छोड़कर साक्षाद कर्ताके व्यापारका अज्गीकार करने पर विरोध होता है, इससे जीवनके लिए प्राप्त आचार्यके व्यापारोंका अनुवाद करके अप्राप्त माणवकके व्यापारका विधान करना ही उचित प्रतीत होता है। शब्दके साथ भी विरोध नहीं है, क्योंकि 'एतया' इस वाक्यमें प्रयोजक व्यापारके बिना स्वार्थमें भी 'णिच्' प्रत्ययका प्रयोग देखा जाता है। वृच्िके लिए प्राप्त याजनके अनुवादसे जैसे अगाप्त यजनका विधान किया जाता है, वैसे ही 'अध्यापयीत' इत्यादि स्थलमें भी क्यों नहीं होगा?
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मध्यापनमें नित्यत्वका निरास ] भापानुवादसहित ५०७
ननु याजयेदध्यापयेदित्यत्र कर्तव्यापारस्य णिचूपत्ययार्थतयाऽवग- मादेकतरस्य ग्रसिद्धस्याऽनुवादेनेतरस्य विधिरस्तु। 'उपनयीत' इत्यत्र तु धात्वर्थस्यैव प्रयोजकव्यापारत्वादनभिघीयमान: कर्तृव्यापार: कथ विधी- यते। न च वाच्यमुपनयने मा भून्माणवकव्यापारविधिः, अध्यापने तु भविप्यतीति, वाक्ययोः सारूप्यात्, उच्यते; प्रयोजकव्यापाराभिधायिनाS- पि नयतिधातुना माणवकव्यापारस्यानभिवीयमानस्याऽपि गम्यमानताया वक्ष्यमाणत्वात् स एव धातुना लक्षणयोपादाय विधीयते, न प्रयोजक- व्यापार:। तस्य स्वयमेव आ्पत्वाद्। ननु तत्म्नाप्तिर्दु:संपादा, इतरेतरा- श्रयत्वप्रसङ्गात् । दक्षिणाशुथ्रपाद्ङ्गसहिते ह्यध्ययने माणवकस्य विहिते नस्य च स्वविधिप्रयुक्तो सत्यां वृत्यर्थतयाऽऽचार्यप्रवृत्तिः प्रामोति।
शक्का-'यज्ञ करावे' 'अध्ययन करावे' इन वाक्योंमें प्रेरकरूप कर्ताके व्यापारकी 'णिन्' प्रत्ययके अर्थके रूपमें प्रतीति होती है (वह घात्वर्थ याजन, तथा अध्ययनकी प्रयुक्ति करा सकता है) इनमेंसे एक अर्थ जो प्रसिद्ध है उसका अनुवाद करके दूसरेका विधान मानना चाहिए। 'उपनयीत' (उपनयन संस्कार करावे) इस वाक्यमें धातुका अर्थ ही प्रेरणारूप प्रयोजक-प्रेरक-व्यापार है, इसलिए सभिधा द्वारा प्रतीत न होनेवाले कर्चाके व्यापारका विधान कैसे किया जा सकता है? ऐसा भी नहीं कह सकते कि उपनयनमें माणवकके व्यापारका विधान न हो, परन्तु अध्यापनमें तो होगा, कारण कि दोनों वाक्योंमें समानता है। समाधान-उत्तर कहा जाता है, प्रयोजक व्यापारका वोधन करनेवाले 'नी' धातुसे भी अभिधावृत्ति द्वारा बोघित न होनेवाला माणवकका व्यापार प्रतीत हो जाता है, ऐसा हमको आगे प्रतिपादन करना है। और उसी 'नी' धातुसे लक्षणा वृत्ति द्वारा प्राप्त हुए उस माणवकके व्यापारका ही विधान किया जाता है 'प्रयोजक व्यापारका विधान नहीं किया जाता, कारण कि प्रयोजक व्यापार तो स्वयं प्राप्त है। शक्ा-उस माणवकके व्यापारके विधानकी प्राप्ति नहीं सिद्ध की जा सकती, कारण कि इसमें इतरेतराश्रय दोपका प्रसङ् आ जाता है। [ इतरेतराश्रय दोप दिखलाते हैं ।-दक्षिणा या सेवा आदि अद्व सहित अध्ययनका माण- वकके लिए विधान करनेपर उस साङ़ अध्ययनकी अपनी ही विधिसे प्रयुक्ति
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५०८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
वृत्यर्थप्रवृत्तौ आ्रासायां तदतुवादेन माणवकव्यापारोऽ्ययनादिर्विधातुं शक्यत इति, मैवस्; ग्रामकाम याजयेदित्यत्र याजनप्राशेरपि दुःसंपाद- त्वग्रसङ्गात्। दक्षिणाद्यङ्गसहिते कर्तृव्यापारे विहिते सति वृत्यर्थत्वेन प्रयोजकव्यापारप्रासतिस्तत्प्राप्तौ च तदनुवादेन कर्तृव्यापारविधिरिति परस्परा- श्रयत्वात्। अथ स्वविधिप्रयुक्तपु यागान्तरेपु सामान्येन वृत्यर्थतया ग्राप्तं प्रयोजकव्यापारमनूद्य ग्रामकामस्य यागविशेपो विधीयेत तर्हीहाऽपि विध्य- न्तरेपु व्यापारो विधीयताम्। ननु याजनात्मक एव प्रयोजकव्यापारो यागान्त- रेपु आप्ोऽस्ति। उपनयनाध्यापनात्मकस्तु तथा न विध्यन्तरेपु श्राप्त इति चेत्, तर्हिं भाविनी प्प्तिरस्तु। माणचकव्यापारविधिसामर्थ्यादेव
होनेपर जीविकाके निमिच आचार्यकी प्रवृत्ति प्राप्त होती है, और आचार्यकी आजीविकाके लिए प्रवृत्ति प्राप्त होनेपर उसका अनुवाद करके माणवकके अध्ययन आदि व्यापारका विधान किया जा सकता है, [इसलिए प्रयोजक- व्यापारको प्राप्त नहीं कह सकते ]। समाधान-ऐसा नहीं है, कारण कि उक्त प्रकारसे प्राप्तिके दोष देनेसे तो 'ग्रामकी इच्छावालेको यज्ञ कराना चाहिए' इस वाक्यमें यज्ञ करानेकी प्राप्तिका मी सम्पादन नहीं कर सकते। दक्षिणा आदि अङ्गके सहित कर्ताके व्यापारका विधान होनेपर आजीविकाके लिए प्रयोजक व्यापारकी प्राप्ति होती है, और प्रयोजक व्यापारकी प्राप्ति होनेपर उसका अनुवाद करके कर्तांके व्यापारका विधान होगा, इस रीतिसे इतरेतराश्रय हो जाता है। यदि कहो कि अपने ही विधानसे प्रयुक्त दूसरे दूसरे यागोंमें सामान्यरूपसे प्राप्त हुए प्रयोजक व्यापारका अनुवाद करके ग्मकी कामनावालेके लिए यागविशेषका विधान किया जाता है। (इससे अन्योन्याश्रय दोष नहीं आता), तो प्रकृतमें भी दूसरे दूसरे विधानोंके . स्थलमें सामान्यतः प्राप्त प्रयोजक व्यापारके अनुवादसे समीपगमन तथा अध्ययन आदि माणवक व्यापारका विधान किया जाना चाहिए। शङ्का-यज्ञ कराना, ऐसा प्रयोजक व्यापार अन्य यागोंमें म्राप्त है। उपनयन, (समीपप्रापण) तथा अध्यापनरूप व्यापार, तो वैसा दूसरे विधानोंमें प्राप्त नहीं है।
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उपनयनाध्ययनमें अधिकारादिविधित्वका निरास ] भापानुवादसाहित ५०९
प्रयोजकंव्यापारः प्राप्स्यते, तत्पूर्वकत्वात् माणवकव्यापारस्य। न च वैपरी- त्येन प्राप्तिः शङ्या; नह्यनित्येन नित्यप्राप्तिः संभवतीत्युक्तत्वांद्। ननु आ्प्स्योत्पत्तिविध्यसंभवेऽपि तदनुवादेनाऽधिकारविधि: स्यादिति चेद्, न वाक्ये जीवनादिनित्यकाम्याधिकारयोरश्रवणात्। तर्हारुणया पिङ्गक्ष्या क्रीणातीतिवद् गुणविशेपविधिरस्तु, स च
योरपि विशेपतया परस्परसम्बन्धरहितयोरविशिष्टविध्ययोगात, पृथगू विधाने चाक्यभेदप्रसङ्गात्। अरुणवाक्ये तु विशेष्यस्य यागसाधनक्रयणस्याऽप्य-
समाधान-तो भाविनी-होने वाली-प्राप्तिको ले लीजिये। माणवकके (उपगमन या अध्ययनरूप) व्यापारके विधानकी सामर्थ्यसे ही प्रेरणारूप प्रयोजक व्यापार प्राप्त हो जायगा, कारण कि प्रयोजकव्यापारपूर्वक ही माणवकका व्यापार होता है अर्थात् आचार्यकी प्रेरणाके अनन्तर ही माणवकका उपगमन या अध्य- यन होता है। इससे विपरीत अन्य किसी प्रकारसे प्राप्तिकी आशङ्का नहीं करनी चाहिए अर्थात् अध्यापनरूप प्रयोजकव्यापारसे अध्ययनकी प्राप्ति नहीं कहनी चाहिए, कारण कि अनित्य अध्यापनसे नित्य अध्ययनकी ग्राप्ति नहीं हो सकती, यह पूर्वमें ही कह आये हैं। शक्का-यद्यपि प्राप्तकी उत्पत्तिविधि नहीं हो सकती है, तथापि उसके 'प्राप्तके' अनुवादसे अधिकार विधि तो हो सकती है ? समाधान-नहीं, नहीं हो सकती, कारण कि वाक्यमें जीवन आदि नित्य और काम्य अधिकारोंका श्रवण नहीं है। वाक्य तो 'अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयीत तमध्यापयीत' केवल इतना ही है। [ इसमें 'जीविकाकामः' इत्यादि नित्य या काम्य किसी ग्रकारके अधिकारका श्रवण नहीं है।] शङ्का-अच्छा तो 'लाल पिद्लाक्षीसे क्रयण करता है' इस वाक्यके समान गुणविशेपका विधान मानो : वह विधीयमान गुण अष्टवर्पात्मक ब्राह्मण- रूप होगा। समाधान-नहीं, गुणविधान भी नहीं हो सकता है, कारण कि ब्राह्मणत्व और अष्टवर्पत्व दोनों गुण, विशेप होनेसे, परस्पर सम्बन्धरहित हैं, इससे विशिष्ट विधिका सम्बन्ध नहीं हो सकता, अलग अलग विधान करनेमें वाक्यभेदका ६५
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५१० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
न्यतोऽप्राप्स्य विधेयतयाऽरुणादीनामनेकेपामपि विशेषणानां तदन्वये सति विशिष्टविधानं युक्तम्, न तथेह प्रयोजकव्यापारो विधेय: ग्राप्तत्वात्। अतो नाडनेकेषु गुणविधि:, तदुक्तम्- 'पसे कर्मणि नाडनेको विधातुं शक्यते गुणः। अग्राप्ते तु विधीयन्ते वहवोऽप्येकयततः ॥।' इति। ननु प्रयोजकव्यापारस्य प्राप्तत्वाद्यथा विधिर्निराक्रियते तथा माणवक व्यापारस्याऽपि स निराकर्तु शक्य:, 'माणवकसुपनयीत' इत्यत्र कर्मभृतस्य माणवकस्य व्यापाराप्रतीतेः। नहि 'ग्रामं गच्छेत्' इत्यत्र ग्रमस्य व्यापार: प्रतीयते, मैवम्: शब्दतो न्यायतश्रात्र माणवकस्य गमनव्यापारप्रतीतेः।
प्रसङ्ग होगा। उक्त अरुण वाक्यमें तो विशेष्यभूत यागके साधनभूत क्रयणकी अन्य प्रकारसे प्राप्ति न होनेसे वह विधेय है, इसलिए अनेक विशेषणोंका भी उसके साथ अन्वय होनेसे विशिष्ठका विधान युक्तिसक्कत है। प्रकृतमें वैसा प्रयोजक व्यापार विधेय नहीं है, क्योंकि वह तो प्राप्त ही है, (इससे विशेष्य- भूत प्रेरणात्मक व्यापारके विधेय न होनेसे अष्टवर्षत्व तथा न्राह्मणत्व आदि विशेषणविशिष्टका विधान भी सम्भव नहीं हो सकता ] इसलिए अनेक विशेषणोंमें गुणबिधि नहीं हो सकती। कहा भी है- अन्य प्रमाणसे प्राप्त कर्ममें अनेक गुणका विधान नहीं किया जा सकंता। अम्राप्त कर्ममें तो एक ही यलसे बहुत गुणोंका भी विधान हो सकता है। अर्थात् अनेक गुणोंका मी विधेयविशेषणरूप एक यत्नसे विधान हो सकता है। शङ्का-प्रयोजक व्यापारके प्राप्त होनेसे उसके विधानका जैसे निषेध किया जाता है, वैसे ही माणवकव्यापारके विधानका भी निषेध किया जा सकता है, कारण कि 'माणवकका उपनयन करे' इस वाक्यमें कर्मकारक माणवकके व्यापारकी प्रतीति नहीं होती है, जैसे 'ग्रामको जाना चाहिए' इस वाक्यमें ग्रामके व्यापारकी प्रतीति नहीं होती। [अर्थात् इससे जिस व्यापारकी प्रतीति ही नहीं होती उसका विधान कैसे हो सकता है, यह भाव है ? ] समाधान-ऐसा नहीं, कारण कि शब्द द्वारा और न्यायसे भी मावणकका गमनरूप व्यापार प्रतीत होता है। [ शब्द द्वारा गमनकी प्रतीति दिखलाते हैं-]
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उपनयनाध्ययनमें अधिकारादिविधित्वका निरांस ] भापानुवादसहित ५११
लोके हि नयत्यर्थवाचिशव्दग्रयोगेपु नीयमानस्य गमनं दष्टमिति शब्दत- स्तत्प्रतीति: तथा वालानामक्षरशिक्षाय शिक्षकगृहं प्रति गमनं दृष ततो न्यायोऽपि माणवकव्यापारं अत्याययति। नहि प्रेक्षावान् माणवको विधि- मन्तरेणाऽध्ययनादौ प्रवर्त्तते। अर्थावबोधादिद्ष्टफलार्थत्वनिराकरणे रागतः प्रवृत््ययोगात्। ततो वाक्यविपरिणामेन माणवकव्यापारोऽत्र विधातव्य:। यथा 'ग्रामकामं याजयेत्' इत्यत्र 'ग्रामकामो यजेत्' इति विपरिणामस्तथा 'अष्टवर्षँ ब्राह्मणसुपनयीत' इत्यत्रापि 'अष्टवर्पो ब्राह्मण उपगच्छेत् सोऽधीयीत' इति विपरिणाम: स्यात्। नन्वेवमपि नाऽन्र विधि: सङ्गच्छते, निरधिकारत्वात्। न तावदताऽ- एवर्पत्वमात्रमधिकारनिमित्तम्, शूद्रस्याऽप्युपनयनादिप्रसङ्गाद। नाडपि ब्राह्म- णयमात्रम्, जातमात्रस्य तत्प्रसङ्गात्। नाऽप्युभयम्, तयो: परस्परान्वयाभावास,
क्योंकि लोकमें नीधातुके अर्थके वाचक शब्दोंके प्रयोगोंमें नीयमानका गमन देखा गया है, इसलिए शब्दसे उसकी प्रतीति सिद्ध ही है। [ न्यायसे भी उसकी प्रतीति दिखलाते हैं ]-अक्षर सीखनेके लिए अध्यापकके घर वालकोंका जाना देखा गया है, इससे न्याय भी माणवकके व्यापारकी प्रतीति कराता है। विधानके बिना कोई भी बुद्धिमान् माणवक अध्ययनादिमें प्रवृत्त नहीं होता। अध्ययनका अर्थाववोध-अर्थनिश्रय-आदि दृष्ट फल न माननेपर रागसे अध्ययनमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। [ कार्यमें ष्ट फलके लिए ही राग द्वारा प्रवृत्ति देखी जाती है ] इसलिए वाक्यका विपरिणाम करके माणवकके अध्ययन आदि व्यापारको ही प्रकृतमें विधेय मानना चाहिए जैसे 'ग्रामकी कामनावाले याजक यज्ञ करावें' इस वाक्यमें 'ग्रामकी इच्छावाला यज्ञ करे' ऐसा वाक्य बदला जाता है, वैसे ही 'आठ वर्षके ब्राम्मणबालकका उपनयन करे' इस प्रकृत वाक्यमें भी 'आठ वर्षका ब्राह्मण वालक गुरुके समीपमें जावे और वह पढ़े' इस प्रकार वाक्य बदलना होगा। शक्का-इस प्रकार माननेपर भी प्रकृतमें विधिका मानना सज्गत नहीं है, कारण कि अधिकारकी सम्पत्ति ही नहीं हैं, क्योंकि केवल आठ वर्षकी अवस्था अधिकारकी हेतु नहीं मानी जा सकती, क्योंकि ऐसी अवस्थामें आठ वर्षके शूद्रको भी उपनयन संस्कारका प्रसन्न हो जायगा, एवं न्रावाण जाति ही अधिकारकी कारण
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५१२ विचरणप्रमेयसंग्रहं [सूत्र १, वर्णक ३
गुणानां च परार्थत्वादिति न्यायात्। अथ मन्यसे तयोरपि पार्ण्णिक: पर- स्परान्वयो भविष्यति। यथाऽरुणावाक्ये 'अरुणया क्रीणाति' इति प्रत्येकं शाब्दे क्रियान्वये पश्चादेकप्रयोजनत्वसामर्थ्यात् परस्परान्वयस्तद्वदिति, तन्न; तथा सत्यधिकारहेतोरशाब्दत्वप्रसङ्गात्। अतो निरधिकारो विधिरयुक्तम; नैप दोषा; शाब्दमेव सर्वत्राधिकारनिमिच्तमिति नियमाभावात्। साङ्ग
सेडपि क्रियासंवन्धाभिधानमुखेन विशिष्टसमर्पणे शव्दद्वयस्य तात्पर्यकल्प- नात् तत्सिद्धिः। नन्वेवमपि विशिष्टस्य नाऽधिकारनिमित्तत्वसुपादेयविशेपणत्वात्। तथा
नहीं हो सकती, क्योंकि ब्राह्मण वालकके उत्पन्न होते ही उसका उपनयन प्राप्त होगा। दोनोंको भी नहीं मान सकते, क्योंकि दोनोंका परस्पर अन्वय ही नहीं है, कारण कि 'गुणपदार्थ दृसरेके उपकारक होते हैं' (परस्पर अन्वित नहीं होते) ऐसा न्याय है। यदि मानो कि उनका भी पीछे (दोनोंका पृथक पृथक विधिके साथ अन्वय होनेके अनन्तर) परस्पर अन्वय हो जायगा। जसे अरुणाशन्दघटित वाक्यमें 'अरुणा- लाल-वर्णवाली-से क्रयण करता है' इस प्रकार प्रत्येकके साथ शाब्द क्रियान्वय करनेके अनन्तर सबका एक प्रयोजन होनेके कारण परस्पर अन्वय होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी होगा, तो ऐसा भी नहीं मान सकते, कारण कि ऐसा माननेसे अधिकारके कारणमें शा्दप्रतीतिविषयताका अभाव हो जायगा। अधिकार- कारण तो विशिष्ट है, परन्तु दोनोंका परस्पर शाब्द अन्वय हुआ ही नहीं है, वह तो एकप्रयोजनगम्य होनेसे पाण्णिक है, इसलिए अधिकारशून्य विधि युक्त नहीं है। समाधान-उक्त दोष नहीं आता, कारण कि सर्वत्र अधिकारका कारण शाब्द-शब्द द्वारा अभिधासे प्रतीयमान-ही होना चाहिये, ऐसा नियम नहीं है। प्रकृतमें अङ्गविशिष्ट कर्मका अनुष्ठानसामर्थ्य शाब्द न होता हुआ भी • अधिकारका हेतु होता है, इसलिए यदि आग्रहसे कथंचित् यही मानो कि अधिकारका निमिच शाव्द ही होना चाहिए, तो क्रियासम्बन्धके बोधन द्वारा विशिष्टकी प्रतीति करानेमें दोनोंका 'अष्टवर्ष और ब्राह्मण' शब्दोंका-तात्पर्य कल्पन करनेसे विशिष्टको शाब्द मानना सिद्ध हो सकता है। शङ्ा-विशिष्टके शाब्द होनेपर भी वह अधिकारका निमिच
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अध्ययनविधिका दढीकरण] भापानुवादसाहेत ३१३
हि-'तमध्यापयीत' इत्यत्र प्रयोजकव्यापारं प्रति माणवकस्य कर्मताभिधा- यिनी द्वितीयाविभक्ति: स्वव्यापारं प्रति माणवकस्य कर्तृत्वं गमयति, 'कुर्वन्तं ग्रयुङ्कते' इति न्यावेन प्रयोजकव्यापारस्य कर्तविषयत्वात्। न च वाच्यम् 'अध्यापयीत' इति वाक्ये विपरिणामस्योक्तत्वान्माणवकस्याऽधिकारित्वम्, न तु कर्तृत्वमिति। तत्र हि ग्राप्तप्रयोजकव्यापारानुवादेन कर्तृव्यापारे विधि- सम्बन्धमात्रं परिणम्यते, न तु शब्दप्रापतं माणवकस्य कर्तृत्वं पराक्रियते। अत उपादेयो माणवक, तल्लक्षणवत्वात्। साक्षाद्वा परम्परया वा विधिविपयतयाऽनुष्टेयमिति तल्लक्षणम्, कर्त्रादयश्चाऽनुष्टेयं प्रति कारकत्वात् परम्परयाऽनुष्ठेयाः। अतः कर्त्तुरुपादेयस्य माणवकस्य यद्विशेपणं जातिविशिष्टं वयः न तदधिकारनिमित्तम्। 'लोहितोष्णीपा ऋत्विजः
नहीं हो सकता, क्योंकि वह उपादेयका (कर्मकारकभूत माणवकका) विशेषण है, क्योंकि 'उसको अध्यापन करे' इस वाक्यमें प्रयोजकके- आचार्यके-व्यापारके-प्रेरणाके-प्रति माणचकको कर्म कहनेवाली द्वितीया विभक्ति अपने व्यापारके प्रति माणवकके कर्तृत्वकी प्रतीति कराती है, कारण कि 'करते हुये पुरुपको ्रेरित करता है' इस न्यायसे प्रयोजकका व्यापार (प्रेरणा) कर्ताको ही विषय करता है। यह कहना उचित नहीं कि 'अध्यापन करे' इस वाक्यमें पूर्व कहे हुए 'माणवक पढ़े' ऐसे वाक्यपरिणामसे माणवकका अधिकारी होना ग्रतीत होता है, प्रेरणाविपयीभूत कर्ता होना प्रतीत नहीं होता।' कारण कि उस पूर्वकथित वाक्यविपरिणाममें (णिच् प्रत्ययसे) प्राप्त हुए प्रयोजकव्यापारके अनुवादसे क्ताके व्यापारमें विधिका संबन्धमात्र परिणत किया जाता है, शव्दपराप्त माणवकके कर्तृत्वका निपेध नहीं किया जाता है। इस कारण माणवक उपादेय है, क्योंकि उसमें उपादेयका लक्षण विद्यमान है। [उपादेयका लक्षण दिखलाते हैं ]-'साक्षात् अथवा परम्परासे विधिका विषय होकर अनुष्ठानके योग्य होना उपादेयका लक्षण है और कर्ता आदि अनुष्ेयविधिके प्रति कारक होनेसे परम्परासे अनुष्ठेय होते हैं, इसलिए कर्तृभूत उपादेय माणवकका जो जातिविशिष्ट अवस्थारूप विशेषण है, वह
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५१४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्रं १, वर्णक ३
प्रचरन्ति' इत्यादौ कर्तृविशेपणस्य लोहितोष्णीपत्वादेरधिकारनिमित्तत्वा- दर्शनात्। न च कत्तैवाऽधिकारी, कर्ततुरनुष्ठेयकारकतया विधिं प्रति गुण- भूतत्वाद् अधिकारिणश्च विधिं प्रति स्वामितया प्राधान्येनाऽन्वयात्। न चैवमिकारहेतोरेवाऽसम्भवः, अनुपादेयविशेपणस्य तद्वेतुत्वात्। विधि-
जीवनगृहदाहस्वर्गकामनादि। अत्र त्वष्टवर्षत्वाद्युपादेयविशेपणं तत्कथ- मधिकारहेतु: स्यात्। अत्रोच्यते; किं भावनाया वाक्यार्थत्वमाश्रित्येदं न्रवीपि उत नियोगस्य अथवा इष्टसाधनस्य! नाऽडद्य: तत्रािकारान्वयस्य कर्त्रन्वयपूर्वकतया कर्तविशेपणस्यैवाऽधिकारहेतुत्वात्। पुरुपप्रवृत्तिर्हि भावना, सा च क्रियात्मिका सती स्वरूपनिष्पादकानि कारकाणि प्रथममपेक्षते।
अधिकारका निमित्त नहीं हो सकता। [ उपादेयविशेषण अधिकारका निमित्त नहीं हो सकता, उसका दष्टान्त द्वारा समर्थन करते हैं-'लाल पगड़ी बांधे याज्ञिक लोग प्रचरण करते हैं' इस वाक्यमें कर्ताके विशेषणीभूत लाल पगड़ी अधिकारकी निमित्त नहीं देखी गयी है। कर्ताको ही अधिकारी नहीं मान सकते, कारण कि कर्ता अनुष्ठेय-विधि-का कारक होनेसे विधिके प्रति गौण (अप्रधान) हो जाता है। और विधिके प्रति अधिकारीका तो प्रभुत्व होनेसे प्रघानरूपसे अन्वय होना चाहिए। इस युक्तिसे अधिकार हेतुके अभावकी शक्का नहीं हो सकती, कारण कि अनुपादेयके विशेषणोंमें अधिकारकी हेतुताका होना सम्भव है। जैसे विधिप्रयुक्त अनुष्ठेय तथा उसके विशेषणसे अतिरिक्त विधिका सम्बन्धी अनुपादेय था वैसे जीवनगृहदाह स्वर्गकामना आदि विशेषण हैं। प्रकृतमें तो 'आाठ वर्षका होना' इत्यादि उपादेयके विशेषण अधिकारके कारण कैसे हो सकते हैं ? समाधान-इस आशक्काके उत्तरमें कहा जाता है-क्या भावनाको वाक्य का अर्थ मान कर उक्त आशक्का करते हो: अथवा नियोगको? या इष्ट- साधनको ? इनमें प्रथम कल्प नहीं बन सकता, कारण कि उसमें (भावनामें) अधिकारका अन्वय कर्ताके साथ अन्वय होकर ही होता है, इसलिए कर्ताका विशेषण ही अधिकारका कारण हो सकता है, कारण कि पुरुषकी प्रवृत्ति ही तो भावना कहलाती है। वह भावना क्रियाकलापरूप होती हुई अपने सारूप्यको
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मध्ययनिधिका दढीकरण ] भापानुवादसहित ५१५
तन्न पुरुपार्थधात्वर्थयोर्भाव्यत्वेन तत्करणत्वेन चाऽन्वये सति परिशेपात् स्वर्गकामादयः कर्तत्वेनाऽन्वीयन्ते। तस्य च कर्तुर्व्यावर्चकानि जीवनगृह- दाहकामनादीनि। ततः कर्तुरेव फलनियमात् स एव कर्त्ता फलभोक्तृ- त्वोपाधिना स्वामित्वादधिकारं प्रतिपद्यते। अतश्रोपादेयकर्तृविशेपणा- न्येवाऽधिकारिणोऽपि व्यावर्त्तकानि सम्पद्यन्ते। नन्त्रस्तु तर्हि द्वितीयः, नियोगो हि स्वरूपोपाधित्वेनैव नियोज्य- विपयापेक्षते, बिना ताभ्यां कस्य कस्मिन्नियोग इत्याकाङ्गाया अनिवृत्ते:। ततो वाक्यगतस्वर्गकामादिनियोज्यत्वेन धात्वर्थश्व विपयत्वेनाऽन्वेति। न चाऽत्राऽविकारान्वयः पृथगपेक्ष्यते। 'ममाऽयं नियोगः' इति ग्रतिपत्तुर्नियो- ज्यस्यैव तत्स्वामितयाऽधिकारित्वात्। स चाऽधिकारी विपयानुष्ठानमन्तरेण चनानेवाले कारकोंकी सर्व प्रथम अपेक्षा करती है, कर्तृ, कर्म आदि कारकोंके बिना क्रियास्वरूपकी सिद्धि नहीं हो सकती, उसमें से पुरुपार्थका भाव्य-साध्य- रूपसे और घात्वर्थका उस पुरुपार्थके कारणरूपसे अन्वय होनेपर स्वर्ग कामादि पद परिशेषन्याय द्वारा क्तारूपसे अन्वित होते हैं। और जीवन, गृददाह (स्वर्ग) कामना आदि उक्त कर्ताके विशेषण हैं। इस कारणसे कतामें फलसम्बन्धका नियम होनेसे वही कर्ता, फलका भोग पानेवाला होनेसे, स्वागी है, अतः वह अधिकार पाप्त करता है, इससे उपादेयभूत कर्ताके विशेषण ही अधिकारीके भी विशेषण हो जाते हैं। [ उस प्रकारसे भावनाको वाक्यार्थ माननेवाले भाट्ट सिद्धान्तसे भी उक्त आशकाका निराकरण किया गया। अन नियोगको वाक्यार्थ माननेवाले प्रभाकरके मतसे भी उक्त माशकाका निराकरण करनेके लिए प्राभाकर मतका अनुवाद करते हैं]-मच्छा तो द्वितीय पक्ष (नियोगको वाक्यार्थ मानना) ही रहे, कारण कि नियोग अपनी स्वरूपभूत उपाघिसे ही नियोज्य और विषयकी अपेक्षा करता है, क्योंकि नियोज्य तथा विपयके बिना 'किसका और किस कार्यमें नियोग है ?' इस माशक्वाकी निवृत्ति नहीं होती, इसलिए (स्वर्गकामो यजेत) इत्यादि वाक्यमें पढ़े गये स्वर्गकाम आदिका नियोज्यरूपसे और धात्वर्थका विपयरूपसे अन्वय होता है। यहाँपर अधिकारका अन्वय पृथक् अपेक्षित नहीं है, कारण कि 'यह मेरा नियोग है' इस प्रकारकी धारणावाला नियोज्य ही, स्वामी होनेसे, अधिकारी है, और वह अधिकारी विषयके
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५१६ विचरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ३
नियोगनिष्पचिमपश्यंस्तदलुष्ठाने कर्तृतयाऽन्वयं गच्छति। तथा चाडस्मिन्पक्षे धिकारान्वयदशायां स्वर्गादीनामनुपादेयविशेषगत्वं व्यवस्थितमिति, तदेतदसारम् ; प्रकृताप्रतिपक्षत्वाद्। नियोगवादिनो ह्यनुपादेयविशेपण- मेवाऽधिकारहेतुरिति वदन्तोऽपि क्वचित्कर्तृचिशेपणेनाSधिकारिणं व्यावर्व- यन्ति। 'राजा स्वाराज्यकामो राजसूयेन यजेत' इत्पत्र कर्तविशेपणेन राजत्वेन स्वाराज्यकामस्याऽधिकारिणो विशेषणीयत्वात्। अन्यथा स्वाराज्यकामस्य वैश्यादेरपि तदधिकारप्रसङ्गात्। न चैचमनुपादेयमेवाऽधिकारहेतुरिति निय- मस्य भङ्गा, राजत्वस्य वै्यादिभिरनुष्टानेनाऽनिष्पाद्यस्याऽनुपादेयत्वात्।
त्वेऽप्यधिकारहेतुता किं न स्याद १ (यज्ञ आदिके ) अनुष्ठानके बिना नियोगकी सिद्धिको न देखकर उसका अनुष्ठान करनेमें कर्तारूपसे अन्वित होता है, इसलिए इस पक्षमें अधिकारके अन्वयके अवसरमें स्वर्ग आदिमें अनुपादेयविशेषणत्व व्यवस्थित ही होता है। इससे उपादेय विशेषण अधिकार हेतु नहीं हो सकता, इत्यादि आपत्ति नहीं हो सकती । ] इस प्रकार द्वितीय पक्ष सारभूत नहीं है, अर्थात् तुच्छ है। कारण कि उक्त समर्थन प्रकृतके-कताके विशेषणको अधिकारनिमित्त होनेके- प्रतिकूल नहीं है, क्योंकि अनुपादेय विशेषण ही अधिकारका कारण होता है, ऐसा माननेवाले नियोगवादी (प्राभाकर) भी किसी स्थलमें कर्ताके विशेषणसे सी अधिकारीकी व्यावृत्ति करते हैं। जैसे 'राजा स्वराज्यकी-स्वर्गके आधिपत्यकी-इच्छा करता हुआ राजसूय यज्ञ करे, इस वाक्यमें कर्ताके विशेषणीभृत राजत्वसे स्वराज्यकाम अधिकारीको विशिष्ट करना ही है, नहीं तो स्वराज्य चाहनेवाले वैश्य आदिका भी रानसूय यज्ञमें अधिकार प्रसक्त हो जायगा। 'इस प्रकार अनुपादेय ही अधिकारका हेतु है' इस नियमके भङ्ग होनेका भय भी नहीं है, कारण कि राजत्वकी वैश्य आदि क्षत्रियेतर वणोंसे अनुष्ठान द्वारा उत्पत्ति न होनेके कारण वह अनुपादेय है। इस प्रकार 'अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयीत तमध्यापयीत' इस प्रकृत वाक्यमें मी न्राह्मणेतरसे अनुष्ठान- द्वारा निष्पादनके अयोग्य आठ वर्षकी अवस्थासे युक्त ब्राह्मणत्व, कर्ताका विशेषण होनेपर मी, अधिकारका हेत क्यों नहीं होगा? अर्थात् अवश्य होगा।
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मध्ययनविधिका हढीकरण] मापानुवादसहित ५१७
नन्वेवं तहिं तृतीयः पक्षोऽस्तु। तत्र शेय:साधनरूपे वाक्यार्थे श्रेयसो भोक्तव्यरूपस्य भोक्त्राकाह्मयाः ग्राथम्यात्तत्साघनस्याऽपि भोक्कन्वयः प्रथमभावी। न च साधनस्य कृतियोग्यतया कर्काङ्कस्य कर्त्रन्वय एव प्राथमिक इति शङ्गनीयम् ; कृतियोग्यताया अनियमात्। श्रेय:साधनेऽपि चन्द्रोदयादौ तद्दर्यनात्। यत्राऽपि तद्योग्यताऽस्ति तत्रापि श्रेयसः प्रधान- त्वात्तदतुसारेणाऽन्त्रयो वाच्यः । अथ साधनस्य वाक्यार्थत्वात् तत्प्राधान्यम्, तथापि तत्स्वरूपोपाधिभूतं हि श्रेय: कस्य साधनमित्येवं तनिरूपकत्वात्। साधकापेक्षा तु विशिष्टसाधनग्रतीत्युत्तरकालीना। ततः प्रथमप्रतीतश्रेयोऽ- नुमारेण भोक्न्वये सति पश्चादभिलपितसाधनत्वस्याऽन्न कृतियोग्येष्टसाधन- त्वार्थनिष्ठतया विधिना चोदितत्वात् कृतेश्व कर्त्रपेक्षत्वात् स एव भोक्ताड-
[ इस प्रकार गुरुमतमें उपादेय विशेषणको भी उनके मतके ही अनुसार अनुपादेय बनाकर अधिकारका निमिच सिद्ध करके इष्टसाघनत्ववादी एकदेशीके मतसे भी उसे सिद्ध करनेके लिए उनके मतका अनुवाद करते हैं-] तब तो तीसरा (इष्टसाधनत्वको वाक्यका तात्पार्यार्थ मानना) पक्ष ही मानो, उस मतके अनुसार शयःसाघनरूप वाक्यार्थमें भोक्तव्यरूप इषटको भोक्ताकी आकाड्क्षा दी सव प्रथम होती है, इसलिए उसके साधन-उपायभूत-यज्ञादिका मी पहले ही भोक्ताके साथ अन्वय होगा। और यह भी शक्ा नहीं हो सकती कि साधनके कृतियोग्य होनेसे उसे कर्ताकी आकांक्षा है, इससे सर्व प्रथम उसका ही अन्वय कताके साथ करना चाहिये, कारण कि साधनमें कृतियोग्यताका नियम नहीं है, क्योंकि अपने इषके साधन चन्द्रोदयादिमें कृतियोग्यता नहीं देखी जाती। जिस साधनमें क्रियायोग्यता है, उसमें भी इसके ही प्रधान होनेसे उसके ही अनुसार अन्वय करना उचित है। यद्यपि चाक्यार्थ होनेसे साधनमें प्राधान्य प्राप्त है तथापि साधनका स्वरूपोपाधि-(जिसके कारण उसमें साधनता है, ऐसी वस्तु) भूत इष ही है, क्योंकि 'किसका साधन है', इस प्रकार इषट साधनका निरूपक है। क्योंकि साधककी अपेक्षा तो विशिष्ट साधनकी प्रतीति होनेके अनन्तर ही होती है। इसलिए प्रथम प्रतीत हुए इषके अनुसार भोक्ताके साथ अन्वय हो जाता है, पीछे इष्टसाधनत्वके साथ अन्वय होगा। प्रकृतमें कृतियोग्य इष्टसाधनत्व अर्थगत है, अतः विधिके द्वारा प्रेरणाका विपय होनेसे और कृतिको कर्ताकी ६६
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५१८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
धिकारी कर्त्तृतां प्रतिपद्यते। ततोऽस्मिन् पक्षेऽनुपादेयस्यैवाऽधिकारि विशेषणेतेति। एवमपि प्रकृते नाडस्ति विरोध: उपगमनरूपेऽभिलपित- साधने प्रथमं भोक्तृतयाऽधिकारान्वयं आप्तस्य माणवकस्य पश्चात् कर्ञ्रन्वयं प्रप्स्यतोऽपि यद्विशेषणं ब्राह्मण्यादि तस्याऽनुपादेयविशेषणत्वात्। अतोऽ ङ्भूतस्योपगमनस्य साधिकारित्वे सति अङ्गिनोऽध्ययनस्याऽपि तत्सि- ध्यति। अङ्गाङ्गिनोः सर्वत्रैकाधिकारित्वात्।
यात्रवमवर्षादर्वागेवाऽ़ध्ययनसमापतिः प्राप्ता सा च दुःशकेति चेदू, न; अङ्गाङ्िनो: कालैक्यानियमात्। अन्यथाऽङ्गमन्वाधानं पर्वण्यनुष्ठायाऽङ्गि भूताया इष्टेः प्रतिपद्यनुष्ठानं न सम्भवेत्। अतो नाडङ्गाधिकारहेतु: कालोड-
अपेक्षा होनेसे वही भोक्ता अधिकारी कर्ता भी हो जाता है। इस प्रकार इस पक्षमें अनुपादेय ही अधिकारीका विशेषण होता है। [अर्थात् उपादेय माणवकका विशेषण अष्टवर्षत्वविशिष्ट न्राह्मणत्व अधिकारका हेतु नहीं हो सकता। खण्डन करते हैं ]-इस मतके अनुसार मी प्रकृतमें कोई विरोध नहीं आता, कारण कि उपगमनरूप इष्टसाघनमें पहले भोक्तारूपसे अधिकारके अन्वयको प्राप्त और पीछे कर्ताके साथ अन्वय पानेवाले माणवकका भी जो ब्राह्मणत्व आदि विशे- षण है, वह अनुपादेय विशेषण ही है। इसलिए अङ्गभूत उपगमनकी साधिकारिता सिद्ध होनेसे अङ्गीभुत अध्ययनकी मी साधकारिता सिद्ध हो जाती है, क्योंकि यह नियम है कि अङ्भ तथा अद्भीका सर्वत्र एक ही अधिकारी होता है। शक्का-वैसा माननेसे ब्राह्मणत्वके समान उपगमनाधिकारकी हेतु आठ वर्षकी अवस्थाका भी है अङ्गीभूत अध्ययनमें अन्वय होगा; इससे नवम वर्षके प्रारम्भके पूर्व ही अध्ययनकी समाप्ति होनी चाहिए परन्तु ऐसा होना अत्यन्त कठिन है। समाधान-अङ्ग और अङ्गी दोनों एक ही कालमें होते हैं यह कोई नियम नहीं है। यदि यह नियम माना जाय, तो अङ्गभूत अन्वाधानके पर्व (पूणिमा था अमा) में अनुष्ठान करके अङ्गीभूत इष्टिका प्रतिपद्में अनुष्ान करना सम्भव न होगा, इससे अङ्गके अधिकारका कारणीभूत समय अज्गीके अधिकारका कारण नहीं है, यह प्राप्त होता है, अंतः पूर्वोक्त प्रतिपादनके -
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अध्ययनविधिकी अक्षरग्रहणपर्यन्तता] भापातुवादसहित ५१९
ङ्त्यधिकारहेतुः। तदेवं नित्याधिकारसम्भवादध्ययनविधौ न कांड- प्यनुपपत्ति: । नतु 'सकृत्कृते कृतः शास्त्रार्थः' इति न्यायेन सकदध्ययनादेव नित्या- ध्ययनविधिसिद्धेरावृत्तिर्न लभ्येतेति चेद्, न; अक्षरावासिलक्षणदट्टफलानुपपच्या तल्लाभात, त्वयाऽप्यर्थावचोधफलानुपपतत्यैव तत्कल्पनाद। तर्ह्यक्षरावासिपूर्व- कार्थाववोध एवाऽऽवृत्तिहेतुरिति चेदू, न; शाखान्तरीयेम्यः पौरुपेयेभ्यो
मा भूतामक्षरावान्यावृत्ती इति वाच्यम्; जपस्वाध्यायविध्यध्ययनविध्योर- सम्भवप्रसङ्गात्। नह्यनवासेष्वक्षरेपु व्रह्मयज्ञस्वाध्यायो जपितुं शक्य: ।
व्दवाच्यत्वात्। तस्मादक्षरग्रहणान्तो अध्ययनविधिः। यदि विधेरदृष्ं फलम-
अनुसार अध्ययनविधिमें नित्याधिकारका सम्भव होनेके कारण किसी भी प्रकारकी अनुपपत्ति नहीं हो सकती है। शक्ा-एकचार विघिका अनुष्ठान कर देनेसे शास्त्ार्थ चरितार्थ हो जाता है, इस न्यायके अनुसार एकवार अध्ययनसे ही नित्य अध्ययनका विधान चरितार्थ हो जायगा, इस परिस्थितिमें उसकी आवृत्ति प्राप्त न होगी। समाधान-मक्षरग्रहणरूप इष्ट फलकी अनुपपत्तिसे अध्ययनकी आवृत्तिका लाभ हो जायगा। तुमको भी तो अर्थावबोधरूप फलकी अनुपपत्तिसे ही अध्ययनकी आवृत्तिकी कल्पना करनी पड़ती है। तब तो अक्षरग्रहणपूर्वक अर्थनिश्चयको ही आवृत्तिका कारण मानना होगा : नहीं, क्योंकि नियमपूर्वक स्वीकृत नहीं किये गये अथवा बार बार आवृत्ति कर अभ्यस्त नहीं किये गये दूसरी शाखाओंके तथा लौकिक वाक्योंसे भी अर्थका निश्चय देखा गया है। और यह भी नहीं कह सकते कि अक्षरग्रहण और आवृत्ति दोनों न हों तो मत हों, कारण कि जप-स्वाध्यायविधि और अध्ययनबिधि दोनोंका सम्भव न होनेका प्रसङ्क आ जायगा, कारण कि अक्षरग्रहण किये बिना ब्रह्मरूप स्वाध्यायका जप करना नहीं वन सकता और आवृत्तिके बिना अध्ययन भी नहीं वन सकता, क्योंकि अक्षरग्रहणपर्यन्त व्यापार ही अध्ययन शब्दका अर्थ है, इसलिए अक्षरग्रहणपर्यन्त अध्ययनका विधान है। यदि विधिका अदष्ट फल
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५३० विवरणग्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ३
पेक्षितम्, तर्ह्यक्षरप्राप्तिसमवेतमेव तत्कल्पनीयं दष्टसमवेतादृष्टे सति स्वतन्त्रा- दृष्टायोगात्। एवं चाऽ्व्ययनविधेरक्षगग्रहणमात्रपर्यवसानाद्विचारः क्रतुविधि: प्रयुक्तो भविष्यति। यन्ु शावरभाष्ये वेदस्याऽन्यनिरपेक्षतया विचारहेतुत्वं वदन् भाष्यकारोऽव्ययनविधेर्विचारहेतुतामङ्गीचकार, तत्र परम्परया हेतुत्वमव- गन्तव्यम्। विधीयमानाध्ययनप्राप्तो हि स्वाध्यायः क्रतुविधीनुपस्था- पयति। ते च विधयः स्वाध्यायादापातप्रतिपन्ना अनुष्ठेयनिर्णयज्ञानम- न्तरेणाऽनुष्ठापयितुमशक्नुवन्तस्तन्निर्णयाय विचारं प्रयोजयन्ति। न चाऽनुष्टानमेव मा भूदिति वाच्यम्, नित्यंविधिष्वकरणे प्रत्यवायस्थाऽप्या- पाततः प्रतिपन्नत्वात्। काम्यविधिषु तु फलकामनैवाSSधानमिव विचारं
मानना ही जरूरी हो, तो अक्षरप्राप्तिमें नित्य रहनेवाला ही अदष्ट मानना चाहिए, क्योंकि दष्टगत अदष्टका सम्भव होनेपर स्वतन्त्र (दष्टनिरपेक्ष ) अदृष्टकी करपना करना उचित नहीं है।, इस प्रकार अध्ययनविधिका केवल अक्षरग्रहणमें तात्पर्य होनेसे यज्ञविधिके द्वारा ही विचार होगा। शाबरभाष्यमें विचारके प्रति वेदको स्वतन्त्र कारण कहते हुए भाष्यकारने अध्ययनविधिको भी जो विचारका कारण माना है, उसका परम्परया कारण माननेमें तात्पर्य समझना चाहिए। विहित अध्ययनसे प्राप्त स्वाध्याय-स्व्रशाखीय वेद यज्ञविधियोंकी उपस्थिति कराता है। और स्वाध्यायसे आपाततः ज्ञात वे उपस्थित विघियां साध्यके निर्णयात्मक ज्ञानके बिना अपने अनुष्ठानमें अधिकारीको प्रवृत्त करानेके लिए समर्थ न होकर अनुष्ठेयके निर्णयके लिए विचारकी प्रयुक्ति करती हैं। यदि कहा जाय कि अनुष्ठान ही मत हो, क्या हानि है? नहीं, हानि है, क्योंकि नित्यविधिका अनुछान न करनेसे प्रायश्चित होता है, यह आपाततः (विचारसे पूर्व ही) निश्चित हो जाता है। और काम्य- विधिस्थलोंमें तो फलकी अभिलाषा ही आधानके समान विचारकी भी प्रयुक्ति करा देती है। [ उक्त प्रकारसे प्रत्येक करतुविधान विचारकी प्रयुक्ति करेंगे, इससे विचारके अनेक प्रयोजकोंकी कर्पनामें गौरव हैं, इस आशयसे आशक्का करते हैं-] अनेक
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धमविचारमें कतुविधिम्युक्तत्व] भापांतुवादसहित
रस्येति चेद्, न; विधिर्हि सर्वत्र स्वविधेयस्य वा तदुपकारिणो वा म्रयोजको नाऽन्यस्य। विचारस्तु नाऽध्ययनविधेयो नाऽपि तदुपकारी। न चैवमुत्तरक्रतुविधिप्रयुक्तिरविचारस्य निराकर्तु शक्या, तद्विधिविधेयं प्रत्यु- पकारित्वात्। न चैकस्य विचारस्याऽनेकविधिप्रयोज्यत्वानुपपत्तिः, प्रति- वाक्यं विचारसाध्यनिर्णयज्ञानभेदेन तदुपपत्तेः। आधानस्य चैकस्याऽप्य- नेकविधिप्रयोज्यत्वदर्शनात्। यद्यनेकविधिप्रयोज्यत्वे गौरवाद्भीतोऽध्ययन- विधिन्नयोज्यत्वमेव विचारस्य त्रृपे, तदा यागाद्यनुष्ठानस्याऽपि तत्प्रयोज्यत्वं वक्तव्यं स्याद्, लाघवात्। त्वत्पक्षे चाऽध्ययनविधिफलस्य स्वर्गादिसिद्धि- पर्यन्ततया यागानुष्ठानस्य विधेयोपकारित्वात। ततः कतुविविवैयर्थ्यमा-
विधियोंके कारण (विचारकी) प्रयुक्तिकल्पनाकी अपेक्षा एक अध्ययनविधिसे ही विचारकी प्रयुक्ति मानना औचित्यपूर्ण है। खण्डन करते हैं-ऐसा नहीं, कारण कि विधि केवल अपने विधेय तथा उसके उपकारीकी ही प्रयोजक हो सकती है, दूसरेकी नहीं और विचार तो अध्ययन- विधिका न साध्य है और न उसका 'विचारका' अध्ययन उपकारी ही है। इस रीतिसे उत्तर-अध्ययनविधिके अनन्तर विहित-यज्ञविधिके द्वारा विचारकी प्रयुक्तिका निपेध नहीं किया जा सकता; कारण कि उन यज्ञविधियोंके विधेयके प्रति विचार उपकारी है। [जैसे अभी कह आये हैं कि विधेयके निर्णयके चिना अनुष्ठानमें प्रवृत्तिका सम्भव नहीं है, अतः निर्णायक होनेसे विधेयके प्रति विचार उपकारी है]। विचाररूप फलकी अनेक विधियोंसे प्रयुक्ति करना युक्तियुक्त नहीं है, यह भी नहीं कह सकते, कारण कि प्रत्येक वाक्यके विचारसे उत्पन्न होनेवाले निर्णयात्मक ज्ञानके मेदसे उसका होना युक्तियुक्त है। एक ही आधातकी अनेक विधि द्वारा प्रयुक्ति देखी गई है। यदि अनेकविधियोंकी प्रयुक्ति माननेमें गौरव दोपसे डर कर एक अध्ययनविधि द्वारा ही विचारकी प्रयुक्ति मानते हो, तो लाघवका स्वीकार करके यागादिके अनुछानकी प्रयुक्ति भी अध्ययनविधिके द्वारा ही क्यों नहीं कहते? सुम्हारे मतमें अध्ययनविधिका फल स्वर्गादिकी सिद्धि तक है, अतः यागका अनुष्ठान [ अध्ययनविघिसे तुम्हारे अभिमत स्वर्गादि ] विधेयका ही उपकारी है, इससे पृथक यज्ञका विधान
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५२२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३े
पद्येत। ननु सिद्धान्तेऽप्यतिग्सङ्ग: समान:, विमतमध्ययन कतुविधिप्रयु- क्म्, कत्वनुष्ठापकत्वात्, अर्थविचारनिर्णयवत्, अध्ययनात् प्रागप्रतिपन्नानां ऋतुविधीनामध्ययनप्रयोजकत्वायोगात्। अध्ययनविधिरप्यध्ययनात् प्राग- प्रतिपन्न इति चेत, सत्यम्, तथापि संध्योपासनादिविधिवत् पित्रादिभ्य: श्रृय- माणोध्ययनविधिरध्ययनं प्रयोजयति। न च क्रतुविधयोऽध्ययनात्प्राक्पित्रा- दिभ्यः श्रोतुं शक्याः, येन तत्प्रयोज्यत्वमध्ययनस्याऽडपाद्येत। अतोऽ- ध्ययनविधिप्रयुक्तमध्ययनं क्रतुविधित्रयुक्तश्च धर्मविचार इत्यङ्गीकर्त्तव्यम्। अस्तु तहिं ब्रह्मविचारस्याऽपि धर्मचिचारवत् सकलत्रैवर्णिकाधिकृतोत्तरनि- त्यविधिप्रयुक्तिरिति चेत्, तत्र किं श्रवणविधिप्रयुक्तिर्वह्विचारस्य किं वा क्रतुविधिप्रयुक्ति :! नाऽडद्यः सर्वत्रवर्णिकानां श्रवणाद्यननुष्ठाने पत्यचायाभा- करना व्यर्थ हो जायगा। उक्त अतिप्रसञ्ञ दोष, तो तुग्हारे सिद्धान्तमें भी समानरूपसे बना है, क्योंकि अनुमान करेंगे-विमत विवादग्रस्त अध्ययनकी यज्ञविधिके द्वारा प्रयुक्ति होती है, कारण कि अध्ययन क्रतुका अनुष्ान करानेवाला है, जैसे अर्थका विचार द्वारा निर्णय करना। [उक्त अनु- मानमें अनुकूल तर्क दिखलाते हैं ] अध्ययनसे पूर्व ज्ञात नहीं हुई करतुविधियां अध्ययनकी प्रयोजक नहीं हो सकतीं। यद्यपि अध्ययनविधि भी अध्ययनसे पूर्व ज्ञात नहीं है यह सच है तथापि सन्धोपासन आदि विघिके सदश अपने पिता आदिके उपदेश द्वारा ज्ञात अध्ययनविधि अध्ययनकी प्रयुक्ति करा सकती है और उस प्रकारकी कतुविघियां तो अध्ययनसे पूर्व पिता आदिके उपदेश द्वारा ज्ञात नहीं हो सकती हैं। जिससे उन कतुविधियों द्वारा अध्ययनकी प्रयुक्तिकी आपत्ति दी जा सके; इसलिएं ऐसा ही मानना उचित है कि अध्ययनविधिके द्वारा ही अध्ययन है और कतुविधि द्वारा धर्मविचारकी प्रयुक्ति है। शङ्का-जैसे धर्मविचारकी प्रयुक्ति तीनों वणोंके अधिकारसे प्राप्त अध्ययनके अनन्तर विहित यज्ञविधि द्वारा होती है, वैसे ही ब्रह्मविचारकी प्रयुक्ति भी उक्त नित्य विधियोंसे ही क्यों न मान ली जाय ? [अतः ब्रह्म- विचारके लिए पृथक शास्त्रके आरम्भकी आवश्यकता नहीं है।] समाधान-इस आशहाका उत्तर देते हुए यह प्रश्न होता है कि 'श्रोतव्यः' क्या इस श्रव्णविधिसे न्रह्मविचारकी प्रयुक्ति प्राप्त है : अथवा 'सोमेन यजेत' इत्यादि ऋ्नुविधिसे: इनमें प्रथम कल्प नहीं वनता, कारण
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धर्मविचारमें कतुविधिभयुक्तत्व] भापानुवादसहित ५२३
चात् तान् ग्रति नित्यविधित्वानुपपत्तेः । परमहंसस्यैव श्रवणाद्यकरणे प्रत्य- चायात्। नाऽपि द्वितीयः, न्रह्मविचारस्य कत्वनुपकारित्वात्। नन्त्रग्नि- होत्रादिकमनुतिष्ठद्धिरनुष्ठेयमङ्गजातादिकं वेदान्तेपु नाऽस्तीत्येवं निश्चेतुं वेदान्ता विचारयितव्या इति चेद्, न; अध्ययनजन्यापातदर्शनेनैव तावन्मात्र-
कि श्रवणका अनुषान न करनेसे सम्पूर्ण त्रैवर्णिक पापभागी होते हैं, श्रवण नहीं है, इसलिए सकल त्रवर्णिकोंके प्रति श्रवण आदिको नित्यविधि नहीं कह सकते, क्योंकि परमहंसोंके लिए ही श्रवण आदिका अनुष्ठान न करनेसे प्राय- शिव शामसिद्ध है। दूसरा विकल्प भी नहीं टिकता, क्योंकि न्रवाविचार सोमादि यागका उपकारी नहीं है। शक्ा-अगिहोत्रका अनुष्ठान करनेवाले अधिकारी पुरुपोंको निश्चय करना है कि वेदान्तवावयोंमें मनुष्ठेय असिहोत्र आदि तथा उसके अञ्ञ नहीं है, इसलिए वेदान्तोंका विचार करना प्राप्त है। समावान-नहीं, उसके लिए पृथक शास्त्रारम्भकी आवश्यकता नहीं है, कारण कि अध्ययनसे ही आपाततः ज्ञान हो जानेसे इतने ही प्रयोजनके लिए
(१) परमहंस यतिभेदोंगें- 'फुटीचको बहूदको हंसश्ैव तृतीयकः। चतुर्थ: परमो हंगो यो यः पश्रात् स उत्तमः ।' इन प्रकार चार तरहफा संन्यास दिसलाया गया है। कुटी वनवा कर उसमें ही सांसारिक विपयोंसे निरक होकर कापाय चस्र्र एवं शिखा, उपवीत, त्रिदण्ड धारण करता हुआ पव्यह्ञानका अन्यान करनेवाला कुटीचक कहलाता है। और घर छोडकर केवल सात घरोंमें मिक्षा करनेवाला बहदक कहा जाता है। एवं वही वहूदक एक ही दण्ड धारण करता है, तो हंस कहलाता है। तथा सवैपरिग्रह्त्यागी परमहंस होता है, जसे पुराणोंमें कहा है- 'कौपीनाच्छादनं वष्नं कन्थां शीतनिवारिणीम्। अक्षमालं च गृह्ीयार्द्वेणवं दण्डमब्रणम्। माधूकरमथकान्तं परमहंसः समाचरेत्।' उचा लक्षणोंसे युक्त यति यदि त्रदाचिन्तन या त्रह्मज्ञानसे रहित हो जाय, तो 'काष्ठदण्डो भृतो येन सर्वाशी ज्ञानवर्जितः। स याति नरकान् घोरान्मदारौरवसनञितान्।।' स्मृतिके अनुसार प्रोयकरित भागी होता है। तथा 'न दण्डं न शिसां नाच्छादनं चरति परगहंसः' इस प्रकार क्रुतिने परमहंसका लक्षण करके कहा कि 'ज्ञानमेवाऽस्य दण्डः' ज्ञान ही उसका दण्ट है। यदि ज्ान नहीं तो सुतरां प्रायथित्ती होगा।
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५२४ विचरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ३
निश्चयात्। तदेवं ब्रह्मविचारे धर्मविचारवदधीतस्वाध्यायस्य त्रैवणिकमात्र-
कारिविशेषणं न्यायतः आपयितुमानन्तर्यचाचकोऽथशब्द: सूत्रकारेण प्रयुक्तो नाऽडरम्भार्थविवक्षयेति स्थितम्। नतु शास्त्रारम्मे शिष्टाचारपरिपालनाय विभ्नोषशान्तये च मङ्गलाचरणं कर्त्तव्यम्, ततोऽथशब्दो मङ्गलार्थोऽस्तु, सम्भवति हि तस्य मङ्गलार्थत्वम्। "ॐकारश्वाऽथश्दश् द्वावेतौ ब्रह्मणो मुखाद्। कण्ठं भिच्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ।।2 इति स्मृतेरिति चेत! तत्र किं माङ्गल्यं वैयधिकरण्येन न्रह्मजिज्ञासां प्रति उसकी आवश्यकता नहीं है। [जसे घट, पट आदि शब्दोंके पढ्नेमात्रसे विचार करनेके पूर्व सामान्य घट, पटका बोध हो जाता, इसके लिए विशेष उपायका अवलम्बन नहीं किया जाता, वैसे ही वेदान्तवाक्योंके पढ़नेमें अनिहोत्रादि शब्दोंके न आनेसे ही ज्ञात हो जायगा कि यहांपर अमिहोत्र आदि नहीं हैं ]। इस प्रकार मीमांसा करनेपर धर्मविचारमें जैसे वेद पढ़े हुए त्रैवर्णिक- मात्रका अधिकार है, वैसे ब्रह्मविचारमें न होनेसे श्रवण आदिकी विधिके प्रकरणमें पढ़े गये शम, दम आदि साधनचतुष्टयसम्पन्नत्व अधिकारीका विशेषण है, इस सिद्धान्तका न्यायतः बोध करानेके लिए आनन्तर्यस्वरूप अर्थके वाचक 'अथ' शब्दका सूत्रकारने प्रयोग किया है। अधिकाररूप अर्थकी विवक्षासे नहीं किया, ऐसा निर्णय होता है। शङ्का-'शिष्टाचारकी रक्षा करने तथा विन्नोंकी शान्तिके लिए मङ्गला- चरण करना चाहिए' इस नियमके अनुसार मङ्गलका वाचक 'अथ' शब्द यहांपर माना जाय, क्योंकि 'अथ' शब्दका मङ्गलरूप अर्थ होना सम्भव है, स्मृतिमें कहा भी है- ऊकार और अथ शब्द दोनों ब्रह्माजीके मुखसे कण्ठको भेदन करके बाहर प्रकट हुए हैं, इसलिए दोनों मङ्कलके वाचक हैं। समाधान-'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस सूत्रमें पढ़े गये मङ्गलार्थक अथशब्दकी वाक्यार्थके साथ सज्जति नहीं है, यह विकल्प द्वारा दिखाते हैं- क्या (अथ शब्दार्थ) मङ्ल ब्रह्मजिज्ञासाके प्रति वैयधिकरण्यसे (कर्ता या
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अथसन्दकी धानन्तयरथ्िकता] भापानुवादसहित ५२५
कारकत्वमापद्याऽन्वेति किं वा सामानाधिकरण्घेन विशेपणत्वमापद्य! नाडडद्य:, माङ्ग्यस्य क्त्राद्यन्यतमकारकतायां प्रमाणाभावात्। न च जिज्ञासानुप- पत्तिर्मानम्, कारकान्तररेव तदुपपत्तेः। जीव: कर्ता, चित्तेकाव्यसहकृतं वेदा- न्तवाक्यं करणम् इत्यादीनि कारकान्तराणि। नाऽपि द्वितीय:, 'जिज्ञासा मङलम्' इत्युक्ते प्रशंसापरतयार्र्थवादत्वप्रसङ्गात्। शिष्टाचारादयर्थ तु मङ्ला- चरणमानन्तर्यवाचिनाऽप्यथशव्देन सम्पादयितुं शक्यम्, अथकारपरोङ्गारा- दिध्वनेरमृदङ्गादिध्वनिवद् मङ्गलात्मकत्वाद्। एवमपि 'अथैवं मन्यसे' इत्यादाविव्याऽथशब्दः प्रकृतादर्थादर्थान्तरमभिद- कर्म आदिरूप) कारकत्वका आपादन कर अन्वित होता है? [अर्थात् मझ्गलके द्वारा या मझलकी ही तथा स्वयं मङ्लभूत जिज्ञासा करनी चाहिए, ऐसा वाक्यार्थ होता है क्या: ] अथवा सामानाधिकरण्यसे विशेषण होकर अन्वित होता है? [अर्थात् जिज्ञासा ही मझल है, ऐसा वाक्यार्थ होता है]। प्रथम विकलप नहीं माना जा सकता, कारण कि कर्ता आदिमें से ममल कोई मी कारक है, ऐेसा माननेगें प्रमाण नहीं है। कारकके बिना इस जिज्ञासाकी अनुपपत्ति मी प्रमाण नहीं मानी जा सकती, कारण कि मझलसे अतिरिक्त दूसरे कारकोंसे भी उसकी उपपत्ति हो सकती है। [कारकान्तरोंको दिखलाते हैं ]-जीव कर्ता है और चित्तकी एकाग्रतासे युक्त वेदान्तवाक्य करण हैं, इत्यादि दूसरे कारक विद्यमान हैं, [जिनसे कि जिज्ञासाकी उपपत्ति हो सकती है]। दूसरा विकल्प मी नहीं बनता, कारण कि जिन्ासा मझलरूप है, ऐसा सामानाधिकरण्य माननेसे 'अथ जिज्ञासा' इस वाक्यका स्तुतिमें ही तात्पर्य हो जानेके कारण अर्थ- वादका पसक हो जायगा [ इसका स्वार्थमें तात्पर्य न होगा]। शिष्टाचारका पालन करनेके लिए मझल करना तो आनन्तर्यवाची अथशब्दके प्रयोगसे भी हो सफता है। अथशब्द और ओंकार आदिकी ध्वनि मृदझ आदि ध्वनिके समान मझलस्वरूप ही है। [अथकार शब्दका प्रयोग एवकारके समान 'कार' शब्दके साथ समस्त समझना चाहिए, या अकार थकारपरक अथकारशन्दको समझना चाहिए अथवा'ॐकारश्राऽथशन्दश्' इस शोकसे इन दोनोंको आदि शब्द माननेसे ऊकारके सहचार्य्यसे अथ शब्दमें भी वर्णसमष्टिन्यपदेश माना गया है ]। श्ा-इस प्रकार अथशन्दको आनन्तर्यार्थक माननेपर भी 'अथवम्' अर्थात् 'अब तुम ऐसा मानते हो' इस वाक्यमें जैसे अथशब्द प्रकृत अर्थसे
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५२६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
धात्विति चेद्, न; हेतुफलभावेनाऽऽनन्तर्याभिधाने अकृतादर्थादर्थान्त- रत्वस्याऽन्तर्णीततया सिद्धेः। न च चैपरीत्येनाऽऽनन्तर्यमेवाऽन्तर्णीततया सिध्यत्विति वाच्यम्, तत्र कि नियमेन पूर्ववृत्ततया हेतुभूतो वस्तु- विशेषो द्योत्यते किं वा यत्किश्चिद्वस्तु पूर्ववृत्तमपेक्ष्यते १ नाऽडद्य आन- न्तर्याभिधानमन्तरेण हेतुतया पूर्ववृत्तवस्तुविशेपनियमासिद्धेः। न द्वितीय:, लोके सर्वव्यापारेष्वपि यत्किश्चित्पूर्ववृत्तादर्थान्तरस् सिद्धत्वाद्थ- शब्दप्रयोगस्याऽनुवादादृटष्टार्थत्वयोरन्यतरत्वप्रसङ्गात्। अतो नियतपूर्ववृत्त-
मात्राभिधाने तन्न सिध्यति, तथापि मुख्यानन्तर्यस्त्रीकारे सिद्ध्येदेव पुष्कल-
अन्य अर्थका अभिधान करता है, वैसे ही जिज्ञासासूत्रमें प्रयुक्त अथशब्द भी उसी अर्थका वाचक माना जाय ? क्या हानि है? समाधान-नहीं, ऐसा नहीं माना जा सकता, क्योंकि हेतु और फल भावसे आनन्तर्यका अभिधान करनेसे ही अथशब्दार्थमें प्रकृत अर्थसे भिन्न मर्थके अन्तर्गत हो जानेसे वह सिद्ध ही हो जाता है [अर्थात् आनन्तर्य कहनेसे यह नियमतः प्रतीत होता है अब दूसरा विषय चलता है, इसलिए उक्त अर्थान्तरका पृथक अभिधान करनेकी आवश्यकता नहीं है] यदि शङ्का हो कि वैपरीत्यसे याने अथशब्दका प्रकृत अर्थसे अर्थान्तर माननेसे ही आनन्तर्यका ही अन्तर्णीत- रूपसे अभिधान हो जायगा? तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि क्या उसमें नियमतः पूर्ववृत्त होनेसे कारणस्वरूप वस्तुविशेषका दयोतन-ज्ञापन-होता है? या पूर्ववृत्त यत्किश्चित् वस्तुकी अपेक्षा होती है ? इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि आनन्तर्यके अभिधानके बिना कारणरूपसे पूर्वसम्पन्न वस्तुविशेषके रहनेका नियम सिद्ध नहीं हो सकता। दूसरा विकल्प भी नहीं हो सकता, क्योंकि लोकमें सभी व्यापारोंमें कुछ-न-कुछ पूर्व वस्तुसे अन्य अर्थ सिद्ध ही है, इससे अथशब्दका प्रयोग अनुवाद या अद्ृष्ट-इनमें से किसी एक प्रकारके ही अर्थका बोधक हो जायगा। इसलिए नियमतः (व्यभिचारके बिना) पहलेके पर्याप्त कारणोंका बोधन करनेके लिए आनन्तर्यरूप ही अथशब्दका अर्थ मानना चाहिए। यद्यपि आनन्तर्यमात्रके अभिधानसे उक्त अर्थकी सिद्धि नहीं हो सकती, तथापि सुख्य आनन्तर्य अर्थका स्वीकार करनेसे तो सिद्धि हो ही जाती है [ मुख्य आनन्तर्य दिखलाते हैं ]-पुष्कल-
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अथशब्दकी आवन्तर्यार्थकता ] मापानुवांदसांहित ५२७
कारणात् फलस्य यदानन्तर्य तदेव सुख्यम्, अव्यवधानादव्यभिचाराच। यत्तु हेतुफलयोरानन्तर्यं तत्कदाचिन्भिचरति कदाचिन्रवधीयते चेति गौणमेव स्थात्। न च वाच्यं कार्ये चेद्, दश्यते किं पुष्कलकारणावग- मेनेति १ पुष्कलकारणस्याऽधिकारिविशेषणत्वेन फलपर्यन्तेच्छाविचारादि- प्रवृत्तौ प्रतिपत्त्यपेक्षत्वाद्। ननूक्तमेवाऽधिकारिविशेषणम् 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इत्यत्रत्येनाऽथशव्दे नेति चेद्, न; तत्र हयध्ययनानन्तर्यमथशव्देनोक्तम्' न च तस्याऽत्राऽधिकारि- विशेपणत्वं सम्भवति, केवलव्यति रेकाभा वेनाडहेतुत्वात्। नहि शमदमादिकारण-
पर्याप्त-कारणोंसे जो फलका आनन्तर्य है, वही सुख्य आनन्तर्य है; क्योंकि पुष्कल कारण और फलके बीचमें कोई व्यवधान या व्यमिचार होता नहीं है [अर्थात् पुष्कल कारणके अनन्तर ही फलकी उत्पत्ति अवश्य होती ही है] और साधारण कारण और फलका जो आनन्तर्य है, वह तो कदाचित् व्यमिचरित भी होता है और कदाचित् व्यवहित भी हो जाता है, इसलिए वह आनन्तर्य गौण ही होगा। यदि कहो कि कार्य ही जब दष्टिगोचर हो रहा है, तब कारणज्ञान करनेकी आवश्यकता ही क्या है? तो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि पुष्कल कारण अधिकारीका विशेषण है, अतः फलपर्यन्त इच्छासे विचारादिकी प्रवृत्तिमें ज्ञानकी अवश्य अपेक्षा है। मोक्षकी इच्छासे विचार किया जाता है और विचारका अधिकारी शम, दम आदिसे सम्पन्न ही है, इसलिए विचारप्रवृस्ि शम, दम आदि पुष्कल कारणोंके ज्ञानकी अपेक्षा रखती है, यह भाव है]। शङ्ा-'अथातो धर्मजिज्ञासा' इस सूत्रमें कहे गये अथशब्दसे अधि- कारीका विशेषण स्पष्ट कहा ही गया है [ फिर उसकी प्रतीति करानेकी आव- शयकता क्या है: ] समाधान-उस सूत्रमें अथशव्दसे जो अध्ययनका आनन्तर्य कहा गया है, वह यहांपर (त्रमजिज्ञासामें) अधिकारीका विशेषण नहीं हो सकता, क्योंकि केवलव्यतिरेकव्यापिका अभाव होनेसे वह हेतु ही नहीं है, [जिस तरह वेदाध्ययन धर्मजिज्ञासामें कारण है, उस तरह ब्रक्जिज्ञासामें वह कारण नहीं है। न्रमजिज्ञासामें तो शम, दम आदि साधनचतुष्टय सम्पत्ति ही पु्कल कारण है, अतः वेदाध्ययनका होना न होना समान ही है, इसलिए वह पुष्कल
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५२८ विवरणप्रमेयसंग्रह ।सूत्र १, वर्णक ३
पौष्कल्ये अध्ययनाभावापराधे ब्रह्मजिज्ञासाया अप्रवृत्तिर्दष्टा। यद्यपि वेदा- न्तानामनध्ययने तद्विचाराभावादध्ययनमपि पुष्कलकारणेडन्तर्भवेत्, एव- मपि धर्मब्रह्मविचारयोः साधारणहेतोरध्ययनस्य ब्रह्मविचारं प्रत्यपुष्कलका- रणतया तद्विचाराविचारयो: साधारणत्वाद्यदनन्तर नियमेन व्रह्मविचा-
पुष्कलकारणेऽन्तर्भवतीत्यथशव्दार्थः स्यादिति चेद, न; तयोरुपकार्योप- कारकभावासिद्धः। उपकारकत्वे हि वेदान्ताध्ययनवद्धर्मविचारस्याऽपि व्यति- रेको वक्तव्या, न च वकुं शक्य:, धर्मजिज्ञासाया अभावेऽप्यधीतचे-
कारण नहीं हो सकता, इस अभिप्रायसे कहते हैं]-शम, दम आदि पुष्कल कारणके रहते यदि वेदाध्ययन न किया हो, तो भी ब्रह्मजिज्ञासामें प्रवृत्तिका अभाव नहीं देखा जाता। यद्यपि वेदान्त वाक्योंके पढ़े विना उनका विचार करना सम्भव नहीं हैं, इसलिए अध्ययन भी पुष्कल कारणोंके ही अन्तर्गत हो जाता है, तथापि इस प्रकार अध्ययन धर्म तथा ब्रह्म दोनोंके विचारके प्रति साधारण कारण है, इसलिए ब्रह्मविचारमें वह पुष्कल कारण (असाधारण कारण) नहीं हो सकता,कारण कि धर्मविचार अथवा ब्रह्मविचारके करने या न करनेमें अध्ययन साधारण है, [अध्ययनके अनन्तर विचारमें प्रवृत्ति अवश्य होती है, ऐसा नियम नहीं है] अतः जिसके अनन्तर नियमसे (व्यभिचारके बिना) म्रक्मविचारमें प्रवृत्ति हो, ऐसे ही पुष्कल कारणका अन्वेषण करना चाहिये। धर्मविचार और ब्रह्मविचारका परस्पर उपकार्योपकारभाव है, अतः एक ही फलका अङ्ग होनेसे उपकारक धर्मविचारका आनन्तर्य जह्मविचारके पुष्कल कारणमें आ जाता है; इसलिए अथशन्दका अर्थ मान लिया जायगा, ऐसा भी सम्भव नहीं है, कारण कि उनमें परस्पर उपकार्योपकारकभावकी सिद्धि ही नहीं है, यदि ब्रह्मविचारका धर्मविचार उपकारक होता, तो वेदान्तवाक्योंके अध्ययनके समान धर्मविचारका भी व्यतिरेक कहना होगा [ जैसे अध्ययनके न होनेपर विचारका अभाव प्राप्त होता है, वैसे ही धर्मविचारके अभावमें ब्रह्म- विचारका भी अभाव होगा, इस प्रकार व्यतिरेक व्याप्ति माननी होगी ] परन्तु उंक्त व्यतिरेक कहना सम्भव नहीं है, क्योंकि धर्मविचारके अभावमें भी वेदान्त-
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मह्मजिज्ञासामें पूर्वमीमांसाकी अनपेक्षा] भापानुवादसहितं ५२९
दान्तस्य त्हमजिज्ञासोपलम्भाद्। अथ व्युत्पच्यादिसिद्धये पूर्वतन्त्रापेक्षा, तदाऽपि वक्तव्यम्-किं तत्रत्यो न्यायोऽपेक्ष्यते कि वाक्यार्थनिर्णय उताऽयिहोत्रादिकर्म ? आद्ये किं प्रथमपादोक्तवेद ग्रामाण्यापेक्षितसाधकन्यायस्याऽपेक्षा उत न्यायान्तरस्य । नाऽडद्य: उत्तरतन्त्रेपि 'शास्त्रयोनित्वात्', 'अत एव च नित्यत्वम्' इत्या- दिसन्रेपु वेदान्तापेक्षितन्यायस्योक्तत्वात्, अस्तु वा दाढ्याय प्रथम- पादापेक्षा, नैनावता धर्मजिज्ञासानन्तर्यप्रसङ्ग:। ग्रथमपादस्य धर्मब्रह्म- वाक्योंको पढ़े हुए पुरुपकी त्रह्मविचारमें प्रवृत्ति होती है। शक्का-युत्पत्ति आदिकी सिद्धिके लिए पूर्वमीमांसाकी-धर्मविचारशास्त्रकी -अपेक्षा रहती है [कारण कि व्युत्पत्तिमें पद-पदार्थ, वाक्य-वाक्यार्थ तथा शव्दबोधके कारणभूत प्रकृतिप्रत्यार्थ-प्राधान्य आदि अनेकों न्याय अपेक्षित होते हैं, उनका विस्तृत विवेचन पूर्वमीमांसामें किया गया है, इसलिए उसकी अपेक्षा सर्वथा उचित है। ] समाधान-नहीं, उसकी आवश्यकता नहीं है, कारण कि हम प्रश्न करते हैं कि न्युत्पत्ति आदिके लिए क्या पूर्वमीमांसामें वर्णित न्याय अपेक्षित हैं! अथवा वाक्यार्थका निर्णय अपेक्षित है ? अथवा अमिहोत्रादि कर्म अपेक्षित हैं: प्रथम विकल्पमें प्रश्न होता है कि क्या प्रथम पादमें कहे गये वेदमामाण्यमें अपेक्षित साधक-प्रामाण्यके पोपक-न्यायकी अपेक्षा है? अथवा उससे भिन्न अन्य न्यायोकी : इसमें साधक न्यायोंकी अपेक्षा नहीं है, कारण कि उत्तरमीमांसामें भी 'शास्त्रयोनित्वात्' (शास्त्र- मूलक होनेसे अथवा शास्त्रका मूल होनेसे) तथा 'अत एव च नित्यत्वम् (इसीलिए तो नित्य है) इत्यादि सूत्रोंसे वेदान्तमें अपेक्षित वेदान्तके प्रामाण्यके साघक न्यायोंका विवेचन आया ही है। उन वाक्योंको दढ़ करनेके लिए पूर्वमीमांसाके प्रथमपाद- तर्कपाढ-मात्रकी अपेक्षा मानो, तो उतनेसे ही ब्रह्ममीमांसामें धर्ममीमांसाका (१) वेन यदि मनुष्य द्वारा प्रणीत होता, तो उसमें मनुष्यकी अनवधानतासे अपरामाण्य आता, किन्तु मनुष्य उसका प्रणेता नहीं है एवं चेदके ऋपि भी प्रणेता नहीं हैं, किन्तु द्रथा हैं, ध्रुति भी कहती है-'यज्षेन वाचः पदवीयमायन्तामन्यविन्दन्नृपिपु प्रविष्ाम्'। महाभारतमें भी व्यासजी कहते हैं कि युगान्तमें छिपे हुए वेदोंको ही अपने तपोवलसे ऋपियोंने प्राप्त किया, जैसे- युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहामान महर्पयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुक्षाता: स्वयम्भुवा ।।'
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५३० विवरणे प्रमेयसंग्रहे. [ सूत्र १, घर्णक ३
जिज्ञासयो: साधारणत्वात्। प्रथमपादगतवेदान्तप्रामाण्य विचारानन्तर्यमथ- शब्दार्थोऽस्त्वति चेद्, न; तस्याऽप्यध्ययनवदपुष्कलकारणत्वात्। द्वितीयेऽपि तन्न्यायान्तरं ज्रह्मप्रतिपादनेऽपेक्ष्यते उत गुणोपसंहारे?
प्तिपादनेऽनुपयोगात्। 'आकाशस्तल्लिङ्ात्' इत्यादिसूत्रैः श्रुतिलिङ्गादय उप- आनन्तर्य नहीं माना जा सकता, कारण कि तर्कपाद धर्म तथा ब्रह्म दोनोंकी जिज्ञासामें सामान्यरूपसे उपयोगी है। यदि कहो कि तर्क-पादमें प्रतिपादित वेदान्तप्रामाण्यका आनन्वर्य 'अथ' शब्दका अर्थ मान लिया जायगा, यह कहना भी संगत नहीं है, कारण कि इस आनन्तर्यको भी, अध्ययनके समान (उभयसाधारण होनेसे), पुप्कल कारण नहीं मान सकते। द्वितीय कल्पमें मी यह प्रश्न होता है कि क्या अतिरिक्त न्यायोंकी अपेक्षा ब्रह्मका प्रतिपादन करनेमें है? या गुणोपसंहारमें: प्रथम कल्प युक्त नहीं है, कारण कि उत्पत्ति आदि चार प्रकारकी विधियोंका निर्णय करनेमें समर्थ अन्य न्यायोंका अनुष्ठानके अविषय तथा सिद्धभूत पदार्थके प्रतिपादनमें कोई उपयोग नहीं हो सकता। यदि कहो कि 'आकाशस्तलिद्वात्' इत्यादि सूत्रोंसे श्रुति,
(१) निर्गुणन्रह्ममें ही सगुण ब्रह्मके गुणोंका उपसंहार करना चाहिए, जैसा कि अभियुक्तोंका वचन है- 'निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्क्तुमनीश्वराः। ये मन्दा तेऽनुकम्प्यन्ते सविशेषनिरूपणैः ॥' अर्थात् जो मन्द पुरुष निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार नहीं कर सकते, उनके लिए दयालु महर्षियोंने सगुण ब्रह्मका निरूपण किया है। इससे महर्पियोंने वेचारे मन्दवुद्धियोंके साथ वञ्चना की, ऐसा भी आरोप नहीं हो सकता; क्योंकि कहा है- 'वशीकृते मनस्येषां सगुणन्रह्मशीलनातू। तदेवाऽविर्भवेत्साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ।' संगुण ब्रह्मकी उपासनासे मनके निर्गुण ब्रह्मकी उपासनाके योग्य हो जानेपर पहले सगुणरूपसे उपासित ब्रह्मका निगुणरूपसे साक्षात्कार होता है। (२) छान्दोग्यमें लोकगतिके प्रश्नके अवसरपर कहा गया है-'सर्वाणि ह वा इमानि भूता- न्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति' अर्थात् ये सब भूतजात आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं और आकाशको ही प्राप्त होते हैं। और 'आकाशो हवैतेभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्' सचसे उत्कृष्ट आकाश ही है और आकाश ही अन्तिम गति है। इस वाक्यमें आकाशपदसे भूताकाशका भ्रहण प्राप्त होनेके सन्देहमें 'सर्वाणि ह वा इमानि भृतानि आकाशादेव समुत्पधन्ते' इस श्रुतिमें आकाशके द्वारा सबकी उत्पत्ति दिखला कर आकाशपदसे पंरव्रह्मका वोध श्रुतिके वलसे दिखलाते हुए ज्यायस्तवरूप
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ऋ्रह्मजिज्ञासामें पूर्वमीमांसाकी अनपेक्षा ] भापानुवादसहित ५३१
जीव्यन्त इति चेद्; न; तत्र लोकसिद्धश्रुत्यादीनामेवोपजीवनाद् । न द्वितीय :: सगुणविद्यानां मानसक्रियारूपाणां धर्मान्त:पातितया गुणोपसंहारे तदपेक्षायामप्यविरोधाद्। ब्रह्मजिज्ञासायां तूपासनानां प्रासङ्गिकी सङ्गतिः।
लिन्न आदि (तर्कपादमें प्रतिपादित न्यायान्तरों) का आश्रयण किया ही गया है, तो यह मानना भी उचित नहीं है, कारण कि उक्त सूत्रोंमें लोकसिद्ध श्रुति आदि न्यायोंका आश्रयण है [ अर्थाद् पूर्वमीमांसामें जैसे अनादि वृद्धव्यवहारसे सिद्ध श्रुति, लिद्ग आदिका ग्रहण है, वैसे ही उत्तरमीमांसामें उनका ही त्हण है, इसलिए तर्कपादकी अपेक्षा नहीं है, यह भाव है]। दूसरा कल्प गुणोपसंहारमें उप- योग मानना भी, नहीं वन सकता, कारण कि मानसिक क्रियाओंके-उपासनारूप- होनेसे धर्मके ही अन्तर्गत सगुरण विद्याएँ मानी जाती हैं, इसलिए गुणोपसंहारमें- सगुणोपासनावोधक वाक्योंमें-उन न्यायोंकी अपेक्षा रहनेपर भी (प्रथमतः निर्गुण ब्रह्मविचारमें) कोई विरोध नहीं आ सकता, कारण कि ब्रह्मविचारके प्रकरणमें उपासनाओंकी मासझ्विक संङ्जति है। दूसरे विकल्पमें (वाक्यार्थनिर्णयकी
तथा परायणत्वरूप लिंज्की सिद्धि भी परन्रह्मका बोध करानेवाली श्रुति द्वारा दिखलाई गई है- 'आकाशो वरवेतेभ्यो ज्यायान, इत्यादि और 'ज्यायान् पृथिव्या-' इत्यादि, तथा 'विज्ञानमानन्दं व्रहा' रातेदातुः परायणम्।' इत्यादि। (१) सगुण विद्या और निर्गुण विद्या-इन दोनोंमें यद्यपि विद्याके नाते कोई विशेष नहीं है, तथापि सगुणविद्या मानसिक कियारूप है, यह स्पष्ट ही है। गुलावको गुलाव समझना मनके अधीन नहीं है, किन्तु इन्द्रियविकलता न हो, तो गुलाव वस्तु ही स्वयं अपना प्रकाश करायेगी, इसमें मनोव्यापारकी अपेक्षा नहीं है। यदि इन्द्रियवैकल्य है, तो मनके हजार व्यापार करनेपर भी गुलावका अनुभव नहीं हो सकता; किन्तु सगुण उपासनारूप सगुण विद्या सवथा मनोव्यापाररूप है। भगवान् भी कहते हैं-'शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिर- मासनमात्मनः' अर्थोत् उपासनाके लिए मनकी स्थिरता, देशशुद्धि तथा आसन, ध्यान आदिकी आवश्यकता है एवम् मूलाधारसे कुण्डलिनी, सुधुम्ना आदि नाढियों द्वारा ब्रह्मरन्ध् तक चढ़ना और वहाँपर स्थिर होकर अपने इटका निरन्तर एक-सा ध्यान करना चाहिए। भाष्यकार कहते हैं-'उपासनं नाम समानप्रत्ययकरणम्, न च तद्गच्छतो धावतो वा संभवति'। अथ च उद्गीथमें न्रह्मदृष्टि इत्यादि सब मनोव्यापार ही हैं और शुद्ध ज्ञान उसके ही अधीन है, इसके विपरीत चलने फिरनेसे चित्तके विक्षिप्त हो जानेके कारण वह नहीं होता है। (२) किसके अनन्तर किसका अभिधान करना चाहिए, इस जिज्ञासाको उत्पन्न करने- वाली सक्ति छः प्रकारकी होती है, जसे कि कहा भी है-
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५३२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
द्वितीयेऽपि न तावत् पूर्वतन्त्रवाक्यार्थनिर्णयो ब्रह्मविचारप्रवृत्तावुपयुज्यते, क्ाऽप्यन्यविपयज्ञानस्याऽन्यत्र परवृत्तिहेतुत्वादर्शनात्। नाऽपि ्रह्मप्रमितौ तदु- पयोग:, धर्मज्ञानस्य ब्रह्मप्रमापकत्वायोगात्। यदि धर्मज्ञानस्य त्रह्मकार्यत्वात कार्येण कारणानुमानमित्युच्यते, तदा प्रपश्चेनाऽपि कार्येण ब्रह्मणोऽुमातुं आाक्यत्वात् किं धर्मज्ञानेन। तृतीयपक्षेऽ्रपि ब्रह्मविचारे कथमग्निहोत्रादिकर्म- अपेक्षा मानने में) भी पूर्वमीमांसामें किये गये वाक्यार्थनिर्णयका न्रत्मविचारकी प्रवृत्तिमें कोई उपयोग नहीं है, कारण कि ऐसा कहीं भी नहीं देखा गया है कि दूसरे विषयका ज्ञान दूसरे विषयमें प्रवृत्ति करानेका कारण हो (घटविपयक ज्ञान घटमें ही प्रवृत्ति करा सकता है, पटमें नहीं) और ब्रह्मकी प्रमितिमें याने अबाधित निश्चयात्मक ज्ञानमें भी उसका (धर्ममीमांसाशासत्रके वाक्यार्थ निर्णयका) उपयोग नहीं है, कारण कि धर्मका निश्चयात्मक ज्ञान ब्रह्मका निश्चयात्मक ज्ञान नहीं करा सकता। यदि धर्मज्ञान ब्रह्मका कार्य होनेसे कार्यसे. कारणका अनुमान करानेवाला होगा (इससे धर्मज्ञान ब्रह्मपमापक है) ऐसा मानो, तो प्रपश्चरूप कार्यसे मी ब्रह्मका अनुमान किया जा सकता है, इसमें धर्म- ज्ञानकी क्या आवश्यकता है: ['ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' इत्यादि श्रुतिकी सामर्थ्यसे ब्रह्ममें सबके प्रति कारणत्व सिद्ध ही है, इसलिए आणमरपसिद्ध घट, पटादि प्रपञ्चज्ञान ही प्रेक्षावान्के प्रति अपने कारणका अनुमानप्रमापक हो जायगा। इस साधारण बातके लिए इतने बड़े आडम्वरके साथ बारह अध्यायके पूर्व मीमांसाशासत्रसे धर्मज्ञान करनेकी कुछ भी आवश्यकता नहीं है, इससे मुमुक्षुको पूर्वमीमांसाशास्त्र पढ़नेका आनन्तर्य सिद्ध नहीं हो सकता]। तृतीय 'सप्रसङ्ग उपोद्दातो हेतुताऽवसरस्तथा। निर्वाहकैककार्यत्वे पोढा सङ्तिरिष्यते ॥' अर्थात् प्रसङ्ग, उपोद्धात, हेतुता, अवसर, निर्वाहक और एककार्यता ये छः सद्तियाँ हैं। सादश्यादिरूप अथवा कारणान्तरसे स्मरणमें आये हुए विषयकी उपेक्षा न करना प्रसङ्ग सङ्गति है। प्रकृत विषयके वर्णनकी चिन्ताके कालमें प्रकृतके अनुकूल विषयका उपस्थित करना उपोद्धात सङ्गति कहलाती है। प्रकृतंके कारणका प्रतिपादन करना हेतुरूप सप्गति होती है। प्रकृतके विपरीत शिष्यजिज्ञासाकी निवृत्तिके लिए कुछ कहनेकी आवश्यकता-अवसर सङति है। प्रकृत एक ही कार्यका साक्षात या परम्परया जनक (प्रयोजकमात्र) का कहना निर्वाहक कहलाता है। एककार्यत्व सङ्ति एक ही कार्य होना है। इस प्रकार प्रसङ्गसक्गतिमें वर्णन किये हुए विषयका पूर्वापरके साथ सम्बन्ध हँढ़ने की आवश्यकता नहीं होती।
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मक्षविचारमें पूर्वमीमांसाकी अनपेक्षा] भापानुवादसहित ५३३
णामुपयोगः । किं यथा सोपानपरम्परया प्रसादमारोहति तथा संध्योपासन- मारभ्य पूर्वपूर्वाल्पतरकर्म प्रहाणेनोत्तरोत्तरमह त्तरकर्मोपादानात् सहस्रसंवत्सरे निरतिशये कर्मण्यवस्थितः परिशेपाद् ब्रह्मज्ञानेऽवतरतीत्युच्यते किं वा क्रमेण कृत्लकर्मफलावासी ब्रह्मलोकान्तगोचराणां सर्वेंपां कामानामनुभवेन प्रविलये तत्र निवृत्तकामः परमानन्दकामनया ब्रह्मविचारेऽवतरतीति? नाडडय्य:, प्रमाणाभावात्। द्वितीये ब्रह्मविचारो मनुष्याधिकारो न स्यात्,
काम: प्रविलांपनीय एव। तत्र यथा चहिरुपस्थितं दाहयमखिलं दग्व्वा प्रगाम्यति तथा कामोऽपि सर्वभोगेन प्रविलीयत इति चेद्, न; हैरण्यगर्भा-
विकलपके-अभिहोत्र आदिकी अपेक्षाके-माननेमें मी यह प्रश्न होता है कि ब्रह्म- विचारमें अमिहोत्र आदि कर्मोंका उपयोग कैसे होगा ? क्या जैसे सीढ़ियोंसे महलकी छतपर चढ़ा जाता है, वैसे सन्ध्योपासनसे लेकर पूर्व-पूर्वके छोटे-छोटे कर्मोके त्यागसे आगे-आगेके बड़े-बड़े कर्मोंके उपादानसे हजार वर्ष तक चलनेवाले निरतिशय कर्ममें अवस्थित पुरुप परिशेपसे ब्रह्मज्ञानमें पहुँचता है, इस प्रकार कर्मोंका उपयोग कहते हो? अथवा सम्पूर्ण कर्मोंके क्रमशः फल पानेके अनन्तर ब्रहालोक तककी सब कामनाओंका उनके अनुभवसे नाश हो जायगा, फिर उन सब कामनाओंसे रहित पुरुष परम आनन्दकी कामनासे ब्रह्मविचारमें लगता है? (इस प्रकार क्या कर्मोका उपयोग है?)। इनमें प्रथम पक्ष नहीं बन सकता, कर्योंकि सोपानपरम्पराके समान ब्रद्ाविचारमें पहुँचानेके लिए कर्म साधन है, ऐसा माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। दूसरा विकल्प भी युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रद्मका विचार करना मनुष्यके अधिकारसे वाहर हो जायगा, कारण कि वह तो ब्रक्ष- लोककी प्राप्तिके अनन्तर होनेवाला है। [और व्रद्मलोककी प्रप्तिके समय वह भनुष्य- व्यपदेशभागी रहता ही नहीं, क्योंकि मनुष्यव्यवहार तो भूलोकमें ही है, अन्य भिन्न मिन्न लोकोंमें तो देव आदि भिन्न संज्ञाएँ प्राप्त हो जाती हैं, यह भाव है।] शङ्का-कामनाविशिष्ट पुरुषका न्रद्मविचारमें अधिकार न होनेसे कामनाका 'विलय करना ही चाहिए। जैसे अग्नि इन्धन आदि सम्पूर्ण दाह्य वस्तुओंको जलाकर स्वयं शान्त हो जाती है, वैसे ही सब भोगोंके भोगनेपर कामना भी स्वयं विलीन हो जाती है। ६८
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५३४ विवरणप्रमेयसंग्रह ' (सूत्र १, वर्णक ३
दिभोगानां प्रतिक्षण क्षीयमाणत्वादनागतभोगविपयकामनोपपचेः। अग्नेरषि दाह्यान्तरोपस्थाने पुनः प्रज्वलनदर्शनात्। अत एवोक्तम्- 'न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविपा कृष्णवत्मेव भूय एवाऽभिवर्धते ॥' इति। ननु कामावाह्या स्वच्छहृदय: पुमान् कार्यान्तरक्षमो दृष्ट इति चेत्, सत्यम् ; तत्रौत्सुक्यनिवृत्तिर्हृदयस्वास्थ्ये हेतुर्न कामग्रापिः, अनुपभुक्तविपय- स्यौत्सुक्यरहितस्य पुरुपस्य चित्तस्वास्थ्यदर्शनात्। औतसुक्यं च न भोगादेकान्ततो निवर्तते, किन्तु विपयदोपदर्शनात्। न च भोगात् कामो- पश्म इत्येवंविध आगमोऽस्ति । समाधान-हिरण्यगर्भ आदि अवस्थाओंमें प्राप्त होनेवाले भोगोंका प्रतिक्षण विनाश होनेसे आगे आनेवाले अर्थात् जो अवतक प्राप्त नहीं हुए हैं, ऐसे भोगोंकी कामना बनी ही रहती है, अतः कामनाका क्षय नहीं हो सकता। दूसरी जलने योग्य सामग्रीके आ जानेपर दष्टान्तभूत अग्निका भी पुनः प्रज्वलन दिखलाई देता है, इसीलिए तो कहा गया है- विषयोंका उपभोग करनेसे अभिलापाएँ कभी शान्त नहीं होती, किन्तु वृत आदि हविस् पदार्थके छोड़नेसे जसे अंग्नि अधिक बढ़ती ही जाती है, बैसे ही विषयभोगसे अभिलाएँ बढ़ती ही जातीं हैं। शङ्का-अभिलाषाओंकी पूर्ति हो जानेसे पुरुष प्रसन्नचित होकर दूसरे कार्यको करनेमें समर्थ देखा जाता है [ यदि अभिलाषाओंके पूर्ण हो जानेपर भी अभिलाषा बनी ही रहती, तो पुरुषको प्रसन्नचित्त नहीं होना चाहिए, अतः इस प्रसन्नतासे माळम पड़ता है कि अभिलाषाओंकी समाप्ति होती है, यह शङ्काका तात्पर्य है। ] समाधान-यद्यपि आपकी शङ्का ठीक है, तथापि उत्सुकताकी निवृत्ति ही हृदय-प्रसन्नताकी कारण है, अभिलाषाकी पूर्ति कारण नहीं है, कारण कि जिसने विषयोंका भोग नहीं किया है और विषयभोगकी इच्छा भी नहीं है, ऐसे पुरुषका चिच प्रसन्न देखा जाता है। और विषयभोगसे तो उत्सुकताकी सर्वथा निवृत्ति नहीं होती, किन्तु विषयमें दोषके परिक्षानसे होती है, क्योंकि 'भोगसे इच्छाकी शान्ति हो जाती है', इस प्कार बतलानेवाला कोई आगंम प्माण नहीं है।
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गेक्षविचारमें पूर्वभीमांसाकी अनपेक्षा ] भापानुचादसहित ५३५
यस्तु मन्यते वेदिकशव्दा सर्वे संहत्य ग्रषश्चविलयप्रमितिपरा:, ज्योतिष्टोमादिवाक्यानामपि देहातिरिक्तात्मानसुपजीव्य प्रवृत्तानां देहा- त्मत्वप्रविलापकत्वादिति; तं प्रतीतिविरोध एव निराकरिष्यति। तसान केनापि प्रकारेण पूर्वतन्त्रापेक्षा सुलभा। ननु कर्मद्वारा तदपेक्षा स्ाद् ब्रह्मविचारस्य। तथा हि-नित्यक- र्माण्यनुष्टीयमानानि पुरुषे धर्मार्यं गुणमाद्धति, स च धर्मः पापाख्यं मलमपकर्पति ततो गुणाधानमलापकर्पणसंस्काराभ्यां संस्कृतः पुमान् ब्रह्म- विचारेऽधिक्रियते। तदाह गौतमः-यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः स
सभी वेदवाक्य आपसमें मिलकर प्रपञचके विलयका निश्चय कराते हैं, क्योंकि ज्योतिष्टोमादिके प्रतिपादक वाक्य भी देहसे अतिरिक्त आत्माका आश्रयण करके ही प्रवृत्त होते हैं, इसलिए उन वाक्योंका तात्पर्य भी देहात्मवादका विलय करनेमें ही है, ऐसा जो वादी मानता है, उसका खण्डन तो प्रतीतिविरोध ही कर देगा। [ 'स्वर्गकी कामनासे याग करे' इत्यादि वाकयोंसे स्वर्ग और यागों का साध्य-साधनभाव ही शब्दतः प्रतीत होता है, प्रपञ्चका चिलय प्रतीत नहीं होता। अन्यथा स्वर्गादि प्रपञ्चके विलयका बोध करनेसे यागमें किसीकी प्रवृत्ि ही नहीं होगी, यह भाव है ] इसलिए किसी भी कारणसे (ब्रम्मविचारमें) पूर्व- मीमांसाकी अपेक्षा नहीं हो सकती। ब्रह्मविचारको कर्म द्वारा पूर्वमीमांसाकी अपेक्षा होगी; क्योंकि अनुष्ठीयमान अग्निहोत्रादि नित्य कर्म पुरुषमें धर्मनामक गुणकी उत्पत्ति करते हैं, [जिससे कर्म करनेवाले धर्मात्मा कहलाते हैं ] और वह धर्म पापरूपी मलका निराकरण करता है, उसके अनन्तर गुणाधान और मलापकर्परूप दोनों संस्कारोंसे संस्कृत पुरुष न्रम्मविचारमें अधिकार प्राप्त करता है, यही सिद्धान्त गौतम मुनिने भी कहा है-'जिस पुरुपकें ये अड़तालीस संर्कार हो जाते हैं, वह
(१) अवतालीस संस्कार इस प्रकार गिनाये गये हैं-गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोज्यन, जातकर्म, नामकरण, अनप्राशन, चूडा (झुण्डन), उपनयन, चार वेदव्रत, समावर्तन, विवाह, नहायज्, देवयज, पितृयज्ञ, भृतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, (इस प्रकार पांच महायज्ञ) अष्टका भ्राद्ध, पार्वेण श्रद्ध, श्रावणी, आम्रहायणी, श्रीप्ठपदी, चैत्री, आश्वयुजी (इस प्रकार सात पाकयक्ष) अम्याधान, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रयण, चातुर्मास्य, निरदपशुबन्ध,
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५३६ विवरणप्रमेयसंग्रह्ं [सूत्र १, वर्णक ३े
ब्रह्मण: सायुज्यं सालोक्यं च गच्छतीति। अत्रैतच्छव्देन गर्भाधानादीनि सप्तसोमसंस्थान्तानि कर्माणि परामृश्यन्ते। न च वाच्यं कर्मणां संस्कारकत्वे स्व्रतन्त्रफलता न स्याद्, त्रीहिप्रोक्षणादौ स्वतन्त्रफलाभावात् ; तत आश्रमकर्मानुष्ठायिनां स्वतन्त्रफलाभिधायिनी सर्व एते पुण्यलोका भवन्तीति श्रुतिः पीड्येतेति। ग्रोक्षणादिवत् कर्मणामन्याङ्गतानङ्गीकारेण स्वतन्त्रफलताS- विरोधात्। यथा द्रव्यार्जनस्य स्वतन्त्रपुरुपार्थतया निर्णीतस्य क्रत्वनङ्ग- स्याऽपि कतूपकारिता तथाऽनङ्गानामपि कर्मणां ब्रह्मविचारोपकारिता
ब्रह्मके सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है' इस गौतम मुनिके वचनमें 'एतत्' शब्दसे गर्भाधानादिसे लेकर सात सोमसंस्थानान्त कर्मोंका परामर्श होता है। यदि कहो कि कर्मोंको संस्कारजनक माननेमें उनका कोई स्वतन्त्र ही फल नहीं होगा, क्योंकि संस्कारजनक प्रोक्षणादि कर्मोंका कोई स्वतन्त्र फल नहीं देखा जाता है। इस परिस्थितिमें अपने-अपने आश्रमविहित कर्मोंके अनुष्ठापक पुरुषोंके लिए स्वतन्त्र फलका अभिधान करनेवाली 'आश्रम कर्मोंको करनेवाले पुरुष पुण्य लोकोंकी प्राप्ति करते हैं' इत्यादि अर्थवाली 'सर्व एते' इत्यादि श्रुतिसे विरोध होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वे प्रोक्षणादिके समान अन्य किसी भी विधानके अद्ग नहीं हैं, अतः उनका स्वतन्त्र फल होनेमें कोई विरोध नहीं है। [ यदि कर्म किसीके अङ्त नहीं हैं, तो ब्रह्मविचारके भी उपकारी कैसे होंगे इस आशक्काका दष्टान्त द्वारा समाधान करते हैं ]-जैसे स्वतन्त्र पुरुषार्थस्वरूप द्रव्यार्जन स्वयं क्रतुका अङ्ग नहीं है, तो भी क्रतुका उपकारी होता है, वैसे ही अङ्ग न होते हुए भी कर्म त्रह्म- विचारके उपकारी हो सकते हैं, अन्यथा कर्मोंको संस्कारजनक कहनेवाली उक्त
और सौन्रामणी उक्त सात हविरयेज्ञ संस्कार अग्निष्ठोम, अत्यगिष्टोम, उक्थ, पोडशी, षाजपेय, अतिरात्र, आसोर्याम, (इस प्रकार सात सोमसाध्य यज्ञ) इन चालीस संस्कारोंके अंतिरिक्त दया, तितिक्षा, अनसूया, शौच, अनायास, मङ्गल, कूपणताका अभाव एवम् लोलुपताका अभाव ये आत्माके आठ गुण। इनका विशद वर्णन अ्न्थगौरवसे यहांपर नहीं किया गया है, धर्मशास्त्रोंसे जानना चाहिये। (२) सायुज्य-सयुजो भाव :- अर्थात विद्याके द्वारा अविद्याकी नितृत्ति होनेसे ब्रह्मके सांथ एकताकी प्राप्ति। (३) सालोक्यम्-समानलोकस्य भावः प्रासि :- अर्थात् ध्रवण, मनन आदिके बिना केवल उपासना द्वारा समान लोककी प्राप्ति ।
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बक्ज्ञानमें कर्मोंकी उपयोगिता] भापानुवादसहित ५३७
स्यात्। अन्यथा कर्मणां संस्कारत्वस्मृत्यनुपपत्तेः। एवं च कर्माणि केवला- न्यम्युदयफलानि, श्रवणमननादिसहकृतानि तु ब्रह्मज्ञानजनकानीति श्रुति- स्मृत्योरविरोधः। न च गौतमस्मृतौ सालोक्यलिङ्गाद्विरण्यगर्भप्राप्तिरेव संस्कारकर्मणां फलमिति वाच्यम्, तत्र सायुज्यशब्देन मोक्षस्याऽभिहि- तत्वात्। 'ज्ञानमुत्पद्यते पुसां क्षयात् पापस्य कर्मणः' इत्यादिस्मृतिषु स्पष्टमेव पापक्षयलक्षणसंस्कारद्वारा ज्ञानोत्पत्तौ कर्मणां विनियोगात्। यथा प्रोक्षणा-
गौतमस्मृतिकी उपपत्ति नहीं होगी, केवल कर्म स्वर्गादि अभ्युदयको देनेवाले हैं. और वे ही कर्म श्रवण, मननादिसे युक्त होकर ब्रह्मज्ञानके उत्पादक होते हैं, इस प्रकार निष्कर्ष करनेसे श्रुति तथा स्मृतिमें कोई विरोध नहीं रह जाता। 'सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति' यह श्रुति केवल कर्मोंके फलका बोधन करती है और 'यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत् संस्काराः' इत्यादि गौतमस्मृति श्रवण, मननके सहकारसे कमोंका ब्रह्मज्ञानमें उपयोग कह रही है, इस प्रकार विषयका भेद होनेसे विरोध नहीं आता ]। यदि शङ्का हो कि गौतमस्मृतिमें सालोक्यरूप हेतुसे संस्कार कर्मोंका हिरण्यगर्मपरात्तिरूप फल मानना चाहिये, ब्रह्मज्ञान नहीं। तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि उसी स्मृतिमें सायुज्यशब्दसे मोक्षका अभिधान * है। 'पाप कर्मोंका नाश होनेसे पुरुषोंको ज्ञान होता है।' इत्यादि स्मृतियोंमें पापक्षयरूप संस्कार द्वारा ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंकाा विनियोग स्पष्ट ही है जैसे प्रोक्षण आदि संस्कार
*त्रह्माके साथ एक-अभेद-को ही सायुज्य कहते हैं, और ब्रह्मक्य ही मोक्ष माना गया है। * कर्मोंका संस्कार द्वारा ज्ञानसिद्धिका अञ्त होना भगवान्गे भी श्रीमुखसे श्रीमन्न- गवद्ीतामें कहा है-"स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः" अपने अपने कमोंमें तत्पर पुरुष सिद्धि पाता है। यहाँपर स्वपद्से अढतालीस संस्कारोंमें से नित्य कर्ग लिए जाते हैं। और सिद्धिपदसे अन्तःकरणकी शुद्धि अभीष्ट है। आगे चलकर भगचान् कहते हैं- "सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निवोध मे" सिद्धि-चित्तशुद्धि-को पाकर, न्रह्म पानेका प्रकार गुझसे सुनो" कहकर कहते हैं- "बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ।।" विशुद्ध वुद्धि-अन्तःकरण-से युक्त हो और धृतिसे अपना नियमन करके ध्यानयोगमें
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५३८ विवरंणप्रमेर्यसंग्रह [सूत्र १, वर्णेक ३
दीनि संस्कारकर्माणि दर्गपूर्णमासस्वरूपोत्पत्तिहेतुतया स्वर्गे समुच्चीयन्ते तथा नित्यनैमित्तिककर्माणि ज्ञानोत्पत्तिहेतुतया मोक्षे समुच्चीयन्ते। ननु तर्हिं प्रोक्षणादिवदेव गुणकर्मत्वं प्राप्तं ततो न कदाचिदपि स्वतन्त्रफलत्व- सिद्धिरिति चेद्, न; व्रीहिचदत्र संस्क्रियमाणस्याऽSत्मनो विधेयगुणत्वाभावेन तत्प्रासेः। नहि प्रमाणतन्त्रं ब्रह्मज्ञानं विधातुं शक्यम्, येनाऽडत्मनो विधेय· गुणता स्यात्। नन्वेवं सति संस्कारकर्मता नित्यनैमित्तिकयोर्न स्याद्, विहिताङ्गद्रव्यसंस्कारकर्मण्येव तत्प्रसिद्धेरिति चेद्, मैवम् ; अविहितभोज- नाङ्गदधिसंस्कारेऽपि प्रसिद्धेः ।
कर्म दर्शपूर्णमास यागकी स्वरूपोत्पततिमें कारण होते हुए स्वर्गरूप साध्यकी कारणसामग्रीमें जुट जाते हैं, वैसे ही नित्य, नैमित्तिक-सन्ध्योपासना, राहू- परागादिमें (ग्रहणमें) स्नान, दानादि-कर्म ज्ञानोत्पत्तिके कारण होकर मोक्षरूप पुरुषार्थकी कारणसामग्रीमें मी सम्मिलित हो जाते हैं। यदि शक्का हो कि तब तो प्रोक्षणादिके समान वे कर्म भी गुण कर्म ही हुए और गुणकमोंसे स्वतन्त्र फलकी सिद्धि कमी भी नहीं हो सकती, तो ऐसी शक्का भी नहीं हो सकती, कारण कि त्रीहिके समान संस्कारको प्राप्त होनेवाला आत्मा विधेयका गुण नहीं है, अतः उसमें स्वतन्त्र फलकी प्राप्ति हो सकती है, कारण कि न्रह्यज्ञान प्रमाणाधीन है, अतः उसका विधान नहीं किया जा सकता, जिससे कि आत्मा 'त्रीहिके समान' विधेयका गुण हो। यदि शक्का हो कि ऐसा होनेपर नित्य नैमिचिक कर्मोंका संस्कार कर्म होना सिद्ध नहीं होगा, कारण कि विहित-प्रधानभूत विधेय-के अन्नभूत (नीह्यादि) द्रव्यके संस्कारक कर्ममें संस्कारकर्मता प्रसिद्ध है, तो वैसी शक्का करना मी ठीक नहीं है, क्योंकि जिसका किसी 'भोक्तव्यम्' इत्यादि विघायक वाक्यसे विधान नहीं किया जाता, ऐसे अविधेयभूत भोजनके अङ्ग दधि आदि द्रव्यके संस्कारमें मी वैसा (संस्कारका कर्म होना) प्रसिद्ध है।
तत्पर हो वैराग्यको प्राप्त "ततो मा तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्"-'यथार्थतः मुझको आनकर अनन्तर मेरे साथ ऐक्यको प्राप् हो जाता है' इस प्रकार श्रीभगवान्की दिखलाई हुई प्रक्रियासे निल्य कमोंके द्वारा चित्तकी शुद्धिको पाकर ध्यान योग आदि सहकारीकी सम्पत्ति मिलनेसे तत्त्वज्ञानका उदय होनेसे मोक्षपप्तिमें कर्मोका उपयोग स्पष्ट ही है।
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महज्ञानमें कर्मोंकी उपयोगिता ] भाषानुवादसहित ५३९
ननु यदि नित्यकर्मणां ब्रह्मज्ञानेतिकर्त्तव्यता, तथा सति विधिवाक्य- निर्दिष्टं करणत्वं न सिध्येत्, प्रधानोपसर्जनरूपयो: करणेतिकर्त्तव्यतयोरेकताS- संभवात। यदि च नेतिकर्त्तव्यता तदा दध्यादिसंस्कारवदन्यार्थद्रव्य- संस्काररूपता न सिध्येदिति चेद, नैप दोपा; उभयथाऽप्यविरोधाद्। न तावदेकस्य करणत्वमितिकर्त्तव्यत्वं च न संभवति, 'अगनं चित्वा सौत्रामण्या यजेत', 'वाजपेयेनेष्टा बृहस्पतिसवेन यजेत' इत्यत्र सौत्रामणीवृह स्पतिसवयोरन्यत्र करणतया स्वतन्त्रविध्यन्तरविहितयोरप्यग्निचयनवाजपेये- तिकर्त्तव्यतादर्शनात्। तत्र करणेतिकर्त्तव्यविधिवाक्यप्रमाणमेदाद्युक्त सौत्रामण्यादेरुभयार्थत्वमिति चेत्, तर्हात्राऽपि नित्यविधिसामर्थ्यात् संस्कार-
यदि शक्का हो कि नित्य कर्मोंमें न्रह्ज्ञानकी इतिकर्तव्यता मानी जायगी, तो विधिवाक्यसे दिखलाई गई करणता सिद्ध न हो सकेगी, क्योंकि प्रधान और उपसर्जन स्वरूप करण और इतिकर्तवयता इन दोनोंका एकमें रहना सम्भव नहीं है। यदि उनमें इतिकर्तव्यता न मानी जाय, तो दधि आदिके संस्कारकी भाँति अन्यार्थद्रव्य (भोजनादि निमितच् दध्यादि द्रव्य) की संस्कार- रूपता सिद्ध न होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त दोष नहीं आता। दोनों प्रकारोंमें (इति कर्तव्यता मानने या न माननेमें) भी कोई विरोध नहीं है, कारण कि एकमें करणत्व और इतिकर्तव्यत्व दोनों सम्भव नहीं हैं, ऐसा तो है नहीं, [ अर्थात् दोनोंका होना सम्भव है-इसमें दष्टान्त देते हैं ]- अत्यन्त स्वतन्त्र दूसरे विधिवाक्योंमें करणरूपसे विधान किये गये सौनामणी और वृहस्पतिसव यागोंमें भी 'अग्निचयन करके सौत्रामणी याग करे' और 'वाजपेय याग करके वृहस्पतिसव यज्ञसे याग करे' ऐसे स्थलोंमें अभिचयन और वाजपेयके अङ्ग होनेसे इतिकर्तव्यता देखी जाती है। उक्त स्थलोंमें करण तथा इतिकर्तव्यविधिके वाक्यरूप प्रमाणके भेदसे सौत्रामणी आदिमें करण तथा इतिकर्तव्यतारूप यदि उभयार्थत्व सम्भव है, तो प्रकृतमें भी नित्यविधिकी सामर्थ्यसे और उक्त संस्कारबोधक स्मृति और अनुमित श्रुतिकी सामर्थ्यसे उभयार्थकी कल्पना कीजिये। [इससे इतिकर्तव्य माननेमें कोई दोप नहीं आ सकता ]। इतिकर्तव्य न माननेसे भी संस्कान-
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-५४० विवरणप्रमेयसंग्रद्द [सूत्र १, वर्णक ३
संस्काररूपत्वासिद्धिः। आधानस्याऽनितिकर्त्तव्यस्यैव संस्कारत्वात्। ननु कर्मणां ज्ञानसाधनत्वे यावज्ज्ञानोदय तदजुष्टानाद्विविदिपासन्यासो न सिध्येदिति चेद्, नः चित्तस्य छुद्धिद्वारा पत्यक्प्रचणतायां सम्पननायां तदनुष्ठानोपरमाङ्गीकाराविरोधात्। तदुक्तम्- 'प्रत्यकुप्रवणतां बुद्धेः कर्माण्युत्पाद्य शुद्धितः । कृतार्थान्यस्तमायान्ति ग्रावृडन्ते घना इव ॥' इति। तदेवं संस्कारपक्षे कर्मणां ब्रह्मज्ञानोपयोग: सिद्धः । अथ विविदिपापक्षेऽपि सोडनिधीयते। 'तमेत वेदानुवचनेन न्राह्मणा विविदिपन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन' इति श्रूथते। तत्राऽत्मत्च्वापरोक्षा रूप होनेकी प्रसिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि इतिकर्तव्य न होता हुआ ही आधान संस्कार कर्म होता है। शक्ा-कर्मोंको ज्ञानके प्रति साधन माननेमें जवतक ज्ञानका उदय होगा, तब तक उनका अनुषठान करना पढ़ेगा, इससे विवदिषासंन्यासकी सिद्धि नहीं होगी। [ज्ञानेच्छासे कर्मोंका त्याग नहीं वन सकता, कारण कि 'विविदिषन्ति यज्ञेन' इत्यादि श्रुति यज्ञ आदि कर्मोंको ज्ञानसाधन कहती है ]। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि चित्तकी विशुद्धिके द्वारा परमात्माकी ओर तत्परता सम्पन्न होनेके अन्तर कमोंके अनुष्ठानसे विराम माना जाता है, इससे कोई विरोध नहीं आता। कहा भी गया है- वर्षाकालकी समाप्तिमें जैसे मेघ विलीन हो जाते हैं, वैसे ही यज्ञ आदि कर्म बुद्धिकी-अन्तःकरणकी-शुद्धि-विषयाभिलाषा निवृत्ति-के द्वारा पर- मात्माकी लगन उत्पन्न कराकर कृतार्थ होकर अस्त हो जाते हैं- इस प्रकार 'कर्मोंको' संस्कारक माननेके पक्षमें कर्मोंका ब्रह्मज्ञानमें उपयोग सिद्ध हुआ। कर्मोंको संस्कारार्थ माननेसे 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः' इत्यादि शास्त्र रागी पुरुषोंको उद्देश्य करके प्रवृत्त होते हैं। विविदिषासंन्यासादि विधि विरक्तके लिए है (इससे शास्त्रोंमें परस्पर विरोध नहीं आता)। 'तमेतं वेदानुवचनेन-' इत्यादि आगे प्रदर्शित किये जानेवाले श्रुतिवाक्योंसे नित्य कर्मोंका संस्कारार्थ होना सिद्ध नहीं होता, किन्तु विविदिषा-ब्रह्मतत्त्वज्ञानकी इच्छा-के लिए होना प्रतीत होता है, इस आशयसे पक्षान्तर कहते हैं-
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मस्ज्ञानमें कर्मोकी उपयोगिता ] भापानुवादसहित ५४१
नुभवस्तावदिप्यमाणतया स्वर्गादिवद्दावनासाध्योवगम्यते, पुरुपार्थत्वाद्। न च शव्दज्ञानस्येष्यमाणत्वं शङ्कनीयम्, संजाते शाव्दज्ञाने तत्र कामना- नुदयात्। असंजाते तु विपयानवगमादेव तत्र सुतरां कामनाऽसम्भवात्। अपरोक्षानुभवे तु संभवत्येव कामना। शव्दज्ञानोत्पत्तौ विपयस्य सामान्यतः प्रसिद्धत्वात्। यदा तु श्द एवाऽपरोक्षज्ञानस्य जनकस्तदाऽपि तस्य चश्चलत्वान्निश्चल ज्ञानं कामयितव्यमेव। तन्र यज्ञादीनामाख्या- ताभिहितभावनाकरणतयाऽयगतानामिष्यमाणेन साध्येनैवाऽन्वयाद्यज्ञादीनि
अथवा (कर्मोंका फल) विविदिपा मानना चाहिए, क्योंकि 'हमें ब्रम्म- तत्त्वका ज्ञान हो, ऐसी इच्छा होना भी उत्कृष्ट पुण्योंका फल है' वह विवि- दिपा पक्ष इस प्रकार कहा जा सकता है-उस परमात्माको ब्राह्मण वेदानु- वचन, यन, दान, तप और हित, परिमित तथा पथ्य भोजनसे जानना चाहते हैं, इत्यादि अर्थवाली श्रुति है, उस क्रुतिमें आत्मतत्त्वका अपरोक्षानुभव ही इच्छाविषय (अमीष्ट) होता हुआ स्वर्गादिके तुल्य भावनासाध्य प्रतीत दोता है, क्योंकि चह पुरुपार्थरूप है। शव्दज्ञान अमीष्ट है, ऐसी शक्का नहीं की जा सफती, [अर्थात उक्त क्षुतिमें शब्दज्ञानका भावनाके साध्यत्वरूपसे बोध नहीं किया गया हैं। ] कारण कि शब्दज्ञानके उत्पन्न होनेपर उसकी कामना नहीं दो सकती, [अतः शब्दज्ञानको अमीष्ट नहीं माना जा सकता] और शाब्द ज्ञान यदि नहीं हो पाया तो विपयज्ञान न होनेसे उसमें कामनाकां होना विलकुल ही सम्भव नहीं है, इससे मी वही दोष आता है। अपरोक्षा- नुगव-साक्षात्कार-की कामनाका तो सम्भव है ही। [ इसलिए तत्त्व- साक्षात्कार अमीष्ट पुरुपार्थ माना जा सकता है ] कारण कि शब्दननित ज्ञान होनेपर विपयकी सामान्यतः प्रसिद्धि-प्रतीति-हो जाती है [ अतः ज्ञान पदार्थ इच्छाविषय हो सकता है] जिस पक्षमें शब्दको ही अपरोक्ष ज्ञान- साक्षात्कार-का कारण माना जाता है, उस पक्षमें मी उस-शब्दज्ञानके चञ्चल होनेसे निश्चल-स्थिर-जानको अमीष्ट-कामनाविषय-होना ही चाहिए। उस स्थलमें अखयातार्थ भावनाके करणरूपसे प्रतीयमान यज्ञादिका इच्छाविषय-अमीष्ट-साध्य (न्माज्ञान) के ही साथ अन्वय होनेसे गज़ादि व्रह्मज्ञानके उपायस्वरूप प्रतीत होते हैं। केवल इच्छासे अन्वय ६९
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५४२ [सूत्र १, चर्णक ३
ध्यत्वात्। ततश्चाऽऽत्मानुभवकामो यज्ञादीन्यनुतिष्ठेदिति विधि: परिणम्यते। न च 'विविदपन्ति' इति वर्तमानताविरोध:, लेट्परिग्रहेण विध्यधिगमात्। न च नित्यस्य यज्ञादेर्वह्मानुभवकामेन कथ संवन्ध इति वाच्यम्, स्वर्गकामसंवन्धादुपपत्तेः । ननु विमता ज्ञानहेतवो यज्ञा- दिभ्यो भिन्ना:, प्करणान्तरविहितत्वाद, यथा कुण्डपायिनामयने मासमग्नि- होत्रम् ; कुण्डपायिनामयनं नाम संवत्सरसत्रम्। तत्र हि 'मासमगिहोत्रं जुहोति' इति विहितस्य अकरणान्तरविहितात् प्रसिद्धानिहोत्राद्वेदो निर्णीतस्तथाS- नहीं किया जा सकता, कारण कि इच्छा साध्य नहीं है, [इच्छाविषय ब्रह्मज्ञान साध्य है, करणका अन्वय साध्यमें ही करना चाहिए, यह न्यायपाप्त है ]। इससे 'आत्मानुभव-ब्रह्मसाक्षात्कार-की इच्छा रखनेवालेको यज्ञादिका अनुष्ठान करना चाहिए' ऐसा विधिका परिणाम हो जाता है अर्थात् यज्ञादि स्वर्गादि- कामके अतिरिक्त न्रह्मज्ञानके अधिकारसे परिणत हुए विघिवाक्यका विधेय माना जायगा। 'विविदिषन्ति' इस वर्तमानार्थक लट् लकारके प्रयोगका विरो नहीं आता, कारण कि यहांपर (लिडर्थमें) लेट् लकार होनेसे विधिरूप अर्थ लिया जाता है। नित्यभूत यज्ञादिका न्रह्मानुभवकाम अधिकारीसे सम्बन्ध कैसे होगा? ऐसी शङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि स्वर्गकाम अधिकारीसे सम्बन्ध होनेके कारण उपपत्ति हो सकती है। [जैसे नित्य अग्निहोत्र संयोगभेदसे काम्य भी हो सकता है, वैसे ही नित्य यज्ञ भी संयोगभेदसे काम्य हो सकता है अर्थात् एक कर्मका अनेका- धिकारविघिसे सम्बन्ध हो सकता है। [प्रकरणमें पठित अधिकारान्तर- विधिके साथ अधिकारान्तरविधिका संयोगभेदसे सम्बन्ध हो सकता है, परन्तु प्रकरणान्तरस्थसे सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है, इस आशयसे शङ्का करते हैं-] विमत ज्ञानके कारण ('यज्ञेन विविदिषन्ति' इत्यादि श्रतिवाक्यमें प्रति- पादित यज्ञादि) 'प्रसिद्ध अग्निहोत्रादिरूप' यज्ञादिसे भिन्न-अतिरिक्त-हैं, कारण कि (ब्रह्मज्ञानसे ) मिन्न प्रकरणमें पढ़े गये हैं। जैसे 'कुण्डपायियोंके अयनमें एक मास तक अमिहोत्र' कुण्डपायियोंका अयन नाम संवत्सरसाध्य- एकवर्षसाध्य-यज्ञका है। उसमें 'मासभर अग्निहोत्र करें' इस वाक्यसे विहित अमिहोत्रका दूसरे प्रकरणमें विहित प्रसिद्ध अग्निहोत्रसे मेदका निर्णय
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प्रहज्ञानमें कमोंकी उपयोगिता ] भांपानुंवादसाहित ५४३
त्रापि। नैतदुक्तम्, वैपम्यात्। दृष्टान्ते हि न तावदग्निहोत्रशव्द: प्रसिद्धा-
तोक्तार्थभिधायित्वात्। नाऽप्याख्यातशव्दस्तन्र समर्थः, स्वप्रकरणपठितो- पसन्धिर्मासगुणेन च विशिष्टे कर्मविशेषे सति तं विहाय प्रकरणान्तरस्य परामर्शायोगात्। दार्शान्तिके त्वध्ययनयज्ञदानतपोनाशकशब्दानां लौकि- काभिधानतया स्वातन्त्र्यात् प्रदेशान्तरविहिताग्निहोत्रादिपरामर्शोपपत्तौ तान्येव कर्माणि संयोगभेदेन विधीयन्त इत्युपपद्यते। नन्वेवमपि ब्रह्मज्ञानस्य दृष्टप्रमाणसाम्रीजन्यस्य नाऽटष्टापेक्षा, सति प्रमाकरणे यज्ञादिजन्याद्प्टाभा-
किया गया है। इसी तरह प्रकृतमें भी भेद समझना उचित है। समाधान-दष्टान्त दार्शान्तिकमें वैपम्य होनेसे उक्त शक्काके कहनेमें तत्तव नहीं है, क्योंकि दष्टान्त 'कुण्डयायिनामयने मासमगिहोत्रम्' इस वाक्यमें आया हुआ अमिहोत्रशब्द प्रसिद्ध अमिहोत्रका परामर्श करनेमें समर्थ नहीं है, कारण कि वह अलौकिक अभिधान आख्यातपरतन्त्र है, अतः आख्यात ही उक्त अर्थका अभिघायी हो सकता है। [प्रमाणान्तरसे अमिहोत्रकी सिद्धि नहीं है, इससे यह अग्निहोत्र-पदार्थ अलोकिक है और जुहोतिका अर्थ है इसलिए आख्यातपरतन्त्र कहा गया ] आख्यातशब्द मी ग्रसिद्ध अग्निदोत्रके कहनेमें समर्थ नहीं है, अपने प्रकरणमें पढ़े हुए उपसद्-कारक आदिसे तथा मासरूप गुणसे विशिष्ट कर्मविशेपकी प्रतीति होनेपर उसका त्यागकर दूसरे प्रकरणस्थके परामर्श करनेका योग नहीं हो सकता, दार्न्तिक ('तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति-' इत्यादि वाक्य) में तो अध्ययन, यज्ञ, दान, तप, तथा अनाशक शब्दोंका लौकिक अर्थ होनेसे स्वातन्त्र्य है, अतः उनसे प्रकरणान्तरमें भी विहित अग्निहोत्र आदि प्रसिद्ध यज्ञोंके परामर्शकी उपपत्ति हो सकती है, इसलिए उनका प्रसिद्ध ही अग्निहोत्र आदि कर्मोंका- संयोग मेदसे विधान किया जाता हैं। इस प्रकार नित्य अग्निहोत्र आदि काम्य कर्मोंका ब्रह्मज्ञानके साथ सम्बन्ध उपपन्न हो सकता है। शक्का-ऐसा माननेपर भी दृष् प्माणसामग्रीसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्म- ज्ञानको अदृष्ट (प्रमाण) की आवश्यकता नहीं है। प्रमा-निश्चयात्मक ज्ञान-के करणके उपस्थित रहते यज्ञ आदिसे उत्पन्न अदृष्टके
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५४४ विवरणप्रमेयसग्रहं [सूत्र १, वर्णक ३
वापराधेन ज्ञानानुदयादर्शनादिति चेद्, न; शासत्रकसमधिगम्येऽ्थे केवलव्यति रेका भावस्याऽदोपत्वात्। यचवात्र समुच्चयवादिनो मन्यन्ते-न कर्माणि ज्ञानसाधनानि, प्रमाण- रूपत्वाभावात्, किन्तु मोक्षसाधनानीति, तदसत्; 'यज्ञेन विविदिपन्ति' इति भ्रुतज्ञानकरणत्वविरोधाद्। यदि साक्षात् करणत्वं न संभवेत्, तदाऽन्त:करण- छुद्धिद्धारा तत्कल्पनीयम्। लोके 'काष्ठैः पचति' इत्यादौ परम्परया साधनेऽपि
न होनेपर भी ज्ञानका उदय देखा जाता है। [ विषयेन्द्रिय सन्निधान होते ही ज्ञान हो ही जाता है, इसमें पुण्य पापरूप अदष्टकी अपेक्षा नहीं होती, इसलिए पुण्योत्पादक नित्य कर्मोंमें ज्ञानकारणता सिद्ध नहीं हो सकती ]। समाधान-केवल शास्त्र द्वारा ही ज्ञात होनेवाले विषयमें केवल व्यतिरेकका अभाव दोष नहीं होता। [ जैसे कपालोंको अग्निमें तपानेके लिए मन्त्र पढ़े जाते हैं, यहांपर शङ्का हो सकती है कि अग्नि तो बिना मन्त्र पढ़े भी तपा देगा, फिर मन्त्रपाठ क्यों: परन्तु मन्त्रपाठपूर्वक तपानेमें ही अभ्युदय होता है, इसलिए ताप देनेमें यद्यपि मन्त्रपाठके व्यतिरेकका अभाव होते हुए भी मन्त्रपाढ करना शास्त्र होनेसे छोड़ा नहीं जाता, एवं ज्ञानोदयमें भी यज्ञादिका केवलव्यतिरेकाभाव रहते भी 'तमेतम्-' इत्यादि श्रतिके बलसे यज्ञ आदिको ज्ञानसाधन मानना दोषपूर्ण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि शास्त्र कहता है और जो शास्त्र कहे वही अभ्युदयकारी होता है ]। [ज्ञानकर्मसमुच्चयसे मोक्षरूप पुरुषार्थकी सिद्धि माननेवाले वादीका खण्डन करते हैं-] जो कि इस विषयमें ससुच्चयवादी मानते हैं कि कर्म ज्ञानके साधन नहीं हो सकते, कारण कि कर्म प्रमाणस्वरूप नहीं है। (ज्ञानके साघन इन्द्रिय आदि प्रमाण ही होते हैं)। किन्तुं मोक्षरूप पुरुषार्थके साधन हैं, यह कहना उचित नहीं है, 'यज्ञेन विविदिषन्ति-' इत्यादि श्रतिसिद्ध ज्ञान- करणत्वसे विरोध होगा। (अर्थात् यज्ञ आदिको करण कहनेवाली श्तिका विरोध उनके मतमें आ जायगा)। यदि कर्मोंमें (ज्ञानके प्रति) साक्षात्करण सम्भव न हो, तो अन्तःकरणकी शुद्धि द्वारा उसकी (करणत्व) की कल्पना करनी चाहिए (अर्थात् परम्परया करण मानिये), क्योंकि लोकमें
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बंह्ाज्ञानमें कमोंकी उपयोगिता] भापानुवादसहित ५४५
करणविभक्तिदर्शनात्। वेदेऽपि स्वर्ग प्रति करणत्वेन श्ुतस्य यागादेर- पूर्वद्वारा करणत्वकल्पनात्। न त्वेवमत्र वाक्ये मोक्षसाधनता प्रतीयते, प्रत्युत 'न कर्मणा न प्रजया' इत्यादिवाक्यान्तरे कर्मणां मोक्षसाधनता प्रतिपिध्यते। अतस्तेपां ज्ञानहेतुत्तव । ननु विशुद्धिद्वारेण ज्ञानहेतुत्वे संस्कारविविदिपापक्षयोः को भेद: ?
विज्ञानं साधयति, तदभावे सत्यभ्युद्यमेव। विविदिपायां तु विज्ञानस्य कर्मफलत्वात् फलपर्यन्तसाधनानि संपाद्यापि विज्ञानं जनयतीति विशेष:।
'इन्धनसे पाक करता है' इस वाक्यमें परम्परासे कारणभूत इन्धनके आगे मी करणकारक विभक्तिका ('काषैः' तृतीयाका) चिन्ह 'से' आता हुआ देखा गया है। वेदमें भी श्रुति द्वारा करणकारकंरूपसे प्रतिपादित याग आदिमें अपूर्व द्वारा ही करणकारकत्वकी कल्पना की गई है। इस प्रकार प्रकृत वाक्यमें (यज्ञादिका परम्परया भी) मोक्षका साधन-करणकारक-होना प्रतीत नहीं होता, इसके विपरीत 'कर्मसे नहीं, सन्ततिसे नहीं-' इत्यादि दूसरे श्रुतिवाक्योंमें क्रमोंकी मोक्षसाधनताका निषेध किया गया है, इसलिए कर्मोंको ज्ञानका कारण ही मानना उचित है। शक्का-यदि विशुद्धि-चित्तकी विषयविमुखता-द्वारा कर्मोंको ज्ञान- साधन मानते हो, तो संस्कार और विविदिया पक्षोंमें परस्पर क्या भेद होगा? [ संस्कारपक्षमें मी 'प्रत्यक्परवणतां बुद्धे: कर्माण्युत्पाद्य शुद्धितः' इत्यादि प्रतिपादित रीतिके अनुसार चित्तविशद्धि ही अपेक्षित है। और विविदिपापक्षमें भी इसीका प्रतिपादन किया गया है]। समाधान-संस्कार पक्षमें-श्रवण, मनन, निदिध्यासन, अभ्यास, (पुनः पुनः परिशीलन) आदि सहकारी कारणोंके जुटनेपर ही संस्कार विज्ञानकी-ब्रह्मतत्व साक्षात्कारकी-सिद्धि कर सकता है और सहकारियोंके न जुटनेपर संस्कार केवल स्वर्गादि अभ्युदयकी ही सिद्धि करता है। और विविदिपापक्षमें तो विज्ञान कर्मफल है, अतः विविदिपा फलपर्यन्त साधमोंका सम्पादन करके भी विज्ञानको उत्पन्न करती है, इतना विशेप है। [ संस्कारमें सामर्थ्य नहीं है कि श्रवणादि सह- कारियोंकी सम्पच्ति कर सके, केवल सहकारीकी सम्पत्ति पानेपर ही वह ज्ञानोतपादक
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५४६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक ३
तदेवं पक्षद्वयेपि कर्मद्वारा पूर्वतन्त्र स्याऽपेक्षितत्वात्तदानन्तर्यमथशब्दार्थ इति, नैतत् सारम्, जन्मान्तरानुष्ठितैरपि कर्मभिरन्तःकरणशुद्धौ ज्ञानो- दयसंभवात्। अथ मतम्-ऋणापाकरणायेह जन्मनि कर्माऽनुष्ठातव्यम्। 'ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्। अनपाकृत्य मोक्षतु सेवमानो त्रजत्यघः ॥' इति स्मृतेरिति, तदसत् : 'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्व्रजेत्' इति प्रत्यक्ष्त्या वाधितत्वात्। तदुक्तम्- 'प्रत्यक्षवेदवचनप्रामाण्यापाश्रयादतः । आदौ संन्याससंसिद्वेर्ऋ्र्णानीति ह्यपस्मृतिः ॥' इति।
होता है और विविदिषा सकल अपेक्षित श्रवणादि सहकारियोंको सम्पन्न करनेमें समर्थ होती हुई ज्ञानरूपी फलको भी उत्पन्न करती है, इस प्रकार दोनोंमें भेद है, यह भाव है। 'ननु कर्मद्वारा तदपेक्षा स्यात्'-इत्यादिसे लेकर यहांतकके प्रघट्टकसे वर्णित युक्तियोंके आधार पर) संस्कार या विविदिषा दोनों पक्षोंमें कर्म द्वारा पूर्वतन्त्रके अपेक्षित होनेसे पूर्वमीमांसाका या कर्मोंका आनन्तर्य 'अथ' शब्दका अर्थ मानना चाहिए, इस लम्बी शङ्काका समाधान करते हैं ]-ऐसा कहना सारभूत नहीं है, क्योंकि दूसरे-दूसरे पूर्वजन्मोंमें किये गये कर्मोंके द्वारा चित्त शुद्ध होनेसे भी ज्ञानका उदय हो सकता है। [ श्रीमङ्भगवद्गीतामें भी कहा है कि 'अनेकजन्मसंसिद्धः' अनेक जन्मोंके सुकृतोंसे सिद्धि प्राप्त होती है। ] यदि माना जाय कि ऋणके शोधनके लिए इस जन्ममें कर्मोंका अनुष्ान करना चाहिए, जैसा कि स्मृतियोंमें कहा गया है-'तीन ऋणोंका शोधन कर- मनको मोक्षमें लगाना चाहिए। ऋण चुकाए बिना मोक्षमें मन लगानेवाला अधोगामी अर्थात् नरकमें जाता है।' तो यह मानना भी अच्छा नहीं है, कारण कि 'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रन्नजेत्'-अथवा वैराग्यका उदय होनेपर ब्रह्म- चर्याश्रमसे ही गृहस्थाश्रमधर्मका पालन किये बिना भी संन्यास ले ले (मोक्ष- साघनमें लग जाय), इस प्रत्यक्ष श्रुतिसे विरोध आता है। कहा भी है-संन्यास- सिद्धिसे पूर्व ऋणोंके दूर करनेके लिए कही गई 'ऋणानि' इत्यादि स्मृति प्रत्यक्ष प्रमाणभूत वेदवचनोंके आधारसे अपस्मृति है अर्थात् सिद्धान्तभूत स्मृति नहीं है।
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बहाज्ञानमें कमोंकी उपयोगिता] भापानुवादसहित ५४७
'जायमानो वै ब्राह्मणसित्रिभिर्तणवान् जायते' इति श्रुतिरप्यस्तीति चेद, न; तस्या हृदयाद्यवदानशेपार्थवादत्वात्। न चाइसौ भृतार्थवादा, न्याय- विरोधात्। ऋणशब्देनाडत् कि पुत्रयज्ञत्रह्म चर्याण्येवोच्यन्ते किं वा तद्विघय :? तत्र न तावजायमानस्य पुत्रादिसंत्रन्धो युज्यते, योग्यानुपल्धिविरोधाद्।
सामर्थ्यस्य चाऽधिकारिविशेपणत्वाद। अथ 'गृहस्थो जायमानस्त्रिभिऋण- वान् जायते' इति व्याख्यायेत, एवमपि 'गृहात्प्रत्जेत्' इति विधिविरोध: पूर्वोक्तन्यायविरोधश्च दुर्वारः। नहि विवाहृदिने एव पुत्रसंवन्धस्तदुत्पा- दनसामर्थ्य वोपलभ्यते। न च जन्मारभ्य पुत्राद्यधिकारसंपत्ते: प्राग्वि-
'उत्पन्न होनेवाला ब्राम्मण उक्त तीन ऋणोंके ही साथ उत्पन्न होता है' इस प्रकार प्रत्यक्ष क्ति मिलती है, ऐसा कहना भी नहीं वनता, कारण कि वह श्रुति हृदयादि अवदानका अङ्गभूत अर्थवाद है। [हृदयावदानमें हृदय, जिह्वा और वक्ष:स्थल इन तीनका अवदान कहा गया है; इन तीनोंके अवदानके विधानका शेष होनेसे अर्थवाद श्रुति उक्त प्रत्रज्ञनविधायक श्रुतिकी अपेक्षा दुर्बल है ] उस श्रुतिको मुतार्थवाद नहीं कह सकते; कारण कि इसमें न्यायविरोध आता है। क्या उक्त श्रुतिमें ऋणशब्दसे पुत्र, यज्ञ, या ब्रह्मचर्य ही लिये जाते हैं ? या उनका विधान लिया जाता है? उत्पन्न होनेवालेका पुत्रादिके साथ सम्वन्ध होना युक्ति-सङ्गत नहीं है, क्योंकि योग्यानुपलन्धिसे विरोध आता है। [ सम्वन्धयोग्य गृहस्थकी जन्मकालमें उपलन्धि ही नहीं है और न सम्वन्ध होनेवाले पुत्रकी ही उपलन्धि है] और उनका विधान भी ऋणशव्दसे नहीं लिया जाता, कारण कि ऋणविभोचन विघिसे पाप्त नियोगके अनुष्ठानमें सामर्थ्यहीनका अधि- कार नहीं है; कारण कि सामर्थ्य अधिकारीका विशेषण माना गया है। यदि गृहस्थ होता हुआ (अर्थात् सामर्थ्यसम्पन्न होता हुआ विवाहसमयमें ही) तीन ऋणोंसे युक्त होता है, ऐसा व्याख्यान किया जाय, तो ऐसा माननेपर भी 'गृहस्थाश्रमसे ही संन्यास ले ले' इस श्रुति- प्रतिपादित अर्थसे विरोध आता है और पूर्वोक्त न्यायविरोध, तो हटाया नहीं जा सकता। विवाहके ही दिन पुत्रके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता और न उसके उत्पादनका सामर्थ्य ही उपलब्ध होती है। ऐसा भी नहीं
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५४८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
रोधिविध्यन्तरसंबन्धपरिहारार्थमिदं वचनमिति वकुं शक्यम्, पूर्वोक्त संन्यासविरोधात्। 'तस्मादेप वा अनृणो यः पुत्री यज्वा त्रह्मचर्यवासी यदवदानैरेवावदयते तदवदानानामवदानत्वम्' इत्येतदन्तमिदं वचन मशूतार्थवादमात्रम्। ननु 'ब्रह्मचर्य समाप्य गृही भवेत्' इति विधिना विरोधे क्थ ब्रह्म- चर्यादेव संन्यासो विधीयते। मैवम्, संन्यासगार्हस्थ्ययोविरक्ताऽविरक्त- विपयभेदेन व्यवस्थितत्वात्। यस्तु संन्यासस्य कर्मानधिकृतान्धपङ्ग्वादिविपयतया व्यवस्थां मन्यते, स वक्तव्यः किं विधिपर्यालोचनया इद्मतगम्यते उत कल्प्यते? नादः, 'ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्' इति वचनस्य कर्माधिकृतानधिकृतसाधारण्येन
कहा जा सकता है कि जन्मसे लेकर पुत्रादि अधिकार-सम्पत्ति पानेके पूर्व (मध्य- कालिक जीवनमें) विरोधी दूसरी विधियोंके सम्बन्का परिहार करनेके लिए उक्त वचन है; कारण कि पूर्वोक्त संन्यासविधिसे विरोध आता है, अथवा वह ऋण मुक्त हो जाता है-जो पुत्रवान्, यज्ञादिका अनुष्ठाता, नियमपूर्वक वेदाध्ययन करनेवाला और पूर्वोक्त तीन अवदानोंके द्वारा पुण्य कर्मशाली होता है, + वही अवदानकी अवदानता-पुण्यकर्मता-है।' यहां तक उक्त वचन अभूत अर्थवादस्वरूप है, भूतार्थवाद नहीं, जिससे कि स्वतन्त्र प्रमाण हो और 'ब्रह्मचर्यादेव प्रब्रजेत' संन्यासविधानका विरोध कर सके। शङ्का-ब्रह्मचर्यत्रत समाप्त कर नियमपूर्वक वेदाध्ययनके अनन्तर गार्हस्थयव्रत धारण करे। इस विधिके साथ विरोध आनेसे न्रह्माचर्यके अनन्तर ही संन्यासका विधान कैसे संगत हो सकता है? समाधान-संन्यास और गार्हस्थ्यकी विरक्त रागीके लिए पृथक् पृथक् व्यवस्था की गई है। [ रागीके लिए गार्हस्थ्य और विरक्तके लिए ब्रक्मचर्यान्तर ही संन्यास-इस व्यवस्थासे कोई विरोध नहीं रह जाता। ] संन्यास कर्माधिकारसे वहिष्कृत अन्धे, लंगड़े आदिके लिए है (और सम्पन्नेन्द्रियसमर्थके-लिए गार्हस्थ्य है) इस प्रकार जो व्यवस्था मानता है, उससे पूछना चाहिए कि विधिवाक्योंका विचार करनेसे ऐसा ज्ञान हुआ: या ऐसी कलपना ही की जाती है: प्रथम पक्ष नहीं मान सकते, क्योंकि ब्रह्मचर्यके
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संन्यास धिकारका विचार] भापानुवादसहित. ५४९
प्रतीतेः । अधिकृतानां गार्हस्थ्यविधानादनधिकृतेष्वेव तद्वचनं पर्यवस्यतीति चेद् न, 'अथ पुनर्व्ती वाजती वा स्नातको वाडस्रातको वा उत्सन्नागिर- नगनिको वा यदहरेव विरजेतदहरेव प्रव्रजेत्' इत्युत्तरवाक्ये कर्मस्वधिकृतानाम- नधिकृतानां च सुखत एव संन्यासाधिकारित्वेनोपादानात्। न चैवं संन्यासस्य सर्वाधिकारप्रसङ्ग:, विरक्त्तर्नियामकत्वाद्। अविरक्तस्य त्वन्धादेरपि संन्यासे पातित्यपर्यवसानात्। 'यस्तु प्रव्रजितो भृत्वा' इत्यादिना विपयसेवाया निषेधाद्। नाऽपि द्वितीय:, कल्पकाभावात् । अथ मन्यसे-इन्द्रियाणि विद्यमानान्यपि संन्यासिना निरोद्व्यानि, ततो वरमिन्द्रियविकलस्यैव तदधिकार इति, तत्र किमङ्गभूते संन्यासेऽ- नुपयोगादिन्द्रियाणां निरोधः किं वाडङ्विन्यात्मज्ञानेनुपयोगाद् उत अनन्तर ही संन्यास ले लेना चाहिए, इस वचनकी प्रतीति कर्माधिकारी (समर्थ) और अनधिकारी (असमर्थ) दोनोंके लिए साधारणरूपसे होती है। अधिकारप्राप्त पुरुपोंके लिए गृहस्थ जीवनका विधान होनेसे 'परिशेपात्' अनधिकारियोंके ही लिए उक्त वचनोंका संन्यासके विधानमें तात्पर्य माना जाय' यह भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि 'अथ-वती हो या त्रती न हो, स्नातक-विद्या समासिके अनन्तर दीक्षापाप्त हो, अथवा अस्नातक, निरग्नि हो अथवा साग्निक, जैसा भी हो जिस दिन ही उसको वैराग्य प्राप्त हो जाय, उसी दिन संन्यास ग्रहण कर ले- इस अर्थवाले अगले वाक्यमें कर्मोंमें अधिकृत अथवा अधिकारशून्य दोनोंका ही संन्यासविधिमें अधिकारी होना मुखसे-साक्षात् वाचक शब्दोंसे- ही कहा गया है। इस प्रकार अधिकारी, अनधिकारी दोनोंका संन्यासमें अिकार होनेसे सभीका संन्यासमें अधिकार प्राप्त हो जायगा, ऐसी शक्का करना उचित नहीं, कारण कि वैराग्य इसका नियमन करेगा। वैराग्य न होनेसे तो अन्धादिका भी संन्यासग्रहण करनेमें पतित होना ही निश्चित रहता है। 'जो पुरुष संन्यासी होकर भी'-इत्यादि वचनोंसे विषयसेवाका निषेध किया गया है। 'अन्यार्थकी कलपना करना' दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता; कारण कि उसका कोई कल्पक नहीं है। यदि कहो कि संन्यासीको विद्यमान इन्द्रियोंका निरोध भी करना होता है, इससे तो यही अच्छा है कि इन्द्रियसामर्थर्यहीनका ही संन्यासमें अधिकार माना जाय, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वैसा माननेपर प्रश्न यह होता है कि क्या वहाँ अन्जभूत संन्यासमें इन्द्रियोंका उपयोग न होनेसे उनका निरोध है? या प्रधानभूत ७०
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विरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ३
विपरीतप्रवृत्तीनामपि जनकत्वात्! नाऽडद्य:, 'दृष्टिपूत न्यसेत्पादम्' 'पर्यटेत्कीट- वद् भूमौ' इत्यादिसंन्यासधर्मनिर्वाहायेन्द्रियाणामुपयुक्तत्वात्। न द्वितीय :; 'शरीरं मे विचर्पणं जिह्वा मे' इत्यादिनाऽत्मज्ञानाय शरीरेन्द्रियादिपाटवस्य प्ार्थ्यमानत्वात्। तृतीये तु विपरीतप्रवृत्तिमात्रं परित्याज्यम्, नेन्द्रियस्वरूपम्। का तर्ह्विरक्तानामन्धपङ्गवादीनामाज्यावेक्षण विष्णुक्रमाद्युपेतकर्मस्वनधिक- तानां गतिरिति चेत्, पुत्रोत्पादनव्रह्मयज्ञादिकर्मान्तराधिकार इति त्रूम :; अत आत्मज्ञानप्रकरणपठिते तदङ्गभूते संन्यासे शरीरादिपाटवेऽपि तस्य
आत्मज्ञानमें उपयोग न होनेसे : या इन्द्रियां आत्मज्ञानके विपरीत- घातक-प्रवृत्तियोंको उत्पन्न करती हैं, इसलिए उनका निरोध करना है? प्रथम विकल्पको नहीं मान सकते, कारण कि 'भूमिपर पर खूब देख भाल कर रखना चाहिए, कीड़ोंकी भांति जमीन पर चले अर्थात् घीरे-धीरे रेंगता जाय' इत्यादि संन्यासधर्मोंका निर्वाह करनेके लिए इन्द्रियोंका उपयोग (अङ्जभृत संन्यासमें) है ही। दूसरा पक्ष मानना नहीं वनता, क्योंकि 'मेरा शरीर विचर्ण- समर्थ, एवं मेरी जिह्वा-इत्याद्यर्थक श्रुतिवाक्य * द्वारा आत्मज्ञानके उपयोगी शरीर तथा इन्द्रियोंकी पटुता पानेकी प्रार्थना करना संन्यासीको भी प्राप्त है। तीसरे पक्षमें, तो विपरीत प्रवृत्तिका त्याग ही प्राप्त होता है, इन्द्रियोंके स्वरूपका नहीं। [वेदान्तीका सिद्धान्त है कि वैराग्यहीन अन्ध, पङ्ग आदिका ब्रह्मज्ञानमें भी अधिकार नहीं है और कर्मोंकी उनमें योग्यता नहीं है, इसलिए, उनमें उनका अधिकार नहीं है, इससे ये बेचारे वैदिक मार्गसे-ज्ञानकाण्ड अथवा कर्मकाण्ड दोनोंसे-व्रन्चित रह जायँगे, इस आशयसे शङ्का-समाधान करते हैं ]- शङ्का-तब तो घृतका अवलोकन तथा विष्णुकी परिक्रमा आदि कर्मोंसे युक्त यज्ञोंके अनधिकारी (वैराग्यरहित) अन्धों या लँगड़ोंकी क्या गति होगी? 'अर्थात् वे कैसे वैदिक मार्गका अनुसरण कर सकेंगे? समाधान-पुत्रोत्पादन, वेदाध्ययन इत्यादि दूसरे, जिनमें अवेक्षण, परिक्रमण आदि नहीं करना होता है, कर्मोंमें उनका अधिकार है, ऐसा कहते हैं। इसलिए आत्मज्ञान प्रकरणमें पढ़े हुए उसके अब्रभूत संन्यासमें शरीरादिके * अर्थात् 'शरीरं मे विचर्पणं जिह्वा मे मधुमत्तमा कणाभ्यां भूरि विध्रुवम् अननं प्राणः चक्षः श्रोत्रं मनो वाचम्' इत्यादि क्रुति द्वारा।
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सन्यांसाधिकारका विचार] भापानुवांदसहित ५५१
विरक्तस्यैव मुख्याधिकार: । ननु पूर्व संस्कारविविदिपापक्षाबुक्ती, तत्र नित्यकर्मणामात्मज्ञानाङ्ग त्वमुक्तमिदानीं तच्यागस्याउङ्गत्त्वमिति पूर्वापरविरोध इति चेद्, न; उभयो- रप्यङ्गत्वात्। न चोभयोविरुदयोरेकेनाऽनुष्ठानासंभवः, कालभेदेन तदुप- पत्तेः । आ चित्तशुद्धि कर्माण्यनुष्ठेयानि तत उपरि तानि संन्यसितव्यानि। एकफलत्वं च कर्मतत्संन्यासयोर्द्वारभेदादुपपद्यते। कर्माणि हि चित्तशुद्धि- द्वाराऽडत्मज्ञानं प्रत्यारादुपकारकाणि। संन्यासस्त्वनन्यव्यापारतया श्रवणा- दिनिप्पादनद्वारेण संनिपत्योपकरोति। यस्तु भास्कर: संध्यावन्दनादिनित्यकर्मणस्तदङ्गभृतोपवीतस्य च त्यागं
पाटव-क्षमता-के होनेपर भी पाटवशाली विरक्तका-वैराग्य सम्पन्नका-ही मुख्य अधिकार है। शक्का-इससे पूर्व कर्मोंके लिए संस्कार और विविदिपा-त्रह्मज्ञान- कामना-दो पक्ष कहे गये हैं, उनमें निर्णय किया गया है कि नित्यकर्म आत्मज्ञानके अद्ग हैं। अब कहा जा रहा है कि वे त्यागके-संन्यासके-अझ्ग हैं, इस प्रकार अगले पिछले अ्न्थोंमें परस्पर विरोध आता है। समाधान-संन्यास तथा कर्म दोनों मी (ब्रह्मज्ञानके) अद्ग ही हैं। यदि शक्का हो कि परस्पर विरुद्धका (कर्म करने तथा त्याग करनेका) एक ही पुरुपसे अनुष्ठान नहीं हो सकता है' तो यह शक्का भी उचित नहीं है, कारण कि समयके मेढ-हेर फेर-से दोनोंकी उपपत्ति हो सकती है। [समयका भेद दिखलाते हैं ]-चितशुद्धि-वैराग्योदय-पर्यन्त नित्य कर्मोका अनुष्ान करना आवश्यक है, और वैराग्योदयके अनन्तर उनका त्याग-संन्यास लेना- उचित है। कर्म और उनका संन्यास दोनोंका एक ही (न्रसज्ञानरूप फल) होना द्वारमेदसे सम्भव है। [द्वारभेद दिखलाते हैं]-नित्यकर्म तो चित्त- शुद्धिके द्वारा बक्षज्ञानके प्रति आरात् उपकारक (व्यवधानसे परम्परया उपकारक) हैं और उनका संन्यास (सकल विरोधिवृत्तियोंका नाश होनेके कारण) केवल आत्मचिन्तन व्यापारके अवशिष्ट रहनेसे श्रवण आदिकी सम्पत्तिके द्वारा-सन्निपत्य-साक्षात् (व्यवधानके बिना) उपकारक है। जो कि भास्कर सन्ध्याचन्दन आदि नित्य कर्मका तथा उसके अङ्गभूत यज्ञो-
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५५२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक हे
नेच्छति, सोऽपरिचितशास्त्रवृत्तान्तत्वादुपेक्षणीयः। 'यज्ञं यज्ञोपचीतं च त्यक्त्वा गूढश्चरेन्मुनिः' इति यज्ञोपवीतादित्यागस्य साक्षाद्विहितत्वात्। न च पूर्वोंपवीतत्यागेऽप्यन्यस्वीकार: शङ्गनीयः ; जावालश्रुतांवपि 'अयज्ञोपवीती कथ न्राह्मणः' इति प्रश्नपूर्वकम् 'इदमेवाऽस्य तद्यज्ञोपवीतं य आत्मा' इत्येव- कारेण वाह्ययज्ञोपवीतं व्यावच्याऽSत्मन एव यज्ञोपवीतत्वसंपादनात्। तदेव- मात्मज्ञानाधिकारिणः संन्यासस्य विहितत्वात्तद्विरोघिन्या: ऋणत्रयश्चुतेर- भूतार्थवादत्वात् कर्मद्वाराऽपि पूर्वतन्त्रापेक्षाया असिद्धौ न धर्मविचारानन्तर्य-
पवीतका त्याग नहीं होना चाहिए, ऐसा मानता है, वह शास्त्रीय सिद्धान्तसे अभिज्ञ म होनेके कारण उपेक्षणीय है [अर्थात् उसके सिद्धान्तका भादर नहीं करना चाहिए ] कारण कि स्मृतिकारोंने 'यज्ञका (नित्य, काम्य और नैमित्तिक सब प्रकारके कर्मका) और यज्ञोपवीतका त्यागकर निर्जनमें छिपकर (एकान्त वाससे) अपनी दिनचर्या वितावे' इत्यादि वचनोंसे यज्ञोपवीत आदिका त्याग साक्षाद कहा है। ऐसा मी नहीं कहा जा सकता कि पूर्वाश्रममें धारण किये गये यज्ञोपवीतका त्याग करके दूसरे नूतन यज्ञोपवीतका धारण करना चाहिए, कारण कि जाबाल श्रुतिमें मी 'यज्ञोपवीत धारण किये बिना ब्रह्मण कैसे' ? इस प्रकार प्रश्न उठानेके अनन्तर कहा कि 'यही उसका यज्ञोपवीत है, जो आत्मा है' इस वाक्यमें 'इदमेवास्य' यहाँ 'एव' पद दिया है [ जो अन्यके सम्बन्धका भभाव- बोधन करता है] इस एवकारसे वाहरी सूत्रनिर्मित यज्ञोपवीतका निषेध करके आत्मा ही यज्ञोपवीत कहा गया है। इस प्रकार आत्मज्ञानके अधिकारीके लिए संन्यासका विधान किया गया है, इसलिए उसके विरोघमें उपस्थित तीन ऋणोंकी प्रतिपादिका श्रुति अभूतार्थवाद हो जाती है, जिसके कारण कर्म द्वारा भी पूर्वमीमांसाकी (ब्र्ज्ञानमें) अपेक्षा सिद्ध नहीं होती, इसलिए धर्मविचारका आनन्तर्यरूप 'अथ' शब्दका अर्थ नहीं माना 'जा सकता। [ 'नैतत्सारम्' अन्थसे धर्मविचारानन्तर्यका खण्डन कर सिद्ध किया कि ब्रह्मज्ञानके अधिकारीका विशेषण धर्मविचारानन्तर्य नहीं हो सकता, अर्थात् कोई नियम न रहा कि धर्मविचार करनेवाला ही ब्रह्मविचार कर सकता है। अय्य धर्मविचार और व्रह्मविचारमें कार्यकारणभाव न होनेपर मी
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ज्ञानकर्मके समृच्चयका निराकरण ] भापानुवादसहित ५५३
ननु यदि धर्मन्रह्मविचारयोर्हितहेतुमन्भावेनाSSनन्तर्य न सम्भवति, तर्हि तयोरानन्तर्यमात्रोपलक्षितक्रममथशब्दः प्रतिपादयतु। 'हृदयस्याऽग्रेऽवद्य- त्यथ जिह्वाया अथ चक्षसः' इत्यत्राऽथशब्दस्य क्रमप्रतिपादकत्वदर्शनादिति चेत, तत्र वक्तव्यम्-किमथशच्दः खयमेव क्रमं प्रतिपादयति आहोस्वित प्रमाणान्तरप्रतिपन्नक्रमापेक्षितन्यायं सचयति १ नाऽडद्यः; स्वयं न्यायसूत्रान्त :- पातित्वात्। न द्वितीय :; क्रमनोधकप्रमाणासम्भवात्। क्रमो ह्ेककर्तृकाणां चहनां युगपदसुष्टानासम्भवेऽपेक्ष्यते। एककर्तृकत्वं चाऽङ्गाद्गिनोर्वा
पौवीपर्यरूप करमका बोध आनन्तर्यार्थक 'अथ'से करना चाहिए, इस प्रकार कहने- वाले बादीका खण्डन करनेके लिए शका करते हैं]-यदि धर्म औौर नक्मके विचारोंमें परस्पर कार्यकारणभावसे आनन्तर्यका सम्भव नहीं है, तो उन दोनोंके आनन्तर्य- नात्रसे उपलक्षित कमका प्रतिपादन 'अथ' शव्दसे ही होगा।[ हेतुहेतुमद्भावके अभावमें क्रमयोधक 'अथ' शब्दका प्रयोग दष्टान्त द्वारा दिखलाते हैं], क्योंकि 'पह्ले हदयका अवदान-खण्डन-करे, अनन्तर जिह्ाका, अनन्तर वक्षःस्थलका, हत्याद्यर्थक वाक्यमें 'अथ' शन्द क्रमका प्रतिपादन करता है, यह देखा गया है। समाधान-क्या 'अथ' शब्द् स्वतः ही क्रमका प्रतिपादन करता है: अर्थात क्या अथशब्द क्रमका वाचक है? अथवा दूसरे प्रमाण द्वारा सिद्ध कमसे अपेक्षित न्यायका सूचन करता है : इसमें प्रथम विकल्प नहीं दो सकता, कारण कि स्वयं 'अथ' शब्द न्यायसूत्रमें आया है। [यदि 'अथ' शब्द ही स्वयं क्रमका वोधक होता, तो न्यायसूत्रमें अपेक्षित क्रमनियमका अभिधान 'अथ' शब्दसे होना चाहिए, परन्तु वहांपर क्रमरूप अर्थ नहीं लिया गया है। ] द्वितीय विकल्प नहीं हो सकता, कारण कि क्रमका बोधक कोई प्रमाण नहीं है। एक ही कर्ताको अनेक कार्य प्राप्त होनेपर एक साथ सबका अनुषान सम्भव न होनेसे क्रमकी अपेक्षा होती है। या अम और अद्वियोंमें तथा एक ही अङ्गीके साथ सम्बन्ध रखनेवाले अनेक अश्रोंमें अथवा अधिकारान्तरसे प्राप्त हुई प्रयुक्ति द्वारा अनुभवको प्राप्त हुए (१) जैसे प्रयाज और दर्शपूर्णमास एक ही कर्ताके कर्तव्य हैं। (२) परम अपूर्वके साधक आग्नेयादि छः या्गोंमें । (३) दर्शपूर्णमासके अधिकार प्राप्त प्रयुकतिका आश्रयण करनेवाले गोदोहन आदि।
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५५४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक ३
न चाऽन्र तेपामन्यतमत्वे श्त्यादि प्रमाणमस्ति। यद्यपि ज्योतिष्टोमादाव धिककृतस्यैवाऽङ्गाववद्धोपासनेष्वधिकारस्तथापि न नः काचिद्धानिः, उपासनानां धर्मविशेपाणामेवाऽस्मिन् शास्त्र आ्सङ्गिकी सङ्गतिरित्युक्तत्वात् शास्त्रतात्पर्यविपय ब्रह्मज्ञानस्याऽधिकारत्वाभावाद्।
पि फलैक्यात् कत्रेक्यं क्रमश्र तथा धर्मब्रह्मविचारयोः स्यादिति चेद्, न; तयो: फलक्ये मानाभावात्। 'विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सहइति समुच्चयविधिरेव मानमिति चेद्, न; 'अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽ-
अङ्गोंमें ही एककर्तृकत्व प्राप्त होता है। प्रकृत (धर्म-ब्रह्मविचारका) क्रम माननेमें पूर्वोक्त अम्भाक्विभाव आदिमें से एकके भी होनेमें श्रुति आदि प्रमाण नहीं हैं। यद्यपि ज्योतिष्टोमादिके अधिकारीका ही (उद्गीथ आदि) अङ्गभूत उपासनाओंमें अधिकार है; [श्रुति भी कहती है-'यदेव विधया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति' अर्थात् ज्ञान, श्रद्धा तथा उपासनासे किया हुआ कर्म ही सफल होता है, अतः इस श्रुतिके वाक्यसे कर्माधिकृतका ज्ञानमें भी अधिकार प्रतीत होता है, ] तथापि इसमें हमारी कोई हानि नहीं है, कारण कि उपासनास्वरूप धर्मविशेषोंकी ही [ज्योति- ष्टोमादिका नहीं ] इस वेदान्वशास्त्रमें प्रासङ्गिकी सङ्गति है, ऐसा पहले ही कह आये हैं; इससे शास्त्रके तात्पर्यविषयीभूत न्रह्मज्ञानमें कर्ममें अधिकृतका अधिकार नहीं है, अतः एक विधिके द्वारा अनुष्ठान होनेसे क्रमापेक्षित न्यायका अनुसन्धान नहीं किया जा सकता। शङ्का-जैसे आग्नेय आदि छः यागोंमें पूर्वोक्त अद्गाद्विभावादि प्रकारोंके न होनेपर भी सवका एक ही फल होनेसे एककर्तृकत्व (एक ही कर्ताका होना) तथा क्रम माना गया है, वैसे ही धर्म तथा ब्रह्म के विचारमें भी क्रम माना जायगा। समाधान-ऐसा नहीं मान सकते; कारण कि इन दोनोंका (धर्म और ब्रह्मविचार- का) एक ही फल होता है, इसमें प्रमाण नहीं है। 'विद्या और अविद्या-इन दोनोंको जो साथ-साथ जानता है' इत्याद्यर्थक श्रुतिसे समुच्चयविधानको भी प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि 'अविद्यासे मृत्युको पारकर विद्यासे अमृत प्राप्त करता है।'
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ज्ञानकर्मके समुकयका निराकरण ] भापानुवादसहित ५५५
मृतमश्नुते' इत्यविद्या्यस्य कर्मणो विद्यायाश् वाक्यशेपे फलभेदा- वगमाद्। 'तेनैति त्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजसश्र' इति वचनं समुचयविधायकमिति चेन्, मैतम् ; नाऽत् ज्ञानकर्मणोरेकस्मिन् पुरुपे समुच्चयविधिः, किन्तु ब्रह्म- वित्रपुण्यकृतोरुमयो: पुरुपयोरयोंगे (मार्गे) समुच्चयविधिः। अन्वाचयार्थन चकारेण प्रत्येकं निरपेक्षमार्गान्ययोपपत्तेः । ब्रह्मविच्छव्देनाञ् सगुण-
इत्याद्यर्थक श्रुतिसे अविद्यारूप कर्मोंका और विद्याका वाक्यशेषमें फल- भेद प्रतीत होता है। 'उसी (देवयान) मार्गसे त्रहज्ञानी और पुण्यकर्मा दोनों जाते हैं' इत्यादि अर्थवाले श्रुतिवचनको मी समुच्चयविधायक मानना नहीं वनता, कारण कि इस वाक्यमें ज्ञान और कर्मका एक ही पुरुपमें समुचयका विधान नहीं है, किन्तु बवाज्ञानी और पुण्यकर्मा पुरुषोंका दोनों मार्गोमें योग दोनेमें समुझयका विधान है। [ज्ञान और कर्म एक ही पुरुषमें आश्रित होकर एक फलके साधन हैं।' इस अर्थमें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है, किन्तु जो ब्रद्म- ज्ञानी तथा जो पुरुष उद्गीथोपासना आदि पुण्यकर्म करनेवाले हैं, वे दोनों भी इसी देवमागसे जाते हैं.अर्थात् मार्गमें दोनोंका साथ हो जाता है, इस प्रक्ार मागमें साथ हो जानेमें तात्पर्य है]। कारण कि अन्वाचयार्थक चकारसे निरपेक्ष एक मागके साथ प्रत्येकके अन्वयकी उपपत्ति हो सकती है। [अन्वा- चयार्थक नफारसे परामृष्ट अर्थोका परस्पर अपेक्षित होना आवश्यक नहीं है, जैसे 'मिक्षामट गां चानय' इस वाक्यमें यद्यपि-'भिक्षाटन' तथा 'गवानयन' दोनोंका एक ही देवदचादिमें कर्तृत्वका सम्बन्ध है, तथापि दोनों कार्य परस्पर निरपेक्ष हैं, धैसे ही प्रकृत 'तेनेति' इत्यादि श्रुतिमें परस्परनिरपेक्ष दोनोंका एकमार्गगामित्व दोना उपपन्न है। [निर्गुण न्रव्मज्ञानीके गतागतका निषेध दोनेसे तथा कर्मकाण्डपधान पुरुषोंका धूम्रयानसे जाना प्रतिपादित होनेसे प्रकृत श्रुतिमें श्रत्यन्तरसे विरोध-परिहारके न्रक्षवित् और पुण्यकृत् शब्दोंका अर्थ दिखलाते हैं-] 'तेनैति' इत्यादि श्रुतिमें त्रह्मवित् पदसे सगुण
१. यह भारतगें कहा है-'सवभृतात्मभृतस्य सम्यक् भृतानि पश्यतः। देवा अपि मार्ग सुखन्त्यपदस्य पदेपिणः' 'पदवीकी गवेपणा करनेवाले देवता भी पदवीहीन सर्वात्मभावको प्राप्त हुए त्दाज्ञानीके मार्गगं मोहित होते हैं अर्थात् उसको देस नहीं पाते-इससे ब्रह्मज्ञानी- का देवमार्गसे भी जाना निपिद् है।
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५५६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
ब्रह्मोपासकोऽभिधीयते, निर्गुणन्रह्मविद उत्तरमार्गेण गमनाभावाद । पुण्यकृच्छव्देन च प्रतीकोपासकोऽभिप्रेत: केवलकर्मिणां धूमादिमार्ग- श्रवणात्। ततो ब्रह्मवित्पुण्यकृतोराविद्युल्लोकमुत्तरमागे गमनसमुच्चयपरं वचनम् । न च 'तान्याचरथ नियतं सत्यकामा:' इत्यत्र ज्ञानकर्मसमुच्चय- विधि: सुसम्पाद:, केवलकर्मणामेव श्रवणात्। न च सत्यशब्दो ब्रह्मपरः, 'एप वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः' इति वाक्यशेपे सत्यलोकाभिधानात्। न च 'सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन' इत्ययं समुच्यविधिः। नह्त्र तप:शब्दोऽग्निहोत्रादिकमाचष्टे, किन्तु ध्यानम्; 'मनसश्चेन्द्रियाणां चैकाग्रयं परमं तपः' इति इति स्मृतेः। तस्मान ज्ञानकर्मसमुच्चये मानमस्ति। ब्रह्मका उपासक लिया जाता है, कारण कि निर्गुण-व्रह्म-ज्ञानीका उत्तर मार्ग याने देवयानसे गमन नहीं होता है। और पुण्यकृत् शब्दसे प्रतीकोपासक लेनेमें तात्पर्य है, क्योंकि केवल कर्म करनेवालोंके लिए धुममार्गसे जानेका श्रुतिमें विधान है। इससे ब्रह्मज्ञानी और पुण्यकर्मा दोनोंका विद्युल्लोककी प्राप्ति तक उत्तरमार्गमें साथ-साथ गमनमें तात्पर्य रखनेवाला उक्त वचन है। शङ्का-'सत्यकाम पुरुष उन कर्मोंका अवश्य 'माचरण करे' इत्यादयर्थक श्रुतिसे ज्ञान और कर्मके समुच्चयका विधान किया जा सकता है। [ अर्थात् सत्यशब्दका अर्थ परन्रह्मरूप प्रसिद्ध ही है, उसकी कामनासे कर्मोंका अनुष्ठान कहा गया है, इससे समुचयकी प्रतीति होती है ]। समाधान-ऐसा नहीं, कारण कि श्रुति केवल कर्मवालोंके लिए कहती है। सत्यशब्दका न्रह्मरूप अर्थ नहीं लेना चाहिए, कारण कि 'यह पुण्य ब्रह्मलोक सुकृतशाली तुम पुण्यकर्माओंके लिए है, ] इत्याद्यर्थक वाक्यशेषमें सत्यलोक कहा गया है, [ 'एष' यह सर्वनाम पूर्व कथित सत्यका परामर्श करता है। इसलिए ब्रह्मका वाचक भी सत्यपद वाक्यशेषके बलसे प्रकृतमें ब्रह्मलोकका 'ही वाचक है ]। 'यह सत्यसे लभ्य है तथा तपसे लभ्य है और सम्यक् ज्ञानसे लभ्य है' इत्याद्यर्थक श्रुति (कर्मवाचक तपके वलसे) समुच्चयविधायक होगी, ऐसा मी नहीं कह सकते, कारण कि उक्त श्रुतिमें तपःशब्द अभिहोत्रादि कर्मका अभिधान नहीं करता, किन्तु ध्यानको कहता है। 'मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता उत्कृष्ट तप है', ऐसा स्मृतियोंमें कहा गया है। इसलिए ज्ञान और कर्मोंका समुच्चय माननेमें कोई
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ज्ञानकर्मके समुच्चयका निराकरण ] भापानुवादसहित ५५७
प्रत्युत 'नास्त्यकृतः कृतेन' 'न कर्मणा न प्रजया' इत्यादिना कर्मणः साक्षा- न्मोक्षसाधनता निपिध्यते। न च केवलकर्मण एव प्रतिपेध इति वाच्यम्, समुच्चय विधायिप्रमाणाभावे सर्वकर्मणां ग्रतिपेधोपपत्तेः; अन्यथा ज्ञानाङगतया सर्वकर्मसंन्यासविधानं नोपपद्येत । संन्यासाश्रमधर्मैः समुच्चयोऽस्त्विति चेद, न; तद्धर्माणां ध्यानादीनां ज्ञानस्वरूपोपकारित्वात् फलसमुचयानु- पपत्तेः। नित्यकर्मविधानानुपपत्तिरेव ज्ञानसहकारितया नित्यकर्मणां मोक्षफलत्वं कल्पयतीति चेद्, न; प्राभाकरमते तेपां फलनिरपेक्षत्वाद्। भाट्टपक्षे विश्वजिन्न्यायेन स्वर्गकल्पनाद्। वेदान्तिपक्षे संस्कारविविदि- पयोरुक्तत्वात्। व्रह्मज्ञानमेवेतिकर्त्तव्यतया कर्मणां मोक्षसाधनत्वं कल्प-
प्रमाण नहीं है। वल्क इसके विपरीत 'अकृत-मोक्ष-कृत द्वारा-कर्म द्वारा- प्राप्य नहीं है। (क्योंकि वह तो अकृत है) और 'न प्रजया' (अर्थात् पुत्रोत्पादन आदिसे भी लभ्य नहीं है) इत्यादि वचनोंसे कर्म साक्षात् मोक्षका उपाय नहीं है, इस प्रकार निषेध किया जाता है। केवल (उपासनासे रहित) कर्मका ही निपेध है, यह भी कहना उचित नहीं है, कारण कि समुच्चय का विधायक प्रमाण न होनेसे (अविशेपसे) सभी कर्मोंका निषेध उपपन्न होता है। अन्यथा ज्ञानके अश्रभूत सकल कर्मोंके संन्यासका (त्यागका) विधान उपपन्न न होगा। यदि कहो कि संन्यासाश्रमके ध्मोंके साथ समुचय मानो, तो वह भी नहीं बनता, कारण कि संन्यासाश्रमके धर्म्मरूप ध्यान आदि ज्ञानके स्वरूपके साधक हैं, अतः फलके साथ समुचयकी उपपत्ति नहीं हो सकती। शङ्का-नित्य कर्मोंके विधानकी अनुपपत्ति ही ज्ञानकी सहकारिता द्वारा नित्य क्मोंसे मोक्षरूप फल होता है, यह कर्पना करती है। समाधान-ऐसा नहीं, क्योंकि प्रभाकरके मतमें नित्य कर्मोंको फलकी अपेक्षा नहीं रहती और भट्टके मतमें विश्वजिन्न्यायसे उनके स्वर्गरूप फलकी कल्पना की जाती है। और वेदान्तियोंके मतमें नित्य कर्मोंका फल संस्कार और विविदिपा है, यह कह ही आये हैं। शका-त्रह्यज्ञान ही इतिकर्तव्यस्वरूप होनेके कारण कर्मोंमें मोक्ष साधनताकी कल्पना करेगा।
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५५८ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
यतीति चेद्, न; शमादिरूपेतिकर्तव्यतान्तरस्य सद्भावाद। 'यज्ञेन विवि- दिपन्ति' इति विध्युद्देशे करणतया प्रसिद्धानां कर्मणामितिकर्त्तव्यतायां विधिविरोधाच्च। कथश्चित्तेपां मोक्षसाधनत्वकल्पनेऽप्युदितानुदितहोमवद् ज्ञानकर्मणोर्विकल्प एव किं न स्यात् १ तथा च-न समुचयसिद्धिः। न च समुचयवादिना मोक्षे कर्मणोऽध्यास: सुनिरूप:, न तावद् ब्रह्मा- त्मैकत्वं तत्साध्यम्, तस्य सिद्धस्वभावत्वात्। नाऽप्यविद्यातत्कार्यनिवृत्ति- स्तत्साध्या, 'तरति शोकमात्मविद्' इत्यादौ तन्निवृत्तेर्ज्ञानसाध्यत्वश्रवणात्। किं च समुच्चयवादिमते विज्ञानसाध्यमपि फलं न भवति। कि कर्मोपा- धिनिवृत्तिर्ज्ञानफलम्, किं वा मिथ्याध्यासनिवृत्तिः, उत तत्प्रवाहनिवृत्तिः, अथवा मिथ्याज्ञानसंस्कारनिवृत्तिः, आहोस्विद् ब्रह्मस्वरूपप्रकाशनम्! नाऽडय्य: कर्मोपाधीनां सत्यवस्तुतया ज्ञानानिवर्त्यत्वात्। न द्वितीय :; मिथ्याध्यासस्य समाधान-नहीं, कल्पना नहीं करेगा, कारण कि कर्मोंसे अतिरिक्त शम, दम आदिरूप इतिकर्तव्यता विद्यमान है। 'यज्ञ द्वारा ज्ञानेच्छा करनी चाहिए' इत्यादि विधिके उद्देशमें करणकारकरूपसे प्रसिद्ध कर्मोंको इति- कर्तव्य माननेसे विधिके साथ विरोध मी आता है। उनको किसी प्रकार मोक्षका साधन माननेपर भी उदितानुदित होमके समान ज्ञान और कर्मोंका विकल्प-पाक्षिकपाप्ति-क्यों न मानी जाय? इससे समुचयकी सिद्धि नहीं हो सकती। और समुचयवादीके लिए मोक्षमें कर्मोंके अध्यासका- सम्बन्धका-निरूपण करना सरल नहीं है, क्योंकि उन कर्मोंका फल ब्रह्म और जीवका ऐक्य भी नहीं हो सकता, कारण कि वह तो स्वभावसे ही सिद्ध है। अविद्या या उसके कार्योंकी निवृत्ति भी उनका फल नहीं माना जा सकता, कारण कि 'आत्मज्ञानी शोकसे पार हो जाता है- इत्यादि अर्थवाले श्रुतिवाक्यमें अविद्या या उसके कार्यकी निवृत्ति ज्ञानका फल कहा गया है। और भी दोष आता है कि समुच्चयवादीके मतमें विज्ञानसे साध्य फल भी नहीं हो सकता। क्या कर्मरूप उपाधिकी निवृत्ति ज्ञानका फल है: अथवा मिथ्या अध्यासकी निवृत्ति: या उसके प्रवाहकी निवृत्ति? अथवा मिथ्या अज्ञानके संस्कार की निवृत्ति किं वा ब्रह्मस्वरूपका प्रकाश : प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि सत्यवस्तु होनेसे ज्ञान द्वारा कर्मरूप उपाधिकी निवृत्तिका सम्भव नहीं है। दूसरा पक्ष भी नहीं बनता, क्योंकि मिथ्या अध्यास क्षणिक होता है,
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अथशब्दके क्रमार्थत्वका निरास] भांपांतुवादसहित ५५९
क्षणिकत्वात्स्वयमेव निवृत्तेः । न तृतीय:, प्रवाहस्य प्रवाहिनिवृत्तिमन्तरेण पृथगुच्छेदाभावात्। न चतुर्थः, रजतादिसंस्कारस शुक्यादिज्ञाननिवर्त्य- त्वादर्शनात्। ज्ञानाभ्याससंस्काराढू निवृत्तौ संस्कार एव मुक्तिहेतु: स्याद्। ततो 'ज्ञानादेव केवल्यम्' इति शास्त्रं विरुष्येत। न पश्चम:, ब्रह्मण: स्वग्र- काशत्वाद्। यत्तु भास्करेण प्रलपितं समुचयसामर्थ्यादेव धर्मावघोधानन्तर न्रह्मववोध इति, तत्समुच्चयनिराकरणादेव निराकृतम्। सत्यपि वा समुचये तत्कर्थ सिध्येत्, वैपरीत्यप्रसङ्गस्य तव दुर्वारत्वाद्। तथा हि- ज्ञानवतैवाऽनुष्टितानि कर्माणि मोक्ष साधयन्तीति प्रथमं त्रह्माववोघमुत्पाद्य तद्वोधवतैव व्रह्मचारिणा धर्मविचारिणा धर्मविचारादि सरवं कर्तु युक्तमिति विपरीत एव क्रमः स्यात्। कर्मानुष्ठानस्य ब्रह्माववोधोत्तर- कालभावित्वेऽपि धर्मविचार: पूर्वमेव क्रियतामिति चेद्, नः तथा- इसलिए स्वयं निवृत् हो जाता है। तीसरा पक्ष भी युक्त है नहीं, क्योंकि प्रवाहका प्रवाहीकी निवृत्तिके अतिरिक्त पृथक् कोई उच्छेद-विनाश-नहीं है। चौथा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि रजतादिका संस्कार शुकति आदिके ज्ञानसे निवृत् होते नहीं देखा गया है। ज्ञानके अभ्यास द्वारा उत्पन्न संस्कारसे निवृत्ति माननेमें संस्कारको ही मुक्िका कारण मानना होगा। इससे 'ज्ञानके द्वारा ही मुक्ति होती है' इस शास्त्रसे विरोध आ जायगा। पांचवां पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण कि व्रह्म स्वयंप्रकाश है। 'समुचयकी सामर्थ्यसे ही धर्मनिर्णयके अनन्तर ब्रह्मज्ञान होता है' यह भास्करका प्रलाप समुच्चयका निराकरण करनेसे ही खण्डित हो गया, अथवा समुचय सिद्ध, होनेपर भी वह-क्रम-कैसे सिद्ध हो सकता है: कारण कि विपरीत क्रमका (त्रह्मज्ञानके अनन्तर धर्मज्ञानका) वारण तुमसे (भास्करसे) करते नहीं बनेगा। क्योंकि ज्ञानी पुरुष द्वारा ही किये गये कर्म मोक्षके उपायभूत हैं, यह समझ कर पहले व्रह्मज्ञान उत्पन्न कर न्रह्ज्ञानी ब्रहमाचारीको ही (धर्मविचारकी कामनासे) धर्मविचार आदि सव कुछ करना उचित है, इस प्रकार उलटा ही क्रम प्राप्त हो जायगा। शक्ा-यदि कहो कि यद्यपि कर्मोंका अनुछान ब्रह्मज्ञानके उत्तरकालमें होता है, तथापि धर्मका विचार तो (त्रह्मज्ञानसे) पूर्व ही करना चाहिए। [ इससे विचारमें विपरीत क्रमकी आशक्का नहीं हो सकती ]।
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५६० विवरणंप्रमेयंसंग्रंह i सूत्र १, वर्णेक ३
प्रसङ्गात्। न तावत् तेपां भोग: फलम्, पुरुपस्य भोगाद्विरक्तत्वात्। नाडपि मुक्ति, ज्ञानाभावेन तस्यामवस्थायां समुच्चयाभावात्। अपूर्वद्वारेणोप- कारकत्वे जन्मान्तरानुष्ठितकर्मभिरेच तत्सिद्धौ कृतमिह जन्मनि कर्मा- नुष्ठानेन। न च धर्मविचारात् पूर्वं सुसुक्षुत्वमेच नाडस्ति, दृश्यन्ते हि वाल्यमारभ्य सुसुक्षवः। न च मुमुक्ष्यमुपुक्षुसाधारणत्वाद्धर्मविचार एव प्रथमं कर्त्तव्य इति वाच्यम्, त्वन्मते काम्यमानमोक्षहेतुत्वेन साधारणत्वा- सिद्धेः। अथ नित्याध्ययनविधिप्रयोज्यत्वाद्धर्मविचारः साधारण, तदापि न तस्य प्राथम्यनियमः ; काम्यमानव्रह्मविचारानन्तरमपि नित्यकर्म- विचारोपपत्तेः। यद्यव्ययनानन्तरमेव कर्मविचाराननुष्ठाने प्रत्यवायस्तदाऽपि
समाधान-ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि उपर्युक्त सिद्धान्त (ब्रम्मज्ञानीका धर्मानुष्ठानमें अधिकार) माननेसे मुमुक्षु यतिके धर्मविचारकी परिसमाप्ति तक (ब्रह्मज्ञानके पूर्व तक) किये गये आश्रम कर्म सब व्यर्थ हो जायंगे, क्योंकि उनका भोगरूप फल तो हो नहीं सकता, क्योंकि सुमुक्षु पुरुपको भोगसे विरकति रहती है। मुक्ति मी फल नहीं है, कारण कि उस दशामें ज्ञान न होनेसे समुचय नहीं है [और आपके मतमें समुचय ही मुक्तिका साघन है]। यदि अपूर्व द्वारा उपकारक माने जायँ, तो जन्मान्तरमें किये गये कर्मोंके द्वारा ही अपूर्वकी सिद्धि हो जानेसे इस जन्ममें कर्मोंके अनुष्ठानकी आवश्यकता नहीं रह जाती। धर्म- विचारसे पूर्व सुमुक्षत्व नहीं वन सकता, ऐसा भी नहीं माना जा सकता; क्योंकि बहुत लोग वाल्यावस्थासे ही मुमुक्षु होते देखे गये हैं। यह भी कहना उचित नहीं कि 'मुमुक्षु-विरागी-तथा अमुमुक्षु-रागी-दोनोंके लिए साधारण होनेसे धर्मविचार करना ही प्रथम प्राप्त होता है, कारण कि तुम्हारे मतमें धर्मविचार कामनाविषयीभूत मोक्षका साधन है, अतः उसे साधारण नहीं कह सकते, [अतः कामनारहित पुरुषके लिए उक्त साधन नहीं हुआ ]। यदि यह कहो कि नित्यभूत अध्ययनविधिसे प्रयोज्य होनेके कारण धर्मविचार साधारण हो सकता है, तो मी धर्मविचारके प्राथम्यका नियम नहीं बन सकता; कारण कि कामनाविपयीभूत ब्रह्मविचारके अनन्तर मी नित्यभूत कर्म- विचारकी उपपत्ति हो सकती है। यदि कहो कि अध्ययनके अनन्तर ही कर्मोंका
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अथंशन्दके क्रमार्थत्वका निरांस ] भापांनुवादसंहित ५६१
तत्परिहारायैंकं कर्मवाक्यं त्रह्मोधात् प्राग्विचारयितव्यम्, अन्यत्तु पश्चात्। तथा सति विदुपाऽनुष्ठीयमानानां न्रह्मचारिघर्माणामपि मोक्ष- साधनत्वलाभात्। अग्निहोत्रादिधर्माणामेव मोक्षसाधनत्वं न ब्रह्मचारि- धर्माणामिति चेद्, वेदानुवचनादिपु प्रत्येकं निरपेक्षकरणविभक्तिश्रवणाद् त्रह्मचारिणोऽध्ययनस्याऽपि मोक्षसाधनत्वोपपत्तेः। अत एव ्रुतिब्रह्म चर्यादेव संन्यासं विधत्ते। तेन ब्रह्मचारिधर्माणां संन्यासधर्माणां वा ज्ञाने समुचयोपपत्तौ त्वन्मतेऽगिहोत्रादीनामननुष्ठानमेव प्रसज्येत । किं च कतुविधय एव धर्मविचारप्रयोजकाः, न त्वध्ययनविधिः। अन्यथा ब्रह्म- विचारस्याऽप्यव्ययनविधिप्रयोज्यत्वप्रसङ्गात्। 'श्रोतव्यः' इति विध्यन्तरं तत्प्रयोजकमस्तीति चेद्, न; धर्मविचारे कप्तप्रवर्त्कभावेनाऽध्ययनविधिनैव ब्रह्मविचारस्याऽपि प्रयोगसम्भवे 'श्रोतव्यः' इति विधेरपि प्रवर्तकत्वकल्पने
(धर्मका) विचार न करनेसे प्रायश्चित होता है, तो मी उस प्रत्यवायके परिहारके लिए किसी भी एक कर्मवोधक वाक्यका ब्रह्मज्ञानसे पूर्व विचार कर लेना चाहिए और दूसरे वाक्योंका (ब्रह्मज्ञानके) पश्चात् विचार करना चाहिए। ऐसा माननेसे तो विद्वान्के द्वारा किये जानेवाले ब्रह्मचारीके भेक्षचर्यादि धर्म मोक्षके साधन हो सकते हैं। यदि मानो कि अग्निहोत्र आदि धर्म ही मोक्षके साधन हो सकते हैं, ब्रह्मचारीके धर्म मोक्षके साधन नहीं हो सकते, तो वेदानुवचन आदि प्रत्येकमें परस्पर निरपेक्ष करणकारकार्थ तृतीयाविभक्तिके श्रवणसे त्रक्षचारीके (वेदानुवचनरूप) वेदाध्ययनमें भी मोक्षसाधनत्वकी उपपत्ति हो सकती है। इसीलिए श्रुति ब्रह्मचर्याअ्रमसे ही संन्यासका विधान करती है। इससे त्रह्मचारीके धर्म और संन्यास-धर्म दोनोंके ज्ञानमें समुच्चयकी उपपत्ति हो जानेसे तुम्हारे मतमें अग्निहोत्रादिका अनुष्ान न करना ही प्राप्त हो जायगा। और यज्ञविधान ही धर्मविचारके प्रयोजक हैं, अध्ययनका विधान प्रयोजक नहीं है। नहीं तो ब्रह्मविचारकी भी प्रयुक्ति अध्ययनविधिसे प्राप्त होगी। शक्का-न्रह्मविचारका प्रयोजक 'श्रोतव्यः' यह दूसरा विधान है। इसलिंए अध्ययनविधिसे उसकी प्रयुक्ति नहीं मानते ]। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि धर्मविचारमें माने गये प्रयोजक रूप अध्ययनविधिसे ही त्रक्षविचारकी भी प्रयुक्तिका सम्भव है, अतः 'श्रोतव्यः' इसको
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५६२ विवरणप्रमेयसंग्रद्द [सूंत्र. १, वर्णक ३
गौरवात्: ब्रह्मविचारस्य काम्यत्वान्न नित्याध्ययनविधिप्रयोज्यतेति चेद्, न; काव्यक्रतुविचारस्य तत्प्योज्यताङ्गीकारात्। न च वाच्यं धर्म- विचारादपि ब्रह्मविचारे शमदमोपसदनाद्यङ्गाधिक्याद्विध्यन्तरप्रयोज्यतेति, एकस्यैवाऽध्ययनविधेर्न्यूनाधिकाङ्गौ धर्मव्रह्मविचारौ प्रति प्रयोजकत्वसंभ- वाद। एक एव हि दर्शपूर्णमासविधि: पुरोडाशहविष्कावान्नेयाग्रीपोमीययागा- ववघाताद्यङ्गसहितं [तौ !] तद्रहितं चाऽऽज्यहविष्कमुपांशुयाजं प्रवर्तयति। ननु विधिर्हिं सर्वत्रोपादेयस्यैवाऽनुष्टापकः, शमदमादयस्त्वनुपादेया, ब्रह्म विचाराधिकारिविशेषणत्वात्, ततो नाडध्ययनविधिस्तदनुष्ठापक इति चेद्, न; अध्ययनविध्यधिकारिण उपनीतस्यैव तत्प्रयुक्ते ब्रह्मविचारेऽप्यधिकारितया
पृथक् प्रयोजक माननेमें गौरव है। यह भी नहीं कह सकते कि ब्रह्मविचारके. काम्य होनेसे नित्यभूत अध्ययनविधिसे उसकी प्रयुक्ति नहीं हो सकती है, कारण कि काम्य यज्ञोंके विचारकी प्रयुक्ति नित्यभूत अध्ययन विधि द्वारा मानी गयी है। शक्का-धर्मविचारकी अपेक्षा ब्रह्मविचारमें शम, दम, उपसदन आदि अद्गोंके अधिक होनेसे अध्ययनसे अतिरिक्त दूसरी विधिसे प्रयुक्ति मानी जानी चाहिए। समाधान-उक्त कल्पना नहीं हो सकती, कारण कि एक ही अध्ययन- विधांन अर्प और अधिक अङ्गवाले धर्मविचार तथा ब्रह्मविचारके प्रति प्रयोजक हो सकता है। दृष्टान्त द्वारा समर्थन करते हैं-एक ही दर्शपूर्णमासका विधान अवघात आदि अङ्गोंके सहित पुरोडाशहविस्वाले आमेय और आभीषोमीय याग तथा उक्त अद्गोंसे रहित वृतहविष्क उपाशुयागकी प्रयुक्ति करता है। शङ्का-विधान सर्वत्र उपादेयका ही अनुष्ठान कराता है। शम, दम आदि तो अनुपादेय हैं, क्योंकि वे ब्रह्मविचारके अधिकारीके विशेषण हैं। इससे अध्ययनविधिको उसका (शमदमादि अओ्रोंका) अनुष्ठापक नहीं मान सकते। समाधान-ऐसा नहीं, कारण कि अध्ययनविधिका अधिकारी उपनीत पुरुप है, उसी उपनीत पुरुषका ही अध्ययनविधिसे प्रयुक्त ब्रह्मविचारमें भी
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अभशन्दकी अधिकारिविशेपणार्थकता ] भापानुवादसहित ५६३
अमादीनामतद्विशेषणत्वात्। अन्यथा श्रवणविधेरपि तदसुष्ठापकता न स्यात्। तदेवं भास्करादिसमुच्चयचादिमतानामनेकथा दुष्टत्वाद् धर्मब्रह्म- विचारयो: फलैक्यायोगान कर्तरैक्यमिति न तत्प्रयुक्तक्मार्थोडथशब्दः। नन्वेवमपि पूर्वतन्त्रे द्वादशभिरपि लक्षणैर्धर्म एको जिज्ञास्यस्तत्र यथा लक्षणानां क्रमनियमस्तथा पूर्वोत्तरतन्त्रयोरपि जिज्ञास्यैक्ये क्रमनिय- मार्थोऽथब्दः स्यादिति चेद, न; फलवज्जिज्ञास्यस्थाऽपि भिन्नत्वात्। यथा पूर्वतन्त्रेऽनुष्ठानापेक्षोऽम्यृदयः फलम्, तथोत्तरतन्त्रे चाडनुष्ठानानपेक्ष निःश्रेयसमिति फलभेदः। तथा पूर्वतन्त्रे पुरुपव्यापारतन्त्रो ज्ञानदशा- यामविद्यमानो धर्मो जिज्ञास्यः, उत्तरतन्त्रे पुरुपव्यापारानपेक्षं ज्ञानकालेऽपि विद्यमानं व्रम्म जिज्ञास्यम्, अतो वेदार्थत्वाकारेणैक्येऽपि जिज्ञास्यमेदो न वारयितुं अक्यः । ग्रमणक्ये ग्रमेयभेदो न युक्त इति चेदू, न; प्रमा-
अधिकार होनेसे म आदि न्ह्मविचारके अधिकारीके विशेषण नहीं हैं। इसके विपरीत माननेसे तो श्रवणादि विधिमें भी उसकी अनुष्ठापकता नहीं प्राप्त होगी। इस प्रकार भास्कर आदि समुचयवादियोंके मत अनेक प्रकारके दोपोंसे पूर्ण हैं, और धर्म तथा व्रह्म दोनोंके विचारोंका एक फलसे सम्बन्ध नहीं है, अतः दोनोंका एक ही कर्ता नहीं हो सकता, इसलिए उसके द्वारा प्राप्त होनेवाले क्रमरूप अर्थका वाचक अथशब्द नहीं हो सकता। शक्का-ऐसा माननेपर भी पूर्वमीमांसा शास्त्रमें बारहों लक्षणोंसे एक ही धर्म जिन्ास्य है, उसमें जैसे लक्षणोंका क्रमनियम है, उसी प्रकार पूर्वोत्तर- गीमांसा शास्तोंमें भी जिज्ञास्य एक होनेसे क्रमनियमार्थक 'अथ' शब्द लिया जायगा। समाधान-ऐसा नहीं, कारण कि फलके समान जिज्ञास्य भी भिन्न-भिन्न है। जसे पूर्वमीमांसामें अनुष्ठानकी अपेक्षा रखनेवाला अभ्युदय फल है, वैसे ही उत्तरमीमांसामें अनुष्ठानकी अपेक्षा न रखनेवाला निःश्ेयस फल है, इस प्रकार फलभेद है। एवं पूर्वमीमांसामें पुरुषव्यापारके अधीन ज्ञानावस्थामें अविद्यमान धर्म जिज्ञास्य है और उत्तरमीमांसामें पुरुपव्यापारकी अपेक्षा न रखता हुआ ज्ञानावस्थामें भी विद्यमान व्रक्ष जिज्ञास्य है। इसलिए वेदार्थ होनेके कारण ऐक्य होनेपर भी जिज्ञास्यभेदका चारण नहीं किया जा सकता। और यह भी नहीं कह सकते कि प्रमाणके एक होनेपर प्रमेयका भेद गानना उचित नहीं है, कारण कि प्रमाणका
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५६४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३.
णैक्यासिद्धे। नहि धर्मे ब्रह्मणि वा वेदो वेदाकारेणैव प्रमाणम्, किन्तु चोदनाकारेण धर्म वोधयति वेदान्तवाक्यरूपेण च ब्रह्मस्व्रूपम्। तत्र चोदनेति शब्दभावनां कुर्वीणः शब्दोऽभिधीयते। सा च चोदना अंशत्रय- विशिष्टामर्थभावनां कुर्वंती तदनववोधे पुरुपप्रवृत्ययोगात् पुरुपप्रेरणार्थमेवाऽर्थ- भावनां प्रतिपाद्यति। वेदान्तवाक्यं पुनर्वोधयत्येव, न तु ब्रह्मणि तद्धोधे वा पुरुषं प्रेरयति, ब्रह्मणोडकार्यस्याडपुरुपतन्त्रत्वाद् वोधस्य च ग्रमाण- प्रमेयतन्त्रस्य पुरुपेच्छाप्रयत्ञानधीनत्वात्। अनिच्छतोऽप्रयतमानस्यापि दुर्गन्धादिज्ञानदर्शनात्। तदेवं धर्मब्रह्मणोस्तत्प्रमाणयोश्वाऽत्यन्तविलक्षण- त्वानाऽत्र जिज्ञास्यैक्यप्रयुक्तमपि क्रममथशव्दो वक्तुमर्हति। तस्मादान- न्तर्याभिधानमुखेन पुष्कलकारणरूपस्य शास्त्रीयस्याऽधिकारिविशेषणस्य सूचनायैवाऽथशव्द:। तच्चाऽधिकारिविशेपणं चतुर्धा शास्त्रे प्रसिद्धं नित्याऽनित्यवस्तुविवेक एक होना सिद्ध ही नहीं है। धर्म और ब्रह्म दोनोंमें वेद वेदरूपसे ही ग्रमाण नहीं है, चोदनाके आकारसे वेद धर्मका बोध कराता है और वेदान्तवाक्य- रूपसे ज्रह्मस्वरूपका बोध कराता है। उसमें 'चोदना' शब्दसे भावनाको करनेवाला शब्द कहलाता है और वह चोदना अंशत्रयविशिष्ट अर्थभावनाको करती हुई उसका बोध न होनेमें पुरुषकी प्रवृत्तिका सम्बन्ध न होनेसे पुरुषकी प्रेरणाके ही लिए अर्थभावनाका प्रतिपादन करती है। और वेदान्तवाक्य तो बोध ही कराता है। न्रह्म तथा उसके बोधमें पुरुषकी घेरणा नहीं करता, कारण कि ब्रह्म कार्यरूप न होनेसे पुरुषव्यापारके अधीन नहीं हैं, क्योंकि प्रमाण और प्रमेयके द्वारा उत्पन्न होनेवाला वोध पुरुषकी इच्छा तथा उसके प्रयत्नके अधीन नहीं है। इच्छा न रखने तथा प्रयत्न न करते हुए मी पुरुपको दुर्गन्धादिका ज्ञान होते देखा गया है। इस प्रकार धर्म तथा ब्रह्मका एवं उनके प्रमाणोंका परस्पर अत्यन्त भेद होनेसे प्रकृतमें एक जिज्ञास्य होनेके कारण प्राप्त हुए क्रमरूप अर्थको अथशब्द नहीं कह सकता। इससे आनन्तर्यरूप अर्थका अभिधान करता हुआ पुष्कल कारणरूप (साधनचतुष्टय) अधिकारीके शास्त्रीय विशेषणको सूचन करनेके लिए ही अथशन्दका प्रयोग किया गया है। और वह अधिकारीका विशेषण शास्त्रमें चार प्रकारका प्रसिद्ध है - १ नित्यानित्यवस्तविवेक, २ ऐहिक या पारलौकिक विषय भोगोंसे विरक्ति,
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अथशब्दकी अधिकारिविशेपणार्थकता ] भाषानुवादसहित ५६५
इहाडमुत्रार्थफलभोगविराग:, शमदमादिसाधनसंपद्, मुसुक्षुत्वं चेति। तत्र 'सोऽन्वेष्टव्यः' इति विधिप्नकरणे 'तद्यथेह कर्मचितो लोक क्षीयते' इत्यादिना नित्यानित्यतस्तुविवेको दर्शितः । श्रवणविधित्रकरणे च 'आत्मनस्तु कामाय सव ग्रियं भवति' इतीहामुत्रार्थफलभोगविरागो दशितः। 'आत्मन्येवात्मानं पशयेत्' इति दर्शनविधिग्रकरणे 'शान्तो दान्त:' इत्यादिना शमादयो दर्शिताः। 'तद्विजिज्ञासस्त्र' इति विचारविधिग्रकरणे 'वरुण पितरमुपससार' इति गुरूपस- दनं दर्शितम्। न च मुमुक्षुत्वप्रापकप्रमाणाभावः, सर्वत्र हि फलश्षुतयः कामनोत्पादनद्वारेण मुमुक्षोरधिकारप्रदर्शनार्थाः; अन्यथा साधनानुष्ठाना- देव फलसिद्ेस्तत्संकीर्तनवैफल्यात्। यद्यपि शंमादयो ज्ञानविधिपकरणे पठितास्तथापि तेपां विचाराधिकारिविशेषणत्वमविरुद्वम्। ज्ञानस्य विधातुमशक्यतया तत्साघनस्य विचारस्यैव तत्र विधेयत्वात् । एवमपि प्रतिशासं विचारविधेर्भिन्नत्वात्तत्र च तान्यधिक्का रिविशेपणान्यपि व्यवतिप्ठन्ते, ३ शम, दम आदि साधनों की सम्पत्ति और ४ मुमुक्षुता। उनमें से 'उस न्क्का अन्वे- पण करना चाहिए' इस विधिके प्रकरणमें पढ़े गये-'जैसे कर्मोपार्जित स्वर्गादिलोक क्षीण हो जाते हैं'-इत्यादि वाक्य द्वारा नित्यानित्य वस्तुका विचेक दिखलाया गया है। और श्रवणविधिके पकरणमें-'आत्माकी कामनासे सब कुछ परिय लगता है' इस वाक्यसे ऐहिक और पारलौकिक विपयोंसे वैराग्य दिखलाया गया है, 'भात्मा ही में आत्माका दर्शन करे' (अर्थात् अनात्मामें आत्मदृष्टि न करें) इस दर्शनविधिके प्रकरणमें 'शमयुक्त तथा दमयुक्त हो' इत्यादि वाक्यसे शम, दम मादि दिखलाये गये हैं। 'उसका विचार करो' इस विचारविधिके प्रकरणमें 'अपने पिता वरुणके पास गया' इस वाक्यसे गुरुके समीपमें गमनरूप उपसदन दिखालाया गया है। मुमुक्षुताके परापक प्रमाणका अभाव भी नहीं है, कारण कि सर्वत्र कामनाके उत्पादन द्वारा फलश्ुतियां मुमुक्षुक्ता अधिकार दिखलाती हैं। अन्यथा साधनके अनुष्ठानसे ही फलकी सिद्धि हो जायगी, फिर उसका सक्कीर्तन करना व्यर्थ हो जायगा। यद्यपि ज्ञानविधि-प्रकरणमें शम आदि पढ़े गये हैं, तथापि उनको विचारके अधिकारीके विशेषण माननेमें कोई विरोध नहीं है, कारण कि ज्ञानका विधान करना सम्भव नहीं है, इसलिए उसका साधनभूत विचार ही उस ज्ञानविधिमें विधेय है, ऐसा मानना उचित है। शक्का-इस प्रकार माननेपर. भी प्रत्येक शाखामें विचार-विधियाँ भिन्न-
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५६६ विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र १, वर्णक ३
न तु समुचीयन्त इति चैदूं, न; सर्वशाखाप्रत्ययन्यायेन विचारविधेरेक- त्वात्। नानाशाखासु श्रयमाणस्य ज्योतिष्टोमादिकर्मणः शासामेदेन भेदावासौ 'एक वा संयोगरूपचोदनाख्याविशेपाद्' इति सूत्रेण सिद्धान्तितम्। तत्र यथा फलसंयोगस्य द्रव्यदेवतालक्षणरूपस्य 'यजेत' इत्यादिचोदनाया ज्योतिष्टोमादिसंज्ञायाश्च सर्वत्राऽविशेपेण कर्मैक्यं तथा विचारोऽपि सर्वत्रैक एव। स चैको विचारविधिरधिकारमीक्षमाणः: प्रकरणसामर्थ्यात् फलसङ्की- रतनवैफल्यपरिहाराच वर्णितधर्मकलापमधिकारनिमित्तत्वेन स्वीकरोति। निरधिकारस्य विधे: परवृत्तिपर्यन्तत्वायोगात्। नन्वेपु वाक्येपु विचार- पदाभावाद्विचारोऽभिधीयत इति कथमवगम्यते! उच्यते-'स विजिज्ञा-
मिन्न हैं, अतः उनमें वे सभी अधिकारीके विशेषण व्यवस्थित हैं, उनका समुच्चय नहीं है। समाधान-नहीं, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि सर्वशाखाप्रत्ययन्यायसे विचारविधि एक ही है। अनेक शाखाओंमें पढ़े गये ज्योतिष्टोम आदि यज्ञोंका शाखाओंके भेदसे भेद प्राप्त होनेपर 'एक वा संयोगरूपचोदनाख्याविशेपात्' (जै० सू० २ अ० ४ पा० १९) (संयोगरूप चोदनामें कोई विशेष न होनेसे) इस सूत्रसे एक होना ही सिद्धान्त किया गया है। उसमें जैसे द्रव्य-देवता-सम्बन्धस्वरूप फलसंयोगका 'यजेत' इत्यादि लिडर्थभूत चोदनासे और ज्योतिष्टोम आदि संज्ञामें सर्वत्र विशेष न होनेसे एक कर्म माना जाता है, वैसे ही विचार मी सब शाखाओंमें एक ही है। वह एक ही विचारविधि अधिकारकी अपेक्षा करती हुई प्रकरणकी सामर्थ्यसे और फलके वर्णनका चैफल्यपरिहार करनेसे वर्णित धर्मसमूहको अधिकारके निमित्तत्वरूपसे स्वीकार करती है। अधिकारशुन्य विधानका प्रवृत्तिपर्यन्त सम्बन्ध नहीं हो सकता [अर्थात् निरधिकार विधि केवल पुस्तकोंमें लिखी ही रह जाती है, इससे अधिकारी न होनेसे कोई उसका अनुष्ठान करना अपना कर्तव्य ही नहीं समझता।] शङ्का-उक्त वाक्योंमें विचार-पदके न होनेसे विचारका अभिधान होता है, यह कैसे समझा जा सकता है? समाधान-सुनिये, कहते हैं-'स विजिज्ञासितव्यः', 'तद् विजिज्ञासस्व' अर्थात् उसकी जिज्ञासा करो इस अर्थवाले उक्त दोनों वाक्योंके अन्तर्गत
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अथशब्दकी अधिकारिविशेषणार्थकंता] भापानुवादसाहित ५६७
सितव्यः' 'तद्विजिज्ञासस्व' इत्यत्राऽन्तर्णीतो विचारो विधीयते, इष्यमाण- ज्ञानस्येच्छायाश विधेयत्वायोगात्। 'श्रोतव्यः' इत्यत्र स्वयमेव विचारो विहितः । 'पश्येत्' इत्यत्र तु पूर्वमेवोक्तम्। तस्मात् सर्वत्र मनननिदिध्यास- नाभ्यामङ्गाभ्यां थवण नामाऽङ्ि विधीयते इति सिद्धम्। ननु सर्वत्र फलसाधनविधौ फलकामनैव पुष्कलाधिकारनिभित्तमित्य- त्राऽपि सुमुक्षुत्वमेवाऽधिकारिविशेषणं शमदमादिकं त्वनुष्ठेयतथा प्रयाजादिवत् फलोपकार्य्यङ्गं भविष्यतीति चेत्, सत्यम्; अङ्गस्याऽप्यधिकारिविशेषणत्वं विचाररूप अर्थका ही विधान किया जाता है, कारण कि इच्छांके विपयभुत ज्ञान तथा इच्छा दोनों विधेय नहीं हो सकते। 'शतव्यः' इस पदसे स्वयं विचारका विधान किया गया है और 'पश्येत्' इस पदमें तो पहले ही कह आाये हैं। [ 'जिज्ञासितव्यः' या 'विजिज्ञासस्व' इन पदोंमें सन्-प्रकृतिभूत धातुका अर्थ ज्ञान है और सन्का अर्थ इच्छा है, 'तव्य' या 'लोट' प्रत्यय विधिके बोधक हैं। यद्यपि सममित्याहृत प्रकृतिके अर्थका भी विधान करना न्याय- प्राप्त है, परन्तु दोनोंके विधानका सम्भव न होनेसे उसके उपायभूत विचारमें विधिका संक्रमण किया जाता है, इस प्रकार 'विजिज्ञासस्व' आदि पद विचारके अर्थतः वाचक हुए, परन्तु श्रवण तो विचाररूप अर्थमें रूढ़ है, अतः वह स्वतः वाचक पद होनेसे मुख्यतः विचाररूप अर्थको कहता है ] इस उक्त मिणयके वलसे मनन, निदिध्यासन रूप अझ्ोंके द्वारा श्रवण-विचार-रूप अज्ञीका विधान किया जाना सिद्ध होता है। शक्ा-अन्यप्र सभी स्थलोंमें फलकामना ही पुष्कल-पर्याक्ष- अधिकारकी निमित्त-उत्पादक-मानी जाती हैं एवं प्रकृतमें मुमुक्षुता ही अधिकारीकी विशेषण रहे और शम, दम आदि तो अनुष्ठानके विषय-योग्य होनेसे प्रयाजादि यागोंके सदश फलके उपकारी अङ्ग होंगे, [पुष्कल कारण नहीं होंगे ]। समाधान-यह सच है' कि अञ्गको भी अधिकारीका विशेषण मानना विरुद्ध १ 'पूर्यपक्षे दढीभूते सत्यमित्युच्यते वुधैः' अर्थात् जहां पूर्वपक्ष कुछ युक्त-सा जंचता है यहां पर समाधान देनेके पूर्व अमियुक्त 'सत्य है' ऐसा कहते हैं, परन्तु इस सत्यपदका यथार्थरूप या अवाधित रूप अर्थ नहीं है .: ।
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५६८ विचरंणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक ३
न विरुध्यते, शमादिगुणको भूत्वा पश्येदित्यादिलिङ्गात्। शासत्रेकगम्यस्य युक्याऽपलापायोगात्।. अङ्गभूताया अपि दीक्षाया उत्तरक्रत्वधिकारनि- मित्ततादर्शनात्। यद्यपि सुमुक्षुत्वे सत्यन्यधर्माभावापराधेन प्रवृत्यभावो न दष्टचरस्तथापि सुमुक्षुत्वस्वरूपोपाधित्वादन्येपामधिकारनिमित्तत्वमनिवा- यम्। नहि नित्यानित्यवस्तुविवेकाभावे सतीहाऽमुत्रार्थफलभोगविराग उपपद्यते। नाऽपि तस्मिन्नसति शमादियुक्तत्वेन सुमुक्षुत्वं संभवति। अतः पूर्वपूर्व उत्तरोत्तरस्य स्वरूपोपाधि: । नन्वेवं सति न कस्याऽपि स्वरूपं सिध्येद्, मूलकारणस्य नित्या- नित्यवस्तुविवेकस्याऽसंभवाद। नहि नित्यं नाम किंचिदस्ति यस्याS-
नहीं है; कारण कि इस अर्थके परिचायक 'शमादि गुणोंसे युक्त होता हुआ दर्शन-विचार-करे' इत्यादयर्थक वाक्य मिलते हैं, अतः केवल शास्त्रसे ही प्रवीत होनेवाले अर्थका युक्तियोंसे खण्डन नहीं किया जा सकता। [ जैसे आंखके सामने छोटी अंगुलीकी आड़ आनेसे ही चन्द्रमाके शास्त्रगम्य परिमाणका निषेध नहीं किया जा सकता]। दष्टान्त द्वारा उक्तार्थका समर्थन करते हैं-अङ्गभूत दीक्षा भी उत्तर कतुओंमें अधिकारकी निमिच देखी गई है। यद्यपि मुमु- क्षुताके प्राप्त हो जानेपर दूसरे 'नित्याऽनित्य वस्तुके विवेक' आदि धर्मोंके न होनेके कारण 'ब्रह्मविचारमें' प्रवृत्ति-अनुष्ठान-का अभाव कमी नहीं देखा जाता तथापि मुमुक्षुत्वस्वरूप उपाधिकें-विशेषण-होनेसे अर्थात् अन्य अधिकारि निमिच आ ही जाते हैं, क्योंकि नित्याऽनित्य वस्तु-विवेकादि अन्य धर्मोंके अभावसे सुमुंक्षुता ही नहीं हो सकती, अतः अन्य उक्त तीनों धर्मोंमें अधिकार-निमित्तत्व नहीं हटाया जा सकता। नित्याऽनित्यवस्तुविवेकके अभावके रहते इस लोक और परलोकके विषयोंके भोगसे विरक्ति नहीं हो सकती और उसके न होनेसे शम, दम आदिसे सम्पन्न होकर मोक्षकी इच्छारूप मुमुक्षुता भी नहीं हो सकती। इसलिए पूर्व पूर्व उत्तर उत्तरकी स्वरूपोत्पादकरूप उपाधि है। [ अर्थात् नित्याऽनित्यवस्तुविवेकसे सर्वथा विषयविरक्ति और विषयविरक्तिसे शम, दमादि सम्पत्ति और शम, दमादि सम्पत्तिके अनन्तर मुमुक्षुता होती है, यह भाव है ]। शङ्ा-अब तो किसीका भी स्वरूप नहीं वन सकेगा, कारण कि सबके मूलकारणभूत मित्याऽनित्यवस्तुविवेकका सम्भव नहीं है, क्योंकि नित्य
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अथशब्द की अधिकारिविशेषणार्थकता ] भाषानुवादसहित ५६९
नित्याद्विचेक: स्यात्। न च सर्वानित्यत्वे मानाभावः, विमतं सर्वमनित्यम्, सच्वादू, वटादिवत, इति चेटू, मैवम् ; कार्यजातस्योत्पत्तिविनाशाभ्यामेवो- पादानस्यैकस्याऽनादे: कृटस्थस्याऽवधिभृतस्य नित्यत्वसिद्धेः। तथाहि न तावत् कार्य निरुपादानमुपपद्यते, अनुभवविरोधाद्। अत उपादानमङ्गी- कार्यम्। उपादानत्वं च कार्यान्तरस्य न संभवति। तथा सति कार्यानु- गतस्यैवोपादानत्वनियमात् पूर्वपूर्वकार्यानुवेधस्योत्तरोत्तर कार्येऽभ्युपगन्तव्य- त्वाचरमे कार्येऽनन्तपूर्चकार्याणामनुगतिः प्रसज्येत। न चैचमुपलभ्यते, अतोऽनाद्येव तदुपादानम्। तस्य चैकस्यैव सर्वकार्योत्पादकत्व- संभवेऽनेकत्वकल्पने गौरवादेकत्वमभ्युपेयम्, कूटस्थत्वं चाऽविकारित्वाद्, पदार्थ कोई है ही नहीं, जिसका अनित्यसे विवेक-पार्थक्यज्ञान-किया जाय और सबको ही अनित्य माननेमें प्रमाणका अभाव भी नहीं है, कारण कि 'विमत सव- कुछ (न्रक्ष आदि) अनित्य है, सत् होनेसे, घट, पट आदिके समान, यह अनुमान ममाण है। [घट, पट मादि सभी पदार्थ 'सन् घटः', 'सन् पटः' इत्यादि प्रतीतिके वलसे सत् हैं और विनाशी होनेसे अनित्य हैं, इस व्यापिसे सत्-पदार्थभूत ब्रह्म भी अनित्य होगा, यह भाव है। ] समाधान-ऐसा नहीं, कारण कि सम्पूर्ण कार्योंकी उत्पत्ति और विनाशसे ही कूटस्थ (अविकारी और अपरिणामी) तथा अवधिभूत एक उपादान कारणका नित्य होना सिद्ध होता है। [उपादान कारणकी नित्यता सिद्ध करते हैं ]- उपादानरहित कार्यकी तो उत्पत्ति हो ही नहीं सकती, क्योंकि (कार्यको उपादान- रहित माननेमें) अनुभव विरोध आता है; इसलिए उपादानका अग्गीकार अवश्य करना चाहिए। कार्यान्तर भी उपादान नहीं माना जा सकता 'अर्थात् एक कार्यका दूसरा कार्य उपांदान नहीं हो सकता। यदि कार्यान्तर ही कारण मानां जाय, तो कार्यानुगत-कार्यमें विद्यमान-को ही उपादान माननेका [जैसे घटमें मिट्टीकी अनुवृत्तिसे मिट्टी उसकी उपादान है] नियम होनेसे पूर्व-पूर्व कार्यका अनुवेध (अनुवृत्तिरूप सम्बन्ध) अंग्रिम-अग्रिम कार्यमें मानना ही चाहिए, इस परम्परासे अन्तिम कार्यमें अनन्त पूर्व कार्योंकी अनुवृत्ति आनेका प्रसङ्ग हो जायगा। पर ऐसा अनुभवमें याता नहीं, इस हेतुसे अनादि ही वह उपादान है। अकेले एक उसमें ही सव कार्योंकी उपादानताका सम्भव होनेपर उसकी (उपादानकी) अनेकताकी कलपना करनेमें गौरव होनेसे एकत्वकी ही
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५७० विवरणप्रमैयसंग्रह [सूत्र १, वरणक ३
विकारित्वे च कार्यत्वप्रसङ्गात्। तच् कूटस्थवस्तु विनश्यतो विकारजात- स्याज्वधिः। अन्यथा निरवधिकविनाशे सत्युपादानासंभवाद्वर्त्तमानसृष्टिरेव न सिध्येत्। अतः कूटस्थं वस्तु नित्यमिति नित्यानित्यवस्तुविवेकसिद्धौ तत्कार्यो मुसुक्षुत्वान्तो धर्मकलापोऽपि सिध्यन्नाऽधिकारिणं ब्रह्मविचारे प्रवर्त्तयति। यस्तूक्तसाधनसम्पद्विरहेऽपि दैववशात् कुतूहलाद्वा बहुशुतत्व- वुध्धा वा तत्र प्रवर्त्तते, स पवृत्तोऽ्यनन्तर्सुखचेता वहिरेवाऽभिनिविशमानो निर्विचिकित्सं ब्रह्मात्मत्वेनाऽवगन्तुं न शक्रोति। तंस्माद्वर्णितवस्तुकलापा- नन्तर्यमथशब्दार्थः। अत्र भास्करः प्रललाप, विचारकर्तव्यतां प्रतिपद्यमानस्य किल सूत्रकारस्य शमादयो न बुद्धिसमारूढाः । न चाऽवुद्धिसमारूढमर्थमधि- कारिविशेषणतयोपादातुमरहति; धर्मविचारस्तु वुध्धारूढोऽधिकारिविशेषण- करपना करना युक्तिसक्गत है और विकारी न होनेसे ब्रह्म कूटस्थ माना जाता है विकारी होनेसे, तो वह भी कार्य ही हो जायगा। और वही कूटस्थ वस्तु विनाशित्वस्वभाववाले कार्यमात्रकी अवधि है, अन्यथा ध्रुव- केन्द्र-भूत वस्तु न माननेसे निरवधिक विनाशकी प्राप्ति होनेसे (अर्थात् सब-कुछ-का नाश हो जानेसे, उपादानका रहना भी सम्मव नहीं हो सकता, इससे (उपादानके न रहनेसे) वर्तमान सृष्टिका होना ही सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिए कूटस्थ वस्तु नित्य है, इससे नित्य वस्तुका सम्भव होनेसे उसका कार्य (नित्यानित्यवस्तुविवेकसे उत्पन्न होनेवाला) सुमुक्षुतापर्यन्त धर्मसमूह (ऐहिक पारलौकिक विषयभोगविराग, शम, दमादिसम्पत्ति तथा मुमुक्षुता) सिद्ध होता हुआअधिकारीको ब्रह्मविचारमें प्रवृत्त कराता है। जो कोई पुरुष उक्त साधन- सम्पत्तिके बिना भी दैववश अथवा उत्सुकतासे या बहुंत शास्त्र जाननेकी बुद्धि होनेसे ब्रह्मविचारमें प्रवृत्त होता है, वह बहिमुखचित्तप्रवृत्तिवाला होनेसे बाहर ही बाहरका ज्ञान प्राप्त करता है और अन्तःप्रवेश न पाता हुआ ब्रह्मको निर्विचिकित्स -सन्देहशुन्य-होकर आत्मरूपसे नहीं जान सकता। इसलिए पूर्वमें जिसका वर्णन किया गया है, ऐसे वस्तुसमूहका आनन्तर्य ही अथशब्दका अर्थ है। :इस विषयमें भास्करने प्रलाप किया है कि विचारका कर्तव्यरूपसे प्रति- पादन करनेवाले सूत्रकारकी बुद्धिमें शम, दम आदि नहीं आये थे और बुद्धिमें न आया हुआ अर्थ अधिकारीका विशेषण होनेकी योग्यता नहीं रख सकता। और
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अतःशब्दकी हेत्वर्थता ] भापानुवादसहित ५७१
तयोपादीयत इति। नैतदयुक्त्म्: शमादीनां विचारविधिप्रकरणपठिततया संनिहिततराणामनुद्धारोहायोगात्। न च तेपामत्राऽनुपयोग; विधिप्रयुक्ता-
पयोगः। न च तथा धर्मविचार: संनिहिततरः। भिन्नप्रकरणोपातधर्म- विपयत्वात्। नाऽप्यसावत्रोपयुज्यत इति पूर्वमेव समर्थितम्। तस्मादस्मदुक्त एवाऽथशब्दार्थ इति सिद्धम्। अतःशब्दो हेत्वर्थः। नन्वथगब्द एवाऽऽनन्तर्याभिधानमुखेन हेतुतया पूर्ववृत्तमर्थ गमयतीत्युक्त तेन पुनरुक्तिः। न च वाच्यं हेतुत्वं नाऽथशब्दे- नाऽभिधीयते किन्त्वर्थात् प्रतीयते। अन्र त्वतःशब्देनाऽभिधीयते तेन न पुन-
धर्मका विचार तो 'सूत्रकारकी' वुद्धिमें विद्यमान था उसको अधिकारीके विशेषणके रूपमें ले सकते हैं। परन्तु भास्करका उक्त प्रलाप युक्तिपूर्ण नहीं है, क्योंकि विचारविधिके प्रकरणमें पठित होनेसे अत्यन्त संनिहित शम आदि सूत्रकारकी ुद्धिमें नहीं हैं, ऐसा कहनेका अवसर नहीं आ सकता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि उनका प्रकृतमें उपयोग नहीं है; कारण कि विधिके कारण प्राप्त हुए अधिकारीके अनुबन्धके अन्तःपाती ही शमादि हैं, 'शमादिके विना अधिकारसम्पत्ति ही नहीं मिल सकती और अधिकारीके विना विधि व्यर्थ होती है, इसलिए अधिकारीकी सम्पत्तिमें शम, दम आदि आ जाते हैं, और अन्वय-व्यतिरेक द्वारा शम, दम आदिका विचारमें उपयोग दिखा आये हैं। इस प्रकार (शमादिके तुल्य) धर्मविचार अत्यन्त सन्निहित है भी नहीं। कारण कि वह भिन्न-पकरणमें पठित धर्मको विषय करता है और धर्मका प्रकृतमें-ब्रम्मज्ञानमें-उपयोग नहीं है, इसका सर्थन कर आये हैं। इसलिए अथ- शव्दका हमारा अभिमत अर्थ मानना ही उचित है, यह सिद्ध हुआ। अतःशब्द हेतुका वाची है, शङ्का-'आनन्तर्य अर्थका अभिधान करनेसे अथशब्द ही कारणभूत पूर्ववर्त्ती पदार्थका बोध करा ही देता है' ऐसा कहा है, इससे पुनः अतः- शब्दके प्रयोगसे पुनरुकि दोष होगा। अथ शब्दसे हेतुस्वरूपका अभिधान नहीं होता, किन्तु अर्थात् प्रतीत होता है और सूत्रमें अतःशन्दके देनेसे हेतुका अभिधान होता है, इससे पुनरुक्ति नहीं है, यह मी नहीं कह सकते, कारण कि
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५७२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक. ३
रुक्तिरिति। अर्थात्प्रतीतस्याऽपि तात्पर्यविषयतयाऽथशब्दार्थत्वाद् 'यत्पर: शब्द: स शब्दार्थः' इति न्यायात्। न चाऽथशब्दस्याऽऽनन्तर्यमात्रे विधेये तात्पर्य सम्भवति, वैयर्थ्यप्रसङ्गात्। तस्मादार्थिकेऽपि हेतुत्वेऽ- थशब्दस्य तात्पयें सत्यथातःशब्दयोः पुनरुक्तिर्ुष्परिहरा। नैप दोप :; अथशब्देन साधनचतुष्टयस्य विचारहेतुत्वे परिगृहीते तस्याऽनिर्वाहा- शङ्गायां तन्निराकरणेन हेतुत्वनिर्वाहायाऽतः शब्दोपादानात्। तथाहि- स्वर्गादीनां कृतकत्वपरिच्छिन्नत्वादिहेतुभिरनित्यत्वमनुमाय तस्माद-
अर्थात् प्रतीत होनेवाला अर्थ भी तात्पर्यका विषय माना जाता है, इससे (हेतुरूप अर्थ) अथशव्दका अर्थ ही हो गया, क्योंकि न्याय है कि 'जिस अर्थमें जिस शब्दका तात्पर्य होता है, उस शन्दका वही अर्थ माना जाता है। और केवल आनन्तर्यरूप अर्थके विधानमें अथशन्दका तात्पर्य मानना सम्भव भी नहीं, कारण कि ऐसा माननेसे अथशन्दका देना ही व्यर्थ हो जायगा। इसलिए अर्थात् प्रतीयमान भी हेतुरूप अर्थमें अथशन्दका तात्पर्य सिद्ध होनेसे 'अथ' और 'अतः' इन दोनों शब्दोंके प्रयोगसे प्राप्त हुई पुनरुक्ति नहीं हटाई जा सकती। समाधान-उक्त (पुनरुक) दोप नहीं आ सकता, कारण कि अथ- शब्दसे साधनचतुष्टयमें विचारके प्रति कारणता प्रतीत हुई। अनन्तर शक्का हो सकती है कि साधनचतुष्टयमें अथशब्द द्वारा प्रतीत हुई कारणताका निर्वाह नहीं हो सकता (अर्थात् साधनचतुष्टय विचारके कारण नहीं हो सकते) इस आशक्काके निराकरण द्वारा कारणताका निर्वाह करनेके लिए अतःशब्दका ग्रहण किया गया है। (अतःशब्दके साधन प्रयोग- चतुष्टयमें कारणताका निर्वाहप्रकार दिखलाते हैं)-स्वर्गादिमें कृतकत्वै और परिच्छिन्नत्वे रूप हेतुओंके द्वारा (कार्य और परिच्छिन्न होनेसे) अनित्यताका अनुमान करके उस स्वर्गादिरूप अनित्य पदार्थसे नित्य पदार्थका विवेक
१ जो उत्पाद्य अर्थात क्रियाकलापसे साध्य है, वह कृतक-कार्य है। जैसे घट, पट आदि। २ परिच्छेद-किसी भी वस्तुके साथ देश, काल या परिमाण, संख्या आदि विशेषण लगाकर उसके देश-काल आदि या इयत्ताका परिचय देना परिच्छेद कहाता है। और जिसका उक्त प्रकारोंमें से किसी भी प्रकारसे परिचय दिया जाता है वह परिच्छन् कहाता है। जैसे इस
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नित्यानित्यवस्तुविवेकका फल ] भापानुवादसहित ५७३
नित्यान्नित्यं विवेक्तव्यम्। न चाडयं विवेक: सुलभः, उक्तहेतूनां प्रध्वंसः परमाण्वादावनेकान्तिकत्वात्। नित्यत्वं च कर्मफलस्य अ्यते-'अक्षय्यं ह.वै चातुमस्यियाजिन: सुकृतं भवति' इत्यादौ। अतः कथं पुरुपार्थात् कर्मफलात् चिरज्याऽपुरुपार्थे ब्रह्मज्ञाने पुरुपा: अवर्त्तेरन्। यद्यपि ब्रह्मण्यानन्दोऽ़स्ति तथापि नाडसौ जीवेनोपभोक्तुं शक्य:, स्वाश्रयसुखोपलव्घेरेवोपभोगत्वाद्। न च त्रक्षधर्मस्य सुखस्य जीवाश्रयतयोपल्धिः संभवति, लोकेऽन्यसुख- स्याऽन्याश्रयत्वादर्शनाद्। अथ सुखापरोक्ष्यमात्रस्योपभोगत्वे व्यभिचाराभावात् स्वाश्रयविशेषणं व्य- र्थमिति मन्यसे, एवमपि जीवव्रह्मणोमेदे बह्मानन्दापरोक्ष्यमनुपपन्नम्, पुरुपा- (पार्थकयज्ञान) करना चाहिए। और यह विवेक सुलभ-सुगम-नहीं है। कारण कि उक्त हेतु (कार्यत्व और परिच्छिन्नत्व आदि) प्रध्वंस तथा परमाणु आदिमें व्यमिचरित हैं [ न्यायपक्षमें प्रध्वंस कार्य होता हुआ भी नित्य है और परमाणु परिच्छिन्न होता हुआ मी नित्य है]। और कर्म द्वारा प्राप्त फलोंकी नित्यता मी 'चातुर्मास्य याग करनेवालेको अक्षय पुण्य होता है' इत्याद्यर्थक श्रुतिमें सुनी जाती है। इसलिए पुरुपार्थभूत स्वर्गादिस्वरूप कर्मोंके फलोंसे विरक्त होकर पुरुषार्थसे वहिष्कृत न्रहाज्ञानमें पुरुष कैसे प्रवृत्त हो सकेंगे? यद्यपि नस्ममें आनन्द है, परन्तु जीव उसका (ब्रम्मानन्दका) भोग नहीं कर सकता, कारण कि अपनेमें सुखकी उपलन्धि होना ही उपभोगपदार्थ है। और ब्रद्ममें विद्यमान सुखरूप धर्मकी जीवाश्रित होकर उपलब्धि नहीं हो सकती है अर्थात् जीव त्रह्मके सुखका अपनेमें अनुभव नहीं कर सकता है, कारण कि लोकमें दूसरेका सुख दूसरेमें नहीं देखा जाता। यदि सुखके आपरोक्ष्य-साक्षात्कार-को ही उपभोग माननेमें व्यभिचार न होनेसे स्वाश्रय (अपनेमें) विशेषण देना व्यर्थ मानते हो, तो भी जीव और ब्रक्षमें मेद होनेसे ब्रह्मानन्दका साक्षात्कार नहीं हो सकता, कारण कि दूसरे पुरुपके सुखका साक्षात्कार दूसरेको होते नहीं देशमें विद्यमान दस सेर वजनी एक घड़ा इत्यादि। (स्वर्गादि एकदेशविशेष माने जाते हैं, इसलिए उनमें देशपरिच्छेद है और 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' इस प्रकार अभियुक्त वचनोंके तथा 'तद्थेह कर्मचितः' इत्यादि श्रुतिके वलसे पुण्यतारतम्यके अनुसार उनमें
कार्य भी है)। कालपरिमाणादिपरिच्छेद भी विद्यमान है और 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि वचनोंसे वह
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५७४ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ३
न्तरानन्दस्याऽडपरोक्ष्यादर्शनात्। जीवब्रह्मणोरमेदस्त्वनुभवविरुद्धः, अतो मोक्षान्निरानन्दाद्विरज्याऽल्पदुःखमिश्रितेऽपि विषयानन्दे पुरुषः प्रवर्त्तते, 'नह्यजीर्णभयादाहारपरित्याग:, किन्तु अ्रतिविधातव्यम्' इति न्यायादित्यथ- शब्दपरिगृहीतोरऽर्थों न निर्वहतीत्याशङ्केत; सेयमाशङ्का न कर्त्तव्या, यस्माद्वेद एव ब्रह्मव्यतिरिक्तपुरुषार्थजातस्याऽनित्यतां दर्शयति-'तद्यथेह कर्मजितो लोक: क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोक: क्षीयते' इत्यादि:। न चेयं सामान्यश्चुतिश्चातुर्मास्यादिविशेषश्रुतिविपयादन्यत्रैव व्यवतिष्ठतामिति वाच्यम्, तत्र तावच्ातुर्मास्यश्तिः सुकृतस्यैवाऽक्षयत्वं ब्रूते न तत्फलस्य। न च सुकृताक्षयकथनमुखेन तत्फलाक्षयत्वे वाक्यतात्पर्यमिति कल्पयितुं
देखा जाता। और भी जीव तथा ब्रह्मका अमेद तो अनुभवसे विरुद्ध है, इसलिए आनन्द-सुख-शून्य मोक्षसे विरक्त होकर पुरुष थोड़ेसे दुःखसे मिश्रित विषयानन्दमें भी प्रवृत्त होता है। [अल्प दुःखके सम्बन्धसे विषयानन्दसे भी विरक्ति हो जानेकी आशक्काके निवारणके लिए लोकन्याय दिखलाते हैं-] 'अजीर्ण रोगके भयसे भोजन करना नहीं छोड़ा जाता, किन्तु रोगसे बचे रहनेके उपाय किये जाते हैं' इस न्यायसे अथशब्द द्वारा प्रतीत हुए (साधनचतुष्टयमें विचारहेतुतारूप) अर्थका निर्वाह (शक्का रहित समर्थन) नहीं हो सकता,' ऐसी आशङ्का हो सकती है, पर वह नहीं करनी चाहिए, क्योंकि भगवान् वेद ही ब्रह्मसे अतिरिक्त सकल पुरुषार्थकी अनित्यता दिखला रहे हैं-'जैसे इस लोकमें कर्मोंके द्वारा उपार्जित लोक (ग्मादि धनसम्पत्ति) क्षीण हो जाते हैं वैसे ही परलोकमें पुण्योंके द्वारा आप किये स्वर्गादि लोक नष्ट हो जाते हैं, इत्यादि। ऐसी व्यवस्था भी नहीं की जा सकती उक्त्त (अनित्यताप्रदर्शक) सामान्य श्रुति चातुर्मास्यादिविषयक विशेष श्रतिके विषयकी अपेक्षा दूसरे कर्मों द्वारा प्राप्त फलोंकी अनित्यता दिखलाती है (सामा- न्यतः कर्मफलमात्रकी नहीं), कारण कि वह चातुर्मास्यविषयक विशेष श्रुति सुकृत-पुण्य-को ही अक्षय-नित्य-कहती है, उसके फलको नहीं। सुकृत-पुण्य-के नित्य कथनके द्वारा उसके फलको नित्य कहनेमें तात्पर्य माननेकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, कारण कि इस कल्पनामें प्रमाणसे
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म्हज्ञानकी पुरुपार्थता ] भार्पानुवादसहित ५७५
शक्यम्, प्रमाणविरोधात्। परिच्छिन्नत्वादिहेतुभि: फलानित्यत्वानुमानाद् । न. च तेपामनैक्रान्तिकत्वम्, परमाण्वादावपि नित्यत्वासंप्रतिपत्तेः। न चाऽक्षये सुकते सति तत्फलस्य क्षयानुपपत्तिः, अनुपभोगवदुपपत्तेः। सत्येव हि मुकृते क्वचित् फलं नोपसुज्यते, 'कदाचित् सुकृतं कर्म कूटस्थमिव तिष्ठति' इति स्मृतेः। तथा फलस्य क्षयोऽि कि न स्यात् १ नापि 'हिरण्यदा अमृतत्वं भजन्ते' इत्यादिश्वित्यन्तरेपु फलनित्यत्वं सुसंपादम्। अत्राऽप्य- नुमानानुगृहीतया सामान्यश्ुत्या विरोधस्य तादवस्थ्याद। तस्मान्नित्या- नित्यवस्तुविवेकपूर्वमनित्येभ्यो ब्रह्मव्यतिरिक्तपुरुपार्थेभ्यो वैराग्यसुपपन्नम्। न च न्रह्यज्ञानं न पुरुपार्थ :; आनन्दसाक्षात्कारत्वात्। जीव- न्रह्मणोरभेदस्य अ्रथमवर्णके प्रतिविम्बद्ृष्टान्तेन साधितत्वात् संभवत्येव विरोध आता है। [अनुमानरूप प्रमाणसे विरोध दिखलाते हैं-] परिच्छिन्नत्व आदि 'पूर्वोक्त' हेतुओंसे फलमात्रकी अनित्यताका अनुमान किया गया है। यह फहना भी नहीं वनता कि उन हेतुओंमें व्यभिचार आता है, कारण कि परमाणु आदिमें (न्यायमतसिद्ध) नित्यता सर्ववादिसम्मत नहीं है। सुकृत- पुण्य-के अक्षय रहते उसके फलका क्षय होना उपपत्तिशूत्य भी नहीं है, कारण कि अनुपभोगके समान क्षय हो सकता है। [जैसे पुण्य रहते भी उसका उपभोग नहीं होता अर्थात् उपभोगका विनाश हो जाता है, वैसे ही सुकृत रहते भी उसके फलका विनाश होनेमें कोई अनुपपति नहीं आ सकती। [ सुकृत रहते भी उपभोगके विनाशका शास्त्र द्वारा समर्थन करते हैं ]-स्मृति कहती है कि कर्म कृटस्थ-विकारशन्य नित्य-की भाँति (उदासीन) स्थित रहता है- अर्थात् उपभोगात्मक विकारको प्राप्त नहीं होता ऐसे (उपभोगाभावके तुल्य) फलका विनाश भी क्यों न हो जाय ! 'हिरण्य-सुवर्ण-देनेवाले अमर (विनाश रदित फलको प्राप्त) हो जाते हैं' इत्यर्थक दूसरी श्रुतियोंमें फलके नित्यत्वका सम- धन करना भी सरल नहीं है, कारण कि इन श्रुतियोंमें भी अनुमान द्वारा अनुगृद्दीत सामान्यध्रुतिसे विरोध, ज्यों-का-त्यों चना है, इसलिए नित्याऽनित्य-वस्तु-विवेकपूर्वक व्रह्मसे अतिरिक्त अनित्यभूत पुरुपाथोंसे विरक्ति होना युकियुक्त है। न्रद्मज्ञानमें पुरुपार्थत्वका अभाव भी नहीं मान सकते, कारण कि ब्रह्मज्ञान आनन्दका साक्षात्काररूप है। प्रथम वर्णकमें जीव और ब्रह्मके अभेदका प्रतिविम्ब-हष्टान्तसे समर्थन कर चुके हैं, अतः उसका साक्षात्कार होना सम्भव ही
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५७६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
तत्साक्षात्कारः। न च नित्ये जीवस्वरूपभूते व्रह्मानन्दे विवदितव्यम्, जीवे परग्रेमास्पदत्वस्य कदाचिदप्यनपायात्। सुखसाधनानां तदभिव्यक्तिमात्रो- पक्षयात्। अन्यथा साधनानां सुखं अति जनकत्वमभिव्यञ्जकत्वं चेति गौरवात्। एवं च सकलचिपयसुखानां ब्रह्मानन्दलेशतया परमानन्दरूपे ब्रह्मणि दुःखसागरात् संसारे उद्वियाः प्रवर्चन्ते। तदेवमुक्तशङ्गानिराकरणेनाड- थशब्दार्थनिर्वाहायाऽतःशब्द इत्यनवद्यम्। ब्रह्मजिज्ञासेति पदेन 'ब्रह्मणो जिज्ञासा' इति पष्ठीसमासोऽवगन्तव्यो न तु धर्माय जिज्ञासा धर्मजिज्ञासेतिवच्तुर्थीसमासः। तत्र ह्यन्तणीतविचारार्थ- आधान्यमाश्रित्य प्रयोजनविवक्षया धर्मायेति चतुर्थीसमास आश्रितः । नहि विचारस्य यत्प्रयोजनं तदेव कर्म, येन धर्मस्येति कर्मणि पष्टी
है। [ इससे पुरुषान्तरके सुखका साक्षात्कार पुरुषान्तर द्वारा न हो सकनेकी आशक्काका खण्डन हो गया ] और नित्य जीव-स्वरूपभूत ब्रह्मानन्दमें विवाद नहीं करना चाहिए, क्योंकि जीवका परम प्रेमास्पदत्व कभी भी विनष्ट नहीं होता। सुखके उपायभूत ऐहिक या पारलौकिक विषय तो सुखकी अभिव्यक्तिमात्र करा देनेमें उपरत होते हैं। [ अर्थात् साधनोंकी नित्यता या अनित्यता सुखकी नित्यता या अनित्यतासे सम्बन्ध नहीं रखती, उनका तो सुखकी अमिव्यक्तिमात्रसे उपक्षय होता है। ] यदि सुखाभिव्यक्तिके अनन्तर साधनभूत विषय वने रहें, तो साधनोंका सुखके प्रति जनकत्व और अभिव्यञ्ञकत्व दोनोंका प्रसङ्गरूप गौरव होगा। इस निर्णयके अनुसार सम्पूर्ण विषयसुख ज्रह्मानन्दके ही लेश हैं, अतः संसारमें दुःखरूपी समुद्रसे घबड़ाये हुए पुरुष परमानन्दरूप ब्रह्षमें प्रवृत होते हैं। इस प्रकार उक्त शक्काका निराकरण करनेसे अथशब्दसे प्राप्त (साघनचतुष्टयकी विचारहेतुतारूप) अर्थका निर्वाह करनेके लिए अतःशब्द दिया गया है। इससे कोई दोष नहीं आता। .अब ब्रह्मजिज्ञासा इस समस्त पदका व्याख्यान करते हैं-'ब्रह्मजिज्ञासा' पदमें ब्रह्मकी जिज्ञासा, ऐसा षष्ीसमास करना चाहिए। धर्मके लिए जिज्ञासा इस प्रकार धर्मजिज्ञासापदमें जैसा चतुर्थी समास है, वैसा यहां नहीं है। धर्मजिज्ञासापदमें तो अन्तर्भृत विचाररूप अर्थका प्राधान्य लेकर प्रयोजनकी विवक्षासे धर्मके लिए ऐसा चतुर्थी समासका आश्रयण किया गया है, कारण कि जो विचारका प्रयोजन है, :वही कर्म नहीं हो सकता, जिससे 'धर्मका'
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'म्रझ्मजिज्ञासा' में पर्छ्टासमास है नकि चतुर्थीसमास ] भापानुवादसहित ५७७
प्राप्नुयात्। अत्र तु शब्दोपात्तं ज्ञानेच्छाप्राधान्यमाश्रीयते, इच्छायाश्च यदेव कर्म तदेव प्रयोजनम्, तेन कर्मणि पष्ठी तादर्थ्ये चतुर्थी च ग्राप्ता। तत्र स्वरूप- सिद्धहेतुतया प्राधान्यात् कर्मणि पष्टीमेवाऽऽश्रित्य समासो दर्शितः। अन्र वृत्तिकारा :- ब्रह्मशव्देन. जातिजीवकमलासनशब्दराशीनाम- भिधेयतामाशङ्घेत्थं निराकुर्वन्ति। न खल जात्यादीनामत्र कर्त्तव्यतया कर्तृतया वाडन्वयः संभवति। न तावद् ब्राह्मणजातेः कर्मत्वम्, ्त्यक्षसि- द्वतया जिज्ञास्यत्वायोगात्। नाऽपि कर्तत्वम्, जिज्ञासायास्त्रवार्णिकाधिकार- त्वात्। नाऽपि जीवो जिज्ञास्यः, अहंप्रत्ययसिद्धत्वात्। यद्यपि तस्य कर्तृत्वमस्ति तथापि तदुपादानं व्यर्थम्, अन्यस्य कर्तृत्वप्रसङ्गाभावात्। न च शब्दराशेवेदस्याऽचेतनस्य कर्तृत्वं संभवति, नाऽपि तस्य कर्मत्वम्, धर्म- जिज्ञासौत्पत्तिकसून्राभ्यां तस्यारऽर्थवत्वप्रमाणत्वयोर्निरूपितत्वात्। हिरण्य-
इस प्रकार कर्ममें प्ठी प्राप्त हो सके। और धर्मजिज्ञासापदमें तो शब्दसे कही गई ज्ञानकी इच्छाके प्राधान्यका आश्रयण किया जाता है। और इच्छाका जो कर्म है, वही विचारका प्रयोजन भी है, इसलिए कर्म होनेसे कर्ममें षष्ठी और प्रयोजन होनेसे तादुर्थ्यमें चतुर्थी प्राप्त हुई। उनमें स्वरूपसिद्धिका कारण होनेसे प्राधनतया कर्ममें पष्ठीका ही आथ्यण करके समास दिखाया गया है। इस सूत्रमें नह्मपदसे न्राह्मणजाति, जीव, कमलासन, चतुर्मुख, ब्रह्मा, या शन्दराशिस्वरूप वेदके बोधकी आशक्का करके वृत्तिकारने समाधान किया है कि इस शास्त्रमें जाति आदिका कर्तव्य कर्म या कर्तृरूपसे अन्वय होना सम्भव नहीं है, कारण कि न्राह्मणजातिका कर्म होना सम्भव नहीं, क्योंकि वह तो प्रत्यक्ष सिद्ध है;' इसलिए जिज्ञास्य (कर्म) नहीं हो सकती और न ब्राह्मणजातिका कर्ता होना ही सम्भव है, क्योंकि जिज्ञासामें तीनों वर्णोंका अधिकार है। जीव भी जिज्ञासाका कर्म नहीं है, क्योंकि जीव मी अहंप्रतीतिसे सिद्ध ही है। यदपि जीवमें कर्तृत्वका सम्भव है, तथापि उसका उपादान व्यर्थ है, कारण कि दूसरेके कर्तृतवका प्रसङ् नहीं है। और शव्दसमूहात्मक वेद अचेतन होनेसे, कर्ता नहीं हो सकता है और उसके (वेदके) कर्मत्वका मी सम्भव नहीं है, कारण कि धर्मजिज्ञासा और औत्पत्तिक सूत्रोंसे वेदके अर्थवत्व और प्रमाणत्व-
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५७८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूंत्र १, वर्णक हे
गर्भस्याऽपि न जिज्ञास्यत्वं तत्पदादपि विरक्तस्य जिज्ञासोपदेशात्। न च तस् कर्तृत्वम्, ज्ञानवैराग्ययोः सहसिद्धत्वादिति। सोऽयं वृत्तिकारप्रयासो व्यर्थः, 'जन्माद्यस्य यतः' इति वक्ष्यमाणलक्षणस्य ब्रह्मणो जात्यादि- शङ्काया अनुदयांद्। नन्वेवमपि ब्रह्मण इति नेयं कर्मणि पष्टी भवितुमर्हति, तथात्वे ब्रह्मस्वरूपमात्रस्य विचार्यत्वेन अतिज्ञासिद्धावप्यन्यस्य तदसिद्धेः। यदा तु सम्बन्धसामान्ये षष्ठी परिगृद्यते तदा ब्रह्मसंवन्धिनां स्वरूपप्रमाणयुक्ति साधनफलानां सर्चेषां विचारप्रतिज्ञा सिध्यति। अथ मतम्-कर्मणि पष्ठ्यां सत्यां जिज्ञासापेक्षितं जिज्ञास्यं निर्दिष्टं भवति नाऽन्यथा, न च तदन्तरेण जिज्ञासा सुनिरूपेति, तन्न; संवन्धसामान्य-
का निरूपण किया गया है। हिरण्यगर्भ मी जिज्ञास्य नहीं हो सकता, हिरण्यगर्म- पदसे मी विरक्त हुए ब्रह्माके लिए जिज्ञासाका उपदेश है [अर्थात् हिरण्यगर्भको भी ब्रह्मविचार करनेका अधिकार है। ऐसी अवस्थामें वह स्वयं कैसे जिज्ञासाका कर्म होगा?] उसका कर्ता होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि ज्ञान और वैराग्य उसको हिरण्य- गर्भपदप्राप्तिके साथ-साथ ही माप्त हो जाते हैं। [ इसलिए 'न्राम्मणजाति आदि ब्रह्मपदसे नहीं लिये जा सकते' इस वृत्तिकारके मतका खण्डन करते हैं-] इस प्रकारका वृत्तिकारका प्रयास व्यर्थ ही है, कारण कि 'जन्माद्यस्य यतः'-(जिससे इस प्रपञ्चजातका प्रादुर्भाव हुआ है) इस प्रकार वक्ष्यमाण लक्षणवाले ब्रह्मके जात्यादि होनेकी शक्काका उदय ही नहीं हो सकता। शङ्का-ऐसा माननेपर भी 'ब्रह्मणः' यह कर्ममें पष्ठी नहीं हो सकती, कारण कि कर्ममें षष्ठी माननेसे ब्रह्मस्वरूपमात्रके विचारविषय होनेकी प्रतिज्ञा तो सिद्ध हो भी सकती है, परन्तु दूसरेके विचारविषय होनेकी प्रतिज्ञाकी सिद्धि नहीं हो सकती। और जब कि सम्बन्धसामान्यमें षष्ठी मानते हैं, तव ब्रह्मके सम्बन्धी-स्वरूप, प्रमाण, युक्ति (कर्म), साधन (उपाय), फल (परमानन्द) सबके ही विचार करनेकी प्रतिज्ञा सिद्ध होती है। यदि कहो कि कर्ममें षष्ठी माननेमें जिज्ञासासे अपेक्षित जिज्ञास्यका (कर्मका) निर्देश हो जाता है। अन्यथा (सम्बन्धसामान्यमें षष्ठी माननेसे) नहीं होता।. कारण कि कर्मका निर्देश किये बिना जिज्ञासाका निरूपण नहीं किया जा सकता।
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'ब्रह्मणः' यह कर्ममें पछ्ठी है नाक सम्वन्धसामान्यमें ] मापानुवादसहित ५७९
पष्टीपक्षेऽपि ब्रह्मण: कर्मत्वलाभात्। नहि सामान्यं विशेषपर्यवसानमन्त- रेण व्यवहारमालम्बते। तत्र कोडसौ विशेप इति वीक्षायां सकर्मिकायां जिज्ञासाक्रियायां कर्मकारकस्याऽभ्यर्हिततया कर्मत्वं पर्यवस्यति। तस्मा- त्सर्वसंग्रहाय संघन्धसामान्ये पष्टी ग्राह्या न कर्मणीति चेद्, नाडयं दोप: कर्मणि पष्ठ्या प्रधाने जिज्ञासाकर्मभूते ब्रह्मणि निर्दिष्टे तदपेक्षितानां प्रमाणादीनामर्थसिद्धतया परृथगवक्तव्यत्वात्। नहि राजा गच्छतीत्युक्ते तदपेक्षितपरिवारस्य गमनं परृथग्वक्तव्यं भवति। एवं चाडस्मत्पक्षे सुखतः प्रधानविचारः प्रतिज्ञायतेऽर्थंतोऽन्यः। त्वत्पक्षे तु चैपरीत्येन। वतोऽ- तो यह भी उचित नहीं है, सम्बन्घसामान्यपक्षमें मी नम्में (ब्रह्मस्वरूपमें) कर्मत्व हो सकता है, कारण कि विशेषमें तात्पर्यबोधन किये बिना सामान्यसे व्यवहार ही नहीं हो सकता। उसमें वह विशेष कौन है : यह विचार करनेपर सकर्मक जिज्ञासा- करियामें कर्मकारकके अभ्यर्हित होनेसे कर्मत्वमें तात्पर्य माना जाता है। [ब्रह्मणः इस पदमें सम्बन्घसामान्यार्थक पष्ठी माननेमें मी सकर्मक जिज्ञासापद को कर्मकी अपेक्षा होनेके कारण सम्वन्धसामान्यार्थक पष्ठीमें भी व्यवहार प्राप्त करनेके लिए सर्वप्रथम कर्मकारकरूप सम्वन्ध ही उपस्थित होगा। अभियुक्तोंका वचन है 'निर्विशेषं न सामान्यम्' । ] इसलिए सबका ही संग्रह करनेके लिए सम्बन्धमें पष्ठी माननी चाहिए, कर्ममें नहीं। समाधान-यह दोष (अन्यका असंग्रहरूप) नहीं आता, कर्ममें पष्ठी माननेसे जिज्ञासाके कर्मभूत प्रधान ब्रह्मका निर्देश हो जानेसे उससे अपेक्षित प्रमाणादिका निर्देश भी अर्थात् हो जायगा, अतः पृथक कहनेकी आवश्यकता नहीं है। 'राजा जाता है' कहनेसे उसके अपेक्षित अझ्रक्षक आदि परिवारका गमन पृथक नहीं कहा जाता। इस प्रकार हमारे मतमें साक्षात शब्द द्वारा प्रधानभूत ब्रह्मविचारकी प्रतिज्ञा की जाती है। और प्रमाणादि अन्यकी प्रतिज्ञा अर्थात् हो जाती है। तुम्हारे पक्षमें तो इसके विपरीत प्रकारसे होती है 'अर्थात् शब्द द्वारा सम्बन्धसामान्यका बोध करानेसे प्रमाणादि विचारकी प्रतिज्ञा शब्दतः सिद्ध हुई और [निर्विशेषं न सामान्यम्' न्याय द्वारा और सकर्मक धातु द्वारा अपेक्षित होनेसे कर्मभूतब्रह्मविचारकी प्रतिज्ञा अर्थात् सिद्ध होती है' इससे हमारा पक्ष ही उत्तम है। 'प्रधानका ही शब्दतः परामर्श करना उचित है। ] और मी हेतु है (कर्ममें ही घष्ठी
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५८० विवरणप्रमेयसंग्रह [सून्र १, वर्णक ३
स्मत्पक्ष एव श्ेयान्। किं च साधिकारस्य विचारविधेः प्रतिपादके 'तद्विजिज्ञासस्त्र' इति श्रुतिवाक्ये व्रह्मणः कर्मकारकत्वनिर्देशात् सूत्रस्य च तदेकार्थतया सूत्रेऽपि ब्रह्मणः कर्मत्वमेव ग्राह्यम्, जिज्ञासापदेन ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासेत्यवयवार्थ उपादेयः । तथा चेच्छायाः फलविपयत्वान्निश्चलापरो- क्षावगतिफलपर्यन्तता सूत्रिता भवति। न च वाच्यं ज्रह्मण्यवगतेऽनवगते वा न ज्ञानेच्छा अ्सज्यत इति, परोक्षत्वेनाऽप्रतिष्ठितापरोक्षत्वेन वाऽवगते निश्चलापरोक्षावगतये तदिच्छोपपत्तेः । ननु ज्ञानं नाम प्रमाणफलं संवेदनमिति सुगतप्राभाकरवैशेषिकनैया- यिका:। संविजनकप्रमातृव्यापार इति वार्त्तिककारीयाः। आत्मचतन्य- मेवैति क्षपणकलौकायतिकाः। ज्ञायतेऽनेनेति करणव्युत्पन्या बुद्धिवृत्तिर्ज्ञानम्,
माननी चाहिए) कि अधिकारविशिष्ट विचारविधिके प्रतिपादक 'उसके विज्ञान- की इच्छा करनी चाहिए' इत्यादर्थक श्रुतिवाक्यमें ब्रह्मका कर्मकारकरूपसे निर्देश किया गया है, इसलिए 'व्रह्मजिज्ञासा' सूत्रका मी उक्त श्रुतिवाक्यके ही समान अर्थ होनेसे ब्रह्मको कर्मकारक ही मानना उचित है। और जिज्ञासापदसे 'जाननेकी इच्छा' ऐसा यौगिक अर्थ लेना चाहिए। इस प्रकार इच्छाके फलविषयिणी होनेसे स्थिर साक्षात्काररूप फलपर्यन्त इच्छाका सूत्रमें उपन्यास हो जाता है। ऐसी शक्का करना भी ठीक नहीं है कि ब्रह्मके ज्ञात होनेपर या न होनेपर भी ब्रह्मज्ञानकी इच्छाका प्रसङ्क नहीं आ सकता। (ज्ञात होने- पर इच्छा करना व्यर्थ होता है और अज्ञातकी इच्छा हो नहीं सकती) कारण कि 'ब्रह्म है' ऐसा शब्द द्वारा परोक्षज्ञान अथवा अस्थिर प्रत्यक्ष ज्ञान होनेपर भी स्थिर प्रत्यक्ष ज्ञान (साक्षात्कार) होनेके लिए व्र्ज्ञानकी उपपत्ति हो सकती है। शङ्का-सुगत-बौद्धोंके एकदेशी-, प्रभाकरमतानुयायी मीमांसक, वैशे- षिक-कणादमत माननेवाले -- तथा गौतमानुयायी नैयायिक प्रमाणके-इन्द्रियादिके, फलभूत संवेदनको-ज्ञान कहते हैं। और वार्तिककारका मत है कि संवित्- ज्ञान-जनक प्रमाताका व्यापार ज्ञान कहलाता है। आत्मचैतन्य ही ज्ञान है ऐसा क्षणिक-विज्ञानवादी वौद्ध और चार्वाक आदि कहते हैं। 'जिसके द्वारा जाना जाय' इस करणव्युत्पत्तिसे ज्ञानपद वुद्धिकी वृत्तिको कहता है तथा
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ज्ञानकी अन्तःकरणपरिमाणरूपताका उपपादन ] भापानुवादसहित ५८१ भावव्युत्पच्या तु संवेदनमेवेति सांख्यवेदान्तिनः । तत्र कीढशं ज्ञानमिष्य- त इति चेद्, उच्यतें- न तावत्सुगतादि्चतुष्टयस्य लोकायतस्य च पक्ष उपपन्नः, तैर्ज- न्यस्याऽि फलभूतसंवेदनस्य कर्तृव्यापारपूर्वकत्वानभ्युपगमात्; विमतं कर्त- व्यापारपूर्वकम्, फलत्वाद्, ग्रामग्रासिवदित्यनुमानविरोघात्। एतेन क्षपणक- पक्षोऽप्यपास्तः । यद्यपि तत्पक्षे संवेदनं स्वरूपेणाऽजन्यं तथापि विपयाव- भासित्वोपाधिना तजन्माभ्युपेयम्। अन्यथा सर्वदा सर्वविषयावभासप्रस- झात। ननु सर्वगतस्य निरवयवस्याऽऽत्मनो न परिस्पन्दपरिणामौ व्यापारौ युक्तो । सत्यम्, अत एव वार्तिककारीयं मतसुपेक्षणीयम्। अस्मन्मते ज्ञानाकारपरिणामो जाना जाना' इस भावव्युत्पत्तिसे तो संवेदन ही ज्ञान है, ऐसा सांख्य तथा वेदान्तका मत है, इनमें से कैसा ज्ञान इष है ? समाधान-उक्त विप्रतिपत्तियोंमें प्रथम सुगत आदि चारोंका तथा लौका- यतिकका-नास्तिकका-मत युक्तिस्ञत नहीं है, कारण कि उन वादियोंने उत्पन्न होनेवाले फलभूत (जन्य) ज्ञानको भी कर्तृव्यापार-पूर्वक नहीं माना है; इससे 'विमत याने जन्य कर्ताके व्वापारपूर्वक होता है, फलस्वरूप होनेसे, ग्रामकी प्राप्तिके तुल्य' इस अनुमानसे विरोध होगा। [जैसे किसी गांवमें पहुँचनेके पूर्व जानेवालेका व्यापार अवश्य रहता है, वैसे जन्य घट, पट आदिके ज्ञानमें मी प्रमाताका व्यापार ज्ञान होनेसे पूर्वतक अवश्य रहता है ]। इस अनुमान- विरोधसे विज्ञानवादीके मतका मी खण्डन हो गया। यद्यपि उसके मतमें ज्ञान स्वरूपतः जन्य नहीं है, तथापि विषयावभासकत्वरूप उपाघिसे तो उसका जन्म मानना ही होगा, [घट, पट आदि विषयका बोध कराना तो उसका जन्मरूप ही है, उस घट, पट आदि आकारवाले जन्य ज्ञानमें विरोध स्पष्ट ही है ]। यदि इसको भी जन्य न मानें, तो सदा ही सम्पूर्ण विषयोंके ज्ञानका मसक्क या जायगा। शक्का-सर्वत्र व्याप्त और अवयवशुन्य आत्मामें परिस्पन्द (क्रिया) और परिणाम होना युक्तिविरुद्ध है। समाधान-ठीक है, इसी कारण तो वार्तिककारका मत उपेक्ष- णीय है। हमारे मतमें तो अध्यास द्वारा. सिद्ध हुए अन्तःकरणके ७४
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५८२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वणंक ३
युज्यते। न च तादगात्मनः संवेदनाकारेणव परिणामोऽस्त्विति वाच्यम्, संवेदनस्य स्वरूपतो नित्यसिद्धत्वात्। न चैवं संवेदनस्याऽजन्यस्य फलत्वासंभवः, विपयोपाधिकस्य तस्य जन्माङ्गीकारात। यद्यप्यन्त :- करणपरिणामा: सर्वेऽपि साक्षिवेद्यत्वादपरोक्षास्तथापि विपयेण सहाऽपरोक्ष हेतुरन्तःकरणपरिणामोऽपरोक्षज्ञानमितरत्परोक्षमिति तद्विवेक: । तत्रैता दशमन्त:करणपरिणामरूपमपरोक्षज्ञानं सूत्रेऽस्मिन्निष्यमाणतया निदिष्टम्। नन्वेतत्प्रथमसूत्रं यदि शास्त्रेऽन्वर्भूतं तदानीमस्य स्वेनैचाSSरम्भसिद्धा- ात्माश्रयतापत्तिः। अन्येन चेदनवस्था। अथाऽनन्तर्भृतं तह्यस्याऽनारम्भ- प्रसङ्ग इति चेद्, नैप दोप :; स्वाध्यायाध्ययनादापातप्रतिपन्नः श्रवणविधि- रेव स्वापेक्षितानुवन्धत्रयविचाराय अ्थमसूत्रमारम्भयति। तथा च वक्ष्य-
सम्पर्कको पाकर आत्माका ज्ञानरूपसे परिणाम होना युक्ति-समत है। यदि कहो कि वैसे ही अन्तःकरणके सम्पर्कको प्राप्त हुए आत्माका संवेदनके रूपमें ही परिणाम मान लिया जाय, तो ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि संवेदन स्वरूपतः नित्यसिद्ध है। यदि कहो कि उत्पन्न न होनेवाला 'स्वतः सिद्ध' संवेदन फल नहीं हो सकता है, तो ऐसा ी नहीं कह सकते, कारण कि विपयरूप उपाधिसे युक्त संवेदनका जन्म माना गया है। यद्यपि सम्पूर्ण अन्तःकरणके परिणाम साक्षिवेद्य होनेसे प्रत्यक्ष ही है; तथापि विषयके साथ साक्षात्कारका कारणभूत अन्तःकरणपरिणाम ही प्रत्यक्ष कहलाता है और उससे मिन्न परोक्ष कहलाते हैं, इस प्रकार परोक्ष और अपरोक्षका विवेकग्रह होता है। इनमें उक्त प्रकारका (न्रद्मरूप विपयके साथ साक्षात्कारका जनक) अन्तःकरणपरिणामरूप अपरोक्ष ज्ञान (साक्षात्कारात्मक अनुभव) इस सूत्रमें अमीष्ट माना गया है। शक्का-यदि यह प्रथम सूत्र शास्त्रके अन्तर्गत माना जाय, तो उसका अपने ही द्वारा आरम्भ माननेमें आत्माश्रय दोपकी आपत्ति होती है। और यदि दूसरेसे आरम्भ माने, तो अनवस्था होती है। यदि शास्त्रके अन्तर्गत
आ सकता है। न माना जाय, तो इस सूत्रका आरम्भ करनेका प्रसङ्ग ही नहीं
समाधान-यह दोष नहीं आता, कारण कि स्वाध्यायके अध्ययनसे आ़पततः ज्ञात हुई श्रवणविधि ही अपने लिए अपेक्षित (विषय, सम्बन्ध,
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भापातुवादसेहित ५८३
प्रयोज्यत्वादस्य अपोरुपेय विधिप्रयुक्तत्वान्नाऽनवस्था । श्रवणविधिर्यदि स्वनिर्णयाय प्रथम- सूत्रमेवारम्भयेत् तर्द्युच्रसूत्रसन्दर्भस्याऽऽरम्भकं कि स्यादिति न शङ्कनीयम्, प्रथमसन्ननिर्णतिन तेनव विधिना तदारम्भोपपत्तेः। अत एवं तद्विधि- निर्णयस्य सूत्नस्य शास्त्रादित्वं समन्वयाद्यध्यायसङ्गतिश्राऽस्य सुलभा, श्रोतव्यादिवाक्यानां स्वारथे समन्ययद्वारेण विचार्यमाणवेदान्तवाक्या- नामपि त्रह्मणि समन्वयनिमिचत्वात्। अन्र च सूत्रेऽनुवादपरिहाराय कर्तव्यपदमध्याहृत्येव्यमाणज्ञानस्य फलभूतस्य स्वत एव सम्पाद्यतया- वगतस्य विघेयत्वायोगात्। तदुपायमन्तर्णीतविचारयुपलक्ष्य ब्रह्म- ज्ञानं प्रत्यदष्टस्याऽपि साधनत्वाद्विधिमुपयाद्येष्टसाधनताविधिपक्षं स्वीकृत्य मुमुक्षुणा झ्वानुभवाय विचारः कर्त्तव्य इति श्रौतो वाक्यार्थ:
प्रयोजन या फल रूप) तीन अनुबन्धोंके विचारके लिए प्रथम सूत्रका आरम्भ कराती है, इससे आगे वर्णित सम्पूर्ण शास्त्रकी प्रयोजक श्रवणविधिसे ही इसकी प्रयुक्ति होती है, अतः यह शासत्रके अन्तर्गत आ जाता है। और अपौरुपेय विधिसे प्रयुक्त होनेके कारण अनवस्था दोप मी नहीं आ सकता। श्रवण- विधान अपना निर्णय करानेके लिए यदि प्रथम सूत्रके प्रारम्भकी ही प्रयुक्ति करा सकें, तो उत्तर सूत्रके सन्दर्भका आरम्भ करानेवाला कौन होगा ? ऐसी शक्का भी नहीं करनी चाहिए, कारण कि प्रथम सुत्रसे निर्णीत श्रवणविधिसे ही उसका आरम्भ हो सकेगा। अतएव उस विधिके निर्णायक सूत्रमें वेदान्तशास्त्रकी आदिता और समन्वयादि अध्यायोंकी सम्ति भी सुलभ है; कारण कि यह सूत्र 'शरोतव्यः' इत्यादि वाक्योंके स्वार्थमें (विचारविधिमें) समन्वय-सम्तिके द्वारा विचारके विषय वेदान्त- वाक्योंका भी ब्रह्ममें समन्वय करनेमें निमिच होता है। और इस प्रथम सूत्रमें अनुवाद दोपका परिहार करनेके लिए कर्तव्यपदका अध्याहार कर फल- स्वरूप अपने-आप सम्पादनयोग्यत्वरूपसे अवगत इष्यमाण ज्ञान विधेय नहीं हो सकता, उस ज्ञानके उपायभूत अन्तर्भावित विचारको उपलक्ष्य फर म्राज्ञानके प्रति अदष्टके भी कारण होनेसे विधिका उपपादन कर इष- साधनतारूप विधिपक्षको स्वीकार करते हुए ुमुक्षु अधिकारीका ज्रह्ासाक्षातकारके लिए (वेदान्तवाक्योंका) विचार करना चाहिए, इस प्कार 'श्रोतव्यः'
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५८४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ३
कथनीयः। कथिते च तस्मिन् संवन्धविषयप्रयोजनान्यर्थादवगम्यन्त इति स्थितम् ॥
इति विवरणप्रमेयसंग्रहे अ्रथमसूत्रे तृतीयवर्णकं समाप्तम् ॥
इत्यादि श्रतिवाक्यका अर्थ करना चाहिए। इस अर्थका प्रतिपादन, करनेके अनन्तर सम्बन्ध, विषय और प्रयोजन अर्थात् जाने जाते'हैं, ऐसा सिद्धान्त है।
इति श्री पं० ललिताप्रसाद-डबराल-विरचित विवरणोपन्यास- भाषानुवादका तृतीय वर्णक समाप्त।
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प्रयोजनविपयसम्बन्धाक्षेप ] भापानुवादसहित ५८५
अथ चतुर्थं वर्णकम तृतीयवर्णके सत्रपदवाक्यार्थ ईरितः । अधिकार्यथशव्देन तत्र साक्षात्म्रसाधित: ।।१।। सुत्नितं त्रितयं त्वेतत्संबन्धो विपयः फलम्। चतुर्थे वर्णके सरव तदाक्षिप्य निरुप्यते ॥२॥
अस्मिस्तु वर्णके साक्षातदेवाक्षिप्य साध्यते ।।३।। ननु व्रह्मस्वरूपं यदि मानान्तरेण प्रतिपन्नं तदा नाडस्य शास्त्रस्य
चतुर्थ वर्णक तृतीय वर्णकमें सूत्रस्थ पदोंका तथा वाक्यका अर्थ कहा गया है। (पद तथा वाक्यार्थका अगले उत्तरार्द्व तथा दूसरे श्लोकके पूर्वार्द्धसे संकलन करते हं-) अथशव्द द्वारा अधिकारीकी साक्षात् सिद्धि की गई है ॥ १ ॥ विषय, फल तथा सम्बन्ध-ये तीन अनुबन्ध सम्पूर्ण सूत्रसे कहे गये हैं। [साधनचतुष्टयके आनन्तर्यको कहनेवाले अथशब्दका तात्पर्यार्थ प्रसिद्ध है कि साधनचतुष्टयसम्पन्न ही ्रह्मविचारका अधिकारी है, और जिज्ञासामें सन्- प्रकृत्यर्थ ज्ञान ही फल है, उसका प्रधान कर्मकारक व्रह्म विपय है, विषय और फलका सम्बन्ध 'श्रोतव्यः' इत्यादि विधिसे सिद्ध ही है-इस प्रकार 'अथातो न्रदाजिज्ञासा' इस सूत्रने तीनोंको अपनेमें गूँथ लिया।] चतुर्थवर्णककी आवश्यकता दिखलाते हैं-अब चतुर्थवर्णकमें ऊपर कहे अनुवन्धोंका आक्षेप द्वारा निरूपण किया जाता है॥ २ ॥ प्रथम वर्णकमें निरूपण कर आनेके कारण पुनरुक्ति दोपको हटाते हैं-प्रथम वर्णकमें तो अध्यासका आश्रयण करके इनकी सिद्धि की गई है और अब-इस चौंथ वर्णकरमें-अनुबन्धोंकी ही स्वतन्त्ररूपसे आक्षेप द्वारा सिद्धि की जाती है।। ३ ॥। शक्ा-यदि अन्य प्रत्यक्षादि म्रमाणोंसे त्रह्मस्वरूप अवगत है तो वह इस
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५८६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ४
विपयो भवितुमर्हृति, अनधिगतार्थत्वाभावाद्। नापि तदवगमोऽस्य प्रयोजनम्, एतच्छास्त्रात्म्रागेव सिद्धत्वात्। अथाऽप्रतिपन्नं तदाऽत्यन्त- मवुच्धारूढ़ेनाडर्थेन कथमिदं शास्त्रं संवध्येत। यद्यपि प्रत्यक्षादिकमत्यन्ता- दष्टचरेणाऽप्यर्थेन संवध्यमानं दष्ट तथापि विचारात्मकस्य शास्त्रस्य न तत्सं- भवति। सर्वत्राऽडपाततः प्रतिपन्नस्यैव विचारसंचन्धदर्शनादिति चेद्, एवं तर्हि व्रह्मणोऽप्यध्ययनादापातप्रतिपन्नस्याऽनिर्णीतस्य विपयस्य विचार- शास्त्रसंवन्धे सति तदवगमः फलमिति न कोऽपि दोप:। ननु विषयप्रयोजनसंवन्धा नाडन्र प्रतिपादनीया चक्ष्यमाणसमन्वयाध्या- यादिभिरेव तत्सिद्धेः। न च तदप्रतिपादने श्रोतृणामप्रवृत्तिः, शास्त्रप्रणे- तृगौरवादेव विपयादिसद्भावनिश्चयेन प्रवृत्तिसंभवात्। मैवम्, सामान्यतो
शास्त्रका विषय नहीं हो सकता है, क्योंकि वह अज्ञानविषय नहीं है, अज्ञात- अपूर्व-ही विषय हो सकता है। और उसका परिज्ञान भी इस शास्त्रका प्रयोजन नहीं हो सकता, क्योंकि उसका तो इस शास्त्रके पहले ही ज्ञान हो चुका है। यदि किसी भी प्रमाणसे सिद्ध नहीं है, तो कभी भी बुद्धिमें न आये हुए अर्थसे इस शास्त्रका सम्बन्ध कैसे होगा ? यद्यपि प्रत्यक्ष आदि ज्ञान पहले कभी भी बुद्धिमें न आये हुए अर्थसे मी सम्बन्ध करते देखे गये हैं, तथापि विचारस्वरूप शास्त्रमें तो ऐसा सम्भव नहीं हो सकता। अन्य स्थलोंमें सर्वत्र आपाततः (किसी न किसी प्रकार) ज्ञात (बुद्धिमें आरूढ़) पदार्थका ही विचार-निर्णय- से सम्बन्ध होते देखा गया है। समाधान-ऐसा मानो, तो अध्ययन द्वारा आपाततः (शान्दिक) ज्ञात अनिर्णीत ब्रह्मरूप विषयका भी विचारशास्त्रसे सम्बन्धका सम्भव होनेपर उस (ब्रह्मका) ज्ञान-साक्षात्कार-फल हो सकता है, इसमें कोई दोष नहीं आता। शङ्का-विषय, प्रयोजन और सम्वन्धका इस सूत्रमें प्रतिपादन नहीं करना चाहिए, कारण कि समन्वयादि अध्यायों द्वारा ही इनका प्रतिपादन सिद्ध हो जाता है। इन तीनोंका प्रतिपादन किये बिना श्रताओंकी प्रवृत्तिका अभाव मी नहीं कह सकते, कारण कि शास्त्रको बनानेवालेके गौरवसे (आदरसे) ही विषयादिका निश्चय कर प्रवृत्ति हो सकती है। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि सामान्यतः विषयादिके सद्भावका
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प्रयोजनविपयसंचन्धाक्षेप ] भापानुवादसहित ५८७
विषयादिसच्चनिश्चयेऽपि स्वाभिप्रेतप्रयोजनविशेषानवगमे प्रवृत्ययोगात्। ननु तहिं प्रवृत्यङ्गतया प्रयोजनविशेष एव वक्तव्यो न विषय- संवन्धौ। अथ विषयोऽपि प्रयोजनसाधनतया प्रवृत्यङ्गं तथापि प्रयो- जनावगमादेव सोऽनगम्यते, तत्संचन्धिन एव विपयत्वनियमात्। लोके द्वेधीभावाखव्यप्रयोजनसमवायिन एव काष्ठस्य च्छिदिक्रियाविपयत्वाद् । विपयविपयिप्रतीतौ तत्संबन्धोऽपि प्रतीयत एवेति न सोऽपि पृथग्वक्तव्य इति चेत, मैतम्; तत्र किं प्रयोजनविपयसंचन्धानां स्वरूपतोऽत्यन्तभेदा- भावात् पृथग्वक्तव्यत्वाभाव:, कि वाऽन्यतराभिधानेनेतरयोरर्थसिद्धत्वाद्, उत ग्रत्येक्मेव स्वातन्त्र्येण प्रवृत्तिसमर्थंतया संभूय पवृत्यङ्गतत्वाभाचात्। नाऽडद्य:, पुरुपार्थरूपं प्रयोजनम्, अनन्यथासिद्वो विपयः, एतत्प्रतिपाद्यत्वं
निश्चय होनेपर भी अपने अमीष्ट प्रयोजनविशेषकी प्रतीति न होनेसे प्रवृत्तिका होना संभव नहीं है। शङ्का-तव तो प्रवृत्तिका उपकारी होनेसे प्रयोजनविशेषका ही कथन उचित है, विपय और सम्बन्ध नहीं कहने चाहिए। यद्यपि विषय भी प्रयोजनका साधक होनेसे प्रवृत्तिमें उपकारक है, तथापि प्रयोजनके ज्ञात हो जानेसे ही विपयकी प्रतीति हो जाती है, कारण कि प्रयोजनसे सम्बद्ध ही विषय होता है, ऐसा नियम है। लोकमें द्वैधीभाव-दो टुकड़ा होना-रूप प्रयोजनका सम्बन्धी काष्ठ ही छेदन-कियाका विषय है। विषय और विषयी- प्रयोजन-की प्रतीति होनेसे उनका सम्बन्ध भी प्रतीत हो ही जाता है; इसलिए उसके भी पृथक अभिधानकी आवश्यकता नहीं है। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि हम विकल्प करेंगे कि क्या विपय, प्रयोजन और सम्बन्ध-इनमें स्वरूपतः अत्यन्त भेदका अभाव है, अतः इनको पृथक नहीं कहना चाहिए : या इनमें एकका भी अभिधान हो जानेसे दूसरेकी अर्थात् सिद्धि हो जाती है, अथवा प्रत्येक ही स्वतन्त्ररूपसे [दूसरेकी अपेक्षा न रखकर ] प्रवृत्त करानेमें. समर्थ हैं, अतः मिलकर सब प्रवृत्तिके अन्ञ नहीं हैं, इसलिए [ पृथक्-पृथक सबका कहना आवश्यक नहीं हैं ] प्रथम, विकल्प नहीं बन सकता, कारण कि पुरुषार्थरूप तो प्रयोजन- फल-माना गया है, दूसरेसे .सिद्ध (निर्णीत ) न होनेवाला विषय
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५८८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत १, वर्णक ४
संवन्ध: इत्येवमेपां भिन्नत्वात्। तत्र विषयत्वमन्ययोगव्यावृत्तिरूपमयोग- व्यावृत्तिरूपश्च संबन्ध इति तयोर्ववेक:। न द्वितीय:, सत्यप्येकस्मिन्नित- राभावदर्शनेनारऽर्थसिध्धयोगात्। दृश्यते हि काकदन्तानां ग्रन्थान्तरेणाS- सिद्धतया विषयत्वे अतिपाद्यितुं शक्यतया संबन्धे च सत्यपि तद्विचार- णायां प्रयोजनाभावः। तथा परिपक्ककदलीफलत्वगुत्पाटनादिपु कुठार- दात्रादिना साधयितुं शक्यतया संवन्धे पुरुपैरपेक्ष्यतया प्रयोजने सत्यपि न कुठारादिव्यापार विपयत्वमस्ति, अङ्ुल्यादिभिरेव तदुत्पाटनसिद्धे: । एवं मेर्वादेरन्यैरनानीततया विषयभूतस्य सम्रयोजनस्याऽप्यस्मदादिकर्तका- नयनव्यापारेण न संबन्धं पश्यामा, अयोग्यत्वात्। तदेवं परस्परव्यभि-
है तथा इससे प्रतिपादित होनेवाला सम्बन्ध कहलाता है; इस प्रकार इन तीनोंमें परस्पर भेद विद्यमान है। इनमें विषय तो अन्ययोगकी व्यावृत्तिरूप है अर्थात इस शास्त्रके विषयसे दूसरेका सम्बन्ध नहीं है और सम्बन्ध अयोगकी व्यावत्तिरूप है अर्थात् फलसे विषयका सम्वन्ध अवश्य है, उसका अभाव नहीं, ऐसा सम्बन्ध और विषयका विवेक-मेद ग्रह है। दूसरा कर्प नहीं माना जा सकता, कारण कि एकके रहते हुए भी दूसरेका अभाव देखा जाता है, इसलिए दूसरेकी अर्थ द्वारा सिद्धि नहीं हो सकती। प्रयोजनाभावमें दृष्टान्त देते हैं-कौएके दाँत किसी दूसरे अ्न्थसे सिद्ध नहीं हैं, इसलिए (अनन्यथासिद्धरूप) विषयत्वका प्रतिपादन किया जा सकता, अतः सम्बन्ध होना भी सम्मव है, परन्तु उस काकदन्तरूप विषयका विचार करनेसे प्रयोजन कुछ नहीं निकलता। [ विषयाभावका द्ष्टान्त दिखलाते हैं I-एवं पकी हुई केलेकी फलियोंका छिलका उतारनेमें कुठार, हँसुआ आदि साधनोंका सम्बन्ध हो सकता है और उससे पुरुषोंका प्रयोजन भी निकलता फिर भी वे कुठार आदिके व्यापारके विषय नहीं होते; कारण कि अङगुली आदिसे ही छिलकेका उच्चटन हो सकता है। [सम्बन्घाभावका दष्टान्त दिखलाते हैं-] वैसे ही दूसरोंके द्वारा लाने लायक न होनेसे विषयभूत और (सुवर्णमय होनेसे) प्रयोजनविशिष्ट भी सुमेरु पर्वतके हमारे ऐसे मनुष्यों द्वारा किये गये व्यापारसे सग्वन्ध होते नहीं देखते हैं, कारण कि उसमें योग्यता नहीं है। इस प्रकार परस्पर व्यमिचारवाले इन तीनोंमें (एक दूसरेके
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मक्षमें औपचारिक विचारविपयत्व। भापानुवादसहित ५८९
चारिषु नाऽस्त्यर्थसिद्धिशङ्गाऽपि। न तृतीयः, उक्तत्रयमेलनमन्तरेण प्रतृ- कयभावात्। नहि काकदन्तविचारे कदलीफलादात्पाटनाय कुठारादी मेर्वाद्या- नयने वा पुरुपत्रवृत्तिरुपलभ्यते । स्यादेतत, ब्रह्मस्वरूपं वेदान्तानामेव विपयो न विचारशास्त्रस्य, प्रमाणप्रमेयादिसंभावनाहेतुभृतन्यायानां तद्विपयत्वाद्। अत्र सिद्धान्ताभिज्मन्यः परिजहार-विमतं विचारशास्त्रं वेदान्तै- रभिन्नार्थम्, तदितिकर्तव्यत्वाद्, यथा दर्शपूर्णमासाभ्यामेकविपयं तदि- तिकर्तव्यं प्रयाजादि यथा वा वीजेन सहैककार्यजनकं तत्सहकारिभूतं जल- भूम्यादि । यद्यपि विचारशास्रेण न्याया एव साक्षात्प्रतिपाद्यमाना उपलभ्यन्ते तथापि ब्रह्मण: परम्परया विपयत्वं भविष्यति; यथा छेत्तुर्हस्तव्यापार: साक्षात् कुठारमेव विपयीकुर्वाणोऽपि परम्परया काष्ठमपि विपयीकरोति तद्वदिति।
रहनेसे एक दूसरेकी) अर्थात् सिद्धि होनेकी शङ्का भी नहीं हो सकती, तीसरा विकल्प मी नहीं हो सकता। तीनोंके मेलके बिना प्रवृत्ति नहीं हो सकती; सर्थात तीनों मिलकर प्रवृत्तिके अङ्ग हैं, अतएव काकदन्तका विचार करनेमें सथवा केलेकी फली आदिके छीलनेके लिए कुठारादिमें या सुमेरुपर्चतके आनयनमें पुरुपकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती है। शक्ा-अस्तु, यह (उक्त कथन) सम्भव भी कैसे होगा; कारण कि ब्रह्म- स्वरूप तो वेदान्तवाक्योंका ही विषय हो सकता है; विचारशास्त्रका नहीं, क्योंकि विचारशासत्रके विपय तो प्रमाण, मेय आदिकी सम्भाचनाके कारणभूत न्याय ही हैं। समाधान-इस आशक्कामें अपनेको सिद्धान्तज्ञानी समझनेवालेने समाधान किया है कि विमत विचारशास्र, वेदान्तवाक्योंके साथ अभिन्न अर्थके प्रतिपादक हैं, कारण कि वही (वेदान्त ही) इतिकर्तव्यता इसमें मी है, दर्शपूर्ण- मासयागोंके साथ समानविषयवाले उसी इतिकर्तव्यतासे विशिष्ट प्रयाजादि यागके समान या वीजके साथ एक कार्यके जनक उस बीजके सहकारी पृथ्वी, जल आदिके समान। यद्यपि विचारशासत्रसे न्यायोंका ही साक्षात् प्रतिपादन किया हुआा देखा जाता है तथापि ब्रह्म परम्परासे विपय हो जायगा; जैसे छेदनकर्ताका हृस्तव्यापार साक्षात् कुठारको ही विपय करता हुआ भी परम्परासे. काठको ४५
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५९० विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र १, वर्णक ४
नाऽयं पण्डितंमन्यस्य परिहारः समीचीन:, विचारस्य वेदान्तेति- कर्तव्यत्वासिद्धेः । यथा प्रयाजादेरितिकर्त्तव्यतायामागमो मानं यथा वा जलभूम्यादेः सहकारित्वमन्वयव्यतिरेकसिद्धं न तथा विचारस्येतिकर्तव्य- त्वे किश्चिन्मानस्ति। न चेतिकर्तव्यत्वशून्यस्य वेदान्तश्दस्य व्रह्मावगमं प्रति कथं करणतेति शङ्कनीयम्, शब्दोपलव्धेः शक्तिज्ञानसंस्कारस्य च तदितिकर्तव्यत्वात्। विचारोऽपि दोपनिराकरणेन ब्रह्मप्रमितिहेतुतया शब्दं प्रति इतिकर्चव्यतां भजत्विति चेद, न; वैदिकशब्दे दोपाभावाद्। न चैवं विचारवैयर्थ्यम्, पुरुपदोषनिरासहेतुत्वात्। पुरुपदोपश्च द्विविध :- शब्दशक्तितात्पर्यान्यथावधारणं अत्यक्षादिविरोधवुद्धिश्र। तत्र लौकिक- प्रयोगेषु ग्रामेऽस्मिन्नयमेक एवाऽद्वितीयः प्रशुरित्यादिपु सजातीयमात्र-
सकता है। भी विषय करता है; वैसे ही प्रकृतमें भी विचारशास्त्रका ब्रह्म विषय हो
परन्तु अपनेको स्वयं पण्डितमाननेवालेका इस प्रकार समाधान उचित नहीं है; क्योंकि विचारशास्त्रमें वेदान्तरूप इतिकर्तव्यताकी सिद्धि नहीं है। जैसे प्रयाजादिको इतिकर्तव्यता माननेमें शास्त्र प्रमाण है; अथवा जैसे जल और भूमि आदिमें अन्ययव्यतिरेकसे सिद्ध 'बीजकी' सहकारिता है वैसे विचारकी इतिकर्तव्यतामें कोई प्रमाण नहीं है। इतिकर्तव्यतासे शून्य (इतिकर्तव्य न माना जानेवाला) वेदान्तवाक्य ब्रह्मज्ञानके प्रति करण कैसे हो सकंता है? यह शक्का भी नहीं करनी चाहिए, कारण कि शब्दकी उपलब्धि (शब्दका श्रावण प्रत्यक्ष) और शकतिज्ञानजनित संस्कारमें ही उसकी इतिकर्तव्यता है। शङ्का-विचार भी दोषोंके दूर कर देनेसे ब्रह्मनिर्णयका कारण होता है इसलिए उसको शब्दके प्रति इतिकर्तव्यता प्राप्त हो जायगी। समाधान-नहीं, वैदिक शब्दोंमें दोष नहीं होता है। [जिससे दोष- निराकरणरूप द्वार पा सके ]। और विचार व्यर्थ भी नहीं हो सकता, कारण कि पुरुषदोषके निराकरणमें विचार हेतु है। पुरुषका दोष दो प्रकारका होता है-एक तो शब्दशक्तितात्पर्यका विपरीत निश्चय और दूसरा अत्यक्ष आदिसे विरोधज्ञान। इनमें से 'इस गांवमें यह एक ही अद्वितीय. स्वामी है' इत्यादि लौकिक प्रयोगोंमें सजातीयमात्रके निवारणमें शक्तिका तात्पर्य
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शब्दंमें ही अर्थप्रमितिहेतुता।] भापांनुवादसहित ५९१
निवारणे शक्तितात्पर्यमवलोक्य वैदिकप्रयोगेऽपि तथैवाऽवधारयति। तदेतदन्यथाऽवधारणं समन्वयविचारेण निरसिष्यते विरोधवुद्धिश्ाऽविरोध- विचारेण। एवं च प्रतिबन्धनिवारण एवोपक्षीणस्य विचारस्य कथ ब्रह्म- प्रमितिहेतुता १ तस्माद न विचारशास्त्रविपयो ब्रह्मेति। अत्रोच्यते शब्दादेवोत्पन्नमपि ब्रह्मज्ञानं प्रतिवन्धनिवृत्तौ सत्या- मेव प्रतितिष्ठति, न तु ततः पूर्वम्। तथा च प्रतिबन्धनिरासिनो विचारस्य न्रमम निर्णयहेतुत्वाद् न्रह्मविषयत्वसुपपद्यते।
प्यर्थप्रमितेरेव हेतुर्न प्रतिवन्धनिरासस्येति। तदसत्, किं तात्पर्यमवि- ज्ञातमेत्रारऽर्थप्रमितिहेतुरुत विज्ञातम्१ नाऽडद्यः, सर्वत्र लौकिकवाक्येपु तात्प- रयविगमफलकविचारवैयर्थ्यापातात्। अनवगतेऽपि तात्पर्येऽन्यथाग्रति-
देखफर 'एकमेवाऽद्वितीयं त्र' इत्यादि वैदिक प्रयोगमें मी वैसे ही (सजातीय द्वितीयके निवारणमें ही) शक्तितात्पर्यका निश्चय करता है। इस प्रकारका विपरीत निश्चयरूप प्रथम दोप समन्वयविचारसे दूर किया जायगा और विरोधबुद्धिरूप 'दूसरा दोप' विरोधाभावके विचारसे दूर किया जायगा। इस परिस्थितिमें प्रतिबन्धके दूर करनेमें क्षीणशक्ति हुआ विचार त्रह्निश्चयका कारण कैसे दो सकता है : इसलिए विचारशासत्रका विषय न्रम्म नहीं हो सकता। इस विपयमें कहा जाता है-शव्दसे उत्पन्न हुआ न्रह्ज्ञान भी प्रतिबन्ध- की निवृत्ति होनेपर ही प्रतिष्ठित (स्थिर) होता है, इससे पहिले प्रतिष्ठित नहीं होता। इस दशामें व्रवाका निर्णायक होनेसे प्रतिबन्धके निवारणमें समर्थ विचारशास्त्रका ब्रहम विषय हो सकता है। इसपर कोई कहते हैं कि विचार करनेसे प्रतीत होनेवाला तात्पर्य अर्थनिर्णयका कारण है, इसलिए विचार भी अर्थनिश्यका ही कारण होता है; प्रतिबन्धके दूर करनेका कारण नहीं होता है। उनका यह कथन उचित नहीं है, कारण कि क्या अज्ञात ही तात्पर्य अर्थनिश्चयका कारण है? अथवा ज्ञात : प्रथम कल्पयुक्त नहीं है, क्योंकि लौकिक वाक्योंमें तात्पर्यके बोधके लिए किया गया विचार सर्वत्र व्यर्थ हो जायगा। कारण कि तात्पर्यके अज्ञात रहनेपर भी प्रथम करपके अनुसार विपरीत निश्चयका
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६९२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ४
पच्यभावात्। द्वितीयेऽपि न तावत् तात्पर्य पदार्थविपयम्, तस्य वाक्या- र्थप्रतीतावनुपयोगात्। वाक्यार्थविषयत्वे चाऽन्योन्याश्रयत्वम्-विषयभूत- वाक्यार्थस्य विशेषणस्याऽवगतौ 'तद्विशिष्टतात्पर्यावगतिस्तात्पर्यावगतौ च वाक्यार्थप्रमितिरिति। अथ मन्यसे-पदेभ्यः पदार्थानवगम्याऽनन्तरं नूनमेपां संसर्गोडस्ति, सह प्रयुज्यमानत्वात, इत्युत्प्रेक्षया वाक्यार्थावगतौ नोक्तदोप इति। तद- युक्तम्, तत्र न तावदुत्प्रेक्षा स्मृतिः; अनवगतार्थगन्तृत्वात्। नाऽपि संशयः, कोटिद्वयाभावात्। नाऽपि विपर्ययः, वाधाभावात्। परिशेषा- च्छन्दजन्यो वाक्यार्थवोधः प्रमाणमित्येवाऽभ्युपेयम्। एवं च शव्दस्य तात्पर्यावगममनपेक्ष्य प्रमापकत्वं पूर्वोक्तपरस्पराश्रयत्वं वा दुर्वारम्। ननु गवादिपदानां गोत्वादिसामान्ये न्युत्पच्तिवद्वाक्यानामपि वाक्यार्थत्वसामान्ये तात्पर्यम्, ततश्र सामान्यस्य पूर्वमेव ज्ञाततया तात्पर्य- अभाव हो जायगा। दूसरे कर्पमें मी प्रथम तो तात्पर्यका विषय पदार्थ है नहीं, क्योंकि उसका वाक्यार्थप्रतीतिमें उपयोग नहीं होता है। वाक्यार्थको विषय माननेमें अन्योन्याश्रय आग है। [ अन्योन्याश्रय दिखलाते हैं-1 विषयभूत वाक्यार्थस्वरूप विशेषणकी प्रतीतिके अनन्तर वाक्यार्थविशिष्ट तात्पर्यकी प्रतीति होती है और तात्पर्यकी प्रतीतिके अनन्तर वाक्यार्थका निश्चय होता है। यदि मानो कि पदोंके द्वारा पदार्थोंका ज्ञान करनेके अनन्तर उन पदार्थोंका अवश्य कोई सम्बन्ध है, क्योंकि इनका साथमें प्रयोग किया गया है, इस प्रकार उत्प्रेक्षासे वाक्यार्थकी प्रतीति हो जानेके कारण उक्त (अन्योन्याश्रय) दोष नहीं आता, तो यह भी कथन युक्तिसङ्गत नहीं है, कारण कि उत्पेक्षाको स्मृति तो मान नहीं सकते, क्योंकि वह (उत्प्रेक्षा) अप्रतीत अर्थकी प्रतीति कराती है। संशय मी नहीं है, क्योंकि दो विरुद्ध कोटि उसमें नहीं हैं। विपर्यय भी नहीं कह सकते, कारण कि बाध नहीं है। इस अवस्थामें परिशेषसे (अन्तमें) 'शब्दजन्य वाक्यार्थ बोध प्रमाण है' ऐसा ही मानना होगा। ऐसा माननेसे तात्पर्य- प्रतीतिकी अपेक्षाके बिना ही शब्दमें प्रमाजनकत्व या पूर्वोक्त अन्योन्यश्रयत्व दोष नहीं हटाया जा सकता। शक्का-जैसे गो आदि पदोंकी गोत्वसामान्यमें व्युत्पत्ति-शक्ति-मानी जाती है, वैसे ही वाक्योंका भी वाक्यार्थत्वसामान्यमें तात्पर्य माना जाता है।
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शब्दमें ही अर्थप्रमितिहेतुता ] भाषानुवादसहित ५९३ विशेषणत्वसंभवात् तद्विशिष्टं तात्पर्यमवगम्यते। तथा च न तात्पर्येण वाक्यार्थ- विशेषप्रमितौ पूर्वोक्तदोप इति चेद्, न; वाक्यार्थविशेपतात्पर्यांभावप्रसङ्गात्। अथ गोत्ववाचिनो गोशव्दस्य गोव्यक्तो पर्यवसानवत् सामान्यगोचरमेव तात्पर्ये विशेपे पर्यवस्येद्, एवमपि न तात्पर्यमर्थप्रमितिहेतुः। विमतो वाक्यार्थावगम: शब्दशक्तिमात्रनिवन्धन:, शाव्दज्ञानत्वात्, पदार्थज्ञानवत्। यदि च तात्पर्य वाक्यार्थप्रमितिहेतुः स्यात् तदा वांक्यार्थोडशाब्दः स्यात्, तात्पर्यमात्रात् तत्प्रमितिसिद्धेः। शव्दान्वयव्यतिरेकौ च शब्दस्य पदार्थप्रदर्शनमुखेन तात्पर्योपाध्युपयोगितयाऽप्युपपद्येयाताम्। तस्मात्
अतः पहले ही ज्ञात होनेसे सामान्य तात्पर्यका विशेषण होता है, और उससे विशिष्ट तांत्पर्यकी प्रतीति हो सकती है। इस प्रक्रियासे तात्पर्य द्वारा वाक्यार्थ- विशेपका निश्रय माननेमें पूर्वोक्त दोप नहीं आता। समाधान-उक्त कथन नहीं चन सकता, कारण कि वाक्यार्थविशेषमें तात्पर्यका अभाव हो जायगा। [ऐसा इष्ट नहीं कह सकते, क्योंकि वृद्धव्यवहारमें अर्थ- विशेषके बोधके तात्पर्यसे ही शब्द और वाक्यका प्रयोग किया जाता है। ] यदि कहो कि जैसे गोत्वसामान्यका वाची गोशब्द गोव्यक्तिविशेषका बोध करानेमें पर्यवसित होता है, वैसे ही सामान्यविषयक तात्पर्य भी विशेष अर्थमें पर्यवसित हो जायगा; तो यह कहना मी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर भी तात्पर्य अर्थ- निश्चयका कारण नहीं हो सकता। [कारण कि अनुमानसे पदार्थसंसर्गरूप वाक्यार्थनिश्चय मी शक्तिके द्वारा ही हो सकता है, इसके लिए तात्पर्यकी अपेक्षा नहीं है। उक्तार्थ साधक अनुमान दिखलाते हैं-] विमत याने विवादास्पद [वाक्यार्थ बोधको फोई शक्त्यधीन और फोई तात्पर्याधीन मानते हैं, इससे वह विमत हुआ ] वाक्यार्थकी प्रतीति शव्दशक्तिमात्रके अधीन है, शब्द (शब्दजनित) ज्ञान होनेसे, पदार्थज्ञानके सदश। [इस अनुमानके विपरीत् ] यदि तात्पर्य वाक्यार्थज्ञानका कारण माना जायगा, तो वाक्यका अर्थ शाब्द (शब्दजनित) ज्ञान नहीं कहा जायगा; कारण कि तात्पर्यमात्रसे वाक्यार्थके निश्चयकी सिद्धि हो जायगी। [शब्दबोध वही कहलाता है, जो शब्दनिष्ठशक्तिके द्वारा उपस्थित होता है] शब्दके अन्वय-व्यतिरेक तो पदार्थका वोध करा कर शब्दकी तात्पर्योपाधिमें-विशेषणभूत पदार्थमें-उपयोगिता बतलाकर मी उपपन्न
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५९४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णेक ४ शाब्दत्वसिद्धये शब्द एवार्ऽर्थप्रमितिहेतु:, तात्पर्यवोधस्तु प्रतिवन्धनिरासी त्येवाऽम्युपेयम्। एवं च तात्पर्यहेतोर्विचारस्याऽपि प्रतिवन्धनिरासित्वादुप- चारेणैव ब्रह्मविषयत्वम्। ननूपचारेणाऽपि न ब्रह्मणो विचारविपयत्वं संभवति, आपातप्रसिद्धेरपि दुस्संपादत्वाद्। न तावल्लोके प्रसिद्धम्, मानान्तरागोचरत्वाद्। नाऽपि वेदे तत्प्रसिद्धिः, तत्र ब्रह्मशव्दस्याऽनवधृतार्थत्वात। 'लोकावधृतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकर' इति न्यायेनाऽव्युत्पनशव्दस्य वेदेऽप्यचोधकत्वात्।
हो सकते हैं। [शब्दके अन्वय-व्यतिरेकसे शाब्द कहलानेकी भी उपपत्ति नहीं हो सकती, कारण कि केवल पदार्थकी उपस्थिति करा देनेसे वे चरितार्थ हो जायँगे ]। इसलिए [ पदार्थसंसर्गरूप वाक्यार्थमें ] शान्दत्व (शान्दवोधत्व) की सिद्धिके लिए शब्द ही अर्थनिश्चयका कारण है और तात्पर्यज्ञान तो प्रतिबन्ध दूर करनेमें ही कारण है, ऐसा ही मानना उचित है। इस प्रकार तात्पर्यका कारणभूत विचार भी प्रतिबन्धके निराकरणमें ही हेतु है, अतः उपचार द्वारा ही उसका ब्रह्म विषय होता है। [अर्थात् तात्पर्यप्रतीतिके विना भी शक्ति या लक्षणा द्वारा शब्दसे ही अर्थनिश्चय हो जाता है, परन्तु उक्त विपरीत प्रतीति या विरोधबुद्धिरूप पुरुषदोषके द्वारा उत्पन्न हुए संशयादि प्रतिबन्धकोंकी निवृत्तिके लिए तात्पर्यज्ञान अपेक्षित होता है और तात्पर्य- निर्णयके लिए विचारेतिकर्तव्यता अपेक्षित है और यह सर्वविध व्रह्मनिश्चय शब्द द्वारा हुए ब्रह्मनिश्चयकी प्रतिष्ठाके ही लिए है-इसलिए करणमूत शब्दका तथा विचारादि इतिकर्तव्यताका भी लक्षणाके द्वारा एक ही ब्रह्म विषय हुआ।] शङ्का-उपचार-लक्षणा-से मी ब्रम्म विचारका विषय नहीं हो सकता, कारण कि ब्रह्मकी आपातप्रसिद्धि-सामान्यज्ञान-का भी सम्पादन नहीं बन सकता। क्योंकि लोकमें तो ब्रह्म प्रसिद्ध है ही नहीं, क्योंकि वह शब्द प्रमाणके अतिरिक्त प्रत्यक्ष आदि किसी प्रमाणका विषय नहीं है। और वेद में भी ब्रह्मकी प्रसिद्धि नहीं है, क्योंकि वेदमें आये हुए ब्रह्मशब्दके अर्थका निर्णय ही नहीं हो सका है। कारण कि 'लोकमें प्रतीतार्थक शब्द ही वेदमें भी अर्थबोध करा सकता है' इस न्यायसे अव्युत्पन्न शब्द (जिसका व्युत्पत्ति-ग्रह नहीं हुआ है, ऐसा शब्द) वेदमें भी बोधक नहीं होता।
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शब्दमें ही अर्थप्रमिति हेतुता] भापानुवादसहित ५९५
मैवस्, वैदिकप्रयोगान्यथानुपपच्या व्रह्माशव्दार्थस्य कस्यचित्स्वर्गादि- चत् कल्प्यत्वात्। प्रसिद्धू पदसमभिव्याहारस्य स्वर्गत्रह्मवाक्ययोः समानत्वात्। एवमपि ब्रह्मशब्दस्याऽर्थमात्रं सिध्यति न त्वर्थविशेप इति चेद्, न; प्रसिद्धपद्समभिव्याहारेण तदन्वययोग्यस्यैवार्ऽर्थविशेपस्य कल्प्यत्वात्। न च तस्मिन्विवक्षितेऽर्थविशेपे शब्दस्य वृत्यसंभवः । रूढ्या तत्रावर्त्त- मानमपि शव्दमवयवार्थव्युत्पादनेन वर्तयितुं शक्यत्वात्। एतदर्थमेच समाधान-ऐसा नहीं, वैदिक प्रयोगोंकी अन्यथा अनुपपचिसे ब्रह्माशब्दके किसी-न-किसी अर्थकी स्वर्गादिके तुल्य कल्पना करनी चाहिए [ जैसे लोकमें स्वर्गकी प्रसिद्धि न होनेपर मी वैदिक प्रयोगके वलसे एक पदार्थविशेपरूप स्वर्गकी कल्पना की जाती है, वैसे ही व्रद्मशन्दार्थकी भी करपना हो जायगी ]। प्रसिद्ध पदका समभिव्याहार स्वर्ग तथा व्रक्ष दोनों वाक्योंमें समान है। शक्का-इस निर्णयसे भी तो केवल न्रम्मशन्दका सामान्य ही अर्थ सिद्ध हुआ [अर्थात् व्रस्शब्द अर्थका वाचक है, इतना ही सिद्ध होता है] अर्थविशेपकी तो सिद्धि नहीं हो सकती। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि प्रसिद्ध पदके समभिव्याहारसे उसके साथ अन्वययोग्य अर्थविशेषकी ही कर्पना करनी चाहिये। [ 'तद् ब्रह्म, तद् विजिज्ञासस्त्' इत्यादि पदोंमें विचारविधायक 'विजिज्ञासस्व' आदि पदोंके साथ अन्यसिद्धिके लिए लोकप्रसिद्ध जात्यादिसे भिन्न पदार्थविशेपका ही वाचक न्रद्मपद है, ऐंसा मानना होगा। इन वेदान्तवाक्योंके विचारके लिए प्रवृत्त विचार- शास्त्रमें पठित मी न्रदापद उसी अर्थका वाचक लिया जायगा, इसलिए बलपदार्थके अप्रसिद्ध होनेका दोप नहीं आता। ] और उस कल्पित अर्थ- विशेषकी विवक्षा माननेमें शव्दकी वृत्तिका असम्भव दोप भी नहीं आता। रूढिसे उस अर्थमें न्राशन्दकी वृत्ति (शक्त्यादि) न होनेपर मी अवयव-( प्रकृति-प्रत्यय) के अर्थको लेकर अर्थविशेपमें न्रह्मशब्दकी वृत्ति हो सकती है, इसीलिए (प्रकृति-प्रत्ययके अर्थका व्युत्पादन कर शब्दकी वृत्ति दिखानेके निमित ही) सर्वत्र निगम, निरुक, तथा (१) प्रकृतिप्रत्यय निप्प शब्दमें प्रकृतिरूप एक देशके अर्थको लेकर विशिष्ट शब्दकी अर्थोन्तरमे वृत्ति होना निगम कहलाता है; जैसे देहशब्द 'दिह् उपचये' धातुसे बना हुआ उपचिधित वस्तुभृत शारीरादिका वाचक होता है। (२) निरुक नाम है-सम्पूर्ण अवयवके अर्थोका आश्रय. करके अर्थान्तरका अभिधान
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५९६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, चर्णक ४
सर्वत्र निगमनिरुक्तव्याकरणानां पवृत्तत्वात्। तथा चाऽत्र 'सत्यं ज्ञानमन्तं ब्रह्म' 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इति श्रुतिसूत्रप्रयोगान्यथानुपपच्या वाधरहितं चिद्रूपमन्तशन्यं पुरुपार्थपर्यवसायितया जिज्ञास्यं चस्तु ब्रह्मशब्दार्थ इति कल्प्यते। ब्रह्मशब्दश्च वृह वृहि वृद्धावित्यस्माद्धातोनिष्पन्नो महत्वमाचषटे। तच्च महत्त्वं संकोचकप्रकरणोपपदयोरभावान्निरतिशयमेव संपद्ते। ततो देशतः कालतो वस्तुतश्राऽन्तशून्यमित्युक्तं भवति। तथा वाध्यत्वजडत्वा- पुरुषार्थत्वादिदोपराहित्यमपि महत्वमेव। लोके दोपरहितेपु गुणवत्सु पुरुपेषु महापुरुपा इति व्यवहारदर्शनात। ततो व्युत्पत्तिवशाद् यथोक्तेडर्ये ब्रह्मशब्दो वर्त्तते। जातिजीवकमलासनादिपु यथोक्तार्थाभावेऽपि रूढि- वशाद् ब्रह्मशन्दवृत्तिरुपपद्यते।
व्याकरण शास्त्रोंकी प्रवृत्ति है। इस सिद्धान्तके अनुसार प्रकृतमें सत्य ज्ञान और अविनाशी रूप न्रह्म है' 'इसलिए साधन चतुष्टयके अन- नतर ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादि अर्थवाले श्रुति तथा सूत्र प्रयोगोंकी अन्यथा अनुपपतिसे वाधरहित, चिद्रूप, विनाश रहित, परम पुरुषार्थ होनेसे जिज्ञासायोग्य वस्तु न्रद्म- शब्दका अर्थ है ऐसी कल्पना की जाती है। और न्रम्म-श्द वृद्धूयर्थक वृह या वृहि धातुसे बना हुआ है, अतः महत्व्रका अभिधान करता है। और वह महत्त्व सक्कोचके कारणमूत प्रकरण तथा समभित्याहृत उपपदके न होनेसे निरतिशयरूप ही सम्पन्न होता है। इससे देश, काल तथा वस्तुसे मी परिच्छेद- शून्य वह वस्तु है ऐसा निश्चित होता है। एवं वाध्यत्व, जडत्व और अपुरुषार्थत्व इत्यादि दोषोंसे मुक्त रहना मी महत्त्व ही है। लोकमें दोप रहित और गुणी पुरुषोंके लिए महापुरुष ऐसा व्यवहार देखा जाता है। इस प्रकार व्युत्पत्तिके वलसे उक्त अर्थमें ब्रह्मशन्दकी वृत्ति है। और जाति, जीव, कमलासन आदि अर्थोमें व्युत्पत्तिलभ्य उक्त महत्त्वरूप अर्थके अभावमें भी रूढिके कारण ब्रह्मशब्दकी वृत्ति उपपन्न होती है। [अर्थात् रूढिके कारण ब्रह्मशब्द जात्यादिका वाचक है और योगवलसे महत्त्वविशिष्ट न्रम्मका वाचक है। करना, जैसे-सोमशब्द। इसमें सह-उमा दो अवयव हैं, जिनका अर्थ है-पार्वती और सहित। इंनके द्वारा उक्त पद महादेवजीका वाचंक हुआ। - (३) प्रत्ययकी विधानसामथ्यसे अर्थका. निश्वय कराना व्याकरणका कार्य है।
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आत्मरुपसे महाकी प्रसिद्धि ] भाषानुवादसहित ५९७
ननु वृंहतिधात्वर्थानुगमनेन किं सौत्रस्य ब्रह्मशब्दस्यार्डर्थो वर्ण्यते किंवा श्रौतस्य १ नाऽडद्यः; पौरुपेयप्रयोगस्य मूलग्रमाणापेक्षस्य तदभावे निर्णयानुपयोगात्। अथ ्रुतिर्मूलप्रमाणं तथाऽप्युत्तरसूत्रे जगज्न्मादि- कारणं ्रह्मेति निर्णेष्यमाणत्वादस्मिन् सूत्रे प्रयासो न कर्तव्यः । न द्वितीय: 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते', 'तद्विजिज्ञासस्व', 'तद् ब्रह्म', 'सत्यं ज्ञानम- नन्तं ब्रह्म' इत्यादिश्ुतौ स्वयमेवार्डर्थनिर्णयात्; नैप दोप:, प्रथमसूत्रपवृत्ति- दशायामनिष्पन्नस्य द्वितीयसूत्रस्य तदर्थनिर्णयहेतुत्वासंभवाद। अ्रुतावपि पदार्थस्याऽन्यतः प्रसिद्धिमन्तरेण वाक्यार्थग्रमित्ययोगादुभयत्राऽपि धात्वर्था नुगमेनाऽर्थस्य वर्णनीयत्वात्। धात्वर्थानुगमः संभावनामात्रवुद्धिहेतुर्न निर्णायक इति चेद, मा भूनिनिर्णय :; संभावितस्याऽनिर्णीतस्पैवाऽर्थस्याऽत्र
शङ्का-क्या वृद्धयर्थक वृहि धातुके अर्थका अनुगम करके सुत्रमें पठित ब्रद्मशब्दके अर्थका निरूपण करते हो ? या श्रुतिमें आये हुए ब्रह्मशब्दके अर्थका ! इनमें प्रथम पक्ष नहीं बन सकता, कारण कि मूल प्रमाणकी अपेक्षा रखनेवाले पुरुषके प्रयोगका उस मूल प्रमाणके अभावमें निर्णय करना उपयोगशुन्य है अर्थात् जिस पौरुपेय प्रयोगका मूल ही नहीं है, उस प्रयोगके अर्थका निर्णय करना व्यर्थ है। यदि श्रुतिको प्रमाण मानें, तो भी उत्तर सूत्रमें 'जगत्के जन्मादिका कारण व्रह्म है' ऐसा निर्णय करना है, इसलिए इस सूत्रमें उसके निर्वचनका प्रयास नहीं करना चाहिए। द्वितीय पक्ष भी नहीं माना जा सकता, कारण कि 'जिससे सकल भूत उत्पन्न होते हैं', 'उस ब्रह्मका विचार करो' 'वह ब्रह्म है', 'सत्यरूप, ज्ञानस्वरूप एवं अपरिच्छिन्न ब्रक्ष है' इत्याद्यर्थक श्रुतिमें स्वयं ही ब्रह्मशब्दके अर्थका निर्णय किया गया है। समाधान-उक्त दोप नहीं आ सकता, कारण कि प्रथम सूत्रकी प्रवृत्तिके अवसरमें द्वितीय सूत्र बना ही नहीं था, इसलिए वह (द्वितीय सूत्र) प्रथम सूत्रके अर्थनिर्णयका कारण नहीं हो सकता। श्रुतिमें मी पदार्थकी दूसरे प्रमाणोंसे प्रसिद्धि हुए बिना वाक्यार्थका निश्चय नहीं हो सकता, अतः दोनोंमें (वेद तथा लोकमें) धात्वर्थका अनुगम करके ही वर्णन करना उचित है। घात्वर्थका अनुगम तो केवल सम्भावनाबुद्धिका हेतु है, निर्णयका हेतु नहीं है, ऐसी शङ्का करो, तो अच्छी बात है, निर्णय मत हो, केवल सम्भावनासे सिद्ध हुए ७६
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५९८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ४
जिज्ञासाविषयत्वेनाऽपेक्षितत्वात्। अथ विवक्षितस्य ब्रह्मशब्दार्थस्य निश्चिता प्रसिद्धिरपेक्ष्येत, तर्हि साऽपि संपादयते। आत्मा तावद् 'अहमस्मि' इति सर्वलोकप्रत्यक्षः प्रतीयते, स एव हि ब्रह्म; 'स वा अयमात्मा ब्रह्म' इति श्रुतेः। ततश्र ग्रतिपन्नपुद्दिश्य विचारसंभवाच्छक्यग्रतिपाद्यत्वलक्षणः संवन्ध: सिध्यति। तथा चाऽत्यन्ता- प्रसिद्धभावाद्विपयत्वसिद्धिः। नन्वेवं तर्हि अत्यक्षस्याऽपि गोचरत्वेनाड- साधारणत्वाभावाद्विपयत्वं न सिध्यतीति चेढ, अहमित्यात्मत्वसामान्या- कारेण सर्वप्रत्यक्षसिद्धावपि तद्विशेपस्य विप्रतिपद्यमानस्य अत्यक्षसिद्- योगात्। यद्यप्यात्मनि वस्तुतो नाडस्ति सामान्यविशेपभावस्तथापि यथा रज्जुद्रव्यस्य दण्डसर्पधारादावनुस्यूतरूपेण प्रतीयमानत्वमेव सामान्यं तथाSS- अनिर्णीत अर्थकी ही इस प्रथम सूत्रमें जिज्ञासाके विपयत्वरूपसे अपेक्षा है। यदि ब्रह्मशब्दके विवक्षित अर्थकी निश्चित ही पसिद्धि अपेक्षित हो, तो उस निश्चित प्रसिद्धिका मी सम्पादन किया जाता है। आत्मा तो 'मैं हूँ' इस प्रकार सम्पूर्ण लोगोंको प्रत्यक्षरूपसे प्रतीत है। वही ग्रह्म है, कारण कि 'वह यह आत्मा ब्रह्म है' ऐसे अर्थवाली श्रुति विधमान है। इससे प्रतीतिसिद्ध ब्रह्मको उद्देश्य कर (विषय बनाकर) विचारका सम्भव है, इसलिए प्रतिपाद्यत्वरूप सम्बन्धका प्रतिपादन हो सकता है। इससे अत्यन्त अप्रसिद्धिके अभावसे त्रद्माका विषय होना सिद्ध होता है। शङ्का-इस रीतिसे तो ब्रह्म प्रत्यक्षका भी विपय हो गया। आप कह आये हैं कि लोकसिद्ध अहं प्रतीतिसे न्रह्म प्रत्यक्ष है, इससे अनन्यसाधारण न होनेसे ब्रह्मका विषय होना सिद्ध नहीं हो सकता। अनन्यसाधारण ही विषय हो सकता है, ऐसा नियम है। समाधान-यह शक्का उचित नहीं है, कारण कि 'अहम्' (मैं) इस प्रकार आत्मसामान्यरूपसे प्रसिद्धि रहनेपर भी अनन्त (अपरिच्छिन्न), अन्यय इत्यादि विशेषरूपसे विप्रतिपत्तिगस्त होनेसे (इस विषयमें वादियोंका मतैक्य न होनेसे) उक्त विशेषरूपकी प्रत्यक्ष द्वारा सिद्धि नहीं हो सकती, [ इसलिए ज्रह्मका स्वरूपविशेप अनन्यसाधारण हो गया ]। यद्यपि (सकलविशेपशुन्य) आत्मामें सामान्यविशेषभाव वास्तविक नहीं है, तथापि जैसे रज्जुरूप द्वुव्यका दण्ड, सर्प या (जल) धारा आदिमें अनुवर्तमानरूपसे प्रतीयमानत्व
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जात्मरूपसे त्रंक्षकी प्रसिद्धि ] भाषानुवादसाहित ५९९
पत्तिस्कन्धेष्वनुस्यूतत्वेन प्रतीयमानत्वं सामान्यं भविष्यति, अ्रत्यक्षसिद्धेऽ- पि शरीरादर्थे प्रयुज्यमानस्याऽडत्मवाचिनोडहंशव्दस्य विग्रतिपत्तिरुपपद्यते। गोशव्दवदर्थ-
गोशव्दस्य हि प्रत्यक्षसिद्धव्यत्त्याकृतिक्रियागुणाद्यर्थपु प्रयुज्यमानस्य जातिरर्थत्वेन वैदिकै: प्रतिपन्ना, व्यक्ति: सांख्यादिभि:, उभयं चैयाक- रणैः, अवयवसंस्थानाख्याऽऽकृतिरार्हतादिभिः, त्रितयमपि नैयायिकैः। अथ गोशव्दस्य प्रयोगे जात्यादीनामन्वयव्यतिरेकनियमात् तदर्थ- त्वशङ्का, तर्ह्हंशव्द्प्रयोगेऽपि शरीरादीनामन्वयव्यतिरेकनियमादेव तदर्थ- त्वशङ्गाऽस्तु। तत्र विचारविरहित प्रत्यक्षमेव प्रमाणमाश्रित्य चेतयमानो देह ही सामान्य है। [अर्थात् दण्डादिमें इदन्तव या पुरोवर्तित्वरूपसे सर्वत्रं एक-सी प्रतीति होती है ] इसी प्रकार आत्माका मी शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, शून्य, कर्ता, भोक्ता, सर्वज्ञ, तथा ब्रह्म नामक विप्रतिपत्तिके विषय पदार्थोंमें अनुगम होनेसे प्रतीयमानत्व ही सामान्य होगा, प्रत्यक्षसिद्ध भी शरीर आदि- रूप अर्थमें प्रयुज्यमान अहंशब्दमें गोशब्दकी तरह अर्थविप्रतिपत्ति हो सकती है। [ प्रत्यक्षसिद्धमें विप्रतिपत्ति नहीं होती, इसका निराकरण किया गया, अब गोशव्दार्थमें विप्रतिपति दिखलाते हैं-] प्रत्यक्षसिद्ध व्यक्ति, आकृति, क्रिया, गुण आदि अर्थोंमें प्रयुज्यमान गोशव्दका मीमांसक जातिरूप अर्थ मानते हैं, एवं सांख्य आदि व्यक्तिरूप अर्थको, वैयाकरण जाति और व्यक्ति दोनोंको, आर्हत (जैन) आदि अवयवसंस्थानरूप आकृतिको और नैयायिक तीनोंको गोशव्दका अर्थ मानते हैं। [ इस प्रकार प्रत्यक्षसिद्धमें भी विप्रतिपत्ति देखी जाती है। ] यदि गोशव्दके प्रयोगमें जात्यादि पदार्थोंका निय- . मतः अन्वय-व्यतिरेक हेनेसे जात्यादिमें गोशव्दार्थत्वकी आशक्का मानी जाय, तो प्रकृत 'अहम्' शब्दके प्रयोगमें शरीरादिरूप अर्थोंका भी अन्वय- व्यतिरेकनियम होनेसे उन्हें 'अहम्' शब्दका अर्थ माननेकी आशङ्का होगी। ('अहम्' शब्दार्थकी विप्रतिपत्ति दिखलाते हैं-] उनमें विचारशुन्य प्रत्यक्षको ही प्रमाण मानकर 'चेष्टा करता हुआ देह आतमा
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६०० विचरणग्रमैयसंग्रह i सूंत्र १, वर्णक ४
आत्मेति शास्त्रसंस्कारवर्जिता जना: अ्तिपन्नाः। तथा भृतचतुष्टयमात्र- तत्ववादिनो लौकायतिकाश् 'मनुष्योऽहं, जानामि' इति शरीरस्याऽहंग्रत्यया- लम्वनत्वेन ज्ञानाश्रयत्वेन चावगम्यमानत्वात् तदेवाऽडत्मेति मन्यन्ते। अन्ये पुनरेवमाहु :- सत्यपि शरीरे चक्षुरादिभिविना रूपादिज्ञा- नाभावादिन्द्रियाण्येव चेतनानि। न चेन्द्रियाणां करणतया ज्ञानान्वय-
अतः काणोऽहं मूकोऽहमित्यहंप्रत्ययालम्त्नानि चेतनानीन्द्रियाणि प्रत्येकमात्मत्वेनाऽभ्युपेयानि। शरीरे त्वहंग्रत्ययालम्वनत्वं चेतनत्वं चाऽडत्म- भूतेन्द्रियाश्रयत्वादन्यथासिद्धम्। नन्वेकस्मिन् शरीरे वहनामिन्द्रियाणां चेतनत्वे 'य एवाऽहं पूर्व रूपमद्राक्ष स एवेदानीं गव्द शृणोमि' इति प्रत्यभिज्ञा
है', ऐसा शास्त्रसंस्कारद्दीन मनुष्य मानते हैं। एवं चार (पृथ्वी, जल, तेज और वायु- को) ही तत्त्व माननेवाले लौकायतिक-नास्तिक-'मैं मनुष्य हूँ और जानता हूँ' (ज्ञानवान् हूँ) इस प्रतीतिके अनुसार 'अहम्' प्रतीतिका विषय तथा ज्ञानका आश्रय होनेसे शरीर ही आत्मा है, ऐसा मानते हैं। और दूसरोंकी इस प्रकार विप्रतिपत्ति है-शरीरके विद्यमान रहते भी चक्षुरादि इन्द्रियोंके बिना रूपादिका ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए इन्द्रियाँ ही चेतन- स्वरूप (आत्मा) हैं। इन्द्रियोंका ज्ञानके साथ अन्वयत्यतिरेक अन्यथासिद्ध है, क्योंकि इन्द्रियां करण हैं [ चक्षुरादि इन्द्रियोंके द्वारा रूपादिज्ञानदर्शनसे इन्द्रियोंका चेतन होना नहीं माना जा सकता, कारण कि इन्द्रियाँ तो ज्ञानकी साधन हैं, आश्रय नहीं हैं, जैसे कुठार आदि छेदनके साधन हैं, आश्रय या कर्ता नहीं हैं], ऐसा मानना उचित नहीं है; कारण कि करणकारककी कल्पना करनेकी अपेक्षा उपादान-आश्रय-की कल्पना करना श्रेष है। इसलिए 'मैं काना हूँ, मैं मूक (गूंगाः) हूँ' इत्यादि अहंप्रत्ययके आलम्बन-आश्रय- चेतनस्वरूप इन्द्रियोंमें प्रत्येक चक्षुरादिको आत्मा समझना चाहिए। और शरीरका अहंप्रतीतिमें विषय होना या चेतन होना, तो आात्मभूत इन्द्रियोंका आश्रय होनेसे अन्यथासिद्ध है। शक्का-एक ही शरीरमें अनेक इन्द्रियोंके चेतन होनेपर 'जिस मैंने पहलें रूप देखा था, वहीं में इस समय शब्दको सुन रहा हूँ' ऐसी प्रत्यभिज्ञा नहीं
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देहाद्यात्मवादियोंके मतका निरूपण] भांपानुवादसहित ६०१
न स्यात्। तथा भोक्तृत्वं च रूपरसादिपु युगपदेव सान क्रमेणेति चेद्, मेवम् ; नहि चेतनैकत्वं प्रत्यभिज्ञाक्रमभोगयोनिमित्तम्, किन्त्वेकशरीरा- श्रयत्वमेव। ततो यथैकस्मिन् गेहे चहनां पुरुपाणामेककस्य विव्राहेऽ- न्येपामुपसर्जनत्वं तथा इन्द्रियात्मनामप्येकैकस्योपभोगकालेऽन्येपामुप- सर्जनत्वमिति। अन्ये तु मन्यन्ते-सवमे चक्षुराद्यभावेऽपि केवले मनसि विज्ञाना- श्रयत्वमहंग्रत्ययालम्तनत्वं चोपलभ्यते। न च रूपादिज्ञानानां चक्षुरादा- श्रयत्वम्, तथा सति केवले मनसि रूपादिस्मृत्यनुपपचेः । ततः करणा- न्येव चक्षुरादीनि। अहंग्रत्ययस्तु तत्र कर्तत्वोपचारात् सिध्यति। न चाऽनेकात्मस्वेकशरीराश्रयत्वमात्रेण अ्त्यभिज्ञा युज्यते, एकप्रासादमा-
हो सकती। और रूप, रस आदि विषयका भोग करना भी एक साथ ही प्राप्त हो जायगा, क्रमसे न होगा। समाधान-ऐसा नहीं, क्योंकि चेतनका एक होना प्रत्यमिज्ञा और क्मसे भोगका निमित्त नहीं है, किन्तु एक शरीरमें रहना ही निमिच है। जैसे एक घरमें बहुत पुरुपोंमें से एक एकके विवाहमें दूसरोंका, उपसर्जनत्व-गौणता- माना जाता है (अर्थात् जिसका विवाह रहता है उसका प्राधान्य और अन्योंकी अप्रधानता रहती है) एवं इन्द्रियरूप आत्माओंमें भी एक एकके उपभोगके समय दूसरोंकी अप्रधानता रहती है, [ इसलिए प्रत्यभिज्ञाकी और क्रमिक भोगकी उपपत्ति हो जाती है ]। कुछ वादियोंका मत है कि-स्वममें चक्षुरादिके अभावमें मी केवल मनमें विज्ञानका आश्रयत्व और अहंग्रत्ययका आलम्बनत्व पाया जाता है। और रूपादिज्ञान चक्षुरादि इन्द्रियोंके आश्रित नहीं हो सकते, कारण कि ऐसा माननेसे केवल मनमें रूपादिकी स्मृति नहीं हो सकेगी। [ स्मरण और अनुभवमें सामानाधिकरण्यका नियम है], इसलिए इन्द्रियों- को करण ही मानना चाहिए। इन्द्रियोंमें अहंप्रतीति होना तो करणमें कर्तृत्वकी लक्षणा करनेसे उपपन्न होता है। मिन्न-भिन्न अनेक आत्माओंमें एक ही शरीरमें आश्रित होनेसे प्रत्यभिज्ञाकी उपपत्ति नहीं हो सकती, कारण कि एक मकानमें रहनेवालोंको मी समान प्रत्यभिज्ञा होनेका प्रसन्
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६०२ विवरणप्रमेयसंग्रह iसूत्र १, वणक ४
श्रितानामपि तत्प्रसङ्गाद्। तस्मात् चक्षुरादि करणं शरीराद्याधारं मन
विज्ञानवादिनस्तु क्षणिकविज्ञानव्यतिरिक्तवस्तुनः सद्भ्ावमनुभव- विरुद्धं मन्वानास्तस्यैव विज्ञानस्याऽऽत्मत्वमाहुः। पत्यभिज्ञा तु ज्वालाया- मिव संततविज्ञानोदयसादश्यादुपपद्यते। विज्ञानानां हेतुफलसंतानमात्रा- देव कर्मज्ञानबन्धमोक्षादिसिद्धि: । माध्यभिकस्तु सुपुसे विज्ञानस्याऽप्यदर्शनाच्छन्य मेवाऽऽत्मतच्चमित्याह। यदि सुपुप्े विज्ञानप्रवाहः स्यात्तदा विपयावभासोऽपि प्रसज्येत, निरालम्वनज्ञानायोगात्। जागरणस्वामज्ञानानामेव सालम्वनत्वम्, न सौषुप्तिकज्ञानानामिति चेद्, न; विशेपाभावात्। विमत सालम्वनम्, प्रत्ययत्वात्, संमतवत्। उत्थितस्य सौपुप्तविषयस्मृत्यभावनियमान्न तत्र आ जायगा। इसलिए चक्षुरादि इन्द्रिय करण हैं और शरीरादिका आधार मन ही आत्मा है। विज्ञानवादी तो क्षणिक विज्ञानसे अतिरिक्त वस्तुके सद्भावको अनुभव- विरुद्ध मानकर उसी क्षणिक विज्ञानको आत्मा कहते हैं। प्रत्यभिज्ञा तो ज्वाला-दीपशिखादि अग्निकी लपक-में जसे निरन्तर एकसे विज्ञानका उदय होनेके कारण सादश्यसे उपपन्न होती है। और विज्ञानोंके हेतु तथा फल सन्तानमात्रसे ही कर्म-ज्ञान, बन्ध-मोक्ष आदिकी सिद्धि होती है। माध्यमिक्-शुन्यवादी बौद्ध-तो सुपुप्ति अवस्थामें विज्ञानके मी न रहनेसे शुन्य ही आत्मतत्व है, ऐसा कहता है। यदि सुषुप्तिदशामें भी विज्ञानका प्रवाह माना जाय, तो विषयका ज्ञान भी उस समय होना चाहिए, कारण कि विषयके बिना ज्ञानका होना सम्भव नहीं है। शङ्का-जान्नत् तथा स्वप्न अवस्थाके ज्ञानमें सालम्बनत्वका-सविषयत्व- का-नियम है, सुषुप्तिकालके ज्ञानोंमें ऐसा-सविषयत्वका-नियम नहीं है। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि इसमें कोई विशेष नहीं है। [ अर्थात् जागरादि ज्ञानमें और सौषुप्त ज्ञानमें ज्ञानसामान्यके कारण कोई विशेष नहीं है]। कारण कि विमत सौषुपज्ञान-आलम्बन-विषय-विशिष्ट है, ज्ञान सामान्य होनेसे, सम्मत-जागर सवमके-ज्ञानके तुश्य। जागर अवस्था प्राप्त होनेपर सुषुप्िकालके विषयका स्मरण न होनेका नियम होनेसे उस
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देहाद्यात्मवादियोंके मतका निरूपण] भापानुवादसहित ६०३
चिषय इति चेत, तर्हि नियमेनाऽस्मर्यमाणत्वादेव तत्र ज्ञानमपि मा भूद। न च शन्ये विवदितव्यम्, यथा सविकल्पकः स्वविपयविपरीतनिर्चि- कल्पकजन्यस्तथा सत्प्रत्ययोऽपि स्व्रविपरीतप्रत्ययजन्य इत्यभ्युपेय- त्वात्। एवं चोत्थाने सति जायमानस्याऽहमस्मीति सत्प्रत्ययस्य समन- न्तरपूर्वप्रत्यय लक्षणकारणरहितस्य वास्तवत्वायोगाच्छन्यमेव तच्वमिति। अपरे पुनः शरीरेन्द्रियमनोविज्ञानशन्यव्यतिरिक्तं स्थायिनं संसारिण कर्त्तां भोक्तारमात्मानमाहु:। न च शन्येऽहंप्रत्यय उपपद्यते, वन्ध्या- पुत्रादावपि तत्प्रसङ्गात्। नाऽपि क्षणिकविज्ञाने क्रमभावी व्यवहारो युज्यते, सर्वो हि लोकोऽनुकूलं वस्तु प्रथमतो जानाति, तत इच्छति, ततः प्रयतते, ततस्तत्प्रामोति, ततः सुखं लभते। यद्येतादशमेककर्तृकतया
सुपुप्तिकालमें विषय नहीं रहता (केवल ज्ञानमात्र रहता है), ऐसा मानो, तो स्मरण न होनेके नियमसे ही सुपुप्तिमें ज्ञान मी न माना जाना चाहिए। और शून्यके माननेमें विवाद नहीं करना चाहिए, कारण कि जैसे सविल्पक ज्ञान अपने (सविकल्प) विषयके विपरीत निर्विकल्पकसे उत्पन्न होता है, वैसे ही सत्को विषय करनेवाला ज्ञान मी अपनेसे विपरीत असत् (शुन्य) के ज्ञानसे उत्पन्न होता है, ऐसा मानना आवश्यक है। एवं सुपुपिसे जाग जानेपर होनेवाली समनन्तर पूर्वप्रत्ययरूप कारणसे हीन 'मैं हूँ' इस प्रकार सत्- विपयक प्रतीतिको वास्तविकत्वका सम्भव नहीं है, अतः शुन्य ही तत्त्वभूत पदार्थ है। इससे भी दूसरे वादी शरीर, इन्द्रिय, मन, विज्ञान तथा शून्यसे भी अतिरिक्त स्थायी रहनेवाले कर्ता और भोक्ता रूप संसारीको आत्मा कहते हैं। शुन्यके लिए अहंव्यवहार नहीं हो सकता, अन्यथा वन्ध्यापुत्रादिमें मी 'अहं' प्रत्यय होनेका प्रसङ् आ जायगा, (वन्ध्या पुत्र भी शुन्यसे अविशेष है)। और क्षणिकविज्ञानवादमें भी क्रमभावी व्यवहार युक्त नहीं है, कारण कि सारा संसार प्रवृतिके पूर्व उपादेय वस्तुको अनुकूल जानता है, अनन्तर उसकी इच्छा करता है, तब उसके पानेके लिए प्रयत्न करता है, इसके अनन्तर उसको पाता है, तदन्तर सुखप्राप्ति होती है। यदि एक ही कर्ताका उक्त प्रकारके व्यव-
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६०४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूनर १, वर्णक ४
भासमानं व्यवहारमेकसंतानवर्चिनो वहव आत्मान: परस्परवार्चानभिज्ञा अपि निष्पादयन्ति, तदा भिन्नसंतानवर्तिनः किं न निप्पादयेयुः । तस्मात् 'य एवाऽहमिदं वस्त्वज्ञासिपं स एवेदानीमिच्छामि' इत्याद्ययाधितप्रत्यभिज्ञा- निर्वाहाय स्थाय्यात्माऽडस्युपेयः। न चाडसौ विज्ञानरूप:, अहं विज्ञान- मित्येकत्वानुभवाभावात्। 'ममेदं विज्ञानम्' इति हि संचन्धोऽनुभूयते। न चाऽयमनुभवो ममात्मेतिवदौपचारिका, वाधाभावात्। एतेन शरीरेन्द्रिय- मनसामात्मत्वं ग्रत्युक्तम्। तत्राऽपि संब्न्धप्रत्ययस्याऽनिवार्यत्वात्, अह- मुल्लेखस्य तत्राऽध्यासिकत्वाद्। न चाऽयमात्मा सादि:, शरीरोत्पत्तिसमनन्तरमेव सुखदुःखप्रास्तिमच- लोक्य तद्धेतुभूतयोः पुण्यपापयो: कर्त्ता पूर्वमप्यस्तीत्यवगमात्। न चाडयम- हारका एक सन्तानमें होनेवाले बहुतसे आत्मा एक दूसरेके व्यवहारसे परिचित न होते हुए भी सम्पादन करते हैं, तो मिन्न सन्तान-प्रवाह-में आनेवाले आत्मा भी उक्त व्यवहारका सम्पादन व्यों न कर सकें। [अर्थात् देवदतादिके ज्ञान, इच्छा आदिसे यज्ञदत्तकी प्रवृत्ति तथा देवदत्तके व्यवहारका ज्ञान यज्ञ दत्तको भी होना चाहिए ] इसलिए 'जिस ही मैंने इस वस्तुको जाना था वही मैं इस समय चाह रहा हूँ' इत्यादि वाधरहित प्रत्यभिज्ञाके निर्वाहके लिए स्थायी आत्मा मानना चाहिए। वह आत्मा विज्ञानस्वरूप नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसके विपरीत 'मैं विज्ञान हूँ' ऐसा अभेदरूपसे अनुभव नहीं होता है; किन्तु 'मेरा यह विज्ञान है' इस प्रकार भेदसम्बन्धका अनुभव होता है। उक्त (मेरा विज्ञान, ऐसे) अनुभवको 'मेरी आत्मा' इस व्यवहारके तुल्य लाक्षणिक मानना उचित नहीं है, कारण कि इसमें (मेरा विज्ञान इस व्यवहारमें) बाघ नहीं देखा जाता। 'बाधके विना लक्षणाका सम्भव नहीं है' इस सिद्धान्तसे शरीर, इन्द्रिय तथा मनको आत्मा माननेका भी खण्डन हो गया। उनमें भी भेद- सम्बन्धके ज्ञानका निवारण नहीं हो सकता, क्योंकि उन (शरीरादि) में 'अहम्' व्यवहार अध्यासमूलक होता है। [ मैं स्थूल हूँ, मैं कृश हूँ इत्यादि प्रतीति बाधित होनेसे वस्तुभूत नहीं है।] और आत्माको सादि (कार्य) नहीं मान सकते, कारण कि शरीरकी उत्पत्तिके अनन्तर ही सुख तथा दुःखकी प्राप्तिको देखकर उसके कारणभूत पुण्य तथा पाप (सुखका कारण पुण्य और दुःखका पाप)
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वादियोंके मतोंका निरूपण और खण्डन] भापानुवादसहित ६०५
नित्यः, विनाशानिरूपणात्। न तावत् स्वतो विनाश:, निर्हेतुकविनाश स्यातिग्रसङ्गिनः सुगतव्यतिरिक्तैरनङ्गीकारात्। नाऽपि परतः, निरवय- वस्य विनाशहेतुसंसर्गासंभवात्। संभवेऽि वा न विनाशः सिध्येत्। कर्मनिमित्तो ह्यन्यसंसर्ग:, स च तत्कर्सफलोपभोगायाऽडत्मनोऽवस्थितिमेव साधयेद्, न विनाशम्। तस्मादनादेरविनाशिनोऽनन्तशरीरेपु यातायात- रूप: संसार: सिद्धः। निर्विकारस्य भोगासंभवाद्विकारस्य क्रियाफल- रूपस्याऽभ्युपगमे क्रियाचेशात्मकं कर्तत्वमनिवार्यम्। भोककत्वमप्यनुभूयमानं शरीरादिपु विज्ञानपर्यन्तेष्वनुपपन्नत्वादुक्तात्मन्येव पर्यवस्थति। तथा हि- शरीरं तावत् पश्चभूतसंघातरूपम्, 'पश्चभूतात्मके तात ! शरीरे पश्चतां गते' इत्यादिशास्राद्। यत्तु नैयायिको मन्यते-भूलोक्वासिनां शरीरं पार्थिवमेव, तत्र का कर्त्ता इससे भी पहले है, ऐसा माना जाता है। और यह आत्मा अनित्य भी नहीं है, कारण कि विनाशका निरूपण नहीं किया जा सकता; क्योंकि आत्माका स्वतः विनाश तो होता नहीं है, क्योंकि कारणके बिना होनेवाले अतिप्रसङ्ग- ग्रस्त विनाशको बौद्धोंसे अतिरिक्त और कोई नहीं मानता। अन्य कारणसे भी (आत्माक्का) विनाश नहीं हो सकता, क्योंकि निरवयव आत्माका विनाशके कारणके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता। और उसका सम्भव होनेपर भी विनाश सिद्ध नहीं हो सकता, कारण कि दूसरेका सम्बन्ध कर्म (क्रिया) द्वारा ही होता है और वह कर्मजनित सम्बन्ध उस कर्मके फलका उपभोग करनेके लिए आत्माकी स्थितिको ही सिद्ध करेगा, विनाशको नहीं। इससे अनादि और अविनाशी आत्माका अनन्त शरीरोंमें गतागतरूप (जन्म-मरणरूप) संसार सिद्ध होगा। विकारशन्यके भोगका सम्भव न होनेसे क्रिया-फलरूप विकारके माननेमें क्रियावेशात्मक कर्तृत्वका निवारण नहीं किया जा सकता और अनुभूयमान (अनुभवमें आनेवाला) भोक्तृत्व भी विज्ञानपर्यन्त शरीरादिमें नहीं वन सकता, इससे वह पूर्वकथित आत्मामें ही मानना पड़ता है, क्योंकि शरीर तो आकाशादि पांच भूतोंका संघातरूप है, क्योंकि 'हे तात ! पञ्चभूतात्मक शरीरके पञ्चत्वको प्राप्त होनेपर' अर्थात् अपने कारणभूत पाचों भूतोंमें मिल जानेपर, ऐसा शास्त्र कहता है। और नैयायिकोंका जो यह मत है कि भूलोकमें रहनेवाले मनुष्योंका शरीर ชง
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६०६ विचरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ४
केदनाद्युपलन्धिर्वस्त्ादावित भूतान्तरोपट्टम्भादिति, तदसत्; शोपादिना जलाद्यपगमेऽपि यथा वस्त्रादिस्वरूपस्य नाऽपचयस्तथा क्लेदनपाचनव्यू ज्ञावकाशानामपगमेऽपि शरीरस्याऽपचयाभावप्रसङ्गात्। यच्च वैशेपिकैरुच्यते-पश्चभूतात्मकत्वे शरीरस्याऽप्रत्यक्षत्वग्रसङ्ग:, चाय्वाकाशयोरप्रत्यक्षतया प्रत्यक्षाप्रत्यक्षव्ृतित्वादिति; तदप्ययुक्तम्, तथा
पृथ्वीसे ही वना है, पाँच भूतोंसे नहीं। उसमें पसीने आादिकी उपलब्धि तो अन्य भूतोंके सम्बन्धसे होती है। जसे कि दूसरे भूतोंके सम्बन्धसे वस्त्रमें जलादिकी उपलन्धि होती है, [आदि पदसे बढ़ना, फेलना, सिकुड़ना, गरम होना तथा अन्दरसे पोलापन आदि लेने चाहिएँ। तात्पर्य यह है कि क्ेदनादि यधपि जलादिके असाधारण गुण हैं तथापि जैसे वस्त्रादिमें जलादिके संयोगसे क्ेदन, पाचन, व्यूहन आदि देखे जाते हैं, पर वे पाश्चमौतिक नहीं कहलाते, किन्तु पार्थिव ही कहलाते हैं, वैसे ही मनुष्यशरीर मी पार्थिव ही है ऐसा मानना चाहिए]। यह मत उचित नहीं है, कारण कि जसे सुखा देने आदिसे जलादिका सम्बन्ध दूर हो जानेपर भी वस्त्रके स्वरूपकी कोई हानि नहीं होती, वैसे क्ेदन (गीलापन), पाचन, व्यूहन (वढ़ना) तथा (आकाश) पोलापन आदि गुणोंका नाश होनेपर भी शरीरके स्वरूपकी किसी प्रकारसे हानि नहीं होनी चाहिए। [ वस्त्रका जलादि उपादान नहीं है, अतः क्ेदनादिके नष्ट होनेपर भी जसे वस्त्रके स्वरूपका कुछ नहीं विगड़ता, वैसे केदनादि गुणोंके नष्ट होनेपर भी शरीरको वस्त्रके समान अपने स्वरूपमें रहना चाहिए, परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता है, बल्कि क्ेदनादिका विनाश होनेपर शरीर- स्वरूपका ह्रास देखा जाता है, अतः नैयायिकोंका मत असङ्गत है ]। और वैशेषिकोंका जो यह कहना है कि 'शरीर पाँच भूतोंसे बना है' ऐसा माननेमें उसका प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकता, कारण कि वायु और आकाशका प्रत्यक्ष न होनेसे शरीर प्रत्यक्ष (पृथ्वी आदि तीन) और अप्रत्यक्ष (आकाश, वायु) भूतोंमें रहता है। [ इसलिए सम्पूर्ण उपादानोंका प्रत्यक्ष न होनेसे प्रत्यक्षा- प्रत्यक्ष उपादानमें रहनेवाले शरीरका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, यह भाव है]। वैशेषिकोंका यह कथन भी युक्तिसन्नत नहीं है, कारण कि उक्त हेतुके मान लेनेसे तो सभी अवयवी पदार्थोंका कभी प्रत्यक्ष ही न हो सकेगा, क्योंकि
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देहात्मवादियोंके मतका खण्डन] भांपानुवीदसाहित ६०७
सति सर्वाचयविनामप्नत्यक्षत्वापातात्, प्रत्यक्षाप्रत्यक्षावयववृत्तित्वात्। नहि सूक्ष्मा: परभागस्थिताश्चाऽवयविनोऽघयवा: प्रत्यक्षीकर्तु शक्यन्ते। तस्मा- द्ूतसंघातः शरीरम्। न च गन्धादिमतां तद्रहितानां च भूतानामेक- कार्यजनकत्वं न स्यात्, परस्परविरोधादिति वाच्यम्, तथा सति नीलादीना- मेकावयविजनकत्वस्यैकचित्ररूपारम्भकत्वस्य चाऽसम्भवप्रसङ्गात्। अनु- भववलादेव तत्र तथा स्व्रीकारे ग्रकृतेऽपि तन्न दण्डवारितम्। तत्र शरीरस्य भोक्तृतां वदन्तो लोकायता: ग्रष्टव्या :- किं व्यस्वानां भूतानां प्रत्येकं भोक्तृत्वम् उत समस्तानाम् १ आद्येऽपि न तावद्युगपत् सर्वेपां भोक्तृता, तदा स्वार्थप्रवृत्तानां तेपामन्योन्यमङ्गाङ्गिभावानुपपत्तौ सभी अवयवी पदार्थ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकारके अचयवोंमें ही रहते हैं। अवयवीके अन्तिम अव्यन्त सूक्ष्म अवयवोका (जहांपर पुनः अन्य अवयवकी कल्पना नहीं हो सकती, ऐसे अवयवोंका) प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता इसलिए पाँचों भृतोंका समूह (मिला हुआ पिण्डविशेप) ही मनुष्यशरीर है। यदि कहो कि गन्धादि गुणवाले और उन गुणोंसे रहित भुतोका परस्पर विरोध होनेसे उनसे एक कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, तो यह कहना मी युक्त नहीं है, कारण कि (परस्पर विरोधियोंको एक कार्यके प्रति जनक न माननेसे) नीलादि परस्पर विरोधी गुण भी एक अवयवीके (द्रव्यके) प्रति तथा एक चित्ररूपके प्रति जनक नहीं हो सकेंगे। [ अर्थात् परस्पर विरुद्ध नीलादि गुण भी चित्रपट आदिके आरम्भक नहीं हो सकेंगे। ] यदि कहो कि अनुभव-सामर्थ्यसे परस्पर विरोधी होते हुए भी नीलादि गुण चित्रपटके आरम्भक माने जाते हैं, तो प्रकृतमें भी उनको (अनुभवके वलसे परस्पर विरुद्ध पृथ्वी आदिको) एक शरीरके प्रति आरम्भक मानना डंडा मारकर भी नहीं हटाया जा सकता। इन विरुद्ध परिस्थितियोंके उपस्थित होनेपर पहले शरीरको भोक्ता माननेवाले लोकायतसे-नास्तिकसे-पूछना चाहिए कि क्या अलग-अलग (प्रत्येक) भूत भोग करते हैं: अथवा सब मिले हुए मृत भोग करते हैं: प्रथम पक्षमें सबका एक साथ भोग करना तो नहीं बन सकता, कारण कि एक साथ (क्रमके बिना) भोगके लिए अपने-अपने अमीष्टके साधनमें प्रवृत्त हुए भूतोंका परस्पर अज्जाभिभाव न होनेके कारण उनका संघात ही नहीं हो सकता। [जुदे-जुदे
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६०८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूतं १, वर्णक ४
संघातापत्यभावप्रसङ्गाद्। [ न चान्तरेणाडङ्गाङ्गिभावं संघातस्योपपत्तिः ।] अन्तरेण च संघातं भोक्तृत्वे देहाद्वहिरप्येकैकस्य भूतस्य भोक्तृतोपलभ्येत। नाऽपि क्रमेण तेपां भोक्तृत्वम्, संघातानुपपचितादवस्थ्यात्। न च वरवि- वाहादिन्यायेन गुणप्रधानभावेन तदुपपत्तिः, वैपम्यात्। यथा एकैकस्य वरस्याऽसाधारणत्वेनैकैका कन्या भोग्या, न तथा चतुणीं प्रथिव्यप्ेजोवायूनां भोकणां रूपरसगन्धस्पर्शा भोग्या व्यवस्थिताः तत्र कथ क्रमभोगः? अथ कर्थचिव्वतिष्ठरन्, तदाऽपि युगपत् सर्वविपयसंनिधाने सति क्रमानु-
अपने-अपने कामोंमें लगे रहनेकी दशामें मिलकर एक कार्यका करना सम्भन नहीं होता, यह भाव है]। [अङ्भािभावके विना संघातका सम्भव नहीं हो सकता ], [ क्योंकि अञ्गाङ्िभावको प्राप्त हुए तिनके ही संघातरूप रज्जुभावको प्राप्त होते हैं]। यदि संघातके विना मी एक-एक भूत भोक्ता मान लिया जाय, तो शरीरके बाहर भी एक-एक भूतमें भोक्तृत्वकी प्रसक्ति होगी। और क्रमसे मी प्रत्येक भूतोंको भोक्ता नहीं मान सकते, कारण कि ऐसा मानने- पर मी संघातकी अनुपत्ति तो वैसी ही वनी रह जाती है। [ क्योंकि एक साथ अथवा जुदे-जुदे अपने-अपने कार्यके साधनमें प्रवृत्त हुए पदार्थोंका अग्राद्िभाव न होनेसे संधात कैसे हो सकेगा]। वर-विवाह आदि न्यायका अनुसरण करके गुण-प्रधानभाव (अज्गाञ्जिभाव) से भी संघातकी उपपत्ति नहीं हो सकती, कारण कि दष्टान्त और दार्टान्तिकमें विपमता है। [दृष्टान्तभूत घरविवाहन्यायका विवेचन करते हैं-] जैसे एक-एक वरके लिए असाधारण- रूपसे (जिसमें दूसरेके सम्बन्धका लेश भी प्राप्त न हो, इस रूपसे) एक-एक कन्या भोग्यमूत वस्तु है, वैसे ही भोग करनेवाले पृथिवी, जल, तेज और वायुके लिए एक-एक रूप, रस, गन्ध और स्पर्श व्यवस्थित-नियत-भोग्यवस्तु नहीं है अर्थात् भूतोंके विषय नियत नहीं हैं। [अतएव पृथ्वीमें रूप, रस आदिकी भी उपलन्धि होती है। आकाश केवल शब्दगुणक है, इसलिए आकाशका तो शब्द असाधारण गुण हो सकता है, परन्तु अन्य वायु आदि चार भूतोंमें उत्तरोत्तर गुणोंकी वृद्धि होनेसे स्पर्शादि भोग्य वस्तु असाधारण नहीं मानी जा सकती, इसलिए असाधारण-विपयमें वर-कन्याके समान नियत वयवस्था नहीं हो सकती]। यदि कथंचिद् रूप आदि विषयोंमें व्यवस्था
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देहात्मवादियों के मतका खण्डंन] भोपानुवादसाहित ६०९
पपत्तिः। यथैकस्मिन् मुहते अ्रत्येकं भोग्यक्न्यावस्तुनि संनिहिते राणां क्रमविवाहो गुणभधानतया संघातो वा नाऽस्ति, तद्वत्। नाऽपि समस्तानां भोक्तृत्वसंभवः, प्रत्येकमविद्यमानस्य चैतन्यस्य संघातेऽप्यमावाद्भोगानुप- पत्तेः। अथ मन्यसे-अगौ अ्रक्षिप्तेपु तिलेप्वेकैकस्य ज्वालाजनकत्वा- भावेऽपि तिलसमृहस्य यथा तज्जनकत्वं तथा संघातस्य चैतन्यं स्यादिति, तदाऽपि संघातापत्ती हेतुर्वक्तव्यः। आगामिभोगाढिति चेद्, न; यदि ताबन्द्ोगस्य गुणभावस्तदा प्रधानानां भृतानामन्योन्यं गुणप्रधानभाव- मानी मी जाय, [यद्यपि रूपादि साधारण हैं, तथापि व्यवस्था हो सकती है कि तेजका रूप ही भोग्य है तथा वायुका स्पर्श ही, पृथ्वीका गन्ध ही और जलका रस ही भोग्य है] तो मी एक साथ सब विपयोंकी उपस्थिति होनेपर क्रमकी उपपति नहीं हो सकती, [अर्थात् एक ही क्षणमें सभी भोक्ता अपने-अपने भोग्यका भोग करेंगे; क्रमकी अपेक्षा क्यों होगी?] जैसे एक ह्ी मुहर्तमें प्रत्येक कन्यारूप भोग्यवस्तुका सन्निधान होनेपर वरोंका क्रमसे विवाह अथवा गुणप्रधानभाव-अभ्राद्विभाव-से संघात नहीं होता वैसे पकृतमें भी [ भूतोंका करमसे भोग अथवा गुणपधानरूपसे संघात नहीं हो सकता। और प्रकृतमें गुणप्रधानभाव मानकर संघातकी सिद्धि करना आवश्यक है, इससे दष्टान्त तथा दार्टान्तिकमें समानता नहीं आ सकती ]। और दूसरे पक्षका (मिले हुए भृत भोग करते हैं, इसका) भी सम्भव नहीं है, कारण कि प्रत्येक्में न रहनेवाले चैतन्यका (भोगकर्तृत्वका) संघातमें भी अभाव होनेसे भोगकी उपपत्ति नहीं हो सकती। यदि माना जाय कि आगमें डाले गये तिलोंमें से एक-एक तिल द्वारा ज्वालाकी उत्पत्ति न होनेपर भी तिलसमूहमें जैसे ज्वालाका जनकत्व है अर्थात् तिलसमूहसे जैसे ज्वालाकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही प्रकृतमें मी प्रत्येक भूतमें भोक्तृत्वके न होनेपर मी उसके संघातमें भोवतृत्वरूप चेतन्यका सम्भव होगा, तव मी संघातके होनेमें हेतु कहना होगा। [संघातात्मक शरीरके अतिरिक्त चेतन पदार्थ लोकायतके मतमें है ही नहीं, जो पत्येक अचेतनभूतका चेतनात्मक संघात उत्पन्न कर दे, इसलिए उसका कोई कारण कहना होगा यह तात्पर्य है ]। आगे प्राप्त होनेवाले भोगके द्वारा भी संघात नहीं माना जा सकता [ अर्थात् आगामी भोगको भी संघातका कारण नहीं मान सकते ] कारण कि यदि भोगको गुण (अप्रधान) मानो, तो प्रधानरूपसे माने
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६१० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ४
रहितानां कर्थ संघातापत्तिः१ प्राधान्यं तु भोगस्याऽनुपपन्नम्, भोक्तृशेपत्वात्। न. च वाच्यं शेपिणं भोगं प्रति शेपभृतयोः स्त्रीपुंशरीरयोभोक्रो संघाता- पत्तिर्दष्टेति, तन्राऽपि शरीरयोर्भोक्तृत्वासंप्रतिपचेः। ज्वालां प्रति तिलानां संधातापत्तिरिति योडयं दष्टान्त:, सोपि तवाडसिद्ध :; संघाता- निरूपणात्।
गये परस्पर गुणप्रधानभावसे शून्य पृथ्वी आदि भूतोंका संघात कैसे हो सकेगा: [ अर्थात् भोग्यस्वरूप गन्धादि गुणके प्रति प्रधानभृत पृथ्वी आदि, परस्पर निरपेक्ष होनेसे, संघातभावको प्राप्त नहीं हो सकते याने स्वतन्त्र होनेसे अपने अधीन मोग्यका भोग स्वयं आप ही कर लेंगे ] और भोग्यवस्तुस्वरूप रूपादिका प्राधान होना तो माना ही नहीं जा सकता, कारण कि भोग्य तो भोक्ताका उपकारक अङ्ग है। [ भोक्ताओं तथा मोगमें गुणप्रधानभाव न होनेके कारण ही संघातकी उपपतति- का अभाव नहीं कह सकते, क्योंकि तादर्थ्यसे शेपशेपिभावको लेकर संघातकी उपपत्ति हो सकेगी; इस प्रकारके वादीके आशयका खण्डन करनेके लिए शङ्काका अनुवाद करते हैं-] शङ्का-शेषीरूप भोगके प्रति भोग करनेवाले शेपमूत स्त्री तथा पुरुपके शरीरोंका संघात होते हुए देखा जाता है, [शरीरके बिना भोग अनुपपन्न है, क्योंकि शरीरका लक्षण है कि 'भोगायतनं शरीरम्', इसलिए शरीरको भोगके प्रति शेष (उपकारक) मानना ही पड़ेगा। इसलिए जसे एकके प्रति शेप होनेसे छः प्रयाजोंका संघात होता है, वैसे ही एक ही भोगके प्रति पांचों भूतोंका भी संधात उपपन्न हो सकता है, यह भाव है। ] समाधान-स्त्री तथा पुरुषके शरीरोंको भोक्ता मानना सभी प्रकारके सिद्धान्तोंसे "सिद्ध नहीं है, [क्योंकि हमारे ही मतमें स्त्री-पुरुषोंके शरीरोंमें आत्मा ही भोक्ता है और शरीर केवल भोगार्थ होनेसे आत्माका ही शेप है, इससे आपके समान भोकतास्वरूप शरीरोंका संघात नहीं माना जा सकता] और तुम्हारे (लोकायतके ) द्वारा दिखलाया हुआ जो ज्वालाके प्रति तिलोंका संघातरूपी दष्टान्त है, वह मी सिद्ध नहीं है, कारण कि संघातका निर्वचन ही नहीं हो सकता।
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देहात्मवादियोंके मतका खण्डन ] भापानुवादसहित ६११
न तावल् संघातो नाम भोगभोगिनोर्वनवदेकदेशतामात्रम्, तथा सति तेन न्यायेन व्यापिनां भूतानां सर्वत्र तत्सच्वाच्चैतन्यभोगयो: सार्वत्रि- कत्वग्रसङ्गात्। नाऽपि तदारन्धोऽवयवी संघातः, तस्य भृतेभ्यो भेदे पश्चमतच्वाभ्युपगमग्रसङ्गात्। अमेदे भूतमात्रतया संघातासंभवात्। भेदा- भेदयोश्चाऽनङ्गीकरणाद्। अथाऽवयविनः पारतन्त्र्यान्न पश्चमतत्वापत्ति:, तर्हि जलादे: प्रथिव्यादितन्त्रत्वान्न तत्वचतुष्टयमपि सिध्येत्। न चैक-
[जैसे अनेक वृक्षोंका एक देशमें उगना ही उनका संघातभृत वन कहलाता है, वैसे भोग और भोक्ताका समानाधिकरणत्व ही संघात है, इस प्रकारके वादीके आशयसे कहते हैं कि ] वनके समान भोग और भोगीका एक देशमें दोना ही तो सद्दात है? नहीं, वह भी संघात नहीं माना जा सकता, क्योंकि ऐसा मान लेनेसे तो इस न्यायसे (अर्थात् एकदेशस्थताको ही संघात माननेकी नीतिसे) व्यापकस्वरूप पृथ्वी आदि भूतोंकी (शरीरके चाहर भी) एक- देशस्थता सर्वत्र विद्यमान ही है, इसलिए चैतन्य और भोगका सभी जगह प्रसभ्न आ जायगा। और उन अवयवोंसे (भृतोंसे) एक अवयवीका होना भी संघात नहीं कहा जा सकता, कारण कि उस अवयवीका यदि (अवयवरूप) भूतोंसे मेद माना जाय तो 'अवयचीरूप' पांचवां तत्त्व माननेका प्रसक्क आ जायगा। [ लैकायतिक केवल पृथ्वी, जल, तेज और वायु, इस प्रकार चार ही तत्त्व मानता है। उनसे ने हुए शरीररपी अवयवीको उनसे भिन्न माननेपर उसे पांचवां तत्त्व मानना पड़ेगा, इससे स्वयं अपसिद्धान्त दोपका भागी होगा, यह सारांश है]। और यदि भेद नहीं मानते, तो शरीर चार प्रकारके भूत ही रहे, अतः अतिरिक्त संघातकी सिद्धि ही नहीं हुई। और मेद तथा अमेद दोनोंको तो तुम मानते नहीं हो [ 'सुवर्णका कुण्डल है तथा कुण्डल सुवर्ण है-इन दोनों प्रतीतियोंसे सुवर्ण तथा कुण्डल दोनोंमें भेदाडमेदस्वरूप तादात्म्य माना जाता है, इसमें मेद कालपनिक और अमेद परमार्थ है, ऐसा तादाल्य नास्तिक नहीं मानता ]। यदि कहो कि अवयवी अचयवोंके पराधीन है, इसलिए अवयवसे अतिरिक्त पांचवाँ तत्त्व माननेकी आपत्ति नहीं आ सकती, तो जलादिके भी पृथ्वी तत्त्वके पराधीन होनेसे आपके सम्मत चार तत्त्र भी सिद्ध नहीं हो सकेंगे, [क्योंकि यदि अवयवीमें अवयव-भेद प्रतीविरूप पराधीनता मानी जाय, तो जलादिमें मी पृथ्वी-भेद-प्रतीतिरूप
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६१२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ४
त्रत्वाद्। न चकार्थक्रियायां युगपदन्वयः संघातः, तदानीं काष्ठाथ्रयेण चहिना वायुसमुद्भूतेन जले ताप्यमाने सति तन्र भूतचतुष्टयसंघाताद्गो- गप्रसङ्गात्। न चाऽगन्यय:पिण्डवत् संश्लेपः संघातः, शरीरे वायोस्तथा संश्लेपाभावात्। वहिव्याप्ते चाऽयःपिण्डे सन्तापितजले वायुसंयुक्ते भोग- प्रसङ्गात्। न चोक्तदोपपरिहारायकस्यैव भृतस्य भोक्तृत्वनियति: शङ्क- नीया, सर्वसंनिधानेऽस्यैव भोग इत्यनिर्द्धारिणाद।
पराधीनता विद्यमान ही है। और दूसरे अवयवोंसे बननारूप पराधीनता मानो, तो पृथ्वी मी जलसे वनी है। इसलिए पृथ्वीमें भी उक्त पराधीनता चली गई, इस परिस्थितिमें तुम्हारे अभिमत चार तत्व दिवंगत ही हो चुके, यह भाव है। ] तथा 'यह एक द्रव्य है' इस बुद्धिमें विपय होनेकी योग्यता ही संघात पदार्थ है, ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि परमार्थतः अनेक पदार्थोंमें एक बुद्धिका होना केवल भ्रम है [भ्रमात्मक बुद्धिमें कार्यकारित्व नहीं रहता, इसलिए अ्रमविषय संघातमें भी भोकृत्व नहीं हो सकता, यह तात्पर्य है] और एक ही अर्थक्रियामें (प्रमातृत्व आदि व्यवहारमें) सचका एक साथ अन्वय होनेको भी संघात नहीं कह सकते हैं, कारण कि ऐसा माननेसे वायुसे सुलगी हुई लकड़ीकी आगसे गरम किये गये जलमें चारों भूतोंका संघात होनेसे उसमें भी भोगका प्रसज्ज हो जायगा। वैसे अग्नि और लोहेके गोलेके सम्बन्धके समान सम्बन्धको (सर्वावयवसे एकरस-व्याप्तिको) भी संघात नहीं मान सकते, कारण कि शरीरमें वायुका आग और लोहेंके समान सम्बन्ध (एक-एक अवयवमें समानरूपसे व्याप्ति) नहीं है। [दूसरा दोष भी देते हैं-] जिसने जलको तपाकर अपनेमें ही सुखा लिया हो और वायु भी उसपर लगता हो, ऐसे गरम लोहपिण्डमें (चारों भूतोंका संघात होनेसे) भोगप्राप्तिका प्रसङ्ग होगा [परन्तु तप्ायःपिण्डमें भोग देखा नहीं जाता है, इसलिए भोगका समवायी कारण संघातरूप शरीर नहीं हो सकता] उक्त दोषके परिहारके लिए कहो कि एक ही भूत भोक्ता है, तो यह भी नहीं कह सकते, कारण कि सबके संनिधानमें, यह इसका भोग है, इस प्रकार निश्चय नहीं किया जा सकता [रूप, रस, गन्ध और स्पर्श-रूप भोग्य वस्तु और भोगान्वयी चारों
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इन्द्रियोंके गोलकरूपत्वका अभाव ] भापानुवादसहित ६१३
यत्तु लौकायतैकदेशिनां मतद्वयम्-इन्द्रियाणां भोक्तृत्वं देहेन्द्रिय- संघातस्य च भोक्तृत्वमिति, तदुक्तन्यायेन निराकरणीयम्। ननु कानि पुनरिन्द्रियाणि येपां भोत्तृत्वं निराक्रियते। तत्र गोलक- मात्राणीति सुगताः, तच्छक्तय इति मीमांसका:, तव्तिरिक्तानि द्रव्या- न्तराणीत्यन्ये सर्वे वादिन:। न तावद्ोलकमातत्वं युक्तम्, कर्णशष्कुल्यादिविरहिणामपि सर्पा- दीनां शब्दादयुपलन्धिसद्भावात् । वृक्षाणां च सर्वगोलकरहितानां विष- योपलम्भसत्चात्, 'तस्मात् पश्यन्ति पादपाः' इत्यादिशास्त्रात्। न च वृक्षाणामचेतनत्वम्, हिंसाप्रतिपेधेन आणित्वावगमात् । अत एव न गो- भूतोंके मी उपस्थित रहनेमें कौन किसका भोग है, इसका नियामक कोई नहीं है, इसलिए अविशेषसे चारोंको भोक्ता मानना होगा और उनका संघात वन नहीं सकता, इसलिए संघातभूत शरीरात्मक भूतोंको भोक्ता मानना युक्तिसंगत नहीं है, यह तात्पर्य है। ] और मी लोकायत-मतके एकदेशियोंके जो ये दो मत हैं कि इन्द्रियां भोक्ता हैं अथवा देहेन्द्रियका संघात भोक्ता है। इन दोनों मतोंका दिखलाये गये न्यायके अनुसार खण्डन करना चाहिए। [ इन्द्रियोंमें भोक्कतत्वका खण्डन करनेके पहले इन्द्रियविषयक विप्रतिपत्ति दिखलानेके लिए प्रश्न करते हैं-] इन्द्रियां कौन पदार्थ हैं? जिनमें भोक्तृत्वका खण्डन किया जा रहा है। इस विपयमें बौद्ध कहते हैं कि गोलकमात्र [अर्थात् शरीरमें दीख पड़नेवाले आंख, नाक, कान आदिके तत्-तत् आकार] ही इन्द्रियाँ हैं। मीमांसक आकारोंमें देखने, सुनने आदिकी शक्तियोंको ही इन्द्रिय मानते हैं और इतर सभी लोग इन दोनोंसे अतिरिक्त द्रव्यान्तर ही इन्द्रिय है, ऐसा मानते हैं। [चौद्धका खण्डन करते हैं-] गोलकको ही इन्द्रिय मानना उचित नहीं है, कारण कि कर्णशष्कुली (कानके भीतर एक विशेष प्रकारके छेद) आदिसे शुन्य सर्प आदिको भी शव्दादि विषयोंका प्रत्यक्ष होता है और किसी मी इन्द्रियका गोलक न होनेपर भी वृक्षादिको सम्पूर्ण विषयोंकी उपलन्धि होती है, क्योंकि 'इससे वृक्ष मी देखते हैं' ऐसा शास्त्र कहता है। वृक्षोंको चेतनारहित नहीं मान सकते, क्योंकि शास्त्रोंमें उनकी हिंसाका निषेध है,
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६१४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ४
लकशक्तित्वमिन्द्रियाणाम्। अथ शक्तिमद्द्रव्यान्तरकल्पनात् प्रतिपन्नस्थानेपु शक्तिमात्रकलपने लाघवं मन्यते, तर्ह्यत्यन्तलाघवादात्मन एव क्रमका- रिसर्वविज्ञानसामर्थ्य कल्पप्यताम्, किमेभिरिन्द्रियः १ न च सर्वगतसाSS- त्मनो गोलकप्रदेशेष्वेव ज्ञानपरिणामोऽनुपपन्नः, त्वया तसैव शरीर- प्रदेशमात्रे ज्ञानपरिणामाङ्गीकाराद। एवं चाऽनिन्द्रियेष्वपि गोलकप्रदेशेपु ज्ञानान्वयव्यतिरेकौ शरीरद्रव्यान्यथासिद्धौ, ततो न मीमांसकमतमुपपन्नम्। सन्तु तर्हिं द्रव्यान्यराणीन्द्रियाणि, तानि च गोलकविशेपसंवन्धाचक्षुरादि-
अतः 'वृक्षोंमें प्राण है' ऐसा प्रतीत होता है। इसी कारण गोलककी शक्तियोंको भी इन्द्रिय नहीं मान सकते [ क्योंकि उससे भी सर्प अथवा वृक्षादिमें व्यमिचार बना ही रह जायगा ] यदि कहो कि शकिशाली द्रव्यान्तरक्ी कल्पनाकी अपेक्षा सर्वसम्मत नाक, कान आदि आकारविशेपवाले स्थानोंमें केवल शक्तिकी कल्पना करनेमें लाघव है, तो इसपर यह कहा जा सकता है कि शक्तिकी अपेक्षा अधिक लाघव होनेसे आत्मामें ही क्रमके उत्पादक सर्व- विज्ञानके सामर्थ्यकी ही कल्पना करो, इन (विप्रत्तिपतिग्रस्त) इन्द्रियोंकी कल्पना करनेसे क्या फायदा है? शङ्ा-सर्वत्र व्याप् आत्माका केवल गोलक-प्रदेशमें ज्ञानरूप परिणाम मानना युक्त नहीं है। समाधान-तुम भी उस सर्वगत आत्माका शरीरप्रदेशमें ही ज्ञानरूप परिणाम मानते हो। [अर्थात् 'यश्चोभयोः समो दोषः परिह्ारस्तयोः समः' इत्यादि न्यायसे जैसे तुम्हारे मतमें सर्वत्र व्याप् होनेपर भी आत्माका शरीरसे बाहर ज्ञानाकार परिणाम नहीं हो सकता, केवल शरीरमें ही हो सकता है, वैसे ही मेरे मतमें भी गोलकमात्रमें ज्ञानाकार परिणामकी प्राप्ति असङ्गत नहीं हैं ] इस रीतिसे इन्द्रियसे भिन्न होनेपर भी गोलकोंमें ज्ञानका अन्वय-व्यतिरेक तो शरीररूप द्रव्यके कारण अन्यथासिद्ध है। [अर्थात् सर्वव्यापी आत्माका जैसे इन्द्रिय- भिन्न शरीर के साथ ज्ञानान्वय-व्यतिरेक है, वैसे ही गोलकोंके साथ भी है, इन अन्वय-त्यतिरेकोंसे गोलकोंका या इनकी शक्तियोंका चेतनात्मक इन्द्रिय होना सिद्ध नहीं हो सकता ] इससे मीमांसक मत स्कत नहीं है, यह स्पष्ट है। तब तो अन्य वादियोंका सिद्धान्त-'दृष्यान्तर ही इन्द्रियाँ हैं और ने उस गोलकके
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इृद्रियोंके गोलंकरूपत्वका अभाव ] भापानुवांदसेहित ६१५
शब्दवाच्यानीति; तदप्ययुक्तम्, तेपु अ्रमाणाभावात्। विमता रूपादयुप- लब्धय:, करणपूर्विका:, कर्तृव्यापार्त्वाद्, छिदिक्कियावत्, इति चेद्, न; अनैकान्तिकत्वात्। करणप्रेरणलक्षणे कर्तव्यापारे करणान्तराभावात्, अन्यथाऽनवस्थानात्। 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च' इत्या- गमगम्यानीन्द्रियाणीति चेद्, न; आगमसंस्कारविरहिणामपीन्द्रियप्रतिप-
(आकार-चिशेपके) सम्बन्घसे आंख आदि शब्दोंसे कही जाती हैं-मान लें, तो यह मी उचित नहीं है; क्योंकि उस प्रकारके अतिरिक्त द्रव्योंके माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। शक्का-विमत (विवादगस्त) रूपादिका प्रत्यक्ष, करणपूर्वक होता है, कर्ताके व्यापाररूप होनेसे, छेदन क्रियाके सदश; [जसे छेदन-क्रिया करण (साधन) द्वारा हो सकती है, वैसे ही व्यापारत्वसामान्यसे सभी व्यापार साधनसे ही सिद्ध होते हैं और वे साधन जिनका नाम आंख, कान आदि है, ऐसे द्रव्यान्तर ही हैं, क्योंकि उपलब्ध द्रव्य तो दर्शनादिके साधन हो नहीं सकते ] यह अनुमान उन इन्द्रियात्मक अतिरिक्त द्रव्योंके माननेमें प्रमाण है। समाधान-ऐसा नहीं है, कारण कि उक्त अनुमान व्यभिचारदोपसे दूपित है। [छेदनक्रियाके साधनभृत कुठार आदि भी तो अपने व्यापारके कर्ता हैं, लेकिन उस करणरूप कुठारादि कर्ताका व्यापार करणपूर्वक नहीं है, इसलिए ऐसे कर्तृत्यापारमें व्यभिचार आया, अतः उक्त अनुमान नहीं हो सकता। यदि प्रधानीभूत फर्तृव्यापारमें ही उक्त नियम माना जाय; सामान्य कर्तृव्यापार- मात्रमें नहीं, तो भी दोप देते हैं-] करण और प्रेरणात्मक कताके व्यापारमें कोई दूसरा करण नहीं है। [ यद्यपि देवदत्तादिसे की जानेवाली छेदनक्रियाके पहले कुठारादि करण हैं, तथापि करणभूत कुठारको प्रेरणा करते हुंए देवदत्तादिके व्यापारमें तो दूसरा करण नहीं है। यदि उसमें देवदचादिका प्रयल और उसमें मन, बुद्धि इत्यादि करणपरम्परा लगाते चलो, तो दोष देते हैं-] अन्यथा करणपरम्परा माननेसे तो अनवस्था दोप आ जायगा, अर्थात् करणपरम्पराके कहीं भी न रुकनेसे मूलकरणकी भी सिद्धि नहीं हो सकेगी। शक्का-'इस न्र्से ही प्राण, मन और सब इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं।' इत्यादर्थक आगमसे इन्द्रियोंकी प्रामाणिक प्रतीति होती है।।
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६१६ विवरण्रमैयसंग्रहं [सूत्र १, वर्णक ४
तेः। न च मनोवत्साक्षिवेद्यानीन्द्रियाणि, रूपादिज्ञानाख्यं लिङ्गमनपेक्ष्य साक्षिमात्रेण चक्षुरादीनां प्रतिपत्तेरभावात्। तस्मान्न सन्त्येवेन्द्रियाणीति।
तत्संस्कारहितास्तानि जानन्ति किन्तु गोलकान्येव। यन्तु तेपामिन्द्रियाणामहङ्कारकार्यत्वं सांख्यैरुच्यते तत्र किमध्या- त्माडहङ्गार: कारणं कि वा कृत्सकार्यव्यापिनी काचिदहङ्गाराख्या प्रकृतिः १ उभयत्राऽषि नाडस्ति किमपि मानम्। अथ द्वितीयपक्षे नाना- पुराणवचनानि मानम्, तन्न, श्रुतिविरोधात्। 'अन्नमयं हि सोम्य मन समाधान-यह शङ्का उचित नहीं है; कारण कि शास्त्रजनित संस्कारसे सर्वथा विहीन पामरोंको भी इन्द्रियोंकी प्रतीति होती है। इन्द्रियोंको मनकी भाँति साक्षिवेद्य भी नहीं मान सकते, कारण कि रूपादिकी प्रतीतिरूप हेतुकी अपेक्षाके बिना केवल साक्षीसे ही आंख आदि इन्द्रियोंकी प्रतीति नहीं होती है। [अर्थात् रूपादिज्ञान द्वारा ही साक्षी चक्षुरादि इन्द्रियोंकी प्रतीति करता है। मनकी भाँति उपलब्त्रिसामान्यसे नहीं ]। इसलिए इन्द्रियाँ हैं ही नहीं। नहीं, इन्द्रियोंके विषयमें ऐसा शास्त्र द्वारा ही जाना जाता है कि गोलकसे अतिरिक्त ही इन्द्रियां हैं। शास्त्रीय संस्कारसे शून्य पामर उनको नहीं जान सकते, वे तो केवल गोलकोंको ही इन्द्रियाँ जानते हैं, [ इससे सूचित किया कि षौद्ध तथा मीमांसक शास्त्रीय वासनासे विहीन पामर हैं ]। इन्द्रियाँ अहङ्कारकी कार्य हैं, ऐसा सांख्यमतावलम्चियोंका जो कहना है, उसपर प्रश्न होता है कि क्या अध्यात्म अहंकार इनका कारण है? या सम्पूर्ण कार्यमात्रको व्याप्त करनेवाली अहक्कार नामकी कोई प्रकृति है?। [ अर्थात् आध्यामिक अह- क्वारसे इन्द्रियोंका जन्म है अथवा आधिदैविक अहक्कारसे?] दोनों प्रकारोंमें कोई भी प्रमाण नहीं है, दूसरे पक्षमें अनेक पुराण-वचन प्रमाण हैं, ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि ऐसा माननेमें श्रुतिसे विरोध आता है। [श्रुति-विरोध (१) 'त्रिविधोऽयमहद्कारो महत्तत्वादजायत। इन्द्रियाणां ततः सृष्टिरगुणद्वारा महा- मुने । ॥' हे महामुनिजी, यह आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीन प्रकारका अहक्कार महत्तत्वसे उत्पन्न हुआ है। और इस अहद्वारसे गुणोंके द्वारा इन्द्रियोंकी सृष्टि हुई है। इत्यादि पुराण-वचन समझने चाहिएँ।
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इन्द्रियोंके भौतिकत्वका खण्डन] भीपातुंचांदसहित ६१७
आपोमयः ग्राणस्तेजोमयी वाक' इत्यादिश्ुतौ भृतविकारत्वानगमात्। अतः पुराणवचनानीन्द्रियाणामहङ्गाराधीनतामात्रं प्रतिपाद्यन्ति। यच्च शुष्कतार्किकभौतिकत्वमिन्द्रियाणामुक्तम्, तदप्ययुक्तम्; तैर्मानस्य वक्तुमशक्यत्वात् । इन्द्रियाणि भौतिकानि, सावयवत्वात्; सावयवत्वं च मध्यमपरिमाणत्वादिति चेद्, न; इन्द्रियाणामणुपरिमा- णत्वेऽपि वाधाभावेन हेत्वसिद्धेः । विपयावभासस्याऽप्यणुत्वग्रसङ्गो वाध इति चेट्, न; त्वन्मतेऽणुपरिमाणेनाऽपि मनसा विस्तृतात्मादि- दिखलाते हैं-]'हे सौम्य! मन अन्नमय अर्थात् अन्नका विकार है तथा प्राण जलका और वाणी तेजका विकार है' इत्यर्थक श्रुतिसे इन्द्रियाँ भृतकी विकार हैं, ऐसा प्रतीत होता है, अतः उक्त श्रुतिसे विरोधका परिहार करनेके लिए पुराणके वचनोंसे इन्द्रियोंका अहक्वारके अधीन रहना केवल प्रतिपादित होता है। और भी जो शुष्क तर्कवादी वैशेपिक-मतानुयायियोंका कहना है कि इन्द्रियाँ भौतिक हैं [वैशिपिक केवल तर्क द्वारा इन्द्रियोंको भृतविकार मानते हैं, शासत्रसे नहीं, इसलिए शास्त्रीयवासनासे शुन्योंको भी तर्क द्वारा जान लेना प्राप्त हो जाता है कि इन्द्रिय भूतविकार हैं, इससे उक्त कथनका खण्डन हो जाता है कि शास्त्र द्वारा ही इन्द्रियोको गोलकसे अतिरिक्त जाना जा सकता है] वह भी युक्तिसङ्गत नहीं है, कारण कि वे इसमें म्रमाण नहीं दे सकते। शङ्का-इन्द्रियाँ भूतविकार हैं, क्योंकि वे अवयवयुक्त हैं, और उनका अवयवयुक्त होना मध्यमपरिमाणसे सिद्ध होता है। [मध्यमपरिमाणवाले घटादि सब जैसे सावयव हैं, वैसे इन्द्रियाँ भी सावयव होंगी ] यह अनुमान इन्द्रियोंके भौतिकत्वमें प्रमाण है। समाधान-ऐसा नहीं है, कारण कि इन्द्रियोंको अणुपरिमाण मान लेनेमें भी बाध नहीं आता है, अतः मध्यमपरिमाणत्वरूप हेतु असिद्ध है। शक्ञा-इन्द्रियोंको अणुपरिमाण माननेपर उनके कार्यस्वरूप विषय- अ्रत्यक्षको मी अणुपरिमाण मानना होगा, इसलिए इन्द्रियोंको अणुपरिमाण नहीं मान सकते। समाधान-उक्त तर्क उचित नहीं है, कारण कि तुम्हारे मतके अनुसार अणुपरिमाणवाले मनसे भी महत्परिमाणवाले आत्मा आदि पदार्थोंका प्रत्यक्ष
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६१८ विवरणप्रमेयसंग्रहं [सूत्र १, वर्णक ४
वस्तुदर्शनसद्भावात्। चक्षुः रूपगुणवत्प्रकृतिकम्, रूपादिपु पञ्चसु मध्ये रूपस्यैवाऽभिव्यञ्जकत्वाद्, यद्यस्य नियमेनाऽभिव्यञ्जकं तत् तद्गुणवत्य्- कृतिकम् , यथा रूपाभिव्यञ्ञको रूपप्रकृतिको दीप:, एवमन्यत्राऽप्यू- हनीयमिति चेद्, न; शव्दस्यैवाऽभिव्यञ्जके श्रोत्रे शब्दगुणवदाकाशा- कर्णशष्कुल्यचच्छिनाकाशमात्रस्य त्व्रया
होते देखा जाता है। [अतः इन्द्रियोंके अणु माननेपर मी उक्त दोप नहीं आता। ] पुनः दूसरे वर्क द्वारा इन्द्रियोंका भौतिकत्व सिद्ध करते हुए शक्का करते हैं-] चक्षु इन्द्रिय रूपचत्-प्रकृतिक है अर्थात् चक्षुरिन्द्रियकी प्रकृति रूपवान् द्रव्य है, क्योंकि वह रूपादि पांच गुणोंमें से केवल रूपकी अभित्यक्ति करती है। नियम है कि जो जिसकी व्यभिचारके विना अभिन्यक्ति करता है, वह उस गुणवाली प्रकृतिका ही विकार होता है, जसा कि रूपको अभिव्यक्त करनेवाला रूपवत्-प्रकृतिक (तैजस) दीप है। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियविषयक भी अनुभव करना चाहिए। [अर्थात् जिह्ा इन्द्रिय रस गुणवाले जलका विकार है, क्योंकि रूपादिमें से केवल रसका ग्रहण करती है, जैसे मुखसे उत्पन्न होनेवाली लार, नासिका गन्व गुणवाली पृथ्वीका विकार है, अतएव रूपादिमें से गन्घका ही ग्रहण करती है, जैसे हींग आदि द्रव्य एवं त्वग्रिन्द्रिय स्पर्शगुणक वायुका विकार है, क्योंकि रूपादिमें से स्पर्शका ही ग्हण करती है, जसे पंखेकी हवा, इस प्रकार अन्य अनुमान समझने चाहिएँ। उक्त अनुमानमें अनुकूल तर्कका अभाव दिखला कर समाधान करते हैं-] ऐसा नहीं, कारण कि केवल शब्दकी अभिव्यक्ति करनेवाले कानमें व्यभिचार है, क्योंकि शन्दगुणवाले आकाशका कर्णेन्द्रिय विकार नहीं है, कर्णेन्द्रियको तो तुम कानके मीतर विद्यमान एक प्रकारका छिद्ररूप आकाश ही मानते हो*। [ इसलिए श्रोत्रग्राह्य विशेषगुणवाले द्रव्यसे उत्पन्न न होनेपर मी जैसे कर्णे- न्द्विय शब्दमात्रका ग्रहण करती है, वैसे दूसरी इन्द्रियाँ मी तत्-तद्-विशेष गुणवाले द्रव्यकी विकार न होनेपर भी तचतदू-विशेष गुणकी अभित्यञ्जिका होतीं हैं, ऐसा माननेमें कोई हानि नहीं है।
- आकाश एक ही हैं, उसका कोई सजातीय मेद तो हैं ही नहीं, अतः वह किसीका आरम्भक नहीं है।
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इन्द्रियोंके भौतिकत्वका खण्डन ] भापानुवादसहित ६१९
श्रोत्रत्वाभ्युपगमात्। विशेपव्यासौ नाडनैकान्तिकतेति चेद्, एवमप्यतिप्रसङ्गो दुर्यारः । रूपादिचतुष्टयाभिव्यञ्ञकस्य मनसो भूतचतुष्टयारभ्यत्वस्य सुसाधत्वात्। अभृतस्याऽप्यात्मादेर्ग्राहहिकतया मनो न भूतारभ्यमिति चेतु, तहिं संख्यापरिमाणादेरपि ग्राहकतया चक्षुरादीनां भूतारभ्यत्वं न स्यात्। असाधारणविपयारभ्यत्वाङ्गीकारे सति भौतिकत्वसिद्धिरिति चेत, तर्हि मनोऽप्यसाधारण चिपयेणाऽऽत्मनाडडरभ्येत। एकद्रव्यस्याऽडत्मन:
शङ्का-विशेप व्याप्ति माननेमें व्यभिचार नहीं आता है [ अर्थात् 'जो जिसके विशेष गुणका अभिव्यञ्ञक है' इत्यादि नियमको इन्द्रियसामान्य- विपयक न मानकर रूपादिचतुष्टयके ग्राहक चक्षुरादि-इन्द्रिय-विशेष-विषयक ही मानेंगे, इससे श्रोत्रेन्द्रियमें व्यभिचार नहीं आ सकता है, यह भाव है] समाधान-उक्त प्रकारसे विशेषविषयक नियम माननेमें मी अति- प्रसन्न नहीं हटाया जा सकता है, कारण कि उक्त व्याप्तिसे रूपादि चारोंकी (रूप, रस, गन्ध और स्पर्शकी) अभिव्यक्ति करनेवाला मन मी पृथ्वी, जल, तेज, वायु-इन चारों भूरतोंका विकार हो जायगा, जो तुमको मी इष नहीं है। यदि कहो कि भूतोंसे अतिरिक्त आत्मादिकी मी मन अभिव्यक्ति करता है, इसलिए मन भृतोंका विकार नहीं हो सकता; तो भूतके विशेष गुणोंसे अन्य संखया तथा परिणाम आदिकी अभिव्यञ्जक होनेसे चक्षुरादि इन्द्रियाँ भी भूतकी विकार नहीं हो सकतीं। शङ्ा-असाधारण विपयसे उत्पन्न होती हैं, ऐसे नियमका अङ्भीकार कर लेनेपर इन्द्रियाँ भौतिक सिद्ध हो सकती हैं, [अर्थात् जो जिसका असाधारण-अनन्यग्राह्य-विपय है, वह उस विपयवालेसे उत्पन्न होता है, इस व्याप्तिसे चक्षुका रूप असाधारण विषय है, इसलिए चक्षु रूपवाले तेजोरूप द्रव्यसे उत्पन्न होता है, इसी प्रकार अन्य इन्द्रियोंके विषयमें भी समझना चाहिए, यह सारांश है ]। समाधान-इस निर्णयके अनुसार तो मन भी उसके असाधारण विषय आत्मासे बना हुआ माना जाना चाहिए, [क्योंकि आत्मा भी मनसे इतर इन्द्रियोंके द्वारा ग्राह नहीं है, अतः वह मनका ही असाधारण विषय है]। आत्मरूप एक द्रव्यसे सावयव द्रव्यका आरम्भ भले ही न हो, परन्दु मनोरूप
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६२० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ४
सावयवद्रव्यानारम्भकत्वेऽपि निरवयवं मनोद्रव्यं अत्यारम्भकत्वं किं न स्याद्। तस्मान्न शुष्कतर्कादिन्द्रियाणां भौतिकत्वरिद्धिः किन्त्वागमादेव। तानि पुनरिन्द्रियाणि सर्वगतानीति योगा: अ्रतिपेदिरे। तदपि मानहीनम्। आत्मेन्द्रियमनांसि सर्वगतानि सर्वत्र-दष्टकार्यत्वादाकाशवत् ; दृश्यते हि ज्ञानं तत्कार्य सर्वत्रेति चेद्, न; सर्वत्रेत्यनेन कृत्सजगद्विव- क्षायामसिद्धिप्रसङ्गात्। यत्र शरीरं तत्र सर्वत्रेति विवक्षायां शरीरे निरवयव द्रव्यका उससे आरम्भ क्यों नहीं होगा? [ अर्थात् अकेले द्रव्यसे सावयव द्रव्य नहीं हो सकता, क्योंकि सावयवका आरम्भक सङ्कात ही होता है, परन्तु अवयवशून्य मनका आरम्भक अकेले आत्मरूप द्व्यके होनेमें कोई बाधा नहीं है, यह तात्पर्य है। ] इसलिए शुष्क याने शास्त्राऽननुगृहीत तर्कसे इन्द्रियोंका भौतिक होना सिद्ध नहीं हो सकता, किन्तु शास्त्र द्वारा ही इन्द्रियोंका भौतिकत्व सिद्ध हो सकता है। वे * इन्द्रियां सर्वगत-चारों ओर प्रसरणमें समर्थ व्यापक परिमाणवाली- हैं, ऐसा पातञ्ञल योगदर्शनकार मानते हैं। परन्तु उनका ऐसा मी मानना प्रमाणशून्य है। यदि कहो कि आत्मा, इन्द्रिय तथा मन सर्वगत (विभु) हैं, सभी जगह इनके कार्यकी उपलन्धि होनेसे, आकाशके समान। [अर्थात् जैसे आकाशका सर्वत्र ही शब्दरूप कार्य देखा जाता है, अतः वह विभु है, वैसे ही आत्मादिके ज्ञान आदि कार्योंकी मी सर्वत्र उपलब्धि होती है, अतः वे विभु हैं ] क्योंकि उनका कार्यभुत ज्ञान सर्वत्र ही देखा जाता है, इस अनुमानसे उनकी व्यापकता सिद्ध होगी, तो ऐसा कहना भी नहीं वनता, कारण कि उक्त हेतुके अन्तर्गत 'सर्वत्र' पदसे यदि सम्पूर्ण संसारकी विवक्षा करोगे तो हेतुकी असिद्धि है, [ क्योंकि शरीरके वाहर कहीं भी संसारमें इन्द्रिया- दिकार्य-ज्ञान नहीं होता ]। यदि जहां शरीर है, वहां सर्वत्र (शरीरमें) ऐसी विवक्षा करो अर्थात् 'सर्वत्र' पदसे सारा संसार न लेकर सम्पूर्ण शरीर
- 'कानि पुनः' इत्यादिसे लेकर 'किन्त्वागमादेव' तकके अ्रन्थसे इन्द्रियोंके स्वरूप तथा कारणविषयक विप्रतिपत्तिका निराकरण करके सिद्धान्त किया कि गोलकसे अतिरिक्त ही इन्द्रियां हैं और उनके कारण आकाशादि भूत हैं। अव 'तानि पुनः' से लेकर-'मन इति सिद्धंम्' पर्यन्त प्रघट्टकसे इन्द्रियाँ तथा मनमें प्रमाणविपयक विप्रतिपत्ति दिखलाकर सिद्धान्त मतका प्रदर्शन करते हैं।
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इन्द्रियोंकी प्राप्यकारिता और परिच्छिन्नता ] भाषानुवादसहित ६२१
एवाडनैकान्तिकत्वम्, दृश्यते हि यत्र शरीरं तत्र सर्वत्र शरीरकार्यम्। न च शरीरस्य सर्वगतत्वमस्ति। अथेन्द्रियाणि सर्वगतानि, परोपाधिकगमनत्वात्, आकाशवत्; यथाऽडकाशस् गमनं घटाद्युपाधिकं तथेन्द्रियाणां शरीरोपाधिकं गमनमिति चेदू, न; शरीरावयवेप्वनैक्ान्तिकत्वात्। आ्णोपाधिकं हि तेपां गमनम्। किश्चेन्द्रियाणां सर्वगतत्वे युगपत् सर्वचिपयोपलष्धि: स्यात्। शरीर एव वृत्तिलाभाननाडयं दोप इति चेत्, तर्हि चहिरिन्द्रिय- सन्भावकल्पना न प्रमाणप्रयोजतवती। तस्मादसर्वगतानीन्द्रियाणि। यत्तु तान्यग्राप्यकारीणीति सुगताः कल्पयन्ति, यदयुक्तम्; तत्र
केवल लेना हो, तो शरीरमें ही व्यमिचार होगा, कारण कि देखा जाता है कि जहाँ जहाँ शरीर है, वहाँ सर्वत्र शरीरका कार्य-चलन, स्थिति, आसनादि- कुछ-न-कुछ अवश्य रहता है, परन्तु इस सर्वत्रदष्टकार्यत्वरूप हेतुसे शरीरका सर्वगतत्व नहीं देखा जाता है। यदि कहो कि इन्द्रियाँ सर्वगत हैं; दूसरेके कारण गमनशील होनेसे, आकाशके समान अर्थात् जसे आकाशका गमन घटादिरूय उपाधिके द्वारा होता है, वैसे ही इन्द्रियोंमें गमन शरीररूप उपाधिके द्वारा होता है, इस अनुमानसे इन्द्रियोंका सर्वगतत्व सिद्ध होगा, तो यह कहना मी उचित नहीं है, कारण कि शरीरके अवयवोंमें ही व्यभिचार बना हुआ है, क्योंकि उनका प्राणरूप उपाधिसे ही गमन होता है। [ परन्तु शरीरके अवयव सर्वगत नहीं हैं। दूसरा भी दोष देते हैं-] इन्द्रियोंको सर्वगत माननेमें एक साथ सभी विपयोंका ज्ञान होना चाहिए। यदि कहा जाय कि शरीरमें ही इन्द्रियोको अपने वृत्तिरूप कार्यका उत्पादन करनेकी योग्यता प्राप्त होती है, अतः उक्त दोप नहीं आता [अर्थात् सर्वगत होते हुए भी कार्यजनन- योग्यता सर्वत्र नहीं है, किन्तु परिच्छिन्न शरीरमें ही है, अतः उक्त दोषका' प्रसद्न नहीं है] तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि (इन्द्रियोंको सर्वगत मानकर शरीरके) बाहर इन्द्रियोंकी सच्ताकी कल्पना करना प्रमाण तथा प्रयोजन दोनोंसे शुन्य है, इसलिए इन्द्रियोंको सर्वगत नहीं मान सकते। बौद्धोंकी जो यह कल्पना है कि इन्द्रियाँ अप्राप्यकारी हैं [ अर्थात् परिच्छिन्न इन्द्रियाँ शरीरके एक देशमें ही स्थित हैं और विषय देशमें न जाकर ही ज्ञान प्राप्त करती हैं], वह युक्त नहीं है, क्योंकि यहाँपर प्रश् होता है कि उन इन्द्रियोंमें ७९
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६२२ विचरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र १, चर्णक ४
किं चक्षुःश्रोत्रयोरेवाऽम्रा्यकारित्वम् उत्तेतरेपामपि? न तावदितरेपाम्; दूरत एव स्पर्शरसगन्धोपल्धिग्रसङ्गात्। नाऽपि प्रथमः, विमते चक्षु :- श्रोत्रे आप्यकारिणी, वाह्येन्द्रियत्वाद्, घ्राणादिवत्, तेजसस्त्वतिदुरशीघ्र- गमनदर्शनादुन्मीलनमात्रेण चक्षुपो घ्रवादिप्राप्तिरविरुद्धा। शव्दस्य च वीचिसन्तानवत् परम्परया श्रोत्रसमवायः ग्राप्तिरिति यत्तार्किकैरुच्यते तद्सत्, तथा सति 'इह श्रोत्रे शब्दः' इति प्रतीयेत; प्रतीयते तु 'तत्र शब्दः'
क्या आँख और कान ही अप्राप्यकारी (शरीर देशमें ही रहकर ज्ञानके जनक) हैं? या और इन्द्रियाँ मी। इनमें आंख, कानसे अतिरिक्त इन्द्रियोंको तो ऐसा नहीं मान सकते, क्योंकि दूरसे ही स्पर्श, रस तथा गन्धका ज्ञान मानना पड़ेगा। प्रथम पक्ष (आंख तथा कानमें ही अप्नाव्यकारित्व मानना ) भी नहीं हो सकता, कारण कि विमत (विवादगस्त) आंख और कान प्राप्यकारी हैं (विषय देशमें जाकर ज्ञानके जनक हैं), वास्ेन्द्रिय होनेसे, नाक आदि इन्द्रियोंके समान । [ घ्राणादि इन्द्रियोंमें उक्त अतिप्रसन्नका वारण करनेके लिए प्राव्यकारित्व मानना आवश्यक है, अतः इन्हींका दष्टान्त करके वाह्येन्द्रियमात्रमें प्राप्यकारिता मानना उचित है। आंखको प्राप्यकारी माननेमें उसके खुलते ही विलम्बके विना कोशों दूर न जा सकनेकी आशङ्काका समाधान करते हैं-] बड़ी शीघ्रतासे अत्यन्त दूर तक तेज चला जाता है, यह प्रत्यक्ष है, इसलिए खुलते-खुलते ही आंखोंका ध्रुवादि देश तक जाना भी कोई विरुद्ध नहीं है। [इन्द्रियोंमें अप्राप्यकारित्व मानकर नैयायिकसम्मत शव्दकी कान तक प्राप्तिका खण्डन करनेके लिए उनके मतका अनुवाद करते हैं- ] तरङ्गोंके सन्तानके समान परम्परासे कानके साथ शब्दका समवाय-सम्बन्ध- कर्णेन्द्रियप्राप्ति है [ अर्थात् जैसे जलमें उत्पन्न हुई प्रथम तरङ्ग क्रमशः दूसरी-दूसरी तरङ्गोंको उत्पन्न करती हुई परम्परासे तटतक पहुँच जाती है, वैसे ही प्रथम उत्पन्न हुआ आकाशसमवायी शब्द क्रमशः दूसरे-दूसरे शब्दोंको उत्पन्न करता हुआ कर्णेन्दिय तक अपना सम्बन्ध प्राप्त करता है ], ऐसा जो तर्कवादियोंका कहना है-वह भी युक्तियुक्त नहीं है, कारण कि उक्त रीतिसे 'इस कानमें शब्द है' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, परन्तु प्रतीति तो यह होती है कि वहां-उस अमुक प्रदेशमें-शब्द हो रहा
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मनकी सावयवता] भापातुंवादस हित ६२३
इति। तस्माद्यथानुभवं श्रोतरस्यैव तत्र गमनं कल्पनीयम्। तदेवं भौतिकानि परिच्छिन्नानि प्राप्यकारीणीन्द्रियाणि सन्तीति सिद्धम्। किं तर्हि मनो नाम यस्मिन्नाऽऽत्मत्वमपरे लोकायतैकदेशिनो मन्यन्ते। नित्यं निरवयवमणुपरिमाणं मन इति तर्किकाः । तत्र न तावन्नित्यम्, परिच्छिन्नत्वाद्, घटवत्। विमतं नित्यम्, निरवयवद्रव्यत्वादात्मवद्,इति चेढ्, न; हेत्वसिद्धेः । विमतं सातयचम्, करणत्वाद, चक्षुरादिवत्। अन्यथा मनसोऽन्मयत्वं श्रत्युक्तं वाध्येत। कथं तर्हिं मूर्तद्रव्यानभिघात इति चेटू, जीवनद्शायां देहाद्वहिनिरगमनाभावादिति त्मः । मरणद्शायां तु
है। इसलिए अनुभवके अनुसार उस देशमें कानके ही जानेकी कल्पना करना उचित है। इस प्रकार निर्णयके अनुसार सिद्ध हुआ कि इन्द्रियाँ भौतिक, परिच्छिन्न (शरीरके एक देशमें रहनेवाली) तथा प्राप्यकारी हैं। [प्रसअसे मनोविषयक विप्रतिपत्तिको दिखलाते हैं-] तो मन क्या वस्तु है, जिसको कि कुछ नास्तिक लोग आत्मा मानते हैं। इस विषयमें तार्किक लोग (न्याय-चेशेपिक) मनको नित्य, अवयवशुन्य तथा अणु- परिमाण मानते हैं। इसमें प्रथम तो मन नित्य हो नहीं सकता, क्योंकि घटके समान वह परिच्छिन्न है। शक्का-'विमत मन नित्य है, अवयवशुन्य द्रव्य होनेसे, आत्माके समान', इस अनुमानसे मन नित्य माना जा सकता है। समाधान-नहीं, नित्य नहीं माना जा सकता, कारण कि अवयव शून्यद्रव्यत्व- रूप हेतु मनमें स्वरूपतः असिद्ध है, क्योंकि 'मन सावयव है, करण (ज्ञानसाघन) इन्द्रिय होनेसे, आंख आदिके तुल्य', इस अनुमानसे मन सावयव सिद्ध होता है। [अनुकूल तर्कके अभावकी आाशक्काका समाधान करते हैं-] अन्यथा-मनको सावयव न माननेसे-श्रुतिमें प्रतिपादित मनका अन्नविकार होना वाघित हो जायगा। शझा-यदि मन अन्नविकार है, तो मूर्त द्रव्यसे उसका प्रतिघात- प्रतिबन्ध-होना कसे वारण किया जा सकता है? समाधान-जीवनदशामें-मनुष्यादिके, जीते जी-वह (मन) देहसे वाहर नहीं जाता है। [अतः मूर्त द्रव्य द्वारा उसका प्रतिबन्ध नहीं होता, इससे मूर्तद्व्यानभिघात मी मनको निरवयव सिद्ध करनेमें समर्थ नहीं हो सकता।]
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६२४ विचरणत्रमेयसंग्रह [सूत १, वर्णक ४
सावयवत्वेनाऽभिमतानां चक्षुरादीनामप्यप्रतिघातो विद्यव एव। अत एव सावयवत्वात् संयोगविभागवत्वाच्च घटादिवन्नाऽणुपरिमाणत्वम्। सर्वगतत्वे च युगपत् सर्वेन्द्रियसंयोगात् सर्वज्ञानग्रसङ्ग:। मध्यमपरिमाणत्वे तुन कोऽपि दोप:। तदाऽपि स्थूलसक्ष्मेपु हस्तिपुत्तिकादिदेहेपु क्रमेण प्राप्य- माणेपु कथं तत्तदेहसमानत्वेन वृत्तिरिति चेद्, अवयचोपचयापचया- भ्यामिति त्रूम: ।
और मरनेपर तो सावयव माने हुए चक्षुरादि इन्द्रियोंका मी मूर्त द्रव्यसे प्रतिघाताभाव रहता ही है। [शक्का करनेवाले वादीका तात्पर्य यह है कि जैसे सावयव चक्षुरादि इन्द्रियोंका मूर्त द्रव्य-दिवाल आदि-से प्रतिबन्ध होता है, वैसे ही मनका किसीसे भी प्रतिबन्ध नहीं देखा जाता है, इसलिए मनको निरवयव मानना चाहिए। समाधाताका तात्पर्य है कि जीवनदशामें इन्द्रियोंके प्राप्यकारित्व-पक्षमें चक्षुरादि इन्द्रियोंके समान मनका देहके वाहर निर्गमन न होनेसे मूर्त द्रव्य उसका प्रतिवन्ध नहीं कर सकता और मरणदशामें अवश्य मनका वहिनिर्गमन होता है; परन्तु उस समय चक्षुरादिके समान मनका भी प्रतिबन्ध सूर्त द्वारा नहीं हो सकता। ] इसलिए सावयव तथा संयोग-विभाग-शाली होनेपर भी मनको घटादिके समान अणुपरिमाण नहीं मान सकते अर्थात् जैसे घटादि अणुपरिमाण नहीं, वैसे मन भी अणु नहीं है। और सर्वगत-व्यापकी- मृत महत्परिमाणवाला-माननेसे एक साथ ही सब इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध हो जानेसे सव विपयोंका ज्ञान होनेका प्रसङ्ग आ जायगा। मध्यम- परिमाण माननेमें तो कोई भी दोप नहीं आता। शक्का-मध्यमपरिमाण माननेपर भी बड़े और छोटे हाथी तथा फर्तिंगाके-पतंगाके-क्रमशः प्राप्त होनेवाले शरीरोंमें तत्तत् देहके समानरूपसे रहना कैसे हो सकेगा [ अर्थात् हाथीके शरीरका परिवर्तन होनेपर कदाचित् चींटीकी देहकी प्राप्ति होती है और चींटीकी देहका परिवर्तन होनेपर हाथीके शरीरकी प्राप्ति होती है, इस क्रमसे मिलनेवाले स्थूल-सूक्ष्म शरीरोंमें स्थूल-सूक्ष्म मनका समावेश कैसे हो सकेगा ? हाथीके शरीरका निर्वाह अतिसूक्ष्म चींटीके मनसे कैसे होगा और अतिसूक्ष्म चींटीके शरीरमें इतने वड़े हाथीका मन कैसे आ सकेगा?] समाधान-अवयवोंके उपचय तथा अपचयसे होगा ऐसा हम
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मैनकी सावयवता और परिच्छिनता] भापानुवादसाहेत ६२५.
शाक्यास्तु समनन्तरप्रत्यय एवोचरज्ञानकरणतया मन इति प्रति- पंदिरे, तदसङ्गतम्; व्याप्तिमनपेक्ष्य केवलस्य पूर्वज्ञानस्योत्तरज्ञानजनक- त्वायोगात्। लिद्गज्ञानस्य व्याप्तिसापेक्षस्यैव लिद्विज्ञानजनकत्वदर्शनाद्। शव्दज्ञानं व्यापयनपेक्षमेवाऽर्थज्ञानजनकमिति चेद्, न; त्वन्मते शब्द- स्याऽनुमानान्त:पातितया तत्राऽपि व्याप्यपेक्षत्वाद्। विशेपणज्ञानं व्याप्य- नपेक्षमेव विगिष्टज्ञानजनकमिति चेद्, न; विशिष्टज्ञानस्य संग्रयोगजन्य- त्वात्। अथ समनन्तरातीतप्रत्यय उत्तरज्ञानं न जनयति किन्तु
कहते हैं। [अर्थात् चीटीके गनके अययव हाथीका शरीर पानेपर बढ़ जाते हैं और चीटीके शरीरमें आनेवाले हाथीके मनके अवयव घट जाते हैं ] । बौद्धोंका कहना है कि आगे होनेवाले ज्ञानके प्रति समनन्तरपत्यय कारण है, अतः वही (समनन्तरप्रत्यय ही) मन है, परन्तु यह मत मानने योग्य नहीं है; कारण कि व्यापिकी अपेक्षा न करके केवल पूर्व ज्ञानको उत्तर ज्ञानका जनक मानना युक्तियुक्त नहीं हो सकता; कारण कि व्यासिकी अपेक्षा फरके ही हेतुका ज्ञान साध्यके ज्ञानका जनक होता है, यही अनुभव है। शका-शन्दसे उत्पन्न हुआ ज्ञान व्याप्तिकी अपेक्षा न करके ही अर्थ- ज्ञानका (शान्दवोधका) जनक होता है। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि तुम्हारे मतमें शब्द प्रमाण अनुमानके ही अन्तर्गत माना गया है, अतः उसमें (शब्दज्ञानमें) व्याप्तिकी अपेक्षा है ही। शक्ा-विशेपणज्ञान व्यापिज्ञानके बिना ही विशिष्टज्ञानका जनक हो जाता है[अतएव विशेपणीभूत पूर्वज्ञान स्वतन्त्ररूपसे ही उत्तर ज्ञानका जनक हो जायगा ]। समाधान-नहीं, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि संप्रयोगसे विशिष्ट ज्ञान होता है। [ जैसे 'नीलोडयं घटः' (यह नीला घड़ा है) इस आकारका विशिष्ट ज्ञान विशेषणीभूत नीलादि पदार्थके ज्ञानके संस्कारसे सहकृत इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वैसे ही सभी विशिष्ट ज्ञान संप्रयोगसे ही उत्पन्न होंगें, समनन्तरप्रत्यय- रूप मनसे नहीं, यह माव है। ] यदि मानो कि सममन्तर पूर्व ज्ञान उसतर ज्ञानका
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६२६ [सूंत्र १, वर्णक ४
तस्याSकारमात्रं समर्पयतीति चेद्, न; आकाराकारिणोरमेदाद। आका- रस्य स्वाभाविकतयाऽन्यापेक्षाभावात्। तस्मादन्यदेव सावयवं मन इति सिद्धम्। ननु कश्चाडयं वास्तव आत्मा यो देहादिपु विज्ञानान्तेपु आ्रान्तैर्वादि- भिरारोप्यते। तत्र सर्वगतोऽयं जीव आत्मेति केचित्, तदसत्; शुष्कतार्किकाणां साधकाभावात्। अथ मतम्-देहाद्वहिरन्तथ्र सर्वाणि भोगसाधनान्यात्मभोगायैव व्याप्रियन्ते। तव्यापारश्ाऽदष्टवदात्मसंयोगापेक्षस्ततोऽसौ सर्वगत इति। तत्र किं यस्मिन्नाऽऽत्मप्रदेशेऽदष्ट तत्प्रदेशे संयोगोऽपेक्ष्यते उताऽदृष्टो- जनक नहीं है। किन्तु उसको (उत्तर ज्ञानको) आकारमात्र देता है, * तो यह भी सिद्धान्त उचित नहीं है, कारण कि आकार और जिसका वह आकार है, ऐसे आकारीमें किसी प्रकारका भेद नहीं है और आकार स्वाभाविक होनेसे उसमें दूसरेकी अपेक्षा नहीं है, इसलिए समनन्तर प्रत्ययसे मिन्न ही कोई दूसरा सावयव मन सिद्ध होता है। [अब सुख्य उपादेय आत्माके विषयमें विप्रतिपत्ति दिखलाते हैं-] यह वस्तुभूत आत्मा ऐसा कौन-सा पदार्थ है ? जिसका कि अ्रममें डूवे हुए नास्तिकादिवादी देहसे लेकर विज्ञान पर्यन्त अनात्मपदार्थोंमें आरोप करते हैं। इनमें से कुछ वादियोंका कहना है कि सर्वत्र व्यापक यह जीव ही आत्मा है, परन्तु यह कथन युक्त नहीं है, कारण कि शुष्क तर्कवादियोंके लिए उक्त मतकी सिद्धि करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है। यदि यह माना जाय कि देहसे वाहर और भीतर सभी प्रकारके भोगोंके साधन आत्माके भोगके लिए ही प्रयत्नशील रहते हैं। और उन भोगके साधनोंका व्यापार अद्ष्टाश्रय आत्माके साथ संयोगकी अपेक्षा रखता है, इसलिए यह आत्मा (सर्वगत) व्यापक है, ऐसा मानना चाहिए। इस मतमें प्रश्न उठता है कि क्या जिस प्रदेशमें अदृष्ट है, उसी प्रदेशमें आत्माके संयोगकी अपेक्षा होती है, या अदष्टसे उपलक्षित आत्माका संयोग अपेक्षित है अर्थात् *वौद्धमतमं अधिपति-चक्षुरादि, सहकारी आलोक, समनन्तर तथा आलम्वन ये चार प्रत्यय ज्ञानके जनक हैं। इनमें पूर्व प्रत्ययसे ज्ञानस्वरूप, दूसरे प्रत्ययसे ज्ञानकी प्रकटता (सपष्टता), तीसरेसे वोधका आकार तथा चौथेसे घटादिका आकार होता हैं।
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आत्माकी स्वयंम्रकाशता ] भापानुचादसहित ६२७
पलक्षतात्मसंयोगः १ नाऽडद्य, देहावच्छिन्नात्मसमवेताद्प्टस्य स्वर्गभोग- हेतुत्वात्। न द्वितीय:, मोक्षेऽपि भोगप्रसङ्गाद। तस्मादागमादेव सर्वगतत्वसिद्धिः। न चाऽयमात्मा जड़:, प्रत्यक्षानुमानागमैः स्वप्रकाशत्वावगमात्। तत्र प्रत्यक्षं सौपुप्तमवगन्तव्यम्। अनुमानान्यपि आत्मा स्वप्रकाशः, स्वसच्तायां प्रकाशव्यतिरेकरहितत्वात, ग्रदीपवत् संवेदनवच्च । तथा विपय-
केवल आत्माका संयोग: इनमें प्रथम कल्प नहीं बन सकता, कारण कि देहा- वच्छिन्न आत्मामें रहनेवाले अदृष् स्वर्गरूप भोगके कारण हैं [अर्थात् इस भूलोकके देहमें रहनेवाले आत्मसमवेत अटप्टसे स्वरगमें भोग मिलता है, इससे अदष्टवान् मूलोक या मूलोकस्थ शरीरके प्रदेशसे भिन्न स्वर्गरूप प्रदेशमें भोगके मिलनेसे अटष्टवत् प्रदेशसे संयोगका होना सिद्ध नहीं हो सका] दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि मोक्षदशामें भी भोगके प्राप्त होनेका प्रसङ्क आ जायगा। आत्मसंयोग सर्वत्र ही है, इसलिए केवल आत्मसंयोग फलका (भोगका) जनक नहीं होता। [अन्यथा सवको सब कालमें सुखदुःखादि सब भोग हो जायँगे ] इसलिए आगम द्वारा ही आत्माका सर्वगत होना सिद्ध हो सकता है। (केवल झुष्क तर्कसे नहीं)। आत्मा जड़ है, ऐसी आशक्का भी नहीं करनी चाहिए, कारण कि ग्रत्यक्ष, अनुमान तथा शास्त्रोंके द्वारा आतमा स्वप्रकाश है, ऐसा ज्ञात होता है। इन प्रमाणोंमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे सुपुप्ति कालका प्रत्यक्ष लेना चाहिए। [सुषुप्तिसे उठनेके अनन्तर 'मैं आनन्दपूर्वक सोया' इस प्रकार सुपुप्तिकालमें अनुभूत सुखका स्मरण होता हैं, इससे सुषुपिकालमें सुखानुभवकी प्रयोजक किसी चक्षुरादिकी वृत्तिके न होनेके कारण वहां स्वयंप्रकाशात्मक आत्माका ही सद्भाव मानना होगा। वह आनन्द दुःखाभावरूप नहीं है, इस विषयमें प्रथम वर्णकमें ही विशदरूपसे वर्णन किया गया है। ] अनुमान प्रमाण भी अनेक हैं-जैसे 'आत्मा स्वप्रकाश है, अपने सद्भावमें प्रकाशके अभावसे रहित होनेसे, प्रदीप या संवेदन (ज्ञान) के समान । [यदि प्रदीप या ज्ञान विद्यमान हैं; तो सम्भव नहीं कि उनका प्रकाश न हो, उनका प्रकाश अवश्य होता है। घटादिके रहते हुए भी यदि आलोकादि सहकारी कारण न हों, तो उनका
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६२८ विचरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र १, वर्णक ४
प्रकाशकर्तृत्वात्, अदीपवत्। विषयग्रकाशाश्रयत्वात्, आलोकवत् अनिन्द्रियगोचरत्वे सत्यपरोक्षत्वात् संवेदनवत्। आत्मा सति धर्मिण्य जन्यप्रकाशगुण:, प्रकाशगुणत्वात्, आदित्यचत्। आगमश्र-'अन्नाडयं पुरुषः स्वयंज्योतिः' इत्यादिः। स चाऽयमात्मा सर्वशरीरेप्वेक एव, सर्वत्राऽहमित्येकाकारप्रत्ययवेदनीयत्वाद्, गोत्ववत्। शरीराणां भिन्नत्वा- देवाऽतीतशरीरादाविव न भोगानुसंधानप्रसङ्ग:। ननु तर्हयस्याऽपि मनुष्य-
प्रकाश नहीं हो सकता। और आत्मा तो प्रदीपादिके समान स्वप्रकाश है]। तथा (आत्माके स्वप्रकाशके साधनेमें अन्य मी हेतु हैं, जैसे) विषयप्रकाशका कर्ता होनेसे, दीपकके समान विषयप्रकाशका आश्रय होनेसे, आलोकके समान, इन्द्रियोंका विषय न होते हुए अपरोक्षरूप होनेसे, संवेदनके तुल्य (आत्मा स्वप्रकाश है)। एवं धर्मी होते हुए भी आत्मा अजन्य (किसीसे उत्पन्न न होनेवाले) प्रकाशरूप गुणवाला है, सूर्यके सदश । शास्त्र भी कहता है 'यहां सुपुप्तिमें यह पुरुष (आत्मा) स्वयंज्योति-स्वयं- प्रकाश-है' इस प्रकार प्रमाणसिद्ध यह आत्मा सम्पूर्ण शरीरोंमें एक ही है, कारण कि सर्वत्र 'अहम्' (मैं) इस प्रकार गोत्वके समान एक ही प्रकारकी प्रतीतिसे जाना जाता है। [जैसे सकल गोव्यक्तियोंमें गोत्वकी समानाकार प्रतीति होनेसे गोत्व एक ही अनुगत है, वैसे ही सकल मनुष्य-शरीरोंमें 'मैं- अहम्-' इत्याकारक अनुगत प्रतीतिसे अहम्-प्रतीतिवेदय भी एक ही है।] और शरीरोंका परस्पर भेद होनेसे ही अतीत शरीरोंमें जैसा भोगका स्मरण होता है, वैसा भोगके अनुसन्धानका प्रसङ्ग नहीं आ सकता। [यदि सभी शरीरोंमें आत्मा एक ही है, तो सबको समीके भोगके परिज्ञानकी प्रसक्ति होनी चाहिए, इस प्रकार पूर्वपक्षी आशङ्का करता है, इसपर समाधाताका कहना है कि जैसे एक ही देवदत्त आदिको अपने जन्म-जन्मान्तरोंमें अनुभूत भोगोंका अनुसंधान जन्मान्तरोंके शरीरोंके अलग अलग होनेके कारण नहीं होता, 'वैसे ही प्रकृतमें मी देवदत्त और यज्ञदच आदिके शरीरका परस्पर भेद होनेसे एकको दूसरेके भोगका अनुसंधान नहीं होता अर्थात् भोगानुसंधान एक ही शरीरमें होता है, भिन्न-भिन्न शरीरोंमें नहीं होता, यह भाव है।]
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आत्माके विपयमें विप्रतिपत्तियां ] भापानुवादसहित ६२९
शरीरस्य ग्रतिक्षणं परिणामभेदान्भेदे सत्यत्राऽप्यात्मनो भोगाननुसंधानं ग्रसज्येतेति चेद्, न; 'तदेवेदं शरीरम्' इति प्रत्यभिज्ञया तदेकत्वाव- गमात्। न च ज्वालाप्रत्यभिज्ञावद् भ्रान्तत्वम्, तत्र सूक्ष्मदर्शने अ्रत्यक्षत एव ज्वालानां भेददर्शनात्; अन्र तदभावाद्। तदेवमेक: स्वग्रकाश आत्मेति सिद्धान्त: । तमेतमात्मानमवैदिका देहादिवुद्धन्तपदार्थरूपत्वेन प्रतिपन्नाः मीमांसकादयस्तु तस्य देहादिव्यतिरेकं प्रतिपद्याऽपि कर्त्तारं भोक्तारं तमिच्छन्ति।
सर्वगतस्य तदेतत्सांख्या न सहन्ते; न तावदात्मनः कर्वृत्वं स्व्राभाविकम्, निरचयवस्याऽऽत्मनः परिस्पन्दपरिणामलक्षणक्रियाचेशा-
शक्का-तब तो इस मनुष्य शरीरमें भी प्रतिक्षण होनेवाले परिणामके मेदसे भेद होनेपर भोगका अनुसन्धान नहीं होना चाहिए। समाधान-यह दोप नहीं आता, कारण कि 'यह वही शरीर है', इस प्रकार होनेवाली प्रत्यभिज्ञाके आधारपर उस शरीरमें एकत्वका ही ज्ञान होता है। इस एकत्व प्रतीतिकी जनक प्रत्यभिज्ञाको दीपज्वालाविपयक प्रत्यभिज्ञाके समान भ्रम नहीं मान सकते, कारण कि दीपज्वालामें सूक्ष्म विचार करनेपर प्रत्यक्षसे ज्वालाओंका भेद देखा जाता है और शरीरमें प्रत्यक्षसे मेद नहीं ज्ञात होता है, इसलिए आत्मा एक और स्वप्रकाश है, ऐसा सिद्धान्त है। इस स्वप्रकाश आत्माको वेदवाह्य प्रतिवादी देहसे लेकर वुद्धिपर्यन्त पदार्थके रूपमें जानते हैं। (और वैदिकोंमें भी) मीमांसक आदि तो आत्मा देहादिसे भिन्न है, ऐसा जानकर मी उसको कर्ता और भोक्ता मानते हैं। इस मीमांसकमतको सांख्यवादी सहन नहीं करते। [ उनका कहना है कि ] आत्मामें कर्तृत्व स्वभावसिद्ध तो हो ही नहीं सकता, कारण कि सर्वत्र व्यापकस्वरूप और अवयवशुन्य-अखण्ड-आत्मा परिस्पन्द या परिणाम- स्वरूप कियाका आश्रय नहीं वन सकता। [अर्थात् व्यापक होनेसे उसमें परिस्पन्द-चलनात्मक-क्रिया और अखण्ड होनेसे परिणाम नहीं हो सकता, जो कि परिच्छिन्न और सखण्ड़में ही सदा रहते हैं और उक्त. कियाका ८०
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६३० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र १, वर्णक ४
योगात्। स्वाभाविकत्वे चैतन्यवत्क्रियावेशो न कदाचिद्पि व्यभि- चरेत्। नाऽपि कर्तृत्वमागन्तुकम्, निरवयवे कर्तृत्वहेतूपरागायोगात्। नाऽपि बुद्धेः कर्तृत्वमात्मन्यारोपयितुं शक्यम्, अख्यातिवादे भ्रान्त्य- भावाद् । तस्मान्नाऽस्ति कर्तृत्वम्। न चैवं भोक्तृत्वमपाकर्चु शक्यम्, नहि सुखदुःखान्वयो भोग:, येन कर्तृत्ववव्यभिचरेत्, किन्तु चिद्रूपत्वेन दश्यसाक्षित्वं भोक्तृत्वम्। तस्माद्भोक्तैवाSSत्मेति सांख्यानां पक्ष: । वैशेषिकयोगनैयायिका उक्ताद्भोकुर्जीवादतिरिक्त: सर्वज्ञः सर्वशक्ति-
आश्रय ही कता होता है। ] यदि कर्तृत्वको स्वाभाविक मानो, तो चैतन्यके समान वह कभी भी व्यभिचरित नहीं होगा [ अर्थात् जैसे आत्माका स्वाभाविक चैतन्य नित्यसिद्ध (सदैव विद्यमान) रहता है, वैसे ही क्रियाश्रयत्वरूप कर्तृत्व मी सदा ही विद्यमान रहना चाहिए ] और कर्तृत्वको आगन्तुक भी नहीं मान सकते, क्योंकि अवयवरहित पदार्थमें कर्तृत्वके उत्पादक हेतुओंका. सम्बन्ध ही नहीं हो सकता। बुद्धिमें विद्यमान कर्तृत्वका आत्मामें आरोप भी नहीं किया जा सकता, [ सांख्य बुद्धिमें ही कर्तृत्वका स्वीकार करते हैं और पुरुषको निर्लेप मानते हैं। उस बुद्धिके कर्तृत्वका आत्मामें आरोप मीमांसक आदिकी ओरसे कहा जाता है, यह शक्काका तात्पर्य है।] कारण कि अख्यातिवादमें भ्रम ज्ञानका अभाव है। [अख्यातिवादी मीमांसक ज्ञानमात्रको यथार्थ मानते हैं। शुक्तिमें 'यह रजत है' इस ज्ञानमें 'यह' अंश प्रत्यक्ष और 'रजत' अंश स्मरणरूप है, इसलिए दोनों अंश यथार्थ ही हैं। और आरोपमें तो यथार्थता रहती ही नहीं है, दूसरेके धर्मका दूसरेमें प्रतीत होना ही भ्रम है। परन्तु मीमांसक ऐसा मानते नहीं हैं, अतः उनके मतमें बुद्धिधर्मका आरोप आत्मामें नहीं हो सकता, यह भाव है ]। इसलिए आत्मामें कर्तृत्व नहीं है। इस रीतिसे आत्मामें भोक्तृत्वका खण्डन नहीं किया जा सकता, कारण कि सुख या दुःखकी अनुवृत्ति-सम्बन्ध- तो भोग कहलाता नहीं है, किन्तु चिट्रं होक र श्य क रका (जड़का) साक्षी-प्रकाशक-होना ही भोक्तृत्व है, इसका आत्मामें कभी भी व्यभिचार नहीं है, इसलिए आत्मा भोक्ता ही है, ऐसा सांख्यशास्त्रकारोंका पक्ष है। वैशेषिक, योग तथा नैयायिक पूर्वोक्त साङ्ख्यसम्मत भोक्तारूप जीवसे
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आत्मांके विपयमें विमरतिपत्तियां] भापानुवादसहित 专 き 化 रीश्वरोऽपि कश्िदस्तीत्यनुमिमते । विमतं जगत् स्वरूपोपादानाद्य- भिज्ञकर्तकम्, विविधकार्यत्वात्, आ्रासादादिवत्। तत्र कल्पनालाघवेनैक- कर्तकत्वोपादानात् सर्वज्ञत्वसिद्धिरिति वैशेपिकादयः । विमता ज्ञानैधर्य- शक्तय: कांचित्परां काष्ठां प्राप्ताः, सातिन्रयत्वात्, परिमाणवद् इति योगा:। विमतं धर्माधर्मफलं व्यवाहितकर्मफलत्वात्, सेवाफलवत्, इति नैयायिकाः ।
भिन्न दूसरा कोई सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ईश्वर मी पदार्थ है, ऐसा अनुमान करते हैं। [अनुमानका स्वरूप दिखलाते हैं-] विमत-विवादग्रस्त प्रपश्च- जगत्के स्वरूप तथा उपादान कारण दोनोंको जाननेवाले कर्ता द्वारा बना है, नाना प्रकारका कार्य होनेसे, प्रासादके-महल या कोठीके-समान। इसमें कल्पनालाघवके बलसे प्रपश्चको एककर्तृक माननेसे सर्वज्ञत्वकी सिद्धि होती है, यह चैशेपिक आदि मानते हैं। [ नाना प्रकारकी रचनाओंसे पूर्ण विश्वको वही बना सकता है, जो इतनी वैचित्रयपूर्ण रचनाओंकी जानकारी रखता हो तथा इन रचनाओंके उपादान कारण परमाणु आदिका भी पूर्ण परिचय रखता हो, ऐसा सर्वज्ञ ईश्वर ही हो सकता है। अल्पज्ञको कर्ता माननेमें तो अनेक कर्ताओंके माननेसे गौरव हो जायगा ]। पातञ्जल-योगदर्शनकार- कहते हैं कि विमत ज्ञान तथा ऐश्वर्यकी शक्तियां किसी अन्तिम काष्ठाको प्राप्त हैं, सातिशय होनेसे, परिमाणके सदश, [जैसे सेर-छटांक, गिरह-गज आदि छोढे बड़े परिमाण सातिशय होनेसे अन्तिम सीमावाले होते हैं, छोटेमें परमाणु और बड़ेमें महत्परिमाण; वसे ही ज्ञान तथा ऐश्वर्यकी शक्तियां भी सातिशय होनेसे चरमगति वाली होती हैं, वह चरम गति ईश्वर ही है। उससे अघिक ज्ञान तथा ऐश्वर्यशाली कोई नहीं है। ] इस अनुमानसे ईश्वर सिद्ध होता है। नैयायिकोंका अनुमान है कि विमत धर्म तथा अधर्मका फल (सुख-दुःखादि), कर्म, उनके फल तथा उनके भोक्ताको जाननेवाला ही देता है, व्यवहित कमोंका फल होनेसे, सेवाके फलके सदश, [ कर्म क्रियाकलापरूप होनेसे विनाशी हैं, इन विनाशी कर्मोंसे कालान्तरमें होनेवाला फल कैसे हो सकता है? क्योंकि कारणको कार्यके अव्यवहित पूर्व क्षणमें रहना आवश्यक है, इसलिए व्र्यवहित कर्मोंका फल देनेवाला कोई ऐसा पुरुष होना चाहिए जो कर्मोंके
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६३२ विवरणप्रमेयसंग्रह i सूत्र १, वर्णक ४
नन्वीश्वरपक्षोपन्यासो न युक्तः, यतोऽत्र जिज्ञास्ये प्रत्यगात्मरूपे व्रह्मणि विप्रतिपत्तिर्दरशयितुं प्रक्रान्ता। नैप दोप :; प्रत्यगात्मा तस्मादी- श्वरादन्योऽनन्यो वेति प्रत्यगात्मविप्रतिपत्तावेव पर्यवसानात्। अन्र भास्कर आह-नेह प्रत्यगात्मा जिज्ञास्यते, येन तद्विप्रति- पत्तिरुपन्यस्येत; किन्त्वीश्वर एव त्रह्मशव्देनोददिश्य विचार्यते, जन्मा- दिसूत्रे जगत्कारणत्वलक्षणाभिधानात् । तस्य च लक्षणस्र प्रत्यगात्म- न्यसंभवादनुभवविरोधादिति। तत्र वक्तव्यमीश्वरो जगत्कारणादन्योऽ-
फल और भोक्ता दोनोंको जानता हो, वह सर्वज्ञ ईश्वर 'ही हो सकता है। ] शङ्का-[ आत्मविषयक विप्रतिपत्तिके प्रसङ्गमें ] ईश्वरक्का वर्णन करना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि प्रकृतमें जिज्ञासाके विषय प्रत्यगात्मस्वरूप न्रह्मकी विप्रत्तिपत्ति दिखलानेके लिए ही प्रकरण चल रहा है। समाधान-यह दोप नहीं है, कारण कि मत्यगात्मस्वरूप न्रह्म उस ईश्वरसे भिन्न है या अभिन्न है : इस रीतिसे ईश्वरका उपन्यास भी प्रत्यगात्म- विषयक विप्रतिपत्तिके ही अन्तर्गत आ जाता है। इस विषयपर भास्करका कहना है-इस प्रथम सूत्रमें प्रत्यगात्माकी (न्रह्मकी) जिज्ञासा नहीं की जा रही है। जिससे ब्रह्मविषयक विप्रतिपत्तिका उपन्यास किया जाय, किन्तु ब्रह्मशन्दसे ईश्वरका ही उद्देश करके विचार किया जाता है, कारण कि जन्मादि सूत्रमें उसीका जगत्कारणत्वरूप लक्षण किया गया है। यह जगत्कारणत्वरूप लक्षण अनुभवसे विरोध होनेसे ब्रह्ममें नहीं घट सकता है, [क्योंकि वह तो निर्धर्म तथा निर्लेप है]। भास्करके उक्त मतके विषयमें यह कहना चाहिए कि क्या ईश्वर जगंत्के कारणसे मिन्न है ? या अभिन्न है?
१. इसी आशयसे महिम्नस्तोन्रमें कहा गया है- कतौ सुप्ते जाग्रत्वमसि फलयोगे क्रतुमतां क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते। अतस्त्वां संप्रेक्ष्य ऋतुपु फलदानप्रतिभुवं श्रुतौ श्रद्धां वध्वा दढपरिकरः कर्मसु जनः ।' अर्थात् हे महेश्वर ! आपकी आराधनाके विना क्षणविनाशी क्रियाकलापात्मक यज्ञ फल देनेमें कैसे संमर्थ हो सकते हैं, इसलिए आपके ऊपर भरोसा रखकर ही याज्ञिक पुरुष श्रुतिमें श्रद्धा करके यज्ञोंमं प्रवृत्त होते हैं।
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आत्माके विपयमे विप्रतिपत्तियाँ] मांपांतुवांदसहित ६३३
नन्यो वेति। अन्यत्वे 'प्रधानमेके परमाणूनपरे' इत्यादिना त्वच्छासतरे जगत्कारणविश्रतिपत्तिप्रदर्शनमसमञ्ञसं स्यात्, ईश्वरविप्रतिपत्तेरेव त्वया दर्शनीयत्वात् । अनन्यत्वे च त्वदीयः प्रधानपरमाण्वादिपक्षोपन्यास ईश्वराभिप्रायः स्याद्, न च तद्युक्तम् ; नहि वादिनः ग्रधानमीश्चरः परमाणुर्वेश्वर इति विप्रतिपद्यन्ते। यद्यपि अत्यगात्मनि जगत्कारणत्वं पामरा नाडनुभवन्ति, तथापि श्ुतिस्मृतिन्यायकुशला अनुभवन्त्येव। एवं च श्रुत्यादिग्रसिद्धजगत्कारणत्वलक्षणेन वि्रतिपद्यमानप्रत्यगात्मविशेपस्वरूपे ब्रह्मणि वोध्यमाने यज्जगत्कारणं तद् त्रह्मेत्येतादृशी वचनव्यक्तिद्विंतीयसूत्रे युज्यतेतराम्। तथा पुरुपाणां केशकरदेहादियुद्धन्तवन्धनिवर्त्तनेन सत्य- फलिष्यति। त्वत्पक्षे तु
यदि ईश्वर भिन्न है, तो 'कोई लोग प्रधानको-प्रकृतिको-और दूसरे परमा- शुओंको' इत्यादि अन्थसे तुम्हारे शास्त्रमें जगत्के कारणके विषयमें विप्रत्ति- पत्तिका दिखलाना अयुक्त होगा, क्योंकि तुमको तो ईख्वरके विषयमें ही विप्रतिपत्ति दिखलानी चाहिए थी। यदि जगत्के कारणसे ईश्वर भिन्न नहीं है तो तुम्हारा दर्शाया हुआ प्रधान तथा परमाणु आदि पक्षोंका उपन्यास भी ईश्वरके ही अभिप्रायवाला होगा, अर्थात् उक्त पक्षोंसे इश्वरका वर्णन समझा जायगा, जो कि युक्तियुक्त नहीं है, कारण कि वादी और प्रतिवादियोंका ऐसा विवाद नहीं है कि प्रधान ईश्वर है? या परमाणु ईश्वर है: यद्यपि पामर (मूर्ख) प्रत्यगात्मा ब्रह्ममें जगत्कारणत्वका अनुभव नहीं करते हैं, [अर्थात् मूर्ख ब्रह्म ही संसारका कारण है, ऐसा नहीं समझते हैं] तथापि प्रुति, स्पृति तथा न्याय शास्त्रमें प्रवीण विद्वान् तो ऐसा अनुभव करते ही हैं। इस परिस्थितिमें श्रुति आदिसे प्रसिद्ध संसारकारणत्वरूप लक्षणके चलसे विप्रतिपत्तिविषयक प्रत्यगात्मस्वरूप ब्रह्माके बोधित होनेपर 'जो संसारका कारण है, वह न्रम्म है' इस प्रकार वचनका स्वरूप होना दूसरे (जन्माद्यस्य यतः) सूत्रमें अत्यन्त युक्तिपूर्ण है। एवं पुरुपोंको क्वेश देनेवाले देहसे लेकर वुद्धिपर्यन्त बन्धकी निवृत्ति करनेसे सत्य (त्रिकालावाधित), ज्ञान (साक्षात्कारात्मक घोधस्वरूप), अनन्त (परिच्छेदसे रहित), आनन्द (नित्यनिरतिशय सुखरूप) अ्रत्यगात्मा न्रह्मस्वरूप परिशेपात् फलित हो जायगा।
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६३४ विवरणप्रमैयसंग्रह [सूंत्र १, वर्णक ४
जगत्कारणस्य विप्रतिपद्यमानत्वाच्द्विशेप एव ब्रह्मानुवादेन बोधनीयः। तथा च यद् ब्रह्म तज्जगत्कारणमित्येवं वचनव्यक्ति: सूत्रस्याऽडपद्येत, पुरुपाणां च न किंचित् प्रयोजनं तद्ोधे स्यात्। न चोपासनं प्रयोजनम्, अरोपितरूपेणाऽप्युपासनसंभवे तत्प्रतिपादनवैयर्थ्यात्। तस्मादसङ्गतोऽयं भास्करपक्ष: । परमार्थदर्शिनस्तु य ईश्वरः स एव अत्यगात्मेति मन्यन्ते। विमतौ जीवेश्वरौ वस्तुतो न भिन्नो, उपाधिपरामर्शमन्तरेणाSविभाव्यमानभेदत्वाद्, विम्बप्रतिविम्ववत् । अन्यथा त्रह्मणि निरतिशयतृहृत्यर्थान्वयो न सिध्वेत्। तस्य कृत्स्देशकालव्यापित्वेऽपि जीवेभ्यो भिन्नत्वाद्वस्तुतः सर्वगत- त्वाभावात्।
तुम्हारे (भास्करके) मतमें तो जगत्के कारणकी विप्रतिपत्ति होनेसे त्रह्मका अनुवाद करके उसके (जगत्कारणके) विशेषको ही दिखलाना होगा। इस परिस्थितिमें जो त्रह्म है वही जगत्कारण है, इस प्रकारका वाक्यस्वरूप दुसरे सूत्रका प्राप्त होगा और उस (जगत्कारणके) बोधसे पुरुपोंका कोई प्रयोजन मी सिद्ध नहीं होगा। उपासनाको भी उसका प्रयोजन नहीं मान सकते, कारण कि आरोपितरूपसे भी उपासनाका सम्भव है, इसलिए उसके लिए उसका प्रतिपादन करना व्यर्थ ही है। इसलिए उक्त भास्करका मत असङ्गत है अर्थात् प्रधानतया ईश्वरविपयक विश्रतिपति दिखलानेका कथमपि अवसर नहीं है। परमार्थदर्शी अर्थात् ब्रह्मतत्वका साक्षात्कार किये हुए वेदान्तदर्शनकार तो 'जो ईश्वर है वही प्रत्यगात्मा है' ऐसा मानते हैं। [ अपने मतका साधक अनुमान करते हैं-] विमत जीव और ईश्वर, परमार्थतः मिन्न नहीं हैं (एक ही हैं), उपाघिके सम्वन्घज्ञानके बिना भेदका बोध न होनेसे; बिम्ब और प्रतिबिम्बके समान। अन्यथा ब्रह्मपदार्थमें 'ृह' धातुके निरतिशय- रूप अर्थका सम्बन्ध सिद्ध नहीं हो सकेगा, कारण कि उसके (ब्रह्मके) सम्पूर्ण देश और कालमें व्याप्त होनेपर भी जीवोंसे भिन्न होनेके कारण वस्तुतः सर्वगतत्व सिद्ध नहीं हो सकता। [ वह वस्तुतः सर्वगत तभी माना जायगा, जब सकल वस्तुओंमें उपादानरूपसे अनुस्यूत होगा, ज़ीवको त्रह्मसे भिन्न माननेमें त्रह्मके जीवपदार्थमें
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आत्माके विपयमें विभ्रतिपत्तियाँ] भाषानुवादसहित ६३५
ननु वृहत्यर्थानुगमाय ब्रह्मण: सर्वात्मकत्वाङ्गीकारे दुःखात्मकताया. अप्यङ्गीकार्यत्वादपुरुपार्थता स्यात्। आनन्दरूपत्वमप्यस्तीति पुरुपार्थतेति चेद्, मैवम् : नहि तृसिहेतुरित्येतावता विपमिश्रितान्नं पुरुपैरर्थ्यते। 'न लिप्यते लोकदुःखेन' इत्यादिशास्ान्न दुःखात्मकतेति चेद्, न; 'आत्मवेदं सर्वम्' इति सर्वतादात्म्यश्चत्या सर्वोपादानत्वलक्षणयुक्तया च तस्य वाधितत्वात्। अथैकदेशिमतमाथित्य सर्वज्ञस्याऽज्ञानमिथ्याज्ञानाभावा- भ्राजनर्थसंवन्ध इति चेदू, न; तन्मते सर्वप्रपश्चतादात्म्यस्य चास्तवस्य जननायाऽविद्याद्यनपेक्षणात्। अत एव तच्वज्ञाने सत्यप्यपायस्य दुःसम्पाद-
मनुस्यृत न होनेसे उक्त सर्वगतत्व नहीं हो सकता, इसलिए जीव और ईश्वर वस्तुतः अभिन्न हैं, भिन्न नहीं हैं, यह तात्पर्य है ]। शङ्का-'वृह' धातुके अर्थके अनुगमके लिए ब्रह्मको सर्वात्मा (सकलवस्तु- स्वरूप) माननेपर उसमें दुःखस्वरूपता भी माननी होगी, इससे वह पुरुपार्थ ही न होगा। यदि कहो कि आनन्दस्वरूप भी तो ब्रह्म है, इसलिए उसमें पुरुषार्थत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इतनेसे वह पुरुपार्थ नहीं माना जा सकता, कारण कि विप मिला हुआ अन्न भूख अवश्य मिटा सकता है, पर पुरुष उसको चाहते नहीं हैं [ अर्थात् वह विपमिश्रित अन्न पुरुषार्थ नहीं होता, वैसे ही आनन्दरूप ब्रह्म भी दुःखमय होनेसे पुरुपार्थ नहीं हो सकता ] 'वह ईश्वर मनुष्योके दुःखसे दुःखी नहीं होता' इत्यादर्थक शास्त्रोंके आधारपर ब्रहमा दुःखात्मक नहीं है, ऐसा मानना भी उचित नहीं है, कारण कि 'यह सब कुछ आत्मा ही है' इत्यादर्थक सकल प्रपन्नके साथ तादात्म्यका बोधन करनेवाली श्रुतिसे और सर्वोपादानत्वरूप ब्रह्मके लक्षणकी युक्तिसे भी उक्त शास्त्रका बाध हो जाता है। यदि किसी एकदेशीके मतका आश्रयण करके यह माना जाय कि सर्वज्ञमें अज्ञान अथवा विपरीत ज्ञान नहीं हैं, अतः मनर्थका (पुरुपार्थभिन्न दुःखका) उसमें सम्बन्ध नहीं है, तो वह भी नहीं मान सकते, कारण कि उस एकदेशीके मतमें सम्पूर्ण प्रवश्चके वस्तुभूत तादातम्यकी उत्पत्तिके लिए अविद्या आदिकी अपेक्षा नहीं होती है। [यदि प्रपञ्वतादात्म्यकी उत्पत्तिके लिए अविद्यादिकी अपेक्षा होती, तो कह सकते थे कि सर्वज़में अविद्याका सम्बन्ध नहीं है, इसलिए
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६३६ विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र १, वणर्क ४
ल्वात्। अथाऽपि ब्रह्मणो धर्माधर्मरहितत्वान्न दुःखादिसबन्धस्तदनुभवो वा संभवतीति चेद्, न; दुःखादिसर्वप्रपश्चोपादानतया तत्संवन्धस्य सवज्ञतया तदनुभवस्य चावारणीयत्वात्। अथैतदोपपरिजिहीर्षया कार्यप्रपश्चाद् व्रह्मणो भिन्नत्वं वा कारणाकारणरूपेण व्रह्मद्वयं चाडभ्युप- गम्येत; तदा इहत्यर्थो नाऽनुगच्छेत्। तस्मात् सर्वात्मकं सर्वजं त्रह्माडपु- रुपार्थतया न जिज्ञास्यमिति। अत्रोच्यते-भवेदयं दोपः पारमार्थिकअपश्चवादे, मायावादे तु न कोऽपि दोप :; वस्तुतो त्रह्मणो निर्लेपत्वाद। तदेवं देहादिनिलेपत्रह्मान्ता: पदार्था युक्तिं वाक्यं च समाश्रयन्दिर्वादिभिः अ्रत्यगात्मतया विग्रति-
अनर्थका तादात्म्य नहीं हो सकता]। इसीलिए तत्त्वज्ञान होनेपर भी उसके (तादाम्यके ] विनाशका सम्पादन करना कठिन होता है [ क्योंकि तत्त्वज्ञानसे तो अविद्याका ही नाश होता है और तादात्म्यमें अविद्या है ही नहीं, जिससे कि अविद्याका नाश होनेपर उसका कार्यभूत तादात्म्य भी नष्ट हो जाय, वह तो उस मतमें बना ही रह जायगा ]। यदि कहो कि धर्म तथा अधर्मसे न्ह्ममें दुःखादिका सम्बन्ध तथा उसका अनुभव नहीं हो सकता है, तो यह भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि दुःख आदि सम्पूर्ण प्रपश्चके प्रति उपादान होनेसे दुःखादिके सम्बन्धका तथा सर्वज् होनेसे दुःखादिके अनुभवका ब्रक्षमें वारण नहीं किया जा सकता। यदि उक्त दोषके समाधानके लिए कार्यस्वरूप प्रपञ्चसे न्रह्मका भेद अथवा कारण और अकारण (कार्य) रूपसे दो ब्रह्मके भेद माने जायँ, तो 'वृहि' घात्वर्थका अनुगमन नहीं हो सकेगा, इसलिए पुरुषार्थस्वरूप न होनेसे सर्वात्मक और सर्वज्ञ न्रह्म जिज्ञासाका विषय नहीं हो सकता। [ इस लम्बी शक्काका समाधान करते हैं-] इस शङ्काके उत्तरमें कहा जाता है-यह दोष तो प्रपञ्चको पारमार्थिक माननेमें आ सकता है। मायावादमें (प्रपश्चको मिथ्या माननेवालोंके मतमें) तो कोई भी दोष नहीं आता, क्योंकि व्रह्म वस्तुतः निर्लेप-सर्वप्रकारके सम्बन्धसे रहित-है। अपनी-अपनी युक्ति तथा प्रमाणभूत वचनका आश्रयण करके प्रतिवादी इस प्रकार देहसे लेकर निर्लेप ब्रह्म पर्यन्त पदार्थोंके विषयमें प्रत्यगात्मरूपसे
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वादियोंके मतोंका खण्डन] भापानुवादसहित ६३७
पद्यन्ते। तत्र तन्र तन्मतसिद्धा युक्ति: पूर्वमेव दर्शिता। वाक्यं च 'स वा एप पुरुपोऽन्नरसमयः', 'स वा अयमात्मा ब्रह्म', 'परथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयः' इत्यादिकं शरीरात्मवादेऽ वगन्तव्यम्। 'ते ह वाचमृचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुद- गायत्' इत्यादीन्द्रियात्मवादे, 'मन उदगायत्' इति मनआत्मवादे, 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः' इत्यादि विज्ञानात्मवादे, 'असद्वा ड्दमग्र आसीत्' इति अन्यात्मवादे, 'मन्ता वोद्धा कर्त्ता सवझे जीवः सुखदुःखभोक्ता' इत्यादि कर्तभोक्त्रात्मवादे, 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सच्चमनश्ननन्यो अभिचाकशीति' इत्यादि साक्षित्वलक्षणकेवलभोक्का- त्मवादे, 'य आत्मनि तिष्ठनात्मानमन्तरो यमयति' इति तटस्थात्मवादे, निर्लेपव्रह्मात्मवादे तु सर्वाणि वेदान्तवाक्यान्यवगन्तव्यानि। तत्र
विवाद करते हैं। तत्-तत् स्थानमें उनके मतका अनुसरण करनेवाली युक्तियोंका पहले ही दिग्दर्शन कराया गया है। और 'वह यह पुरुष अन्न-रसमय है, वह यह आत्मा व्रह्म है और पृथ्वीरूप, जलरूप, वायुरूप, आकाशरूप, तेजःस्वरूप है' इत्यादर्थक वाक्य भी देहात्मवादके पक्षमें आपाततः प्रमाण हैं, यह समझना चाहिए। 'वे वाणीसे कहने लगे कि तुम हमारे लिए उद्धान करो, उसको स्वीकार करके वाणीने उनके लिए उद्धान किया' इत्याद्यर्थक वाक्य इन्द्रियोंको आत्मा माननेके पक्षमें हैं। 'मनने उद्गान किया' इत्यर्थक वाक्य मनको आत्मा माननेमें, 'कौन आत्मा है' इस प्रश्नके उत्तरमें 'जो यह विज्ञानस्वरूप है' इत्यर्थक वाक्य विज्ञानको आत्मा माननेमें, 'इस सृटिसे पूर्व सब असत् था' इत्यर्थक वाक्य शुन्यको आत्मा माननेमें, 'मनन कर्ता बोद्धा, कर्ता स्वप्नमें जीव सुख-दुःखका भोक्ता है' इत्यादि वाक्य आत्माको कर्ता, भोक्ता माननेमें, 'इन दोनोंमें एक स्वादु कर्मफलका भोग करता है और दूसरा भोग न करता हुआ प्रकाशमान रहता है! इत्यादि वांक्य आत्माको साक्षीरूप केवल भोक्ता माननेमें तथा 'जो अपनेमें स्थित होता हुआ भीतर आत्माका नियमन करता है' इत्यादि वाक्य तटस्थ आत्माके माननेमें प्रवृत्त होते हैं। और 'आत्मा निर्लेप न्रह्मरूप है' इस मतमें तो सम्पूर्ण वेदान्तवाक्योंका ही समन्वय है, ऐसा समझना चाहिए। इनमें निर्लेप.
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६२८। विवरणप्रमेयसंग्रह्द [ सूत्र १, चर्णक ४
समीचीनत्वमन्योक्तयो स्त्वाभासत्वमित्येतत्सूत्रकार एव तत्र तत्र स्पष्टीकरिष्यति। एवं च सत्येतद्विचारशास्त्रमश्ुत्वा पण्डितंमन्यतया देहादितटस्थेश्वरान्तेप्वन्यतमं यं कश्चिदात्मानमवलम्वमानो सुसुक्षुर्न मोक्ष प्राप्तुयाद्, तच्वज्ञान- लभ्यस्य मोक्षस्य विपरीतज्ञानेन सम्पादयितुमशक्यत्वात्। न च तस्य पापिष्ठस्य कदाचिन्निष्कृतिरस्ति। 'अतस्तस्य महत्तरं पापम् 'योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते। किं तेन न कृतं पापं चोरेणाऽडत्मापहारिणा ॥' इति न्यायात्। अतः सत्यज्ञानानन्दादिरूपस्याऽडत्मनोऽसत्कल्पना मापादयतस्तस्याऽडत्मघातिन: कष्टलोकप्राप्तिः श्रयते-
ब्रह्मस्वरूप आत्मा है, इस प्रकार माननेवाले अद्वैतवादी द्वारा प्रदर्शित युक्ति और प्रमाणभूत वाक्योमें समीचीनता (प्रमाणता) है और दूसरे वादियोंके द्वारा दिखलाई गई युक्तियों तथा प्रमाणरूपसे दिये वाक्योंमें आभासता (अप्रमाणता) है, इसका स्पष्ट प्रतिपादन तत्-तत् स्थलोंमें सूत्रकार स्वयं करेंगे। इस परिस्थितिमें इस विचारशास्त्रका (उत्तरन्रह्ममीमांसाका) श्रवण न करके अपनेको पण्डित समझ कर कहे गये देहसे लेकर तटस्थ ईश्वर पर्यन्त पदार्थोंमें से किसी एक पदार्थको आत्मा मानकर उसके सहारे मोक्षकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य मोक्षको नहीं पा सकता, कारण कि तत्त्वज्ञानको न पाकर विपरीत ज्ञानसे मोक्षका सम्पादन नहीं किया जा सकता। और विपरीत ज्ञानको रखनेवाले उस पापीका कमी मी संसारसे छुटकारा नहीं हो सकता। इसलिए उसका विपरीत ज्ञान बड़ा भारी पाप है, क्योंकि- 'जो सद्प आत्माको असत्रूप समझता है, उसने क्या पाप नहीं किया? अर्थात् पाप किया ही, क्योंकि वह तो आत्माको ही चुरा लेनेवाला महान् चोर है', ऐसा शास्त्रीय न्याय है। इसलिए सत्य, ज्ञान, आनन्दादि स्वरूप आत्माके विषयमें असत्- विपरीत-करपनाका आपादन करनेवाले आत्मघातियोंको दुःखप्रद. लोकोंकी प्राप्ति होती है, ऐसा-श्तिमें कहा गया है-
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देहात्मवादि योंके मतका खेण्डनं j भापातुवादसाहित ६३९
'असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥' इति। ननु त्रह्मविचारेण तत्वज्ञाने निष्पन्नेऽपि न मोक्ष उपपद्यते, पृथि- व्यादिग्रपश्चनिवृत्तेरभावात्, नैप दोप: सर्वजीवसाधारणेपु पृथिव्यादिपु
विपयोपरागाभावाद्वा एतददर्शनं न प्रमोति, निरिन्द्रियस्येव रूपादिदर्शन- स्वतो
वे अशुभ लोक हैं, जो सदैव अन्ध (दृष्टिका उपघात करनेवाले) अन्ध- कारसे व्याप्त रहते हैं। मरनेके वाद उन लोकोंकी उन्हें प्राप्ति होती है; जो आत्मघाती मनुष्य हैं।' [अज्ञान तथा अन्यथाग्रहण दोनों हिंसामें ही सम्मिलित हैं। वस्तुका यथार्थरूप न रखना या न समझना हिंसा ही है, अतः अनात्माको आत्मा समझ कर और आत्माका शुद्ध निर्लेप सत्, चित् और आनन्द रूप न समझ कर कर्ता, भोक्ता आदि धर्मसहित समझना भी आत्मघात ही कहलाता है, अतः ऐसे आत्मघाती पुरुप दुःखद असुर्य नामक (देवादिस्थावरान्त) लोकको प्राप्त होते हैं, यह भाव है।] शक्ा-न्रह्मका विचार क़रनेसे तत्वज्ञानके होनेपर मी मोक्षकी उपपत्ति नहीं हो सकती, कारण कि पृथ्वी आदि प्रपश्चकी नियृत्ति ही नहीं होती [ सर्व- प्रपश्चनिवृत्तिको ही मोक्ष कहते हैं और त्रह्मविचारसे प्रपश्चकी निवृत्ति नहीं देख पड़ती, अतः तत्वज्ञानसे भी मोक्ष नहीं हो सकता, यह भाव है ]। समाधान-उक्त दोष नहीं आता, कारण कि यद्यपि पृथ्वी आदि प्रपश्व सकल-जीव-साधारण रहता है, तथापि अन्तःकरणके अध्यासकी निवृत्ति हो जानेके कारण प्रमातृत्व आदि धर्मोंके न रहनेसे अथवा आत्मस्वरूप चितन्य के साथ स्वतः विपयका सम्पर्क न होनेसे पृथ्वी आदि प्रपश्चका दर्शन ही प्राप्त नहीं होता। [जब शुद्ध चतन्य सर्वविध लेपसे शुन्य है और अन्तःकरणाध्यासरूप उपाधि ब्रह्मविचारसे छूट ही गई, तब सर्वसाधारणकी दृष्टिमें पृथ्वी आदि ्रपश्चके रहनेसे भी अध्यासरूप उपाधिशुन्य पुरुप उस प्रपश्चात्मक द्वैतका दर्शन नहीं कर सकता, यह भाव है। ] [सर्वसाधारणकी दृष्टिमें विषय 'द्वैत' के विद्यमान रहते भी उसका दर्शन नहीं होता है, इसका दष्ान्त द्वारा समर्थन करते हैं-] जैसे कि इन्द्रियहीन पुरुषको रूपादिका दर्शन
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६४० विवरणप्रमेयसंग्रह ।सूत्र १, वर्णक ४.
मित्येक: पक्षः । इतरस्तु सर्वद्वैतनिवृत्तिपक्षः समन्वयसूत्रे वक्ष्यते। तदेवमहमित्यात्मत्वसामान्याकारेण सर्वप्रत्यक्षसिद्धस्याऽत्यन्ताप्रसिद्धभावा- द्विशेषतो वादिविप्रतिपत्तिविपयस्याऽपि निष्प्रपश्चन्रह्मरूपेण विशेपेण शास्त्रान्तरेष्वसिद्धत्वाच्च विपयत्वसिद्धिः। तस्य च ब्रह्मणोडनेन शास्त्रेण प्रतिपादयितुं शक्यतया प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावलक्षणः संचन्धोऽपि सिद्ध इत्युभयस्याऽपि सिद्धे पयोजनस्य च मोक्षस्याऽभिहितत्वान्निप्प्रत्यूहो ब्रह्मविचारः कर्तव्य इत्यशेपमतिमङ्गलम्। इति श्रीविद्यारण्यमुनिग्रणीते विवरणप्रमेयसंग्रहे प्रथमसूत्रे चतुर्थवर्णकम्।
समाप्तं चेदं सूत्रम् ।
नहीं होता, इस प्रकार एक पक्ष है। और सम्पूर्ण द्वैत प्रपञ्च की निवृत्ति हो जाती है, इस प्रकारका दूसरा पक्ष समन्वय सूत्रमें कहा जायगा। अन्तर्में तातत्वििक बात यह हुई कि 'अहम्' इस प्रकार आत्मत्वरूप सामान्य आकारसे सबके प्रत्यक्षसे सिद्ध ब्रह्मभूत आत्माकी अत्यन्त अप्रसिद्धि नहीं हो सकती और विशेष प्रकारसे वादियोंकी विप्रतिपत्तिका विषय होनेपर भी प्रपश्चशून्य ब्रह्मात्मक विशेषरूपसे दूसरे शास्त्रोंके द्वारा वह सिद्ध नहीं है, इसलिए इस विचारशास्त्रकी विषयता ब्रह्ममें सिद्ध हो सकती है। और उस ब्रह्मका इस शास्त्रसे प्रतिपादन हो सकता है, अतः प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध मी सिद्ध है, इसलिए (विषय तथा सम्बन्ध ) दोनोंकी मी सिद्धि है और मोक्षरूप प्रयोजनका पहले ही अभिधान हो चुका है अतः ब्रह्मका विचार निर्विवादरूपसे करना चाहिए, इस प्रकार (प्रथम सूत्रका व्याख्यानतात्पर्य) सम्पूर्ण ही अत्यन्त मझलमय है।
इति श्रीविवरणप्रमेयसंग्रहके पं० ललितापसाद डरालविरचित भापानुवादमें चौथा वर्णक समाप्त हुआ
प्रथम सूत्र समाप्त
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प्रथम सूत्रसे द्वितीय सूत्रकी संगति] भापानुवादसहित ६४१
अथ द्वितीयं सूत्रम् 'अथातो त्रह्मजिज्ञासा' इत्यत्र त्रहम ज्ञातुकामेन ज्ञानोपायभृतमिदं विचारशास्त्रं श्रोतव्यमिति प्रतिज्ञातम्, जिज्ञासापदस्य ज्ञानेच्छालक्षण- स्वार्थांपरित्यागेनाऽन्तणातविचारलक्षकत्वात्। प्रतिज्ञाते च त्रह्मविचारे तदङ्गानि लक्षणप्रमाणयुक्तिसाधनफलान्यप्यर्थात्प्रतिज्ञातान्येवेति लक्षणादि- प्रतिपादको वक्ष्यमाणः सूत्रसन्दर्भः सङ्गच्छतेतराम्। अन्यथा ज्ञानेच्छा- मपुरुपतन्त्रां कर्त्तव्यत्वेन प्रतिज्ञायेच्छानुपयुक्तानि लक्षणादीनि प्रतिपा- दयतः सूत्रकृतो महदकौगलमापद्येत। यद्यपि साध्यसिद्धेः साधनाद- धीनत्वात् साधनादीन्येव प्रथमं विचार्याणि, तथापि तानि ब्रह्मप्रमाणं ्रह्मयुक्तिन्रह्मसाधनं ब्रह्माप्रमितिरिति त्रह्मविशिष्टत्वेन ब्रह्मस्वरूपनिर्णय-
द्वितीय सूत्र 'अथातो म्रहजिज्ञासा' इस ग्रथम सूत्रमें 'ब्रह्मज्ञानकी इच्छा रखनेवाले पुरुपको ज्ञानके उपायभूत (साधनभूत) इस विचारशास्त्रका (वेदान्तशास्त्रका), श्रवण करना चाहिए, ऐसी प्रतिज्ञा की गई है, कारण कि 'जिज्ञासा' पढ ज्ञानविषयक इच्छारूप अपने अर्थका परित्याग नहीं करता है, इससे वह अन्तर्णीत (अन्तर्गत) विचारका लक्षक (बोधक) है। ब्रह्मविचारकी प्रविज्ञा करनेपर उसके अम्रभूत लक्षण, प्रमाण, युक्ति, साघन और फल-इन सभीकी प्रतिज्ञा अर्थतः सिद्ध हो ही जाती है; इसलिए लक्षण आदिका प्रतिपादन करनेवाले अग्रिम द्वितीय सूत्रके सन्दर्भकी प्रथम सूत्रके साथ सङ्गति है ही। अन्यथा जिसकी उत्पत्ति पुरुपाधीन नहीं है, ऐसी ज्ञानेच्छाकी कर्तव्यरूपसे प्रतिज्ञा कर यदि सूत्रकार इच्छाके लिए अनुपयुक्त लक्षण आदिका प्रतिपादन करं, तो उनका बड़ा भारी अकौशल (मौख्य) ग्रकट होगा। यद्यपि साधन आदिके अधीन साध्यकी सिद्धि होती है, इसलिए साधन आदिका ही पहले विचार करना चाहिए, तथापि वे साधन आदि त्रहमें प्रमाण, ब्रक्ममें युक्तियाँ; त्रह्मभाप्िका साधन तथा त्रह्मका निश्चयात्मक ज्ञान, इस प्रकार तस्मसे विशिष्ट हैं [अतः अक्षस्वरूपके निर्णयकी अपेक्षा रखते हैं, क्योंकि सर्वत्र साधनादिमें त्रहम विशेषण लगा है और विशेषणज्ञानके बिना
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६४२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक ?
सापेक्षाण्युपसर्जनानि च। अतो निरपेक्ष अ्रधानं च ब्रह्मस्वरूप भगवान् सूत्रकार: प्रथमं लक्षयति-'जन्माद्यस्य यतः' इति। नन्वज्ञाते स्वरूपे लक्षणं ज्ञाते वा १ नाऽज्ञाते, किमस्य लक्ष्यस्य लक्षणमिति जिज्ञासानुदयात्। अस्येदं लक्षणमिति लक्ष्यलक्षणसंवन्धा- परिज्ञानाच। नाऽपि ज्ञाते, वैयर्थ्यात्। किश्च स्वरूपलक्षणमुच्यते तटस्थलक्षणं वा १ नाऽडद्य, जन्मादिकारणत्वस्य सप्रतियोगिकस्य स्वरूपत्वायोगात्। स्वरूपत्वे च सविशेपत्वप्रसङ्गात्। नाऽपि द्वितीय:, स्वरूपलक्षणेन विना तटस्थलक्षणमात्रेण स्वरूपप्रतीत्ययोगात्। अन्यत्र च स्वरूपलक्षणस्याऽप्रसिद्धेः। कथचित्तत्प्रसिद्धावप्यस्य तटस्थलक्षण- विशिष्टज्ञानका संभव नहीं है] और उपसर्जन-गौण-हैं। इसलिए निरपेक्ष और प्रधानभूत ब्रह्मत्वरूपका भगवान् सूत्रकार सर्वप्रथम लक्षण करते हैं- 'जन्माद्यस्य यतः' से। शङ्का-स्वरूपका ज्ञान न होनेपर लक्षण किया जाता है? या स्वरूपका ज्ञान होनेपर? इनमें स्वरूपके अज्ञात रहनेपर लक्षण करना नहीं बन सकता, कारण कि इस लक्ष्यका लक्षण क्या है ? ऐसी जिज्ञासाका उदय नहीं होता है। और इसका यह लक्षण है, ऐसा लक्ष्य-लक्षण-भाव सम्बन्धका ज्ञान नहीं होता है। स्वरूपके ज्ञात रहते भी नहीं कह सकते, क्योंकि ज्ञात होनेपर लक्षण करना व्यर्थ है। [ लक्षणनिर्माणका स्वरूपज्ञान कराना ही फल है। यदि वह फल सिद्ध ही है तो उसके लिए प्रयास करना पिष्टपेषणके सदश व्यर्थ है। ] [और भी विकल्प करते हैं-] क्या स्वरूपलक्षण करते हो या तटस्थलक्षण: इनमें प्रथक कल्प नहीं बन सकता, कारण कि सप्रतियोगिक जन्मादिकारणत्वरूप ब्रह्मका स्वरूप नहीं हो सकता। यदि इसको ब्रह्मका स्वरूप मानो, तो ब्रह्म सविशेष हो जायगा। दूसरा पक्ष भी नहीं माना जा सकता, कारण कि स्वरूपलक्षण किये बिना केवल तटस्थलक्षणसे स्वरूपकी प्रतीति नहीं हो सकती, क्योंकि कहीं दूसरी जगह स्वरूपलक्षणकी प्रसिद्धि नहीं है। कथचित् प्रसिद्धि मान भी ली जाय, तो भी इस तटस्थलक्षणकी अतिव्यापत हो जायगी, कारण कि (१) अन्यकी व्यावृत्ति करता हुआ स्वरूपका परिचय देनेवाला असाधारण धर्म। (१) केवल इतर व्यावर्तक असाधारण धर्म।
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वक्षका स्वरूप गौर तटस्थलक्षण] भापानुवादसहित ६४३
स्याऽतिव्याप्तिः, प्राधानादावपि जगत्कारणत्वसंभवात्। अतोडनेन सूत्रेण किं प्रतिपाद्यत इति ! अत्र त्रम :- जगज्जन्मस्थितिघ्वंसा यतः सिध्यन्ति कारणात्। तत् स्वरूपतटस्थाभ्यां लक्षणाभ्यां प्रदर्श्यते। अधीतवेदान्तस्य विदितपदपदार्थसंवन्धस्याडडपाततो ब्रह्मस्वरूपं जात्वा विशेपतो ज्ञातुमाकाङ्गतः कलप्तलक्ष्यलक्षणसंबन्धत्वेन सार्थकमेवेदं लक्षणा- भिधानम्। तत्र तावजन्मादिकारणत्वं मायाविशिष्टन्रह्मणः स्वरूपल- क्षणत्वेऽप्यविरुद्म्। शुद्धत्रह्मणस्तु तत् तटस्थलक्षणम्। स्वरूपलक्षणं तु तस्य 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादिश्युतिपु प्रसिद्धम्। न चोक्तलक्षणस्याऽ- तिव्याप्तिः, प्रधानादेर्जगत्कारणत्वस्य निराकरिष्यमाणत्वात्। अतिव्यास्या- दिदोपपरिहारेण लक्षणनिर्णया या Sत्रैवार्डर्थात्मूत्रिते प्रमाणयुक्ती इत्यवगन्तव्यम्।
प्रधान (प्रकृति) आदिमें [ आदिपदसे परमाणु आदि लेने चाहिए ] जगत्- कारणत्वका सम्भव है। इसलिए प्रश्न होता है कि इस दूसरे सूत्रसे किस वस्तुका प्रतिपादन किया जा रहा हैं? समाधान-इस आशकाके उत्तरमें कहा जाता है-'जिस कारणसे संसारके जन्म, स्थिति तथा विनाश-ये तीनों सिद्ध होते हैं, उसका स्वरूप और तटस्थ लक्षणोंके द्वारा प्रदर्शन (विवेक) किया जाता है।' वेदान्तवाक्योंके पदनेसे पदपदार्थसम्बन्ध-ज्ञान द्वारा पहले सामान्यरूपसे ब्रह्मस्वरूपको जानकर विशेपरूपसे जाननेकी आकाहावाले जिज्ञासुके लिए माने गये लक्ष्यलक्षण- भावसम्बन्ध होनेसे यह लक्षण करना सप्रयोजन ही है [ व्यर्थ नहीं है] । इस दशामें संसारके जन्मादिका कारण होना मायामिश्रित ब्रह्मका स्वरूपलक्षण होनेपर भी विरोध नहीं आ सकता। शुद्ध ब्रद्का तो वह तटस्थलक्षण ही है। उसका स्वरूपलक्षण तो 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियोंमें सत्य-ज्ञानादिरूप प्रसिद्ध है [ इससे अन्यत्र अप्रसिद्धि दोष भी नहीं आता ]। और उक्त लक्षणमें अतिव्याप्ति दोष भी नहीं है [ अर्थात् प्रधानादिमें जगत्कारणत्वरूप तटस्थलक्षण अतिप्रसक्त भी नहीं है], कारण कि प्रधानादिमें संसारकी कारणताका आगे खण्डन किया जायगा। अतिव्याप्ति आदि दोपोंका परिहार करनेसे यहींपर अर्थात् इसी सुत्रमें लक्षणोंका निर्णय करनेके लिए
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६४४ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक ?
अध्यायद्वये तयोरेव प्रमाणयुक्त्योः सूत्रकारेण अपश्चयिष्यमाणत्वात्। ननु जन्मादीत्यस्मिन् बहुव्रीहौ स्थिंतिप्रलययोरन्यपदार्थत्वाद् पुँल्लिङ्ग- द्विवचनेन भवितव्यम् १ न भवितव्यम्, जन्मनोऽप्यन्यपदार्थत्वेन विवक्षि- तत्वाद्। न चैवं सत्येकस्यैव जन्मनो विशेष्यत्वविशेषणत्वप्रसङ्ग:, जन्मादि त्रयस्य विशेष्यत्वेन विवक्षित्वाद। अत एव न पुँल्लिङ्गचङुवचनप्राप्तिरपि । यद्यप्यनादौ संसारे न जन्मनो वस्तुत आदित्वम्, तथापि जनित्वा स्थित्वा ग्रलीयते इति व्यावहारिकीं लोकप्रसिद्धिसुपजीव्य 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' इति श्रुतौ जन्मन आदित्वनिर्देशस्तमुपजीव्याडयं सौत्राऽपि निर्देश उपपन्नः ।
अर्थतः प्रमाण और युक्तियोंका सूचन किया गया है, ऐसा समझ लेना चाहिए, क्योंकि दो अध्यायोंमें उन्हीं प्रमाण और युक्तियोंका सूत्रकार बड़े विस्तारसे वर्णन करेंगे। शङ्ा-'जन्मादि' इस पदमें जन्म आदि ययोः स्थितिप्रलययोस्तौ जिनके आदिमें जन्म हैं' ऐसे स्थिति और प्रलय [ अर्थात् तद्गुणसंविज्ञान बहुत्रीहिसे जन्मादि पदसे जन्म, स्थिति और प्रलय तीनों लिए जाते हैं ], इस प्रकार बहुव्रीहि समासमें स्थिति और प्रलयके अन्य पदार्थ होनेसे जन्मादि पदको पुंलित्न और द्विवचन होना चाहिए। समाधान-वह पुंल्िक् और द्विवचन नहीं हो सकता, कारण कि जन्मकी भी अन्यपदार्थरूपसे विवक्षा कर सकते हैं। ऐसा माननेसे एक ही जन्ममें विशेष्यत्व और विशेषणत्व दोनोंका प्रसङ्ग नहीं आ सकता, कारण कि जन्मादि तीनोंमें विशेष्यत्वकी विवक्षा की गई है। इसीलिए पुंल्लिन्व और बहुवचन आनेकी प्रसक्ति भी नहीं होती। यद्यपि अनादि संसारमें जन्मका ही वस्तुतः सर्वप्रथमत्व नहीं है, तथापि 'उत्पन्न होकर, कुछ दिन रहकर लीन हो जाता है' इस लोकप्रसिद्ध रीतिको लेक्र 'जिससे ये सघ भूतसमूह उत्पन्न होते हैं, इस श्रुतिमें जन्ममें ही प्रथमत्वका निर्देश किया गया है, उक्त श्रुतिको ही मूल मानकर सूत्रमें भी जन्मका आदिपदसे निर्देश करना उ़चित है।
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सूत्रस्थ 'अस्थ और यतः' पदोंका अर्थ ] भापानुवादसहित ६४५
अस्येति सूत्रग्रतीकेन प्रत्यक्षादिग्रतीतं कृत्स्नं जगदभिधीयते, इदमः सर्वनामत्वाद्। अन्यन्रेवाऽत्र सङ्कोचकस्य प्रकरणादेरभावात्। अत एव पष्ठीविभक््था जन्मादीनां जगतश्च सर्व एवेह संचन्धो विवक्ष्यते। न च जगदाश्रितानां जन्मादीनां गृहाथितकाकवल्लक्ष्यसंबन्धरहितत्वाद लक्षणत्वमिति वाच्यम्, शुद्धूब्रह्मसवन्धाभावेऽपि मायाविशिष्टकारण- ्रह्मसंचन्धित्वात्। यत इत्यनेन हि सूत्रपदेन कारणमेव निर्दिश्यते, न तु शुद्धम्। ननु कारणत्वमपि न लक्ष्यान्तर्गतम्। कारणत्वं हि नानाविधकार्यगोचर-
सून्नमें प्रतीकरूपसे आये हुए 'अस्य' इस पष्ठयन्त 'इदम्' शब्दसे प्रत्यक्ष आदिसे प्रतीत सम्पूर्ण प्रपश्चका अगिधान किया जाता है, कारण कि 'इदम्' सर्वनाम है [ सर्वेपां नाम-वाचकम्-अर्थात् सबका जो वाचक हो वह सर्चनाम कहलाता है, अतः प्रकृतमें 'इदम्' सर्वनाम मी दृशयमान सकल विश्वका वाचक है], क्योंकि और स्थलोंकी नाई प्रकृतमें संकोचकारक कोई प्रकरण आदि प्रमाण नहीं है। [ इदम् आदि सर्वनाम कहीं-कहींपर पूर्वकथित या सन्नि- दित मात्रका तथा कहींपर वुद्धिस्थ यत्किश्चित्का ही परामर्श करता है। संकोचमें तो प्रकरणादि ही नियामक होता है। प्रकरणादिके अभावमें तो सकलका ही वाचक होता है] इस कारणसे ही पष्ठी विभक्ति द्वारा जन्मादि और जगत्का यहाँ सभी तरहका सम्बन्ध विवक्षित होता है। शक्ा-जगत्का आश्रय करनेवाले जन्म आदि घरमें बैठे हुए काकके सदश लक्ष्यके साथ सम्बन्ध न होनेसे लक्षण नहीं हो सकते। [ जैसे गृहाश्रित काकादिका नम्मके साथ सम्न्न्ध न होनेसे वह (काकादि) ब्रद्मका लक्षण नहीं माना जा सकता, वैसे ही सकल प्रपञ्चाश्रित जन्मादि भी ब्रक्षके लक्षण नहीं हो सकते ]। समाधान-शुद्ध नस्मके साथ सम्बन्ध न होते हु मी मायाशबलित कारण पाके साथ सम्बन्ध हो सकता है, क्योंकि सूत्रमें आये हुएं 'यतः' पदसे कारण त्रद्माका ही निर्देश है, शुद्धका नहीं। शक्का-कारणत्व भी लक्ष्यके अन्तर्गत नहीं आता, कारण कि नाना प्रकारके कार्योंसे सग्वन्ध रखनेवाली (उत्पादिका ) क्रियाओंका आश्रय ८२
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६४६ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक?
क्रियावेशात्मत्वं तत्प्रसवशक्त्यात्मकत्वं वा। न च तदुभयं जिज्ञास्ये विशुद्धे व्रह्मण्यन्तर्भवितुमर्हति, ततः कारणसंचन्धिनो जन्मादेरलक्षणत्वमिति चेद्, मैवस्; काकाधिकरणत्ववदुपपत्तेः । काकाधिकरणत्वं हि न गृहेऽन्तर्भवति। तथा च सति काकविगमे गृहैकदेशभङ्गचुद्धिप्रसङ्गात्। अतो गृहस्याऽ- धिकरणत्वं नामौपाधिको धर्मः, सच परिशेपाल्लक्षणे एवाऽन्तर्भवति। तननिरुपकस्य काकस्य यथा लक्षणत्वं तथा ब्रह्मणोऽपि कारणत्वमौपाघिको धर्मो लक्षणान्तःपाती। तन्निरूपकस्य जन्मादेर्लक्षणत्वे का तब हानि :?
अथवा तादश क्रियाका उत्पादन करनेकी सामर्थ्य ही कारण है। और उक्त दोनों प्रकारके कारणत्वका जिज्ञासाविपयीभृत शुद्ध ब्रह्ममें अन्तर्गत होना नहीं वन सकता, इससे कारणसम्बन्धी जन्मादि (जिज्ञास्य ब्रह्मके) लक्षण नहीं हो सकते। [ जैसे आकाशके अन्तर्गत न होनेसे गन्ध- वत्त्व आकाशका लक्षण नहीं माना जाता, वैसे ही प्रकृतमें सर्वविघघर्मशून्य जिज्ञास्यभूत शुद्ध ब्रह्ममें उक्त कारणत्वके न होनेसे वह उसका लक्षण नहीं हो सकता ]। समाधान-ऐसा नहीं है, क्योंकि काकाधिकरणत्वकी भाँति (कारणत्वका लक्षण होना) उपपन्न हो सकता है। [ वादीकी शङ्का है कि लक्ष्यान्तर्गत ही लक्षण हो सकता है। उसका समाघाता उत्तर देता है कि काकाधिकरणत्वकी तरह लक्ष्यान्तर्गत न होनेपर भी लक्षण हो सकता है। इसीका आगे स्पष्टीकरण कर रहे हैं-] काकाधिकरणत्व मकानके अन्तर्गत नहीं है। यदि वह (काकाधिकरणत्व) मकानके ही अन्तर्गत मान लिया जाय, तो काकके उड़ जानेपर (काकाघिकरणताका नाश होनेसे) 'घरका एक भाग नष्ट हुआ' ऐसी बुद्धिका प्रसंग आ जायगा। इससे मकानमें विद्यमान काककी अधिकरणता एक प्रकारका औपाधिक धर्म है और वह धर्म परिशेषसे [ पूर्वोक्त- गृहैकदेशके नाशकी बुद्धिका प्रसङ्गरूप दोष होनेसे लक्ष्यभूत घरका अङ्ग तो हो नहीं.सकता, अतः ] लक्षणके ही अन्तर्गत होता है। उस अधिकरणत्वका निरूपक काक जैसे उपलक्षणविघया मकानका लक्षण होता है, वैसे ही व्रह्ममें मी कारणत्व उपाधिप्रयुक्त धर्म है और वह लक्षणके ही अन्तर्भूत है, इसलिए उस कारणत्वके निरूपक जन्मादिको (पूर्वोक्त रीतिसे) लक्षण
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'यतः' से रद्दविध कारणकी चिवक्षा] भांपानुवादसहितं ६४७
ननु लक्षणान्त:पातित्वेन त्रह्मण्यङ्गीक्रियमाणं कारणत्वं कीदशम्? कि निमित्तत्वमेव उतोपादानत्वमेव अथोभयम्१ न तावत् ग्रथम- द्वितीयौ, उपादानस्य निमित्तस्य वाऽन्यस्याऽवश्याङ्गीकर्तव्यत्वेन न्रह्मणि वृहत्यर्थान्वयाभावात् अ्ृत्युक्तानन्त्यभङ्गगग्रसङ्गात्। नाऽपि तृतीयः, एकस्योभयकारणत्वे ग्रमाणाभावात्। नह्यत्राऽनुमानं संभवति। तथा- हि-भृतभौतिकं जगत् पक्षीक्रियते भृतमात्रं चा? आद्ये भागे वाघ:,
माननेमें तुम्हारी क्या हानि है: अर्थात् कुछ नहीं है। [ जैसे काकके उड़ जानेपर मी काकाधिकरणत्व मकानका उपलक्षण होता है, वैसे ही जगत्कारणत्व भी त्रह्मका उपलक्षण हो सकता है, इस प्रकार समान प्रतिवन्दी उत्तर है, यह भाव है। ] शक्ा-लक्षणके अन्तर्गतत्वरूपसे न्रद्ममें (उपलक्षणविधया) माना गया कारणत्व किस प्रकारका है? क्या वह केवल निमित्त कारण है? या केवल उपादान कारण है ? अथवा निमिच् उपादान दोनों है? इनमें प्रथम और द्वितीय पक्ष नहीं मान सकते, कारण कि ऐसा माननेसे उपादान या निमिच कारणको नदसे अतिरिक्त अवश्य मानना होगा, इस परिस्थितिमें ब्रह्ममें 'वृहि' धातुके अर्थका समन्वय नहीं हो सकेगा [ब्रह्माको दोमें से एक कारण माननेपर जब समवायी कारण मानेंगे तब निमित्तमें और निमिच कारण मानेंगे तब समवायीमें नसाका भेद हो जानेके कारण न्रह्की व्यापकताका अभाव स्पष्ट ही होगा, यह भाव है] और श्रुतिसे प्रतिपादित आनन्त्यका भन्ग हो जायगा। तीसरा पक्ष मी नहीं वन सकता, कारण कि एकको ही उपादान और निमित्त यों दो प्रकारका कारण माननेमें प्रमाण नहीं है। इस विपयमे अनुमान भी प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि उक्त अनुमानमें क्या भूत और भौतिक दो प्रकारके प्रपश्चको पक्ष करेंगे अथवा केवल भृतमात्रको पक्ष करेंगे? प्रथम पक्षके माननेमें एक भागमें बाघ होगा, कारण कि भौतिक जगत्में अभिन्ननिमित्तोपादानवस्वरूप साध्यका अभाव (वाघ) देखा जाता है [ अर्थात् भौतिक घट, पट आदिके प्रति भिन्न-भिन्न कुलाल, तन्तुवाय आदि निमित्त और मृत्तिका तथा तन्तु आदि उपादान कारण देखे जाते हैं, पर दोनोंकी अमिन्नता देखी नहीं जाती, इसलिए पक्षके एक १. निमितं च उपादानं च निमित्तोपादाने, ते अभिन्ने यस्य तस्य भावः तद्व्त्वम् -- एक ही है निमित्त और उपादान फारण जिसका, ऐसा कार्य होना।
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६४८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र २, वर्णक १
वटादिष्वेव कार्यत्वहेतोरनैकान्तिकत्वाद् । अतो न कारणत्वं लक्षणमिति चेद्, मैवम्; सूत्रगतया 'यतः' इति पश्चम्या द्विविधकारणत्वस्य विवक्षितत्वात्। जायमानवस्तुप्रकृतौ हेतौ च पश्चमीविधानात्। न च तन्तुष्वनेकेषु प्रकृतित्वदर्शनादेकस्य ब्रह्मणः प्रकृतित्वासंभव इति वाच्यम्, तत्र किं महाभूतप्रकृतित्वं न संभवति भौतिकप्रकृतित्वं वा १ नाऽडद्य:, महाभूतानि सत्ताप्रकृतिकानि, तदनुरक्तत्वाद, यो यदतुरक्त: स
भौतिकरूप भागमें उक्त साध्यका अभाव है, यह तात्पर्य है। ] दूसरा पक्ष भी नहीं बन सकता, कारण कि घटादि-पदार्थोंमें ही कार्यत्वरूप हेतु व्यभिचरित है। [उक्त अभिन्नोपादाननिमित्तकत्वरूप साध्यकी सिद्धि आप कार्यत्वरूप हेतुके द्वारा ही करेंगे, परन्तु वह हेतु उक्त साध्यसे व्याप्त नहीं है, क्योंकि प्रदर्शित- रीतिके अनुसार घटादि कार्योंमें हेतु तो विधमान है, परन्तु तथोक्त साध्य नहीं है। ] इसलिए ब्रह्मका लक्षण कारणत्व नहीं माना जा सकता। समाधान-ऐसा कहना उचित नहीं है, कारण कि सूत्रमें आई हुई 'यतः' इस पश्चमी विभकिसे दो प्रकारका (निमित्त और उपादान) कारण विवक्षित है, क्योंकि उत्पन्न होनेवाले पदार्थकी प्रकृतिमें और हेतुमें पश्चमी विभक्तिका [ 'जनिकर्तु: प्रकृतिः इस सूत्रसे ] विधान किया जाता है। यदि कहो कि अनेक तन्तुओंमें (घटकी) उपादानकारणता देखी जाती है, अतः अकेले व्रक्में प्रकृतित्वका (उपादानत्वका) होना सम्भव नहीं हो सकता, तो यह कहना भी उचित नहीं है, कारण कि उसपर प्श्न यह होता है कि क्या ब्रम्म महाभूतोंका उपादान नहीं हो सकता : या भौतिक घट, पटादि कार्योंका उपादान नहीं हो सकता ? प्रथम निकष्प नहीं बन सकता, कारण कि [अनुमान द्वारा उसका सम्भव होगा, अनुमान दिखलाते हैं] महाभूत एकसत्तामात्र प्रकृतिक हैं, अर्थात् महाभूतोंका उपादान (प्रकृति) एक ही सद् वस्तु है, सचासे अनुरक्त (अनुगत) होनेसे [ आकाशादि महाभूतोंमें सत्तानुरागके द्वारा आकाश सत् है, वायु सत् है, तेज सत् है इत्यादि अनुगत- रूपसे 'सन्' प्रतीति होती है। ] क्योंकि व्याप्ति है कि जो जिससे अनुरक्त रहता है, उसकी वह अनुगत पदार्थ पकृति (उपादान) है, जैसे तन्तुसे अनुरक्त कपड़ा। जसे तन्तुओंकी अनुरक्ति होनेसे कपड़ेकी प्रकृति तन्तु होता
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अपनचके प्रति मक्षकी निमित्तता और उपादानता] भाषानुवादसहित ६४९
तत्प्कृतिक:, यथा तन्त्वनुरक्तस्तन्तुप्रकृतिक: पटः। सत्तायश्चकत्वं लोकवदेवासत प्रसिद्धम्, दिक्कालादिपु द्रव्यत्वजात्यनुगमेऽप्यतत्प्रकति- कत्वादनैकान्तिकतेति चेट्, न; वेदान्तिभिर्द्रव्यत्वादीनामपि प्रकृति- त्वाङ्गीकारात् । सच्ताया एव ह्यौपाधिका भेदा द्रव्यत्वादयो न स्वतन्त्राः । - अतो न प्रथिव्यादौ सत्ताद्रव्यत्वोभयप्रकृतित्वप्रसङ्गः । नाऽपि द्वितीय: भौतिकेष्वपि सत्तानुरक्तेपु भूतद्वारा भूतानुगतसत्ताया एव लाघवन्यायेन मूलप्रकृतित्वाङ्गीकारात। न च प्रकृतेरेव निमित्तत्वे मानासम्भवः, विमतं
है, वैसे ही महाभूतोंकी मी सत् प्रकृति है। और सचाका एकत्व तो लोक और वेदमें प्रसिद्ध ही है। [लोकवत् पाठ माननेमें लोकके तुल्य अर्थात् जैसे लोकमसिद्धिके लिए कोई अनुमानादि प्रमाण अपेक्षित नहीं है, वैसे ही सचाके एक होनेमें प्रमाणोंको देनेकी अपेक्षा नहीं है, क्योंकि वह तो प्रसिद्ध ही है। "जैसे आकाशादिमें सत्ताकी अनुगत प्रतीति होती है, वैसे द्रव्यत्वादि भी अनुगत- रूपसे भासते हैं, परन्तु द्रव्यत्व तो न्यायमतमें उपादान नहीं माना जाता और यदि प्रकृति माना जाय तो अनेकोंका उपादान होना प्राप्त होता है; इन आशक्काओंका अनुवाद करके समाधान करते हैं] दिक् काल आदि पदार्थोंमें द्रव्यत्व जातिका अनुराग होनेपर भी द्रव्यत्वप्रकृृति न होनेसे व्यभिचार दिखलाना उचित नहीं, कारण कि वेदान्तसिद्धान्तवाले द्रव्यत्व आदिको मी प्रकृति मानते हैं। द्रव्यत्व आदि सचाके ही औपाधिक मेद हैं, स्वतन्त्र पदार्थ नहीं हैं [ अर्थात् वे सचासे सब अभिन्न हैं], इसलिए पृथ्वी आदि भूतोंमें सता और द्रव्यत्वरूप भेदोंके प्रकृतित्वका प्रसङ् नहीं आ सकता। दूसरा विकलप भी नहीं मान सकते, कारण कि सच्तासे अनुगत घट, पटादि भौतिक पदार्थोंमें मी भूतोंके द्वारा भूतोंमें अनुगतरूपसे विद्यमान सत्ता ही लाघवन्यायसे मूल प्रकृति मानी गई है। .[ सात्पर्य यह है कि जसे दधिमन्थनसे उत्पन्न हुए नवनीतकी मूल प्रकृति दूध ही है, क्योंकि दधि दूधका ही परिणाम है) वैसे ही प्रकृतमें पृथ्वी आदिके कार्यभृत घटादिकी मूल प्रकृति भी सचामात्र है, क्योंकि वे सत्ताके परिणाम- भूत पृथ्वी आदिके विकार हैं। यदि कहो कि प्रकृति (उपादान कारण) को निमिच कारण माननेमें प्रमाणका सम्भव नहीं है, तो यह कहना उचित नहीं
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६५० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक १
जगद् अभिन्ननिमित्तोपादानकम्, प्रेक्षापूर्वजनितत्वाद् आत्मगतसुखदु:खराग- द्वेपादिवत्। अज्ञानोपादानंकदोपनिमित्तकशुक्तिरजतव्यावृत्तये प्रेक्षापूर्वे- त्युक्तम्। घटादीनामपि पक्षत्वान्नाऽनैकान्तिकता। कुलालाद्याकारेण ब्रह्मण एव निमित्तत्वाद् न भागे वाधोऽपि । अदष्टादिनिमित्तभेददर्शना- त्साध्यवैकल्यमिति चेद्, न; उपादानाधिष्ठात्रोरेवैकत्वानुमानात्। तथा च सति जगत्यपि ्रह्मव्यतिरिक्तस्याऽद्ष्टस्य निमित्तत्वं प्रसज्येतेति चेद्,
है, कारण कि इसमें अनुमान प्रमाण विद्यमान है। [अनुमान दिखलाते हैं-] विवाद्ग्रस्त संसार अभिन्ननिमित्तोपादानक है [अर्थात् इस प्पश्च- रूप कार्यका जो निमित्त कारण है, वही उपादान कारण भी होता है] क्योंकि बुद्धिपूर्वक इसकी उत्पत्ति की गई है, जैसे आत्मामें होनेवाले सुख, दुःख तथा राग और द्वेष। शुकिरजतमें अज्ञान उपादान है और दोप निमिच है। इस प्रकार अ्रमात्मक ज्ञानरूप कार्यकी व्यावृत्तिके लिए बुद्धिपूर्वक विशेषण दिया गया है [भ्रमात्मक ज्ञान वुद्धिपूर्वक-सोच समझकर-नहीं होते हैं। 'घटादिके निमिच कुलालादि और उपादान मृदादि होनेसे घटादिमें व्यभिचार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वे भी हमारे पक्षमें ही आ जाते हैं [ घटादिरूप पक्षकदेशमें उक्त रीतिसे आनेवाले वाधका वारण करते हैं-] कुलालादिके आकारसे ब्रह्म निमिच्त कारण है, अतः पक्षकदेश घटादिमें बाघ भी नहीं है। [अर्थात् मृदवच्छिन्न चतन्य उपादान और कुलालावच्छिन्न चैतन्य निमित्त कारण है, औपाधिक भेद होनेपर मी वास्तव अमेदं होनेसे कोई दोष नहीं आता ]। शक्का-कार्यमात्रमें अदष्ट निमित्त कारण है, इस नियमके अनुसार अथवा सुखादिभोगमें तो अदष्टके ही निमिच होनेसे अदष्टादि निमिच कारणके भेद देखे जानेसे (एककारणत्वरूप) साध्यका अभाव दोष होगा। समाधान-नहीं, कारण कि उपादान और अघिष्ठाताके एक होनेका अनुमान करते हैं। [सुखादिरूप कार्यके प्रति मी अदृष्ट अधि- छान नहीं है, अतः निमिच्तका भेद होनेसे भी दोष नहीं आ सकता] ऐसा माननेपर मी तो (सुखादिकी भाँति) जगतूमें ब्रह्मसे अतिरिक्त अदष्टको निमिचकारणत्वका मसङ्क आ ही जायगा [ इससे अद्ृष्ट और ब्रह्म दो
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परिणामवादका खण्डन ] भापानुचादसहित ६५१
एवं तर्ह्दष्टोपहितस्याऽऽत्मन एव सुखादिनिमित्तत्वं द्रष्टव्यम्। अथ छुतर्कोंपहतमतिः सन्नस्मिन्ननुमानेऽत्यन्तं न श्रीयसे, तर्हि सृष्टिवाक्यप्रसिद्धमेकस्योभयकारणत्वं लक्षणत्वेन निर्दिश्यते। सृष्टिवाक्यं च 'तदैक्षत' इति निमित्तत्वम् 'बहु स्याम्' इत्युपादानत्वं च प्रतिपादय- तीति सन्तोष्टव्यम्। अत्र केचित्। श्रुतेः स्वतःप्रामाण्यात्तथाभूतैव ब्रह्मणः प्रपश्चा- पत्तिरिति परिणामवादमवतारयन्ति। तन्र तथाभूतत्वं नाम किं सत्य-
निमिच् कारण होनेसे साध्यवैकल्य चना ही रह गया ] ऐसा दोष दिया जाय, तो इस अद्टोपहित आत्माको ही सुखादिका निमिच समझना चाहिए। [तात्पर्य यह है कि सुखादिस्थलमें भी जब अदष् स्वतन्त्र निमित नहीं है, तब उस दष्टान्तसे अन्यत्र मी अदष्टमें स्वतन्त्र निमित्तकारणत्व कैसे प्राप्त हो सकता है ? इस सिद्धान्तके अनुसार प्रपञ्चमात्रको अभिन्ननिमित्तोपादानकत्व या अभिन्नोपादानाधिष्ठानकत्व सुतरां सिद्ध हो जाता है ]। यदि कुतर्कके कारण बुद्धि मारी जानेपर इस उक्त अनुमानसे अधिक प्रसन्नता न हो सके, तो सरष्टिवाक्यमें प्रसिद्ध एकमें ही दोनों कारणताका लक्षणरूपसे निर्देश किया गया है। [ अनुमान समझमें न आ सकनेके कारण यदि ब्रह्मका कारणत्व- रूप लक्षणमें विवाद करते हो, तो श्रुतिप्तिपादित सृष्टिवाक्यपर श्रद्धा रख कर कारणत्व लक्षण मानिए सृष्टि वाक्य दिखाते हैं-]और सृष्टि वाक्य है कि 'तदैक्षत'-'उस न्रह्मने ईक्षण-मायाके उनमुख होनेकी कामना-किया' इससे न्रह्मका निमिच्त या अषिष्ठान होना दिखलाया गया, और 'बहु स्याम्'- 'बहुत हो जाऊँ' इसके द्वारा ब्रह्मका उपादान कारण होना प्रतिपादन किया गया, इस प्रकार सृष्टिवाक्योंसे सन्तोष करना चाहिए। इस विपयपर कोई वादी श्रुतिके स्वतःप्रमाण होनेसे ब्रह्मका तथाभूत प्रपश्नरूपसे परिणाम होता है इस तरह परिणामवादका अवतरण करते हैं, [ 'बहु स्यां प्रजायेय' यह स्वतःप्रमाण श्रतिका सृष्टिवाक्य ब्रह्मका प्रपश्चरूप परिणामको कहता है, अतः इसे प्रमाण मानना चाहिए। ] इन परिणामवादियोंसे प्रश्न करना चाहिये कि आपका तथाभूतत्व पदार्थ क्या है? क्या सत्यशब्दसे
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६५२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक १
शब्दाभिधेयत्वं किं वा स्वोपाधावभावव्यावृत्तत्वम् उत स्वाश्रयोपाधाव- वाध्यत्वम् अथवा स्वरूपेणाऽवाध्यत्वम् : नाद्य, स्वम्सृष्टेः सत्य- शव्दाभिधेयताप्रसङ्गात्। तद्वुद्धेरपि स्वतः आमाण्यप्रासेर्दुर्वारत्वात्। अथ तत्र दोषादप्रामाण्यं अ्तेस्तु नैवमिति मन्यसे एवमपीदं रजतं मिथ्या, वाध्यत्वादित्यनुमानप्रमाणगम्ये रजते सत्यत्वं प्रसज्येत। न द्वितीयः, मायाचादिभिरपि अत्यादिप्रतिपन्नसष्टेः स्वाधिष्ठाने ब्रह्मण्य- भावव्यावृत्तत्वाङ्गीकारात्। न तृतीय:, कल्पितानां अ्तिविम्वश्यामत्व-
कहे जाने योग्य होना है? अथवा अपनी उपाधिमें अपने अभावसे रहित होना है ? या अपने आश्रयकी उपाधिमें बाध्य न होना है? अथवा स्वरूपसे बाघित न होना है ? इनमें से ग्रथम विकल्प नहीं मान सकते, कारण कि स्वप्नसृष्टि भी सत्यशब्दसे कही जाने लगेगी। स्वप्नबुद्धिमें भी स्वतःप्रमाणत्व नहीं हटाया जा सकता। [ 'अथ सथान् रथयोगान् पथः सृजते' इत्यादि श्रुतिवाक्य ही स्वप्नसृष्टिमें प्रमाण है और स्वप्नमें रथादिवुद्धि भी होती है। बुद्धि तथा श्रुति दोनों स्वतः प्रमाण हैं, इसलिए तुम्हारे मतसे स्वम्सृष्टि सत्य कही जानी चाहिए। ] यदि स्वम्सृष्टिमें (निद्रारूप) दोष है (अथवा श्रुतिसे ही वहांपर 'न रथा' इत्यादि बाघ है) इसलिए प्रामाण्य नहीं माना जाता और सृष्टिश्रुतिमें तो ऐसा (वाघ या दोष) नहीं है, ऐसा मानते हो, तो तो मी 'यह रजत मिथ्या है, बाध्य होनेसे' इस अनुमानप्रमाणसे जाने गये 'पक्षमूत' रजतमें भी सत्यत्वका प्रसक्क आ जायगा। [ परन्तु ऐसा नहीं है, इस अनुमानसे केवल इतना ही दिखाया जाता है, रजतभिन्नको रजत समझना प्रमाण नहीं है, रजतको सिद्ध करनेमें इसका तात्पर्य :नहीं, अतः प्रमाणगम्यत्व होना-मात्र सत्यत्वका प्रयोजक नहीं है। ] दूसरा विकल्प भी नहीं बन सकता, कारण कि मायावादी भी श्रुत्यादिसे सिद्ध सृष्टिको अपने अविष्ठान ब्रह्ममें अभावव्यावृत्त-अभावरहित-मानते हैं। [ भास- मान सृष्टिका अपने अधिष्ठान ब्रह्ममें अभाव नहीं है, एतावता सृष्टिको प्रमाणभूत या सत्य नहीं कह सकते, अर्थात् दूसरा विकल्प परिमाणकी प्रमाणता सिद्ध नहीं कर सकता ] तीसरा विकल्प भी साधक नहीं है, क्योंकि कल्पनाके विकरपभूत प्रतिबिम्बगत इयामता और घटाकाशादिरूपसे परिच्छिन्न होना आदि
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परिणाभवादका खण्डन ] भापानुवादसहित ६५३
चटाकाशपरिच्छिन्नत्वादीनामौपाधिकधर्माणामपि स्वाश्रयोपाधाववाध्य- लाद। न चतुर्थ:, सृष्टेरपि परमार्थसत्यत्वांशेनव वाध्यत्वं न स्वरूपेणे- त्यङ्गीकारात्। सृष्टेः सत्यत्वाभावे सृष्टिश्रितेरग्रामाण्यं स्याद इति चेद्, न; सृष्टिस्वरूपमात्रप्रमापणे अवृत्तायाः अ्ुतेः सष्टिस्वरूपसद्भावमात्रेण ग्रामाण्योपपत्ती तत्सत्यताया अप्रयोजकत्वात्। नहि रूपप्रमापकस्य चक्षुपः शब्दाभावादप्रामाण्यं भवति, प्रमाणत्वापराधमात्रेण सत्यतायां तात्पर्यकल्पने स्वमचिपयसष्टिश्रुतेरपि तथात्वं स्यात्। अ्रयोजनशून्यता तूभयत्र समाना दुःखतत्साधनांशेऽनर्थहेतुत्वं च समम्। सृष्टिसत्यता.
[आदि पदसे जपाकुसुमके संसर्गसे प्रतीयमान स्फटिकगत लौहित्यादिका ग्रहण है] औपाधिक धर्मोंका मी अपने आश्रयभूत प्रतिविम्ब या घटाकाशादिके रहते उसके उपाधिरूप दर्पण या घटादिमें ाध नहीं होता है। [ दर्पणमें श्यामत्व, घटमें परिच्छिन्नत्व तथा जपामें लौहित्य आदि अवाघित ही हैं, इससे भी प्रतिविम्ब- श्यामत्व आदि प्रमाण नहीं माने जाते ]। चतुर्थ विकल्प भी नहीं बनता, कारण कि सृष्टिमें भी परमार्थरूपसे ही वाध्यत्व है, स्वरूपसे नहीं, ऐसा' माना गया है, [अतः स्वरूपसे अवाध्य होना भी प्रामाण्यका साधक नहीं है]। शक्ता-सृष्टिको सत्य न माननेसे सृष्टिप्रतिपादक श्रुति अप्रमाण हो जायगी। समाधान-सृष्टिप्रतिपादक श्रुतिमें अमामाण्य नहीं आ सकता, कारण कि सृष्टिके स्वरूपमात्रका निश्चय कराने लिए प्रवृत्त हुई श्रुतिका सष्टिके स्वरूपसद्भाव- मात्रसे प्रामाण्य उपपन्न हो सकता है, अतः वह सृष्टिकी सत्यतामें प्रयोजक नहीं है, [श्रुतिके स्वतःप्रामाण्यसे सृष्टिकी सत्यता नहीं मानी जा सकती, क्योंकि उसका प्रामाण्य तो सृष्टिके स्वरूपमात्रके ोधनसे ही वना है]। कारण कि रूपका निश्चय करनेवाला चक्षु शब्दका निश्चय न करानेसे अप्रमाण नहीं हो सकता। प्रामाण्यमात्रके अपराघसे सृष्टिकी सत्यतामें श्रुतिका तात्पर्य माननेसे तो स्वप्नकालिक सृष्टिबोधक श्रुतिमें मी ऐसा होना-स्वम्सृष्टिकी सत्यताका बोधकत्व-प्राप्त हो जायगा। प्रयोजनसे रहित होना तो दोनोंमें समान है। [ यदि स्वन्न-सृष्टिको सत्य माननेमें प्रयोजन नहीं है, तो इस जागर-सृष्टिको भी सत्य माननेमें कोई प्रयोजन नहीं है, व्यवहार तो दोनोंमें समान ही है एवं स्थायित्व और अस्थायित्व भी
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६५४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक ३
प्रतिपादने कर्मकाण्डस्य पत्यक्षादेरवा आ्रमाण्यसिद्धि: अयोजनमिति चेद्, न; तत्प्रामाण्यस्य जगन्नित्यत्ववादिमीमांसकमतेऽप्युपपत्तौ परिणाम- वादाऽनवतारात्। मतान्तरेष्वपि सटष्टिश्वित्यवगमात् आगेव लोकव्य- वहारात्तत्रामाण्यं सिद्धम्। ततो निष्प्रयोजनैव सृष्टिश्रुतिः स्यात्। अस्मन्मते तु मानान्तराऽनवगताखण्डेकरसन्रह्मावगमाय महावाक्य= अवृत्ति:। सष्टिश्रुतिस्तु-
दोनों सृष्टियोंमें समान ही है]। दुःख और उसके साधनरूप परिणामांशमें अनर्थका कारण होना भी समान ही है। [यदि स्वप्न-सृष्टिको दुःख या दुःख- साधन माननेपर उसके अनर्थकारी होनेसे उसकी सत्यतामें श्रुतिका तात्पर्य न माना जाय, तो जागर-प्रपञ्च-सृष्टिमें भी उक्त अनर्थ-हेतुता समान ही है, अर्थात् वह भी दुःखमय और दुःखसाधन ही है, यह भाव है। ] शङ्का-प्रपश्न-सृष्टिमें सत्यताका प्रतिपादन करनेसे कर्मकाण्ड तथा प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके प्रामाण्यकी सिद्धि ही प्रयोजन माना जायगा। [ यदि प्रपश्न सत्य न हो, तो स्वर्ग, पुत्र, धन, धान्य. आदिकी कामनाकी पूर्तिके लिए कर्मकाण्ड-वाक्य द्वारा तत्तत् यागका विधान करना अप्रमाण होगा और प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका भी परामाण्य नहीं रह जायगा। ] समाधान-नहीं, कर्मेकाण्ड-भाग या प्रत्यक्ष, आदिका प्रामाण्य तो संसारको नित्य माननेवाले मीमांसकके मतसे भी उपपन्न हो सकता है, उससे परिणाम- वादका अवतरण नहीं वन सकता। [जो वादी जगत्को सत्य नहीं मानते, उनके मतमें सृष्टिके प्रामाण्यके वोधनमें श्रुतिका तात्पर्य माना जायगा, इस आशक्काका समाधान करते हैं-] दूसरे मतोंमें भी सृष्टि-विषयक श्रुतिका ज्ञान होनेसे पूर्व ही लोकव्यवहारसे सृष्टिका प्रामाण्य सिद्ध है, [ इसलिए श्रुति- वाक्यरूप शब्दके प्रामाण्यकी आवश्यकता-भपेक्षा-नहीं है, एवं 'सन् घटः' इत्यादि लोकव्यवहारसे ही सिद्ध सत्त्वके अभेदका प्रतिपादन करनेके लिए भी शास्त्र सप्रयोजन नहीं है ]। अतः सृष्टिविषयक श्रुति प्रयोजनशुन्य ही हो जायगी। हमारे (वेदान्तियोंके) मतमें तो दूसरे प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा नहीं जाने गये अखण्डैकरस ब्रह्मकी प्रतीति करानेके लिए महावाक्योंकी प्रवृत्ति है। और सृष्टिके प्रतिपादक वाक्य तो-
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पेरिणामवादका खण्डन ] मापानुवादसहित
'अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपश्चं प्रपञ्यते। नाऽन्यत्र कारणात्कार्य न चेतत्र क्व तन्भवेत्।।' इति न्यायेनाऽखण्डैकरसत्वप्रतिपादनायेति न वैयर्थ्य किश्चित्। ननु यथा 'इदं रजतम्' इति ज्ञानस्य प्रतीतितो रजतस्वरूपमात्रगोचरत्वेड पि वस्तुतो रजताभासगोचरत्वेनाऽप्रामाण्यं तथा श्रौतसष्टिज्ञानस्याऽपीति चेद्, न; तत्र यथा रजताभासादन्यन्मुख्यरजतं लोके प्रसिद्ध तद्वदत् सटण्ठन्तरस्य मुख्यस्याऽभावाच्तस्या एव मुख्यसटष्टित्वेन तद्गोचरज्ञानस्य मुख्यरजतज्ञानवत् ग्रामाण्योपपत्तेः। न च पारमार्थिकव्रह्मणो मिथ्या- भृतप्रपश्चभावापत्तिविरोध इति वाच्यम्, देवदत्तस्य मायया मिथ्या- व्याघ्रादिभावापत्तिदर्शनात्। न च मिथ्याकार्ये सष्टिशव्दप्रयोगानु-
'अध्यारोप और अपवाद-इन दोनोंके द्वारा निष्पपञ्च-प्रपश्चशन्य-शुद्ध ब्रह्मका विस्तारसे वर्णन किया जाता है। कारणसे अन्यत्र कार्यकी स्थिति नहीं हो सकती। यदि कारणमें कार्यकी स्थिति न मानो, तो वह कार्य फिर कहां रह सकता है? अर्थात् कहीं भी नहीं रह सकता।' -इस न्यायसे उस ब्रह्मकी अखण्डता तथा एक-रसताका प्रतिपादन करनेके लिए प्रवृत्त हैं, इसलिए कुछ भी व्यर्थ नहीं है। शङ्ा-जैसे 'यह रजत है' इस ज्ञानमें यद्यपि रजतका स्वरूपमात्र विपय है, तथापि उसके वस्तुतः-परमार्थतः-रजताभासविषयक होनेसे वह प्रमाण नहीं माना जाता, वैसे ही श्रुतिसे उत्पन्न सृष्टि-ज्ञान भी प्रमाण नहीं होता [ विषयके स्वरूपसे सिद्ध होनेपर भी परमार्थतः असिद्ध होनेसे ज्ञानका प्रामाण्य नहीं हो सकता ]। समाधान-उक्त दष्ठान्त उचित नहीं है, कारण कि जैसे शुक्ति-रजतसे भिन्न (दूसरा) मुख्य-व्यावहारिक-रजत लोकमें प्रसिद्ध है, वैसे प्रकृतमें श्रुति- सिद्ध सृष्टिसे अतिरिक्त दूसरी मुख्य सृष्टि कहीं प्रतीत नहीं है, इसलिए. उसीको मुख्य सृष्टि मान कर मुख्य रजतके ज्ञानकी भांति उसमें प्रामाण्य मानना उपपत्तियुक्त है। परमार्थभूत ब्रह्मकी मिथ्यात्मक प्रपञ्च- भावापत्ति माननेमें विरोध नहीं दिखाना चाहिए, कारण कि माया द्वारा देवदचका मिथ्याभूत व्याघ् आदि होना देखा गया है। मिथ्यास्वरूप प्रपश्चात्मक
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६५६ विवरणत्रमैयंसंग्रह [सूंत्र २, वर्णेक १
पपत्तिः, 'माया ह्येषा मया सृष्टा' इत्यादिप्रयोगदर्शनात्। न च सटष्टि- मिथ्यात्वे मानाभावः, श्रुतिस्मृतिप्रत्यक्षानुमानार्थापचीनां सच्चात्। 'मायां तु प्रकृतिं विद्याद्', 'मम माया दुरत्यया' इति श्रुतिस्मृती अनिर्वंच- नीयमायात्मकत्वं सष्टेरदर्शयतः। घटाद्यभावग्राहिप्रत्यक्षमपि सष्टेर्मिथ्यात्वं दर्शयति। यथा 'इदं रजतम्' इत्यत्रेदन्तोपाधौ प्रतिपन्नस्य सत्येव तदुपाधौ 'नेदं रजतम्' इति बाधः तथा 'अस्ति वटः' इत्यत्राऽस्त्यर्थोपाधौ प्रतिपन्नस्य घटस्य तदुपाधावेव नास्तीति पत्यक्षेणैव बाधो दश्यते। ननु देशकांल- विशेषे तदुपाधिकास्त्यर्थे वा घटस्य निषेधो नाऽस्त्यर्थमात्रे, ततो देशान्तरे कालान्तरे च घटस्य सद्भाव इति चेदू, न; यदा देशकालौ निषिध्येते तदा देशकालान्तराभावे न केवलाऽस्त्यर्थस्यैवोपाधित्वं वाच्यम्, निरुपां- कार्यके लिए सृष्टिशब्दके प्रयोगकी अनुपपत्ति भी नहीं कह सकते, कारण कि 'इस मायाकी मैंने सृष्टि की है' इत्यादि प्रयोग देखे गये हैं, [अतः मिथ्याभूत. मायाके लिए सृष्टिशब्दका प्रयोग शास्त्रोंमें आया है ]। सृष्टिको मिथ्या- अपारमार्थिक-माननेमें प्रमाणका अभाव भी नहीं कह सकते, क्योंकि इस सृष्टिमिथ्यात्वमें श्रुति, स्मृति, प्रत्यक्ष, अनुमान तथा अर्थापत्ति रूप प्रमाण विद्यमान हैं। 'मायाको प्रकृति समझना' और 'मेरी माया सहसा नहीं हटाई जा सकती' इत्यादि श्रुति तथा स्मृतिमें सृष्टि अनिर्वचनीय-मायामयता दिखलातीं हैं। और घट आदिके अभावका बोध करानेवाले प्रत्यक्षसे भी सृष्टिका मिथ्या होना सिद्ध है। जैसे कि 'यह रजत है' इस प्रतीतिमें इदन्तारूप उपाधिमें ज्ञात रजतका उसी उपाधिमें (इदन्तामें ही) 'यह रजत नहीं है' ऐसा बाघ होता है, (इस बाधके कारण उसे रजतरूप समझना मिथ्या है) एवं 'घट है' इस ज्ञानमें अस्तिके अर्थभूत सचा-रूप उपाघिमें ज्ञात घटका उसी उपाधिमें 'नहीं है' इस प्रकार प्रत्यक्षसे ही बाघज्ञान होता है। शङ्का-देशकालविशेषमें या देशकालोपाघिविशिष्ट अस्त्यर्थ सचामें 'नास्ति घटः' इस प्रकार घटका निषेध किया जाता है, केवल अस्त्यर्थ सचामें ही नहीं, इससे 'इस देश या कालमें उसका निषेध होनेपर मी' दूसरे देश या दूसरे कालमें घटका सद्भाव बना ही रहता है। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि जब (देश नहीं, काल नहीं, इस प्रकार) देश तथा कालका निषेध किया जाता है, तब दूसरे देश
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पररिणामंवादका खण्डन ] भापानुवादसहित ६५७
धिकनिपेधायोगात। ततस्तत्र क्लसोपाधेर्घटादिनिपेधसम्भवे सत्य न्योपाधिकल्पने गौरवप्रसङ्ग:। न चवमेवाऽस्त्यर्थनिपेधेऽस्त्यर्थान्तरा-
अस्त्यर्थस्याऽनुयायिनो निषेधाभावात्। तस्मादस्त्यर्थ ब्रह्मणि वटाद्य- भाववोधकं प्रत्यक्ष मिथ्यात्वे मानम्। यस्त्वभावस्य पष्टमानगम्यत्वमाह तं प्रत्येकैकाभावविशिष्टवस्त्वन्तर- पत्यक्षं वा पष्ठमानमेव वा मिध्यात्वं वोधयतु। अनुमानान्यपि तद्धोधकान्युच्यन्ते-विमता विकारा: स्वानुस्यू- तेकवस्तुनि कल्पिताः, प्रत्येकमेकस्वभावानुविद्धत्वाद् विभक्क्तत्वाच, चन्द्र- या कालका अभाव होनेसे केवल अस्त्यर्थ सत्ताको ही उपाधि मानना होगा, कारण कि उपाधिशुन्य निषेध हो नहीं सकता, अन्यथा निपेधका भासना ही असम्भव होगा। इसलिए देशकालनिपेधमें मानी हुई अस्त्यर्थरूप उपाधिमें घटादिके निषेषका सम्भव होनेसे दूसरी उपाधिकी करपना करनेसे गौरवका प्रसङ् आता है। शक्का-उक्त रीतिके अनुसार 'अस्त्यर्थों न' इत्याकारक अस्त्यर्थके निपेधमें दूसरा अस्त्यर्थ न होनेके कारण निपेध्य अस्त्यर्थके उपाघिशुन्य होनेसे निरुपाधिक निपेध माना ही जाता है,[ अर्थात् उपाधिकी कल्पनासे अनवस्था या गौरव नहीं आ सकता ]। समाधान-ऐसा नहीं कहा जा सकता, कारण कि अनुयायी अस्त्यर्थका निषेध नहीं हो सकता। [ अस्त्यर्थ सर्वत्र अनुवर्तमान रहता है, अन्ततः 'अभाव है, निपेध है, अस्त्यर्थ नहीं है' इत्यादि प्रकारसे नास्तिमें भी अस्त्यर्थ रहता है, अतः उसका निषेध नहीं हो सकता और अस्त्यर्थके सदूप होनेसे त्रह्माद्वैतवादमें भी हानि नहीं आा सकती। ] इसलिए अस्त्यर्थ सदूरूप ब्रह्ममें धटादिके अभावका बोधन करनेके लिए प्रवृत्त प्रत्यक्ष प्रमाण प्रपश्चमें मिथ्यात्व-वोधन करता है। और जो वादी अभावको छठे अनुपलन्धिरूप प्रमाणसे जानने योग्य कहता है, उसके प्रति एक-एकके अभावसे विशिष्ट अन्य वस्तुका प्रत्यक्ष अथवा छठा प्रमाण अनुपलन्धि ही प्रपञ्चके मिथ्यात्वका बोधन करेगा। अब प्रपश्चमिथ्यात्वके बोधक अनुमान भी कहे जाते हैं-िमत-भूत- भौतिक आकाशादि तथा घट, पटादि रूप प्रपश्च-अपनेमें अनुवर्तमान एक ही वस्तुमें
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६५८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक ३
स्वभावानुविद्धचन्द्रकल्पितजलचन्द्रभेदवत्। शन्यवादिनं अ्रति सिद्धसा- धनतापरिहाराय वस्तुनीति पदम् । अनेकेषु विपयेषु विज्ञानाकार: कल्पित इति वादिनं अत्येकेति। क्षणिकैकज्ञाने सर्व कल्पितमिति वादिनं प्रति स्वानुस्यूतेति। वनाकारानुविद्वेषु तत्राऽकल्पितेपु तरुष्वनैकान्तिकत्वव्यावृ- त्तये प्रत्येकमिति। भेद: कल्पितो जडत्वात्, कार्यत्वात्, रजतवत् ; भेद- कल्पित हैं, [हेतु देते हैं-] प्रत्येक एक ही स्वभावसे सम्बद्ध होनेसे अथवा परस्पर विभक्क होनेसे, [दष्टान्त देते हैं-] चन्द्रस्वभावसे अनुविद्ध चन्द्रकल्पित जलचन्द्रोंके भेदके समान। शून्यवादीके मतमें सिद्ध-साधन दोपके परिहारके लिए 'वस्तुनि' यह पद दिया गया है। [ शून्यवादी सभी पदार्थोंको कल्पित ही मानता है, और इस अनुमानसे भी यही सिद्ध किया गया, कोई नवीनता नहीं आई; इससे वस्तु पद दिया गया है। शून्यवादी एक भी वस्तु ऐसी नहीं मानता, जो कल्पित न हो, और इस मतमें अनुस्यूत सत् पदार्थ कल्पित नहीं है। प्रत्युत-सारा प्रपश्च इसमें ही कल्पित है, इतनी नवीनता आनेसे सिद्धसाधन दोष नहीं आता ] [प्रत्येक पदका प्रयोजन दिखलाते हैं-] अनेक विषयोंमें विज्ञानका आकार कल्पित होता है, इस प्रकार माननेवाले वादीके मतके अनुसार अर्थान्तर दोषका वारण करनेके लिए 'प्रत्येक' पद दिया गया है। क्षणिक एक ज्ञानमें सम्पूर्ण जगत्को कल्पित माननेवालेके प्रति 'स्वानुस्यूत' पद दिया है [ क्षणिक- वादी अनुस्यूत एक स्थायी पदार्थ नहीं मान सकता, इससे उसके मतको लेकर सिद्धसाधनादि दोष नहीं दिया जा सकता। हेतुगत प्रत्येक पदका फल कहते हैं-] एक ही वनरूपमें अनुवृत्त और उस वनमें कर्पित न माने जानेवाले वृक्षोंमें व्यभिचारका वारण करनेके लिए (हेतुमें) प्रत्येक पद दिया है। [ प्रत्येक वृक्ष वन नहीं कहा जाता, किन्तु वृक्षोंके समूहको वन कहते हैं, अतः वृक्षमें हेतु तथा साध्य दोनोंके न होनेसे व्यभिचार दोष नहीं आता। विभक्तत्व-कल्पितमेदवत्ता-रूप हेतुसे भेदाश्रय प्रपञ्चमें मिथ्यात्वकी सिद्धि पहले कर आये हैं, अब भेदमें कल्पितत्वका साधन करते हैं-]-भेद कल्पित-मिथ्या-है, जड़ या कार्य होनेसे, रजतके समान; या १ -- यह दूसरा हेतु है। विभक्तत्व धर्मिसत्तासमसत्ताक भेदवत्वको कहते हैं- घट, पटादिकी सत्ताके समान इनके भेदकी सत्ता भी कल्पित ही है, अतः इस हेतुका अर्थ कल्पित भेद हुआ।
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परिणामवादका खण्डन ] भापानुवादसहित ६५९
त्वात् चन्द्रभेदवत्; प्रतिपन्नोपाधावस्थूलादिवाक्यैः ग्रतिपिध्यमानत्वात, देहा- त्मभाववत् : विरोधिकारणस्वभावाऽनुपमर्देन विरोधिकार्यापत्तिलक्षणत्वाद्, मायाविव्याघ्रवत् ; ग्रलयावस्थायां सह कालेन स्वोपाधौ शून्यत्वाद्, देहा- त्मभाववत्। ग्रलयकाले एव शून्यत्वं न स्वोपाधावित्याशङ्काव्युदासाय सह कालेनेत्युक्तम्। अर्थापत्तिरपि-प्रपश्चस्य भिथ्यात्वमन्तरेणाऽनुपपन्नौ जन्मविनाशौ, अमिध्याभूतयोरत्रह्मशन्ययोर्जन्मविनाशादर्शनात। न चैवं अपश्चमिथ्यात्वाङ्गीकारे ब्रह्मज्ञानस्याऽपि प्रपश्चज्ञानवन्मिथ्यात्वमनुमीयते भेदरूप होनेसे चन्द्रमेद (चन्द्रविशेष) के तुल्य। अथवा सदूप त्रम्मात्मक उपाधिमें 'स्थूल नहीं' इत्याधर्थक 'अस्थूलम्' इत्यादि वाक्योंके द्वारा निषेधका विषय होनेसे, देहात्मभावके समान; [अर्थात् जसे देहमें आत्मबुद्धि 'मैं मनुष्य नहीं हूँ' इस प्रत्यक्ष वाघसे मिथ्या है, वैसे ही सद्ूप त्रह्ममें 'सन् घटः' इत्याकारक प्रपञ्ञवुद्धिके 'अस्थूलम्' इत्यादि वाक्यों द्वारा वाधित होनेसे प्रपश्चमें मिथ्यात्व सिद्ध होता है ]। अथवा विरोधी कारणके स्वभावका उपमर्दन करके (अर्थात् अनुवर्तन करके) विरोधी कार्यरूपकी प्राप्ति होनेसे, मायावी नटके व्याघ्र होनेके समान। [ मायावी मनुष्य विरोधी व्याघ्नरूप कार्यकी प्राप्ति करता हुआ भी अपना चैतन्य या लोकानुरञ्जन आदि स्वभाव नहीं छोड़ता, मायाची सिंहका विकरालरूप भी अनुरञ्जनका ही साधक है, इससे विवर्तवाद सिद्ध हुआ।] अथवा पलयद्शामें कालके साथ अपनी उक्त उपाघिमें शुन्यरूप होनेसे, देहात्मभावके समान। [मरनेपर 'मैं मनुष्य हूँ' इत्याद्याकारक देहात्मभावसे शून्य हो जाता है, एवम् प्रलयमें सब प्रपश्च शून्य हो जाता है। ] प्रलयकालमें ही शुन्यत्व होता है (अर्थात् काल ही सब प्रपश्चका लय करता है) अपनी उपाघिमें नहीं होता, इस आशक्काकी व्यावृत्तिके लिए 'कालके साथ' ऐसा कहा। अर्थात् अविद्याके प्रलयसे कालकी भी निवृत्ति हो जाती है। अर्थापत्ि भी इसमें प्रमाण है-प्रपश्चको मिध्या माने बिना उसके जन्म और विनाश दोनों नहीं वन सकते; कारण कि मिथ्या नहीं माने जानेवाले न्रह्म तथा शुन्य-तुच्छ-का जन्म और विनाश दोनों नहीं देखे जाते। शक्ा-इस प्रकार ्रुतिसिद्ध पपश्चको अनुमानादिसे मिथ्या माननेपर न्रदाज्ञान भी प्रपश्नज्ञानके समान मिथ्या होगा। i .
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६६० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, चर्णक ₹
इति वाच्यम् स्वरूपतो मिथ्यात्वाङ्गीकाराद। विपयतो मिथ्यात्वं तु 'तत्सत्यं स आत्मा' इति वचनविरुद्म्। नन्वस्थूलादिवाक्येः स्थूलादिव्य- तिरिक्तरूपमप्यस्तीति अ्तिपाद्यते, न तु स्थूलादिरूपं निपिध्यते, ततः प्रतिपिध्यमानत्वमिति हेतुरसिद्ध इति चेत, स्थूलप्रपश्चतादात्म्यवति ब्रह्मण्य- न्यरूपविवक्षयाऽप्येवं अ्तिपेधानुपपत्ते :; नहि शुकायां गवि क्षीरसंपत्ति विवक्षन्न शुक्का गौरिति प्रयुङ्के, किं तर्हि क्षीरसंपन्ना गौरिति। ततः स्थूलादिप्रपश्चं निपिध्यैव रूपान्तरं प्रतिपाद्यते इत्यङ्गीकर्त्तव्यम्। तर्का- अ्तिष्ठानान्न मिथ्यात्वानुमानमिति चेद्, न; विचारशास्त्रानारम्भप्रसङ्गात्।
समाधान-ऐसा नहीं कहा जा सकता, कारण कि [ विपयविपयिभावापन्न ज्रह्मज्ञानमें ] स्वरूपतः मिथ्यात्वका अङ्गीकार किया ही गया है। (न्रद्मज्ञानको) 'ब्रह्मरूप' विषयसे मिध्या मानना तो जो 'सत्य-अवाधित-है वह आत्मा है, इत्यादि श्रुतिवचनोंसे विरुद्ध है। [इसलिए ब्रह्मज्ञानका विषय त्रद्ष मिथ्या नहीं माना जा सकता और सृष्टिका (प्रपश्चका) ज्ञान तो 'अस्थूलम्' इत्यादि वाक्योंसे वाघित होनेसे मिथ्या माना गया है ]। शङ्का-'अस्थूलम्' इत्यादि वाक्योंसे (स्थूल ही नहीं बलिक) स्थूलादिसे अतिरिकतरूप मी इसका है, ऐसा प्रतिपादन करते हैं। स्थूलादि रूपका निषेध नहीं किया जाता है; इससे प्रतिपिध्यमानत्व-निषेधका विषय होना- रूप-हेतु सिद्ध नहीं हो सकता। समाधान-ऐसा नहीं, कारण कि स्थूल प्रपश्चके तादात्म्यको पाप्त हुए ब्रह्ममें स्थूलभिन्न अतिरिक्त रूपकी विवक्षासे मी 'अस्थूलम्' (स्थूल नहीं) इस प्रकार निषेध करना उपपन्न नहीं होता, क्योंकि लोकमें भी शुक्वर्णवाली गायमें दूघकी अधिकता प्रकट करनेकी विवक्षासे-'यह गाय शु्क नहीं है' इस प्रकार (निषेध वाक्यका) प्रयोग नहीं किया जाता, किन्तु 'यह गाय दृधकी सम्पत्तिवाली है' ऐसा प्रयोग किया जाता है। इससे स्थूलादि प्रपश्चका निषेध करके ही ('अस्थूलम्' इत्यादि वाक्योंसे) रूपान्तरका प्रतिपादन किया जाता है, यही मानना होगा। शक्का-वर्कके प्रतिष्ठित न होनेसे मिथ्यात्वसाधक अनुमान कैसे प्रविष्ित (सङ्गत ) होगा,!
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परिणामवादका खण्डन ] भापानुवादसहित ६६१
नहि अुत्यर्थनिर्णायकतर्कप्रदर्शनाय विचारशास्त्रारम्भः, किन्तु परकीय- तर्कनिराकरणायव। ब्रह्म तु अ्तिमात्रसिद्धमिति चेद्, तर्हि 'असद्वा हदम्' 'सदेव सोम्ेदम्' इत्यादिश्ुतिद्वयसामर्थ्यात् कारणस्य सदसच्चे साताम्। सर्वशक्ति- तवाद् त्रह्मण: सर्वमुपपन्नमिति चेद्, न; तथा सति कदाचिच्छृन्यत्व- स्याऽपि प्रसङ्गाद। सर्वशक्तित्वं तु अ्त्यनुसारेणैवाऽवगन्तव्यम्। अत्यर्थश् तदनुसारितर्कानिश्चेतव्यः। अतोऽनुमानमपि अ्त्यविरोधि ग्रपश्चमिध्यात्वं साधयिप्यत्येव। न च 'सन् घटः' इत्यादिसद्वुद्धनुगमविरोध, अनुगत- सत्ताया अधिष्ठानत्वाद् घटादिविशेषाणामेव मिथर्यात्वात्। तस्मादयौत: परिणामवाद इति सिद्धम्। एवं च सति विवर्त्तवादाभिप्रावेणैव ब्रह्मणः श्ुती द्विविधकारणत्व-
समाधान-[ऐसा नहीं, इससे तो विचारशास्त्रका आरम्भ ही नहीं दो सकता। श्रुतिके अर्थके निर्णायक तर्कोंको दिखलानेके लिए विचारशासत्रका आरम्भ नहीं है; किन्तु दूसरे विरोधियों द्वारा उपस्थित किये गये तर्कोंका निराकरण करनेके लिए ही शास्त्रका आरम्भ है। न्रक्म केवल श्रुतिसे सिद्ध है, ऐसा मानना भी नहीं बन सकता, कारण कि 'अथवा यह सब मसत् था', 'हे सौम्य ! यह सत् ही था' इत्यादि परस्पर विरुद्ध दो श्रुतियोंकी सामर्थ्यसे कारणम सत्त्व और असत्व दोनों प्राप्त हो जायँगे। यदि कहो कि ब्रह्ममें सब प्रकारकी शक्तियाँ हैं, अतः त्रद्ा दोनों प्रकारका याने सत् और असत् है, तो ऐसा कहना भी उचित नहीं है; कारण कि ऐसा कहनेसे तो कदाचित् नक्षम शुन्यत्वका भी प्रसक्क आ जायगा। त्रक्ममें सब शक्तियोंका होना तो श्रुविके अनुसार ही समझना चाहिए और श्रुतिके अर्थका तो श्रुतिके अनुकूल तर्कके द्वारा निश्चय करना चाहिए, इसलिए श्रुतिके साथ विरोध न रखनेवाला अनुमान मी प्रपश्चके मिथ्याभावको सिद्ध करेगा ही। 'सन् घटः' (घट सत् है) इत्यादि प्रतीतिके साथ विरोध (घटके मिथ्या माननेमें भी) नहीं आाता, कारण कि अनुगत सचाके ही अघिष्ठान होनेसे घटादिविशेष ही मिथ्या हैं, अर्थात् घटादिका 'सत्त' इत्याकारक विशेषण अघिष्ठानभूत सत्ताके द्वारा प्राप्त है, विशेष्य स्वयं स्वरूपतः मिथ्या है, इसलिए परिणामवाद किसी तरह भी श्रुति- सम्मत नहीं है, यह सिद्ध हुआ। ऊपर किये गये निर्णयके अनुसार विवर्तवादके अभिपायसे ही ब्रक्षमें
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६६२ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक १
सुक्तम्। तच कारणत्वं तटस्थलक्षणत्वेन यद्यपि लक्ष्याद् ब्रह्मण: पृथग्धूतं तथापि तस्य मिथ्यात्वान्न लक्ष्यस्याऽद्वितीयत्वविरोधः । न च सत्यस्यैव लक्षणत्वं न मिथ्याभुतस्येति वाच्यम्, असाधारण- संबन्धो हि लक्षणत्वप्रयोजको न लक्षणसत्यत्वम्। सत्यानामप्य- संवद्धानां काकादीनां गृहोपलक्षणत्वादर्शनात्। असत्यानामपि संचद्धानां रजतादीनां 'यद्रजतमित्यभात् सा शुक्ति:' इत्यादौ शुक्त्यादिलक्षकत्वात्।
संवन्धः। अतः प्रपश्चजन्मादिकारणत्वेन तटस्थेन जिज्ञास्यविशुद्धब्रह्म- स्वरूपं निर्विन्ञमुपलक्ष्यते। न चोक्तलक्षणेन अधानादीनि लक्षयितुं शक्यन्ते, तेपां सर्वज्ञत्व- सर्वशक्तित्वाभावात् ; सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वयोश्र सूत्रस्थयच्छव्देन विचक्षित- दो प्रकारकी [निमित और उपादान ] कारणता श्रुतिमें कही गई है। यद्यपि तटस्थ लक्षण होनेसे उक्त कारणता लक्ष्यस्वरूप ब्रह्मसे पृथक् है, तथापि उसके (कारणत्वलक्षणके) मिथ्या होनेसे लक्ष्यभूत ब्रह्मके अद्वितीय होनेमें विरोध नहीं आता। और यह भी नहीं कहा जा सकता कि सत्य ही लक्षण होता है, मिथ्या नहीं, क्योंकि असाधारण सम्बन्ध [अध्याप्ति, अति- व्याप्ति, असम्भवरूप तीन दोषोंसे रहित होना ] ही लक्षणत्वका प्रयोजक है, लक्षणका सत्यत्व प्रयोजक नहीं है। इसलिए सत्य होनेपर भी उक्त सम्बन्धसे शुन्य काकादि मकानके लक्षण नहीं देखे जाते और 'जो रजतके समान भासित हुआ था, वह शुक्ति है, इत्यादि स्थलमें उक्त सम्वन्धसे सम्बन्घी होनेके कारण असत्यभूत रजत आदि भी शुक्ति आदिके लक्षण देखे जाते हैं। प्रकृतमें प्रपश्च और ब्रह्मका वास्तव सम्बन्घ न होनेपर मी अध्यास द्वारा तादात्म्य (अमेद) सम्बन्ध है ही। इसलिए प्रपञ्चजन्मादिकारणत्वरूप तटस्थ लक्षणके द्वारा जिज्ञासाविषय विशुद्ध ब्रह्मका स्वरूप निर्विन्न उपलक्षित (सूचित ) होता है। उक्त कारणत्वरूप लक्षणसे प्रधान (सांख्यसम्मत प्रकृति) आदि लक्षित नहीं हो सकते, कारण कि प्रधान आदि सर्वज्ञ या सर्वशक्तिशाली नहीं हैं। और सूत्रमें आये हुए 'यतः' इस (पश्चमीकी प्रकृति) यत्- शब्दसे सर्वज्ञत्व और सर्वशक्तिमत्त्वकी ही विवक्षा है। इस प्रकारकी विवक्षा
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वादियोंके मतसे पपच्का मेद] भापांनुवादसहित ६६३
त्वात्। सा च विवक्षा सूत्रगतेदंश-दार्थभूतकार्यग्रपश्चपर्यालोचनया लभ्यते। तं च प्रपश्चं वादिनः स्वप्रक्रियानुसारेण विभजन्ति। तथाहि- द्रव्यगुणकर्मसामान्यानीति वार्तिककारीयाः। कार्यकारणयोगविधिदु:खा- न्तशव्दवाच्या जगदीश्वरसमाधित्रिपवणस्ानाद्यनुष्ठानमोक्षा: पञ्चति शैवाः। द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेपसमवायाः पडिति वैशेपिका:। जीवाजीवाऽडस्र- तसंवरनिर्जरवन्धमोक्षाः सप्तेति क्षपणकाः । तत्र वद्धो मुक्तो नित्यसिद्ध- श्चेति त्रिविधो जीवपदार्थः। पुद्धलास्तिकायो धर्मास्तिकायोऽधर्मास्ति- काय आकाशास्तिकायश्चेत्यजीवपदार्थक्चतुर्विधः। आस्रावयति पुरुपं
सूत्नमें पढ़े गये 'अस्य' के प्रकृतिभूत 'इदम्' शब्दके अर्थभूत कार्य-प्रपच्चकी पर्यालोचनासे पाई जाती है। उस कार्य प्रपश्चका वादी लोग अपनी अपनी प्रक्रियाके अनुसार इस प्रकार विभाग करते हैं-वार्तिककारका कहना है-द्रव्य, गुण, कर्म, और सामान्य इस तरह चार प्रकारके पदार्थ हैं। शवागमकारका मत है-कार्य, कारण, योग, विधि और दुःखान्त शव्दोंसे क्रमशः कहे जानेवाले संसार, ईश्र, समाधि, त्रिपवण स्नानादिका [सायं, प्रातः तथा मध्याह तीनों कालोंमें न्ञ्रान करना त्रिवपण सान कहलाता है और आदि पदसे अगिहोत्रादिका ग्रहण है] अनुष्ठान तथा मोक्ष इस प्रकार पाँच पदार्थ हैं। वैशिपिक द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय-इन छः पदार्थोंको मानते हैं। क्षपणक (जैन) जीचे, अजीव, आसव, संवर, निर्जर, वन्ध और मोक्ष-यों सात पदार्थ मानते हैं। इनमें तीन प्रकारका नीव पदार्थ है-बद्ध, मुक्त, और नित्य- सिद्ध। अजीव पदार्थ पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अघर्मास्तिकाय और आकाशास्तिकाय इस तरहसे चार प्रकारका है। पुरुपको ज्ञान उत्पन्न
१-द्रव्य आदिकी परिभापा इस प्रकारकी की गई है-गुणवाला तथा कार्यका समवायी कारण द्रव्य, गुणक्रियाशन्य सत्तावान तथा समवायीसे भिन्न गुण, चलनात्मक या संयोग- विभागका निरपेक्ष कारण कम तथा नित्य और अनकोमें अनुगतरूपसे रहनेवाला सामान्य कहलाता है। २-नित्य द्रव्योंमें ही रहनेवाला तथा अपने आप भिन्न होनेवाला विश्ेष पदार्थ है, और समवाय नित्य सम्बन्धको कहते हैं। ३-जीवपदसे चेतनसष्टि और अजीवसे जद परमाणु आदि विवक्षित हैं।
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विवरणग्रमैयसंग्रहं i सूत्र २, वर्णक १
ज्ञानजननेन विपयेष्वितीन्द्रियप्रवृत्तिरास्त्रव:, स्रोतसो द्वारं संवृणोतीति शमदमरूपा प्रवृत्ति: संवस, निर्शेपेण पुण्यापुण्ये सुखदुःखोपभोगेन जरय- तीति तसशिलारोहणादिनिर्जर:, अष्टविधं कर्म चन्धा, अलोकाकाशे सत- तोर्ध्वगमनं मोक्षः। द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषपारतन्त्र्यशक्तिनियोगा अष्टाविति चिरन्तना: आभाकरा :; द्रव्यगुणकर्मसामान्यसमवायशक्ति- संख्यासा दृश्यान्यष्टावित्याधुनिकाः। प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनद्ष्टान्तसिद्धा-
कराकर विषयोंमें प्रवृत्त करानेवाली इन्द्रियपरवृत्ति आसव कहलाती है, इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिको रोक देनेवाली शम, दम आदिरूप प्रवृत्ति संवर है, पुण्य तथा पाप दोनोंको सुख, दुःखके भोग द्वारा निश्शेष जला देनेवाला तक्षशिलारोहणादि निर्जर कहलाता है, आठ प्रकारके कर्म वन्धपदसे लिए जाते हैं, अलोकाकाशमें निरन्तर ऊर्ध्वगतिको मोक्ष कहते हैं। द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, पारतन्य, शर्क्ति और नियोग इस प्रकार आाठ पदार्थोंको प्राचीन प्रभाकरानुयायी भीमांसक मानते हैं, और द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, समवाय, शक्ति, संख्या और साहश्य इस प्रकार आठ पदार्थोंको नवीन मीमांसक मानते हैं। प्रैमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दष्टान्त, सिद्धान्त, भवयव, तर्क,
१-पारतन्त्र्य-समवाय सम्वन्ध। २-शकि वह पदार्थ है, जिसके कारण अग्नि आदि दाहादिके जननमें समर्थ होते हैं। ३-लिढादि प्रत्ययका अर्थ नियोग है, जिसके कारण पुरुष अनुष्ठानमें प्रवृत्त होता है और जो अनुष्ठान पुण्यजनक है, यह सूचित करता है। ४ -- (१) प्रमाण-प्रमाका (निश्चयात्मक ज्ञानका) साधन, (२) प्रमेय-प्रमाके विषय घट, पटादि, (३) संशय-निश्चय न कर सकना अर्थात एक ही धर्मीमें समानकोटिसे नाना अकारका ज्ञान होना, (४) प्रयोजन -- उद्देश्य, (५) दृष्टान्त-व्याप्तिका समन्वय करनेके लिए स्थल, जो सर्ववादिसम्मत हो, (६) सिद्धान्त-प्रमाणरूपसे माना गया निश्चय, (७) अवयव- न्यायवाक्यका प्रविज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनयन और निगमनरूप भाग, (८) व्याप्तिके वलसे हठात् अनिष्टकी प्रसक्ति दिखा देना तर्क है, (९) निर्णय-प्रथम तर्क द्वारा उपस्थित की गई अनिष्ट प्रसकिका निराकरण करके निक्षय करना, (१०) वाद-रागादि दोपोंसे शून्य होकर तत्वजिज्ञासुके लिए की गई कथा, गुरुका उपदेश आदि । यह कधा प्रश्नपूर्वक भी होती है, परन्तु इसमें रागादि या अभिनिवेश नहीं होता है। (११) जल्प-अपने-अपने मतके साधनमें प्रवृत्त हुई कथा, (१२) वितण्डा-उपर्युक्त जल्प कथा, परन्तु इसमें अपने पक्षका साधन नहीं किया जाता, केवल परपक्षका खण्डन ही किया जाता है, (१३) हेताभास-हेतु न हो, परन्तु
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वांदियोंके मतसे प्रपञ्चका भेद] मापानुवादसहित ६६५
न्तावयवतर्कनिर्णयचादजल्पवितण्डाहेत्वा भासच्छलजातिनिग्रहस्थानानि पोड़- द्ेति नैयायिकाः। एकादशेन्द्रियपश्चम्राणपश्चभूताहङ्गारमहदव्यक्तपुरुपाः पश्चविशतिरिति सांख्याः । वेदान्तिनस्तु 'त्रयं वा इदं नामरूपं कर्म', 'नाम- रूपे व्याकरवाणि' इति श्रुतिद्वयमाश्रित्य त्रैविध्यं द्वैविध्यं वाडङ्गीकुर्वन्ति। युक्तव्ाऽन्त्यः पक्ष:, स्ष्टः सृज्यगोचरनामरूपयो: प्रथमं बुद्धया- रोहात्। लोके घटं चिकीपो कुलाले तद्दर्शनात्। मूलकारणमपि नामरूपा- निणय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान-इन सोलह पदार्थोंको नैयायिक मानते हैं। सांख्यवादी ग्यारह इन्द्रियाँ, पाँच प्राण, पाँच महाभूत, अहक्वार, महत्, प्रकृति और पुरुष-इन पचीस तत्त्वोंको मानते हैं। वेदान्ती तो 'तीन प्रकारका यह प्रपश्न है-नाम, रूप, और कर्म' तथा 'नाम और रूपका व्याकरण करते हैं' ऐसे अर्थवाली दो श्रुतियोंके आधार पर प्रपश्चको तीन या दो प्रकारका मानते हैं। इसमें अन्तिम पक्ष (नामरूपात्मक प्रपश्चका त्रैविध्य मानना) ही युक्त है। सर्जनकर्चाकी वुद्धिमें सर्वप्रथम जानेवाली वस्तुके नाम और रूप ही आते हैं। क्योंकि लोकमें घड़ा बनानेवाले कुम्हारमें ऐसा ही देखा जाता है [ अर्थात् घट वनानेकी इच्छा करनेवाले कुम्हारको सबसे पहले पत्म्यन्त पद आदिसे हेतुके समान जो माल्म होता हो, (१४) छल-विपरीत अर्थकी कल्पना करके वादीके वचनोंको काट देना, (१५) जाति -- अपने वक्त्व्यमें ही विरोध दिखा देनेवाला उत्तर, (१६) निग्रहस्थान-व्याख्याताकी सामय्येहीनताकी सूचना। (१) ग्यारह दृन्द्रिय-आख, नाक, कान, जिल्वा और त्वक इस तरह पांच ज्ञानेन्द्रिय और छ: कर्मेन्द्रिय-मुख, हाथ, पांव, गुदा, जननेन्द्रिय और एक मन। (१) पांच प्राण-प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान। पांच महाभृत-आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी।(२) सांख्यमतमें पांच प्राणोंके स्थानमें प्रायः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पञ्च तन्मात्राओंकी संख्या पाई जाती है-प्रन्थकारने प्राणोंकी संख्या गिनाई है, ये तो वायुके भेदोंमें हैं। तत्वमेदोमें नहीं। अद्ार-महत्तत्वका विकार, अन्तःकरणमें कार्यक्षमताका अभिमानरूप गृतिविशेष। महत्-प्रकृतिका प्रथम विकार, जिससे साम्यावस्थामें वैपम्य उत्पन्न हुआ और जो शुद्ध, चैतन्यमें सर्वप्रथम रक्षणस्थानीय बुद्धपादिविशेपृत्तिविशेप है, इनके मतमें वह पृथक् तत्त्व समझा गया है। प्रकृति-सत्व, रज और तम-इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्था और स्वयं किसीका भी विकार नहीं। पुरुष-चेतनतत्व तथा निर्लेप परन्तु भोका। २-नाम-चाचक शब्द-आय सष्टि। रूप-रूप्यते वोष्यते-यःअर्थ। कर्म-उपा नाम और रुूपका सम्बन्ध ।
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६६६ विवरणप्रमैयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक१
भ्यां स्वबुद्धयारूढं सृजति, स्रष्टत्वात्, कुलालवत्। एतावता जगद् बुद्धि- मच्चेतनकार्यमिति लभ्यते। न च जीवकार्यत्वं शङ्गनीयम्, कर्तृत्वभोक्त- त्वविशिष्टानां नामरूपात्मकानां सर्वजीवानां कार्यान्त:पातित्वाद्। न च जगत्कारणस्य सर्वज्ञत्वे विवदितव्यम्, जगतः प्रतिनियतदेशकालनिमिच्त- क्रियाफलाश्रयत्वात्। प्रतिनियतदेशोत्पादाः कृष्णमृगादयः। प्रतिनियत- कालोत्पादाः कोकिलादयः। प्रतिनियतनिमित्ता नवाम्बुदनादसंभवा बलाकागर्भादयः। प्रतिनियतक्रिया ब्राह्मणानां याजनादयः। प्रतिनियत- फलं ब्रह्मलोके सुखं नरके दुःखमित्युदाहार्यम्। तामीदृशीं नियतिम-
'घट' यह नाम अर्थात् जिसको बनाना चाहता है उस वस्तुका वाचक शब्द और तदुपरान्त घटरूप अर्थ जिसको बना रहा है, उसका स्वरूप-इन दोनोंका ज्ञान अत्यन्त अपेक्षित है ]। इस कुलालदष्टान्तसे मूल कारण भी नाम (शब्द ) और · रूप (अर्थ)-इन दोनोंसे अपनी बुद्धिमें प्राप्त वस्तुकी ही रचना करता है, सृष्टिकर्ता होनेसे, कुलालके समान। [ऐसा अनुमान भी नामरूपात्मक-शब्दार्थ- मय-] द्विविध प्रपश्चकी सिद्धि करता है। इतने शास्त्रार्थसे संसार किसी बुद्धि- शाली चेतनका रचा हुआ कार्य है, यह सिद्ध होता है। संसार जीव द्वारा रचित है, ऐसी आशक्का नहीं की जा सकती, कारण कि कर्तृत्व-भोक्तत्व- विशिष्ट नाम-रूपात्मक जीवोंका भी कार्यकोटिमें ही समावेश है [ अर्थात् कार्यरूप प्रपञ्च ही जीव हैं, अतः इनका भी कोई अन्य कर्ता होगा] एवं जीव सर्वज्ञ भी नहीं हो सकता और सर्वज्ञसे अतिरिक्त इस महान् कार्य प्रपश्चकी रचना कर भी नहीं सकता। जगत्के कारणको सर्वज्ञ माननेमें विवाद नहीं किया जा सकता, कारण कि संसार नियमित देश, काल, निमिच, क्रिया और फलका आश्रय है। कृष्ण मृग (काले हिरण) आदि कुछ पदार्थ किन्हीं खास ही देशोंमें होते हैं, सर्वत्र नहीं होते; अर्थात् ब्रह्मावर्तमें ही कृष्णसार और हिमवान्में कस्तूरी मृग होते हैं। कोकिल आदि वसन्तादि नियमित समयमें ही होते हैं और वगुला, बलाकाके गर्भधारण आदि नियमित निमित्तवाले हैं, क्योंकि ये नवीन मेघोंकी गर्जनासे ही होते हैं। ब्राम्मणोंके याजनादि नियमित कर्म हैं। ब्रह्मलोकमें सुख और नरकमें दुःख, ऐसा फलविषयक भी नियम है, इत्यादि
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मक्षके दो लक्षणोंकी उपपत्ति] भापानुवादसहित ६६७
साङ्र्येण कथमसर्वज्ञ: सम्पादयेत्। नाऽपि सर्वशक्तित्वे विवदितव्यम्, जगतो मनसाऽप्यचिन्त्यरचनारूपत्वात। नह्ेकस्या अपि शरीररचनाया विविधनाड़ीजालादिसंनिवेशविशिष्टाया रूपं मनसाऽपि शक्यं चिन्तयितुं दरे जगद्रचनायाः। तदीदशं अगत् कथमसर्वशक्तिर्विरचयेत् १ तदेवं सूत्रगत- यच्छव्देनैव सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तित्वं च विचक्षितम्। सूत्रं चोपलक्षणप्रतिपादकमेवं योजनीयम्-अस्योक्तविधस्य जगतो जन्मादि यतः सर्वज्ञात् सर्वशक्तेः कारणाद् भवति तत्कारणं त्रह्मेति। नन्वत्र सन्रे व्रह्मास्वरूपलक्षणं नोक्तम्, न च तदन्तरेण स्वरूप- मवगम्यते प्रकृष्टप्रकाशात्मत्वमनुक्त्वा 'शाखाग्रे चन्द्रः' इत्येवोक्ते चन्द्र- स्वरूपानवगमात्। यच्छव्देन तदुक्तमिति चेत्, तत् किं सर्वशक्तित्वम् उत रूपसे उदाहरण समझना चाहिए, इस प्रकारकी नियत शैलीको असर्वज्ञ तथा अल्पज्ष पुरुप ठीक-ठीक कैसे सम्पादन कर सकता है? एवं 'जगत्कारणके' सम्पूर्ण शक्तिशाली होनेमें विवाद करना उचित नहीं है; कारण कि संसारकी रचना हम जैसे अल्पशक्ति मनुष्योंके लिए मनसे मी चिन्तन करने योग्य नहीं है, निर्माण करना तो दूर रहा। नाना प्रकारकी नाड़ियोंके समूह आदिके सन्निवेशसे युक्त एक शरीरकी ही रचनाके जब स्वरूपका हम मनसे भी विचार करनेमें समर्थ नहीं हैं तब सम्पूर्ण संसारकी रचनाका चित्रण तो दूर ही रहा। अतः अर्पशक्तिशाली जीव इस प्रकारके विलक्षण संसारकी रचना कैसे कर सकता है? इस सिद्धान्तके अनुसार सूत्र पठित 'यत्' शब्दसे सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता विवक्षित है। [पदार्थोंका अन्वय दिखलाते हैं-उपलक्षण- तटस्थ लक्षण-का प्रतिपादन करनेवाले सूत्रकी इस प्रकार पदार्थयोजना (अन्वय) करनी चाहिए। इस प्रकार प्रदर्शित स्वरूपवाले संसारका जन्मादि (जन्म, स्थिति और लय ) जिस सर्वज्ञ और सर्वशक्तिशाली कारणसे होता है, वह कारण व्रद्म है। शक्का-इस दूसरे सूत्रमें न्रह्मका स्वरूप लक्षण तो कहा ही नहीं गया और स्वरूप लक्षणके बिना स्वरूप जाना नहीं जाता, जैसे प्रकृष्टप्रकाश-सबसे अधिक प्रकाशवालाचन्द्रमा है, ऐसा स्वरूप लक्षण न. कह करके वटकी शाखाके अग्रभागमें 'दिखलाई देनेवाला' चन्द्रमा है; इतनामात्र कह देनेसे चन्द्रमाके स्वरूपका ज्ञान नहीं हो सकता। यदि कहो कि 'यत्' शब्द द्वारा
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६६८ विवरणप्रमेयसंग्रद्द [ सूत्र २, वर्णक १
सर्वज्ञत्वम् १ नाउडद्य: प्रधानादावपि तत्संभवात्। न द्वितीय:, सर्वोपाधि- कस्य तस्य शुद्धब्रह्मस्वरूपत्वायोगात्। सर्वज्ञत्वं च दुर्णम्। किं पडिभ: प्रमाणैः सर्वज्ञत्वम् उत अत्यक्षेणैव ! आद्येऽपि न तावद् युगपत् सर्वज्ञ- त्वम्, प्रत्यक्षादीनामयुगपत् प्रवृत्तेः । क्रमेण सर्वज्ञत्वेऽपि तत्किं सर्वांप- रोक्ष्यम् उत सर्वज्ञानमात्रम् : नाऽडद्य:, नित्यानुमेयानामापरोक्ष्यानुयपत्ते:। न द्वितीय :; अस्माकमपि पड्भिः प्रमाणैः क्रमेण सर्वज्ञत्वग्रसङ्गात्। प्रत्यक्षेणैव सर्वज्ञत्वमपि किं वाहेन उत मानसेन अथवा साक्षिप्रत्यक्षेण? देशकालविग्रकृष्टार्थेपु साक्षात्संवन्धाभावात्। परम्परया संवन्धेऽस्माकमपि सर्वज्ञत्वप्रसङ्गात्। द्वितीयेऽपि किं केवलेन
उसका स्वरूप कहा गया है; तो प्रश्न होगा कि क्या वह स्वरूप सर्वशक्तित्व है? या सर्वज्ञत्व है: प्रथम पक्षको तो नहीं मान सकते, कारण कि प्रधान-प्रकृति-आदिमें मी सर्वशक्तिशालित्व का सम्भव है। दूसरा कल्प भी नहीं बनता, कारण कि सम्पूर्ण उपाधियोंसे भूषित वह कारण व्रह्म शुद्ध ब्रह्मस्वरूप नहीं हो सकता। और उसका सर्वज्ञ होना सिद्ध भी नहीं किया जा सकता; कारण कि उसका सर्चेज्ञ होना प्रत्यक्षादि छः प्रमाणोंके द्वारा सकल ज्ञान प्प्त करना है क्या? अथवा केवल एक ही प्रत्यक्षके द्वारा सब जान जाना है? प्रथम कल्पमें भी एक साथ सर्वज्ञ होना संगत नहीं हो सकता, कारण कि प्रत्यक्षादि प्रमाणोंकी युगपत्-एक साथ ही प्रवृत्ति नहीं होती है। क्रमशः सर्वज्ञ होना माननेमें भी क्या वह सर्वज्ञ होना सबका साक्षात्कार करना है? या सबका साधारण ज्ञान- मात्र है? इसमें प्रथम पक्ष उचित नहीं है, कारण कि नित्य अनुमेय (आकाशादि) पदार्थोंका प्रत्यक्ष होना संगत नहीं है। दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण कि हम मनुष्योंमें भी छः प्रमाणोंके द्वारा क्रमशः सर्वेज्ञत्वका प्रसक्क आ जायगा। एक प्रत्यक्ष द्वारा ही सर्वज्ञ होना माननेमें भी विकल्प होते हैं कि क्या बाह्य प्रत्यक्षसे: अथवा मानससे : या साक्षिप्रत्यक्ष द्वारा ? इनमें प्रथम पक्ष साधक नहीं है, कारण कि चक्ष आदि बाह्य इन्द्रियोंका देश तथा कालसे व्यवहित घट, पट, आदि निषयोंके साथ साक्षात् सम्वन्ध नहीं हो सकता। परम्परा सम्बन्ध माननेमें तो हम साधारण जीव भी सर्वेज्ञ कहलायेंगे। दूसरे विकल्पमें भी क्या केवल मनके द्वारा: अथवा योगाभ्यास माप्त किये
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स्वरूप और तटस्थ लक्षणकी उपपति] भाषानुवादसहित ६६६
मनसा उत योगाभ्यासजन्यातिशययुक्तेन अथवा सर्वविषयसंस्कारयुक्तेन? नाऽडद्य:, केवलमनसो चहरस्वतन्तर्ात्। नद्वितीय, अतिशयस्य स्त्रविपय एव प्रभवात्। मार्जारादिद्ृष्टीनामपि योग्यरूपेष्वेवाऽतिशयचच्व- दर्शनात्। न तृतीयः, प्रथमतः सर्वग्रहणाभावे तत्र संस्कारायोगात्। क्रमेण सर्वग्रहणे सति तत्सँस्कारकल्पनेऽप्यतीतानागतवर्त्तमानार्था-
अतिशय सहित मनसे? या सम्पूर्ण विषयोंके संस्कारसे विशिष्ट मनसे: प्रथम करप उचित नहीं है, कारण कि अकेला मन वाहरी घट, पट आदि विपयोंका प्रत्यक्ष करनेमें स्वतन्त्र नहीं है अर्थात् चक्षु आदि वाह्य इन्द्रियोंके अधीन होकर दी मन वाहा पदार्थोंको विषय कर सकता है। दूसरा कल्प भी नहीं बनता, कारण कि अतिशय अपने ही विपयमें होता है। विल्ली आदिकी दृष्टियोंका भी अपने योग्य रूपोंमें ही अतिशय देखा जाता है [अर्थात् बिल्ली आदिकी दृष्टिमें इतना ही विशेष है कि आलोकके सनिधानके बिना अन्धकारमें भी वे दूरसे रूपका दर्शन कर लेते हैं, परन्तु व्यवहित रूपका तथा शब्दादि विषयोंका चक्षुसे प्रत्यक्ष नहीं कर सकते एवं उत्कट योगाभ्याससे उत्पन्न अविशय भी रूपादि विषयोंमें देश, कालके व्यवधानरूप प्रतिबन्धका ही दूरीकरण करता है, जिससे तत्-तत् इन्द्रियां अपने-अपने विपयोंको देश-कालका व्यवधान रहनेपर भी जान जाती हैं, अतः उससे ऐसा विशेष उत्पन्न नहीं होता कि आंख गन्धका भी प्रत्यक्ष कर सके; अभियुक्तोंका भी वचन है- 'यत्राऽप्यतिशयो हष्टः स स्वार्थानतिलङ्गनात्। दूरात् सूक्ष्मादिद्ष्टौ स्यान्न रूपे श्रोत्रवृच्तिता ।I' अर्थात् योगादिके अभ्याससे अपने विपयको छोड़कर अन्य विषयका ग्रहण करनेके लिए कोई विशेप उत्पन्न नहीं होता है। हां, दूरके (व्यवहित) तथा परमाणु जसे सूक्ष्मभूत पदार्थोंको देखनेमें चक्षुका अतिशय हो सकता है, परन्तु श्रोत्रका रूप विषय नहीं हो सकता। ] तीसरा कल्प मी युक्त नहीं है, कारण कि पहले सम्पूर्ण विपयोंका ज्ञान न होनेसे उनमें तद्विपयक संस्कार होनेका सम्भव ही नहीं है, [ क्योंकि पूर्वानुभव ही संस्कारका जनक है।] क्रमशः सम्पूर्ण विपयोंका ज्ञान होनेके पश्चात् उनके उत्कट संस्कारकी करपना करनेपर भी बीते हुए, आगे आनेवाले [ याने जो अभी उपस्थित नहीं हैं, ऐसे विषय ] तथा वर्तमान ८५
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६७० विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र २, वर्णक ?
नामनन्तानामियत्तानवधारणात् सर्वग्रहणानुपपत्तिः । न च साक्षिप्रत्यक्षेण सर्वज्ञता, प्रदीपप्रभावत्तस्याऽतीतानागतार्थग्राहित्वाभावात्। तस्मान्नास्ति सर्वज्ञ इति। अत्रोच्यते-सर्वविषयाकारधारिपु मायापरिणामेपु अतिविम्वितं चैतन्यं सर्वानुभव इत्युच्यते। तस्य च विपयैराध्यासिकसंवन्धाद्वर्च- मानकाले तावत् सर्वज्ञत्वं सिद्धम्। अतीतविपयाणां तदवच्छिन्नमायावृत्तीनां तद्वच्छिन्नानुभवानां च निवृततौ तत्संस्कारादस्मदादिष्विवाSतीतविपयाः स्मृतिरूपा मायापरिणामा भवन्ति। तत्प्रतिविम्वतानुभवेनाऽतीतविषय- ज्ञत्वमपि सिध्यति। तथा सृष्टेः परागपि स्क्ष्यमाणपदार्थावधारणस्य कुलालादिषु दष्टत्वादागामिसर्वविपयज्ञानमपि स्वमायापरिणामवशाद्
समयमें उपस्थित अनन्त-असड्ख्य-विषयोंकी इयचाका (इतने ही हैं, ऐसा) निर्णय नहीं हो सकता है, अतः सम्पूर्ण चिषयोंका ज्ञान होना उपपत्तिसे युक्त नहीं है। साक्षिप्रत्यक्ष द्वारा भी सर्वज्ञत्व नहीं हो सकता, कारण कि प्रदीपके आलोकके समान साक्षिप्रकाश भी अतीत तथा अनागत विषयोंका ग्रहण नहीं करता है। [ जैसे दीपकका प्रकाश वर्तमान विषयका ही ग्रहण करा सकता है, वैसे ही साक्षीका प्रकाश भी वर्तमान विषयका ही ग्हण करता है। ] इसलिए सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो ही नहीं सकती। इस लम्बी शक्काके उत्तरमें कहा जाता है कि सम्पूर्ण विषयोंके आकारको धारण करनेवाले मायाके परिणामोंमें प्रतिविम्धित चैतन्य ही सर्वानुभव (सब कुछ जानना) कहा जाता है; उस अनुभवका विषयोंके साथ अध्यासमूलक सम्बन्ध होनेसे वर्तमान कालमें तो सर्वज्ञ होना सिद्ध ही है। वीते हुए विषयोंकी और उन अतीत विषयावच्छिन्न मायावृत्तियोंकी तथा उनसे अवच्छिन्न अनुभवोंकी- उन मायाके परिणामोंमें प्रतिबिम्धित चतन्योंकी-निवृत्ति होनेपर उनके संस्कारसे हम लोगोंके समान बीते हुए विषय स्मृतिरूपमें परिणत होते हैं। उन स्पृतिरूप मायाके परिणामोंमें प्रतिबिम्वित अनुभवके (चैतन्यके) द्वारा अतीत विषयोंका परिज्ञान भी सिद्ध हो जाता है। एवं उत्पत्तिसे पहले भी बनाये जानेवाले पदार्थका ज्ञान कुलालादिमें दिखलाई देता है, अतः आगे होनेवाले सब विषयोंका ज्ञान मी अपनी मायाके परिणामकी सामर्थ्यसे होगा, इस प्रक्रियाके
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जन्मािमें वृद्धधादि विकारोंका अन्तर्भाव] भांपानुवादसहित ६७१
भविष्यतीति युक्ता सर्वज्ञता। न चात्र मानाभाव: 'यः सर्वज्ः' इति श्ुतेः। न च स्वरूपलक्षणत्वासंभवः, लक्षणाभिधानावसरे सर्वज्ञशव्देन सर्वप्रकाशकत्वोपलक्षितशुद्धचैतन्यमात्रस्य विचक्षितत्वात। तदेवं जन्म- स्थितिनाशाख्यविकारत्रयकारणस्य त्रह्मणः सूत्र एव स्वरूपलक्षणमपि सिद्धम्। यद्यपि वृद्धिपरिणामापक्षयास्त्रयो भावविकारा जन्मस्थितिनाश- व्यतिरेकेण प्रसिद्धास्तथापि वृद्धिर्जायते वृद्धिस्तिष्ठति वृद्धिर्नव्यतीत्येव- मेव वृद्धादयो निरूप्यन्ते नाऽन्यथा। ततो वृध्ादीनां जन्माद्यन्तर्भा- वान सूत्रगतादिशव्देन पृथग् ग्हणम्। न च निरुक्तकारपठितपड्भाव-
अनुसार सर्वज्ञता युक्त ही है। सर्वज्ञ होनेमें प्रमाणका अभाव भी नहीं है, कारण कि 'जो सर्वज्ञ है' ऐसे अर्थवाली श्रति ही उसमें प्रमाण है। स्वरूपलक्षणका भी असम्भव नहीं है, कारण कि लक्षणके कथनके अवसरपर सर्वज्ञशब्दसे सर्व- प्रकाशकत्वरूपसे उपलक्षित शुद्ध चैतन्य ही विवक्षित है। इस रीतिसे जन्म, स्थिति और नाश रूप तीन विकारोंके कारणभूत न्रह्मका स्वरूपलक्षण भी सूत्रमें ही सिद्ध है। [सर्वज्षताके बिना संसारके जन्मादिका कारण हो नहीं सकता और 'यतो वा इमानि भृतानि जायन्ते' इत्यादि श्रुति ब्रह्मको स्पष्ट ही जगत्के जन्मादिके प्रति कारण कह रही है, अतः इस प्रमाणभूत श्रुतिके अनुवादक 'जन्मादस्य यतः' इस सूत्रसे ही सर्वप्रकाशकत्वरूप सर्वज्ञतात्मक स्वरूपलक्षण मी उपपन्न हो गया ।] [यास्क आदि मुनिके वचनोंसे प्रतीत अतिरिक्त वृद्धि आदि तीन विकार भी आदिपदसे गरृहीत होते हैं, इस शङ्काकी निवृत्ति करते हैं-] यद्यपि वृद्धि, परिणाम और अपक्षय-हास-ये तीन भाव-प्रपश्चके विकार जन्म, स्थिति और नाश-इन तीनोंसे पृथक् प्रसिद्ध हैं, तथापि उनका निरूपण 'वृद्धि होती है, वृद्धि रुक गई, वृद्धि नष्ट हो गई', इत्यादि प्रकारसे ही किया जाता है, किसी दूसरे पकारसे उनका निरूपण नहीं किया जाता। इससे वृद्धि आदि विकारोंका भी जन्मादिमें अन्तर्भाव हो जाता है, अतः सूत्रपठित आदि शब्दसे उनका पृथक ग्रहण नहीं किया जाता है। शक्का-निरुक्तकार 'यास्क मुनि' द्वारा प्रदर्शित छः भावविकारोंका ही
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६७२ विचरणप्रमेयसंग्रह सूंत्रं २, वर्णक १
विकारग्रहणे सति नाऽस्त्यन्तर्भावप्रयास इति वाच्यम्, तदा ह्यापेयवाक्यस्य न तावदनुमानादि मूलम्, अस्माकमपि तत्संभवेन तद्वाक्यवैयर्थ्यात्। नाऽपि अत्यक्षम्, ब्रह्मजन्यमहाभूतविकाराणां श्रुतिमन्तरेणाऽग्रत्यक्षत्वाद्। भौतिकविकारा एव सुनिना ओ्रोक्ता इति चेत्, तर्हि तेपामिह ग्रहणे भौतिक- कारणभूतपञ्चकमेव ब्रह्मत्वेन सूत्रे लक्षितमिति वुद्धि: स्यात्। अतः श्ुत्यु- क्ता जन्मादयस्त्रय एवात्र ग्राह्याः। नहि श्रुतिर्मूलप्रमाणमपेक्षते, येनोक्तदोप: ग्रहण करना उचित है, क्योंकि ऐसा होनेपर जन्मादि तीनोंमें उन सबका अन्तर्भाव करनेके लिए पृथक प्रयास करनेकी आवश्यकता नहीं होगी। समाधान-ऐसा नहीं, कारण कि ऋषिके वाक्योंमें अनुमान आदि तो मूल-प्रमाण माने नहीं जा सकते, क्योंकि ऐसा तो हमारे वाक्योंमें भी संभव होनेसे ऋषिवाक्योंका उपन्यास ही व्यर्थ हो जायगा [ हम भी अपने अमीष्ट अर्थका बोध करानेके लिए वाक्यकी रचना करेंगे और उसकी पुष्टिमें मूलमूत अनुमान- प्रयोग दिखला देंगे। इस प्रकार अनुमानमूलक वाक्योंके प्रमाण माने जानेपर ऋषिवाक्योंके उद्धरणकी अपेक्षा ही नहीं रह जायगी]। उनमें प्रत्यक्ष भी प्रमाण नहीं है, क्योंकि ब्रह्मसे उत्पन्न पांच महामृतरूप विकारोंका श्रुतिसे अतिरिक्त साधन द्वारा ज्ञान ही नहीं हो सकता। [यद्यपि ऋषिवाक्यमें प्रत्यक्ष प्रमाण हो सकता है, तथापि प्रकृतमें महाभूतात्मक विकार तो केवल 'यतो वा इमानि' इत्यादि श्रुतिसे ही सिद्ध हैं, प्रत्यक्षसे नहीं। और जो भौतिक विकार प्रत्यक्ष हैं, उनको ही श्रुति और सूत्रमें लेना नहीं है, इस आशयसे शङ्का-समाधान करते हैं-]यदि कहा जाय कि सुनि व्यासजीने भौतिक घट, पह आदि विकारोंको ही अपने सूत्रमें जन्मादिपदसे कहा है, तो यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि उन भौतिक विकारोंका इस सूत्रमें अ्हण करनेसे भौतिक घट, पट आदिके कारण पांच महाभूत ही लह्स्वरूपसे सूत्रमें लक्षित किये गये हैं, ऐसा समझा जायगा। [ भाव यह है कि घट-पटादिजन्मादिकारणत्वरूप लक्षणसे तो महाभूत ही ब्रह्म समझे जायँगे, क्योंकि घटके जन्म, स्थिति तथा लय या वृद्धयादि छः विकार पृथ्वीरूप भूतमें ही हैं, एवं अन्यत्र भी समझना चाहिए। ] इसलिए श्रुतिमें दिखलाये गये जन्मादि तीन ही विकार लेने चाहिएँ जो प्रत्यक्ष नहीं हैं। और श्रुति तो स्वयं प्रतिपादित अर्थकी पुष्टिमें अपनेसे अतिरिकत मूल प्रमाणकी अपेक्षा नहीं रखती, जिससे कि मूल पमाणकी अपेक्षा
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श्रेक्ष-परिणामवाद का निरास] भांपानुवादसहित ६७३
स्याद्, अतो यत्किश्चिज्न्मवद्भूतभौतिकं तस्य सर्वस्य मूलकारणत्वेन शुत्युक्तं त्रह्मैवाSत्र लक्षितमित्यवगम्यते। नन्वेवमपि सूत्रे श्ुत्युक्तं जन्मैव सूत्र्यतां तावतैवोक्तार्थसिद्धेरिति चेद्, न; केवलनिमित्तकारणत्वशङ्काव्युदासार्थत्वात् स्थितिप्रलययोः। नहनुपादाने केवलनिमित्ते स्थितिप्रलयौ संभवतः। यद्यपि जन्मस्थितिप्रलया निरुक्तकारेणाऽप्युक्तास्तथापि न तद्वचनद्वारा श्रुतिमूलत्वं सूत्रस्य कल्पनीयम्। सूत्राणां साक्षाच्छुत्यर्थनिर्णयपरत्वाद। अन्यथा ऋपि- वाक्यान्येव वक्ष्यमाणसूत्रैरुदाहृत्य निर्णीयेरन्। तस्मात् 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते इत्येतच््रृत्युक्तानेव जन्मस्थितिनाशान् साक्षात् सूत्ने निर्दिश्य तत्कारणं त्रक्षेति लक्ष्यते। ननु कथ त्रह्मण: कारणत्वम्, किं त्रह्म पूर्वरूपं परित्यज्य रूपान्तरेण
होनेसे उक्त दोप आ सके, इसलिए जो भी कुछ जन्मादिशाली भूत या भौतिक प्रपश्चजात है, उस सबके मूल कारणरूपसे श्रुतिमें कहे गये ब्रह्मका ही इस सूत्रमें लक्षण किया गया है, ऐसा जाना जाता है। शक्का-ऐसा माननेपर भी श्रुतिमें कहा गया केवल जन्म ही सूत्रमें देना चाहिए अर्थात् 'आदि' पद देना व्यर्थ है, क्योंकि जन्म इतना कहनेसे ही उक्त कारणत्वरूप अर्थकी सिद्धि हो जायगी। समाघान-नहीं, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि ब्रह्म केवल निमित्त कारण ही है, इस आशकाका चारण करनेके लिए 'आदि' पद दिया गया है। उपादानसे अतिरिक्त केवल निमित्त कारणमें स्थिति और प्रलयका सम्भव नहीं हो सकता। यद्यपि जन्म, स्थिति और प्रलय-इन तीनोंको निरुक्तकारने भी कहा ही है, तथापि निरुक्तकारके वचन द्वारा सूत्रमें श्रुतिमूलकत्वकी कल्पना करना उचित नहीं है, कारण कि साक्षात् श्रुतिके अर्थके निर्णयमें सूत्रोंका तात्पर्य है, [ऋपिवाक्योंको द्वार मानकर नहीं ] यदि इसके विपरीत माना जाय, तो आगे कहे जानेवाले सूत्रोंसे ऋविवाक्योंका ही उद्धरण करके निर्णय किया जाता। इसलिए 'जिस कारणभूत ब्रह्मसे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं' इत्यर्थक भ्ुतिमें कहे गये जन्म, स्थिति और प्रलय-इन तीनोंका ही सूत्रमें साक्षात् निर्देश करके उनका कारण ब्रह्म है; ऐसा लक्षण किया जाता है। शक्ा-त्रह्मको कारण किस रीतिसे मानते हो! क्या त्रह्म अपने पूर्व रूपका
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६७४ विचरणग्रमेयसंग्रह [सृभ २, वर्णक ₹
परिणमते उताऽपरित्यज्य विवर्तते? आद्ये सृष्टेरुपरि ज्ञानानन्दरूपस्य न्रह्मण उच्छेद: स्यात्। अथ जगद्रूपेण परिणतं तद् त्रह्म पुनरपि प्रलयावस्थायां ज्ञानानन्दन्रह्मरूपेण परिणमेत तथापि तस्य त्रह्मणः पुनर्जगढ़ाकारपरिणाम- स्व्भावित्वादनिर्मोक्षप्रसङ्ग: । न च सृष्टिक्षितिः परिणामे प्रमाणम्, तस्या: सृष्टिमात्रोपक्षीणायाः पूर्वसपपरित्यागापरित्यागयोस्ताटस्थ्यान्। न च श्रुत्यन्तरं परिणामे संभवति, 'अज आत्मा महान् धुवः' इति घ्रुवशव्देन परिणामविरुद्वकौटस्थ्याभिधानान्। कृटस्थत्वं च त्रह्मणो निरवयवत्वादुपपन्नम्। नतु निरचयवमपि परिणमत एच। तथाहि- हेमगतरुचकादिपरिणामः
त्याग करके दूसरे रूपमें बदल जाता है? या पूर्व रूपका त्याग न करके दूसरे रूपमें दल जाता है: [ अर्थात् त्रह्मका दधि-दुग्धवत् तातत्विक परिणाम होता है या रज्जुसर्पवत् अतात्त्विक अन्यथाभाव? ] प्रथम करप नहीं वनता, कारण कि सृष्टि हो जानेपर ज्ञान और आनन्द रूप त्रह्का विनाश हो जायगा। [ सदूपका नहीं, क्योंकि सदृरूप तो तात्त्विक अन्यथाभावके साथ भी अनुवर्तमान रहता है,] यद्यपि संसारके रूपमें परिणामको प्राप्त हुआ त्रक्म प्रलयावस्थामें फिर भी ज्ञान और आनन्द रूपमें वदल जायगा; तथापि उस न्रझ्मका बार-बार संसारके आकारमें बदलनेका स्वभाव होनेसे मोक्षका अभाव हो जायगा। [सर्थात् ज्ञानान्दाकारको बद्ल कर जगदाकार और जगदाकारको छोड़ कर ज्ञानानन्दाकार इत्यादि परम्परा ब्रह्मकी चलती ही रहेगी, ऐसी दश्ामें मोक्षका प्रसभ्ज ही नहीं या सकता।] सृष्टिविषयक श्रुतिको त्रह्म-परिणाममें प्रमाण मी नहीं मान सकते, कारण कि उस सृष्टि- श्रुतिका केवल सटष्टिका वोधन करनेमें तात्पर्य है, इसलिए त्रद्मके पूर्व रूपका परित्याग होता है या नहीं होता, इस विषयमें वह श्ति तटस्थ-उदासीन-है। [अर्थात् श्रुतिवाक्योंमें ऐसा कोई वाचक पद नहीं है; जिससे कि उक्त अर्थक्ी स्पष्टरूपसे प्रतीति हो ] और कोई दूसरी श्रुति भी परिणामरूप अर्थका बोधन करनेवाली नहीं है। 'अज (जन्म-रहित) आत्मा महान् और ध्ुव है' इत्यर्थक श्रुतिमें तो धुवपदसे परिणामके विरुद्ध न्रह्मकी कूटस्थताका (अपरिणामिताका) चोध होता है, और अवयवशुन्य होनेसे त्रझमका कूटस्थ होना उचित है। शक्का-अवयवशुन्यका मी परिणाम होता ही है। इस विपयमें अनुमानका
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अ्रह्म-परिणामवादका निरासं ] भापानुवादसहित ६७५
परम्परया परमाणुपर्यवसायी, अवयववृत्तित्वाद्, संयोगवत्। संयोगो ह्यवयव्येकदेशममवेतः परम्परया निरवयवपरमाणुसंयोगपुरःसरः ग्रसिद्ध इनि। तत्र वक्तव्यं कोडयं परिणाम इति। मृत्पिण्डस्य घटरूपापत्ता- विव स्वावयवानां पूर्वसंयोगात्संयोगान्तरापच्या संमूछिताचयत्वं परि- णाम:, तक्राद्यातश्चनावयवसंयोगेन क्षीरस्य दधिभाववद्वयवान्तर- संयोगेन संमृछितावयवत्वं वा, यूनो वृद्ध्त्ववदवस्थान्तरं चा, काष्ठस्य स्तम्भाद्यापत्तिवदन्यथाभावो वा, अणोरण्न्तरसंयोगेन दयणुकापत्तिवद्ध स्त्वन्तरसंयोगो वा, उद्कस्य नदीभाववत्परिस्पन्दो वा। पक्कफलस्य वर्णा न्तरवद् गुणान्तरोदयो वा, उपादानानुरक्तद्रव्यान्तरोत्पत्तिर्वां! न तावस्
प्रतिपादन करता है-सुवर्णमें होनेवाले रुचक ( कड़ा) आदि स्वरूप परिणामको परम्परासे परमाणुओोंमें होनेवाला ही मानना चाहिए, अवयवमें वृत्ति होनेसे, संयोगके समान। [समन्वय करते हैं-] संयोग अवयवीके (धर्मीके) एकदेशमें (अवयवमें) समवायसम्वन्धसे रहता हुआ परम्परासे अवयवशुन्य परमाणुके संयोगको लेकरके ही होता है, यह प्रसिद्ध है। [ इसी प्रकार अवयवीका परिणाम मी निरवयवका परिमाण होनेपर ही होता है। ] समाधान-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि यहांपर कहना होगा कि यह परिणाम क्या वस्तु है? [ जो निरचयवमें भी हो जाता है। ] मिट्टीके पिण्डसे घटाकारकी प्राप्तिमें जसे अपने अवयवोंका पहलेके संयोगसे दूसरा संयोग होनेके कारण संमूछितावयवत्व [अवयवोंका पृथक ग्रहण न होकर सव एक समूहरूपसे अवयवीका बोध होना ] परिणाम होता है, वैसे क्या प्रकृतमें संमूर्च्छितावयवत्व ही परिणाम है अथवा तक आदि जोड़नके अवयवके संयोगसे दूधकीं दघिरूप प्राप्तिके समान दूसरे अवयवके संयोगसे होनेवाला संमूर्छितावयवत्व परिणाम है? या जैसे युवा पुरुषको दूसरी वृद्धा अवस्था प्राप्त होती है, वैसे ही दुसरी अवस्थाका पाना परिणाम है? किंवा जसे लकड़ीका स्वम्भ आदिके रूपमें परिवर्तन होता है, वैसे ही दूसरे रूपमें बदल जाना परिणाम है : अथवा जैसे परमाणुके साथ संयोग होनेसे व्यणुकादि होते हैं, वैसे ही दूसरी वस्तुका संयोग परिणाम है या जैसे जल नदीके रूपको पा जाता है, वैसे ही परिस्पन्द परिणाम है? अथवा पके हुए फलके रूपके बदलनेके समान दूसरा गुण हो जाना परिणाम है: या उपादान कारणसे
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६७६ [ सूत्र २, वर्णक १
प्रथमद्वितीयौ, निरवयवस्य तादृशपरिणामानुपपत्ते:। नाऽपि तृतीयचतुर्थी, तथा सति जगदाकारपरिणामे पुनर्वल्मभावानुपपत्तावनिर्मोक्षग्रसङ्ग: । नहि वृद्ध: कदाचिदपि युवा भवति। नाऽपि स्तम्भा वृक्षरूपेण ग्ररोहेयुः। क्कचित्पुनः प्ररोहोऽपि दृश्यत इति चेत्, तर्हि मोक्षसापि तथा पुनः परिणाम- रूपत्वे सत्यनित्यत्वं दुर्वारं स्यात्। नाडपि पश्चमपप्ठसप्तमाः, परिणामल- क्षणस्याऽतिव्याप्तेः। वस्त्वन्तरसंयोगिन्याकाशे परिस्पन्दमाने भ्रमरे लौहित्योदयवति च पटे द्रव्यपरिणामचुद्धयभावात्। नाडप्यट्टम, अवय- विनस्तथा परिणामेऽप्यवयवपरिणामस्य दुर्भणत्वात्। किं हेमावयवानां रुचकरूपेण परिणामः कि वा रुचकोपयुक्तद्रव्यान्तररूपेण उत रूचकोप-
अनुरक्त अतिरिक्त द्रव्यकी उत्पत्ति परिणाम है? इनमें प्रथम और द्वितीय करप नहीं माने जा सकते, कारण कि अवयवशुन्य पदार्थका उक्त प्रकारसे परिणाम नहीं हो सकता। तीसरे और चौथे विकल्पको भी नहीं मान सकते, कारण कि ऐसा माननेसे प्रपंचके आकारमें परिणाम होनेके अनन्तर पुनः त्रहमाभावकी उपपत्ति न हो सकनेसे मोक्षके अभावका प्रसंग हो जायगा, क्योंकि वृद्धावस्थाको प्राप्त हुआ पुरुष फिर युवावस्थाको नहीं पा सकता और स्तम्भ भी फिर वृक्ष- रूपसे उग नहीं सकते। यदि कहा जाय, कि कहीं कहीं 'स्तम्भभावके अनन्तर' फिर उगना भी देखा जाता है, तो मोक्षका भी पुनः परिणाम होनेसे उसमें अनित्य- त्वका वारण नहीं किया जा सकेगा। पांचवाँ, छठा और सातवाँ विकल्प भी साधक नहीं हो सकता, कारण कि परिणामके लक्षणकी अतिव्यापि हो जायगी। दूसरी वस्तुके साथ संयोगको प्राप्त हुए आकाशमें और उड़ते हुए अ्रमरमें तथा रंगनेसे लाल रंगको पाये हुए पटरूप द्रव्यमें परिणामवुद्धिका अभाव है। [ और आपका पाचवां परिणामका लक्षण उक्त आकाशमें, छठा उक्त भ्मरमें और सातवां उक्त पटमें (जो कि लक्ष्य नहीं है) चला जाता है, अतः अतिव्याप्त हो जाता है।] आठवां लक्षण भी नहीं बनता, कारण कि अवयवीका उक्त प्रकारसे [उपादान- कारणानुगत दूसरा अवयवी हो जानारूप] परिणामका सम्भव होनेपर भी अवयवोंका वैसा परिणाम होता है, यह कहना नहीं वन सकता। [ दिये गये हेम-रुचक दष्टान्तका विघटन करते हैं-] क्या सुवर्णके अवयवोंका रुचकरूपमें परिणाम होता है ? अथवा रुचकके उपयोगी द्रव्यान्तरके रूपमें ?
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मक्ष-परिणामवादका निरास ] भापानुचादसहित ६७७
युक्तावस्थान्तररूपेण । न तावद् द्वितीयतृतीयौ, रुचकंव्यतिरेकेण तदुपयुक्तद्रव्यान्तरावस्थान्तरयोरदर्शनात्। नाऽपि अ्रथमः, रुचकस्याऽवय- विकार्यत्वाद्। अवयवकार्यत्वे चाऽऽरम्भवादग्रसङ्गात्। न चाऽवयवानां रुचकानुगमानुपपत्तिः, अवयविद्वारा तदुपपत्तेः । न चाऽऽश्रयावयवेषु विकारमन्तरेणाSSश्रितावयविनि विकारानुपपत्तिः, परमाणौ असतोरेव जन्मचिनाशयोर्णुके दर्शनात्। जन्मविनाशव्यतिरिक्तधर्मस्य तथात्व- मिति चेद्, न; कपालेप्वसत्या एव घटत्वजातेर्घटसमचेतत्वात्। व्यापका- नामवयवानामवस्थान्तरमन्तरेण व्याप्यस्याऽचयविनोऽवस्थान्तरं नोपपन्न- या रुचकके योग्य अन्य अवस्थाके रूपमें ? दूसरे और तीसरे विकल्प तो बन नहीं सकते, कारण कि रुचकसे अतिरिक्त रुचकके उपयोगमें आनेवाले द्रव्यान्तर और अवस्थान्तर तो कोई देखनेमें नहीं आते हैं। प्रथम विकरप भी नहीं हो सकता, क्योंकि रुचक अवयवीका कार्य (परिणाम) है, [ अवयवका नहीं। ] यदि अवयवका कार्य माना जाय, तो आरम्भवाद प्राप्त होगा। [अर्थात् परिणामवाद को तो तुम सिद्ध करना चाहते हो और सिद्ध कर गये अवयवोंसे रुचकका आरम्भ याने नयायिकसम्मत आरम्भवाद, इससे अर्थान्तर, सिद्धसाधन, अपसिद्धान्त आदि दोष होंगे।] रुचकमें अवयवोंके अनुगमकी अनुपपत्ति भी नहीं हो सकती, कारण कि अवयवीके द्वारा अवयवोंके अनुगमकी उपपत्ति हो सकती है। शक्का-आश्रयभूत अवयवोंमें विकारके उत्पन्न हुए बिना अवयवीमें विकार नहीं हो सकता, [ इससे आश्रयरूप अवयवभूत ब्रह्ममें परिणाम उपपन्न होगा ]। समाधान-उक्त अनुपपत्ति नहीं है, कारण कि [ आश्रयभूत अवयवात्मक ] परमाणुमें न रहनेवाले जन्म और विनाश व्यणुकमें देखे गये हैं; [इस दष्टन्तसे अवयविगत विशेषण अवयवमें अवश्य रहता है, ऐसा कोई नियम नहीं है]। जन्म और विनाशसे अतिरिक्त ध्मोंमें उक्त नियमका माना जाना भी उचित नहीं है, कारण कि कपालमें न रहनेवाली घटत्व जाति घटमें रहती है, [घटत्व आदि जातियाँ भी जन्म और विनाशसे अतिरिक्त हैं; तथा अवयवमें विशेषण न होकर अवयवीमें विशेषण होती हैं ]। यदि कहो कि व्यापकीभूत अवयवोंकी अवस्थाका परिवर्तन हुए बिना व्याप्यस्वरूप अवयवीकी अवस्था नहीं
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६७८ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक १
तद्दर्शनात्। अस्तु वाऽवयचानां परिणामस्तथाप्यचयविपरिणामप्रयुक्त- त्वानाऽडसौ ब्रह्मपरिणामस्य दृष्टान्तः । नहि ब्रह्मावयचकं परिणामि कि- श्विदस्ति, यत्प्रयुक्तो त्रह्मपरिणामः स्याद्। निरवयवत्वादवयविद्ृष्टान्तेनाऽपि न व्रह्मण: परिणामसिद्धिः । यत्तु निरचयवसंयोगवत् परिणाम इति, तत्राऽपि किं दश्यमानाचयवि- संयोगस्य परमाणुसमवेतत्वमुच्यते उत परमाणुसंयोगपूर्वकत्वं कल्प्यते?
विन्येव घटत्वजतिसमवायवत् संयोगोपपत्तेः। अवयवानां संयोगेजनुग
बदल सकती; तो ऐसा भी कहना उचित नहीं है; कारण कि व्यापकीभूत जाति तथा गुणोंमें अवस्थाके परिवर्तनके विना भी व्याप्य द्रव्योंमें मवस्थाका परिवर्तन देखा जाता है। अथवा भले ही अवयवोका परिणाम हो, तो भी यह (अवयव- परिणाम) अवयवीके परिणामका कारण है, अतः वह त्रह्मपरिणामका टष्टान्त नहीं वन सकता। कारण कि जिसका व्रह्म अवयव हो; ऐसा कोई परिणामी द्रव्य नहीं दीखता, जिससे कि (अवयवभूत) न्रह्मका परिणाम हो सके। और अवयव- शून्य होनेसे अवयवीके दष्ान्तसे मी त्रह्ममें परिणामित्वकी सिद्धि नहीं हो सकती। और 'अवयवरहित पदार्थका जिस प्रकार संयोग होता है, उस प्रकार उनका परिणाम भी हो सकता है' ऐसा जो कहा जाता है, उसमें प्रष्टव्य यह है कि दिखलाई पड़नेवाला (त्र्यणुकादिरूप) अवयवीके संयोगको क्या परमाणुमें समवेत [ समत्रायसम्वन्घसे रहनेवाला ] मानते हो : या उसमें परमाणुसंयोगपूर्वकत्वकी कल्पना करते हो? इनमें प्रथम कल्प नहीं मान सकते, कारण कि परमाणुमें विद्यमान रूपके समान संयोगका भी प्रत्यक्ष न हो सकेगा। दूसरा कल्प भी नहीं हो सकता, कारण कि जैसे घटत्व ( आदि) जातिका समवाय अवयवीमें रहता है; वैसे ही संयोगकी भी अवयवीमें ही उपपत्ति होती है। अवयवोंका संयोगमें अनुगम [अर्थात् अवयवोकी संयोगसें प्रतीति होना ]
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वस-परिणामवादका निरास ] भापांनुवांदसाहित ६७९
मस्त्ववयविद्वाराऽन्यथासिद्ः। संयोगस्याऽचयविवृत्तित्वे कृत्स्व्यापित्व- प्रसङ्गेनाऽवयवेष्वेव वृत्तिरिति चेत्, तर्ह्यवयविनां तन्तूनां संयोगासंभवेन पटानारम्भग्रसङ्ग: । कृत्सव्यापित्वं तु तार्किकं पत्यवयवावृत्तिपरमाणु- संयोगोदाहरणेन परिहर्तव्यम्। अन्यान्प्रत्याकाशवर्त्ती शब्द उदाहार्य:। तस्मान संयोगदष्टान्तेन निरवयवपरिणामोऽनुमातुं शक्यः। ननु कथं त्रह्मणो निरवयवत्वम्, येन परिणामो निराक्रियेत? सावयव-
तो अवयवीके द्वारा अन्यथासिद्ध है। [ क्योंकि अवयवीके संयोगसे ही अवयव- संयोगकी प्रतीति होती है; अतः निरवयव परमाणु आदिमें संयोग भी नहीं है]। शक्ा-संयोग अवयवीमें रहता है, ऐसा माननेसे सम्पूर्ण अवयवीको व्याप्त करनेका प्रसक आता है; अतः अवयवोंमें ही संयोग मानना उचित है। समाघान-उक्त रीतिसे अवयवी तन्तुओोंमें संयोगका असम्भव है, अतः उनसे पटका (वस्त्रका) आरम्भ नहीं हो सकेगा। सर्वाशव्यापी होना- रूप दोपका तो तर्कशील नैयायिकके प्रति अवयवमें न रहनेवाले परमाणु- संयोगके उदाहरणसे परिहार करना चाहिए और दूसरे वादियोंके प्रति आकाशवर्ती शब्दका उदाहरण देना चाहिए। [ अर्थात् यदि अवयवीका संयोग ही कार्यका आरम्भक माना जाय और उसमें उसके आरम्भक अवयव न माने जायँ, तो अवयवीके संयोगमें सर्वाशव्यापित्व दोप देना अवयवसंयोगमें मी समान है, जसे तार्किक परमाणुसंयोग मानता है; परन्तु उसका आरम्मक अवयवान्तर नहीं मानता, इस दशामें भी परमाणुसंयोगको कृत्स्नव्यापी नहीं मानता, अन्यथा उक्त रीतिसे उसके भी कृतस्नव्यापी होनेका प्रसङ्ग है ही। एवं अन्य मतमें निरवयव आकाशसयुक्त शव्द भी कृत्स्नव्यापी नहीं है। उक्त रीतिसे तो उसे भी कृतस्नव्यापी होना चाहिए ] इस प्रघट्टकके अनुसार निरवयवका परिणाम होना असम्भव होनेसे उसका अनुमान नहीं कर सकते। अभ्रिम अन्थसे त्रह्मको सावयव मानकर परिणामकी आशक्का करते हैं- शक्ा-श्सका अवयवशुन्य होना कैसे सिद्ध है, जिससे कि उसके परिणामका खण्डन किया जा सके। समाधान-'ब्रहा निरवयव ही है' कारण कि उसका अवयचोंसे युक्त होना नहीं कहा जा सकता और श्रुतिसे भी निरवयव होना ही सिद्ध
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६८० विवरण्रमैयंसग्रह [सूत्र २, वर्णक १
त्वस्थ दुर्भणत्वाच्छ्ुतेश्रेति वदामः। सावयवत्वे किमवयवाचयविनोरुम- योरपि स्वप्रकाशत्वम् उताऽन्यतरस्यैव१ आद्ये तयोरितरेतराविपयत्वान्न केनचिदपि सावयवत्वं प्रतीयात्। द्वितीये घटात्मनोरिव तयोनांशांशि- भावसिद्धिः। श्रुतिश्च 'निष्कलं निष्क्रियं शान्तम्' इति क्रियावयचशून्यता- माह। नियन्तृत्वादिक्रियापि भयत इति चेत् , तर्हि तच्चतो निष्क्रियत्वं मायया सक्रियत्वमिति व्यवस्थाऽस्तु; 'मायाभिः पुरुरूप ईयते' इति विनिगमश्चुतेः। निर्व्यापारस्य चेतनस्य सुपुप्ते पुरुपार्थत्वानुभवेन निष्क्रिय-
है, ऐसा हम कहते हैं। [ सावयवत्वकी असिद्धि दिखलाते हैं-] यदि न्रह्म सावयव माना जाय; तो प्रश्न यह होगा कि क्या अवयव और अवयवी दोनों स्वमकाश हैं: अथवा इनमें से कोई एक ही (अवयव या अवयवी) स्वप्काश है? इनमें से यदि प्रथम कल्प (दोनोंको स्वप्रकाश) माना जाय, तो ये दोनों किसी एक दूसरेके विषय नहीं हैं, अतः कोई भी अपनेको सावयव नहीं समझ सकेगा। [ब्रह्म सावयव होनेसे अवयव और अवयवीरूप होगा, इन दोनों रूपोंमें यदि स्वप्रकाशता है, तो व्रह्म कैसे अपनेमें सावयवत्वका अनुभव करं सकता है? वह तो तब हो सकता जब कि एक दूसरेका विषय होता अर्थात् अवयवका प्रकाश अवयवीके द्वारा या अवयवीका अवयव द्वारा ऐसा विषय-विपयिभाव होता ]। और दूसरे कल्पमें (दोनोंमें से एकको ही स्वप्रकाश माननेमें) घट और आत्मामें जैसे अवयव और अवयवी भाव नहीं है, वैसे इन दोनोंमें भी अवयवावयवि- भाव सिद्ध नहीं हो सकता। [दूसरे कपमें एकको प्रकाशरूप माना है, इस दशामें उन पदार्थोंमें परस्पर अवयवावयविभाव उस तरह नहीं होता जिस तरह जड़स्वरूप घट और प्रकाशस्वरूप आत्मामें अवयवावयविभाव नहीं है] 'निष्कल, निष्क्रिय तथा शान्त त्रह्म है' इत्यादयर्थक श्रुति मी ब्रह्मको क्रियारूप अवयवसे रहित कहती है। यदि शङ्का करो कि नियन्तृत्व-नियमन करना-आदि क्रिया मी ब्रह्ममें श्रुतिसे सिद्ध है, तो उसपर हमारा समाधान यह होगा कि वास्तवमें ब्रह्म क्रिया- रहित ही है और मायाके द्वारा क्रियाविशिष्ट है, ऐसी व्यवस्था मानिये। [ वैपरीत्यके वारणके लिए श्रतिरूप प्रमाण देते हैं-] 'माथाओंके फारण बहुरूपताको प्राप्त करता है' इत्याघयर्थक सिद्धान्त श्रुतिसे ऐसी ही व्यवस्था होती है। सुपुप्त पुरुषमें व्यापार-क्रिया-हीन चेतनके पुरुषार्थरूपसे अनुभवगोचर होनेसे उस ब्रह्मका क्रिया-
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मांयाका निर्वचन] भांपानुचांदसहित ६८१
त्वस्य ताच्तिकत्लीपपत्तेः । न च व्रह्मप्रवृत्तेर्मायिकत्वे युक्त्यभाव: स्त्रप्नवृत्तिवन्निष्प्रयोजनत्वेन मिथ्यात्वोपपत्तेः। तदेवं निरवयवं ब्रह्म न परिणमते, किन्तु विवरसते इति द्वितीयपक्षोऽङ्गीकार्यः। तस्मिन्नपि पक्षे पूर्वरूपमपरित्यजतो ्रह्मणो निर्विकारत्वाजगद्रूपेण विकरिष्यमाणं वस्त्व- न्तरं किश्चिदङ्गीकार्यम्। तत्किं माया उताऽन्यत् १ नान्यत्, त्रह्ममायाभ्यां व्यतिरिक्तस्य कार्यत्वेन सूलकारणत्वायोगात्। मायापक्षेऽपि किं 'माया प्रज्ञा तथा मेधा' इत्यमिधानमनुसत्य माया- शव्देन ग्रज्ञोच्यते उत पामरप्रसिद्धया मन्त्रौपधादि: अथवा स्वकीय- रहित होना वस्तुतः युक्तिसिद्ध होता है। नियमन आदि ब्रह्मकी प्रवृत्तिको मायाजनित माननेमें युक्तियोंका अभाव नहीं कह सकते, कारण कि प्रयोजनशुन्य होनेसे अपनी प्रवृत्तिके समान उसमें मिथ्यात्व उपपन्न है। [जैसे मनुष्यकी प्रयोजनशुन्य प्रवृत्ति मिथ्या है, वैसे ही ब्रह्मकी प्रवृत्तिमें कोई प्रयोजन न होनेसे वह मिथ्या अर्थात् इन्द्रजालके सदश मायाजनित है] इस उपयुक्त सिद्धान्तके अनुसार अवयवहीन त्रसमका परिणाम नहीं हो सकता, किन्तु विवर्त होता है। [अर्थात् दूधका दधिके सदश तात्त्विक अन्यथाभावरूप परिणाम नहीं होता है, किन्तु शुक्तिरजतके समान अवास्तव अन्यथामावरूप विवर्त होता है, जो कि बुद्धिविपरिणाममात्र है, अतः निरवयवका भी विवर्त होना सम्भव है]। इस रीतिसे विवर्तात्मक परिणामरूप दूसरे पक्षका ही अभ्गीकार करना होगा, उस दूसरे पक्षमें भी वक्षके निर्विकार होनेसे पूर्वरूपका त्याग नहीं हो सकता, इसलिए संसारके रूपमें बदलनेवाली न्रह्मसे अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु माननी होगी। वह वस्तु क्या है? माया है अथवा उससे कोई अति- रिक्त है: मायासे अतिरिक्तको तो मान नहीं सकते, क्योंकि ब्रह्म और माया-इन दोनोंसे अतिरिक्त सकल पदार्थ कार्य ही हैं, इसलिए उन्हें मूल कारण मानना नहीं वन सकता। [प्रथम कल्प मानकर माया ही उस जगत्के रूपमें बदलनेवाली है, ऐसा मानना होगा। ] माया माननेके पक्षमें भी विकल्प हो सकता है कि 'माया प्रज्ञा और मेधा पर्याय हैं' इस कोशके अनुसार क्या मायाशव्दसे प्रज्ञा कही जाती है? अथवा पामर-साधारण अज्ञानी पुरुषोंकी प्रसिद्धिके अनुसार मन्न्र, औपध आदि लिये जाते हैं ? या अपनेको पण्डित माननेके
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६८२ विंवरणप्रमेयसँग्रह [सूत्र २, वर्णक १
पण्डितंमन्यत्वेन जड़ात्मिका काचित्पारमार्थिकशक्ति: किंवा 'नाऽसदा- सीत्' इत्यादिशास्त्रानुसारतोऽनिर्वचनीयशक्तिः १ आद्येऽपि न तावत् 'प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म' इति अ्त्युक्तव्रह्मचतन्यरूपप्रज्ञाया सायात्वं संभवति, 'भूयश्ान्ते विश्वमायानिवृत्तिः', 'दैवी हेषा गुणमयी', 'माययाऽपहृतज्ञाना' इति शास्त्रेण मायाया निवर्त्यत्वगुणमयत्वप्रज्ञानावरणत्वाभिधानात्, चैतन्यस्य तदसंभवात्। नाऽपि 'धीः प्रज्ञा शेसुषी मतिः' इत्यभिधानोक्ताया बुद्धिरूपप्रज्ञाया मायात्वम्, बुद्धेरुपादानत्वायोगात्। न द्वितीय:, नहि लोके मन्त्रौपधादौ मायाशब्दः प्रयुज्यते, कि तर्हि तत्कार्ये गन्घर्व- नगरादौ वाधिते। न तृतीय:, पारमार्थिकशक्तौ प्रमाणाभावात्। चतुर्थऽ-
अभिप्रायसे जडस्वरूप कोई (अज्ञात) पारमार्थिक-सद्रप-शक्तिको लेते हो? अथवा 'असत् नहीं था' इत्यादि शास्त्रके अनुसार मायासे कोई अनिर्वचनीय- मिथ्याभूत-शक्ति ली जाती है: [ अनिर्वचनीय इसलिए कहते हैं कि निर्दिष्ट शास्त्रमें असत्का निषेध जसे किया वैसे 'नो सदासीत्' ऐसा सत्का भी निषेध किया है, अतः सदसद्विलक्षण अनिर्वचनीय ही होता है।] प्रथम पक्ष माननेमें भी तो 'प्रज्ञा, प्रतिष्ठा, विज्ञान, ब्रह्म' इस श्रुतिमें (ब्रह्मके साथ प्रज्ञाका सामानाधिकरण्य होनेसे) ब्रह्मका पर्याय प्रज्ञा है, इसलिए कहे. गये ब्रह्म-चैतन्यरूप प्रज्ञाका माया होना सम्भव नहीं है, कारण कि 'अन्तमें सम्पूर्ण मायाकी निवृत्ति हो जाती है', 'यह गुणमयी दैवी माया है', 'मायाके कारण ज्ञानहीन हुए' इन शास्त्रोंने मायाको विनाशी गुणमय तथा ज्ञानका आवरण कहा है, यह सब चैतन्यमें सम्भव नहीं है। अर्थात् प्रज्ञा विनाशशील, गुणमयी तथा ज्ञान- विरोधिनी नहीं है, इसलिए मायापदसे नित्य चतन्यात्मक प्रज्ञा नहीं ली जा सकती, और 'प्रज्ञा धीः शेमुषी मतिः' इस प्रकार बुद्धिके पर्याय- प्रदर्शक कोशके आधारपर बुद्धिरूप प्रज्ञा भी माया नहीं हो सकती, कारण कि बुद्धि मूल कारण नहीं हो सकती। दूसरा पक्ष (मन्त्र, औषध आदिको माया मानना) नहीं बनता, कारण कि लोकमें मन्त्र, औषध आदिके लिए मायाशन्दका प्रयोग नहीं होता, किन्तु उन मन्त्र, औषध आदिके कार्यस्वरूप गन्धर्वनगर आदिमें ही मायाशब्दका प्रयोग होता है, जो कि वाघके विषय हैं, (अर्थात् मिथ्या हैं)। तीसरा पक्ष (मायाको
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सायाका निर्वचन ] भापानुवादसहित ६८३
व्यनिर्वचनीया सा माया किं जगत उपादानं किंवा जगदुत्पत्तौ कारणमिति विवेक्तव्यम्? तत्र 'मायां तु प्रक्ृति विद्याद्' इति श्रुतेरुपादानत्वं युक्तम्। न च 'प्रक्रियते अनया' इति ग्रकृतिश्दः करणे व्यृत्पादनीयः, उपादाने रूढत्वात्, रूढेश ग्रावल्यात्। 'इन्द्रो मायाभिः' इति तृतीया- श्रुत्या करणत्वमिति चेद्, न; तत्राऽऽत्मनो बहुत्वापत्तावेव करणत्वश्रवणात्। तावता च ग्रपश्चोपादानत्वे का हानिः१ 'आत्मन आकाशः संभूतः' इति पञ्चम्या ग्रकृतित्वमात्मनः श्रूयते, ततो न मायोपादानमिति चेद्, न; निमित्तेऽपि पश्चमीसंभवात्। न च मायैव निमित्तमस्त्विति वाच्यम्,
परमार्थमृत शक्ति मानना) उचित नहीं है, कारण कि मायाको पारमार्थिक शक्ति माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। चतुर्थ कल्प (अनिर्वचनीय) माननेमें भी वह (आपकी मानी हुई) माया क्या संसार-समवायी कारण है? या संसारकी उत्पत्तिमें निमिच्त कारण है? इसका विवेचन करना ावश्यक है। इस विवेचनके अवसरपर 'मायाको प्रकृति-उपादान-समझना चाहिए' इस श्रुतिसे मायाको उपादान मानना उचित होता है। 'जिसके द्वारा प्रक्रिया-सृष्टि- की जाय वह प्रकृति है' इस व्युत्पत्तिसे प्रकृतिशब्द कारणवाची नहीं माना जा सकता, कारण कि प्रकृतिशब्द उपादान कारणमें रूढ़ है, [और रूढ़िरयोगा- पहारिणी' इस न्यायसे ] रूढ़ि प्रवल मानी जाती है। शक्का-'इन्द्र मायाओंके द्वारा' इत्यादि तृतीया विभक्तिके श्रवणसे प्रकृतिको करण कहेंगे। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते; कारण कि उस श्रुतिमें एक आत्माके नाना होनेमें ही मायाको करण माना गया है; इससे भी प्रपञ्चके प्रति उपादान होनेमें कोई वाघा नहीं आ सकती। शक्का-'आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ' इत्याद्यर्थक श्रुविमें 'आत्मनः' इस पश्चमी विभक्तिके मनेसे आत्मा ही प्रकृति है, यह सिद्ध होता है, इससे संसारकी उपादान माया नहीं हो सकती। समाधान-पश्चमी विभक्ति निमित कारणके लिए भी आ सकती है, 'आत्मनः' इसमें पश्चमी आनेसे ब्रह्मको उपादान नहीं कह सकते; किन्तु निमिच्तमें पश्चमी है। मायाको ही निमिच कारण मानना उचित नहीं है; कारण कि
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६८४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक ?
जाड्यरूपेण मायायाः प्रपश्चेऽनुगतत्वात्। आत्माऽपि सत्तारूपेण स्फूर्ततिरूपेण वाडनुगत इति चेद्, एवं तर्ह्यात्मा माया चेत्युभयम् उपादान- मस्तु। तथा च मायायामतिव्यासेन जगज्न्मादिकारणत्वलक्षणेन विशुद्धं ब्रह्म न सिध्यति। अत्रोच्यते-एकस्य कार्यस्य परस्परनिरपेक्षोपादानद्दयाऽसंभवान्माया ब्रह्म च मिलित्वैकमेवोपादानमिति वाच्यम्। तत्र त्रैविध्यं संभवति- रज्ज्वा संयुक्तसूत्रद्वयवत् समप्रधानभावेनोभंयमपि जगत उपादानम्। तघ् सत्तास्फृत्येशयोर्रह्मण उपयोगः। जाड्यविकारांशयोस्तु मायाया इति केचिदाहुः। 'देवात्मशक्तिम्' इति श्षतिवलान्मायाख्या शक्तिरेव साक्षादुपादानम्।
जड़ताके रूपमें माया प्रपञ्चमात्रमें अनुगत है। यदि कहा जाय कि आत्मा मी तो सदूपसे या स्फुरणरूपसे प्रपश्नमात्रमें अनुगत है, तो आत्मा और माया दोनोंको उपादान मानिये। इससे जगत्के जन्मादिकाकारणत्वरूप लक्षणके द्वारा उसका मायामें भी समन्वय हो जानेसे विशुद्ध न्रह्की सिद्धि नहीं हो सकती। समाधान-इस लम्वे पर्यनुयोगके उत्तरमें कहा जाता है-एक कार्यके एक दूसरेसे अपेक्षा न रखनेवाले दो उपादान कारण नहीं हो सकते, इसलिए माया और ब्रह्म दोनों मिलकर एक ही उपादान है; ऐसा कहना होगा; इस कथनमें तीन प्रकारकी रीतियां हो सकती हैं- रस्सीके संयुक्त दो सूत्रोंके समान समप्धानभावसे (माया और ब्रह्म) दोनों जगत्के उपादान हैं [ अर्थात् जैसे वेष्ित-बटे हुए-दो सूत्र रस्सीके प्रति समानरूपसे उपादान हैं, उनमें एक दूसरेमें न्यूनाधिक प्राधान्य नहीं है; वैसे ही ब्रह्म और माया दोनोंमें जगत्की स्थिति होनी चाहिए ]। इनमें सचा और स्फुरण (प्रकाश) अंशमें ब्रह्मका उपयोग है तथा जड़ता और विकाररूपी अंशोंमें मायाका उपयोग है, ऐसा एक प्रकारका कहींपर वादीका मत है। 'देवात्मश्ञक्तिस्' इत्यादि श्रुतिके आधारपर मायानामक शक्ति ही साक्षात् उपादान है और शक्तिको शक्तिमान्के अधीन रहना नियमतः प्राप्त
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मतभेदसे जगदपादान-निरूपण ] भापानुवादसहित ६८५
शक्त्ेश नियमेन शक्तिमत्पारतन्त्र्यात् शक्तिमति व्रह्मण्यप्यर्थाद् उपादानत्वं पर्यवस्यतीत्यन्ये। आरोपिताया मायाया अधिष्ठानव्रह्मस्वरूपमन्तरेण वस्तुतः स्व- रूपान्तराभावाद मायाया एव साक्षादुपादानत्वेऽपि तदधिष्ठानत्वेन
आद्ये पक्षे मायाविशिषव्रह्मणो मुख्योपादानत्वं द्वितीयतृतीययोस्तु मायाया एव। पक्षत्रयेऽपि विशुद्धव्रह्मण औपचारिकमेचोपादानत्वम्। तत्र मुख्योपादानस्य जगत्कारणत्वं स्वरूपलक्षणम्। औपचारिकोपादानस्य तु तत्तटस्थलक्षणम् । तथा सति किं स्वरूपलक्षणत्वेनाऽभिप्रेतं जगत्कारण- त्वं मायायामतिव्यासं किं वा तटस्थलक्षणत्वेन ? नाऽडद्य, मायाया
है, इसलिए न्रद्में भी उपादानत्व अर्थात् सिद्ध होता है-इस प्रकार दूसरे वादियोंका मत है। यद्यपि अघिष्ठानभूत ब्रह्मके स्वरूपके बिना आरोपित (मिथ्याभूत) मायाका वस्तुतः मतिरिक्त स्वरूप न होनेसे माया ही साक्षात् उपादान है, तथापि (मायाका) अिष्ठान त्रह्म है, अतः हठात् नम्ममें भी उपादानत्व प्राप्त होता है, [रजतबुद्धिसे ग्रहण करनेपर भी हाथमें शुक्ति ही आती है, कारण कि अध्यस्त पदार्थ मघिष्ठानके अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता, एवं अध्यस्त मायाको उपादान माननेसे न्रक्मको उपादान मानना अर्थात् सिद्ध हो जाता है] ऐसा कुछ वादी मानते हैं। प्रथम पक्षमें मायाविशिष्ट व्रह्ममें मुख्य उपादानत्व प्राप्त होता है तथा दूसरे और तीसरे पक्षमें केवल मायामें सुख्य उपादानत्व प्राप्त होता है। तीनों पक्षोंमें शुद्ध नसमें गौण ही उपादानकारणत्व प्राप्त है। इनमें मुख्य उपादानका जगत्कारणत्व स्वरूप लक्षण है और औपचारिक उपादानका तो वही जगत्कारणत्व तटस्थ लक्षण होता है। इस दशामें प्रश्न होता है कि क्या स्वरूपलक्षणके रूपमें माने गये जगत्कारणत्वकी मायामें अतिव्याप्ति होती है? या तटस्थ लक्षणके रूपसे अभिप्रेत जगत्कारणत्वकी मायामें अतिव्याप्ति होती है? इनमें प्रथम कल्पोक्त अतिव्याप्ति नहीं हो सकती, कारण कि माया लक्ष्यकोटिमें ही ८७
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६८६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, चर्णक १
लक्ष्यान्त:पातित्वात्। न द्वितीय:, जगत्कारणत्वस्य तटस्थलक्षणरूपेण मायायामवृत्तेः। तस्माजगत्कारणत्वरूपतटस्थलक्षणेन ज्ञानानन्दादिरूप- स्वरूपलक्षणेन च विशुद्धब्रह्मसिद्धिः । ननु न तावत् प्रथिव्यादयुपादानत्वं ब्रह्मलक्षणम्, प्रथिव्यादीनामृत्प- च्यदर्शनात। नाऽपि वटाछ्युपादानत्वम्, वटादीनां पृथिव्यादिकार्यत्वादिति चेदू, मैवम् ; विमता: प्ृरथिव्यसेजोवायवः जायन्ते, प्ृथिव्यपेजोवायुवुद्धि गोचरत्वात्, संग्रतिपन्नपृथिव्यप्तेजोवायुभागवत्। आकाशकालदिगादयो
आ जाती है। दूसरे कल्पसे उक्त अतिव्याप्ति भी नहीं हो सकती, कारण कि जगत्कारणत्वरूप लक्षणका तटस्थ लक्षणके रूपसे मायामें समन्वय नहीं हो सकता। [जगत्कारणत्वरूप तटस्थ लक्षण औपचारिक उपादानका ही हो सकता है; माया तो उक्त तीनों प्रकारोमें से किसी भी प्रकारसे औपचारिक उपादान नहीं है। ] इसलिए जगत्कारणत्वरूप तटस्थ लक्षणके द्वारा और ज्ञान, आनन्द आदि स्वरूप लक्षणके द्वारा विशुद्ध ब्रह्मकी सिद्धि हो सकती है। शङ्का-ब्रह्मका पृथिवी आदि भूरतोंके प्रति उपादानकारणत्वरूप लक्षण नहीं हो सकता, कारण कि पृथिवी आदि भूतोंकी उत्पत्ति नहीं देखी जाती है। और उसका घट आदि भौतिक द्रव्योंके प्रति उपादानत्वरूप लक्षण मी नहीं बन सकता, कारण कि घट आदि भौतिक द्रव्य तो पृथ्वी आदि भूतोंके कार्य हैं, [ इसलिए भौतिक द्रव्योंके उपादान पृथ्वी आदि भूत ही होंगे, ब्रह्म नहीं होगा ]। समाधान-उक्त आशङ्ा युक्त नहीं है, कारण कि पृथ्वी आदि भूतोंकी उत्पत्ति प्रथम तो अनुमानसे सिद्ध है-[ साघक अनुमान प्रयोग दिखलाते हैं-] 'विमत पृथ्वी, जल, तेज और वायु उत्पन्न होते हैं; पृथ्वी, जल, तेज और वायु-इस बुद्धिके विषय होनेसे; उभयवादिसम्मत पृथ्वी, जल, तेज, और वायु-इन भूतोंके एकदेश-अवयव-के सदश। [वादी और प्रतिवादी अवयवभूत वृक्ष, पाषाण आदिकी उत्पत्ति मानते हैं; अतः इसको दृष्टान्त मानकर पृथ्वी • आदि अवयवी भूतोंकी भी उत्पत्ति माननी चाहिए। निरवयव आकाश आदि पदार्थ- साधारण उत्पत्तिका साधक अनुमान दिखलाते हैं-] आकाश, काल और दिग् आंदि भी उत्पन्न होते हैं, विभक्त-एक दुसरेसे भिन्न-मिन्न-होनेसे,
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मतमेदसे जगदुपादान-निरूपण] भापांनुवादसहित ६८७
जायन्ते, विभक्तत्वाद, घटादिवत्। ननु अ्त्यनुमानमस्ति-प्रथिव्यादयो न जायन्ते, महाभूतत्वात्, आकाशवत्। आकाशश्र न जायते, निरवयवद्रव्य- त्वात्, आत्मवत्, इति चेट्, मैवम्; सामान्यविपयान्महाभृतत्वहेतोरपि विशेपविपयस्य प्रथिवीवुद्धिगोचरत्वस्य वलीयस्त्वाद। तदुक्त भट्टाचार्ये :- 'वाधः सामान्यशास्त्रस्य विशेपविपयाद्यथा। अनुमानान्तरैरेवमनुमानस्य वाधनम् ॥' इति। घटादिके समान [जैसे घट, पट आदि यावत् विभक्क पदार्थ उत्पन्न होते देखे जाते हैं, वैसे ही याकाशादिमें भी विभक्तत्व होनेसे उनकी उत्पत्ति माननी होगी, इस अनुमानसे अवयवरहित अथवा सावयव सभी भूतोंकी उत्पच्ति सिद्ध की गई ]। शक्का-उक्त अनुमानका विरोधी अनुमान है-'पृथ्वी आदि उत्पन्न नहीं होते हैं, कारण कि आकाशके समान वे सव महाभूत हैं *। [निरवयव भूतोंकी अनुत्पत्ति सिद्ध करते हैं-] आकाश उत्पन्न नहीं होता, अवयवशुन्य द्रव्य होनेसे, आत्माके समान। समाधान-सामान्यविषयक्त महाभूतत्वरूप हेतुकी अपेक्षा विशेष- विषयक पृथ्वीवुद्धिगोचरत्वरूप हेतु बलवान् है। इस विषयमें भट्टाचार्य महाशयने कहा है- जैसे विशेपविषयक शास्रसे सामान्यविषयक शासत्रका बाघ होता है, वैसे ही दूसरे (विशेषचिपयक) अनुमानोंसे सामान्यविपयक अनुमानका बाध हो जाता है।' *आकाशके दृशन्तसे पृथ्वी आदिकी अनुत्पत्ति सिद्ध की गई है और इससे अव्यवहित मूर्च पठ्किमें विभकत्वरूप हेतुसे आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध की गई है, अतः विरोध-सा प्रतीत होता है, परन्तु यह अग्रिम अनुमान पूर्व अनुमानका विरोधी है-पूर्वमें विभकत्व हेतुसे वादीने उत्पत्ति दिखलाई है और प्रतिवादी महाभूतत्वरूप हेतुसे आकाशके दृष्टान्त द्वारा अनुत्पत्ति सिद्ध करता है। यह आवश्यक नहीं है कि प्तिवादी वादीके तर्कको सहसा स्वीकार कर ले, अथवा यह अगला आकाशादिकी उत्पत्ति सिद्ध करनेवाला अनुमान मूलभूत विवरणमें न होते हुए भी प्रमेयकार द्वारा सावयव-निरचयव-भूतसाधारणकी उत्पत्ति सिद्ध करनेके लिए उद्ट्वित किया गया है, अतः आगे दिये जानेवाले समाधानमें विभक्तत्वरूप. हेतुका उदेख न करते हुए केवल पृथ्वीवुद्धिगोचरत्वका ही उल्ेस किया गया है। अन्यथा विभकत्व हेतुसे आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध होनेके अनन्तर प्रत्यनुमानमें अनुत्पत्तिरूप साध्यमं आकाश केसे दष्टान्त हो सकता ?
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६८८ ववरणप्रमेयंसंग्रहं [सूंत्र २, वंर्णक १
आकाशजन्माभावानुमाने श्रुतिविरोधः साधनविकलश्च दृष्टान्तः, निर्गुणात्मनि गुणवत्वलक्षणस्य द्रव्यत्वस्याऽभावात्। तस्मात् जायमानपृथि- व्यादिकृत्सजगदुपादानत्वं ब्रह्मलक्षणम्। ननु वादिनो जगदुपादाने विप्रतिपद्यन्ते। तथाहि-विमताः सर्वे विकारा:, सुखदुःखमोहसामान्यप्रकृतिकाः, तदन्वितस्व्रभावत्वाद्, ये यदन्वितस्वभावास्ते तत्प्रकृतिकाः, यथा मृदन्विता मृत्प्रकृतिकाः शरावा- दयः। तथा विमताः सर्वविकारा अविभक्तैकप्रकृतिकाः, परिमितत्वाद् अनेकत्वात् विकारत्वाच्, शरावादिवत्, इति सांख्या: प्रधानं जगदुपादान- मनुमिमते। विमतं कार्यद्रव्यं स्वपरिमाणादणुतरपरिमाणारन्धम्, कार्यद्रव्यत्वात्,
और आकाशकी उत्पततिके अभावको सिद्ध करनेवाले अनुमानमें श्रुतिका विरोध और साधन-शून्य दष्टान्त हो जाता है, कारण कि निर्गुण आत्मामें गुणवत्त्वरूप व्रव्यत्वकां अभाव है। इन दोनों वातोंके कारण अनुमान दुर्बल हो जाता है। [अनुमानकी पुष्टि आगमसे होनी आवश्यक है और दृष्टान्तको हेतुशून्य भी नहीं होना चाहिए ]। इसलिए उत्पन्न होनेवाले पृथ्वी आदि सम्पूर्ण जगत्का उपादान होनारूप ब्रह्मका लक्षण सिद्ध होता है। शक्का-जगत्के उपादानके विषयमें वादियोंका विवाद (विरुद्ध मत) है कि विमत सकल विकार (भूत, भौतिक) सुख, दुःख और मोह साधारण प्रकृतिवाले हैं [अर्थात् सब निकारोंकी प्रकृति-उपादान-सामान्यतः सुख- बुःख-मोहात्मक है ], कारण कि वे उससे-सुख-दुःख-मोहसामान्यसे-युक्त स्वभाववाले हैं। जो जिन गुणोंसे युक्त स्वभाववाले होते हैं, उन सबकी उन्हीं गुणोंसे युक्त प्रकृति (उपादान) होती है। जसे कि मिटीरूप सामान्यसे युक्त मिट्टीसे बने हुए घड़े और सकोरे आदि। तथा विमत सम्पूर्ण विकारोंकी मिली हुई एक ही प्रकृति-उपादान-है, कारण कि वे परिमित-नाप-तोल वाले-अनेक तथा विकार कहलाते हैं, सकोरे आदिके समान' इस प्रकार अनुमान द्वारा सांख्यवादी प्रधान-त्रिगुणात्मिका मूल प्रकृति-को ही विश्वका उपादान (मुल प्रकृति) मानते हैं। परमाणुवादी नैयायिक-'विमत कार्य द्रव्य (घट, पट आदि भौतिक फार्य) अपने
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स्वभावादिवादियोंके मतोंका निराकरण ] भापानुवादसहित
पटवत् इति परमाणूंस्तद्वादिन: कल्पयन्ति। सर्वं कार्यमभावपुरःसरम्, योग्यत्वे सत्यन्तुपलभ्यमानपूर्वावस्थत्वाद्, व्यतिरेके परपरिकल्पितात्मवत्, इति शन्वं छन्यवादिनो वदन्ति। योगा: शैवाथ्च स्वकीयागमसामर्थ्याद्विरण्यगर्भ पछ्ुपतिं चाऽडहुरिति। तद्युक्तम्-आन्तराणां सुखादीनां वाह्यानां घटादीनां च प्त्य- क्षतो भेदग्रतीती सुखदुःखसोहसामान्यान्वितत्व्हेतोरसिद्धत्वाद्। घटा- दिविकारा: सुखदुःखमोहात्मका:, स्वाभिव्यञ्जकचित्तोपाधौ सुखाद्याकार- प्रतिभासहेतुत्वाद्, यथा दर्पणोपाधौ सुखाकारग्रतिभासहेतुर्सुखात्मको
परिमाणकी अपेक्षा छोटे परिमाणवालेसे उत्पन्न हुआ है, क्योंकि वह कार्यद्रव्य है, जैसे कि पट,-इस प्रकारके अनुमानसे परमाणुको विश्वके प्रति उपादान मानते हैं। सुन्यवादी बौद्ध कहते हैं कि सकल कार्यजात अभावपुरस्सर है अर्थात् अभावसे ही उत्पन्न हुआ है, कारण कि योग्यता होनेपर भी पूर्वावस्थाकी उपलन्धि नहीं होती [ यदि उसकी पूर्वावस्था-कारणावस्था-भावरूप होती, तो उसकी उपलन्धि होती, अतः उसकी पूर्वावस्थाको अभावरूप ही मानना चाहिए, इसमें व्यतिरेक दष्टान्त है-दूसरे वादियोंके द्वारा कल्पित आत्मा, इस प्रकार अनुमानसे शुन्य ही जगत्का उपादान सिद्ध होता है। योगशासतवेत्ता तथा शैवागमके अनुयायी अपने-अपने शास्त्रोंके बलपर हिरण्यगर्भ या पशुपतिको उपादान मानते हैं। समाधान-वादियोंका उक्त मत युक्त नहीं है, कारण कि आन्तर- मीतरी-सुखादि और बाह-वाहरी-घट आदि पदार्थोंके भेदका प्रव्यक्ष ज्ञान दोनेसे सुख, दुःख तथा मोह सामान्यसे अन्वित होनारूप हेतु सिद्ध नहीं होता है। [यदि सभी विकार सुख-दुःख-मोहसामान्यवाले समान ही होते और आभ्यन्तर सुख, दुःख आदि विकारोंमें और बाह्य घट, पट आदि विकारोंमें मेदका प्रत्यक्ष नहीं होता ]। शक्ा-'घट आदि विकार सुख-दुःख-मोह-सामान्यात्मक हैं, कारण कि ये अपने-सुख, दुःख आदिके-अभिव्यञ्ञक-अनुभव करानेवाले- चित्तरूप उपाधिमें सुखादि आकारके प्रतिभासके कारण हैं। [ यदि वाह्य घटादि
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६९० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक १
विम्ब इति हेतुसिद्धिरिति चेद्, न; तथा सत्येकमेव पदार्थसुपलभ- मानस्य युगपत्सुखादित्नितयोपलम्भप्रसङ्गात्। अदृष्टवशादेकोपलम्भ इति चेद्, न; अदृष्टेन वस्तुसामर्थ्यनियमायोगात्। नह्यदृष्टवशात् पापाणो मृदुर्भवति। अदट्टस्य वस्तुसामर्थ्यानियामकत्वेऽप्युपलम्भनियामकत्व- सस्त्येवेति चेद्, एवमपि सुखादिसामान्यान्वितत्वहेतुरनैकान्तिक: । शुक्कलादिगुणैघटत्वादिसामान्यथ्वाऽन्यितानां द्रव्याणां तत्प्रकृतित्वादर्शनाद्। परिमितत्वमपि वस्तुकृतं चेत, अ्रधानपुरुपयोरनित्ययोरनैकान्तिकता ।
न हों, तो उनके उपभोगसे उत्पन्न हुए सुखादिका प्रतिभास अन्तःकरणमें हो ही नहीं सकता अर्थात् अन्तःकरणकी सुखादिरूप वृत्ति ही नहीं होगी, जैसे दर्पणरूप उपाधिमें मुखाकार प्रतिभासका कारण बिम्बभूत मुखस्वरूप होता है' इस अनुमानसे उक्त हेतुकी सिद्धि हो जायगी। समाधान-उक्त हेतुसाधक अनुमानको प्रमाण मानकर यदि सभी पदार्थ सुख-दुःख-मोहसामान्यसे युक्त माने जायँ, तो किसी मी एक पदार्थकी उपलब्धि करनेवाले पुरुषको एक ही कालमें सुख, दुःख तथा मोह तीनोंके अनुभवका प्रसक्क आ जायगा। अदृष्ट-प्रार्घविशेष-के कारण सुखादिमें से एकका ही अनुभव होता है, ऐसी व्यवस्था भी नहीं की जा सकती, कारण कि अदष्टके द्वारा वस्तुस्वभावकी सामर्थ्यका नियमन नहीं हो सकता। [ वस्तुका स्वभाव यदि सुखादिस्वरूप है, तो उनमें से दो की निवृत्ति अदृष्ट कैसे कर सकेगा]। अदष्टके बलसे पत्थर कोमल नहीं हो सकता। अदष्ट वस्तुसामर्थ्यका नियामक न होनेपर भी अनुभवका नियामक तो है, ऐसा यदि मान भी लिया जाय, तो मी सुखादिसामान्यसे अन्वित होनारूप हेतुमें व्यभिचार आ ही जाता है; [ कारण कि सुखादिकी सच्ता उपलम्भसे अतिरिक्त नहीं होती है। यदि उपलम्भ नहीं है, तो सुखादिकी स्थिति भी नहीं है ] और शुक् आदि गुणोंसे अथवा घटत्व आदि सामान्यसे अन्वित घटादि द्रव्योंकी प्रकृति शुक्कादि गुण और घटत्व आदि सामान्य नहीं हैं। परिमितित्व हेतुका खण्डन करते हैं-यदि परिमितत्व भी वस्तुके कारण होता हो, तो नित्यस्वरूप प्रधान-सांख्यसम्मत त्रिगुणात्मिका मूल प्रकृति-और पुरुष-आतमा चेतन-इन दोनोंमें ही व्यमिचार है। [ अर्थात् उक्त दोनों
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स्वभावावादिवादियोंके मतोंका निराकरण] भापानुवादसहित ६९१
देशकालकतं चेद्, चटहिमकरकादिपु प्रत्यक्षदष्टभिन्नप्रकृतिकेष्वनेकान्तम् । एतेनाऽनेकत्वविकारत्वहेतू व्याख्यातौ। कार्यद्रव्यत्वं च दीर्घविस्तीर्णदुक- लद्यार्धे सङ्कचिते रज्जुद्रव्येऽनकान्तिकम्। अथ दुकूलद्वयसंयोगमन्तरेण रज्जुद्रव्यं नामाऽन्यन्नाऽस्ति तथापि तत्प्रत्यनुमानग्रस्तम्। विमतं द्वयणुकं सावयवारव्यम्, सावयतत्वाद्, घटवव् इति हि ग्रतिप्रयोगः। अन्यवा- दिनोऽपि घटस्य पूर्वावस्थारूपा मृत् प्रत्यक्षोपलब्धेत्यसिद्धो हेतुः। योगशैवा- गमास्तु वेदविरोधादग्रमाणम्।
वस्तुएँ तो हैं ही, परन्तु इनमें परिमितत्व नहीं है ]। देश या कालके कारण परि- मितत्व माना जाय, तो भी जिनकी प्रकृति प्रत्यक्ष मिन्न भिन्न दीखती है, ऐसे घट, हिम (चरफ), करक (ओले पत्थर) आदिमें साध्यका (एक- प्रकृतिकत्वका) व्यभिचार है। [ वस्तुकृत परिमितत्व न मान कर काल या देशकृत माननेसे पुरुप और प्रकृतिमें से व्यभिचारका वारण होनेपर भी घट हिमादिमें देशकालकृत परिमितत्व रहता है और उनमें साध्य नहीं है, अतः साध्यवद्यृत्ति ह्ोनेसे व्यभिचरित हेतु हो गया, क्योंकि घटकी प्रकृति मिट्टी है और हिमकी प्रकृति जल है, ऐसा प्रत्यक्ष सिद्ध है। ] इसीसे अनेकत्व और विकारत्वरूप हेतुका भी व्याख्यान हो गया [ अर्थात् घट, हिमादिमें अनेकत्व और विकारत्वके रहनेपर भी साध्य-अविभक्तेकप्रकृतिकत्व-नहीं है] और परमाणुवादियोंका कार्यद्रव्यत्वरूप हेतु भी लम्बी और चौड़ी दो धोतियोंके समेटनेसे बने हुए रस्सीरूप द्रव्यमें व्यमिचरित है। [अर्थात् उक्त रज्जुरूप कार्य- द्रव्यका उपादान दो लम्बी और चौड़ी धोतियां है, परमाणु नहीं है] यदि कहा जाय कि रज्जुनामक द्रव्य दो रज्जुओंके संयोगसे अतिरिक्त कोई कार्य द्रव्य नहीं है, तो मी उक्त कार्यद्रव्यत्वहेतुक अनुमान प्रत्यनुमानग्रस्त है। [अर्थात् कार्यद्रव्यत्व हेतु सत्पतिपक्षरूप हेत्वाभाससे आक्रान्त है ] उस प्रतिपक्षी अनुमानका इस प्रकार प्रयोग है-'विमत द्यणुक (कार्यद्रव्य) अवयवसहित पदार्थसे बना है, कारण कि वह द्यणुक अवयवविशिष्ट है, घटके समान । शुन्यवादीका मी 'योग्यत्वे सति अनुपलभ्यमानपूर्वाचस्थत्वरूप' हेतु असिद्ध है कारण कि घटकी पूर्वी- वस्थारूप मिट्टीका प्रत्यक्ष दर्शन होता है। योग अथवा शैव शास्त्र तो वेदके साथ विरोध मनेसे प्रमाणमूत ही नहीं हैं।
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६१२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र २, वर्णक १
ननु वादिनां प्रमाणानुपपत्तावपि न अमेयानुपपत्तिः, नहि चक्षुरुपद्र- वमात्रेण दश्यरूपादिहानिरद्ष्टेति चेद, न; अमेयस्याऽप्यन्यदीयस्य दुनिर्रू- पत्वात्। कि केवलं प्रधानादि जगत्कारणम् उतेश्वराधिष्ठितम् ! नाऽडद्य: अचेतनस्य प्रतिनियतरचनातुपपत्तेः। द्वितीयेऽपि तस्येश्वरस्य श्रुतिसिद्धत्वे ब्रह्मवादप्रसङ्ग:। अनुमानगम्यत्वे कुलालादिद्ष्टान्तेनैव परिच्छिन्नज्ञा- नशक्तित्वं स्यात्। अंथ कुलालादिवदनेकत्वाभावादेकस्य सर्वजगत्स्ष्टुस्तस्य सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वे अर्थात् भविष्यतः। एवमपि विमतं जगज्जीवेश्वरा
शङ्का-वादियोंको प्रमाणकी उपपत्ति न होनेपर भी प्रमेयकी उप- पत्तिका अभाव नहीं हो सकता। [यदि वादी अपने अपने सिद्धान्तसम्मत जगत्के उपादानभूत परमाणु आदिमें प्रमाण नहीं दे सकते, तो इसका यह तात्पर्य नहीं मानना चाहिए कि प्रमेय ही नहीं है, क्योंकि प्रमाणके अभावमें भी प्रमेय रहता है, इसको दृष्टान्तसे सिद्ध करते हैं-] आँखमें खरावी आ जानेसे ही दश्यरूप आदिकी हानि नहीं देखी गई है। समाधान-दूसरे वादियोंके सम्मत प्रमेयका निरूपण मी नहीं हो सकता, [प्रमाणके अभावमान्नसे प्रमेयका अभाव नहीं कहा जा रहा है, परन्तु प्रमेय. ही नहीं है, इस प्रकार प्रमेयकी दुर्निरूपता भी दिखलाते हैं-] क्या प्रधानादि केवल (अन्यनिरपेक्ष होकर) विश्वके कारण होते हैं ? अथवा ईश्वरके अधीन होकर कारण होते हैं?। इनमें प्रथम कल्प नहीं मान सकते, कारण कि अचेतनसे व्यवस्थित रचना नहीं वन सकती। दूसरे पक्षके माननेमें भी यदि वह अघिष्ठानभूत ईश्वर श्रतिसे सिद्ध है, तो ब्रह्मवादका प्रसङ्ग आ जाता है। [अर्थात् श्रुतिमें मायाघिष्ठान सृष्टिकर्ता ईश्वर ब्रह्म ही कहा गया है, अतः ब्रह्मोपादानक जगत् सिद्ध होता है।। यदि उसको अनुमानगम्य माना जाय, तो कुलाल आदि दष्टान्तसे ही वह परिच्छिन्न-ज्ञानशक्तिवाला हो जायगा। [अर्थात जैसे घट आदिका कर्ता कुलाल आदि परिमित शक्ति और ज्ञानवाले हैं, वैसे ही सृष्टिकर्ता ईश्वर भी है ]। यदि कहा जाय कि जैसे कुलाल आदि घटादिके कर्ता अनेक हैं, वैसे ईश्वर अनेक नहीं हैं, प्रत्युत एक है और जगत्भरका रचयिता है, इसलिए उसकी सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमचा अर्थात् सिद्ध हो जायगी, तो ऐसा कहनेपर भी निमत संसारको जीव
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स्वभावादिवादियोंके मतोंका निराकरण ] भापानुवादसहित ६३
भ्यायुत्पद्यते, कार्यत्वाद्, घटादिवत्, इत्यतिप्रसङ्गो दुर्वारः। अदष्टद्वारा जीवस्याऽपि जगत्कर्तृत्वादिष्टापत्तिरिति चेत्, तर्हि घटादिवैलक्षण्याय पृथिव्यादौ कर्तृत्रयं प्रसज्येत। शून्यस्य तु निरुपाख्यत्वान्न जगहुपादनत्वसं- भावनाऽप्यस्ति, जगतः सदन्वयात् । सदन्वयः संवृत्तिकल्पित इति चेद, एवमपि त्वन्मते निरन्वयविनाशचतः पूर्वकल्पस्य संस्कारासंभवेन तत्सदशो वर्त्तमानकल्प इति नियमो न स्यात्। ततश्च कर्मतत्फलतत्म्र- साणव्यवहारोच्छेद: विशिष्टसंनिवेशयुक्तदेवादिभावकामनयाऽनुष्ठित- कर्मणां कल्पान्तरे तथाविधदेवादिरूपानुत्पत्ते: कर्मोच्छेदः । अत्यन्तपु- ण्यकारिण आकल्पं स्वर्गमनुभूय कल्पान्तरे पूर्वजातिस्मरणपूर्वकं जन्म श्रतौ फलत्वेन श्रुतं तच् फलं निरन्वयविनाशे संस्काराभायान्
और ईश्वर दोनोंने बनाया है, कार्य होनेसे, घट आदिके तुल्य' इस प्रत्यनुमानसे जीव भी संसारका कर्ता है, ऐसा अतिमसऊ नहीं हटाया जा सकता। जीव भी अटछ द्वारा सँसारका कर्ता है, इस प्रकार यदि इष्ट ही माना जाय, तो घटादिसे वलक्षण्य-मेद-दिखलानेके लिए पृथ्वी आदि कार्यके प्रति तीन कर्ताओंका प्रसन्न होगा। निरुपाख्य होनेसे शून्यमें तो संसारके उपादानत्वकी सम्भावना भी नहीं हो सकती, कारण कि संसार सत्से अन्वित है। [निरुपाख्यमें सत्की अनुवृत्ति वाधित है और जगत्के साथ 'सन् घटः, सन् पटः' इत्यादिरूपसे सत्की अनुवृत्ति होती है ]। यदि सत्का अन्वय संवृत्तिके द्वारा माना जाय, तो मी तुम्हारे (शून्यवादीके) मतमें अन्वयशून्य विनाशशाली पूर्व कल्पके संसारका सम्भव न होनेसे उसीके सदश वर्तमान कल्प है, ऐसा नियम नहीं वन सकता। इससे कर्म, कर्मफल तथा उसके प्रमाण आदिका सब व्यवहार नष्ट हो जायगा। [ प्रत्येक व्यवहारके विनाशका प्रकार दिखलाते हैं-] विशिष्ट आकृतिसे युक्त देवादिभावकी इच्छासे किये गये कर्मोंका दूसरे कल्पमें उसी प्रकार देवादिरूपकी उत्पत्ति न होनेसे कर्मोंका विनाश हो जायगा। अत्यन्त (अधिक) पुण्य करनेवाले पुरुषके लिए श्रुतिमें ऐसा पुण्यफल कहा गया है कि कलपपर्यन्त स्वर्गका उपभोग करनेके अनन्तर दूसरे करपमें अपनी पूर्व जातिका स्मरण रख कर वह जन्मग्रहण करता है। उस श्रुति द्वारा कथित फलका अनुवृत्ति रहित विनाश होनेपर संस्कारके न हो सकनेसे सम्भव ८८
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६९४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक १
संभवेत् । तथा पूर्ववेदस्य निरन्वयविनाशे सति धर्मस्य मानान्तराग- म्यत्वेन तद्गोचरनूतनपदरचनायाः पुरुपैः कर्त्तुमशक्यतया धर्म्रमाणम- प्युच्छिद्येत। तदङ्गीकारे च तथैव तदभिमतकर्मतत्फलतत्प्रमाणाना- मप्युच्छेद: स्यात्। सर्वं कार्य स्वभावादेवोत्पद्यत इति वार्हस्पत्यो मन्यते। स प्रतिवक्त व्यः-किं स्वयमेव स्वस्य निमित्तमित्यर्थः, किं वा निर्निमित्तमुत्पद्यत इति? नाऽडद्य:, आत्माश्रयत्वात्। द्वितीये घटस्य भावाभावौ युगपत्स्याताम्, क्रमकारिनिमित्तनिरपेक्षत्वात् । अथ मन्यसे त्वन्मतेऽरपि तस्य निमि-
नहीं है। एवं पूर्व कल्पके वेदका अन्वयशुन्य विनाश हो जानेपर धर्ममें प्रमाणका भी उच्छेद हो जायगा, कारण कि वेदमें आई हुई तादृश नूतन पदोंकी रचना पुरुषोंके द्वारा नहीं की जा सकती। और धर्मको वेदसे अतिरिक्त दूसरे किसी प्रमाणसे जान मी नहीं सकते, इसलिए निरन्वय विनाश नहीं मान सकते। यदि निरन्वय विनाशका अङ्गीकार करोगे, तो उनके-निरन्वय विनाश माननेवाले चौद्धके-अभिमत कर्म, उनका फल तथा उनमें प्रमाणभूत धर्मग्रन्थोंके व्यवहारका भी विनाश हो जायगा। [ तात्पर्य यह है कि इससे पूर्व प्रघट्टकमें कहा है कि वेदोक्त कर्म, फल आदि तथा चेद प्रमाणके उच्छिन्न होनेसे बौद्धका कोई अपसिद्धान्त आदि दोष नहीं आ सकता, वह तो प्रसन्नतासे इष्टापत्ति कह देगा, परन्तु वेदान्तीका कहना है कि बौद्ध मी कर्म, कर्मफल तथा उनमें प्रमाणभूत धर्मग्रन्थ तो अपने मतमें मानता ही है, अतः उनके भी अभिमतका उच्छेद हेगा, इसलिए इसमें इष्टापत्ति मी नहीं मान सकते। वृहिस्पतिका-चा्वीकका-मत है कि सम्पूर्ण कार्य स्वभावसे ही उत्पन्न होता है, [ पृथ्वी आदि भूतोंका अपना रूप ही ऐसा है जैसा कि दीख रहा है, उसको किसीने बुद्धिपूर्वक रचा नहीं है। ] परन्तु उससे प्रश्न करना चाहिए कि स्वभावसे उत्पन्न होता है, इसका यह अभिप्राय है कि स्वयं अपना निमित है ? अथवा निमित्तके बिना ही उत्पन्न हो जाता है: इनमें प्रथम कल्प तो माना नहीं जा सकता, कारण कि ऐसा माननेसे आत्माश्रय दोष होगा। दूसरे पक्षके माननेमें घटके भाव-उत्पत्ति- और अभाव-विनाश-दोनों एक ही कालमें होने चाहिएँ, कारण कि क्रमशः कार्य करनेवाले निमिचकी उसमें अपेक्षा ही नहीं है। [नास्तिक स्वभाववादी
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स्वभावादिवादियों के मतोंका निराकरणं ] भांपातुवादसहित ६९५
तस्य क्रमकारित्वं स्वाभाविकं चेत्स्वभाववाद:। निमित्तांन्तरसापेक्षत्वेऽ- नवस्थापातः। कालमेदेन तस्यैव क्रमकार्यवस्थाङ्गीकारेऽपि स कालक्रमः स्वाभाविकश्रेत् स्वभाववादः। निमित्तान्तरापेक्षचेदनवस्थेति । तदसत् ; किमनेनाडवस्थापादनेन चस्तूनां सामर्थ्यस्य निमिन्तान्तरनिरपेक्षत्वमुच्यते कि वा सति वस्तूनां सामर्थ्ये निमित्तान्तरानुसरणं व्यर्थमिति १ आद्योऽ- झ्ीकृत एव। द्वितीयेऽपि कि निमित्तान्तरापेक्षत्वं न प्रतीयत इत्युच्यते
जब निमित्तकी अपेक्षा न रखकर ही कार्यकी उत्पत्ति मानता है, तव उत्पत्ति और विनाश एक साथ ही क्यों न हो जायँ ]। शक्षा-यदि माना जाय कि तुम्हारे वेदान्तीके मतमें भी यदि उस निमिचका क्रमशः कार्य करना स्वभाव है, तो स्वभाववाद सिद्ध हुआ [ इससे अन्तर्गड् निमिच्ान्तर मानना अधिक हुआ ]। यदि उसमें दूसरे निमित्तकी अपेक्षा है, तो अनवस्था दोष आ जाता है। [क्योंकि नियामक निमिचान्वरोंकी अन्वेषणपरम्परा लगी ही रहेगी]। और यदि कालमेदसे उस निमिचकी कमसे कार्य उत्पन्न करनेकी अवस्था मान भी ली जाय, तो भी वह कालकम यदि स्वभावसिद्ध है, तो पुनः वही स्वभाववाद आ जाता है। यदि दूसरे निमिचकी अपेक्षा मानी जाय, तो अनवस्था दोप वना ही है। समाधान-नास्तिकका उक्त आरोप उचित नहीं है, कारण कि इस अवस्थाका प्रतिपादन करनेसे क्या प्रयोजन: [अर्थात् हमारे ऊपर आरोप करना कि निमित्तकी क्रमशः कार्य करनेवाली अवस्थाका निरूपण नहीं किया जा सकता, यह उचित नहीं है] इमें तो पूछना है कि वस्तुओंकी-पदार्थोंक़ी-सामर्थ्य दूसरे निमित्तकी अपेक्षा नहीं रखती है, ऐसा कहा जा रहा है! [अर्थात् वस्तु अपने कार्यकरत्वरूप सामर्थ्यके लिए दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखती, क्योंकि वस्तुसामर्थ्य स्वत :- सिद्ध है ] अथवा कार्य करनेके लिए वस्तुसामर्थ्यके रहते दूसरे निमिचका अनुसरण करना व्यर्थ है: [ इन दोनों प्रकारोंमें कौनसा स्वभाववादी तुम्हारा मत है :] प्रथम कर्प तो माना ही गया है। [क्योंकि वस्तुसामर्थ्य दूसरे हजार निमिचोंसे भी नहीं उत्पन्न हो सकती, सहस प्रयत्न करनेपर भी सिकतासे तैल नहीं पा सकते ] दूसरे पक्षमें भी प्रश्न होता है कि क्या कार्यको अपनेसे दूसरे निमित्तकी अपेक्षा रखना प्रतीत नहीं होता: अथवा प्रतीत होता हुआ मी उसका निरूपण
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६९६ विवरणप्रंमेयंसंग्रहं [सूंत्र २, वर्णक ₹
कि वा अतीतमपि दुर्निरूपमिति ? नाऽडद्यः, प्रत्यक्षविरोधाद्। घटमा- रभमाणस्य कुम्भकारस्य दण्डचक्रादपेक्षायाः प्रत्यक्षसिद्धत्वात्। न द्वितीयः, सर्वानिर्वाच्यत्ववादिनो दुर्निरूपत्वस्याऽलंकारत्वात्। भृतचतु- ष्टयसेव तच्वं अत्यक्षमेवैकं अ्माणं स्वभाववाद एव पारमार्थिक इति मन्यमानस्य तत्र प्रतिज्ञातार्थे हेतूपन्यासे सनिमित्तत्वप्रसङ्ग: । अनु. पन्यायसे च प्रतिज्ञातार्थासिद्धिः। ग्रतीतिमात्रशरणत्वे चाऽनिर्वचनीय- वादापातः। तदेवं वस्त्वन्तरस्य कारणत्वसम्भावनानिराकरणे पारिशेष्या- दस्मदुक्तः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरीश्र एव कारणमित्येतादृशी युक्तिरपि ब्रह्मस्वरूपनिर्णयायाऽनेनैव सूत्रेण तन्त्रेणाSSवृच्या वा सूत्रितेति द्रष्टव्यम्। अनया च युक्त्या यथोक्तव्रह्संभावनायां पश्चादागमेन तत्साधयितुं शक्यम्। यथाऽडहु :- नहीं किया जा सकता ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण कि इसके माननेमें प्रत्यक्षसे विरोध आाता है, क्योंकि घटको रचनेवाले कुलाल-कुम्हार-को दण्ड, चक्र आदिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष दीखती है। दूसरा पक्ष नहीं माना जा सकता, कारण कि वि्व भरके सभी पदार्थोंको अनिर्वचनीय कहनेवाले वेदान्तीके मतमें उसका निरूपण न हो सकना तो अलक्कार ही है। [ कार्यको निमिचान- पेक्ष माननेमें और भी दोष देते हैं-]चार भूत-पृथ्वी, जल, तेज और वायु- ही पदार्थ हैं, एक प्रत्यक्ष ही ग्रमाण है, स्वभाववाद पारमार्थिक-सत्य सिद्धान्त-है, इस प्रकार सिद्धान्त माननेवाले तुम यदि अपने प्रतिज्ञात विषयकी पुष्टिमें हेतु दिखलाते हो, तो वस्तुकी सिद्धिमें निमिचसहित होनेका प्रसङ्ग होगा। यदि हेतु नहीं दिखलाया जाता, तो अपने प्रतिज्ञात अर्थकी सिद्धि नहीं हो सकती। यदि केवल प्रतीतिके बलका आधार लिया जाय, तो अनिर्वचनीय- वादका मानना ही हो जाता है। इस प्रकार ब्रह्मसे दूसरी वस्तुके कारण होनेकी सम्भावनाका निराकरण-खण्डन-हो जानेसे अन्तमें हमारे सिद्धान्तके अनुसार सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान ईश्वर ही संसारका कारण हैं, इस प्रकारकी युक्ति भी ब्रह्मस्वरूपका निर्णय करनेके लिए इसी सूत्रसे तन्त्र अथवा आवृचिके द्वारा दिखलाई गई है, यह समझना चाहिए। इस युक्तिके द्वारा कथितके अनुसार ब्रद्मकी सम्भावना सिद्ध होनेके अनन्तर शास्त्र द्वारा उसकी सिद्धि हो सकती है। जैसा कि शास्त्रकारोंने कहा है-
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स्वभांवादिवादियों के मतोंका निराकरण] मापातुंवादसहित ६९७
'सम्भावितः ग्रतिज्ञायां पक्ष: साध्येत हेतुना। न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतनेव यो हतः ।।' इति। नन्यनुमानादेव यथोक्तेश्वरसिद्धो किमाभ्यां युक्त्यागमाभ्याम्। न च सत्यागमेऽनुमानप्रयासवैय्थ्यमिति वाच्यम्, 'यतो वा' इत्याद्या- गमस्याऽनुमानसिद्धार्थानुवादकत्वात्। अनुमानं चवं ग्रयोज्यम्-विमतं जगद् उपादानोपकरणाद्यसिलाभिज्ञकर्तकम्, कार्यत्वाद्, गरृहवत्, इति वैशे- पिकरुच्यत इति चेद्, न; विमतं जगद्हुकर्तकमसर्वज्ञकर्तकं वेत्यतिप्रसङ्ग- स्याऽपि तद्वत्सुसाधत्वात्। ज्ञानैश्वर्यशक्तय उत्कृष्यमाणा: क्वचित्पर्यवसिताः, उत्कृष्यमाणध- मत्ाद्, परिमाणवत्, इति सांख्या योगाक्च वदन्तीति चेद्, न; निरीश्व- प्रतिज्ञावाक्यमें सम्भावनासे माने गये पक्षका हेतुवलसे साध्ययुक्त होना सगर्थित किया जाता है। उस पक्षकी रक्षा अनेक हेतुओंके द्वारा भी नहीं हो सकती जो प्रतिज्ञामें आते आते न ठहर सके [ अर्थाद जिसकी सम्भावना ही नहीं है, ऐसे पतिज्ञात अर्थकी पुष्टिके लिए हेतुका उपन्यास करना व्यर्थ ही होता है ]। शक्ा-अनुमान द्वारा ही कथित ईश्वरकी सिद्धि हो सकती है, इसके लिए इन युक्ति और शास्त्रोंके उपन्यासकी क्या आवश्यकता है? आगमके रहते हुए अनुमान करनेका प्रयत्न विफल नहीं माना जा सकता, कारण कि 'यतो वा- जिससे कि- इत्यादि आगम अनुमानसे निर्णीत वस्तुका ही अनुवाद करते हैं। और अनुमानप्रयोग इस प्रकार करना चाहिए-'विमत सभी प्रपश्च उपादान-समवायी-तथा अन्य निमित्त कारण आदि सब सामग्रीके जाननेवाले कर्तासे रचा गया है, कार्य होनेसे, गृहकी भाँति, ऐसा वैशेपिक कहते हैं। समाधान-'विमत प्पश्च अनेक कर्ताओंसे वनाया गया है, या असर्वज्ञ कर्तासे बनाया गया है, इत्यादि अतिप्रसञ् पूर्व अनुमानकी भाँति भली प्रकारसे सिद्ध किया जा सकता है। 'उत्कर्पको माप्त होनेवाले ज्ञान, ऐश्वर्य तथा शक्तियां कहींपर चरम- वृद्धिको प्राप्त होकर स्थित होती हैं, उत्कर्प पानेवाले धर्मयुक्त होनेसे, परिमाणके तुल्य' इस प्रकार कहनेवाले योग तथा सांख्यवादियोंका मत
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६९८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक ₹
रवादिनां देवादिभि: सिद्धसाधनत्वात्। सर्वविषयज्ञानश्वर्यशक्तिमति पर्यवसितत्वसाधनेऽपि गुरुत्वरागद्वेषदुःखादिष्वनैकान्तिकता। पुण्य पापफलं कर्म तत्फलाद्यभिज्ञेन पदीयते, कर्मफलत्वात्, सेवाफलवत्, इति नैयायिका अनुमिमत इति चेद्, न; देवादिभिरेव सिद्धसाधनत्वात्।
पिकादयोऽनुमानं मन्यन्ते। नहि युक्तिरेवाऽसुमानम्। व्याप्त्याभासोS- नुपपच्याभास उदाहरणमात्रदर्शनं चेत्येतत्रयं संभावनावुद्धिजनकत्वेन युक्तिरित्युच्यते, अव्यभिचरितव्याप्तिकमर्थनिश्चायकमनुमानम्। अतो
उचित नहीं है' कारण कि निरीश्वरवादीके मतमें देवादिके कारण सिद्धसाधन आ जाता है। [ ईश्वरको न माननेवाले तो देवादिको ही परमैश्वर्यादिशाली मानते हैं, इसलिए ज्ञानादिकी उत्कर्षसीमा ईश्वर ही है, ऐसा सिद्ध नहीं हो सकता ] सकल-पदार्थ-विषयक ज्ञान तथा ऐश्वर्य एवं शक्तिशालीमें पर्यवसितत्वका-चरम सीमा होनेका-साधन करनेपर 'भी गुरुत्व (वजन), राग (प्रेम या आसक्ति), द्वेष (अपरेम) और दुःख आदिमें व्यभिचार आता है। [उक्त गुण ज्ञानादिके तुल्य उत्कर्षशाली होते हुए मी ईश्वरमें पर्यत्रसित नहीं हैं ]। नैयायिकोंका जो यह अनुमान है कि 'पुण्य और पापके फलोंको कर्म तथा उसके फलको जाननेवाला ही देता है, कर्मफल होनेसे, सेवाके फलोंके सदश', वह भी साधु नहीं है, क्योंकि देव आदिके द्वारा ही इसमें भी सिद्धसाधन आता है, [ क्योंकि देवादि मी कर्म तथा फल दोनोंको जानते हैं और कर्मफल देते हैं]। इसलिए सम्भावनाबुद्धिको उत्पादन करनेसे आगमका उपकार करनेवाली [असम्भावनाके निराकरणसे आगममें प्रामाण्यग्रह करानारूप उपकार है।] हमारी कही हुई युक्तिको ही वैशिषिक आदि अन्य वादी अज्ञानसे-अमसे-अनुमान समझ बैठे हैं। केवल युक्तिको अनुमान नहीं कहा जाता। [दोनोंका भेद दिखलानेके लिए प्रथम युक्तिके स्वरूपका उल्लेख करते हैं-] व्याप्ति-सा मालूम पड़ना और अनुपपचि-सा प्रतीत होना और उदाहरणमात्र दिखा देना, इन तीनोंको, सम्भावनावुद्धिके उत्पादक होनेसे, युक्ति कहते हैं। [ अनुमानका स्वरूप कहते हैं-] व्यभिचारशून्य, व्याप्ियुक्त और अर्थका निश्चय करनेवाला अनुमान होता है। इस कारण
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महमें युक्ति और अनुभवकी अपेक्षा। भापानुवादसहित ६९९
वशेपिकादिप्रयोगाणां सत्यप्यनुमानदोपे श्रुतिसिद्धन्नह्मणि संभावनावुद्धि-
एवं तर्हि युक्तिव्याजेन वैशेपिकाद्यभिमतमनुमानमेव जन्मादिसूत्रे न्रह्मनिश्चायकत्वेनोपन्यस्तमिति चेद्, अनुमानमात्रात्कारणसन्धावमात्रसि द्वावपि सत्यज्ञानादिरूपस्य ब्रह्मण आगममन्तरेणाSसिद्धेरागमग्रथन एव सूत्रतात्पर्यात्। आगमवाक्यानि हि वक्ष्यमाणसूत्रैः उदाहृत्य तात्पर्यतो निर्णायन्ते, त्रह्मसाक्षात्कारस्य शव्दानुसारिभिर्न्यायैर्रह्मणि वेदान्तवाक्य- तात्पर्यनिर्णयाधीनत्वात्। नद्यनुमानादिग्रमाणान्तरनिर्णेतृणां वैशेपिकादीनां
वैशेपिक आदि वादियों द्वारा प्रदर्शित अनुमानप्रयोगोंके अनुमानके हेत्वाभासादि दोपोंसे दूपित रहनेपर भी श्रुतिके द्वारा समर्थित ब्रह्विपयक् सम्भावना- बुद्धिके उत्पादनमें हेतु होनेके कारण हम वेदान्तियों द्वारा दर्शाई गई युक्तिको मानना कोई विरुद्ध नहीं है। शक्ा-ऐेसा माननेसे तो युक्तिके वहाने वैशेषिक आदि वादियोंके सम्मत अनुमान ही जन्मादि सूत्रमें नक्के निश्चायक प्रमाणरूपसे कहे गये हैं, यह मान लेना चाहिए। समाधान-केवल अनुमानोंके द्वारा कारणकी सचा ही सिद्ध हो सकती है [ अर्थात् अनुमान इतना ही सिद्ध कर सकता है कि इस दश्यमान कार्य- जात प्रपश्चका कोई उत्पादक कारण अवश्य है ] परन्तु सत्य-ज्ञानादिस्वरूप न्रद्मकी तो आगम-श्रुति-के बिना सिद्धि नहीं हो सकती। इसलिए जन्मादिसूत्रका तातपर्य आगमको ही दर्शानेमें हैं [ आगमसे ही स्वरूप-निश्चय हो सकता है, अतः 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' इत्यादि शास्त्रको ही सूत्रमें जन्मादिपदसे लिया जाना उचित है, अनुमानमात्र नहीं ] आगे कहे जानेवाले सूत्रोंमें आगम वाक्योंका उदाहरण देकर तात्पर्यनिर्णय किया गया है, [इसलिए अगले सूत्रोंमें आगम-वाक्योंका उदाहरण देना पुनरुक्त या व्यर्थ नहीं है; ] कारण कि ब्रह्मका साक्षात्कार शन्दबोधके अनुकूल (उपक्रमादि) न्यायोंके द्वारा न्ह्ममें वेदान्तवाक्योंका तात्पर्यनिर्णय करनेसे हो सकता है। केवल अनुमान आदि दूसरे प्रमाणोंसे न्रह्मनिर्णय करनेवाले वैशोपिक आदि वादियोंको ्र्का साक्षात्कार नहीं देखा गया है। और
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७०० विचरणप्रमेयसंग्रद्द [ सूत्र २, वर्णक १
ब्रह्मावगतिर्द्श्यते। न चाऽपौरुपेयस्य पौरुपेयमनुमानं सूलमिति युक्तम्। न चैवमनुमानस्याऽत्यन्तानपेक्षा स्यादिति वाच्यस्, श्त्यर्थदार्ब्याय श्त्यविरोधिन्यायस्याऽपेक्षितत्वात्। 'पण्डितो मेघावी' इत्यादिश्ुत्यैचाऽडगमस्य पुरुपचुद्धिसाहाय्यमङ्गीक्रियते, अन्यथाध्ययनादेव न्रह्मागतौ 'आचार्य- वान्पुरुपो वेद' इत्युक्तो गुरूपदेशनियमो व्यर्थः स्यात्। आचार्यो हि श्रुत्य- नुसारिभिर्दष्टान्तैः शिष्येभ्यः अ्रत्ययदारद्यसुत्पादयति। तच्च प्रत्ययदात्वं मननरूपत्वादवगतिहेतुः । एतदेव हि मननं यदाचार्ययुत्त्या स्वयुत्तया च श्रौतप्रत्ययस्य दार्ढ्यापादनम्। मननस्य चाऽवगतिहेतुत्वं 'मन्तव्यः' इति श्रुत्या सिद्धम्। ननु धर्मजिज्ञासायां वेदस्मृतीतिहासपुराणान्येव प्रमाणं नाऽनुमानादि। तत्राऽपि श्रृतिलिङ्गवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्या निर्णयहेतवः । पदान्तनिर- अपौरुषेय (श्रुति) का पुरुपपरणीत अनुमानको सूल मानना युक्त भी नहीं है। [ पुरुषप्रणीत वाक्योंमें पुरुषके रागादि दोपसे दोष आना सम्भव है, अतः पौरुषेय अनुमान सर्वथा दोषशन्य अपौरुपेयमें प्रमाण नहीं हो सकता ]। इससे अनुमानकी बिलकुल अपेक्षा नहीं रह जाती, यह भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि श्रतिसे प्रतिपादित अर्थकी पुष्टिके लिए श्रतिसे विरोध न रखनेवाले न्याय- वाक्य-अनुमान-की अपेक्षा रहती है। 'पण्डितो मेघावी' इत्यादि श्रुतिसे ही श्रुतिको पुरुषवुद्धिकी सहायता अपेक्षित है, ऐसा स्वीकार किया गया है। यदि ऐसा न माना गया होता, तो पठनमात्रसे ही ज्रह्का साक्षात्कार हो ही जाता, फिर 'अचार्ययुक्त पुरुष ही जान सकता है' इत्यादिसे कहा गया गुरुके द्वारा उपदेश पानेका नियम निष्फल हो नायगा। आचार्य-गुरु महाराज- श्रुतिके अनुकूल दष्टान्तोंके द्वारा शिष्योंके ज्ञानकी हढ़ता उत्पन्न करा देता है। मननरूप होनेसे वह ज्ञानकी दढ़ता साक्षात्कारका कारण बनती है। यही तो मनन है कि आचार्य द्वारा दिखलाई गई अथवा अपनी ही मेघासे आहित की गई युकिसे श्रुतिसे प्राप्त ज्ञानकी हढ़ता प्राप्त की जाय। और मननमें साक्षात्कार- कारणत्व तो 'मन्तव्य' (मनन करना चाहिए) इस श्रतिवाक्यसे सिद्ध है। शङ्का-धर्मजिज्ञासामें चेद, स्मृति, महाभारत आदि इतिहास तथा पुराण ही प्रमाण हैं, अनुमान आदि दूसरे प्रमाण नहीं हैं। उन श्रति आदि प्रमाणोंमें भी श्रुति, लिद्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या रूप न्याय ही तात्पर्यनिर्णयके
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मझ्में युक्ति और अनुभवकी अपेक्षा ] भापानुवादसहित ७०१
पेक्ष: शब्द: श्रुतिः। श्रौतस्याऽर्थंस्यार्थान्तरेणाडविनाभावो लिङ्गम्। अन्यो- न्याकाङ्कासंनिधियोग्यतावन्ति पदानि वाक्यम्। वाक्यद्वयसामर्थ्यमार- भ्याधीतविपयं ग्रकरणम्। क्रमवर्त्तिनां पदार्थानां क्रमवत्तिभिः पदाथैर्य- थाक्रमं सम्वन्ध: स्थानम्। संज्ञासाम्यं समाख्या। तैरेव ब्रह्मनिर्णयोऽ- व्यस्त्वति चेद्, न; युक्यनुभवयोरपि ब्रह्मजिज्ञासायामपेक्षितत्वात्। युक्त्यपेक्षा पूर्वमेव प्रसाधिता। अनुभवो नाम त्रह्मसाक्षात्कारफलकोड न्तःकरणवृत्तिभेदः। न च तमन्तरेण ज्ञानाकाष्ष निवचते। न च ब्रह्म- स्वरूपमनुभवितुमयोग्यमिति शङ्कनीयम्, वटादिवत्सिद्धवस्तुत्वात्। विमतं त्रह्मवाक्यमनुभवनिरपेक्षफलपर्यन्तज्ञानजनकम्, प्रमाणभूतवेदवाक्यत्वाद्,
कारण हैं। इनमें-दूसरे पदकी अपेक्षा न रखनेवाला शब्द ही 'श्रुति' पदका अर्थ है। ्रुतिप्रतिपादित अर्थका दूसरे अर्थके साथ सम्बन्ध लिन है। परस्पर आकांक्षा (एक-दूसरेके विना अन्वयाननुभावकता) सन्निधि (विलम्बराहित्य या व्यवधानशून्यत्व) एवं योग्यता (वाघका न होना) वाले पद ही वाक्य कहलाते हैं। दो वाक्योंकी सामर्थ्यको लेकर पढ़ा गया विषय प्रकरण है। क्रमशः आये हुए पदार्थोंका क्रमशः आये हुए पदार्थोंके साथ कमके अनुसार होनेवाला सम्वन्ध स्थान पदार्थ है। संज्ञाकी समता समाख्या है। [ इन सबका वर्णन विशेष-विशेष उदाहरणोंके साथ प्रथम वर्णकमें किया गया है ] इनसे ही ब्रह्मका निर्णय हो जायगा। समाधान-युक्ति और अनुभव-इन दोनोंकी भी ब्रह्मजिज्ञासामें अपेक्षा रहती है। युक्तिकी अपेक्षा प्रथम ही सिद्ध कर आये हैं। [अनुभवको दिखलाते हैं-] ब्रह्मसाक्षात्कारको उत्पन्न करनेवाली एक प्रकारकी अन्तःकरणकी वृत्ति ही अनुभव है। और इस प्रकारके अनुभवके बिना ज्ञानकी इच्छा निवृत्त नहीं होती [अर्थात् अनुभव-साक्षात्कार-जब तक नहीं होगा, तब तक ब्रह्म- जिज्ञासा बनी ही रहेगी]। और यह भी नहीं कह सकते कि ब्रद्मस्वरूप साक्षा- त्कारके योग्य नहीं है, कारण कि वह घट आदिके सदश सिद्ध वस्तु है। शङ्का-'विमत ब्रहावाक्य (ब्रह्मतात्पर्यक वेदान्तवाक्य) अनुभवकी अपेक्षासे शून्य फलपर्यन्त ज्ञानका उत्पादक है, प्रमाणभूत वेदवाक्य होनेसे, धर्म- 65
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७०२ विचरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र २, वर्णक १
धर्मवाक्यवदिति चेद्, न; अनुभवायोग्यविपयत्वोपाधिहतत्वात्। न- ह्यनुष्ठानसाध्यो धर्मोऽनुष्ठानात्पूर्व वाक्यवोधावसरेऽनुभवितुं योग्य: । अनुष्ठानं तु विनाऽप्यनुभवं शाव्दज्ञानमात्रादेव सिध्यतीत्यनपेक्षित एव धर्मानुभव:। नन्वनुभवयोग्यत्वानुभवसापेक्षत्वाभ्यां विना ब्रह्मणो धर्मेण सह वैषम्यान्तरं नाडस्ति प्रत्युत वेदप्रमेयत्वं सममेव। ततोऽनुभवकृत- वैषम्यमपि मा भूदिति चेद्, न; धर्मन्रह्मणोः कर्तव्यसिद्धयोः पुरुषा धीनत्वानधीनत्वादिभूयोवैषम्यसंभवात्। लोके तावदेववत्तोऽशवेन गच्छति न च गच्छति पदभ्यां वा गच्छतीति कर्त्तव्यस्य गमनस्य करणाकरणान्यथाकरणेषु पुरुपाधीनत्वं दृश्यते। तथा वेदेऽपि 'अतिरात्रे
प्रतिपादक वेदवाक्योंके समान'। [इस अनुमानसे अनुभवकी अपेक्षाका निरा- करण हो जाता है ]। समाधान-उक्त अनुमान अनुभवायोग्यविषयत्वरूप उपाघिसे दृषित है, [उपाधिमें साधनाव्यापकत्वका समन्वय करते हैं- ] अनुष्ठानसे होनेवाला धर्म अनुष्ानसे पहले वाक्यार्थके बोधकालमें अनुभवके लिए योग्य नहीं है। और अनुष्ान तो अनुभवके बिना केवल शाब्दवोघसे भी सिद्ध हो सकता है, इसलिए धर्मका अनुभव (धर्मजिज्ञासामें) अपेक्षित ही नहीं है। शक्का-अनुभवके योग्य होना और अनुभवकी अपेक्षा रखना-इन दोनोंसे अतिरिक्त व्रह्म तथा धर्ममें कोई वैषम्य नहीं है, वरिक वेद- प्रमेयत्व-वेदका तात्पर्यार्थ होना-दोनोंमें समान ही है। अतः उनमें अनुभव द्वारा की गई विषमता भी नहीं होनी चाहिए। समाधान-कर्तव्य (क्रियासे उत्पाद्य) तथा सिद्ध (अनुत्पाद्य) स्वरूप धर्म तथा जह्ममें क्रमशः पुरुषके अधीन और पुरुषके अधीन न होना रूप बड़ी विषमता विद्यमान है। [ पुरुषाधीनत्वादिका स्पष्टीकरण करते हैं-] लोकमें देखा जाता है कि देवदत्त घोड़ेकी सवारीसे जाता है या नहीं जाता है अथवा पैदल ही यात्रा करता है, इस प्रकार कर्तव्यरूप गमनका करना, न करना या दूसरे ही प्रकारसे करना आदिमें पुरुष स्वाधीन देखा जाता है एवं वेदमें 'अविरात्रमें
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ब्रह्ममें युक्ति और अनुभवकी अपेक्षा] भापांनुवादसहित ७०३
पोडशिनं गृह्गाति नातिरात्रे पोडशिनं गृह्णाति' इति करणाकरणे भ्रयेते। 'उदिते जुहोत्यनुदिते जुहोति' इति करणान्यथाकरणे । 'ज्योतिष्टोमेन यजेत', 'न कलञ्जं भक्षयेत्' इति विधिप्रतिपेधौ। 'व्रीहिभिर्यजेत यवैवा' इती- च्छाविकल्पः । पड्यागानां समुच्चय: । 'न हिंस्यात्स्वी भूतानि', 'अग्नी- पोमीयं पशुमालभेत' इत्युत्सर्गापवादौ। पकृतेरतिदिष्टानां कुशमयवहिंपां विकृतावुपदिष्टशरमयवहिभिर्वाधः। परकृतानां नारिष्टहोमानां वैकृतैः उपहोमैः समुच्ित्याऽनुष्ठानमभ्युच्चयः । 'उदिते जुहोत्यनुदिते जुहोति' इति शाखाभेदेन व्यवस्थितविकल्पः । न चैवं सिद्धे त्रह्मणि पुरुपाधीनत्व-
संभवेयुः । सिद्धवस्तुन्यपि स्थाणुर्वां पुरुपो चेति विकल्पोऽस्तीति चेतु, न; पुरुपेच्छाधीनत्वेनाऽवस्तुतन्त्रस्य तस्याऽसम्यक्त्वात्। 'योपा पोडशीका ग्रहण करे अथवा अतिरात्रमें पोडशीका ग्रहण न करे' इस प्रकार करने या न करनेका प्रतिपादन किया गया है। और 'उदय होनेपर हवन करे अथवा उदय होनेसे पूर्व ही हवन करे' इस प्रकार करना तथा अन्यथा करना कहा गया है। 'ज्योतिष्टोम याग करे', 'कलल्जका भक्षण न करे' ऐसा विधान और निपेध है। 'ब्रीहिसे याग करे अथवा यवसे' इस प्रकार इच्छाका विकल्प कहा है। छः यागोंका समुच्चय दिखलाया हैं। 'किसी भी प्ाणीकी हिंसा न करे', 'अग्नि और सोम देवताके उद्देश्यसे पशुका बलिदान करे' इस प्रकार उत्सर्ग-सामान्यशास्त्र-तथा अपवाद-वाघशास्त्र-दिखलाये गये हैं। प्रकृति यागमें अतिदेशसे प्राप्त कुशमय बर्हियोंका विकृति यागमें उपदेशसे प्राप्त शरमय वर्हियोंसे वाघ होता है। प्रकृत नारिष्टोम होमोंका वैकृत उपहोमोंसे समुच्चय करके अनुष्ठान करना अभ्युच्चय है। 'उदय होने- पर हवन करे अथवा उदय होनेसे पूर्व ही हवन करे' ऐसा शाखाभेदसे व्यवस्थित-नियत-विकल्प कहा गया है। परन्तु उक्त रीतिसे सिद्धवस्तुभूत ब्रह्ममें पुरुपकी स्वाधीनता, विधि या निषेध, इच्छाविकल्प, समुच्चय, उत्सर्ग, अपवाद, वाध, अभ्युच्चय, व्यवस्थितविकल्प आदिका किसी प्रकार सम्भव नहीं है। शक्का-सिद्धस्वरूप वस्तुमें भी 'स्थाणु है या पुरुप है' इस प्रकार, विकरप होता ही है। समाधान-पुरुपकी इच्छाके अधीन होनेसे अवस्तुके द्वारा उत्पन्न हुआ
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७०४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र २, वर्णक १
चाव गोतमागि:' इत्यादौ पुरुषेच्छाधीनमवस्तुतन्त्रमेव ध्यानमागमिकं सम्यगुपलभ्यत इति चेद्, न; तस्य कर्त्तव्यगोचरत्वात्। अथाऽपि सिद्धवस्तुनः सम्यगज्ञानाधीनत्वात् सम्यग्ज्ञानस्य च प्रमातपुरुषे- च्छाघीनत्वाद्वस्त्वपि पुरुषाधीनं भविष्यतीति चेत्, न; सत्यामपि पुरुषेच्छायामिदं रजतमित्यत्र वस्त्वभावे सम्यगज्ञानादर्शनात्। तस्मात्सिद्ध- गोचरसम्यग्ज्ञानस्य वस्त्वेव प्रधानं प्रयोजकम्। तत्रैवं सति सिद्ध- गोचरं ब्रह्मज्ञानमपि वस्तुतन्त्रमेवेति न ज्ञानद्वाराऽपि ब्रह्मण: पुरुपा- धीनत्वम्। अतो धर्मादृत्यन्तं विलक्षणस्य सिद्धस ब्रह्मणो युक्ता युक्यनुभवापेक्षा। नतु ब्रह्मण: सिद्धवस्तुत्वेन घटादिवन्मानान्तरगोचरत्वाज्जन्मा-
वह विकल्प उचित ज्ञान नहीं है अर्थात् भ्रम है। यदि शङ्का हो कि 'हे गोतम ! स्त्रीको अम्नि समझो' इत्यादि पुरुषेच्छाधीन अवस्तुतन्त्र ध्यानका ही आगमसे प्रतिपादन किया गया है और वह उचित-प्रमाण-भी माना गया है' तो, यह शक्का भी उचित नहीं है, कारण कि वह आगमप्रतिपादित ध्यान कर्तव्यका विषय है। शङ्का-सिद्धस्वरूप वस्तु भी प्रमाणभूत ज्ञानके अधीन है और प्रामाणिक ज्ञान प्रमाता पुरुषकी इच्छाके अधीन है, इसलिए सिद्ध वस्तुको भी पुरुषके अधीन मान लिया जायगा। समाधान-पुरुषकी इच्छाके रहनेपर भी 'यह रजत है' इस स्थलमें रजतरूप वस्तुके न होनेसे सम्यक्-प्रमाणभूत-ज्ञान नहीं देखा जाता है। [ अर्थात् शुक्तिमें 'यह रजत है' इस ज्ञानको प्रामाणिक ज्ञान नहीं कहते, बरिक भ्रम कहते हैं। ] इसलिए सिद्धवस्तुविषयक प्रामाणिक ज्ञानमें प्रधान प्रयोजक वस्तु ही है। इस सिद्धान्तके स्थिर होनेपर सिद्धवस्तुविषयक ब्रह्मज्ञान भी वस्तुके ही अधीन है। [अर्थात् वस्तु उसका भी प्रधान प्रयोजक है, ] इसलिए ज्ञानके द्वारा भी न्रह्मरूप वस्तु पुरुषके अधीन नहीं है। इससे धर्मकी अपेक्षा अत्यन्त भिन्न सिद्धभूत ब्रह्ममें [ब्रह्मसाक्षात्कारमें ] युक्ति और अनुभवकी अपेक्षा कहना उचित ही है। शङ्का-यदि ब्रह्म सिद्ध वस्तु है; तो घट आदि सिद्ध वस्तुके समान वहं
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सत्यादिवाक्यमे चह्षस्वरूपवोधकत्व] भांपानुवादसहित ७०५
दिसूत्रमनुमानोपन्यासार्थमेवाडस्त्वति चेट्, मैवम्; न तावद् ब्रह्म वेदान्तानभिज्ञग्रत्यक्षगम्यम्, रूपादिहीनत्वाद्। अनुमानमपि किं यत्कार्य तत्सकारणमिति सामान्यव्याप्तिकम् उत यत्कार्य तद् ब्रह्मकारण- कमिति विशेपव्यासिकम् : नाऽडद्यः, तावता ब्रह्मासिद्धेः । द्वितीयेऽपि ब्रह्मण इन्द्रियविपयत्वेऽनुमानवैयर्थ्य तदविपयत्वे व्याप्तिग्रहासिद्धिः । नन्वेवं सत्यनुमानच्छायोपजीचियुक्तीनामपि ब्रह्म गोचरो न स्यात्, सत्यमेवं तथापि शव्दावगम्ये ब्रह्मणि संभावनावुद्धिहेतवो युक्तयः। तथाहि-मृदादिट्टष्टन्तरुपादानव्यतिरेकेण कार्यस्याऽनिरूपणा- दद्वितीयता संभाव्यते। स्फटिकलौहित्यदृष्टान्तेनाऽऽत्मनि कर्तृत्वादेरारो-
अन्यान्य प्रमाणोंका भी विषय होगा, इस परिस्थितिमें 'जन्मादि' सूत्र अनुमानका उल्लेख करनेके लिए ही है, ऐसा क्यों न मान लिया जाय ? समाधान-सबसे प्रथम तो यही है कि ब्रह्म वेदान्तवाक्योंसे अनभिज्ञ पुरुपके प्रत्यक्षका विपय नहीं हो सकता; कारण कि उस ब्रह्ममें प्रत्यक्षके प्रयोजक रूप आदि नहीं हैं। दूसरा अनुमान रहा, उसे भी क्या 'जो कार्य है उसका कारण अवश्य होता है' इत्याकारक सामान्य-व्याप्ति-घटित मानते हो : अथवा 'जो कार्य है, उसका कारण न्रह्म है' इस प्रकार विशेप- व्याप्तिघटित मानते हो? प्रथम कल्प साधक नहीं हो सकता, कारण कि उक्त सामान्य-व्याप्तिसे विशेष ब्रह्मकी सिद्धि नहीं हो सकती। दूसरा कल्प माननेमें यदि त्रक्मको (घटादिके तुल्य) इन्द्रियोंका विषय मानोगे, तो अनुमान करना ही निप्प्रयोजन होगा; यदि इन्द्रियोंका विषय न मानोगे, तो विशेष- व्याप्तिका ज्ञान ही नहीं वन सकता। शक्का-उक्त रीतिके अनुसार तो अनुमानकी छायाका (व्याप्याभासका) आश्रयण करनेवाली युक्तियोंका भी विपय न्रह्म नहीं हो सकता। समाधान-ठीक है, तथापि शब्द-वेदान्तवाक्यों-द्वारा जानने योग्य ब्रह्मके विपयमें युक्तियाँ सम्भावनावुद्धिको उत्पन्न करती हैं। जैसे कि मिट्टी आदि दष्टान्तों द्वारा उपादान कारणसे अतिरिक्त कार्यको माननेका खण्डन किया जाता है, इसलिए ( कार्य-कारणमें) अद्वितीयता-दूसरेका न होना-अर्थात् अमेदकी ही सम्भावना हो जाती है। और स्फटिक-
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७०६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र २, वर्णक १
पितत्वम्, प्रतिविम्त्रद्ृष्टान्तेन जीवव्रह्मैक्यम्, रज्जुसर्पद्ृष्टान्तेन त्रह्मव्य- तिरिक्तप्रपश्चस्य स्वातन्त्र्याभावः, घटाकाशदष्टान्तेनाऽसङ्गताद्वारेण विशुद्धा- द्वितीयप्रत्यगात्मता, तप्तपरशुद्दष्टान्तेन जीवन्रह्मैक्यसत्यता। तथा च
स्वरूपवाक्यस्य फलपर्यन्ततापेक्षितसंभावनार्थवादतां श्षुतियुक्तयः प्रतिपद्यन्ते। अन्यथा निरर्थकास्ता: स्युः। तस्मादुपकारकयुक्तिसूचनापूर्वकं वेदान्त- वाक्यप्रदर्शनार्थमेव सन्रम् । ननु सर्वत्र वेदवाक्ये ब्रह्मपदस्याऽप्रसिद्धार्थत्वान्न तत्पदं स्वार्थ
गत लौहित्यके दृष्टान्तसे आत्मामें कर्तृत्व आदि आरोपित प्रतीत होते हैं, प्रतिविम्बद्ष्टान्तसे जीव और ब्रह्मकी एकता दिखलाई जाती है, रज्जु- सपेको दृष्टान्त वनाकर अघिष्ठानभूत व्रह्मसे अतिरिक्त प्रपञ्चकी स्व्रतन्त्रताक्तका निराकरण किया जाता है, घटाकाशके दृष्टान्तसे सज्जराहित्य दिखलाकर विशुद्ध और अद्वितीय प्रत्यगात्माका प्रतिपादन किया जाता है एवं तप्त कुठारके दष्टान्तसे जीव और ब्रह्मकी एकताका सत्यत्व दिखलाया जाता है। इस प्रकार विघि तथा निषेध वाक्योंमें प्रवृत्त कराने तथा निवृत कराने में अपेक्षित स्तुति तथा निन्दारूप अर्थवादके समान स्वरूपवाक्य- सिद्धवस्तुके स्वरूपके प्रतिपादक वेदान्तवाक्यकी फलपर्यन्ततामें अपेक्षित सम्भावनारूप अर्थवादताको श्रुतिमें युक्त युक्तियां प्राप्त हो जाती हैं [ विघिवाक्यके श्रवणके बाद अधिकारीको आशङ्का होती है कि इस विधानका फल क्या है? उस आशक्ाकी निवृच्तिके लिए तथा अधिकारीकी प्रवृत्तिके लिए जैसे विधिवाक्यंका प्रशंसात्मक अर्थवाद है, वैसे ही निषेध्यके पालनमें उत्सुकताको उत्पन्न करनेके लिए निषेध्यका निन्दास्वरूप अंर्थवाद है। ठीक इसी प्रकार सिद्ध वस्तुके प्रतिपादक वेदान्तवाक्योंकी सार्थकताके लिए तथा सिद्ध वस्तुमें सम्भावनावुद्धिको उत्पन्न करानेके लिए श्रुतिकथित युक्तियां भी सम्भावनारूप अर्थवाद हैं]। यदि ऐसा न माना जाय, तो वे श्रुति-युक्तियां व्यर्थ हो जायँगी। इसलिए [ सम्भावनावुद्धिको उत्पन्न करानेके लिए ] उपकारक युक्तिकी सूचना करता हुभा उक्त सूत्र वेदान्तवाक्योंको दिखलानेके लिए ही है। शङ्का-सर्वत्र वेदवाक्यमें न्रह्मशन्दका अप्रसिद्ध अर्थ होनेसे .वह
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सत्पादिवाक्यमें वह्षस्वरूपवोधकत्वर] भापानुवादसहित ७०७
विशेष्यत्वेन विशेपणत्वेन वा वाक्यार्थे समर्पयितुमलम्। ततः किं तद्वेदान्त- वाक्यं यत्सूत्रे लिलक्षयिपितमिति। उच्यते-सत्यज्ञानानन्तानन्दप्रत्य- गात्मस्वरूपस्य ब्रह्मपदार्थस्याऽप्रसिद्धावपि ब्रह्मत्वमान्नस्य वृहत्यर्थरूपस्य प्रसिद्धत्वाचदनुवादेन सत्यादिपदार्थपरस्परान्वयसामर्थ्याद्विशिष प्रतिपत्तुं शक्यत इति लक्षणरूपेण ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनपरं सत्यादिवाक्यम्। ब्रह्म
न च प्रमाणान्तरसिद्धस्य लक्षणत्वात्सत्यादीनामपि लक्षणत्वे तद्वाक्यस प्रमाणान्तरप्रसिद्धार्थानुवादकत्वप्रसङ्ग इति चाच्यम्, अर्थाल्लक्षणत्वेऽपि मानान्तरानवगतब्रह्मोधकत्वेन साक्षात्प्रमाणरूपत्वात् । वाक्यं तु 'यस्मादाकाशः संभृतः स आत्मा' 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्येवं स्वाध्यायपाठक्रममुल्लङ्ध्य योजनीयम्, प्रसिद्धस् कारणत्वस्याड-
(ब्रह्मपद) अपने अर्थको प्रधान या अप्रधानरूपसे वाक्यार्थमें नहीं उपस्थित करा सकता। ऐसी परिस्थितिमें कहिए कि वह कौन वेदान्तवाक्य है? जिसका सुत्रमें उल्लेख कराना अमीष्ट है। समाधान-यद्यपि ब्रहमपदका सत्य, ज्ञान, अनन्त, आनन्द तथा प्रत्यगात्मा रूप अर्थ प्रसिद्ध नहीं है, तथापि 'बृह' धातुका केवल ज्रह्मत्वमात्र अर्थ प्रसिद्ध है, अतः उस प्रसिद्ध अर्थका अनुवाद करके सत्य आदि पदार्थोंके परस्पर अन्वयकी सामर्थ्यसे विशिष्ट ब्रह्म जाना जा सकता है, इसलिए लक्षणके रूपसे त्रह्मस्वरूपका प्रतिपादन करनेवाला सत्यादि वाक्य है। शङ्ा-प्रमाणान्तरसे सिद्ध पदार्थ ही लक्षण होता है, इसलिए यदि सत्य आदिको लक्षण मानेंगे, तो उनका बोधक सत्यादिवाक्य ('सत्यं ज्ञानम्' इत्यादि वाक्य) प्रमाणान्तरसे प्रसिद्ध अर्थका अनुवादक हो जायगा। समाधान-सत्यादिमें अर्थतः लक्षणत्वके सिद्ध होनेपर मी उसका वाक्य प्रमाणान्तरसे न जाने गये ब्रह्मका बोधक होनेसे साक्षात् प्रमाण माना जाता है, [ अनुवादक नहीं। सत्यादि ब्रह्मलक्षण है, यह तो अर्थात् सिद्ध होता है।] वाक्यका स्वरूप तो 'यस्मात्' इत्यादि अर्थात जिससे आकाश उत्पन्न हुआ, वह आत्मा सत्य, ज्ञान और अनन्त-परिच्छेदरहित-ब्रह्म है' इस प्रकार स्वाध्यायपाठके कमको बदलकर पूरा करना चाहिए, कारण कि प्रसिद्ध कारणका ही अनुवाद होता है। न्याय है कि 'प्रसिद्धका अनुवाद
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[ सूत्र २, वर्णक १ ७०८ विवरणप्रमेयसंग्रह
नुवाद्यत्वात : प्रसिद्धमनूद्याऽप्रसिद्धं प्रतिपाद्यत इति न्यायाद। अन्या- न्यप्युपनिपद्वाक्यान्येवं ब्रह्मप्रतिपाकत्वेन योजनीयानि। तत्रैवं सति 'भृगुर्वै वारुणि:' इत्यारभ्य 'तद् ब्रह्म' इत्येतदन्तं वाक्यं सूत्रद्वयस्योदा- हरणम्। तन्राऽपि 'भृगु:' इत्यादि 'तद्िजिज्ञासस्व' इत्येतच प्रथमसूत्रस्य।
'तद्विजिज्ञासस्व' इत्येतद्विहाय 'यतो वा' इत्यादि 'तद् ब्रह्म' इत्यन्तं चाक्यं द्वितीयसूत्रोदाहरणम्, तयोः सूत्रवाक्ययोरर्थेक्यानुगमात्। ननु जगत्कारणे नानात्वस्याऽपि प्रतीतिरस्ति, यत इति तसिलप्रत्य- यस्य बहुत्वैकत्वयोः स्मरणात्। तथा च तदनुवादेन कथमद्वितीयं ब्रह्माऽन्न प्रतिपादनीयमिति। उच्यते-'येन जातानि' इति वाक्यशेषादेकत्व- विषय एव तसिलूप्रत्ययो निर्द्धार्यते। स च प्रत्ययः कारणैकत्वं प्रमापयति।
करके अपसिद्धका प्रतिपादन किया जाता है।' दूसरे उपनिषद्वाक्योंकी भी इसी रीतिसे योजना करनी चाहिए [ क्योंकि वे भी 'ब्रह्मके प्रतिपादक हैं। ] इस निर्णयके आधारपर 'वरुणका अपत्य भृगु-' इत्यादयर्थक वाक्यसे आरम्भ कर 'वह ब्रह्म है' यहांतकके उपनिषद्वाक्य दो सूत्रोंके उदाहरण हैं। उनमें मी 'भृगु-' इत्यादि और 'उसका विचार करो' यह वाक्य प्रथम सूत्रका उदाहरण है, कारण कि उस सूत्रके प्रतिपादनीय विषयोंका-अधिकारका निर्णय तथा ज्ञानकी कर्तव्यता, इन दोनोंका-उस उदाहरणमें अनुगम होता है। 'उस ब्रह्मका विचार करना चाहिए' इसको छोड़कर 'यतो वा-' जिससे-इत्यादि वाक्यसे प्रारम्भ कर 'वह ब्रह्म है' इस वाक्य तक दूसरे जन्मादि सूत्रका उदाहरण है, कारण कि उन वाक्योंमें और सूत्रके अर्थमें एकता-समानता-का अनुगम है। शङ्ा-जगत्के 'कारणभूत पदार्थका नाना होना भी प्रतीत होता है, क्योंकि 'यतः' इस पदमें 'तसिल्' प्रत्ययका बहुत्व और एकत्व दोनों अर्थोंमें समानरूपसे व्याकरण द्वारा विधान होता है, इसलिए उसके (बहुत्वके) अनुवादसे 'यतः' पदसे अद्वितीय ब्रह्मका प्रतिपादन करना कैसे कहा जायगा? समाधान-आपके पर्यनुयोगका उत्तर कहा जाता है-'जिससे उत्पन्न हुए-' इस वाक्यशेषसे एकत्वरूप अर्थमें ही 'यतः' पदके 'तसिलू' प्रत्ययका
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ब्रह्मके आनन्दादि स्वरूपका कथन ] भापानुवादसहित ७०९
यद्यपि यत इत्यत्र प्रातिपदिकार्थस्य जगत्कारणमात्रस्याऽनुमानतोऽपि सिद्धेरनुवाद्यत्वं तथापि अत्ययार्थस्यैकत्वस्य मानान्तरासिद्धः प्रत्ययस्य ग्रमापकत्वमविरुद्म् । ननु किमेकत्वमत्र लक्षणं किं वा लक्ष्यम् उताऽन्यत् किंचित्? आद्ये कारणत्वमेकत्वं चेति लक्षणद्दयं त्रह्मणो व्यर्थ स्यात्। द्वितीयवती- ययोस्तु वाक्यभेदप्रसङ्ग:, एकत्वत्रह्माख्ययोर्द्वयो: प्रतिपाद्यत्वादिति चेद्, मैवस् : आद्ये कारणत्वं तटस्थलक्षणमेकत्वं स्वरूपलक्षणं चेत्युभयो: सार्थ- कत्वय्। द्वितीये कारणमन्द्यैकत्वविशिष्टं त्रह्म विधीयत इति न वाक्य- भेदा। तृतीये तु यत्कारणं तदेकमिति प्रथमं कारणमनूदैकत्वं विधाय
तात्पर्य निर्णीत होता है। [यद्यपि 'तसिलु' प्रत्ययका एकत्व और बहुत्व दोनों अर्थोंमें सामान्यरूपसे प्रयोग होता है; तथापि प्रकृतमें अग्रिम 'येन' इस एक-वचनसे 'तसिल' को एकत्व अर्थमें ही मानना उचित है]। वह एकत्व अर्थमें आया हुआ 'तसिल्' प्रत्यय कारणकी एकताका निश्चय कराता है। यद्यपि 'यतः' इस पदके 'यत्' प्रातिपदिकका केवल जगत्कारणरूप जो अर्थ है, वह अनुमानसे मी सिद्ध हो सकता है; इसलिए उसका 'यत्' प्रातिपदिकसे अनुवाद ही प्रांप्त होता है; तथापि प्रत्ययका एकत्वरूप अर्थ दूसरे प्रमाणसे सिद्ध नहीं है; अतः प्रत्ययको उस अर्थकी प्रमाका जनक मानना विरुद्ध नहीं है। शक्का-एकत्व यहाँ लक्षण है? या लक्ष्य है? अथवा लक्ष्य और लक्षणसे भिन्न और कुछ है: प्रथम करपमें कारणत्व और एकत्व इस प्रकार ब्रह्मके दो लक्षण व्यर्थ होंगे। दूसरे और तीसरे कल्पमें तो वाक्यमेदका प्रसङ्ग होगा, कारण कि एकत्व तथा ब्रह्म-इन दो लक्ष्योंका उसमें प्रतिपादन करना होगा। समाधान-उक्त दोष नहीं है, कारण कि प्रथम पक्ष माननेमें कारणत्व तटस्थ लक्षण होगा और एकत्व स्वरूप लक्षण होगा, इसलिए दोनों लक्षणोंकी सार्थकता सिद्ध होती है। दूसरे पक्षमें कारणका अनुवाद करके एकत्वविशिष्ट ब्रह्मका विधान किया जाता है, अतः उसमें वाक्यमेद होनेका प्रसभ्ग नहीं आ सकता। तीसरे पक्षमें तो जो कारण है, वह एक है, इस प्रकार पहले कारणका अनुवाद करके एकत्वका विधान करनेके अनन्तर जो एक कारण है; वह न्रह्म है, ९०
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७१० चिचरणप्रमेयसंग्रद्द [सूत्र २, चर्णक १
पश्चाद्यदेकं कारणं तद् ब्रह्मेति कारणमेकत्वसहितमनद्य न्र्ात्वं चोध्यत इति वाक्यैकवाक्यत्वान्न वाक्यभेद:। तथा च सर्वजगत्कारणस्यैकत्वे सृज्यगोचरज्ञानशक्ती विहाय स्रष्टृत्वासंभवात्सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वे अप्य- स्मिन्नेव वाक्ये कारणस्याऽर्थात्सिद्धतः । ननु 'यो गोसदशः स गवयशव्दवाच्यः' इतिवद्यदेकं कारणं तद् ब्रह्मशब्दवाच्यमिति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धपरं वाक्यं ग्रतिभाति। तथा सति वृहत्यर्थरूपवस्तु प्रतिपादकं न स्यादिति चेद, न; 'तद्विजिज्ञासस्त' इति जिज्ञास्यत्वेन प्रतिज्ञाय कीदशं तदित्याकाह्वायां तद् वृहत्यर्थरूपमिति स्वरूपप्रतिपादनात्। संज्ञासंज्ञिसंवन्धस्त्वार्थिको भविष्यति। एवं च सत्येकं सर्वजञं सर्वशक्तिकं सर्वतोऽनवच्छिन च जगत्कारणं त न्शव्दा . भिधेयमिति वाक्यार्थः संपद्यते।
इस रीतिसे एकत्वविशिष्ट कारणका अनुवाद करके नहात्वका प्रतिपादन किया जाता है, इसलिए वाक्यैकवाक्यतान्यायसे वाक्यमेद नहीं आता। इस रीतिसे जगतके कारणमें एकत्वके सिद्ध होनेपर सृज्यमान जगत्के ज्ञान और शक्तिके बिना कर्ता द्वारा उसकी रचना असम्भव है, इसलिए कारणकी सर्वज्ता और सर्वशक्ति- मत्ता भी इसी वाक्यमें सिद्ध होती हैं। शङ्का-'जो गऊके सदश आकारवाला है, वह गवयपदका अर्थ है' इसके समान जो एक कारण है, वह ब्रह्मशन्दका वाच्य (मर्ध) है; ऐसा संज्ञा- संज्ञिसम्बन्धमें वाक्यका तात्पर्य प्रतीत दोता है। परन्तु संज्ञासंनिभाषगें उसका तात्पर्य माना जाय, तो 'वृह' धातुके अर्थमूत वस्तुका प्रति- पादक वह वाक्य नहीं होगा। समाधान-'उसका विचार करना चाहिए' इस वाक्यसे त्रष जिज्ञासाका विषय है, ऐसी प्रतिज्ञा की गई है, अनन्तर 'वह कैसा है' ऐसी आकांक्षा होनेपर वह 'बृह' घात्वर्थरूप है, इस पकार स्वरूपका प्रतिपादन किया गया है। संज्ञा- संज्ञिभावरूप सम्बन्ध तो अर्थात् सिद्ध हो जायगा। इस निर्णयके अनुसार जो एक, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान् और किसी प्रकारसे मी अवच्छिन्न न होकर संसारका कारण है; वह ब्रह्मशन्दका वाच्य अर्थ है, ऐसा वाक्यार्थ सम्पन्न होता है।
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वस्मके आनन्दादि स्वरूपका कथन] भापातुवादसहित ७११
ननु निरुपाधिकस्वरूपकथनमन्तरेण सोपाधिकतासर्वज्ञत्वादयो धर्मा न प्रतीयन्ते, यतो यत्सुपिरं तदाकाश प्रकृष्टप्रकाशश्चन्द्र इतिवत् स्वरूप- लक्षणमेव थ्रुत्या किंचिद्वक्तव्यम्। ब्रह्मशब्दाभिधेयमेव स्वरूपलक्षणमिति चेद्, न वृहत्वधर्ममात्राभिधानात्। यथा महान् घट इत्युक्ते महत्त्वस्य निरुपाधि: वटो धर्मितया प्रतीयते तथेहाऽपि. वक्तव्यम्। सच्छब्दाभिधेयं लक्षणमिति चेट्, न; महासामान्यमात्राभिधानात्। यथा सन्नित्युक्ते घट इत्यवान्तरसामान्यव्यक्तिरपर्यवसानत्वेन महासामान्येनाऽपेक्ष्यते तथेहाप्यवा- न्तरसामान्यव्यक्तिर्वक्तव्या। ज्ञानमेव वृहत्त्वसर्वज्ञत्वादिधर्मवत्तया निरु- पावित्रह्मस्वरूपलक्षणमिति चेद्, न; वेदान्तिमते विज्ञानत्वस्य सुख- दुःखरागद्वेपापेक्षया महासामान्यरूपत्वेन तत्राऽप्यवान्तरसामान्याधारव्य-
शङ्ा-उपाघिशुन्य स्वरूपके कथनके विना उपाधिविशिष्टत्व तथा सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंकी प्रतीति नहीं हो सकती, कारण कि जो छिद्ररूप है, वह आकाश है, अधिक प्रकाशवाला चन्द्रमा है, इत्यादि वाक्योंके सदश किसी स्वरूप लक्षणका ही श्तिके द्वारा प्रतिपादन होना चाहिए। 'केवल ब्रह्मशब्दके वाच्य अर्थको स्वरूप लक्षण नहीं मान सकते; क्योंकि ब्ह्मशव्दसे तो केवल वृहत्त्वधर्म वाच्यवृत्तिसे कहा जाता है। जसे 'बड़ा घड़ा' ऐसा कहनेसे महत्त्वघर्मका उपाधिशून्य घड़ा ही धर्मीरूपसे प्रतीत होता है; वैसे ही प्रकृतमें भी बृहत्त्वघर्मशाली किसी निरुपाधि विशेष्यकी प्रतीति होती है, ऐसा कहना होगा। 'सत्' पदार्थको भी स्वरूप लक्षण नहीं मान सकते, कारण कि सत्शब्द भी महा- सामान्य-सचा जाति-मात्रका अभिधान करता है। [निरुपाधि धर्मीका नहीं।] जैसे 'सत्' इतना ही कहनेपर महासामान्यका (धर्मीके बिना) पर्यवसान नहीं हो सकता, इसलिए घट आदि महासामान्यके अवान्तर सामान्यवाली व्यक्ति अपेक्षित होती है, वैसे ही प्रकृतमें भी अवान्तर सामान्य व्यक्ति अपेक्षित होती है, ऐसा कहना होगा। वृहत्त्व, सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त होनेके कारण ज्ञान ही निरुपाधि ब्रह्मका स्वरूप लक्षण है, ऐसा नहीं मान सकते, कारण कि वेदान्तीके मतमें सुख, दुःख, रांग और द्वेपकी अपेक्षा ज्ञानत्व महासामान्य माना जाता है, इसलिए ज्ञानत्वमें भी अवान्तर सामान्यके आश्रयभूत धर्मीकी आकाङ्ण निवृत् नहीं होती है। [ इसलिए किसी निरुपाधिको स्वरूप लक्षण कहना आवश्यक ही है]।
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७१२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र २, वर्णक १
कयपेक्षाया अनिर्वचनादिति। अत्रोच्यते-'आनन्दाघ्वव खल' इति शत्याSS- नन्द एव निरुपाधित्रह्मरूपमिति निर्णीयते। अुत्यन्तरं च 'यो वै भूमा तत्सुखम्' इति सुखस्यव ब्रह्मधर्मत्वमाह। एवं तर्हि 'विज्ञानमानन्दम्' इति सामानाधिकरण्याद्विज्ञानं निरुपाधिकं त्रह्मगुणः स्यादिति चेत, तत्र वक्तव्यम्-किं विज्ञानानन्दयोः सामानाधिकरण्यं नीलोत्पलवद् गुणगुणि- भावविवक्षया किं वा द्रव्यं घट इतिवत्परापरसामान्यभावविवक्षया ? नाऽडद्य:, 'केवलो निगुर्णश्र' इति ्ुतेः।ुणस्य गुणिना ेदाभेदयो निरूपणादुपपन्नं निर्गुणत्वम्। अत्र भेदाभेदवादी न निर्गुणं द्रव्यमस्तीति जल्पति। मा भुन्निर्गुणं द्रव्यम्, त्रह्म तु न द्रव्यम्, ग्रमाणाभावात्। समवायिकारणत्वाद्
समाधान-इस आक्षेपके उत्तरमें कहा जाता है-'आानन्दसे ही निश्चय' इत्यादयर्थक श्रुतिके वलसे 'आनन्द ही ब्रह्मका निरुपाधि स्वरूप है' ऐसा निर्णय किया जाता है। दूसरी श्रुति भी 'जो महान्-वृहत्-है, वह सुख-मानन्द- स्वरूप है, इस प्रकार सुख-आनन्द-को ही न्रह्मका धर्म कहती है। शक्का-ऐसा माननेसे तो 'विज्ञान, आनन्द' इस प्रकार एक विभक्तयन्त होनेसे विज्ञान ही ब्रह्मका निरुपाधिक गुण माना जायगा। समाधान-तब इस आशक्काका उत्तर देते हुए हम प्रश्न करेंगे कि विज्ञान और आनन्दमें सामानाधिकरण्य-एक विभक्तिका होना-क्या 'नीला कमल' इस वाक्यके समान गुणगुणिभावकी विवक्षासे है? अथवा 'द्रव्य घट है' इस वाक्यके समान परापरसामान्यमावकी-सामान्यविशेषभावकी-[ द्रव्य यह द्रव्यत्वरूप पर- सामान्यका बोध कराता है, वह सामान्य हुआ और 'घट' यह घटत्वरूप अवान्तर सामान्यका बोध कराता है, अतः वह विशेष सामान्य हुआ ] विवक्षासे है? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है, कारण कि श्रुति कहती है कि वह 'केवल और गुणशन्य है'। गुणका गुणीके साथ भेद और अमेदका निरूपण न हो सकनेसे गुण और गुणीमें न तो भेदका और न अभेदका ही निरूपण किया जा सकता है, अतः ब्रह्मका निर्गुण होना युक्तियुक्त है। इस विषयपर भेदामेदवादी भास्कर कहता है कि गुणशुन्य द्रव्य होता ही नहीं है। इसपर हमारा यह कहना है कि द्रव्य गुणशुन्य न होता हो, तो मत हो, -
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बसके आानन्दादि स्वरूपका कथन ] भापानुवादसहित ७१३
द्रव्यमिति चेद्, न; आरम्भवादानभ्युपगमात्। उपादानकारणत्वात् द्रव्यमिति चेद्, न; गुणादीनामपि स्वगतज्ञेयत्ववाच्यत्वादिधमोंपा-
चेद्, न; दानत्वात्। गुणो नाम धर्मः, तथा च न निर्धर्मकः पदार्थोऽस्तीति कस्यचिद्धर्मस्यैव निर्धर्मकताया अङ्गीकार्यत्वात्। अन्यथाऽनवस्थापत्तेः। तस्मान्न निर्गुणं व्रह्मेति वचनं दर्शनप्रद्वेष- मात्रम् । द्वितीयपक्षोऽङ्गीकृत एव। विज्ञानं सामान्यपरं तद्विशेप आनन्दः, स एव हि व्रह्म । न च सर्वज्ञत्वाद्वितीयत्वादिधर्मैंः सद्वितीयत्वम्, अपश्चोषाधिकतया तेपामनिर्वचनीयत्वात्। विज्ञान- सामान्यमपि दुःखरागाद्युपाधिकत्वादनिर्वचनीयमेव । तादशसामान्याधारे विज्ञानप्रयुक्तार्थक्रियाकारिण्यानन्दे विज्ञानव्यवहारोऽप्युपपन्न एव।
परन्तु ब्रह्म तो द्रव्य नहीं है, कारण कि उसके (ब्रह्मके) द्रव्य माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि कहो कि ब्रह्म समवायिकारण है, इसलिए द्रव्य है, [क्योंकि द्रव्यसे इतर समवायिकारण कोई हो ही नहीं सकता ] तो ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि हम आरम्भवादका स्वीकार नहीं करते हैं। [ यह नैयायिक मत है कि परमाणुद्वयसंयोग द्यणुकके आरम्भ द्वारा परम्परासे जगत्का आरम्भक है]। उपादान कारण होनेसे भी ब्रह्मको द्रव्य नहीं मान सकते, क्योंकि गुणादि भी अपने ज्ञेयत्व, वाच्यत्व आदि धर्मोंके प्रति उपादान कारण माने ही जाते हैं, [ पर वे द्रव्य नहीं कहलाते ]। गुण धर्मको कहते हैं, इसलिए धर्मशुन्य कोई पदार्थ ही नहीं है, ऐसा भी कहना उचित नहीं है, कारण कि किसी धर्मको निर्धर्मक अज्गीकार करना ही होगा, अन्यथा अनवस्था होगी। इसलिए निर्गुण ब्रह्म नहीं है, यह कहना एक दर्शनके ऊपर द्वेषका ही प्रदर्शन करना है। उपादानकारण होनेसे द्रव्य है, ऐसा दूसरा पक्ष तो हम मानते ही हैं। विज्ञान सामान्य- परक है, उसका विशेप है-आनन्द, वही ब्रह्म है। सर्वज्ञत्व, अद्वितीयत्व आदि धर्मोंके द्वारा द्वितीयसहित होना भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि प्रपश्चोपाधिक- प्रपश्चरूप उपाधि द्वारा प्राप्त-सर्वज्ञत्व आदि सब अनिर्वचनीय (मिथ्या) हैं। विज्ञानसामान्य भी दुःख, राग आदि उपाधिसे युक्त होनेके कारण अनिर्वचनीय ही है। इससे अनिर्वचनीय विज्ञानत्वसामान्यके आधारभूत और विज्ञानप्रयुक्त
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७१४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र २, वर्णक १
नतु यथा कल्पितरजतत्वाधारभूतायां शुक्तावसुख्यो रजतव्यवहारस्तथाSS- नन्दे विज्ञानव्यवहार: स्यादिति चेद्, न; तद्वदत्र पारमार्थिक- सामान्यान्तराभावेन वैपम्यात् । तदेवं विज्ञानस्वभाव आनन्दो ब्रह्मेति स्वरूपलक्षणस्य श्रौतत्वादशेषमतिमङ्गलम्।
इति विवरणप्रमेयसंग्रहे द्वितीयसूत्रं समाप्तम्।
व्यवहारके सम्पादक आनन्दके लिए विज्ञानशब्दका व्यवहार भी सङ्गत होता है। शङ्का-जैसे कश्पित रजतत्वके आधारभूत शुक्तिमें अमुख्य (गौण, अवास्तव) रजतव्यवहार होता है, वैसे ही आनन्दमें विज्ञानव्यवहार भी गौण (अवास्तव) ही होगा। समाधान-शुक्ति रजतके तुल्य प्रकृतमें दूसरा पारमार्थिक सामान्य न होनेसे विषमता है। [जैसे शुक्तिमें केवल अवास्तव रजत ही नहीं है, किन्तु व्यवहारदष्टिसे पारमार्थिक शुक्तित्व भी है, वैसे ब्रह्ममें कोई दूसरा पारमार्थिक सामान्य नहीं है ]। इस प्रकारके निर्णयसे 'विज्ञानस्वभाव आनन्द ब्रह्म है' ऐसा स्वरूप लक्षण श्रतिसिद्ध होनेसे सम्पूर्ण अत्यन्त मङ्गलमय है।
इति श्री पं० ललिता प्रसादडबरालविरचितविवरणोपन्यास- भाषानुवादमें द्वितीयसूत्र समास्त ।
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वेद में पीरुपेयत्वकी आशङ्का ] भापानुवादसहित ७१५
अथ तृतीयं सूत्रम द्वितीयसूत्रे ब्रह्मणो लक्षणद्वयमभिहितम्। इदानीं सूत्रकारेण ब्रह्मण: सर्वज्ञत्वे हेतुरुच्यते-'शास्त्रयोनित्वात्' इति। पूर्वसूत्र एव श्रुति- युक्तिभ्यां सर्वज्ञत्वसाधनाद्यर्थमेतदिति चेद्, मवम् ; शब्दोपादानभावाद् ध्वनिगतविपय द्योतनाशक्तयोन्त- ञ्रक्मण्येव स्युरग्रेविषयविपयिणी दीपशक्ति: खलूचैः। द्रष्टुश्च ज्ञानशक्तिननु न करणता किन्तु दीपप्रभाव- त्संयुक्तद्योतनवेत्यपरमिह पुनः साध्यते सर्वविच्वम्।।
तृतीय सूत्र 'जन्मादस्य यतः' इस द्वितीय सूत्रमें ब्रह्मके तटस्थ और स्वरूप (जगत्- कारणत्व तथा सत्यज्ञानानन्द) इस प्रकार दो लक्षण कहे गये हैं। अब सूत्रकार न्रद्मके सर्वज्ञ होनेमें हेतु दिखलाते हैं-'शास्त्रयोनित्वात्' । शक्का-पूर्व सूत्रमें ही श्रुति तथा युक्तिके द्वारा सर्वज्ञत्वका साघन कर ही लिया गया है, इसलिए पुनः उसमें हेतु देना व्यर्थ है। समाधान-उक्त आक्षेप उचित नहीं है, कारण कि ध्वनिमें-शब्दमें-विषय- घट, पट आदि अर्थ-का प्रकाश करनेकी जो शक्तियां हैं, वे सब ब्रह्ममें ही हैं, क्योंकि ्रहम ही शब्दरूप वेदका उपादान है। [नियम है-कार्यमें कारणसे ही गुण प्राप्त होता है] जसे विपयको प्रकाशित करनेवाली दीपकी शक्ति अग्निकी ही शक्ति है, इसमें कोई सन्देह नहीं। [ इस दष्टान्तसे सिद्ध हुआ कि शब्दोंमें विषय-प्रकाश-शक्ति अपने उपादानभूत ब्रह्मसे ही प्राप्त है, इसलिए उस शक्तिको ब्रह्मशक्ति ही मानना चाहिए। यदि शङ्का हो कि शब्दोंमें विषयप्रकाश करनेकी कारणता है, अतः ब्रह्ममें भी कारणताका ही अनुमान होगा, इसलिए शास्त्रयोनित्वरूप हेतुसे भी सर्ववित्त्व सिद्ध नहीं हो सकता, तो इस आशक्काका समाधान उत्तरार्द्धसे करते हैं-] द्रष्टामें-चेतनमें-ज्ञान- शक्तिका ही साधन करना उचित है, केवल कारणताका साधन करना उचित नहीं है। [दष्टान्तमें समता दिखलाते हैं-] क्योंकि जैसे दीपकी प्रभा अपनेसे संयुक्त सम्पूर्ण पदार्थोंका प्रकाश करती है, वैसे ही व्रह्मा भी अपनेसे संयुक्त सम्पूर्ण
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७१६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ३, वर्णक १
अयमर्थ :- साधितमपि पुनर्हेत्वन्तरेण इढीक्रियते। न च पुनरुक्ति- प्सङ्ग:, जगत्कर्तृत्वशङ्याऽSक्षिप्ते सर्वज्ञत्वे समाधीयमात्वाद्। चिमतं ब्रह्म वेदगतसर्वविषयप्रकाशनशत्त्याधारः, वेदोपादानत्वाद, यथा दीपगत- प्रकाशनशत्त्याधारो दीपोपादानभूतोऽगनिरिति हि प्रयोग:। यद्यपि वेदे करणशक्तिरप्यस्ति, तथापि चेतनत्वाद् व्रह्मणो ज्ञानशक्तिरेवाऽनुमेया। नहि चेतनस्य कर्तुः करणशक्तिः संभाव्यते। न चोपादानोपादेययोः प्रपञ्चका प्रकाश करता है। ब्रह्म सबके प्रति उपादान होनेसे सबके साथ संयुक्त है, इसलिए इस सूत्रमें पूर्व सूत्रकी अपेक्षा विलक्षण ही सर्ववित्वका साघन किया जाता है। [अर्थात् पूर्व सूत्रमें जगत्कारणत्वसे सर्ववित्व सिद्ध किया गया है और इस सूत्रमें वेदोपादानत्व द्वारा विलक्षण सर्वज्ञत्व सिद्ध किया जायगा, इससे पुनरुक्त या सिद्धसाधनादि दोष नहीं आाते। अतएव व्रह्मके प्रपश्च- कारणत्वसे गृहीत होनेपर भी शास्त्रकारणत्वरूप हेतु दिया गया है। इसका स्वयं व्याख्यान करके स्पष्टीकरण करते हैं-] तात्पर्य यह है कि सिद्ध किया गया भी 'सर्वज्ञत्व' दूसरे हेतुके द्वारा दढ़ किया जा रहा है, इससे पुनरुक्ति दोपका प्रसङ्ग नहीं आता, कारण कि दूसरेमें जगत्कारणत्वकी आशक्कासे सर्वज्ञत्व होनेमें आक्षेप हो सकता है, [अर्थात् व्रह्म जगत्का कर्ता है, परन्तु वेद तो नित्य पदार्थ है, इसलिए उसका कर्ता तो त्रह्म नहीं होगा, इसलिए वेदका अकर्ता होनेसे उसका ज्ञान भी उसको नहीं होगा, अतः केवल जगत्कर्तृत्वसे सर्वजञत्वमें आक्षेप हो सकता है। इसलिए उसका समाधान करना प्राप्त हो जाता है। [समाधानस्वरूप अनुमानप्रयोग दिखलाते हैं-] 'विमत ब्रह्म वेदमें विद्यमान सम्पूर्ण अर्थजातका प्रकाश करनेमें समर्थ शक्तिका मूल आधार है, कारण कि वह वेदका उपादान है। जैसे दीपकी प्रकाश देनेवाली शक्तिका मूल आघार दीपका उपादानभूत अग्नि है। यद्यपि वेदमें करणशक्ति (साधकत्व-सहायकत्व) भी है, उससे करण- शक्तिको ही अनुमान द्वारा उसके उपादानभूत ब्रह्ममें भी मानना होगा। इससे सर्वज्ञत्व सिद्ध नहीं हो सकता, तथापि चेतन होनेके कारण ब्रह्मकी ज्ञानशक्तिका ही अनुमान द्वारा साघन करना उचित है। चेतनरूप कर्त्ताका करण होना सम्भव नहीं है। [वह तो स्वयं रचयिता ही है, साधनभूत कारक
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वेदमें पौरुपेयत्वकी आशङ्का ] भापानुवादसहित ७१७
सर्वशक््यनुगत्या भाव्यमिति नियमोऽस्ति, अग्निकार्यभूतायां प्रभायां प्रकाशशक्तेरेवाऽनुगमाद् दाहशक्तेरननुगमात्। एवं वेदोपादानेऽपि ब्रह्मणि घोधशक्तिरेवाऽनुगच्छतु को विरोध इति। न च वेदस्य सर्चप्रका शकत्वे विवदितव्यम्, पुराणाद्यनेकविद्योपवृंहितेन वेदेनाऽविपयीकंतस्य वस्तुनः सच्चे मानाभावात्। न च वेदोपादानत्वमसिद्धम्, वेदस्य च ब्रह्मणि सर्वोपनिपत्सिद्धत्वात्। ननु ब्रह्म न वेदोपादानम्, वेदोक्ताखिलाभिज्ञ- त्वात, ऋष्यादिवद्, इति चेदू, न; वेदोक्तमात्राभिज्ञत्वस्योपाधित्वाद्।ब्रह्म तु वेदोक्तादप्यधिकं जानाति । तथाहि-वेदः स्त्रविपयविज्ञाना-
नहीं हो सकता'। उपादान और उपादेय दोनोंमें सब प्रकारकी शक्तियोंका अनुगम होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। [इससे शक्का नहीं कर सकते हैं कि उपा- दानमें उपादेय वेदगत करणशक्ति मी आनी चाहिए। दष्टान्त द्वारा नियमका न होना सिद्ध करते हैं-] कारण कि अग्निके कार्यस्वरूप दीपकी प्रभामें (प्रकाशमें) प्रकाशशक्तिका ही अनुवर्तन है, दाहशक्तिका अनुवर्तन नहीं है। इसी प्रकार वेदके उपादानभूत ब्रद्ममें भी बोधशक्ति-ज्ञानशक्ति-का ही अनुगम होता है, यदि ऐसा माना जाय, तो क्या विरोध होगा? वेद सम्पूर्ण पदार्थोंका प्रकाश करता है, इसमें कोई विवाद ही नहीं करना चाहिए, कारण कि पुराण आदि अनेक विद्याओंसे परिपुष्ट किये गये वेदका जो विषय नहीं है, ऐसे पदार्थकी सचामें कोई प्रमाण ही नहीं है [ अर्थात् वेदमें न आया हुआ पदार्थ आकाश- पुप्पके समान है ]। व्रक्ममें वेदोपादानत्व असिद्ध मी नहीं है, कारण कि वेद भी नामरूपात्मक प्रपश्चके ही अन्तर्गत है और सम्पूर्ण नामरूपांत्मक प्रपश्चका उपादान न्रम्म ही है, इसका प्रतिपादन सभी उपनिषत् करती हैं। शङ्का-त्रम्म वेदका उपादान नहीं माना जा सकता, वेदमें प्रतिपादित सम्पूर्ण विपयोंका अभिज्ञ होनेसे, ऋपि आदिके समान। समाधान-वेदोकतमात्राभिज्ञत्वरूप उपाघिसे उक्त अनुमान दूषित है। [ऋपि आदि तो केवल वेदप्रतिपादित ही अर्थ जानते हैं ] और ब्रह्म तो वेदप्रतिपादित अर्थसे मी अधिक जानता है। यथा-वेदको अपने विषयके विज्ञानकी अपेक्षा अधिक विपयको जाननेवालेने बनाया है, क्योंकि
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७१८ विचरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र ३, वर्णक १
दप्यधिकविपयवित्प्रणीतः, वाक्यप्रमाणत्वात्, पाणिनि्रणीतशास्त्रचद्। संभाव्यते ह्वेतत्साध्यम्, लोके वागविपयस्यापि क्षीरगुडादिमाघुर्यविशे- पस्याऽनुभवगम्यत्वात्। तथा च वेदस्य व्यवहार्यसर्वचस्तुप्रकाशकत्वात्सर्व- ज्ञत्वम्। वेदोपादानं व्रह्म तु व्यवहारातीतं निजस्वरूपमपि स्वचैत- न्येनाऽभिव्यनक्तीति निरतिशयसर्वज्ञम्। अथ वेदोऽपि ब्रह्मस्वरूपं लक्षणया अकाशयेत् तथापि वेद: किंचिन्मुख्ययैव वृत्या प्रका- शयति किचिल्लक्षणया किंचित्सामान्येन किंचिद्विशेपेण। ब्रह्म वेद वाक्यस्वरूप प्रमाण है, पाणिनि द्वारा रचे गये व्याकरणशास्त्रके तुल्य। इस साध्यका सम्भव भी है, क्योंकि लोकमें वाणीके विषय न होनेवाली दूध और गुड़ आदिकी मधुरता (मिठास) का विशेष अन्तर केवल अनुभवसे ही जाना जाता है। [ इस दष्टान्तसे वाणीरूप वेदके विपय ऐसे मी कुछ पदार्थ हैं जिनका अनुभव ब्रह्मको है, यह सिद्ध किया गया। शक्का उत्पन्न होती है कि अभी कहा गया है कि वेदवाह्य वस्तुके होनेमें कोई प्रमाण ही नहीं है और अत्र कहा जाता है कि वेदवाह्य मी वस्तु है, जिसका ज्ञान ब्रक्ष करता है, इससे आपके कथनमें परस्पर विरोध होता है, इसके समाघानमें उत्तर है कि उक्त विरोध तात्पर्यको न समझनेसे प्रतीत होता है। वेदवाह्य वस्तु न माननेका तात्पर्य यह है कि जो कुछ भी वागिन्द्रियगोचर पदार्थ है, वह सब वेदका विषय है, ऐसा कोई वाग्विषय पदार्थ नहीं है कि जो वेदवाह्य माना जा सके, परन्तु वागविषय पदार्थ ही नहीं है, ऐसा इसका तात्पर्य नहीं है। इसी वागविषय पदार्थका भी ज्ञाता ब्रह्म है, ऐसा कहा गया है, इससे कोई विरोध नहीं माता।] इससे वेद भी व्यवहारके विषय सकल पदार्थोंका प्रकाशक है, इसलिए वह सर्वज्ञ माना जाता है। परन्तु वेदका उपादानभूत व्रह्म तो वागादिके सम्पूर्ण व्यवहारके अविषय अपने स्वरूपको भी अपने चैतन्य द्वारा प्रकाशित करता है, इसलिए निरतिशय सर्वज्ञ है। [इससे अधिक सर्वज्ञ हो नहीं सकता, यह सर्वज्ञताकी सीमा है] । यद्यपि वेद मी ब्रह्मस्वरूपको लक्षणाके द्वारा ('तत्त्वमसि' आदि वाक्योंमें भागत्यागलक्षणा अथवा शुद्ध लक्षणाके द्वारा प्ातिपदिकार्थ- मात्र शुद्ध चैतन्यरूप अर्थमें तात्पर्यका निश्चय किया गया है) ब्रह्मके स्वरूपको प्रकाशित कर ही सकता है, तथापि वेद तो कुछ विषयको मुख्य- वृत्ति (अभिधानशक्ति) के द्वारा और कुछ विषयको लक्षणावृत्तिके द्वारा प्रकाशित
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वेदमें पौरुपेयत्वकी आाशङ्का ] मांपांनुवादसहित ७१९
तु सर्वं सर्वात्मना ग्रकाशयतीति वेदादप्यधिकाभिज्ञमेव। ननु वेदस्य ब्रह्मणा ग्रणयनं नामोच्चारणमात्रं चेदुपाध्यायवद् ब्रह्माऽसर्वज्ञं स्यात्। अर्थ बुद्धा रचितत्वे व्याकरणादिवद्वेद: पौरुपेय: स्यात्। अथ मन्यसे प्रमाणान्तरेणार्ऽर्थमुपलभ्य विवक्षित्वा रचिता व्याकरणादयो मानान्तरसापेक्षतया पौरुपेया भवन्तु नाम वेदस्य तु नित्यज्ञानजन्यनित्येच्छावता ईश्वरेण रचितस्य माना- न्तरनिरपेक्षस्य कर्थ पौरुपेयत्वमिति। नैतत्सारम्, तादगीश्वरे प्रमाणाभावात्। अनुमानानामीश्वरासाधकत्वस्य पूर्वसूत्रे दर्शित- त्वात्। आगमस्तत्साधक इति चेद्, न; उक्तेश्वरसिद्ी तत्प्रोक्ताग-
कर सकता है, एवं कुछ विपयोंको सामान्यरूपसे और कुछको विशेपरूपसे प्रका- शित करता है, परन्तु ब्रहा तो सबको ही सर्वस्वरूपसे (सामान्य विशेष सभी प्रकारसे) प्रकाशित करता है, इसलिए वेदकी अपेक्षा उसको अधिक सर्वज्ञ ही मानना उचित है। यदि केवल त्रह्म द्वारा शन्दोंका उच्चारणमात्र वेदकी रचना मानी जाय, तो उपाध्यायके-चेदशिक्षकके-समान ब्रह्म मी असर्वज्ञ होगा। अर्थज्ञानपूर्वक यदि वेदकी रचना मानी जाय, तो व्याकरण आदि शास्त्रोंकी भाँति वेद पौरुपेय-पुरुषप्रणीत-माने जायँगे। यदि कहो कि दूसरे प्रमाणोंके द्वारा प्राप्त अर्थकी विवक्षासे रचे गये व्याकरण आदि शास्त्र दूसरे प्रमाणोंकी अपेक्षा रखनेसे पौरुपेय भले ही माने जायँ, परन्तु वेद तो नित्यज्ञानसे उत्पन्न हुई नित्य इच्छावाले ईश्वरसे रचे गये हैं, इसलिए दूसरे प्रमाणकी अपेक्षा न रखनेसे पौरुषेय कैसे माने जा सकते हैं, तो यह भी कथन मूल्यवान नहीं है, कारण कि नित्यज्ञानजन्य नित्य इच्छावाले ईश्वरके माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। कथित अनुमान ईश्वरके साधक 'नहीं हैं, ऐसा पूर्व सूत्रमें ही प्रतिपादन किया गया है। आगम-शास्त्र-को इश्वरके साधनमें प्रमाण कहा जाय, तो यह भी नहीं बनता, कारण कि कथित ईश्वरकी सिद्धि होनेके अनन्तर ही उससे कहे गये शासत्रमें आ्रमाण्य सिद्ध हो सकता है और आगममें प्रामाण्यसिद्धिके अनन्तर ही आगम-
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७२० विवरणप्रमेयसंग्रहं [सूत्र ३, वर्णेक १
वेदस्याऽनपेक्षत्वादेव प्रामाण्यं नेश्वरप्रोक्तत्वाद् अतो नेतरेतराश्रय इति चेद्, एवमपीश्वरेच्छा नित्या ज्ञानजन्या चेति व्याहतिर्दुष्परिहरा। अथारडथ बुद्धा रचित्वे समेऽपि व्याकरणादीनां वक्रभिग्रायप्रयुक्त- त्वात्पौरुपेयत्वं वेदानां त्वध्ययनविधिन्नयुक्तत्वादपौरुपेयतेति चेद्, न; विमता वेदा वक्कभिप्रायप्रयुक्ता नाऽध्ययनविधिप्रयुक्ता चा, अर्थ बुद्धा रचितत्वाद्, व्याकरणादिवदिति पोरुपेयताया दुवारत्वाद्। न च वेदानां चतन्याख्यनिर्विकल्पकज्ञानपूर्वकत्वं व्याकरणादिवैपम्यमिति. वाच्यम्, चैतन्यस्याप्यभिलपितसाधनोपरागे सविकल्पकत्वात्। नन्वपौरुपेया वेदा: प्रवाहाविच्छेदे सत्यस्मर्यमाणकर्तकत्वादात्मय-
प्रतिपादित ईश्वरकी सिद्धि हो सकती है, इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष आ जाता है। यदि कहा जाय कि वेद दूसरे प्रमाणोंकी अपेक्षा न रखनेसे ही प्रमाण है, ईश्वररचित होनेके कारण नहीं, इसलिए अन्योन्याश्य दोप नहीं आ सकता, तो भी ईश्वरकी इच्छा नित्य है और वह ज्ञानसे उत्पन्न होती है, इस प्रकारका व्याघात तो नहीं हटाया जा सकता [ अर्थात् नित्यको जन्य मानना विरुद्ध है]। शङ्का-अर्थज्ञानपूर्वक रचा जाना यद्यपि समान ही है, तथापि व्याकरण आदि शास्त्रोंका वक्ताके अभिप्रायके अनुसार प्रयोग होनेके कारण वे पौरुषेय माने जाते हैं, परन्तु वेदोंका प्रयोग अध्ययनविधिके द्वारा होता है, अतः वे पौरुषेय नहीं माने जा सकते। समाधान-विमत वेद वक्ताके अभिप्रायसे प्रयुक्त हैं अथवा अध्ययन- विधिसे प्रयुक्त नहीं हैं, कारण कि व्याकरणादि शास्त्रोंके सदश वे अर्थज्ञान- पूर्वक रचे गये हैं, इस प्रकार अनुमानके प्रयोगसे वेदोंका पौरुषेय होना नहीं हटाया जा सकता। व्याकरण आदि शास्त्रोंकी अपेक्षा वेदोंमें चैतन्यनामक निर्विकल्पज्ञानपूर्वकत्वरूप विपमता भी नहीं कही जा सकती, कारण कि चैतन्यका अभीष्ट उपायके साथ संसर्ग होनेपर उसे सविकल्पक ही मानना होगा। [क्योंकि निर्विकलपसे कोई भी संसर्ग नहीं हो सकता।] शङ्का-वेद पौरुषेय नहीं है, प्रवाहके विच्छेद न होते हुए इनके फर्ताका स्मरण न होनेसे, आत्माके तुल्य। [जसे आत्माका प्रवाह वरावर
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वेदमें पौरुषेयत्वकी आशङ्गा] भापानुवादसहित ७२१
दिति चेत्, किमत्र स्मरणागोचरकर्तकत्वं हेतु: उताऽप्रमीयमाणकर्वक- त्वम् १ आद्यो जीर्णकूपांदावनैकान्तिः । द्वितीयोऽसिद्ध, वेदो विशिष्टवहुज्ञपुरुपप्रणीतः, वह्र्थविपयवाक्यप्रमाणत्वाद, भारतवत्; 'स इदं सर्वमसजत ऋचो यजूँपि सामानि' इत्यनुमानागमाभ्यां वेदे कर्तुः प्रमी- यमाणत्वात्। एवं तर्हि वेदस्य पौरुपेयत्वप्रसङ्ग इष्ट इति चेद्, न; प्रामा- ण्यभङ्गग्रसङ्गात्। न तावन्नित्येच्छादिमदीश्वररचितत्वात् प्रामाण्यम्, दूपितत्वात्। नापि महाजनपरिग्रहाद् देहात्मभावचन्द्रप्रादेशमात्रत्वादीनां महाजनपरिगृहीतानामेवाSप्रामाण्यदर्शनात्। स्मृतिपुराणपित्रादिवाक्यवदर्थस्य चला आ रहा है और उसके कर्ताका ज्ञान नहीं होता, अतः वह किसी पुरुष द्वारा प्रणीत नहीं है, वैसे ही वेदोंका भी ग्रवाह बराँवर चला आ रहा है, और कर्ताका पता नहीं है, अतः चे पुरुषप्रणीत नहीं माने जा सकते।] समाधान-इस अपौरुपेत्वके साधक अनुमानमें क्या कर्तांका स्मरण- विषय न होनारूप हेतु है ? यां कर्ताका निश्चय न हो सकनारूप हेतु है! इनमें प्रथम कल्प तो पुराने कूप आदिमें व्यभिचरित है। [बहुत पुराने कृपादि कार्योंके कर्तांका भी स्मरण नहीं रहता है। ] दूसरा कल्प असिद्धि दोपसे दृषित है, कारण कि 'वेद विशिष्ट और अधिक ज्ञानशाली पुरुष द्वारा रचा गया है, क्योंकि वह भारत ग्न्थके समान अनेक अर्थोंको विषय करनेवाला वाक्यरूप प्रमाण है', इस अनुमान तथा 'उसने इस हश्यमान सम्पूर्णको रचा, तथा ऋकू, यजु और साम वेदोंको इस प्रकारके अर्थवाले आगमसे वेदकी रचनाके विषयमें कर्ताका निश्चय होता ही है। शङ्का-तब तो उक्त तर्कके अनुसार वेदमें पुरुपप्रणीतत्वका प्रसङ्ग ही हो जायगा। समाधान-नहीं, नहीं होगा, कारण कि ऐसा माननेसे वेदके प्रामाण्यका भङ्ग हो जायगा। नित्य इच्छा आदिवाले ईस्रके द्वारा रचित होनेसे भी वेदका प्रामाण्य नहीं कह सकते, क्योंकि इसमें पहले ही दोष दे आये हैं। [ अर्थात् इस प्रकारका ईश्वर प्रमाणसिद्ध ही नहीं है। ] महाजन-अधिक जनसमुदाय-के सम्मत होनेसे भी प्रामाण्य नहीं आ सकता, कारण कि चन्द्रमाके प्रादेश-वित्ता-मात्र परिमाण आदिका, जो कि महाजनके द्वारा परिगृदीत ही है, अप्रामाण्य देखा गया है।
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७३२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ३, वर्णक १
मानान्तरसिद्धतया प्रामाण्यं स्यादिति चेद्, मैवम्; किं वेदार्थभृतौ धर्माधमौं प्रत्यक्षेणाऽनुभृतौ उताऽगमान्तरेण। न चरमः, अनवस्थानात्। अ्रथमेऽपि नहि तावदस्मदादिप्रत्यक्षेण धर्माधर्मावुयलभामहे। नापि योगिप्रत्यक्ष तद्ग्राहकम् , तसय स्वविषयरूपादिष्वेवाऽतिशयकरत्वात्। न चाऽऽत्मसम- वेततया धर्माधर्मा मानसप्रत्यक्षाविति वाच्यम्, वेदसष्टिकाले धर्माधर्म- योर्भाविनोरवर्तमानत्वात्। पूर्वकल्पानुष्ठितौ धर्माधमौं तदा वतेते एवेति
शक्कास्मृति, पुराण तथा पिता आदिके वाक्योंके सदश अर्थके दूसरे प्रमाणसे सिद्ध होनेके कारण वेदोंका प्रामाण्य मान लिया जायगा [जैसे प्रमाणान्तरसे सिद्ध अर्थके प्रतिपादक स्मृति आदिके वाक्य प्रमाण होते हैं, वैसे ही वेदवाक्य भी प्रमाण मान लिए जायँगे ]। समाधान-वेदके तात्पर्यार्थस्वरूप धर्म और अधर्म [ विधिवाक्यका तात्पर्य धर्ममें है और निषेधका अधर्ममें ] क्या प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा जाने गये हैं? या दूसरे (वेदसे इतर) शास्त्र द्वारा :। दूसरा कर्प नहीं वन सकता, कारण कि इसमें अनवस्था दोष या जाता है। [दृसरेसे आगमके तात्पर्यार्थका ज्ञान तीसरेसे, तीसरेका चौथेसे इत्यादि परम्परा न रुकेगी ] प्रथम कल्पमें भी हम ऐसे साधारण मनुष्य प्रत्यक्षसे धर्म और अधर्मका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते। योगियोंका प्रत्यक्ष भी धर्म और अधर्मका ज्ञान प्राप्त करानेवाला नहीं हो सकता, कारण कि योगीका प्रत्यक्ष अपने विषय रूप आदिमें ही अतिशय प्राप्त कर सकता है [ चक्षुरादिके अगोचर धर्म और अधर्मका दर्शन नहीं कर सकता। 'दिव्यं ददामि ते चक्षुः-' इस भगवद्वाक्यमें दिव्यपदका भी इतना ही तात्पर्य है-सम्पूर्ण विराटरूपके दर्शनकी सामर्थ्य उत्पन्न हो जाय। अविषयकी दर्शनसामर्थ्य नहीं हो सकती, अतएव अभियुक्तोंका वचन है-'न रूपे श्रोत्रवृत्तिता' ]। आत्मसमवेत होनेसे धर्म और अधर्म मानस प्रत्यक्षके विषय भी नहीं हो सकते, कारण कि वेदकी रचनाके अवसरपर आगे होनेवाले धर्म और अधर्म अनुवर्तमान ही नहीं थे। [ धर्माधर्म तो वेदैक- प्रमाणगम्य हैं, वेदकी रचनाके पूर्व तो वे सिद्ध ही नहीं थे, अतः वेद-रचनाकालमें उनकी अनुवृत्ति कैसे होगी? अनुवृत्ति तो पूर्वसिद्ध पदार्थकी ही हो सकती है। अतः मानस प्रत्यक्षके विषय मी नहीं हो सकते। ] पूर्व कल्पमें किथे गये
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वेदमें पौरुषेयत्वकी आशङ्का ] भाषानुवादसहित ७२३
चेद्, न; पूर्ववेदसृष्टावपि तथेत्यनवस्थायामन्धपरम्पराग्रसङ्गात्। तस्मात्पौ रुपेयत्वे वेदस्य ग्रामाण्यं दुःसम्पादम्। अत एव सुगता आर्हताथ्ाऽप्रमाणं वेदमाहुरिति चेद्, न; तेपां स्वागमेष्वप्रामाण्यप्रसङ्गात्। अत एव लोकायत आगममात्रं नेच्छतीति चेद, न; तस्य वाक्यमात्राप्रामाण्ये वादानधिकार:, लौकिकवाक्यग्रामाण्ये किमपराद्धं वेदवाक्यैः। तदेवं पौरुपेयत्वे वेद- स्येष्टं आ्रमाण्यं प्रभज्येत : अपौरुपेत्वे ब्रह्मण उपाध्यायवद्सर्वज्ञत्वं प्रसज्येतेति। धर्म और अधर्म उस कालमें विद्यमान ही हैं, यह मानना भी उचित नहीं है, कारण कि उस पूर्व कल्पके वेदोंकी रचनाकालमें भी पूर्वोक्त प्रकारका [उससे भी पूर्व कल्पमें अनुष्ठित धर्माधर्मोंकी अनुवृत्ति मानना ] समाधान देनेसे अनवस्था दोष आ जानेपर अन्धपरम्पराका प्रसक्त आ जाता है। इसलिए वेदको पुरुषप्रणीत माननेसे उसके प्रामाण्यका समर्थन नहीं हो सकता। इसी कारणसे बौद्ध तथा जनमतावलम्बियोंने वेदको प्रमाण नहीं माना, यह कहना भी उचित नहीं है, कारण कि उनको (वेदको अप्रमाण माननेमें पौरुषेयत्व- रूप हेतुसे) अपने (बौद्ध और जैन) शास्त्रोंमें अपामाण्य मांननेका प्रसङ्ग भा जायगा। [ उनके शास्त्र मी तो पौरुपेय हैं, अतः उनको भी अग्रमाण मानना होगा ]। यही कारण है कि लोकायत-नास्तिक-आगममात्रको नहीं चाहता। [आगममात्र पुरुषप्रणीत है, अतः वह किसीको भी प्रमाण मानना नहीं चाहता ], परन्तु उसका कथन भी उचित नहीं है, कारण कि, वाक्यमात्रको अप्रमाण माननेसे नास्तिकका वादमें-तत्त्वजिज्ञासारूप परस्पर शास्त्रार्थकथामें-अधिकार ही नहीं हो सकता। [वाक्योंको सर्वथा अप्रमाण माननेवाला अपना अभिप्राय किस साधनसे प्रकट कर सकेगा? और प्रतिवादीका अभिप्राय कैसे समझेगा : अतः उस प्रलापीके कथनपर कोई मी ध्यान देना उचित न समझेगा । ] यदि वह नास्तिक [ वादमें अपना अधिकार पानेके लिए ] लौकिक वाक्योंमें प्रामाण्य मान ले, तो हम पूछ सकते हैं कि तव वैदिक वाक्योंने क्या अपराध किया है कि वे प्रमाण न माने जायँ१ इस प्रकार वेदको पुरुषप्रणीत माननेमें उसका प्रामाण्य, नष्ट होता है।' और वेदको पुरुपप्रणीत न माननेसे ब्रह्ममें उपाध्यायके-गुरुके-तुलय असर्वज्ञत्वका प्रसन्न हो जायगा है।
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७२४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र े, चर्णक ₹
अत्रोच्यते-पौरुषेयत्वं तावन्न सहामहे। तथाहि-किं शब्दार्थ- तत्संवन्धानां पौरुपेयत्वमुत क्रमावस्थितवाक्यानाम्। आद्येऽपि न तावज्जीवा: कर्तारः। तथा सति कश्चित्सागरं विवक्षित्वा मेरुशव्दमपि वाच- कत्वेन प्रयुञ्जीत, स्वतन्त्रत्वात्। नापीश्वरः कर्ता, कल्पादिपु शब्दार्थ- संवन्धव्यवहार: पूर्वपूर्वच्य वहार परम्पराधीनः, अभिधानाभिधेयव्यवहारत्वाद्, इदानीन्तनव्यवहारवत्, इत्यनादित्वानुमानात्। न च डित्थादिसाङ्केतिक- शव्देष्वनेकान्तः, तेपां गाच्यादिशब्दवदभिधानाभासत्वात्। न द्वितीय:, समाधान-इस शक्काके उत्तरमें कहा जाता है कि वेदकी पुरुष द्वारा रचना हम नहीं सह सकते, क्योंकि प्रश्न हो सकता है कि क्या शब्द, अर्थ, तथा उनके सम्वन्धकी रचना पुरुष द्वारा हुई है, ऐसा मानते हो? या क्रमसे रखे गये (पौर्वापर्ययुक्त) वाक्योंकी रचना पुरुष द्वारा हुई, ऐसा मानते हो? [वेद शब्दार्थ तथा उनका सम्वन्ध और पौर्वापर्यविशिष्ट वाक्य दोनों रूपवाला है, इनमें किस रूपकी रचना पुरुष द्वारा मानते हो ?' प्रथम पक्ष माननेमें मी जीव तो उसकी रचनाके कर्ता हो नहीं सकते। यदि जीव कर्वा माना जाय, तो कोई जीव समुद्रका वोध करानेकी इच्छा करके मेरुश्दको मी समुद्ररूप अर्थका वाचक बनाकर उसे प्रयोगमें लावेगा, कारण कि वह शब्दार्थसम्बन्धकी रचनामें स्वतन्त्र है। ईश्वरको भी कर्ता नहीं मान सकते, कारण कि शब्दार्थसम्वन्धमें अनुमानसे मनादित्व सिद्ध होता है। अनुमानप्रयोग इस प्रकार है-'कल्पादिकालोंमें शब्दार्थसम्बन्वरूप व्यवहार पूर्व-पूर्व व्यवहारपरम्पराके अधीन है, अभिधान-अभिघेय-व्यवहार होनेसे, [अभिधान शब्द है और अभिघेय मर्थ है अर्थात् वाच्यवाचकव्यवहार ] इस कालमें होनेवाले वाच्यवाचकव्यवहारके तुल्य। 'जैसे वर्तमानमें घट- शब्दार्थसम्बन्ध अनादि है, वैसे ही आदि कालमें भी अनादि ही था। डित्थ आदि संज्ञाशव्दोंमें इसका व्यभिचार नहीं दिया जा सकता, कारण कि वे डित्थादि शब्द गावी आदि अपभ्रंशशब्दोंके तुल्य शन्दाभास माने गये हैं। [साधुशब्द नहीं माने जाते ] 'पररीत्या परो बोधनीयः' न्याय लेक्कर नैयायिक असाघुशन्दोंमें शक्ति नहीं मानते, अतः वे शन्दाभास माने गये हैं। [वस्तुतः डिस्थ आदि शब्दोंमें भी अनादि ही वाच्यवाचकभाव है, इसलिए कोई व्यमिचार नहीं आता]। क्रमिक वाक्यरचनारूप द्वितीय
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वदमें पौरुपेयत्वशङ्धाका परिहार। मापानुवादसहित ७२५
सृष्टिकालीनं चेदाध्ययनं पूर्ववेदाध्ययनानुस्मृतिनिवन्धनम्, वेदाध्ययनत्वाद्, ददानीन्तनवेदाध्ययनवत्, इत्यनादित्वसिद्धेः । न चैवं सर्वेष्यपि ग्रन्थेष्विद- मनादित्वं सुसाधमिति वाच्यम्, तैस्तैरेव ग्रन्थैस्तत्कर्तृणां अतिपाद- नात् तदागमविरोधाद। इहाऽपि श्रुत्यैव वेदस्य कर्ता प्रतिपाद्यत इति चेत्, किं हिरण्यगर्भविपयया 'इदं सर्वमसृजत ऋचो यजूँपि' इत्यादिश्ुत्या किं वेश्वर- विषयया 'अस्य महतो भृतस्य निःश्वसितम्, इत्यादिश्रुत्या ! नाऽडद्य, 'यो ब्रम्माणं विद्धाति' इत्यादिश्वतौ हिरण्यगर्भोत्पत्तेः प्रागेव वेदसद्ध्ावावगमात्। सतामेव वेदानां हिरण्यगर्भवुद्धौ प्राथमिक्माविर्भावमभिग्रेत्याऽसजतेति श्रुति- रप्युपपन्ना । न द्वितीय :: उपादानप्रकरणपठिता सा श्रुति: ईश्वरस्य वेदोपा-
पक्ष नहीं कह सकते, कारण कि 'सृष्टिकालका वेदाध्ययन पूर्वकालमें किये गये वेदा- ध्ययनके स्मरण द्वारा हुमा है, वेदाध्ययन होनेसे, वर्तमानकालके वेदाध्ययनके तुल्य' इस अनुमानके द्वारा पौर्वापर्यविशिष्ट वाक्यरूप वेदमें अनादित्व ही सिद्ध होता है। शक्का -- तत्र तो इस प्रकारका अनादित्व सभी अ्न्थोंमें सरलतासे सिद्ध किया जा सकता है। समाधान-उन्हीं अ्न्थोंसे अपने-अपने कर्ताओंका-रचयिताओंका-प्रतिपादन होनेसे उन अन्थरूप आगमोंसे विरोध आ जाता है। [ इसलिए सभी ग्रन्थ अनादि नहीं हो सकते] यदि कहो कि प्रकृतमें मी श्रुतिके द्वारा ही वेदके कर्ताका प्रतिपादन किया जाता है, तो यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि यहांपर प्रश्न होगा कि क्या हिरण्यगर्भको विषय करनेवाली 'इस सबको रचा तथा ऋक् और यजुर्वेदको-'इत्याद- र्थक श्रुतिसे उसका प्रतिपादन होता है: अथवा ईश्वरका निर्देश करनेवाली 'इस महान ईश्वरका यह निःश्चास है-' इत्यादर्थक श्रुतिसे ? इनमें प्रथम पक्ष नहीं माना जा सकता, कारण कि 'जो त्रक्ष हिरण्यगर्भको रचता है'-इत्याद्यर्थक श्रुतिसे हिरण्य- गर्भकी उत्पत्तिसे पहले मी वेदके सद्भावका बोध होता है। पूर्वसिद्ध वेदोंका ही हिरण्यगर्भकी-त्रह्माकी-बुद्धिमें सबसे पहले प्रादुर्भाव हुआ, इसलिए 'असृजत' (चनाया) यह श्रुति भी उपपन्न हो गयी। [हिरण्यगर्भने ही वेदका प्रथम दर्शन (ज्ञान) पाया, इसलिए उपचारतः 'हिरण्यगर्भने वेदको बनाया' ऐसा श्रुतिमें कहा गया है, नृतन रचना नहीं कही गयी है] दूसरा-ईश्वरको विषय करनेवाली श्रुतिके द्वारा कर्ताका निर्देशरूप-पक्ष भी साधक नहीं है, कारण कि उक्त श्रुति उपादान-
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७२६ विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ३, वर्णक ?
दानत्वमेव ब्रूते न तु चेदकर्तृत्वमपि। ईश्वरोपादनत्वमपौरुपेयत्वं च विरुद्धमिति चेद्, न; एतादशापौरुपेयत्वस्याऽङ्गीकृतत्वात्। भारतादीनां व्यासादिभिर्मानान्तरेणारडर्थ बुद्धा रचितत्वं पोरुपेयत्वम्। ततो मूल- प्रमाणापेक्ष तत्प्रामाण्यम्। वेदो नार्थ बुद्धा रचितः, असर्वज्ञवचनत्वाभावे सति धर्माधर्मन्रह्मप्रमाणत्वात्, परपरिकल्पितेश्वरवुद्धिवद्। तथा च ब्रह्मकार्यस्याऽपि वेदस्य स्वतःसिद्धप्रमाण्ये न काचिद्धानिः। ननु प्रमाणदष्टवादी ह्याप्त:, तद्दृष्टस्योत्प्रेक्षितस्य च क्ता नाऽडस:। तथा च चेदो न प्रमाणम्, आप्ताप्रणीतवाक्यत्वाद्, उन्मत्तवाक्यवत्, इति चेद्, कारणके प्रदर्शक प्रकरणमें पढ़ी गई है, इसलिए ईश्वर वेदका उपादान कारण है, ऐसा ही कहती है, वेदका कर्ता है, ऐसा नहीं कहती है। ईश्वरोपादानकत्व और अपौरुषेयत्व दोनोंका एक स्थलमें होना विरुद्ध है[ पुरुषप्रणीत कार्यका ही उपादान कारण होता है, इसलिए सोपादानक पदार्थको पुरुषप्रणीत कार्यके विरुद्ध अपौरुपेय नहीं कह सकते ], ऐसा भी नहीं माना जा सकता, कारण कि इस प्रकारका अपौरुषेयत्व-व्रह्मोपादानकत्व होते हुए भी पुरुषप्रणीतत्वका न होना-स्वीकार ही करते हैं, [ इसलिए अपौरुषेय होनेसे वेदोंका स्वतःप्रामाण्य है और जो पुरुष- प्रणीत हैं, उनका परतःप्रामाण्य होता है। ] जैसे'-भारत आदि ग्रन्थोंका प्रणयन श्रीव्यासजीने दूसरे वेदादि प्रमाणों द्वारा अर्थका निश्चय करके किया है, इसलिए वे अ्रन्थ पौरुषेय माने जाते हैं। अतः मूल (जिसके द्वारा अर्थ ज्ञान करके ग्रन्थोंका प्रणयन किया गया हो, ऐसे) प्रमाणकी अपेक्षा करके उनका प्रामाण्य माना जाता है। 'वेद अर्थज्ञानपूर्वक रचित नहीं है, असर्वज्ञवचन न होता हुआ धर्माधर्ममें प्रमाणस्वरूप होनेसे, नैयायिक आदि दूसरे वादियोंके सम्मत ईश्वरकी बुद्धिके समान'। [इस अनुमानसे वेदमें भारतादिसे वैलक्षण्य सिद्ध होता है ] इसलिए ब्रह्मका कार्य होनेपर भी वेदके स्वतःसिद्ध प्रामाण्य माननेमें कोई हानि नहीं है। शक्का-प्रमाण द्वारा निश्चित अर्थका वक्ता ही आप (शिष्ट) कह- लाता है, प्रमाणोंसे अनिश्चित केवल अपनी करपनासे कल्पित अर्थका वक्ता आप नहीं कहलाता. है। इसलिए प्रमाणदष्ट अर्थका वक्ता न होनेसे वेद प्रमाण नहीं माना जा सकता, क़ारण कि वह आस पुरुष द्वारा नहीं बनाया गया है, उन्मत् पुरुषके वाक्यके तुल्य।
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वेदमें पारुषयेत्वशङ्काका परिहार] मांपानुवादसहित ७२७
मैवम् ; वेद: प्रमाणम्, अनाताग्रणीतवाक्यत्वात्, मन्वादिवाक्यवत्, इत्यपि प्रयोगाद। कथ तर्हिं निर्णय इत्युच्यते-प्रामाण्यं स्वतःसिद्धमप्रामाण्यं तु कार- णदोपादिति ह्यस्मत्सिद्धान्तः । अत्रोन्मत्तवाक्यस्य आ्रन्त्योत्प्रेक्षया वा डुएं ज्ञानं सूलम्, इत्यप्रामाण्यमुचितम्। मन्वादिवाक्यस्य स्वत एव ग्रामाण्ये सत्याप्प्रणीतत्वाख्यो गुणोऽपि प्रतिवन्धककारणदोपनिवारक- तयोपयुज्यते। वेदस्य तु प्रतिवन्धासंभवादन्तरेणैव गुणं स्वतः प्रामाण्यं सिध्यति। नन्वाप्तग्रयोगानपेक्षत्वे स्मर्यमाणेनाऽपि घटशव्देन घटः अ्रमी- येत? ग्रमीयतां नाम, यत्र-कुत्रचित् पुरोवतिनि तु घटरहिते स्थले ग्रमाणा- न्तरविरोधाद् न ग्रमास्यते।
समाधान-नहीं, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि प्रतिपक्षी अनुमानसे वेदका प्रामाण्य सिद्ध हो सकता है। [अनुमानप्रयोग दिखलाते हैं-] वेद प्रमाणभूत है, क्योंकि वह अनाप्तसे नहीं बनाया गया है, मनु आदिके वाक्यके समान। तब निर्णय कैसे होगा : ऐसी जिज्ञासा होनेपर निर्णयका प्रकार कहा जाता है-वेदका प्रामाण्य तो स्वतःसिद्ध है और अप्रामाण्य कारणके दोपसे होता है, यह हम वेदान्तियोंका सिद्धान्त है। इसमें उन्मतवाक्यका मूलभूत ज्ञान भ्रम तथा कल्पना रूपसे दोपसे युक्त है, इसलिए उसको अप्रमाण मानना उचित है। यद्पि मनु आदिके वाक्यका प्रामाण्य स्वतः ही सिद्ध है, तथापि आप्त द्वारा रचितत्वरूप गुण मी प्रामाण्यके प्रतिबन्धक दोषके निवारणका हेतु होनेसे वह प्रामाण्यबोधनमें उपयुक्त होता है। परन्तु वेदमें तो किसी प्रतिवन्धकके न होनेसे गुणके बिना ही प्रामाण्य स्वत :- सिद्ध होता है। शक्का-यदि आसप्रयोगकी अपेक्षा न होगी, तो स्मृत घटशब्दसे भी घटकी प्रमा-निश्चय-हो जायगी। समाधान-उस स्थलमें निश्चय हो जाय, कोई हानि नहीं है, परन्तु घटशुन्य किसी भी सामनेके स्थानपर दूसरे प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके साथ विरोध आनेसे। 'स्मरणविषयीभूत शब्दसे' घटकी प्रमा न होगी, [इसलिए प्रमाजनक आतो- पदेश आवश्यक होता है ।।
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७२८ विचरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र ३ै, वर्णक ₹
अथ मतं कस्यचित्कदाचिद्सति अ्रमाणान्तरोदये तस्मिन्नपि स्थले घटः स्मर्यमाणशव्दाद ग्रमीयते, तर्ह्याप्तप्रयोग एव ग्रामाण्ये हेतुरस्तु। स च प्रयोगो द्वेधा निष्पद्यते-मन्वादिवाक्यानि मानान्तरेणारडर्थमुपलभ्य प्रयुक्तानि। वेदवाक्यानि पूर्वपूर्वप्रयोगाननुस्मृत्य प्रयुक्तानि। उन्मच्वा- क्यानि पुनस्तदुभयाभावादग्रमाणान्येव। नन्वेवं वेदे ग्रामाण्यमन्धपरम्पसाग्रस्तं भवेदिति चेत्तर्हेंवं व्यवस्थाS- स्तु । स्मर्यमाणशव्देभ्यस्तात्पर्याभावाननार्डर्थप्रमितिः । वेदे पुनरध्ययन- विधितात्पर्यादासप्रयोगाभावेऽपि ग्रमितिरुत्पत्स्यत इति। न चा्ध्ययनविधि-
शङ्का-यदि कदाचित् किसी देशमें किसी कारणविशेपसे दूसरे विरोधी प्रामाणका उदय नहीं होगा, तो स्मरणविपयीमूत शब्द द्वारा घटादिकी प्रमा हो ही जायगी।
समाधान-उक्त अतिप्रसङ्नका वारण करनेके लिए आप् पुरुपके प्रयोगको ही प्रामाण्यमें कारण मानिये। और यह प्रामाण्यग्राहक आपप्रयोग दो प्रकारका होता है-एक तो प्रमाणान्तरोंसे अर्थज्ञान प्राप्तकर प्रयुक्त हुए मनु आदिके वाक्य अर्थात् मनुस्मृति आदि-स्मृतियाँ तथा पुराण-अ्न्थ और दूसरा पूर्व पूर्व कल्पके प्रयोगोंका स्मरण करके मयुक्त हुए वेदवाक्य। उन्मत्त वाक्योंमें उक्त दोनों प्रकारोंके न होनेसे वे तो अप्रमाण-प्रामाण्य- शून्य-ही हैं। शङ्का-इस रीतिसे तो वेदमें अन्धपरम्पराप्राप्त ही प्रामाण्य होगा। समाधान-इस दोपके वारणके लिए निम्न प्रकारकी व्यवस्था (निर्णय) भानिये। स्मरणके विपयभूत (स्मृतिमें आये हुए) शन्दोंसे अर्थका निश्चय नहीं हो सकता, कारण कि स्मर्यमाण शब्दोंमें कोई तात्पर्य नहीं रहता। वक्ताका ही तात्पर्य शब्दों द्वारा वोधित होता है, उसके वोधनमें उच्चरित शब्द ही समर्थ होता है, अनुच्चरित नहीं, परन्तु वेदमें तो अध्ययनविधिके द्वारा ही तात्पर्थकी प्रतीति हो जाती है, [अन्यथा तात्पर्यशुन्यके अध्ययन- विधानका कोई प्रयोजन ही नहीं रह जायगा ], इसलिए आपप्रयोगके न होनेपर भी प्रामाण्य-निश्चयजनकत्व-का उदय हो जायगा। अध्ययनविधि-
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वेदमें पौरुपेयत्वशङ्कका परिहारं] मापानुवादसहिते ७२९
वाक्यस्य तात्पर्याभाचादग्रामाण्यं शङ्कनीयम्, स्वेनैव्र तात्पर्यसिद्धेः। न चैवमात्माश्रयो दोप, शब्दशब्दवत्स्वपरनिर्वाहकेष्वविरोधात्। अतो ब्रह्मवद्वेदस्याऽपि पर्यालोचनायामनादित्वं पर्यवस्यति, न तु कालिदासदि- ग्रन्थवत्पौरुषेयत्वम् । न चानादित्वेऽपि पुराणवाक्यवदन्यथासंनिवेश- ग्रणयनं शङ्कनीयम्, नियतक्रमविशिष्टानामेव वर्णपदवाक्यप्रकरणका- ण्डादीनां वेदशव्दवाच्यानां कल्पादिप्रलययोरप्याविर्भावतिरोभावमात्रभाजां
तर्हि वेदो न ब्रह्मोपादान:, अनादित्वाद, कूटस्थनित्यत्वाच्च, ब्रह्मवदिति चेद्, स्वतन्त्रत्वोपाधिहतत्वात्। वेदस्तु ब्रह्मपरतन्त्र:, ब्रह्मण्यारोपितत्वाद्, वाक्यके तात्पर्यके अभावसे अपामाण्यकी शक्का नहीं की जा सकती, कारण कि स्वयं अपने ही द्वारा तात्पर्यकी सिद्धि हो जाती है। इसी प्रकार आत्माश्रय दोप भी नहीं देना चाहिए, क्योंकि शब्द-शब्दकी भाँति अपने * तथा दूसरेके निर्वाहकोंमें आत्माश्रय दोपसे विरोध नहीं आता। [जैसे शब्द- शब्द अपने स्वरूपका भी स्वयं ग्रह कराता है और घट, पट आदि दूसरे शब्दोंका भी बोध कराता है। ] इससे ब्रह्मके समान वेदमें भी, विचार करनेपर, अनादित्व निश्चित होता है, कालिदास आदिके बनाये हुये अन्थोंके सदश पौरुपेयत्व सिद्ध नहीं होता। अनादि माननेपर भी पुराण- वाक्योंके सदश पौर्वापर्यक्म तथा पदोंका परिवर्तन करके पुरुष द्वारा उनकी रचनाकी आशक्का नहीं की जा सकती, कारण कि निश्चित पौर्वापर्यक्रमसे युक्त वर्ण, पद, वाक्य, प्रकरण तथा काण्ड आदि ही वेदशव्दके अर्थ हैं, इसलिए वे कूटस्थ नित्य माने गये हैं। केवल करपके आदिमें वेदका प्रादुर्भाव और पलयकालमें तिरोभावमात्र होता है [ अर्थात् वेद उत्पत्ति और विनाशसे रहित हैं याने वेदका वर्णादिमें से कोई भी क्रम नहीं वदल सकता। यथानुपूर्वीसे ही वेदका प्रादुर्भाव होता है, अतः उसमें पौरुपेयत्वकी किसी प्रकार भी आशका नहीं हो सकती ]। शक्का-तव तो 'वेद नहोपादानक अर्थात् ब्रक्षकार्य नहीं हो सकता, अनादि और कूटस्थ नित्य होनेसे, ब्रह्मके तुल्य' इस अनुमानसे वेदका उपादान ब्रह्म नहीं हो सकता। समाधान-उक्त अनुमान स्वतन्त्रत्वरूप उपाधि दोपसे दृषित् है।
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७३० [सूत्र ३, वर्णक २
यथा रज्ज्वामारोपितो रज्जुतन्त्र: सर्पः । ननु रज्जुसर्पवद्वेदस्य कथं मिथ्यात्वमुच्यते १ निर्वक्तुमशक्यत्वादिति जरूम:। तथाहि-कि वर्णमात्रं वेद: किं वा क्रमसहिता वर्णाः१ नाऽऽद्यः, अक्रमव्युत्क्रमोच्चारितेषु वर्णपु वेदवुद्धभावात् । द्वितीयेऽपि स क्रम: किं वर्णनिष्ठ उच्चारणनिष्ठो वा उपलब्धिनिष्ठो वा १ वर्णनिष्ठत्वेऽपि तावत्क्रमो न देशकृत: संभवति, वर्णानां सर्वगतत्वात्। नाऽपि कालकृत:, नित्यत्वात्। नाऽपि वस्तुकृतः, विरोधात्। नहेकदैव राजा जारेति जकारस्य पूर्वापरभावो युक्त:। नाऽप्युच्ारणनिष्ठः क्रमो वर्णेषूपरज्यते, उच्चारणतत्क्रमयोः श्रोत्राविषयत्वात्। वेदस्तु वर्णात्मा श्रोत्रग्राह्यः उपलब्धिनिष्ठोऽपि किं वर्णानां धर्म उत वर्णेष्वारो-
दृष्टान्तभूत ब्रह्म स्वतन्त्र है, पक्षमूत वेद स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि वह उपादानभूत ब्रह्ममें आरोपित है, जैसे उपादानस्वरूप रज्जुमें आरोपित रज्जुसर्प रज्जुके अधीन है। शक्का-वेदको रज्जुसर्पकी भांति मिथ्या पदार्थ कैसे कहते हैं ? समाधान-निर्वचन करना सम्भव न होनेसे मिथ्या कहा जा रहा है, ऐसा हमारा कहना है, [निर्वचनका असम्भव दिखलाते हैं-] क्योंकि क्या केवल वर्ण ही वेद हैं? अथवा क्रमविशिष्ट वर्ण वेद हैं? प्रथम कल्प नहीं हो सकता, कारण कि क्रमके बिना तथा उलट-पुलट उच्चारण किये गये वर्णोंमें वेदबुद्धि नहीं होती है। दूसरे पक्षमें मी क्या वह क्रम वर्णोंमें है? या उच्चारणमें: अथवा उपलब्धि (श्रावण प्रत्यक्ष) में ? वणोंमें माननेसे भी वह क्रम देशकृत नहीं हो सकता, क्योंकि वर्ण सर्वत्र व्याप्त हैं। कालकृत भी नहीं हो सकता, क्योंकि वर्ण नित्य हैं। वस्तु द्वारा भी नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें विरोध आता है, कारण कि एक ही समयमें राजा-इस क्रमसे युक्त वर्गोमें-जार ऐसा जकारका आगे पीछे चला नाना युक्तियुक्त नहीं है। उच्चारणमें विद्यमान क्रम व्णोंमें सम्बन्ध नहीं कर सकता, क्योंकि उच्चारण और उच्चारणका क्रम श्रोत्रेन्द्रियका विषय नहीं है। [ वर्ण ही कानके विषय होते हैं, क्रियात्मक उच्चारण नहीं ] और वेद तो वर्णस्वरूप और श्रोत्रेन्द्रियग्राह्य है। उपलब्धिमें विद्यमान भी क्या
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वह्षमें वेदोप्रादानत्व-प्रयुक्त सर्वज्ञत्व] मापानुवादसहित ७३१
प्यते किं वा वर्णानायुपलक्षणम्: नाऽऽद्य: अन्यनिष्ठस्याऽन्यघर्मत्वा- नुपपत्तेः । द्वितीयेऽप्यख्यातिवादिनः क्रममात्रस्य वा चर्णमात्रस्य वा वेदशव्दानर्हत्वाद् विशिष्टप्रत्ययस्याऽनङ्गीकाराद् अविवेकमात्रमेव वेद इति अथीववोधो न स्यात्। अन्यथाख्याती पुनर्विशिष्टप्रत्ययस्याS- नङ्गीकाराद्, (अविवेकमात्रत्वात्) विशिष्टार्थस्य चाऽभावाद् ज्ञानातिरिक्तों वेदो न स्याद। न तृतीय:, क्रमविशिष्टवर्णप्रत्ययस्य प्रत्यक्षत्वाद्।
वर्णोंका धर्म है अथवा वणोंमें आरोपित किया जाता है: अथवा वर्णोंका उपलक्षण है : इनमें ग्रथम पक्ष नहीं मान सकते, कारण कि अन्यमें रहनेवाला अन्यका धर्म नहीं हो सकता। दूसरे पक्षके माननेमें भी क्रम- मात्र या वर्णमात्र वेद नहीं माना जाता और अख्यातिवादी- मीमांसकके मतमें विशिष्टज्ञान माना नहीं गया है। अतः अविवेक- मात्र ही वेद कहलायेगा, उससे अर्थबोध नहीं हो सकेगा। [ यदि वर्णोंमें उपलव्धिगत क्रमका आरोप माना जाय, तो वह अन्यमें अन्य धर्मका प्रतिभास होनारूप भ्रमज्ञान होगा-और अख्यातिवादी मीमांसक उक्त लक्षणलक्षित अमको परोक्षापरोक्ष दोनों ज्ञानोंका विवेक न होना रूप ही मानता है, जैसे कि प्रथम वर्णकके अध्यासवादमें स्पष्टरूपसे दिखलाया गया है। इससे अति- रिक्त विशिष्ट एक ज्ञान नहीं मानता ]। अन्यथाख्यातिवादीके-विज्ञानवादी बौद्धैक- देशी, अथवा नैयायिकके-मतमें यद्यपि विशिष्ट ज्ञानका अङ्गीकार है, [तथापि वह ज्ञान तो अ्ममात्र है।] अतः उक्त विशिष्ट अर्थका अभाव होनेसे विज्ञानसे अतिरिक्त वेद और कुछ न होगा। [बौद्ध आन्तर विज्ञानमय वस्तुका धर्मभूत अनादि वासनासे आरोपित वाह्य वस्तुमें प्रतीत होनेवाले 'इदमिदम्' इत्यादि विशिष्ट ज्ञानको भ्रम मानता है और नैयायिक पुरोवर्ती शुक्ति आदिमें आपणस्थ रजत आदिमें रहनेवाले रजतत्वकें आरोप द्वारा उत्पन्न 'यह रजत है' इस विशिष्ट ज्ञानको भ्रम मानते हैं। दोनोंके मतमें बाह्यार्थ शून्य ही अ्रमात्मक विशिष्ट ज्ञान होता है, सामने देशमें वास्तविक बाह्य वस्तुका अभाव ही है। इसलिए यह दूसरा आरोप पक्ष अन्यथाख्याति या अख्याति किसी मतमें मी नहीं वन सकता, इसलिए परिशेपात उसे अनिर्वचनीय ही मानना होगा ]। तीसरा पक्ष-उपलक्षण मानना-भी उचित नहीं है, कारण कि क्रमविशिष्ट
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७३२ विवरणप्रमेयसंग्रद्द [ सूत्र ३, वर्णक ₹
अतोऽनिर्वचनीयो वेदः। अनिर्वचनीयस्यापि तुच्छव्यावृत्तत्वात् देहात्म- वदर्थक्रियासामर्थ्यमविरुद्धम्। तदेवं व्रह्मविवर्ततयाऽकार्यस्याऽपि वेद-
निष्पाद्यत्वाभावान्न पौरुपेयत्वदोपः, सर्वार्थप्रकाशकवेदोपादानस्य न्रह्मण उपाध्यायवैलक्षण्यादसर्वज्ञत्वदोपोऽपि न । न च न्रह्मणः सर्वप्रकाशस्य सर्वसंसर्गित्वादेव सर्वज्ञतासिद्धौ वेदोपादानत्वेन तत्साधनं व्यर्थमिति वाच्यम्, वाय्वाकाशरसगन्धादिसंसर्गिणः सवितकिरणस्य तत्प्नकाशकत्वा वर्णोंका ज्ञान प्रत्यक्ष होता है। उपलक्षण वह माना जाता है जो कदाचित् रहा हो और इदानीं न रहता हुआ भी परिचायक हो। प्रकृतमें वर्णके साथ क्रमका सम्बन्ध ऐसा नहीं माना जा सकता, क्योंकि वेदमें सर्वदा क्रमविशिष्ट ही वर्ण रहते हैं, क्रमशून्य वर्ण कभी भी नहीं रहते, जिससे क्रम उपलक्षण * माना जाय। इन सव कारणोंसे चेद अनिर्वचनीय है। अनिर्वचनीय होते हुए भी वेदके तुच्छ-वन्ध्यापुत्र आदि अलीक- पदार्थोंसे विलक्षण तथा व्यावहारिक सचावान होनेसे देहमें आत्मा- भिमानके समान उसे व्यवहार करने करानेकी सामर्थ्यसे युक्त मानना कोई विरुद्ध नहीं है। इस प्रकार व्रह्मका विवर्तरूप कार्य (अतात्विक परिणाम) होनेसे तथा अकार्य-किसी पुरुप द्वारा नहीं रचे हुए-वेदमें अनादित्व और कूटस्थ नित्यताके सिद्ध होनेके कारण प्रमाणान्तरोंसे अर्थज्ञान प्राप्त करके पुरुषकी इच्छाके अनुसार वेदका रचा जाना नहीं हो सकता, इसलिए वेदमें पौरुषेय-पुरुषप्रणीत-होनेका दोष नहीं आ सकता। और सम्पूर्ण अर्थोंका- विषयोंका-प्रकाश करनेवाले वेदके उपादानस्वरूप व्रम्ममें उपाध्यायकी-आधु- निक गुरुकी-अपेक्षा विलक्षणता आनेके कारण असर्वज्ञ-अत्पज्ञ- होनेका दोष भी नहीं आता। स्वयंप्रकाश न्रह्मका सकल अर्थजातके साथ सम्बन्ध होनेसे सर्वज्ञ होना सिद्ध हो ही जाता है, पुनः शास्त्रयोनित्व- वेदोपादानत्व-रूप हेतुके द्वारा उसका समर्थन करना व्यर्थ नहीं कहा जाना चाहिए, कारण कि वायु, आकाश, रस, तथा गन्ध आदि पदार्थोंके * 'यावत्कार्यमवस्थायिमेदे हेतोरुपाधिता। कादाचित्कतया मेदघीहेतुरुपलक्षणम्" यावत्कार्य पर्यन्त मेदका कारण अनन्वयी होता हुआ उपाधि कहलाता है। और यदि कादाचित्क मेदका कारण हो तो उपलक्षण कहलाता है।
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सर्वोपादानत्वरूपसे वहमें सर्वज्ञत्व] भापानुवादसहित ७३३
दर्शनात्। तस्मात् सर्वार्थप्रकाशनसमर्थसर्ववेदोपादानतयैव सर्वज्ञत्वं साध- नीयमिति सूत्रकाराभिग्रायः।
इति श्रीविद्यारण्यमुनिप्रणीते विवरणप्रमेयसङ्गहे तृतीयसूत्रस्थ प्रथमं वर्णकं समाप्तम्।
साथ सम्बन्ध रखनेवाली सूर्यकी किरण उन वायु आदि पदार्थोंकी प्रका- शक हो, ऐसा नहीं देखा गया है। [अतः सर्वरससर्गित्वमात्रसे सर्वज्ञत्व-सर्व- प्रकाशकत्व-सिद्ध नहीं हो सकता] इसलिए सम्पूर्ण विषयोंके प्रकाशनमें- ज्ञान करानेमें-समर्थ सम्पूर्ण वेदका उपादान होनेसे ही सर्वजताका साघन करना चाहिए, ऐसा सूत्रकारका अभिप्राय है।
इति श्री पं० ललिता प्रसादडवराल-विरचित-विवरणोपन्यास- भापानुवादमें तृतीयसूत्रका प्रथम वर्णक समाप्त।
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७३४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ३, वर्णक २
अथ तृतीयसूत्रे द्वितयिं वर्णकम् अथवा द्वितीयसूत्रे लक्षणमभिधायाऽनेन प्रमाणं प्रतिज्ञायते-शास्त्र- योनित्वादिति, वेदग्रमाणकत्वादित्यर्थः। अनेकार्थसूचकत्वं सूत्रस्याऽलङ्कारो न वाक्यदोपमावहति, विश्वतोमुखमिति सूत्रलक्षणे दर्शनात्। त्रह्मग्रमा- पकं च वेदवाक्यं 'यतो वा इमानि' इत्यादि। यद्यप्येतत्पूर्वसूत्र एचोदाहृतं तथाप्येतत्सूत्रवैयर्थ्य नाडस्ति, एतत्सूत्रप्रतिपाद्यं शास्त्रकवेद्यत्वं ब्रह्मणोऽ- भिलक्ष्य पूर्वसूत्रस्याऽडगमग्रथने तात्पर्याभिधानात्। अन्यथा पूर्वसूत्रस्य युत्तयुपन्यासमात्रे तात्पर्य को निवारयेत् १ युक्त्युपन्यासमात्रत्वे च प्रतिकायं
तृतीय सूत्रका द्वितीय वर्णक [पूर्व वर्णकमें वेदका उपादान कारण होनेके कारण ईश्वर सर्वज्ञ है, ऐसा सिद्ध किया गया, अब द्वितीय सूत्र ही से लक्षणप्रतिपादन द्वारा सर्वज्ञताकी सिद्धि माननेपर भी वस्तुकी सिद्धिके लिए प्रमाणकी भी आवश्यकता होती है, क्योंकि 'लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः', ऐसा न्याय हे, इसलिए इस द्वितीय वर्णकसे तृतीय सूत्रका तात्पर्य दिखलानेके लिए कहते हैं-] अथवा दूसरे सूत्रमें लक्षण दिखलाकर इस तीसरे सूत्रसे प्रमाणकी प्रतिज्ञा करते हैं-शास्त्र योनि याने पमाण होनेसे अर्थात् ब्रह्ममें चेद प्रमाण होनेसे, ऐसा अर्थ हुआ। सूत्रका यह भूपण ही है कि वह अनेक प्रकारके अर्थोका सूचन करे, इससे सूत्रमें (अनेकार्थकत्वरूप) वाक्यदोष नहीं आ सकता, कारण कि सूत्रके लक्षणमें 'विश्वतोमुख' चारों ओर दृष्टि रखनेवाला (अर्थात् अनेक अर्थोका सूचन करनेमें समर्थ), ऐसा विशेषण देखा गया है। ब्रह्ममें प्रमाणभूत वेदवाक्य 'यतो वा इमानि' (जिस न्रह्मसे यह सब भूत) इत्यादि लेने या समझने चाहिए। यद्यपि 'यतो वा' इत्यादि वेदवाक्य उदाहरणरूपसे पूर्व सूत्रमें ही दिखलाये गये हैं, तथापि इस सूत्रको (पुनः इन वाक्योंको दृष्टान्त देनेके लिए) निष्प्रयोजन नहीं मान सकते, कारण कि ब्रह्मका केवल शास्त्र द्वारा ही बोध होता है, इंस प्रकार इस तीसरे सूत्रके प्रतिपादनीय विषयको लक्ष्य करके ही पूर्व सूत्रका 'यतो वा'-इत्यादि श्रतिवाक्योंका उद्धरण करनेमें तात्पर्य है, अन्यथा पूर्व सूत्रका केवल युक्ति मात्र दिखलानेमें तात्पर्य हैं इस अतिप्रसभ्गका निवारण कौन कर सकेगा ? और
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सर्वज ब्रह्ममें शास्त्रेकगम्यत्व ] भापातुवादसहित ७३५
पृथक्कारणजन्यताया अपि संभवात्सर्वजं सर्वशक्ति व्रह्म जगत्कारण- मित्ययमर्थो न सिद्धेत्। न च वृहतेर्धातोरर्थानुगमात्तत्सिद्धि:, वृहत्यर्थ- वाचिनो त्रह्मशव्दस्याऽपि वेद एव प्रयोगात्। नहि लोके जगत्कारणे ब्रह्म- श्द: प्रयुज्यते। अतो जन्माद्यस्य यतः शास्त्रकप्रमाणं तद् ब्रह्मेत्येताव- दिदमेकं सूत्रम्, तावता युक्तिमात्रशङ्कानिवृत्तेः। पृथककरणं तु शास्त्रो- पादानत्वेन सर्वज्ञत्वं सुसंपादमिति व्याख्यानान्तरेण कथयेतुम्। तस्माजगजन्मादिनिमित्तोपादानकारणं सर्वज ब्रह्म शासत्रकगम्यमिति सूत्रद्वयेन सिद्धम्। तत्र विम्बस्थानीयं न्रह्म मायाशक्तिमत्कारणं जीवाथ् प्रत्येकमविद्या-
केवल युक्तिके प्रदर्शनमें तात्पर्य माननेसे तो प्रत्येक कार्यके पृथक्-पृथक् कारणोंसे उत्पन्न होनेका मी सम्मव होनेसे 'सर्वज्ञ, सकल शक्तिशाली एक व्रह्म ही सम्पूर्ण संसारका कारण है' इस अमीष्ट अर्थकी सिद्धि नहीं हो सकेगी। वृदि धातुके अर्थानुगम द्वारा मी उक्त अर्थकी सिद्धि नहीं हो सकती, कारण कि वृहि धातुके अर्थके वाचक न्रहमशन्दका प्रयोग मी तो वेदमें ही आया है। संसारके कारणभूत किसी वस्तुके लिए लोकमें ब्रद्मशब्दका प्रयोग नहीं किया जाता है, इसलिए 'जिसके द्वारा इस विश्वके जन्म आदि होते हैं, वह ब्रक्म केवल शास्त्रपमाणक है' इतने ही अर्थमें तात्पर्य रखनेवाला यह एक तीसरा सूत्र है। इससे युक्तिमात्रकी शक्का निवृत्त हो जाती है। पृथक् सूत्र करना तो शास्त्रोपादानत्वरूप हेतुसे ब्रह्मके सर्वज्ञत्वका भली भाँति संपादन किया जा सकता है, ऐसा दूसरे व्याख्यानसे कहनेके लिए है। इस निष्कर्पसे संसारके जन्म आदिका निमित तथा उपादान-कारणभूत सर्वज्ञ ब्रह्म केवल शास्त्र द्वारा जाना जा सकता है, ऐसा अर्थ दोनों सूत्रोंसे सिद्ध होता है। [ एक शुद्ध व्रह्ा मायावश जगद्रूपमें परिणत होता हुआ कारण माना जाय, तो विद्याके उत्पन्न होनेपर अविद्याका चिनाश हो जानेसे संसारकी निवृत्ति हो जानी चाहिए, इससे एककी ही मुक्तिसे सबकी मुक्ति होगी, इस अतिप्रसन्नका वारण करनेके लिए मतमेद दिखलाते हैं-] बिम्बस्थानीय माया- शक्तिशाली जह् प्रपश्चका कारण है और प्रत्येक जीव अपनी-अपनी (प्रारब्ध कर्मोपार्जित) अविद्यासे घिरे हैं, [इससे जिसमें विद्याका उदय होगा उसीमें
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७३६ विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ३, वर्णक २
नुबन्धा इति केचित्। मायाविद्याप्रतिविम्वितं जगत्कारणं विशुद्धव्रह्मामृतत्वालम्बनं जीवा- थ्राऽविद्यानुवन्धा इत्यन्ये। प्रथमे पक्षे मायाविद्ययोर्भेद: ब्रह्मणश्च न प्रतिविम्बता द्वितीये तु तद्वपरीत्यमिति विशेष:। ब्रह्मसिद्धिकारास्त्वेवमाहु :- जीवा एव स्वाविद्यया अ्त्येकं अ्रप- श्राकारेण ब्रह्मणि विभ्राम्यन्ति, ब्रह्म तु मायाविशिष्ट विम्बरूपं प्रतिविम्ब- रूपं वा न जगत्कारणम्। यच्चया दष्ट तन्मया दष्टमिति संादस्तु बहुपुरुषावगत द्वितीयचन्द्रवत्सादश्यादुपपद्यते। अविद्याके नष्ट होनेसे उसका ही संसार विलीन होगा, सवका नहीं] ऐसा कोई वादी मानते हैं। दूसरे वादियोंका मत है कि मायारूप अविद्यामें प्रतिविम्वित ब्रह्म विश्वका कारण है और मायारहित शुद्ध न्रह्म अमृतत्वका-मुक्तिका- स्थान है और जीव अविद्या ही से आवृत रहते हैं। [ इस मतमें भी पूर्व मतकी भाँति अविद्याके नानात्वसे समाधान किया जाता है। दोनों मतोंमें भेद दिखलाते हैं-] प्रथम मतमें माया और अविद्यामें भेद माना गया है और व्रह्म प्रतिबिम्ब- रूप नहीं माना गया है। दूसरे मतमें तो इसके विपरीत है (अर्थात् माया और अविद्यामें भेद नहीं माना गया और न्रह्मका प्रतिविम्बरूप होना भी माना गया है)। [ब्रह्मसिद्धिनामक अन्थके रचयिताका (सुरेश्वराचार्यका) कहना है कि जीव ही अपनी-अपनी अविद्याके वलसे प्रत्येक घट, पट आदि रूप प्रपश्चके आकारसे ब्रह्मविषयक भरममें पड़े रहते हैं (अर्थात् अपनी अविद्या द्वारा ब्रह्मको प्रपश्चा- कारमें प्रकट करते हैं) मायाविशिष्ट विम्वरूप या प्रतिविम्बरूप ब्रह्म तो प्रपश्चका कारण नहीं है। [ इस मतमें भी अविद्याका नानात्व और प्रपश्न- भेदसे ही समाधान समझना चाहिए ]। [प्रपश्चभेद माननेमें अतिप्रसञ्नका समाधान करते हैं-] 'जिस (घटादि) को तुमने देखा उस (घटादि) को मैंने देखा' इस प्रकार संवाद-दोनोंके दर्शनके विषय घटादि प्रपञ्चमें एकताकी प्रतीति-तो अनेक पुरुषोंसे ज्ञात हुए दूसरे चन्द्रमाके तुल्य सादश्यमहिमासे होता है। [ जैसे सर्वसम्मतिसे चन्द्रमाका एक होना ही सिद्ध है, परन्तु
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वेद में पौरुपेयत्वकी आशङ्का] मापानुवादसहित ७३७
स्वरूपेणाऽघिष्ठानत्वमपेक्ष्य त्रह्मणो जगत्कारणत्वव्यपदेश इतीष्ट- सिद्धिकारा: प्रकारान्तरेण वर्णयन्ति। ब्रह्मैकमेव स्वाविद्यया जगदाकारेण विवर्तते स्वमादिवदिति। सर्वेऽप्येते सिद्धान्ता:, प्रक्रियाणां तत्वाववोधाय कल्पितत्वादिति सर्वं निर्मलम्। इंति श्रीविद्यारण्यमुनिप्रणीतविवरणप्रमेयसंग्रहे तृतीयसूत्रस्य द्वितीयं चर्णकं समासम्। इति तृतीयसूत्रम्।
पुरुपके अक्षिगत दोषके कारण कभी कभी दो चन्द्रमा दिखलाई पड़ते हैं। वह दूसरा चन्द्रमा केवल दोपसे कल्पित है और दोप सबके पृथक-पृथक् हैं, इसलिए उन पृथक्-पृथक् दोपोंसे कल्पित चन्द्रमा भी पृथक्-प्रथक ही हैं, परन्तु सादश्यके वलसे संवाद हो जाता है एवं प्रतिपुरुषस्थ पृथक्-पृथक् अविद्यासे पृथक्-प्ृथक जीवोंने अपने आपमें घट, पट आदि विश्वकी करपना की, परन्तु उनमें सादश्यकी महिमासे ही संवाद-व्यवहार-हो जाता है। इष्टसिद्धिकार पूर्वोक्त मतका ही दूसरे प्रकारसे वर्णन करते हैं-] स्वरूपतः अघिष्ठानत्वकी अपेक्षा करके ब्रह्म विश्वका कारण है, ऐसा व्यवहार होता है। एक-अद्वितीय-ब्रक्ष ही अपनी अविद्याके द्वारा प्रपश्नके आकारसे विवर्तरूप परिणामको प्राप्त होता है, स्वप्नादिके तुल्य। [जैसे स्वप्न केवल मनका ही विवर्तरूप है, वैसे ही विश्व मी ब्रह्मका विवर्त है।] उक्त प्रकारके समी सिद्धान्त हैं, और उनकी प्रक्रियाओंकी कल्पना तत्त्वका-रहस्यका-ज्ञान होनेके ही लिए की गई है, अतः सब कुछ निर्मल-दोषरहित-है। [ इससे सिद्धान्तोंकी रीतिके भेदसे अद्वैततत्वमें हानि नहीं आ सकती, क्योंकि ये तो सब तत्त्वज्ञानके उपायभूत कलपनामात्र हैं, अतः उपायोंमें रहनेवाला भेद उपेयमें मेद नहीं ला सकता ।] इति श्री पं० ललिताप्रसादडबरालविरचितविवरणोपन्यास- भापानुवादमें तृतीय सूत्रका द्वितीय वर्णक समाप्त ।
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७३८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, चर्णक {
अथ चतुर्थ सूत्रम् तृतीयसूत्रे त्रह्मणि चेदान्ता: प्रमाणमिति ग्रतिज्ञातं चतुर्थसूत्रे तत्प्रा- माण्यसुपपाद्यते।
दनधिगतार्थत्वाभावाच न ब्रह्मणि वेदान्तग्रामाण्यं संभवति। सूत्रकारो हि जैमिनि: 'आम्रायस्य क्रियार्थत्वात्' इति सूत्रेणाSक्रियार्थानां वेदान्तानामानर्थ- क्यमेवाऽऽह। यद्यप्यादिमध्यावसानेपु वेदान्तानां व्रह्मैक्यतात्पर्यदर्शनाद् नाऽऽनर्थक्यसंभवस्तथापि न ग्रामाण्यं घटते। ब्रह्मचोधका वेदान्ता न ग्रमाणम्, मानान्तरयोग्यत्वे सति मानान्तरातुपलभ्यस्य ्रह्मणो बोधकत्वान्,
अथ चतुर्थ सूत्र तीसरे सूत्रमें प्रतिज्ञा की गयी कि तहमें वेदान्तवाक्य प्रमाण हैं, अब चतुर्थ सूत्रसे उन वेदान्तवाक्योंका प्रामाण्य सिद्ध किया जाता है। शङ्का-ब्रह्मका प्रतिपादन करनेमें वेदान्तवाक्योंका प्रामाण्य नहीं हो सकता, कारण कि सूत्रकार-पूर्वमीमांसाकार-जैमिनि मुनिके वचनसे विरोध आता है और सिद्धस्वरूप वस्तुका प्रतिपादन करनेके लिए अवसर ही नहीं आ सकता एवं उसका प्रतिपादन करनेसे कोई प्रयोजन-अमीष्ट-ही सिद्ध नहीं होता है। [ तथा उसका प्रतिपादन किन्हीं अपूर्व-प्रमाणान्तरोंसे अन्ञात विषयका प्रतिपादन स्वरूप नहीं होता। प्रामाण्व उन्हीं वाक्योंका माना जाता है, जिनमें उक्त दोष न आते हों। उक्त दोपोंका क्रमशः समन्वय करते हैं-] सूत्रोंके रचयिता जमिनि मुनिने 'शास्त्र क्रियाके लिए है' इत्याद्यर्थक सूत्रके द्वारा जो क्रियार्थक नहीं हैं उन वेदान्तवाक्योंको निरर्थक (प्रयोजनशुन्य) ही कहा है। यद्यपि आदि (उपक्रम), मध्य (अभ्यास) और अवसान (उपसंहार) में वेदान्तवाक्योंका न्रह्मकी अद्वितीयतामें तात्पर्य होनेसे वे निसर्थक नहीं हो सकते, तथापि उनका ( वेदान्तवाक्योका) प्रमाण होना संगत नहीं है, [कारण कि अनुमानसे उनका अप्रामाण्य सिद्ध होता है। अनुमानप्रयोग दिखलाते हैं-] 'ब्रह्मका वोध करानेवाले वेदान्त प्रमाण नहीं माने जा सकते, क्योंकि वे दूसरे प्रमाणोंके योग्य होकर
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पक्षमें वेदान्त प्रमाण नहीं हो सकते] भापानुवादसहित ७३९
यथा स्पर्शयोग्यस्य स्पर्शाऽनुपलभ्यस्य चित्रगतनिम्नोनवभावस्य बोधकं चाक्षुपज्ञानम्। न च विशेपणासिद्धिः, व्रह्म मानान्तरयोग्यम्, परिनिष्ठित- वस्तुत्वाद, घटादिवद्। न च ब्रह्मैकप्रमाणवेद्यम्, परिनिष्टितत्वात, गन्धा- दिवदिति वाच्यम्, चक्षु:स्पर्शनग्राह्येपु घटादिद्रव्येप्वनैकान्त्यात्। तथापि प्राभाकराभिमतं कार्य प्रमाणान्तरयोग्यम्, तुच्छव्यावृत्तत्वाद्, घटवत्, इत्याभाससमानत्वमिति चेट, न; परिनिष्टितत्वस्योपाधित्वात्। अनुमेय-
दूसरे प्रमाण द्वारा न जाने गए बस्के बोधक हैं, जैसे स्पर्श द्वारा जानने योग्य स्पर्श द्वारा न जाने जाते हुए चित्रमें दिखलाये गये निन्नोन्नतभाव-ऊँचाई- निचाई-का बोध करानेवाला चाक्षुप प्रत्यक्ष। [चाक्षुप प्रत्यक्षसे चित्रमें ऊँचाई- निचाईका ज्ञान दोता है और उँचाई-निचाई स्पर्शके योग्य भी है, परन्तु वह चित्रमें स्पर्शसे ज्ञात नहीं हो सकती। अतः चित्रमें चक्षुसे ऊँचानीचापनका देखना अ्रम है। यदि यथार्थ होता तो स्पर्शसे भी प्रतीत होता एवं सिद्ध वस्तुभूत त्रक्ष शव्दसे अतिरिक्त प्रमाणोंसे मी जाना जा सकता है, परन्तु जाना जा रहा है केवल वेदान्तरूप शब्द ही से, अतः तादृश शब्द प्रमाके जनक नहीं माने जा सकते, सिद्ध वस्तुको केवल शब्दैकगम्य मानना उचित नहीं है, अतः उसको प्रमाणान्तरयोग्य ही मानना चाहिए ] 'मानान्तरयोग्यरूप' विशेषणका न दो सकना भी नहीं माना जा सकता, कारण कि व्रक्ष प्रमाणान्तर योग्य-दूसरे प्रमाणोंसे ज्ञात होने योग्य-है, कारण कि वह घटादि पदार्थोंके सदश परिनिष्ठित-सिद्ध-वस्तुरूप है। 'व्रम्म केवल एक प्रमाणके ही द्वारा जाना जा सकता है, परिनिष्ठित होनेसे गन्ध आदि परिनिष्ठित पदार्थोंके तुल्य' ऐसा अनुमान मी नहीं हो सकता, कारण कि चक्षु और स्पर्शके द्वारा प्रतीत होने योग्य घटादि द्रव्योंमें व्यभिचार है। शक्धा-[ यद्यपि उक्त अनुमानसे सिद्ध वस्तुमें प्रमाणान्तरयोग्यता प्रतिपादित की गई-] तथापि (उक्त अनुमान) प्रभाकरानुयायियोंका सम्मत कार्य प्रमाणान्तर योग्य है, तुच्छसे पृथक् होनेसे, घट आदिके तुल्य, [ उसे घट आदि तुच्छ-वन्ध्यापुत्र आदि अलीक-पदार्थसे विलक्षण हैं, अतः प्रमाणान्तरयोग्य हैं, चैसे. कार्य भी हैं] इस अनुमानाभासके समान है (अर्थात् पूर्वोक्त अनुमान भी सदनुमान नहीं है)।
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७४० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक १
भविष्यद्वृष्ट्यादौ परिनिष्ठितत्वाभावान्न साध्यव्यासिरिति चेद्, एवमपि प्रमाणान्तरयोग्यत्वं प्रति प्रतियोग्यपेक्षस्य तुच्छव्यावृत्तत्वस्य प्रयोजकत्वे गौरवं तन्निरपेक्षस्य परिनिष्ठितत्वस्य प्रयोजकत्वे लाघवमिति नाऽस्त्येव साम्यम्। व्रह्म शब्दैकगम्यम्, रूपादिभिर्व्याप्तिग्रहादिभिश्च हीनत्वात्, परकीयकार्यवद्, इति चेट्, न; अनुभवगम्यताया अपि भवन्द्िरङ्गीकारात्। एवं च सति प्रथमानुमाने हेतुगतं मानान्तरानुपलभ्यस्येति विशेषणम- सिद्धमिति चेट्, न; अनुमातृणां ब्रह्मानुभवासिद्धौ विशेषणासिद्धेः। अतः
समाधान-इस अनुमानके तुल्य पूर्वोक्त अनुमान नहीं है, कारण कि इस अनुमानमें परिनिष्ठितत्वरूप उपाधि है (अर्थात् दष्टान्तभूत घटादि परिनिष्ठित मी हैं और प्रमाणान्तरयोग्य मी हैं, परन्तु कार्य परिनिष्ठित- स्वरूप नहीं है) । (उपाधिमें साध्यव्यापकत्वका व्यभिचार देते हैं-) अनुमानसे प्रतीत होने योग्य होनेवाली वृष्टि आदिमें परिनिष्ठितत्वके न होनेसे साध्यके साथ व्यापि नहीं है, इस प्रकार यदि कहा जाय, तो मी प्रमाणान्तर- योग्यत्वके प्रति प्रतियोगीकी अपेक्षा रखनेवाले तुच्छव्यावृत्त्वको प्रयोजक माननेमें गौरव है और प्रतियोगीकी अपेक्षासे शुन्य परिनिष्ठितत्वको प्रयोजक माननेमें लाघव है, इसलिए पूर्वोक्त अनुमानाभासकी समानता नहीं हो सकती। [ इस अनुमानमें प्राणान्तरयोग्यत्वका प्रयोजक तुच्छत्यावृत्तत्व कहा गया है, इसमें तुच्छव्यावृत्तत्वग्रहके लिए प्रतियोगिभूत तुच्छके ज्ञानकी अपेक्षासे गौरव होता है। और पूर्वोक्त अनुमानमें प्रकृत साध्यका प्रयोजक परिनिष्ठितत्वरूप हेतु है, इसमें प्रतियोगीके ज्ञानकी अपेक्षा न होनेसे लाघव है ] यदि 'ब्रम्म केवल शब्दप्रमाणसे ही प्रतीत होने योग्य है, कारण कि वह रूप आदि और व्याप्तिग्रह आदिसे रहित है, जैसे कि दूसरेके कार्य हैं' ऐसा कहा जाय, तो मी उचित नहीं है, कारण कि आप तो अनुभवयोग्य भी ब्रह्मको मानते हो। यदि कहो कि ऐसा-अंनुभवगम्य-माननेसे प्रथम अनुमानमें दिये गये 'मानान्तरसे न जानने योग्यरूप' हेतुके विशेषणकी सिद्धि नहीं हो सकती, तो ऐसा कहना भी नहीं बनता, कारण कि अनुमान करनेवाले वादीके मतमें ब्रह्मविषयक अनुभवकी सिद्धि न होनेसे उक्त विशेषणकी सिद्धि हो जाती है, इसलिए संवादक-सहश अर्थके प्रमांपक-मूल
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व्रसमें वेदान्त प्रमाण नहीं हो सकते ] भापानुवादसहित ७४१
पथमानुमानेन संवादकमूलप्रमाणरहितानां वेदान्तानामप्रामाण्यं सिद्धति। अपौरुपेयवचसां न मूलग्रमाणापेक्षेति चेत, सत्यम् ; तथापि 'अहं मनुष्यः' इति प्रत्यक्षेण वाधितत्वात् 'आदित्यो यूपः' इतिवद्प्रामाण्यमेव। उक्तप्रत्य- क्षस्य दोपजन्यत्वेन अृत्यवाधकत्वेऽपि सिद्धे ब्रह्मणि प्रवृत्तिनिवृत्ति- साध्येष्टपाश्यनिष्टपरिहाररूपप्रयोजनासंभवाद् तात्पर्यरहिता वेदान्ता नैव ग्रामाण्यं लभन्ते। अथोच्येत-न अयोजनं तात्पर्य वा प्रामाण्यप्रयोजकं किन्त्वनवग- तार्थचोधकत्वमिति। एवमपि मानान्तरायोग्यं कार्यमेव वेद: प्रमापयंतु न तु तद्योग्यं सिद्धं व्रह्म । तस्मादनर्थका वेदान्ताः। अध्ययनविधि- परिगृहीतानामग्नामाण्यमयुक्तमिति चेत्, तर्हिं कर्तरूपस्य जीवस्य देवता- रूपस्य त्रह्मणश्च प्रकाशकत्वेन क्रियाविधिशेपत्वमस्तु, तथा च मन्त्रा- र्थवादादिवत्प्रामाण्यं सेत्स्यतीति। न्रह्मविधायकत्वेनैव ग्रामाण्यमस्त्विति प्रमाणोंसे रहित वेदान्तवाक्योंमें प्रामाण्य सिद्ध नहीं होगा। यद्यपि यह कहा जा सकता है कि अपोरुपेय वाक्योंको मूल प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है, (वे तो स्वतः प्रमाण हैं) तथापि 'मैं मनुष्य हूँ' इस प्रत्यक्षसे बाघित होनेके कारण 'सूर्य यूप-स्तम्भ-है' इस प्रतीतिके समान इनका अप्रामाण्य ही हो जाता है। यद्यपि उक्त 'अहं मनुष्यः' यह प्रत्यक्ष दोषजनित होनेसे श्रुतिका वाधक नहीं हो सकता, तथापि सिद्धभूत व्रद्मका प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्ति और निवृत्तिसे साध्य इष्टपाप्ति तथा अनिष्टपरिहाररूप किसी भी प्रयोजनका सम्भव न होनेसे वेदान्तवाक्य तात्पर्यशुन्य होकर प्रामाण्यको नहीं पा सकते। यदि कहा जाय कि प्रयोजन या तात्पर्य प्रामाण्यका प्रयोजक नहीं है, किन्तु अनवगत-दूसरे प्रमाणोंसे अज्ञात-अर्थका बोधक होना ही प्रामाण्यका प्रयोजक है, तो भी प्रमाणान्तरके अयोग्य कार्यकी (कर्मकाण्डकी) ही वेद प्रमा करावेगा, प्रमाणान्तरके योग्य सिद्ध ब्रझ्मका निश्चयात्मक ज्ञान नहीं करा- बेगा, इसलिए वेदान्ववाक्य प्रयोजनशुन्य ही ठहरे। यदि कहो कि अध्ययनविघिसे प्रयुक्त हुए वेदान्तवाक्योंको अग्रमाण मानना युक्त नहीं है, तो कर्तास्वरूप जीव तथा देवतारूप व्रद्माके बोधक होनेसे वेदान्तवाक्योंको क्रियाविधिका (अनुष्ठानात्मक कर्मकलापका) अद्ग मानिये। इससे मन्त्र, और अर्थवादके वाक्योंके समान (विधिशेष होनेसे) उनका भी प्रामाण्य सिद्ध हो ९४
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७४२ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक ?
चेद्, न; क्रियाविषयस्य विधेः परिनिष्ठतवस्तुन्यसंभवात्। ननु न ताव द्वेदान्ता एकस्य विधेः शेषभूता:, 'सोरोदीत' इत्यादिवत्प्रकरणपाठा- भावात्। नाऽपि सर्वविधिसमूहस्य, भिन्नवस्तुप्रतिपादकानां सर्वविधी नामेकवाक्यत्वाभावात्। न च धर्मसामान्यसेकमेव सर्वविधिभिः ग्रति- पाद्यमिति वाच्यस्, सामान्यस्याऽनुष्ठानानर्हत्वात्। अथोच्येत यथा सर्वक्रतु- संवन्धिन्या जुह्ाः प्रकृतिद्रव्यं समर्पयत्पर्णमयीवाक्यमनारभ्याधीतमपि सर्वक्रतुवाक्यानां प्रत्येकं शेषभावं भजते तथा कर्तु: समर्पका वेदान्ता अपीति। नैतत्सारम्; निर्विशेषप्रधानैर्वेदान्तैरात्मनि स्तूयमाने प्रतिपाद्य- साने वा कर्मप्रवृत्तावनुपयोगात्। न चोपयोगः कल्पयितुं शक्य:, कर्तृत्वादिसर्वविशेषनिराकरणस्य प्रवृत्तिविरोधित्वात्। तस्मान्न क्रिया- जायगा। व्रह्मके विधायक मानकर (अर्थात् विघिशेष न मानकर) तो उनका प्रामाण्य नहीं वन सकता, कारण कि क्रियाकी विषयभूत विधि सिद्धस्वरूप वस्तुमें नहीं हो सकती। वेदान्तवाक्य किसी एक विधानके अङ्र तो नहीं माने जा सकते, कारण कि 'वह रोया' इत्यादयर्थक वाक्यके समान किसी प्रकरणमें उनका पाठ नहीं है। और सम्पूर्ण विघानोंके अङ्ग भी नहीं हो सकते, क्योंकि भिन्न-भिन्न वस्तुके प्रतिपादक सम्पूर्ण विधानोंकी एकवाक्यता नहीं होती। सम्पूर्ण विधियोंसे एक ही धर्मसामान्यका विधान भी नहीं मान सकते, कारण कि सामान्यका अनुष्ठान करना सम्भव नहीं हो सकता, [क्योंकि 'अभियुक्तोंका क्रथन है-'निर्विशेषं न सामान्यम्' अर्थात् विशेषके बिना सामान्य है ही नहीं । ] यदि कहा जाय कि जैसे सम्पूर्ण यागोंसे संचन्ध रखनेवाली जुहके प्रकृति-द्रव्यका-जिससे वह बनती है उस द्रव्यका-समर्पण करनेवाला 'यस्य पर्णमयी जुहूः' यह वाक्य प्रकरणके बिना यद्यपि पढ़ा गया है, तथापि सम्पूर्ण क्रतुवाक्योंमें वह प्रत्येकका अज्ञ होता है, वैसे ही यज्ञकर्ताका बोध करानेवाले वेदान्तवाक्य भी सब विधियोंके अङ्ग हो जायंगे, तो यह कहना भी सार- गर्भित नहीं है, क्योंकि निर्विशेषप्रधान (प्रधानतया विशेषशुन्यके प्रतिपादक) वेदान्तवाक्यों द्वारा स्तूयमान अथवा प्रतिपाद्यमान आत्मामें कर्मोकी प्रवृत्ति होनेपर कोई उपयोग नहीं आता। [कर्मोकी सफलता और अनुष्ठानयोभ्यता तो कर्ता तथा देवता दोनोंके सविशेष होनेसे ही हो सकती है]। उपयोगकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, कारण कि कर्तृत्व आदि सम्पूर्ण विशेषोंका
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ब्रह्ममे वेदान्त प्रमाण नहीं हो सकते] भांपानुवांदसहित ७४३
विधिशेषा वेदान्ताः। एवं तर्हिं सगुणोपासनाविविशेपा भवन्तु, न चैवं मन्तव्यम् ; उपासनाविधिशेपरपि वेदान्तैः सर्वज्ञत्वादिगुणविशिष्ट जगत्कारणं परि- निष्ठित ब्रह्मस्वरूपं न सिध्यति संचादकमूलप्रमाणाभावात्। अत उपास्या- सि्ौ कथमुपासनाविधि: दूरे तच्छेपत्वं वेदान्तानामिति अनुमानाद- निर्दिष्टविशेपे जगत्कारणेऽवगते तस्योपासनाविधौ नित्यशुद्धवुद्धसत्य- ज्ञानानन्तत्वाद्युपास्यगुणारोपेण वेदान्तानामन्वयात्। ननु वेदान्ताना- सुपासनाविधिपरत्वेन देवताकाण्डेऽन्वयस्तावन्नाऽस्ति, प्रकरणभेदात; स्वकाण्डे निराकरण करना प्रवृत्तिका विरोधी है। इसलिए वेदान्तवाक्य क्रियारूप विधिके अज्जभूत नहीं हो सकते। पुनः वादी अपने मतका समर्थन करता है कि वेदान्त क्रियाकलापात्मक विधिके शेप नहीं हो सकते हों, तो मत हों, परन्तु उन्हें सगुण उपासना (जो क्रियाकलापरूप नहीं है, किन्तु केवल बुद्धिपरिणाममात्र है) रूप विधिके अन्र माननेमें क्या हानि है ? समाधान किया जाता है कि ऐसा नहीं मानना चाहिए, कारण कि उपासनाविधिके अङ्गभूत वेदान्तवाक्योंके द्वारा भी सर्वज्ञत्व आदि गुणोंसे युक्त और विश्वके कारण सिद्धवस्तुभूत ब्रह्मका स्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें सम्मति देनेवाला (प्रमापक्) मूल प्रमाण नहीं है [मूल प्रमाणभूत वेदान्तवाक्य तो उपासना- विधिके अज्ञ हो जाते हैं, इसलिए उनको अतिरिक्त प्रधान ग्रमाणकी आवश्यकता होगी ] इसलिए उपास्य देवताकी सिद्धि न होनेसे ज उपा- सनाका विधान ही सक्कत नहीं हो सकता है, तब उस उपासनाविधिका वेदान्तोंको अङ्ग मानना तो दूर ही रहा (अर्थात नहीं वन सकता)। इसलिए विश्व-प्रपश्चका कारण विशेषशुन्य है, ऐसा अनुमानसे जान लेनेपर उसमें उपासनाविघिके उपयुक्त नित्य, शुद्ध, वुद्ध, सत्य, ज्ञान, अनन्तत्व आदि गुणोंके आरोपसे वेदान्त- वाक्योंका समन्वय होता है। [ तात्पर्य यह है कि उपासनाका अङ्र होनेसे ब्रह्म- स्वरूपकी सिद्धि नहीं की जा रही है, किन्तु अनुमान द्वारा ज्ञात उपास्यमें गुणोंके आरोप द्वारा वेदान्तोंका उपासनाविधिमें समन्वय किया जा रहा है]। इस प्रकारका समन्वय, उपासनाविधिपरक माननेसे, किया जाय, तो देवता- काण्डमें अन्वय तो भिन्न प्रकरण होनेसे हो नहीं सकता, केवल वस्तु
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1 ७४४ विवरणप्रमेयसंग्रहं [सूत्र 8, वर्णकं १
तु वस्तुमात्रपर्यवसायिनि न कोऽपि विधिः भ्यते। न च कल्पयितुं शक्यते, 'पूपा प्रपिष्टभागः' इत्यादौ द्रव्यदेवतासंचन्धवदत्र विधिकल्प- कस्याऽश्रुतत्वादिति चेद, मवम् ; अध्ययनविधिपरिग्रहेण आ्रमाण्यं परिकल्प्य तत्प्रामाण्यान्यथानुपपच्योपासनाविधेः कल्पयितुं शक्यत्वाद्। फलं च 'एतावदरे खल्वमृतत्वम्' इत्याद्यर्थवादगतं मोक्षरूपमनगन्तव्यम्। तस्मान्न ब्रह्मणि वेदान्ता: प्रमाणम्, किन्तूपासनायाम्। इत्येवं पूर्वपक्षे पाप्ते सूत्रकार आह-'तन्तु समन्वयात्' इति। तुशब्देन पूर्वपक्षो निपिध्यते। तदिति स्व्पक्षे प्रतिज्ञा-तद् ब्रह्म वेदान्तैः अमीयते इत्यर्थः। कुतः १ वेदान्तानां त्रह्मणि तात्पर्येण सभ्यगन्विरितत्वात्। तात्पर्य हि पुरुषधर्मः, स च कथ वेदान्तानां स्यादिति चेद्, मैवम्; मात्रका प्रतिपादन करनेमें तात्पर्यवाले अपने काण्डमें तो किसी विधिका मी श्रवण नहीं है और न उसकी कल्पना करना ही सम्भव है, कारण कि 'सूर्यका प्रपिष्ट द्रव्य भाग है' इत्याघर्थक वाक्यमें द्रव्य तथा देवताके सम्बन्धके तुल्य प्रकृतमें विधिका कल्पक वाक्य श्रुतिमें नहीं आया है,. समाधान ऐसा नहीं कहा जा सकता, कारण कि अध्ययनविघिके वलसे (वेदान्तवाक्योंके प्रामाण्यकी करपना करके उस कल्पित प्रामाण्यकी अन्यथा अनुपपत्तिके आघारपर (अपने काण्डमें मी) उपासनाविधिकी कल्पना की जा सकती है। और उसका फल (अरे उपासक या जिज्ञासु? यही या इतना ही अमृतत्व है) इस अर्थवादके वलसे मोक्षरूप समझना चाहिए। इस निष्कर्षसे सिद्ध होता है कि व्रह्मका प्रतिपादन करनेसे वेदान्तोंका प्रामाण्य नहीं हो सकता, किन्तु उपासनामें तात्पर्य माननेसे ही हो सकता है। इस प्रकार पूर्वपक्ष होनेपर सूत्रकार कहते हैं-'तत्तु समन्वयात्' अर्थात् वह व्रह्म तो वेदान्तवाक्योंसे प्रतिपादित होता है, कारण कि उनका तात्पर्य ब्रह्ममें ही भली भाँति घटता है। 'तु' शब्दसे उक्त पूर्वपक्षका निषेध किया गया है। 'तत्' पदसे अपने पक्षमें प्रतिज्ञा दिखलाई गई है-वह ब्रह्म वेदान्तवाक्योंसे यथार्थज्ञानका विषय किया जाता है, क्योंकि वेदान्तोंका ब्रह्ममें तात्पर्य द्वारा उचित अन्वय किया गया है। शक्का-तात्पर्य तो पुरुषका धर्म है, अतः वह पुरुषधर्मस्वरूप तात्पर्य वेदान्तोंका धर्म कैसे हो सकता है?
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वैदान्तोंका अद्वितीय मह्ममें तात्पर्य] भापानुवादसहत ७४५
नहि विवक्षैव तात्पर्यम्, सत्यांमपि विवक्षायामप्रयुक्ते शब्दे तात्पर्य- व्यवहाराभावात्। नाडपि पुरुषप्रयोगमात्रम्, उन्मत्तादिग्रयोगे तदभावात्। अतस्तदर्थप्रमितिशेपत्वं तात्पर्यम्। तच्च शब्दधर्म एव। न च तस्मि- न्नपि विवक्षेव तत्प्रयोजिकेति वाच्यम्, केवलव्यतिरेकाभावात्। सत्यपि तादर्थ्ये विव्क्षाभावापराधेन तात्पर्याभावादर्शनात्। न च विवक्षाव्य-
समाधान-ऐसी शक्का नहीं की जा सकती, क्योंकि विवक्षा-कहनेकी इच्छा- मात्र-ही तात्पर्य नहीं कहलाती है, (जिससे कि वह वेदान्तघर्म न हो सके.) कारण कि विवक्षाके रहते भी शब्दप्रयोगके बिना तात्पर्यव्यवहार नहीं हो सकता। [वक्ताकी इच्छा है वटादिवोधके तात्पर्यसे घटादि पदोंका उच्चारण करे, परन्तु जब तक वह घटादि पदका प्रयोग न करेगा तब तक उसकी विवक्षा तात्पर्यके रूपमें परिणत न होगी, अतः केवल विवक्षा तात्पर्य नहीं है] और पुरुषका-वक्ताका-शब्दपरयोगमात्र भी तात्पर्य नहीं है, क्योंकि उन्मत्त-प्रमादी-आदि वक्ताके प्रयोगमें तात्पर्य नहीं रहता। इसलिए तदर्थ- पमितिशेपत्व-उस विवक्षित अर्थका यथार्थ ज्ञान करानेकी सामर्थ्य-ही तात्पर्य है। [ 'स चासौ अर्थः तदर्थस्तस्य प्रमितौ शेपः समर्थः उपकारक इति यावत्, तस्य भाव:' इस विग्रहसे उक्त अर्थ सिद्ध होता है। ] और इस प्रकारका तात्पर्य शब्दोंका ही धर्म है, [कारण कि अर्थबोधकी विवक्षासे ही उसके अनुसार अर्थबोध करानेके लिए शब्दप्रयोग किया जाता है, अतः तात्पर्य शब्दधर्म है। ] [ यद्यपि विवक्षाके अनुसार अर्थबोध करानेके लिए किया हुआ प्रयोग शब्दोंका ही धर्म है, परन्तु श्दप्रयोगकी नियामिका तो विवक्षा ही है, इस आशयसे शक्का करते हैं-] उस प्रकारके प्रयुक्त रूप शब्दघममें मी तो विवक्षा ही नियामिका है। [ इससे विवक्षाको ही तात्पर्य कहना चाहिए और वह पुरुपधर्म है, शब्दघर्म नहीं है।। समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, कारण कि इसमें केवल- व्यतिरेकका अभाव है। (केवलव्यतिरेकका अभाव दिखलाते हैं-) तादर्थ्यके- अर्थकी प्रमिति करानेमें समर्थ शब्दप्रयोगके-रहते (भी) विवक्षाके अभाव रूपी अपराधसे तात्पर्यका अभाव नहीं देखा गया है। [इसलिए 'विवक्षाके १ मूलमें अपि पाठ अधिक ही आ गया है।
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक १
तिरेकेण तात्पर्यगमकाभाव, उपक्रमादीनां भावात्। न च प्रमेयस्य कार्यत्वमेव तात्पर्यगमकम्, 'पुत्रस्ते जातः' इत्यादिष्वसत्यपि कार्यत्वे तात्पर्यदर्शनात्। तत्राऽपि तात्पर्यादेव प्रमेयस्य कार्यपर्यवसानमनुमीय- तामिति चेद्, न; कार्यत्वप्रमितितात्पर्ययोरन्योन्याश्रयप्रसङ्गात्। कार्यविषय- प्रमितौ सत्यां तत्प्रमितिजननसामर्थ्यलक्षणं तात्पर्य सिध्यति, सिद्धे च तस्मिस्तत्प्रमितिसिद्धिरिति । ननु तात्पर्याभावः प्रतीतिग्रतिवन्धकः, 'विपं सुङ्क्ष्' इत्यादौ वाक्यादेव प्राप्ताया विपभोजनप्रमितेस्तात्पर्याभावेन प्रतिवध्यमानत्वात्। तत्प्रतिवन्धनिवारकं च तात्पर्यस्। तथा च ग्रथमतो वाक्यादेव कार्यप्रमितौ सत्यां पश्चांत्तथैव कार्यप्रमित्या पतिवन्धनिरासि-
अभावमें तात्पर्यका अभाव' ऐसा व्यतिरेक नहीं है। ] विवक्षाके अतिरिक्त किसी तात्पर्यकी प्रतीति करानेवालेका अभाव भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि तात्पर्यके प्रत्यायक उपक्रमादि विद्यमान हैं। प्रमेयका केवल कार्य होना ही तात्पर्यका सूचक नहीं माना जा सकता, [जिससे कि सिद्धवस्तुप्रमेयक वेदान्त- वाक्योंका तात्पर्य न होनेसे उनमें अप्रामाण्य माना जाय ], कारण कि 'तेरा पुत्र उत्पन्न हुआ' इत्यादि वाक्यप्रयोगस्थलमें कार्यरूप प्रमेयके न होते हुए भी तात्पर्यकी उपलब्धि होती है। यदि कहो कि ऐसे स्थलोंमें भी तात्पर्यरूप हेतुसे ही प्रमेयमें कार्यत्व अनुमान द्वारा सिद्ध होगा, तो यह कहना उचित नहीं है, कारण कि ऐसा माननेसे कार्यत्वका निश्चय और तात्पर्य-इन दोनोंमें अन्योन्याश्रय दोष आ जायगा, क्योंकि कार्यविषयक प्रमिति-यथार्थ निश्चय-हो जानेके अनन्तर उसकी प्रमितिके उत्पन्न करनेके सामर्थ्यरूप तात्पर्यकी सिद्धि हो सकती है और तादश तात्पर्यकी सिद्धि हो जानेपर ही कार्यत्वकी प्रमिति हो सकती है। [अन्योन्याश्रय दोषके परिहारके आशयसे शङ्का करते हैं-] तात्पर्यका अभाव प्रमितिका प्रतिबन्धक होता है जिसमें तात्पर्य नहीं रहता उसकी प्रमा नहीं हो सकती ] जसे 'विषको खा जाओ' इत्यादि वाक्योंमें केवल वाक्यसे प्राप्त हुई विषभक्षणकी प्रमितिका, उसमें तात्पर्य न होनेसे, प्रतिबन्ध हो जाता है, इसलिए तात्पर्य प्रतिबन्धका निवारण करनेवाला माना गया है। इस सिद्धान्तके अनुसार सर्वप्रथम वाक्यश्रवणमात्रसे कार्यज्ञान हो जाता है, अनन्तर उसी प्रकार उस
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वेदान्तोंका अद्धितीय म्रक्ममें तात्पयं] भापानुवादसहित ७४७
तात्पर्यमप्यस्तीत्यवगम्यते। न पुनस्तात्पर्येण कार्यप्रमितिर्भाव्यते ततो नाऽन्योन्याश्रय इति चेत्, सत्यम्; तथापि कार्यत्वं न तात्पर्यलिङ्गम्, 'जर्तिलयवाग्वा वा जुहुयात्', 'गवीधुकयवाग्वा वा' इत्यादिपु सत्यपि कार्ये तात्पर्याभावात्। 'अनाहुतिव जर्तिलाक्ष गवीधुकाश्र' इत्युत्तरवाक्येनाSSरण्य- तिलानां गवीधुकानां च निराकरणात्। तस्मादुपक्रमादीन्येव तात्पर्यलिङ्गानि, उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम्। अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिश्चये॥ इत्युक्तत्वात्। असिद्धानि हि सर्वेष्वपि वेदान्तेपु त्रह्मण उपक्रमा- वाक्यसे कार्यप्रमितिके द्वारा प्रतिबन्घकों दूर करनेमें समर्थ तात्पर्य भी प्रक्कतमें है, ऐसा निश्चय किया जाता है। तात्पर्य द्वारा कार्यप्रमितिकी भावना नहीं की जाती, इसलिए अन्योन्याश्रय दोष नहीं आया। ['विष भक्षण करो' इत्यादि स्थलमें प्रथम प्रथम उत्पन्न कार्यप्रमिति अनन्तर वाधित होती है, अतः वह तात्पर्यके उन्नयनमें समर्थ नहीं है, परन्तु अन्यत्र 'घटमानय' (घड़ा लाओ) इत्यादि स्थलमें प्रथम उन्नीत कार्यप्रमितिका अनन्तर भी बाघ नहीं होता है, अतः प्रतिबन्ध विनाशक तात्पर्यके प्रत्यायनमें वह स्वतः समर्थ है, अपनी सचामें तात्पर्यावगतिकी अपेक्षा नहीं रखती ]। समाधान-वादीकी शक्का ठीक है, परन्तु इस प्रकार अन्योन्याश्रयका परिहार हो जानेपर भी कार्यत्व तात्पर्यका अनुमापक हेतु नहीं माना जा सकता, कारण कि (अथवा जर्तिल यवागूसे-जंगली तिलोंसे सिद्ध की गई लपसीसे-हवन करे) अथवा (गवीघुक यवागूसे हवन करे) इत्यादि वाक्योंमें कार्यकी प्रतीतिके रहनेपर भी तात्पर्य नहीं है, कारण कि 'जअ्ली तिलसे आहुति नहीं होती है' इस अगले वाक्यसे जझली तिल और गवीधुकका निपेध किया गया है [ और अजाक्षीरसे हवनके उपक्रमसे भी विरोध आंता है। इसलिए उपक्रम आदि ही तात्पर्यके प्रत्यायक हेतु हैं, (कार्यत्व नहीं)। शास्त्रमें उपक्रम (प्रारम्भ, प्रतिज्ञा, अधिकार तथा प्रकरण), उपसंहार (निवर्हण या समाप्ति), अभ्यास (पुनः पुनः आवृत्ति), अपूर्वता (प्रमाणान्तरसे असिद्ध अर्थका प्रतिपादन), फल (प्रयोजन), अर्थवाद (स्तुति-प्रशंसा कचित् निन्दारूप) और उपपत्ति-(युक्तियां) ये तात्पर्यके निर्णायक हेवु (प्रयोजक) हैं, ऐसा कहा गया है।
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७४८ विचरणप्रमेयसंग्रह्द [सूत्र ४, वर्णक १
दीनि। ततस्तात्पर्येण चेदान्ता ब्रह्मणि समन्विता:। अन्वयस्य सम्यकृत्वं नामेतरवैलक्षण्येनाऽर्थप्रतिपादनम्। इतरत्र हि 'गामानय' इत्यादिशब्दाः क्रियाकारकसंसर्ग प्रतिपादयन्ति। 'उद्धिदा यजेत' इत्यत्रोद्भिद्यागशव्दयोरेकार्थत्वेऽपि नियोगाकाङ्क विद्यते। 'नीलमुत्पलम्' इत्यत्र गुणगुणिनोर्भेदामेदौ अतिपादयौ। एकार्थप्रतिपादकेष्वप्यन्येषु शब्देषु लिङ्गसंख्ये अवर्जनीये। वेदान्तास्तु न तथा संसर्ग वा साकाङ्कर्थ वा मेदाभेदौ वा लिङ्गसंख्याविशिष्ट वा प्रतिपादयन्ति, किन्त्वभिधावृत्या लक्षण- योपाधिद्वारा वाडखण्डैकरसमेव जगत्कारणसामान्यानुवादेन प्तिपाद्यन्ति । तत्र व्युत्पन्नः। आनन्दशब्दश्च
सम्पूर्ण वेदान्तोंमें ब्रह्मके उपक्रम आदि प्रसिद्ध ही हैं। इसलिए तात्पर्य द्वारा वेदान्त व्रह्ममें भली भाँति अन्वयको प्राप्त होते हैं। दूसरे शब्दोंकी अपेक्षा विलक्षण रीति-सरलता-से अर्थ- बोध करा देना ही अन्वयकी सम्यकता है। [ इतर वाक्योंकी अपेक्षा वेदान्तवाक्योंमें विलक्षणता दिखलाते हैं-] 'गाय ले आवो' इत्यादि शब्द क्रियाकारकभावरूप सम्बन्धात्मक (गाय कर्म और लाओ क्रिया) वाक्यार्थका प्रतिपादन करते हैं। 'उद्धिद' यागसे अपूर्व साधन करे' इत्यादि स्थलमें उद्धिद् और यागका समान अर्थ होनेपर भी नियोगकी आकाह बनी ही रहती है। 'नील कमल' इस वाक्यमें गुण और गुणीका भेद तथा अमेद दोनोंका प्रतिपादन है। एक ही अर्थके प्रतिपादक दूसरे शब्दोंमें भी लिङ्ग और संख्याकी अपेक्षा छोड़ी ही नहीं जा सकती। वेदान्तवाक्य तो उक्त अन्य वाक्योंके समान संसर्ग या आकाह्हयुक्त अर्थ तथा भेदामेद अथवा लिङ् और संख्यासे विशिष्ट अर्थका प्रतिपादन नहीं करते, किन्तु अभिधावृत्ति-प्रथम शब्दशक्ति-से अथवा लक्षणावृतिसे उपाघि द्वारा अखण्ड तथा एकरस सर्वात्मा लिङ्ग, संख्यादि रूप विशेषणोंसे भी रहितका ही विश्वके कारणसामान्यके अनुवादसे प्रतिपादन करते हैं। इसमें ज्ञानशब्द अनेक विकारोंसे युक्त अन्तःकरणकी वृत्तिमें, प्रतिविम्बित चैतन्यरूप अर्थका वाचक व्युत्पचिसिद्ध है और आनन्द शब्द अन्तःकरणकी
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वेदान्तोंमें मद्याप्रतिपादकत्व्र ] मापानुवादसहित ७४९
त्यनुकूलतया स्फुरन्त्यां कस्यांचिव्वक्तौ लोके प्रसिद्धः । तावेतौ ज्ञाना- नन्दशन्दौ वाक्यान्तरेण नित्यत्वप्रतिपादकेन विरोधाद् वृत्त्यंशं परित्यन्याS- नुकलतया स्फुरन्तीं व्यक्तिं प्रतिपादयतः। तथा च वृत्तित्यागांशे लक्षणा, इतरांशे तु मुख्यवृत्तिः। एकसत्यानन्तशव्दा: स्वगतभेदाभावमिथ्या- त्वाभावसजातीय विजातीयद्वितीयाभावाभिधानद्वारेण वर्तन्ते। सर्वज्ञ: सर्वशकतिरित्यादिशव्दाश्राऽनिर्वचनीयप्रपश्चोपाधितया तत्र तत्र लक्षणया
वर्तन्ते। 'अयमात्मा ब्रह्म', 'तच्वमसि' इत्यादिशनदाथ् भागत्यागलक्षणया ब्रह्मण्येव वर्त्तन्ते । तदेवं सर्वे वेदान्ता अखण्डैकरसब्रह्मप्रतिपादकाः । ननु सत्यज्ञानादिशब्दानां भिन्नार्थत्वे कथमखण्डैकरसे वृत्तिः ? एकार्थत्वे पुनरुक्तिप्रसङ्ग:, नैप दोप :; तात्पर्येण प्रतिपाद्यस्यकत्वेऽपि व्यावर्च्यानामसत्यजडादीनामनिर्वचनीयार्थानामनेकत्वात्। न चाऽनिर्वच- शुद्ध सास्विक वृत्तिमें अभित्यक्त अनुकूल-सुखास्पद-रुपसे प्रवीत होनेवाली किसी एक चिद्व्यक्ति (चतन्य) रूप अर्थका वाचक है, ऐसा लोकमें प्रसिद्ध है। कथित ज्ञान और आनन्द शब्द नित्यत्वके प्रतिपादक दूसरे वाक्योंसे विरोध होनेके कारण वृत्तिरूप भागका त्याग करके अनुकूलरूपसे प्रतीत होनेवाली चित्व्यक्तिका ही प्रतिपादन करते हैं। इसलिए वृत्तिभागका त्याग करनेमें लक्षणा और चिद्व्यक्तिरूप दूसरे अंशमें मुख्यवृत्ति-अभिधा-का ही व्यापार है। एक, सत्य और अनन्त शब्द अपनेमें भेदका अभाव, मिथ्यात्वका अभाव, तथा सजातीय-विजातीय-रूप द्वितीयका अभाव प्रतिपादन करते हुए लक्षणा द्वारा उसी चिद्व्यकिरूप अर्थके वाचक हैं। सर्वज्ञ और सर्वशक्ति आदि शब्द भी अनि- वचनीय प्रपश्चरूप उपाधिके द्वारा उसी चतन्यके समर्पक हैं। 'यह आत्मा ब्रम्म है वही तुम हो' इत्यर्थक 'अयमात्मा न्ह्म', 'तत्वमसि'-आदि शब्द भी भागत्याग- लक्षणासे नमके ही वाचक हैं। इस रीतिसे सम्पूर्ण वेदान्त अखण्ड एकरस ब्रह्ाके टी प्रतिपादक हैं। शक्का-सत्य, ज्ञान आदि शन्दोंका उक्त रीतिसे यदि भिन्न-भिन्न अर्थ है, तो अखण्ड एकरसरूप अर्थमें उनकी शक्ति कैसे होगी? और यदि इनका भिन्न-भिन्न अर्थ न मानकर एक ही अर्थ माना जाय, तो पुनरुक्ति दोषका प्रसङ्ग आ जायगा। समाधान-यह दोप नहीं आता, कारण कि तात्पर्य द्वारा सबका प्रतिपाद्य अर्थ यद्यपि एक ही है, तथापि व्यावृत्ति-निषेध-के विषयभूत असत्य ९५
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७५० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक १
नीयपदार्थेन तदभावेन वा परमार्थभावरूपाद्वैतस्य काचित् क्षतिरस्ति। तस्मात् तच्वमस्यादिमहावाक्यानि 'सोडयं देवदत्त' इत्यादिवाक्यवदखण्डै- करस प्रतिपादयन्ति । तथाहि-एकं देवदत्तमेकस्मिन् देशे काले च द्वौ पुरुपौ दृष्टवन्तौ, पुनर्देशकालान्तरे तमेव तावेव दद्दशतुः । तयोर्मध्ये 'सोऽयं देवदत्त:' इति अत्यभिजानात्येक:। अपरस्तु पूर्वदाद् देवदत्ताद्भिनं पश्चाद् दृष्ट मन्यते। तं पत्यभिज्ञाहीनमितरो वोधयति 'सोडयं देवदत्तः' इति। तत्र वोधयिता स्पष्ट भेदेन प्रतीयमानयोस्त चद्देशकालयोस्तद्विशिष्टयोर्वा देवदत्तयोरक्यं न अत्यभिजानाति, विरो- धात् ; किन्तु विशिष्टद्वयोपलक्षित एको देवदत्तः पत्यभिज्ञागोचर: । जड आदि अनिर्वचनीय (मिध्याभूत) अर्थ अनेक हैं, [ इसलिए अनेक व्यावस्योंका निषेध करनेके लिए पृथक्-पृथक सत्य, ज्ञान आदि शब्दोंका उपादान है, इससे पुनरुक दोष मी नहीं आता और तात्पर्य द्वारा एक ही अर्थके प्रतिपादक होनेमें असामञ्जस्य भी नहीं रहता ]। अनिर्वचनीय (मिथ्या) पदार्थ अथवा उसके अभावके कारण परमार्थ भावरूप अद्वैतकी कोई हानि नहीं हो सकती। इस निष्कर्षकी रीतिसे 'वह तुम हो' इत्याद्यर्थक महावाक्य 'वह यह देवदत्त है' इत्यादि प्रत्यभिज्ञावाक्यके सदश अखण्ड एकरस (न्रह्मरूप) अर्थका ही प्रतिपादन करते हैं। समता दिखलाते हैं-जैसे एक देवदचको दो पुरुषोंने एक ही देश और एक ही समयमें देखा। कुछ समय चीतनेपर उसी देवदचको उन दोनों (पूर्वद्रष्टाओं) ने ही देशकालान्तरमें पुनः देखा। उनमें से एक तो जानता है कि 'यह वही देवदत है'। परन्तु दूसरा पुरुष (भूल जानेसे) पूर्व कालमें देखे हुए देवदतसे इस समय देखे गये देवदत्तको दूसरा ही समझता है। प्रत्यभिज्ञा (जानकारी) से रहित उस दूसरे पुरुषको ज्ञाता दूसरा पुरुष बोध कराता है कि यह (सामने दिखलाई देने- वाला) देवदत्त वही (पहले देखा हुआ ही) देवदत है। ऐसे स्थलमें दुसरेको बोध करानेवाला दूसरा पुरुष मिन्न-भिन्न रूपसे स्पष्ट प्रतीत होनेवाले देश तथा कालका एवं भिन्न-भिन्न देशकालविशिष्ट दोनों देवदत्तोंकी एकताकी प्रत्यभिज्ञा नहीं कर रहा है, कारण कि इसमें प्रत्यक्ष विरोध है, [परोक्ष और अपरोक्ष एक नहीं हो सकता। ] किन्तु उसकी प्रत्यभिज्ञा देशकालरूपी दो वैशिष्ट्योंसे उपलक्षित एक ही देवदचको विषय करती है। [ दोनों भिन्न-भिंन्न
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'तत्वमसि' आदिकी अखण्डार्थकता ] मापानुवांदसहित ७५१
तत्र प्रत्यभिज्ञानं देवदत्तस्वरूपपैक्यम्। विशिष्टाभिधायिभ्यां 'सोडयम्' इति पदाभ्यां स्वार्थकदेशपरित्यागेनैकदेशलक्षणया परस्मै प्रतिपादयति। ननु 'सोडयम्' इति पदार्थयोर्यदेवदतैक्यं तदेव वाक्येनाऽपि प्रति- पाद्यते उताऽन्यत् १ आद्येऽनुवादग्रसङ्ग: । न द्वितीय: ऐक्यान्त- रस्याभावादिति चेद्, न; प्रत्यभिज्ञाया अप्यनेन न्यायेनाऽप्रामाण्य- प्रसङ्गात्। अभिज्ञावगतस्यैवैक्यस्य बोधनेऽनुवादकत्वम्, ऐक्यान्तरं तु नाडस्तीत्यत्रापि सुचचत्वात्। एकस कालद्वयसंबन्धः अत्यभिज्ञाप्रमेय- मिति चेद्, न; तस्याऽप्यभिज्ञाद्वयेनैव सिद्धत्वात्। अथ प्रत्यभिज्ञा-
देश और कालका वैशिष्टय उसमें उपलक्षणमात्र है, उपाधि या विशेषण नहीं है, जिससे विरोधियोंकी एककालमें उपस्थिति वाघित हो सके)। वहांपर उक्त प्रत्यभिज्ञासे देवदत्तके स्वरूपकी एकताका, विशिष्ट देवदसतको कहनेवाले 'सः' (वह), 'अयम् (यह) इन दो पदोंसे स्वार्थके एक भागका त्याग करके पक देशकी लक्षणाके द्वारा, दूसरेके प्रति प्रतिपादन कर रहा है। शक्षा-वह और यह-इन दो पदार्थोमें जो देवदत्तकी एकता प्रतीत हो रही है, वही एकता क्या वाक्यसे भी प्रतिपादित होती है? या इससे भिन्न दूसरी ? प्रथम पक्षके माननेमें वाक्य अनुवादक हो जायगा। (जिससे उसका प्रामाण्य ही विनष्ट होगा)। दूसरा पक्ष नहीं माना जा सकता, कारण कि दूसरा (भिन्न) ऐक्य है ही नहीं। समाधान-उक्त शक्का उचित नहीं है, कारण कि इस प्रकारके न्यायसे (विकल्प करनेपर) तो प्रत्यभिज्ञामें भी अनामाण्यका अवसर आ जायगा, कारण कि प्रत्यभिज्ञा भी अभिज्ञा (प्रथम ज्ञान) से ही प्रतीत हुए एकत्वका बोध करानेमें अनुवादक कहलायेगी और दूसरा भिन्न ऐक्य तो है ही नहीं, ऐसा प्रत्यभिज्ञाके विषयमें भी कहा जा सकता है। भृत तथा वर्तमान दोनों कालोंसे एक वस्तुके सम्बन्धका बोध कराना ही प्रत्यभिज्ञाका प्रमेय-विषय-नहीं माना जा सकता, कारण कि वह दोनों कालोंका सम्बन्ध भी दोनों अभिज्ञाओंसे (भृत- कालिक ज्ञान तथा वर्तमानकालिक ज्ञानसे) ही सिद्ध हो जाता है। यदि कहा जाय कि मत्यभिज्ञा अपूर्व अर्थकी बोघिका नहीं है, तथापि
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७५२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक १
नस्याऽनधिगतार्थगन्तृत्वाभावेऽपि भेदभ्रमव्युदासित्वादभिज्ञाभ्यां भेदभ्रमा- व्युदासिनीभ्यां फलतो विशेषसद्भ्ावात् प्रामाण्यं तर्हिं 'सोडयम्' इति वाक्यस्याऽप्येवमेव पदाभ्यां विशेषसद्ावात ग्रमाण्यमस्तु। एवं च तच्व- मसिवाक्यमपि त्वंपदार्थे कर्तत्वाद्ंशं विरोधिनं परित्यज्य साक्षिमात्रमु- पादाय तत्पदार्थ परोक्षादंशपरित्यागेनाऽवशिष्टेन चिन्मात्रणैक्यं पदार्थ- प्रतीतिसमये प्रतिपन्नमपि भेदभ्रमव्युदासाय प्रतिपादयति। तदयं प्रयोग :- तच्वमस्थादिवाक्यं अखण्डार्थनिंष्ठम्, कार्यकरणव्यतिरिक्त- द्रव्यनिष्ठत्वे सति समानाधिकरणत्वात्, सोडयं देवदच इति वाक्य- वद् इति। नतु मृद्घटो नीलमुत्पलमित्यादौ पदार्थयोः प्रत्येकमसाधारण- मैक्यमे कैकपदप्रसेयं पदार्थयोरित रेतरैक्यं तु वाक्यप्रमेयमित्यनधिगतार्थगन्तृ-
भेदरूप भ्रमका निराकरण करती है, इसलिये भेदभ्रमको दूर करनेमें असमर्थ दोनों अभिज्ञाओंसे प्रत्यभिज्ञा विलक्षण है, अतः प्रत्यभिज्ञाका प्रामाण्य माना जाता है, तो 'सोडयम्-वह यह' इस वाक्यका भी इसी भांति (भेदग्रम दूर करना रूप विशेष होनेसे) पदों (पदार्थों) की अपेक्षा विशेष होनेके कारण प्रामाण्य मान लिया जायगा। इससे ही 'तत्त्वमसि-वह तू है' यह वाक्य मी त्वं पदार्थमें विद्यमान कर्तृत्वरूप विरोधी अंशका त्याग करके साक्षी (चैतन) मात्र अर्थका ग्रहण करके तत् पदार्थमें परोक्ष आदि अंशको छोड़कर पदार्थप्रतीति कालमें ज्ञात हुए भी शेष चिन्मात्र (चैतन्यमात्र) अर्थके साथ एकत्वका-अमेदका- मेदभ्रम दूर करनेके लिए प्रतिपादन करता है। इससे यों अनुमानके प्रयोगका स्वरूप होता है-'तत्त्वमसि' आदि वाक्य अखण्ड अर्थके बोध करानेमें तात्पर्यवाले हैं, कार्यकारणसे अतिरिक्त द्रव्यपरक होते हुए समानविभक्त्यन्त या एकार्थके प्रतिपादक होनेसे, 'सोडयं देवदतः'-वह यह देवदच है' इस प्रत्यभिज्ञा वाक्यके समान। शङ्ा-'मिट्टी घड़ा, नील 'कमल' इत्यादि स्थलमें मिट्टी और घड़ा आदि पदा्थोंमें प्रत्येकगत असाधारण एकत्व एक-एक पदका प्रतिपाध विषय है, दोनों पदार्थोंका परस्पर एकत्व तो वाक्यका ही प्रतिपाद्य प्रमेय है, इसलिए प्रकृत स्थलमें जैसे अपूर्व अर्थका बोधन करनेसे ही उक्त
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'तख्वमसि' आदिकी अखण्डार्थकता] भापानुवादसहित ७५३
त्वादेव यथा वाक्यप्रामाण्यं तथाऽत्राप्यस्तु। तथा च भेदभ्रमव्युदास- मात्रविशेपात् प्रामाण्यमित्येपा कष्टकल्पना न भविष्यतीति चेद्, न; चैपम्यात्। तत्र हि कार्यकारणयोर्द्रव्यगुणयोश् भिन्नयोरैक्यं अ्तिपाद्यते 'व्यवहारे भट्टनयः' इति न्यायेन भेदाभेदाभ्युपगमात्। अत्र त्वखण्डैकरसं प्रतिपाद्यत इत्यस्ति महद्वैपम्यम्। अत्र केचिदाहु :- 'य आत्मनि तिष्ठन' 'एप त आत्मा सर्वान्तरः' इत्यादिशाखस्राज्जीवन्रह्मणोरपि भेदाभेदावभ्युपेयौ। अन्यथा पदार्थवाक्या- र्थयोः साङ्कर्यादिति, ते अ्ष्टव्या :- तत्र भेदो ज्ञानेन निवर्त्यते न वेति ? न चेन्मोक्षो न स्यात्। निवन्यंते चेत्, तदापि भेदामेदविपयमेव
वाक्योंका प्रामाण्य माना जाता है, वैसे ही प्रकृत ('तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य अथवा 'सोडयं देवदचः' इत्यादि प्रत्यभिज्ञावाक्यमें) भी माना जाना चाहिये। इससे मेदभ्मके दूरीकरणमात्ररूप विशेषके द्वारा इनका प्रामाण्य होता है, ऐसी क्िष्ट कल्पना नहीं करनी होगी। समाधान-उक्त कथन उचित नहीं है, कारण कि 'मृद्घटः' इस वाक्यकी अपेक्षा (प्रत्यभिज्ञा और महावाक्योंमें) विषमता है, क्योंकि 'मृद्घटः' इत्यादि वाक्योंसे भिन्न-भिन्न कार्य-कारण तथा गुण-द्रव्यका एकत्व प्रतिपादन किया जाता है। [परस्पर भिन्नोंकी एकताके प्रतिपादनमें आनेवाले विरोधका परिहार करते हैं-] 'व्यवहारमें मीमांसक कुमारिलभट्टका मत माना जाता है' इस न्यायसे (कार्य-कारण और गुण-गुणीमें) भेद और अमेद दोनों माने गये हैं। और प्रकृतमें (महावाक्योंसे) तो अखण्ड एकरस-सर्वथा मेदशुन्य-का प्रतिपादन किया जाता है, इसलिए अधिक वैषम्य है। इस विपयमें मेदाभेदवादी भास्कर आदि किसी व्याख्याताओंका कहना है कि-'जो आत्मामें स्थित होता है', वह यह आत्मा सर्वान्तर- सबका अन्तर्यामी है-' इत्यर्थक शासत्रसे जीव और ब्रह्ममें भी भेद और अभेद मानना चाहिए-अन्यथा पदार्थ और वाक्यार्थका सांकर्य हो जायगा। इनसे प्रश्न करना है कि यह भेद क्या अमेदज्ञान द्वारा निवृत होता है या नहीं ? यदि निवृत नहीं होता, तो मोक्षकी उपपत्ति नहीं हो सकती। और यदि निवृत होता है, तो भी प्रश्न होगा कि भेदामेदविषयक ही
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७५४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र ४, वर्णक है
ज्ञानं तन्निवर्त्तकम् उताऽमेदमात्रविषयं ज्ञानान्तरम्। नाऽडद्य:, ज्ञानस्य स्वविपयनिरास्यत्वायोगात् । न द्वितीय, अभेदज्ञानजनकप्रमाणाभा- वाद। त्वन्मते शास्त्रस्य भेदाभेदविपयत्वात्। शास्रजन्यभेदाभेदज्ञाना- भ्यासादभेदज्ञानं जायत इति चेद्, एवमपि ज्ञाननिवर्च्यत्वे भेदस्य मिथ्यात्वं स्यात्। ज्ञानेनाऽज्ञानं निवर्त्यते, भेदस्तु कर्मभिर्विनश्यतीति चेद्, न; 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इत्येवकाराभिधेयभेदनिरासस्य ज्ञानप्रयुक्तत्वावगमाद्। अथ ज्ञानप्रागभाववद्भ्ेदस्य ज्ञाननिवर्त्यत्वेऽपि न मिथ्यात्वं तथापि किं येनैवाSडकारेण जीवस्य ब्रह्मणो भेदस्तेनैवाSभेदोऽपि उताऽडकारान्तरेण ? आद्ये मेदनिवृत्तावभेदोऽपि निवर्तेत, तत्प्रयोजकाकारस्यैक्याद्। द्वितीये
ज्ञान उसकी निवृत्ति कर देता है? अथवा अमेदमात्रविपयक दूसरा ज्ञान उसकी निवृत्ति करता है:। इनमें प्रथम पक्ष नहीं वन सकता, कारण कि ज्ञान अपने विषयका निवारक नहीं हो सकता है (अर्थात् ज्ञानसे ज्ञानविपयका निराकरण नहीं हो सकता)। दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण कि अभेद- विषयक अतिरिक्त ज्ञानको उत्पन्न करानेवाला प्रमाण नहीं है। तुम्हारे (मेदामेदवादीके) मतमें शास्त्रका तो भेदामेद विषय है। शास्त्र द्वारा उत्पन्न हुए भेदामेदज्ञानके अभ्यास-पुनः पुनः परिशीलन-से अभेद- विषयक ज्ञान उत्पन्न होता है ऐसा मान लेनेपर भी तो मेदको, ज्ञान द्वारा निवत्य मान लेनेसे, मिथ्या मानना होगा। ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति की जाती है और कर्मोंके द्वारा मेदका विनाश हो जाता है, ऐसा मानना उचित नहीं है क्योंकि 'ब्रह्म जाननेवाला व्रह्म ही हो जाता है-' इत्यर्थक वाक्यमें एवकार (एवपद) का वाच्य अर्थभूत मेदका विनाश ज्ञानके द्वारा होता है, ऐसा पाया जाता है। यद्यपि कहा जाय कि ज्ञानके प्रागभावके सदश भेद ज्ञानसे नष्ट होता है, ऐसा माननेपर भी मिथ्या नहीं कह सकते, तथापि प्रश्न होता है कि जिस आकारसे जीव और ब्रह्मका भेद है, उसी आकारसे अभेद मी है? अथवा दूसरे आकारसे: इनमें प्रथम पक्षके माननेमें भेदकी निवृत्ति होनेपर ही अमेद की मी निवृत्ति हो जायगी [ दोनोंका एक ही आकार होनेसे एककी निवृत्ति होनेपर दूसरे की भी निवृत्ति हो जायगी ], कारण कि उसका प्रयोजक आकार एक ही है (जो नष्ट हो चुंका)।
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'तत्तवमसि' आदिकी अखण्डार्थकता ] भापानुवादसहित ७५५
निरवयवव्रह्मभूतस्य जीवस्य धर्मभूतो भेदो न तावत्कर्मणा निवर्त्तयितुं शक्यते। ज्ञानेन तन्निवृत्तावपि यदि तेन भेदेनोपलक्षितो जीवस्तदा त्रह्मैव जीवः स्यात्। अथ भेदविशिष्टस्तर्हि मेदनाशे जीवोऽपि नश्येत्। अथ विशिष्टाकारनाशेऽपि विशेष्यांशो जीवो ब्रह्ैक्यरूपं मोक्षमनुभवेद, तहिं संसारदशायामपि ब्रह्मतादात्म्यापन्नः स एव विशेष्यांशो जीव इत्यम्युपेयम् : संसारमोक्षयोवैयाधिकरण्यायोगात्। एतेनैतदप्यपास्तं यदमृतानन्देनोच्यते न युगपज्जीवत्रह्मणोरमेदाभेदी विरोधात्, किन्तु पदार्थ- त्वदशायामतिरेको वाक्यार्थत्वदशायां चाऽखण्डत्वमिति। 'एकधवानु- द्रष्टव्यं नेह नानाऽस्ति कि चन' इत्यादिश्रुतिविरोधश्च। न च 'य आत्मनि तिष्ठन्' इत्यादिश्युतिर्मेदाभेदौ प्रतिपादयति, किन्तु भ्रान्तिप्रसिद्ध भेदमनू- द्याडभेदमेव वोधयति। कथ तहिं पदार्थवाक्यार्थयोः साङ्गर्यपरिहार इति दूसरे पक्षके माननेमें अवयवशून्य ब्रह्मात्मक जीवका धर्मभूत भेद कर्म द्वारा तो निवृत्त नहीं किया जा सकता। और ज्ञान द्वारा उसकी निवृति होनेपर भी यदि उस भेदसे उपलक्षित जीव माना जाय, तो व्रम्म ही जीव कहलायेगा। और यदि भेदविशिष्ट जीव है, तो मेदके नष्ट होनेपर जीवका भी विनाश हो जायगा। यदि कहो कि विशिष्ट आकारका नाश होनेपर भी विशेष्यभूत जीवरूप अंश व्रक्षाभेदरूप मोक्षका भागी हो जायगा, तो संसार- दशामें मी ब्रह्मके साथ तादात्म्यको प्राप्त हुआ वही विशेष्यभूत अंश जीव है, ऐसा मानना होगा। कारण कि संसार और मोक्षका वैयधिकरण्यसे सम्बन्ध नहीं हो सकता। (अर्थात् जिसको संसार है, उसको ही मोक्ष भी प्राप्त होता है, अन्यथा मोक्ष पुरुपार्थ नहीं माना जायगा)। इससे यह कहना भी खण्डित हो जाता है कि जो अमृतानन्द ने कहा है 'जीव और ब्रह्मका एक कालमें ही विरोध होनेसे मेद और अमेद नहीं हो सकते, किन्तु पदार्थदशामें भेद और वाक्यार्थदशामें अखण्डत्व-अमेद-है, और 'एक ही प्रकारका दर्शन- साक्षातकारात्मक ज्ञान-करना चाहिए, इसमें अनेक-भेद-कुछ नहीं है' इत्यर्थक श्रुतिसे भी विरोध आग है। 'जो आत्मामें स्थित हो-' इत्यर्थक श्रुति भी मेदामेदका प्रतिपादन नहीं करती है। किन्तु भ्रमसिद्ध भेदका अनुवाद करके अमेदका ही बोधन करती है। पदार्थ तथा वाक्यार्थका सक्कर होना कैसे हट़ाया जायगा यदि ऐसा प्रक्ष करो,
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७५६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सुत्र ४, वर्णक ?
चेदू, उच्यते-तत्र न तावत् पदवाच्यस्य वाक्यार्थेन साङ्गर्यप्रसङ्गोऽस्ति। वाच्यस्याऽविद्याकल्पितोपाधिविशिष्टत्वात्। पदलक्ष्यस्य तु वाक्यार्थत्व- मिष्टमेव । तस्मान्महावाक्यस्याऽखण्डार्थतायां न कदाचिदनुपपत्तिः। तथा 'सत्यं ज्ञानमनन्तं न्रह्न' इत्याद्यवान्तरवाक्यमप्यखण्डार्थनिष्ठम्, लक्षणवाक्यत्वात्, प्रकृष्टप्रकाशश्न्द्र इति वाक्यवत्। तत्र कश्िच्चन्द्रपाति- पदिकार्थानभिज्ञ: कंचित्पप्रच्छ अस्मिन् ज्योतिर्मण्डले कशन्द्रो नामेति? सोऽपि चन्द्रप्रातिपदिकमात्रार्थविवक्षया प्रयुङ्क्ते प्रकृष्टप्रकाशश्रन्द्र इति। तत्र प्रकाशशब्द: प्रकाशत्वसामान्याभिधानमुखेन लक्षणया व्यक्तिविशेषे वर्तते। प्रकृष्टशब्द्श्च प्रकर्षगुणाभिधानमुखेन लक्षणया प्रकाशविशेषे वर्तते। तत्र गुणसामान्ययोश्चन्द्रपदानभिधेयत्वात्तडुभयं व्युदस्य तत्सम- चायिप्रकाशविशेष एव चन्द्रपदाभिधेयतया समर्प्यत इति प्रकृष्टप्रकाश-
तो उत्तर कहा जाता है-उसमें पदके वाच्यभूत अर्थके साथ तो वाक्यके अर्थका साङ्चर्य प्रसंग नहीं है, कारण कि वाच्य अर्थ अविद्याकल्पित उपाघिसे विशिष्ट है। और पदके लक्ष्यभूत अर्थका वाक्यार्थ होना तो अभीष्ट ही है, इसलिए महावाक्यको अखण्डार्थपरक माननेमें कोई अनुपपत्ति नहीं हो सकती। [ एवं 'सत्य, ज्ञान, और अनन्त ब्रह्म है' इत्यादर्थक महावाक्योंका भी अखण्डरूप अर्थके बोधनमें ही तात्पर्य है, कारण कि ये लक्षणवाक्य हैं, 'अधिक प्रकाशवाला चन्द्रमा इस लक्षणवाक्यके सहश। (दष्टान्तमें दिये गये लक्षण- वाक्यका अखण्ड अर्थमें तात्पर्य दिखलाते हैं-) चन्द्रपदार्थको न जाननेवाला कोई पुरुष किसीसे प्रश्न करता है कि इस प्रकाशमान ग्रहनक्षत्र- मण्डलमें चन्द्रमा कौन है। वह मी (उत्तर देनेवाला पुरुष) चन्द्ररूप प्रातिपदिकके ही अर्थको प्रकट करनेकी इच्छासे कहता है कि इनमें सबसे अधिक प्रकाशवाला चन्द्रमा है। इस वाक्यमें प्रकाशपद प्रकाशत्वसामान्यको कहता हुआ लक्षणाके द्वारा व्यक्तिविशेषका बोधक हो जाता है, और प्रकृष्ट शब्द प्रकर्ष-आधिक्य-गुणका बोध कराता हुआ लक्षणासे प्रकाशविशेषका बोध कराता है। इनमें गुण तथा सामान्य ये दो चन्द्रपदके अभिघेय अर्थ नहीं हैं, इसलिए इन दोनोंका त्यागकर उसमें रहनेवाले पकाशविशेषका ही चन्द्रपदके अभिघेय अर्थके रूपमें समर्पण किया जाता है, इसलिएप्रकृष्ट,
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वेदमें निरपेक्षमामाण्योपपादन] भापानुवादसहित ७५७
चन्द्रशव्दानामेकार्थता सिध्यति। न चैवं पदद्वयवैयर्थ्यम्, अग्रकाश- मेघादिव्यावृत्ती प्रकाशपदस्याऽल्पप्रकाशनक्षत्रादिव्यावृत्तौ प्रकर्पपद्स्य चोपयोगात्। एवं सत्यज्ञानादिवाक्येऽप्यखण्डार्थता योजनीया। यच्तक्तं त्रह्मण: परिनिष्ठितवस्तुतया मानान्तरयोग्यस्याऽपि मानान्त-
कचक्षुर्वदप्रामाण्यमिति। तत्र वक्तव्यं किं ग्रमाणान्तरयोग्यत्वे सति तद- तुत्पत्तौ विपयस्थाऽभावे निशचिते तत्र शब्दमिथ्यात्वमाशङ्कयते कि वा प्रमाणान्तरसंभिन्नार्थविषयत्वात् पौरुपेयवचोवत्सापेक्ष ग्रामाण्यमिति उत प्रमाणान्तरयोग्यार्थविपयतया तत्सिद्धार्थानुवादाशङ्गेति ? नाऽडद्यः, माना- न्तरानुदयमात्रेण तथात्वे सर्वत्राऽतिप्रसङ्गात्। पौरुपेयवचसां मानान्तर-
प्रकाश तथा चन्द्र-इन तीनों शब्दोंका एक ही अर्थ सिद्ध होता है। और दो पदोंका देना भी व्यर्थ नहीं हो सकता, कारण कि प्रकाशशुन्य मेघ आदिकी व्यावृत्तिके लिए प्रकाशपदका और कम पकाशवाले नक्षत्र आदिकी वयावृत्तिके लिए प्रकर्षपदका उपयोग है। इसी प्रकार सत्य, ज्ञान आदि वाक्यमें सब पदोंका एक ही अखण्डरूप अर्थके वोधनमें तात्पर्य समझना चाहिए। पूर्वमें जो यह कहा गया था कि परिनिष्ठित-सिद्ध-वस्तु होनेके कारण प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तरके योग्य होते हुए भी न्रह्मका दूसरे प्रमाणोंसे उपलम्भ (ज्ञान) नहीं होता है, अतः चित्रगत रेखात्मक निग्नोन्नत भावको दिखलानेवाले चक्षुके तुल्य ब्रह्मबोधक वेदान्तवाक्य भी अप्रमाण हैं। यहांपर पूछना यह है कि क्या प्रमाणान्तरके योग्य होते हुए उसके प्रमाणान्तरसे उपलब्ध नहीं हो सकनेपर विपयके अभावका निश्चय हो जानेसे शब्दमिथ्यात्व-अर्थात् वेदान्तवाक्यरूप शब्द प्रमाणके मिथ्या होने-की आशक्का की जा रही है ? या प्रमाणान्तरयोग्य अर्थ- विपयक होनेसे उनका पुरुप द्वारा कथित वचनके सदश सापेक्ष प्रामाण्य है? अथवा प्रमाणान्तरयोग्य विपय होनेसे उस प्रमाणान्तरसे सिद्ध अर्थके अनु- वादक होनेकी आशक्ा है? इनमें प्रथम पक्ष नहीं वनता, कारण कि दूसरे प्रमाणका केवल उदय न होनेसे ही वैसा (विपयका अभाव) माननेपर सर्वत्र अतिपसद आ जाता है (अर्थात् जिस स्थलमें प्रमाणान्तरकी प्रसिद्धि नहीं होगी वहींपर विपयका अभाव कह देना होगा)। पुरुषकथित वाक्योंमें. SE
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७५८ चिवरणग्रमेयसंग्रह् [सूत्र 8, वर्णक १
सापेक्षत्वेऽपि वेदवचसस्तदयोगात्। न द्वितीयः, मानान्तरसंभिननार्थ- त्वाभावात्। विमतं वेदान्तवाक्यं मानान्तरसंभिन्नार्थम्, भृतार्थविषयत्वाद् नदीतीरफलसत्तावाक्यवदिति चेद्, न; पौरुपेयवचनत्वस्योपाधित्वाद्। अनुभूतार्थस्मृतिवदिति निदर्शनेऽपि स्वार्थप्रवृत्तज्ञानान्तरजन्यत्वमुपाधि:। नहि वेदवाक्यं मानान्तरेणाऽर्थसुपलभ्य विरचित येन साधनव्यापकता स्यात्। अथ मन्यसे-वेदान्तवाक्यस्य भृतार्थविपयत्वान्मानान्तरयोग्या- र्थत्वं साधयित्वा तेन च संभिन्नार्थता साधनीयेति, तर्हि विधिवाक्या-
मानान्तरकी अपेक्षा रहते हुए भी 'अपौरुषेय वेदवाक्योंमें सापेक्षत्वका सम्बन्ध नहीं आा सकता। दूसरा पक्ष नहीं हो सकता, कारण कि वेद वाक्योमें मानान्तरसम्भिन्नार्थत्व-दूसरे प्रमाणसे सिद्ध पदार्थका प्रतिपादक होना- नहीं है। शक्का-'विमत वेदान्तवाक्य दूसरे प्रमाणसे सिद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेमें तात्पर्यवाले हैं, कारण कि उनका विपय सिद्ध वस्तु है, जैसे कि नदीके तीरमें फलोंकी सचाका वोधन करनेवाला वाक्य [इस अनुमानसे वेदान्तवाक्य मानान्तरसंभिन्नार्थताके ही प्रतिपादक माने जायँगे ]। समाधान-उक्त अनुमानमें पौरुषेयवचनत्वरूप उपाधि है। [दृष्टान्तभूत नदीके तीरमें फलोंकी सत्ताका बोधक वाक्य तो पुरुषवचन है और दार्धान्तिक पक्षभूत वेदान्तवाक्य पुरुषवचन नहीं हैं, इससे साधानाव्यापकत्व हुआ]। यदि नदीतीरफलसावाक्यवत्के स्थानपर अनुभूत अर्थके स्मरणके तुल्य ऐसा द्ृष्टान्त भी दिया जाय, [ क्योंकि स्मरणमें पुरुषवचनत्व नहीं है, इससे साध्यव्यापकत्व न होनेसे उक्त उपाधिका अवसर नहीं रहता ] तो भी स्वार्थप्रवृत्तज्ञानान्तरजन्यत्व-अपने अर्थका प्रतिपादन करनेके लिए प्रवृत्त दूसरे ज्ञानसे उत्पन्न होना-उपाधि है। [स्मरणमें तो ज्ञानान्तरजन्यत्व (अनुभवजन्यत्व) है ] परन्तु वेदवाक्य तो दूसरे प्रमाणों द्वारा विषयका ज्ञान प्राप्त करके नहीं रचे गये हैं, जिससे (उपाधिकी विघटक) साधनव्यापकता आ सके। यदि ऐसा भी मानो कि वेदान्त- वाक्यका विषय सिद्ध वस्तु है, अतः उसमें मानान्तरयोग्यार्थत्व-दूसरे प्रमाणोंके योग्य विषयवाला होना-सिद्ध करके उससे ही सम्मिन्नार्थता सिद्ध की
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वेदमें निरपेक्षत्रामाण्योवपादन ] भापानुवांदसहित ७५९
नामपि तुच्छव्यावृत्तार्थत्वान्मानान्तरयोग्यविपयतया संभिन्नार्थता केन वार्यते ? न च विधिवाक्यत्वादेव मानान्तरयोग्यार्थत्वाभाव:, लौकिक- विधिवाक्येपु मानान्तरयोग्यार्थत्वदर्शनात्। तत्राऽपि तदयोग्यार्थत्वे कार्यसंचन्धग्रहणासंभवाद्वेदेऽपि तत्प्रतिपत्तिन स्यात्। अथ वैदिक- कार्यस्य कालत्यातीतस्व्रभावत्वाद् न मानान्तरयोग्यता तर्हि त्रह्मणोऽपि रूपादिहीनस्वभावत्वादेव मानान्तरयोग्यता न भविष्यति । अस्ति जायगी, तो विधिवाक्य भी सुच्छसे व्यावृत्त अर्थवाले हैं, अतः मानान्तर- योग्य विपयवाले ही हो जायँगे, इससे इनकी संमिन्नार्थताका वारण कैसे किया जा सकता है। [यहांपर मानान्तरयोग्य और मानान्तरसम्भिन्न दो पद पृथक्- पृथक् दिये गये हैं। मानान्तरयोग्यपदसे केवल इतना ही अर्थ लेना चाहिये कि जिस विषयका प्रतिपादन वेदान्तवाक्य कर रहे हैं, चह विषय चक्षुरादिसे भिन्न प्रमाणोंसे भी जाना जा सकता है, क्योंकि वेदान्तवाक्यका विषय घट, पट आदिके सदश सिद्धवस्तुभृत व्रह्म है और घट, पट आदि सिद्ध वस्तु केवल शब्दगम्य नहीं हैं, किन्तु मानान्तरगम्य भी हैं। दूसरे मानान्तरसम्मिन्नपद्से वह अर्थ लिया जाता है जो कि दूसरे प्रमाणोंसे-सभिन्न-सम्बद्ध अर्थात् गृहीत है, वह अर्थ केवल योग्यमात्र ही नहीं, किन्तु उसका ग्रहण भी किया गया है। इससे विधिवाकयोंके विपय केवल शव्दैकगम्य ही माने जायँ, तो शन्दोपकल्पितमात्र बन्ध्या पुत्रादिके समान हो जायँगे। उनसे मेद दिखलानेके लिए मानान्तरयोग्यत्वरूप वलक्षण्य विधिवाक्यप्रतिपाद्य विषयमें मानना आवश्यक है और जो मानान्तरयोग्य है, उसका मानान्तरसम्भिन्न होना कथमपि असम्भव नहीं है, प्रत्युत सुतरां सम्भव है, इसलिए विधिवाक्योंका मी तात्पर्य मानान्तरगृहीतार्थके बोधनमें ही माननेका अति- प्रसङ आ जायगा, जो इष्ट नहीं है]। विधिवाक्य होनारूप हेतुमात्रसे मानान्तर- योग्यार्थत्वका अभाव नहीं कहा जा सकता, कारण कि लौकिक विधिवाक्यमें (घटमानय इत्यादि स्थलमें) मानान्तरयोग्यार्थत्व देखा जाता है। यदि लौकिक वाक्योंमें मानान्तरयोग्यार्थत्वका अभाव हो, तो कार्यके सम्बन्धज्ञानका होना असम्भव हो जायगा, इससे चेदमें भी उसकी-कार्यसम्बन्धग्रहकी-प्रतिपत्ति न हो सकेगी। यदि वेदविहित कार्यका कालन्यातीत (तीनों कालोंके अगोचर) स्वभाव होनेसे मानान्तरयोग्य होना नहीं माना जा सकता यह कहा जाय, तो ब्रह्मका स्वभाव भी (स्वरूप मी) रूपादिसे विहीन ही है, इसलिए उसमें मानान्तरके विषय
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७६० विवरणंप्रमेयसंग्रह । सूंत्र.४, वर्णक १
ब्रह्मणि मानान्तरं स्वरूपचतन्याख्यमिति चेद्, न; तस्यैव न्रह्मत्वाद्। स्वरूपचैतन्यस्य ब्रह्मप्रमापकत्वेऽपि तत्सभिन्नार्थत्वमात्रेण न तत्सापेक्ष- त्वदोष:। स्वरप्रकाशपुरुषान्तरसंवेदनगोचरानुमानस्य तत्सापेक्षत्वदोपा- दर्शनाद्। नाऽपि तृतीयः, स्पर्शज्ञानयोग्यद्रव्यविपयस्य चक्षुपोऽनुवादक- त्वादर्शनात्। शब्द एवेयमनुवादकतेति चेत्, तथापि विधिवाक्ये तामाशङ्गां कथं परिहरिष्यसि। लौकिकस्य विध्यर्थस्य मानान्तरयोग्यत्वेऽपि वैदिकस्य तदयोग्यत्वादिति चेद्, भूतार्थेऽपि तत्समानम्। न च शब्द-
होनेकी योग्यता प्राप्त न होगी। ब्रह्ममें विद्यमान स्वरूपचैतन्यनामक मानान्तर भी नहीं कह सकते, कारण कि वही स्वरूपचतन्य ब्रह्मरूप है। स्वरूपचैतन्यके ब्रह्मनिश्चायक होनेपर भी उसके सिद्धभूत अर्थ होनेसे ही उससे सापेक्ष होनेका दोष नहीं आ सकता (अर्थात् यद्यपि ब्रह्मपमा स्वरूपचैतन्य द्वारा ही होती है, इसलिए स्वरूपचतन्यरूप अन्य प्रमाणसे सिद्धका ही प्रतिपादन वेदान्तवाक्योंसे होता है, ऐसा मानना ही होगा, तथापि वेदान्तवाक्यसे प्रतिपाद ब्रह्मको स्वरूपचतन्यकी अपेक्षा नहीं है); कारण कि स्वप्रकाशभूत दूसरे पुरुषके ज्ञानविषयक अनुमानमें उससे सापेक्ष होना दोष नहीं देखा गया है। [ जसे सांख्यमतमें परपुरुषविषयक अनुमान स्वप्रकाशरूप पुरुषको विपय करता हुआ भी उसके स्वरूपभूत प्रकाशसे सापेक्ष नहीं माना जाता एवं प्रभाकरमतमें परज्ञान-विपयक अनुमान भी स्वप्रकाशरूप ज्ञानको विषय करता हुआ भी स्वरूपभूत स्वप्रकाशज्ञान- सापेक्ष नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी ब्रह्मप्रमा स्वरूपचतन्यको विषय करती हुई भी स्वरूपचैतन्यापेक्ष नहीं है।। तीसरा पक्ष (मानान्तरके योग्य अर्थको विषय करनेसे अनुवादक होनेकी आशक्कारूप पक्ष) भी नहीं वनता, कारण कि स्पर्शज्ञानके योग्य घटादि द्रव्यको विषय करनेवाले चक्षु आदि प्रमाण अनुवादक नहीं देखे गये हैं। यदि शब्दरूप प्रमाणस्थलमें ही उक्त रीतिसे अनुवादकता मानी जाती है, ऐसा कहो, तो भी विधिवाक्यस्थलमें उक्त आशङ्काका परिहार कैसे किया जा सकेगा। [विधिवाक्य भी शब्द- प्रमाण ही है। ] लौकिकविधिवाक्यके प्रतिपाद विषयके मानान्तरयोग्य होनेपर भी वैदिक-विधिप्रतिपाद्य अर्थ मानान्तरयोग्य नहीं हो सकता, यदि ऐसा कहा
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वेद में निरपेक्षपरामाण्योपपादन] भापातुवादसहित ७६१
स्यैवाऽनुवादकत्वशङ्केति नियन्तुं शक्यम्, शव्दावगतेज्ये मानान्तर- मेवाऽनुवादकमित्यस्याऽपि सुवचत्वात्। तस्माद्भूतार्थनिष्ठमपि वैदिकं वचो निरपेक्षं प्रमाणम्। ननु सर्वत्रोत्तमवृद्धो मानान्तरेणार्ऽर्थमुपलभ्य तत्र शव्दं प्रयुङ्क्ते। मध्यमवृद्ू्च तस्माच्छव्दात्तमर्थमवगत्य तत्र प्रवर्चते। तां च प्रवृत्ति- सुपलभ्य वालो व्युत्पद्यते यथाव्युत्पत्ति च शब्दस्य बोधकत्वम्। ततो मानान्तरसंभिन्नस्यैवारडर्थस्य शब्दप्रमेयतया कथ वचसो निरपेक्ष प्रामाण्यम्? नैप दोपस; वालो हि स्वयं मानासंभिन्नं घटादिप्रमेयमात्रं प्रत्यक्षादि-
जाय, तो सिद्धवस्तुविपयक वेदान्तवाक्योंमें भी उक्त कथन समानरूपसे संगत हो सकता है। [और दूसरा समाधान यह भी हो सकता है कि ] शब्दपमाण ही अनुवादक है, इस आशङ्काका नियमन नहीं किया जा सकता अर्थात् ऐसा नियम नहीं बनाया जा सकता कि शव्दप्रमाण ही अनुवादक है, क्योंकि ऐसा भी कहा जा सकता है कि शब्दप्रमाणसे ज्ञात अर्थका अन्य प्रमाण ही अनुवादक है। इसलिए सिद्धभूत ब्रह्मके प्रतिपादक वेदान्तवचन निरपेक्ष (दूसरे प्रमाणोंकी अपेक्षा न रखते हुए स्वतन्त्र) प्रमाण हैं। [शब्द प्रमाणको सापेक्ष सिद्ध करनेके लिए शङ्का करते हैं-]शब्दप्रयोगस्थलमें सर्वत्र देखा गया है कि उत्तम बृद्ध प्रत्यक्षादि दूसरे प्रमाणोंके द्वारा अर्थकी उपलब्धि करके उसका बोध करानेके लिए शब्दका प्रयोग करता है। और मध्यम वृद्ध अर्थात् जिसके प्रति शब्दप्रयोग किया जाता है, वह उस शब्दसे प्रतिपाद अर्थका बोध करके उसके अनुसार कार्य करनेमें प्रवृत्त होता है। मध्यम वृद्धकी प्रवृत्तिको देखकर बालकको उस अर्थमें शब्दकी व्युत्पत्तिका ग्रह होता है और व्युत्पच्तिके अनुसार ही शन्द अर्थका बोधक होता है। [व्युत्पत्ति प्रवृत्तिदर्शनसे होती है, प्रवृत्ति शब्दपरयोगसे होती है और शव्दप्रयोग प्रमाणान्तरसे ज्ञात अर्थकी विवक्षासे किया जाता है, इस परम्परासे शब्द प्रमाण प्रमाणान्तरक्ी अपेक्षा रखता है, यह सिद्ध होता है-इस आशयसे शक्काका उपसहार करते हैं-] इसलिए प्रमाणान्तरसे सिद्ध अर्थ ही शब्दका प्रतिपाद्य प्रमेय होनेसे शब्दप्रमाणमें निरपेक्ष (स्वतन्त्र) प्रामाण्य कैसे हो सकता है? समाधान-उक्त दोष नहीं आ सकता अर्थात् शब्दमें निरपेक्ष प्रामाण्य है,
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७६२ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र ४, वर्णक ई
भिरवगत्य तन्न प्रवर्त्तमान: स्वदष्टान्तेन मध्यमवृद्धस्याऽपि मानान्तरा- मिश्रितशुद्धप्रसेयज्ञानपूर्विकां परवृत्तिमनुमाय तस्मिन् अमेयमात्रे शब्द- स्योत्तमवृद्धप्रयुक्तस्य सामर्थ्यमवगच्छति। न च वाच्यं कार्यस्य केवलस्य शबदशक्तिविषयत्वेऽपि सिद्धार्थस्य मानान्तरसंभिन्नस्यैव तद्विपयतेति । तन्र तावत् कार्यवाक्यगतसिद्धपदानि मानान्तरासंभिन्नेऽर्थे शक्तिमन्ति कार्यवाक्यगतत्वात्, कार्यपदवत्। तथा च तद्दृष्ान्तेनेतरेपामपि सिद्ध-
कारण कि वालक स्वयं दूसरे प्रमाणोंके द्वारा न जाने गये घटादि प्रमेय- जातको प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे जानकर उन अर्थोंमें प्रवृत्त होता हुआ अपनेको द्ष्टान्त बनाकर दूसरे प्रमाणोंसे असंबद्ध शुद्ध प्रमेय ज्ञानके अनन्तर ही मध्यम वृद्धकी भी होनेवाली प्रवृत्तिका अनुमान करके उस प्रमेय- मात्रमें (मात्रपदसे मानान्तरसम्भेदका वारण है) उत्तम वृद्ध द्वारा युक्त शब्दकी सामर्थ्य (अर्थवोध करना) समझ लेता है। [ व्युत्पित्सु बालक शव्दप्रयोगरूप अथवा घटाहरणादिरूप व्यवहार देखता हुआ स्वयं मानान्तरासंभिन्न शुद्ध घट, पट आदि विषयोंका ज्ञान प्राप्त कर लेता है और यथावसर प्राप्त हुए ज्ञानके वलपर घटाहरणादि अथवा घट आदि शब्दके व्यवहारमें प्रवृत्त होता है एवं मध्यम वृद्धिकी प्रवृत्ति देखकर वह निश्चय कर लेता है कि इस मध्यम वृद्धकी प्रवृत्ति मी मेरे समान ही उत्तम वृद्धके शव्दसे मानान्तरारसभिन्न अर्थको जान करके ही हुई है, अतः उत्तम वृद्धका शब्द केवल मानान्तरासम्भिन्न अर्थका ही प्रतिपादक है, ऐसा निश्चय करता है। इस प्रक्रियासे शब्दका निरपेक्ष प्रामाण्य सिद्ध होता है ]। केवल कार्यरूप अर्थको शक्तिका (शब्दशक्तिका) विषय मान भी लें, वो मी सिद्धभूत पदार्थ तो प्रमाणान्तरसे सिद्ध होकर ही शव्दशक्तिका विषय हो सकता है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, [कारण कि अनुमानसे शब्दोंकी मानान्तरासिद्ध अर्थके बोधनमें सामर्थ्य सिद्ध होती है। [ अनुमानपयोग दिखलाते हैं-) 'कार्यके प्रतिपादक वाक्यमें पढ़े गये सिद्ध वस्तुपरक पद (पक्ष) मानान्तरसे असम्भिन्न अर्थमें शक्तिशाली (वाचक) हैं (साध्य), कार्यप्रतिपादक वाक्यमें पठित होनेसे (हेतु), कार्यबोधक पदके सदश (दष्टान्त)। इस प्रकार उस कार्यपरक वाक्यगत सिद्धवस्तु-
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वेदमें निरपेक्षप्रामाण्योपपादन] भापानुवादसहित ७६३
पदानां तत्साधनीयम्। यत्तत्तमवृद्धस्यार्ऽर्थोपलव्धिहेतुभूतं मानान्तरं तद्विवक्षोत्पादनद्वारा शव्दप्रयोगे हेतुर्न तु शव्दप्रमेयेऽन्तर्भवति तच्च वालस्तदाऽवगमिष्यति यदा स्वयमुत्तमवृद्धो भूत्वा शब्दग्रयोगं करिष्यति। अत्र केचिचोदयन्ति-व्यर्थोडयं व्युत्पत्तिनिरूपणप्रयासः । शब्द- स्याऽर्थासंस्पशित्वात्। नह्यङुल्यग्रे हस्तियूथशतमास्त इत्यादिशब्दैः कथिदर्थ: ग्रमीयते। यत्राऽप्याप्तवाक्ये ग्रमीयते तत्राऽपि मानान्तरनिवन्धना सा ग्रमितिर्न शब्दनिवन्धनेति। तदेतचोदं आ्भाकर: परिहरति। यद्यपि पौरुपेयवाक्यैर्नाभिधेय- संसर्ग: प्रमीयते तथाप्येवमयं पुरुपो वेदेति वत्तृज्ञानविशेप: ग्रमीयते
परक पदको दष्टान्त करके अन्य भी सिद्ध पदोंका मानान्तरासम्भिन्न अर्थमें शक्तिका होना अनुमान द्वारा सिद्ध कर लिया जायगा। इससे पूर्व उत्तम वृद्धू का अर्थज्ञान करनेमें कारणभूत मानान्तरका जो निर्देश किया गया है, वह विवक्षाको उत्पन्न करा कर शब्दप्रयोग करनेमें कारण है। शब्द प्रमेय कोटिमें नहीं ा सकता [ विवक्षाके अधीन ही शव्दप्रयोग होता है, और विवक्षा ज्ञात अर्थकी ही होती है, इसलिए मानान्तरसम्भिन्नार्थत्व विवक्षोत्पादन द्वारा प्रयोगमात्रमें हेतु है, शब्द द्वारा अर्थबोध करानेमें हेतु नहीं है] और उस मानान्तरको वालक तब जान सकेगा जव वह स्वयं उत्तम वृद्ध होकर शब्द प्रयोग करेगा। शब्दप्रमाणके विपयमें कोई कोई वादी कहते हैं कि उक्त प्रकारसे व्युत्पत्तिके निरूपणका परिश्रम करना व्यर्थ है, कारण कि शब्दका अर्थके साथ कोई सम्वन्ध ही नहीं रहता है। जैसे कि 'अङ्गलीके अग्रभागमें सेकडों हाथियोंका झुंड है' इत्यादि शब्दोंके द्वारा किसी अर्थकी प्रमिति (अवाधित ज्ञान) नहीं होती और जिस आप पुरुषके वाक्य-स्थलमें अर्थका अवाघित ज्ञान होता है, उस स्थलमें भी दूसरे प्रमाणोंके द्वारा ही वैसा ज्ञान होता है, शन्दोंके द्वारा नहीं। गुरुमतानुयायी इस पूर्वपक्षका समाधान करते हैं कि पौरुपेय वाक्योंसे विधेयका सग्बन्ध यद्यपि निश्चित नहीं हो सकता, तथापि 'यह पुरुप ऐसा जानता है'
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७६४ विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र ४, वर्णक
एव। अङ्गुल्यग्रादिवाक्येष्वप्यव्यभिचारात्। स च ज्ञानविशेपो ज्ञेय- विशेषँ कल्पयतीति। सोडयं परिहरोऽनुपपन्नः, वैयधिकरण्यात्। शव्दस्याऽर्थ्ासंस्पार्शित्वे चोदिते लिङ्गस्य तत्सस्पर्शित्वं प्रतिपाद्यत इति किं केन सङ्गच्छेत। वक्तृज्ञानद्वारा शब्दार्थसंस्पर्शः ग्रतिपाद्यत इति चेद्, न; वक्वज्ञानस्य शब्दप्रमेयत्वायोगात्। 'गामानय' इत्यादिवाकयेषु वक्तज्ञानवाचकपदाभावात्। वाक्यार्थस्य पदार्थानतिरेकात्। अतिरेकेऽपि किं वक्वज्ञानमात्रं वाक्यार्थ उत ज्ञेयविशिष्टम्। आद्ये लौकिकवाक्यादप्रमिते ज्ञेये व्यवहारो न स्याद्। ततो व्युत्पत्यभावाद्वैदिकवाक्यस्याऽप्यवोधकत्वप्रसङ्ग: । द्वितीये इस प्रकार वक्ताको ज्ञान विशेषका निश्चय होता ही है। 'अङ्गुलीके अग्रभाग- आदि वाक्योंमें भी व्यभिचार नहीं है और तादश ज्ञानविशेष ज्ञेयविशेपकी कल्पना करता है। [ जिस पुरुषने 'अङ्गलीके अग्नभागमें सैकड़ों हाथी रहते हैं', ऐसा वाक्य कहा हो, उसका तो ज्ञान ऐसा मानना ही होगा और उस अनुमित ज्ञानविशेषसे ज्ञेयविशेषका अनुमान द्वारा सम्बन्ध सिद्ध हो ही जाता है, इसलिए शव्दोंका अर्थसे सम्बन्ध हो जानेके कारण व्युत्पत्तिके प्रकारका प्रदर्शन उचित ही है ]। गुरुमतानुयायियोंका उक्त परिहार युक्तियुक्त नहीं है, कारण कि इस समाधानमें वैयधिकरण्य दोष आ जाता है। शब्दका अर्थके साथ सम्बन्धाभावका तो प्रश्न किया गया और हेतुभूत ज्ञानविशेषका अर्थके साथ सम्बन्ध दिखलाया गया, इसलिए किससे कौन सब्गत हो सकता है। वक्ताके ज्ञान द्वारा शब्द और अर्थके सम्बन्धका प्रतिपादन किया जाता है, ऐसा कहना भी नहीं बनता, कारण कि वक्ताका ज्ञान शब्दका प्रमेयभूत अर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि 'गाय ले आओ' इस वाक्यमें वक्ताके ज्ञानका वाचक कोई पद (शब्द) नहीं है, वाक्यका अर्थ पदके अर्थसे अतिरिक्त नहीं होता है? यदि अतिरिक्त मान मी लिया जाय, तो भी प्रश्न होता है कि केवल वक्ताका ज्ञान वाक्यार्थ है? या ज्ञयसे विशिष्टज्ञान वाक्यार्थ है ? प्रथम विकल्पके माननेमें लौकिक वाक्य द्वारा प्रमित न हुए ज्ञेयमें व्यवहारकी सिद्धि नहीं होगी। इससे व्युत्पत्ति न होनेके कारण वैदिक वाक्य मी अर्थबोधक न हो सकेंगे। दूसरे विकल्पके माननेमें भी
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वेदान्तोंका नक्षमें ही ग्रामाण्य। मापानुवादसहित ७६५
ज्ञेयमेव वाक्यात् प्रमीयताम्, वक्तज्ञानस्य शब्दप्रयोगलक्षणलिङ्गानुमेयतयाS- न्यथासिद्धेः । ननु ज्ञेयमप्यन्यथासिद्धम्, श्रोता हि पदेभ्यः पदार्थानवगत्य नूनमेपां संसर्गोऽस्तीति सहग्रयोगवलादुत्प्रेक्षत इति चेद्, मैवम्; उत्प्रेक्षाया एवाऽत्र वाक्यजन्यप्रमितित्वात्। न तावदियमुत्प्रेक्षा स्मृतिसंशयचिपर्या- सेप्वन्तर्भवति, संस्कारजन्यत्वकोटिद्वयवाधानामभावाद्। ग्रमितित्वेऽपि प्रत्यक्षादिकारणान्तराभावाद् वाक्यजन्यत्वं परिशिष्यते। न च वक्तृज्ञानेनाS- सुमितेन ज्ञेयमन्तरेणाऽनुपपद्यमानेन पदार्थसंसर्ग: कल्पयितुं शक्य:, तथा सति वेदे वक्तुरभावात्संसर्गग्रमित्यसिद्धेः। तस्माच्छाव्दमेव संसर्गज्ञानम्। अङुल्यग्रादिवाक्यानां त्वनाप्तसंसर्गादर्थास्पर्शित्वम्। अर्थसंस्पर्शिनोSपि
ज्ञेय अर्थकी ही वाक्यसे प्रमिति मानिये, क्योंकि वक्ताका ज्ञान तो शब्दप्रयोगरूप हेतुसे अनुमेय होनेके कारण अन्यथासिद्ध है। शझा-ज्ञेय अर्थ भी अन्यथासिद्ध है; क्योंकि श्रोता पुरुष पदोंसे पदार्थका ज्ञान करके 'निश्चय इन पद-पदार्थोंका सम्वन्ध है' इस प्रकार सहप्रयोगके बलसे सम्भावना कर लेता है। समाधान-प्रकृतमें सम्भावनाकी ही वाक्य द्वारा प्रमिति होती है। और उक्त सम्भावना स्मरण, संशय तथा विपर्यय (भ्रम) कोटिमें नहीं आ सकती, कारण कि उसमें संस्कारसे उत्पन्न होना, दो कोटियोंका होना एवं वाधज्ञान-इनमें से कोई भी नहीं है। [यदि उक्त वाक्यसे प्रमित सम्भावना संस्कार- जन्य होती, तो स्मरणके अन्तर्गत आ सकती, यदि उसमें (यह वा वह) ऐसी दो कोटियां होती, तो संशय आता तथा उत्तरकालमें 'ऐसा नहीं' इस प्रकार वाघज्ञान होता, तो उसे भ्रम माननेका अवसर आता, इनमें से एक मी नहीं है, अतः वह वाक्यजन्य प्रमिति ही है । ] प्रमितिके माननेपर भी वहाँ प्रत्यक्ष, आदि दूसरे कारणोंका अभाव है, अतः उसे वाक्यजन्य मानना ही शेप रहता है। यदि कहो कि अनुमानसे सिद्ध वक्ताका ज्ञान ज्ञेयके बिना उपपन्न नहीं होता, अतः वह पदार्थके संसर्गकी कल्पना करता है, तो ऐसा कहना भी उचित नहीं है, कारण कि ऐसी कल्पना करनेपर वेदमें किसी भी वक्ताके न होनेसे पदार्थसंसर्गके निश्चयकी असिद्धि हो जायगी। इसलिए शब्द द्वारा ही संसर्ग-ज्ञान होता है। और 'अङ्गुलीके अग्रभागमें- इत्यादि वाक्योंका तो आपके साथ संसर्ग न होनेसे अर्थके साथ-स्पर्श-सम्बन्ध-
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७६६ विवरणत्रमेयसंग्रह् [सूत्र ४, वर्णक ?
प्रत्यक्षस्य कारणदोपे सति शुक्याद्यर्थासंस्पर्शित्वदर्शनात्। नह्यपौरुपे- यस्याउद्वैतागमस्य कश्चिदोपसंसर्ग: संभवति येनाऽर्थासंस्पर्शित्वमाशड्क्येत। यदि द्वैतावभासीनि प्रत्यक्षादीनीति तेन विरुध्येरन् तदा तान्येव वाध्य- न्ताम्। 'इन्द्रो मायाभिः' इत्यादिना मायाख्यदोपजन्यत्वश्रवणात्। दोप- जन्यत्वेऽपि स्वमवन्वहाराविसंवादे प्रामाण्यलाभात्। अद्वैतागमोऽपि प्रत्यक्षादिविपयस्य द्वैतस्य तच्वांशमेव बाधते न व्यवहारसंवादांशम्। एवं च सति यथा मायाकार्याणामपि प्रत्यक्षादीनां स्वस्वविपयेपु व्यावहा- रिकपदार्थु प्रामाण्यं तथैवाऽद्वैतागमस्य मायाकार्यत्वेऽप्यद्वैते स्व्विपये ग्रामाण्यं किं न स्ात् १ न चवं शुक्तिरजतादिज्ञानेSतिग्रसङ्ग: शङ्गनीय:, तत्राऽपि यावद्वार्धं आतिभासिकेषु रजतादिप ज्ञानस्य स्वतः आमाण्यानिवारणात्, अन्यथा अवृत्यनुपपत्ते:। विशेपदर्शनकालीनवाध नहीं है। अर्थसे सम्बन्ध रखनेवाले प्रत्यक्ष प्रमाणका भी इन्द्रियदोष होनेपर शुक्ति आदि अर्थके साथ सम्बन्ध नहीं देखा जाता है। अपौरुषेय अद्वैत शास्त्रमें कोई मी दोषका सम्बन्ध तो है नहीं, जिससे कि अर्थसम्बन्घके अभावकी आशक्का की जा सके। यदि कहो कि प्रत्यक्ष आदि प्रमाण देतका ज्ञान कराते हैं, अतः प्रत्यक्षादि विरोधी होंगे, तो उन विरुद्ध होनेवाले प्रत्यक्ष आदिका ही वाघ कीजिये, क्योंकि 'इन्द्र मायाओंके द्वारा' इत्यादि वाक्योंमें द्वैतका मायानामक दोषसे जन्य होना कहा गया है। दोपके कारण उत्पन्न होनेपर मी स्वप्नके समान व्यवहारका विसंवाद न होनेसे प्रामाण्यका लाभ हो जाता है। अद्वैत-शास्त्र मी प्रत्यक्षादि प्रमाणके विषयभूत द्वैतकी यथार्थताका (सत्यताका ) ही वाघ करता है, व्यवहारवादका वाघ नहीं करता। इस दशामें जसे मायाके कार्यमृत प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका अपने- अपने विषयमृत व्यावहारिक घट, पट आदि पदार्थोंमें प्रामाण्य माना जाता है, वैसे ही मायाकार्य होते हुए भी अद्वैत आगमका अपने विषय अद्वैतमें प्रामाण्य क्यों नहीं माना जायगा: इस रीतिसे शुक्तिरजतादि (प्रत्यक्ष भ्रमात्मक) ज्ञानमें प्रामाण्य माननेका अतिप्रसङ्क नहीं दिया जा सकता, कारण कि वहांपर (भ्रमस्थलमें) बाघज्ञानका जबतक उदय न होगा, तवतक प्रतिभाससे सिद्ध. शुकिरजतादिमें ज्ञानका स्वतःप्रामाण्य नहीं हटाया जा सकता। इसके विपरीत (ज्ञानका स्वतःप्रामाण्य न माननेसे) रजतार्थीकी रजतमें प्रवृत्ति
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वेदान्ताका वक्षमें ही न्रामाण्य] भापासुवादसहित ७६७
येनैतादृशमप्रामाण्यसुच्येत। नतु चित्रगतनिम्नोन्नतविषयचाक्षुपज्ञानस्य विपयगतश्यामादिरेखा-
दोपादग्रामाण्यमिति चेद, न; तत्राऽि स्पर्शज्ञानवाधादेवाSप्रामाण्यात्। अनधिगंतार्थगन्वृत्वलक्षणस्य ग्रामाण्यस्य न संवादापेक्षा शङ्कितुमपि शक्या। न चाऽऽम्रायस्य सर्वस्य क्रियार्थत्वाद्विधिवाक्यानामेव आ्रामाण्य- मिति वाच्यम्, इतरेतराश्रयत्वात्। विधिवाक्यानामेव प्रामाण्ये सिद्धे
नहीं बनेगी। विशेपज्ञानकालमें उत्पन्न हुए बाधकी पर्यालोचनासे ही पूर्व ज्ञानमें अप्रामाण्यका व्यवहार होता है। और अद्वैतज्ञानका कभी बाध ही नहीं होता, जिससे कि [अद्वैतज्ञानमें ] उक्त प्रकारका अप्रामाण्य कहा जा सके। शञङ्का-जैसे चित्रमें निम्नोन्नतभावका ज्ञान करानेवाले चाक्षुप प्रत्यक्षका अग्रामाण्य उसके विषय-निम्नोन्नत चित्र-गत श्यामादि वर्णकी रेखाओंका विशेष प्रकारसे खींचा जानारूप दोपके द्वारा प्राप्त है, वैसे ही प्रकृतमें भी अद्वैत- नामक विपयके दोपसे ही [ अद्वैतप्रतिपादक वेदान्तवाक्योंका ] अग्रामाण्य होगा। समाधान-उक्त कथन युक्त नहीं है, कारण कि दष्टान्त-स्थलमें भी स्पर्श- ज्ञान द्वारा वाधका उदय होनेपर ही अप्रामाण्य माना जाता है। अनधिगतार्थ- गन्तृत्व-अपूर्व अर्थका बोधन कराना-रूप प्रामाण्यमें संवादकी अपेक्षा करनेकी शङ्का भी नहीं की जा सकती। [ कारण कि प्रमाणका विषयभूत अर्थ यदि दूसरे प्रमाणसे सिद्ध है, तो वह विषय अपूर्च ही नहीं रहा, यदि अपूर्व- दूसरे प्रमाणोंसे अज्ञात-अर्थके बिना उसका बोध किया जा रहा है, तो वह प्रमाण ही नहीं माना जा सकता, इसलिए प्रमाण-प्रमेयमें संवादकी अपेक्षाका अवसर ही नहीं आता ] यदि कहो कि वेद-शास्त्र सम्पूर्ण ही क्रियाकलापात्मक कर्मकाण्डका ही प्रतिपादन करनेके लिए हैं, इसलिए विधिवाक्योंका ही प्रामाण्य माना जायगा, तो यह कहना भी नहीं वनता, कारण कि ऐसा माननेसे इतरेतराश्रय दोष आता है। [ इतरेतराश्रय दिखलाते हैं-] विधिवाक्योंका प्रामाण्य सिद्ध होनेपर ही
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७६८ विवरणप्रमैयसंग्रह [सूंत्र ४, वर्णक १
सर्वस्याSSम्नायस्य क्रियार्थत्वसिद्धिस्तत्सिद्धौ चेतरसिद्धिरिति। न च अवृत्ति- निवृत्तिसाध्ययोरिष्टप्राप्यनिष्टपरिहारयोरभावादपुरुपार्थे ब्रह्मणि कथ वेदान्त- प्रामाण्यमिति शङ्कनीयम् ; लोको हीष्टप्राप््यनिष्टपरिहारावेव साक्षात् प्रार्थयते न अवृत्तिनिवृत्ती, तयोरायासात्मकत्वात्। अप्राप्तग्रामादिप्राप्ताव- परिहृतरोगादिपरिहारे चाऽडयासमन्तरेणाऽभिलपितसिद्धभावादायासं पुरुष: सहेताऽपि, यत्र तु प्राप्तमेव कण्ठचामीकरादिकमजानानः पुरुषः पुनः प्राप्तुमिच्छति परिहृतमेतर च रज्जुसर्पादिकं परिजिहीर्पति तत्र ज्ञान- मात्रादभीष्टसिद्धौ कुत आयासं सहेत। नहि तन्राऽडयासोऽपेक्ष्यते, प्रत्युत ज्ञाने सति पूर्वोडप्यायास: परिहियते। एवं च सति नित्यप्राप्तस्य ब्रह्मण: प्राप्तौ नित्यनिवृत्तस्य संसारस्य परिहारे च हेतुभूतं तच्चज्ञानं जनयतां सम्पूर्ण वेदशास्त्रका विधिमें तात्पर्य सिद्ध होगा। और सम्पूर्ण वेदका विधिमें तात्पर्य निर्णीत होनेपर केवल विधिवाक्योंका प्रामाण्य सिद्ध होगा। शङ्का-प्रवृत्ति और निवृत्तिके द्वारा की जानेवाली अभीष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति-इन दोनोंके न होनेसे पुरुषार्थशुन्य सिद्धभूत ब्रह्मके प्रतिपादनमें वेदान्तवाक्योंका प्रामाण्य कैसे माना जा सकता है? समाधान-उक्त शङ्का उचित नहीं है, कारण कि संसारमें सभी लोग साक्षात् इष्ट-प्राप्ति और अनिष्टका निराकरण ही चाहते हैं, प्रवृत्ति तथा निवृत्तिको नहीं चाहते; क्योंकि प्रवृत्ति तथा निवृत्ति दोनों परिश्रमस्वरूप हैं। [ और परिश्रम कोई नहीं चाहता । ] यद्यपि यह हो सकरता है कि प्राप्त न हुए गाँवकी प्राप्ति तथा न छूटे हुए रोगको दूर करनेके लिए परिश्रमके बिना अभीष्टकी सिद्धि (ग्रामप्राप्ति और अनमीष्ट रोगकी निवृत्ति) नहीं हो सकती, अतः भले ही वहांपर पुरुष परिश्रम कर ले, तथापि जहां गलेमें पड़ा हुआ सुवर्णका हार प्राप्त ही है, परन्तु उसे न जानकर पुरुष फिर उसको प्राप्त करना चाहता है और जहाँ रज्जुसर्ष वस्तुतः है ही नहीं याने वह परिहृत ही है, तथापि उसको भगाना (परिहृत करना) चाहता है, वहाँ तो ज्ञान हो जानेसे ही अभीष्टकी सिद्धि हो जाती है; फिर उसके लिए उस स्थलमें पुरुष परिश्रम क्यों सहेगा? ऐसे स्थलोंमें परिश्रम करनेकी अपेक्षा नहीं रहती, बरिक ज्ञान हो जानेपर पहलेसे प्रारम्भ किया गया परिश्रम भी छोड़ दिया जाता है। इस सिद्धान्तके अनुसार नित्यपाप्त ब्रह्मकी प्राप्तिमें और नित्यनिवृत्त संसारके त्यागमें कारणभूत
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वेदान्तोंका चक्षमें ही त्रामाण्य] भाषानुवादसहित ७६९
चेदान्तानां कुतोऽपुरुपार्थपर्यवसायित्वशङ्का। तसाद्वेदान्तानां ब्रह्मणि प्रामाण्यं केनाऽपि वारयितुं न शक्यम्। किश्च, पुरुपार्थस्य आमाण्यप्रयोजकत्वे नित्यनैमित्तिकवाक्यानां प्रामाण्यं गुरुमते दुःसम्पादम्। नहि तत्र फलमस्ति, किन्त्वनुष्ठाने प्रयास एव, अननुष्ठाने तु प्रत्यवायः स्पष्टः। तत उभयथाऽप्यनर्थहेतूनां तेपां कथं प्रामाण्यसिद्धिः। तस्मात्प्रत्यक्षादिवच्छव्दस्याऽप्यनधिगता- वाधितासंदिग्धार्थवोधकत्वमात्रं आमाण्यनिमित्तम्। तच्व कार्यव्रह्म वाक्ययोः समानम्। तथा च सति पूर्वपक्षिणा वेदान्तानामप्रामाण्यसिद्धये महता प्रयासेन यद्विधिपरत्वकल्पनं तदकाण्डे ताण्डवित्तम्, तस्मात्सिद्ध त्रह्मणि वेदान्तानां ग्रामाण्यमिति। इति श्रीविद्यारण्यमुनिप्रणीते विवरणग्रमेयसंग्रहे चतुर्थसूत्रे प्रथमं वर्णकं समाप्तम् । तत्वज्ञानके उत्पादक वेदान्तवाक्योंका तात्पर्थ पुरुपार्थशुन्य पदार्थका बोधन करानेमें कैसे माना जा सकता है ? इसलिए वेदान्तवाक्योंका न्द्में प्रामाण्य मानना किसीसे भी दूर नहीं किया जा सकता। [प्रकारान्तरसे भी समर्थन करते हैं-] और यह भी है कि यदि पुरुपार्थको ही प्रामाण्यका प्रयोजक माना जाय, तो गुरुमतमें (प्रभाकरमतमें) नित्य तथा नैमित्तिक कर्म-बोधक वाक्योंका प्रामाण्य सिद्ध नहीं किया जा सकेगा, कारण कि उनका कोई फल नहीं है, किन्तु उनके करनेमें केवल परिश्रम है और न करनेमें प्रायश्चित्त लगता है। इसलिए करने या न करने-दोनों तरहसे भी अनर्थके उत्पादक उन नित्य-नैमित्तिक विधिवाक्योंका प्रामाण्य कैसे सिद्ध हो सकता है? इसलिए प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके सदृश अनधिगत (प्रमाणान्तरागृहीत-अपूर्व), अवाघित (वाधज्ञानरहित) तथा असंदिग्ध (सन्देहसे व्यावृत्त) अर्थका बोधक होना ही प्रामाण्यका प्रयोजक है। ऐसा प्रयोजक विधिवाक्य और ब्रह्मबोधकवाक्य दोनोंमें एक-सा ही है। इस दशामें पूर्चपक्षी लोग वेदान्तोंके अप्ामाण्यकी सिद्धिके लिए इतने वड़े प्रयासके साथ जो यह कल्पना करते हैं कि वेदान्तोंका विधिमें तात्पर्य है, वह तो केवल अनवसरमें नृत्य करनेके समान है। इसलिए वेदान्तवाक्योंका ब्रह्मामें ही प्रामाण्य है। चतुर्थ सूत्रमें प्रथम वर्णक समाप्त।
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७७० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक ₹
द्वितीयं वर्णकम शब्दानां सिद्धार्थे शक्तिमङ्गीकृत्याऽपि ब्रह्मणि वेदान्तमामाण्यं न संभवतीति ये मन्यन्ते तेषां मतं पूर्ववर्णके निरस्तम्। ये पुनः कार्या- न्वितस्वार्थे एव शब्दशक्तिरिति मन्यमाना: कार्यशेपतयैव ब्रह्म वेदान्तैः प्रमीयते इति कथयन्ति, तेषां मतमस्मिन्वर्णके निरस्यते। ते हेवमाहु :- उत्तमवृद्धेन गामानयेत्युक्तेऽनन्तरं मध्यमवृद्वेन क्रियमाणं गवानयनं व्युत्पित्सुर्वालो गवानयनकार्यमनेन वाक्येन वोधित- मित्यवगत्य पुनरश्वमानय गां वधानेत्यादिपयोगेष्वावापेद्धाराभ्या-
द्वितीय वर्णक सिद्ध अर्थमें शब्दोंकी शक्तिका स्वीकार करनेपर भी ब्रह्ममें वेदान्त-वाक्योंका ग्रामाण्य नहीं हो सकता, इस प्रकार जो मानते हैं, उनके मतका खण्डन पूर्व वर्णकमें किया जा चुका है। अब उन प्राभाकरानुयायियोंके मतका खण्डन किया जाता है, जो कार्यसे सम्बद्ध स्वार्थमें ही शब्दकी शक्ति मानकर विधिके अझ्रूपसे ही वेदान्तवाक्यों द्वारा ब्रह्मका प्रतिपादन होता है, ऐसा कहते हैं। वे यों कहते हैं-उच्तम वृद्धने (आज्ञा देनेवाले प्रयोजक पुरुषने) 'गऊ लाओ' ऐसा कहा, तदनन्तर मध्यम वृद्ध (जिससे काम करनेको कहा गया उस पुरुष) द्वारा किये गये गऊके आनयन (लाना) रूप कार्यको देखकर व्युत्पचतग्हकी (जाननेकी) इच्छा रखनेवाला बालक निश्चय करता है कि उक्त वाक्यसे गाय लानारूप कार्य (क्रिया) ही बोधित होता है। तदनन्तर 'घोड़ा लाओ' और 'गाय बांधो' इत्यादि प्रयोगोंमें आवाप और उद्यापसे [ अर्थात् अन्वयव्यति- रेकसे पूर्व वाक्यमें जो 'गाय' और 'लाओ' पद थे उन दोनों पदोंके श्रवणसे गायका लाना कार्य किया गया। 'अब घोड़ा लाओ' कहनेसे दूसरे पदार्थका लाना हुआ, और 'गाय बांधो' वाक्यसे गायके साथ दूसरी क्रिया हुई, इस तरह 'गाय लाओ' और 'गाय बांघो' इन दोनों वाक्योंमें 'गाय' पद समान है, क्रियाका कर्म पदार्थ भी गायरूप समान है, इसलिए 'गाय' पदका अर्थ यही सास्नादि- मान् पदार्थ है, परन्तु दोनों स्थलोंमें वह कार्यान्वित ही दीख पड़ता है, अतः देखनेवाले बालकने निश्चय किया कि कार्यान्वितमें ही शन्दोंकी शक्ति होती
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कार्याङ्गरूपसे वेदान्तमें वक्ष-प्रतिपादकत्व] भापानुवादसहित ७७१
मेककस्य पदस्य कार्यान्वितस्वार्थे सामर्थ्य पतिपद्यते। न चेष्टसाधने व्युत्पत्तिः संभवति, अतीते इष्टसाधनादौ मध्यमवृद्धप्रवृत्त्यभावात्। कृतियोग्ये इष्टसाधने प्रवृत्तिरस्तीति चेत्, नर्ह्यव्यभिचारात्कार्यमेव व्युत्पत्ति- प्रयोजकं भविष्यति। अव्यभिचारित्वमात्रेण कार्यस्य ग्रयोजकत्वे कार्य- गतलीकिकत्वस्याप्यव्यभिचाराद् व्युत्पत्तौ प्रयोजकत्वं अ्रसज्येत । तथा च वेदे नियोगप्रतिपत्तिर्न स्यादिति चेद्, न; कार्य परित्यज्याऽ न्वितस्व्रार्थमात्रस्य प्रयोजकत्वाङ्गीकारे केनाऽन्वित इति साकाद्गत्वअ्रसङ्गाद्। न च लौकिकत्वपरित्यागे वाघोऽस्ति। ननु सिद्धपदानां कार्यान्विित- स्वार्थसंभवेऽि कार्यपदस्य न तत्संभवः कार्यान्तराभावादिति चेद्, न; धात्वर्थस्याऽपि कार्यतया तदन्वितयोगे कार्यपदस्य व्युत्पत्ते:। यद्यपि
है, एवं 'आनय' पदमें आवाप और उद्दापको देखकर उसका भी अर्थनिर्णय किया, इससे ] एक एक पदकी कार्यान्वित स्वार्थमें सामर्थ्यका (शक्तिका) निर्द्वारण करवा है। इएसाघनमें व्युत्पत्तिग्रह नहीं हो सकता, कारण कि भृतकालिक इष्टसाधनमें मध्यम वृद्धकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। यदि कृति (क्रिया) के योग्य इष्ट- साधनमें प्रवृत्ति होती है, ऐसा माना जाय, तो व्यभिचारशुन्य होनेसे कार्य ही व्युत्पत्तिका प्रयोजक (शब्दकी शक्तिका ग्राहक) मान लिया जायगा। शक्ा-यदि व्यभिचारशून्य होनेसे ही कार्यको व्युत्पत्तिका प्रयोजक माना जाय, तो कार्यमें लौकिकत्वका भी व्यभिचार नहीं है, अतः उस कार्यमें रदनेवाले लौकिकत्वको भी व्युत्पत्तिका प्रयोजक मानना होगा। इससे वेदमें नियोगकी प्रतीति नहीं हो सकेगी। समाधान-यदि कार्यको छोड़कर अन्वित स्वार्थमात्रमें (लौकिकत्वमें) ही प्रयोजकत्व माना जाय, तो वह किससे अन्वित है : इस प्रकार साकाड्क्ष होनेका प्रसङ्ग आ जायगा। और लौकिकत्वके छोड़नेमें कोई वाध भी नहीं है। शङ्का-सिद्ध पदार्थके प्रतिपादक 'गो' आदि पदोंकी शक्ति कार्ययुक्त स्वार्थमें सम्भव होनेपर भी कार्यबोधक 'लाओ' आदि पदका वैसा-कार्यान्वित अर्थका बोधन करना-सम्भव नहीं है। समाधान-धातुका अर्थ कार्यरूप होनेसे उस कार्यसे युक्त नियोगमें
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७७२ विवरणत्रमेयसंग्रह् [सूत्र ४, वर्णक २
लोके 'फलितो दुमः' इत्यादिवाक्यानि कार्यरहितान्यपि प्रयुज्यन्ते तथापि तत्र 'तं पश्य'इत्यादिकार्याध्याहारोऽवगन्तव्यः, कार्यान्विते व्युत्पनस्य
मन्तरेण वाक्यप्रयोगानुपपत्तेर्नियोगनिष्ठा वेदान्ता:। न च रज्जुसर्प- कण्ठचामीकरादाचिव तत्वज्ञानमात्रेण प्रयोजनसुपलभामहे। न चतच्छा- स्त्रीयम्, तथा सति श्रवणोत्तरकालीनयोर्मनननिदिध्यासनयोरविधि- प्रसङ्गात्। न च सर्वस्य वेदस्य विधिनिष्ठत्वे सत्येकैव मीमांसा पोड़शलक्षणी स्यादिति शङ्गनीयम्, क्रियाविधिप्रतिपत्तिविधिरूपाभ्यां तन्भेदसिद्धेः। यानि वेदान्तवाक्यानि ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादकानि 'सदेव सोम्येदम्' इत्यादीनि तानि सर्वाणि 'सोऽन्वेष्टव्यः' इत्यादिविधिषु कोऽसावात्मेत्याकाङ्गयां तच्छेपतयैवाऽडत्मविशेषं समर्पयन्ति। तस्मादनन्यशेपाद्वितीय प्रतिपादकत्वं वेदान्तानां नाडस्तीति। कार्यपदकी व्युत्पत्ति सिद्ध हो सकती है। यद्यपि लोकमें (फला हुआ पेड़) इत्यादि वाक्य कार्यशुन्य अर्थका भी प्रतिपादन करते ही हैं, तथापि ऐसे वाक्योंमें 'उसको (फलित पेड़को) देखो, इत्यादि प्रकारसे कार्यका अध्याहार समझना चाहिए, कारण कि कार्यान्वित पदार्थमें शक्तिशाली पद कार्यके बिना बोधक नहीं हो सकते। इसलिए प्रवृत्ति या निवृत्तिसे साध्य प्रयोजनके बिना वाक्यका प्रयोग नहीं हो सकनेसे नियोगके बोधनमें ही वेदान्तोंका तात्पर्य है। रज्जुसर्प या गलेके हारके समान तत्त्वज्ञानमात्रसे ही प्रयोजनका सिद्ध होना नहीं माना जा सकता, कारण कि उक्त प्रयोजन शास्त्रका तात्पर्यविषय नहीं है। यदि इसको शास्त्रीय प्रयोजन मान लिया जाय, तो श्रवणके बाद होनेवाले मनन और निदिध्यासनको विधि न माननेका प्रसक्क आ जायगा। यदि कहो कि सभी वेद विधिपरक होंगे, तो सोलह अध्यायकी एक ही मीमांसा हो जायगी, तो यह कहना मी उचित नहीं है, कारण कि क्रियाविधि और प्रतिपत्ि (ज्ञान) विधिके मेदसे उन दोनोंका मेद ही है। 'सदेव सोम्य०' इत्यादि जो ब्रह्म- स्वरूपके प्रतिपादक वाक्य हैं, वे सव 'सोऽन्वेष्टव्यः' इत्यादि विधियोंमें 'आत्मा कौन है ?' इस प्रकारकी आत्मविषयक जिज्ञासा होनेपर उसके अङ्गरूपसे विशेष आत्माका समर्पण करते हैं ? इससे वेदान्त अनन्यशेष अद्वितीय आत्माके प्रतिपादक नहीं हैं।
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वेदान्तोंका मक्षमें पामाण्य] भापानुवादसहित ७७३
अत्रोच्यते-न तावनियोगन्रह्मणी उभे अपि वेदान्तैः प्रमातुं शक्येते, विरुद्धत्निकद्वयापतिप्रसङ्गात्। तच्च अ्रथमसूत्रद्वितीयवर्णके विस्तृतम्। नाऽपपि नियोगमात्रं अ्रमातुं शक्यम्, विधेयानिरूपणात्। न तावच्छाव्दं ब्रह्मज्ञानं विधेयम, तस्याऽऽपातिकस्याऽव्ययनादेव निष्पत्तेः। निर्णयक् विचारजन्यः । अन्यथाऽग्रिहोत्रादिज्ञानस्याऽपि तद्वावाक्याच्ययन- तद्विचाराभ्यामसिद्धिपसङ्गात्। नाऽपि शव्दावगते ब्रह्मणि स्मृतिसन्तानो विधेया, तद्विघेरद्ष्टफलत्वे स्वर्गादिवन्मोक्षस्याऽपि कर्मजन्यत्वेनाऽनित्य- त्वप्रसङ्गात्। अथाऽङ्गमर्दनप्रवाहेण शरीरे सुखप्रवाहोत्पत्तिवदभीष्टव्रह्म- विपयस्मृतिसन्तानेनाऽपि सुखसन्तानो दृष्टफलं भवेत्, तर्ह्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां तत्सिद्धेविधिवैय्धर्यम्। अस्तु तहिं स्मर्यमाणस्य साक्षात्करणं स्मृति- इस प्रकारके पूर्वपक्षके उत्तरमें कहा जाता है-नियोग और ब्रह्म-इन दोनोंका निश्चय तो वेदान्तवाक्योंके द्वारा नहीं किया जा सकता, कारण कि इसमें विरुद्ध दो त्रिकोंकी आपत्तिका प्रसन्न होगा। इसका वर्णन विस्तार- पूर्चक प्रथम सूत्रके द्वितीय वर्णकमें किया गया है। केवल नियोगका निश्चय भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस नियोगके विघेयका निरूपण नहीं होता-शब्द द्वारा उत्पन्न न्रह्मज्ञान तो विघेय हो नहीं सकता, कारण कि विचारके पूर्व भी वेदान्तवाक्योंके केवल पठनसे शव्दजनित नम्मज्ञानकी सिद्धि हो सकती है। और निर्णय तो विचारसे उत्पन्न होता है। यदि ऐसा न माना जाय, तो उन अग्निहोत्रादिके प्रतिपादक वाक्योंके पढ़ने तथा विचार करने से अग्निहोत्रादिके ज्ञानकी भी असिद्धिका प्रसङ्ग आ जायगा। [ इसलिए शव्दज्ञानका पठनसे ही और निर्णयका विचारसे ही अस्तित्व मानना होगा ] और शब्द द्वारा जाने गये न्रह्ममें स्मृतिसन्तान (ब्रह्मकी निरन्तर स्मृतिकी उत्पत्ति होते रहना ) मी विघेय नहीं हो सकता, कारण कि उस ब्रदाविषयक स्ृतिसन्तानविधिके अद्षफलक होनेके कारण स्वर्गादिके तुल्य मोक्षमें भी, कर्मजन्य होनेसे, अनित्यत्वका प्रसङ्ग आ जायगा। शरीरकी मालिसके निरन्तर चाल रहनेसे शरीरमें जसे सुखप्रवाहकी उत्पत्ति होतीर हती है, वैसे ही अमीष्ट ब्रह्मविपयक स्मृतिके सन्तानसे (प्रवाहसे) मी निरन्तर सुख होते रहना- रूप इष्ट फल यदि उस विधिका कहा जाय, तो यह फल अन्वय-व्यतिरेक द्वारा ही सिद्ध हो सकता है, इसलिए उस फलकी सिद्धिके लिए विधिवाक्यका होना
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७७४ विचरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र 8, वर्णक २
संतानविधेः प्रयोजनमिति चेत्, तदापि किं स्मृतिसन्तान: स्वयमेव साक्षात्कारं जनयेत् उताऽदृष्टद्वारा अथवा विज्ञानान्तरद्वारा ! नाऽडद्य:, नहि स्मृतिरूपस्य परोक्षज्ञानस्य सन्तानो विपयसाक्षात्कारं जनयितु-
द्वितीयेऽपि न तावत् स्मृतिसन्तानजन्यमदष्टमान्रं साक्षात्कारोत्पादने प्रभवति; साक्षात्कारस्य प्रमाणजन्यत्वात्। प्रमाणस्याऽप्यदष्टसहकारित्वे प्रमाणेनैव साक्षातंकारोत्पत्तावद्ृष्टवैयर्थ्यम्। न तृतीय:, स्मृतिसन्तान- जन्यं तद्विज्ञानान्तरं स्वयमेव साक्षात्कारजनकम् उताऽदष्टद्वारेत्यादि- विकलपदोषप्रसङ्गात्। ननु तर्हिं शब्दावगते ब्रह्मणि ध्यानं विधीयताम्। न च स्मृति-
व्यर्थ है। [वही विधिवाक्य चरितार्थ होता है, जो अनन्यसिद्ध फलकी सिद्धिके लिए विधानका प्रतिपादन करे ]। यदि कहो कि स्मृतिके विपयभूत (ब्रह्मका) साक्षात् (प्रत्यक्ष दर्शन) करना ही स्मृतिसन्तानविधिका फल माना जाय, तो इसपर विकल्प होंगे कि क्या स्मृतिसन्तान स्वयं साक्षात्कारको उत्पन्न करेगा ? अथवा अदष्टके द्वारा या दूसरे विज्ञानके द्वारा: इनमें प्रथम विकल्प नहीं हो सकता, कारण कि स्मृतिस्वरूप परोक्ष ज्ञानका सन्तान (प्रवाह) विषयके साक्षात्कारको (प्रत्यक्ष ज्ञानको) उत्पन्न करनेका साहस नहीं कर सकता। अन्यथा (यदि परोक्ष ज्ञानको प्रत्यक्ष ज्ञानके उत्पादनमें समर्थ मान लिया जाय, तो) अनुमानस्वरूप ज्ञानप्रवाह भी अपने विषय अनुमेयका साक्षात्कार करा देगा। दूसरे विकरपके माननेमें भी प्रथम तो स्मृतिपरवाहसे उत्पन्न हुआ अदृष्ट ही साक्षात्कारको उत्पन्न करानेमें समर्थ नहीं हो सकता, कारण कि साक्षात्कार तो प्रमाण द्वारा उत्पन्न होता है। प्रमाणका भी यदि अद्ृष्ट उपकारी माना जाय, तो प्रमाण द्वारा ही साक्षात्कारकी उत्पत्ति हो जानेपर उसके लिए अदष्टका मानना ही व्यर्थ है। तीसरा विकल्प भी नहीं बन सकता, क्योंकि इसमें भी स्मृतिप्रवाहसे उत्पन्न हुआ वह दूसरा विज्ञान क्या स्वयं ही साक्षात्कारका उत्पादक है? या अहष्टके द्वारा ? इत्यादि विकल्प- दोषोंका प्रसङ्क विद्यमान ही है। शझा -- तब तो शब्द द्वारा जाने गये ब्रह्ममें ध्यानका विधान करना
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वेदान्तोंका ब्रह्ममैं प्रामाण्य ] भापानुंवादसहित ७७५
सन्तान एव ध्यानम्, स्मृतिसन्तानस्य वस्तुगोचरत्वाद् ध्यानस्याऽडरोपित- विपयतयाऽपि संभवात्। न च ग्रयोजनाभाव:, व्रह्मापरोक्षस्य प्रयोजनत्वात्। दृश्यते हि ध्यानाभ्यासप्रचयसामर्ध्यान्मृतपुत्राद्याप- रोक्ष्यम्। न च तद्वदेव त्रह्माऽऽपरोक्ष्यस्य भ्रान्तत्वग्रसङ्ग:, शब्दग्रमाण- संवाद्सन्भ्ावाद्। स्वमवस्तुसाक्षात्कारस्याऽपि कस्यचिञ्ञागरणज्ञान- संवादे प्रामाण्यदर्शनात्, नेतत्सारम् ; स्वतःग्रामाण्यहानिप्रसङ्गात्। न च रवमे चक्षुरादिप्रवृत्तिमन्तरेण वस्तुसाक्षात्कार: संभवति। जागरण- संचादस्तु सादश्यादुपपद्यते। अथ स्मृतिसन्तानध्यानयोरविधेयत्वेऽपि
उचित है। और स्मृतिप्रवाह ही ध्यान नहीं कहा जा सकता, कारण कि स्मृति- सन्तान तो वास्तव वस्तुको विपय करता है और ध्यानका विषय तो आरोपित (अवास्तव) भी हो सकता है। प्रयोजनका अभाव भी (अर्थात् ध्यानका कोई फल नहीं है, ऐसा भी) नहीं कह सकते, क्योंकि उससे ब्रह्मसाक्षात्काररूप फल हो सकता है। ध्यानके अभ्यासके आधिक्यसे मरे हुए पुत्र आदिका साक्षात्कार देखा भी जाता है। और मृतपुत्र आदिके ध्यानके वलसे उत्पन्न साक्षात्कारकी भाँति व्रह्मसाक्षात्कारको भ्रम माननेका प्रसद्ग भी नहीं आ सकता, कारण कि त्रह्मसाक्षात्कारमें वेदान्तवाक्यरूप शब्द-ग्रमाणका संवाद सम्भव है। [और मृत पुत्र आदिके साक्षात्कारमें ध्यानसे अतिरिक्त प्रमाणान्तरका संवाद नहीं मिलता ] रवममें उत्पन्न हुए प्रत्यक्षका जागरणावस्थाके ज्ञानके साथ संवाद मिलनेसे प्रामाण्य देखा गया है। समाधान-ध्यानका विधान करनेवाली युक्तियाँ सारभूत नहीं है, कारण कि इससे ज्ञानके स्वतःमामाण्यकी हानिका प्रसङ्ग होता है। और स्वप्नमें तो चक्षु आदि प्रमाणोंके व्यापारके बिना वस्तुको साक्षात्कार सम्भव ही नहीं है। जागरणमें संवाद तो केवल सादश्यसे होता है। [आशय यह है कि यदि ध्यानसन्तानाधिक्यसे उत्पन्न हुआ साक्षात्कार (प्रत्यक्षज्ञान) शब्द- प्रमाणके साथ संवाद मिलनेसे प्रमाण माना जाय, तो ज्ञानोंके स्वतःपरामाण्यकी हानि होगी! यदि प्रमाणान्तर-संवादसे प्रमाणित न किया जाय, तो वह मृत पुत्र आदिके साक्षात्कारके तुल्य भ्रम माना जायगा। इस प्रकार उक्त युक्तियाँ उभयथा दोपग्रस्त हैं। स्वप्नसाक्षातकारको प्रमाणान्तरके संवादसे प्रमाण माननेका
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७७६ विवरणप्रमेयसँग्रह [ सूंत्र ४, वर्णक ₹
शाब्दज्ञानादन्यदेव ज्ञानमलौकिकं श्रवणमननादिकरणकं वेदानुवच- नादीतिकर्त्तव्यताकं न्रह्मापरोक्ष्यफलकं मोक्षकामः कुर्यादिति विधीयत इति चेद्, मैवम्; वेदान्तानां ब्रह्मप्मापके विधेयज्ञाने आ्माण्यकल्पनाद् ब्रह्मण्येव साक्षात्प्रामाण्यकल्पनाया लघीयस्त्वात्। न च विधिसंस्पर्शित्वं प्रामाण्यकारणम्, किन्तु प्रमितिजननम् । अन्यथा अग्निहोत्रादिवाक्यं दर्शपूर्णमासविधिनिष्ठमपि स्याद्, विधिसंस्पर्शाविशेपात्। ग्रमितिश्च सत्य-
प्रतिपादन करना तो बनता ही नहीं, क्योंकि स्वप्नमें वस्तुका साक्षात्कार होता ही नहीं, साक्षात्कार तो चक्षुरादि इन्द्रियोंसे नन्य ही हो सकता है, स्वप्नमें बहिरिन्द्रियाँ निर्व्यापार रहती हैं, अतः स्वप्नमें प्रतीयमान सब त्रम ही है, जागरणसंवाद तो केवल सादश्य द्वारा है। ] शक्का-यद्यपि स्मृतिसंतान और ध्यान विधेय नहीं हैं, तथापि शब्द- जनित (शान्दबोधरूप) ज्ञानकी अपेक्षा दूसरे अलौकिक श्रचण, मनन आदि साधनोंसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानका, जिसकी इतिकर्तव्यता वेदानुवचनादि हैं, और ब्रह्मका साक्षात्कार फल है, मोक्षकी इच्छा रखनेवाला विधान करे, इस प्रकारकी ज्ञानविधि मानेंगे। समाधान-ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि वेदान्तोंका न्रह्मनिश्चायक विधेयरूप ज्ञानमें प्रामाण्यकल्पनाकी अपेक्षा साक्षात् न्रह्ममें ही प्रामाण्यकी कलपना करनेमें लाघव है, विधिके साथ सम्बन्ध होना प्रामाण्यका कारण नहीं है, किन्तु प्रमितिका (निश्चयात्मक ज्ञानका) उत्पन्न करना ही प्रामाण्यका कारण है, [इससे ब्रह्मनिश्चायक होनेसे ही वेदान्तोंका प्रामाण्य हो सकता है, उसमें प्रामाण्य माननेके लिए विधिके संसर्गकी कल्पना करनेकी आवश्यकता नहीं है ] अन्यथा (यदि विघिके सम्वन्धसे ही वाक्योंका प्रामाण्य माना जाय, तो) अग्निहोत्रवाक्य दर्शपूर्णमासके विघेयवाक्यमें भी माना जायगा, विधिके साथ सम्बन्ध समान है। [अग्निहोत्र-वाक्यमें दर्शपौर्णमासके नियोगकी प्रतीति तो- होती नहीं, इसलिए उसमें उसका प्रामाण्य भी नहीं माना जा सकता, इसलिए जिस वाक्यमें जिस नियोगकी प्रतीति हो वह उसमें ही प्रमाण हो सकता है, इसलिए दर्शपूर्णमासनियोग-बोधक वाक्यमें ही अग्निहोत्रका प्रामाण्य होना चाहिए। ] और निश्चयात्मक ज्ञान तो सत्य, ज्ञान
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वेदान्तोंका ब्रह्ममें श्रामाण्य] भंपांनुगांदसवहित ७७७
ज्ञानादिवाक्येभ्यो ब्रह्मण्येव जायते, न विधौ। न च लौकिकात् प्रामाण्या- दन्यदेव वैदिकं आ्रामाण्यं विधिसंसृष्टमिति शङ्कनीयम्, यथा शब्दार्था य एव लौकिकास्त एव वैदिकास्तथा ग्रामाण्यस्याऽि लोकवेदयोरेकत्वात्। तदेवं वेदान्तेपु न किश्चिद्विधेयं निरूपयितुं शक्यम् । नाऽपि नियोग: सुनिरूपः । लोके ह्याचार्य: शिष्यं नियुङ्क्ते इत्या- दावुत्क्रष्टस्य पुरुपस्याऽचरपुरुपप्रेरणात्मकोऽभिग्रायभेदो नियोगत्वेनाऽभि- मतः। न चाऽसावपौरुपेये वेदे संभवति। ननु नियोगो नाम प्रवर्त्तक:, प्रवर्तकत्वं कार्यवुद्धिगम्ये चस्तुनि प्रतिष्ठितमिति चेत्, किमिदं कार्य नाम किं कृतिसंसृष्टं किंवा कृतियोग्यम् अथवा कृतियोग्यत्वे सति क्रियाकारकफलविलक्षणं किश्चिदलौकिकम्: नाऽडद्य, कृतिर्हि पुरुष- प्रवृत्ति:, कार्य च प्रवृत्तिनिमित्तम्। न च प्रवृत्तिसंसृष्टस्य पवृत्तिनिमित्तत्वं
आदि वाक्योंसे ब्रह्मविपयक ही होता है, विधिविपयक नहीं होता। लौकिक प्रामाण्यकी अपेक्षा भिन्न ही विघिसे सम्बद्ध वैदिक प्रामाण्य है, ऐसा मानना भी नहीं वन सकता, कारण कि जो लौकिक शब्दार्थ हैं, वे ही वैदिक शब्दार्थ हैं, इस प्रकारका प्रामाण्य भी लोक और वेद दोनोंमें समान (एक ही) है, इसलिए वेदान्तोंमें किसी विघेयका निरूपण नहीं किया जा सकता। और नियोगका निरूपण करना मी सरल नहीं है, कारण कि लोकमें 'आचार्य शिष्यको नियुक्त करता है' इत्यादि स्थलमें उत्तम पुरुषका अपकृष्ट पुरुषकी ्ेरणारूप एक अभिप्रायविशेष ही नियोग माना गया है। इस अभिप्ायविशेषरूप नियोगका अपौरुषेय वेदमें सम्भव नहीं हो सकता। शङ्का-नियोग तो प्रवृत्ति करानेवालेको कहते हैं और प्रवर्तकत्व (प्रवृत्ति कराना) तो कार्यबुद्धिसे प्रतीयमान वस्तुमें स्थित रहता है। समाधान-इस कार्यवुद्धिमें कार्य क्या वस्तु है: कृतिसे (क्रियासे) सम्बन्ध रखनेवाला कार्य है या कृतिके (क्रियाके) योग्यको कार्य कहते हो अथवा कृतिके योग्य होते हुए करिया-कारकफलसे विलक्षण कुछ अलौकिक ही कार्य है? इनमें प्रथम पक्ष नहीं बन सकता, कारण कि कृति तो पुरुषकी प्रवृत्ति-व्यापार-है और कार्य प्रवृत्िका निमिच है। और प्रवृत्तिके साथ
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७७८ विवरणग्रमेयसंग्रह [सूंत्र ४, वर्णक २
संभवति। अंशतः, आत्माश्रयत्वात्। न द्वितीय :; दुःखसाधनानामपि कृतियोग्यतया कार्यत्वे सति अवर्त्तकत्वप्रसङ्गात्। न तृतीयः, तस्य प्रत्यक्षाद्यगोचरस्य व्युत्पच्ययोग्यस्य शब्दप्रतिपाद्यत्वासभवा् । न पराभिमतकार्यानङ्गीकारे प्रवर्त्तकाभावः, कृतियोग्येष्टसाधनस्य प्रवर्तक- त्वात्। कृतियोग्यत्वविशेषणोपादानान्न चन्द्रोदयादौ व्यनिचारः। यद्यपि कवृतियोग्यस्य फलस्याऽि अवर्त्तकत्वमस्ति, तथापि वालस्य व्युत्पत्ति- निमित्ततया मध्यमवृद्धप्रवृत्तिहेतुभूतं गवानयनादिलक्षणमिष्टसाधनमेव। अतश् येयं महता प्रयासेन कार्यव्युत्पत्तिः साधिता सा नाऽस्माकमनिष्टा, इष्टसाधनस्यैव कृतियोग्यस्य कार्यत्वाभ्युपगमाद्। एकमेव हि वस्तु
संसर्गवाली वस्तु प्रवृत्तिका निमिच नहीं हो सकती, कारण कि इसमें अंशतः आत्माश्रय दोष आ जाता है। (अर्थात् कार्यवुद्धिके अनन्तर ही क्रिया- संसर्गकी प्रतीति होगी और क्रियासंसर्गकी वुद्धि होनेपर ही कार्यवुद्धि हो सकती है, इस प्रकार अन्योन्याश्रय ही अंशतः आत्माश्रय कहा गया है)। दूसरा कल्प मी संगत नहीं है, कारण कि दुःखके साघनीमूत आघात आदि भी कृतिके योग्य हो सकते हैं। अतः उनके प्रवर्तक होनेका प्रसङ्ग आ जायगा। तीसरा पक्ष भी नहीं बनता, कारण कि प्रत्यक्ष आदिका चिषय न होनेसे तथा व्युत्पत्तिके योग्य न होनेसे उस कार्यका शब्द द्वारा प्रतिपादन करना सम्भव नहीं हो सकता। मीमांसकके माने हुए कार्यका अङ्गीकार न करनेसे प्रवृत्तिजनकका अभाव भी नहीं हो सकता, कारण कि कृतियोग्य इष्ट- साधन प्रवृत्तिका जनक माना जा सकता है। 'कृतियोग्य' ऐसा विशेषण देनेसे चन्द्रोदय आदिमें व्यभिचार नहीं आ सकता, क्योंकि चन्द्रोदयादि इष्ट- साधन होते हुए मी कृतियोग्य नहीं हैं। ] यद्यपि कृतियोग्य फल भी प्रवृत्तिजनक हो सकता है, तथापि बालककी व्युत्पच्तिका निमित होनेसे मध्यम वृद्धकी प्रवृत्तिका कारण गायका ले आना आदिरूप इष्टसाधन ही प्रवर्तक हैं। इसलिए यह जो आपने बड़े परिश्रमके साथ कार्यको व्युत्पत्तिका साधन कहा, उससे हमारा कोई अनिष्ट नहीं सिद्ध होता, कारण कि उससे कृतियोग्य इष्टसाधन ही कार्यका स्वरूप माना गया है। एक ही वस्तु
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वेदान्तोंका वदमें ग्रामाण्य] भापानुवादसहित ७७९
कृतिनिरूप्यतया कार्यमित्युच्यते इष्टनिरुप्यतया चेष्टसाधनमिति। न च पराभिमतालौकिककारये इवेष्टसाधनेऽपि कृतियोग्येऽननुभूते प्रमा-
त्वमवगत्याऽनागतेप्वपि तेपु तदनुमानात्। न चैवं परकीयकार्यमनुमातुं शक्यम्, अलौकिकत्वव्याघातात्। तस्मात् क्रृतियोग्येष्टसाधनमेव विध्यर्थो न तु नियोगः । न चैतादृशोऽपि विधिवेदान्तेपु सम्भवति। तत्राऽविद्या निवृत्तिलक्षणो मोक्ष इएस्तस्य च साधनं ब्रह्मात्मक्यतच्वज्ञानम्। सोडयं साध्यसाधनभावो लोकसिद्धः। शुक्तित्वज्ञानेन तदविद्यानिवृत्ति-
कृतिके द्वारा निरूप्यमाण होनेसे कार्य कहलाती है और वही वस्तु इष्टसे निरूपित होनेपर इष्टसाधन कही जाती है। वस्तु एक ही है। शह्ा-मीमांसकके अमीषट अलौकिक कार्यके समान इसाधनमें मी, जिसका कि कृतियोग्यरूपसे अनुभव नहीं हो सकता, प्रमाणाभाव है। समाधान-अन्न, पान आदिरूप किये गये भूतकालिक उपभोगोंमें अन्वय- व्यतिरेक द्वारा इष्टसाधनत्वकी प्रतीति करंनेके अनन्तर आगामी उपभोगोंमें मी इषसाधनत्वका अनुमान हो सकता है। और उक्त रीतिके अनुसार दूसरेके कार्योंका अनुमान नहीं किया जा सकता है, कारण कि इस प्रकार अनुमानसे कार्यज्ञान करनेपर उसकी अलौकिकताका व्याघाव हो जायगा। [जैसे हम अन्वयव्यतिरेक द्वारा उपभुक्त अन्न, पान आदिमें अनुमूत इषटसाधनत्वका आगामी अन्न, पानादिमें भी अनुमान द्वारा ग्रह करके प्रवृत्ति मानते हैं, वैसे ही यदि आप भी कार्यके विषयमें युक्ति कहें, तो आपको अपसिद्धान्त दोप लगेगा, क्योंकि आप तो उस कार्यको अलौकिक मानते हैं और उक्त प्रकारसे तो वह अलौकिक सिद्ध नहीं हो सकता है। ] इसलिए कृतियोग्य इषसाधन ही विधिका अर्थ हो सकता है, नियोग नहीं। और इस प्रकारका (कृतियोग्य इष्टसाधनरूप) मी विधान वेदान्तोंमें नहीं हो सकता, कारण कि उनमें अविद्याकी निवृत्तिरूप ही मोक्ष इष्ट है और उसका साधन-कारण-जीव त्रह्मको एक तत्त्व समझना (अद्वैत ज्ञान) ही है। इस रीतिका कार्यकारण-साध्यसाधन-भाव तो लोकसे ही सिद्ध है, क्योंकि शुकतिके तत्व (यथार्थ) ज्ञानसे (उसमें रजतज्ञानकी उत्पादिका)
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७८० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
दर्शनात्। अतस्तद्विधिपरत्वे वेदान्तानामनुवादकत्वग्रसङ्ग:। ननु सिद्धे व्युत्पन्यभावाद् ब्रह्मपरत्वमपि न सम्भवतीति चेद्, न; 'प्रमिन्न- कमलोदरे मधूनि मधुकर: पिवति' इत्यादावग्रसिद्धमधुकरपदार्थस्य पुरुषस्य प्रसिद्धपदसमभिव्याहारेण सिद्धार्थेऽपि व्युत्पत्तिदर्शनात्। न च तत्र कार्याध्याहार: कल्पनीयः, अ्रयोजनप्रमाणयोरभावात्। न च व्युत्पतते: कार्याव्यभिचारः प्रयोजनम्, तस्यवाऽद्याप्यसम्प्रतिपत्तेः। तस्माद् ब्रह्मण्येव वेदान्तप्रामाण्यम्। अत्र केचिन्मन्यन्ते-न खल जीवन्रह्मणोरैक्यमस्ति, 'यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते' इति ज्योतिःशव्दाभिधेयस्य ब्रह्मणो त्रह्मा- ण्डाद्धहिरवस्थानश्रवणात्। यदि सर्वगत्वश्ुतिः कुप्येत, तर्हिं सर्वत्र
अविद्याकी निवृत्ति देखी जाती है। इसलिए उसके विधानमें तात्पर्य माननेसे वेदान्तोंमें अनुवादकत्वका प्रसन्न होता है, वह इष्ट नहीं है। शङ्का-सिद्ध पदार्थमें व्युत्पत्तिका सम्भव न होनेसे वेदान्तोंका ब्रह्ममें भी तात्पर्य नहीं माना जा सकता। समाधान-उक्त कथन उचित नहीं है, कारण कि 'खिले हुए कमलके वीचमें मधुकर मधुका पान करता है' इत्यादि वाक्योंमें मधुकर पदार्थको न जाननेवाले व्युत्पित्स पुरुषको मधु आदि प्रसिद्ध पदके समभिव्याहार (सांनिध्य) से (अ्रमररूप ) सिद्ध अर्थमें भी व्युत्पत्ति होती है, यह देखा जाता है। उक्त स्थलमें कार्यका अध्याहार करना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि कार्यके अध्याहार करनेका उसमें कोई प्रयोजन या प्रमाण नहीं है। व्युत्पत्तिका कार्यके साथ व्यभिचार न होना भी फल नहीं माना जा सकता, कारण कि उसकी (व्युत्पत्तिका कार्यके साथ व्यभिचार न होनेकी) अब तक सिद्धि नहीं हो पायी है। [ इसलिए व्युत्पत्तिका कार्याव्यमिचार स्वीकृत नहीं हो सकता ] अतएव ब्रह्ममें ही वेदान्तवाक्योंका प्रामाण्य मानना चाहिए। इस विषयमें कुछ एकवादियोंका मत है-जीव और ब्रह्म काा्ा अभेद , (ऐक्य) हो ही नहीं सकता, कारण कि 'जो इस न्रह्माण्डसे.अन्यत्र ज्योति दीप्ष हो रही है' इत्यादि श्रुतिमें 'ज्योतिःशब्दवाच्य पदार्थस्वरूप ब्रह्मकी ब्रम्माण्डसे बाहर अवस्थति प्रतीत होती है। यदि इसमें ब्रझ्मको सर्वत्र व्यापक
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जीवन्नसके मेदका निराकरण। मापानुवादसहित ७८१
वर्तमानमपि त्रह् जीवेरवा अ्रपञ्चेन वा न संस्पृश्यते, 'असङ्गो ह्ययं पुरुष:' इति शुतेः। 'अहं ब्रह्मास्मि' इति श्रुतिस्त्वारोपिततादात्म्य रूपेणोपासनं विद्धाति। तस्माच्चोपासनान्मोक्ष: फलिप्यति यागादिव स्वर्गः। न च वेदान्तानामपासनाविधिपरत्वे त्रह्मस्व्ररूपासिद्धिः, देवताधिकरण- न्यायेन मानान्तरसिद्धिविरोधयोरभावे स्वार्थेऽपि प्रामाण्यसम्भवाद्। न च जीवाद्िने त्रह्मण्यद्वैतशुतिव्याकोप, तस्याः अतेर्विकागतीत- न्नह्मविपयत्वात्। तस्य चकत्वाम्युपगमात्। न च नैयोगिकफलत्वे मोक्षस्य स्वर्गादिवदनित्यता, 'न स पुनरावर्त्तते' इति अ्त्याऽलुमानस्य वाधादिति। नतत्सारम्, आद्यन्तदत्यस्य मोक्षस्योपासनात्मकक्रियासाध्यत्वा- योगात्। 'विमुक्तथ विस्नुच्यते', 'व्रक्षव सन् त्रह्माप्येति' इत्यादिश्युतिर्मोक्ष-
कद्दनेवाली श्रुतिसे विरोध याता हो, तो सवत्र चर्वमान (व्यापक) भी ब्रह्म जीव सथवा प्रपश्चसे सम्बद्ध नहीं होता, कारण कि श्रुति कहती है-'वह न्रसनप पुरुष असम-सम्वर्जित-है'। 'मैं त्रद्म हूँ' इत्यर्थक य्रति तो आरोपित अमेद द्वारा उपासनाका विधान करती है, इसलिए जसे याग द्वारा स्वर्ग फलित होता है, वैसे ही उपासनासे मोक्षकी सिद्धि होती है। वेदान्त-वाक्योंका उपासनाविधिमें तात्पर्य माननेसे नव्यस्वरूपकी असिद्धि होनेका दोष भी नहीं आ सकता, कारण कि देवताघिकरणन्यायसे दूसरे ग्रमाणोंसे सिद्धि और विरोधके न आनेसे स्वार्थमें (त्म्मस्वरूपमें) भी प्रामाण्य मानना सम्भव हो सकता है। जीवसे नक्मको मिन्न माननेसे अह्ैतकी प्रतिपादक श्रुतिसे विरोध भी नहीं आता, कारण कि उस श्रुतिका विषय विकारशुन्य न्दा है और उसका एक होना माना ही गया है, मोक्षको नियोगका फल माननेसे स्वर्गादिके सुल्य वह अनित्य होगा, इस प्रकार दोप भी नहीं कह सकते, क्योंकि 'वद्द ब्रह्ज्ञानी पुनः इस संसारमें नहीं लौटता' इत्यर्थक श्रुतिसे अनुमानका वाध हो जायगा। [ इस मतका खण्डन करते हैं-] उक्त कथन सार-युक्ति-शुन्य है। आदि-प्रारम्भ-और अन्त-विनाश-से शन्य मोक्ष उपासनारूप क्रियाके द्वारा साध्य है, ऐसा माननेका अवसर नहीं या सकता, क्योंकि 'विमुक्त-मोक्षको प्राप्त हुआ-मुक्त हो जाता है', 'नस ही होता हुआ तद्को प्राप्त करता है' इत्याद्यर्थक
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७८२ I सूत्र ४, वर्णक २
स्याऽनादितामाह। 'विद्ययाऽमृतमश्नुते', 'त्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इत्यादिका चाऽविनाशितां पतिपादयति। तथा तदनुग्राहको न्यायोऽप्यनुसंघेय:। सादित्वे च मोक्षस्याऽन्तवच्चं स्यात्। अन्तवच्चे च पुनर्वन्धान्मोक्षशब्द- स्योपचरितार्थत्वप्रसङ्ग:। तथा क्रियासाध्यत्वेऽस्युदयफलवच्छरीरेन्द्रि- यादिसम्बन्ध उपचयापचयत्वं च केन वार्येत। कर्मफलस्य वैचित्र्य दर्शनाच्छरीरादिरहितो मोक्षोऽपि तत्फलं भविष्यतीति चेद्, न; शरीरा- दिराहित्यस्य स्वाभाविकत्वात्। तथाहि-न तावदात्मनो देहेन संयोग उपपद्यते, निरवयवत्वात्। नाऽपि समवाया, देहं ग्रति समवायिकरण- त्वाभावात् सामान्यादिरूपत्वाभावाच। एवं तादात्म्यादिनिराकरणसूद्यम्। ततो वास्तवसम्बन्धाभावे सत्यशरीरत्वं स्वाभाविकं सशरीरत्वं तु मिथ्या-
श्रुतियाँ मोक्षको अनादि कहती हैं। और 'विद्या द्वारा अमृतत्वका (मरण- शून्यत्वका) उपभोग होता है', 'व्रम्मनिष्ठ अमृतत्वको प्राप्त करता है' इत्यादयर्थक श्रुतियाँ मोक्षको विनाश रहित कहती हैं। एवं इन श्रुतियोंके द्वारा प्रतिपादित अर्थके पोषक न्यायका (अनुमानादिका) अनुसन्धान मी करना चाहिए। यदि मोक्ष सादि माना जाय, तो उसको विनाशी मी मानना होगा। और उसको अन्तवान् (विनाशशाली) माननेसे मोक्षशब्दमें उपचरितार्थकत्वका (लाक्षणिक अर्थका प्रतिपादक होनेका) प्रसङ्ग आ जायगा। एवं मोक्षको क्रियासाध्य माननेसे अभ्युदयरूप फलके ऐसे शरीरेन्द्रियादिका सम्बन्ध होनेसे उसमें उपचय या अपचय होनेका प्रसङ्क कौन हटा सकेगा? कर्मके फलोंकी विचित्रता देखनेसे शरीरादिसे रहित मोक्ष भी उसका फल हो सकेगा, यह कहना भी नहीं वनता, कारण कि उसका शरीरादिसे शुन्य होना स्वाभाविक है। आत्माका देहके साथ संयोग होना उपपन्न नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मा अवयवशन्य है। [और निरवयवसे संयोग नहीं बनता ]। समवाय सम्बन्ध भी नहीं हो सकता, कारण कि आत्मा शरीरके प्रति समवायी कारण नहीं है और आत्मा सामान्यादि- रूप भी नहीं है। [ समवाय सम्बन्ध या तो समवायिकारणसे होता है अथवा जाति, गुण पदार्थोंसे ही हो सकता है, आत्मा देहका दोनों पदार्थ नहीं है]। इसी रीतिसे तादात्म्य आदि सम्बन्धोंका मी न हो सकना समझना चाहिए। इसलिए संयोगादि वास्तव सम्बन्ध न हो सकनेसे आत्माका शरीर रहित होना
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कमोंसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्तिका अभाव ] भापानुवादसहित ७८३
न च मिध्याज्ञानं कर्मभिर्निवर्त्तते १ नाडप्यशरीर एव मोक्ष: कर्म- भिरन्यथा परिणम्यत इति वत्ुं शक्यस्, कूटस्थस्य परिणामायोगात्। नन्वेवमप्युपासनासाध्यत्वमात्रेण मोक्षस्य कथसुपचयादिप्राप्तिरिति चेद्, उच्यते-तत्रोपासनस्य स्वरूपतः संख्यातः कालतो वा परिमितिरस्ति न वा ? न चेत्, वर्ह्यनिर्धारितविशेपस्योपासनस्याऽनुष्ठानमशक्यं स्याद्। अस्ति चेत्, तर्हि सा प्रदर्शनीया१ नहि साङ्गदर्शपूर्णमासपरिमितिव- देतावदिदमित्युपासनास्वरूपपरिमितिः प्रदर्शयितुं शक्यते। न च संख्यात: परिमाणमस्ति। सहसरं लक्ष वा प्रत्ययानां मोक्षसाधनमित्येताद्दस्य नियामकस्याऽदर्शनात्। नाऽपि कालतः परिमाणमस्ति, एकं शतं सहस्रं वा संवत्सराणामुपासीनस्य मोक्ष इति नियमग्रमाणाभावात्। मरण-
स्वभावसिद्ध है। और शरीरसे सम्बन्धका होना तो मिथ्या अज्ञानके द्वारा हुआ है, यह समझना चाहिए। और वह मिथ्या (अवास्तव) अज्ञान कर्मकलापके मनुष्ठाताओंके द्वारा नहीं नष्ट किया जा सकता और शरीरके सम्बन्से विरहित मोक्षको ही कर्मकाण्डी अन्यथा परिणत कर सकते हैं, क्योंकि कूटस्थका-निर्विकार अर्थात् परिणामशुन्यका परिणाम होना सम्भव नहीं है। शका-ऐसा माननेपर मी उपासनासे ही साध्य होनेके कारण मोक्षमें उपचयादिकी प्राप्ति कैसे संगत हो सकती है? समाधान-कहा जाता है कि उस उपासनाका स्वरूप, संख्या तथा कालके द्वारा परिच्छेद है या नहीं! यदि नहीं है, ऐसा मानो, तो विशेपरूपसे निर्द्धारण न हो सकनेसे उस उपासनाका अनुषान करना असम्भव होगा। [विशेषशून्य सामान्य- मात्रका तो परिज्ञान भी असम्भव है, इस परिस्थितिमें अनुषान तो दूर रहा]। यदि है, तो वह परिच्छेद दिखलाना होगा। अङ्गसहित दर्शपूर्णमासके परिच्छेदकी भाँति 'इतना यह है' इस प्रकार उपासनाके स्वरूपका परिमाण नहीं किया जा सकता। और संख्याके द्वारा मी परिमाण नहीं है, क्योंकि हजार या लाख उपासनात्मक ज्ञान मोक्षके साधन हैं, ऐसा कोई नियम करनेवाला प्रमाण नहीं है। एवं कालके कारण मी परिच्छेद नहीं हो सकता, कारण कि एक या सौ अथवा हजार वर्षों तक उपासना करनेवालेको मोक्षरूप फल मिलेगा, ऐसा कोई. नियम --
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
मेवाऽवधिरिति चेत्, तथापि दर्शपूर्णमासवदेकाकारा साधनपरिमितिर्न लभ्यते। एकेन दशभिः शतेन सहस्रेण वा कालेन कस्थचिन्मरणात् पुरुषभेदेषूपचयापचयप्रसङ्गात्। उपास्यापरोक्ष्यमवधिरिति चेत्, तथापि कस्यचित्केनचित्कालेनाऽSपरोक्ष्यात्साधनोपचयापचयौ तद्वस्थावेव । अतस्तत्फले मोक्षेऽप्युपचयापचयौ दुर्वारौ। लोके वेदे च क्रियातारतम्यात् तत्फलेऽपि तारतम्यदर्शनात्। न चोपासनैकरूप्याभावेऽपि फलैकरूप्यं शास्त्राद्ज्विष्यतीति शङ्मनीयम्, शास्त्रस्याऽन्यथाऽनुपपत्तौ न्यायविरुद्ध- कल्पनायोगात्। अतो 'यत्कृतकं तदनित्यम्' इत्यादिन्यायानुसारेणाऽनित्यत्वा- दिकं मोक्षस्य प्रमोति।
कारक प्रमाण नहीं मिलता। यदि मरण (देहावसान) कालकी अवधि- परिच्छेद-माना जाय, तो भी दर्शपूर्णमासके तुल्य एक आकारसे ही साधनका परिमाण नहीं पाया जा सकता। और एक, दस या हजार (दिन, मास या वर्ष आदि) कालमें किसीका मरण होनेसे पुरुपमेदोंमें उपचय और अपचय आनेका प्रसङ्ग आ ही जायगा। (अर्थात् किसी पुरुषका एक, किसीका दो एवं किसीका सौ तथा हजार वर्षमें मरण होनेसे इस प्रकार पुरुषविशेषोंमें कालकृत परिमिति माननेसे कालकृत उपचय तथा अपचय अवश्य आ जायगा। यदि उपास्य (उपासनाका कर्मभूत) न्रह्मका साक्षात्कार ही अवधि माना जाय, तो मी किसीको कुछ कालमें उपास्यका आपरोक्ष्य होत है, अतः पूर्वोक्त रीतिसे (पूर्वोक्त दोषके तुल्य) साधनगत उपचय तथा अपचयके होनेका प्रसक बना ही है। इस रीतिसे उस साधनके फलभूत मोक्षमें भी उपचय तथा अपचय आनेका दोष नहीं इटाया जा सकता, कारण कि लोक या वेद दोनों स्थलोंमें क्रियाके तारतम्यसे उसके फलमें तारतम्य (उपचय-अपचय-कमी- वेशी) देखा जाता है। उपासनाका एक-सा रूप (आकार) न होनेपर भी फलकी एकता (एकाकारता) शास्त्र द्वारा सिद्ध हो जानेकी आशक्का भी नहीं की जा सकती। शास्त्रकी दूसरे प्रकारसे भी सज्जति होनेपर न्यायविरुद्ध कल्पना करनेका अवसर नहीं आ सकता, इसलिए (जो कृतक-क्रियाजन्य-है वह
प्राप्त होता है। अनित्य है) इस व्यासिसे केवल मोक्षमें अनित्यत्व आदि दोषोंका प्रसङ्न
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कमोंसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्तिका अंभाव] भाषानुवादसहित ७८ं५
यस्तक्तमपुनरावृत्तिश्चुतिवाधितोडयं न्याय इति, तदसत्। तत्र किं 'ब्रह्म लोकमभिसंपद्यते' 'न स पुनरावर्चते' इत्येपा अ्रुतिर्वाधिका उत'एपैच देचपथो ब्रह्मपथ एतेन प्तिपद्यमाना इमं मानवमावत नावर्तन्त' इत्येपा श्रुतिः १ नाऽऽद्य:,अग्रसक्तप्रतिपेधात्। नहि ब्रहमालोकाभिसंपत्तिसमये पुनरावृत्तिः प्रकता अथ न स पुनरावर्ततिष्यत इति वाक्यार्थ: कल्प्येत, तन्न; 'तद्यथेह कर्मजितः' इत्यादिश्ुत्याऽनुमानेन च विरोधे सति श्ुतार्थपरित्यागेनाऽश्वतार्थकल्पना- सम्भवात् । द्वितीये त्विममिति विशेपणं मानवान्तरे पुनरावृत्ति दर्शयति। नन्वस्मिन् कल्पेऽनावृत्तिं प्रतिपादयतो वाक्यस्य कल्पान्तरे पुनरावृत्ति-
यह जो कहा गया कि पुनरावृत्तिका निपेध करनेवाली श्रुतिसे यह न्याय (मोक्षमें कृतकत्वरूप हेतुसे अनित्यत्वप्रतिपादक अनुमानप्रयोग- रूप न्याय) वाघित हो जाता है। [ अर्थात् उस श्रुतिके वलसे मोक्षके कृतकत्व माननेपर भी अनित्यत्व आदि दोप नहीं आ सकते ], यह भी सअत नहीं है, कारण कि इसमें विकरप किया जायगा कि उक्त न्यायका 'ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है और वह पुनः लौटता नहीं' इत्यर्थक 'ब्रह्मलोकम्'- इत्यादि श्रुतिसे वाध होता है? अथवा 'यही देव मार्ग है यही ब्रह्ममार्ग है, इस मार्गसे जानेवाले मानवसृष्टिमें पुनः नहीं आते ) एतदर्थक श्रुति उस न्यायका वाघ होता है : इसमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है, कारण कि ऐसा माननेसे अपाप्तका ही निषेध प्राप्त होता है, क्योंकि ब्रह्मलोककी प्राप्ति- कालमें पुनः आवृत्ति (लौटना) प्राप्त ही नहीं है। (ब्रह्मलोककी प्रापतिके कालमें लौटनेकी प्रसक्ति कैसे हो सकती है?) यदि 'वह पुनः नहीं लौटेगा' इस प्रकार (भविष्यमें पुनरावृत्ति करना निषेधपरक) वाक्यकी कल्पना करना भी उचित नहीं है, कारण कि 'जैसे कर्मोसे अर्जित'-इत्यादि अर्थवाली श्रुति और अनुमान (पूर्वोक्त कृतकत्वरूप-हेतुमूलक) से विरोध होनेपर श्रुत अर्थका परित्याग करके अश्रुत अर्थकी कलपना करना सम्भव नहीं है। दूसरे कल्पमें तो 'इमम्' यह विशेषण दूसरी मानव-सृष्टिमें पुनरावृत्तिका प्रदर्शन करा रहा है। [अर्थात् इस मानवसृष्टिमें (जिससे वह गया है, उसमें) नहीं आता। परन्तु इससे दूसरे मानवमें नहीं लौटना तो सिद्ध नहीं होता ]। शक्का-इस कर्पमें पुनरावृत्तिका निषेध करनेवाले वाक्यका दूसरे
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७८६ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र ४, वर्णक २
अ्रतिपादनेऽरपि तात्पर्ये वाक्यभेद इति चेद्, न; पुनरावृत्तेरार्थिकत्वात्। अन्यथा सर्वत्र सविशेपणवाक्येष्वस्य चोद्यस्य टुष्परिहरत्वात। नन्वेपा श्रुतिः कल्पे कल्पे प्रवर्त्तमाना तत्र तत्राऽऽवृतिं निषेधति ततोऽर्थादनावृत्ते- रात्यन्तिकत्वसिद्धिरिति चेद, न; अ्रतिपततृभेदात्। अस्मिन् कल्पे अति- पन्नानामागामिकल्पे पुनरावृत्तिस्तत्र अतिपन्नानां तत उपरिकल्पे पुनरा- वृत्तिरित्यभ्युपेयम्। अन्यथा विशेषणवैयर्थ्यात्। कल्पमें आवृत्ति (लौट आने) के प्रतिपादनमें मी तात्पर्य होनेसे वाक्यमेद होनेका प्रसङ्ग आता है। [इसलिए कलपान्तरमें पुनरावृतिपरक वाक्य नहीं माना जायगा ।] समाघान-उक्त दोष नहीं आ सकता, कारण कि पुनरावृत्ति अर्थात् सिद्ध हो जाती है। [अर्थात् सिद्ध हुए अर्थके लिए वाक्यमेढकी करपनाकी आवश्यकता नहीं है ] अन्यथा (यदि आर्थिक अर्थका वोध करानेके लिए अतिरिक्त वाक्यकी आवश्यकता हो, तो) विशेषणविशिष्ट सभी वाक्योंमें उक्त दोषका (वाक्यमेद होनेका) समाधान नहीं हो सकता। [किसीने कहा 'मधुर वचन कहा करो' इस वाक्यमें मधुर विशेषणसे अर्थात प्रतीत होता है कि 'कट्ु वचन न कहना'। यदि वाक्यके बिना इसकी प्रतीति न हो सके, तो इसके लिए मी 'कट्ठ वचन न कहो' चाक्यभेदका प्रसङ्ग आ जायगा, अतः आर्थिक अर्थकी प्रतीतिके लिए वाक्यभेदकी आवश्यकता नहीं होती और ऐसा भी नहीं है कि अर्थतः प्रतीत होनेवाला कोई अर्थ ही नहीं है, वह तो प्रतीत होता ही है। शङ्का-यह पुनरावृत्तिका निषेध करनेवाली श्रुति प्रतिकल्पमें प्रवृत्त होती हुई (अपना अर्थवोध कराती हुई) पुनरावृत्तिका प्रत्येक कल्पमें निषेध करती है, इस प्रकार अर्थतः सिद्ध हो जाता है कि पुनरावृत्तिका निषेध नित्य (अव्यभिचरित) है। समाधान-उक्त युक्ति उचित नहीं है, कारण कि इसमें प्रतिपताओंका (सुक्कोंका) मेद है। (ऐसी व्यवस्था माननी ही होगी) इस करपमें ब्रह्मपाप्ति करनेवालोंकी आनेवाले कल्पमें पुनरावृत्ति होगी और आनेवाले करपमें ब्रह्म- प्राप्ति करनेवालोंकी उससे आगेके करपमें पुनरावृत्ति होगी, ऐसा मानना ही होगा। नहीं तो 'इमम्' या 'इद' दोनों विशेषण व्यर्थ होंगे।
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मोक्षमें अनित्यत्वकी आशङ्का ] भापानुवादसहित ७८७
नन्वस्तु तर्हनित्य एव सोक्ष:, अनित्यस्याऽपि स्वर्गादे: पुरुंपार्थ- त्वदर्शनात्। तथा चोपासनक्रियासाध्यो मोक्षो भविष्यतीति चेत, किं न्यायानुसारेणवमुच्यते किंवा अृत्यनुसारेण : नाऽडद्य, न्यायविच्चाभिमा- शङ्का-मच्छा तो अनित्य ही ोक्ष रहे। अनित्य होते हुए भी स्वर्गादिको पुरुषार्थ मानना देखा ही गया है, इसलिए उपासनारूप क्रियाका साध्य फल मोक्ष माना जायगा। समाधान-ऐसा मानना क्या न्यायका अनुसरण करके कहा जा रहा है? अथवा श्ुतिका अनुसरण करके : प्रथम पक्ष नहीं माना जायगा, कारण कि न्यायोंका परिज्ञान रखनेके अमिमानशाली सांर्य, योग, वैशेषिक, नैयायिक, (१ ) सांख्य तथा योगशास्त्रकी प्रक्रिया है-द्रष्टा-पुरुप-और दृश्य-अनात्मा प्रकृतिका- अविवेक-पार्थक्येन ज्ञान न होना-ही अविदा है। वह अनादि कालसे पवृत है, उसका विनाश तत्त्वज्ञान (विचेकज्ञान) द्वारा ही होता है। उसके विनाशके अनन्तर-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेप तथा अभिनिवेशरूप क्लेश नष्ट हो जाते हैं। तदन्तर किसी प्रकारकी प्रवृत्ति न होनेसे मोक्ष होता है। इन मतोंमें अविद्यानिवृत्ति ही नित्य मोक्ष होना माना गया। एवं वैशेपिककी प्रक्रियासे भी सिद्ध है-द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवायरूप पदार्थोंमें साधम्म और वैधम्म द्वारा यथार्थ ज्ञानके न हो सकनेसे प्रवृत्त हुआ अनादि मिथ्याज्ञान यथार्थरुपसे तत्त्वज्ञान होनेसे निवृत्त होता है। तदनन्तर नैयायिकप्रक्रियाके अनुसार दोपादिकी निवृत्तिसे कमशः मोक्षसिद्धि होती है। नैयायिकोंकी प्रकिया संक्षेपमें इस प्रकार है-आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, पृथ्वी आदि विपय, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोप, मरण, सुख, दुःख और अपवर्ग-इन वारह पदार्थोंमें अनादि- प्रवाहरूपसे चला हुआ अज्ञान तत्वज्ञानके द्वारा निधृत्त हो जाता है। तदनन्तर उसके कार्यस्वरूप राग-द्वेप-मोहात्मक दोपोंकी नियृत्ति हो जातीं है और दोषोंकी निवृत्ति हो जानेसे सुख-दुःखको उत्पन्न करनेवाली तन्मूलक प्रवृत्ति या निवृत्तिरूप प्रवृत्तियोंका होना सम्भव नहीं हो सकता। तदनन्तर प्रवृत्ति-निवृत्ति द्वारा उत्पन्न होनेवाले झुभाशुभ-कर्म-जनित स्थावर जङ्गम किसी भी योनिमें जन्म नहीं मिलता। इसलिए शरीरसम्बन्ध न होनेसे आतयन्तिक दुःखका ध्वंस सुतरां सिद्ध हो जाता है। इससे नैयायिक मतमें भी तत्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति ही प्रधानरूप मोक्षकी प्रयोजक सिद्ध होती है। बौद्धोंकी प्रक्रिया है कि-स्थायी माननेकी कल्पनाके द्वारा परवृत्ति या प्रवृत्तिजनित सुमन, दुःख, जन्म, वन्ध आदि फल पर्यन्त राग, द्वेप आदि दोषोंसे विज्ञान दूपित हो जाते हैं। उन दूपित विज्ञानोंमें क्षणिकत्व तथा शून्यत्व रूप दुःखात्मत्वरूप अपने यथार्थ स्वरूपका परिचिन्तन करनेसे स्थायित्व आदि सब वित्रम मिथ्याज्ञान निवृत्त हो जाते हैं। तदन्तर विशुद्ध विज्ञानके अन्तिम क्षणका उदय होता है, उसीका नाम मोक्ष है। इस मतमें भी मिथ्याज्ञानकी निवृत्तिसे ही मोक्ष माना गया है।
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७८८ विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र ४, वर्णक २
निभिरेव सांख्ययोगवैशेषिकनैयायिकवौद्धादिभि: सर्वैः स्वस्वप्रक्रियानुसा- रेणाऽनादिमिथ्याज्ञानस्य तत्वज्ञानेन निवृत्तौ मोक्षो भवति स च नित्य इत्येवाडङ्गीकाराद। न द्वितीय:, 'य एवं वेदाहं व्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति', 'तद्धैतत्पश्यन्नृपिर्वामदेवः प्रतिपेदे', 'त्वं हि नः पिता योऽस्माकमवि दाया: परं पारं तारयसि', 'भूयश्ान्ते विश्वमायानिवृत्तिः', 'य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति' इत्याद्याः अ्तयो ब्रह्मात्मत्वदर्शनसमकालमेवाऽविद्यानिवृत्तावविना- शिनं सोक्षं दर्शयन्त्यो न क्रियानुप्रवेशशक्कामपि सहन्ते । ननु अहं 'ब्रह्मास्मि' इत्यादिशास्त्रं न ब्रह्मात्मैकत्वपरं किन्तु जीवविल- क्षणे प्रमाणान्तराविरुद्धे ब्रह्मणि शास्त्रप्रतिपन्ने सम्पदव्यासक्रियायोगसंस्कारे- ्वन्यतममपरं भविष्यति। तत्र संपद् नामाल्पे वस्तुन्यालम्बने महद्वस्तुदर्श- नम्। यथाऽल्पे मनसि वृत्यनन्तत्वसाम्येनाऽनन्तविश्वेदेवसंपादनं कृत्वा
तथा बौद्ध आदि सभी वादियोंने अपनी अपनी प्रक्रियाके अनुसार 'अनादि मिथ्याज्ञानकी तत्त्वज्ञानसे निवृत्ति होनेपर मोक्ष होता है और वह नित्य है' ऐसा सिद्धान्त माना है। दूसरा पक्ष नहीं बनता, कारण कि 'जो ऐसा जानता है कि मैं ब्रम्म हूँ वह यह सब कुछ हो जाता है', 'यह समझकर वामदेव ऋषिको प्राप्त हुए', 'तुम हमारे पिता (शोकनिवारक) हो जो अविद्याके उस पारको पहुँचा देते हैं। (अर्थात् अविद्या-मिथ्या अज्ञानकी अत्यन्त निवृत्ति करा देते हैं) 'अन्तमें विलकुल (सर्वात्मना) यह विश्वमाया- प्रपञ्चजात-की निवृत्ति हो जाती है' और 'जो इसको जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं' इत्याद्यर्थक श्रुतियां न्रह्मसाक्षात्कारके समान कालमें ही अविद्याकी निवृत्ि होनेसे अविनाशी मोक्षका प्रतिपादन करती हुई क्रियाके सम्बन्धको नहीं सह सकतीं। शङ्का-'मैं ब्रह्म हूँ' एतदर्थक अनेक वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य जीव और ब्रह्मके अभेदबोधनमें नहीं है, किन्तु जीवसे विलक्षण-अतिरिक्त और दूसरे प्रमाणसे विरुद्ध न होनेवाले तथा शास्त्रसिद्ध ब्रह्ममें सम्पद्, अध्यास, क्रियायोग तथा संस्कार इनमें से किसी एकका प्रतिपादन करनेमें तात्पर्य होगा। इनमें से छोटी वस्तुमें बड़ी वस्तुका दर्शन करना सम्पद् कहलाता है। जैसे छोट़ेसे मनमें वृत्तियोंके अनन्तत्वकी समानता लेकर अनन्त विश्वेदेवों-
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जीवन्रह्मकी एकताका उपपादन ] भापानुवादसहित ७८९
अनन्तलोकजयः । 'अनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वेदेवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति' इति अतेः। तथा जीवे चिद्रूपसाम्येन ब्रह्मरूपसम्पादनं कृत्वा म्रह्मफलमचाप्यते। अध्यासस्त्वन्यस्मिन्नन्यत्वदृष्टिः। यथा 'आदित्यो व्रह्म' इति श्तिवशादवह्मरूप आदित्ये व्रह्मदष्टिस्तथाऽत्राप्यत्रह्मरूपे जीवे ब्रह्मदृष्टिः। सत्राSडलम्घनमविद्यमानसमं कृत्वा सम्पाद्यसैव प्राधान्येन चिन्तनं संपद्, आलम्वनस्यैच प्राधान्येन चिन्तनमध्यास इति तद्विवेक: । क्रियायोगस्तु यथा 'वायुर्वाच संचर्ग:' इति श्रुतावग्न्यादीन् संवृणोत्तीति संचरणक्रिया- सम्बन्धाद् द्यो: संवर्गगुणत्वेनोपासनं तथा जीवस्य स्वगतेन वृहत्यर्थ- योगेन त्रह्मगुणतयोपासनम् । संस्कारथ् कर्माङ्गस्य व्रीह्याज्यादेः ग्रोक्षणा- वेक्षणादिना यथा भवति तथा कर्तृतया कर्मगुणभूतस्याऽत्मनो ब्रह्मदृष्टया संस्कार: क्रियत इति।
की सम्पत्ति करके अनन्त लोकोंका जय होता है, क्योंकि 'मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं, अतः उसके द्वारा वह अनन्त लोकका जय करता है' ऐसी श्रुति है। एवं चिदरूपसे जीवमें ब्रह्मकी समानता होनेसे उसमें ब्रह्मरूपकी सम्पत्ति करके ब्रह्मरूप फल पाया जाता है। और दूसरे पदार्थमें दूसरे पदार्थकी बुद्धि होना तो अध्यास कहलाता है। जैसे 'सूर्य व्रम्म है' इत्यर्थक श्रुतिके वलसे ब्रह्मस्वरूपसे भिन्न सूर्यमें ब्रह्मवुद्धि की जाती है, वैसे ही व्रह्मसे अतिरिक्त स्वरूपवाले जीवमें ब्रह्म-दृष्टि की जाती है। इनमें आलम्बनभूत वस्तुको अविद्यमानके समान करके (जिसकी उस आलम्बन- भूत वस्तुमें सम्पत्ति की हो) उस सम्पाद्यका ही प्रधानरूपसे चिन्तन करना सम्पद् है और आलम्वनका ही प्रधानरूपसे चिन्तन करना अध्यास है, ऐसा दोनोंका विवेक है। क्रियायोग तो जैसे 'वायु ही संवर्ग है' इत्यर्थक श्रुतिमें वायु, अभ्नि आदिका संवरण करता है, अतः संवरण क्रियाके सम्बन्धसे दोनोंकी संवर्गरूप गुणसे उपासना होती है, वैसे ही जीवकी अपनेमें रहनेवाले बृंहणरूप वृह धातुके अर्थके सम्वन्घसे व्रह्मगुणरूपसे उपासना होती है। और संस्कार जैसे कर्मके अज्रभूत ब्रीहि तथा घृत आदिके प्रोक्षण तथा अवेक्षण आदिसे होता है, वैसे ही कर्ता होनेके कारण कर्मके अङ्गभूत आत्माका न्रह्ाद्वष्टिके द्वारा संस्कार किया जाता है। १००
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७९० विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र ४, चर्णक २
नैतत्सारम्: कि जीवन्रह्मभेदप्रतिभासविरोधभयात् सम्पदादिपरत्वं वेदान्तानां कल्प्यते१ किं वा जीवब्रह्मैक्ये तात्पर्याभावाद् : उत फलानु- सारात्: नाऽडद्य:, अभेदेऽपि विम्वग्रतिबिम्बवद्भेदप्रतिभासोपपततेः । न द्वितीय, 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्युक्तस्यक्यस्य 'स एष इह प्रविष्टः' इति प्रवे- शार्थवादेन 'अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद' इति भेदनिन्दया चोपपादितत्वात्। एवं सर्वश्रुतिष्वप्यैक्यतात्पर्य- लिङ्गप्रवेशादिकमवगन्तव्यम् । न तृतीयः, अविद्यानिवृचिन्रह्मात्मभावश्च फलं श्रूयते। न च संपदादिपरत्वे तदुपपद्यते, संपदादीनामयथावस्तु- त्वेनाऽप्रमाणज्ञानानामविद्यानिवर्त्तकत्वासम्भवात्। अन्यस्याऽन्यात्मत्वविरो- धाच। तस्मादैक्यपरं शास्त्रम्। अत्र कश्चिदाह-ब्रह्मणो भिन्नाभिन्नो जीव: । ततथ् ब्रह्मणो समाधान-उक्त कथन सारगर्भित नहीं है; क्या आप जीव और ब्रह्मके मेदकी प्रतीतिके विरोधके भयसे वेदान्तवाक्योंका सम्पद् आदिमें तात्पर्य माननेकी करपना करते हैं ? अथवा जीव और ब्रह्मके अभैदमें उनका तात्पर्य न होनेसे ? या फलके बलसे? इनमें प्रथम कल्प उचित नहीं है, कारण कि अमेद रहने- पर भी बिम्ब और प्रतिबिम्बके समान भेदप्रतीतिकी उपपत्ति हो सकती है। दूसरा कल्प मी युक्त नहीं है, कारण कि 'मैं ब्रम्म हूँ' इत्यर्थक. श्रतिसे प्रतिपादित ऐक्यका (अमेदका)-'वह यह इसमें प्रविष्ट हो गया' इत्यादर्थक प्रवेशके अर्थ- वादसे और 'जो अन्य देवताकी उपासना करता है (अर्थात् यों भेद मानता है) कि वह दूसरा है और मैं दूसरा हूँ वह ज्ञानी नहीं कहा जा सकता' इस प्रकार भेदकी निन्दासे-उपपादन किया गया है। इस रीतिसे सब श्रुतियोंमें भी ऐक्यमें तात्पर्यके लिन्र, प्रवेश आदि समझने चाहिएँ। तीसरा पक्ष भी नहीं बनता, कारण कि अविद्यानिवृत्ति और ब्रह्मभावापत्तिरूप फलका श्रवण है। वेदान्तोंका सम्पद् आदिमें तात्पर्य माननेसे उक्त फलकी उपपत्ति नहीं हो सकती, कारण कि सम्पद् आदि सभी मिथ्याभूत वस्तु हैं, इसलिए अप्रमाण ज्ञान अविद्याका निवर्तक नहीं हो सकता और दूसरेके दूसरेका स्वरूप होनेमें भी विरोध आता है, इसलिए सिद्ध है कि वेदान्तशास्त्रका तात्पर्य जीवन्रह्मकी एकतामें-अमेदमें-ही है। किसीका (भास्करका) कहना है कि जीव बह्मसे भिन्न और अभिन्न दोनों
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भेदाभेदवादका निरास] मॉपानुवादसहित ७११ नित्यमुक्तता जीवस नित्यवद्धता च व्यवस्थामश्तुते। अत्यन्ताभेदे तु न्रह्मैव स्व्रसंसराय कथ जगदुत्पादयेत। विरुद्धा च विशुद्धस्याऽनुद्धताग्रति- पत्तिरिति। अत्रोच्यते-न तावत् जीवन्रह्मणोर्जातिव्यक्तिभावो गुणगुणिभाव: कार्यकारणभावो विशिष्टस्वरूपत्वमंशांशिभावो वा विद्यते, मानाभावात्। न च तदभावे क्वचिद्ेदाभेदौ दृश्येते, 'ममैवांशो जीवलोके' इति स्मृतेरंशांशिवेति चेद्, न; 'निष्कलम्' इति निरंशत्वप्रतिपादकश्रुतिविरो- धात्। 'पादोऽस्य विश्वा भूतानि' इति श्रुतिर्नाशांशिभावं त्रुते, किन्तु त्र्ानन्त्यप्रतिपादनाय जीवस्याऽल्पतामात्रमाह। अन्यथा सांशस्य ब्रह्मणो घटादिवद्वयवारभ्यत्वप्रसङ्गाद्। ननु स्वाभाविकी निरवयवता बुध्धाद्युपाधि- निमिचं सांशत्वमिति नोक्तदोप इति चेद्, एवमपि वास्तवभेदो न सिध्येद।
प्रकारका है। इससे व्रह्मका नित्यमुक्त रहना और जीवका नित्यचद्ध रहना व्यवस्थित हो सकता है। यदि त्रम्मका और जीवका अत्यन्त अमेद माना जाय, तो स्वयं व्रक्ष अपने संसार-वन्धन-के लिए संसारको क्यों उत्पन्न करेगा? और विशुद्ध न्रम्मका अशुद्ध होना विरुद्ध मी होता है। इस भाहकरके कथनपर कहा जाता है कि जीव और ब्रह्ममें जातिव्यक्ति माव, गुणगुणिभाव, कार्यकारणभाव या विशिष्टस्वरूपत्व तथा अंशांशिभाव नहीं हैं, क्योंकि इनके होनेमें कोई प्रमाण नहीं है। और इनके न रहनेपर कहीं मी मेद और अमेद नहीं देखे जाते हैं। यदि शक्का हो कि 'यह जीव संसारमें मेरा (ब्रक्षका) ही अंश है' इस स्मृतिसे जीव और ब्रह्ममें अंशांशि- भाव सिद्ध होता है, तो यह भी उचित नहीं है, कारण कि इसमें 'वह निष्कल- निशवयव-है' इत्पर्थक अवयवशन्यताप्रतिपादक श्रुतियोंसे विरोध आता है। 'सम्पूर्ण भूत इसके पाद हैं' एतदर्थक श्रुति तो अंशांशिभाव-अवयवावयवि- भाव-का बोध नहीं करा रही है, किन्तु घ्रक्मकी अनन्तताका प्रतिपादन करनेके लिए जीवकी केवल अल्पताको कहती है। अन्यथा (ब्रह्मको सावयव माननेमें) सावयवय न्रम्ममें भी घटादिके सदश अवयवोंसे आरभ्य होनेका प्रसङ्ग आ जायगा। यदि अह्ममें स्वभावसिद् अवयवशून्यता और बुद्धि आदि उपाधिके कारण सावयवता है ऐसा माननेपर उक्त दोप नहीं है, तो मी वास्तविक मेद
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७९२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
नहि निरवयवमाकाशं खङ्गधारादिभिर्वस्तुतो भेतुं शक्यम्। अथाऽन्त :- करणोपाधीनां वस्तुतो ब्रह्मविदारणसामर्थ्यमस्ति तर्हि ब्रह्म स्वसाऽनर्थाय कथमुपाधीन् सृजेत्। न च जीवार्था तत्सृष्टि, तत्सृष्टेः आग् जीवविभागा- सिद्धेः। न च कर्माविद्यासंस्कारा अन्तःकरणोत्पत्ते: आग्विद्यमाना अपि जीवं विभजन्ते, अन्तःकरणद्रव्यस्यैव जीवोपाधित्वाङ्गीकाराद। ननु नील- पीतादिवद्द्ेद: स्वाभाविको द्रव्यत्वादिजातिनिवन्धनश्चाऽभेद इति चेत्, तर्हि 'अयमात्मा ब्रह्म' इति सामानाधिकरण्यं न स्या्, नीलं पीतमिति सामा- नाधिकरण्याभावात् । अथ न निष्पन्नो भेदो नाऽप्यनादि: किन्तूपाधि- निबन्धन: केवलं ब्रह्मणि पकाशते। स तर्ह्यतस्मिंस्तदारोपो विभ्रम एव
सिद्ध नहीं होता, क्योंकि खड्गकी धारसे अवयवरहित आकाशके वस्तुतः टुकड़े नहीं किये जा सकते। यदि कहा जाय कि अन्तःकरणमे ऐसी सामर्थ्य है कि वह ब्रह्मका वस्तुतः विदारण-टुकड़े-कर सकता है, तो ब्रह्म अपने अनर्थके लिए उपाधिकी सृष्टि क्यों करेगा? उपाधिकी सृष्टि जीवके लिए भी नहीं मान सकते, कारण कि उपाधिकी सृष्टिके पूर्व जीवरूप भेदकी ही सिद्धि नहीं है। [अर्थात उपाधिके द्वारा ही जीव और ब्रह्म ऐसा विभाग बनता है, इससे पूर्व तो अद्वैत ब्रद् ही है।] अन्तःकरणकी उत्पत्तिसे पूर्वमें रहनेवाले कर्म, अविद्या तथा संस्कार द्वारा भी जीवरूप विभागकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि अन्त:करणरूप द्रव्य ही जीवमेदमें प्रयोजक उपाधि माना गया है। शक्का-नील, पीत आदि भेदोंके सदश जीवमेद भी स्वभावसिद्ध ही है (इससे उपाघिसृष्टिके पूर्व भी जीव विद्यमान रह सकता है) और द्रव्यत्व आदि जातिके कारण अभेद होगा। समाधान-ऐसा माननेपर 'यह जीवात्मा व्रक्ष है' ऐसा सामानाविकरण्य. नहीं बनेगा। [द्रव्यत्व आदि जातिके कारण सामानाघिकरण्य नहीं हो सकता ] क्योंकि 'नील पीत है' ऐसा सामानाधिकरण्य कहीं नहीं देखा जाता । (नील, पीतके साथ घटत्वादि या पदार्थत्वका सम्बन्ध है ही)। यदि कहा जाय कि मेद सिद्ध नहीं है और अनादि भी नहीं है, किन्तु उपाधिके कारण केवल ब्रह्ममें प्रकाशित होता है, तो वह भेद अन्यमें अन्यका आरोप-
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मेदाभेदवादका निरांस] भाषानुवादसहित
स्यात्। ग्रामाणिकस्य भेदस्य कथं विभ्रमत्वमिति चेद्, न; जीवन्रह्मभेदे प्रत्यक्षादीनामप्रसरात्। आगमस्तु न भेदं प्रतिपादयति प्रत्युत 'एप त आत्माङ- न्वर्याम्यमृत' इत्यभेदं अ्रतिपाद्य 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' इति भेदं प्रतिषेधति। न च संसारित्वासंसारित्वव्यवस्थानुपपत्तिरभेदे मानम्, अभेदस्याऽप्यङ्गीकृत- त्वेनाऽव्यवस्थातादवस्थ्याद्। नह्याकाशं घटेनाऽवच्छिद्य तदन्तर्धूमादिसमावेशे सत्याकाशस्य धूमादिसंयोग: परिहर्त्तु शक्यते, घटावच्छिन्नभागसहितस्यैवा- Sडकाशत्वात्। अथाऽपि भेदांशसुपजीव्य व्यवस्थोच्येत तर्ह्यस्मन्मतेऽपि ब्रह्मण्य- विद्यादिसंसर्गासंर्गाभ्यां व्यवस्था किंन स्यात्। एकस्मिन्नेव वस्तुनि संसर्गस्य रूप (विना भेदवालेमें मेदका आरोपरूप) भ्रममात्र ही होगा। प्रमाणसिद्ध मेद भ्रम नहीं हो सकता, यह कहना भी उचित नहीं है, कारण कि जीव और ब्रह्मके भेदमें प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंका प्रसद नहीं है। शास्त्र तो भेदका प्रति- पादन नहीं करता, परन्तु उसके विपरीत 'यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृतरूप है' इस प्रकार अभेदका प्रतिपादन करके 'इससे अतिरिक्त कोई द्रष्टा नहीं है' इन वाक्योंसे मेदका निषेध करता है। संसारित्व-बद्ध-और असंसारित्व-मुक्क-की व्यवस्थाका न बनना ही भेदकी सिद्धिमें प्रमाण है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; कारण कि अभेदका भी अज्गीकार कर लेनेसे व्यवस्थाका न वनना वैसे ही है। आकाशको घटरूप उपाधिके द्वारा भिन्न करके (महाकाशसे घटाकाशका भेद सिद्ध करके) उस उपाधिके अन्दर धूमादिका समावेश होनेपर उस उपाध्यवच्छिन आकाशके साथ मी धूमादिके संयोगका परिहार नहीं किया जा सकता, क्योंकि घटावच्छिन्न भाग सहित ही आकाश है। [अर्थात् अवश्य ही घटान्तर्गत आकाशके साथ धूमका संयोग होनेसे शुद्ध अवच्छित्नका अभेद मानने- वालेके मतमें आकाशसे मी धूमका संयोग है ही। एवं व्रक्षका अन्तःकरणरूप उपाधिके द्वारा जीवभेद होनेके अनन्तर उस अवच्छिन्नसे संसारका सम्बन्ध होनेसे अवश्य ही न्रह्मका मी संसारसे सम्बन्ध हो गया। इससे ब्रह्म नित्यमुक्त है यह व्यवस्था नहीं बनेगी। ] यदि भेदभागको लेकर व्यवस्था बनायी जाय, तो हमारे मतसे मी ब्रह्मके साथ अविद्याके संसर्ग तथा संसर्गके अभावसे व्यवस्था क्यों नहीं हो सकेगी। [ब्रह्मके साथ अविद्याका सम्बन्ध होनेसे संसारित्व और संसर्ग छूटनेसे, मुक्तत्व व्यवस्था होनेमें कोई असाम- जस्य नहीं है। ] एक ही पदार्थमें संसर्ग-सम्बन्धका होना और न होना दोनों
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७९४ विवरणप्रमैयंसंग्रह [ सूत्र ४, वर्णक २
भावाभावौ चिरुद्धाविति चेद, न; भेदस्य भावाभावयोरेकत्र त्वयाऽभ्युपगमात्। अभेदो नाम न सेदाभावा, किन्त्वैक्याख्यं धर्मान्तरसिति चेतु, तथापि मेदाभेदौ विरुद्धावेव परस्परनिवर्तकत्वात्। 'अहं मनुष्य:' इति प्रतीतं देहा- त्मैक्यं 'नाऽहं मनुष्योऽपि तु ब्रह्मास्मि' इत्यनेन देहात्मभेदभानेन निवर्चते। तथा द्वौ चन्द्राविति प्रतीतो भेदश्चन्द्रैक्यज्ञानेन निवर्त्तते। अतो विरोध- भीतसत्वं कथ मेदामेदावङ्गीकुर्वीथाः । तदङ्गीकारे वा ब्रह्मण्यविद्यासंसर्गेण तयोर्विम्बप्रतिविम्बद्दष्टान्तेनोपपादयितुं सुशकयो: कस्तव प्रद्ेपः। न चांऽश- भूते जीवे संसारिणि सत्यंशिनो ्रह्मणस्तदभावे तवाऽस्ति कश्रिद् दृष्टान्त:। नहि वस्त्नैकदेशे देहैकदेशे वा चण्डालसूतिकादिभिरुपस्पृष्टे कृत्लौ वस्त्रदेहाव- प्रक्षालनीयौ भवतः। अतो न त्वन्मते ब्रह्मणोऽसंसारित्वं अ्रत्युंत सर्वजीवैः विरुद्ध नहीं रह सकते, यह कहना मी उचित नहीं है, कारण कि एकमें ही मेदका होना और न होना दोनों तुम भी मानते आये हो। यदि कहा जाय कि अभेद भेदका अभावरूप पदार्थ नहीं है, किन्तु (अधर्मके सदश) अमेद एक दूसरा धर्म ही है। तथापि भेद और अभेद एक दूसरेके विरोधी तो हैं ही, कारण कि इनमें एक दूसरा एक दूसरेका निवर्तक है। 'मैं मनुष्य हूँ' इस प्रतीतिसे सिद्ध हुमा देह और आत्माका अमेद 'मैं मनुष्य नहीं हूँ, प्रत्युत ब्रह्म हूँ' इस प्रतीतिके द्वारा देह और आत्मामें भेदका प्रतिमास होनेसे निवृत्त हो जाता है; इसी प्रकार दो चन्द्र हैं, इस प्रकार प्रतीत हुआ चन्द्रमाका भेद चन्द्रके ऐक्यज्ञानसे निवृत्त होता है। इसलिए विरोघसे भयभीत तुम भेद और अमेद दोनोंकी एकमें स्थिति कैसे मान रहे हो ? और यदि विरोधसे न डरकर परस्पर विरुद्धोंकी भी एकमें स्थिति मान सकते हो, तो ब्रह्ममें अविद्याके सम्बन्धसे, उन दोको-ब्रह्ममें अविद्याके संसर्ग और उसके अभावको जिनका विम्बप्रतिबिम्वद्ष्टान्तसे उपपादन करना सरल है, माननेमें कौन तुम्हारा द्वेष है। और अंशभूत जीवके संसारी होते हुए अंशी-अवयवीस्वरूप-ब्रह्म संसारी नहीं है, इसमें तुम्हारे पास कौन-सा दष्टान्त है। ऐसा नहीं देखा गया कि वस्त्रका एक भाग अथवा देहके किसी एक अवयवसे चाण्डाल आदि अस्पृश्य जातिका स्पर्श हो जानेसे वह सारा वस्त्र और सम्पूर्ण देह शुद्ध न की जाय। [ एक देशमें मी अशुद्धि आ जानेसे सम्पूर्ण अवयवीको ही अशुद्ध मान कर उस अवयवी भरकी शुद्धि की जाती है। ] इसलिए तुम्हारे मतमें ब्रह्ममें असंसारित्व (नित्यमुक्तत्व) नहीं बन सकता। प्रत्युत इसके विपरीत
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मेदाभेदवादका निरास ] भापानुवादसहित ७९५
सर्वप्रपश्चेन चाडभिन्नतया सर्व दोपजातं स्वात्मन्येव त्रह्म पश्येत्। तथा च तादृशव्रह्मप्राप्तेरपुरुपार्थतया शास्त्रारम्भादिकमनुपपननं स्याद्। नहि ज्ञान- ध्यानादिभिः स्वोपाधौ कर्थचित्प्रविलापितेऽप्यशेपजीचोपाधयः प्रविला- पयितुं शक्यन्ते येन ब्रह्मणि सर्वो दोप: परिहियेत । अस्मन्मते तु ब्रह्मणि न कश्िद्दोप:, प्रतिविम्वश्यामत्वादीनां विम्वसंबन्धादर्शनात्। तच्ज्ञानेन सर्वोपाधिविनिर्मोक्षश्रोपपद्यते। स्वमकल्पितवस्तूनां सर्वेषामपि प्रवोधे निवृ- त्िदर्शनात्। शुकवामदेवादित ्वज्ञानेन सर्वोपाधिनिवृत्ताविदानीं संसारानु- पलब्धिः प्रसज्येतेति चेद्, न; त्वत्पक्षेऽरपि समानत्वाद्। एकैकस्य जीवसयैकक- समस्त जीव तथा सम्पूर्ण प्रपश्चके साथ अमेद होनेसे ब्रह्म सम्पूर्ण दोषसमूहको अपनेमें ही समझेगा। इस परिस्थितिमें नित्यवद्ध ब्रह्मकी प्राप्तिमें पुरुपार्थत्व सद्जत न होनेसे उसके लिए वेदान्त या विचारशास्त्रोंका आरम्भ करना युक्तियुक्त न होगा। ज्ञान या ध्यान आदिसे अपनी उपाधिका किसी प्रकार विलय (विनाश) कर देनेपर सम्पूर्ण जीवोंकी उपाधियोंका विनाश नहीं किया जा सकता, जिससे कि न्रह्ममें दिये जानेवाले समस्त दोपोंका परिहार हो सके। [जिसको ज्ञान हुआ है और जिसने ध्यानादि या मनन किया है, उसकी उपाघियोंकी निवृत्ति होनेसे अन्य पामर प्राणियोंकी सव उपाधियां नष्ट नहीं हो सकतीं और वे प्राणी मी व्रम्माऽभिन्न ही हैं, अतः उनके द्वारा नरद् दृपित बना ही रह जायगा, व्रह्म तो प्राणियोंके भेदसे मिन्न नहीं है, जिससे कि ज्ञानी और ध्यानीके द्वारा प्राप्त ब्रह्मको निर्दोष कह सकें एवं सदोपकी प्राप्ति कथमपि पुरुषार्थ नहीं हो सकती। ] और हमारे मतमें तो जक्षमें कोई दोप ही नहीं है, क्योंकि प्रतिविम्गत श्यामत्व आदि दोषोंका सम्बन्ध बिम्ब्रके साथ नहीं देखा जाता है। [ इससे उपाधिकृत दोषका संसर्ग प्रतिबिम्ब- स्थानीय जीवके साथ ही होगा ्रह्मके साथ नहीं होगा। ] और तत्त्वज्ञानके द्वारा समस्त उपाघियोंसे छुटकारा पा जाना सम्भव है। देखा जाता है कि स्वनमें कल्पत सभी पदार्थोका (जागरणावस्थामें) बोध होनेपर विनाश हो जाता है। हमको श्रीशुकदेवजी तथा श्रीवामदेव सुनिजीको हुए तत्वज्ञानके द्वारा समस्त उपाधिके विलय हो जानेपर इस समय संसारकी उपलब्धि नहीं होनी चाहिए, इस प्रकार दूषण देना भी उचित नहीं है, कारण कि यह दोष तो तुमको भी समान ही है। [ जो दोष दोनोंको समान होता है, उसका उत्तर करनेके लिए एक ही वाध्य
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७९६ विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र ४, वर्णक २
स्मिन् कल्पे मुक्तावप्यनन्तजीवानामतीतानन्तकल्पेपु मुक्ती कथ संसार उपलभ्येत। अनुभवमवलम्व्येदानीन्तनसंसारसमाधानमुभयो: समानम्। उपपत्तिस्त्वेकात्मवादिभिरस्माभिरेव कथश्चिद्वक्तुं शक्यते। तथाहि- यस्त्वं मां प्रति बन्धमोक्षव्यवस्थां पृच्छसि स त्वमेक एव सर्वकल्पना- विष्ठानभूतश्चिदेकरस आत्मा त्वदन्ये मुक्ता मुच्यमाना सोक्ष्यमाणाश्च सवें. जीवास्त्वदविद्यया स्वप्न इव कल्पिताः । वामदेवादिम्रक्तिश्ततिश्च त्वत्प्र- रोचनाय ब्रह्मविद्याप्रशंसार्था। एवं च सति कस्य बन्धमोक्षावित्येप संदेहस्तव तावत् संसारदशायां मोक्षदशायां वा न जायते। एवं प्रत्येकं तत्तत्पुरुपदृष्टा
नहीं होता। ] क्योंकि तुम्हारे मतमें भी एक एक जीवकी (ज्ञानी ध्यानीकी) एक-एक कल्पमें मुक्ति हो जानेसे अनन्त जीवोंकी अनन्त कर्पोंमें मुक्ति हो जानेके कारण संसार कैसे उपलब्ध हो सकेगा? अनुभवके बलपर इस समय यदि दीख पड़नेवाले इस संसारकी स्थितिका समाघान किया जाय, तो यह समाधान दोनोंके लिए एक-सा ही होगा (अर्थात् हम भी अनुभवके बलसे संसारकी स्थिति कहेंगे)। [ यदि दोनों पक्षोंमें शक्का और समाधान समान ही हैं, तो आपका ही मत क्यों माना जाय? इस आशकासे अपने मतके समर्थनमें विनिगमक देते हैं-] एकात्मवादी हमारे मतमें ही उपपत्ति हो सकती है। [वस्तुतः हमारे मतमें अनिर्वचनीय र्याति है, परन्तु यज्ञानुरूप एवं बलि तुष्यतु दुर्जनन्यायसे कुछ भी निर्वचन हो सकता है, तो हमारे ही मतमें हो सकता है, इस माशयसे 'कथश्वित्' कहा' उपपचि इस प्रकार है-] जो तुम हमसे बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था पूँछ रहे हो, वह तुम अकेले ही समस्त कल्पनाओंके अघिष्ठानभूत चिदूय आत्मा हो और तुमसे अतिरिक्त मुक्त हुये या मुक्त होनेकी अवस्थाको प्राप्त हुए अथवा भागे मुक्त होनेवाले सभी जीव तुम्हारी अविद्यासे स्वन्न सदश कस्पत हैं। और वामदेव आदिकी मुक्ति कहनेवाली श्रुति तो तुमको प्ररोचन करनेके लिए या न्रक्मविद्याकी प्रशंसाके निमित है। इस प्रकार सिद्धान्त निश्चित होनेपर किसको बन्ध तथा मोक्ष होता है, यह सन्देह तुमको तो न संसारदशामें और न मोक्षदशामें हो सकता है। इस प्रकार तत्-तत् पुरुषकी दष्टिसे वही वही (स्वयं) आत्मा है। १ यथ्चोभयोः समो दोषः परिहारस्तयोः समः। नैकस्तत्राऽनुयोक्तव्यः।
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मेदाभेदवादका निरास] भापानुवादसहित ७९७
स स एवाऽडत्मेति गुरुशास्त्रास्यां वोधिते सति न कस्याऽपि संदेह उदेतीति किमन्राऽनुपपन्नम्। अतोऽखण्डेकरसात्मवादेऽनुपपच्यभावाद् तत्तत्परेण शास्त्रेणाSSत्मतच्वे बोधिते सद एवाSविद्यातत्कार्ययो: स्वमवत् प्रविलीनयो: सतोरद्वितीये त्रह्मणि संपदादिरूपेणोपास्तिक्रियायाः कोऽवसरः। अत एव अ्तिर्न्ह्मण उपास्यत्वं निपेधति-'यन्मनसा न मुनते येनाहुर्मनो सतं तदेव ब्रहम त्वं विद्धि नेदं यढिद्मुपासते'इति। न च वेद्यत्ववदुपास्यत्वमपि स्यादिति मन्तव्यम्, 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादि'इति ्ुत्या
चैतन्याभिव्यक्तियुक्तया श्ास्त्रजन्यया विद्ययाऽविद्यातत्कार्यनिवृत्तेर्त्रह्मण यास्त्रवेद्यत्वमुपचर्यते। एतां वृत्ति प्रति संनिधिमात्रेणाऽखण्डैकरसत्व-
ऐसा गुरु तथा शास्त्र द्वारा उपदेश होनेपर किसीको मी सन्देह नहीं हो सकता, फिर कहो कि इसमें क्या अनुपपत्ति है : इसलिए आत्माके अखण्ड (निरवयव ) और एकरस माननेके पक्षमें किसी प्रकारकी अनुपपत्ति न होनेसे ताहश आत्माके बोधनमें तातपर्यवाले शास्त्र द्वारा आत्मतत्वका वोघन हो जानेपर तुरत ही सवसकी भाँति अविद्या तथा उसके कार्यभूत प्रपञ्चका विलय हो जानेसे अद्वितीय नदामें पूर्वोक्त, सम्पदादि रुपसे उपासना क्रियाका अवसर कैसे आ सकता है ? इसीलिए तो श्रुति त्रह्मके उपासनाविषय होनेका निषेध करती है। 'जिसका मनसे मनन नहीं किया जाता, पत्युत जिसके द्वारा मन मनन करनेवाला कहलाता है, वही ब्रदा है, उसको तुम ब्रह्म जानो, यह ब्रह्म नहीं है, जिसकी कि उपासना की जाती है' इत्यर्थक श्ुति उपासनाका निषेध करती है। वेद्यत्व (न्रक्- विद्याविपयत्व) की माँति व्मका उपासना विषय होना भी नहीं मानना चाहिए, कारण कि 'वह न्रक्ष ज्ञानविषयसे मी अतिरिक्त है और ज्ञानके अविपयसे मी परे है' एतदर्थक अ्ुतिसे वस्मका वेद-ज्ञानविषय-होना निपिद्ध किया गया है। [त्रह्ममें शास्त्रवेद्यत्वकी उपपत्ति दिखलाते हैं-] त्रह्मके वस्तुतः अवेद होनेपर मी चैतन्यकी अभित्यक्तिसे युक्त तथा शास्त्रसे उत्पन्न त्रह्मविद्यात्मक अखण्डैकरस ब्रम्माकार अन्तःकरणकी वृत्तिके द्वारा अविद्या तथा उसके कार्यस्वरूप प्रपश्चकी निवृत्ति होनेसे व्रम्ममें शास्त्रवेद्यत्वका गौण व्यवहार होता है। इस पूर्वोक्त अखण्डैकरस ब्रम्माकारवृत्तिके. प्रति १०१
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७९८ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र ४, वर्णक २
लक्षणस्वाकारसमर्पकतया स्वस्त्राकारसमर्पकघटादिवद्धत्तिव्याप्यत्वलक्षणं विप- यत्त्वं ब्रह्मणोऽभिप्रेत्य 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्', 'एपोऽणुरात्मा वेदितव्यः', 'सं त्वौपनिषदं पुरुपम्' इत्याद्याः शुतयः प्वृत्ताः। जडेषु घटादिष्विव प्रमाण-
अपने केवल सन्निधानसे अखण्डकरसस्वरूप अपने आकारका समर्पण करनेसे अपने अपने आकारका समर्पण करनेवाले घटादिके सदश वृत्तिव्याप्यत्वरूप विषयत्व ब्रह्ममें मानकर 'मनके द्वारा ही साक्षात्कार करना चाहिए', 'यह अणु सूक्ष्मातिसूक्ष्मरूप आत्मा ज्ञेय-जानने योग्य-है' और उस उपनिषदोंके द्वारा जानने योग्य पुरुष-चेतनशकिको' एतदर्थक श्ुतियां प्रवृत् होती हैं। [यद्यपि ब्रह्म अप्रमेय एवं अवेद्य और अव्यपदेश्य है, इसलिए वह वास्तवमें न तो श्रुतिसे वेद्य और न गुरुके उपदेशसे ज्ञेय हो सकता है। ऐसी दशामें ब्रह्मको शास्त्रवेद्य कैसे कहा जाय ? इस शङ्काके समाधानका आशय है कि वस्तुतः ब्रह्म वेद्य नहीं है, परन्तु जैसे स्वप्रकाश भी सूर्य घनीभूत बादलों या धूलीपटलसे आच्छन् हुआ प्रकाशित नहीं होता, परन्तु उस आवरक मेघमण्डल एवं धूलीपटलके प्रचण्ड वायु द्वारा या अन्य कारणोंसे हट जानेपर अपने स्वरूपसे प्रकाशित होता हुआ दृष्टिगोचर होता है, वैसे ही स्वप्रकाश तथा विशुद्ध भी ब्रह्मात्मा अनादि अविद्या तथा उसके कार्यों द्वारा आच्छन्न हुआ अप्रकाशित-सा रहता है। उस आवरणके अपनयनके लिए प्रचण्ड वायुस्थानीय अन्यविषयव्यावृत्त अन्तःकरणकी शुद्ध वृचिकी अपेक्षा होती है। यह वृत्ति अत्यन्त निर्मल होनेसे सन्निहितकी अभिव्यक्ति करती है और उसके आकारको मी ग्रहण कर लेती है, ब्रह्म सर्वव्यापक होनेसे सर्वत्र सन्निहित है, श्रवण, मनन आदि अन्तःकरणकी वृत्तिमें कोई अन्य विषयोंका ज्ञेय शेष नहीं रहता, अतः स्वच्छ अखण्डैकरसकी अभिव्यक्ति तथा उसका आकार लेना ही उस वृत्तिको स्वतः प्राप्त हो जाता है। यही ब्रझ्मका विषय होता है, जिसके कारण सम्पूर्ण आवरण नष्ट हो जाते हैं और स्वरूपसिद्ध स्वतःप्रकाश ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाग है, एतावता ब्रह्म शास्त्रवेद्य मी कहा गया है। जड़ पदार्थ टादिकी वृत्ि द्वारा प्रकाश और ब्रह्मप्रकाशमें भेद दिखलाते हैं-] जड़ पदार्थ घट आदिमें प्रमाण द्वारा उत्पन्न
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मेदामेदवादकी निरास। भापानुंवादसहित ७९९
कृतस्फुरणातिशयस्य स्वप्रकाशे ज्ह्मण्यसंभवात् फलव्याप्यत्वाभावलक्षण- मचिपयत्वं च 'यतो वाचो निवर्चन्ते' इत्याद्याः अुतयः अत्यपीपदन्। न चाऽन्राऽत्यन्तं फलाभावः, अन्तःकरणवृत्यभिव्यक्तत्वोपाधिना ब्रह्मचैतन्य- स्यैव फलत्वोपचारात्। घटादिष्वप्यस्यैव फलत्वव्यवहारात्। तदुक्तम्- 'परागर्थप्रमेयेपु या फलत्वेन संमता। संवित् सैवेह मेयोऽर्थों वेदान्तोक्तिग्रमाणतः ॥' इति॥ अतो फलावस्थं भूत्वा चरमक्षणे स्वावच्छेदिकां वृत्तिं निवर्त्तयति। तत उपर्यवच्छेदकाभावात् फलावस्थतां परित्यज्य निर्विकल्पकचैतन्यमात्रं मोक्षदशायां परि- शिष्यते। एवं च सति नित्यमुक्तं व्रक्व स्वाविद्यादिप्रतिविम्बितं सज्जीव- किये गये प्रकाशरूप अतिशयका स्वप्रकाशरूप ब्रह्ममें सम्भव नहीं है [ क्योंकि व्रक्षा तो स्वयंप्रकाशरूप है, उसमें प्रकाशरूप अतिशय उत्पन्न करानेके लिए किसी प्रमाणजनित वृत्ति आदि दूसरे कारणकी अपेक्षा नहीं है ]। इसलिए फल- व्याप्यत्वरूप विपयत्वकें अभावका मी 'जिस नरम्मरूप अवधिसे वाणी निवृच हो जाती है' एतदर्थक श्रुतियोंने प्रतिपादन किया है। यहाँ फलका अत्यन्त अभाव है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; कारण कि अन्तःकरणकी उक्त वृत्तिमें अभिव्यक्त होना रूप उपाधिके द्वारा ब्रदाचैतन्यमें ही फलत्वका गौणरूपसे व्यवहार होता है, क्योंकि घटादि स्थलोंमें भी इसीका फलरूपसे व्यवहार होता है [ अर्थात् घटाकार अन्तःकरणकी वृत्तिमें अभिव्यक्त चतन्य ही घटा- चच्छित चतन्यके नामसे फल कहलाता है ]। इस विपयमें कहा भी गया है- 'वहिर्भूत घट, पट आदि विषयस्थलोंमें जिस संवित्को फल माना गया है, वही संवित् ही प्रकृत वेदान्तवाक्यरूप शब्द प्रमाण द्वारा प्रमेय अर्थ है [अर्थात् वेदान्तवाक्योंका भी घटावच्छिन्न चतन्यप्रकाशके तुरय संविदूप न्नवचतन्य प्रकाश ही प्रमेय है ]। इसलिए न्रम्चतन्य अन्तिम क्षणके पूर्वक्षणमें अवच्छिन्न होनेसे. फलावस्थामें विद्यमान होकर अन्तिम क्षणमें अपनी अवच्छेदिका-उपाधिरूप-वृत्तिमात्रको भी नष्ट कर देता है। तदनन्तर अवच्छेदकारक उपाधिके न रह जानेसे फलावस्थाका त्यागकर निर्विकलपक चैतन्यमात्र मोक्ष-दशामें अवशिष्ट रह जाता है। इस सिद्धान्तके निर्णीत होनेपर (इस प्रकार व्यवस्था बननेपर) नित्य-
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विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूंत्र ४, वर्णक २
भावमापाद्य संसरति स्वविदयया च विसुच्यत इत्युक्तं भवति। नन्वेवं जीवस्यैव ब्रह्मत्वे 'तच्वमसि' आदिमहावाक्येधु पदद्वयस्य पुन- रुक्ति: स्याद्, तत्परिहाराय भेदाभेदावभ्युपेयाविति चेद्, न; तथा सति वाक्यार्थज्ञानेन शरीरेन्द्रियादिसंसारस्य निवृत्यसिद्धेः। तथाहि-कियुपपत्ति- तस्तन्निवृत्ति: साध्यते? उत 'भिद्यते हृदयग्रन्थि०' इत्याद्यागमात्! नाऽडद्यः, त्वन्मते देहादिविशिष्टस्यैव जीवस्य ब्रह्मणा सह भेदाभेदयोर्वास्तिवयोर्महा- वाक्यार्थतया तद्गोचरज्ञानेन देहादिनिवृत्त्ययोगाद् । न द्वितीयः, वर्स- मानापदेशिन आगमस्य योग्यानुपलन्धिविरोधेऽर्थवादत्वात्। अथ मोक्ष-
सुक्तस्वरूप ब्रह्म ही अपनी अविद्या आदिमें प्रतिविम्नित होता हुआ जीवभावको प्राप्त कर संसारी हो जाता है और पुनः वही अपनी ही विद्याके द्वारा मुक्त हो जाता है, ऐसा निष्कर्ष निकलता है। शङ्का-यदि उक्त रीतिसे जीवको ही ब्रह्मभाव प्राप्त है, तो 'वह तू है' इत्याद्यर्थक महावाक्योंमें (वह तू) ऐसे दो पदोंका देना पुनरुक होगा (जो कि दोष माना जाता है) इस दोषका वारण करनेके लिए भेद और अमेद दोनोंका माना जाना उचित ही है। समाधान-ऐसा (भेद और अमेद दोनोंके) माननेपर वाक्यार्थज्ञान द्वारा शरीरेन्द्रिय आदि संसारकी निवृत्तिकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि विकरप हो सकते हैं-क्या उपपत्ति-अनुमानप्रयोग-से देहादिकी निवृचि सिद्ध की जायगी? अथवा 'हृदयग्रन्थि टूट जाती है' एवदर्थक शास्त्रके द्वारा ? इनमें प्रथम विकल्प युक्त नहीं हो सकता, क्योंकि तुम्हारे मतमें देहेन्द्रिय आदिसे विशिष्ट जीवका ही ब्रह्मके साथ वास्तव भेदाऽमेद महावाक्योंका अर्थ माना गया है, इस दशामें उन महावाक्योंके वास्तविक भेदाऽमेदविषयक ज्ञानसे देह आदिकी निवृत्तिका होना सम्भव नहीं है। दूसरा कल्प भी युक्त नहीं है, कारण कि 'भिद्यते' इस वर्तमान पदसे व्यवहार करनेवाले शास्त्रको योग्यकी अनुपलब्धिके कारण विरोध आनेसे अर्थवाद माना जायगा। [शास्त्र वर्तमानमें निवृत्ति कहता है और इस कालमें योग्यानुपलब्धिरूप निवृत्ति है नहीं, इसलिए विरोध आनेसे शास्त्रको ब्रह्मविद्याका प्रशंसक ही मानना होगा, स्वार्थपरक नहीं मान सकते। यद्यपि मोक्षावस्थामें देहादिकी निवृत्तिके बोधनमें शास्त्रका तात्पर्य
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भेदाभेदवादका निरास] मापानुवादसहित ८०१
दशायां देहादिनिवृत्तावागमस्य तात्पर्य तथापि यदि मोक्षदशायां जीवस्य भेदांशो न निवतर्तेत तदा तनिनिर्वाहाय देहेन्द्रियान्त:करणाद्युपाधिरप्य- भ्युपेयः । ततो न संसाराद्विशेपः । यदि च भेदांशनिवृत्ति:, तदापि न तच्वज्ञानात्तनिवृचि:, तस्य स्वविपयानिवर्त्तकत्वात्। त्वन्मते मेदस्याऽपि तच्वज्ञानविपयत्वात्। नाऽपि कर्मभिस्तन्निवृत्तिः आगमविरोधाद्। आगमस्य सार्वकालिकमेदाभेदप्रतिपादकत्वाङ्गीकारात्। न च भेदाभेदवादे तच्चंपदार्थी सुनिरूपौ, तत्र कोऽसी त्वंपदार्थो जीव: १ किं भेदाभेदास्या- मंशाभ्यामंशी किं वांऽशदयसमुदाय उतांऽशद्यमेव १ आद्येऽपि यद्यभेदांशो
माना जा सकता है, तथापि यदि मोक्षावस्थामें जीवके मेदरूप अंशकी निवृत्ति नहीं होती, तो स अवस्थामें उस मेदकी स्थितिके निर्वाहके निमिच् देह, इन्द्रिय तथा अन्तःकरण यदि उपाधिका सद्भाव मानना ही होगा। [ इससे मोक्षावस्थामें भी निवृत्तिबोधनमें तात्पर्य माननेसे शास्त्र अवाघित नहीं हो सकता] ऐसी दशामें संसारावस्था तथा मोक्षावस्थामें कोई भेद नहीं आा सकता। और यदि भेदरूप अंशकी निवृत्ति मान भी ली जाय, तो मी तत्वज्ञानके द्वारा उस मेदकी निवृत्ति नहीं हो सकती 'अर्थात् उस कालमें भेदका निवर्तक न होनेसे भेदकी निवृत्ति हो नहीं सकती, कारण कि वह तत्वज्ञान अपने विषय भ्रमात्मक भेदका निवर्तक नहीं वन सकता। तुम्हारे मतमें मेद भी तत्वज्ञानका विषय है। और कर्मोंके द्वारा भी भेदकी निवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि इसमें शास्त्रोंका विरोध आता है। कारण कि तुम्हारे मतमें सदैव रहनेवाले मेद और अमेद दोनोंका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्र माने गये हैं। और यह भी दोप आता है कि मेदाSमेदवादीके मतमें 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थोंका निरूपण करना मी सरल नहीं होगा, कारण कि इस अवसरपर पूछा जायगा कि यह जीवरूप 'त्वं' पदार्थ कौन वैस्तु है: क्या मेद और अमेद-इन दोनों अंशोंसे युक्त एक अतिरिक्त अवयवी है या केवल दोनों अंशोंका समुदायरूप: अथवा केवल दोनों अंश ही है ! प्रथम कल्प माननेमें भी यदि अमेद अंश ब्रह्मरूप है, तो १- यद्यपि प्रथम सूननमें ही कई-एक स्थानपर जीवस्वरूपका वर्णन किया गया है, तथापि त्वंपदार्थभूत जीवके स्वरूपका मोहवश मेदाऽमेदको माननेवाले भास्करके मतका निरपण करना असम्भव होनेसे उसका मत असजत है, ऐसा प्रतिपादन करनेके लिए जीवस्वरूप- विषयक प्रश्नका अवसर आता है।
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८०२ विवरणप्रमेयसंग्रंह [ सूत्री ४, वर्णक ₹
ब्रह्म तदा ब्रह्मणो जीवाशत्वं जीवस्य च सावयवत्वमापद्येत। अथाऽमेदांशो न व्रह्म तर्ह्यत्यन्तभेद एव स्याद्। न द्वितीय: जीवस्याऽवस्तुत्वप्रसङ्गाद। समुदायिव्यतिरिक्तसमुदायानिरूपणा्। वतीयेऽपि किममेदांश एव जीव: किं वा भेदांश एव उतांऽगदयं अरत्येकम् अथवांशद्यं परस्परमभिन्नम् अहोस्वित्परस्परमपि भिन्नाभिन्नम् : नाऽडद्य:, ब्रह्मण एव जीवत्वप्रसङ्गात्। न द्वितीयः, अत्यन्तभदग्रसङ्गात्। तथाच तत्त्वज्ञानेन मोक्षादिव्यव- हारासिद्धिः । न तृतीय:, जीवद्वयप्रसङ्गात्। न चतुर्थः, तदा ब्रह्मव जीव इति चन्धमोक्षव्यवहारासिद्धेः । न पश्चमः, भेदाभेदानवस्था- प्रसङ्गात्। कस्य चाडयं शास्त्रोपदेशः। न तावदभेदांशस्योपदेशः, ब्रह्म-
ब्रह्ममें जीवकी अंशताका और जीवमें सावयवताका प्रसक् आ जायगा। और यदि अभेद अंश जीवका ब्रह्मरूप नहीं माना जाता, तो जीव और ब्रह्मका अत्यन्त भेद ही सिद्ध होगा (अभेद नहीं)। दूसरा पक्ष भी संगत नहीं है, कारण कि इसके माननेसे जीव वास्तव पदार्थ नहीं रह जायगा, कारण कि समुदायीसे- अवयवीसे-अतिरिक्त समुदायका निरूपण नहीं किया जा सकता। तीसरा पक्ष माननेमें भी क्या अमेद अंश ही जीव है: या भेदरूप ही अंश : अथवा प्रथक पृथक दोनों अंश अथवा परस्पर अभिन्न दोनों अंश हैं? अथवा परस्पर भी भिन्नाभिन्न जीव है? इनमें प्रथम पक्ष नहीं हो सकता, कारण कि . ब्रह्ममें ही जीवत्वका प्रसङ्क आ जायगा। द्वितीय पक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि इससे तो जीव ब्रह्मके अत्यन्त भेदका प्रसज्ञ होगा। इन दोनों पक्षोंके माननेसे तत्वज्ञान और मोक्षादि व्यवहारकी असिद्धि हो जायगी। तीसरा कल्प नहीं वनता, क्योंकि इससे भी दो जीव होनेका प्रसक्क आ जायगा। चतुर्थ कल्प मी उचित नहीं, कारण कि उस पक्षमें ब्रह्म ही जीव है, इससे बन्ध और मोक्षका व्यवहार नहीं वन सकता, [नित्यमुक्तमें बन्धन होना सम्भव नहीं और वन्घनके विना मोक्षव्यवहार नहीं बनता]। पांचवां कल्प नहीं हो सकता, कारण कि इसके माननेसे भेद तथा अमेद- की अनवस्था होनेका प्रसन् आ जाता है। [अनवस्थाका उपपादन करते हैं-] यह शास्त्रोपदेश किसके लिए होगा : अमेद अंशके लिए तो उपपन्न नहीं हो सकता, कारण कि अमेदांशके ब्रह्मस्वरूप होनेसे उसको उपदेशकी अपेक्षा नहीं है। और मेदरूप अंशको मी शास्त्रोपदेश प्राप्त नहीं होता, कारण कि उस भेद अंशको
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भेदामेदवादका निरास] भापानुवादसहित ८०३
स्वरूपतया तस्योपदेशानपेक्षत्वाद्। नाऽपि भेदांशस्योपदेशः। 'अहं व्रह्मा- स्मि' इति प्रतिपत्ययोगात्। मोक्षावस्थायामभिनतया युज्यते सा प्रतिपत्ति- रिति चेद्, न भेदांशस्य पुनरभेद: सम्भवति, विरोधात्। अविद्या- दिदोपोऽपि न तावदभेदाशस्य युक्त:, ब्रह्मण्येव ग्रसङ्गात्। नाऽपि भेदांशस्य, उपाधिजननात् ग्राग्मेदाभावात्। अथोपाधिमनपेक्ष्य स्वत एव भिन्नोंऽशोंऽशी वा जीवस्तथापि तदंशविनाशे जीवविनाशात् कस्य मोक्ष उपदिश्येत, अमेदांशस्य ब्रह्मणो नित्यमुक्तत्वाद्। मोक्षोऽपि भिन्नाभिन्नश्चेत् तर्हि 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इत्येवकारविरोध: संसारा- दविशेपक्च स्यात्। न च स्वर्गनरकवन्धमोक्षादिव्यवस्थासिद्धये भेदा- मेदानपेक्षिती, भेदेनैव कर्थचित्तत्सिद्धेः । न च तावेकन्र युक्तौ।
"मैं ब्रह्म हं' इस प्रकार अमेदका निश्चय नहीं हो सकता। यदि मोक्षावस्थामें अभिन्न हो जानेसे 'मैं न्रह्म हूं' इत्याकारक प्रतीति होना सम्भव है, ऐसा कहा जाय, तो यह कैसे सम्भव हो सकता है कि भेदरूप अंश अमेदके रूपमें हो जाय, कारण कि इनमें परस्पर विरोध है। और अविद्या आदि दोषका भी अभेद अंशमें सम्भव नहीं है अन्यथा ज्रह्ममें मी उन दोषोंका प्रसक्क आ जायगा। भेदरूप अंशके मी (अविद्या आदि दोष) नहीं हो सकते, कारण कि उपाधिके उत्पन्न होनेसे पूर्व भेदरूप अंश ही नहीं है। यदि उपाधिकी अपेक्षा न रखकर ही जीव भिन्न अंशरूप या अंशी है, ऐसा माना भी जाय, तो भी उस जीवात्मक अंश या अंशीका विनाश होनेसे जीवका भी नाश होगा, इससे किसको शास्त्र द्वारा मोक्षका उपदेश किया जायगा। अभेद अंशरूप तो नित्यमुक्त ही है। यदि मोक्ष भी भिन्नामिन्नरूप माना जाय, तो 'ब्रम्म जाननेवाला ब्रक्ष ही हो जाता है' एतदर्थक वाक्यमें आये हुए निर्धारणार्थक 'एव' पदसे विरोध होगा। ('एव' पदके बलसे तो मोक्ष अमेदरूप ही प्रतीत होता है) और संसारदशासे (मोक्षदशामें) कोई विशेषता भी न रह जायगी। (मेदाडमेद तो संसारमें है और वही मेदामेद मोक्षमें भी रहा)। स्वर्ग, नरक, बन्ध और मोक्ष आदि व्यवस्थाके लिए भी मेदाडमेद माननेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मेदको मानकर भी कर्थचित् उक्त व्यवस्था बन सकती है। [ स्वर्ग, नरक या बन्ध और मोक्षका सांकर्य दूर करनेके लिए मेदामेद दर्शाते हो, परन्तु इसके
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८०g विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र ४, वर्णक २
भेदस्य धर्मिप्रतियोगिसापेक्षत्वादभिन्ने चैकस्मिन् वस्तुनि तदयोगात्। शास्त्नरं पुनर्नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इति भेदोपमर्देनैप त आत्मेत्यभेदमेव प्रतिपादयति, न तु मेदामेदौ। अथ जीवन्रह्मणोः स्वभावाद्व्वेदः स त्वद्रव्य- त्वादिसामान्ययेव दर्शयति। सर्वव्यापी सर्वभृतान्तरात्मेति विकार- संस्पर्शपरिहारायैवं कल्प्यत, इति चेद्, न; विकारान्तर्वर्ततित्वेऽप्यसङ्ग-
विपरीत जीव व्रह्मका अभेद भी माननेसे यदि जीवको नरक या वन्धन है, तो ब्रह्मको भी नरक तथा बन्घका होना सुतरां प्राप्त हो जाता है, इस दशामें असांकर्य कैसे हो पाया। यदि मेद ही दोनोंका माना जाय, तो कर्थंचित् व्यवस्था बन सकती। अपने (सिद्धान्तीके) मतमें तो भेद वास्तव नहीं है, इसलिए कर्थचित् कहा गया। अवास्तव भेदसे अवस्तुभूत चन्घ तथा नरकका होना कोई मसऊत नहीं है]। उन दोनों मेदाडमदोंको एक अधिकरणमें मानना भी युक्तियुक्त नहीं है, कारण कि मेद तो अपने धर्मीके प्रतियोगीकी अपेक्षा रखनेवाला है [ जैसे पटमें घटका सेद'। यह भेद अपने धर्मीरूप पटके प्रतियोगी घटकी अपेक्षा रखकर ही चरितार्थ होता है]। अतः मेदशुन्य एक ही पदार्थरूप अधि- करणमें उस मेदके होनेका अवसर नहीं आ सकता और शास्त्र तो 'इससे अतिरिक्त भिन्न द्रष्टा कोई नहीं है' इस प्रकार मेदको तिरस्कृत करके 'यह तुम्हारा आत्मा है' इस रीतिसे अभेदका ही प्रतिपादन करता है, मेदा- भेद दोनोंका नहीं। शक्का-जीव और व्रक्मका यदि स्वभावसिद्ध अमेद है, तो सत्त्व तथा द्रव्यत्व आदि सामान्यका ही प्रदर्शन करता है। 'सर्वव्यापी और सव मृतोंका अन्तरात्मा' इस प्रकारकी करपना तो केवल विकारजातसे सम्बन्ध परिहारके ही लिए हैं। * समाधान-विकारके मध्यमें रहनेसे भी असक्र स्वभाव होनेके कारण
- भास्करके मतमें स्वभावतः भेद और स्वभावतः अमेद दोनों हैं। मेदसे तो स्वर्ग, नरक आदिकी व्यवस्था चनती है और सत्त्वादि सामान्यसे सुवर्णादिका कटक, कुण्डलादि के साथ जसे अमेद है वैसे स्वभावतः अभेद भी है। मेद इतना ही है सुवर्णादि तो कटक, कुण्डलादिरूपसे परिणामको प्राप्त हो जाता है और ब्रह्ममें उक्त प्रकारसे विकारका संसर्ग नहीं होता है, क्योंकि उसमें वास्तव भेद भी है। नहीं तो विकारमध्यवती होनेसे उसका संसर्ग होना अनिवार्य हो जाता।
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ब्ह्मभाप्तिका स्वरूप ] मापानुवादसहित
स्वभावतया तत्संस्पर्शाभावात्। अन्यथा मध्यमपरिमाणत्वेन सावयवत्व- प्रसङ्गाद्। 'ब्रह्मविदामोति परम्' इत्यादिप्राप्तिथुतिवलाद् ब्रह्मणो दुरदेशवर्त्तित्व- मिति चेद, काडसौ प्रापिः१ न तावद् ब्रह्मभाव:, दूपितत्वात्। नाऽपि जीव- ब्रह्मभ्यामारभ्यमाणं द्रव्यान्तरम्, मोक्षस्य विनाशित्वप्रसङ्गाद। मोक्षस्य नित्यत्वाद् ब्रह्मणः सर्वगतत्वाङ्गीकारे सावयवत्वायोगाद् द्रव्यान्तरारम्भ- कत्वमेव न स्यात्। जीवन्रह्मणोः संचन्ध: प्रासिरिति चेद्, मैवम् ; न तावत् तादात्म्यम्, अणुमहतोविरुद्दयोस्तदयोगाद् । नाऽपि समवायादि:, भिन्न- द्रव्ययो: संयोगातिरिक्तसम्चन्धाभावात्। संयोगस्य च विप्रयोगावसानतया
विकारका सम्बन्ध नहीं हो सकता। [ इसके लिए कोई कल्पना करनेकी आवश्य- कता न थी ] अन्यथा याने केवल मध्यवर्तित्वसे उनका संस्पर्श प्राप्त होता, तो [ सब भूतोंका अन्तरात्मा (मध्यवर्ती) होनेके कारण ] मध्यम परिमाणवाला होनेसे आत्मामें भी सावयवत्वका प्रसङ्ग आ जायगा। शङ्का-'ब्रह्मज्ञानी पर ब्रक्मकी प्राप्ति करता है' एतदर्थक प्राप्तिको दिखलाने- वाली श्रुतिकी सामथ्यसे ब्रह्मका दूर देशमें रहना प्रतीत होता है। समाधान-यह प्राप्ति कौनसा पदार्थ है? [ जिसके बलपर ब्रह्मका दूर देशमें रहना कहा जा रहा है] ब्रह्मभावको तो प्राप्ति नहीं कह सकते, कारण कि इस न्रह्मभावकी प्राप्तिमें प्रथम ही दोष दे आये हैं। जीव और ब्रह्म-इन दोनोंके द्वारा बननेवाले अतिरिक्त द्रव्यको भी प्राप्ति नहीं कह सकते, कारण कि (उसका आरम्भ होनेसे) मोक्षमें विनाशित्वका प्रसङ्ग आ जायगा। मोक्ष नित्य पदार्थ है एवं ब्रह्मको सर्वत्र व्यापक माननेसे वह अवयवविशिष्ट नहीं हो सकता, इसलिए व्रक्ष अतिरिक्त द्रव्यका आरम्भक ही नहीं बन सकता। जीव और ब्रह्मके सम्बन्धको भी प्राप्ति नहीं कह सकते, कारण कि इनका सम्बन्ध तादात्म्य, तो हो नहीं सकता, क्योंकि परस्पर विरुद्ध अणुपरिमाण तथा महत्परिमाणवाले जीव और ब्रह्मका तादात्म्य (अमेद ) सम्बन्ध हो नहीं सकता। समवाय आदि अन्य सम्बन्ध भी नहीं बन सकते, कारण कि भिन्न-भिन्न द्रव्योंके संयोग सम्बन्धसे अतिरिक्त समवाय आदि सम्बन्ध नहीं हो सकते। और संयोगका अन्त विपयोगमें होता है, इसलिए [ यदि ब्रह्मपाप्तिको जीव और ब्रह्मका १०३
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८०६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, चर्णक २
पुनरावृत्तिप्राप्तेः। शास्त्रवलादपुनरावृत्तिरिति चेद, तर्हि 'स स्वराड् भचति' इति ब्रह्मप्राप्त्यनन्तरं स्वराड्भावप्राप्तिश्रवणादनेकेश्वराः प्रसज्येरेन्। तस्माद् ब्रह्म-
कर्थ तर्हि 'तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति' इति मूर्धन्यया नाड्या गमनं मोक्षाय श्रूयत इति चेद्, मैवम् ; नाऽमृतत्वं नाम मोक्षः, किन्तूत्तमलोके चिरकालावस्थानय् । 'आभृतसंप्ठवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते' इति स्मृतेः। अन्यथा सूर्धन्यनाड्या निर्गच्छतां प्रतीकोपासकानामपि मोक्षप्रसङ्गात् । न चतदिष्टम् , तेपामाविद्युल्लोकमेव गमनमित्येकस्मिन्न- धिकरणे निर्णीतत्वात्। अथाऽपि 'स एव तान् त्रह्म गमयति' इति श्रुत्या
संयोग सम्बन्ध माना जाय, तो] पुनरावृत्तिकी प्राप्तिका प्रसङ्क हो जायगा। यदि शासत्रकी सामर्थ्यसे पुनरावृत्तिका होना न माना जाय, तो 'वह स्वराट होता है' इत्यादर्थक ब्रह्मपरासतिके अनन्तर स्वराट होनेकी श्रुतिके आधारपर अनेक ईश्वरोंका प्रसभ्भ आ जाता है। इसलिए ब्रह्मप्रासतिकी प्रतिपादक श्रुतिका अविद्याकी निवृत्ति होनेपर जीवकी अपने स्वरूपमृत ब्रह्मकी अभिव्यक्तिमें ही तात्पर्य है। शङ्ा-तव तो 'उस शिरोनाड़ीके मार्गसे ऊपर जानेवाला अमृत- भाव (मोक्ष) को प्रप्त करता है' इत्यर्थक श्रुतिमें शिरोगत नाडीमार्गसे गमनरूप फलका श्रवण कैसे सङ्गत हो सकता है? [क्योंकि तुम्हारे (वेदान्तीके) मतमें ब्रह्मपाप्तिके लिए कहीं आने-जानेकी आवश्यकता तो है ही नहीं, वह तो केवल ब्रह्माभित्यक्ति है ]। समाधान-उक्त दोष देना उचित नहीं है, कारण कि जो अमृतत्व पदार्थ है, वह मोक्ष नहीं है, किन्तु अधिक समय तक उत्तम लोकोंमें स्थिति ही मोक्ष है। स्मृतिमें कहा भी गया है कि 'प्रलय तक स्थायी स्वर्गादि स्थानको अमृत कहते हैं'। अन्यथा (यदि अमृतत्वपदार्थ मोक्षरूप माना जाय, तो) शिरोनाड़ीके द्वारा निकलनेवाले पतीक-उपासकोंको भी मोक्षकी प्राप्तिका प्रसन् हो जायगा, जो कि इष्ट नहीं है, उनका तो 'विद्युत्-लोक तक ही गमन होता है, ऐसा एक अधिकरणमें निर्णय किया गया है। शंङ्ा-इस उक्त सिद्धान्तके रहते भी 'वही अमानुष पुरुष उन उपा- सकोंको ब्रह्म प्राप्त कराता है' एतदर्थक श्रुतिके द्वारा कोई अमानव दिव्य पुरुष
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क्रियापूर्वक व्रक्षकी प्राप्ति नहीं है ] भापांतुवादसहित
कथ्विदमानवः पुरुषः संमुखमागत्य वह्मोपासकान् गृहीत्वा विद्युल्लोकादुपरि- तनान् चरुणेन्द्रप्रजापतिलोकानतिक्रम्य व्रह आपयतीत्येवं गमनमेव मोक्षाय प्रतीयत इति चेद्, न; तस्य गमनस्य कार्यव्रह्मविपयत्वाद्। न च वृहत्यर्थानुगमात् परमेव ब्रह्माऽत्र ग्राह्यमिति शङ्गनीयम्, त्रह्मशब्दस्य कार्यन्रह्मणि रूढत्यात्। रूढिश्र योगवृत्तेर्वलीयसी, शीघ्रग्रतिपत्तिहेतुत्वाद्। परव्रह्मण्यपि रूढिरस्तीति चेद, तथापि शुत्यन्तरे समानप्रकरणे 'ब्रह्म- लोकान् गमयति' इति भोगभूमिविशेपवाचिलोकशव्दश्रवणादन्यास्वपि शाखासु तटाकाश्वत्थराजगृहद्वारपालवेश्मसभापर्यङ्कादीनां भोग्यवस्तूनां प्रतीयमान- त्वात् कार्यव्रह्मवेति निश्चीयते। किश्चाऽचिरादिमार्गेण गच्छतां निर्गुण- न्रह्मप्राप्तिश्वेत्तर्हिं पश्चाग्निविद्यावतां गृहस्थानामपि सा स्यात्। न च 'स एतान् त्रह्म गमयति' इत्येतच्छ्द्रः पश्चाग्निविव्वतिरिक्तान् परामृशतीति
सामने मा कर त्रह्मकी उपासना करनेवालोंको साथ लेकर विद्युत्-लोकसे ऊपरवाले वरुण, इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंको पार कराकर ब्रह्मको आप्त करा देता है, इंस प्रकार वर्णनसे मोक्षकी प्राप्तिके लिए गमनकी प्रतीति होती ही है। समाघान-वह गमन तो कार्यब्रह्मकी (हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मकी) प्राप्तिको विषय करता है। वृह्धातुके मर्थका अनुगम हो, इसलिए पर न्रक्षका ही ग्रहण होता है, ऐसी आशक्का नहीं करनी चाहिए, कारण कि ब्रह्मपद कार्यब्रह्ममें रूढ़ है। योगार्थकी अपेक्षा रूढिपाप्त अर्थ बलवान् होता है, कारण कि रूढि-प्रसिद्धि-शीव्र अर्थका बोध करा देती है। यद्यपि परत्रह्मरूप अर्थमें भी रूढि हो सकती है, तथापि समान प्रकरणमें-उपासनाकी फलश्ुतिरूप प्रकरणमें-पढी गई दूसरी 'ब्रह्मलोकमें पहुँचाया जाता है' इस अर्थका बोधन करनेवाली श्रुतिमें भोगके योग्य भूमि- विशेपके वाचक लोकशव्दके अ्वणसे और अन्य शाखाओंमें भी तटाक (तालाव) पीपल, राजभवन, द्वारपाल, घर, सभा, पलन्न आदि भोगके योग्य वस्तुओंकी प्रतीतिसे कार्यब्रह्मका ही निश्य होता है। किश्न, यदि अर्चि आदि मार्गसे आनेवाले उपासकोंको निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, तो पञ्चाग्निविद्याके उपासक गृहस्थोंको भी निर्गुण ब्रद्मकी प्राप्ति होनी चाहिए। यदि शक्का हो कि 'वह (दिव्य पुरुष) इनको ब्रह्म प्राप्त कराता है' इस वाक्यमें 'एतत्' (इनको) शब्द पश्चाग्नि- विद्वानोंसे अतिरिक्त ज्ञानियोंका परामर्श करता है, तो यह कहना भी युक्ति-
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र ४, वर्णक २
युक्तं वक्तुम्, पश्चाग्निविदामेव, प्राधान्येन पकृतत्वात् तेपामनिर्दिष्टफलत्व- प्रसङ्गाद्। किश्र, व्रह्मोपासनानां सर्वेपामपि यद्येकरूपं फलं तदा गुणोपचयापचयाभ्यामुपासनोपचयापचयौ व्यर्थो स्याताम्। तथा च कर्मभूयस्त्वात् फलभयस्त्वमिति न्यायविरोधः। अथोपचयापचयवत्तत्फलं तर्हिं न विकारासंस्पर्शिव्रह्मप्राप्ति तत्र तदभावात्। किश्च, वैश्वानरोपासनफलं त्रैलोक्यशरीरापत्तिर्यदीष्यते तदा विकारासंसृष्टे ब्रह्मणि कथं तदुपपाद्येत । अथ नेष्यते, तंदा 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति' इति श्रतिविरोधः स्यात्। किश्च पित्रादिसङ्करपै- र्विकारासंसृष्टे ब्रह्मण्युपभोगो न स्यात् चेत्, पित्रादिसङ्गल्पश्रुतिविरोधः ।
सङ्कत नहीं है, कारण कि पञ्चाग्निविद्याके विद्वान् ही प्रधानरूपसे प्रकरणपाप्त हैं। [ यदि उनके प्रकरणप्राप्त होनेपर भी न्रह्मपात्तिरूप फलके सम्बन्घकी योग्यता न होनेसे उनसे अतिरिक्त ही लिए जायँ, तो ] पञ्चाग्निविद्याके ज्ञाताओंके लिए फलनिर्देशके अभावका प्रसङ्ग आ जायगा। किश्च, नक्षकी उपासनाके साधनीभूत शाण्डिल्य आदि सम्पूर्ण विद्याओंका यदि एक ही (ब्रह्म- प्राश्तिरूप) फल माना जाय, तो गुणोंके उपचय तथा अपचयसे उपासनामें प्राप्त उपचय तथा अपचय निष्प्रयोजन हो जायँगे । [ यदि उपासना और कर्मोंके उपचयापचय व्यर्थ माने जायँ, तो 'क्रमोंके आधिक्यसे फलोंका मी आधिक्य होता है' इस न्यायसे विरोध होगा। यदि फलको एकरूप न मानकर उपचयापचयसे युक्त मानो, तो 'वह फल' विकारके सम्वन्धसे विरहित न्रह्मकी प्राप्तिरूप नहीं हो सकता, कारण कि उस विकारशुन्य न्रह्मपात्तिमें उपचय तथा अपचय नहीं हो सकते। और यदि वैश्वानरविद्याका फल तैलोक्यशरीरका पाना माना जाय, तो विकारशुन्य ब्रह्ममें वह फल कैसे उपपन्न किया जा सकता है ? यदि वह फल इष्ट नहीं है, तो 'उसकी जो जिस प्रकारसे उपासना करता है वह वही होता है' एतदर्थक श्रुविसे विरोध होगा। एवं पिन्नादिसंकल्पोंके द्वारा विकारशून्य ब्रह्ममें यदि उपभोगकी प्राप्ति न मानी जाय; तो पित्रादि- संकल्पकी भ्रुतिसे, जिसमें कहा गया है कि 'संकल्प द्वारा ही इसको पितृ- लोक उपस्थित होते हैं, विरोध आ जायगा। और यदि उपभोगकी प्राप्ति
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क्रियापूर्वक ग्रक्मकी प्राप्ति नहीं है। भांपानुवादसहित
स्याचेद्विकारावा्त्ति ब्रह्म पित्रादियुक्तं स्याद्। किश्च, विकारावर्तति- ब्रह्मप्राप्तोऽपि 'व्रह्मैवैति मनसैतान् कामान् पशयन् रमते तेन पिवृलोकेन संपन्नो महीयते' इत्यादिश्ुतौ ब्रह्मण एव भोग: साधनैर्दशितः स्यात्। तथा चाऽडसकामता विरुष्येत। स्वार्थप्रयुक्ता च सृष्टिः स्यात्। अथोच्येत न पित्रादिसङ्गल्पैन्रह्णि भोगोऽभिधीयते, किन्तु ब्रह्मानन्दे निखिलविपयानन्दान्तर्भावादैश्वर्यविशेप उपचर्यत इति, तन; वह्वीनां
प्रसङ्गाच। किश्र, विकारावर्तिन्रहाास्य लिङ्गरीमस्तिचे्का प्रलयश्चतिर्वाध्येत। नाडस्ति चेद्, 'मनसैतान्' इति श्रुतिर्वाध्येत। किश्च, तस्य
मानी जाय, तो विकारशून्य ब्रह्मके पित्रादिसे युक्त हो जानेका प्रसङ्ग होगा। और मी दोप आता है कि विकारशून्य ब्रह्मके प्राप्त होनेपर भी 'इन सव कामों-उपभोगोंका मन-वुद्धि-के द्वारा ब्रह्मादृष्टि रखकर उपभोग करता है और पितृलोककी सम्पत्तिको प्राप्त हुआ पूजित होता है' एतदर्थक श्रुतिमें साधनोंके द्वारा ब्रह्मका ही भोग दिखलाया गया है, यह कहना होगा। इस दशामें आपकामता-सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त कर लेना-विरुद्ध होती है, [अर्थात् ब्रह्ममें मी साधनोंके द्वारा मोगोंकी प्राप्ति मानी जाय, तो ब्रह्ममें कही गई आपकामता उपपन्न नहीं हो सकेगी]। और अपने स्वार्थ-उपभोग-के लिए ही राजादिके समान व्रक्म, कृतार्थ होनेपर भी, सृष्टि करता है, यह मानना होगा। शक्ा-पित्रादिसळ्ल्परूप साघनोंसे ब्रह्ममें भोगकी प्ाप्ति नहीं दिखलाई जा रही है, किन्तु ब्ह्ारूप आनन्दमें समस्त विषयोंका आनन्द मन्तर्गत होता है, अतः ऐश्वर्य विशेषका उपचार किया जा रहा है। समाधान-उक्त कथन संगत नहीं है, कारण कि अनेक श्तियोंको उप- चारार्थक माननेकी कल्पना करना युक्त नहीं है। और उसका निर्णय करनेके लिए प्रवृत्त चतुर्थ अध्यायका चतुर्थ पाद विफल हो जायगा। और भी दोप आता है कि विकाररहित ब्रह्मको प्राप्त हुए पुरुषका यदि लिङ्ग शरीर माना जाय, तो कलाप्रलयक्षुति बाधित होगी। [क्योंकि कलामलयश्रुति कहती है कि पुरुपसे सम्बन्ध रखनेवाली सोलह कलाएँ पर पुरुषको पाकर
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्रे ४, वर्णेक २
लिङ्गशरीरविलयनिमित विद्यैव चेत, तर्द्युत्क्रान्तिकाले विलयः स्याद्। लिङ्गशरीरारम्भककर्मणः क्षीणत्वात्। अमानवपुरुषकरसंस्पर्शश्रेत्, तदापि विद्युल्लोके स्यात्। उभयथाऽपि न ब्रह्माण्डादुपरि लिङ्गशरीरविलयः । किश्चौपाधिकजीवपक्षे जीवस्य न विकाराचर्ततित्रह्मगमनं संभवति। निर- वयवावच्छेदस्य घटाकाशस्येवोद्धत्याऽडनयनायोगात्। उद्धरणे च ब्रह्म- शुन्योऽयं प्रदेश: स्यात्। उपरिष्टाच्च त्रह्मोपचयः प्राप्तुयात्। तस्मात् उपाधिगमनादात्मनि गमनविभ्रमः। ननूपाधेरपि गमनं न संभवति, तदुपादानस्य ब्रह्मणश्चलनशृन्यत्वात्। नहि मृदि निश्चलायां घटस्य
लीन हो जाती हैं ]। यदि उसका लिन्न शरीर नहीं है, तो 'मनके द्वारा इन उपभोगोंको' एतदर्थक पूर्वोक्त श्रुति बाघित होगी। और यदि ब्रह्मके लिद्ग शरीरके लीन होनेमें विद्याको ही निमिच मानें, तो उत्क्रान्ति कालमें याने शरीरसे छुटकारा पानेके समयमें उसका लय होना चाहिए, कारण कि उस समय लिझ्र शरीरके आरम्भक कर्म्मोंका क्षय हो जाता है। यदि कहो कि अमानव दिव्य पुरुषके हाथका स्पर्श यदि (लिन्र शरीरके विनाशमें) कारण है, तो भी विद्युत्-लोकमें उसका विलय होना चाहिए, [ क्योंकि विद्युत्-लोकमें ही अमानव पुरुष मिलता है] कुछ मी हो, दोनोंमें से कोई मी कारण माना जाय, तब मी ब्रह्माण्डसे आगे लिङ्ग शरीरका विलय होना प्राप्त नहीं होता। और भी कहा जा सकता है कि जीवको औपाधिक माननेके पक्षमें विकार- शून्य ब्रह्ममें जीवका गमन सम्भव, नहीं है, कारण कि अवयवरहित अवच्छेदवाले घटाकाशको जैसे निकाल कर ले याना सम्भव नहीं है। [वैसे ही उपाधिमें से अवयवशुन्य ब्रह्मको निकाल लेना भी सम्भव नहीं है, जिससे ब्रह्ममें गमन बन सके । ] और यदि उससे ब्रह्मक्ा उद्धरण हो जाय, तो वह देश ब्रहाशन्य हो जायगा और आगे बाहर निकलकर ब्रह्मका उपचय होना प्राप्त हो जायगा। इसलिए उपाधिके गमनसे ही आत्मामें भी गमनका भ्रम होता है। शङ्ा-उपाधिका भी गमन सम्भव नहीं है, कारण कि उस उपाधिका उपादानभूत ब्रह्म गमनक्रियासे रहित है, मृत्िकाके चलनक्रियासे रहित होनेपर घटके गमनका होना सम्भव नहीं है.।
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क्रियापूर्वक व्रम्की प्राप्ति नहीं है] भापानुवादसहित ८११
गमनमस्तीति चेद्, एवं तर्हि स्वामगमनवत् मायाविजम्भितो गमनादि- प्रतिभासः । तदेवमापिरपि क्रियापूर्विका परत्रह्मणि नोपपद्यत इति सिद्धम्। संस्कृतिपक्षेऽपि न तावद् त्रह्मणि गुणाधानलक्षणः संस्कार: संभ- चति, अनाधेयातिशयरूपत्वात्। नाऽपि दोपापनयनलक्षण:, नित्यशुद्ध- स्वभावे दोपाभावात्। अथ मन्यसे निर्मलस्वभावेऽपि दर्पणेऽन्यसंपर्क- कृतमलस्याऽपनयनं यथा निघर्पणक्ियया भवति, तथाऽडत्मन्यप्यविद्या- कतदोपस्थाऽपनयनं क्रिययाऽस्त्वति; तत्र वक्तव्यम्-किमात्माश्रितया क्रियया दोपापनयः किं वाऽन्याथ्रितया? नाऽडद्य, सर्वगते निरवयव समाधान-ऐसा मानो, तो स्वमावस्थाके गमनसदश मायाके द्वारा ही गमनकी प्रतीति मानो, (वास्तविक गमन नहीं हो सकता)। इस प्रकारके निष्कर्पसे करिया द्वारा होनेवाली प्राप्ति मी परव्रह्मविषयक नहीं हो सकती, ऐसा मत सिद्ध होता है [ अर्थात् यदि ब्रह्म कहीं दूर देशमें रहनेवाला हो, तो उसकी प्राप्तिके लिए साघनीभूत क्रियाकलापका विधान सक्त हो सकता, परन्तु त्रह्म तो सर्वत्र व्याप्त है, इसलिए उसकी प्राप्तिके लिए क्रियाके विधानकी आवश्यकता नहीं है ]। [ क्रियाकलाप द्वारा यदि प्राप्तिका सम्भव नहीं है, तो क्रिया द्वारा दर्पणगत मलापनयनरूप संस्कारके तुल्य उपासनादि क्रियाके द्वारा ब्रद्मगत अनादि अविद्यारूप मलके द्वारा प्राप्त अभिव्यक्तिके प्रतिबन्धका निराकरण करनेके लिए त्रह्ममें संस्कारविशेपकी, उपपत्तिकी सम्भावनाका भी खण्डन करते हैं-] संस्कारपक्षमें भी क्रियाके द्वारा व्रह्ममें गुणोंकी उत्पत्ति करना तो सम्भव नहीं है, कारण कि व्रह्मका स्वभाव है कि उसमें कोई मी अविशय उत्पन्न नहीं हो सकता। (अर्थात् वह स्वतः सर्वातिशयपूर्ण है) एवं दोपोंका निराकरणरूप संस्कार मी नहीं हो सकता, क्योंकि नित्य तथा शुद्ध स्वभाववाले न्रह्ममें दोष नहीं आ सकते। यदि तुम्हारा मत हो कि शुद्ध (चमकदार स्वभाववाले) दर्पणमें मी हस्वादिके सम्बन्धसे उत्पन्न हुए मलको निघर्षण (मलकर साफ करना) क्रियासे जैसे दूर करते हैं, वैसे ही आत्मामें (ब्रह्ममें) भी अनादि अविद्याके कारण प्राप्त हुए दोपका निवारण क्रियाके द्वारा सम्भव है, तब भी हम उक्त कथनपर प्रश्न करेंगे कि क्या ब्रह्मगत करियाके द्वारा दोपका निराकरण होता है: या अन्याश्रित क्रियाके
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८१२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
आत्मनि क्रियानुपपत्तेः। न द्वितीय:, प्रत्यगात्मनोऽन्यद्रव्यैः संयोगाभावेन तत्तदाश्रितक्रियां अत्यविपयत्वात्। अथाऽडत्मनि परि- स्पन्दपरिणामयोरभावेऽपि मन्त्रदेवताभिधानाद्विपनिरासवदीश्वराभिधाना- छोषापनयः स्यादिति चेद्, न तस्य दोपस्य पारमार्थिकत्वे स्वाश्रय- विकारमन्तरेणाऽपसारणायोगात्। न चाऽडत्मनो विकास संभवति, 'अविकार्योडयमुच्यते' इति स्मृतेः । दोषस्याऽविद्यात्मकत्वे विद्ययैव निवृत्ति: स्यान्न तु क्रियया। ननु शास्त्रीयेः स्नानाचमनादिकर्मभिरात्मनो गुणाधानलक्षणः संस्कार: श्रूयत इति चेद्, अन्त:करणविशिष्टस्यैचाऽSत्मन- स्तच्छवणात्। नहि निरुपाधिकस्याऽडत्मनो धर्माधर्माननुतिष्ठतस्तत्फलं संभवति। तस्मान्न संस्कृतिरप्यात्मनि संभवति। ततश्रोत्पच्यादिचतु- द्वारा : इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण कि सर्वत्र व्याप्त अवयवरहित आत्मामें क्रियाका होना युकतिसे संगत नहीं है। दूसरा विकल्प भी नहीं बन सकता, क्योंकि प्रत्यगात्माका (ब्रम्मका) अतिरिक्त द्रव्योंसे संगोग नहीं हो सकता, इसलिए उन उन अतिरिक्त द्रव्योंमें आश्रित क्रियाके प्रति ब्रह्मका विषय होना सम्भव नहीं है। शङ्ा-यद्यपि परमात्मामें परिस्पन्द 'किसी भी प्रकारकी गमनादि क्रिया' तथा परिणाम-विकार-होना सम्भव नहीं है, तथापि मन्त्र या देवताओंके नामका उच्चारण करनेसे जसे चढ़ा हुआ विष उतर जाता है, वैसे ही ईश्वरके नामके उच्चारणसे दोषोंका निराकरण हो जायगा। समाधान-उक्त आशक्का नहीं बन सकती, कारण कि यदि न्ह्ममें प्राप्त हुए उस दोषको परमार्थ-सत्य-मानो, तो अपनेमें किसी भी प्रकारके विकारके हुए बिना उस दोषका दूर करना नहीं बन सकता। और आत्माका तो कोई भी परिणाम होना सम्भव नहीं है, क्योंकि स्पृतियोंमें वह विकारशून्य कहा गया है, और यदि दोष अविद्यारूप (मिथ्या) माना जाय, तो उसकी निवृत्ति विद्याके ही द्वारा हो सकती है, क्रियाके द्वारा नहीं। यदि शास्त्रविहित स्नान, आचमन आदि क्रियात्मक कर्मोंके द्वारा आत्मामें गुणोत्पचिरूप संस्कारका होना शास्त्रोंमें सुना जाता है, ऐसा कहा जाय, तो वह संस्कार भी अन्तःकरणविशिष्व (सोपाघिक) आत्माका ही होता सुना जाता है। धर्म तथा अधर्मका अनुष्ठान करते रहनेपर भी उपाधिशून्य आत्माको उनके पुण्यपापरूप फलका मिलना सम्भव नहीं है। ! अतएव अभियुक्तोंका वचन है कि-'निस्त्रैगुण्यो
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ज्ञानमें कियासे वैलक्षण्य ] भापानुवादसहित ८१३ विधफलस्य मोक्षे दुःसम्पादत्वात् तदतिरेकेणान्यस्य क्रियाफलस्याऽभावाचच विज्ञानस्यैव मोक्षो गोचरो न क्रियायाः। नतु ज्ञानमपि ध्यानवद् मानसक्रियेति चेद्, न; फलतः कारणतक्च ज्ञानक्रिययोर्चैलक्षण्यात्। वस्तुस्फुरणं हि ज्ञानफलं तचाSSत्मस्वरूपत्वादजन्यम्। तज्जन्मग्रति- भासस्तु तदभिव्यज्कान्त:करणवृत्तिजन्मोपाधिक: । न चैवं ध्यानक्रिया- फलमजन्यम्, गरुडदेवतादिध्यानाद्विपनिर्हरणचश्याकर्पणादिफलस्य पूर्वम- विद्यमानस्यैच जन्मदर्शनात्। कारणं च ध्यानक्रियायाश्चोदनाजन्य- पुरुषेच्छापूर्वकः प्रयतो न विपयसद्भाचः, असत्यपि विपये विधितो योपिदग्न्यादिध्यानदर्शनात्। ज्ञानं तु अ्माणप्रमेयजन्यं न पुरुपेच्छा- भवाऽर्जुन!''तथा निस्रगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः' आदि। इन वाक्योंसे गुणातीत मार्गमें विचरण करनेवालोंके लिए विधि-निषेधमें अधिकारका अभाव कहा गया है]। इसलिए आत्मामें संस्कारका होना भी नहीं बनता। इससे पूर्व ग्रन्थमें दिखलाये गए उत्पत्ति आदि चारों फलोंका मोक्षमें सम्पादन करना असम्भव है और उनसे अतिरिक्त कोई दूसरा क्रियाका फल है ही नहीं, इसलिए मोक्ष विज्ञानका (तत्वनिश्चयका) ही विषय हो सकता है, क्रियाका नहीं। शक्ा-ज्ञान भी तो ध्यानके सदश मनकी किया ही है। समाधान-नहीं, नहीं है, कारण कि ज्ञान और करियामें फलरूपसे तथा कारण- रूपसे परस्पर भेद है, [ इसलिए दोनों एक नहीं माने जा सकते। ज्ञान और क्रियामें फल तथा कारणका भेद दिखलाते हैं-] चस्तुका प्रकाश ज्ञानका फल है और वह (वस्तुप्रकाश) आत्माका स्वरूप होनेसे जन्य (क्रियासे उत्पन्न कराने योग्य) ही नहीं है। आत्मस्वरूप प्रकाशके जन्मकी जो प्रतीति होती है, वह तो उस आत्मस्वरूप वस्तुप्रकाशकी अभिव्यञ्जक अन्तःकरणकी तदाकारवृचिके जन्मसे ही होती है। और ध्यानरूप क्रियाका फल तो पूर्वोक्त ज्ञानफलके तुल्य अजन्य नहीं है (अर्थात् जन्य ही है), कारण कि गरुड़, देवता आदिके ध्यानसे विपका अपसरण, वशीकरण तथा आकर्षण आदि . पूर्वकालमें अविद्यमान ही फलोंका जन्म देखा जाता है। और ध्यानरूप क्रियाका कारण चोदनासे उत्पन्न हुई पुरुषकी इच्छाके द्वारा उत्पन्न हुआ प्रयत्न ही है, विपयकी सचा नहीं है, क्योंकि विषयके न रहनेपर भी चोदनाके द्वारा स्त्रीमें अग्नि आदिका ध्यान देखा गया है। ज्ञान तो इससे १०३
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८१४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
मनुवर्त्तते, अनिच्छतोऽपि दुर्गन्धादिज्ञानदर्शनात् । यद्यप्यनुमान- शब्दादिषु ज्ञानस्य न प्रमेयजन्यत्वनियम:, अतीतानागतवस्तुज्ञानेपु तदसम्भवात्, तथापि लिङ्गशब्दादितन्त्रमेव तत्राऽपि ज्ञानम्, न पुरुपेच्छा- तन्त्रमिति क्रियातो विलक्षणमेव। नतु संयोगविभागपरम्पराव्यतिरेकेण क्रियैव नाडस्ति, यतो वैलक्षण्यं ज्ञानस्योपपाद्येत। सर्वत्र संयोगविभागपरम्परावति हि शयेनादौ चलतीति अत्ययो जायते। न चैवं स्थाणावपि श्येनसंयोग- विभागवति चलनप्रत्ययः असज्येतेति चाच्यम्, आकाशप्रदेशविशेष- संयोगविभागं प्रत्येव तदङ्गीकारात्। नहि स्थाणुराकाशप्रदेशविशेपैः
विपरीत प्रमाण (ज्ञानके जनक इन्द्रियादि साधन) तथा प्रमेय (विषय) से उत्पन्न होता है, अतः वह पुरुषकी इच्छाका अनुवर्तन नहीं करता, क्योंकि इच्छाके न रहने- पर भी पुरुषको दुर्गन्ध आदि अनिष्ट विपयोंका ज्ञान हो ही जाता है, ऐसा देखा गया है। [ इसलिए ज्ञानमें विषयसद्भाव और विपयग्रहण में समर्थ इन्द्रियोंका विषयसे संनि- कर्षमात्र अपेक्षित है। ] यद्यपि अनुमान तथा शब्द आदि प्रमाणोंके स्थलमें ज्ञान प्रमेयके (विषयके) द्वारा उत्पन्न होता है, ऐसा नियम नहीं है, (अर्थात् उक्त स्थलमें विषयके सद्भावके विना मी ज्ञानकी उत्पत्ति देखी जाती है)। कारण कि भूत तथा आगामी पदार्थोंके ज्ञानमें विषयका सद्भाव नहीं रहता, तथापि उक्त स्थलोंमें हेतु तथा शब्द आदिके अधीन ही ज्ञान रहता है, पुरुपकी इच्छाके अधीन नहीं रहता (अर्थात् हेतु तथा शब्द ही ज्ञानको उत्पन्न करते हैं, इच्छा नहीं करती)। [ ज्ञान इच्छाके अधीन नहीं है, ऐसा कहनेमें कहीं मी व्यभिचार नहीं है ], इसलिए क्रियाकी अपेक्षा ज्ञान विलक्षण (भिन्न) ही है। शङ्का-संयोग तथा विभागकी परम्परासे अतिरिक्त कोई क्रिया पदार्थ ही नहीं है, जिससे कि ज्ञानमें क्रियासे वैलक्षण्यका उपपादन किया जाय, कारण कि संयोग और विभागकी परम्परावाले [ पूर्व देशसे विभाग और उत्तर देशसे संयोग यों लगातार जिनमें संयोग-विभाग चलते हों, ऐसे ] श्येन आदिमें ही 'चल रहा है (गमन क्रियायुक्त है), ऐसा व्यवहार होता है। यदि कहो कि इयेनके संयोग और विभागशाली स्थाणु आदिमें भी गमन क्रियाकी प्रतीतिका प्रसङ्क होगा, तो यह मी नहीं कह सकते, कारण कि आकाशरूप देशविशेषके साथ
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क्रियामें संयोगविभागातिरिक्तत्व्र] मांपातुवादसहित ८१५ संयुज्यते विभज्यते वा। तस्मादतिप्रसङ्गाभावान्नाऽस्ति संयोगविभाग- प्रचयातिरेकिणी क्रियेति चेद्, भैवम् ; बहुलान्धकारावृते नभस्यप्रतीयमाने तत्प्रदेशविशेषसंयोगविभागानामप्यप्रतीतौ खद्योतो चलतीति अ्त्यय- सन्ावाद्। तस्मात् संयोगाद्यतिरिक्ता क्रिया अत्यक्षसिद्धा। आ्रभाकरस्तु क्रियाया नित्यानुमेयतां मन्वान इत्थं प्रयुड्न्क्े --
जन्यौ, व्यवस्थितद्रव्ये कादाचित्कत्वात्, संयोगविभागजन्यकार्यवत् इति। तत्र योसावतिशयः स एव क्रिया भविष्यति। ईश्वरेच्छया सिद्ध- साधनता मा भूदित्युत्पननेनेत्युक्तम्। आत्ममन:संयोगजन्यादृष्टव्य- होनेवाली संयोग-विभागकी परम्परा ही क्रिया मानी गई है, [वृक्षादि नहीं ।] आकाशरूप देशविशेषसे स्थाणु न तो संयोगको ही प्राप्त करता रहता है और न विभागको ही प्राप्त करता रहता है। [ इयेन आदि पक्षी तो आकाशरूप देशविशेषसे संयोग तथा विभागकी परम्पराको प्राप्त करते रहते हैं, अतः इयेनादि पक्षी ही क्रियावान् कहे जा सकते हैं, स्थाणु आदि नहीं । ] इसलिए अतिमसन का सम्भव न होनेसे संयोग और विभागकी परम्परासे अतिरिक्त क्रिया नामकी कोई वस्तु नहीं है। समाधान-उक्त कथन सक्कत नहीं है, कारण कि घने अन्घकारसे आच्छन्न आकाशकी प्रतीति न होनेपर और उस देशविशेषमें विद्यमान संयोग- विभागकी परम्पराकी प्रतीति न होनेपर मी 'खद्योत (जुगुनू) गमन करता है' ऐसा ज्ञान होता है। इसलिए क्रियाको संयोग-विभाग-परम्परासे अतिरिक्त मानना प्रत्यक्ष प्रमाणसे सिद्ध है। इस विपयमें क्रिया नित्य अनुमानसे ही प्रतीत होती है, ऐसा माननेवाला प्रभाकरमतानुयायी इस प्रकार अनुमानप्रयोग करता है-'विवादग्रस्त प्रथम संयोग तथा प्रथम विभाग, उस प्रथम संयोग और विभागके आश्रयमें विद्यमान [उस आद् संयोगविभागके ] पूर्व क्षणमें उत्पन्न हुए अतिशयसे जन्य हैं, कारण कि वे व्यवस्थित द्रव्यमें कदाचित् होते हैं, संयोग और विभागसे उत्पन्न हुए कार्यके तुल्य'। उसमें जो अतिशय है, वही क्रियापदसे कहा जायगा। ईश्वरकी इच्छाको लेकर सिद्धसाधन दोष न आ जाय, इसलिए 'उत्पन्नेन' यह पद साध्यमें दिया गया है। [ ईश्वरेच्छारूप,
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८१६ [सूंत्र ४, वर्णक २
वच्छेदायाऽव्यवहितपूर्वक्षणेति। द्रव्येण सहोत्पने शौक्ल्यादावनैकान्तिकत्व- व्यवच्छेदाय व्यवस्थिते द्रव्ये इति। मैवम् ; किमत्र सयोगिनोद्योरप्यतिशयः साध्यते किं ाडन्य- तरस्मिन्नेव उताऽविशेपितमतिशयमात्रम् १ नाऽडद्य, श्येनस्थाणुसंयोगा- दावभावात्, तस्याऽन्यतरकर्मजन्यत्वात्। न द्वितीयः, उभयकर्मजन्ये मल्लमेषसंयोगादौ साध्यासम्भवात्। वृतीयेऽपि किमसौ क्रियाख्योऽ तिशयः स्थिरादेव द्रव्यादुत्पद्यते उताऽतिशयान्तरात् १ आद्ये संयोगवि- भागयोरेव तस्माद् द्रव्यादुत्पत्तिरस्तु किमनेनाऽतिशयेन। द्वितीयेऽ- नवस्थापात:। अतिशय सभी कार्यके पूर्वक्षणमें विद्यमान रहता है, अतः उक्त अनुमानमें उसको लेकर सिद्धसाधन दोष होगा, उसका वारण करनेके लिए 'उत्पन्न' पद दिया गया है, ईश्वरेच्छा किसीसे उत्पन्न नहीं होती। ] आत्मा तथा मनके संयोगसे उत्पन्न हुए अदष्टका वारण करनेके लिए 'अव्यवहितपुर्वक्षण' पद दिया गया है। [ क्योंकि अदृष्टसे अतिशय होता है और अतिशयसे आद्य संयोगादि होते हैं, इससे अदष्ट संयोगादिके अव्यवहित पूर्वक्षणमें नहीं रहता।] एवं द्रव्यके साथ उत्पन्न हुए शुक्ल आदि गुणमें व्यभिचारका वारण करनेके लिए 'व्यवस्थित द्रव्य' कहा गया है। प्रभाकर का उक्त मत उचित नहीं है, [कारण कि उसमें कोई विकल्प नहीं बन सकता, क्योंकि हम विकल्प करेंगे कि ] क्या उक्त अनुमानमें दोनों संयोगाश्योंमें अतिशय सिद्ध किया जा रहा है : अथवा संयोगाश्रय दोमें से किसी एकमें ही : या विशेषशुन्य (साधारण) अतिशयमात्र : इनमें प्रथम पक्ष नहीं वन सकता, कारण कि श्येन (वाज पक्षी) और स्थाणुके संयोग आदिमें उस ( दोनोंमें विद्यमान) अतिशयसे जन्य होनेका अभाव है, कारण कि स्थाणुश्येनसंयोग इनमें से एक ही के कर्मसे उत्पन्न हुआ है। दूसरा भी युक्त नहीं है, क्योंकि दोनोंके कर्मसे उत्पन्न हुए दो मरल-पहलवान्- तथा दो भेड़ोंके संयोग आदिमें (एकमें ही अतिशयरूप) साध्यका सम्भव नहीं है। तीसरा पक्ष माना जाय, तो प्रश्न होगा कि यह क्रियानामक अतिशय स्थिर (व्यवस्थित) द्रव्यसे उत्पन्न होता है : या दूसरे अतिशयसे : इसमें प्रथम पक्ष माना जाय, तो उस स्थिर द्रन्यसे संयोग और विभागकी ही उत्पत्ति क्यों न साक्षात्
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क्रियामें संयोग-विभागातिरिक्तत्व] मापानुवादसहित ८१७
अथ मतं भूमिपादयोः संयोग: पादाशरितकर्मणा जायते। तचच कर्म न कर्मान्तरेण जायते, किन्तु अयत्नवदात्मपादसंयोगेन, ततो नाऽनव- स्थेति, तहिं प्रयत्नवदात्मपादसंयोगस्यैव भूपादसयोगारम्भकत्वमिप्यपि चक्तुं शक्यतया न कर्म सिध्येत्, तस्मानाऽनुमेया क्रिया किन्तु प्रत्य- क्षैव। न च क्षणिकस्य कर्मण: कथमिन्द्रियसंयोगज्ञानलक्षणक्षणद्दयाव- स्थानमिति वाच्यम्, शब्दविद्युदादिवदविरोधात। अतश्च प्रत्यक्षसिद्ध- क्रियातो वैलक्षण्यं ज्ञानस्योपपन्नम्। नन्वन्त:करणपरिणामरूपत्वाद् ज्ञानमपि क्रियेव। सत्यम्, तथापि ध्यान-
मान ली जाय ? चीचमें इस अतिशयके माननेका क्या प्रयोजन? 'अर्थात् मध्यमें अतिशय रखनेसे किस प्रयोजनकी सिद्धि करनी होगी। दूसरे पक्षमें अनवस्था दोप आ जाता है। शङ्ा-यदि माना जाय कि पृथ्वी और पैरोंका संयोग पैरोंमें रहनेवाले कर्मके द्वारा उत्पन्न होता है। और वह कर्म दूसरे कर्मसे उत्पन्न नहीं होता, किन्तु प्रयत्नके समान आत्मा और पैरके संयोगसे होता है; इसलिए अनवस्था नहीं आती। समाधान-तव तो प्रयत्नके सदश आत्मा और पैरका संयोग ही पृथ्वी तथा चरणके संयोगका भी आरम्भक है, ऐसा कहा जा सकता है। इससे अतिरिक्त कर्मकी सिद्धि नहीं हो सकेगी। इसलिए करियाको अनुमानका विपय नहीं मान सकते, किन्तु क्रिया प्रत्यक्ष गोचर ही है। शक्ा-क्षणिक कर्मका इन्द्रियसयोग और ज्ञानरूप दो क्षण तक अवस्थित रहना कैसे हो सकता है? समाधान-शब्द और विद्युत् आदिके तुल्य कोई विरोध नहीं है। [जैसे उच्चरितपध्वंसी शन्द श्रोत्रेन्द्रियसंयोग तथा शान्द प्रत्यक्षरूप क्षणोंमें अवस्थित रहता है तथा क्षणचश्चला बिजलीकी चमक जबतक चाक्षुष ज्ञान होता है तभी तक स्थित रहती है वैसे ही कर्म भी आधुविनाशी होता हुआ उक्त दोनोंमें अवस्थित रह सकता है। ] इसलिए प्रत्यक्षसिद्ध क्रियाकी अपेक्षा ज्ञानकी विलक्षणता सङ्गत ही है। यदि कहो कि अन्तःकरणका परिणामस्वरूप होनेसे ज्ञान भी क्रिया ही है,
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८१८ विवरणग्रमैयसंग्रह [सूंत्र ४, वर्णक ₹
वत्पुरुपतन्त्रत्वाभावाद्विधियोग्यक्रियातो वैलक्षण्यसस्त्येव। यथा योपि त्यग्निध्यानं विधिजन्यपुरुषेच्छावशात् कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुँ शक्यम्, न तथा प्रसिद्धेऽग्राचग्निज्ञानं विधातुं पुरुपेच्छयाऽनुष्ठातुं वा शक्यम् । सत्यामपीच्छायां मनःसहकतस्य चक्षुपः स्पर्शनेन्द्रियस्य वाऽगनिसंयोग- मन्तरेण तज्ज्ञानानुदयात्। सति तु तत्संयोगे विनाऽपीच्छां ज्ञानो- दयात। अन्यथाकरणं तु दूरापास्तम्। नहि पुरोवस्थितोऽगनिर्निपुणतरे- णाऽपि स्तम्भाद्याकारेणाजवगन्तुं शक्यते। कथं तर्हि रज्जौ सर्पज्ञानमिति चेत् , तस्य ज्ञानाभासत्वात। न च सोऽप्याभास: पुरुपतन्त्र: अनिच्छतः
तो यह यद्यपि कहना सत्य है तथापि ध्यानके समान ज्ञान पुरुषव्यापारके मधीन नहीं है, अतः उसका विधान करनेके योग्य क्रियासे वैलक्षण्य (भेद) है ही। जैसे स्त्रीमें अग्निके ध्यानको विधिके द्वारा उत्पन्न हुई पुरुपकी इच्छासे करना या न करना अथवा भिन्न प्रकारसे करना सर्वथा सम्भव है, वैसे ही प्रसिद्ध (महा- नस आदिमें विद्यमान लोकप्रसिद्ध) अग्निमे अग्निज्ञानके लिए विधान करना या पुरुषकी इच्छावश उस ज्ञानका अनुष्ठान करना सम्भव नहीं है। इच्छाके रहते हुए भी मनसे संयुक्त चक्षुरिन्द्रिय अथवा त्वगिन्द्रियके साथ अग्निका संयोग हुए बिना अग्निके ज्ञानका उदय नहीं हो सकता। और अग्नि तथा इन्द्रियका संयोग हो जानेपर तो इच्छाके बिना मी ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। अन्यथा करनेकी कथा तो दूर रही। (अर्थात् प्रसिद्ध वस्तुको अन्यथा करना तो हजार इच्छाके रहते भी बन नहीं सकता), कारण कि सामने विद्यमान अग्निको अत्यन्त प्रवीण भी पुरुष स्तम्भ आदिके आकारसे ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। यदि ज्ञान अन्यथा नहीं हो सकता, तो रज्जुमें सर्प-ज्ञान कैसे होता है: [ इस शञ्काके उत्तरमें कहते हैं-] वह (रज्जु- सर्पज्ञान ज्ञान नहीं है, किन्तु) ज्ञानके समान प्रतीत होता है। और वह ज्ञाना- भास भी पुरुषके यत्नके अधीन नहीं है; कारण कि इच्छाके न रहते हुए भी तथा डरके कारण काँपते हुए पुरुषको भी रज्जुमें सर्पाभास हो जाता है [यह कोई नहीं चाहता कि मैं भयकम्पित होऊँ, परन्तु यह उसके अधीन नहीं है कि कारणसामग्रीके रहते भयजनित कम्पका कारणभूत रज्जुसर्पज्ञानका उदय न हो ]।.
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ज्ञानमें क्रियासे वैलक्ण्य] भापानुवादसहित ८१९
कम्पमानस्याऽपि जायमानत्वात्। ननु लोकेऽमुमश्निं पश्येति केनचेद्विहिते सत्यन्योऽपि स्वेच्छया तदभिमुखो भूत्वा तं पश्यति असत्यां त्वि- च्छायां विमुखो भृत्वा चक्षुपी निमील्य वा न पश्यति तथा शास्त्रवशा- दाहवनीयाद्यग्नीन् करणाद्युपेतानवलोकयति । अतः कथं पुरुपस्य ज्ञान- विषयकरणाडकरणाऽन्यथाकरणेपु स्वातन्त्र्याभाव: । उच्यते-अभिमुख्यवैमुख्ये दर्शनादर्शनयोः साम्रयौ। तत्र तत्स- म्पादनलक्षणक्रियायामेव पुरुपस्य स्वातन्त्र्यं न ज्ञानाज्ञानयोः। अतः पश्ये- त्युक्ते सामग्रीं सम्पादयेत्ययमर्थः सम्पद्यते। यदि ज्ञानं पुरुपप्रयत्नजन्यं
शका-लोकमें देखा जाता है कि 'इस अग्निकी ओर देखो' ऐसी आज्ञा पानेपर दूसरा (जिसको आज्ञा दी गई है, वह) पुरुष मी अपनी इच्छासे उस अग्निके संमुख होकर उसकी ओर देखता है और यदि इच्छा नहीं करता, तो उस अझिकी ओर विमुख होकर (मुँह फेरकर) या आँखें वंद कर नहीं देखता एवं शास्रवश (शास्त्रीय आज्ञाका पालन करनेकी इच्छासे) हस्त, पाद आदि करणयुक्त आहवनीय आदि अग्निओंका दर्शन (ध्यान) करता है। [ यदि वह पुरुष शासत्रीय आज्ञा-पालनकी इच्छासे प्रेरित होकर उनके अभि- मुख होनेकी चेष्टा न करे, तो आहवनीय आदिका दर्शन नहीं हो सकता। और यदि करणसहितोंकी भावना करनेकी इच्छा न करे, तो अन्यथा-दर्शन भी कर सकता है]। इसलिए कैसे कहा जा सकता है कि ज्ञानके विषयमें करने, न करने या अन्यथा करनेकी पुरुषमें सामर्थ्य नहीं है? समाधान-अभिमुख (सामने मुख करना अथवा आँख खोले रखन) तथा विमुख (मुख फेर लेना अथवा आँख बंद कर लेना) दोनों देखने और न देखनेकी क्रमशः सामग्रियाँ (कारण) हैं। इसमें इस सामग्रीको सम्पन्न करनेकी क्रियामें ही पुरुपका स्वातन्त्र्य है, ज्ञानकी उत्पत्ति करने या न करनेमें नहीं है। (सामग्रीके जुटनेपर ज्ञान अवश्य होगा और सामग्रीके अभावमें ज्ञान कथमपि नहीं हो सकता) इस सिद्धान्तके अनुसार 'देखो' इस आज्ञा देनेवाले वाक्यका तात्पर्यार्थ होता है कि देखनेकी सामग्री (अभिमुख होना आदिको) सम्पन्न करो। [इससे अतिरिक्त ज्ञानोत्पत्ति करनेकी आज्ञा देना उक्त वाक्यका अर्थ नहीं है] यदि ज्ञान पुरुषके परयलसे उत्पन्न होनेवाला माना जाय, तो
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८२० विवरण्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
स्यात तदा धारावाहिकद्वितीयतृतीयादिज्ञानानामुत्पत्तिर्न स्याद्। ग्रथम ज्ञानस्यैव अयत्ननान्तरीयकत्वात्। नहि प्रयत्नजन्यगमनादिक्रियायाः परम्परा सकृत्प्रयत्नमात्रादुत्पद्यमाना दश्यते। अथ वाणविमोकचक्रभ्रम- णादौ प्रथमप्रयत्नादेव क्रियापरम्परा जायत इत्युच्येत, तन्न; तत्रोत्तरोत्तर- क्रियाणां वेगाख्यसंस्कारजन्यत्वात्। न च धारावाहिकज्ञानेपु तथा संस्कारोऽस्ति। न च प्रथमज्ञानजन्यसंस्कारादुचरोत्तरज्ञानपरम्परा जायता- मिति वाच्यम् : तथा सति स्मृतित्वप्रसङ्गात। स्मृतित्वे चेन्द्रियसंयोगा- द्यनपेक्षत्वप्रसङ्ग:। तस्मात् द्वितीयवृतीयादिज्ञानानां अमाणतन्त्रत्वाद् प्रथमज्ञानस्याऽपि तथात्वे वक्तव्ये अयतान्वयव्यतिरेको प्रमाणसामग्रीसम्पा- दनविषयतयोपपद्येते।
धाराप्रवाहसे होनेवाले दूसरे या तीसरे ज्ञानोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकेगी, कारण कि प्रथम ज्ञान ही प्रयत्नका नान्तरीयक है। [अर्थात् यदि ज्ञानकी उत्पत्तिके लिए प्रयत्न अपेक्षित माना जाय, तो वह प्रयत प्रथम ज्ञानको उत्पन्न करके नष्ट हो जायगा। पुनः दूसरे प्रयत्नके विना ज्ञानान्तरकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, इसलिए प्रथम प्रयत्न और प्रथम ज्ञानका ही सम्बन्ध होना वन सकेगा। कारण कि प्रयत्नसे उत्पन्न होनेवाली गमनक्रियाकी परम्परा एक ही प्रथम प्रयत्नमात्रसे उत्पन्न होती हुई नहीं देखी गई है। यदि कहो कि बाणके छोड़ने या चक्रके घुमाने आदिमें प्रथम प्रयत्नसे ही क्रियाकी परम्परा (वाणका बरावर चला जाना और चक्रका घूमते रहना) होती ही रहती है, तो यह कहना उचित नहीं है, कारण कि ऐसे स्थलमें उत्तर-उत्तर क्रियाओंकी उत्पत्ति वेगात्मक संस्कारके द्वारा होती है। और धारापवाहसे होनेवाले ज्ञानोंमें ऐसा कोई संस्कार नहीं है। प्रथम ज्ञानसे उत्पन्न हुए संस्कारके कारण उत्तरोत्तर ज्ञानोंकी धाराका उत्पन्न होना भी नहीं मान सकते, कारण कि उत्तरोत्तर ज्ञानधाराको संस्कारजन्य माननेसे स्मृति-स्मरणरूप ज्ञान-माननेका प्रसङ् आ जायगा। यदि उसको स्मृति मानेंगे, तो इन्द्रियसंयोगकी अपेक्षाके अभावका प्रसङ्क होगा। इससे द्वितीय और तृतीय आदिमें प्रमाणाघीनत्व होनेसे प्रथम ज्ञानमें भी वही प्रकार मानना होगा, इस अवस्थामें प्रयत्नके अन्वय और व्यतिरेक प्रमाणकी सामग्रीके सम्पादनमें उपपन्न होते हैं।
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ज्ञानमें किपासे वैलक्षण्य] भापानुवादसहित ८२१
एवं स्मृतिज्ञानमपि संस्कारोद्रोधाधीनं न पुरुपप्रयताधीनम्, सदृश- दर्शनाददष्टवशाद्ा संस्कारोदोघे अयत्तमन्तरेणाऽप्यनिष्टविषयस्मृतिदर्शनात्। यदि कचित् स्मृतिविशेपे प्रयतापेक्षा दृश्येत तदाऽपि प्रयलेन चिन्तापरपर्याय- चित्तैकाध्यमेव जायते, न तु स्मृतिः। तेन चकाय्येण संस्कार उद्धो- ध्यते। तदुक्तम्-'सदृशादृष्रचिन्ताद्याः स्मृतिवीजस्य वोधकाः' इति। यज्ु शास्त्रवशादाहवनीयादीनां शरीरावलोकनम्, तन्नाऽस्ति काचिदा- हवनीयदेवताया मूर्तिरिति योऽयं परोक्षः अ्रत्ययो सूर्तिविशेपविपयः स न पुरुपतन्त्र:, चिनैव प्रयतनं मूर्त्तिविशेपवाचिशव्दैरेव जायमानत्वात्। यच् पुरोवर्ष्यङ्गाराणां तन्मूर्ततिविशेषाकारेण भावनं तन्न ज्ञानम्,
उक्त रीतिके अनुसार स्मरणात्मक ज्ञान भी संस्कारके उद्ोघनसे उत्पन्न होता है, पुरुपपयत्नके द्वारा उत्पन्न नहीं होग, कारण कि सदृश वस्तुके दर्शनसे अथवा अदष्टवश संस्कारके जाग्रत् होनेपर प्रयत्नके बिना भी अपनी अनमीष्ट (अगिय) वस्तुका स्मरण होना देखा गया है। [अप्रियका स्मरण कोई नहीं चाहता, जिसके लिए प्रयत्न किया जाय।] यदि कहींपर स्मरण विशेपमें प्रयत्नकी अपेक्षा देखी जाती है, तो वहाँपर भी प्रयत्नके द्वारा केवल चिन्वारूपी चित्तकी एकाग्रता- मात्र होती है, स्मरणकी उत्पत्ति नहीं होती। [ प्रयत्नसे चित्तैकाय्य होता है, चित्तकी पकायतासे संस्कारका उद्दोधन और उससे स्मृति होती है, ऐसा नियम दिखलाते हैं-] प्रयत्नजनित उस चित्तकी एकाग्रतासे संस्कार जाग्रत् होता है। इस विपयमें कहा गया है-'सदश, अदष्ट तथा चिन्ता आदि स्मृतिके कारणीभूत संस्कारके उद्ोधक हैं।' [ इस वचनसे सिद्ध होता है कि चिन्तादि प्रयत्न भी संस्कारके ही उह्ोघक हैं, स्मरणके नहीं ।] शास्त्रके आघारपर आहवनीय आदि अभिके जिस शरीरका प्रत्यक्ष करना कहा गया है, वह कोई आहवनीय देवताका आकाररूप शरीर नहीं है, इसलिए जो यह शन्दात्मक शास्त्र द्वारा उत्पन्न हुए आकारविशेषका परोक्षात्मक ज्ञान होता है, वह भी पुरुपव्यापाराधीन नहीं है, कारण कि पुरुषकृत प्रयत्न. (अभिमुख होना आदि) के बिना मी आकारविशेषके बोधक शब्दोंसे ही ताढश परोक्ष ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। और सामने विद्यमान १०४
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८२२ विवरणप्रमेयसंग्रद् [सूत्र ४, वर्णक २
अयथावस्तुत्वात्। न चाऽयथावस्तुत्वे कथं शास्त्रीयत्वमिति वाच्यम्, नहि शास्त्रमङ्गाराणां हस्तपादादीनवयवान् प्रतिपादयति। तथा सति प्रत्यक्षविरोधप्रसङ्गात्, किन्तर्ह्ययथावस्तुगोचरेणाऽपि भावनेन फलविशेष: साध्य इति प्तिपादयति। न चाऽसौ साध्यसाधनभावो मिथ्या, ततो भावनस्याऽयथावस्तुत्वेऽपि न शास्त्रस्य काचिद्धानिः। भाव- नस्य च पुरुपतन्त्रत्वमस्माभिरभ्युपेयत एव, तस्य ध्यानक्रिया- रूपत्वात् । नतु ध्यानमप्यनुभवतन्त्रमेव धारावाहिकस्मृतिज्ञानरूप- त्वादिति चेद्, न; अननुभूते स्मृत्ययोगात्। नहि योपिदादेर-
लाल अज्जारोंमें उस आकार-विशेषका जो चिन्तन है, वह तो यथार्थ-ज्ञान नहीं है, कारण कि (अंगारोंका उस आकारविशेषसे चिन्तन करना) यथार्थ वस्तु नहीं है। यदि यथार्थ वस्तु नहीं है, तो शास्त्रकारोंने उसका प्रतिपादन कैसे किया? ऐसी शक्का करना भी उचित नहीं है, क्योंकि शास्त्र अन्ारोंके हाथ, पांव आदि अवयवोंका प्रतिपादन नहीं कर रहा है। यदि ऐसा होगा, तो प्रत्यक्षके साथ विरोध होनेका प्रसञ्ग होगा। [ तब शास्त्र किसका प्रतिपादन करता है? यह जिज्ञासा हो, तो सुनो] शास्त्र अयथार्थ-वस्तुविपयक भावनासे भी फलविशेष होता है, ऐसा प्रतिपादन करता है। और उक्त शास्त्रीय साध्य-साघनभाव (कार्यकारणभाव) मिथ्या (अयथार्थ) नहीं है, इसलिए उक्त भावनाके अयथार्थ होनेपर मी शास्त्रकी कोई हानि नहीं है। [ विप-शक्का आदिसे भी मरणादि कार्य देखे जाते हैं, अतः अयथार्थसे भी यथार्थ फलकी उत्पत्ति होनेके कारण शास्त्र द्वारा अयथार्थ भावनासे यथार्थ फलविशेषकी उत्पत्तिका तथा उनमें साध्यसाधनभावका प्रतिपादन होनेपर भी उसमें (शास्त्रमें) अप्रामाण्यरूप हानि नहीं आ सकती।] और भावना पुरुषव्यापारके अधीन है, ऐसा हम स्वीकार करते ही हैं, कारण कि भावना (मानसी क्रिया) ध्यानात्मक क्रियास्वरूप है। शङ्का-ध्यान मी तो अनुभवके ही अधीन है, कारण कि धाराप्रवाहसे होनेवाला स्मरणात्मक ज्ञान ही ध्यान है [ और स्मरण अनुभवके ही अधीन है ]-। समाधान-[ अज्वारोंका आकारविशेष अनुभवमें नहीं आता है, ऐसी दशामें उस आकारंविशेषका स्मरणात्मक ध्यान कैसे किया जा सकता है, इस आशयसे
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ध्यान और स्मरणका वैलंक्षण्य] मापानुवांदसहित ८२३
ग्न्यादिरूपत्वं किंचिद्नुभृतम् । नतु 'योपा चाव गोतमाग्नि:' इत्याग- मातदनुभव इति वाच्यम्, किमस्मादागमात् प्रमितिर्जायते किं वा विपर्ययानुभवः १ आदये योपिदगनित्वग्रमितिपरेणाडनेन वाक्येन ध्यान- विधिन सिध्येत । अथ विधिपरमेतद्वाक्यं तदा न योपिदगित्वं प्रमी- यते। उभयपरत्वे वाक्यभेदो विरुद्धत्रिकद्वयापत्तिश्। योपिदग्नित्वप्र- मितौ प्रत्यक्षविरोधथ। न द्वितीया, दोपरहितस्पाऽऽगमवाक्यस्य चिप- र्थयानुभवहेतुत्वायोगात् । तस्माननैतेन वाक्येन प्रसिद्धयोर्थोपिदग्न्यो-
उत्तर देते हैं-] जिसका अनुभव नहीं हुआ है, उसका स्मरण नहीं हो सकता। स्त्री आदिका अभि आदिके रूपमें कभी भी अनुभव नहीं हुआ है। 'स्त्री अमि है' पतदर्थक आगमके (श्रुतिके) वलसे तादश अनुभवका होना भी नहीं माना ना सकता, कारण कि इसमें विकल्प किया जा सकता है कि उस शास्त्रसे उक्त प्रमारूप (यथार्थ ज्ञानरूप) अनुभव होता है : अथवा विपर्ययरूप (अयथार्थरूप) अनुभव होता है।। प्रथम करपके माननेमें स्त्रीमें अग्निका निश्चय करानेवाले शास्त्रसे ध्यानका विधान सिद्ध नहीं हो सकता। और यदि वह शास्त्रं ध्यानका विधायक माना जाय, तो सत्रीमें अग्निका निश्चय नहीं हो सकता। शासका दोनोंमें तात्पर्य माननेसे वाक्यभेद और विरुद्ध दो त्रिकोंकी आपसि होगी। [सकदुश्चरित न्यायसे एक वाक्य एक ही अर्थका बोधक होगा, इसलिए दोनों अर्थोंका बोधन करनेके लिए दो वाक्य मानने होंगे, एक विधायक होगा और दूसरा प्रमापक होगा, इस प्रकार वाक्यभेद करनेसे गौरव होगा। इस गौरवसे अतिरिक्त दूसरा भी दोप होगा-यदि योषिदभिका विधान किया जाय, तो योषिदग्निमें विघेयत्व, उपादेयत्व एवं प्राधान्यरूप त्रिक प्राप्त होते हैं। अथ च योषिदग्निकी उक्त वाक्यसे प्रमा मानी जाय, तो योषिदग्निमें उद्देश्यत्व, अनुवाद्यत्व एवं गुणत्वरूप त्रिक प्राप्त होते हैं। विधिस्थलमें योपिदम्नि प्रधान है और प्रमितिस्थलमें योषिदग्नि ध्यानविशेषण होनेसे अप्रधान है, इस प्रकार इन विरुद्धे त्रिकोंके कारण योपिदग्निमें वैरूप्य प्रसङ्क आ जाता है। ] स्त्रीमें अग्निका निश्चय करनेसे प्रत्यक्षविरोध भी स्पष्ट है। दूसरा विकल्प भी नहीं बन सकता, कारण कि (अपौरुपेय होनेसे) सर्वथा दूपणशुन्य शास्त्रको विपर्ययरूप (अयथार्थरूप) अनुभवात्मक ज्ञानका कारण होना प्राप्त नहीं हो सकता।
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[सूंत्र ४, वर्णक २
स्तादात्म्यमनुभवितुं शक्यम्, किंतर्हि यथा दर्शपूर्णमासादिरूपायाः शारीरक्रियायाः स्वर्गसाधनत्वं तद्ाक्यात् प्रमीयते तथाऽस्मादपि वाक्यात् कस्याशिन्मानसक्रियाया फलविशेपसाधनत्वं ग्रमीयते तर्हि योषिदभनिपद्द्यं व्यर्थ स्ादिति चेद्, न; क्रियाभाजो मनस आकार- विशेषसमर्पकत्वात्। यथा 'गोकर्णाकारेण पाणिनाSडचामेत्' इत्यत्र गोशब्दः कर्णशन्दो वाऽडचमनाङ्गस्य पाणे: स्वार्थसददशाकारं केवलं समर्पयतो न तु असिद्धमर्थ अ्तिपादयतः तथा योपिदगिशब्दावपि प्रसिद्धस्वार्थमस्पृशन्तावेव तत्सदशाकारं मनसो ध्यानाङ्गस्य किं न समर्पयेताम् १ न च योविदनितादात्म्यस्याऽत्यन्तमग्रसिद्धत्वाद तत्सदृशा- कारसमर्पणमयुक्तमिति वाच्यम्। किं शब्दस्याऽत्यन्ताविद्यमानाकार- समर्पकत्वाभाव: किंवा मनसस्तदाकारभाकत्वाभावः १ उभयमपि वक्तु-
इसलिए 'योषा वाच' इत्यादि उक्त वाक्यसे लोकमें प्रसिद्ध (अनुभृत) स्त्री अथवा अग्निमें परस्पर तादात्म्यका (अभेद प्रत्ययका) अनुभव नहीं हो सकता, किन्तु जैसे शरीरसे निष्पन्न होनेवाले दर्शपूर्णमास आदि क्रिया-कलापमें शास्त्र द्वारा स्वर्गके प्रति साघनता (हेतुता) निश्चित होती है वैसे ही 'योषा चाव' इस वाक्यसे भी किसी (ध्यानकर्म) मानस क्रियाका फलविशेषके प्रति हेतु होना निश्चित होता है। तव तो 'योषित्' और 'अग्नि'-इन दोनों पदोंका देना व्यर्थ होगा, ऐसी शक्का करना भी सङ्गत नहीं है, कारण कि किया करनेमें तत्पर अन्तःकरणको आकार प्राप्त करानेके लिए दोनोंका सार्थक्य है। जैसे 'गोके कानका आकार बना कर हाथसे आचमन करना चाहिए' इत्यर्थक वाक्यमें गोशन्द और कर्णशब्द आचमनके अङ्गभूत (साधनीभूत) हाथका केवल गोके कर्णरूप स्वार्थके सदश आकाररूप अर्थका ही प्रतिपादन करते हैं, प्रसिद्ध गौके कानरूप अर्थका प्रतिपादन नहीं करते, वैसे ही प्रकृतमें योषित् और अग्नि- शब्द भी अपने लोकप्रसिद्ध स्वार्थसे सम्ब्रन्ध न रखते हुए ही ध्यानके साधनीभूत अन्तःकरणको. अपने स्वार्थके सदश आकारका ही समर्पण क्यों नहीं कर सकते? योषित और अग्निका तादात्म्य लोकमें भी प्रसिद्ध नहीं है, इसलिए उसका प्रति- पादन करना युक्तिसञ्जत नहीं है, ऐसा कहना मी उचित नहीं है, कारण कि इसमें प्रश्न करेंगे कि क्या शब्द अत्यन्त अप्रसिद्ध आकारका समर्पण
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ध्यान और स्मरणका वैलक्षण्प] भापानुवादसहित ८२५
मशक्यम्, यतो नरस्य विपाणस्य चाऽत्यन्ताविद्यमानमेव सम्चन्धाकारं नरविपाणशब्द: समर्पयन्तुपलभ्यते मनश्र तमाकारं भजते। ततश्र श्रुतिसमर्पिंताकारविशिष्टाया मानसक्रियायाः प्रवाहो ध्यानं न तु स्मृतिग्रवाहः। नन्वविद्यमानविपये ध्यानस्मृतिप्रवाहयोरसाङ्कर्येऽपि विद्यमानविपये चतुर्भुजधारिविष्ण्ादौ शास्त्रेणाऽनुभूते विधीयमानं ध्यानं न स्मृतिप्रवाहाद्विशिप्यत इति चेद्, न; परोक्षत्वेनाऽनुभूताया मूर्चेरपरोक्ष- शालग्रामग्रतिमादावनुसन्धानस्य विहितस्य प्रागनुभूतताभावेन - वस्तुपु स्मृतिर्ध्याना- द्विशिप्यते। तद्यथा-वाल्ये पठित्वा वेदं चिरकालव्यवधाने सति पुनः पर्यालोचयन्नंकैकस्मिन् वाक्ये चिरं चित्तेकाय्यं कृत्वा तचद्वाक्यं यथापठितमेवाऽवगच्छति सैपा स्मृतिः। न चाऽत्र पुरुपः स्व्रतन्त्रा,
करनेमें समर्थ नहीं है? या अन्तःकरण तादश आकारको प्राप्त नहीं कर सकता? इनमें से एकको भी नहीं मान सकते, कारण कि नरविषाणशब्द अत्यन्त अप्रसिद्ध ही मनुष्य और सींगके परस्पर सम्बन्धाकारको समर्पण कराता हुआ देखा जाता है और अन्तःकरण उस आकारको प्राप्त भी होता है। इसलिए शव्दात्मक श्रुतिसे प्राप्त हुए आकारसे युक्त मानस क्रियाकी प्रवाह-परम्परा ही ध्यान पदार्थ है, स्मरणकी परम्परा ध्यानपदार्थ नहीं है। शक्ा-अत्यन्त अप्रसिद्धात्मक विपयके स्थलमें ध्यान और स्मृतिकी परम्परामें पार्थक्य सिद्ध होनेपर मी शास्त्र द्वारा मनुभवमें आये हुए चार भुजाओोंको धारण करनेवाले विष्णु भगवान्के ध्यानका विधान करनेमें तो स्मरण-परम्परासे अतिरिक्त दूसरा ध्यान पदार्थ कोई नहीं है। समाधान-शब्द द्वारा परोक्षरूपसे अनुभूत मूर्चिके प्रत्यक्ष अनुभूत शालग्राम- शिलारूप प्रतिमा आदिमें जिस अनुसन्धानका (ध्यानका) विधान है, वह अनुभूत न होनेके कारण स्मरणरूप ज्ञान नहीं हो सकता है। प्रत्यक्षरूपसे अनुभूत वस्तुओंका भी स्मरण ध्यानकी अपेक्षा विशिष्ट अर्थात् अतिरिक्त है। जैसे कि बाल्यकालमें वेद पढ़कर बीचमें अधिक समय तक व्यवधान हो जानेसे अनन्तर दुवारा पर्यालोचन करते हुए एक-एक वाक्यमें अधिक काल तक चिचकी एकाअता करके पठनक्रमके अनुसार ही उन वाक्योंका
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८२६ विवरणप्रमैयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक र
प्रयतेन चित्तैकांय्ये संपादितेऽपि कस्मिंश्रिद् वाक्यविशेपे स्मृत्य- नुदयात्। न च स्मर्यमाणमपि वाक्यमन्यथा स्मत्तु शक्यम्, अवेदवाक्यत्वप्रसङ्गात्। नाऽपि स्वेच्छावशादस्मर्तुं शक्यम् ; अनिच्छतो शौचावसरेऽपि कदाचिद्वेदवाक्यस्मृतेरनिवार्यत्वात्। अतः कर्तुमकर्तु- मन्यथा वा कर्सुमशक्या यथानुभूतं वस्त्वविलङ्यन्ती तत्संस्कारो- द्वोधमात्राधीना स्मृतिरित्युच्यते। ध्यानं त्वनुभूतेऽननुभृते वा वस्तुनि विद्यमानानामविद्यमानानां वा धर्माणां निरङ्कशं कल्पनं यल्ोके मनोराज्यमिति प्रसिद्धम् । ' न च तत्र पुरुपः परतन्त्र, स्वेच्छा- मनोभ्यां विना साधनान्तराऽनपेक्षणात्। तर्ह्ययथाशास्त्रमपि देवता-
ज्ञान प्राप्त करता है, इसका नाम स्मरण है। इस प्रकारके स्मरणमें पुरुष स्वाधीन नहीं है, कारण कि प्रयत्नके द्वारा चितकी एकाअ्रताको सम्पन्न क़र लेनेपर मी किसी किसी (पठित भी) वाक्यविशेषके स्मरणका उद्य नहीं होता और स्मरणमें आनेवाले वाक्यका भी अन्यथा [पठित आनुपूर्वकि विपरीत ] स्मरण नहीं हो सकता, कारण कि अन्यथा स्मरणमें आये वाक्यको वेदवाक्य न होनेका प्रसङ् आ जायगा। [ अर्थात् जबतक यथापठित आनुपूर्वीका ज्ञान न हो जाय, तवतक तादश स्मृतिका जनक चित्तैकाअतादि व्यापार होता ही रहेगा। ] और उसमें अपनी इच्छाका स्वातन्त्र्य भी नहीं है कि उसका स्मरण होना रोक सके, इच्छा न रहते हुए भी अशुद्ध अवस्थामें कभी-कभी वेदवाक्योंका स्मरणमें आ जाना नहीं रोका जा सकता। इसलिए जिसका करना, न करना या अन्यथा-करना सम्भव नहीं है और जो यथानुभूत वस्तुका उल्लद्दन नहीं करता एवं जो केवल पूर्व अनुंभवसे उत्पन्न संस्कारके उद्बोघसे उत्पन्न होनेवाला ज्ञान है, उसको स्मरण कहते हैं। और जिस विषयका अनुभव हुमा हो या न हुआ हो, उस (अनुभूत या अननुभूत) वस्तुमें रहने या न रहनेवाले धर्मोंकी निरङ्कश (स्वेच्छामात्रसे) करपना: करना ध्यान कहलाता है, जिसको लोकमें मनोराज्य नामसे प्रसिद्धि दी गई है। उस ध्यानमें पुरुष पराधीन (विषयादिके वश) नहीं हैं, क्योंकि अपनी इच्छा तथा अन्तःकरणके अतिरिक्त दूसरे साधनकी अपेक्षा नहीं रहती। तब तो शास्त्रके प्रतिकूल भी (जैसे कि शास्त्रोंमें वर्णित नहीं
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ध्यानमें वस्तुविपयत्वका खण्डन] भापानुवादसहित ८२७ दिध्यानं स्वेच्छानुसारेण प्रसज्येतेति चेत्, सत्यम् ; तत्केन निवार्यते। नहि मनोराज्यं राजादिना शास्त्रेण वा निवारयितुं। शक्यते परन्तु शास्त्रोक्तध्याने शास्त्रीयः फलविशेपो भवति नेतरत्र, अदृष्टे साध्य- साधनसम्वन्धे शास्त्रस्य नियामकत्वात्। न च शास्त्रमप्ययथावस्तु- गोचरध्यानेन क्थ फलविशेपं प्रतिपादयतीति वाच्यम्, नहि वयं शास्त्रं पर्यनुयोक्ुं प्रभवाम:, शास्त्रस्याऽचिन्त्यमहिमत्वाद्। अन्यथा फाऽडद्रुतिप्रक्षेपः क वा स्वर्ग: कामत्रोपपत्तिमद्राक्षीः १ अथाऽपि श्रद्धा- जाड्येन योपिदग्न्यात्मिकां कांचिदेवतां परिकल्प्य तद्ध्यानस्य वस्तुविषयत्वं त्रूगे तर्द्यादित्यो यूपो यजमानः प्रस्तर इत्यादावि
है) अपनी इच्छामात्रसे देवता आदिके ध्यानकी प्रसकि हो जानेकी शक्का की जाय, तो उचित ही है, क्योंकि ऐसे ध्यानका निवारण कौन कर सकेगा? मनोरथसे कल्पित राज्यकी निवृत्ति कोई राजा या शास्त्र नहीं कर सकता। परन्तु मेद इतना ही है कि शास्ोक्त ध्यानमें शासत्रोंसे प्रतिपादित फलविशेष होता है और अन्य प्रकारके (अपनी इच्छामात्रसे कल्पित अश्ञास्त्रीय) ध्यानमें उक्त फलकी सिद्धि नहीं होती, कारण अदप्टरूप कार्यकारणभावमें शास्त्र नियामक (व्यवस्थापक) माना गया है। अयथार्थ-वस्तुविषयक ध्यानसे फलविशेपकी उत्पत्तिका शास्त्र भी कैसे प्रतिपादन करते हैं : यह शक्का भी नहीं की जा सकती, कारण कि हम जैसे साधारण बुद्धिवाले पुरुष शास्त्रोंके ऊपर अन्यथा आरोप करनेमें समर्थ नहीं हैं, क्योंकि शास्त्रोंका महत्त्व हम लोगोंके ध्यानमें भी नहीं आ सकता। यदि ऐसा न हो, तो कहाँ आाहुतिका देना और कहां स्वर्ग, इसमें तुम कौन-सी उपपत्ि देखते हो? [अर्थात् अगनिमें घृतादि हविस द्रव्यका आहुतिरूपसे प्रक्षेप करना होम कहलाता है। और उसकाफल स्वर्ग-प्राप्ति शास्त्रोंमें कही गयी है। इस कार्यकारणभाव- सम्वन्धकी उपपत्ति दृष्ट न होनेसे अचिन्त्य ही माननी होगी, अतः शास्त्रोंमें दष्टानुसारी तर्कवलसे कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता । ] यदि उक्त युक्तिसे (शास्त्रोंको अचिन्त्यमहिम मानकर) श्रद्धासे मूक (तर्कशुन्य) होकर योपिदग्निरूप किसी नवीन देवताकी करपना करके उसके ध्यानको वस्तुविषयक होना कहो, [इससे पूर्व प्रघट्टकमें कहा गया है कि 'योषा वाव'
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८२८ विवरणप्रमेयसंग्रह् [ सूत्र ४, वर्णक २
तत्तदूपां देवतां प्रकल्प्य स्वार्थे प्रामाण्यं प्रसज्येत। प्रत्यक्षविरोधस्तु भवतोऽपि समानः। न चवमिन्द्रादिदेवतानामप्यपलापः, तत्प्रति- पादकमन्त्रार्थवादानां मानान्तरविरोधाभावात्। ननु सर्वेष्पि वस्तुष्व- भिमानिन्यो देवताः सन्ति 'मृदन्वीत', 'आपोऽन्ुवन्' इत्यादौ सत्रकारेण तदङ्गीकारादिति चेत्, तर्ह्त्राऽप्यम्न्यभिमानिनी काचिदेवता योपिदभि- मानिनी चापरेति देवताद्वयमस्तु। न च ते देवते अत्र ध्येये, इत्यादि वाक्य द्वारा प्रतिपादित ध्यानगें आकारविदेपसे युक्त कोई देवताकी मूर्ति उललिखित नहीं है, केवल ध्यानमान है, उसका खण्डन करते हैं कि शास्त्रोंको अचिन्त्यमहिम माननेवाला ताहश आकारकी देवमूर्ति भी मान सकता है। ऐसी दशामें उस शासत्रीय मूर्तिका ध्यान अवस्तुविपयक नहीं माना जा सकता ] तो 'आदित्यो यूपः' (सूर्य यूप-स्तम्भ-है) तथा 'यजमान: प्रस्तरः' (यजमान कुश-मुष्टि है) इत्यादि चाक्योंमें भी तत्तदृप देवता- विशेषकी कल्पना करके स्वार्थमें प्रामाण्य जानेका प्रसभ आ जायगा। [सिद्धान्तमें सूर्यका यूप होना या यजमानका कुश-मुष्टि होना सम्भव न होनेसे उक्त वाक्योंका स्वार्थमें तात्पर्य नहीं माना जा सकता, प्रत्युत चे अर्थवादवाक्य माने जाते हैं, अव तो शास्त्रोंमें श्रद्धाके वश तादश आकारवाली देवताका होना सम्भव होनेसे स्वार्थमें तात्पर्य मान लेनेका प्रसझ नहीं हटाया जा सकेगा। ] प्रत्यक्षविरोध तो आपको मी समान ही है। [ जैसे आदित्यका युप होनेमें प्रत्यक्ष विरोध है, ऐसे ही योपित्का अभि होनेमें मी प्रत्यक्ष विरोध है।] उक्त रीतिसे (कल्पित-मिथ्या-वस्तुविषयक ध्यानकी उपपत्ति माननेसे) इन्द्र आदि देवताओंके भी अपलापका (आकारविशेपसे युक्त न माननेका) प्रसङ्ग नहीं आ सकता, कारण कि इन्द्रादि देवताओंके पतिपादक मन्त्र तथा अर्थवाद-वाक्योंका प्रत्यक्ष आदि दूसरे प्रमाणोंसे विरोध नहीं आता है। शङ्का-सभी पदार्थोंमें अभिमानी देवता हैं-जैसे 'मिट्टीने कहा' या 'जलने कहा' इत्यादि वाक्योंमें सूत्रकारने भी ऐसा माना है। समाधान-यदि उक्त रीतिसे सर्वत्र अभिमानी देवता माने जायँ, तो प्रकृतमें भी एक अगनिको अभिमानी देवता और दूसरा योषित्का अभिभानी देवता इस प्रकार दो देवता मानने होंगे। [ क्योंकि प्रकृतमें योषित और अग्नि दो पदार्थ हैं, अतः तदभिमानी देवता भी दो ही होंगे। ] परन्तु प्रकृतमें उन दो
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ध्यान वस्तुविषय ही नहीं होता] भापानुवादसहित ८२९
देवता संभवति, नरविपाणादावतिप्रसङ्गात्। न च योपिदशि- नामिका काचिद्देवता स्यादिति मन्तव्यम्, नाममात्रत्वे योपिदवय- वेपु यथायोगमग्न्यवयवसम्पादनवैफल्यात्। सम्पाद्यते हि तथा श्रुतौ 'योपा वाब गोतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि धूमो योनि- रर्चि:' इत्यादिना। अथैतध्वानफलग्रदाता परमेश्वर एतदेवता भविष्यति तथापि नाऽसावत्र व्येयः । नहि सर्वान्तर्यामिणो जगदीश्वरस्याऽति- जुगुप्सितयोपिदवयवरूपेण ध्यानसुचितम्। परमेश्वरस्य सर्वांत्म- कत्वादविरोध इति चेत्, तर्हि 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति' इत्यनया न्यायानुगृहीतया श्ुत्योपास्याकारप्राप्तः फलत्वावगमादुपा-
देवता ध्यानके विषय नहीं हैं, किन्तु योषित् और अग्निका तादात्म्य ही ध्यानका विपय है। और अवस्तुमृत दोनोंके तादात्म्यके अभिमानी देवताका सम्भव भी नहीं है। [यदि अवस्तुका मी अभिमानी देवता माना जाय, तो ] मनुष्यके सींगरूप वस्तु आदिमें अतिपसङ् आ जायगा। और योपिदग्निनामवाले किसी अतिरिक्त देवताका मानना मी उचित नहीं है, कारण कि योपिदग्निनामक देवताके माननेमें योषित् (स्त्री) के अवयवोमें यथोचित अग्निके अवयवोंकी सम्पत्ति करना व्यर्थ है। और 'हे गोतम ! स्त्री अग्नि है, उसका उपस्थ ही समिधा है और केश धूम एवं योनि ज्वाला है' इत्यादर्थक श्रुतिसे ऐसी सम्पत्ति दिखलाई गई है। यदि कहो कि उक्त ध्यानके फलविशेषको देनेवाले परमेश्वर ही इस प्रकारके देवता होंगे, सो भी ठीक नहीं, क्योंकि परमेश्वर प्रकृतमें ध्यानका विपय नहीं हो सकता, कारण कि सर्वान्तर्यामी जगदीश्वरका अत्यन्त घृणास्पद स्त्रीके अवयवरूपसे ध्यान करना उचित नहीं है। यदि कहो कि परमेश्वर सकल- स्वरूपात्मक है, अतः विरोध नहीं है [ अर्थात् आपकी दष्टिसे घृणास्पद स्त्रीके अवयवोंका भी स्वरूपमूत जब ईश्वर हो सकता है, तब तदूपसे उसका ध्यान करनेमें विरोध ही क्या है: ], तो यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'उस परमेश्वरकी जिस जिस रूपमें उपासना की जाय, वह उसी रूपमें हो जाता है' एतदर्थक न्याया- नुगृदीत श्रुतिसे यह प्रतीत होता है कि उपासकको उपास्यके आकारकी प्राप्तिरूंप फल १०५
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८३० विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
सकस्याSत्र जुगुपसितयोपिद्वयवत्वप्राप्ताचग्निरूपत्वप्राप्तौ वा सत्यामनर्थ- फलैव पञ्चाग्निविद्या स्यात्। अथ विशेषशास्त्रवलादत्र त्रह्मलोक्कप्राप्तिः फलं तर्हि तद्धलादेव विनाऽप्युपास्यदेवतामवस्तुविपयेण ध्यानेन फलसिद्धौ शास्त्रभक्तंमन्येन त्वया ध्यानस्य वस्तुविपयतायां नाऽत्यन्तमभि- निवेष्टव्यम्। अथोच्येत- 'उपपापेपु सर्वेपु पातकेपु महत्सु च । प्रविश्य रजनीपादं त्रह्मध्यानं समाचरेत् ।।' इति स्मृतौ यथावस्तुविषयध्यानमवगम्यते इति। तत्र कि ध्याठ- दृष्ट्ा वस्तुविषयत्वं शास्त्रदृप्टया वा १ आद्येऽपि यदि ध्याता त्रह्मात्मत्वं जानाति तदा नाडसौ प्रायश्वित्तेऽधिकरोति, पातकादिसम्चन्धा
मिलता है, इससे प्रकृतमें उपासकको अत्यन्त घृणास्पद सत्रीके अवयवोंके रूपकी अथवा अग्निरूपकी प्रापतिरूप फलके मिलनेसे मनर्थ (अनिष्ट) फल देनेवाली ही पञ्चाग्निविद्याकी उपासना होगी। यदि कहो कि प्रकृत में विशेष शास्त्रके वलसे त्रह्मलोककी प्राप्ति ही फल होगा, तो उसी शासत्रके वलसे उपास्य देवताके बिना भी अवस्तुविषयक ध्यानसे फलकी सिद्धि हो जायगी, फिर अपनेको शास्त्रभक्त कहलाने- वाले तु्हें ध्यानमें वस्तुविषयकत्वकी सिद्धि करनेमें आग्रह नहीं करना चाहिए। शङ्का-यदि कहा जाय कि 'सम्पूर्ण उपपातक तथा बड़े बढ़े पातकोंके होने- पर रजनीपादमें प्रवेश करके (न्राह्ममुहर्तमें) न्सका ध्यान करना चाहिए' एतदर्थक स्मृतिमें यथार्थ ब्रह्मरूप वस्तुका ध्यान करना प्रतीत होता है। [ऊपर कहे गये सिद्धान्तके अनुसार आप स्मरणको यथावस्तुविषयक और ध्यानको अयथावस्तु- विषयक मानते हैं। परन्तु ऐसा मानना असङ्गत है, क्योंकि यदि ऐसा होता तो प्रकृत स्मृतिमें ब्रह्मध्यानके स्थानमें त्रह्म-स्मरणपद देना चाहिए था, परन्तु ध्यानपद दिया है, अतः मालम पड़ता है कि ध्यान यथावस्तुविषयक होता है, यह भाव है। ] समाधान-तो इसमें प्रश्न किया जा सकता है कि उक्क स्मृतिमें क्या ध्याता पुरुषकी दृष्टिसे ध्यान यथावस्तुविषयक कहा जाता है : अथवा शास्त्रदष्टिसे : प्रथम करपको माननेपर मी यदि ध्यान करनेवाले पुरुषने त्रम्मात्मका साक्षात्कार कर लिया है, तो उसका प्रायश्चितमें अधिकार ही
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ध्यान वस्तुविषय ही नहीं होता ] भापानुवादसहित ८३१
भावात्। अथ न जनाति तदाऽसावात्मानमन्त करणविशिष्टतया ब्रह्मस्वरूपं परोक्षतयाऽवगच्छन्नहं व्रह्मास्मीति ध्यानं कथ वस्तुविपयं मन्येत। न द्वितीया, ध्याता ह्यन्त:करणविशिष्टस्याऽत्मनो ब्रह्मत्त्वं ध्यायति । यद्यपि तन्राऽन्त:करणाशं विहाय चिदंशस्य ब्रह्मत्वं शास्त्रसंवादि तथाऽपि न तावता ध्यानस्य वस्तुविपयत्वम् । अन्यथाऽनेन न्यायेनांशतः संचादिनां शुक्तिरजतादिज्ञानानां याहच्छिक- संवादिलिङ्गाभासादिजन्यज्ञानानां च वस्तुविपयत्वेन प्रामाण्यप्रसङ्गपात्।
नहीं है, कारण कि उसमें पातक आदिके सम्बन्धका ही सम्भव नहीं है। [ स्मृतिकारोंने मी कहा है-'गृहस्थोक्तानि पापानि कुर्वन्त्याश्रमिणो यदि। शौचवच्छोधनं कुर्युररवांग् ब्रह्मनिदर्शनात्।।' अर्थात् यदि गृहस्थके समान पापोंको अन्य आश्रमधारी (ब्रह्मचारी), वानप्रस्थ तथा संन्यासी करें, तो क्रमशः द्विगुण, त्रिगुण और चतुर्गुण प्रायश्चित करें, परन्तु उक्त प्रायश्चित्को ब्रह्मसाक्षात्कारके पूर्व ही करना चाहिए। ब्रह्मसाक्षात्कारके अनन्तर तो 'क्षीयन्ते चाऽस्य कर्माणि तस्मिन् दष्टे परावरे' के अनुसार कोई पापपुण्यका संसर्ग ही नहीं रहता। ] यदि कहो कि ध्याता पुरुपको ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं होता, तो वह (ध्याता पुरुष) आत्माको अन्तःकरणविशिष्टरूपसे और ब्रह्मस्वरूपको परोक्षरूपसे जानता हुआ 'मैं ब्रह्म हूँ' इस ध्यानको कैसे वस्तु- विषयक समझ सकेगा। दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता, (अर्थात् शाखत्रं- दृष्टिसे भी ब्रह्मध्यान यथावस्तुविषयक नहीं हो सकता) कारण कि ध्यान करनेवाला पुरुप अन्तःकरणविशिष्ट आत्माका ब्रद्मरूपसे ध्यान करता है [ ध्यानके विपय उस अन्तःकरणविशिष्ट आत्माको व्रह्म समझता है, जो कि यथार्थ चस्तु नहीं है ]। यद्यपि उक्त स्थलमें अन्तःकरणरूप अंशका त्याग करके चैतन्यरूप अंशमें न्रहत्व शास्त्रसम्मत है [अतः यथार्थ वस्तु हो गया] तथापि इतनेसे ध्यानमें यथार्थवस्तुविषयकत्व नहीं माना जा सकता। यदि अंशतः त्याग करनेसे अंशतः यथार्थवस्तुविषयकत्वका ज्ञानमें अज्ञीकार किया जाय, तो अंशतः संवादवाले शुकतिरजतादि ज्ञानोंको और इच्छा-मात्रसे संवादप्राप्त लिद्गाभासादिसे उत्पन्न हुए ज्ञानोंमें भी (अंशतः) यथार्थवस्तुविषयकत्व होनेसे प्रामाण्य माननेका प्रसज्न आ जायगा।
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८३२ विवरणप्रमेयसंग्रहे [सूत्र ४, वर्णक २
ननु विदितत्रह्मात्मतच्तानामपि 'ब्रह्मध्यानं करिष्यामः' इति व्यवहार- दर्शनाध्यानस्य वस्तुविषयत्वमिति चेद्, न; प्रचलपूर्ववासनया प्रच्युते ब्रह्मात्मत्वानुभवे तस्यामेवावस्थायामेवं व्यवहारात्। नहि त्रह्मात्म- त्वमनुभवन्त एवं व्यवहर्त्तुमर्हन्ति। नहि लोके देवदत्तः स्व्रस्य मनुष्यत्वसनुभवन् मनुष्यत्वं ध्यायामि व्यास्यामीति वा व्यवहरति । ननु 'ध्यायति प्रोपितनाथा पतिम्' इत्यत्र वस्तुविपयेऽपि ध्यानव्यवहारोऽ- स्तीति चेद्, न; तत्र ध्यानशव्दस्य पूर्वानुभूतपतिविपयस्मरणलक्ष- कत्वात्। यद्वा चिरहातुरा मनोराज्यं करोतीति मुख्यमेव ध्यान- मस्तु । तस्मादवस्तुविपये ध्याने पुरुपस्य स्वच्छन्दप्रवृत्ती क: प्रतिबन्धः १ नतु सकृत्पयत्मात्रेण घटिकामात्रं ध्यानानुव्ृत्तिरुपलभ्यते, तन्न आथमिकमनोव्यापारं परित्यज्येतरेपां मनोव्यापाराणं प्रयत्न- शङ्का-ब्रह्मसाक्षात्कार किये हुए यतियोंका भी 'हम वक्षका ध्यान करेंगे' इत्याकारक व्यवहार देखनेसे ध्यान वस्तुविषयक माना जाय। समाधान-ऐसा नहीं हो सकता, कारण कि पूर्वजन्मार्जित वासनाके प्रावल्यसे बह्साक्षात्कारके छूट जानेपर (विस्मृत हो जानेपर) अज्ञानकी अवस्थामें ही उक्त व्यवहार होता है। देवदत अपनेको मनुष्य समझता हुआ 'मैं मनुष्यरूपका ध्यान करता हूँ या करूँगा' ऐसा व्यवहार नहीं करता। शङ्ा-'प्रोषितभर्तृका (जिस स्त्रीका पति परदेशमें है, चह स्तरी) अपने पतिका ध्यान करती है, इस व्यवहारमें वस्तुभूत पतिविषयक ज्ञानमें भी ध्यानका व्यवहार देखा गया है। समाधान-उक्त व्यवहारमें ध्यानपदका लक्षणाके द्वारा पूर्वानुभृत पतिका स्मरण ही अर्थ समझना चाहिए। अथवा विरहके दुःखमें डूवी हुई प्रोषित- भर्तृका (पतिध्यानसे) मनोरथस्वरूप राज्य (विरहाभावका अनुभव) कर रही है, इस अर्थमें उसका तात्पर्य होनेसे (अवस्तुचिपयक) मुख्य ही ध्यान उत्तव्यवहारस्थलमें माना जा सकता है। इसलिए अवस्तुविषयक ध्यानके विषयमें पुरुषकी अपनी इच्छा-पूर्वक प्रवृत्ति होनेमें कौन प्रतिबन्ध है? शक्का-केवल एकवारके प्रयत्नमान्नसे घडीभर ध्यानकी अनुवृत्ति होती है, उसमें पहलेके मनोजन्य व्यापारको छोड़कर अन्य आगे होनेवाले मनके ज्यापारोंको प्रयत्नकी अपेक्षा न रहनेसे धारावाहिक-ज्ञान-न्यायसे प्रथम प्रथम
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ध्यानमें पुरुषप्रयत्नकी अपक्षा ] भापानुवादसहित ८३३
निरपेक्षत्वाद धारावाहिकज्ञानन्यायेन तन्निरपेक्षत्वे आथमिकस्याऽपि प्राप्ते सति सामग्रीसम्पादन एव प्रयत्न उपक्षीयतां तथा च ज्ञानाद् ध्यानस्य पुरुपतन्त्रत्वकृतं वैपम्यं न भविष्यतीति चेत्, किमिदानीमेवाऽडरभ्याड- भ्यस्यतामाि सकृत्प्रयताद् ध्यानानुवृत्तिः किं वा पद्वभ्यासवता- मेव १ नाऽडद्या, अनुभवविरोधात्। न द्वितीयः, प्रतिमनो- व्यापारं विद्यमानानामेव पृथक्प्रयतानामभ्यासपाटवाभिभूततयाऽनभि- मन्यमानत्वात्। यथा वालस्यकहायनस्य प्राथमिकगमनाभ्यासावसरे
होनेवाले मनोव्यापारमें ी प्रयत्ननिरपेक्षत्वके प्राप्त होनेपर [स्मरणके समान ] सामग्रीसम्पादनमें ही प्रयत्नका उपयोग होगा। इस रीतिसे ज्ञानकी अपेक्षा ध्यानमें पुरुषके प्रयत्न द्वारा किया गया वैषम्य (भेद) नहीं हो सकेगा। [ जैसे धारामवाहसे होनेवाले ज्ञान प्रयत्ननिरपेक्ष मनोव्यापारमात्रसे उत्पन्न हो जाते हैं, और सर्वप्रथम ज्ञान मी केवल वैसे ही मनोव्यापारसे हो जाता है, उन्मुखीभवन आदि पुरुष प्रयत्न तो विषयेन्द्रियसंयोग आदि ज्ञान-सामग्री- मात्रका उत्पादन करनेमें उपयुक्त होकर क्षीण हो जाते हैं, वैसे ही ध्यानस्थलमें मी उक्त न्यायसे पुरुषप्रयत्न केवल ध्यानसामग्रीमात्रके उत्पन्न करानेमें उपक्षीण होगा, ध्यान तो प्रयत्ननिरपेक्ष मनोव्यापारमात्रसे धारावाहिक ज्ञानके तुल्य होग रहेगा, यह भाव है। ]
समाधान-उक्त रीतिके माननेसे प्रश्न किया जा सकता है कि प्रथम प्रथम अभ्यास करनेवालोंका मी क्या एक ही वारके प्रयत्नसे ध्यान वराबर बना रहता है? अथवा पर्यात अभ्यास (पुनः पुनः परिशीलन) वालोंका ही? इनमें प्रथम पक्ष नहीं माना जा सकता, कारण कि इसमें अनुभवविरोध आता है। [ अनुभवमें यही आया है कि एकबारके ही प्रयल्नसे ध्यान नहीं बना रहता; ध्यानकी अनुवृत्तिके लिए पर्याप्त अभ्यास करना पड़ता है। ] दूसरा पक्ष मी नहीं वन सकता, कारण कि (पर्याप्त अभ्यासवालोंके मी) प्रत्येक मनोव्यापारमें विद्यमान ही पूथक पृथक् प्रयत्न अम्यासकी पटुताके कारण अभिभूत हो जाते हैं, अतः प्रतीत नहीं होते। [अर्थात् ध्वानानुवचिस्थलमें सर्वत्र (प्रवीण-अगवीण दोनोंके ध्यानमें) प्रथम प्रथम हुए ध्यानके समान पृथक्
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८३४ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
प्रतिपादविन्यासं पृथक्प्रयतोऽभिव्यज्यते न तथा पुनः शीघ्रगमने तदभिव्यक्तिरस्ति। न चाश्त्र पुनः पृथक्प्रयलाभाच:, विषमस्थले व्यवधानपतनादिना तदभिव्यक्तः। एवं ध्यानाभ्यासपाटवोपेतस्याऽपि आथमिकध्यानानुसारेण अ्रयत्विशेषा अवगन्तव्याः। अथवा यथा वक्रवाणे वेगरहितेऽप्यृजूकते तस्मिन्नेव वेगस्तथाऽ- आ्यासात् प्राग्वेगशून्येऽपि ध्यानाभ्यासादजूकृते मनसि वेगाख्यः संस्कार: कल्प्यताम्। अस्मिन्नपि पक्षे ध्यानस्य प्रयत्नतन्त्रत्वं
पृथकू प्रयत्न प्रत्येक मनोव्यापारोंमें अपेक्षित हैं और वे प्रयत्न होते ही रहते हैं, परन्तु अपवीणके तो स्पष्ट प्रतीत होते रहते हैं और प्रवीण पुरुपके अपने अभ्यासके पाटवसे स्पष्ट प्रतीत न होनेसे उन प्रयत्नोंमें न होनेका अभिमानमात्र हो जाता है, वस्तुतः प्रयत्न तो प्रवीणके भी पृथक पृथक विद्यमान ही हैं। इस आशयको दष्टान्त द्वारा दिखलाते हैं-] जैसे एक वर्षकी अवस्थावाले वालकका प्रथम चलना सीखनेके अवसरपर प्रत्येक पैर रखनेमें प्रथक पृथक् प्रयत्नोंका होना स्पष्ट प्रतीत होता रहता है, परन्तु (अभ्यास हो जानेपर) शीघ्र चलनेमें ताइश परृथक पृथक् प्रयत्नोंकी स्पष्ट प्रतीति नहीं होती। और यह नहीं कहा जा सकता कि उक्त स्थलमें (शीघ्रगमनमें) पृथक प्रयत्न नहीं है। विषम स्थलमें (ऊचनीच भूमिमें) घीरे घीरे उतरना आदि क्रियाके द्वारा उन पृथक् पृथक् विद्यमान प्रयत्नोंकी स्पष्ट प्रतीति होती है। इस प्रकार ध्यानके अभ्यासकी प्रवीणतासे युक्त पुरुषके भी प्रथम होनेवाले ध्यानके अनुसार पृथक् पृथक् प्रयत्न समझ लेने चाहिए। [यदि उक्त सिद्धान्तको न माननेका आग्रह हो, तो पक्षान्तर कहते हैं-] अथवा जैसे वेगशुन्य मी वक्रवाणके (टेढ़े वाणके) सीधे कर देनेसे उसीमें वेग उत्पन्न हो जाता है, वैसे ही ध्यानाभ्याससे पहले वेगरहित भी मनमें, ध्यानाभ्याससे उसके स्थिर होनेपर, वेगनामक संस्कारकी कर्पना करनी चाहिए। [ इस कल्पनाके आधारपर शङ्ा उत्पन्न हो सकती है कि वेगसे ही ध्यानकी अनुवृत्ति सिद्ध हो आयगी, उसके लिए पृथकू पृथक् प्रयत्न माननेकी आवश्यकता नहीं है तदनुसार प्रथम ध्यान भी प्रयत्ननिरपेक्ष ही होगा, उसका खण्डन करते हैं-] इस पक्षमें मी ध्यानके प्रयत्नसापेक्ष होनेका निवारण नहीं किया जा सकता, जैसे वाणमें प्रथम
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ध्यानमें पुरुषनयत्नकी अपेक्षा ] मापानुवादसहित ८३५
नाऽपैति । वाण इव गमनस्याऽप्याद्यक्रियायाः प्रयत्ननान्तरीयकत्वात्। न चैंवं धारावाहिकज्ञानेपु पृथक्प्रयलाः कल्पयितुं शक्पन्ते। यथाऽ- नभ्यस्तविपये ध्याने आ्रथमिके द्वयोई्वयोरावृत्योर्म्ये किंचित् किं चिन्वधानं पृथकप्रयतगमक्कमस्ति न तथा प्रथमिकेऽपि धारा- चाहिकज़ञाने तदस्ति। प्रमाणप्रमेयसम्यन्धजन्ये तस्मिन् बालवृद्ध- योर्विशेपाऽदर्शनात्। अथ द्वितीयतृत्तीयादिज्ञानाकारपरिणामपरम्परा- निर्वाहाय मनसि वेगः कथचित् कल्प्येत तथाप्यज्ञानस्य ग्रयल- नान्तरीयकत्वाभावान ज्ञानं पुरुपतन्त्रम्। नहि ज्ञानं प्रयतानन्तरमेव
गमन-क्रिया प्रयत्नके विना नहीं हो सकती, वैसे ही मनमें मी (ध्यानजनक) प्रथम व्यापार प्रयत्नके चिना हो ही नहीं सकता। [ पुनः प्रथम करपका सिंहाव- लोकन करते हैं-] जैसे ध्यानानुत्तिस्थलमें पृथक पृथक् प्रयत्न होते हैं, वैसे धारावाहिक ज्ञानस्थलमें पृथक्-पृथक् प्रयलोंकी करपना नहीं की जा सकती। [ध्यानस्थलके समान ज्ञानपवाहमें प्रयतोंकी करपनाके आधारका अभाव दिखलाते हैं-] नूतनविषयके प्रथम ध्यानमें जैसे दो दो (ध्यानों) के मध्यमें होने- वाला कुछ-कुछ व्यवधान पृथकू-पृथक प्रयत्नोंका सूचक है। [यदि मध्यमें दूसरा पृथक प्रयत्न न होता, तो निरन्तर आवृत्तिकी अनुवृत्ति होनी चाहिए, दोनोंके नीचमें व्यवधान न होता। यह व्यवधान ही पृथक् प्रयत्नको सिद्ध करता है।] इस भाँति प्राथमिक-प्रथम उत्पन्न हुए-भी धारावाहिक ज्ञानमें कोई गमक नहीं है। ज्ञानस्थलमें तो प्रमाण-इन्द्रियादि-और प्रमेय-विषय-के सम्बन्धसे उत्पन्न हुए ज्ञानमें चाल तथा वृद्धके कारण कोई विशेष नहीं देखा जाता। [यदि ध्यानके तुल्य ज्ञान भी प्रयल्नसापेक्ष होता, तो बाल तथा वृद्धके ज्ञानमें भी ध्यानके समान विशेषता आनी अनिवार्य होती। अर्थात् अधिक प्रयत्नशाली वृद्धके ज्ञानमें कम प्रयत्नशाली बालकके ज्ञानकी अपेक्षा भेद होना चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं है। ] यद्यपि द्वितीय या तृतीय ज्ञानकी धाराकी सिद्धिके लिए अन्त :- करणमें यथाकर्थंचित् वेगनामक संस्कारकी कलपना की भी जाय, तथापि अज्ञान प्रयत्नके अनन्तर ही उत्पन्न नहीं होता है, [अज्ञानपदको अज्ञाननिवृत्तिपरक मान करके तात्पर्य मानना होगा कि यदि अज्ञाननिवृत्तिमें ऐसा नियम होता कि प्रयत्नके ही अनन्तर वह हो सकती है, तो उसके जनक
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८३६ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
जायते, किन्तु तेन अयत्नेन प्रमाणादिसामय्यां सम्पादितायां पश्चा- दुत्पद्यते तथाऽज्ञाने निवृत्तिरपि न पयत्नानन्तरभाविनी, किं तहिं प्रयत्नेन विरोधिसामतयां सम्पादितायां पश्चान्निवर्चते। एवं च सामग्र्याः अयत्नतन्त्रत्वे सति ज्ञानमेव पुरुपेण कर्तुमकतु वा शक्य- मिति वादिनां विभ्रमः। अन्यथाकरणं तु ज्ञानस्याऽत्यन्तमनाश- ङ्नीयमित्युक्तं पुरस्तात् । न च ध्यानमपि प्रयत्नसभ्पादितसामग्रीतन्त्रं न अयत्नतन्त्रमिति वक्तुं शक्यम्, प्रयत्नातिरिक्तसामय्यभावात । अतो ध्यानस्याऽन्यव्यवधानमन्तरेण साक्षादेव करणाकरणे सुशके। अन्यथाकरणं तु निरङ्कशं संभवति। तदेवमजन्यफलं वस्तुविपयं प्रमाण-
ज्ञानको भी प्रयत्नानन्तर होनेका नियम होनेसे ज्ञान पुरुषाघीन माना जाता, परन्तु उक्त नियम नहीं है ] इसलिए ज्ञानका होना पुरुपके अधीन नहीं माना जा सकता। [उक्त आशयका उपपादन करते हैं-] ज्ञान प्रयत्नके अन्यहित अनन्तर ही नहीं होता, किन्तु उस प्रयत्नके द्वारा 'विपयेन्द्रियसयोग आदि' प्रमाणादि सामग्री सम्पन्न होती है, तदनन्तर ज्ञानकी उत्पत्ति होती है। एवं अज्ञानमें निवृत्ति भी प्रयत्नके अनन्तर ही नहीं होती, किन्तु प्रयत्न द्वारा अज्ञानविरोधी (आवरणभङ्ग आदि) सामग्री उत्पन्न होती है, और उसके पश्चात् अज्ञान निवृत होता है। इस निश्चयके अनुसार सामग्रीको ही पुरुष- व्यापारके अधीन होना सिद्ध है, इसपर भी अन्य वादियोंका, ज्ञानकी ही उत्पत्ति या अनुत्पत्ति पुरुषके प्रयत्नके अधीन है, यह कहना अ्रममात्र है। ज्ञानके अन्यथा करनेकी तो शब्का भी नहीं की जा सकती, इसका पहले ही स्पष्ट प्रतिपादन कर आाये हैं। उक्त रीतिके अनुसार ध्यानको भी प्रयत्न द्वारा सम्पादित सामग्रीके अधीन मानकर पुरुषपयत्के अधीन नहीं मानते, ऐसा कहना युक्तिसअ्त नहीं है, कारण कि ध्यानमें प्रयत्नके अतिरिक्त सामग्री नहीं है। [अर्थात् ध्यानमें प्रयत्न ही सामग्री है, उस प्रयत्नरूप सामग्रीके नान्तरीयक होनेसे ध्यानका पुरुषाघीन होना निर्विवाद है ।] इसलिए ध्यानकी प्रयत्नके बिना साक्षात् उत्पत्ति होनेसे उसका करना या न करना सम्भव हो सकता है। और अन्यथाकरना तो निर्बाध (किसी भी प्रतिबन्धके बिना) सम्भव है। उक्त सम्पूर्ण प्रषट्ठकके निष्कर्षसे फलित होता है कि जन्य
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4 ज्ञान और ध्यानके वैपम्यका उपसंहार] भापानुवादसहित ८३७
जन्यं ज्ञानं जन्यफलं वस्तुनिरपेक्ष पुरुपेच्छाप्रयत्नमात्रजन्यं ध्यान- मिति ज्ञानध्यानयोर्मानिसत्वेन समयोरपि फलतो विपयतः कारणतथ्च महद्वैलक्षण्यं सिद्धम्। एवं च सत्यपुरुपतन्त्रतयाऽनुष्ठातुमशक्यं ब्रह्मज्ञानं विधियोग्यं न भवतीति 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इति तव्य- प्रत्ययोरऽर्हार्थोऽवगन्तव्यः। कर्थं तर्ह्यात्मन्येवाऽऽत्मानं पश्येदिति
फलसे शून्य, वस्तुविषयक तथा ्रमाणके द्वारा उत्पन्न होनेवाला ज्ञान होता है और जन्य फलवाला, वस्तुकी अपेक्षासे विरहित एवं पुरुषकी इच्छासे उत्पन्न प्रयत्नमात्रसे उत्पन्न होनेवाला ध्यान कहलाता है। इस प्रकार मनोजन्य होनेसे ज्ञान और ध्यानमें समता होते हुए भी फल, विषय तथा कारणके द्वारा बहुत बड़ा मेद सिद्ध होता है। इस निष्कर्षके अनुसार पुरुषव्यापारके अधीन न होनेसे त्रद्ज्ञानका अनुष्ठान (विधान) नहीं हो सकता। इसलिए 'आत्मा वा अरे'-आत्मदर्शन करना चाहिए-इस वाक्यमें योग्यतीरूप अर्थका वाचक 'तव्य' प्रत्यय है, ऐसा समझना चाहिए। शङ्धा-'मात्माको अपने आत्मामें ही देखे' एतदर्थक 'आत्मन्येव-' इत्यादि वाक्योंसे दर्शनका विघान कैसे सङ्गत हो सकता है। [ यद्यपि प्रकृत वाक्यमें भी अई अर्थमें ही लिङ् हो सकता है, तथापि भाष्यानुकूल समाधान देनेके लिए प्रकृत वाक्यमें शक्का करते हैं। भगवान् शङ्कराचार्य ब्रक्षमें चोदनाकी विषयताके अभावका प्रतिपादन करके समन्वयसूत्रमें 'किमर्थानि तर्हिं आत्मा वा अरे दष्टव्यः श्रोतव्य इत्यादीनि विधिच्छायानि वचनानि' अर्थात् ब्रम्मदर्शनविपयक विधानकी उपपत्ति कैसे हो सकती है? यों शक्का करके समाधान
पानेकी और अनिष्ट वस्तुके परिहारकी उत्कट अभिलापामें चित्त व्यग्र होनेसे परमात्माकी ओर नहीं झुकता, इसलिए बाहरी विषयोंसे अन्तःकरणकी वृत्तिको हटानेके लिए प्रयत्नशील रहनेके विधानमें उक्त वाक्यघटक लिडादिका तात्पर्य है, इस आशयसे उत्तर देते हैं।] (१) 'अह कृत्यतृचश्च'-पाणिनीय सूत्रसे अर्ह अर्थमें दृशधातुसे तव्य प्रत्यय होकर 'वष्टव्यः' पदकी सिद्धि हुई है, 'प्रेषातिसर्गप्राप्तकालेपु कृत्याश्र' सूत्रसे प्रेष-प्रेरणा-रूप अर्थमं नहीं हुई है। १०६
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८३८ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
दर्शनविधिरिति चेद्, दर्शनसाधनभूतान्तर्मुखत्वादिविधित्वेन व्यार्येय इति बूम:। व्याख्यातं चाऽस्माभिर्विचारविधिपरत्वेन प्रथमसूत्रतृतीय- वर्णके। तदेवं मोक्षपर्यालोचनया उत्पत्याद्ययोग्यन्रह्मपर्यालोचनया ज्ञानपर्यालोचनया च विध्यसंभवादहेयानुपादेयात्मतच्वे वेदान्ताः पर्यवस्यन्तीत्यभ्युपेयम्। नन्वहंग्रत्ययावसेयात्मनः कर्माङ्गलवात् तत्र पर्यवसितानां चेदान्ता- नामपि कर्मविधिवाक्यैरेकवाक्यता स्यादिति चेद्, न; अनन्यवेद्ये क्रियाकारकसंसर्गशून्य एवाऽडत्मनि वेदान्तानां पर्यवसनाद् । अनिहोत्र- फला वेदा: शीलवृत्तफलं अुतमिति स्मृतिकारैः सर्वो वैदो धमे विनि- युक्त इति चेद्, न; 'तं त्वौपनिपद पुरुपं पृच्छामि', 'सवें वेदा यत्प-
समाधान-साक्षातकारके कारणीभूत अन्तर्मुखत्व आदि (बाहरी विषयोंसे विमुख कर अन्तःकरणको आभ्यन्तर कर अध्यात्मके चिन्तनमें लगाना) के विधानमें तात्पर्य मानकर उन वाक्योंका व्याख्यान करना चाहिए, ऐसा हम कहते हैं। और हम प्रथम सूत्रके तृतीय वर्णकमें उक्त वाक्योंका विचारविधिमें तात्पर्य कह आये हैं। इस प्रकार मोक्ष तथा उत्पत्ति मादिके अयोग्य त्रह्म तथा ज्ञान- इन सबके पूर्वोक्त स्वरूपोंका विवेचन करनेसे विधिका अवसर सम्भव न होनेसे हानोपादानशुन्थ ब्रह्मतत्वका विवेचन करनेमें ही वेदान्त वाक्योंका तात्पर्य निर्द्धारित करना चाहिए। शङ्का-'अहम् 'मैं' इस प्रतीतिसे प्रतीयमान मत्मा ही विश्वजिदादि कर्मकलापका (कर्तव्यत्वेन) अद्ग है, इसलिए उसी महंप्रत्ययके विषय आत्मामें वात्पर्य रखनेवाले वेदान्तोंकी भी कर्मविधायक वाक्योंके साथ एकवाक्यता करनी ही उचित है। समाधान-उक्त कथन उचित नहीं है, कारण कि किसी भी अन्य प्रमाणसे वेद्य न होनेवाले क्रियाकारकभावरूप सम्वन्घसे विरहित आत्मामें ही वेदान्तोंका तात्पर्य निर्द्धारित होता है। यदि यह शङ्का हो कि 'वेदोंका प्रयोजन (तात्पर्य) अगिनिहोत्र आदि कर्मोंका प्रतिपादन करना है और शील तथा सदाचारका प्रतिपादन करना शास्त्रोंका प्रयोजन है' एतदर्थक स्मृतिके रचयिता आचार्योंने सम्पूर्ण वेदोंका चोदनात्मक धर्ममें ही विनियोग किया है, तो यह शक्ा उचित नहीं है, कारण कि
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वमिहितान्वयवादमें भी वेदान्तोंमें अनुपंपत्यभावं] भापानुवादसहित ८३९
दमामन्ति', 'वेदैश्र सर्वैरहमेव वेद्यः' इति क्रुतिस्मृतिवशात् पूर्वस्मृत्यर्थस्य निर्णेतव्यत्वात्। नन्वाम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानामिति वदन् जैमिनि- रित्थं मन्यते-उत्तमवृद्धोक्तशव्दश्रवणानन्तरं मध्यमवृद्धस्य प्रवृतिं दृष्टा तया तस्य कार्यज्ञानमनुमाय कार्यान्वित एवाडयें शब्दसामर्थ्य न्युत्पित्सुर्जानाति। तथा च सिद्धूवस्तुन्यगृहीतसामर्थर्यस्य शव्दस्य तद्धोधकत्वासँभवाद्वेदान्तानामप्यद्वैतात्मतत्ववोधकत्वं नाऽस्तीति, मैवम्; किं भाङमतमचलस्व्यैचसुच्यते किं वा त्रभाकरमतमवलस्व्य । नाउडद्य:।
'उस उपनिपत्-वेदान्त-वाक्योंसे प्रतिपादित पुरुषके विषयमें प्रश्न करता हूँ' एवं 'सब वेद जिस पदका प्रतिपादन करते हैं' इत्यर्थक श्रुतियां और 'सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा में ही जाना जाता हं' इत्यर्थक स्मृतिके अनुसार ही 'मगिहोत्रफला-'इत्यादि पूर्वोक्त स्मृतिके तात्पर्यका निर्णय करना चाहिए। शङ्ा-'सम्पूर्ण आम्नाय-वेद-क्रियाके (कर्मकाण्डके) प्रतिपादनके ही निमिच हैं, जो वेदवाक्य क्रियाका प्रतिपादन नहीं करते, वे सब अनर्थक हैं' इस अभिप्रायके 'आन्मायस्य-' इत्यादि सूत्रकी रचना करनेवाले जैमिनि मुनिका सिद्धान्त है कि उत्तम वृद्ध (आज्ञा देनेवाले पुरुप) के द्वारा कहे गए 'गाय लाओ' इत्यादि वाक्य सुननेके अनन्तर प्रयोज्य वृद्धकी (जिसको आज्ञा दी गयी है, उसकी गौ आदि लानेमें) प्रवृत्ति देखकर उस प्रवृत्तिसे प्रयोज्य वृद्धमें कार्यज्ञानका अनुमान करके शब्दार्थव्युत्पत्तिकी इच्छा रखनेवाला अबोध बालक कार्यसे अन्वित ही अर्थमें शब्दकी सामर्थ्य निर्द्वारित करता है [अर्थात् कार्यन्वित मर्थमें ही शब्दकी शक्तिको जानता है।] इस प्रक्रियाके अनुसार सिद्धभूत (क्रियाऽनवयशुन्य) अर्थमें शब्दशक्तिका ज्ञान न होनेसे शब्दमें ताहश सिद्ध अर्थका बोधकत्वका सम्भव न हो सकनेके कारण वेदान्तवाक्योंका भी मद्दैतरूप आत्मतत्त्वका बोधक होना सम्भव नहीं है। [ इसलिए विधिशेष ही वेदान्तवाक्योंको मानना चाहिए। ] समाधान-जैमिनिसूत्रोंके दो व्याख्याता हैं, एक कुमारिल भट्ट और दूसरे प्रभाकर, इनमें से उक्त कथन क्या भटानुयायियोंके मतके आधारपर है ? अथवा प्रभाकरानुयायियोंके मतको लेकर : इनमें प्रथम कल्प
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूंत्र 8, वर्णक २
अभिहितान्वयवादी हि भाङट। स चैवं व्युत्पत्तिप्रक्रियां रचयति- उत्तमवृद्धेन वाक्ये प्रयुक्ते श्रोतुर्मध्यमवृद्धस्य प्रवृत्या विशिष्टसंसर्गज्ञानं शब्दकार्यत्वेनाऽनुमाय शब्दसमुदायस्याऽर्थसमुदाये सामर्थ्यं प्रतिपद्यते। तत्र
चारेऽपि गोमात्रस्याऽन्वयाद् वन्धनेऽपि गोशव्दस्य गोमात्रे सम्बन्धं प्रतिपद्यते न त्वानयनतत्संसर्गयोर्वर्यभिचरितयोः। एवं सर्वपदानां पदार्थ-
नहीं बन सकता, कारण कि भट्टके अनुयायी अभिहितान्वयवादी हैं। उनके मतमें व्युत्पत्तिप्रक्रिया इस रीतिपर दिखलाई गयी है-उत्तम वृद्धके द्वारा 'गाय लाओ' इत्यादि वाक्यके प्रयुक्त होनेपर (श्रोता) मध्यम वृद्धकी प्रवृत्तिसे विशिष्ट सम्बन्धज्ञान शब्दका कार्य है, ऐसा अनुमानकर 'गामानय' इत्यादि शब्द- ससुदायके (पृथक् पृथक् एक एक शब्दका नहीं) विशिष्ट संसर्गविषयक अर्थसमुदायमें सामर्थ्यका-शक्तिका-अवधारण करता है। अनन्तर 'गायको लाओ', 'गायको वांघो' इत्यादि प्रयोगोंमें आवाप और उद्दापसे मानयन (लाना) तथा उसके साथ कर्मत्वरूप संवन्धका व्यमिचार होनेपर भी केवल गोपदार्थभूत गाय- मात्रका बन्धनमें भी अन्वय होनेसे गोशब्दके गोपदार्थमात्रमें शकतिरूप सम्वन्घका बोध होता है, व्यमिचरित होनेवाले आनयन और उसके सम्बन्धमें शक्तिग्रह नहीं होता। [ वालक उत्तम वृद्ध द्वारा कहे गये-'गामानय' इत्यादि वाक्यको सुन और तदन्तर मध्यम वृद्धकी प्रवृत्तिको देख कर विशिष्ट (कर्मत्वसम्न्घसे गोपदार्था- न्वित) आनयनरूप अर्थमें ही उक्त वाक्यकी शक्ति समझता है। वह बालक करपना करता है कि यदि मध्यम वृद्धको उक्त वाक्यका अर्थनोध न हुआ होता, तो वह वाक्यको सुननेके बाद कार्यमें प्रवृत्त न होता। प्रवृत्ति भी उसकी दूर देशमें विद्यमान गायको समीपमें ले आनेमें ही हुई है, इसलिए निश्चित होता है कि 'गामानय' वाक्यकी सामर्थ्य इसी अर्थका बोध करानेमें है। इससे उसने ऐसा भी निर्द्धारण किया कि वाक्यसे सम्वन्ध रखनेवाले अर्थका ही ज्ञान होता है, क्योंकि उसने यही अर्थ क्यों समझा? कोई दूसरा ही कार्य क्यों नहीं किया?। तदनन्तर उस बालकने उत्तम वृद्धको कहते सुना कि 'गां बधान, अश्वमानय' (गाय बांधो और घोड़ा ले आओ) और मध्यम वृद्धको गाय बांधते और घोड़ा लाते देखा। इसमें कुछ-कुछ दूसरे-दूसरे प्रकारके शब्दोंको सुनने
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अभिहितान्वयवादमें भी वेदान्तोंमें अनुपपत्यभाव ] भापानुवादसहित ८४१
स्वरूपमात्रेषु सामर्थ्यप्रतिपच्तेः संसर्गवोधः किंनिवन्धन इति वीक्षाया- मनन्यथासिद्धान्वयतिरेकाभ्यां शब्दावगतपदार्थनिवन्धन इति कल्प्यते। ततः पदेभ्य: पदार्थाः पदार्थेभ्यः संसर्ग इत्यभिहितान्वय इति। तथा कुछ-कुछ दूसरे-दूसरे प्रकारके अर्थोंको देखनेसे विचार किया कि प्रथम वाक्यमें जैसे गोपद था वैसे ही दूसरे वाक्यमें भी है, और अर्थ भी-प्रथम व्युत्पत्तिके समान गलकम्बल, पूछ आदिवाली वस्तु भी-समान ही है। परन्तु आनयनका (दूरदेशसे समीप देशमें लानेका) सम्बन्ध नहीं दीख रहा है, इसलिए उसने निश्चय कर लिया कि गोपदार्थके साथ आनयन तथा उसके सम्बन्धका बोध होना नियमतः नहीं है, अर्थात् व्यभिचरित है, किन्तु गलकम्बल आदिसे युक्त वस्तु तो नियमित दीख रही है, अतः गोपदका शुद्ध (सम्बन्घरहित) गल- कम्बल आदिसे युक्त वस्तु ही अर्थ है। एवं आनयन भी पदार्थसे सम्बन्ध रखता हुआ ही सर्वत्र प्रतीत नहीं होता, कारण कि 'अश्वमानय' इस वाक्यका अर्थ, जो कि 'अश्वमानय' वाक्यके श्रवणके अनन्तर मध्यम वृद्धकी प्रवृत्तिको देखनेसे ज्ञात हुआ है, उसमें गोपदार्थ और उसका सम्बन्ध नहीं है, इसलिए आनयन पदार्थ भी शुद्ध सम्बन्धरहित दूर देशसे समीप देशमें लानामात्र ही है। इस व्यावहारिक प्रक्रियाके अनुसार व्यवहारके शक्तिग्राहक होनेपर भी उसमें किसी-किसी शब्दकी तथा किसी-किसी अर्थकी अनुवृत्तिरूप आवाप एवं किसी-किसी शब्द तथा अर्थका भी न रहनारूप उद्धापसे गो आदि पदोंकी शक्तिका अन्वयविरहित अर्थमें ही निश्चय होता है, इस आशयसे निष्कर्प लिखते हैं-] इस प्रकार सभी पदोंका शुद्ध पदार्थस्वरूपमात्रमें सामर्थ्यका (शक्तिका) ज्ञान होता है। यदि पदसे केवल पदार्थका ही वोध होता है, तो अन्वयस्वरूप सम्बन्धकी (जो वाक्यसे प्रतीत होता है) प्रतीति कैसे होगी, यों जिज्ञासा होनेपर उत्तरमें कल्पना की जायगी कि अन्यथासिद्धिको प्राप्त न होनेवाले अन्वय तथा व्यतिरकके बलसे शन्दश्रवणके बाद प्रतीत हुए पदार्थ ही अन्वयकी भी प्रतीति करा देंगे। [ अर्थात पदोंके अन्वय-व्यतिरेक पदार्थमात्रकी प्रतीति करानेमें ही उपयुक्त होते हैं, उनसे संसर्गका बोध नहीं हो सकता, किन्तु पद द्वारा प्रतीत हुए पदार्थ ही अन्वय-व्यतिरेकके बलसे संसर्गका बोध कराते हैं। यद्यपि प्रत्यक्ष- दृष्ट घट, पट आदि पदार्थोंसे संसर्गका बोध नहीं होता, तथापि पदोंके द्वारा उपस्थित
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८४२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
एवं च सत्येतन्मतानुसारेण शब्दस्य न कार्यान्वितस्वार्थे सामथ्यं किन्तु स्वार्थमात्रे। ततः सूत्रगतानर्थक्यपदेनाSक्रियार्थानां शब्दानां नाऽभिधेयाभावो वर्णयितुं शक्यः । अथ प्रयोजनाभावो वर्ण्येत, तन्न; सोऽरोदीदित्यादिवाकयानां तथात्वेऽपि निरतिशयानन्दरूपन्रह्मप्रतिपाद कानां वेदान्तानां निष्प्रयोजनत्वायोगात्। नन्वस्तु तर्हिं द्वितीयः पक्षः, अन्वितामिधानवादिना आ्भाकरेण
यति-शुक्ां गामानय दण्डेनेति शब्दस्य श्रवणानन्तरं श्रोतुर्गवानयने प्रवृत्तिमुपलभ्य गवानयकर्त्तव्यताऽनेन श्रोत्रा शव्दात्प्रतिपन्नेति भूतार्थ-
पदार्थोंमें संसर्गबोधकत्व स्वभावसिद्ध है। ] इसलिए पदोंसे पदार्थ तथा पदार्थोंसे सम्बन्धका नोध होता है, ऐसा अभिहितान्वयवादी (भाट) कहते हैं। भट्टमतावलम्न्रियोंकी प्रक्रियाको माननेवालोंके मतमें कार्यसे अन्वित स्वार्थमें शब्दकी शकि नहीं है, किन्तु अन्वयरहित स्वार्थमें ही है। इस सिद्धान्तके अनुसार जमिनि मुनिजीके उक्त 'माम्नायस्य०' इत्यादि सूत्रमें स्थित आनर्थक्यपदसे क्रियामें तात्पर्य न रखनेवाले शब्दोंका अभिघेय (वाच्य अर्थ) नहीं है, ऐसा आनर्थक्य नहीं कह सकते, [क्योंकि उक्त रीतिसे पदमात्रका क्रियानन्वित स्वार्थ ही है ]। यदि आनर्थक्यपदसे प्रयोजनका अभाव कहा जाय, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'वह रोया' इत्यादर्थक वाक्योंके प्रयोजनरहित होनेपर भी अतिशयविरहित (सर्व श्रेष्ठ) आनन्दरूप ब्रह्मका प्रतिपादन करनेमें प्रवृत् वेदान्तवाक्य प्रयोजनरहित हो ही नहीं सकते। शङ्का-अच्छा तो दूसरा पक्ष ही मानो, अर्थात् प्रभाकरमतके अनुसार उक्त सूत्रका तात्पर्य वर्णन किया जायगा, कारण कि प्रभाकरके अनुयायी भट्टमतानुया- यियोंके समान अन्वयके विना शुद्ध पदार्थमें व्युत्पत्ति नहीं मानते। वे इस प्रकार व्युत्पत्तिप्रक्रियाकी रचना करते हैं-'दण्डसे शुझ्क गाय ले आओ' इस- प्रकार शब्दोंके सुननके अनन्तर श्रोता (सुननेवाले) की गाय लानेमें प्रवृत्ि देखकर इस शोताने उक्त वाक्यसे गायका ले आनारूप कर्तव्यका ज्ञान प्राप्त किया, इसलिए (गाय आदि रूप) सिद्ध वस्तुसे अन्वित कार्यमें शन्द --
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अभिहितान्वयवादमें भी वेदान्तोंमें अनुपपत्यभाव] भापानुवादसहित ८४३
संसृष्टे कार्ये शव्दसमुदायस्य सामर्थ्यं वाला प्रतिपद्यते। पुनश्च गां वधानाSश्वमानयेत्यादिप्रयोगान्तरेपु गोशव्दस्याऽन्वये कार्यसंसृष्टगवाकृते- रन्तयात्तदुद्धारे च कार्यसंसृष्टगवाकृतेरेवोद्धारात् कार्यसंसृष्टायां गवि पद- सामर्थ्यं कल्प्यते। आनयनतत्संसर्गव्यभिचारेऽपिकार्यसंसर्गाव्यभि- चारात। एवं च सति यथाभिहितान्वयवादे पदानां प्रथमावगतसंसर्ग- बुद्धिहेतुत्वस्याऽपवादो वाक्यवाक्यार्थयोर्मध्ये पदार्थतच्छक्तिव्यवधानगौरवं चेति दोपद्वयमस्ति न तथाऽन्विताभिधानवादे तदस्ति प्रत्युत पदानामेव संसर्गप्रतिपादने लाघवमिति।
समुदायकी शक्तिको वालक निर्द्धारित करता है। तदनन्तर 'गाय बांधो और घोड़ा ले आओ' इत्यादि दूसरे शब्दोंके प्रयोगोंमें गोपदका अन्वय करनेमें कार्यसे सम्बद्ध ही गोपदार्थभूत आकृतिका अन्वय होता है और दूसरे वाक्योंमें गोपदके न रहनेसे (वदल देनेसे) कार्यसम्बद्ध ही गोपदार्थ वदल जाता है, [अनन्वित गोपदार्थ नहीं है], इसलिए कार्यान्वित गोपदार्थमें ही गोपदकी सामर्थ्यकी (शकिकी) कल्पना की जाती है। यद्पि आनयन तथा उसके संसर्गका (कर्मत्व आदिका) 'गौरागच्छति' आदि वाक्यमें व्यभिचार पाया जाता है, तथापि कार्यसामान्यमात्रसे अन्वयका तो कहीं भी व्यभिचार नहीं है। [अमिहितान्वयवादकी अपेक्षा अन्विताभिघान- वादमें लाघव दिखलाते हैं-] उक्त अन्विताभिधानवादकी प्रक्रियाके मान लेनेसे जैसे अभिहितान्वयवादमें पदोंके प्रथम (व्यवहारसे) प्रतीत हुए संसर्ग- ज्ञानके कारणका वाघ करनारूप एक और दूसरा वाक्य तथा वाक्यार्थके मध्यमें पदार्थ तथा उस वाक्यकी शक्तिके ज्ञानका व्यवधानरूप यों दो दोष आ जाते हैं, वैसे अन्विताभिधानवादमें दोप नहीं आते। इसके विपरीत पदोंका ही सीधा अन्वय प्रतिपादन करनेमें लाघव है। [अर्थात् पद ही सीधे वाक्यार्थ- रूप अन्वयका बोध करा देते हैं, अतः उसके लिए अतिरिक्त वाक्यशक्ति मानना आवश्यक नहीं है। अमिहितान्वयवादमें तो वाक्यार्थबोधके हेतु- भूत पदोंके द्वारा पदार्थस्मृति तो अपेक्षित ही है, परन्तु इसके अतिरिक्त पदार्थोका परस्पर अन्वय बोध होनेके लिए वाक्यशक्तिग्रह होनेके अनन्तर व्यवधानसे. ही संसर्गावगाही वाक्यार्थबोध होता है, मन्विताभिधान-
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८४४ विचरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
नैतत्सारम्, नहि प्रयोगभेदेपु कार्यसंसर्ग एव गवाकृतेनियमेन अतीयते, किन्तु गुणद्रव्यक्रियाकारकसंसर्गश्। तथाहि-शुक्कां गामानये- त्यत्र गुणस्य जातियुक्तेन द्रव्येण सम्बन्धः द्रव्यस्य च विभक्त्यर्थन कारकेण पुनश्र विभक्तयर्थविशिष्टस्य द्रव्यस्य क्रियया क्रियायाथ् नियोग- कार्येणेति व्यवहितः कार्यसन्चन्धः । तथा च सत्यव्यवहितसम्वन्धो- पादानसिद्धयेऽन्यान्वितस्वार्थमात्रे शब्दसामर्थ्यमभ्युपेयम्, लाघवात्। अन्यथाऽनुवादप्रसङ्गात्। कार्यान्वितस्वार्थेपु अ्रमाणान्तरगृहीतेपु शब्द- सामर्थ्यं प्रतिपद्य पश्चाद् वाक्यप्रमाणादपि तावन्मात्रप्रतिपत्तौ कथमनुवादो
वादके समान पदोंके श्रवणान्तर पदशक्तिके द्वारा अव्यवधानसे वाक्यार्थ वोध नहीं हो सकता।] समाधान-इस प्रकार अन्विताभिधानवादका क्रियान्वित स्वार्थमें पदोंका अर्थवर्णन करनेकी प्रक्रिया सारगर्भित नहीं है अर्थात् असंगत है, कारण कि सब प्रकारके प्रयोगोंमें अकेले गोपदार्थस्वरूपमें कार्यका ही सम्बन् नियमसे (अव्यमिचाररूपसे) प्रतीत नहीं होता, किन्तु गुण, द्रव्य, क्रिया तथा कारकका भी सम्बन्ध प्रतीत होता है। [उक्ताशयका उपपादन करते हैं-] 'शुझ्क वर्णकी गायको लाओ' इस वाक्यमें शुक्क गुणका गोत्वजातिसे युक्त गायरूप द्रव्यके साथ सम्बन्ध और उस द्रव्यका विरभक्त्यर्थभूत कारकसय्बन्ध एवं विभक्त्यर्थ कारकसम्बन्धसे विशिष्ट (कर्मकारक) द्रव्यका 'आनयन आदि' क्रियासे तथा क्रियाका (लोडादिके अर्थमृत) नियोगस्वरूप कार्यसे अन्वय होता है। इस प्रकारसे होनेवाली प्रक्रियाके अनुसार गोपदवाच्य गोपदार्थका कार्यके साथ व्यवधानसे ही सम्बन्ध होता है। इस दशामें अव्यवहित सम्बन्धकी सिद्धिके लिए (स्वार्थसे अतिरिक्त) अन्य पदार्थसे अन्वयप्राप्त स्वार्थमें ही लाघवके अनुरोधसे शब्दकी शक्ति मानना उचित है। अन्यथा माननेसे अनुवादका प्रसङ्क आ जायगा। [ तात्पर्य यह है कि कार्यान्वित ही गवादिरूप स्वार्थमें यदि गोपदकी शक्ति मानी जाय, तो कार्यबोधक लोट् आदिका प्रयोग करना गोपदादिसे ही सिद्धार्थका प्रतिपादक होनेसे अनुवादकके अतिरिक्त विधि- बोधक नहीं हो सकता ], कारण कि 'व्यवहारके दर्शनसे अनुमानादि प्रमाण द्वारा गृहीत कार्यान्वित स्वार्थमें गो आदि पदोंकी शक्तिका निश्चय. करके
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अन्वितापिधानवादमें शाकतित्रह-विचार ] भापालुवादसहित ८४५
न भवेत्। न च कार्येण सर्वपदार्थानामव्यवहितः सम्वन्धोऽ स्ति येन तत्संसृष्टे सामर्थ्य स्यात्। अस्ति कार्यस्य सर्वपदार्थैः सम्बन्धः शेपश्ञेपिलक्षण इति चेत्, तत्र कार्यस्य शेपिता नाम किं स्वामिता किं वाडवयविता उत साध्यता अथवा परमसाध्यता? नाऽडद्या, अचेत- नस्य स्वामित्वायोगात् । न द्वितीयः, इतरपदार्थानां कार्य प्रत्यवय- वत्वाभावात्, न तृतीय:, क्रियाया एव सर्वत्र कारकसाध्यत्वात्। न चतुर्थ:, स्वर्गादेरेव परमसाध्यत्वात्। अतः सर्वानुगतैकप्रयोजक- लाभायान्यान्त्रिते सामर्थ्यमभ्युपेयम्। यदि कार्यान्विते सामर्थ्यं स्यात्
तदनन्तर वाक्यरूप प्रमाणसे मी यदि कार्यान्वयका ही बोध होगा, तो वाक्यमें अनुवादकत्वका प्रसक्ग क्यों नहीं होगा ? और सम्पूर्ण पदार्थोंका कार्यके (नियोगके) साथ व्यवधानशुन्य सम्बन्ध हो भी नहीं सकता, जिससे कि कार्य-सम्बद्ध स्वार्थमें श्दकी शक्ति हो सके। शज्धा-सम्पूर्ण पदार्थोंके साथ कार्यका शेषशेपिभावरूप सम्बन्ध विद्यमान ही है। समाधान-यदि शेप-शेपिगाव सम्बन्ध कार्यके साथ है, तो इसमें विकर्प हो सकते हैं कि कार्यमें शेपिता (कार्यको शेपी मानना) क्या स्वामित्वरूप है? या अवयवितारूप है ? अथवा साध्यतारूप है? अथवा परमसाध्यतारूप है। इनमें प्रथम करप नहीं बन सकता, कारण कि अचेतनका कार्यका स्वामी होना सम्भव नहीं है। दूसरा कर्प मी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थ कार्यके अवयव नहीं हो सकते। तृतीय पक्ष मी नहीं हो सकता, कारण कि सर्वत्र किया कारकसे ही साध्य होती है, [अतः प्रकृतमें नियोगात्मक कार्य भी कारकसाध्य ही है]। चतुर्थ पक्ष भी नहीं बन सकता, कारण कि परम साध्य तो स्वर्ग आदि ही हैं। इसलिए सर्वत्र अनुगत एक प्रयोजकके लाभके लिए अन्यसे अन्वित पदार्थमें ही शक्ति मानना उचित है। [पूर्वप्रदर्शित रीतिसे नील आदि गुणोंका घटादि द्रव्योंके साथ और गुणान्वित द्रव्योंका विभक्त्यर्थभूत कर्मादिसम्बन्ध द्वारा क्रियाके साथ अन्वय होगा, अनन्तर क्रियाका 'लोट' आदिके अर्थमूत नियोगके साथ अन्वय होगा, इतनी परम्पराको लेकर आपके अन्तर्गङ्डभूत नियोगके साथ १०७
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८४६ विवरणप्रसेय संग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
तदा कार्यपदस्य तन्न सिद्धेत, कार्यान्तराभावाद्। अस्ति घात्वर्थलक्षणं कार्यान्तरमिति चेद्, न; धात्वर्थस्य प्रथमतः कार्यत्वाभावाद्। नियोग- कार्यस्य साध्यत्वसिद्धर्थ धात्वर्थे विपयत्वेनाऽन्व्रिते पश्चात् करणभूतस्य च तस्य धात्वर्थस्याऽनुष्ठेयतया कार्यत्वं न तु नियोगान्वयकाले। न चक-
पदार्थका अन्वय होगा, इसलिए पदकी सामान्यतः अन्य पदार्थसे अन्वित स्वार्थमें ही शक्ति माननी चाहिए, कार्यान्वितमें नहीं माननी चाहिए, क्योंकि कार्यान्वय सर्वत्र अनुगत नहीं है और व्यभिचरित भी है, इस आशयसे व्यभिचार-स्थल दिखलाते हैं-]-यदि कार्यान्वित स्वार्थमें ही शब्दकी. सामर्थ्य मानी जाय, तो कार्यरूप पदका वह (कार्यान्वितरूप स्वार्थ) सिद्ध नहीं होगा, कारण कि वहांपर कार्यरूप पदार्थसे अतिरिक्त दूसरा कार्य नहीं है। [ जैसे 'गामभ्याज' इत्यादि वाक्यमें गोपदार्थसे अतिरिक्त लोडन्त पदार्थ प्रेरणारूप क्रियाका नियोगात्मक कार्य विद्यमान है, इसलिए उक्त स्थलमें व्यवहित मी क्रियान्वित स्वार्थका सम्भव है, वैसे जहाँ 'कार्यम्' ऐसा पद है, वहां अतिरिक्त पदार्थ कार्य नहीं है, जिससे कि उसके साथ अन्वित होकर कार्यपद अपने स्वार्थका बोध करा सके। कार्यमें वाचकरूप दो पद हैं-एक कुधातु और दूसरा ण्यत्रूप कृत्य प्रत्यय इन दोनोंका कार्य ही अर्थ है, इसलिए परस्परान्वित स्वार्थका बोध हो सकता है, ऐसा समझ कर वादी शङ्का- करता है-] यदि कहो कार्यपदमें कृधातुका अर्थस्वरूप अतिरिक्त कार्य भी विद्यमान ही है, [नियोगनिर्वाहके लिए धात्वर्थमें कार्यत्वबुद्धि कर्तव्यबुद्धिके निश्यके बाद ही हो सकती है, इस आशयसे सिद्धान्तीका समाधान है-] तो यह कहना भी उचित नहीं है, कारण कि नियोगरूप कार्यके साथ अन्वय होनेसे पहले घात्वर्थ कार्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि नियोगस्वरूप कार्यमें साध्यत्वकी सिद्धिके लिए विषयत्वरूपसे घात्वर्थका अन्वय होता है, अनन्तर करणात्मक उस घात्वर्थमें, अनुष्ठानयोग्य होनेसे, कार्यत्व माना जा सकता है, परन्तु नियोगके साथ अन्वय होते समय वैसा नहीं माना जा सकता। [तात्पर्य यह है कि 'यजेत' इत्यादि स्थलमें लिडदिपत्यय द्वारा यागविषय नियोगकी प्रतीति हुई। वह नियोग स्वयं कृतिसाध्य नहीं हो सकता, अतः नियोगमें कृति- साध्यत्वका निर्वाह करनेके लिए विषयीभूत यजादिघात्वर्थरूप यागादिमें कृति-
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अन्विताभिधानवादमें शकतिग्रह-विचार] भापानुवादसहित
स्मिन् कार्यपदे व्यभिचारभयेन बहूनां पदानामव्यभिचरितकार्यान्वितार्थ- त्वहानमयुक्तमिति वाच्यम्, तथा सत्यर्थगतप्रमाणान्तरग्राह्यत्वस्याऽप्य- व्यभिचारितया शव्दसामर्थ्यविपयत्वप्रसङ्गात्। अथोच्येत-अनन्यथा-
साध्यत्व माना जाता है। इस रीतिसे जवतक यागका विषयत्वरूपसे नियोगमें अन्वय नहीं होता, तवतक यागमें कृतिसाध्यत्वरूप अनुष्ठेयत्वकी सिद्धि ही नहीं हो सकती, फिर वह कृतिसाध्यरूप कार्य केसे माना जा सकता है क्योंकि वह तो नियोगविषय होनेसे सिद्ध ही है। और नियोगका तो कार्यत्व-बुद्धिविषयताशुन्य शुद्ध घात्वर्थमात्रसे अन्वय होता है, कार्यबुद्धिमें विषय हुए घात्वर्थसे नहीं होता, क्योंकि घात्वर्थभृत यागादि पदार्थमें कर्तव्यवुद्धि तो नियोगमें अन्वय होनेपर ही होती है। इससे यह मी नहीं कह सकते कि नियोगके अनन्तर अन्वय हो जानेपर कार्यवुद्धि होती ही है, अतः कार्यान्वय वन ही गया, कारण कि हम तो यही कहते हैं कि नियोगके साथ अन्वयकालमें तो कार्यके साथ अन्नय नहीं होता। और दूसरा अन्योन्याश्रय दोप मी आता है-विपयके बिना विपयीका सम्भव नहीं है, अतः घात्वर्थ यागादिरूप विपयमें अन्वयके अनन्तर ही विपयी नियोगकी सिद्धि होगी और नियोगमें घात्वर्थके अन्वयके अधीन ही घात्वर्थमें कार्यत्वक्ी सिद्धि होगी । ] शक्ा-[ पदका कार्यान्वित ही अर्थ है, ऐसा माननेवालोंका कहना है कि ] एक कार्यपद्मे व्यभिचार होगा, इस डरसे व्यभिचरित न होनेवाले कार्यान्वित अर्थमें अनेक पदोंकी शक्तिका त्याग करना युक्तिसञ्ञत नहीं है। समाधान-यदि अधिक स्थलमें व्यभिचरित न होनेवाला अर्थ ही पदोंका अर्थ मान लिया जाय, तो पदोंके स्वार्थमें सर्वदा विद्यमान प्रमाणान्तरआ्रह्यत्वरूप अर्थमें भी, (अर्थात् घटादि पदार्थ केवल पदके द्वारा ही नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आदि दूसरे प्रमाणोंसे भी ग्रृहीत होते हैं) अधिक स्थलोंमें व्यभिचार न होनेसे, शब्दशक्तिके विपयत्वका प्रसङ् हो जायगा। [ यद्यपि विकल्पवृत्तिसे उपस्थित होनेवाले वन्ध्यापुत्रादि पदार्थोंमें प्रमाणान्तरग्राह्मत्वका व्यभिचार है, तथापि अधिक स्थलमें व्यभिचारशन्य होनेके कारण वादीके मतमें अल्प स्थलका व्यभिचार वाघक न होनेसे उक्त अतिप्रसक् दोषमें कोई वाधक नहीं है। ]
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विवरणप्रमेयसंग्रहं I सूंत्रं 8, वर्णकं २
सिद्धान्वयव्यतिरेकवलात सर्वत्र शब्दवाच्यत्वं कल्पनीयम् , ग्रमाणान्तरग्राह्य- त्वस्याऽव्यभिचारित्वं तु प्योगनिमिचततयाऽन्यथासिद्धम् ; शन्दप्रयोगो हि प्रमाणान्तरगृहीत एवाडयें सम्भवति नाडन्यथा। तस्मान्नोक्तप्रसङ्ग इति। - तहि कार्यस्याऽव्यभिचारित्वमप्यन्यथासिद्धम्। मध्यमवृद्धप्रवृत्तिदर्शनेन हि वालस्य व्युत्पत्तिर्भवति। न च कार्यज्ञानेन विना मव्यमवृद्धप्रवृत्तिः,
शङ्का-यदि वादीका कहना हो कि अन्यथासिद्धिसे शन्य अन्वय और व्यतिरेकके आधारपर ही सर्वत्र शब्दके वाच्य अर्थकी कल्पना की जाती है और प्रमाणान्तरग्राह्यत्वरूप अर्थमें व्यभिचारका न आना तो उसकी प्रयोगमें निमित्तता होनेसे ही अन्यथासिद्ध है। [अर्थात् प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके द्वारा अर्थज्ञान प्राप्त करके शब्दप्रयोग किया जाता है, अतः अर्थमें गृहीत तथा अव्यभिचरित प्रमाणान्तरगम्यत्व तो प्रयोगमें ही पुरुपको प्रवृत्त करा देनेमें उपयुक्त हो जाता है, उसमें शन्दसामर्थ्यका विषय होनेतक बल ही नहीं रह जाता, अतः प्रयोग द्वारा अन्यथासिद्ध हो जाता है ।] कारण कि शब्दोंका प्रयोग तो प्रमाणान्तरोंसे ज्ञात अर्थमें ही हो सकता है, अन्यथा नहीं होता। [अर्थात् ज्ञात पदार्थोंका ही चोध करानेके लिए शब्दोंका परयोग होता है, अज्ञात पदार्थोंके लिए शब्दोंका प्रयोग ही नहीं हो सकता] इसलिए उक्त अतिप्रसङ्ग (प्रमाणान्तरगम्यत्वरूप अर्थमें शब्दसामर्थ्यविषयत्व- रूप दोषका होना) नहीं वन सकता। समाधान-तब तो कार्यका भी व्यभिचारसे शून्य होना अन्यथासिद्ध है। [ कार्यकी अन्यथासिद्धि दिखलाते हैं-] मध्यम वृद्धकी (जिसको काम करनेकी आज्ञा दी गई है, उसकी) प्रवृत्तिको देखनेसे ही वालकको व्युत्पत्ति (शब्दके अर्थका ज्ञान) होती है। और कार्यज्ञानके बिना मध्मम वृद्धकी प्रवृत्ति हो ही नहीं सकती। [ अर्थात् यदि काम करनेवालेको कामका ही पता न हो, तो वह करेगा ही क्या? इस दशामें उसकी प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती, परन्तु बालक उसको काम करते देखता है, 'प्रवृत्तिरूपलिङ्गदर्शनहेतुकार्याव्यभिचारस्य' इस पदमें प्रतृत्तिरूपं यत लिग्गम्, तस्य दर्शनम्, तत्र हेतुर्यः कार्यस्य अव्यभिचारस्तस्य-ऐसा समास है। प्रवृत्तिसे
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अन्विताभिधानवादमें शक्तिग्रह-विचार] भापानुवांदसहित ८४९
सर्वपद्सामर्थ्यविपयत्वम् 1 एवं च सति देवदत्तो भुक्त्वा निर्गत इत्येव- मादिभिः कार्यशन्यैरपि वाक्यैलोंके प्रतीयमानाऽर्थप्रमितिरुपपद्यते.। न च कार्यरहितस्थले कथ व्युत्पत्तिरिति वाच्यम्, निघण्टुव्याकरणो- पदेशैरपि व्युत्पत्तिसम्भवात्। तस्मात् कार्यमनपेक्ष्याऽन्यान्वितस्व्रार्थ पदान्यभिदधति। नन्वन्विताभिधानाङ्गीकारे गोशब्द आनयनवन्धनाद्यनेकप्रतियो- गिकान्वयवत्स्वार्थमभिदध्याद् आनयशव्दश् गवाश्चाद्यनेकप्रतियोगि कान्वयवत्स्वार्थम्। तथा च गामानयेति वाक्यस्यार्डर्थो व्यवस्थितो न
इसलिए उसको निश्चय होता है कि कार्यज्ञान इसको अवश्य हुआ है। ] इससे प्रवृत्तिरूप लिन्वदर्शनमें कारणीभृत कार्यके अव्यमिचारकी (अन्वय- व्यतिरेककी) अन्यथासिद्धि होनेसे कार्य सम्पूर्ण पदोंकी सामर्थ्यका (शक्तिका) विपय है, ऐसा नहीं वन सकता। कार्यमें पदोंकी शक्तिका विपयत्व न होनेसे ही कार्यमें तात्पर्य न रखनेवाले 'देवदत्त भोजन करके चला गया' इत्यादि वाक्योंसे भी लोकमें प्रतीयमान अर्थकी प्रतीति देखी जाती है। यदि कहो कि जहां कार्यशून्य वाक्य हैं, वहाँ अर्थप्रतीति नहीं होती, तो यह कहना मी युक्त नहीं है, कारण कि निघण्टु (वैदिककोश-या साधा- रण कोश) तथा व्याकरण आदि शास्त्रोंके उपदेशोंसे भी व्युत्पत्ति (अर्थ- प्रतीति) हो सकती है। इसलिए कार्यकी अपेक्षा न करके केवल अन्य पदार्थोंसे अन्वित स्वार्थका ही पद अभिधान (शक्ति द्वारा वोष) करते हैं। शक्का-अन्चिताभिधानके माननेमें 'गो' शब्द अपनी अभिधाशक्तिके द्वारा आनयन, वन्घन आदि अनेक अर्थोंके अन्वयसे युक्त ही स्वार्थका वोध करावेगा तथा 'आनय' शब्द भी गाय तथा अश्व आदि अनेक पदार्थोंके साथ अन्वित ही अर्थका वोध करावेगा, इस परिस्थितिमें 'गाय ले माओ' इस वाक्यका अर्थ व्यवस्थित नहीं होगा [ अर्थात् उक्त वाक्यमें आनयना- दी कार्यके अन्वय तथा व्यतिरेकका अनुमान होता है, इसलिए प्रृत्ति ही कार्याव्यभिचारका अनुमापक लिस है। जैसे धूम वद्विका अनुमापक है और धूमदर्शनमें हेतु वहिका अन्यभिचार-अन्वयव्यतिरेक-है, ैसे ही प्रवृत्तिरूप लिस्के दर्शनमैं हेतु कार्यका अव्यभिचार है।
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८५०. विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
स्यादिति चेद्, मैवम्: गोशब्दार्थान्वयग्रतियोगिविशेपमानयशन्दो नियच्छति तथाSऽनयशव्दार्थान्वयप्रतियोगिविशेपं गोपदमिति पद्द्वय- वलाद्वाक्यार्थव्यवस्थासिद्धेः। नन्वेवमपि गोपदस्याऽऽनयनसंसृष्टगोत्वमर्थः। आनयपदस्याऽपि गोत्वसंसष्टमानयनमित्यर्थाधिक्याभावात् पदद्वयस्य पर्या- यता स्यादिति चेद्, मैवम् ; नहि गामिति पदमात्रादानयनान्वितत्वं गोः प्रतीयते आनयेति वा पदमात्रादानयनस्य गवान्वितत्वं किन्तु पदद्वयेन परस्परान्वितत्वं अ्रतीयते, अतो नोक्तदोप:।
न्वित स्वार्थ ही गोपदका अर्थ है, ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती, जब कि गोपदका अनेक पदार्थान्वित स्वार्थ है ]। समाधान-उक्त दोष नहीं आ सकता, कारण कि गोपदार्थके साथ अन्वित होनेवाले पदार्थका नियमन (व्यवस्थापन) आनयपद कर देता है। एवं आनयन पदार्थके साथ अन्वयको प्राप्त होनेवाले पदार्थकी व्यवस्था गोपद करता है, दसलिए गो और आनयन-इन दोनों पदोंके कारण वाक्यार्थकी व्यवस्था बन जाती है। इस प्रकार व्यवस्था वन जानेपर भी शङ्का रह जाती है कि गोपदका आनयनसे सम्बद्ध गोत्व ही (गोपदार्थ) अर्थ है और आनयपदका भी गोपदके स्वार्थसे सम्बद्ध आनयनरूप अर्थ है, यों दोनों पदोंका ('गो' पद और 'आनय' पदका) एक दूसरेके अर्थसे अतिरिक्त अधिक अर्थ न होनेसे उन्हें पर्याय मानना पड़ेगा। उत्तर देते हैं कि उक्त शक्का नहीं हो सकती, कारण कि केवल गोपदके श्रवणमात्रसे आनयनयुक्त गोपदार्थकी प्रतीति नहीं होती और न केवल आनयपदसे ही गोपदार्थसे अन्वित आनयनकी प्रतीति होती है, क्रिन्तु दोनों पदोंके रहनेसे ही एक दुसरे अर्थसे अन्वित पदार्थकी प्रतीति होती है; इसलिए उक्त दोष नहीं आ सकता * ।
पर्योस्में स्वन्त्र ्द ी प्रतीत होनेवाले म्पूर्ण स्वार्थका वोध करा देते हैं, इसलिए सब पर्याय शब्दोंका प्रयोग एक साथ प्राप्त नहीं होता। प्रकृतमें इसके विपरीत दोनों पदोंके रहनेसे ही परस्परान्वित अर्थका वोध होता है, केवल एक-एक पदके प्रयोगसे नहीं, इसलिए दोनों पदोंके अर्थमें प्रत्येकके अर्थसे भेद सिद्ध ही है।
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अन्वितामिधानवादमें शक्तिग्रह-विचार] भापानुवादसहित ८५१
ननु गोशब्दोचारणे कृते गवाकृतिरेव किमिति प्रतीयंते न सामर्थ्य- विपयीभूतं सर्वमिति। अव्यभिचांरात्संस्कारभूयस्त्वाद्गवाककतेरितरेषां व्यभिचारादिति ब्रूमः । ननु गोशव्देनाऽऽनयशव्देन च पूर्वापरीभावा- दर्थभेद इति वाच्यम्, आहिताग्न्यग्न्याहितशब्दयोरप्यर्थभेदप्रसङ्गात्। [ यदि अन्यसे अन्वित पदार्थमें पदोंकी शक्ति मानी जाय, तो स्वेतरयाव- त्पदार्थजात (अपने स्वार्थसे अतिरिक्त सभी अन्य पदार्थ) पदकी शक्तिके विषय हो जायँगे, इस रीतिसे आनयनादिके साथ अन्वयकी प्रतीतिका भी गो आदि पद द्वारा सम्भव होनेके कारण गो और आनय आदि पद समानार्थक होनेसे पर्याय हो जायँगे, ऐसी आशक्का करते हैं-] गोशव्दके उच्चारण करनेसे केवल गायका ही आकारविशेष प्रतीत क्यों होता है? गोपदकी शक्तिके विषय अन्य सकल पदार्थ प्रतीत क्यों नहीं हो जाते ? [ जिससे कि पर्याय होनेका दोप निवृत्त हो सके। ]. समाधान-गायकी आकृतिके उपस्थित होनेमें कारण संस्कारका आधिक्य है और गोपदार्थमें उसका व्यभिचार भी नहीं है, इतर सम्पूर्ण पदार्थोंके साथ तो व्यभिचार विद्यमान है, *ऐसा हम कहते हैं। गोशव्द और 'आनय' शव्दको ('गामानय' 'मानय गाम' इस प्रकार) आगे पीछे बदल कर उसका प्रयोग करनेसे अर्थके परिवर्तनकी भी आशक्का नहीं की जा सकती, कारण कि इस प्रकारका परिवर्तन करनेसे तो आहिताझि और अग्न्याहित-इन दोनों पदोंके अर्थमें भी भेद (परिवर्तन) हो जायगा It * 'गामानय' या 'गां वधान' इत्यादि भिन्नभिन्न वाक्योंमें गायका आकार तो एक-सा सर्वत्र अन्वित है, उसमें व्यभिचार नहीं है; पर आनयन या वन्धन परस्पर व्यभिचरित हैं, अतः एक दूसरे वाक्यमें एक दूसरे अर्थका अभाव है। * 'आहिता अग्रयो येन' 'जिसने अग्निका आधान किया हो' इस बहुीहि समासमें 'आहित' पदका, निष्टान्त होनेसे, पूर्वप्रयोग नियमतः प्राप्त था, परन्तु 'वाहिताग्न्यादिघु' इस पाणिनीय सूत्रके अनुसार आहितपद्का पूर्वप्रयोग करनेमें विकल्प हो जाता है। इसलिए आहिताग्नि तथा अग्न्याहित, यों दोनों प्रकारका प्रयोग होता है, परन्तु अर्थ दोनों प्रयोगोंसे एक ही प्रतीत होता है, उसमें अग्नि तथा आहितका पूर्वप्रयोग करनेसे कोई भेद नहीं आता, एवं 'गामानय' (गाय लाओ) अथवा 'आनय गाम्' (ले आओ गाय) ऐसा वदल कर प्रयोग करनेपर भी अर्थमेदका प्रसङ्ग नहीं आ सकता, यह भाव है।
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८५२ विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
ननु गोज्व्देन गोत्वेऽमिहिते तत्संसष्टमानयनमितरेणाडभिधीयते तथाSड- नयशन्देनाऽनयनेऽमिहिते तत्संसष्टं गोत्वं गोशब्देनाऽभिधीयत इत्यन्योन्याश्रयत्वमिति चेदू, नैप दोप :; तत्तत्पद्श्रवणदशायां स सोऽर्थ: प्रतीयते अन्त्यपदोच्ारणानन्तरं च युगपत्सर्वपदानि स्मर्यमाणानि सम्भूय स्वार्थान् पूर्वमभिहितानेवाऽन्योन्यसंसृष्टतया प्रतिपादयन्ति। तथा च कुत इतरेतराश्रयता। तटुक्ततं शालिकनाथेन- 'पदजातं अ्ुतं सर्वं स्मारितानन्चितार्थकम्। न्यायसम्पादितव्यक्ति पश्राद्वाक्यार्थवोधकम् ॥।' इति॥ न अभिहितान्वयवादे
शङ्का-गोशव्द द्वारा उसके अर्थभूत गोत्वकी (आकारविशेष गोस्वरूपकी ) प्रतीति होनेके अनन्तर गोत्वसे अन्वित आगमनकी प्रतीति होती है एवं आनयशव्दसे आनयनरूप अर्थका अभिधान होनेपर आनयनसे अन्वित गोत्वरूप अर्थकी प्रतीति होती है, इस रीतिसे अन्योन्याश्रय दोष आनेका प्रसङ्ग होता है। समाधान-उक्त दोष देना उचित नहीं है, कारण कि गो आदि तत्-तत् पदके श्रवणसे गोत्व आदि तत्-तत् अर्थ प्रतीत होता है, अन्तिम (वाक्यमें अन्त्य) पदके सुननेके अनन्तर ही सम्पूर्ण पूर्वोच्चरित एक साथ स्मृतिमें आये हुए पद मिलकर पदश्रवणकालमें आभिहित ही अपने अपने अर्थोका, एक दूसरे पदार्थके साथ अन्वितरूपसे, प्रतिपादन करते हैं। इस परिस्थितिमें अन्योन्याश्रय दोषका प्रसङ्ग ही कैसे हो सकता है? यही बात शालिकनाथने भी कही है- 'सम्पूर्ण पद श्रवणगोचर होते हुए अनन्वित 'केवल' स्वार्थके स्मारक होते हैं, अनन्तर याने अन्तिम पद श्रवणके पश्चात् आकाड्क्षादि वाक्यन्यायोंसे एक ही स्मृतिमें व्यक्त हुए सम्पूर्ण पद संसर्गरूप वाक्यार्थके बोधक होते हैं अर्थात् अन्तिम पदके श्रवणके अनन्तर होनेवाली स्मृतिमें आरूढ़ पद परस्पर अन्वित अर्थके बोधक होते हैं। यदि शक्का हो कि उक्त रीतिके अनुसार अन्विताभिधानवादमें अभि- हितान्वयवादकी अपेक्षा वैलक्षण्यकी सिद्धि ही नहीं होगी [ अर्थात् अभि-
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अन्वितामिधानवाद में शक्तिग्रह-विचार ] भापानुवादसहित ८५३
हि पदानि पदार्थानभिधायोपक्षीयन्ते पदार्थेभ्यो वाक्यार्थप्रतिपत्तिः। अन्विताभिधानवादे तु पदानामेव वाक्यार्थप्रतिपादकत्वमिति विशेष:। तस्मादन्विताभिधानवादे दोपाभावात् फलितो दुम इत्यादिकार्यशून्यवाक्य- प्रयोगाणां च लोके भूयसासुपलम्भाद्वेदेऽपि 'वपट्कर्तः प्रथमभक्षः' 'तस्मात्पूपा ग्रपिष्टभागः' इत्यादिकार्यरहितवाक्यानामुपलम्भादन्यान्वितस्व्रा- र्थमात्रे शन्दसामर्थ्यं सिद्धम्। यद्यपि तेषु वेदवाकयेपु कर्त्तव्य इति पदम- ध्याहियते तथाऽपि न वाक्यार्थप्रतिपत्तिसिद्धये तदध्याहारः, अन्त- रेणाऽप्यध्याहारं तत्प्रतिपत्तेः। किन्तु अपूर्वार्थद्रव्यदेवतासम्बन्धावगमाधी- नस्तदष्याहार: । हितान्वयवादके समान इस मतमें मी श्रवण कालमें पदोंका अनन्वित ही स्वार्थ प्रतीत होता है, इससे कोई वैलक्षण्य नहीं आया, यह भाव है], तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि अभिहितान्वयवादमें पदार्थोका अभिधान करके पद सामर्थ्यीन हो जाते हैं, अनन्तर पदोंके द्वारा उपस्थित हुए पदार्थ वाक्यार्थका ज्ञान कराते हैं। और अन्विताभिधानवादमें तो इसके विपरीत पद ही वाक्यके अर्थका प्रतिपादन करते हैं, यों दोनों मतोमें मेद है, अतः अन्वितामिवानवादमें दोपका अभाव है और 'फला हुआ वृक्ष' इस प्रकार लोकमें कार्यरहित वाक्योंके अनेक प्रयोग पाये जाते हैं तथा वेदमें भी 'वपट्कार करनेवालेका प्रथम भक्ष' एवं 'इसलिए सूर्यका भाग प्रपिष्ट' इत्यादि अर्थवाले कार्यशून्य वाक्य उपलब्घ होते हैं, इससे केवल अन्यान्वित स्वार्थमें पदकी शक्ति सिद्ध होती है। यद्यपि ऊपर कहे गये वेदवाक्योंमें 'कर्तव्य' पदका अध्याहार किया जाता है, [ इससे उक्त वाक्योंका 'वपट्कर्ताके लिए प्रथम भक्ष करना चाहिए' और 'सूर्यका भाग प्रपिष्ट करना चाहिए', इस अर्थमें तात्पर्य होनेके कारण वे नियोगशुन्य नहीं माने जा सकते ] तथापि वाक्यार्थबोधकी सिद्धिके लिए उक्त पदका अध्याहार नहीं किया जाता, कारण कि अध्याहारके बिना भी वाक्यार्थवोधकी सिद्धि हो जाती है [ अर्थात् नियोगवोधक 'तव्य' आदिके बिना भी सिद्ध पदार्थोंके परस्पर अन्वयका बोध होनेमें कोई बाघा नहीं है ], किन्तु अपूर्वोत्पत्तिके प्रयोजक द्रव्य तथा देवताके सम्बन्धकी प्रतीतिके वलपर 'कर्तव्य' पदका अध्याहार है।* * अर्थात् चपट्कारकके साथ प्रथम भक्षका सम्वन्ध प्रमाणान्तरसे अग्राप्त होनेके कारण अपूर्व १०८
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८५४ विवरणप्रमेयसंग्रद्द [ सूत्र ४, वर्णक २
यत्तु वृद्व्यवहारानुसारिणा सूत्रकारेणैव कार्यान्वितस्वार्थे शब्द- सामर्थ्यं दर्शितम्-'तद् भूतानां क्रियार्थन समान्नायः' इति, तत्र धर्मजिज्ञासो- पक्रमात् प्रकृतोपयोगितया क्रियार्थतेत्युक्तम्, न तु सिद्धार्थे. सामर्थ्याभावा- भिग्रायेण, यतो भाष्यकारेणैव गुणगुण्यादीनां विशेपणविशेष्यादिभावेन समन्वयो दर्शितः। यदि जैमिनीयसूत्रं सिद्धार्थे शब्दसामर्थ्याभावपरं
श्का-वृद्धव्यवहारका अनुसरण करके सूत्रकार जैमिनिमुनिने ही 'तदू भूतानाम्'-'पूर्वोक्त निष्कर्षके अनुसार सिद्ध पदार्थोंका समाम्नाय- कथन-कार्यके ही निमित्तसे होता है' इत्यर्थक सूत्र द्वारा कार्यान्वित स्वार्थमें पदोंकी शक्ति दिखलाई है। समाधान-सूत्रकारने उक्त सूत्रमें क्रियार्थपद इसलिए दिया है कि वहाँ धर्मजिज्ञासाका उपक्रम (प्रकरण) होनेसे प्रकृत धर्मजिज्ञासाका वह उपयोगी है, * सिद्ध पदार्थोंका अभिधान करनेमें पदोंकी शक्ति ही नहीं है, इस अभिपायसे नहीं दिया गया है, [ अर्थात् उक्त सूत्रमें प्रस्तावोपयोगी क्रियार्थ- पद देनेका तात्पर्य यह नहीं हो सकता कि पदोंका स्वार्थ सिद्धस्वरूप अर्थ नहीं है, ] कारण कि जैमिनिमुनिके सुन्नोंके व्याख्याता भाष्यकार शबर- स्वामीने गुण तथा गुणी (द्रव्य) आदिका विशेष्यविशेषण आदि भावसे समन्वय दिखलाया है ।। यदि आग्रहवश जैमिनिके सूत्रका तात्पर्य सिद्ध (भूत) अर्थमें पदोंकी शक्तिके अभावके बोधनमें ही है, ऐसी कल्पना की जाय, तो
है। तथा प्रपिष्ट भागके साथ सूर्य देवताका सम्वन्ध अपूर्व है, इस प्रकार उक्त वाक्योंका समन्वय होनेसे 'कर्तव्य' पदका अध्याहार है, इसके विपरीत 'कर्तव्य' पदका अध्याहार करनेके अनन्तर उक्त वाक्योंके प्रदर्शित अर्थमें तात्पर्यका निर्णय नहीं किया जाता, इसलिए सिद्ध अर्थोंका अन्वय सम्भव है। चोदनात्मक साध्यरूप धर्मके निरूपणके प्रस्तावमें सिद्ध पदार्थोंका कथन क्रियानिमित्त ही माना जा सकता है, अन्यथा साध्यनिरूपणके प्रस्तावमें सिद्धका निरूपण करना व्यर्थ हो जायगा। * 'शुकः पटः' या 'खण्डो गौः' इत्यादि वाक्योंमें शुक्क पट तथा खण्ड गो आदिका विशेष्य- विशेषणभाव दिखलाकर ही पदार्थोंका अन्वय किया गया है; किसी कियामें अन्वय करके पदार्थोंका समन्वय नहीं किया गया है। भाष्यकारके साथ उक्त प्रकारसे सिद्ध पदार्थोंका समन्वय करनेसे सूत्रविरोध भी नहीं है, कारण कि सूत्रमें प्रसङ्गसे दिया गया क्रियार्थपद सिद्ध पदार्थोंमें समन्चयके अभावका वोधन नहीं कर रहा है।
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अन्विताभिधानवादमें शक्तिग्रह-विचार] भांपानुवांदसहित ८५५
कल्प्येत तदानीमखण्डैकरसे ब्रह्मणि वेदान्तसमन्वयप्रतिपादकानि वादरायणसूत्नाणि विरुध्येरन्। ननु 'सत्यं ज्ञानम्' इत्यादिवेदान्तेपु प्रातिपदिकार्थानामेकरसब्रह्मपर- तयाऽन्वयेऽपि प्रथमाविभक्तयर्थस्य कारकतयाऽन्वये सति कथमखण्डै- करसत्वसिद्धिरिति चेद्, न; पाणिनिना प्रातिपदिकार्थमात्रे प्रथमा- विभक्तेः स्मरणात्। तत्र लिङ्गसंख्यादयस्त्वर्थात् प्रतीयमाना अपि 'प्रज्ञानधन एव इत्यादिश्रुतिविरोधादनिर्वचनीया भविष्यन्ति। ननु अखण्ड, एकरस तथा सिद्धस्व्ररूप ब्रह्ममें वेदान्तके (उपनिपत्के) वाक्योंके वात्पर्यका वर्णन करनेमें प्रवृत्त व्यासमुनि द्वारा रचित वेदान्तसूत्रोंसे विरोध आा जायगा। [ अर्थात् जैमिनिसूत्र तो वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य कार्यमें सिंद्ध करेंगे और व्यासमुनिके सूत्र त्रह्ममें सिद्ध करेंगे, इस प्रकार उनका परस्पर विरोध हो जायगा, अतः सिद्ध अर्थमें भी पदोंकी सामर्थ्य मानना उचित है।] शक्का-यद्यपि 'सत्यं ज्ञानम्'-(सत्य-त्रिकालाडवाघित-ज्ञान- नित्य संवित्-) इत्यादि वेदान्तवाक्योंमें प्रातिपदिकमात्रके अर्थमूत सत्य, ज्ञान आदि पदार्थोंका एकरूप ब्रह्मके तात्पर्यसे अन्वय हो भी सकता है, तथापि इन सत्य, ज्ञान आदि प्रतिपदिकसे आयी हुई प्रथमा विभकतिके अर्थका तो कारक सम्बन्घसे ही अन्वय होगा, तव अखण्ड, एकरस नद्मकी सिद्धि कैसे होगी? [प्रथमा विभक्तिका 'तिङ्समानाघिकरणे प्रथमा' इस अनुशासनके अनुसार कर्ता या कर्मरूप कारक अर्थ होनेसे एकरस ब्रद्म नहीं हो सकता, कारण कि क्रियाविशिष्टको कर्ता तथा क्रियाजन्यफलाश्रयको कर्म कहते हैं ]। समाधान-उक्त शक्का उचित नहीं है, कारण कि पाणिनिमुनिने प्रातिपदिकके ही अर्थमें प्रथमा विभक्तिका स्मरण किया है । उस प्रथमान्त पदके प्रयोगस्थलमें यदपि लिद्ग, संख्या आदिरूप अर्थ अर्थतः प्रतीत होते हैं, तो मी 'प्रज्ञानघन' (वह प्रज्ञानधन रूप ही है) इत्यादि श्रुतिसे विरोध होनेके कारण वे अनिर्वचनीय-मिथ्या या आरोपित-ही होंगे। * 'प्रातिपदिकार्थलित्परिमाणवचनमात्रे प्रथमा' इस पाणिनिसूत्रसे प्रथमाका पाति- पदिकके हो अर्थगें विधान किया गया है, स्मरणपद्से पाणिनीय श्ास्त्र वेदमूलक स्मृतिके समान प्रमाण माना गया है।
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८५६ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र ४, वर्णक २
प्रथमान्तप्रयोगेष्वस्तिक्रियाध्याहारं कात्यायन: सस्मार, तथा च सत्यं ज्ञानमनन्तं व्रह्माऽस्तीत्यध्याहारेऽखण्डत्वं अज्येतेति चेद्, मैवम्, 'एते दुमा: फलिताः', 'अयं पुरुपो राजकीय:' इत्यादिप्रयोगेपु सम्वन्धमात्रपर्यवसायिष्वस्तिक्रियाध्याहारस्योपयोगाभावाद्यथा नाऽध्याहार- स्तथाऽखण्डार्थपर्यवसायिपु वेदान्तेष्वप्यवगन्तव्यम्। किश्च, क्रिया- यामत्यन्तभक्तेनाऽपि 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्यादिवाक्येपु भूतार्थे समन्वयो वक्तव्य:, हननाभावस्य
शक्ा-वार्तिककार कात्यायनकी स्मृति है कि प्रथमान्त पदके प्रयोगमें 'अस्ति' क्रियाका अध्याहार होता है।* इसलिए 'सत्य, ज्ञान तथा अनन्त ब्रह्म' इत्यर्थक वाक्यमें भी 'अस्ति' पदका अध्याहार वश्यक होनेसे ब्रह्मके अखण्डत्वका भङ्ग हो जायगा। [ब्रह्म अस्तिक्रियाका कताकारक है, अतः उसमें क्रियाका वैशिष्ट्य आनेसे एकरसत्वका विघात स्पष्ट ही है, यह भाव है। ] समाधान-उक्त नियम उचित नहीं है, कारण कि 'फलोंसे परिपूर्ण ये वृक्ष' तथा 'राजाका यह पुरुष' इत्यर्थक सम्वन्धमात्रके बोधनमें तात्पर्य रखनेवाले वाक्योंके प्रयोगमें, 'अस्ति' क्रियाके अध्याहारका उपयोग न होनेके कारण जसे उसका अध्याहार नहीं होता, वैसे ही 'अखण्ड न्रह्मारूप अर्थके बोधनमें तात्पर्य रखनेवाले वेदान्तवाक्योंमें भी अस्तिका उपयोग न होनेसे अध्याहार नहीं होता, यह समझना चाहिए। [दूसरा भी दोष देते हैं-] क्रियान्वयमें अधिक आदर (आग्रह) रखनेवालेको भी 'ब्राह्मणको नहीं मारना चाहिए' इत्यादर्थक वाक्योंमें सिद्ध पदार्थको मानकर ही समन्वय करना होगा। [उक्त वाक्यसे कोई काम करना प्रतीत नहीं होता, बरिकि कामकी निवृत्ति (निषेध) ही प्रतीत होती है और निषेध क्रियारूप नहीं हो सकता, इस आशयसे कहते हैं-] कारण कि प्रकृतमें क्रियाका होना असम्भव है, क्योंकि हननका (मारनेका)
'तिडसमानाधिकरणे प्रथमा' इस वार्तिकके अनुसार सर्वत्र प्रथमासे कर्तृकर्म कारकरूप अर्थका ही बोध होता है और उसीमें अन्वय होता है, यदि अन्य कोई क्रियाविशेषकी प्रतीतिका होना सम्भव न भी हो, तो भी अस्ति, भवति आदि किया अवश्य ही हो सकती है, अतएव प्रथमान्तस्थलमें 'अस्ति' क्रिया अवश्य ही रहती है।
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प्रभाकरका खंण्डनं ] भांपानुवादसहित ८५७
आ्राप्तक्रियानिवृत्तिलक्षणत्वाद् । न च निवृत्ते: क्रया्म्, औदासी न्यरूपत्वात्। अत्र प्राभाकर आह-न तावत् प्रतिपेधवाचि नवपदं ब्राह्मणेन सम्व- ध्यते, प्रत्यक्षस्य त्राह्मणस्य प्रतिषेधायोगात्। नाऽपि धात्वर्थेन हननेन। हन्तृमनसि प्रवृत्ततया हननस्याऽभावासम्भवात्। नाऽपि तव्यग्रत्ययार्थेन फलप्नार्थनया प्रवृत्तिहेतुना कार्यबुद्धा वा। त्रिविधस्याऽपि प्रत्ययार्थस्याऽन्र प्रत्यक्षस्य प्रतिपेधानर्हत्वाद्। अतो यथा 'नेक्षेतोदन्त- मादित्यम्' इत्यत्रेक्षणविरोध्यनीक्षणसङ्गल्पक्रिया विधीयते तथा
अभाव माप्त हुई मारणरूप क्रियाकी निवृत्ति-निषेध-स्वरूप है। और निवृत्ति क्रिया नहीं मानी जा सकती, कारण कि निवृत्ति तो उदासीनता (कुछ न करना) रूप है। प्रकृत विषयमें ['ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इस वाक्यके शाव्द्वोधप्रकारको लेकर ] प्रभाकरानुयायियोंका कथन है कि प्रकृत वाक्यमें निषेधवाचक 'नन्' पदका न्राहाणके साथ सम्बन्ध नहीं होता है अर्थात् नञूपदार्थ निषेध त्राह्मण पदार्थके साथ अन्वित नहीं होता, कारण कि प्रत्यक्षरूपसे हश्यमान त्राह्मणका निषेध करना सम्भव नहीं है। धातुके अर्थभूत मारनारूप क्रियाके साथ भी अन्वय नहीं किया जा सकता, कारण कि हननक्रिया तो हनन करनेवाले कर्ताके मनमें प्रवृत्त हो ही गई है, अतः उसके अभावका बोधन करना तो सम्भव नहीं हो सकता।। एवं तव्यप्रत्ययके अर्थस्वरूप फल- प्रार्थनाके साथ अथवा प्रवृत्तिमें हेतुके साथ या कार्यवुद्धिके साथ भी अन्वय नहीं हो सकता, कारण कि उक्त तीनों प्रत्ययार्थोंका प्रत्यक्ष होनेसे निषेध नहीं किया जा सकता। इसलिए जैसे 'उदय होते समय सूर्यका दर्शन न करे' इत्यादि वाक्यमें देखनेके प्रतिकूल देखनेके अभावके सङ्कल्प (मानस किया) फरनारूप क्रियाका विधान किया जाता है वैसे ही 'ब्राह्मणका हनन
उक्त वाक्यका प्राप्त हनन क्ियाका अभाव अर्थ माना जाय, तो सङ्गति नहीं होगी, क्योंकि जो किया हन्ताके मनमें प्राप्त हो गई है, उसका अभाव कैसे ? और किया तो उत्पत्ति- विनाश-शालिनी होती है, अतः उसका विनाश स्वतः सिद्ध है।
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विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्रे ४, वंर्णक २
रागप्राप्तहननविरोध्यहननसंकल्पक्रिया विधीयत इति। तदेतद्सारम्, नञ्पदस्याऽभावे मुख्यत्वात्। न च भावान्तरमेवाड- भाव:, तथा सत्यभावस्य प्रतियोगिनिरपेक्षत्वप्रसङ्गात्। ननु तदन्यत- द्विरोघिनावपि नञ्पदस्यार्थौ। तदुक्तम्- 'नामधात्वर्थयोगी तु नैव नञ् प्रतिपेधक:। वदत्यत्राह्मणाधर्मावन्यमात्रविरोधिनौ ।।' इति॥
नहीं करना चाहिए' इत्यर्थक वाक्यमें भी रागतः प्राप्त हुई हननक्रियाके प्रतिकूल हननाभावके संकरपरूप मानस क्रियाका विधान किया जाता है। उक्त प्रकारके प्रभाकरानुयायियोंकी प्रक्रिया युक्तिहीन है, नञूपद मुख्य शक्तिके द्वारा अभावमें ही सामर्थ्य रखता है। [ अर्थात नञ्रपद अभावका ही वाचक है। मीमांसकका सिद्धान्त है कि भावसे अभाव कोई अतिरिक्त पदार्थ नहीं है-जैसे घटाभाव भूतल आदि अघिकरणसे, जो कि भाव ही पदार्थ हैं, अतिरिक्त नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी हननाभाव हनन- विरोघी-संकल्पक्रियारूप भावपदार्थसे अतिरिक्त नहीं है, इसलिए अभावरूप अर्थ माननेमें भी प्रकृत वाक्यका तात्पर्य संकलपक्रियाके यिधानमें हो सकता है, इस आशङ्काका खण्डन करते हैं-] दूसरे भावपदार्थको ही अभाव पदार्थ कहना उचित नहीं है कारण कि अभावको भावपदार्थ माननेसे अभावको प्रतियोगिनिरपेक्ष मानना पड़ेगा। [ जैसे घट, पट आदि पदार्थ दूसरेकी अपेक्षाके बिना ही प्रतीत हो जाते हैं, वैसे अभावपदार्थ जिसका अभाव कहना हो, उस प्रतियोगीके ज्ञानके बिना नहीं हो सकता। अव यदि अभाव भी घट-पटके समान भाव पदार्थ होगा, तो घट, पटके समान प्रतियोगीसे निरपेक्ष हो जायगा । ] शङ्का-नञ्पदका अभाव ही मुख्य अर्थ नहीं है, किन्तु उससे अन्य (भेद) और उसका विरोधी (विरोध) भी नञ्का अर्थ है। कहा है-'नाम (प्रातिपदिक) तथा धातुके साथ सम्बन्ध रखनेवाला नञ् प्रतिषेधका (निषेधका) बोधक नहीं होता। जैसे 'अधर्म' पदमें धर्मरूप प्रातिपदिक अर्थके साथ अन्वयको प्राप्त करनेवाला नञूपद धर्मविरोधीका बोधक. है, धर्मके अभावका नहीं। एवं 'नेक्षत' यहांपर धातुके साथ योग होनेसे
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प्रभाकरका खण्डन ] भापानुवाद सहित ८५९
मैवम्, तत्र नञ्पदस्य लाक्षणिकत्वात्। अन्यथाऽनेकार्थत्वस्याS- न्याय्यस्य ग्रसङ्गात् । नेक्षेतेत्यत्र तु प्रजापतिव्रतप्रकरणत्वात् तदनुसारेण लाक्षणिकोऽपि विध्यर्थोऽनुष्ठेयव्रतलाभाय स्वीकृतः । न चाऽत तथा मुख्यमभावं परित्यज्य लाक्षणिकार्थस्वीकारे किश्चित् कारणमस्ति । न च हननाभाव एवाऽनुष्ठेय इति वाच्यम्, अनादेः आगभावस्य तद्योगात्। अन्यथा विधिप्रतिपेधविभागव्यवहारो लौकिको न सिध्येत्। ईक्षणविरोघी सक्कल्पक्रियाका बोध होता है, ईक्षणके अभावका नहीं, स्वयं दष्टान्त देते हैं-] अन्राह्मण और अधर्म शब्द क्रमशः केवल ब्राह्मणभिन्न तथा धर्मविरोधीरूप अर्थका ही 'नन्' पद द्वारा वोध कराते हैं। समाधान-उक्त कथन उचित नहीं है, कारण कि वहाँ नलूपदका भेद और विरोवरूप अर्थ लाक्षणिक है [ अर्थात् उक्त अर्थोंमें नञ् पदकी लक्षणा है मुख्य शक्ति नहीं है ]। अन्यथा अन्याय्यत्वरूप अनेकार्थत्वका प्रसन आ जायगा। [ तात्पर्य यह है कि 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्यादि वाक्योंका असन्दिग्घ अर्थका प्रतिपादक होना आवश्यक है, इसलिए ऐसे वाक्योंमें अनेक अर्थके प्रतिपादक पदोंका आना न्यायसंगत नहीं है; क्योंकि अनेकार्थक शब्दोंके रहनेसे निणयके विपरीत संदेह ही रह जाता है। ] 'उदय होते हुए सूर्यको न देखे इत्यर्थक 'नेक्षेत' इत्यादि वाक्यमें तो प्रजापतित्रतका प्रकरण होनेसे उसके अनुकूल लक्षणासे प्राप्त हुए भी ईक्षणविरुद्ध संकल्पात्मक क्रियाका विधानरूप अर्थ, अनुष्ठानके योग्य त्रतकी सम्पत्तिके लिए, मान लिया जाता है। प्रकृत वाक्यमें ('ब्राह्मणं न हन्यात्' इत्यादिमें) कोई वैसा कारण नहीं है; जिसके आधारपर अभावरूप मुख्य अर्थका परित्याग करके लाक्षणिक अर्थ-( विरोधी हननप्रतिकूल संकलपरूपक्रियाका) स्वीकार किया जाय। और हननका अभाव ही अनुष्ानका विषय है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अनादि अजन्य प्रागभावका अनुष्ठान करना सम्भव नहीं है। [ जन्य ही पदार्थ क्रियासाध्य हो सकता है] और क्रियासाध्य ही अनुष्ठेय होनेके योग्य हो सकते हैं। यदि अनादि प्रागभाव भी अनुष्ठानयोग्य मान लिया जाय, तो लोकसिद्ध विधि और निषेधके विभागका व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकेगा। लोकमें 'घटं कुरु' इत्यादि नन्रहित लोडन्तप्रयोगघटित वाक्योंमें अनुष्ठानयोग्य
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८६० विवरणग्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
ननु नव्पदार्थस्य धात्वर्थेनाऽन्वये सति हि हननप्रागभावोऽत्राडथों भवति। न च तदन्वयः सुलमः, अ्रकृत्यर्थस्योपसर्जनत्वाद्। अतः प्रधानेन प्रत्ययार्थेन नवर्थस्याऽन्वयो वाच्य इति चेद्, एवमपि नञ्पदस्य नाऽन्न ग्रतिपेधपरत्वमपैति। तव्यप्रत्ययो हि विधिं ब्रूते। विधिर्नामेष्ट- साधनम्। ततश्च हननस्य यदिष्टसाधनत्वं पामरदृष्टिसिंद्ध पुरुपस्य प्रवर्त्तकं तदेव तव्यप्रत्ययेनाऽनूद प्रतिपिध्यते-ब्राह्मणहननमिष्टसाधनं न भवतीति। शक्का-नन्पदार्थस्वरूप अभावका धातुके अर्थ हननके साथ अन्वय होनेके अनन्तर ही प्रकृतमें हननके प्रागभावकी प्रतीति होना सम्भव है, परन्तु वैसा अन्वय (घात्वर्थके साथ नलर्थका अन्वय ) हो नहीं सकता, कारण कि प्रकृति ('हन्तव्यः' पदमें तव्यप्रत्ययकी प्रकृति हन्-धातु) प्रत्ययार्थके प्रति उपसर्जन-विशेषणरूप-गौण-हो गई है। [ एक पदार्थके साथ दूसरे पदार्थका अन्वय करनेमें व्युपत्ति है 'पदार्थः पदार्थेनाऽन्वेति' अर्थात् पदका प्रधान अर्थ दूसरे पदके प्रधान अर्थके साथ अन्वयको प्राप्त होता है, इस नियमके अनुसार विशेषणभूत घात्वर्थमें नञर्थका अन्वय नहीं हो सकता। ] इसलिए प्रकृतमें* प्रधानीभूत प्रत्ययके अर्थके साथ ही ननर्थ अभावका अन्वय करना होगा । समाधान-इस रीतिसे प्रधानीभूत प्रत्ययार्थके साथ नवर्थका अन्वय करनेपर भी प्रकृत वाक्यमें नपदके अभावरूप अर्थका निषेध नहीं किया जा सकता। [प्रत्ययार्थमें नञर्थके अन्वयका उपपादन करते हैं-]'तव्य' अत्यय विधिका अभिधान करता है। इष्टसाधन ही विधि कहलाती है। जिस हननको साधारण मूख मनुष्योंने इष्टसाधन समझकर प्रवृत्तिका प्रयोजक मान लिया है, उसी हननका 'तव्य' प्रत्ययके द्वारा अनुवाद करके निषेध किया जाता है कि ब्राह्मणहनन इष्टसाधन नहीं हो सकता। [ इसलिए घटादिक्कृतिकी प्रतीति होनेसे विधिका व्यवहार है। और 'घटं मा कार्पीः' इत्यादि वाक्योंमें निषेधार्थक पदके होनेसे अनुष्ठानके अयोग्य निवृत्तिकी प्रतीति होती है, अतः प्रतिपेवव्यवहार होता है। अभावको भी अनुष्ठान योग्य माननेसे तो निपेधार्थकपद्घटित वाक्योंको भी विधि- वाक्य होनेका प्रसङ्ग आ जानेसे लौकिक विधिनिषेधव्यवस्था नहीं वन सकती, सभी ाक्य विधिपरक ही हो जायंगे। *प्रकृतिप्रत्ययो सहाथ व्रृतस्तन्र प्रत्ययार्थस्य प्राधान्यम्' प्रकृति (जिससे प्रत्ययका विधान हो) और प्रत्यय-इन दोनोंके अर्थमें प्रत्ययार्थ प्रधान होता है, ऐसा नियम है।
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प्भाकरका खण्डन ] माषानुवादसहित ८६१
शब्दार्थत्वात्। हननस्य चाउटष्टविरोधित्वात्। नन्विह वाडमुत्र वार्ड- नर्थहीन: पुरुपार्थः प्रपश्चमध्ये नाऽस्ति, अतथाऽदष्टविरोधिनोऽपीष्टत्व- मस्त्विति चेत्, सत्यमेतत्सर्वत्रारऽर्थोऽनर्थसंयुक्त इति, तथाप्यर्थाधिक: पुरुपार्थाऽनर्थाधिकोऽपुरुपार्थ इति तद्विभागः। तथा चानर्थाधिक्या- दपुरुपार्थभृतं ब्राह्मणहननं मुखतः प्रतिपिध्यते। हननप्रवृत्तिहेतुभूतरागा- दुद्धोधनिमित्तप्रध्वंसोऽनुष्टेय इति त्वर्थात् प्रतीयते। न चाडर्थिकोडथों वह हनन प्रवृत्तिजनक भी नहीं हो सकता।] और इएसाघनरूप प्रत्ययार्थ प्रत्यक्ष है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, कारण कि अटप्टसे विरोध न करनेवाला दष्ट प्रयोजन ही इष्टशन्दका अर्थ माना गया है। [यदि दृष्ट प्रयोजन ही इष्ट मान लिया जाय, तो अगम्यागमनादिरूप निपिद्धके आचरणमें भी इष्टत्त्वका प्रसद्ग होगा, इसलिए उसका अदप्टसे विरोधी न होना भी आवश्यक है, अगम्याका गमन अहष्टविरोधी है। ] प्रकृतमें हनन अदष्टका विरोधी है। शका-विश्वके सम्पूर्ण पदार्थोंमें ऐसा एक मी पुरुपार्थ नहीं है, जो यहां अथवा परलोकमें अनर्थसे रहित हो, * इसलिए अदष्टविरोधीको भी इष्ट मानना चाहिये। समाधान-यह सत्य है कि सभी पदार्थ अनर्थसे युक्त हैं, फिर भी जिसमें अर्थकी-अभीष्ट फलकी-मात्रा विपुल होगी, वह पुरुषार्थ माना जायगा और जिसमें अनर्थकी मात्रा अधिक होगी, वह पुरुषार्थ नहीं माना जायगा, इस रीतिसे पुरुषार्थ और अपुरुपार्थकी व्यवस्था बन सकती है। उक्त व्यवस्थाके अनुसार अधिक अनर्थप्रद पुरुषार्थभिन्न ब्राह्मण- हत्याका शब्द द्वारा साक्षात् निषेध किया जाता है और हत्यामें होने- वाली प्रवृत्तिके कारणीभूत राग आदिके (आदिपदसे द्वेप आदिका ग्रहण समझना चाहिए) उद्धोघके कारणके ध्वंसका अनुष्ान करना चाहिए, * 'तात्पर्य यह है कि यज्ञादिका अनुष्ठान परलोकके लिए हितकारी अवश्य है, परन्तु इस लोकमें अर्जित धनका उनमें व्यय होनेसे किसीन किसी अंशमें वे अनर्थकारी हैं ही एवं ऐहिक- मान्र तथा आपाततः रमणीय यादच्छिक उपायोंसे धन कमाना या विपयोपभोग करना परलोकके लिए अनर्थकारी है तथा अगम्यागमन अथवा चौर्य आदि उभयन्न अनर्थकारी हैं, अतः सचत्र अनर्थका संसर्ग है।
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २ ८६२ विधातुं शक्य:, अशाब्दत्वात्। यश्चाऽर्थादर्थो न स चोदनार्थ इति न्यायात्। अतो हननमिष्ट न भवति, किन्त्वनिष्टमित्येतावति शास्त्रेण वोधिते सति हननरागनिमित्तभूत इष्टत्वभ्रमो निरोद््व्य इत्यन्वयव्यति- रेकाभ्यामेवाजवगम्यते। नन्वेवमप्यत्र तव्यप्रत्ययेनाडपूर्वाभिधानादनुष्ठान- परमेवैतद्वाक्यमिति चेद्, न; मानान्तरागम्येऽपूर्वे सम्बन्धग्रहाभावात्।
ऐसा अर्थात् प्रतीत होता है । [उक्त निमित्तके प्रध्वंसमें अनुष्ठेय होनेके कारण विधिविषयत्व है। इस आशक्काका निवारण करते हैं-] और अर्थतः सिद्ध हुए अर्थका विधान नहीं बन सकता, कारण कि वह शाब्द (शब्द- शकतिसे उपस्थित किया गया) अर्थ नहीं है। यह नियम है कि जो अर्थ अर्थतः सिद्ध होता है, वह चोदना-विधि-का अर्थ नहीं हो सकता। [प्रकृत वाक्यका किसी विधिमें तात्पर्य नहीं हो सकनेसे श्ान्द अर्थ दिखला कर रागनिमिसके निरोधरूप अर्थकी अर्थात् सिद्धि दिखलाते हैं-] इसलिए ब्राह्मणकी हत्या इष्ट नहीं हो सकती, प्रत्युत अनिष्ट (पुरुषार्थहीन) है, इतने अर्थकी शञास्त्र द्वारा प्रतीति होनेपर अन्वय-व्यतिरेक द्वारा प्रतीत होता है कि हननमें प्रयोजक रागके कारणस्वरूप इष्टत्वभ्रमका निरोध करना चाहिए। [ जो इष्ट नहीं हैं, किन्तु अनिष्ट हैं, उनको करनेमें हेतुभृत रागके निमिच इष्टत्वअ्रमका निवारण तो लौकिक अन्वय-व्यतिरेकसे ही सिद्ध होता है। ] शङ्का-उक्त प्रकारको मान लेनेपर भी प्रकृत वाक्यसे 'हन्तव्यः' पदमें विद्यमान विध्यादि अर्थके वाचक 'तव्य' प्रत्ययके द्वारा अपूर्व-नियोगात्मक- अर्थका अभिधान होनेसे अनुष्ानमें ही इस वाक्यका तात्पर्य मानना उचित होगा। समाधान-प्रत्यक्ष आदि दूसरे प्रमाणोंसे प्रतीत न होनेवाले अपूर्वरूप अर्थके साथ शब्दोंके सम्बन्धका ज्ञान नहीं हो सकता। शास्त्र द्वारा ही अपूर्वको
- सारांश यह है कि भ्रमवश ब्राह्मणहननमें इष्टत्ववुद्धि हुई है, अतः हननमें प्रवृत्तिके प्रयो- जक राग आदिके उद्ोधका जव प्रसङ् होगा, तव 'न हन्तव्यः' इत्यादि शास्त्रसे अर्थात् प्रतीत होता है कि प्रवृत्तिजनक रागादिसे प्राप्त हननमें करना चाहिए। इष्टत्वभ्रह्का निरोध
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प्रंभाकरका खर्ण्डन ] मांपानुंवादसंहित ८६३
आगमादेवाऽपूर्वमवगम्य तत्र सम्बन्धग्रहणे वकवन्धप्रयासः स्यात्। क्षणिकस्य यागस्य शुतस्वर्गसाधनत्वानुपपत्या तदवगतिरिति चेत्, तर्ह्यापूर्वमशव्दार्थ: स्याद्: 'अनन्यलभ्यः शब्दार्थ:' इति नियमाद् । जान करके उस (शासत्रसे गृहीत) अपूर्वमें यदि शब्दोंके सम्वन्धका ग्रहण करो, तो वगुलाके पकड़नेमें किये जानेवाले परिश्रमके समान व्यर्थ परिश्रमका ही प्रसफ् हो जायगा *। ['स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि श्रुतिसे यागमें स्वर्गसाधनताकी प्रतीति होती है। कारणका कार्यसे अव्यवहित पूर्व रहना आवश्यक है, याग तो क्रियारूप है, अतः उत्पन्न होकर वह नष्ट होनेवाला है। ऐसी दशागें उस यागमें कालान्तरमें होनेवाले स्वर्गके प्रति श्रुतिसे प्रतिपादित कारणत्वकी रक्षा एक अतिरिक्त अपूर्वके बिना हो नहीं सकती, इस मशयसे शक्का करते हैं- ] शक्का-क्षणिक यागमें श्रुतिसिद्ध स्वर्गकारणत्वकी अनुपपत्ति हो जायगी, इसलिए अपूर्वकी प्रतीति होती है [ इससे अ्तार्थापत्तिरूप प्रमाणान्तरसे प्रतीयमान अपूर्वका शब्दोंसे भी सम्बन्ध हो जायगा, ऐसा प्रतिपादन करनेमें वकवन्धप्रयासकी समानताका प्रसन्न नहीं हो सकता, यह भाव है।] समाधान-यदि ऐसा माना जाय; तो अपूर्व किसी शब्दका भर्थ ही नहीं हो सकेगा, क्योंकि शब्दका अर्थ वही माना जाता है, जो दूसरेसे सिद्ध न हो। यदि अन्य प्रकारसे उपलब्ध अर्थको मी शब्दार्थ मानेंगे, तो * वकन्धप्रयासका स्वरूप यह है कि किसीने पूछा कि वक कैसे वांधा जा सकता है? उत्तरमें अपनी बुद्धिमत्ताका अभिमान रखनेवाला मन्दमति उपाय वतलाता है-'पहले वकके सिरपर मक्खन रखना चाहिए, जब मध्याहमें प्रचण्ड सूर्यकी किरणोंसे वह पिघल जायगा तव उसकी चूंदोसे आखें भर जायंगी फिर वह अनायास पकढ़ा जायगा। परन्तु उक्त उपाय उपयुक्त् नहीं है, क्योंकि जयतक वकको पकढ़ न लिया जायगा तबतक उसके मस्तकपर कौन मक्खन रखने जायगा ? और यदि पकढ़ा ही गया, तो उकत उपाय करनेकी आवश्यकता ही क्या है? ऐसा ही अपूर्चवादीका भी कथन है कि शब्दात्मक शास्त्रोंके द्वारा ही (प्रमाणान्तरसे अगम्य) अपूर्वका बोध करके शब्दोंसे उसका सम्वन्धग्रह कर लो। परन्तु यहाँ प्रश्न यह है कि जब अपूर्चका शब्दसे सम्बन्धवोधन ही नहीं होगा, तव शब्द द्वारा अपूर्वज्ञान कौन करा सकेगा ? और उसका ज्ञान होनेके अनन्तर सम्बन्धग्रह करानेकी आवश्यकता ही क्या है? इसलिए उकक प्रयास व्यर्थ और असजत है।
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८६४ विवरणंप्रमेयसंग्रह [सूंत्र ४, वर्णक २
अन्यथा शरीरेन्द्रियविषयसम्बन्धमन्तरेण स्वर्गासिद्धा शरीरादीनामपि अत्ययार्थत्वं प्रसज्येत। तदेवं कार्यान्वितस्वार्थ एव शब्दसामर्थ्यमित्य- भिनिविशमानेनापि वाक्यानां ृतार्थसमन्वयस्याऽम्युपेयत्वे किमपराद्धं वेदान्तैः १ न च वेदान्तैरवगतेऽपि ब्रह्मणि विधिमन्तरेण फलाभाव इति शङ्कनीयम्, तत्वावगमेनाऽविद्यायां निवर्त्तितायां तत्कृतशरीरादि- सम्बन्धनिवृत्ते: फलत्वात्। कर्मकृतः शरीरसम्बन्धो नाऽविद्याकृत इति चेत्, किमात्मनः कर्म स्वाभाविकं किंवा शरीरकतम्: नाऽडद्य:, चतन्यस्य क्रियारहितत्वाद्। न द्वितीय:, कर्मशरीरयोरन्योन्याश्रयत्वग्रसङ्गात्। कर्मशरीरव्यक्तीनां प्रवाहाङ्गीकारान्राऽन्योन्याश्रय इति चेत्, तर्हन्धपरम्परा प्रसज्येत। वीजा-
शरीर, इन्द्रिय एवं विषयके साथ सम्बन्धके विना स्वर्गकी सिद्धि न हो सकनेसे शरीर आदिको भी प्रत्ययार्थ मानना पड़ेगा, [ इसलिए अर्थापचिसे प्रतीयमान अर्थ शब्द अर्थ नहीं माना जा सकता ]। इस प्रकार उक्त निर्णयके अनुसार कार्यान्वित स्वार्थमें ही शब्दसामर्थ्य माननेके अभिमानीको मी यदि 'न हन्तव्यः' इत्यादि वाक्योंका सिद्धस्वरूप स्वार्थमें समन्वय अभिप्रेत है, तो वेदान्तवाक्योंने कौन-सा अपराध किया: [जिससे कि उनका तात्पर्य ब्रह्मरूप वस्तुके प्रतिपादनमें न माना जाय। ] वेदान्त- वाक्योंके द्वारा ब्रह्मकी प्रतीति होनेपर भी विधिके बिना उसका प्रयोजन नहीं हो सकता, ऐसी शक्का नहीं की जा सकती, कारण कि व्रक्षरूप तत्त्वकी प्रतीतिके द्वारा अविद्याकी-अज्ञानकी-निवृत्ति हो जानेसे उसके (अविद्याके) द्वारा उत्पन्न हुए शरीरादिसम्बन्घकी निवृत्तिरूप फल (प्रयोजन) विद्यमान है। शरीरसम्बन्ध तो कर्मोंके द्वारा होता है, अविद्यासे नहीं होता, ऐसी शक्का यदि की जाय, तो विकलप उठते हैं कि आत्माका कर्म सच्चा याने स्वभावसिद्ध है: या शरीरके द्वारा है? इनमें प्रथम कल्पको नहीं मान सकते, कारण कि चैतन्यस्वरूप आत्मा क्रियासे रहित है। दूसरा पक्ष भी नहीं बन सकता, कारण कि इस पक्षको माननेसे कर्म और शरीरमें अन्योन्याश्रय दोषका प्रसङ्भ हो जायगा। यदि कहो कि शरीर और कर्मका प्रवाह मानते हैं, इसलिए अन्योन्याश्रय दोष नहीं हो सकता, तो यह भी नहीं कह सकते, कारण कि अन्धपरम्पराका प्रसक् हो जायगा।
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अविद्यापयुक्त शरीरादिका सम्बन्ध] भापानुवादसहित ८६५'
करादिवद्विरोध इति चेट्, एवमपि पुत्रादिसम्बन्धवत् शरीरसम्वन्धस्य कर्ममात्रनिमित्तत्वे पुत्रादाविव शरीरेऽप्यहमभिमानस्य गौणत्वं ग्रसज्येत। न च तद्यक्तम्, सिंहदेवद्च्तयोरिव शरीरात्मनोः प्रसिद्धभेदाभावाद्। अन्यथा पुत्रादिशरीरेणेव स्वशरीरेणाऽपि प्रमातृत्वाभावप्रसङ्गात्। तस्मानन [अर्थात् इस जन्ममें प्राप्त शरीरसम्बन्ध इससे पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंके द्वारा और उस जन्ममें प्राप्त शरीर उससे भी पूर्वके अन्ममें अर्जित कर्मोंके द्वारा प्राप्त होता है, इस प्रकार पूर्व-पूर्व-प्रवाहका मानना प्रमाणशून्य होनेसे अन्धपरम्परा दोपसे अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा, यह भाव है] । शझ्ा-बीज और अङ्कर व्यक्तियोंकी परम्पराके समान प्रकृतमें भी अन्ध- परम्परा नहीं है, अतः विरोध नहीं है। [जैसे लोकमें वीजाङ्करमें प्रसिद्ध कार्यकारणभावकी रक्षाके लिए मानी गई प्रवाहानादितामे अन्धपरम्परा दोप नहीं माना जाता वसे ही प्रकृतम मी प्रवाहानादिता माननेसे उक्त दोप नहीं दोगा, यह भाव है।] समाधान-यद्यपि इस प्रकार अन्धपरम्परा दोपका परिहार हो सकता है, तथापि पुत्रादिसम्न्धके सदश शरीरादिसम्बन्धको केवल कर्म द्वारा मान लेनेसे घुन्नार्दिमं होनेवाला 'अहम्' व्यवहार जैसे गौण-उपचरितार्थ-माना जाता है; वैसे ही शरीरके लिए होनेवाले 'अह्म्' व्यवहारको मी गौण माननेका प्रसक्क हो जायगा।* और इसको गौण मानना युक्तियुक्त भी नहीं है, क्योंकि सिंह और देवदतके समान शरीर तथा आत्मामें प्रसिद्ध भेद नहीं है। [और गौण व्यवहारके लिए लोक- प्रसिद्ध भेदका होना आवश्यक है। ] अन्यथा पुत्रादिके शरीरके समान अपने शरीरसे भी प्रमातृत्वके अभावका प्रसङ्क हो जायगा। [ यदपि पिता और पुत्रका लोकप्रसिद्ध भेद होनेपर भी अमेदके आरोप द्वारा पुत्रके लोकमें पुत्र आदिके दुःसी दोनेपर पिताका व्यवहार पाया जाता है कि में दुःखी हूं। परन्तु चहांपर पुत्रके साथ अधिक मोह दोनेसे अभेदाध्यवसानमूलक पुत्रके लिए 'मैं' व्यवहार किया जाता है, पुत्र पितासे वस्तुतः भिन्न है, इसलिए पुत्रमें 'मैं' व्यवहारको जसे सर्वसाधारण गौण मानते हैं, वैसे ही अपने शरीरके लिए 'मैं मोटा हूं', इस प्रकारसे किय गए 'मैं' व्यवदारको कोई गौण नहीं मानता, इसलिए शरीरमें किये गए 'मैं' व्यवहारको गौण नहीं कह सकते, यह भाव है।
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८६६ विवरणप्रमेयसंग्रद्द [सूत्र ४, वर्णक ₹
कर्मनिमिच: शरीरादिसम्बन्धः, किन्त्वविद्याकृतः। स च तच्वज्ञाननिव्त्यः। अत एव श्रतिस्तच्वदर्शिनो यथापूर्व संसा- रित्वं व्यावर्त्तयति-'सचक्षुरचक्षुरिव सकर्णोडकर्ण इव' इत्यादिका। तर्हि तच्वज्ञाने सति सदः शरीरपातः स्ादिति चेद्, न; 'तस्य तावदेव चिरं यावन् विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये इति श्रुत्या प्रारब्धकर्मशेपसमापि- पर्यन्तमवस्थानावगमात् । 'क्षीयन्ते चाडस्य कर्माणि' इति श्रुतिस्त्वनारब्ध- कर्मविषया, 'अपवादविषयं परित्यज्य सामान्यं अ्वर्चते' इति न्यायाद्।
लिए 'अहम्' ऐसा गौण व्यवहार किया भी जा सकता है, तथापि पुत्रके विद्वान् होनेसे पिता विद्वान् या पुत्रके शरीरसम्बन्धी परिश्रम करनेसे पितामें श्रम आदि नहीं होते। इसलिए सिद्ध होता है कि गौण आत्माके किये हुए कार्योंका साक्षात् सम्बन्ध अपनेसे नहीं होता, इस परिस्थितिमें यदि शरीरके लिए किया गया 'अहम्' व्यवहार भी गौण होगा, तो किये गये कामोंका अपनेसे साक्षात सम्बन्ध नहीं होगा, इससे प्रमातृत्व आदि व्यवहार अनुपपत्न हो जायगा। ] इसलिए मानना चाहिए कि शरीरादिका सम्बन्ध कर्मके कारण नहीं है; किन्तु अविद्याके ही कारण है। और वह सम्बन्ध (संसार) तत्त्वज्ञानसे ही छूट सकता है। इसी कारण 'चक्षुके रहते हुए भी वह (तत्त्वज्ञानी) चक्षुरहितके समान और कर्णविशिष्ट होते हुए भी कर्णरहितके समान है' इत्यर्थक श्रुति तत्त्वसाक्षात्कार करनेवालेकी पूर्ववर्ती संसारिताकी व्यावृत्ति करती है। यदि शक्का हो कि इस दशामें तत्त्वसाक्षात्कार होते ही तुरन्त शरीर छूट जायगा, तो ऐसी आशङ्का भी उचित नहीं है, कारण कि 'उस ( न्रह्मज्ञानीकी) तबतक स्थिति रहती है, जबतक सम्पूर्ण कमोंसे मुक्ति न हो जाय, अनन्तर ब्रह्मसम्पत्ति होगी' इत्यादयर्थक श्रुतिके बलसे अवशिष्ट प्रारब्घ कर्मोंकी जबतक समाप्ति नहीं होगी, तबतक शरीरकी अवस्थितिकी प्रतीति होती है। 'ब्रह्मज्ञानीके सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं' इत्यादयर्थक श्रुति तो अनारव्घ-संचित तथा क्रियमाण-कर्मोंके विषयमें प्रवृत्त है, क्योंकि वाक्यार्थका निर्णायक न्याय है कि अपवादविषयका परिहार करके ही सामान्य श्रास्त्रके तास्पर्यका निश्य किया जाता है। [ब्रह्मज्ञानीके कर्मोंके विनाशकी प्रतिपादिका
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संसारकी तर्वज्ञानसे निवृत्ति भापानुवादसहित ८६७
यद्यपि तच्तज्ञानमशेपकर्मांपादानभूतामविद्यां निवर्तयति, तथापि प्रारब्ध- कर्मणो न निवर्त्तकम् , स्वयं तत्फलत्वाद्। तदुक्तमाचार्ये :- 'आरब्घस्य फले होते भोगो ज्ञानं च कर्मणः । अविरोधस्तयोर्युक्तो वैधम्य चेतरस्य तु ॥।' इति ॥
प्रसज्येतेति मन्तव्यम्, नहि वयं तयोयोगपदं ब्रूमः, किन्तु
श्रुति सामान्य शास्त्र है। और ब्रह्मज्ञानीकी तुरत विदेह-मुक्ति न कहकर कुछ काल तक उसके शरीरावस्थानको कहनेंवाली श्रुति विशेष शास्त्र है, इसलिए सामान्य शास्त्रको प्रारव्ध कर्मसे भिन्न कर्मपरक और विशेप शास्त्रको प्रारब्ध कर्म- परक मानकर व्यवस्था करना उचित है, अन्यथा परस्पर विरोध होनेसे उनमें अप्रामाण्यका प्रसद्भ हो जायगा।] यदयपि तत्वज्ञान-ब्रह्मसाक्षात्कार- सम्पूर्ण कर्मोंकी कारणीभत अविद्याको नष्ट कर देता है, तथापि प्रारब्ध कर्मको निवृत्त नहीं करता, कारण कि वह तत्वज्ञान स्वयं ही प्रारव्ध कर्मका फल है। [अतः उससे परारव्घका विनाश माननेपर उपजीव्यके साथ विरोध होगा विदेह- मुक्तिरूप अवस्थामें उक्त दोपका प्रसन्ज नहीं आ सकता, कारण कि प्रार्ध कर्मका सम्बन्ध वर्तमान शरीर तथा उस शरीरके सम्बन्धसे प्राप्त किये हुए तत्त्वज्ञान आदिसे ही है, प्रारव्धकी निश्शेप समाप्ति हो जानेपर शरीरपातके अनन्तर तो तत्त्वमय हो जानेसे तत्वज्ञानको अपने उपजीव्यके साथ विरोध करनेका अवसर ही नहीं रह जाता, क्योंकि उसका तो उपभोग द्वारा ही क्षय हुआ है, तत्त्वज्ञानसे नहीं हुआ है]। यही आचार्यपादका भी कहना है- 'भोग और ज्ञान दोनों प्रारव्ध कर्मके फल हैं, इसलिए भोग तथा ज्ञान- इन दोनोंका विरोध न होना ही युक्तियुक्त है। और दूसरेसे तो वैधर्म्य- विरोध-होता ही है'। शङ्का-जीवन्मुक्त पुरुषमें अर्थात् शरीरसम्बन्धके रहते हुए भी जिसको ब्रह्म- साक्षात्कार हुआ है, ऐसे पुरुषमें आत्मा द्वैतका अनुभव और संसारित्वरूप द्वैतका अनुभव यों दोनों विरुद्धोंका एक साथ प्रसङ्क हो जायगा। समाधान-हम इन दोनोंका एक कालमें होना नहीं कहते हैं, परन्तु
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विवरणप्रमेयसंग्रह ! सूत्र ४, वर्णक २
पर्यायेणोद्द्वाभिभवौ। न च शरीरपातात् पूर्वमपरोक्षं तच्वज्ञानमेव नाडस्ति, व्यासादीनां सशरीराणामेव तत्वदर्शनस्य पुराणेष्ववगमात्। ननु तथ्वदर्शिनोऽपि यथा कदाचिद् द्वैतदर्शनं तथा ज्योतिष्टोमादिकर्मा- नुष्ठानमपि स्यादिति चेद्, न; अनुष्ठानस्य ग्रतिनियतदेशकालाघिकार- कर्तृप्रतिपच्यधीनत्वात्। तच्वदर्शिनस्त्वार्घकर्मनिमिच्तदोपोद्वस्य देश- कालनियमाभावेन प्रारब्धानुष्ठानसमाप्तिपर्यन्तमवस्थानायोगात्। यथासं- पर्यायसे एकके अनन्तर दूसरेका उदय और दवना अभिभव कहते हैं। शरीर छूटनेसे पहिले साक्षात्कारात्मक तत्वज्ञान ही नहीं होता, ऐसा कहना उचित नहीं है, कारण कि शरीरसम्बन्धके रहते हुए भी व्यास मादि मुनियोंको तत्त्वसाक्षात्कारस्वरूप ज्ञान हुआ था, ऐसा पुराण वचनोंसे प्रतीत होता है। शङ्का-जैसे तत्वसाक्षात्कार होनेके अनन्तर तत्त्वज्ञानीको कभी संसारित्व आदि द्वैतका अनुभव होता रहता है वैसे ही ज्योतिष्टोम आदि यागोंका अनुषठान भी प्राप्त क्यों नहीं होता ? समाधान-उक्त आशक्का नहीं हो सकती, कारण.कि यज्ञयाग आदि कर्मोंका अनुष्ठान नियत देश, काल, अधिकार तथा कर्ताकी प्रतिपत्तिके अधीन है। और तत्त्वसाक्षात्कार करनेवाले जीवन्मुक्त ज्ञानीके तो प्रारव्घ कर्मोंके कारण होनेवाले द्वैतदर्शनरूप या शरीरसम्बन्धरूप दोषको, देश-कालका नियम न होनेसे, आरब्ध ज्योतिष्टोम आदि यागकी समाप्ति तक रहनेका अवसर नहीं है। [ तात्पर्य यह है कि जीवन्मुक्त पुरुषको यद्यपि अवशिष्ट प्रारब्धकर्मके कारण कदाचित् बीच बीचमें द्वैतदर्शन (प्रमातृत्व या कर्तृत्वका अभिमानरूप दोष) आता जाता रहता है, तथापि इसमें देश-कालके सम्बन्धका नियम नहीं है कि अमुक देशमें ही जीव- न्मुक्तकी ज्योतिष्टोम आदि यागमें होनेवाली प्रवृत्तिमें उपयोगी अधिकार आदि दोषका प्रारब्घवश उदय होगा तथा इतने समय तक अमुक दोष स्थिर रहेगा, जिससे कि आर्यावर्त आदि देशविशेषके तथा पक्ष, मास, वर्ष आदि कालके नियमोंसे नियमित यज्ञका आरम्भ जीवन्मुक्त कर सके। न मालम किस समय प्रारब्धवश उदय हुआ दोष पुनः उदय हुये तत्त्वज्ञानसे विनष्ट हो जाय, उसी समय प्रारब्ध यज्ञ अपूर्ण ही छूट जायगा। ] यदि शङ्का हो कि जितना भी सम्भव हो सके उतना ही अनुष्ठान उसे प्राप्त हो,
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विद्यासे संसारकी निवृत्ति ] भापानुवादसहित ८६९
भवमनुष्ठानमिति चेद्, न; पुनः पुनस्तच्वदर्शनेनाऽनुष्ठितकर्मणां वाधे सत्यनुष्ठानप्रयोजनाभावात्। प्रत्यहसुपचीयमानदुरितनिवृत्ति: प्रयोजनमिति चेद्, न; ज्ञानिन आगामिदुरितादिसम्बन्धासंभवाद् । सम्भवे वा दैनन्दिनतच्वदर्शनेनैव तन्निवृत्ते:, 'अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृचमः। सर्व ज्ञानप्रुवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥।' इति स्मृतेः । तच्वदर्शिनः शास्त्रनियमाभावे यथेष्टाचरणं स्यादिति चेद्, न; आचरणस्य हिताहितप्राप्तिपरिहारप्रार्थनानिमित्तत्वात्। जीवन्मुक्तस्य तु तो ऐसी शक्का करना उचित नहीं है, कारण कि पुनः पुनः तत्त्त्वसाक्षात्कार होनेके कारण अनुष्ठित कर्मोंका बाध होनेपर अनुष्ठानका कोई प्रयोजन ही नहीं रहजाता। [अर्थात् यदि मान लिया जाय कि प्रारघवश उत्पन्न दोपकी प्रेरणासे उस दोपके उदयक्षणमें कर्मका अनुष्ठान कर भी लिया जाय, तो भी उससे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है, कारण कि पुनः तत्त्वसाक्षात्कारका उदय होनेसे प्रपश्चमात्रका वाघ होनेके कारण फलप्रार्थनाके बीचमें अनुष्ठित कर्मका भी अनुष्ान कैसे आगे चल सकता है, इस दशामें प्रथम अनुष्ठान करनेमें प्रवर्तक प्रयोजन ही कौनसा होगा, जिससे कि जीवन्मुक्तकी अनुष्ठानमें प्रवृत्ति हो सके । ] प्रतिदिन बढ़नेवाले पापकी निवृत्ति भी कर्मोंके अनुछानमें प्रवर्तक प्रयोजन नहीं हो सकती अर्थात् विहित नित्य कर्मोंके न करनेसे होनेवाले पापके भयसे भी ज्ञानीको कर्म करना प्राप्त नहीं हो सकता, कारण कि तत्वद्रष्टामें आनेवाले पाप आदि फलोंके .सम्बन्धका सम्भव ही नहीं है। यदि उन पाप आदि फलोंके साथ सम्बन्धका सम्भव मी हो, तो भी प्रतिदिन होनेवाले तत्त्वसाक्षात्कारसे ही उसकी निवृत्ति हो जायगी। स्मृति भी कहती है कि यदि तुम सभी पापियोंसे अधिक पापी भी हो, तो भी ज्ञानरूपी नौकासे सारे पापसागरको पार कर जाओगे। शक्का-यदि ब्रह्मसाक्षातकारवाले ज्ञानी पुरुषमें शास्त्रीय नियमोंका अभाव माना जाना ( अर्थात् वह उनसे मुक्त माना जाय), तो उसका मनमाना (निर्मयाद) व्यवहार हो जायगा। समाधान-ऐसा नहीं हो सकता, कारण कि व्यवहारमात्र अपने हितकी प्राप्ति और अहितिकी निवृत्तिके लिए होता है। जीवन्मुक्त ती अपनी ११०
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विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र ४, वर्णक २ ८७० स्वात्मन्येव निरतिशयानन्दमशेपानर्थनिवृत्तिं च साक्षादनुभवतः साध्य- पुरुपार्थप्रार्थनाभावादाचरणमेव नाऽस्ति कुतो यथेष्टाचरणप्रसङ्ग: १ मिक्षा- टनादिप्रवृत्तिस्त्वारब्धकर्मदोपसूला। न च तद्वत्पुण्यपापे अप्यार्धकर्मणा प्रवर्तेयातामिति वाच्यम्, आरब्धकर्मणः फलमात्रहेतुत्वाद्। पुण्यपापयोः पुनर्निमित्तमविद्यारागादि, तच्च तच्वज्ञानेन निवर्त्तितम्। न च मनननिदिध्यासनयोः प्रतिवन्दी ग्राह्या, तयोरपि श्रवणवदुपायत्वेन आत्मामें ही निरतिशय (जिससे अधिक नहीं हो सकता) आनन्द और सब प्रकारके अहितकी निवृत्ति का साक्षात् (अपरोक्ष ) अनुभव करता है।. इसलिए उसको किसी भी प्रकारके हितप्राप्ति अथवा अनिष्टनिवृत्तिरूप पुरुषार्थ करनेकी अभिलाषा नहीं रह जाती, इसलिए ज उसका व्यवहार ही नहीं रहता, तब मनमाने व्यवहारका प्रसङ् ही कैसे आ सकता है? और भिक्षाटन आदि व्यवहार तो प्रारब्ध कर्मोंके दोषके कारण होते रहते हैं। भिक्षाटन आदिमें प्रवृत्तिके सदृश प्रारब्ध कर्मके द्वारा पुण्य और पापमें (पुण्यपापजनक कर्मानुष्ठानमें) मी उसकी प्रवृत्ति नहीं कह सकते, कारण कि प्रारब्ध कर्म तो केवल अपने फलके प्रति कारण हैं। और पुण्य तथा पापमें तो अविद्या तथा उसके कार्य राग आदि कारण हैं। [ अपने संचितमें से 'यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्धावभावितः ॥' इस स्मृतिवचनसे मरणसमयके भावोंके अनुसार एकत्रित हुए कर्म ही प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं। ये केवल वर्तमान देहके सम्बन्घसे प्राप्त होनेवाले कर्मफलोंमें निमित्त हैं। आगामी देह सम्नन्घके या आगामी देहसम्बन्धसे मिलनेवाले फलोंके कारणीभृत पुण्य-पापके उत्पादक नहीं हैं। इसलिए प्रारघमें यह शक्ति नहीं है कि वह तत्त्वज्ञान होनेपर भी आगामी देहसम्बन्धके जनक पुण्यपापको प्राप्त करा सके। आगामी देहसम्बन्घके उत्पादक पुण्यपाप तो अविद्या तथा रागादिसे किये जानेवाले क्रियमाण कर्मोंसे ही उत्पन्न होते हैं, तत्वज्ञानीके क्रियमाण कर्म ज्ञानदग्ध हो जाते हैं, इससे फलोत्पादक नहीं होते ]। और पुण्यपापके निमित्तभृत अविद्या तथा रागादि तो तत्त्वसाक्षात्कारसे निवृत्त हो गये हैं। मनन और निदिध्यासनको प्रतिबन्दीरूपसे नहीं ले सकते। [ जैसे ततत्वसाक्षात्कार-
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मेदामेदवादका खण्डन j भापांनुवादसहित
तच्चदर्शनात् प्रागेवाऽनुष्ठेयत्वात्। नंतु भेदामेदयोरुभयोरपि वास्तवत्वान्नाउद्वैतदर्शनेन द्वैतदर्शनं वाध्यते, येन कर्मप्रवृत्तिर्न सम्भवेद् । न च पूर्वपक्षसिद्धान्तादिनियमस्य भेदाभे- दवादिना वक्तुमशक्यत्वात् सर्वसाङ्गर्यमिति शङ्कनीयम्, अद्वैतवादेऽपि समानत्वात्। मचम्, अद्वैतवादे मायाकल्पितस्य प्पश्चस्य यथा दर्शनमेव भेदेन व्यवस्थितत्वात्। ब्रह्मण एवाउद्वितीयत्वाद्। त्वन्मते तु साङ्गर्यं दुष्परिहरम्। न च व्यवहारसाङ्गर्येऽप्यदुष्टो मोक्ष इति
जनक श्रवणके अनन्तर मी मनन और निदिध्यासनका अनुष्ठान प्राप्त होता है, थैसे ही अन्य विहित कर्मोंका अनुषान भी प्राप्त हो जायगा, ऐसी शङ्का करना भी उचित नहीं है। ] कारण कि मनन और निदिध्यासन भी श्रवणके समान उपाय ही हैं, इसलिए उनका अनुष्ठान मी तत्त्वसाक्षात्कारके पूर्व ही प्राप्त है, अनन्तर प्राप्त नहीं है। [इसलिए उनको लेकर भी प्रतिवन्दी प्रक्ष नहीं किया जा सकता ।] शक्का-भेद तथा अभेद दोनों वास्तव हैं, अतः अद्वैततस्वके साक्षात्कारसे द्वैततत्वका वाध होता है, यह कहना सम्भव नहीं हो सकता, जिससे कि कर्मोंमें प्रवृत्तिका निवारण किया जा सके। मेदाऽमेद: वादीके मतमें सिद्धान्तपक्ष तथा पूर्वपक्षके पार्थक्यके निर्वचनका (भेद और अमेद दोनोंको सत्य माननेसे किसको पूर्वपक्ष और किसको सिद्धान्त पक्षमें रक्खा जाय) संभव न होनेसे पूर्वपक्ष तथा सिद्धान्तपक्ष सबके साक्क्र्यका (अविवेकका) प्रसन्न नहीं कहा जा सकता, कारण कि अद्वैतवादमें मी उक्त दोष समान ही है। [अद्वैतके अतिरिक्त कुछ भी न माननेसे भी पूर्वपक्ष उत्तरपक्षका नियम कैसे उपपन्न हो सकता है, इसलिए 'यश्ोभयोः समो दोपः' इस न्यायके अनुसार मेदाऽमेदवादीको ही उक्त दोप नहीं दिया जा सकता, इसके लिए जैसा भी परिहार अद्वैतवादी करेगा वही परिहार मेदामेदवादमें भी हो जायगा, यह भाव है। ]. समाधान-ऐसा नहीं है, कारण कि अद्वैतवादीके मतमें मायाके द्वारा आरोपित दश्यमान विश्वकी उसके प्रतिभासके अनुसार ही प्रतीयमान मेदके द्वारा व्यवस्था हो सकती है, क्योंकि ब्रम्म ही अद्वितीय पदार्थ है। तुम्हारे (मेदाडमेदवादीके) मतमें तो साङ्कर्यका निवारण नहीं हो सकता। [अद्वैत-
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८७२ विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र ४, वर्णक २
वाच्यम्, तच्वदर्शनेन अपश्चानिवृत्तौ देहात्मभावसुखदुःखादेरप्यवाधा- दनिर्मोक्षप्रसङ्गात्। संसारदशायामेव भेदाभेदौ देहात्मभावादिश्वेति चेत्, तथापि भेदाभेदयोः परस्परविरोध: कथ परि्वियेत। प्रामाणि- कत्वादविरोध इति चेद्, न; किं 'खण्डो गौः' इति प्रत्यक्षज्ञानमेकमेव तत्र प्रमाणं किं वा 'झुण्डो गौ:' इत्यनेन सहितम् अथवा 'स एवाडयं गौः' इति तृतीयज्ञानसहितम् १ नाऽऽद्य: खण्डो गौरित्यस्मिन् प्रत्यये भिन्नोऽभिन्नश्चेति प्तिभासाभावाद्। मेदाभेदशव्दोल्लेखाभावेऽपि तत्प्रतीतिरस्त्येवेति चेद्, न परस्परोपमदरूपयोस्तयोः सहग्रतिभासा-
वादमें काल्पनिक मेदके प्रतिभासके द्वारा द्वैवकी सिद्धिकी आशक्का और परमार्थतः न्रह्मरूप अद्वैत होनेसे उसके वाधरूप सिद्धान्तपक्षकी उपपत्ति हो सकती है, अन्य मतमें तो दोनोंके यथार्थ होनेसे साङ्कर्य नहीं हट सकता, यह भाव है]। व्यवहारका साङ्कर्य होनेपर मी मोक्षकी व्यवस्थामें कोई दोप नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते, कारण कि तत्त्वज्ञानसे प्रपश्चकी (द्वैतकी) निवृत्ति न होनेपर देहमें आत्मनुद्धि तथा सुख, दुःख आदि भावोकी निवृत्तिका भी संभव न होनेसे मोक्षका अवसर ही नहीं आ सकता। यद्यपि कहा जा सकता है कि भेद और अभेद दोनोंकी वास्तविक स्थिति और देहात्मभाव आदि संसारदशामें ही हैं, तथापि भेद और अमेदके एक साथ रहनेमें परस्पर विरोधका परिहार तो नहीं किया जा सकता। यदि कहो कि दोनों प्रमाणसिद्ध हैं, अतः उनमें परस्पर विरोध नहीं है, तो यह कहना भी उचित नहीं है, कारण कि (आप मेदाभेदका मानना किस प्रमाणसे सिद्ध करते हैं) क्या 'यह वैल खण्ड है' यह अकेला ही प्रत्यक्षज्ञान उसमें प्रमाण है: अथवा 'यह सुण्ड है' इस दूसरे प्रत्यक्षज्ञानके साथ उक्त ज्ञान प्रमाण है: या 'वही यह बैल है' इस प्रत्यभिज्ञारूप तीसरे ज्ञानके सहित उक्त ज्ञान प्रमाण है: इनमें प्रथम पक्ष नहीं मान सकते, कारण कि 'वैल खण्ड है' इस एक ज्ञानमें भिन्न (मेद) और अभिन्न (अमेद) इस प्रकार दोनोंकी प्रतीति नहीं होती। यदि कहो कि भेदा Sमेदरूप शब्दोंका उल्लेख न होनेपर भी भेदामेदरूप अर्थकी प्रतीति तो है ही। [अन्यथा खण्ड और गो पदार्थमें विशेष्यविशेषणभाव ही नहीं हो सकता, परस्पर मेदाऽमेद रहनेसे ही नील, घट आदिमें विशेष्यविशेषणभाव होता है, ] तो ऐसा मानना भी उचित
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भैदामेदवादंका खण्डंन 1 मापांनुवांदसहित ८७३
योगात्। अथ जातिव्यक्त्योरभेदस्तावदभ्युपेयत एव इतरेतरात्मत्वाद- भेदोऽप्यभ्युपेयत इति चेद्, न; भिन्नयोरितरेत्रात्मत्वे संग्रतिपन्न- दष्टान्ताभावात् । न द्वितीया, खण्डो गौर्सुण्डो गौरित्यनयोज्ञानयोः संभूय अमात्वाभावात् । अथाऽपि प्रथमज्ञानेन यस्मिन् गोत्वे खण्डात्मकत्वं गृहीतं तस्मिननेव गोत्वे द्वितीयज्ञानेन खण्डत्वं निराकृत्य मुण्डत्वे ग्रहीतेऽर्थाद्द्वेदाभेदसिद्धिरिति चेद्, न; 'स एवाडयं गौः' इति पत्यभिज्ञामन्तरेणैकस्य गोत्वस्योभयसम्वन्धासिद्धेः । न तृतीय:, प्रत्ययद्वयस्यैकस्मिनर्थे आमाण्यायोगात्। न च प्रत्ययत्रयान्यथा
नहीं है कारण कि भेद तथा अभेद एक दूसरेकी प्रतीतिके विनाशक हैं, अतः उन दोनोंका साथ साथ एक ही प्रतीतिमें प्रतिभास नहीं हो सकता। [ सुन्दोपसुन्द या सत्प्रतिपक्ष न्यायसे दोनोंका प्रतिभास होना असम्भव होगा । ] शक्का-जाति (गोत्व आदि) और व्यक्ति (गोविशेष) का भेद तो माना ही जाता है और इतरेतरस्वरूप होनेसे उनका अभेद भी माना ही जाता है। समाधान-दो भिन्न पदार्थोंको एक दूसरेका स्वरूप माननेमें वादी और प्रतिवादी दोनोंका सम्मत दष्टान्त नहीं मिलता। दूसरा कलप भी उचित नहीं है, कारण कि 'खण्ड गो' और 'मुण्ड गो' इन समिलित दोनों ज्ञानोंमें यथार्थ- ज्ञानत्व नहीं माना जाता। शक्का-यद्यपि ये दो ज्ञान मिलकर भ्रमस्वरूप नहीं हैं, तो भी 'खण्डो गौः' इस प्रथम ज्ञानसे जिस गोत्वमें खण्डस्वरूपका ज्ञान हुआ है, उसी गोत्वमें 'मुण्डो गौः' इस दूसरे ज्ञानसे खण्डत्वकी निवृत्ति करके सुण्डत्वका ग्रह होनेपर अर्थात् भेदा5मेदकी सिद्धि हो जाती है। समाधान-वह यही गाय है (अर्थात् जिसमें खण्ड बुद्धि हुई थी, वही यह मुण्ड गाय है) इस प्रत्यभिज्ञाके बिना एक ही गोत्वके सम्बन्धकी सिद्धि खण्ड और मुण्ड दोनों स्थलोंमें नहीं हो सकती। तीसरा पक्ष भी नहीं बनता, कारण कि एक ही अर्थमें दो ज्ञानोंका होना प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। शक्का-एक ही विपयमें विरुद्ध ज्ञानोंके होनेमें खण्ड और सुण्ड-ये दो ज्ञान
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विवरणप्रमेयसंग्रह [सूत्र ४, वर्णक २
नुपपत्तिः आ्रामाणम्, हस्वोऽकारो दीर्वाडकारः स एवाऽयमकार इति प्रत्ययत्रयस्य भेदाभेदावन्तरेणौपाधिकब्ूस्वदीर्व त्वोपजीवनेनाऽप्युपपते:। नन्वेवं ेदाभेदयोरसंभवेऽप्यात्मनि तौ स्यातामिति चेढ्, न; तत्र भेदासिद्धेः। विवाद्गोचरापन्राः स्थावरजङ्गमशरीरव्यक्तयः पतिवादि दित्येकत्वानुमानात्। अथाऽऽत्मानो भिन्नाः युगपज्ननमरणादिचिरुद्ध- और तीसरी प्रत्यभिज्ञा इस प्रकार तीन ज्ञानोंकी अन्यथा अनुपपत्ति ही प्रमाण है। समाधान-एकमें तीन ज्ञान मेदा5मेदके बिना भी हो सकते हैं, जैसे हस्व सकार (१), दीर्घ अकार (२) और यह वही अकार (३) इस रीतिसे तीन ज्ञान उपाधि द्वारा उत्पन्न होनेवाले हस्वत्व और दीर्घत्वरूप धर्मोंका आश्रयण करके भी होते हैं। [ इससे परस्पर विरुद्ध दो ज्ञानोंका एकमें साधन करनेवाली तीन ज्ञानोंकी अन्यथा अनुपपत्तिको नहीं मान सकते। ] शक्का-उक्त प्रकारसे भेदामेदका होना सम्भव न भी हो, परन्तु आत्मार्में सो भेदाडमेद सिद्ध हो ही जायगा। समाधान-आत्मामें भेदकी सिद्धिका सम्भव नहीं है। [आत्मामें भेदके विरोधी एकत्वकी सिद्धिके लिए अनुमान प्रयोग दिखलाते हैं-] विवादके विषयीभूत [वेदान्ती सर्वत्र आत्माका अभेद मानता है, परन्तु प्रतिवादी घट, पट, वृक्ष आदि जड़ शरीर तथा मनुष्यादि चेतन शरीरमें रहनेवाले आत्माको संसारित्वरूपसे भिन्न मानता है, अतः पक्षको विवादग्रस्त कहा ] स्थावर (वृक्षादि) तथा जङ्गम (मनुष्यादि ) शरीरव्यक्ति (प्रत्येक शरीर) ये विवाद- मति रखनेवाले प्रतिवादीके शरीरमें रहनेवाले आत्माके द्वारा ही आत्मावाले हैं, [ सर्वत्र वही आत्मा है जो तुम्हारे विवाद करनेवाले प्रतिपक्षीके शरीरमें है, उससे भिन्न आत्मा नहीं है, इससे सकल शरीरव्यक्तिको पक्ष करके आत्माक्का एकत्वरूप साध्य दिखलाया गया। इसमें हेतु देते हैं-] कारण कि सम्पूर्ण शरीर व्यक्ति ही हैं, प्रतिवादीके शरीरव्यक्तिके तुल्य। इस प्रकार उक्त अनुमानसे एकत्वकी सिद्धि होती है। शक्का-उक्त अनुमानके विपरीत आत्मा परस्पर भिन्न हैं, कारण कि एक ही कालमें जन्म, मरण आदि विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं, जैसे अगनि और
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जीवमझ्मका अभेद ] भापानुवादसहित ८७५
धर्माश्रयत्वादग्न्युदकादिवदिति चेद्, नं; जननादीनां शरीराश्रयत्वेन हे- त्वसिद्धेः। न चाऽडत्मकत्वे सुखदुःखादिसार्ङ्कर्यप्रसङ्ग, प्रतिविम्बेपु सत्यप्येकत्वे वर्णसार्ङ्गर्यादर्शनात्। अन्योन्यवृत्तान्तानसुसन्धानमपि शरीर-
जल। [अगि तथा जलमें एक ही कालमें उष्णता तथा शैत्य गुण, 'जो कि परस्पर विरुद्ध हैं, रहते हैं, इसलिए मिन्न-भिन्न हैं, वैसे ही आत्मामें भी एक- का तो जन्म हो रहा है और उसी कालमें दुसरेकी मृत्यु होती है, इस प्रकार परस्पर विरुद्ध धर्मोंका एक ही कालमें होनेसे आत्माओंमें मेद सिद्ध होता है।] समाधान-उक्त अनुमानकी सिद्धि नहीं हो सकती, कारण कि जन्म- मरण आदि विरुद्ध धर्मोंका आश्रय शरीर है, आत्मा नहीं है, इसलिए हेतुकी सिद्धि नहीं हो सकती। [साध्यसमानाधिकरण हेतुसे ही साध्यकी सिद्धि होती है। मकृतमें तो भेदरूप साध्यका अधिकरण आत्मा माना जा रहा है और उसका साधक विरुद्ध धर्माश्रयत्वरूप हेतु आत्माश्रय नहीं है, प्रत्युत शरीराश्रय होनेसे व्यधिकरण है, इसलिए सत् हेतु नहीं है, जिससे कि उसके द्वारा साध्यकी सिद्धिका सम्भव हो सके। ] आत्माके एक-अभिन्न-माननेसे सुख-दुःख आदिके साङ्कर्यका प्रसद्व नहीं आ सकता। (अर्थात् देवंदत्तके सुख-दुःख यज्ञदततके भी अनुभवमें आने चाहिएँ, क्योंकि अनुभवका कर्ता आत्मा दोनोंमें एक ही है। ऐसी शङ्काका अवसर नहीं आ सकता। ] कारण कि प्रतिविम्बोंका वस्तुतः अमेद होनेपर भी उनमें परस्पर वर्णसांङ्कर्य नहीं देखा जाता। जैसे ही मुखादिका एक ही कालमें खड्ग, सुकुर आदि तथा नील, पीत और कृष्ण वर्णके दर्पण आदि उपस्थित अनेक उपाघियोंके मेदसे प्रतिविम्बोंमें अनेक परस्पर विरुद्धरूपसे प्रतीत होनेवाले लम्ब, वर्तुल आदि आकारभेद एवं नील, रक्त आदि वर्णमेद एक दूसरेमें प्रतीत नहीं होते हैं। यद्यपि सभी प्रतिबिम्ब बिम्बभूत मुखसे अभिन्न हैं तथापि वर्ण आकार आदिका सांकर्य नहीं होता। एवं प्रतिबिम्ब स्थानीय जीवात्माओंका विम्वस्वरूप आत्मासे अभेद होनेपर भी उपाधिके द्वारा प्राप्त हुए दोषके संसर्गका परस्पर सांकर्य नहीं हो सकता। [ यद्यपि उक्त द्ष्टान्तसे कल्पना की जा सकती है कि जड़ाश्रित धर्मोंका परस्पर सांकर्य अनुपपन्न है, परन्तु चेतनाश्रय धर्मोंका सांकर्य क्यों नहीं होगा। इस आशङ्कासे कहते हैं-]
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८७६ विवरणप्रमेयसंग्रह [ सूत्र ४, वर्णक २
भेदादेवोपपद्यते, एकस्याऽऽप्यात्मनोऽतीतशरीदिष्वनुसंधानादर्शनाद् । न च जीवानामन्योन्यभेदाभावेऽपि जीवब्रह्मणोभेद: स्यादिति मन्त- व्यम्, न तावदत्र प्रत्यक्षं क्रमते, जीवब्रह्मणोरतीन्द्रियत्वाद्। नाऽपि विरुद्धधर्माश्रयत्वहेतुना अग्न्युदकादिवदिति चेद्, न; जननादीनां शरीराश्रये हेत्वसिद्धेः। नाऽपि नियन्तुनियन्तव्यादि श्रौतलिङ्गं भेदे मानम्, एक दूसरेके वृतान्तका न जानना मी शरीररूप उपाधिके भेदसे ही संगत हो सकता है, जैसे कि एक भी आत्माको बीते हुए उसीके शरीरोंका ज्ञान होता हुआ नहीं देखा जाता है। शक्का-उक्त रीतिसे यद्यपि जीवोंका परस्पर भेद सिद्ध नहीं हो सकता, तथापि जीव और ब्रह्मका भेद तो मानना ही होगा [ संसारित्व और सुक्तत्वकी व्यवस्था भैद तथा अभेदके बिना बन ही नहीं सकेगी। इसलिए आत्मभेदका पक्ष जीव और ब्रह्मको ही मानेंगे ]। समाधान-यह भी नहीं माना जा सकता, कारण कि जीव और ब्रह्मके मेदकी सिद्धिमें प्रत्यक्ष प्रमाण समर्थ नहीं है, कारण कि जीव और ब्रह्म दोनों इन्द्रियगोचर नहीं हैं। [इन्द्रियातीत पदार्थोंका सेद भी इन्द्रिय- गोचर नहीं हो सकता ] अभनि तथा उदकके तुल्य विरुद्ध धर्मके आश्रय होनेके कारण भेदकी सिद्धिका भी सम्भव नहीं है, कारण कि (औपाधिक) जनन-मरण आदि विरुद्ध धर्मके आश्रयभूत शरीरके होनेसे (जीव और ब्रह्मरूप पक्षमें) उक्त हेतुकी सिद्धि नहीं है [ अर्थात् व्यघिकरण होनेसे असत् हेतु है और व्यघिकरणधर्माश्रयत्वरूप हेतु मैदसे अव्यमिचरित भी नहीं है, प्रतिबिम्बोंमें इसका व्यमिचार दिखलाया ही गया है।] एवं नियन्ता-नियमन करनेवाला (जिसके कारण ब्रह्म अन्तर्यामी कहा जाता है) और नियन्तव्य-नियमनका कर्म (जिसका नियमन किया जाता जाता है, जीवात्मा) इन दोनोंमें परस्पर विरुद्ध नियन्तृत्व तथा नियन्तव्यत्व आदि * रूप श्रुतिसिद्ध हेतु (उन वास्तव धर्मोंका आश्रय होना) भी भेदका साधक नहीं हो सकता, कारण कि 'इससे (ब्रह्मसे) अतिरिक्त कोई * आदि पदसे ईश्वर होना तथा ऐश्वर्य होना एवं द्रष्टा होना तथा हृशय होना आदि धर्म लिये जाते हैं।
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वेदान्तोंका ब्रद्षमें ही पर्यवसान) मापानुवादसहित ८७७ 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योडतोऽस्ति शरोता' इत्यादिश्रुतिभिस्तस्य वाधाद्। नाडपि 'द्वा सुपर्णा' इति श्रुत्या भेदसिद्धि, 'स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एक:' इत्याद्येकत्वप्रतिपादकश्तुतिविरोधात्। भ्रान्तिसिद्धद्वैतानुवादेनाऽपि द्वित्वश्रुत्युपपचेः । तस्मान्न भेदाभेदावित्यद्वैतदर्शनेन द्वैतदर्शनस्य वाध: सिद्धः । ततथ् ब्रह्मसाक्षात्कारमात्रेण फलसिद्धेर्न वेदान्तेपु विधि- गन्धोऽपि शङ्कनीय:। यदि स्यात्तर्हकैव पोडशलक्षणी धर्ममीमांसा दष्टा नहीं है और न्रम्मसे अतिरिक्त कोई श्रोता नहीं है' इत्यादर्थक श्रुतियोंके द्वारा भेदका वाघ होता है। [अर्थात् भेद माननेसे उक्त श्रुतिसे विरोध आता है] और 'द्वा सुपर्णा' दो पक्षी ( जीवात्मा और परमात्मा) इत्यादि श्रुतिके द्वारा भी भेदकी सिद्धि नहीं हो सकती, कारण कि 'नो यह पुरुषमें और जो यह सूर्यमण्डलमें वह सब एक ही है' इत्याद्यर्थक एकत्वका ग्रतिपादन करनेवाली श्रुतिसे विरोध आता है। और भेदका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति तो अ्रमसिद्ध द्वैतका (भेदका) अनुवाद करके भी उपपन्न हो सकती है। [अर्थात् द्वेतका ग्रम मात्र है, कारण कि द्वैतकी सिद्धि प्रमात्मक प्रत्यक्षसे नहीं हो सकती। यदि प्रत्यक्ष द्वारा भेदका ज्ञान माना जाय, तो भेदग्रह तभी हो सकेगा जव धर्मी (जिसमें भेद है) और प्रतियोगी (जिसका मेद है) इन दोनोंकी व्यवस्था वन जाय और इन दोनोंकी व्यवस्थाकी सिद्धि मेदकी सिद्धिके बिना नहीं हो सकती, इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष वना ही रह जाता है।] भेदके भ्रमकल्पित होनेसे मेदाडमेद दोनों वास्तव नहीं माने जा सकते। इस सिद्धान्तके अनुसार अद्वैतदर्शनसे द्वैतका बाध सिद्ध है। [अतः प्रघट्टकके आरम्भमें ही की गई आशक्काका-अद्वैत दर्शनसे द्वैतका वाध नहीं हो सकता, इस शक्काका-खण्डन हो गया। ] इस निर्णयके अनुसार ब्रह्मसाक्षात्कारमात्रसे फलकी सिद्धिका सम्भव होता है, अतः वेदान्तवाक्योंका विधिके प्रतिपादनमें तात्पर्य है, ऐसी आशक्काके लेशकी (जरासा सम्बन्ध होनेकी) तो शक्का भी नहीं हो सकती। [ सिद्ध वस्तुका प्रतिपादन करंनेवाले वेदान्तवाक्योंका, प्रयोजनशुन्य होनेसे, विघिमें तात्पर्य है, ऐसी करपना भी नहीं वन सकती, कारण कि वरह्मसाक्षात्काररूप प्रयोजन सिद्ध ही है। इसके विपर्ययमे दोप देते हैं-] यदि वेदान्तोंका तात्पर्य विघिमें ही होता, तो सोलह अध्यायवाली ( वारह अध्याय पूर्वमीमांसाके और चार अध्याय उत्तर- १११
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८७८ विवरणप्रमेयसंग्रह् [सूत्र ४, वर्णक २
असज्येत । तथा च 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इति पृथगारम्भो नोषपद्येत। शरीरेन्द्रियसाध्या विधिभेदा: पूर्वमीमांसायां निरूपिता, इह तु मानस- साध्यो विधिर्निरूपित इति पृथगारम्भ इति चेत्: वर्हि 'अथाऽतः परिशिष्टधर्म- जिज्ञासा' इत्येवाऽडरम्येत, न त्वेवमारभ्यते। तस्माद्वर्मब्रह्मभेदादेवाऽनयो- र्मीमांसयोरभेद:। तदेवं विधिशङ्काया अप्यभावाननिर्विन्रो त्रह्मणि वेदान्त- समन्वय इत्यशेषमतिमङ्गलम् ।
मीमांसांके मिलकर यों सोलह अध्यायवाली) एक ही धर्ममीमांसाका प्रसङ्ग हो जायगा। इस परिस्थितिमें 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादि रीतिसे ब्रह्म- जिज्ञासारूप अधिकारान्तरके उपक्रमसे अतिरिक्त मीमांसाका आरम्भ करना युकतिर्सगत न होता। शक्का-शरीर और इन्द्रियके संघात द्वारा हो सकनेवाले ज्योतिष्टेम आदि अनुष्ठानविशेषोंका निरूपण पूर्वमीमांसामें किया गया है और इस उत्तर- मीमांसामें तो मनके (एकाग्रता आदि) व्यापारसे सिद्ध हो सकनेवाले उपासना आदि अनुष्ठानका विवेचन किया गया है, इसलिए यों वैषम्य होनेके कारण इस उत्तरमीमांसाका पृथक आरम्भ किया गया है।
समाधान-यदि उक्त वैषम्यसे पृथक आरम्भ प्राप्त हो जाय, तो सर्वसाम्यके कारण शरीरव्यापारसाध्य विघियोंका प्रतिपादन करनेके अनन्तर परिशिष्ट मनोव्बापारसाध्य विधिका निर्णय करनेवाली धर्मजिज्ञासा प्रारम्भ की जाती है', ऐसा अर्थवाला सूत्र वनाना उचित होता, परन्तु इस प्रकारसे तो उत्तरमीमांसाका प्रारम्भ नहीं किया जा रहा है। इसलिए यही कहना उचित है कि धर्म तथा ब्रह्मके मेदसे ही इन दोनों मीमांसाओंमें मेद है। [अर्थात् धर्मविचार पूर्वमीमांसामें और न्रह्मका निर्णय उत्तरमीमांसामें है, शरीरेन्द्रियसाध्यत्व और मनोव्यापारसाध्यत्व- रूपसे धर्मद्वैविध्यके कारण मीमांसाका द्वैविध्य नहीं है। ] इस प्रकार विधिकी शङ्काका भी अवसर न होनेसे बह्ममें वेदान्तोंका समन्वय-तात्पर्यका निश्चय-निर्विध्न (बाधरहित) होता है, अतः यह सारा सिद्धान्त अत्यन्त मज्लमय है।
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अन्थका उपसहार ] मापानुवादसहित ८७९ संगृहीतं विवरणं सहाऽनेकनिंचन्धनैः। टीकायासं विना लोका: क्रीडन्त्वत्र यथासुखम्॥ महतां हृदयं वोद्धुमशक्तोऽप्यतिभक्तित: । अकार्प ग्रन्थमेतेन प्रकाशात्मा प्रसीदतु।। यद्िद्यातीर्थगुरने शुभ्पान्या न रोचते तस्मात्। अस्त्वेपा भक्तियुता श्रीविद्यातीर्थपादयो: सेवा।। इति श्रीविद्यारण्यमुनिग्रणीते विवरणप्रमेयसंग्रहे चतुर्थसूत्रे द्वितीयवर्णकम्। समाप्तं चेदं सूत्रम्। समाप्तश्च विवरणप्रमेयसङ्ग्रहः । शुभं भवतु।
[अन्तमें अ्रन्थकार अ्न्थरचनेका प्रयोजन वतलाते हुए उपसंहार करते हैं-] अनेक अ्रन्थोंकी सहायतासे अर्थात् वेदान्तके अन्य प्रामाणिक अ्रन्थोंमें प्रतिपादित सिद्धान्तके साथ समन्वय करते हुए, विवरणनामक ग्रन्थमें प्रतिपादित प्रमेयोंका (विपयोंका) इस अ्न्थमें संग्रह किया गया है। जिज्ञासु जन टीकासे होनेवाले परिश्रमके बिना ही इस निवन्धमें विनोदका लाभ करें। [ टीकाके द्वारा अर्थवोध करते समय मूल पुस्तकका भी आश्रय करना पड़ता है, इससे अनिवार्य परिश्रम भा ही पड़ता है, जसी कि ग्रन्थारम्भमें ही प्रतिज्ञा की गई है]।। १ ॥ [अभिमानका परिहार करते हैं-]यद्यपि धुरन्धर प्रौढ विद्वानोंका अभिप्राय जाननेमें मैं समर्थ नहीं हूँ, तथापि प्रगाढ़ भक्तिके कारण [अर्थात् गुरु तथा शासत्रमें अत्यन्त निर्व्याज आदर होनेके कारण प्राप्त हुए चोघके अनुसार ] मैंने इस ग्रन्थकी रचना की है, इसलिए प्रकाशात्मानामक मेरे गुरु महाराज इससे मसन्न हों ।। २ ॥ [ग्रन्थरचनासे गुरुकी प्रसन्नताका उपपादन करते हैं-] चूँकि विद्यापदान करनेवाले मेरे गुरु महाराजको अन्य किसी प्रकारकी सेवा अच्छी नहीं लगती है,
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८८0 विवरणग्रमेयसंग्रद्द [सूत्र ४, षर्णक २
इसलिए भक्तिसे की गई यह ग्रन्थरचनात्मक सेवा श्रीविद्यावीर्थस्वरूप गुरु महाराजके पैरोंकी सेवा मानी जाय । ३ ॥ श्रीगौरीशक्कर श्रेष्ठिस्थापितन्यासमण्डलात्। प्राप्तकण्ठीकृताद्वैवकणिकोऽन्ववदद् ह्विजः ॥ १ ॥ विद्यासु शास्त्रषु न तत्त्ववुद्धौ जागर्ति सो.ऽयं ललिताप्रसादः । तथापि यद्दै कृतवान् प्रयत्नं जागर्ति सोडयं ललिता-प्रसाद: ॥ २। कराणत्यधिपस्य पूर्णकृपया विद्यागुरूणां तथा वाणाङाङ्कघरामिते (१९९५) कुजदिने कृष्णे रवौ चापगे। माघे वैक्रमवत्सरे स्ववसितो भापानुवादो ह्ययं विश्वेशस्य कराम्वुजेषु परया भत्तयाऽर्प्यते सादरम् ॥ ३ ॥
इति श्री पं० ललिता प्रसादडबरालविरिचत विवरणप्रमेयसंग्रह- भाषानुवादमें चतुर्थसूत्र समाप्त